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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    लोक शब्दों का कारखाना है. यहाँ युग की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न अर्थहीन से लगने वाले ध्वनिपुंजों के संयोग से नये और अर्थवान शब्द ढाले जाते रहते हैं. उनका पुनर्गठन, रूपान्तरण, आमेलन ही नहीं किया जाता अपितु आवश्यकता पड़्ने पर उन्हें विशिष्ट अभिप्रायों से मण्डित भी किया जाता है जहाँ इनसे काम नहीं चलता, वहाँ दूसरी भाषाओं से उधार लेकर काम चलाया जाता है. और इस प्रकार वे किसी वस्तु या भाव की स्पष्ट पहचान के वाहक बन जाते हैं. 

    किसी भी अनुभूति के विविध रूपों के लिए बोलियों में जितने भिन्न-भिन्न शब्द मिलते हैं, उतने दुनिया की किसी भी नागर भाषा में नहीं मिलते. उदाहरण के लिए दुर्गन्ध शब्द को लें. नागर भाषा में यह अकेला शब्द है पर लोक में दुर्गन्ध के विविध प्रकारों के लिए अलग-अलग शब्द हैं जैसे कुमाऊनी में खौसैनी (मिर्च के जलने की दुर्गन्ध), किहड़ैनी (ऊन जलने की दुर्गन्ध) चुरैनी (शौचालय की दुर्गन्ध) सिमरैनी ( पानी के जमा होने और सड़्ने की दुर्गन्ध), बोकड़ैनी ( किसी व्यक्ति की काँख से निकलने वाली दुर्गन्ध, बथड़ैनी ( कुल्ला न करने वाले व्यक्ति के मुह से निकलने वाली दुर्गन्ध), भुबैनि ( अधपके चिचंडा आदि की गंध) आदि. 

    लोक केवल गन्ध विश्लेषक शब्दों का सृजन नहीं करता, दृश्यमान जगत को रूपायित करने वाले शब्दों का भी सृजन करता है. उदाहरण के लिए कुमाऊनी में सूर्योदय से पहले के प्रकाश के लिए भुर-भुर उज्याव, और खिली चाँदनी के लिए फूल-फटक ज्यूनि, घने अँधेरे लिए घुप्प अन्यार, लज्जा के कारण रोकने का प्रयास करने पर ओठों पर उभर आने वाली मुस्कान के लिए मुल-मुल-हँसी, और किसी घटना की जीवन्त अभिव्यक्ति के लिए ध्वन्यात्मक शब्दों यथा कुमाऊनी में प्या्च्च पिचक गया, क्याच्च काट दिया पट्ट ( किसी ठोस जमीन पर) गिर गया. बद्द ( किसी बिछी हुई या कोमल भूमि पर) गिर गया, लोटि गो (गिर गया) भथड़्क्क ( किसी मोटे व्यक्ति का गिरना) गिर गया, फसड़्क्क फिसल गया शब्द लोक कि सहज और निर्बाध सृजन क्षमता के ऐसे प्रतीक है जो किसी भी नागर भाषा में दुर्लभ होते हैं. 

    कुमाऊनी में एक शब्द है 'निमैल' . हिन्दी का गुनगुना या गुनगुनी शब्द इसके निकट होते हुए भी "निमैल'की गहराई तक नहीं पहुँचते. बाहर कड़ाके की ठंड से या ठंडे पानी से नहाने के बाद थोड़ी देर बिस्तर पर ओढ़ कर लेट जाइए, या अंगीठी के पास बैठ जाइए. कुछ देर में आप निमैल का अनुभव करने लगेंगे. नागर भाषा का कोई अकेला शब्द इतनी विशिष्ट व्यंजना दे सकता है. इस में संदेह है. उद्धवशतक के गहबरि आयो गरो भभरि अचानक त्यों, प्रेम पर्यो चपल चुचाई पुतरीनी सों में तो 'भभरि'और 'चुचाइ'जैसा जीवन्त विम्ब-विधान भी लोक की ही देन है.

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    कुमाऊनी सांस्कृति और द्रविड़ संस्कृति
    आज द्रविड़ भाषा और संस्कृति की मुख्य भूमि दक्षिण भारत है, लेकिन अतीत में इस भाषा-परिवार की भाषाएँ और संस्कृति पूरे भारत में ही नहीं, पश्चिम में बिलोचिस्तान और कुछ विद्वानों के अनुसार तो अफ्रीका में सहारा मरुस्थल के उस पार तक फैली हुई थीं। वर्तमान में इस भाषा-परिवार की तमिल, मलयालम, कन्नड़ तथा तेलगु जैसी प्रमुख भाषाएँ और इरुल, कुरुम्ब, कोडगु, टोडा, कोट, बदग, कोरगा, तुलू, गौंडी, कोण्डा, कुई, कुवी, पैंगो, मंडा, कोलामी, नैक्री, नैकी (चंडा), पर्जी, ओल्लारी, गडबा, ब्राहुई (बिलोचिस्तान), कुरुक्ष ( नेपाल) तथा माल्टो (झारखंड) आदि बोलियाँ भारतीय उप महाद्वीप में बोली जाती हैं। 

    द्रविड़ भाषा परिवार की भाषाओं और बोलियों के इस भौगोलिक वितरण से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आर्यो के प्रसार से पूर्व द्रविड़ भाषा-भाषी जन पूरे भारत में फैले हुए थे। आर्यो के प्रसार और उनके सांस्कृतिक प्रभुत्व के कारण द्रविड़ भाषाएँ उसी प्रकार दक्षिण की ओर सिमटती गयीं जिस प्रकार हिन्दी के वर्चस्व के कारण कुमाऊनी और गढ़वाली भाषाएँ धीरे-धीरे कुमाऊँ और गढ़वाल के अन्तवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों की ओर सिमटती जा रही हैं। 

    आर्यो के आगमन से पूर्व भारत के अन्य क्षेत्रों की तरह ही मध्य हिमालय में भी आर्येतर प्रजातियाँ निवास करती थीं। इनमें से अनेक प्रजातियाँ पहले खशों के और बाद में आर्यो के इस अंचल में प्रवेश के बाद या तो पलायन करने के लिए विवश हुईं अथवा कालक्रम में नवांगतुकों में ही समंजित हो गयीं। उन्होंने यहाँ की भाषा और संस्कृति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। मध्य पहाड़ी के शब्द-समूह के विकास में जहाँ भारतीय आर्य भाषा परिवार की विभिन्न युगों की भाषाओं के शब्द-समूहों की प्रमुख भूमिका है वहीं आर्येतर भाषाओं का भी योगदान नकारा नहीं जा सकता। इनमें सर्वाधिक योगदान द्रविड़ भाषाओं के शब्द-समूह का है। 

    अभी तक मध्य पहाड़ी के आर्येतर शब्द-समूह का जितना संकलन हो पाया है उनकी द्रविड़ भाषाओं के शब्दकोशों में उपलब्ध शब्दों के साथ ध्वनि और अर्थ की दृष्टि से तुलना करने पर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि द्रविड़ परिवार की बोलियों के शब्द-समूह और मध्य पहाड़ी के शब्द-समूह का समग्र संकलन और परितुलन कर लिया जाय तो मध्य पहाड़ी के शब्द-समूह का कम से कम दशमांश द्रविड़ भाषाओं से अधिगृहीत सिद्ध होगा । 

    केवल शब्द ही नहीं कुमाऊँ के स्थान-नामों के साथ बहुत से ऐसे प्रत्यय जुडे़ हैं जिनकी सार्थक पहचान केवल द्रविड़ भाषाओं के शब्दों के अवशिष्टांशों के रूप में संभव है। इनमें जोग्यूड़, भुल्यूड़, पठक्यूड़, रज्यूड़ जैसे स्थान-नामों के साथ जुड़ा 'ऊड़' (तमिल 'ऊर'या गाँव), चापड़, राँकड़, कुमड़, दुबड़, कोरड़, दागड़ जैसे स्थान-नामों के साथ संयुक्त 'अड़'प्रत्यय ( मलयालम 'अड या आश्रय स्थल और तमिल में चारों ओर से घिरा स्थान ) बिषाड़, तुनाड़, तलाड़, कमराड़, बबियाड़, सिमराड़, ककलाड़ी भिताड़ी दड़माड़ी, जोग्याड़ी जैसे स्थान-नामों के साथ संयुक्त 'आड़'तथा 'आड़ी'जैसे प्रत्यय ( भले ही इन्हें गाड़ (छोटी नदी) का वाचक माना जाता हो, द्रविड़ भाषाओं के 'अड' (आश्रयस्थल) की ही देन हैं। इसीतरह बीसाबजेड, संगेड, लझेड, कसेड़़़, भटेड़, कलनेड़ी जैसे स्थान-नामों के साथ संयुक्त 'एड़', 'एड़ी'प्रत्यय (द्रविड़ भाषाओं के 'एडम'या स्थान) उल्लेखनीय हैं

    कुमाऊनी के शब्द-समूह में ही नही विभिन्न सांस्कृतिक अवधारणाओं में भी द्रविड़ परंपराओं के अवशेष विद्यमान है। लोक-देवताओं में ऐड़ी, जो आम तौर पर बधाण के समान ही पशुओं का देवता और कहीं-कहीं ग्राम देवता भी माना जाता है, के मूल में द्रविड भाषाओं के एडम (स्थान) का योगदान है। इस प्रकार यह स्थली-देवता या भूमियाँ के रूप में भी सामने आता है। यही नहीं शिव की तरह ही इसकी बारात की कल्पना भी देवताओं की रथयात्रा संबंधी द्रविड़ रीति-रिवाजों से साम्य रखती है। इसी तरह चुडै़ल जो पूरे उत्तरी भारत में भयावह स्त्री प्रेत मानी जाती है और आम तौर पर लड़ाकू स्वभाव की महिलाओं के लिए भी विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त होती है, का मूल भी तमिल के चुडल (श्मशान) शब्द में निहित है। संभवतः इसमें तमिल के चुडल (श्मशान) और स्वभाव में तमिल के ही चुडु (बहुत गरम) का मिश्रण है।

    दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु की लोक-परंपराओं और कुमाऊनी लोक-परंपराओं की तुलना करने पर बहुत सी समानताएँ दिखायी देती हैं । मध्य हिमालय के ग्रामों की तरह ही तमिलनाडु में भी प्रत्येक ग्राम का एक ग्राम देवता होता है जिसे आयनार कहा जाता है। उसमें वही शक्तियाँ निहित मानी जाती हैं जो एक भूमियाँ में होती हैं। कुमाऊँ की तरह ही द्रविड़ परंपरा में भी प्रत्येक लोक देवता की एक निश्चित भोज्य सामग्री है। देवताओं के अवतरण (नचाने) की परंपरा भी सभी आदिम जातियों की विरासत के रूप में दोनों ही क्षेत्रों में विद्यमान है। 

    बच्चों से संबंधित धारणाओं में भी बहुत समानता है। कुमाऊँ के जनों में प्रचलित मान्यताओं के समान ही तमिलनाडु में भी यदि किसी महिला के आरंभिक दो बच्चे जीवित न रहें तो तीसरे बच्चे का नाम ऐसा रखा जाता है जिससे वह बुरी नजर और अकाल मृत्यु से बच सके यथा कुमाऊँ में जोगादत्त (जोगी,) भिखारी, बच्चीनाथ, अमरनाथ, तो तमिलनाडु में कुप्पुस्वामी ( कुप्प -गँवार), पक्किरी (फकीर), पिचाइ (भिखारी) कुप्पाम्मल (गँवारन) आदि। 

    दोनों ही समाजों में शिशु को दर्पण दिखाने का निषेध है और यह माना जाता है कि ऐसा करने पर बच्चा गूँगा हो जाएगा। बच्चों के दाँत गिरने पर कुमाऊँ में उसे दूब में दबा दिया जाता है और यह माना जाता है कि ऐसा करने पर दाँत जल्दी निकलते हैं तो तमिलनाडु में बच्चे के पहले दाँत के गिरने पर उसे गोबर में रख कर छत के किसी कोने में छिपा देते हैं। बच्चों को नजर लगना और उसके निवारण के लिए सिर के ऊपर से तीन बार परिछन दोनों ही क्षेत्रों में समान है। ऐसा लगता है कि तीन का मोटिफ संसार के कई समाजों में पक्के वचन का परिचायक है।

    भारतीयों के रीतिरिवाजों में नारियल और पूगीफल (सुपारी) का महत्व निश्चय ही द्रविड़ों की देन है। कुमाउनी समाज में किसी विवाहित महिला के प्रथम रजोदर्शन को प्रथम संतानोत्पत्ति के समान मानना, शिशु के स्थान पर नारियल का रखा जाना, प्रथम रजवती स्त्री को 'नरुवैकि मै' (नारियल की माँ) नाम से संबोधित करना, सभी संस्कार और परंपराओं को शिशु जन्म के समान ही सम्पन्न करना निश्चय ही द्रविड़ समाज की परंपराओं की देन है। रजोदर्शन के संबंध में द्विजेतर जातियों में विद्यमान कट्टरता भी निश्चय ही आर्येतर जातियों की विरासत है।

    यात्रा संबंधी विश्वासों में कुमाऊँ और तमिलनाडु दोनों ही क्षेत्रों में तलवे में खुजली लगाना भावी यात्रा का संकेत माना जाता है। यात्रा आरंभ करते समय गरुड़, जल से भरा घड़ा, विवाहित महिला, दायीं ओर कौआ, बायीं ओर नाग, बछडे़ को दूध पिलाती गाय का दिखायी देना शुभ माना जाता है। चलते समय सिर का दरवाजे से टकराना, किसी के द्वारा टोक दिया जाना, साँप, बिल्ली, सन्यासी, नाई, विघवा स्त्री द्वारा रास्ता काट दिया जाना अशुभ माना जाता है। यदि ऐसा हो तो यात्री को घर वापस आकर, पानी पीकर तथा थोड़ी देर रुक कर पुनः प्रस्थान करने का विधान है। 

    दोनों ही समाजों में सुबह.सुबह, पानी का भरा बर्तन, मछली, हल्दी या कोई शकुन वाली चीज, गाय बछड़ा, दायीं हथेली, पत्नी का मुँह, पागल, काला बंदर, दिखायी देना, दायीं हथेली का खुजलाना शुभ माना जाता है। यह भी माना जाता है कि सुबह के स्वप्न प्रतिफलित होते हैं।

    दोनों ही समाजों में छींकने के बाद आराध्य देव का नाम लेना अथवा बच्चे के माता.पिता द्वारा 'शतंजीवी'कहने की परंपरा है। तमिल समाज में भी चतुर्थी के चाँद के दर्शन का निषेध है। यह माना जाता है कि ऐसा करने पर स्मृति कमजोर हो जाती है। दोनांे ही समाजों में दाँतों से नाखून काटने का निषेध है। बैठ कर पाँव हिलाते रहनेे की आदत दरिद्रता की निशानी मानी जाती है। बायें हाथ से कोई चीज देना अपमान जनक माना जाता है। टूटे दर्पण में मुँह देखने का निषेध है। दोनों ही समाजों में अन्नादि किसी वस्तु को तोलते या मापते समय पहली माप के लिए एक के स्थान पर आराध्य देव का नाम या लाभवाची शब्द का उच्चारण किया जाता है। दोनो ही समाजों में दूकानदार के सुबह-सुबह सुई और तेल बेचने तथा किसी वस्तु के लिए ना कहने का भी निषेध है। शाम के बाद बाल काटना, नाखून काटना, साँप या नाई का नाम लेना, सुई लेना या देना, सुबह.सुबह, किसी के घर से आग माँगना, बुरा माना जाता है।

    किसी कार्य को किस दिन करना चाहिए अथवा नहीं करना चाहिए, इस बारे में दोनो ही क्षेत्रों में थोड़ी बहुत भिन्नता के बावजूद समानता है। कुमाऊँ में सोमवार को लड़की के मायके से ससुराल जाने का निषेध है तो तमिलनाडु में शुक्रवार को। तमिलनाडु में तो शुक्रवार को किसी को भुगतान भी नहीं किया जाता। मंगल को कोई बड़ा काम आरंभ नहीं किया जाता। बुधवार सर्वोत्तम दिन माना जाता है। वृहस्पति को पहली बार आने वाला अतिथि अच्छा नहीं माना जाता तो कुमाऊँ में मंगल या शनिवार को। 
    उचैण या रोग व्याधि के दूर होने पर पूजा करने के वचन और देवताओं को नवान्न अर्पित करने की परंपरा - 'ओग'दोनो ही समाजों में विद्यमान है।

    अपने-अपने अंचल के वीरों की याद में स्थापित होने वाले वीरस्तम्भ जो मध्यहिमालय में बिरखम और कर्नाटक में वीरगल्लुस कहे जाते हैं लगभग सभी समाजों में विद्यमान हैं। 
    कुमाऊँ में छोलिया नृत्य और कर्नाटक प्रदेश का कोम्बात नृत्य दोनों में विलक्षण समानता है। दोनों ही सामन्ती युद्धों की अनुकृति हैं। अतः इन्हें किसी जाति या प्रजाति विशेष से जोड़ना समीचीन नहीं है। 

    इन समानताओं से ऐसा लगता है कि किसी युग में मध्य हिमालय में द्रविड़ भाषाओं को बोलने वाले जनों का अस्तित्व था। कालान्तर में खशों और आर्य जनों का आधिपत्य हो जाने के बाद या तो वे इस अंचल से भी पलायन के विवश हुए अथवा नवागंतुकों में ही निम्न कही जाने वाली जातियों के रूप में समंजित हो गये। 
    पांडुकेश्वर दानपत्रों में इस अंचल के निवासियों में खस, किरात, द्रविड़, कलिंग गौड, हूण, औड्र, मेद, आन्ध्र, चाण्डाल आदि जनों का उल्लेख भले ही बाहर से देखने पर राजाओं के विरुद वर्णन की अतिशयोक्ति लगे, पर शब्द समूह और परंपराओं का अवगाहन करने पर वे इस अंचल में आर्येतर भाषाओं को बोलने वाले जनों की अवस्थिति के एक और साक्ष्य हैं।

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    ममता मिशन कामयाब,बनने से पहले तीसरा मोर्चा बिखरने लगा,वाम संकट गहराया!

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    ममता मिशन कामयाब,बनने से पहले तीसरा मोर्चा बिखरने लगा,वाम संकट गहराया!

    जैसे जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं,पक्ष से पक्षांतर की दूरी मिटने लगी है।डूबते जहाज छोड़कर चूहों की अंधी दौड़ तेज से तेज होती जा रही है।चुनाव की तारीखें तय हो चुकी हैं।बंगाल में करीब दो महीने के मतदान के कार्यक्रम से साफ जाहिर है कि राज्य में कानून व्यवस्था का जायजा लेकर ही संवेदनशील उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ बंगाल को भी एक पांत में बैठा दिया गया है,जहां चुनावी हिंसा खून की होली में बदल सकती है।


    रोज दर्ज होते चुनाव सर्वेक्षणों के मुताबिक नरेंद्र मोदी का राजसूय यज्ञ की पूर्णाहुति का समय आ गया है।रोज रंग बिरंगे पुरोहितों की कतार लंबी होती जा रही है।तीसरा मोर्चा बनने से पहले ही बिखरने लगा है।अम्मा जयललिता राम विलास पासवान के मुकाबले राजनीतिक मौसम परखने में फीसड्डी नहीं है,फिर उन्होंने साबित किया।भगवा सिंहद्वार खुला रखने की गरज से वाम गठबंधन की उन्होंने बाकायदा भ्रूण हत्या कर दी है। बाकी क्षत्रप तो कसमसाने लगे हैं।लालू क्या करेंगे देखना बाकी है,नीतीश खुद प्रधानमंत्रित्व के दावेदार हैं।बाकी जो लोग तीसरे मोर्चे के चेहरे बनकर उभरे हैं,उनके किसी भी खेमे में रम जाने की भारी गुंजाइश है।


    वाम दलों की हालत बंगाल में सबसे ज्यादा खराब है।बांकुड़ा में नौ बार के सांसद बुजुर्ग कामरेड वासुदेव अचारिया तक की हालत पतली है।उनके मुकाबले सुचित्रा सेन की बेटी अभिनेत्री मुनमुन सेन का दावा मजबूत समझा जा रहा है।सुभाषिणी अली को बैरकपुर के कुरुऎक्षेत्र में झांसी की रानी की तर्ज पर मोर्चाबंद तो कर दिया गया है,लेकिन वहां उनके वीरगति प्राप्त करने के ही आसार हैं।संसद में शायद सबसे ज्यादा मुखर गुरुदास दासगुप्त इसबार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं,इसके बदले वाममोर्चा ने पिटे हुे नक्सली नेता संतोष राणा को मैदान में उतारा है,जिनके मुकाबले बंगाली फिल्मों के सुपरस्टार देब को खड़ा करके दीदी ने तुरुप का पत्ता फेंका है।दीदी ने पिछले चुनावों में हारी हुई सीटों पर चमकदार चेहरे पेश कर दिये हैं,सर्वत्र लड़ाई दिलचस्प हो गयी है।जंगल महल और मेदिनी पुर में वामदल खस्ता हाल हैं और उत्तर व दक्षिण 24 परगना समेत कोलकाता में हालत सुधरी नहीं है।रज्जाक मोल्ला के बहिस्कार के बाद मुसलमान वोट बैंक तो छीज ही गया है,जिसके बारह मुस्लिम उम्मीदवार सजाने से बढ़ने के कोई आसार नहीं है।


    इसके अलावा त्रिपुरा में भी दोनों सीेटें जीतने के लिए लोहे के चने चबाने पड़ेंगे कामरेडों को।दीदी ने त्रिपुरा समेत पूरे उत्तर पूर्व में जबर्दस्त मोर्चाबंदी कर दी है।उत्तर में सिरे से अनुपस्थित कामरेडों का दक्षिण में एकमात्र मरुद्यान केरल है,वहां वे कितने गुल खिला पायेंगे,कहना मुश्किल है।


    पिछले चुनावों में जिस मायावती को बाकायदा प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाकर पेश किया था वामदलों ने,उनकी ओर से तीसरे मोर्चे के प्लेट पर घास भी नहीं परोसा जा रहा है।जाहिर है कि मुलायम अपनी नाव केशरिया जहाज से भिड़ायें,इससे पहले नीले और केशरिया झंडे एकाकार हो जाने की प्रबल संभावना है।असम गण परिषद और बीजू जनता दल के केशऱिया होने न होने की कोई राजनैतिक मजबूरी नहीं है।बाकी रही सही कसर राम विलास पासवान और उदितराज ने पूरी कर दी है।


    हालत कितनी संगीन है,समझ लीजिये,वाम मोर्चा सरकारों में लगातार मंत्री रहे किरणमय नंद ने अपनी दुकान अलग कर ली है और उनकी समाज वादी पार्टी ने बंगाल में वाम विरोधी चार चार उम्मीदवार मैदान में उतार दिये हैं।वामदलों के लिए राहत यह है कि नजरुल इस्लाम के मूलनिवासी एजंडे में फिलहाल लोकसभा चुनाव नहीं है और सामाजिक न्याय मोर्चा वाले बहिस्कृत रज्जाक मोल्ला ने माकपा के खिलाफ फिलहाल उम्मीदवार खड़ा न करने की घोषणा कर दी है।


    लेकिन दलितों के वोट इसबार और कटेंगे।वाम खेमे में ,यहां तक कि नौ फरवरी का ब्रिगेड रैली में रहे मतुा शंघातिपति कपिल कृष्ण ठाकुर अब वन गांव से तृणमूल उम्मीदवार हैं। उनका छोटा भाई मंजुल पहले से दीदी के मंत्रिमंडल में हैंं।मतुआ वोटबैंक बहुत मजबूत है और वहां से कोई तिनका भी वामदलों को अब हासिल होने से रहा।


    कही ऐसा न हो कि तीसरे मोर्चे के नाम पर वाम दल एकदम अकेले न हो जाये कांग्रेस की तरह। आसार ऐसे ही नजर आ रहे हैं।बाकी अब नीतीश का भरोसा है। वे भी कब बिहार का राजपाट संबालने की गरज से पलटी खा जायेंगे,कोई ठिकाना नहीं है।


    नरेंद्र मोदी को निष्कंटक बनाने का दीदी का मिशन कामयाबी के रोज नये झंडे गाड़ रहा है।सचमुच राष्ट्रीय राजनीति में कारगर सकारात्मक हस्तक्षेप दीदी को करना होता तो वे सर्वत्र अगंभीर उम्मीदवार खड़ा करके मौन सांसदों की टीम बनाने की कोशिश नही करती।पिछली संसद में दीदी की फिल्मी जोड़ी तापस पाल और शताब्दी राय ने एक भी प्रश्न नहीं पूछा है।अब समझ लीजिये कि दीदी का लोकतंत्र यही है कि वफादार गूंगे लोग चमकदार चेहरे के साथ संसद में हाजिरी लगाये और बाकी जो कुछ भी करना हो,दीदी खुद करेंगी।राष्ट्रीय राजनीति के प्रवक्ता बतौर दीदी के पास अन्ना हजारे के अलावा कोई उल्लेखनीय है तो सांसद मुकुल राय,जिनका रेलमंत्री जमाना देश देख चुका है।अन्ना किसके निर्देश पर काम करते हैं,इसका खुलासा करने की कोई जरुरत ही नहीं है।


    तीसरे मोर्चे का खेल खराब करना अगर दीदी का खेल है,तो वे चैंपियन बन चुकी हैं। मोदी उनको जीत की ट्राफी बतौर क्या पेश करने वाले हैं,बस,यही देखना बाकी है।



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    अरविंद के नहीं,राष्ट्र के सवाल हैं मोदी से।यह केशरिया कयामत हर कीमत पर रोक दी जाये, यह लोक गणराज्य भारत के अस्तित्व का बुनियादी सवाल है।

    पलाश विश्वास

    अरविंद केजरीवाल ने गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्रित्व के दावेदार नरेंद्र मोदी से जो सोलह सवाल पूछे हैं,वे दरअसल अरविंद के सवाल हैं नही,ये सावाल राष्ट्र की ओर से हैं,जो समय समय पर उठाये जाते रहे हैं।मोदी को विकासपुरुष बतौर पेश किया जा रहा है।शेयर बाजार में अभूतपूर्व जोश है। निवेशकों की आस्था अटूट है।तो जिन मतदाताओं के जनादेश पर वे राजकाज के अधिकारी बनने वाले हैं,उन्हें मोदी इन सवालों का जवाब क्यों नहीं देते।अरविंद केजरवाल से मिलने  न मिलने की उन्हें पूरी स्वतंत्रता है।उनसे संवाद न करना चाहे तो भी हर्ज नहीं।लेकिन लोकतंत्र में आस्था है और पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता है तो अत्यंत नैतिक मान्यताओं के झंडेवरदार मोदीमय संघपरिवार का मान रखते हुए उन्हें राष्ट्र को संबोधित करके इन सवालों का जबाव हर हाल में देने चाहिए।अगर अरविंद केजरीवाल झूठ का पुलिंदा पेश कर रहे हैं,तो उस झूठ का भी पर्दाफाश होना जरुरी है।सवालों के जववाब नहीं मिलेंगे तो जाहिर है कि भावी प्रधानमंत्री की साख कोई मजबूत होगी नहीं और बाकी देश को लगेगा,हो न हो,अरविंद कुछ न कुछ सच जरुर बोल ही रहे हैं।


    आज दिल्ली के पूर्व  मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से सोलह सवालों का जवाब लेना चाहते थे। लेकिन, उन्हें नरेन्द्र मोदी से मिलने की इजाजत नहीं मिल सकी। जिसके बाद वह वापस हो लिए। अपने गुजरात दौरे पर नरेन्द्र मोदी पर जमकर हमला बोले। साथ ही अरविन्द केजरीवाल ने नरेन्द्र मोदी पर सोलह सवाल भी उछाल दिए हैं।

    गुजरात दौरे पर अरविन्द ने नरेन्द्र मोदी सरकार पर जमकर कटाक्ष किये हैं। अरविन्द ने कहा है कि, गुजरात में विकास के बारे में नरेंद्र मोदी जो दावे करते हैं, वे खोखले हैं। केजरीवाल ने कहा कि मोदी के तमाम दावे झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। उनके सरकार में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। यदि गुजरात को नरेन्द्र मोदी कृषि प्रधान देश बता रहे हैं तो किसानों के सामने ऐसी स्थित क्यों आ जाती है जिसके लिए उन्हें आत्महत्या करना पड़ रहा है। आइये हम आपको बताते हैं उन सोलह सवालों के बारे में जिनके जवाब अरविंद केजरीवाल नरेन्द्र मोदी से जानना चाहते थे।

    केजरीवाल के नरेन्द्र मोदी से  सवाल

    1.  क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद केजी बेसिन से निकली गैस के दाम बढ़ाएंगे?

    2.  पढ़े-लिखे युवाओं को ठेके पर नौकरी क्‍यों दे रहे हैं और उन्‍हें मात्र 5300 रुपये प्रति महीना दे रहे हैं, इतने में कोई कैसे जिंदगी चलाएगा?

    3.  पिछले दस सालों में राज्‍य में लघु उद्योग क्‍यों बंद हुए हैं?

    4.  किसानों की जमीनें बड़े उद्योगपतियों को कौड़ियों के भाव क्‍यों दिए जा रहे? आपने किसानों की जमीन छीनकर अडानी और अंबानी को दे दी है।

    5.  आपके पास कितने निजी हेलिकॉप्‍टर या प्लेन हैं? आपने ये खरीदे हैं या बतौर तोहफा मिला है? आपकी हवाई यात्राओं पर कितना खर्च आता है और इसके लिए पैसे कहां से आते हैं?

    6.  गुजरात के सरकारी अस्‍पतालों में इलाज की सुविधा क्‍यों नहीं है?

    7.  आपने हाल में पंजाब में कहा था कि कच्छ के सिख किसानों की जमीन नहीं छीनी जाएगी, तो इस मामले में गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट क्यों गई है?

    8.  गुजरात में विकास के दावे झूठे हैं, मोदी जी आप बताइए कि गुजरात में कहां विकास हुआ है?

    9.  आपके मंत्रिमंडल में दागी मंत्री क्यों शामिल है, बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे दागी मंत्री सरकार का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?

    10. मुकेश अंबानी से आपके क्या रिश्ते हैं, आपने अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को मंत्रिमंडल में क्यों जगह दी?

    11. गुजरात में सरकारी स्कूलों के हालात बदहाल क्यों है?

    12. सरकारी दफ्तरों में बहुत ज्यादा करप्शन है, विभागों में भारी भ्रष्टाचार क्यों है?

    13. कच्छ के किसानों को पानी नर्मदा बांध के बावजूद आज तक क्यों नहीं मिला? सारा पानी उद्योगपतियों को दे दिया गया।

    14. गुजरात के किसान बेहाल है। किसान खुदकुशी कर रहे हैं। हाल के वर्षों में गुजरात में 800 किसानों ने खुदकुशी की, क्यों?

    15. प्रदेश में रोजगार का बुरा हाल क्यों है और बेरोजगारी क्यों बढ़ी है?

    16. चार लाख किसानों ने बिजली के लिए कई साल से आवेदन दिया है, उन्हें अब तक बिजली क्यों नहीं मिली है?





    हम न आप  के समर्थक हैं और न हम राजनीतिक दलों के दफ्तरों के घेराव का समर्थन करते हैं। लेकिन इन सवालों का जबाव नहीं मिला तो हमें पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए। क्या नमोमय भारत ही इस लोकगणराज्य का भविष्य है। जिस नमो की सुनामी है,वह सवालों से भागता है तो देस में लोकतंत्र की क्या हालत होगी। क्या हमें नमोमय भारत बनने देने की मुहिम में शामिल हो जाना चाहिए उनकी जबावदेही से मुकरने के बावजूद,बुनियादी सवाल अब यह है।


    अरविंद केजरीवाल के सोलह सवालों का मुख्य स्वर दरअसल यही है।जिसे अनसुना करके संघ परिवार दरअसल अपने ही पांवों में कुठाराघात कर रहा है।


    समझ लीजिये कि तीसरा मोर्चे से नरेद्र मोदी का कुछ बनने बिगड़ने वाला नहीं है।अन्ना ममता युगलबंदी की वजह से बनने से पहले ही बिखर गया है तीसरा मोर्चा।हम कहने को मजबूर हैं कि विचारधारा और जनप्रतिबद्धता के मोर्चे पर सिरे से नाकाम वामदलों की न सिर्फ साख खत्म हुई है बल्कि उनका अपना वजूद भी संकट में है।बंगाल में हारकर वाम दल सिर्फ केरल के भरोसे भारत की राजनीति में कोई हस्तक्षेप कर ही नहीं सकते। इसीलिए ममता बनर्जी की जनविरोधी अगंभीर राजनीति के आगे वामदल इतने असहाय हो गये हैं।जिन क्षत्रपों के सहारे वामपहल है,वे भागते चूहों की जमात है और पानियों की हलचल मुताबिक एक जहाज छोड़कर दूसरे जहाज की सवारी करने के वे जन्मजात अभ्यस्त हैं।वाम विचारधारा के मुताबिक अस्मिताओं की यह राजनीति राज्यतंत्र में कोई फेरबदल तो करेगा ही नहीं ,बल्कि उनकी मौकापरस्त राजनीति में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के विरुद्ध लोकतंत्र और धर्मनिपेक्षता अप्रासंगिक हो गये हैं।


    जाहिर है कि कोई धर्मनिरपेक्ष मोर्चा नमोमयभारत को रोकने की हालत में कतई नहीं है।


    अगर नमो सुनामी कोई रोक सकता है तो फिलवक्त वह आप है। एनजीओ तत्व तो सभी दलों में हैं।भारत सरकार के सारे कामकाज या तो कारपोरेट कर रहे हैं या फिर एनजीओ। महज इस तर्क से आप को खारिज कर देना इस वक्त भारी राजनीतिक मूर्खता होगी।


    अगर वामदल नमोमय भारत के निर्माण के खतरे के प्रति तनिक भी सावधान हैं,तो आप को राजनीतिक दल के बजाय बदलाव के लिए जनआकांक्षाओं के के महाविस्फोट और अस्मिता राजनीति से ऊपर आम भारतवासियों और सामाजिक शक्तियों का मोर्चा समझना होगा,जहां पिटे हुए भ्रष्ट,ढपोरशंख, परंपरागत मौकापरस्त और अस्मिताओं के चेहरों के लिए कोई जगह फिलहाल नहीं है।


    वाम दल अगर आप को बिना शर्त समर्थन देते हैं बिना सीटों के तालमेल के तो गजब हो सकता है।यह विकल्प मौकापरस्त क्षत्रपों के महागठजोड़ से हजार गुणा बेहतर ही नहीं होगा,बल्कि दलबदलुओं के सहारे तेज होती जा रही मोदी सुनामी को रोकने का ्ंतिम और निर्णायक प्रयास होगा।


    आप के नेता क्या राजी हैं या नहीं,यह सवाल बेमतलब हैं।अगर आर्थिक सुधारों और कारपोरेट राज के खिलाफ आपकी लड़ाई है तो आपको यह समझ ही लेना चाहिए केशरिया राष्ट्र में खुदरा कारोबार को पहले ही हरी झंडी दे चुके मोदी अमेरिकी जायनवादी समर्थन से अगर इस देश का प्रधानमंत्री बने तो भारतीय संविधान जो बदलेगा सो बदलेगा,समता और सामाजिक न्याय का जो होगा सो होगा,धर्मोन्माद से देश जो लहूलुहान होगा सो होगा, बल्कि देश की संघीय ढांचा तहस नहस हो जायेगा और पूरा देश तब गुजरात होगा।


    कैसा गुजरात, उसकी छवि अरविंद के सवालों की पृष्ठभूमि में साफ तौर पर उभरही आयी है।


    इसके अलावा अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी हितों का असर इतना ज्यादा होगा कि गरीबों की क्या कहें,छोटी पूंजी और मंझोली पूंजी वाले काोबरियं का सत्यानाश भी तय है।पीएफ पेंशन तक बाजार में जो जायेगा,सो जायेगा, विनिवेश और निजीकरण का जो तूफान आयेगा,सो आयेगा, लेकिन करप्रणाली का सारा बोझ आम जनता के कंधे पर डालने का जो स्त्रीविरोधी वर्णवर्चस्वी संघी आर्थिक एजंडा है,उसके तहत जाति धर्म निर्विशेष गरीबों का सफाया हो ही जायेगा। फिर आप अस्मिताओं के ठेकेदारों के मुंह ताकते रह जायेंगे जो अंततः घनघर वंशवादी हैं और जिनकी दृष्टि में भारत नहीं है।


    कामरेड ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनाकर कामरेडों ने जो ऐतिहासिक भूल की है, वाम आंदोलन को बंगाल,केरल और त्रिपुरा तक सीमाबद्ध करने का जो महापाप कर दिया है,उसके प्रायश्चित्त का मौका यही है क्योंकि यह केशरिया कयामत हर कीमत पर रोक दी जाये, यह लोक गणराज्य भारत के अस्तित्व का बुनियादी सवाल है।जो तीसरा मोर्चा हरगिज नहीं रोक सकता क्योंकि उसके सारे क्षत्रप या तो केशरिया हो चुके हैं या फिर केशरिया होने को हैं।


    हमें आप की सीमाोओं का पूरा ख्याल है,उसके खतरों से भी हम वाकिफ हैं। लेकिन शायद हमारे सामने फिलवक्त आप के साथ मोर्चाबद्ध हो जाने या कम से कम उसके खिलाफ न होने के विकल्प के अलावा कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं।


    गौरतलब है कि दिल्ली के पूर्व सीएम और आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर उन पर हमला बोला है. केजरीवाल ने मोदी से जवाब मांगते हुए पूछा है कि बीजेपी के उद्योगपति मुकेश अंबानी से क्या रिश्ते है? केजरीवाल ने पूछा है कि मोदी बताएं कि वह मुकेश अंबानी को किस दर पर गैस देंगे? उन्होंने कहा कि मोदी गैस के दाम पर अपना रुख साफ करें.

    रैलियों में किसका पैसा?

    मोदी से उनकी रैलियों को लेकर भी सवाल पूछा गया है. सवाल है, जनता में चर्चा है कि आपकी रैलियों में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं. यह सारा पैसा किसका है? कुछ लोगों का कहना है कि मुकेश अंबानी आपको फंड कर रहे हैं. क्या यह सच है? अरविंद केजरीवाल ने मोदी को लिखी इस चिट्ठी को सार्वजनिक किया.

    क्या अंबानी देते हैं हवाई यात्रा का खर्च?

    केजरवाल ने सवाल उठाया है कि क्या हवाई यात्रा के लिए नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को हेलॉकॉप्टर मुकेश अंबानी देते हैं? चिट्ठी में कहा गया है कि जनता के मन में शक है कि आपकी पार्टी और आपके मुकेश अंबानी से संबंध हैं, आप जवाब देकर इस शक को दूर करें. साथ ही राहुल गांधी और मोदी पर मुकेश अंबानी के हेलिकॉप्टरों में घूमने को लेकर भी सवाल किया गया है. केजरीवाल ने चिट्ठी पढ़ते हुए कहा, खबरों के मुताबिक मोदी और राहुल अंबानी के हेलिकॉप्टरों में घूमते हैं. जनता जानना चाहती है कि जहाज आपको फ्री में मिलते हैं या किराया देते हैं?

    नहीं लेंगे अंबानी से चंदा

    उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय मंत्रियों ने मुकेश अंबानी को फायदा पहुंचाया है. उन्होंने आरोप लगाया कि अंबानी बंधुओं का विदेशों में कालाधन है. केजीरावाल ने कहा कि जब हमलोगों ने मुकेश अंबानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई तो हमारे इस कदम का बीजेपी और कांग्रेस ने मिलकर विरोध किया. उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि मुकेश अंबानी से उनकी पार्टी चंदा नहीं लेगी.


    बहरहाल अपने 'आम आदमी' स्टाइल के कारण दूसरे नेताओं से अलग दिखने वाले 'आप' संयोजक अरविंदकेजरीवालने आखिरकार विरोधियों को बड़ा हथियार दे दिया है। अरविंद केजरीवालशुक्रवार को जयपुर से प्राइवेट विमान लेकर दिल्ली पहुंचे। गुजरात से जयपुर पहुंचने के लिए केजरीवाल ने रेलीगेयर के प्राइवेट प्लेन का सहारा लिया। उनके विमान से सफर करने पर उनके विरोधियों ने उनपर जमकर सवाल दागे। लेकिन, केजरीवाल ने साफ कर दिया उनके विमान का खर्चा एक मीडिया ग्रुप ने किया है। क्योंकि, उन्हें मीडिया हाउस के कार्यक्रम में पहुंचना था, लेकिन वहां से कोई फ्लाइट नहीं होने के कारण मीडिया हाउस ने विमान की व्यवस्था की थी। कार्यक्रम में पहुंचने के बाद केजरीवाल ने कहा कि आगामी लोकसभा त्रिशंकु होगी। किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा। उधर, मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने को लेकर भी मीडिया हाउस के कार्यक्रम में केजरीवाल से सवाल किया गया। लेकिन, केजरीवाल इस मसले पर साफ कर दिया कि वो कहां से चुनाव लड़ेंगे ये बाद में तय किया जाएगा। इससे पहले पार्टी के मनीष सिसौदिया ने कहा था कि मोदी जहां से चुनाव लड़ेंगे केजरीवाल वहीं से चुनाव लड़ेंगे, लेकिन पहले भाजपा ये तय करे कि मोदी को चुनाव लड़ाना कहां से है।

    पार्टी का कहना है कि प्राइवेट प्लेन इंतजाम आयोजनकर्ता ने किया है। पार्टी का इस खर्च से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन, आयोजनकर्ता ने इस मसले पर टिप्पणी करने से इनकार किया है। केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली के लिए कोई फ्लाइट नहीं थी तो आयोजनकर्ताओं ने निजी विमान का इंतजाम कराया। इस दौरान मीडिया हाउस के कार्यक्रम में बोलते हुए केजरीवाल ने अपने विरोधियों पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मेरे विमान का खर्चा तो मीडिया हाउस ने किया, जिसे उन्होंने सार्वजनिक भी कर दिया, लेकिन मोदी और राहुल गांधीके विमान का खर्चा कौन उठाता है। उन्होंने कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि दिल्ली में सरकार रहते उनकी पार्टी ने बहुत काम किए। आगामी लोकसभा में भी ऐसा ही करने का प्लान है। लोकसभा में किसी को बहुमत नहीं मिलेगा। लोकसभा भी दिल्ली विधानसभा की तरह त्रिशंकु होने जा रही है।

    विरोधियों से पूछा सवाल

    केजरीवाल ने अपनी प्राइवेट विमान यात्रा पर उठ रहे सवालों को भी चुनावी हथियार बना लिया। केजरीवाल ने ट्वीट किया कि जिस तरह उन्होंने अपनी यात्रा के खर्च को सार्वजनिक किया है, वैसे ही राहुल और मोदी भी अपने खर्च का ब्योरा दें।

    कुछ घंटों पहले मोदी पर उठाया था सवाल

    गुजरात में केजरीवाल ने अपने सोलह सवालों में मोदी से यह भी पूछा कि देशभर में वह निजी विमानों पर जो पैसा खर्च करते हैं, उसका खर्च कहां से आता है। ये हेलिकॉप्टर किसके है। जिन निजी विमानों में आप देशभर में घूमते हैं, वे किसने आपको दिए हैं।

    राहुल से भी पूछा था यही सवाल

    कुछ महीनों पहले अरविंद केजरीवाल ने एक जनसभा में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चुनौती देते हुए सवाल किया था कि वह राहुल गांधी के हेलिकॉप्टर और अन्य हवाई यात्राओं में आने वाले खर्च का हिसाब दें।

    कांग्रेस ने साधा निशाना

    कांग्रेस ने केजरीवाल की इस विमान यात्रा पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेता ने कहा कि केजरीवाल केवल दूसरों पर आरोप लगाना जानते हैं।

    बीजेपी नेता विजेंद्र गुप्ता ने बोला हमला

    बीजेपी नेता विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि केजरीवाल खुद को दबा-कुचला आदमी कहकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि केजरीवाल यह भी साफ करें कि आयोजनकर्ताओं ने उनकी निजी यात्रा का खर्च क्यों उठाया।



    Aam Aadmi Party

    about an hour ago

    Arvind Kejriwal asks 16 questions to Narendra Modi. He has disclosed these 16 questions in media.


    Arvind Kejriwal on the way to meet Narendra Modi to ask these 16 questions. Police stopped him at Gandhinagar giving reason that Arvind is going without appointment.


    These 16 questions are common people's problem in Gujarat. Will Narendra Modi answer?


    Tweet using #AKasksModiPhoto: Arvind Kejriwal asks 16 questions to Narendra Modi. He has disclosed these 16 questions in media.     Arvind Kejriwal on the way to meet Narendra Modi to ask these 16 questions. Police stopped him at Gandhinagar giving reason that Arvind is going without appointment.    These 16 questions are common people's problem in Gujarat. Will Narendra Modi answer?    Tweet using #AKasksModi

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    Thus,we must seek the answer to Arvind Kejriwal's 17 questions to Modi

    NAMO Euphoria inflicts Indian economy

    Ultimately Modi happens to be a stock exchange phenomenon all the round.


    Excalibur Stevens Biswas

    The Indian economy is transformed in a NAMO Smart Phone.

    It is quite a typical viral fever.It is Namo Euphoria.Riding high on pre poll survey,fence jumping and media superlative hype,Indian sensex economy is bubbled up.


    It was not-so muted cry from CLSA that has soon acquired mass. In August this year, CLSA's renowned strategist Chris Wood proclaimed Narendra Modi as the stock markets's greatest hope. Today, the 'Modi bandwagon' is crowded with independent analysts and brokerages.


    Ultimately Modi happens to be a stock exchange phenomenon all the round.Because zionist United States of America and Israel have chosen him the next Prime Minister of India and the corporate media already created a ready made fashionable juicy delicious mandate poured with most aggressive religious nationalism and we the people are predestined to endorse it as the forces patriotic,committed,secular have lost relevance and credit.Ideologies and identities immersed into blatant crude naked opportunism.

    Thus,we,the Indian people discover ourselves amidst cross fire blind.


    In fact, the Open Market Economy has killed Indian whatsoever,Indian sovereign republic,its constitution,law and order, justice, humanity, resources, business, culture and environment.


    There is no Indian economy.

    Rather it is an economy of a state ruled by satanic global order.


    However,Stocks Markets ignored the anxiety caused by the geopolitical tension over Ukraine and spurted to all-time highs on a slew of positive domestic factors and robust FII buying ahead of high-stake elections.

    The benchmark indices - S&P BSE Sensex and the CNX Nifty - were in a record-breaking spree. The former hovered near the key milestone of 22,000-mark, while the latter breached the historic landmark of 6,500 this week.

    Aggressive buying by foreign institutional investors (FIIs), the main market mover, reflected their faith in Indian economy and its growth story in a week when the Election Commission announced the schedule for the Lok Sabha polls.

    FIIs bought shares worth Rs. 5,044.54 crore in the week, including provisional data of March 7.

    Narrowing Current Account Deficit (CAD), rising rupee against the dollar and easing inflation played their part to boosting investor sentiment.

    India's current account deficit fell to $4.2 billion, or 0.9 per cent of GDP, in December quarter of 2013-14 on the back of a rise in exports and fall in gold imports.

    The lower CAD, the difference between outflow and inflow of foreign exchange, bolstered the rupee and attracted increased overseas investment. The Indian currency gained 68 paise, or 1.10 per cent, against the US unit in the week.

    Barring healthcare, IT and tech shares, which performed poorly, all other sectoral indices surged. The rally was led by realty, banking, capital goods, metal, oil & gas and power stocks.

    Sharp surge was seen in BHEL, ICICI Bank, Axis Bank, RIL, Bharti Airtel, HDFC Bank, Maruti Suzuki, L&T, SBI, Coal India, Hindalco, ONGC, Tata Steel, HDFC, Gail India and ITC.

    The Bombay Stock Exchange 30-share gauge resumed lower on global meltdown on fears of an imminent war between Russia and Ukraine as possible sanctions by the West against Moscow, and touched a low of 20,920.98 on Monday.



    The truth is reflected perhaps is these lines.

    Reserve Bank of India Governor Raghuram Rajan, making his first appearance in Washington, DC, in his current avatar, has said his priority focus is “how to get India out of the headlines,” and declared that “we Indians treat our economy very much like we treat our cricket team.”


    “All our players are geniuses, gods, and we actually elevate them to that status, disregarding the weaknesses that actually exist. Of course, when we do badly, we throw rocks at their door and burn effigies of our players and we castigate them for the same weaknesses that exist when we are doing well -- we just overlook these weaknesses.”


    Rajan told the standing room only audience that packed the university’s auditorium despite inclement weather, how “to some extent, we start saying how can they do any good because these weaknesses are really serious – ‘Gautam Gambhir can’t face a rising ball, a short-pitched ball, he is incompetent. Sehwag just lashes out at everything, he is incompetent and so on’.”

    Thus, he argued drawing an analogy, “I’d like to say that to some extent our views of the economy have been quite similar.”

    “In the go-go years of 2002-12, an average growth rate of eight percent in that decade, we ourselves and, I would argue, the world community, tended to see India as a coming superpower, strong, no weaknesses, everybody is a super-genius from the IITs and of course, the safety school for IITs is CornellUniversity. So, India must be full of super-geniuses.”




    As A smartphone dedicated to Gujarat Chief Minister Narendra Modi is slated to be available by September this year.

    The team behind the smartphone is from Surat, Gujarat and is lead by Ammeet Desai. The company has been running a smartphone OEM in China for the last 6 years.

    The SMART NAMO range will include high end Android phones as well as feature phones later on. “The phones will initially be manufactured in Shenzhen, China but the company has already submitted an application to the Gujarat government to set up an assembly line in the state. They hope to do this by the end of 2013,” Ammeet Desai told NextBigWhat.

    The company came up with the idea to dedicate a phone to a leader after they saw many companies in China commemorating leaders with products such as watches and memorabilia of national leaders.

    Apart from being from Gujarat, the reason they picked Narendra Modi is that they were impressed by the work of the leader and also the output in terms of economy of the state.


    Thus,we must seek the answer to Arvind Kejriwal's 17 questions to Modi

    Aam Aadmi Party (AAP) leader Arvind Kejriwal on Friday released 17 questions that he wanted Gujarat chief minister Narendra Modi to answer. The questions, which range from the state of Gujarat's economy to solar energy, make allegations against Modi's government but offer no evidence. Here is a translated and edited version of the questions Kejriwal wants Modi to answer:

    Q1. Does government plan to raise the price of KG Basin gas to $16 per unit? If you become the prime minister, will you raise the price of gas to $16 per unit?


    Q2. Is it true that your government is buying solar energy at Rs. 13 per unit, and that without inviting tenders? MP and Karnataka buy solar power at Rs. 7.5 per unit and Rs. 5.5 per unit after inviting tenders, so why is your government buying electricity (solar power) at such high price?     


    Q3. You claim that agriculture growth rate in Gujarat is 11%, but by your own government's estimates in 2006-2007 agricultural production in the state was Rs. 27,815 crore. In 2012-2013, agricultural production fell to Rs. 25,908 crore. This means agricultural production has fallen in Gujarat during your tenure and the annual agricultural growth rate is -1.18% (sic). How do you then claim agriculture growth rate is 11%?


    Q4. In the last 10 years almost two-third small industries have shut down in Gujarat. We found that in a small place like Mehsana alone 140 of the 187 small industrial units have shut down. Under such circumstances, what is your model for development? Will you shut down all small, medium industries in the country and hand over industry in the country to select business houses?


    Q5. You claim that there is no corruption in Gujarat, but people in towns and villages told us that there is rampant corruption in all government departments. People have to pay bribes to get BPL cards, avail government schemes or make licences. How do you then claim that there is no corruption in Gujarat?


    Q6. At least two of your ministers are accused of involvement in financial scams? Couldn't you find honest persons for your ministry among 6 crore Gujaratis.



    Q7. Would you like to comment on your relationship with businessman Mukesh Ambani?


    Q8. Recently, 13 lakh people applied for 1,500 junior-level government posts in Gujarat. How do you then claim that there is no unemployment in the state?


    Q9. Young people employed by your government on contract are paid a mere Rs. 5,300 monthly? Can an educated, self-respecting person survive on Rs. 5,300?


    Q10. Do you accept that it is the government's responsibility to provide good education to the country's poor? We have travelled across Gujarat's villages and towns in the last few days. Gujarat's government schools are in a poor state. We have also found colleges where there are only three teachers including the principal for 600 children. With such education system, how can the country progress?


    Q11. Do you accept that a government's responsibilities include providing good healthcare services? Government health services are crippled in the entire state. There is corruption everywhere. In many villages, the primary health centres are shut, lying in ruins. In hospitals at taluka and district-levels, more than half of the posts are vacant. Those who are there, they don't come. The hospitals do not have medicines. Under such circumstances, why are you making claims of providing good health services in Gujarat before the entire country?  

    Q12. Farmers throughout Gujarat are unhappy with your government. He gets less than what he spends for his produce because on minimum support price, your government has been ignoring him. Farmers are being forced to commit suicide. In the last few years, 800 farmers have committed suicide in Gujarat and you have stopped all subsidies which were given to farmers.    

     


    Q13. You are going around the country saying your government has taken electricity to villages. We have found that 4 lakh farmers applied for electricity connection to your government for years, but they are not getting it. When you are not even giving connection to farmers, then why are you making hollow claims on providing electricity?   


    Q14. Under your government, the land of farmers is being snatched away and you are giving them to your favourite industrialists at throwaway prices. In this, many farmers have not been given compensation. To those farmers whom you have paid compensation, the amount is way less than the market rate. You have snatched away farmers' land and given them to industrialists such as Adani and Ambani at the rate of Rs. 1 per square metre. Why? Why is your government so heartless towards farmers?  


    Q15. The height of Narmada Dam was raised in 2005 to provide water to the people of Kutch for drinking and farming. But, even eight years later, the people of Kutch have not got water. This water was given to some of your favourite industrialists. Why this discrimination against the people of Kutch?     


    Q16. You had said in Punjab that the land of Sikhs living in Kutch, Gujarat, will not be snatched away. The truth is your government has moved court to take away the land of Sikh families. Why don't you take back this case?


    Q17. You move around in private helicopters and aircraft. How many such aircraft/choppers do you have? Who do they belong to? How much do you pay for these aircraft/choppers? Or, does someone else pay for them? Why don't you make your air travel expenses public?



    Just read the Economic Times report.


    INVESTOR WEALTH SURGES BY . 2.88 L CR IN FOUR TRADING SESSIONS

    Led by FIIs, D-St Marches into Uncharted Territories

    Foreign fund managers continue to pour money, retail investors make a cautious comeback

    OUR BUREAU MUMBAI



       The euphoria is spreading. Foreign fund managers continue to pour money as well-heeled investors strike aggressive derivative deals and retail investors make a cautious comeback to ride the rally in the Indian stock market which touched a new high on Friday.

    But many of them could lose their shirt if their bets on the outcome of the forthcoming general election backfire.

    Investor wealth has surged by a whopping . 2.88 lakh crore in the past four trading sessions alone. The only sellers in Dalal Street were local institutions booking profits before the fiscal closing. Foreign institutional investors (FIIs) purchased shares worth . 2,577 crore on a provisional basis, pushing the Sensex up 406 points, or 1.89%, to a record high of 21,960.89. The broader index Nifty too hit a fresh high of 6,566. Nearly 42 stocks hit new highs on Friday while 149 stocks hit a yearly high. Over 260 stocks were locked at the upper circuit on BSE for want of sellers in these counters.

    India’s second biggest company in terms of market capitalisation, Reliance Industries, gained 5.72% to . 869, its biggest single-day gain in the last five years. Some of the biggest gainers among BSE 200 stocks were Adani Enterprises (10.13%), DLF (9.87%), Jaiprakash Associates (9.76%), Yes Bank (8.63%) and IRB Infrastructure (7.91%). “A ‘favourable’ elections outcome could provide a disproportionate boost to some sectors and stocks, some of which are severely underowned by institutional investors today,” said Manishi Raychaudhuri, MD & Asian equity strategist, BNP Paribas. “Policy initiatives are currently underway in areas such as power, roads, monetary policy and banking, and the momentum of such initiatives is likely to continue post election, whatever the result”.

    FIIs were also net long in the derivatives market, having purchased index futures and options worth . 3,812 crore — a reflection of their optimism that the market could rally further.



    economictimes.com



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    सितारों की चमक से चौंधियाने से पहले कामकाज का हिसाब भी देख लें!

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


    बंगाल से पिछली लोकसभा में दो लोकप्रिय सितारों की जोड़ तापस पाल और शताब्दी राय को जनता ने भारी मतों से विजयी बनाया था।तापस पाल और शताब्दी राय। दोनों ने लोकसभा में अपने पूरे कार्यकाल में एक भी सवाल नही पूछा। तो दूसरी ओर वाम पक्ष दक्षिण पक्ष के दो दर्जन से ज्यादा ऐसे सांसद हैं,जिन्होंने सांसद कोटे की पूरी रकम ही नहीं निकाली,इलाके के विकास की सुधि क्या लेते।


    विडंबना है कि इनमें से ज्यादातर अब भी चुनाव मैदान में हैं और अपनी अपनी पार्टी के दम पर इस बार भी संसद में पहुंचने की तैयारी में हैं। इस पर तुर्रा यह कि ममता बनर्जी ने तृणमूल टिकट पर एक झुंड सितारों को फिर संसद में भेजने की चाकचौबंद तैयारी कर ली है।


    यही नहीं,भाजपा की ओर से भी सितारों को बंगाल के चुनावी मैदान में उतारा गया है।


    गौरतलब है कि रायदीघि में विधायक देवश्री के बचाव में दीदी ने कहा कि वे तो अतिथि कलाकार हैं,जो राजनेताओं की तरह काम नहीं कर सकते।दीदी के कृपाधन्य एक और सांसद कबीर सुमन हैं जो बागी बन गये।उन्होंने भी अपने इलाके की सुधि नहीं ली। लेकिन वे भी बतौर निर्दलीय फिर लोकसभा में पहुंचने की मंशा जगजाहिर कर चुके हैं।


    गौरतलब है कि पंचायत चुनाव के परिणाम आते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गईं और इसी सिलसिले में उन्होंने राइटर्स में सांसदों व मंत्रियों के साथ अलग-अलग बैठक कीं। मुख्यमंत्री ने दोपहर में पहले राज्य के मंत्रियों के साथ बैठक करने के बाद तुरंत राज्य व लोकसभा के सभी सांसदों की बैठक बुलाई। उन्होंने सांसदों से सांसद कोटे की रकम खर्च करने को लेकर सासंदों से ब्यौरा लिया। बैठक में एक दो सांसदों को छोड़कर सभी ने हिस्सा लिया। गैर हाजिर सांसदों में कबीर सुमन थे। दीदी की इस खबरदारी के बावजूद तृणमूल सांसद भी अपने इलाके के विकास के बारे में लापरवाह रहे।


    तब मुख्यमंत्री ने सांसदों से कहा था कि वे अपने इलाके में जाएं और सांसद कोटे की रकम खर्च करने की मुकम्मल योजना तैयार करें, जिससे केंद्र सरकार से मिलने वाली रकम का उपयोग किया जा सके और भविष्य में केंद्र से रकम मिलने में सुविधा हो।


    सांसदों ने तब जवाब में कहा कि कहा कि रकम खर्च का सर्टिफिकेट पाने में दिक्कत आ रही है, तो उन्होंने कहा कि रकम के खर्च व प्रोग्राम में समानता रखने की जरुरत है, जिससे सर्टिफिकेट मिलने में दिक्कत न हो। सांसदों से कहा कि जिसका जो भी प्रोजेक्ट है, उसे नवंबर तक पूरा कर लिया जाना चाहिए क्योंकि वर्ष 2014 में लोक सभा का चुनाव होना है। सांसदों ने बताया कि उन्हें केंद्र सरकार की तरफ से संसदीय क्षेत्र में काम करने के लिए पांच करोड़ रुपये मिलते हैं लेकिन खर्च प्रमाण पत्र नहीं मिलने से यह रकम मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।


    माननीय सासंदों की दिलचस्पी इलाके के विकास में कम, बल्कि चुनावी कार्यकर्ताओं की फौजें बनाने में ही ज्यादा होती है।जिसके चलते स्थानीय जनसमस्याओं की सिरे से अनदेखी करके वोट बनाने वाले क्लबों और संस्थाओं को उदारता के साथ अनुदान देने में ही उनकी संसदीय रकम खत्म हो जाती है।नाम के वास्ते थोड़ा बहुत काम भी हो ही जाता है।


    वोट बटोरु विकास के अलावा चूंकि जनसमस्याओं से इनका कोई लेना देना नहीं होता,इन्हें संसद कोटे की रकम निकालने तक का होश नहीं होता।


    खास बात तो यह है कि अपने अपने इलाके में घिर चुके दो केंद्रीय मंत्री अधीर रंजन चौधरी और दीपा दासमुंसी समेत कुल पच्चीस सांसद सांसद कोटे की दूसरी किश्त की रकम ही नहीं निकाल पाये।यह रकम भी कोई छोटी रकम नही है।पूरे 62 करोड़ पचास लाख रुपये सांसदों और मंत्रियों की गलती की वजह से बेकार चले गये।


    कितने ही खस्ताहाल स्कूलों,अस्पतालों और सड़कों का कायाकल्प होते होते रह गया।पहली किश्त में जो रकम निकाली इन सांसदों ने उसकी आडिट रपट ही जमा नहीं हो सकी तो दूसरी किश्त की मांग भी करते तो किस मुंह से।


    अब अपनी खाल बचाने के लिए इनकी दलील है कि प्रशासनिक असहयोग की वजह से ही आडिट रपट जमा नहीं हो सकी। जाहिर है कि आम जनता के मजबूत हाजमें में उनकी पूरी आस्था है।


    इस पर तुर्रा यह कि पहले दो किश्तों में मिलने वाली दो करोड़  की रकम अब दोगुणा से भी ज्यादा बढ़कर पांच करोड़ है।अगली लोकसभा में यह रकम और बढ़ सकती है। लेकिन अपने जनप्रतिनिधियों के कच्चे हिसाब की वजह से लोककल्याणकारी उनकी किसी भूमिका की उम्मीद न ही करें तो बेहतर।


    इन सांसदों में माकपा के सबसे ज्यादा आठ, राज्य में सत्तादल के छह,आरएसपी के दो,फारवर्ड ब्लाक,भाकपा, एसयूसीआई और भाजपा के एकमात्र सांसद भी शामिल हैं।



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    Nilay Upadhyay added 10 new photos.
    शान्ति निकेतन की विश्व में प्रसिद्ध संथाल परिवार की मूर्तियां




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    पहले तय कर लिया जाये कि मोदी को रोकना है कि अरविंद केजरीवाल को
    पलाश विश्वास

    दोस्तों, पहले ही साफ कर दूं ,जैसा हमेशा मैं कहता आ रहा हूं कि आम आदमी पार्टी से मेरा कोई लेना देना नहीं है। न मैं उनका या किसी राजनीतिक दल का समर्थक हूं।


    मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आगामी लोकसभा चुनावों के लिए निर्मामाधीन जनादेश को लेकर भी हमारी चिंता नहीं है।इसे थोड़ी गहराई में जाकर समझें। हमें दरअसल चुनाव के बाद धर्मोन्मादी भारत में जो निरंकुश राज्यतंत्र का नरमेध अभियान जारी होना है विकास के नाम पर,उसकी चिंता है।उस आसन्न भविष्य की चिंता हैं।


    हम अरविंदकेजरीवाल और उनकी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ दागे जा रहे सवालों का जवाब नहीं देंगे। इनमें से अनेक सवाल हमारे भी हैं और अनिश्चित नमोमय भारत के माहौल में मैंने उनपर खुलकर लिखा भी है।कृपया मेरे ब्लाग देख लें और उन्हें खोलने में दिक्कत हो तो हस्तक्षेप पर लगे आप पर मेरे पुराने आलेख देख लें। मैं न अरविंद का और न आप का कोई प्रवक्ता हूं न टिकट पर मेरा कोई दावा है। शुरुआती आकलन के बाद लगातार तेज होती नमोसुनामी में हमें अपनी प्राथमिकता बदलनी पड़ी है। ऐसा सिर्फ मेरे लिए नहीं है,परिस्थितियों पर तीखी नजर रखने वाले अनेक जनप्रतिबद्ध साथियों का आकलन बदल गया है।


    दिल्ली में एफडीआई रद्द होने से पहले खास आदमी की पार्टी आप के पीछे मजबूती से खड़ा था कारपोरेट इंडिया।उसके बाद कारपोरेट राज के खिलाफ जो अरविंद के धुंआधार प्रहार हो रहे हैं,उनके किसी भी सूरत में अब कारपोरेट विकल्प बनने के आसार नहीं हैं।बनेंगे तो उनकी साख जाती रहेगी।वे शेर पर सवार हो चुके हैं और शेर की पीठ से जिसदिन उतरेंगे,शेर उन्हें खा लेगा। होगा विश्व बैंक का प्रोजेक्ट, लेकिन बताइये कौन सी सरकार बनी है सन 1991 के बाद वह कौन सी सरकार बनी है,जो विश्वबैंक का प्रोजेक्ट नही है। रंग बिरंगी तमाम अल्पमत सरकारों के संचालक कारपोरेट असंवैधानिक तत्व ही हैं। यहां तक कि बंगाल में परिवर्तन के बाद मां माटी की सरकार आदिम कारपोरेट मसीहा सैम पित्रोदा हैं।मौजूदा प्रधानमंत्री से लेकर महामहिम राष्ट्रपति तक तमाम नीति निर्धारक,अर्थशास्त्री विश्व बैंक,आईएमएफ,यूनेस्को आदि घनघोर जायनवादी अमेरिकी संस्थानों के वेतनबोगी कारिंदे हैं।विनिवेश महायज्ञ केप्रथम पुरोहित अरुण शौरी भी विश्वबैंक से आये थे।


    फोर्ड फाउंडेशन से पुरस्कृत राजनीति,साहित्य,कला क्षेत्र के तमाम महामहिम हैं।यहां तक कि राथचािल्डस और राकफेलर के कारिंदे भी खूब हैं।


    फिर सीआईए के एजंट कौन है और कौन नहीं,भारतीय राजनीति में इसका कोई हिसाब उसतरह नहीं है जैसे कालाधन का लेखाजोखा। पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर राजनेता,मजदूर नेता और तमाम भ्रांतियों के रथी महारथी सीआईए के एजंट रहे हैं।


    मौजूदा राज्यतंत्र वर्ण वर्चस्वी,वर्ग वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी व्यवस्था है,उसमें बदलाव अनिवार्य है और उसके बिना कोई बदलाव संभव नहीं है।समता, सामाजिक न्याय और डायवर्सिटी के लक्ष्य भी राज्यतंत्र में बदलाव के बिना असंभव है।


    हम अपने बहुजन मसीहों की तर्ज पर ग्लोबीकरण को स्वर्णकाल भी नहीं मानते।


    हम यह भी मानते हैं कि यह पूंजीवादी तंत्र भी नहीं है। यह क्रोनी कैपिटेलिस्ट साम्राज्यवाद है और आवारा पूंजी अर्थ व्यवस्था, राजकाज, समाज, संस्कृति, साहित्य, पत्रकारिता, उत्पादन प्रणाली पर काबिज है।साम्राज्यवादी वैश्विक शैतानी व्यवस्था का यह उपनिवेश हैं जहां सत्ता वर्ग सिरे से सामंती है।भ्रष्ट भी।


    इसके साथ ही यह भी समझना जरुरी है कि धर्मोन्माद उत्तर आधुनिक मुक्त बाजार का सबसे मजबूत हथियार है।इस सिलसिले में मैं हमेशा भारत में हरित क्रांति, भोपाल गैस त्रासदी, सिखों के जनसंहार, बाबरी विध्वंस और गुजरात नरसंहार जैसी घटनाों को निर्णायक मानता रहा हूं।


    अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की पूंजी धर्मोन्माद नहीं है फिलहाल,जबकि बाकी विकल्प नख से शिख तक धर्मोन्मादी है।


    हम दरअसल न अरविंद को देख रहे हैं और न आप में शामिल तमाम खास चेहरों को। हमारी नजर सामाजिक शक्तियों,उत्पादक शक्तियों के तेज ध्रूवीकरण पर  है,जो अस्मिता तिलिस्म में कैद भारतीय समाज और भारतीय राजनीति में बदलाव की आखिरी उम्मीद है। हमें  यानि जनपक्षधर मोर्चा और लाल नील दोनों तबकों को समझ लेनाचाहिए कि परिवर्तन की हर घड़ी पर धर्मन्मादी तत्वों ने ही विजय पताका फहराया है।


    मसलन सत्तर का दशक है। नक्सलवादी जनविद्रोह, तेलंगना,श्रीकाकुलम और ढिमरी ब्लाक ही नहीं,आजाद भारत में तेभागा और खाद्य आंदोलन जैसे जनांदोलनों से लेकर पराधीन भारत के तमाम आदिवासी किसान विद्रोह की विरासत की संपूर्ण भ्रांति में तिलांजलि हो गयी। अब जन युद्ध जंगल में सीमाबद्ध है।खेत खलिहान तबाह हैं।कृषि की हत्या हो गयी।जल जंगल जमीन से लेकर नागरिकता,पर्यावरण और मानवअधिकारों से बेदखली का पूरा कारोबार धर्मोन्मादी छाते के अंदर हो रहा है। सामाजिक और उत्पादक शक्तियां ,किसान और मजदूर केशरिया में सरोबार है। अंबेडकरी आंदोलन मलाईदार तबके के हितों के मुताबिक सत्ता की चाबी में तब्दील है और बहिस्कृत बहुसंख्य तमाम समुदाय धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की पैदल सेनाएं हैं।तो वामपक्ष भी संसदीय राजनीति के तहत दक्षिणपंथ में एकाकार है,जिसकी वजह से बंगाल में वाम पतन हो गया और बाकी देश में वाम का नामोनिशान बचा है तो सिर्फ केरल और त्रिपुरा में।उत्तर भारत में,हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर में,कश्मीर और तमिलनाडु में कहीं भी वाम नहीं है।


    सामाजिक व उत्पादक शक्तियों के गठजोड़ से सन सैंतालीस से सन 1952 तक मुख्य विपक्षा बने रहे वाम दलों की इस दुर्गति के पीछे वर्ण वर्चस्वी वर्ग वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी वाम नेतृत्व है,जिसने उत्तर भारत में वाम नेतृत्व को कुचलकर रख दिया और सत्ता की राजनीति में हमेशा दलाली करते रह गये।जनाधार बनाने के लिए आंदोलन की बजाय सत्ता समीकरण साधने का लाल नील रिवाज सत्तर के दशक की ब्रांतियों की उपज है।


    सही मायने में अब न लाल है और न नील।लाल नील सबकुछ अब केशरिया है।


    जनादेश बनाने में कारपोरेट,मीडिया और सम्राज्यवादी अति सक्रियता के मुखातिब राष्ट्र और जन गण के सामने जो मुख्य चुनौती है,आप मानें या न माने वह यह सर्वव्यापी केशरिया है। अपढ़ लोगों की क्या कहें ,पढ़े लिखे तकनीक समृद्ध नवधनाढ्य उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग बाजार में अतिरिक्त क्रयशक्ति हासिल करने की अंधी दौड़ में इस केशरिया तूफान की बुनियाद बने हुए हैं। सूचना क्रांति के कारपोरेट चरित्र और मीडिया विस्फोट से दरअसल सूचना निषेध नहीं है,संपूर्ण भ्रांति में उलझे लाल नील पक्षों के आत्मघात से संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडा मुताबिक भारतीय मीडिया अब सर्वत्र वर्ण वर्चस्वी,वर्ग वर्चस्वी और नस्ल वर्चस्वी है।सारस्वत मीडिया प्रमुखों की यह फौज तब जनतादल सरकार में पहली बार सूचना प्रसारण मंत्री बने लालकृष्ण आडवाणी ने तैयार की।कमंडल अभियान मंडल के बहाने जो जो शुरु हुआ ,उसमें भी इस केशरिया खेसड़िया जहरीले ब्रिगेड का बड़ा योगदान है। आडवाणी को रामरथी बतौर पहचाना जाता है, लेकिन हिंदू राष्ट्र के माफिक केशरिया आत्मघाती मीडिया दस्ते के वे जनक हैं और उनका यह  योगदान सैम पित्रोदा से कहीं ज्यादा निर्णायक हैं। मीडिया के प्रबंधकों की क्या कहें,जो पैदल सेनाएं हैं,उन्हें भी अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने से कोई परहेज नहीं है। अटल सरकार के जमाने में बछावत आयोग का महापाप ढोते हुए अधिकांश पत्रकार शार्टकाट से राजनीतिक अनुकंपा के मार्फत अपना वजूद बहाल रखने में मजबूर है।


    बछावत मार्फत जो वेतनमान बना वह मानवाधिकार का सरासर हनन है।देश में जब केंद्र और राज्यों के वेतनमान समान हैं, सेना में जब एक रैंक के लिए समान वेतनमान है तो न्याय के किस सिद्धांत के तहत एक ही संस्थान के अलग अलग केंद्रों में एक ही पद पर अलग अलग वेतन मान है,बताइये। महज एक दफा सत्ता में आकर पत्रकारिता को कूकूर जमात में तब्दील करने वाले पेडन्यूज संस्कृति के लोग जब सत्ता में मुकम्मल तौर पर आयेगें,तो मीडिया और अभिव्यक्ति, सूचना के अधिकार का क्या होगा,इसका अंदाज हो या न हो,मीडिया के लोग देश को केशरिया बनाने में रात दिन सातों दिन बारह मास चौबीसों घंटे एढ़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। और तो और,सोशल मीडिया भी पीछे नहीं है।


    यह सब इसलिए हुआ कि समाजिक शक्तियों और उत्पादक शक्तियों को संबोधित करने में हमारी भारी चूक हो गयी। छात्रों युवाजनों और स्त्रियों का सत्तर दशक हमारे हाथों से फिसल गया और हम विचारधारा की जुगाली करते रहे। सामाजिक यथार्थ और वस्तुगत परिस्थितियों के मुताबिक नीतियं के साथ रणनीति बनाने औऱ अमल में लाने वाला कोई नेतृत्व जनपक्षधर मोर्चे में सिरे से अनुपस्थित रहा।


    आज हम आप के बहाने मौजूदा तंत्र से बुरी तरह नाराज आम लोगों की गोलबंदी को देख नहीं रहे हैं।देख रहे हैं तो अरविंद केजरीवाल और आप में शामिल तमाम खास चेहरों को।


    माफ कीजियेगा,हम तो अरविंद के सवालों के बजाय देख रहे थे कि पूरे गुजरात में हाशिये पर खड़े तमाम लोग कैसे भय को तोड़कर सड़कों पर उतर आये। कच्छ में अनुसूचित जनजातियों को असंवैधानिक तरीके से पिछड़ी जातियों में बदलकर अनुसूचित क्षेत्र का दायरा तोड़कर जिस निरंकुश तरीके से भूम अधिग्रहण हुआ और गुजरात के बाकी हिस्सों में सरकार प्रापर्टी डीलर में तब्दील हो गयी,उसका नजारा हमने भी कच्छ के रण में नमकीन हवाओं की सुगंध में महसूस किया है। इसके विरुद्ध जो जनाक्रोश की आंच है,उसको महसूसने की जरुरत है।


    हम उत्तराखंड से हैं और उत्तर भारत के किसान समाज में हमारी जड़ें हैं, जहां कभी अत्यंत शक्तिशाली किसानसभा जिसके नेता और ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह के नेता भी मेरे दिवंगत पिता पुलिन बाबू थे और जिस किसान आंदोलन को हम चरण सिंह से लेकर महेंद्र सिंह टिकैत के हाथों सत्ता समीकरण के दक्षिणपंथ में बदलते देखा है, वहां भी किसानों में नयी हलचल महसूस की जा रही है।


    बदलाव के ये तत्व ही निर्णायक हैं न कि कारपोरट जनादेश और सत्ता समीकरण।

    हम दरअसल आप के मंच को घेरे उमड़ती हुई भीड़ में अपने लोगों को देख रहे हैं,आंदोलनकारियों की फौज को देख रहे हैं,जनिसे नरंतर संवाद की जरुरत महसूस कर रहे हैं।


    संघी हिदू राष्ट्र का एजंडा कोई गोपनीय नहीं है, वह अब मुकम्मल खतरा है और उसका ही निरंकुश चेहरा संघ भाजपी व्यापी नरेंद्र मोदी हैं।सबसे खतरनाक बात तो यह है कि संघ ने अपने लोकतांत्रिक उदार मुखौटों का भी परित्याग कर दिया है। अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो राजनीति और राजनय में अविराम कुशल संवाद के पैमाना भी है।भाजपा और संघ तमाम हिंदुत्व नेताओं औरयहां तक कि सरदार पटेल की हिंदुत्व वादी मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा को तत्पर  है।


    कोई भी कहीं भी वाजपेयी का भूलकर उल्लेख नहीं कर रहा है।


    संसद में सबसे अच्छी वक्ता सुषमा स्वराज,कुशल प्रवक्ता अरुणजेटली, कट्टर संघी मुरली मनोहर जोशी से लेकर रामरथी कमंडलधारी लाल कृष्ण आडवाणी तक नरेंद्र मोदी के आगे म्लान हैं।हाशिये पर हैं।


    इसे संघ और भाजपा का संकट समझने की भूल कतई न करें.यह अनागत केशरिया भविष्य का अशनिसंकेत है।


    नरेंद्र मोदी सुनामी का सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र और उदारता का,मानवता और नागरिकता, संविधान,कानून का राज,देश के संघीय ढांचे का अवसान है।


    हम मामूली किसान शरणार्थी परिवार के बेटे हैं। हमारी तुलना में आपकी शिक्षा दीक्षा बेहद उच्च कोटि का है।


    आपसे विनम्र निवेदन किंतु यही है कि आसन्न केशरिया कयामत की तेज दस्तक को सुनने में भूल न करें, नमोसुनामी कोई परिकल्पना  मात्र है तो उसके कार्यान्वयन के आसार भी पूरे हैं।


    चूहो की दौड़ भागते जहाजों से हैं और न उन्हें देश की परवाह है और न देसवासियों की। उनकी दृष्टि और हमारी दृष्टि में कोई फर्क नही होना चाहिए।

    आज मैने लाल पर लिखा है तो समय समय पर नील पर भी खूब लिखा है। जिस बहुजन अस्मिता की नींव पर केशरिया तिलिस्म तामीर हो रही हैं, संगमरमरी उस इतिहास के तमाम नीले कारगरों के हाथ भी ताजनिर्मातओं की तरह काट दिये गये हैं या काट दिये जायेंगे।


    इसी लिए हमने उनसे सवाल भी किया है कि जाति अस्मिता क्या चीज है कि धोकर पीन से सामाजिक न्याय का लक्ष्य हासिल हो जायेगा।


    कृपया उसे भी पढ़े लें।और इस मंतव्य के साथ जोड़कर पढ़ लें।

    स‌ाथी अशोक कुमार पांडेय ने फेसबुक वाल पर लिखा हैः

    पहले कांग्रेस वाले दुखी थे "आप" से, अब निक्करधारी संघी तो जैसे पगला गये हैं. उनका चले तो केजरीवाल के चड्ढी का ब्रांड भी पता करके उसकी आलोचना कर दें. पागलपन की हद यह कि आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह यह सब नाम कमाने के लिए और चुनाव जीतने के लिए कर रहे हैं. तो भैया ये साहेब चाय क्या देश का कुपोषण दूर करने के लिए पी/पिला रहे हैं? उन्होंने सवाल किये हैं और सवाल करना हर नागरिक का हक है, जवाब नहीं है तो गाली गलौज से जनता बेवकूफ नहीं बनेगी.


    "आप" को लेकर मेरी असहमतियां तीख़ी हैं लेकिन कोई दुश्मनी नहीं. वाम के जो साथी भी आपा खोये दे रहे हैं उन्हें थोड़ा नियंत्रण रख के मुद्दों पर आलोचना और असहमति दर्ज करानी चाहिए. याद रखें "असहमति के साहस के साथ सहमती का विवेक ज़रूरी है"

    लाइक किया हैः

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    • अशोक कुमार पांडेय ने टिप्पणियों के जवाब में लिखा है

    • हाँ और अधिक विस्तार से जनपक्ष पर लेख हैं दो.

    • हिमांशु स‌ोनी

    • बेहतर !

    • Achutanandsharma Sharma Nice! Fascism is the most primary inherent characteristic of RSS-BJP wandwagon.

    • Abhishek Goswamiसटीक विश्लेषण ।

    • मैंने जो टिप्पणियां की हैं

    • Palash Biswasअशोकजी, मेरी स‌मझ में तो यह नहीं आ रहा है कि नमोमयभारत निर्माण सुनामी के खिलाफ तिनकों का जो प्रतिरोध आप खड़ा कर रहा है,उसको भी तहस नहस करने की यह पुरजोर कोशिश किसके काम आयेगी।पहले आप तय कर लें कि आपको हिंदू राष्ट्र चाहिए या नहीं और उसके मुताबिक मोदी का विरोध जरुरी है पहले कि अरविंद कीखिंचाई।

    • मैं आपसे स‌ौ फीसद स‌हमत हूं।मुझे मालूम है कि पहले स‌े ही संघ परिवार आप स‌े किस बुरी तरह परेशान है।पगलाये हुए स‌ांढड के आगे लाल झंडा हिलाने का माहौल है वहां।

    • जो मुद्दे वाम को उटाने चाहिए थे,वे मुद्दे अरविंद केजरीवाल उठा रहे हैं।इसमे बुराई क्या है।उन मुद्दों पर बहस केंद्रित करने के बजाये बेमतलब आप पर निशाना स‌ाध कर हम संघियों की मुश्किल आसान कर रहे हैं।

    • नरेंद्र मोदी के हक में तो भाजपाई भी नहीं हैं।न अटल,न आडवाणी,न जोशी,न स‌ुषमा,न जेटली।

    • हम लोग संघी स‌िपाहसालार बनने को रामविलासी उदितराजी जयी ममताई मायामय मुलायम भूमिका निभाने को इतने बेताब है।

    • 10 minutes ago· Like

    • Palash Biswasफेसबुक पर जो लोग स‌िरे स‌े हैं,उन्होंने हमारे,जगदीश्वर जी,सुरेंद्र ग्रोवर,राजीव नयन,उदय प्रकाश,मोहन क्षोत्रियजी जैसे अनेक स‌ाथियों के आप के बारे में बदलते आकलन को देख रहे होंगे।हम आप को भाव इतने दे रहे हैं क्योंकि हमारे पास दूसरा चारा है ही नहीं।जिनके भरोसे वाम हैं,वे भीतरी केशरिया हैं और उनका केशरिया या तो निखर चुका है या पिघलकर बाहर आने को है।

    • 7 minutes ago· Like

    • Palash Biswasएकदम अकेले वाम है और अब तो नीला भी केशरिया हुआ जाये है।

    • Palash Biswasबंगाल में हम वाम दुर्गति देख रहे हैं।गुरुदास दासगुप्त का विकल्प तैयार नहीं हो पाया।कामरेड ज्योति बसु और प्रमोद दासगुप्त की छोड़िये। वासुदेव आचार्य जैसे नौ बार के संसदीय चेहरे के मुकाबले पिटे हुए ग्लिमर के मुनमुन मजबूत है,इससे ज्यादा फजीहत क्या हो स‌कती है।

    • Palash Biswasस‌ुभाषिणी अली को,और वृंदा कारत को भी नारी दिवस पर हजारो टन कागद कारे करने वालों को पार्टी पोलित ब्यूरो में कब के शामिल कर लेना चाहिए था। करते तो उत्तर भारत में लाल झंडा स‌िरे स‌े गायब न हुआ होता।

    • Palash Biswasवृंदा के लिए लोकसभा की कोई स‌ीट नहीं मिली कि अफसोस कि स‌ुभाषिनी को भी बैरकपुर स‌े जिता लेने की कोई हालत नहीं है।

    • Palash Biswasबीस स‌ीटें तक जीतने की हालत नहीं है और बीसियों मीटर छलांग कर मौकापरस्तों के भरोसे तीसरे मोर्चे स‌े क्या खाक रोकेंगे नमोमय भारत को।

    • Palash Biswasधर्मोन्मादी देश में धर्मनिरपे&ता का कोई मोर्चा बना ही नहीं है।

    • Palash Biswasबेहतर हो कि स‌ाफ स‌ाफ तय यह कर ले कि हमें आखिर मोदी को रोकना है या केजरीवाल को


    प्रतिक्रिया में पामबर्ड मोटघरे ने लिखा है


    मोदी गुजरात की कुछ अनकही बातें

    1.एक ऐसा राज्य है जिसके दो मिनिस्टर जेल में है और दो बैल पे बहार घूम रहे है उसमे से जो गृहमंत्री था ओ कुछ दिनों के लिए गुजरात से तडीपार किया गया था

    ये सब मिनिस्टर संगीन जुर्म के अपराधी है

    2.गुजरात एक ऐसा राज्य है जहा विधानसभा और कैबिनेट ऑफ़ मिनिस्टर नाम के लिए है वहा कभी विधानसभा नाम के लिए दो तिन दिन चलाई जाती है और कभी भी कैबिनेट क बैठक नहीं होती

    3.गुजरात राज्य के 45%बच्चे कुपोषित है जो भारत देश में सबसे जादा है

    4.गुजरात राज्य की51%महिलाये औसत वजन से कम वजन की है

    5.गुजरात राज्य का शिक्षा क्षेत्र में18 क्रमांक है जो दस साल पहले 9वा क्रमांक था

    6.गुजरात राज्य भारत का सबसे ज्यादा कर्जबाजारी राज्य है जो 175000करोड़ है

    इसका मतलब गुजरात में हर एक आदमी पर 24हजार कर्ज है जो भारत में सबसे ज्यादा है

    7.भारत में सबसे ज्यादा टैक्स वसूलने वाला राज्य गुजरात है

    8.भारत मै सबसे कम पढ़ा लिखा मुख्यमंत्री (less educated) गुजरात का है

    9.भारत में सबसे ज्यादा खुदपे खर्च करने वाला cm गुजरात का है

    10.भारत मैं सबसे ज्यादा बेरोजगारी गुजरात में है l

    यह है मोदी के गुजरात की हकीकत


    जाति कौन सी चीज है,जिसे धोकर पी जायेंगे तो सामाजिक न्याय और समता का लक्ष्य हासिल हो जायेगा?

    माननीय एचएल दुसाध जी के फेसबुक वाल से

    ढसाल में 99% कमियां:एक मार्क्सवादी सह आंबेडकरवादी

    एच एल दुसाध

    मित्रों कुछ देर पहले(9-9.40pm) मोबाइल पर एक ऐसी शख्सियत से लम्बे वार्तालाप में मशगूल था जिन्हें मार्क्सवादी अर्थात सवर्ण एकमात्र दलित चिन्तक मानते हैं.सवर्ण मार्क्सवादियों में उनकी लोकप्रियता का यह आलम है कि पिछले वर्ल्ड बुक फेयर में मेरे जिले का एक मार्क्सवादी,जो शायद अपना जनपदवासी होने के ना...See More

    इस पोस्ट में उन्होंने हमारे आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़े के धसाल को महाकवि न मानने पर अपना उद्गार व्यक्त करते हुए मेरा उल्लेख भी कर दिया है।इस संबंध में दोनों मित्रों के बीच हुए संवाद में मैं बीच में फंस गया हूं।

    आनंद जी ने  धसाल जी के उद्गार पर जो विनम्रता पूर्वक निवेदन किया,उसके जवाब में उन्होंने आनंद जी को जो जवाब दिया,उसका लब्वोलुआब यही हैः


    सर शाम को आपने वार्तालाप के दौरान ढसाल के विषय में जो राय दी वह स्तंभित करनेवाली रही.बातों-बातों में मैंने यह भी उपलब्धि किया कि डाइवर्सिटी के प्रति भी आप में सम्मान का भाव नहीं है.हम व्यक्ति के रूप में तो परस्पर के प्रति आदर रख सकते हैं ,पर वैचारिक रूप से नदी के ऐसे दो किनारे हैं जिनका मिलना मुमकिन नहीं दीखता.आप बेसिकली मार्क्सवादी हैं,यह यकीं आज और पुख्ता हुआ.


    इल बारे में दुसाध जी से और आनंद जी से मेरी सविस्तार बात हुई है।

    इस गर्मागर्म बहसबाजी से सविता सख्त नाराज हो गयी है और मुझे जिम्मेदार ठहरा रही हैं कि क्यों मेंने दुसाध जी से आनंद की बात करायी।


    गौरतलब है कि जब अरविंद केजरीवाल की सरकार दिल्ली में बनी तब एनजीओ सरकार के प्रतिरोध की गरज से नया राजनीतिक दल खड़ा करने के कार्यभार के साथ नईदिल्ली से दुसाध जी का प्रस्थान हुआ,पटना में उन्होंने एक कामयाब सम्मेलन भी किया और दिल्ली से चलने से पहले उन्होंने हमें जो सूचना दी,उसके मुताबिक वे हमारे यहां आ पधारे।


    उन्होंने सीधे कहा कि आपको इस राजनीतिक दल का चेहरा बनना है।


    जाहिर है कि जैसा भी है,मेरा चेहरा मेरा है और वह कम से कम राजनीति का चेहरा हो,ऐसा तो मैं मान ही नहीं सकता।बेहतर होता कि दुसाध जी कोई फिल्म निर्माता निर्देशक होते और हमें अपनी फिल्म का चेहरा बनाने का प्रस्ताव देते तो मुझे खुशी खुशी रजामंद होने में कोई दिक्कत नहीं थी।


    चूंकि दुसाध जी बेहद ईमानदारी से लिखते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं तो उस दिन से लगातार हम उनसे निवेदन कर रहे हैं कि हम तो चाहते हैं कि वे महाबलि हनुमान हों ,लेकिन हम नहीं चाहते कि वे रामभक्त हनुमान बनें।


    उनके साथ भाजपा नेता लल्लन सिंह आये थे।


    दुसाध जी के डायवर्सिटी विचारों पर हम सहमति जता चुके हैं।समता और सामाजिक न्याय की बत करने वाले किसी भी शख्स को सैद्धांतिक तौर पर इससे कोई ऐतराज नहीं है।हमारे अन्य मित्र भी उनसे सहमति जता चुके हैं ।


    सविता की चेतावनी के बावजूद कि  सत्ता की राजनीति में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है और हमारे पूरे परिवार की तरफ से अपना वीटो भी तलाक की धमकी के साथ उन्होंने लगा दिया,हम राजनीतिक परिदृश्य पर लंबी बहस में उलझते रहे और इस पर सहमति हुई कि सत्ता की राजनीति से हमारा कोई लेना देना नहीं है।इसी के मध्य आनंद तेलतुंबड़े का फोन आ गया,जिनसे बात करने की इच्छा दुसाध जी जता चुके थे।


    हमने दुसाध जी को आनंद का फोन थमा दिया और उन्होंने भी सामाजिक बदलाव के मद्देनजर राजनीतिक सत्ता समीकरण को गैर प्रासंगिक बता दिया।


    उस दिन भी नामदेव धसाल पर दुसाध जी से हमारी बात हुई थी। बार बार होती रही है। हमारा साफ साफ कहना है कि नामदेव दलित अस्मिता के कवि रहे हैं और उनकी कविता से बड़ा योगदान उनका दलित पैंथर आंदोलन है। हम न तो नामदेव धसाल को मुक्तिबोध या निराला से बड़ा कवि मानेंगे,न सुकांत भट्टाचार्य या पाश से बड़ा कवि।लेकिन हम उनकी कविताओं के प्रशंसक रहे हैं।न हम ओम प्रकाश बाल्मीकि को प्रेमचंद से बड़ा कथाकार मानेंगे और न कंवल भारती को रामविलास शर्मा और विजयदान सिंह चौहान से बड़ा आलोचक। यह हमारा मूल्याकंन है।


    किसी के कहने से हमारे विचार नहीं बदलेंगे,हमारी दृष्टि,सामाजिक यथार्थ के बदलते संदर्भ ,हमारे इतिहास बोध,वैज्ञानिक दृष्टिकोण,सौंदर्यबोध और अवधारणाओं और विचारों को जोड़ने तोड़ने की हमारी क्षमता के मुताबिक ही विचार बनेंगे बिगड़ेंगे।


    कम से कम विचारों के मामले में हम मौकापरस्त नहीं है।सत्ता समीकऱण और निजी लाभ हानि की वजह से लोगों के विचार और जीवन बदले जाते हैं,पक्ष पक्षातंरित हो जाते हैं,हम फिलहाल अपने को इस विपर्यय से बचाने की कोशिश कर रहे हैं।चारों तरफ से अभिमन्यु की तरह घिर जाने के बाद हमारा क्या हश्र होगा हम भी नहीं जानते।


    इस बारे में हमने विस्तार से लिखा भी है कि दलित पैंथर आंदोलन का विचलन कोई अलग घटना नहीं है।यह समूचे अंबेडकरी आंदोलन की तार्किक परिणति है.जो अपने बुनियादी जाति उन्मूलन के एजंडे से ही भटक गया।


    अगर भारत में सही मायने में दलित साहित्य की बात की जाये तो शैलेश मटियानी का लिखा से बेहतर कोई दलित साहित्य हमारी जानकारी में नहीं है।लेकिन आजीवन कसाई परिवार में जनमने के बावजूद एकदम शास्त्रीय लेखन क्षमता वाले शैलेश जी ने अपने को कभी दलित नहीं माना।वे प्रगतिशील थे।एक निजी हादसे की वजह से नितांत अकेलेपन और टूटन में उन्होंने भी संघ परिवार की शरण ली धसाल की तरह।


    निजी तौर पर इसके लिए हम न नामदेव धसाल और न शैलेश मटियानी को इसका जिम्मेदार मानते हैं। हम लोगों ने धूमिल का अंत देखा है।पाश की शहादत देखी है और गोरख पांडेय की खुदकशी से भी वास्ता पड़ा हमें।


    इन तमाम लोगों के लिए जो हालात बने,उनसे उन्हें बचाने लायक कोई शरण स्तल हम नहीं बना सकें तो जहां उन्हें शरण मिल सकती थी वे वहां गये,या बेमौत मारे गये पाश की तरह या गोरख ने आत्महत्या कर ली। आज वरवरा राव और गद्दर के अवस्थान में फर्क आया है। लेकिन चेरावंडा राजू की जमात में वे दोनों हैं और रहेंगे।


    किसी प्रतिबद्ध कार्यकर्ता और संस्कृति कर्मी की रचनाधर्मिता उसकी सामाजिक सक्रियता से बनती बिगड़ती है।विचारधारा ,आंदोलन और संगठन के विचलित होने की हालत में अकेले व्यक्ति पर तमाम लांछन लगाना शायद न्याय भी नहीं है।


    जो लोग रास्ता भटक गये, जो लोग अलग थलग हो गये, उनके लिए कारंवा की भी बड़ी जिम्मेदारी है,हमारा ऐसा मानना है।


    हमें व्यक्तियों को अपनी अपनी फतवेबाजी से ईश्वर बनाने की वर्चस्ववादी प्रवृत्तियों से बचना चाहिए कम से कम कला और साहित्य के मामले में।


    कल ही हमारे फिल्मकार मित्र जोशी जोसफ,जिनकी पूर्वोत्तर बनायी बेहतर फिल्मों के जरिये हमारी यात्रा मणिपुर के इमा खैथलों से लेकर इरोम शर्मिला के आफसा विरोधी आंदोलन में भागेदारी तक चल रही है, उनसे लंबी बातचीत हुई।


    प्रतिरोध के सिनेमा के दिल्ली आयोजन के  मौके पर हमने खुद अपनी गैरहाजिरी के एवज में एक नोट लिखकर भारतीय उपमहाद्वीप के एक तिहाी लोगों के अपढ़ और नब्वे फीसद लोगों के बाजारु अर्धपढ़ होने के मद्देनजर तेजी से गैरप्रासंगिक होते जा रहे प्रिटं के विकल्प बतौर विजुअल मीडिया को पेश करने की दलीलें दी थीं।


    चूंकि न हम फिल्मकार हैं और न इस माध्यम के विशेषज्ञ,हमने आनंद पटवर्द्धन के अति प्रसंगिक फिल्मों के हवाला देते हुए यही लिखा था कि निःसंदेह जय भीम कामरेड जैसी उनकी फिल्म जमीन तोड़डती है,लेकिन उनकी शास्त्रीयता को भी तोड़ना जरुरी है।


    जैसे हम बार बार कहते रहे हैं कि आनंद तेलतुंबड़े या अरुंदति राय,गौतम नवलखा या सुभाष गाताडे जैसे अनेक लोग सामाजिक यथार्थ को बड़ी शिद्दत और काबिलियत से संबोधित करते हैं,लेकिन उनके पाठक हमेशा सत्ता वर्ग के होते हैं।जिन वंचितों के हालात बदलने के लिए वे लिखते हैं,उनतक उनकी बात पहुंच ही नहीं पाती।


    आम लोगों को सत्ता,राजनीति,राष्ट्र,समाज और अर्थव्यव्स्था में हो रहे बदलाव के बारे में सही सही सूचना ही नहीं हो पाती।इसलिए वे भाव वादी तरीके से सोच रहे होते हैं।


    जैसे अभिनव सिन्हा की टीम ने एक बड़ी पहल की जाति विमर्श को फोकस करने के सिलसिले में। लेकिन जिस तबके को संबोधित किया जाना है,उनकी मानसिक तैयारी के बारे में उन्होंने सोचा ही नहीं।

    यह ऐसा ही है कि जैसे किसी सर्जन ने मरीज को आपरेशन थियेटर में ले जाकर जीवनदायी प्रणालियों को एक्टिवेट किये बिना ,एनेस्थेशिया दिये बिना सीधे दिमाग की चीरफाड़ शुरु कर दी हो।


    ऐसे चिकित्सकों की इन दिनों बेहद भरमार है।


    जोशी आनंद पटवर्द्धन के बारे में हमारी टिप्पणी से खासे नाराज हैं। वे पटवर्द्धन के उतने ही दोस्त हैं जितने हमारे।


    कल हमसे बोले,तुम छोटी फिल्मों की बात करते हो,हमने अभी दो घंटे की फिल्म बनायी है।तुम्हारे लिए अलग स्क्रीनिंग करेंगे।आओ देखो.फिर बात करो माध्यम पर।


    जाहिर सी बात है कि कोई भी बढ़िया निर्देशक अपने माध्यम में बाहरी हस्तक्षेप बर्दाशत नहीं करता।


    जोशी ने आगे जो कहा, वह बेहद महत्वपूर्ण है। उसके मुताबिक साहित्य और कलामाध्यमों के दो अनिवार्य तत्व है,पालिटिक्स और पोयेटिक्स।इन पर बात करने के लिए दोनों दुरुस्त होने चाहिए।


    राज्यतंत्र की समझ के बिना सामाजिक यथार्थ की दृष्टि से रचनाक्रम करना असंभव है तो इतिहासबोध से लैस वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित सौंदर्यबोध के बिना किसी भी तरह का मूल्याकन नाजायज है।


    हम चाहते हैं कि दुसाध जी इस वक्तव्य के तात्पर्य को समझें।


    हम इस व्यक्तिगत संवाद को सार्वजनिक नहीं बनाते अगर इसका सार्वजनिक महत्व नहीं होता।दुसाध जी ने पहले ही अपना उद्गार फेसबुक वाल पर डालकर निजी संवाद को सार्वजनिक बना चुके हैं।


    क्योंकि मैं बीच में फंसा हुआ हूं तो मुझे भी अपनी सफाई देने का हक है। इसीसिलसिले में आनंद ने दुसाध जी की सहमति से अपना जो जवाब मेरे साथ साझा किया,उसे मैं ानंद की सहमति से आप सबके साथ साझा कर रहा हूं।


    दुसाध जी अगर डायवर्सिटी के अपने सिद्धांतों को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें फतवेबाजी से बाज आना होगा।और बहुजन अंबेडकरी राजनीति के माफिक टैग लगाने से परहेज करना होगा।हमने उनसे इस सिलसिले में बात भी की है।


    अगर हम निराला या टैगोर को ब्राह्मण कवि नहीं कहते, प्रेमचंद को लाला कथाकार नहीं कहते, फिल्मों को जाति पहचान के हिसाब से नहीं देखते,बाजार,उत्पादन प्रणाली और श्रमसंबंधों में जाति वरीयता नहीं देखते,तो साहित्यऔर कला में विचारधारा और पहचान के आधार पर इस किनारे उस किनारे की बात करके डायवर्सिटी के सिद्धांत का मखौल क्यों उड़ा रहे हैं।


    सांप्रतिक इतिहास में बाबा साहेब अंबेडकर और महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से लेकर इंदिरागांधी और कामरेड ज्योति बसु में भयंकर वैचारिक मतभेद के बावजूद संवाद का सिलसिला हमेशा कायम रहा है।


    अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति और राजनय संवाद की हालिया बेहतरीन मिसाल है।वाजपेयी की वजह से ही केंद्र में भाजपी की सरकार बनी,यह बात संघ परिवार मान लें तो यह राष्ट्र और यह समाज बेवजह रक्त नदियों के डूब में समाहित होने से बचेगा और भाजपा के लिए सत्ता समीकऱण धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के खूनी खेल के बजाय स्वस्थ लोकतांत्रिक विकल्प बतौर बनना ज्यादा व्यवहारिक होगा।


    इस सत्य को नजरअंदाज करके लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी मुंह की का चुके हैं और धर्मोन्मादी सुनामी के जरिये भाजपा चेहरा बनकर देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए रोजाना जो भयंकर गलतियां नरेंद्र मोदी कर रहे हैं,वह देश के लिए जितना खतरनाक है उससे कम खतरनाक न शंघ परिवार के लिए है और न नरेंद्र मोदी स्वयं के लिए।


    हमने दैत्य,राक्षस, दानव,यक्ष,असुर, किन्नर जैसे पौराणिक टैगो का हवाला देते हुए कहा था कि ये सारे टैग नस्ली नरसंहारक टुल हैं।अस्मिता ऐसा ब्रह्मास्त्र है,जिसका परिणाम हमेशा आत्मघाती होता है।


    वीटी राजशेखर की बड़ी भूमिका रही है,लेकिन उनकी परिणति जाति अंधता में हुई।हमारे ज्यादातर कामरेड विचारअंध हैं। मायावती की जाति अंधता बहुसंख्य आम जनता की नियति सी बन गयी है।


    जाति पहचान के जरिये सशक्तीकरण के फायदे पाने वाली जातियों के नाम गिना दीजिये तो बाकी छह हजार जातियों की जाति अंधता का औचित्य पानी की कतरह सरल हो जायेगा।


    हमारे हिसाब से तो भ्रष्टाचार की जड़ है यह जाति व्यवस्था और उसकी विशुद्धता का सिद्धांत।वर्णवर्चस्वी इंतजामात में भ्रष्टाचार का कारखाना है और ऴंशवादी वायरल से बचता वनहीं कोई छोटा या बड़ा। जाति और विवाह के जटिल प्रबंधकीय खर्च के लिए ही बेहिसाब अकूत संपत्ति अर्जित करने की जरुरत होती है।


    बंगाल में 35 साल के वाम शासन से और जो हुआ हो,उससे इतना तो जरुर हुआ है कि वैवाहिक संबंधों में जाति धर्म या भाषा का टंटा खत्म है और दहेज न होने की वजह से सार्वजनिक जीवन में तमाम समस्याओं और आर्थिक बदहाली के बावजूद लोग तनावरहित आनंद में हैं।


    जहां जाति का बवंडर ज्यादा है,वहां अंधाधुंध कमाने की गरज बाकायदा कन्यादायी पिता की असहाय मजबूरी है।उत्तर भारतीय परिवार और समाज में ज्यादा घना इस जाति घनघटाों की वजह से ही हैं।


    और समझ लीजिये कि आपकी पहचान का फायदा उठाकर कैसे कैसे लोग आपके मत्थे पर बैछकर हग मूत रहे हैं और आप तनिक चूम करें कि चूतड़ पर डंडे बरसने लगे।


    जाति राजनीति की वजह से आप प्लेटो में परोसे जाने वाले मुर्ग मुसल्लम को रहमोकरम पर हैं।


    आप जाति उन्मूलन कर दीजिये।विवाह संबंधों को खुल्ला कर दीजिये,भ्रष्टाचार की सामाजिक जड़ें खत्म हो जायेंगी।


    हम वीटीआर की नाराजगी का शिकार हुए हैं।


    हम कोई चुनाव लड़ नहीं रहे हैं कि बहुमत का समर्थन हमारे लिए अनिवार्य है।

    दुसाध जी,आप इसे समझ लें कि हम आपके इन विचारों को भावनाों के विस्पोट के अलावा कुछ नहीं समझते।हम आपके लिखे और आपके विचारों का समर्थन करते हैं।


    लेकिन यह तो आप हैं जो अपने विचारों और सिद्धांतों के विपरीत आचरण कर रहे हैं।


    कृपया मोदियाइये नहीं।


    जाते जाते हम आनंद के नीचे दिये गये पत्र के मुताबिक वंचितों को न्याय दिलाने और सामाजिक न्याय और समता के लक्ष्य के लिए वंचित समुदायों को चिन्हित करने की हद तक,उनके समान अवसर और संसाधनों में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की हद तक अस्मिताओं का उल्लेख कर सकते हैं,लेकिन राजनीतिक या वैचारित टुल की तरह कदापि नहीं।


    फिर हम मानते हैं कि नदियों के किनारे भी मिलल जाते हैं कभी कभार तो सामाजिक अंतर्विरोधों को सही तरीके से संबोधित करके हम सभी नयी दिसा भी बना ही सकते हैं।

    और इसीलिए किसी भी तरह के मतभेद के बावजूद इस वक्त संवाद बेहद जरुरी है।


    जिन भगवा महानों से हम सिरे से असहमत हैं,उनसे भी संवाद की संबावना से हम इंकार नहीं करते।


    आप तो खैर मित्र हैं।जो रूठते रहेंगे और मनाये भी जाते रहेंगे।


    लेकिन बेहतर होगा कि रूठने का बचपना से हम बचें और वस्तुपरक सोच अपनाकर बालिग जरुर बनें।


    Dr. Anand Teltumbde


    9:40 AM (4 hours ago)


    *

    to h.l, me





    Dear Dusad ji,


    I am sorry if I hurt your feelings because my opinions did not concur with yours. But to say that we constitute two banks of river that would never meet is a hasty conclusion. Because the sincerity that you have been reflecting in your writings and reflected during our meeting and most opinions you express and on the contemporary issues gave me an impression that we could carry on our discussions. Our opinions etc. are not cast in stone; they are the products of our reflection of our social experience, which in a dynamic world should be subject to change. So long as we reflect it with objectivity within the confines of our commitment to the cause of downtrodden (emancipation of humanity, rather), there is absolutely no issue. There will always be meeting point.


    Your labeling me as Marxist is again pasting some identity on me. I have a serious problem with these labels. I do not consider myself as any 'ist or ite'. This kind of labeling also is identitarian fixation. I do not really know what Marxism is and least its utility because in my observation these identities have only done damage in dividing people with identitarian intoxication that prevented them seeing other's viewpoint objectively in the attempt of working together. (as you did yourself) Palash and I always thought you are a valuable resource in the battle for emancipation of our people. [I take liberty to mark this mail to Palash as I referred to his opinion. I trust, you will not mind.]


    Anyways. you are respected for what you think but we would continue viewing you as our friend.


    Regards

    Anand



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    बेकार की उम्मीदें मजबूर मोदी से


    ओमेर अनस

    HASTAKSHEP

    भारतीय राजनीति के कुछ प्रमुख शब्द ऐसे हैं जो पूरी राजनीति को अब तक परिभाषित करते आये हैं, इनमें सबसे ज्यादा प्रमुख शब्द है जात-बिरादरी का। तक़रीबन हर पार्टी के समीकरण इसी जातीय गणित के इर्द गिर्द बुने जाते हैं। मंडल आयोग ने इस समीकरण को बाकायदा कानूनी हैसियत ही दे डाली। अब वोटर सबसे पहले या तो अनुसूचित जाती जनजाति का है या अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का है या फिर सामान्य वर्ग का, फिर जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का कानून हर पार्टी में देखने को मिलता है। दूसरा बड़ा प्रमुख शब्द हिन्दू मुस्लिम है जो भारतीय राजनीती को बहुत गहराई तक प्रभावित करता है। शिक्षा, विकास, स्वास्थ्य क्षेत्रों में पिछड़े और कृषि प्रधान देश में इन दोनों के अलावा बाकी तमाम समीकरण या तो परदे के पीछे रखे जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी पार्टी के तौर पर उभरी जिसकी बुनियाद में सर्वणों के वर्चस्व को एक धार्मिक और वैचारिक मान्यता प्राप्त थी। पार्टी के नीति निर्माता से लेकर तमाम बड़े फैसले लेने में पार्टी के अन्दर दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग को कभी भी सहर्ष स्वीकार नहीं किया गया। रही बात मुसलमानों की तो बीजेपी का उभार ही मुस्लिम विरोध की कोख से हुआ है। हज़ारों पन्नों में फैला मुस्लिम दुश्मनी पर आधारित वैचारिक साहित्य पार्टी के लिए एक नई पहचान दिलाने में रोड़ा बना हुआ है। "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं", "मुसलमानों के दो ही स्थान, कब्रिस्तान या पाकिस्तान"और "राम लला हम आयेंगे मंदिर वहीँ बनायेंगे"के नारों ने हिन्दू वोट बैंक को मुसलामानों के खिलाफ भड़काने में कामयाब हुआ है।

     भाजपा के कश्मीर और पाकिस्तान नीति कुछ और नहीं बल्कि उसकी मुस्लिम दुश्मनी का एक विस्तार मात्र है जिसे "दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे"जैसे नारों ने अतिहिंसक बनाने का प्रयत्न किया गया ताकि उसका फायदा ज्यादा से ज्यादा राजनीति में हिन्दू वोटो के ध्रुवीकरण करके उठाया जा सके। इस पूरे तजुर्बे ने भाजपा को बैसाखी वाली सरकारें दिलाई और गठबंधन वाला विपक्ष दिलाया, लेकिन उसे कांग्रेस की तरह अकेले दम पर बहुमत कभी हासिल नहीं हो सका।

    बीते दिनों में भारतीय जनता पार्टी में इस बात पर सहमति उभर चुकी है कि भाजपा की सर्वणों वाली पार्टी की पहचान और भाजपा में ब्राह्मणों और बड़ी जातों के चेहरों का वर्चस्व पार्टी को दलितों और पिछड़े वर्गों तक ले जाने में रूकावट बन रहा है। भारतीय जनता पार्टी एक उच्च जातीय, नगर के संपन्न लोगों की पार्टी की छवि से निकल कर कांग्रेस जैसी छवि बनाने में असफल रही है। वहीँ बाबरी विध्वंस और गुजरात दंगों ने भारतीय जनता पार्टी को देश के मुस्लिम वोटरों से हमेशा के लिए दूर कर दिया था। दलितों, पिछड़ों और मुस्लिम मतदाताओं से दूर रहकर भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने में विफल हो चुकी है, लेकिन उससे भी ज्यादा तकलीफ की बात ये है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी भाजपा के पैरों में बेड़ी बन चुका था। उसे अकेले दम पर सरकार बनाने के लिए उसे एक नए फार्मूले की जरुरत थी और नरेंद्र मोदी उसी नए फार्मूले का एक अत्यधिक प्रचारित चेहरा हो चुके हैं।

     नरेंद्र मोदी बीजेपी के डूबते जहाज़ को बचाने के लिए पहले खुद को पिछड़े वर्ग का व्यक्ति बता कर वोट बटोरना चाहते हैं, वहीँ मुस्लिम दुश्मनी का प्रतीक बन चुके नरेंद्र मोदी का एक उदार चेहरा सामने लाने के लिए एक नई भाषा भी गढ़ी गई है। मोदी जैसा व्यक्ति पूरी पार्टी को लगातार विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर  बढाने की कोशिश कर रहा है। मोदी लगातार सांप्रदायिकता, कश्मीर, पाकिस्तान, बाबरी मस्जिद, सामान सहिंता जैसे विवादित मुद्दों से खुद को दूर रखने में कामयाब हुए हैं, वो भी गठबंधन के किसी सहयोगी के दबाव के बगैर। जिन मुद्दों पर नितीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन किया था, नरेंद्र मोदी उन मुद्दों पर नितीश कुमार के बगैर ही अमल कर रहे हैं, यानी की भाजपा अपने दम पर भी सेक्युलर पार्टी रह सकती है, ये साबित करने की कवायद पूरी हो गई है।

    एक ऐसे समय में जब सामाजिक न्याय के मंडल फार्मूला ने दलितों और पिछड़ों के एक बड़े तबके को उभारने में मदद दी है, लेकिन उस उभरते पिछड़े वर्ग को मुलायम सिंह यादव, मायावती और लालू यादव की परिवार संचालित राजनीति में समुचित जगह नहीं मिल सकी है। उभरते दलित वर्ग का भाजपा की विकास राजनीति से जुड़ना एक सुनहरा मौका बन कर आया है, और ऐसे में अल्पसंख्यक खुद को ठगा सा महसूस करें तो कोई हैरत की बात नहीं होगी। इसलिए कई सारे अल्पसंख्यक नेताओं का रुझान भी भाजपा की विकास राजनीति की तरफ होना अवसरवाद दौड़ की ताजा मिसाल है, लेकिन बड़ा सवाल ये है की किया भारतीय जनता पार्टी में ये बदलाव सिर्फ भाषा का बदलाव है। क्या भाजपा जातीय और धार्मिक समीकरण पर केन्द्रित भारतीय राजनीति को विकास और भ्रष्टाचार के एक नए समीकरण पर चलाना चाहती है जिसे पैदा तो अन्ना हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने किया, और उसका राजनीतिकरण अरविन्द केजरीवाल ने किया और उसके फल नरेंद्र मोदी खाना चाहते हैं? क्या दलित मतदाताओं का भाजपा और मोदी की तरफ झुकाव सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा करने में सहायक सिद्ध होगा? और क्या नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी अपनी वैचारिक और सैद्धान्तिक मुस्लिम विरोध से खुद को दूर करके एक सेक्युलर पहचान हासिल करने में सफल होंगे ?

    बहरहाल भाजपा के अंदरूनी बदलाव, नरेंद्र मोदी के उभार और कथित विकास राजनीति के बीच में दरअसल सिफ मौकापरस्ती का रिश्ता नजर आरहा है। न तो भाजपा का ब्राह्मणवाद बदला है और न उसके अन्दर समाजिक न्याय के लिए उनकी सोच में कोई अंदरूनी और नीतिगत या पार्टी के अन्दर किस किस्म का  परिवर्तन दिख रहा है। मोदी को पार्टी का चेहरा बना देने मात्र से पार्टी के पदों पर ब्राह्मणों और ऊँची जाति के लोगों का वर्चस्व कम नहीं हो जायगा और ना ही दलितों और पिछड़ों के मुहल्लों में भाजपा की इकाइयों का अचानक विस्तार हो जायगा। पार्टी में दलित चेहरे खरीद खरीद कर लाने पड़ रहे हैं, जो पार्टी हिंदुत्व और हिन्दू धर्म के आधार पर समाजिक सरंचना पर विश्वास करती हो वो अम्बेडकर के "मैं हिन्दू पैदा हुआ था लेकिन हिन्दू मरूँगा नहीं"की हद तक खुद को कैसे बदल सकती है।

     ये मानने के लिए कोई बदलाव नहीं दिख रहा है कि भारतीय जनता पार्टी अपने आप को हिंदुत्व और हिन्दू सामाजिक सरंचना से खुद को अलग करने की कोशिश कर रही है।

     दूसरा बड़ा निराश करने वाला मामला ये है की भारतीय जनता पार्टी सत्ता के लिए खुद अपने वजूद को दांव पर लगा चुकी है। पार्टी के अन्दर तेज़ी के साथ मोदी का व्यक्तित्व पार्टी से ऊपर उठता जारहा है जिसको लेकर पार्टी को बनाने वाले पुराने नेताओं में बेचैनी वाजिब है, जिस तरह से अडवानी और मुरली मनोहर जोशी की बेइज्जती हो रही है और संगठन को मोदी के आगे नतमस्तक कर दिया गया है उससे ये उम्मीद और भी ख़त्म हो चली है कि भाजपा में सामाजिक न्याय का मुद्दा महत्वपूर्ण हो सकेगा। मोदी के दरबारियों में जो लोग शामिल हैं वो संगठन नहीं बल्कि मीडिया और कार्पोरेट घरानों के एजेंट हैं, जिन्होंने मोदी के ऊपर करोड़ों रुपए दांव पर लगा रखे हैं। अन्ना और केजरीवाल द्वारा तैयार किये गए भ्रष्टाचार और विकास के बहुप्रचारित मुद्दों को नरेंद्र मोदी जिस ढंग ले उड़े हैं, उससे भाजपा के पुराने मुद्दों की चमक तो फीकी पड़ रही है साथ में ये शक भी मजबूत हो गया है कि मोदी की दावेदारी दरअसल कारोबारी घरानों के महलों में तय पायी है जो भाजपा के पार्टी संगठन को पूरी तरह से खरीद लेने या मोदी के कब्जे में लाने के लिए कोई भी कीमत दे सकते थे। अब रही बात ये कि मोदी का विवादित मुद्दों से दूर रहना किया इस बात का प्रमाण है कि भाजपा के अन्दर सोच का बदलाव आ रहा है? क्या भाजपा में मुस्लिम समाज के प्रति हिंसक सोच में कोई बदलाव आ रहा है? ये समझना इसलिए आसान है कि नरेंद्र मोदी की पूरी चुनावी मुहिम में अल्पसंख्यक मतदाताओं को जोड़ने का कोई ख़ास उत्साह नहीं दिख रहा है, सिर्फ इतनी चिंता है की विवादित मुद्दों से दूर रहा जाय ताकि सीटों की कमी पड़ने पर नए सहयोगी तलाश किये जा सके। अभी तक के उम्मीदवारों की लिस्ट से भी जाहिर है कि पार्टी अभी तक मुस्लिम उम्मीदवारों को मौका देने के लिए दिमागी तौर पर तैयार नहीं है, उत्तर प्रदेश और बिहार जहाँ जातीय और धार्मिक समीकरणों ने भाजपा को बेमाना बना कर रख दिया था, पार्टी इस समीकरण को बिगाड़ने वाले सभी रास्तों और विकल्पों पर अमल कर रही है। मुज़फ्फरनगर दंगा इसकी एक साफ़ मिसाल है, जहाँ मुस्लिम-पिछड़ा की राजनीतिक एकता अब बहुत कमज़ोर हो गई है।

    ऐसे में नरेंद्र मोदी की मीडियाबाज़ी को कांग्रेस के घोटालों की वजह से कुछ ज्यादा ही खुराक मिल गई है, लेकिन अन्ना और केजरीवाल के मुद्दों पर रंग जमाने वाले नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी के लिए असली चैलेंज कहीं और नहीं बल्कि खुद उनकी पार्टी के भीतर है जहाँ उन्हें भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, साम्प्रदायिकता पर साफ़ साफ़ बातें करनी होंगी। क्योंकि सामाजिक न्याय सिर्फ टाटा और अम्बानी की खैरात बाँटने का नाम नहीं है, बल्कि दबे कुचले लोगों को बराबरी पर आने देने के लिए रास्ता देने का नाम है जो करना मोदी की वैचारिक प्रशिक्षण और नौउदारवाद के बुनयादी जरूरतों के खिलाफ है। मोदी को लगता है जनता तमाशे को देख कर वोट देगी या मोदी के चेहरे को देख कर वोट करेगी लेकिन मोदी असली इम्तिहान में फ्लॉप हो रहे हैं क्योंकि वो जनता के लिए अपने उमीदवारों का ऐलान करने के लिए अपनी तंगनज़र सोच और कारोबारी घरानों के दबाव से बाहर निकलने का साहस नहीं दिखा सके हैं। येदुरप्पा की ख़ुशी और मुरली मनोहर जोशी की नाराजगी एक मजबूर मोदी की तस्वीर दिखाती हैं और ऐसे मजबूर नरेंद्र मोदी से उम्मीदें करना बेकार है।

    About The Author

    ओमेर अनस, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में शोधार्थी हैं।

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    MARGIN SPEAK


    On the Murder of Nido Taniam


    ANAND TELTUMBDE


    While the murder of the 19-year-old student from Arunachal Pradesh, Nido Taniam, powerfully foregrounds the issue of racism, in the resultant cacophony, issues concerning the continuing neglect of the north-east and the severe state repression unleashed over there, irrespective of whether such omissions and commissions are due to racism or not, have been swept under the carpet.


    Anand Teltumbde (tanandraj@gmail.com) is a writer and civil rights activist with the Committee for the Protection of Democratic Rights, Mumbai.


    10 march 15, 2014 vol xlIX no 11 EPW Economic & Political Weekly


    Nido Taniam, a 19-year-old student from Arunachal Pradesh was beaten to death in Delhi in broad daylight on 29 January by some young men in a trivial altercation. The impunity with which the crime took place was alarming enough but the indignation of the north-easterners accusing mainland India of racial prejudice against them caused huge consternation. Unlike others, they saw it not as an isolated crime, but one falling in a pattern of several such incidents of discrimination and assault on young women and men coming from north-eastern states for studies and jobs to Delhi and other metros. While this incident has powerfully foregrounded the issue of racism, which was, of course, denied by the ruling establishment, including a minister from the north-east, in the resultant cacophony, the issues of continuing neglect of the entire north-east and its repression, irrespective of whether they are due to racism or not, were totally lost. If the north-east had got its dues in terms of development, Nido and his ilk would not have come to Delhi and fallen prey to the hatred of hooligans there. Before one jumps on to racism, this root cause of the problem needs to be seriously looked into.


    A Saga of Neglect


    North-east India, a landmass bigger than the United Kingdom and many other countries would rank around 78th in the world by area and 30th by population. It shares a 4,500 km border with fi ve different countries of south Asia, Nepal, Bhutan, China, Myanmar and Bangladesh, but connects to the heartland with a tenuous 22 km Siliguri corridor. This landlocked hilly region of approximately 8% of its landmass, but with only 3% of its population, has immense developmental potential. The region is richly endowed with biodiversity, hydro-potential, minerals like oil and natural gas, coal, limestone, dolomite, graphite, quartzite, sillimonite, etc, and huge forest wealth. It meets over 10% of the demand for forest products in the country. Moreover, it possesses about 80% of the total hydropower potential in the country. Arunachal Pradesh alone is expected to generate nearly 3 lakh MW hydel power, nearly 30% of the total available in the country.


    Imagine the export potential of such a richly endowed region with its geographical proximity to the markets of six bordering countries if it had deployed its resources in setting up industrial infrastructure. Paradoxically, the region is industrially the most backward in India.


    Only Assam, and to some extent Meghalaya, have some degree of industrial development centred on tea, oil and timber, which has largely been a colonial legacy. If India had decided to industrialise this region, it could have been one of the richest and most developed regions in the

    country. With less than half the population density of the country, it would have given employment to many people from the mainland. But alas, the government decided to continue the colonial policy of taking away its wealth and keeping the region backward, forcing its youth to

    migrate for education and employment.


    With this colonialist mindset, the government blames the problem of insurgency in the region for its backwardness, the very same argument it makes against the Maoist-controlled areas. But it does not realise that development and insurgency constitute the chicken or egg syndrome; if there had been development there would not have been any insurgency as such. It does not realise the hollowness of its argument that the insurgency in the north-east or for that matter anywhere is basically a product of its own myopic attitude.


    For instance, what prevented the government to develop the extraordinarily endowed Bastar for five decades after Independence? If this was done, Maoists would not have been able to enter Bastar. The fact remains that the government essentially followed in the footsteps of the

    colonialists, which is at the core of much of the discontent and notion of being colonised in the north-east.


    The government's response in terms of repression only sets into motion a vicious cycle which would push ethnic groups inhabiting this region, undisturbed for centuries, to take up arms. This is the root cause of insurgency and the secessionist movements, either for sovereignty or for separate homeland, in the north-east.


    Tyranny of the AFSPA


    The Armed Forces (Special Powers) Act (AFSPA), the government's draconian response, clearly exemplifi es its colonial mindset. This Act appeared early in the history of the republic as a revamped version of an ordinance – Armed Forces (Special Powers) Ordinance – issued in August 1942 during the second world war to deal with the Quit India Movement, and was formalised in 1958 as AFSPA by the Nehru government. It was initially supposed to have remained in operation for one year to tackle the Naga problem but it still continues as does even the Naga problem, which clearly proves its uselessness.


    Still it has been in force over the last 55 years in north-east India and for 20 years in Jammu and Kashmir, despite persistent demand by the people for its repeal.


    Notwithstanding the government's claim of its constitutionality, it is clearly at odds with the democratic rights enshrined in the Constitution and the UN Convention on Human Rights to which India has been a signatory. With a simple notifi cation from the representative of the central government (the governor), any area, state, or parts of the state, can be declared as "disturbed" to enforce AFSPA that empowers the armed forces to make preventive arrests, search premises without warrant, and shoot and kill civilians. More than 1,500 extra-judicial killings had taken place in Manipur alone over the last 30 years.


    The judicial enforcement of fundamental rights is effectively suspended; court proceedings are made contingent upon the central government's prior approval.


    The AFSPA's continued application has led to numerous protests. The epic fast of Irom Chanu Sharmila, the "Iron Lady of Manipur", now in its 14th year, had started as the protest against an encounter by Assam Rifl es which had led to the Economic & Political Weekly EPW march 15, 2014 vol xlIX no 11 11death of 10 people in November 2000 at Malom village, demanding the repeal of AFSPA. Already the longest in history, this fast has shaken the world but not our republican government! As her fast continued, another unusual form of protest was adopted by some members of the Meira Paibis against the gunning down of a 32-year-old, Thangjam Manorama, by troops of the 17th Assam Rifl es, allegedly after raping her. They shocked the nation by publicly stripping themselves in front of the Kangla Fort on 15 July 2004 with a banner "Indian Army Rape Us". They too shook the entire world by the degree of their desperation but could not shake the Indian government.


    These are just extra-heroic protests, among numerous others, by the ordinary people of the north-east. Controversy over Racism There has been a spate of reports in the recent past of discrimination and attacks against north-eastern Indians in certain metros, particularly Bangalore and New Delhi. In 2007 the North East Support Centre and Helpline (NESC&H) had to be started to deal with prejudice and attacks against people from the north-east.


    In Delhi, they (excluding Assamese) are humiliated as "chinky" by people, in reference to their Mongoloid features.


    In April 2012, the death of a 19-year-old Manipuri boy Richard Loitam, under suspicious circumstances, in his college hostel in Bangalore sparked protests demanding justice for the student. In August 2012, rumours of threat to their lives saw a large-scale exodus of these people from Bangalore.


    As the furore over the murder of Nido was still alive, two young women from Manipur were thrashed in full public view by local goons in Delhi. Hundreds of people from north-east India have been protesting against the "racial" discrimination being practised against them.


    Expectedly, the government and the political class acknowledged the discrimination but denied its racial prefi x as they did in the case of dalits wanting to bring caste within the purview of the World Conference against Racism, Racial Discrimination, Xenophobia and Related Tolerance, which was organised by the United Nations in Durban in August-September 2001.


    The government had then projected an un tenable excuse that castes were its "internal matter". While technically caste may not be race but in the context of discrimination and xenophobia, particularly applied to dalits, there was hardly any distinction between them; rather, caste would turn out worse than race.


    But in the case of north-eastern people of the Mongoloid race, there could not be such a defi nitional argument. Praja Rajakiya Vedike (PRV), a Bangalore-based non-governmental organisation, had compiled a case study of 150 people from the region, demonstrating that they suffered "racism" in Bangalore.


    India has been in the forefront at international conferences in condemning racism, colonialism and apartheid.


    But suddenly when her own people raised the issue of racial discrimination, she went into denial mode. The Indian government succeeded in keeping the issue of caste out of the agenda of the

    Durban conference but did not realise that she can still be incriminated by customary international law and other UN Charter bodies.


    The general image of the people of the north-east in Indian society is that they are tribes of an alien race. In tune with this depiction, they are expected to – just like dalits are also supposed to conform to this image as backward, illiterate, clumsy and ugly people. But most migrant north-easterners are exactly the opposite; they are well-educated, speak better English, are smartly dressed, and good-looking, enough to invoke envious hatred in our caste-entrenched society.


    A minor tussle fl ares up with the smallest provocation into an atrocity quite like in the case of dalits. It is a pity that there are no ripples created in dalit circles with regard to the plight of north-easterners!


    The issue, as to whether the discrimination is racial or not, can best be cleared by the victims themselves and not by others. If dalits feel that they are subject to racial discrimination, so be it; so also with respect to north-easterners.


    Technicalities apart, the stark fact is that India is racist. It is better she admitted to it in order to do away with this continuing ignominy.


    Published in Economic and Political Weekly



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    MAHAMANAV HARICHAND GURUCHAND JANMOTSAV

    Dear Brothers & sisters,

     

    We are celebrating the Birth Anniversary of Mahamanav Adartirth Harichand Thakoor and Karmavir Guruchand Thakoor on Saturday, the 15th March,2014 at Dr. Babasaheb Ambedkar Bhavan, Gokuldas Pasta Road, Dadar (E), Mumbai between 5.00 PM to 9.00 PM.

     

    What we are today is due to and only due to  the sacrifice of our great emancipators Dr. Babasaheb Ambedkar who struck the manusmruti rule with his mighty pen and in just one day this brutal, discriminatory and polluted manusmruti was replaced by the most sacred document of  humanity – THE CONSTITUTION OF INDA. It is due to the rule of this Constitution we have emerged as Human being from sub human-being. But dear brother and sisters what if Dr. Babasaheb Ambedkar  could not have got the opportunity to draft the Constitution of India ?. The only dream of Bharat Ratna Dr. Babasaheb Ambedkar was to get elected to the Constituent Assembly and draft a Constitution which will end the thousand year old slavery of the 6743 castes of shudras (OBCs) and  the ati-shudras (SCs/STs), so that they can live a life with dignity. The General Elections that took place in 1946 the Scheduled Caste Federation headed by Dr. Babasaheb Ambedkar lost all the seats including himself, except for one candidate got elected from Bengal and that was Mahapran Jogedranath Mandal. With the terrible lose to the Schedule Caste Federation in the General elections, Dr. Babasaheb' s hopes were shattered. The inhuman racial Congress rubbed salt on the wounds by saying – we have not only closed the door but also the windows of the Parliament for Dr. Ambedkar. The most optimistic man had become nervous and despondent, not for his personel gains but for the future of his people at large. At such a critical juncture Mahapran Jogendranath Mandal called on Dr. Babasaheb Ambedkar and gave his an assurance that he will strive till the last drop of his blood but get Dr. Babasaheb Ambedkar elected to the Constituent Assembly. Mahapran Jogendranath Mandal was himself a Barrister and very learned personality, but image this Mahamanav's  great  magnamity and sacrifice, he turned the impossible into a possible thing , faced numerous problems, risks, challenges and political conspiracy including the threat to his life but despite the strong resistant from Congress got Dr. Babasaheb Ambedkar elected to the Constituent Assembly from Khulna, Jessore, Faridpur and Barisal (now in Bangladesh) with absolute majority and flying colors.


    It was only and only due to the Social, Educational and Cultural revolution created by  Adartirth Harichand Thakoor and Karmavir Guruchand Thakoor that visionary, revolutionary and path finding leaders like Mahapran Jogendranath Mandal would be created in Bengal due to whom Dr. Babasaheb Ambedkar could  give this country the most sacrosanct document "Constitution of India" and emancipation from manusmruti dumped slaved, to all of us.

     

    We solicit your attendance for the above programme and be witness to the reviewing of historical polarization, once again. Attach, please find pamphlet for the programme, kindly print / Xerox and circulate to make this programme a grand success.

    With Regards

    LT  COL  SIDDARTH BARVE

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    राजनीतिक संरक्षण के तहत सीमा के आर पार हर तरह की तस्करी बेलगाम,सुरक्षा बंदोबस्त से हालात बदल नहीं रहे हैं

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    राजनीतिक हवा गरम बांग्लादेश में हो या भारत में हो,रंग बिरंगे तस्करों के पौ बारह है।बंगाल भर में इन तस्करों के मजबूत राजनीतिक चेहरे हैं और सीमाई इलाकों के तमाम वोटबैंक उनके यहां नजरबंद हैं।इनकी सक्रिय मदद के बिना कोई पार्टी चुनावी जंग फतह कर ही नहीं सकती। हाल में बयालीस करोड़ के सोने के साथ पकड़े गये अब्दुल बारिक विश्वास न सिर्फ स्तानीय पंचायत समिति के नेता हैं,बल्कि वे विधायक फिल्म स्टार देवश्री राय के साथ तस्वीरों में है। अब्दुल बारीक सोने के साथ गायों की तस्करी के लिए भी मशहूर है।यह एक उदाहरण है जो अपवाद नहीं है। दक्षिण 24 परगना से लेकर उत्तरबंगाल तक विस्तृत सीमाई इलाकों में तस्करी रोजगार का सबसे फायदेमंद कुटीरउद्योग है।बेरोजगारी के आलम में लोग या तो बंगाल बाहर चले जाते हैं रोजगार के लिए या फिर तस्करगिरोहों के चपेट में आ जाते हैं।


    इन इलाकों में अपहरण,फिरौती और तमाम आपराधिक वारदातों को अंजाम देने वाले भी ये राजनेता तस्कर हैं,जिनके खिलाफ पुलिस प्रशासन की कार्रवाई की कोई सूरत नहीं बनती।सोना और विदेशी मुद्रा तो फिर भी गनीमत है,पशु और उपभोक्ता सामग्रियों की तस्करी भी उतनी नुकसान देह नहीं है।लेकिन नारी देह,मादकद्रव्यों की तस्करी का नेटवर्क इतना तगड़ा है कि सीमापार के तमाम गांवों से जिंदा गोशत की सप्लाई घरेलू बाजार और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक में बेरोकटोक होती है।काम दिलाने के बहाने लड़कियां बहुत आसानी से कोलकाता,दिल्ली मुंबई होकर सीध नरक में दाखिल करा दी जाती हैं।इन इलाकों में शादी और रिश्तेदारी की आड़ में भी देहतस्करी का धंधा खूब फल फूल रहा है। सीमा के आर पार के तमाम इलाकों से लड़कियों की तस्करी बाकायदा राजनीतिक मदद से होती है।गाय चोर, देहबाजार के दल्ला,फिरौती मास्टर,सोना करेंसी के महीन तस्कर कारीगर सारे के सारे किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं।इसके अलावा भारत-बांग्लादेश सीमा पर सक्रिय तस्कर वस्तुओं की तस्करी के लिए बड़े पैमाने पर बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों द्वारा पकड़े जाने पर वे उनकी सहानुभूति हासिल कर सकें। अकेले मुर्शिदाबाद जिले में ही कम से कम 300 बच्चे अवैध सामान को सीमा पार ले जाने के धंधे में लिप्त हैं।जानवरों व चावल की तस्करी अक्सर इसलिए होती है, क्योंकि दोनों देशों में इन वस्तुओं की कीमतों में काफी अंतर है, वहीं बच्चों का इस्तेमाल अक्सर खांसी के सिरप, फेंसेडिल की तस्करी के लिए किया जाता है।



    जलपाईगुड़ी ज़िले में पुलिस अधिकारियों के मुताबिक बांग्लादेश की सीमा के पास एक गांव में गांववालों ने चार लोगों के हाथ-पैर बांध कर उन्हें जिंदा जला दिया।


    सिलीगुड़ी के पुलिस आयुक्त जगमोहन ने कहा, "हो सकता है ये मौतें पशु तस्करों के दो गिरोहों की आपसी भिड़ंत का नतीजा हो. पूरी जांच के बाद ही हकीकत सामने आएगी।"


    लोगों को संदेह था कि यह चारों लोग गांव में पशुओं को चुराने आए हैं. सीमावर्ती इलाके में पशुओं की तस्करी एक गंभीर समस्या है।


    समय-समय पर भारी तादाद में पशुओं को चुरा कर सीमा पार भेजने के मामले सामने आते रहते हैं। आमबाड़ी के जिस बलरामपुर गांव में यह वारदात हुई, वहां भी पशुओं की चोरी के मामले बढ़ रहे हैं। गांव वालों ने पुलिस से कई बार इसकी शिकायत की थी।



    पुलिस तो इन्हें हाथ भी नहीं लगाती।स्थानीय लोग होने के कारण वे सुरक्षा इंतजामात के अनेक छेद निकाल लेते हैं और आसानी से मिस्टर इंडिया की तर्ज पर अदृश्य तौर पर सीमा के आर पार होते हैं।सीमा पर तैनात दोनों ओर के कुछ लोगों को नकद भुगतान करके रियायतें हासिल कर लेना भी आम बात है।


    सीमा क्षेत्रों से लेकर कोलकाता तक विदेशी मुद्रा और नकली नोट का कारोबार जोरों पर है।सोना तो कहीं भी पिघलकर आर पार होता है।बांग्लादेश सीमा से इन दिनों बड़े पैमाने पर सोने की तस्करी हो रही है। बांग्लादेश सीमा पर तैनात बॉर्डर सिक्यूरिटी फोर्स (बीएसएफ) साउथ बंगाल फ्रंटियर के जवानों ने पिछले महीने में सीमा के नजदीक से लगभग 7 किलोग्राम सोना (अनुमानित मूल्य 1 करोड़ 83 लाख) जब्त किया था। यही नहीं,हाल में कोलकाता के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक यात्री के यहां से 611.6 ग्राम सोना बरामद किया गया। कस्टम्स की एयर इंटेलीजेंस यूनिट के सहायक आयुक्त आर. मीणा ने बताया कि नन्दलाल भागुमल कृष्नानी नामक यात्री इंडिगो एयरलाइन्स की उड़ान से बैंकाक से यहां आया था। उसने हाथ में सोने का बेस्लेट पहन रखा था। उसके पास सोने के चार बार थे। जूते की एड़ी में एक को छुपा रखा था। एयर इंटेलीजेंस यूनिट ने सोना को जब्त कर लिया है। इसकी कीमत 18 लाख 67 हजार 320 रूपए है।पिछले तीन महीनों में यहां 80 किलो से ज्यादा सोना जब्त किया गया है।


    इससे पहले कस्टम्स अधिकारियों ने पिछले सप्ताह ही एयरपोर्ट पर खड़े एक विमान के टायलेट से 7.22 करोड़ रुपये कीमत का लगभग 24 किलो सोना जब्त किया था। यह सोना एक-एक किलो वजन के बिस्किटों की शक्ल में था। सफाई कर्मचारियों ने विमान की सफाई के दौरान टायलेट में दो बैग पड़े देखे। उनको खोलने पर सोना बरामद हुआ। इस सोने का कोई दावेदार सामने नहीं आया ।वह विमान दुबई और बैंकॉक समेत देश के कई शहरों की उड़ान भरने के बाद कोलकाता पहुंचा था। उसके दो दिन बाद फिर साढ़े तीन किलो सोना बरामद किया गया। असिस्टेंट कस्टम्स कमिश्नर आर.एस. मीना ने तब कहा,, "यह सोना पैकेटों में बंद था और इसे एक कूरियर कंपनी के जरिए अवैध तरीके से मुंबई भेजा जा रहा था।" जांच के दौरान संदेह होने पर अधिकारियों ने उन पैकेटों को खोला। उनमें सोना भरा था। इन दोनों मामलों में किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई।



    जाहिर है कि कोलकाता सोने की तस्करी के केंद्र के तौर पर उभर रहा है। सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने के बाद इसकी तस्करी में अचानक तेजी आई है।


    दो चार छापे ,दो चार गिरप्तारियों से तंत्र नहीं टूटता। देह बाजार के अलावा मादकद्रव्यों का जो कारोबार अबाध चल रहा है,उसका ताजा सबूत कोलकाता के पीजी मेडिकल कालेज में  एक इंटर्न की मौत के बाद ड्रग नेटवर्क के खुलासे से हुआ है।सबसे खतरनाक बात तो यह है कि इलीट शैक्षणिक संस्थानों के हास्टलों से लेकर रैव पार्टियों और फिल्मी दुनिया तक में भी इस बेलगाम नेटवर्क की गहरी पैठ है।


    उत्तर चोबीस परगना ,दक्षिण 24 परगना से लेकर मालदह मुर्शिदाबाद तक के सीमाई गांवों में नशा कारोबार का कैंसर इतना लाइलाज है कि हेरोइन और ब्राउन शुगर नाश्ता है रोज का।खेतों खलिहानों में कामकाजी हाथों की शिराओं धमनियों में यह कैंसर बहता है तो घर की जवान औरतें भी नशा की शिकार हैं।आपको सबूत चाहिए तो ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है, हासनाबाद या वनगांव,माजदिया या लालगोला के आसपास किसी भी गांव में दो चार दिन रहकर देखें कि कैसे हर रोज मौत दबं पांव बिना आहट इस कैंसर की आड़ में आखेट करती है।


    पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के सीमाई इलाकों से हर साल करोड़ों रुपए के नकली नोट भारत आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल का मालदा जिला नकली नोटों की तस्करी का सबसे आसान जरिया बन गया है। यहां सीमा के दोनों तरफ घनी आबादी है। बीच में बांस और बल्लियों की दीवार खड़ी की गई है। काम के सिलसिले में गांववाले यहां से वहां जाते रहते हैं इसके लिए हर गांव में एक दरवाजा बनाया गया है। बीएसएफ जवानों की निगरानी में इस गेट से लोगों का आना-जाना होता रहता है लेकिन सीमा पर हो रही हर हरकत पर नजर रख पाना मुमकिन नहीं है और इसी का फायदा उठाकर बांग्लादेश से नकली नोटों की खेप भारत पहुंचाई जा रही ।


    पुलिस इन्हें छूने की हिम्मत भी नहीं करती क्योंकि राजनीतिक चेहरे की चमक की चकाचौंध में इन इलाकों में दिशाएं गुम हैं।


    हालत कितनी संगीन है कि इसीसे अंदाजा लगाइये कि भारत सरकार ने भी माना है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के निकट अनेक स्थानों से भारत में नकली नोटों की तस्करी की जा रही है।लेकिन भारत सरकार भी स्थानीय राजनीति के तिलिस्म को तोड़ने के बारे में कोई हस्तक्षेप करने के काबिल नहीं है।

       

    गौरतलब है कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने राज्यसभा को बताया है कि गह मंत्रालय के अनुसार, ऐसी कोई विशिष्ट सूचना नहीं है जिससे पता चले कि आजमगढ़ और उसके निकटवर्ती क्षेत्र देश में नकली नोटों के प्रसार के केंद्र बने हुए हैं। लेकिन सूचना से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट अनेक स्थानों से भारत में नकली नोटों की तस्करी की जा रही है।

       

    उन्होंने नंदी येल्लैया के प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा उपलब्ध सूचना के अनुसार इस साल 30 जून तक जब्त नकली भारतीय नोटों का अंकित मूल्य 16.29 करोड़ रूपये था। उन्होंने बताया कि 2012 में जब्त नकली भारतीय नोटों का अंकित मूल्य 32.63 करोड़ रूपये और 2011 में 29.40 करोड़ रूपये था।

       

    चिदंबरम ने बताया कि नकली भारतीय नोटों की समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए गए हैं और गृह मंत्रालय में एक विशेष एफआईसीएन समन्वय समूह भी गठित किया गया है ताकि देश की विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच जानकारी साक्षा की जा सके।


    उत्तर 24 परगना जिले के बसीरहाट इलाके में विशेष अभियान चलाकर डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेन्स (डीआरआई) ने 45 किलोग्राम सोना बरामद किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत लगभग 13 करोड़ रूपए आंकी गई है। इस सिलसिले में अब्दुल बारिक और मक्साद मंडल नामक दो लोगों को गिरफ्तार किया है। अब्दुल स्थानीय तृणमूल नेता है। मक्साद उसका वाहन चालक है। दोनों को रविवार को कोलकाता के बैंकशाल कोर्ट में पेश किया गया।


    अदालत ने हिरासत में भेज दिया। दोनों से पूछताछ की जा रही है। डीआरआई सूत्रों के अनुसार सोना बांग्लादेश से तस्करी कर लाया गया था। इतना सोना कैसे और किसके मार्फत मंगाया गया? इसका पता नहीं चल पाया है। जांच की जा रही है। प्राथमिक जांच में पता चला है कि अब्दुल लम्बे समय से तस्करी के धंधे में लिप्त था। वह पशुओं की तस्करी भी करता था। एक समय वह इलाके का कुख्यात समाजकंटक था। पुलिस में उसके खिलाफ मामले भी दर्ज हैं।


    देश में महिला तस्करी की समस्या सुलझाने की दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। खासकर भारत बांग्लादेश सीमा से सटे इलाकों में महिलाओं की तस्करी का धंधा कुटीर उद्योग की तरह बेरोकटोक चल रहा है। सीमा के आर पार तस्करों की अबाध आवाजाही से सामान्य कानून व्यवस्था की समस्या के तौर पर इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है। बहरहाल इस दिशा में पहली बार भारत और बांग्लादेश ने मिलकर हालात सुधारने का बीड़ा उठाया है। आतंकवाद से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच जो सहयोग हैए उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए भारत और बांग्लादेश ने महिलाओं की तस्करी से निपटने के लिए एक समझौता पत्र पर दस्तखत कर दिये हैं।साफ जाहिर है कि छिटपुट धरपकड़ और दबिश, छापेमारी से इस समस्या का हल निकालना मुश्किल है।आतंकविरोधी अभियान की जैसी द्विपक्षीय मुश्तैदी के बिना महिलाओं की व्यापक तस्करी रोकने का उपाय नहीं है, ढाका और दिल्ली ने यह महसूसते हुए इस मउ के तहत पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए भी प्रावधान किये हैं ताकि बचायी गयी महिलाएं फिर गलत हाथों में इस्तेमाल न हों।


    गौरतलब है कि महिलाओं की तस्करी का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बंगाल में है।भारत में कहीं भी बंगाल से उठायी गयी महिलाएं खुले बाजार में दिखती और बिकती हैं।पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता शहर पूर्वी भारत में महिलाओं की तस्करी और खरीद.फ़रोख्त के सबसे बड़े केंद्र के तौर पर उभरा है। राज्य के ग्रामीण इलाकों में गरीबी व पड़ोसी बांग्लादेश व नेपाल से लगी लंबी सीमा इसकी बड़ी वजह है।नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो के जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार राज्य में महिलाओं की खरीद.फ़रोख्त का धंधा तेजी से फ़ल.फ़ूल रहा है। वर्ष 2011 में राज्य में महिलाओं की खरीद.फ़रोख्त का आँकड़ा आठ हजार तक पहुँच गया। लेकिन गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक असली तादाद इससे कहीं बहत ज्यादा हैए यह आंकड़ा तो उन मामलों के आधार पर तैयार किया गया है जो पुलिस तक पहंचे हैं। राज्य सरकारें इसे रोक पाने में अभीतक नाकाम हैं। सीमांतवर्ती गांवों में सर्वत्र महिलातस्कर अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय है और घर घर में लापता महिलाओं की दास्तां सुनी जा सकती है।राज्य पुलिस और प्रशासन में बैठे लोग अबतक दूसरे राज्यों और बांग्लादेश के अधिकारियों के साथ बैठक करके ही तस्कर गिरोहों से निपटने की कोशिश करते थे, लेकिन सीमा के आरपार धड़ल्ले से जारी इस कारोबार के संदर्भ में कोई द्विपक्षीय समझौता न होने कारण कामयाबी कम ही मिल पा रही थी।अब हुए समझौते के तहत द्विपक्षीय रणनीति तस्करी रोकने और उद्धार की गयी महिलाओं के पुनर्वास के लिए बनायी गयी है।


    बंगाल में समाज कल्याणए नारी व शिशुकल्याण सचिव रोशनी सेन ने जानकारी दी है किइस समझौते पत्र पक दस्तखत हो गये हैं।अब स्टैंडर्डआपरेशनल प्रोसिडिउर के मसविदे पर बांग्लादेश की हरी झंडी मिलते ही इस रणनीति पर तेजी से अमल शुरु हो जायेगा।गौरतलब है कि बंगाल के सीमावर्ती इलाकों से ही भारत में सबसे ज्यादा महिलाओं की तस्करी होती हैं। जिन्हें सीधे महाराष्ट्र बेज दिया जाता है। इस सिलसिले में महाराष्ट्र पुलिस से भी बात हो चुकी है और बंगाल के अफसरान दिल्ली में बैठक कर आये हैं,इसी मंथन के तहत यह द्विपक्षीय समझौता हो गया।​

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    ​बंगाल के समाज कल्याम विभाग के मुताबिक हाल में महाराष्ट्र के निषिद्ध इलाकों से ५६ महिलाओं को बरामद कर बंगाल लाया गया तो पाया गया कि इनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी हैं।इस तरह अनेक महिलाओं को कानूनी जटिलता की वजह से वापस बांग्लादेश भेजना असंभव है। समझौते में इस समस्या से निपटने के उपाय किये गये हैं।


    ताजा अध्ययनों से साफ है कि राज्य में महिलाओं की बढ़ती तस्करी में पड़ोसी देशों की भी अहम भूमिका है। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक, देश में सबसे ज्यादा आबादी वाले दस जिलों में से पांच इसी राज्य में हैं और इनमें से तीन.उत्तर व दक्षिण 24.परगना और मुर्शिदाबाद बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं।राज्य की लगभग एक हजार किमी लंबी सीमा बांग्लादेश से सटी है। इसके जरिए गरीबी की मारी बांग्लादेशी महिलाओं को कोलकाता स्थित दक्षिण एशिया में देह व्यापार की सबसे बड़ी मंडी सोनागाछी में लाया जाता है और यहां से उनको मुंबई व पुणे जैसे शहरों के दलालों के हाथों बेच दिया जाता है। सीमा सुरक्षा बल ;बीएसएफ के एक अधिकारी कहते हैं कि सीमा पार से आने वाली महिलाओं को देख कर यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन घुसपैठिया है और किसको तस्करी के जरिए यहां लाया जा रहा है। इसी तरह नेपाल से सिलीगुड़ी कॉरीडोर से युवतियों को बेहतर नौकरियों का लालच देकर यहां लाया जाता है।


    राज्य खुफिया विभाग की एक रिपोर्ट और महिला तस्करों के चंगुल में पड़ने वाली एक युवती जरीना खातून की मां जहूरा बीबी की ओर से दायर एक याचिका के आधार पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने मई, 2010 में महिला तस्करी के मुद्दे का संज्ञान लिया था। तब एडवोकेट जनरल बलाई राय ने अदालत को बताया था कि वर्ष 2009 के दौरान राज्य के विभिन्न जिलों से ढाई हजार नाबालिग युवतियां गायब हुई थीं।जरीना भी उसी साल गायब हुई थी और तबसे से आज तक उसका कोई पता नहीं चल सका है। उसके बाद के वर्षों में तमाम कोशिशों के बावजूद यह तादाद और बढ़ी है। सरकार वर्ष 2011 में गायब होने वाली युवतियों और महिलाओं का कोई आंकड़ा अब तक तैयार नहीं कर सकी है।अब सरकार ने खुफिया विभाग में यूनाइटेड नेशन्स ऑफिस ऑफ ड्रग एंड क्राइम ;यूएनओडीसी के सहयोग से एक मानव तस्करी निरोधक शाखा का गठन किया है। इसकी एक इकाई बांग्लादेश सीमा से लगे मुर्शिदाबाद जिले में स्थापित की जाएगी।




    19 फरवरी 2013

    आईबीएन 7


    बांग्लादेश की जमीन से आईएसआई एक नई साजिश रच रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने की खतरनाक साजिश और अपने इस नापाक मकसद के लिए पाकिस्तान पश्चिम बंगाल के उन इलाकों का इस्तेमाल कर रहा है, जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के सीमाई इलाकों से हर साल करोड़ों रुपए के नकली नोट भारत आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल का मालदा जिला नकली नोटों की तस्करी का सबसे आसान जरिया बन गया है। पश्चिम बंगाल का मालदा जिला नकली नोटों की तस्करी की पड़ताल के लिए आईबीएन7 देश की सीमा पर बसे मालदा के उन गांवों में जा पहुंचा। जहां हमारे और पड़ोसी मुल्क के गांव महज कुछ कदमों की दूरी पर हैं। सबसे आईबीएन7 का कारवां पहुंचा चुरिअंतपुर गांव में। यहां सीमा के दोनों तरफ घनी आबादी है। बीच में बांस और बल्लियों की दीवार खड़ी की गई है। काम के सिलसिले में गांववाले यहां से वहां जाते रहते हैं इसके लिए हर गांव में एक दरवाजा बनाया गया है। बीएसएफ जवानों की निगरानी में इस गेट से लोगों का आना-जाना होता रहता है लेकिन सीमा पर हो रही हर हरकत पर नजर रख पाना मुमकिन नहीं है और इसी का फायदा उठाकर बांग्लादेश से नकली नोटों की खेप भारत पहुंचाई जा रही ।


    बीएसएफ के जवान इस तरीके से तस्करी रोकने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं लेकिन हर बार तस्कर कोई नया रास्ता निकाल लेते हैं, लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। बांग्लादेश से नोटों के बंडल भला कोई क्यों फेंकेगा। आखिर गांववालों को पैसा क्यों दिया जाता है। इन सवालों की तफ्तीश करते हुए कुछ नए खुलासे सामने आए। पता चला कि भारत से हर रोज करीब 5 हजार जानवर बांग्लादेश भेजे जा रहे हैं। सीमा से सटे 260 गांवों में कौन-कौन इस तस्करी में शामिल है, पता कर पाना मुश्किल है लेकिन जानवरों की इस तस्करी के बदले हर रोज करोड़ों रुपए के नकली नोट भारत आ रहे हैं।


    नाइट विजन कैमरे से ली गईं तस्वीरों से देखने पर पता चलता है कि रात के अंधेरे में कैसे गांववाले बीएसएफ जवानों को चकमा देने की कोशिश करते हैं। पहले कुछ लोग फेंसिंग के पास जाकर टोह लेते हैं, रास्ता साफ दिखने पर वो अपने कुछ और साथियों को बुला लेते हैं। फेंसिंग के दूसरी तरफ भी हलचल होने लगती है फिर तस्करों ने चुटकियों में तीन बड़े-बड़े बांसों की मदद से क्रेन तैयार कर लिया और फिर जानवरों को रस्सी से बांस की इस क्रेन से बांध दिया जाता है। मिनटों में बांस-बल्ली की ऊंची दीवार पार करा दी जाती है।बीएसएफ के जवानों के लिए ये रोज की बात है। बीएसएफ के जवान तस्करों पर धावा भी बोलते हैं लेकिन स्थानीय लोगों की मदद मिलने की वजह से ज्यादा तस्कर बच निकलते हैं।


    बीएसएफ ने सीमा से सटे गांवों में 2010 में 21 लाख रुपए, 2011 में 40 लाख रुपए, 2012 में 60 लाख रुपये के नकली नोट बरामद किया था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक ये बरामदगी भारत आने वाले नकली नोटों का पांच फीसदी भी नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक हर दिन 50 करोड़ रुपये का नकली नोट भारत में आ रहा है जिसमें ज्यादातर मालदा के रास्ते से आता है।

    मालदा के गांवों से हो रही तस्करी ने भारत सरकार को चिंता में डाल दिया है। हालत ये है कि एनआईए की टीम ने मालदा में डेरा डाल लिया है। दरअसल एनआईए की चिंता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि जानवरों की तस्करी और नकली नोटों के इस खेल में बांग्लादेश का प्रशासन भी तस्करों की मदद कर रहा है। नकली नोट का भारत आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन नकली नोटों की तस्करी के जो नए-नए तरीके सामने आ रहे हैं, उसने सुरक्षाबलों को परेशानी में डाल दिया है। सीमा पर बीएसएफ और तस्करों के बीच डाल-डाल और पात-पात का खेल चल रहा है। तमाम खतरों को दरकिनार कर लोग सिर्फ इसलिए इस खेल में शामिल हैं, क्योंकि इससे उन्हें कम वक्त में मोटा मुनाफा हासिल होता है।


    मालदा से बांग्लादेश भेजे जाने वाले जानवरों में से सबसे सस्ता जानवर भी कम से कम 20 हजार रुपए में बिकता है। हमारे यहां 5 हजार में मिलने वाला बैल बांग्लादेश पहुंचते-पहुंचते 50 हजार रुपए का हो जाता है। अब अगर हर रोज करीब 5 हजार जानवर सीमा पार भेजे जाते हैं तो ये कारोबार करीब 10 करोड़ रुपए का हो जाता है। अगर इतना ही होता तो ये मामला सिर्फ जानवरों की अवैध तस्करी का होता, लेकिन सीमा पार से तस्करों को एक खास ऑफर दिया जाता है। उन्हें असली नोटों के साथ नकली नोट मिलाकर दिया जाता है और असली कीमत से तीन गुना ज्यादा रकम दी जाती है। यानी 4 करोड़ के जानवर भेजने पर सीमापार से 12 करोड़ के नोट आते हैं, जिसमें करीब आधे नकली नोट होते हैं। तीन गुना ज्यादा कमाई के चक्कर में गांववाले हर खतरा उठाने को तैयार रहते हैं।


    मालदा-बांग्लादेश की सीमा पर 44 किलोमीटर हिस्से में नदी है। तस्करों ने नदी के तेज बहाव को भी अपने कारोबार का हिस्सा बना लिया है। पानी का बहाव तेज होने पर भारत से जानवरों को नदी के रास्ते बांग्लादेश भेज दिया जाता है। तस्करी की ये भी बड़ी वजह है कि बांगलादेश खुद तस्करी को बढ़ावा दे रहा है। भारत से तस्करी कर लाए गए जानवरों पर बंगलादेश बाकायदा टैक्स लेता है। टैक्स देते ही तस्करी के जानवर बिल्कुल लीगल हो जाते है। मालदा से सटे गांवों में फैली गरीबी भी यहां के लोगों को तस्करों की मदद के लिए मजबूर कर देती है। गांव के ज्यादातर लोग बीड़ी बनाकर अपना गुजारा करते हैं। ऐसे में तस्करों की ओर दिए जाने वाले लालच को वो ठुकरा नहीं पाते और यही वजह है कि तमाम एहतियात के बावजूद सीमा पार से नकली नोटों का भारत आना जारी है।




    পাচারের সোনা রুখতে গোয়েন্দাদের গুলি করতে চেয়েছিল আব্দুল


    অমিত চক্রবর্তী ও অতনু দাস


    কলকাতা ও বারাসত: অল্পের জন্য বড় বিপদ থেকে বেঁচে এখন কিছুটা স্বস্তিতে কেন্দ্রীয় রাজস্ব গোয়েন্দা অফিসাররা৷ রবিবার সকালে বেলিয়াঘাটায় শাসনে কালিয়ানিবিলের কাছে দ্রুত বেগে আসা গাড়িটা দাঁড় করাতেই চালকের পাশে বসা ব্যক্তি নিজের কোমরে পিছনে হাত দিয়ে ছিলেন৷ এক অফিসার প্রায় ঝাঁপিয়ে পড়ে হাত চেপে ধরেন তার৷ অন্য অফিসাররা তাঁর কোমর থেকে বের করে আনেন লোডেড নাইন এমএম পিস্তল৷ কয়েকটি ব্যাগে প্রায় ৪৪ কেজি সোনা সমেত বসিরহাটের কুখ্যাত পাচারকারী আব্দুল বারিক বিশ্বাসকে ধরতে গিয়ে এমনই অভিজ্ঞতা কেন্দ্রীয় সংস্থার অফিসারদের৷ ধৃতের বিরুদ্ধে খুনের চেষ্টার অভিযোগও এনেছে কেন্দ্রীয় সংস্থাটি৷


    জেলে গিয়ে ধৃত বারিককে এখন জেরা করে কয়েকটি নাম পেয়েছেন তদন্তকারীরা৷ যদিও বসিরহাটের সংগ্রামপুর এলাকায় বারিকের প্রাসাদপোম বাড়ি আর সেখানে পৌছোনোর রাস্তা এখন ঘিরে রেখেছে তার গ্যাংয়ের ছেলেরা৷ নেতা-মন্ত্রী-পুলিশকে পকেটে পুরে রাখা বারিক যে কখনও গ্রেপ্তার হতে পারে তা কল্পনাও করেনি বসিরহাট৷ কিন্ত্ত সত্যি-ই এখন তা ঘটায় আতঙ্ক ছড়িয়েছে গোটা এলাকায়৷


    গরু পাচারের পান্ডা আব্দুল বারিক বিশ্বাস যে বেশ কিছুদিন ধরেই ও-পার থেকে সোনা আনছে, সে খবর ছিল রেভিনিউ ইনটেলিজেন্সের গোয়েন্দাদের কাছে৷ বারিককে ধরার পর কিছুটা বিস্মিত রেভিনিউ ইনটেলিজেন্সের অফিসাররাও৷ এক অফিসার বলেন, 'এর আগে বহরমপুরে প্রায় ৫৮ কেজি সোনা ধরা পরেছিল৷ সেই সোনা গাড়ির মেঝেতে আলাদা খাপ তৈরি করে রাখা ছিল৷ ফলে তা উদ্ধার করতে বেশ বেগ পেতে হয়েছিল৷ কিন্ত্ত এ ক্ষেত্রে, ছোট ছোট ব্যাগে ভর্তি করে চালকের পাশে, গাড়ির পিছনের আসনের নীচে রাখা ছিল সোনা৷ এত খোলাখুলি তা রেখে দেওয়ায় সোনা উদ্ধার করতে অসুবিধা হয়নি৷ কিন্ত্ত এ ক্ষেত্রে বোঝা গিয়েছে, কোনও তল্লাশি হবে না বলে পাচারকারী আত্মবিশ্বাসী ছিল৷' ধরা পরার মূহুর্তে সে যে আগ্নেয়াস্ত্র বের করার চেষ্টা করেও সফল হয়নি সে জন্য নিজেদের বরাতকেও বাহবা দিচ্ছেন অফিসাররা৷ যদিও ওই আগ্নেয়াস্ত্র লাইসেন্সড বলে দাবি করেছে আব্দুল৷ তার কাগজপত্রের খোঁজ করছেন অফিসাররা৷


    কোনও নির্দিষ্ট ডেরায় নয়, কলকাতার রাস্তায় কয়েকজন এজেন্টের কাছে পেঁৗছে দেওয়ার জন্যই ছোট ছোট ব্যাগে সোনা ভাগ করে রাখা হয়েছিল বলে জেরায় জেনেছেন তদন্তকারীরা৷ যাদের কাছে পৌঁছে দেওয়ার কথা বলেছে ধৃত, তাদের সন্ধানে এখন হন্যে হয়ে ঘুরছেন গোয়েন্দারা৷ কেন না কোনও শপিং মলের সামনে বা কোনও রেস্তোঁরার পাশে সোনা হাতবদল হওয়ার কথা ছিল৷ ফলে এজেন্টদের নাম বললেও কোনও ঠিকানা না পাওয়ায় তাদের খুঁজে পাওয়া দুষ্কর বলে মনে করছেন অফিসাররা৷ যে সোনা পাওয়া গিয়েছে তার অধিকাংশেই সুইজারল্যান্ডের ছাপ মারা৷ কিছু দুবাইয়েরও রয়েছে৷ রবিবারই বসিরহাটের সংগ্রামপুরে বাড়িতে হানা দিয়ে বেশ কিছু জিনিস আটক করেছেন তদন্তকারীরা৷ একটি মারুতিতে সেইসব জিনিস কলকাতায় নিয়ে যাওয়া হয়৷


    এদিন বারিকের বাড়ির দিকে এগোতেই বাধা দিলেন স্থানীয় ভ্যানচালকরা৷ একটা চাপা ভয় কাজ করছে গোটা এলাকায়৷ দুর্গাপুজোর সময় স্থানীয় প্যারাডাইস ক্লাবের ছেলেরা সীমান্তে পাচারের জন্য যাওয়ার পথে ট্রাক বোঝাই গরু আটকে চাঁদা চায়৷ কিছুক্ষণের মধ্যে শ'দেড়েক স্বশস্ত্র দুষ্কৃতী এসে হামলা করে গোটা এলাকায়৷ চলে মারধর৷ গত বছর ঘোজাডাঙা সীমান্ত দিয়ে গরু পাচার করতে না চাওয়ায় এক ট্রাক মালিক ও তাঁর পরিবারকে ব্যাপক মারধরের অভিযোগ ওঠে পাচারকারীদের বিরুদ্ধে৷ দুটি ঘটনাতেই নাম জড়ায় বারিকের৷ ভোটের মুখে সেই বারিক ধরা পরার পর নতুন গন্ডগোলের আশঙ্কা এখন বসিরহাট জুড়ে৷



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    दिल्ली देखेगी दीदी का दम और देश देखेगा उत्कट राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं का केशरिया तांडव।


    ममता मोदी संयुक्त कारपोरेट उपक्रम में तब्दील होने जा रही है भारतीय राजनीति।


    पलाश विश्वास


    बंगाल में  भूमि अधिग्रहण विरोधी जनज्वार पर सवार बाजार के शस्त्रों से लैस दुर्गारुपेण अवतरित अग्निकन्या ने वामासुर का वध कर दिया है और बंगाल को धनधान्य से परिपूर्ण शष्यश्यामला बनाने के पीपीपी कार्यक्रम,उनके शब्दों में गुजरात से बेहतर विकास का माडल को सै पित्रोदा और मोंटेक बाबू के दिशा निर्देशन में राथचाइल्ड्स जमाई के संरक्षण में कार्यान्वित करके दिल्ली के सिंहद्वार पर दस्तक देने चल पड़ी हैं सादगी और ईमानदारी की छवि।


    तसलिमा नसरीन को कोलकाता से निकालने के लिए जिस मध्य कोलकाता के जिस इलाके में भारी उपद्रव हुआ,उसी इलाके में  प्रचंड दीदी समर्थक एक अखबार में प्रकाशित एक चित्र लेकर बवाल मचा हुआ है।स्थिति बेकाबू बतायी जाती है और बताया जा रहा है कि कर्फ्यू जैसे हालात हैं।दीदी इसे साजिश बताकर विपक्ष पर वार कर सकती हैं,हालांकि उन्हें हालात सड़क पर उतरकर नियंत्रित कर लेने की कला भी आती है और उम्मीद है कि वे हरचंद कोशिश करेंगी कि मामला नियंत्रित कर लें।


    लोकसभा चुनाव में वाम और कांग्रेस को मटियामेट करने और अन्ना सौजन्य से दिल्ली दखल की हड़बड़ी में दीदी ने दुर्भेद्य दुर्ग प्रगतिशील बंगाल के चप्पे च्पे को केशरिया रंग दिया है।नरेंद्र मोदी ने जिस तरह एक मात्र गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री बतौर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले अब भी जीवित अटल बिहारी वाजपेयी का नामोनिशान पार्टी कार्यक्रमों से मिटा दिया,जैसे रामरथी लालकृष्ण आडवाणी को पैदल कर दिया,चिसतर ह संसदीय नेता सुषमा स्वराज की बोलती बंद कर दी है,ठीक उससे दो कदम आगे हैं ममता बनर्जी,जिन्हें राजनीतिक विरोध कतई बर्दाश्त नहीं होता और जिनका राजकाज विशुद्ध फतवाबाजी है।


    आज जिस आसानी से अमेरिका और यूरोप ने यूक्रेन के मुद्दे पर रुस पर प्रतिबंध लगा दिये और जिसपर चीन की भी सहमति हो गयी,उसके आलोक में यह सोचना जरुरी है कि बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अमेरिकी सातवें नौसैनिक बेड़े के मुखातिब भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अगर प्रतिपक्ष के नेता अटलजी को भारत के राजनयिक प्रतिनिधि बतौर चुनकर विश्व जनमत को अपनी तरफ नही किया होता तो इतिहास कुछ और ही होता।


    इसे चंद्रशेखर जी की खाड़ी युद्ध के दौरान बतौर प्रधानमंत्री और जराजीव गांधी की बतौर प्रतिपक्ष नेता भूमिकाओं के बरअक्श आंके तो शायद बात समझ में आ जाये।


    राजनीति और राजनय में दोहरी उपलब्धियों के अपने महानायक को कबाड़ में डालकर संघ परिवार और भाजपा के मोदीकल्प से देश में जो राजनीति आने वाली है,वह विशुद्ध कारपोरेट मार्केटिंग की आइकन सेलिब्रिटी राजनीति है,जिसके तहत पार्टी के बाकी चेहरों को गैर प्रासंगिक बनाकर तानाशाह मसीहा बनाने का मुक्त बाजार तैयार होता है।


    दीदी के मंत्री ज्योति प्रिय मल्लिक माकपाइयों के सामाजिक बहिष्कार का आवाहन करते हुए माकपाई परिवारों से वैवाहिक संबंध तक तोड़नी अपील करते हैं तो फिर सांप के साथ जो करते हैं,उन्हें उसी तरह खत्म करने के लिए आम सभाओं में आम जनता को भड़काते हैं।उनके जिलाध्यक्ष माकपाइयों की गड्ढें में फंसे चूहो की तरह बताते हुे उन्हें जहर देकर मारने की बात करते हैं।


    अब अगर बाकी देश की जनता भी इस राजनीति को विकल्प बतौर अपनाती है तो समझ लीजिये कि क्या नतीजे होगें।


    दीदी इस मिशन को बंगाल में कामयाबी के साथ आजमा चुकी हैं और बाकी देश में ममता मिशन खुलने का कारपोरेट तैयारी है।


    ममता मोदी संयुक्त कारपोरेट उपक्रम में तब्दील होने जा रही है भारतीय राजनीति।


    केशरिया पहाड़ हंस रहा है और गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के समर्थन से दार्जिलिंग ही नहीं, अलीपुर द्वार और जलपाईगुड़ी में भगवा लहराने की तैयारी है।


    इसी के साथ दमदम, हावड़ा,हुगली,कृष्णनगर ,बारासात और जिन सीटों पर माकपा और कांग्रेस का कब्जा है,वहां अगंभीर चमकदार चेहरे खड़ा करके वाम कांग्रेस शिविर के मजबूत महत्वपूर्ण उम्मीदवारों को हराकर बंगाल को केशरिया बनाने की पूरी तैयारी करके दीदी दिल्ली पहुंच रही है और वहां अरविंद केजरीवाल और आप अन्ना ममता निशाने पर हैं।



    दिल्ली के हर लोकसभा क्षेत्र से चमकीले तृणमूल उम्मीदवार होंगे।जैसे माकपा के वासुदेव आचार्य के खिलाफ आदिवासी बहुल बांकुड़ा में वसंत पार ग्लेमर आइकन मुनमुन सेन और चुनाव नहीं लड़ रहे गुरुदास दासगुप्त के घाटाल में बंगाली फिल्मों के सुपरस्टार देब को भाकपा के नक्सली संतोष राणा के खिलाफ उम्मीदवार बनाया गया है उसीतरह दिल्ली में चाकलेटी मुंबइया बेमेल जोड़ी विश्वजीत और मौसमी चटर्जी को बंगाल की शताब्दी तापस पाल जोड़ी के तौर पर बाकायदा मार्केटिंग आइकन अगंभीर राजनीति तुरुप बतौर फेंककर आप को तहस नहस करने की तैयारी है।हालांकि इस सिलसिले में  यानी सिनेस्टार, खिलाड़ियों और गायकों को टिकट देने के लिए अन्य राजनीतिक दलों की ओर से आलोचना के जवाब में तृणमूल सुप्रीमो की दलील भी उनकी शायरी की तरह लाजवाब है कि उम्मीदवार सूची को वास्तव में प्रतिनिधित्व वाला अभास देने के लिए कई नये चेहरे को शामिल किया गया है।


    इस सिलसिले में एक दिलचस्प शरारत में शायद आप लोगों की भी दिलचस्पी हो। हमारे मित्र सहकर्मी  शैलेंद्र चूंकि माकपाई हैं एकदम प्रतिबद्ध और कवि भी हैं,तो हम लोगों ने मजे मजे में उसे छेड़ने के लिए साबित किया कि माकपा बंगाल,केरल और त्रिपुरा तीनों जगह से हारेगी और दीदी सौ सीटें जीतकर देश की प्रधानमंत्री हो जायेंगी तो हिंदी कविता के लिए बारी संकट हो जायेगा।दीदी कविता में भाषण करती हैं।हिंदी में शायरी करती हैं।उनके भाषण ही कविता संग्रह होंगे।सरकारी खरीद के मोहताज प्रकाशक उनके ही काव्य छापेंगे और नामवर सिंह उन्हें विश्व की सर्वश्रेष्ठ कवि साबित कर देंगे।वैसे भी बांग्ला में उनके असंख्य कविता संग्रह हैं जिनकी भारी बिक्री होती है।उनके हिंदी कविता संग्रह इतने बिकेंगे कि किसी कवि के कविता संग्रह फिर न छपेंगे और न उन्हें कोई आलोचक संपादक घास डालेगा।वैसे गंभीरता पूर्वक विचार करें तो इसका खतरा मुकम्मल भी है। जैसे कोलकाता के चौराहों पर रवींद्र संगीत बजता है ,राजधानी नयी दिल्ली में हर चौराहे पर दीदी बजेंगी।इसका शुभारंभ रामलीला मैदान से हो रहा है।शैलेंद्र मित्रों की घेराबंदी से निकल भागे लेकिन देश और देशवासियों के बागने का रास्ता है ही नहीं।संघ के एक्शन प्लान बी के मुताबिक मोदी थम गये तो दीदी पेश हैं।


    दीदी का थर्ड फ्रंट तोडो़ मिशन कामयाब है और अब नमोममय भारत के स्वर्णमार्ग पर आखिरी स्पीडब्रेकर को तोड़ने का मिशन है।यही नहीं , तय है कि जहां भी मोदी को कड़ी चुनौती मिलेगी,उले तोड़ने के लिए बजरिये अन्ना दीदी का इस्तेमाल ब्रह्मास्त्र बतौर होगा।मसलन गुजरात में अरविंद केजरीवाल के दौरे  और उनके सोलह सत्रह सवालों से संघियों की नींद हराम हो गयी तो अपने मीडिया अवतारों और दवमंडल के हारे स्टिंग ट्विस्टिंग कराकर बहस केजरीवाल की साख और विश्वसनीयता की तरफ मोड़ दी और वे सारे यक्ष प्रश्न जो भारतीय वामपंथियों ने भी दागे नहीं कभी उनुत्तरित ही रह गये।अब केजरीवाल वाइरल से गुजरात को मुक्त करने के लिए अन्ना ममता फिनाइल का इस्तेमाल होना है।


    नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल के दौरे के बाद अब 20 मार्च को अन्ना हजारे और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी गुजरात के दौरे पर जा रही हैं। राज्य समता पार्टी प्रमुख प्रवीण सिंह जडेजा ने हजारे को आमंत्रित किया है जिनका दावा है कि सामाजिक कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ राज्य का दौरा करेंगे। उनके साथ में फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती भी होंगे।


    वाम दल बंगाल और केरल के दम पर तीसरे मोर्चे की चुनावी राजनीति करते रहे हैं। बाकी भारत के कम्युनिस्ट आंदोलनकारियों और सक्रिय ईमानदार कार्यकर्ताओं को बंगाली मलयाली वर्ण वर्चस्व के तहत किनारे करने का खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है वामपंथ को।


    बंगाल का किला ध्वस्त होते ही वाम अप्रासंगिकता आज के बारत का सबसे भयानक यथार्थ है।


    वृंदा कारत और सीता राम येचुरी के लिए सीट मिली या नहीं, या वे चुनावी जंग में लहूलुहान होना नहीं चाहते ,पता नहीं, लेकिन जिस सुभाषिनी अली को वाम नेतृत्व का राष्ट्रीय चेहरा होना चाहिेए था,जिसे पोलित ब्यूरो में होना था,उन्हें हारा हुआ मंगलपांडेय के गढ़ बैरकपुर में उतारा गया है।


    कामरेडों को हाशिये पर रखकर जिन  लालू, मुलायम, पासवान, मायावती, चंद्रबाबू, जयललिता,प्रफुल्ल महंत,नवीन पटनायक को पलक पांवड़े पर बैठाकर वाम विचारधारा और आंदोलन की नींव में बारुदी सुरंग बिछा दी गयी हैं,दीदी की चिनगारी से वहां एक के बाद एक केशरिया विस्फोट होते चले जा रहे हैं।इसी के मध्य तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी के जयललिता के साथ काम करने की इच्छा जताने के एक दिन बाद ही एआईएडीएमके सुप्रीमो जयललिता ने ममता बनर्जी से फोन पर बात की। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच आम चुनाव को लेकर बातचीत हुई है।


    ममता बनर्जी ने कहा था कि जयललिता को फेडरल फ्रंट का हिस्सा होना चाहिए। ममता बनर्जी ने जयललिता को पीएम पद का उम्मीदवार बताया। जलललिता ने लेफ्ट पार्टियों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन समाप्त करने का फैसला किया है।



    अब जब दिल्ली को संबोधिक करेंगी दीदी और अन्ना का वरद हस्त होगा अपने ही चेले अरविंद केजरीवाल के मत्थे,तो न कहीं लाल होगा, न हरा और न नील,दसों दिशाओं में होगा केशरिया और केशरिया।


    दैनिक भास्कर में प्रकाशित इस मंतव्य पर गौर करना जरुरी है


    क्‍या अन्‍ना हजारे नरेंद्र मोदीऔर ममता बनर्जी के बीच कड़ी का काम कर रहे हैं? बुधवार को दिल्‍ली के रामलीला मैदान में अन्‍ना-ममता की साझा रैली से पहले राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है।

    यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्‍योंकि

    1. टीम अन्‍ना के कई सदस्‍य भाजपा से सीधे तौर पर जुड़ गए हैं या जुड़े होने के संकेत दे चुके हैं। अन्‍ना के सहयोगी पूर्व सेनाध्‍यक्ष जनरल वी.के. सिंह भाजपा में शामिल हो गए हैं, जबकि उनकी साथी किरण बेदी खुले आम नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन कर चुकी हैं।

    2. अन्‍ना के निशाने पर सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी (आप) है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने अन्‍ना को 'आप' को नुकसान पहुंचाने के लिए राजनीतिक मंच मुहैया कराया है। यह जुगलबंदी अंतत: भाजपा को ही फायदा पहुंचाएगी।

    3. बुधवार की रैली से पहले अन्‍ना दिल्‍ली में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर सकते हैं। इसमें वह 30-40 'ईमानदार' निर्दलीय उम्‍मीदवारों का समर्थन करने की घोषणा कर सकते हैं।

    4. राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भाजपा को एक मात्र विकल्‍प मानने वाली किरण बेदी का  ममता-भाजपा गठबंधन की संभावनाओं पर मानना है कि हर कोई हर विकल्‍प खुला रखता है। उन्‍होंने एक अखबार से कहा कि सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनाव में भाजपा कितनी सीटें जीतती है।

    5. दिल्‍ली का गणित: दिल्‍ली में पहली बार तृणमूल कांग्रेस सभी सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी का यहां कोई आधार नहीं है। लेकिन, उसे उम्‍मीद है कि अन्‍ना का साथ मिल जाने से उन लाखों मतदाताओं का वोट मिल सकता है, जो केजरीवालकी पार्टी के पक्ष में मतदान कर सकते थे। अब तक आए चुनावी सर्वे के नतीजों के मुताबिक दिल्‍ली में मुख्‍य मुकाबला 'आप' और भाजपा में ही होने वाला है। ऐसे में तृणमूल के उम्‍मीदवार खड़े करने और उन्‍हें  अन्‍ना का साथ मिलने का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को ही होने वाला है।


    इसके विपरीत सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने मोदी पर निशाना साधा है जबकि ममता बनर्जी का गुणगान किया है। उन्होंने कहा नरेंद्र मोदी की चाय पर चर्चा कार्यक्रम पर निशाना साधते हुए कहा कि शराब की बोतल लेकर वोट देना या कोई चाय पिला दे उसको वोट देना, सही नहीं है।


    लोकसभा चुनाव 2014 के लिए मार्च से प्रचार अभियान शुरु करने जा रहे अन्‍ना हजारे ने कहा कि वह आने वाले चुनाव में नरेंद्र मोदी की जगह पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी का समर्थन करेंगे।


    सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने आज पुणे में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को 'आशा की किरण'बताते हुए उनकी प्रशंसा की और कहा कि वह दिल्ली में मुख्यमंत्री से भेंट करेंगे और आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान उनकी पार्टी के सभी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करेंगे ।


    अन्ना ने कहा, 'हमें उसमें आशा की किरण दिखायी देती है । यदि लोग ऐसे नेताओं का समर्थन करने लगें तो देश को बदलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा ।'उन्होंने कहा कि ममता चप्पल और एक साधारण सी साड़ी पहनती हैं और बतौर मुख्यमंत्री वेतन भी नहीं लेतीं ।


    अपने गांव राणेगण सिद्धि में तृणमूल कांग्रेस के महासचिव मुकुल रॉय से मिलने के बाद अन्ना ने संवाददाताओं से कहा, 'मुकुल रॉय ममता के संदेश के साथ आए थे । मैं दिल्ली जाकर ममता से मिलूंगा । वहां हम चर्चा करेंगे कि क्या रास्ता अपनाना है ।'इससे पहले मुकुल रॉय ने कहा था कि अन्ना हजारे आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे देश में तृणमूल कांग्रेस के सभी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करेंगे ।


    ममता के प्रतिनिधि के रूप में अन्ना से मिलने पहुंचे पूर्व रेल मंत्री रॉय ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल के साथ नहीं जुड़ने की बात करने वाले अन्ना हजारे की ओर से समर्थन पाकर उनकी पार्टी 'गौरवान्वित'है । पूर्व मंत्री के अनुसार, हजारे ने कहा कि ममता एक ईमानदार नेता हैं जो भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं ।


    हस्तक्षेप पर ओमेर अनस का लेख इतना भाया कि अफसोस हुआ कि मैं इस लेखक को नहीं जानता।शायद पहलीबार अमलेंदु को फोन लगाकर मैंने इस लेख की तारीफ की।हम उनके बारीक विश्लेषण से सहमत हैं।उनके लिखे इस विश्लेषण पर खास गौर करने की जरुरत हैः


    बीते दिनों में भारतीय जनता पार्टी में इस बात पर सहमति उभर चुकी है कि भाजपा की सर्वणों वाली पार्टी की पहचान और भाजपा में ब्राह्मणों और बड़ी जातों के चेहरों का वर्चस्व पार्टी को दलितों और पिछड़े वर्गों तक ले जाने में रूकावट बन रहा है। भारतीय जनता पार्टी एक उच्च जातीय, नगर के संपन्न लोगों की पार्टी की छवि से निकल कर कांग्रेस जैसी छवि बनाने में असफल रही है। वहीँ बाबरी विध्वंस और गुजरात दंगों ने भारतीय जनता पार्टी को देश के मुस्लिम वोटरों से हमेशा के लिए दूर कर दिया था। दलितों, पिछड़ों और मुस्लिम मतदाताओं से दूर रहकर भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने में विफल हो चुकी है, लेकिन उससे भी ज्यादा तकलीफ की बात ये है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी भाजपा के पैरों में बेड़ी बन चुका था। उसे अकेले दम पर सरकार बनाने के लिए उसे एक नए फार्मूले की जरुरत थी और नरेंद्र मोदी उसी नए फार्मूले का एक अत्यधिक प्रचारित चेहरा हो चुके हैं।

    नरेंद्र मोदी बीजेपी के डूबते जहाज़ को बचाने के लिए पहले खुद को पिछड़े वर्ग का व्यक्ति बता कर वोट बटोरना चाहते हैं, वहीँ मुस्लिम दुश्मनी का प्रतीक बन चुके नरेंद्र मोदी का एक उदार चेहरा सामने लाने के लिए एक नई भाषा भी गढ़ी गई है। मोदी जैसा व्यक्ति पूरी पार्टी को लगातार विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर  बढाने की कोशिश कर रहा है। मोदी लगातार सांप्रदायिकता, कश्मीर, पाकिस्तान, बाबरी मस्जिद, सामान सहिंता जैसे विवादित मुद्दों से खुद को दूर रखने में कामयाब हुए हैं, वो भी गठबंधन के किसी सहयोगी के दबाव के बगैर। जिन मुद्दों पर नितीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन किया था, नरेंद्र मोदी उन मुद्दों पर नितीश कुमार के बगैर ही अमल कर रहे हैं, यानी की भाजपा अपने दम पर भी सेक्युलर पार्टी रह सकती है, ये साबित करने की कवायद पूरी हो गई है।

    बहरहाल भाजपा के अंदरूनी बदलाव, नरेंद्र मोदी के उभार और कथित विकास राजनीति के बीच में दरअसल सिफ मौकापरस्ती का रिश्ता नजर आरहा है। न तो भाजपा का ब्राह्मणवाद बदला है और न उसके अन्दर समाजिक न्याय के लिए उनकी सोच में कोई अंदरूनी और नीतिगत या पार्टी के अन्दर किस किस्म का  परिवर्तन दिख रहा है। मोदी को पार्टी का चेहरा बना देने मात्र से पार्टी के पदों पर ब्राह्मणों और ऊँची जाति के लोगों का वर्चस्व कम नहीं हो जायगा और ना ही दलितों और पिछड़ों के मुहल्लों में भाजपा की इकाइयों का अचानक विस्तार हो जायगा। पार्टी में दलित चेहरे खरीद खरीद कर लाने पड़ रहे हैं, जो पार्टी हिंदुत्व और हिन्दू धर्म के आधार पर समाजिक सरंचना पर विश्वास करती हो वो अम्बेडकर के "मैं हिन्दू पैदा हुआ था लेकिन हिन्दू मरूँगा नहीं" की हद तक खुद को कैसे बदल सकती है।


    कृपया पूरा लेख हस्तक्षेप या मेरे ब्लागों पर अवश्य पढ़ लें।मैंने हस्तक्षेप से ही इसे अपने ब्लागों पर लगाया है और मित्रों से आवेदन है कि यह जरुरी लेख खुद तो पढ़ें ही ,दूसरों को भी पढ़ायें।



    गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का विकल्प भी खोल रखा है। उन्होंने कहा कि लोग निर्णय करेंगे। उन्होंने कांग्रेस या भाजपा के साथ किसी भी गठबंधन से इंकार किया और उम्मीद जताई कि चुनावों में लोग उनकी पार्टी को पुरस्कृत करेंगे।


    उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं। कोई भी ताकत जिसमें कम्युनिस्ट हैं वह चलने वाली नहीं है, क्योंकि लोगों ने माकपा को खारिज कर दिया है। इसलिए यह तीसरा मोर्चा नहीं है बल्कि यह थका हुआ मोर्चा है।


    यही नहीं,ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी के 'चाय पर चर्चा' कार्यक्रम को ड्रामा करार दिया है। बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए ममता बनर्जी ने कहा, 'राजनीति का मतलब मीडिया के सज-धज कर बैठ जाना नहीं होता। राजनीति समर्पण और तपस्या मांगती है। राजनीति सादा जीवन मांगती है।'


    नरेंद्र मोदी की राजनीति को सस्ता बताते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा, 'हम बीजेपी की तरह चाय की दुकानों पर चर्चा में यकीन नहीं करते। हम चुनाव के वक्त ऐसे ड्रामे करने में यकीन नहीं रखते। यह सस्ती राजनीति है।'


    गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता अरविंद केजरीवाल के मुकाबले 'ज्यादा त्यागी'बताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने पहले ही कहाहै  कि अगर ममता देश की प्रधानमंत्री बनती हैं, तो यह अच्छी बात होगी।


    इंदौर प्रेस क्लब के 'प्रेस से मिलिये'कार्यक्रम में 76 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि ममता के मुकाबले केजरीवाल ने कम त्याग किया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री होने के बावजूद ममता सरकारी गाड़ी.बंगले का इस्तेमाल नहीं करतीं और सादे कपड़े व हवाई चप्पल पहनती हैं। वह बड़े-बड़े उद्योगों के बजाय गांवों को केंद्र में रखकर काम कर रही हैं। मुझे ममता के विचार पसंद हैं।


    हजारे ने एक सवाल पर कहा कि मैं ममता को उनकी व्यक्तिगत सोच के आधार पर प्रधानमंत्री पद के योग्य मानता हूं। अगर वह प्रधानमंत्री बन जाती हैं, तो यह अच्छी बात होगी। उन्होंने हालांकि लगे हाथ स्पष्ट किया कि वह ममता के व्यक्तिगत विचारों के समर्थक हैं। लेकिन उन्होंने आसन्न लोकसभा चुनावों में उनकी अगुवाई वाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस का समर्थन नहीं किया है। तृणमूल कांग्रेस के चुनावी विज्ञापनों में हजारे के इस्तेमाल पर वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि यह मतदाता की जिम्मेदारी है कि वे चुनावों में किसे वोट देते हैं।


    हांलांकि आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज कहा कि सिर्फ अन्ना हजारे ही यह बता सकते हैं कि 'वह ममता बनर्जी का समर्थन क्यों कर रहे हैं।'


    एनडीटीवी पर प्रसारित एक विशेष कार्यक्रम 'लीडर 2014' सवालों का जवाब देते हुए केजरीवाल ने कहा, 'मैं नहीं मानता कि मेरे साथ विश्वासघात हुआ है। यह मेरा दुर्भाग्य है कि अन्ना हमें पसंद नहीं करते और (इसकी जगह) ममता बनर्जी की राजनीति को पसंद करते हैं।'


    वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहर द्वारा मॉडेरेट किए गए इस कार्यक्रम में हालांकि केजरीवाल ने कहा, 'अन्ना जी हमारे लिए बेहद सम्मानीय हैं, लेकिन यहां मतों का अंतर हो सकता है। अन्ना जी हमारे बारे में जो भी कहते हैं, वह हमारे लिए बेहद गंभीर है।'

    इसी बीच आदरणीय सुरेंद्र ग्रोवर जी ने पते की बात की है

    और लो बुज़ुर्ग जोशी से पंगा.. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ [आरएसएस] प्रमुख मोहन भागवत ने अपने कार्यकर्ताओं को नमो-नमो का जाप करने से मना किया है... भागवत ने साफ़ कर दिया है कि संघ किसी भी तरह से व्यक्तित्व संचालित अभियान [पर्सनेलिटी ड्रिवेन कैंपेन] का हिस्सा नहीं बन सकता...


    ओम थानवी जी के वाल से संजय शर्मा की कलम से…

    मैंने अब तक सैकड़ों इंटरव्यू किये होगे , मुझे याद नहीं आ रहा कि किसी भी नेता ने यह ना कहा हो कि कैसा रहा ? बढ़िया छापना ..हम भी कहते है कि बहुत अच्छा रहा और किसी खास अंश का उल्लेख करते हुए कहते है कि यह आपने बहुत बढ़िया बोला ..और यह भी कई बार कहा है कि इसका यह अंश बहुत अच्छा रहा इसको बढ़िया करके छापेंगे इसमें गलत क्या है ..यह हमारे ऊपर है कि लिखते समय या दिखाते समय हम कितनी ईमानदारी से उसे दिखाते है . .पुण्य प्रसून जी की ईमानदारी पर वही सवाल उठा सकते है जिनको इस सिस्टम से सिर्फ यही चाहिए कि सिर्फ उनकी ही जय जयकार हो ..सबसे खतरनाक बात यह कि हिटलर की मानसकिता के लोग लगातार मीडिया पर हमला कर रहे है . यह एक साजिश है लोकतंत्र के हर हिस्से को कमजोर करने की . बीजेपी के नेता इस इंटरव्यू पर बहुत हल्ला कर रहे है ..मैं मोदी जी का करन थापर के साथ का एक इंटरव्यू लगा रहा हूँ ..कुछ सवालों के बाद ही मोदी जी कैमरा बंद करवा देते है और कहते है ऐसे सवाल क्यों पूछ रहे हो हम तो आपको दोस्त मानते है ..क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि मोदी जी चाहते है कि उनके मित्र बन जाओ पर सवाल ना पूछो ..इसीलिए मोदी जी ने आज तक कोई इंटरव्यू नहीं दिया जबकि राहुल जैसे शख्स तक ने इंटरव्यू दे दिया ..कितने खतरनाक लोग है कि रिपोर्टर के कैमरामेन तक उनकी पहुँच है जो उनको इंटरव्यू के टेप तक दे देता है ..


    जगदीश्वर चतुर्वेदी लिखते हैं


    मैं नरेन्द्र मोदी की खिलाओ पिलाओ और पटाओ कला का क़ायल हूँ!

    पहले सिर्फ़ कांग्रेस वाले इस कला का प्रयोग चुनिंदा ढंग से करते थे !लेकिन मोदी ने एक अच्छे कांग्रेस अनुगामी की तरह इस कला को सीखा है और 'मीडियाकर्मियों' और 'ओपियनमेकरों 'को पेट भरकर प्रचार करने की कला सिखायी है!

    बहुत सारे 'मीडियाकर्मियों 'की ग़रीबी को कम किया है !

    इसे रामजीकी कृपा ही कहेंगे !!


    जगदीश्वर चतुर्वेदी

    मोदी का असत्य-५-


    गुजरात की जनता की मोदी किस तरह कुसेवा कर रहे हैं इसका आदर्श उदाहरण है स्वास्थ्यसेवाएं !

    बिना इलाज के बच्चे और माताओं की मृत्यु के मामले में गुजरात का देश में बुरा स्थान है।

    एक अच्छे नेता के लक्षण हैं कि वह सत्य का सामना करता है ।लेकिन धूर्तनेता के लक्षण हैंकि वे सत्य को छिपाते हैं । मोदी धूर्त नेता की कैटेगरी में आते हैं। टाइम्स आॅफ इण्डिया में आज जो रिपोर्ट छपी है वह मोदी के स्वास्थ्य और शिक्षा संबंधी सभी दावों का खण्डन करती है।

    यह रिपोर्ट ऐसे पत्रकार ने लिखी है जिसको विकासमूलक ख़बरों का बेहतरीन पत्रकार माना जाता है ।

    हिमांशु जी की इन पंक्तियों पर भी गौर करें


    आप हमें गरिया रहे हैं कि सिपाहियों के मरने पर अब मानवाधिकार वाले क्यों चुप हैं .


    ये अब क्यों नहीं बोलते ?


    लेकिन भाई अब आप बोलिए .


    जब गरीब की ज़मीन छीन कर अमीर को दी गयी तब आप चुप रहे .


    क्या ये हिंसा नहीं थी ?


    लेकिन आप इस हिंसक कार्यवाही के समय चुप रहे .


    लेकिन तब हम बोले थे .


    लेकिन हमें विकास विरोधी कह कर आपने हम पर डंडे चलवाए थे .


    जब गरीब की ज़मीन छीनने के लिए सरकारी हथियारबंद सिपाहियों का इस्तेमाल निहत्थी औरतों और बूढों के खिलाफ किया गया तब आप चुप रहे .


    क्या वो हिंसा नहीं थी .


    हम तब भी उस हिंसा के खिलाफ बोले लेकिन आपने हमें नक्सली कह कर दुत्कार दिया .


    और हमें जेलों में सड़ने के लिए डाल दिया .


    जब सिपाहियों द्वारा लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और निर्दोष लोगों को पीटा गया आप चुप रहे .


    क्या वो हिंसा नहीं थी .


    पर हम तब भी बोले .


    लेकिन आपने हमें विदेशी एजेंट कह कर हमारा मजाक उड़ाया .


    आपने अपनी पूरी ताकत लगा कर हमें पीड़ित जनता के बीच से हटा दिया .


    लोगों के लिए न्याय पाने के सभी रास्तों को जान बूझ कर बंद कर दिया .


    अब जब हिंसा होती है तो आप चिल्ला कर हम से कहते हैं कि अब बोलो .


    लेकिन हम तो अब तक बोल ही रहे थे .


    अब आपकी बारी है अब आप बोलिए .


    बोलिए और सोचिये कि आपकी चुप्पी और आपका लालच कितनी हिंसा को जन्म दे सकता है .


    ये सिपाही भी गरीब के बच्चे हैं .


    इन्हें गरीबों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है . किसके फायदे के लिए .


    टाटा , अम्बानी और जिंदल के लिए ज़मीने हडपने के लिए ना ?


    और आप इसलिए चुप हैं क्योंकि आपके बच्चों को इन्ही अमीरों की कंपनियों में नौकरी करनी है .


    इसलिए अब आप बोलिए .


    कि इस हिंसा का ज़िम्मेदार कौन है ?


    हमें गाली देने से क्या होगा ?


    आपका स्वकेंद्रित विकास , आपका लुटेरा अर्थशास्त्र , हथियारों के दम पर चलती हुई आपकी राजनीति


    सिर्फ हिंसा को ही जन्म देगी .


    इसमें से शांति अहिंसा और सौंदर्य निकल ही नहीं सकता .


    आदरणीय हिमांशु कुमार जी ने एकदम सही लिखा है

    भारत के हिंदुओं तुम जो मोदी को अपना प्रिय नेता बनाने की बात भी बोल रहे हो उसका मतलब समझते हो ?


    इस तरह तुम आपने साथ रहने वाले करोड़ों मुसलमानों को सन्देश दे रहे हो कि तुम मुसलमानों को मारने वाले नेता को अपना बहुत प्यारा समझते हो .


    विकास वगैरह का बहाना मत बनाओ . उस झूठ की पोल कभी की खुल चुकी है .


    अरे पागलों, एक ही देश में रह कर कोई एक समुदाय अगर खुद को दुसरे समुदाय से ज़्यादा ताकतवर दिखाने की कोई भी हरकत करेगा ,


    तो दूसरा समुदाय या तो डर जाएगा या वो भी खुद को तुम्हारे बराबर शक्तिशाली दिखाने की कोशिश करेगा .


    इस तरह समाज में विभिन्न समुदायों में होड़, अविश्वास और घृणा बढ़ेगी .


    उसमे से हिंसा और अशांति और टूटन निकलेगी .


    अंत में समाज के टूटने से राष्ट्र भी टूट जाएगा .


    इसलिए भाइयों और बहनों ये मूर्खता अभी ही बंद कर दो .


    तुम्हारा हिंदू या मुसलमान होना महज इत्तिफाक की बात है .


    तुम्हारा जन्म दुसरे धर्म में भी हो सकता था .


    इसलिए अपने धर्म पर इतराओ मत .


    राजनीति को लोगों के स्वास्थ्य , शिक्षा , सम्मान , और बराबरी के लिए काम करने का साधन बनाने की ज़ोरदार कोशिश करो .


    आजादी का मतलब है देश में सबके अधिकार बराबर हैं , सबकी गरिमा और सम्मान एक सामान हैं .


    लेकिन अगर देश में सब बराबर नहीं हैं .


    और किसी समुदाय को खुद को छोटा मानने के लिए मजबूर किया जाता है तो


    इसका अर्थ है वह समुदाय आज़ाद नहीं बल्कि अभी भी गुलाम है .


    क्या आप देश के भीतर एक समुदाय पर दुसरे समुदाय का शासन चलाना चाहते हैं ?


    देश के भीतर दूसरी गुलामी की कोशिश मत कीजिये ये आपको भयानक परिणाम तक पहुंचा सकता है .


    हमें मालूम है आपको इस तरह की गुलामी दूसरों से करवाने में मज़ा आता है .


    लेकिन अब आप एक आज़ाद देश में रहते हैं .


    पुराने भारत में नहीं जहां ऊंची जातियों का राज चला करता था और करोड़ों लोगों को धर्म के नाम पर गुलामों की तरह रहने पर मजबूर कर दिया गया था .


    समझोगे तो ठीक है .


    नहीं तो आपकी मर्जी .


    फिर जो होगा खुद ही भुगतोगे .

    हिमांशु जी ने आगे मंतव्य किया है

    Himanshu Kumar

    क्यों भाई अगर आप गाना पसंद करते हो कि 'यहाँ राम अभी तक है नर में नारी में अभी तक सीता है .'


    तो सोनी सोरी को सीता मानने में तुम्हारे पेट में क्यों दर्द शुरू हो जाता है ढोंगियों .


    आप सोनी सोरी में सीता का रूप क्यों नहीं देख पाते ?


    लेकिन उसके साथ जो अन्याय राम का नाम लेकर सत्ता में आयी हुई पार्टी के राज में किया गया है .


    उसके लिए हम मरते दम तक अपना विरोध दर्ज़ करेंगे .


    जो जिंदा इंसानों के दर्द से ज़्यादा इतिहास के पात्रों के लिए लड़ने मरने को ज़्यादा महत्व दे .


    ऐसे नकली धर्म की ऐसी की तैसी .क्यों भाई अगर आप गाना पसंद करते हो कि 'यहाँ राम अभी तक है नर में नारी में अभी तक सीता है .'    तो सोनी सोरी को सीता मानने में तुम्हारे पेट में क्यों दर्द शुरू हो जाता है ढोंगियों .     आप सोनी सोरी में सीता का रूप क्यों नहीं देख पाते ?     लेकिन उसके साथ जो अन्याय राम का नाम लेकर सत्ता में आयी हुई पार्टी के राज में किया गया है .    उसके लिए हम मरते दम तक अपना विरोध दर्ज़ करेंगे .    जो जिंदा इंसानों के दर्द से ज़्यादा इतिहास के पात्रों के लिए लड़ने मरने को ज़्यादा महत्व दे .    ऐसे नकली धर्म की ऐसी की तैसी .


    हम अविनाश से भी सहमत हैं कि


    अरविंद [Arvind Kejriwal | Aam Aadmi Party] और पुण्‍य प्रसून [Punya Prasun Bajpai] के बहुप्रचारित (दुष्‍प्रचारित) रॉ फुटेज से इतना तो हुआ कि प्राइवेटाइजेशन को लेकर "आप" का रुख जगजाहिर हो गया। भले ही वोटबैंक की राजनीति और मध्‍यवर्ग की तबीयत के मद्देनजर केजरीवाल पुण्‍यप्रसून से प्राइवेटाइजेशन के मसले पर सोची-समझी मंशा के साथ नहीं बात कर पाये (कि प्राइवेटाइजेशन के खिलाफ बोलेंगे तो मध्‍यवर्ग छिटक जाएगा), हमारे लिए इतना काफी है कि प्राइवेटाइजेशन पर उनकी नीति कांग्रेस और बीजेपी से इतर वाममार्गी है।




    अविनाश का मंतव्य सौ टका सच है।

    जिन्‍हें अपनी ताकत का इलहाम कुछ ज्‍यादा हो जाता है, वही अपने लिए भस्‍मासुर पैदा कर लेते हैं। आरएसएस के साथ ठीक यही हो रहा है। हिंदुत्‍व के काले काले बादल से विभाजन की लाल लाल बारिश कराने वाले इस गिरोह ने दंगों के उस्‍तादNarendra Modiको जब बीजेपी में नेतृत्‍व की तलवार थमायी, तब उसे अंदाजा भी नहीं होगा कि अंदरखाने यह रक्‍तपिपासु ड्रैक्‍युला संघ में ही अपने मन की मोहरें बिछाने की कोशिश करेगा। कुछ संघ पदाधिकारियों से Mohan Bhagwatको जब इसकी जानकारी मिली, तो उन्‍हें लगा कि कहीं ऐसा न हो कि बाद में मोदी के मिजाज के हिसाब से आरएसएस में पदों पर लोग बिठाये-उठाये जाने लगें। स्‍तब्‍ध मोहन भागवत ने स्‍वयंसेवकों को ताकीद की है कि अब से नमो नमो करना बंद करो - वरना बाद में बहुत देर हो जाएगी।


    [ http://khabar.ibnlive.in.com/news/117239/12 ]


    Avinash Das

    मेरे एक मित्र [Farid] ने फेसबुक पर ठीक ही लिखा है कि जब भी आप ने देश, विकास की हकीकत, भ्रष्‍टाचार, गरीबों की मौत और कुपोषण के बारे में पूछा, उन्‍होंने कोई न कोई वीडियो या तस्‍वीर (99 फीसदी मॉर्फ्ड) आप के मुंह पर दे मारा। मीडिया ने भी उनके सुर में सुर मिलाया। अभी जब मैं मीडिया की कुछ वेबसाइट्स पर घूम रहा था, तो ज्‍यादातर जगहों पर नमो के ऑफिसियल प्रचार की खुशबू (गंध) फैली हुई थी। अरविंद [Arvind Kejriwal | Aam Aadmi Party] और पुण्‍य [Punya Prasun Bajpai] वाले वीडियो फुटेज को जिस ABP Newsने देश की तमाम जरूरी खबरों से ज्‍यादा तवज्‍जो दी, उसकी सच्‍चाई उनकी वेबसाइट पर सबसे ऊपर नजर आती है। अपनी तरफ से ज्‍यादा क्‍या कहूं, आप खुद ही देख लें स्‍क्रीन शॉट।मेरे एक मित्र [@[701693860:2048:Farid]] ने फेसबुक पर ठीक ही लिखा है कि जब भी आप ने देश, विकास की हकीकत, भ्रष्‍टाचार, गरीबों की मौत और कुपोषण के बारे में पूछा, उन्‍होंने कोई न कोई वीडियो या तस्‍वीर (99 फीसदी मॉर्फ्ड) आप के मुंह पर दे मारा। मीडिया ने भी उनके सुर में सुर मिलाया। अभी जब मैं मीडिया की कुछ वेबसाइट्स पर घूम रहा था, तो ज्‍यादातर जगहों पर नमो के ऑफिसियल प्रचार की खुशबू (गंध) फैली हुई थी। अरविंद [@[347939248636912:274:Arvind Kejriwal] | @[290805814352519:274:Aam Aadmi Party]] और पुण्‍य [@[252987041406349:274:Punya Prasun Bajpai]] वाले वीडियो फुटेज को जिस @[153808061303123:274:ABP News] ने देश की तमाम जरूरी खबरों से ज्‍यादा तवज्‍जो दी, उसकी सच्‍चाई उनकी वेबसाइट पर सबसे ऊपर नजर आती है। अपनी तरफ से ज्‍यादा क्‍या कहूं, आप खुद ही देख लें स्‍क्रीन शॉट।

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    Surendra Grover

    कब तक छुपाओगे और कितना छुपाओगे..?

    http://beyondheadlines.in/2014/03/gujarat-ka-sach/

    गुजरात का सच, जिसे छुपाते रहे हैं मोदी...

    beyondheadlines.in

    Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines नरेन्द्र ने मोदी बिहार के पुरणिया में हुंकार रैली के दैरान मुसलमानों के वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश में सच्चर समिति के जिन आंकड़ों को पेश कर अपना सी...



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    संघ परिवार के पास हिंदू राष्ट्र का एजंडा है तो इसके जवाब में बाकी लोगों के पास क्या है?


    पलाश विश्वास


    साठ के दशक के सिंडिकेट जमाने की राजनीति को याद कीजिये, देशभर में जबर्दस्त आंदोलन था,इंदिरा हटाओ।


    जवाब में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाो का नारा दिया। महज हवाई नारा नहीं था वह।


    एक सुनियोजित कार्यक्रम और उसे अमल में लाने की युद्धक राणनीति इंदिराजी के पास थी।


    उन्होंने हक्सर से लेकर अर्थशास्त्री अशोक मित्र जैसे विशेषज्ञों की टीम की मदद से सुनियोजित तरीके से प्रिवी पर्स खत्म किया,राष्ट्रीयकरण की नीतियां लागू की और जब तक राज करती रही अप्रतिद्वंद्वी रहीं।


    नेहरु वंश के उत्तराधिकार उनकी पूंजी हर्गिज नहीं थी। वे हालांकि नेहरु की लाइन पर ही भारत में सोवियत विकास माडल को लागू कर रहीं थीं।


    तब चूंकि सोवियत संघ महाशक्ति बतौर वैश्विक घटनाओं और विश्व अर्थव्यवस्था में राजनीतिक,राजनयिक और आर्तिक विकल्प देने की स्थिति में था,इंदिरा जी को सोवियत माडल लागू करने में खास दिक्कत नहीं हुई।


    उन्हें अमेरिकी खेमे की दखलांदाजी के जरिये अस्थिर किया जाने लगा तो उन्होंने लोकतांत्रिक तौर तरीके को तिलांजलि देकर तानाशाह बनने का विकल्प जो उनके और कांग्रेसी सियासत के अवसान का कारण भी बना।


    फिर विश्वानाथ प्रताप सिंह ने भारतीय राजनीति को मंडल रपट लागू करके सत्ता समीकरण बदलने की क्रांतिकारी पहल जो की तो उसके मुकाबले कमंडल वाहिनी को हिंदुत्व के पुनरुत्थान की पृष्ठभूमि मिल गयी।


    हिंदू राष्ट्र का एजंडा तब से लेकर अबतक एक निर्णायक एजंडा है,जिसे ग्लोबीकरण के एजंडा से जोड़कर संघ परिवार ने एक बेहद मारक प्रक्षेपास्त्र बना दिया।


    हम भले ही हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के खिलाफ हों, हम भले ही मुक्त बाजार के खिलाफ हों,लेकिन न इंदिरा गांधी की तरह और न संघ परिवार की तरह हमारे पास कोई वैकल्पिक एजंडा,सुनियोजित रणनीति और मिशन को समर्पित विशेषज्ञ टीम है।


    आगामी लोकसभा के परिप्रेक्ष्य में कारपोरेट इंडिया,वैश्विक ताकतों और मीडिया के तूफानी करिश्मे के बावजूद हकीकत यही है कि भारतीय राजनीति मे अपने एजंडे और विचारधारा के प्रति संघी कार्यकर्ता सौ फीसद खरा प्रतिबद्ध टीम है।


    अब चाहे आप मोदी को हिटलर बता दें या हिंदुत्व के एजंडे को फासीवादी नाजीवादी साबित कर दें,भारत की मौजूदा परिस्थितियों में किसी परिवर्तन की उम्मीद नहीं है।


    केसरिया सुनामी से महाविध्वंस से बचने का कोई विकल्प हमारे पास नहीं है, न कोई एजंडा है और न कोई रणनीति जिससे हम व्यापक जनता को गोलबंद करके जनादेश को जनमुखी जनप्रतिबद्ध बना सकें।


    पहले इस सत्य और सामाजिक राजनीतिक यथार्थ को आत्मसात कर सकें तो शायद कुछ बात बनें।


    मसलन ममता बनर्जी जो रामलीली मैदान में कुर्सियों को संबोधित करती अकेली महाशून्य को संबोधित करती देखी गयीं,उसका मुख्य कारण वे चली तो थीं देश का प्रधानमंत्री लेकिन न उनके पास विचारधारा है,न कार्यक्रम, न युद्धक रणनीति और न ऐसी विशेषज्ञ विशेषज्ञ टीम जो विकल्प का निर्माण कर सकें।


    इसी व्यक्तिकेंद्रित राजनीति के कारण ही सामाजिक और उत्पादक ताकतों के व्यापक गोलबंदी,छात्र युवाओं की विपुल गोलबंदी के बावजूद आम आदमी पार्टी अब भी हवा हवाई है और संघियों की बुलेट ट्रेन को रोकने लायक हिंदू राष्ट्र के एजंडे का मुकाबला करने लायक कोई एजंडा उनके पास नहीं है।


    भारत का लोकतांत्रिक ढांचा एक व्यक्ति एक वोट के नागरिक अधिकार की नींव पर तो खड़ा है,लेकिन नागरिकों के सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सशक्तीकरण का काम हुआ ही नहीं।


    भारवर्ष में नागरिक सिर्फ वोट हैं और वोट के अलावा नागरिकता का न कोई वजूद है, न अभिव्यक्ति है।


    जनगणना है,लेकिन जनगण नहीं हैं।


    वियतनाम युद्ध हो या इराक अफगानिस्तान से वापसी का मामला हो,यह ध्यान देने लायक बात है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद को वैश्विक परिस्थितियों और चुनौतिों के मद्देनजर नहीं,अमेरिकी नागरिकों के प्रतिरोध आंदोलन की वजह से पीछे हटना पड़ा।


    अमेरिका ने परमणु संधि पर दस्तखत किया,लेकिन उसे अमल में लाने के लिए संसद से पास कराना अनिवार्य था।


    जबकि हमारे यह किसी शासकीय आदेश, केबिनेट के फैसले या राजनयिक कारोबारी समझौते का संसदीय अनुमोदन जरुरी नही है।


    बायोमेट्रिक नागरिकता के सवाल पर इंग्लेंड में सरकार बदल गयी,लेकिन हमारे यहां बिना किसी संसदीय अनुमोदन के गैरकानूनी असंवैधानिक कारपोरेट आधार योजना बिना प्रतिरोध चालू रहा।


    अब चुपके से आधार पुरुष भारतीय राजनीति के ईश्वर बनने की तैयारी में है।


    नागरिकता और नागरिक आंदोलनों की अनुपस्थिति पर बहुत सारे उदाहरण सिलसिलेवार पेस किये जा सकते हैं। उसकी जरुरत फिलहाल नहीं है।


    हम जिसे नागरिक समाज मानते हैं, उसमें,इलिट अभिजन उस आयोजन में  हाशिये के लोग,बहिस्कृत समुदायों के लोग और क्रयशक्ति हीन आम शहरी लोग कहीं नही हैं।


    वे दरअसल जनांदोलन हैं ही नहीं, वैश्विक आर्थिक सस्थानों के प्रोजेक्ट मात्र हैं जो नख से सिख तक व्यक्ति केंद्रित हैं।


    व्यक्ति केंद्रित राजनीति, व्यक्ति केंद्रित आंदोलन और व्यक्तिकेंद्रित विमर्श और एजंडा से बहुसंखय जनता के धर्मोन्माद का मुकाबला नहीं किया जा सकता।


    अगर हम कहीं मुकाबले में हैं,तो हमें सबसे पहले इस जमीनी हकीकत को समझ ही लेना चाहिए,जिसकी वजह से संघ परिवार इतना अपराजेय है और उसे चुनौती देनी वाली कोई ताकत मैदान में है ही नहीं।


    अब तो रमलीला मैदान के फ्लाप शो से साबित हो गया कि संघ परिवार ने अपने एक्सन प्लान बी को समेट लिया है। संघ रिमोटित अन्ना फिर अराजनीतिक मोड में वापस।


    दीदी बंगाल के अपने मजबूत जनाधार पर खड़ी होकर अपना जख्म चाटने के लिए और बंगाल में कांग्रेस और वामदलों पर भूखी शेरनी की तरह झपटने के लिए कोलकाता वापस।


    दो मौकापरस्त लोगों के गठजोड़ की संघ परिवा र को जबतक जरुरत थी, उसका गुब्बारा खूब उड़ाया गया और फिर राष्ट्रीय मंच पर गुब्बारा में पिन।


    संघी बर्ह्मास्त्र फिर तूण में वापस अगले वार के लिए। इस युद्ध नीति को समझिये।


    संघ परिवार निजी और अस्मिता एजंडे के सारे चमकदार चेहरों और मसीहों को अपने में समाहित करने के लिए कामयाब इसलिए है कि उसको चुनौती देनेवाल कोई एजंडा है ही नहीं।


    भारत में वर्ग और  जाति के घटाटोप में दरअसल निजी कारोबार ही चलाया जाता रहा है।


    अंबेडकर ने अपने समूचे लेकन में जाति विमर्श से कोसों दूर रहे हैं। शिड्युल कास्ठ फेडरेशन की राजनीति के बावजूद वे डिप्रेस्ड क्लास की बात कर रहे थे और जाति को भी जन्मजात अपरिवर्तनीय वर्ग बता रहे थे।


    इसके बावजूद जाति पहचान के आधार पर अंबेडकर विचारधारा और उनकी विरासत आत्मकेंद्रित वंशवादी,नस्ली, जाति अस्मिताओं के बहाने सत्ता चाबी बतौर इस्तेमाल हो रही है।


    अंबेडकर  के जाति उन्मूलन एजंडे का कहीं कोई चिन्ह नहीं है।


    इसी तरह वाम आंदोलन भी वर्चस्ववादी विचलन में भटक बिखर गया और कुछ कोनों को छोड़कर सही मायने में उसका कोई राष्ट्रीय वजूद है ही नहीं।


    न वर्ग चेतना का विस्तार हुआ और न कहीं वर्ग संघर्ष के हालात बने।


    फिर जाति को वर्ग बताने वाले समाजवादी लोग भी व्यक्ति केंद्रित पहचान ,अस्मिता और सत्ता में भागेदारी में निष्णात।


    चूहे हमने ही पैदा किये हैं तो चूहादौड़ की इस नियति से क्षण प्रतिक्षण बदल रहे राजनीतिक समीकरण को आम जनता के बुनियादी मुद्दों से जोड़ने की हमारी आकांक्षा भी बेबुनियाद है।


    हिंदू राष्ट्र का एजंडा सीधे बहुसंख्य जनता के धर्मोन्माद के आवाहन के सिद्धांत पर आधारित है जिसे अल्पसंख्यकों की कोई परवाह नहीं है।


    वर्णवर्चस्वी नस्ली इस विचारधारा की खूबी यह है कि वह न जाति विमर्श में कैद है और न कोई वर्ग चेतना उसकी अवरोधक है।


    इस संघी समरसता और डायवर्सिटी के मकाबले हम जाति,धर्म, क्षेत्र,वर्ग,भाषा जैसी हजारों अस्मिताओं में कैद उसके अश्वमेधी घोड़ों को रोकने का ख्वाब ही देख सकते हैं या कागद कारे ही कर सकते हैं,और फिलहाल कुछ भी संभव नहीं है।


    बैलेंस जीरो है।


    लेकिन शुरुआत कहीं न कहीं से तो करनी ही होगी।



    इस जनादेश को हम बदलने की हालत में नहीं है।

    ममता की दुर्गति से जाहिर है कि तमाम व्यक्ति विकल्पों की रेतीली बाड़ केसरिया सुनामी को रोकने में कामयाब होगी,ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती।


    तो आइये ,अभी से तय करे कि इस निरंकुश पुनरुत्थान के खिलाफ हमारा वैकल्पिक एजंडा क्या होगा और अस्मिताओं के तिलिस्म और आत्मघाती धर्मोन्माद के शिकार भारतीय जनगण को हम कैसे इस अशनिसंकेत के विरुद्ध मोर्चाबंद करेंगे।


    जाति और वर्ग विमर्श में  हमारे लोग एक दूसर के दुश्मन हो गये हैं।

    पूरे देश को एक सूत्र में बांधे बिना तमाम अस्मितओं को तोड़कर देश समाज जोड़े बिना फिलाहाल हिंदू राष्ट्र के अमोघ एजंडा से लड़ने के लिए कोई हथियार हमारे पास है ही नहीं।



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    संघ परिवार के पास हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा है तो बाकी लोगों के पास क्या है?

    संघ परिवार के पास हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा है तो बाकी लोगों के पास क्या है?

    पलाश विश्वास

    साठ के दशक के सिंडिकेट जमाने की राजनीति को याद कीजिये, देश भर में जबर्दस्त आन्दोलन था, इंदिरा हटाओ। जवाब में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। महज हवाई नारा नहीं था वह।

    एक सुनियोजित कार्यक्रम और उसे अमल में लाने की युद्धक राणनीति इंदिराजी के पास थी। उन्होंने हक्सर से लेकर अर्थशास्त्री अशोक मित्र जैसे विशेषज्ञों की टीम की मदद से सुनियोजित तरीके से प्रिवी पर्स खत्म किया, राष्ट्रीयकरण की नीतियाँ लागू की और जब तक राज करती रही अप्रतिद्वंद्वी रहीं।

    नेहरु वंश के उत्तराधिकार उनकी पूँजी हर्गिज नहीं थी। वे हालाँकि नेहरु की लाइन पर ही भारत में सोवियत विकास मॉडल को लागू कर रहीं थीं।

    तब चूँकि सोवियत संघ महाशक्ति बतौर वैश्विक घटनाओं और विश्व अर्थव्यवस्था में राजनीतिक,राजनयिक और आर्तिक विकल्प देने की स्थिति में था, इंदिरा जी को सोवियत मॉडल लागू करने में खास दिक्कत नहीं हुयी। उन्हें अमेरिकी खेमे की दखलंदाजी के जरिये अस्थिर किया जाने लगा तो उन्होंने लोकतान्त्रिक तौर तरीके को तिलांजलि देकर तानाशाह बनने का विकल्प जो उनके और कांग्रेसी सियासत के अवसान का कारण भी बना।

    फिर विश्वानाथ प्रताप सिंह ने भारतीय राजनीति को मंडल रपट लागू करके सत्ता समीकरण बदलने की क्रांतिकारी पहल जो की तो उसके मुकाबले कमंडल वाहिनी को हिन्दुत्व के पुनरुत्थान की पृष्ठभूमि मिल गयी।

    हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा तब से लेकर अब तक एक निर्णायक एजेण्डा है, जिसे ग्लोबीकरण के एजेण्डा से जोड़कर संघ परिवार ने एक बेहद मारक प्रक्षेपास्त्र बना दिया।

    हम भले ही हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के खिलाफ हों, हम भले ही मुक्त बाजार के खिलाफ हों,लेकिन न इंदिरा गांधी की तरह और न संघ परिवार की तरह हमारे पास कोई वैकल्पिक एजेण्डा, सुनियोजित रणनीति और मिशन को समर्पित विशेषज्ञ टीम है।

    आगामी लोकसभा के परिप्रेक्ष्य में कॉरपोरेट इंडिया, वैश्विक ताकतों और मीडिया के तूफानी करिश्मे के बावजूद हकीकत यही है कि भारतीय राजनीति मे अपने एजंडे और विचारधारा के प्रति संघी कार्यकर्ता सौ फीसद खरा प्रतिबद्ध टीम है।

    अब चाहे आप मोदी को हिटलर बता दें या हिन्दुत्व के एजंडे को फासीवादी नाजीवादी साबित कर दें,भारत की मौजूदा परिस्थितियों में किसी परिवर्तन की उम्मीद नहीं है।

    केसरिया सुनामी से महाविध्वंस से बचने का कोई विकल्प हमारे पास नहीं है, न कोई एजेण्डा है और न कोई रणनीति जिससे हम व्यापक जनता को गोलबंद करके जनादेश को जनमुखी जनप्रतिबद्ध बना सकें।

    पहले इस सत्य और सामाजिक राजनीतिक यथार्थ को आत्मसात कर सकें तो शायद कुछ बात बनें।

    मसलन ममता बनर्जी जो रामलीली मैदान में कुर्सियों को संबोधित करती अकेली महाशून्य को संबोधित करती देखी गयीं, उसका मुख्य कारण वे चली तो थीं देश का प्रधानमंत्री बनने लेकिन न उनके पास विचारधारा है, न कार्यक्रम, न युद्धक रणनीति और न ऐसी विशेषज्ञ विशेषज्ञ टीम जो विकल्प का निर्माण कर सकें।

    इसी व्यक्ति केन्द्रित राजनीति के कारण ही सामाजिक और उत्पादक ताकतों के व्यापक गोलबंदी, छात्र युवाओं की विपुल गोलबंदी के बावजूद आम आदमी पार्टी अब भी हवा हवाई है और संघियों की बुलेट ट्रेन को रोकने लायक हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे का मुकाबला करने लायक कोई एजेण्डा उनके पास नहीं है।

    भारत का लोकतान्त्रिक एक व्यक्ति एक वोट के नागरिक अधिकार की नींव पर तो खड़ा है,लेकिन नागरिकों के सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सशक्तीकरण का काम हुआ ही नहीं।

    भारत वर्ष में नागरिक सिर्फ वोट हैं और वोट के अलावा नागरिकता का न कोई वजूद है, न अभिव्यक्ति है।

    जनगणना है, लेकिन जनगण नहीं हैं।

    वियतनाम युद्ध हो या इराक अफगानिस्तान से वापसी का मामला हो, यह ध्यान देने लायक बात है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद को वैश्विक परिस्थितियों और चुनौतिों के मद्देनजर नहीं, अमेरिकी नागरिकों के प्रतिरोध आन्दोलन की वजह से पीछे हटना पड़ा।

    अमेरिका ने परमणु संधि पर दस्तखत किया, लेकिन उसे अमल में लाने के लिये संसद से पास कराना अनिवार्य था। जबकि हमारे यह किसी शासकीय आदेश, केबिनेट के फैसले या राजनयिक कारोबारी समझौते का संसदीय अनुमोदन जरूरी नहीं है।

    बायोमेट्रिक नागरिकता के सवाल पर इंग्लेंड में सरकार बदल गयी, लेकिन हमारे यहाँ बिना किसी संसदीय अनुमोदन के गैरकानूनी असंवैधानिक कॉरपोरेट आधार योजना बिना प्रतिरोध चालू रहा।

    अब चुपके से आधार पुरुष भारतीय राजनीति के ईश्वर बनने की तैयारी में है।

    नागरिकता और नागरिक आन्दोलनों की अनुपस्थिति पर बहुत सारे उदाहरण सिलसिलेवार पेस किये जा सकते हैं। उसकी जरुरत फिलहाल नहीं है।

    हम जिसे नागरिक समाज मानते हैं, उसमें, इलिट अभिजन उस आयोजन में हाशिये के लोग,बहिस्कृत समुदायों के लोग और क्रयशक्ति हीन आम शहरी लोग कहीं नही हैं।

    वे दरअसल जनान्दोलन हैं ही नहीं, वैश्विक आर्थिक सस्थानों के प्रोजेक्ट मात्र हैं जो नख से सिख तक व्यक्ति केन्द्रित हैं।

    व्यक्ति केन्द्रित राजनीति, व्यक्ति केन्द्रित आन्दोलन और व्यक्ति केन्द्रित विमर्श और एजेण्डा से बहुसंख्य जनता के धर्मोन्माद का मुकाबला नहीं किया जा सकता।

    अगर हम कहीं मुकाबले में हैं, तो हमें सबसे पहले इस जमीनी हकीकत को समझ ही लेना चाहिए,जिसकी वजह से संघ परिवार इतना अपराजेय है और उसे चुनौती देनी वाली कोई ताकत मैदान में है ही नहीं।

    अब तो रामलीला मैदान के फ्लाप शो से साबित हो गया कि संघ परिवार ने अपने एक्शन प्लान बी को समेट लिया है। संघ रिमोटित अन्ना फिर अराजनीतिक मोड में वापस।

    दीदी बंगाल के अपने मजबूत जनाधार पर खड़ी होकर अपना जख्म चाटने के लिये और बंगाल में कांग्रेस और वामदलों पर भूखी शेरनी की तरह झपटने के लिये कोलकाता वापस।

    दो मौकापरस्त लोगों के गठजोड़ की संघ परिवार को जब तक जरूरत थी, उसका गुब्बारा खूब उड़ाया गया और फिर राष्ट्रीय मंच पर गुब्बारा में पिन।

    संघी बर्ह्मास्त्र फिर तूण में वापस अगले वार के लिये। इस युद्ध नीति को समझिये।

    संघ परिवार निजी और अस्मिता एजेण्डे के सारे चमकदार चेहरों और मसीहों को अपने में समाहित करने के लिये कामयाब इसलिये है कि उसको चुनौती देने वाला कोई एजेण्डा है ही नहीं। भारत में वर्ग और जाति के घटाटोप में दरअसल निजी कारोबार ही चलाया जाता रहा है।

    अंबेडकर अपने समूचे लेखन में जाति विमर्श से कोसों दूर रहे हैं। शिड्युल कास्ट फेडरेशन की राजनीति के बावजूद वे डिप्रेस्ड क्लास की बात कर रहे थे और जाति को भी जन्मजात अपरिवर्तनीय वर्ग बता रहे थे।

    इसके बावजूद जाति पहचान के आधार पर अंबेडकर विचारधारा और उनकी विरासत आत्मकेन्द्रित वंशवादी,नस्ली, जाति अस्मिताओं के बहाने सत्ता चाबी बतौर इस्तेमाल हो रही है। अंबेडकर के जाति उन्मूलन एजेण्डे का कहीं कोई चिन्ह नहीं है।

    इसी तरह वाम आन्दोलन भी वर्चस्ववादी विचलन में भटक बिखर गया और कुछ कोनों को छोड़कर सही मायने में उसका कोई राष्ट्रीय वजूद है ही नहीं। न वर्ग चेतना का विस्तार हुआ और न कहीं वर्ग संघर्ष के हालात बने। फिर जाति को वर्ग बताने वाले समाजवादी लोग भी व्यक्ति केन्द्रित पहचान, अस्मिता और सत्ता में भागेदारी में निष्णात।

    चूहे हमने ही पैदा किये हैं तो चूहादौड़ की इस नियति से क्षण प्रतिक्षण बदल रहे राजनीतिक समीकरण को आम जनता के बुनियादी मुद्दों से जोड़ने की हमारी आकाँक्षा भी बेबुनियाद है।

    हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा सीधे बहुसंख्य जनता के धर्मोन्माद के आवाहन के सिद्धांत पर आधारित है जिसे अल्पसंख्यकों की कोई परवाह नहीं है।

    वर्णवर्चस्वी नस्ली इस विचारधारा की खूबी यह है कि वह न जाति विमर्श में कैद है और न कोई वर्ग चेतना उसकी अवरोधक है।

    इस संघी समरसता और डायवर्सिटी के मुकाबले हम जाति, धर्म, क्षेत्र, वर्ग, भाषा जैसी हजारों अस्मिताओं में कैद उसके अश्वमेधी घोड़ों को रोकने का ख्वाब ही देख सकते हैं या कागद कारे ही कर सकते हैं और फिलहाल कुछ भी सम्भव नहीं है।

    बैलेंस जीरो है।

    लेकिन शुरुआत कहीं न कहीं से तो करनी ही होगी।

    इस जनादेश को हम बदलने की हालत में नहीं है।

    ममता की दुर्गति से जाहिर है कि तमाम व्यक्ति विकल्पों की रेतीली बाड़ केसरिया सुनामी को रोकने में कामयाब होगी,ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती।

    तो आइये, अभी से तय करे कि इस निरंकुश पुनरुत्थान के खिलाफ हमारा वैकल्पिक एजेण्डा क्या होगा और अस्मिताओं के तिलिस्म और आत्मघाती धर्मोन्माद के शिकार भारतीय जनगण को हम कैसे इस अशनिसंकेत के विरुद्ध मोर्चाबंद करेंगे।

    जाति और वर्ग विमर्श में हमारे लोग एक दूसर के दुश्मन हो गये हैं।

    पूरे देश को एक सूत्र में बांधे बिना तमाम अस्मितओं को तोड़कर देश समाज जोड़े बिना फिलाहाल हिन्दू राष्ट्र के अमोघ एजेण्डा से लड़ने के लिये कोई हथियार हमारे पास है ही नहीं।

    About The Author

    पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।


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    दिल्ली के फ्लाप शो  का दीदी की सेहत पर कोई असर नहीं,बंगाल में जमीन खोकर देश भर हव हवाई बनने का विकल्प दीदी अब शायद ही चुनें।

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



    जिन लोगों को लगता है कि दिल्ली में अन्ना हजारे की गैरहाजिरी में रामलीला मैदान पर हुए फ्लाप शो से दीदी को गहरा धक्का लगा है,वे लोग शायद बहुत गलतफहमी में हैं या फिर दीदी के मिजाज को जानते ही नहीं है। दीदी अपने भाषण और संवाददाता सम्मेलन में अन्ना के खिलाफ टिप्पणी करने से बचे हैं। लेकिन इसमें कोई शक नही है कि इस गुड़ गोबर खेल में अन्ना से दीदी का भरोसा उठ गया है।जब दिल्ली में ही अन्ना के नाम पर भीड़ नहीं जुटी तो बाकी देश में अन्ना के भरोसे दीदी फिर कोई बड़ादांव खेलने की गलती शायद दोबारा करें। प्रणव मुखर्जी के खिलाफ पूर्व राष्ट्रपति कलाम को मैदान में उतारने के लिए मुलायम सिंह यादव के साथ साझा सम्मेलन का मामला सामने है।उस दुर्घटना के बाद दीदी का मुलायम से कोई संवाद नहीं है।


    खासकर बंगाल में दीदी के वोट बैंक पर दिल्ली फ्लाप शो का किसी असर की आशंका फिलहाल  नहीं है।बल्कि अन्ना के साथ दीदी के राष्ट्रव्यापी अभियान का असर उनके अल्पसंख्यक वोट बैंक पर होना था,क्योंकि मुस्लिम नेता इसे भाजपा का खेल समझ रहे हैं। जिस तरह दीदी की रैली में न आने के लिए तबीयत खराब का बहाना बनाया अन्ना ने और पूर्व सेनाध्यक्ष भाजपाई जनरल वीके सिंह से मंत्रणा की,कांग्रेसियों से भी उनकी बात हुई,दीदी का उनपर भरोसा उठ गया है।इसके साथ ही चुनाव परवर्ती परिस्थितियों में भाजपा के साथ दीदी के मधुर संबंधों की संभावना भी खारिज हो गयी है। बताया जाता है कि अन्ना के नजदीदी जिस पत्रकार पर रैली में भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी थी,उनको भुगतान मोदी कैंप से हुआ और आखिरी मौके पर उन्होंने दीदी को लंगड़ी मार दी। दीदी को जानने वाले बखूब समझ सकते हैं कि इस अपमान को हजम करने वाली वे कतई नहीं हैं।


    गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के साथ भाजपा का गठबंधन और दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुर द्वार में तृणमूल उम्मीदवारों के मुकाबले विमल गुरुंग का भाजपा को समर्थन दीदी के सरदर्द का सबब बन सकता है।इसके अलावा पूरे बंगाल में दीदी को घेरने की जो भाजपाई कोशिश है,उससे दीदी को पलटवार करने की जरुरत महसूस हो सकती है।इसके मद्देनजर दीदी पहले तो पहाड़ से निर्वासित नेता सुबास घीसिंग को पुनर्जीवित करने के बारे में सोच सकती हैं और ज्यादा आक्रामक हुईं तो बाकी देश में भाजपा का खेल खराब करने के लिए अप्रत्याशित और हैरतअंगेज कदम उठा सकती हैं।वामपंथियों से चूकि दीदी की मुख्य लड़ाई है तो तीसरे मोर्चे के खिलाफ मैदान तो वह नहीं छोड़ेंगी।अन्ना हजारे की अनुपस्थिति के बावजूद बाकी देश में तीस उम्मीदवारों की सूची जारी करके दीदी ने अपना इरादा बता दिया है।दिल्ली में एक ही सीट पर फिलहाल बीते दिनों केफिल्मस्टार विश्वजीत के नाम की घोषणा हुई है जो दिल्ली के फ्लाप शो के अकेले स्टार थे।


    लेकिन वक्त का तकाजा यही है कि दीदी का ध्यान अब बंगाल की रणभूनि पर केंद्रित रहेगा,जहां कांग्रेस,वामदलों के अलावा मुकाबले में भाजपा भी पहले से काफी मजबूत है।लेकिन चहुमुंखी चुनाव होने के बावजूद बंगाल में जो लगभगचार दशकों की जो परंपरा है,उसके मुताबिक ध्रूवीकरण फिर हुआ तो दीदी की सीटें बढ़ेंगी,घटेंगी नहीं।


    दिल्ली में केडी सिंह और संतोष भारतीय पर भरोसा करना दीदी के लिए भारी पड़ा।दीदी फिर जब चाहे तब दिल्ली के रामलीला मैदान में ही अपने दम पर बड़ी रैली करके आलोचकों को जवाब दे सकती हैं। लेकिन अरविंद केंजरीवाल की आम आदमी पार्टी बन जाने के बाद केडी सिंह और किरण बेदी के भाजपा में चले जाने के बाद निस्संग अन्ना के नाम पर देश में कहीं भी चुनाव लड़ना संभव नहीं है,दीदी को यह सबक मिल गया है।


    कायदे से देखा जाये तो दीदी का मजबूत जनाधार बंगाल में है।दो चार सीटों के अलावा बाहरी राज्यों में किसी बड़े करिश्मे की उम्मीद दीदी को नहीं होगी।दिल्ली का हादसा नहीं होता तो शायद भाजपा को दीदी के देस व्यापी अभियान के मौके का लाभ उठाने का अवसर मिल जाता। फायदा चूंकि सिर्फ भाजपा को ही होना है,वामदलों और कांग्रेस को नहीं,इसलिए नये सिरे से दीदी की रणनीति बन गयी है। उनके समर्थकों का मनोबल पस्त नहीं हुआ है और पार्टी पर उनका पूरा नियंत्रण है। तो भाजपाई चुनौती को अब शायद वे बेहतर ढंग से निपटेंगी।


    बाकी उनकी सेहत पर कोई असर होने नहीं जा रहा है।बंगाल में जमीन खोकर देश भर हव हवाई बनने का विकल्प दीदी अब शायद ही चुनें।



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    Santhal Revolt is defined an Insurrection! Insurgency is synonymous to Insurrection. If Santhal revolt is an act of Insurrection, what do you mean by Insurgency in Modern India?

    Palash Biswas

    (Wrote in April 2007)


    Warren Hastings failed to quell the Chuar uprisings. The district administrator to Bankura wrote in his diary in 1787 that the Chuar revolt was so widespread and fierce that temporarily, the Company's rule had vanished from the district of Bankura. Finally in 1799 the Governor General, Wellesley crushed these uprisings by a pincer attack. An area near Salboni in Midnapore district, in whose mango grove many rebels were hung from trees by the British, is still known by local villagers as "the heath of the hanging upland", Phansi Dangar Math. Some years later under the leadership of Jagabandhu the paymaster or Bakshi (of the infantry of the Puri Raja), there was the well-known widespread Paik or retainer uprising in Orissa. In 1793 the Governor General Cornwallis initiated in the entire Presidency of Bengal a new form of Permanent Settlement of revenue to loyal landlords. This led to misfortunes for the toiling peasantry: in time they would protest against this as well.

    First Chuar Rebellion (1767.)


    http://books.google.co.in/books?id=75-a8FSPmvQC&pg=PA6&lpg=PA6&dq=First+Chuar+Rebellion+(1767.)&source=bl&ots=rEFYEp4Gz5&sig=ALlEcA2uUT823OsrvqBqAgohVng&hl=en&sa=X&ei=QwQiU6bqJ4aYrgfG8IDIDg&ved=0CCgQ6AEwAA#v=onepage&q=First%20Chuar%20Rebellion%20(1767.)&f=false


    Chuar rebellion


    Chuar rebellion[edit]

    Towards the end of the 18th century certain portions of the district around Raipur was affected by the Chuar rebellion. The leader of the rebels was Durjan Singh, a former zamindar of Raipur. He had a following of about 1,500 men and created havoc in certain areas. The police force was simply not in a position to control the situation. At the time Bankura appears to have been part of Jungle Mahals. While the Chuars continued to be a menace, Bankura played an important role in the commercial department of East India Company.Sonamukhi had a head factory with 31 subordinate ones, including one at Patrasayar, as well as at Surul and Ilambazar in Birbhum. The disturbances of the Chuars in 1832 in the western part of the district lead to the disbandment of the Jungle Mahals in 1833. While Bishnupur was transferred to Burdwan, most of the district formed a part of Manbhum and what was known as North-west Frontier Agency. In 1872, the parganas of Sonamukhi, Indas, Kotulpur, Shergarh and Senpahari were transferred to Burdwan.[10]

    Wiki pages on Midnapur and Bankura mentioned only.

    INSURRECTION:The act or an instance of open revolt against civil authority or a constituted government.

    Santhal Revolt is defined an Insurrection! Insurgency is synonymous to Insurrection. If Santhal revolt is an act of Insurrection, what do you mean by Insurgency in Modern India?

    All nationality movements in India have been always defined as Insurgency.

    In accordance with this definition the Resistance of peasants in Nandigram may well be defined as Insurrection!

    In West Bengal, Dalit movement is represented by two types of people. First who are aligned with the Red Horses of Post Modern Globalisation and do act as they are directed by their Marxist  Bosses.These people stand by Buddhadev in this troubled time. they do not hesitate to do anything to sustain political supremacy of the Marxists. All so called people`s representatives fall in this line! Any criticism of the system is defined as insurgency and any one may be declared Maoist in West Bengal today, whoever has the guts to protest annihilation of Rural India! These Dalit Intelligentsia is worried for Buddhadev, his industrialisation and urbanisation, and Left stakes in Bengal. They have to do nothing for the Dalit Mass but they always lead the Dalit Movement justifying Marxist action in Marichjhapi and Nandigtram! They restrict the general Dalit masses against any mobilisation, political, social, cultural or philosophical. All Dalit voices are defined as Insurrection as Santhal Revolt and all agrarian uprising in India since East India Company raj has been defined! These people say so many things against imperialism and feudalism. Though in action, they do invest everything to enhance the Hindu Zionist system worldwide. They always quote from Ambedkar and dalit Icons, fund ceremonies, mobilise pocket organs and organisations, forums sponsored by the government. Since the educated dalits in West Bengal always tend to be creamy layer In Laws, they back these people in full strength! Despite reservation and quota, no Dalit or Backward may get a job without the Green signal from the party. Minorities fail to get that chance too, despite the much hyped Sachchar committee report!

    Secondly, some Dalit leaders are most agitated whenever you speak against Brahminical system. They claim to be Ambedkarites and followers of Jogendra Nath Mandal, but try their best to defend Brahminical system. They are dalits but spread hatred campaign against other dalits, Non Bengalies, backward OBCs and minorities , specilly Muslims! They don`t see anything wrong in our so called national leaders and despise anything pronounced against Brahmans . They are very religious and are over worried of Persecution of Hindus in Bangladesh by Muslims, They want retaliation. But, since Sangh Parivar is not a reconing force in Bengal, they join the RED. They are over committed Marxist and sometimes also pose as naxalites.

    When we speak against the betrayals of Indian communists and the Brahman zamindar communist leadership, they try their best to isolate us terming as insurgency mongers. When we speak against Hindu Zionist Red saffron gang, they scream that Dalit Movement is undermined!

    Both type of Dalit leadership is, in fact, afraid of losing status, position and job. They starve for recognition and publicity and take away whatsoever credit for Dalit movement. They never allow to happen it and always hijack the Dalit movement. They always say, Brahmans are better than the dalit idiots. A typical Namoshudra psyche is this. They are dalits for thousands of years but they want to be an integral part of the Brahminical system. Any genuine dalit activity is synonym Insurrection for these people! They are afraid that for Dalit uprising, they would be the first to be evicted and thrown into dustbin.

    Because Bangal has been the Base of Indian Dalit Movement and it is dead now. I won`t describe Nandigram Uprising and resultant Dalit mobilisation a Resurrection as Sangh uses the term for Hindu rashtra!

    In the line of santhal Insurrection the latest trend of third party dalit movement may be well described as dalit Insurrection.

    Today I got an opportunity to witness A dalit Poetry Festival against Genocide of Dalits in Nandigram. More than fifty people were present there in Tripura Hitsadhani Sabha hall who dared to challenge the Brahminical system. Dalit sahity sanstha president Gundhar Burman, Novelist and Nikhil Bahart Editor Kapil Krishna Thakur, Jankantha editor Nakul Mallick, the writer of Bangla dalit sahityer itihas were the dignitaries. Burman released the latest issue of Chaturth Dunia edited by Amar Biswas. Two critics Dr sanat Naskar from calcutta University and Dr Sukhranjan Midde fro Rabindra Bharati  analysed every poem recited from the Dias. Naskar read his beautiful poem written in santahali dialect. Charan Poet octogenarian warrior Anil Mallick set the tone. Other poets were Shyamal Pramanik, Shashibhushan Poddar, Sukanto Mandal, Bimalendu Haldar, Manjubala, Jatin Bala, Gopal Heera, Amarendra Haldar, Uttam sarkar, Ranendra Nath Poddar, Malay Biswas whom I could hear! Manju Bala is the editor of dalit mag Adal badal which published latest issue on Nandigram!

    On this occassion, Saturday evening in Kolkat witnessed a drama enacted by Shantikunj Naatuke Dal titled Krishi jameer ladai ( Fight for agro Land)! Raju Das is the writer and director of the drama. Actors: Raju Das, Namita Das, Deepa mallick, Ranen Poddaran Pran Gobinda Biswas!




    Tribal and Agrarian movement for land rights in context to united Bengal, Bihar, Orissa

    *http://ashim22.tripod.com/id19.html

            Social movements are generally conceived as the manifestation of collective behavior.

            The study of this historicity of the social movements is extremely important in order to have an insight into the present structural arrangements of it as well as its future orientations.

            “the tribal communities who with a sensitivity born of isolation and with a relatively intact mechanism of social control revolted more often and far more violently than any other community including peasants of India.’’

            British colonialism made a very excellent use of this situation and added some more dimensions in it. Through the enactment of the Permanent Settlement Regulations Act in 1793 it introduced the concept of private property in land which was unknown in Indian history. As a result of this most of the erstwhile adivasi rajas or chieftains were converted into zamindars or landlords and the common peasants were transformed into serfs or rayats. Instead of payment of nominal subscription to the Mughal emperors, British rule made the payment of land revenue a compulsion. The responsibility of revenue collection was vested with the zamindars. The burden of this proved to be enormous for the peasants and a large number of them were forced to sell their lands, only to become landless labourers. The moneylenders, liquor vendors and other people from outside the region exploited this situation Hence a new class of absentee landlords was also created.

            The land question here requires some more attention. The adivasis of this region conceived of themselves as natural owners of the land, which they have reclaimed by extensive labour. Moreover, land and the forest were not merely viewed as means of production in their custom. They were rather, culturally and religiously, associated with the land and forest. So, they could hardly tolerate their alienation from the land and the forest as created by the British agrarian policies.

    Phase of Agrarian Movement (1765 -1845)

            "True agrarian movements have arisen whenever urban interests have encroached, in fact, or in seeming, upon vital rural interests."

            Hence agrarian movements take place whenever urban penetration occurs in the rural areas. It may be through the influence of urban values, (as for example, interdependence, individualism etc.) or through the acquisition of better lands in the rural area, imposition of land revenue, land tax and so on.

    The major peasant uprisings of this phase are as following:

            1. First Chuar Rebellion (1767.)

            2. Dhalbhum Rebellion (1769 -1774)

            3. Tilka Majhi's War (1780--1785)

            4. Pahadia Revolt (1788 -1791)

            5. First Tamar Rebellion (1795)

            6. Second Chuar Rebellion (1798-1799)

            7. Nayek Hangama (1806 -1826)

            8. Second Tamar Rebellion (1820)

            9. Kol Insurrection (1831 -1832)

            10. Ganga Narayan's Movement (1832 -1833)

            British encroachment into the Jharkhand region started in the year 1765 after receiving the 'Dewani' of Bengal, Bihar and Orissa.At its initial stage colonial administrators were basically interested in collecting land revenues from this region which was quite inaccessible due to its heavy hilly and forest covers.Apart from this the British administrators had to face another difficulty and that was concerning the attitude of the indigenous communities who refused to pay land revenues, as this was not be fitting to their customs.Hence payment of land revenue and that too in a compulsory manner was the basic reason behind the uprisings of this phase, especially those prior to 1793, the year in which the Permanent Settlement Regulation Act was enacted.

            The Permanent Settlement Act of 1793 brought certain administrative changes, which much more directly undermined the customs of the adivasi communities of this region.Firstly, the payment of land revenue by the cultivators to their chiefs were customarily guided but the Permanent Settlement Act

            Secondly, the law and order of this region was maintained by the 'ghatwals' or the pykes under the command of the local chiefs who were well informed of the customs and local cultures of the people.These pykes enjoyed gifts of lands from their chiefs for the service rendered by them.

            Thirdly, due to strict revenue assessment most of the local chiefs were found in huge arrears and their estates were auctioned to meet the revenue balances.The indigenous communities had a traditional organic relationship with their chiefs and could not bear the system that eventually led to their extinction. Finally, and most importantly, the estates of the local chiefs in arrears were auctioned, and in most of the cases, these were purchased by the outsiders, mostly non-adivasi zamindars.

    • Hence, the Permanent Settlement Act of 1793 marginalised the peasantry economically and also drove them towards a state of cultural alienation.The traditional economic and political organisations of the indigenous people centering on the autonomous village community were undermined.

    • The second Chuar Rebellion of 1798-1799, later on the Kol Insurrection of 1831-1832 and the Ganga Narayan's uprising of 1832-1833most prominently showed this trend. In all these the adivasi communities especially the Bhumijs of the Jungle Mahal and adjacent areas of the Chotanagpur plateau region participated in large numbers.

    Phase of Consolidation (1845-1920)

    These outsiders were mostly the zamindars, moneylenders, etc. created by the British rule, and they used to exploit the peasantry severally.

    The major uprisings of the second phase are as under:

    1. The Santhal Insurrection (1855)

    2. The Sipoy Mutiny (1857)

    3. Sardari Agitation or Mulkui Larai (1858-1895)

    4. Kherwar Movement (1874)

    5. The Birsa Munda Movement (1895-1900)

    6. Tana Bhagat Movement (1914-1919)

    This was most prominent in the Santhal Insurrection, Kherwar Movement and Birsa Munda Movement. The first two, being predominantly participated by the Santhals tried to establish the Santhal Raj while the Birsa Munda Movement went for the Munda Raj under the leadership of Birsa Munda.

    Agrarian movement in Modern India

    Understanding Peasant movement

            Peasant movements were almost unknown to the academy, and agrarian structures were expressed solely in the reigning idiom of British policy or economic history.

            Rajendra Prasad, Jawaharlal Nehru, Mahadev Desai and tens of other nationalist leaders had written accounts directed at the iniquities of the Indian agrarian social order but mainly directed at the fact of British rule.

            Peasant movements and nationalist politics pressured policy making towards, first, modifying and then ending the era of landlordism in colonial India. Agrarian power at Indian Independence stood redefined.

            The questions that became dated pertained to the role that peasants played in the transformation of the social order.

            British policy in India increasingly became one of support for landlords through whom the officialdom of empire sought to protect their dominions.

            Every now and then there was a deviation from this policy to accommodate the pressure generated by an unequal agrarian society which, under the impact of the market, produced peasant movements

            Between 1930 and 1935 when prices of agricultural produce did indeed fall, there was a rise in prices over this entire period.

            Greatest impact which such a rise in prices produced was manifest in a developing struggle between landlord and peasant for control over the increased value of agricultural surplus. The landlord raised rents. Tenants protested.

    Many of those peasants who won tenancy and property rights against the landlords themselves became rent-receivers. They rented out the land rented in (or acquired after a struggle) from superior proprietors. Many others became rich cultivators

    The Blue Mutiny, 1859-1862

            Poor peasants and small landlords opposed indigo planters in Bengal. In this they were helped by moneylenders whose own credit resources stood threatened by the structure of the monopolistic rights of the planters.

    The Pabna and Boora Uprisings, 1872-1875

            Rich cultivators, benefiting from the commercialization of agriculture and producing cash crops, protested to secure further their occupancy rights granted nominally in 1859. In this they succeeded by 1885 when the Bengal Tenancy Act was passed. Later, by the middle twentieth century, such tenants were transformed into rent-receivers.

    The Mappilla Rebellions, 1836-1921

            Poor peasants in Malabar (Kerala) protested for security of tenure. This was granted in 1887 and 1929. But only a rich tenantry benefited from these movements. This tenantry itself acquired afresh and consolidated further its rights as rent-receivers vis-à-vis.

    The Deccan Riots, 1875

            Up against a heavy land revenue demand of the state, 1840-1870,cultivators lost their lands to moneylenders from the towns.

            The state intervened to legislate in favor of the 'agriculturists' in 1879. The state's pro-landlord stance therefore could also become pro-peasant as long as the framework within which it realized its land revenue did not alter to its disadvantage.

    Punjab Agrarian Riots, 1907

            The state intervened to prevent alienation of land from peasants to moneylenders in 1900 but urban middle classes protested, in nationalist idiom, against government intervention. Riots broke out against moneylenders. The government appeared pro-peasant, as the peasants rioted against 'agriculturalist' moneylenders, who were landlords. Landlords we might recall were over the long term supported by British rule.

    Peasant Movements in Oudh. 1918 - 1922

    The peasants of eastern Uttar Pradesh defied large landlords through a tenants movement for security of tenure. Oppressive traditions of forced labour were attacked through fierce agrarian riots. Small landlords and the rural poor supported and led the movement. Statutory rights of occupancy were secured in 1921.The movement marked a phase of retreat for landlordism.

    Peasant Protest against Indigo Cultivation in North Bihar, 1860-1920 and Champaran. 1907-1909 and 1917-1918

            Moneylenders and rich peasants voiced grievances of indebted small peasantry and agricultural labourers. Planters of indigo were put to rout by the rural hierarchy was left undisturbed. The movement signified the emergence of the peasant as a symbol in a nationalist ideology.

    Agrarian Unrest in Uttar Pradesh, 1930-1932

            When prices slumped, peasants could not pay rents to landlords nor landlords revenue to the state. The Indian National Congress launched a no-rent no-revenue campaign of middle and rich peasants, supported by the rural poor, and small property holders. The movement marked a simultaneous retreat for landlordism and an attrition of the political domination of the colonial state.

    Peasant Agitations in Kheda, 1917-1934 and Bardoli, 1928

            In Bardoli a proletariat in traditional agrestic servitude protested against an increased land revenue valuation alongside a dominant and in relation to the 'serfs' exploitative peasant community. The 'serfs' were partly convinced of the validity of nationalist ideology as represented to them and were in part coerced into joining the movement.

    Peasant Struggles in Bihar, 1933-1942

            When prices fell in 1930, the rents to which tenants had agreed in a period of rising prices (1900-1920) became too heavy to bear. Peasants were evicted by landlords as the latter attempted to increase their power and control. The tenants movement that developed sought to regain control over the lands from which the peasants had been evicted.

    Share-croppers Agitation in Bengal, 1938-1950

            The share-croppers were mostly poor peasants with very small holdings who fought landlords for security from eviction and aright to at least two-thirds of the produce.

            In legislation in 1950 and in 1978-1979 these rights were recognized and pushed through despite landlord opposition by various governments in Independent India.

    The Telengana Rebellion, Hyderabad, 1946-1951

            A movement involving sustained armed struggle of rich peasants and the rural poor. The peasantry sought to destroy the political

            power of large landlords while the agricultural labourers fought against forced labour.

    Tebhaga Movement in 1946- North Bengal

            Proletariat militant struggle in North Bengal. The stir shaped his vision of a revolutionary struggle.

            The Naxalbari uprising of March 1967.The armed peasants' struggle began in Naxalbadi in West Bengal on March 2, 1967 when a tribal youth named Wimal Kesan, who had a judicial order, went to plough his land. Local landlords attacked him through their goons. This sparked wide-scale violence by tribal who started capturing back their lands and then starts Naxalite movement.

    *


    People's Democracy

    (Weekly Organ of the Communist Party of India (Marxist)


    Vol. XXXI

    No. 09

    March 04, 2007

    THE 1857 REBELLION: A PRE-HISTORY

    Centres of early revolts

    Archana Prasad

    THE 1857 rebellion was preceded by a wave of agrarian uprising in the late eighteenth and first half of the nineteenth centuries. The thrust of these uprisings was to contest the nature of changes that were being brought about by the East India Company which was leading the colonial campaign in several parts of the country. The Company’s administration tried to re-order an existing feudal order in the first century of colonial rule in order to ensure the political and economic stability of the Empire. This process led to a severe discontent amongst the traditional landholders and the peasantry comprising of cultivators and tenant farmers; as well as other groups like pastoralists, tribals and landless labourers who were intrinsically depended on agriculture and its allied sectors for their survival.

    Broadly speaking, there were at least three or four distinct processes that led to the agrarian uprisings between 1757 and 1857. The most important one was the land settlement process which structured all British policies through out this period. The conquest of Bengal led to the permanent settlement, while ryotwari tenures were regularised in Madras, mahalwari tenures in the North and malguzari tenures introduced in several parts of Central India. These land tenures were also accompanied by basic reforms in the process of collection of revenue where the fixing of rents was done by Company officials and not the traditional mirasidars, poligars, zamindars or taluqdars. The British promulgated rules where the lands of revenue defaulters could be auctioned to a new class of land holders especially in the permanent settlement areas. This meant that traditional landholders were converted from people who could govern and administer their own estates to mere revenue collectors and farmers. This created a disgruntled class of displaced zamindars who provided leadership to many protests of the period either themselves or through their militia. Perhaps the most representative rebellion of traditional chiefs and revenue collectors who lost their powers because of colonial measures was the rebellion of the poligars of North Arcot (1803-05). The revolt of the Paiks in Orissa under Jagbandhu, the commander of the Raja of Khurda, in 1817; the rising of the Gujars under Bijai Singh talukdar (1824) in Kumaun and Garhwal and the revolt of the Gumsur zamindars in Ganjam district of Orissa (1835-37) reflected the general dispossession amongst the traditional feudal elite of the period.

    PEASANT REVOLT

    Sanyasi Rebels

    Though the traditional elites may have lost their power and privileges because of early colonial penetration, these measures had a far more devastating impact on the peasantry. The peasants were forced to pay higher and higher taxes without any remission because of direct colonial control over fixation of revenue. In fact those landholders who complied with and became agents of the colonial regime were forced to enforce a strict time line in the collection of revenue. In addition they also extracted additional labour and revenue for their own profit, thus subjecting the peasants to double exploitation. Further the peasants were unable to invoke their customary feudal relationships with the landholders to default payments. This accentuated the contradictions between the peasantry and the landholders including the traditional rulers granted tenures by the British. At another level, the increasing indebtedness of the peasantry and its exploitation by a new class of landholders and moneylenders was clearly reflected in the agrarian uprisings. The Sannyasi rebellions (1763-1800) in East Bengal, the Kol revolts (1831-32) in Chhottanagpur, and the Santhal insurrection (1855-56) were conducted against the exploitation of the landlords and the mahajans. Similarly the Mappilla revolts in early nineteenth century Malabar were against the zamindars. Many of these revolts followed the strategy of raiding the properties of zamindars and mahajans and extracting taxes from them. In this sense these classes were firmly identified by these people and institutions as implementers of oppressive colonial policies. This anti-colonial tendency of the peasant movements was evident most clearly in the Khasi resistance in Sylhet (1829-31), resistance by Lallaji Patel, a village headman, in the Satmahals (Malwa, 1831) and the Khond insurrection (1846) in Ganjam.

    While the settlement of property rights provided the basic context of the pre-1857 revolts, the commercialisation of agriculture through the introduction of cash crops and the establishment of European plantations for this purpose was seen in the case of the indigo growing areas. The cultivation of indigo was determined by the needs of the English cloth markets as well as those of remittance trade. The Indigo Commission also highlighted the importance of trade to the tune of two million pounds sterling a year and political importance of having a large body of European planters. Thus for 22 years (1780-1802) the Company directly promoted indigo factories and placed India amongst the foremost indigo producing nations of the world. Though the plantation of indigo was a private enterprise the East India Company not only encouraged the planters in various ways but also gave them legal and administrative protection against the peasants who worked on their plantations who were forced to grow indigo in place of food crops. Several economic and non-economic oppressive practices including torture were routinely practiced by the planters many of whom colluded with the zamindars to maintain their dominance and deal with their problems in administering those areas. The discontent of the raiyats was because of three reasons: lack of remunerative prices for indigo – indigo was not lucrative as it was planted at the same time as food crops – and loss of fertility of the soil because of indigo.

    INDIGO REVOLT

    Titu Mir

    It is significant that many uprisings of the late eighteenth and early nineteenth century opposed the planter raj by either refusing to grow indigo in the lands where they were originally growing food, and also by refusing to pay their taxes. The first phase of revolts in Eastern India started in the early part of the nineteenth century under Biswanath Sardar who looted the Neelkunthis (or the estates of Indigo planters). Two decades later the first signs of trouble again emerged when the cultivators of Saran, Tirhut, Munger, Bhagalpur and Purnia refused to plant indigo. In Madhubani subdivision they formed a body and refused to plant indigo. Another major revolt against the indigo planters and their zamindars was that led by the Wahabi peasant leader Titu Mir in 24 Parganas of Bengal (1831) who provided leadership to both Muslim and Hindu lower caste peasantry.

    The third instrument of colonial oppression over the peasantry was monopoly merchant capital through a series of unfair measures that were in evidence throughout the country. The East India Company appointed its agents for indigo and opium trade and passed regulations that made indigenous trade illegal. In other areas like Khurda they put a tax on the production of salt and ensured that salt could only brought from agents who had been given leases by the Company. Thus ordinary peasants were forced to buy salt from the agents at exorbitant rates. In Chhittagong the British started the method of revenue collection from cotton and gave over the collection rights to speculators through the establishment of karpas mahals. This affected the Chakmas (who were essentially shifting cultivators) adversely as they cultivated cotton on their sterile lands and exchanged it for rice, salt and other necessities. They reacted under the leadership of Janbox Khan in 1782 and gathered the people to stop payment of cotton. They also destroyed the storehouses of the lease holders who protected their stocks with the help of the British. A similar pattern was also seen in the case of the Kurda revolts where peasants made salt in violation of the Company’s orders and attacked and looted the stores of the salt agents. This clearly showed that it was not only the land tenure and tax policies but also the trading practices in commodities of daily use that had impacted the peasantry and spurred it into rebellion.

    MISCONCEIVED NOTIONS

    Velu Thambi, Diwan of Travencore

    Scholars from the 1960s onwards have classified these movements as restorative (Katheleen Gough, ‘Indian Peasant Uprisings’, Economic and Political Weekly 1974) and messianic movements which used religious symbols and relying on revivalist, nativist and syncretic leadership (Stephen Fuchs, in his book Rebellious Prophets, Asia Publishing House, 1965). Thus Titu Mir’s movement, the Sannyassi and the Mappilah rebellion, amongst others, are seen as movements that have communal overtones and religious base. This characterisation however comes out of the lack of understanding of the nature of agrarian discontent and the political philosophy that guided these movements.

    The first point to remember is that these agrarian uprisings from the mid eighteenth century till the 1857 rebellion spanned the entire length and breadth of the country and often followed the trajectory of colonial expansion. Their existence also showed that the penetration of colonialism was a contested process and the colonists met resistance wherever they tried to establish their authority. Six major uprisings were identified in Bengal, five in Bihar, three in Assam and fifteen in Central and South India. This meant that the pre-colonial society of the time was providing an important challenge to colonial annexation which was bringing about a realignment of classes through its interventions. And this realignment of forces only sometimes and not always articulated a restorative agenda. In other words, though anti-colonialism was a more general characteristic of these movements, the restorative agenda depended more on the local co-relation of forces in these movements.

    At a second level however, many of these movements can also be seen as ones that had incipient anti-feudal characteristics which also used religion for political mobilisation and articulation of their goals. For example sannyasis and fakirs rebellions of the late eighteenth century were led by settler sanyasis from the Giri and fakirs from the Madari sects who had settled in Mymensigh as peasants. Many of them had turned to agriculture and were regular peasants who were a victim of British merchants. Similarly Titu Mir’s Wahabi protests found a mass base in lower caste Hindu and Muslim peasantry because of its agrarian programme. In both cases the leaders of the movements belonged to religious traditions that were outside the pale of organised mainstream religion that formed the basis of most feudal authority. Similarly K N Pannikar (‘Peasant Revolts in the Malabar’, in A R Desai eds., Peasant Struggles in India) has effectively shown how the class conflict between the Muslim peasantry and Hindu landlords structured the contours of the nineteenth century protests where religion gave them both moral strength and a potent language to articulate their demands.

    Thus, more than anything else, the use of religion as also the restorative agenda of some of these movements revealed the inability of the peasantry to articulate their own politics especially where the peasants were led by the traditional elites. In other cases it reflected the ‘tunnelled’ vision of the peasant leadership and the lack of a vocabulary to articulate the agrarian agenda in the first century of colonialism. In this sense the agrarian uprisings preceding the 1857 rebellion were both structured and limited by the imposition of colonial measures on a feudal system. This ensured that they remained pre-modern in character and consciousness.

    Centres Of Resistance (1763-1856)


    1. Sanyasi,* 1763-1800, Dhaka, 1763, Rajshahi, 1763, 1764, Cooch Bihar, 1766, Patna, 1767, Jalpaiguri, Rangpur, etc., 1766-69, 1771, 1776, Purnea, 1770-71

    Mymensingh, 1773

    37. Gujars,* Kunja (near Roorki), 1824


    38.Sindgi (near Bijapur), 1824

    2. Midnapur, 1766-67

    39. Bhiwani, Rewari, Hissar, Rohtak, 1824-26

    3.Rajas of Dhalbhum, 1766-77

    40. Kalpi, 1824

    4. Peasants under Shamsher, Ghazi’s Leadership, Roshanabad, (Tripura), 1767-68

    41. Kittur, Belgaum District., 1824-1829


    42. Kolis,* Thanna District., 1828-30

    5. Sandip, island south of Noakhali, 1769-70

    43. Ramosis,* Poona, 1826-29

    6. Moamarias, Jorhat and Rangpur, 1769-99

    44. Garos,* also called Pagal Panthis’ revolt, Sherpur, Mymensingh District., 1825-27, 1832-34

    7. Ckakmas,* Chittagong, 1776-89

    45.Gadadhar Singh, Assam, 1828-30

    8. Gorakhpur, Basti and Bahraich, 1781

    46.Kumar Rupchand, Assam, 1830

    9.Peasants, Rangpur, 1783

    47. Khasis,* under Tirot Singh, 1829-33

    10. Birbhum and Bishnupur, 1788-89

    48. Singhphos,* Assam-Burma border, 1830-31, 1843

    11. Chuar* Peasants, Midnapur, 1799

    49. Akas,* Assam, 1829, 1835-42

    12. Peasants, Bakarganj District., 1792

    50. Wahabis,* Bihar, Bengal, N. W. F. P., Punjab, etc., 1830-61

    13.Vizianagaram 1794

    51.Titu Mir, 24-Parganas, 1831

    14. Bednur, 1799-1800

    52.Peasants, Mysore, 1830-31

    15.Kerala Varma Raja, Kottayam, 1797, 1800-05

    53. Vishakhapatnam, 1830-33

    16. Sylhet, 1787-99, Radharam, 1787, Khasis,* 1788

    Agha Muhammas Reza, 1799

    54. Bhumji,* Manbhum, 1832


    55. Coorg, 1833-34

    17.Vazir Ali, Awadh, 1799

    56. Gonds,* Sambalpur, 1833

    18.Ganjam and Gumsur, 1800, 1835-37

    57. Naikda,* Rewa Kantha, 1838

    19. Palamau, 1800-02

    58. Farazis,* Faridpur, 1838-47

    20. Poligars,* Tinnevelly, Ramnathapuram, Sivaganga, Sivagiri, Madurai, North Arcot, etc., 1795-1805

    59. Khamtas,* Sadiyas, Asdsam, 1839


    60.Surendra Sai, Sambalpur, 1839-62

    21.Vellore Mutiny, 1806

    61. Badami, 1840

    22. Bhiwani, 1809

    62. Bundelas,* Sagar, 1842

    23. Naiks* of Bhograi, Midnapur District., 1810-09

    63.Salt riots, Surat, 1844

    24.Travancore under Velu Thambi, 1808-09

    64. Gadkari,* Kolhapur, 1844

    25.Chiefs of Bundekhand, 1808-12.

    65. Savantavadi, North Konkan Coast, 1844-47

    26.Abdul Rahman, Surat, 1810

    66.Narshimhs Reddy, Kurnool, 1846-47

    27.Hartal and agitation in Benares, 1810-11

    67. Khonds,* Orissa, 1848

    28. Parlakimedi, western border of Ganjam District., 1813-34

    68. Nagpur, 1848

    29.Cutch, 1815-32

    69. Garos,* Garo Hills, 1848-66

    30. Rohillas,* Bareilly, Pilibhit, Shahjahanpur, Rampur, 1816

    70. Abors,* North-eastern India, 1848-1900


    71. Lushais,* Lushai Hills, 1849-92

    31. Hathras,* 1817

    72. Nagas,* Naga Hills, 1849-78

    32. Paiks,* Cuttack, Khurda, Pipli, Puri, etc., 1817-18

    73. Umarzais,* Bannu, 1850-52

    33. Bhils, Khandesh, Dhar, Malwa, 1817-31, 1846, 1852

    74.Survey riots, Khandesh, 1852

    34. Kols,* Singhbhum, Chota Nagpur, Sambalpur, Ranchi, Hazari Bagh, Palamau, Chaibasa, 1820-37

    75.Saiyads of Hazara, 1852

    35. Mers,* Merwara, 1819-21

    76.Nadir Khan, Rawalpindi, 1853

    36.Platoon of the Bengal Army, Barrackpore, 1824

    77. Santhals,* Rajmahal, Bhagalpur, Birbhum, etc., 1855-56.


    * Indicates a movement, a community, a tribe, or a group of people.


    India's Freedom

    Posted By :Sita Ram and Balwinder Kaur

    India's Struggle for Freedom

    Two centuries of the history of Indian dependence to British rule begins with the treachery, the intrigue and the farce of the battle of Plassey in 1757. The various storms that had passed over India till then, i.e. foreign attacks, internal dissension or other disasters had affected the upper ranks of Indian society. The results of the British conquest of India were far more widespread. England destroyed the basic framework of Indian society, without signs of general revivification:

    The misfortunes imposed on India by the British were far greater than its previous misfortunes. India, ruled by Britain was alienated from its endogenous heritage.

    The people of India, however, did not necessarily accept this in a deferential way. Practically from 1760, Indian resistance struggles began against the exploitation and rule of the East India Company. Who were the people who came forward in these resistance struggles? Discontent first burst out among the poorer and working people - tribals, peasants, remnants of the indigenous troops (those who were really peasants in military livery). In many cases, they were given leadership by segments of the dispossessed, old chieftain, nawabi and land holding class. The Nawab of Bengal, Mir Kasim lighted the torch of resistance. Installed at Murshidabad in 1760, he found peasants, weavers, and merchants of Bengal Subah (state) were discontented by East India Company's servant’s oppression. In letters to the Board's president in Calcutta, Vansittart, he wrote that British officials were taking away commodities by force from the peasants and merchants; that they either did not pay just price, or if they did, paid only fractionally; and that the Company's Indian agents behaved as if they themselves were the landholders, landlords or proprietors. The English did not heed Mir Kasim's protest. In 1763 the Nawab promulgated a firman abolishing all internal trade duties in Bengal Subah so that Indian merchants had the opportunity to compete on equal terms with the British merchants, who had, previously, alone enjoyed exemptions from such duties. The result was war between the British and the Nawab. At Buxar (1764) the troops of Mir Kasim, Shuja-ud-daulah, Nawab-Wazir of Awadh and the fugitive Emperor of Delhi, and Shah Alam II were defeated by the British. The Awadh Nawab and Shah Alam II submitted. But Mir Kasim did not accept defeat. With his family he took refuge in the refractory area of Rohilkhand, now in Uttar Pradesh. As long as he lived, he endeavoured to organize forces against the British in India. So he has been correctly called "a defeated but great fighter in India's freedom struggle"

    In the first century of Company's rule quite a few princes, Nawabs and landholders of the indigenous principalities took up this torch, supported by common people of those areas. The British rulers could frustrate these resistance movements by deceit, treachery, and force; but this cannot diminish the glory of these resistance movements. Just two representatives among the very many brave men and women of this type of leadership are being mentioned here - Tipu, the Sultan of Mysore, and the princess of Kittur, a small principality in Karnataka.

    Haidar Ali and his son Tipu were the main obstacles to the expansion of British Empire in South India. Tipu was trying to modernize the economy of his state and military power and to take help of the French, who, at this time, were enemies of the British. The Governor General Wellesly attacked Tipu's kingdom with a large military force. The British troops occupied the Mysore capital, Seringapatan through a local commander's treachery. Tipu fell on the ramparts, fighting bravely. His anti - British militant heritage was carried on by a son, a grandson and indeed even in the 20th century by his granddaughter's daughter Nurunnesa (Noor Inayet Khan) in the present century.

    Kittur was a small principality near Belgaum in Karnataka. When its prince died without a son, the British rulers endeavoured to incorporate the principality within their empire. The widowed princess Channammaresisted, beginning her struggle in 1825.

    She was imprisoned after unequal battles by the British, and died in custody. But the resistance did not end. The relay of revolt was carried on by Rayanna who came from a peasant household in Sangoli. The cultivators carried on resistance struggle in the countryside, for three years, only after which could the British troops drown this movement in blood, brutally killing Rayanna, the leader of the revolt.

    While some of the indigenous ruling class, who were losing their own power to dominate, were keeping alive resistance to English paramountcy in this way, throughout the country in innumerablescattered localities, the toiling poor were rising up and revolting - people who were cultivators and forest tribal people. Some instances of this may be given.

    From the time of the Bengal famine of 1770-71, the toiling peasantry, both Hindus and Muslims, all over north Bengal revolted against oppressive British rule and their revenue collecting agents. Fakirs andSannyasis gave them leadership. Majnu Shah and Bhabani Pathak were prominent among them. These uprisings continued in North Bengal and parts of Central Bengal for about three decades. Even the Governor General of Bengal, Warren Hastings had to admit in his reminiscences that these rebels numbered more than half a lakh, that more than one English officer lost his life, and several English companies were defeated in endeavoring to quell these insurgencies. It took the British at least a decade of burning villages and slaughtering the people before they could suppress the uprisings. At about the same time, in 1783 and 1784 there was a widespread peasant uprising in Rangpur district of north Bengal, which also was not insignificant. Over the entire rarh tract of West Bengal (in the districts of Bankura and Midnapore) Chuarsrevolted for about 30 years till 1799. This revolt began in Dhalbhum in 1767. Its leader was the local chief's nephew Jagannath Dhal (or Dhavaldeva). Captain Morgan's troops were totally defeated trying to crush the uprising. In a secret letter to Governor Verelst in Calcutta, he wrote that practically the whole of Dhalbhum and the Jangle Mahals had been in revolt against British rule. The Chandrakona region of Midnapore was another centre of revolt, where a leader of rebels wasGobardhan Dikpati (or hereditary village boundary guard).

    Warren Hastings failed to quell the Chuar uprisings. The district administrator to Bankura wrote in his diary in 1787 that the Chuar revolt was so widespread and fierce that temporarily, the Company's rule had vanished from the district of Bankura. Finally in 1799 the Governor General, Wellesley crushed these uprisings by a pincer attack. An area near Salboni in Midnapore district, in whose mango grove many rebels were hung from trees by the British, is still known by local villagers as "the heath of the hanging upland", Phansi Dangar Math. Some years later under the leadership of Jagabandhu the paymaster or Bakshi (of the infantry of the Puri Raja), there was the well-known widespread Paik or retainer uprising in Orissa. In 1793 the Governor General Cornwallis initiated in the entire Presidency of Bengal a new form of Permanent Settlement of revenue to loyal landlords. This led to misfortunes for the toiling peasantry: in time they would protest against this as well.

    Such revolts of the people of the poorer classes did not take place only in Bengal Presidency, but in many parts of India. From 1817 to 1846 these were scattered Bheel uprisings - in Khandesh, Dhar, Malwa and Baglana. The Bheel headmen of the villages generally led these uprisings. One of the leaders of the Bheel revolt of 1825 in Khandesh, Shiurarn was a blacksmith. In 1824 - 25 in the Central India Bundelkhand division of Uttar Pradesh there was a united uprising against British rule by poor peasants, both Muslim and Hindu. One of its leaders was Nana Pandit, another Shaikh Dalla. They were joined by the fugitive rebel leader of the old Nagpur principality Appa Saheb, and a segment of the Pindari raiders. The British could crush this uprising after several years of wanton oppression. But this revolt linger in the strains of a popular song in Bundelkhand: "Below is the earth, above Allah our hope is in Shaikh Dalla"

    A similar revolt broke out under the leadership of Jat peasantry in 1824 in the districts Districts of Rohtak and Hisar in the present state of Haryana. The Koli uprising lasted from 1839 till 1845 allover western Gujarat. Revolt broke out in 1845 in the districts of Sawantwadi and Kolhapur in Maharashtra. Ultimately this had to be defeated by the English General Outram.

    In the north eastern region of India In the present state of Meghalaya the Khasi revolt was organized by the aboriginal people there from 1829 to 1833. About 10,000 Khasis carried on guerrilla warfare bringing the early British administration of the Khasi Hills to a halt. Only after four years could the English crush the insurgency by burning villages barbarously, and slaying its leader Tiroth Singh.

    In the same way, from 1830 to 1833; there were aboriginal uprisings over a wide tract of Chotariagpur's tribal area. Hundreds of thousands ofMundas from Ranchi to Manbhum participated. Thousands of tribal men, women and children were imprisoned at Chaibasa and several were shot by the English. Five thousand square miles were devastated.

    One of the most important aboriginal revolts was the Santal uprising of 1855. Sidhu, Kanhu, Bhairo and others led myriads of Santals to a gathering on the Bhagnadiha heath, for deciding to end British rule of their territory and establishing Santal independency. Working people in neighbouring villages such as blacksmiths, potters, weavers and oilpressers gave the SantaIs their active support. They marched towards Calcutta. Conflict broke out. Finally, the British required cannons and muskets to put down this rebellion. Sir W.W. Hunter has written that as long as their drums could be beaten, not one rebellious Santal would surrender. 15 thousand Santals were slaughtered in this rebellion by the British imperialists.

    The first century of British rule is full of such minor or major peasant and tribal uprisings. Connection between them was difficult as they were internally divisive and scattered in character. Yet they jolted the colonial and feudal exploitative and administrative arrangements of British imperialism. To appease peasant revolt the British also had to make some changes in its apparatus of revenue management. Yet the blood stained experience of rebellions over far-flung Indian regions left deep impressions on the minds of the common people in the regions where the' revolts took place. In the next phase, this created the atmosphere in which the freedom struggle could proceed.

    The Wahabi and Faraizi struggles were somewhat different cases of resistance movement during the first century. The revolting Wahabis desired to revive a fundamentalist and purified Islamic religion, cleansed of doctrinal and ethical lapses. Despite this religious garb, the Wahabi movement took on the character of a liberation struggle against foreign British rule. The originator of the Wahabi revolt in India was Saiyad Ahmed Baelvi (1786-1831). His basic teaching was that India had become Dar-ul-Harb or a country inimical to Islam since foreign Britons (with a different religion) ruled it. He proclaimed that the English were the main enemies of India and that the duty of all Wahabis was to extirpate this foreign rule. He wrote to a Maratha leader that it was necessary for Indians to join together to make the land free by driving the British out.

    The tide of Wahabi revolt reached Bengal as well. The leader of this revolt in the villages of Swarupnagar and Baduria in the vicinity of Barasat (near Calcutta) was Mil Nisar Ali, alies Titu Mir. Titu Mir was able to build a free zone over a tract where colonial rule was weakened. The Joint Magistrate of Barasat Alexander was defeated by Titu. Finally his bamboo fortification had to be destroyed by cannon, and Titu and 40 others died heroe’s deaths. 800 rebels were imprisoned. Titu's commander Rasul was sentenced to death, the rest to transportation to a penal settlement for life. After this, for many years the British took to suppressing any movements nourished by Muslim popular mass support by labelling them indiscriminately as Wahabi.

    The first convicts transported to the Andamans

    Islands were the Wahabis. When Lord Mayo, Viceroy of India went to inspect the Andamans in 1872, a Wahabi convict named Sher Ali stabbed Mayo to death. Sher Ali later proudly proclaimed in the courtroom, 'Brother, I have despatched our enemy'. The Judge who sentenced Sher Ali to death was later assassinated by a Wahabi rebel.

    The Faraizi movement was similar to that of the Wahabis. In 1842 the Faraizi leader, Dudu Mian procalimed that the proprietor of all land is Allah, men are equal in his eyes, so those of his fellows who revere Allah would no more pay rents to landlords;.they would not sow indigo for planters nor obey foreign rule. Dudu Mian was born in Madaripur subdivision of Faridpur District (now in Bangladesh), his original name was Muhammad Sohain. This aroused enthusiasm among the poor peasants, artisans and other rural working folk.

    Dudu Mian was a competent organizer. He divided Bengal into several regions which he called Halkas. About 300 to 400 Faraizis lived in each Halka. There would be one organizer called ustad at the head of each Halka: several thousand of them in Bengal with Dudu, himself at their head. Each Faraizi village was governed by Panchayati arrangements. Each Faraizi was bound on oath to help co-sectaries in case of oppression by white indigo planters and Zamindars.

    The Farizi movement spread from Madaripur to Bakharganj. From there, it was disseminated to Dacca, Comilla and Mymensingh on the one hand, and to Jessore and 24 Parganas on the other. A semi-official account would have it that one/sixth of Bengal of those days was influenced by this movement. The planters, Indian landlords and British magistrates felt disturbed. Many Faraizis were arrested. Dudu Mian was imprisoned: he died in prison in 1862.

    However, it is a fact that since the Wahabi and Faraizi movements were restricted to Muslims, the movement had certain sectarian limitations. And it need hardly be noted that the British bureaucracy took full advantage of this.

    The century-long anti-British government rebellions, divided and scattered as they were, which germinated anti-British consciousness among the peasants and the urban poor, were woven together on a India-wide frame by the sepoys of the Indian Army. In an age which preceded the birth of the working class, these troopers performed the duty of being the vanguard of anti-imperialist liberation struggle. The Wahabi rebels made their support known to the sepoy mutineers Discontent had long been growing among the Indian troopers of the British armed forces in India. In times of war, the Indian sepoys fought in the front ranks, they gave their lives before the rest but they were treated as servile and their pay was half that of the British. On top of this came weird instructions. The Governor-General Barlow ordered in 1806 that Hindu sepoys could not wear the tika on their foreheads that Muslim sepoys would have to shave their beards. And turbans were prohibited. In place of turbans, they would have to wear leather caps, which might have been sewn from cows' or pigs skins. Hindu and Muslim sepoys were enraged. This diktat of the Governor-General was repudiated by Sepoys at Vellore near Madras. The British Commander Colonel Gillespie sentenced the ringleaders to death and sternly suppressed the Vellore Mutiny. But sepoy discontent grew, in 1828; the sepoys were given orders to go by sea to Rangoon to fight in Burma. The sepoys who were quartered in Bengal refused to go. The English Commander-in-Chief, Paget had some sepoys shot and hanged the ringleaders. The mutiny was defeated but the embers of discontent scattered from one cantonment to another.

    In 1853, some angry Muslim sepoys tried to kill an English commander near Hyderabad. Local Hindu sepoys refused to arrest them. Lord Dalhousie the Governor-General sternly repressed the rebellion. The Hindu and Muslim sepoys of Hyderabad cantonment were dismissed from service.

    In May, 1857, first at Meerut cantonment, then at Delhi, open mutiny broke out among the sepoys. Even before that, on 29 March, 1857, the young sepoy Mangal Pandey had raised the banner of revolt in Barrackpur cantonment near Calcutta. He gave his life. on the gallows. In the bulletin issued by the rebel sepoys in Delhi to the people, they wrote that the land had lost its freedom to the British, the common people were impoverished and destitute, they were tortured by heavy taxes, there was scarcity of food and clothing, and even women's honour was at stake, there was no limit to English oppression how long would Indians submit to this insult, this misery.

    The Revolt started in Meerut cantonment on 9 May, 1857; On 11 May the mutineers captured Delhi and proclaimed Bahadur Shah as Emperor of independent India. The flames of rebellion burst out at Lucknow, and then allover the Awadh region. On the 4th June, Kanpur rose in revolt. Gradually the revolt spread from south of the Sutlej to Bihar, from Uttar Pradesh to Central India - i.e. in the entire Hindi-Urdu speaking tract. Where mass revolt did not break out, there also scattered uprisings occurred. In official language, the masses were "disturbed". The foundations of British imperialism were shaken to their roots.

    Writing far away, in London, on the basis of reports sent by the British themselves, Karl Marx made the following correct evaluation of the Sepoy Revolt at the end of June, 1857: "This is not a military mutiny but a national revolt".

    British commanders or civilian officials who were in India in 1857-1858, have given practically the same estimate. Thornhill writes:

    "Within a week of the revolt breaking out, the British Empire was practically at an end"

    The historian Kaye wrote the whole of Awadh and Bundelkhand had risen in popular revolt and that beyond the capital, British administration everywhere had fallen like a house of cards. A British magistrate of the Awadh region wrote that wherever there were revolts, there the rebels looted the government treasury, set fire to military barracks, and opened the jail gates' by smashing their locks: The historian Rice Holmes writes: "Dispossessed landlords organized their angry peasantry to drive out the feudal classes supported by the British. The debt ridden, oppressed agriculturists slaughtered usurious moneylenders, against whom their rage had been piling up for many years".

    Even in Bengal supposed to be relatively peaceful, there was suppressed anger. Russell, the correspondent of ' The Times' was then in India. In his Diary, published in 1860, he wrote about his journey through Burdwan town in 1857: "In no instance is a friendly glance cast towards the white man's carriage. Oh! That language of the eye! Who can doubt it? Who can misinterpret it?"

    The paper 'Payam-i-Azadi' was the mouthpiece of the 1857 Revolt. It was written in one of its editorials:

    "The government tries to use Hindus and Muslim against each other. Brothers; don’t place yourselves in this devilish trap. Hindus, Muslim, brothers; Forgetting trivial divisions, join under the same banner in the fight for freedom"

    In Awadh, Bihar and Central India, for one year, the rebel troops, the common working people of villages and towns fought with remarkable courage against the British. The British commander Hugh Rose writes that when he was fighting to recapture Jhansi, then countless women and men standing side by side defended the town and as a result he had to storm Jhansi by 'drowning it in rivers of blood'. Charles Ball has left a remarkable eyewitness account of how after losing an arm to a cannonball, the octogenarian rebel leader, Kunwar Singhcounterattacked British troops and repulsed them. It is well known how the heroic princess of Jhansi, Lakshmibai met martyrdom on the battlefield and Tantia Tope trapped in treacherous wiles, smilingly stepped on the gallows.

    In 1877, the youthful Rabindranath justly wrote in the 'Bharati' periodical: "Tantia Tope and Kunwar Singh were not merely two petty rebels. If any has to write history, their names will have to be placed along with the great heroes".

    "The British imperialists brutally repressed this freedom struggle in India. Many sepoys were tied to the muzzles of cannon, then barbarously blown from guns. Village after village was set a fire. The people of the country were indiscriminately slaughtered all aver North and Central India. Marx wrote: "English commanders have written of widespread rape, beating children to death and burning of villages". The English historian Kaye too wrote "Infuriated English troops bayoneted women, infants and even aid people. They let loose violence in Delhi". Of course, the mast revolutionary among English working class leaders Ernest Janes expressed support far the mutineers and penned his famous poem "Revolt of Hindustan".

    The revolt was crushed, but anger against alien domination began tofester among Indians, and it was these seeds which bare revolutionary potential far the future.

    About ninety percent of the Indian people lived in villages. The British rulers had made few attempts to diffuse education andknowledge among them. But even if they had togovern India well; they needed an Indian class of English-educated people. The father of the policy of Anglicized education, Macaulay, has openly declared that they had an objective for opening the portals of higher education by means of English education: to create an educated Anglicized class of gentry, staunchly loyal to Western civilization, who would be differentiated from the lives and values of the myriads of their impoverished country folk and loyal to British rule.

    In Rabindranath's language: "One group of urbanites gained by this opportunity, education, prestige, wealth. They were the ones to be enlightened, the illuminate. The ones, who learnt English by rote on their school branches, were the ones who learnt to identify educated society as the country at large. It was from that time that there grew in progressively cheerless ill-educated villages, scarcity of water, difficulties of roads, disease, and ignorance".

    Consequently, the awakening that took place in the newly enlightened society of India, despite its total contribution, did retain very many limitations. Yet this educated society did not only remain devoted to. England. A section of its next two generations learnt from this Western education, the ideas of freedom, democracy, and the fundamentals of progress. Side by side in their consciousness with infatuation and subordination to British rule, their group developed the first seeds of westernized criticism and protest. In a later period, it was these seeds which took the form of national movement for freedom of the entire country. One section of the wealthy, educated, Indian middle class, looking at the English industrial revolution dreamt of modernizing industrial development far India. This rising bourgeois class of India initially believed that it could fulfill the work of Indian industrialization, with British official collaboration. But the hard knacks of reality made such people, from Dwarkanath Tagore tothe late nineteenth century cotton mill owners realize that British imperialism wished essentially to exploit India, and that in the last resort colonialism would never stretch out the hand of India-British cooperation. And, it was from this realization that was spelled out through the subsequent period of freedom struggle the dual aspect of the dialectics of cooperation and conflict, within the Indian bourgeois class and colonialism.

    Ramah Ray had been the unquestioned standard bearer of the earliest stage of the trend of awakening of the educated community. He was disturbed by the religious fanaticism, ignorance and superstitions of contemporary leaders of society. After studying Hindu, Buddhist, Muslim and Christian tenets deeply, he expressed the opinion that there was fundamental unity in all the religious opinions of the world, that there was no reason for conflict and that this was what the Vedanta stated. So he believed that there should be fraternity among people of all the regains of the world. To propagate this view, he set up an organization in 1828, called the Brahmo Sabha. Later its name was changed toBrahmo Samaj. In connection with its preaching, there also grew up in Bombay (now Mumbai), a similar organization for religious and social reform - the Parthian Same

    Reactionary and self-interested leaders of society of those times, who were greedy of the wealth of widowed women, had maintained principally for that reason, the practice of burning on the pyres of their husbands, widows, who were called "Satis" or virtuous women, referring to those submitted death with their deceased husbands. Rammahuncarried on through out his life successful propaganda against this practice. Particularly when, and-hundred: and-fifty years after this, bride torture still remains in India, masquerading under the name of dowry system, then Rammahun's campaign surely appears very significant.

    Apart from this, Rammahun's forceful opinions in favor of freedom of the press and of democratic movements all aver the world is an indispensable heritage for the progress of our national movement. Yet the limitation of his ideology can surely be seen in Rammhun's view that the future progress and welfare of the country would come under the aegis of British rule.

    In the same period there was another progressive trend among the students of Calcutta's Hindu College. The originator of this trend was the young teacher Henry Louis Vivian Derozio. He was like an elder brother and friend of his students. Among them he tried to arouse feelings of rationalism, patriotism and revolutionary consciousness. His followers are known by the name of 'Young Bengal'. In an essay of 1835 (the year of T.B. Macaulay's 'Education Minute' to the Governor-General-in-Council which advocated Anglicization of higher education) a young student of Hindu College, Calash Chandra Dutt dreamed that a hundred year later an armed popular uprising was taking place against British rule in India. And, another youth, Uday Chand Adhya wrote an essay demanding that the medium of education and official work should be the mother tongue.

    Derozio wrote a patriotic poem in English about India, which was translated into Bengali by Rabindranath's eldest brother, Dwijendranath Tagore. It was the Young Bengal group which organized the first political organization in this country, the Bengal British India Society. The bilingual journal of this was the Bengal Spectator.

    The influence of Young Bengal was to be seen in the middle of the nineteenth century in the 'Young Bombay party'. Its founder was the school teacher of Bombay, Naoroji Fardunji, and their objective was overall reform of society, and they had a journal called the Rast Gaftar. About the same time, a similar movement was started in Madras byGazulu Lakshminarain Chetty.

    But the principal midnineteenth century social reformer of India was definitely Ishwar Chandra Vidyasagar. He was born on 29 September, 1820 in the village of Birsingha in Medinipur district. Having gained great learning in Bengali and Sanskrit in his youth, he started his teaching career in 1841 at Fort William College in Calcutta, as its Head Pandit. It was he who prepared readers in his mother tongue Bengali for little children - the 'Barnaparichaya', the 'Bodhadaya', the 'Kathamala' the 'Vetalpanchavimsati'. He opened a new vista before the children of Bengal. As an Inspector of the Government School Department., he was able within merely four years to set up twenty model schools for boys and thirty-five for women. It was Vidyasagar who was able to bring girls in this part of the country out of the darkness of the veil into the enlightenment of knowledge.

    And yet, the greatest achievement of his life was the initiation of the practice of Hindu widow- remarriage, In those times, girls were married in childhood, and if they were widowed before they could learn what marriage meant, they were still forced to follow various cruel rules of social custom. Vidyasagar entered the fray against this inhuman practice, disregarding all social resentment and abuse. The Widow Remarriage Act was passed in 1855. At this time, the weaving-women of Santipur printed on the borders of their famous hand-woven Saris, the sentence: "Long may live Vidyasagar, blessed with eternal life".Vidyasagar's only son wedded a young widow. Vidyasagar wrote to his brother: 'My son has given me glory". Even in the nineteenth century awakening, examples are scarce of such an idealist and patriot in word and in deed, in social life and in private life.

    Peasant revolts flared up after even the brutal repression of 1857. Certain changes were found in the character of these rural resistance movements. From now on in many cases, peasants began to directly struggle for their own demands against the government, foreign landlords, and indigenous landowners and usurers. In 1859-60, popular discontent was widespread over a large tract of central Bengal against the misbehavior of British indigo planters; this is known as the Blue Revolt or Indigo Revolt. Hindu and Muslim peasants gathered together. Even a British member of Parliament of the time has called the barbarous oppression of the British indigo planters and their armed retainers "unimaginably inhuman':

    The indigo cultivators’ resistance to them remained undaunted. A section of the educated intelligentsia came forward in their support. Memorable among the latter was Harishchandra Mukherjee and his "Hindoo Patriot’s" role. Dinabandhu Mitra wrote his play "Nil Darpan" or "The Mirror of Indigo" at this time.

    Indigo cultivators pretests brake out, after this, from time to time in the nineteenth century - in Jessore in 1883 and in 1889-90, and in Darbhanga and Champaran from 1866 to 1868. In the 'sixties and seventies of the nineteenth century, patriotic Sikhs were organized in the Kuka Revolt. In 1872, the English troops repressed the Kuka rebellion brutally. A British official named Cowan cruelly killed 65 Kukas by blowing them from guns and one young boy of 12 years was killed with sword. The picture of this brutality has been captured in the portrait of a contemporary Russian travelling painter Vereschtchagiin. The leader of this rebellion, Satguru Ram Singh gave up his life in deportation in Rangoon in 1885.

    Peasant insurgency again flared up in north and east Bengal in the 1870s. The big landlords of this region were very oppressive. They would forcibly take possession of peasant crops and lands at will and however they could; or arbitrarily increase the rates of rent. In 1873, the peasants of Sirajganj subdivision, Pabna District first grouped together against this and then organized non-rent leagues. Poor peasants, Hindu and Muslims united together in this struggle. Their demand was that none would pay enhanced rents: The British government took the side of the landlords. This divided the educated class, but its progressive wing supported the insurgent peasantry. It may be said that this struggle first made the rural areas familiar with techniques of forming peasant leagues and organizing strikes.

    In the Deccan at about the same time in the districts of Pune and Ahmednagar in Maharashtra, a fairly widespread peasant insurgencybegan. The peasants of this region would get entrapped in debts to usurious moneylenders in their liability to pay high revenue assessents to the government. They were forced into extremes of poverty. Towards the end of 1874, the Pune and Ahmednagar peasantry first began a social boycott against the moneylenders; this took on the form of popular conflict. They snatched away loan deeds by force and burned them. Frightened by courageous resistance, the police fled away. Infantry, cavalry and artillery troops were sent to crush the peasant revolt. The insurgency was swamped in blood. Progressive intellectuals in Pune and other parts of Maharashtra supported this brave peasant struggle. The indomitable Basudev Phadke came forward to lead the insurgents in armed guerrilla resistance. Phadke was the son of a well-to-do Brahman family of Colaba district in Maharashtra, and he had a government appointment. Distressed by peasant sufferings, he quit his post to organize peasant struggle. For a few months, he placed the British administrators in a quandary. He was then captured and deported to the distant and arid British colony of Aden at the tip of Arabia. In 1883 he died there in prison.

    Peasant unrest was expressed in other parts of the country as well. As an example, we may take the Mopala peasants of southern Malabar, who were tormented by their Jenmimasters. From 1835 to 1854 there were at least 22 revolts among them. Mapala revolts also took place 5 times from 1873 to 1880.

    The peasants of the Brahmaputra Valley racked by high revenue assessments now took to the path of resistance. They refused to pay revenue enhancements and made determined efforts to resist attempts of penal attachment of lands by the state. Here too the British had to use force in suppressing peasant unrest. Many peasants lost their lives to bullets and bayonets. Also, all over Chhotanagpur in the last decade of the nineteenth century, there broke out the fearless popular revolt under Birsa Munda's leadership. All these peasants had courage, heroism and self-sacrifice in good measure. But it was not possible for them to defeat the British armed with modern weapons with their pitifully limited organization and the lack of support of the urban middle class. What these insurgencies proved was the extent of anticolonial power that lay dormant among the people.

    Songs, poems, drama, short stories, etc. have played significant parts in the national movements and resistance struggles of practically all those countries, particularly those under alien rule, where such movements have taken place. There was no exception to this in India.

    The first expression of nationalism in our country's literature is to be found in this sort of pride in our past history and this sort of patriotism based on such a historiographical context. Germinating nationalism was actually latent in the words put into the mouths of the Rajput heroes by the poet Rangalal Bandopadhyaya, "In the lack of freedom, who wishes to stay alive, 0, who wishes to stay alive".

    It was in Madhusudan Dutts poetry that the first sharp expression of patriotic fervour took place after the initial infatuation of devotion to British rule had passed

    "0 Bengal, in your treasury are various jewels; caring not for them, I wandered infatuated for the treasures of others" or "keep this slave in your heart, this entreaty I place at your feet". Satyendranath Tagorewrote the song "Incant the victory of India" for singing as the mass invocation at the Hindu Mela, one of the germinal national organizations. Mirza Ghalib wrote in Urdu stirring, patriotic songs. In Urdu mushairas, very many people used to take part in these emotions, singing out the lines. Many patriotic songs were also written in Marathi. In 1876, Bankim Chandra Chattopadhyaya composed "Bande Mataram". And in 1876, too Dwarkanath Gangopadyaya edited and published the first collection of national songs of this country.

    There was a common base note in the vernacular patriotic songs of various regions - Bharatvarsha is our motherland. India's oppression and exploitation has led to so much sorrow, misery and shame. Who is there to end this poverty and shame? Consequently this sort of poetry and songs helped in the development and sharpening of patriotic feelings.

    But the most emotion was aroused by dramatic performances of rousing plays in the theatres. The play "Neel Darpan" has already been mentioned. Sivanath Sastri has written that, watching the performance of "Neel Darpan" he used to feel that if there were no weapons close by, and then he would like to tear the British planters to pieces with his bare teeth. The independent-minded Gaikwad, prince of Baroda was deposed in a conspiracy by the British Government.

    The young dramatist Amritalal Basu wrote in criticism of this, the play "Heerak-churna" sharply condemning the British administrators. A play "Cha-kar Darpan" was written condemning the oppression of tea plantation managers. The wealthy devotee of the government,Jagadananda Mukherjee toadied to the Prince of Wales (heir-apparent of Queen Victoria) on his visit to India. A satirical playlet was written against him entitled "Gajadananda and the Heir-Apparent". In 1875,Upendranath Das wrote the play "Surendra-Binodini" on the first page of which was written:

    "Neither heavenly bliss do I desire, nor the groves of paradise, if, for a moment, can I get freedom".

    These plays were enacted in open theatres, and were tremendously appreciated by audiences. This disturbed the British administration. According to the Dramatic Performances Regulation Act of 1876passed by the Viceroy, Lord Northbrook, no play could be performed in an open theatre without the permission of the Police Commissioner.

    Many journals and newspapers also played their part in this age in awakening anti-imperialist consciousness. In 1858 the English Viceroy gave the fiat that Indians visiting Government House would have to salute British officials without headgear, unshod and bowing down. The Bengali weekly, "Somprakash" wrote a satirical editorial against this insolent diktat.

    The pointed writings in favour of the cultivators at the time of the indigo strike, and against tea planters' oppression, by Harish Mukherjee and Dwarakanath Gangopadhyaya which were published in the Hindoo Patriot and the Sanjibani aroused anti-British feeling among educated society. Similar journals like the "Kesari" and the "Hindu" were published in Maharashtra and in Madras. The secret report of the British intelligence investigation department was that vernacular papers were propagating extreme anger against British rule. In 1878, the Viceroy Lord Lytton muzzled all newspapers by passing a repressive law - the Vernacular Press Act.

    It was in 1878 that a Calcutta nationalist organization, the Indian Association first gave the call for all India protest against a repressive law. The day of protest was practiced on 18 April, 1878 in many Indian towns, under the leadership of Surendranath Banerje, then in the nationalist forefront in Bengal. The British policy of repression instead of blighting the seeds of Indian national consciousness, stoked the fuel for the flames of nationalism. The conflict was intensified around the focus of the Ilbert Bill controversy.

    Farsighted elements among the British imperialists were scared by the ensemble- discontent and revolt among the Indian poor peasantry on the one hand, the sharp criticism and initial germs of protest among the progressive sections of the middle class intelligentsia against British administration, on the other. Allan Octavian Hume wrote as their representative: India has become a smouldering volcano. A popular outburst will be the consequence of a policy of repression. Instead, accept some demands, channelise the steam of educated class anger by safety valves, and help in forming an appropriate national organization.

    In the meanwhile, the leaders of the Indian Association had invited at Calcutta in December 1883 the first meeting of the Indian National Conference. Its second session was also held in Calcutta in 1885. On the other hand, the Bombay nationalists were also feeling the need for an all-India organization. Consequently the Indian National Congress was born in Bombay in 1885.

    Two contradictory tendencies were clear in the National Congress from its very birth. One was to maintain British administration in India and make it more liberal and democratic. The approach of supporters of this trend was to pass critical resolutions, carry on propaganda, and petition. Later these people were known as Moderates.

    The essential of the other trend was devotion to the goal of self-rule, and struggle for earning Indian self-rule, as well as sacrifice for that goal. Later, the supporters of that trend were known as Extremists.

    The proposal for the Partition of Bengal came in this context. First Risley, then the Viceroy, Lord Curzon himself desired to break East Bengal away from Calcutta so as to weaken the rising force of Extremism in Bengal. Risley mentioned in a confidential letter the actual plan of imperialism: "Bengal's strength is in its unity. If this is divided, its strength will also be broken. One of our principal aims is to weaken this unified centre of resistance".

    But Bengal did not submissively accept this imperialist game. The Bengal people, Hindu and Muslim alike, confronted it. In a vast concourse at the Town Hall on 7th August, 1905, the anti-Partition movement was initiated. A movement for rescinding the Partition was decided upon. An invitation was given in the ‘Sanjibani’ for the boycott of all foreign commodities and for the use of only indigenous products or Swadeshi.

    Bengal was partitioned on the 16th October, 1905 and many Muslims as well as Hindus observed it as a day of mourning. The hartal (strike) was observedin the towns as well as some villages of Bengal. Abstinence from cooked food was practiced in many homes. Thousands of people participated barefoot in mourning processions, with Rabindranath'srecently composed song on their lips: "The life of Bengalees, the minds of Bengalees, brothers and sisters in the homes of all Bengalees, let them be one, let them be one, let them be one, 0 divine Lord".

    The tide of Swadeshi spread from, Calcutta to the district headquarters-Barisal, Mymensingh, Medinipur. Even the Moderate Gokhale himself in his Presidential speech to the Varanasi session of Congress had to say that the Bengal Partition was one of the "meanest acts" of British rule in India. Surendranath Banerjee thundered that they would smash British arrogance. Yet the leadership of the movement began to pass into Extremist hands-into those of Bipinchandra Pal, Aurobindo Ghosh, and outside Bengal, Bal Gangadhar Tilak, Lala Lajpat Rai and others. The students became the life and soul of this movement. The first militant students organization, The anti -circular society, initiated in protest against a Government circular to prevent Swadeshi propaganda in schools joyfully took up the work of organizing boycott of sale of foreign textiles in shops, and hawking bales of Indian made cloth to people's homes while chanting Rajanikanta Sen's "Raise to your heads, 0 brothers, the coarse cotton bestowed on you by the Mother (land)".

    The tides of boycott and Swadeshi flowed through Bengal, Maharashtra and the Punjab. In many towns, people held festivals to burn British cloth. Even some washermen vowed not to wash foreign cloth. Sweetmeat vendors took vows not to use British sugar for preparing sweets. Women took to ceremonially breaking bangles and household utensils made from British glass. Great emotional support in arousing this movement for indigenization of production came from the songs of Rabindranath, Dwijendralal Roy, Rajanikanta, Atulprasad Sen and Mukunda Das and the patriotic plays of Kshirodeprasad Vidyavinode and many others.

    On the other hand, there was great enthusiasm for the manufacture of various types of Swadeshi commodities. Innumerable indigenous textile factories, match and soap factories sprang up. P.C. Ray organized the famous Bengal Chemical works. Rabindranath busied himself in founding a Swadeshi Bhandar; Jamshedji Tata was able to base his steel factory on merely Swadeshi subscription. Banks and insurance companies grew up through Swadeshi enterprise. V.O. Chidambaram Pillai set up an indigenous steam navigation company at Tuticorin, a port in Tamil Nadu. Tilak and Lajpat Rai broadcast the idea of Swadeshi in Maharashtra and the Punjab. The driving force of Swadeshi in Delhi was Sayed Hyder Reza. In 1921, at the time of composing "Hind Swaraj", Gandhiji too wrote that it was through the boycott movement of 1905 to 1908 that the national movement stepped from the stage of petitioning to that of resistance and struggle. The dissemination of national education was another massive work performed by the Swadeshi movement. The National Council of Education was set up-whose developed form is now Jadavpur University.

    While the Swadeshi movement was basically limited to the educated middle class of the towns, it was not completely alien to rural peasantry or urban proletariat. The Extremist leaders realized the importance of organizing workers and peasants within Swadeshi movements, but they failed to link the demand for self-government (Swaraj) with even the minimal anti-landlord or anti-capitalist demands of peasants or workers. If such demands had been voiced, the latter would have enthusiastically joined in the struggle for self-determination of educated society.

    Even so, many workers strikes developed in Bengal-among workers in the East India Railway, in the Clive Jute Mills, in Burn Company, and in many neighboring factories. Tilak gave the Bombay workers the call to strike. Chidambaram Pillai had a successful factory strike in Cochin. It was in this age that some trade unions grew in India.

    Discontent burst out at this time among indigo cultivators in Champaran, and a decade later, Mahatma Gandhi made this cause his own. There was widespread peasant awakening in Assam and Mymensingh Aswini Kumar Dutt took the leadership of peasant consciousness in Barisal which included Muslims.

    A notable section of Muslim citizens also took part in the Swadeshi movement. When students used to hawk Swadeshi cloth on the streets of Calcutta singing partiotic hymns, they were accompanied by Maulavi Liakat Hussain. The barrister, Abdul Rasul chaired the session of the political conference at Barisal in 1906 on which the local Magistrate and police unleashed brutal repression. The Magistrate, Emerson prohibited the raising of the slogan 'Bande Mataram' in any open procession. Disregarding the order, bleeding from lathis, the venerableKrishnakumar Mitra continually went on calling out 'Bande Mataram', many were severely beaten up along with Chittaranjan Guha Thakurtaand the student volunteers. It was about this time, that Abdul Kalam Azad began to preach revolutionary politics through the Urdu paper ‘Al Helal’.

    Despite all this glory in the movement for Swaraj and Swadeshi, in which the leadership passed to Extremists it, was not free from serious limitations. The greatest weakness of the Extremists was partiality in their ideology to high caste and the Hindu religion. This proved to be an obstacle to the formation of stable and firm Hindu-Muslim unity. Due to unevenness in social development, the affluent and middle class elements of Indian society were inducted into the framework of Westernized education rather later, and received comparatively less opportunities for government employment and social advancement. As a result, communal grievances piled up. Taking full advantage of this, British imperialism incited communally divisive forces. The All-India Muslim League was formed with the patronage of senior British officials in Dacca (the headquarters of the newly partitioned province of Eastern Bengal and Assam) in 1906.

    Of course, it would be wrong to jump to the conclusion that the Extremist leaders were all communalists. Many of them dreamt of united Hindu Muslim movements. They also desired to abandon the sterile path of the politics of petitioning and to awaken their country in the way of independence, sacrifice and struggle.

    From the end of the nineteenth century and the beginning of twentieth century, in different parts of India a segment of fearless youth dreamt of liberating their country folk by armed revolutionary struggle. Two Maharashtrian brothers, Damodar and Vinayak Chapekar assassinated oppressive English officials.

    They went to the gallows, followed by a brother of theirs. TheAnushilan Samiti was founded in Bengal in 1902 by the barrister, Pramathanath Mitra. Aurobindo Ghosh joined them from Baroda. Swami Vivekananda's spiritual disciple, Sister Nivedita was an important force in this group. After the imperialist repression of 1906 in Barisal, Jugantar the organ of the revolutionary outlook in Bengal openly noted in its editorial that:

    "If the 30 crores of country's population raise their 60 crores of hands aloft in the vow of resistance, then only will this oppression stop. Only force can silence this use of force".

    The "Mitra Mela" was organized by the Savarkar brothers of Maharashtra. Madanlal Dhingra, a follower of Savarkar, assassinated in London Curzon Wylie an English official. He courted a martyr's death In her. Paris journal "Talwar" the famous Parsee woman revolutionaryBhikaiji Rustom Cama wrote in firm support of his act in an editorial. Joining the International Socialist Congress of 1907 in Stuttgart, Madame Cama presented the demand for India's freedom the first time in a world gathering.

    The revolutionary movement spread to South India. Chidambaram Pillaideclared that full independence was India's objective. In Tinnevelly, a militant strike followed in protest to his arrest. The British Magistrate Ashe gave firing orders: many lives were lost. The revolutionary Vanchi Aiyar took revenge by killing Ashe and evaded arrest by committing suicide. The revolutionary Khudiram Bose was arrested after attempting to shoot the 'Oppressive Magistrate of Bengal Presidency Kingsford, and Khudiram's comrade in arms, Prafulla Chaki committed suicide. Khudiram was hanged and in the villages and towns of Bengal, the immortal story of the way he greeted martyrdom was spread through the lines of the folksong:

    "Give me Leave, 0 Mother, let me wander" One of this revolutionary group had committed an act of betrayal. He was daringly shot in the prison itself by Satyendra Basu and Kanailal.

    Punjab too had as glorious a place in the revolutionary movement asMaharashtra and Bengal. In particular it spread among the Sikhs.Rashbihari Basu used to act as a go-between with them and the Bengalis. In 1912, on the 12th December, a bomb was hurled at the Viceroy, Lord Hardinge (while he was making his ceremonial entry in British India's new capital of Delhi). The Viceroy was grievously hurt, but recovered. A few revolutionaries were hanged. Rashbihari went underground to carry on revolutionary activities.

    The story of this phase will have to be closed with just another event from 1908. When a British Magistrate, following the verdict of British jurymen ordered six years rigorous imprisonment for Tilak, then the Bombay working class came out in the first general strike of Indian national movement. Although many Indian leaders could not follow the significance of this historic event at the time, yet reading the news in exile. Lenin welcomed the revolutionary element in the Indian working class, and noted that the heyday of British imperialists in India was coming to an end.

    Rallying the moderates and inciting the communalists, the British Government launched an assault on the Indian national movement by passing the 1909 Government of India Act, known as the Morley-Minto Reforms. They conferred the vote on less the 1% of the population, the elected representatives were given no majority in the central or provincial legislative assemblies and what was more, and a communal system of electoral representation was inserted. The Moderates were caught in the trap thus sprung, by and large supporting the 'Reforms' of 1909. The communal Muslim League also welcomed this Act. But voicing the discontented consciousness of youthful society in the country, the Extremist leader Bipin Pal declared that India would not "sell its soul for Morley's mess of pottage".

    The First World War broke out in 1914- a struggle of greed between the old imperialist states and rising German imperialism. Displaying remarkable historical prescience Rabindranath wrote the conflict has broken out between one interest and other. Self interest will lead to catastrophe. It was during the First World War that he wrote his penetrating essay in Bengali on 'the roots of war' and his English book Nationalism-which stripped the mask from imperialism. Indian nationalists felt that if they could exert united pressure, then taking advantage of the War, they could make some advances. The supporter of Irish nationalism, Mrs. Annie Besant called for 'Home Rule’ or limited self-government within the framework of British imperialism. Tilak joined her Home Rule League after his release from prison. Meanwhile Congress and the Muslim League signed an accord among themselves at Lucknow in 1916. The Muslim League agreed to support of demand for Home Rule and the Congress accepted separate electorates. But violent revolutionary movement again raised its head. In 1913, in U.S.A - Sohan Singh Bhakna, Taraknath Das, Lala Hardayal

    and others formed the 'Ghadr' Party. 'Ghadr' means revolt and it was inscribed in the first issue of the party's paper Ghadr "What is your name? Revolt. What is your work? Revolt. Where will you carry it out? In India. In what will you write the message of revolt? In Blood, not by words"

    Many Sikh migrants reached Canada under leadership of Baba Gurdit Singh in the hired Japanese ship, Komagata Maru but were not allowed to disembark. After much suffering, the ship returned towards Calcutta. When British troops attempted to arrest them, conflict broke out with the militant leadership of the travellers at Budge-Budge near Calcutta port on 29 September 1914. 20 travellers lost their lives, more were injured, but Gurdit Singh and some of his comrades-in-arms were able to escape.

    Under the leadership of a teacher in the nationalist Muslim college of Deoband, Maulana Obeidullah Sindhi, many young revolutionary Muslims left India for Baluchistan. They set up liberated government in a distant tract there. Later they shifted their headquarters to Kabul. They were joined by Raja Mahendra Pratap and Maulana Barkatullah.Sending secret news to Deoband students, they began to exert influence in favour of Indian revolution. But their ciphered silk handkerchief was intercepted, and the Government started the Silk Letter Conspiracy Case.

    And in Bengal, under the leadership of the revolutionary hero,Jatindranath Mukherjee, making contact with the German Government through the Indian Revolutionary Committee at Berlin, there was an attempt to bring arms and ammunitions from Germany and build up a mass uprising in Bengal. But the British intelligence got wind of these plans. At Chashakhanada on the banks of the Burhi Balam River in Balasore District, Jatindranath and four of his comrades-in-arms confronted a large British force in unequal conflict. Chittapriya died in battle, Jatindranath in hospital and two of the heroes hanged.

    The plan had been that on the 21st February, 1915, the Indian troops would simultaneously mutiny in North India and also where posted outside India. But the plan was betrayed by traitors to the British.Vishnu Ganesh Pingle was captured with 10 high explosive bombs in cantonment at Meerut. Elsewhere, the Young revolutionary leader,Kartar Singh Sarabha was captured, seven were hanged in the FirstLahore Conspiracy Case and 42 other ghadarites were hanged in Ghadar Conspiracy cases and about 300 were awarded various imprisonments and dozens of them were sent to Cellular Jail Andamans where seven Ghadarites were died facing the brutal treatment of the jail authorities. Rashbihari Bose made a dramatic escape of Japan hoodwinking the British. Indian troops at Singapore had not got news of the failure of the concerted mutiny. After revolt they held out heroically for a week. Many of them faced martyrdom.

    In the period of the First World War, many other scattered, limited attempts at armed uprisings were frustrated in India. Jatindranath's right-hand man, Narendranath Bhattacharya was sent to China and Japan, searching for arms. Evading imperialist arrest, he arrived in the U.S.A. with the assumed name of Manabendranath Roy; and journeyed thence to Mexico. Here he accepted Marxist views and was elected Secretary of the Mexican Socialist Party. At Lenin's invitation he travelled to Moscow, to participate in the 1920 Second Congress of theCommunist International.

    The revolutionary attempts were shattered indeed, but they scared British imperialism. It endeavored to compromise with moderate nationalists. In August 1917, Montague, the Secretary of State for India announced that after the war ended, India would be given, step by step, responsible self-government. But the Report submitted jointly by Montague and the Viceroy, Lord Chelmsford in 1918 represented a mountain giving birth to amouse. A new Government of India Act appeared in 1919, which was rejected as in adequate, unsatisfactory and disappointing by even the middle-of-the-road National Congress.

    Whatever infatuation had been bred in the Indian mind was dispelled by the amendment to the Criminal Procedure Code prepared by Mr. Justice Rowlett. At this time, British imperialism was giving leadership in Turkey and the Arab world to dastardly conspiracies against the independence of the whole of West Asia. Anger was growing in the whole of Indian Muslim social consciousness. Combined anger burst out against theRowlett Bill. Mohandas Karamchand Gandhi, who had returned from South Africa, came forward to lead his Satyagrahas in India, and theIndian Khilafat led by Maulana Muhammad Ali and Maulana Shaukat Ali came forward in its leadership.

    A Hartal of public work stoppage was observed all over India on 6 April, 1919. Many Hindu and Muslims lost their lives to police bullets in Delhi. Two popular leaders, Dr. Satyapal and Dr. Saifuddin Kichlu were arrested in the Punjab. The Amritsar populace vented their angry protests. So on the 13th April, General Dyer ordered a brutal massacre at Jallianwala Bagh. More than a thousand men, women and children were killed or wounded. Martial law was clamped on the Punjab. The English troops caned men and subjected women to assaults on their modesty. Rabindranath in anguish and insult gave up his British honour-the knighthood conferred by the Crown, saying that an honour conferred by imperialism stung him like a thorn. Even the normally peaceful Mahatma Gandhi wrote in Young India that this satanic government cannot be mended, it must be ended.

    Gandhi was elected President of the All-India Khilafat Committee in November, 1919. The proposal for non-violent non-co-operation was practically unanimously accepted at the Nagpur Annual Session of the Congress in December 1920. Having united Congress and the Khilafat movement, Gandhi called on his countrymen to join the non-co-operation movement to gain Swaraj within a year.

    An unprecedented mass movement began. The British publicist Valentine Chirol has written that India had reached the threshold of a popular revolution.

    Hindu - Muslim unity appeared to have entered a new phase. Popular awakening flooded beyond the urban intelligentsia's limits into the rural areas of India. The peasants of Medinipur decided that they would no more pay revenue to their Union Boards. Peasants in South India, in Guntur, in Krishna and Godavari districts embarked on no rent campaigns. A widespread movement for no-rent started in the U.P. ln Chhotanagpur, many aboriginal tribes people came together in the Tana Bhagat movement. The movement spread to jute mills, railways, and even to the Assam tea gardens. In Andhra Pradesh, in Madras Presidency, the violent Rampa popular uprising broke out under Alluri Sitaram Raju's leadership. Sitaram Raju was martyred: but he lighted the spark of freedom struggle in peasant consciousness. The Moplah Revolt burst out in far southern Malabar against zamidars-usersoppression backed by British imperialism. The imperialists subjected the Moplahs to inhuman tortures. Though it was weakened by communal fanaticism, the Moplah Revolt was indubitably a glorious episode in our national struggle.

    Both British imperialism and the national leadership came to realize that the far flung rural society of India was the repository of boundless strength and the demand for Swaraj if channalised into united popular disturbance, would shake British rule to its foundations. The villagers of the Chauri Chaura area of Gorakhpur in U.P. unable to put up with repression of government, set fire to a police station, killing 22 policemen. Pleading that the non-violent movement was deviating from its ideal, Gandhi unilaterally directed that it be called off for the time being Deshbandhu Chittaranjan Das, Motilal Nehru and Lajpat Rai protested against Gandhi's decision. In his Autobiography, Jawaharlal has written that the movement was then advancing on all fronts and they were gaining prestige and success, they were angered by the halting of the movement at such a stage. Subhas Chandra Bose has written that when the people's enthusiasm was at the point of an explosion, then Gandhi by directing a retreat had called for a national disaster. The young organizers of Communist movement believed that when imperialism failed to crush popular revolt with guns, it had to rely on leaders following the path of compromise like Gandhi.

    In December, 1922, at Gaya Session of the Congress, the President, Deshbandhu C.R.Das proposed a new strategy. Take part in government sponsored elections even if we are in a minority in the Reformed Legislative Assemblies; wreck the farce of the British Reform Act from within. Gandhi's followers did not support the idea. So Chitta Ranjan, Srinivas Ayyangar, Motilal Nehru and others formed a new party theSwarajya Party. Coming to a pact or electoral understanding with nationalist Muslims in Bengal, the Swarajya party was victorious. It was able by continual disruption within the Bengal Legislature to make it difficult for the ministerial group composed of British and Indian loyalists to carry on administration.

    Meanwhile the seeds of Socialist and Communist movements had begun to sprout. M.N. Roy and few Indian revolutionaries established anIndian Communist Party in October 1920 in far off Tashkent. The nationalist Muslim Muhajirin who had left their country, journeyed at the end of the War to Soviet Russia, many were attracted by Communism. When they began to return home, some of them were arrested and in 1922 the British-rulers began the Peshawar Bolshevik Conspiracy case. A South Indian working class leader Singaravelu Chettiar was the first to proclaim that he was a Communist at a Congress session at Gaya in 1922. Actually in the previous year, in the Ahmedabad Congress of 1921, the demand for complete Independence had been raised by Hasrat Mohani and Swami Kumarananda who were later on to accept the Communist ideology. Even earlier than that, in Bombay in 1920 the united popular organization of the Indian working class- the All India Trade Union Congress- had been born. Giving his presidential address at Lahore in 1923, the Deshbandhu said: The Swaraj which we are fighting for will be for 98% of the people. In the meanwhile not only M.N. Roy, but also Abani Mukherjee, Birendranath Chattopadhyaya, Dr. Bhupendranath Dutta, Fazl Elahi Kurban, Dalip Singh Gill and many other revolutionaries resident in foreign lands had accepted the communist ideolgy; they now began to try and spread it in India. Frightened by this, the imperialists arrested the Communist organizers in Calcutta, Bombay and Kanpur and began the Kanpur Bolshevik Conspiracy Case of 1924. The results of repression often had the reverse of what is expected. Many revolutionary youth were attracted by Communism: in 1925 December in Kanpur meeting the Communist Party of India was set up, with the Bombay cotton mill labour organizer,S.V. Ghate as its Secretary.

    The revolutionaries also revived their efforts. A new Hindustan Republican Army was established: it was later called the Hindustan Socialist Republican Army. Its leaders were Chandrasekhar Azad andSardar Bhagat Singh.

    In U.P. in 1925, focusing round these revolutionary efforts came to theKakori Conspriracy Case. Four revolutionaries were hanged,Ramprasad Bismil, Roshan Singh, Ashfaqulla and Rajen Lahiri. Many revolutionaries were arrested in the Dakshineswar Bomb Case in Bengal.

    In the meanwhile, the British Government had announced that for the purpose of initiating fresh reforms, a Commission under the leadership of Sir John Simon was to come to India. The Indian national movement was unanimous in declaring the boycott of the Simon Commission(which was all white): popular discontent again swirled through the whole of India. Wherever the Simon Commission went, there were public work closures and black flags demonstrations with "Go Back Simon" cries greeting it.

    The anti-Simon demonstrations were viciously attacked by the police. In 1928 in Lahore, the veteran nationalist leader Lala Lajpat Rai was fatally injured by police lathis. He died a few days later. Sardar Bhagat Singh and his friends took vengeance for his death by shooting the responsible police officer, Saunders. Bhagat Singh was able to flee underground.

    From 1927 strike actions were widespread and sharp all over India. In Bombay, under the leadership of the Communist-organized Girni Kamgar Union, there was a general strike lasting for a few months in 1928; and violent industrial strikes and tension in the railways and jute mills of Bengal. This brought a new revolutionary force into the forefront of the national movement.

    Storm warnings sounded in the Calcutta Session of the Congress in the 1928. The question arose – what was the objective of the national movement complete Independence or Dominion Status? Gandhi and the old guard leaders were in favour of Dominion Status. Subhas Chandra and Jawaharlal, the armed revolutionaries and the Communists were in favour of complete Independence. Gandhi’s proposal was victorious by a small majority. But the very next day, a fiery procession of half a lakh of workers led by Communists and Leftists arrived at the Congress Session to make their support for the complete Independence resolution known. The official historian of the Congress, Dr. Pattabhi Sitaramayya has written that this was the most significant event of the 1928, Calcutta Congress. In January 1929, in a speech to the Central Legislative Assembly, the Viceroy Lord Irwin said that he was concerned at the spread of Communist ideas in India. Seven weeks later on the 20th March as a result of India-wide searches by the Police, thirty one Communists and Left working class leaders were arrested and the historic Meerut Conspiracy case was started. This case lasted for four years and British imperialism made a determined attempt to bring a rift between the nationalist movement and the Communist movement. But this conspiracy was foiled. On the one hand the Communist prisoners used the Court Room dock appropriately to explicate the nature of imperialist exploitation and to spread information about facts and perspectives on popular revolution. On the other hand, the national movement too stood beside the Meerut prisoners. As a result, the Meerut Conspiracy Case helped in creating popularity for Communist ideology, particularly among the revolutionary youth of the country.

    Three of the Meerut Conspiracy case accused were English Communists and Leftists. They too firmly stood beside their Indian comrades and were sentenced to rigorous imprisonment. There were worldwide demands for freeing the Meerut prisoners from the most honoured scientist of the world Albert Einstein, and the French intellectual Romain Rolland, to the British Trade Union Congress.

    The second Lahore Conspiracy case was started in 1929. In defence of the dignity and honour of political detenues Bhagat Singh, Batukeswar Dutt, Jatin Das and other prisoners went on hunger strike. The Government was ultimately forced to accept the detenues demand for appropriate treatment in prison: but Jatin Das passed away after 63 days hunger strike. Subhas Chandra Bose brought his body by train from Lahore to Calcutta. Innumerable people thronged the railway station en route stood to pay respect to the body. They must have taken a vow to end imperial servitude.

    In this fiery situation in 1929, the resolution for complete independence was accepted at the Lahore Congress. On the 26th January 1930, IndependenceDay was observed all over the country. The pledge for not resting till complete Independence was gained was taken by unfurling the national flag. From 1930 began the Civil Disobedience Movement for demanding complete Independence. Gandhi ji embarked on his Dandi March, with hand-picked volunteers, who would defy the British laws prohibiting common manufacture of salts in India. But, all over the country, women and men in their thousands took part in thisSatyagraha, determinedly putting up with indescribable tortures and beatings at the hands of the police detailed for stopping salt manufacture.

    An unprecedented popular uprising took place in the northwest Frontier Province of India in the land of the Pathans, sparked off by Red-Shirt volunteers, led by the "Frontier Gandhi" Abdul Ghaffar Khan who called for freedom. The frightened British authorities used Garhwali troops to repress urban discontent. The idea of some officials was to start Hindu Muslim tension by using Hindu Garhwali troops to fire at Muslim Pathan crowds. At Peshawar on the 23rd April 1930, a British Commander ordered Garhwalis to open fire on a Pathan demonstration. A non-commissioned officer, Chandra Singh Garhwali threw down his rifle. Other Garhwalis followed suit. Groups of Pathans embraced the Garhwali troops in joy. A Calcutta newspaper wrote that Peshawar had changed hands. Chandra Singh and others were given savage sentences.

    Gandhi was arrested at the beginning of May 1930. There were widespread protests all over India. Workers in Sholapur where there were many cotton workers and Railway employees spontaneously rose to drive out the English authorities and hoist the flag of freedom. After three or four days many troops were brought from Bombay to drown in blood the unarmed popular uprising of Sholapur. Four leaders of the revolt were hanged. By militantly defeating the strength of British power and by taking power for however brief a period; the revolutionary working class of Sholapur began a new chapter of the national movement.

    A few days before that on India's Eastern frontier, under the leadership of Surya Sen (known affectionately as Masterda) some revolutionaries on 18th April, 1930 occupied the Chittagong armoury and the principal Government offices. The British senior officers fled to ships anchored at sea. Declaring Chittagong to be independent, the revolutionaries retreated to the nearby Jalalabad range. There, on the 22nd April, fifty or sixty revolutionaries were attacked by a few hundred English and Gurkha troops. About one hundred troops and twelve revolutionaries lost their lives. Then the revolutionaries came down from the hill under cover of darkness, and went underground. A year later, some revolutionaries under the leadership of the heroic maiden, Pritilata Wadedar

    attacked the Chittagong European Club at Pahartali. Pritilata embraced martyrdom. All over India in respect and astonishment rose the feeling: fortunate indeed is Chittagong. In the jail of Hijli (where the Indian Institute of Technology Kharagpur is now housed) English jailors fired on defenseless revolutionary prisoners. In reply revolutionary in Medinipur shot down in open daylight, one by one, three successive English magistrates. In the Bengal Government's life centre Writer's Buildings; the revolutionaries by carrying out a daring raid through the corridors could spread terror within the fortress of imperialism.

    As the movement grew, the English Government's oppression also over-stepped its own bounds. Official estimates themselves have it that within a year 60,000 volunteers were sentenced to imprisonment. Pattabhi Sitaramayya in his book "History of the National Congress" has written that in 1930-31, only within 10 months, 10,000 men, women and children were imprisoned. But the movement could not be stopped only by order of imprisonment. So indiscriminate lathicharges, brutal physical torture and firing on unarmed groups followed. The press was censored from printing this news.

    But the movement, instead of being crushed began to take on the character of a popular uprising. In England, ‘The Spectator' wrote that if there had been no troops in Bombay, the Government would have fallen within a day. The British merchants were greatly hurt by the movement to boycott British commodities. In their distress, they joined Indian merchants to demand that there should be a compromise with the Indian national leaders on the basis of Dominion Status.

    To curb this popular revolt, a compromise with Gandhi and the Congress leaders was sought. The national leadership was worried by the tides of popular uprising. Gandhi criticized the Sholapur revolt and the "indiscipline" of the Garhwali troops in Peshawar. On the 5th May, 1931, the Viceroy Irwin and Gandhi together signed a truce. Within a fortnight, the foremost revolutionary Bhagat Singh was hanged alongwith his two comrades Shivram Hari Rajguru and Sukhdev. In protest there was heard all over India a new slogan "Inquilab Zindabad" (Long live revolution). The tumuliuous youthful society raised the Hindi slogan "What did the youth get? The hanging of Bhagat Singh". Yet the Karachi Congress accepted the Gandhi-Irwin Pact. Gandhi arrived in England for the Round Table conference, but had to return empty handed. The movement went on for quite some time more. Then in 1934 the Congress working committee unconditionally withdrew The Civil Disobedience Movement and two months later by a declaration the Government proscribed the Communist Party of India. According to the Government of India Act of 1935, provincial elections were announced for 1937. Before that in 1936 in the Lucknow Congress special Session, Jawaharlal Nehru in his presidential address announced that freedom was India's first objective, after which socialism would be necessary for eradicating poverty in the country. The National Congress would also have to join the worldwide movement against Fascism and Imperialism.

    The Leftists in the country announced their support for Jawaharlal. They included the recently organized Congress Socialist Party, the followers of M.N. Roy and the Communists. The All India Kisan Sabhaand the All-India Students Federation were built up. The Indian national movement made its support known for the imperiled democracy of Spain, and for China, devastated though unvanquished by Japanese attacks. Rabindranath himself was the Chairman of the Committee for the support of Spanish democracy. Jawaharlal Nehru journeyed to the battle fields of Spain to express his solidarity. The Marathi Communist,Bal Mukund Huddad fought rifle in hand in the International Brigade. A five member medical mission was sent to succour China: one of its members Dr. Dwarakanath Kotnis accepted martyrdom on Chinese soil.

    Congress candidates were elected amidst great enthusiasm in most Provinces in the 1937 election. Hopes were aroused that all detenues would be released. Revolutionary prisoners in the Andaman Islands went on hunger strike on the demand for freedom. There was a largeprocession of students in Calcutta on the basis of the demand for freeing the prisoners. Rabindranath himself blessed their effort. Only ten percent of the detenues were not released. But the Chittagong rebels, Bhagat Singh's comrades and some others remained in prison.

    Subhas Chandra Bose was elected Congress President at Haripura in 1938. At the Tripuri Congress, defeating the Rightist candidate Pattabhi Sitaramayya, and with the support of the combined left, Subhas Chandra was once again elected President. The Right Congress elements forced Subhas out of this position. Subhas Chandra organized a new left grouping, the Forward Bloc. With Sub has support, the Congress socialists, Royists and Communists built up the Left Consolidation Committee. At this time came the second World War. The British Government began large scale arrests of communists and Leftists. The Congress leadership too was not left alone. On 22 June, 1941, Hitler attacked the Soviet Union. On the 7th December, Japan declared war on England and the United States of America. Practically the whole of the Europe was then under the heel of Hitlerite Germany. Japan brought South-East Asia under its grip.

    At this time came the Second World War. The British Government began large-scale arrests of Communists and Leftists. The Congress leadership too was not left alone. on 22 June, 1941, Hitler attacked the Soviet Union. On the 7th December, Japan declared war on England and the United States of America. Practically the whole of Europe was then under the heel of Hitlerite Germany. Japan brought South-East Asia under its grip.

    In this moment of crisis, the authorities released the Congress leadership from prison. Sir Stafford Cripps was sent by the British Cabinet to carryon discussions in this country. But the Cripps Mission was unsuccessful. Gandhiji rejected the Cripps proposals as "a post-dated cheque on a Crashing bank". On 8th August, 1942 in the All-India Congress Committee meeting, Gandhiji announced his fateful new strategy:

    "Karenge ya Marenge (we will do or die) British, quit India"

    Popular uprisings once again rocked various parts of India for a few months. Work closures and general strikes, uprooting of rail tracks, blowing up many bridges, took place. British authority broke down temporarily in Satara, Ballia, Azamgarh, Darbhanga, Parts of Contai and Tamluk: and popular initiative dreamt of building independent government. Deep roots grew in the popular consciousness that British government could be ended: this created the ground for popular uprising in post-war India.

    Hundreds of women children were martyred in the unforgettable "Quit India" popular uprising Matangini Hazra, Kanaklata Barua (of Assam), Hemu Kalani (of Sind)" Lakshman Nayak (of Orissa), Srishkumar (of Gujarat), Said Akbar (of the NWFP) and others have become immortal.

    Under the leadership of Communist-led peasant discontent in Malabar, four peasants of Kayyur village were arrested. They were hanged by British imperialism in 1943. They went to the gallows with the call "Long live the Revolution" on their lips.

    In the meanwhile in 1940, the Muslim league passed its Pakistan Resolution. Widespread propaganda was carried out during the War and after it for Pakistan.

    In 1941, Subhas Chandra was detained under house arrest. He dramatically fled from there to Kabul and then went by a circuitous route to Germany. From there, he was taken to Japan. In October 1943, he formally established the Azad Hind Sarkar (the national India Government) and organized the Azad Hind Fauj - a militant representation of Hindu-Muslim unity. The fearless armed struggle of the Indian National Army under the direction of Netaji Subhas opened new dimensions in the Indian national movement. Though ultimately defeated in battle, they were able to raise The Indian national flag before Kohima in Nagaland: this did inspire their countrymen.

    The war came to an end. Anti-imperialist mass uprisings broke out all over South-East Asia. Unprecedented popular unrest too was felt in India. In Calcutta, on 21 November, 1945, and again on Rashid Ali Day in February, 1946, students, workers and citizens, Hindus and Muslims jointly called for freeing undertriaI I.N.A. officers by a general strike, barricades were raised in the city's streets, and in the industrial suburbs. Many young people were martyred 'Rameswar, Salam and many others.

    A wave of unrest lapped across the armed forces. The Royal Indian Navy ratings mutinied in Bombay and Karachi. They came into armed conflict with the British authorities. The organized working class went on strike in solidarity with the naval mutineers. Three hundred workers and naval mutineers were killed, eminent among them the Communist woman leader, Kamal Dhonde.

    Widespread popular movements took place in the rural areas and in the Princely States. A crore of Hindu, Muslim, Harijans, Adivasis and poor peasants raised the struggle for Tebhaga in the Bengal villages. In Travancore, in protests against the government of the reactionary Diwan, the heroes of Punnapra-VayaJar lost their lives in popular revolt.Shaikh Abdulla led the popular movement against the princely authorities in Kashmir. In Hyderabad, the unforgettable armed struggle in Telengana against Nizam's rule started at this time. Imperialism rattled at the popular uprising, began to hurriedly close its ranks with the national leaders. A Cabinet Mission arrived with proposals to give India complete independence. But in whose hands could power be transferred—to united India or to a truncated India and to Pakistan? Violent dissension broke out over this question. British imperialism stoked communally divisive forces. On the 16th August, 1946, the bloodstained fratricidal conflict which began in Calcutta, reached its fulfillment in the 2nd June Mount Batten Declaration about the partition of India.

    On the 15th August 1947 came the long-awaited freedom of India. But among all the joy remained the anguish of the operation performed on the motherland, breaking it into two moieties. Yet freedom did come. The sprouts of freedom bloomed in the soil soaked by the blood of thousands of martyrs who had fallen in the century and a half long fight for it. We have presented here an exceptionally abbreviated account of that freedom struggle as it traversed the tracks of a difficult path, rising or falling at times, so that the new and future generations of India can make some sense out of the freedom, won by blood, which is gift of their heritage.

    (Source - India’s Struggle for Freedom – An Album Published by the Department of Information & Cultural Affairs, Government of West Bengal 1987)



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    भाजपा की तो बल्ले बल्ले, बंगाल में भगवा वोटों की वजह से दर्जनभर सीटों में कुछ भी हो सकता है!

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



    चुनाव सर्वेक्षण में भले ही इसे नजरअंदाज कर दिया गया है और दूसरे राजनीतिक दल भले ही अपने अपने समीकरण से बल्ले बल्ले हैं,हकीकत यह है कि बंगाल में केशरिया लहर खूब है और कम से कम दर्जनभर सीटों में भगवा वोटों की वजह से कुछ भी हो सकता है।भाजपा ने हावड़ा, बारासात, वनगांव, बारुईुपुर , राणाघाट, हुगली, आसनसोल लोकसभा क्षेत्रों में अपनी ताकत बढ़ाई है और जीत के लिए मैदान में वजनदार उम्मीदवार उतारे हैं। हुगली से चंदन मित्र,आसनसोल से बाबुल सुप्रिय और बारासात से जादूगर पीसी सरकार बेहद दमदार उम्मीदवार हैं तो बारुईपुर में संघी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा दक्षिण 24 परगना में भी केशरिया लहराने के लिए लामबंद हैं। पहाड़ों में दार्जिलिंग,जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से भाजपा के हैरतअंगेज नतीजे निकालने के आसार हैं।तो दमदम और कृष्णनगर में भाजपाई जीत के अतीत से कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद है।दीदी का अंध वाम विरोध वामदलों का सफाया तो कर सकता है लेकिन वह बंगाल और बाकी देश में दरअसल संघ परिवार और भाजपा केहित में सबसे बेहतरीन मोका है।दीदी के वाम विरोध की वजह से तीसरा मोर्चा आकार ले ही नहीं पाया।बंगाल में साफ हो जाने के बाद वाम पक्ष का सही मायने में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप न बंगाल में संभव है और न बाकी देश में।इसी तरह वामदल भी दीदी का खेल गुड़ गोबर करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे।भाजपा की तो बल्ले बल्ले है।


    दरअसल लोग यह भूल जाते हैं कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी और एनसी चटर्जी की अगुवाई में ही बंगाल में बजरिये हिंदुत्व राजनीति शुरु हुई।श्यामाप्रसाद बाबू तो भारतीय जनसंघ के संस्थापक हैं, इसी जनसंघ का आधुनिक कायाकल्प भाजपा है।1977 में जिस जनतादल ने बंगाल में लोकसभा चुनावों में कमाल किया थी ,उसके उम्मीदवार भी संघी ज्यादा थे। 1977 से संघ परिवार की विचारधारा और उसके कैडरआधारित संगठन को वामपंथियों का मुकाबला करना पड़ा।इस लंबी अवधि मेंं दार्जिलिंग में गोरखा समर्थन से लोकसभा चुनाव तो भाजपा ने जीता ही,माकपाइयों के गढ़ दमदम में भी तपनसिकदर दो दो बार जीते और बतौर दमदम के संसदीय प्रतिनिधि ममता बनर्जी के प्रबल प्रतिरोध के बावजूद केंद्र में मंत्री रहे।कृष्णनगर सीट भी वामजमाने में बाजपा ने माकपाइयों से छीनी है।