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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    जन हस्तक्षेप
    फासीवादी मंसूबों के खिलाफ अभियान
    आमंत्रण

    'शासन और साम्प्रदायिकता: हाशिमपुरा जनसंहार मामले में इंसाफ का माखौल'पर सभा

    तारीख: 09 अप्रैल, 2015 (गुरूवार)
    समय: शाम 0530 बजे
    स्थान: गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (आईटीओ के नजदीक), नई दिल्ली 

    वक्ता:
     न्यायमूर्ति (अवकाशप्राप्त) राजिन्दर सच्चर (इस जनसंहार का तथ्यान्वेषण करने वाले पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज के दल के सदस्य),
     रेबेका जान (पीडि़तों के वकील),
     सईद नकवी (वरिष्ठ पत्रकार) 
     कॉलिन गोन्ज़ाल्वेज़ (वरिष्ठ मानवाधिकार वकील)
     नीलाभ मिश्र (संपादक, ऑउटलुक (हिंदी))

    साथियो,
       चुनावी फायदे के लिए साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काना और मजहबी हत्याओं को अंजाम देना सिर्फ फिरकापरस्त संगठनों का काम नहीं है। इस खेल में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल भी शामिल हैं जिससे न्यायपालिका समेत शासन के विभिन्न अंगों के साम्प्रदायीकरण को बढ़ावा मिल रहा है। हाशिमपुरा जनसंहार मामले पर अदालत का हाल का फैसला शासन और न्यायपालिका के साम्प्रदायिक गठजोड़ की जीती-जागती मिसाल है। वर्ष 1987 की इस घटना में उत्तर प्रदेश पीएसी के कर्मियों ने 42 बेगुनाहों की हत्या कर दी थी। 
       तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने 1986 में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व वाले, भारतीय जनता पार्टी के मंदिर अभियान का मुकाबला करने के लिए अयोध्या में बाबरी मस्जिद (जिसका अब नामोनिशान तक नहीं है) का ताला खोल दिया। समाज के विभिन्न तबकों ने सरकार के इस फैसले का जगह-जगह विरोध किया। मुस्लिम समुदाय इस फैसले से सीधे प्रभावित था इसलिए मुसलमानों ने कांग्रेस सरकार के इस साम्प्रदायिक कदम का बड़े पैमाने पर विरोध किया। 
       मुसलमानों के किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन को दंगा करार देना इस देश में रवायत बन चुका है। रिपोर्टों के मुताबिक तत्कालीन गृह राज्यमंत्री पी चिदंबरम ने उत्तर प्रदेश सरकार को मुसलमानों के विरोध को कुचल देने का निर्देश दिया। अपने हिंसक साम्प्रदायिक बर्ताव के लिए कुख्यात पीएसी ने 22 और 23 मई, 1987 की रात मेरठ शहर के हाशिमपुरा में धावा बोल दिया। मस्जिद के बाहर से मुसलमान पुरुषों को उठा कर एक ट्रक में ठूंस दिया गया। उन्हें गंग नहर के किनारे एक सुनसान जगह पर ले जाया गया। पीएसी के कर्मियों ने उनमें से कइयों को गोलियों से मार डाला और उनकी लाशें नहर में फेंक दीं। बाकियों को हिंडन नदी के किनारे ले जाकर गोली मारी गई और लाशों को वहीं फेंक दिया गया। 
       अदालत ने इस सरकार प्रायोजित जघन्य हत्याकांड के सभी अभियुक्तों को 28 साल तक चले मुकदमे के बाद बरी कर दिया। उसने इस जनसंहार के दौरान किसी तरह अपनी जान बचाने में कामयाब रहे पांच पीडि़तों की गवाहियों को दरकिनार करते हुए अपराधी पुलिसकर्मियों को संदेह का लाभ दे दिया। 
       दलितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ जघन्य अपराधों के दोषियों को अदालत से बरी किए जाने के बढ़ते वाकये गंभीर चिंता का विषय हैं। बिहार में लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला में दलितों की हत्या के दोषियों को भी हाल ही में अदालत से बरी कर दिया गया है। 
       इस तरह के अपराध सरकारी तंत्र के सहयोग और सक्रिय हिस्सेदारी के बिना मुमकिन नहीं हैं। लिहाजा ऐसी घटनाओं में सरकार और पुलिस सुनिश्चित करती है कि सभी सबूतों को नष्ट कर दिया जाए ताकि अपराधी बच सकें। इंसाफ की हत्या के इन मामलों में शासक वर्ग की राजनीतिक पार्टियां भी पीडि़तों के लिए जुबानी जमाखर्च के सिवा कुछ नहीं करतीं। न्याय के लिए सतत अभियान की जगह सिर्फ बयानबाजी और प्रतीकात्मक विरोध ने ले ली है। 
       जनहस्तक्षेप सुरक्षा बलों और न्यायपालिका के साम्प्रदायीकरण के सवाल पर व्यापक विमर्श चाहता है जिसमें आपकी हिस्सेदारी अपेक्षित है।

    ह0/
    ईश मिश्र
    संयोजक

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    নারায়ণগঞ্জে সাত খুন : মন্ত্রীর জামাতাকে রক্ষার জন্যই তদন্তে বিলম্ব


    Artile

    মন্ত্রীর জামাতাকে রক্ষা করতেই নারায়ণগঞ্জের সাত খুন মামলার অভিযোগপত্র জমা দিতে দেরি হচ্ছে বলে অভিযোগ উঠেছে। বহুল আলোচিত এ মামলার বেশির ভাগ আসামি ধরা পড়েছেন, তাঁরা আদালতে স্বীকারোক্তিমূলক জবানবন্দিও দিয়েছেন। তদন্তকারী এ-সংক্রান্ত যাবতীয় তথ্যপ্রমাণ হাতে পেলেও অভিযোগপত্র দিতে পারেননি। এ মাসের ২৭ তারিখ এ ঘটনার এক বছর পূর্ণ হবে।

    মন্ত্রীর জামাতা হলেন র্যাব-১১-এর সাবেক অধিনায়ক লে. কর্নেল তারেক সাঈদ মোহাম্মদ। সাত খুনে জড়িত থাকার কথা তিনি স্বীকারও করেছেন। তাঁকে রক্ষার জন্য অভিযোগপত্র দিতে দেরি হচ্ছে কি না, জানতে চাইলে নারায়ণগঞ্জের পুলিশ সুপার খন্দকার মহিদ উদ্দিন গতকাল শনিবার প্রথম আলোকে বলেন, 'তদন্ত শেষ করে ফেলা হয়েছে। এক সপ্তাহের মধ্যে অভিযোগপত্র দেওয়া হবে। তদন্তে কাউকে ছাড় দেওয়া হয়নি।'

    এদিকে মামলার অন্যতম আসামি নূর হোসেনকে ভারতের কারাগার থেকে দেশে ফিরিয়ে আনার ব্যাপারে সরকারের ভেতরে কোনো তৎপরতা নেই বললেই চলে। তাঁকে ফিরিয়ে আনার যে উদ্যোগ, সেটা কেবল দুই দেশের চিঠি চালাচালির মধ্যেই সীমাবদ্ধ।
    জানতে চাইলে স্বরাষ্ট্র প্রতিমন্ত্রী আসাদুজ্জামান খান কামাল প্রথম আলোকে বলেন, নূর হোসেনকে প্রক্রিয়া মেনেই দেশে ফিরিয়ে আনার কাজ চলছে। এ জন্য মন্ত্রণালয় ভারত সরকারের সঙ্গে নিয়মিত যোগাযোগ রাখছে। তিনি বলেন, এই মামলায় অনেক আসামি ধরা হয়েছে। শিগগিরই অভিযোগপত্র দেওয়া হবে।

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    समाजमा चेत फर्किएको बेला

    जित्नेले इतिहास त लेख्छ तर भविष्य लेख्न सत्तैै्कन र भविष्य लेख्न नसक्नेको इतिहास अन्ततः झुठो ठहर्छ। कुनैपनि विजेताले झुठको पर्खाल निर्माण गरेर सत्यलाई लुकाउन न पहिले कहिल्यै सकेको थियो न पछि कहिल्यै सक्नेछ। त्यसैले विजय आफँैमा निराकार हुँदैन।
    साधनले मात्र कसैको विजयलाई अमरत्व प्रदान गर्न सत्तै्कन, साध्य सर्वाधिक बलवान् हुन्छ। नैतिक युद्धले लेखेको इतिहास सदा अमर रहन्छ। साध्यको मतलब नगरी सुरु गरिएका लडाइँलाई धर्म युद्ध भनिदैन र असत्य लडाइँको विजय क्षणिक हुन्छ। विश्वको इतिहासमा यो शाश्वत सत्य बारम्बार प्रमाणित हुँदैआएको छ। नेपालमा पनि यस्ता गलत युद्धका विजेताको शासन अल्पकालीनै रहेका छन्। तर मानव इतिहासमा त साध्यको परवाहै नगरी बारम्बार ठूल्ठूला युद्ध पनि लडिएका छन्, आफ्नो शासन स्थापित गर्न जस्तोसुकै सम्झौता गर्ने लडाकु पनि प्रकट भएका छन्। यिनको विजयले समाज बेलाबेलामा दिग्भ्रमित बन्न पुग्छ तर चाँडैनै समाजमा चेत फर्कन्छ र सत्यले सधैँ विजय प्राप्त गर्छ। डा. गोविन्द केसीको १२ दिनको अनशनले प्राप्त गरेको विजय पनि समाजमा फर्किएको चेतको परिणाम हो। नेपालका शासकले यस सत्यलाई आत्मसात् गर्नसकेका छैनन्।

    समाजमा सधैँ सत्य र असत्यबीचमा लडाइँ चलिरहेको हुन्छ। समाजमा सत्यको लडाइँले धेरै विजय प्राप्त गर्न थालेपछि गरिब, निमुखा, पीडित र सीमान्त जनताको जीवनस्तर उकासिन थाल्छ। लडाइँमा असत्यको बोलबाला रहेसम्म सम्पूर्ण जनताको नाममा सीमित वर्गले फाइदा उठाउँछन् र गरिब तथा निमुखा जनता सधैँ रोग, भोक र शोकको आगोमा पिल्सिरहन्छन्। हाम्रो समाजमा अहिलेसम्म ज्यादातर लडाइँ सत्यका नाममा लडिएका असत्यका लडाइँ हुन्। सत्यको लडाइँ भन्ने भ्रममा जनता परिवर्तनका खातिर आफ्नो ज्यान उत्सर्ग गर्न तयार भएर तातो गोलीको पर्वाह नगरी सडकमा उत्रन्छन् तर विजयी शासक अन्ततः गैरजिम्मेवार, शोषक र भ्रष्ट निस्कन्छन्। त्यसैले नेपालीको जीवनस्तरमा सकारात्मक परिवर्तन आउन नसकेको हो।

    अहिले जनताका प्रतिनिधि सबैभन्दा ठूला सत्ता साझेदार दल नेपाली कांग्रेस र नेकपा (एमाले) जनताको अधिकारका लागि सधै समाजमा संघर्ष गर्दैआएका छन् तर यिनको विजयपश्चात् नेपाली समाजले कहिल्यै समानता र सामाजिक न्यायको अनुभूति गर्न पाएका छैनन्। विसं २०४६ सालसम्म जनताप्रति अनुत्तरदायी सरकार थियो तर त्यसपछि बनेका सरकार पनि व्यक्तिमुखी, नातामुखी, दलमुखी र आर्थिक फाइदामुखी बन्न पुगेको देखियो। त्यसैको फलस्वरुप २०६० सालमा तत्कालीन राजाले शासनमा प्रत्यक्ष हस्तक्षेप गर्दासमेत जनस्तरबाट ठूलो विरोध भएन। तर राजाको शासन आफैँमा अत्यन्त गैरजिम्मेवार र जनहितविपरीत भएका कारण यिनै दुई दल जन समर्थन लिएर राजतन्त्रलाई पाखा लाउन सफल भए। तर फेरिपनि यिनको मति फर्किएन। सबै क्षेत्रमा व्यापक भ्रष्टाचार, गैरजिम्मेवारी र नैतिक कमजोरी फेरि पनि अत्यन्त बढेर गएको छ। जनता फेरि पनि कुनै विकल्पको खोजीमा छन्। विकल्प चाहे तिनै दलबाट सिर्जित होस् वा बाहिर खोज्नु परोस् तर जनतालाई विकल्प चाहिएको देखिएको छ।

    राजनीतिक नेतृत्वको चरित्र फेर्ने चर्चा सुरु गर्न लागि अहिलेे अत्यन्त उपयुक्त समय छ। किनभने समाजमा चेत फर्केको छ। पैसा र शासकीय बलका आधारमा जस्तोसुकै जनविरोधी कामलाई पनि समर्थन गर्ने अवस्थामा पुगेको देशमा अचानक परिवर्तनको ताजा हावा बहेको छ। अब यस देशमा अनैतिक, भ्रष्ट, नातावादी, कृपावादी र गलत नेताको जरुरत छैन भन्ने बेला अहिल्यै हो। अहिले नै हो यो देशमा गलत तत्वको जरो उखेलेर सही तत्वको मलजल गर्ने बेला। यस अवस्थामा पनि नेपाली जनताले सही आवाज बुलन्द गर्न सकेनन् भने डा. गोविन्द केसीको जस्तो सत्याग्रह र सत्यको विजय हुने अर्को अवस्था आउन धेरै समय लाग्नसक्छ।

    सत्य र स्वच्छ नेतृत्व नयाँ दल र नयाँ व्यक्तिबाट मात्र आउँछ भन्ने पनि केही निश्चित हुँदैन। स्थापित शक्ति र राजनीतिक दलमा पनि सकारात्मक सोच भएका स्वच्छ चरित्रका व्यक्तिको उत्थान हुनुपर्छ। नेपाली कांग्रेसको आसन्न महाधिवेशन यस्तो शक्ति उदय हुने अत्यन्त सुनौलो मौका हुनसक्छ। अहिले भ्रष्टाचारको आहालमा पसेकाहरू जसरी पनि धेरै पैसा कुम्ल्याएरमात्र दलको माथिल्लो स्थानमा पुग्न सकिन्छ र त्यहाँबाट सिंहदरबारको बाटो सहज हुन्छ भन्ने सोच राखेर ब्रम्हलुटमा लागिपरेका छन्। तिनको अस्तित्व नै पार्टीबाट मेटिनुपर्छ। चाहे त्यस्ता व्यक्ति धेरैपल्ट मन्त्री भएका ठूला नेता हुन्, बारम्बार निर्वाचन जितेका हेभिवेट हुन्, कुनै महान् नेताका छोरा, छोरी वा भतिजा हुन् वा माफियाको बलमा पार्टी राजनीतिको मूलमा पुगेर सत्तामा पुग्ने सपना बुन्नेहरू हुन् ती कसैलाई पनि अघि बढ्न दिइनु हुँदैन। हुनत, नेपाली कांग्रेसको महाधिवेशन प्रतिनिधि हुने अवस्थासम्म पुग्दा कतिपयले नैतिकता, इमानदारी र सच्चरित्रताको हवन गरिसकेका हुन्छन्। तर इमानदारी र नैतिकताको बाटोमा हिंड्न र देशको अस्तित्वका लागि मरिमेटन तयार जनतिनिधि अझै धेरै छन् र तिनको चेतना यस पटकको महाधिवेशनमा खुल्नुपर्छ। यस्तो चेत अन्त पनि खुल्नुपर्ने अवस्था छ।

    समाजमा चेत फैलिएको यस्तो अवस्थामा राजनीतिक नेतृत्व भने अझै अचेत देखिन्छ। यो अचेत वर्गलाई अझै पनि विदेशी प्रभुको चरणमा लम्पसार पर्नु र अकुत सम्पति थुपार्नुमात्र राजनीतिक प्रगतिको बाटो हो भन्ने भ्रम छ। यिनको विचारमा नेपालको सम्पूर्ण चुरे डाँडा काटेर प्रभुको घर घरमा बाटो बनाउन दिएको अवस्थामा मात्र आफ्नो भविष्य सुध्रन्छ छ। यिनलाई लाग्छ, नेपालको अध्यागमनको सम्पूर्ण जिम्मेवारी विदेशीलाई दिइयो भनेमात्र प्रभु खुसी हुनेछन्। भ्रष्टाचारी देशको सूचीमा करिब १०० नंबरको हाराहारीमा पर्ने दुई देशमा एक देशका कर्मचारीले अर्को देशमा आतंककारीको प्रवेशमा रोक लगाउन सक्छन् भन्ने सोच आफैँमा कति विकृत र असंगत छ त्यसको चर्चा गरिराख्नै पर्दैन। तर सर्वसाधारण जनता यिनका विरुद्ध नउत्रेसम्म आमाको अस्मिता लुटाएर एक छाक टार्न उद्यत यस देशका ठेकेदारहरूको बोलबाला कायम रहन्छ। कुनै पद पाइन्छ भन्ने लोभ साधेर बसेका विद्वत वर्ग सेतो र कालोको विभेद खुट्याएर बोल्न अघि नसर्दसम्म आफूलाई सार्वभौम देशका स्वतन्त्र जनता हुँ भन्न नेपालीलाई अझै गाह्रै देखिन्छ।

    यी अचेत वर्गलाई जनताको समर्थन र समर्पणमा गरिने कार्यले मात्र सकारात्मक ऊर्जा प्रदान गर्छ भन्ने चेत कहिल्यै पलाएन। संविधान निर्माण र परिवर्तन गर्नसक्ने सामर्थ्य भएका दल एक जना निष्ठावान् डाक्टरको सत्याग्रहका सामु कसरी लाचार भए भन्ने यस्तो सशक्त उदाहरणबाट समेत यो तत्व केही सिक्न चाहँदैन। विगतमा पञ्चायतको बिगबिगीमा अर्बौँको सम्पत्ति कमाएका नेताको प्रजातन्त्रमा के हाल भयो? प्रजातन्त्रको दुहाई दिएर भ्रष्टाचारीका अगुवा बनेकाको लोकतन्त्रसम्म आइपुग्दा के चाला भयो? 'जनयुद्ध'का नाममा जनतालाई लुटेर जम्मा गरेको सम्पत्तिवालको ऐश्वर्य कति टुक्रा र कति कमजोर भयो यी सबैको हिसाबकिताब पनि राख्दैनन् र यिनबाट केही शिक्षा पनि लिँदैनन् हाम्रा नेता।

    कैयौँपल्ट मौका पाउँदा पनि सरकारमा नगएका सुशील कोइरालालाई प्रधानमन्त्रीको कुर्सी प्राप्त भएपछि त्यसको मोह बढ्यो। सत्ता सहयोगी एमालेका १६८ सभासद्ले पत्र लेखेर धम्क्याए भन्दैमा आफैँले गरेको सम्झौता तोड्न उनी उद्यत भए। तर जनताको सशक्त प्रतिरोधका कारण कति लज्जास्पद घुँडा टेकाई भयो? अब पनि नसिक्ने?

    एमालेका सम्पूर्ण उच्च नेतृत्व वर्गको नाक फेदै काटिएको छ केसीको अनसनमा झुक्नु परेको कारण। संविधान बनाउन एमालेले देखाएको अडानबाट कमाएको साख पनि यिनले सबै टुकुचामा बगाए। आखिरमा एमाले सम्पूर्ण दल राजेन्द्र पाण्डेको अनुयायीभन्दा बढी केही होइन भनेर प्रमाणित भएको छ केसीको अनशन प्रकरणमा। तर हामीले स्वदेशबाट मात्र होइन विदेशबाट पनि केही सिकेनौ।

    हार्वड विश्वविद्यालयका प्राध्यापक क्यलेस्टस जुमाले एक टि्वटमार्फत शक्ति र सम्पत्तिले जनमत जित्न सकिँदैन भन्ने सशक्त उदाहरण पेस गरेका छन्। यो उदाहरण नेपालका लागि पनि उत्तिकै सान्दर्भिक हुन्छ किनभने नेपालका शासकको नैतिकताको धरातल अफ्रिकी शासकको भन्दा धेरै माथिल्लो छैन। अफ्रिकी शासक अत्यन्त भ्रष्ट, त्रू्कर, तानाशाही देखिन्छन् र सत्तामा आएपछि बाँचुन्जेल शासन गर्न चाहन्छन्। तर जुमाका अनुसार सन् ९० को दशकदेखि अहिलेसम्म १९ पटकभन्दा बढी निर्वाचनबाट शासक पराजित भएका छन्। हालै नाइजेरियाका अत्यन्त सशक्त राष्ट्रपति गुडलक जोनाथन पनि निर्वाचनमा पराजय भोग्न बाध्य भएका छन्। यसभन्दा अघि मलावी, जाम्बिया, बेनिन, मडागास्कर, सेनेगल, आइभोरी कोस्ट, बुरुन्डी, सोमालियाआदि देशमा यस्तै परिवर्तन भएको थियो। यसको अर्थ शासक तानाशाह, शक्तिशाली, धनी र चतुर हुँदैमा जनताको समर्थन प्राप्त हुँदैन भन्ने न हो। असल शासक जनताप्रति उत्तरदायी, स्वच्छ र निष्ठाको राजनीतिमा विश्वास गर्ने व्यक्ति हुनुपर्छ। नेपालमा निष्ठावान र स्वच्छ शासकको जरुरत हुनाले समाज जागेको बेला त्यसका लागि पहल हुनुपर्छ।
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    उपेक्षामा भूमि सुधार
    विसं २०७१ असारमा नेपाल सरकारले १२ औँ पटक सुकुमबासी समस्या समाधान आयोग गठन गर्यो । मुलुकमा रहेका सम्पूर्ण भूमिहीन, सुकुमबासी र अव्यवस्थित बसोबासको समस्या समाधान गर्ने यसको पनि उद्देश्य रह्यो।

    राजाका पालमा होस् या बहुदलमा अथवा अहिलेको गणतन्त्रमा आयोगको उद्देश्यमा कुनै फरक छैन। तर सुकुमबासीका समस्या उही। त्यही जमिनमा बसोबास गरिआएका छन्, जहाँ पहिलादेखि थिए। उनीहरूको समस्या क्रमशः जटिल बन्दै गएको छ। त्यसैले त अहिलेसम्म १२ औँ पटक आयोग बन्यो। तर गरिबी घट्ला, सुकुमबासीको समस्या समाधान होला भनेको त झनझन् बढ्दै गएको छ। अहिलेको आयोगलाई पनि सर्वाेच्च अदालतले काम गर्नमा रोक लगाएको छ। सायद अव तेह्रोँ पटक आयोग बन्ने कसरत हुनेछ।

    सुकुमबासीले खोजेको सुरक्षित घरबास र किसानी सीप भएकालाई खेतीयोग्य जमिनको स्वामित्व नै हो। यिनले अर्थोक केही खोजेका छैनन्। कृषि सीप भएकाले जमिन पाए भने आफै उत्पादन गरेर खान सक्छन्। त्यसैकारण जमिनको स्वामित्वको कुरा उठेको हो।

    यतिका दिनसम्म जनताले नेताहरूको भाषण र भोटको लागि ठूलाठूला आश्वासनको पोकोमात्र पाए। र, आश्वासन सधैँ उधारो भयो। दलका कार्यकर्ताहरू हुनेखाने बने। तिननको जीवनस्तर रातारात परिवर्तन भयो। सुकुमबासी आयोग बन्यो, उनीहरूकै निम्ति जागिर खाने थलो बन्यो। घुम्ने कुर्सीमा उनीहरू नै पुगे। सुकुमबासीको समस्या जहिँको त्यहीँ रह्यो! कति बुझाउने आयोगमा फाराम सुकुमबासीले? कति खर्च गर्ने रकम? यसले पनि गरिब जनतालाई झन् गरिब बनाइरहेको छ। आर्थिक बोझ झन् थपिएको छ। राज्यले अहिलेसम्म बनाएको आयोगलाई गरेको खर्चले जमिन किनेर वितरण गरेको भए सबै सुकुमबासीको समस्या हल भइसक्थ्यो होला।

    बेलाबेला भूमि सुधार आयोग बन्छ। नाम दिइन्छ उच्चस्तरीय! तर आयोगले गरेको काम भने कहिल्यै उच्चस्तरीय बन्नसकेन। सधैँ निम्नस्तरीय! आजसम्म बनेको आयोगले बुझाएका प्रतिवेदनहरू सरकारी दराजमा थन्केर बसेका छन्। कार्यान्वयनमा लैजाने पात्र जन्मेन। आयोग बनाउन, पदाधिकारी र कर्मचारीलाई तलबभत्ता खुवाउनमा मात्रै सीमित छ सरकारको उपस्थिति, उपलब्धि भने शून्यबराबर। यो त सरकारको लागि पनि लज्जास्पद विषय हुनुपर्ने हो। यो त खाली गरिब, भूमिहीन, सुकुमबासी जनताको आँखामा छारो हाल्ने मेसोमात्र भएको छ।

    गरिबलाई झुक्याउनुको पनि सीमा हुन्छ! नेपालमा भूमिसुधारको मुद्दा उठेकै ७ दशक पुग्नलाग्यो तर, समस्या जहाँको तहीँ छ। कतिपय विषयमा निर्णय पनि भएका छन्। तर कार्यान्वयन भने हुँदैन। के ले रोकेको छ कार्यान्वयन गर्न? बुझ्न कठिन भएको छ।

    त्यही गरिब किसानले उत्पादन गरेको अन्न खाएर राज्यका उच्च निकायमा पुगेका कर्मचारीदेखि गरिब जनताको भोटले चुनाव जितेर मन्त्री, प्रधान मन्त्री भएका व्यक्तिले पनि जनताको समस्या समाधान गर्नेतर्फ ध्यान दिएनन्। अहिले पनि राज्यको नीति, नियम, कानुन फेरबदल भएन भनेर भूमि सुधार, भूमि वितरण, भूमिहीन किसानको समस्या समाधान गर्नतर्फ भाँजो हाल्ने काम भइरहेको छ। परिणामतः अहिलेसम्म भूमिको सवाल, बिर्ताको सवाल, गुठीको सवाल, महिला किसानको सवाल, साना किसानको सवाल, हरूवाचरुवाको सवाल उस्तै छ।

    मुख्यगरी भूमि सुधार राजनीतिक दलका एजेन्डा बन्नु तर कार्यान्वयनमा पार्टीभित्र विरोधीहरूको हावी हुनु, जनवर्गीय संगठनमा जसको सवाल उसैको अगुवा नहुनु, अस्थिर सरकार, विभिन्न सरकारी आयोग गठन हुनु तर त्यसमा सम्बद्ध व्यक्तिको नियुक्ति नहुनुजस्ता कारणले गर्दा समस्याले निकास पाउनसकेको छैन। त्यसैले वास्तविक सुकुमबासी पहिचान गर्न गाविसस्तरीय सर्वपक्षीय समावेशी समिति बनाएर सिफारिस गर्ने र त्यसको आधारमा भूमि वितरण गर्ने, भूमिको स्वामित्व भएका तर बाँझो राखेकाहरूको जमिन राज्यले खोसेर किसानहरूलाई वितरण गर्नु आवश्यक छ। वर्तमान भूमिको नापी प्रणाली अवैज्ञानिकखालको छ। त्यसैले पुनः नापी गर्नु जरुरी छ। र, भूमि सुधारलाई अब बन्ने संविधानमा प्राथमिकताका साथ समावेश गरिनुपर्छ।

    भूमि सुधारको सवाल खाली भूमिहीन सुकुमबासीको मात्र होइन। यो त राजनीतिक विषय हो। यो राज्यको सामाजिक र आर्थिक समृद्धिको विषय हो र हुनुपर्छ। सबै जनताको सुरक्षित बास र खाद्य सम्प्रभुताको सवाल हो यो। समग्र अर्थतन्त्रसँग जोडिएको सवाल हो। र, गरिबी न्यूनीकरणसँग जोडिएको विषय पनि हो। त्यसकारण पनि राज्यले यस विषयलाई गम्भीरताका साथ लिनुपर्छ।
    अध्यक्ष, राष्ट्रिय भूमि अधिकार मञ्च नेपाल
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    The ban on cattle slaughter threatens the livelihoods and ways of life of vast numbers of people--mostly belonging to the so-called lower castes--engaged in the production, distribution and consumption of beef.

    Anand Teltumbde (tanandraj@gmail.com) is a writer and activist with the Committee for the Protection of Democratic Rights, Mumbai.

    The Holy Cow

    Anand Teltumbde

    The ban on cattle slaughter threatens the livelihoods and ways of life of vast numbers of people—mostly belonging to the so-called lower castes—engaged in the production, distribution and consumption of beef.

    Anand Teltumbde (tanandraj@gmail.com) is a writer and activist with the Committee for the Protection of Democratic Rights, Mumbai.

    To a long list of measures such as the attacks on churches, fraudulent conversions in the ghar wapsi campaign, exhortations to Hindu women to produce at least four children in order to "protect" Hinduism, and continuing assaults and humiliation of Muslims, the development-focused Bharatiya Janata Party (BJP) has added the "holy cow" from its Hindutvavadi repertoire. On 3 March, the Maharashtra government got the presidential assent to its draconian bill prescribing harsh punishments not only for killing the cow and its progeny but also for just possessing their meat in any form. As a matter of fact, Maharashtra has always had prohibitions and restrictions on certain types of bovine meats.

    The Maharashtra Animal Preservation Act, 1976 provided for a total ban on the slaughter of cows, including the male or female calf of a cow. In 1995, the BJP–Shiv Sena government had passed an amendment to this act including bulls and bullocks and buffalo calves, both male and female, in the ban list and sent it for the presidential assent. However, neither the subsequent central governments, including the BJP-led National Democratic Alliance (NDA) at the centre nor the Congress-led governments in the state over the next 15 years pursued it. Now that the BJP has captured power both in the state and the centre, the bill had a cakewalk, despite its controversial and harsh provisions, and set in motion competition among BJP-ruled states, Haryana having already proposed making punishment for cow slaughter equal to that for killing a human being.

    Apart from violation of fundamental democratic rights of people to eat what they want, such acts, it is scarcely realised, can invite a veritable economic disaster. The country where, of the 26 million children born each year, approximately 1.83 million die before their fifth birthday, where two Dalits are murdered every day, where thousands of farmers commit suicide every year, where on an average 130 people are killed yearly in communal violence, and millions suffer the intrinsic violence embedded in the state's anti-people policies, how come the cow assumes such a desperate priority? When did the poor cow become a holy cow? While it is true that much of the ills we suffer stem from our much eulogised Constitution, but is this ban really constitutional? Is the stereotype of Hindu majority really valid when the fact remains that Hindus are nothing but a bunch of castes, which makes India a country of minorities.

    Myth of the Holy Cow

    Whether Hindus ate beef or not was answered conclusively by Babasaheb Ambedkar in his Riddles in Hinduism. In the Rig Veda, a cow that was yielding milk was not fit for being killed (Aghnya). The cow symbolised wealth in ancient agricultural communities like Indo–Aryans, and hence was venerated and treated as sacred. However, this utility or veneration did not prevent the Aryan from killing the cow for purposes of food. Rather, the cow was killed because it was sacred. Ambedkar cites Pandurang Vaman Kane who wrote Dharma Shastra Vichar in Marathi: "It was not that the cow was not sacred in Vedic times, it was because of her sacredness that it is ordained in the Vajasaneyi Samhitathat beef should be eaten." Apastamba Dharma Sutra (15, 14, 29) also says: "The cow and the bull are sacred and therefore should be eaten." That the Aryans of the Rig Veda did kill cows with a sword or axe for purposes of food and ate beef are abundantly clear from several richas of the Rig Veda itself. The ancient etiquette for hospitality towards important guests also involved serving beef. The killing of cow for the guest had grown to such an extent that the guest came to be called "Go-ghna," the killer of the cow. That the Hindus in the past did kill cows and did eat beef is proved abundantly by the description of the Yajnas given in the Buddhist Sutras which relate to periods much later than the Vedas and the Brahmanas.

    Another prominent scholar, D D Kosambi wrote in his Ancient India (1965), why "a modern orthodox Hindu would place beef-eating on the same level as cannibalism, whereas Vedic Brahmins had fattened upon a steady diet of sacrificed beef." Even Sarvepalli Radhakrishnan, in his Religion and Society, admitted that in ancient times, meat was consumed by the Brahmins too and only under the influence of Buddhism, Jainism and Vaishnavism did the practice become discredited. Indeed, many other historians and scholars have testified that Hindus, particularly Brahmins customarily ate beef. It is only in the struggle against Buddhism for supremacy, as Ambedkar claims, that Brahmins strategically assimilated certain tenets of Buddhism by becoming zealous vegetarians and worshippers of the cow. Recently, Dwijendra Narayan Jha, a professor of history at the University of Delhi, has written a full-length book titledThe Myth of the Holy Cow throwing light on the beef-eating habits of ancient Hindus, Buddhists and even early Jains. Needless to say, he has to move under police protection from threatening Hindu zealots.

    Obnoxious Despotism

    It is a myth, which is uncritically accepted, that Hindus are a majority and therefore their writ should prevail. Hindus are basically numerous castes strung in a hierarchy in contention for superiority. The ritual differences among the dwijaband since colonial times remain, but to this horde the entire bandwagon of the class of Shudra communities was hitched in the post-independence period, rendering the caste system into a quasi class division between the Dalits and non-Dalits. Needless to say, there are several differences among the myriad layers with regard to food habits. The vegetarianism of Indians is a myth propagated by the hypocritical, hegemonic upper-caste Hindus who do not exceed 15% of the population. Generally, Dalits, Adivasis and the lower echelons of the Shudra band, notwithstanding their sanskritisation, eat meat and do not have qualms about eating beef. Rather, beef being relatively low-priced, they rely on it more for animal protein. If we conservatively assume that half of the Shudra castes fall in this class, then 45% of Hindus would eat beef, if available. Add to this, if we were to add the Muslims (13.4% of the Indian population) and Christians (2.3% of the population), then 60.7% of Indians become beef eaters. As a matter of fact, a significant part of the modern youth belonging to even the so-called dwija castes do eat beef. It is not for nothing that India, despite all the restrictions, ranks seventh in the world in beef eating.

    Ignoring the will of this vast majority, 24 states/union territories have strict laws banning the killing of cattle, which makes it difficult for households and restaurants to source, store or serve beef legally. In 2012, in protest against the ban on beef, Dalit students of the Osmania University, Hyderabad, asserted their culinary rights in public and made a political statement of the dietary habits of Dalits and Muslims by cooking and eating beef biryani on campus. I was to preside over the function but could not. It was expectedly attacked by the Hindutvavadi goons.

    Economic Idiocy

    The veneration of the cow comes from its utility in the ancient and medieval agricultural economies and did not have much to do with religion. Even Muslim rulers like Babar, Hyder Ali, Akbar, Jahangir, and Ahmad Shah had banned or restricted cow slaughter. The sentiment was exploited for political mobilisation of Hindus in the upper caste-led freedom movement. Gandhi, who said, "I worship it [cow] and I shall defend its worship against the whole world," played a big role. Today, in the era of neo-liberal capitalism with its social Darwinist competition, the feudal sentiment of veneration or sacredness has been overtaken by considerations of efficiency and productivity. The cattle economy involves sophisticated science, technology and management methods of which slaughtering after the productive period is an integral part.

    With 57% of world's buffaloes and 16% of the world's cattle, India ranks first in terms of the world's buffalo and cattle population. Although the country is also the world's largest milk producer, with a total output of 132.4 million tonnes of milk in 2012–13, valued at over Rs 2,900 billion, higher than the combined value of other major agricultural crops like paddy, wheat and sugar cane, the average milk yield per dairy cow per year of the Indian cow is just 1,284 kg as against 6,212 kg in the European Union and 9,117 kg in the United States. Livestock production is the most important agricultural activity in the country, contributing about 24.8% to agricultural gross domestic product. Dairy farming dominates livestock production, providing 18 million people, mostly belonging to low-caste landless/marginal farmers, with direct employment and a way out of poverty. Perhaps therefore it stands singularly neglected by the government's elitist policymakers.

    While the West has perfected modern scientific techniques in animal husbandry, India still follows ancient techniques of cattle rearing. The most efficient way of intensive dairying is to keep cows indoors in hygienic conditions, impregnating them artificially, and milking them only for the most productive first two lactations. Milk yield and quality drops thereafter and dairy cows are generally replaced after four to five years. In India, however, dairy cows are inefficiently milked over six to eight lactations and more, almost for their entire life. It is not that farmers do not know this to be uneconomical but they do not have the option to dispose of their unproductive cattle. The upper-caste Hindutvavadi brigade feigns love for the cow but the brunt of the imposition is borne by the poor low-caste cattle farmers, who want to sell their unproductive cows for slaughtering as the surreptitious business amply shows.

    Slaughtering of cows is not necessarily cruelty; keeping them alive in painful neglect is. The so-called Pink Revolution has brought India on par with Brazil as the world's top exporter of bovine meat. With its huge bovine population, India has a natural advantage in this market. The ban on cattle slaughter not only squanders this advantage but threatens the livelihoods and ways of life of vast numbers of people, mostly belonging to the so-called lower castes, engaged in the production, distribution and consumption of beef.

    http://www.epw.in/margin-speak/holy-cow.html


    #सत्रह सौ कानून# खारिज करने की तैयारी है

    #तानाशाह फासीवादी# फरमान से सारे कायदे कानून खत्म करने का यह #केसरिया समय कारपोरेट# हैं।



    बाकी #मनुस्मृति शासन# के वैश्विक विस्तार और हिदू साम्राज्यवादी एजंडा को ग्लोबल हिंदुत्व,अमेरिका और इजराइल का साझा एजंडा के तहत #सोने की चिडिया लूटो# #दुनिया को तबाह करो#,एजंडा को लागू करने वाले #कल्कि अवतार #हैं #नरेंद्र मोदी#।

    पलाश विश्वास

    सत्रह सौ कानून खारिज करने की तैयारी है।गूड फ्राइडे पर एक सुप्रीम कोर्ट के एक  ईसाई जज के कड़े ऐतराज को हाशिये पर रखकर जो न्यायाधीशों का सम्मेलन हिंदुत्व के शंखनाद के मध्य हुआ,वहां कल्कि अवतार की यह उदात्त घोषणा है।


    बजट सत्र से पहले एकबार थोकभाव से गैरजरूरी कानून गिलोटिन से खत्म कर दिये गये और बिजनेस फ्रेंडली सरकार अब सत्रह सौ कानून खत्म करने का ऐलान कर रही है।


    कानून गैर जरूरी हैं तो उन्हें खत्म करने के बारे में बगुलों की सिफारिशों पर सार्वजनिक बहस हो न हों,संसद में बहस तो पहले होनी चाहिेए।संसद में तो बहस करो।


    तानाशाह फासीवादी फरमान से सारे कायदे कानून खत्म करने का यह केसरिया समय कारपोरेट हैं।


    डिजिटल देश है।एक एक कानून को खत्म होने से पहले सरकार उस कानून का बौरा और बगुला विसेषज्ञों की सिफारिशों पर चाहे तो नागरिकों की सुनवाई कर सकती है,सार्वजनिक जनसुनवाई हो न हो,लेकिन शुरु से केसरिया,शुरु से केसरिया संसद में बिना रिकार्ड के तमाम संदिग्ध कानून खारिज करने,जनविरोधी कानून बिना बहस पास करने या जनपक्षधर कानूनों को जनविरोधी कानूनों में तब्दील करके जनता के संवैधानिक रक्षाकवच को तहस नहस करके सोनो की चिड़िया बेचो का धंधा बेरोकटोक है।


    अपने डाक्टर साहेब से आज मैंने कहा कि हमा लोगों के नामकरण में कोई भारी गड़बड़ी हो गयी है लगता है।मांधाता और पलाश नाम का महात्म लोग दरअसल समझते नहीं हैं और हम लोगों के कहे लिखे को लोग कोई तरजीह नहीं देते क्योंकि इस नामकरण मे कोई ईश्वरीय स्पर्श नहीं है अलौकिक।


    मांधाता को समझने के लिए जो इतिहास में झांकने की जरुरत है,वह तकलीफदेह हैं और भारत के जंगलों के भूगोल की तरह जंगल की आग की तरह पलाश नाम से लोगों को सिर्फ एलर्जी ही हो सकती है।


    संजोग से हमारा जन्म 1956 के शरणार्थी आंदोलनों और  1958 के ढिमरी ब्लाक के किसान विद्रोह के आंदोलनकारियों के गांव में हुआ।गांव इन्हीं आंदोलनों की कोख से जनमा जो जात पांत बिरादरी रक्तसंबंधों से ऊपर रहा है तो गांव बसते ही हमारा जन्म हो गया और तब तक उस गांव बसंतीपुर में फूल कोई और खिले न थे।


    हमारी ताई घर की असल मालकिन थीं,चारों तरफ घनघोर जंगलों में दावानल की तरह खिले पलाश के नाम पर मुझे उनने पलाश बना दिया।


    आज सविता बाबू अपने धर्म मायके यानी निगार रजिया जैदी के घर पहुंच गयीं।भाई पद्दोलोचन उनके साथ हैं।


    डाकू सुल्ताना को पकड़ कर जो जागीर इस परिवार को मिली थी,बिजनौर में अब वह सिमटते सिमटते खत्म सी है।रजिया जैदी लखनऊ में बस गयी तो निगार का ठिकाना भी दुबई होकर फिर वही लखनऊ में।उनका छोटा भाई राजू हाकी भी हाकी खिलाड़ी बनना चाहता था,वह अब रोजगार की तलाश में मध्य पूर्व में तेलकी कुंओं के आसपास कहीं है।


    घर में शबनम और हुमा हैं।उनकी अम्मा गजल और ठुमरी अद्भुत गाती थीं।उन्हें गले का कैंसर हो गया था।हम उनके आखिरी वक्त उनसे मिलने गये तो अम्मा ने अपनी बेइंतहा तकलीफ भूलकर हमें गजल और ठुमरी गाकर सुनायी थी और उस मुलाकात के बाद वे ज्यादा दिनों तक जी नहीं पायी।


    उनके पिता बाबूजी बिजनौर को दंगों में झुलसते देखने के हादसे कते बाद बाबरी विध्वंस से उपजे धपर्मोन्मादी माहौल में शोक संतप्त जब गुजरे तो उनसे हमारी जो मुलाकातें हुईं ,उसको हमने अपनी कहानी उस शहर का नाम बताओ,जहा दंगे नहीं होंगे,हूबहू दर्ज किया है।


    उस घर में सविता बचपन से जाती रही है और हिंदू बेटी है उनकी,इस लिहाज से उनने अपने खानपान में जरुरी सुधार कर लिया था तभी से।पूरे खानदान में।पहलेपहल यूपी में रहते हुए नियमित आना जाना रहा है।बाबूजी और अम्मा के इंतकाल के बाद पिर उस सुराल में मेरा जाना हुआ नहीं।


    निगार की चचेरी बहन है रजिया।हमारी शादी के तुरंत बाद भारतीय ओलपिंक महिला हाकी टीम में जो सबसे उजला चेहरा रहा है।अब हमारा उस घर में बिरले ही जाना आना हो पाता है।इस बीच घोड़े पर सवार जो हम बिजनौर पहुंचे तो हम सविता के मुस्लिम मायके जा नहीं सकें।


    हमारी दोनों मुसलमान सालियों ने सविता के फोन पर इस सिलसिले में गिला शिकवा करने लगीं तो हमने कह दिया कि हम अपाहिज और विकलांग हो चुके हैं।


    कहने को तो कह दिया लेकिन सोचें तो हम कितना सच कह रहे थे शत प्रतिशत हिंदुत्व और ईसाइयों व मुसलमानों समेत तमाम विधपर्मियों के सफाये के हिंदुत्व एजंडे के मद्देनजर।


    शबनम अभी कालेज में स्पोर्ट्स कोच है जो खुद हाकी की बेहतरीन खिलाड़ी रही हैं।तो हुमा कालेज में संगीत पढ़ाती है और जब गाती है तो गजब ढाती है।


    हमने शबनम से दूल्हा मियां की खबर ली जो वहां थे नहीं।दुआ सलाम हो नहीं सका।


    हुमा से वही सवाल किया तो बोली कि दूल्हा अभी मिला ही नहीं।हमने अर्ज किया तो हम तो थे।उनने कहा कि अब फिर देर किस बात की चले आइये,हम लोग साथ रह लेंगे।


    हमने कहा कि अब बिजनौर में ही डेरा डालेंगे और बाकी जिंदगी गाना सुनते हुए बिता देंगे।


    इस पर हुमा बोली कि दीदी से फोन नंबर ले लिया है ताकि आपको फोन पर गाना सुनाया जा सकें।


    हमें मालूम नहीं कि आखिर रिटायर करने के बाद इस बंद अंधेरी सुरंग में तब्दील देश में हमारी जगह कहां होगी या होगी या नहीं।फिर जो धर्मोन्माद के हालात हैं,जो ध्रूवीकरण है और हिंदुत्व का सर्वव्यापी संक्रमण है,हम यह भी नहीं जानते के हम फिर कभी अपने मुसलमान स्वजनों से परिजनों की तरह मिल पायेंगे या नहीं।



    जितनी मस्ती से अपनी दोनों मुसलमान सालियों से बातें कीं हमने ,रोजनामचे में वह आतत्मीयता देश के साझे चूल्हे की विरासत को रेखांकित करने की गरज से दर्ज करते हुए मन बेहद कच्चा कच्चा हो रहा है।


    हजारों साल से जिस भारतवर्ष को हम जानते हैं जिसकी सरजमीम पर जीकर मरखप गयी हमारी हजारों पीढ़ियां और हमें मालूम भी नहीं है कि हमारी लहू की असल कोख किस पहचान में हैं,कितनी रक्त धाराओं के विलय के बाद हमारे वजूद का यह सिलसिला बना है।


    डाक्टर मांधाता सिंह ने कहा कि यह जानना दिलचस्प होगा कि जब नरेंद्र मोदी एकमुश्त सत्रह सौ कानूनों को खत्म करने का बाबुलंद ऐलान कर रहे हैं और संघ परिवार हिंदुत्व के एजंडे के तहत पंचामृत पेश करते हुए संपूर्ण निजीकरण से लेकर डाक विभाग को बैंकिंग और रेलवे समेत दूसरे तमाम महकमों की तरह विदेशी पूंजी के हवाले करने वाला है ,तभी अचानक बालीवूड की चोटी की हीरोइन ऐसा बयान क्यों दे रही हैं कि शादी से पहले सेक्स करूं या न करूं,मेरी मर्जी।


    फिर यह भी खोज का मामला है कि विगत यौवना किसी सोप हिरोइन के शिक्षा के भगवेकरण और इतिहास के भगवेकरण के मध्य स्पाईकैम की क्या भूमिका है और देश भर का मीडिया क्यों अचानक शापिंग माल और अन्यत्र स्पाई कैमरा खोजने की मुहिम चला रहा है,जबकि उसी मीडिया में स्त्री देह का कारोबार सबसे बड़ी पूंजी है।


    देश के तमाम अहम ज्वलंत मुद्दों से इस मीडिया से कुछ लेना देना नहीं है उन्हें मटियाकरमीडिया अब मुकम्मल स्पाईकैम है।


    इस महीने हम लोगों का आयकर बीस फीसद रेट से कटा है,सिर्फ इसलिए कि मजीठिया का अरीअर वेतन की पहली किस्त का भुगतान अलग से हुआ है। लेकिन उसका पीएफ वेतन के हिस्से बतौर काटा नहीं गया है।


    24 फीसद पीएफ कटवाने के बाद आयकर दस फीसद हमें भुगतान नहीं करना था जो सोर्स से बीस फीसद जो कटा,सो कटा ,अब वेतन पर भी बीस फीसद दर से इनकाम टैक्स कटा है।


    दशक भर के इंतजार के बाद मजीठिया फर्जीवाड़ा का भोगा हुआ यथार्थ यही है कि हम पहले के वेतन से इतना बचा नहीं सकें कि पर्याप्त निवेश करके बाजार में पूंजी के मुनाफे का खुराक बनते हुए आयकर बचाने की सोचें तो दूसरी ओर हैसियत में मजीठिया की दो प्रोन्नतियों के बावजूद कोई तब्दीली न होने के कारण भविष्य के सारे दरवाजे बंद हैं।


    जब मीडिया में ऐसा हो रहा है ,जहां सबसे बड़ा सामाजिक सक्रिय बुद्धिजीवी जमात है.जो आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा समर्थक है,बाकी देश,बाकी जनता तो रमाभरोसे बजरंगी हैं।


    हालांकि राजनेताओं और अर्थशास्त्रियों की जो बिलियनर मिलियनर हैसियत है,उसके मुकाबले फेंके हुए टुकड़ा टुकड़ा जूठन बटोरते हुए अपनी हड्डियां चबाकर नरभक्षी हो जाने की नौबत है मीडिया कर्मी जमात की।


    हाल यह है कि हमारे एक घनघोर मित्र जो आजतक कंप्यू को घृणा की नजरिया से देखते थे,वे उनकी खबरे कंपोज करके देने वाला कोई बचा न होने की वजह से प्रायोजित खबरों को कंपोज करने के लिए रिटायर होने से दो साल पहले चतकरप लिख रहे हैं।


    हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि भारत में कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता और संघ परिवार का धर्मोन्मादी हिंदुत्व के एजंडे में कोई फर्क नहीं है धर्मनिरपेक्षता के तिलिस्मी वोट बैंक चुनावी सत्ता हित साधो पाखंड के सिवाय।


    यह फर्जीवाड़ा भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में हिंदुत्व के पुनरुत्थान से पहले 15 अगस्त,1947 से चल रहा है और वर्ण वर्चस्वी मनुस्मृति हिंदू राष्ट्र का एजंडा गांधीवादी धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी विकास के माडल के नाम पर तभी से अमल में हैं।


    बहुजनों और अल्पसंखयकों के खिलाफ तब बजरंगियों की युद्धघोषणा न थी और आज जैसे तमाम पिछड़े,दलित,आदिवासी और अल्पसंख्यक संघ परिवार से नत्थी हैं,उसीतरह तब सत्तर के दशक के बाद गैर कांग्रेस वाद और मंडल राजनीति बहुजन सत्ता समीकरण बन जाने से पहले तमाम पिछड़े, दलित, बहुजन,आदिवासी और अल्पसंख्यक कांग्रेस के साथ नत्थी थे।


    दरअसल संघ परिवार की पार्टी तौर भाजपा का उतथान का श्रेय किसी श्यामाप्रसाद मुखर्जी या दीनदयाल उपाध्याय या अटल बिहारी वाजपेयी का नहीं है।इसका श्रेय अकेले विश्व हिंदू परिषद के बजरंगी ब्रिगेड या बाबरी विध्वंस आंदोलन या रामरथी लालकृष्ण आडवाणी को भी नहीं है।


    नरेंद्र भाई मोदी तो सत्ता समीकरण में अश्वमेध का दिग्विजयी अश्व हैं।


    इस अश्वमेध और इस अश्व की भूमिका के बारे में जो पौराणिक आख्यान हैं,उस पर चर्चा करेंगे तो वह छापने लायक भी नहीं होगा।


    बाकी आप पढ़ लें।


    बाकी मनुस्मृति शासन के वैश्विक विस्तार और हिदू साम्राज्यवादी एजंडा को ग्लोबल हिंदुत्व,अमेरिका और इजराइल का साझा एजंडा के तहत #सोने की चिडिया लूटो# #दुनिया को तबाह करो#,एजंडा को लागू करने वाले #कल्कि अवतार #हैं #नरेंद्र मोदी#।


    हिंदुत्व के पुनरूत्थान का काम तो दो राष्ट्र के सिद्धांत के तहत भारत विभाजन और बंगाल के अछूतों और पंजाब के सिखों और पंजाबियत के साझे चूल्हे को अपने ही देश में बेनागरिक शरणार्थी बनाने और विकास के नाम पर आदिवासियों की बेइंतहा सिलसिले तके साथ हिंदू राष्ट्र भारत के प्रादानमंत्री बतौर पंडित जवाहरलाल नेहरु के मनोनयन से शुरु हो गया था।


    जिस नेहरु को धर्मनिरपेक्ष तबका धर्मनिरपेक्ष,समाजवाद और पंचशील सिद्धातों का धारक वाहक साबित करने में अघाता नहीं है,वर्णवर्चस्वी एकादिकारवादी सत्ता के वे ही जनक हैं और हिंदुत्व के प्रथम अवतार भी वे ही हैं,गुरु गोलवलकर नहीं।गोडसे भी नहीं।


    धर्मनिरपेक्षता का वोटबैंक समीकरण के साथ अर्थव्यवस्था से बहुजनों और अलपसंख्यकों के निर्मम बहिस्कार का सिलसिला नेहरु और इंदिरा का हरित हरित समाजवादी गरीबी हटाओ माडल है,जो बदलकर अब मोदी का पीपीपी गुजराती माडल है।


    भारतीय लोकगणराज्य अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजंडे को सिरे से नकारने वाले हिंदू साम्राज्यावाद के लिए बाबासाहेब के संविधान से ही लोकतांत्रिक हो गया,इस छलावे के भुलावे में बहुजन अब भी हैं तो मुसलमानों और दूसरे विधर्मी संघ परिवार के हिंदुत्व के मुकाबले कांग्रेस की मुक्तबाजारी मनुस्मृति छतरी में ही अपनी रिहाई की उम्मीद बांधते हैं।


    जैसे अकाली और सिख आपरेशन ब्लू स्टार में सत्ता वर्ग के सम्मिलित सफाये अभियान से बेखबर मिथ्या न्याय की उम्मीद में है,जैसे कांग्रेसी राजनीति और समाजवादी हरित क्रांति से सिखों के नरसंहार का अंजाम बना,उसीतरह आज आत्मघाती अकाली राजनीति फिर सिखोें को आपरेशन ब्लू स्टार की दहलीज पर खड़ा कर रही है।


    हमारे अग्रज आनंद स्वरुप वर्मा का जो आलेख हिंदू पत्रकारिता पर हस्तक्षेप पर लगा है,उसे ध्यान से पढ़ लें और फिर विवेचन करें कि लोकल का ग्लोबल का मुकाबला कैसे संघ परिवार के स्वदेशी अभियान बन जाता है।


    इसी परिदृश्य में समझें कि कैसे धर्मनरपेक्षता के सिपाहसालार तबका साठ के दशक से असम समेत समूचे पूर्वोत्तर को आत्मध्वंंसी नस्ली सांप्रदायिकता और उग्रवाद की आग में झोंकता रहा है।


    आपरेशन ब्लू स्टार की तरह बाबरी विध्वंस, गुजरात नरसंहार की तरह समूते पूरब और पूर्वोत्तर को गुजरात बनाने में हिंदू धर्मनिरपेक्ष मीडिया मसीहावृंद की खास भूमिका रही है।हम उन उजले चेहरों की असलियत भी खोलेंगे।इंतजार करें।


    राममंदिर आंदोलन से पहले जो दंगे हुए,उसमें संघ परिवार का कितना हाथ है और अल्पसंख्यों को असुरक्षित बनाकर उनका वोटबैंक लूटने का धर्मनिरपेक्ष गांधीवादी कांग्रेसी खेल कितना है,इसका इतिहास की खिड़कियों और हकीकत के आइने में चीरपाड़ होनी चाहिए।


    कैसे गांधीवादी मसीहा वृंद संघ परिवार की गोद में खेलता रहा है और कैसे सत्तर के दशक से सारस्वत संघी संप्रदाय मीडिया में सर्वेसर्वा हैं और बाकी लोग अछूत इस किस्से का खुलासा भी हम करेंगे।हम इसका भी आगे चलकर खुलासा करेंगे कि कैसे नानाजी देशमुख खोजी पत्रकारिता के दिग्दर्शक थे,यह जानना भी दिलचस्प होगा।


    हम बार बार लिख रहे हैं और बड़ी स्पष्टता से लिख रहे हैं कि अबाध पूंजी का सिलसिला डा.मनमोहन सिंह ने कतई शुरु नहीं किया,वह सिलसिला हरित क्रांति और तकनीकी क्रांति के इंदिरा राजीव जमाने से शुरु हुआ।


    इंदिरा और राजीव समय में संघ परिवार का एजंडा लागू करने की हालत में नहीं था जनसंघ और उसकी संतान भाजपा।तब कांग्रेस ही संघ परिवार को एजंडे को लागू कर रही थी।


    नरसिंह राव और मनमोहनसिंह की जोड़ी ने भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने का जो सिंहद्वार खोला,उसमे बाबरी विध्वंस की जितनी भूमिका रही है,उससे ज्यादा भूमिका है मुक्तबाजारी अर्थसशास्त्र की और जनविरोधी सैन्य राष्ट्र की।

    इस जनसंहार संस्कृति को हम राष्ट्रवाद मानने की भूल कर रहे हैं और हिंदुत्व की धर्मनिरपेक्षता का पारायण,जिसका असली चरित्र आपरेशन ब्लू स्टार है,बाबरी विध्वंस और गुजरात नरसंहार भी नहीं करते हुए अपनी ही  हड्डियां चबाते हुए हम इस लोकतंत्र में विधर्मियों और बहुजनों के बहिस्कार के विरुद्ध अनिवार्य जाति उन्मूलन के साथ साथ राज्यतंर्त में बदलाव के जरुरी एजंडे पर बहस शुरु ही होने नहीं दे रहे हैं।


    और भाषायी कारीगरी से आरक्षण विरोध,आपरेशन ब्लू स्टार और सती प्रथा,संघ परिवार से मसीहावृंद के  चोली दामन के साथ का बेशर्म बचाव भाषाई करतब,लफ्फाजी और हिंदुत्व की गांधीवादी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर करने जा रहे हैं।


    यह हरकत दीपिका पाडुकोण की बहुचर्चित वीडियो में कुवांरियों को देहमुक्त करने की स्वतंत्रता के मुक्तबाजारी कार्निवाल के मुकाबले कम जनविरोधी नहीं है।


    मैं सिरे से बेहद बदतमीज हूं और सच को सच कहने में हमारी काई राजनीतिक या समाजिक बाध्यता या बौद्धिक खेमेबंदी या किसी मसीहा की नियामत रहमत आड़े नहीं आती।


    इसलिए हमें माफ जरुर करें और बाकी हमें गरियाने या सिरे से खारिज या नजरअंदाज करने का हक तो आपको है ही।


    वैसे भी हम लिखे हुए शब्दों की दुनिया में घुसपैठिया हैं,हमरा केई नागरिक या मानवाधिकार तो हैं ही नहीं।





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    DDD 276, তামাশা, বান-কি মুনবেগম খালেদা জিয়া

    Dhaka Daily Dish, 276th Issue, 5th April '15
     
    Dear All
    At last a new political phase is about to start.  BAL Govt after failing to
    face political problem of mass agitation & aborodth against it – gave a
    new bait of Mayor election in 3 main city corps, with all the hope to
    divert public attention to a new issue.  BAL Govt also calculated that
    BNP will boycott that elections and automatically BAL will occupy all the
    3 cities through an election of its style.  But BNP decided to participate.
     
    The lead feature is from Mr Mahbub Talukder, a retired Govt Secretary.
    He writes 'Rammo Rachana' but portrays political problem through them.
    Mr Ban Ki Mun, UN Secretary General, gave a message to ensure fare &
    free election for city corporations.  He started his mission on Bangladesh
    national election, and don't be surprised & shocked if he gives message on
    thana/upojela elections also.  Dr Azizur Rahman, former Advisor of Care
    Taker Govt and an economist gave a small feature on little & limited power
    & prospect of Begum Kheleda Zia to arrange a dialogue to defuse political
    crisis, until BAL Govt agrees or allows.  A nice cartoon is also given,  Tks.
    Haque, Lowell, MA, USA.

    তামাশা

    মাহবুব তালুকদার |  এপ্রিল ২০১৫Manab Zamin                                            

    চাচা বললেনবিএনপির কাণ্ডটা দেখ আসন্ন সিটি করপোরেশন নির্বাচনকে বিএনপি 

    বলছেএটা নাকি তামাশার নির্বাচন তাই যদি হবে তাহলে তোমরা নির্বাচনে এলে কেনো?
    আমি জানালামবিএনপি একটি নির্বাচনমুখী দল নির্বাচনের মাধ্যমেই তারা ক্ষমতার

    বদল চায় এই তিন সিটি করপোরেশনের নির্বাচন তামাশার কিনা জানি না তবে পুরো

    নির্বাচন প্রক্রিয়াটাই তামাশার ব্যাপার 
    চাচা রক্তচক্ষু তুলে তাকালেন আমার দিকেতুমি কি বিএনপিতে নাম লিখিয়েছ ?
    চাচাএই এক অদ্ভুত সমস্যা আমাদের আমরা আমাদের চিন্তার বিপরীত বক্তব্যকে

    মোটেই সহ্য করতে পারি না এটা মোটেই গণতান্ত্রিক মানসিকতা নয়

    সিটি নির্বাচন অবাধ  নিরপেক্ষ করতে আহ্বান মুনের

    মানবজমিন ডেস্ক |  এপ্রিল ২০১৫

    বাংলাদেশে গত কয়েক সপ্তাহে সহিংসতা কমে আসার বিষয়টি স্বাগত জানিয়েছে

    জাতিসংঘ ২৮শে এপ্রিল অনুষ্ঠেয় সিটি করপোরেশন নির্বাচনে বিরোধী দলের

    অংশগ্রহণের সিদ্ধান্তে আশান্বিত সংস্থাটির মহাসচিব বান-কি মুন পরশু বাংলাদেশ

    পরিস্থিতি নিয়ে বিভিন্ন প্রশ্নের উত্তরে জাতিসংঘ মহাসচিবের মুখপাত্রের কার্যালয়

    থেকে প্রকাশিত এক নোটে  কথা বলা হয়

     

    সমাধান খালেদার হাতে, ভ্রান্ত ধারণা

    হামিদ বিশ্বাস২০ মার্চ ২০১৫Manab Zamin     

    সংকট নতুন নয়আগেও ছিল স্বৈরশাসক এরশাদের পতনসহ সব শেষ ২০০৬ সালেও

    রাজনৈতিক অচলাবস্থা সৃষ্টি হয়েছিল কিন্তু এবারের সংকট সম্পূর্ণ আলাদা জটিলতা,

    কাঠিন্যতা  দীর্ঘ মেয়াদের  বিচারে এটাই মহাসংকট স্বাধীনতার পর এত বড় সংকটে

    দেশ আর কখনও পড়েনি মানবজমিনকে দেয়া এক সাক্ষাৎকারে সাবেক তত্ত্বাবধায়ক

    সরকারের অর্থ উপদেষ্টা  জ্যেষ্ঠ অর্থনীতিবিদ এবি মীর্জ্জা মোআজিজুল ইসলাম

    এসব কথা বলেন সাক্ষাৎকার নিয়েছেন অর্থনৈতিক রিপোর্টার হামিদ বিশ্বাস

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     भुंदरा बौक कुत्ता अछेकि नि कटद ?


                            चबोड़्या स्किट संकलन  :::   भीष्म कुकरेती 

    ----------चरित्र ---------

    भुंदरा बौ 

    लड़का 

    कुत्ता (बच्चा कुत्ताक भेष मा )

    स्थान - बस स्टॉप 

    [भुंदरा बौ बेंच मा बैठिक स्मार्ट फोन पर घन्ना भाई  क स्किट दिखणि च ]

    [एक कुत्ता भुंदरा बौक पास बैठिक भुंदरा बौक खुट आदि चटणु च ]

    भुंदरा बौ [अफिक ] - घन्ना भाई का स्किट स्टेज मा ठीक  लगदन। स्मार्ट फोन मा उथगा मजा किलै नि आंद ह्वाल। 

    [इथगा मा एक लड़का आंद, कुछ देर इना -ऊना दिखद , कुछ टाइम पास करणो तरकीब सुचद ]

    लड़का - लगणु च मीन आप तै दिख्युं च। 

    भुंदरा बौ [नराज ह्वेक ]- छोरी तै पटाणो भौत पुरण तरीका च। 

    लड़का - लगणु च हमर अर तुमर इकु बस च। 

    [भुंदरा स्मार्ट फोन मा व्यस्त रौंदि ]

    लड़का - आपक कुत्ता काटद त नी च ?

    भुंदरा बौ - नही , म्यार कुत्ता बड़ो सांत कुत्ता च। 

    [इथगा मा  लड़का कुत्ता का पास जांद ]

    [लड़का कुत्ता पर धीरे से प्यार से खुटन ठेस लगांद।  कुत्ता पैल लड़काक हथ कटद अर लड़का तैं जमीन मा गिरांद अर फिर पैथर काटि दींदु।  आस पास का लोग लड़का तै कुत्ता से छुडांदन ]

    भुंदरा बौ - मि तै लगणु च बिंडी काटि दे। 

    लड़का - पर आपन त बोलि छौ आपक कुत्ता नि कटद ?

    भुंदरा बौ -कनि ब्वाल।  पर स्यु म्यार कुत्ता नी च। 


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  • 04/05/15--23:06: আড়াই মাসে ক্ষতি ৪৯০০ কোটি টাকা : সিপিডি CPD for conducive political environment for accelerating growth জানুয়ারি থেকে মধ্য মার্চ মাস পর্যন্ত আড়াই মাসের রাজনৈতিক অস্থিরতায় উৎপাদনব্যবস্থায় ৪ হাজার ৯০০ কোটি টাকার ক্ষতি হয়েছে; যা মোট দেশজ উৎপাদনের (জিডিপি) দশমিক ৫৫ শতাংশ। রাজনৈতিক অস্থিরতা না থাকলে সমপরিমাণ পণ্য ও সেবা উৎপাদিত হতো, যা জিডিপিতে যোগ হয়ে এর আকার বড় করত।গতকাল রোববার এ তথ্য দিয়েছে বেসরকারি গবেষণা প্রতিষ্ঠান সেন্টার ফর পলিসি ডায়ালগ (সিপিডি)। ওই সময়ে প্রধান নয়টি খাতে উৎপাদনে কী পরিমাণ ক্ষতি হয়েছে, সেটা বিবেচনায় এনে উৎপাদন ক্ষতির হিসাব করেছে সিপিডি। সিপিডি জানিয়েছে, এটি তাদের রক্ষণশীল হিসাব।সিপিডি বলছে, জানুয়ারি থেকে মার্চের মাঝামাঝি পর্যন্ত ৮১ দিন অবরোধ ও ৬৭ দিন হরতাল হয়েছে। এ সময়ে সবচেয়ে বেশি ক্ষতি হয়েছে বস্ত্র খাতে। এ খাতের ক্ষতি ১ হাজার ৩১৮ কোটি টাকা। এরপর সবচেয়ে বেশি ক্ষতি পর্যটন খাতে। এ খাতে ক্ষতির পরিমাণ ৮২৫ কোটি টাকা। এ ছাড়া পরিবহনে ৭৪৪ কোটি টাকা, চিংড়িশিল্পে ৭৪১ কোটি, পোলট্রিশিল্পে ৬০৬ কোটি, পাইকারি ও খুচরা ব্যবসায় ৪৪৮ কোটি, কৃষিতে ৩৯৮ কোটি, প্লাস্টিক
  • আড়াই মাসে ক্ষতি ৪৯০০ কোটি টাকা : সিপিডি


    CPD for conducive political environment for accelerating growth

    জানুয়ারি থেকে মধ্য মার্চ মাস পর্যন্ত আড়াই মাসের রাজনৈতিক অস্থিরতায় উৎপাদনব্যবস্থায় ৪ হাজার ৯০০ কোটি টাকার ক্ষতি হয়েছে; যা মোট দেশজ উৎপাদনের (জিডিপি) দশমিক ৫৫ শতাংশ। রাজনৈতিক অস্থিরতা না থাকলে সমপরিমাণ পণ্য ও সেবা উৎপাদিত হতো, যা জিডিপিতে যোগ হয়ে এর আকার বড় করত।গতকাল রোববার এ তথ্য দিয়েছে বেসরকারি গবেষণা প্রতিষ্ঠান সেন্টার ফর পলিসি ডায়ালগ (সিপিডি)। ওই সময়ে প্রধান নয়টি খাতে উৎপাদনে কী পরিমাণ ক্ষতি হয়েছে, সেটা বিবেচনায় এনে উৎপাদন ক্ষতির হিসাব করেছে সিপিডি। সিপিডি জানিয়েছে, এটি তাদের রক্ষণশীল হিসাব।সিপিডি বলছে, জানুয়ারি থেকে মার্চের মাঝামাঝি পর্যন্ত ৮১ দিন অবরোধ ও ৬৭ দিন হরতাল হয়েছে। এ সময়ে সবচেয়ে বেশি ক্ষতি হয়েছে বস্ত্র খাতে। এ খাতের ক্ষতি ১ হাজার ৩১৮ কোটি টাকা। এরপর সবচেয়ে বেশি ক্ষতি পর্যটন খাতে। এ খাতে ক্ষতির পরিমাণ ৮২৫ কোটি টাকা। এ ছাড়া পরিবহনে ৭৪৪ কোটি টাকা, চিংড়িশিল্পে ৭৪১ কোটি, পোলট্রিশিল্পে ৬০৬ কোটি, পাইকারি ও খুচরা ব্যবসায় ৪৪৮ কোটি, কৃষিতে ৩৯৮ কোটি, প্লাস্টিকশিল্পে ২৪৪ কোটি টাকা এবং ব্যাংক ও আর্থিক খাতে ১৫৬ কোটি টাকার ক্ষতি হয়েছে। 


    Artile



    http://www.prothom-alo.com/bangladesh/article/496066/%E0%A6%86%E0%A7%9C%E0%A6%BE%E0%A6%87-%E0%A6%AE%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A7%87-%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%B7%E0%A6%A4%E0%A6%BF-%E0%A7%AA%E0%A7%AF%E0%A7%A6%E0%A7%A6-%E0%A6%95%E0%A7%87%E0%A6%BE%E0%A6%9F%E0%A6%BF-%E0%A6%9F%E0%A6%BE%E0%A6%95%E0%A6%BE 

    __._,_.___

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    डा. सी. के. राउतमाथि प्रहरी दमनको काठमाडौं लगायत देशभर विरोध प्रदर्शन
    मोरंगबाट ८ जना गिरफ्तार

    २०७१ चैत्र २२ गते - चैत २१ गते डा. सी. के. राउतलाई झापाको राजगढ़मा आयोजित सभामा सम्बोधन गर्न जाँदा प्रहरीले उहाँमाथि सीधै लाठी चार्ज गरी टाउको र पाखुरामा घाइते तुल्याई कार्यक्रम बिथोलेको विरोधमा आज दिनभरि मधेशका विभिन्न जिल्लामा तथा काठमाडौंको माइतीघर मण्डलामा विरोध प्रदर्शन गरिएको छ। सोही क्रममा मोरंग जिल्लाबाट ८ जना गिरफ्तार भएका छन्। मोरंग जिल्लाबाट गिरफ्तार हुनेहरूमा रामेश्वर पंडित, छोटेलाल सोरेन, बद्री साह, डा. संजय साह, डा. परमेश्वर मुर्मु, सरोज शर्मा, वी.पी. मंडल, अंजय मिश्र रहेका छन्।

    झापाको राजगढमा चैत्र २१ गते प्रहरीको दमन हुँदा डा. सी. के. राउत, दशरथ मुखिया, कौशिला महतो, सीताराम पंडित लगायत १८ जना घाइते भएका थिए भने प्रहरीले ६१ जनालाई हिरासतमा लिएका थिए। राजगढ़मा स्थानीय महिलाहरूलाई समेत भूईंमा पछारेर प्रहरीले लाठी चार्ज गरेका थिए। फलस्वरूप स्थानीय जनता प्रहरीको दमनबाट व्यापक रूष्ट भएका थिए।







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    Dear Karki jee,

    Thank you for circulating the very interesting and timely op-ed
    write-up by the Nagarik editor, Prateek Pradhan, entitled "Samaj ma
    Chet Pharkiyeko Bela" that, among others, rebuked PM Sushil Koirala
    for the fickleness of his leadership as he capitulated to the
    blackmail by 168 avaricious UML CA members with Rajendra Pandey as
    their ringleader. While Dr. Govind KC's fifth "fast unto death"
    protest once again unleashed the wrath of the nation, forcing PM
    Koirala to another round of capitulation, Mr. Pradhan himself has
    chosen to see it as a marker of the "return of the nation's urge for
    vigilance', a rather too optimistic a characterization in view of the
    fact that it is only likely to leave the overall corruptibility and
    the blatant lack of accountability of the Koirala government largely
    intact. Furthermore, Mr. Pradhan mentions that the NC and the UML
    "have always fought for people's right", a compliment totally
    uncalled for in view of the fact that he laments in the same breath
    that people have never been able to experience "social justice" as and
    when they have been in power. Mr. Pradhan has also gone on to bank on
    the NC's upcoming national convention to throw up more honest leaders.
    But he acknowledges that it is a hope against hope, because by his own
    judgment, the NC politicians, by the time they qualify to rise up to
    becoming convention delegates, would have already "consigned to
    flames" any capacity they might have had for "ethics, honesty and good
    character".  As indicated by Mr. Pradhan at various points in his
    write-up, a successful politician in Nepal is necessarily a corrupt
    man (or woman). It is so for two reasons. Given the stubborn
    persistence of feudalistic order in Nepal, almost all politicians come
    from among the ranks of feudal elites whose hallmark is extraction of
    resources from the community without accountability to go with it.
    Corruption is just one means of such extraction. Secondly, since most
    voters are poor and lack access to proper education, money plays the
    central role in elections. Therefore, unless there is a fundamental
    reformulation of Nepal's polity, these political parties, which
    incidentally number in hundreds to underscore the widespread
    prevalence of feudalistic order in the country, cannot but be the
    instruments of sustained decay and destruction of the nation.

    In the present day world, outside of the city state of Singapore,
    China has the record of being the fastest developing nation in the
    world. But in two areas, Nepal has excelled even China. After Nepal
    nationalized its forests in 1957, it was subjected to sustained
    denudation, bringing the country to the brink of desertification by
    mid-Eighties. In 1988, Nepal legislated forest user groups--that now
    number 18,000 in the country-- empowering the forest users themselves
    to manage their own forests. The result was dramatic; by the end of
    the century, Nepal's forest wealth had staged a successful comeback.
    In other words, it took thirty years for Nepal to wreck its forests
    and only ten to rebuild it. Similarly, the same year, Nepal introduced
    mothers' groups and female community health volunteers in the
    communities--that now number 52,000 each in the country--that
    empowered the mothers themselves to access necessary health services
    from, the government health posts and bring them to the doorstep of
    all the mothers and their children in the communities all over the
    country. Because of these institutions, today, Nepal ranks at the top
    of the table in international ranking in meeting the MDGs in child
    survival and maternal mortality rate reduction. The secret of their
    success lay in the fact that when the users themselves--not their
    so-called "representatives" in the VDCs-- are empowered to manage
    their own services, even the feudalistic order is not a deterrent.
    Participation of the users themselves assures transparency of
    management that , in turn, ensures accountability of leaders. In
    short, the user managed institutions assure good governance
    conditions, the hallmark of a genuine democracy. Given the
    internationally applauded successes in these two sectors, it has
    always been abundantly clear that all the development sectors could
    benefit from such an approach and that would be the surest way for
    Nepal to graduate out of poverty. But these feudal crooks who
    masquerade as "politicians" and "people's representatives" have never
    done anything to empower the people themselves to manage their own
    affairs. Therefore, what Nepal needs is to end the endless run of
    these corrupt politicians and reformulate its polity in a manner that
    would inalienably empower the people themselves at the grassroots. I
    hope this makes sense to Mr. Pradhan.

    Warm regards
    Bihari Krishna Shrestha


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    Nayisarkar Watchmen
     
    Nayisarkar Watchmen
    cordinator at lok andolan gujarat surat
     
     
    https://docs.google.com/spreadsheets/d/1_eB62_FLXE3sdAgqXpNDL-7CObvR0Zpt1IjXdQzwxtg/edit 
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    गुलमोहर किताब की ओर से अजय सिंह के पहले कविता संग्रह 'राष्ट्रपति भवन में सूअर'
    पर बातचीत, सोमवार, 6 अप्रैल 2015, 5 PM
    जयशंकर प्रसाद ऑडिटोरियम, कैसरबाग, लखनऊ
    आप आइए, इंतजार रहेगा

    https://www.facebook.com/events/461255220695681/...

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    'गुलमोहर किताब की ओर से अजय सिंह के पहले कविता संग्रह 'राष्ट्रपति भवन में सूअर'  पर बातचीत, सोमवार, 6 अप्रैल 2015, 5 PM  जयशंकर प्रसाद ऑडिटोरियम, कैसरबाग, लखनऊ  आप आइए, इंतजार रहेगा  https://www.facebook.com/events/461255220695681/  @[1283521962:2048:Amalendu Upadhyaya] @[100002168930339:2048:Amalendu Upadhyaya] @[100003486270691:2048:Anil Azami] @[100002153938412:2048:Amit Mishra] @[100000462649725:2048:Anil Kumar Singh] Shahnawaz Alam @[100004968284512:2048:Adiyog Adiyog] @[100002407021628:2048:Avinash Chanchal] @[100001321369717:2048:Anuj Shukla] @[1482004015407551:274:Peoples Campaign Against Communalism & Corporate Loot] @[1058838026:2048:Afaq Ullah] @[1521254214:2048:Balbeer Yadav] @[100001887503613:2048:Bhagwanswaroop Katiyar] @[100006463247910:2048:Balvant Yadav] @[277109819136110:274:Journalist's Union For Civil Society - JUCS] @[572904046172706:274:All India workers Council] @[100006978439453:2048:All India Worker Council] @[100007507188414:2048:Peoples Campaign Lucknow] @[100001639751962:2048:Shiv Das] @[100001439699153:2048:Dheeraj K Soni] @[100000035387859:2048:Ekta Singh] @[100001311110166:2048:Faizan Musanna] @[1664883301:2048:Ghufran Siddiqui] @[100000864897911:2048:Suvrat Gupta] Hare Ram Mishra Jucs India @[534137963:2048:Ish Mishra] @[1400944735:2048:Munna Kumar Jha] @[100006768917542:2048:Jan Samvad] @[100002671667987:2048:Jyoti Rai] @[1574412859:2048:Sharad Jaiswal] @[100000871852256:2048:Rishi Kumar Singh] @[100001457093671:2048:Dilip Khan] @[100000046927837:2048:Lakshaman Prasad] @[100007335009805:2048:Rihai Manch Lucknow] @[1397702133809900:274:RIHAI MANCH Lucknow] @[100007369265023:2048:Masihuddin Sanjari] @[100007470704183:2048:Rihai Manch Allahabad] Shoaib Mohammad @[1387256208191170:274:Mohammad Shoaib] Nai Pirhi @[100008314658972:2048:Nagrik Parishad] @[678016075594429:274:NAI PIRHI] @[829469293749757:274:Nagrik Parishad Uttar Pradesh] @[1171454772:2048:Purnima Oraon] @[100004319502663:2048:Raghvendra Pratap Singh] @[100000572111376:2048:Vijai Pratap] @[1344549984:2048:Arun Kumar Oraon] @[100003331431808:2048:Partition Revisited] @[1812847189:2048:Randhir Singh Suman] @[100009162889502:2048:Rihai Manch Awadh] @[100009157823347:2048:Rihai Manch] @[100009104950082:2048:Rihai Manch Azamgarh] @[1553968068214139:274:Rihai Manch News] @[1838709725:2048:Tarique Shafique] @[100000078225123:2048:Rakesh Veda] @[757624456:2048:Anand Swaroop Verma]'


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  • 04/06/15--02:48: हिंदू साम्राज्यवादी कारपोरेट शिकंजे में छटफटाती सोने की चिड़िया को रिहा करो देशभक्तोंं! अभूतपूर्व हस्तक्षेप जनांदोलनों के खिलाफ न्यायप्रणाली में,अब एकसाथ खड़ा न हुए ,तो बचे हुए हैं वे मारे जायेंगे,प्रधानमंत्री ने फासिस्ट फतवे से अदालतों की सामूहिक अवमानना कर दी। जजों के सम्मेलन में पीएम मोदी ने उठाया सवाल, पूछा-कहीं फाइव स्टार एक्टिविस्ट तो न्यायपालिका को चला नहीं रहे हैं? हम आपके साथ हैं तो आप भी हमारा साथ दें।फिर देखिये कि हम लोग मिलकर आम जनता के बीच इन हत्यारों को कैसे बेनकाब करके उनकी ही पैदल सेनाओं को उनके खिलाफ लामबंद करते हैं। यह हमारा खुला आवाहन है।जब तक जान है,हम लड़ेंगे साथी।
  • हिंदू साम्राज्यवादी कारपोरेट शिकंजे में छटफटाती सोने की चिड़िया को रिहा करो देशभक्तोंं!

    अभूतपूर्व हस्तक्षेप जनांदोलनों के खिलाफ न्यायप्रणाली में,अब एकसाथ खड़ा न हुए ,तो बचे हुए हैं वे मारे जायेंगे,प्रधानमंत्री ने फासिस्ट फतवे से अदालतों की सामूहिक अवमानना कर दी।

    जजों के सम्मेलन में पीएम मोदी ने उठाया सवाल, पूछा-कहीं फाइव स्टार एक्टिविस्ट तो न्यायपालिका को चला नहीं रहे हैं?

    हम आपके साथ हैं तो आप भी हमारा साथ दें।फिर देखिये कि हम लोग मिलकर आम जनता के बीच इन हत्यारों को कैसे बेनकाब करके उनकी ही पैदल सेनाओं को उनके खिलाफ लामबंद करते हैं।


    यह हमारा खुला आवाहन है।जब तक जान है,हम लड़ेंगे साथी।


    पलाश विश्वास

    कारपोरेट एकाधिकार वर्णवर्चस्वी पीपीपी नरसंहारी विकास के लिए सत्रह सौ कानून खत्म करने के ऐलान के साथ कल्कि अवतार ने जनांदोलनों और आंदोलनकारियों की परवाह न करने का फरमान करते हुए भारत के इतिहास में खुलेआम न्यायपालिका में सबसे बड़ा हस्तक्षेप करते हुए भारत के तमाम न्याय़ाधीशों की अवमानना कर दी है और मीडिया में इसका गनीमत है कि प्रधानमंत्री का पक्ष महिमामंडित करते हुए खुलासा भी हो गया है।


    अब वक्त है कि जनपक्षधर राजनीति अराजनीति को सारी अस्मिताएं तोड़कर इस अभूतपूर्व कयामत के खिलाफ खड़ा करने की और भारतीय जनगण को हकीकत बताने की।


    कारपोरेट मीडिया इस मुक्तबाजारी तिलिस्म को मजबूत ही करेगा।हम वैकल्पिक मीडिया में अब भी बिना संसाधन खड़े हैं।


    जनसंगठन ग्राउंड जीरों के हाल हकीकत भी हमें बताते रहें तो हम और कारगर तरीके से सच को सच बताने की मुहिम तेज कर सकते हैं।


    जनादोंलनों और जनपक्षधर वैकल्पिक मीडिया की सारी ताकत एकजुट करके ही हम इस नरसंहारी कयामत का मुकाबला कर सकते हैं।


    जनांदोलनों और जनपक्षधरता से जुड़े जनसंगठन खुलकर हमारा साथ दें तो हम हवा में बात नहीं कर रहे हैं,सालभर में कमसकम दस करोड़ लोगों को सीधे संबोधित करने और उन्हें सोने की चिड़िया भारत को हत्यारों के शिकंजे से निकालने की ठोस योजना हमारे पास है।आप साथ तो दें।


    हम फिलहाल हस्तक्षेप,समकालीन तीसरी दुनिया और समयातंर की सम्मिलित रीडरशिप बढ़ाकर अपने छीजते हुए साधनों और सहयोग से वंचित होने के बावजूद निरंतर जनता के मुद्दों और जनांदोलन के जनपक्षधर ताकतों और जनपक्षधर विपक्ष के साथ खड़े हैं।आप हमारे साथ आ जायें।बढ़ायें हाथ।


    इस मोर्चाबंदी को अगर हम जनांदोलनों और जनपक्षधर ताकतों के सक्रिय सहयोग से ठोस आधार दे सकें तो बाजार के व्याकरण और माध्यमों की,भाषाओं की सारी दीवारें हम यकीनन ढहा सकते हैं।जो देश जोड़ने के लिए अनिवार्य भी है।


    हालात कितने संगीन हैं,कृपया इस पर गौर करें।भाषण पेलने का आत्ममुग्ध नपुंसक अभ्यास के बजाए ठोस एकता और सक्रियता जरुरी है।


    हम आपके साथ हैं तो आप भी हमारा साथ दें।


    फिर देखिये कि हम लोग मिलकर आम जनता के बीच इन हत्यारों को कैसे बेनकाब करके उनकी ही पैदल सेनाओं को उनके खिलाफ लामबंद करते हैं।


    यह हमारा खुला आवाहन है।जब तक जान है,हम लड़ेंगे साथी।


    With India Inc still wary of fresh investments, the government is pulling out all stops to get stalled public investments off the ground and expedite big-ticket greenfield projects that have been on the drawing board for years such as the Navi Mumbai International Airport.

    In the weeks since it presented its first full-year Budget with a focus on reviving the economy through public investments, the Modi government has asked the Cabinet Secretariat to speed up implementation of over 135 public investment projects worth ` . 2.5 lakh crore by resolving red tape hurdles.

    http://epaperbeta.timesofindia.com/index.aspx?eid=31817&dt=20150406

    कानूनों के सरलीकरण का आह्वान करते हुए मोदी ने कहा कि संविधान में निर्थक कानूनों को समाप्त करना होगा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने समीक्षाधीन 700 पुराने कानूनों और अन्य 1,700 कानूनों को हटाने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में प्रतिदिन एक कानून को हटाने की है।

    जजों के सम्मेलन में पीएम मोदी ने उठाया सवाल, पूछा-कहीं फाइव स्टार एक्टिविस्ट तो न्यायपालिका को चला नहीं रहे हैं?

    Times of India  reports:

    CJI Contradicts, Says Judges As Fearless As Ever

    Prime Minister Narendra Modi on Sunday said judges must not fear the reaction of five-star activists while discharging their "divine" duty of dispensing justice as per the Constitution and law.

    "The judiciary is not as fearless today as it used to be 10 years back. Are five-star activists not driving the judiciary?

    http://epaperbeta.timesofindia.com/index.aspx?eid=31812&dt=20150406

    Economic Times reports:

    CLARION CALL PM urges judiciary to deliver on its `divine' role even as Wipro chief asks people working to improve India to join hands

    Prime Minister Narendra Modi targeted what he described as "five-star activists driving the judiciary" and asked judges to introspect on whether they were delivering on their "divine" role in a manner that would safeguard the judicial system's credibility since they can't be criticised by outsiders.

    http://epaperbeta.timesofindia.com/index.aspx?eid=31818&dt=20150406



    यह मीडिया की खबर है और मीडिया की खबर यह भी है कि लंबित परियोजनाओं को फास्टट्रैक पर चालू किया जा रहा है और बेदखली के रास्ते आने वाले सारे अवरोध बेरहमी से अबाध पूंजी और पीपीपी माडल के हिंदु्त्ववादी नरसंहारी अश्ममेधी संस्कृति के तहत उड़ा दिये जायेंगे।

    हम आपको यकीन दिलाते हैं कि इस देश के किसान,मजूर,कारोबारी और उद्यमी,आदिवासी और अल्पसंख्यक जब जाग खड़े होंगे तो यह हिंदू साम्राज्यवादी मुक्तबाजारी तिलिस्म किरचों की तरह बिखर कर चकनाचूर हो जायेगा।


    अब वक्त का तकाजा है कि जनपक्षधर ताकतें फिलहाल जनजागरण के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दें,तो वर्गविहीन जातिविहीन स्वतंत्र संप्रभू सोने की चिड़िया भारत को मिलियनर बिलियनर नस्लवादी विध्वंसक नरभक्षी वर्णवर्चस्वी मुक्तबाजारी राष्ट्रद्रोही सत्ता वर्ग के शिकंजे से मुक्त किया जा सकता है।


    बाकी आपकी मर्जी।

    जैसा कि हम बार बार चेता रहे हैं कि इस हिंदू साम्राज्यवादी तूफान से जो कयामत आने वाली हैं,उससे वे भी नहीं बचेंगे,जिनके सुर्खाब के पर लगे हैं।


    मित्रों, हम जमीन पर आसमान के नीचे बाबुलंद आवाज में कह रहे हैं कि देश भर के बहुजन बहुसंख्य जनगण इस निर्णायक लड़ाई के लिए एकदम तैयार हैं।


    समस्या एकमात्र यही है कि हम अलग अलग द्वीपों में खड़े न जनता को जोड़ पा रहे हैं और न सोने की चिड़िया का पेट चीर रहे सत्तावर्ग के शिकंजे में वधस्थल में तब्दील इस देश के वध्य जनगण से कोई संवाद  की स्थिति बना पा रहे हैं।


    देश के हर कोने में हमारे स्वजन जख्मी लहूलुहान हैं और उनका सबकुछ लुट रहा है और अस्मिताओं के रंग बिरंगे चश्मे में इस कयामती मंजर में खून के समुंदरों से घिरे होने के बावजूद अपने ही दिल की धड़कनों को सुनने से साफ इंकार कर रहे हैं।


    प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने जनपक्षधरता के खिलाफ खुले युद्ध का ऐलान कर दिया है और सेनाएं सजी हैं इस महाभारत में अभिमन्यु की तरह अलग अलग चक्रव्यूह में घिरी हुई हर जनपक्षधर ताकत के सफाये के लिए।जो राजनीति में हैं,जो संसदीय राजनीति में भी हैं,जो वाम हैं,जो आवाम के साथ हैं और जो बहुजनों के नुमाइंदे हैं,उनकी शामत भी आने वाली है।


    फाइव स्टार आंदोलनकारियों को विकास का अवरोध बताते हुए  पीपीपी माडल विकास,नरसंहारी अश्वमेध और एकमुस्त मनुस्मृति जायनी हिंदू साम्राज्यवाद के शत प्रतिशत केसरिया कारपोरेटराज की बहाली के लिए गूड फ्राइडे पर न्यायाधीशों को बुलाकर स्वतंत्र लोकगणराज्य के प्रधाननमंत्री ने जनांदोलनों की परवाह न करने का फरमान सुनाया है।हुक्मउदुली की आशंका जाहिर है,नहीं है।नहीं है।


    इस खबर पर गौर करें कृपया


    आज देशभर के शीर्ष न्यायाधीशों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए मोदी ने सवाल उठाते हुए कहा था कि कहीं फाइव स्टार एक्टिविस्ट तो न्यायपालिका को चला नहीं रहे हैं?

    इसके बाद मोदी के इस बयान पर चर्चा हो गई थी कि क्या हमारी न्यायिक व्यवस्था में किसी प्रकार का हस्तक्षेप हो रहा है ये चर्चा अभी गर्म ही है कि भारत के पूर्व चीफ जस्टिस और प्रेस काउंसिल  के चेयरमैन रह चुके मारकंडे काटजू ने इस संदर्भ में बड़ा बयान दिया है, काटजू ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि, आज की तारीख में भारत में लगभग 50 फीसदी जज भ्रष्ट हैं.

    इस पोस्ट में काटजू ने लिखा, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज दिल्ली में जजों की कॉन्फेंस को संबोधित करते हुए  कहा हमारे यहां जजों को बेहद पवित्र आत्मा वाला और भगवान के बाद का दर्जा दिया गया है,

    मैं चाहता हूं कि काश ये शब्द सच होते, पर सच ये है कि आज न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का अंबार फैला हुआ है,  और  एक भ्रष्ट इंसान की आत्मा आखिरकार पवित्र कैसे हो सकती है.

    जब मैंने  इलाहाबाद 1971 में लॉ की प्रैक्टिस शुरु की थी तो उस वक्त कोई भी भ्रष्ट जज हाई कोर्ट में नहीं था और शायद भारत के किसी भी हाईकोर्ट में नहीं था.

    कोई जज बेहद शालीन तो कोई बेहद अभद्र थे, कोई काफी बुद्धिजीवी तो कोई काफी थोड़े कम थे पर इस बात में कोई शक नहीं है कि हाईकोर्ट में कोई भी भ्रष्ट नेता रहा हो.

    1994 में जब जस्टिस वेंकटचालीभारत के चीफ जस्टिस थे उस वक्त भ्रष्टाचार के आरोप में हाईकोर्ट में भारी तादाद में जजों के तबादले हुए और ये तबादले तब तक जारी हैं.  

    साल 2001 में जस्टिस भरुचा ने कहा था , लगभग 20 फीसद  हाईकोर्ट जज भ्रष्ट हैं, और म्छे लगता है अब ये आकड़ा 40 से 50 फीसद तक पहुंच चुका होगा.'

    http://abpnews.abplive.in/ind/2015/04/05/article548242.ece/Justice-Markandey-Katju




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    মানবাধিকার এবং ওআইসির দলিল
    শাহ্ আব্দুল হান্নান

    ০৬ এপ্রিল ২০১৫,সোমবার, ১৭:৫২


    মানবাধিকার মানব জাতির অতি গুরুত্বপূর্ণ কিছু বিষয়ের মধ্যে অন্যতম। মানবাধিকার মানুষের স্বভাবগত। অর্থাৎ মানুষের যে স্বভাব তার মধ্যেই মানবাধিকারের দাবিটি রয়েছে। রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, 'কুল্লু মাউলুদিন আলাল ফিতরা'। এর অর্থ, প্রত্যেক ব্যক্তিকে সৃষ্টি করা হয়েছে একটি স্বভাবের ওপর। সে স্বভাবের মধ্যে রয়েছে স্বাধীনতা। হজরত ওমর রা:-এর একটি বিখ্যাত বক্তব্য আছে : 'আল্লাহ তো তোমাদের সবাইকে স্বাধীন করে সৃষ্টি করেছিলেন, কে তোমাদের গোলাম করল?'এটি একটি খুবই গুরুত্বপূর্ণ বক্তব্য।

    আমরা মানবাধিকারের ইতিহাস পর্যালোচনায় গেলে দেখব মদিনা সনদ বা মদিনার রাষ্ট্র গঠনের সময় ইহুদিদের সাথে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যে চুক্তি করেছিলেন, যাকে বলা হচ্ছে : 'মিসক আল মদিনা'বা 'মদিনা চুক্তি'- তার বিভিন্ন দিক রয়েছে। এটি হচ্ছে পৃথিবীর প্রথম লিখিত সংবিধান। এর আগে কোনো লিখিত সংবিধান কোনো রাষ্ট্রের ছিল কি না, তা ইতিহাস থেকে সুস্পষ্টভাবে জানা যায় না। এ সংবিধানে বিভিন্ন দিকের কথা বলা হয়েছে। যেমন বলা হয়েছে- রাষ্ট্র কেমন হবে, এর শাসক কে হবে। কিন্তু একই সাথে এ সনদে বিভিন্ন গোষ্ঠীর কী অধিকার হবে, তা-ও বলে দেয়া হয়েছিল। কাজেই এটি শুধু একটি সাংবিধানিক দলিলই নয়, এটি একটি মানবাধিকার দলিলও। বিশ্বের ইতিহাসে মানবাধিকারের দলিলের মধ্যে মদিনার সনদ একটি গুরুত্বপূর্ণ ডকুমেন্ট। যদিও আমি আগেই বলেছি মানুষের স্বভাবের মধ্যে এটি আছে। কিন্তু ডকুমেন্ট হিসেবে যদি আমরা দেখতে চাই তাহলে মদিনার সনদের ঐতিহাসিক গুরুত্ব বোঝা যায়।

    মানবাধিকার নিয়ে এরপর অনেক কাজ হয়েছে। সেখানে ফ্রিডম, লিবার্টি, ডেমোক্র্যাসির কথা বলা হয়েছে। এটি ইউরোপসহ বিশ্বের ইতিহাসে একটি গুরুত্বপূর্ণ ঘটনা। তাতেও মানুষের অধিকারের কথা আলোচিত হয়েছে। এভাবে এর একটি ঐতিহাসিক বিকাশ আমরা মানবাধিকারের ইতিহাসে দেখতে পাই। কিন্তু এরপরও কোনো একটি দলিলে সব মানবাধিকার আনার কাজটি আগে হয়নি। এ কাজটি হয় ১৯৪৮ সালে জাতিসঙ্ঘের মানবাধিকার সনদে, 'জাতিসঙ্ঘ মানবাধিকার'ঘোষণার মাধ্যমে।

    মানব ইতিহাসে বিভিন্ন ঘোষণায়, দলিলে বা বিভিন্ন লেখকের লেখায় এর আগে যেগুলোকে মানবাধিকার বলে গুরুত্ব দেয়া হয়েছে, তা একত্র করে জাতিসঙ্ঘের সব রাষ্ট্র একমত হয়ে এ দলিল প্রণয়ন করে। এদিক থেকে এটি গুরুত্বপূর্ণ। এতে মানবজাতির সব রাষ্ট্রের স্বাধীন ইচ্ছার একটি প্রতিফলন ঘটেছিল- এটিকে অস্বীকার করা যাবে না। কিন্তু যেহেতু এ প্রশ্নটি ছিল এবং আছে যে, ইসলাম মানবাধিকার দিয়েছে কি না, দিলে কতটুকু দিয়েছে? মানবাধিকারসংক্রান্ত ইসলামের যেহেতু একটি দৃষ্টিভঙ্গি রয়েছে এবং যেহেতু ইসলাম মূলত একটি নৈতিক শক্তি, সে জন্য তার একটি নিজস্ব দৃষ্টিভঙ্গি রয়েছে। সে কারণে যখন ওআইসি গঠিত হয় তখন এর নেতৃবৃন্দ উপলব্ধি করলেন যে, তাদের একটি মানবাধিকার দলিল খাড়া করা দরকার। সে কাজটি শুরু হয় আশির দশকের প্রথম দিকে। ১০ বছর ধরে কাজ হয়। তার জন্য সব ইসলামি চিন্তাবিদ, আইনজ্ঞ, ফিকাহবিদের একসাথে যুক্ত করে 
    ওআইসির ফিকাহ অ্যাকাডেমি এ দলিল তৈরি করে। নানা পদ্ধতি, ঘাত, চড়াই-উতরাই পেরিয়ে ১৯৯০ সালে কায়রোতে এ ডকুমেন্টটি পাস করা হয়। এটি একটি ঐতিহাসিক এবং অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ দলিল। এখানে সে সম্পর্কে আলোচনা করা হলো।

    a. All human beings form one family whose members are united by submission to God and descent from Adam. All men are equal in terms of basic human dignity and basic obligations and responsibilities, without any discrimination on the grourds of race, color, language, sex, religious belief, political affiliation, social status or other considerations. True faith is the guarantee for enhancing 
    such dignity along the path to human perfection.

    b. All human beings are God's subjects, and the most loved by Him are those who ar most useful to the rest of His subjects, and no one has superiority over another except on the basis of piety and good deeds.

    অনুবাদ : ধারা-১
    ক. আদম থেকে উদ্ভূত এবং আল্লাহর প্রতি আনুগত্যের ভিত্তিতে ঐক্যবদ্ধ সমগ্র মানবজাতি এক পরিবারের সদস্য। জাতি, গোত্র, বর্ণ, ভাষা, নারী-পুরুষ, ধর্ম বিশ্বাস, রাজনৈতিক মতবাদ, সামাজিক অবস্থান বা অন্য যেকোনো বিবেচনানির্বিশেষে মূল মানবিক মর্যাদা এবং দায়িত্ব ও কর্তব্যের দিক থেকে সব মানুষ সমান। খাঁটি ঈমান ব্যক্তির মধ্যে মানবিক পূর্ণতা এনে দিয়ে এ মর্যাদা বৃদ্ধিকে গ্যারান্টি দেয়।

    খ. প্রতিটি মানুষ আল্লাহর অধীন। সেসব ব্যক্তিকে তিনি সবচেয়ে বেশি ভালোবাসেন, যারা তার সমগ্র সৃষ্টিজগতের কল্যাণে নিয়োজিত এবং শুধু খোদাভীতি (তাকওয়া) ও সৎকর্মের ভিত্তিতেই একজন মানুষ অন্যের চেয়ে শ্রেষ্ঠ হতে পারে।

    এ ধারাতে মানবজাতি বা সব মানুষের যে মৌলিক সমতা তা ঘোষণা করা হয়েছে। অর্থাৎ লিঙ্গ, জাতি, রাজনৈতিক মতাদর্শের ভিত্তিতে ভেদাভেদ না করে মতবাদনির্বিশেষে সবাই যে আল্লাহ তায়ালার অধীন বান্দা এবং তারা মানুষ হিসেবে সমান- এ কথাটিই তাতে বলা হয়েছে।

    এ সনদের ২ নম্বর ধারায় মানুষের জীবনকে রক্ষার কথা বলা হয়েছে। বলা হয়েছে :

    ক. জীবন হলো খোদাপ্রদত্ত একটি উপহার এবং প্রত্যেক ব্যক্তিরই জীবন ধারণের সুনিশ্চিত অধিকার রয়েছে। প্রত্যেক ব্যক্তি, সমাজ এবং রাষ্ট্রের কর্তব্য এ অধিকারকে যেকোনো ধরনের অবমাননা থেকে রক্ষা করা। শরিয়াহ নির্দেশিত কোনো কারণ ছাড়া কাউকে হত্যা করা হারাম বা নিষিদ্ধ।

    খ. এমন কোনো কাজ করা বা উপায় অবলম্বন করা নিষিদ্ধ যা মানব জাতির ব্যাপক ধ্বংসযজ্ঞের কারণ হয়ে দাঁড়ায়।

    গ. স্রষ্টাকর্তৃক নির্ধারিত সময়সীমার মধ্যে (Term of time willed by Allah) কারো জীবন রক্ষা করা শরিয়াহ নির্দেশিত একটি কর্তব্য।

    ঘ. শারীরিক ক্ষতি বা নির্যাতন থেকে নিরাপত্তা পাওয়ার অধিকার সবার জন্যই সুরক্ষিত। একে নিশ্চয়তা দান করা রাষ্ট্রের দায়িত্ব এবং শরিয়াহ নির্দেশিত কোনো কারণ ছাড়া এ অধিকার লঙ্ঘন করা নিষিদ্ধ।

    তৃতীয় ধারায় বলা হয়েছে, মানুষের বিরোধ মীমাংসার জন্য কোনো রকম সশস্ত্র সঙ্ঘাতে লিপ্ত হওয়া যাবে না। এ গোটা ডকুমেন্টই ইসলামি নীতির আলোকে প্রণীত হয়েছে। এ ধারায়ও বলা হয়েছে, যুদ্ধ যদি শুরু হয়েই যায় তাহলে যারা যুদ্ধরত নয় তাদের হত্যা করা যাবে না। বৃদ্ধ, মহিলা, শিশুদের হত্যা করা যাবে না। আহত ও অসুস্থদের চিকিৎসাসেবা দিতে হবে। যুদ্ধবন্দীদের খাওয়ানো ও আশ্রয় দেয়াসহ সবকিছু করতে হবে। মৃতদেহ অবমাননা করা যাবে না। যুদ্ধবন্দী বিনিময় করতে হবে। বন্দী অবস্থায় তাদের দেখতে দিতে হবে। ফসল নষ্ট করা যাবে না, গাছ কাটা যাবে না, সাধারণ জনগণের ঘরবাড়ি ধ্বংস করা যাবে না।

    মেয়েদের অধিকার সম্পর্কে এ সনদের ৫ নম্বর ধারায় আলাদাভাবে উল্লেখ করা হয়েছে। বলা হয়েছে, পরিবার হলো সমাজের ফাউন্ডেশন। পরিবারকে বিয়ের মাধ্যমে গঠন করা হবে। এ ধারার মাধ্যমে লেসবিয়ানিজম, সমকামিতা, ছেলে-ছেলে, মেয়ে-মেয়ে বিয়ে অস্বীকার করা হয়েছে। এ ধারায় আরো বলা হয়েছে সমাজ ও রাষ্ট্রের দায়িত্ব হচ্ছে বিয়ের পথে যত প্রতিবন্ধকতা আছে তা দূর করা এবং তাকে সহজ করে দেয়া। এগুলোতে ইসলামি দৃষ্টিভঙ্গির প্রতিফলন ঘটেছে। পরিবারকে তার সুরক্ষা ও কল্যাণ নিশ্চিত করতে হবে। নারীর অধিকার সম্পর্কে ৬ নম্বর ধারায় সুন্দর করে বলা হয়েছে। ধারাটিতে স্পষ্টভাবে বলা হয়েছে : ক. মর্যাদা এবং তা ভোগ করার অধিকারের পাশাপাশি কর্তব্য পালনের দিক 
    থেকেও নারী-পুরুষ সমান। নারীর রয়েছে স্বতন্ত্র সামাজিক সত্তা বা পরিচয় ও অর্থনৈতিক স্বাধীনতা এবং তার নিজের নাম ও বংশপরিচয় বজায় রাখার অধিকার। 

    খ. পরিবারের ভরণপোষণ ও সার্বিক কল্যাণের দায়দায়িত্ব স্বামীর ওপর বর্তাবে। অন্য ধারা ৭-এ বাবা-মা এবং শিশুদের অধিকারের কথা বলা হয়েছে। প্রতিটি মানুষের শিক্ষার অধিকারের কথা ধারা ৯-এ বলা হয়েছে।

    অনুবাদ : ধারা ৯
    ক. জ্ঞানার্জন বাধ্যতামূলক এবং শিক্ষার সুব্যবস্থা করা সমাজ ও রাষ্ট্রের কর্তব্য। রাষ্ট্র শিক্ষা অর্জনের সব পদ্ধতিকে সহজলভ্য করবে এবং সমাজের স্বার্থে শিক্ষাকে বহুমুখী করার প্রতিশ্রুতি দেবে যেন তা মানবজাতির কল্যাণে মানুষকে ইসলাম ধর্ম ও সমগ্র বিশ্বের প্রকৃত অবস্থার সাথে পরিচিত করে তোলে।

    খ. বিভিন্ন শিক্ষা ও পথ নির্দেশনামূলক প্রতিষ্ঠান যেমন পরিবার, স্কুল, বিশ্ববিদ্যালয়, প্রচারমাধ্যম প্রভৃতি থেকে ধর্মীয় এবং দুনিয়াবি শিক্ষালাভের অধিকার প্রতিটি মানুষের রয়েছে। তার এ শিক্ষালাভের অধিকার এমন যে, তা ভারসাম্য ও সমগ্রতা পায় তার ব্যক্তিত্ব বিকাশে। স্রষ্টার প্রতি বিশ্বাস (ঈমান) দৃঢ়করণে, তার অধিকার ও কর্তব্য বা বাধ্যবাধকতার প্রতি শ্রদ্ধা এবং এর সুরক্ষার ব্যাপারে এ শিক্ষা তার ভেতরে এনে দেয় উৎকর্ষ। 

    এ সনদের ১১ নম্বর ধারায় বলা হয়েছে প্রতিটি মানুষ স্বাধীন সত্তা হিসেবে জন্ম নেয়। কাউকে দাস করা যাবে না, গোলাম করা যাবে না, সব ধরনের উপনিবেশবাদ নিষিদ্ধ। তেমনিভাবে অন্যান্য ধারায় মানুষের চলাফেরার স্বাধীনতার কথা বলা হয়েছে। সবারই কাজ করার অধিকার থাকার কথা বলা হয়েছে। সুদ নিষিদ্ধের কথা বলা হয়েছে। আইনসম্মতভাবে যে সম্পত্তির মালিকানা থাকবে তা ভোগের অধিকারের কথা ১৫ নম্বর ধারায় বলা হয়েছে। ধারা ১৭-এ পরিচ্ছন্ন পরিবেশে বসবাসের অধিকারের কথা বলা হয়েছে। ১৮ নম্বর ধারায় নিরাপত্তার সাথে বাস করার অধিকারের কথা আছে। ধারা-২০-এ অন্যায়ভাবে কাউকে গ্রেফতার করা যাবে না বলে উল্লেখ করা হয়েছে। কাউকে জিম্মি বা পণবন্দী না করার ব্যাপারে ২১ নম্বর ধারায় উল্লেখ করা হয়েছে। তেমনিভাবে এখানে বলা হয়েছে সবারই তার মত প্রকাশের স্বাধীনতা রয়েছে, যদি তা শরিয়তের নীতিমালার বিরোধী না হয়।

    ধারা-২২-এ বলা হয়েছে দায়িত্ব বা ক্ষমতা আমানতমাত্র। ধারা-২৪-এ বলা হয়েছে, এ সনদের আলোকে যা কিছু দেয়া হয়েছে এগুলো ইসলামি শরিয়তের আওতায় হবে। যদি কোনো কিছুর ব্যাখ্যার প্রয়োজন হয় তাহলে সেটি ইসলামি শরিয়াহ থেকে নিতে হবে। এ কথা সর্বশেষ ধারা-২৫-এ বলা হয়েছে। এতে বলা হয়েছে, The Islamic Shariah is the only source of reference for the explanation or clarification of any of the articles of this Declaration.

    মুসলিম বিশ্বের জন্য এ সনদ অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ। দুঃখের সাথে বলতে হয়, এ দলিলটি যতটা প্রচার হওয়া দরকার ছিল এটি সেভাবে হয়নি। আশা করি ভবিষ্যতে এটি ব্যাপকভাবে ছড়াবে। ইসলামের আলোকে সর্বসম্মত মানবাধিকার ঘোষণার এ অত্যন্ত মূল্যবান দলিলের মাধ্যমে আমাদের জাতি-সমাজ গড়ে তোলার চেষ্টা করতে হবে। (Naya Diganta)
    লেখক : সাবেক সচিব, বাংলাদেশ সরকার


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    Dear friends,
     We are celebrating the Joint Birth Anniversary of Rashtrapita Jyotirao Phule and Dr Babasahab Ambedkar at Thane on 11th April 2015. Hon. Indumati Khaparde( wife of Hon. D.K.Khaparde) will inaugurate the function. Please find the attached handbill of the program. Kindly attend the program.

    With regards,
    Sanjay Somkuwar.

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    पुस्तक समीक्षा

    'आणा-भ्वीणा 'पीछे छूटते समय की एक समळऔण

                                                                                 वीरेन्द्र पंवार

                                                                                         

    आणा-भ्वीणा का शाब्दिक अर्थ है पहेलियाँ। सुधीर बर्त्वाल गढ़वाली भासा और साहित्य के लिए नया नाम हैलेकिन*आणा-भ्वीणा* नाम से गढ़वाली में पहेलियो को प्रकाशित कर उन्होंने सराहनीय कार्य किया है। मेरी दृस्टि में गढ़वाली में पहेलियों का ये पहला संकलन है ! इससे पूर्व कहावते और मुहावरों के संकलन प्रकाशित हुवे हैं। गढ़वाली भासा एवं साहित्य में इस महत्वपूर्ण अवदान के लिए सुधीर बर्त्वाल बधाई के पात्र हैं। असल में आणा-भ्वीणा पीछे छूटते समय की एक समळऔण हैं।

                लोकसमाज में आज विज्ञानंटेक्नॉलॉजीमोबाइल,इंटरनेट और संचार के तमाम संसाधनों की घुसपैठ के बाद भले ही इन् पहेलियों का अस्तित्व कहीं खो सा गया है,बावजूद इसके इनका महत्व है। गढ़वाल के जीवन में संघर्ष,विरह और करुणा व्याप्त रही है,युगों तक यहाँ का लोकजीवन प्रायःस्थिर रहा हैआज की भांति उसमे गतिशीलता कम रही है। पहेली पर्वतीय लोकसमाज के उसी युग का प्रतिनिधित्व करती है। इन्में गढ़वाल के लोकजीवन की झलक देखि जा सकती है। सुधीर बर्त्वाल ने ऐसी विधा का डॉक्यूमेंटेशन किया है,जो साहित्य का हिस्सा भले ही न रही हो, भले ही ये टाइम-पास का  साधन रही होंलेकिन पहेलियाँ लोकरंजन के साधन के रूप में लोकसमाज का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं ।कालान्तर में पहेलियाँ लोकसमाज में काफी प्रचलित रही। इन् पहेलियों की उपस्थिति दर्शाती है परिस्थितयां कैसी भी रही हों,पर्वतीय लोकसमाज में ज्ञानार्जन करने की विधियों की आकांक्षा बलवती रही।

               पहेलियाँ लोकसमाज की अपनी परिकल्पना पर आधारित रचनाएँ हैंजिनमें  प्रश्न सीधे न पूछकर प्रतीकों को माध्यम बनाकर पूछे जाते हैं। इनका सृजन प्रायः मनोविनोद के लिए किया गयाइन् पहेलियों में तर्क और विज्ञानं के बजाय इनको लोकरंजन के एक उपकरण के रूप में अधिक देखा जाता है,इनका उपयोग बुद्धि चातुर्य की परख के रूप में किया जाता रहा है। लेखक ने एक जगह लिखा भी है की कभी कभी पहेलियों के प्रतीक सटीक नहीं बैठते,कभी कभी मजाक में ही सही वाद-विवाद की नौबत आ जाती है।

     ये पहेलियाँ मौखिक रूप में रहीपरन्तु युगों तक जिन्दा रहीं। सभ्यता के इस दौर में संस्कृति के ये पदचिन्ह पीछे छूटते नजर आ रहे हैं, अभी भी इन् पहेलियों को समग्रता के साथ उकेरा नहीं जा सका है। आज ये पहेलियाँ प्रायः लुप्ति के कगार पर हैं । आज के समय में संकलन का यह कार्य श्रमसाध्य ही नहीं कठिन भी हैक्योंकि पुरानी पीढ़ी की मदद के बगैर यह कार्य सम्भव नहीं है। और पुराने जानकार लोग अब कम रह गए हैं।जिनको पहेलियाँ कंठस्त याद हों। ऐसे समय में सुधीर ने इनको उकेरने सहेजने ,संजोने का कार्य किया है। समझा जा सकता है की एक युवा रचनाकार के लिए यह चुनौती भरा कार्य रहा होगा। 

    लोक समाज में इन् पहेलियों का चलन और इनकी उपस्थिति एक सुखद अनुभूति देते हैं। संकलन में लगभग ४२९ पहेलियां संकलित हैं,१०० मुहावरे १०० कहावतें संकलित की गयी हैं।गढ़वाली के शब्द-युग्म एवं ब्यावहरिक बोधक शब्दों का संकलन कर लेखक ने इस कृति को दिलचस्प बना दिया है।पहेलियों के रूप में लोकभासा प्रेमियों के लिए आणा-भ्वीणा एक अच्छी सौगात है। संकलन में तल्ला नागपूरया भासा अपनी रवानगी पर है।संस्कृति प्रकाशन अगस्तमुनि की साफ़ सुथरी छपाई ने इस संकलन को ख़ूबसूरत आकार दिया है।पुस्तक की कीमत १०० रुपए है। लेखक सुधीर बर्त्वाल  का  फोन नंबर ९४१२११६३७६।


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    आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आणि त्याच्याशी निगडित शेकडो संघटना तसेच खाटे बुद्धिजीवी पुराणांत आणि शास्त्रांमध्ये असलेल्या आणि धर्माच्या वेष्टनात गुंडाळून ठेवलेल्या महान भौतिकवादी परंपरा आणि वैज्ञानिक उपलब्धींच्या जागी मिथक, भाकडकथा यांनाच प्राचीन भारताच्या वैज्ञानिक उपलब्धींच्या रूपात प्रस्तुत करण्याच्या आपल्या फॅसिस्ट अजेंड्यावर मोठ्या प्रमाणात काम करत आहेत. आपण विसरता कामा नये की फॅसिस्ट शक्तींचा पहिला हल्ला जनतेची तर्कशक्ती आणि इतिहासबोध यांवरच असतो. तर्कशक्ती आणि इतिहासबोध ह्यांनी रिक्त समाजमानस फॅसिस्ट अजेंड्यावर संघटित करणे नेहमीच सोपे असते. जर्मनीमध्ये हिटलरने पाठ्यपुस्तकांचे पुनर्लेखन करावयास लावले होते, हा निव्वळ योगायोग नाही. त्याने जर्मन समाजाचे हरवलेले वैभव पुन्हा प्राप्त करून देण्याचे आश्वासन जनतेला दिले होते आणि जर्मनीला जगातील सर्वात शक्तिशाली देश बनवण्याचे स्वप्न दाखवले होते. आज आपणसुद्धा चहूबाजूंनी अश्या असंख्य घटना घडताना बघत आहोत.

    आपण हेही लक्षात घेतले पाहिजे की अंधविश्वास आणि इतिहासोन्मुखता यांच्या वाढत्या ज्वराचा संबंध केवळ आर.एस.एस, भाजपा किंवा त्यांच्या सहयोगी संघटनांपुरता मर्यादित नाही. आज ही एक विश्वव्यापी परिघटना बनली आहे आणि वेगवेगळ्या धार्मिक कटृरपंथी आणि पुनरुत्थानवादी शक्ती ह्यामध्ये सहभागी आहेत. ह्या परिघटनेचा वस्तुगत आधार भांडवलशाहीच्या विश्वव्यापी पतनोन्मुखतेमध्ये निहित आहे. आज जागतिक भांडवलशाही तिच्या स्वाभाविक गतीने अशा स्थितीला येऊन पोहोचली आहे जेथून तिच्याकडे जनतेला देण्यासाठी सकारात्मक असे काहीही उरलेले नाही. विज्ञान, कला आणि इतिहास ही क्षेत्रेसुद्धा ह्याला अपवाद नाहीत. भांडवलाचे वर्चस्व कायम राखण्यासाठी भांडवलशाही स्वयंस्फूर्त गतीने समाजात अंधविश्वास, अंधभक्ति, कूपमंडूकता आणि इतिहासोन्मुखता ह्यासारख्या टाकावू मूल्यांना खतपाणी घालत आहे. अनिर्बंध भांडवली शक्तीचे अस्तित्व कायम ठेवण्यासाठी आवश्यकता असते ती म्हणजे सर्व प्रकारच्या पुरातन आणि नवनवीन अंध-उन्मादी विचारांना समाजाच्या धमन्यांमध्ये भिनवले जाण्याची! आर.एस.एस आणि भाजप यांचा तथाकथित वैज्ञानिक-सांस्कृतिक अजेंडा प्रत्यक्षात भारतीय भांडवली वर्गाच्या ह्याच अचेतन वस्तुगत आवश्यकतेची सचेतन अभिव्यक्ति आहे.
    http://sfuling.com/archives/147
    भारतीय विज्ञान परिषद - वैज्ञानिक तर्कपद्धतीचे श्राद्ध घालण्याची तयारी - स्‍फुलिंग
    sfuling.com
    आपण विसरता कामा नये की फॅसिस्ट शक्तींचा पहिला हल्ला जनतेची तर्कशक्ती आणि इतिहासबोध यांवरच असतो. तर्क...

    AFSPA not to be revoked in neither in Kashmir nor in the North East as Salwa Judum intensified!

    PDF saves Face and not to be part of NDA in Delhi.

    Our dearest iron lady Irom Sharmila might be on Hunger Strike for another fourteen years!


    Deputy CM Brings Bill to amend  temple and Shrines regulation to ensure the biggest push for Hindutva in the Valley

    Deputy CM speaks Hindutva:

    • Some people in administration are hatching plots

    • Action will be taken against conspirators

    • PDP-BJP alliance is beginning of a new chapter

    • Govt won't accept any unconstitutional matter

    • We're committed to ensure return of KPs to Valley


    Palash Biswas

    AFSPA not to be revoked in neitehr in Kashmir nor in the North East as Salwa Judum intensified!


    Media reports say that after Integrated Action Plan (IAP) that faces termination another key special infrastructure scheme (SIS) for Naxalaffected states is on the verge of closure because of devolution of central pool of taxes to the states.

    The key security scheme was meant for four states -- Chhattisgarh, Jharkhand, Odisha and Bihar -- to help them create Special Anti-Naxal Forces (SANF) based on the highly successful model of Andhra Pradesh's elite Greyhounds crack commando force.\

    On the other hand,the ongoing anti-Naxal operation will be made more effective and in order to give the Red rebels a run for their money, additional police camps in Maoist-hit Dumaria-Imamganj region of the district will be set up. The decision was taken at a high-level meeting of police and CRPF officials. IG operations Sushil Khopade chaired the meet.The meet assumes importance in view of the recent spurt in Maoist activities in the region, incidents of land mine blasts, escalation in turf war between rival Naxalite organizations and perceived trust deficit between Bihar police and CRPF on a host of issues including the location of additional police camps. However, IG operations Sushil Khopade vehemently denied any trust deficit between agencies engaged in anti-Naxal operations. There was perfect coordination and the situation on the Naxal front was fully under control, asserted Khopade.

    On the other hand,Police in Telangana on Monday continued combing operations for one more terror suspect believed to be holed up in Nalgonda district, where two operatives of the banned SIMI were killed in a gunfight on Saturday.


    Six police teams and personnel of elite anti-Maoist force Greyhounds are participating in the large-scale operations at different places in Nalgonda districts and also a part of neighbouring Warangal district.



    Our dearest iron lady Irom Sharmila might be on Hunger Strike for another fourteen years!

    AFSPA not to be revoked in Kashmir,PDF saves Face and not to be part of NDA in Delhi but Deputy CM Brings Bill to amend  temple and Shrines regulation to ensure the biggest push for Hindutva in the Valley.The government yesterday withdrew the controversial circular asking constitutional authorities to maintain the sanctity of the state flag, saying it was not approved by a "competent authority".However, Deputy CM termed the PDP-BJP alliance as a beginning of a new chapter, a new experiment, despite the religious and regional divide.


    "We should forget the past. People are deprived of their rights for last 67 years. There is new environment and new vision and ideology. We are honestly working for betterment of J&K and the country, we have entered into the alliance," he said.


    On setting up of Kashmiri temple and Shrines bill, Singh said "We are very serious on temple bill. We will sit with them and work — how we will be able to iron out those circumstances, and in new atmosphere and in government, we will do better."



    Deputy CM speaks Hindutva:

    • Some people in administration are hatching plots

    • Action will be taken against conspirators

    • PDP-BJP alliance is beginning of a new chapter

    • Govt won't accept any unconstitutional matter

    • We're committed to ensure return of KPs to Valley



    Meanwhile,AFSPA not to be revoked in Kashmir,PDF saves Face and not to be part of NDA in Delhi but Deputy CM Brings Bill to

    Deputy Chief Minister Nirmal Singh on Friday after the deadly militant attack in Jammu said time was not proper to discuss the revocation of AFSPA from Jammu and Kashmir.

    A civilian and three forces personnel were killed on Friday when two heavily-armed militants stormed a police station in Jammu and Kashmir before being gunned down.

    Singh said that as the government is mulling to make the system better in the state and to provide effective governance to the people, certain elements in Pakistan get disrupted and try to foil the peace efforts of the state dispensation.

    He maintained further that the issues could be resolved on table and by holding negotiations but it seems that Pakistan doesn't want peace in the already terror ridden state of Jammu and Kashmir, "The government here is leaving no stone unturned to make establish peace and provide god governance in Jammu and Kashmir but always it is our neighbour which strives to disrupt the process," Singh said.

    Over the revocation of AFSPA from the state, the deputy chief minister remarked that his party has a stated position over scraping any such law and that unfortunately the issue is being deeply and severely politicized than being discussed. "It is very unfortunate that AFSPA has now become a political issue and people are trying to score political goals by raising it. Our party has a stand that AFSPA could be revoked from any place in the state depending upon the security scenario."

    "I don't think we can discuss the revocation of AFSPA at present. It is not the proper time. You have seen how militants are trying to create havoc in the state and what we all should do is to commend our security forces who are rendering sacrifices of their precious lives for the state. How could one talk about AFSPA revocation at present?"



    While replying to a question, he said that there were conspiracies before this (flag issue) and in future "we expect such conspiracies."

    "Yesterday, an attempt was made, on which the government's stand has come. There are some people in this administration, either they are not playing their role or they are… They had to play the role of informing the government, which is highest body, (on vital issue), due to which this controversy has been created. Before this, such incidents have taken place. In future, we will see what corrective measures would be taken," Singh said.

    Asked if the government would punish those responsible, Singh said "definitely, action would be taken. We have already said yesterday."

    He further said that they have just entered into the government. "The way the mandate has been given by the people, and the government that has been formed, we get information from press and media about the conspiracies."

    "But the way north pole and south pole (are in power) and central pole has been setup, the government has enthusiasm to work for the betterment of the people of J&K. We will continue with it," Singh said.

    Deputy CM termed the PDP-BJP alliance as a beginning of a new chapter, a new experiment, despite the religious and regional divide.

    "We should forget the past. People are deprived of their rights for last 67 years. There is new environment and new vision and ideology. We are honestly working for betterment of J&K and the country, we have entered into the alliance," he said.

    Replying to a question about the resolution by Independent MLA Engineer Rashid about return of mortal remains of Afzal Guru, Singh said the government will not accept any unconstitutional matter.

    "When I talk of the state government, I talk about all the coalition partners. BJP will play its role. Other will also perform their role, we hope so," he added.

    On the issue of return of displaced Kashmiri Pandits to the Valley, the Deputy CM said, "It is the commitment of the state government to ensure return of KPs back to Valley. I appeal the community to provide full cooperation to the government".

    On setting up of Kashmiri temple and Shrines bill, Singh said "We are very serious on temple bill. We will sit with them and work — how we will be able to iron out those circumstances, and in new atmosphere and in government, we will do better."

    The government yesterday withdrew the controversial circular asking constitutional authorities to maintain the sanctity of the state flag, saying it was not approved by a "competent authority".

    The government said appropriate administrative action will be taken after enquiry into the circumstances leading to the issuing of this circular.

    "The draft of the circular was not approved by the competent authority before issue of the same on March 12, 2015 and as such stands withdrawn with immediate effect," an official spokesman had said yesterday.

    Appropriate administrative action will be taken after enquiry into the circumstances leading to the issuing of this circular, he added.

    Mufti government had on Thursday issued a circular asking all constitutional authorities to maintain the sanctity of the state flag, at all costs, as is being done in respect of the National flag.

    Jammu and Kashmir has a separate constitution and separate flag unlike other states under special status.



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    Land bill controversy: It's clear who's telling lies now

    • Sitaram Yechury
    In his, by now 'compulsory' address on the State-owned radio, Mann ki baat, on March 22, Prime Minister Narendra Modi accused the combined Opposition in Parliament opposing the amendments moved by this government to the land acquisition Bill, 2013 of spreading a pack of 'lies' as a 'conspiracy' to undermine farmers' interests.

    Now, the recent BJP's two-day national executive in Bengaluru vowed to oppose the Opposition's 'disinformation campaign'. The national media reported that 'the land ordinance entirely dominated' this meeting (Hindustan Times, April 5). Saying that the reality was different from that propagated by the Opposition, a booklet titled 'Information about Disinformation' was circulated at the meeting. The PM said that unlike the previous governments that worked for the rich, his government is working for the poor.

    In an unprecedented manner, the Rajya Sabha has been 'prorogued' to facilitate the re-issuance of the land acquisition ordinance a day before the earlier ordinance lapsed on April 5.

    Proroguing one House during a session to facilitate the issuance of ordinances has been only in the rarest of rare cases in our Parliament's history. It may have been necessary under situations when the state budgets needed to be approved in time for states under President's rule, but never in recent history has this happened for the promulgation of a law.

    By taking recourse to such methods, a peculiar situation has developed when the finance Bill, which was introduced in the 234th session of the Rajya Sabha, will now be sent back to the Lok Sabha in the 235th session, whenever the president issues fresh summons for this.

    The power to issue an ordinance is a British legacy of retaining control by the Crown, overruling the opinion of even the highly restricted and selected legislative bodies under colonial rule.

    In the Constituent Assembly, Hriday Nath Kunzru objected to continuing with this provision in independent India's Constitution, pointing out that the ordinance-making power of the governor general under the Government of India Act 1935 has always "been unpopular".

    Replying while rejecting the removal of this provision in our Constitution, BR Ambedkar said: "My submission to the House is that it is not difficult to imagine cases where the powers conferred by the ordinary law existing at any particular moment may be deficient to deal with a situation, which may suddenly and immediately arise….The emergency must be dealt with, and it seems to me that the only solution is to confer upon the President the power to promulgate a law, which will enable the executive to deal with that particular situation because it cannot resort to the ordinary process of law because again ex-hypothesi the legislature is not in session."

    Hence, Article 123 is there in our Constitution.

    Does the re-issuance of the land ordinance, in the face of the opposition by the majority in the Rajya Sabha, fall under such an 'emergency'? In creating a situation by proroguing an ongoing Parliament session to facilitate the re-issuance of this ordinance, is the Modi government not dangerously tweaking our Constitution and parliamentary procedures and moving towards authoritarian rule?

    Why such desperation to re-issue this ordinance? Why is such a campaign of untruths charging the Opposition with spreading 'lies' being unleashed by the PM? Is it a lie to say that the BJP had fully supported the passing of the 2013 land acquisition Act? Then why these changes now? Do these changes not suggest that Modi is bringing them to benefit both the foreign and domestic corporates at the expense of the already beleaguered Indian farmer? Therefore, is this not an attempt to actualise the 'pay-back time' to benefit those who liberally financed Modi's electoral campaign?

    The original law stipulated a percentage of consent of the families of farmers (70-80%) whose land is being acquired. The Modi government ordinance added a new section (10A) increasing the number in the special category that are exempt from such consent requirements — industrial corridors and infrastructure projects, including projects under public-private-partnership.

    The earlier law required a social impact assessment and review by an expert group and defined a bar on the acquisition of multi-crop agricultural land. Have these not been removed with regard to the new five items added to the special category, Mr Prime Minister?

    Is it a lie, Mr Prime Minister, that Section 24 (2) has been amended? The earlier Bill allowed the return of the acquired land if the award had been made five or more years prior to the coming into force of the 2013 law (i.e. any award passed on or before January 1, 2009) provided either compensation had not been paid or physical possession had not been taken.

    Is this provision now not being amended, Mr Prime Minister, in favour of the corporates acquiring land and against the interests of the farmer? During the last week of the Parliament session, the Rajya Sabha was informed in a written reply by the minister concerned that of the land already acquired for special economic zones (SEZs) nearly half is lying unutilised even after five years.

    Has not the Modi government amended and expanded the definition of industrial corridors to include land up to 1 kilometre on either side of the designated road or railway track for such an industrial corridor? Is it not a fact that the amount of land that can be now acquired for the Delhi-Mumbai Industrial Corridor alone is estimated to be a whopping 17.5% of our agricultural land?

    Of course, we need to promote industrialisation. But not 'crony' capitalism. Protect our agriculture and the kisans'— our annadaataas — livelihood and prevent them from being pushed into a faster pace of committing distress suicides. No industrialisation has ever succeeded by adversely affecting the food security of any country.

    Sitaram Yechury is CPI(M) Politburo member and Rajya Sabha MP
    The views expressed by the author are personal


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