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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    রামের নামে পিতৃ পরিচয় না হলেই বাকি ভারতবাসীরা হারামজাদা !! শরিদিন্দু উদ্দীপন

    গত সোমবার দিল্লীর এক নির্বাচনী প্রচারে গিয়ে সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতি বাকি ভারতবাসীদের এরকম কদর্য ভাষাতেই আক্রমণ করেছিলেন। ঘটনা প্রসঙ্গে এদিনই দিল্লীর একটি গির্জাতে একদল দুষ্কৃতী আগুন ধরিয়ে দেয়। পরদিন থেকে পার্লামেন্টের উভয় কক্ষেই প্রচণ্ড নিন্দার মুখে পড়ে শাসক দল। লোকসভা এবং রাজ্যসভা অচল করে দেন বিরোধী সাংসদেরা। দাবী ওঠে সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতিকে পদত্যাগ করতে হবে। দাবী ওঠে তার বিরুদ্ধে পুলিশকে এফআইআর করতে হবে এবং তাকে গ্রেপ্তার করতে হবে। এমন জটিল পরিস্থিতিতে প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদির কড়া প্রতিক্রিয়াতে সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতি দোষ স্বীকার করে ক্ষমা চাইলেও বিরোধীরা তার গ্রেপ্তারের জন্য এককাট্টা মনোভাব দেখাচ্ছেন। এটা নিঃসন্দেহে সংসদীয় গণতন্ত্রের একটি শুভ দিক। কিন্তু এই ঘটনা থেকে আর একটি বীভৎস দিক এমন ভাবে উন্মোচিত হয়ে পড়েছে যা গণতন্ত্রের পক্ষে ভয়ঙ্কর পরিণতি ডেকে আনতে পারে। নিঃসন্দেহে বলা যায় যে এই ভয়ঙ্কর বার্তা হঠাত মুখ ফসকে বেরিয়ে আসা কোন আলটপকা বুলি নয় বরং এটি ভাগুয়া সন্ত্রাসের একটি সর্বজন জ্ঞাত সুপরিকল্পিত বার্তা। মহাপ্রলয়ের অমৃত বাণী। মিশন ২০৩০ এর ব্লুপ্রিন্ট। রাম রাজ্য প্রতিষ্ঠা করার গোপন এজেন্ডা। 
    ২০০৬ সালে বাবরি মসজিদ ধ্বংস করার পর হিন্দু ধর্ম সংসদ দ্বারা অনুমোদিত এমনি এক গোপন দস্তাবেজ তৈরি করেছিলেন ভারতের সম্মিলিত ভাগুয়া বাহিনী। তথাকথিত হিন্দুত্বের পবিত্র দেবভূমি প্রয়াগে আয়োজিত এই ভাগুয়া সম্মেলনে অংশগ্রহণ করেছিল আরএসএস, বিশ্ব হিন্দু পরিষদ, বজরং দল এবং অখিল ভারতীয় ব্রাহ্মণ মহাসভা। এই সম্মেলনে সংগঠিত ভাবে সংকল্প করা হয়েছিল যে ভাগুয়া বাহিনীর আগামী দিনের প্রয়াস হবে সংরক্ষণ তুলে দেওয়া, ভারতীয় সংবিধান ধ্বংস করা, বৌদ্ধ, খ্রিষ্টান, শিখ ও মুসলিম ধর্মের প্রভাব ধ্বংস করে দেওয়া এবং দলিত আন্দোলনগুলির মধ্যে ভেজাল মিশিয়ে তাকে বিভাজিত করে ফেলা। এই কাজগুলিকে সুচারু ভাবে কার্যকরী করার জন্য অস্ত্র-সস্ত্র, ধর্ম, কর্ম, অধর্ম, কূটনীতি এবং রণনীতি গ্রহণ করা এবং রাজনৈতিক ভাবে বিজেপিকে সমর্থন করা। এই ঘোষণায় এটাও দাবী করা হয় যে নিরঙ্কুশ ভাবে বিজেপি রাষ্ট্র ক্ষমতায় আসীন হলে রামরাজ্য প্রতিষ্ঠা করতে আর কোন বাঁধা থাকবে না। এই গোপন দস্তাবেজের ২০টি ধারায় সংসদে ভাগুয়া ধ্বজ উত্তোলন করা ভারতীয় সংবিধানকে ধ্বংস করে মনুর শাসন কায়েম করা এবং রামরাজ্য প্রতিষ্ঠা করার রণকৌশলগুলি বিস্তারিত আলোচনা করা হয়েছে। বিজেপি এখন নিরঙ্কুশ ভাবে রাষ্ট্র ক্ষমতায় সমাসীন। ভাগুয়া বাহিনীর এমন ধারনাটাই স্বাভাবিক যে রামরাজ্য প্রতিষ্ঠা করার আর কোন বাঁধা নেই। সুতরাং সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতির এই রামধুন হঠাৎ মুখ ফসকে বেরিয়ে আসা অমৃতবর্ষণ না ও হতে পারে। হতে পারে এটি একটি পরিকল্পিত ভাষণ। তাই আমারা শঙ্কিত। এ সংকট মোচনের দায়িত্ব কিন্তু দেশের প্রধান সেবক নরেন্দ্র দামোদর মোদির। তাকেই নিতে হবে উপযুক্ত ব্যবস্থা। আশ্বস্ত করতে হবে বাকি দেশভক্ত ভারতবাসীদের যারা রামজাদা না হলেও হারামজাদা নয়।

    রামের নামে পিতৃ পরিচয় না হলেই বাকি ভারতবাসীরা হারামজাদা !!    গত সোমবার দিল্লীর এক নির্বাচনী প্রচারে গিয়ে সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতি বাকি ভারতবাসীদের এরকম কদর্য ভাষাতেই আক্রমণ করেছিলেন। ঘটনা প্রসঙ্গে এদিনই দিল্লীর একটি গির্জাতে একদল দুষ্কৃতী আগুন ধরিয়ে দেয়। পরদিন থেকে পার্লামেন্টের উভয় কক্ষেই প্রচণ্ড নিন্দার মুখে পড়ে শাসক দল। লোকসভা এবং রাজ্যসভা অচল করে দেন বিরোধী সাংসদেরা। দাবী ওঠে সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতিকে পদত্যাগ করতে হবে। দাবী ওঠে তার বিরুদ্ধে পুলিশকে এফআইআর করতে হবে এবং তাকে গ্রেপ্তার করতে হবে। এমন জটিল পরিস্থিতিতে প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদির কড়া প্রতিক্রিয়াতে সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতি দোষ স্বীকার করে ক্ষমা চাইলেও বিরোধীরা তার গ্রেপ্তারের জন্য এককাট্টা মনোভাব দেখাচ্ছেন। এটা নিঃসন্দেহে সংসদীয় গণতন্ত্রের একটি শুভ দিক। কিন্তু এই ঘটনা থেকে আর একটি বীভৎস  দিক এমন ভাবে উন্মোচিত হয়ে পড়েছে যা গণতন্ত্রের পক্ষে ভয়ঙ্কর পরিণতি ডেকে আনতে পারে। নিঃসন্দেহে বলা যায় যে এই ভয়ঙ্কর বার্তা হঠাত মুখ ফসকে বেরিয়ে আসা কোন আলটপকা বুলি নয় বরং এটি ভাগুয়া সন্ত্রাসের একটি সর্বজন জ্ঞাত সুপরিকল্পিত বার্তা। মহাপ্রলয়ের অমৃত বাণী। মিশন ২০৩০ এর ব্লুপ্রিন্ট। রাম রাজ্য প্রতিষ্ঠা করার গোপন এজেন্ডা।   ২০০৬ সালে বাবরি মসজিদ ধ্বংস করার পর হিন্দু ধর্ম সংসদ দ্বারা অনুমোদিত এমনি এক গোপন দস্তাবেজ তৈরি করেছিলেন ভারতের সম্মিলিত ভাগুয়া বাহিনী। তথাকথিত হিন্দুত্বের পবিত্র দেবভূমি প্রয়াগে আয়োজিত এই ভাগুয়া সম্মেলনে অংশগ্রহণ করেছিল আরএসএস, বিশ্ব হিন্দু পরিষদ, বজরং দল এবং অখিল ভারতীয় ব্রাহ্মণ মহাসভা। এই সম্মেলনে সংগঠিত ভাবে সংকল্প করা হয়েছিল যে ভাগুয়া বাহিনীর আগামী দিনের প্রয়াস হবে সংরক্ষণ তুলে দেওয়া, ভারতীয় সংবিধান ধ্বংস করা, বৌদ্ধ, খ্রিষ্টান, শিখ ও মুসলিম ধর্মের প্রভাব ধ্বংস করে দেওয়া এবং দলিত আন্দোলনগুলির মধ্যে ভেজাল মিশিয়ে তাকে বিভাজিত করে ফেলা। এই কাজগুলিকে সুচারু ভাবে কার্যকরী করার জন্য অস্ত্র-সস্ত্র, ধর্ম, কর্ম, অধর্ম, কূটনীতি এবং রণনীতি গ্রহণ করা এবং রাজনৈতিক ভাবে বিজেপিকে সমর্থন করা। এই ঘোষণায় এটাও দাবী করা হয় যে নিরঙ্কুশ ভাবে বিজেপি রাষ্ট্র ক্ষমতায় আসীন হলে রামরাজ্য প্রতিষ্ঠা করতে আর কোন বাঁধা থাকবে না। এই গোপন দস্তাবেজের ২০টি ধারায় সংসদে ভাগুয়া ধ্বজ উত্তোলন করা ভারতীয়  সংবিধানকে ধ্বংস করে মনুর শাসন কায়েম করা এবং রামরাজ্য প্রতিষ্ঠা করার রণকৌশলগুলি বিস্তারিত আলোচনা করা হয়েছে। বিজেপি এখন নিরঙ্কুশ ভাবে রাষ্ট্র ক্ষমতায় সমাসীন। ভাগুয়া বাহিনীর এমন ধারনাটাই স্বাভাবিক যে রামরাজ্য প্রতিষ্ঠা করার আর কোন বাঁধা নেই। সুতরাং সাধ্বী নিরঞ্জন জ্যোতির এই রামধুন হঠাৎ মুখ ফসকে বেরিয়ে আসা অমৃতবর্ষণ না ও হতে পারে। হতে পারে এটি একটি পরিকল্পিত ভাষণ। তাই আমারা শঙ্কিত। এ সংকট মোচনের দায়িত্ব কিন্তু দেশের প্রধান সেবক নরেন্দ্র দামোদর মোদির। তাকেই নিতে হবে উপযুক্ত ব্যবস্থা। আশ্বস্ত করতে হবে বাকি দেশভক্ত ভারতবাসীদের যারা রামজাদা না হলেও হারামজাদা নয়।
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    होश में आओ दोस्तों कि फिजां अब कयामत है।

    लाल किला भी बेदखल और विधर्मी धर्मस्थल के विध्वंस का महोत्सव दिल्ली में भी।

    क्योंकि हिंदू साम्राज्यवाद का पुनरूत्थान का समय है कारपोरेट मुक्तबाजार

    पलाश विश्वास

    कोलकाता में मौसम बेहद बदल गया है और नवंबर से ही सर्दी होने लगी है।


    हम लोग सालाना अतिवृष्टि अनावृष्टि बाढ़,सूखा,भूकंप,भूस्खलन की मानवरची आपदाओं के मध्य अपने अपने सीमेट के जंगल में रायल बेगंल टाइगर की तरह विलुप्तप्राय होते रहने की नियति के बावजूद मुक्तबाजारी कार्निवाल में मदहोश हैं।


    जो अमेरिका हम बन रहे हैं,वहां सर्वव्यापी बर्फ की  आंधी जाहिर है कि हमें आकुल व्याकुल नहीं कर सकतीं।जाहिर है।


    हम सुनामी, समुद्री तूफान और केदार जलप्रलयमें गायब मनुष्यों और जनपदों के बारे में उतने ही तटस्थ है जितने कि जल जंगल जमीन नागरिकता आजीविका नागरिक मानवाधिकारों  प्रकृति पर्यावरण से बेदखली के निरंतर अश्वमेध अभियान से।


    जैसे कि अविराम जारी स्त्री उत्पीड़न से।अविराम भ्रूण हत्याऔर आनर किलिंग से।


    जैसे कि सभ्यता के चरमोत्कर्ष का दावा करते हुए निरंतर जारी नस्लभेदी अस्पृश्यता के आचरण से और अपने चारों तरफ हो रहे अन्याय,अत्याचार और बलात्कार और नरसंहार से।शूतूरमुर्ग की तरङ बालू में सर गढ़ाये जिंदगी जीने के नाम मौत जी रहे हैं हम लोग।


    मौसम के मिजाज से हमें कोई नहीं लेना देना और हमें सुंदरवन की परवाह नहीं है कि उसे किसे किसे बेचा जा रहा है जैसे हमें गायब होती घाटियों,झीलों,नदियों और जलस्रोतों के गायब होते रहने,जनपदो के डूब में शामिल होते जाने,गांवों के सीमेंट के जंगल में तब्दील होते जाने और निरंतर तेज होती जलयुद्ध के साथ अभूतपूर्व भुखमरी और बेरोजगारी की तेज होती दस्तक की कोई परवाह नहीं है।


    अत्याधुनिक भोग आयोजन में निष्णात हमें निजीकरण,विनिवेश,विनिंत्रण,विनियमन या बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता के बहाने अपने ही संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों और अपनी निजी गोपनीयता और नागरिक संप्रभुता की भी परवाह नहीं है।


    लेकिन बदलते मौसम के बहाने हमें अपने नैनीताल में बिताय़ी जाडो़ं की छुट्टियां खूब याद आ रही हैं।


    हमें याद आ रही हैं युगमंच और नैनीताल समाचार के तमाम साथियों के साथ,गिरदा के साथ और मोहन के साथ तो कभी कभार पंकज बिष्ट.आनंद स्वरूप वर्मा, शमशेर सिंह बिष्ट, सुंदरलाल बहुगुणा,चंडी प्रसाद भट्ट,विपिन चाचा के साथ हिमपात मध्ये देखे बदलाव के ख्वाबों से लबालब वे सर्दियों की मुलामय सी धूप और वे अंतहीन बहसें।


    हमे याद आ रहे हैं फादर व्हाइटनस और फादर मस्कारेनस और नैनीताल भुवाली के गिरजाघरों के तमाम पादरियों की,जो हमारे सहपाठी थे डीएसबी में और नहीं भी थे।

    हम जाड़ों की छुट्टियों में क्रिसमस के दिन अमूमन चर्च में होते थे।


    सुबह नाश्ते में पावरोटी के साथ पोच या आमलेट तो रात में खाने के बाद फलाहार और काफी सेवन।


    भुवाली चर्च में क्रिसमस की उस रात की याद भी आती है जब रात के बारह बजे गुल कर दी गयी बत्ती के बाद जो पहली रोसनी आयी और मेरे चेहरे पर पड़ी तो मुझे जिंदगी में पहलीबार और अंतिमबार सार्वजनिक तौर पर गाने का प्रयास करना पड़ा और बेसुरे उस चीख से ही शुरु हुआ था बड़ा दिन।



    और आज सुबह ही खबर पढ़ने को मिली कि अबकी दफा बड़ादिन का त्योहार यानी क्रिसमस अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन होगा और पटेल के जन्मदिन के एकता परिषद बतौरमनायेजाने की तर्ज पर यह देशभऱ में राजकीय सुशासन दिवस होगा।


    जवाहर लाल  नेहरु और इंदिरा गांधी के सारे देश वासी भक्त नहीं हैंलेकिन भारतीय इतिहास उनकी भूमिका के बगैर अधूरा है।


    उनके जनम मरण को मिटाने पर तुला संघ परिवार अब अल्पसंख्यकों के पर्व त्योहारों का केशरियाकरण करने लगा है।


    पैसे के अभाव में लालबहादुर स्मारक बंद होने को है।


    मुझसे पूछिये तो हम इन स्मारकों के समर्थक नहीं है।


    तमाम बंगले जहां सिर्फ मृतात्माओं का वास है और तमाम जमीनें जहां महान लोगों की समाधियां हैं,वे खाली कराकर गरीब गुरबों को बांट दी जाये,हमारा लक्ष्य बल्कि यही है औऱ भूमि सुधार का असली एजंडा राजधानी से ही लागू होना चाहिए।


    हम पर्व त्योहारों की आस्था के आशिक भी नहीं हैं और न उन्हें मनाने की कोई रस्म निभाते हैं।हम तो जनसंहारी कालीपूजा और दुर्गोत्सव के बहाने नरमेध उत्सव के खिलाफ हैं।लेकिन संविधान में दिये मौलिक अधिकारों के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी है और धर्म और आस्था के मामले में जनता के हक हकूक का हम पुरजोर समर्थन करते हैं अपनी कोई आस्था न होने के बावजूद,बशर्ते की वह धर्म घृणा अभियान सत्ता विमर्श और सौंदर्यबोध में तब्दील होकर जनसंहारी मुक्ताबाजारी संस्कृति का हिस्सा न हो।


    जाहिर है कि हमें संघ परिवार के धर्म कर्म और संघियों की आस्था के अधिकार का भी पुरजोर समर्थन करते हैं लेकिन उतना ही समर्थन हमारा बाकी धर्मालंबियों, समुदाओं, नस्लों के हकहकूक के पक्ष में है।


    मेरे गांव बसंतीपुर भी आस्था के मामले में कट्टर हिंदू हैं,जैसे कि इस देश के हर जनपद के हर गांव के वाशिदे किसी न किसी धर्म के आस्थावान बाहैसियत होंगे।


    मैं अपना मतामत स्पष्ट तौर पर व्यक्त करता हूं और इन सामंती परंपराओं के अवशेष का विरोद भी करता हूं,लेकिन हम अपने देश वासियों के धार्मिक अधिकार के खिलाफ और अपने अपने गांव के पर्व त्योहारों के विरुद्ध तब तक खड़े नहीं हो सकते,तब तक ऐसे पर्व त्योहार अस्पृष्यता,नस्ली बेदभाव और मुक्ताबाजरी उत्सव में तब्दील न हो जाये।


    जिस भारत को विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर महामानव मिलन तीर्थ भारततीर्थ कहते रहे और मानते रहे कि यहां तमाम मतों, मतांतरों, धर्मों, नस्लों और उनकी बहुआयामी संस्कृतियों का विलय ही भारत राष्ट्र हैजो भारततीर्थ भी है,वहां चूंकि जन्मजात हम हिंदू है तो हम सिर्फ हिदुत्व के पर्व त्योहार मनायेंगे और अहिंदू त्योहारों को मटिया देंगे,इस अन्याय का प्रतिवाद किये बिना हमें राहत नहीं मिलेगी।


    और जनम पर तो  हमारा कोई दखल नहीं है तो कर्मफल सिद्धांत मानें तो हम तो परजन्म में ईसाई मुसलामान बौद्ध सिख दलित ब्राह्मण से लेकर गिद्ध कूककूर तक हो सकते हैंं,जन्म आधारित पहचान और आस्था के बहाने हम इंसानियत के खिलाफ खड़े हो जाये,यह किस किस्म का हिंदुत्व है,नहीं जानते ।


    दरअसल यही संघ परिवार के सनातन हिंदुत्व का एजंडा है जो दरअसल जायनी मुक्तबाजार का एजंडा भी है,जिसकी पूंजी धर्मोन्मादी राष्ट्रीयता है।


    दरअसल यह हिंदू साम्राज्यवाद का पुनरूत्थान है।


    यह एजंडा कामयाब हो गया तो मुक्तबाजार भारत तो बचा रहेगा,फलेगा फूलेगा,लेकिन भारतवर्ष की मृत्यु अनिवार्य है।


    इस हकीकत को भी बूझ लीजिये कि हिंदू साम्राज्यवाद के इस पुनरूत्थान का जिम्मेदार दरअसल संघ परिवार ही है.यह कहना गलत होगा।


    पंडित जवाहर लाल नेहरु खुद हिंदू साम्राज्यवादी थे और विस्तारवाद के पक्षधर थे तो एकाधिकारवादी नस्ली राजकाज के भी वे पुरोधा रहे हैं।


    उन्हीं के किये कराये की वजह से क्षेत्रीय अस्मिताओं के नस्ली रंगबेध के खिलाफ उठ खड़े होने की निरंतरता से भारतवर्ष अब खंड खंड एक राजनीतिक भूगोल है,कोई समन्वित राष्ट्रीयता नहीं है और उन्हीं की वजह से आज हिंदुत्व ही भारत की एकमात्र राष्ट्रीयता है।


    और अब परमाणु शक्तिधर भारत का राजकाज संभाल रहे संघ परिवार अगर परमाणु शस्त्रास्त्र प्रथम प्रयोग की कारपोरेट लाबिइंग में लगा है तो समझना होगा कि यह प्रयोग किसके खिलाफ होने जा रहा है और उसकी भोपाल गैस त्रासदी का जखम पीढ़ी दर पीढ़ी कौन लोग अश्वत्थामा बनकर वहन करते रहेंगे।


    दर असल लाल किला हिंदुत्व के नजरिये से विधर्मी विरासत है जैसे नई दिल्ली की तमाम मुगलिया इमारतें,जो परात्व और ऐतिहासिक धरोहरें भी हैं।


    अयोध्या काशी मथुरा के धर्मस्थलों के खिलाफ जिहाद रचने वाले और बाबरी विध्वंस बाबा साहेब डा.भीमराव अंबेडकर के परानिर्वाण दिलवस के दिन करके हिंदुत्व के मसीहा संप्रदाय नें एक मुश्त विधर्मी विरासत और इस देश के बहिस्कृत बहुजनों के हिस्सेदारी के दावे को एक मुश्त खारिज करने की जो अनूठी कामयाबी हासिल की है कि कोई अचरज नहीं कि इतिहास को वैदिकी सभ्यता बना देने वाले लोग इन पुरातात्विक और ऐतिहासिक विरासतों के हिंदुत्वकरण का कोई बड़ा अभियान छेड़ दें।


    हाल में कारपोरेट साहित्य उत्सव के मुख्य मेहमान बने नोबेलिया अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने जयपुर के मंच से ज्ञान विज्ञान विकास के लिए संस्कृत के अनिवार्य पाठ की वकालत की थी।


    संविधान की आठवीं सूची में भारतीय भाषाओं को मान्यता दी गयी है,लेकिन हिंदुत्व के राजकाज में उन भाषाओं,उनसे जुडी बोलियों और संस्कृतियों के सत्यानाश की कोी कसर बाकी नहीं रही कभी।


    अब संस्कृत अनिवार्य भाषा बनने वाली है तो नरेंद्रभाई मोदी के व्यक्तित्व कृतित्व का अनिवार्य पाठ शुरु हो गया समझो।


    इसी के साथ लालकिले के प्राचीर से हिंदुत्व के एजंडे का जयघोष का कार्यक्रम भी भागवत गीता उत्सव के तहत हो रहा है।


    हम बार बार कहते रहे हैं कि संविधान से ही राष्ट्र की रचना हुई है।


    हम बार बार कहते रहे हैं कि संविधान ही रक्षा कवच है।


    हम बार बार कहते रहे हैं कि अच्छा हो या बुरा,बिना राज्यतंत्र में बदलाव उसे बदलने की कोई भी कोशिश कारपोरेट मनुस्मृति  स्थाई बंदोबस्त में खुदकशी का फैसला होगा।


    हम बार बार कहते रहे हैं कि संविधान में दिये गये हक हकूक और संविधान के तहत मिले देश के लोकतंत्र के आधार पर ही,इसी जमीन पर हम इस कारपोरेट केसरिया कयामत का मुकाबला कर सकते हैं।

    दरअसल अस्मिताओं को तोड़कर जाति धर्म नस्ल भाषा क्षेत्र अस्मिता निरिविशेष मेदनतकश तबके की गोलबंदी बिलियनरों मिलियनरों की सताता जमात केखिलाफ जब तक नहीं होगी.हम कयामत के शिकंजा में कैद रहेंगे और वहीं दम तोड़ते रहेंगे।


    इसे यूं समझिये कि धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस समाते तमाम दलों उपदलों के समर्थन या तठस्थता के सहारे श्रम के सारे अधिकार छीन लिये गये और अब बीमा बिल भी कांग्रेस समेत समूचे धर्मनिरपेक्ष खेमे के समर्थन से पास होना है।


    ऐसे ही जनसंहारी तमाम कानून बन बिगड़ रहे हैं।ऐसा ही है नरमेध महोत्सव।


    विदेशी अबाध पूंजी और नवउदारवाद और पूना समझौते की अवैध संतानें अब अरबपति करोड़पति हैं और वे हमारे कुछ भी नहीं लगते।


    हमें क्यों मनुष्यता के विरुद्ध युद्ध अपराधियों को अपना प्रतिनिधि मानकर खुद को युद्ध अपराध की हिस्सेदारी लेनी चाहिए,दिलोदिमाग को एकात्म विपाश्यना में डालकर सोचें जरुर।


    जो मु्क्त बाजार में साँढ़ संस्कृति है और धर्म के बहाने जो पुरुषतंत्र है,उसमें समूची स्त्री देह एक अदद योनि के अलावा कुछ भी नहीं है और सारा अनुशासन उस योनि की पवित्रता के लिए है।वही दरअसल धर्म कर्म आस्था है।जो स्त्री देह का शिकार है।


    स्त्री के बाकी शरीर,उसके मन मस्तिष्क को लेकर पुरुषतंत्र की कोई चिंता नहीं है।यह निर्लज्ज वर्चस्ववाद है। योनि के अधिकार का गृहयुद्ध है ,युद्ध है और कुछ नहीं।


    धर्म और आस्था के बहाने इस उपमहादेश में धर्म जाति नस्ल निर्विशेष स्त्री शूद्र है और यौन क्रीतदासी भी।


    अवसर उसके लिए जो हैं,जो उच्चपद हैं,पुरुषतंत्र उसके एवज में उसपर अपना ठप्पा लगाता रहता है।


    ठप्पा लगाने से इंकार करने वाली स्त्रियां वेश्या बना दी जाती हैं,बलात्कार की शिकार होती है.,प्रताड़ना और उत्पीड़न के मध्य जीने को विविश कर दी जाती है और ज्यादा बागी हो गयीं तो मार दी जाती है।


    उसी स्त्री के विरुद्ध युद्ध और मनुस्मृति शासन अनुशासन ही संघ परिवार का एजंडा है।


    गौहर खान के गाल पर तमाचा हो या बापुओं का बलात्कार या धार्मिक फतवा या आनर किलिंग या आइटम कन्याओं को वेश्या कहना,या प्रेम प्रदर्शन के खिलाफ नैतिकता पुलिस बाजार के व्याकरण के मुताबिक है।


    क्योंकि बाजार में स्त्री का स्टेटस चाहे कुछ भी हो वह एक उपभोक्ता सामग्री है और पुरुषतांत्रिक धर्मराज्य के मुक्तबाजार में उसकी योनि का नीलाम होना अनिवार्य है।


    यही संघ परिवार का एजंडा है और हिंदू साम्राज्यवाद का पुनरूत्थान भी।


    ध्यान दें कि संघ परिवार अब महज ब्राह्मणवाद का वर्चस्व नहीं है।


    सिर्फ ब्राह्मणवाद के बहाने ब्राह्मणों के खिलाफ युद्धघोषणा की जुबानी जमाखर्च से पुरुषातात्रिक यह मुक्तबाजारी मनुस्मृति व्यवस्ता का राज्यतंत्र बदलेगा नहीं।


    इंडियन एक्सप्रेस में हाल में छपे सर्वे के मुताबिक दलितों के विरुद्ध अस्पृश्यता का आचरण करने वालों में ब्राह्ममों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है तो उसके तुरंत बाद ओबीसी हैं। आदिवासी और विधर्मी लोग भी हिंदुत्व के शिकंजे में हैं और वे भी दलितों के खिलाफ छुआछूत मानते हैं।और तो और दलित जातियां भी एक दूसरे के खिलाफ छुआछूत का बर्ताव करती हैं।


    कांशीराम और मायावती के आंदोलनों की आंशिक सफलता के बावजूद हकीकत यह है कि जिस बहुजन समाज की परिकल्पना के तहत वे भारत में समता और सामाजिक न्याय के आधार पर नया समाज और राष्ट्र बनाना चाहते हैं,सामाजिक यथार्थ उसके उलट हैं।जिसे हम देखते हुए देखने से इंकार कर रहे हैं।


    मसलन संसद में जिस साध्वी के रामजादा बयान पर बवाल है ,वे खुदै दलित हैं और मनुस्मृति केअनुशासन मुताबिक जो शब्द वे दूसरों के लिए इस्तेमाल कर रही है,उसी शब्द से उनकी अस्मिता है।


    घृणा अभियान चाहे संघ परिवार का हो या चाहे उनके विरोधियों का,इससे राजनीति भले सधती हो,धर्मोन्मादी धर्वीकरण मार्फत कारपोरेट और सत्ता हित जरुर सधते हों,देश लेकन पल छिन पल छिन टूटता है।जो अब पल छिन टूट रहा है।माफ करना दोस्तों कि अब हमारा कोई देश नहीं है और हम किसी मृत भूगोल के अंध वाशिंदे हैं।


    दलितों के सारे राम अब हिंदुत्व के हनुमान हैं और सारे शूद्र संघपरिवार के क्षत्रप हैं जिनमें प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक केसरिया कारपोरेट क्षत्रप हैं और उन्हें सत्ता का जायका ऐसा भाया है कि वे बाकी बिरादरी और बाकी समुदायों और नस्लों को निर्मम तरीके से साफ करने में दिन रात एक किये हुए हैं।


    शूद्र यानी ओबीसी कमसकम 42 प्रतिशत है।


    दलितों का ब्राह्मणवाद विरोधी बंगाल के किसान आंदोलन की बहुजनसमाजी मतुआ आंदोलन अब केसरिया है।


    और बाबासाहेब की पार्टी रिपब्लिकन पार्टी की भीमशक्ति अब शिवशक्ति में समाहित है तो मायावती का सोशल इंजीनियरिंग फेल है।


    जाहिर है कि अस्मिता आधारित सत्ता की भागेदारी हमारी वंचनाओं,हमारी बेदखली के प्रतिरोध की कोई जमीन तैयार नहीं कर ही है।


    किसी पहचान के जरिये चाहे वह धार्मिक हो या जातिगत या नस्ली या भाषाई या क्षेत्रीय,सत्ता में भागेदारी तो संघ परिवार खुद दे देगा,लेकिन कयामत के इस मंजर के बदलने के आसार नहीं है।


    हम बंगाल में पिछले तेइस साल से रह रहे हैंऔर इसके अभ्यस्त हैं कि नवंबर से ही सिर्फ ईसाई ही नहीं,सारा बंगाल क्रिसमस के बड़े दिन का कैसे इंतजार करता है।


    अभी से केक की आवक होने लग गयी है और तमाम दुकानें सजने लगी है।बंगाल के केशरियाकरण के बाद यह नजारा सामने आयेगा या नहीं,हमें नहीं मालूम।


    यही नहीं,एनआईए वर्धमान में बम धमारके के मद्देनजर अब मदरसा आईन की भी पड़ताल करेगा।हमें नहीं मालूम कि संसद और सुप्रीम कोर्ट के अलावा किसी और संस्थान को देश के संविधान और कायदा कानून और खासतौर पर अल्पसंख्यकों के निजी कानूनो में ताक झांक की कितनी इजाजत है।


    ये खबरें तब आ रही है जबकि राजधानी नई दिल्ली में प्रधानमंत्री के पूर्व और पूर्वोत्तर के अनार्यभारत को जीतने के अश्वमेधी अभियान और नेपाल में राजतंत्र की वापसी के संघी अंतरराष्ट्रीय एजंडा के बीच नस्ली भेदभाव के तहत पूर्वोत्तर के वाशिंदों पर हमले जारी हैं।जो थमने केआसार भी नहीं हैं।


    और वहां बाकी हिमालय यानी कश्मीर, हिमाचल, गोरखालैंड ,उत्तराखंड के लोग भी हिंदुत्व की सुगंधित पहचान के बाद अव्वल दर्जे के हिंदू के बजाय बंधुआ मजदूर माने जाते हैं।फांकसी का फंदा उन्ही के गले के माफिक है।


    दोयम दर्जे के या तीसरे दर्जे के नागरिक भी नहीं है वे,सवर्ण होंगे  तो होंगे।


    इन्हीं खबरों के मध्य अब ओड़ीशा के आदिवासी बहुल आरण्यक अंचल में नही,राजधानी के दिन दूना रातचौगुणा तेजी से विकसित सीमेंट के जंगल और उसके मध्य मेट्रो नेटवर्क और तमाम राष्ट्रनेताओं और इतिहासपुरुषों के समाधिस्थलों के मध्य विधर्मी धर्मस्थलों के विध्वंस का महोत्सव शुरु हो चुका है।


    और फिलहाल एक चर्च ही जलाया गया है।


    अब बाकी विध्रमी धर्मस्थलों की बारी।


    होश में आओ दोस्तों कि फिजां अब कयामत है।



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    ভারতের ভেতরে যুদ্ধ

    03 Dec, 2014

    আঞ্চলিক পরাশক্তি থেকে ভারত যখন বিশ্ব শক্তি হওয়ার নিরন্তর চেষ্টায় রত তখন রাষ্ট্রের চোখে দেশটির এক নম্বর শত্রু এখন দেশটির কিছু জনগন। এই শত্রু পাকিস্তান বা চীনের মতো বাইরের কোনো দেশ নয়, দেশের ভেতরেই রয়েছে এই শত্রু। বিশ্বের বৃহত্তম 'গণতান্ত্রিক রাষ্ট্র'নিজের দেশের মানুষের বিরুদ্ধে নিজের ভৌগোলিক সীমার মধ্যে যুদ্ধে লিপ্ত। ভারতের মধ্যাঞ্চল তথা ঝাড়খণ্ড, ছত্তিশগড়, অন্ধ্রপ্রদেশ, উড়িষ্যা, বিহার আর পশ্চিমবঙ্গের বিস্তীর্ণ এলাকাজুড়ে চলছে এই যুদ্ধ।

    অবশ্য ভারতের রাষ্ট্রযন্ত্র উত্তর-পূর্ব ভারত আর কাশ্মীরে একইভাবে যুদ্ধ করছে অনেক আগে থেকেই । কিন্তু মধ্য ভারতের এই যুদ্ধের রূপ স¤পূর্ণ ভিন্ন। কাশ্মীর বা উত্তর-পূর্ব ভারতের যুদ্ধ স্বাধীনতার যুদ্ধ হলেও এ অঞ্চলের গেরিলা যোদ্ধারা চান ভারতের বর্তমান রাষ্ট্র ব্যবস্থাটি বদলাতে। কারণ এই রাষ্ট্র তাদের নিজ ভূমে পরবাসী করে ফেলেছে। অরণ্যাঞ্চলে করপোরেট বাণিজ্যর নামে লাখ লাখ মানুষকে বাস্তুচ্যুত করে দীর্ঘস্থায়ী বঞ্চনা আর নিপীড়নের মাধ্যমে ঠেলে দেয়া হয়েছে। এই অঞ্চলে রয়েছে মূল্যবান খনিজ বক্সাইট, লৌহ আকরিক, টিন, গ্রানাইট, মার্বেল তামা, সিলিকা, ইউরেনিয়াম ও লাইমস্টোনসহ নানা ধরনের খনিজ সম্পদ। ভারত সরকার এখন অরণ্য রক্ষার বাহানায় এ অঞ্চলের হাজার বছরের বাসিন্দা ভূমিপুত্রদের উৎখাত করে কিংবা পাহাড়ে প্রবেশ নিষিদ্ধ করে বহুজাতিক কোম্পানির মাধ্যমে এসব খনিজ সম্পদ উত্তোলন করছে। আদিবাসী এ মানুষ দেখছে তাদের জীবন-জীবিকা অর্জনের অবলম্বন পাহাড় আর বন উজাড় হয়ে যাচ্ছে। তাদের জীবন-জীবিকার পথ হয়ে যাচ্ছে রুদ্ধ। মাথা গোঁজার ঠাঁই পর্যন্ত হারিয়ে ফেলছেন।



    জঙ্গলে মাওবাদীদের ক্যাম্প

    তাদের সামনে সশস্ত্র সংগ্রাম ছাড়া বিকল্প কোনো পথ খোলা নেই। বঞ্চিত মানুষের এই সংগ্রাম মাওবাদী আন্দোলন নামে পরিচিত। ভারতের প্রখ্যাত লেখিকা অরুন্ধতি রায়ের মতে এই মাওবাদীরা হচ্ছে প্রকৃতপক্ষে সশস্ত্র গান্ধীবাদী। কারণ তাদের সংগ্রাম যেমন জীবন-জীবিকা রক্ষার সংগ্রাম, তেমনি বন পরিবেশ প্রকৃতি রক্ষারও সংগ্রাম। পশ্চিমবঙ্গের লালগড় থেকে শুরু করে ঝাড়খণ্ড উড়িষ্যা ছত্তিশগড় অন্ধ্রপ্রদেশ ও মহারাষ্ট্রের বিশাল অরণ্যাঞ্চলের যারা ভূমিপুত্র তারা সবাই এখন মাওবাদী। ভারতের সাবেক স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী পি চিদাম্বরের দেয়া তথ্য মতে দেশের প্রায় ২০টি প্রদেশে মাওবাদীদের ব্যাপক প্রভাব রয়েছে । ভারতের ২২৩ জেলায় দুই হাজারের বেশি থানা ব্যাপক কিংবা আংশিকভাবে মাওবাদী হামলায় ক্ষতিগ্রস্ত হয়েছে। এরাই এখন তার এবং প্রধানমন্ত্রী মনমোহন সিংয়ের চোখে ভারতের এক নম্বর নিরাপত্তা হুমকি।

    সম্প্রতি ছত্রিশগড়ের সুকমায় মাওবাদীদের হামলায় সেন্ট্রাল রিজার্ভ পুলিশ ফোর্স (সি আর পি এফ) এর ১৩ জন সদস্য নিহত হয়। এরমধ্যে ২ জন ছিলো উর্ধ্বতন কর্মকর্তা। এ এলাকায় ২০১৩ সালের মে মাসে কংগ্রেস নেতা ও দলীয় কর্মীদের ওপর মাওবাদী হামলায় মারা যায় ২৭ জন। গত দুই মাস ধরে ভারতের নিরাপত্তা বাহিনীর সদস্যরা মাওবাদীদের বিরুদ্ধে অভিযান চালাচ্ছিলো। এর আগে কংগ্রেস শাসনামলে স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী ছত্তিশগড়ে মাওবাদীদের হামলায় ভারতের আধা সামরিক বাহিনী সিআরপিএফ'র ৭৬ জন সদস্য নিহত হয়।

    মাওবাদীদের নিয়ন্ত্রণ আছে এমন এলাকাগুলোতে ভারতের প্রায় ৭৫ হাজার নিরাপত্তা বাহিনী মোতায়েন আছে। যার মধ্যে কেন্দ্রীয়ভাবে বিশেষ প্রশিক্ষিত ১৫ হাজার সদস্য রয়েছে। এ অবস্থায় মাওবাদীদের সশস্ত্র সংগ্রামের শক্তি বেড়ে চলার কারণে দিল্লিকেন্দ্রিক ভারতের কোনো কোনো মহল থেকে দাবি তোলা হয় যে মাওবাদীদের বিরুদ্ধে সর্বাত্মক বিমান হামলা চালানো হোক। যদিও ভারতের বিমান বাহিনী প্রধান বলেছেন এখনো সে রকম পরিস্থিতি তৈরি হয়নি। ভারতের বিমান বাহিনী ১৯৬৬ সালে মিজো জনগোষ্ঠীর স্বাধীনতা আন্দোলন দমনের জন্য বিমান হামলা চালিয়েছিল। এসব আলোচনা থেকে বোঝা যায়, ভারতের শাসক শ্রেণীর মধ্যে মাওবাদীদের লড়াই-সংগ্রাম নিয়ে স্নায়ুবিক চাপ বাড়ছে। অপর দিকে ভারতের নিরাপত্তা বাহিনী এই লড়াই দমনের জন্য অস্ত্রসজ্জার কাজটি পুরোমাত্রায় চালিয়ে যাচ্ছে।



    টহলরত সিআরপিএফ জওয়ান

    ইসরাইল থেকে আনা হয়েছে লেজার রেঞ্জ ফাইন্ডার, থারমাল ইমেজিং ইকুইপমেন্ট এবং চালকবিহীন ড্রোন বিমান। সম্প্রতি পাহাড়ি এলাকা, জঙ্গল আর মরুভূমিতে ব্যবহারের জন্য ৫০ হাজার রাউন্ড গুলি চালাতে সক্ষম হেভি মেশিনগান কেনার চাহিদাপত্র দেয়া হয়েছে। বিদ্রোহ দমনের কাজে এই হেভি মেশিনগান ব্যবহৃত হবে (জেন্স ডিফেন্স উইকলি ৩১ মার্চ ২০১০ )। শুধু তাই নয়, ইসরাইলি গোয়েন্দা সংস্থা মোসাদ ৩০ জন উচ্চপদস্থ ভারতীয় পুলিশ কর্মকর্তাকে গুপ্ত হত্যা চালানোর প্রশিক্ষণ দিচ্ছে। যাদের উদ্দেশ্য হচ্ছে নেতৃস্থানীয় মাওবাদী নেতাদের হত্যা করে তাদের নেতৃত্বশূন্য করা। ছত্তিশ গড়ে মাওবাদী ও তাদের সমর্থক আদিবাসী জনগোষ্ঠীর ওপর নিপীড়ন চালানোর জন্য সরকারি পৃষ্ঠপোষকতায় একটি মিলিশিয়া বাহিনী গঠন করা হয়। সালওয়া জুদুম নামের এই আদিবাসীদের গ্রামের পর গ্রাম থেকে উচ্ছেদ করেছে। অনেককে ধরে এনে শিবিরে আটকে রাখা হয়েছে। শুধু ছত্তিশগড়ে এ ধরনের মানুষের সংখ্যা তিন লাখের বেশি। কিন্তু এভাবে নিপীড়ন চালিয়ে আন্দোলন দমন করা যায়নি বরং বেড়েছে। শুধু ছত্তিশ গড়ে ২০০৯ সালে মাওবাদীদের সাথে ভারতের নিরাপত্তা বাহিনীর ৪২২টি সংঘর্ষের ঘটনা ঘটে। এতে মারা যায় ৩৪৫ জন। এর মধ্যে পুলিশ ছিল ১২১ জন মাওবাদী ১৩৭ জন এবং সাধারণ গ্রামবাসী ৮৭ জন। (আনন্দ বাজার পত্রিকা ০৭ এপ্রিল ২০১০)।

    ভারতীয় নিরাপত্তা বাহিনীর ধারণা প্রায় ২০ হাজার মাওবাদী গেরিলা এখন নানা অঞ্চলে যুদ্ধে লিপ্ত রয়েছে। ভারতীয় শাসক শ্রেণীভুক্ত নিরাপত্তা বিশ্লেষকরা শঙ্কিত এ কারণে যে, জম্মু কাশ্মীরে তিন হাজার সশস্ত্র যোদ্ধাকে মোকাবেলা করতে বিপুল পরিমাণ সৈন্য মোতায়েন করতে হয়েছে। এখন ২০ হাজার গেরিলা মোকাবেলা করা তাদের জন্য আরো বড় ধরনের সঙ্কট তৈরি করেছে। ২০০৪ সালে কমিউনিস্ট পার্টি ইন্ডিয়ার (মাওবাদী) সাথে একত্রিত হয় পিপলস ওয়ার গ্রুপ (পিডব্লিউজি) এবং মাওবাদী কমিউনিস্ট সেন্টার। এরপর থেকে তাদের আন্দোলন বেগবান হতে থাকে। সশস্ত্র হামলার তীব্র রূপের কারণে বিভিন্ন নিরাপত্তা বাহিনীর সমন্বয়ে যৌথ বাহিনী গঠন করা হয়েছে। একের পর এনকাউন্টারের নামে বিচার বহির্ভূতভাবে অসংখ্য মাওবাদী আন্দোলনকারীকে হত্যা করা হয়েছে। এর মধ্যে অনেক নিরীহ দরিদ্র যুবক যেমন আছে, তেমনি আদিবাসী যুবকরাও আছে। এর ফলে আন্দোলন দমন তো হয়নি বরং মাওবাদীদের জনভিত্তি আরো শক্তিশালী হয়েছে।

    সম্প্রতি ভারতের প্রখ্যাত লেখিকা ও মানবাধিকার কর্মী অরুন্ধতি রায় মাওবাদীদের সাথে কয়েক দিন কাটিয়ে 'ওয়ার্কিং উইথ দ্য কমরেডস'শিরোনামে একটি প্রবন্ধ লিখেছেন। এ প্রবন্ধে আদিবাসী জনগোষ্ঠীর ওপর নির্যাতন নিপীড়নের যেমন চিত্র এসেছে তেমনি মাওবাদীদের যুদ্ধপ্রস্তুতি ও সামরিক প্রশিক্ষণের নানা বিবরণ এসেছে। অরুন্ধতি রায় প্রবন্ধের শুরুতে এক বর্ণনায় লিখেছেন In Dantewada, the police wear plain clothes and the rebels wear uniforms. The jail superintendent is in jail. The prisoners are free (three hundred of them escaped from the old town jail two years ago). Women who have been raped are in police custody. The rapists give speeches in the bazaar (http://www.outlookindia.com/article.aspx?264738)

    আমরা দেখছি ভারতের বিভিন্ন রাজ্যে জনস্বার্থ সংশ্লিষ্ট আন্দোলনে মাওবাদীরা সরাসরি ভূমিকা রাখছে। পশ্চিমবঙ্গের সিঙ্গুর নন্দিগ্রাম আর পূর্বমেদেনীপুরে স্থানীয় জনসাধারণের ভূমি রক্ষার যে আন্দোলন তাতেও মাওবাদীরাই মুখ্য ভূমিকা পালন করেছে। মাওবাদীরা তাদের নিয়ন্ত্রিত এলাকায় কার্যত বিকল্প শাসন পদ্ধতি চালু রাখার চেষ্টা করেছে। মাওবাদী নেতা কাটেশ্বর রাও কিষেনজি সে সময় ফ্রন্টলাইন পত্রিকার সাথে এক সাক্ষাৎকারে বলেছেন তাদের লক্ষ্য মাওবাদীদের নিয়ন্ত্রিত একটি স্বাধীন এলাকা গঠন করা। যেখানে তারা বিকল্প শাসনব্যবস্থা কায়েম করবে। (ফ্রন্টলাইন ৬ নভেম্বর ২০০৯) ।



    মাওবাদী সন্দেহে আটক কিশোর

    মাওবাদীদের দমনে ভারতের নানামুখী পরিকল্পনার মধ্যে নিরাপত্তা বাহিনীর ওপর হামলার যে কৌশল গেরিলারা দেখিয়েছে তাতে ধারণা করা হচ্ছে মাওবাদীরা যথেষ্ট প্রশিক্ষিত। ভারতের নিরাপত্তা বাহিনীকে ফাঁদে ফেলে তাদের বলয়ের মধ্যে এনেছে। উদ্ধার করতে আসা নিরাপত্তা বাহিনীর সদস্যরাও নিহত হয়েছে। হামলার ধরন প্রমাণ করে এটা ছোটখাটো গেরিলাযুদ্ধ নয় বরং তা ছিল পরিকল্পিত যুদ্ধ কৌশলের অংশ। মাওবাদীদের হামলায় শুধু ভারতের আধা সামরিক বাহিনী সিআরপিএফ'র ৭৬ সদস্য মারা যায়নি, বিপুল পরিমাণ অস্ত্রও মাওবাদীদের হাতে চলে গেছে। ৬ এপ্রিলের এ হামলায় ছয়টি লাইট মেশিনগান, উচ্চক্ষমতাসম্পন্ন বিস্ফোরকসহ অনেকগুলো মর্টার, ৭০টির বেশি একে ৪৭ রাইফেল, ভারতীয় কিছু রাইফেল, বেশ কিছু পিস্তল, গ্রেনেড ও গোলাবারুদ।

    অনেক ভারতীয় বিশ্লেষক দাবি করেন মাওবাদীরা নেপাল, ভুটান ও বাংলাদেশ থেকে অস্ত্র পাচ্ছে। ভারতের অভ্যন্তরীণ ব্যাপার নিয়ে প্রতিবেশী দেশগুলোকে দায়ী করার এই প্রবণতা ভারতের নতুন নয়। বাংলাদেশে-ভারতের একটি বন্ধু সরকার ক্ষমতাসীন থাকার পরও তারা বাংলাদেশকে দায়ী করেছে। তবে নেপালের মাওবাদী গেরিলাদের সাথে আদর্শিক কারণে তাদের যোগাযোগ থাকা অস্বাভাবিক নয়। ভারতীয় নিরাপত্তা বিশ্লেষকরা বলেছেন, ভারতের মাওবাদী গেরিলারা নেপালের গেরিলাদের মতো লাইট ইনফেন্ট্রি প্রশিক্ষণ নিচ্ছে। যদি মাওবাদী গেরিলাদের সাথে ভারতের গেরিলাদের সত্যিকার যোগাযোগ ঘটে থাকে তবে তা ভারতের শাসক শ্রেণীর জন্য বড় ধরনের দুঃসংবাদের কারণ হবে। নেপালের মাওবাদীরা ভারত সমর্থিত রাজার সেনাবাহিনীকে পরাজিত করে নেপালের রাজনীতিতে নিজেদের অনিবার্য হিসেবে দাঁড় করিয়েছে।

    নেপালের পাহাড় আর বনে এই গেরিলারা যুদ্ধ করেছে। এই অভিজ্ঞতা যদি ভারতের গেরিলারা পেয়ে থাকে তবে উত্তর-পূর্ব ভারতের চেয়েও এই যুদ্ধের রূপ হবে ভয়ঙ্কর। সন্দেহ নেই ভারত সরকার এখন সর্বাত্মকভাবে মাওবাদীদের বিরুদ্ধে অভিযান পরিচালনা করবে। কিন্তু এই সর্বাত্মক যুদ্ধের মাধ্যমে কী মাওবাদীদের পরাস্ত করা সম্ভব হবে? নিজ দেশের মানুষের সাথে এই যুদ্ধের ভবিষ্যতই বা কী? ভারতে বঞ্চিত মানুষের এই সংগ্রামের ইতিহাস অনেক পুরনো। ১৯৬৭ থেকে ৭৭ পর্যন্ত নকশাল বাড়ির আন্দোলন, পঞ্চাশের দশকে তেলেঙ্গানায় এবং ৮০র দশকে অন্ধ্র, বিহার আর মহারাষ্ট্রে এভাবে আন্দোলন গড়ে উঠেছে। ভারতের শাসক শ্রেণী কঠোরভাবে এসব আন্দোলন দমন করেছে। কিন্তু সেই আন্দোলন বারবার নতুন শক্তি নিয়ে গড়ে উঠেছে।



    মাওবাদী হামলায় নিহত কংগ্রেস নেতা

    মূলত ভারতে পুঁজি বিকাশের সাথে সাথে বিরাট একটি জনগোষ্ঠী নির্যাতিত, নিপীড়ত এবং মৌলিক অধিকার থেকে বঞ্চিত। মিডিয়ায় যে চাকচিক্যময় ভারতকে দেখছি এর ভেতরের চিত্রটি খুবই করুণ। আমরা শুধু কিছু তথ্য দেখে নেই ইউএনডিপি কর্তৃক প্রকাশিত দারিদ্র্য সূচকে ভারতের অবস্থান ১৮২টি দেশের মধ্যে ১৩৪তম। বিশ্বব্যাংকের প্রতিবেদন অনুযায়ী ভারতের ৪৫ কোটি মানুষ দৈনিক ১ দশমিক ২৫ ডলারের কম আয়ে জীবনযাপন করে। কর্মক্ষম জনগণের মধ্যে ১০ শতাংশ বেকার। এখনো খাদ্যের জন্য মানুষকে লাইনে দাঁড়াতে হয়। ভারত সরকার এখনো নিশ্চিত করতে পারেনি সবার জন্য স্বাস্থ্যসেবা। বর্তমান বাজেটে সরকার স্বাস্থ্য খাতে ব্যয় নির্ধারণ করেছে ২২ হাজার ৬৪১ কোটি রুপি, যা মোট জিডিপি'র মাত্র দশমিক ৪ শতাংশ। অথচ সামরিক খাতে ব্যয় করা হবে মোট জিডিপি'র আড়াই শতাংশ।

    বিশ্বস্বাস্থ্য সংস্থার রিপোর্ট অনুযায়ী ভারতে প্রতি বছর দূষিত পানি এবং বাতাসের কারণে মারা যায় প্রায় ৯ লাখ মানুষ। ১৯৯৯ থেকে ২০০৭ পর্যন্ত ঋণের টাকা শোধসহ এ জাতীয় কারণে ভারতে দুই লাখের বেশি কৃষক আত্মহত্যা করেছে। ২৪ লাখ মানুষ এইডসে আক্রান্ত। বিশ্বব্যাংকের পরিসংখ্যান অনুযায়ী তিন বছরের কম বয়সী ৪৬ শতাংশ শিশু পুষ্টিহীনতায় ভোগে। ভারতের প্রায় ৩৪ শতাংশ মানুষ নিরক্ষর। এর বিপরীতে ভারতের সমরপ্রস্তুতির দিকটি দেখা যাক। ভারতের অর্থমন্ত্রী প্রণব মুখার্জি ২৬ ফেব্রুয়ারি সে দেশের ২০১০-১১ অর্থবছরের বাজেট ঘোষণা করেছেন। বাজেটে গত অর্থবছরের চেয়ে সামরিক খাতে ব্যয় বৃদ্ধি করা হয়েছে প্রায় ৪ শতাংশ। বাজেটে সামরিক খাতে ব্যয় ধরা হয়েছে এক লাখ ৪৭ হাজার ৩৪৪ কোটি রুপি। আগামী বছরে সরকারের মোট ব্যয়ের ১৩ শতাংশ ব্যয় হবে সামরিক খাতে। গত অর্থবছরে এ ব্যয়ের পরিমাণ ছিল এক লাখ ৪১ হাজার ৭০৩ কোটি রুপি। এর আগের অর্থবছরে সামরিক ব্যয় বৃদ্ধি করেছিল ৩৪ শতাংশ। যা ছিল ভারতের ৬৪ বছরের ইতিহাসে নজিরবিহীন ঘটনা। গত এক দশকে ভারতে সামরিক ব্যয় ছিল ৪৫ হাজার ৬৯৪ কোটি রুপি। এক দশক পরে অর্থাৎ ২০০৯-১০ সালে এসে সেই ব্যয়ের পরিমাণ বেড়ে দাঁড়িয়েছে এক লাখ ৪১ হাজার ৭০৩ কোটি রুপি। ভারত সামরিক খাতে ব্যয় বৃদ্ধির যে পরিকল্পনা গ্রহণ করেছে তাতে ২০১৫ সাল পর্যন্ত প্রতি বছরে ৮ দশমিক ৩৩ শতাংশ হারে সামরিক ব্যয় বৃদ্ধি পাবে। আর এতে ২০১৪-১৫ অর্থবছরে সামরিক খাতে বরাদ্দ গিয়ে দাঁড়াবে এক লাখ ৯২ হাজার ৩৯ কোটি রুপি। অথচ ভারতে হতদরিদ্র মানুষের সংখ্যা বিশ্বে সর্বাধিক।



    ভারতীয় নিরাপত্তাবাহিনীর হাতে নিহত মাওবাদী গেরিলা

    সমাজের হতদরিদ্র মানুষের জন্য ভারতের অর্থমন্ত্রী এর চেয়ে ভালো কোনো সান্ত্বনামূলক বাক্য ব্যবহার করতে পারেনি। ভারতের সমাজজীবনে এই ভারসাম্যহীনতা, বঞ্চনা আর নিপীড়নের অন্য নাম মাওবাদী আন্দোলন। ভারতের সমরাস্ত্র পাকিস্তান বা চীনের বিরুদ্ধে ব্যবহারের আগে তা নিজ দেশের জনগোষ্ঠীর বিরুদ্ধে ব্যবহৃত হচ্ছে। ভারতের মধ্যাঞ্চলের সশস্ত্র সংগ্রামের আসল কারণটি লুকিয়ে আছে সমরসজ্জা আর নাগরিক সেবার এই ব্যবধানের মধ্যে। সর্বাত্মক অভিযানের মাধ্যমে তা যতই দমনের চেষ্টা করা হোক না কেন তা বারবার ফিরে আসবে। ভারতের ভেতরের এই যুদ্ধের পরিসমাপ্তি শিগগিরই ঘটবে না।

    http://www.bdmonitor.net/newsdetail/detail/200/101202


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    জামাতুল মুজাহিদিন নামে পোস্টার করার ঘটনায় হিন্দু যুবক আটক

    02 Dec, 2014

    অবশেষে রহস্য উন্মোচিত হল জামাতুল মুজাহিদিন'র নামে পোস্টার করার ঘটনার। পুলিশ এ ঘটনায় জড়িত থাকার অভিযোগে অমিয় সরকার নামে এক যুবককে গ্রেফতার করেছে। কোলকাতার একটি কলেজের বি কম প্রথম বর্ষের ছাত্র ধৃত অমিয়।

    গতকাল মবার তাকে গ্রেফতার করে কোলকাতার বিধাননগর কমিশনারেটের পুলিশ। অমিয়'র বিরুদ্ধে ভারতীয় দণ্ডবিধির ৫০৫ ধারায় মামলা দায়ের হয়েছে। আজ মঙ্গলবার অমিয় সরকারকে আদালতে তোলা হবে।

    পুলিশের স্পেশাল ব্রাঞ্চের অতিরিক্ত ডিসি শিবানী তেওয়ারি জানান, তদন্তে জানা যায় ১৯ বছর বয়সী ওই কলেজ ছাত্রের নাম। তবে এই ঘটনায় কোনো জঙ্গি যোগসূত্র পাওয়া যায়নি।

    গত ২৭ নভেম্বর (বৃহস্পতিবার) রাজারহাট থানা এলাকার বিষ্ণুপুরে একটি স্কুল সংলগ্ন দেওয়ালে হঠাৎ করেই জামাত-উল-মুজাহিদিনের নামে পোস্টার দেখতে পাওয়া যায়। তাতে ১৮ বছরের এক কিশোরীকে মানববোমা হিসাবে ব্যবহার করার হুমকি দেয়া হয়। দুটি মোবাইল নম্বরেরও ইঙ্গিত ছিল ওই পোস্টারে। এছাড়াও সাঙ্কেতিক ভাষা ব্যবহার করে একটি নাম ও ফোন নম্বর দেয়া ছিল ওই পোস্টারে।

    হাতে লেখা ওই পোস্টারে বলা হয়েছিল, তোমরা আমাদের আর আটকাতে পারবে না। আমরা পশ্চিমবঙ্গের সব জায়গাতে ছড়িয়ে আছি। ১৮-১৯ বছরের ছেলে মেয়েদেরকেই ব্যবহার করব। প্রথম বিস্ফোরণ করব শিয়ালদহ স্টেশনের কাছে। নজর রাখছি ১৮ বছরের একটি মেয়ের ওপর। যেকোনো সময় ধরে মানব বোমায় পরিণত করব। মেয়েটির ব্যাপারে সব জানি। এরপরেই সাঙ্কেতিক কয়েকটি নম্বর দেয়া হয় ওই পোস্টারে। এ নিয়ে ব্যাপক চাঞ্চল্যের সৃষ্টি হয়।

    এই ঘটনার তদন্তে নেমে পুলিশ এখন বলছে, ফেসবুকের বান্ধবীকে 'শিক্ষা'দেয়ার জন্য জেহাদি পোস্টার লাগিয়েছিলেন ওই যুবক। এই ঘটনায় জঙ্গি সংগঠনের কোনো হাত নেই বলে স্পষ্ট জানিয়েছে পুলিশ।'অনির্বাণ সেন'নামে ফেসবুকের একজনের সঙ্গে আলাপ হয় অমিয়'র। প্রোফাইলের নাম পুরুষের হলেও ব্যবহারকারী আসলে ছিলেন একজন তরুণী। কিন্তু হঠাৎ করেই 'ডিসেবেলড'হয়ে যায় প্রোফাইলটি। চ্যাটে পাওয়া ফোন নম্বরটিও কাজ করেনি। এ কারণে মানসিক আঘাত পেয়েই নাকি 'বান্ধবী'র ওপর প্রতিশোধ নিতে তার নম্বর দিয়ে পোস্টার সাঁটিয়ে দেয় ধৃত অমিয় সরকার। তাকে জেরা করে এমনটাই জানতে পেরেছে পুলিশ।

    http://www.kalerkantho.com/online/world/2014/12/02/157998

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    अब 'सिक्किमीकरणनहीं बल्कि 'मोदीकरण'

    आनंद स्वरूप वर्मा

    भारत के पड़ोसी देशों में प्रायः भारत को लेकर एक आशंका बनी रहती है। 1975 मंे सिक्किम के भारत में विलय के साथ इस उपमहाद्वीप के राजनीतिक शब्दकोष में एक नया शब्द जुड़ा-'सिक्किमीकरण'। नेपाल इस घटना से सबसे ज्यादा बेचैन हुआ और उसने अपनी विदेश नीति को इस तरह संयोजित करना शुरू किया ताकि अपने उत्तरी पड़ोसी चीन को भी वह कुछ तरजीह दे सके। यद्यपि दक्षिणी पड़ोसी भारत के साथ उसके सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध आर्थिक संबंधों की तुलना में ज्यादा गहरे और पुराने थे लेकिन सिक्किमीकरण की घटना ने उसे उत्तर की ओर देखने के लिए मजबूर किया।21वीं सदी के इस कालखंड में-खासतौर पर नेपाल के संदर्भ में-एक नया शब्द जन्म ले रहा है और वह है 'मोदीकरण'

    अब भारत को कुछ भी ऐसा करने की जरूरत नहीं है जिससे यह आरोप लगाया जा सके कि उसने विस्तारवाद का परिचय देते हुए पड़ोस के अमुक इलाके को या अमुक देश को अपने अधीन कर लिया। अब उसे सिक्किम की तरह रातांेरात अपनी सेना और अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को भेजकर किसी चोग्याल को कैद करने की जरूरत नहीं है। अब उसे कोई एक लेन्दुप दोरजी नहीं चाहिए जो उसकी ओर से अपने देश की राजनीति को संचालित करे। अब वह लेन्दुप दोरजियों की एक जमात अलग-अलग पार्टियों के नेताओं और जनता के विभिन्न तबकों में ही पैदा करने की हैसियत पा चुका है। अब ताकत की जरूरत नहीं बल्कि कभी नसीहत देकर तो कभी हिदायत देते हुएकभी मुस्करा कर तो कभी नजर तिरछी करते हुए वह अपना काम संपन्न कर सकता है जिसके लिए उसे अब तक हथियारों और सैनिकों की जरूरत होती थी। यह है आज के युग का सिक्किमीकरण। यह है नए अवतार का 'सिक्किमीकरणजिसे आप सुविधा के लिए 'मोदीकरणकह सकते हैं।

    प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस वर्ष अगस्त में नेपाल की पहली यात्रा की और खुद नेपाल के कुछ राजनेताओं के अनुसार उन्होंने 'नेपाल की जनता का दिल जीत लिया'। नेपाली संसद में शानदार भाषणपशुपतिनाथ के मंदिर में पूजा अर्चना और नेपाल को बड़े-बड़े तोहफों की सौगात के जरिए उन्होंने नवंबर में नेपाल की धरती को अपने कदमों से पुनः कृतार्थ करने का वायदा भी कर दिया। यह तो इत्तफाक है कि नवंबर में ही सार्क देशों का शिखर सम्मेलन तय था। अगर यह तय नहीं होता तो भी यह यात्रा होनी ही थी। इस यात्रा में बहुत सारे अधूरे काम पूरे होने थे जो बकौल मोदी जी 'पिछले 20-30 वर्षों से रुके पड़े थे।'अपनी इस यात्रा में एक विनम्र दर्प के साथ मोदी ने घोषणा की कि पिछली यात्रा में उन्होंने जो वायदे किए थे उसे 'महज 100 दिनों मेंपूरे कर दिए। सचमुच वे वायदे पूरे हो गए। अपर कर्णाली जल विद्युत परियोजना पर समझौता संपन्न हो गयाअरुण-3 जल विद्युत परियोजना पर समझौते का एक चरण संपन्न हो गयादोनों देशों के बीच बस सेवा शुरू कर उन्होंने 'कनेक्टिविटीके अपने वायदे का एक अंश पूरा कर दियाएक अस्पताल और ट्रामा सेंटर का निर्माण हो गया वगैरह-वगैरह।

    जो नहीं हो सका उसके लिए मोदी जी को क्यों दोष दिया जाय! नेपालियों की मति मारी गयी थी कि उन्होंने जनकपुरलुंबिनी और मुक्तिनाथ की यात्रा में विघ्न पहुंचा दी। इस'पापका फल उन्हें भुगतना पड़ सकता है। तराई के लोग कितनी हसरत पाले हुए थे कि मोदी जी जब सड़क मार्ग से जनकपुर में प्रवेश करेंगे और जानकी धाम मंदिर में राम-सीता विवाह के अवसर पर वहां उपस्थित होंगे तो दोनों देशों की मैत्री में चार-चांद लग जाएंगे। कॉरपोरेट घरानों के पैसों पर पल रहे भारत के कई टीवी चैनलों ने बड़े उत्साह के साथ अपनी कैमरा टीमों को तैयार रखा था ताकि वे देश-विदेश की जनता को आंखों-देखा विवरण प्रस्तुत कर सकें। जी-न्यूज ने तो 'मोदी चले राम के ससुरालशीर्षक से एक पूरा कार्यक्रम भी 13 नवंबर को प्रसारित किया था। जनकपुर के मंदिर परिसर में एक सार्वजनिक सभा की तैयारी भी पूरी हो गयी थी लेकिन सरकार के एक मंत्री के अनुसार माओवादियों और उनके बहकावे में आए कुछ मधेसियों ने सारी योजना पर पानी फेर दिया। नेकपा (एमाले) के कुछ नेताओं ने भी इस बात पर एतराज प्रकट किया कि किसी दूसरे देश का प्रधानमंत्री कैसे यहां आकर सार्वजनिक सभा कर सकता है। उनका कहना था कि क्या सार्क सम्मेलन में आने वाले अन्य नेता मसलन पाकिस्तानश्रीलंका या भूटान के नेताओं को इस बात की छूट मिल सकती है कि वे नेपाल में जनसभाएं करेंएक कुशल राजनीतिज्ञ और गुजरात जैसे प्रांत में डेढ़ दशक तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के नाते नरेन्द्र मोदी को यह तो पता ही होगा कि इस तरह के आयोजनों की इजाजत प्रोटोकोल नहीं देता। बावजूद इसके अगर उन्होंने यह कार्यक्रम बनाया था तो जानना दिलचस्प होगा कि इसके पीछे कौन सी मानसिकता काम कर रही होगी। क्या वह नेपाल को कोई अलग राष्ट्र नहीं मानतेक्या वह नेपाल को भारत का ही एक विस्तार मानते हैंक्या दोनों देशों के हिन्दू बहुल होने की वजह से संप्रभुता की लकीर मिट गयी थीअगर ऐसा है तो निश्चय ही यह एक बेहद खतरनाक बात है। तराई के कुछ प्रायोजित संगठन अगर यह कह रहे हैं कि मोदी के इस इलाके में आने से यहां की समस्याएं उनकी समझ में आतीं और समाधान होता तो इस कथन के पीछे उनका आशय क्या हैवे कौन लोग हैं जिन्होंने मोदी की यात्रा रद्द होने के खिलाफ प्रदर्शन का आयोजन कियाक्या वे राष्ट्रीय स्वयं संघ की शाखा 'हिंदू स्वयंसेवक संघ', 'सीमा जागरण मंचऔर 'हिन्दू जागरण मंचके लोग हैं जो मध्ेासी जनअधिकार फोरम अथवा इसी तरह के संगठनों में अपनी घुसपैठ बना चुके हैंविश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने पूर्वी नेपाल के विराटनगर शहर में अप्रैल2014 में हिन्दू कार्यकर्ताओं की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि 'अगर नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए तो नेपाल फिर से हिन्दू राष्ट्र बना दिया जाएगा।'अशोक सिंघल के अलावा इस संगठन के और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अन्य नेताओं ने भी समय-समय पर इसी तरह की बातें की थीं। इन दोनों संगठनों को अगर यह कहकर छूट दे दी जाय कि ये गैर राजनीतिक संगठन हैं तो भी अगर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसी तरह के उद्गार प्रकट किए हों तो उसे क्या कहा जाएगा। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व मार्च 2010 में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जब भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष और भारत के वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह काठमांडो गए थे तो उन्होंने कहा था कि 'हमें इस बात पर हमेशा गर्व होता रहा है कि नेपाल दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र है। अगर नेपाल फिर से हिन्दू राष्ट्र बन सके तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होगी।भाजपा के ही एक अन्य नेता विजय जौली और भगत सिंह कोश्यिारी ने भी नेपाल की धरती पर जाकर उसके हिन्दू राष्ट्र न रहने पर दुःख प्रकट किया था। लेकिन अब राजनाथ सिंह सहित अन्य नेता सत्ता की मजबूरियों को देखते हुए यह कहने लगे हैं कि केवल उनके चाहने से नहीं बल्कि नेपाली जनता के चाहने से ही नेपाल फिर हिन्दू राष्ट्र हो सकता है।

    तो बात अब नेपाली जनता के चाहने पर आकर थम गयी है। जरूरत है नेपाली जनता के अंदर वह 'चाहतपैदा कराने की। जरूरत है एक सहमति के निर्माण की। नोम चोम्स्की का कहना था कि मीडिया सहमति का निर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग कॉनसेंट) करता है। नरेन्द्र मोदी और उनकी जमात ने भारतीय मीडिया को काफी हद तक साध लिया है और वह इस काम को बखूबी अंजाम देने में लगा है। हर बात में भारत की नकल करने वाला नेपाली मीडिया फिर क्यों पीछे रहे-वह भी अपने भरसक इसे बखूबी निभाने की कोशिश कर रहा है।

    नरेन्द्र मोदी को पता है कि क्रमशः स्थितियां उनके अनुकूल होती जा रही हैं क्योंकि राजा समर्थक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी के नेता कमल थापा के अलावा नेपाली कांग्रेस और नेकपा (एमाले) के कई नेता भी अब खुलकर हिन्दू राष्ट्र की वकालत करने लगे हैं। मोदी की यात्रा से महज 20 दिन पहले 7 नवंबर को नेपाल में 'हिन्दू राष्ट्र की पुनर्स्थापना के लिए महाअभियानके नाम से जो सम्मेलन हुआ उसके कर्त्ताधर्त्ता किसी हिन्दूवादी संगठन के नेता नहीं बल्कि नेपाली कांग्रेस के नेता खुम बहादुर खड़का थे। इस अभियान की रिपोर्टिंग करते हुए 'हिन्दू एग्जिस्टेंस डॉट ओआरजीनामक वेबसाइट ने लिखा कि'भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बार-बार नेपाल यात्रा इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि नेपाल दुबारा हिन्दू राष्ट्र बनने जा रहा है।तराई के इलाकों में इन्हीं संगठनों के लोगांे ने बड़े-बड़े बैनर लेकर प्रदर्शन किया और यह संदेश देने की कोशिश की कि मोदी के आने से ही इस देश को बचाया जा सकता है। इंडियन एक्सप्रेस में 7 अप्रैल 2014 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार आरएसएस की नेपाली शाखा 'हिन्दू स्वयं सेवक संघ'तराई के क्षेत्रों में तकरीबन 7 हजार 'एकल विद्यालयखोलने की योजना पर काम कर रहा है ताकि हिन्दू राष्ट्र के खिलाफ की गयी साजिश को विफल किया जा सके। इसी रिपोर्ट में मोदी के चुनाव अभियान का जिक्र करते हुए कहा गया था कि किस तरह उन्होंने सोमनाथ (गुजरात)विश्वनाथ (वाराणसी) और पशुपतिनाथ (नेपाल) के बीच एकजुटता कायम कर सांस्कृतिक तौर पर हिन्दुओं को संगठित किया है। ऐसा करते हुए मोदी लगातार 'विकासकी बात करते रहे हैं और इनसे संबद्ध अन्य संगठन हिन्दू राष्ट्र की पुनर्स्थापना के अभियान को मजबूत करने में लगे हैं। इस रिपोर्ट में अशोक सिंघल के हवाले से कहा गया है कि नेपाल को आज एक मोदी की जरूरत है।

    जनकपुर की यात्रा के दौरान पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार नरेन्द्र मोदी छात्रों के बीच3000 साइकिलों का वितरण करने वाले थे। उनके इस कार्यक्रम की तीखी आलोचना करते हुए एनेकपा (माओवादी) के नेता गिरिराज मणि पोखरेल और नेकपा (एमाले) के उपाध्यक्ष युवराज ज्ञवाली ने टिप्पणी की कि क्या यह मोदी का कोई चुनाव क्षेत्र है जहां वह साइकिलें बांटने आ रहे हैंउन्होंने सवाल किया कि क्या किसी अन्य देश के प्रधानमंत्री को इस बात की इजाजत दी जा सकती हैइन मुद्दों पर इतना हो-हल्ला हुआ कि उन्हें यह सारा कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। वैसेमोदी समर्थकों का कहना है कि यह कार्यक्रम रद्द नहीं बल्कि 'स्थगितकिया गया है।

    कहने के लिए तो नरेन्द्र मोदी सार्क देशों के शिखर सम्मेलन में भाग लेने आए लेकिन उनका सारा ध्यान नेपाल की राजनीति को अपने अनुरूप ढालने में ही लगा रहा। उन्होंने विभिन्न दलों के नेताओं से अलग-अलग मुलाकात कर और सार्वजनिक तौर पर भी यही बात कही कि वे निर्धारित अवधि के अंदर अर्थात 22 जनवरी 2015 तक संविधान का निर्माण कर लंे वरना...। एक भारतीय टीवी चैनल ने इसे बड़े भाई की सलाह कहा तो एक ने 'सख्त हिदायतनाम दिया। भारत और नेपाल के अखबारों में जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई उसके अनुसार मोदी ने सचमुच इन नेताओं को हिदायत दी है और कहा है कि वह (मोदी) उम्मीद करते हैं कि प्रत्येक नेता 22 जनवरी को फोन करके उन्हें खबर देगा कि संविधान का निर्माण हो गया। इस दुःसाहस को क्या कहा जाए! क्या नरेन्द्र मोदी नेपाल को अपना कोई सूबा समझ रहे हैंक्या भविष्य का नेपाल उनकी कल्पना में एक ऐसा नेपाल है जो उनके डिक्टेट पर काम करेगाअगर ऐसा है तो मोदी ने एक खतरनाक खेल की शुरुआत कर दी है। इसकी परिणति इस उपमहाद्वीप की राजनीति को कहां तक ले जाएगी यह आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन एक बात तो तय है कि 'मोदीकरणके रूप में 'सिक्किमीकरणएक नए अवतार में जन्म ले रहा है।

    यह लेख किंचित संशोधन के साथ आज (दिसंबर 2014 ) के नेपाली दैनिक 'कान्तिपुरमें प्रकाशित  हुआ है.


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    ---------- Forwarded message ----------
    From: Hastakshep समाचार पोर्टल<news.hastakshep@gmail.com>
    Date: 2014-12-03 22:53 GMT+05:30
    Subject: (हस्तक्षेप.कॉम) अब 'सिक्किमीकरण'नहीं बल्कि 'मोदीकरण'
    To: hastakshep@googlegroups.com


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    হাসান ফেরদৌস, বিশেষ প্রতিনিধি, যুক্তরাষ্ট্র | আপডেট: ০৭:৫৮, ডিসেম্বর ০৪, ২০১৪ | প্রিন্ট সংস্করণ
    যুক্তরাষ্ট্রের সহকারী পররাষ্ট্রমন্ত্রী নিশা দেশাইকে নিয়ে বাংলাদেশের একজন জ্যেষ্ঠ মন্ত্রীর মন্তব্যে মার্কিন কূটনীতিকেরা বিস্ময় প্রকাশ করেছেন। তাঁদের আশঙ্কা, ওয়াশিংটনকে লক্ষ্য করে ঢাকা থেকে অকারণ এমন মন্তব্য চলতে থাকলে তা দুই দেশের সম্পর্কে অবনতি ঘটাবে।
    গত ২৭ নভেম্বর রাতে তিন দিনের সফরে ঢাকায় গিয়েছিলেন যুক্তরাষ্ট্রের দক্ষিণ ও মধ্য এশিয়াবিষয়ক সহকারী পররাষ্ট্রমন্ত্রী নিশা দেশাই বিসওয়াল। ২৮ নভেম্বর তিনি বিএনপির চেয়ারপারসন খালেদা জিয়ার সঙ্গে সাক্ষাৎ করেন। জাতীয় সংসদে বিরোধীদলীয় নেতা রওশন এরশাদের সঙ্গেও তিনি একই দিনে সাক্ষাৎ করেন। এ দুই 'রুটিন'সাক্ষাৎকালে মার্কিন মন্ত্রী পরবর্তী নির্বাচন কবে জানতে চান। ২৯ নভেম্বর ঢাকা ছাড়ার আগে দুপুরে সংবাদ সম্মেলনে তিনি মন্তব্য করেন, যুক্তরাষ্ট্র বাংলাদেশে অন্তর্ভুক্তিমূলক গণতন্ত্রের বিকাশ দেখতে চায় এবং সে লক্ষ্যে কাজ করে যাবে।
    একই দিন প্রায় একই সময়ে খুলনা সার্কিট হাউসে মহানগর আওয়ামী লীগের ত্রিবার্ষিক সম্মেলনে স্থানীয় সরকার, পল্লী উন্নয়ন ও সমবায়মন্ত্রী এবং দলের সাধারণ সম্পাদক সৈয়দ আশরাফুল ইসলাম নিশা দেশাইকে 'দুই আনার মন্ত্রী'বলে উপহাস করেন। তিনি বলেন, 'মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের দুই আনা মন্ত্রী, চার আনাও না, এক মন্ত্রী আছে নিশা দেশাই।'তিনি ঢাকায় নিযুক্ত মার্কিন রাষ্ট্রদূত ড্যান মজীনাকে 'কাজের মেয়ে মর্জিনা'উল্লেখ করে বলেন, 'বাংলাদেশ কিন্তু ওই অবস্থায় নাই যে কাজের মেয়ে মর্জিনা বাংলাদেশের ক্ষমতার রদবদল করতে পারে।'
    বাংলাদেশের একজন মন্ত্রীর হঠাৎ এমন মন্তব্যের কারণ বুঝতে পারছে না কোনো মহল। এ বিষয়ে মার্কিন পররাষ্ট্র দপ্তরের মন্তব্য জানতে চাইলে এই প্রতিবেদককে সংশ্লিষ্ট মন্ত্রীর (সৈয়দ আশরাফ) সঙ্গে যোগাযোগ করতে বলা হয়। সংশ্লিষ্ট মন্ত্রীর বদলে এই প্রতিবেদক ওয়াশিংটনে বাংলাদেশ দূতাবাসের সঙ্গে যোগাযোগ করলে জানানো হয়, এ ব্যাপারে তাদের বলার কিছু নেই। ঢাকার পররাষ্ট্র মন্ত্রণালয় অথবা সংশ্লিষ্ট মন্ত্রণালয় হয়তো সঠিক ব্যাখ্যা দিতে পারবে।
    সরকারের কয়েকজন নীতিনির্ধারকের সঙ্গে কথা বলে জানা যায়, এ সময়ে নিশা দেশাইয়ের ঢাকা সফর সরকারের উচ্চপর্যায়ে একধরনের অস্বস্তি সৃষ্টি করেছে। সরকার মনে করে, বিএনপির আন্তর্জাতিক লবিংয়ের অংশ হিসেবে তিনি ঢাকায় আসেন। তাই প্রধানমন্ত্রী তাঁকে সাক্ষাৎ দেননি। এ ছাড়া খালেদা জিয়ার সঙ্গে নিশা দেশাইয়ের সাক্ষাতের বিষয়টি সরকার ভালোভাবে নেয়নি। কারণ, তিনি এখন আর বিরোধীদলীয় নেতা নন। পাশাপাশি পরবর্তী নির্বাচন নিয়ে নিশা দেশাইয়ের মন্তব্যেও সরকারে অস্বস্তি সৃষ্টি করেছে।
    তবে সরকারের উচ্চপদস্থ একজন কর্মকর্তা প্রথম আলোকে বলেন, যখন যুক্তরাষ্ট্রের সঙ্গে বাংলাদেশ সম্পর্কোন্নয়নের চেষ্টা চালাচ্ছে, তখন এ ধরনের বক্তব্য এ উদ্যোগের ক্ষেত্রে অন্তরায় হয়ে দাঁড়ায়। এমন মন্তব্য যে যুক্তরাষ্ট্র ভালোভাবে নেয় না, তা ওয়াশিংটন সম্প্রতি ঢাকাকে জানিয়েছে। এ ক্ষেত্রে চারজন জ্যেষ্ঠ মন্ত্রীর মন্তব্যের উল্লেখ করে যুক্তরাষ্ট্র তাদের হতাশা বাংলাদেশকে জানিয়েছে। নিশা দেশাই ও ড্যান মজীনাকে নিয়ে তির্যক মন্তব্য করে সৈয়দ আশরাফুল ইসলাম ওই তালিকায় নতুন করে যুক্ত হলেন।
    বিষয়টি বোঝার জন্য এই প্রতিবেদক একাধিক সাবেক মার্কিন কূটনীতিকের সঙ্গে কথা বললে তাঁরা সবাই বিস্ময় ও অজ্ঞতা প্রকাশ করেন। সেখানকার পররাষ্ট্র মন্ত্রণালয়ের কোনো কোনো কর্মকর্তার মতে, ওয়াশিংটনকে লক্ষ্য করে ঢাকা থেকে অকারণে কাদা ছোড়া চলতে থাকলে তার ক্ষতিকর প্রভাব দুই দেশের সম্পর্কে পড়তে বাধ্য। এ মুহূর্তে যুক্তরাষ্ট্র বাংলাদেশি পণ্যের অন্যতম প্রধান আমদানিকারক দেশ। এশিয়ায় আফগানিস্তান ও পাকিস্তানের পর বাংলাদেশই যুক্তরাষ্ট্রের সর্বাধিক বৈদেশিক সাহায্য পেয়ে থাকে। মার্কিন পররাষ্ট্র দপ্তরের নিজস্ব মূল্যায়ন অনুসারে, যুক্তরাষ্ট্র বাংলাদেশকে তার একটি 'গুরুত্বপূর্ণ কৌশলগত মিত্র'হিসেবে বিবেচনা করে। গত মাসে ওয়াশিংটনে অনুষ্ঠিত এ দুই দেশের পররাষ্ট্রসচিব পর্যায়ে অংশীদারত্বের সংলাপেও উভয় পক্ষই পারস্পরিক সম্পর্ক জোরদারের পক্ষে মত দেয়।
    নাম না প্রকাশের শর্তে বাংলাদেশের পররাষ্ট্র মন্ত্রণালয়ের উচ্চপদস্থ একজন কর্মকর্তা জানান, তাঁদের জন্য এ মুহূর্তে অগ্রাধিকার হলো আগামী বছরের প্রথমার্ধে পররাষ্ট্রমন্ত্রী এ এইচ মাহমুদ আলীর ওয়াশিংটন সফর। এ ব্যাপারে উভয় পক্ষই নীতিগতভাবে সম্মত হয়েছে। ওই কর্মকর্তা আশঙ্কা ব্যক্ত করেন, ঢাকা যদি অকারণে এভাবে কাদা ছোড়া বন্ধ না করে, তাহলে এ সফর বিলম্বিত হতে পারে। এমন হলে তা হবে একটি কূটনৈতিক বিপর্যয়। ওই কর্মকর্তার ধারণা, নিশা দেশাই অথবা রাষ্ট্রদূত মজীনা সম্পর্কে এমন মন্তব্য সম্ভবত কোনো পরিকল্পিত নীতির প্রকাশ নয়।
    কোনো কোনো মার্কিন বিশেষজ্ঞের ধারণা, কাদা ছোড়ার ঘটনাটি যতটা না কূটনৈতিক, তার চেয়ে অনেক বেশি রাজনৈতিক, যার 'টার্গেট'অভ্যন্তরীণ শ্রোতৃমণ্ডলী। নব্বই দশকে বাংলাদেশে মার্কিন রাষ্ট্রদূত হিসেবে দায়িত্ব পালন করা উইলিয়াম বি মাইলাম দীর্ঘ আলাপে এই প্রতিবেদককে বলেন, নির্বাচনের ব্যাপারে যেকোনো মন্তব্যকেই বাংলাদেশের ক্ষমতাসীন রাজনৈতিক নেতৃত্ব সুনজরে দেখবে না। মধ্যবর্তী নির্বাচন দেওয়ার কোনো পরিকল্পনা এই সরকারের নেই। ফলে নির্বাচনবিষয়ক যেকোনো ইঙ্গিত তাদের গাত্রদাহের কারণ হতে পারে।
    বর্তমানে ওয়াশিংটনভিত্তিক গবেষণা সংস্থা উইলসন সেন্টারের সিনিয়র পলিসি স্কলারের পদে কর্মরত মাইলাম বলেন, 'সম্ভবত আওয়ামী লীগ মনে করে, তাদের আমেরিকাকে প্রয়োজন নেই। আমি আজই (গত মঙ্গলবার) পড়ছিলাম, প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা বলেছেন, বাংলাদেশের তৈরি পোশাক আমদানি না করে আমেরিকার কোনো উপায় নেই। কারণ, বাংলাদেশ থেকে আমদানি বন্ধ করলে আমেরিকা তৈরি পোশাকের সংকটে পড়বে। তাঁর এ কথার অর্থ সম্ভবত এই যে আমেরিকাকে বাংলাদেশের যতটা প্রয়োজন, তার চেয়ে বেশি আমেরিকার প্রয়োজন বাংলাদেশকেই। বলাই বাহুল্য, এ রকম ধারণা হাস্যকর।'তিনি বলেন, 'দীর্ঘমেয়াদি হিসাবে এই নীতি অনুসরণের ফল ভয়াবহ হবে। তবে চলতি সরকার দীর্ঘ মেয়াদের কথা ভাবছে বলে মনে হয় না।'
    'বাংলাদেশ এখন পশ্চিমের বদলে পুবের দিকে তাকাচ্ছে'—বাংলাদেশের একজন মন্ত্রীর এ বক্তব্যের প্রতি দৃষ্টি আকর্ষণ করা হলে মাইলাম জানান, বাংলাদেশ সম্ভবত একই সঙ্গে ভারত ও যুক্তরাষ্ট্র এবং অন্যান্য ইউরোপীয় দেশকে জানান দিতে চায় যে চীন তাদের হাতে একটি গুরুত্বপূর্ণ তাস। তিনি তাঁর আগের আশঙ্কা পুনর্ব্যক্ত করে বলেন, বাংলাদেশ ক্রমশ কার্যত একদলীয় সরকারব্যবস্থার দিকে এগোচ্ছে। ওবামা সরকার যে বাংলাদেশের চলতি 'একতান্ত্রিক লক্ষণের'বিরুদ্ধে কোনো কঠোর অবস্থান নেয়নি, তাতে মাইলাম তাঁর অসন্তোষ প্রকাশ করেন।
    যুক্তরাষ্ট্র-বাংলাদেশের অংশীদারত্বের সংলাপ শেষে যৌথ বিবৃতিতে গণতন্ত্র বিষয়টির আদৌ কোনো উল্লেখ না থাকার বিষয়টি উল্লেখ করে সাবেক রাষ্ট্রদূত মাইলাম বলেন, 'ব্যাপারটি খুবই দুঃখজনক।'সবশেষে তিনি বলেন, বাংলাদেশে বহুদলীয় গণতন্ত্র দরকার তার নিজের প্রয়োজনে, আমেরিকার প্রয়োজনে নয়।
    এ বিষয়ে জানতে চাইলে ওয়াশিংটনে বাংলাদেশের সাবেক রাষ্ট্রদূত হুমায়ুন কবীর গতকাল বুধবার প্রথম আলোকে বলেন, নির্বাচন নিয়ে বাংলাদেশের সঙ্গে বেশ কিছুদিন ধরে যুক্তরাষ্ট্রের রাজনৈতিক পর্যায়ে কিছুটা দূরত্ব তৈরি হয়েছে। রাজনৈতিক এ দূরত্ব কমানোর কার্যকর কোনো উদ্যোগ দৃশ্যমান নয়। উপরন্তু সরকারের দায়িত্বশীল পর্যায় থেকে মার্কিন কর্মকর্তাদের বিরুদ্ধে নেতিবাচক মন্তব্য এ দূরত্ব কমাতে মোটেও সহায়ক হবে না।

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    সাক্ষাৎকারে শফিক রেহমান : বিদেশি চাপে বেকায়দায় সরকার, পতন হবে

    বাংলাদেশের বর্তমান সরকারকে সম্পূর্ণ অবৈধ এবং অনৈতিক আখ্যা দিয়ে এই সরকারকে চলে যেতে হবে বলে মন্তব্য করেছেন সিনিয়র সাংবাদিক ও বিশিষ্ট মিডিয়া ব্যক্তিত্ব শফিক রেহমান।
    তিনি বলেন, বিএনপি নেতারা মনে করছেন, সরকারকে বিদায় নিতে হবে এবং তারা সেটা বলছেন। সরকার কিভাবে চলে যাবে সেটি বড় একটি প্রশ্ন। এর উত্তর হচ্ছে- আন্দোলনের মাধ্যমে সরকার চলে যাবে।
    দেশের বর্তমান প্রেক্ষাপটে রেডিও তেহরানকে দেয়া একান্ত সাক্ষাৎকারে প্রবীণ সাংবাদিক ও রাজনৈতিক ভাষ্যকার শফিক রেহমান এসব কথা বলেন।


    সাক্ষাৎকারে তিনি বলেন, এদেশে আন্দোলনসহ বিভিন্ন বিষয়ে কূটনৈতিক সমর্থনের প্রয়োজন আছে।

    মধ্যপ্রাচ্যের মুসলিম কিছু দেশ, ইউরোপীয় ইউনিয়ন এবং যুক্তরাষ্ট্র বর্তমান আওয়ামী লীগ সরকারের বিরুদ্ধে খুব কঠিন অবস্থান নিয়েছে। তো সার্বিকভাবে আওয়ামী লীগ সরকারের ওপর যে চাপ সৃষ্টি হয়েছে তাতে সরকার বেকায়দায় আছে; নাজুক অবস্থার মধ্যে পড়েছে।

    বিশিষ্ট এ সাংবাদিক বলেন, আওয়ামী লীগ যদি চায় এবং অন্যকে বাধ্য করে তাহলে তখন আওয়ামী লীগের চেয়ে অনেক বেশি সহিংস দল তৈরি হবে। আর তখন আওয়ামী লীগ নিশ্চিহ্ন হয়ে যাবে। আমি নিজেও হয়তো সেই আন্দোলনে যোগ দেব।

    ভারত-বাংলাদেশ সম্পর্ক বিষয়ে শফিক রেহমান বলেন, বাংলাদেশের সাড়ে তিন দিক থেকে ঘিরে রেখেছে ভারত। ফলে তাদের সঙ্গে সদ্ভাব থাকতেই হবে। তবে তার মানে এই নয় যে তাদের পদানত হয়ে থাকতে হবে বা তারা আমাদেরকে পদানত রাখতে পারবে।

    পাঠকদের জন্য পুরো সাক্ষাৎকারটি উপস্থাপন করা হলো—

    প্রশ্ন: বিএনপি নেতা গয়েশ্বর চন্দ্র রায় আগামী মার্চের মধ্যে সরকার পতনের হুঁশিয়ারি দিয়েছেন। মির্জা আব্বাস বলেছেন, সরকারের কাছে কত গুলি আছে দেখতে চাই। আর শামসুজ্জামান দুদু বলেছেন, ডিসেম্বরে ঢাকা অবরোধ করা হবে। তাছাড়া বিশিষ্ট রাষ্ট্রবিজ্ঞানী ও ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের সাবেক ভিসি প্রফেসর এমাজউদ্দিন আহমেদ বলেছেন, আগামী মার্চ-এপ্রিলের মধ্যেই দেশের বর্তমান রাজনৈতিক চেহারার পরিবর্তন হবে। আজ ক'দিন ধরে বিভিন্ন অঙ্গন থেকে এ ধরনের কথা উচ্চারিত হচ্ছে। কিসের ভিত্তিতে এই আভাস?

    শফিক রেহমান: বাংলাদেশের মতো দেশে রাজনীতি নিয়ে এভাবে ভবিষ্যত বাণী না করাই উচিত। কারণ আমেরিকার মতো বাংলাদেশে সুনির্দিষ্ট সময়ে নির্বাচনের বিধি-বিধান নেই। আমরা সবসময় বৃটিশ পার্লামেন্টারি পদ্ধতিকে অনুসরণ করছি। আমরা অনিশ্চিতের মধ্যেই থেকে যাচ্ছি। এই অবস্থার সমাধান হওয়া উচিত বলে আমি মনে করি।

    বাংলাদেশে এই মুহূর্তে যে সরকারটি আছে তারা সম্পূর্ণ অবৈধ এবং অনৈতিক সরকার। এই সরকারকে চলে যেতে হবে, বিদায় নিতে হবে। বিএনপি নেতারা মনে করছেন, সরকারকে বিদায় নিতে হবে। আর সেকথাই তারা বলছে। তবে সরকার কিভাবে চলে যাবে সেটি একটি প্রশ্ন। এর উত্তর হচ্ছে আন্দোলনের মাধ্যমে সরকার চলে যাবে।

    বিএনপি নেতারা যে মার্চের কথা বলছে সে সম্পর্কে বলব, এই শীতকালটাকে যদি সরকার পার করতে পারে তাহলে অনেকের ধারণা সরকার আরো একটি বছর ক্ষমতায় থেকে যাবে। ফলে বিএনপিসহ অন্যান্য বিরোধীদল খুবই চেষ্টা করবে যাতে আন্দোলনের মাধ্যমে ক্ষমতাসীন আওয়ামী লীগের কাছ থেকে নির্দলীয় নিরপেক্ষ তত্ত্বাবধায়ক সরকারের মাধ্যমে স্বচ্ছ একটি নির্বাচন আদায় করে নিতে পারে। আর সে কারণেই এখন বিএনপি নেতাসহ অন্যান্য নেতাদের কাছ থেকে এ ধরনের কথা আসছে।

    প্রশ্ন: বিএনপির কোনো কোনো নেতা সম্প্রতি জানিয়েছেন, সরকার বিরোধী আন্দোলনের বিষয়ে তাদের পক্ষে জোরালো কূটনৈতিক সমর্থন রয়েছে। এখন বরং তাদের জন্য জনপ্রত্যাশা পূরণই বড় চ্যালেঞ্জ হয়ে দাঁড়িয়েছে। প্রশ্ন হচ্ছে- বিএনপি কি এই চ্যালেঞ্জ মোকাবেলা করতে পারবে বলে আপনি মনে করেন? আর এই কূটনৈতিক সমর্থনেরই বা কী গুরুত্ব আছে?

    শফিক রেহমান: আমি প্রথমেই বলব কূটনৈতিক সমর্থনের খুবই গুরুত্ব আছে। আজকের যুগে শেষ বিচারে কূটনৈতিক সমর্থনের দরকার পড়ে। কেননা এখন বিশ্ব একটা গ্লোবাল ভিলেজ। ধরুন, বাংলাদেশের কাছ থেকে যুক্তরাষ্ট্র, ইইউসহ অন্যরা যে গার্মেন্টস সামগ্রী কিনবে এবং মধ্যপ্রাচ্যসহ অন্যান্য জায়গায় আমাদের জনশক্তি রপ্তানি হবে। আর এগুলোর ওপর নির্ভর করবে বাংলাদেশের অর্থনীতির অভ্যন্তরীণ যে সেক্টরগুলো আছে। যেমন ধরুন হাউজিং প্রজেক্ট। মধ্যপ্রাচ্যসহ বিভিন্ন দেশে লোক গেলে তারা এদেশে ফ্লাট কিনবে। তখন হাউজিং সেক্টরটা খুব ভালোভাবে চলবে। এভাবে প্রতিটি জিনিসের সঙ্গে প্রতিটি জিনিস সম্পৃক্ত। আর সেকারণে বিদেশি সমর্থন দরকার।

    এখন যদি কূটনৈতিকরা বলে যে, না আমরা তোমাদের গার্মেন্ট কিনব না; তোমাদের জনশক্তি নেব না, তাহলে সঙ্কটে পড়তে হবে। এরই মধ্যে আমরা দেখতে পাচ্ছি মধ্যপ্রাচ্যে লোক নিচ্ছে না। যদিও সম্প্রতি প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা সংযুক্ত আরব আমিরাতে গিয়েছিলেন কিছু লোক নেয়ার তদবির করতে। কিন্তু সে সফর ব্যর্থ হয়েছে। তারা কেবল বলেছে মাত্র ২ হাজার নারী শ্রমিক তারা নেবে। তবে সেটিও নিশ্চিত করা যায়নি।

    আমরা দেখতে পাচ্ছি, বর্তমান আওয়ামী লীগ সরকার ২০০৮ সালে তাদের নির্বাচনী ইশতেহারে বলেছিল, ঘরে ঘরে চাকরি দেয়া হবে। কিন্তু তারা সেটা করতে তো পারেইনি বরং বিভিন্ন দেশে তাদের যাওয়ার পথ বন্ধ হয়ে গেছে। বিভিন্ন দেশ থেকে লোকজন ফিরে আসছে, নতুন চাকরির বাজারও সৃষ্টি হচ্ছে না। এর ফলে দেশে বেকারত্ব আরো বেড়ে গেছে। ফলে এ বিষয়টি আসলে কূটনীতির উপর নির্ভর করে। মধ্যপ্রাচ্যের মুসলিম কিছু দেশ, ইউরোপীয় ইউনিয়ন ও যুক্তরাষ্ট্র বর্তমান আওয়ামী লীগ সরকারের বিরুদ্ধে খুব কঠিন অবস্থান নিয়েছে।

    বাংলাদেশে যে পর পর মৃত্যুদণ্ড দেয়া হচ্ছে, এ কারণেও তারা ক্ষুব্ধ। অথচ হাসিনা বলছেন, বিদেশিরা যে যাই বলুক না কেন আমি বিচার করব এবং মৃত্যুদণ্ড দিতেই থাকব। অর্থাৎ তার কথায় এমন মনে হচ্ছে যে, তিনিই বিচারক এবং তিনি মৃত্যুদণ্ড দিতেই থাকবেন। আর এর মাধ্যমে তিনি এদেশে হাজার হাজার বিধবা সৃষ্টি করছেন।

    তবে এটি আজকের যুগে সম্ভব না। কারণ তুর্কিসহ ১২টি মুসলিম দেশে মৃত্যুদণ্ড নিষিদ্ধ করা হয়েছে। মোট ১৪০টি দেশে মৃত্যুদণ্ড স্থগিত করা হয়েছে। এসব কারণে ইইউ বাংলাদেশের প্রতি খুবই বিরক্ত। কারণ তারা মৃত্যুদণ্ড নিষিদ্ধ করেছে। তাছাড়া আমেরিকাও বিভিন্ন কারণে বাংলাদেশের ওপর বিরক্ত। ফলে সার্বিকভাবে আওয়ামী লীগ সরকারের ওপর যে চাপ সৃষ্টি হয়েছে তাতে সরকার বেকায়দায় আছে; নাজুক অবস্থার মধ্যে পড়েছে। আর এজন্যেই প্রধানমন্ত্রী ইংল্যান্ডে গেলেন না। তার সফর বাতিল করা হয়েছে।

    এর আগে ব্রিটিশ প্রধানমন্ত্রী ক্যামেরনের সঙ্গে দেখা করে তিনি মিথ্যা কথা বলেছেন। তিনি বলেছিলেন, ক্যামেরন বলেছেন- পাঁচ জানুয়ারির নির্বাচন ভালো হয়েছে। কিন্তু বাস্তবতা হচ্ছে তিনি কখনও এমনটি বলেননি। আমি ইংল্যান্ডে বহু বছর ছিলাম এবং এখনও সেখানকার রাজনীতি আমি ফলো করি। কিন্তু আমি কখনও দেখিনি কোনো ভিজিটিং প্রেসিডেন্ট বা প্রধানমন্ত্রী যাওয়ার পর দিনই একটা স্টেটমেন্ট আসে। কিন্তু প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা সফরের পর এরকমই একটি স্টেটমেন্ট এলো যে, আমরা বাংলাদেশে একটি সুষ্ঠু নির্বাচন দেখতে চাই। এসব কারণে প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা খুবই বিব্রত আছেন।

    শেখ হাসিনার সরকার অবৈধ সরকার এটি বিশ্ববাসীর কাছে পরিচিতি লাভ করেছে। সুনির্দিষ্টভাবে আরো একটি জায়গায় তিনি আটকে গেছেন। লতিফ সিদ্দিকী নিউইয়র্কে যে বিবৃতি দিয়েছিলেন, সেখানে শেখ হাসিনার পুত্র সম্পর্কে বিভিন্ন অভিযোগ তিনি করেছেন। আর সেই অভিযোগের চিত্র মিডিয়াতে চলে এসেছে। আর জয় সম্পর্কে যেসব কথা লতিফ সিদ্দিকী বলেছেন, তার উত্তর শেখ হাসিনা অর্থাৎ জয়ের মা এখনও পর্যন্ত দিতে পারেননি।

    কেন এই অভিযোগগুলো করা হলো, এটা সত্য নাকি মিথ্যা সে ব্যাপারে উনি কিছু বলছেন না। উনি কেবল লতিফ সিদ্দিকীর ধর্মের দিক এবং হজের দিকটা নিয়ে কথা বলেছেন। এটার ফলে একটা ধারণা করা যেতে পারে যে, আমেরিকা এবং ইইউসহ অন্যান্যরা বাংলাদেশের দুর্নীতিগ্রস্ত সরকার সম্পর্কে সুনির্দিষ্ট প্রমাণ তারা পেয়েছে। আর সেটা শেখ হাসিনার সরকারের জন্য শুভ সংবাদ নয়।

    আর সেজন্যেই কূটনৈতিক চাপ অব্যাহত থাকলে শেখ হাসিনার জন্য তার সরকারকে টিকিয়ে রাখা সম্ভব হবে না। তারপরও কূটনীতিকরা বলবে যে হ্যাঁ আমরা তোমাদের দেশে দুর্নীতির চিত্র দেখছি; অনিয়ম দেখছি। এরপরও বলা হচ্ছে মানুষ আওয়ামী লীগকে চায়। বিএনপিকে প্রমাণ করতে হবে যে, দেশের মানুষ আওয়ামী লীগকে চায় না। জনসমর্থন তাদের পক্ষে। আর সেজন্যেই খালেদা জিয়া দেশের বিভিন্ন স্থানে জনসভা করছেন। কিশোরগঞ্জে জনসভা করেছেন। অন্যান্য জায়গায়ও তিনি মিটিং করেছেন।

    বিএনপির জনসভায় এই যে জনসমর্থন বিদেশিরা এবং হাসিনা দেখছে- এতেই প্রমাণ হয়ে যাচ্ছে জনসমর্থন বিএনপির পক্ষে রয়েছে। ফলে জনসমর্থন যেমন দরকার একইসঙ্গে কূটনৈতিক সমর্থনও দরকার।

    তারপরও হার্ডডোজ যদি প্রয়োজন হয় সেক্ষেত্রে আমি বলব খালেদা জিয়া অত্যন্ত সাহসী, তিনি শেখ হাসিনার মতো পালিয়ে যাননি। শেখ হাসিনা সাহসের বড়াই করেন কিন্তু সময়মতো পালিয়ে যান। যেমন ১/১১ পর তিনি দু'বার পালিয়ে গিয়েছিলেন দেশ থেকে। তারপর বিদেশিদের কাছ থেকে গ্যারান্টি নিয়ে তিনি দেশে ফিরে আসেন।

    তারপর তৎকালীন তত্ত্বাবধায়ক সরকারের দ্বারাই তিনি ক্ষমতায় এসেছিলেন। অন্যদিকে খালেদা অত্যন্ত সহসিকতার সঙ্গে বর্তমান আন্দোলনের নেতৃত্ব দেবেন বলে আমার বিশ্বাস। একই সঙ্গে আমি বলে রাখছি, আমি কিন্তু বিএনপির কোনো সদস্য নই।

    প্রশ্ন: বাংলাদেশের রাজনীতির ক্ষেত্রে ভারতের একটা বিশেষ ভূমিকা ও প্রভাব রয়েছে বলে অনেকে মনে করেন। সম্প্রতি ঢাকায় অনুষ্ঠিত ভারত-বাংলাদেশের কূটনীতিকদের এক সম্মেলনে ভারতের সাবেক হাইকমিশনার পিনাক রঞ্জন চক্রবর্তী বলেছেন, ৫ জানুয়ারির নির্বাচন আদর্শ নয়। তিনি চান বাংলাদেশে আদর্শ গণতন্ত্র ফিরে আসুক। ভারতীয় কূটনীতিবিদের এ বক্তব্যকে কিভাবে দেখবেন?

    শফিক রেহমান: ভারত আমাদের শুধু তিন দিক থেকে ঘিরে রাখেনি সাড়ে তিন দিক থেকে ঘিরে রেখেছে বলে সাবেক ভারতীয় এক হাইকমিশনার দেব মুখার্জী আমাকে বলেছিলেন। তার সঙ্গে আমার পরিচয় ছিল। আমাকে তিনি বললেন, শফিক তোমাদের তিন দিক থেকে নয় সাড়ে তিন দিক থেকে আমরা ঘিরে রেখেছি। তার মানে জিজ্ঞেস করায় তিনি আমাকে বললেন, বঙ্গোপসাগরেও তোমাদেরকে আমরা ঘিরে রেখেছি। ফলে যে দেশটি আমাদের সাড়ে তিন দিক থেকে ঘিরে রেখেছে তাদের সঙ্গে সদ্ভাব থাকতেই হবে। তবে তার মানে এই নয় যে তাদের পদানত হয়ে থাকতে হবে বা তারা আমাদেরকে পদানত রাখতে পারবে। ভারত যদি আমাদেরকে কাশ্মীর ভাবে তাহলে তারা ভুল করবে।

    তবে কাশ্মীরের মুসলমানদেরকে তারা পদানত করে রাখতে পেরেছে এর কারণ হচ্ছে তারা স্বাধীনতার স্বাদ পায়নি। কিন্তু বাংলাদেশের মানুষ স্বাধীনতার স্বাদ পেয়েছে। ফলে ভারতের জন্য সংকট হবে যদি তারা কাশ্মীরের কথা ভেবে অথবা হায়দ্রাবাদের কথা ভেবে বাংলাদেশকে পদানত করে রাখতে চায়। একটি বিষয় মনে রাখা দরকার, ব্রিটিশ শাসনের সময় যতগুলো আন্দোলন হয়েছে তার অধিকাংশই কিন্তু বাংলাদেশের ভূখণ্ড থেকে হয়েছে। সূর্যসেন যিনি ব্রিটিশ বিরোধী আন্দোলন করেছিলেন তিনিও বাংলাদেশের সন্তান। বলতে গেলে প্রায় সব আন্দোলন বাংলাদেশ থেকেই হয়েছে। ফলে আবারও যদি তীব্র আন্দোলন হয় তাহলে সেটা ভারতের জন্য ভালো হবে না।

    এ প্রসঙ্গে আমি বলব, ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ে ভারতের সাবেক রাষ্ট্রদূতদের নিয়ে যে মিটিং হয়েছে সেখানে অনেককে সাবেক বলা হলেও পিনাক রঞ্জন চক্রবর্তীতে সাবেক বলা যাবে না। কারণ আমি যতটুকু জানি পিআর চক্রবর্তী দিল্লিতে বাংলাদেশ ডেস্কের অন্যতম কর্মকর্তা হিসেবে কাজ করছেন। আর তিনি যদি বলেন- বাংলাদেশে একটি ভালো নির্বাচন হওয়া উচিত এবং তা হবে বলে আশাপ্রকাশ করেন তাহলে সেটা আমাদের জন্যও আশার কথা। আর একথার পরিপ্রেক্ষিতে বলা যাবে যে, ভারতের সুমতি হয়েছে অথবা বলতে হবে রামের সুমতি হয়েছে।

    পিনাক রঞ্জন চক্রবর্তী সম্পর্কে আমি আরো দু'একটা কথা বলতে চাই। তার নামের আদ্যক্ষর হচ্ছে পিআর অর্থাৎ পিনাক রঞ্জন চক্রবর্তী। ঢাকায় হাইকমিশনার থাকা অবস্থায় কোনো দিনও তিনি বেগম খালেদা জিয়ার ঈদ বা অন্য কোনো পার্টিতে আসেননি। আমি ওইসব পার্টির অন্যতম সংগঠক হিসেবে বিষয়টি জানি। তারপর তিনি যখন থাইল্যান্ডে বদলি হয়ে যান তখন খালেদা জিয়ার সঙ্গে দেখা করতে এসেছিলেন। আর সেদিন আমি তাকে ধরলাম এবং হাসতে হাসতে বললাম, আপনি আপনার নামের প্রতি সুবিচার করেননি।

    তিনি অবাক হয়ে গেলেন এবং এর অর্থ জানতে চাইলেন। তখন আমি তাকে বললাম আপনার নামের আদ্যক্ষর হচ্ছে পিআর, মানে পাবলিক রিলেশন্স। অথচ আপনি জনসংযোগ বা পাবলিক রিলেশন্স করেননি। আপনি কেবল একটি দলের সঙ্গে রিলেশন্স করেছেন। অথচ ভারতের হাইকমিশনার হিসেবে উচিত ছিল দুটি দলের সঙ্গেই পিআর তৈরি করা। অথচ আপনি সেটা করেননি এবং সে বিষয়টি সংশোধন করার জন্য শেষবারের মতো আপনি খালেদা জিয়ার সঙ্গে দেখা করতে এসেছেন। তিনি আমার কথার উত্তর দিতে পারেননি।

    ফলে আমাদেরকে একটা কথা মনে রাখতে হবে, এদেশের বুদ্ধিজীবী এবং কূটনীতিকরা ভারতের কথা এলেই চুপ হয়ে যায়। ভারতীয়দের কাছে বাংলাদেশের বুদ্ধিজীবীরা যে নতজানু হয়ে যায় সেটা অত্যন্ত লজ্জার বিষয়। এর কারণ আমি খুঁজে পাই না। ব্যক্তিগতভাবে আমি বিদেশে বহু বছর কাজ করেছি। ভারতের সঙ্গে কম্পিটিশন করে জিতেছি অনেক সময় তাদের চেয়ে ওপরে উঠেছি।

    আমাদের দেশের মানুষদেরকে আরব সাগর পাড়ি দিয়ে দৃষ্টি দিতে হবে মধ্যপ্রাচ্য, ইউরোপ এবং আমেরিকার দিকে। ফলে ফরগেট দি ইন্ডিয়ান! তারা ভালো হোক মন্দ হোক তাদের মতোই আছে; তাদের মতোই তারা তাদের রাষ্ট্র চালাবে। তাদের কাছে নতজানু হওয়ার বিষয়টি আমার কাছে খুবই বিরক্তিকর মনে হয়। এই ভারতীয়দের আনা হচ্ছে। কেন তাদেরকে আনা হচ্ছে? কেন ইংল্যান্ড থেকে বা ইউরোপ আমেরিকার অন্যান্য দেশ থেকে লোকদের আনা হচ্ছে না। তারা আনতে পারবে না। এখানে ভারতপ্রীতি এবং ভারত ফোবিয়া দুটোকেই আমি মারাত্মক খারাপ বিষয় বলে মনে করি।

    তবে হ্যাঁ একথাও সত্যি যে, ভারত আমাদের প্রতিবেশি বড় রাষ্ট্র। আমরা প্রতিবেশির সঙ্গে বন্ধুত্বপূর্ণ অবস্থা বজায় রাখতে চাই। ইউরোপে আমরা দেখেছি ফ্রান্স এবং জার্মানি বহু বছর লড়াই করেছে। আবার তারা বন্ধুত্বপূর্ণ সম্পর্ক গড়ে তুলেছে। আমরাও ভারতের সঙ্গে সহাবস্থানে থাকতে চাই। তবে লিড নিতে হবে ভারতকে। কারণ তারা বড় রাষ্ট্র। তাদেরকে আমাদের সঙ্গে ভালো ব্যবহার করতে হবে। আমরা তো তাদের সঙ্গে ভালো সম্পর্ক রাখতে প্রস্তুত আছি; আমরা তো তাদের সঙ্গে লড়াই করে কখনও জিততে পারব না। ফলে আমরা কেন তাদের সঙ্গে লড়াই করব; এ বিষয়টি ভারতকে বুঝতে হবে।

    প্রশ্ন: আওয়ামী লীগের নেতৃত্বাধীন সরকারের বিরুদ্ধে আন্দোলন করতে গিয়ে জোটের আকার বাড়তে বাড়তে এখন ২০ দলে পৌঁছেছে। তারপরও আন্দোলনের বড় কোনো কর্মসূচি নেই। সংকটটা কাদের- বিএনপির নাকি জোটের?

    শফিক রেহমান: দেখুন, এটি হচ্ছে আওয়ামী প্রচারণা। মিডিয়ার প্রচারণা। আর আপনারাও আওয়ামী সেই প্রচারণার মধ্যে পড়ে গেছেন। বিএনপির সবচেয়ে বড় দুর্বলতা হচ্ছে তাদের কোনো পত্রিকা নেই, রেডিও নেই, টেলিভিশন নেই; কিচ্ছু নেই। তাদের কেবল আছে জনসমর্থন। আর আওয়ামী সরকারের আছে মিডিয়া সমর্থন, আছে প্রোপাগাণ্ডা।

    আমি বাংলাদেশে ছোটবেলা থেকে আছি। ১৯৪৫ সাল থেকে বাংলাদেশের বিভিন্ন আন্দোলন আমি দেখে আসছি। পাকিস্তান আন্দোলন, ভাষা আন্দোলন থেকে শুরু করে প্রায় সব আন্দোলনই আমি দেখেছি এবং সক্রিয়ভাবে অংশগ্রহণ করেছি। কিন্তু ২০১৩ সালে যে আন্দোলন দেখেছি এমন দুর্বার আন্দোলন আর কখনও দেখিনি। আপনাদের নিশ্চয়ই মনে আছে এর আগে আওয়ামী লীগ বলত তাদের কাছ থেকে বিএনপির আন্দোলন শিখতে হবে। তবে এখন আর তারা সেটা বলে না। কেননা বিএনপির আন্দোলন কিরকম হতে পারে সেটা আওয়ামী লীগ খুব ভালোভাবে জেনে গেছে।

    সেই আন্দোলনের সময় কয়েক হাজার গাছ কাটা পড়েছে, অনেক জায়গায় আন্দোলনকারীরা রেললাইন উপড়ে ফেলেছে। বিক্ষুব্ধ জনতা বিভিন্ন শহর দখল করে নিয়েছিল। এমনটি ১৯৭১ সালেও হয়নি। এই সত্যটাকে আজকে মানতে হবে। আমি দেশজুড়ে ১৯৭১ সালেও এতবড় আন্দোলন দেখিনি। আমি ৭১ দেখেছি এবং ২০১৩ দেখেছি।

    তবে সেই দুর্বার আন্দোলনেও সরকার পড়েনি। সরকার পড়েনি এই অর্থে প্রধানমন্ত্রী গণভবন থেকে না বের হয়ে গেলে সরকার পতন বলা যাবে না। তিনি যেদিন গণভবন থেকে বেরিয়ে গিয়ে বলবেন, আমি ক্ষমতা ছেড়ে দিলাম। অথচ সেটা তিনি করেননি। তিনি বসে আছেন এই ভরসায় যে কেউ না কেউ তাকে উদ্ধার করবে।

    তবে আমি একথা বলব, আন্দোলন সার্বিকভাবে হয়েছে সারাদেশে। তবে ঢাকাতে সরকারের পতন হয়নি। তাছাড়া আমি আরো একটা কথা বলে রাখতে চাই সেটি হচ্ছে- বিএনপি কোনো সংগ্রামী, বিপ্লবী বা ক্যাডারভিত্তিক দল নয়। রাস্তায় নেমে মারামারি কাটকাটি করবে এটি বিএনপির কাছ থেকে আশা করাও তো অন্যায়।

    বিএনপি সম্পর্কে আমি আরো বলতে চাই, খালেদা জিয়া যখন ক্ষমতায় ছিলেন তখন তিনি স্পষ্ট ঘোষণা করেছিলেন যে কোনো আন্দোলনে যেন কেউ মারা না যায়। তার কারণ হচ্ছে এর আগে এরশাদের আমলে মিছিলে আন্দোলনে বাস উঠিয়ে দিয়ে মানুষ হত্যা করা হয়েছিল। মিলনকে হত্যা করা হলো। অথচ খালেদা জিয়া সেটা করতে দেননি। তিনি মানুষের মৃত্যু চাননি। অথচ এখন আন্দোলনের সময় বলে দেয়া হয় দেখামাত্র গুলি কর, দেখামাত্র গ্রেপ্তার কর। তো এই অবস্থার মধ্যে আন্দোলন করতে গেলে সহিংস হতে হবে। বিএনপি সহিংস আন্দোলন চায় না। বিএনপি একটি শান্তিপূর্ণ গণতান্ত্রিক দল।

    আওয়ামী লীগ যদি চায় এবং অন্যকে বাধ্য করে তাহলে তখন আওয়ামী লীগের চেয়ে অনেক বেশি সহিংস দল তৈরি হবে। আর তখন আওয়ামী লীগ নিশ্চিহ্ন হয়ে যাবে। আমি নিজেও হয়তো সেই আন্দোলনে যোগ দেব। তবে সরকারের এমনটি করা কোনোভাবেই ঠিক হচ্ছে না।ওরা অন্যায় করছে। তাদেরকে গণতন্ত্র চর্চা করতে হবে এবং গণতান্ত্রিকভাবে ক্ষমতার পরিবর্তন করতে হবে। মানুষের আশা করা অন্যায় যে বিএনপি আওয়ামী লীগের মতো সহিংস এবং বদমায়েশি করবে। এটা কখনও হবে না।

    প্রশ্ন: সরকারবিরোধী আন্দোলনে আরো বড় প্লাটফর্ম গঠনের তৎপরতা শুরু করেছে বিএনপি, যে প্লাটফর্ম সরকারের হার্ডলাইন অবস্থানকে মোকাবেলায় মোক্ষম অস্ত্র হিসেবে কাজ করবে। এমন কার্যকর প্লাটফর্ম গড়ে ওঠার সম্ভাবনা কতটা দেখছেন আপনি?

    শফিক রেহমান: সরকারবিরোধী বড় প্লাটফর্ম গড়ে ওঠার সম্ভাবনা আছে। যে কোনো গণতন্ত্রমনা দল বা ব্যক্তির উচিত হবে যদি বড় কোনো প্লাটফর্ম হয় তাহলে তাতে যোগ দেয়া। কেননা বাংলাদেশের অতীত ইতিহাসের দিকে তাকালে দেখা যাবে যুক্তফ্রন্ট থেকে শুরু করে ৯০-এ এরশাদবিরোধী আন্দোলন পর্যন্ত বড় প্লাটফর্ম তৈরি হয়েছে।

    যখন সবগুলো দল ক্ষমতাসীন দলের বিরুদ্ধে সংঘবদ্ধ হয় এবং একসঙ্গে আন্দোলন করে তখন তারা জয়লাভ করে। সেই হিসেবে যদি একটা বড় ফ্রন্ট হয় অর্থাৎ বিশ দল থেকে যদি ৩০ দল হয় তাহলে সফলতা আসবে খুব সহজেই। তবে বর্তমানে অনেক দল মানে একজনের একটি সাইনবোর্ড দল; তারপরও তাদের একটা অবদান থাকে। তারা কথা বলতে পারে; চিন্তাধারা প্রকাশ করতে পারে; এবং ইনপুট দিতে পারে। ফলে সবাই মিলে বিএনপির সঙ্গে যদি আন্দোলন করে সেটা বিএনপির জন্যও ভালো হবে এবং অন্য সবার জন্যও ভালো হবে। আর তখন দেশে একটা গণতন্ত্র ফিরে আসবে।

    তবে সবচেয়ে ভালো হয় আওয়ামী লীগ যদি এটা বুঝতে সক্ষম হয় যে মারামারি কাটাকাটি করে কোনো লাভ হবে না, বিদেশিদের চাপ আছে এবং দেশে একটা বড় প্লাটফর্ম হয়েছে ফলে যে কোনো মুহূর্তে বড় আন্দোলন হতে পারে। হয়তো আওয়ামী লীগের এবং শেখ হাসিনার এমন একটা সুমতি হতে পারে যে আমি তোমাদের নির্বাচন দিলাম এবং নির্দলীয় নিরপেক্ষ তত্ত্বাবধায়ক সরকারের অধীনে একটা নির্বাচন হবে। যেখানে তারা এমপি থেকে হাস্যকর নির্বাচন করার বিষয়টি আর রিপিট করবেন না। তারা যদি তাদের ভুল এবং গোয়ার্তুমি থেকে বেরিয়ে আসতে পারেন তাহলে দেশের জন্য ভালো হবে।

    তবে বিএনপি যে কোনোভাবেই হোক জিতবে কারণ মানুষ তাদের পক্ষে। তবে বড় কোনো প্লাটফর্ম হলে গণতন্ত্র পুনরুদ্ধারের যে কথা হচ্ছে সেটি খুব দ্রুত সম্ভব হবে এবং ক্ষমতায় ফিরে আসাটা সহজ হবে। একইসঙ্গে হতাহতের পরিমাণ কম হবে। আর আমরা সেটাই চাই। বিভিন্ন আন্দোলনে এদেশে অনেকে বিধবা হয়েছে, অনেকে এতিম হয়েছে। আমরা আর রক্তপাত দেখতে চাই না।
    http://bangla.irib.ir/2010-04-21-08-29-09/2010-04-21-08-30-45/item/68285-%E0%A6%AC%E0%A6%BF%E0%A6%A6%E0%A7%87%E0%A6%B6%E0%A6%BF-%E0%A6%9A%E0%A6%BE%E0%A6%AA%E0%A7%87-%E0%A6%AC%E0%A7%87%E0%A6%95%E0%A6%BE%E0%A7%9F%E0%A6%A6%E0%A6%BE%E0%A7%9F-%E0%A6%B8%E0%A6%B0%E0%A6%95%E0%A6%BE%E0%A6%B0-%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%B7%E0%A6%AE%E0%A6%A4%E0%A6%BE-%E0%A6%A5%E0%A7%87%E0%A6%95%E0%A7%87-%E0%A6%9A%E0%A6%B2%E0%A7%87-%E0%A6%A4%E0%A6%BE%E0%A6%A6%E0%A7%87%E0%A6%B0-%E0%A6%9A%E0%A6%B2%E0%A7%87-%E0%A6%AF%E0%A7%87%E0%A6%A4%E0%A7%87-%E0%A6%B9%E0%A6%AC%E0%A7%87
    http://www.amardeshonline.com/pages/details/2014/12/04/261821#.VH_m9WfDXgI

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    0 0

    Awami league inflicted with internal conflict.
    নীতিনির্ধারক-দায়িত্বশীল পর্যায়ের লোকদের একের পর এক বিস্ফোরক মন্তব্য
    ঘরের লোকদের 'বিতর্কিত'বক্তব্যে নাকাল আ'লীগ
    সরদার আবদুর রহমান : নিজের ঘরেই এক চরম বেকায়দায় পড়েছে আওয়ামী লীগ ও তার নেতৃত্বাধীন মহাজোট সরকার। ঘরের লোকদের 'বিতর্কিত'বক্তব্যে বলতে গেলে নাকাল অবস্থা আ'লীগের। সাম্প্রতিক সময়ে দলের নীতিনির্ধারণী ও উচ্চ পর্যায়ের দায়িত্বশীলদের কাছ থেকে একের পর এক বক্তব্য-মন্তব্য উচ্চারিত হতে থাকায় শুধু দলের ভেতরে নয়, জাতীয়-আন্তর্জাতিক পর্যায়েও তোলপাড় সৃষ্টি করে। বিতর্কিত বক্তব্য দিয়েও কোন কোন ক্ষেত্রে এসব ব্যক্তি তাদের বক্তব্যে অনড় ও অটল থাকার ঘোষণাও দেন। 
    বিতর্কিত বক্তব্য দিয়ে আলোচনায় আসা এসব ব্যক্তিদের মধ্যে উল্লেখযোগ্য হলেন, প্রধানমন্ত্রীর গুরুত্বপূর্ণ উপদেষ্টা এইচ টি ইমাম, বহিষ্কৃত মন্ত্রী লতিফ সিদ্দিকী, দলের সাধারণ সম্পাদক ও এলজিআরডি মন্ত্রী সৈয়দ আশরাফুল ইসলাম, অর্থমন্ত্রী আবুল মাল আব্দুল মুহিত, সাবেক মন্ত্রী এয়ার ভাইস মার্শাল অব. একে খন্দকার প্রমুখ। এছাড়া দলের 'জাতীয় নেতাদের'একজন তাজউদ্দীন আহমদের মেয়ে শারমিন আহমদও বই লিখে আওয়ামী লীগকে বেকায়দায় ফেলে দেন। সর্বশেষ, 'মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের দুই আনা, চার আনাও না; এক মন্ত্রী আছে নিশা দেশাই'-এই মন্তব্য করে বিতর্ক সৃষ্টি করেন এলজিআরডি মন্ত্রী সৈয়দ আশরাফুল ইসলাম। এর আগে প্রধানমন্ত্রীর রাজনীতি বিষয়ক উপদেষ্টা এইচ টি ইমামের ৫ জানুয়ারির নির্বাচন নিয়ে বিস্ফোরক বক্তব্যে প্রকম্পিত হয়ে ওঠে মহাজোটের ক্ষমতার মসনদ। আর মহানবী হযরত মুহাম্মাদ স. ও পবিত্র হজ্ব  নিয়ে কুরুচিপূর্ণ বক্তব্যে সঙ্গে প্রধানমন্ত্রীর পুত্র সজীব ওয়াজেদ জয়কে নিয়ে কটূক্তি করায় সরকারের পাশাপাশি লতিফ সিদ্দিকীর নিজের ক্ষমতার ভিত নড়বড়ে হয়ে যায়।
    রিক্রুটেডদের দিয়ে মোবাইল কোর্ট করিয়ে নির্বাচন  
    প্রধানমন্ত্রীর রাজনৈতিক উপদেষ্টা এবং আওয়ামী লীগের নির্বাচন সংক্রান্ত কুট-কৌশল নির্ধারক এইচ টি ইমাম গত ১২ নবেম্বর ছাত্রলীগের এক অনুষ্ঠানে ৫ জানুয়ারির বিতর্কিত নির্বাচনের 'ভেতরের কথা'প্রকাশ করে দেন। তিনি পাবলিক সার্ভিস কমিশনের ওপর নিজেদের দলীয় নিয়ন্ত্রণ ব্যবহার করার কথাও প্রকাশ করেন। বিরোধী জোটের পক্ষ থেকে নির্বাচন সম্পর্কে বিরোধীদলীয় অভিযোগকে এতোদিন সরকারি মহল উড়িয়ে দিলেও ইমামের বক্তব্যে তা সরকারি স্বীকৃতি লাভ করে। ৫ জানুয়ারির নির্বাচন সম্পর্কে তিনি বলেন, 'নির্বাচনের সময় বাংলাদেশ পুলিশের, প্রশাসনের যে ভূমিকা; নির্বাচনের সময় আমি তো প্রত্যেকটি উপজেলায় কথা বলেছি। সব জায়গায় আমাদের যারা রিক্রুটেড তাদের সঙ্গে কথা বলে, তাদের দিয়ে মোবাইল কোর্ট করিয়ে আমরা নির্বাচন করেছি। তারা আমাদের পাশে দাঁড়িয়েছে, তারা বুক পেতে দিয়েছে। আমাদের যে ১৯ জন পুলিশ ভাই প্রাণ দিয়েছে, তোমাদের মনে আছে এরা কারা? সব আমাদের মানুষ।'একই অনুষ্ঠানে দলীয় প্রার্থীদের চাকরি প্রদান প্রসঙ্গে এইচ টি ইমাম বলেন, 'যখনই কারো বায়োডাটা নিয়ে যাই, বলি যে এরা সুযোগ্য, প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা সব সময়ই জিজ্ঞেস করেন তারা কি ছাত্রলীগ করেছে? কোথায় পদধারী ছিল? তোমরা অনেকেই বল ছাত্রলীগের চাকরির কথা। দেখ, আমার চেয়ে, নেত্রীর চেয়ে, অন্য কারো দরদ কী বেশি আছে? আমরা তো জান-প্রাণ দিয়ে চেষ্টা করি। নেত্রী বলেন, যেভাবেই হোক আমাদের ছেলেদের একটা ব্যবস্থা করে দাও। তোমাদের লিখিত পরীক্ষায় ভালো করতে হবে। তারপরে আমরা দেখব।' 
    জয় সরকারের কেউ নয় 
    এর আগে আওয়ামী লীগের অন্যতম প্রভাবশালী নেতা বহিষ্কৃত মন্ত্রী আব্দুল লতিফ সিদ্দিকীর গত ২৯ সেপ্টেম্বর নিউ ইয়র্কে সেখানকার টাঙ্গাইলবাসীদের সাথে এক মতবিনিময়কালে দেয়া বক্তব্যে রীতিমত ঝড় ওঠে বাংলাদেশের রাজনৈতিক ও ধর্মীয় মহলে। তিনি তার বক্তৃতায় প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনার পুত্র সজীব ওয়াজেদ জয়কে নিয়েও মন্তব্য করেন। তিনি বলেন, 'কথায় কথায় আপনারা জয়কে টানেন কেন? 'জয় ভাই'কে? জয় বাংলাদেশ সরকারের কেউ নয়। তিনি কোনো সিদ্ধান্ত নেয়ারও কেউ নন।'প্রধানমন্ত্রীর সফরসঙ্গী হিসেবে নিউ ইয়র্ক সফরকালে লতিফ সিদ্দিকী আরো বলেন, 'আমি জামায়াতে ইসলামীর বিরোধী। তার চেয়েও বেশি বিরোধী হজ ও তাবলীগ জামাতের।'তিনি বলেন, 'এ হজে যে কত ম্যানপাওয়ার নষ্ট হয়। হজের জন্য ২০ লাখ লোক আজ সৌদি আরবে গেছে। এদের কোন কাম নাই। এদের কোনো প্রডাকশন নাই। শুধু রিডাকশন দিচ্ছে। শুধু খাচ্ছে আর দেশের টাকা দিয়ে আসছে।'তিনি হজের শুরু প্রসঙ্গে বলেন, 'আব্দুল্লাহর পুত্র মোহাম্মদ চিন্তা করলো, এ জাজিরাতুল আরবের লোকেরা কীভাবে চলবে। তারা তো ছিল ডাকাত। তখন একটা ব্যবস্থা করলো যে, আমার অনুসারীরা প্রতি বছর একবার একসাথে মিলিত হবে। এর মধ্য দিয়ে একটা আয়-ইনকামের ব্যবস্থা হবে।'তাবলীগ জামাতের সমালোচনা করে আব্দুল লতিফ সিদ্দিকী বলেন, 'তাবলীগ জামাত প্রতি বছর ২০ লাখ লোকের জমায়েত করে। নিজেদের তো কোনো কাজ নেই। সারা দেশের গাড়ি-ঘোড়া তারা বন্ধ করে দেয়।'আব্দুল লতিফ সিদ্দিকীর এই বক্তব্য মিডিয়ায় প্রকাশিত হলে তার দল আ'লীগ চরম বেকায়দায় পড়ে যায়। ফলে দ্রুত সিদ্ধান্ত নিয়ে তাকে মন্ত্রিসভা ও দল থেকে বহিষ্কার করা হয়। তার বিরুদ্ধে সরকারের তরফে কোন আইনগত ব্যবস্থা নেয়া হয়নি। এমনকি তার সংসদ সদস্য পদ বহাল রয়েছে। তবে দেশের বিভিন্ন স্থানে ধর্মপ্রাণ মানুষদের পক্ষ থেকে দায়েরকৃত মামলায় আত্মসমর্পণের পর তিনি এখন কারাগারে রয়েছেন। সূত্র জানায়, লতিফ সিদ্দিকীর হজ¦ বিষয়ক মন্তব্যে সরকার বিব্রত হলেও মূল অ্যাকশনটা হয়েছে প্রধানমন্ত্রীর পুত্রকে তাচ্ছিল্য করে বক্তব্য দেয়ার দায়ে।
    নিশা দেশাই 'দুই আনার মন্ত্রী' 
    সম্প্রতি বাংলাদেশ সফর করেন যুক্তরাষ্ট্রের সহকারী পররাষ্ট্রমন্ত্রী নিশা দেশাই বিসওয়াল। এই সফর নিয়ে চরম বিরূপ প্রতিক্রিয়া প্রকাশ করেন আওয়ামী লীগ সাধারণ সম্পাদক ও স্থানীয় সরকার মন্ত্রী সৈয়দ আশরাফুল ইসলাম। তিনি গত ২৯ ডিসেম্বর খুলনায় দলের এক সম্মেলনে বক্তৃতাকালে নিশা দেশাইকে 'দুই আনার মন্ত্রী'হিসেবে আখ্যায়িত করেন। বিএনপি চেয়ারপার্সন বেগম খালেদা জিয়ার সঙ্গে নিশা দেশাইয়ের বৈঠকের প্রসঙ্গ উল্লেখ করে সৈয়দ আশরাফ বলেন, 'মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের দুই আনা, চার আনাও না- এক মন্ত্রী আছে নিশা দেশাই। ভারতীয় বংশোদ্ভূত, যদিও সে মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের নাগরিক। সাবেক প্রধানমন্ত্রী খালেদা জিয়াকে ইঙ্গিত করে তিনি বলেন, 'টেলিভিশনে দেখে মনে  হয়েছে ২২/২৩ বছরের মেয়ের সামনে খালেদা জিয়া একদম শিশু। হাত পেতে বসে আছেন ক্ষমতাটা যাতে এই মিস দেশাই খালেদা জিয়ার হাতে তুলে দেবেন।'একই অনুষ্ঠানে সৈয়দ আশরাফ বাংলাদেশে নিযুক্ত বিদায়ী মার্কিন রাষ্ট্রদূত ড্যান ডব্লিউ মজিনারও সমালোচনা করেন। রাষ্ট্রদূত মজিনাকে 'কাজের মেয়ে মর্জিনা'বলে সম্বোধন করেন তিনি। আশরাফ বলেন, 'কয়দিন আগে উনি (খালেদা জিয়া) ছিলেন আরেকজনের দিকে তাকিয়ে। মজিনা তো কত চেষ্টা করল নির্বাচনটা বন্ধ করার জন্য, শেখ হাসিনা যাতে প্রধানমন্ত্রী না হতে পারে তার জন্য। এমন কোনো প্রচেষ্টা নাই তিনি করেন নাই। আল্লার ওয়াস্তে সবশেষে চাকরির মেয়াদও শেষ, ক্ষমতাও শেষ। আগামী সপ্তাহে তিনি যুক্তরাষ্ট্রে পাড়ি দেবেন। জীবনে হয় তো আর বাংলাদেশে আসবেন না। বাংলাদেশ কিন্তু ওই অবস্থায় নাই যে 'কাজের মেয়ে মর্জিনা'বাংলাদেশের ক্ষমতার রদবদল করবে।'এর আগে কৃষিমন্ত্রী মতিয়া চৌধুরী ও শিল্পমন্ত্রী তোফায়েল আহমদও যুক্তরাষ্ট্র সম্পর্কে বিভিন্ন প্রকার বিরূপ মন্তব্য করেন।
    'ঘুষ'অবৈধ নয়?
    'ঘুষ দেয়া-নেয়া অবৈধ নয়'বলে সামাজিক ও ধর্মীয় মহলে বিতর্ক তোলেন আরেক সিনিয়র মন্ত্রী আবুল মাল আবদুল মুহিত। তিনি বলেন, 'যা কোনো কাজের গতি আনে, আমি মনে করি তা কোনো অবৈধ বিষয় নয়। উন্নত দেশগুলোয় একে বৈধ করে দেয়া হয়েছে ভিন্ন নামে।'গত ১২ নবেম্বর বাংলাদেশ ব্যাংকের এক অনুষ্ঠানে তিনি বলেন, 'কারো কাজ দ্রুত করে দিয়ে উপহার নিলে তা অবৈধ মনে করা হয়। কিন্তু এ ক্ষেত্রে আমি তা অবৈধ মনে করি না।'মুহিতের 'ঘুষ অবৈধ নয়'এমন মন্তব্যের প্রেক্ষিতে বিভিন্ন সামাজিক যোগাযোগ ও গণমাধ্যমে তোলপাড় শুরু হলে তিনি আত্মপক্ষ সমর্থন করে দেয়া এক বিবৃতিতে বলেন, 'বাংলাদেশের প্রেক্ষাপটে তিনি এ ধরনের মন্তব্য করেননি।'অর্থমন্ত্রীর এ বক্তব্যের পর দেশের বিভিন্ন ইসলামি সংগঠন ও শীর্ষ ওলামায়ে কেরামগণ প্রবল ক্ষোভ প্রকাশ করেন। তারা অর্থমন্ত্রীকে মন্ত্রিসভা থেকে বহিষ্কার ও তার দৃষ্টান্তমূলক শাস্তির দাবি জানিয়ে গণমাধ্যমে বিবৃতিও দেন। হেফাজতে ইসলামের পক্ষ থেকেও এর প্রতিবাদ জানানো হয়।
    বঙ্গবন্ধুর ভাষণে জয় পাকিস্তান!
    আওয়ামী লীগেরই আরেক ঘরের লোক মুক্তিযুদ্ধের উপ-অধিনায়ক সেক্টর কমান্ডার্স ফোরামের বিদায়ী সভাপতি ও সাবেক মন্ত্রী একে খন্দকার বীরোত্তম তাঁর লেখা আত্মজৈবনিক গ্রন্থ '১৯৭১ : ভেতরে বাইরে'প্রকাশের পর তাঁর নিজের দল আওয়ামী লীগকে চরম বেকায়দায় ফেলে দেন। এর ফলে আওয়ামী লীগ বেজায় ক্ষুব্ধ হয়। এই বিবরণের গুরুতর ও উল্লেখযোগ্য দিক হলো, বইয়ের ৩২ পৃষ্ঠায় একে খন্দকার লিখেছেন, ঐতিহাসিক ৭ মার্চ বঙ্গবন্ধুর ভাষণের শেষ শব্দ ছিল 'জয় পাকিস্তান'। এছাড়া একে খন্দকার তার বন্ধু মঈদুল হাসানের বরাত দিয়ে বলেন, 'তাজউদ্দীন আহমদ ১৯৭১ সালের ২৫ মার্চ রাতে স্বাধীনতার একটি ঘোষণাপত্র লিখে বঙ্গবন্ধু শেখ মুজিবুর রহমানকে তা পাঠ করতে বললেও তিনি রাজি হননি। উল্টো তিনি বলেন, 'এটা আমার বিরুদ্ধে একটা দলিল হয়ে থাকবে। এর জন্য পাকিস্তানিরা আমাকে দেশদ্রোহের বিচার করতে পারবে।'এ কথা শুনে তাজউদ্দীন আহমদ ক্ষিপ্ত হয়ে বঙ্গবন্ধুর বাসা থেকে বেরিয়ে যান।'এ ছাড়া 'মুজিব বাহিনী ভারতীয়দের কাছ থেকে সম্মানী পেতো', 'মুজিব বাহিনী অস্থায়ী সরকার ও মুক্তিবাহিনীকে অবজ্ঞা করত'মুক্তিযুদ্ধকালীন এমন আরো কিছু তথ্য তিনি তার বইয়ে উল্লেখ করেছেন। একে খন্দকারের এই বই নিয়ে তাঁর বিরুদ্ধে তিরস্কার, গালাগালি ও সমালোচনার বন্যা বয়ে যায়। সংসদ অধিবেশন থেকে রাজপথ, আলোচনার টেবিল ও সামাজিক যোগাযোগ মাধ্যমসহ প্রায় সবখানেই দলের বাঘা বাঘা নেতা থেকে পাতি নেতা পর্যন্ত একে খন্দকারের পি-ি চটকানোর কাজ চলে। দলের নীতিনির্ধারকদের কেউ কেউ বইটি অবিলম্বে নিষিদ্ধের দাবি তোলেন। ইতিহাস বিকৃতি ও রাষ্ট্রদ্রোহিতার অভিযোগে সরকারের প্রভাবশালীরা তাঁকে গ্রেফতারেরও দাবি জানান। একজন নেতা তাঁকে 'কুলাঙ্গার'এবং আরেকজন নেতা 'রাষ্ট্রদ্রোহী'আখ্যা দেন। 
    মুজিববাহিনীর আক্রমণের লক্ষ্যবস্তু মুক্তিযোদ্ধারা!
    প্রবাসী সরকারের প্রধানমন্ত্রী ও দলের তৎকালীন সাধারণ সম্পাদক তাজউদ্দীন আহমদ এবং আ'লীগের সাবেক ভারপ্রাপ্ত সভাপতি জোহরা তাজউদ্দীনের কন্যা শারমিন আহমদ তাঁর রচিত স্মৃতিচারণমূলক গ্রন্থেও আওয়ামী লীগের সাজানো ইতিহাসকে তছনছ করে দেন। তাঁর এই বইয়ের বিবরণ নিয়ে তিরস্কার করতে ছাড়েননি দলের অনেক নেতা। তাঁর 'তাজউদ্দীন : নেতা ও পিতা'গ্রন্থে তিনি উল্লেখ করেন, 'পূর্ব পরিকল্পনা অনুযায়ী আব্বু (তাজউদ্দীন আহমদ) স্বাধীনতার ঘোষণা লিখে নিয়ে এসেছিলেন এবং টেপ রেকর্ডারও নিয়ে এসেছিলেন। টেপে বিবৃতি দিতে বা স্বাধীনতার ঘোষণার স্বাক্ষর প্রদানে মুজিব কাকু অস্বীকৃতি জানান। কথা ছিল যে, মুজিব কাকুর স্বাক্ষরকৃত স্বাধীনতার ঘোষণা হোটেল ইন্টারকন্টিনেন্টালে (বর্তমানে শেরাটন) অবস্থিত বিদেশী সাংবাদিকদের কাছে পৌঁছে দেওয়া হবে এবং তাঁরা আন্ডারগ্রাউন্ডে গিয়ে স্বাধীনতাযুদ্ধ পরিচালনা করবেন। আব্বু বলেছিলেন, 'মুজিব ভাই, এটা আপনাকে বলে যেতেই হবে, কারণ কালকে কী হবে, আমাদের সবাইকে যদি গ্রেপ্তার করে নিয়ে যায়, তাহলে কেউ জানবে না, কী তাদের করতে হবে। এই ঘোষণা কোনো-না-কোনো জায়গা থেকে কপি করে আমরা জানাব। যদি বেতার মারফত কিছু করা যায়, তাহলে সেটাই করা হবে।'মুজিব কাকু তখন উত্তর দিয়েছিলেন 'এটা আমার বিরুদ্ধে দলিল হয়ে থাকবে। এর জন্য পাকিস্তানিরা আমাকে দেশদ্রোহের জন্য বিচার করতে পারবে। ---মুজিব কাকুকে আত্মগোপন বা স্বাধীনতার ঘোষণায় রাজি করাতে না পেরে রাত নয়টার দিকে আব্বু ঘরে ফিরলেন বিক্ষুব্ধ চিত্তে। আম্মাকে সব ঘটনা জানালেন। মুজিব কাকুর সঙ্গে পুরান ঢাকার পূর্ব নির্ধারিত গোপন স্থানে আব্বুর আত্মগোপন করার কথা ছিল। মুজিব কাকু না যাওয়াতে পূর্ব পরিকল্পনা ভেস্তে যায়।'শারমিন আরো লিখেছেন, '--একদিকে আব্বুকে (তাজউদ্দীন আহমদকে) যেমন প্রতিহত করতে হয়েছিল আন্তর্জাতিক চক্রান্ত তেমন যুবনেতাদের অনাস্থা ও ষড়যন্ত্র এবং আওয়ামী লীগের একাংশের অন্তর্কলহ ও কোন্দল। বঙ্গবন্ধুর ভাগ্নে শেখ ফজলুল হক মনির নেতৃত্বে যুবনেতারা স্বাধীন বাংলাদেশ তথা মুজিবনগর সরকারের প্রতি অনাস্থা প্রদর্শন করে।'শারমিন আরো লিখেছেন, '--আগস্টে আব্বু যখন দিল্লি সফর করেন, সেখানে তিনি 'র'এর সাহায্যপুষ্ট 'মুজিব বাহিনীর'ক্রমবর্ধমান উচ্ছৃঙ্খল কার্যকলাপ ও সরকার-বিরোধী ভূমিকা সম্পর্কে গভীর উদ্বেগ প্রকাশ করেন এবং এই স্বাধীনতাযুদ্ধকে বিভক্তকারী মারাত্মক সমস্যা সমাধানের জন্য পি.এন হাকসার (ইন্দিরা গান্ধীর সচিব) এবং 'র'এর প্রধান রামনাথ কাওয়ের সাহায্য চান। কিন্তু দুজনেই নীরব..।'শারমিন আরো জানান, 'সমগ্র জাতির মুক্তি ও কল্যাণের লক্ষ্যে আব্বুর নিবেদিত কর্মপ্রয়াসের বিপরীতে অনুগত তরুণদের ক্ষুদ্র অংশকে নিয়ে সঙ্কীর্ণ ব্যক্তিস্বার্থে গঠিত মুজিব বাহিনীর প্রতিষ্ঠা বাংলাদেশের স্বাধীনতা সংগ্রামকে ব্যাপকভাবে ক্ষতিগ্রস্ত করছিল। তাদের আত্মঘাতী কর্মকা- ও ভিত্তিহীন অপপ্রচারণা তাঁদের ক্রমশই অপ্রিয় করে তোলে। পাকিস্তানি সেনাবাহিনী নয়, বরং মুক্তিযোদ্ধাদের বিভিন্ন ইউনিট হয় মুজিববাহিনীর আক্রমণের লক্ষ্যবস্তু। জাতীয় মুক্তিসংগ্রামের কাতার থেকে তারা এভাবেই বিচ্ছিন্ন হয়ে পড়ে। ভারত সরকারও তাদের প্রশিক্ষণ বন্ধ করে দিতে বাধ্য হয়। একপর্যায়ে মুজিববাহিনীর শীর্ষস্থানীয় এক নেতা এতটাই হিংসাত্মক ও মরিয়া হয়ে ওঠে যে সে আব্বুকে হত্যারও প্রচেষ্টা চালায়।'এছাড়া 'মুক্তিযুদ্ধের পূর্বাপর-কথোপকথন'নামক গ্রন্থেও মুক্তিযুদ্ধের তিন দিকপাল একে খন্দকার, মঈদুল হাসান ও এস আর মির্জা আওয়ামী লীগের গড়া ইমেজকে প্রশ্নবিদ্ধ করে তুলেছেন। 
    ভাষ্যকারদের মতে, আওয়ামী লীগ বঙ্গবন্ধু ও স্বাধীনতার ইতিহাসকে সম্পূর্ণ নিজেদের মতো করে সাজিয়ে তুলেছিলো। কিন্তু এসব গ্রন্থের তথ্যাবলি সেই সাজানো ইতিহাসকে তছনছ করে দিয়েছে। এভাবে ভেতর থেকে একের পর এক বিস্ফোরণে রীতিমত বেকায়দায় পড়েছে ক্ষমতাসীন আওয়ামী লীগ। একদিকে দলীয় লোকজনের খুন-হত্যা, টেন্ডারবাজি, চাঁদাবজি, দুর্নীতি-লুটপাটের অভিযোগ, অপরদিকে সরকারের অভ্যন্তরীণ বিষয় নিয়ে ঘরের লোকদের একের পর এক মন্তব্যে সরকারের ভেতরে এখন চরম অস্থিরতা বিরাজ করছে বলে জানা গেছে। রাজনীতি বিশ্লেষক ও সচেতন মানুষ মনে করছেন, সরকার শাক দিয়ে মাছ ঢেকে রাখার যে চেষ্টা করে আসছিলো তা মন্ত্রী-উপদেষ্টারা সবই ফাঁস করে দিচ্ছেন।

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    Dhaka daily dish, 180th Issue, 3rd Dec '14

     
    Dear all
    Another fine feature from respected senior-most Journalist
    Mr Serajur Rahman, former Chief of Bangla Service, BBC, London.
    With all his experience and expertise in media for a prolonged period of 
    almost half century– he is indeed a living legend in his sphere.  His 
    analysis and comments matter a lot to intelligentsia. Thanks.
    Haque, Lowell, MA, USA.
     
    সময়ের ভাবনা

    জমিদারের জিয়াফত এবং গাধা  গাজরের কাহিনী

    সিরাজুর রহমান,28 Nov 14, Naya Diganta, Post Editorial               

    অনেক   দিন   আগের   এক   কলামে   লিখেছিলাম   এই   সত্যি   কাহিনীটি ।   পুনরুক্তির   জন্য  
    সহৃদয়   পাঠকের ক্ষমা   পাবো ,  আশা   করি ।   আমার   ছোটবেলায়   আমাদেরই   এলাকায়  
    ঘটেছিল   ব্যাপারটা ।   চৌধুরী জমিদারদের   বাড়িতে   বিয়ে ।   সাত   গ্রামের   মানুষকে  
    জিয়াফতে   দাওয়াত   দেয়া   হয়েছে   ঢোল   পিটিয়ে ।  সাধারণ   মানুষ   প্রায়ই    অর্ধভুক্ত -
    অভুক্ত   থাকে ।   অন্যরাও   আগের   দিন   থেকে   না   খেয়ে   ছিল ।   চৌধুরীবাড়ির  জিয়াফত  
    পেট   ভরে   ভালো - মন্দ   মণ্ডা - মেঠাই   খাবে ।   ……….
       দিকে   মন্ত্রী   ও   আওয়ামী   লীগের   কোনো   কোনো   নেতার   ঔদ্ধত্য   অনেক   বেড়ে  েছে 
    চুনোপুঁটি মন্ত্রীরাও   এখন   মানুষকে   ভয়   দেখাচ্ছেন ।   এত   দিন   ভয়   দেখাচ্ছিল   ক্যাডারেরা
    বাংলাদেশে   অমুককে কবর   দেয়া   যাবে   না ,  তমুকের   জানাজা   হবে   না ।   পিয়াস   করিম  
       অন্য   সত্যভাষীদের   লাশ   শহীদ মিনারে   নেয়া   যাবে   না ।   এখন   হুমকি   নিয়ে  ময়দানে
    নেমেছেন   মন্ত্রীরা ।   কারোই   বুঝতে   অসুবিধা হওয়ার   কথা   নয়   যে ,  তারা   মহা   দুশ্চিন্তায় 
    আছেন ।   চাকরি   আর   বেশি   দিন   নেই ।   ক্ষমতার অপব্যবহা   ও   দুর্নীতিসহ   বহু  
    অপকর্ম   করেছেন   অনেকে ।   ' হিসাব   দেয়ার   এসেছে   সময় ।   গদি   গেলে সেসবের   তদন্ত  
    হবেই   এবং   তখন   কাঠগড়ায়   দাঁড়াতে   হবে   তাদের ।   তা   ছাড়া   বহু   অত্যাচার   আর
    নির্যাতন   করা   হয়েছে ।   ভুক্তভোগীরা   আদালতের   বিচারের   মুখ   চেয়ে   থাকবেন ।   তবে  
    অনেকের ধৈর্যের   বাঁধ   ভেঙেও   যেতে   পারে ।   ধারণা   করা   যায় ,  দুশ্চিন্তায়   রাতে   মন্ত্রীদের
    ঘুম   হয়   না ।   বিনিদ্র রজনী   জেগে   তারা   মকশো   করেন   সকালে   ওঠে   খালেদা   জিয়ার  
    বিরুদ্ধে   কী   গালিগালাজ   করবেন । এক   প্রতিমন্ত্রী   বলেছেন ,  যারা   জয়   বাংলা   স্লোগান  
    দেবে   না ,  তাদের   বাংলাদেশে   থাকতে   দেয়া   হবে না ।   এক   কালের   গডফাদার   খ্যাত  
    আরেক   মন্ত্রী   বলেছেন ,  বিএনপিকে   দেশছাড়া   করতে   হবে  ' যেন   বাংলাদেশ   তাদের  
    বাপের   সম্পত্তি ।   আল্লাহ   যাদের   ধ্বংস   করতে   চান   তাদের   আগে   উন্মাদ   করে দেন ।  
    আর   বাংলা   প্রবাদেও   আছে , ' অতি   বাড়   বেড়ো   না   ঝড়ে   উড়ে   যাবে '  ।    ।  ।

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    বরিশালে নার্সদের ওপর চড়াও পুলিশ, আহত ৪০, আটক ১৪


    বরিশালে সড়ক অবরোধকারী ইনস্টিটিউট অ্যান্ড হেলথ টেকনোলজি (আইএইচটি) শিক্ষার্থীদের ওপর লাঠিচার্জ করেছে পুলিশ। এ সময় শিক্ষার্থীরাও পুলিশকে লক্ষ্য করে ইটপাটকেল নিক্ষেপ করে। এ ঘটনায় ৩ পুলিশ কনস্টেবল সহ ৪০ জন আহত হন। গতকাল সকাল ১১টার দিকে নগরীর বান্দরোড শেবাচিম হাসপাতালের সামনে এ ঘটনা ঘটে। এ সময় ১৪ শিক্ষার্র্থীকে আটক করে পুলিশ। আহত শিক্ষার্থীদের শেরেবাংলা মেডিক্যাল কলেজ হাসপাতালে ভর্তি করা হয়েছে। শিক্ষার্থীরা জানান, অবিলম্বে 'বাংলাদেশ ডিপ্লোমা মেডিক্যাল এডুকেশন বোর্ড'গঠন, ৪ বছর মেয়াদি ডিপ্লোমা মেডিক্যাল টেকনোলজি ও ফার্মেসি কোর্স চালু, নতুন পদ সৃষ্টি, আইনগত সমস্য নিষ্পত্তি, সরকারি চাকরিতে ডিপ্লোমা মেডিক্যাল টেকনোলজিস্ট ও ফার্মসিস্টদের ২য় শ্রেণীর গেজেটেড কর্মকর্তা পদমর্যাদা, উচ্চশিক্ষা সমপ্রসারণে বিএসসি ও এমএমসি কোর্স চালু, Bangladesh University of Medical Science and Technology গঠন করাসহ ১০ দফা দাবি আদায়ের লক্ষ্যে সকাল ১০টায় শিক্ষার্থীরা বান্দরোডে মানববন্ধন শুরু করে।

    http://www.amardeshonline.com/pages/details/2014/12/04/261819#.VH_EuGcxi88


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    THE 18TH KATHMANDU SAARC SUMMIT THAT DID NOT YIELD MUCH

    [The 18th SAARC Kathmandu summit  did not offer much to share here with our readers. There is no reason to be happy about and tell it was a success when Nepal can't trade with Bhutan or there is no use okaying the 500 or 1000 Indian Rupee Note uses in the market when Nepalese workers in India can't open a bank account in Indian banks to transfer what they earn to Nepal. While coming home from India, Nepalese workers are looted by Indian thugs as they have to carry the money in bundles.] 


    By B. K. Rana

    The 18th Kathmandu SAARC summit, the first since 2011, concluded today in Kathmandu. For the summit meeting, Kathmandu, the capital city of Nepal, was donned like a bride: streets reworked and cleaned up, sidewalk vase planted flowers bloomed naturally like in square gardens, painted street walls and member country flapping flags that fluttered in the gentle winds seemed welcoming everyone to the capital city. The member country leaders praised Nepal for having beautifully organized the summit ! The acronym – SAARC - stands for 'South Asian Association for Regional Cooperation' and was founded in 1985 with 7 founding member countries in alphabetical order – Bangladesh, Bhutan, India, Pakistan, Maldives, Nepal and Sri Lanka.

    Then  Indian Prime Minister Indira Gandhi had shown some reluctance in founding any such organization as Nepal was then already proposed a 'Zone of Peace', which India never appreciated and approved of as well. As anyone can understand, India is the major player, however, Pakistan also asserts its greater role within the organization. In Kathmandu this time, Pakistan recommended China and South Korea for the organization's full memberships and the reason it offered for was China's recent 'growth and rise' and bringing in Central Asia more closer. It may sound a wise proposal, bringing China into the forum but India may not appreciate it saying, 'China is not in South Asia' and also would further retort, 'Could SAARC countries also ask for ASEAN memberships or like such others ?' If China were to be included, SAARC  would require changing into some other name - befitting China and South Korea also, as BIST-EC has now become BIMSTEC - the  Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation. 

    The 1971 fall of Dhaka and birth of Bangladesh which used to be East Pakistan is what  Pakistan feels humiliated of and can't just forget about. There are some Hindu nationalists that also do not accept even today, the 1947 Indian sub-continent partition. India and Pakistan have long-standing unresolved Kashmiri issue. The hanged Pakistani Prime Minister Zulfiqar Ali Bhutto on December 15, 1971, tore down the papers at the UN Security Council meeting and walked out denouncing the proposal that he thought was to "legalize aggression, legalize occupation" or in other words was very much in favour of India. (Please watch a Video below).



    One of the Modi government ministers said earlier this year that India would repeal its constitution's article 370 which provides greater autonomy for the Muslims in the state of Kashmir but not to the Hindu folks. Kashmir, according to Bhutto is 'a disputed territory' and since long a hotbed of terrorism in South Asia. In early October this year, 9 civilians were killed in Indo-Pak border firings. The agreed 2003 ceasefire still holds, but the neighbours often accuse each other of violating it. This fresh skirmish is what caused Indo-Pak leaders to not formally meet during the Kathmandu Summit. India and Pakistan have fought 4 wars until recently all of them were for the disputed territory of Kashmir and all the wars were won by India.

    During the summit meeting, Indian Prime Minister Narendra Modi and Pakistani Prime Minister Nawaj Sharif distanced themselves, even did not seem looking at each other, but upon Nepalese Prime Minister Sushil Koirala's 'sincere request', the former two unwillingly shook hands only to be clapped by few onlookers after the conclusion of the summit ! The duo's  body language told they were in confront-mood, not yielding to each other and, one of the Nepalese former Prime Ministers Dr. Babu Ram Bhattarai, posted on his Facebook wall as saying - "Until and unless India and Pakistan have normal relations, SAARC will suffer only a 'ritualistic' fate". He meant, in substance, SAARC has just become like some 'fashion show' in some lavish hotel wherein least developed and impoverished country leaders gather, shake hands, talk of their own, go on a retreat, issue a joint declaration and fly back home ! That's all. It does not have that much effect in the global spectrum although the region is populated with more than 1 billion and 700 million people. The western media did not really care about it.

    South Asia is plagued with terrorism. While addressing the summit meeting, Prime Minister Nrendra Modi paid tribute to November 26, 2008 Mumbai Taj Hotel terrorist attack victims also. The terrorist attack took 164 innocent lives wounding 308 others. India insists it has evidence that the attack was 'sponsored' by Pakistani Government but Pakistan just does brush the allegation aside. The Indian media report Pentagon Generals as saying "Pakistan (is) using militants as proxies to counter superior Indian military". India has suffered terrorist attacks several times already in the past and the July 7, 2013 Bodh Gaya bomb blast was latest in the list. 


    Referring to the 2002 Gujarat riot that killed, according to official figures, 790 Muslims and 254 Hindus, some people in Pakistan see Narendra Modi as a 'Hindu Taliban'. Since PM Modi has vowed to crush terrorism, 'Ayman al-Zawahiri, the leader of al-Qaida, on the other hand has also announced the formation of an Indian branch of the extremist organization, calling on Muslims across the subcontinent to join the "caravan of jihad". The Indian Mujahideen - IM - is active in India and Nepal borders. India suspects the IM jihadits hide and operate from Nepal also.

    Prime Minister Modi on his Sunday, August 3, 2014 address to Nepal's National Assembly in Kathmandu, the first ever address by any foreign leader, had declared he would visit Janaki Temple in  Janakpur, East Nepal Terai also while attending the SAARC summit. The Indian media had published a long list of his itineraries. The Indian Prime Minister Modi was also reported in the media he would distribute some 3000 bicycles and also speak to the general public which among many others, The Himalayan Voice also had objected. In the absence of his counterpart Prime Minister Sushil Koirala, Prime Minister Modi's speech would have violated diplomatic norms and protocol also. The controversy flared up and he had to cancel the visit. In an unrestrained speech at the Bir Hospital, National Trauma Center that he handed over to Nepal Government, the visibly frustrated Indian PM Modi told he would visit the temple some other time and had bought a sapling to plant in Lumbini Garden also. He further told by visiting Janaki Temple,he wanted to experience by himself how it felt crossing the borders overland ? This all suggested he regretted not having an opportunity to visit the temple and Lumbini garden also. PM Modi should have visited any places he liked in Nepal but not chosen to speak to the general public everywhere he reached out. He offered a lecture at the Madison Square Garden in New York and in Sydney, Australia also and likewise President Bill Clinton had also offered a talk to some business leaders in Mumbai also but those were the different conditions. PM Modi should have visited the Janaki temple and not wanted to speak to the general public. If he had done so, he would have an opportunity to present himself as an accomplished statesman in South Asia.

    Prime Minister Modi landed in another controversy as he suggested Nepalese leaders bring a 'consensus  constitution' on time. He explicitly told to make room in the constitution for 'Pahadi' and 'Madheshi' peoples' aspiration also. With the term 'Pahadi', he meant the agitating Adivasi Janajatis or the indigenous folks that are thrown in the margin for centuries and now seek recognition and a fair share in the governance whereas by 'Madheshi' he meant the Terain folks, that also feel humiliated and second graded in the country as one of the results of which C. K. Raut campaigned for the secession of Terai from Nepal although no Terain political parties seemed supporting his movement.

    The 18th SAARC Kathmandu summit  did not offer much to share here with our readers. There is no reason to be happy about and tell it was a success when Nepal can't trade with Bhutan or there is no use okaying the 500 or 1000 Indian Rupee Note uses in the market when Nepalese workers in India can't open a bank account in Indian banks to transfer what they earn to Nepal. While coming home from India, Nepalese workers are looted by Indian thugs as they have to carry the money in bundles. 

    The two major stakeholders: India and Pakistan are at loggerheads  as usual and as long as it persists SAARC will not yield any fruits expected and adding more countries such as China and South Korea into it would also not help much. Both India and Pakistan have to demonstrate their willingness to educate people against social evils that persist there such as:  hanging a Dalit to death by a Pachayat in India for having affair with a married womanand militants gunning down health workers in Pakistan. There is not much to be excited about the regular gatherings of South Asian leaders in some certain places which they call summit meetings.

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    CHINA AND INDIA RACE FOR DAMS ON RIVER BRAHMAPUTRA: IMPACTS COULD BE MASSIVE AND UNKNOWN

    Posted by The Himalayan Voice:
    [China certainly wants to utilize Tibetan water resources  for its development.  It is presumed that one day Chinamay divert waters from the Great Bend of the Yarlung Tsangpo (River Brahmaputra), north of the McMahon Linebuilding another mammoth dam, much bigger than the Three Gorges Dam, the biggest in the world.  Among many,  Engineer Guo Kai's 'Shuotian Canal Project' has been viewed as a perfect model which would 'save China withTibet's waters'. "This will be another gigantic powerplant with an astonishing generation capacity of 20-40,000 Mega Watt! Nothing like this exists today in the world. If built - this will be the largest in the world. How large? Sheer three times bigger than the current world's largesthydroelectric plant- the Three Gorges Dam. To put it into perspective this one plant can fulfill the entire energy need of Bangladesh five times over. The taming of this mighty river will require nuclear explosives to punch hole in Himalayan Mountains!"]


    By B. K. Rana

    (The Three Gorges Dam in Yangtze River in China, The largest dam in the world)
    This week China'smassive Three Gorges Dam  on the Yangtze River  is undergoing a majortest of the flood control function, one of the key justifications for this project, astorrential rains swell rivers that feed it, reportsThe China Post. 

    This giant dam which, submerged 13 cities, 140 towns, 1352 villages, 657 factories & 30,000 hectares of cultivated landconstruction works completed last year (1993 – 2009)is the world's largest dam and largest hydro-power project which  will generate "an incredible 18.2 gigawatt of electricity from its 26 hydro turbines. Theoutput is equivalent of 18 typical coal power stations (40 million tons of coal), or the power used by four cities the size of Los Angeles".

    It is obvious that China requires more energy as well waters as it has four times bigger the population than that of  the United States. And it has enough financial and human resources to undertake such huge projects, which it  has been doing since ancient times.  'China is the greatest economic growth zone in history. Already the world's third-largest economy behind the United States andJapan, China now accounts for 7.5% of the world's total economic activity. It's on track to pass Japan no later than 2010, and may pass the United States by 2020. The country's economy has increased by a cumulative 371.3% in the last 40 years, an annual average of 9.3%" - outlines Kieth Fit-Zerald, the Chief Investment Strategists at Money Morning in Baltimore, USA. 'By 2040 the Chinese economy will reach $123 trillion; nearly three times the economic output of the entire globe in 2000' - writes Robert Fogel for Foreign Policy.

    The current Chinese economic growth has  been a tool for maintaining  socioeconomic balance at a healthful level.  Even an 8 % GDP growth rate is  very healthy for Chinabut lesser than that may cause some difficulty:  some sort of social unrest - lack of job and unemployment. Therefore, China looks for  bigger projects to fund and create jobs and empower its own people. And, the  Tibetan Water projects  can serve the purpose.

    Tibet - The Water Tower of Asia:

    (The Great Bend of River Brahmaputra)
    Since decades Chinese experts have been looking around for water resources. Tibet is  also called the water tower ofAsia. Nearly 90% rivers flow downstream from the Tibetan plateau to China, India, Bangladesh, Nepal, Pakistan, Thailand, Burma, Laos, Cambodia and Vietnam also.

    China certainly wants to utilize Tibetan water resources  for its development.  It is presumed that one day Chinamay divert waters from the Great Bend of the Yarlung Tsangpo that is River Brahmaputra - pictured left), north of the McMahon Line building another mammoth dam, much bigger than the Three Gorges Dam, the biggest in the world.  Among many, Engineer Guo Kai's Shuotian Canal Design has been viewed as a perfect model which would 'save China with Tibet's waters'. 

    "This will be a gigantic power plant with an astonishing generation capacity of 20-40,000 Mega Watt! Nothing like this exists today. If built- this will be the largest in the world. How large? Sheer three times bigger than the current world's largest hydroelectric plant- the Three Gorges Dam. To put it into perspective this one plant can fulfill the entire energy need of Bangladesh five times over. The taming of this mighty river will require nuclear explosives to punch hole in Himalayan Mountains!"

    But, the real concern in the downstream is not on the generation of hydro-electricity. The proposed dam will "divert 200 billion cubic meters of waters to the Yellow River for easing water shortages in cities of Shaanxi,Beijing and Tianjin in Northern China." writes  The Real Time Bangladesh

    The impact  would be profound, massive and unknown. The  Indigenous Portal  also reports: "The water diversion project at the Great Bend will spell disaster for the Tibetan plateau and the lower riparian countries, India's North East and Bangladesh. Officially the projects have been termed as the great South-North water diversion project of China. India fears Chinese reported plans to use nuclear technology in the project will lead to environmental concerns in the Eastern Himalayas.  Indian experts say the mega scheme could be disastrous for the 185 million people of India's North East and Bangladesh. There is also serious concern about the Earthquake disaster: the region's regular earthquakes that can hit 8.0 on the Richter scale, can destroy the proposed Chinese dam and cause devastating floods downstream."

    (Zangmu Hydro-Power Project in Tibet near Nepal border)

    Exacerbate Tensions Between Two Countries:

    a) One possibility, currently denied though, China may divert water from the Brahmaputra to drought stricken areas in China, leaving India andBangladesh short.

    b)  "Area of giant dams is seismically unstable. The tectonic plate on which India sits is pushing against the Asian plate, uplifting the Himalaya Mountains. Recent earthquakes in Sichuan Province have been devastating."

    c) "Dams will sequester silt that normally gets washed to the flood plains of India and Bangladesh renewing fertility and maintaining elevation in light of rising sea levels."

    d) The border between China and India in this area is not settled. An aggressive push to industrialization in this area may exacerbate tensions between the countries. This is being felt in New Delhi.


    There was an uproar in Indian parliament last May. The opposition party leaders were seeking answer to the proposed (28 dams  and 38 Gigawatt power production) Brhamputra Dam. Please watch the video below.


    ***

    [Worried that China might build a very big dam on theBrahmaputra River near its borders, India has recently approved two big dams of their own, "in principle", on the same river downstream in its state of Arunachal Pradesh. What is interesting, and disturbing at the same time, is that India is building these dams to pre-empt China by establishing a prior use claim.]

    A key member of India's Planning Council, Dr. Kirit Parikh, is reportedly pushing for this idea as "a broad strategic vision". I disagree with Dr. Parikh because China is not known for respecting riparian rights on international rivers. On the contrary, I think his words would only give more excuse for China to push ahead with their plans. 
    What follows is an editorial I wrote in 2004 in response to the news that India expressed concerns about Chinese plans then:

    Let the Brahmaputra Flow
    Tashi Tsering
    Trin-Gyi-Pho-Nya: 

    Tibet's Environment and Development Digest. January 12, 2004, Issue 4.

    India finally expressed concern over Chinaís plans to divert the Brahmaputra River. In November 2003, several Indian news reports carried a story that the Indian state of Assamís Union Ministry of Water Resources asked their foreign affairs counterparts ìto seek factual detailsî about the project. Indiaís concerns became real after Chinaís official news agency, Xinhua, confirmed Chinaís intentions. According to Xinhua, preliminary studies of the water diversion project were conducted at the proposed construction site in mid-2003, followed by another round of feasibility studies in October. It would not be surprising if China denies having such plans, as did Tibet Autonomous Regionís Chairman, Xiang Ba Ping Cuo, at a press conference last August.

    Construction of this mammoth multi-purpose project is tentatively scheduled to start in 2009. The main structures are planned in Tibetan areas of Pema Koe, near Indiaís northeastern border. The area is also known as the ìGreat Bendî of the Yarlung Tsangpo (Tibetan name for Brahmaputra) where the river takes a sharp U-turn to enter into India. At the Great Bend, the Tsangpo River descends over 3,000 meters in approximately 200 km, constituting one of the greatest hydropower potentials anywhere in the world. China hopes to build a hydroelectric plant there that would generate twice the electricity produced by the Three Gorges Dam, currently the worldís largest dam. Plans also include diverting the waters thousands of kilometers across the Tibetan Plateau to the ìthirstyî northwestern parts of China, into the provinces of Xinjiang and Gansu.


    If undertaken, the project is bound to raise some serious transboundary issues. Claude Arpi, a Tibet-China-India analyst, called the project ìa declaration of warî by China. "When it comes to a transboundary question, where the boundary is not even agreed upon, it seems practically impossible to find a workable understanding," Arpi said. In addition to border disputes, the project would make India and Bangladesh dependent on China for release of water during the dry season, and for protection from floods during the wet season. Not to mention the adverse impacts on the millions of people living downstream when nutrient rich sediments and fish will be blocked by the dam. Arpi believes the most serious issue to be the fact that the Great Bend area is located in a highly earthquake prone area. "A huge reservoir and a few PNEs [Peaceful Nuclear Explosions, as proposed by Chinese scientists to make tunnels through the Himalayas for the project] could provoke new earthquakes even more devastating than in August 1950 when thousands died."

    Such massive water control projects are clearly a state (central government) undertaking--without the economic and political support of the state, these projects cannot proceed. Unfortunately, and often ironically, national leaders prefer to marvel at their engineering accomplishments in controlling nature to serve economic development rather than addressing issues of transboundary and socio-environmental responsibilities. In fact, Chinaís plan to divert the Brahmaputra would impair India's own plan to link approximately thirty of its own rivers, a project that is bound to affect the downstream riparian state of Bangladesh.

    Such international transboundary river development projects raise many important issues--from the comparative importance of national economic development to issues of social justice, from the primacy of territorial sovereignty to the merits of international cooperation. As important as these intractable topics of debate are, policy makers ought not to forget the real issue--the concern expressed by the affected people. After all, states exist to provide material and physical security to the people. The goal of development policies should be to benefit the people first, not powerful interest groups like corrupt bureaucracies and businesses.

    While the Brahmaputra Diversion Plan will bring sizeable benefits to China in the form of construction jobs, electricity, and water for the "thirsty north," the price that the affected people and the environment must pay is clearly unacceptable. For the local Tibetans, the project is an imposition on their land and their birthright by the occupying Chinese government. The beneficiaries of the project are foreigners while "locals" are made to bear its price. If China is genuinely committed to human rights and sustainable development as it claims to be, then the Brahmaputra Diversion Plan should not be undertaken. 


    @  Tibetan Plateau

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    For the final assault against Indian people,the Billionaire Millionaire hindutva hegemony gears up!

    Palash Biswas

    The Lal quila is booked for Gita Mahotsav and all those who are not the offsprings of Rama,has been branded as bastards.A Church is burnt in Delhi,the capital which practices apartheid with full venom.The Day is not far away as the ruling NDA is making India an America inflicted with racial Vedic civilization changing history,geography,demography and so on,that all the places of worship non hindu and all memorials and entire archaeological heritage non Hindu including the Red Fort and the Taj would be claimed by the Kar Sevaks from Gujarat!


    Nevertheless, the stalemate in Rajya Sabha over the hate speech by Union Minister Sadhvi Niranjan Jyoti continued on Thursday with the Opposition appearing to be in no mood to relent on its demand for her ouster even as Prime Minister Narendra Modi has made a statement on the issue.


    It would continue as I am afraid  until the bull`s eye struck the eye washing would continue to accomplish the task of reforms legislation before US President Barack Obama lands in New Delhi to celebrate a hijacked Republic Day.


    As labour reforms made new laws depriving the working class, workers are told to withdraw PF and they have to reappointed afresh.The guillotine is working so fine in robotic, biometric, digital US Periphery.E tailing made FDI in multi brand retail quite irrelevant and the business friendly minimum governance is all set to kill retail business in India.


    The government's disinvestment plan will kick off on Friday with a 5% stake sale in Steel Authority of India (SAIL) as it looks to raise a record amount from asset disposals with barely four months to go in the current fiscal year.The Economic Times reports.The government may raise around . 1,700 crore through the sale, going by ` the stock price. The company informed the stock exchanges about the proposed stake sale to be held through the offer for sale (OFS) route on December 5 and said that the government will decide on the floor price for the issue on Thursday .



    Mind you,amid the tussle between the government and opposition parties, Parliament approved a labour law that redefines small factories and frees small companies from furnishing separate labour returns. The approval comes two days after Parliament approved amendments to the Apprentices Act, 1961, and sets the ball rolling on labour reforms to ease the process of doing business in India. The Labour Laws (Exemption from Furnishing Returns and Maintaining Registers by Certain Establishments) Amendment Bill, 2011, was approved by Lok Sabha on Friday. On 25 November, Rajya Sabha had approved the draft law after a discussion on black money.As live mint reported.




    Linkage of cash subsidy to bank account would make the trasferred amount taxable and it would make subsidy irrelavnt.It is name of the game for those wo still manage to survive above the poverty line and would,however climb down with more FDI,more automation,more privatisation,more sell off,more lock out ans sutters down and the omnipotent free flow of foreign capitalas well as black money.


    However,it would rather sound amusing that Oil prices have been dropping sharply over the past three months — a huge energy story with major repercussions for dozens of countries, from the United States to Russia to Iran.But on Friday, prices went into serious free-fall. The reason? OPEC — a cartel of oil producers that includes Saudi Arabia, Iran, Iraq, and Venezuela — had a big meeting in Vienna on November 27. Before the gathering, there was speculation that OPEC countries might cut back on their own oil production in order to prop up prices. But in the end, the cartel couldn't agree on how to respond and did nothing.


    For the final assault against Indian people,the Billionaire Millionaire hindutva hegemony gears up!


    Here you are! It is the current status of the parliamentary democracy of People`s Republic India reduced to a FDI Raj of a military state ruled by absolute power without any space of freedom whatsoever.Without any space for civic and human rights! Without any space for green,weather cycle,Bicycle,ecology,climate or environment and we stand quite detached,quite detached at this juncture so crucial for the nation and nationality,for freedom ,sovereignty and unity or integration.It is all abput money making.It is all about making in dissmissing whtever made in India.


    Personally,it was a horrible day last day as we lost our friend and colleague Apan Roychowdhury,retired as Editor in Charge,Financial Express.He talked to the personnel department day before yesterday and we had to hear that he just succmbed to diabetes within a year of his retirement.I just broke the news at home but could not tell Sabita the cause of his death as we both happen to be diabetic.


    On the other hand,the senior reporter in Jansatta,Prabhakar Mani Tiwari lost his father who had been in ICU for the last week.


    I may not have any words for the bereaved families as I understand that no consolation is enough while someone loses his dearest ones all of a sudden.


    But the nation is in ICU under the absolute rule of Billionaire Millionaire hegemony,it is more a awesome trouble.As legendary scribes Rajendra Mathur and Prabhash Joshi had been justifying the Operation blue star and writing that the nation is on operation table,similar situation has emerged.Once again the nation is on operation table.We know the results of the Operation Blue Star as no body at the time could expect.It is turning the be predestined disaster ,predestined ethnic cleansing and predestined mass destruction.


    I have booked the tickets today.I would reach Nagpur on 3rd January.I have some friends there and at least one of them would accompany me on 4th January in Wardha,I hope.I would stay in Wardha on 4th and 5th January.I would attend your programme and in between I would like to interact with each and everyone in the campus,specifically every student there.


    I would be in Nagpur on 6th and 7th thereafter and therefrom would return Kolkata.


    I would be in Wardha and Nagpur from 3rd January to seventh January to interact with students and youth.In future,I would rather concentrate on my interactions with students,youth,ladies and workers which have the potential to do something decisive.I just wasted ten full years addressing the employees sector to sector.I It proved disappointment all the way.


    Those who have grown beyond doubt and who are being hired with dollar bags ,it is going to be a merry Xmass if the Sangh Pariwar allows to celebrate. Over the next two years, the Obama Administration would focus significantly on India-US economic and financial partnership and support the reform effort of the Indian government, a US official has said.


    Coincidentally,winter session of the Indian Parliament is under pipeline to pass all the reform bills with undeclared consensus highlighting non issues  all the way and making news of nonsense.


    Bamboo Politics of hate speech to polarize respective vote banks is the name of the game,power politics and we have been witnessing this for decades in identity struck democratic cricket fixed as well as betted on.But the winter session is dedicated to hate speeches just because  to drop a huge curtain of legislation and policy making which herald total disaster with complete mind control with surgical precision.


    Thus,Economic Times reports:

    Govt ready to change `foreign investment' in Bill to FDI

    The government is determined to get the long-pending Insurance Bill passed in the winter session of Parliament and may even, as a last resort, concede an Opposition demand for riders to be put in place in the legislation aimed at raising the limit on overseas investment in the sector to 49% from 26%.

    To be sure, most members of the select committee that met on Wednesday for a clause-by-clause discussion on the Bill have agreed to a composite cap of 49%, but this could still be reconsidered so as to take all Opposition parties on board, a senior government official told ET.

    Some members want this to be limited specifically to foreign direct investment (FDI), which means only insurers would be allowed in, the worry being that portfolio investment flows would be volatile. The government could drop the controversial `foreign investment' clause and replace it with `foreign direct investment' in a bid to get the Bill passed.

    "This can be looked at, as a measure of abundant caution," the official said.

    In its present form, the Bill seeks to allow overseas investments both in the form of FDI and foreign institutional investment (FII) amounting to 49% in the insurance sector.

    A senior executive at a private life insurer said a composite limit was preferable, since restricting this to FDI would make the sector less attractive.

    "The government should not bind itself with only increasing the foreign investment cap through FDI route. There should be a composite cap on the foreign investment giving profitable insurers the avenue to tap capital markets," he said.

    http://epaperbeta.timesofindia.com/index.aspx?eid=31817&dt=20141204




    Describing this as "a win-win" proposition, the US official said, the partnership would also encourage greater opening of India's economy to US firms and improving the climate for US investment in the country.


    "Over the next two years, we plan to focus significant attention on the US-India Economic and Financial Partnership –the US Treasury's main vehicle to engage on economic issues with India. "Through this Partnership, we will support India in its growth and reform efforts and encourage the greater opening of India's economy to US firms," Treasury Undersecretary Nathan Sheets said.


    "This is, again, a "win-win" proposition," Sheets said.


    "We can create new growth and employment opportunities in the United States by further opening this growing market for US exports, improving the climate for US investment in India, and levelling the playing field for US companies," he said. "For India, faster growth, deeper financial markets, and greater openness to trade and foreign investment promise to raise incomes, reduce poverty, and bring many more Indians into the global middle class," he added.


    The top Treasury official said the US has an important window of opportunity to deepen its economic engagement with India.


    "India and its people share with the United States an entrepreneurial spirit, a commitment to a vibrant private sector, and a record of economic growth built largely on domestic demand," Sheets said.


    He said one of the top priorities of the Obama Administration is engagement with the world economy's emerging giants, notably China and India in Asia, as well as Mexico and Brazil in Latin America.


    "We are committed over the next two years to finding ways to continue to strengthen our bilateral relationship with China – such as by advancing negotiations on a high-standard bilateral investment treaty – and to work together in multilateral settings," he said.

    Smriti spelt out the government's stand and policies on alternative systems of education

    On the other hand,Union Human Resource Development Minister Smriti Irani in written replies to questions raised in the Lok Sabha, spelt out the government's stand and policies on alternative systems of education, revamping of mid-day meal schemes and criteria for grant of autonomy to select colleges.

    On the issue of alternative systems of education, Irani said that the present National Curriculum Framework (NCF-2005) takes care of any new development and concern in the school level education system.

    She further said that addressing these concerns, the NCF–2005 follows five guiding principles i.e. (i) connecting knowledge to life outside the school, (ii) ensuring that learning is shifted away from rote methods, (iii) enriching the curriculum to provide for overall development of children rather than remain text book centric, (iv) making examinations more flexible and integrated into classroom life and, (v) nurturing an over-riding identity informed by caring concerns within the democratic polity of the country.

    The minister added that various curriculum materials developed by the NCERT provide children opportunities to bring experiences in the classroom and also provide scope of infusing arts, heritage craft and work across the subjects at all levels, which in turn, helps in developing sensitivity towards all culture. Cultural aspects in education are an integral part of school curriculum at all the stages.

    She said that the National Policy on Education 1986, as amended in 1992, has been the guiding document for the policies of the Central Government in the education sector. "The government has been following National Policy on Education 1986, as modified in 1992, which provides for National System of Education implying that up to a given level, all students, irrespective of caste, creed, location or sex, have access to education of a comparable quality. The National System of Education envisages a common educational structure," she said.

    On the revamping of the mid-day meal scheme, Irani, in her written reply, said, that the government of India has requested all states and union territories to have the meals tested in accredited labs. She further revealed that the Governments of the NCT Delhi and Punjab have engaged accredited labs for testing of samples in their state.

    Governments in the states and union territories may involve food inspectors to collect the food samples for testing on quality parameters. Irani further stated that the mid-day meal guidelines envisage that teachers should not be assigned responsibilities that will impede or interfere with teaching and learning. "Teachers should, however, be involved in ensuring that (i) good quality, wholesome food is served to children, and (ii) the actual serving and eating is undertaken in a spirit of togetherness, under hygienic conditions, and in an orderly manner so that the entire process is completed in 30-40 minutes," she said in her reply.

    She added, "It should however, be ensured that the food prepared is tasted by 2-3 adults including at least one teacher before it is served to children. Thus, the teacher is to supervise that the mid day meal is served in an orderly manner within specified time (recess period) and to taste the meal on rotational basis before it is served."

    The guidelines provide that, as far as possible, the responsibility of cooking, supply of cooked midday meal should be assigned to local women's/mothers' self-help group or local youth club affiliated to the Nehru Yuvak Kendras or a voluntary organization or by personnel engaged directly by the School Management Committee (SMC)/Village Education Committee (VEC)/Parent Teacher Association (PTA)/Gram Panchayat/Municipality.

    The minister revealed that the mid-day meal scheme covers 10.80 crore children in 11.58 lakh schools during 2013-14. The Scheme provides for a mechanism to deal with complaints and grievances of the stakeholders. The Ministry of HRD has been issuing instructions from time to time for effective implementation of the Scheme.

    On criteria for grant of autonomy to select colleges, Irani said it included factors like academic reputation and previous performance in university examinations and its academic/co-curricular/extension activities in the past; academic/extension achievements of the faculty; quality and merit in the selection of students and teachers, subject to statutory requirements in this regard; adequacy of infrastructure, for example, library, equipment, accommodation for academic activities, etc.; quality of institutional management; National Assessment and Accreditation Council (NAAC) accreditation of 'B' grade or above; financial resources provided by the management/state government for the development of the institution; responsiveness of administrative structure and motivation and involvement of faculty in the promotion of innovative reforms etc.

    As per the latest XIIth plan guidelines, once a college attains the status of an autonomous college, it is entitled for the following privileges: have freedom to determine and prescribe its own courses of study and syllabi, restructure and redesign the courses to suit local needs; prescribe rules for admission in consonance with the reservation policy of the state government; evolve methods of assessment of students' performance, the conduct of examinations and notification of results; use modern tools of educational technology to achieve higher standards and greater creativity; promote healthy practices such as community service, extension activities, projects for the benefit of the society at large, neighbourhood programmes, etc.

    She revealed that the scheme of autonomous colleges is being implemented by the University Grants Commission (UGC) to provide autonomy to select colleges. As on date there are 487 autonomous colleges (affiliated to 93 universities) in 24 states and union territories in the country.


    India's FIMI flays proposed mine legislation


    The new mining and mineral sector legislation proposed by the Indian government, which envisions an auction process to allocate resources, would be the death knell for the industry, the Federation of Indian Mineral Industries (FIMI) claimed.


    In a communication to Prime Minister Narendra Modi, by way of comments on the new Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill 2014 slated to be placed before the ongoing Parliament session, FIMI said that no resource-rich country adopted auction as a method to allocate naturalresources and, if adopted, could lead to cartelization and waste of resources.


    In a strongly worded response to the legislation, FIMI said that framers of the amendment Bill were not aware of the state and reality of the Indian miningindustry.

    It said that most resource-rich countries had not adopted the auction route and the allocating of natural resources based on competitive bids over fears of cartelization and monopolization in the industry, rather opting for a 'first-come-first-served' philosophy as a preferred route for allocating natural resources to prospective investors.


    FIMI maintained that the auction route would lead to selective mining of higher-grade mineral resources while low-grade minerals would not be optimally extracted, inflating costs of extractions and making such minerals uncompetitive compared to imported minerals.


    Coming down heavily on the draft of the legislation, FIMI said that the framers of the proposed law had assumed that India possessed rare minerals not available or produced anywhere in the world, whereas the reality was that minerals produced in India were abundantly available in several countries.


    On the contrary, the proposed law completely overlooked the necessity of exploring for natural resources which were currently scarce and in respect of which the country was highly import dependent.


    The draft legislation also took no notice of the fact that there was scarce global capital available for exploration and development of mineral resources, a high risk venture, and made no effort to make investments in the Indian miningsector attractive to global investors, as is the case in resource-rich countries likeAustralia and South Africa, which would see foreign direct investors, instead of making India a destination, moving to other lucrative markets, FIMI said.

    http://www.miningweekly.com/article/indias-fimi-flays-proposed-mine-legislation-2014-12-03



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    Internacionalización

    Internacionalización. ¿Lo has pensado?

    Desde que empezó la crisis ha habido un tema sobre el que se ha creado un amplio consenso en España: el mercado interior se queda pequeño a nuestras PYMES y se busca una mayor presencia de España en el mundo.

    El apoyo a las PYMES con vocación internacional nunca ha sido tan intenso. Si crees que tu empresa o proyecto puede y/o debe tener una dimensión internacional, este es el momento.

    ICO internacional y exportadores

    El ICO puso en marcha estas dos líneas específicas para internacionalización. Con condiciones y tramitación similares (pero con ciertos matices) a las líneas ICO habituales, esta financiación se tramita en los bancos y cajas.

    CDTI

    El CDTI ofrece su apoyo a cualquier PYME española que quiera internacionalizar su tecnología. Dicha tecnología puede haber sido desarrollada por la empresa en un proyecto CDTI anterior, en un proyecto financiado por otra Administración o en un proyecto llevado a cabo con los recursos propios de la empresa. Las solicitudes se tramitan directamente en el CDTI.

    ICEX

    Facilita el acceso a financiación para internacionalización a través de diversos convenios. Destaca el acuerdo con CERSA, que permite obtener financiar a empresas que necesiten el aval de una SGR. Esta solicitud se tramita directamente en el ICEX.

    FIEM

    El Fondo para la Internacionalización de la Empresa y su línea EVATIC, dependientes de la Secretaría de Estado de Comercio del Ministerio de Economía y Competitividad, son un instrumento excelente para la financiación de proyectos de cierta complejidad y que se encuadren en mercados clave para la economía española y con un marcado efecto arrastre exportador.

    Solicítanos información sin ningún tipo de coste ni compromiso de contratación.

     


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    ---------- Forwarded message ----------
    From: Hastakshep समाचार पोर्टल<news.hastakshep@gmail.com>
    Date: 2014-12-05 0:13 GMT+05:30
    Subject: (हस्तक्षेप.कॉम) 6 दिसंबर 1992-श्रीमद् भगवत गीता के दर्पण में
    To: hastakshep@googlegroups.com


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    • हिंदू साम्राज्यवाद का पुनरूत्थान का समय है कारपोरेट मुक्तबाजार

      Posted:Wed, 03 Dec 2014 19:36:38 +0000
      जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी के सारे देशवासी भक्त नहीं हैं लेकिन भारतीय इतिहास उनकी भूमिका के बगैर अधूरा है।  उनके जनम मरण को मिटाने पर तुला संघ परिवार अब अल्पसंख्यकों के पर्व त्योहारों का...

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    • प्रधान स्वयंसेवक मोदी जी और सार्क सम्मेलन

      Posted:Wed, 03 Dec 2014 18:35:01 +0000
      बहुत घूम लिए विदेश में कुछ दिन तो गुजारिए देश में। जब मोदी शरीफ के साथ मजबूत रिश्ते रख सकते हैं तो पाकिस्तान के साथ भारत की औपचारिक बातचीत क्यों नहीं हो सकती ? नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं...

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    Tilak Shrestha <tilakbs@gmail.com>

    9:28 PM (3 hours ago)

    Dear all:

    Namaste!

    Nepal was and still is the only Hindu rastra. It is a matter the wishes of Nepalese people, regardless of India or Modi Jee. Let me remind:

    1. The declaration of 'secularism' does not have people's mandate. The issue was never discussed in public, nor came from. To impose such important national decision without mandate is the 'Treason.' Only way the status from Hindu rastra may be changed is through public debate and referendum. Otherwise, the declaration of secularism remains unconstitutional and unacceptable.

    2. The concept of secularism applies only on Religions like – Christianity, Islam and Communism. It is irrelevant to Dharma like ours. Dharmas are not Religions. A Dharma is about truth 'Satya' and inner spiritual discipline 'Yoga.' A religion is about social control through brain washing. Religions are not spiritual systems. Thus, secularism means not letting any religion to interfere with politics. However, Hindu rastra simply means recognition of our heritage, roots and values; not theocracy.

    3. It is well known that the change in status from the only Hindu rastra is done with bribery and corruption to facilitate Christian conversion. 

    Advair, Kapil, 2010. "Hindu nation sold on Rs. 20 million" Review Nepal, July 26, 2010     http://www.reviewnepal.com/detail_news.php?id=656

    Kaidi, Prem. 2006. "Joshua II ko Paisama Dharma Niripekshya" Janamanch, June 11, 2006. PKaidi@yahoo.com

    Shah, Saubhagya. 2008. "Civil society in uncivil places: Soft state and regime changes in Nepal" Policy studies 48. East-West Center, Washington DC.  www.eastwestcenter.org/washington

    Wagle, Achyut. 2011. "Christianity, Communism & Constitution"Republica \ opinion, July 5, 2011. Editor of the 'Arthik Abhiyan'http://www.myrepublica.com/portal/index.php?action=news_details&news_id=33108

    4. Our shared heritage, roots and values are the very basis of our nationhood. Merely having bunch of people together does not a make a nation. Otherwise, a prison will be a great nationalist institution.

    5. Let me also add that we have many Dharmas in Nepal, like Shiva Dharma, Buddha Dharma, Vaishnav Dharma, Tantra Dharma etc. All these Dharmas are collectively known as the 'Hinduism' or Sanatana Dharma. Shiva Dharma is also known as Tibetan bon Po and Kirati Mundhum. Shiva's teachings are spread out far and wide including in Veda, Kirati Mundhum, Tibetan Bon Po, and South Indian Agama. The unity of the three principal sects of Hinduism in Nepal – Bauddha (Buddha), Shaiva (Nilkantha) and Vaishnav (Narayan) is beautifully given in the temple located in Kathmandu valley, which we lovingly call – 'Budha Nilkantha Narayan.'

    Thanks, Tilak


    बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस को ही बाबरी विध्वंस  के लिए क्यों चुना संघ परिवार के हिंदुत्व ब्रिगेड ने ?


    नवउदारवादी जमाने में अमेरिकी इजराइली समर्थन से ग्लोबल हुए हिंदुत्व के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध बाबासाहेब अंबेडकर के साथ इस देश में कृषि आजीविका से जुड़े बहुसंख्य आबादी की लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष साझे चूल्हे की विरासत रही है और खंडित जाति धर्म नस्ल भाषा क्षेत्र अस्मिताओं और विविधताओं को जोड़कर सतीकथा की तरह एकात्म हिंदुत्व के बिना पंडित जवाहर लाल नेहरु की ओर से रखी गयी हिंदू साम्राज्यवाद की नींव पर मुकम्मल  इमारत तामीर करने से पहले एक धर्मोन्मादी महाविस्फोट की जरुरत थी,जो बाबरी विध्वंस है और जिसमें बाबासाहेब समेत फूले, पेरियार, अयंकाली, लोखंडे,नारायणगुरु, हरिचांद गुकरुचांद बीरसा मुंडा,रानी दुर्गावती,सिधो कान्हो,चैतन्य महाप्रभू,संत तुकाराम,गुरु नानक,कबीर रसखान,संत गाडगे महाराज,लिंगायत मतुआ और तमाम आदिवासी किसान आोंदालनों की सारी विरासतें एकमुश्त ध्वस्त हैं।


    आप चाहे बाबासाहेब का परानिरवाण दिवस मनाइये, बाबरी विध्वंस के मौके पर काला दिन,उस विरासत को पूरी वैज्ञानिक चेतना के साथ अस्मिताओं के आरपार  फिर बहाल किये बिना मुक्तबाजारी कारपोरेट हिंदू साम्राज्यवाद की चांदमारी से आपकी जान बचेगी नहीं,चारा जो हरियाला है,वह दरअसल वधस्थल का वातावरण है।



    पलाश विश्वास


    बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस को ही बाबरी विध्वंस  के लिए क्यों चुना संघ परिवार के हिंदुत्व ब्रिगेड ने?


    बाबासाहेब के परानिर्वाण दिवस पर बाबासाहेब की कर्मभूमि मुंबई के चैत्यभूमि में श्रद्धांजलि देने के लिए शिवाजी पार्क पर शिवशक्ति में निष्णात भीमशक्ति के लाखों चेहरों पर यकीनन इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं लिखा होगा।


    6 दिसंबर को देशभर में बाबारी विध्वंस की वर्षी का जश्न और मातम मनाने वाले परस्परविरोधी भारत देश के आम नागरिकों के सरदर्द का सबब  भी नहीं है यह सवाल और न देश विदेश में बाबासाहेब की स्मृति में भाव विह्वल बाबासाहेब के करोड़ों अनुयायियों भक्तों के लिए इस सवाल का कोई महत्व है।


    इस सवाल पर गौर करने से पहले इस सूचना पर गौर करें कि संसद के शीतकालीन सत्र में गैर जरूरी करार दिये गये नब्वे कानूनों को एक मुश्त खत्म कर दिये गये विपक्ष की गैरमौजूदगी में। बिना बहस बिल  पास हो गया है।जैसा बाकी सारे कायदे कानून बदलने याबिगाड़ने के लिए होता रहा है और होता रहेगा।


    इस निरसन और संशोधन  (दूसरा) विधेयक का कोई ब्यौरा लेकिन उपलब्ध नहीं है।


    गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 90 पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को खत्म करने के लिए निरसन एवं संशोधन (दूसरा) विधेयक 2014 संसद में पेश किया। कानून मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने कहा कि "बहुत सारे कानून अप्रासंगिक हो गए हैं। ये भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं। सरकार शासन और प्रशासन में सुधार करने और इसे सरल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस वजह से ऐसे कानूनों को खत्म करना जरूरी हो गया है।'


    संसदीय कार्यमंत्री एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि सदन में कांग्रेस समेत विपक्ष मौजूद नहीं है। एकतरफा बहस के दौरान भाजपा की मीनाक्षी लेखी ने कहा कि 1998 में एक समिति बनी थी। उसने 1382 कानूनों को समाप्त करने की सिफारिश की थी। लेकिन इस दिशा में काम काफी धीमे-धीमे हुआ।


    पुराने और अप्रासंगिक कानूनोेंं को खत्म करने के लिए सरकार की ओर से बृहस्पतिवार को लोकसभा में पेश विधेयक पास हो गया। नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा शीतकालीन सत्र में रखे गये इस संबंधी विधेयक में अभी 36 पुराने पड़ चुके कानूनों को शामिल किया गया है। आने वाले समय में सरकार की योजना ऐसे 300 कानूनों को खत्म करने की है। सदन में भी कोई यह नहीं जानता था कि सड़क पर पड़े 10 रुपये के नोट को बटुए में रखने और बिना इजाजत पतंग उड़ाने से जेल हो सकती है। ये और इस तरह के कई कानून देश पर बोझ बने हुए हैं। इनमें से कई कानून तो ब्रिटिश शासन के समय से चले आ रहे हैं।


    सिर्फ एक गैर जरुरी कानून का हवाला देकर धकाधक एकमुश्त 1382 कानूनों को समाप्त कर दिया गयाहै और हम नागरिकों को मालूम भी नहीं हैं कि कौन कौन से कानून खत्म किये जारहे हैं और उनसे राजकाज में क्या सरलता आने है और किसके लिए सरलता आने वाली है।


    संसद में हमारे किसी जनप्रतिनिधि ने  इन खत्म होने वाले कानूनों का ब्यौरा नहीं मांगा है।बहरहाल सरका की तरफ से कहा जा रहा है कि इन कानूनों को खत्म करने से न्यायिक प्रक्रिया तेज हो जायेगी और फालतू मुकदमे खत्म हो जायेंगे।


    हम नही जानते कि ये फालतू मुकदमे किनके खिलाफ है और किनकी सहूलियत और किनकी सुविधा वास्ते येकानून खत्म किये जा रहे हैं।


    नवउदारवाद की संतानों को और उनके राजकाज को कारपोरेट हितों के अलावा किसी और चीज की परवाह है,ऐसा सबूत पिछले तेईस सालों से नहीं मिला है।


    समझ में आनी चाहिए लंबित जो परियोजनाएं हैं और उनमें जो देशी विदेशी पूंजी फंसी हैं,उनके सामूहहिक कल्याण के लिए ही ये कानून खत्म किये जा रहे हैं।


    हम सहमत है कि अगर मुख्यमंत्री बाहैसियत बंगाल की मुख्यमंत्री को अपशब्द कहने की स्वतंत्रता है तो बाकी लोगों को भी होनी चाहिए।


    राजनीति जो सिरे से अभद्र और अश्लील हो गयी है,उसकी वजह धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण के जरिये सत्ता समीकरण साधकर कारपोरेट सत्ता की बागडोर पर कब्जा करना है और रंग बिरंगी राजनीति के तमाम क्षत्रप और सिपाही खुलकर भाषा का दुरुपयोग कर रहे हैं।


    इसकी आड़ में संसदीय कार्यवाही के बहिस्कार के बहाने एकमुश्त 1382 कानून खत्म करने की जो नूरा कुश्ती तमाशा है,वही आज का लोकतंत्र है और बार बार सत्ता बदलाव के लिए गठजोड़ और सत्ता समीकरण बनाने बिगाड़ने के खेल से कुछ बदलने वाला नहीं है।हर्गिज नहीं बदलने वाला है।पानी सर के ऊपर बहने लगा है,दोस्तों।


    बाबासाहेब के परानिर्वाण दिवस पर इस बात को समझने की खास जरुरत है कि संघ परिवार बिना किसी योजना के ,बिना किसी योजना के सिर्फ शुभमुहूर्त के हिसाब से अपने एक्शन की तारीख तय नहीं करता।


    समझने वाली बात यह है कि केंद्र में पहली भाजपाई सत्ता समय में और उससे भी पहले इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ सत्ता में आये गैरकांग्रेसी अमेरिका परस्त सत्तासमूह के संघी तत्वों ने इजराइल भारत,ग्लोबल हिंदुत्व और ग्लोबल जायनी गठजोड़ की नींव रखी और भारत इजराइल संबंध का पहला पड़ाव,इस्लाम के खिलाफ तेलयुद्ध सह आतंक के विरुद्ध अमेरिका के महायुद्ध,मुक्त बाजार के अश्वमेध राजसूय के लिए हिंदू साम्राज्यवाद का पुनरू्थान अमेरिकी इजराइली हित और अबाध विदेशी पूंजी के लिए अनिवार्य धर्मोन्मदी राष्ट्रवाद के लिए योजनाबद्ध कारपोरेट केसरिया एजंडा रहा है बाबरी विध्वंस का यह मानवता विरोधी युद्ध अपराध।


    कांग्रेस और संघ परिवार के चोली दामन के साथ के रसायन को समझे बिना ,नेहरु के हिंदू साम्राज्यवाद को समझे बिना समाजवादी माडल के इंदिरा गाधी के गरीबी उन्मूलन के देवरस फार्मूले को समझे बिना इस नवउदारवादी वैदिकी मनुस्मृति सभ्यता को समझना आसान नहीं है।


    धर्मोन्मदी केसरिया कारपोरेट राज के लिए सबसे जरुरी यह था कि बहुसंख्य भारतीय कृषि आजीविका,देशज उत्पादन प्रणाली से जुड़े बहुसंख्य बहिस्कृत वंचित जनसमुदायों की पूरी विरासत और उनके इतिहास भूगोल,उनकी मातृभाषा,उनके लोक,उनके प्रतीकों को खत्म करना जो एकमुश्त संभव हो सका बाबरी विध्वंस में बाबासाहेब के परानिर्वाण दिवस को समाहित करने से।


    दलितों,आदिवासियों, किसानों,ओबीसी समुदायों,असुरक्षित शरणार्थियों,मुसलमान समेत तमाम धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों के गेरुआकरण का प्रस्थानबिंदू है यह छह दिसबंर का बाबरी विध्वंस तो यह अरबपति करोड़पति सत्ता वर्चस्वी नवधनाढ्य उत्तरआधुनिक मनुस्मृति वर्णशंकर सत्ता वर्ग का जन्म रहस्य भी है।


    जिसे समूचे एशिया को युद्ध भूमि में तब्दील करके ,नरसंहार संस्कृति के तहत प्रकृति और मनुष्यता के सर्वनाश के एजंडा के तहत पूरा किया गया सक्रिय कांग्रेसी साझेदारी के साथ अंजाम दिया संघ परिवार ने।


    समझने वाली बात है कि भोपाल गैस त्रासदी हो,या सिखों का नरसंहार यादेश व्यापी दंगो का षड्यंत्र,या बाबरी विध्वंस हो या आरक्षण विरोधी आंदोलन या फिर गुजरात नरसंहार राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सत्ता समीकरण का इतिहास भूगोल को समझे बिना हम समझ ही नहीं सकते कि इन घटनाओं को अंजाम देने वाले अभियुक्तों के अलावा सरगने शातिराना दिलोदिमाग और भी हैं।


    मानवता के विरुद्ध अपराधी उन युद्धअपराधी षड्यंत्रकारियों को,सरगाना ,माफिया गिरोहों को कटघरे में खड़ा करके बांग्लादेश के युद्ध अपराधियों की तरह एक ही रस्सी में पांसी दिये बिना मुक्तबाजारी यह कयामत कभी थमने वाली नहीं है।


    जिसके लिए वैज्ञानिक चेतनाके साथ बहुसंख्य भारतीकृषिजीवी प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षक समूहों की व्यापक एकता के लिए अपने असली इतिहास को समझे बिना और बाबा साहेब की विरासत को वैज्ञानिक चेतना से लैस किये बिना भावनाओं की राजनीति का अंजाम फिर वहीं केसरिया पैदल फौजे हैं जो हम हैं।


    जो चैत्यभूमि में लाखों की तादाद में जमा जनसमूह भी है।और करोड़ों अंध भक्त और अनुयायी बाबासाहेब के भी हैं जिसकी वजह से हमारे तमाम राम हनुमान हुए जाते हैं।


    नवउदारवाद की उच्च तकनीक वाले राजवीगाधी ने इसका शुभारंभ राममंदिर का ताला खुलवाकर किया तो नवउदारवाद के मसीहा नरसिंह राव और डां. मनमोहन सिंह के राजकाज के तहत संघ परिवार ने पूरे तालमेल के साथ इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया जो भारत में गृहयुद्ध युद्ध के वैश्विकि सौदागरों का मुक्त बाजार और अमेरिका और इजराइल के नेतृत्व में नागरिकता,नागरिक मनवाधिकार,प्रकृति और पर्यावरण,जल जंगल,जमीन आजीविका के हक हकूक से वंचित करने के पारमाणविक डिजिटल बायोमेट्रिक रोबोटिक आटोमेशन बंदोबस्त की बुनियाद है।



    संघ परिवार रके बाबरी विध्वंस एजंडे के तहत ही इजराइल के साथ भारतीय सत्ता तबके की प्रेमपिंगे तेज होती रही है और हमारी आंतरिक सुरक्षा अब अमेरिका इजराइल,मोसाद एफबीआई और सीआईए के हवाले हैं तो हमारी अर्थव्यवस्था और हमारा यह लोकतंत्र एकमुश्त अमेरिकी इजराइली उपनिवेश है,जो अब जापान के साथ भी साझा हो रहा है और इसीके साथ आकार ले रहा है ग्लोबल हिंदू साम्राज्यवाद का रेशमपथ।


    समझने की जरुरत है कि  यरूशलम के अल अक्श मसजिद के दखल के ड्रेस रिहर्सल बतौर बाबरी विध्वंस की योजना बनीं और उसकी पृष्ठभूमि भी तैयार की स्वंभू धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस ने बाबारी मस्जिद का ताला खुलवाकर।


    उससे भी पहले संघ कांग्रेस गठजोड़ ने मिलकर सिखोे के नरसंहार मार्फते हिंदुत्व के पुनरूत्थान को अंजाम दे दिया।वह अल अक्श मंदिर भी अब तालाबंद है और उसे भी किसी भी दिन ध्वस्त कर देगा इजराइल।


    जैसे अयोध्या मथुरा वाराणसी के एजंडे के मध्य ही थमा नहीं रहेगा बाबरी विध्वंस का अशवमेधी घोड़ा,लालकिले पर भागवत गीता महोत्सव के आयोजन और क्रिसमस दिवस पर अचल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन को पटेल के जन्मदिन को  एकता दिवस मनाने की तर्ज पर सुशासन दिवस बतौर मनाने के आयोजन और ऩई दिल्ली में ही गिरजाघर में आगजनी वागदात के माध्यम से समझा दिया है निरंकुश केसरिया कारपोरेट मुक्तबाजारी निरंकुश सत्ता ने,जिसमें समूची अरबपति करोड़पति रंग बिरंगी राजनीति निष्णात है ।


    धर्म निरपेक्षता तो एक मौकापरस्त सत्ता समीकरण है या फिर अस्मिता केंद्रित वोट बैंक समीकरण जिसके कितने और उपकरण और कितने और संस्करण उपस्थित हों मुक्तबजार में,आम जनता की कयामत बदलेगी नहीं।


    रामलला की आराधना की इजाजत और रामलला के भव्यमंदिर से बकरे की अम्मा को जाहिर है किसी की खैर मनाने की इजाजत नहीं मिलने वाली है और न विधर्मियों के भारतीयकरण और हिंदुत्वकरण से जनसंहार का सिलसालिा खत्म होना है क्योंकि इस उत्तरआधुनिक वैदिकी सभ्यता में भी वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।


    नवउदारवादी जमाने में अमेरिकी इजराइली समर्थन से ग्लोबल हुए हिंदुत्व के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध बाबासाहेब अंबेडकर के साथ इस देश में कृषि आजीविका से जुड़े बहुसंख्य आबादी की लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष साझे चूल्हे की विरासत रही है और खंडित जाति धर्म नस्ल भाषा क्षेत्र अस्मिताओं और विविधताओं को जोड़कर सतीकथा की तरह एकात्म हिंदुत्व के बिना पंडित जवाहर लाल नेहरु की ओर से रखी गयी हिंदू साम्राज्यवाद की नींव पर मुकम्मल  इमारत तामीर करने से पहले एक धर्मोन्मादी महाविस्फोट की जरुरत थी,जो बाबरी विध्वंस है और जिसमें बाबासाहेब समेत फूले, पेरियार, अयंकाली, लोखंडे,नारायणगुरु, हरिचांद गुकरुचांद बीरसा मुंडा,रानी दुर्गावती,सिधो कान्हो,चैतन्य महाप्रभू,संत तुकाराम,गुरु नानक,कबीर रसखान,संत गाडगे महाराज,लिंगायत मतुआ और तमाम आदिवासी किसान आोंदालनों की सारी विरासतें एकमुश्त ध्वस्त हैं।


    आप चाहे बाबासाहेब का परानिरवाण दिवस मनाइये, बाबरी विध्वंस के मौके पर काला दिन,उस विरासत को फिर बहाल किये बिना मुक्तबाजारी कारपोरेट हिंदू साम्राज्यवाद की चांदमारी से आपकी जान बचेगी नहीं,चारा जो हरियाला है,वह दरअसल वधस्थल का वातावरण है।


    शीतल चव्हाण ने सुबह ही यह पोस्ट दर्ज  कराया हैः

    "महामानव डॉ.बाबासाहेब आंबेडकरांचे महापरिनिर्वाण "

    रविवार ,२ डिसेंबरला नानकचंद रत्तू सकाळी नेहमीप्रमाणे सव्वासातला आले, तेव्हा बाबासाहेब बिछान्यात पडून राहिले होते. त्याला पाहताच बाबासाहेब म्हणाले, "आलास वेळेवर ! आज आपल्याला खूप काम करायचे आहे."ते बिछान्यातून उठले, चहा घेतला व 'कार्ल मार्क्सचे ''दास कॅपिटल 'या ग्रंथातील मजकूर परत डोळ्यांखालून घालून ' buddha & his dhamma 'या ग्रंथाच्या लेखनासाठी बसले. आणि नानकचंद ला टाईप करायला देत होते. हे काम संध्याकाळपर्यंत चालले .दिनांक ४ डिसेंबर ला बाबासाहेब सुमारे ८-४५ ला उठले . सकाळी सुमारे ११ वाजता बाबासाहेबांना भेटायला जैन धर्माचे काही लोक आले. त्यांनी याबाबतीत विचारविनिमय करावा अशी विनंती केली.बाबासाहेब त्यांना म्हणाले, 'यासंबंधी आपण उद्या रात्री ८-३० च्या नंतर चर्चा करू .

    दिनांक ५ डिसेंबर १९५६ ला नानकचंद ऑफिस सुटल्याबरोबर बाबासाहेबांच्या बंगल्यावर आले. तसा बाबासाहेबांचा नोकर सुदाम याने त्यांना फोन केला होता. बाबासाहेबांना झोप लागत नव्हती . ते अस्वस्थ होते. अशा परिस्थितीतही बाबासाहेब मधूनमधून 'buddha & his dhamma 'या ग्रंथांचा मजकूर लिहित होते ३-४ कागद लिहून झाले होते. तेव्हा नानकचंद संध्याकाळी ५-३० आले त्यावेळी बाबासाहेबांचा चेहरा म्लान झालेला व अस्वस्थ असलेले त्याला दिसले त्यांनी नानकचंदला लिहिलेले कागद टाईप करण्यास दिले. त्यानंतर काही वेळ गेल्यावर संध्याकाळी बाबासाहेब डोळे मिटून हळू आवाजात 'बुद्धं शरणं गच्छामि 'त्रिशरण म्हणू लागले . नंतर त्यांनी नानकचंद ला 'बुद्ध भक्तिगीते 'हि रेकॉर्ड लावायला सांगितली व त्या गीतांबरोबर आपणही गुणगुणू लागले नोकराने जेवण आणले तेव्हा बाबासाहेब म्हणाले 'जेवणाची इच्छा नाही 'पंरतु नानकचंद ने आग्रहाणे जेवावयास उठवले डायनिंग हॉलच्या दोन्ही बाजूंना भिंतींच्या कडेने ग्रंथांची कपाटे ओळीने लावलेली होती. त्या ग्रंथांच्या कपाटांना पाहत पाहत बाबासाहेबांनी एक दीर्घ निःश्वास सोडला . आणि हळूहळू चालत डायनिंग टेबलापाशी गेले. इच्छा नसतांना दोन घास खाल्ले .नंतर नानकचंद ला डोकीला तेल लावून मसाज करायला सांगितले . मसाज संपल्यावर ते काठीच्या साहाय्याने उभे राहिले आणि एकदम मोठ्यांदा म्हणाले ,"चल उचल कबीरा तेरा भवसागर डेरा."

    त्यावेळी ते फार थकलेले दिसत होते, चेहराही एकदम निस्तेज झाला होता. त्यांना झोप येऊ लागली तेव्हा नानकचंद ने जाण्याची परवानगी मागितली . ते म्हणाले "जा आता . पण उद्या सकाळी लवकर ये. लिहिलेला मजकूर टाईप करावयाचा आहे ."

    नानकचंद निघाले तेव्हा रात्रीचे ११-१५ झाले होते.

    दिनांक ६ डिसेंबर ला नानाकचंद सकाळी नेहमीपेक्षा उशीराच उठेल. ते सायकल बाहेर काढतात तोपर्यंत तर दारावर सुदाम उभा राहिला म्हणाला 'माईसाहेबांनी तुम्हांला लागलीच बोलावले आहे. नानाकचंद तसेच निघाले त्यांनी सुदामला विचारले एवढ्या घाईने का बोलावले आहे ? आणि बंगल्यावर पोहचल्यावर ते बाबासाहेबांच्या बिछान्याजवळ गेले आणि म्हणाले "बाबासाहेब मी आलोय ! असे भांबवून मोठयांदा ओरडले . साहेबांच्या अंगाला हात लावला त्यांना ते गरम असल्याचा भास झाला म्हणून ते छातीचा मसाज करू लागले ऑक्सिजन देण्याचा प्रयत्न केला हे सर्व प्रयत्न निष्फळ ठरले ,तेव्हा कळून चुकले कि , बाबासाहेबांच्या जीवनाचा प्रचंड ग्रंथ आटोपलेला आहे .

    बाबा गेल्याचे पाहून नानकचंद मोठ्यांदा रडू लागले. बंगल्यातील सर्व जण गोळा झाले माळ्याने तर बाबासाहेबांच्या पायावर लोळण घेतली आणि तोही रडू लागला .

    पुढची व्यवस्था करायची म्हणून नानकचंद यांनी ९ वाजता फोन करण्यास सुरवात केली व सर्वांना हि बातमी कळविली आणि बाबासाहेबांचा पार्थिव देह मुंबईस राजगृह येथे विमानाने आणण्यात येणार आहे हि बातमी मुंबईतील लोकांना कळली तेव्हा लोकांचे थवेच्याथवे विमानतळाकडे जाऊ लागले. दिल्लीहून बाबासाहेबांचा पार्थिव देह घेऊन विमान निघाले सांताक्रूझ विमानतळावर रात्री उतरले .तिथे आधीच सगळी व्यवस्था करण्यात आली होती .अॅम्ब्यूलन्स विमानतळावरून राजगृहाकडे जाण्यास निघाली. हजारो लोक थंडीत कुडकुडत रस्त्याच्या दोन्ही बाजूंना हातात हार घेऊन व डोळ्यातून अश्रूंना वाट करून देत उभे होते. वंदना घेत घेत अॅम्ब्यूलन्स हळूहळू चालत राजगृहाला आली. तेव्हा राजगृहापुढे जमलेल्या लाखो लोकांच्या तोंडून एकच आर्त स्वर निघाला .'बाबा ! 'आणि ते रडू लागले .

    स्त्रियांचा आक्रोश तर विचारायलाच नको ! मातांनी आपली मुले बाबांच्या चरणावर घातली. काहींनी भिंतीवर डोकी आपटली, कित्येकजणी मुर्च्छित पडल्या.

    हिंदू कॉलनीतील सवर्ण हिंदूंना बाबासाहेबांच्या पार्थिव देहाचे दर्शन घेण्यासाठी रांगेत तीन-चार तास उभे राहावे लागले . हिंदू कॉलनीतील लोकांनी , 'आमच्या वस्तीतील ज्ञानियांचा राजा गेला ! आमच्या हिंदू कॉलनीचे भूषण हरवले ! 'असे उद्गार काढले.

    एवढी जरी गर्दी तेथे जमली होती तरी लोक अत्यंत शिस्तीने अत्यंदर्शनासाठी उभे होते.

    बाबांचा पार्थिव देह राह्गृहात आणल्यानंतर बौद्ध भिक्षूंनी धार्मिक विधी पार पाडला हा विधी अत्यंत साधा होता. नंतर बाबासाहेबांच्या पार्थिव देहावर पावित्र्यनिदर्शक अशी शुभ्र वस्त्रे चढविण्यात आली पार्थिव देहाजवळ असंख्य मेणबत्त्या लावण्यात आल्या होत्या. त्यांच्या उशाला बुद्धांची एक मूर्ती होती. दुपारी एक वाजेपर्यंत सुमारे दोन लक्ष ( लाख ) लोकांनी अंत्यदर्शन घेतले . बाबासाहेबांच्या दुःखद निधनामुळे सुमारे दोन लक्ष कामगारांनी हरताळ पाळला. त्यामुळे पंचवीस कापड गिरण्या पूर्णपणे बंद होत्या. अनेकांनी आपली दुकाने बंद केली होती. शाळा कॉलेजमधील विद्यार्थ्यांनी देखील हरताळात भाग घेतला होता.

    एका शृंगाररलेल्या ट्रकवर बाबासाहेबांचा पार्थिव देह ठेवण्यात आला .त्या मागे बुद्धांची मूर्ती ठेवण्यात आली होती. त्यांच्याशेजारीच पुत्र यशवंतराव (उर्फ भय्यासाहेब आंबेडकर ) व पुतणे मुकुंदराव बसले होते. मिरवणुकीची लांबी सुमारे दीड ते दोन मैल होती. किमान दहा लाख लोकांनी भारताच्या या बंडखोर सुपुत्राचे अंतिम दर्शन घेण्यासाठी मार्गावर दुतर्फा गर्दी केली होती. एवढी मोठी प्रचंड गर्दी ! पण बेशिस्त वर्तनाचा एकही प्रकार कुठेही घडला नाही. अशाप्रकारे डॉ. बाबासाहेबांची अंत्ययात्रा निघाली परळ नाक्यापासून मिरवणूक एल्फिन्स्टनरोडकडे निघाली तेव्हा जिकडे तिकडे माणसांशिवाय दुसरे काहीच दिसत नव्हते.बरोबर दिनांक ७ डिसेंबर ५ वाजता महायात्रा दादरच्या चौपाटीवर आली. डॉ. बाबासाहेबांच्या शवाला अग्नी देण्यासाठी भागेश्वर स्मशानभूमीतच समुद्राच्या बाजूच्या भिंतीलगत एक वाळूचा प्रचंड चौथरा तयार करण्यात आला होता . बाबांचे शव ट्रकच्या खाली उतरविण्यात आले मेणबत्यांचे तबके घेतलेले चार भिक्षु पुढ होते. बाबासाहेबांचे शव सर्वांना दिसेल अशाप्रकारे एका उंच व्यासपीठावर ठेवण्यात आले. मुंबई सरकारतर्फे बाबासाहेबांच्या पार्थिव देहाला पुष्पहार अर्पण करण्यात आला. मुंबईतील व बाहेरगावची अनेक प्रमुख मंडळी उपस्थित होती. भिक्षूंनी धार्मिक विधीस प्रारंभ केला ते करूण दृश्य पाहतांना अनेकांच्या डोळ्यातून अश्रू वाहत होते. त्यांचा हा विधी आनंद कौसल्यायन यांच्या मार्गदर्शनाखाली झाला .यानंतर बाबासाहेबांचे शव चंदनाच्या चितेवर चढविले आणि डॉ. बाबासाहेबांच्या पार्थिव शवाला सशत्र पोलीस दलाने त्रिसर बंदुकीने बार काढून मानवंदना दिली व बिगुलाच्या गंभीर स्वरात त्यांच्या देहाला पुत्र यशवंतराव यांच्या हस्ते संध्याकाळी ७-१५ वाजता अग्नी देण्यात आला बाबासाहेबांच्या शवाला अग्नी देताच यांचे आप्तस्वकीय यांना संयम आवरता आला नाही ते चीतेकडे धावले ओक्साबोक्शी रडू लागले . व त्यांनी पुन्हा 'बाबांचे 'शेवटचे दर्शन घेतले. आणि काही क्षणात बाबासाहेबांचा पार्थिव देह कायमचा अनंतात विलीन झाला.

    रविवार दिनांक ९ ला सकाळी ८ वाजता दादर चौपाटीवर विस्तीर्ण वाळूच्या पटांगणात जाहीर शोकसभा झाली अध्यक्ष भदंत कौसल्यायन हे होते. आणि अनेक वक्ते उपस्थितीत होते. अनेकांची भाषणे झाली श्रीमती रेणू चक्रवर्ती यांनी भाषणात हे उद्गार काढले 'आम्हा तरुण सभासदांना डॉ. आंबेडकर यांच्या सान्निध्यात राहण्याचा अगर त्यांच्यबरोबर काम करण्याचा सुयोग मिळाला नाही. डॉ. आंबेडकर यांनी राज्यघटना व हिंदू कायद्याची संहिता जी मुळ तयार केली होती , ती उकृष्ट होती. आणि जोपर्यंत या दोन कृती भारतात अस्तीत्वात राहतील तोपर्यंत आंबेडकरांच्या अद्वितीय बुद्धीमत्तेचा व कर्तुत्वाचा स्मृतीदीप भारतात तेवत राहील .हिंदू समाजातील पिडीत व दलित लोकांना त्यांनी ज्ञानाची संजीवनी पाजून जिवंत केले आणि आपल्या मानवी हक्कांसाठी लढण्यास उभे केले. त्याचप्रमाणे त्यांनी पददलितांबद्दलची वरिष्ठ वर्गाची दृष्टी बदलून टाकली हे त्यांचे अनुपम थोर राष्ट्रकार्य होय.

    त्यानंतर आचार्य अत्रे यांनी सुद्धा भाषण केले ते म्हणाले या महान नेत्याच्या मृत्युच्या मृत्यूने मृत्यूचीच कीव वाटू लागली आहे. मरणानेच आज आपले हसू करून घेतले आहे .मृत्यूला काय दुसरी माणसे दिसली नाहीत ? मग त्याने इतिहास निर्माण करण्याऱ्या एका महान जीवनाच्या या ग्रंथावर , इतिहासाच्या एका पर्वावरच का झडप घातली ? भारताला महापुरुषांची वाण कधी पडली नाही . परंतु असा युगपुरुष शतकाशतकात तरी होणार नाही. झंझावाताला मागे सारणारा ,महासागराच्या लाटांसारखा त्यांचा अवखळ स्वभाव होता. जन्मभर त्यांनी बंड केले. आंबेडकर म्हणजे बंड असा बंडखोर शूरवीर , बहाद्दर पुरुष आज मृत्युच्या चिरनिद्रेच्या मांडीवर कायमचा विसावा घेत आहे.त्यांचे वर्णन करण्यास शब्द नाहीत.

    महामानव ,बोधिसत्व , भारतीय घटनेचे शिल्पकार डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर यांना महापरिनिर्वाण दिनी विनम्र अभिवादन व कोटी कोटी प्रणाम .....

    ! जय भीम ! !! जय भारत !! !!! नमो बुद्धाय !!!



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    • अलीगढ़ विश्वविद्यालय, राजा महेन्द्र प्रताप और ध्रुवीकरण के प्रयास

      Posted:Thu, 04 Dec 2014 18:30:30 +0000
      महेन्द्र प्रताप एक मार्क्सवादी थे परंतु उन्हें केवल एक जाट नेता बताया जा रहा है। वे धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति के खिलाफ थे और यह इससे स्पष्ट है कि उन्होंने भारतीय जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल...

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    • 'अखिल भारत शिक्षा संघर्ष यात्रा-2014'रैली व भोपाल महा-पड़ाव से एकजुट संघर्ष की शुरूआत

      Posted:Thu, 04 Dec 2014 18:16:02 +0000
      भोपाल। शिक्षा के निजीकरण, बाज़ारीकरण व सांप्रदायीकरण के खिलाफ़ और 'केजी से पीजी तक'पूरी तरह मुफ़्त व सरकार द्वारा वित्त-पोषित 'समान शिक्षा व्यवस्था'की स्थापना के लिए, 'अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच',...

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    • मोदी जी इसपे भी ध्यान दें ये आपके ही देश के लोग हैं

      Posted:Thu, 04 Dec 2014 17:49:06 +0000
      हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जायेगे हम तुमको खबर होने तक मिर्जा ग़ालिब के इस शेर के सही तौर पर इस्तेमाल होने का मौक़ा उस वक्त आया जब यह कालम लिखा जा रहा है। इस शेर के वाजिब तौर पर...

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    • सफाई मजदूरों पर अमानवीय पुलिसिया कहर की निन्दा

      Posted:Thu, 04 Dec 2014 17:43:49 +0000
      लखनऊ 4 दिसम्बर। अपने साथी की मौत पर मुआवजे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे अम्बेडकर पार्क के सफाई मजदूरों पर बर्बर लाठीचार्ज और पुलिसिया कहर की भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)  की लखनऊ जिला...

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    • Babri Masjid Stalemate: Aftermath of Hasim Ansari's Unwarranted Sensational Statement

      Posted:Thu, 04 Dec 2014 17:29:24 +0000
      Regarding the Babri Masjid latest turn of the events the sensation created by veteran Pairokar / Mutwalli of the Babri Masjid (Mohtaram Hashim Ansari Sb) who is closer to century. No doubt his...

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    • 6 दिसंबर 1992-श्रीमद् भगवत गीता के दर्पण में

      Posted:Thu, 04 Dec 2014 16:52:13 +0000
      पता नहीं सन् 1990-91 में चर्चित वह ऑडियो सीडी उमा भारती की थी या ऋतंभरा की, लेकिन उस आग लगाऊ भाषण में कहा गया था -होता है यदि एक बार तो महाभारत हो जाने दो।अयोध्या में ०६-१२-१९९२ को मर्यादा पुरुषोत्तम...

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    • Chhatrapati Shivaji's Memorial Gets Nod From Environment Ministry– Prakash Javadekar

      Posted:Thu, 04 Dec 2014 14:04:10 +0000
       New Delhi, 04:   Approval to erect a grand memorial of Chhatrapati Shivaji in the Arabian Sea has been given by the Ministry of Environment, informed the Union Environment Minister, Prakash...

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    Ajit HoKolorob writes why RSS chose to demolish Babri mosque on Babasaheb` Paranirvan Divas.

    ১৯৫৬ এর ৬ই ডিসেম্বর। বাবাসাহেব আম্বেদকর এর মৃত্যুদিন। ১৯৯২ সালের ঠিক ঐ দিনটাকেই বেছে নিয়েছিলো সংঘ-এর লোকরা বাবরি মসজিদ ধ্বংস করতে। বুঝিয়ে দিয়েছিলো— শুধু মুসলিমরা নয়, অন্য কোনো সংখ্যালঘুরাও নয়, মৌলবাদের প্রধাণ টার্গেট তাদের 'নিজেদের'ধর্মের লোকরা। নীচু জাতেরদের মুক্তি যে তথাকথিত 'বর্ণ হিন্দু'সম্প্রদায়ের দয়াদাক্ষিণ্যের ওপর দাঁড়িয়ে হবে না, দলিতদের মুক্তির জন্য যে তাদের বেড়িয়ে যেতে হবে হিন্দুধর্মের আচার-আচরণ থেকে— একথা নিয়ে সবচেয়ে লড়েছিলেন যে আম্বেদকর, তার মৃত্যুদিন টাকে সম্ভবত বুঝেশুনেই বেছেছিলেন উচ্চবর্ণ-হিন্দুদের সংগঠন আর.এস.এস এর নেতারা। আর তারপর থেকে আরও জোরদার হয়েছে দলিতদের 'হিন্দু'বানানোর প্রক্রিয়া। 'আদিবাসী'দের আদর করে ডাকা হয়েছে 'বনবাসী'বলে। এই ভূখন্ডে দীর্ঘদিন ধরে যে সাংস্কৃতিক বৈচিত্র্যের ঐতিহ্য প্রবহমান, তাকে দলে-পিষে মেরে সকলকে 'ওদের পছন্দমাফিক হিন্দু'করতে চায় সংঘ। যেমন ইরাক আর সিরিয়াতে নিজেদের 'পছন্দমাফিক মুসলিম'বানাতে চায় আই.এস.আই.এস সকলকে, যেমন মিজোরামের কিছু জায়গায় 'ক্রিশ্চান'না'হলে দলিতকে শাস্তি দেয় 'ফাদার'রা...
    Ajit HoKolorob writes  that It is all about the Agenda of Hidu imperialism which targets the Hindu Bahujan,the nature associated agrarian workers` communities,subjected to eternal exclusion,excommunication and ethnic cleansing first,not as believed mostly,the Muslims and other Non Hindus.

    Mid you,HOKKOLOROB and Shahabag,Bangladesh spearhead the  students` movement to declare Hindutva and Islamist flag bearers as siblings and demand to hang them together with single hanging rope.

    It is most readable article to understand the rise of Hindu imperialism afresh.

    I recommend everyone to read ,circulate and publish the content and if possible,pl translate it in all Indian languages .

     I am very happy to see our students aware of the global Zionist  plus global Hindutva conspiracy against humanity and nature and expect them to lead,us,the masses to fight against the corporate religious billionaire millionaire hegemony across political borders and identities as well.

    We expect them,the students and the youth with all social and productive forces united to finish the hegemony of racial apartheid worldwide and I would live to see this.

    Palash Biswas


    'এসে দেখি আমি ধর্মতলার চারকোণে চারদল....?'

    ১৯৫৬ এর ৬ই ডিসেম্বর। বাবাসাহেব আম্বেদকর এর মৃত্যুদিন। ১৯৯২ সালের ঠিক ঐ দিনটাকেই বেছে নিয়েছিলো সংঘ-এর লোকরা বাবরি মসজিদ ধ্বংস করতে। বুঝিয়ে দিয়েছিলো— শুধু মুসলিমরা নয়, অন্য কোনো সংখ্যালঘুরাও নয়, মৌলবাদের প্রধাণ টার্গেট তাদের 'নিজেদের'ধর্মের লোকরা। নীচু জাতেরদের মুক্তি যে তথাকথিত 'বর্ণ হিন্দু'সম্প্রদায়ের দয়াদাক্ষিণ্যের ওপর দাঁড়িয়ে হবে না, দলিতদের মুক্তির জন্য যে তাদের বেড়িয়ে যেতে হবে হিন্দুধর্মের আচার-আচরণ থেকে— একথা নিয়ে সবচেয়ে লড়েছিলেন যে আম্বেদকর, তার মৃত্যুদিন টাকে সম্ভবত বুঝেশুনেই বেছেছিলেন উচ্চবর্ণ-হিন্দুদের সংগঠন আর.এস.এস এর নেতারা। আর তারপর থেকে আরও জোরদার হয়েছে দলিতদের 'হিন্দু'বানানোর প্রক্রিয়া। 'আদিবাসী'দের আদর করে ডাকা হয়েছে 'বনবাসী'বলে। এই ভূখন্ডে দীর্ঘদিন ধরে যে সাংস্কৃতিক বৈচিত্র্যের ঐতিহ্য প্রবহমান, তাকে দলে-পিষে মেরে সকলকে 'ওদের পছন্দমাফিক হিন্দু'করতে চায় সংঘ। যেমন ইরাক আর সিরিয়াতে নিজেদের 'পছন্দমাফিক মুসলিম'বানাতে চায় আই.এস.আই.এস সকলকে, যেমন মিজোরামের কিছু জায়গায় 'ক্রিশ্চান'না'হলে দলিতকে শাস্তি দেয় 'ফাদার'রা...

    মন্দির-মসজিদ-গীর্জা দিয়ে নিরন্ন পেটের মানচিত্রকে ভুলিয়ে দেবার সংগঠিত রাজনীতি বাবরি মসজিদ ভেঙ্গে ভারতবর্ষে তার এক অন্যতম 'সাহসী পদক্ষেপ'নিয়েছিল ১৯৯২ এর ৬ই ডিসেম্বর। কিন্তু তারপর অনেক জল গড়িয়ে গেছে। তাই ৬ই ডিসেম্বরের আজকের প্রাসঙ্গিকতা শুধু ওখানে মসজিদের আগে মন্দির ছিলো কিনা, মন্দিরের আগে কী ছিলো, 'শ্রীরামচন্দ্র'বলে আদও কোনো মানুষ বাস্তবে অযোধ্যা কেন, অন্য কোথাও-ও জন্মেছিলেন কিনা— নাকি ওটার কবি বাল্মীকির কল্পনা এসব ছাড়িয়ে এগিয়ে গেছে আজকের বিতর্ক। মানুষে মানুষে দাঙ্গা আর হানাহানি খারাপ, হিন্দু-মুসলিম-ক্রিশ্চান সকলের রক্তের রঙ-ই লাল— আর তাই আসুন আমরা সকলে মিলে সাম্প্রদায়িক সম্প্রীতি বজায় রাখি এটা চিত্কার বলাটা খুব জরুরী, কিন্তু ওটুকুতে থেমে গেলে সমস্যা হবে। 'ধর্মনিরপেক্ষতা'ভাঙিয়ে করে খেতে চাওয়া লোকের অভাব নেই সেটা একটা সত্যি কিন্তু তার চেয়েও গুরুত্বপূর্ণ হল আজকের ভারতে সাম্প্রদায়িকতাকে প্রমোট করছে করা আর এর বিরুদ্ধে লড়াই এর মানেটাই বা কী?

    আমাদের দেশে আজকের দিনে সাম্প্রদায়িকতাকে পুরোপুরি মদত করছে, ব্যবহার করছে কর্পোরেটরা শক্তিরা। না, ওপর থেকে দেখলে তাদের স্বার্থের সাথে সম্পর্ক নেই ধর্ম-সাম্প্রদায়িকতা এসবের। তারা শুধু চায় দেশের মানুষ কমপয়সায় খাটুক উদয়াস্ত, দেশের সরকার জমি-জল-জঙ্গল-নদী-পাহাড় সব তুলে দিক ওদের হাতে বিনা পয়সায়। কিন্তু মানুষ জীবটাই যে গোঁয়ার— সে দু'বেলা খেতে চায়, মাথায় ছাদ চায়, এমনকি মাঝে মাঝে সম্মান নিয়ে 'মানুষের মতো'করে বাঁচতে চায়! তাই সে জোট বাঁধে, আওয়াজ তোলে 'হেঁই সামালো'! আর এটাকে খুব ভয় পায় সুন্দর স্যুট-টাই-ক্লীনশেভ কর্পোরেটরা! মানুষগুলো তাই নিজেদের মধ্যে হিন্দু-মুসলমান নিয়ে মারপিট করলে ওদের পোয়া বারো! কেউ কিছু বললেই ব্যাটাকে 'পাকিস্তানের দালাল'বলে ভরে দেওয়া যাবে!

    তাই ওরা আর.এস.এস-কে বেছেছে, তাই ওরা মোদীকে এনেছে এবারে। কারণ বিশ্বব্যাপী সংকটের পর ওদের হাল বেশ খারাপ। তাই ওদের আরো মুনাফা চাই, আরও তাড়াতাড়ি মুনাফা চাই। না'হলে কংগ্রেস-সিপিএম-লালু-মুলায়ম-মায়া-মমতা-জয়ললিতা-করুনানিধিরা ভালই দালালি করছিলো ওদের। 'দালালি'করা নিয়ে প্রতিযোগিতাটাও বেশ জমে উঠেছিলো— এদিকে বুদ্ধবাবু মালকোঁচা মেরে 'লালঝান্ডা'বগলে নিয়ে পুঁজির মালিকদের কাছে গিয়ে গলায় বকলসের দাগটা দেখিয়ে আসেন তো ওদিকে রাহুলবাবা গালে টোল পড়া হাসি নিয়ে মালিকদের পা-ধরতে ছোটেন। তবু, মালিকদের কৃপা পাওয়া গেল না, মিডিয়ারা গালমন্দ বাড়িয়ে দিলো, অবশেষে ভোটে হারতে হল!

    এদিকে 'বিপ্লব'করা ছাড়া সিপিএম এর কাছে এখন বাঁচার আর অন্য কোনো রাস্তা খোলা নেই! ৩৪ বছর ধরে দালালি করার পড়েও মালিকরা লাথি মেরেছে। বেচারা 'বোকা'জনগণ বুঝতেই পারেনি 'সীমাবদ্ধ ক্ষমতায় কেন্দ্রের প্রচন্ড বঞ্চনা'র মাঝেও কী কষ্ট করে সিপিএম পার্টি পশ্চিমবঙ্গের জনগণের সেবা করে চলেছিলো অক্লান্তভাবে! প্রমোটাররা বুঝে গেছে সিপিএম পার্টিকে আর টাকা দিয়ে লাভ নেই। ভাড়াটে গুন্ডারা বুঝেছে সিপিএম গাঁয়েগঞ্জে নিজের ক্যাডারদেরই সুরক্ষা দিতে পারছে না, গুন্ডাদের কী শেল্টার দেবে? সিপিএম তাই এখন প্রকৃত অর্থে 'সর্বহারা', হারানোর মতো কিছু নেই আর— জয় করার আছে গোটা বিশ্বব্রম্ভান্ড! অতঃপর 'বিপ্লব করা'র জন্য সঙ্গে নিতে হবে 'ছোটখাটো'বন্ধুদের। একটু বেশি 'প্রজেকশন'দিয়ে দিতে হবে তাদের লিডারদের। লক্ষ্যটা কিন্তু পরিষ্কার, মালিকদের ভরসা পুনরুদ্ধার করা, যাতে আবার দালালি করা যায়— এবার অবিশ্যি আনলে, মালিকরা আরও ভালো করে 'টাইট'দিয়ে তারপরে আনবে, যাতে বেশি 'বামপন্থা'কপচানো না যায়!

    এবার কতগুলো কথা সোজা করে বলে ফেলি। ৬ই ডিসেম্বরে এতগুলো কর্মসূচী কেন? সকলে এক হলে হয় না? না, হয় না। হলে, সবসময় ভালো-ও হয় না। এই যে ১৬ পার্টির পক্ষ থেকে যে মিছিল ডাকা হয়েছে 'সাম্প্রদায়িকতার/ফ্যাসিবাদ-এর বিরুদ্ধে একসাথে লড়াই'করার জন্য সেটার ভবিতব্য ঠিক কী? ভারতে সাম্প্রদায়িকতার সমস্যা অঙ্গাঙ্গীভাবে যুক্ত হয়ে রয়েছে কর্পোরেট পুঁজির স্বার্থের সাথে, নিও-লিবারালিজমের সাথে। এই প্রশ্নে 'প্রাচীনপন্থী আর.এস.এস'আর কর্পোরেট পুঁজির প্রতিনিধি 'মডার্ন মোদী'আর মুকেশ আম্বানীদের মধ্যে কোনো দ্বন্দ্ব নেই। আমাদের দেশে সাম্প্রদায়িকতাবিরোধী সংগ্রাম তাই করতে হবে সক্কলে মিলে, নিও-লিবারালিজমের বিরুদ্ধে সংগ্রামী ঐক্য গড়ে তুলে! যে সিপিএম পশ্চিমবঙ্গে (এবং সর্বভারতীয় ক্ষেত্রে নীতিগতভাবে) নিও-লিবারালিজমকে লাগু করলো, সিঙ্গুর-নন্দীগ্রামে রক্ত ঝরালো পুঁজির অঙ্গুলিহেলনে, তাকে নিয়ে সাম্প্রদায়িকতার বিরোধিতা করতে যদি পারা যায়— তবে কংগ্রেসকে নিয়েই বা করা যাবে না কেন? আরও বৃহৎ ঐক্য, আরও স-অ-অ--ক-ক-ক্কলে মিলে! হ্যাঁ, ঐ ১৬ পার্টির মধ্যে বহু দল আছে, যেসব দলে এরকম বহু মানুষ আছে, যারা সত্যি-সত্যি লড়তে চান, যারা সত্ভাবে সমাজটার ভালো করতে চান, এই সমাজটাকে বদলানোর স্বপ্ন নিয়ে আজ-ও যারা বাঁচেন কিংবা প্রাণ দেন লড়াই-এর ময়দানে। পার্টিগুলোর লীডারদের ভোটের-জোটের অঙ্ক কষার আগে ঐ মুখগুলো মনে পড়ে তো?

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    • Agniswar Serampore "অতঃপর 'বিপ্লব করা'র জন্য সঙ্গে নিতে হবে 'ছোটখাটো'বন্ধুদের। একটু বেশি 'প্রজেকশন'দিয়ে দিতে হবে তাদের লিডারদের। লক্ষ্যটা কিন্তু পরিষ্কার, মালিকদের ভরসা পুনরুদ্ধার করা, যাতে আবার দালালি করা যায়— এবার অবিশ্যি আনলে, মালিকরা আরও ভালো করে 'টাইট'দিয়ে তারপরে আনবে, যাতে বেশি 'বামপন্থা'কপচানো না যায়! "----- এখানে আসলে পরস্পর পরস্পরকে qualify করার গল্প। ফলে ব্যাপারটা উভয়ত।
      15 hrs · Like
    • Arijit Hokkolorob parasporik pith chaprachapri bolchho?
      14 hrs · Like
    • Tuhin Ghosh ভালো করে কাঁটা বেছে তবেই খেতে বোলছ ...

      এসেফাই এর একটি পোস্ট নজরে এলো ; লালন- কবীর -শাহ সব স্টিরিওটাইপই বর্তমান । 
      ...See More
      14 hrs · Like
    • 12 hrs · Like · 1
    • Agniswar Serampore oi r ki ektu 'rajnoitik' kore bollam 
      12 hrs · Like
    • Arindam Ghosh B.R.Ambedkor er 5 lakh Dolit k Budhhism convert kora k ki bolben?
      11 hrs · Like · 1
    • Sushovan Paul Mr. Arijit vul ideology apnar.bamponthi rajniti always dhormer urdhe.r apni brbr dhormok tanchen
      2 hrs · Like
    • Palash Biswas http://ambedkaractions.blogspot.in/2014/12/blog-post_5.html
      बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस को ही बाबरी विध्वंस के लिए क्यों चुना संघ परिवार के हिंदुत्व ब्रिगेड ने ?

      नवउदारवादी जमाने में अमेरिकी इजराइली समर्थन से ग्लोबल हुए हिंदुत्व के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध बाबासाहेब अंबेडकर के साथ इस देश में कृषि आजीविका से जुड़े बहुसंख्य आबादी की लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष साझे चूल्हे की विरासत रही है और खंडित जाति धर्म नस्ल भाषा क्षेत्र अस्मिताओं और विविधताओं को जोड़कर सतीकथा की तरह एकात्म हिंदुत्व के बिना पंडित जवाहर लाल नेहरु की ओर से रखी गयी हिंदू साम्राज्यवाद की नींव पर मुकम्मल इमारत तामीर करने से पहले एक धर्मोन्मादी महाविस्फोट की जरुरत थी,जो बाबरी विध्वंस है और जिसमें बाबासाहेब समेत फूले, पेरियार, अयंकाली, लोखंडे,नारायणगुरु, हरिचांद गुकरुचांद बीरसा मुंडा,रानी दुर्गावती,सिधो कान्हो,चैतन्य महाप्रभू,संत तुकाराम,गुरु नानक,कबीर रसखान,संत गाडगे महाराज,लिंगायत मतुआ और तमाम आदिवासी किसान आोंदालनों की सारी विरासतें एकमुश्त ध्वस्त हैं।

      आप चाहे बाबासाहेब का परानिरवाण दिवस मनाइये, बाबरी विध्वंस के मौके पर काला दिन,उस विरासत को पूरी वैज्ञानिक चेतना के साथ अस्मिताओं के आरपार फिर बहाल किये बिना मुक्तबाजारी कारपोरेट हिंदू साम्राज्यवाद की चांदमारी से आपकी जान बचेगी नहीं,चारा जो हरियाला है,वह दरअसल वधस्थल का वातावरण है।
      बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण दिवस को ही बाबरी विध्वंस  के लिए क्यों चुना संघ परिवार के हिंदुत्व ब्रिगेड ने ?
      AMBEDKARACTIONS.BLOGSPOT.COM|BY PALASH BISWAS

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