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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    लेकिन पता नहीं बिरसा के आदिवासी दर्शन से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है?

    भारतीय संसद में अंबेडकर के समर्थन में आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा के मूलनिवासी होने का दावा हम न जाति विमर्श में न वर्ग संवाद में समझ सकते हैं।


    पलाश विश्वास

    आदिवासियों का साम्राज्यवाद के विरुद्ध,सामंतवाद के विरुद्ध महासंग्राम हमारे इतिहास के सबसे उज्ज्वल अध्याय हैं,जिनसे न जुड़ पाने की वजह से मुक्त बाजार में हम आज इतने असहाय हैं।


    भारतीय संसद में अंबेडकर के समर्थन में आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा के मूलनिवासी होने का दावा हम न जाति विमर्श में न वर्ग संवाद में समझ सकते हैं।


    मुक्त बाजार के परिदृश्य में पूंजी समर्थक विचारधारा,संगठन,समाज और संसकृति का ही विकास संभव है।अबाध आवारा पूंजी के हितों के माफिक है हिंदुत्व का यह पुनरुत्थान।


    जबकि इसके मुकाबले सिरे से विचारधाराएं और आंदोलन अदृश्य है।


    बंगाल में वाम अवसान के बाद ही केसरिया ताज महल की नींव बनने लगी है।जबकि हिंदू महासभा की राजनीति का गढ़ अखंड बंगाल था।भारतीय जनसंघ की स्थापना भी बंगाल के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही की थी।


    लेकिन वाम विचारधारा और आंदोलन की वजह से बंगाल की जमीन पर 1977 से लेकर ममता बनर्जी के उत्थान के दरम्यान हिंदुत्व की खेती नहीं हो सकी।


    विचारधारा का मुकाबला विचारधारा से ही संभव है।


    संगठन का मुकाबला संगठन से ही संभव है।


    राज्यतंत्र की समझ के बिना सामाजिक यथार्थ की दृष्टि से रचनाकर्म करना असंभव है तो इतिहासबोध से लैस वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित सौंदर्यबोध के बिना किसी भी तरह का मूल्यांकन नाजायज है।




    राज्यतंत्र की समझ के बिना सामाजिक यथार्थ की दृष्टि के बिना व्यवस्था के खिलाफ हर लड़ाई विचलन के लिए अभिशप्त है।


    व्यक्ति को न विचारधारा के खिलाफ और न संगठन के खिलाफ कोई हथियार बनाया जा सकता है। आदिक्रांति के जनक स्पार्टकस और गौतम बुद्ध भी संस्थागत संगठन और आंदोलन के जरिये गुलामी के तंत्र को तोड़ने में कामयाब हुए,व्यक्तिगत करिश्मे की वजह से नहीं।


    तंत्र के खिलाफ सुनियोजित संगठनात्मक संस्थागत जनांदोलन की जमीन तैयार किये बिना किसी मसीहा की जादू की छड़ी या करिश्माई मंत्र से व्यवस्था परिवर्तन की दिशा का निर्माण नहीं कर सकते।


    तिलिस्म जो बन गया है,उसे तोड़े बिना दिशाएं गायब ही रहेंगी और इस रात की सुबह असंभव है।


    जिस मंडल क्रांति के गर्भ से कमंडल का जन्म हुआ, उसमें पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था ही नहीं थी।मंडल के तहत आरक्षण पिछड़े वर्गों के लिए है। पिछड़े वर्गं में अल्पसंख्यक और सवर्ण दोनों शामिल हैं।


    लेकिन राजनीति ने अदर बैकवर्ड कम्युनिटीज को अदर बैकवर्ड कास्च बनाकर देश में हिंदुत्व का पुनरूत्थान रच दिया।


    इसी तरह अंबेडकर की लड़ाई अस्पृश्यता के विरुद्ध थी। सामाजिक न्याय और समता के लिए उनकी लड़ाई थी।लेकिन वे अपने को वर्किंग क्लास का नेता कहते थे।


    अपने समूचे लेखन में उन्होंने सिर्फ जाति उन्मूलन की बात की है,जाति पहचान की बात कभी नहीं की।


    उन्होंने शिड्युल्ड कास्ट एसोसिएशन के जरिये कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीति से इतर मूक बहुसंख्यजनता को अलग पहचान दी लेकिन वे तब भी डिप्रेस्ड क्लास की ही बात कर रहे थे।


    अंबेडकर का सारा जीवन जाति के अंत के लक्ष्य को समर्पित था।जब उन्हें हिंदू धर्म में ऐसा असंभव लगा तो उन्होंने धर्मान्तरण के लिए जाति व्यवस्था के हिंदुत्व को तिलांजलि दे दी।


    But the world owes much to rebels who would dare to argue in the face of the pontiff and insist that he is not infallible.


    -Babasaheb Ambedkar


    In the fight for Swaraj you fight with the whole nation on your side...[but to annihilate the caste], you have to fight against the whole nation—and that too, your own. But it is more important than Swaraj. There is no use having Swaraj, if you cannot defend it. More important than the question of defending Swaraj is the question of defending the Hindus under the Swaraj. In my opinion, it is only when Hindu Society becomes a casteless society that it can hope to have strength enough to defend itself. Without such internal strength, Swaraj for Hindus may turn out to be only a step towards slavery. Good-bye, and good wishes for your success.


    -B.R. Ambedkar


    अंबेडकर के इस वक्तव्य में साफ जाहिर है कि अगर भारत में स्वराज कायम करना है तोजाति विहीन हिंदू समाज की स्थापना के बिना ऐसा असंभव है।


    आज जाति वर्चस्व का जो आलम है,उसका तार्किक परिणाम ही हिंदू राष्ट्र है।


    भारत राष्ट्र इस अमोघ नियति का शिकार इसलिए हो रहा है क्योंकि 15 अगस्त, 1947 से भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर कदम जाति को मजबूत बनाता रहा है।


    विडंबना तो यह है हजारों साल से जो जाति बहिस्कृत समुदायों को गुलाम बनाये रखने में कामयाब है,उस गुलामी का सिलसिला तोड़ने के लिए अपने आवार मसीहा संप्रदाय की अगुवाई में आजादी के ख्वाहिश में अंबेडकर के नाम उसी जाति को अपना वजूद मानकर सामाजिक न्याय और समता का अभियान चला रहे हैं लोग।


    मुंबई में आज हरिचांद ठाकुर का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है,जो नील विद्रोह के नेता थे और जाति अस्मिता के बिना वर्चस्ववादी ब्राह्मणधर्म को तोड़ने के लिए जिन्होंने मतुआ आंदोलन को जन्म दिया।


    उनका मुख्य नारा भूमि सुधार था,जो आदिवासी और किसान विद्रोहों की विरासत के ही मुताबिक था।


    हरिचांद ठाकुर की लड़ाई अस्मिता की लड़ाई नहीं थी और न महात्मा ज्योतिबा फूले की।वे राजनीति नहीं कर रहे थे और न सत्ता समीकरण के मुताबिक मौसम बेमौसम रंग बदलने वाले गिरगिट थे वे।


    हरिचांद ठाकुर और ज्यतिबा फूले दोनों बहुसंख्य जनता के सशक्तीकरण के लिए शिक्षा आंदोलन चला रहे थे।


    संजोग से बंगाल में जो प्रगतिशील आंदोलन नवजागरण मार्फत शुरु हुआ,वह भी ईश्वरचंद्र विद्यासागर के शिक्षा आंदोलन से प्रारंभ हुआ।


    औपनिवेशिक शासन और सामंतवाद से लड़ने के लिए अस्मिता राजनीति के बजाय भारतीय जन गण के लगभग अपढ़ और पढ़े लिखे भी,पुरखों ने अस्मिताओं की बजाय कमजोर तबकों,पिछड़ों,अस्पृश्यों के सशक्तीकरण का आंदोलन चलाया।


    अय्यंकाली का केरल में कृषि समाज को एकजुट करके चलाया गया कृषि हड़ताल की तो दूसरी कोई नजीर भी नहीं है।


    चुआड़ विद्रोह के बारे में लिखा बहुत कम उपलब्ध है।इस पर गौरीपद चटर्जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक मिदनापुरःफोररनर्स आफ इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल है।हमने नंदीग्राम सििंगुर जनविद्रोह के दौरान 2007 में कुछ दस्तावेज डेनिश नार्वे डच आर्काइव से निकालकर अपने ब्लागों पर कुछ लेख लिखे थे। तब जिस प्लेटफार्म में ब्लागिंग हती थी,वह अब हैं ही नहीं,वे दस्तावेज हासिल नहीं कर सकते।नये सिरे से खोज करनी होगी।लेकिन आप चाहे तो इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।इसका लिंक इस प्रकार हैः

    http://books.google.co.in/books?id=75-a8FSPmvQC&pg=PA6&lpg=PA6&dq=First+Chuar+Rebellion+(1767.)&source=bl&ots=rEFYEp4Gz5&sig=ALlEcA2uUT823OsrvqBqAgohVng&hl=en&sa=X&ei=QwQiU6bqJ4aYrgfG8IDIDg&ved=0CCgQ6AEwAA#v=onepage&q=First%20Chuar%20Rebellion%20(1767.)&f=false


    चुआड़ विद्रोह शामिल लोग सभी जातियों और धर्मों के भारतीयराजे रजवाड़े महाराष्ट्र से लेकर पूर्वी बंगाल,असम, मध्यभारत, आंध्र बिहार,झारखंड और ओड़ीशा तक ईस्टइंडिया कंपनी के खिलाप लड़ रहे थे।


    खासकर बंगाल,ओड़ीशा,झारखंड और बिहार में तो चुआड़ विद्रोह ने ईस्टइंडिया कंपनी की नाक में दम कर दिया था।


    इन बागियों को चोर चूहाड़ अपराधी बताकर और उनके विद्रोह को चुआड़ यानी चूहाड़ विद्रोह बताकर बेररहमी से दबाया गया।बागियों के थोक दरों पर सूली पर चढ़ा दिया गया।फांसी पर लटकाया गया। लेकिन भारतीय इतिहास में इस विद्रोह की कोई चर्चा ही नहीं है।


    Warren Hastings failed to quell the Chuar uprisings. The district administrator to Bankura wrote in his diary in 1787 that the Chuar revolt was so widespread and fierce that temporarily, the Company's rule had vanished from the district of Bankura. Finally in 1799 the Governor General, Wellesley crushed these uprisings by a pincer attack. An area near Salboni in Midnapore district, in whose mango grove many rebels were hung from trees by the British, is still known by local villagers as "the heath of the hanging upland", Phansi Dangar Math. Some years later under the leadership of Jagabandhu the paymaster or Bakshi (of the infantry of the Puri Raja), there was the well-known widespread Paik or retainer uprising in Orissa. In 1793 the Governor General Cornwallis initiated in the entire Presidency of Bengal a new form of Permanent Settlement of revenue to loyal landlords. This led to misfortunes for the toiling peasantry: in time they would protest against this as well.


    आदिवासी विद्रोहों को आदरणीया महाश्वेता देवी ने कथा साहित्य का विषय बना दिया।उनका अरण्येर अधिकार उपन्यास कम दस्तावेज ज्यादा है। वरना हिंदी और बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं के लोग वीरसा मुंडा के बारे में वैसे ही अनजान होते जितने सिधो कान्हों, टांट्या भील,तीतूमीर के बारे में।


    हमारा जो मुख्य मुद्दा है वह यह है कि आजादी के बाद तक तेभागा और खाद्य आंदोलन और यहां तक कि नक्सलबाड़ी जनविद्रोह में जो समूचा कृषि समाज संघठित प्रतिरोध संघर्ष में एकताबद्ध रहा,वह पराधीन भारत में किसानों और आदिवासियों का सम्मिलित कृषि समाज रहा है,जिसमें शूद्रों और अछूतों और मुसलमानों की नेतृत्वकारी विरासत थी,उसे हम कहां छोड़ आये।


    वह दरअसल छूटा नहीं,अस्मिता जाति पहचान वर्ग विमर्श के घटाटोप में बिखरता चला गया और हमें इसका होश ही नहीं रहा।


    सरेराह चलते चलते धोती लंगोट उतर गयी,हमें पता ही न चला।


    आज हिंदुत्व पुनरुत्थान के इस मुक्तबाजारी जायनवादी समय में हमें अगर मुकाबले में कहीं खड़ा होना है,तो अपनी उस गौरवशाली विरासत में प्रतिरोध की जमीन खोजनी होगी।


    चूहों की मातबरी में कम से कम  परिवर्तन या क्रांति असंभव है,इस बुनियादी तथ्य को दिमाग में तौल लें और फिर मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और उसके मद्देनजर अपनी भूमिका तय करें,तभी हम कुछ कर सकते हैं।


    आम लोगों को सत्ता,राजनीति,राष्ट्र,समाज और अर्थव्यव्स्था में हो रहे बदलाव के बारे में सही सही सूचना ही नहीं हो पाती।इसलिए वे भाव वादी तरीके से सोच रहे होते हैं।


    जैसे अभिनव सिन्हा की टीम ने एक बड़ी पहल की जाति विमर्श को फोकस करने के सिलसिले में। लेकिन जिस तबके को संबोधित किया जाना है,उनकी मानसिक तैयारी के बारे में उन्होंने सोचा ही नहीं।


    यह ऐसा ही है कि जैसे किसी सर्जन ने मरीज को आपरेशन थियेटर में ले जाकर जीवनदायी प्रणालियों को एक्टिवेट किये बिना ,एनेस्थेशिया दिये बिना सीधे दिमाग की चीरफाड़ शुरु कर दी हो।


    ऐसे चिकित्सकों की इन दिनों बेहद भरमार है।


    जाति पहचान के जरिये सशक्तीकरण के फायदे पाने वाली जातियों के नाम गिना दीजिये तो बाकी छह हजार जातियों की जाति अंधता का औचित्य पानी की कतरह सरल हो जायेगा।


    हमारे हिसाब से तो भ्रष्टाचार की जड़ है यह जाति व्यवस्था और उसकी विशुद्धता का सिद्धांत।वर्णवर्चस्वी इंतजामात में भ्रष्टाचार का कारखाना है और ऴंशवादी वायरल से बचता वनहीं कोई छोटा या बड़ा। जाति और विवाह के जटिल प्रबंधकीय खर्च के लिए ही बेहिसाब अकूत संपत्ति अर्जित करने की जरुरत होती है।


    बंगाल में 35 साल के वाम शासन से और जो हुआ हो,उससे इतना तो जरुर हुआ है कि वैवाहिक संबंधों में जाति धर्म या भाषा का टंटा खत्म है और दहेज न होने की वजह से सार्वजनिक जीवन में तमाम समस्याओं और आर्थिक बदहाली के बावजूद लोग तनावरहित आनंद में हैं।


    जहां जाति का बवंडर ज्यादा है,वहां अंधाधुंध कमाने की गरज बाकायदा कन्यादायी पिता की असहाय मजबूरी है।उत्तर भारतीय परिवार और समाज में ज्यादा घना इस जाति घनघटाों की वजह से ही हैं।


    और समझ लीजिये कि आपकी पहचान का फायदा उठाकर कैसे कैसे लोग आपके मत्थे पर बैछकर हग मूत रहे हैं और आप तनिक चूम करें कि चूतड़ पर डंडे बरसने लगे।


    जाति राजनीति की वजह से आप प्लेटो में परोसे जाने वाले मुर्ग मुसल्लम को रहमोकरम पर हैं।


    आप जाति उन्मूलन कर दीजिये।विवाह संबंधों को खुल्ला कर दीजिये,भ्रष्टाचार की सामाजिक जड़ें खत्म हो जायेंगी।


    आदरणीय एके पंकज ने जो सवाल किया है,उसके जवाब में हमारे प्रगतिशील पाखंड का भंडा फूट जाता है और बदलाव मुहिम की कलई भी खुल जाती है।आखिर ऐसा क्यों होता है कि हम बिरसा को सुनते हुए भगत सिंह से मिलने लगते हैं और भगत सिंह के बाद अगली मुलाकात चे से होती है, फिर उत्सुकता से भगत सिंह और चे दोनों बिरसा के उलगुलान की कहानी सुनकर एक ही साथ बोल पड़ते हैं 'इंकलाब-जिंदाबाद!'इसी के साथ अम्बेडकर भी सॉलिडारिटी में आ खड़े होते हैं, लेकिन पता नहीं बिरसा के आदिवासी दर्शन से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है?

    आपके पास इस यक्ष प्रश्न का कोई जवाब हो तो जरुर दें।डरें नहीं, गलत जवाब पर आपका सर नहीं फूटने वाला है क्योंकि राजा विक्रमादित्य के साथ ही वेताल का भी अवसान हो गया है।

    आदरणीय हिमांशु कुमार जी ने जो लिखा है,एकदम सही लिखा है।

    आज़ाद भारत में सोनी सोरी ,अपर्णा मरांडी , दयामनी बारला ,आरती मांझी ही क्यों जेल में डाली जा रही हैं .


    आखिर आदिवासी औरतें ही भारतीय राष्ट्र की शत्रु क्यों मानी जा रही हैं ?


    ये कैसा समाज है ,ये कैसा विकास है , ये कैसी राजनीति है ?


    दिक्कत की बात यह है कि कमोबश यह सब हमें स्वीकार भी है . (4 photos)PhotoPhotoPhoto

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    Tribal and Agrarian movement for land rights in context to united Bengal, Bihar, Orissa
    **http://ashim22.tripod.com/id19.html

            Social movements are generally conceived as the manifestation of collective behavior.
            The study of this historicity of the social movements is extremely important in order to have an insight into the present structural arrangements of it as well as its future orientations.
            "the tribal communities who with a sensitivity born of isolation and with a relatively intact mechanism of social control revolted more often and far more violently than any other community including peasants of India.''
            British colonialism made a very excellent use of this situation and added some more dimensions in it. Through the enactment of the Permanent Settlement Regulations Act in 1793 it introduced the concept of private property in land which was unknown in Indian history. As a result of this most of the erstwhile adivasi rajas or chieftains were converted into zamindars or landlords and the common peasants were transformed into serfs or rayats. Instead of payment of nominal subscription to the Mughal emperors, British rule made the payment of land revenue a compulsion. The responsibility of revenue collection was vested with the zamindars. The burden of this proved to be enormous for the peasants and a large number of them were forced to sell their lands, only to become landless labourers. The moneylenders, liquor vendors and other people from outside the region exploited this situation Hence a new class of absentee landlords was also created.
            The land question here requires some more attention. The adivasis of this region conceived of themselves as natural owners of the land, which they have reclaimed by extensive labour. Moreover, land and the forest were not merely viewed as means of production in their custom. They were rather, culturally and religiously, associated with the land and forest. So, they could hardly tolerate their alienation from the land and the forest as created by the British agrarian policies.
    Phase of Agrarian Movement (1765 -1845)
            "True agrarian movements have arisen whenever urban interests have encroached, in fact, or in seeming, upon vital rural interests."
            Hence agrarian movements take place whenever urban penetration occurs in the rural areas. It may be through the influence of urban values, (as for example, interdependence, individualism etc.) or through the acquisition of better lands in the rural area, imposition of land revenue, land tax and so on.
    The major peasant uprisings of this phase are as following:
            1. First Chuar Rebellion (1767.)
            2. Dhalbhum Rebellion (1769 -1774)
            3. Tilka Majhi's War (1780--1785)
            4. Pahadia Revolt (1788 -1791)
            5. First Tamar Rebellion (1795)
            6. Second Chuar Rebellion (1798-1799)
            7. Nayek Hangama (1806 -1826)
            8. Second Tamar Rebellion (1820)
            9. Kol Insurrection (1831 -1832)
            10. Ganga Narayan's Movement (1832 -1833)
            British encroachment into the Jharkhand region started in the year 1765 after receiving the 'Dewani' of Bengal, Bihar and Orissa.At its initial stage colonial administrators were basically interested in collecting land revenues from this region which was quite inaccessible due to its heavy hilly and forest covers.Apart from this the British administrators had to face another difficulty and that was concerning the attitude of the indigenous communities who refused to pay land revenues, as this was not be fitting to their customs.Hence payment of land revenue and that too in a compulsory manner was the basic reason behind the uprisings of this phase, especially those prior to 1793, the year in which the Permanent Settlement Regulation Act was enacted.
            The Permanent Settlement Act of 1793 brought certain administrative changes, which much more directly undermined the customs of the adivasi communities of this region.Firstly, the payment of land revenue by the cultivators to their chiefs were customarily guided but the Permanent Settlement Act
            Secondly, the law and order of this region was maintained by the 'ghatwals' or the pykes under the command of the local chiefs who were well informed of the customs and local cultures of the people.These pykes enjoyed gifts of lands from their chiefs for the service rendered by them.
            Thirdly, due to strict revenue assessment most of the local chiefs were found in huge arrears and their estates were auctioned to meet the revenue balances.The indigenous communities had a traditional organic relationship with their chiefs and could not bear the system that eventually led to their extinction. Finally, and most importantly, the estates of the local chiefs in arrears were auctioned, and in most of the cases, these were purchased by the outsiders, mostly non-adivasi zamindars.
    • Hence, the Permanent Settlement Act of 1793 marginalised the peasantry economically and also drove them towards a state of cultural alienation.The traditional economic and political organisations of the indigenous people centering on the autonomous village community were undermined.
    • The second Chuar Rebellion of 1798-1799, later on the Kol Insurrection of 1831-1832 and the Ganga Narayan's uprising of 1832-1833most prominently showed this trend. In all these the adivasi communities especially the Bhumijs of the Jungle Mahal and adjacent areas of the Chotanagpur plateau region participated in large numbers.
    Phase of Consolidation (1845-1920)
    These outsiders were mostly the zamindars, moneylenders, etc. created by the British rule, and they used to exploit the peasantry severally.
    The major uprisings of the second phase are as under:
    1. The Santhal Insurrection (1855)
    2. The Sipoy Mutiny (1857)
    3. Sardari Agitation or Mulkui Larai (1858-1895)
    4. Kherwar Movement (1874)
    5. The Birsa Munda Movement (1895-1900)
    6. Tana Bhagat Movement (1914-1919)
    This was most prominent in the Santhal Insurrection, Kherwar Movement and Birsa Munda Movement. The first two, being predominantly participated by the Santhals tried to establish the Santhal Raj while the Birsa Munda Movement went for the Munda Raj under the leadership of Birsa Munda.
    http://ashim22.tripod.com/id19.html

    Sudhir Suman

    आन्दोलनकारी आदिवासी महिलाओं के गीत सुनिए और उन गीतों पर पढ़िए रामजी भाई के विचार

    tab geet upload naheen kar paya tha ab geet bhee suniye महिला सशक्तीकरण का माले मॉडल राबर्टसगंज। सोनभद्र जिले का जिला मुख्यालय। अवसर था भाकपा(माले) के जिला ईकाइ के सम्मेलन का। सम्मेलन समाप्त हो चुका था और सम्मेलन में हिस्सा लेने आये...

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    • Faisal Anurag JAHAN TAK MUJHE PATA HAI PALASH A. K. RAI NE BIRSA SE LENIN KAA NAARA DIYA AUR JHARKHAND KI RAAJNEETI KO BADAL SAA DIYA.AB BHI BIRSA MUNDA KAA RAAJNEETIK DARSHAN PAR KAAM KARANE WAALE HAZARON HAIN JO TAMAAM TARAH KE SANGHRON ME LAGE HUYE HAIN.

    • 16 minutes ago· Like

    • Palash Biswas It ,makes no difference until we stand united.

    • S.r. Darapuri shared Amalesh Prasad Yadav's photo.
    • एक बहस तलब मुद्दा.एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन के एक कारण:-  नोएडा में एक एनजीओ संचालक से बातचीत हो रही थी। एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन के कारणों पर। संचालक महोदय ने एक अजीब कारण की चर्चा की। ''एससी/एसटी/ओबीसी के टैलेंटेड लड़के सवर्ण लड़कियों से शादी कर लेते हैं। यह भी एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन का प्रमुख कारण है। एससी/एसटी/ओबीसी के टैलेंटेड लड़कों का संस्‍कार एससी/एसटी/ओबीसी समाज और परिवार को नहीं मिल पाता है।क्‍या इससे एससी/एसटी/ओबीसी का विकास बाधित होता है?'' आप अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं।

    • एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन के एक कारण:-

    • नोएडा में एक एनजीओ संचालक से बातचीत हो रही थी। एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन के कारणों पर। संचालक महोदय ने एक अजीब कारण की चर्चा की। ''एससी/एसटी/ओबीसी के टैलेंटेड लड़के सवर्ण लड़कियों से शादी कर लेते हैं। यह भी एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन का प्रमुख कारण है। एससी/एसटी/ओबीसी के टैलेंटेड लड़कों का संस्‍कार एससी/एसटी/ओबीसी समाज और परिवार को नहीं मिल पाता है।क्‍या इससे एससी/एसटी/ओबीसी का विकास बाधित होता है?'' आप अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं।


    Amalesh Prasad Yadav

    Follow· 21 hours ago


    एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन के एक कारण:-

    नोएडा में एक एनजीओ संचालक से बातचीत हो रही थी। एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन के कारणों पर। संचालक महोदय ने एक अजीब कारण की चर्चा की। ''एससी/एसटी/ओबीसी के टैलेंटेड लड़के सवर्ण लड़कियों से शादी कर लेते हैं। यह भी एससी/एसटी/ओबीसी के पिछड़ेपन का प्रमुख कारण है। एससी/एसटी/ओबीसी के टैलेंटेड लड़कों का संस्‍कार एससी/एसटी/ओबीसी समाज और परिवार को नहीं मिल पाता है।क्‍या इससे एससी/एसटी/ओबीसी का विकास बाधित होता है?'' आप अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं।


    सरदार पटेल जिन्दा होते तो 70 आदिवासी गाँवो को खदेड़कर 2500 करोड़ की प्रतिमा बनाने का कडा विरोध करते..

    Jayantibhai Manani

    इस पोस्ट को 847 shares किये गए है और 199 लोगो ने लाइक किया है. इस की वजह है आदिवासियो की होनेवाली दुर्गति के विरुद्ध सोसियल मिडिया में उठ रही आवाज ही है..अगर सरदार पटेल जिन्दा होते तो 70 आदिवासी गाँवो को खदेड़कर 2500 करोड़ की प्रतिमा बनाने का कडा विरोध करते.. और इस बजेट को बच्चो के कुपोषण हटाने के लिए इस्तेमाल करवाते... गुजरात में प्रति 100 बच्चो में से 45 बच्चे कुपोषण-भुखमरी के शिकार है. जिस में 100 आदिवासी बच्चो में से 88 बच्चे, 100 एससी बच्चो में से 75 बच्चे और 100 ओबीसी बच्चो में से 46 बच्चे कुपोषण-भुखमरी के शिकार है..इस पोस्ट को 847 shares किये गए है और 199 लोगो ने लाइक किया है. इस की वजह है आदिवासियो की होनेवाली दुर्गति के विरुद्ध सोसियल मिडिया में उठ रही आवाज ही है..     अगर सरदार पटेल जिन्दा होते तो 70 आदिवासी गाँवो को खदेड़कर 2500 करोड़ की प्रतिमा बनाने का कडा विरोध करते.. और इस बजेट को बच्चो के कुपोषण हटाने के लिए इस्तेमाल करवाते... गुजरात में प्रति 100 बच्चो में से 45 बच्चे कुपोषण-भुखमरी के शिकार है. जिस में 100 आदिवासी बच्चो में से 88 बच्चे, 100 एससी बच्चो में से 75 बच्चे और 100 ओबीसी बच्चो में से 46 बच्चे कुपोषण-भुखमरी के शिकार है..    प्रोजेक्ट की हकीकत यह कि सरदार पटेल की आकृति वाली एक साठ मंजिला इमारत बनाई जा रही है, जिसकी ऊंचाई 182 मीटर होगी. अमेरिका की टर्नर कन्सट्रक्शन और माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स भवन निर्माण की कंपनियां हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया में भवन निर्माण का जाल खड़ा कर रखा है. इन कंपनियों में जहां टर्नर कंस्ट्रक्शन मुख्य निर्माण कंपनी है वही मीनहार्ट्ज तथा माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स डिजाइन और आर्किटेक्ट फर्म हैं.    मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में गठित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट ने परियोजना के बारे में अपनी वेबसाइट पर जो आधिकारिक जानकारी मुहैया कराई है, उसके अनुसार यह मूर्ति तकनीकी तौर पर यह एक 182 मीटर (597 फुट) ऊंची ईमारत होगी, जिसमें अंदर पहुंचकर कोई भी व्यक्ति विस्तृत सरदार सरोवर का नजारा देख सकता है.    इस इमारत की शक्ल एक इंसान जैसी होगी, जो सरदार वल्लभ भाई पटेल होंगे. जाहिर है मोदी सरकार राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक सरदार पटेल की प्रतिमा के बहाने सरदार सरोवर के आसपास एक पर्यटन केन्द्र विकसित कर रही है. व्यापार और कारोबार को राष्ट्रीय अस्मिता के रूप में पेश करके मोदी गुजरात में पर्यटन कॉरीडोर विकसित करने की आधारशिला रख रहे हैं.    टेण्डर में घोषित 2 हजार, 60 करोड़ की इस मूल परियोजना के प्रचार के लिए 3 करोड़ का अलग से टेण्डर निकाला गया है, जिसका इस्तेमाल परियोजना के पूरा होने से पहले इस मनोरंजन पार्क को दुनियाभर में डिजिटल मीडिया के जरिए प्रचारित करना है. अगर यह परियोजना मनोरंजक पार्क के रूप में प्रचारित की जाती, तो शायद देश और दुनिया के लिए सरदार पटेल का यह विशाल लौह भवन इतना चर्चा का विषय नहीं बन पाता.    बहरहाल, उन्होंने जैसे चाहा, वैसे आने वाले इतिहास की व्याख्या कर दी और दुनिया उस 'सरदार के सपनों का सौदागर'को मोदीनामा मान जोर-शोर से प्रचार कर रही है. <a href=

    प्रोजेक्ट की हकीकत यह कि सरदार पटेल की आकृति वाली एक साठ मंजिला इमारत बनाई जा रही है, जिसकी ऊंचाई 182 मीटर होगी. अमेरिका की टर्नर कन्सट्रक्शन और माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स भवन निर्माण की कंपनियां हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया में भवन निर्माण का जाल खड़ा कर रखा है. इन कंपनियों में जहां टर्नर कंस्ट्रक्शन मुख्य निर्माण कंपनी है वही मीनहार्ट्ज तथा माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स डिजाइन और आर्किटेक्ट फर्म हैं.

    मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में गठित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट ने परियोजना के बारे में अपनी वेबसाइट पर जो आधिकारिक जानकारी मुहैया कराई है, उसके अनुसार यह मूर्ति तकनीकी तौर पर यह एक 182 मीटर (597 फुट) ऊंची ईमारत होगी, जिसमें अंदर पहुंचकर कोई भी व्यक्ति विस्तृत सरदार सरोवर का नजारा देख सकता है.इस इमारत की शक्ल एक इंसान जैसी होगी, जो सरदार वल्लभ भाई पटेल होंगे. जाहिर है मोदी सरकार राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक सरदार पटेल की प्रतिमा के बहाने सरदार सरोवर के आसपास एक पर्यटन केन्द्र विकसित कर रही है. व्यापार और कारोबार को राष्ट्रीय अस्मिता के रूप में पेश करके मोदी गुजरात में पर्यटन कॉरीडोर विकसित करने की आधारशिला रख रहे हैं.

    टेण्डर में घोषित 2 हजार, 60 करोड़ की इस मूल परियोजना के प्रचार के लिए 3 करोड़ का अलग से टेण्डर निकाला गया है, जिसका इस्तेमाल परियोजना के पूरा होने से पहले इस मनोरंजन पार्क को दुनियाभर में डिजिटल मीडिया के जरिए प्रचारित करना है. अगर यह परियोजना मनोरंजक पार्क के रूप में प्रचारित की जाती, तो शायद देश और दुनिया के लिए सरदार पटेल का यह विशाल लौह भवन इतना चर्चा का विषय नहीं बन पाता.बहरहाल, उन्होंने जैसे चाहा, वैसे आने वाले इतिहास की व्याख्या कर दी और दुनिया उस 'सरदार के सपनों का सौदागर'को मोदीनामा मान जोर-शोर से प्रचार कर रही है.





    आदिवासी साहित्य - Adivasi Literature

    Yesterday· Edited

    उनके मार्क्सवाद, गांधीवाद, लोहियावाद के लिए हम लड़ते हैं, लड़ रहे हैं, लेकिन क्या वे हमारे आदिवासी दर्शन की बात भी करते हैं? दुनिया के आदिवासी साहित्य ने इसका जवाब दिया है. अब लोग भारतीय आदिवासी साहित्य से सुनना चाहते हैं. आदिवासी लेखकों क्या तुम तैयार हो?


    - Gladson DungdungPhoto: उनके मार्क्सवाद, गांधीवाद, लोहियावाद के लिए हम लड़ते हैं, लड़ रहे हैं, लेकिन क्या वे हमारे आदिवासी दर्शन की बात भी करते हैं? दुनिया के आदिवासी साहित्य ने इसका जवाब दिया है. अब लोग भारतीय आदिवासी साहित्य से सुनना चाहते हैं. आदिवासी लेखकों क्या तुम तैयार हो?    - Gladson Dungdung

    S.r. Darapuri shared Lalajee Nirmal's photo.
    1995 में एक वार्तालाप के दौरान मैंने भी कांशी राम से यह पूछा था कि आप दलितों के लिए विशेष क्या कर रहे हैं क्योंकि आप भी उन्हें आरक्षित सीटों तक ही सीमित कर देते हैं. अब तो आप के पास पैसा भी है और सामान्य सीट पर सवर्ण वोटों के बट जाने के कारण दलित वोटों से उसे जीतना आसान होता है तो आप को दलितों को सामान्य सीट पर लड़ाना चाहिए. इस पर उन्होंने कहा कि दलितों के पास पैसा नहीं होता जबकि सवर्णों के पास पैसा होता है. मतलब यह कि कोई गरीब दलित कभी चुनाव नहीं लड़ सकता.
    वर्तमान में पैसे वाले दलित ही बसपा का टिकट खरीद कर चुनाव लड़ते हैं परन्तु गरीब कार्यकर्ता का कभी नंबर नहीं आता.इस महान देश में क्या १०-२० दलित भी सक्षम नही है जो सामान्य निर्वाचन क्षेत्रो से चुनाव लड़ सके |देश के मुख्य राजनैतिक दल यह पहल क्यों नही कर रहे है |एक तरफ उनकी सोच है कि दलित सक्षम हो रहे है इसलिए आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए ,दूसरी तरफ आप दलितों को आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रो से ही बाधे रखना चाहते है |आपका यह दोहरा मापदंड अब नही चलने वाला हम ६०-७० के दलित नही है |अम्बेडकर महासभा ने एक अभियान के तहत राजनैतिक दलों से यह जानना चाहा  है कि  जिन राजनीतिज्ञों को आप सक्षम समझते है उन्हें सामान्य निर्वाचन क्षेत्रो से अपना उम्मीदवार क्यों नही बना रहे |इस मुद्दे पर आज बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और  उत्तर प्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष मान.स्वामी प्रसाद मौर्या से अम्बेडकर महासभा के पदाधिकारियो ने गंभीर मंत्रणा की |
    इस महान देश में क्या १०-२० दलित भी सक्षम नही है जो सामान्य निर्वाचन क्षेत्रो से चुनाव लड़ सके |देश के मुख्य राजनैतिक दल यह पहल क्यों नही कर रहे है |एक तरफ उनकी सोच है कि दलित सक्षम हो रहे है इसलिए आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए ,दूसरी तरफ आप दलितों को आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रो से ही बाधे रखना चाहते है |आपका यह दोहरा मापदंड अब नही चलने वाला हम ६०-७० के दलित नही है |अम्बेडकर महासभा ने एक अभियान के तहत राजनैतिक दलों से यह जानना चाहा है कि जिन राजनीतिज्ञों को आप सक्षम समझते है उन्हें सामान्य निर्वाचन क्षेत्रो से अपना उम्मीदवार क्यों नही बना रहे |इस मुद्दे पर आज बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष मान.स्वामी प्रसाद मौर्या से अम्बेडकर महासभा के पदाधिकारियो ने गंभीर मंत्रणा की |
    Satya Narayan
    स्‍तालिन की पुण्‍यतिथि 5 मार्च के अवसर पर
    यह अफ़सोस की बात है कि आज आम घरों के नौजवानों और मज़दूरों में से भी बहुत कम ही ऐसे हैं जो स्तालिन और उनके महान कामों और विश्व क्रान्ति में उनके योगदान के बारे में जानते हैं। बुर्जुआ झूठे प्रचार के चलते बहुतों के मन में झूठी धारणाएँ बैठी हुई हैं। बहुतेरे प्रगतिशील बुद्धिजीवी और राजनीतिक कार्यकर्ता भी निरन्तर और चौतरफ़ा बुर्जुआ प्रचार के कारण पूर्वाग्रह ग्रस्त और भ्रमित हैं। लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि स्तालिन को ठीक से समझा जाये और सही पक्ष में खड़ा हुआ जाये। स्तालिन का नाम और उनके काम क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति के बीच की विभाजक रेखा बन चुके हैं।
    http://www.mazdoorbigul.net/archives/2694
    स्तालिन: पहले समाजवादी राज्य के निर्माता - मज़दूर बिगुल
    mazdoorbigul.net
    मज़दूर वर्ग के पहले राज्य सोवियत संघ की बुनियाद रखी थी महान लेनिन ने, और पूरी पूँजीवादी दुनिया के प्रत्यक्ष और खुफ़ि‍या हमलों, साज़िशों, घेरेबन्दी और फ़ासिस्टों के हमले को नाकाम करते हुए पहले समाजवादी राज्य का निर्माण करने वाले थे जोसेफ़ स्तालिन।...
    S.r. Darapuri
    Will these selfish Dalit leaders listen to Dr. Ambedkar?
    On the same issue of scavenging, Dr. Ambedkar makes scathing critique of the social order where a section of people have to do such demeaning and humiliating jobs. While claims are made about the development and 'concern for all communities' the conditions of dalits in Gujarat are abysmal, temple entry is opposed at places, there is low rate of conviction for anti dalit atrocities, there is prevalence of manual scavenging still prevalent and this receives glorification from Modi. There is denial of access for water to the main sump at places. Cases of intimidation of dalits wanting to convert to Buddhism have been reported from Gujarat. These are few of the phenomenon prevalent in the Laboratory of Hindu rashtra, Gujarat. What should one say of leadership of dalits who compromise the values of Dr. Ambedkar, the values of long term goals of social justice and annihilation of caste for their short term greed for electoral power for their own self? There is a need for introspection by these leaders and their followers about the opportunism and lack of principles of such people in the positions of leadership of the communities.
    Contemporary Dalit Politics and Ambedkar's Goal of Caste Annihilation | TwoCircles.net
    twocircles.net
    Ambedkar was committed to annihilation of caste and was totally opposed to the concept of Hindu nationalism, as propounded by RSS-BJP.


    Satya Narayan

    क्या 'आम आदमी'पार्टी से मज़दूरों को कुछ मिलेगा ?

    (बिगुल मज़दूर दस्ता द्वारा लुधियाना के मजदूरों में वितरित एक पर्चा)

    http://www.mazdoorbigul.net/archives/5000

    क्या 'आम आदमी'पार्टी से मज़दूरों को कुछ मिलेगा ? - मज़दूर बिगुल

    mazdoorbigul.net

    17 फरवरी को भारतीय पूंजीपतियों के राष्ट्रीय संगठन सी.आई.आई. की मीटिंग में केजरीवाल ने असल बात कह ही दी। उसने कहा कि उसकी पार्टी पूंजीपतियों को बिजनेस करने के लिए बेहतर माहौल बनाकर देगी। विभिन्न विभागों के इंस्पेक्टरों द्वारा चेकिंग...


    समकालीन दलित राजनीति और अम्बेडकर का जाति उन्मूलन का लक्ष्य

    समकालीन दलित राजनीति और अम्बेडकर का जाति उन्मूलन का लक्ष्य

    राम पुनियानी

    गत 28 फरवरी 2014 को लोक जनशक्ति पार्टी (एल.जे.पी.)के अध्यक्ष रामविलास पासवानअपनी पार्टी सहित, राजग गठबंधन में शामिल हो गये। ये वही पासवान हैं, जो 12 साल पहले, गुजरात में कत्ल-ओ-गारतशुरू होते ही राजग गठबंधनसे यह कहते हुये बाहर हो गये थे कि गुजरात में हो रही हिंसा वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। ताकि ऐसा न लगे कि वे थूक कर चाट रहे हैं इसलिये उनके पुत्र ने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी को गुजरात दंगों के मामले में क्लीनचिट मिल गयी है और इसलिये राजग में शामिल होने में कुछ भी गलत नहीं है। कुछ दिन पहले, एक अन्य दलित नेता उदित राज भी भाजपा में शामिल हो गये थे। उन्होंने इस आश्वाशन पर भाजपा की सदस्यता ली कि उन्हें लोकसभा का टिकिट दिया जाएगा। महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के रामदास अठावले राजग का हिस्सा बन गये और उन्हें राज्यसभा के टिकिट से नवाजा गया। ऐसे कई अन्य दलित नेता हैं जो या तो भाजपा के सदस्य हैं या उन दलों से जुड़े हुये हैं, जो कि राजग गठबंधन में शामिल हैं। इन सभी नेताओं का यह दावा रहा है कि वे डॉक्टर बी.आर. अम्बेडकर के अनुयायी हैं। अम्बेडकर जाति के उन्मूलन के हामी थे और वे उस हिन्दू राष्ट्रवाद के कड़े विरोधी थे, जिसकी अवधारणा भाजपा-आरएसएस ने दी है।

    भारत के स्वाधीनता संग्राम के समय देश में तीन तरह के राष्ट्रवाद अस्तित्व में थे: भारतीय राष्ट्रवाद, मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद।भारत के अधिकांश लोग भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक और अनुयायी थे। अधिकांश हिन्दू और अधिकांश मुसलमान, दोनों ही भारतीय राष्ट्रवाद में विश्वास रखते थे। सामाजिक फिज़ा में सांप्रदायिकता घोलने का काम श्रेष्ठी वर्ग ने किया, जिसमें शामिल थे राजे-रजवाड़े, जमींदार और दोनों धर्मों की ऊँची जातियों के समृद्ध लोग। अंग्रेजों ने बड़ी कुटिलता से धार्मिक राष्ट्रवाद की आग को जलाए रखा। मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने अलगाववाद की राह पकड़ ली और पाकिस्तान का निर्माण उनकी प्रमुख माँग बन गयी। हिन्दू राष्ट्रवादी, धार्मिक राष्ट्रवादके तो समर्थक थे परन्तु पाकिस्तान उन्हें स्वीकार्य नहीं था। उनका कहना था कि भारत हमेशा से हिन्दू राष्ट्र रहा है। असल में इस दावे में कोई दम नहीं है क्योंकि प्राचीनकाल मेंराष्ट्र की अवधारणाही नहीं थी। राष्ट्र-राज्य की अवधारणा आधुनिक है। शायद इसलिये अपनी पुस्तक ''पार्टिशन ऑफ इण्डिया''के संशोधित संस्करण में, अम्बेडकर ने पाकिस्तान के निर्माण का इस आधार पर पुरजोर विरोध किया कि उससे हिन्दू राजकी स्थापना की राह प्रशस्त हो सकती है। उन्होंने लिखा,

    ''अगर हिन्दू राज स्थापित होता है तो वह इस देश के लिये एक बहुत बड़ा संकट होगा। हिन्दू चाहे जो भी कहें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु यह एक तथ्य है कि हिन्दू धर्म, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिये खतरा है। वह प्रजातंत्र का दुश्मन है। हमें हिन्दू राज को रोकने के लिये हर संभव प्रयास करने चाहिए''

    (पाकिस्तान ऑर पार्टिशन ऑफ इण्डिया, पृष्ठ 358)।

    यहाँ अम्बेडकर जिस हिन्दू धर्म की बात कर रहे हैं, वह ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म है जो कि संघ परिवार के हिन्दुत्व का वैचारिक आधार है।

    अम्बेडकर ने दलित आंदोलन की नींव रखी। उन्होंने अनुसूचित जाति फेडरेशन का निर्माण किया और उसके बाद रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया की आधारशिला रखी। सन् 1952 के आम चुनाव, जिनमें पहली बार भारत के सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार मिलने वाला था, के पहले, अनुसूचित जाति फेडरेशन ने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से गठबंधन कर लिया। अनुसूचित जाति फेडरेशन के घोषणापत्र में ''किसी भी प्रतिक्रियावादी पार्टी जैसे हिन्दू महासभा या जनसंघ के साथ गठबंधन की संभावना को सिरे से नकारा गया था'' (अम्बेडकर के गायकवाड़ को पत्र, पृष्ठ 280-296, गोपाल गुरू द्वारा इकोनोमिक एण्ड पालिटिकल वीकली,दिनाँक 16 फरवरी 1991 में उद्धृत)। अम्बेडकर यह अच्छी तरह समझते थे कि जनसंघ-हिन्दू महासभा का अंतिम और दूरगामी एजेण्डा हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है और यह भी कि हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना, धर्मनिरपेक्ष प्रजातान्त्रिक भारतके विरूद्ध है। अम्बेडकर का दलितों के लिये मन्त्र था ''शिक्षा प्राप्त करो, संगठित हो और संघर्ष करो''। वे जाति के उन्मूलनके हामी थे और स्वंतत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों के समर्थक। वे इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे कि केवल प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में ही शिक्षा प्राप्त करना, संगठित होना और संघर्ष करना संभव हो सकता है। इसलिये उन्होंने हिन्दुत्ववादी राजनैतिक दलों से किसी भी प्रकार के समझौते की बात कभी सोची ही नहीं।

    अब क्या हो रहा है? पिछले कुछ सालों में देश में एक नया दलित नेतृत्व उभरा है जो एक ओर अम्बेडकर से विचारधारा के स्तर पर जुड़ा रहना चाहता है तो दूसरी ओर, अपनी और अपने परिवार की चुनावी महत्वाकांक्षाओं को भी पूरा करना चाहता है। इसलिये ये नेता बिना किसी संकोच के सांप्रदायिक पार्टियों की गोदी में बैठ रहे हैं। महान कवि नामदेव ढसाल ने शिवसेना की सदस्यता ले ली थी, जिसने अम्बेडकर की पुस्तक ''रिडल्स ऑफ हिन्दुइज्म''के प्रकाशन पर भारी हंगामा मचाया था। रामदेव अठावले भी सांप्रदायिक ताकतों के साथ हैं, जिन्होंने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता दिलवाई है। उदित राज ने भी हिन्दू राज की पार्टी को गले लगा लियाहै और रामविलास पासवान ने बेशर्मी से भाजपा के साथ जुड़ने का निर्णय लिया है। जाहिर है कि उनके इस निर्णय के पीछे दबे-कुचलों की भलाई का उद्देश्य नहीं है। उन्होंने स्वयं की राजनैतिक महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिये यह निर्णय लिया है। सांप्रदायिक दलों के साथ जुड़ने से दलित नेताओं को भले ही कुछ समय के लिये फायदा हो जाए परन्तु ऐसा करके वे हिन्दुत्व-हिन्दू राज की राजनीति को मजबूती देंगे। यह वह राजनीति है जो जाति और लिंग के पदानुक्रम में विश्वास करती है

    भाजपा की दलितों से जुड़े मुद्दों पर क्या सोच है, इसे केवल एक उदाहरण से समझा जा सकता है। हाल में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखित पुस्तक ''कर्मयोग''को वापस ले लिया गया। इस पुस्तक में मोदी ने लिखा है,

    ''मुझे यह विश्वास नहीं है कि वे (वाल्मीकि) इस काम को केवल अपनी आजीविका चलाने के लिये करते आये हैं। अगर ऐसा होता तो वे यह काम पीढ़ी दर पीढ़ी नहीं करते…किसी न किसी समय,किसी न किसी को यह ज्ञान प्राप्त हुआ होगा कि पूरे समाज व ईश्वर की प्रसन्नता की खातिर यह काम करना उनका (वाल्मीकि) कर्तव्य है। यह काम उन्हें ईश्वर द्वारा सौंपा गया है और सफाई का यह काम वे सदियों से एक आन्तरिक आध्यात्मिक गतिविधि के बतौर करते आ रहे हैं। यह पीढि़यों से चल रहा है। यह विश्वास करना असंभव है कि उनके पूर्वज कोई अन्य काम या व्यवसाय शुरू नहीं कर सकते थे।''

    सफाई के कार्य के इसी मुद्दे को लेकर डॉ. अम्बेडकर ने उस सामाजिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की जो किसी एक तबके के लोगों को ऐसे घिनौने व अपमानजनक काम करने पर मजबूर करती है। यद्यपि विकास और 'सभी समुदायों की फिक्र'के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं परन्तु सच यह है कि गुजरात में दलितों की हालत बहुत खराब है। कई जगह उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता है और उनके विरूद्ध हिंसा के मामलों में दोषसिद्धि की दर बहुत कम है। हाथों से मैले की सफाई का काम अभी भी जारी है और मोदी उसे महिमामंडित कर रहे हैं। दलितों को कई स्थानों पर पानी के स्त्रोतों से पानी नहीं भरने दिया जाता है। गुजरात में कई दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने की खबरें भी आती रही हैं। ये तो हुई हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला गुजरात की बात। परन्तु हम उन दलित नेताओं के बारे में क्या कहें0 जो डा. अम्बेडकर के मूल्यों से समझौता कर रहे हैं और राजनैतिक सत्ता हासिल करने की खातिर सामाजिक न्याय और जाति उन्मूलन के अपने दूरगामी लक्ष्य को भुला बैठे हैं। इन नेताओं को आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। ऐसे नेताओं के अनुयायियों को भी यह विचार करना होगा कि वे आखिर कब तक इतने घोर अवसरवादी और सिद्धान्तविहीन लोगों को अपना नेता मानते रहेंगे। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

    About The Author

    Ram Puniyaniwas a professor in biomedical engineering at the Indian Institute of Technology Bombay, and took voluntary retirement in December 2004 to work full time for communal harmony in India. He is involved with human rights activities from last two decades.He is associated with various secular and democratic initiatives like All India Secular Forum, Center for Study of Society and Secularism and ANHAD.


    Jagadishwar Chaturvedi

    अरविंद केजरीवाल ने जिन सवालों से प्रचार अभियान आरंभ किया है उससे वे नायक बनकर सामने आ रहे हैं और उनकी राष्ट्रीय बढत को मोदी रोक नहीं सकते। जैसा दृश्य बन रहा है उसमें आम आदमी पार्टी को एक बडी राजनीतिक ताकत के रुप में उभारने में मोदी के आक्रामक प्रचार अभियान की प्रच्छन्न रुप से बडी भूमिका है। मोदी की वर्चुअल इमेज तो केजरीवाल के सामने टिम टिम दीपक जैसी है।

    Unlike·  · Share· 16 hours ago·


    Himanshu Kumar

    हिमालय में हूँ . मिट्टी और बांस से बनी हुई कुटिया के भीतर बैठा हूँ .


    खिड़की के बाहर बर्फ से ढकी हुई पहाडियां दीख रही हैं .


    घर के पीछे एक पहाड़ी नदी कल कल करती हुई बह रही है .


    कुछ समय इधर ही रह कर लिखने पढ़ने में शान्ति से समय गुज़ारूंगा .

    Unlike·  · Share· 6 hours ago·


    महाराष्ट्रातील सत्तासंघर्षाची दिशा

    Sunil Khobragade

    March 3, 2014 at 9:41pm

    भारतीय सत्तासंघर्ष सद्यस्थितीत अशा एका बिंदूवर येऊन पोहचला आहे की जेथून कल्याणकारी राज्याची प्रस्थापना या भारतीय संविधानाच्या  सर्वोच्च संकल्पाचा कडेलोट करणारे दोन मार्ग सुरु होतात. एक मार्ग कल्याणकारी राज्याच्या प्रस्थापनेचे उद्दिष्ट ठोकरुन लावून धर्मप्रवण व्यक्तीमानस, धर्माधिष्ठीत समाजरचना आणि धर्मसंम्मत अनैतिक आचार याद्वारे अधिकाधिक दुःखनिर्मिती करत तात्काळ विनाशाकडे नेणारा आहे.तर,दुसरा मार्ग कल्याणकारी राज्याच्या प्रस्थापनेसाठी आवश्यक उपाययोजना न करता भय, भूक, दास्यता, भ्रष्टाचार कायम ठेऊन थोड्या धीम्या गतीने विनाशाकडे नेणारा आहे. कोणत्याही मार्गाने गेले तरी भारतीय संविधानाने हमी दिलेल्या दर्जा आणि संधीची समानता, सामाजिक, आर्थिक आणि राजनैतिक न्याय, आचार,विचार, श्रद्धा, उपासना यांचे स्वातंत्र्य आणि सन्मानाचे जीवन जगण्याचा अधिकार या राष्ट्रसंकल्पाचा कडेलोट अटळ आहे. या स्थितीत भारताच्या निर्माणकर्त्यांनी परिश्रमपूर्वक निर्माण केलेले सार्वभौम, धर्मनिरपेक्ष, लोकशाही गणराज्य वाचविण्यासाठी इतर कोणता मार्ग उपलब्ध आहे काय? यावर विचार करणे आवश्यक आहे. प्रश्न संपूर्ण देशाला विनाशापासून वाचविण्याचा आहे.परंतु, याची सुरुवात मात्र कोणत्यातरी एका प्रदेशापासून करावी लागेल. सत्ताधारी आणि विरोधी म्हणून ओळखले जाणारे प्रमुख राजकीय  पक्ष व त्यांच्या छायेत खुरटत वाढणारे ' सत्तातुरांना न भयं न लज्जा ' या नीतीने वाटचाल करणारे व्यक्तिकेंद्री प्रादेशिक पक्ष या संविधानशत्रूंपासून देशाला  वाचविण्याचा प्रारंभिक प्रयोग भारतीय पुनर्निर्माण चळवळीची आधारभूमी असलेल्या  महाराष्ट्र राज्यात यशस्वी झाला तर त्याची पुनरावृत्ती  इतर राज्यांमध्येही करता येऊ शकते. महाराष्ट्र ही भारतीय पुनर्निर्माण चळवळीचे जनक कांतीबा जोतिराव फुले,छत्रपती शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर या महापुरुषांची आणि  लोकहितवादी, आगरकर यासारख्या सुधारकांची जन्मभूमी आणि कर्मभूमी आहे. भारत नावाचा देश कसा असावा/ कसा असेल ? याचा दस्तावेज विद्वतशिरोमणी महाराष्ट्रपुत्र डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी तयार केला आहे.हे पाहता भारत देशाला विनाशापासून वाचविण्याची जबाबदारी महाराष्ट्रातील जनतेनेच घेतली पाहिजे. यासाठी आधी महाराष्ट्र मग शेषराष्ट्र ही भूमिका घेऊन राष्ट्रनिर्माते डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या वारसांनी भारताच्या संविधानशत्रूंना पराभूत करण्याची सुरुवात महाराष्ट्रापासूनच केली पाहिजे.भारताचे संविधानशत्रू असलेले सत्ताधारी आणि विरोधी म्हणून ओळखले जाणारे प्रमुख पक्ष व त्यांच्या दिंडीत सामील झालेले प्रादेशिक राजकीय पक्ष अत्यंत प्रबळ आहेत. प्रचंड धनशक्ती, संपूर्ण भारतातील जनतेचा बुद्धिभेद करणारी विक्राळ माध्यमशक्ती, बंधुभाव नष्ट करणारी जहाल कुटिलता,  जनतेला त्राही-त्राही करुन सोडणारी निष्ठुर  निर्दयता या सर्व दुर्गुणांचा समुच्चय या  धन आणि धर्म नियंत्रित पक्षांमध्ये झाला आहे. त्यामुळे या संविधानघातकी पक्षासूरांचा मुकाबला करण्यासाठी थेट मैदानात उतरण्याबरोबरच छत्रपती शिवरायांच्या गनिमी काव्याचा वापर करणे गरजेचे आहे. या संविधानघातकी पक्षासूरांचे निर्दालन करण्याचे मार्ग कोणकोणते असतील,यासाठी कोणत्या तंत्रांचा वापर करावा लागेल, भारतीय संविधानाने आखून दिलेल्या संसदीय मार्गानेच या संविधानघातकी पक्षासूरांना कसे पराभूत करता येईल, भारतीय संविधानाने भारतातील जनतेला दिलेल्या एक व्यक्ती, एका व्यक्तीला एक मत आणि एका मताचे एक मूल्य या भिमास्त्राचा वापर करुन संविधानघातकी पक्षासूरांचे कसे दहन करता येईल याची गुरुकिल्ली आंबेडकरवादी तत्वज्ञानविद्येत आहे. मात्र, आजपर्यंत ही विद्या वापरण्याचे कौशल्य अर्जित करण्याकडे दुर्लक्ष केल्यामुळे संविधानशत्रू बलवान झाला आहे.  एक व्यक्ती, एका व्यक्तीला एक मत आणि एका मताचे एक मूल्य या भिमास्त्राचा वापर करण्याच्या विद्येत जनता पारंगत झाल्यास संविधानघातकी  पक्षांसूरांना आणि त्यांच्या वळचणीखाली मूळ धरलेल्या संविधानशत्रूंना पळता भूई थोडी होईल. संविधानाने भारतीय जनतेच्या हातात दिलेल्या भिमास्त्राचा यशस्वी वापर सर्वप्रथम महाराष्ट्रात करायचा आहे हे आपण वर म्हटले आहे. यासाठी  महाराष्ट्राचे सत्ताकारण,महाराष्ट्राच्या सत्ताकारणावर परिणाम करणारे घटक,या घटकांची उपयोगिता आणि उपद्रवमूल्य यांचा वापर करून  संविधानप्रेमी घटकांना निष्प्रभ करण्याचे महाराष्ट्रातील सत्ताधारी  व विरोधी पक्षांचे तंत्र,महाराष्ट्राच्या राजकारणातील धार्मिक व जातीय अंतर्विरोध,जातीय आणि धार्मिक संख्याबळ व त्यांचे भौगोलिक स्थान व त्याआधारे करता येऊ शकणारे प्रयोग,सत्ताधारी व विरोधी पक्षांचा पाडाव करण्यासाठी आत्मसात करावयाची कौशल्ये आणि नष्ट करावयाचे अवगुण इत्यादीसारख्या अनेक घटकांची परखड चर्चा,चिकित्सा,समीक्षा करण्याची आणि नवीन प्रमेये मांडण्याची आवश्यकता आहे.ही चर्चा,चिकित्सा,समीक्षा आणि नवीन प्रमेये म्हणजे महाराष्ट्राची सत्ता हस्तगत करण्याची गुरुकिल्ली ठरणार आहे.

    महाराष्ट्राचे सत्ताकारण

    महाराष्ट्रातील सत्तासंघर्षात ब्राह्मण आणि मराठे हे दोन मुख्य अक्ष राहिले आहेत.इतर जाती या दोन अक्षाच्या अवतीभवती केंद्रित राहिल्या आहेत.छत्रपति शिवाजी महाराजांनी कुणबी-कुळवाडी,महार,रामोशी,कोळी आणि धर्मांतरित मुसलमान या जातींचे संघटन करून खानदानी मुसलमान + ब्राह्मण यांच्या अभद्र युतीला शह दिला व शुद्रातीशुद्रांच्या हातात राजसत्ता खेचून आणली.शतकभराच्या शिवराज्यानंतर ब्राह्मणांनी पेशवाईच्या रूपाने शिवरायाच्या समीकरणाला शह देऊन ब्राह्मणराज्य पुन्हा प्रस्थापित केले. यानंतर जवळपास दीडशे वर्षे मराठे महाराष्ट्राच्या सत्तास्पर्धेतून बाहेर फेकले गेले होते.एकोणविसाव्या शतकाच्या अखेरच्या दशकापासून इंग्रजांसोबत सनदशीर मार्गाने सुरु झालेल्या राजकीय लढ्यावर  गोखले,रानडे,टिळक,केळकर या ब्राह्मण नेत्यांनी कब्जा केला होता. विसाव्या शतकाच्या प्रारंभी मराठा-कुणबी व इतर ब्राह्मणेत्तर जातीमध्ये थोडीफार राजकीय जागृती सुरु झाली.ब्राह्मणजातीय राजकारणाला शह देण्यासाठी छत्रपति शाहू महाराजांच्या पुढाकाराने भास्करराव जाधव व श्रीपतराव शिंदे यांच्या नेतृत्वाखाली मराठ्यांनी ' ऑल इंडिया मराठा लीग" नावाने मराठ्यांची पहिली राजकीय संस्था १९१७ साली स्थापन केली.त्याच वर्षी मराठेत्तर जातींनी अण्णासाहेब लठ्ठे यांच्या नेतृत्वाखाली "डेक्कन रयत एसोसिएशन" नावाची राजकिय संस्था  स्थापन केली.सुरुवातीच्या काळात ' ऑल इंडिया मराठा लीग" आणि "डेक्कन रयत एसोसिएशन" या दोन्ही संगठना परस्पर सहकार्याने सत्यशोधकी विचारांचे ब्राह्मणविरोधी राजकारण करीत असत.या काळात भास्करराव जाधव,दिनकरराव जवळकर,केशवराव जेधे या प्रमुख मराठा नेत्यांनी महाराष्ट्राच्या राकारणात प्रभाव निर्माण केला. मराठा नेतृत्वाखाली काम करणाऱ्या पक्षांना त्यावेळेस ब्राह्मणेत्तर पक्ष या नावाने संबोधले  जाई.या दोन्ही संगठनानी राजकीय राखीव जागांची जोरदार मागणी केली. या संगठनाच्या संघर्षामुळेच १९१९ च्या मोंटेग्यू-चेम्सफर्ड सुधारणा कायद्याअन्वये मराठा व तत्सम इतर जातींना मुंबई विधानमंडळामध्ये राखीव जागा देण्यात आल्या.  

    सन १९३० साली ब्राह्मणेत्तर पक्ष कॉंग्रेसमध्ये विलीन झाला. या काळात कॉंग्रेस पक्षावर शंकरराव देव, नरहर विष्णू गाडगीळ,नरसिंह केळकर या ब्राह्मण नेत्यांची पकड होती.केशवराव जेधे यांच्या नेतृत्वाखाली ब्राह्मणेत्तर पक्ष कॉंग्रेसमध्ये विलीन झाल्यानंतर कॉंग्रेसमधील ब्राह्मण नेतृत्व आणि मराठा नेतृत्व अशी सत्तास्पर्धा महाराष्ट्राच्या राजकारणात सुरु झाली.केशवराव जेधे,  भास्करराव जाधव,नाना पाटील,शंकरराव मोरे या मराठा नेत्यांनी ब्राह्मणी वर्तुळात बंदिस्त झालेल्या कॉंग्रेस पक्षाला मराठा जातीमध्ये लोकप्रिय केले.याचा परिणाम म्हणून १९३६ मध्ये महाराष्ट्रात केवळ ४५९१५ एवढी सदस्यसंख्या असलेल्या  कॉंग्रेस पक्षाचे १९३७ मध्ये १,५६,८९४ इतके सदस्य झाले. मराठा जातीच्या सहभागामुळे  मुंबई प्रांतिक विधीमंडळात कॉंग्रेसचे १७५ पैकी ८८ सदस्य निवडून आले. परंतु मुंबई प्रांताचे मुख्यमंत्री मात्र बाळ गंगाधर खेर या ब्राह्मण नेत्यास करण्यात आले.यापुढील काळात मराठा व ब्राह्मण नेत्यांमधील सत्तासंघर्ष आणखी तीव्र झाला.कॉंग्रेसवर शंकरराव देव,बाळ गंगाधर खेर,मोरारजी देसाई या ब्राह्मण नेत्यांचे प्रस्थ निर्माण झाले.यामुळे केशवराव जेधे,शंकरराव मोरे,तुळसीदास जाधव, दि.बा.पाटील,गोविंदराव पवार या मराठा नेत्यांनी  कॉंग्रेसमधून बाहेर पडून १९४८ साली शेतकरी कामगार पक्षाची स्थापना केली.मात्र लवकरच त्यांच्यामध्ये मतभेद झाल्याने शेवटी ऑगस्ट १९५४ मध्ये केशवराव जेधे कॉंग्रेस पक्षात परत आले.या कालावधीत यशवंतराव चव्हाण यांच्या रूपाने मराठा जातीतील प्रबळ नेतृत्वाचा उदय झाला.मोरारजी देसाई आणि जवाहरलाल नेहरू यांच्यातील सुप्त संघर्षामुळे नेहरूंनी यशवंतराव चव्हाण यांना झुकते माप दिल्यामुळे कॉंग्रेसमध्ये पुन्हा मराठा विरुद्ध ब्राह्मण असा सत्तासंघर्ष सुरु झाला.या सत्तासंघर्षात यशवंतराव चव्हाण यांचा विजय होऊन १ नोव्हेंबर १९५६ मध्ये मुंबई राज्याचे मुख्यमंत्रीपद त्यांना देण्यात आले.मराठा नेतृत्वाने कॉंग्रेसमधील देव-देसाई-खेर या ब्राह्मण नेतृत्वाला शह  दिल्यामुळे ब्राह्मणांनी एस.एम.जोशी,श्री.अ.डांगे आणि प्र.के.अत्रे या कॉन्ग्रेसेत्तर नेतृत्वाला प्रस्थापित करण्यासाठी ब्राह्मण,सी.के.पी,महार व मराठेत्तर जाती यांना संयुक्त महाराष्ट्र समितीच्या झेंड्याखाली एकत्र आणून मराठा नेतृत्वाला  शह देण्याचा प्रयत्न केला परंतु तो यशस्वी  झाला नाही. मराठा नेतृत्वाने ब्राह्मण नेतृत्वावर मात करण्याचे  मुख्य कारण  राजकीय असण्यापेक्षा वैचारिक आणि सांस्कृतिक स्वरूपाचे आहे ही बाब प्रामुख्याने लक्षात घेतली पाहिजे.मराठा राजकारणाची मुहूर्तमेढ रोवणारे मराठा नेतृत्व क्रांतीबा फुल्यांच्या कट्टर ब्राह्मणविरोधी सत्यशोधक तत्वज्ञानाच्या मुशीत घडले होते.ब्राह्मणांनी मराठ्यांना क्षत्रिय मानण्यास नकार दिल्याची,खालच्या जातीचे,शुद्र ठरविल्याची खंत मराठा नेत्यांच्या नेणीवेतून पुसली गेली नव्हती.कॉंग्रेसमध्ये सामील झाल्यानंतरसुद्धा मराठा नेत्यांचा हा ब्राह्मणविरोध कायम होता.मराठेत्तर शुद्र जातीमध्येही सत्यशोधक तत्वज्ञान रुजलेले असल्यामुळे मराठ्याच्या ब्राह्मण नेत्रुत्वविरोधी भूमिकेला महाराष्ट्रातील जैन,माळी इत्यादी जातींचाही पाठींबा लाभला.यामुळेच मराठ्यांना ब्राह्मण नेतृत्वाला महाराष्ट्राच्या सत्तास्पर्धेतून निर्णायकरित्या दूर करता आले.१९६० नंतरच्या काळात महाराष्ट्रातील सत्तासंघर्ष मराठा विरुद्ध ब्राह्मण या अक्षावरून मराठा विरुद्ध मराठेत्तर जाती या अक्षावर स्थिरावले आहे.साठोत्तरी काळात मराठा नेतृत्व अधिकाधिक कर्मठ हिंदुत्ववादी बनत गेले आहे.आजमितीस अस्तित्व पणाला लाऊन हिंदुत्वाचे संरक्षण करण्यात मराठा जात सर्वात पुढे आहे.मात्र मराठ्यांच्या हिंदुत्वसंरक्षक वैचारिक भूमिकेचा  विरोध करण्यासाठी मराठेत्तर जाती पुढे येत नाहीत कारण या जातीसुद्धा ( सी.के.पी.म्हणजेच कायस्थ प्रभू,पाठारे प्रभू ,वंजारी,धनगर,आगरी,भंडारी इत्यादी ) हिंदुत्वसंरक्षक आहेत.यामुळे महाराष्ट्राचे सत्ताकारण वैचारिक भुमिकेच्या विरोधाऐवजी निव्वळ राजकीय भूमिकेच्या विरोधावर अधिष्ठित झाले आहे.मराठा जातीसामुहाकडे भौतिक साधनाचा निर्विवाद कब्जा असल्यामुळे केवळ राजकीय भूमिकेच्या विरोधाच्या आधारे मराठा नेतृत्वावर वर्चस्व प्रस्थापित कारणे  दुरापास्त आहे.या स्थितीत महाराष्ट्रातील सत्तास्पर्धा हिंदुत्व संरक्षक सत्ताधारी जातीसमूह विरुद्ध हिंदुत्व विरोधक जाति-धर्म समूह  या तात्त्विक विरोधाच्या पातळीवर अधिष्ठित करणे अत्यावश्यक आहे.    

    चन्द्रशेखर करगेती with Rajiv Nayan Bahuguna and 19 others

    बल हर दा,


    बताओ तो उत्तराखण्ड के सुलगते सवाल क्या-क्या हैं ?


    क्या अब भी तुम्हारी जुगत केवल और केवल, सत्ता पाने को संघर्ष और अनुत्तरित सवाल तक ही सीमीत है ?


    जवाब देना हो दाज्यू आगे लोकसभा चुनाव भी है और राज्य में पंजाबी और उर्दू अकादामियां भी घोषित हो गयी है !


    ग्वेल ज्यु, जाने कुमाऊंनी और गढवाली को अकादमी रूपी उडयार कब मिलेगा ? सवाल तो और भी बहुत से हैं दाज्यू, पहले इसका तो जवाब दे दो ?

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    Arundhati Roy replies to Dalit Camera


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    आज जाति वर्चस्व का जो आलम है, उसका तार्किक परिणाम ही हिन्दू राष्ट्र है

    आज जाति वर्चस्व का जो आलम है, उसका तार्किक परिणाम ही हिन्दू राष्ट्र है


    तिलिस्म तोड़े बिना दिशाएं गायब ही रहेंगी और इस रात की सुबह असम्भव है

    सामाजिक यथार्थ की दृष्टि के बिना व्यवस्था के खिलाफ हर लड़ाई विचलन के लिये अभिशप्त है

    लेकिन पता नहीं बिरसा के आदिवासी दर्शन से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है?…. भारतीय संसद में अंबेडकर के समर्थन में आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा के मूलनिवासी होने का दावा हम न जाति विमर्श में न वर्ग संवाद में समझ सकते हैं।

    पलाश विश्वास

    आदिवासियों का साम्राज्यवाद के विरुद्धसामंतवाद के विरुद्ध महासंग्राम हमारे इतिहास के सबसे उज्ज्वल अध्याय हैं, जिनसे न जुड़ पाने की वजह से मुक्त बाजार में हम आज इतने असहाय हैं।

    भारतीय संसद में अंबेडकर के समर्थन में आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा के मूलनिवासी होने का दावा हम न जाति विमर्श में न वर्ग संवाद में समझ सकते हैं।

    मुक्त बाजार के परिदृश्य में पूँजी समर्थक विचारधारा, संगठन, समाज और संसdकृति का ही विकास सम्भव है।अबाध आवारा पूँजी के हितों के माफिक है हिन्दुत्व का यह पुनरुत्थान। जबकि इसके मुकाबले सिरे से विचारधाराएं और आन्दोलन अदृश्य है। बंगाल में वाम अवसान के बाद ही केसरिया ताज महल की नींव बनने लगी है। जबकि हिन्दू महासभा की राजनीति का गढ़ अखण्ड बंगाल था। भारतीय जनसंघ की स्थापना भी बंगाल के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही की थी। लेकिन वाम विचारधारा और आन्दोलन की वजह से बंगाल की जमीन पर 1977 से लेकर ममता बनर्जी के उत्थान के दरम्यान हिन्दुत्व की खेती नहीं हो सकी। विचारधारा का मुकाबला विचारधारा से ही सम्भव है। संगठन का मुकाबला संगठन से ही सम्भव है। राज्यतन्त्र की समझ के बिना सामाजिक यथार्थ की दृष्टि से रचनाकर्म करना असम्भव है तो इतिहासबोध से लैस वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित सौंदर्यबोध के बिना किसी भी तरह का मूल्यांकन नाजायज है। राज्यतन्त्र की समझ के बिना, सामाजिक यथार्थकी दृष्टि के बिना व्यवस्था के खिलाफ हर लड़ाई विचलन के लिये अभिशप्त है। व्यक्ति को न विचारधारा के खिलाफ और न संगठन के खिलाफ कोई हथियार बनाया जा सकता है। आदिक्रांति के जनक स्पार्टकस और गौतम बुद्ध भी संस्थागत संगठन और आन्दोलन के जरिये गुलामी के तन्त्र को तोड़ने में कामयाब हुए, व्यक्तिगत करिश्मे की वजह से नहीं।

    तन्त्र के खिलाफ सुनियोजित संगठनात्मक संस्थागत जनान्दोलन की जमीन तैयार किये बिना किसी मसीहा की जादू की छड़ी या करिश्माई मंत्र से व्यवस्था परिवर्तन की दिशा का निर्माण नहीं कर सकते। तिलिस्म जो बन गया है, उसे तोड़े बिना दिशाएं गायब ही रहेंगी और इस रात की सुबह असम्भव है।

    जिस मण्डल क्रांति के गर्भ से कमण्डल का जन्म हुआ, उसमें पिछड़ी जातियों के लिये आरक्षण की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। मण्डल के तहत आरक्षण पिछड़े वर्गों के लिये है। पिछड़े वर्गं में अल्पसंख्यक और सवर्ण दोनों शामिल हैं। लेकिन राजनीति ने अदर बैकवर्ड कम्युनिटीज को अदर बैकवर्ड कास्ट बनाकर देश में हिन्दुत्व का पुनरूत्थान रच दिया। इसी तरह अंबेडकर की लड़ाई अस्पृश्यता के विरुद्ध थी। सामाजिक न्याय और समता के लिये उनकी लड़ाई थी। लेकिन वे अपने को वर्किंग क्लास का नेता कहते थे। अपने समूचे लेखन में उन्होंने सिर्फ जाति उन्मूलन की बात की है, जाति पहचान की बात कभी नहीं की। उन्होंने शिड्युल्ड कास्ट एसोसिएशन के जरिये कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीति से इतर मूक बहुसंख्य जनता को अलग पहचान दी लेकिन वे तब भी डिप्रेस्ड क्लास की ही बात कर रहे थे। अंबेडकर का सारा जीवन जाति के अंत के लक्ष्य को समर्पित था। जब उन्हें हिन्दू धर्म में ऐसा असम्भव लगा तो उन्होंने धर्मान्तरण के लिये जाति व्यवस्था के हिन्दुत्व को तिलांजलि दे दी।

    But the world owes much to rebels who would dare to argue in the face of the pontiff and insist that he is not infallible.

    -Babasaheb Ambedkar

    In the fight for Swaraj you fight with the whole nation on your side…[but to annihilate the caste], you have to fight against the whole nation—and that too, your own. But it is more important than Swaraj. There is no use having Swaraj, if you cannot defend it. More important than the question of defending Swaraj is the question of defending the Hindus under the Swaraj. In my opinion, it is only when Hindu Society becomes a casteless society that it can hope to have strength enough to defend itself. Without such internal strength, Swaraj for Hindus may turn out to be only a step towards slavery. Good-bye, and good wishes for your success.

    -B.R. Ambedkar

    अंबेडकर के इस वक्तव्य में साफ जाहिर है कि अगर भारत में स्वराज कायम करना है तो जाति विहीन हिन्दू समाज की स्थापना के बिना ऐसा असम्भव है।

    आज जाति वर्चस्व का जो आलम है, उसका तार्किक परिणाम ही हिन्दू राष्ट्र है। भारत राष्ट्र इस अमोघ नियति का शिकार इसलिये हो रहा है क्योंकि 15 अगस्त, 1947 से भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर कदम जाति को मजबूत बनाता रहा है।

    विडम्बना तो यह है हजारों साल से जो जाति बहिष्कृत समुदायों को गुलाम बनाये रखने में कामयाब है, उस गुलामी का सिलसिला तोड़ने के लिये अपने आवारा मसीहा संप्रदाय की अगुवाई में आजादी के ख्वाहिश में अंबेडकर के नाम उसी जाति को अपना वजूद मानकर सामाजिक न्याय और समता का अभियान चला रहे हैं लोग।

    मुंबई में आज हरिचांद ठाकुर का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है, जो नील विद्रोह के नेता थे और जाति अस्मिताके बिना वर्चस्ववादी ब्राह्मण धर्म को तोड़ने के लिये जिन्होंने मतुआ आन्दोलन को जन्म दिया। उनका मुख्य नारा भूमि सुधार था, जो आदिवासी और किसान विद्रोहों की विरासत के ही मुताबिक था। हरिचांद ठाकुर की लड़ाई अस्मिता की लड़ाई नहीं थी और न महात्मा ज्योतिबा फूले की। वे राजनीति नहीं कर रहे थे और न सत्ता समीकरण के मुताबिक मौसम बेमौसम रंग बदलने वाले गिरगिट थे वे। हरिचांद ठाकुर और ज्यतिबा फूले दोनों बहुसंख्य जनता के सशक्तिकरण के लिये शिक्षा आन्दोलन चला रहे थे।

    संजोग से बंगाल में जो प्रगतिशील आन्दोलन नवजागरण मार्फत शुरु हुआ, वह भी ईश्वरचंद्र विद्यासागर के शिक्षा आन्दोलन से प्रारंभ हुआ। औपनिवेशिक शासन और सामंतवाद से लड़ने के लिये अस्मिता राजनीति के बजाय भारतीय जन गण के लगभग अपढ़ और पढ़े लिखे भी, पुरखों ने अस्मिताओं की बजाय कमजोर तबकों, पिछड़ों,अस्पृश्यों के सशक्तिकरण का आन्दोलन चलाया।

    अय्यंकाली का केरल में कृषि समाज को एकजुट करके चलाया गया कृषि हड़ताल की तो दूसरी कोई नजीर भी नहीं है। चुआड़ विद्रोह के बारे में लिखा बहुत कम उपलब्ध है। इस पर गौरीपद चटर्जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तकमिदनापुरःफोररनर्स आफ इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल है।हमने नंदीग्राम सिंगुर जनविद्रोह के दौरान 2007 में कुछ दस्तावेज डेनिश नार्वे डच आर्काइव से निकालकर अपने ब्लागों पर कुछ लेख लिखे थे। तब जिस प्लेटफार्म में ब्लागिंग हती थी, वह अब हैं ही नहीं, वे दस्तावेज हासिल नहीं कर सकते। नये सिरे से खोज करनी होगी। लेकिन आप चाहे तो इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें। इसका लिंक इस प्रकार हैः -

    http://books.google.co.in/books?id=75-a8FSPmvQC&pg=PA6&lpg=PA6&dq=First+Chuar+Rebellion+(1767.)&source=bl&ots=rEFYEp4Gz5&sig=ALlEcA2uUT823OsrvqBqAgohVng&hl=en&sa=X&ei=QwQiU6bqJ4aYrgfG8IDIDg&ved=0CCgQ6AEwAA#v=onepage&q=First%20Chuar%20Rebellion%20(1767.)&f=false

    चुआड़ विद्रोह शामिल लोग सभी जातियों और धर्मों के भारतीयराजे रजवाड़े महाराष्ट्र से लेकर पूर्वी बंगाल, असम, मध्य भारत, आंध्र बिहार, झारखण्ड और ओड़ीशा तक ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ रहे थे। खासकर बंगाल, ओड़ीशा, झारखण्ड और बिहार में तो चुआड़ विद्रोह ने ईस्टइंडिया कंपनी की नाक में दम कर दिया था।

    इन बागियों को चोर चूहाड़ अपराधी बताकर और उनके विद्रोह को चुआड़ यानी चूहाड़ विद्रोह बताकर बेररहमी से दबाया गया। बागियों के थोक दरों पर सूली पर चढ़ा दिया गया। फांसी पर लटकाया गया। लेकिन भारतीय इतिहास में इस विद्रोह की कोई चर्चा ही नहीं है।

    Warren Hastings failed to quell the Chuar uprisings. The district administrator to Bankura wrote in his diary in 1787 that the Chuar revolt was so widespread and fierce that temporarily, the Company's rule had vanished from the district of Bankura. Finally in 1799 the Governor General, Wellesley crushed these uprisings by a pincer attack. An area near Salboni in Midnapore district, in whose mango grove many rebels were hung from trees by the British, is still known by local villagers as "the heath of the hanging upland", Phansi Dangar Math. Some years later under the leadership of Jagabandhu the paymaster or Bakshi (of the infantry of the Puri Raja), there was the well-known widespread Paik or retainer uprising in Orissa. In 1793 the Governor General Cornwallis initiated in the entire Presidency of Bengal a new form of Permanent Settlement of revenue to loyal landlords. This led to misfortunes for the toiling peasantry: in time they would protest against this as well.

    आदिवासी विद्रोहों को आदरणीया महाश्वेता देवी ने कथा साहित्य का विषय बना दिया। उनका अरण्येर अधिकारउपन्यास कम दस्तावेज ज्यादा है। वरना हिंदी और बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं के लोग बिरसा मुंडा के बारे में वैसे ही अनजान होते जितने सिधो कान्हों, टांट्या भील, तीतूमीर के बारे में।

     हमारा जो मुख्य मुद्दा है वह यह है कि आजादी के बाद तक तेभागा और खाद्य आन्दोलन और यहां तक कि नक्सलबाड़ी जनविद्रोह में जो समूचा कृषि समाज संघठित प्रतिरोध संघर्ष में एकताबद्ध रहा,वह पराधीन भारत में किसानों और आदिवासियों का सम्मिलित कृषि समाज रहा है,जिसमें शूद्रों और अछूतों और मुसलमानों की नेतृत्वकारी विरासत थी,उसे हम कहां छोड़ आये।  वह दरअसल छूटा नहीं, अस्मिता जाति पहचान वर्ग विमर्श के घटाटोप में बिखरता चला गया और हमें इसका होश ही नहीं रहा। सरेराह चलते चलते धोती लंगोट उतर गयी, हमें पता ही न चला। आज हिन्दुत्व पुनरुत्थान के इस मुक्तबाजारी जायनवादी समय में हमें अगर मुकाबले में कहीं खड़ा होना है, तो अपनी उस गौरवशाली विरासत में प्रतिरोध की जमीन खोजनी होगी। चूहों की मातबरी में कम से कम परिवर्तन या क्रांति असम्भव है, इस बुनियादी तथ्य को दिमाग में तौल लें और फिर मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और उसके मद्देनजर अपनी भूमिका तय करें, तभी हम कुछ कर सकते हैं। 

    आम लोगों को सत्ता, राजनीति, राष्ट्र, समाज और अर्थव्यव्स्था में हो रहे बदलाव के बारे में सही सही सूचना ही नहीं हो पाती। इसलिये वे भाव वादी तरीके से सोच रहे होते हैं।

    जाति पहचान के जरिये सशक्तीकरण के फायदे पाने वाली जातियों के नाम गिना दीजिये तो बाकी छह हजार जातियों की जाति अंधता का औचित्य पानी की तरह सरल हो जायेगा।

    हमारे हिसाब से तो भ्रष्टाचार की जड़ है यह जाति व्यवस्था और उसकी विशुद्धता का सिद्धांत। वर्णवर्चस्वी इंतजामात में भ्रष्टाचार का कारखाना है और वंशवादी वायरल से बचता नहीं कोई छोटा या बड़ा। जाति और विवाह के जटिल प्रबंधकीय खर्च के लिये ही बेहिसाब अकूत संपत्ति अर्जित करने की जरुरत होती है।

    बंगाल में 35 साल के वाम शासन से और जो हुआ हो, उससे इतना तो जरूर हुआ है कि वैवाहिक संबंधों में जाति धर्म या भाषा का टंटा खत्म है और दहेज न होने की वजह से सार्वजनिक जीवन में तमाम समस्याओं और आर्थिक बदहाली के बावजूद लोग तनावरहित आनंद में हैं।

    जहां जाति का बवंडर ज्यादा है, वहां अंधाधुंध कमाने की गरज बाकायदा कन्यादायी पिता की असहाय मजबूरी है। उत्तर भारतीय परिवार और समाज में ज्यादा घना इस जाति घनघटाओं की वजह से ही हैं।

    जाति राजनीति की वजह से आप प्लेटो में परोसे जाने वाले मुर्ग मुसल्लम को रहमोकरम पर हैं।

    आप जाति उन्मूलन कर दीजिये। विवाह सम्बंधों को खुल्ला कर दीजिये, भ्रष्टाचार की सामाजिक जड़ें खत्म हो जायेंगी।

    आदरणीय एके पंकज ने जो सवाल किया है, उसके जवाब में हमारे प्रगतिशील पाखण्ड का भंडा फूट जाता है और बदलाव मुहिम की कलई भी खुल जाती है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि हम बिरसा को सुनते हुए भगत सिंह से मिलने लगते हैं और भगत सिंह के बाद अगली मुलाकात चे से होती है, फिर उत्सुकता से भगत सिंह और चे दोनों बिरसा के उलगुलान की कहानी सुनकर एक ही साथ बोल पड़ते हैं 'इंकलाब-जिंदाबाद!'इसी के साथ अम्बेडकर भी सॉलिडारिटी में आ खड़े होते हैं, लेकिन पता नहीं बिरसा के आदिवासी दर्शन से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है?

    आपके पास इस यक्ष प्रश्न का कोई जवाब हो तो जरूर दें। डरें नहीं, गलत जवाब पर आपका सर नहीं फूटने वाला है क्योंकि राजा विक्रमादित्य के साथ ही वेताल का भी अवसान हो गया है।

    आदरणीय हिमांशु कुमार जी ने जो लिखा है, एकदम सही लिखा है।

    आज़ाद भारत में सोनी सोरी, अपर्णा मरांडीदयामनी बारला, आरती मांझी ही क्यों जेल में डाली जा रही हैं।

    आखिर आदिवासी औरतें ही भारतीय राष्ट्र की शत्रु क्यों मानी जा रही हैं? ये कैसा समाज है, ये कैसा विकास है, ये कैसी राजनीति है? दिक्कत की बात यह है कि कमोबश यह सब हमें स्वीकार भी है।

    About The Author

    पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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    जो बहुजनों का कारपोरेट वधस्थल पर वध का एकमुश्त सुपारी ले चुके हैं, क्या बाबासाहेब की विरासत सिर्फ उन्हीं की है?

    पलाश विश्वास

    जो बहुजनों का कारपोरेट वधस्थल पर वध का एकमुश्त सुपारी ले चुके हैं, क्या बाबासाहेब की विरासत सिर्फ उन्हीं की है?


    अनिता भारती जी हमारी अत्यंत आदरणीया लेखिका हैं,जातिभेद के उच्छेद विषय पर अरुंधति के लिखने पर उन्हें सख्त एतराज है।अनिता जी का सवाल है कि सवाल यह नही कि अरुंधति क्यों लिख रही है, और अभी ही क्यों लिख रही है जबकि जातिभेद के उच्छेद पर दिया गया भाषण जो की बाद में एक पुस्तक के रुप में बहुत पहले आ चुका है. इस पर वर्षों से चर्चा होती रही है. तमाम साथी जो बाबासाहेब को पढना शुरु करते है, सबसे पहले यही किताब पढते है. अरुंधति के इस पुस्तक को कोट करने या इस पर लिखने से यह किताब ज्यादा महत्वपूर्ण नही हो गई है. यहां यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि क्या जैसे कि अधिकांश अति प्रगतिशील बुद्धिजीवी अम्बेडकर के बरक्स गांधी और मार्क्स को, और उनकी विचाधारा को कहीं अधिक व्यावहारिक, लोकप्रिय, प्रभावशाली, निष्पक्ष, सैद्धांतिक, उपचारपरक, ममाधान करने वाली सिद्ध करते रहे है, क्या अरुंधति ने भी वैसा ही दिखाया है या साबित किया है. क्योंकि दलित, भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा दूध के जले है इसलिए छाछ को भी फुंक फूंक कर पीते है. आशीष नंदी और योगेन्द्र यादव इसके ताजा तरीन उदाहरण है. वैसे मेरा भी एक सवाल है अरुंधति से. जब तब इस देश में दलितों पर जुल्मोसितम की बाढ़ आई रहती है, वे इस पर कब-कब बोली है या उन्होने कितनी बार दलितो की बस्ती का दौरा किया है?

    इस पर   मेरा यह  जवाब हैः


    • अनिता जी ,मालूम नहीं,अरुंधति इस पर क्या जवाब देंगी।लेकिन दलित बस्तियों में नीला झंडा उठाये लोगों ने बाबासाहेब का एजंडा का जो हश्र किया और जाति व्यवस्था बहाल रखने वाली मुक्त बाजारी धर्मोन्मादी हिंदुत्व में जो ब्रांडेड फौज स‌माहित हो गयी है,तो राज्यतंत्र को स‌मझ लेने में कोई हर्ज नहीं है।फिलहाल राज्यतंत्र को विश्लेषित करने में अरुंधति का कोई जवाब नहीं है।फिर मुक्त बाजारी जायनवादी उत्तरआधुनिक मनुव्यवस्था की बहाली के लिए जब शासक वरणवर्चस्वी तबका अस्पृश्यों को अपना स‌िपाहसालार बनाने को तत्पर है,तो अरुंधति जैसी स‌क्षम विश्लेषक को स‌िरे स‌े खारिज करके हम कोई बुद्धिमत्ता नहीं दिखायेंगे।हमारे जो मलाईदार लोग हैं,आरक्षण स‌मृद्ध नवधनाढ्य वे कितनी बार स‌त्ता हैसियत छोड़कर अपने लोगों के बीच जाते रहे हैं,इसका भी हिसाब होना चाहिए।

    • आपके इस मंतव्य स‌े मैं स‌िरे स‌े असहमत हूं क्योंकि हम मौजूदा तंत्र को तोड़ने के लिए धर्मोन्मादी स‌त्ता के स‌मरस स‌मागम के प्रतिरोध के लिए स‌मावेशी बहुसंख्य गठजोड़ का पक्षधर हूं।

    • अस्मिता राजनीति के लोग तो अब स‌ुपारी किलर हो गये हैं जो रपोरेटवधस्थल में बहुसंख्यआबादी जिनमें बहिष्कृत मूक जनगण ही हैं,के नरसंहार हेतु पुरोहिती स‌ुपारी किलर बन गये।मसीहों और दूल्हों की स‌वारी स‌े अब कोई उम्मीद किये बिना इस पूरे तंत्र को नये स‌िरे स‌े स‌मझने की जरुरत है।अंबेडकर को तो मूर्ति बना दिया गया है,उनमें नये स‌िरे स‌े प्राण प्रतिष्ठा की जरुरत है।

    • अनिता जी मैं आपके इस मंतव्य पर एक संवाद चाहता हूं ताकि हम लोग इस बारे में स‌िलसिलेवार बतिया लें।उम्मीद हैं कि न स‌िर्फ आप अपना पक्ष और खुलकर लिखेंगी बल्कि दूसरों के मतामत पर लोकतांत्रिक तरीके स‌े गौर करेंगी।

    अरुंधति की बात क्या करें,हमारे लोग तो बाबासाहेब के परिजनों में से एक अंबेडकरी आंदोलन के वस्तुवादी अध्येता और चिंतक आनंद तेलतुंबड़े को भी कम्युनिस्ट कहकर गरियाते हैं।क्योंकि वे अंबेडकर की प्रासंगिकता बनाये रखने की कोशिस कर रहे हैं और दुकानदार प्रजाति के लोग तो अंबेडकरी आंदोलन का बतौर एटीएम इस्तेमाल जो कर रहे हैं सो कर रहे हैं,अंबेडकरी साहित्यको भी मरी हुई मछलियों की तरह हिमघर में बंद कर देना चाहते हैं।लोग कुछ अपढ़,अधपढ़ लोग,जिनकी एकमात्र पहचान जाति है और खास विशेषता पुरखों के नाम का अखंड जाप,ऐसे लोगों के बाजारु फतवेबाज टार्च की रोशनी में अंबेडकर का अध्ययन हो,तो हो गयी क्रांति।


    अगर मार्क्सवाद के सिद्धांतकार कार्ल मार्क्स,रूसी क्रांति के महानायकों लेनिन स्तालिन,चीनी जनक्रांति के नेता माओ या फ्रांसीसी क्रांति के सिद्धांतकार हाब्स लाक रुसो,अश्वेत क्रांति के नायकों के साहित्य और उनपर आधारित आंदोलनों पर ऐसा फतवा लागू होता तो पूरी दुनिया पर तो क्या,उनके अपने देश में भी कोई असर नहीं होता।


    सम्राट अशोक ने अपने पुत्र और पुत्री को गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचारक बतौर विश्वयात्रा पर भेजा था,इसीलिए प्रतिक्रांति के जरिये बौद्धमय भारतवर्ष के अवसान के बाद भी दुनियाभर में गौतम बुद्ध के विचारों की विजयपताका लहरा रही है आज भी।


    गौतम बुद्ध की रक्तहीन क्रांति में कौन सी अस्मिता काम कर रही थी और उसकी क्या वर्गचेतना रही है,इसपर विद्वतजन शोध करके हमें आलोकित करें तो बेहतर।


    विचार हमेशा संक्रामक होते हैं। अगर अंबेडकर विचारधारा में आस्था है तो अंबेडकर विचारधारा और उनके साहित्य पर सभी समुदायों ,सभी देशों में विमर्श चलें तो अनिता जी जैसी सक्षम लेखिका को ऐतराज क्यों होना चाहिए।


    देश में जो लोग कारपोरेट राज चला रहे हैं,उनके सिद्धांतकारों के खिलाफ क्यों नहीं हमारे लोग फतवा जारी करते कि अमर्त्यसेन भुखमरी पर शोध कैसे कर सकते हैं या मोंटेक सिंह आहलूवालिया या तेंदुलकर गरीबी रेखा कैसे परिभाषित कर सकते हैं।


    बहुजन साहित्य और बहुजन आंदोलन के तौर तरीके ब्राह्मणवादी होते गये हैं,क्योंकि हम भी शुद्ध अशुद्ध जिसपर सारी नस्ली बंदोब्सत तय है,उसीको उन्हींकी शैली अपनाकर खुद को शुद्ध साबित करके नव पुरोहित बनते जा रहे हैं।


    बहुजनों में विमर्श अनुपस्थित  है और कोई संवाद नहीं है क्योंकि पहले से ही आप तय कर लेते हैं कि कौन दलित हैं ,कौन दलित नहीं है,कौन ओबीसी है कौन ओबीसी नहीं है।फिर त्थ्य विश्लेषण करने से पहले आप सीधे किसी को भी ब्राह्मण या ब्राह्मण का दलाल  याफिरक कम्युनिस्ट,वामपंथी या माओवादी डिक्लेअर कर देते हैं।


    सत्तावर्ग के लोग ऐसी गलती हरगिज नहीं करते हैं और हर पक्ष को आत्मसात करके ही उनकी सत्ता चलती है।


    देख लीजिये, हिंदू साम्राज्य के राजप्रासाद की ईंटों की शक्लों की कृपया शिनाख्त कर लें।


    हमारे लोग दूसरे पक्ष को सुनेंगे नहीं,पढ़ेंगे नहीं,तो बहुजन साहित्य के नाम पर कोई भी अपने अपने प्रवचन को पुस्तकाकार छाप बांटकर जो मसीहागिरि का कारोबार खोल रखा है,उसकी असलियत का पता भी नहीं चलेगा।अंबेडकरी विचारधारा और आंदोलन पर सही संवाद में सबसे बड़ी बाधा यही है कि हर ब्रांड के हर दुकानदार ने अपना अपना अंबेडकर छाप दिया है।हर ब्रांड का अंबेडकर बिकाऊ है।और असली अंबेडकर बाकायदा निषिद्ध धर्मस्थल है और अंबेडकर विमर्श गुप्त तांत्रिक क्रिया है और इस विद्या के अधिकारी बहुजन भी नहीं है।संस्कृत मंत्र की तरह है अंबेडकर साहित्य,जिसका उच्चारण जनेऊधारी द्विज ही कर सकते हैं।


    वैदिकी पवित्र ग्रंथ पढ़ने पर शूद्रों के कानों में शीशा तोप देने का वैदिकी रिवाज रहा है तो क्यागैरबहुजन अबेडकर विमर्श में सामिल होने की जुर्रत करें तो उनके खिलाफ भी हिंदुत्ववादियों के राम मंदिर आंदोलन की तर्ज पर इतिहास का बदला ले लिया जाये।


    मैंने अंबेडकरी आंदोलन पर अरुंधति का लिखा पढ़ा है और उसे बेहद विचारोत्तेजक माना है।लेकिन उस पर जो सवाल जवाब हो रहे हैं,वे अरुंधति की पहचान पर केंद्रित हैं,न मुद्दोंपर,न देश काल परिस्थिति पर और न ही अंबेडकरी विचार और आंदोलन पर।यह अत्यंत दुर्भाग्यजनक है।


    वाम आंदोलन में भले ही नेतृत्व शासक जातियों का है,लेकिन वहां भी पैदल सेना हमारे लोग ही जैसे भगवा वाहिनी की बनावट है,वैसी ही लालसेना है। नीले रंग की मिलावट की जांच भी तो होनी चाहिए।वरना बार बार बहुजन हाथी गणेश बनता रहेगा और आपके महाजन हिंदुत्व के खंभे बनते चले जायेंगे।


    जाति उन्मूलन के एजंडे पर बहस चलने की बात करती हैं आप।तो बहस होने क्यों नहीं देती


    बहस होचुकी है तो जाति उन्मूलन एजंडा का ताजा स्टेटस क्या है


    अगर बहुजन राजनीति जाति उन्मूलन के एजंडे को ही लागू कर रही है तो जाति अस्मिता को केंद्रित क्यों हैं वह


    तो क्या जाति उन्मूलन के एजंडे पर बहस हो ही नहीं सकती


    अंततः अंबेडकर साहित्य भारतीय जनगण की अमूल्य धरोहर है क्योंकि इस लोक गणराज्य के संविधान के निर्माता भी बाबा साहेब हैं।इस हिसाब से तो देखें तो अंबेडकर साहित्य पर बारत के हर नागरिक का समान अधिकार है।


    अगर कोई भी वामपंथ और संघ परिवार की विचारधारा और दुनियाभर के दर्शन, गांधीवाद, समाजवाद, लोहियावाद पर विचार कर सकता है,मंतव्य कर सकता है और उनको ऐतराज भी नहीं होता तो बाबासाहेब के आंदोलन और उनके साहित्य का ठेका तय करके निषिद्ध धर्मस्थल में बाबा साहेब की मूर्ति की रस्मी पूजा से हमारे लोग आखिरकार केसके हित साध रहें हैं,इसपर आत्मालोचना बेहद जरुरी है।


    बहुजन राजनीति कुल मिलाकर आरक्षण बचाओं राजनीति रही है अबतक।


    वह आरक्षण जो अबाध आर्थिक जनसंहार की नीतियों, निरंकुश कारपोरेट राज,निजीकरण,ग्लोबीकरण और विनिवेश,ठेके पर नौकरी की वजह से अब सिरे से गैरप्रासंगिक है।


    आरक्षण की यह राजनीति जो खुद मौकापरस्त और वर्चस्ववादी है और बहुजनों में जाति व्यवस्था को बहाल रखने में सबसे कामयाब औजार भी है,अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजंडे को हाशिये पर रखकर सत्ता नीति  अपनी अपनी जाति को मजबूत बनाने लगी है।


    अनुसूचित जनजातियों में एक दो आदिवासी समुदायों के अलावा समूचे आदिवासी समूह को कोई फायदा हुआ हो,ऐसा कोई दावा नहीं कर सकता।संथाल औऱ भील जैसे अति परिचित आदिवासी जातियों को देशभर में सर्वत्र आरक्षण नहीं मिलता।


    अनेक आदिवासी जातियों को आदिवासी राज्यों झारखंड और छत्तीसगढ़ में ही आरक्षण नहीं मिला है।


    इसी तरह अनेक दलित और पिछड़ी जातियां आरक्षण से बाहर हैं।


    जिस नमोशूद्र जाति को अंबेडकर को संविधान सभा में चुनने के लिए भारत विभाजन का दंश सबसे ज्यादा झेलना पड़ा और उनकी राजनीतिक शक्ति खत्म करने के लिए बतौर शरणार्थी पूरे देश में छिड़क दिया गया,उन्हें बंगाल और उड़ीशा के अलावा कहीं आरक्षण नहीं मिला।


    मुलायम ने उन्हें उत्तरप्रदेश में आरक्षण दिलाने का प्रस्ताव किया तो बहन मायावती ने वह प्रस्ताव वापस ले लिया और अखिलेश ने नया प्रस्ताव ही नहीं भेजा।उत्तराखंड में उन्हें शैक्षणिक आरक्षण मिला तो नौकरी में नहीं और न ही उन्हें वहां राजनीति आरक्षण मिला है।


    जिन जातियों की सामाजिक राजनीतिक आर्थिक स्थिति आरक्षण से समृद्ध हुई वे दूसरी वंचित जाति को आरक्षण का फायदा देना ही नहीं चाहतीं।


    मजबूत जातियों की आरक्षण की यह राजनीति यथास्थिति को बनाये रखने की राजनीति है,जो आजादी की लड़ाई में तब्दील हो भी नहीं सकती।


    इसलिए बुनियादी मुद्दं पर वंचितों को संबोधित करने के रास्ते पर सबसे बड़ी बाधा बहुजन राजनीति के झंडेवरदार,ब्रांडेड ग्लोबीकरण समर्थक बुद्धिजीवी और आरक्षणसमृद्ध पढ़े लिखे लोग हैं।लेकिन बहुजन समाज उन्हीके नेतृत्व में चल रहा है।


    हमने निजी तौर पर देश भर में बहुजन समाज के अलग अलग समुदायों के बीच जाकर उनको उनके मुहावरे में संबोधित करने का निरंतर प्रयास किया है और ज्यादातर आर्थिक मुद्दों पर ही उनसे संवाद किया है,लेकिन हमें हमेशा इस सीमा का ख्याल रखना पड़ा है।


    वैसे ही मुख्यधारा के समाज और राजनीति ने भी आरक्षण से इतर  बाकी मुद्दों पर उन्हें अबतक किसी ने संबोधित ही नहीं किया है।


    जाहिर है कि जानकारी के हर माध्यम से वंचित बाकी मुद्दों पर बहुजनों की दिलचस्पी है नहीं, न उसको समझने की शिक्षा उन्हें है और बहुजन बुद्धिजीवी,उनके मसीहा और बहुजन राजनीति के तमाम दूल्हे मुक्त बाजार के कारपोरेट जायनवादी धर्मोन्मादी महाविनाश को ही स्वर्णयुग मानते हैं और इस सिलसिले में उन्होंने वंचितों का ब्रेनवाश किया हुआ है।


    बाकी मुद्दों पर बात करें तो वे सीधे आपको ब्राह्मण या ब्राह्मण का दलाल और यहां तक कि कारपोरेटएजेंट तक कहकर आपका सामाजिक बहिस्कार कर देंगे।


    अरुंधति का लिखा समझने की तकलीफ उठाने को भी तैयार नहीं हो सकते बहुजन पढ़े लिखे लोग।


    बहुजनों की हालत देशभर में स‌मान भी नहीं है।


    मसलन अस्पृश्यता का रुप देशभर में स‌मान है नहीं।जैसे बंगाल में अस्पृश्यता उस रुप में कभी नहीं रही है जैसे उत्तरभारत,महाराष्ट्र,मध्यभारत और दक्षिण भारत में।


    इसके अलावा बंगाल और पूर्वी भारत में आदिवासी,दलित,पिछड़े और अल्पसंख्यकों के स‌ारे किसान स‌मुदाय बदलते उत्पादन संबंधों के मद्देनजर जल जंगल जमीन और आजीविका की लड़ाई में स‌दियों स‌े स‌ाथ स‌ाथ लड़ते रहे हैं।


    मूल में है नस्ली भेदभाव,जिसकी वजह स‌े भौगोलिक अस्पृश्यता भी है।महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की तरह बाकी देश में जाति पहचान स‌ीमाबद्ध मुद्दों पर बहुजनों को संबोधित किया ही नहीं जा स‌कता।


    आदिवासी जाति स‌े बाहर हैं तो मध्यभारत,हिमालय और पूर्वोत्तर में जातिव्यवस्था के बावजूद अस्पृश्यता के बजाय नस्ली भेदभाव के तहत दमन और उत्पीड़न है।


    उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त करने,कृषि को खत्म करने की जो कारपोरेट जायनवादी धर्मोन्मादी राष्ट्रव्यवस्था है,उसे महज अंबेडकरी आंदोलन और अंबेडकर के विचारों के तहत संबोधित करना एकदम असंभव है।फिर भारतीय यथार्थ को संबोधित किये बिना साम्यवादी आंदोलन के जरिये भी सामाजिक शक्तियों की राज्यतंत्र को बदलने के लिए गोलबंद करना भी असंभव है।


    यह बात आनंद तेलतुंबड़े जी भी अक्षरशः मानते हैं।




    ध्यान देने की बात है कि अंबेडकर को महाराष्ट्र और बंगाल के अलावा कहीं कोई उल्लेखनीय स‌मर्थन नहीं मिला।


    लंदन में गोलमेज सम्मेलन के वक्त पंजाब में जो बाल्मीकियों ने उनका स‌मर्थन किया,वे लोग भी कांग्रेस के स‌ाथ चले गये।


    बंगाल स‌े अंबेडकर को स‌मर्थन के पीछे बंगाल में तब दलित मुस्लिम गठबंधन की राजनीति रही है,भारत विभाजन के स‌ाथ जिसका पटाक्षेप हो गया।


    अब बंगाल में विभाजनपूर्व दलित आंदोलन का कोई चिन्ह नहीं है।बल्कि अंबेडकरी आंदोलन का बंगाल में कोई असर ही नहीं हुआ है।


    अब अंबेडकर आंदोलन जो है ,वह आरक्षण बचाओ आंदोलन के सिवाय कुछ है नहीं।


    बंगाल में नस्ली वर्चस्व का वैज्ञानिक रुप अति निर्मम है,जो अस्पृश्यता के किसी भी रुप को लज्जित कर दें।यहां शासक जातियों के अलावा जीवन के किसी भी प्रारुप में अन्य सवर्ण असवर्ण दोनों ही वर्ग की जातियों का कोई प्रतिनिधित्व है ही नहीं।


    अब बंगाल के जो दलित और मुसलमान हैं,वे शासक जातियों की राजनीति करते हैं और किन्हीं किन्हीं घरों में अंबेडकर की तस्वीर टांग लेते हैं।


    अंबेडकर को जिताने वाले जोगेंद्रनाथ मंडल या मुकुंद बिहारी मल्लिक की याद भी उन्हें नही है।


    इसी वस्तु स्थिति के मुखातिब हमारे लिए अस्पृश्यता के बजाय नस्ली भेदभाव बड़ा मुद्दा है जिसके तहत हिमालयऔर पूर्वोत्तर तबाह है तो मध्य भारत में युद्ध परिस्थितियां हैं।


    जन्मजात हिमालयी समाज से जुड़े होने के कारण हम ऴहां की समस्याओं से अपने को किसी कीमत पर अलग रख नहीं सकते और वे समस्याएं अंबेडकरी आंदोलन के मौजूदा प्रारुप में किसी भी स्तर पर संबोधित की ही नहीं जा सकती जैसे आदिवासियों की जल जंगल जमीन और आजीविका से बेदखली के मुद्दे बहुजन आंदोलन के दायरे से बाहर रहे हैं शुरु से।


    ऐसे में अंबेडकर का मूल्यांकन नये संदर्भों में किया जाना जरुरी ही नहीं,मुक्तिकामी जनता के स्वतंत्रता संग्राम के लिए अनिवार्य है।आप यह काम कर रहे हैं तो मौजूदा हालात के मद्देनजर आपको और ज्यादा जिम्मेदारी उठानी होगी।


    गैरबहुजन साम्यवादी लोग इस सिलसिले में  जो प्रयोग कर रहे हैं,उसकी एक भौगोलिक सीमा है।वे जिन लोगों से संवाद कर रहे हैं,वे आंदोलन के साथी बहुजन  हैं।वंचित समुदायों के होने के बावजूद उत्पादन प्रणाली में अपना अस्तित्व बनाये रखने की लड़ाई में वे आम बहुजन मानसिकता को तोड़ पाने में कामयाब हैं।इसलिए उन्हें  विमर्श की भाषा समझने में कोई दिक्कत होगी नहीं।


    फिर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय,मुंबई विश्वविद्यालय या कोई भी विश्वविद्यालय परिसर मूक अपढ़ हमेशा दिग्भ्रमित कर दिया जाने वाला सूचना तकनीक वंचित भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता।


    यह सामाजिक संरचना बेहद जटिल है और इसके भीतर घुसकर उन्हें आप अंबेडकर के मूल्यांकन के लिए राजी करें और अंबेडकर के प्रासंगिक विचारों के साथ बुनियादी परिवर्तन के लिए राजी करें,इसके लिए आपकी भाषा भी आपकी रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।ऐसा मेरा मानना है।


    हम तो आपको सही मायने में जनप्रतिबद्ध कार्यकर्ता के रुप में सबसे ज्यादा कुशल व प्रतिभासंपन्न तब मानेंगे जब वैज्ञानिक विश्लेषण आप बहुजनों के मूक जुबान से करवाने में कमायाब है।खुद काम करना बहुत कठिन भी नहीं है,लेकिन विकलांग लोगों से काम करवा लेने की कला भी हमें आनी चाहिए,खासकर तब जबकि वह काम किसी विकलांग समाज के वजूद के लिए बेहद जरुरी है।


    चुनौती यह है कि हम अंबेडकर का पूनर्मूल्यांकन कर सकते हैं, लेकिन इसका असर इतना नहीं होगा ,जितना कि खुद बहुजनों को हम अंबेडकर के पुनर्मूल्यांकन के लिए तैयार कर दें,एसी स्थिति बना देने का।दरअसल हमारा असली कार्यभार यही है।


    हमारी पूरी चिंता उन वंचितों को संबोधित करने की है,जिनके बिना इस मृत्युउपत्यका के हालात बदले नहीं जा सकते।


    किसी खास भूगोल या खास समुदाय की बात हम नहीं कर रहे हैं,पूरे देश को जोड़ने की वैचारिक हथियार से देशवासियों के बदलाव के लिए राजनीतिक तौर पर गोलबंद करने की चुनौती हमारे समाने हैं।


    क्योंकि बदलाव के तमाम भ्रामक सब्जबाग सन सैंतालीस से आम जनता के सामने पेश होते रहे हैं और उन सुनामियों ने विध्वंस के नये नये आयाम ही खोले हैं।


    आप का उत्थान कारपोरेट राजनीति का कायकल्प है जो समामाजिक शक्तियों की गोलबंदी और असमिताओं की टूटन का भ्रम तैयार करने का ही पूंजी का तकनीक समृद्ध प्रायोजिक आयोजन है।


    इसका मकसद जनसंहार अश्वमेध को और ज्यादा अबाध बनाने के लिए है। लेकिन वे संवाद और लोकतंत्र का एक विराट भ्रम पैदा कर रहे हैं और नये तिलिस्म गढ़ रहे हैं।उस तिलिस्म कोढहाना भी मुक्तिकामी जनता के हित में अनिवार्य है,जो आप बखूब गढ़ रहे हैं।


    जहां तक तेलतुंबड़े का सवाल है,अगर बहुजन राजनीति का अभिमुख बदलने की मंशा हमारी है तो महज आनंद तेलतुंबड़े नहीं, कांचा इलेय्या, एचएल दुसाध, उर्मिलेश, गद्दर, आनंद स्वरुप वर्मा जैसे तमाम चिंतकों और सामाजिक तौर पर प्रतिबद्ध तमाम लोगों से हमें संवाद की स्थिति बनानी पड़ेगी।ये लोग बहुजन राजनीति नहीं कर रहे हैं।

    हमें आनंद पटवर्द्धन और अरुंधति राय की दलीलों पर भी गौर करना होगा।


    तभी मौजूदा मुक्त बाजार में हम अंबेडकरी आंदोलन और स्वयं अंबेडकर को मुक्तिकामी जनपक्षधर ब्रह्ामास्त्र में तब्दील कर सकते हैं।


    अंबेडकर के पुनर्मूल्यांकन अगर होना है तो संवाद और विमर्श से ऐसे लोगों के बहिस्कार से हम बहुजन मसीहा और दूल्हा संप्रदायों के लिए खुल्ला मैदान छोड़ देंगे।जो बहुजनों का कारपोरेट वधस्थल पर वध का एकमुश्त सुपारी ले चुके हैं।



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    The Doctor and the Saint

    ARUNDHATI ROY

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    Ambedkar’s point is that to believe in the Hindu 'shastras' and to simultaneously think of oneself as liberal or moderate is a contradiction in terms.
    Ambedkar’s point is that to believe in the Hindu 'shastras' and to simultaneously think of oneself as liberal or moderate is a contradiction in terms.

    What Gandhi and Ambedkar said and did continue to have an immense bearing on contemporary politics, says the writer in her Introduction to the just released Annihilation of Caste: The Annotated Critical Edition. Exclusive excerpts.

    Annihilation of Caste is B.R. Ambedkar’s most radical text. It is not an argument directed at Hindu fundamentalists or extremists, but at those who considered themselves moderate, those whom Ambedkar called “the best of Hindus”— and some academics call “left-wing Hindus”. Ambedkar’s point is that to believe in the Hindushastras and to simultaneously think of oneself as liberal or moderate is a contradiction in terms. When the text of Annihilation of Caste was published, the man who is often called the ‘Greatest of Hindus’ — Mahatma Gandhi — responded to Ambedkar’s provocation.

    Their debate was not a new one. Both men were their generation’s emissaries of a profound social, political and philosophical conflict that had begun long ago and has still by no means ended. Ambedkar, the Untouchable, was heir to the anticaste intellectual tradition that goes back to 200–100 BCE. Gandhi, a Vaishya, born into a Gujarati Bania family, was the latest in a long tradition of privileged-caste Hindu reformers and their organisations.

    Putting the Ambedkar–Gandhi debate into context for those unfamiliar with its history and its protagonists will require detours into their very different political trajectories. For this was by no means just a theoretical debate between two men who held different opinions. Each represented very separate interest groups, and their battle unfolded in the heart of India’s national movement. What they said and did continues to have an immense bearing on contemporary politics. Their differences were (and remain) irreconcilable. Both are deeply loved and often deified by their followers. It pleases neither constituency to have the other’s story told, though the two are inextricably linked. Ambedkar was Gandhi’s most formidable adversary. He challenged him not just politically or intellectually, but also morally. To have excised Ambedkar from Gandhi’s story, which is the story we all grew up on, is a travesty. Equally, to ignore Gandhi while writing about Ambedkar is to do Ambedkar a disservice, because Gandhi loomed over Ambedkar’s world in myriad and un-wonderful ways.

    The Indian national movement, as we know, had a stellar cast. It has even been the subject of a Hollywood blockbuster that won eight Oscars. In India, we have made a pastime of holding opinion polls and publishing books and magazines in which our constellation of founding fathers (mothers don’t make the cut) are arranged and rearranged in various hierarchies and formations. Mahatma Gandhi does have his bitter critics, but he still tops the charts. For others to even get a look-in, the Father of the Nation has to be segregated, put into a separate category: Who, after Mahatma Gandhi, is the greatest Indian?

    Dr. Ambedkar (who, incidentally, did not even have a walk-on part in Richard Attenborough’s Gandhi, though the film was co-funded by the Indian government) almost always makes it into the final heat. He is chosen more for the part he played in drafting the Indian Constitution than for the politics and the passion that were at the core of his life and thinking. You definitely get the sense that his presence on the lists is the result of positive discrimination, a desire to be politically correct.

    The fact is that neither Ambedkar nor Gandhi allows us to pin easy labels on them that say ‘pro-imperialist’ or ‘anti-imperialist’. Their conflict complicates and perhaps enriches our understanding of imperialism as well as the struggle against it.

    History has been kind to Gandhi. He was deified by millions of people in his own lifetime. Gandhi’s godliness has become a universal and, so it seems, an eternal phenomenon. It’s not just that the metaphor has outstripped the man. It has entirely reinvented him. (Which is why a critique of Gandhi need not automatically be taken to be a critique of all Gandhians.) Gandhi has become all things to all people: Obama loves him and so does the Occupy Movement. Anarchists love him and so does the Establishment. Narendra Modi loves him and so does Rahul Gandhi. The poor love him and so do the rich.

    He is the Saint of the Status Quo.

    Gandhi’s life and his writing — 48,000 pages bound into ninety-eight volumes of collected works — have been disaggregated and carried off, event by event, sentence by sentence, until no coherent narrative remains, if indeed there ever was one. The trouble is that Gandhi actually said everything and its opposite. To cherry pickers, he offers such a bewildering variety of cherries that you have to wonder if there was something the matter with the tree.

    For example, there’s his well-known description of an arcadian paradise in The Pyramid vs. the Oceanic Circle, written in 1946:

    Independence begins at the bottom. Thus every village will be a republic or panchayat having full powers. It follows, therefore, that every village has to be self-sustained and capable of managing its affairs even to the extent of defending itself against the whole world… In this structure composed of innumerable villages there will be ever-widening, never-ascending circles. Life will not be a pyramid with the apex sustained by the bottom. But it will be an oceanic circle whose centre will be the individual always ready to perish for the village… Therefore the outermost circumference will not wield power to crush the inner circle but will give strength to all within and derive its own strength from it.

    Then there is his endorsement of the caste system in 1921 in Navajivan. It is translated from Gujarati by Ambedkar (who suggested more than once that Gandhi “deceived” people, and that his writings in English and Gujarati could be productively compared):

    Caste is another name for control. Caste puts a limit on enjoyment. Caste does not allow a person to transgress caste limits in pursuit of his enjoyment. That is the meaning of such caste restrictions as inter-dining and inter-marriage… These being my views I am opposed to all those who are out to destroy the Caste System.

    Is this not the very antithesis of “ever-widening and never ascending circles”?

    It’s true that these statements were made twenty-five years apart. Does that mean that Gandhi reformed? That he changed his views on caste? He did, at a glacial pace. From believing in the caste system in all its minutiae, he moved to saying that the four thousand separate castes should ‘fuse’ themselves into the four varnas (what Ambedkar called the ‘parent’ of the caste system). Towards the end of Gandhi’s life (when his views were just views and did not run the risk of translating into political action), he said that he no longer objected to inter-dining and intermarriage between castes. Sometimes he said that though he believed in the varna system, a person’s varna ought to be decided by their worth and not their birth (which was also the Arya Samaj position). Ambedkar pointed out the absurdity of this idea: “How are you going to compel people who have achieved a higher status based on their birth, without reference to their worth, to vacate that status? How are you going to compel people to recognise the status due to a man in accordance to his worth who is occupying a lower status based on his birth?” He went on to ask what would happen to women, whether their status would be decided upon their own worth or their husbands’ worth.

    Gandhi never decisively and categorically renounced his belief in chaturvarna, the system of fourvarnas. Still, why not eschew the negative and concentrate instead on what was good about Gandhi, use it to bring out the best in people? It is a valid question, and one that those who have built shrines to Gandhi have probably answered for themselves. After all, it is possible to admire the work of great composers, writers, architects, sportspersons and musicians whose views are inimical to our own. The difference is that Gandhi was not a composer or writer or musician or a sportsman. He offered himself to us as a visionary, a mystic, a moralist, a great humanitarian, the man who brought down a mighty empire armed only with Truth and Righteousness. How do we reconcile the idea of the non-violent Gandhi, the Gandhi who spoke Truth to Power, Gandhi the Nemesis of Injustice, the Gentle Gandhi, the Androgynous Gandhi, Gandhi the Mother, the Gandhi who (allegedly) feminised politics and created space for women to enter the political arena, the eco-Gandhi, the Gandhi of the ready wit and some great one-liners — how do we reconcile all this with Gandhi’s views (and deeds) on caste? What do we do with this structure of moral righteousness that rests so comfortably on a foundation of utterly brutal, institutionalised injustice? Is it enough to say Gandhi was complicated, and let it go at that? There is no doubt that Gandhi was an extraordinary and fascinating man, but during India’s struggle for freedom, did he really speak Truth to Power? Did he really ally himself with the poorest of the poor, the most vulnerable of his people?

    “It is foolish to take solace in the fact that because the Congress is fighting for the freedom of India, it is, therefore, fighting for the freedom of the people of India and of the lowest of the low,” Ambedkar said. “The question whether the Congress is fighting for freedom has very little importance as compared to the question for whose freedom is the Congress fighting.”

    In 1931, when Ambedkar met Gandhi for the first time, Gandhi questioned him about his sharp criticism of the Congress (which, it was assumed, was tantamount to criticising the struggle for the Homeland). “Gandhiji, I have no Homeland,” was Ambedkar’s famous reply. “No Untouchable worth the name will be proud of this land.”

    History has been unkind to Ambedkar. First it contained him, and then it glorified him. It has made him India’s Leader of the Untouchables, the King of the Ghetto. It has hidden away his writings. It has stripped away the radical intellect and the searing insolence.

    All the same, Ambedkar’s followers have kept his legacy alive in creative ways. One of those ways is to turn him into a million mass-produced statues. The Ambedkar statue is a radical and animate object. It has been sent forth into the world to claim the space — both physical and virtual, public and private — that is the Dalit’s due. Dalits have used Ambedkar’s statue to assert their civil rights — to claim land that is owed them, water that is theirs, commons they are denied access to. The Ambedkar statue that is planted on the commons and rallied around always holds a book in its hand. Significantly, that book is not Annihilation of Caste with its liberating, revolutionary rage. It is a copy of the Indian Constitution that Ambedkar played a vital role in conceptualising — the document that now, for better or for worse, governs the life of every single Indian citizen.

    Using the Constitution as a subversive object is one thing. Being limited by it is quite another. Ambedkar’s circumstances forced him to be a revolutionary and to simultaneously put his foot in the door of the establishment whenever he got a chance to. His genius lay in his ability to use both these aspects of himself nimbly, and to great effect. Viewed through the prism of the present, however, it has meant that he left behind a dual and sometimes confusing legacy: Ambedkar the Radical, and Ambedkar the Father of the Indian Constitution. Constitutionalism can come in the way of revolution. And the Dalit revolution has not happened yet. We still await it. Before that there cannot be any other, not in India.

    Excerpted from the “The Doctor and the Saint”, Arundhati Roy’s book-length introduction to Dr. B.R. Ambedkar’s Annihilation of Caste: The Annotated Critical Edition, Navayana, Rs.525.

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    NARENDRA BISHT
    INTERVIEW
    "We Need Ambedkar--Now, Urgently..."
    The Booker prize-winning author on her essay The Doctor and the Saint and more


    Almost half of the 400-page book is Roy’s essay, the other half Annihilation of Caste. Roy writes about caste in contemporary India before getting into the Gandhi-Ambedkar stand-off. Taking off from what Ambedkar described as “the infection of imitation”, the domino effect of each caste dominating the ones lower down in the hierarchy, Roy says, “The ‘infection of imitation’, like the half-life of a radioactive atom, decays exponentially as it moves down the caste ladder, but never quite disappears. It has created what Ambedkar describes as the system of ‘graded inequality’ in which even the ‘low is privileged as compared with lower. Each class being privileged, every class is interested in maintaining the system’”.

    However, the thrust of Roy’s powerful but disturbing essay deals with her exploration of the Gandhi-Ambedkar debate, and the man deified as the father of the nation does not come off well in this book. She writes: “Ambedkar was Gandhi’s most formidable adversary. He challenged him not just politically or intellectually, but also morally. To have excised Ambedkar from Gandhi’s story, which is the story we all grew up on, is a travesty. Equally, to ignore Gandhi while writing about Ambedkar is to do Ambedkar a disservice, because Gandhi loomed over Ambedkar’s world in myriad and un-wonderful ways.”

    The Doctor and the Saint, your introduction to this new, annotated edition of Dr Ambedkar’s Annihilation of Caste, is also a deeply disturbing critique of Gandhi, especially to those of us for whom Gandhi is a loved and revered figure.

    Yes, I know. It wasn’t easy to write it either. But in these times, when all of us are groping in the dark, despairing, and unable to understand why things are the way they are, I think revisiting this debate between Gandhi and Ambedkar, however disturbing it may be for some people, however much it disrupts old and settled patterns of thought, will actually, in the end, help illuminate our path. I think Annihilation of Caste is absolutely essential reading. Caste is at the heart of the rot in our society. Quite apart from what it has done to the subordinated castes, it has corroded the moral core of the privileged castes. We need Ambedkar—now, urgently.

    Why should Gandhi figure so prominently in a book about Ambedkar? How did that come about?

    Ambedkar was Gandhi’s most trenchant critic, not just politically and intellectually, but also morally. And that has just been written out of the mainstream narrative. It’s a travesty. I could not write an introduction to the book without addressing his debate with Gandhi, something which continues to have an immense bearing on us even today.

     
     
    Caste is at the heart of the rot in our society. Quite apart from what it has done to the subordinated castes, it has corroded the moral core of the privileged castes. We need to take Ambedkar seriously.
     
     
    Annihilation of Caste is the text of a speech that Ambedkar never delivered. When the Jat-Pat-Todak Mandal, an offshoot of the Arya Samaj, saw the text and realised Ambedkar was going to launch a direct attack on Hinduism and its sacred texts, it withdrew its invitation. Ambedkar publi­shed the text as a pamphlet. Gandhi published a response to it in his magazineHarijan. But this exchange was only one part of a long and bitter conflict between the two of them...when I say that Ambedkar has been written out of the narrative, I’m not suggesting that he has been igno­red; on the contrary, he is given a lot of attention—he’s either valorised as the ‘Father of the Constitution’ or ghettoised and then praised as a “leader of the untouchables”. But the anger and the passion that drove him is more or less airbrushed out of the story. I think that if we are to find a way out of the morass that we find ourselves in at present, we must take Ambedkar seriously. Dalits have known that for years. It’s time the rest of the country caught up with them.

    Have you always held these views about Gandhi, or did you discover new aspects to him as you explored him vis-a-vis Ambedkar?

    I am not naturally drawn to piety, particularly when it becomes a political manifesto. I mean, for heaven’s sake, Gandhi called eating a “filthy act” and sex a “poison worse than snake-bite”. Of course, he was prescient in his understanding of the toll that the Western idea of modernity and “development” was going to take on the earth and its inhabitants. On the other hand, his Doctrine of Trusteeship, in which he says that the rich should be left in possession of their wealth and be trusted to use it for the welfare of the poor—what we call Corporate Social Responsibility today—cannot possibly be taken seriously. His attitude to women has always made me uncomfortable. But on the subject of caste and Gandhi’s attitude towards it, I was woolly and unclear. Reading Annihilation of Caste prompted me to read Ambedkar’s What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables. I was very disturbed by that. I then began to read Gandhi—his letters, his articles in the papers—tracing his views on caste right from 1909 when he wrote his most famous tract, Hind Swaraj. In the months it took me to research and write The Doctor and the Saint I couldn’t believe some of the things I was reading. Look—Gandhi was a complex figure. We should have the courage to see him for what he really was, a brilliant politician, a fascinating, flawed human being—and those flaws were not to do with just his personal life or his role as a husband and father. If we want to celebrate him, we must have the courage to celebrate him for what he was. Not some ima­gined, constructed idea we have of him.

    You could be accused of selectively picking out quotes from his writing to suit your own imagined, constructed idea of Gandhi....

    When a man leaves behind 98 volumes of his Collected Works, what option does anybody have other than to be selective? Of course I have been selective, as selective as everybody else has been. And of course, those choices say a lot about the politics of the person who has done the selecting. My brief was to write an introduction to Anni­hilation of Caste. Reading Ambed­kar made me realise how large Gandhi loomed in Ambedkar’s universe. When I read Gandhi’s pronoun­cements supporting the caste system, I wondered how his doctrine of non-violence and satyagraha could rest so comfortably on the foundation of a system which can be held in place only by the permanent threat of violence, and the frequ­ent application of unimaginable violence. I grew curious about how Gandhi even came to be called a Mahatma.

    I found that the first time he was publicly called Mahatma was in 1915, soon after he returned to India after spending 20 years in South Africa. What had he done in South Africa to earn him that honour?

     
     
    Ambedkar challenged Gandhi not just politically and intellectually, but also morally. To excise him out of the mainstream narrative is a travesty.
     
     
    That took me back to 1893, the year he first arrived in South Africa as a 24-year-old lawyer. I followed Gandhi’s writings about caste over a period of more than 50 years. So that answers questions like—“Did Gandhi change? And if so, how? Did he start off badly and grow into a Mahatma?” I wasn’t really researching Gandhi’s views on diet or natural cures, I was following the caste trail, and in the process I stumbled on the race trail, and eventually, through all the turbulence and mayhem, I found coherence. It all made sense.

    It was consistent, and consistently disturbing. The fact is that whatever else he said and did, and however beautiful some of it was, he did say and write and do some very disturbing things. Those must be explained and accounted for. This applies to all of us, to everybody, sinner and saint alike. Let’s for the sake of argument imagine that someone driven by extreme prejudice ransacks the writings of Rabindranath Tagore. I am not a Tagore scholar, but I very much doubt that he or she would find letters, articles, speeches and interviews that are as worrying as some of the writings in the Collected Works of Mahatma Gandhi.

    You say that Gandhi harboured attitudes that can only be described as racist towards the Blacks during his years in South Africa, you seem to see his positions as flawed and hypocritical. Would you agree with that?

    I have not used those adjectives. I think you have inferred them from Gandhi’s speeches and writings reproduced in my introduction, which is perfectly understandable. Actually I don’t think Gandhi was a hypocrite. On the contrary, he was astonishingly frank. And I am impressed that all his writings, some of them—in my view at least—seriously incriminating, have been retained in the Collected Works.

    That really is a courageous thing. I have written at length about Gandhi’s years in South Africa. I’ll just say a couple of things here about that period. First, the famous story about Gandhi’s political awakening to racism and imperialism because he was thrown out of a ‘whites only’ compartment in Pietermaritzberg is only half the story. The other half is that Gandhi was not opposed to racial segregation. Many of his campaigns in South Africa were for separate treatment of Indians. He only objected to Indians being treated on a par with ‘raw kaffirs’, which is what he called Black Africans. One of his first political victories was a ‘solution’ to the Durban post office ‘problem’. He successfully campaigned to have a third entrance opened so that Indians would not have to use the same door as the ‘kaffirs’. He worked with the British army in the Anglo-Boer war and during the crushing of the Bambatha rebellion. In his speeches he said he was looking forward to “an Imperial brotherhood”. And so it goes, the story. In 1913, after signing a settlement with the South African military leader Jan Smuts, Gandhi left South Africa. On his way back to India he stopped in London where he was awarded the Kaiser-e-Hind for public service to the British Empire. How did that add up to fighting racism and imperialism?

    But ultimately he did fight imperialism, did he not? He led our country to freedom....

    What was ‘freedom’ for some was, for others, nothing more than a transfer of power. Once again, I’d say the Gandhi-Ambedkar debate deepens and complicates our understanding of words like “imperialism” and “freedom”. In 1931, when Ambedkar met Gandhi for the first time, Gandhi questioned him about his sharp criticism of the Congress, which at the time amounted to criticising the struggle for the homeland. Ambedkar’s famous, and heart-breaking, reply was: “Gandhiji, I have no homeland. No untouchable worth the name would be proud of this land.”

    Even after he returned from South Africa, Gandhi still saw himself as a ‘responsible’ subject of Empire. But in a few years, by the time of the first national non-cooperation movement, Gandhi had turned against the British. Millions of people rallied to his call, and though it would be incorrect to say that he alone led India to freedom from British rule, of course he played a stellar part. Yet in the struggle, though Gandhi spoke about equality and sometimes even sounded like a socialist, he never challenged traditional caste hierarchies or big zamindars.

     
     
    The rise of Dalit parties has been dazzling. The real worry is that even as Dalits become more influential in parliamentary politics, democracy itself is being undermined in serious, structural ways.
     
     
    Industrialists like the Birlas, the Tatas and the house of Bajaj bankrolled Gandhi’s political activity and he took care never to cross swords with them. Many of them had made a lot of money during the First World War, and had now come up against a glass ceiling.

    They were irked and limited by British rule and by their own brushes with racism. So they threw their weight behind the national movement.

    Around the time Gandhi returned from South Africa, mill workers who had not benefited from the managements’ windfall profits had become restive and there were a series of lightning strikes in the Ahmedabad mills. The mill-owners asked Gandhi to mediate. I have written about Gandhi’s interventions over the years in labour disputes, his handling of labour unions and his advice to workers about strikes—much of it is very puzzling. In other areas too, the famous Gandhian ‘pragmatism’ took some very strange turns. For example, in 1924, when villagers were protesting against the Mulshi Dam being built by the Tatas some distance away from Pune, to generate electricity for the Bombay mills, Gandhi wrote them a letter advising them to give up their protest. His logic is so very similar to the Supreme Court judgement of 2000 that allowed the construction of the World Bank-funded Sardar Sarovar Dam to proceed...so Ambedkar was spot-on when he said, “The question whether the Congress is fighting for freedom has very little importance as compared to the question for whose freedom is the Congress fighting?”


    Photograph by Corbis, From Outlook 10 March 2014

    In the past you have written powerful political essays based on reporting from the field or on contemporary events as they unfold. But in this work, you seem to have done some very serious historical research and drawn very different conclusions from many known historians who have worked on the national movement, Gandhi and Ambedkar. You are obviously going to be challenged. Do tell us about the journey that writing The Doctor and the Saint involved.

    You say I’ll be challenged? Oh, and here I was imagining that it was me that was doing the challenging! Several years ago, S. Anand, the publisher of Navayana, gave me a spiral-bound copy of Anni­hilation of Caste and asked me if I would write an introduction to it. I read it and found it electrifying. But I was intimidated by the prospect of writing an introduction to it—a real introduction, not just some quotes patched together with praise and banalities. I didn’t feel that I was equipped to do that. I knew it would mean swimming through some pretty treacherous waters. Anand said he would wait, and he did.

     
     
    On the issue of Muslims, there were serious differences between Gandhi and the Hindu Right. But on the issues of caste, religious conversion and cow protection, Gandhi was in stride with the Hindu Right.
     
     
    Meanwhile, he began work on the annotations which placeAnnihilation of Caste in a context and make it an extraordinarily rich resource for scholars interested in the subject. I was writing fiction and had promised myself that I wasn’t going to write anything that involved footnotes anymore. But of course, when I started writing the introduction, given the way my argument developed, I had to reference almost every sentence. After a while I began to enjoy myself. The notes are not just references, they’re almost a parallel narrative, in and of themselves. I hope at least some people take the trouble to read them....

    But coming back to your question of The Doctor and the Saintbeing a challenge—many historians have criticised Gandhi before, for other reasons, so I don’t think I am alone on this one at all. Many Dalits and Dalit scholars have, over the decades, been very sharply critical of Gandhi and Gandhism. Having said that, if this book begins another debate, a real debate, it can only be a good thing. I think it’s high time that there was one. I’m sure there are plenty of people who would be happy to weigh in on it.

    Given what happened to Wendy Doniger’s book, are you worried?

    Not about this book in particular, no. It’s Ambedkar’s book. But it’s true that we are becoming less and less free to write and say what we think. What the irreverent Mirza Ghalib could say in the 19th century about his relationship with Islam, what Saadat Hasan Manto could say about mullahs in the 1940s, what Ambedkar could say about Hinduism in the 1930s, what Nehru or JP could say about Kashmir—none of us can say today without risking our lives. The argument between Gandhi and Ambedkar that followed the publication of Annihilation of Caste was a harsh, intense debate between two extraordinary men—they were not afraid of real debate. Unlike contemporary bigots who demand book-banning, Gandhi—who found the text of Ambedkar’s speech disagreeable—actually wanted people to read it. He said, “No reformer can ignore the address.... It has to be read only because it is open to serious objection. Dr Ambed­kar is a challenge to Hinduism.”

    Your introduction begins with a powerful critique of the all-pervasive domination of traditional upper castes in the establishment, including the media, and you suggest that there has been a ‘project of unseeing’ across the political establishment. Don’t you think that the post-Mandal realities of contemporary India have actually made caste a fundamental unit of all politics?

    When you look at India, through the prism of caste, at who controls the money, who owns the corporations, who owns the big media, who makes up the judiciary, the bureaucracy, who owns land, who doesn’t—contemporary India suddenly begins to look extremely un-contemporary. Caste was the engine that drove Indian society—not just Hindu society—much before the recommendations of the Mandal Comm­ission. A long section of The Doctor and the Saint is an analysis of how, in the late 19th century, when the idea of ‘empire’ began to mutate into the idea of a ‘nation’, when the new ideas of governance and ‘representation’ arrived on our shores, it led to an immense anxiety about demography, about numbers. For centuries before that, millions of people who belonged to the subordinated castes—those who had been socially ostracised by privileged castes for thousands of years—had been converting to Islam, and later to Sikhism and Christianity to escape the stigma of their caste. But suddenly numbers began to matter. The almost fifty million “untouchables” became crucial in the numbers game. A raft of Hindu reformist outfits began to proselytise among them, to prevent conversion. The Arya Samaj started the Shuddhi movement—to ‘purify the impure’—to try and woo untouchables and Adivasis back into the ‘Hindu fold’. A version of that is still going on today with the VHP and the Bajrang Dal running their ‘Ghar Vapasi’ programmes in which Adivasi people are ‘purified’ and ‘returned’ to Hinduism. So yes, caste was, and continues to be, the fundamental unit of all politics in India.

    So how can you call it a ‘project of unseeing’?

    The ‘project of unseeing’ that I write about is something else altogether. It’s about the ways in which influential Indian intellectuals today, particularly those on the Left, for whom caste is just a footnote—an awkward, inconvenient appendage of reductive Marxist class analysis—have rendered caste invisible. To say “we don’t believe in caste” sounds nice and progressive. But it is either an act of evasion, or it comes from a position of such rarefied privilege where caste is not encountered at all. The ‘project of unseeing’ exists in almost all of our cultural practice—does Bollywood deal with it? Never. How many of our high-profile writers deal with it? Very few. Those who write about justice and identity, about the ill effects of neo-liberalism—how many address the issue of caste? Even some of our most militant people’s movements elide caste.

     
     
    Is there a version of Communism that I endorse? I don’t know, I am not a Communist. But we do need a robust, structural critique of capitalism.
     
     
    The Indian government’s churlish reaction to Dalits who wanted to be represented at the 2001 World Conference against racism in Durban is part of the ‘project of unseeing’. In the same way, the Indian census entirely elides caste in its data collection—leaving us all in the dark about what’s really going on—the scale of dispossession and violence against Dalits is part of the ‘project of unseeing’. Here’s something to think about—in 1919, during what came to be called ‘The Red Summer’ in the United States, approximately 165 Black people were killed. Almost one century later, in 2012 in India—the year of the Delhi gang-rape and murder—according to official statistics, 1,574 Dalit women were raped. And 651 Dalits were murdered. That’s just the criminal assault against Dalits. The economic assault, notwithstanding the emergence of a clutch of Dalit millionaires, is another matter altogether.

    You say that caste in India—“one of the most brutal modes of hierarchical social organisation that human society has known—has managed to escape censure because it is so fused with Hinduism, and by extension with so much that is seen to be kind and good—mysticism, spiritualism, non-violence, tolerance, vegetarianism, Gandhi, yoga, backpackers, the Beatles—that, at least to outsiders, it seems impossible to pry it loose and try to understand it”. You argue that caste prejudice is on a par with racial discrimination and apartheid but has not been treated as such. Many would argue that electoral politics and reservation are adequate to deal with historical injustice. But recen­tly a senior Congress leader, Janar­dhan Dwivedi, said reservation should be discontinued. How would you respond to such an argument?

    It was an outrageous thing for anyone to say. Reservation is extremely important, and I have written at some length about it. To be eligible for the reservation policy, a Scheduled Caste person needs to have completed high school. Govern­ment figures say more than 70 per cent of Sche­duled Caste students drop out before they matriculate. Which means for even low-end government jobs only one in every four Dalits is eligible. For a white-collar job, the minimum qualification is a graduate degree. Just over 2 per cent of Dalits are graduates. Even though it actually applies to so few, the reservation policy has meant that Dalits at least have some representation in the echelons of power. This is absolu­tely vital. Look at what one Ambedkar, who had the good fortune to get a scholarship to study in Columbia, managed to do. It is thanks to reservation that Dalits are now lawyers, doctors, scholars and civil servants. But even this little window of opportunity is resented and is under fire from the privileged. And the track record of government institutions, the judiciary, the bureaucracy and even supposedly progressive ins­titutions like jnu in implementing reservation is appalling. There is only one government department in which Dalits are over-represented by a factor of six.

    Almost 90 per cent of those designated as municipal sweepers—people who clean streets, who risk their lives to go down manholes and service the sewage system, who clean toilets and do menial jobs—are Dalits. Even this sector is up for privatisation now, which means private companies will be able to subcontract jobs on a temporary basis to Dalits for less pay and with no guarantee of job security. Of course there are problems with people getting fake certificates and so on. Those need to be addressed. But to use that to say reservation shouldn’t exist is ridiculous.

    But surely you agree that the rise of Dalit parties like the BSP marks something close to a revolution in Indian democracy?

    The rise of Dalit political parties has been a dazzling phenomenon.

    But then our electoral politics, in the present shape, cannot really be revolutionary, can it? The book, and not just the introduction, deals with it in some detail. Ambedkar’s confrontation with Gandhi at the Second Round Table Conference in London in 1931 had precisely to do with that—with their very different views on the matter of political representation of and for Dalits.

    Ambedkar believed that the right to representation was a basic right.

     
     
    Reductive Marxist class analysis renders caste invisible. Very few high-profile writers deal with it. Our most militant people’s movements elide the issue. It finds no place in Indian census data. It’s a Project of Unseeing.
     
     
    And all his life he fought for untouchables to have that right. He thought and wrote a great deal about the first-past-the-post electoral system and how untouchables would never be able to emerge from the domination of privileged castes in such a system because the population was scattered in a way that they would never form a majority in a political constituency. Gandhi, who worked among untouchables with missionary zeal, was not prepared to allow them to represent themselves. And he explicitly worked against that possibility. His Harijan Sevak Sangh—funded by G.D. Birla—which fronted the Temple Entry movement was made up only of privileged caste members. In the Mahajan Mazdoor Sangh, the mill workers’ union that Gandhi started in Ahmedabad, workers, many of whom were untouchables, were not allowed to be office-bearers, they were not allowed to represent themselves. At the Second Round Table Conference in London in 1931, Gandhi said, “I claim myself, in my own person, to represent the vast mass of untouchables.” In S. Anand’s note on the Poona Pact at the back of the book, he writes of how Gandhi, in a reply to a question from an untouchable member of the Congress party asking if he would ensure that Harijans were represented in state councils and panchayat boards, said the principle was “dangerous”.

    Gandhi played a great part in seeing to it that Ambedkar’s project of developing untouchables into a political community that was aware of its rights, that could choose its own representatives from among themselves, was thwarted and undermined. Even today Dalits are paying the price for that. Despite these odds, the Bahujan Samaj Party has emerged in UP. But even there, it took more than half a century for Kanshi Ram—and then Mayawati—to succeed. Kanshi Ram worked for years, painstakingly making alliances with other subordinated castes, to achieve this victory. The BSP needed the peculiar demography of Uttar Pradesh and the support of many OBCs. But if it is to grow as a political party, it will have to make alliances that will dilute its political thrust. For a Dalit candidate to win an election from an open seat—even in UP—continues to be almost impossible. Still, notwithstanding the charges of corruption and malpractice, I don’t think anybody should ever minimise the immense contribution the BSP has made in building Dalit dignity. The real worry is that even as Dalits are becoming more influential in parliamentary politics, democracy itself is being undermined in serious and structural ways.

    Your account of the manner in which Gandhi prevailed over Ambedkar on the issue of the Communal Award, in which the British awarded a separate electorate for untouchables, is fascinating—the description of how Ambe­dkar had to give up his dream and sign the Poona Pact in 1932. But I have a question about the issue of separate electorates. Many histo­rians argue that this idea really was at the root of the problems that would lead to Partition. And many would argue against separate electorates. Do you think that India still needs separate electorates?

    I think our first-past-the-post electoral system is gravely flawed and is failing us. We need to rethink it. But I think we should be careful of collapsing all these very contentious issues about separate electorates, the Communal Award and Partition into one big accusatory mess. As I said earlier, Ambedkar had thought out the demand for a separate electorate and separate representation for untou­chables very carefully. I really don’t want to restate what I’ve written...but let’s just say that he had come up with a brilliant and unique plan.

    His idea really was to create a situation in which Dalits could develop into a political community with its own leaders. His proposal for a separate electorate was to last for only 10 years. And we are talking here about a people who were ostracised by the privileged castes for thousands of years in the most unimaginably crude and cruel manner—people who were shunned, who were not allowed access to public wells, to education, to temples, besides other things. People who were not entitled to anything except violence and abuse. But when they asked for a separate electorate, everybody behaved as though the world was ending.

     
     
    Ambedkar speaks about the Adivasis in the same patronising way as Gandhi speaks about untouchables. It’s hard to understand how a man who saw the insult to his own people so clearly could have done that.
     
     
    Gandhi went on an indefinite hunger strike and public pressure forced Ambedkar to give up his demand and sign the Poona Pact. It was preposterous. How can we possibly say that Ambedkar’s demand for a separate electorate led to Partition? The impulse was exactly the opposite. He was trying to bring liberty and equality to a society that practised a vicious form of apartheid. He was talking about justice, brotherhood, unity and fellow feeling—not Partition. But caste hierarchy means that only the privileged can close the door on Dalits.

    When Dalits close the door on themselves, it is made out to be an act of treachery. Also, while we like to place all the blame for Partition on Jinnah—using the word ‘blame’ presupposes that everybody agrees that Partition was a terrible thing, but even that is not true—we forget that people like Bhai Parmanand, a founder-member of the Ghadar Party, a pillar of the Arya Samaj in Lahore, and later an important leader of the Hindu Mahasabha, suggested, as far back as 1905, during the partition of Bengal, that Sindh should be joined with Afghanistan and the North West Frontier Province, and should be united into a great Muslim Kingdom. Partition happened because a whole set of forces was set into play, and it all spun out of the control of the men who had positioned themselves at the helm of affairs.

    You criticise Ambedkar quite harshly for his views on Adivasis.

    Ambedkar speaks about Adivasis in the same patronising way that Gandhi speaks about untouchables. It’s hard to understand how a man who saw the insult to his own people so clearly could have done that.

    Ambedkar was a man of reason, and a man with a keen sense of justice. I bel­ieve he would have taken the criticism seriously and would have changed his views. But that’s not the only criticism I have of him. In his embrace of Western liberalism, his support of urbanisation and modern ‘development’, he failed to see the seeds of catastrophe that were embedded in it. I have written about this at some length too.

    You have also explored the great failure of Communists to address caste. You write that “they treated caste as a sort of folk dialect derived from the classical language of class analysis”. I think all Communists should read your precise take on the great trade union leader S.A. Dange. My question to you is this: Party communism has disappointed you. But is there any version of Commu­nism that you support and endorse?

    My criticism of the way mainstream Communist parties have dealt with caste goes all the way back to The God of Small Things. When the novel came out in 1997, the Communist Party of India (Marxist) was extremely angry with the book. They were angry with my depiction of a character called Comrade K.N.M. Pillai who was a member of the Communist Party and his prejudices against Velutha, a Dalit who was one of the main characters in the book. Communists and Dalits ought to have been natural allies, but sadly that has just not happened. The rift began in the late 1920s, quite soon after the Communist Party of India was formed. S.A. Dange—a Brahmin like many Communist leaders tend to be even today, and one of its chief ideologues—organised India’s first Communist trade union, the Girni Kamgar Union with 70,000 members. A large section of the workers were Mahars, untouchables, the caste that Ambedkar belonged to. They were only employed in the lower-paid jobs in the spinning department, because in the weaving department, workers had to hold the thread in their mouths, and the untouchables’ saliva was considered polluting to the product. In 1928, Dange led the Girni Kamgar Union’s first major strike. Ambedkar suggested that one of the issues that ought to be raised was equality and equal entitlement within the ranks of workers. Dange did not agree, and this led to a bitter falling out. That was when Ambedkar said, “Caste is not just a division of labour, it is a division of labourers.” There is a very very compelling section inAnnihilation of Caste in which Ambedkar writes about Caste and Socialism. Is there a version of Communism that I support and endorse? I’m not sure what that means. I am not a Communist. But I do think that we are in dire need of a structural and robust criticism of capitalism, and I do not mean just crony capitalism.

    Right now, the new player on the political scene, the Aam Aadmi Party, which is obviously inspired by Gandhian symbolism, is taking on crony capitalism. It has attacked Mukesh Ambani and RIL, who you wrote about in your last big essayCapitalism: A Ghost Story. What are your views on AAP?

    It’s a little difficult to have a coherent view on AAP because it doesn’t seem to have a coherent view of itself. I am not an admirer of anti-corruption as a political ideology, because I think corruption is the manifestation of a problem, and not the problem itself. Of course, it gets a lot of political traction in an election year—after all even the corrupt are against corruption—but eventually it will lead us down a blind alley. But I was one of the people who cheered when AAP took on Mukesh Ambani. Suddenly everybody, the mainstream media as well as the social media, began to discuss the Ambanis and the gas-pricing issue—these are things that hardly anybody dared to even whisper about only a few months ago. We all remember how the news of the Ambani car crash in Mumbai was just blanked out. On this score, the Aam Aadmi Party has put a little steel into everybody’s spine. They identify themselves with the Gandhi cap, but going after industrial houses in this way is very un-Gandhian activity, and I’m all for it. I just hope it doesn’t end in a gladiatorial inter-corporate war, where a new monster takes the place of the old one. Mud-slinging and allegations about who has been bought over or bribed by whom is good entertainment, but the rot is deeper than corruption and bribery. The real problem as I see it is that the big corporations—Tata, Reliance, Jindals, Vedanta and several others—run so many businesses simultaneously. Mukesh Ambani is personally worth something like 1,000 billion rupees. But the Tatas, Vedanta, Jindals, Adanis are not all that different. Even if everything is completely above board there is a problem. Even if you are a hard-core classical capitalist you have to see there is a problem here. This kind of cross-ownership of businesses, this scale of profits—limitless profits—accruing to fewer and fewer people, the conflict of interest between corporates and the media—how can you have a free press that is owned and run by corporations? I understand that as a political strategy, AAP is singling out Mukesh Ambani and taking him on for the sheer spectacle of it. Having a 27-storeyed tower built as a personal residence—it’s hubris, he was asking, begging, to be taken down. But at some point I would be glad to see the problem being addressed in a more serious and structural way. Particularly since we are looking to AAP to put a few roadblocks in the way of what is being called the rise of Moditva—which is basically corporate capitalism fused with primitive fascism.

    Many people will take issue with your interpretation when you say “there was never much daylight between Gandhi’s views on caste and those of the Hindu Right. From a Dalit point of view Gandhi’s assassination could appear to be more a fratricidal killing than an assassination by an ideological opponent”. You then go on to say that Narendra Modi is able to invoke Gandhi without the slightest discomfort because of this. Are you therefore handing Gandhi over to the Hindu Right? He is someone they have been eager to appropriate, so are you not playing into their hands?

    Gandhi’s not a stuffed toy, and who am I to hand him over to anyone?

    Let me just say this—on the issue of Muslims and their place in the Indian nation there surely were serious ideological differences between Gandhi and the Hindu Right, and for this Gandhi paid with his life. But on the issues of caste, religious conversion and cow protection, Gandhi was perfectly in stride with the Hindu Right. At the turn of the century—the 19th and 20th centuries—when various reformist organisations were proselytising to the untouchable population, the right-wing was, if anything, more enthusiastic. For example, V.D. Savarkar, a disciple of Tilak’s, and a hero of the Hindu Right, supported the 1927 Mahad satyagraha which Ambedkar led, for the untouchables’ right to use water from a public tank. Gandhi’s support was less forthcoming. Who were the signatories to the Poona Pact?

    There were many, but among them were G.D. Birla, Gandhi’s industrialist-patron, who bankrolled him for most of his life; Pandit Madan Mohan Malaviya, a conservative Brahmin and founder of the Hindu Mahasabha; and Savarkar, who was accused of being an accomplice in the assassination of Gandhi. They were all interconnected in complex ways.

     
     
    One cannot have a coherent view on AAP as it doesn’t have one of itself. But it has put steel in everyone’s spine. I just hope it doesn’t end in a gladiatorial inter-corporate war, where a new monster replaces the old.
     
     
    Birla funded Gandhi as well as the Arya Samaj’s Shuddhi movement. When the RSS was banned after the assassination of Gandhi, Birla lobbied for the ban to be lifted. A recent report in Caravan about Swami Aseemanand, a major RSS leader and the son of a devout Gandhian, who is in jail, being tried for orchestrating a series of bomb blasts including the Samjhauta Express blast, in which about 80 people were killed, describes how boys in his ashram in Gujarat were made to chant the Ekata mantra every morning, an ode to national unity that invokes Gandhi as well as M.S. Golwalkar, the most important RSS ideologue.

    Narendra Modi delivers many of his hissy pronouncements from a spanking new convention hall in Gujarat called Mahatma Mandir. In 1936, Gandhi wrote an extraordinary essay calledThe Ideal Bhangi which he ends by saying—“Such an ideal Bhangi, while deriving his livelihood from his occupation, would approach it only as a sacred duty. In other words, he would not dream of amassing wealth out of it.” Seventy years later, in his book, Karmayogi (which he withdrew after the Balmiki community protested), Narendra Modi said: “I do not believe they have been doing this job just to sustain their livelihood. Had this been so, they would not have continued with this kind of job generation after generation.... At some point of time somebody must have got the enlightenment that it is their (Balmikis’) duty to work for the happiness of the entire society and the Gods; that they have to do this job bestowed upon them by Gods; and this job should continue as internal spiritual activity for centuries.” You tell me—where’s the daylight?

    When Arundhati Roy does a scathing critique of a man as revered as Mahatma Gandhi, it gets noticed around the world. Some would argue that keeping a beautiful idea alive is more important than undermining it with a certain reality.

    That’s a good question. I actually thought about that quite a lot—as any writer would, or should. I decided it was completely wrong, completely unacceptable. That kind of a cover-up—and it would be nothing less than a cover-up—comes at a price. And that price is Ambedkar. We have to deal with Gandhi, with all his brilliance and all his flaws, in order to make room for Ambedkar, with all his brilliance as well as his flaws. The Saint must allow the Doctor a place in the light. Ambed­kar’s time has come.



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    A Reply To The Mahatma
    Excerpted from Annihilation of Caste: The Annotated Critical Edition, published by Navayana

    Ramesh Shinde/Navayana
    Essential reading Cover of the first edition of ‘Annihilation of Caste’, 1936

    8.1 Why does the Mahatma cling to the theory of everyone following his or her ancestral calling? He gives his reasons nowhere. But there must be some reason, although he does not care to avow it. Years ago, writing on Caste versus Classin his Young India [1], he argued that the caste system was better than a class system on the ground that caste was the best possible adjustment for social stability. If that be the reason why the Mahatma clings to the theory of everyone following his or her ancestral calling, then he is clinging to a false view of social life.

    8.2 Everybody wants social stability, and some adjustment must be made in the relationship between individuals and classes in order that stability may be had. But two things, I am sure, nobody wants. One thing nobody wants is a static relationship, something that is unalterable, something that is fixed for all times. Stability is wanted, but not at the cost of change when change is imperative. The second thing nobody wants is mere adjustment. Adjustment is wanted, but not at the sacrifice of social justice.

    8.3 Can it be said that the adjustment of social relationships on the basis of caste—i.e., on the basis of each to his hereditary calling—avoids these two evils? I am convinced that it does not. Far from being the best possible adjustment, I have no doubt that it is of the worst possible kind, inasmuch as it offends against both the canons of social adjustment—namely, fluidity and equity.

    9.1 Some might think that the Mahatma has made much progress, inasmuch as he now only believes in varna and does not believe in caste. It is true that there was a time when the Mahatma was a full-blooded and a blue-blooded sanatani Hindu. [2] He believed in the Vedas, the Upanishads, the puranas, and all that goes by the name of Hindu scriptures; and therefore, in avatars and rebirth. He believed in caste and defended it with the vigour of the orthodox. [3]He condemned the cry for inter-dining, inter-drinking, and intermarrying, and argued that restraints about inter-dining to a great extent “helped the cultivation of will-power and the conservation of a certain social virtue.”

    9.2 It is good that he has repudiated this sanctimonious nonsense and admitted that caste “is harmful both to spiritual and national growth”, and maybe his son’s marriage outside his caste has had something to do with this change of view. But has the Mahatma really progressed? What is the nature of the varna for which the Mahatma stands? Is it the Vedic conception as commonly understood and preached by Swami Dayanand Saraswati and his followers, the Arya Samajists? The essence of the Vedic conception of varna is the pursuit of a calling which is appropriate to one’s natural aptitude. The essence of the Mahatma’s conception of varna is the pursuit of one’s ancestral calling, irrespective of natural aptitude.

    9.3 What is the difference between caste and varna, as understood by the Mahatma? I find none. As defined by the Mahatma, varna becomes merely a different name for caste, for the simple reason that it is the same in essence—namely, pursuit of one’s ancestral calling. Far from making progress, the Mahatma has suffered retrogression. By putting this interpretation upon the Vedic conception of varna, he has really made ridiculous what was sublime. While I reject the Vedic varnavyavastha for reasons given in the speech, I must admit that the Vedic theory of varna as interpreted by Swami Dayanand and some others is a sensible and an inoffensive thing. It did not admit birth as a determining factor in fixing the place of an individual in society. It only recognised worth.

    9.4 The Mahatma’s view of varna not only makes nonsense of the Vedic varna, but it makes it an abominable thing. Varna and caste are two very different concepts. Varna is based on the principle of each according to his worth, while caste is based on the principle of each according to his birth. The two are as distinct as chalk is from cheese. In fact, there is an antithesis between the two. If the Mahatma believes, as he does, in everyone following his or her ancestral calling, then most certainly he is advocating the caste system, and in calling it the varna system, he is not only guilty of terminological inexactitude, but he is causing confusion worse confounded.

    9.5 I am sure that all his confusion is due to the fact that the Mahatma has no definite and clear conception as to what is varna and what is caste, and as to the necessity of either for the conservation of Hinduism. He has said—and one hopes that he will not find some mystic reason to change his view—that caste is not the essence of Hinduism. Does he regard varna as the essence of Hinduism? One cannot as yet give any categorical answer.

    9.8 The real reason why the Mahatma is suffering from this confusion is probably to be traced to two sources. The first is the temperament of the Mahatma. He has in almost everything the simplicity of the child, with the child’s capacity for self-dec­eption. Like a child, he can believe in anything he wants to believe in. We must therefore wait till such time as it pleases the Mahatma to abandon his faith in varna, as it has pleased him to abandon his faith in caste.

    9.9 The second source of confusion is the double role which the Mahatma wants to play—of a Mahatma and a politician. As a Mahatma, he may be trying to spiritualise politics. Whether he has succeeded in it or not, politics has certainly commercialised him. A politician must know that society cannot bear the whole truth, and that he must not speak the whole truth; if he is speaking the whole truth it is bad for his politics. The reason why the Mahatma is always supporting caste and varna is because he is afraid that if he opposed them he would lose his place in politics. Whatever may be the source of this confusion, the Mahatma must be told that he is deceiving himself, and also deceiving the people, by preaching caste under the name of varna.

    10.1 The Mahatma says that the standards I have applied to test Hindus and Hinduism are too severe, and that judged by those standards every known living faith will probably fail. The complaint that my standards are high may be true. But the question is not whether they are high or whether they are low. The question is whether they are the right standards to apply. A people and their religion must be judged by social standards based on social ethics. No other standard would have any meaning, if religion is held to be a necessary good for the well-being of the people.

    10.2 Now, I maintain that the standards I have applied to test Hindus and Hinduism are the most appropriate standards, and that I know of none that are better. The conclusion that every known religion would fail if tested by my standards may be true. But this fact should not give the Mahatma as the champion of Hindus and Hinduism a ground for comfort, any more than the existence of one madman should give comfort to another madman, or the existence of one criminal should give comfort to another criminal.

    10.3 I would like to assure the Mahatma that it is not the mere failure of the Hindus and Hinduism which has produced in me the feelings of disgust and contempt with which I am charged. I realise that the world is a very imperfect world, and anyone who wants to live in it must bear with its imperfections.

    10.4 But while I am prepared to bear with the imperfections and shortcomings of the society in which I may be destined to labour, I feel I should not consent to live in a society which cherishes wrong ideals, or a society which, having right ideals, will not consent to bring its social life into conformity with those ideals. If I am disgusted with Hindus and Hinduism, it is because I am convinced that they cherish wrong ideals and live a wrong social life. My quarrel with Hindus and Hinduism is not over the imperfections of their social conduct. It is much more fundamental. It is over their ideals.


    Notes:

    1. Young India, a weekly in English,was founded and published from Bombay since 1915 by Indulal Yagnik, along with Jamnadas Dwarkadas and Shankerlal Banker. Yagnik also brought out Navajivan, a monthly in Gujarati. In 1919, Yagnik requested Gandhi, who had returned from South Africa, to take over as editor of Young India and Navajivan. Under Gandhi’s editorship,YI appeared since 7 May 1919 as a biweekly and from 7 September 1919 as a weekly from Sabarmati Ashram, Ahmedabad (Rajmohan Gandhi, 2007, 211). Gandhi published YI till he founded the Harijan in 1932. Ambedkar here is referring to Gandhi’s piece dated 29 December 1920, where he argues why caste is better than class: “The beauty of the caste system is that it does not base itself upon distinctions of wealth-possessions. Money, as history has proved, is the greatest disruptive force in the world. Even the sacredness of family ties is not safe against the pollution of wealth, says Shankaracharya. Caste is but an extension of the principle of the family. Both are governed by blood and heredity… Caste does not connote superiority or inferiority. It simply recognises different outlooks and corresponding modes of life. But it is no use denying the fact that a sort of hierarchy has been evolved in the caste system, but it cannot be called the creation of the Brahmins.” (CWMG 22, 154–5).

    2. Gandhi on his being sanatani: “The friend next asked me for a definition of a sanatani Hindu and said: ‘Could a sanatani Hindu Brahmin interdine with a Hindu non-Brahmin although the latter may be a non-vegetarian?‘ My definition of a sanatani Brahmin is: He who believes in the fundamental principles of Hinduism is a sanatani Hindu. And the fundamental principles of Hinduism are absolute belief in truth (satya) and ahimsa (non-violence).” Reported in The Hindu, 23 March 1925, from a speech in Madras at the height of the Non-Brahmin Movement in Madras Presidency. In another speech in Calcutta, around the same time, Gandhi says: “Let the sanatani Hindus understand from me who claims to be a sanatani Hindu. I do not ask you to interdine with anybody; I do not ask you to exchange your daughters with the Untouchables or with anybody, but I do ask you to remove this curse [of untouchability] so that you may not put him beyond the pale of service.” From Amrit Bazar Patrika, 2 May 1925. Anil Nauriya, however, makes the case (2006, 1835) that Gandhi’s views on varna changed in the mid-1940s and that he came to denounce varnashrama: “Gandhi incrementally unfurled a critique of the fourfold varna order, taking the concept of such an order in the end, by the mid-1940s, to vanishing point.” On such exercises in ‘cherry picking’, see Roy’s introduction to this volume.

    3. David Hardiman writes (2004, 126) that during the South African years, Gandhi “had appeared to have little time for the caste system. He had been expelled from his own Baniya sub-caste for travelling overseas—considered a ‘polluting’ act at that time—and had never sought to gain readmission to the caste. In 1909, he condemned the caste system and caste tyranny. On his return to India he adopted a much softer line on the question. He denied that the caste system had harmed India, arguing that it was no more than a form of labour division, similar to occupational divisions all over the world. It was in fact superior to class divisions, ‘which were based on wealth primarily’. He also believed that reform could be brought about through caste organisations.”


    http://www.outlookindia.com/article.aspx?289692



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    Right to food might not change the situation at all because the government agencies have to work for business interests.



    सवाल यह भी है कि क्या मां माटी मानुष की सरकार सचमुच अवैध खाद्य कारोबार पर अंकुश लगाना चाहती है।


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    Excalibur Stevens Biswas


    बंगाल में रहने वाला हर शख्स खाद्यप्रदूषण का शिकार है।मिलावटी खाद्य ही परोसा जाता है हर थाली में।पौष्टिक आहार की कोई व्यवस्ता नहीं है।बंगाल में 1959 में आजादी के बाद जो खाद्य आंदोलन शुरु हुआ और जिसकी नींव पर खड़ी रही वाम राजनीति।साठ के दशक के खाद्य आंदोलन की वजह से प्रफुल्ल सेन के मुख्यमंत्रित्व और केंद्रीय मंत्री अतुल्य घोष की अगुवाई में कांग्रेसी सत्ता का अवसान करके बंगाल में पहला परिवर्तन करने वाले वामपंथी ही थे। लेकिन अब बंगाल के वामपंथी सत्ता से बेदखल होनेके बावजूद खाद्यसुरक्षा के मुद्दे पर खामोश है।बल्कि जनवितरण प्रणाली की आवाज बार बार उठायी जाती है,जिसका वजूद वाम जमाने ही लगभग खत्म हो गया।राशन से सड़ा हुआ अनाज का रिवाज वाम जमाने से ही शुरु हुआ।


    मां माटी मानुष की सरकार ने हाल में खाद्य में मिलावट के खिलाफ अवैध खाद्य कारोबार खत्म करने के उद्देश्य से एक क्रांतिकारी अभियान छेड़ा है,जिसके बारे में रेडियो से प्रचार तो हो रहा है लेकिन आम जनता को इसकी खास जानकारी नहीं है और न खाद्य सुरक्षा आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ताओं को।


    बंगाल सरकार का निर्देश है कि भोजन,खाद्य सामग्री  बनाने और भोजन बेचने वालो के लिए अब लाइसेंस अनिवार्य है। राज्य में खाद्य निरीक्षक अब तक क्या करते रहे हैं,इसकी किसी को कोई जानकारी है ही नहीं। राज्य में व्यापक पैमाने पर यह कारोबार बिना लाइसेंस,बिना सरकारी निगरानी में चल रहा है।


    गली गली में जो मिठाइयों की दुकाने हैं और हर कूचे में जो फास्ट फुड की दुकानें हैं,उनपर निगरानी का कोई तंत्र ही नहीं है।कचरे के ढेर,गंदी नालियों के किनारे ऐसा कारोबार खूब फल फूल रहा है। खासकर फास्ट फूड के धंधे में बेरोजगार युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है।ये लोग राजनीतिक और पुलिस संरक्षण में अपना कारोबार चला रहे हैं और उनमें से ज्यादातर के पास लाइसेंस नहीं है।हाकर बिना लाइसेंस कुछ भी बेचने को आजाद हैं और यूनियन का परिचयपत्र ही उनका लाइसेंस है।यह रघुकुल रीति बा वाम जमाने से चली आ रही है।


    सवाल हैकि क्या राज्य सरकार को आम जनता की सेहत की चिंता है।

    सवाल यह भी है कि क्या मां माटी मानुष की सरकार सचमुच अवैध खाद्य कारोबार पर अंकुश लगाना चाहती है।


    अगर निगरानी तंत्र विकसित न हुआ तो पूरी कवायद बेकार हो जायेगी क्योंके बिना लाइसंसे जो परोसा जा रहा है, लाइसेंस मिल जाने पर उसे परोसने की भी पूरी छूट हो जायेगी।


    एक और खतरा यह है कि इससे एकाधिकार कारोबार के सिंहद्वार खुल जायेंगे और बड़ी कंपनियां,बड़े कारोबारी शुद्ध बोजन परोसने के नाम पर इस कारोबार से छोट और मंझोले खुदरा कारोबारियों को बाहर कर देंगे।


    उम्मीद है कि सरकार इन खतरों से बेखबर न होगी और खादय कारोबार में लाइसेंस राज कायम करते हुए छोटे और मंझौले, खुदरा कारोबारियों के हितों का पूरा ख्याल रखा जायेगा।




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    attribution http://www.citehr.com/465007-registration-license-under-food-safety-act-online.html#ixzz2wFFogh11


    For few months the state govt. has launched a campaign against illegal food sellers who sell and cook without food license.  If people want to get shops from licensed shops then there is only one avenue that leads to monopolistic business of food ejecting out small and medium food sellers as well as traders.


    Nobel laureate Amartya Sen's work, Poverty and Famines: An Essay on Entitlement and Deprivation has long informed policymakers that food scarcity is not necessarily the cause of famines. His work on the Bengal famine showed that food availability was 11 per cent higher in 1943, the year of the famine, than in 1941. The problem was distribution.


    Now the recent food crisis is rooted deeply in the system which deprive the masses of food security and the right to food might not change the situation at all because the government agencies have to work for business intersts.



    And if govt. is so conscious then why there is a boom in the number of illegal foot? Fast food corners?


    If the popularity of Rasgulla, Sandesh and Mishti Doi is anything to go by, the Bengalis from Eastern India sure know a great deal about sweet making.But you may never know wherefrom to get the safe sweets.Unaware consumption might land you in hospital any time.


    No worry,you may find sweets shops anywhere and may locate private medical care anywhere. It is the real life cycle in Bengal.


    Is it another stunt or a direct publicity of shopping malls and corporate monopolistic companies?



    Mind you,West Bengal Finance Minister Amit Mitra declared in last January that the State had fetched investments worth around one hundred crore at a food park at Sankrail in Howrah district.

    Thus, private companies would get the food business striking the rot out.

    According to the minister, three new companies in the food processing sector have been allotted nearly 5 acres in the second phase at Sankrail food park.

    "These three companies put together will invest nearly 100 crore and are expected to create 600 jobs," Mitra told reporters at the State Secretariat.

    The minister also added that 10 industries have been allotted land at the food park over the past 20 days.

    Fifty Years Ago: Food Movement of 1959

    Mon, 2009-08-31 14:13 | Pragoti Editorial Team
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    In post-independence and post-partition Congress-ruled West Bengal, the echoes of famine continued to be heard in the 1950s. The collusion between rice mill-owners, jotdars and food hoarders created an artificial food crisis. These proprietor segments, who controlled rice distribution, also exercised a strangle-hold over the villages and formed the rural backbone of the Bengal Congress. So the government refused to take any measure which went against their interests. As hunger assumed famine like proportions, the people organised themselves into a 'Committee to Combat Famine' under the leadership of the undivided Communist Party of India. Other left parties also endorsed this initiative. From the second half of the 1950s, between 1956 and 1958, food movements became an annual occurrence. The Food Movement of 1959 however was a turning-point in the history of class struggle in West Bengal. Food insecurity by this time had reached frightening proportions in rural and urban areas and distress was acute among the marginal and landless peasantry, the workers and lower middle-classes.

     

    On 31 August, a huge mass demonstration was organised in Kolkata where hundreds and thousands arrived from the villages under the leadership of the Kisan Sabha. Though primarily a mass protest by peasants, rural women with babies walked alongside high school students; office workers merged with the columns of manual workers. The whole of Kolkata's colonial city centre turned into a sea of 300,000 people demanding an end to destitution and hunger. The centre of the rally was the Shahid Minar, the foot of the monument and the adjoining open space of the 'Maidan' having historically served as the convergence point of anti-colonial and anti-establishment protests. That afternoon rain repeatedly lashed at the demonstrators. But their determination to force the Congress government to provide immediate relief or quit remained resolute. At the end of the meeting, a procession began and started making its way towards Writers' Building. By then evening had descended. First, the demonstrators were cordoned off by the police. Then unexpectedly, without any warning, violent 'action' began. Contemporary observers have noted the way the police attacked directionless, panic-stricken people blinded by teargas.

     

    80 people died in the carnage that day; they were mostly starving peasants who had survived the devastating and man-made Bengal Famine of 1943 and were no longer willing to die of hunger without any protest. Not a single bullet was fired. The police used sticks to beat people to death. 1000 people went missing and 3000 were injured. Ordinary bystanders, petty shopkeepers, cinema-hall ushers and sex-workers offered solidarity and assistance to those fleeing the police from the main thoroughfares in a bloodied state and spilling into the side streets and narrow alleys of north Kolkata. The police arrested thousands. According to one eye-witness who is now 74 years old: 'In the semi-darkness, I saw mothers, sisters, brothers lying motionless on the road.' The police later cremated many of the anonymous victims. Bodies could be seen floating in theGanges. The next day, on 1 September, the police fired on students who were protesting against the atrocities and a wave of repression followed. Entire neighbourhoods of north Kolkata became anti-police bastions of resistance and the government deployed troops in several districts. Jyoti Basu compared the events of 31 August with Jallianwallabagh in the Bengal Legislative Assembly and the combined opposition managed to corner the Congress. In 1966, a second Food Movement was launched by the left parties and its impact could be felt in the victory of the First United Front government of 1967. 1959 demonstrated that despite utmost and merciless ferocity, the Congress and the social forces it represented in West Bengal, were in a process of retreat. This retreat, however, claimed the lives of 80 people on 31 August 1959. At a time of rising hunger in the country, Pragoti remembers and salutes them.


    http://www.pragoti.in/node/3575

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    आनंद तेलतुंबड़े का यह महत्वपूर्ण लेख जाति के उन्मूलन की जरूरत, आरक्षण की सामाजिक प्रासंगिकता और इन सबके उलट शासक वर्गों के वास्तविक इरादों की एक ऐतिहासिक पड़ताल करता है. अनुवाद: रेयाज उल हक

    औपनिवेशिक दौर में अछूतों का गुस्सा पहली बार सामाजिक प्रक्रियाओं से उन्हें बाहर रखे जाने के खिलाफ जाहिर हुआ था. जोतिबा फुले के अलावा, जिन्होंने उनके मुद्दे को अस्पृश्यता के परे जाकर समझा और अछूतों को अपने 'शूद-अतिशूद्र'में एक ऐसे वर्ग के रूप में शामिल किया जो 'शेतजी और भातजी' [सेठ-साहूकार] के हाथों शोषित थे. दूसरे सभी समाज सुधारकों का पूरा जोर कुल मिला कर जाति की बीमारी के बजाए महज ऊपर से दिखने वाले अस्पृश्यता के लक्षण पर ही था. लखनऊ संधि के बाद कांग्रेस को सचमुच अछूतों को हिंदुओं के रूप में अपने साथ बनाए रखने की जरूरत महसूस हुई, कि कहीं ऐसा न हो कि वे मुसलमानों के हाथ अपना राजनीतिक हिस्सा खो दें. इसलिए उन्होंने छुआछूत के मुद्दे पर काम करना शुरू किया. बाबासाहेब आंबेडकर की लगातार कोशिशों के कारण, खास कर 1931-32 में गोलमेज सम्मेलन में उनकी जोरदार दलीलों से गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 में अछूतों को 'अनुसूचित जातियों'के रूप में अलग और विशेष हैसियत मिली थी. 1937 के चुनावों से पहले, जब इस अधिनियम में दिए गए प्रावधानों को लागू कराने के लिए इस अनुसूची को तैयार करना था, इस सिलसिले में पूरे भारत में अस्पृश्यता के आधार पर जातियों की पहचान करने के लिए भारी मशक्कत की गई. ये प्रावधान राजनीतिक शक्ल में थे. अपने बुनियादी रूप से ये अलग निर्वाचक मंडलों के साथ आरक्षण की शक्ल में थे जो बाद में, पूना पैक्ट के कारण बदले हुए रूप में, साझे निर्वाचक मंडलों में आरक्षण के रूप में सामने आए. अधिनियम में तरजीही प्रावधान (preferment provisions) भी थे जिनमें राज्य को उनके हितों का खयाल रखने की जिम्मेदारी दी गई थी. इसी के मुताबिक अनुसूचित जातियों के सक्षम लोगों को सरकारी क्षेत्रों में नौकरियां दी गईं. जब डॉ. आंबेडकर 1942 में वायसरॉय की कार्यकारी परिषद के सदस्य बने, यह तरजीही नीति एक कार्यकारी आदेश के जरिए कोटा सिस्टम में बदल दी गई.

    यहां इस बात पर गौर किया जाना महत्वपूर्ण है कि आरक्षण व्यवस्था का इस बिंदु तक विकास अवधारणा के स्तर पर सही था. एक आम नियम के अपवाद के रूप में आरक्षण को असाधारण लोगों तक विस्तार दिया गया (अछूत दुनिया में एक बेहद असाधारण समूह हैं, इस पर कोई भी असहमत नहीं होगा). लेकिन सत्ता हस्तांतरण के बाद, संविधान लिखे जाने के दौरान इस असाधारण प्रावधान का विस्तार इस तरह हुआ कि इसकी वजह से समाज में चले आ रहे सांप्रदायिक और जातीय विभाजन आने वाले दिनों के लिए पुख्ता हो गए, वरना वे राजनीतिक अर्थव्यवस्था में आने वाले बदलावों के जोर के आगे टिक नहीं पाते और मिट जाते. पहली बात तो ये हुई कि जो प्रावधान अछूतों के लिए बनाए गए थे, उन्हीं प्रावधानों को एक नयी अनुसूची बना कर आदिवासियों तक बढ़ा दिया गया. अगर सरकार आदिवासियों के लिए कुछ करना चाहती थी तो इसका एक विकल्प यह था कि अनुसूचियों को एक साथ मिला दिया जाता या अछूतों के लिए मौजूद अनुसूची को बढ़ा कर उसमें आदिवासियों को शामिल कर लिया जाता. ऐसा करने से जाति का मुद्दा धुंधला पड़ गया होता क्योंकि हालांकि आदिवासी पिछड़े थे, लेकिन उन पर अछूतों की तरह अछूत होने का सामाजिक कलंक नहीं था. अगर इन अनुसूचियों का मकसद ठीक-ठीक समान था तो इनको अलग किए जाने का कोई मतलब नहीं था सिवाए यह कि इसने अछूत जातियों को एक अलग श्रेणी के रूप में जिंदा रखा. अछूतों और आदिवासियों को एक साथ मिला देने से कम से कम यह होता कि जाति का कलंक फीका पड़ गया होता. लेकिन उन्हें अलग अलग रखे जाने से अछूतों की पहचान अलग लोगों के रूप में बनी रही. इस अलगाव का लाभ विभिन्न समुदायों की उन मांगों में बखूबी दिखता है जो खुद को अनुसूचित जनजातियों में तो शामिल किए जाने की मांग करते हैं, लेकिन अनुसूचित जातियों में कतई नहीं. यह उन्हें कमतर होने का सामाजिक कलंक उठाए बिना सारे फायदे मुहैया कराता है. हम यह साफ देखते हैं कि ये फायदे उठाने के लिए कोई भी अनसूचित जाति का होना पसंद नहीं करता!

    आदिवासियों (जनजातियों) के लिए बनी अनुसूची में एक और समस्या थी, जो यह थी कि आदिवासियों के रूप में समुदायों की अनुसूची बनाने के लिए एक ढीले-ढाले मानक का इस्तेमाल किया गया था. अछूतों के उलट, जिनको अनुसूची में अछूतपन के एक ठोस मानक के आधार पर शामिल किया गया था, आदिवासियों के लिए ऐसा कोई मानक नहीं हो सकता था. या ऐसा कोई मानक किसी भी दूसरे समुदाय के बारे में असंभव था. यह समस्या इस शक्ल में सामने आई कि कुछ गलत समुदायों को अनुसूची में शामिल कर लिया गया जिन्होंने बजाहिर  आदिवासियों के लिए बने फायदों पर कब्जा कर लिया है. हरेक राज्य में यह दिखेगा कि महज एक या दो समुदायों ने, जो यों भी ऊंची जातियों जितने आगे बढ़े हुए हैं, जनजातियों के लिए अनुसूची में एकाएक महज शामिल कर लिए जाने की वजह से फायदों पर कब्जा कर लिया है.

    सबसे बड़ा खेल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत खेला गया, जिसने अन्य पिछड़े वर्गों की भलाई को बढ़ावा देने को सरकारों के लिए बाध्यकारी बना दिया. यह अनुच्छेद कहता है:
    राष्ट्रपति भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशाओं के और जिन कठिनाइयों को वे झेल रहे हैं उनकी खोजबीन के लिए और उन कठिनाइयों को दूर करने और उनकी दशा को सुधारने के लिए संघ या किसी राज्य द्वारा जो उपाय किए जाने चाहिए उनके बारे में और इस मकसद के लिए संघ या किसी राज्य द्वारा जो अनुदान किए जाने चाहिए और जिन शर्तों के अधीन वे अनुदान किए जाने चाहिए उनके बारे में सिफारिश करने के लिए आदेश द्वारा एक आयोग नियुक्त कर सकेगा...नियुक्त आयोग अपने को निर्देशित विषयों की खोजबीन करेगा और राष्ट्रपति को रिपोर्ट देगा जिसमें उसके द्वारा पाए गए तथ्य दर्ज किए किए जाएंगे और जिसमें ऐसी सिफारिशें की जाएंगी जिन्हें आयोग उचित समझे.

    संविधान की हिमायत में कोई यह दलील दे सकता है कि अनुच्छेद में इस्तेमाल किया गया शब्द 'सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग'है न कि 'जातियां'. असल में संविधान अछूतों के संदर्भ को छोड़ कर कहीं भी 'जाति'का इस्तेमाल नहीं करता है. लेकिन इस बात को सब जानते थे कि अनुच्छेद में 'वर्ग'का मतलब क्या था. यह सिर्फ जातियों के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाने वाला था. इस अनुच्छेद को शासक वर्गों के लिए एक ऐसा हथियार बन जाना था, जिसे किसी सही मौके पर इस्तेमाल किया जा सके. शासक वर्ग को संविधान ने कहीं अधिक जरूरी जिम्मेदारियां सौंपी थीं. एक दशक के एक तयशुदा समय के भीतर पूरा किए जाने की मांग करती ऐसी एक जिम्मेदारी और अकेली ऐसी जिम्मेदारी थी: चौदह साल की उम्र के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान. उन्होंने इसकी अनदेखी कर दी लेकिन फौरन उन्होंने अनुच्छेद 340 का अनुसरण करते हुए 'पिछड़े वर्गों'की पहचान करने के लिए 29 जनवरी 1953 को कालेलकर आयोग का गठन कर दिया. कुदरती तौर पर, अपने सामाजिक पिछड़ेपन के संदर्भ में, जातियों को तो तस्वीर में आना ही था. वो आईं और आयोग ने ऐसी जातियों की पहचान की जो 'शैक्षणिक'रूप से पिछड़ी थीं और सरकारी नौकरियों के साथ साथ व्यापार, कारोबार और उद्योग में उनका कम प्रतिनिधित्व था.

    कालेलकर आयोग ने 30 मार्च 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें 2399 पिछड़ी जातियों और समुदायों की पहचान पिछड़े के रूप में की, जिसमें से 837 को उसने 'सर्वाधिक पिछड़ा'माना. अन्य मामलों में इसने 1961 में जातिवार जनगणना कराने और सभी तकनीकी और प्रोफेशनल संस्थानों में पिछड़े वर्गों के योग्य छात्रों के लिए 70 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की. शायद इसके लिए सटीक मौका अभी सामने नहीं आया था इसलिए रिपोर्ट को केंद्र सरकार ने इस आधार पर नकार दिया कि इसने पिछड़े वर्ग की पहचान करने के लिए किसी वस्तुनिष्ठ मानदंड का इस्तेमाल नहीं किया था.

    अगले दशक तक, आंशिक भूमि सुधार और हरित क्रांति की वजह से राजनीतिक अर्थव्यवस्था में बदलाव आने शुरू हुए, जिन्होंने भारी आबादी वाली शूद्र जातियों के बीच धनी किसानों के वर्ग को पैदा किया. इन जातियों ने व्यापक ग्रामीण भारत में ऊंची जातियों के हाथ से ब्राह्मणवाद की मशाल अपने हाथ में ले ली. इन बदलावों के नतीजे में क्षेत्रीय दलों के बनने में तेजी आई और चुनावी राजनीति (जो सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजयी घोषित करने पर आधारित है, जिसमें वोटों की एक छोटी संख्या भी नतीजों को बना और बिगाड़ सकती है) और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन गई.

    पिछड़ी जातियों का उभार और उनके क्षेत्रीय दल धीरे धीरे स्थानीय स्वशासी निकायों से राज्यों में फैले और आखिर में इसका नतीजा 1977 में जनता पार्टी के हाथों कांग्रेस की हार के रूप में सामने आया. जनता पार्टी इन सभी तत्वों की एक पचमेल खिचड़ी थी. जनता पार्टी सरकार ने 1 जनवरी 1979 को दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया, जिसे मंडल आयोग के नाम से जाना जाता है. इसकी जिम्मेदारी 'सामाजिक या शैक्षणिक रूप से पिछड़ों की पहचान'करना थी. आयोग ने 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (ओबीसी) की ग्यारह कसौटियों पर पहचान की लेकिन अनिवार्य रूप से जातीय अथवा धार्मिक समुदायों के संदर्भ में जो 3743 अलग अलग जातियों और समुदायों से आते थे और कुल आबादी का 54 फीसदी थे (अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को छोड़ कर). आयोग ने दिसंबर 1980 को अनेक सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्ट सौंप दी. आयोग के रिपोर्ट सौंपने के एक दशक के बाद 1989 में तब के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपने राजनीतिक मंसूबों के तहत जातियों का पिटारा खोलने का फैसला किया. इसका फौरी नतीजा यह हुआ कि देश भर में 'आरक्षण'के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी आग फैल गई, जो तब तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तक ही सीमित थी और हिचक के साथ ही लेकिन जिसको व्यापक रूप से मान लिया गया था. इस आग ने हास्यास्पद घटनाओं को जन्म दिया. हालांकि आरक्षण जिन पिछड़े वर्गों के लिए था, उस वर्ग के लोग अनुसूचित जातियों पर टूट पड़े जो बेवकूफी में 'आरक्षण'का बचाव करने उतर पड़े थे. आखिर में, ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण 1993 में लागू हुआ और उच्च शिक्षा संस्थानों में 2008 में. आरक्षण राजनीतिक दलों के हाथों में एक हथियार के रूप में अपने सच्चे रूप में सामने आए जिन्होंने अपने राजनीतिक गुणा-भाग के लिहाज से बेधड़क इस्तेमाल करना शुरू किया.

    कोई भी समझदार इनसान आसानी से यह देख सकता है कि भारत जैसे एक पिछड़े देश में पिछड़ेपन को आरक्षण के एक असाधारण कदम के लिए कसौटी के रूप में इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता, जहां 80 फीसदी आबादी (सरकारी हिसाब से 22.5 फीसदी अनुसूचित जातियां-अनुसूचित जनजातियां तथा 54 फीसदी पिछड़ी जातियां जो मिल कर 76.5 फीसदी बनाती हैं. इनमें बाहर रखी गई जातियों के 5 फीसदी गरीब लोगों को रख दें, जिनमें से सभी ऊंची जातियों से ही नहीं हैं, तो यह आंकड़ा 80.5 फीसदी तक चला जाएगा) को पूरी तरह पिछड़ा कहा जा सकता है. कहने का मतलब ये नहीं है कि अछूतों के अलावा ऐसे लोग नहीं हैं जो उनसे गरीब और पिछड़े नहीं हैं. वे सचमुच हैं. और राज्य की उनके प्रति तयशुदा जिम्मेदारी बनती है. उसके पास इस जिम्मेदारी को पूरा करने के नीतिगत उपाय भी हैं न कि अकेला आरक्षण, जो एक ऐसी दोधारी तलवार है जिसका इस्तेमाल बहुत सावधानी से करने की जरूरत है. मिसाल के लिए, खुद संविधान में ही ऐसी एक नीति का संकेत दिया गया है. यह पास के स्कूलों में सभी बच्चों को एक परिपक्व उम्र तक मुफ्त, अनिवार्य और गुणवत्ता परक शिक्षा मुहैया कराने के बारे में था. (संविधान ने 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की बात सुझाई थी और उसे इतने अधिक शब्दों में विस्तार से नहीं बताया था). मुझे लगता है कि अगर सरकार ने इस अकेले मुद्दे को उचित भावना के साथ लिया होता और इस प्रावधान को लागू किया होता तो आरक्षणों की जरूरत तक नहीं रह गई होती. अगर सरकार जनता के पिछड़ेपन पर सचमुच चिंतित है, तो इस बात को यकीनी बनाने की जरूरत को समझा होता कि इस धरती पर आए हरेक बच्चे को उसके मां-बाप की अक्षमताएं पैदाइशी तौर पर हासिल न हों. गर्भ धारण करने वाली हरेक औरत को बेहतरीन डॉक्टरी देखरेख और उचित भोजन राज्य द्वारा मुहैया कराया जाता. वो एक सेहतमंद माहौल में बच्चे को पैदा करती और पैदाइश के बाद बच्चे के सेहतमंद विकास के लिए उचित भोजन और जरूरी चीजें मुहैया कराई जातीं. इसके बाद उसे बेहतरीन शिक्षा दी जाती. अगर सभी बच्चे केवल करीब के स्कूलों से समान शिक्षा हासिल करते तो एक स्वस्थ समाजीकरण होता और उनकी क्षमताओं को साकार करने के समान मौके मिलते. तथाकथित कल्याणकारी योजनाओं की एक भीड़ में उलझने के बजाए सरकार को इन कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए थी. लेकिन इसने इनकी पूरी तरह अनदेखी की. इसके बजाए जब उसे हालात ने इस मामले में कुछ करने को मजबूर किया तो उसने संविधान द्वारा दी गई असली जिम्मेदारी को ही बदल दिया और 'शिक्षा का अधिकार'अधिनियम को लागू किया. इस अधिनियम ने केवल उस बहुस्तरीय शिक्षा व्यवस्था को कानूनी जामा ही पहनाया है, जो सरकार की मेहरबानी से देश भर में फली फूली है. यह व्यवस्था शिक्षा के स्तर को मां-बाप की सामाजिक-आर्थिक हैसियत की बुनियाद पर निर्धारित करती है, और यह ठीक मनु द्वारा पेश किए गए नियमों के समान है. यहां भी, बहुत शातिराना तरीके से आरक्षण के हथियार का इस्तेमाल निचली जातियों और वर्गों को बेवकूफ बनाने के लिए किया है.

    कोई भी इस छोटे से इतिहास में शासक वर्गों के छिपे हुए मंसूबों को साफ साफ देख सकता है, कि वे अपनी सोने के अंडे देने वाली जाति की मुर्गी को कभी मरने नहीं देंगे! दूसरी तरफ यह दलित राजनीति के दिवालिएपन की दास्तान भी है, जिसे ऐसे मुद्दे दूर दूर तक भी नहीं छूते. बल्कि यह अजीब विरोधाभास है कि इसके उलट उनके बीच शिक्षा के प्रसार के साथ साथ अस्मिता या पहचान के आधार पर संकल्पित 'आंबेडकरवाद'के फैलाव के बावजूद, उनके बीच ऐसे लोगों की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है जो यह मानते हैं कि कि जातियां सचमुच खत्म की जा सकती हैं.

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    हम चूंकि जाति उन्मूलन के मुद्दे को हिंदू राष्ट्र के कारपोरेट साम्राज्य के खिलाफ बुनियादी और जवाबी एजंडा मानते रहे हैं

    पलाश विश्वास

    कवि मित्र उदय प्रकाश ने लिखा है कि

    ब्रेख़्त की एक कविता कुछ इस तरह थी :

    'इतना पोपला हो चुका है उनका मुंह

    कि हर आती-जाती हवा

    उसमें सीटी बजा जाती है !'


    इस समय बहुत-सी सीटियां सुनाई देने लगी हैं.


    पिछले दिनों बाबासाहेब बी. आर. आंबेडकर की चर्चित और क्रांतिकारी किताब एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट (जाति का उन्मूलन) का विस्तृत टिप्पणियों समेतएक नया संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसमें अरुंधति रॉय की 150 पन्ने की प्रस्तावना भी शामिल है. द डॉक्टर एंड द सेंटशीर्षक वाली इस प्रस्तावना के अलग अलग अंश कारवां, आउटलुक और द हिंदू में छप चुके हैं, अरुंधति का एक साक्षात्कार आउटलुक में आ चुका है और लेखिका ने देश में अनेक जगहों पर इस सिलसिले में व्याख्यान और भाषण दिए हैं. इसी बीच प्रस्तावना के सिलसिले में, और एक गैर-दलित होते हुए आंबेडकर की रचना पर लिखने के अरुंधति के 'विशेषाधिकार' का मुद्दा उठाते हुए कुछ लेखकों और समूहों ने अरुंधति और किताब के प्रकाशक की आलोचना की है. इनके अलावा फेसबुक पर भी इस सिलसिले में अलग अलग बहसें चल रही हैं. अरुंधति ने इनमें से कुछ का जवाब देते हुए एक टिप्पणी जारी की है जिसे यहां पढ़ा जा सकता है.


    5 मार्च 2014 को इंडिया हैबिटेट सेंटरमें किताब पर एक बातचीत रखी गई, जिसमें पहले अरुंधति ने एक छोटा सा भाषण दिया और इसके बाद हिंदी के जानमाने कवि असद जैदी के साथ एक संवाद में भाग लिया. पेश है इस संवाद सत्र की रिकॉर्डिंग. साथ में, द डॉक्टर एंड द सेंटके आखिरी हिस्से का अनुवाद. अनुवाद: रेयाज उल हक


    हालांकि हम जिस दौर में जी रहे हैं वे उसे कलियुग कहते हैं. राम राज्य में भी शायद बहुत देर नहीं है. चौदहवीं सदी की बाबरी मसजिद को, जो कथित रूप से अयोध्या में 'भगवान राम' की जन्म भूमि पर बनाई गई थी, हिंदू फासीवादियों ने आंबेडकर की बरसी 6 दिसंबर 1992 को गिरा दिया. हम इस जगह पर भव्य राम मंदिर बनाए जाने के खौफ में जी रहे हैं. जैसा कि महात्मा गांधी ने चाहा था, अमीर लोग अपनी (और साथ-साथ हरेक की) दौलत के मालिक बने हुए हैं. चार वर्णों की व्यवस्था बेरोकटोक राज कर रही है: ज्ञान पर बड़े हद तक ब्राह्मणों का कब्जा है, कारोबार पर वैश्यों का प्रभुत्व है.  क्षत्रियों ने हालांकि इससे अच्छे दिन देखे हैं, लेकिन अब भी ज्यादातर वही देहातों में जमीन के मालिक हैं. शूद्र इस आलीशान हवेली के तलघर में रहते हैं और घुसपैठ करने वालों को बाहर रखते हैं. आदिवासी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं. और रहे दलित तो हम उन्हीं के बारे में तो बातें करते आए हैं.


    क्या जाति का खात्मा हो सकता है?


    तब तक नहीं जब तक हम अपने आसमान के सितारों की जगहें बदलने की हिम्मत नहीं दिखाते. तब तक नहीं जब तक खुद को क्रांतिकारी कहने वाले लोग ब्राह्मणवाद की एक क्रांतिकारी आलोचना विकसित नहीं करते. तब तक नहीं जब तक ब्राह्मणवाद को समझने वाले लोग पूंजीवाद की अपनी आलोचना की धार को तेज नहीं करते.


    और तब तक नहीं जब तक हम बाबासाहेब आंबेडकर को नहीं पढ़ते. अगर क्लासरूमों के भीतर नहीं तो उनके बाहर. और ऐसा होने तक हम वही बने रहेंगे जिन्हें बाबासाहेब ने हिंदुस्तान के 'बीमार मर्द' और औरतें कहा था, जिसमें अच्छा नहीं होने की चाहत नहीं दिखती.

    हस्तक्षेप में प्रकाशित इस संवाद की पिछली कड़ी पर अनिता भारती जी को लग रहा है कि यह लेख उनके खिलाफ लिखा गया है।ऐसा हरगिज नहीं है।

    स‌ुपारी किलर हो गये हैं अस्मिता राजनीति के लोग

    http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2014/03/18/%E0%A4%B8%E2%80%8C%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%97%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%85%E0%A4%B8


    उन्होने इस पर लिखा हैः

    मुझे Palash Biswasजी के द्वारा लिखे गए लेख पर हैरानी हो रही है. मैने अरुंधति राय के राउंड टेबल इंडिया पर छपे पत्र को पढकर कुछ प्रतिक्रिया अपनी फेसबुक की वाल पर लिखी थी. पता नही क्यों पलाश जी ने मेरे बात का मंतव्य समझे बिना जल्दी जल्दी स मेरे खिलाफ लेख लिख मारा और अब देखा वही लेख हस्तक्षेप में भी छपा हुआ है.. मुझसे अगर आप इस मुद्दे पर बातचीत करने के इच्छुक थे तो मैं भी थी आपसे बातचीत करने में उतनी ही इच्छुक थी और. यह बात मैने अपनी वाल पर भी आपके जबाब में लिखी थी. पर अब देख रही हूँ कि वे अब हमें या मुझे जिसे भी कहो, सुपारी किलर भी बता रहे है उनका एक वाक्य पढिए, जो मेरे अनुसार बहुत ही आपत्तिजनक है- अस्मिता राजनीति के लोग तो अब स‌ुपारी किलर हो गये हैं जो कॉरपोरेटवधस्थल में बहुसंख्यआबादी जिनमें बहिष्कृत मूक जनगण ही हैं,के नरसंहार हेतु पुरोहिती स‌ुपारी किलर बन गये। ।"

    अनिता जी,यह वाक्य आपके खिलाफ नहीं है।यह अस्मिता राजनीति करने वालों के लिए है।राजनीति यानी स‌त्ता की राजनीति।वह आप नहीं कर रही हैं।मैंने तो आपकी टिप्पणी को बतौर स‌ूत्र इस्तेमाल करते हुए एक संवाद की शुरुआत करने कीकोशिश की है।मुझे आपके स‌रोकार और आपके मंतव्य पर  कोई संदेह नहीं है।आपको जो शंकाएं थीं,उसके आधार पर मैंने अपनी बात रखी है।यह संवाद संवादविरोधी राजनीति को चिन्हित किये बिना नहीं हो स‌कता।मेरा मकसद किसी भी स‌ूरत में आप जैसे अत्यंत प्रतिबद्ध और ईमानदार व्यक्ति के विरोध का नहीं है।हम चाहते हैं कि आप इस विषय पर खुलकर लिखें।आपने बाद में जो मंतव्य किये हैं,वे भी संवाद में शामिल होंगे।आपका लिखा एक एक पंक्ति बहस को खोलेगा।जो बहुजन राजनीति का मौजूदा हाल है,उससे आप जुड़़ी नहीं है और न उसके लिए आप जिम्मेदार है।लेकिन हमारे विमर्श में आपका भारी योगदान है और रहेगा।मैंने जो मुद्दे उठाये हैं,कृपया उन पर गौर करें।आपसे हमने अपनी असहमति बता दी है।हमने अरुंधति के लिखे को भी ब्लाग में डाल दिया है।खास बात तो यह है कि दूसरे बुद्धिजीवियों की तरह अरुंधति ने बाबासाहेब को गांधी के मुकाबले छोटा नहींं किया है और गांधी स‌े तुलना उन्होंने बाबासाहेब का महत्व रेखांकित करने के लिए ही किया है।इसके अलावा आउट लुक में उन्होंने स‌ाफ स‌ाफ कहा है कि मौजूदा वक्त अंबेडकर की स‌बसे ज्यादा आपातकालीन जरुरत है।हम उनके मुद्दे पर गौर न करेंगे तो यह गलत होगा।हमारा कहने का आशय यह है।बाकी मसीहों,दूल्हों और दलबदलू मौकापरस्त चूहों के बारे में स‌ुपारी किलर स‌े ज्यादा कोई स‌टीक विशेषण हो तो आप बताएं।आप ऎसा कैसे स‌ोच स‌कती हैं कि मैं आपके खिलाफ लिख भी स‌कता हूं।आप अत्यंत महत्वपूर्ण हैं ,हमारे लिए इसीलिए आपके कहे स‌े मैंने यह इस संवाद की शुरुआत की किसी मसीहा या दूल्हे या स‌ुपारी किलर को उद्धृत किये बिना।आपने स‌त्तावर्ग को कभी स‌मर्थन दिया है और बहुजनों के खिलाफ आपने कुछ लिखा है,इसका मुझे यकीन नहीं है और न मैंने ऎसा कुछ लिखा है।हमने अंबेडकरी आंदोलन का यथार्थ और उसके बाहर देश में जो मौकापरस्त स‌त्ताचस‌्पां राजनीति है,उसका खुलासा किया है,आप इससे अपने को जोड़कर हमें शर्मिंदा कर रही हैं।बहस चूंकि आगे जारी रहेगी।आपने जो मंतव्य किया और आपके उठाये मुद्दे पर मैंने जो लिखा,उसपर आगे आप खुलकर लिखें तो हम आलोकित होंगे।

    अनिता जी हिसाब स‌े हम इस मुद्दे पर स‌िरे स‌े बात करें तो ज्यादा बेहतर है और इसे अरुंधति ने खूब रेखांकित किया हैः

    तब तक नहीं जब तक हम अपने आसमान के सितारों की जगहें बदलने की हिम्मत नहीं दिखाते. तब तक नहीं जब तक खुद को क्रांतिकारी कहने वाले लोग ब्राह्मणवाद की एक क्रांतिकारी आलोचना विकसित नहीं करते. तब तक नहीं जब तक ब्राह्मणवाद को समझने वाले लोग पूंजीवाद की अपनी आलोचना की धार को तेज नहीं करते.


    और तब तक नहीं जब तक हम बाबासाहेब आंबेडकर को नहीं पढ़ते. अगर क्लासरूमों के भीतर नहीं तो उनके बाहर. और ऐसा होने तक हम वही बने रहेंगे जिन्हें बाबासाहेब ने हिंदुस्तान के 'बीमार मर्द' और औरतें कहा था, जिसमें अच्छा नहीं होने की चाहत नहीं दिखती.


    अनिता भारती जी का  मंतव्य यह भी  हैः

    पलाश जी आपकी विद्वता से मैं हमेशा प्रभावित रही हूँ पर आपसे सादर अनुरोध है कि बिना जल्दबाजी किए मेरा स्टेटस दूबारा से पढिए और मेरी वाल पर आपके कमेंट पर किया गया मेरा कमेंट भी जरुर पढिए. तब शायद आप मेरी बात समझ पाएं.

    मुझे नही लगता कि दलित समाज या उसका कोई बुद्धिजीवी यह चाहेगा कि अम्बेडकर पर उनका 'एकाधिकार' रहे या केवल अम्बेडकर पर वही केवल अपनी 'कलम' चलाएं. हमारी और हमारे समाज की सबसे बडी लडाई तो इसी बात पर है कि डॉ. अम्बेडकर और उनकी विचारधारा को ही क्यों केवल एक सीमित दायरे और समाज में कैद करके देखा जाता है, जबकि उनके विचारों की, उनके दर्शन की और उनके कार्यों की प्रसांगिकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी तब थी. आप लोगों को सवाल उठाना या अपने संशय जाहिर करना इतना नागवार गुजरता है कि आप सीधे सीधे आरोपों पर उतर आते है और छूटते ही यह कहते है कि क्या दलितों पर लिखने के लिए दलित होना जरुरी है ? अरे भई आप दलितों पर खूब लिखो, बाबा साहेब पर खूब लिखो, सावित्रीबाई ज्योतिबा पर खूब लिखो, किसने मना किया है. पर शर्त यही है कि आप दलितों को अपना दलित प्रेमी और उनके प्रति सदभावी होने का भरोसा तो जगाओ. ढाई हजार साल से वे आपके जुल्मोसितम और अन्याय के शिकार हो रहे है बिना उफ किये। अगर ऐसे में अब कुछ पढे लिखे दलित अपनी आपके प्रति कुछ शंकाएं, कुछ सवाल, खडा कर रहे है तो ये कुछ गलत तो नही है। यह आपके ऊपर है कि आप उन्हे कैसे संतुष्ट करें. दलित समाज बडा सीधा सादा न्याय प्रिय होता है बहुत जल्दी सब पर भरोसा कर उसे अपना लेता है.


    अनिता भारती जी हमारी अत्यंत आदरणीया लेखिका हैं,जातिभेद के उच्छेद विषय पर अरुंधति के लिखने पर उन्हें सख्त एतराज है।अनिता जी का सवाल है कि सवाल यह नही कि अरुंधति क्यों लिख रही है, और अभी ही क्यों लिख रही है जबकि जातिभेद के उच्छेद पर दिया गया भाषण जो की बाद में एक पुस्तक के रुप में बहुत पहले आ चुका है. इस पर वर्षों से चर्चा होती रही है. तमाम साथी जो बाबासाहेब को पढना शुरु करते है, सबसे पहले यही किताब पढते है. अरुंधति के इस पुस्तक को कोट करने या इस पर लिखने से यह किताब ज्यादा महत्वपूर्ण नही हो गई है. यहां यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि क्या जैसे कि अधिकांश अति प्रगतिशील बुद्धिजीवी अम्बेडकर के बरक्स गांधी और मार्क्स को, और उनकी विचाधारा को कहीं अधिक व्यावहारिक, लोकप्रिय, प्रभावशाली, निष्पक्ष, सैद्धांतिक, उपचारपरक, ममाधान करने वाली सिद्ध करते रहे है, क्या अरुंधति ने भी वैसा ही दिखाया है या साबित किया है. क्योंकि दलित, भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा दूध के जले है इसलिए छाछ को भी फुंक फूंक कर पीते है. आशीष नंदी और योगेन्द्र यादव इसके ताजा तरीन उदाहरण है. वैसे मेरा भी एक सवाल है अरुंधति से. जब तब इस देश में दलितों पर जुल्मोसितम की बाढ़ आई रहती है, वे इस पर कब-कब बोली है या उन्होने कितनी बार दलितो की बस्ती का दौरा किया है?


    इस‌ पर हमारा कहना है

    अनिता जी,आपकी बातें वाजिब है।हकीकत तो यह है कि हमने भी अपने पिता की मौत स‌े पहले,जो कि खुद अंबेडकरवादी के स‌ाथ स‌ाथ वामपंथी थे और अंबेडकर का पाठ स‌ामाजिक यथार्थ और प्रतिबद्धता की अनिवार्यशर्त मानते थे,हमने अंबेडकर को पढ़ा ही नहीं था।हमने भी दलितों के बीच पहचान के आधार पर 2005 तक जबत हम वामपंथी धारा स‌े जुड़े रहे कोई काम नहीं किया।हम अरुंधति के लिखे का इसलिए स‌्वागत कर रहे हैं कि राष्ट्र के चरित्र और कारपोरेट स‌ाम्राज्यवाद की इतनी अच्छी स‌मझ को वे अंबेडकर स‌े जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।हम बहुजन स‌माज की बात अक्सर करते रहे हैं।आदिवासियों के जल जंगल जमीन के हक हकूक के लिए अरुंधति लगातार आवाज उठाती रही हैं।दलितों को आदिवासियों स‌े अलग करके आप देखें तो लगेगा कि उनके स‌रोकार बहुजन स‌माज स‌े जुड़े नहीं है।अगर आदिवासी स‌माज को आप भारतीय बहुजन स‌माज का अंग मानती हैं तो उनकी आवाज स‌ुनने में आपको कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।


    आप निरंतर स‌क्रिय हैं।हम स‌मझते हैं कि अंबेडकर की प्रासंगिकता के बारे में बाकी लोगों के बनिस्बत आपका नजरिया खुला होना चाहिए।अरुंधति मूलतः लेखिका हैं।आदिवासी मामलों में वह कुछ इलाकों में गयी जरुर हैं,लेकिन वे एक्टिविस्ट नहीं है।आपने जो लिखा है,उसपर हमने गौर किया है।अरुंधति के नाम जाति उन्मूलन के स‌िलसिले में किये गये स‌वाल भी हमने देखे हैं और अरुंधति का जवाब भी।हम तो चाहते हैं कि इसपर स‌ार्थक संवाद हो और आप ऎसे संवाद को दिशा देने के लिए अत्यंत स‌क्षम है।इसी वजह स‌े मैंने यह टिप्पणी स‌ार्वजनिक की है और आपके विस्तत विश्लेषण का इंतजार कर रहे हैं।हम चूंकि जाति उन्मूलन के मुद्दे को हिंदू राष्ट्र के कारपोरेट साम्राज्य के खिलाफ बुनियादी और जवाबी एजंडा मानते रहे हैं तो इस स‌िलसिले में लगाता लिखने और संवाद का स‌िलसिला बनाने की कोशिश कर रहे हैं।


    दूसरी बात तो यह है कि आपकी उदारता है कि आप मेरी विद्वता की बात कर रही हैं।मैं कायदे स‌े बेहद जूनियर पत्रकार हूं और शायद अपढ़ भी।अपने स‌रोकारों की वजह स‌े लेखन के जरिये निरंतर संवादवाद प्रयास की बदतमीजियां जरुर करता रहता हूं और भले लोग नाराज हो जाते हैं।मैं अकादमिक बहस का अभ्यस्त नहीं हूं।प्तरकारिता की शैली में और शायद कभी रचनात्मक लेखन कर चुके होने के कारण एक संवाद शैली के मुताबिक बात करता हूं।मेरी दिलचस्पी किसी पत्रकार की तरह ही अपने के बजाय दूसरों के परिप्रेक्ष और उनकी स‌म्मति असम्मति के जरिये स‌ार्थक संवाद परिदृश्य बनाने की होती है।


    मैं अरुंधति का अंबेडकरी आंदोलन के बारे में लिखना स‌कारात्मक मानता हूं और टाहता हूं कि देश के बाकी आम और खास नागरिक भी अंबेडकर को पढ़ें ताकि स‌मता और स‌ामाजिक न्याय आधारित स‌माज की स‌्थापना के लिए अंबेडकरी जाति उन्मूलन प्रकल्प जो स‌त्ता की चाबी की कीमत बतौर बंद है,दुबारा खुला जा स‌कें।हम मानते हैं कि यह न स‌िर्फ बहुजन स‌माज बल्कि बहसंख्य निनानब्वे फीसद भारतीय,भारतीयसंविधाऩ,लोक गणराज्य और लोकतांत्रिक व्यवस्था का वजूद कारपोरेट मनुतंत्र के मुकाबले बहाल रखने के लिए अनिवार्य है।


    बल्कि हमें अरुंधति,राम चंद्र गुहा,एडमिरल भागवत,राम पुनियानी,सुभाष गाताडे.आनंद तेलतुंबड़े,आनंद पटवर्द्धन, जैसे लोगों के लिखे,जो स‌चमुच के विद्वान हैं,पर गौर करना चाहिए और उनकी पृष्ठभूमि के बजाय उनके उठाये मुद्दों की प्रासंगिकता पर संवाद फोकस करना चाहिए।यह बेहद जरुरी भी है।


    इसके जवाब में अनिता जी ने लिखा हैः

    पहली बात पलाश जी मैं अरुंधति के लेखन का विरोध नही कर रही हूं, मैं केवल अपनी शंकाएं जाहिर कर रही हूँ. इसमें कोई दो राय नही कि जैसा कि आपने उनके बारे में लिखा वह वे सब काम कर रही है. मैं यहां अरुंधति दलित सरोकारों की बात कर रही हूँ और उसपर अपनी बात रख रख रही हूं.

    शायद अनिता जी हमारे तर्क से सहमत नहीं हैं कि अंबेडकर सिर्फ दलितों के नेता नहीं थे और भारतीय सामाजिक यथार्त के सिलसिले में वे अब भी आदिवासियों और दलितों को अलग अलग धरातल पर देख रही है,जैसा कि प्रचलित नजरिया है।

    मेरी समझ से यह खंडित अस्मिता का विमर्श है,जिससे हम बाहर निकलने में अलग है और हम दलितों की समस्याओं को बाकी देश के साथ जोड़कर देखने में असमर्थ हैं।

    अनिता जी आप हमारे लिए अत्यंत आदरणीय हैं लेकिन कारपोरेट साम्राज्यवाद के प्रवक्ता आशीष नंदी और पार्टीबद्ध अराजनीतिक नागरिक समाज प्रतिनिधि योगेंद्र यादव के सरोकारों की तुलना अगर अरुंधति के सरोकार और लेखन से की जाये तो शायद हम अंबेडकरी आंदोलन की प्रासंगिकता और इसके विचलन,जाति उन्मूलन के एजंडा को राष्ट्र के बदलते चरित्र,निरंकुश दमनकारी सैन्य राज्यतंत्र,जल जंगल जमीन की लड़ाई के संदर्भ में रेखांकित कर ही नहीं सकते और अस्मिता आधारित सत्ता चाबी एवं आरक्षण बजरिये मलाईदार तबके के ग्लीबीकरण वैश्विक व्यवस्था समर्थक दृष्टिभंगी में ही अनंत काल तक सीमाबद्ध रहे हम लोग,जो खुद को अंबेडकर अनुयायी समझते हैं।यह शंका और निषेधभाव तो बाकी गैर दलित समुदायों में से किसी को अंबेडकर विचारधारा से जोड़ नहीं पायेगा।अंबेडकरी आंदोलन के लिए हमारी रंग बिरंगी शंकाएं ही हमें गोलबंद होने से रोक रही हैं और खंडित हम सत्तातंत्र में आत्मसात हुए जा रहे हैं।


    हिमांशु जी की यह कूकूर कथा सत्ता राजनीति के रथी महारथी प्रतिद्वंद्विता के रूपक बतौर पढ़ लें तो खूब मजा आयेगा।जैसे कुत्तों को राज्यतंत्र की समझ नहीं है वैसे ही सत्ता रेस के घोड़े बिना राज्यतंत्र को समझे अंधी दौड़ में खतम हैं।

    होली की पूर्व संध्या पर स्थानीय कसबे का डाग शो देखने का मौका लगा . मेरी मेज़बान ने एक कुत्ता पाला हुआ है जिसे लेकर वो उस डाग शो में जा रही थीं . उन्होंने मुझे भी उसमे आने के लिए आमंत्रित किया.


    मुझे उसमे कोई सैद्धांतिक विरोध नहीं दिखा . मैं उनके साथ हो लिया .


    ये एक पहाड़ी क़स्बा है . सामने की तरफ बर्फ से ढके पहाड़ है . उनके तले एक छोटी पहाड़ी पर एक छोटे से मैदान में यह शो होने वाला था.


    जानवरों के इलाज के सरकारी महकमे ने इसका आयोजन किया था . तीस रुपया देकर कुत्ते और उसके मालिक का नाम लिखा जा रहा था . नाम लिखे कुत्ते को फ्री में रेबीज के इंजेक्शन और पेट के कीड़ों की दवाई मिलने की व्यवस्था करी गयी थी .


    आधे से जयादा लोग तो अपने कुत्तों का रजिस्ट्रेशन करवा कर फ्री के इंजेक्शन लगवा कर घर चले गए .


    बाकी बचे हुए कुत्तों के मालिक अपने कुत्तों के साथ गर्व के साथ मैदान के चारों तरफ लगे शामियानों में बैठ गए .


    घोषणा करने वाले ने इस प्रतियोगिता के जज साहेबान का परिचय दिया . ये लोग फौज में जानवर के डाक्टर लोग थे .


    एक कुतिया ने ने जज साहब के हाथ में काट खाया . मैं समझ गया कि इस कुतिया को अब ये जज साहब बिलकुल नहीं जीतने देंगे जबकि मेरी राय में कुतिया ने एक अनजान आदमी को खुद को छूने का विरोध किया था और अपने कुत्ता धर्म का पालन किया था .


    कुछ कुत्ते इतना भीड़ भडक्का देख कर बुरी तरह डर रहे थे . मुझे इस बात का पता उनकी दोनों टांगों के बीच से पेट के साथ लगी हुई उनकी पूंछ देख कर लगा .


    कई कुत्ता मालिक जज साहब को प्रभावित करने के लिए गेंद फेंक कर अपने कुत्ते को उसे उठा कर लाने के लिए उकसाते थे , लेकिन कुत्ता आपने चरों तरफ इतने गुर्राते हुए कुत्तों को देख कर अपने मालिक के नीचे ही दुबक जाते थे .


    कुछ कुत्ते वाकई बहुत बड़े थे . एक बड़ा कुत्ता छोटे कुत्तों के वर्ग में शामिल हो गया . लेकिन दुसरे मालिकों के शोर मचाने पर उसे वापिस भेजना पड़ा .


    एक महिला जो अपने रसूख की वजह से जज साहेबान के साथ कुर्सी डाल कर बैठ गयी थी उसके कुत्ते को उसका नौकर लेकर जज साहब के सामने लाया . नौकर ने गेंद फेंकी , कुत्ते ने गेंद की तरफ देखा भी नहीं .


    लेकिन जज साहब ने उसी कुत्ते को विजेता घोषित कर दिया .


    हम लोग अपना सांत्वना पुरस्कार लेकर घर लौट आये .


    Sheeba Aslam Fehmi Correct!

    Round Table India - Arundhati Roy replies to Dalit Camera

    roundtableindia.co.in

    Arundhati Roy [This is her response to Dalit Camera's 'An...

    • Upendra Prasadबकवास करने का अरुन्धति राय को एक बहाना चाहिए था. मुस्लिम धनपशुओं को अपने मजहब की जाति व्यवस्था से तो कोई मतलब नहीं, वे हिन्दू जातिव्यव्स्था में मगजमारी किया करते हैं. यह भी उसी मगजमारी की अगली कड़ी से ज्यादा कुछ नहीं रही होगी.

    • 13 hours ago· Like

    • Gopal Yadavअंबेडकर ने कब जाती उन्मूलन की बात की? जाती नहीं रहेगी तो अनुसूचित जाती कह के आरक्षण कैसे लेंगे? मैं तो सबसे बड़ा विद्वान लालू यादव को मानता हूँ जो सीधा कहता है सभी जातिवाद करते हैं मैं क्यों नहीं करूँगा?

    • 6 hours ago· Like

    • Gopal Yadavअंबेडकर नेहरू का बहुत बड़ा चमचा था| दोनो ने मिल कर बहुसंख्यक हिंदुओं के विरोध में दूरगामी क़ानून बनवाए जिसकी आवश्यकता नहीं थी| भारतीय समाज उससे कहीं नहीं सुधरा पर अराजकता बढ़ती ही गयी| हिंदुओं की जनसख्या को रोक कर मुसलमानों को जनसंख्या बढ़ाने देने के लिए ही अंबेडकर और नेहरू ने मिल कर हिंदू विवाह अधिनियम बनवाया और ज़बरदस्ती लागू करवाया, ताकि मुसलमानों को आगे करके बहुसंख्यक पिछड़ों पर निर्बाध रूप से राज कर सकें|

    • 6 hours ago· Like

    • Gopal Yadavअब जबकि पिछड़ों का राज आने लगा तो जातिवाद का विरोध होने लगा| ये जातिवाद का विरोध नहीं कृषक जातियों के राज का विरोध है|

    • 6 hours ago· Like

    • Upendra Prasadजाति व्यवस्था को खत्म करने का सूत्र गीता में है. अम्बेडकर की पुस्तक "एन्निहिलेशन आफ कास्ट" का मानना है कि धार्मिक अवधारणाओं के ऊपर हमारी जाति व्यवस्था खड़ी और और यदि हम इन अवधारणाओं को खंडित करें, तो जातिव्यवस्था अपने आप समाप्त हो जाएगी. इसलिए अम्बेडकर ने एक और किताब लिख डाली, "रिड्ड्ल्स आफ हिन्दुइज्म", जिसमें राम को एक हजार और कृष्ण को दो हजार गालियाँ दे डालीं. मुसलमानों को ये दोनों पुस्तकें "अन्निहिलेशन आफ कास्ट" और ''रिड्डल्स आफ हिन्दुइज्म" बहुत अच्छी लगती हैं, क्योंकि उन्हें भी राम और कृष्ण की निन्दा में मजा आता है. पलाश बिश्वास ने जिस आयोजन की चर्चा की है, पता कीजिए उसमें मुस्लिम पैसा लगा होगा.

    • 2 hours ago· Like



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    How the government would ensure consumer protection?


    बेहतर हो कि ऐसा कोई चाकचौबंद प्रशासनिक इंतजाम हो जिससे उपभोक्ता ठगे ही न जाये!


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    Excalibur Stevens Biswas

    Government of West Bengal,the Maa Maati Manush sarkar has launched consumer awareness campaign afresh amidst Loksabha Election campaign.It claimed that consumers had been betrayed during all the years of left rule.The Chief minister Mamata Banerjee launched consumer safety project in 2012 which remained idle hitherto.


    Consumer safety being almost absent the emphasis is to redress grievances which seldom lodged.No administrative initiatve has been taken to ensure consumer safety by default.


    The question remains unanswered how the government would ensure consumer protection?


    What is Consumer Rights ?

    Right to Safety

    -------------------

    Means right to be protected against the marketing of goods and services, which are hazardous to life and property. The purchased goods and services availed of should not only meet their immediate needs, but also fulfill long term interests. Before purchasing, consumers should insist on the quality of the products as well as on the guarantee of the products and services. They should preferably purchase quality marked products such as ISI, AGMARK, etc



    Right to be Informed

    -----------------------

    Means right to be informed about the quality, quantity, potency, purity, standard and price of goods so as to protect the consumer against unfair trade practices. Consumer should insist on getting all the information about the product or service before making a choice or a decision. This will enable him to act wisely and responsibly and also enable him to desist from falling prey to high pressure selling techniques.



    Right to Choose

    -----------------

    Means right to be assured, wherever possible of access to variety of goods and services at competitive price. In case of monopolies, it means right to be assured of satisfactory quality and service at a fair price. It also includes right to basic goods and services. This is because unrestricted right of the minority to choose can mean a denial for the majority of its fair share. This right can be better exercised in a competitive market where a variety of goods are available at competitive prices




    Right to be Heard

    --------------------

    Means that consumer's interests will receive due consideration at appropriate forums. It also includes right to be represented in various forums formed to consider the consumer's welfare. The Consumers should form non-political and non-commercial consumer organizations which can be given representation in various committees formed by the Government and other bodies in matters relating to consumers




    Right to Seek Redressal

    -------------------------

    Means right to seek redressal against unfair trade practices or unscrupulous exploitation of consumers. It also includes right to fair settlement of the genuine grievances of the consumer. Consumers must make complaint for their genuine grievances.Many a times their complaint may be of small value but its impact on the society as a whole may be very large. They can also take the help of consumer organisations in seeking redressal of their grievances.



    Right to Consumer Education

    ----------------------------

    Means the right to acquire the knowledge and skill to be an informed consumer throughout life.Ignorance of consumers, particularly of rural consumers, is mainly responsible for their exploitation. They should know their rights and must exercise them. Only then real consumer protection can be achieved with success.



    पश्चिम बंगाल सरकार ने इस बीच उपभोक्ता फोरम के तहत ग्राहकों को जगाने का अभियान चलाया हुआ है।वैसे राज्य में पहले से उपभोक्ता फोरम बना हुआ है और उपभोक्ताओं की सामग्री और सेवा संबंधी शिकायतों के निवारण के लिए जिलों में उपभोक्ता अदालतों का गठन भी हो गया है।


    मां माटी मानुष की सरकार ने तो सत्ता संभालते ही उपभोक्ता पोरम के पुनर्गठन के साथ ही समाधान प्रकल्प की शुरुआत कर दी थी।लेकिन नतीजे वही ढाक के तीन पात।


    ग्राहकों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी न होने से शिकायते इक्का दुक्का ही दर्ज होती है और ग्राहकों की सुरक्षा के लिए जो प्रशासनिक  तंत्र बनना अनिवार्य है,वह अभी बन नहीं सका है।


    ग्राहक ठगे जाने पर अदालतों की शरण में जाने के बारे में सोचते हैं।ज्यादातर तो कानूनी पचड़े में पड़ते ही नहीं है।


    बिना रसीद खरीददारी के रिवाज के चलते शिकायत दर्ज करने का आधार भी अमूमन होता नहीं है।


    बेहतर हो कि ऐसा कोई चाकचौबंद प्रशासनिक इंतजाम हो जिससे उपभोक्ता ठगे ही न जाये।


    अगर अर्थ व्यवस्था मुक्त बाजार है तो इस मुक्त बाजार में सेवाओं की भूमिका सबसे ज्यादा है।भारत में कृषि के अवसान के बाद और औद्योगिक उत्पादन प्रणाली चौपट हो जाने के बाद सेवाक्षेत्र का ही विकास दर में सबसे ज्यादा योगदान है।


    इसके मद्देनजर अर्थ व्यवस्था की सेहत के लिए उपभोक्ता संरक्षण अनिवार्य है।


    ग्राहकों को जगाने का काम 1986 में कानून बनने के बाद लगातार जारी है लेकिन ग्राहक जाग ही नहीं रहे हैं।अपनी आय के हिसाब से ज्यादातर लोग खरीददारी में सौदेबाजी से कम खर्च करने के फिराक में होते हैं और वैधानिकता की परवाह नहीं करते ,खुद तमाम औपचारिकताएं भी नहीं पूरी करते।

    यह अभ्यास उनके गले में फंदा बना हुआ है।बाजार और सेवाओं में अपर्याप्त निगरानी के कारण विक्रेता और सेवादाता ग्राहकों और उपभोक्ताओं की इस कमजोरी का फायदा उठाते हैं।


    उपभोक्ता सलाहकार केन्द्र का उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक कराते हुए उनकी समस्याओं को क्रमबध्द निवारण करवाने में सहयोग देना है जो प्रमुखत: इस प्रकार हैं:-


    1. खरीदी गई वस्तुओं एवं उनसे संबंधित सेवाओं के बारे में उचित जानकारी से उपभोक्ताओं को अवगत कराना।


    2. संबंधित विभाग के या कंपनी के निवारण अधिकारी के बारे में जानकारी प्रदान करना।


    3. जिला उपभोक्ता फोरम एवं राज्य उपभोक्ता फोरम की प्रक्रिया की जानकारी प्रदान करना।


    बाकी राज्यों की तरह बंगाल में भी ये प्रावधान हैं,लेकिन उन्हें जमीनी हकीकत में बदलना असंभव है।महानगर कोलकाता में बाकायदा गैरकानूनी मिलावटी नकली सामग्रियों के बाजार प्रशासन और पुलिस की नजरदारी के तहत सजे हुए हैं।देहात में तो आधी कीमत पर ब्रांडेड हर चीज उपलब्ध है,जो जाहिर है असली और शुद्ध होती नहीं है।


    उपनगरों में तो खाद्यतेल और खाद्यसामग्री के तमाम केंद्रों में दिनदहाड़े फर्जीवाड़ा हो रहा है,जिनपर कोई कार्रवाई नहीं होती।प्रशासन को शिकायत का इंतजार होता है और लोग आसानी से तमाम जोखिम उठाकर शिकायत नहीं करते।उपभोक्ता जागरुकता मुहिम जवाबदेही से बचने और इस गोरखधंदे को चालू रखने का अच्चा बहाना हो गया है।


    उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए बंगाल में मां माटी मानुष की सरकार ने 2012 में ही राज्य स्तर में 'कंज्यूमर अफेयर्स फोरम' बनाने एवं 'समाधान' नामक प्रोजेक्ट की शुरुआत करने की योजना बना दी थी। इसका उद्घाटन पुरुलिया में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा किया गया था।


    इसकी जानकारी राज्य सरकार के उपभोक्ता विभाग के मंत्री साधन पांडे ने विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस 2012 के उद्घाटन के मौके पर दी।


    तब उन्होंने कहा भी था कि विगत 30 वर्षो में उपभोक्ता विभाग को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया था। जिसके कारण उपभोक्ताओं को लगातार  ठगी का सामना करना पड़ा ।


    पभोक्ता विभाग के मंत्री ने दावा भी किया कि  नई सरकार के सत्ता में आने के बाद इस विभाग को काफी उन्नत किया गया है।


    इसके लिए एक टोल फ्री नंबर का भी उद्घाटन किया गया था। जिसके माध्यम से गरिया एवं दमदम के कई बाजारों को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई थी।


    मंत्री के मुताबिक विभाग की ओर से समाधान निकाला गया है।उन्होंने कहा कि  जिला स्तर पर बनाए जाने वाले इस फोरम में 90 दिनों के अंदर समस्या का समाधान निकाला जाएगा। आम जनता मे जागरुकता फैलाकर इस कार्य को उन्नत किया जा सकता है। जनता को जागरुक करने के लिए बहुत ही जल्द सरकार एवं संवाद माध्यम की सहायता से अभियान चलाया जाएगा। इसके साथ ही पुलिस एवं स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सहयोग से इस कार्य को किया जाएगा।


    मंत्री ने तब ऐलान किया कि कार्य को सही ढ़ंग से करने के लिए कंज्यूमर वेलफेयर आफिसर की संख्या में भी बढ़ोत्तरी की जाएगी।


    गौरतलब है कि राज्य सरकार के उपभोक्ता विषयक विभाग की ओर से स्टार थियेटर में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस 2012 पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। जिसका उद्घाटन आलम बाजार के स्वामी जीतात्मानंद जी महाराज ने किया। इस मौके पर उपभोक्ता विषयक विभाग के राज्य मंत्री सुनिल चंद्र तिर्की, कलाकार सनातन दिंदा, कोलकाता नगर निगम की उपमेयर फरजाना आलम एवं कालीपद दास समेत अन्य भी मौजूद थे।


    उसके बाद गंगा में बहुत पानी बह चुका है और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मां माटी मानुष की सरकार को उपभोक्ता संरक्षण की याद आयी है।


    गौरतलब है कि देश के प्रत्‍येक राज्‍य/जिले में उपभोक्‍ता में जागरूकता बढ़ाने के लिए और उपभोक्‍ता शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्‍न राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों में उपभोक्‍ता कार्य विभाग, खाद्य, सिविल आपूर्ति और उपभोक्‍ता कल्‍याण विभाग आदि गठित किए गए हैं।

    राज्‍यों/संघ क्षेत्रों में विभिन्‍न उपभोक्‍ता मामलों में कार्यवाही करने के लिए राज्‍य उपभोक्‍ता विवा निपटान आयोग और किसी विशेष राज्‍य के सभी या कुछ जिलों में जिला फोरम राज्‍य उपभोक्‍ता संरक्षण परिषद आदि का भी गठन किया गया है।


    इनमें से कुछ निम्‍नानुसार हैं :


    ये विभाग और फोरम, उपभोक्‍ताओं के हितों की संरक्षा करने और उन्‍हें उनके अधिकारों और कर्तव्‍यों के प्रति जागरूकता बनाने के लिए समय समय पर कार्यशालाएं, संगोष्ठियां और सम्‍मेलन आयोजित करते रहते हैं। ये प्रचार और विज्ञापन अभियान भी चलाते हैं और उपभोक्‍ता के कल्‍याण और शिक्षा के लिए पत्रिकाएं /  दैनिकियां / अन्‍य दस्‍तावेज भी प्रकाशित करते हैं।


    इसके अतिरिक्‍त, देश भर में उपभोक्‍ता आंदोलन को प्रोत्‍साहित करने के लिए, सरकारें और संघ राज्‍य क्षेत्र के प्रशासन अपनी उपभोक्‍ता कल्‍याण निधि का सृजन भी करते हैं। अब तक, राज्‍य स्‍तरीय उपभोक्‍ता कल्‍याण निधि का सृजन, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्‍थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखण्‍ड, जम्‍मू और कश्‍मीर, मिज़ोरम, सिक्किम और त्रिपुरा में किया गया है।

    उपभोक्‍ता क्‍लबों की योजना को विकेन्द्रित किया गया है और इसे दिनांक 1.04.2004 से राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों की सरकारों को अंतरित किया गया है। सभी संबद्ध गैर सरकारी संगठन/वीसीओ, अपने - अपने राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों के खाद्य, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्‍ता कल्‍याण विभागों के नोडल अधिकारियों को आवेदन भेजें। मार्च 2006 तक, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, महाराष्‍ट्र, गुजरात, ओडिशा, राजस्‍थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, जम्‍मू और कश्‍मीर, हरियाणा, दिल्‍ली, राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, पंजाब, सिक्किम, लक्षद्वीप हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश के राज्‍यों में 4661 उपभोक्ता क्‍लबों को संस्‍वीकृति दी गई है।

    राज्‍य सरकारों और संघ राज्‍य क्षेत्र प्रशासनों द्वारा किए गए ये सभी प्रयास उपभोक्‍ताओं के बीच जागरूकता लाने और उन्‍हें वस्‍तुओं के अधिकतम खुदरा मूल्‍य, उनकी समाप्ति तिथि, स्‍वर्ण आभूषणों की हालमार्किंग, भार और माप के संबंध में प्रावधान आदि जैसे विभिन्‍न पहलुओं के बारे में प्रदान करने के सही मार्ग पर बढ़ रहे हैं।


    उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986) पर बी गौर करें

    धारा 1 : संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारम्भ और लागू होना-

    भारतीय संसद द्वारा विनियमित इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986है, जिसकी अधिकारिकता जम्मू-कश्मीर को छोड कर समस्त भारतवर्ष है। केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित तिथि के उपंरात यथा उपरोक्त यह अधिनियम सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रभावी है।

    धारा 2 : परिभाषाएं- अधिनियम के अन्तर्गत निम्नवत परिभाषाएं उल्लेखित है :

    1 समुचित प्रयोगशाला से अभिप्राय केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से है।

    2 शाखा कार्यालय का तात्पर्य विपरीत पक्ष द्वारा शाखा के रूप में वर्णित संस्थान से है।

    3 परिवादी से तात्पर्य उपभोक्ता अथवा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार से अभिप्रेत तथा समान हित वाले बहुसंख्यक उपभोक्ताओं में से एक या अधिक उपभोक्तागण से है। उपभोक्ता की मृत्यु की दशा में उसका कानूनी शिकायत करने व कोई अनुतोष प्राप्त करने की दृष्टि से लिखित में प्रस्तुत किया गया शिकायती पत्र, जो निम्नलिखित से सम्बधित होगा :

    (अ) जब किसी व्यापारी अथवा सेवा प्रदाता द्वारा अनुचित व्यापारिक व्यवहार किया गया हों।

    (ब) क्रय किये गये अथवा क्रय के लिए सहमत माल में त्रुटियां आना।

    (स) क्र्रय किये गये पदार्थ अथवा भाड़ें पर लिये गई सेवाओं में किसी प्रकार की कमी ।

    (द) किसी व्यापारी अथवा सेवा प्रदाता द्वारा माल या सेवाओं में अधिक कीमत ली गई हो।

    (ध) किसी भी माल अथवा पदार्थ का निर्धारित मानक के उल्लघंन की स्थिति में तथा जीवन और सुरक्षा के लिए परिसंकट में होने की स्थिति में जो जीवन और सुरक्षा के लिए हानिकारक है।

    5 उपभोक्ता से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसने किसी भी वस्तु पदार्थ तथा सेवा को प्राप्त करने के लिए भुगतान किया हो अथवा अशतः भुगतान किया हो या भुगतान करने का वचन दिया हो। उपभोक्ता का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से भी है, जो सेवाओं का भाडे पर लेता है या उपयोग करता है। प्रतिबंध यह हैं कि वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए सेवाऐं लेनेवाला व्यक्ति उपभोक्ता की श्रेणी में नही आता है। किन्तु स्वनियोजन द्वारा अपनी जीविका उपार्जन के प्रयोजनों के लिए ली गई सेवाऐं अथवा क्र्रय कि गई वस्तुएं इससे भिन्न सम>ी जायेंगी।

    6 त्रुटि से तात्पर्य गुणवत्ता, मात्र माप-तोल, शुद्धता अथवा मानक आदि में कोई दोष, कमी अथवा अपूर्णता आना है।

    7 जिला पीठ से तात्पर्य जिला उपभोक्ता संरक्षण न्यायालय से है।

    8 सहकारी सोसायटी से तात्पर्य सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1860 के अधीन रजिस्टर्ड संस्था है।

    9 सेवा से तात्पर्य प्रयोगकर्ता को उपलब्ध कराई गई सेवा तथा सुविधाओं का प्रबधं भी है। भुगतान करने पर प्राप्त होती है। किन्तु इसके अन्तर्गत निशुल्क अथवा व्यक्तिगत सेवाऐं नही आती ।

    10 अनुचित व्यापारिक व्यवहार किसी माल की बिक्री ,प्रयोग या आपूर्ति अथवा सेवाओं को प्रदान करने में अनुचित आचरण एवं व्यवहार से है।

    धारा 3- अधिनियम का किसी अन्य विधि के अल्पीकरण में न होना : तात्पर्य यह है इस अधिनियम की व्यवस्था वर्तमान में अन्य विधि की व्यवस्थाओं की अतिरिक्त व्यवस्था के रूप में होगें अर्थात सम्बंधित अधिनियमों में अनुुतोष उपलब्ध होने की स्थिति में भी इस अधिनियम की व्यवस्थाओं का उपयोग किया जा सकता है।

    धारा 4- केन्द्रीय उपभोक्ता परिषद का गठन : अधिनियम की व्यवस्था के अनुसार उपभोक्ता मामलों के मंत्री की अध्यक्षता में एक केन्द्रीय परिषद का गठन किया जायेगा जिसमें सरकारी व गैर सरकारी सदस्य प्रतिनिधि होगें।

    धारा 5- केन्द्रीय परिषद की प्रक्रिया : केन्द्रीय परिषद की बैठक वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य होगी तथा अध्यक्ष के विवेकानुसार बैठक निर्धारित स्थान व समय पर निश्चित किये गये एजेंडे पर होगी।

    धारा 6- केन्द्रीय परिषद के उद्धेश्य : (क) जीवन एवं सम्पति को हानि पहुँचाने वाले माल, पदार्थ एवं सेवाओं से सम्बंधित अधिकारों के प्रति सुरक्षा।

    (ख) उपभोक्ताओं को पदार्थ की गुणवत्ता ,मात्र,शुद्धता, मानक एवं मूल्य के प्रति संरक्षण सुनिश्चित करना तथा अनुचित व्यापारिक व्यवहार से सुरक्षा।

    (ग) प्रतियोगी मूल्यों पर वस्तुओं को उपलब्ध कराने की व्यवस्था ।

    (घ) उचित फोरम पर उपभोक्ताओं के हितों का सरंक्षण।

    (च) अनुचित व्यापारिक व्यवहार एवं उपभोक्ताओं के उत्पीडन से सम्बंधित प्रतितोष दिलाना।

    धारा 7- राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद : प्रत्येक राज्य में उपभोक्ता मामलों के मंत्री की अध्यक्षता में एक राज्य कांउसिल का गठन किया जायेगा जिसमें परिषद राज्य सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार वर्ष में कम से कम दो बार अवश्य बैठक करेगी।

    धारा 8- राज्य परिषद के उद्धेश्य - उपरोक्तलिखित केन्द्रीय परिषद की भांति राज्य परिषद का उद्धेश्य भी राज्य के क्षेत्र में उपभोक्ताओं के अधिकारों का संरक्षण करना होगा ।

    धारा 8i - प्रत्येक जनपद में जिला कलेक्ट्रर की अध्यक्षता में परिषद का गठन राज्य सरकार द्वारा किया जायेगा जिसमें अन्य सरकारी एवं गैर सरकारी सदस्य होगें तथा परिषद की बैठक राज्य सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होगी।

    धारा 8ii - जिला उपभोक्ता परिषद के उद्धेश्य : केन्द्रीय एवं राज्य परिषद की भांति जनपद की सीमा क्षेत्र में उपभोक्ताओं के हितो का सरंक्षण, इस परिषद द्वारा सुनिशि्ंचत किया जायेगा।

    धारा 9- जिला उपभोक्ता फोरम का गठन : प्रत्येक जनपद में राज्य सरकार द्वारा एक या अधिक जिला फोरम का गठन किया जायेगा।

    धारा 10- जिला फोरम का स्वरूप : प्रत्येक जनपद में जिला जज की योग्यता रखने वाले व्यक्ति की अध्यक्षता में जिला फोरम का गठन किया जायेगा जिनमें अन्य दो सदस्य होगेंं और उनमें से एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य होगा। प्रत्येक सदस्य की नियुक्ति अध्यक्ष सहित पॉंच वर्ष की अवधि के लिए की जायेगी।

    धारा 11- जिला फोरम की अधिकारिता : अधिनियम की व्यवस्था के अनुसार जिला फोरम की जनपदीय सीमा अधिकारिता के अन्तर्गत उपभोक्ता द्वारा निम्न स्थितियों में शिकायत दर्ज कराई जा सकेगी-

    (अ) विपक्षी अथवा विपक्षीगण शिकायत दर्ज कराने के समय उक्त जिला फोरम के सीमा क्षेत्र में निवास करते हों, उनका कार्यालय व्यापारिक संस्थान हो अथवा उसकी शाखा हो।

    (ब) जहां पर एक से अधिक विपक्षी हों वहां पर उनमें से कोई एक उपरोक्तानुसार स्थित हों। (स) पूर्ण रूप अथवा अांशिक रूप से कार्य का कारण उत्पन्न होता हो।

    यह उल्लेखनीय है कि शिकायतकर्ता के निवास स्थान के आधार पर अधिकारिकता नही बनती है और इस सम्बंध में कोई भ्रम नही रहना चाहिए।

    धारा 12- शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया : किसी भी उपभोक्ता अथवा पंजीकृत उपभोक्ता संगठन द्वारा अथवा जहां पर अनेकों उपभोक्ताओं का समान हित सम्बद्ध हों, एक या एक से अधिक उपभोक्ता द्वारा अथवा केन्द्रीय एवं राज्य सरकार द्वारा शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। शिकायत के साथ शुल्क की राशि क्रमशः एक लाख पर सौ रूपये, पांच लाख तक की राशि पर दो सौ रूपये, दस लाख तक की धनराशि पर चार सौ रूपये तथा बीस लाख रूपये तक की धनराशि पर पांच सौ रूपये का बैंक ड्रा्ट अथवा पोस्टल आर्डर द्वारा जो अध्यक्ष जिला फोरम के नाम देय होगा, जमा करानी होगी। शिकायत सादे कागज पर विपक्षी गण के नाम व पते सहित शिकायत का विवरण देते हुए जो अनुतोष मांगा गया है उसके उल्लेख के साथ सम्बंधित साक्ष्य की फोटो प्रतियां संलग्न करके तीन प्रतियों में जिला फोरम में प्रस्तुत की जानी चाहिए। शिकायत के लिए वकील की अनिर्वायता नही है और शिकायत स्वयं अथवा अपने प्रतिनिधि द्वारा दर्ज कराई जा सकती है। प्रारम्भ में शिकायत को सुनवाई हेतु स्वीकार करने पर विचार किया जा सकेगा और 21 दिन की अवधि में इस सम्बध्ां में आदेश पारित किये जायेगें। कोई भी शिकायत बिना शिकायतकर्ता को सुनें अस्वीकृत नही की जायेगी।

    धारा 13- शिकायत दर्ज होने के उपरांत की प्रक्रिया : शिकायत प्राप्त होने पर विपक्षी को शिकायत की प्रति भेजते हुए एक माह की अवधि में अपना उत्तर प्रस्तुत करने के निर्देश दिये जायेगें। इस अवधि में केेवल 15 दिन की सीमा और ब<ाई जा सकेगीं। दोनेा पक्षों को सुनवाई का समुचित अवसर देने के उपरांत जिला फोरम द्वारा शिकायत का निस्तारण यथासम्भव तीन माह की अवधि में किया जायेगा । यदि शिकायत के आधार पर किसी वस्तु पदार्थ या माल के तकनीकी अथवा लेबोरट्री परीक्षण की आवश्यकता अनुभव होती है तो सम्बंधित मान्यता प्राप्त लेबोरट्री को सम्बंधित वस्तु/पदार्थ भेजा जायेगा ऐसे मामलों में शिकायत का निस्तारण पांच महिने की अवधि में होगा तथा सामान्यतः शिकायत का निस्तारण तीन महिने में किये जाने की अधिनियम में व्यवस्था है।

    भारत सरकार द्वारा तीस मई 2005 को निर्गत विनियमों के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई है कि शिकायतों की सुनवाई में सामान्यतः स्थगन न दिया जाये तथा केवल अति आवश्यक मामलों में यदि स्थगन देना पडे तो द्वितीय पक्ष को व्यय के रूप में कम से कम 500 रू0 की धनराशि प्रति स्थगन दिलाने की अपेक्षा की गई है। इस प्रकार उपभोक्ता शिकायतों के त्वरित निस्तांरण के प्रति पर्याप्त बल दिया गया है।

    धारा 14- इस धारा के अन्तर्गत जिला फोरम के निर्णय के स्वरूप एवं विवरण की व्याख्या की गई है। जिसके द्वारा त्रुटियों के निवारण, माल को बदलने, मूल्य की वापसी तथा क्षतिपूर्ति के भुगतान का विवरण दर्शाया गया है।

    धारा 15- जिला फोरम के आदेश की तिथि से एक माह की अवधि में राज्य आयोग में प्रभावित पक्ष द्वारा अपील की जा सकेगी किन्तु आदेशित धनराशि का 50 प्रतिशत अथवा 25000/- की धनराशि जो भी कम हो जमा करनी होगी।

    धारा 16- राज्य आयोगपीठ का गठन किया जा सकेगा जिसके अध्यक्ष उच्च न्यायालय सेवानिवृत्त जज होगें।

    धारा 17- राज्य की सीमा की अधिकारिता के अन्तर्गत एक करोड की धनराशि तक की शिकायतें राज्य आयोग के समक्ष दर्ज कराई जा सकेगी ।

    धारा 18- राज्य आयोग द्वारा जिला फोरम की भांति, वादों का निस्तारण यथाविधि किया जायेगा।

    धारा 19- राज्य आयोग द्वारा पारित आदेश के विरूद्ध अपील एक माह की अवधि में कि जा सकेगी किन्तु आदेशित धनराशि का 50 प्रतिशत भाग अथवा 35000/- जो भी कम हो, जमा करनी होगी।

    धारा 20- राष्ट्रीय आयोगपीठ का गठन किया जायेगा, जिसके अध्यक्ष उच्च्तम न्यायालय के सेवानिर्वत्त न्यायाधीश होगें।

    धारा 21- राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिकता एक करोड से अधिक धनराशि की शिकायत होगी ।

    धारा 22- राज्य आयोग की भांति राष्ट्रीय आयोग की वादों निस्तारण की प्रक्रिया होगी। उपभोक्ता अदालतों के अध्यक्ष के अनुपस्थिति में वरिष्ठ सदस्य पीठ की अध्यक्षता का कार्य करेगें।

    धारा 23- राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरूद्ध एक माह की अवधि में उच्चतम न्यायालय में अपील कि जा सकेगी किन्तु आदेशित धनराशि का 50 प्रतिशत अथवा 50000/- जो भी कम हो जमा कराने होगें।

    धारा 24- अपील न होने की स्थिति में पारित आदेश अन्तिम होगा। कार्य के कारण प्रारम्भ होने के समय से दो वर्ष की अवधि में शिकायत दर्ज कराये जाने की समय सीमा निर्धारित है।

    धारा 25- उपभोक्ता अदालत द्वारा पारित आदेश अनुपालन कराने की व्यवस्था : (अ) अन्तरित आदेशों के अनुपालन न होने पर सम्पति कुर्क किये जाने की व्यवस्था। (ब) आदेशित धनराशि की वसूली भू राजस्व की वसूली की भांति जिला कलेक्ट्रर द्वारा कराई जा सकेगी

    धारा 26- भ्रामक व झूठे तथ्यों पर आधारित शिकायतों के प्रति दस हजार रू0 तक के अर्थदण्ड की व्यवस्था ।

    धारा 27- उपभोक्ता अदालतों के आदेशों के अनुपालन न करने पर एक माह से तीन वर्ष तक की अवधि के कारावास की व्यवस्था अथवा 2000 से 10000 तक के आर्थिक दंड की व्यवस्था है।

    धारा 27ii - उपरोक्त के प्रति अपील एक माह की अवधि में केवल राज्य आयोग, राष्ट्रीय एवं सुप्रीम कोर्ट में की जा सकेगी।

    धारा 28 - फोरम व उपभोक्ता न्यायालय किसी भी न्यायिक प्रक्रिया कि भांति व्यक्तिगत दायित्व से मुक्त होगा और जिला फोरम, राज्य आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग के सदस्य के विरद्ध निर्णय सम्बंधी किसी भी कार्य एवं कृत्य के प्रति किसी प्रकार की वैधानिक कार्यवाही अथवा वाद दायर करना वर्जित होगा।

    धारा 29 : प्रश्नगत अधिनियम में प्रकियाओं के क्रियान्वन में आने वाली कठिनाइयोें को केन्द्रीय सरकार द्वारा दूर किया जा सकेगा।

    धारा 30 : केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकारें अधिनियम से सम्बंधित विनियमों का गठन अधिसूचना द्वारा कर सकेगें ।

    धारा 30iii - राष्ट्रीय आयोग केन्द्रीय सरकार की अनुमति से प्रश्नगत से सम्बंधित विनियमों का गठन अधिसूचना द्वारा कर सकेगा।

    धारा 31 : इस अधिनियम से सम्बंधित नियम एवं विनियमों को संसद के समक्ष विचारार्थ रखा जायेगा।

    इसी भांति राज्य सरकार द्वारा उक्त अधिनियम के अन्तर्गत नियमों को प्रदेश विधायिका के समक्ष विचारार्थ रखा जायेगा।


    The state is again canpaigning for consumer forum and customer  satisfaction but is the state govt. has the capability to protect the consumer rights???

    amari case its not solved yet. Neither the hooch victims yet reccieved compensesion and latest is sudipto sen's scam so many failures but still  claiming a success. Now the question is are consumers secure?????




    Consumer Court West Bengal

    State Commissions West Bengal

    West Bengal State Consumer Disputes Redressal Commission,

    Bhabani Bhavan,

    (Ground Floor),

    31, Belvedere Road, Alipore,

    Kolkata – 700 027

    STD CODE: 033

    E-mail : wb-sforum@nic.in

    States/District Forum West Bengal

    Barasat CDF

    24 PGS(N), 2 No., Barrackpore Road, Maya Bhavan (1st Flr), PO Nabapally, Barasat

    033-2542-5131

    Birbhum CDF

    C/o House of Abdur Rashid, Chandnipara, Behind Deaf & Dumb School, P.O. & P.S. Suri,

    Distt. Birbhum

    03462-255559. (Telefax)

    Bankura CDF

    Dist. Judge, Kuchkuchia Road, PO 7 Dt. Bankura

    953242-241317

    Burdwan CDF

    Muchipara, G.T. Road, PO Sripally, Distt. Burdwan – 713103

    0342-2545861

    CDF Kol. Unit – I

    8B, Nelie Sengupta, Sarani, 7th Floor, Kolkata-700087.

    033-2252-0634

    CDF Kol. Unit-II

    8B, Nelie Sengupta, Sarani, 7th Floor, Kolkata-700087.

    033-2252-0312

    CDF Alipore

    24 PGS(S), 18, Judges Court Road, Alipore, Kolkata-27.

    033-2479-4350

    Coochbehar CDF

    Sri D.K. Dutta, 2nd Floor, B.S. Road (Opp. Site of the CMO Health Office, Coochbehar-736101

    03582-222023.


    Darjeeling CDRF

    New Bldg, CAPT N. Sherpa 24, Mahatih Chand Road, Darjeeling-734101.

    0354-2252305

    D.Dinajpur CDF

    Distt. Judges Office, Dakshin Dinajpur at Balurghat, Balurghat – 733 101

    03522-271050

    Howrah CDF

    Red Court Bldg., Rishi Bankim Ch. Road, Howrah-711101.

    033-2660-0892

    Hooghly CDF

    C/o Khadya Bhawan, PO Chinsurah, Hooghly-712102

    033-2680-4768

    Jalpaiguri

    PO Jalpaiguri, Old Court, Near D. M. Office, District Jalpaiguri,

    03561-225395

    Maldah CDF

    Maldah Sevaniketan, Atul Ch. Kr. Market, PO & Distt. Maldah-732101.

    03512-251472

    Murshidabad CDF

    Murshidabad Cantonment Road, Behrampur, Murshidabad

    03482-253207

    Midhnapore CDF

    At the house of Nemia Kundu, Mohatabpur, PO & Dt. Midnapore

    03222-266694

    Nadia CDF

    170, Don Bosco Road, Austin Memorial House, P.O. Krishnanagar, Nadia

    953472-257788

    Purulia CDF

    Collectorate Compound, P. O. & Distt. Purulia.

    03252-224001

    Purba Mednipore

    President, DCDRF A. Abasbari, PO Tamluk, Purba Mednipore

    953228-270125

    Siliguri CDF

    Kshudiram Basu Bipanan Kendra, (2nd Floor), Hill Cart Road, Pradhannaar, Siliguri-724403.

    0353-2517190

    U. Dinajpur CDF

    PO Raigunj, (Super Market Complex), Block – I, First Floor

    U. Dinajpur

    03523-252006


    Consumer Protection Act, 1986

    From Wikipedia, the free encyclopedia
    Consumer Protection Act, 1986
    Emblem of India.svg
    An Act to provide for better protection of the interests of consumers and for that purpose to make provision for the establishment of consumer councils and other authorities for the settlement of consum­ers' disputes and for matters connected therewith.
    Citation Act No. 68 of 1986
    Enacted by Parliament of India
    Date commenced 24 December 1986

    Consumer Protection Act, 1986 is an act of Parliament of India enacted in 1986 to protect interests of consumers in India. It makes provision for the establishment of consumer councils and other authorities for the settlement of consum­ers' disputes and for matters connected therewith.

    Consumer Protection Council[edit]

    Consumer Protection Councils are established at the national, state and district level to increase consumer awareness.[1]

    Central Consumer Protection Council[edit]

    It is established by the Central Government which consists of the following members:

    • The Minister of Consumer Affairs, – Chairman, and
    • Such number of other official or non-official members representing such interests as may be prescribed.

    State Consumer Protection Council[edit]

    It is established by the State Government which consists of the following members:

    • The Minister in charge of consumer affairs in the State Government – Chairman.
    • Such number of other official or non-official members representing such interests as may be prescribed by the State Government.
    • such number of other official or non-official members, not exceeding ten, as may be nominated by the Central Government.

    The State Council is required to meet as and when necessary but not less than two meetings every year.

    Consumer Disputes Redressal Agencies[edit]

    Main article: Consumer Court
    • District Consumer Disputes Redressal Forum (DCDRF): Also known as the "District Forum" established by the State Government in each district of the State. The State Government may establish more than one District Forum in a district. It is a district level court that deals with cases valuing up to INR2 million (US$33,000).[1]
    • State Consumer Disputes Redressal Commission (SCDRC): Also known as the "State Commission" established by the State Government in the State. It is a state level court that takes up cases valuing less than INR10 million (US$160,000)[1]
    • National Consumer Disputes Redressal Commission (NCDRC): Established by the Central Government. It is a national level court that works for the whole country and deals with amount more than INR10 million (US$160,000).[1]

    Objectives[edit]

    Objectives of Central Council[edit]

    The objectives of the Central Council is to promote and protect the rights of the consumers such as:-

    1. the right to be protected against the marketing of goods and services which are hazardous to life and property.
    2. the right to be informed about the quality, quantity, potency, purity, standard and price of goods or services, as the case may be so as to protect the consumer against unfair trade practices.
    3. the right to be assured, wherever possible, access to a variety of goods and services at competitive prices.
    4. the right to be heard and to be assured that consumer's interests will receive due consideration at appropriate forums.
    5. the right to seek redressal against unfair trade practices or restrictive trade practices or unscrupulous exploitation of con­sumers; and
    6. the right to consumer education.
    7. the right against consumer exploitation.

    Objectives of State Council[edit]

    The objects of every State Council shall be to promote and protect within the State the rights of the consumers laid down in clauses 1 to 7 in central council objectives.

    Jurisdiction[edit]

    Jurisdiction of District Forum[edit]

    1. Subject to the other provisions of this Act, the District Forum shall have jurisdiction to entertain complaints where the value of the goods or services and the compensation, if any, claimed does not exceed rupees twenty lakhs.
    2. A complaint shall be instituted in a District Forum within the local limits of whose jurisdiction:-
    a) – the opposite party or each of the opposite parties, where there are more than one, at the time of the institution of the complaint, actually and voluntarily resides or carries on business or has a branch office or personally works for gain, or
    b) – any of the opposite parties, where there are more than one, at the time of the institution of the complaint, actually and voluntarily resides, or carries on business or has a branch office, or personally works for gain, provided that in such case either the permission of the District Forum is given, or the opposite parties who do not reside, or carry on business or have a branch office, or personally work for gain, as the case may be, acquiesce in such institution; or
    c) – the cause of action, wholly or in part, arises.

    Jurisdiction of state commission[edit]

    1. Subject to the other provisions of this Act, the State Commission shall have jurisdiction:-
    a) – to entertain
    i) – complaints where the value of the goods or services and compensation, if any, claimed exceeds rupees twenty lakhs but does not exceed rupees one crore; and
    ii) – appeals against the orders of any District Forum within the State; and
    b) – to call for the records and pass appropriate orders in any con­sumer dispute which is pending before or has been decided by any District Forum within the State, where it appears to the State Commission that such District Forum has exercised a jurisdiction not vested in it by law, or has failed to exercise a jurisdiction so vested or has acted in exercise of its jurisdiction illegally or with material irregularity.

    Jurisdiction of National Commission[edit]

    a) - Subject to the other provisions of this Act, the National Commission shall have jurisdiction—

    i) complaints where the value of the goods or services and compensation, if any, claimed exceeds rupees one crore; and
    ii) appeals against the orders of any State Commission

    b) – to call for the records and pass appropriate orders in any consumer dispute which is pending before or has been decided by any State Commission where it appears to the National Commission that such State Commission has exercised a jurisdiction not vested in it by law, or has failed to exercise a jurisdiction so vested, or has acted in the exercise of its jurisdiction illegally or with material irregularity.

    1. The District Forum, the State Commis­sion or the National Commission shall not admit a complaint unless it is filed within two years from the date on which the cause of action has arisen.
    2. Notwithstanding anything contained in sub-section (1), a complaint may be entertained after the period specified in sub-section (1), if the complainant satisfies the District Forum, the State Commission or the National Commission, as the case may be, that he had sufficient cause for not filing the complaint within such period:

    Provided that no such complaint shall be entertained unless the National Commission, the State Commission or the District Forum, as the case may be, records its reasons for condoning such delay.

    See also[edit]

    References[edit]

    1. Jump up to:a b c d "CONSUMER PROTECTION AND NATIONAL CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION". NCDRC. Archived from the original on 21 July 2011. Retrieved 18 December 2012.

    External links[edit]


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      Swatantra Mishra
      अभी बाबा साहेब आंबेडकर की किताब 'जाति का उच्छेद'अंग्रेजी में आ रही है जिसकी बहुत लम्बी भूमिका उन्होंने लिखी है. क्या लिखा है, यह एक पाठक के तौर पर मैं पढ़ने को उत्सुक हूँ. उसपर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूँ. लेकिन दलित लेखक और चिंतक यह सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकर्म में किसी दलित लेखक को शामिल क्यों नहीं किया? इस सवाल पर क्यों अरुंधति के समर्थक बिदक रहे हैं. भागीदारी का सवाल उठाने पर क्यों किसी को मुश्किल पेश आ रही है? 
      अरुंधति हिंदी मीडिया से बात क्यों नहीं करती हैं 

      अरुंधति रॉय को पढ़ना बहुत स्तरों पर अच्छा लगता है. वे जब भी प्रकट होती हैं तो कुछ न कुछ हिलता सा दीखता है. वे अपनी लेखनी में भाषा के रोमांच के साथ नए- नए तथ्यों के साथ हर बार प्रकट होती हैं. अभी बाबा साहेब आंबेडकर की किताब 'जाति का उच्छेद'अंग्रेजी में आ रही है जिसकी बहुत लम्बी भूमिका उन्होंने लिखी है. क्या लिखा है, यह एक पाठक के तौर पर मैं पढ़ने को उत्सुक हूँ. उसपर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूँ. लेकिन दलित लेखक और चिंतक यह सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकर्म में किसी दलित लेखक को शामिल क्यों नहीं किया? इस सवाल पर क्यों अरुंधति के समर्थक बिदक रहे हैं. भागीदारी का सवाल उठाने पर क्यों किसी को मुश्किल पेश आ रही है? 
      अरुंधति को मैंने कई मुद्दे पर बातचीत करने के लिए फ़ोन किया। कई बार फ़ोन पर कुछ जानकारी लेने के बाद (अरुंधति) उधर से जवाब आता आप 15 मिनट बाद फ़ोन कीजियेगा। उसके बाद वह 15 मिनट कभी नहीं आया जब उन्होंने मेरा फ़ोन उठाया हो और बातचीत हुई हो. मैंने उनके कुछ करीबियों से जब पता किया तो उन्होंने बताया कि वे हिंदी मीडिया से बात नहीं करती हैं. आदिवासियों, गरीबों लोगों की चिंता में दिन-रात घुलने वाली अरुंधति हिंदी मीडिया से बात नहीं करती हैं, यह मुझे नहीं पचा. इसलिए मैंने प्रयोग के तौर पर कम-से-कम ५-६ मौकों पर पकड़ने की कोशिश की लेकिन उनके (अरुंधति) करीबी मित्र की बात ही सही निकली। एक प्रसंग याद आ रहा है, कभी बहुत पहले पढ़ा था. एक बहुत बड़े वैज्ञानिक शायद आइंस्टीन एक क्रन्तिकारी पार्टी के मेंबर थे. वे जब भी पार्टी की बैठक में जाते तो वे पीछे बैठते थे. उनसे आग्रह किया जाता पर वे मना करते। वे कहते- मैं विज्ञान की दुनिया का उस्ताद हो सकता हूँ लेकिन यहाँ जो लोग राजनीतिक तौर पर ज्यादा सक्रिय हैं, जो लोग जमीन पर काम कर रहे हैं वही मेरे नेता हैं, मैं उनका follower हूँ.
      Photo: अरुंधति हिंदी मीडिया से बात क्यों नहीं करती हैं   अरुंधति रॉय को पढ़ना बहुत स्तरों पर अच्छा लगता है. वे जब भी प्रकट होती हैं तो कुछ न कुछ हिलता सा दीखता है. वे अपनी लेखनी में भाषा के रोमांच के साथ नए- नए तथ्यों के साथ हर बार प्रकट होती हैं. अभी बाबा साहेब आंबेडकर की किताब 'जाति का उच्छेद'अंग्रेजी में आ रही है जिसकी बहुत लम्बी भूमिका उन्होंने लिखी है. क्या लिखा है, यह एक पाठक के तौर पर मैं पढ़ने को उत्सुक हूँ. उसपर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूँ. लेकिन दलित लेखक और चिंतक यह सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकर्म में किसी दलित लेखक को शामिल क्यों नहीं किया? इस सवाल पर क्यों अरुंधति के समर्थक बिदक रहे हैं. भागीदारी का सवाल उठाने पर क्यों किसी को मुश्किल पेश आ रही है?  अरुंधति को मैंने कई मुद्दे पर बातचीत करने के लिए फ़ोन किया। कई बार फ़ोन पर कुछ जानकारी लेने के बाद (अरुंधति) उधर से जवाब आता आप 15 मिनट बाद फ़ोन कीजियेगा। उसके बाद वह 15 मिनट कभी नहीं आया जब उन्होंने मेरा फ़ोन उठाया हो और बातचीत हुई हो. मैंने उनके कुछ करीबियों से जब पता किया तो उन्होंने बताया कि वे हिंदी मीडिया से बात नहीं करती हैं. आदिवासियों, गरीबों लोगों की चिंता में दिन-रात घुलने वाली अरुंधति हिंदी मीडिया से बात नहीं करती हैं, यह मुझे नहीं पचा. इसलिए मैंने प्रयोग के तौर पर कम-से-कम ५-६ मौकों पर पकड़ने की कोशिश की लेकिन उनके (अरुंधति) करीबी मित्र की बात ही सही निकली। एक प्रसंग याद आ रहा है, कभी बहुत पहले पढ़ा था. एक बहुत बड़े वैज्ञानिक शायद आइंस्टीन एक क्रन्तिकारी पार्टी के मेंबर थे. वे जब भी पार्टी की बैठक में जाते तो वे पीछे बैठते थे. उनसे आग्रह किया जाता पर वे मना करते। वे कहते- मैं विज्ञान की दुनिया का उस्ताद हो सकता हूँ लेकिन यहाँ जो लोग राजनीतिक तौर पर ज्यादा सक्रिय हैं, जो लोग जमीन पर काम कर रहे हैं वही मेरे नेता हैं, मैं उनका follower हूँ.
      Unlike ·  · 
      • You, Anita BhartiAk PankajPramod Ranjan and 24 others like this.
      • Nivedita Shakeel अरुंधति रॉय ने इतनी सुन्दर भूमिका लिखी है कि उसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए। मुझे लगता है तुम्हारी ये बात सही नहीं है कि वे हिन्दी मीडिया से बात नहीं करती। मैंने खुद उनसे बात कि है. काफी संवेदनशील महिला है। इस तरह कि टिप्पणी से बचना चाहिए। हर लिखने वाला आंदोलन करे ये जरुरी नहीं। वह अगर लिख कर अपना काम कर रहा है तो उसे भी आंदोलन का ही हिस्सा मन जाना चाहिए

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      BR Ambedkar, Arundhati Roy, and the politics of appropriation

      Dear Friends
      There has been a lot of debate on Facebook over the recent book "Annihilation of Caste" published by Navayana (http://navayana.org/product/annihilation-of-caste/).  And alsoRoundtableindia.co.in the only website has been voicing their problem with the present book.  First time Livemint has published an opinion piece by G. Sampath who engages with both the open letter and to other debates in Facebook. We are circulating the text of the article appeared in Livemint for your consideration. Also we have attached the open letter written by Dalit Camera to Ms. Roy and her reply with this email. Also hereby giving youRoundtable.co.in link for other articles. (http://roundtableindia.co.in/index.php?option=com_content&view=article&id=7283%3Aan-open-letter-to-ms-arundhati-roy&catid=119%3Afeature&Itemid=132), and watch Ms. Roy's speech in the Delhi Book Lauch, a very interesting one too. (https://www.youtube.com/watch?v=QAeEK4DyRYw)


      Author: G.Sampath


      Published date: March 18th 2014
      In 1936, the Jat-Pat-Todak Mandal (Forum for the Break-up of Caste), a Lahore-based Hindu reformist group, invited B.R. Ambedkar to deliver its annual lecture. They wanted a copy of his speech in advance, and when Ambedkar shared it with them, the progressive-minded, reformist, anti-caste Hindus found the contents “unbearable”. They withdrew their invitation. Ambedkar never got to deliver his speech. He ended up self-publishing it — at his own expense — under the title ‘Annihilation of Caste’.
      Three-quarters of a century after its publication, Annihilation of Caste (AoC) still remains largely unread by its target audience — caste Hindus, or the people Ambedkar called ‘the Touchables’ (the terms ‘Touchables’, ‘privileged castes’, ’caste Hindus’, ’savarnas’, and ’non-Dalits’ are used interchangeably in this essay).
      All these years, AoC has been kept in circulation, in multiple translations, largely by small Dalit presses and Dalit readers. It has served, and continues to serve, as an inexhaustible resource for Dalit political mobilization. It has been a well spring of spiritual succour and moral support for Dalits who have had the misfortune of being born, growing up, and having to make their lives in a society that assaults their dignity and questions their self-worth on a routine basis.
      Now this revolutionary classic is all set to gain a wider, savarna readership — the audience whom Ambedkar could not address. The Delhi-based anti-caste publishing house, Navayana, has just published an annotated critical edition of AoC, with an introduction by Arundhati Roy.
      The background
      On the face of it, this special publication, with an introduction by a writer of the stature and international fame of Roy, and detailed annotations by the Navayana publisher S. Anand, ought to be a good thing, and worth celebrating. Given the recent resurgence of the Hindu Right in the Indian political landscape, one could even consider it timely.
      But this edition of AoC, though widely welcomed in non-Dalit circles in India and abroad, has evoked fierce objections from Dalits, with many even calling it an insult to the Dalit community.
      The Ambedkarite website, Round Table India (RTI) published an open letter to Arundhati Roy questioning, among other things, her motives in writing this introduction, her suitability for such a task, her excessive focus on Gandhi in her essay, and the politics surrounding her decision to write it.
      Roy replied to the letter explaining the logic behind her choices. Anand, who’s also copped a lot of flak from Dalits, especially on social media, has published his response on the Navayana website. Unlike Anand and Roy, both of whom have shown a willingness to engage with their Dalit critics, other privileged caste writers have come down heavily on these Dalit voices, accusing them of intolerance, fanaticism, misogyny, and of trying to curb the freedom of expression of non-Dalits. This piece hurls the ultimate insult at Dalit writers and activists angered by the Navayana edition, charging them with practising “the politics of Brahminism”.
      In view of the limitations of length imposed by a column of this kind, one can either review the book or engage with this debate. I propose to do the latter, as I believe it offers an important opportunity for savarnas (like myself, I might add) to introspect on how privilege determines their very subjectivity and worldview.
      Given the complexity of this debate — on the politics of publishing a seminal text of Dalit resistance with an introduction by a celebrity non-Dalit who has almost no history of engagement with Dalit politics nor any track record of Dalit scholarship — I intend to do no more than present the broad contours of it, and end by attempting to show why this Navayana edition, for all its good intentions, constitutes a typical example of the politics of appropriation.
      Who can represent Ambedkar?
      If one were to sum up the Ambedkarite position in this debate in one line, as enunciated by Dalit writers such as Anoop Kumar , it would be this: You want to represent Ambedkar without bearing — or having borne — the burden of being Dalit in a society that oppresses Dalits. How could you?
      First of all, does Roy’s introduction qualify as a form of representation? Well, it certainly does – not in terms of talking for, but in terms of talking about. As for the act of annotating, it is a practice embedded in what the French sociologist Pierre Bourdieu calls the “scholarly habitus”, which, again, is so tied up in structures of power and privilege that, in the field of caste, it is available to a Dalit only rarely and against heavy odds.
      Roy has defended her act of representing/introducing Ambedkar by asking: “If it is your case that only Dalits can write an introduction about Ambedkar, then I must disagree with you. What if tomorrow Gujarati banias say only they can write about Gandhi? Or Mahars say that their understanding of Ambedkar is more authentic and more radical than that of other Dalits?”
      Raising the question of how, given that caste is a graded system of inequality, anybody can arrogate to themselves the status of the “authentic victim”, she cautions Dalits against “essentialism”. This might be a good place to point out that all those who practice identity politics have always been susceptible to the charge of essentialism. It is the very reason why, for instance, a Dalit cannot take a stand on an issue unless she can also demonstrate that it is the unified stand of the entire Dalit community, whereas no savarna intellectual is ever expected to be a representative of all savarnas. While it is true that any self-proclaimed Dalit stand will necessarily be essentialist, the charge of being essentialist can only ever be made by other Dalits with divergent points of view on the issue at hand. When voiced by a non-Dalit, it necessarily will be — and should be—be met with suspicion.
      For Roy, the only thing that matters is this: “The point is, whatever my privileges are – or yours for that matter – are we fighting against Brahminism or strengthening it? If it is your argument that through my introduction I am somehow actually perpetuating caste please tell me how that it so.”
      Anand, in his statement, makes a similar case, asking: “What is it that we do with privilege? Sharpen it into a weapon and wield it against the very banyan tree of brahminism that entangles us with its roots in the air? Or should we just enjoy the shaded comfort of this tree? I believe it is the former that this edition of the book attempts.” He further adds, “While I understand the anxiety and politics over who gets to introduce or annotate Ambedkar, I do strongly believe Ambedkar belongs to all.” Well, does he, now, is what some of his Dalits interlocutors are asking.
      The dynamics of privilege
      Let us assume for the sake of argument that both Dalits and the privileged castes have an equal right to introduce Ambedkar. Do both of them also have equal power to exercise that right? If they do not – and both Roy and Anand would readily acknowledge that they do not – how should a Dalit interpret a savarna’s assertion that they both have an equal right, if not as an instance of insincerity?
      Moving on from the assertion to the action, if we acknowledge that Dalits do not enjoy the kind of opportunities for exercise of knowledge capital that members of the privileged caste such as Anand and Roy do, Roy’s writing of the introduction and Anand’s annotations are an exercise of exactly the same privilege that is being denied to Dalits day in and day out on some ground or the other. That is why Dalits find it offensive.
      Given that Navayana is the foremost anti-caste publisher in the world – a Dalit writing the Introduction could have yielded a tremendous amplification of a Dalit voice. But Navayana believed that Ambedkar’s text would be better amplified by a celebrated writer who commands a ready audience across the globe. But then, if taking Ambedkar to the world was the idea, then it is strange that both the excerpts from the book published so far in mainstream magazines are from the Introduction written by a non-Dalit, and not from the Dalit-authored text being introduced. Clearly, the strategy of wielding the weapon of Brahminical privilege against Brahminism doesn’t seem to be working in this instance at least. And the reason why it cannot work has always been obvious to Ambedkarite Dalits: Any exercise of brahminical privilege is ALWAYS ALREADY an act of Dalit exclusion.
      To paraphrase what Chippewa poet Lenore Keeshig-Tobias says in her essay, ‘Stop stealing Native stories’, Roy, having squeezed out the possibility of a Dalit intellectual introducing AoC, turns around and tells Dalits to write their own introductions. Dalits can ask, like Keeshig-Tobias does, “How can we?” Even if they had access to the means to do so, they would be told — it’s already been done, and done by none other than Arundhati Roy.
      From this standpoint, even this very essay, showcasing a savarna writer laboring to present a Dalit perspective, is an absurdity that is fully deserving of the scorn of Dalit critics. Far from seeking to defend myself, all that I (or anybody else in my position) am entitled to do is to acknowledge it as a valuable reminder of my own status as an oppressor perched on the higher reaches of the dung heap of privilege.)
      One argument trotted out time and again in support of the claim that Ambedkar belongs to all is that that his work is now a part of the global intellectual heritage of ideas that anyone should be free to engage with irrespective of their caste identity. Dalits, most prominently Kumar, have maintained that Ambedkar is their deity, and that non-dalits who seek to represent him are appropriating the Dalit deity. Savarna writers have responded to this by arguing, as Roy does, that we should not turn Ambedkar into another ‘God’ and instead recognize that he too is a human being, with his merits, flaws, and so on.
      History, however, offers ample evidence that such modes of representation can and do serve as mechanisms of appropriation. Music, for instance, was one mode of political resistance that was available to Black Americans. But the histories of jazz, rock n roll, and now rap, are all of them testaments to white appropriation.
      “How can any non-Dalit be part of a Dalit movement when you will not even concede that they have the right to engage with Ambedkar?” asks Roy. Well, for starters, a sense of entitlement to every single intellectual, political, and cultural space available is precisely how the power of privilege operates.
      The story-teller’s tale
      At the launch of AoC in Mumbai, Roy spoke eloquently about the importance of story-telling, and how it wasn’t as if she was picked to write the Introduction only because she was famous – if she was famous, she said, she was famous “for something” – implying that she was chosen to write the Introduction because of her exceptional story-telling skills, and the story of Ambedkar and Gandhi and the politics surrounding AoC is such an important story that it can only gain by someone of Roy’s caliber telling it to an audience that has so far not been interested in hearing it.
      Roy’s argument here is deeply flawed on at least three grounds.
      Firstly, nobody can, of course, dispute Roy’s genius as a story-teller. She has behind her an unmatched body of work, uniquely among Indian writers, wherein she recounts, with imagination, passion and empathy, the courageous struggles of the oppressed and the marginalized against the might of a corporate state. But to even attempt to say — based on Roy’s story-telling skills or ready command over a vast global readership or any other criteria one might care to bring up — that she is therefore the best possible candidate to narrate the tale of ‘the doctor and the saint’ is to fall back on the dubious ‘merit argument’ whose notoriety Anand and Roy are all too familiar with.
      Secondly, neither Anand nor Roy can say that she wrote this introduction or he did the annotations to help the Dalit cause – for the simple reason that to say so would be an insult to all Dalits. To their credit, neither has said anything like it in so many words. But they ended up further stoking Dalit anger by implying it, for instance, by saying that they have done it (published this edition) only for the noble cause of fighting Brahminism.
      Thirdly, in the savarna view of the world, for Ambedkar to be just a Dalit deity is not an exalted enough status given his great intellect. He must, therefore, whether the Dalits like it or not, be elevated to his true position in the global, non-Dalit, pantheon of intellectual giants. And this requires transporting him – in a Brahmin bag -- from the claustrophobic confines of a Dalit temple to the open air of the global free market.
      Structural privilege, as in the case of racism or casteism, invariably displays two properties. The first is invisibility: by its very nature, it is invisible to its biggest beneficiaries. The second is it induces blindness. Brahminical privilege induces blindness to the possibility that there might be alternative value systems that rule out exporting a cultural property or commodifying it. And nobody can deny that this edition of AoC, targeted at a non-Dalit audience, for many of whom caste is “an exotic Hindu thing” (Roy’s words), will render Ambedkar as an object available for consumption.
      Strangely enough, Roy herself has written, most eloquently, about how it is the prerogative of the Dongria Kondh adivasis to keep the bauxite in the Niyamgiri hills, and about the central role of their deity, Niyamraja, in giving them a sense of identity and community. If Dalits wish to keep Ambedkar for Dalits alone – for after all, they, and not the savarnas, have been the ones who have kept his legacy alive all these years – how can she then say that Ambedkar belongs to all? How different is it from an industrialist saying that the minerals in the mountains belong to all and not just the adivasis who happen to live there? How can she acknowledge the political power of the Niyamraja for the adivasis, and be blind to the political power of Ambedkar the deity for the Dalits?
      One could make the argument that it is not as if Ambedkar doesn’t already belong to all --- for isn’t he the father of the Indian Constitution? Well, the Ambedkar that the Dalits revere as a deity is not the same as the non-deified avatar the savarnas admire as a legal luminary and scholar. And for Dalits, AoC as a text signifies the former, and not the father of the Constitution. Incidentally, Ambedkar was hardly pleased with the document he is credited with fathering. He had this to say about it: “The Constitution was a wonderful temple for the gods, but before they could be installed, the devils have taken possession.”
      Again, borrowing Keeshig-Tobias’ argument against white appropriation, the savarnas have a lot of intellectuals and gods and revolutionaries to write about and discuss and worship if they choose to. But Ambedkar is all that the Dalits have – “to fight off illness and death”.
      As regards story-telling, Keeshig-Tobias writes, “So potent are stories that, in native culture, one storyteller cannot tell another’s story without permission.” Did Roy take the Dalits’ permission to write the Introduction to AoC? Or is it the case that “maybe they just know a good story when they find one and are willing to take it, without permission, just as the archeologists used to rob our graves for museums”?
      Ambedkar as a cultural good
      AoC embodies Dalit labour. And not just Dalit labour but Dalit pain and Dalit humiliation have gone into its creation and its post-publication life. But the royalties, as well as the social and cultural capital accruing from this Navayana edition – which is a private, cultural property and not part of the Dalit commons -- would not be flowing into the estate of a Dalit writer. If even this is not appropriation, then it is difficult to understand what appropriation means.
      Roy’s argument that she has written the introduction to AoC not as an authority on Ambedkar but simply “from the position of a writer who engages with things that she feels are important to her, and to the society that she lives in” is a textbook instance of romantic individualism that proclaims the absolute right of an author to the entire realm of cultural and intellectual resources in the name of a common public domain – dismissing any restrictions as a form of censorship – while ignoring the fact that such a common public domain of ideas is not equally accessible to all. Roy seems unable to recognize that such authorial self-assertion, in this case, coming from a position of privilege in the face of protests voiced from the margins, cannot but be complicit with the relations of power that undergird this so-called common public domain of ideas.
      All this does not mean that no political or social good can ever come from those who, by no fault of their own, happen to occupy positions of privilege. Had that been the case, no white person could ever have played any role in the anti-slavery and civil rights movements in the United States, no man could have played any part in women’s liberation movements, and no heterosexual could ever take part in LGBT (lesbian, gay, bisexual, and transgender) struggles for equality. But any such intervention on the side of the oppressed from those occupying positions of privilege needs to be done with sensitivity to the immediate political context of inequality and exclusion that structures all such engagements.
      The ethics of exercising rights
      So, should Roy have written her essay at all? Of course, yes. And she has produced, as usual, a brilliant piece of writing that not only situates AoC in its historical context but also carries out the epistemologically and politically important maneuver of reprising the Dalit perspective on Mahatma Gandhi for a non-Dalit audience. Even so, Dalits have pointed out serious flaws in it, especially in its presentation of the Ambedkar-Gandhi encounter – but this is one aspect of the ongoing debate that I cannot go into here as it is beyond the scope of this already very long essay.
      Roy’s essay, for all its faults, is bound to be unsettling and disturbing for most caste Hindus, who ought to read it for that very reason. But what could have been avoided is its presentation as an introduction to AoC. If the main thrust of her essay, in her own words, is to move the Gandhi monument out of the way so that savarna readers can get to Ambedkar, then this operation could very well have been carried out in a standalone publication. Why did it have to be presented as an introduction to AoC?
      All said and done, one positive fallout of the entire debate triggered by this initiative of Navayana’s – “a historical mistake”, as Anand calls it – is that it just might awaken savarnas to the possibility that the real magnitude of their caste privilege is something they may never really be able to grasp either intellectually or morally – at any rate, not to the same degree or with the cosmic immediacy with which it bears down on the personhood of those who bear the brunt of it.
      Perhaps the savarnas can take a hint from a self-proclaimed white appropriator of a black invention, the rap artist Macklemore. Here is someone who is not only sensitive to his own white privilege but is respected by Blacks for his readiness to acknowledge, in his work, that his adoption of rap – which ought to be his right as an artist -- is itself an act of racist appropriation.
      Macklemore sums up it up well in this song where he talks about the nature of white privilege:
      “Hip-hop started off on a block that I’ve never been to
      To counteract a struggle I’ve never been through
      If I think I understand just because I flow, too?
      That means I’m not keeping it true, I’m not keeping it true.”
      Roy and Anand both flow, for sure, but have they kept it true? In their 416-page edition of AoC, there is not a single acknowledgement anywhere that their enterprise, notwithstanding its indubitable merits, is essentially a casteist one – not merely an exercise of Brahminical privilege but a Brahminical exercise of privilege. If Dalits are angry, it’s because they have every reason to be.


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      please watch Ms. Arundhati Roy's speech in Delhi book launch


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      सच यह है कि इस वक्त भारत को बाबासाहेब डा. भीमराव अंबेडकर की सख्त जरुरत है।संवाद का फोकस भी यही होना चाहिए।

      पलाश विशवास
      अरुंधति राय के जाति   उन्मूलन के सिलसिले में जो संवाद हमने शुरु करने की कोशिश की है,हमेशा की तरह उसके मुद्दों को संबोधित करने की कोशिश नहीं हो पा रही है। यह साफ करना जरुरी नहीं है कि हमने लगातार वामपंथी विश्वासघात,उनके सवर्ण नेतृत्व और भारत के मौजूदा संकट के लिए उनकी जवाबदेही पर  निरंतर लिखा है।जाहिर है कि हमारे विद्वतजन मुझ जैसे मामूली लेखक का लिखा पढ़ते नहीं होंगे।

      हम लगातार अंबेडकरी आंदोलन और विचारधारा के मुद्दे ही उठाते रहे हैं और अब भी अंबेडकर के जाति उन्मूलन एजंडा को मौजूदा संकट से निकलने और उसके प्रतिरोध का एकमात्र विकल्प मानते हैं।


      मैं साम्यवादियों का पक्ष नहीं ले रहा हूं।जो मैंने अंबेडकरी आंदोलन के बारे में लिखा है,वह दरअसल आत्मालोचना ही है। हम अंबेडकर की विचारधारा से उसीतरह विचलने के शिकार हो रहे हैं जैसा कि वाम विचारधारा के लोग।उनका सवर्ण वर्चस्व इसका जिम्मेदार है तो अबेडकरी आंदोलन के तमाम सिपाहसालार कारपोरेट राज के हक में खड़े हैं।सत्ता की राजनीति के तहत।


      मैं मामूली पत्रकार हूं।कोई लेखक भी नहीं हूं। अपनी सक्रियता या प्रतिबद्धता का दावा भी मैं नहीं करता।आपके सारे आरोप हमारे सर माथे। हमारे बारे में आपका आकलन जो भी हो,उसका ताल्लुकात भारत के इतिहास,वर्तमान और भविष्य के सात नहीं है।यह बहस का मुद्दा भी नहीं है। न वामपंथ हमारे सरोकार का मामला है।उसके झंडेवरदारों ने ही उस विचारधारा को विसर्जित कर दिया है।


      लेकिन जैसे अरुंधति ने लिखा है, अरुंधति के बारे में आपका जो भी आकलन हो,सही या गलत,वह सच यह है कि इस वक्त भारत को बाबासाहेब डा. भीमराव अंबेडकर की सख्त जरुरत है।संवाद का फोकस भी यही होना चाहिए।


      अगर भारतीय बहुजन आंदोलन के मौजूदा नेतृत्व की आलोचना करके हमने भारी गलती की तो वह आलोचना भी मैं वापस लेने के लिए तैयार हूं।


      लेकिन अंबेडकरी एजंडे पर हम संवाद तो करें।सही प्रसंगों और संदर्भों में अंबेडकरी आंदोलन की दिशा तो तय करें। मैं तो नाचीज हूं और मुझे कोई श्रेयभी नहीं लेना और न आप अरुंधति जैसी किसी को कोई श्रेय दें।बराबर।चलेगा।


      लेकिन अंबेडकरी आंदोलन के महिमामंडन के वामपंथी अभ्यास से बचकर उसकी दशा दिशा का सही विवेचन तो करें।


      मसलन माननीय एच एल दुसाध के लिखे से हर वक्त मैं सहमत नहीं होता लेकिन मैं उनकी इस कोशिश की हमेशा सराहना करता हूं कि तमाम समस्याओं को वे अंबेडकरी निकष से जांचते हैं।उनके विश्लेषण से हम सहमत असहमत हो सकते हैं लेकिन वे अंबेडकर के अनुसरण की ईमानदार कोशिश करते हैं,इसपर संदेह का अवकाश नहीं है।


      मैं फिर अरुंदति ने जो लिखा है,उसपर आप लोगों की राय का इंतजार कर रहा हूं।


      क्या जाति का खात्मा हो सकता है?


      तब तक नहीं जब तक हम अपने आसमान के सितारों की जगहें बदलने की हिम्मत नहीं दिखाते. तब तक नहीं जब तक खुद को क्रांतिकारी कहने वाले लोग ब्राह्मणवाद की एक क्रांतिकारी आलोचना विकसित नहीं करते. तब तक नहीं जब तक ब्राह्मणवाद को समझने वाले लोग पूंजीवाद की अपनी आलोचना की धार को तेज नहीं करते.


      और तब तक नहीं जब तक हम बाबासाहेब आंबेडकर को नहीं पढ़ते. अगर क्लासरूमों के भीतर नहीं तो उनके बाहर. और ऐसा होने तक हम वही बने रहेंगे जिन्हें बाबासाहेब ने हिंदुस्तान के 'बीमार मर्द' और औरतें कहा था, जिसमें अच्छा नहीं होने की चाहत नहीं दिखती.

      इसके साथ ही निवेदन है कि आनंद तेलतुंबड़े जी का यह आलेख भी देख लेंः


      शासक वर्ग सोने के अंडे देने वाली जाति की मुर्गी को मारना नहीं चाहते

      http://ambedkaractions.blogspot.in/2014/03/blog-post_18.html


      अंबेडकर का यह लिखा भी देख लें

      A Reply To The Mahatma Excerpted from Annihilation of Caste: The Annotated Critical Edition, published by Navayana B.R. AMBEDKAR

      A Reply To The Mahatma

      Excerpted from Annihilation of Caste: The Annotated Critical Edition, published by Navayana

      B.R. AMBEDKAR


      फिर यह इंटरव्यू भी


      NTERVIEW

      "We Need Ambedkar--Now, Urgently..."

      The Booker prize-winning author on her essay The Doctor and the Saint and more

      SABA NAQVIINTERVIEWS ARUNDHATI ROY

      HTTP://WWW.OUTLOOKINDIA.COM/ARTICLE.ASPX?289691

      अरुंधति का लिखा भी

      The Doctor and the Saint ARUNDHATI ROY

      The Doctor and the Saint

      http://ambedkaractions.blogspot.in/2014/03/the-doctor-and-saint-arundhati-roy.html


      The Doctor and the Saint Ambedkar, Gandhi and the battle against caste By ARUNDHATI ROY - See more at: http://caravanmagazine.in/reportage/doctor-and-saint#sthash.YmhkjBkq.dpuf


      Arundhati Roy replies to Dalit Camera

      http://ambedkaractions.blogspot.in/2014/03/arundhati-roy-replies-to-dalit-camera.html


      इस पर आपके लिखे का हम इंतजार कर रहे हैं।

      बहरहाल आप लिखें न लिखें,यह संवाद जारी रहेगा।







      Anita Bharti

      मुझे Palash Biswasजी के द्वारा लिखे गए लेख पर हैरानी हो रही है. मैने अरुंधति राय के राउंड टेबल इंडिया पर छपे पत्र को पढकर कुछ प्रतिक्रिया अपनी फेसबुक की वाल पर लिखी थी. पता नही क्यों पलाश जी ने मेरे बात का मंतव्य समझे बिना जल्दी जल्दी स मेरे खिलाफ लेख लिख मारा और अब देखा वही लेख हस्तक्षेप में भी छपा हुआ है.. मुझसे अगर आप इस मुद्दे पर बातचीत करने के इच्छुक थे तो मैं भी थी आपसे बातचीत करने में उतनी ही इच्छुक थी और. यह बात मैने अपनी वाल पर भी आपके जबाब में लिखी थी. पर अब देख रही हूँ कि वे अब हमें या मुझे जिसे भी कहो, सुपारी किलर भी बता रहे है उनका एक वाक्य पढिए, जो मेरे अनुसार बहुत ही आपत्तिजनक है- अस्मिता राजनीति के लोग तो अब स‌ुपारी किलर हो गये हैं जो कॉरपोरेटवधस्थल में बहुसंख्यआबादी जिनमें बहिष्कृत मूक जनगण ही हैं,के नरसंहार हेतु पुरोहिती स‌ुपारी किलर बन गये। ।"

      Like·  · Share· 6 hours ago·

      • Musafir D. Baitha, Subhash Gautam, Sanjeev Chandan and 21 others like this.

      • Vinod Kumar Bhaskerकभी कभी मिस-understanding हो जाती है |

      • 6 hours ago· Like· 1

      • Palash Biswasअनिता जी,यह वाक्य आपके खिलाफ नहीं है।यह अस्मिता राजनीति करने वालों के लिए है।राजनीति यानी स‌त्ता की राजनीति।वह आप नहीं कर रही हैं।मैंने तो आपकी टिप्पणी को बतौर स‌ूत्र इस्तेमाल करते हुए एक स‌ंवाद की शुरुआत करने कीकोशिश की है।मुझे आपके स‌रोकार और आपके मं...See More

      • 5 hours ago· Like· 5

      • Musafir D. Baithaअनीता जी, पलाश जी की तो सफाई आ गयी, अब आप कुछ कहिये. अगर उनके इस वक्तव्य से कन्फ्यूजन एवं द्वंद्व खत्म हो जाएगा तो हमें भी राहत मिलेगी.

      • 5 hours ago· Like· 2

      • Anita Bhartiपलाश जी, आपके द्वारा लिखे गये लेख में उठाएं गए मुद्दों और आरोपों से क्या मैं यह समझू कि क्या केवल दलित या अम्बेडकरवादी या फिर वंचित समाज ही अकेला जिम्मेदार है? और अगर ऐसा है तो इस सबके लिए किसी की कोई भूमिका या नाकामी जिम्मेदार नही है? मेरे ख्याल कारपोरेटी लूटेरे, पूंजीवादी, जातिवादी, धार्मिक उन्मादी फौज, सुपारी किलर, तर्कविहान, मिलावटी, दुकानदार आदि-आदि. क्या आपकी निगाह में या आपकी विचारधारा की निगाह में दलित वंचित शोषित की यही छवि है? आपने यह छवि कैसे और क्यूं गढी है? क्या पूरी बहुजन दलित विचारधारा आपको यही लगती है आपने आंदोलन साहित्य राजनीति सबका घालमेल करके सबका एक ही सार निकाला है जो आपके अनुसार आपके लेख से यह दिखता है या आप ऐसा कह रहे है. उसका मैं पूरे लेख पढने के बाद पाईंट वाईज दे रही हूँ. कृपया आप भी देखे कि आप क्या कहना चाहते थे और क्या कह गए है. 1 दलित बस्तियों में नीला झंडा उठाये लोगों ने बाबासाहेब का एजेण्डा का जो हश्र किया और जाति व्यवस्था बहाल रखने वाली मुक्त बाजारी धर्मोन्मादी हिन्दुत्व में जो ब्रांडेड फौज स‌माहित हो गयी है,

      • 2 हमारे जो मलाईदार लोग हैं, आरक्षण स‌मृद्ध नवधनाढ्य वे कितनी बार स‌त्ता हैसियत छोड़कर अपने लोगों के बीच जाते रहे हैं, इसका भी हिसाब होना चाहिए।

      • 3 अस्मिता राजनीति के लोग तो अब स‌ुपारी किलर हो गये हैं जो कॉरपोरेटवधस्थल में बहुसंख्यआबादी जिनमें बहिष्कृत मूक जनगण ही हैं,के नरसंहार हेतु पुरोहिती स‌ुपारी किलर बन गये।

      • 4 अरुंधति की बात क्या करें, हमारे लोग तो बाबासाहेब के परिजनों में से एक अंबेडकरी आंदोलन के वस्तुवादी अध्येता और चिंतक आनंद तेलतुंबड़े को भी कम्युनिस्ट कहकर गरियाते हैं। क्योंकि वे अंबेडकर की प्रासंगिकता बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं और दुकानदार प्रजाति के लोग तो अंबेडकरी आंदोलन का बतौर एटीएम इस्तेमाल जो कर रहे हैं सो कर रहे हैं,

      • 5.अंबेडकरी साहित्यकों भी मरी हुई मछलियों की तरह हिमघर में बंद कर देना चाहते हैं। लोग कुछ अपढ़, अधपढ़ लोग, जिनकी एकमात्र पहचान जाति है और खास विशेषता पुरखों के नाम का अखंड जाप, ऐसे लोगों के बाजारू फतवेबाज टॉर्च की रोशनी में अंबेडकर का अध्ययन हो, तो हो गयी क्रांति।

      • 6.बहुजन साहित्य और बहुजन आंदोलन के तौर तरीके ब्राह्मणवादी होते गये हैं, क्यों कि हम भी शुद्ध अशुद्ध जिसपर सारी नस्ली बंदोब्सत तय है, उसीको उन्हीं की शैली अपनाकर खुद को शुद्ध साबित करके नव पुरोहित बनते जा रहे हैं।

      • 7.बहुजनों में विमर्श अनुपस्थित है और कोई संवाद नहीं है क्योंकि पहले से ही आप तय कर लेते हैं कि कौन दलित हैं, कौन दलित नहीं है, कौन ओबीसी है कौन ओबीसी नहीं है। फिर त्थ्य विश्लेषण करने से पहले आप सीधे किसी को भी ब्राह्मण या ब्राह्मण का दलाल या फिर कम्युनिस्ट, वामपंथी या माओवादी डिक्लेअर कर देते हैं।

      • 8.सत्ता वर्ग के लोग ऐसी गलती हरगिज नहीं करते हैं और हर पक्ष को आत्मसात करके ही उनकी सत्ता चलती है। देख लीजिये, हिन्दू साम्राज्य के राजप्रासाद की ईंटों की शक्लों की कृपया शिनाख्त कर लें।

      • 9.अंबेडकरी विचारधारा और आंदोलन पर सही संवाद में सबसे बड़ी बाधा यही है कि हर ब्राण्ड के हर दुकानदार ने अपना अपना अंबेडकर छाप दिया है। हर ब्राण्ड का अंबेडकर बिकाऊ है। और असली अंबेडकर बाकायदा निषिद्ध धर्मस्थल है और अंबेडकर विमर्श गुप्त तांत्रिक क्रिया है और इस विद्या के अधिकारी बहुजन भी नहीं है।

      • 10.संस्कृत मंत्र की तरह है अंबेडकर साहित्य, जिसका उच्चारण जनेऊधारी द्विज ही कर सकते हैं।

      • 11.नीले रंग की मिलावट की जाँच भी तो होनी चाहिए। वरना बार-बार बहुजन हाथी गणेश बनता रहेगा और आपके महाजन हिन्दुत्व के खंभे बनते चले जायेंगे।

      • 12. बहुजन राजनीति कुल मिलाकर आरक्षण बचाओ राजनीति रही है अब तक।

      • 13.आरक्षण की यह राजनीति जो खुद मौकापरस्त और वर्चस्ववादी है और बहुजनों में जाति व्यवस्था को बहाल रखने में सबसे कामयाब औजार भी है,अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजेण्डे को हाशिये पर रखकर सत्ता नीति अपनी अपनी जाति को मजबूत बनाने लगी है।

      • 14.मजबूत जातियों की आरक्षण की यह राजनीति यथास्थिति को बनाये रखने की राजनीति है, जो आजादी की लड़ाई में तब्दील हो भी नहीं सकती।

      • 15.इसलिये बुनियादी मुद्दों पर वंचितों को संबोधित करने के रास्ते पर सबसे बड़ी बाधा बहुजन राजनीति के झंडेवरदार,ब्रांडेड ग्लोबीकरण समर्थक बुद्धिजीवी और आरक्षणसमृद्ध पढ़े लिखे लोग हैं। लेकिन बहुजन समाज उन्हींके नेतृत्व में चल रहा है।

      • 3 hours ago· Edited· Unlike· 4

      • Ujjwal Bhattacharyaबहुत ईमानदारी के साथ सवाल उठाये हैं अनिता जी ने. मेरा सिर्फ़ एक सवाल है - ऐसा क्यों हो रहा है ? मुझे लगता है कि अनिता जी के तीखेपन में मेरा यह सवाल कहीं खो जाता है. मैं उनकी टिप्पणी सेव करके रख ले रहा हूं. सामयिक राजनीति से थोड़ा छुटकारा मिले तो इन मुद्दों को फिर से छेड़ना चाहूंगा.

      • 3 hours ago· Like

      • Arvind Sheshपलाश विश्वास की यह भाषा और "क्रांति" का ठेका उठाने वालों का इसी तरह का बर्ताव दरअसल इस बात का प्रतिनिधि उदाहरण है कि अस्मिता के संघर्ष अस्मिता की राजनीति में कैसे तब्दील हुए होंगे। (विस्तार से लिखूंगा) एक सवाल करने का हक नहीं देंगे, एक सवाल बर्दाश्त नहीं करेंगे और उम्मीद करेंगे कि ये अचानक "देवदूत" की आसमान से उतरें और हजारों सालों से वंचना के शिकार लोग (दूसरे "मसीहाओं" को छोड़कर) इन्हें अपना "मसीहा" घोषित कर दें, अपने सिर पर बिठा लें। ...एक बात और कि इक्का-दुक्का उदाहरणों से ये लोग समूचे वंचित वर्ग के अब तक के संघर्ष को खारिज करने और उसे अपने मकड़जाल की गिरफ्त में लेने की मंशा से सबको एक ही डंडे से हांक रहे हैं।पलाश विश्वास ने जिन्हें निशाना बनाकर "सुपारी किलर" टर्म का इस्तेमाल किया है, उन "किलरों" और जिनके नाम की "सुपारी" ली गई है, उनका साफ-साफ नाम लेने की हिम्मत करनी चाहिए और उसकी वजहें भी बतानी चाहिए, क्योंकि मार्क्सवाद का गाना गाने वालों को सबसे पहले "कार्य-कारण संबंध" के अनिवार्य पहलू का ध्यान रखना होगा...! वैसे हम अब इस बात की पड़ताल तो कर ही रहे हैं कि जिस मार्क्सवाद की जरूरत इस देश के सबसे वंचित तबकों को रही, उसे उनसे दूर करने और यहां तक कि मार्क्सवाद की इस देश में हत्या करने की "सुपारी" किसने उठाई हुई है...!

      • 3 hours ago· Like· 3

      • Musafir D. Baithaअनीता जी ने पलाश विश्वास के वक्तव्य से जो पॉइंट निकाले हैं वे किसी द्विज वामपंथी टाइप के विचारक की पूंजी होनी चाहिए थी....

      • 3 hours ago· Like· 2

      • Dharmendra Kumarपलाश बिस्वास जी बहुत दिनो से भरे हुये बैठे थे... वैसे भी नीले झंडे के उफान ने इनको बेरोजगार जो कर दिया है... बस उसी बात ...गुस्सा निकाल दिया..... और सारे दलित आंदोलन का क्रिटिकल एनालिसिस कर दिया... अब जब कि वे कमिया गिना चुके है, शतुमुर्ग स्टाईल मे रेत मे सर दिये आराम फरमा रहे होंगे ..... मैं उस समय उस पोस्ट पर ही था अनीता जी ने जो प्रश्न उठाए वे स्वाभाविक थे, मैं भी पूछ सकता हूँ कि आखिर अरुंधति को जाती व्यवस्था के उच्छेद पर टिप्पणी लिखने कि अचानक क्या आवश्यकतों हो गई, उभरती हुई दलित चेतना औए दलितो मे पढे लिखे लोगो कि बड़ी संख्या मे शायद इन्हे बाज़ार नज़र आता होगा, हालांकि हम अरुंधति के लिखे गए इंटरोंडकसन के खिलाफ नहीं है, लेकिन इस बात को भी समझते है, कि जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए यह पुस्तक एक प्रस्थान बिन्दु है.... जिससे जुड़ कर वे अपनी जमीन तलाश रही हो..... इस पुस्तक के संरक्षक तो प्रश्न पूछेंगे ही....

      • 2 hours ago· Like· 1



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      Magic pen left behind,the color of the black and white journalism faded away.

      Palash Biswas


      One of India's best-known authors and 

      journalists, Khushwant Singh elevated English writing 

      in India with uninhibited wit and humour and was 

      equally facile with his pen on serious issues like