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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    बारह बरस से भटकती रूहें और एक चुनाव सर्वे: प्‍यू रिसर्च सेंटर का ओपिनियन पोल

    अभिषेक श्रीवास्‍तव 

    इतिहास गवाह है कि प्रतीकों को भुनाने के मामले में फासिस्‍टों का कोई तोड़ नहीं। वे तारीखें ज़रूर याद रखते हैं। खासकर वे तारीखें, जो उनके अतीत की पहचान होती हैं। खांटी भारतीय संदर्भ में कहें तो किसी भी शुभ काम को करने के लिए जिस मुहूर्त को निकालने का ब्राह्मणवादी प्रचलन सदियों से यहां रहा है, वह अलग-अलग संस्‍करणों में दुनिया के तमाम हिस्‍सों में आज भी मौजूद है और इसकी स्‍वीकार्यता के मामले में कम से कम सभ्‍यता पर दावा अपना जताने वाली ताकतें हमेशा ही एक स्‍वर में बात करती हैं। यह बात कितनी ही अवैज्ञानिक क्‍यों न जान पड़ती हो, लेकिन क्‍या इसे महज संयोग कहें कि जो तारीख भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक कालिख की तरह यहां के फासिस्‍टों के मुंह पर आज से 12 साल पहले पुत गई थी, उसे धोने-पोंछने के लिए भी ऐन इसी तारीख का चुनाव 12 साल बाद दिल्‍ली से लेकर वॉशिंगटन तक किया गया है?

    मुहावरे के दायरे में तथ्‍यों को देखें। 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्‍टेशन पर साबरमती एक्‍सप्रेस जलाई गई थी जिसके बाद आज़ाद भारत का सबसे भयावह नरसंहार किया गया जिसने भारतीय राजनीति में सेकुलरवाद को एक परिभाषित करने वाले केंद्रीय तत्‍व की तरह स्‍थापित कर डाला। ठीक बारह साल बाद इसी 27 फरवरी को 2014 में नरेंद्र मोदी की स्‍वीकार्यता को स्‍थापित करने के लिए दो बड़ी प्रतीकात्‍मक घटनाएं हुईं। गुजरात नरसंहार के विरोध में तत्‍कालीन एनडीए सरकार से समर्थन वापस खींच लेने वाले दलित नेता रामविलास पासवान की दिल्‍लीमें नरेंद्र मोदी से होने वाली मुलाकात और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन;तथा अमेरिकी फासीवाद के कॉरपोरेट स्रोतों में एक प्‍यू रिसर्च सेंटरद्वारा जारी किया गया एक चुनाव सर्वेक्षण, जो कहता है कि इस देश की 63 फीसदी जनता अगली सरकार भाजपा की चाहती है। प्‍यू रिसर्च सेंटर क्‍या है और इसके सर्वेक्षण की अहमियत क्‍या है, यह हम आगे देखेंगे लेकिन विडंबना देखिए कि ठीक दो दिन पहले 25 फरवरी 2014 को न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस नामक एक कांग्रेस समर्थित टीवी चैनल द्वारा 11 एजेंसियों के ओपिनियन पोल का किया गया स्टिंग किस सुनियोजित तरीके से आज ध्‍वस्‍त किया गया हैठीक वैसे ही जैसे रामविलास पासवान का भाजपा के साथ आना पिछले साल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीदवारी के खिलाफ नीतिश कुमार के एनडीए से निकल जाने के बरक्‍स एक हास्‍यास्‍पद प्रत्‍याख्‍यान रच रहा है। 




    न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस ने तो तमाम देसी-विदेशी एजेंसियों के सर्वेक्षणों की पोल खोल ही दी थी, लेकिन आज आए प्‍यू के पोल की स्‍वीकार्यता देखिए किसभी अखबारों और वेबसाइटों ने उसेप्रमुखता से प्रकाशित किया है और कहीं कोई आपत्ति का स्‍वर नहीं है। दरअसल, ओपिनियन पोल की विधि और तकनीकी पक्षों तक ही उनके प्रभाव का मामला सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पीछे की राजनीतिक मंशा को गुणात्‍मक रूप से पकड़ना भी जरूरी होता है। इसलिए सारे ओपिनियन पोल की पोल खुल जाने के बावजूद आज यानी 27 फरवरी को गोधरा की 12वीं बरसी पर जो इकलौता विदेशी ओपिनियन पोल मीडिया में जारी किया गया है, हमें उसकी जड़ों तक जाना होगा जिससे कुछ फौरी निष्‍कर्ष निकाले जा सकें।

    एक पोल एजेंसी के तौर पर अमेरिका के प्‍यू रिसर्च सेंटर का नाम भारतीय पाठकों के लिए अनजाना है। इस एजेंसी ने मनमाने ढंग से चुने गए 2464 भारतीयों का सर्वेक्षण किया है और निष्‍कर्ष निकाला कि 63 फीसदी लोग भाजपा की सरकार चाहते हैं तथा 78 फीसदी लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। विस्‍तृत जानकारी किसी भी अखबार की वेबसाइट से ली जा सकती है, लेकिन हमारी दिलचस्‍पी पोल पर से परदा उठाकर उसके पीछे छुपे चेहरों को बेनक़ाब करने की है। ध्‍यान दें कि सवा अरब के देश में महज़ ढाई हज़ार लोगों के इस सर्वेक्षण को जारी करने की तारीख चुनी गई 27 फरवरी, जिस दिन रामविलास और मोदी दोनों अपने जीवन का एक चक्र पूरा करने वाले हैं। क्‍या कोई संयोग है यहकतई नहीं।

    प्‍यू रिसर्च सेंटर वॉशिंगटन स्थित एक अमेरिकी थिंक टैंक है जो अमेरिका और बाकी दुनिया के बारे में आंकड़े व रुझान जारी करता है। इसे प्‍यू चैरिटेबल ट्रस्‍ट्स चलाता और वित्‍तपोषित करता है, जिसकी स्‍थापना 1948 में हुई थी। इस समूह में सात ट्रस्‍ट आते हैं जिन्‍हें 1948 से 1979 के बीचसन ऑयल कंपनी के मालिक जोसेफ प्‍यू के चार बेटे-बेटियों ने स्‍थापित किया था। सन ऑयल कंपनी का ब्रांड नाम सनोको है जो 1886 में अमेरिका के पेनसिल्‍वेनिया में बनाई गई थी। इसका मूल नाम पीपुल्‍स नैचुरल गैस कंपनी था। कंपनी के मालिक जोसेफ प्‍यू के सबसे बड़े बेटे जे. हॉवर्ड प्‍यू (ट्रस्‍ट के संस्‍थापक) 1930 के दशक में अमेरिकन लिबर्टी लीगकी सलाहकार परिषद और कार्यकारी कमेटी के सदस्‍य थे और उन्‍होंने लीग को 20,000 डॉलर का अनुदान दिया था। यह लीग वॉल स्‍ट्रीट के बड़े अतिदक्षिणपंथी कारोबारियों द्वारा बनाई गई संस्‍था थी जिसका काम अमेरिकी राष्‍ट्रपति रूज़वेल्‍ट का तख्‍तापलट कर के वाइट हाउस पर कब्‍ज़ा करना था। विस्‍तृत जानकारी 1976 में आई जूलेस आर्चर की पुस्‍तक दि प्‍लॉट टु सीज़ दि वाइट हाउस में मिलती है। हॉवर्ड प्‍यू ने सेंटिनेल्‍स ऑफ दि रिपब्लिक और क्रूसेडर्स नाम के फासिस्‍ट संगठनों को भी तीस के दशक में वित्‍तपोषित किया था।

    प्‍यू परिवार का अमेरिकी दक्षिणपंथ में मुख्‍य योगदान अतिदक्षिणपंथी संगठनों, उनके प्रचारों और प्रकाशनों को वित्‍तपोषित करने के रूप में रहा है। नीचे कुछ फासिस्‍ट संगठनों के नाम दिए जा रहे हैं जिन्‍हें इस परिवार ने उस दौर में खड़ा करने में आर्थिक योगदान दिया:

    1. नेशनल एसोसिएशनऑफ मैन्‍युफैक्‍चरर्स: यह फासीवादी संगठन उद्योगपतियों का एक नेटवर्क था जो न्‍यू डील विरोधी अभियानों में लिप्‍त था और आज तक यह बना हुआ है।

    2. अमेरिकन ऐक्‍शन इंक: चालीस के दशक में अमेरिकन लिबर्टी लीग का उत्‍तराधिकारी संगठन।

    3. फाउंडेशन फॉर दि इकनॉमिक एजुकेशन: एफईई का घोषित उद्देश्‍य अमेरिकियों को इस बात के लिए राज़ी करना था कि देश समाजवादी होता जा रहा है और उन्‍हें दी जा रही सुविधाएं दरअसल उन्‍हें भूखे रहने और बेघर रहने की आज़ादी से मरहूम कर रही हैं। 1950 में इसके खिलाफ अवैध लॉबींग के लिए जांच भी की गई थी।

    4. क्रिश्चियन फ्रीडम फाउंडेशन: इसका उद्देश्‍य अमेरिका को एक ईसाई गणराज्‍स बनाना था जिसके लिए कांग्रेस में ईसाई कंजरवेटिवों को चुनने में मदद की जाती थी।

    5. जॉन बिर्च सोसायटी: हज़ार इकाइयों और करीब एक लाख की सदस्‍यता वाला यह संगठन कम्‍युनिस्‍ट विरोधी राजनीति के लिए तेल कंपनियों द्वारा खड़ा किया गया था।

    6. बैरी गोल्‍डवाटर: वियतनाम के खिलाफ जंग में इसकी अहम भूमिका थी।

    7. गॉर्डन-कॉनवेल थियोलॉजिकल सेमिनरी: यह दक्षिणपंथी ईसाई मिशनरी संगठन था जिसे प्‍यू ने खड़ा किया था।

    8. प्रेस्बिटेरियन लेमैन: इस पत्रिका को सबसे पहले प्रेस्बिटेरियन ले कमेटी ने 1968 में प्रकाशित किया, जो ईसाई कट्टरपंथी संगठन था।

    जोसेफ प्‍यू की 1970 में मौत के बाद उनका परिवार निम्‍न संगठनों की मार्फत अमेरिका में  फासिस्‍ट राजनीति को फंड कर रहा है:

    1. अमेरिकन इंटरप्राइज़ इंस्‍टीट्यूट, जिसके सदस्‍यों में डिक चेनी, उनकी पत्‍नी और पॉल उल्‍फोविज़ जैसे लोग हैं।

    2. हेरिटेज फाउंडेशन, जो कि एक नस्‍लवादी, श्रम विरोधी, दक्षिणपंथी संगठन है।

    3. ब्रिटिश-अमेरिकन प्रोजेक्‍ट फॉर दि सक्‍सेसर जेनरेशन, जिसे 1985 में रीगन और थैचर के अनुयायियों ने मिलकर बनाया और जो दक्षिणपंथी अमेरिकी और ब्रिटिश युवाओं का राजनीतिक पोषण करता है।

    4. मैनहैटन इंस्टिट्यूट फॉर पॉलिसी रिसर्च, जिसकी स्‍थापना 1978 में विलियम केसी ने की थी, जो बाद में रीगन के राज में सीआइए के निदेशक बने।

    उपर्युक्‍त तथ्‍यों से एक बात साफ़ होती है कि पिछले कुछ दिनों से इस देश की राजनीति में देखने में आ रहा था, वह एक विश्‍वव्‍यापी फासिस्‍ट एजेंडे का हिस्‍सा था जिसकी परिणति ऐन 27 फरवरी 2014 को प्‍यू के इस सर्वे में हुई है। शाह आलम कैंप की की भटकती रूहों के साथ इससे बड़ा धोखा शायद नहीं हो सकता था। यकीन मानिए, चौदहवीं लोकसभा के लिए फासीवाद पर अमेरिकी मुहर लग चुकी है।

    (समकालीन तीसरी दुनिया के मार्च अंक में प्रकाशित होने वाले विस्‍तृत लेख के मुख्‍य अंश) 

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    मलकपुर शिविर, शामली। अपनी बीमार मां और हताश पिता के बीच चार लोगों के परिवार के लिए आटा गूंधते हुए निसा कैमरा देखकर रुकती नहीं। बस मुस्करा देती है। पास की खाट पर उसकी मां की सांसें दमे से उखड़ रही हैं और पिता धुआं उगलते चूल्हे में आग जलाने की कोशिश कर रहे हैं।innocent-smile-photo-reyaz

    बिना दीवारों वाली यह एक ऐसी जगह है जहां रातों में तापमान दो डिग्री तक गिर जाता है। हवा से बचाव के लिए उनके पास पॉलिथीन की चादरों, फटे कपड़ों और चीथड़े हो चुके कंबलों के अलावा कुछ नहीं है। आसपास गन्ने की सूखी हुई पत्तियां हैं, लकड़ी की चिन्नियां हैं, न्यूमोनिया से मरते बच्चों की फेहरिश्त है, खाली पेट दिन गुजारने की मजबूरियां हैं और अपने घर से बेदखल कर दिए जाने की जलील यादें हैं। इन सबके बीच वह कौन सी चीज है जो उन्हें कैमरे के सामने मुस्करा उठने के लिए तैयार करती है?

    क्या यह सिर्फ कैमरे के आगे खड़े होकर मुस्कराने की आदत भर है?

    लेकिन यह मुमकिन नहीं है। मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर और बागपत के जो एक लाख से ज्यादा लोग अपने घरों से उजाड़ दिए गए हैं, गुजर बसर की आखिरी उम्मीदें भी जिनसे छीन ली गई हैं, जिनकी हरेक पुरानी चीज को उनकी जिंदगी से बाहर कर दिया गया है- यह सिर्फ एक आदत भर नहीं हो सकती कि वे कैमरे के आगे मुस्कराएं।

    इसका संबंध काफी हद तक इससे है कि वे अपनी जिंदगी में फोटोग्राफ्स को किस तरह लेते आए हैं।

    यह यकीन किया जाता है कि फोटोग्राफ किसी एक चुने हुए पल को हमेशा के लिए, या कम से कम लंबे समय तक के लिए, सहेज कर रख लेता है। वक्त गुजर जाता है, आदमी गुजर जाते हैं, जगहें बदल जाती हैं, लेकिन तस्वीरों में बचा कर रखा हुआ वह पल ज्यों का त्यों बना रहता है। बदले हुए हालात में वह उस जिंदगी की यादगार के रूप में मौजूद रहता है। फोटोग्राफ द्वारा यह भूमिका अपना लेने के कारण इंसानी याद्दाश्त पर उस खास मौके को हमेशा ज्यों का त्यों बचा कर रखने की जिम्मेदारी नहीं रहती। और चूंकि एक फोटोग्राफ भौतिक रूप में मौजूद रहता है न कि महज किसी की याद में, इसलिए वह सबके लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होता है। इस सहूलियत के कारण फोटोग्राफ्स को उन हालात के एक सच्चे सबूत की तरह लिया जाता है, जिनसे एक खास वक्त में जिंदगी को गुजरना पड़ा था।

    यानी ये आदतें नहीं बल्कि यादें हैं, जो इन हालात में फोटोग्राफ के लिए तैयार होने को सहज बनाती हैं।

    वे यादें खौफ और आतंक में डूबी हुई रातों की यादें हैं। जब मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर और बागपत के दूर दराज के उनके गांवों में प्रभुत्वशाली हिंदू भू-स्वामी जातियों तथा खाप पंचायतों के नेतृत्व में दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों द्वारा जनसंहार,औरतों पर यौन हमले, आगजनी और लूटपाट की गई। झूठी खबरों और अफवाहों के बूते पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया कि उनका गांवों में रहना मुमकिन नहीं रह गया। मुस्लिम आबादी वाले मुहल्लों पर हमले हुए, उनकी दुकानें और मकान लूट लिए गए। औरतों के खिलाफ किए गए अमानवीय अपराधों की ऐसी शिकायतें हैं, जिन पर एकबारगी यकीन नहीं होता। आरा मशीन पर उन्हें चीर देने की शिकायतें। कांच के टुकड़ों पर, निर्वस्त्र करके नाचने पर मजबूर करने की शिकायतें। मुस्लिम गोरी औरतों को हमलावरों द्वारा जबरन अपने घर में कैद कर रख लेने की शिकायतें।

    शामली जिले के फुगाना गांव में मेहरदीन की नंगी लाश पिंकू जाट के घर में बल्लियों से लटकी हुई मिली। एक दूसरे गांव में घटना की पड़ताल करने दिल्ली से गई एक टीम को कहा गया कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि मुसलमान कितनी संख्या में मार दिए गए? उनके तो बच्चे ज्यादा होते हैं।

    सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता। कम से कम उस व्यवस्था को तो बिल्कुल ही नहीं, जिसे बटन दबा कर बदल देने के दावों की गूंज अभी ठीक से खत्म भी नहीं हुई है। मेहरदीन की तरह सीधे हमले में मार दिए गए लोगों की तादाद सरकारी तौर पर अधिक से अधिक 80 है लेकिन गैर सरकारी तौर पर यह संख्या 130 के ऊपर जाती है। जो इन हमलों में जीवित बच गए वे एक अनिश्चित भविष्य में दाखिल हुए। उनमें से ज्यादातर पिछले चार महीनों से ज्यादा वक्त इन शिविरों में गुजार चुके हैं, जहां बाहर से आ रही नाकाफी मदद किसी तरह जिंदा रख पा रही है। कभी कभी वह भी नहीं। जैसे कि चित्तमखेड़ी, बागपत से आईं महबूबा के लिए अपनी बच्ची को भूल पाना मुश्किल हो रहा है। 2 दिसंबर को बुखार और उल्टी शुरू हुई तो उन्होंने पाया कि उसे ठंड लगी है। अगले दिन सबेरे वे उसे पास के कैराना कस्बे में एक डॉक्टर को दिखाने ले गईं। इंजेक्शन देकर इंतजार करने के बाद भी जब उसकी हालत नहीं सुधरी तो डॉक्टर ने उन्हें लौटा दिया। उस रात दो बजे उनकी बच्ची गुजर गई। खुशनुमा! अब बस यह एक नाम बचा रह गया है, एक खाली जगह की शक्ल में, जो यह महसूस कराता है कि वह बच्ची कभी इस दुनिया में हुआ करती थी।

    महबूबा के पति फावड़े की मजदूरी करते हैं। यानी जमीन के मालिक प्रभुत्वशाली तबके के खेतों में काम करते हैं। उनके पास अपनी जमीन कभी नहीं हुई। सांप्रदायिक हमलों में परिवार के उजड़ जाने और रोजगार खो बैठने के बाद उनके पास कुछ भी नहीं है, सिवाय इस तंबू के, जूट की रस्सियों से बुनी हुई एक खाट के, दर्जन पर कपड़ों के और कुछ बर्तनों के। आप इसे एक दुस्वप्न भरी जिंदगी कह सकते हैं, जो पिछले साल सितंबर में शुरू हुई।

    लेकिन महबूबा के लिए इसकी शुरुआत कभी हुई ही नहीं। वे लोग इसे हमेशा से जीते आए हैं। अपनी सात साल की बेटी के बाल ठीक करते हुए वे बताती हैं, 'कई साल पहले मेरे ससुर बारू को बीच मोहल्ले में पीट पीट कर मार दिया गया। न कोई केस बना न किसी को सजा हुई। जिन्होंने मारा वे ऊंची जाति के हैं। जमीन उनकी है, पुलिस और सरकार में उनका रौब-दाब है। हम कौन हैं? हम तो उनकी हाजिरी में जीने वाले लोग हैं। हमारी कोई ताकत नहीं है। 'इस साल जब रमजान का महीना चल रहा था, जबरन उन्हीं तबकों से आने वाले लोगों ने मस्जिद पर से लाउडस्पीकर उतरवा दिया, जिस पर अजान दी जाती थी और रोजा खोलने के वक्त का ऐलान होता था। कोई कुछ न कर सका। महबूबा कहती हैं, 'बच्चे पूछते हैं कि हम मुसलमान क्यों हैं? हम जिस तरह जीना चाहते हैं, हमें इसकी आजादी क्यों नहीं है? हमारे पास आज तक एक मस्जिद तक नहीं है। बस एक चबूतरा है, जिसे हम मस्जिद कहते हैं। '

    और अब महबूबा से वह गांव भी छूट गया है जिसमें एक चबूतरेनुमा मस्जिद हुआ करती थी। और अगर सरकार की चली तो यह शिविर भी छूट जाएगा। प्रेस और अदालतों में राहत शिविरों की दुर्दशा की खबरों की चर्चा के बाद जबरन शिविरों को बंद कराया जाने लगा है। साल के पहले हफ्ते में, जब मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में तापमान शून्य के आसपास गिर गया था, पुलिस और प्रशासन ने जबरन शिविरों को खाली कराया। जिस वक्त महबूबा अपनी बच्ची के बाल संवार रही थीं, सरकारी अधिकारियों की गाडिय़ों का एक काफिला मलकपुर शिविर से धूल उड़ाता हुआ रवाना हुआ। वे इस शिविर को खाली कराने के लिए 12 घंटे में दूसरी बार आए थे। पहली बार वे आधी रात के बाद उस वक्त आए थे जब उन्हें उम्मीद थी कि लोग सो रहे होंगे। लेकिन परिवारों के मर्द और बच्चे सड़क को घेरे हुए रात भर बैठे थे, ताकि पुलिस को जबरन शिविर में घुसने से रोका जा सके। अगले दिन दोपहर में जब वे दोबारा आए तो फिर लोगों ने उन्हें घेर कर वापस लौटा दिया। इलाके में लगभग सभी शिविरों में यह कहानी थोड़े-बहुत अंतर से दोहराई गई।

    मलकपुर, नूरपुर खुरगान, सुनेठी और लोई जैसे करीब 25 राहत शिविरों में रह-रहे तीस हजार से अधिक लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है। शिविर छोड़ कर वे जाएंगे कहां? जिन लोगों ने पिछले चार महीनों में कभी अपने पुराने गांव लौटने की कोशिश की, उन्हें अपमान और धमकियां सहनी पड़ीं। खेड़ी गांव, जिला शामली के सलीम दिसंबर में एक बार अपने गांव लौटे थे। उनके मकान पर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के लोगों ने कब्जा कर लिया है। सलीम को देख कर उन्होंने गाली-गलौज की और कहना शुरू किया कि 'मुल्ले फिर आ गए। देखते हैं कि ये कैसे यहां रहते हैं। 'डरे हुए और अपमानित सलीम लौट आए।

    राज्य या केंद्र, किसी भी सरकार ने इनको फिर से बसाने की कोई कोशिश नहीं की है। लेकिन ये हमेशा के लिए विस्थापित जिंदगी जीते रहें, इसे यकीनी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। सरकार राहत शिविरों में रह रहे सभी लोगों को पीडि़त मानने को राजी नहीं। इसलिए उन्हें मुआवजा भी नहीं मिलेगा। अगस्त-सितंबर के दौरान इन इलाकों में हुए सांप्रदायिक हमलों के कारण 162 गांवों के मुसलमान विस्थापित हुए। लेकिन सरकार महज 9 गांवों को ही 'दंगाग्रस्त'स्वीकार करने को तैयार है। वे गांव हैं-लाक, लिसाढ़, बहावड़ी, कुतबा, कुतबी, मोहम्मदपुर रायसिंह, काकड़ा, फुगाना, और मुंडभर। सरकार इन गांवों के कुल 1800 परिवारों को प्रति घर पांच लाख की रकम मुआवजे के बतौर देने की बात कर रही है। लेकिन एक घर में अगर अनेक परिवार हों तब या तो यह रकम बंट कर बहुत थोड़ी सी रह जाएगी या फिर रकम किसी एक परिवार के पास ही रहेगी और बाकी परिवारों को कोई रकम नहीं मिल पाएगी। ऐसा अनेक मामलों में देखने में आया भी है।

    राज्य सरकार ने अब तक जिन गिने-चुने लोगों को मुआवजा राशि दी है, उन्हें इसके लिए एक हलफनामा दायर करना पड़ा है कि वे लौट कर अपने गांव नहीं जाएंगे। अगर गए तो यह राशि उनसे उसी तरह जब्त कर ली जाएगी जैसे बकाया लगान वसूला जाता है।

    बाकी 153 गांवों के विस्थापित लोगों के बारे में सरकार का कहना है कि वे मुआवजे के लालच में शिविरों में रह रहे हैं, जबकि उनका कोई नुकसान नहीं हुआ है। यह सही नहीं है। लोगों ने हमले से आतंकित होकर गांव छोड़ा और जो लोग पीछे रह गए वे मार दिए गए या लापता हैं, जैसे कि लिसाढ़ से आए अलीबाज के अब्बा के साथ हुआ। अगस्त-सितंबर में जब वे लोग गांव से भागे तो उनके अब्बा नसीरुद्दीन नहीं आए। उनके साथ-साथ 12 दूसरे लोगों ने भी गांव छोडऩा कबूल नहीं किया। अगले दिन वे सभी 13 लोग मार दिए गए। उनमें से सिर्फ दो की लाश मिल पाई। साफ है कि अगर लोग गांव से नहीं भागते तो मार दिए जाते।

    अलीबाज का एक सवाल है:'जिस घर में मेरे चाचा (अजमू), चाची (अलीमन) और अब्बा (नसीरुद्दीन) का कत्ल कर दिया गया, मैं वहां जाकर कैसे रह सकता हूं? मुझे यह भरोसा कौन दिलाएगा कि वहां मुझे मार नहीं दिया जाएगा?'

    अलीबाज ने सिर्फ अपने परिजन ही नहीं खोए हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी को लगातार तबाह होते देखा है। और यह एक ऐसी घटना है जिसे कैलेंडर की कुछ तयशुदा तारीखों में नहीं मापा जा सकता। यह इस व्यवस्था में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों का सामाजिक इतिहास भी बनाता है।

    पच्चीस साल पहले तक अलीबाज के पास अपने दो हथकरघे हुआ करते थे, जिस पर बुने कपड़ों को उनके मुहल्ले के लोग घूम-घूम कर बेचा करते थे। पूंजी की कमी, सूत की महंगाई और सरकारी मदद की गैर मौजूदगी में उन्हें यह काम बंद कर देना पड़ा। इसके बाद वे शहर की दुकानों से थोक में कपड़े खरीद कर गांव-गांव में बेचने लगे। लेकिन 20 साल यह काम करने के बाद इस काम को भी बंद कर देना पड़ा, क्योंकि उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं बच पाती थी। सो उन्होंने घूम-घूम कर रद्दी-कबाड़ खरीद कर बेचना शुरू किया। इस धंधे में उनका यह तीसरा साल था। लेकिन अब धंधा भी हाथ से गया और थोड़ी बहुत जमा पूंजी भी। उनके पास कुल मिला कर 300 गज जमीन हुआ करती थी, जिस पर उनके घर के सात कमरे थे। उन्हें दुख इस बात का है कि जब हिंदू समूह ने हमला किया तो उनमें वे दलित भी थे, जिनके पास उन्हीं जितनी जमीन है। या उतनी भी नहीं। वे समझ नहीं पाते कि आखिर दलितों को उनसे क्या शिकायत थी?

    अगर इलाके में जमीन के मालिकाने पर नजर डालें तो इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इलाके में ज्यादातर जमीनों के मालिक संपन्न जाट हैं। सबसे संपन्न 4.78 फीसदी लोगों के पास कुल भूमि का 26.73 फीसदी मालिकाना है, जबकि सबसे नीचे के 60 फीसदी लोगों के पास करीब 20 फीसदी जमीन है। जाहिर है इस दूसरे समूह के पास बहुत छोटी जोतें हैं-एक हेक्टेयर से भी कम। भूमिहीन लोगों में मुस्लिम और दलित सबसे बड़े दो समूह हैं। वे अपनी आजीविका के लिए जाटों के खेतों और उनके द्वारा संचालित दूसरे धंधों पर निर्भर हैं। वे एक दूसरी वजह से भी निर्भर हैं। संपन्न जाट महाजनी का एक समांतर धंधा भी करते हैं। वे10 फीसदी तक के ऊंचे सूद पर पैसा गरीब भूमिहीनों को देते हैं। कुरमल गांव से आकर नूरपुर खुरगान में रह रहे दिलशाद ने 2003 में 40 हजार रुपए एक जमींदार सूदखोर से लिए थे, जिसके बदले में उन पर 2006 में एक लाख 80 हजार रुपए की देनदारी थी। पैसा न चुका पाने की हालत में उन्हें जमींदारों के यहां बंधुआ मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है, जो ज्यादातर मामलों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। इस प्रभुत्वशाली तबके का कानूनी और साथ साथ कानून के बाहर के राजनीतिक-सामाजिक संगठनों पर पूरा कब्जा होता है—चाहे वह पंचायतों के सरपंच हों, मुखिया हों या प्रधान या फिर खाप पंचायतें हों। उनका पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर पूरा नियंत्रण होता है। दिलशाद ने मुसलमानों द्वारा झेले जा रहे सामंती उत्पीडऩ और हमले के डर के बारे में बताया, 'अगर हम नए कपड़े पहनें तो वे हमें गाली देते हैं और सुअर कहते हैं। वे हमारे साथ गाली के बगैर बात ही नहीं करते …और तो और वे किसी को भी कभी भी गिरफ्तार करा सकते हैं। '

    खेती से होने वाली आय को सूद पर चलाने और बाजार की स्थिरता के बीच भारी मशीनों के इस्तेमाल की वजह से खेती की उत्पादकता में कोई खासी तरक्की नहीं दिखी है, राज्य की उत्पादकता में सात फीसदी वृद्धि दर के बरक्स इस इलाके में खेती की वृद्धि दर महज 4.5 फीसदी है। जाहिर है कि बड़े किसान, जो ज्यादातर गन्ने की खेती करते हैं और जिन्हें अपर्याप्त सरकारी समर्थन मूल्य की शिकायत रही है, संकट का सामना कर रहे हैं। इस संकट का एक दूसरा पहलू भी है। इस संकट ने एक सामाजिक तनाव को पैदा किया है, जिसका नतीजा सांप्रदायिक हमले के रूप में सामने आया है और जो पूरे देश में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के खिलाफ लगातार बढ़ रहे हमलों का ही एक हिस्सा है। दलित तबका आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न और भूस्वामी जाट तबके पर इस कदर निर्भर है, कि वह उनके दबाव से तब बाहर नहीं जा सका, जब खाप पंचायतों के जरिए आरएसएस और संपन्न तबके ने मुसलमानों पर हमले की योजना पर अमल किया।

    इसलिए, जिन्हें मुआवजा नहीं मिला है, वे भी अब अपने गांव नहीं लौटना चाहते। अब दोबारा उस बंधुआ जिंदगी को जीने की चाहत उनमें नहीं है।

    वे अपने गांव नहीं लौट सकते। वे शिविरों में नहीं रह सकते। उनके पास कोई संसाधन नहीं हैं। वे कहां जाएं?

    महबूबा गुस्से में हैं, 'आग लगा दो अपने मुआवजे में। मेरी बच्ची को जिंदा कर दो। '

    जिस जगह पर उनकी बच्ची दफन है, उसे छोड़कर वे कहीं नहीं जाएंगी।

    याद! अपनी मरी हुई बच्ची की याद, जो इस जमीन पर दफन है। इसलिए वे इस जमीन से नहीं जाएंगी। इंसान किसी को क्यों याद करता है। अब हम उस जगह पर पहुंच गए हैं जहां हम यह सवाल कर सकते हैं—चीजें याद में क्यों बनी रहती हैं? खासकर अगर वह नाइंसाफी और जुल्म से, गुनाह और जुर्म से जुड़ी हुई हों? ऐसी यादों के बने रहने के साथ यह उम्मीद जुड़ी होती है कि इनका कभी इंसाफ होगा। इंसाफ की यह उम्मीद किसी हुकूमत या व्यवस्था से भी हो सकती है और किसी ऐसी ताकत से भी जिनके बारे में उन्हें यकीन हो कि वह मौजूद है और वह सब कुछ देखती और इंसाफ करती है।

    हुकूमत और व्यवस्था ने उनके सामने बार- बार यह साफ किया है कि वे उनसे कोई उम्मीद नहीं रखें। ठंड से ठिठुरते हुए जिन हफ्तों में उन्हें पुलिस और प्रशासन से शिविरों की हिफाजत के लिए रात-रात भर सड़कों पर जागते हुए बैठना पड़ा, उत्तर प्रदेश की सरकार और प्रशासन मुलायम सिंह के गांव सैफई में भव्य जलसे में जुटा हुआ था। इस आयोजन में 200 से 300 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसके अलावा सात हजार की आबादी वाले इस गांव के लिए 334 करोड़ रुपए की योजनाएं मौजूदा सरकार के दौरान घोषित की गई हैं। लेकिन सांप्रदायिक हमलों में तबाह लोगों को बहाल करने की जरूरत इस सरकार को कभी महसूस नहीं हुई।

    अगर सरकार और मौजूदा व्यवस्था इस इंसाफ को यकीनी नहीं बनाती तो जब तक यह इंसाफ मिल नहीं जाता, तब तक के लिए जरूरी है कि अपराध के सबूत बने रहें। और जिनके खिलाफ ये अपराध किए गए हैं, वे भी। बदहाली और तकलीफों से गुजर रही जिंदगी के बीच कैमरे के सामने अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने में किसी झिझक के न होने के पीछे यह जिद है। राहत शिविरों में रह रहे हजारों लोग महसूस करते हैं कि उन पर किया गया हमला एक कौम के रूप में उनके अस्तित्व पर किया गया हमला है। वे महसूस करते हैं कि एक पूरे समुदाय के रूप में उनकी जिंदगी को तबाह कर देना इस हमले का मकसद है। वे यह भी बताते हैं कि यह ऐसा हमला नहीं है, जिसे महज तारीखों के साथ गिनाया जा सके। यह शायद उनके होने के साथ ही शुरू हो गया था। इसलिए, जब वे काले से डिब्बे के भीतर एक शटर के खुलने और बंद होने के बीच कैमरे की तरफ देखना चुनते हैं तो वे एक बयान दे रहे होते हैं कि एक संप्रदाय के रूप में मिटा दिए जाने की सारी कोशिशों के बावजूद वे बने हुए हैं। यहां, इस तरह, हाड़ मांस की शक्ल में। रगों में दौड़ते हुए खून और आती जाती सांसों के साथ, ताकि सनद रहे।

    वे जानते हैं कि अगर यादें बनी रहीं तो इंसाफ की उम्मीदें भी बची रहेंगी। अगर उन्हें भुला दिया गया तो जुर्म का आखिरी सबूत भी मिट जाएगा। वे देखते हैं कि कैसे उनकी सारी तकलीफों को, उनके दर्द और उनकी बेदखली को पिछले चार महीनों में झुठलाने की कोशिशें हुई हैं। ये कोशिशें तब हुई हैं जब एक लाख लोग इन चार महीनों में उजड़े और राहत शिविरों में बसने को मजबूर किए गए। अगर वे यहां से चले गए तो क्या कोई मानेगा कि यहां कोई जुर्म हुआ भी था? अगर इस जुर्म के होने को स्वीकार करना है तो सबसे पहले उनकी मौजूदगी को भी स्वीकार करना होगा, जिन के खिलाफ जुर्म हुआ।

    जाहिर है अब तक उन्हें निराशा ही मिली है। लेकिन इस दुनिया में ४म४ हाथ के तंबू के सामने अपने परिवार के लिए आटा गूंथती इस लड़की की तस्वीर जब तक रहेगी, वह इंसानी याद को इस बेचैनी से निजात दिलाती रहेगी कि इंसाफ की जरूरत को साबित करने वाली अकेली वही नहीं है। एक तस्वीर भी है।

    नोट : इस लेख में फोटोग्राफी संबंधी कुछ बुनियादी स्थापनाओं के लिए लेखक जॉन बर्जर और सूसन सॉन्टैग का आभारी है।


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    भूमि अधिग्रहण कानून : एक सदी बाद का बदलाव और सार्थकता के सवाल

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    land-encroachment-by-stateपूरी एक सदी और दो दशक लग गए देश के सबसे महत्त्वपूर्ण और जन अधिकार से जुड़े एक कानून को बदलने में। 1894 के भूमि अधिग्रहण बिल की जगह 2014 की पहली तारीख से नया कानून लागू हो गया है। कहा जा रहा है कि यह उन तमाम नाइंसाफियों का जवाब है जो ब्रिटिश हुकूमत से आजाद देश में 66 साल तक चली आ रही थी।

    लेकिन क्या वाकई अपनी जमीन से बेदखल किए गए लोगों के लिए इस कानून में इंसाफ और अधिकार की गूंज उतनी ही ठोस और मौलिक है जैसा कि दावा किया जा रहा है या यह लोकप्रियतावाद के भेस में वही पुराना हथकंडा है जिसके दम पर जमीनों के असली मालिकों को देखते ही देखते वंचित और भूमिहीन और विस्थापित बना दिया जाता रहा है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के मुताबिक आजादी के बाद से देश के करीब छह करोड़ लोग विकास प्रोजेक्टों के नाम पर विस्थापित किए गए हैं। इनमें से 40 फीसदी आदिवासी हैं।

    करीब 120 साल का वक्त लग गया एक जनविरोधी कानून को बदलने में। कैसी हैरानी है। 1894 का कानून जबरन अधिग्रहण को सही ठहराता था। जमीन पर कब्जे की नीयत बनते ही कार्रवाई शुरू हो जाती थी बगैर इसकी परवाह किए कि जमीन के मालिक पर इसका क्या असर पड़ेगा। वह कितना उत्पीडि़त होगा। उसकी सुनवाई का कोई जरिया नहीं था। जमीन अधिग्रहीत हो गई तो हो गई। पुनर्वास के मुद्दे पर ये कानून खामोश था। अरजेंसी का क्लॉज था ही नहीं। यानी कब्जे की क्या अनिवार्यता है इसे लेकर भी कानून नें कोई बात नहीं थी। मन किया और पैसा फेंका, जमीन अपनी। और मुआवजा! आधा अधूरा, मनमाना। सुप्रीम कोर्ट में कब्जे से जुड़ी मर्यादाओं की अनदेखी के कई मामले आए। जजों ने इस बात पर चिंता भी जताई कि यह कानून फ्रॉड बन गया है और साधारण मनुष्य के कल्याण की घोर अनदेखी करता है। कानून की आड़ में यह लूट चलती रही। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस कानून को बदले जाने की जरूरत भी बताई थी। लेकिन 66 साल से अधिग्रहण का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा और देश के कई हिस्से इसकी चपेट में आ गए। लोग तो जो बेहाल हुए सो हुए ही।

    इस सरकार ने भी 10 साल झोंक दिए यह समझने में कि कानून कितना खतरनाक और उपनिवेशी है। इससे उन दलों का किरदार भी सामने आया है जो किसी न किसी रूप में सरकारों मे भागीदार रहे हैं। उसे समर्थन करते रहे हैं। फिर वह चाहे बीजेपी हो या वामदल। इस कानून से इतर देश के आर्थिक और सामाजिक हालात को देखें तो विस्थापन ही सबसे बड़ी हलचल रही है। चाहे वह अधिग्रहण जैसी राजनैतिक आर्थिक गतिविधि से हो या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण या किसी दंगे जैसी घृणित मुहिम से। सरकारों के और नौकरशाही के रवैये ने भी समाज में एक ध्रुवीकरण बनाया है। मिसाल के लिए उत्तराखंड को ही देखें जहां बांध परियोजनाओं ने लोगों को रोजगार, नगद धन और अन्य कथित गारंटियों की एवज में अपने मूल स्थानों से बेदखल किया है। उत्तराखंड जैसे खेतिहर प्रदेश में आज खेती की हालत शोचनीय है और लोग खेती की जमीनों को बेच रहे हैं। पूंजी का ऐसा दुष्चक्र पहाड़ में फैला है कि इसका अंदाजा अभी योजनाबद्ध ढंग से सरकारी या गैरसरकारी स्तर पर लगाया ही नहीं जा सका है। न जाने इस मामले पर सरकारों की और गैर सरकार सरदारों की नींद कब टूटेगी।

    निर्माण को विकास का विकल्प बताकर जो देशव्यापी एजेंडा सरकारें, कॉरपोरेट और उनके दलाल चला रहे हैं उसने संस्कृति, भूगोल और समाज सबकुछ उलटपुलट दिया है। यह तब है जब विश्व बैंक और आईएमएफ पोषित कई एनजीओ सक्रिय हैं उन इलाकों में जिन्हें वलनरेबल कहा जाता है। इसी वलनरेबिलिटी के नाम पर एनजीओ की फंडिंग का निर्बाध प्रवाह जारी है। किसान खेती किसानी छोड़ कर मैदानों का रुख कर रहे हैं। मैदानों में उनके लिए जगहें नहीं हैं धक्के हैं। एक विराट आलस्य पूरी कौम पर पसर गया है। जैसा चल रहा है चलने दो का भाव यथास्थिति, निराशा और ऊब के साथ बना हुआ है। कोई भी राजनैतिक मूवमेंट कोई भी सामाजिक आंदोलन इस समय इस गतिरोध को तोडऩे के लिए आगे नहीं आया है। शायद है ही नहीं। जो दिखता है वह छिटपुट प्रतिरोध है। बेशक वह दमदार है लेकिन उससे हवाला लेकर आगे बढ़ाने वाली शक्तियां कुंद पड़ चुकी हैं।

    क्योंकि आगे बढ़ाने का दावा करने वाली शक्तियां किसी और ही विमर्श पर दो-चार हैं। यह सत्ता का विमर्श है। वे ऐसे कैसे हो गईं इसकी छानबीन भी की जा रही है लेकिन यह छानबीन भी चंद पन्ने भरकर और चंद आंकड़े इकट्ठा कर सोने चली जाती है। सोना इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है इस देश में। या तो टीवी देखेंगे या सोएंगे। या सोने की हास्यास्पद खोज करेंगे।

    बहरहाल लौटते हैं नए साल की पहली तारीख से अमल में आ गए इस भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुन:स्थापन अधिनियम, 2013(एलएआरआर—लार एक्ट) पर। इसमें न्यायसंगत मुआवजे के अधिकार और पारदर्शिता पर खास जोर दिया गया है। इसी के आसपास भूमिधारी समुदाय के हकहकूक के मसलों को कानून में रेखांकित किया गया है। मुकम्मल पुनर्वास इस कानून का मूल आधार है। बिना उसके कोई भी जमीन किसी भी किसान से देश के किसी भी हिस्से में किसी भी कीमत पर नहीं ली जा सकेगी। लेकिन जितना क्रांतिकारी यह कानून दिखाया गया है उतना यह है नहीं। सरकारी और पब्लिक प्राइवेट भागीदारी के जिन भी उपक्रमों के लिए जमीन चाहिए होगी उसका अधिग्रहण वहां के 70 फीसदी लोगों की रजामंदी के बाद हो जाएगा और विशुद्ध निजी उपक्रमों के लिए जनसहमति का यह प्रतिशत 80 का होगा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में तो 100 फीसदी का सुझाव आ गया था लेकिन उस मोड़ पर बिल लचीला हो गया।

    बिल में यूं अधिग्रहण को लेकर कुछ कड़े प्रावधान हैं। सही है कि नया कानून हक के रास्ते पर एक गनीमत की तरह आया है। इसमें जाहिर है विकास के उपनिवेशी मॉडल का मुखरता से विरोध करते आ रहे कुछ जनसंघर्षों और उनके पक्ष में खड़ी आवाजों का भी योगदान है। जवाबदेही इस कानून में लगभग अपरिहार्य कर दी गई है। और यह जवाबदेही जमीन की मंजूरी से शुरू होकर मुआवजे के आकार उसकी अवधि और मुकम्मल पुनर्वास तक जाती है। पुनर्वास के लिए गाइडलाइन तय की गई है। यह पहला बिल है जिसमें भूमि अधिग्रहण और उसमें शामिल आरएंडआर यानी रीसेटलमेंट और रीहैबिलटेशन की जरूरतों को जोड़ा गया है। कानून के पांच अध्याय और दो समूचे शेड्यूल पुनर्वास और पुन:स्थापन की प्रक्रिया की बारीकियां बताने के लिए रखे गए हैं। पुनर्वास और पुन:स्थापन से पहले कानून में मुआवजे के भुगतान का उल्लेख है जिसके तहत ग्रामीण इलाकों में जमीन की बाजार कीमत का चार गुना और शहरी इलाकों में बाजार मूल्य का दोगुना जमीन के मालिक को दिया जाएगा। इसमें कोई आयकर और स्टांप शुल्क भी नहीं लगेगा।

    आदिवासी और अनुसूचित इलाकों में तो जमीन अधिग्रहण अव्वल तो किया ही नहीं जा सकेगा और अगर होगा भी तो इसके लिए वहां जो भी स्थानीय जन प्रतिनिधित्व ढांचा सक्रिय होगा मिसाल के लिए ग्राम सभा तो उसके अनुमोदन के बाद ही जमीन ली जा सकेगी अन्यथा नहीं। ओडीशा नियमगिरी में वेदांता के खनन प्रोजेक्ट को वहां के आदिवासियों ने अपनी ग्राम सभाओं के जरिए ही पीछे धकेला था। लेकिन कानून में एक बड़ी खामी आदिवासियों के उचित चिह्निकरण की है। पांचवे शेड्यूल से बाहर भी देश में आदिवासी समुदाय है जिसकी संख्या जानकारों के मुताबिक कुल आदिवासी आबादी की कोई 50 फीसदी से ज्यादा बैठती है, उनकी जमीनों का क्या होगा।

    एक आकलन के मुताबिक देश का 90 फीसदी कोयला आदिवासी इलाकों में है। 50 प्रतिशत के करीब प्रमुख खनिजों के स्रोत वहीं हैं और कई हजार लाख मेगावाट की ऊर्जा संभावनाएं भी वहीं बिखरी हुई हैं। तो निशाने पर सबसे ज्यादा यही समुदाय है जो पूरे देश में बिखरा हुआ है। तो क्या यह बिल आर्थिक उदारवाद के ताजा चरण की आंधी में इन इलाकों को बचाएगा या उन्हें खोदने के लिए इस कानून की ढाल लेकर जाएगा। क्योंकि आदिवासियों के पास अंतत अपने जल जंगल जमीन के बाद जो बचता है वह संघर्ष और प्रतिरोध ही है। इस प्रतिरोध से टकराना सरकारों और निगमों के लिए आसान नहीं है सो यह कानून प्रतिरोध की दीवार में कुछ छेद कर सके, क्या असली मंतव्य यह तो नहीं। क्योंकि आखिरकार 'नेशनल इंटरेस्ट'भी तो एक तर्क रहा है, विकास के इस मॉडल का।

    यूं इस नए बिल में 26 सब्स्टेंशल यानी पक्के संशोधन किए गए हैं जिनमें से 13 संशोधन इस मामले पर गठित स्टैंडिंग कमेटी और 13 संशोधन मंत्री समूह के लाए हुए हैं। नए कानून के लागू होने के बाद लाजिमी हो गया है कि 13 और कानूनों में भी संशोधन किए जाएं जिनका संबंध किसी न किसी रूप में भूमि अधिग्रहण और बुनियादी ढांचे के विकास से है। इनमें सबसे प्रमुख तो कोयला क्षेत्र अधिग्रहण और विकास कानून 1957 और भूमि अधिग्रहण(खदान) कानून 1885, और राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 है। झारखंड और ओडीशा में कोयला और दूसरे खनन मामले स्थानीय लोगों में आक्रोश का कारण रहे हैं। दूसरे कानून जिनमें संशोधन अनिवार्य हो गया है वे हैं एटमी ऊर्जा कानून 1962, इंडियन ट्रामवेज एक्ट 1886, रेलवे एक्ट 1989, प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम 1958, पेट्रोलियम और खनिज पाइपलाइन एक्ट 1962, दामोदर घाटी निगम अधिनियम 1948, बिजली अधिनियम 2003, अचल संपत्ति अधिग्रहण अधिनियम 1952, विस्थापितों का पुनर्वास अधिनियम 1948, और मेट्रो रेलवे अधिनियम 1978।

    हालांकि जमीन अधिग्रहण से जुड़े इन सभी बिलों को एक छाता कानून के दायरे में लाने की वाम की मांग को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने नहीं माना। उनकी दलील है कि ऐसा करने के चक्कर में यह बिल ही अटक जाता। सरकार का दावा है कि नया कानून अगर सही भावना और सही इरादे से अमल में लाया गया तो यह नक्सल समस्या का एक बड़ा हल बन सकता है। नक्सलवाद के पनपने के पीछे आदिवासी इलाकों में हकहकूक पर अनैतिक और अवैध कब्जे, विस्थापन, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव ही है। लेकिन ये कानून आदिवासी हकों की कितनी परवाह करता है ये स्पष्ट नहीं है क्योंकि इसका मूल इरादा तो अवस्थापना विकास का ही है। यानी बड़े निवेश और बड़े प्रोजेक्टों के लिए जगह बनाना। आर्थिक उदारवाद के दूसरे तीसरे चौथे भाग को गति देने के लिए अब निवेश और निर्माण का सहारा लिया जा रहा है।

    नए कानून में जमीन अधिग्रहण बेशक आसान नहीं होगा लेकिन इसके दूसरे पहलू भी देखें। ऐसा तो है नहीं कि सरकार उदारवाद से पीछे हट गई है और मुक्त बाजार से उसका मोह टूट गया है। वह तो और मुक्तगामी हुई जा रही है। जो भी सरकार आएगी वह भला पीछे क्यों रहेगी। निर्माण परियोजनाएं लाइए लेकिन ऐसा तो नहीं हो सकता कि लोगों को कह दो तुम जाओ, ये पहाड़ जल जंगल जमीन आज से हमारे। तो बिल इस खुराफात को रोकेगा। लेकिन कब तक रोकेगा। क्या उसमें किसी भी हद तक जाकर या ऐसा कड़ा से कड़ा प्रावधान है जो राष्ट्रहित के नाम पर लोगों को बरगलाता जान पड़े तो फौरन कार्रवाई हो सके। क्या लोगों को अच्छीखासी नगद राशि या बड़े मुआवजे के झांसे में फंसाना कठिन होगा। क्या ग्राम सभाओं को 'मैनेज'करने की कुटिलता नहीं होगी। नया कानून कॉरपोरेट, निगमों और कंपनियों की संभावित 'अधमताओं'पर खामोश है और यही इसकी एक बुनियादी कमजोरी भी है।

    एक और आशंका देखिए। रियल एस्टेट और जमीन के कारोबार से जुड़े बड़े बिल्डर्स और बड़े ठेकेदारों के लिए इस बिल में पौ बारह होने की सुनहरी नौबते भी हैं। जमीनों के दाम बढ़ेंगे, अपार्टमेंट बनाने या दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों की कीमतों में उछाल आएगा। निर्माण सेक्टर, ऊर्जा सेक्टर, खनन सेक्टर के कॉरपोरेट धुरंधर नए कानून पर जितना चाहें भौहें चढ़ाएं लेकिन कुल मिलाकर निवेश और आर्थिक उदारवाद का चक्का भीषण तेजी से घूमेगा और जमीनों के वास्तविक मालिक और दूर नहीं फिंकवा दिए जाएंगे, कौन जानता है। वरना अपने जन के प्रति ये सदाशयता यूपीए को अपने शासनकाल के दूसरे चरण में ही क्यों सूझी।

    बेशक कानून में यह प्रावधान है कि पांच साल पुराने अधिग्रहण इसके दायरे में होंगे और मुआवजा भारीभरकम होगा और पुनर्वास के नियम नए सिरे से ही तय होंगे लेकिन वे मामले जो और पहले के हैं। वे लोग जो अपनी अपनी जमीनों से विस्थापित होकर भूमंडलीय पूंजी के रचाए अन्य असहाय ठिकानों को कूच कर गए हैं, उनका क्या होगा। मिसाल के लिए टिहरी बांध या नर्मदा के बांधों के विस्थापित कहां जाएंगे। जैतपुर और कुडनकुलम तो हाल के ही अधिग्रहण हैं, और यूपी के एक्सप्रेस हाईवे और फॉर्मूला वन रेस सर्किट के विस्थापित—नए कानून की झिलमिल में क्या उनका संकट किसी को दिखेगा।

    http://www.samayantar.com/land-acquisition-act-change-after-a-century/



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    बहस : दलित समाज और जूठन

    Author:  Edition : 

    चंद्रभान सिंह यादव

    joothan-by-om-prakash-valmikiसदियों का संताप'से ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेखन शुरू होता है, जो उनके सृजन के मूल में है। 'बस! बहुत हो चुका', 'अब और नहीं'जैसे काव्य संग्रहों के शीर्षक से विषयवस्तु का अंदाजा लगाया जा सकता है। आपको कवि हृदय मिला था जो प्रेम-सौंदर्य की जगह अपने समुदाय के दुख-दर्द में डूबा रहा। 'मैं, तुम'जैसी कविताओं में उठाए गए सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। 'दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र', 'मुख्यधारा और दलित समाज'और 'दलित साहित्य : अनुभव संघर्ष और यथार्थ'के माध्यम से दलित साहित्य का समाजशास्त्र ही नहीं गढ़ा गया, अपितु सैद्धांतिकी भी निर्मित की गई। 'सफाई देवता'वाल्मीकि समाज का अतीत है। यह भारतीय समाज-इतिहास के भूगोल को विस्तारित करने वाली रचना है।

    'सलाम', 'घुसपैठिये'और 'छतरी'कहानी संग्रहों में कई स्थानों पर आत्मकथात्मक अंशों की प्रस्तुति है, जिससे लेखन में प्रामाणिकता आई है। कविता 'ठाकुर का कुआं', कहानी 'शवयात्रा'और आत्मकथा 'जूठन'मानक रचनाएं हैं, अपने-अपने विधा की। 'जूठन'हिंदी ही नहीं, बल्कि समूचे भारतीय साहित्य की आत्मकथाओं के बीच दहकता दस्तावेज है। कांचा इलैया की मशहूर कृति 'वाई आइ ऐम नाट अ हिंदू'का अनुवाद 'मैं हिंदू क्यों नहीं'आपके कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ। साहित्य की कोई प्रमुख विधा वाल्मीकि जी से अछूती नहीं रही। नाट्य निर्देशन, अभिनेता के साथ चित्रकारी की कला में भी माहिर थे। दलित वर्ग के लिए सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता तो थे ही।

    'जूठन'जातिगत उत्पीडऩ और अतिदलित समाज के संघर्ष का आख्यान है। यह आत्मकथा नहीं अतीत की घटनाओं और पीड़ादायी अनुभवों से उपजी कराह है, जहां लेखक ही नहीं समय-समाज भी उपस्थित है—यातनामय भयावहता के साथ। आत्मकथा में उपेक्षा-अत्याचार का अनवरत सिलसिला है, जिससे आक्रोश-विरोध का उपजना स्वाभाविक है। इससे गुजरते हुए संवेदनशील पाठक की सांसें थम सकती हैं, नसें फट सकती हैं। ऐसी ही घटनाएं और परिस्थितियां दलित साहित्य के उद्भव के मूल में हैं। 'जूठन'के आरंभ में दलित साहित्य की विषयवस्तु और आत्मकथा लिखने के कारणों पर टिप्पणी है—'दलित-जीवन की पीड़ाएं असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं। ऐसे अनुभव जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके।'वे अब दलित आत्मकथाओं में स्थान प्राप्त कर रहे हैं।

    'जूठन'सिर्फ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा नहीं अपितु दलित समाज का भोगा सच है, जहां जाति व्यवस्था की खतरनाक खायी है और वहां से आने वाली दर्दनाक चीखें हैं। पढ़ते समय लगता है कि 'जूठन'आह से उपजा हुआ आख्यान है। वर्णित घटनाएं और प्रसंग वर्णव्यवस्था की निमर्मता के प्रमाण हैं। प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश के समय बालक ओमप्रकाश वाल्मीकि को तरह-तरह से परेशान किया जाता है। शिक्षक द्रोणाचार्य की भूमिका में हैं, तो सहपाठी अर्जुन-भीम की तरह तीर-कमान साधे हुए हैं। प्रवेश परीक्षा अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। तीन दिन तक लगातार झाड़ू लगवाया जाता है किंतु कक्षा में बैठने का मौका एक दिन भी नहीं मिलता।

    हेडमास्टर की तेज आवाज, 'चूहड़ा हो के पढऩे चला है… जा चला जा… नहीं तो हाड़-गोड़ तुड़वा दूंगा।' (पृष्ठ 16) में जातीय दंभ और अमानवीयता चरम पर है। परंतु पिता की जिद—'यो चूहड़े का यहीं पढ़ेगा… इसी मदरसे में। और यो ही नहीं, इसके बाद और भी आवेंगे पढऩे कू।' (पृष्ठ वही) दलित समाज के भावी स्वरूप का संकेत है, जहां शिक्षा के माध्यम से सवर्णवादी वर्चस्व को तोडऩे का प्रयास हो रहा है। जब हेडमास्टर का ऐसा व्यवहार है, तो छात्रों और अध्यापकों का व्यवहार कैसा होगा? इतनी उपेक्षा और प्रताडऩा के बाद भी ओमप्रकाश आठवीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते शरतचंद्र, प्रेमचंद और रवींद्रनाथ टैगोर के साहित्य का अध्ययन कर चुके थे। ओमप्रकाश वाल्मीकि के पात्रों के संतुलन और समझदारी के मूल में उनकी अध्ययनप्रियता है, तो सामाजिक अनुभव भी।

    बालक ओमप्रकाश के पास तर्क करने की क्षमता ही नहीं, शास्त्रों पर प्रश्न उठाने का साहस भी है—'अश्वत्थामा को तो दूध की जगह आटे का घोल पिलाया गया और हमें चावल का मांड। फिर किसी भी महाकाव्य में हमारा जिक्र क्यों नहीं आया? किसी भी महाकवि ने हमारे जीवन पर एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा?' (पृष्ठ 34) वाल्मीकि पर द्रोणाचार्य रूपी मास्टर ने महाकाव्य तो रचा, मगर उसकी पीठ पर और शीशम की छड़ी से। अकारण नहीं सनातन साहित्य सवालों के घेरे में आ जाता है। डॉ. धर्मवीर यूं ही नहीं सवाल उठाते हैं कि लेखन और चिंतन में दलित समुदाय उपेक्षित रहा है। हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य शुक्ल बड़े साफ शब्दों में लिखते हैं कि—'चाकरी करेंगे नहीं चौपट चमार की।'अन्य अध्यापक बालक ओमप्रकाश से काम तो लेते हैं, परंतु सहयोग की जगह प्रताडऩा देते हैं। प्रश्न पूछने पर प्रोत्साहन के स्थान पर असहनीय शब्द मिलता है—'देखो चूहड़े का, बामन बन रहा है।'

    तरह-तरह की उपेक्षाओं के बीच गरीबी-अभाव का जीवन कोढ़ में खाज से कम नहीं है। ओमप्रकाश के छठी कक्षा में प्रवेश के लिए भाभी अपनी पाजेब गिरवी रख देती है—वैद्य सत्यनारायण शर्मा के पास। इसके बाद देवर भाभी भाव-विह्वल होकर एक दूसरे से लिपट कर रोते हैं। अब शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब देवर द्वारा भाभी के शारीरिक-आर्थिक उत्पीडऩ का समाचार न आता हो। इस प्रसंग से तथाकथित सभ्य समाज के देवर-भाभियों को सीख लेनी चाहिए। बालक वाल्मीकि को सांस्कृतिक कार्यक्रमों से दूर रखा जाता है, छठी कक्षा की अद्र्धवार्षिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके मॉनीटर बनने के बाद भी। परीक्षार्थियों को सहयोग एवं स्नेह की जरूरत होती है, ताकि प्रसन्नचित्त रहें और अच्छे अंक प्राप्त कर सकें।

    दलित विद्यार्थियों का पानी की पर्याप्त मात्रा के बाद भी प्यास बुझाना मुश्किल था, 'परीक्षा के दिनों में प्यास लगने पर गिलास से पानी नहीं पी सकते थे। हथेलियों को जोड़कर ओक से पानी पीना पड़ता था। पिलाने वाला चपरासी भी बहुत ऊपर से पानी डालता था। कहीं गिलास हाथों से छू न जाए।' (पृष्ठ 27) ऐसे परिवेश में एक ओर सवर्णवादी मानसिकता का विकास होगा, तो दूसरी ओर दलित विद्यार्थियों के अंदर हीनता-कुण्ठा का भाव विकसित होगा। अकारण नहीं कि शिक्षित लोग जातिवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। पाठ्यक्रम निर्धारण से लेकर अध्यापकों की नियुक्ति तक जातीय वर्चस्व कायम है। प्रयोगात्मक परीक्षा में भेदभाव अपने चरम पर होता है। बारहवीं कक्षा में ओमप्रकाश को रसायनशास्त्र की प्रयोगात्मक परीक्षा में फेल कर दिया जाता है, जबकि सभी विषयों में अच्छे अंक मिले थे।

    पिछड़ा-दलित समाज आंतरिक जातिवाद में जकड़ा हुआ है, जिसका कटु अनुभव ओमप्रकाश वाल्मीकि को है। क्योंकि भंगी (वाल्मीकि) जाति दलितों में भी दलित हैं। 'अबे चूहड़े किंधे घुसा आ रहा है? … हम चूहड़े-चमारों के कपड़े नहीं धोते, न ही इस्तरी करते हैं। जो तेरे कपड़े पे इस्तरी कर देंगे तो तगा हमसे कपड़े न धुलवाएंगे, म्हारी तो रोजी-रोटी चली जागी।' (पृष्ठ 28) धोबी के इस कथन में एक ओर उसकी मानसिकता व्यक्त है, तो तगा (त्यागी) का सवर्णवादी-छुआछूत का दबाव भी। साथ में भंगी का कपड़ा इस्तरी करने से रोजी-रोटी जाने का भय भी।

    ऐसी परिस्थितियों में ओमप्रकाश को अहसास हो जाता है कि गरीबी-अभाव से तो निपटा जा सकता है, किंतु जाति से पार पाना आसान नहीं। गरीबी का कारण बेरोजगारी के साथ मजदूरी का कम मिलना भी है। महाजनी सभ्यता में कर्जदार का जीवन बद से बदतर होता है। ब्याज भरते-भरते जिंदगी चुक जाती है, मूलधन ज्यों का त्यों वारिस को विरासत में मिलता है। जिस समाज के ज्यादातर लोग कर्ज में डूबे हों, तो मान-सम्मान की रक्षा कैसे संभव है—'तमाम लोग खामोशी में सब-कुछ सह जाते थे। मान-सम्मान का कोई अर्थ न था। कोई भी आता, डरा-धमकाकर चला जाता था।' (पृष्ठ 29)

    जीवन की मूलभूत आवश्यकता—रोटी कपड़ा और मकान से सदियों तक वंचित रहा है दलित समाज। आज भी इसकी मुकम्मल व्यवस्था नहीं है इनके पास। सरकारें पौष्टिक भोजन की उपलब्धता का दावा करती रही हैं। दूध तो दूर, दलित बच्चों को मांड (चावल का पानी) भी नियमित नसीब नहीं होता। 'शादी-विवाह के मौकों पर जब उनके घरों में चावल-दाल बनते थे, तो हमारी बस्ती के बच्चे बर्तन लेकर मांड लेने दौड़ पड़ते थे। फेंक दिया जाने वाला मांड हमारे लिए गाय के दूध से ज्यादा मूल्यवान था।' (पृष्ठ 34)

    भय-भूख का यह दारूण दृष्य सभी दलित आत्मकथाओं में देखा जा सकता है। यह कल्पना की चीज नहीं, दलित समाज की हकीकत है—'पूरी के बचे-खुचे टुकड़े, एक आध मिठाई का टुकड़ा या थोड़ी बहुत सब्जी पत्तल पर पाकर बांछें खिल जाती थीं। जूठन चटकारे लेकर खाई जाती थी।' (पृष्ठ 19) अभाव में अद्भुत उल्लास देखा जा सकता है। जीवन की दूसरी मूलभूत आवश्यकता कपड़ा बड़ी मुश्किल से नसीब होता था। गंदा पहनने पर लोग कहते थे—'चूहड़ा कितना गंदा पहना है।'स्वच्छ पहनने पर—'चूहड़ा होकर इतना अच्छा कपड़ा पहनता है।'जाड़े की रात काटना बहुत दुखदायी होता है। लेखक के शब्दों में—'देहरादून की पहली सर्दी मेरे लिए बहुत कष्टदायक रही थी। मेरे पास सर्दियों में पहनने के लिए कोई गर्म कपड़ा नहीं था।' (पृष्ठ 93)

    सफायी कर्मियों की जर्सी का रंग बदलवाकर पहनने की उसके सामने विवशता है, किंतु इसे पहनने पर लड़के जमादार कहकर व्यंग्य कसते हैं। यह समस्या सिर्फ वाल्मीकि तक ही सीमित नहीं है, अपितु पूरे दलित समाज को अपने आगोश में समेटे हुए है। तुलसीराम 'मुर्दहिया'में बचपन का बखान करते हैं—'हमारे घर में सोने के लिए जाड़े के दिनों में घर की फर्श पर धान का पोरा अर्थात् पुआल बिछा दिया जाता था। उस पर कोई लेवा या गुदड़ी बिछाकर हम धोती ओढ़कर सो जाते। इसके बाद मेरे पिताजी ढेर सारा पुआल हम लोगों के ऊपर फैला देते।' (पृष्ठ 34)

    दलित आत्मकथाकारों द्वारा किया गया अभाव-उत्पीडऩ का यथार्थ चित्रण कहीं-कहीं प्रेमचंद और 'रेणु'को पीछे छोड़ देता है। ऐसी दु:खद अनुभूतियां सभ्य-शहरी, संपन्न समाज के पास नहीं हो सकतीं। मेट्रोपोलिटन शहरों में रहने और पांच सितारा होटलों में बैठकर दलित समाज के विकास के लिए योजना बनाने वालों के पास जमीनी हकीकत का ज्ञान नहीं है। थोड़ा बहुत है भी, तो उसका प्रयोग नहीं कर पाते क्योंकि योजनाएं वोट बैंक को ध्यान में रखकर लोक लुभावनी बनाने का दबाव जो है।

    रोटी, कपड़ा के बाद तीसरी मूलभूत आवश्यकता है—मकान। गरीबी में दो जून की रोटी पाना मुश्किल है, तो मकान की मुकम्मल व्यवस्था कैसे संभव होगी। दलित गर्मी का दिन पेड़ के नीचे काटता है, तो रात खुले आसमान में। जाड़े का दिन अलाव-आग और पुआल के सहारे। दलित आत्मकथाओं में बरसात का वर्णन वेदनापूर्ण है। छत का चूना, दीवाल का दरकना आम बात है—'उस रात हमारी बैठक का एक हिस्सा गिर गया था। मां और पिताजी एक पल के लिए भी नहीं सोए थे। बस्ती में कई मकान गिर गए थे। लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं।' (पृष्ठ 31)

    दिहाड़ी दलित मजदूरों के लिए बरसात के दिन नर्क से कम नहीं होते। बरसात के कारण बाहर काम नहीं होता, अछूत को घर के अंदर काम पर लोग रखते नहीं, शाम के लिए रोटी का जुगाड़ नहीं, घर गिरने के डर से रात को नींद नहीं आती। गलियों में कीचड़ और सुअरों की गंदगी रहती है, मक्खी-मच्छरों की संख्या में दिन दुनी रात चौगुनी की वृद्धि होती है। भंगी या महादलित के अच्छा-पक्का मकान बनवाने में तरह-तरह की अड़चनें खड़ी की जाती हैं, जिसका बखूबी वर्णन ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी कहानी 'शवयात्रा'में किया है।

    मध्यकाल में संभ्रांत हिंदू समाज की विधवाओं को सती होना पड़ता था। पुनर्जागरण के बाद भी विधवा-विवाह को हीन दृष्टि से देखा जाता था। आधुनिक युग में विधवाओं पर समाज द्वारा सुविधाहीन जीवन जीने का दबाव है, किंतु दलित समाज में विधवा-विवाह को मान्यता आदिकाल से है। क्योंकि जहां स्त्रियां श्रम करती हैं, वहां उनका महत्त्व-आवश्यकता और कुछ स्वतंत्र व्यक्तित्व भी होता है। बड़े भाई सुखबीर की मृत्यु के बाद छोटे भाई जसबीर से भाभी की शादी करा दी जाती है। इस शादी को रिश्तेदार और समाज द्वारा स्वीकृति प्राप्त है। चाचा श्यामलाल की पत्नी को मायके वापस भेज दिया जाता है। श्यामलाल की दूसरी शादी रामकटोरी से होती है, वह भी कुछ दिनों बाद सोल्हड़ का हाथ थाम लेती है। अत: दलित समाज में विवाह-विच्छेद और पुनर्विवाह के नियम शिथिल हैं।

    दलित और तथाकथित सवर्ण समाज की कुछ मान्यताएं परस्पर विरोधी हैं। सभ्य समाज के लिए जो हेय है, दलित समाज के लिए वह श्रेय भी हो सकता है। सभ्य समाज (हिंदू और मुसलमान दोनों) के लिए घृणित और अछूत जानवर है—सूअर, किंतु दलित-भंगी समाज में इसका महत्त्व गौ माता से कम नहीं है। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में—'शादी-ब्याह, हारी-बीमारी, जीवन-मृत्यु सभी में सूअर की महत्ता थी। यहां तक की पूजा-अर्चना भी सूअर के बिना अधूरी थी। आंगन में घूमते सूअर गंदगी के प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक समृद्धि के प्रतीक थे, जो आज भी वैसे ही हैं।' (पृष्ठ 24) सूअर की महत्ता को स्थापित करने के लिए रूपनारायण सोनकर ने 'सूअरदान' (उपन्यास) लिखा है। दलित विमर्श में जब सूअर का जिक्र आता है, तो नागार्जुन की कविता 'पैने दांतों वाली'जेहन में कौंध जाती है। महाकवि की निगाह में 'यह भी तो मादरे हिंद की बेटी'है। इस कविता में सूअर शेरनी है।

    आम धारणा है कि समाजशास्त्र समाज को समझने का सशक्त माध्यम है। समाजशास्त्र की अवधारणा, उपागम और निष्कर्ष पाश्चात्य समाजदर्शन पर आधारित है, तो भारतीय समाज का प्रामाणिक ज्ञान उससे किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। स्वदेशी समाजशास्त्र का आधार इतिहास, धर्मशास्त्र और साहित्य है, जिसमें दलितों का न तो उचित प्रतिनिधित्व है और न ही महत्त्व। इसलिए समाजशास्त्र के माध्यम से दलित समाज की सही समझ नहीं विकसित की जा सकी है।

    अकारण नहीं कि इस समाज के विकास के लिए बनी सरकारी योजनाएं फलीभूत नहीं हो पाती हैं। ऐसे में दलित आत्मकथाओं के माध्यम से जो सच निखरकर आ रहा है, उसे देखने और समझने की जरूरत है। 'जूठन'और उसके बाद आईं सभी दलित आत्मकथाओं में भूत-प्रेत, जादू-टोना का उल्लेख इस समाज की अज्ञानता और पिछड़ेपन को बयां करता है। तबीयत खराब होने पर डॉक्टर की जगह भगत (ओझा) को बुलाया जाता है और दवा की जगह भभूत या राख दी जाती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि का आंखों देखा हाल—'भूत के प्रभाव का जिक्र करके भगत भूत पकडऩे की क्रियाएं करता था जिसके बदले में देवी-देवताओं पर सूअर, मुर्गे, बकरे और शराब चढ़ायी जाती थी। प्रत्येक घर में उन देवताओं की पूजा होती थी।' (पृष्ठ 37)

    दलित समाज की धार्मिक आस्था और विश्वास सवर्ण समाज से भिन्न है। सनातन धर्म एवं ब्राह्मण ग्रंथों में राक्षस या दानव का चरित्र अमानवीय और विध्वंसक रूप में प्रस्तुत है, क्योंकि राक्षस और दानव ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध करते हैं। प्रतिरोध की संस्कृति के पोषक दानव का संबंध द्रविड़ से भी हो सकता है। दलित समाज की धार्मिक मान्यताओं पर स्थानीयता या क्षेत्रीयता प्रभावी है। उत्तर प्रदेश में चमरिया माई और शीतला देवी का महत्त्व है, तो हिमाचल और उसके आसपास के क्षेत्रों में ज्वाला देवी का। बच्चों पर कृपा करने वाली देवी पचौटे वाली है। धर्मशास्त्रों के दबाव में दलितों को ज्ञान एवं धन-संपदा से वंचित रखा गया, तो इनके यहां सरस्वती एवं लक्ष्मी का महत्त्व कैसे संभव है? रामकथा में शंबूक का वध किया जाता है और महाभारत में एकलव्य के दाहिने हाथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा में मांग लिया जाता है, तो इन ग्रंथों की सहज स्वीकृति दलित समाज में कैसे संभव होगी?

    जयप्रकाश कर्दम का मानना है कि दलित समाज में 'जाहर कथा रामकथा के विकल्प के रूप में विकसित दिखाई पड़ती है। इसका आधार राम और जाहर के बीच कई समानताओं का होना है। राम ने चौदह वर्ष वनवास में व्यतीत किए थे, तो जाहर पीर ने भी बारह वर्ष वनवास में व्यतीत किए थे। रामकथा का प्रमुख विषय राम-रावण युद्ध है, तो जाहर कथा में जाहर और अरजन-सरजन के बीच युद्ध प्रमुख है।' (समकालीन भारतीय साहित्य, अंक 158, पृष्ठ 154)

    आत्मकथाएं दलित समाज का आईना हैं, जिसमें सामान्य जीवन व्यवहार के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों को भी देखा जा सकता है। अपने समाज की धार्मिक मान्यताओं-आस्थाओं का यथा अवसर उल्लेख मिलता है। 'दलित घरों में पूजे जाने वाले देवता हिंदू देवी-देवताओं से अलग होते हैं, जिनके नाम किसी पोथी-पुराण में ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। …जन्म हो या कोई शुभ कार्य, शादी-विवाह या मृत्यु-भोज!—इन देवी देवताओं की पूजा बिना अधूरा है।' (पृष्ठ 37)

    आजादी के स्वर्णजयंती वर्ष में प्रकाशित 'जूठन'उसके खोखलेपन को व्यक्त करने में सफल रही। ऐसे जनतंत्र का क्या मतलब, जिसमें लोकतांत्रिक अधिकार चंद लोगों की मुट्ठी में हों? आजादी के बाद 'एक दुनिया समानांतर'के लोमहर्षक सच का यह दस्तावेज है, जिसकी सर्जनात्मक क्षमता से हिंदी में दलित आत्मकथा लेखक का मार्ग प्रशस्त हुआ। अकारण नहीं कि इसका देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और एन.सी.ई.आर.टी. सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्थान मिला। पाठ्यक्रमों में दलित साहित्य को स्थान दिलाने में वाल्मीकि जी के रचनात्मक लेखन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। 'आत्मकथा के बाद के पच्चीस वर्षों की कथा-दूसरा भाग लिखे बगैर उनका जाना दलित साहित्य की अपूरणीय क्षति का घटित हो जाना है। वाल्मीकि जी को अब इस रूप में याद किया जाए, ताकि दलित समूह/ वर्ग के लेखकों को काम के आधार पर अत्यधिक सहयोग और सम्मान मिले।'श्योराज सिंह बेचैन के इस कथन से बड़ी वाल्मीकि जी के लिए कोई दूसरी श्रद्धांजलि नहीं हो सकती।


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    कृषि : आत्‍महत्‍या की खेती

    Author:  Edition : 

    विनय सुल्‍तान

    हैदराबाद से महबूबनगर रवाना होते वक्त इस बात का रत्तीभर भी इल्म नहीं था कि मैं वहां की सबसे भयावह त्रासदियों से रू-ब-रू होने जा रहा हूं।

    farmer-suicideइस देश में नकदी फसल उगाना बहुत महंगा सौदा है। इतना महंगा कि कई बार जान के रूप में कीमत वसूल करता है। कपास भारत में सबसे ज्यादा बोई जाने वाली नकदी फसल है। यह फसल हर साल जितने लोगों की मौत का कारण बनती है, उनकी संख्या सांप्रदायिकता के गुजरात तांडव में मारे गए लोगों से चार गुनी ज्यादा है। 1995 से 2012 तक इस देश में 2,84,694 किसानों ने आत्महत्या की। इसमें से 68 फीसदी आत्महत्याएं कपास उगाने वाले क्षेत्रों में हुईं।

    कपास पैदा करने वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्याओं के कारण बहुत साफ हैं। जहां परंपरागत फसलों जैसे मक्का या ज्वार उगाने का खर्च आठ से दस हजार है, वहीं कपास की लागत चालीस से पचास हजार आती है। जाहिर-सी बात है कि किसान इसके लिए कर्ज लेता है। तेलंगाना में सरकारी बैंक से कर्ज महज 18 फीसदी किसानों के लिए मयस्सर है। 82 फीसदी किसान कर्ज के लिए महाजनी व्यवस्था पर निर्भर हैं। यहां ब्याज की दर 36 फीसदी है। ये दर आपके सामान्य लोन, होम लोन या इस तरह के किसी भी किस्म के लोन से तीन से पांच गुना ज्यादा है। महाजनी कर व्यवस्था का सबसे काला पहलू है सूद न चुकाने की स्थिति में सूद मूल में जुडऩा और उस पर सूद शुरू हो जाता है। फसल को बोने के समय जो कर्जा लिया जाता है, फसल कटते-कटते वह डेढ़ से दो गुना तक बढ़ जाता है। ब्याज मुक्त ऋण का आवंटन यहां 15.24 फीसदी है, जबकि 40 फीसदी कृषि योग्य भूमि इस क्षेत्र में आती है।

    गोदावरी, कृष्णा और तुंगभद्रा जैसी नदियों का तीन-चौथाई बहाव क्षेत्र तेलंगाना में है, लेकिन महज चार फीसदी जमीन को ही नहरों का पानी सिंचाई के लिए मिल पाता है। महबूबनगर, खम्मम और रंगारेड्डी में कृष्णा और तुंगभद्रा का बहाव क्षेत्र है। ये जिले पिछले चार साल से सूखे से त्रस्त थे। नागार्जुन सागर बांध नालगोंडा जिले में बना हुआ है। इसके द्वारा कुल 25 लाख एकड़ जमीन के लिए सिंचाई की व्यवस्था की गई। चौंकाने वाला तथ्य ये है कि इसके जरिये सीमांध्र की 20 लाख एकड़ और तेलंगाना की महज 5 लाख एकड़ जमीन सींची जा रही है। इसी तरह जिस श्रीसेलम परियोजना के कारण तेलंगाना के कुर्नूल जिले के 67 गांवों के एक लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा था, उसकी एक बूंद भी तेलंगाना को नहीं मिलती।

    हालांकि 'तेलगु गंगा'के नाम पर इसका एक हिस्सा चेन्नई की पेयजल आपूर्ति के लिए दिया जाता है। जिस सुपर साइक्लोन का त्रासदी उत्सव मनाने के लिए लिए हमारा हिंदी मीडिया बड़े पैमाने पर आंध्र और तमिलनाडु पहुंचा था, उसकी असल त्रासदी का सिलसिला अब चालू हुआ है। लेकिन बड़ी त्रासदी ये भी है कि इसको कवर करने के लिए वहां अब कोई ओबी वेन नहीं है। इस सुपर साइक्लोन की वजह से खड़ी फसल बर्बाद हो गई। किसानों की आत्महत्या यहां कोई नई बात नहीं है, पर इस तबाही ने इनकी दर को तेज कर दिया है।

    मैं अच्छा किस्सागो नहीं हूं और जो पांच घटनाएं मैं आपको बताने जा रहा हूं, वो भी कोई कहानी नहीं हैं। यहां त्रासदियां की ऐसी जंजीर है, जिसमें एक से बड़ी दूसरी त्रासदी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। साथ ही यह हमारे पैंसठसाला लोकतंत्र में किसानों के बदतर हालात का लिटमस परीक्षण भी है।

    जमीन हत्या की बारी

    महबूबनगर के बीजनापल्ली मंडल का गांव है नंदी वड्डेमान। इस सफर में मेरे साथ थे आंध्र ज्योति के पत्रकार महेश और उनके साथी महबूब खान। ये हमारे लिए अनुवादक, दोस्त, गाइड और मेजबान की भूमिका एक साथ निभा रहे थे। नंदी वड्डेमान में पिछले एक महीने में दो किसानों ने आत्महत्या की है। गांव की सरपंच पी. ज्योति के अनुसार पिछले पांच साल में दस हजार की आबादी वाला ये गांव 80 से ज्यादा आत्महत्याओं का गवाह बन चुका है।

    सबसे पहले हम जी. अंजनैलू के घर पहुंचे। अंजनैलू सागर समुदाय के सदस्य थे, जो पिछड़े वर्ग में आता है। अंजनैलू के पास चार एकड़ जमीन थी और इतनी ही जमीन उन्होंने बटाई पर ली थी। छह बच्चियों के पिता अंजनैलू के ऊपर चार लाख का कर्जा था, लेकिन खेत की लहलहाती फसल अंजनैलू के हौसले के लिए रीढ़ की हड्डी का कम करती थी। चार साल के अकाल के बाद धरती ने छाती फाड़कर कुछ उगाया था, लेकिन बेमौसम की बरसात के कारण अंजनैलू के खेत तालाब बन गए। फसलों के साथ-साथ वह हौसला भी डूब गया, जिसने अंजनैलू को कर्ज के पहाड़ के सामने जिंदादिली से खड़ा कर रखा था। पिछले सितंबर की 27 तारीख को अंजनैलू ने फांसी पर लटककर जान दे दी।

    आज अंजनैलू की बीवी इंदिरा आवास योजना की सहायता से बने एक कमरे के लगभग घर जैसे ढांचे में अपनी छह बेटियों के साथ एक ऐसी लड़ाई लड़ रही है, जिसका नतीजा पहले से तय है। उनकी सबसे बड़ी बारह वर्षीय बेटी जयम्मा खेत में मजदूरी करती है। उनकी दो बेटियां कंधों पर यूरिया खाद के कट्टों से बने स्कूल बैग लटकाए ऐसी नौकरी के लिए पढ़ रही हैं, जो शायद ही उन्हें कभी मिल सके।

    नंदी वड्डेमान का ये परिवार पहले अपने मुखिया को खो चुका है, अब इस परिवार की जमीन पर हत्यारे साये मंडरा रहे हैं। कर्जदाता अंजनैलू की पत्नी विजयम्मा पर जमीन बेचकर कर्जा उतारने के लिए दबाव बना रहे हैं। छोटी जोत वाले किसान किस प्रक्रिया के जरिये खेत-मजदूर बनते जा रहे हैं, इसे समझना कोई मुश्किल पहेली नहीं है।

    किताबें तुम्हारी दोस्त नहीं रहीं

    नंदी वड्डेमान में जी. अंजनैलू के पड़ोसी वी. मलेश के घर की कहानी और अधिक त्रासदीपूर्ण है। मलेश एक भूमिहीन किसान थे। वह बटाई पर खेती किया करते थे। उन्होंने पांच एकड़ जमीन बटाई पर ली थी। पिछड़े सागर समुदाय के मलेश ने एक बेहतर कल की उम्मीद में कपास बोया। इस बेहतर कल को और बेहतर बनाने के लिए खाद और कीटनाशकों की जरूरत हुई। मलेश ने बेहतर कल के लिए आज से कुछ कर्ज लिया। बेमौसम बरसात ने मलेश के बेहतर कल पर पानी फेर दिया। वह आज से लिए दो लाख के कर्ज के साथ इस दुनिया से चले गए। पिछली 6 अक्तूबर को मलेश ने कर्ज की वजह से फांसी पर लटककर अपनी जान दे दी, ऐसा पुलिस के दस्तावेज में लिखा हुआ है।

    मलेश अपनी 40 साल की जिंदगी में ऐसा कोई ढांचा खड़ा करने में कामयाब नहीं हो पाए, जिसे घर कहा जा सके। न ही 510,072,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाली इस ग्रह पृथ्वी पर ऐसी एक इंच जमीन है जिसे मलेश का परिवार अपना कह सके। आज उनकी पत्नी वी. अनीता अपनी दो बच्चियों के साथ एक कमरे वाले किराए के मकान में रह रही हैं। इसके लिए वह हर महीने 500 रुपए अदा करती हैं। उनकी दोनों बिटिया रानी फिलहाल पढ़ रही हैं। उन्हें इस बात का थोड़ा भी गुमान नहीं है कि परिस्थितियों के निर्मम हाथ उनकी किताबें छीनने में देर नहीं लगाने वाले हैं। किताबें जो दुनिया में इंसान कि सबसे अच्छी दोस्त कही जाती हैं, अब उनकी दोस्त नहीं रही हैं।

    जब मैंने अनीता से कर्ज के बाबत पूछा तो उनका जवाब था 'सरकार ने अगर सहायता नहीं की तो मेरे और मेरे बच्चों के पास जहर खाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।'वह मेरी तरफ लगातार उम्मीद भरी नजरों से ताक रही थीं। उनकी आंखों में विधानसभा के प्रतिबिंब को बनते-बिगड़ते देखा जा सकता था।

    नंदी वड्डेमान से वापस लौटते हुए हम रास्ते में मक्के की बर्बाद हुई फसल के फोटोग्राफ लेने के लिए रुके। जैसे ही मेरे साथी पत्रकार फोटो लेकर खेत से लौटने लगे, एक महिला उनके कदमों में लोट गई। इस महिला कि उम्र हमसे दो-गुनी रही होगी। इस अनुभव ने मेरे सामने दो बातों को बहुत साफ तरीके से रखा। पहला, दिल्ली आज भी गांव के गरीब-गुरबा लोगों के लिए एक जादुई शब्द है। दूसरा, पैंसठ साला लोकतंत्र अपने लोगों को इस बात का अहसास दिलाने में पूरी तरह से नाकामयाब रहा है कि उनके पास इज्जत से जिंदगी जीने का हक है। (वैसे यह मुश्किल काम है भी, क्योंकि उनके पास ऐसा कोई हक दार-असल है भी नहीं।)

    गणेश अब बॉय बन गया है

    महबूब नगर का जड्चर्ला मंडल। यहां हमारी यात्राओं के हमराह थे उदय मित्रा। उदय मित्रा साहब स्थानीय डिग्री कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे हैं। वह तेलगु में कहानियां भी लिखते हैं। मैं, उदय मित्रा साहब और उनका स्कूटर सबसे पहले गंगापुर गांव की तरफ निकले। ये गांव स्थानीय मेले के लिए मशहूर है।

    गंगापुर के सी. कृष्णय्या मुद्दीराज समाज के सदस्य थे, जो कि पिछड़ी जाति में आता है। कृष्णय्या के पास चार एकड़ जमीन थी। तीन लड़कियां और एक लड़के के पिता कृष्णय्या की सबसे बड़ी बेटी सयानी हो चुकी थी। अपनी चार एकड़ और बटाई की पांच एकड़ जमीन के भरोसे कृष्णय्या ने अपनी बेटी के हाथ पीले कर दिए। दहेज भारतीय समाज की क्रूर सच्चाई है। कृष्णय्या ने कर्ज लेकर बेटी को दहेज दिया। कृष्णय्या को उम्मीद थी कि नौ एकड़ पर जब कपास की फसल लहलहाएगी, तो उनका सारा कर्ज रुई कि तरह उड़ जाएगा। पर बेमौसम की बरसात ने छह लाख के कर्ज को भीगी रुई की मानिंद भारी बना दिया।

    कृष्णय्या ने अपनी आखिरी शाम के लिए वो जगह चुनी, जो उनकी जिंदगी कि एकमात्र उम्मीद था, यानी उनके खेत। दस अक्टूबर की शाम को कृष्णय्या ने अपने जीवन को अपने खेतों को आखिरी अलविदा कहा और जहर पीकर हमेशा के लिए सो गए।

    हम जब कृष्णय्या के घर पहुंचे, उस समय उनकी पत्नी याद्दाम्मा दूसरों के खेत में मजदूरी करने गई हुई थीं। उनकी चार एकड़ जमीन आज बटाई पर चढ़ चुकी है। कृष्णय्या का पंद्रह वर्षीय मैट्रिक पास बेटा जड्चर्ला में एक निजी दफ्तर में 3,000 के वेतन पर चपरासी का काम करता है। वहां साहब लोग उसे गणेश नहीं बॉय कहकर बुलाते हैं।

    हम सपने भी नहीं देख सकते

    महबूबनगर के जड्चर्ला मंडल का कोडगल गांव। गंगापुर से कोडगल की दूरी महज छह किलोमीटर थी। शाम के चार बज रहे थे। गंगापुर से कोडगल की मेरी छोटी-सी यात्रा कोडगल के सरकारी स्कूल के सामने जाकर ठिठक गई। समय स्कूल की छुट्टी का था। बच्चे बेतहाशा दौड़ रहे थे। चारों तरफ चिल्ल-पों मची हुई थी। हालांकि मेरे पास इस बात के लिए कोई सरकारी तथ्य तो मौजूद नहीं है, पर लगभग चालीस फीसदी बच्चे नंगे पांव थे। स्कूल के बाहर एक लड़के और लड़की का चित्र बना हुआ था, जो कि पेंसिल पर बैठे हुए थे। इस चित्र पर लिखी इबादत तेलगु में होने के बावजूद मुझे समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई कि ये दीवार सर्वशिक्षा अभियान के मूर्खतापूर्ण दावों से रंगी हुई है।

    कोडगल के के. नरसिंहलू 40 वर्षीय किसान थे। उनके परिवार में उनके बूढ़े पिता नगय्या(85), पत्नी भीमम्मा(36) और बेटा श्रीलू(13) और बिटिया स्वाति(15) हैं। नरसिंहलू के पास पहले चार एकड़ जमीन थी। उसमें से दो एकड़ बेचकर इंदिरा आवास योजना से मिली तीस हजार की सहायता द्वारा डेढ़ लाख की लागत वाला दो कमरों का घर तैयार किया। अपने पास बची दो एकड़ जमीन और इतनी ही जमीन बटाई पर लेकर नरसिंहलू ने कपास और तरबूज बोया। घर बनाने और फसल बोने के लिए गया कुल कर्ज लगभग दो लाख था।

    नरसिंहलू के बूढ़े पिता नगय्या के जीवन की यह क्रूर त्रासदी है कि उनका एक बेटा फेफड़े की बीमारी के कारण मर गया और दूसरा तरबूज की बीमारी के कारण। इस 25 अक्टूबर को नरसिंहलू को आत्महत्या किए हुए एक साल बीत चुका है। उनकी दो एकड़ जमीन पांच हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से बटाई पर चढ़ चुकी है। उनकी पत्नी भीमम्मा के पास न तो खेत जोतने की ताकत बची है और न ही खाद-बीज के लिए पैसा। ऊपर से रोज-रोज होने वाला तकाजा मूल के साथ हर दिन जिल्लत को भी बढ़ा रहा है।

    नरसिंहलू की पंद्रह वर्षीय बिटिया इस साल 12वीं में आ गई है। मैंने उससे पूछा कि वह बड़ी होकर क्या बनना चाहती है? उसका जवाब था कि कोई भी छोटी-मोटी नौकरी करके मां की मदद करना चाहती हूं। मैंने जब उससे पूछा कि क्या उसके पास डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर या कलेक्टर बनने जैसा कोई सपना नहीं है? तो उसने बड़े ही सपाट स्वर में कहा 'हम ऐसे सपने भी नहीं देख सकते।'अपनी लाख कोशिशों और सभ्यता के तमाम तकाजों के बावजूद वह अपना गुस्सा छुपा नहीं पा रही थी।

    स्वयं सहायता समूह सहायता नहीं कर सका

    जड्चर्ला मंडल का गांव लिंगमपेट। तीन महीने में इस गांव के आठ किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें से तीन महिलाएं हैं। पिछली तीन आत्महत्याएं 10 दिन के भीतर हुई थीं। ये मेरे सफर का आखिरी पड़ाव था। इसके बाद मुझे फिर दिल्ली लौट जाना था।

    ढलती शाम को कंधे पर लटकाए हम वैंकटय्या के घर पहुंचे। वेंकटय्या मुदिका समुदाय के सदस्य हैं, जो अनुसूचित जाति में आती है। उनकी पत्नी वेंकटम्मा ने 15 अक्टूबर को आत्महत्या कर ली। ये गांव में दस दिन के भीतर होने वाली तीसरी आत्महत्या थी।

    वेंकटय्या के पास कुल जमा एक एकड़ जमीन है,जिस पर उन्होंने मक्का बोया। बुवाई के दो दिन बाद ही तेज बारिश के चलते किए-कराये पर पानी फिर गया। वेंकटय्या के पास फिर से बुवाई करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था, पर उसके पास अब बुवाई लिए पैसे नहीं थे।

    वेंकटम्मा गांव में स्वयं सहायता समूह चलाती थी। संकट में फंसे पति की मदद के लिए उन्होंने स्वयं सहायता समूह के खाते से किसी को बिना बताए चालीस हजार रुपए अपने पति को दे दिए। वेंकटम्मा ने सोचा था कि फसल कटने के बाद वह सारे पैसे वापस जमा करावा देंगी। वैसे भी अगर खेती ही नहीं रही तो उनका परिवार खाता क्या?

    वेंकटम्मा को क्या पता था कि ये बारिश उनका इतनी जल्दी पीछा नहीं छोडऩे वाली है। पहले बारिश ने बीजों को तबाह किया और दूसरी दफा खड़ी फसलों को तबाह किया। अपनी साथिनों द्वारा लगाए जा रहे गबन और विश्वासघात के आरोप वेंकटम्मा कि जिंदगी को नरक बनाने के लिए काफी थे।

    15 अक्टूबर की शाम वेंकटम्मा ने जिस मिट्टी और घास-फूस की संरचना को इतने जतन से एक मुक्कमल घर की शक्ल दी थी, उसी घर के पिछवाड़े में फांसी पर लटककर जान दे दी। वेंकटम्मा के सात साल के बेटे अंजनैलू इस बात को शायद ही ठीक-ठीक समझ पा रहा है। कैमरे के सामने आते ही वह बरबस मुस्कुरा देता है। मेरे पास इस रिपोर्ट में चस्पां करने के लिए वेंकटय्या के बयान की जगह उनकी आंखों से गिरते आंसू हैं, जो कि हमारे वापस लौटने के वक्त तक बह रहे थे। मैं आज भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि वेंकटय्या बोल सकते हैं।

    हम जैसे ही वेंकटय्या के घर से निकलने को हुए वेंकटय्या के पिता मेरे बहुत करीब आकर तेलगु में कुछ बोलने लगे। मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले मेरे गाइड उदय मित्रा ने कुछ पैसे उनके हाथ में रख दिए। लौटते-लौटते अंधेरा हो चुका था। सड़क किनारे एक आदमी धुत्त नशे में बड़बड़ा रहा था। हम जड्चर्ला के लिए टैंपो में सवार हुए। टैंपो का इंजन स्थायी भाव से भड़भड़ा रहा था, लेकिन इससे भी ज्यादा एक-एक सवाल दिमाग को भड़भड़ा रहा था। इसे किसानों की आत्महत्या कहा जाए, जैसा की पुलिस के दस्तावेजों में दर्ज है या फिर हमारी राजनीतिक व्यवस्था द्वारा सुनियोजित तरीके से किया जा रहा नरसंहार। खैर,आप इसे जो भी कहें, ये इन परिवारों के नारकीय जीवन में कोई खास फर्क नहीं पैदा करेगा।


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    सरकारों और कारपोरेशनों द्वारा नागरिकों की निगरानी बंद हो!

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    पिछले दिनों दुनिया भर के पांच सौ लेखकों ने आम नागरिकों पर बढ़ती जा रही निगरानी (सर्वेलेंस)का विरोध करते हुए इसके तत्काल बंद किए जाने की मांग की। प्रस्तुत है उस वक्तव्य का अविकल अनुवाद।

    हाल के वर्षों में सर्वेलेंस (निगरानी) किस हद तक बढ़ चुका है इसकी जानकारी सामान्य हो चुकी है। माउस के कुछ क्लिक्स के साथ सत्ता आपके मोबाइल उपकरण, आपके ईमेल, आपकी सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट तलाशों (सर्चेज) तक पहुंच सकता है। यह आपके राजनीतिक झुकाव और गतिविधियों पर नजर रख सकता है और इंटरनेट कारपोरेशनों के सहयोग से, यह आपसे संबंधित सामग्री (डाटा) और इस तरह आपके उपभोग और व्यवहार का अंदाज लगा सकता है। लोकतंत्र का आधार व्यक्ति की अभेद्य अक्षतता है। मानवीय अक्षतता का विस्तार जैविक शरीर से आगे तक है। अपने विचारों और अपने निजी पर्यावरणों और संचार में सब मानवों का यह अधिकार है कि वे बिना नजर रखे व बिना दखलंदाजी के रहें। यह मानवीय मौलिक अधिकार राज्य सत्ता और कारपोरेशनों के द्वारा व्यापक निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी के विकास के दुरुपयोग से व्यर्थ हो गया है। निगरानी में आया हुआ कोई व्यक्ति अब स्वतंत्र नहीं है, जिस समाज में निगरानी हो रही हो वह लोकतंत्र नहीं है। किसी तरह की वैधता को बनाए रखने के लिए हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों को हर हालत में वास्तविक दुनिया की तरह ही आभासीय (वर्चुअल) दुनिया में भी लागू होना चाहिए।

    निगरानी निजता का हनन करती है और सोचने और विचारने की स्वतंत्रता का हनन करती है।

    व्यापक निगरानी (मास सर्वेलेंस) हर नागरिक को एक संभावित संदेहास्पद व्यक्ति मानकर चलती है। यह हमारी ऐतिहासिक जीतों में एक निर्दोषिता की धारणा को उलट देती है।

    निगरानी व्यक्ति को पारदर्शी बना देती है जबकि राज्य सत्ता और कार्पोरेशन गोपनीय तरीके से काम करते हैं। जैसा कि हमने देखा है कि इस ताकत का नियोजित तरीके से दुरुपयोग हो रहा है।

    निगरानी (सर्वेलेंस) चोरी है। यह जानकारी (डाटा) सार्वजनिक संपत्ति नहीं है: यह हमारी चीज है। जब इसका इस्तेमाल हमारे व्यवहार का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है तब हमें किसी और चीज के लिए लूटा जाता है: स्वाधीन इच्छा का सिद्धांत लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के लिए महत्त्वपूर्ण है।

    हम सब लोगों केलिए लोकतांत्रिक नागरिक होने के नाते यह निश्चित करने का अधिकार चाहते हैं कि किस हद तक उनके बारे में किसके द्वारा जानकारी (डाटा) को कानूनी तरीके से संकलित और प्रसंस्कृत किया जा सकता है; उनके तथ्य कहां संकलित हैं और उनका किस तरह से उपयोग किया जा रहा है; अगर यह जानकारी और तथ्य गलत तरीके से इकट्ठे व संकलित किए गए हैं तो इन को नष्ट करने के लिए वापस लेने का अधिकार चाहते हैं।

    - सब देशों और कारपोरेशनों से हमारी मांग है कि इन अधिकारों का सम्मान किया जाए।

    -हम सब नागरिकों का अह्वान करते हैं कि वे आगे आएं और इन अधिकारों की रक्षा करें।

    - हम संयुक्त राष्ट्र संघ से मांग करते हैं कि डिजिटल युग में नागरिक अधिकारों की रक्षा को केंद्रीय महत्त्व का माने और एक अंतरराष्ट्रीय डिजिटल अधिकार अधिनियम (इंटरनेशनल बिल आफ डिजिटल राइट्स) बनाए।

    हम सरकारों से मांग करते हैं कि इस तरह के समझौते पर हस्ताक्षर करें और उसका पालन करें।

    - अल्बर्टो मांगुआ, जेम्स ब्रेडले, तहमीमा अनम, पॉल स्कॉट, माग्रेट एटवुड, लिआओ यिवु, ज्यां-जेक्वा बेनिनेक्स, गुंटर ग्रास, कोस्टास एक्रिवॉस, भारत के शाहिद अमीन, अमित चौधरी, अमित घोष, रामचंद्र गुहा, रणजीत हस्कोटे, गिरीश कर्नाड, अरुंधति रॉय, रॉडी डॉयल, यिट्जाक लाओर, एमोस ओज, आंद्रिया बाजानी, मासिमो कारलोटो, तोसिहिको उजी, रोजा बेलट्रान, इयान बुरूमा, टिम कोरबाल्लीस, निक्की हेगर, हेलन हबीला, चिका उनिग्वे, ओलुमिदे पोपूला, मोहसिन आमिद, सउद अमीरी, अला हलेहेल, ओल्गा टोकारक्जुक, पेड्रो रोसा मेंडेस, मर्सिया कार्तारेस्क्यू, व्लादिमीर एरिस्तोव, ब्रेयटन ब्रेयटनबाख, एंटजी क्रोग, जेएम कोएट्जी, जुलिओ ललामाजारेस, तारिक अली, मार्टिन एमिस, जूलियन बार्नेस, जॉन बर्जर, कोजुओ इशिगुरो, पीको आयर, हरी कुंजरु, हनीफ कुरैशी, जॉन एशबेरी, सेफीर, रिचार्ड सेनेट, जेन स्माइले, एलिस वॉकर, इलिएट वेनबर्जर तथा जेफरी यांग।


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    save-girls-compaignउत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्त्री-पुरुष का अनुपात बेहतर है। इस क्षेत्र के बेहतर लिंगानुपात की प्रशंसा नोबल पुरस्कार विजेता अमृत्य सेन ने भी की थी कि केरल के अलावा केवल उत्तर प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं अधिक हैं। यह इस बात को बताता है कि इन इलाकों में महिलाओं के प्रति भेदभाव नहीं है। लेकिन यह बात पिछली जनगणना तक ठीक भी थी। तब सभी पर्वतीय जिलों केवल उत्तरकाशी को छोडकर सभी में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या हजार से ज्यादा थी। उत्तरकाशी में यह 996 थी, जिसे असमान्य नहीं कहा जा सकता। इस बार केंद्रीय स्थास्थ्य मंत्रालय के वर्षिक स्थास्थ्य सर्वे में बड़े ही चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह सर्वे 2005 में राष्टीय जनसंख्या आयोग की एक सिफारिस के बाद किया गया। इसमें कहा गया कि हर जिले की स्वास्थयगत स्थितियां अलग-अलग होती है। इसलिए जिले वार स्थास्थ्य मानकों को मानने के लिए सर्वे किया जाए। इसी के तहत जुलाई 201व से लेकर मार्च 2011 तक नौ राज्यों बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, उड़ीसा राजस्थान और असम के 284 जिलों में यह सर्वे किया गया। सर्वे में जिलों में लिंगानुपात का आंकलन भी किया गया। इसके तीन स्तर थे। पहला कुल जनसंख्या का लिंगानुपात क्या है, दूसरा 0-4 साल के बच्चों के बीच लिंगानुपात क्या है और तीसरा तत्काल जन्म ले रहे बच्चों में लिंगानुपात क्या है। इस सर्वे के अनुसार उत्तराखंड के सभी पर्वतीय नौ जिलों में स्त्री-पुरुष अनुपात बिगड़ गया है। कुल जनसंख्या का जो लिंगानुपात है उससे कम 0 से चार वर्ष तक का और उससे भी कम तत्काल जन्म पर लिंगानुपात उससे भी नीचे चला गया है। कमोवेश सभी जिलों की स्थिति खराब है सभी जिलों में 0-4 वर्ष की जनसंख्या में प्रतिहजार पर लड़कियों की संख्या 900 से नीचे चली गई है और नवजात बच्चों पर और भी कम है। पिथौरागढ़ जिले की स्थिति तो सबसे खराब है, वहां प्रति हजार लड़कों पर केवल 764 लड़कियां जन्म ले रही है। यह जिला 284 जिलों में सबसे निचले स्थान पर चला गया।

    देखा जाए तो प्रकृति स्त्री और पुरुष के बीच भेद नहीं करती है। सामान्य रूप से जितने लड़के पैदा होते हैं लगभग उतनी ही लड़कियां भी पैदा होती है। इसके अलावा जैविक रूप से नवजात लड़कियों में जीवित रहने की क्षमता नवजात लड़कों से ज्यादा होती है। इस तरह प्रति हजार पर लड़कियां ज्यादा होनी चाहिए। पर्वतीय समाज में ऐसा था। तब ऐसा अचानक क्या हो गया कि लड़कों के मुकाबले लड़कियों का जन्म कम हो गया। इसके लिए सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों पर ध्यान देना होगा। सामाजिक रूप से उत्तराखंड का पर्वतीय समाज के दो प्रमुख घटक रहे है। पहला स्थानीय खस और दलित वर्ग और दूसरा मुख्य धारा से आया ब्राह्मणों और राजपूतों का वर्ग। पहला वर्ग बहुसंख्यक था और दूसरा अल्पसंख्यक। लेकिन सत्ता और सांस्कृतिक तौर पर अल्पसंख्यक वर्ग ही प्रभावशाली था। बाहर से आया वर्ग पूरी तरह से पितृसत्तात्मक था लेकिन स्थानीय वर्ग उस तरह से पितृसत्तात्मक नहीं रहा। वहां महिलाओं के अधिकारों के प्रति कहीं अधिक लोकतांत्रिक था। स्थानीय वर्ग में संपत्ति और सामाजिक जीवन, जिसमें विवाह और तलाक शामिल है, में महिलाओं को बहुत अधिक अधिकार थे। यहां तक कि संपत्ति के मामले में महिलाओं की स्वतंत्र स्थिति भी थी। जिन नियमों और कानूनो से यह समाज संचालित होता था उसे ब्रिटिश शासन में कुमाउं कस्टमरी लॉ या खस फैमली लॉ कहा जाता था। इन स्थितियों में ऐसा सामाजिक माहौल बना हुआ था, जिसमें महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं था कम से कम जन्म को लेकर तो बिल्कुल भी नहीं। यह सही है कि एक लड़के की चाह तो रखी गई लेकिन उसके लिए लड़कियों को बाधा नहीं माना गया। यह सबसे बड़ा कारण था कि महिलाओं की संख्या हमेशा पुरुषों से ज्यादा रही। लेकिन आजादी की लड़ाई और आजादी के बाद पूरे समाज में खुद को मुख्य धारा के साथ जोडऩे की होड़ लग गई। आजादी के बाद कस्टमरी लॉ खत्म कर दिए गए और हिंदू अधिनियमों से समाज को संचालित किया जाने लगा तो महिलाओं की परंपरागत स्थित में परिवर्तन आ गया। महिलाओं की संपत्ति और सामाजिक स्थिति में अंतर आ गया और वैधानिक रूप से पितृसत्तात्मक समाज स्थापित हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि हर पुरानी पीढ़ी के अवसान के साथ पितृ सत्ता ज्यादा मजबूत हो गई। आज उत्तराखंडी समाज पूरी तरह से पितृ सत्तात्मक हो गया है।

    आर्थिक तौर पर उत्तराखंडी समाज कृषि समाज ही था लेकिन यह पूरी तरह से कृषि समाज भी नहीं था। बल्कि पशुपालन और वनों पर भी आधारित था। पूरी अर्थ व्यवस्था का केंद्र बिदु महिला थी। आजादी से पहले माल प्रवास, जाड़ों में तराई और भाबर जाने की परंपरा, कृषि का अनिवार्य हिस्सा थी। दीपावली से होली तक माल प्रवास के दौरान गेहूं की फसल उनके पास होती थी, धान और अन्य फसलों के लिए वे पहाड़ों की खेती पर निभग् थे। आजादी के बाद माल प्रवास खत्म हो गया। इसके अलावा वनों पर लगातार सरकारी शिकंजा कसता चला गया। अंग्रेजों के वन अधिनियम ने पहली बार कृषि और वन भूमि को अलग किया। अंग्रेजों ने हर वन अधिनियम के बाद जंगल का रकबा बढ़ा दिया और खेती का रकबा कम कर दिया। वन अधिनियम ने खेती के लिए नई जमीनों की खोज को बंद कर दिया। गोया कि बाद में अंग्रेजों ने नया आबाद कानून बनाया गया लेकिन आजादी के बाद वह भी खत्म हो गया। जंगलों के छिनने, बढ़ती आबादी के खेती-किसानी मे जगह न होने और वन अधिनियम के कारणं खेती के लिए नई जमीन न पा सकने के कारण कृषि अनुत्पादक हो गई और लोगों को पलायान के लिए मजबूर होना पड़ा। जो लोग पहाड़ों में रह भी गए तो मानने लगे कि खेती-किसानी से कुछ नहीं हो सकता। इस अवधारणा ने उन्हें खेती से बिमुख कर दिया। उन्होंने मान लिया कि आखिर में जाना तो महानगरों की ओर ही पड़ेगा। अब अर्थव्यवस्था का केंद्र बिदु खेती न नौकरी करना हो गई। इसके लिए फौज या महानगर जाना अनिवार्य हो गया। महानगर और फौज में लड़के तो जा सकते थे, लड़कियां नहीं, फिर खेती से बिमुख होने के कारण महिलाओं की प्राथमिक स्थिति भी बदल गई।

    सांस्कृतिक तौर पर पर्वतीय समाज में दहेज जैसा शब्द नहीं था। लेकिन अब दहेज पहुंच गया है। अब लड़कियां बोझ हो गईं और उनके साथ भेदभाव किया जाने लगा। और यह भेदभाव जन्म से पहले से ही शुरू हो गया। मशीनों के माध्यम से लिंग निर्धारण की सुविधा का परिणाम यह हुआ कि लड़कियों की गर्भ में ही हत्या होने लगी। पर्वतीय जिले सबसे पिछड़े हुए क्षेत्र हैं, वहां मां-बाप के पास शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं पर खर्च करने के लिए बहुत कम धन है। जब उन्हें लड़का या लड़की दो में से एक को चुनना होता है तो वे निश्चित रूप वे लड़के को ही चुनते है और यह चुनाव जन्म से पहले ही हो जाता है।

    जन्म पर लिंगानुपात जन्म पर लिंगानुपात जन्म पर लिंगानुपात लिंगानुपात (0-4 वर्ष) लिंगानुपात (0-4 वर्ष) लिंगानुपात (0-4 वर्ष) लिंगानुपात (सब आयु वाले) लिंगानुपात (सब आयु वाले) लिंगानुपात (सब आयु वाले)
      कुल ग्रामीण शहरी कुल ग्रामीण शहरी कुल ग्रामीण शहरी
    उत्तराखंड 866 877 833 877 888 846 992 1026 913
    अल्मोड़ा 874 879 802 896 899 843 1131 1144 968
    बागेश्वर 823 831 667 880 885 776 1089 1099 925
    चमोली 857 856 864 879 900 781 1045 1077 903
    चंपावत 880 853 1017 888 877 943 1017 1045 891
    देहरादून 836 876 800 865 880 852 944 953 937
    हरिद्वार 870 870 868 847 842 862 881 868 904
    नैनीताल 918 908 932 882 872 896 910 924 890
    पौड़ी गढ़वाल 885 890 854 912 920 861 1134 1162 989
    पिथौरागढ़ 764 781 668 817 844 699 1067 1084 991
    रूद्रप्रयाग 861 863 500 894 897 586 1194 1200 720
    टेहरी गढ़वाल 890 895 843 922 929 867 1220 1273 929
    उधमसिंह नगर 867 914 787 877 912 817 904 918 880
    उत्तरकाशी 868 882 741 921 933 818 996 1012 891

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    'गण'के लिये नये 'तंत्र'की दरकार है

    लेखक : पवन राकेश :::: वर्ष :: :

    कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं होता
    एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!

    aap-ki-krantiअरविंद केजरीवाल ने 'आम आदमी पार्टी'के माध्यम से इस गणतंत्र में उम्मीदों और सम्भावनाओं का पत्थर तो उछाल ही दिया है। सुराख होगा या नहीं यह तो भविष्य ही बतायेगा, पर उसकी उछाल ने एक खदबदाहट तो पैदा कर ही दी है। नाकारेपन, भ्रष्टाचार और सरकारी दादागिरी से तंग आ गये 'गण'को यह लगने लगा है कि अभी कुछ होने की सम्भावनाएँ मरी नहीं हैं और यदि सही सोच और प्रक्रिया सामने आए तो वह कुछ कर सकता है।

    गणतंत्र के 64 साल का लेखाजोखा देखा जाय तो विकास और असमानता साथ-साथ बढ़ते नजर आते हैं। एक तरफ हमारा मंगल मिशन है, दूसरी तरफ लगातार दम तोड़ती खेती है। एक तरफ स्वास्थ्य सेवाओं को स्वास्थ्य पर्यटन से जोड़ा जाता है, दूसरी ओर डाक्टर, नर्स व अन्य स्टाफ की कमी से सारे अस्पताल जूझ रहे हैं। ढेर सारे इंस्टीट्यूट, विश्वविद्यालय, कॉलेज खुलते जा रहे हैं। उधर आपको योग्य अध्यापक/ट्यूटर नहीं मिलते। यदि समाचार पत्रों में प्रकाशित नौकरियों के विज्ञापनों पर नजर डालें, जो रोज प्रकाशित होते हैं और रोज नई नियुक्तियों से भरे होते हैं तो हर हाथ को रोजगार मिल ही जाना चाहिए। फिर भी बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है। खेती हो या व्यापार, शिक्षा हो या चिकितसा यह विरोधाभास हर क्षेत्र में दिखता है।

    जिस भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल को सिर आँखों पर बिठाया वह एक अनिवार्य बुराई के रूप में समाज में जड़ जमा चुका है। इसका एक कारण पुराने पड़ चुके कानून भी हैं। सालों पहले बने कानून आज की परिस्थितियों में, आज के सन्दर्भ में अपनी अर्थवत्ता खो चुके हैं। लेकिन वह उसी रूप में चले आ रहे हैं जिसका लाभ कभी अधिकारी उठाते हैं और कभी जनता। इनको जाँचने और दुरुस्त करने के बजाय ऐसे ही ढोते रहने का परिणाम ही न्यायालयों में बढ़ते मुकदमों के ढेर के रूप में देखा जा सकता है। आज जितने मुकदमे निजी स्तर पर हैं उनसे ज्यादा मुकदमे सरकार बनाम जनता के हैं।

    आम आदमी पार्टी को मौका मिला था कि वे इस व्यवस्था को ठीक करने के लिए कुछ कदम उठाते लेकिन वह अति उत्साह में जिन बातों में उलझ गये हैं उससे उसकी ऊर्जा अब बँट जायेगी। मुख्य कार्य पर ध्यान लगाने के बजाय फालतू बातों को निपटाने में ही वक्त और ऊर्जा लगेगी जिससे बचा जा सकता है। भारतीय मानसिकता का एक अजब विरोधाभास है, जिसे समझ कर ही उसकी ऊर्जा को एक सकारात्मक दिशा दी जा सकती है। हमारा सामाजिक मनोविज्ञान यह है कि हम कितने ही बुरे हों, अराजक हों, कमीने हों, हिंसक हों लेकिन हम इन सबको पसन्द नहीं करते और इनके विरोध में खड़े हो जाएँगे। आज इस मनोविज्ञान को बदलने की सख्त जरूरत है। हमें लगता है कि सारी अच्छाइयाँ दूसरों में होनी चाहिए- हमारी तो कोई बात नहीं।

    पैंसठवाँ गणतंत्र दिवस मनाते हुए यह कचोट गहरी हो जाती है कि हमारी सरकारें विश्वबैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जेसी संस्थाओं की गिरवी हैं। कर्ज को ही अर्थव्यवस्था की खुशहाली का पैमाना माने जाने लगा है। राज्य सरकारें इस बात पर गर्व करती हैं कि हमारी योजनाएँ इस या उस संस्था के पैसे से चल रही हैं। इसका परिणाम ? सरकार की नीतियाँ इन संस्थाओं के मनमाफिक बन रही हैं, जिसने न केवल हमारी राष्ट्रीय भावना को खत्म कर दिया है, वरन् हमारा 'ब्रेन वॉश'भी कर दिया है। आज हम अपने बच्चे को सिर्फ कॉरपोरेट बनाना चाहते हैं ताकि वह पैसा कमाये। इसी का नतीजा है कि हमारे पास सैनिकों, सिपाहियों अधिकारियों, अध्यापकों का टोटा पड़ गया है और जो हैं भी उनकी गुणवत्ता को हम खुद ही कोसते रहते हैं। देश के प्रति जिम्मेदारी का जज्बा बहुत दूर की कौड़ी लगती है।

    ऐसे हालातों के बीच केजरीवाल की तनी मुट्ठी ने एक लौ तो दिखाई है कि हम आज भी कुछ कर सकते हैं। 2014 का आसन्न चुनाव हमें एक मौका दे रहा है कि हम ऐसे लोगों को अपना नेतृत्व करने को चुनें जो हमें अगले पाँच साल तक सिर्फ कोसने का ही मौका न दें वरन् एक नया 'तंत्र'बनाएँ जो इस 'गण'का हो, आम आदमी का हो।


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    बिना पते की पुष्टि किये मोबाइल कनेक्शन का धंधा जोरों पर,कहीं आपके नाम किसी और का मोबाइल तो चालू नहीं!


    Illegal sale of sim cards without address verification!


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


    बिना पते की पुष्टि किये मोबाइल कनेक्शन का धंधा जोरों पर,कहीं आपके नाम किसी और का मोबाइल तो चालू नहीं!देश में कई लाखों ऐसे मोबाइल यूजर्स भी हैं जो कई नेटवर्क कनेक्‍शन यानी सिम लेकर मोबाइल इस्तेमाल करते हैं और एक समय के बाद किसी एक सिम का ही इस्तेमाल करते हैं।जबकि दूसरे सिम के कनेक्‍शन भी उनके ही नाम पर होते हैं लेकिन वे इस्तेमाल नहीं करते। न ऐसे सिम के दुरुपयोग के बारे में उनको खबर होती है।आधिकारिक तौर पर  इस तरह के मोबाइल कनेक्‍शन को बंद कर देने का प्रावधान है लेकिन अमूमन ऐसा होता है नहीं।


    यह समस्या बेहद गंभीर है।आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों और बढ़ते हुए अपराधों के मद्देनजर। क्योंकि पूरे विश्व में पाँच अरब मोबाइल कनेक्शन हैं। इनमें से 47 प्रतिशत कनेक्शन भारत-चीन समेत एशिया प्रशांत क्षेत्र में हैं। मोबाइल कंपनियां भारत में ही एक करोड़ कनेक्शन का बाजार कब्जाने की होड़ में हैं। इस पर तुर्रा यह कि सरकार नए मोबाइल कनेक्शन लेने के लिए आधार कार्ड को पहचान के तौर पर इस्तेमाल करने पर विचार कर रही है और इस संबंध में नियमों को जल्दी अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। पहचान निश्चित करने के लिहाज से यह बंदोबस्त कारगर हो सकता है लेकिन आधार का बायोमेट्रिक डाटा हेक हो जाने पर संबंधित व्यक्ति जो फंसेगा,सो फंसेगा,अपराधी माफिया और आतंकी गिरोहों को अपने मंसूबों को अंजाम देना केक वाक जैसा हो जायेगा।


    बंगालभर में और शायद देशभर में यह धंधा खूब फल फूल रहा है। नेट पर उपलब्ध तथ्य हैक करके बहुत कुछ किया जा सकता है,मोबाइल कनेक्शन तो मामूली बात है।लोग कनेक्शन बंद होने या कनेक्शन मिलने में देरी होने की हालत में दोबारा तिबारा अपने दस्तावेज एजंसी के हवाले कर देते हैं।अतिरिक्त दस्तावेज का क्या दुरुपयोग संभव है,किसी को इसका अंदेशा तक नहीं होता।इस गैरकानूनी धंधे के पीछे यह तथ्य सबसे गौरतलब है।


    नियमों के मुताबिक नये कनेक्श के लिए दिये जाने वाले सिम के एवज में 24 से लेकर 72 घंटे के मध्य पता संबंधी सबूत पेश करने होते हैं।लेकिन सिंडकेट की महिमा अपरंपार है कि कनेक्शन बिना दस्तावेज न केवल चालू हो जाता है,वह बाधित होता भी नहीं है।जिसको कनेक्शन दिये गये,उसके बदले किसी और नाम पर दस्तावेज और कनेक्शन का करिश्मा आम है। जिस व्यक्ति के नाम किसी और का मोबाइल कनेक्शन चालू होता है,किसी बड़ी वारदात में फंसने से पहले उसे कानोंकान खबर तक नहीं होती।


    मोबाइल की चोरी हो जाने पर या सिम गायब हो जाने पर भी अमूमन लोग पुलिसिया पचड़े में वक्त खराब होने की आशंका से अनिवार्य एफआईआर दर्ज नही कराते।ऐसे मामले में हर बार अपराधी सिम नष्ट नहीं कर रहा होता है। उसे कहीं सुरक्षित ठिकाने पर छुपा दिया जाता है और जब तय हो जाता है कि सिम न लाक हुआ और न कोई जांच पड़ताल चल रही है और मामला एकदम शांत है तो या तो अपराधी या गिरोहबंद लोग ऐसे सिम का खुद इस्तेमाल  कर लेते हैं या फिर एजंसियों और सिंडिकेट माध्यम नये ग्राहक जिसके पास पते का सबूत होता नहीं है,उसके हवाले कर दिया जाता है।


    आधुनिक तकनीक से खेलने वाले ज्यादातर युवाजनों को इन खतरों की कोई ज्यादा परवाह होती नहीं है और न आम ग्राहक जागरुक है,यही इस धंधे की असल पूंजी है,जिसके माफिक लोग चांदी काट रहे हैं।


    एजंसियां जिनमें से अनेक अधिकृत भी नहीं होती, एक ही नाम पर कई कई कनेक्शन जारी कर देते हैं और एक ही दस्तावेज का इस्तेमाल करके कंपनियों के एजंटों के मार्फत पते की पुष्टि हो जाती है।ऐसे गलत काम करने वाले लोगों को अपना अपना कमीशन मिल जाता है।


    कानूनन एक नाम पर नौ से ज्यादा सिम जारी नहीं हो सकते किसी कंपनी की ओर से।लेकिन ऐसा भी धड़ल्ले से हो रहा है।


    एक बार पते की पुष्टि हो जाये तो सिम का इस्तेमाल कौन और कैसे कर रहा है,इसकी परख का कोई पुख्ता बंदोबस्त है नहीं।


    जबकि नागरिकों को नये कनेक्शन के लिए हर तरह की खानापूरी करनी होती है।


    Illegal sale of sim cards without address verification


    A new syndicate is at its peak in west bengal that is sale of sim cards without address verification . Now the new act sys that a new mobile connection needs address verification to start the connection which takes from 24 hours to 72 hours.


    But thanks to these syndicates the customer gets a new connection without any documents and the connection is already up and running.


    How this happens ?


    These syndicates they issue several sim cards on one name and they also pay some company people to solve the verification issue.


    Again a legal issue jumps in now .


    You cannot have more than 9 sim cards registered under one name but multiple sim cards are issued without any hastle..


    Irony is that they use fake ids sometimes stolen datas from other people.


    But the problem is that the verification happens the only provision  to stop the misuse of numbers for criminal activities.


    Is it heppening reallly???



    Once verified,no one is there to investigate the misuse.


    .Areas like railway stations near police stations etc are the most fruitful zones for this business.


    But innocent ordinary citizens are always  harassed to get a new connection.



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    परिवार वाद ही आगे चलकर जातिवाद में विकसित होता है

    परिवार वाद ही आगे चलकर जातिवाद में विकसित होता है

    बहस तलब- जाति उन्मूलन को बुनियादी एजेण्डा बनाये बगैर हम न वर्ग जाति वर्चस्व टल्ली लगाकर तोड़ सकते हैं और न पूँजी निर्देशित राज्यतन्त्र को बदलने की कोई पहल कर सकते हैं

    यदि देश के सारे गरीब एक हो गये तो ?

    पलाश विश्वास


    बहस की शुरुआत करें, इससे पहले एक सूचना। दृश्यांतर का ताजा अंक मेरे सामने है। इस भव्य पत्रिका के संपादक अजित राय हैं। इस अंक में नियमागिरि पर एक रिपोर्ताज है। हमारे प्रिय लेखक मधुकर सिंह की कहानी है। मीडिया की विश्वसनीयता पर दिलीप मंडल का मंतव्य है। किसानों की आत्महत्या के कथानक पर भूतपूर्व मित्र संजीव के उपन्यास फांस का अंश है। संजीव हंस के संपादक बनने के बाद हमारे लिये भूत हैं। राजेंद्र यादव के धारावाहिक उपन्यास की चौथी किश्त भूत है। कुंवर नारायण की कविताएं हैं। और स्मृति शेष ओम प्रकाश बाल्मीकि हैं। जरूर पढ़ें।

    बहस से पहले सुधा राजे की पंक्तियां भी देख लें।

    युवा कवियत्री सुधा राजे लिखती हैं

    जिस दिन से सारा मीडिया """(असंभव बात) """"

    नेता के बारे में एक भी शब्द कहना लिखना त्यागकर

    केवल

    और

    केवल

    जनता की समस्याओं और संघर्षों उपलब्धियों और नुकसानों के के बारे में चित्र शब्द ध्वनि से जुट जायेगा अभिव्यक्ति पर

    व्यक्ति पूजा बंद हो जायेगी

    और

    वास्तविक चौथे पाये की स्थापना होगी

    राजनेताओं की अकल अकड़ सब ठिकाने आ जायेगी।

    एक ही थैली के चट्टे बट्टे "

    कक्षा तीन में 'कक्का मास्साब ने सेंवढ़ा में यह कहावत पढ़ायी थी ।

    अब लोग इतने भी भोले नहीं रहे कि ये नौ दो ग्यारह वाले "बजरबट्टू को खरीदेगे वह भी ऑयल ऑफ ओले के प्रॉडक्ट मुफ्त मिलने के बाद!!!!

    हमारे परम आदरणीय गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी, जिन्होंने जीआईसी नैनीताल के जमाने से लगातार हमारा मार्गदर्शन किया है और अब भी कर रहे हैं, जिन्होंने हमें शोषणविहीन वर्गविहीन समाज के लक्ष्य की दिशा दी और अग्निदीक्षित किया है, उन्होंने हमारे जाति उन्मूलन संवाद में हस्तक्षेप किया है। वे जाति आधारित आरक्षण के विकल्प बतौर आर्थिक आरक्षण की बात कर रहे हैं, लेकिन हमारे आकलन के हिसाब से तो मौजूदा राज्यतन्त्र और मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था में लोककल्याणकारी राज्य के अवसान के बाद क्रयशक्ति वर्चस्व के जमाने में किसी भी तरह का आरक्षण उतना ही अप्रासंगिक है, जैसे सामाजिक क्षेत्र की योजनाएं या कॉरपोरेट उत्तदायित्व। जाति  उन्मूलन को बुनियादी एजेण्डा बनाये बगैर हम न वर्ग जाति वर्चस्व टल्ली लगाकर तोड़ सकते हैं और न पूँजी निर्देशित राज्यतन्त्र को बदलने की कोई पहल कर सकते हैं।

    हमने इस बहस की प्रस्तावना आपकी सहमति असहमति के लिये फेसबुक पर डाला ही था कि हल्द्वानी से हमारे गुरुजी का फोन आ गया।

    सीधे उन्होंने सावल दागा, पलाश, बताओ,जाति उन्मूलन होगा कैसे।

    हमने कहा कि हम अंबेडकर की परिकल्पना की बात कर रहे हैं और चाहते हैं कि अस्मिताओं के दायरे तोड़कर देश जोड़ने की कोई पहल हो।

    गुरुजी ने कहा कि जाति तो टूट ही रही है। अंतर्जातीय विवाह खूब हो रहे हैं।

    हमने कहा कि बंगाल में सबसे ज्यादा अंतर्जातीय विवाह होते हैं। ब्राह्मण कन्या की किसी से भी पारिवारिक सामाजिक सम्मति से शादी सामान्य बात है। लेकिन बंगाल में जाति सबसे ज्यादा मजबूत है जहां जाति कोई पूछता ही नहीं है।

    बात तब भेदभाव पर चली। हमने गुरुजी को बताया कि बंगाल में अस्पृश्यता बाकी देश की तरह नहीं रही। लेकिन भेदभाव बाकी देश की तुलना में स्थाईभाव है।

    गुरुजी ने कहा भेदभाव खत्म होना चाहिए।

    मैंने जोड़ा, नस्ली भेदभाव।

    उन्होंने कहा कि विकास से भेदभाव टूटेगा।

    हमने कहा कि असली समस्या मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था है। पूँजीवादी विकास के तहत औद्योगीकरण होता तो उत्पादन प्रणाली जाति को तोड़ देती। लेकिन जाति उत्पादक श्रेणियों में है और अनुत्पादक श्रेणियां वर्ण हैं। श्रमजीवी कषि समाज को ही जाति व्यवस्था के तहत गुलाम बनाया गया है। अब कृषि और उत्पादन प्रणाली, उत्पादन व श्रम सम्बंधों को तहस नहस करने से क्रयशक्ति आधारित वर्चस्ववादी समाज से जाति-वर्चस्व, वर्ग-वर्चस्व खत्म होने से तो रहा।

    गुरुजी सहमत हुए।

    बाद में हमने आनंद तेलतुंबड़े से भी विस्तार से बात की।

    उनका मतामत लिखित रूप में प्रतीक्षित है।

    फिलहाल हमारी दलील के पक्ष में ताजा खबर यह है कि बंगाल में जाति और भेदभाव खत्म होने के राजनैतिक बौद्धिक प्रगतिशील दावों के बावजूद 1947 से पहले के दलित मुस्लिम मोर्चा को पुनरुज्जीवित किया गया है। इसे संयोजक रज्जाक मोल्ला माकपा और किसान सभा के सबसे ज्यादा जुझारु नेता हैं, जिन्होंने वामदलों में दलित मुस्लिम नेतृत्व की मांग करते पार्टी में हाशिये पर आने के बाद सामाजिक न्याय मोर्चा का ऐलान किया हुआ है, जिसका घोषित फौरी लक्ष्य बंगाल में दलित मुख्यमंत्री और मुस्लिम उपमुख्यमंत्री है।

    अब बंगाल में जाति की अनुपस्थिति पर अपनी राय जरूर दुरुस्त कर लें। माकपा ने तो रज्जाक बाबू को पार्टी से निष्कासित कर ही दिया है।

    आर्थिक विकास की बात आर्थिक आरक्षण की तर्ज पर तमाम दलित चिंतक नेता मसीहा करते हैं। सशक्तिकरण का मतलब मुक्त बाजार की क्रयशक्ति से उनका तात्पर्य है। भारत सरकार चलाने वाले कॉरपोरेट तत्वों का सारा लब्वोलुआब वही है।

    डॉ. अमर्त्य सेन तो खुले आम कहते हैं कि उनकी आस्था मु्क्त बाजार में है लेकिन उनका लक्ष्य सामाजिक न्यायहै। हमारे हिसाब से ये दलीलें पूरी तरह कॉरपोरेट राज के हक में है।

    मालूम हो कि आज ही इकोनामिक टाइम्स की लीड खबर के मुताबिक भाजपा अनुसूचित सेल के संजय पासवान के हवाले से नई केशरिया सरकार के जाति एजंडे का खुलासा हुआ है। उदितराज जैसे दलितों के नेता बुद्धिजीवियों को साधने के बाद और फेंस पर खड़े दलितों पिछड़ों आदिवासियों अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में लाने के अभियान के साथ नमोमय भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था तोड़ने की है। मंडल के मुकाबले कमंडल यात्रा रामराज के लिये नहीं, संवैधानिक आरक्षण तोड़ने के लिये है और नमोमयभारत बनते ही यह लक्ष्य पूरा हो जायेगा।

    बुनियादी सवाल फिर वही है कि बाजार अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट राज में संवैधानिक आरक्षण जहांँ सिरे से अप्रासंगिक हो चुका है, वहाँ जाति को खत्म किये बिना वर्ग वर्चस्व को तोड़े बिना आप हाशिये पर खड़े बहुसंख्य बहिष्कृत भारतीयों के हक हकूक बहाल किये बिना आर्थिक आरक्षण की बात करेंगे तो अस्मिताओं के महातिलिस्म से मुक्ति की राह खुलेगी कैसे।

    गुरुजी ने लिखा हैः

    मेरे बहुत से मित्र जाति उन्मूलन की बात करते हैं। मेरे विचार से किसी कानून के द्वारा जाति बोध को समाप्त नहीं किया जा सकता। जाति सामन्ती व्यवस्था में पनपती है और औद्योगिक विकास और शहरीकरण के साथ स्वत: क्षीण होती जाती है। लेकिन शर्त यह है कि सत्ता से जुड़े लोग इसे प्रश्रय न दें। जाति आधारित आरक्षण, जाति और सम्प्रदाय की सापेक्ष्य संख्या के आधार पर राजनीतिक द्लों द्वारा प्रत्यशियों का चयन, कुछ ऐसे तत्व हैं जो जाति बोध की समाप्ति में बाधक हैं। जब तक जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था रहेगी, जातिबोध समाप्त नहीं हो सकता। इसका तरीका एक ही है कि आरक्षण को जाति के स्थान पर आर्थिक आधार से जोड़ दिया जाय। लेकिन क्या हमारे राजनीतिक दल ऐसा करेंगे? यदि देश के सारे गरीब एक हो गये तो ?

    यह भी सत्य है कि परिवार वाद ही आगे चलकर जातिवाद में विकसित होता है… और यह भारत में आज भी हो रहा प्रधानमंत्री का बेटा प्रधान मंत्री, मंत्री का बेटा मंत्री, सांसद का बेटा सांसद, नौकरशाह के बेटा नौकरशाह और प्रोफेसर का बेटा प्रोफेसर, प्रतिभा और कौशल, भारत से बाहर।

    नई सरकार के जमाने में आरक्षण की बात रही दूर सरकारी कर्मचारियों की क्या शामत आने वाली है, हमारे आदरणीय जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के इस मंतव्य से उसका भी अंदाजा लगा लें-

    मोदी और ममता तो पीएम बनने के पहले ही एक्सपोज़ हो गये हैं ! दोनों के नेतृत्व में चल रही राज्य सरकारों ने कहा है कि वे सातवें पगार आयोग के गठन के ख़िलाफ़ हैं और कर्मचारियों की नियमानुसार पगार बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं ।

    यानी कर्मचारी महँगाई से मरें इन दोनों नेताओं को कोई लेना देना नहीं है।

    पे कमीशन कर्मचारियों का लोकतांत्रिक हक़ है और मोदी-ममता का इसका विरोध करना कर्मचारियों के लोकतांत्रिक हकों पर हमला है।

    इस पर अमर नाथ सिंह ने सवाल किया है, सर कृपया वह स्रोत भी बताएं जहाँ मोदी और ममता की सरकारों ने ये पुण्य विचार व्यक्त किये हैं।

    जगदीश्वर चतुर्वेदी का जवाब, नेट पर अख़बार देखो, टाइम्स में छपी है ख़बर

    फिर जगदीश्वर चतुर्वेदी का अगला मंतव्य हैः

    नरेन्द्र मोदी ने जब पीएम कैम्पेन आरंभ किया था मैंने फ़ेसबुक पर लिखा था कि गुजरात दंगों के लिये भाजपा माफ़ी माँगेगी !

    कल राजनाथ सिंह के बयान के आने के साथ यह प्रक्रिया आरंभ हो गयी है ! निकट भविष्य में मोदी के द्वारा सीधे दो टूक बयान आ सकता है।

    गुजरात के दंगों पर माफ़ी माँगते हुए !! इंतज़ार करें वे मुसलमानों के नेताओं के बीच में हो सकता है यह बयान दें !

    कारण साफ़ है पीएम की कुर्सी जो चाहेगी मोदी वह सब करेंगे!!

    संघ परिवार को हर हालत में केन्द्र सरकार चाहिए इसके मोदी कुछ भी करेगा !!

    झूठ बोलो भ्रमित करो। कुर्सी पाओ दमन करो ।

    यह पुरानी फ़ासिस्ट प्रचार शैली है और मोदी इस कला में पारंगत हैं ।

    फिर सुरेंद्र ग्रोवर जी का यह मिसाइल भी

    विनोद कापड़ी इंडिया ने जिस तरह ‪#‎न्यूज़_एक्सप्रेस पर‪ #‎ऑपरेशन_प्राइम_मिनिस्टर के ज़रिये ‪#‎सी_वोटर को नग्न किया है, इसके लिये न्यूज़ एक्सप्रेस की टीम बधाई की पात्र है.. मगर एक बात समझ नहीं आ रही कि‪ #‎मीडिया इस पर पर चुप्पी क्यों साध गया.. अरे भाई, आप लोग उपेक्षा कर दोगे तो आप को जनता उपेक्षित कर देगी.. इससे यह भी ज़ाहिर हो रहा है कि चुप्पी साधे बैठा मीडिया बरसों से ‪#‎सर्वे के नाम पर पूरे देश को मूर्ख बनाता चला आया.. कोई टीवी चैनल एग्जिट पोल के नाम पर किसी अवांछित को भावी प्रधानमंत्री बतौर पहली पसंद बताता रहा तो हर अखबार एक ही सर्वे को अपने अपने हिसाब से खुद को नम्बर वन साबित करता रहा.. जय हो..

    इन्हें भी पढ़ना न भूलें


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    और बहा ले जाए बुरे वक्तों को बुरे वक्तों की कविता


    पलाश विश्वास


    Ak Pankaj shared Rang Varta's photo.

    आज से काउंटडाउन शुरू हो गया है. 20 दिन बाद रांची के दर्शक सहित देश भर से आए लोग शिरकत करेंगे इस द्वितीय आदिवासी-दलित नाट्य समारोह और इस अवसर पर आयोजित दो दिवसीय आदिवासी दर्शन एवं साहित्य विषयक सेमिनार में.


    वे सभी जिनकी रुचि उत्पीड़ित समाजों के संघर्ष और सृजन में है, उनका स्वागत रहेगा.प्रिय साथियो, तीन दिवसीय 'द्वितीय आदिवासी-दलित नाट्य समारोह'एवं 'आदिवासी दर्शन और समकालीन आदिवासी साहित्य सृजन'पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में 21-23 मार्च 2014 को रांची झारखंड में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.    @[137643649404:274:Arvind Gaur], @[100002024290062:2048:Shyam Kumar], @[100000870673202:2048:Manish Muni], @[100000155414226:2048:Rajesh Kumar], @[1256843336:2048:Shilpi Marwaha], @[100001783987852:2048:Abhishek Nandan], @[100006531797237:2048:Arun Narayan], @[100001370063747:2048:Parvez Akhtar]

    प्रिय साथियो, तीन दिवसीय 'द्वितीय आदिवासी-दलित नाट्य समारोह'एवं 'आदिवासी दर्शन और समकालीन आदिवासी साहित्य सृजन'पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में 21-23 मार्च 201...See More


    दृश्यांतर के ताजा अंक में प्रकाशित हिंदी के शीर्षस्थ कवि कुंवर नारायण की यह कविता हमारी मौजूदा चिंताओं को कहीं बेहतर अभिव्यक्त करती है। आज  संवाद का आरंभ उनकी दो निहायत प्रासंगिक कविताओं से


    विश्वबोध की सुबह


    इतनी बेचैन क्यों है सुबह?

    क्या हुआ रातभर …

    हत्याएं...बलात्कार  लूचपाट…



    यह कैसा शोर?

    क्यों बाग रही बदहवास हवाएं

    जंगलों की ओर?


    डर लगता किसी से पूछते

    क्या हुआ सारी रात?

    लोग कुछ कह रहे दबी जुबान से

    शायद कभी नहीं बीतेगा बुरा वक्त!



    मैं ऊंचा सुनने लगा हूं

    बदल गया दूसरों से

    मेरी बातचीत का अंदाज


    बाहर कुछ होता रहता हर वक्त

    मैं छिपकर जीता हूं अपने अंदर के वक्त में भी


    एक अजीब तरह की प्रतीक्षा में

    कोी आनेवाला है

    कुछ होने वाला है जल्दी ही..

    ऐसा कुछ जैसा कुछ

    कभी नहीं हुआ इससे पहले

    मेरी अपेक्षा स्थापित

    यह कैसा विकल विश्वबोध!


    कैसी हो बुरे वक्तों

    की कविता

    कैसी हो बुरे वक्तों की कविता?


    कवि बदलते

    कविताें बदलतीं

    पर बदलते नहीं बुरे वक्त!


    बहुत-सी मुश्किलें शब्द ढूंढती

    बिल्कुल आसान भाषा में बूंद-बूंद

    चाहती कि वे उठों भाप की तरह

    अथाह गहरे समुद्रों से

    पहाड़ों से टकराएं बादलों की तरह

    घेर कर बरसें पृथ्वी को

    जैसे आंधी,पानी,बिजली..


    और बहा ले जाए बुरे वक्तों को

    बुरे वक्तों की कविता!


    साभारः दृश्यांतर


    संपादक अजित राय को धन्यवाद इन कविताों के लिए। वे हमारे पूर्व परिचित हैं।अब संपादक भी हैं और शायद उन्हें मित्र कहने की भी हमारी औकात नहीं है।जब हमारे पुरातन विख्यात मित्र हमारी मित्रता को अवांछित अपमानजनक मानते हों,तो हमारे सहकर्मी संपादक कवि शैलेंद्र शायद सही कहते हैं, तुम स्साले चिरकुट हो।हर किसी को दोस्त मान लेते हो।हर कोई दोस्त होता नहीं है,समझा करो। शैलेंद्र इलाहाबाद से हमारे मित्र हैं और हम लोग खुलकर बोलते हैं।गाली गलौज करने वाले मित्रों का मैं बुरा नहीं मानता इसलिए की पुख्ता दस्ती शायद गाली गलौज की भाषा मांगती है।हमने मित्रों से निवेदन किया है कि खामोशी की वजाय गाली गलौज की सौगात हमारी पहली पसंद है।वे अहमत हों और अपनी असहमति के हक में उनकी कोई दलील न हो तो वे बाशौक गाली गलौज मार्फत अपनी असहमति दर्ज करा सकते हैं जो महान भारतीय संस्कृति और लोकपरंपरा दोनों हैं।


    बहरहाल इस कविता का विश्वबोध हैरतअंगेज है और नहीं भी। समकालीन कविता परिदृश्य में वैश्विक वर्चस्व वाद के खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें चुनिंदा हैं,इसलिए हैरत अंगेज।खासकर दूरदर्शन ठिकाने से प्रकाशित भव्य पत्रिका में। हैरत्ंगेज इसलिए नहीं क्योंकि आखिरकार कुंवर नारायण बड़े कवि हैं।


    आलोचक और अति उदार समीक्षाएं,पुरस्कार और प्रतिष्ठा से कोई बड़ा कवि बनता नहीं है।


    वरना वाल्तेयर आज भी प्रासंगिक नहीं होते जिन्हें लिखने के एवज में हमेशा निर्वासन,कैद की सजा और यंत्रणा मिलती रहीं और आग में जलने के बावजूद अग्निपाखी की तरह उनकी कविताएं आज भी जिंदा है।


    विश्वबोध ही कविता और कवि को महान और प्रासंगिक बनाता है। इसे यूं समझिये कि अगर शेयर बाजार में आपका दांव है और आपको वैश्विक इशारों को समझने की तहजीब और तमीज न हो तो गयी भैंस पानी में।


    इस सिलसिले में यह कहना शायद मुनासिब ही होगा कि शायद यह पहलीबार है कि मैं कुंवर नारायम जी की किसी कविता की चर्चा कर रहा हूंय़ुनकी कविताओं को न समज पाने का डर लगता है। जैसे हमारे तीन अत्यंत प्रिय अग्रजों मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल और नीलाभ की दृष्टि में अस्सी के दशक में शमशेर सबसे बड़े कवि थे। मार्कंडेयजी को इससे बड़ी शिकायत थी। कहते थे,मंगलेश बहुत बदमाश है।शमशेर की कुछ पंक्तियों के लिए पांच सौ रुपये देता है और हम जो लिखे,उसके लिए फकत सौ रुपये।

    मगर हमें फिल्म ओमकारा की बोली की तरह शमशेर हमेशा दुर्बोध्य लगते रहे।उनके कविता संग्रह और कुंवर नारायण के भी ,हमारे पास हैं,लेकिन हमने कभी इन दो बड़े कवियों को समझने की हिम्मत नहीं कर पाये।


    बाबा नागार्जुन बड़े मस्त थे।शलभ को वे लंबी कविताओं का मुक्तिबोध के बाद सबसे बड़े कवि मानते थे,लेकिन राहुल सांकृत्यायन,त्रिलोचन और नागार्जुन की इस औघड़ तिकड़ी के बाबा त्रिलोचन जी को आधुनिक केशवदास कहने से परहेज नहीं करते थे।


    लोक और शास्त्रीय दोनों विधाों में समान दखल और चकित कर देनी वाली विद्वता और उसे सटीक अभिव्यक्ति देने वाले त्रिलोचन हमेशा हमारे आकर्षण के केंद्र रहे तो बाबा का आसन हमेसा हमारे दिल में रहा है।मुक्तिबोध और निराला की तत्सम बहुल कविताओं को हमने अबोध्य नहीं समझा तो इसकी खास वजह उनका विश्वबोध है।


    भारतभर में सबसे ज्यादा बाजारु लेखन बंगाल में होता है।सुनील गंगोपध्याय प्रभाव से बंगाल का समूचा साहित्य कला संस्कृति भाषा परिवेश देहमय आदिम घनघोर है। इस जंगल में अब भी माणिक बंदोपाध्याय का सामाजिक यथार्थबोध और उनकी वैश्विक दृष्टि हमें हमेशा राह दिखाती है।मजे की बात है कि पश्चिम बंगाल तो क्या भारत भर में कोई उनके अनुयायी खोजें तो मुश्किल हो जायेगी। लेकिन बांग्लादेश के तमाम आधुनिक बड़े और युवा संस्कृतिकर्मी अख्तराज्जुमान इलियास की दृष्टि मुताबिक मामिक के ही अनुयायी हैं।इसलिए भारत जैसे इतने बड़े गणतांत्रिक देस के पड़ोसी धार्मिक कट्टरपंथ से लहूलुहान बांग्लादेश में प्रतिरोध का हीरावल दस्ता वहीं संस्कृति प्रदेश है।


    इसे हालिया एक किस्से के जरिये बताऊं,फरवरी में नागपुर में अंबेडकरी उन चुनिंदा डेलीगेट सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक बैठक में शामिल होने का मौका मिला,जिसमें बाबासाहेब और कांशीराम जी के वे साथी भी शामिल थे,जो आंनंद तेलतुंबड़े के मुताबिक हार्डकोर हैं,और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक का प्रतिनिदित्व कर रहे थे।अस्मिता राजनीति के दायरे तोड़कर अंबेडकरी आंदोलन को पुनरुज्जीवित करने के तौर तरीकों पर गर्मागर्म बहसें चल रही थी।पूरा युवा ब्रिगेड था।जिसमें आदिवासी युवाजन भी थे और दक्षिण भारत के लोग भी।


    बीच बहस में जब फैसले बहुत विवादित होने लगे तो कश्मीर के हंगामाखेज युवा अधिवक्ता कम सामाजिक कार्यकर्ता ज्यादा,ऐसे अशोक बसोत्तरा ने अचानक बहस में हस्तक्षेप करते हए कहा कि आप सारे लोग बातें बड़ी बड़ी करते हों लेकिन आपकी दृष्टि का दायरा घर.आंगन,गली मोहल्ले में ही कैद है।अगर बदलाव चाहिए तो इंडिया विजन दिमाग में रखकर तब मुंह खोलि्ये।इस वक्तव्य का चामत्कारिक असर हुआ और हम लोगों ने सर्वसहमति से तमाम फैसले किये।


    विनम्रता पूर्वक आपको बताऊं कि जब अमेरिका से सावधान लिखा जा रहा था,पूरे एक दशक तक हमारे कथालेखक इसे नजरअंदाज करते रहे,लेकिन लगभग देशभर के दो चार अपवादों को छोड़कर सभी शीर्षस्थ और युवा कवियों तक ने इस इंटरएक्टिव साम्राज्यवादी अभियान में सहयोग जारी रखा लगातार।


    शायद कथा के मुकाबले कविता ज्यादा वैश्विक होती है।कथा का चरित्र आंचलिक होता है।आंचलिकता के बिना कथा की बाषा नहीं बनती और उसमें कालजयी तेवर नहीं आ पाते।


    इसके उलट कविता में वैश्विक दृष्टि न होने से कविता कविता नहीं होती। इसी निकष पर आज भी भारतभर में गजानन माधव मुक्तिबोध से बड़ा कोई कवि हुआ नहीं है।


    यहां तक कि नोबेल विजेता रवींद्र नाथ टैगोर भी,जिनकी नब्वे फीसद कविताएं निहायत सौंदर्यगंधी प्रेमरसीय रोमांस के अलावा कुछ भी नहीं है।बल्कि रवींद्र ने सामाजिक सरोकारों पर जो गद्यलिका है,वह अनमोल है।


    आपको शायद इस सिलसिले में हमारे प्रयोगों में कुछ दिलचस्पी हों।


    उदारीकऱण का दशक पूरा होते न होते हम तो साहित्य और पत्रकारिता में कबाड़ हो गये। नेट तभी हमारा विकल्प बना। लेकिन नेट पर हिंदी लिखी नहीं जा रही थी और नेट पर हिंदा के पाठक थे। हमें मजबूरन अंग्रेजी को विकल्प चुनना पड़ा।


    हमने भारत देश को ईकाई न मानकर इस  समूचे दक्षिण एशिया के जिओ पालिटिकल ईकाई को अपनी अंग्रेजी लेखन की धुरी बनायी। नतीजतन बांग्लादेश और पाकिस्तान की पत्र पत्रिकाओं में मैं खूब छपा। यहां तक कि क्यूबा,चीन और म्यांमार में भी।


    दरअसल मुद्दों को समझने और संप्रेषित करने  के लिए राजनीतिक सीमाओं का अतिक्रमम अनिवार्य है। कालिदास और अमीर खुसरों की रचनाएं ऐसा आज भी करती हैं और इसीलिए शेक्सपीअर आज भी समान रुप से प्रासंगिक है।


    कविता पर यह बात मौजूदा परिदृश्य को समझने और मुद्दों से कारगर तरीके से निपटने के लिए बेहद जरुरी है।


    भारतीय राजनीति और भारतीय समाज में असली मुद्दे एकदम हाशिये पर है। भारतीय साहित्य, संस्कृति और राजनीति में आखिरीबार शायद सत्तर के दशक में मुद्दों को बहाल करने की गंभीर चेष्टा हुई थी। तबसे दूर तक चुप्पी है।जो सबसे खतरनाक है,ख्वाबों के मर जाने से ज्यादा खतरनाक।


    कविता को इस यथास्थिति को तोड़ने में पहल करनी चाहिए तभी बुरे वक्त की कविताएं बुरे वक्तों को बहा सकती हैं,अन्यथा नहीं।


    हमारा सवाल है कि कुंवर नारायण जी जैसे बुजुर्ग कवि अगर समय की नब्ज को कविता में दर्ज करने में समर्थ हैं तो हमारे युवा कवि क्या कर रहे हैं। यह हमारी चिंता का सबब है। सरदर्द का भी।


    क्या समकालीन कवियों और रचनाकरों की कलम और उंगलियों में टोपी या टोंट लगी है?


    अभिषेक श्रीवास्तव ने सूचना दी है

    हमारे एक हरियाणवी मित्र कहा करते थे कि जब बाढ़ आती है तो सांप और नेवला एक ही पेड़ पर चढ़ जाते हैं। इधर बीच हुए दो डेवलपमेंट से उनकी बात नए संदर्भ में समझ आ रही है।


    पहला, नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ लिखने-बोलने वाले पत्रकारों के लिए अचानक कांग्रेस पोषित चैनलों में नौकरी की संभावना बनी है। दूसरा, नरेंद्र मोदी के सत्‍ता में आने से डरे हुए सोशलिस्‍ट, मार्क्सिस्‍ट, ट्रॉट्सकियाइट, इस्‍लामिस्‍ट, गांधियन, आदि सभी किस्‍म के बुद्धिजीवी कांग्रेस पोषित एनजीओबाज़ों के पाले में खिसक आए हैं और लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता पर संयुक्‍त कार्यक्रम करवाने में जुट गए हैं।


    (प्रो. पुरुषोत्‍तम अग्रवाल ठीक ही कहते हैं: मैं टीका लगाता हूं, हिंदू हूं लेकिन बीजेपी का वोटर नहीं। अर्थात् इस देश को आज कांग्रेसी हिंदुओं की सख्‍त ज़रूरत है!)

    Yashwant Singh

    शाबास Payal .. इसे कहते हैं सरोकार वाली पत्रकारिता. दरअसल अब मीडिया को इन कार्पोरेट परस्त, अज्ञानी, पेड न्यूज वाले पत्रकारों के रहमोकरम पर नहीं छोड़ना चाहिए. हमको आपको सभी को सजग सतर्क जनपक्षधर दृष्टि रखते हुए सही तथ्य को सामने लाना चाहिए, वो भले ही फेसबुक के जरिए सामने आए या ट्विटर, ब्लाग, वेब से... कार्पोरेट परस्त मीडिया को हम सोशल मीडिया वाले ही औकात में रख सकते हैं...

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    दैनिक जागरण की असंवेदनशील पत्रकारिता, मूक जानवरों को आतंक का पर्याय बताया... http://bhadas4media.com/print/18110-2014-02-28-13-09-35.html

    Palash Biswas I enquired about the journalist who committed suicide jumping before a running train in Mokama.I am surprised to know that the socialist journalist turned JDU MP and the editor of a andolan has blocked all social media website for his working journalists and no one there knows anything about other journalists.Bhadas is blocked in most of the newspaper campus.What an emergency against the scribes who are deprived of information about themselves while supposed to bring forward the truth.I hope ,Yashwant and others would innovate something rather more striking.


    Surendra Grover

    Kanupriya Goelका कहना है "दोनों राष्ट्रीय स्तर की पार्टियाँ एक दुसरे की प्रतिद्वंद्वी कम पूरक ज्यादा है." याने कि कुछ बरस तुम लूटो और कुछ बरस हमें लूटने दो.. हिसाब बराबर.. वाह री दो दलीय व्यवस्था..

    Unlike·  · Share· 20 hours ago· Edited·

    Ak Pankaj shared Artist Against All Odd (AAAO)'s photo.

    उसकी छलांग से

    छलांग से उड़ रही धूल से

    अब भी परेशान हैं वे सारे चेहरे

    जो 75 साल बाद भी

    बस इसी चाहना में

    शीलाजीत वियाग्रा खाते हुए

    मंडरा रहे हैं

    पृथ्वी के हर हिस्से में

    कि जो औरत उन्हें

    दी जाएगी भोगने के लिए

    वह 24 कैरेट कुमारी होगीलोग   उस छलांग से डरे हुए हैं  उस बूढ़ी औरत की छलांग से  जिसे बचपन में समझाया था  घर-परिवार ने  समाज ने   लिंग मंदिरों ने   बड़े-बूढ़ों ने   सीख दी थी सभी ने उसे  दौड़ोगी भागोगी कूदोगी  छलांग लगाओगी तो  तुम्हारा कौमार्य टूट जाएगा  फिर जिंदगी भर  जो बनेगा तुम्हारा स्वामी  वह संदेह करता रहेगा  सेकेंड हैंड वस्तु की तरह ही  व्यवहार करेगा तुमसे    वह बूढ़ी औरत  75 साल की उम्र में भी  लगा रही है छलांग  और उसकी छलांग से   छलांग से उड़ रही धूल से  अब भी परेशान हैं वे सारे चेहरे  जो 75 साल बाद भी  बस इसी चाहना में   शीलाजीत वियाग्रा खाते हुए   मंडरा रहे हैं   पृथ्वी के हर हिस्से में  कि जो औरत उन्हें   दी जाएगी भोगने के लिए  वह 24 कैरेट कुमारी होगी    वे सब डरे हुए हैं  वे सब डर रहे हैं  75 साल की वह पहाड़ी बूढ़ी  जब जब लगाती है छलांग  सदियों पुराना कोई धर्म गं्रथ  आज का व्हाइट हाउस नियंत्रित कोई कानून  दरक दरक जाता है   चटकता है भरभराता है गिरता है  छलांग से डरे हुए हैं  नए पुराने दूल्हों की सुहागराती दुनिया  जहां बिल्लियां अब  मरने से इनकार कर रही हैं    Oinam Rashi Devi, aged over 75 yrs from Manipur, in action during 35th National Masters Athletic Championship 2014 in Coimbatore on February 25. Soon we will be launching our new campaign 'Adding Life to the Years' for senior citizens... Photo source PTI Source : Deccan Herald - grassroots to galaxies



    अब इस पर गौर करें।


    शरीर का सिर्फ एक अंग विकसित हो तो वह तरक्की नहीं कैंसर है. हमने सपने बदल दिये हैं. इसमें अमीर अपने ख्वाहिश पूरा कर लेता है, लेकिन गरीब-बेरोजगार की फौज बिकने के लिए तैयार है. उनसे बाबरी मस्जिद तुड़वा लीजिए या दंगा करवाइये...

    'आप अपने लिए लड़ते हैं, तभी हारते हैं. सही जगह पहुँचने के लिए सही घोड़ा औए ठीक सवार भी चाहिए. जो लोभी होगा वह निडर कैसे हो सकता है? जो लोग संस्कृति की बात करते हैं कभी उन्होंने- नरहरि दास, मीरा, कबीर, सूर व तुलसी का नाम नहीं लिया...'ये बात विप्लवी पुस्तकालय, गोदरगावाँ के 84वाँ वार्षिकोत्सव में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने कही. वे 'आजादी के दीवानों के स्वप्न और वर्तमान भारत'विषय पर आयोजित आमसभा में बोल रहे थे.sahitya-pic-bihar-shashi-shekhar

    उन्होंने आगे कहा कि क्या अंबानी को जरूरत है समाजवाद की? शरीर का एक अंग विकसित हो तो वह तरक्की नहीं कैंसर है. हमने सपने बदल दिये हैं. इसमें अमीर अपने ख्वाहिश पूरा कर लेता है लेकिन गरीब बेरोजगार की फौज बिकने के लिए तैयार है. बाबरी मस्जिद तुड़वा लीजिए या दंगा करवाइये.

    विषय प्रवेश करते हुए दूरदर्शन के एंकर सुधांशु रंजन ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भारतीय परंपरा के पौराणिक-ऐतिहासिक उदाहरणों को श्रोताओं के समक्ष रखा. उन्होंने कहा कि न्यायोचित समाज का निर्माण करना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. हमारे यहां नेता सत्ता का मोह नहीं छोड़ते. एक समय प्रतिस्पर्धाथी कि कौन कितना त्याग करता है और आज कौन कितना संचय करता है की होड़ है. यह एक तरह का विश्वासघात है उन शहीदों के साथ.

    अलीगढ़ मुस्लिम विवि में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक प्रो. वेदप्रकाश ने कहा कि भगत सिंह क्रांतिकारी के साथ प्रखर बुद्धिजीवी भी थे. पुस्तकालय कैसे क्रांति का केंद्र बन सकता है, यह भी भगत सिंह ने सिखाया. इंकलाव निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है.

    कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि सुभाष चंद्र बोस गांधी के विकल्प बन गये थे. प्रेमचंद की एक नारी पात्र कहती है कि जान की जगह गोविन्द को बैठाने से क्या होगा, चेहरा बदलने से क्या होगा..? उन्होंने आगे कहा कि जनतंत्र सिमटता जा रहा है, जिसके पास खाने-पीने का साधन नहीं है उसके लिए कौन सा जनतंत्र है. जनतंत्र पर जनता का नियंत्रण नहीं है.. इस जनतंत्र को मानवीय बनाने की जरुरत है.

    प्रलेस के उप्र महासचिव डॉ संजय श्रीवास्तव ने कहा कि देश में सांप्रदायिकता की खेती की जा रही है, चाय की चुस्कियों के साथ! बिहार प्रलेस महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा कि युवा पीढ़ी में आधुनिकता और करोड़पति, अरबपति बनने की होड़ लगी है. एक तरफ इनके ठाट-बाट हैं तो दूसरी ओर भूख, अभाव, शिक्षा आवास व सुरक्षा के लिए तरसते लोग. युवाशक्ति की ऊर्जा क्षीण हो रही है.. हम  किस हिन्दुस्तान को बनाना चाहते हैं? एक नई किस्म की राजनीति चल रही है. कुर्सी की राजनीति.. समाज को मानवीय बनाने के लिए सपने देखने की जरुरत है.

    समारोह का यादगार लमहा प्रसिद्ध रंगकर्मी प्रवीर गुहा द्वारा निर्देशित व रवीन्द्रनाथ टैगोर लिखित नाटक 'विशाद काल'का मंचन एवं दिनकर शर्मा द्वारा प्रेमचंद की कहानी का एकल मंचन भी महत्वपूर्ण रहा.

    समारोह के दूसरे दिन 27 फरवरी को चंद्रशेखर आजाद (शहादत दिवस) के सम्मान में आयोजित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता दैनिक 'हिन्दुस्तान'के प्रधान संपादक शशिशेखर थे. उन्होंने 'लोक जागरण की भारतीय संस्कृति और कट्टरता के खतरे'पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि विचार की भूमि से ही विचार पैदा होता है. क्या कारण था कि 1947 से पहले स्कूलों में अलख जगा करता था. हम आसानी से एक एक हो जाते थे. आज वैसी सोच नहीं है. हमने उस आइने को छिपा दिया है जिसे कन्फ्युशियस पास रखते थे. यह आईना हमें हमारी जिम्मेवारी का अहसास कराता है. सवालों के हल शब्दों से नहीं कर्म से होता है.

    सत्र के प्रथम वक्ता प्रो. वेदप्रकाश ने कहा कि लोक जागरण भारत कि विरासत रही है. आत्म जागरण का मतलब आत्म कल्याण के साथ-साथ जन कल्याण भी होनी चाहिए. डॉ संजय श्रीवास्तव ने संगोष्ठी के वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा कि लोक जागरण का अग्रदूत कबीर से बड़ा कोई नहीं हुआ. मुर्दे को जगाने का काम कबीर कर रहे थे. बुद्धकाल को लोक जागरण नहीं मानना हमारी बड़ी भूल होगी. हम आज भी कबीर के सहारे खड़े हैं.. हमें आज कबीर की जरुरत है. इस सत्र में डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी और सुधांशु रंजन ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए.

    कार्यक्रम की अध्यक्षता जीडी कॅालेज के पुर्व प्राचार्य प्रो. बोढ़न प्र. सिंह ने की. कार्यक्रम में उमेश कुवंर रचित पुस्तक 'भारत में शिक्षा की दशा व दिशा'का लोकार्पण भी किया गया. समारोह में दैनिक 'हिन्दुस्तान'के प्रधान संपादक शशिशेखर ने स्कूली बच्चों को सम्मानित किया. इस अवसर पर 'हिन्दुस्तान'के वरीय स्थानीय संपादक डॉ तीरविजय सिंह, विनोद बंधु सहित अतिथि एवं स्थानीय साहित्यकार मौजूद थे.

    हजारों दर्शक व श्रोताओं के साथ भाकपा राज्य सचिव राजेन्द्र सिंह, रमेश प्रसाद सिंह, नरेन्द्र कुमार सिंह, धीरज कुमार, आनंद प्र.सिंह, सर्वेश कुमार, डॉ एस. पंडित, डॉ अशोक कुमार गुप्ता, सीताराम सिंह, चन्द्रप्रकाश शर्मा बादल, दीनानाथ सुमित्र, सीताराम सिंह, अनिल पतंग, दिनकर शर्मा, वंदन कुमार वर्मा, अमित रौशन, परवेज युसूफ, आनंद प्रसाद सिंह, मनोरंजन विप्लवी, अरविन्द श्रीवास्तव आदि की उपस्थिति ने आयोजन को यादगार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

    जनज्वार के सौजन्य से

    जनज्वार डॉटकॉम

    सरकारें विकास नहीं करतीं विकास तो आप लोग (पूंजीपति) करते हैं, जो हॉल के अन्दर बैठे हैं. केजरीवाल ये भूल गये कि विकास मेहनतकश जनता करती है. किसानों-मजदूरों के खून से विकास होता है, जो गर्मी में तपकर, ठंड में ठिठुर कर भी काम करते हैं... http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4816-vishvbank-ka-rajneetik-product-aap-for-janjwar-by-sunil-kumarसरकारें विकास नहीं करतीं विकास तो आप लोग (पूंजीपति) करते हैं, जो हॉल के अन्दर बैठे हैं. केजरीवाल ये भूल गये कि विकास मेहनतकश जनता करती है. किसानों-मजदूरों के खून से विकास होता है, जो गर्मी में तपकर, ठंड में ठिठुर कर भी काम करते हैं... http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4816-vishvbank-ka-rajneetik-product-aap-for-janjwar-by-sunil-kumar


    कोयले की धूल से मरते हर साल 70 हजार

    पेशेगत बीमारियों की चपेट में मजदूर

    भारत में सिलिका धूल प्रभावित मजदूरों की तादाद आईएलओ के अनुसार 2007 में 1 करोड़ थी. यह संख्या आज काफी बढ़ गई है, क्योंकि खनन और औद्योगिक इकाइयों की संख्या बढ़ती जा रही है. अमेरिका स्थित ओके इंटरनेशनल के अनुसार भारत में 30 हजार लोग सिलिकोसिस से मरते हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसार हर साल हमारे देश में 70 हजार लोगों की मौत कोयला की धूल प्रदूषणजनित बीमारी से होती है...

    समित कुमार कार

    कल-कारखानों और खदानों में मजदूरों की पेशेगत बीमारी और दुर्घटनाओं से मौत और कार्यस्थल पर महिला मजदूर और कर्मचारियों के यौन शोषण, बलात्कार और हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. इनके मद्देनजर सभी स्तर पर पेशागत सुरक्षा, सेहत और अन्य श्रम अधिकारों के लिए मजदूर और कर्मचारियों को जागरूक करने के लिए ऑक्युपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ एसोसिएशन ऑफ झारखंड (ओशाज) और राइजिंग ऑक्युपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ नेटवर्क ऑफ इंडि़या (रोशनी) ने अभियान शुरू किया है.health-silicosis_graphic-bimariइस अभियान का उद्देश्य मजदूरों को नए सिरे से जागरूक कर सभी हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) को संवेदनशील बनाकर कार्यस्थल को सुरक्षित बनाए रखने का संस्कार विकसित करने और पेशागत सुरक्षा और स्वास्थ्य को मजदूरों के मौलिक अधिकार के रूप में कायम करने की दिशा में अभियान जारी रखना है.

    झारखंड खनिज संपदा से भरपूर है. यहां कोयला, लोहा, तांबा, यूरेनियम, क्योर्टज, क्योर्टजाइट, क्रोमाईट, ग्रेनाइट आदि खनिजों के खनन दलन और प्रसंस्करण इकाइयों और इससे संबंधित सार्वजनिक और निजी छोटे मंझोले और बडे कल कारखानों की संख्या 16 हजार के आसपास होगी.

    इसमें ताप विद्युत प्लांट, सीमेंट प्लांट, स्पंज आयरन प्लांट, कोयला, तांबा, यूरेनियम, क्रोमाईट, बॉक्साइट, लौह अयस्क, रैमिंगमास (क्योर्टज यानी सफेद पत्थर का पाउडर) इकाइयां और ग्रेनाइट स्टोन क्रेशर आदि शामिल हैं. ये सबसे ज्यादा धूल पैदा करने और प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयां हैं. इन खनिजों के खनन और प्रसंस्करण के दौरान मजदूर फेफड़े की कई लाइलाज पेशागत बीमारियों से पीडि़़त होते हैं.

    फेफड़े की पेशागत बीमारियों के विभिन्न रूप हैं. निउमोकोनिओसिस इसका जेनेरिक नाम है. इन खनिजों के धूलकण हवा के साथ फेफड़े में जाने से ये बीमारियां होती हैं. काम करने के दौरान सांस के साथ धूल खींचने से फेफड़ों में निशान जैसे मांसतंतु पैदा करता है. यह हवा से ऑक्सीजन निकालने की फेफड़ों की क्षमता को कम कर देता है. धूल कण फेफड़ों की गहरी वायुकोशीय थैलियों में खुद को जकड कर रख सकते हैं. इन्हें श्लेष्मा या खांसने से साफ नहीं किया जा सकता हैं.

    इन सभी बीमारियों में से सिलिकोसिस और कोल वर्कर निउमोकोनिओसिस से पीडि़तों और मृतकों की संख्या मजदूरों में सबसे ज्यादा है. मार्बल, क्योर्टजाइट, ग्रेनाइट का खनन, सुरंग खुदाई, कटाई और निर्माण, डि़ªलिंग, ब्लास्टिंग, सडक निर्माण स्थल और सैंड ब्लास्टिंग, फाउंड्री, कांच निर्माण, सिलिकायुक्त अब्रेसिव, स्लेट पेंसिल आदि के उत्पादन और सड़क निर्माण स्थल, क्योर्टज यानी सफेद पत्थर के पाउडर के उत्पादन और स्टोन क्रशिंग सहित 77 किस्म की उत्पादन प्रक्रियाओं में सिलिका धूल का उत्सर्जन होता है.

    बीमारियों के स्रोत और उनकी किस्में

    स्रोत                              पेशागत फेफड़े की बीमारियां

    खनिजों का धूलकण     निउमोकोनिओसिस के विभिन्न रूप

    सिलिका                     सिलिकोसिस

    लौह अयस्क             सिडेरोसिस

    कोयला कोल वर्कर   निउमोकोनिओसिस

    एसवेस्टॉस             एसवेस्टॉसिस

    वेरिलियम              वेरिलिओसिस

    स्ट्रॉनसियम            स्ट्रॉनसिओसिस

    अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार हर साल लगभग 24 लाख लोग अपने पेशे या काम के कारण मरते हैं. इसमें 20.2 लाख लोग पेशागत बीमारी और 3.8 लाख लोग कार्यस्थल पर दुर्घटना के कारण मौत का शिकार होते हैं. आईएलओ द्वारा पेश आंकडे काफी कम दिखते हैं, क्योंकि भारत सहित अन्य विकासशील देशों से सही आंकडे़ मिलते ही नहीं. झारखंड सहित अन्य राज्य भी इसी तरह की रिपोर्ट देते रहते थे कि उनके राज्य में सिलिकोसिस जैसी पेशागत बीमारी नहीं है. कहीं दो या कहीं तीन सिलिकोसिस पीडि़त मजदूरों के आंकडे देकर खानापूर्ति कर दी जाती है.

    भारत में सिलिका धूल प्रभावित मजदूरों की तादाद आईएलओ के अनुसार 2007 में 1 करोड़ थी. यह संख्या आज काफी बढ़ गई है, क्योंकि खनन और औद्योगिक इकाइयों की संख्या बढ़ती जा रही है. अमेरिका स्थित ओके इंटरनेशनल के अनुसार भारत में 30 हजार लोग सिलिकोसिस से मरते हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल 70 हजार लोगों की मौत कोयला की धूल प्रदूषणजनित बीमारी से होती हैं.

    मुसाबनी में सफेद पत्थर का पाउडर बनाने वाली दो इकाइयों के 40 मजदूरों की मौत पिछले 10 वर्षों में सिलिकोसिस से हो चुकी है. मौत की औसत उम्र 33 साल है. 20 मजदूर सिलिकोसित से प्रभावित हैं जो अभी भी जिंदा हैं और 150 धूल पीडि़त मजदूरों की जांच नहीं हुई है.

    सराइकेला-खरसवां जिला स्थित आदित्यपुर गम्हारिया उद्योगिक क्षेत्रों और कांड्रा में हजारों मजदूरों की मौत सिलिकोसिस से हो गई. इसमे ईएसआई निबंधित इकाइयों के मजदूर भी शामिल हैं. उन्हें ईएसआई कार्ड नहीं दिया गया था और मुआवजा भी नहीं दिया गया है. झारखंड में कितने लोगों की इस बीमारी से मौत हो गई है, इसका कोई सही आंकड़ा सरकारी विभागों के पास नहीं है.

    झारखंड में विभिन्न किस्म के धातव और अधातव खनिजों का खनन और प्रसंस्करण दो सौ सालों से अधिक समय से जारी है. सोलह हजार के करीब धूल उत्सर्जनकारी और प्रदूषण फैलाने वाली खदानें और औद्योगिक इकाइयां हैं. आंकड़ों के अनुसार झारखंड में सिलिकोसिस सहित अन्य पेशागत बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या आनुमानिक 25-30 लाख है.

    कमाऊ पिता/माता की सिलिकोसिस से असमय मौत या फेफड़े की बीमारी के कारण अपाहिज बन जाने से झारखंड के 60 लाख बच्चों की जिंदगियां प्रभावित हुई हैं. 30 लाख अन्य आश्रितों की जिंदगियां भी प्रभावित हुई हैं. इनमें अधिकांश महिलाएं भी प्रभावित हैं, जिनके पति की मौत इस बीमारी से हो गई है या जो इससे पीडि़त हैं. नतीजा हुआ है कि प्रभावित परिवारों के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. उन्हें पढ़ाई-लिखाई छोड़नी पड़ी. इन बच्चों को घरेलू नौकर या बाल श्रमिक के रूप में काम करना पड़ रहा है.

    कारखाना और खदान मजदूरों की पेशागत सुरक्षा और सेहत से संबंधित कानून हैं द फैक्ट्रीज एक्ट 1948 और द माइनिंग एक्ट 1952. मजदूरों की पेशागत और शारीरिक तकलीफ के इतिहास का आकलन और छाती के एक्स-रे से बीमारियों की जांच संभव है. एक्स-रे प्लेटों का आई.एल.ओ. वर्गीकरण कर धूल के संपर्क मे रहने की पुष्टि की जाती है और लगातार फैलने वाली बीमारियों के विस्तार की जानकारी दी जाती है.

    इसी प्रक्रिया से सिलिकोसिस के साथ फेफड़े की अन्य पेशागत बीमारियों की जांच की जाती है. फैक्ट्रीज एक्ट 1948 की तीसरी सूची में अनुबंधित बीमारियों के लक्षण मजदूरों में पाए जाने पर चिकित्सक को मुख्य कारखाना निरीक्षक को सूचित करना कानूनी बाध्यता है. अनुबंधित बीमारियों से पीडि़तों और मृतकों के परिजनों कीे सामाजिक सुरक्षा के लिए नियोजक द्वारा कानूनन वर्कमैन कंपेंनसेशन एक्ट 1923 और ईएसआई एक्ट 1948 के तहत मुआवजा देने का प्रावधान है. लेकिन भ्रष्टाचार के कारण कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश लागू नहीं हो रहा है और मजदूर न्यायोचित अधिकार से वंचित हैं.

    सिलिकोसिस सहित अन्य पेशागत बीमारियों की पहचान टीबी के रूप में की जाती है. अस्पतालों में सिलिकोसिस पीडि़तों को पर्ची नहीं दी जाती. भर्ती होने पर छल से उन्हें निकाल दिया जाता है. उनकी जांच सही पद्धति से नहीं की जाती है और डॉक्टरों द्वारा टीबी से पीडि़त बता दिया जाता है. टीबी के लिए मुआवजे का प्रावधान नहीं है. इस तरह मजदूरों को अपने अधिकार से वंचित कर दिया जाता है. इन इकाइयों के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी सहित श्रम अधिकारों और कानून के तहत मिलने वाली अन्य सुविधाएं भी नहीं दी जातीं.

    राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में हस्तक्षेप याचिका दायर की गई. इस पर न्यायालय ने सिलिकोसिस से हुई मौतों में मृतकों को मुआवजा देने और पीडि़तों को चिकित्सा सुविधा प्रदान करने का आदेश 5 मार्च 2009 को दिया. इन आदेशों को लागू करने के लिए आयोग को अधिकृत किया है, जो मानवाधिकार कानून 1993 के धारा 18 के तहत जीवन के अधिकार की अवहेलना से हुई मौत पर आधारित है. लेकिन झारखंड सरकार उस पर अमल नहीं कर रही है. विभिन्न कारण बताकर मुआवजा देने के आदेश को ठुकरा रही है. सिलिकोसिस और सिलिका धूल पीडि़तों की जांच और चिकित्सा भी नहीं करा रही है. इसके कारण आयोग अपनी कार्यवाही नियमानुसार चला रही है.

    झारखंड सरकार ने ओशाज की पहल पर झारखंड ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ सेल का गठन किया और सिलिकोसिस निवारण और रोकथाम के लिए राज्य स्तरों पर कार्य योजना तैयार की है. लेकिन इसमें मृतकों के पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट को आधार बना दिया गया है. इसका कोई कानूनी औचित्य नहीं है.

    पोस्टमॉर्टम को मुद्दा बनाकर मृतकों के परिवारों को मुआवजा नहीं दिया जा रहा है, न ही कार्य योजना लागू की जा रही है. पश्चिम बंगाल सरकार ने भी सिलिकोसिस नियंत्रण कार्यक्रम की घोषणा की है. इन दो राज्यों की सरकारों द्वारा किए गए फैसलों को मजदूरों के हित में लागू कराना मजदूरों की सक्रिय सहभागिता के बिना संभव नहीं है. आदिवासी, दलित और गरीब मजदूरों के लिए मुआवजे की मांग हो या एयर होस्टेज मौसमी चैधरी का मामला, सभी मामलों में न्याय पाने में देर हो रही है.

    क्वार्क साइंस सेंटर झारग्राम और नागरिक मंच कोलकाता की पहल पर इंटक, ऐटक, एचएमएस, एआईसीसीटीयू, यूटीयूसी, और यूटीयूसी (एल-एस) ट्रेड यूनियनों द्वारा पश्चिम बंगाल के झारग्राम में सिलिकोसिस से मरे श्रमिकों के मुआवजे के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक हस्तक्षेप याचिका दायर की गई थी. इस पर अदालत ने 26 नवंबर 1996 को द वर्कमैन कंपनसेशन एक्ट 1923 के तहत सिलिकोसिस पीडि़तों और मृतकों के आश्रितों को मुआवजा देने की राय दी थी.

    इसके मुताबिक संबंधित कंपनी को मुआवजा देना पड़ा, जबकि वह इकाई डायरेक्टोरेट ऑफ फैक्ट्रीज में निबंधित ही नहीं थी. उनके मजदूरों को कोई भी नियुक्ति पत्र, गेट पास और कंपनी के मजदूर होने का प्रमाणपत्र नहीं दिया गया था. यह दिखाता है कि कंपनी और श्रमिकों के सरकारी विभागों में निबंधित होने या नहीं होने या मजदूरों की यूनियन होने या नहीं होने से कोई इकाई संगठित से असंगठित नहीं हो जाती.

    तथाकथित असंगठित इकाई की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है. लिहाजा इन पर श्रम अधिकारों से संबंधित कानून लागू नहीं होते. फैक्ट्रीज एक्ट 1948 के तहत उपायुक्त, जिला मजिस्ट्रेट, जिला कलक्टर को कारखाना निरीक्षण का अधिकार प्राप्त है. लेकिन यह निरीक्षण होता ही नहीं. इसी वजह से कार्यक्षेत्र असुरक्षित रहता है और मजदूर पीडि़त होते हैं. इकाई अगर निबंधित नहीं है या मजदूरों को पहचान पत्र नहीं दिया जाता है तो उक्त इकाई के मालिक, प्रबंधक, संबंधित सरकारी नियामक विभाग, कारखाना निरीक्षक, श्रम विभाग और सर्वोपरि जिला प्रशासन जिम्मेदार है.

    सिलिकोसिस या अन्य पेशेगत बीमारियां छुआछूत वाली नहीं है. इसे असंगठित इकाई या दोषी इकाई को बंद हो गया बताकर मुआवजा देने की जिम्मेदारी से मुकरा नहीं जा सकता. उसके कार्यक्षेत्र में मजदूरों के सिलिकोसिस या अन्य पेशागत बीमारियों से पीडि़त होने और उसकी मौत के लिए जिम्मेदार भी उपरोक्त सभी सरकारी प्रशासनिक पदाधिकारी हैं. इसीलिए सर्वोच्य न्यायालय ने अपने आदेश में मुआवजा देने की राय दी सरकार को मुआवजा देना ही है.

    फिर भी हजारों मजदूरों के मरने के बावजूद राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों के नेता और कार्यकर्ता, एनजीओ, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता उदासीन बने हुए हैं. वे पेशागत बीमारी से मौत को अहम मुद्दा नहीं समझते और उसे मुद्दा नहीं बनाते हैं.

    सभी धूल उत्सर्जनकारी खनन प्रसंस्करण और औद्योगिक इकाइयां संगठित क्षेत्र के दायरे में आती हैं. भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने संगठित क्षेत्र में आने वाली सिलिका धूल उत्सर्जनकारी इकाइयों रैमिंगमास (क्योर्टज-सफेद पत्थर का पाउडर), स्टोन क्रेशर और स्लेट पेंसिल को असंगठित क्षेत्र की संज्ञा दे दी. इन इकाइयों में पीडि़त मजदूरों को असंगठित क्षेत्रों का बता उनके लिए सामाजिक सुरक्षा के मुआवजे का कानूनी प्रावधान नहीं होने का जिक्र कर मुआवजे की सिफारिश नहीं करने का निर्णय लिया है.

    इसमें सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और एनजीओ ने समर्थन दिया है. असंगठित क्षेत्र की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है. लिहाजा इन पर श्रम अधिकारों से संबंधित कानून भी लागू नहीं होते हैं. लेकिन देश के विभिन्न राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं, एनजीओ, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जाने-अनजाने ऐसा प्रचार किया है, जिससे मजदूरों का अधिकार छीना जा रहा है.

    मजदूरों को इन विषयों पर जागरूक और एकजुट होने की जरूरत है. अपने अधिकारों को लेकर कंपनी प्रबंधन से संवाद बनाना जरूरी पहल है. बिना संघर्ष और संवाद किए कोई भी अधिकार हासिल करना संभव नहीं है. उन्हें यह बात समझाने की जरूरत है कि पेशागत बीमारी और दुर्घटनाओं से दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का 4 फीसद नुकसान हो जाता है.

    खराब पेशागत सुरक्षा और सेहत की वजह से दुनिया के विभिन्न देशों में कुल राष्ट्रीय उत्पाद का 2- 14 फीसद बर्बाद हो रहा है. प्रबंधकों द्वारा किए जा रहे उत्पादन और विकास के दावों का असली चेहरा इन तथ्यों से उजागर हो गया है. आज के आर्थिक प्रतिस्पर्धा के युग में उतनी भारी रकम गंवाने से हुए नुकसान का बोझ मजूदरों के अधिकारों का हनन कर उन पर लादना चाहते हैं.

    मजदूरों की न्यायोचित मांगों को स्वीकृति देकर कार्यस्थल में पेशागत सुरक्षा और स्वास्थ्य बनाए रखने की व्यवस्था की शुरूआत कर मजदूरों के जीवन के अधिकार तथा मानवाधिकार के अन्य सवाल और पर्यावरण संरक्षण को सर्वाधिक महत्व दिया जाना चाहिए ताकि उत्पादन प्रणाली को टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सके. अन्यथा मजदूर अपने अधिकारों की रक्षा में जो भी कानूनी कदम उठाएंगे, वह सही और प्रासंगिक होंगे.

    इस सिलसिले में मांग की जा रही है कि सिलिकोसिस से मरने वाले और पीडि़त हर कामगार को 10 से 13 लाख रुपए तक मुआवजे के साथ साथ पीएफ, ग्रेच्युटी, बीमारी के इलाज में खर्च हुआ पैसे और मुआवजा मिलने में हुई देरी पर ब्याज का भुगतान किया जाए. सिलिकोसिस से श्रमिकों के प्रभावित होने के लिए कई सरकारी विभाग जिम्मेदार हैं, इसलिए मृतकों के आश्रितों को पुनर्वास के रूप में सरकारी नौकरी दी जाए. सिलिकोसिस और सिलिका धूल पीडि़तों को बीपीएल का दर्जा देकर सरकारी योजनाओं में दी गई सुविधाओं का लाभ दिया जाए.

    सरकारी अस्पतालों में सभी नागरिकों और सिलिकोसिस पीडि़तों के लिए निशुल्क दवा, स्वास्थ्य जांच और इलाज का खर्च सरकार वहन करे. प्रखंड और जिला स्तरीय सरकारी अस्पतालों में ऑक्यूपेशनल डि़जीज डि़टेक्शन सेंटर खोला जाएं, जहां एक्स-रे और फेफड़े के जांच की सुविधा हो.

    सिलिकोसिस की रोकथाम और शमन के लिए राज्य कार्य योजना से पोस्टमार्टम के प्रावधान को हटाकर उक्त कार्य योजना को लागू किया जाए. झारखंड सरकार की 10 जुलाई 2012 की अधिसूचना के अनुसार पत्थर और खनिज क्रशिंग और प्रसंस्करण जैसा सिलिका और अन्य खनिज धूल पैदा करने वाली खतरनाक प्रक्रियाओं पर फैक्ट्रीज एक्ट 1948 से संबंधित नियम को लागू किया जाए.

    पेशागत सुरक्षा और स्वास्थ्य राज्य सरकार के लिए विधिक उत्तरदायित्व और जिम्मेवारी का विषय होना चाहिए. यह राज्य सरकार को औद्योगिक समूहों में प्रदूषण रोकने और श्रमिकों की सेहत और पर्यावरण के प्रति जवाबदेह बनाएगा. छोटी और मंझोली इकाइयों (जिनमें स्थाई और ठेका मजदूरों को मिलाकर 200 से कम ही मजदूर काम करते हैं) को मिलाकर एक सहायता संघ (कनसोर्टियम) बनाकर उद्योग क्षेत्र में ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर/ऑक्यूपेशनल डि़जीज डि़टेक्शन सेंटर खोला जाए.

    उद्योग क्षेत्र में चल रही इकाइयों या नए उद्यमियों को कम कीमत वाले धूल नियंत्रण तंत्र और प्रदूषण नियंत्रक उपकरण बनाने के लिए शोध और प्रयोग करने और इससे संबंधित नए उपकरणों को विकसित करने के लिए सरकार की ओर से प्रोत्साहित किया जाए. बचाव के लिए सक्षम उपकरण यानी पत्थर या किसी तरह के क्रशर के लिए उपयुक्त और खास किस्म के मास्क या धूलरोधी यंत्र के निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग दिया जाए.

    श्रम से जुडे अधिनियमों और कानूनों को लागू करने के लिए कडे कानून बनाए जाएं तथा कानून तोड़ने वालों को कठोर सजा देने का प्रावधान हो. राष्ट्रीय पेशागत सुरक्षा और स्वास्थ्य आयोग का गठन किया जाए.

    (समित कुमार कार ऑक्युपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ एसोसिएशन ऑफ झारखंड के महासचिव हैं.)

    http://www.janjwar.com/janjwar-special/27-janjwar-special/4819-koyle-kee-dhool-se-marte-har-saal-70-hazar-for-janjwar-by-samit-kumar-kaar

    मीणा को काल्पनिक जातियों में बाँटने का कुचक्र

    मीना और मीणा दोनों शब्दों के लिये तकनीकी रूप से Mina/Meena दोनों ही सही शब्दानुवाद हैं, क्योंकि 'ण'के लिये सम्पूर्ण अंग्रेजी में कोई पृथक अक्षर नहीं है. चूँकि 1956 में आदिवासियों का नेतृत्व न तो इतना सक्षम था और न ही इतना जागरूक कि वह इसे जारी करते समय सभी पर्यायवाची शब्दों के साथ उसी तरह से जारी करवा पाता, जैसा कि गूजर जाति के नेतृत्व ने गूजर, गुर्जर, गुज्जर, के रूप में जारी करवाया...

    पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    'मीणा'जनजाति के बारे में तथ्यात्मक जानकारी रखने वाले और जनजातियों के बारे में बिना पूर्वाग्रह के अध्ययन और लेखन करने वाले इस बात को बखूबी जानते हैं कि 'मीणा'अबोरिजनल भारतीय (Aboriginal Indian) जनजातियों में से प्रमुख जनजाति है. फिर भी कुछ पूर्वाग्रही और दुराग्रही लोगों की ओर से 'मीणा'जनजाति को 'मीणा'एवं 'मीना'दो काल्पनिक जातियों में बांटने का कुचक्र चलाया जा रहा है.meena-community-of-rajsthan

    इन लोगों को ये ज्ञात ही नहीं है कि राजस्थान में हर दो कोस पर बोलियां बदल जाति है, इस कारण एक ही शब्द को अलग-अलग क्षे़त्रों में भिन्न-भिन्न मिलती जुलती ध्वनियों में बोलने की आदिकाल से परम्परा रही है. जैसे-गुड़/गुर, कोली/कोरी, बनिया/बणिया, बामन/बामण, गौड़/गौर, बलाई/बड़ाई, पाणी/पानी, पड़ाई/पढाई, गड़ाई/गढाई, रन/रण, बण/बन, वन/वण, कन/कण, मन/मण, बनावट/बणावट, बुनाई/बुणाई आदि ऐसे असंख्य शब्द हैं, जिनमें स्वाभाविक रूप से जातियों के नाम भी शामिल हैं. जिन्हें भिन्न-भिन्न क्षे़त्रों और अंचलों में भिन्न-भिन्न तरीके से बोला और लिखा जाता है.

    इसी कारण से राजस्थान में 'मीणा'जन जाति को भी केवल मीना/मीणा ही नहीं बोला जाता है, बल्कि मैना, मैणा, मेंना, मैंणा आदि अनेक ध्वनियों में बोला/पुकारा जाता रहा है. जिसके पीछे के स्थानीय कारकों को समझाने की मुझे जरूरत नहीं हैं. फिर भी जिन दुराग्रही लोगों की ओर से 'मीना'और 'मीणा'को अलग करके जो दुश्प्रचारित किया जा रहा है, उसके लिए सही और वास्तविक स्थिति को समाज, सरकार और मीडिया के समक्ष उजागर करने के लिये इसके पीछे के मौलिक कारणों को स्पष्ट करना जरूरी है.

    यहाँ विशेष रूप से यह बात ध्यान देने की है कि वर्ष 1956 में जब 'मीणा'जाति को जनजातियों की सूची में शामिल किया गया था और लगातार राजभाषा हिन्दी में काम करने पर जोर दिये जाने के बाद भी आज तक प्रशासन में अंग्रेजी का बोलबाला है. इसके चलते छोटे बाबू से लेकर विभाग के मुखिया तक सभी पत्रावलि पर टिप्पणियॉं अंग्रेजी में लिखते हैं, जिसके चलते आदेश और निर्णय भी अंग्रेजी में ही लिये जाते हैं.

    हाँ, राजभाषा हिन्दी को कागजी सम्मान देने के लिये ऐसे आदेशों के साथ में उनका हिन्दी अनुवाद भी परिपत्रित किया जाता है, जिसे निस्पादित करने के लिये केन्द्र सरकार के तकरीबन सभी विभागों में राजभाषा विभाग भी कार्य करता है. राजभाषा विभाग की कार्यप्रणाली अनुवाद या भावानुवाद करने के बजाय शब्दानुवाद करने पर ही आधारित रहती है, जिसके कैसे परिणाम होते हैं, इसे एक उदाहरण से समझाना चाहता हूँ.

    मैंने रेलवे में करीब 21 वर्ष सेवा की है. रेलसेवा के दौरान मैंने एक अधिकारी के अंग्रेजी आदेश को हिन्दी अनुवाद करवाने के लिये राजभाषा विभाग में भिजवाया, वाक्य इस प्रकार था-'10 minute, Loco lost on graph' इस वाक्य का रेलवे की कार्यप्रणली में आशय होता है कि 'रेलवे इंजिन के कारण रेलगाड़ी को दस मिनिट का विलम्ब हुआ. 'लेकिन राजभाषा विभाग ने इस वाक्य का हिन्दी अनुवाद किया ''10 मिनट, लोको ग्राफ पर खो गया. ''इसे शब्दानुवाद का परिणाम या दुष्परिणाम कहते हैं.

    इसी प्रकार से एक बार एक अंग्रेजी पत्र में भरतपुर स्थित Keoladeo (केवलादेव) अभ्यारण (इसे भी अभ्यारन भी लिखा/बोला जाता है) शब्द का उल्लेख था, जिसका राजभाषा विभाग ने हिन्दी अनुवाद किया ''केओलादेओ'. मुझे अनुवाद प्रणाली पर इसलिये चर्चा करनी पड़ी, क्योंकि जब पहली बार जिस किसी ने भी 'मीणा'जाति को जनजातियों की सूची में शामिल करने के लिए किसी बाबू या किसी पीए या पीएस को आदेश दिये, तो उसने 'मीणा'शब्द को अंग्रेजी में Meena के बजाय Mina लिखा और इसी Mina नाम से विधिक प्रक्रिया के बाद 'मीणा'जाति का जनजाति के रूप में प्रशासनिक अनुमोदन हो गया. लेकिन संवैधानिक रूप से परिपत्रित करने से पूर्व इसे हिन्दी अनुवाद हेतु राजभाषा विभाग को भेजा गया तो वहाँ पर Mina शब्द का शब्दानुवाद 'मीना'किया गया, जो अन्तत: जनजातियों की सूची में शामिल होकर जारी हो गया.

    यह भी विचारणीय है कि मीना और मीणा दोनों शब्दों के लिये तकनीकी रूप से Mina/Meena दोनों ही सही शब्दानुवाद हैं, क्योंकि 'ण'अक्षर के लिये सम्पूर्ण अंग्रेजी वर्णमाला में कोई पृथक अक्षर नहीं है. चूँकि उस समय (1956 में) आदिवासियों का नेतृत्व न तो इतना सक्षम था और न ही इतना जागरूक कि वह इसे जारी करते समय सभी पर्यायवाची शब्दों के साथ उसी तरह से जारी करवा पाता, जैसा कि गूजर जाति के नेतृत्व ने गूजर, गुर्जर, गुज्जर, के रूप में जारी करवाया है.

    यही नहीं, आज तक जो भी आदिवासी राजनेता रहे हैं, उन्होंने भी इस पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और 'मीणा'एवं 'मीना'दोनों शब्द चलते रहे, क्योंकि व्यक्तिगत रूप से हर कोई इस बात से वाकिफ रहा कि इन दोनों शब्दों का वास्तविक मतलब एक ही है, और वो है-''मीणा जनजाति'', जिसे अंग्रेजी में Meena लिखा जाता है. अब जबकि कुछ असन्तोषियों या प्रचारप्रेमियों को 'मीणा'जन जाति की सांकेतिक प्रगति से पीड़ा हो रही है, तो उनकी ओर से ये गैर-जरूरी मुद्दा उठाया गया है, जिसका सही समाधान प्रारम्भ में हुई त्रुटि को ठीक करके ही किया जा सकता है.purushottam-meena-nirankushपुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'राजस्थान में आदिवासी अधिकारों के लिए सक्रिय हैं.

    http://www.janjwar.com/society/1-society/4815-meena-mina-ko-kalpnik-jatiyon-men-bantne-ka-kuchakr-for-janjwar-by-purushottam-meena-nirnkush



    बंगाल में चतुर्मुखी चुनाव पंचमुखी भी हो सकता है,फायदा में सिर्फ नमो लहर

    वामदलों के हाशिये पर चले जाने और तीसरे मोर्चे का खेल खराब करने के अन्नाई भाजपा एजंडे के कार्यान्वयन के अलावा दीदी के हाथ फिलहाल कुछ आने की संभावना ठीक उसी तरह नहीं है,जैसे आप सुनामी के गर्भपात से विश्वबैंक के भारतीय वंसत से कुछ भी नहीं बदलने जा रहा है।


    Thanks to didi,NAMO advantage in Bengal!Didi all set to destroy CPIM plus third front as well as congress!



    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



    सोमवार को कोलकाता प्रेस क्लब में शायद एक ऐतिहासिक घटना होने जा रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सेवा में रहते हुए अविराम अदालती लड़ाई जारी रखने वाले आईपीएस अफसर वहां बंगाल के मूलनिवासियों का घोषणापत्र जारी करने वाले हैं।रज्जाक मोल्ला के विद्रोह का पूरक है यह कार्यक्रम।जिसके तहत प्रदेश ही नहीं देश के सत्ता समीकरण में भारी उलटफेर की संभावना है।


    इस बीच बंगाल से प्रधानमंत्रित्व के दावेदार ममता बनर्जी ने अपने प्रधानमंत्रित्व के दावेदारी के तहत शेरनी की तरह देशरक्षा के संकल्प के तहत जो अश्वमेधी घोड़े दौड़ाने शुरु किये हैं देशभर में,उससे वामदलों के हाशिये पर चले जाने और तीसरे मोर्चे का खेल खराब करने के अन्नाई भाजपा एजंडे के कार्यान्वयन के अलावा दीदी के हाथ फिलहाल कुछ आने की संभावना ठीक उसी तरह नहीं है,जैसे आप सुनामी के गर्भपात से विश्वबैंक के भारतीय वंसत से कुछ भी नहीं बदलने जा रहा है।


    बहरहाल जहां तक बंगाल में बहुजन राजनीति का सवाल है, मतुआ आंदोलन की निरंतरता और जोगेंद्र नाथ मंडल के शुरुआती प्रयासों के बाद जो काम बामसेफ और बहुजनसमाज पार्टी पिछले तीस साल से कर नहीं पाये, रज्जाक और नजरुल की अगुवाई में दलित मुस्लिम गठबंधन से वह एजंडा जमीनी हकीकत बनता नजर आ रहा है।


    अब दीदी देशभर में सड़कों का धूल छानते हुए ईमानदारी और सादगी की छवि जरुर बन सकती है,लोकिन उनकी लंबी अनुपस्थिति में बंगाल में लगातार तेज हो रही केशरिया बयार को तेज होने से रोकने लायक संगठन उनके पास भी नहीं है।


    अगर दलित मुस्लिम गठबंदन ने कुछ गजब का खेल दिखाया तो इसकी प्रतिक्रिया में हिंदुत्व ध्रूवीकरण भी तेज हो जाने के आसार हैं।


    दीदी की दिल्ली रैली से पहले दिल्ली पहुंच गये हैं माकपा निष्कासित रज्जाक मोल्ला।वे वहां दलित मुस्लिम गठबंधन को राष्ट्रीय स्वरुप देने की कवायद करेंगे।


    हावड़ा से पूर्व तृणमूल सांसद विक्रम सरकार जो अब तक नजरुल रज्जाक के साथ थे ,भाजपा के साथ चले गये हैैं।


    सैफुद्दीन चौधरी और संतोष राणा के भी वाम मुख्यदारा में शामिल होने की खबर है।


    यह शुरुआती ध्रूवीकरण की दिशा बनने के संकेत हैं।बहुत सारे उलटफेर अब और होने हैं।इसमें खास बात यह है कि बंगाल भी बाकी देश की तरह तेजी से नमोमय बनने लगा है।


    फिलहाल बंगाल में कान आंख यथासंभव खोल लेने के बावजूद अरविंद केजरीवाल के रोड शो का कोई जमीनी असर होता नहीं दीख रहा है। इसके बावजूद बंगाल में पूरे पैंतालीस साल के बाद किसी बड़े चुनाव में राजनीति चतुष्कोण है।


    पांचवा कोण भी तैयार है और उसके आकार लेने की देरी है। साहित्यकार व आईपीएस अफसर नजरुल इस्लाम रिटायर हो चुके हैं और रज्जाक मोल्ला माकपा बाहर। रिटायर होते ही साहित्यिक मोर्चे से बगावत का ऐलान कर दिया है नजरुल ने।


    यह पंचम कोण बंगाल को पहली प्रतिक्रिया में तो नमोमय दिशा देने जा रहा है और फिलहाल भाजपाइयों के हाथों में बिन मांगे हर समीकरण के मध्य दोनों हाथों में कमजोर संगठन के बावजूद घी चस्पां लड्डू ही लड्डू हैं।


    लेकिन दलित मुस्लिम संगठन की असली रणनीति लोकसभा चुनाव को लेकर नहीं,बल्कि 2016 के बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर है।लोकसभा चुनाव तो उसके लिए लंबी लड़ाई का रिहर्सल है और इस रिहर्सल का सारा फायदा भाजपो को होगा क्योंकि दीदी वामदलों और कांग्रेस दोनों को बंगाल के नक्शे से मिटाने के लिए संघी पिच पर ही धुआंधार खेल रही हैं।


    सोमवार को कोलकाता प्रेस कल्ब में उनकी तरफ से तीन बेहद आक्रामक पुस्तकें मूलनिवासी घोषणापत्र,मूलनिवासी भाओता और उलंग रानी प्रकाशित हो रही हैं। इन पुस्तकों के शीर्षक अनूदितकरने की जरुरत नहीं है।


    बांग्ला के मूर्धन्य कवि नीरेंद्र नाथ चक्रवर्ती की बहुचर्चित कवित उलंग राजा को याद कर लें,बस।


    राज्य सरकार की सेवा में रहते हुए नजरुल और माकपा में बने रहकर रज्जाक मंच साझा करते रहे हैं।इनका भरत मिलाप इसी चुनाव में संभावित है।


    आपको बता दें, नजरुल समर्थक पहले ही सांगठनिक तौर पर राज्यभर में संगठित है और उनके साथ दलित,आदिवासी,पिछड़े और मुसलमान हर जिले में हैं।


    बंगाल सरकार की सेवा में रहते हुए नजरुल अपने चुनिंदा कार्यकर्ताों के साथ सामाजिक कार्यक्रमों के मार्फत अराजनीतिक मंचों के जरिये बंगाल का चप्पा चप्पा पहले ही छान चुके हैं।


    रज्जाक का जनाधार प्रश्नातीत है।बंगाल का कोई कोना ही शायद ऐसा हो जहां वाम जनाधार में रज्जाक की छाप नहीं है।


    इनके उम्मीदवार भी मैदान में हो गये, तो सारे राजनीतिक दलों का वोट बैंक टूटेगा सिवाय केशरिया वोट बैंक। बंगाल में यह समीकरण चुनाव नतीजों में खासा फेरबदल कर सकता है और तमाम भविष्यवक्ता और चुनाव विशेषज्ञ गलत साबित हो सकते हैं।


    वैसे भी भाजपा का वोटबैंक इस बार नमोसुनामी के तहत बंगाल में अभूतपूर्व ढंग से मजबूत होने जा रहा है। वामदवलों की हालत सबसे खराब है और कांग्रेस के लिए तो साइनबोर्ड भी बचाना मुश्किल हो सकता है।तृणमूल कांग्रेस को भी इसका अंदाजा है और उन्हें खुसफहमी है कि भले वोट ज्यादा मिल जाये भाजपा को,सीटें नहीं मिलेंगी।


    लेकिन बदलते समीकरण के मध्य दार्जिलिंग तो भाजपा काते में है ही, बारासात, दमदम,कृष्णनगर और हावड़ा में भी पसंदीदा रंग केशरिया बन सकता है।यह तो नमूना है।असल खेल तो अभी बाकी है।


    जाहिर है कि दार्जिलिंग की सीट फिर भाजपा को मिलना तय है। केंद्र में सत्ता बदलने की भनक लगते ही दीदी के साथ खड़े विमल गुरुंग फिर केशरिया होने लगे हैं और उनका समर्थन फिलहाल पहाड़ों में निर्णायक है।


    भाजपा की जो ऱणनीति है,उसके मुताबिक पीसी सरकार जैसे उम्मीदवार हैरतअंगेज नतीजे निकाल सकते हैं। माकपा के मुकाबले हो या नहीं, कांग्रेस से तो भाजपा के आगे निकल जाने  के मजबूत आसार हो गये हैं।


    दीदी का अल्पसंख्यक वोट बैंक फिलहाल अटूट है लेकिन रज्जाक नजरुल समीकरण के थोड़ा भी असरदार निकलने पर अल्पसंख्यक उन्हीके साथ बने रहेंगे,इसकी कोई गारंटी नहीं है।मुसलमान भाजपा या वामदलों को एकदम वोट नहीं देंगे,ऐसा भी नहीं कह सकते।कांग्रेस को तो कुछ मुसलमान वोट देंगे ही।दलितों,पिछड़ों और आदिवासियों के बारे में भी फिलहाल यही कहा जा सकता है।


    Thanks to didi,NAMO advantage in Bengal!Didi all set to destroy CPIM plus third front as well as congress!


    Anna Mamata alliance is all set to destroy CPIM plus third front as well as congress!Bengal to witness four or five alliances at a time after forty five years which strengthens NAMO Advantage in Bengal.


    Darjiling almost gone to BJP.Magician PC Sarkar Junior,EX TMC MP Vikram Sarkar and Tapan Sikdar may upset the apple carts in Barasat, Howrah and Dumdum respectively.Beside Bjp has its traditional citadel in Krishnanagar.Rising the voting percentage is not the only decisive equation,four or five cornered fight in almost all Bengal seats would hurt every other political party with the exception named BJP.


    CPIM expelled Razzak Mollah and retired IPS officer Nazrul Islam has to open up his Mulnivasi manifesto on Monday in Kolkata press club.Dalit Muslim alliance is now the ultimate truth and the it has to stimulate Hindutva polarisation only to benefit RSS. On the other hand the dalit Muslim OBC tribal hijacked vote banks seem to be all set to break away from the dondage.


    The central administrative tribunal in West Bengal has struck down the promotion of five director generals of Bengal police in response to a petition filed by IPS Nazrul Islam.


    The verdict has come as a humiliation to the as all the DGs have been struck down by the order. During the hearing over the past few months, it was becoming clear that the state government was increasingly being pushed to the wall.

    Islam has already been approached by the Aam admi Party and the Congress to become its member in the state. Islam is supposed to retire on February 28.

    But Nazrul and Razzak opted for Dalit Muslim alliance,the potential game changer in Bengal.Before independence,all three interim Bengal governments were the result of Dalit Muslim alliance.The resurrected mission has declared to make a Dalit Chief Minister with a Muslim deputy in the next assembly elections.


    With the general elections barely two months away, Communist Party of India –Marxist (CPM) came up with a rather harsh decision, expelling senior party leader and former land and land reforms minister of West Bengal, Abdur Razzak Molla, from the party in view of "anti-party activities and public vilification of the party's leadership."


    The decision was taken at a meeting of the CPI(M) State Secretariat, a statement issued by the party's State Committee said.


    Mr. Molla's reacted to the expulsion, saying it was "most welcome" and one that he "was awaiting."


    He has courted controversy in recent times for his open criticism of certain top leaders of the party, making his displeasure with their style of functioning known in both private circles as well as in the public domain.

    Mr. Molla's remarks have caused considerable unease within the CPI(M) leadership. The move could particularly affect the party's support base in the MLA's home turf in South 24 Parganas district.


    An MLA representing the Canning Purba Assembly constituency, Mr Molla's most recent public display of disgruntlement with the CPI(M) leadership was earlier this month when he announced the setting up of a consortium of different Dalit and minorities groups.


    It was by no means an easy decision for CPM. Molla, 69, a 45-year party veteran and an eight-time lawmaker from the Canning East constituency since 1977, was also a grass roots leader and the face of the minority community within the CPM fold. With a huge chunk of the minority vote having decisively moved towards ruling Trinamool Congress in the state elections in 2011 and thereafter, chucking out Molla can have serious ramifications for a beleaguered CPM in rural Bengal. However, given Molla's open revolt against the party, the CPM leadership had to send out a strong message. Speaking to Gulf News from Kolkata yesterday (Thursday), Mohammad Salim, CPM central committee member, said: "This was inevitable. Molla has been making derogatory comments about the party's leadership for quite sometime now. Even though elections are close, we could not have put up with such audacity. And honestly, we are not even bothered about the fallout of sacking Molla. For the party, discipline and decency matter a lot more than electoral fortunes."

    Reacting to news about his expulsion, the diminutive Molla told newspersons in Kolkata late on Wednesday: "A most welcome move! Let me say this yet again that I am not anti-Left. My only issue is with pseudo- leftists."

    In fact, Molla was sticking out like a sore thumb ever since the CPM-led Left Front lost the state Assembly elections in Bengal in May 2011. Holding the outgoing chief minister, Buddhadeb Bhattacharjee, responsible for CPM's severely flawed industry and land acquisition policy, that resulted in the poll debacle, Molla had said: "One who doesn't even know how to handle a simple non-venomous serpent has tried to flirt with a cobra … the result is there for everyone to see!"


    He had openly criticised the party's choice of Hritabrata Bandyopadhyay as the CPM nominee for the recent Rajya Sabha polls. Much to the chagrin of the CPM's state unit, only last week, Molla launched a new platform called Social Justice Forum and declared at its first public gathering that he would seriously consider using the platform for a new political identity in the coming days.


    ৪৫ বছর পর লোকসভা নির্বাচনে রাজ্যের লড়াই চতুর্মুখী

    দুই বা তিন নয়। এবার লড়াই চারের। লোকসভা নির্বাচনে পশ্চিববঙ্গে লড়াই এবার চতুর্মুখী। লড়াইয়ের ময়দানে বামফ্রন্ট, কংগ্রেস, বিজেপি এবং তৃণমূল কংগ্রেস। পয়তাল্লিশ বছর পর রাজ্যের ইতিহাসে চতুর্মখী লড়াই। ফলে এক জটিল সমীকরণের মুখে এবারের লোকসভা ভোট।সারা বছর ধরেই রাজনৈতিক ময়দানে দেখা যায় এই চার দলকে। একে অপরের বিরুদ্ধে তোপ দাগতেও ছাড়েন না নেতারা।


    কিন্তু ভোট আসতেই চার কমে হয়ে যায় তিন। অতীতের সম্পর্ক যাই থাকুক না কেন ভোটের বাজারে কিন্তু মিলে যায় দুই দল।


    দল গড়লেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়

    ১ ৯৯৮-লোকসভা ভোট

    লড়াই

    বাম, কংগ্রেস ও তৃণমূল- বিজেপি জোটের মধ্যে


    ১ ৯৯৯-লোকসভা ভোট

    লড়াই

    বাম, কংগ্রেস ও তৃণমূল - বিজেপি জোটের


    ২০ ০ ১

    বিধানসভা নির্বাচন

    লড়াই

    বাম, বিজেপি , কংগ্রেস ও তৃণমূল জোটের মধ্যে


    ২০ ০ ৪

    লোকসভা নির্বাচন

    লড়াইয়ে

    বাম, কংগ্রেস ও তৃণমূল - বিজেপি জোট


    ২০ ০ ৬

    বিধানসভা নির্বাচন

    বাম, কংগ্রেস ও তৃণমূল - বিজেপি জোটের মধ্যে ছিল লড়াই


    ২০ ০ ৯

    লোকসভা নির্বাচনে লড়াইয়ের ময়দানে

    বাম, বিজেপি কংগ্রেস ও তৃণমূল জোট


    ২০ ১ ১

    বিধানসভা নির্বাচনে লড়াই

    বাম, বিজেপি ,কংগ্রেস ও তৃণমূল জোটের মধ্যে

    (অর্থাত্‍ পঞ্চায়েত অথবা পুরভোট বাদ দিলে তৃণমূল কংগ্রেস কোনও নির্বাচনেই একক শক্তিতে লড়াই করেনি। কখনও হাত ধরেছে কংগ্রেসের কখনও বিজেপির। )


    এবার দেখে নেওয়া যাক ভোটের শতকরা হিসেবে কে কোথায় দাঁড়িয়ে।


    দুহাজার এগারোর শেষ বিধানসভা ভোটে


    বামেদের শতকরা ভোট ছিল ৪২ শতাংশ

    কংগ্রেস ও তৃণমূল কংগ্রেসের ৪৮ শতাংশ

    বিজেপির ৪ শতাংশ


    কিন্তু তৃণমূলের একার ভোট কত? বলা কঠিন। কারণ একটাই একক শক্তিতে কখনওই লড়েনি তৃণমূল । কংগ্রেসের ভোটের শতকরা হার কত?

    লোকসভা ভোটের তারিখ ঘোষণা এখন শুধুই সময়ের অপেক্ষা। এখনও পর্যন্ত যে যেখানে দাঁড়িয়ে তাতে কংগ্রেস ও তৃণমূল অথবা তৃণমূল বিজেপির মধ্যে জোটের সম্ভাবনা নেই বললেই চলে। লড়াই সরাসরি চারমুখি।


    ফলে এবারে ভোটে কে কোথায় দাঁড়িয়ে বলা একটু হলেও কঠিন। যেমন কঠিন কে কার কাটবে ভোট। রাজনৈতিক বিশ্লেষকদের মতে এবার লোকসভা ভোটে ঘটতে পারে অনেক ঘটনা।

    http://zeenews.india.com/bengali/kolkata/four-sided-fight-in-state-after-45-years_20599.html

    দিল্লির যুদ্ধে মমতার মোক্ষম চাল অণ্ণা

    জয়ন্ত ঘোষাল

    নয়াদিল্লি,২ মার্চ , ২০১৪ee e

    একটা পোস্টারে ব্যানারে ছয়লাপ দিল্লি শহর।

    ছবিতে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের মুখ। তলায় লেখা, 'সাদগি, সচ্চাই ঔর ইমানদারি'। যার অর্থ: অনাড়ম্বর জীবন, সত্য ও সততা।

    সঙ্গে মমতার জবানিতে লেখা রয়েছে, 'ম্যায় কিসিসে ডরতি নেহি হুঁ। জব তক জিন্দা রহুঙ্গি, শেরনি কী তরহা রহুঙ্গি অউর দেশকি রক্ষা করুঙ্গি।'অর্থাৎ: আমি কাউকে ভয় পাই না। যত দিন বাঁচব, বাঘিনীর মতো বাঁচব এবং দেশকে রক্ষা করব।

    শুধু পোস্টার-ব্যানার নয়, ১২ মার্চ রামলীলা ময়দানে অণ্ণা হজারে-মমতার যে যৌথ সভা হবে, তার প্রচার চলছে টিভি চ্যানেলগুলিতেও। দিল্লির জনসভা সেরেই মমতা-অণ্ণা যাবেন উত্তরপ্রদেশে। সেই সভারও প্রস্তুতি শুরু হয়ে গিয়েছে লখনউয়ে। উত্তর ভারতের আরও কিছু রাজ্যে পর পর সভা করবেন দু'জনে। জামা মসজিদের শাহি ইমামও বেশ কিছু জনসভায় থাকবেন বলে খবর।

    অণ্ণা ও মমতার এই সমঝোতাকে রাজনৈতিক দিক থেকে বিশেষ তাৎপর্যপূর্ণ বলে মনে করা হচ্ছে। কংগ্রেস এবং বিজেপি-র শীর্ষ নেতাদের অনেকেই বলছেন, প্রতিকূল পরিস্থিতিতে ঠিকমতো চাল দেওয়ার নামই হল রাজনীতি। মমতা সে কাজে দারুণ ভাবে সফল।

    লোকসভা ভোটের দিকে তাকিয়ে একেবারে গোড়ায় মমতা চেয়েছিলেন নীতীশ কুমার, নবীন পট্টনায়ক, জয়ললিতাদের নিয়ে একটি ফেডেরাল ফ্রন্ট গঠন করতে। প্রথম প্রথম সে ব্যাপারে উৎসাহও দেখিয়েছিলেন নীতীশ। কিন্তু নরেন্দ্র মোদী লোকসভা ভোটে বিজেপি-র প্রধান মুখ হিসেবে উঠে আসার পরে এনডিএ ছেড়ে তিনি কংগ্রেস সম্পর্কে নরম মনোভাব নিতে শুরু করেন। ফলে ফেডেরাল ফ্রন্ট নিয়ে তাঁর আগ্রহ কমে।

    ফেডেরাল ফ্রন্টের বৃত্ত থেকে দূরে সরে গিয়েছেন নবীন পট্টনায়ক এবং জয়ললিতাও। জয়ললিতা নিজে প্রধানমন্ত্রী হওয়ার স্বপ্ন দেখেন। তাই বামেদের সঙ্গে যোগাযোগ করে তৃতীয় ফ্রন্টের বিকল্প পরিকল্পনা নিয়ে ব্যস্ত হয়ে পড়েছেন। পায়ের তলায় রাজনৈতিক জমির খোঁজে তৃতীয় ফ্রন্ট গড়ার বাধ্যবাধকতা রয়েছে বামেদেরও। সিপিএম সাধারণ সম্পাদক প্রকাশ কারাট বুঝতে পারছেন, পশ্চিমবঙ্গে সিপিএমের অবস্থা শোচনীয়। সেখানে একের পর এক ভোটে বামেদের অবস্থা ক্রমেই খারাপ হচ্ছে। বাম ভোটের অবক্ষয় বন্ধ হওয়ার আশু কোনও লক্ষণই নেই। সেই কারণেই মরিয়া হয়ে মুলায়ম সিংহ যাদব, দেবগৌড়া, জয়ললিতা, নীতীশ কুমার প্রমুখকে নিয়ে তৃতীয় ফ্রন্ট গড়ার চেষ্টা শুরু করেছে সিপিএম।

    এই পরিস্থিতিতে ফেডারেল ফ্রন্ট আপাতত শিকেয় তুলে রেখে অণ্ণা হজারের সঙ্গে মিলে সর্বভারতীয় ক্ষেত্রে একটি রাজনৈতিক পরিসর তৈরি করতে সচেষ্ট হয়েছেন মমতা। সম্প্রতি দিল্লি এসে তিনি বলেছেন, 'এখন নির্বাচনী জোট প্রি-পেড নয় হবে পোস্ট পেড।'অর্থাৎ, ভোটের আগে নয়, জোট যা হওয়ার হবে ভোটের পরেই। বস্তুত এমন কথা বলছেন প্রায় সব দলের নেতারাই।

    কিন্তু অণ্ণার সঙ্গে মমতার জোট দু'টি রাজনৈতিক দলের সমঝোতা নয়। আসলে এর মধ্যে দিয়ে তৃণমূল নেত্রী এক ঢিলে অনেকগুলি পাখি মেরেছেন। প্রথমত, অণ্ণা-মমতার যৌথ জনসভার প্রচার হিন্দি বলয়ে তৃতীয় ফ্রন্টের লম্ফঝম্প অনেকটাই লঘু করে দিয়েছে। দ্বিতীয়ত, উত্তর ও পশ্চিম ভারতে মমতার জন্য অণ্ণা খুবই সময়োপযোগী। কারণ, সেখানে অণ্ণার নিজস্ব ভোটব্যাঙ্ক রয়েছে। সেই ভরসায় বলীয়ান হয়েই ওই এলাকার বিভিন্ন রাজ্যে প্রচারে নামতে চলেছেন মমতা।

    এর পিছনেও একটা লক্ষ্য রয়েছে। নির্বাচন কমিশনের নিয়মমতো কোনও রাজনৈতিক দলকে সর্বভারতীয় দলের স্বীকৃতি পেতে গেলে ১) কোনও একটি রাজ্য থেকে অন্তত চারটি আসন এবং চার বা তার বেশি রাজ্যে লোকসভা বা বিধানসভায় মোট প্রদত্ত ভোটের অন্তত ৬ শতাংশ পেতে হয়। অথবা, ২) কমপক্ষে তিনটি রাজ্য থেকে লোকসভার ১১টি আসনে জিততে হয়। তৃণমূলের হিসেব হল, পশ্চিমবঙ্গ ছাড়া ত্রিপুরা, কেরল, অসম, উত্তরপ্রদেশ, হরিয়ানার মতো রাজ্যে যদি সব মিলিয়ে ১০০টি আসনে লড়া যায়, তা হলে এই দুই শর্তের কোনও একটি পূরণ করে ফেলা যাবে।

    অণ্ণা-প্রশ্নে মমতা সুচতুর রণকৌশল নিয়েছেন, তেমনই অণ্ণার দিক থেকেও মমতার সঙ্গে হাত মেলানোর কারণ রয়েছে। নিজে রাজনৈতিক দল গড়বেন না বলে অনেক আগেই জানিয়ে দিয়েছেন অণ্ণা। তাঁর শিষ্য অরবিন্দ কেজরীবালও গোড়ায় সেই কথাই বলেছিলেন। কিন্তু পরে সেই মত থেকে সরে এসে আম আদমি পার্টি গড়েন কেজরীবাল। দিল্লির ভোটে বিপুল সাফল্যও পেয়েছেন তিনি। সঙ্গে সঙ্গে অণ্ণার সঙ্গে তাঁর দূরত্বও বেড়েছে। বস্তুত, গুরু-শিষ্যের মতপার্থক্য এখন চরম আকার নিয়েছে। অণ্ণা চাইছেন কেজরীবালের বিষদাঁত ভাঙতে।

    কিন্তু কংগ্রেস বা বিজেপি, মায়াবতী বা মুলায়ম কারও পক্ষে প্রচার করাই অণ্ণার পক্ষে অসুবিধার। কারণ, এদের সকলের বিরুদ্ধেই দুর্নীতির অভিযোগ বিস্তর। আর তাই মমতার সততা, তাঁর সহজ-সরল জীবনযাপন, মূল্যবোধের রাজনীতিকে হাতিয়ার করেছেন অণ্ণা। মমতাকেই তিনি বেছে নিয়েছেন আম-আদমি ব্র্যান্ড হিসাবে।

    http://www.anandabazar.com/national/%E0%A6%A6-%E0%A6%B2-%E0%A6%B2-%E0%A6%B0-%E0%A6%AF-%E0%A6%A6-%E0%A6%A7-%E0%A6%AE%E0%A6%AE%E0%A6%A4-%E0%A6%B0-%E0%A6%AE-%E0%A6%95-%E0%A6%B7%E0%A6%AE-%E0%A6%9A-%E0%A6%B2-%E0%A6%85%E0%A6%A3-%E0%A6%A3-1.6611

    বুদ্ধদেবকে তোপ রেজ্জাকের, নজর রাখছে সিপিএম

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি,২ মার্চ , ২০১৪ee e

    বহিষ্কৃত হওয়ার পর রেজ্জাক মোল্লা কোন পথে এগোন, সে দিকে নজর রাখছেন প্রকাশ কারাট-সীতারাম ইয়েচুরিরা। দিল্লিতে গত কাল ছিল সিপিএম পলিটব্যুরোর বৈঠক। আজ এবং আগামিকাল কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠক। দলীয় সূত্রের খবর, রেজ্জাকের সম্ভাব্য পদক্ষেপ কী কী হতে পারে, নেতাদের কথায় সে প্রসঙ্গ উঠেছে। তাৎপর্যপূর্ণ ভাবে ঠিক এই সময়টাতেই রাজধানী এসে সিপিএম তথা প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যের বিরুদ্ধে তোপ দেগেছেন রেজ্জাক। বুদ্ধদেববাবুর উত্থানের সময় থেকে দলে পচন ধরতে শুরু করেছিল বলে অভিযোগ করেছেন তিনি।

    আজ এক সাক্ষাৎকারে রেজ্জাক বলেন, "১৯৮৭ পর্যন্ত পার্টি ঠিক পথেই চলছিল। তার পর যেই দলে বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য গুরুত্ব পেতে শুরু করলেন, সব নষ্ট হয়ে গেল।"বুদ্ধবাবুর হাত ধরে ক্রমশ পুঁজিপতি এবং দালালদের অনুপ্রবেশ ঘটেছিল বলে অভিযোগ করে রেজ্জাক বলেন, "এ ভাবে তো সংগঠন চলে না। অনেক বার এ কথা আমি দলের নেতাদের বলেছি। এই দল শ্রমিক-কৃষকদের দল থেকে মালিক এবং পুঁজিপতিদের দল হয়ে উঠল। ঠান্ডা ঘরে বসে নেতারা তত্ত্ব বানাতেন এবং তা চাপিয়ে দেওয়ার চেষ্টা হতো দরিদ্র মানুষের উপর।"আসন্ন লোকসভা নির্বাচনে বামফ্রন্টের ফলাফল খুবই খারাপ হবে বলে মনে করছেন রেজ্জাক। তাঁর কথায়, "ভাল ফলের কোনও প্রশ্নই ওঠে না। জঘন্য হবে ফলাফল।"

    দলবিরোধী কার্যকলাপ এবং জনসমক্ষে দলের ভাবমূর্তিকে হেয় করার অভিযোগে রেজ্জাককে ছেঁটে ফেলতে বাধ্য হয়েছেন সিপিএম নেতৃত্ব। দলের আদর্শগত অবস্থানের কারণেই এই পদক্ষেপ করতে হয়েছে পলিটব্যুরোকে। কিন্তু আদর্শগত অবস্থানের পাশাপাশি লোকসভা ভোটের আগে কৌশলগত দিকটিও মাথায় রাখতে হচ্ছে দলীয় নেতাদের। তাই কেন্দ্রীয় কমিটির ঘোষিত আলোচ্যসূচিতে না থাকলেও ঘরোয়া আলোচনায় রেজ্জাক-প্রসঙ্গ উঠেছে। এই সময়ে দিল্লিতে উপস্থিত রয়েছেন পশ্চিমবঙ্গ, কেরল এবং ত্রিপুরা সিপিএমের শীর্ষ নেতারা। রেজ্জাক দলের কোনও বিক্ষুব্ধ অংশের সঙ্গে যোগাযোগ করছেন কি না, সে দিকে নজর রাখছে সিপিএম।

    রেজ্জাক অবশ্য সিপিএমকে তোপ দাগলেও নিজের তাস এখনই দেখাতে চাইছেন না। সম্প্রতি 'সামাজিক ন্যায়বিচার মঞ্চ'গড়েছেন। কোনও রাজনৈতিক দল নয়, এই মঞ্চের মাধ্যমেই তিনি পিছিয়ে পড়া সংখালঘুদের জন্য কাজ করতে চান এখনও পর্যন্ত এটাই রেজ্জাকের ঘোষিত বক্তব্য। তাঁর কথায়, "৭২ সালে প্রথম বিধায়ক হই। আর নয়, অনেক হয়েছে। এ বার মুসলিম দলিতদের উন্নয়নের জন্য কাজ করতে চাই।"আজ দিনভর একাধিক দলিত সংখ্যালঘু নেতা-কর্মীর সঙ্গে বৈঠক করেন রেজ্জাক। কথা বলেন বহুজন সমাজবাদী পার্টির কিছু নেতার সঙ্গেও। সূত্রের খবর, জেডিইউ-এর রাজ্যসভার সাংসদ আলি আনোয়ারের সঙ্গে নিয়মিত যোগাযোগ রেখে চলছেন রেজ্জাক। আনোয়ার ইতিমধ্যেই রেজ্জাকের মঞ্চে যোগ দিয়েছেন। বিভিন্ন রাজ্যের দলিত ও পিছড়ে বর্গ সংখ্যালঘুদের সঙ্গে তাঁর মাধ্যমেই রেজ্জাক যোগাযোগ করছেন বলে জানা গিয়েছে।

    অণ্ণা হজারে এবং মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের জোট নিয়ে দিল্লি এই মুহূর্তে সরগরম। কী ভাবছেন বিষয়টি নিয়ে? রেজ্জাকের জবাব, "অণ্ণাকে ঠিক বোঝা যাচ্ছে না। ডান দিকে যেতে চান না বাঁ দিকে! তবে এটা ঠিক, এর ফলে হয়তো মমতার লাভই হবে।

    যদি এই জোটের ফলে পশ্চিমবঙ্গের বাইরে যদি দু'চারটে আসন বেশি পাওয়া যায়, তা হলে তো তৃণমূলের পক্ষে ভালই।"

    http://www.anandabazar.com/state/%E0%A6%AC-%E0%A6%A6-%E0%A6%A7%E0%A6%A6-%E0%A6%AC%E0%A6%95-%E0%A6%A4-%E0%A6%AA-%E0%A6%B0-%E0%A6%9C-%E0%A6%9C-%E0%A6%95-%E0%A6%B0-%E0%A6%A8%E0%A6%9C%E0%A6%B0-%E0%A6%B0-%E0%A6%96%E0%A6%9B-%E0%A6%B8-%E0%A6%AA-%E0%A6%8F%E0%A6%AE-1.6612


    বিজেপির সঙ্গে ফের বন্ধুত্বের পথে মোর্চা


    সঞ্জয় চক্রবর্তী


    শিলিগুড়ি: মোদী হাওয়ায় গা ভাসাচ্ছে মোর্চাও৷ দেশ জুড়ে বিজেপির পালে হাওয়া লাগায় পুরোনো বন্ধুত্বকে ঝালিয়ে নেওয়ার তত্‍পরতা শুরু করেছে তারা৷


    গোর্খাল্যান্ডের দাবি নিয়ে দলের প্রতিনিধিরা দিল্লি গেলেও, রাজধানীতে তাঁরা এখন ব্যস্ত লোকসভা নির্বাচনে সঙ্গী স্থির করতে৷ মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের কড়া অবস্থানে রাজ্য সরকারের সঙ্গে সম্পর্ক পুনরুদ্ধার করলেও তৃণমূলের সঙ্গে নির্বাচনী সমঝোতায় দ্বিধা কাটেনি মোর্চার৷ সেজন্য এ নিয়ে সিদ্ধান্ত ঝুলিয়ে রেখেছে তারা৷

    মোর্চার অন্দরের খবর, দিল্লি গিয়ে দলের প্রতিনিধিরা আসন্ন নির্বাচনে বিজেপির ক্ষমতায় ফেরার সম্ভাবনা আছে বলে পাহাড়ে নেতৃত্বের কাছে রিপোর্ট পাঠিয়েছেন৷ তাতেই বদলে গিয়েছে দিল্লিতে অবস্থানকারী প্রতিনিধি দলের রণকৌশল৷ গোর্খাল্যান্ড গঠনের দাবি জানানো তাদের রাজধানী সফরের উদ্দেশ হলেও এখন যে তারা লোকসভা নির্বাচন নিয়েই আলোচনা করে বেড়াচ্ছেন, তা স্বীকারই করছেন পাহাড়ের নেতারা৷


    দার্জিলিংয়ে বসে মোর্চার সহ সম্পাদক বিনয় তামাং শুক্রবার 'এই সময়'কে বলেন, 'এ কথা ঠিকই যে আমাদের প্রতিনিধিরা পৃথক রাজ্যের দাবি ছাড়াও লোকসভা নির্বাচন নিয়েও প্রাথমিক আলোচনা করছেন৷ তবে সেই আলোচনা কেবল বিজেপি নয়, সব রাজনৈতিক দলের সঙ্গেই হবে৷ আমাদের প্রতিনিধিরা শুধু বিজেপি নয়, ইউপিএর নেতাদের সঙ্গেও কথা বলবেন৷' বিনয়বাবু না বললেও পাহাড়ে এখন জোর আলোচনা তলছে বিজেপিকে ফের দার্জিলিং লোকসভা কেন্দ্রে প্রার্থী দেওয়ার প্রস্তাব দিয়েছেন মোর্চা নেতৃত্ব৷


    বিজেপির কেন্দ্রীয় স্তরের কোনও নেতাকে দার্জিলিং কেন্দ্রে প্রার্থী হিসাবে চাইছেন তাঁরা৷ দিল্লিতে এখনও বিজেপির কেন্দ্রীয় নেতাদের সঙ্গে মোর্চার প্রতিনিধি দলের দেখা হয়নি ঠিকই৷ কিন্ত্ত মোর্চা সূত্রে জানা গিয়েছে, কথাবার্তা চলছে তৃতীয় পক্ষের মাধ্যমে৷ প্রাথমিক স্তরের সেই আলোচনা ইতিবাচক হলে প্রতিনিধি দলটি বিজেপির শীর্ষ নেতাদের সঙ্গে সাক্ষাত্‍ করবেন৷ তবে তাঁরা যশবন্ত সিনহাকে আর প্রার্থী হিসাবে চান না৷


    গত লোকসভা আসনে মোর্চা সমর্থন করেছিল বলেই পাহাড়ের আসন থেকে জিতে সংসদে গিয়েছিলেন প্রাক্তন কেন্দ্রীয় মন্ত্রী৷ কিন্ত্ত তাঁর সম্পর্কে হতাশ মোর্চা নেতারা৷ সেভাবে পাহাড়ে যেমন তাঁকে পাওয়া যায়নি, তেমনই মোর্চার পাশে তাঁকে দাঁড়াতেও দেখা যায়নি তেমন ভাবে৷ তেলেঙ্গানা বিল নিয়ে সংসদে আলোচনার সময় তিনি গোর্খাল্যান্ডের নাম পর্যন্ত উচ্চারণ করেননি৷ অথচ ২০০৯-এর লোকসভা নির্বাচনে তাঁকে মোর্চা সমর্থন করেছিল এই প্রতিশ্রুতি আদায় করেই যে গোর্খাল্যান্ড গঠনে সব রকম উদ্যোগ নেবে বিজেপি৷


    কিন্ত্ত নির্বাচনী ব্যর্থতায় বিজেপি সে বার দিল্লির ক্ষমতা দখল করতে না পারায় মোর্চার আশা আর পূরণ হয়নি৷ তারপর মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের হাত ধরে তারা জিটিএ পেয়ে উত্‍ফুল্ল ছিল৷ মোর্চা নেতারা জিটিএকে পৃথক রাজ্য আদায়ের প্রাথমিক পদক্ষেপ বলে প্রচারও শুরু করেছিলেন৷ কিন্ত্ত বাংলা ভাগে মুখ্যমন্ত্রী অনড় থাকায় পিছু হঠতে হয়েছে তাঁদের৷ রাজ্য সরকারের সঙ্গে সুসম্পর্ক আবার তৈরি করলেও কর্মী-সমর্থকরা তাতে খুশি না হওয়ায় চাপে রয়েছেন বিমল গুরুং৷


    তার উপর মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় দার্জিলিং আসনে তৃণমূলের প্রতীকে প্রার্থী দেওয়ার পরিকল্পনা করায় তিনি আরও চাপে পড়ে গিয়েছেন৷ প্রার্থী হিসাবে প্রাক্তন ফুটবলার ভাইচুং ভুটিয়ার নামও ভাসিয়ে দিয়েছেন মুখ্যমন্ত্রী৷ তাতে দলীয় কর্মীদের অসন্তোষ আরও বেড়েছে৷ তৃণমূলের সঙ্গে জোটে আপত্তি আছে তাঁদের৷ তাই নির্বাচন নিয়ে আলোচনার জন্য কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠক ডেকেও পিছিয়ে দিয়ে বাধ্য হয়েছেন মোর্চা নেতারা৷


    জিটিএতে ফিরে যাওয়ায় পাহাড়ের সাধারণ মানুষের কাছেও মোর্চার বিশ্বাসযোগ্যতা কমেছে৷ তাই লোকসভা নির্বাচনে প্রতিদ্বন্দ্বিতা ও প্রার্থী মনোনয়ন নিয়ে দলের নেতারা মুখে কুলুপ এঁটে রয়েছেন৷ জিজ্ঞাসা করলেই বলছেন, সিদ্ধান্ত নেওয়ার জন্য এখনও সময় আছে৷ মোর্চা সূত্রের খবর, বিজেপির পালে হাওয়া দেখে এই অস্বস্তিকর পরিস্থিতি থেকে রেহাই পাওয়ার পথ খুঁজে পেয়েছেন বিমল গুরুং, রোশন গিরিরা৷ দলের সাধারণ সম্পাদক রোশন দিল্লিতেই আছেন প্রতিনিধি দলের নেতা হিসেবে৷


    পুরোনো বন্ধু বিজেপির হাত ধরার আগে পাহাড়েও ঘর গোছাতে শুরু করেছেন গুরুং৷ তিনি পাহাড়ে আলাদা ভাবে উন্নয়ন পর্ষদের দাবিদার বিভিন্ন জনগোষ্ঠীগুলিকে কাছে টানার চেষ্টা করছেন৷ ওই জনগোষ্ঠীগুলিকে ৫ মার্চ বৈঠকে ডেকেছেন তিনি৷ প্রচার চলছে, একসঙ্গে পাহাড়ের উন্নয়নের পদক্ষেপ গ্রহণের জন্য ওই বৈঠক ডাকা হয়েছে৷ অথচ আলাদা উন্নয়ন পর্ষদ গঠনের জন্য একদিন ওই জনগোষ্ঠীগুলির সঙ্গে তিক্ততা ছিল মোর্চার৷ অন্য দিকে, একের পর এক উন্নয়ন পর্ষদ গড়ে ওই জনগোষ্ঠীগুলিকে কাছে টেনেছেন মুখ্যমন্ত্রী৷


    মুখ্যমন্ত্রীর বিরুদ্ধে বিভাজনের অভিযোগ ছিল মোর্চা নেতাদের গলায়৷ উদ্দেশ সিদ্ধিতে এখন সেই মুখ্যমন্ত্রীর সঙ্গে জনগোষ্ঠীগুলির বিভাজন তৈরি গুরুংয়ের কৌশল হয়ে উঠেছে৷ সেজন্য পৃথক রাজ্যের দাবিতেও তেমন জোরাল আওয়াজ তোলা হচ্ছে না৷ ওই দাবিতে ২ মার্চ সুকনায় যে সমাবেশ ডাকা হয়েছিল, পিছিয়ে দেওয়া হয়েছে তাও৷

    http://eisamay.indiatimes.com/state/gorkha-janamukti-morcha-may-tie-up-with-bjp/articleshow/31201473.cms

    গোটা দেশে মডেল হবে রাজ্য, শতাধিক প্রকল্পের সূচনা করে বললেন মমতা

    সুমন ঘরাই, এবিপি আনন্দ

    Saturday, 01 March 2014 06:36 PM

    কলকাতা: লোকসভা ভোটের আগে শনিবার নবান্ন-র পাশে মঞ্চ থেকে একশোটিরও বেশি প্রকল্পের উদ্বোধন করলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৷ তিন বছরে রাজ্য সরকারের উন্নয়নমূলক কাজের খতিয়ান দিয়ে তিনি বললেন, বিভিন্ন প্রকল্পের মাধ্যমে দেশের মডেল হয়ে উঠবে রাজ্য৷ এই উন্নয়নের ফর্মুলা তিনি অন্য রাজ্যকে ধার দেবেন না বলেও জানান মুখ্যমন্ত্রী৷

    যে কোনওদিন ঘোষণা হয়ে যাবে লোকসভা ভোটের নির্ঘণ্ট৷ জারি হয়ে যাবে আদর্শ আচরণবিধি৷ তাই তার আগেই একসঙ্গে একগুচ্ছ প্রকল্পের উদ্বোধন ও শিলান্যাস পর্ব সেরে ফেললেন মুখ্যমন্ত্রী৷ আজ নবান্নর পাশেই মঞ্চ তৈরি করে অনুষ্ঠানের আয়োজন করা হয়৷ একসঙ্গে সেখানে একশোরও বেশি যেসব প্রকল্পের উদ্বোধন ও শিলান্যাস করেন মুখ্যমন্ত্রী, সেগুলির মধ্যে রয়েছে গার্ডেনরিচ ফ্লাইওভার, বাতানুকুল নজরুল মঞ্চ, উত্তরবঙ্গের রাস্তা, আলিয়া বিশ্ববিদ্যালয়ের ক্যাম্পাস, মার্কেটিং হাব, বকখালিতে হাতানিয়া-দোয়ানিয়া নদীর ওপর ৩৬৫ কোটি টাকা ব্যয়ে সেতু, কৃষিবাজার ইত্যাদি৷ শুধু নতুন প্রকল্পই নয়, গত প্রায় তিন বছরে সরকারের উন্নয়নমূলক কাজের খতিয়ানও তুলে ধরে মুখ্যমন্ত্রী বলেন, রাজ্য সরকার একটা টিম৷ টিম ওয়ার্কেই রাজ্যের এই উন্নয়ন৷

    ইতিমধ্যে ফেয়ার প্রাইস শপের মতো প্রকল্পের জন্য গোটা দেশে প্রশংসা পেয়েছে পশ্চিমবঙ্গ৷ মুখ্যমন্ত্রী এদিন বলেন, আরও বিভিন্ন প্রকল্পে দেশের কাছে মডেল হয়ে উঠবে এরাজ্য৷ তিনি বলেন, উন্নয়নের ফর্মুলা তিনি অন্য রাজ্যকে ধার দেবেন না৷

    প্রতি মাসে বিপুল অঙ্কের সুদ কেটে নেওয়ার জন্য এদিনও ফের কেন্দ্রকে তীব্র আক্রমণ করেন মুখ্যমন্ত্রী৷

    http://abpananda.abplive.in/incoming/2014/03/01/article271086.ece/%E0%A6%97%E0%A7%87%E0%A6%BE%E0%A6%9F%E0%A6%BE-%E0%A6%A6%E0%A7%87%E0%A6%B6%E0%A7%87-%E0%A6%AE%E0%A6%A1%E0%A7%87%E0%A6%B2-%E0%A6%B9%E0%A6%AC%E0%A7%87-%E0%A6%B0%E0%A6%BE%E0%A6%9C%E0%A7%8D%E0%A6%AF-%E0%A6%B6%E0%A6%A4%E0%A6%BE#.UxLw--OSzp8

    রাজ্যে একটি আসনও পাবে না কং-বিজেপি, জোট জল্পনা উড়িয়ে দাবি মুকুলের

    আশাবুল হোসেন, এবিপি আনন্দ

    কলকাতা: জোট জল্পনায় জল ঢাললেন মুকুল রায়৷ এক ধাপ এগিয়ে তাঁর দাবি, রাজ্যে একটিও আসন পাবে না কংগ্রেস৷ খাতা খুলতে পারবে না বিজেপিও৷ দলের অন্দরের হিসেব, ৪২টি আসনে একা লড়াই করে কমপক্ষে ৩৫টি আসন এবার দখল করতে পারবে তৃণমূল৷ এবার তৃণমূলের প্রার্থীতালিকায় থাকবে ১৪টি নতুন মুখ৷

    শনিবার দিল্লি থেকেই ফিরেই মুকুল রায় স্পষ্ট বুঝিয়ে দেন, জোটের সম্ভাবনা নেই৷ শুক্রবারও রাজধানীতে দাঁড়িয়ে লোকসভা নির্বাচনে জোট জল্পনা উড়িয়ে দেন তিনি৷ বলেন, একলা আছি, ভাল আছি৷।

    মুকুল রায়ের দাবি, কংগ্রেসের অবস্থা শোচনীয়৷ রাজ্যে তারা ক্ষয়িষ্ণু শক্তি৷ পঞ্চায়েত, পুরভোটের ফলাফলই বলছে, রাজ্যে তারা একটিও আসন পাওয়ার অবস্থায় নেই৷ লোকসভা ভোটেও এর ব্যতিক্রম হবে না৷

    আর বিজেপি সম্পর্কে তাঁর দাবি, ১৯৯১ সালে এ রাজ্যে সর্বোচ্চ ১৩ % ভোট পেয়েছিল বিজেপি৷ এবারের পঞ্চায়েত ভোটে বিজেপি পেয়েছে ৪ %ভোট৷ লোকসভায় বেড়ে ৭ % হতে পারে৷ কিন্তু তারা কোনও আসন পাবে না৷

    তৃণমূলের সর্বভারতীয় সাধারণ সম্পাদকের দাবি, লোকসভা ভোটেও অব্যাহত থাকবে তৃণমূলের জয়ের ধারা৷ তাঁর ব্যাখ্যা, বিজেপি, কংগ্রেসের পর তৃণমূল এবার দেশে তৃতীয় শক্তি হিসেবে আত্মপ্রকাশ করবে৷ কেন্দ্রে সরকার গঠনেও অন্যতম নিয়ন্ত্রক শক্তি হবে তৃণমূল৷ মানুষের কাছে একটা বার্তা পৌছেছে, বাংলা যদি ভারতীয় রাজনীতিতে নির্ণায়ক শক্তি হয়, তাহলে বাংলার গুরুত্ব বাড়বে, বাংলার উন্নয়ন হবে৷ রাজ্যের সংখ্যালঘু ভোটাররাও তৃণমূলকে সমর্থন করবে বলে দলের শীর্ষ নেতৃত্বের একাংশের দাবি৷ এই অংশের যুক্তি, এবারের ভোটে যে কংগ্রেসের ভরাডুবি হবে, সমস্ত ভোট সমীক্ষায় তার ইঙ্গিত মিলেছে৷ এই পরিস্থিতিতে সংখ্যালঘুরা অনেকেই বিশ্বাস করতে শুরু করছেন, মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের হাত শক্ত করতে পারলে মোদিকে আটকানো সম্ভব৷ তৃণমূলের অন্দরের হিসেব, ৪২টি আসনে একা লড়াই করে তারা কমপক্ষে ৩৫টি আসন এবার দখল করতে পারবে৷ যার মধ্যে গতবারের ১৯ আসন ধরে রেখে, ১৬টি আসন ছিনিয়ে নেবে বিরোধীদের কাছে থেকে৷

    http://abpananda.abplive.in/state/2014/03/01/article271201.ece/%E0%A6%B0%E0%A6%BE%E0%A6%9C%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A7%87-%E0%A6%8F%E0%A6%95%E0%A6%9F%E0%A6%BF-%E0%A6%86%E0%A6%B8%E0%A6%A8%E0%A6%93-%E0%A6%AA%E0%A6%BE%E0%A6%AC%E0%A7%87-%E0%A6%A8%E0%A6%BE-%E0%A6%95%E0%A6%82-%E0%A6%AC%E0%A6%BF#.UxLxU-OSzp8




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    Dear Palash,


    I have written this note as desired by you on the issue of reservations as the tool to preserve castes;


    Note

    Keeping alive the caste goose that lay golden eggs for the ruling classes

    Anand Teltumbde

    During the colonial days, the first expression of the resentment of the Untouchables was against their exclusion from social processes. Barring Jotiba Phule, who conceived their cause beyond untouchability and included them within his ‘shudra-atishudra’ as a class that was exploited by ‘shetjis and bhatjis’, all other social reformers just focused on this visible symptom of untouchability and not the disease of caste per se. Post-Lucknow Pact, the Congress acutely felt the need to keep the Untouchables within its fold as Hindus lest they lost their political share to Muslims. They, therefore, began working on the issue of untouchability. With the persistent efforts of Babasaheb Ambedkar, particularly his forceful arguments in the Round Table Conferences in 1931-32, the separate and special status of the Untouchables was recognized in the Government of India Act 1935 as ‘Scheduled Castes’. A massive exercise was carried all over India to identify castes on the basis of a criterion of untouchability for preparing this schedule before 1937 elections in order to implement the provisions contained in the Act. The provisions were in the political form, originally as reservation with separate electorates and thereafter, as modified in the Poona Pact, reservations in joint electorates. There were preferment provisions also in the Act which mandated the state to take care of their interests. Accordingly, capable people from among the Scheduled Castes were given jobs in the government sector. When Dr Ambedkar became the member of the viceroy’s executive council in 1942 as labour member, this preferment policy was converted into quota system by an executive order.

    The important point to note here is that the evolution of the reservation system up to this point was conceptually correct. The reservation as an exception to the general rule was extended to the exceptional people (nobody could have any dispute over the Untouchables being a very exceptional lot in the world). But after the transfer of power, during the writing of the Constitution, this exceptional provision was proliferated so as to preserve the prevailing communal and caste divisions in the society, lest they disappear under the force of ensuing changes in political economy. First, the same set of provisions as were created for the Untouchables were extended to the Tribals by creating a separate schedule for them. There was an alternative to combine the schedules or extend the existing schedule for the Untouchables to include the Tribes. By doing so, the caste factor could have been diffused because although Tribals were backward, they did not suffer the social stigma of untouchability as the Untouchables did. If the purpose of these schedules were exactly same, there separation did not make sense except for keeping the untouchable castes as a distinct category alive. Merging the Untouchables and the Tribes would have at the minimum diluted the caste stigma. This separation maintained the identity of the Untouchables as separate people. The utility of this separation is illustrated by many communities demanding their inclusion in Scheduled Tribes but not in the Scheduled castes. That would fetch them all the benefits without the social stigma of being inferior. None would like to be Scheduled Castes, however!

    There was another problem with the schedule for Tribes, which was the fluid criterion used for scheduling the communities as tribals. Unlike the Untouchables, who were categorized into the schedule on a concrete criterion of untouchability, there could not be such criterion for Tribals or for that matter, any other people. The problem has manifested into inclusion of certain wrong communities into the schedule which appear to have monopolized most benefits planned for the Tribes. Every state will demonstrate that just one or two communities which otherwise are as advanced as even the upper castes, monopolizing the benefits just by an accident of being included in the schedule for tribes.

    The bigger mischief was played under Article 340 of the Indian Constitution, which made it obligatory for the government to promote the welfare of the OBCs. The Article said:

    “The president may by order appoint a commission, consisting of such persons as he thinks, fit to investigate the conditions of socially and educationally backward classes within the territory of India and the difficulties under which they labour and to make recommendations as to the steps that should be taken by the union or any state to remove such difficulties and as to improve ‘their condition and as to the grants that should be made, and the order appointing such commission shall define the procedure to be followed by the commission. ... A commission so appointed shall investigate the matters referred to them and present to the president a report setting out the facts as found by them and making such recommendations as they think proper.”

    To defend the Constitution, one may argue that the phrase used in the Article is “socially and educationally backward classes” and not ‘castes’. As a matter of fact, except in reference to the Untouchables, the Constitution does not use ‘caste’ anywhere. But everybody knew what was meant by the ‘class’ in the Article. It would only be mapped by the castes. This article would constitute arsenal of the ruling classes, which could be opened at the opportune time. There were far more pressing mandates of the Constitution to the ruling classes. One such mandate and only one in that demanding its fulfillment within a specified time period of a decade, was regarding provision of the free and compulsory education to all children up to the age of fourteen years. They ignored it but almost immediately followed the Article 340 to institute a Kalelkar Commission on 29 January 1953 to identify the ‘backward classes’. Naturally, in reference to their social backwardness, the castes would come into picture. They did come and such castes were identified by the commission which were ‘educationally’ backward and were underrepresented in the government service as well as in the field of trade, commerce and industry.

    The Kalelkar commission submitted its report on 30 March 1955, identifying 2,399 backward castes or communities as backward and of them 837 as the ‘most backward’. It inter alia recommended undertaking caste-wise enumeration of population in the census of 1961 and reservation of 70 per cent seats in all technical and professional institutions for qualified students of backward classes. Perhaps, the opportune time had not yet come and therefore the report was rejected by the Central government on the ground that it had not applied any objective tests for identifying the Backward Class.

    By the next decade, the changes in political economy induced by the calibrated land reforms and Green revolution, which would create a class of rich farmers out of the populous Shudra castes, wielding the baton of Brahmanism from the upper castes in vast rural India. These changes catalyzed regional parties and made electoral politics (based on the first-past-the-post type elections, where a small group of votes also make or unmake the outcome) increasingly competitive. The rise of the backward castes and their regional parties slowly spread through local self governments to states, culminating into defeat of the Congress party in 1977 by the Janata party, which was motley mixture of all these elements. Janata party government established the second backward classes commission on on 1 January 1979, which came to be known as the Mandal Commission with a mandate to “identify the socially or educationally backward.” The commission identified “other backward class”, on eleven criteria, but necessarily in terms of castes or religious communities comprising 54% of the total population (excluding SCs and STs), belonging to 3,743 different castes and communities. The report of the commission was submitted in December 1980 making several recommendations. A decade after the commission gave its report, V.P. Singh, the Prime Minister at the time decided to open up this can of castes in 1989 in his political game plan. It immediately resulted in the nationwide inferno against ‘reservations’, which until then were confined to the SCs and STs and were reluctantly but largely reconciled. The inferno created comic waves. Although the reservations were meant for the BCs, on the ground they came to beat the SCs, who foolishly rushed to defend ‘reservations’. Ultimately, reservations for OBCs were implemented in government services in 1993 and in higher educational institutes in 2008. Reservations came in their true prowess as weapons in the hands of the political parties who began using them with impunity in their political calculus.

    Any sane person can easily see that in a backward country like India, where arguably more than 80% population (by government reckoning 22.5% SCs and STs +54% BCs, which makes 76.5%. Add to it another 5 % of the poor of the excluded castes, all of them not being the upper castes, the tally goes up to 80.5%) can be summarily termed backward, the criterion of backwardness cannot be used for the exceptional measures such as reservation. It is not to say that there are no people other than the Untouchables who are not poorer or backward than them. They indeed are. And the state bears definite responsibility towards them. It has policy instruments to do such things and not reservations alone that are two edged swords that need to be cautiously used. For example, such a policy measure was indicated in the Constitution itself. It was about providing free, compulsory, and quality education to all children through neighourhood schools up to the age of some mature age. (The Constitution had prescribed free and compulsory education up to the age of 14 years and did not elaborate in so many terms). I feel, if the government had taken up this single issue in proper spirit and implemented this provision; there would not have been even the need of reservations. If the government is really concerned with the backwardness of the people, it would have internalized the need to ensure that every child that comes out on earth does not inherit the disability of their parents. Any woman that conceives a child would be provided quality health care and proper diet by the state. She would deliver the child in a healthy atmosphere and the child after the birth would be provided with proper diet and provisions for its healthy growth, followed by quality education. All children if they got the same education only through the neighourhood schools, would have healthy socialization and similar opportunity to realize their potential. Instead of indulging in a plethora of so called welfare schemes the government should have prioritized this programme. But it summarily ignored it. Instead, when the circumstances compelled it to do something in this regard, it changed the original mandate of the Constitution itself and enacted the ‘Right to Education’ Act, which has only legitimized the multilayered education system that evolved in the country under benign gaze of the government. It admits the quality of education as per the socio-economic standing of the parents, something akin to what Manu prescribed. Here also it has mischievously unleashed the weapon of reservation to fool the lower castes and classes.

    One should clearly see the underneath orientation of the ruling classes in this brief history that they would never let the goose of caste die! It is the testimony to the bankruptcy of the Dalit politics on the other hand that such issues do not even remotely concern it. Rather, paradoxically, with the spread of education and ‘Ambedkarism’ among them, increasingly fewer among them believe that castes could really be annihilated.      

    *

    Its translation may ignite debate.

    Regards



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    बाजार की जहरीली मछलियों से बचना उतना आसान भी नहीं है

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


    बंगाल में मछलियों की खपत खूब होती है। महाराष्ट्र और दूसरे समुद्रतटवर्ती इलाकों में भी मछलियों की खपत बहुत ज्यादा है। लेकिन सरकारी दावों और कार्यक्रमों के विपरीत बंगाल में मत्स्यसंकट बाकी राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा है।इसी वजह से बाजार भाव चाहे कुछ भी हो,मछली बाजार की भीड़ जस की तस रहती है।


    आसमान चूमती मांग और अपर्याप्त आवक के मध्य सरकारी निगरीनी की प्रणाली कारगर न  होने की वजह से साल भर बंगाल के लोग शवगृहों में सहेजी गयी और मांग मुताबिक भेजे जानी वाली बांग्लादेशी ईलिस से उत्सव मनाते रहते हैं।


    औद्योगिक प्रदूषण से नदियों के ताजा जल में मिलने वाली मछलियां भी सेहत के लिए खतरनाक है। बंगाल में पेट की बीमारियां महामारी जैसी बारह मास आम लोगों को परेशान करती रहती है और इसकी खास वजह है गली गली में मिठाई और फास्टफूड की कूकूरमुत्ता दुकानें,जिनमें  परोसे जाते खाद्य की कभी जांच पड़ताल ही नहीं हो पाती।


    जलमल एकाकार जहा जलापूर्ति व्यवस्था है महानगरों से लेकर उपनगरों और कस्बों  तक में,शुद्ध तेल और शुद्द वनस्पति जहां दुर्र्लभ है, और मरे नहीं लेकिन कुछ भी खिलाने पिलानेकी निरंकुश आजादी जहां संस्कृति और व्यवसाय दोनों हैं,उनकेलिए अस्वस्थ जीवन का अभिशाप तार्किक परिणति है।


    मछलियां बंगाल में सेहत बिगड़ने की दूसरी बड़ी वजह है क्योंकि मीठा पानी की मछलियां भी आरसेनिक समेत तमाम जहरीले रसायनों से सराबोर है।


    कोलकाता के मछली मार्केट में रोज़ाना अपनी पसंदीदा मछलियों के लिए मारामारी होती है। यहां से मछलियां सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही सप्लाई नहीं होतीं बल्कि देश भर के ज्यादातर शहरों में बंगाल की मछलियां ही आती हैं। लेकिन कोई नहीं जानता कि इस बाजार में उतर रही मछलियां अपने साथ एक जहर ला रही हैं। ऐसा जहर जो धीरे-धीरे शरीर में जमा होता है और खतरनाक बीमारियों को जन्म देता है।


    बाहर से आ रही मछलियों को सड़ने से बचाने के लिए जिस पीला रसायन का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है,वह जानलेवा साबित हो सकता है। फरमैलडीहाइड नामक रसायन का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।


    यह सही है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन का नकारात्मक असर कैरिबियन मछलियों पर स्पष्ट दिख रहा है। इसके कारण वहां की मछलियां काफी जहरीली हो रही हैं। लेकिन प्रदूषण और मिलावट का जो स्थानीय तंत्र है,उसपर मजबूत प्रशासनिक कदम उठाकर बेशक काबू पाया जा सकता है।


    देशभर में समुद्री मछलियों की व्यापक लोकप्रियता और खपत है जबकि समुद्र में रहने वाली शाकाहारी मछलियां शैवाल के सहारे ही जीवित रहती हैं। विषैले शैवाल की बढ़ती संख्या के कारण मछलियों को मजबूरन इसे ही खाकर गुजारा करना पड़ रहा है। इसे खाते ही मछलियां जहीरीली हो जाती हैं। इसके बाद जब मनुष्य इन मछलियों को खाता है, तो वे भी विष की चपेट में आ जाते हैं।


    अब बर्फ की कीमतों में इजाफा हने के कारण जैसे बांग्लादेश में शवगृहों में दस दस साल तक ईलिश का प्लेट बनाकर विदेशी वाणिज्य का कारोबार है,उसी तरह आंध्र से लेकर उत्तर प्रदेश तक से कई  कई दिनों की सड़क रेल यात्रा के बाद थोक और खुदरा बाजार में सड़ने से बचाने के लिए भी रसायन का भी बेरोकटोक इस्तेमाल हो रहा है।रासायनिक खाद और कीटनाशक पगी हाईब्रिड सब्जियों के साथ ऐसी जहरीले रसायन का समीकरण किस नायाब रुप में लोगों की थाली में पहुंचता है,यह शोध का विषय है।


    बाजार में छापामारी से इस समस्या का शायद समाधान नहीं है।न आम विक्रेताओं और न क्रेताओं को इस जहर के बारे में कोई जानकारी है। जिन्हें अंदाजा है ,वे चालान के बदले जिंदा मछलियां खरीद पकाकर खाते हुए मस्त हैं और उन्हें आर्सेनिक चावल और सब्जियों की तरह यह सबकुछ सेहतमंद लगता है।कोई भी सरकारी मशीनरी इस वायरस का सफाया नहीं कर सकता जबतक न कि समूची मत्स्य प्रणाली सुधार न दी जाये।दो चार विक्रेताओं की धरपकड़ से यब बंदोबस्त बदलने नहीं जा रहा है


    गैर-सरकारी संस्था टॉक्सिक्स लिंक का 2010 में  दावा है कि बाज़ार में बिक रही आधी से ज्यादा मछलियों में मरकरी यानी पारा मिला है। पारा वही पदार्थ जो बुखार नापने के लिए थर्मामीटर में चढ़ता उतरता रहता है, जो ब्लड प्रेशर नापने वाली मशीन में भी नजर आता है। मरकरी की मात्रा मछलियों के शरीर में सुरक्षित सीमा से कहीं ज्यादा मिली है।


    टॉक्सिक्स लिंक ने कोलकाता के मछली बाज़ारों से मछलियों के 60 सैम्पल लिए जबकि नदियों और तालाबों से मछलियों के 204 सैम्पल उठाए गए। 60 में से 40 सैपल्स में मरकरी की मात्रा सुरक्षित सीमा से ज्यादा पाई गई जबकि दूसरे इलाकों से आए 204 सैम्पल में से 167 सैम्पल भी लैब टेस्ट में फेल हो गए। ज्यादातर सैम्पल में तो मरकरी की मात्रा तय सीमा से 50 फीसदी ज्यादा पाई गई।


    अभी उस समस्या पर कुछ हुआ ही नहीं कि नयी समस्या खड़ी हो गयी।इसी बाच सियालदह और पातिपुकुर मछली थोक बाजारों में मत्स्य विभाग के अधिकारियों ने छापा मारक कुछ सैंपल जमा किया है। लेकिन इस समस्या की रोकथाम के लिए कोई ठोस उपाय अभी तक हुआ नहीं है।





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    जिनके प्राणभंवर ईवीएममध्ये बसै, उनन से काहे को बदलाव की आस कीजै?


    दो दलीय अमेरिका परस्त कारपोरेट बंदोबस्त अस्मिताओं का महाश्मशान!


    पलाश विश्वास

    सुधा राजे ने लिखा है


    तुम्हें ज़िंदग़ी बदलने के लिये पूँजी जमीन

    और कर्मचारी चाहिये

    मुझे समाज बदलने के लिये केवल अपने पर

    हमले से सुरक्षा और हर दिन मेरे हिस्से

    मेरा अपना कुछ समय और उस समय को मेरी अपनी मरज़ी से खर्च

    करने की मोहलत ।

    मोहन क्षोत्रिय ने लिखा है

    जैसे चूमती हैं बहनें

    अपने भाई को गाल पर

    वैसे ही चूमा था #राहुलको

    #बोंतिने...


    पर मारी गई वह

    उसके पति ने जला दिया उसे !


    क्या कहेंगे इस सज़ा को

    और सज़ा देने वाले के वहशीपन को?


    सत्ता का चुंबन बेहद आत्मघाती होता है।राहुल गांधी के गाल को चूमकर मारी गयी इस युवती ने दामोदर वैली परियोजना के उद्घाटन के मौके पर नेहरु को माला पहनाने वाली आदिवासी की नरक यंत्रणा बन गयी जिंदगी की याद दिला रही है।


    अस्मिता के मुर्ग मुसल्लम के प्लेट बदल जाने से बहुत हाहाकार ,त्राहि त्राहि है।राष्ट्र,समाज के बदलते चरित्र और अर्तव्यवस्था की नब्ज से अनजान उत्पादन प्रणाली और श्रम संबंधों से बेदखल मुक्त बाजार के नागरिकों के लिए यह दिशाभ्रम का भयंकर माहौल है।


    लेकिन कारपोरेटराज के दो दलीय एकात्म बंदोबस्त में यह बेहद सामान्य सी बात है।


    भारतीय राजनीति की धुरियां मात्र दो हैं।कांग्रेस और भाजपा। लेकिन अमेरिका के डेमोक्रेट और रिपब्लिकन की तरह या ब्रिटेन की कंजरनवेटिव और लेबर पार्टियों के तरह कांग्रेस और भाजपा में विचारधारा और चरित्र के स्तर पर कोई अंतर नहीं है।


    आर्थिक नीतियों और राजकाज,नीति निर्धारण में कोई बुनियादी अंतर नहीं है।संसदीय समन्वय और समरसता में जनविरोधी अश्वमेध में दोनों एकाकार है।


    दरअसल हम लोग लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र का छद्म ही जी रहे हैं।लोकतांत्रिकता और संवाद लोक गणराज्य और उसकी नागरिकता का चरित्र है और इस मायने में हम सारे भारतीय जन सिरे से चरित्रहीन हैं।


    परिवार,निजी संबंधों,समाज,राजनीति और राष्ट्रव्यवस्था में सारा कुछ एकपक्षीय है सांस्कृतिक विविधता और वैचित्र्य के बावजूद।हम चरित्र से मूर्ति पूजक बुतपरस्त लोग हैं।


    हम राजनीति करते हैं तो दूल्हे के आगे पीछे बंदर करतब करते रहते हैं।

    साहित्य,कला और संस्कृति में सोंदर्यबोध का निर्मायक तत्व व्यक्तिवाद है,वंशवाद है,नस्लवाद है,जाति वर्चस्व है।


    हमारा इतिहास बोध व्यक्ति केंद्रित सन तारीख सीमाबद्ध है।जन गण के इतिहास में हमारी कोई दिलचस्पी है ही नहीं।


    हमारी आर्थिक समझ शेयर सूचकांक, आयकर दरों और लाभ हानि का अंकगणित है।उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था की संरचना को लेकर हम सोचते ही नहीं।


    हमारे बदलाव के ख्वाब भी देव देवी केंद्रित है।

    दरअसल हम देव देवियों के ईश्वरत्व के लिए आपस में लड़ते लहूलुहान होते आत्मघाती खूंकार जानवरों की जमाते हैं,जिनपर संजोग से मनुष्य की खालें चढ़ गयी हैं।


    लेकिन दरअसल हम में मनुष्य का चरित्र है हीं नहीं।होता तो अमानुषों का अनुयायी होकर हम स्वयं को अमानुष साबित करने की भरसक कोशिश नहीं कर रहे होते।





    हमारी एकमात्र सशक्त अभिव्यक्ति अस्मिता केंद्रित सापेक्षिक व्यक्तिवाद है,जिसका स्थाई भाव धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद है।


    रंग बिरंगे धर्मोन्माद,चुनाव घोषमापत्रों,परस्परविरोधी बयानों के घटाटोप को सिरे पर रख दे तो सब कुछ एक पक्षीय है।


    दूसरा पक्ष जो बहुसंख्य बहिस्कृत आम जनता का है,वे सिरे से गायब हैं।


    सारे लोग जाहिर है कि सत्ता पक्ष के रथी महारथी हैं और बाकी लोग पैदलसेनाएं,पार्टीबद्ध लोग चाहे कहीं हों वे अमेरिकी कारपोरेट साम्राज्यवादी सामंती वर्णवर्चस्वी नस्ली हितों के मुताबिक ही हैं।


    इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि राम विलास पासवान धर्मनिरपेक्षता का अवतार बन गये तो फिर हिंदुत्व में उनका कायाकल्प हो गया।


    इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि ययाति की तरह अनंत सत्तासुख के लिए रामराज उदित राज बनने के बाद फिर पुनर्मूषिकः भव मानिंद रामराज हो गये।


    हमारा सरोकार कौन कहां गया,इससे कतई नहीं है।


    ृजो भी जहां गया,या जा रहा है,सत्तापक्ष में सत्ता की भागेदारी में गया है।


    हमारे मित्र एचेल दुसाध एकमात्र व्यक्ति हैं,जिन्होंने संजय पासवान मार्फत घोषित संघी आरक्षण समापन एजंडा के खिलाफ बोले हैं।


    हस्तक्षेप में उनका लिखा लंबा आलेख हमने ध्यान से पढ़ा है। वे बेहद अच्छा लिखते हैं।उनके डायवर्सिटी सिद्धांतों से हम सहमत भी हैं।हम भी अवसरों और संसाधनों के न्याय पूर्ण बंटवारे के बिना सामाजिक न्याय और समता असंभव मानते हैं।


    लेकिन अभिनव सिन्हा की परिभाषा के मुताबिक मुझे दुसाध जी के संवेदनाविस्फोट को भाववादी कहने में कोई परहेज नहीं है।


    माफ करेंगे दुसाध जी।हम वस्तुवादी तरीके से चीजों,परिस्थियों और समय की चीरफाड़ के बजाय वर्चस्ववादी आइकानिक समाज और अर्थव्यवस्था में चर्चित चेहरों को केंद्रित विमर्श में अपना दिमाग जाया कर रहे हैं।


    इसे ऐसे समझे कि भारतीयरंग बिरंगे सेलिब्रेटी समाज में सहाराश्री कृष्मावतार है और सुप्रीम कोर्ट से निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के मामले में सहाराश्री की गिरफ्तारी के बाद उन सारे लोगों के आर्थिक हित और सुख सुविधाओं में व्यवधान आया है।ये सारे लोग सहाराश्री के पक्ष में कानून के राज के खिलाफ लामबंद हैं।


    वैसा ही राजनीति में हो रहा है ,हमारे देवमंडल के सारे देव देवी अवतार के हित खतरे में हैं राजनीतिक अनिश्चयता के कारण तो उनका पक्षांतर उनके अस्तित्व के लिए जायज हैं।


    वे आज तक जो कर रहे हैं,वहीं कर रहे हैं।


    हमारे हिसाब से दुसाध जी,आगामी लोकसभा चुनावों में तो क्या मौजूदा राज्य तंत्र में किसी भी चुनाव में बहुजनों की कोई भूमिका नहीं हो सकती।


    मसलन अखंड बंगाल बंगाल और पूर्वी बंगाल के अलावा समूचे पूर्वोत्तर समेत असम,बिहार और झारखंड,ओडीशा का संयुक्त प्रांत था।जहां ईस्ट इंडिया कंपनी के सासन काल से ही लगातार साम्राज्यवाद विरोधी विद्रोह और किसान आंदोलन होते रहे हैं।


    आज आप जिस बहुजन समाज की बात करते हैं,वह उस बंगाल में बेहद ठोस आकार में था।आदिवासी,दलित,पिछड़े और मुसलमान जल जंगल जमीन की लड़ाई में एकाकार थे और सत्ता वर्ग के खिलाफ लड़ रहे थे।


    सन्यासी विद्रोह और नील विद्रोह के समय से इस बहुजन सामज की मुख्य मांग भुमि सुधार की थी।


    बाद में हरि गुरुचांद मतुआ आंदोलन से लेकर महाराष्ट्र के ज्योतिबा फूले और अय्यंकाली के आंदोलन का जो स्वरुप बना उसका मुख्य चरित्र इस बहुजन समाज का जगरण और सशक्तीकरण का था।


    आजादी से पहले बंगाल में जो दलित मुस्लिम गठबंधन बना ,वह दरअसल प्रजाजनों का जमींदारों के खिलाफ एका था और इसकी नींव मजबूत उत्पादन और श्रम संबंध थे न कि अस्मिता,पहचान और जाति संप्रदाय का चुनावी रसायन।


    इसके विपरीत बंगाल में अब रज्जाक मोल्ला और नजरुल इस्लाम का जो दलित मुस्लिम गठबंधन आकार ले रहा है,वह मायावती की सोशल इंजीनियरिंग,लालू यादव और मुलायम के जाति अंकगणित की ही पुनरावृत्ति है।जिसमें न अर्थ व्यवस्था की अभिव्यक्ति है और कहीं समाज है और न सत्तावर्ग के साम्राज्यवादी, सामंती,बाजारु नस्लवादी हितों के खिलाफ विद्रोह की जुर्रत और न राज्यतंत्र को बदलकर शोषणविहीन जातिविहीन वर्गविहीन समता सामाजिक न्याय आधारित समाज की स्थापना की कोई परिकल्पना है।


    आपको याद दिला दें कि अंबेडकरी आंदोलन और अंबेडकर की प्रासंगिकता, खासतौर पर उनके जाति उन्मूलन के एजंडे पर अभिनव सिन्हा और उनकी टीम की पहल पर हस्तक्षेप के जरिये पहले भी एक लंबी बहस हो चुकी है।


    कायदे से यह उस बहस की दूसरी किश्त है। हम अभिनव के अनेक दलीलों के साथ असहम थे और हैं। लेकिन उन्होंने एक अनिवार्य पहल की है,जिसके लिए हम उनके आभारी हैं।


    हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जाति उन्मूलन की है न कि बदलते हुए कारपोरेट राज्यतंत्र के जनादेश निर्माण की जनसंहारी प्रस्तुति।


    हम मौजदूा चुनावी कुरुक्षेत्र में धर्म निरपेक्ष और सांप्रदायिकता का पक्ष विपक्ष नहीं मानते।यह तो डुप्लीकेट का राजनीतिक वर्जन है।


    पक्ष में जो है ,वही तो विपक्ष में है।


    धर्मनिरपेक्षता का चेहरा राम विलास पासवान है तो बहुजन अस्मिता उदित राज है।


    दोनों पक्ष कारपोरेट हितों के माफिक हैं।


    दोनो पक्ष सांप्रदायिक हैं।


    घनघोर सांप्रदायिक।


    दोनों पक्ष जनसंहारी हैं।


    दोनों पक्ष अमेरिका परस्त हैं।


    दोनो पक्ष धर्मोन्मादी हैं।


    दोनों पक्ष उत्पादकों और श्रमिकों के खिलाफ हैं और बाजार के हक में हैं।


    दोनों पक्ष परमाणु ऊर्जा के पैरोकार हैं।


    दोनों पक्ष निजीकरण पीपीपी माडल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अबाध पूंजी प्रवाह विनिवेश निजीकरण बेदखली विस्थापन कारपोरेट विकास के पक्ष में हैं।


    इसीलिए जनसंहारी अश्वमेध केघोड़ों की अंधी दौड़ 1991 के बाद से अब तक रुकी ही नहीं है और न किसी जनादेश से रुकने वाली है।


    अल्पमत सरकारों और जाती हुई सरकारों की नीतियां रंगबिरंगी सरकारें और बदलती हुई संसद बार बार सर्वदलीय सहमति से लागू करती है।


    इसलिए इस राजनीतिक कारोबार से हमारा क्या लेना देना है,इसको समझ लीजिये।


    कोई भूख,बेरोजगारी,कुपोषण, स्त्री बाल अधिकारों,नागरिक व मानवाधिकारों, पर्यावरण,अशिक्षा जैसे मुद्दों पर,भूमि सुधार पर ,जल जंगल जमीन के हक हकूक पर,कृषि संकट पर,उतापादन प्रणाली पर,श्रमिकों की दशा पर,बंधुआ मजदूरी पर, नस्ली भोदभाव के तहत  बहिस्कृत समुदायों और अस्पृश्यभूगोल के खिलाप जारी निरंतर युद्ध और राष्य्र के सैन्यीकरण कारपोरेटीकरण के खिलाफ चुनाव तो लड़ ही न रहा है।


    हमारी बला से कोई जीते या कोई हारे।


    इसी सिलसिले में आदरणीय राम पुनियानी का जाति उन्मूलन एजंडे पर ताजा लेक हस्तक्षेप और अन्यत्र भी लग चुका है। जाति विमर्श पर समयांतर का पूरा एक अंक निकल चुका है।आनंद तेलतुंबड़े का आलेख वहां पहला लेख है।


    जाति के विरुद्ध हर आदमी है।हर औरत है।फिरभी जाति का अंत नहीं है। रक्तबीज की तरह जाति का अभिशाप भारतीय समाज,राष्ट्र,राजकाज.समूची व्यवस्था, मनुष्यता और प्रकृति को संक्रमित है। तो हमें उन बुनियादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा जिस वजह से जाति है।


    इस बहस से मलाईदार तबके को सबसे ज्यादा खतरा है।वह यह बहस शुरु ही होने नहीं देता।


    भारतीय बहुजन समाज औपनिवेशिक शासन के खिलाफ निरंतर क्लांतिहीन युद्ध में शामिल होता रहा है और उसने सत्ता वर्ग से समझौता कभी कभी नहीं किया है।इतिहास की वस्तुगत व्याख्या में इसके साक्ष्य सिलसिलेवार हैं।


    लेकिन वही बहुजन समाज आज खंड विखंड क्यों है


    क्यों जातियां और अस्मिताएं एक दूसरे कि खिलाफ लामबंद हैं

    क्यों संवाद के सारे दरवाजे बंद हैं

    क्यों किसी को कोई दस्तक सुनायी ही नहीं पड़ती

    क्यों बहुजन समाज सत्ता वर्ग का अंग बना हुआ है

    क्यों सत्ता जूठन की लड़ाई में कुकुरों की तरह लड़ रहे हैं ब्रांडेड बहुजने देवदेवी,तमाम अस्मिताों के क्षत्रप।


    ये आत्मालोचना का संवेदनशील समय है।

    यक्षप्रश्नों का संधिक्षण है।


    हमें सोचना होगा कि अंबेडकर को ईश्वर बनाकर हम उनकी विचारधारा और आंदोलन को कहां छोड़ आये हैं


    हमें अंबेडकर की प्रासंगिकता पर भी निर्मम तरीके से संवाद करना होगा।


    संविधान में वे कौन से तत्व हैं,जनके अंतर्विरोधों की वजह से सत्ता वर्ग को संविधान और कानून की हत्या की निरंकुश छूट मिल जाती है,इस पर भी वस्तुनिष्ठ ढंग से सोचना होगा।


    अगर वास्तव मे कोई शुद्ध अशुद्ध स्थल हैं ही नहीं,शुद्ध अशुद्ध रक्त है ही नहीं,पवित्र अपवित्र चीजें हैं ही नहीं, तो हमें वक्त की नजाकत के मुताबिक अंबेडकर,उनके जाति उन्मूलन के एजंडे और उनके मसविदे पर बने भारतीय संविधान पर भी आलोचनात्मक विवेचना करने से किसने रोका है।


    अंध भक्ति आत्महत्या समान है।


    अस्मिता और अस्मिता भाषा के ऊपर उठकर मनुष्यता और प्रकृति के पक्ष में खड़े हो जाये हम तभी जनपक्षधर हो सकते हैं,अन्यथा नहीं।


    हमने हस्तक्षेप पर ही निवेदन किया था कि आनंद तेलतुंबड़े जाति उन्मूलन पर अपना पक्ष बतायें।उन्होंने अंग्रेजी में निजीकरण उदारीकरण ग्लोबीकरण के राज में बेमतलब हो गये आरक्षण के खेल को खोलते हुए नोट भेजा है और साफ साफ बताया है कि जाति व्यवस्था को बनाये रखकर जाति वर्चस्व को बनाये रखने में ही आरक्षण की राजनीति है जबकि जमीन पर आरक्षण का कोई वजूद है ही नहीं।


    हम आपको वह नोट भेज रहे हैं।जब इसका हिंदी अनुवाद हो जायेगा तो वह भी लगा देंगे।


    गौर करें कि इससे पहले हमने लिखा हैः

    नरेंद्र मोदी ने कहा है कि देश में कानून बहुत ज्यादा हैं और ऐसा लगता है कि सरकार व्यापारियों को चोर समझती है। उन्होंने हर हफ्ते एक कानून बदल देने का वायदा किया है।कानून बदलने को अब रह ही क्या गया है,यह समझने वाली बात है।मुक्त बाजार के हक में सन 1991 से अल्पमत सरकारे जनादेश की धज्जियां उड़ाते हुए लोकगणराज्य और संविधान की हत्या के मकसद से तमाम कानून बदल बिगाड़ चुके हैं।मोदी दरअसल जो कहना चाहते हैं,उसका तात्पर्य यही है कि हिंदू राष्ट्र के मुताबिक देश का संवैधानिक ढांचा ही तोड़ दिया जायेगा।


    मसलन डा.अमर्त्य सेन के सुर  से सुर मिलाकर तमाम बहुजन चिंतक बुद्धिजीवी की आस्था मुक्त बाजार और कारपोरेट राज में है। लेकन ये तमाम लोग अपना अंतिम लक्ष्य सामाजिक न्याय बताते अघाते नही है। कारपोरेट राज के मौसम के मुताबिक ऐसे तमाम मुर्ग मुसल्लम सत्ता प्लेट में सज जाते हैं।जबकि बाबासाहेब अंबेडकर ने जो संवैधानिक प्रावधान किये, वे सारे के सारे मुक्त बाजार के खिलाफ है।वे संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की बात करते थे,जबकि मुक्त बाजार एकतरफा निजीकरण है। वे निःशुल्क शिक्षा के प्रावधान कर गये लेकिन उदारीकृत अमेरिकी मुक्त बाजार में देश अब नालेज इकोनामी है। संविधान की पांचवीं छठीं अनुसूचियों के तमाम प्रावधान जल जंगल जमीन के हक हूक के पक्ष में हैं, जो लागू ही नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि जमीन जिसकी संसाधन उसीका,लेकिन सुप्रीम कोर्ट की अवमानना  करते हुए अविराम बेदखली का सलवा जुड़ुम जारी है। स्वायत्तता भारतीय संविधान के संघीय ढांचे का बुनियादी सिद्धांत है ,जबकि कश्मीर और समूचे पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत बाबासाहेब के अवसान के बाद 1958 से लगातार भारतीय नागरिकों के खिलाफ आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा की पवित्र अंध राष्ट्रवादी चुनौतियों के तहत युद्ध जारी है।


    अंबेडकर अनुयायी सर्वदलीय सहमति से इस अंबेडकर हत्या में निरंतर शामिल रहे हैं। अब कौन दुकानदार कहां अपनी दुकान चलायेगा,इससे बहुजनों की किस्मत नहीं बदलने वाली है।लेकिन बहुजन ऐसे ही दुकानदार के मार्फत धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की पैदल सेनाएं हैं।


    मोदी व्यापारियों के हक हकूक में कानून बदलने का वादा कर रहे हैं और उसी सांस में व्यापारियों को वैश्विक चुनौतियों का समना करने के लिए भी तैयार कर रहे हैं।असली पेंच दरअसल यही है। कारोबार और उद्योघ में अबाध एकाधिकारवादी कालाधन वर्चस्व और विदेशी आवारा पूंजी प्रवाह तैयार करने का यह चुनाव घोषणापत्र अदृश्य है।


    हमारे युवा साथी अभिषेक श्रीवास्तव ने अमेरिकी सर्वेक्षणों और आंकड़ों की पोल खोल दी है।हम उसकी पुनरावृत्ति नहीं करना चाहते। लेकिन जैसा कि हम लगातार लिखते रहे हैं कि भारत अमेरिकी परमाणु संधि का कार्यान्वयन न कर पाने की वजह अमेरिका अपने पुरातन कारपोरेट कारिंदोंं की सेवा समाप्त करने पर तुला है।अमेरिका को शिकायत है कि इस संधि के मुताबिक तमाम आर्थिक क्षेत्रों में अमेरिकी बाजार अभी खुला नहीं है और न ही अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था संकट से उबर सकी है।


    इसके अलावा खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर अमेरिकी जोर है,जिसका विरोध करने की वजह से कारपोरेट मीडिया आप के सफाये के चाकचौबंद इंतजाम में लगा है।खुदरा बाजार में एफडीआई को हरी झंडी का पक्का इंतजाम किये बिना मोदी को अमेरिकी समर्थन मिलना असंभव है।अब समझ लीजिये कि छोटी और मंझोली पूंजी, खुदरा कारोबार में शामिल तमाम वर्गों के लोगों का हाल वही होने वाला है जो देश के किसानों,मजदूरों और अस्पृश्य नस्लों और समुदायों का हुआ है,जो उत्पादन प्रणाली,उत्पादन संबंधों और श्रम संबंधों का हुआ है।


    तमाम दलित व पिछड़े मसीहा,आत्मसम्मान के झंडेवरदार डूबते जहाज छोड़कर भागते चूहो की तरह केशरिया बनकर कहीं भी छलांग लगाने को तैयार हैं।कहा जा रहा है कि दस साल से जो काम कांग्रेस ने पूरा न किया, वह नमोमय भारत में जादू की छड़ी घुमाने से पूरा हो जायेगा।बंगाल के बारासात से विश्वविख्यात जादूगर जूनियर को टिकट  दिया गया है और शायद उनका जादू अब बहुजनों के काम आये।


    इसी बीच संजय पासवान के मार्फत भाजपा ने हिंदुत्व ध्रूवीकरण के मकसद से आर्थिक आरक्षण का शगूफा भी छोड़ दिया है लेकिन किसी प्रजाति के बहुजन की कोई आपत्ति इस सिलसिले में दर्ज हुई हो ऐसी हमें खबर है नहीं।आपको हो तो हमें दुरुस्त करें।



    इसी बीच कोलकाता जनसत्ता के संपादक शंभूनाथ शुक्ल ने खुलासा किया हैः


    एक वामपंथी संपादक ने मुझसे कहा कि गरीब तो ब्राह्मण ही होता है। हम सदियों से यही पढ़ते आए हैं कि एक गरीब ब्राह्मण था। हम गरीब तो हैं ही साथ में अब लतियाए भी जा रहे हैं। उन दिनों दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में लोग जातियों में बटे हुए थे बजाय यह सोचे कि ओबीसी को आरक्षण देने का मतलब अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण है न कि अन्य पिछड़ी जातियों को। मंडल आयोग ने अपनी अनुशंसा में लिखा था कि वे वर्ग और जातियां इस आरक्षण की हकदार हैं जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ गई हैं। मगर खुद पिछड़ी जातियों ने यह सच्चाई छिपा ली और इसे पिछड़ा बनाम अगड़ा बनाकर अपनी पुश्तैनी लड़ाई का हिसाब बराबर करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि इस मंडल आयोग ने तमाम ब्राह्मण और ठाकुर व बनिया कही जाने वाली जातियों को भी आरक्षण का फायदा दिया था। पर जरा सी नासमझी और मीडिया, कांग्रेस और भाजपा तथा वामपंथियों व खुद सत्तारूढ़ जनता दल के वीपी सिंह विरोधी और अति उत्साही नेताओं, मंत्रियों द्वारा भड़काए जाने के कारण उस राजीव गोस्वामी ने भी मंडल की सिफारिशें मान लिए जाने के विरोध में आत्मदाह करने का प्रयास किया जो ब्राह्मणों की आरक्षित जाति में से था। और बाद में उसे इसका लाभ भी मिला।


    यह खुलासा बेहद मह्त्वपूर्ण है।


    अब हमें 1991 में मनमोहन अवतार से पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर सरकारों के दौरान हुई राजनीति का सिलसिलेवार विश्लेषण करना होगा कि कैसे वीपी सिंह मंडल ब्रहास्त्र का इस्तेमाल करते हुए अपने राजनीति खेल को नियंत्रित नहीं रख सकें।

    हमने 1990 के मध्यावधि चुनावों के दौरान बरेली में दो बार वीपी से लंबी बातचीत की जो तब दैनिक अमरउजाला में छपा भी। लेकिन वीपी इसे मिशन ही बताते रहे। जबकि आनंद तेलतुंबड़े ने जाति अस्मिता को राजनीतिक औजार बनाने का टर्रनिंग प्वायंट मानते हैं इसे।तबसे आत्मघाती अस्मिता राजनीति बेलगाम है और तभी से मुक्त बाजार का शुभारंभ हो गया। जब लंदन में वीपी अपना इलाज करा रहे थे, तब भी मंडल प्रसंग में आनंद तेलतुंबड़े की उनसे खुली बात हुई थी।बेहतर हो कि आनंद यह किस्सा खुद खोलें।



    हम इस मुद्दे पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।


    फिलहाल यह समझ लें कि संघपरिवार ने सवर्णों के पिछड़े समुदायों को आरक्षम भी मंजूर नहीं किया और पूरे देश को खूनी युद्धस्तल में बदलने के लिए कमंडल शुरु किया।


    आनंद से आज हमारी इस सिलसिले में विस्तार से बात हुई तो उन्होंने बताया कि अनुसूचित जातियों के अलावा जाति आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।ओबीसी का मतलब अन्य पिछड़ी जातिया नहीं, अदर बैकवर्ड कम्युनिटीज है,यानी अन्य पिछड़ा वर्ग।


    पिछड़े वर्गों के हितों के विरुद्ध इतनी भयानक राजनीतिक खेल करने वाला संघ परिवार बहुजनों और देस के बहुसंख्य जनगण के हितों के मुताबिक अब क्या क्या करता है,देखना बाकी है।


    मुक्त बाजार को स्वर्ण काल मानने और ग्लोबकरण  को मुक्ति की राह बताने वालों के विपरीत आनंद तेलतुंबड़े का कहना है कि बाजार में खरीददारी की शक्ति के बजाय गर्भावस्था से ही बहुजनों के बच्चों की निःशुल्क क्वालिटी शिक्षा का इंतजाम हो जाये तो बहुजनों के उत्तान क लिए और कुछ नहीं चाहिए।


    हमारे डायवर्सिटी मित्र तमाम समस्याओं के समाधान के लिए संसाधनों और अवसरों का अंबेडकरी सिद्धांत के मुताबिक न्यायपूर्ण बंटवारे को अनिवार्य मानते हैं। हम उनसे सहमत है।संजोग से दुसाध एकमात्र बहुजन बुद्धिजीवी है जिन्होंने आर्थिक आरक्षण के संघी एजंडे को दुर्भाग्यपूर्ण माना है।


    हम लेकिन कारपोरेट राज और मुक्त बाजार दोनों के खिलाप जाति उन्मूलन के एजंडे के प्रस्थानबिंदू मान रहे हैं।


    अनेक साथी बिना मतामत दिये फेसबुक और नाना माध्यम से इस बहस को बेमतब बताते हुए गाली गलौज पर उतारु हैं।हम उनके आभारी हैं और मानते हैं कि गाली गलौज उनकी अभिव्यक्ति का कारगर माध्यम हो सकता है।


    हमें तो उन लोगों पर तरस आता है जो सन्नाटा बुनते रहने के विशेषज्ञ है।


    कवि मदन कश्यप के शब्दों में यह दूर तक चुप्पी सबसे ज्यादा खतरनाक है।ख्वाबों की मौत से भी ज्यादा खतरनाक।


    Dear Palash,


    I have written this note as desired by you on the issue of reservations as the tool to preserve castes;


    Note

    Keeping alive the caste goose that lay golden eggs for the ruling classes

    Anand Teltumbde

    During the colonial days, the first expression of the resentment of the Untouchables was against their exclusion from social processes. Barring Jotiba Phule, who conceived their cause beyond untouchability and included them within his 'shudra-atishudra' as a class that was exploited by 'shetjis and bhatjis', all other social reformers just focused on this visible symptom of untouchability and not the disease of caste per se. Post-Lucknow Pact, the Congress acutely felt the need to keep the Untouchables within its fold as Hindus lest they lost their political share to Muslims. They, therefore, began working on the issue of untouchability. With the persistent efforts of Babasaheb Ambedkar, particularly his forceful arguments in the Round Table Conferences in 1931-32, the separate and special status of the Untouchables was recognized in the Government of India Act 1935 as 'Scheduled Castes'. A massive exercise was carried all over India to identify castes on the basis of a criterion of untouchability for preparing this schedule before 1937 elections in order to implement the provisions contained in the Act. The provisions were in the political form, originally as reservation with separate electorates and thereafter, as modified in the Poona Pact, reservations in joint electorates. There were preferment provisions also in the Act which mandated the state to take care of their interests. Accordingly, capable people from among the Scheduled Castes were given jobs in the government sector. When Dr Ambedkar became the member of the viceroy's executive council in 1942 as labour member, this preferment policy was converted into quota system by an executive order.

    The important point to note here is that the evolution of the reservation system up to this point was conceptually correct. The reservation as an exception to the general rule was extended to the exceptional people (nobody could have any dispute over the Untouchables being a very exceptional lot in the world). But after the transfer of power, during the writing of the Constitution, this exceptional provision was proliferated so as to preserve the prevailing communal and caste divisions in the society, lest they disappear under the force of ensuing changes in political economy. First, the same set of provisions as were created for the Untouchables were extended to the Tribals by creating a separate schedule for them. There was an alternative to combine the schedules or extend the existing schedule for the Untouchables to include the Tribes. By doing so, the caste factor could have been diffused because although Tribals were backward, they did not suffer the social stigma of untouchability as the Untouchables did. If the purpose of these schedules were exactly same, there separation did not make sense except for keeping the untouchable castes as a distinct category alive. Merging the Untouchables and the Tribes would have at the minimum diluted the caste stigma. This separation maintained the identity of the Untouchables as separate people. The utility of this separation is illustrated by many communities demanding their inclusion in Scheduled Tribes but not in the Scheduled castes. That would fetch them all the benefits without the social stigma of being inferior. None would like to be Scheduled Castes, however!

    There was another problem with the schedule for Tribes, which was the fluid criterion used for scheduling the communities as tribals. Unlike the Untouchables, who were categorized into the schedule on a concrete criterion of untouchability, there could not be such criterion for Tribals or for that matter, any other people. The problem has manifested into inclusion of certain wrong communities into the schedule which appear to have monopolized most benefits planned for the Tribes. Every state will demonstrate that just one or two communities which otherwise are as advanced as even the upper castes, monopolizing the benefits just by an accident of being included in the schedule for tribes.

    The bigger mischief was played under Article 340 of the Indian Constitution, which made it obligatory for the government to promote the welfare of the OBCs. The Article said:

    "The president may by order appoint a commission, consisting of such persons as he thinks, fit to investigate the conditions of socially and educationally backward classes within the territory of India and the difficulties under which they labour and to make recommendations as to the steps that should be taken by the union or any state to remove such difficulties and as to improve 'their condition and as to the grants that should be made, and the order appointing such commission shall define the procedure to be followed by the commission. ... A commission so appointed shall investigate the matters referred to them and present to the president a report setting out the facts as found by them and making such recommendations as they think proper."

    To defend the Constitution, one may argue that the phrase used in the Article is "socially and educationally backward classes" and not 'castes'. As a matter of fact, except in reference to the Untouchables, the Constitution does not use 'caste' anywhere. But everybody knew what was meant by the 'class' in the Article. It would only be mapped by the castes. This article would constitute arsenal of the ruling classes, which could be opened at the opportune time. There were far more pressing mandates of the Constitution to the ruling classes. One such mandate and only one in that demanding its fulfillment within a specified time period of a decade, was regarding provision of the free and compulsory education to all children up to the age of fourteen years. They ignored it but almost immediately followed the Article 340 to institute a Kalelkar Commission on 29 January 1953 to identify the 'backward classes'. Naturally, in reference to their social backwardness, the castes would come into picture. They did come and such castes were identified by the commission which were 'educationally' backward and were underrepresented in the government service as well as in the field of trade, commerce and industry.

    The Kalelkar commission submitted its report on 30 March 1955, identifying 2,399 backward castes or communities as backward and of them 837 as the 'most backward'. It inter alia recommended undertaking caste-wise enumeration of population in the census of 1961 and reservation of 70 per cent seats in all technical and professional institutions for qualified students of backward classes. Perhaps, the opportune time had not yet come and therefore the report was rejected by the Central government on the ground that it had not applied any objective tests for identifying the Backward Class.

    By the next decade, the changes in political economy induced by the calibrated land reforms and Green revolution, which would create a class of rich farmers out of the populous Shudra castes, wielding the baton of Brahmanism from the upper castes in vast rural India. These changes catalyzed regional parties and made electoral politics (based on the first-past-the-post type elections, where a small group of votes also make or unmake the outcome) increasingly competitive. The rise of the backward castes and their regional parties slowly spread through local self governments to states, culminating into defeat of the Congress party in 1977 by the Janata party, which was motley mixture of all these elements. Janata party government established the second backward classes commission on on 1 January 1979, which came to be known as the Mandal Commission with a mandate to "identify the socially or educationally backward." The commission identified "other backward class", on eleven criteria, but necessarily in terms of castes or religious communities comprising 54% of the total population (excluding SCs and STs), belonging to 3,743 different castes and communities. The report of the commission was submitted in December 1980 making several recommendations. A decade after the commission gave its report, V.P. Singh, the Prime Minister at the time decided to open up this can of castes in 1989 in his political game plan. It immediately resulted in the nationwide inferno against 'reservations', which until then were confined to the SCs and STs and were reluctantly but largely reconciled. The inferno created comic waves. Although the reservations were meant for the BCs, on the ground they came to beat the SCs, who foolishly rushed to defend 'reservations'. Ultimately, reservations for OBCs were implemented in government services in 1993 and in higher educational institutes in 2008. Reservations came in their true prowess as weapons in the hands of the political parties who began using them with impunity in their political calculus.

    Any sane person can easily see that in a backward country like India, where arguably more than 80% population (by government reckoning 22.5% SCs and STs +54% BCs, which makes 76.5%. Add to it another 5 % of the poor of the excluded castes, all of them not being the upper castes, the tally goes up to 80.5%) can be summarily termed backward, the criterion of backwardness cannot be used for the exceptional measures such as reservation. It is not to say that there are no people other than the Untouchables who are not poorer or backward than them. They indeed are. And the state bears definite responsibility towards them. It has policy instruments to do such things and not reservations alone that are two edged swords that need to be cautiously used. For example, such a policy measure was indicated in the Constitution itself. It was about providing free, compulsory, and quality education to all children through neighourhood schools up to the age of some mature age. (The Constitution had prescribed free and compulsory education up to the age of 14 years and did not elaborate in so many terms). I feel, if the government had taken up this single issue in proper spirit and implemented this provision; there would not have been even the need of reservations. If the government is really concerned with the backwardness of the people, it would have internalized the need to ensure that every child that comes out on earth does not inherit the disability of their parents. Any woman that conceives a child would be provided quality health care and proper diet by the state. She would deliver the child in a healthy atmosphere and the child after the birth would be provided with proper diet and provisions for its healthy growth, followed by quality education. All children if they got the same education only through the neighourhood schools, would have healthy socialization and similar opportunity to realize their potential. Instead of indulging in a plethora of so called welfare schemes the government should have prioritized this programme. But it summarily ignored it. Instead, when the circumstances compelled it to do something in this regard, it changed the original mandate of the Constitution itself and enacted the 'Right to Education' Act, which has only legitimized the multilayered education system that evolved in the country under benign gaze of the government. It admits the quality of education as per the socio-economic standing of the parents, something akin to what Manu prescribed. Here also it has mischievously unleashed the weapon of reservation to fool the lower castes and classes.

    One should clearly see the underneath orientation of the ruling classes in this brief history that they would never let the goose of caste die! It is the testimony to the bankruptcy of the Dalit politics on the other hand that such issues do not even remotely concern it. Rather, paradoxically, with the spread of education and 'Ambedkarism' among them, increasingly fewer among them believe that castes could really be annihilated.      

    *

    Its translation may ignite debate.

    Regards



    दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ प्रस्ताव

    आज के दो दशक पहले उदारीकरण की अनुदार संरचना में धकेले जा रहे भारत की सुहानी तस्वीर एकध्रुवीय वैश्वीकरण के समर्थकों ने पेश की थी। सम्मोहन की उस अवस्था में लगा था कि इस संरचना में षामिल होने भर से देश की तमाम समस्याएं हल जो जाएंगी। सामाजिक प्रश्नोंके संदर्भ में भी यह उम्मीद तारी हुई थी। लेकिन पिछले एक दशक में ही घटी घटनाओं को ध्यान में रखें तो पता चलेगा कि भारतीय समाज की वीभत्स सचाई, जातिवादी मनोरचना एक स्तर पर पहले से अधिक क्रूर, हिंसक और हमलावर हुई है। हाल फि़लहाल में दलितों पर हुए हिंसक हमलों की सूची बनायी जाये तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा हो जाता है। वर्ष 2005 में हरियाणा के गोहाना क़स्बे में वाल्मीकि बस्ती पर हमला करके लगभग सत्तर घर लूटे और जलाये गये। यहीं 2007 में सालवन में दलितों के 300 घर आग के हवाले कर दिये गये। 2010 में हरियाणा के ही हिसार जि़ले के मिर्चपुर गांव में दलितों के दो दर्जन से अधिक घर जला दिये गये और बारहवीं कक्षा की प्रतिभाशाली छात्रा सुमन (पोलियोग्रस्त) को पिता (ताराचंद वाल्मीकि) समेत जला दिया गया। जनवरी 2012 में ओडिशा के बोलंगीर जि़ले के लाठोर क़स्बे में दलित बस्ती पर हमला करके चालीस मकानों को तबाह कर दिया गया। लूट के बाद उनमें आग लगा दी गयी। नवंबर 2012 में तमिलनाडु के धर्मपुरी जि़ले में दलित-बहुल नायकनकोट्टाई गांव में दलितों की तीन बस्तियों पर धावा बोला गया और चार सौ से अधिक मकानों को लूटने के बाद आग के हवाले कर दिया गया।

    जनवादी लेखक संघ का यह राष्ट्रीय सम्मेलन ऐसेदलितविरोधी जातिवादी हिंसा की पुरज़ोर निंदा करता है और सरकार से इस संबंध में कड़ी कार्रवाई की मांग करता है। भारतीय संविधान और संसद द्वारा उनकी सुरक्षा, सबलीकरण और विकास के लिए जो भी क़दम उठाये गये हैं, उन्हें ख़त्म करने की जिस तरह से खुल कर वक़ालत की जा रही है, हम उसकी भी निंदा करते हैं।

    प्रस्ताव: बजरंग बिहारी तिवारीअनुमोदन: संजीव कुमार

    जनवादी लेखक संघ के आठवें राष्ट्रीय सम्मेलन (14-15 फरवरी, इलाहाबाद) में पारित प्रस्ताव



    भीषणतम आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से मिली लोकतंत्र को चुनौती

    लोकसभा चुनाव-2014 में क्या हो बहुजन बुद्धिजीवियों की रणनीति!

    बहरहाल आज जबकि आजाद भारत के शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों में विविधता की अनदेखी के कारण देश में लोकतंत्र के विस्फोटित होने लायक प्रचुर सामान जमा हो चुका है,तथा अगले लोकसभा चुनाव में उसमें कुछ और इजाफा होने जा रहा है,हम क्या करें कि सोलहवीं लोकसभा चुनाव से ही लोकतंत्र के सुदृढ़करण की प्रक्रिया तेज़ हो।

    एच एल दुसाध

     सोलहवीं लोकसभा का चुनाव एक ऐसे समय में होने जा रहा है जब देश में व्याप्त भीषणतम विषमता के कारण हमारे लोकतंत्र पर गहरा संकट मंडरा रहा है।  विषमता का आलम यह है कि परम्परागत रूप से सुविधासंपन्न और और विशेषाधिकारयुक्त अत्यन्त अल्पसंख्यक तबके का जहाँ शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार , सांस्कृतिक-शैक्षणिक प्रत्येक क्षेत्र में 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है, वहीं परम्परागत रूप से तमाम क्षेत्रों से ही वंचित बहुसंख्यक तबका,जिसकी आबादी 85 प्रतिशत है, 15-20 प्रतिशत अवसरों पर आज भी जीवन निर्वाह करने के लिए विवश है। ऐसी गैर-बराबरी विश्व में कहीं और नहीं है।  किसी भी डेमोक्रेटिक कंट्री में परम्परागत रूप से सुविधासंपन्न तथा वंचित तबकों के मध्य आर्थिक-राजनीतिक– सांस्कृतिक इत्यादि क्षेत्रों में अवसरों के बटवारे में भारत जैसी असमानता नहीं है।  इस असमानता ने देश को 'अतुल्य'और 'बहुजन'-भारत में बांटकर रख दिया है।  चमकते अतुल्य भारत में जहाँ तेज़ी से लखपतियों-करोड़पतियों की संख्या बढती जा रही है,वहीँ जो 84 करोड़ लोग 20 रूपये रोजाना पर गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं, वे मुख्यतः बहुजन भारत के लोग हैं। उद्योग-व्यापार, धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र से लगभग पूरी तरह बहिष्कृत बहुजनों के लिए रोजगार के नाम पर अवसर मुख्यतः असंगठित क्षेत्र में है,जहाँ न प्राविडेंट फंड,वार्षिक छुट्टी व चिकित्सा की सुविधा है और न ही रोजगार की सुरक्षा।

      भीषणतम आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से मिली- लोकतंत्र को चुनौती   

    अवसरों के असमान बंटवारे से उपजी आर्थिक और सामाजिक विषमता का जो स्वाभाविक परिणाम सामने आना चाहिए, वह सामने आ रहा है।  देश के लगभग 200 जिले माओवाद की चपेट में आ चुके हैं।  लाल गलियारा बढ़ता जा रहा है और दांतेवाड़ा जैसे कांड राष्ट्र को डराने लगे हैं।  इस बीच माओवादियों ने एलान का दिया है कि वे 2050 तक बन्दूक के बल पर लोकतंत्र के मंदिर पर कब्ज़ा जमा लेंगे।  इसमें कोई शक नहीं कि विषमता की खाई यदि इसी तरह बढ़ती रही तो कल आदिवासियों की भांति ही अवसरों से वंचित दूसरे तबके भी माओवाद की धारा से जुड़ जायेंगे, फिर तो माओवादी अपने मंसूबों को पूरा करने में जरुर सफल हो जायेंगे और यदि यह अप्रिय सत्य सामने आता है तो हमारे लोकतंत्र का जनाजा ही निकल जायेगा।  ऐसी स्थित सामने न आये ,इसके लिए डॉ.आंबेडकर ने संविधान सौंपने के पूर्व 25 नवम्बर,1949 को राष्ट्र को सतर्क करते हुए एक अतिमूल्यवान सुझाव दिया था।

               बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर की चेतावनी

     उन्होंने कहा था- '26 जनवरी 1950 को हमलोग एक विपरीत जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं।  राजनीति के क्षेत्र में हमलोग समानता का भोग करेंगे किन्तु सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में मिलेगी असमानता।  राजनीति के क्षेत्र में हमलोग एक नागरिक को एक वोट एवं प्रत्येक वोट के लिए एक ही मूल्य की नीति को स्वीकृति देने जा रहे हैं।  हम लोगों को निकटतम समय के मध्य इस विपरीतता को दूर कर लेना होगा,अन्यथा यह असंगति कायम रही तो विषमता से पीड़ित जनता इस राजनैतिक गणतंत्र की व्यवस्था को विस्फोटित कर सकती है। '

      हमारे महान राजनेता-लोकतंत्र-प्रेमी या लोकतंत्र-विरोधी !

     ऐसी चेतावनी देने वाले बाबा साहेब ने भी शायद कल्पना नही किया होगा कि भारतीय लोकतंत्र की उम्र छह दशक पूरी होते-होते विषमता से पीड़ित लोगों का एक तबका उसे विस्फोटित करने पर आमादा हो जायेगा।  लेकिन यह स्थिति सामने आ रही तो इसलिए कि आजाद भारत के हमारे शासकों ने संविधान निर्माता की सावधानवाणी की पूरी तरह अनदेखी कर दिया।  वे स्वभावतः लोकतंत्र विरोधी थे।  अगर लोकतंत्र प्रेमी होते तो केंद्र से लेकर राज्यों तक में काबिज हर सरकारों की कर्मसूचियाँ मुख्यतः आर्थिक और सामजिक विषमता के खात्मे पर केन्द्रित होतीं।  तब आर्थिक और सामाजिक विषमता का वह भयावह मंजर कतई हमारे सामने नहीं होता जिसके कारण हमारा लोकतंत्र विस्फोटित होने की ओर अग्रसर है।  इस लिहाज से पंडित नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, जय प्रकाश नारायण, ज्योति बसु जैसे महानायकों की भूमिका का आकलन करने पर निराशा और निराशा के सिवाय और कुछ नहीं मिलता।  अगर इन्होंने डॉ.आंबेडकर की चेतावनी को ध्यान में रखकर आर्थिक और सामाजिक विषमता के त्वरित गति से ख़त्म होने लायक नीतियाँ अख्तियार की होतीं, क्या 10-15 प्रतिशत परम्परागत सुवुधाभोगी वर्ग का शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, शैक्षणिक–सांस्कृतिक क्षेत्रों पर 80-85 प्रतिशत वर्चस्व स्थापित होता और क्या देश अतुल्य और बहुजन भारत में विभाजित होता?

    राजनीति के हमारे महानायकों ने 'गरीबी-हटाओ', 'लोकतंत्र बचाओ', 'भ्रष्टाचार हटाओ',  'राम मंदिर बनाओ'इत्यादि जैसे आकर्षक नारे देकर महज शानदार तरीके से सत्ता दखल किया किन्तु उस राज-सत्ता का इस्तेमाल लोकतंत्र की सलामती की दिशा में बुनियादी काम करने में नहीं किया।  इनके आभामंडल के सामने भारत में मानव-जाति की सबसे बड़ी समस्या-आर्थिक और सामजिक विषमता-पूरी तरह उपेक्षित रही।  इस देश की वर्णवादी मीडिया और बुद्धिजीवियों को इनकी बड़ी-बड़ी जीतों में लोकतंत्र की जीत दिखाई पड़ी।  दरअसल इस देश के बुद्धिजीवियों के लिए इतना ही काफी रहा है कि पड़ोस के देशों की भांति भारत में सत्ता परिवर्तन बुलेट, नहीं बैलेट से होता रहा है।  सिर्फ इसी बिला पर भारत के लोकतंत्र पर गर्व करनेवालों बुद्धिजीवियों की कमी नहीं रही।  अतः महज वोट के रास्ते सत्ता परिवर्तन से संतुष्ट बुद्धिजीवियों ने प्रकारांतर में लोकतंत्र के विस्फोटित होने लायक सामान स्तूपीकृत कर रहे राजनेताओं को डॉ.आंबेडकर की सतर्कतावाणी याद दिलाने की जहमत ही नहीं उठाया।  मजे की बात यह है कि आजाद भारत की राजनीति के कथित महानायक आज भी लोगों के ह्रदय सिंहासन पर विराजमान हैं; आज भी उनके अनुसरणकारी उनके नाम पर वोटरों को रिझाने का प्रयास कर रहे हैं।  बहरहाल हमारे राष्ट्र नायकों से कहां चूक हो गयी जिससे विश्व में सर्वाधिक विषमता का साम्राज्य भारत में व्याप्त हुआ और जिसके कारण ही विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज विस्फोटित होने की और अग्रसर है?

    आर्थिक-सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के पीछे- शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता की अनदेखी  

    एक तो ऐसा हो सकता है कि गांधीवादी-राष्ट्रवादी और मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े हमारे तमाम राष्ट्र नायक ही समग्र वर्ग की चेतना से समृद्ध न होने के कारण ऐसी नीतियां ही बनाये जिससे परम्परागत सुविधासंपन्न तबके का वर्चस्व अटूट रहे।  दूसरी यह कि उन्होंने आर्थिक और सामाजिक –विषमता की उत्पत्ति के कारणों को ठीक से जाना नहीं, इसलिए निवारण का सम्यक उपाय न कर सके।  प्रबल सम्भावना यही दिखती है कि उन्होंने ठीक से उपलब्धि ही नहीं किया कि सदियों से ही सारी दुनिया में आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी,जोकि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है,की सृष्टि शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक) में सामाजिक(social) और लैंगिक(gender) विविधता (diversity)के असमान प्रतिबिम्बन के कारण होती रही है।  अर्थात लोगों के विभन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक-शक्ति का असमान बंटवारा कराकर ही सारी दुनिया के शासक विषमता की स्थित पैदा करते रहे हैं।  इसकी सत्योपलब्धि कर ही अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड इत्यादि जैसे लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देश ने अपने-अपने देशों में शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-टीवी-मीडिया इत्यादि हर क्षेत्र ही सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन की नीति पर काम किया और मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या से पार पाया।  किन्तु उपरोक्त देशों से लोकतंत्र का प्राइमरी पाठ पढने सहित कला-संस्कृति-फैशन-टेक्नोलॉजी इत्यादी सब कुछ ही उधार लेने वाले हमारे शासकों ने उनकी विविधता नीति से पूरी तरह परहेज़ किया।  किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि आजाद भारत के शासकों से भी विदेशियों की तरह 'डाइवर्सिटी नीति'अख्तियार करने की प्रत्याशा थी,ऐसा कई इतिहासकारों का मानना है।

    आजाद भारत को अपने शासकों से विविधता के सम्मान की प्रत्याशा थी

     ऐसे इतिहासकारों के अनुसार – '1947 में देश ने अपने आर्थिक पिछड़ेपन, भयंकर गरीबी, करीब-करीब निरक्षरता, व्यापक तौर पर फैली महामारी, भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए अपनी लम्बी यात्रा की शुरुआत की थी।  15 अगस्त पहला पड़ाव था, यह उपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था:शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था, स्वतंत्रता संघर्ष के वादों को पूरा किया जाना था और जनता की आशाओं पर खरा उतरना था।  भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना, राष्ट्रीय राजसत्ता को सामाजिक रूपांतरण के उपकरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था।  यह महसूस किया जा रहा था कि भारतीय एकता को आंख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए।  इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय,भाषाई,जातीय एवं धार्मिक विविधताएँ मौजूद हैं।  भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुए तथा देश के विभिन्न भागों और लोगों के विभिन्न तबकों को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था।  '

     भारत में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतीकात्मक प्रतिबिम्बन

    इतिहासकारों की उपरोक्त टिपण्णी बताती है कि हमारे शासकों को इस बात का इल्म जरुर था कि राजसत्ता का इस्तेमाल हर क्षेत्र में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन में करना है ।  यही कारण है उन्होंने किया भी,मगर प्रतीकात्मक।  जैसे हाल के वर्षो में हमने लोकतंत्र के मंदिर में अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री,महिला राष्ट्रपति,मुसलमान उप-राष्ट्रपति, दलित लोकसभा स्पीकर,आदिवासी डिप्टी स्पीकर के रूप सामाजिक और लैंगिक विवधता का शानदार नमूना देखा।  मगर यह नमूना सत्ता की सभी संस्थाओं,सप्लाई,डीलरशिप,ठेकों,पार्किंग-परिवहन,मिडिया –फिल्म-टीवी,शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश-अध्यापन,पौरोहित्य इत्यादि में पेश नहीं किया गया।

     वोट खरीदने के लिए राहत और भीखनुमा घोषणाओं पर निर्भर-हमारे राजनीतिक दल

    हमारे स्वाधीन भारत के शासक स्व-वर्णीय हित के हाथों विवश होकर या आर्थिक-सामाजिक विषमता की सृष्टि के कारणों से अनभिज्ञ रहने के कारण शक्ति के स्रोतों का लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य बंटवारे की सम्यक नीति न ग्रहण कर सके। उन्होंने आर्थिक-सामाजिक विषमता के लिए भागीदारीमूलक योजनाओं की जगह 'गरीबी-उन्मूलन'को प्राथमिकता देते हुए राहत और भीखनुमा योजनाओं पर काम किया जिसकी 80-85 प्रतिशत राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही। शासक दलों की शक्ति के स्रोतों के बंटवारा-विरोधी नीति के फलस्वरूप बहुसंख्यक समाज इतना अशक्त हुआ कि वह शक्ति के स्रोतों में अपनी हिस्सेदारी की बात भूलकर विषमता बढानेवाली राहत भीखनुमा घोषणाओं के पीछे अपना कीमती वोट लुटाने लगा। राजनीतिक दलों ने भी उसकी लाचारी को भांपते हुए लोकलुभावन घोषणायें करने में एक दूसरे से होड़ लगाना शुरू कर दिया।

    भीखनुमा घोषणाओं के चलते मुद्दाविहीन रहा 15 वीं लोकसभा चुनाव

       इस बीच कई बार जिस तरह शासक दलों ने भीषण विषमता तथा अवसरों के असम बंटवारे को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की,उससे लगा अब आने वाले दिनों में राहत की जगह भागीदारीमूलक घोषणाओं के आधार पर वोट लेने का दौर शुरू होगा। किन्तु,पार्टियों द्वारा विषमता को लेकर गहरी चिंता व्यक्त किये जाने के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ा। मसलन 2009 में आयोजित 15 वीं लोकसभा चुनाव को लिया जाय। उक्त चुनाव से पहले भूमंडलीकरण के दौर में भारत का तेज़ विकास चर्चा का विषय बन गया था। तेज़ विकास को देखते हुए दुनिया के ढेरों अर्थशास्त्री भारत के विश्व आर्थिक महाशक्ति बनने के दावे करने लगे थे। लेकिन इस तेज़ विकास के साथ चर्चा विकास के असमान बंटवारे की भी कम नहीं थी। उन दिनों नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने बार-बार कहा था ,'गरीबी कम करने के लिए आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है। । । मैं उनसे सहमत नहीं हूँ जो कहते हैं आर्थिक विकास के साथ गरीबी में कमी आई है। 'उनसे भी आगे बढ़कर कई मौकों पर राष्ट्र को चेताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था –'जिस तेज़ी से विकास हो रहा है,उसके हिसाब से गरीबी कम नहीं हो रही है। अनुसूचित जाति,जनजाति और अल्पसंख्यकों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। देश में जो विकास हुआ है उस पर नज़र डालने पर साफ दिखाई देता है कि गैर-बराबरी काफी बढ़ी है। 'यही नहीं गैर-बराबरी से चिंतित प्रधान मंत्री ने अर्थशास्त्रियों से सृजनशील सोच की मांग भी की थी ताकि आर्थिक-विषमता की चुनौती से जूझा जा सके। उन्ही दिनों रष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने विषमता की समस्या से चिंतित होकर बदलाव की एक नई क्रांति का आह्वान किया था। अतः प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा विगत वर्षों में आर्थिक विषमता की समस्या पर एकाधिक बार चिंता व्यक्त किये जाने के बाद उम्मीद थी कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के घोषणापत्र में आर्थिक गैर-बराबरी के खात्मे को अधिक से अधिक स्पेस तथा अनुसूचित जाति,जनजाति और अल्पसंख्यकों के लिए विकास में भागीदारी का सटीक सूत्र देखने को मिलेगा। पर,वैसा कुछ न कर कांग्रेस ने रिश्वत टाइप के लोकलुभावन वादे कर 15 वीं लोकसभा चुनाव को मुद्दाविहीन बना दिया,जिसका अनुसरण दूसरे दलों ने भी किया।

     इस प्रक्रिया में भाजपा ने कांग्रेस के तीन रूपये के मुकाबले दो रुपया किलो के हिसाब से 35 किलो चावल देने का वादा का डाला। फिल्म एक्टर चिरंजीवी की 'प्रजा राज्यम'पार्टी ने आन्ध्र प्रदेश के डेढ़ करोड़ गरीबों को मुफ्त चावल,तेल,और कुकिंग गैस देने की घोषणा कर डाला था। तेलगु देशम का वादा था कि चुनाव जीतने पर वह गरीबों के खाते में कुछ नगद जमा; करा देगी। उसने हर निर्धन की पत्नी को मासिक दो हज़ार ,फिर पन्द्रह सौ और सामान्य गरीब को एक हज़ार नकद देने का वादा किया था। दूसरे दल भी इस किस्म की घोषणायें करने में पीछे नहीं रहे। मतलब साफ़ है कि 15 वीं लोकसभा चुनाव में हमारे राजनैतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में सरकारी खजाने से अरबों रुपये वोटरों को रिश्वत के रूप में देने का एलान कर डाला था। चुनाव बाद जिस तरह कांग्रेस ने मनरेगा को अपनी जीत का कारण बताया,उससे लोकलुभावन घोषणाओं का चलन और बढ़ा।

          16वीं लोकसभा चुनाव पूर्व खतरनाक हालात

      बहरहाल 2014 के पूर्वार्द्ध में अनुष्ठित होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व केंद्र की सत्ता दखल का सेमी-फाइनल माने-जाने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाओं में जिस तरह राहत और भीखनुमा घोषणाओं की होंड मची उसे देखते हुए दावे के साथ कहा जा सकता है कि 15 वीं लोकसभा की भांति 16 वीं लोकसभा चुनाव में भी मुफ्त में अनाज,रेडियो-टीवी-कंप्यूटर-कुकिंग गैस-साइकल,नकद राशि इत्यादि का प्रलोभन देकर वोट खरीदने का उपक्रम चलाया जायेगा। इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान अन्नाद्रमुक द्वारा जारी घोषणापत्र यह यकीन पुख्ता करता है कि सोलहवीं लोकसभा भी भागीदारी नहीं,भीखनुमा घोषणाओं पर केन्द्रित होने जा रहा है। इसमें वादों की झड़ी लगाते हुए कहा गया है कहा गया है कि अगर पार्टी केंद्र की अगली सरकार का हिस्सा हुई तो देश भर में लैपटॉप के साथ मुफ्त मिक्सर ग्राइंडर,पंखे,दुधारू गायें और बकरियां,साइकल,किताबें,छात्रों के नाम फिक्स डिपोजिट,सौर उर्जा प्रयुक्त घर और गरीब लड़कियों को चार ग्राम सोना। जाहिर है जयललिता ने गाय-बकरी से लेकर लैप-टॉप इत्यादि मुफ्त में देने का वादा जो वादा किया है उसका अनुसरण अन्य दल भी करेंगे। ऐसा करके राजनीतिक दल हमारे लोकतंत्र को विस्फोटित करने का कुछ और सामान जमा करेंगे। किन्तु सोलहवीं लोकसभा चुनाव पूर्व लोकतंत्र के विस्फोटित होने लायक कुछ और सामन स्तुपीकृत करने के साथ दो और ऐसी नई बातें हुईं हैं जिसने हमें अपना कुछ कर्तव्य स्थिर करने के लिए बाध्य कर दिया है।

        सवर्णवादी दलों का बाप "आप"

       हम अब तक इसी बात का रोना रो रहे थे कि देश सवर्णवादी दलों द्वारा शासित हो रहा रहा है। पहले कांग्रेस फिर भाजपा जैसी दूसरी सवर्णवादी पार्टी इस रेस में शामिल हो गयी। हम सब इन्ही दोनों को रोकने की रणनीति बनाने में व्यस्त थे कि आम आदमी पार्टी(आप) के रूप में तीसरी सवर्णवादी पार्टी वजूद में आ गयी। 'आप'एनजीओ से जुड़े सवर्णों का ऐसा दल है जो भ्रष्टाचार के खात्मे की आड़ में बहुजन प्रधान राजनीति पर पर सुपर कंट्रोल स्थापित करने का भयावह षड्यंत्र रच रहा है। इस एनजीओ गैंग का जनलोकपाल/लोकायुक्त दरअसल बहुजनों द्वारा निर्वाचित सांसदों/विधायकों पर गैर-निर्वाचित सवर्णों का नियंत्रण स्थापित करने का एक अचूक हथियार है। चूँकि मंडल-उत्तर काल में बहुजनों की जाति चेतना ने शक्ति के तमाम सोतों पर 80-85%कब्ज़ा रखने वाले सवर्णों को राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया इसलिए जब एनजीओ गैंग ने बहुजन प्रधान राजनीति पर सुपर कंट्रोल स्थापित करने का षड्यंत्र किया,उसमें सवर्णों का कारपोरेट,मिडिया,फिल्म,खेल-कूद,गायन इत्यादि से जुड़ा सारा क्रीम तबका शामिल हो गया। भारी आश्चर्य का विषय की सवर्णवादी दलों का बाप 'आप'के साथ जुड़ने में बहुजन सामज के लोग भी होड़ लगाने लगे हैं।

    आत्मसमर्पण बहुजनवादी दलों का

     कांग्रेस –भाजपा के बाद नए व सबसे खतरनाक सवर्णवादी दल आप से निपटने के रणनीति बनाने में व्यस्त थे कि बहुजन राजनीति में भूचाल आ गया। जिन लोगों ने हिंदुत्ववादी भाजपा को गाली देकर व सौ-सौ हाथ की दूरी बनाकर बहुजन नायक का ख़िताब अर्जित किया था उनलोगों में ही भाजपा में शामिल होने व उससे गठबंधन करने की होड़ लग गयी। भाजपा के समक्ष समर्पण करने वाले दलों के अतिरिक्त जो शेष बचे बहुजनवादी दल हैं,वे भी उद्भ्रांत व दिशाहीनता के शिकार हैं। इनमें कुछ तीसरे मोर्चे,जो अब तक भारतीय राजनीति में सपना ही रहा है,में अपनी सम्भावना तलाश रहे हैं तो कुछ ख़ामोशी अख्तियार किये हुए हालात का जायजा ले रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि हम बहुजनों की जातिचेतना के चलते भारतीय राजनीति पर मूलनिवासियों का वर्चस्व स्थापित होने का सपना देखने लगे थे,अधिकांश बहुजनवादी दलों का सवर्णवादी दलों के समक्ष आत्मसमर्पण स्वतंत्र बहुजन राजनीति की करुणतम स्थिति स्वतंत्र मूलनिवासी राजनीति के लिए विराट आघात है।

       बहरहाल बदले हालात में बहुजन बुद्धिजीवियों को सक्रिय भूमिका अदा करने के लिए सामने आना,आज एक ऐतिहासिक जरुरत बन गयी है। कारण,बदले राजनीतिक परिदृश्य में लगता है देश की राजनीति मंडल पूर्व युग में चली गई है,जब सारे एजेंडे सवर्णवादी तय करते थे। मंडल के बाद लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण व समतामूलक समाज के एजेंडे मुख्यतः बहुजन समाज के नेता तय करते थे,जिसका अनुसरण करने के लिए राजनीतिक रूप से लाचार सवर्ण समाज के नेता बाध्य रहते थे। किन्तु वर्तमान स्थिति में मैदान सवर्णवादी दलों के लिए पूरी तरह मुक्त हो गया है। अब सारा एजेंडा भाजपा,कांग्रेस और आप जैसे दल तय करेंगे,बहुजन नायक/नायिकाओं की स्थिति प्रायः मूक दर्शक जैसी रहेगी। यह हालात बेहद चिन्ताजनक है। कारण,जिन सवर्णों का भारतीय राजनीति पर नए सिरे से वर्चस्व स्थापित हुआ है,वे स्वभावतः लोकतंत्र विरोधी हैं।

      मित्रों,जिन लोगों ने हाल ही में केंद्र की अगली सत्ता के प्रबल दावेदार दल के समक्ष आत्मसमर्पण किया है,वे अतीत में समय-समय पर भारतीय राजनीति को आर्थिक और सामाजिक –विषमता के खात्मे एजेंडे पर खड़ा करने की उम्मीद जगाते रहे। किन्तु अब उनके सवर्णवादियों के संग जुड़ने से वह सम्भावना ख़त्म सी होती नज़र आ रही है। उनके खेमा बदल से ऐसा लगता है कि बदलाव की आवाज भारतभूमि पर दम तोड़ चुकी है। ऐसी स्थिति में राजनीति के एजेंडे को आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे पर केन्द्रित करने की ऐतिहासिक जिम्मेवारी अब बहुजन बुद्धजीवियों पर आ पड़ी है। उन्हें बतलाना होगा कि सामाजिक न्याय तथा बदलाव की आवाज भले ही मंद पड़ी गई है पर, मरी नहीं है।

           दो विकल्प हमारे सामने

    मित्रों! यदि आप बहुजन राजनीति के इस संकट ग्रस्त हालात में सामाजिक न्याय तथा आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे की आवाज को बरकरार रखने में सक्रिय योगदान का मन बना रहे हैं तो मेरे ख्याल से हमारे सामने दो विकल्प हैं।

    पहला!

    चूँकि स्वाधीन स्वाधीन भारत के शासकों ने शक्ति के स्रोतों के न्यायोचित बंटवारे से परहेज कर ही विश्व में भीषणतम गैर-बराबरी का साम्राज्य भारत में कायम किया तथा शक्ति के स्रोतों का विभिन्न सामाजिक समूहों में न्यायोचित बंटवारे के जरिये ही फुले-शाहूजी-परियार-बाबासाहेब-जगदेव प्रसाद-कांशीराम इत्यादि के सपनों के समाज का निर्माण किया जा सकता है इसलिए हमें बहुजन नेतृत्व वाले किसी ऐसे दल के पीछे मजबूती से खड़ा होना होगा जो शक्ति के चप्पे-चप्पे को देश के चार प्रमुख सामाजिक समूहों के स्त्री-पुरुषों की संख्यानुपात में भागीदारी दिलाने की लड़ाई में उतरा हो,भले ही वह दल नया व छोटा ही क्यों न हो।

    दूसरा!

    यदि आप आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे के मुद्दे पर कार्यरत किसी बहुजनवादी दल के पीछे खड़े होकर बदलाव की आवाज को मुखर नहीं कर सकते तो कोई मोर्चा बनाकर नोटा(nota)के लिए संगठित अभियान चलायें। इसके लिए राजनीतिक दलों के समक्ष यह सन्देश पहुचाना होगा कि यदि वे अपने चुनावी घोषणापत्र को शक्ति के स्रोतों के भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूह के स्त्री-पुरुषों की संख्यानुपात में बंटवारे केन्द्रित नहीं करते हैं तो हम बहुजन समाज को इवीएम में लगे 'नोटा'का बटन दबाने की अपील करेंगे। अर्थात बहुजन समाज का वोट सिर्फ उसी को मिलेगा जो 'जिसकी जीतनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी'पर अपना चुनावी एजेंडा स्थिर करेगा।

    बहुजन बुद्धिजीवियों को न सिर्फ विषमता के खात्मे की आवाज बुलंद रखने बल्कि बहुजन नेतृत्व के पाला बदल से हताश –निराश शक्तिहीन मूलनिवासियों में उम्मीद की नई किरण पैदा करने के लिए भी नई जिम्मेवारी को वरण करना, इतिहास की मांग बन गई है। मेरा दृढ विश्वास है आप इतिहास की मांग को नज़रंदाज़ नहीं करेंगे। आइये हम फुले-शाहूजी-पेरियार-सर छोटूराम-आंबेडकर-कांशीराम-जगदेव प्रसाद-ललई सिंह यादव के अनुयायी एक बौद्धिक मोर्चा बनाकर अपने इन नायकों के सपनों के भारत निर्माण में योगदान कर अपना जीवन सार्थक बनायें।

    यदि आप इस निवेदन पर अपना आवश्यक कर्तव्य स्थिर करते हैं तो कृपया आगामी दो चार दिनों में मेरे निम्न इमेल और मोबाइल पर सूचना दें। ताकि इस पहल को आगे बढाया जा सके। मित्रों,आपसे यह भी आग्रह है की इस अपील को अधिक से अधिक लोगों तक फॉरवर्ड करें।

       (एच एल दुसाध, लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )

    About The Author

    एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के संयोजक हैं।



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    Nazrula Islam remains apolitical and Razzak mobilises political support

    Excalibur Stevens Biswas


    Retired IPS officer and a noted mainstream Bengali writer Nazrula Islam,best known for his fight against the Chief Minister while in service,has clarified that he is not interested in politics at the time and opted for apolitical mode to work as missionary for awakening and empowerment of the Mulnivasi communities ie SC,ST,OBC and minorities.Islam who has been working for the cause of minorities and SCs/STs, also admitted that he was approached by the Aam Aadmi Party to contest the upcoming Lok Sabha polls as its candidate.


    "My trouble with successive (state) governments has been because I never conceded to their whimsical orders. I always maintained that I was a public servant and not a domestic servant.


    "As regards the two governments, the Left Front being politically structured, corruption under it was controlled. But under the present regime, corruption now is uncontrollable," Islam told media during the launch of his books.


    Initially close to the Trinamool Congress supremo, Islam gradually drifted away after he alleged irregularities during Banerjee's tenure as the railways minister and drew the government's ire after he wrote books accusing her government of "exploiting and treating Muslims only as vote bank".


    Besides one of his earlier books `Muslimder ki karonya’ being almost  banned, Islam was also charge-sheeted by the government for violating service rules.


    Islam also said he will soon approach the Supreme Court after the Calcutta High Court recently quashed a Central Administrative Tribunal order which had quashed the appointments of five IPS officers of the state to the rank of director general of police including the existing state police chief G.M.P. Reddy.


    The CAT's order had come in a petition filed by Islam in which he had questioned the validity of the promotions of the five officers.


    On the other hand expelled CPIM leader Razzak Mollah landing in Delhi just before ANNA Mamata proposed rally engaged himself mobilizing political support for his Dalit Muslim alliance which may turn out to be  game changer beyond Bengal.The equation sounds something having multi dimensional implications as Islam also proposes to hold a meeting with expelled Communist Party of India-Marxist legislator Abdul Rezzak Mollah, who has launched a party to fight for the rights of Muslims and SCs/STs.


    "I have vowed to fight for the welfare of minorities, SCs and STs who have been historically deprived. But I am not in a hurry to join any political party," said Islam who said his fight was against the "upper class domination" in administration and government.


    The equation seems rather tricky as Razzak also clarified that he would not field any candidate against CPIM.Rather he branded ruling TMC as circus party.


    It clearly indicates that Nazrul plus Razzak factor would not go against the left.


    It should be a relief for the Marxist robbed of their traditional votebanks.


    Contending that his relations with successive governments in West Bengal soured because of his inability to bow to "whims" of the political masters, former IPS officer Nazrul Islam Monday hit out at the Mamata Banerjee government saying corruption under it was "uncontrolled".


    Islam, who retired as an additional director general of police Feb 28, also launched three of his books - one of which deals with the deprivation suffered by Muslims, Scheduled Castes (SCs) and Scheduled Tribes (STs) in Bengal while the other two political satires are seemingly aimed at Chief Minister Mamata Banerjee.



    Former IPS officer Nazrul Islam launched three books on Monday — 'Mulnibasi Istahar', 'Bhaontadir Bhanr Samuhahe' 'Ulangini Rani'. All the books criticised Bengal CM Mamata Banerjee.


    It must be noted most of Nazrula`s literary works have been highly applauded by booklovers as well as critics. The titles of his latest books indicate about the explosive content.


    It should also be reminded that he earlier exposed Mamata Bannerjee`s betrayal to Muslims as well as Dalits in his books respectively `Musalmander ki Karoniya’ and `Mulnivasider ki karoniya’.


    It needs to be clarified that the term  and concept `Mulnivasi’ is attributed to BAMCEF led by Waman Meshram which has opted for politics and BAMCEF transformed into Bahujan Mukti Party is the new player in the coming Loksabha elections. Bahujan Mukti Party has focused on UP, Maharashtra and Bengal.


    But Nazrula Islam has nothing to do with Bamcef or BMP. He has chosen quite an apolitical course for his mission of awakening and empowerment.


    Former IPS officer Nazrul Islam who has been approached by various political parties including AAP, today said he was in no hurry to join politics.


    "I was approached by the Aam Aadmi Party. I know how they work against corruption, but they too were not doing much for the backward class," Islam who retired recently told a press conference here.


    "I am in no hurry. First I will have to educate my people, create and awareness and after that, if they decide that we should form a political party, then only it will be decided," Islam said.


    Claiming that no development was done for the uplift of minorities in West Bengal whether by the earlier Left Frontgovernment or the present TrinamoolCongress regime, Islam said, "The so-called minority are the real majority and that organising them for another 'paribartan', will have to face a lot of oppression."


    Criticising Chief Minister Mamata Banerjee, he alleged that the TMC regime did not have any control over corruption as the party lacked structure and control over of its cadres.


    "The Left Front have a party structure and had control over its cadres. So corruption was also under their control. In the case of TMC there is no control (over cadres) and thus no control over corruption as well," Islam claimed.


    Meanwhile,Expelled CPI-M leader Abdur Rezzak Mollah Sunday said he was hopeful pro-Dalit outfits would join him.


    Mollah, an undefeated legislator since 1972, was expelled by the Communist Party of India-Marxist for "anti-party activities" days after he floated "Social Justice Forum" -- a pro-Dalit and minority outfit which he claimed would contest the 2016 West Bengal Assembly polls.


    "I was in Delhi for three days and held talks with several similar outfits. The talks have been fruitful and they have welcomed my decision to contest the polls," said Mollah after holding discussions with some pro-Dalit outfits in Delhi.


    He met representatives of Bahujan Mukti Party, Social Democratic Party of India and Welfare Party of India, among others.


    Mollah who has resolved to install a Dalit chief minister in West Bengal, said he would be going to Kerala soon to hold talks with parties which might extend support to him.


    "I have vowed to fight for the cause of Dalits and minorities and I will be visiting several places, including Kerala, to hold talks with organisations and parties which are endeavouring to bring in social justice in the country," he added.


    Times of India reports:

    It might be mentioned that Nazrula, 1981 batch IPS officer, had moved court against the Bengal government as he was not promoted to the post of DG. The Central Administrative Tribunal (CAT) had asked the Bengal government to set up a new screening committee and consider the appointment of Nazrul and had also asked five IPS officers who were promoted to the post of DGto vacate their posts.


    However, the Bengal government moved the high court and obtained a stay against the CAT order and later the high court quashed the order of the CAT. Nazrul retired from IPS service last Friday.


    In his three books he mentioned that the Mamata Banerjeegovernment, which came to power amid much fanfare, had not been able to deliver what it promised.


    The book 'Mulnibasi Istahar' speaks about the SC/ST/ OBC and the converted Muslims and how they had been deprived of the rights ensured by the Constitution.


    In his book 'Bhaontadir Bhanr Samuhahe' mentions how the leader is duping people by giving false promises. He has created a character Dr Bhaonta Banerjee who likes to be surrounded by jesters and rewards them. The former IPS officer also criticised the buffoons.


    In 'Ulangini Rani' he stated how the people go on fooling the queen, who is not wearing any clothes and the people around her praises about her dress. In this book, Nazrul mentions about chit fund scam in the state and those who were involved in the scam were offered high posts in the administration.


    The three books are major criticism of the Bengal CM with whom Nazrul once shared a good rapport even when she was not in power in Bengal and had worked under her as executive director of security in railway ministry, when she was the Union railway minister. After becoming the CM she brought him back to Kolkata and had offered the post of OSD in the CMO, but Nazrul did not join it and he was put on compulsory waiting.


    Expelled Dissident CPM leaders Abdur Rezzak Mollah and former MP Laxman Seth earlier  claimed the party has turned “incompetent and autocratic” and said the prevalent sycophancy culture will bring about its downfall.


    “When democracy eludes a party things like red-tapism, one-upmanship and dictatorship takes over. It is at that times that some buffoons call the shots in the party. But this system within the party can’t go on for an indefinite period. Just like the Communist Party in the former USSR, it will crumble down,” former Tamluk MP and Haldia strongman Laxman Seth said.


    He was speaking at a convention of Samajik Nyay Bichar Mancha, a forum set up by dissident CPM leader and former state minister Abdur Rezzak Mollah.


    Seth compared former chief minister Buddhadeb Bhattacharjee, without taking his name, to King Lear and said he is surrounded by sycophants.


    The former MP, who was removed from the party state committee as part of the CPM’s drive of purging it of tainted leaders, claimed the “present (state) leadership is authoritarian” and did not give him a chance to defend himself.


    “It is a step that is not permitted by even bourgeoisie parties. They (CPM) are bringing about their destruction,” Seth said, adding that he had no intention of leaving the party right now.


    Incidentally, soon after the CPM initiated an investigation into allegations of corruption and anti-party activities against Seth, he had sent a letter to the party leadership expressing a desire to quit from all posts and the party itself.


    Meanwhile, dissident MP Abdur Rezzak Mollah accused his party of doing little for the uplift of the minorities. “In 19 districts, there is no Muslim district committee secretary. Why should it happen? In Murshidabad, where Muslims form 67 per cent of the population, the district secretary is a Bhattacharya. Why not Moinul Hassan, (party leader from that district) be made the district secretary? The party has a lot to explain,” Mollah said.


    PTI reported him as announcing that Samajik Nyay Bichar Mancha would fight the 2016 Assembly polls in Bengal. He vowed to give the state its first Dalit chief minister and Muslim deputy chief minister.

    On the question whether he will quit CPM, he said, “Let them take action against me. Why shall I leave the party? It is an organisation as of now to battle for the oppressed.”

    Alleging that there was a lack of democracy in the CPM he said there was a need for “rectification in the party from the politburo to the state committee level”. “Then only you can carry on that process to local level. But how can you purify the Ganga, if the Gomukh, from where the river starts, becomes polluted,” Mollah said.



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    लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र का छद्म ही जी रहे हैं हम

    लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र का छद्म ही जी रहे हैं हम

    दो दलीय अमेरिका परस्त कॉरपोरेट बंदोबस्त अस्मिताओं का महाश्मशान!

    जिनके प्राण भँवर ईवीएममध्ये बसै, उनन से काहे को बदलाव की आस कीजै?

    पलाश विश्वास

    सुधा राजे ने लिखा है

     तुम्हें ज़िन्दग़ी बदलने के लिये पूँजी जमीन

    और कर्मचारी चाहिये

    मुझे समाज बदलने के लिये केवल अपने पर

    हमले से सुरक्षा और हर दिन मेरे हिस्से

    मेरा अपना कुछ समय और उस समय को मेरी अपनी मरज़ी से खर्च

    करने की मोहलत ।

    मोहन क्षोत्रिय ने लिखा है

    जैसे चूमती हैं बहनें

    अपने भाई को गाल पर

    वैसे ही चूमा था #राहुल को

    #बोंति ने…

    पर मारी गई वह

    उसके पति ने जला दिया उसे !

    क्या कहेंगे इस सज़ा को

    और सज़ा देने वाले के वहशीपन को?

    सत्ता का चुंबन बेहद आत्मघाती होता है। राहुल गांधी के गाल को चूमकर मारी गयी इस युवती ने दामोदर वैली परियोजना के उद्घाटन के मौके पर नेहरु को माला पहनाने वाली आदिवासी की नरक यंत्रणा बन गयी ज़िन्दगी की याद दिला रही है।

    अस्मिता के मुर्ग मुसल्लम के प्लेट बदल जाने से बहुत हाहाकार, त्राहि त्राहि है। राष्ट्र, समाज के बदलते चरित्र औरअर्थव्यवस्था की नब्ज से अनजान उत्पादन प्रणाली और श्रम सम्बंधों से बेदखल मुक्त बाजार के नागरिकों के लिए यह दिशाभ्रम का भयंकर माहौल है। लेकिन कॉरपोरेटराज के दो दलीय एकात्म बंदोबस्त में यह बेहद सामान्य सी बात है।

    भारतीय राजनीति की धुरियां मात्र दो हैं, कांग्रेस और भाजपा। लेकिन अमेरिका के डेमोक्रेट और रिपब्लिकन की तरह या ब्रिटेन की कंजरवेटिव और लेबर पार्टियों के तरह कांग्रेस और भाजपा में विचारधारा और चरित्र के स्तर पर कोई अन्तर नहीं है। आर्थिक नीतियों और राजकाज, नीति निर्धारण में कोई बुनियादी अन्तर नहीं है। संसदीय समन्वय और समरसता में जनविरोधी अश्वमेध में दोनों एकाकार है।

    दरअसल हम लोग लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र का छद्म ही जी रहे हैं लोकतांत्रिकता और संवाद लोक गणराज्य और उसकी नागरिकता का चरित्र है और इस मायने में हम सारे भारतीय जन सिरे से चरित्रहीन हैं।

    परिवार, निजी सम्बंधों, समाज, राजनीति और राष्ट्रव्यवस्था में सारा कुछ एकपक्षीय है सांस्कृतिक विविधता और वैचित्र्य के बावजूद। हम चरित्र से मूर्ति पूजक बुतपरस्त लोग हैं। हम राजनीति करते हैं तो दूल्हे के आगे पीछे बंदर करतब करते रहते हैं। साहित्य, कला और संस्कृति में सोंदर्यबोध का निर्मायक तत्व व्यक्तिवाद है, वंशवाद है, नस्लवाद है, जाति वर्चस्व है। हमारा इतिहास बोध व्यक्ति केंद्रित सन तारीख सीमाबद्ध है। जन गण के इतिहास में हमारी कोई दिलचस्पी है ही नहीं। हमारी आर्थिक समझ शेयर सूचकांक, आयकर दरों और लाभ हानि का अंकगणित है। उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था की संरचना को लेकर हम सोचते ही नहीं।

    हमारे बदलाव के ख्वाब भी देव देवी केन्द्रित है।

    दरअसल हम देव देवियों के ईश्वरत्व के लिए आपस में लड़ते लहूलुहान होते आत्मघाती खूंखार जानवरों की जमाते हैं, जिन पर संजोग से मनुष्य की खालें चढ़ गयी हैं। लेकिन दरअसल हम में मनुष्य का चरित्र है हीं नहीं। होता तो अमानुषों का अनुयायी होकर हम स्वयं को अमानुष साबित करने की भरसक कोशिश नहीं कर रहे होते। हमारी एकमात्र सशक्त अभिव्यक्ति अस्मिता केंद्रित सापेक्षिक व्यक्तिवाद है, जिसका स्थाई भाव धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद है।

    रंग बिरंगे धर्मोन्माद, चुनाव घोषणापत्रों, परस्पर विरोधी बयानों के घटाटोप को सिरे पर रख दे तो सब कुछ एक पक्षीय है। दूसरा पक्ष जो बहुसंख्य बहिष्कृत आम जनता का है, वे सिरे से गायब हैं। सारे लोग जाहिर है कि सत्ता पक्ष के रथी महारथी हैं और बाकी लोग पैदलसेनाएं, पार्टीबद्ध लोग चाहे कहीं हों वे अमेरिकी कॉरपोरेट साम्राज्यवादी सामंती वर्णवर्चस्वी नस्ली हितों के मुताबिक ही हैं।

    इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि राम विलास पासवान धर्मनिरपेक्षता का अवतार बन गये तो फिर हिंदुत्व में उनका कायाकल्प हो गया।

    इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि ययाति की तरह अनंत सत्तासुख के लिए रामराज उदित राज बनने के बाद "पुनर्मूषको भव"मानिंद रामराज हो गये।

    हमारा सरोकार कौन कहाँ गया, इससे कतई नहीं है।

    जो भी जहाँ गया, या जा रहा है, सत्तापक्ष में सत्ता की भागेदारी में गया है।

    हमारे मित्र एच. एल. दुसाध एकमात्र व्यक्ति हैं, जिन्होंने संजय पासवान मार्फत घोषित संघी आरक्षण समापन एजेंडा के खिलाफ बोले हैं। "हस्तक्षेप"में उनका लिखा लम्बा आलेख हमने ध्यान से पढ़ा है वे बेहद अच्छा लिखते हैं। उनके डायवर्सिटी सिद्धांतों से हम सहमत भी हैं। हम भी अवसरों और संसाधनों के न्यायपूर्ण बँटवारे के बिना सामाजिक न्याय और समता असम्भव मानते हैं।

    लेकिन अभिनव सिन्हा की परिभाषा के मुताबिक मुझे दुसाध जी के संवेदनाविस्फोट को भाववादी कहने में कोई परहेज नहीं है। माफ करेंगे दुसाध जी। हम वस्तुवादी तरीके से चीजों, परिस्थियों और समय की चीरफाड़ के बजाय वर्चस्ववादी आइकानिक समाज और अर्थव्यवस्था में चर्चित चेहरों को केंद्रित विमर्श में अपना दिमाग जाया कर रहे हैं।

    इसे ऐसे समझे कि भारतीय रंग-बिरंगे सेलिब्रेटी समाज में सहाराश्री कृष्णावतार है और सुप्रीम कोर्ट से निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के मामले में सहाराश्री की गिरफ्तारी के बाद उन सारे लोगों के आर्थिक हित और सुख सुविधाओं में व्यवधान आया है। ये सारे लोग सहाराश्री के पक्ष में कानून के राज के खिलाफ लामबंद हैं।

    वैसा ही राजनीति में हो रहा है, हमारे देवमंडल के सारे देव देवी अवतार के हित खतरे में हैं। राजनीतिक अनिश्चयता के कारण तो उनका पक्षांतर उनके अस्तित्व के लिए जायज हैं।

    वे आज तक जो कर रहे हैं, वहीं कर रहे हैं।

    हमारे हिसाब से दुसाध जी, आगामी लोकसभा चुनावों में तो क्या मौजूदा राज्य तंत्र में किसी भी चुनाव में बहुजनों की कोई भूमिका नहीं हो सकती।

    मसलन अखंड बंगाल, बंगाल और पूर्वी बंगाल के अलावा समूचे पूर्वोत्तर समेत असम, बिहार और झारखंड,ओडीशा का संयुक्त प्रांत था। जहाँ ईस्ट इंडिया कंपनी के सासन काल से ही लगातार साम्राज्यवाद विरोधी विद्रोह और किसान आंदोलन होते रहे हैं।

    आज आप जिस बहुजन समाज की बात करते हैं, वह उस बंगाल में बेहद ठोस आकार में था। आदिवासी, दलित, पिछड़े और मुसलमान जल जंगल जमीन की लड़ाई में एकाकार थे और सत्ता वर्ग के खिलाफ लड़ रहे थे।

    सन्यासी विद्रोह और नील विद्रोह के समय से इस बहुजन समाज की मुख्य मांग भूमि सुधार की थी।

    बाद में हरि गुरुचांद मतुआ आंदोलन से लेकर महाराष्ट्र के ज्योतिबा फूले और अय्यंकाली के आंदोलन का जो स्वरूप बना उसका मुख्य चरित्र इस बहुजन समाज का जगरण और सशक्तीकरण का था।

    आजादी से पहले बंगाल में जो दलित मुस्लिम गठबंधन बना, वह दरअसल प्रजाजनों का जमींदारों के खिलाफ एका था और इसकी नींव मजबूत उत्पादन और श्रम सम्बंध थे न कि अस्मिता, पहचान और जाति संप्रदाय का चुनावी रसायन।

    इसके विपरीत बंगाल में अब रज्जाक मोल्ला और नजरुल इस्लाम का जो दलित मुस्लिम गठबंधन आकार ले रहा है, वह मायावती की सोशल इंजीनियरिंग, लालू यादव और मुलायम के जाति अंकगणित की ही पुनरावृत्ति है जिसमें न अर्थ व्यवस्था की अभिव्यक्ति है और कहीं समाज है और न सत्तावर्ग के साम्राज्यवादी, सामंती, बाजारू नस्लवादी हितों के खिलाफ विद्रोह की जुर्रत और न राज्यतंत्र को बदलकर शोषणविहीन जातिविहीन वर्गविहीन समता सामाजिक न्याय आधारित समाज की स्थापना की कोई परिकल्पना है।

    आपको याद दिला दें कि अंबेडकरी आंदोलन और अंबेडकर की प्रासंगिकताखासतौर पर उनके जाति उन्मूलन के एजेंडे पर अभिनव सिन्हा और उनकी टीम की पहल पर हस्तक्षेप के जरिये पहले भी एक लम्बी बहस हो चुकी है।

    कायदे से यह उस बहस की दूसरी किश्त है। हम अभिनव के अनेक दलीलों के साथ असहम थे और हैं। लेकिन उन्होंने एक अनिवार्य पहल की है, जिसके लिए हम उनके आभारी हैं।

    हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जाति उन्मूलन की है न कि बदलते हुए कॉरपोरेट राज्यतंत्र के जनादेश निर्माण की जनसंहारी प्रस्तुति। हम मौजदूा चुनावी कुरुक्षेत्र में धर्म निरपेक्ष और सांप्रदायिकता का पक्ष विपक्ष नहीं मानते। यह तो डुप्लीकेट का राजनीतिक वर्जन है।

    पक्ष में जो है, वही तो विपक्ष में है।

    धर्मनिरपेक्षता का चेहरा राम विलास पासवान है तो बहुजन अस्मिता उदित राज है।

    दोनों पक्ष कॉरपोरेट हितों के माफिक हैं।

    दोनो पक्ष सांप्रदायिक हैं।

    घनघोर सांप्रदायिक।

    दोनों पक्ष जनसंहारी हैं।

    दोनों पक्ष अमेरिका परस्त हैं।

    दोनो पक्ष धर्मोन्मादी हैं।

    दोनों पक्ष उत्पादकों और श्रमिकों के खिलाफ हैं और बाजार के हक में हैं।

    दोनों पक्ष परमाणु ऊर्जा के पैरोकार हैं।

    दोनों पक्ष निजीकरण पीपीपी माडल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अबाध पूंजी प्रवाह विनिवेश निजीकरण बेदखली विस्थापन कॉरपोरेट विकास के पक्ष में हैं।

    इसीलिए जनसंहारी अश्वमेध केघोड़ों की अंधी दौड़ 1991 के बाद से अब तक रुकी ही नहीं है और न किसी जनादेश से रुकने वाली है।

    अल्पमत सरकारों और जाती हुई सरकारों की नीतियां रंगबिरंगी सरकारें और बदलती हुई संसद बार बार सर्वदलीय सहमति से लागू करती है।

    इसलिए इस राजनीतिक कारोबार से हमारा क्या लेना देना है, इसको समझ लीजिये।

    कोई भूख, बेरोजगारी, कुपोषण, स्त्री बाल अधिकारों, नागरिक व मानवाधिकारों, पर्यावरण, अशिक्षा जैसे मुद्दों पर, भूमि सुधार पर, जल जंगल जमीन के हक हकूक पर, कृषि संकट पर, उत्पादन प्रणाली पर, श्रमिकों की दशा पर, बंधुआ मजदूरी पर, नस्ली भोदभाव के तहत बहिष्कृत समुदायों और अस्पृश्य भूगोल के खिलाफ जारी निरंतर युद्ध और राष्ट्र के सैन्यीकरण कारपोरेटीकरण के खिलाफ चुनाव तो लड़ ही न रहा है।

    हमारी बला से कोई जीते या कोई हारे।

    इसी सिलसिले में आदरणीय राम पुनियानी का जाति उन्मूलन एजेंडे पर ताजा लेक हस्तक्षेप और अन्यत्र भी लग चुका है। जाति विमर्श पर समयांतर का पूरा एक अंक निकल चुका है। आनंद तेलतुंबड़े का आलेख वहां पहला लेख है।

    जाति के विरुद्ध हर आदमी है। हर औरत है। फिर भी जाति का अन्त नहीं है। रक्तबीज की तरह जाति का अभिशाप भारतीय समाज, राष्ट्र, राजकाज समूची व्यवस्था, मनुष्यता और प्रकृति को संक्रमित है। तो हमें उन बुनियादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा जिस वजह से जाति है।

    इस बहस से मलाईदार तबके को सबसे ज्यादा खतरा है। वह यह बहस शुरु ही होने नहीं देता।

    भारतीय बहुजन समाज औपनिवेशिक शासन के खिलाफ निरंतर क्लांतिहीन युद्ध में शामिल होता रहा है और उसने सत्ता वर्ग से समझौता कभी कभी नहीं किया है।इतिहास की वस्तुगत व्याख्या में इसके साक्ष्य सिलसिलेवार हैं।

    लेकिन वही बहुजन समाज आज खंड विखंड क्यों है ?

    क्यों जातियां और अस्मिताएं एक दूसरे कि खिलाफ लामबंद हैं ?

    क्यों संवाद के सारे दरवाजे बंद हैं ?

    क्यों किसी को कोई दस्तक सुनायी ही नहीं पड़ती ?

    क्यों बहुजन समाज सत्ता वर्ग का अंग बना हुआ है ?

    क्यों सत्ता जूठन की लड़ाई में कुकुरों की तरह लड़ रहे हैं ब्रांडेड बहुजन देव देवी, तमाम अस्मिताओं के क्षत्रप।

    ये आत्मालोचना का संवेदनशील समय है।

    यक्षप्रश्नों का संधिक्षण है।

    हमें सोचना होगा कि अंबेडकर को ईश्वर बनाकर हम उनकी विचारधारा और आंदोलन को कहां छोड़ आये हैं।

    हमें अंबेडकर की प्रासंगिकता पर भी निर्मम तरीके से संवाद करना होगा।

    संविधान में वे कौन से तत्व हैं, जिनके अन्तर्विरोधों की वजह से सत्ता वर्ग को संविधान और कानून की हत्या की निरंकुश छूट मिल जाती है, इस पर भी वस्तुनिष्ठ ढंग से सोचना होगा।

    अगर वास्तव मे कोई शुद्ध अशुद्ध स्थल हैं ही नहीं, शुद्ध-अशुद्ध रक्त है ही नहीं, पवित्र अपवित्र चीजें हैं ही नहीं, तो हमें वक्त की नजाकत के मुताबिक अंबेडकर, उनके जाति उन्मूलन के एजेंडे और उनके मसविदे पर बने भारतीय संविधान पर भी आलोचनात्मक विवेचना करने से किसने रोका है।

    अंध भक्ति आत्महत्या समान है।

    अस्मिता और अस्मिता भाषा के ऊपर उठकर मनुष्यता और प्रकृति के पक्ष में खड़े हो जाये हम तभी जनपक्षधर हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।

    हमने हस्तक्षेप पर ही निवेदन किया था कि आनंद तेलतुंबड़े जाति उन्मूलन पर अपना पक्ष बतायें। उन्होंने अंग्रेजी में निजीकरण उदारीकरण ग्लोबीकरण के राज में बेमतलब हो गये आरक्षण के खेल को खोलते हुए नोट भेजा है और साफ-साफ बताया है कि जाति व्यवस्था को बनाये रखकर जाति वर्चस्व को बनाये रखने में ही आरक्षण की राजनीति है, जबकि जमीन पर आरक्षण का कोई वजूद है ही नहीं।

    गौर करें कि इससे पहले हमने लिखा हैः

    नरेंद्र मोदी ने कहा है कि देश में कानून बहुत ज्यादा हैं और ऐसा लगता है कि सरकार व्यापारियों को चोर समझती है। उन्होंने हर हफ्ते एक कानून बदल देने का वायदा किया है। कानून बदलने को अब रह ही क्या गया है, यह समझने वाली बात है। मुक्त बाजार के हक में सन 1991 से अल्पमत सरकारे जनादेश की धज्जियां उड़ाते हुए लोकगणराज्य और संविधान की हत्या के मकसद से तमाम कानून बदल बिगाड़ चुके हैं। मोदी दरअसल जो कहना चाहते हैं, उसका तात्पर्य यही है कि हिंदू राष्ट्र के मुताबिक देश का संवैधानिक ढांचा ही तोड़ दिया जायेगा।

    मसलन डा.अमर्त्य सेन के सुर से सुर मिलाकर तमाम बहुजन चिंतक बुद्धिजीवी की आस्था मुक्त बाजार और कॉरपोरेट राज में है। लेकिन ये तमाम लोग अपना अंतिम लक्ष्य सामाजिक न्याय बताते अघाते नहीं है। कॉरपोरेट राज के मौसम के मुताबिक ऐसे तमाम मुर्ग मुसल्लम सत्ता प्लेट में सज जाते हैं। जबकि बाबासाहेब अंबेडकर ने जो संवैधानिक प्रावधान किये, वे सारे के सारे मुक्त बाजार के खिलाफ हैं। वे संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की बात करते थे, जबकि मुक्त बाजार एकतरफा निजीकरण है। वे निःशुल्क शिक्षा के प्रावधान कर गये लेकिन उदारीकृत अमेरिकी मुक्त बाजार में देश अब नालेज इकोनामी है। संविधान की पांचवीं छठीं अनुसूचियों के तमाम प्रावधान जल जंगल जमीन के हक हूक के पक्ष में हैं, जो लागू ही नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि जमीन जिसकी संसाधन उसी का, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए अविराम बेदखली का सलवा जुड़ूम जारी है। स्वायत्तता भारतीय संविधान के संघीय ढांचे का बुनियादी सिद्धांत है, जबकि कश्मीर और समूचे पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत बाबासाहेब के अवसान के बाद 1958 से लगातार भारतीय नागरिकों के खिलाफ आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा की पवित्र अंध राष्ट्रवादी चुनौतियों के तहत युद्ध जारी है।

    अंबेडकर अनुयायी सर्वदलीय सहमति से इस अंबेडकर हत्या में निरंतर शामिल रहे हैं। अब कौन दुकानदार कहां अपनी दुकान चलायेगा, इससे बहुजनों की किस्मत नहीं बदलने वाली है। लेकिन बहुजन ऐसे ही दुकानदार के मार्फत धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की पैदल सेनाएं हैं।

    मोदी व्यापारियों के हक हकूक में कानून बदलने का वादा कर रहे हैं और उसी सांस में व्यापारियों को वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए भी तैयार कर रहे हैं। असली पेंच दरअसल यही है। कारोबार और उद्योग में अबाध एकाधिकारवादी कालाधन वर्चस्व और विदेशी आवारा पूंजी प्रवाह तैयार करने का यह चुनाव घोषणापत्र अदृश्य है।

    हमारे युवा साथी अभिषेक श्रीवास्तव ने अमेरिकी सर्वेक्षणों और आंकड़ों की पोल खोल दी है। हम उसकी पुनरावृत्ति नहीं करना चाहते। लेकिन जैसा कि हम लगातार लिखते रहे हैं कि भारत अमेरिकी परमाणु संधि का कार्यान्वयन न कर पाने की वजह अमेरिका अपने पुरातन कॉरपोरेट कारिंदों की सेवा समाप्त करने पर तुला है। अमेरिका को शिकायत है कि इस संधि के मुताबिक तमाम आर्थिक क्षेत्रों में अमेरिकी बाजार अभी खुला नहीं है और न ही अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था संकट से उबर सकी है।

    इसके अलावा खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर अमेरिकी जोर है, जिसका विरोध करने की वजह से कॉरपोरेट मीडिया आप के सफाये के चाकचौबंद इंतजाम में लगा है। खुदरा बाजार में एफडीआई को हरी झंडी का पक्का इंतजाम किये बिना मोदी को अमेरिकी समर्थन मिलना असंभव है। अब समझ लीजिये कि छोटी और मंझोली पूंजी, खुदरा कारोबार में शामिल तमाम वर्गों के लोगों का हाल वही होने वाला है जो देश के किसानों, मजदूरों और अस्पृश्य नस्लों और समुदायों का हुआ है, जो उत्पादन प्रणाली, उत्पादन सम्बंधों और श्रम सम्बंधों का हुआ है।

    तमाम दलित व पिछड़े मसीहा, आत्मसम्मान के झंडेवरदार डूबते जहाज छोड़कर भागते चूहों की तरह केशरिया बनकर कहीं भी छलांग लगाने को तैयार हैं। कहा जा रहा है कि दस साल से जो काम कांग्रेस ने पूरा न किया, वह नमोमय भारत में जादू की छड़ी घुमाने से पूरा हो जायेगा। बंगाल के बारासात से विश्वविख्यात जादूगर जूनियर को टिकट दिया गया है और शायद उनका जादू अब बहुजनों के काम आये।

    इसी बीच संजय पासवान के मार्फत भाजपा ने हिंदुत्व ध्रुवीकरण के मकसद से आर्थिक आरक्षण का शगूफा भी छोड़ दिया है लेकिन किसी प्रजाति के बहुजन की कोई आपत्ति इस सिलसिले में दर्ज हुई हो ऐसी हमें खबर है नहीं। आपको हो तो हमें दुरुस्त करें।

    इसी बीच कोलकाता जनसत्ता के संपादक शंभूनाथ शुक्ल ने खुलासा किया हैः

    एक वामपंथी संपादक ने मुझसे कहा कि गरीब तो ब्राह्मण ही होता है। हम सदियों से यही पढ़ते आए हैं कि एक गरीब ब्राह्मण था। हम गरीब तो हैं ही साथ में अब लतियाए भी जा रहे हैं। उन दिनों दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में लोग जातियों में बटे हुए थे बजाय यह सोचे कि ओबीसी को आरक्षण देने का मतलब अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण है न कि अन्य पिछड़ी जातियों को। मंडल आयोग ने अपनी अनुशंसा में लिखा था कि वे वर्ग और जातियां इस आरक्षण की हकदार हैं जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ गई हैं। मगर खुद पिछड़ी जातियों ने यह सच्चाई छिपा ली और इसे पिछड़ा बनाम अगड़ा बनाकर अपनी पुश्तैनी लड़ाई का हिसाब बराबर करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि इस मंडल आयोग ने तमाम ब्राह्मण और ठाकुर व बनिया कही जाने वाली जातियों को भी आरक्षण का फायदा दिया था। पर जरा सी नासमझी और मीडिया, कांग्रेस और भाजपा तथा वामपंथियों व खुद सत्तारूढ़ जनता दल के वीपी सिंह विरोधी और अति उत्साही नेताओं, मंत्रियों द्वारा भड़काए जाने के कारण उस राजीव गोस्वामी ने भी मंडल की सिफारिशें मान लिए जाने के विरोध में आत्मदाह करने का प्रयास किया जो ब्राह्मणों की आरक्षित जाति में से था। और बाद में उसे इसका लाभ भी मिला।

     यह खुलासा बेहद मह्त्वपूर्ण है।

    अब हमें 1991 में मनमोहन अवतार से पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर सरकारों के दौरान हुई राजनीति का सिलसिलेवार विश्लेषण करना होगा कि कैसे वीपी सिंह मंडल ब्रहास्त्र का इस्तेमाल करते हुए अपने राजनीति खेल को नियंत्रित नहीं रख सकें।

    हमने 1990 के मध्यावधि चुनावों के दौरान बरेली में दो बार वीपी से लंबी बातचीत की जो तब दैनिक अमरउजाला में छपा भी। लेकिन वीपी इसे मिशन ही बताते रहे। जबकि आनंद तेलतुंबड़े ने जाति अस्मिता को राजनीतिक औजार बनाने का टर्रनिंग प्वायंट मानते हैं इसे। तबसे आत्मघाती अस्मिता राजनीति बेलगाम है और तभी से मुक्त बाजार का शुभारंभ हो गया। जब लंदन में वीपी अपना इलाज करा रहे थे, तब भी मंडल प्रसंग में आनंद तेलतुंबड़े की उनसे खुली बात हुई थी। बेहतर हो कि आनंद यह किस्सा खुद खोलें।

    हम इस मुद्दे पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।

    फिलहाल यह समझ लें कि संघपरिवार ने सवर्णों के पिछड़े समुदायों को आरक्षण भी मंजूर नहीं किया और पूरे देश को खूनी युद्धस्थल में बदलने के लिए कमंडल शुरु किया।

    आनंद से आज हमारी इस सिलसिले में विस्तार से बात हुई तो उन्होंने बताया कि अनुसूचित जातियों के अलावा जाति आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। ओबीसी का मतलब अन्य पिछड़ी जातिया नहीं, अदर बैकवर्ड कम्युनिटीज है, यानी अन्य पिछड़ा वर्ग।

    पिछड़े वर्गों के हितों के विरुद्ध इतनी भयानक राजनीतिक खेल करने वाला संघ परिवार बहुजनों और देस के बहुसंख्य जनगण के हितों के मुताबिक अब क्या क्या करता है, देखना बाकी है।

    मुक्त बाजार को स्वर्ण काल मानने और ग्लोबकरण को मुक्ति की राह बताने वालों के विपरीत आनंद तेलतुंबड़े का कहना है कि बाजार में खरीददारी की शक्ति के बजाय गर्भावस्था से ही बहुजनों के बच्चों की निःशुल्क क्वालिटी शिक्षा का इंतजाम हो जाये तो बहुजनों के उत्थान के लिए और कुछ नहीं चाहिए।

    हमारे डायवर्सिटी मित्र तमाम समस्याओं के समाधान के लिए संसाधनों और अवसरों का अंबेडकरी सिद्धांत के मुताबिक न्यायपूर्ण बंटवारे को अनिवार्य मानते हैं। हम उनसे सहमत है। संजोग से दुसाध एकमात्र बहुजन बुद्धिजीवी है जिन्होंने आर्थिक आरक्षण के संघी एजेंडे को दुर्भाग्यपूर्ण माना है।

    हम लेकिन कॉरपोरेट राज और मुक्त बाजार दोनों के खिलाफ जाति उन्मूलन के एजेंडे के प्रस्थान बिंदु मान रहे हैं।

    अनेक साथी बिना मतामत दिये फेसबुक और नाना माध्यम से इस बहस को बेमतलब बताते हुए गाली गलौज पर उतारू हैं। हम उनके आभारी हैं और मानते हैं कि गाली गलौज उनकी अभिव्यक्ति का कारगर माध्यम हो सकता है।

    हमें तो उन लोगों पर तरस आता है जो सन्नाटा बुनते रहने के विशेषज्ञ है।

    कवि मदन कश्यप के शब्दों में यह दूर तक चुप्पी सबसे ज्यादा खतरनाक है। ख्वाबों की मौत से भी ज्यादा खतरनाक।

    About The Author

    पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।