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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    पारो का अवसान

    पलाश विश्वास

    कथा देवदास के आत्मध्वंस केंद्रित है।पुरुषवर्चस्व की कथा में पारो देवदास की छाया है।उसी छाया में ही उसका वजूद है।


    देवी चौधुरानी के तौर पर पारो को कभी कभार राज करने का मौका मिलता जरुर है,पर अमोघ पुरुषत्व में उसका आत्मसमर्पण ही कथा का चरमोत्कर्ष है।


    सुचित्रा सेन ने  न  सिर्फ परदे पर दिलीपकुमार जैसे किंवदंती के साथ श्वेत श्याम विषाद के अटूट परिवेश में पारो होकर जिया है,बल्कि आजीवन उस पारो के किरदार को जीती रहीं।मरी भी  सुचित्रा सेन का नहीं,पारो का अवसान है यह।


    आज अंततः मृत्यु में पारो का अवसान हो गया।देवदास के अंत के बाद पारो का क्या हुआ,किसी को खबर नहीं थी,कम से कम हमें जीती जागती पारो का जीवन संघर्ष मालूम है।यह कथा की विरासत तोड़ने का तात्पर्य है।वह 26 दिन से अस्पताल में भर्ती थीं। उनकी हालत गुरुवार रात को ज्यादा बिगड़ गई थी।


    रीति और परंपरा तोड़कर परिजनों और चिकित्सकों के बजाय बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने महानायिका के तिरोधान की घोषणा कर दी और वे ही राजकीय अंत्येष्टि का इंतजाम कर रही हैं।लगातार वे पिछले हफ्ते दो दो घंटे राजकाज को तिलांजलि देकर पारो के अवसान की इस घड़ी का इंतजार करती रहीं।पारोकथा का यह राजनीतिक  गिद्ध प्रसंग भी है।


    काठ के ताबूत में भले ही जनता अपनी प्रिय महानायिका का दर्शन से वंचित हो और दर्शनार्थियों को भले ही नंदन में जाकर उनके चित्र पर माल्यार्पण करके संतोष करें,सत्ता और राजनीति के इस सदर्प हस्तक्षेप से महानायिका  का कितना सम्मान हुआ और उनकी गोपनीयता व निजता की कितनी रक्षा हो पायी,यह मामला सघन शोक पर्यावरण में अभी से विवादित हो गया।लेकिन सत्ता और राजनीति को अमूमन इसकी कोई परवाह नहीं होती।वह तो विशुद्ध फार्मूलाबद्ध रसायन शास्त्र है दरअसल।


    जब तक इस स्मृति तर्पण के मुखातिब होंगे आप जिंदगी की तरह काठ के ताबूत में बंद रक्त मांस की सुंदरतम कलाकृति श्मशानचिता के हवाले हो जायेंगी और मुट्ठी भर राख के अलावा उस अप्रतिम विभाजन पीड़ित सौंदर्यगाथा से कुछ भी हासिल नहीं होगा।


    सह कलाकार उत्तम कुमार के अंतिम दर्शन के बाद एक गहरायी शाम को अपनी सार्वजनिक छवि को जिस गोपनीयता और निजता के अंतराल में महानायिका ने छुपा लिया और आजीवन उसका निर्वाह किया,उस गोपनीयता को सर्वशक्तिमान शाश्वत मृत्यु भी अंततः तोड़ नहीं सकी।वह टूट रही है कहीं तो उसकी जिम्मेदार विशुद्ध राजनीति है और सत्ता और राजनीति के समक्ष परिजनों का असहाय आत्मसमर्पण है।


    पारो हारकर भी हारती नहीं कभी।


    लोग सुचित्रा सेन के अभिनय में सौंदर्यपरिधान के दीवाने हैं,रहेंगे युग युगांतर तक।


    मुंबई का बाबू फिल्म में भाई बने देवानंद के साथ गीत दृश्य में सुचित्रा का जो रोमांचक अवतार है,उसकी तुलना सिर्फ आवारा के स्वप्न दृश्य में राजकपूर नरगिस के स्क्रीन साझा या मधुबाला के कुछ विलक्षण पलों से ही की जा सकती है।


    हमभी उस सौंदर्यबोध से निश्चय ही मुक्त नहीं है,लेकिन सुचित्रा के कलाजीवन में मुझे भारत विभाजन की शाश्वत पीड़ा की छाया मंडराती नजर आती है और इसलिए चाहे लाख दफा देवदास कथा पर फिल्म सुपर डुपर हजार करोड़िया हिट हो जाये,हमारी पारो वही सुचित्रा ही रहेंगी।


    देवदास की वह विषाद कथा भारत विभाजन की कथा का भी सघन परिवेश है,जिसे सोलह साल की उम्र में विभाजन पीड़ित रमा ने उस पार बंगाल के पाबना के दिलालपुर गांव को छोड़ने के बाद कोलकाता पहुंचकर आदिनाथ सेन से सोलह साल की ही उम्र में विवाह हो जाने के बाद अपने सुचित्रा पुनर्जन्म में बार बार जिया है।


    आज उनका पैतृक घर जमात के कब्जे में है और इस वक्त जमात के एकाधिकारवादी हमले में बांग्ला देश में अल्पसंख्यक जनजीवन बेदखल है सुचित्रा के पैतृक घर की तरह।


    एकतरफा चुनाव जीतकर सत्ता के जोर से सुचित्रा सेन का वह घर दखलमुक्त जरुर हो सकता है,लेकिन विभाजन की त्रासदी से इस उपमहादेश के लोग सीमाओं के आर पार कभी मुक्त हो पायेंगे,ऐसा नहीं लगता।


    हाल में हमने आजाद कश्मीर की मांग करने वालों से भी संवाद की कोशिशें की हैं।लेकिन उस संवाद को कायम नहीं रख पाये क्योंकि संवाद के लिए उनकी मांग है कि हम भारत से कश्मीर के अलगाव को पहले स्वीकार कर लें।वे बाकी देश से कोई संवाद इसी शर्त पर ही कर सकते हैं,ऐसा उनका दावा है।


    सशस्त्रबल विशेषाधिकार कानून खत्म करने की हमारी मांग बहुत पुरानी है,कश्मीर में भी नागरिक अधिकार,मानवाधिकार और लोकतंत्र की बहाली के हर आंदोलन के साथ हैं और आजाद कश्मीर की मांग करने वालों की हर बात भारतीय जनता तक पहुंचाने के लिए भी हम बिना शर्त तैयार है,लेकिन एक देश भक्त भारतीय के नाते हम एक और विभाजन  को किसी कीमत पर स्वीकार कर नहीं सकते।


    विडंबना है कि कश्मीर सिर्फ उस हिमालयी भौगोलिक ईकाई का नाम नहीं है,भारत विभाजन की जो स्थाई समस्या कश्मीर है,वैसा ही एक कश्मीर उस पार बंगाल मैं है।


    जैसे कश्मीर के लिए भारतीयसेना को बार बार लड़ना पड़ा,वैसे ङी उसपार बंगाल के कश्मीर को आजादी देने की लड़ाई में शामिल होना पड़ा भारतीय सेना को। लेकिन रक्त की नदियों का बहना न उस पार बंद हुआ और न उसपार।


    लेकिन कश्मीर समस्या के समाधान में सत्तावर्ग देशहित और जनहित को हाशिये पर रखकर बार बार हिमालयी भूल दोहराता है,लेकिन उसपार बंगाल के कश्मीर मसले को सुलझाने की पहल न भारत सरकार करती है और न उस कश्मीर में युद्धबंदी जनजीवन की परवाह इसपार बंगाल को है।देश के भीतर जो अनगिनत कश्मीर पैदा कर दिये गये हैं,उनकी चर्चा करके हम तो बार बार आपकी नींद में खलल डालते ही हैं।


    उसी रक्त नदी का पर्याय जीती रही सुचित्र सेन।सुचित्रा के चेहरे पर,समूचे शरीर पर उस खून का नामोनिशान नहीं था,लोकिन उनके दिलो दिमाग में लगातार वह रक्त नहीं बहती रही है।शायद मृत्यु के पार भी वह उसी रक्त नदी में समाहित हैं।


    सुचित्रा की फिल्में में निष्णात होने का हमारे लिए मतलब है विशुद्ध रक्तस्नान।मनोरंजन तो हर्गिज नहीं।नहीं।नहीं।नहीं।


    इस महादेश की महात्रासदी को वे खामोशी से अपनी फिल्म दीप ज्वेले जाई की तरह जीती रहीं,जिस किरदार को खामोशी में जीने के बाद गाइड और तीसरी कसम की वहीदा एक मुकम्मल अभिनेत्री बन पायी।


    त्रासदी यह है कि हमें अपने भीतर बाहर बहती उस अनंत रक्त नदी का अहसास तक नहीं है।इसी लिए यह देश न अब हमारे अंदर कहीं है और न बाहर है।जो है वह वंचितों पीड़ितों के अनंत आर्तनाद मध्ये मुक्तबाजार में नवधनाढ्य क्रयशक्ति का शीत्कार है या फिर अबाध एकाधिकारवादी आक्रामक पूंजी का अनंत अश्वमेधी उत्सव है।


    सुचित्रा सेन के अवसान का एक मतलब वह कालसर्प अभिशाप भी है,जिसके तहत इस उपमहाद्वीप की नियति हजारों साल से जारी कुरुक्षेत्र युद्ध की निरंतरता है,निरंतर विभाजन है और अपने कश्मीर से लगातार लगातार अलगाव और संवादहीनता है।अपनी अपनी अस्मिता में कैद राष्ट्रद्रोह में निष्णात हो जाना है और फिर भी राष्ट्रगान गाना है।राष्ट्र झंडा को राजनीति में लहराना है।


    पारो के अवसान के शोकमुहूर्त पर भी हम इस नियति से जूझने का उपाय करें तो पारो के दिलो दिमाग में बहते विभाजन पीड़िक कश्मीर ,पंजाब और बंगाल के विभाजन पीड़ित अभिज्ञता से गुजरना होगा.जो अंततः अभिनेत्री रमा सुचित्रा सेन की आत्म शक्ति है और बाकी सारी अभिनेत्रियों के मुकाबले वे इस तलस्मी रूपहले पर्दे को अलविदा कहकर गोपनीयता और निजता के साथ बत्तीस साल का एकांत जीवन कहने के बाद उसी उत्तुंग लोकप्रियता और उसी अटूट किंवदंती मध्य समाधिस्थ हो सकीं।


    शरणार्थी कालोनी की अपह्रत अणिमा,जिससे हिंदी के दर्शकों का सामना न हुआ जैसे कि सुचित्रा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म सप्तपदी हिंदी में नहीं बनी,इसलिए हमारे लिए सुचित्रा के उस रुप का बखान करना मुश्किल है।


    उत्तमकुमार के साथ जिस साढ़े चुआत्तर फिल्म में रमा की अप्रतिद्वंद्वी जोड़ी बनी और आज की हिरोइनों की तुलना में करीब करीब अपने दिलीप कुमार की तर्ज पर महज पैसठ फिल्म करके भारतीय फिल्म इतिहास की वह महानायिका बन गयी,उसमें भी वह शरणागत विभाजन पीड़ित परिवार की संघर्षरत युवती है।


    पारो का विषाद और निजी जीवन में चिर गांभीर्य की इस पृष्ठभूमि में हम उन्हें अपने बेहद करीब महसूसते रहे हैं,कभी उनसे मिले बगैर।


    শুক্রবার ভোর রাতে ম্যাসিভ হার্ট অ্যাটাকের পর মাল্টি অর্গান ফেলিয়র হয়। ডাক্তারদের হাজার প্রচেষ্টাতেও বাঁচানো যায়নি মহানায়িকাকে। তাঁর অন্তরালে থাকার সিদ্ধান্তকে সম্মান জানিয়ে অন্তেষ্টিক্রিয়ার পরবর্তী কাজ করা হল।


    बांग्ला सिनेमा की महानायिका सुचित्रा सेन का कोलकाता के अस्पताल में आज निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार थीं।


    देर शाम 82 वर्षीय अदाकारा को सांस लेने में तकलीफ बढ़ गई थी। गुजरे जमाने की अदाकारा को श्वसन तंत्र में संक्रमण को लेकर 23 दिसंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।


    सुचित्रा का जन्म आज के बांग्लादेश के पाबना जिले में 1931 में हुआ था। इन्होंने 1952 में पहली फिल्म शेष कथा में अभिनय किया, लेकिन यह फिल्म रिलीज नहीं हुई। इसके अगले साल इनकी फिल्म '7 नंबर क़ैदी' आई। इसके बाद 1955 में विमल रॉय की बांग्ला फिल्म 'देवदास' में पारो का किरदार निभाया।


    सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं, जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया और 'अग्निपरीक्षा', 'देवदास' तथा 'सात पाके बंधा' जैसी यादगार फिल्में कीं।हिरणी जैसी आंखों वाली सुचित्रा 1970 के दशक के अंत में फिल्म जगत को छोड़कर एकांत जीवन जीने लगीं। उनकी तुलना अक्सर हॉलीवुड की ग्रेटा गाबरे से की जाती थी, जिन्होंने लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया था।


    लेकिन अंतराल में जाने का बाद भी सिर्फ एकबार सहकलाकार उत्तम कुमार के निधन के बाद देर शाम अकेले में उनका अंतिम द्रशन करने चली आयी थी,फिर कभी वह सार्वनिक नहीं हुईं।


    बॉलीवुड में भी इन्होंने कई फिल्में कीं। इसमें से फिल्म 'आंधी' की खासी चर्चा रही। सुचित्रा सेन को 1972 में पद्मश्री सम्मान मिला। 2012 में इन्हें पश्चिम बंगाल सरकार के सर्वश्रेष्ठ अवार्ड बंग भूषण से सम्मानित किया गया।


    उनकी बेटी मुनमुन सेन ने बताया कि आज तड़के कोलकाता के अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।


    बालीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने बंगाली सिनेमा की महान अभिनेत्री सुचित्रा सेन को अपनी श्रृद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्हें उनकी सुदंरता, प्रतिभा, रहस्यों के लिये हमेशा याद किया जायेगा।


    सुचित्रा सेन की नातिन राइमा और रिया सेन भी अभिनेत्री हैं। सुचित्रा बांग्ला और हिंदी फिल्मों में की स्टार अभिनेत्रियों में एक रही हैं। बांग्ला फिल्मों के सुपर स्टार उत्तम कुमार के साथ उनकी रोमांटिक जोड़ी मशहूर रही।


    1952 में फिल्म 'शेष कोथाय' से अपना फिल्मी सफर करने वाली सुचित्रा पहली भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्हें अपने अभिनय के लिए किसी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में अवार्ड से नवाजा गया था।

    ABP Anand Image

    নিভল অগ্নিশিখা, চন্দনের চিতায় শেষকৃত্য সুচিত্রার

    বেলা ৩টে: এখনও পর্যন্ত: চির অন্তরালে গেলেন মহানায়িকা। কেওড়াতলা মহাশ্মশানে চলছে তাঁর শেষকৃত্য। CR দাস পার্কে চন্দনের চিতায় দাহ করা হল তাঁকে। মুখাগ্নি করেন তাঁর মেয়ে মুনমুন সেন। তার আগে গান স্যালুটে শেষ শ্রদ্ধা জানানো হয়। তেইশে ডিসেম্বর শ্বাসকষ্ট এবং বুকে সংক্রমণ নিয়ে বেলভিউতে ভর্তি হয়েছিলেন মহানায়িকা। তারপর টানা ছাব্বিশ দিন তাঁকে বাঁচানোর লড়াই চালিয়ে গেছেন চিকিত্সকরা। আজ সকাল আটটা পঁচিশে ম্যাসিভ হার্ট অ্যাটাকে শেষ হয়েছে সব লড়াই। দুপুর সাড়ে বারোটা নাগাদ সুচিত্রা সেনকে নিয়ে বেলভিউ ক্লিনিক থেকে বের হয় শববাহী শকট। মহানায়িকাকে প্রথমে নিয়ে যাওয়া হয় তাঁর বালিগঞ্জ সার্কুলার রোডের বাড়িতে। সেখান থেকে গোলপার্ক রামকৃষ্ণ মিশন ঘুরে দেহ পৌছয় কেওড়াতলা মহাশ্মশানে।


    ১টা ৪৬: নিভল অগ্নিশিখা, মায়ের মুখাগ্নি করেলেন মেয়ে মুনমুন সেন।


    ১টা ২৫: কেওড়াতলায় শায়িত রয়েছে মহানানিয়ার দেহ


    ১টা ২২: গান স্যালুট দেওয়া হচ্ছে মহানায়িকাকে।


    ১টা ১৫: তাঁর ব্যক্তত্বের জুড়ি মেলা ভার। ওনার জন্য অনেক গান গেয়েছি। মাঝে মাঝে স্টুডিওতে দেখা হয়েছে। যখনই কথা বলতেন খুব ভদ্র ভাবে।


    ১টা: বাড়ি থেকে রওনা দিল মহানয়িকার শেষযাত্রা। যাবে গোলপার্ক রামকৃষ্ণ মিশনে।


    ১২টা ৫২: রাজ্যপালের তরফে শেষ শ্রদ্ধা।


    ১২টা ৫০: দেহ পৌঁছল বালিগঞ্জের বাড়িতে। রয়েছেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। বন্ধ করে দেওয়া হয়েছে বাড়ির দরজা। সাধারণ মানুষ অপেক্ষায়।


    ১২টা ৪৩: রওনা দিল মহানায়িকার শেষ যাত্রা। কালো কাঁচের গাড়িতে মাহানায়িকার দ্দেহ


    ১২টা: কফিন বন্দী মহানায়িকার দেহ।


    ১১টা ৩৫- মৃতদেহ বালিগঞ্জের বাড়িতে নিয়ে যাওয়া হবে।


    ১১টা ৩৫- চন্দন কাঠের চিতায় দাহ করা হবে সুচিত্রা সেনকে


    ১১টা ৩২- রবীন্দ্রসদনে মহানায়িকার প্রতিকৃতিতে শ্রদ্ধা জানাতে পারবেন সাধারণ মানুষ


    ১০টা ৩৫- 'আমাদের প্রিয়জনকে হারালাম'- মুখ্যমন্ত্রী


    ১০টা ৩৫- 'আত্মার শান্তি কামনা করি।' -মুখ্যমন্ত্রী


    ১০টা ৩০- 'রাজ্যসরকার গান স্যালুট দেবে।'


    ১০টা ৩০- 'শেষকৃত্য ব্যাপারে পরিবারই সিদ্ধান্ত নেবে।'- মুখ্যমন্ত্রী


    ১০টা ৩০- 'স্বেচ্ছা নির্বাসনে গিয়েছিলেন, আমরা সেটার সম্মান করব।'- মুখ্যমন্ত্রী'


    ১০টা ৩০- ক্যাওড়াতলা মহা শ্মশানে শেষকৃত্য সম্পন্ন- ঘোষণা মুখ্যমন্ত্রীর


    সকাল ১০টা ১৫- 'বড় মহীরূহের পতন'- মুখ্যমন্ত্রী


    সকাল ১০টা ১৫- মৃত্যুর আনুষ্ঠানিক ঘোষণা করলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়


    সকাল ৯টা ৩৫- হাসপাতালে এলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়


    ৯টা- মিডিয়ার নজর এড়িয়ে মৃতদেহ বাড় করার পরিকল্পনা।


    ৮টা ৩৫- মৃত্যু ঘোষণা নিয়ে দ্বিধাবিভক্ত ডাক্তারমহল। এখনই আনুষ্ঠানিক ঘোষণা চায় না পরিবার। কিছু ডাক্তার এই প্রস্তাবে নারাজ।


    সকাল ৮টা ২৫- হৃদরোগে আক্রান্ত হয়ে মারা গেলেন মহানায়িকা সুচিত্রা সেন।


    বৃহস্পতিবার সন্ধে থেকে শ্বাসকষ্ট শুরু। ফের সুচিত্রা সেনের শারীরিক অবস্থার অবনতি হয়েছে। রক্তে কমে গিয়েছে অক্সিজেনের মাত্রা। শারীরিক অবস্থার অবনতি হওয়ায় মহানায়িকাকে ফের নন ইনভেসিভ ভেন্টিলেশন দেওয়া হয়। বৃহস্পতিবার সন্ধেয় তাঁকে দেখতে হাসপাতালে যান মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।

    http://zeenews.india.com/bengali/kolkata/suchitra-sen-live-update_19483.html

    Capturing the public's imagination for three decades through her ethereal beauty and intense celluloid performance, Suchitra Sensymbolized the golden age of Bengali cinema with memorable films like 'Agnipariksha', 'Devdas' and 'Saat Paake Bandha'.


    The doe-eyed beauty turned a recluse after bidding adieu to the world of films in the late seventies and was often compared to Hollywoodicon Greta Garbo, who shunned public contact.


    No other heroine in Bengal since Kanan Devi caught the public imagination as Sen did. In an era of black and white movies, her intense performances catapulted her to stardom.


    Such was the popularity of the Sen that during Durga Puja, idols of Lakshmi and Saraswati were known to have been modelled on her face.


    Sen on Friday died at the age of 82 after suffering a heart attack.


    Beginning her career with Bengali film 'Shesh Kothai' in 1952, Sen went on to receive a National Award for her performance in Bimal Roy's 1955 Hindi classic 'Devdas', playing the defiant 'Paro' to Dilip Kumar's 'Devdas'.


    She formed an unbeatable romantic pair with Bengali cinema legend Uttam Kumar. The duo gave a string of memorable hits such as 'Harano Sur' (1957), 'Agnipariksha' (1954),'Saptapadi' (1961), 'Grihadaha' (1967), 'Indrani' (1958), 'Sagarika' (1956), 'Bipasha' (1962), 'Kamal Lata' (1969), 'Alo Amar Alo' (1972), 'Har Mana Har' (1972) and 'Priyo Bandhabi' (1975).


    Sen acted in 52 Bengali and seven Hindi films. 'Champakali', with Bharat Bhushan, 'Sarhhaad' and 'Bommbai Ka Babu' with Dev Anand and 'Mamta' were some of her other notable Hindi films.


    However, her most famous Hindi film after 'Devdas' was 1974's 'Aandhi' by Gulzar. She earned wide acclaim for her role opposite Sanjeev Kumar in the film which landed in controversy due to similarities between her character and Indira Gandhi.


    After her 1978 movie 'Pronoy Pasha' with Soumitra Chatterjee flopped, Sen quietly left the limelight and even allegedly refused the Dadasaheb Phalke Award in 2005 preferring not to make a public appearance.


    As per her wishes, her family maintained secrecy even when she was hospitalized. The reason behind Sen's withdrawal from public life remains a mystery.


    A follower of the Ramakrishna Mission order, Sen spent her retired life in meditation and prayer. In 1989, when Bharat Maharaj of the mission passed away, she was seen publicly walking all the way to the crematorium from Belur Math near Kolkata.


    Her daughter Moon Moon, though a well-known Bengali actress, could never overcome the large shadow that her mother's beauty and acting prowess cast. Sen's grand-daughters Riya and Raima have also featured in some Bollywood flicks.


    In 1963, Sen became the first Indian actress to be honoured at an international film festival - best actress award for 'Saat Paake Bandha' at Moscow film festival.


    She was cast opposite matinee idol Uttam Kumar in 30 films from 1953 to 1975. The gossip mills linked Sen to her leading co-stars, Uttam Kumar in particular.


    She earned both national and international acclaim for her performances as the quintessential romantic heroine be it in the role of 'Vishnupriya' in the fifties, 'Rina Brown' in the sixties or 'Bijaya' in the seventies.


    The actress was born as Rama Dasgupta at Pabna ( Bangladesh) in 1931 to Karunamoy and Indira Dasgupta.


    Suchitra married Dibanath Sen from an aristocratic family in 1947 before launching a successful acting career. There were rumours that the marriage suffered due to her successful acting career.


    Initially, Sen was more interested in singing than in acting. In 1951, she auditioned as a playback singer, but was instead offered a role by director Sukumar Dasgupta.


    Dasgupta's assistant director Nitish Roy named her Suchitra by which name she went on to achieve celebrity status.


    Her first film 'Sesh Kothay' (1952) remained unfinished and 'Sat Number Kayedi' with Samar Roy as the hero in 1953 was her first film to hit cinema houses.


    That year three other films of hers were also released - Niren Lahiri's 'Kajari', 'Bhagaban Sri Krishna Chaitanya' and Nirmal Dey's 'Sade Chuttar' opposite Uttam Kumar.


    In 1954, 'Agnipariksha' played to packed houses for a record 15 weeks and the Suchitra and Uttam were on their way to success.


    The pair then had a string of runway successes due to their on-screen chemistry. But Suchitra's talent ensured the success of her films even without Uttam as her co-star.


    'Uttar Phalguni', 'Sandhya Deeper Shikha', 'Deep Jeley Jai', with Basanto Chowdhury and 'Hospital' with Ashok Kumar, were also hits.


    Legendary actress Suchitra Sen passes away

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    Legendary actress Suchitra Sen passes away in Kolkata at 82 today.


    See more of: Suchitra Sen

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    এই সময় ডিজিটাল ডেস্ক: শুক্রবার সকাল ৮.২৫-এ হৃদরোগে আক্রান্ত হয়ে মারা গেলেন মহানায়িকা সুচিত্রা সেন। টানা ২৬ দিন চিকিত্‍‌সাধীন থাকার পর শেষ নিঃশ্বাস ত্যাগ করেন তিনি। মত্যুকালে তাঁর বয়স হয়েছিল ৮৩ বছর। ইতিমধ্যে হাসপাতালে পৌঁছে গিয়েছেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। তিনিই আনুষ্ঠানিকভাবে মহানায়িকার মৃত্যুর খবর ঘোষণা করেছেন। তিনি এও জানিয়েছেন যে কেওড়াতলা মহাশশানে মহানায়িকার শেষকৃত্য সম্পন্ন হবে এবং তাঁকে সম্মান জানাতে গান স্যালুট-এর ব্যবস্থাও করা হবে রাজ্য সরকারের তরফ থেকে। তিনি মহানায়িকার সব ভক্তদের অনুরোধ করেছেন যাতে তাঁর অন্তরালে থাকার সিদ্ধান্তকে সবাই সম্মান জানান এবং কোনও রকম বিশৃঙ্খলা যেন সৃষ্টি না হয় সেই দিকেও বিশেষ নজর রাখতে বলেন। সুচিত্রা সেনের পরিবারের প্রতি তিনি সমবেদনা জানিয়েছেন।


    বৃহস্পতিবার সন্ধে থেকেই তাঁর অবস্থার অবনতি হতে থাকে। শুক্রবার ভোর রাতে ম্যাসিভ হার্ট অ্যাটাকের পর মাল্টি অর্গান ফেলিয়র হয়। ডাক্তারদের হাজার প্রচেষ্টাতেও বাঁচানো যায়নি মহানায়িকাকে।


    ইতিমধ্যে বেল ভিউ হাসপাতালের সামনে জড়ো হতে শুরু করেছে তাঁর গুণমুগ্ধ ভক্তরা। আসতে শুরু করেছেন পুলিশের বড় কর্তারা। এখনও পর্যন্ত অত্যন্ত গোপনীয়তার সঙ্গেই তাঁর সমস্ত চিকিত্‍‌সা হয়ে এসেছে। অনুমান করা হচ্ছে তাঁর অন্তরালে থাকার সিদ্ধান্তকে সম্মান জানিয়ে অন্তেষ্টিক্রিয়ার পরবর্তী কাজ করা হবে।

    17 Jan, 2014 , 11.25AM IST

    মহানায়িকা সুচিত্রা সেন (১৯৩১- ২০১৪)

    12:49 PMনার্সিংহোমের বাইরে মহানায়িকাকে শেষবারের মতো দেখার জন্য ভিড় জমিয়েছেন ভক্তরা।---কুমার শঙ্কর রায়।


    12:47 PMদেহ প্রথমে বালিগঞ্জের বাড়িতে নিয়ে যাওয়া হবে। তারপর কেওড়াতলায় তাঁর শেষকৃত্য করা হবে।

    12:44 PMশেষবারের মতো দেখার অপেক্ষা। বেলভিউ নার্সিংহোমের ছাদে ভক্তরা।------কুমার শঙ্কর রায়।

    12:38 PMঅমিতাভ বচ্চন : 'সুচিত্রা সেনের গ্ল্যামার চিরকাল দর্শকদের মনে থাকবে।'

    12:23 PM'যাঁকে ছোঁয়া যায় না, স্পর্শ করা যায় না, শুধু অনুভূতি করা যায়। উনি একজন অসাধারণ মানুষ ছিলেন। ওনার অবসান হলেও আমাদের মধ্যে চিরদিনই থাকবেন।' : ঋতুপর্ণা সেনগুপ্ত।

    12:18 PMমমতা বন্দ্যোপাধ্যায় : 'শান্তিতে নায়িকার শেষকৃত্য করতে প্রশাসনকে সাহায্য করুন। পরিবারের ইচ্ছাকে সম্মান জানানো উচিত।'

    12:13 PM'মহানায়িকার আত্মার শান্তি কামনা করি' : প্রসেনজিত্‍।

    12:12 PMমহানায়িকাকে শেষ সম্মান জানাতে বাড়িতে আসতে শুরু করেছেন টলিউডের অভিনেত্রী-অভিনেতারা। আসছেন বহু গুণীজনরাও।

    12:10 PMইতিমধ্যে বেল ভিউ হাসপাতালের সামনে জড়ো হতে শুরু করেছে তাঁর গুণমুগ্ধ ভক্তরা।

    12:00 PMমহানায়িকার জীবনাবসান

    11:59 AMদুপুর ২টো নাগাদ রবীন্দ্র সদনে নায়িকার ছবিতে শেষ শ্রদ্ধা জানানো হবে : মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।

    11:58 AMবেলভিউ নার্সিংহোম থেকে সুচিত্রা সেনের দেহ নিজের বাড়িতে নিয়ে যাওয়া হতে পারে।

    11:57 AMবেলা ১টা নাগাদ কেওড়াতলা মহাশশ্মানে তাঁর শেষকৃত্য সম্পন্ন করা হবে।

    11:55 AMপরিবারের তরফে জানানো হয়েছে, তাঁকে কাঠের চুল্লিতে দাহ করা হবে।

    11:28 AMসুচিত্রা সেনের পরিবারের প্রতি মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় সমবেদনা জানিয়েছেন।

    11:27 AMকেওড়াতলা মহাশশানে মহানায়িকার শেষকৃত্য সম্পন্ন হবে এবং তাঁকে সম্মান জানাতে গান স্যালুট-এর ব্যবস্থাও করা হবে রাজ্য সরকারের তরফ থেকে।

    11:27 AMমৃত্যুকালে তাঁর বয়স হয়েছিল ৮৩ বছর। টানা ২৬ দিন চিকিত্‍‌সাধীন থাকার পর শেষ নিঃশ্বাস ত্যাগ করেন তিনি।

    11:26 AMশুক্রবার সকাল ৮.২৫-এ হৃদরোগে আক্রান্ত হয়ে মারা গেলেন মহানায়িকা সুচিত্রা সেন।

    http://eisamay.indiatimes.com/Legendary%20actress%20Suchitra%20Sen%20passes%20away/liveblog/28937133.cms


    এই সময় ডিজিটাল ডেস্ক:শেষ হল পথ। শান্তিতে থাকতে চেয়েছিলেন তিনি। চলেও গেলেন শান্তিতেই। তিন দশক লোকচোক্ষুর আড়ালে থাকার অদম্য শক্তির পরিচয় দিয়েছিলেন মহানায়িকা। তাই তো এত বছর নিজেকে সকলের থেকে বিচ্ছিন্ন রেখেও সকলের কাছের মানুষ হতে পেরেছিলেন তিনি। সকল প্রজন্মের বাঙালির কাছে তাঁর চেয়ে বেশি পরিচিত হয়তো বা কেউ আছে। আজ সেই 'পরিচিতা'ই চিরকালের জন্য চোখ বুজেছেন। মহানায়িকার প্রয়াণে শোকস্তব্ধ চলচ্চিত্রজগত্। শোকাতুর বাংলার আম জনতা থেকে শুরু করে সকলেই। শেষ শ্রদ্ধা জানিয়েছেন অনেকেই--


    মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়--মহানায়িকার চলে যাওয়া আমাদের কাছে খুব বড় দুঃসংবাদ। বড় মহীরুহের পতন। আজকের দিন দুঃখের, শোকের। এই খবর আমাদের হৃদয় ভেঙে চুরমার করে দিচ্ছে। তিনি একজন বিস্ময়, গভীর আশ্চর্য। নিজেকে বহুদিন আড়াল করে রেখেছিলেন। কেউ কারও বিকল্প হয় না। তাঁর আত্মার শান্তি কামনা করি।


    বিশ্বজিত্--বাংলা ছবির জগতে খুব বড় ক্ষতি।


    অপর্ণা সেন--লেজেন্ডারি নায়িকা। উনি চলে যাওয়ার মধ্যে অনেক কিছুর অবসান নিহিত। বিরাট সময়ের অবসান। তাঁর ওপর তথ্যচিত্র করার ইচ্ছে ছিল। কিন্তু তিনি রাজি হননি। জানতাম তিনি রাজি হবেন না। তাঁর মৃত্যু একটি যুগের অবসান।


    শাশ্বত বন্দ্যোপাধ্যায়--আপামর বাঙালির মনের মহানায়িকা। সুচিত্রা সেন ছিলেন, সুচিত্রা সেন আছেন, সুচিত্রা থাকবেন। তাঁর চরিত্রের মধ্য দিয়ে বেঁচে থাকবেন তিনি।


    হৈমন্তী শুক্ল--এত বড় শিল্পী নিজেকে লুকিয়ে রাখতে পারেন, এটা আমাদের শেখার।


    ঋতুপর্ণা সেনগুপ্ত--নায়িকা হয়ে ওঠার দুর্দান্ত দৃষ্টান্ত কেউ দেখাতে পারেননি, পারবেন না। এত বছর লোকচক্ষুর আড়ালে থেকেও সকলের মনে আছেন তিনি। অন্য মাত্রায় নিজেকে নিয়ে যাওয়ার অদম্য প্রয়াস করেছেন। তাঁর কাজ সম্পর্কে কিছু বলার ধৃষ্টতা দেখাতে পারব না। মানুষ হিসেবে অদ্ভূত ক্ষমতা দেখিয়েছেন। তিনি সারাজীবন মহানায়িকা থাকবেন। সেখানে কোনওদিন কারও স্থান হবে বলে মনে করি না। সুচিত্রা সেন এবং রোম্যান্টিসিসমের ইতি কোনও দিন হবে না। তিনি চিরকাল অমর থাকবেন।

    Abhishek Srivastava

    बिचौलिया पूंजीवाद का साहित्यिक मेला आज से फिर शुरू हो रहा है जयपुर में। इस बार प्रायोजकों में कुछ नए कॉरपोरेट नाम जुड़े हैं। सबसे ऊपर सबसे बड़ा नाम ज़ी टीवी का है। वही ज़ी टीवी, जिसके मालिक और संपादक कोयले की दलाली में पकड़े गए थे। बाकी नाम खुद देख लीजिए। देश भर का भूजल सुखा देने वाले कोका कोला से लेकर शराब की दुनिया के बादशाह किंगफिशर, कर चुराने वाले वोडाफोन से लेकर अमेरिकी साम्राज्‍यवाद के ऑक्‍सीजन सिलिंडर फोर्ड कंपनी तक- हर कोई इस बार साहित्‍य अलापेगा। इस मेले को पब्लिक डिप्‍लोमेसी डिवीज़न का भी वरदहस्‍त प्राप्‍त है। मुझे लगता है कि हमारे समय की सबसे महान अश्‍लीलता का अगर कोई नाम हो सकता है तो वो है जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल। आपका क्‍या खयाल है? मित्र Prakash K Ray, क्‍या हर बार की तरह इस बार भी कोई बयान नहीं जारी किया जाए? गोपाल जी से ज़रा बतियाइए। Paniniग्रू से भी।

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    uchitra Sen

    From Wikipedia, the free encyclopedia
    This article contains weasel words: vague phrasing that often accompanies biased orunverifiable informationSuch statements should be clarified or removed. (January 2014)
    Suchitra Sen
    Suchitra Sen as Paro in Bimpal Roy's, Devdas (1955).jpg
    Suchitra Sen as Paro in Bimal Roy's Devdas(1955)
    Born Rama Dasgupta
    6 April 1931
    PabnaBengal Presidency,British India
    (now in Bangladesh)
    Died 17 January 2014 (aged 82) [1]
    KolkataWest Bengal, India
    Nationality Indian
    Other names Rama (pronounced as Raw-maa)
    Ethnicity Bengali
    Years active 1953–1979
    Notable work(s) Saat Pake Badha
    Saptapadi
    Shaapmochan
    Harano Sur
    Deep Jele Jai
    Religion Hinduism
    Spouse(s) Dibanath Sen
    Children Moon Moon Sen
    Awards Padma ShriBanga Bibhushan
    Signature Suchitra Sen English signature.jpg

    Suchitra Sen (Bengali pronunciation: [ʃuːtʃiːraː ʃeːn] About this sound listen (help·info)) or Rama Dasgupta (About this sound listen (help·info); 6 April 1931 – 17 January 2014), was an Indian actress who acted in several Hindi and Bengali films. The movies in which she was paired opposite to Uttam Kumar became classics in the history of Bengali Cinema.[2]

    She was the first Indian actress to be awarded at an international film festival, when she won the Silver Prize for Best Actress award for Saat Paake Bandha at the 1963 Moscow film festival.[3][4] She was awarded the Padma Shri in 1972 by Government of India.[5] In 2005, she refused the Dadasaheb Phalke Award in order to stay away from the public eye.[6] In 2012, she was conferred West Bengal Government's highest HonorBanga Bibhushan.[7]

    Suchitra Sen is also commonly addressed as the 'Mahanayika' (literally meaning in Bengali- 'the great heroine'), signifying her legendary appeal, acting skills, classical grace and beauty and mass popularity down the decades, till modern times.

    Personal life and education[edit]

    Sen was born in Pabna in present day Pabna District of Bangladesh, on 6 April 1931.[8][9] Her father Karunamoy Dasgupta was the headmaster of the local school and her mother Indira Devi was a homemaker. She was their fifth child and third daughter. She had her formal education in Pabna.

    She married Dibanath Sen, son of a wealthy Bengali industrialist, Adinath Sen in 1947[10] and had one daughter, Moon Moon Sen, who is a former actress.

    Sen made a successful entry after marriage into Bengali films in 1952 and then a less successful transition to the Bollywood film industry. According to some unconfirmed but persistent reports in the Bengali press, her marriage was severely strained by her success in the film industry.

    Career[edit]

    Sen made her debut in films with Shesh Kothaay in 1952, but it was never released.[11] The following year saw her act opposite Uttam Kumar in Sharey Chuattor, a film by Nirmal Dey. It was a box-office hit and remembered for launching Uttam-Suchitra as a leading pair. They went on to become the icons for Bengali dramas for more than 20 years, becoming almost a genre to themselves.

    She received a Best Actress Award for the film Devdas (1955), which was her first Hindi movie. Her patented Bengali melodramas and romances, especially with Uttam Kumar, made her the most famous Bengali actress ever. Her films ran through the 1960s and the 1970s. Her husband died, but she continued to act in films, such as the Hindi hit Aandhi (1974), where she played a politician. Aandhiwas inspired by India's Prime Minister Indira Gandhi. Sen received a Filmfare Award nomination as Best Actress, while Sanjeev Kumar, who essayed the role of her husband, won the Filmfare as Best Actor.A point to be noted, her husband,who himself was an industrialist, invested a lot in her success, but later a great deal of rift developed among them.

    One of Suchitra's best known performances was in Deep Jwele Jaai (1959). She played Radha, a hospital nurse employed by a progressive psychiatrist, Pahadi Sanyal, who is expected to develop a personal relationship with male patients as part of their therapy. Sanyal diagnoses the hero, Basanta Choudhury, as having an unresolved Oedipal dilemma — the inevitable consequence for men denied a nurturing woman. He orders Radha to play the role though she is hesitant as in a similar case she had fallen in love with the patient. She finally agrees and bears up to Choudhury's violence, impersonates his mother, sings his poetic compositions and in the process falls in love again. In the end, even as she brings about his cure, she suffers a nervous breakdown. The film is full of beautiful, often partly lit, close ups of Sen which set the tone of the film and is aided by a mesmerizing performance by her. Asit Sen remade the film in Hindi as Khamoshi (1969) with Waheeda Rehman in the Suchitra Sen role.)

    Suchitra's other landmark film with Asit Sen was Uttar Falguni (1963). Suchitra carries the film single-handedly in the dual role of a courtesan Pannabai and her daughter Suparna, a lawyer. In particular, she is brilliant as Pannabai, bringing much poise, grace and dignity in the role of a fallen woman determined to see her daughter grow up in a good, clean environment. Suchitra as Pannabai is able to connect directly with the viewer and make him or her feel deeply for all that she goes through the course of the film thus giving her death at the end a solid, emotional wallop. Her international success came in the year of 1963, when she won the best actress award in Moscow Film Festival for the movie Saat Paake Bandha. In fact, she is the first female to receive an international film award.

    She refused Satyajit Ray's offer due to date problem; as a result Ray never made the film Devi Chaudhurani. She also refused Raj Kapoor's offer for a film under the RK banner. She retired from the screen in 1978 after a career of over 25 years to a life of quiet seclusion. She has avoided the public gaze after her retirement and has devoted her time to the Ramakrishna Mission.[8] Suchitra Sen was a contender for the Dadasaheb Phalke Award for the year 2005, provided she was ready to accept it in person. Her refusal to go toNew Delhi and personally receive the award from the President of India deprived her of that award.

    Death[edit]

    She died at a hospital (Belle Vue Clinic, kolkata) in the morning of the 17th of January, 2014 at 8:25 AM due to a massive heart attack.[12][13] She had been admitted there due to a chronic chest infection 3 weeks ago. The Chief Minister of West BengalMamata Banerjee declared that, Suchitra Sen will be given a gun salute before her cremation[14]. Her Death has been condoled by many leaders including President of India Pranab Mukherjee, Prime Minister Manmohan Singh and BJP's Prime Ministerial CandidateNarendra Modi.[15]

    Selected filmography[edit]

    Year Title Role Language Notes
    1952 Shesh Kothay Bengali Unreleased
    1953 Saat Number Kayedi
    1953 Bhagaban Srikrishna Chaitanya Bishnupriya Bengali
    1953 Sharey Chuattor Romola Bengali
    1953 Kajori
    1954 Sadanander Mela Sheela Bengali
    1954 Agnipariksha Bengali
    1954 Ora Thaake Odhare
    1954 Grihaprabesh Bengali
    1954 Atom Bomb
    1954 Dhuli Minati
    1954 Maraner Parey Tanima Bengali
    1954 Balaygras Manimala
    1954 Annapurnar Mandir Bengali
    1954 Sanjher Pradip Bengali
    1955 Devdas Parvati (Paro) Hindi First Hindi film
    1955 Shapmochan Madhuri Bengali
    1955 Sabar Uparey Bengali
    1955 Snaajhghar
    1955 Snaajher Pradeep Bengali
    1955 Mejo Bou Bengali
    1955 Bhalabaasa Bengali
    1956 Sagarika Sagarika Bengali
    1956 Trijama Swarupa Bengali
    1956 Amar Bou Bengali
    1956 Shilpi Bengali
    1956 Ekti Raat Swantana Bengali
    1956 Subharaatri Bengali
    1957 Harano Sur Dr. Roma Banerjee Bengali
    1957 Pathe Holo Deri Mallika
    1957 Jeeban Trishna
    1957 Chandranath Saraju
    1957 Musafir Shakuntala Verma Hindi
    1957 Champakali Hindi
    1958 Rajlakshmi O Srikanta Rajlakshmi
    1958 Surya Toran Aunita Chatarjee Bengali
    1958 Indrani Indrani
    1959 Deep Jwele Jaai Radha Bengali
    1959 Chaaowa Pawoa Bengali
    1960 Hospital Sarbari
    1960 Smriti Tuku Thaak Shobha Bengali
    1960 Bombai Ka Baboo Maya Hindi
    1960 Sarhad Hindi
    1961 Saptapadi Rina Brown Bengali
    1961 Saathihara
    1962 Bipasha
    1963 Saat Paake Badha Archana Bengali
    1963 Uttar Fhalguni Debjani / Pannabai / Suparna Bengali
    1964 Sandhya Deeper Sikha Jayanti Bannerjee Bengali
    1966 Mamta Devyani / Pannabai / Suparna Hindi
    1967 Grihadaha Achala
    1969 Kamallata Kamallata
    1970 Megh Kalo Dr. Nirmalya Roy Bengali
    1971 Fariyaad
    1971 Nabaraag
    1972 Alo Amaar Alo Atashi Bengali
    1972 Haar Maana Haar Bengali
    1974 Devi Chaudhurani Prafullamukhi Bengali
    1974 Srabana Sandhya Bengali
    1975 Priyo Bandhabi Bengali
    1975 Aandhi Aarti Devi Hindi
    1976 Datta Bijoya Bengali
    1978 Pranoy Pasha Bengali

    Awards and nominations[edit]

    Year Award Result Film
    1963 Moscow Film Festival - Best actress award Won Saat Paake Badha[4]
    1963 Filmfare Best Actress Award Nominated Mamta
    1972 Padma Shri For notable contribution in Arts[5]
    1976 Filmfare Best Actress Award Nominated Aandhi
    2012 Banga Bibhushan Won Lifetime Achievement in Film acting

    References[edit]

    1. Jump up^ "Actress Suchitra Sen passes away". Filmcircle.com. Retrieved Jan 17, 2014.
    2. Jump up^ Sharma, Vijay Kaushik, Bela Rani (1998). Women's rights and world development. New Delhi: Sarup & Sons. p. 368.ISBN 8176250155http://books.google.co.in/books?id=qnJ9J9UygR0C&pg=PA368 Check |isbn= value (help).
    3. Jump up^ "Suchitra Sen, Bengal's sweetheart". NDTV. 17 January 2014. Retrieved 17 January 2014.
    4. Jump up to:a b "3rd Moscow International Film Festival (1963)"MIFF. Retrieved 2012-12-01.
    5. Jump up to:a b "Padma Awards Directory (1954-2013)"Ministry of Home Affairs. "1972: 130: Smt Suchitra Sen"
    6. Jump up^ "Suchitra Sen awarded Banga-Bibhusan"Zee News India. May 20, 2012. Retrieved 2 June 2012.
    7. Jump up^ Das, Mohua (May 20, 2012). "The perils of a packed prize podium Ravi Shankar declines award"Telegraph, Kolkata (Calcutta, India). Retrieved 2 June 2012.
    8. Jump up to:a b Deb, Alok Kumar. "APRIL BORN a few PERSONALITIES". www.tripurainfo.com. Retrieved 2008-10-23.
    9. Jump up^ "Garbo meets Sen Two women bound by beauty and mystery"Telegraph (Calcutta, India). July 8, 2008. Retrieved 2 June 2012.
    10. Jump up^ Chakraborty, Ajanta (Jun 18, 2011). "Actress Suchitra Sen's secrets out!". TNN (Times of India).
    11. Jump up^ Chatterjee, ed. board Gulzar, Govind Nuhalani, Saibal (2003). Encyclopaedia of Hindi cinema. New Delhi: Encyclopaedia Britannica. pp. PT647. ISBN 8179910660.
    12. Jump up^ "Veteran acctress Suchitra Sen dies in Kolkata hospital after massive heart attack". Financial Express. 2012-06-12. Retrieved 2014-01-17.
    13. Jump up^ "Suchitra Sen suffers massive heart attack, passes away - Entertainment - DNA". Dnaindia.com. 2013-10-22. Retrieved 2014-01-17.
    14. Jump up^ "BBC News - Suchitra Sen: Iconic Indian Bengali actress dies". Bbc.co.uk. Retrieved 2014-01-17.
    15. Jump up^ "Indian Leaders Condole the Sad Demise of Suchitra Sen"Biharprabha News. Retrieved 17 January 2014.

    External links[edit]


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    [LARGE][LINK=/article-comment/17301-2014-01-17-13-54-35.html]वीरेन डंगवाल का सोमवार को अपोलो में होगा एक जटिल आपरेशन[/LINK][/LARGE]

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    DetailsCategory: [LINK=/article-comment.html]सुख-दुख...[/LINK]Created on Friday, 17 January 2014 19:24Written by B4M
    कैंसर से लड़ रहे मशहूर कवि और पत्रकार वीरेन डंगवाल की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं. ताजी सूचना के मुताबिक उनके गले में कैंसर का एक ट्यूमर है जो शुरुआती अवस्था में है. यह ब्रेन की नस के पास है. इसे आपरेट करके निकाला जाना है. इसी मसले पर राय मशविरा के लिए वीरेन डंगवाल को लेकर उनके परिजन मुंबई गए थे और टाटा मेमोरियल के वरिष्ठ डाक्टरों से कनसल्ट किया. मुंबई के डाक्टरों ने आपरेशन कर इसे निकलवाने के दिल्ली के डाक्टरों की सलाह को ही सही बताया और आपरेशन करा डालने को कहा.

    दिल्ली लौटे वीरेन डंगवाल ने मुंबई के डाक्टरों के परामर्श पर अपोलो से संपर्क किया और यहां सोमवार को आपरेशन करने पर सहमति बनी. रविवार को वीरेन डंगवाल अपोलो में भर्ती होंगे और सोमवार को आपरेशन किया जाएगा. यह आपरेशन जटिल बताया जा रहा है. इस बीच, वीरेन डंगवाल के परिजनों ने वीरेन डंगवाल के परिचितों, शुभचिंतकों, जानने वालों से अपील की है कि कृपया इन मुश्किल दिनों में फोन करने से बचने की कोशिश करें क्योंकि इससे अव्यवस्था पैदा हो रही है. अपनी बात, अपनी चिंता, सफल आपरेशन के लिए अपनी शुभकामना वीरेन डंगवाल तक पहुंचाना चाहते हैं तो उनके मोबाइल नंबर पर एसएमएस कर सकते हैं.

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    [LARGE][LINK=http://bhadas4media.com/article-comment/15792-2013-11-14-12-37-49.html]वीरेन डंगवाल की रेडियोथिरेपी का दौर पूरा, कल बरेली जाएंगे[/LINK][/LARGE]

    [LARGE][B][LINK=http://bhadas4media.com/article-comment/15442-2013-10-27-09-28-47.html]रेडियोथिरेपी के मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं वीरेन डंगवाल[/LINK][/B][/LARGE]

    [LARGE][LINK=http://bhadas4media.com/article-comment/14275-2013-09-04-20-37-46.html]वीरेन छुट्टी पा कर घर आए, दस दिनों तक कंप्लीट बेड रेस्ट की सलाह[/LINK][/LARGE]

    [LARGE][B][LINK=http://bhadas4media.com/article-comment/14130-2013-08-28-18-17-36.html]कैंसर से लड़ रहे वीरेन डंगवाल का आपरेशन सफल[/LINK][/B][/LARGE]

    [LARGE][LINK=http://bhadas4media.com/article-comment/13565-viren-bday-prog-report.html]आयोजन की कुछ तस्वीरें व कुछ बातें : वीरेन डंगवाल का 66वां जन्मदिन[/LINK][/LARGE]

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  • 01/18/14--11:31: जिनसे अमेरिका को कोई खतरा नहीं है,अमेरिकी उनकी जासूसी नहीं करता! ओबामा के भाषण को ध्यान से पढ़ें तो भारतीय सत्तावर्ग का आधार अभियान समझ में आ जाना चाहिए।जाहिर है कि नागरिकों की खुफिया जानकारी का भारत देश की एकता और अखंडता से कोई लेना देना नहीं है।यह खालिस मुक्त बाजार के हित में कारपोरेट सफाया अभियान का एजंडा है।इस एजंडा को पूरा करने में जायनवादी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद अचूक हथियार है,जिसका इस्तेमाल सभी पक्ष कर रहा है। आदमजाद नंगा होकर अब मुक्त बाजार के महोत्सव में हम जश्न ही मना सकते हैं,अपनी जान माल की हिफाजत नहीं।
  • जिनसे अमेरिका को कोई खतरा नहीं है,अमेरिकी उनकी जासूसी नहीं करता!


    ओबामा के भाषण को ध्यान से पढ़ें तो भारतीय सत्तावर्ग का आधार अभियान समझ में आ जाना चाहिए।जाहिर है कि नागरिकों की खुफिया जानकारी का भारत देश की एकता और अखंडता से कोई लेना देना नहीं है।यह खालिस मुक्त बाजार के हित में कारपोरेट सफाया अभियान का एजंडा है।इस एजंडा को पूरा करने में जायनवादी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद अचूक हथियार है,जिसका इस्तेमाल सभी पक्ष कर रहा है।

    आदमजाद नंगा होकर अब मुक्त बाजार के महोत्सव में हम जश्न ही मना सकते हैं,अपनी जान माल की हिफाजत नहीं।


    पलाश विश्वास


    खास खबर है,जिनसे अमेरिका को कोई खतरा नहीं है,अमेरिकी उनकी जासूसी नहीं करता।खतरा जिनसे हैं मसलन अमेरिका के मित्र देशों के राष्ट्रध्यक्ष, प्रधानमंत्री से लेकर अमेरिकी नागरिक तक की प्रिज्म जासूसी को अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जायज ठहरा दिया है। सही और गलत का यह जायनवादी सौंदर्यशास्त्र है,जो भारत में भी खूब लागू है।अमेरिकी हितों के खिलाफ जो हैं,भारत सरकार और भारतीय नस्लवादी नवधनाढ्य सत्तावर्ग को उनसे जबर्दस्त खतरा है।उनकी खुफिया निगरानी का भारत में भी चाक चौबंद इंतजाम है और लोकतंत्र का शतनाम जाप करने वाली कारपोरेट राजनीति इस ड्रोन प्रिज्म सीआईए नाटो तंत्र को ही मजबूत करने में लगी है।सर्वशक्तिमान वैश्विक व्यवस्था के शिरोमणि की समझ में नहीं आ रहा है कि अबतक जासूसी से हासिल जानकारी के आचार डालने की वैज्ञानिक पद्धति क्या होगी। अब इस जानकारी को किसी के हवाले करने से भी नहीं हिचकेगी अमेरिकी। भारत में नागरिकों की खुफिया जानकारी का अंतिम हश्र क्या होगा,ओबामा के इस सुधारात्मक कार्यक्रम से उसे लेकर नाना शंकाएं उत्पन्न हो गयी हैं।


    गौरतलब है कि देवयानी प्रकरण में भारत अमेरिका राजनय युद्ध के फर्जी घमासान के बावजूद भारत सरकार की ओर से भारतीय नागरिकों की खुफिया निगरानी पर आधिकारिक कोई आपत्ति दूसरे तमाम देशों की तरह अब तक दर्ज नहीं हुई है। खुफिया निगरानी कार्यक्रम में अमेरिका मित्र देशों के प्रबल विरोध की वजह से जो सुधार करने जा रहा है,उससे न भारत और न भारतीय नागरिकों की,न अमेरिका में और न भारत में अमेरिकी खुफिया निगरानी में कोई फ्रक पड़ने वाला है। देवयानी खोपड़ागड़े दलित हैं और उनके साथ हुए अन्याय के विरोध के लिए भारत सरकार के हम आभारी हैं।लेकिन भारतीय अति महत्वपूर्ण नागरिकों की जो अबतक अमेरिका में कूकूरगति होती रही है,वे मामले भी खुलें तो समझ में आये कि यह राजनयिक युद्ध कितना असली है। इसके उलट नाटो की आधारपरियोजना को लागू करते हुए अमेरिका और सीआईए को सारे गोपनीय तथ्य देने वाली अपनी भारत सरकार इन तथ्यों को न केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों,कारपोरेट घरानों के साथ बल्कि माफिया और आपराधिक गिरोह के लिए भी उपलब्ध करा रही है।आदमजाद नंगा होकर अब मुक्त बाजार के महोत्सव में हम जश्न ही मना सकते हैं,अपनी जान माल की हिफाजत नहीं।


    आधार विरोधी मोर्चा के सिपाह सालार गोपाल कृष्ण जी ने आज सुबह सुबह फोन किया और बताया कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के तहत जिन राज्यों में आंखों की पुतलियां और दसों उंगलियों की छाप जमा किया जाना है,भारत सरकार की आधिकारिक सूची में पश्चिम बंगाल का नाम नहीं है।उनके लिए पहेली है कि बंगाल के स्थानीय निकायों को सुप्रीम कोर्ट की मनाही के बावजूद एनपीआर के तहत नागरिकों को आदार बनाने की अनिवार्यता का फतवा क्यों दिया जा रहा है। जबकि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ही पहल पर बंगाल विधानसभा में माकपाइयों के समर्थन से आधार को नकद सब्सिडी से जोड़ने के खिलाफ फतवा जारी हुआ है।


    हमारे लिए भी यह पहेली है। जैसे अरविंद केजरीवाल और योगेंद्र यादव नीत खास आदमी ब्रिगेड को असंवैधानिक आधार के तहत नागरिकों की खुफिया निगरानी से कोई ऐतराज नहीं है,उसी तरह सैम पित्रोदा की सलाह पर चलने वाली बंगाल पीपीपी बंगाल सरकार को बुनियादी तौर पर आधार से कोई परेशानी है नहीं। बंगाल विधानसभा में जो सर्वदलीय प्रस्ताव पास हुआ है, वह आधारविरोधी कतई नहीं है और बाकी देश की कारपोरेट राजनीति की तरह बंगाल की कारपोरेट राजनीति को भी भारतीय नागरिकों की निजता और गोपनीयता से कुछ लेना देना नहीं है। वे नकद सब्सिडी को आधार से जोड़ने का विऱोध सिर्फ इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि बंगाल में दस फीसदी लोगों के आधार कार्ड भी अबतक बने नहीं हैं और आधार की वजह से अचानक नागरिक सेवाएं स्थगित हो गयी तो इसके राजनीतिक समीकरण पर होने वाले दुष्प्रभाव की दरअसल चिंता है।


    फिरभी तेलकंपनियों और खासकर अप्रैल से गैस की कीमत दोगुणा हो जाने की स्थिति में रिलायंस के हितों की चिंता ज्यादा  है,इसीलिए स्थानीय निकायों से वाम बेदखली के बाद सत्ता पक्ष ने सर्वदलीय प्रस्ताव के विपरीत यह पहल कर दी है।


    हम बार बार आपका ध्यान दिला रहे हैं कि कारपोरेट कायाकल्प से सारे राजनीतिक विकल्प कारपोरेट है। मुख्य समस्या राजनीतिक विकल्प का नहीं है,बल्कि कारपोरेट युद्धक राज्यतंत्र है जो संविधान,कानून के राज, लोकतंत्र, पर्यावरण,नागरिक अधिकारों,मानवअधिकारों के अलावा प्रकृति और मनुष्यता के विरुद्ध है।अगले बजट में सभी तरह की सब्सिडी खत्म होनी है। कांग्रेस हार गयी तो संघ परिवार की सरकार हो या आप,आम आदमी और अमीरों के बीच की खाई गरीबों का सफाया करके ही खत्म करेगी।समूची कर प्रणाली बदल जायेगी।गाजरों की थोक सप्लाई कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की तरह मुक्त बाजार के हितों के संरक्षण के लिए राजनीतिक समीकरण साधने के लिए ही हैं। रंग बिरंगे राजनीतिक विकल्प से हमारी समस्याओं का समाधान नहीं होगा और न बंद होगा अबाध नरमेध अभियान।


    लेकिन ऐन चुनाव से पहले बारह सब्सिडी सिलिंडर की घोषणा से लोग बाग बाग है और किसी को खबर नहीं है कि गैस की कीमतों में दोगुणा इजाफा अप्रैल से ही लागू होना है।विनियंत्रित बाजार में तरह तरह के करतब से हम अपनी क्रयशक्ति बढ़ाने की कवायद में ही जिंदगी गुजार रहे हैं।


    इसे इसतरह समझ लें कि सबसे बड़ा भ्रष्टाचार तो बुनियादी संस्थान विवाह में है।सबसे ज्यादा धोखाधड़ी विवाह नामक पवित्रता की आड़ में है। अबाध सेक्स का खुला यह लाइसेंस है पुरुषतंत्र के लिए, जहां काबिल से काबिल लड़की उपभोक्ता वस्तु के अलावा कुछ भी नहीं है।स्त्री अस्मिता का सत्यानाश इसी विवाह संस्थान के जरिये होता है।किसी को जिंदगीभर सुनंदा पुष्कर बन जाने के बाद भी इसका अहसास शायद ही होता है।

    जो व्यक्ति जहां है सिर्फ अपनी बेटी के विवाह में दिये जाने वाले दहेज और तत्संबंधी आयोजन के लिए हर सूरत में हर तरह अंधाधुंध कमाई के फिराक में होता है। आप सिर्फ दहेज का लेनदेन बंद कर दें तो तृणमूल स्तर पर जो भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी पैठी हैं,उनका तुरंत सफाया हो जाये। लेकिन कानून और सशक्तीकरण के पाखंड के बावजूद स्त्री निधन का महोत्सव विवाह और दहेज के माध्यम से पूरे राजनीतिक समर्थन से जारी है और इस व्यवस्था के खिलाफ कोई झाड़ू कहीं नहीं है।


    अमेरिकी हितों के मद्देनजर प्रबंधकीय दक्षता और तकनीकी चमत्कार की जो  राजनीति कारपोरेट महाविध्वंस के लिए है,उसमें पार्टीबद्ध लोग जाहिर है कि किसी किस्म का परिवर्तन रज्यतंत्र में करने के खिलाफ होंगे। जाहिर है कि नस्ली भेदभाव के तहत सामाजिक अन्याय और असमता का वीभत्स तांडव भी जारी रहना है।

    लेकिन सवर्ण असवर्ण विवाह संस्थान में जो स्त्री  विरोधी दहेज वर्चस्व है ,उसके खिलाफ कोई अमेरिका के खिलाफ जंग की जरुरत नहीं है और न कारपोरेट हितों का कोई प्रत्यक्ष लेना देना नहीं है।परिवर्तन के झंडेवरदार अपने प्रभाव क्षेत्र में इस दहेज वर्चस्व विवाह पद्धति को साफ करने के लिए एकबार सपाई तो करके देखें।राज्यतंत्र में बुनियादी परिवर्तन की शुरुआत कम से कम इस तरह अपने ही घर की सफाई से शुरु करने में किसीको कोई दिक्कत नही है।


    लेकिन दीवाल पर लिखे आलेख की तरह इस सच से हम मुंह चुराते हैं।उसीतरह बहिस्कार और जनसंहार की नीतियों पर आधारित,बहुसंख्य कृषि समाज के महाविध्वंस को उद्देश्यित खुले बाजार के तंत्र में हम अपना अपना खाता दुरुस्त करने में ही लगे हैं।जमा के बेहिसाब गणित के ही हम सारे भारतीय नागरिक पहरुआ हो गये हैं।इसके लिए निर्वस्त्र हो जाने पर शर्म का अहसास तक नहीं होता।गू में भी पड़ा होगा पैसा तो जीभ से चाटकर निकाल लेंगे लोग।पैसे के अबाध वर्चस्व के खिलाफ चींचीं करने वालों की बलि देते हुए।


    कटु सत्य तो यह है कि जाति, धर्म, भाषा, नस्ल, क्षेत्र,रंग की अस्मिताएं तोड़कर हम सामाजिक और पारिवारिक संबंध जोड़ते हुए देश जोड़ने और सामाजिक न्याय और समता के लिए कोई नागरिक पहल करना तो दूर,उस दिशा में सोचने में भी असमर्थ हैं। इससे भी बड़ा शर्त यह है कि इन दायरों में रहकर अस्मिता और पहचान बचाते हुए भी हम कुसंस्कार और कुप्रथा का अंत करके एक स्वच्छ ईमानदार समाज के लक्ष्मणगंडित औपनिवेशिक दौर के नवजागरण सुलभ सीमाबद्ध पहल के लिए तैयार नहीं हो सकते। सोच भी नहीं सकते। देश के लोगों की कोई परवाह किये बिना,खुल बाजार में एक दूसरे के वध को सदैव त्तपर हम लोग देशभक्ति के मिथ्या स्वाभिमान का उत्सव रचते हुए स्वयं को,समाज को और देश को तोड़ने का हरसंभव प्रयत्नकरने में बहुआयामी दक्षता के उत्कर्ष पर है। भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए बिना आचरण हम राजनीतिक विकल्प में अपनी ही रचे हुए आत्मध्वंस को दोहरा रहे हैं।


    अर्थ व्यवस्था और वैश्विक व्यवस्था और राज्य तंत्र में बदलाव की तैयारी की ये बुनियादी और प्राथमिक शर्तें हैं,जन्हें हम कम से कम अपने संदर्भ में लागू करना ही नहीं चाहते। यह ध्यान  देने ग्य है कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम आदिवासी और किसान विद्रोहों से हुआ और किसानों और आदिवासी को ही स्वतंत्र देश में हमने तबाही के कगार पर पुंचा दिया है।सत्तापक्ष विपक्ष इसके लिए जितना जिम्मेदार है,अपने बाजारु आचरण से हम सारे भारतीय नागरिक भी उसके लिए कम जिम्मेदर नहीं है।यह भी गौर करने वाली है कि आजादी का अहसास भी नवजागरण से ही होता है। पूरी दुनिया में यह जितना सच है,उतना ही सच भारत के संदर्भ में भी है।भारतीय अस्मिता की बनावट नवजागरण से रची गयी तो नागरिकों के सशक्तीकरण अभिानकी निरंतरता ने ही आजादी का जज्बा पैदा किया। आजादी का वह जज्बा ही सिरे से गायब है और हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारी नागरिकता,हमारी निजता और गोपनीयता हाशिये पर है। मानुष के हक हकूक करने वाले चेहरे के पीछे अमानुष ही है,मानुष नहीं।आधार प्रकल्प को इसलिए हम समझ ही नहीं सकते। डांडी यात्रा या विदेशी कपड़ा के वर्जन के भावावेग को हम समझ ही नही सकते क्योकि हममें से हर कोई अपनी अपनी अस्मिता में कैद है और कहीं कोई सौ टक्का भारतीय है ही नहीं।महज टोपी लगाकर देश की स्वतंत्रता का अंजाम भारत विभाजन हुआ तो हम लोग बार बार उसी अंजाम को दोहराने को नियतिबद्ध इंद्रियों से विकलांग लोग हैं।भोग के अलावा हमारा कोई सरोकार नहीं है और न जीवनदर्शन।दृष्टि अंध है हमारी सारी कुशलता,दक्षता,विधायें,माध्यम और मेधा।


    ओबामा के भाषण को ध्यान से पढ़ें तो भारतीय सत्तावर्ग का आधार अभियान समझ में आ जाना चाहिए।जाहिर है कि नागरिकों की खुफिया जानकारी का भारत देश की एकता और अखंडता से कोई लेना देना नहीं है।यह खालिस मुक्त बाजार के हित में कारपोरेट सफाया अभियान का एजंडा है।इस एजंडा को पूरा करने में जायनवादी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद अचूक हथियार है,जिसका इस्तेमाल सभी पक्ष कर रहा है।


    बीबीसी के मुताबिक अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मित्र देशों और उनकी सरकारों की ख़ुफ़िया निगरानीको रोकने का एलान किया है।अमरीकी इलेक्ट्रॉनिक ख़ुफ़िया तंत्र में भारी बदलाव की घोषणा करते हुए ओबामा ने कहा कि अभी जिस तरह से ये कार्यक्रम चलाया जा रहा है, उस पर रोक लग जाएगी।

    ओबामा ने ये भी एलान किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) करोड़ों अमरीकियों के फ़ोन रिकॉर्ड से जुटाई गई जानकारी अपने पास नहीं रख सकेगी। ये जानकारी कहां जमा रहेगी, इस पर उन्होंने फ़िलहाल कुछ भी नहीं कहा है। लेकिन खुफ़िया अधिकारियों और अमरीकी एटॉर्नी जनरल को 60 दिनों का समय दिया गया है कि वो इस पर अपनी राय दें। माना जा रहा है कि जिस तरह के सुधार का एलान ओबामा ने किया है, वो कई अमरीकी अधिकारियों की उम्मीद से कहीं ज़्यादा है। अमरीकी ख़ुफ़िया तंत्र से जुड़े कई पूर्व अधिकारियों ने ओबामा के इन कदमों की तीखी आलोचना की है और कहा है कि इससे अमरीका की सुरक्षा को धक्का लगेगा। लीक हुई जानकारी की वजह से अमरीका को देश के अंदर ही नहीं अपने मित्र देशों के सामने भी शर्मिंदगी उठानी पड़ी जब पता चला कि उन देशों के नेताओं पर भी निगरानी रखी जा रही थी। यूरोपीय देशों ख़ासकर जर्मनीके साथ अमरीका के रिश्तों में इस लीक की वजह से काफ़ी तनाव आया।

    "मैं दुनिया के लोगों को बताना चाहता हूं कि अमरीका उन आम लोगों की बिल्कुल निगरानी नहीं करता है जिनसे अमरीका को कोई ख़तरा नहीं है."--बराक ओबामा, अमरीकी राष्ट्रपति।


    इस भाषण में उन्होंने अपने मित्र देशों के नेताओं की चिंताओं को भी दूर करने की कोशिश की. उनका कहना था, ''मैं अपने मित्र देशों और साझेदार देशों के नेताओं से कहना चाहूंगा कि अगर किसी विषय पर मुझे उनकी सोच के बारे में जानना होगा तो मैं फ़ोन उठाकर उनसे बात कर लूंगा, न कि उनकी ख़ुफ़िया निगरानी करूंगा।''


    ओबामा ने अपने भाषण में एनएसए कॉन्ट्रेक्टर एडवर्ड स्नोडेन का भी ज़िक्र किया जिन्होंने रूस में पनाह ले रखी है और जिनकी लीक की हुई जानकारी से ही ये पूरा हंगामा शुरू हुआ। उनका कहना था कि स्नोडेन ने जिन दस्तावेज़ों को सनसनीख़ेज़ तरीके से लीक किया, उनकी वजह से कई अमरीकी कार्यक्रमों पर आने वाले कई सालों तक असर पड़ेगा।

    नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने जहां इन सुधारों का स्वागत किया है, वहीं उनका कहना है कि कई ऐसे पहलू हैं जिन पर और ठोस सुधार लागू किए जा सकते थे और अगर ऐसा नहीं हुआ तो इस पूरे कार्यक्रम पर ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ेगा।


    1. आधारयोजना का सच हो ही गया उजागर - Janjwar

    2. www.janjwar.comविमर्शविमर्श

  • 10-01-2012 - ब्रिटेन सरकार के हाल के निर्णय के बाद कहीं भारत में भी इस परियोजना को तिलांजलि न दे देनी पड़े... गोपाल कृष्ण...आई.डी./आधारपरियोजना) असंसदीय, गैरकानूनी, दिशाहीन और अस्पष्ट है और राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के लिए ...

  • आधारकार्ड से राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा - Janjwar

  • www.janjwar.comविमर्शविमर्श

  • 08-03-2012 - राहुल गाँधी ने 'आधार' को पार्टी का एजेंडा बनाया था. अब जबकि उन्होंने पार्टी की हार की जिम्मेदारी ले ली है उन्हें चाहिए की वो मतदाताओं द्वारा खारिज 'आधार' परियोजना को रोकने के लिए कदम उठायें ... गोपाल कृष्ण. चुनाव के दौरान ...

  • देशद्रोही पंचमवाहिनी में शामिल हैं आधारसमर्थक ...

  • www.hastakshep.comहस्तक्षेपबहस

  • 03-01-2014 - जाने अनजाने जो लोग सीआईए और नाटो की असम्वैधानिक कॉरपोरेट आधारपरियोजना के पैरोकार हैं, वे तमाम लोग देशद्रोही पंचमवाहिनी में ...गोपाल कृष्णजी की अगुवाई में हमारे अनेक साथी लगातार इस मामले में जनजागरण चला रहे हैं।

  • आधार और जनसंख्या रजिस्टर परियोजना पर संदेह

    नवभारत टाइम्स | Dec 30, 2011, 04.00AM IST

    गोपाल कृष्ण॥

    भारत सरकार की बायोमेट्रिक्स ( जैवमापन ) पर आधारितविशिष्ट पहचान संख्या बताने वाली यूआईडी आधार योजनानागरिक अधिकारों के लिए खतरनाक है। वित्त से संबंधितसंसदीय समिति की जो रिपोर्ट 13 दिसंबर को दोनों सदनोंमें पेश की गई , उसमें यह भी कहा गया है कि इस योजनाको शुरू करते समय सरकार ने दुनिया के दूसरे देशों केअनुभवों की अनदेखी की है।


    संसदीय समिति का मानना है कि यह देशवासियों के निजीजीवन पर एक तरह का हमला है। ब्रिटेन में ऐसे पहचानपत्र कानून को खत्म कर देने का फैसला 2006 में ही कर लिया गया था। वहां सरकार ने घोषणा की है किअगले कदम में पासपोर्ट आदि के लिए जुटाए गए आंकड़े भी खत्म कर दिए जाएंगे।


    भारत सरकार कहती है कि यूआईडी परियोजना गरीबों के लिए चलाई जाने वाली वित्तीय योजनाओं कोसमावेशी बनाएगी और सरकारी सहायता ( सब्सिडी ) असली जरूरतमंदों तक ही पहुंचे - इसके लिए उनकीपहचान को आसान बनाएगी। लेकिन सरकार भविष्य की कोई गारंटी नहीं दे सकती। अगर यहां नाजियोंजैसा कोई दल कभी सत्तारूढ़ हो गया , तो यूआईडी के ये आंकड़े उसे भी प्राप्त होंगे और वह बदले की भावनासे उनका इस्तेमाल नागरिकों के किसी खास तबके के खिलाफ कर सकता है। जर्मनी , रूमानिया तथा यूरोपके कई और जगहों पर पहले ऐसा हो चुका है , जहां वह जनगणना से लेकर नाजियों को यहूदियों की सूचीप्रदान करने का माध्यम बना।


    पिछले साल 18 मई की अपनी प्रेस विज्ञप्ति में भारत सरकार ने बताया था कि कैबिनेट कमेटी ने विशिष्टपहचान प्राधिकरण द्वारा निवासियों के जनसांख्यिकीय और बायोमेट्रिक आंकड़े इकट्ठे करने की पद्धतिसिद्धांतत : स्वीकार कर ली है। इसमें चेहरे तथा आंखों की पुतलियों की तस्वीरें तथा सभी दस उंगलियों केनिशान लेने का प्रावधान है। इन्हीं मानकों और प्रक्रियाओं को जनगणना के लिए रजिस्ट्रार जनरल आफइंडिया और यूआईडी व्यवस्था के अन्य रजिस्ट्रारों को अपनाना पड़ेगा।


    लेकिन संसदीय समिति ने सरकार के इस कदम को असंवैधानिक और कार्यपालिका के अधिकार से बाहरपाया। योजना मंत्रालय की यूआईडी योजना से गृह मंत्रालय का राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर ( एनपीआरपरियोजना ) शुरू से ही जुड़ा हुआ था , जिसका खुलासा प्रधानमंत्री द्वारा दिसंबर 2006 में गठित शक्ति प्राप्तमंत्रिसमूह की घोषणा से होता है। यह भी पहली बार है कि यहां जनसंख्या रजिस्टर बनाया जा रहा है। इसकेजरिए रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया जो कि सेंसस कमिश्नर भी हैं , देशवासियों से संबंधित आंकड़ों काभंडार तैयार करेंगे।


    यह समझ जरूरी है कि जनगणना और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर अलग - अलग चीजें हैं। जनगणनाहमारी जनसंख्या , साक्षरता , शिक्षा , आवास , घरेलू सुविधाओं , आर्थिक गतिविधियों , शहरीकरण ,प्रजनन दर , मृत्यु दर , भाषा , धर्म और प्रवासन आदि के संबंध में बुनियादी आंकड़ों का सबसे बड़ा स्रोतहै। केंद्र व राज्य सरकारें इसी के आधार पर अपनी योजनाएं बनाती हैं और नीतियों का क्रियान्वयन करतीहैं।


    दूसरी ओर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर , देशवासियों और नागरिकों के पहचान संबंधी आंकड़ों का समग्रभंडार तैयार करने का काम करेगा। इसके तहत व्यक्ति का नाम , उसके माता - पिता , पति - पत्नी का नाम ,लिंग , जन्मस्थान और तारीख , वर्तमान वैवाहिक स्थिति , शिक्षा , राष्ट्रीयता , पेशा , वर्तमान और स्थायीनिवास का पता जैसी तमाम सूचनाओं का संग्रह किया जाएगा। इस आंकड़ा भंडार में 15 साल की उम्र सेऊपर सभी व्यक्तियों की तस्वीरें और उनकी उंगलियों के निशान भी रखे जाएंगे।


    राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के आंकड़े जमा करने के बाद अगला काम होगा - हर नागरिक को विशिष्टपहचान पत्र प्रदान करना। प्रस्तावित यह था कि यह पहचान पत्र एक तरह का स्मार्ट कार्ड होगा , जिसकेऊपर आधार पहचान अंक और फोटो के साथ उस व्यक्ति से संबंधित सभी बुनियादी जानकारियां छपी होंगी।यह सारा विवरण एक चिप में होगा।


    सरकार नागरिकों के आंकड़ा कोष को राष्ट्रीय निधि बताती है। लेकिन यह निधि कब निजी कंपनियों कीनिधि बन जाएगी , यह भी कहा नहीं जा सकता। संसदीय समिति ने संभवत : इसीलिए यह आशंका जताईहै कि ऐसी योजनाएं किन्हीं विशेष स्थितियों में आम नागरिक समाज के खिलाफ हथियार के रूप में भीइस्तेमाल हो सकती हैं।


    Search Results

    1. Boycott UID/Aadhaar Number By Gopal Krishna - Countercurrents.org

    2. www.countercurrents.org/krishna270911.htm

  • Boycott UID/Aadhaar Number. By Gopal Krishna. 27 September, 2011. Countercurrents.org. This is to appeal to you and to draw your most urgent attention ...

  • UID//Aadhaar Scheme Is Against Civil Liberties By Gopal Krishna

  • www.countercurrents.org/krishna231110.htm

  • Nov 23, 2010 - This is with reference to the memorandum of understanding (MoU) between Ministry of Human Resource Development and the Unique ...

  • Delhi Residents, Unorganised And Informal Workers Face Biometric ...

  • www.countercurrents.org/krishna210313.htm

  • Biometric Profiling By Aadhaar/UID. By Gopal Krishna. 21 March, 2013. Countercurrents.org. A Sheila Dikshit's budget speech ignores Punjab & Haryana High ...

  • UID/Aadhar | Bargad... बरगद...

  • bargad.org/category/uidaadhar/

  • Jan 3, 2014 - Posts about UID/Aadhar written by bargad. ...Gopal Krishna, the author of this article, is an activist. He runs ToxicsWatch Alliance, Ban ...

  • Articles Questioning Aadhaar: GOPALA KRISHNA

  • questioningaadhaar.blogspot.com/2010/12/gopala-krishna.html

  • by Ram Krishnaswamy - in 63 Google+ circles

  • Dec 1, 2010 - GOPALA KRISHNA. By Gopal Krishna. 21st Dec 2010. Today I was on Dr. Katherine Albrecht Radio Show, in US at 3 AM early morning for an ...

  • Activists cry foul against Aadhaar - The Telegraph

  • www.telegraphindia.comFront PageJharkhand

  • Jan 12, 2012 - Arguing that the creation of Aadhaar numbers had no legislative base as... of Citizens' Forum for Civil Liberties Gopal Krishna, among others.

  • 'AADHAAR' How a nation is deceived - Page 95 - Google Books Result

  • books.google.co.in/books?id=GQDjWjrSgZ4C

  • Jijeesh p b

  • lI1 Historical Reasons Against UID//Aadhar Project By Gopal Krishna& Prakash Ray, countercurrent.org, 27/09/2010 Money Life.in National Strategy for Trusted ...

  • 'Nandan Nilekani is subverting the Constitution' - Rediff.com News

  • www.rediff.comNews

  • Feb 5, 2011 - Human Rights activist Gopal Krishna speaks at length to Prasanna D Zore on what ails the UID project and why he thinks it should be scrapped ...

  • Gopal Krishna News Photos Videos - Rediff.com

  • www.rediff.comNews

  • Latest news - Gopal Krishna, Photos - Gopal Krishna, Videos - Gopal Krishna.Gopal... How can Aadhaar be deemed 'voluntary' if service delivery is being made ...

  • Aadhaar hide more info under RTI - Moneylife

  • www.moneylife.inLifeUID/Aadhaar

  • Dec 4, 2013 - Aadhaar and transparency are two distinct things. ... as system integrator, said Gopal Krishna, a member of Citizens Forum for Civil Liberties ...





  • America's Secret War In 134 Countries

    By Nick Turse

    18 January, 2014

    TomDispatch.com

    They operate in the green glow of night vision in Southwest Asia and stalk through the jungles of South America. They snatch men from their homes in the Maghreb and shoot it out with heavily armed militants in the Horn of Africa. They feel the salty spray while skimming over the tops of waves from the turquoise Caribbean to the deep blue Pacific. They conduct missions in the oppressive heat of Middle Eastern deserts and the deep freeze of Scandinavia. All over the planet, the Obama administration is waging a secret war whose full extent has never been fully revealed -- until now.

    Since September 11, 2001, U.S. Special Operations forces have grown in every conceivable way, from their numbers to their budget. Most telling, however, has been the exponential rise in special ops deployments globally. This presence -- now, in nearly 70% of the world's nations -- provides new evidence of the size and scope of a secret war being waged from Latin America to the backlands of Afghanistan, from training missions with African allies to information operations launched in cyberspace.

    In the waning days of the Bush presidency, Special Operations forces were reportedly deployed in about 60 countries around the world. By 2010, that number had swelled to 75, according to Karen DeYoung and Greg Jaffe of the Washington Post. In 2011, Special Operations Command (SOCOM) spokesman Colonel Tim Nye told TomDispatch that the total would reach 120. Today, that figure has risen higher still.

    In 2013, elite U.S. forces were deployed in 134 countries around the globe, according to Major Matthew Robert Bockholt of SOCOM Public Affairs. This 123% increase during the Obama years demonstrates how, in addition to conventional wars and a CIA drone campaign, public diplomacy and extensive electronic spying, the U.S. has engaged in still another significant and growing form of overseas power projection. Conducted largely in the shadows by America's most elite troops, the vast majority of these missions take place far from prying eyes, media scrutiny, or any type of outside oversight, increasing the chances of unforeseen blowback and catastrophic consequences.

    Growth Industry

    Formally established in 1987, Special Operations Command has grown steadily in the post-9/11 era. SOCOM is reportedly on track to reach 72,000 personnel in 2014, up from 33,000 in 2001. Funding for the command has also jumped exponentially as its baseline budget, $2.3 billion in 2001, hit $6.9 billion in 2013 ($10.4 billion, if you add in supplemental funding). Personnel deployments abroad have skyrocketed, too, from 4,900 "man-years" in 2001 to 11,500 in 2013.

    A recent investigation by TomDispatch, using open source government documents and news releases as well as press reports, found evidence that U.S. Special Operations forces were deployed in or involved with the militaries of 106 nations around the world in 2012-2013. For more than a month during the preparation of that article, however, SOCOM failed to provide accurate statistics on the total number of countries to which special operators -- Green Berets and Rangers, Navy SEALs and Delta Force commandos, specialized helicopter crews, boat teams, and civil affairs personnel -- were deployed. "We don't just keep it on hand," SOCOM's Bockholt explained in a telephone interview once the article had been filed. "We have to go searching through stuff. It takes a long time to do that." Hours later, just prior to publication, he provided an answer to a question I first asked in November of last year. "SOF [Special Operations forces] were deployed to 134 countries" during fiscal year 2013, Bockholt explained in an email.

    Globalized Special Ops

    Last year, Special Operations Command chief Admiral William McRaven explained his vision for special ops globalization. In a statement to the House Armed Services Committee, he said:

    "USSOCOM is enhancing its global network of SOF to support our interagency and international partners in order to gain expanded situational awareness of emerging threats and opportunities. The network enables small, persistent presence in critical locations, and facilitates engagement where necessary or appropriate..."

    While that "presence" may be small, the reach and influence of those Special Operations forces are another matter. The 12% jump in national deployments -- from 120 to 134 -- during McRaven's tenure reflects his desire to put boots on the ground just about everywhere on Earth. SOCOM will not name the nations involved, citing host nation sensitivities and the safety of American personnel, but the deployments we do know about shed at least some light on the full range of missions being carried out by America's secret military.

    Last April and May, for instance, Special Ops personnel took part in training exercises in Djibouti, Malawi, and the Seychelles Islands in the Indian Ocean. In June, U.S. Navy SEALs joined Iraqi, Jordanian, Lebanese, and other allied Mideast forces for irregular warfare simulations in Aqaba, Jordan. The next month, Green Berets traveled to Trinidad and Tobago to carry out small unit tactical exercises with local forces. In August, Green Berets conducted explosives training with Honduran sailors. In September, according to media reports, U.S. Special Operations forces joined elite troops from the 10 member countries of the Association of Southeast Asian Nations -- Indonesia, Malaysia, the Philippines, Singapore, Thailand, Brunei, Vietnam, Laos, Myanmar (Burma), and Cambodia -- as well as their counterparts from Australia, New Zealand, Japan, South Korea, China, India, and Russia for a US-Indonesian joint-funded coun­terterrorism exercise held at a training center in Sentul, West Java.

    In October, elite U.S. troops carried out commando raids in Libya and Somalia, kidnapping a terror suspect in the former nation while SEALs killed at least one militant in the latter before being driven off under fire. In November, Special Ops troops conducted humanitarian operations in the Philippines to aid survivors of Typhoon Haiyan. The next month, members of the 352nd Special Operations Group conducted a training exercise involving approximately 130 airmen and six aircraft at an airbase in England and Navy SEALs were wounded while undertaking an evacuation mission in South Sudan. Green Berets then rang in the new year with a January 1st combat mission alongside elite Afghan troops in Bahlozi village in Kandahar province.

    Deployments in 134 countries, however, turn out not to be expansive enough for SOCOM. In November 2013, the command announced that it was seeking to identify industry partners who could, under SOCOM's Trans Regional Web Initiative, potentially "develop new websites tailored to foreign audiences." These would join an existing global network of 10 propaganda websites, run by various combatant commands and made to look like legitimate news outlets, including CentralAsiaOnline.com, Sabahi which targets the Horn of Africa; an effort aimed at the Middle East known as Al-Shorfa.com; and another targeting Latin America called Infosurhoy.com.

    SOCOM's push into cyberspace is mirrored by a concerted effort of the command to embed itself ever more deeply inside the Beltway. "I have folks in every agency here in Washington, D.C. -- from the CIA, to the FBI, to the National Security Agency, to the National Geospatial Agency, to the Defense Intelligence Agency," SOCOM chief Admiral McRaven said during a panel discussion at Washington's Wilson Center last year. Speaking at the Ronald Reagan Library in November, he put the number of departments and agencies where SOCOM is now entrenched at 38.

    134 Chances for Blowback

    Although elected in 2008 by many who saw him as an antiwar candidate, President Obama has proved to be a decidedly hawkish commander-in-chief whose policies have already produced notable instances of what in CIA trade-speak has long been called blowback. While the Obama administration oversaw a U.S. withdrawal from Iraq (negotiated by his predecessor), as well as a drawdown of U.S. forces in Afghanistan (after a major military surge in that country), the president has presided over a ramping up of the U.S. military presence in Africa, a reinvigoration of efforts in Latin America, and tough talk about a rebalancing or "pivot to Asia" (even if it has amounted to little as of yet).

    The White House has also overseen an exponential expansion of America's drone war. While President Bush launched 51 such strikes, President Obama has presided over 330, according to research by the London-based Bureau of Investigative Journalism. Last year, alone, the U.S. also engaged in combat operations in Afghanistan, Libya, Pakistan, Somalia, and Yemen. Recent revelations from National Security Agency whistleblower Edward Snowden have demonstrated the tremendous breadth and global reach of U.S. electronic surveillance during the Obama years. And deep in the shadows, Special Operations forces are now annually deployed to more than double the number of nations as at the end of Bush's tenure.

    In recent years, however, the unintended consequences of U.S. military operations have helped to sow outrage and discontent, setting whole regions aflame. More than 10 years after America's "mission accomplished" moment, seven years after its much vaunted surge, the Iraq that America helped make is in flames. A country with no al-Qaeda presence before the U.S. invasion and a government opposed to America's enemies in Tehran now has a central government aligned with Iran and two cities flying al-Qaeda flags.

    A more recent U.S. military intervention to aid the ouster of Libyan dictator Muammar Qaddafi helped send neighboring Mali, a U.S.-supported bulwark against regional terrorism, into a downward spiral, saw a coup there carried out by a U.S.-trained officer, ultimately led to a bloody terror attack on an Algerian gas plant, and helped to unleash nothing short of a terror diaspora in the region.

    And today South Sudan -- a nation the U.S. shepherded into being, has supported economically and militarily (despite its reliance on child soldiers), and has used as a hush-hush base for Special Operations forces -- is being torn apart by violence and sliding toward civil war.

    The Obama presidency has seen the U.S. military's elite tactical forces increasingly used in an attempt to achieve strategic goals. But with Special Operations missions kept under tight wraps, Americans have little understanding of where their troops are deployed, what exactly they are doing, or what the consequences might be down the road. As retired Army Colonel Andrew Bacevich, professor of history and international relations at Boston University, has noted, the utilization of Special Operations forces during the Obama years has decreased military accountability, strengthened the "imperial presidency," and set the stage for a war without end. "In short," he wrote at TomDispatch, "handing war to the special operators severs an already too tenuous link between war and politics; it becomes war for its own sake."

    Secret ops by secret forces have a nasty tendency to produce unintended, unforeseen, and completely disastrous consequences. New Yorkers will remember well the end result of clandestine U.S. support for Islamic militants against the Soviet Union in Afghanistan during the 1980s: 9/11. Strangely enough, those at the other primary attack site that day, the Pentagon, seem not to have learned the obvious lessons from this lethal blowback. Even today in Afghanistan and Pakistan, more than 12 years after the U.S. invaded the former and almost 10 years after it began conducting covert attacks in the latter, the U.S. is still dealing with that Cold War-era fallout: with, for instance, CIA drones conducting missile strikes against an organization (the Haqqani network) that, in the 1980s, the Agency supplied with missiles.

    Without a clear picture of where the military's covert forces are operating and what they are doing, Americans may not even recognize the consequences of and blowback from our expanding secret wars as they wash over the world. But if history is any guide, they will be felt -- from Southwest Asia to the Mahgreb, the Middle East to Central Africa, and, perhaps eventually, in the United States as well.

    In his blueprint for the future, SOCOM 2020, Admiral McRaven has touted the globalization of U.S. special ops as a means to "project power, promote stability, and prevent conflict." Last year, SOCOM may have done just the opposite in 134 places.


    Nick Turse is the associate editor of TomDispatch.com. His latest book is Kill Anything That Moves: The Real American War in Vietnam. He is the author/editor of several other books, including The Changing Face of Empire: Special Ops, Drones, Spies, Proxy Fighters, Secret Bases, and Cyber Warfare, Terminator Planet: The First History of Drone Warfare, 2001-2050 (with Tom Engelhardt), The Complex: How the Military Invades Our Everyday Lives and The Case for Withdrawal from Afghanistan. Turse is currently a fellow at Harvard University's Radcliffe Institute. His website is Nick Turse.com. You can follow him on Twitter @NickTurse, on Tumblr, or Facebook.

    http://www.countercurrents.org/turse180114.htm


    Cultural Organizations or Trojan Horses?

    By George Abraham

    18 January, 2014

    Countercurrents.org

    In ordinary times, a U.S. House resolution ( 417) that calls for 'reaffirming the need to protect the rights and freedom of the religious minorities while praising India's rich religious diversity and commitment to tolerance and equality', may not have ruffled any feathers let alone garnered some media attention. However, in a surprising twist, emotions were flying high over the move by the US lawmakers with some of the national and local Indian organizations that are quite active on the Capitol Hill in lobbying for various causes back in India.

    In particular, the Hindu American Foundation (HAF) and the Indian American Muslim Council (IAMC) are at loggerheads over this resolution that may not bode well for the larger interest of India. There is a potential that the ongoing fight might imperil India's image as well as damage national interests among the US legislators at the Capitol. We have heard of charges and counter-charges by both sides and it is time to examine not only the veracity of these charges but also the propriety of actions undertaken by some of these organizations 'on behalf of the community' and 'for the sake of India'.

    The recent incident involves a Modi supporter and Chicago-based entrepreneur Shalabh "Shalli' Kumar who tried to hijack a carefully planned event by the Republican Party to woo Indian Americans to GOP. Once the story broke, many organizations and individuals like Mr. Juned Qazi, the Executive Committee member and the President of the Madhya Pradesh Chapter of Indian National Overseas Congress(I) USA wrote to the Republican lawmakers stating that the Republican Party was going against its own fundamental principles and traditions of tolerance and dignity by hosting and promoting such an event.

    The leaders of the GOP woke up and learned of the nefarious design by Mr. Kumar under the aegis of the National Indian American Public Policy Institute, to promote Narendra Modi and his candidacy for Prime Minister of India in the upcoming election. Mr. Kumar has committed the egregious error – and is probably in violation of the US ethics rules that prohibit the use of the Congressional seal, stationary and indicia - used the House seal and circulated a flyer that indicated Modi would address the meeting via video link. This action orchestrated by Mr. Kumar probably in collusion with other Modi supporters brought shame and disrepute to our community.

    A simplistic view might be that this is an isolated incident. However, if one examines the growth of the Indian Organizations and their activities under cover, a much clearer picture would seem to emerge. NIAPPI is not the first non-profit organization that engaged in this sort of activity. Many of these organizations are founded to promote cultural or religious activities. To an average Indian American, these are noble objectives and for which they would volunteer their time, efforts and resources to promote the heritage and culture of India in a faraway land. It appears to be rewarding especially when these efforts are directed to educate the younger generations of age-old traditions and customs, and build bridges between the two countries and two cultures.

    However, some of these organizations seem to be operating under dubious objectives. The US India Political Action Committee (USINPAC), an organization that is dedicated to lobby Congress to promote India's interest in the US has generally done a credible job promoting US-India relations. Their recent intervention on behalf of BJP and Narendra Modi exposes their narrow hidden agenda. A newly issued statement says 'USINPAC has successfully led a grassroots lobbying efforts in Washington DC to stop the above Resolution from going to the House Floor for a vote. ' From now until the National elections in India anticipated in mid.2014, USINPAC will spare no effort in making sure the U.S. Congress does not intentionally or unintentionally influence the outcome of India's upcoming elections. India is a sovereign nation and its citizens have a right to choose their leaders' a recent press release stated. Yes, it appears that USINPAC would like to see the election impacted only one way: to assure a Modi victory! Sadly, the organization that is supposed to stand up for the common values and principles both the nations cherish, has decided to throw in their lot with a leader of a party that is no longer welcome in the U.S. That also explains the deafening silence on their part when minorities in India fall victims to human rights violations in places like Gujarat.

    Hindu American Foundation (HAF), is an organization that is said to promote and protect the Hindu philosophy and way of life in U.S. However, lately it has become the lightening rod for the ' Hindutva' agenda. They professes to be ardent supporters of the separation of church and state in US often aligning them with ACLU to fight any Christian symbolism and yet supportive of a supremacist agenda of Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) that has pushed the Narendra Modi candidacy for the Prime Minister in the upcoming election in India. Dr. Raja Swamy, a spokesperson for the 'Coalition Against Genocide' recently commented, "American audiences need to know that HAF and its ilk are rooted in supremacist and majoritarian ideologies. They pay lip service to caste oppression issues and pluralism but have a monoculture and elitist view of the Indian society. They want pluralism and minority rights for themselves here in the US but want minorities, Dalits and women to be second class citizens in India". They ought to examine whether they truly share the same values both these countries are founded upon, freedom, liberty and justice for all.

    Federation of Indian Associations (FIA), the umbrella organization for various cultural and regional outfits in NY Tri-state area was established in 1970's to bring the community together. Their flagship event is the India Day Parade in New York every August to coincide with India's Independence Day. If one carefully analyzes these events, the guest lists often include some of those vehemently anti-Congress leaders from India who would participate in the Parade and then go on to do negative propaganda on the UPA Government led by the Congress Party. This year, one of the invitees made the rounds openly promoting Bharatiya Janata Party (BJP).

    In a nutshell, some of these organizations are carrying on with a stealth agenda to promote the BJP and advance the cause of Narendra Modi. This overt political activity by cultural organizations might be in direct violation of the by-laws or the approved Constitutions and some of them may even be putting their hard-earned tax-exempt status at risk . Another disturbing aspect in the Asian Indian public arena is the notion that like some other communities, we could maneuver through the political process using money power to achieve any narrow political objectives from some of the largely unsuspecting and often naïve political leaders in this country. Shalli Kumar's action is a prime example of such behavior.

    Two top members of a US Congress constituted commission on religious freedom have recently expressed sadness over nomination of Gujarat Chief Minister Narendra Modi as BJP prime ministerial candidate, terming him as the 'poster boy' of India's failure to punish the violent. "It was another son of Gujarat, Mahatma Gandhi, who once offered a broad, tolerant vision for the country and its multi-religious society" wrote Katrina Lantos Swett and Mary Ann Glendon in an Op-ed to CNN.

    It is a known fact the Gujarat's High Court rapped Modi for inaction and ordered compensation for religious structures that suffered damage. In 2005, the U.S. State Department agreed with United States Commission for International Religious Freedom (USCIRF) and others and revoked Modi's visa.

    It is time to ask a pertinent, albeit rhetorical question to many of these organizations that are acting as Trojan Horses on behalf of Modi: would these US-based organizations support for example, a Chris Christie Candidacy for Presidency if he is to show the same 'inaction', as Modi did in 2002 for not protecting the lives and properties of all Indians alike who live in New Jersey?

    George Abraham is Chairman, Indian National Overseas Congress (I), USA

    http://www.countercurrents.org/abraham180114.htm


    Religion, Peace And Violence

    By Ram Puniyani

    18 January, 2014

    Countercurrents.org


    The global scenario is full of violence in the name of religion. The acts of terrorism are attributed to religious teachings at times. The local violence, the attack on religious minorities is also presented as a religious phenomenon. The last three decades have seen this tragic phenomenon where the political agenda of super power on one hand and the agenda of fundamentalist-fascist groups on the other have been given the veneer of religion. The major theory underlying the US policy in the oil zone has derived its legitimacy from Samuel Huntington theory of 'Clash of Civilizations'. In South Asian countries spanning from Pakistan to Myanmar to Sri Lanka, the religious minorities have been on the firing line, have been facing a violence orchestrated by those practicing 'religious nationalism', those who on the pretext of defense of their religion, target the religious minorities. Be it the Hindus and Christians in Pakistan, Christians and Muslims in India, Buddhists and Hindus in Bangla Desh, Muslims in Myanmar or Christians and Muslims in Sri Lanka, the violence has been stalking them in one or the other form. This has increased the feeling of insecurity of religious minorities and also has eroded their rights as citizens.

    What has the moral teachings of religion to do with all this? Nothing whatsoever. Still the popular perceptions and propaganda of the religious nationalist groups has been so pernicious that a 'social common sense' has been created, which gives credence to the role of religion in this violence.

    It is in this light that three major statements from leaders, two of them religious and one political have come as a breath of fresh air, delinking religion from violence and espousing the peace making role of religion. Surely, religion is the most complex social phenomenon. It does encompass the element of moral values, values of humanism, so to say, on one side. At the same time it encompasses more visible facets of identity like rituals, Holy books, places of worship, the clergy and Holy Scriptures. At another level it has the element of faith in the supernatural power, deities. Surely, some of the religions did not talk of the supernatural power. In those religions, the prophets of the religions themselves, in due course have been given the exalted position of the God. This element of faith in supernatural is varying in degrees but is present all the same in different religions. These three statements, which struck the author all, came from people of diverse religious streams.

    The first one came from Pope Francis while deliberating on the future of the church and redefining long-held Catholic doctrines and dogmas. The recently held 'Third Vatican Council' concluded with Pope Francis announcing that Catholicism is now a "modern and reasonable religion, which has undergone evolutionary changes. The time has come to abandon all intolerance. We must recognize that religious truth evolves and changes. Truth is not absolute or set in stone…." In a very profound manner he went on to say that "God is not a judge but a friend and a lover of humanity. God seeks not to condemn but only to embrace… Our church is big enough for heterosexuals and homosexuals, for the pro-life and the pro-choice!"

    He added "because Muslims, Hindus and African Animists are also made in the very likeness and image of God, to hate them is to hate God...Whether we worship at a church, a synagogue, a mosque or a mandir, it does not matter. Whether we call God, Jesus, Adonai, Allah or Krishna, we all worship the same God of love. This truth is self-evident to all who have love and humility in their hearts!""God is changing and evolving as we are, for God lives in us and in our hearts. When we spread love and kindness in the world, we touch our own divinity and recognize it."

    This lengthy quote from his speech demolishes so many of the intolerant attitudes towards, 'others', towards those having different norms, towards those having different sexual orientation as well. We witnessed recently in India that most of the clergy of different religions welcomed the Supreme Court decision whereby same sex relations are regarded as a crime. This quote from Pope also goes against the ideology of "Clash of Civilizations"; and the media propaganda whereby people of other religions are looked down upon, and Muslims in particular are demonized by large section of people. The biggest contribution of Pope is to emphasize on respect-tolerance for those who are different from us. It also outlines that we cannot stick to dogmas which were brought in the name of religion at particular time, in the times gone by. This is an extremely welcome stance taken by the highest authority of Catholic faith, something which can be the role model for clergy of other religions to emulate.


    Not to be left behind, the founding-leader and patron-in-chief of Minhaj-ul-Quran International and author of the acclaimed book Fatwa on Terrorism and Suicide Bombings, Shaykh-ul-Islam Dr. Muhammad Tahir-ul-Qadri condemned all acts of terrorism and said that the concept of "Jihad has been hijacked by terrorists". He is precisely on the dot as the word Jihad has been given the dastardly meaning by the Salafi version of Islam, a version picked up by the US for trainings in especially set up Madrassas, from where the Mujahidin, Taliban, Al Qaeda were brought up. The politics of control on the oil resources took an inhuman form where United States proactively picked up the pervert version of Islam and popularized as 'the Islam', aided and assisted by its minions and large section of World media aping US in most of the matters. Dr. Mohammad, is in line with the Sufi version of Islam, where tolerance for others and celebration of diversity has been the norm. In the name of this Jihad; so much damage has been done to the human race, to redo which massive efforts are needed and one lauds the efforts of those scholars and clerics of Islam who have presented the human, tolerant face of Islam Worldwide. One cannot forget to mention the great Islamic Scholar, Dr. Asghar Ali Engineer, who strove till the end of his life to present the Islam in the proper light, in the light of values of amity and peace. Surely even today there are many who are aggressively promoting the intolerant versions of Islam, the likes of Dr. Zakir Naik, who are doing great disservice to Islam and human society.


    Swami Vivekananda is the latest icon to be hijacked by the politics of intolerance. Those who have spread hatred for religious minorities are projecting him to be their messiah. In this light Indian Prime Minister Dr. Manmohan Singh statement is very praiseworthy. Dr. Singh points out that "true religion cannot be the basis of hatred and division, but of mutual respect and tolerance for faiths and beliefs of all."


    One does note the glaring differences in the interpretation of same religion. One can note the diverse and opposite ways in which political actions take place in the name of same religion. Two or three examples are very obvious. From Hinduism one can see Mahatma Gandhi on one side and Nathuram Godse on the other. In Islam one can see Khan Abdul Gaffar Khan, Maulana Abul Kalam Azad on one side and Osama bin Laden and the Muslim nationalists on the other. Same way one can see Pope Francis on one side and Anders Berling Brevik (Norwegian terrorist who killed 86 youth) on the other. It is the same religion in whose name such opposite stands are taken. We need to wake up to free ourselves from the ossified, intolerant views of religions and stand for humanistic teaching and tolerant traditions of religions.

    Ram Puniyani was a professor in biomedical engineering at the Indian Institute of Technology Bombay, and took voluntary retirement in December 2004 to work full time for communal harmony in India. He is involved with human rights activities from last two decades.He is associated with various secular and democratic initiatives like All India Secular Forum, Center for Study of Society and Secularism and ANHAD.


    http://www.countercurrents.org/puniyani180114.htm



    Shamshad Elahee Shams

    दाऊदी बोहरा समुदाय के नेता सय्य्दना की १०२ साल की उम्र में मौत, जनाजे में हुआ उपद्रव १८ मरे.

    सय्येदना के व्याभिचार के विरुद्ध 'बोहरा समाज सुधार आन्दोलन' के नेता, विश्व प्रसिद्द इस्लामी विद्वान डाक्टर असगर अली इंजीनियर की मृत्यु पिछले साल जब हुई थी, उनकी मैय्यत में गिनती के ढाई दर्जन लोग थे.

    कैसा पाखंडी समाज है ? धूर्तता अपनी पराकाष्ठा पर है...लानत.

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    • You, Himanshu Kumar, Shamshad Elahee Shams, Ramesh Bhangi and 49 others like this.

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    • Swayam Sarvaharaये उपद्रव क्यों हुआ?

    • 6 hours ago· Like

    • Arjun Sharmaशमशाद साहब वैसे मैं पहले से स्व.स्सय्दना बोहराबुद्दीन के बारे में नहीं जानता था इनके मरणोपरांत विकिपीडिया के द्वारा जानकारी पायी.यूट्यूब से इनके किसी धार्मिक प्रवचन सुनने के लिए कोशिस की लेकिन कुछ नहीं मिला ताकि इनके धार्मिक और अध्यात्मिक ज्ञान को समझ ...See More

    • 3 hours ago· Like

    • Ashok Kumar Sharma Syedna is a State within a State. All followers have to pay compulsory taxes to him and have to follow strict code of conduct including a dress code. Those who oppose his archaic and unconstitutional code are excommunicated from society (community) and...See More

    • 2 hours ago· Like· 3

    • Misir Arunमूर्खों का अनुपात हमेशा अधिक रहा है .....विचित्र किन्तु सत्य |

    • about an hour ago· Like· 2

    Navbharat Times Online

    आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर सोशल मीडिया में कई मजेदार कॉमेंट्स और पिक्स शेयर किए जा रहे हैं, देखें...



    फनी पिक्स देखने के लिए क्लिक करें...http://navbharattimes.indiatimes.com/hansi-mazak/funny-photo/hansimazakphotolist/12545581.cms

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    Panini Anand

    सोमवार सुबह 10 बजे तक अरविंद बवाल अपने टूलबॉक्स भारती का इस्तीफा लें अन्यथा इस्तीफा दे दें. और सोमनाथ भारती शर्म करो और डूब मरो चुल्लू भर पानी में.

    Unlike·  · Share· 7 hours ago·

    • You, Abhishek Srivastava, Dilip Khan, Sheeba Aslam Fehmi and 51 otherslike this.

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    • Jyotsna Siddharth horrifying!! AAP will go out of power soon to never come back again!

    • 7 hours ago· Like· 1

    • Kundan Yadavबंदर के हाथ में उस्तुरा मिलने से इस तरह की हरकतें कोई आश्चर्य नहीं।

    • 6 hours ago· Like· 2

    • Lakshman Roy Panini ki baaki baaton se bhale hi kai log sahmat na hon, lekin ye baat bilkul sahi hai ki AAP ne aisa karke khud ko shive sena, ram sena, hindu raksha dal ki category me khada kar liya hai.... ho sakta hai ki wahan galat ho raha ho, jaisa ki harsh bha...See More

    • 3 hours ago· Like

    • Alok Kumar"आप" क्या चाहता है? जन अदालत ! नक्सली स्टाइल.. जिस तरह से उनके स्वयंभू कमांडर (मंत्री) रात बेरात कोर्ट लगाने की कोशिश कर रहे हैं उससे भविष्य अराजक प्रतीत हो रहा है..

    • about an hour ago· Like

    Saradindu Uddipan posted a photo to Nagraj Chandal's timeline.

    AJAY KUMAR DIMPAL===MANDDAL PRESIDENT DESWA

    Unlike·  · Share· 2 hours ago·

    Jitendra Yadav shared Forward Press's photo.

    Bhujan nayak Raja Mahishasur

    साप्‍ताहिक दलित आदिवासी दुनिया के 19-25 जनवरी, 2014 अंक से साभार।

    Unlike·  · Share· about an hour ago·



    Satya Narayan

    एक दमनकारी राज्यसत्ता को चलाने के लिए यह ज़रूरी है कि वे तमाम लोग, जिनका इस व्यवस्था में स्वर्ग है, एक ऐसे दर्शन का प्रचार करें ताकि जनता की सोचने-समझने की शक्ति को ख़त्म किया जा सके। बड़े-बड़े राजनेता से लेकर फिल्मी एक्टर, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर आदि जो करोड़ों की कमाई कर रहे हैं, ऐसे दर्शन का ख़ूब प्रचार करते दिख जायेंगे। शोषणकारी पूँजीवादी राज्यसत्ता अपने तमाम सत्ता-संस्थानों द्वारा चाहे वह शिक्षा केन्द्र हो, न्यायालय व संविधान हों अथवा तथाकथित लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ मीडिया का टी-वी, रेडियो, अख़बार हो – चारों तरफ कूपमण्डूकता, अन्धविश्वास, अवैज्ञानिकता फैलाते हैं।

    http://ahwanmag.com/Babas-in-India

    तुम राम भजो, हम राज करें।

    ahwanmag.com

    एक दमनकारी राज्यसत्ता को चलाने के लिए यह ज़रूरी है कि वे तमाम लोग, जिनका इस व्यवस्था में स्वर्ग है, एक ऐसे दर्शन का प्रचार करें ताकि जनता की सोचने-समझने की शक्ति को ख़त्म किया जा सके। बड़े-बड़े राज...

    Unlike·  · Share· about an hour ago

    Ujjwal Bhattacharya

    अब रास्ते में कोई काला-कलूटा मिल जाय तो उसे घेर लीजिये. पकड़कर पूछिये - अबे, तेरा वीसा कौन सा है ? इश्टुडेंट है ? किस कालिज का ? बिजनेस करता है साला ? कइसा बिजनेस ? तू अपने को अमरीकी समझता है क्या ? फिर उसके डेरे पर पुलिस का छापा लगवाइये. कोई औरत मिल जाय तो उसे भीड़ के बीच बइठाकर जांच के लिये पेशाब करवाइये. साली जरूर ड्रग्स लेती होगी.

    Like·  · 39 minutes ago

    • 2 people like this.

    • Sujit Ghoshक्या यह सही है कि भारतीय सबसें ज्यादा नस्ली होते हैं । आब तो सुनते है गोरी होने की क्रीम साउथ में भी खुब बिकती है

    • 17 minutes ago· Like

    • Ujjwal Bhattacharyaबिल्कुल होते हैं. और वर्ण व्यवस्था भी नस्लवाद है. म्लेच्छ और यवन Xenophobia के शब्द हैं. अन्य धर्मों के साथ धर्मशास्त्रीय विमर्श के आधार पर विवाद नहीं किया गया है, जातिगत आधार पर उन्हें नीचा माना गया है.

    • 13 minutes ago· Like

    • Palash Biswas It is true.The evil of Indian system lies beneath extreme apartheid practiced with surgical precision.

    • a few seconds ago· Like

    जनज्वार डॉटकॉम

    वर्ष 1932 से 2013 तक लगभग 81 वर्ष की समयावधि के बीच न जाने कितने भू-वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों ने केदारनाथ के आसपास के क्षेत्र को लेकर बौद्धिक बहसें, निरीक्षण-परीक्षण तथा शोध पत्र तैयार किये होंगे, लेकिन अफसोस एक भी फतेह सिंह कण्डारी जी की अनुभवपरक पंक्तियों के समानान्तर नहीं टिकते. समय रहते अगर इस पुस्तक का संज्ञान लिया जाता, तो केदारनाथ की भीषण त्रासदी न झेलनी पड़ती...http://www.janjwar.com/2011-06-03-11-27-26/78-literature/4711-amrit-sanjeevani-ek-shodhparak-dastavej-for-janjwar-by-narendra-kathait-for-janjwar

    'अमृत संजीवनी'एक शोधपरक दस्तावेज

    janjwar.com

    Janjwar

    Abhishek Srivastava via Junputh

    "जैसे वे किसानों को देते हैं, आदिवासियों को देते हैं, ठीक उसी तरह वे विरोधी विचारों को भी मुआवज़ा देने में कोई गुरेज़ नहीं करते। इस तरह वे विरोधी विचार को एक तरह से खरीद लेते हैं और उसकी धार को कुंद कर देते हैं। मुआवज़ा लेने के बाद जिस तरह किसान या आदिवासी अपनी ज़मीन या जंगल की लड़ाई जारी रखने का नैतिक अधिकार खो देता है, उसी तरह लेखक भी अपने विचार की लड़ाई फिर नहीं लड़ पाता।"

    Rangnath SinghAvinash DasPanini AnandAshutosh KumarAnita BhartiAjay Prakash Aflatoon Afloo Atul Ch...See More

    जनपथ : जयपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरुद्ध त्रैमासिक पत्रिका ''भोर'' का वक्‍तव्‍य

    junputh.com

    Like·  · Share· 4 hours ago·


    H L Dusadh Dusadh

    10 hours ago·

    • मित्रों!मेरा विश्व कवि ढसाल पर यह लेख आज,18.1.14 के देशबंधु में प्रकाशित हुआ है.आप इसेwww.deshbandhu.co.inपर भी देख सकते हैं.
    • धरती के नरक से निकला एक अप्रतिम नायक:नामदेव ढसाल
    • एच एल दुसाध
    • 15जनवरी,2014 की मनहूस सुबह.मैं दून एक्सप्रेस से कोलकाता से बनारस जा रहा था.अचानक मोबाइल घनघनाहट सुन कर गहरी नींद से उठ गया.धीरे-धीरे आंखे खोलकर जब मोबाइल के स्क्रीन पर नज़र गड़ाया,सुरेश केदारे के नाम देखकर एक अप्रिय संवाद की आशंका से घिर गया.मैंने मन कड़ा कर मोबाइल ऑन किया.उधर से भाई केदारे के सुबकने की आवाज़ सुनाई पड़ी.उनका सुबकना सुनकर मैंने अनुमान लगा लिया कि ढसाल साहब नहीं रहे.कुछ क्षणों के बाद अपनी रुलाई पर किसी तरह काबू पाते हुए उन्होंने कहा,'भाई साहब दादा नहीं रहे!अभी-अभी उन्होंने आखरी सांस ली है.'मैं स्तब्ध रह गया और मोबाइल काट दिया.
    • 15 जनवरी की सबह साढ़े चार बजे जिस दुखद संवाद का सामना किया उसके लिए लिए विगत एक माह से ही मानसिक प्रस्तुति लेने लगा था.पहले से ही कई बीमारियों से घिरे ढसाल साहब ,जिन्हें उनके अनुसरणकारी प्यार से दादा कहते रहे हैं,पिछले सितम्बर से आंत के कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे थे.27 नवम्बर को ही उनका ऑपरेशन होना तय हुआ था,जो उनके रक्त-कणों में कुछ विशेष कमी के कारण टल गया.मैं 27 नवम्बर के पहले ही उनसे मिलने के लिए मुंबई जाना चाहता था.पर, पहुँचा 4 दिसंबर की रात.अगले दिन भाई सुरेश केदारे और लेखक लहू खामकर के साथ उनसे मिलने नरीमन पॉइंट इलाके में अवस्थित 'बॉम्बे हॉस्पिटल'पंहुचा.पता चला तीन डॉक्टरों की टीम उनका कुछ टेस्ट कर रही है जिसमें 3-4घंटे लग सकते हैं.लिहाज़ा उनसे बिना मिले लौटना पड़ा.
    • आईसीइयू में पड़े ढसाल साहब से मिलवाने के लिए सुरेश केदारे जी ने दूसरा प्रयास 7 दिसंबर को किया.किन्तु डॉक्टरों ने मिलने की इज़ाज़त नहीं दी.उनसे न मिलने की निराशा मेरे चेहरे पर गहराते देख भाई सुरेश केदारे और उनके साथ आये एक व्यक्ति ने 'कमाठीपुरा'और 'गोलपीठा'जैसी बस्तियां देख लेने का प्रस्ताव रखा ,जहां वे पले–बढे थे.इन बस्तियों का नाम सुनते ही उनके विषय में पढ़ी बहुत सी बातें जेहन में कौंध गयीं.अतः हम बिना बिलम्ब किये वहां के लिए टैक्सी पकड़ लिए.
    • भाई सुरेश जिन्हें अपने साथ लाये थे ढसाल साहब के बाल सखा वे आत्मा राम भी उस गोलपीठा के ही इलाके के रहनेवाले थे.वे हमें लेकर उस 'गोलपीठा'पहुंचे जहाँ ढसाल साहब बैठकर शुरूआती दिनों में अपनी कवितायेँ लिखा करते थे.मैंने उनकी 'गोलपीठा'पढ़कर इस इलाके के विषय में एक धारणा बना रखा था किन्तु यह साक्षात नरक होगा, इसकी कल्पना नहीं कर पाया था.गोलपीठा से पीबी रोड होते हुए हम 'नवाब चाल'के उस घर की ओर रवाना हुए जहाँ ढसाल साहब पले-बढे.हम जिस रास्ते से गुजर रहे थे उस पर भी ग्लोबलाइजेशन की छाया पड़ी है,ऐसा आत्मा जी ने बताया.सड़कें कच्ची की जगह पक्की हो गयी हैं,चाल भी पक्के मकान में परिवर्तित हो गए हैं.अब बिजली के बल्ब वहां भी रौशनी बिखेर रहे हैं.ढसाल साहब जब युवावस्था की ओर अग्रसर थे तब स्थिति बिलकुल उल्टी थी.बहरहाल बहुत कुछ बदल जाने के बावजूद उस समय के गोलपीठा के विषय में किसी को भी अनुमान लगाने दिक्कत नहीं हो सकती कि वेश्यायों का यह इलाका 30-40 साल पहले साक्षात् नरक रहा होगा.इसका एहसास मुझे रास्ते से गुजरते हुए हुआ.आधे किलोमीटर के सफ़र में मैंने पीबी रोड के दोनों तरफ विभिन्न वय की कम से कम दो सौ वेश्याओं को खड़े पाया,जिनकी आंखों में किसी ग्राहक को पाने के लिए बेचैनी थीं,जो पेट की आग से मजबूर हो कर मुझ जैसे बुजुर्ग को भी बेशर्मी से आमंत्रित कर रहीं थीं.आत्मा जी ने बताया कि भूमाफियाओं और पुलिस की गंठजोड़ से यहाँ की वेश्याओं को भगा दिया गया है किन्तु उन दिनों जब असामाजिक तत्वों और पुलिस की मिलीभगत से यह इलाका वेश्याओं से गुलज़ार रहा करता था, इतनी ही दूरी में सब समय कुछ हज़ार वेश्यायें अपना जिस्म बेंचने के लिए खड़ी मिलती थीं.मानवता के विराट कलंक के रूप में विद्यमान पीबी रोड छोड़कर हम उस 'नवाब चाल'में दाखिल हुए जहाँ ढसाल साहब का परिवार रहता था .
    • ढसाल साहब के पिता एक कसाईखाने में साधारण कर्मचारी थे.उन्ही के आर्थिक-सामाजिक स्तर के दो-तीन परिवारों का उस एक ही कमरे में सहावस्थान था.एक साथ कई चूल्हे जलते थे.आंगननुमा कच्चे नवाब चाल में जल निकासी की कोई व्यवस्था न होने के कारण पास की नाली बजबजाती रहती थी जिससे कीड़े उछल कर भोजन की थाली में आ जाते थे.वहां कमरों में प्राइवेसी और सृजन के लिए शांत वातावरण की कल्पना करना दुष्कर था.ढसाल में सृजन की भूख उन्हें उपयुक्त जगह के तलाश के लिए बाध्य की और उन्होंने वह जगह ढूढ़ निकाली.जगह थी वही गोलपीठा, जहां से वेश्या बाज़ार शुरू होता था;जहाँ दूर-दराज के इलाके से अपना घर-परिवार छोड़कर आये अनपढ़,जाहिल और शराब के नशे में धूत मजदूर जिस्म का सौदा का करने की मानसिक प्रस्तुति लेते थे.ऐसे दम घोटू और अस्वस्थकर जगह पर बैठ कर ढसाल साहब कविता सृजन करते थे.इसी गोलपीठे पर बैठकर लिखी गयी कवितायेँ जब प्रकाशित हुईं,साहित्य की दुनिया स्तब्ध रह गयी.आखिर स्तब्ध क्यों न हो!उन्होंने ने कविता के शास्त्र को ध्वस्त कर दिया था और धरती के नरक के श्याम पक्ष को उसी की भाषा में जिस तरह उकेरा था,वह उसके पहले विश्व कविता जगह में विलुप्त था.यहीं रहकर उन्होंने महज 22-23 साल की युवावस्था में दलित पैंथर जैसे उग्र संगठन को जन्म दिया.यहाँ आते वक्त रास्ते में सुरेश जी ने बहुत दावे के साथ कहा कि गोल पीठा का परिवेश देखने के बाद आप कुछ लिखे बिना नहीं रह पाएंगे.उनका दावा गलत नहीं था.मैंने धरती का नरक देखने के बाद ढसाल साहब की जीवनी लिखने का संकल्प ले लिया था.
    • अगले दिन शाम को हम फिर बॉम्बे हॉस्पिटल पहुंचे.चूँकि मुझे अगले दिन लखनऊ लौटना था इसलिए डॉक्टरों के निर्देश के विपरीत पैन्थरों ने उनसे मिलवाने का विशेष उद्योग लिया और कुछ मिनट के लिए उनका दर्शन करने का अवसर पा गया.मुझे उनसे मिलने के लिए नाक पर मास्क लगा कर अन्दर जाना पड़ा.मैं यही उम्मीद किया था कि उनकी आँखे मुंदी होंगी और मैं उनका चरण स्पर्श कर वापस आ जाऊँगा .किन्तु चमत्कार हुआ.मेरे कदमों की आहट पाते ही उनकी आँखे खुल गयीं.उन्होंने प्यार से मुस्कुराते हुए हालचाल पूछा.उन्हें बोलते देख कुछ जवाब देने की बजाय जल्दी से कमरे से बाहर आया और बैग में पड़ी नई डाइवर्सिटी ईयर बुक लेकर पुनः उनके सामने पहुंचा.मैंने जल्दी –जल्दी इयर बुक में छपे उन पृष्ठों को खोलकर दिखलाना शुरू किया जिनमें उस पिछले 'डाइवर्सिटी डे'के फोटोग्राफ थे जिसका आयोजन स्वयं उनके सौजन्य से हुआ था.अधिकांश तस्वीरों में वे मौजूद थे.तस्वीरे देखकर उनके चेहरे पर मुस्कान खेलने लगी.वहां ज्यादा समय ठहराना उचित नहीं था.लिहाज़ा जल्दी से तस्वीरे दिखा कर चलने लगा.चलने के पहले जब मैंने उन्हें यह बताया कि उनकी जीवनी लिखने जा रहा हूँ ,उनके मुस्कान की लकीर और चौड़ी हो गयी.मैं भाग्यवान रहा कि हर प्रतिकूलता का सदा मुस्कुराते हुए सामना करने वाले ढसाल साहब कैंसर की पीड़ा को छिपा कर मुझ जैसे अपने गुणानुरागी को अंतिम बार भी मुस्कुराहट ही उपहार दिए.धरती के नरक से निकले अप्रतिम पैंथर को शत-शत नमन.
    • दिनांक:17 ,2014.
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    Satya Narayan

    जब क्रान्तियों की धारा बिखराव-ठहराव और पराजय के दौर से गुजरती है, जब क्रान्ति की लहर पर प्रतिक्रान्ति की लहर हावी होती है, जब क्रान्तियाँ रुककर सिंहावलोकन, आत्‍ममंथन और आत्‍मालोचन कर रही होती हैं, उस समय ज्‍़यादातर बुद्धिजीवी क्‍या कर रहे होते हैं? यह जानना दिलचस्‍प होगा।

    http://nightraagas.blogspot.in/2014/01/blog-post_7027.html

    देर रात के राग: एक अंधकार युग में ''महान'' ऐतिहासिक दायित्‍व निभाते बुद्धिजीवियों के बारे में.

    nightraagas.blogspot.com

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    • Harsh Vardhan and 6 others like this.

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    • Mk Azadपूँजी के विरुद्ध मिहनतकस वर्ग के महान संघर्ष में सारे साथी अंत तक नहीं चल पाते, कुछ बीच में ही पूँजी के दबाव के चलते या अपनी निम्न मध्यम वर्गीय चेतना के चलते घुटने टेक देते है. ऐसे में वे समूचे कमुनिस्ट आन्दोलन के बारे में नाकाम और व्यर्थ का संशय और अविश्‍वास का माहौल बनाने की कोशिस करने के सिवाय और कुछ भी कर सकने में अपने को असमर्थ पाते है, इस लिए और भी पतन के दलदल में फंसते जाते है. ऐसे लोग उस अभागे इंसान की तरह होते है जिसका सपना- इस जुल्मी दुनिया को बदलने का सपना, फिर से संगठित होने का और मजदूर वर्ग की लड़ाई में साथ खड़ा होने का सपना - मर गया होता है, विश्वास डीग गया होता है. इनके इस त्रासदपूर्ण पतन पर हम अफसोश ही कर सकते है. आज बुद्धिजीवी साथियो का सर्वहाराकरण और मजदूर साथियो का बुधिजिविकरण सचेतन रूप से हर संगठन को करने की सबसे अधिक आवश्यकता है.

    • about an hour ago· Like· 4

    • Palash Biswasविचारणीय।

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    Abhishek Srivastava shared a link.

    जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पर विवाद

    raviwar.com

    जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल असल में भारत में लूट का खुला खेल चलाने वाली कंपनियों के प्रायोजन को लेकर बयान शुरु हो गया है

    जनज्वार डॉटकॉम

    आज जब घोटालों से सर्वाधिक कलंकित सरकार की कर्णधार कांग्रेस लगातार अपनी जमीन खोती जा रही है, तो भाजपा फिर से अपनी सांप्रदायिक छवि को मोदी के नेतृत्व में पेश करने की भरपूर कोशिश कर रही है. भ्रष्ट कांग्रेस और साम्प्रदायिक भाजपा के बीच में इस बार कॉर्पोरेट की नजर 'आप' पर है, जिसकी कोई आर्थिक नीति नहीं है…http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4709-kranti-koi-numaish-nahi-for-janjwar-by-rupresh-kumar-singh

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    Deven Mewari with Laxman Singh Bisht Batrohi

    कलबिष्ट: एक कथा आख्यान


    कथाकार-उपन्यासकार मित्र डा. बटरोही ने फोन पर बातचीत में बताया है कि वे इन दिनों स्मृतियों की लंबी यात्रा कर रहे हैं और इस यात्रा में लोक कथाओं के नायकों से उनका अंतरंग संवाद हो रहा है। इधर बिनसर के निकट कोट्यूड़ गांव में कलबिष्ट मंदिर की भौतिक यात्रा के बाद वे लोकाख्यान कलबिष्ट की मानसिक यात्रा पर हैं और वहां इस आख्यान के नायक कलबिष्ट, नायिका कमला, खलनायक नौलखिया तथा लछुवा और दूसरे पात्रों के साथ सीधा संवाद कर रहे हैं।

    कल उन्होंने बताया कि उनकी यह मानसिक यात्रा पूर्ण हो चुकी है और यह यात्रावृत्तांत 'मलदेश का खशिया देवताः कलबिष्ट'के नाम से शब्दों में उतर आया है। यह लंबा आख्यान देहरादून से प्रकाशित मासिक 'पर्वतांचल'के मार्च 2014 में प्रकाशित होगा। इस अंक की अतिथि संपादक हैं दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधछात्रा रश्मि रावत।

    डा. बटरोही का कहना है कि उन्होंने इस आत्मकथात्मक आख्यान में देश के जाने-माने इतिहासकारों के विचारों के साथ आदिम वीर खश जाति की जड़ों की तलाश की है और अपनी इस तलाश को वर्तमान समय से जोड़ा है।

    'पर्वतांचल'मार्च 2014 अंक में पढ़िएगा यह आख्यान।

    (parvatanchal@gmail.com)

    Unlike·  · Share· about an hour ago·

    Ak Pankaj

    3 hours ago·

    • हां, हमने झारखंड के सृजनरत और संघर्षरत
    • आदिवासी, स्त्री, दलित-पिछड़ी जनता का पक्ष चुना है.
    • साथी Satya Prakash Chaudhary, एक साझा प्रयास 'साल सकम'पर संगीन आरोप लगा कर, एक ही व्यक्ति पर ताबड़तोड़ हमला करते और वैचारिक सवाल को व्यक्तिगत बनाते हुए यह कह कर निकल लेना कि'फेसबुक पर मैं इस विवाद को यहीं विराम देता हूं', आलोचना की ईमानदारी शैली नहीं है. इसलिए इस संदर्भ में हम अपना पक्ष रखना जरूरी समझते हैं.
    • पहली बात तो यह कि आप जिसे दो प्रमुख सदस्यों का व्यक्तिगत टकराव बता रहे हैं, वह साल सकम के साथियो के लिए व्यक्तिगत बिल्कुल नहीं है, जैसा कि हमारे एक साथी विनोद कुमार जी पहले लिख चुके हैं. टकराव बिना शक वैचारिक है.
    • दूसरी बात यह कि आप यही सवाल उस दूसरे व्यक्ति से क्यों नहीं कर रहे हैं और न ही उसका नाम ले रहे हैं, क्यों? ईमानदार आलोचना का तकाजा यही है कि आप दोनों से 'शहर की पूरी प्रगतिशील जमात के विभाजन का एजेंडा'बनाने पर सवाल करते. लेकिन आप ऐसा नहीं करते हुए और पूरी सचेतनता से उस दूसरे व्यक्ति का नाम बचाते हुए सिर्फ एक पर ही हमले कर रहे हैं. क्यों साथी?
    • आग्रह है कि साल सकम में रहे उस दूसरे प्रमुख सदस्य का नाम आप जरूर बताएं जिसने आपके अनुसार 'व्यक्तिगत टकराव'को 'शहर की पूरी प्रगतिशील जमात के विभाजन का एजेंडा'बना दिया.
    • तीसरी बात यह कि 14 जनवरी का आयोजन पिछले दो साल से साल सकम कर रहा था और आप व आपके संगठन के लोग इसमें शामिल होते रहे थे. तो फिर जब संभवतः 8 जनवरी को एटीआई के आयोजन को लेकर बैठक हुई तो पहले से जारी इस सामूहिक प्रयास 'साल सकम'को तोड़ने में आपका संगठन क्यों एक प्रमुख साझीदार बना? आपने और आपके संगठन ने उसी समय एकता के प्रयास क्यों नहीं किए?
    • चौथी बात यह कि साल सकम के पांच संयोजक थे. पांचों अलग-अलग विचारों और संगठनों से जुड़े लोग हैं और अपनी वैचारिक असहमतियों के बावजूद पांचों ने एक साथ 'साल सकम'बनाया था ताकि वैचारिक संघर्ष को सामूहिक जमीन मिले. इनमें तीन Arvind Avinash, Shambhu Mahato, Ranendra Kumar) वामपंथी हैं, एक लोहियावादी Vinod Jharkhand) और आप सबके अनुसार ही हम 'अस्मितावादी'. आप जानते हैं इनमें से चार एकजुट हैं और एक ने अपना वर्गीय चरित्र दिखाते हुए खुद को अलग किया. और उसके इस गैर-जिम्मेदाराना व गैर-बिरादराना रवैए को रांची/झारखंड ईकाई के चार वामपंथी सांस्कृतिक संगठनों ने आगे बढ़कर साथ दिया. क्यों?
    • इस संदर्भ में दोहरा दूं कि 'साल सकम'का उद्देश्य झारखंड में सृजनरत और संषर्घरत व्यक्तियों, बौद्धिक संगठनों व अन्य सभी जमातों (जिनमें दलित, आदिवासी, स्त्री, पिछड़े, गांधीवादी, लोहियावादी, और वामपंथी प्रमुख हैं) में वैचारिक संघर्ष चलाते हुए व्यापक एकता कायम करना और एक साझा मोर्चा बनाना है. ऐसे महत्वपूर्ण प्रयास को मजबूत करने का काम होना चाहिए या फिर पद, पैसा व बौद्धिक लूट के जरिए जनतांत्रिक संगठनों पर एकाधिकार कायम करने वाले वर्चस्ववादी तोड़क प्रवृत्तियों का सहायक बनना चाहिए?
    • साथी, आप कहते हो 'साल सकम में आपसी मतभेद क्यों हुआ, इसमें मेरी रुचि नहीं है'और 'मतभेद' (विचार) को दरकिनार कर 'मतभेद'को व्यक्तिगत बता कर इसमें रुचि लेते हो, उसके साथ सांगठनिक गठजोड़ बनाते हो. यह कैसी 'सांस्कृतिक पहलकदमी'है?
    • और अंततः यह कि हमने 14 जनवरी के विश्वासघात पर या किसी व्यक्ति विशेष पर कोई हमला अभियान नहीं चलाया. किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेकर तो हर्गिज नहीं. प्रवृत्तियों और विचार पर लिखा है हमेशा. हां, अस्मितावाद पर जो तथाकथित 'छद्म प्रगतिशील'व सामंती और पूंजीवादी नजरिया है, उसके खिलाफ लगातार सांस्कृतिक-राजनीतिक अभियान चलाता रहा हूं. यह अभियान तब भी चलाता था जब लिबरेशन और जसम में था. और अब भी चला रहा हूं जब साथ नहीं हूं जो आगे भी जारी रहेगा. क्योंकि हमारा स्पष्ट मानना है कि इस नजरिए के कारण दलित, आदिवासी, स्त्री और उत्पीड़ित समुदायों के सृजन और संघर्ष की ऐतिहासिक अनदेखी हो रही है. इस ऐतिहासिक अनदेखी को दुरूस्त करने की आवश्यकता है ताकि मुक्ति संघर्ष और ज्यादा संगठित व मारक बने. शोषणकारी व्यवस्था ध्वस्त हो.
    • साल सकम से अलग होने वाले साथी और तोड़क प्रयासों पर मूल पोस्ट साथी विनोद जी की थी. जिसे हमने शेयर किया. लेकिन आपने विनोद जी से कोई 'पूछताछ'नहीं की, न ही साल सकम से संबंधित अन्य तीन लोगों से आपने कोई संवाद किया. हमला सिर्फ हम पर ही क्यों?
    • Satya Prakash Chaudhary

    • अश्विनी पंकज जी, साल सकम के बारे में जो सूचना आपने दी है, उसे मैं सही मान लेता हूं और 'प्रायोजित पूंजी'वाली बात के लिए खेद प्रगट करता हूं. लेकिन इस बात से कोई कैसे इनकार कर सकता है कि साल सकम के भीतर के दो प्रमुख सदस्यों के टकराव को आपने शहर की पूरी प्रगतिशील जमात के विभाजन का एजेंडा बना दिया. फेसबुक पर अभियान शुरू कर...See More

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      • Ak PankajNadeem Akhtar, Zeb Akhtar, Syed Shahroz Quamar, Sanjay Krishna, Janwadi Lekhak Sangh Ranchi,Gladson Dungdung, Sunil Minj, Sachin Shrivastava

      • 3 hours ago· Like

      • Syed Shahroz Quamar Satya Bhai ke status par bhi kaha tha..punah wahi bat duraunga ki mahaz ek vyakti par dosharopan sahi nahin..teen saal se ek din to sabhi sath hote the..aakhir kyon alag alag huye..iska jawab kaun dega..aur kya karan rahe uske...tamaam Vaicharik matbhedon ke ek din to apan saath hote the...

      • 2 hours ago· Edited· Like· 2

      • Pramod Sharma Ab maamla samajh me aaya....yah sthiti dukhad to hai hi... Is-se hum jaise logon ko bahut takleef hoti hai jo aap sabhi logon se prem aur aasha rakhte hain!

      • 2 hours ago· Like· 1

      • Ak PankajSyed Shahroz Quamarसवाल वैचारिक है. जवाब-बहस साल सकम और उन सभी संगठनों के बीच होना चाहिए था, जो 14 का जनवरी का आयोजन पहले से करता था और जिन्होंने इस 14 जनवरी को गैर-बिरादराना ढंग से हड़पने की कोशिश की. पर टारगेट हमें किया गया. हमें कटघरे में खड़ा किया ग...See More

      • 2 hours ago· Like· 2

      • Satya Prakash Chaudhary Main koi jawab doon, isse pahle agar yah saf kar diya jaye ki Randera Kumar aur Ashwini Pankaj mein takrav kyon hua, to behtar rahega.

      • about an hour ago· Like· 1

      • Janwadi Lekhak Sangh Ranchiपंकज जी आप किन 4 सांस्कृतिक संगठनों की तरफ़ इशारा कर रहे है जिसने वर्गीय चरित्र के एक संयोजक की गैर जिम्मेदाराना हरकत में साथ दिया?

      • about an hour ago· Like

      • Syed Shahroz Quamar Satya ji aapka shukriya ki baqaul aapke is vyaktigat takrao me ab aapne dusre vyakti ka naam liya..ab Pankaj ji Aur Randendr ji ko batana chahiye ki aisa kyon hua..kyonki mujh jaise dheron logon ko ye achcha qatai nahin laga.

      • 50 minutes ago· Edited· Like

      • Satya Prakash Chaudhary Isharon mein bat se achha hai, khul kar bat ho

      • 14 minutes ago· Like

      • Ak Pankajसाथी Satya, चलिए थोड़ी देर के लिए बात मान लेते हैं कि यह मामला व्यक्तिगत है. तो सवाल सिर्फ हमीं से क्यों? पहले तो आपने हरसंभव कोशिश की दूसरे व्यक्ति का नाम न आए. हमें ही टैग कर-कर के कटघरे में खड़े करते रहे. पोस्ट विनोद जी की थी. उनको क्यों नहीं टैग किया...See More

      • 13 minutes ago· Like

      • Ak Pankajआप भी भोले नहीं हैं Janwadi Lekhak Sangh Ranchi. 14 जनवरी के समानांतर आयोजन में आपका संगठन शामिल है तो आप खूब अच्छी तरह से जानते हैं वे चार संगठन कौन हैं. और हां, साल सकम के आयोजन का आमंत्रण आपको हमने दिया था. पर एक साझा प्रयास 'साल सकम'को ध्वस्त करने की योजना और समानांतर आयोजन तय करते वक्त आपने या आपके संगठन के जो प्रतिनिधि 8 जनवरी की बैठक में शामिल हुए थे, उन्होंने इस तोड़क प्रयास पर सवाल क्यों नहीं उठाया?

      • 12 minutes ago· Like

      • Praveer Peterलगे रहो .. साथियो !

    Arvind Kejriwal

    Met the Home Minster, Mr. Shinde today. We have asked him to ensure that action is taken against the Delhi police officers who have been found negligent in their duties. This is to ensure that the police understand their responsibility towards the citizens of Delhi and do not allow negligence to creep in. We will protest along with citizens of Delhi outside his office starting Monday if action against the errant cops is not taken.


    We have also demanded that the Delhi Police be moved under the direct control of the Delhi Govt.


    Instead of hiding behind excuses, we are taking affirmative action to ensure safety & security of the people of Delhi. We will take all necessary steps to ensure that.

    Unlike·  · Share· 57,4357,9293,365· 21 hours ago·

    Satya Narayan posted in 4 groups.

    माँगपत्रक शिक्षणमाला - 6 प्रवासी मज़दूरों की दुरवस्था और उनकी माँगें मज़दूर आन्दोलन के एजेण्�

    mazdoorbigul.net

    काम की तलाश में लगातार नयी जगहों पर भटकते रहने और पूरी ज़िन्दगी अनिश्चितताओं से भरी रहने के कारण प्रवासी मज़दूरों की सौदेबाज़ी करने की ताक़त नगण्य होती है। वे दिहाड़ी, ठेका, कैजुअल या पीसरेट मज़दूर के रूप में सबसे कम मज़दूरी पर काम करते हैं। सामाजिक सुरक्षा का कोई भी क़ानूनी प्रावधान उनके ऊपर लागू नहीं हो…

    • Satya NarayanGround Report India Discussion Forum
    • काम की तलाश में लगातार नयी जगहों पर भटकते रहने और पूरी ज़िन्दगी अनिश्चितताओं से भरी रहने के कारण प्रवासी मज़दूरों की सौदेबाज़ी करने की ताक़त नगण्य होती है। वे दिहाड़ी, ठेका, कैजुअल या पीसरेट मज़दूर के रूप में सबसे कम मज़दूरी पर काम करते हैं। सामाजिक सुरक्षा का कोई भी क़ानूनी प्रावधान उनके ऊपर लागू नहीं हो पाता। कम ही ऐसा हो पाता है कि लगातार सालभर उन्हें काम मिल सके (कभी-कभी किसी निर्माण परियोजना में साल, दो साल, तीन साल वे लगातार काम करते भी हैं तो उसके बाद बेकार हो जाते हैं)। लम्बी-लम्बी अवधियों तक 'बेरोज़गारों की आरक्षित सेना'में शामिल होना या महज पेट भरने के लिए कम से कम मज़दूरी और अपमानजनक शर्तों पर कुछ काम करके अर्द्धबेरोज़गारी में छिपी बेरोज़गारी की स्थिति में दिन बिताना उनकी नियति होती है।

    • http://www.mazdoorbigul.net/Charter-of-demand-education-series-6

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    Nityanand Gayen

    पंजे की पकड़ में

    http://khabar.ndtv.com/video/show/special-report/305762

    स्पेशल रिपोर्ट : किसानों की आत्महत्या क्यों... वीडियो - हिन्दी न्यूज़ वीडियो एनडीटीवी ख़बर

    khabar.ndtv.com

    स्पेशल रिपोर्ट : किसानों की आत्महत्या क्यों... हिन्दी न्यूज़ वीडियो। एनडीटीवी खबर पर देखें समाचार वीडियो स्पेशल रिपोर्ट : किसानों की आत्महत्या क्यों... दिल्ली सरकार ने किसानों को कर्ज मुक्त करने का ऐलान किया। घोषणा के बाद लगातार किसानों की आत्महत्या का सिलसिला जारी है। किसानों पर केंद्रित यह स्पेशल…

    Unlike·  · Share· 6 hours ago near Hyderabad· Edited·

    Palash Biswas

    http://raviwar.com/baatcheet/b51_abhay-kumar-dubey-interview-by-alok-putul.shtml

    अभय कुमार दुबे से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

    raviwar.com

    लेखक पत्रकार अभय दुबे का मानना है कि भारत में माओवादियों का कोई भविष्य नहीं है.

    Like·  · Share· 3 hours ago·

    आरामतलब साहित्यकारों की फौज का महोत्सव

    यह नवमध्यवर्ग भूमंडलीकरण की देन है

    नई दिल्ली। जयपुर साहित्य महोत्सव के विरुद्ध अकादमिक जगत में विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं। साहित्य के नाम पर कॉरपोरेट तमाशे के खिलाफ हिंदी के गम्भीर और सरोकारी साहित्यकारों के आवाज़ उठाई है और इस महोत्सव की आड़ में कॉरपोरेट षड़यंत्र को बेनकाब किया है। "भोर"पत्रिका की ओर से रंजीत वर्मा और अंजनी कुमार ने इस सम्बंध में एक साझा वक्तव्य जारी किया है जो इस प्रकार है-

    जयपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरुद्ध एक वक्‍तव्‍य

    जयपुर साहित्य महोत्सव महज महोत्सव नहीं है और वे भी इस बात को छिपा नहीं रहे हैं। अगर यह सिर्फ महोत्सव होता तो मौखिक भर्त्‍सना ही काफी होती या महज उपेक्षा ही इनको मार देने के लिये पर्याप्त होती। अगर मकसद सिर्फ दुनिया भर के लेखकों का आपस में मिल कर मानवता के दुख पर बात करना होता तो भला किसे आपत्ति होती। हां, इतना ज़रूर कोई कह उठता कि मानवता के दुख पर बात करने के लिये ये हर बार जयपुर को ही क्यों चुनते हैं। और वहाँ भी बातचीत के लिये महल में क्यों जा बैठते हैं। या इसी तरह के कुछ और सवाल होते जिनसे बचने के लिये हो सकता है वे अपने कार्यक्रम में कुछ तब्दीली भी ले आते, लेकिन मामला सीधे तौर पर देखा जाये तो इतना भर ही नहीं है। यहाँ वे कार्यक्रमों में कुछ बदलाव लाकर कोई सुधार नहीं कर सकते क्योकि मामला बेहद गम्भीर है और लेखकों के हाथ से बाहर है। क्योंकि वे खुद को आयोजकों के हाथों सुपुर्द किये होते हैं और सच पूछा जाये तो आयोजक की भी वहाँ कोई हैसियत नहीं होती बल्कि वह प्रायोजकों का कारिंदा भर होता है।

    दरअसल, यह सारा खेल प्रायोजक का है जिसके पीछे उसकी अपनी सोची-समझी राजनीति है। लेकिन हम यह भी नहीं कह सकते कि जो लेखक वहाँ जाते हैं वे उनकी राजनीति का शिकार होते हैं क्योंकि इनमें से कई लेखकों के लेखन का आधार वही राजनीति होती है। ऐसे लेखक साहित्य में खुद को सही सिद्ध करने के लिये कॉर्पोरेट ताकत का सहारा लेने वहाँ जाते हैं जबकि जो कॉर्पोरेट ताकतें हैं वे विरोध के एकमात्र क्षेत्र साहित्य को अपने अनुकूल करना चाहती हैं, साथ ही अपनी छवि मानवीय और खुद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रहरी के तौर पर स्थापित करना चाहती हैं। इसके अलावा ये कॉर्पोरेट ताकतें खुद को सही भी साबित करना चाहती हैं क्योंकि उनकी ताकत जिस पूँजी पर टिकी होती है उसका बहुत बड़ा भाग वे लूट, हत्या और दलाली से पैदा करती हैं। उनका तर्क होता है कि जिसका कहीं कोई विरोध नहीं होता वह सही होता है। इसलिये वे तमाम तरह के विरोध को या तो खरीदने की कोशिश करती हैं या उसे हमेशा के लिये खत्म कर देने की।

    बहुत दिनों से जबकि एक ओर लोग इस बात को लेकर परेशान थे कि हिंदी साहित्य में आखिर कोई भी बड़ा साहित्यकार ऐक्टिविस्ट क्यों नहीं हुआ, वहीं दूसरी ओर कॉर्पोरेट ताकतें इस कमजोरी को सेंध लगाने के एक तैयार मौके के रूप में देख रही थीं। आज जो यह जयपुर साहित्य महोत्सव इतना विशाल दिख रहा है, उसके पीछे ऐसे आरामतलब साहित्यकारों की एक पूरी फौज का खड़ा हो जाना है जो नवमध्यवर्ग से आए हैं। यह नवमध्यवर्ग भूमंडलीकरण की देन है, और यह भूमंडलीकरण कॉर्पोरेट ताकतों की मानसिक उपज है जिसे दुनिया भर के शासक सच साबित करने पर न सिर्फ खुद तुले हैं बल्कि उन्हें भी उसने छूट दे रखी है कि वे अपनी ताकत भी अपनी इस मानसिक उपज को सच साबित करने में लगाएं।

    कोई पूछ सकता है कि आखिर इन सबका अभिप्राय क्या है? तो जैसा कि ऊपर कहा गया, इन सबका एकमात्र मतलब अपनी लूट को बेरोकटोक बनाए रखना है, इसलिये वे तमाम सोचने वाले दिमागों को अपनी सोच के अनुकूल बनाना चाहते हैं। हालांकि उन्हें पता होता है कि चाहे वे जितनी भी ताकत लगाएं कई ऐसे लोग होंगे जो तब भी उनका विरोध करेंगे। ये तमाम बड़े कार्यक्रम किये ही इसलिये जाते हैं ताकि ऐसे विरोधियों को हाशिये पर फेंका जा सके, ठीक उसी तरह जैसे ये किसानों को फेंक देते हैं जब गांव के गांव हथियाने निकलते हैं; ठीक उसी तरह जैसे आदिवासियों को धकिया देते हैं जब जंगल के जंगल अपने कब्जे में करने का नक्शा कागज़ पर तैयार करते हैं।साहित्य का असल मकसद क्या है, उसे वे तय करना चाहते हैं जिसे वे स्वान्तः सुखाय से शुरू करते हैं। वे कई बार अपने यहाँ विरोध के स्वर को भी उठने देते हैं ताकि विरोधियों को लगे कि वह एक खुला मंच है और वे वहाँ जाने में कोई पाप न देखें। लेकिन यह मुआवज़े से ज्यादा कुछ नहीं होता है। जैसे वे किसानों को देते हैं, आदिवासियों को देते हैं, ठीक उसी तरह वे विरोधी विचारों को भी मुआवज़ा देने में कोई गुरेज़ नहीं करते। इस तरह वे विरोधी विचार को एक तरह से खरीद लेते हैं और उसकी धार को कुंद कर देते हैं। मुआवज़ा लेने के बाद जिस तरह किसान या आदिवासी अपनी ज़मीन या जंगल की लड़ाई जारी रखने का नैतिक अधिकार खो देता है, उसी तरह लेखक भी अपने विचार की लड़ाई फिर नहीं लड़ पाता।

    ''भोर''पत्रिका ऐसे किसी भी महोत्सव, समारोहों या आयोजनों की भर्त्‍सना करती है और तमाम साहित्यकारों से अपील करती है कि वे जयपुर साहित्य महोत्सव का बहिष्कार करें और अपनी भूमिका पर गम्भीरता से विचार करें।

    "भोर"पत्रिका की ओर से

    रंजीत वर्मा और अंजनी कुमार द्वारा जारी



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    Cinema of Resistance reached Kolkata

    कोलकाता पहुंचा जसम का प्रतिरोध का सिनेमा

    Palash Biswas

    Kolkata People's Film Festival

    Entry absolutely FREE. No Sponsor.RUSH.

    A Cinema of Resistance initiative

    Cinema of Resistance reached Kolkata.I have been following the movement since it began. It is personally satisfying that our dear Sanju alias Sanjay Joshi is the Convener, Cinema of Resistance, JSM. I have seen him as a student of class six or seven while I stayed with them at their residence in Allahabad.100,lookerganj is a milestone for me. We are a family which is scattered all over India.


    Kashturi and our old friend Rajiv talked in detail but I was waiting for the detail.I would join them on the second day.


    Nakul kumar Singh would present a show on Matuti strike also.The festival would witness another current film, `Mujaffarnagr Destimonals'.The audiance would also enjoy the punjabi film, `Anne Ghode da dan'


    I appeal all friends in Kolkata and around to participate from the beginning.Cine club movement is an old movement in kolkata. Nevertheless,it is a beginning as the festival is concerned with resistance which is assumed to be quite absent.The festival would help you to land right into the reality of resistance countrywide.


    I hope,no one concerned with Indian reality would afford to miss the most happening event in the city of joy which is also famous as city of resistance.


    Film maker Surya kant Das would be presenting the story of resistance in Orrissa.


    आखिरकार देश के छोटे नगरों में हंगामा बरपाने के बाद प्रतिरोध का सिनेमा कोलकाता पहुंच ही गया। हम सबके प्रिय कथाकार शेखर जोशी जी के सुयोग्य बेटे संजय जोशी,हमारा संजू इस आंदोलन के संयोजक हैं। जो निजी तौर पर शुकुन देता है।


    इस फिल्मोत्सव में जहां आनंद पटवर्धन जैसे प्रतिष्ठित फिल्मकार के सिनेमा से गुजरने का ेक बार फिर मौका मिलेगा कोलकातावासियों कोक्योंकि कोलकाता में आनंदअत्यंत प्रिय फिल्मकार हैं तो नये फिल्मकारों के अति महत्वपूर्ण सामाजिक सरोकार से सरोबार करतब और करिश्मे के भी मुखातिब होंगे आप।मसलन मुजफ्फरपुर के दंगा अनुभव से भी गुजरकर लहूलुहान होना है।


    जनसंस्कृति मंच की ओर से इस तीन दिवसीय फिल्मोत्सव का आयोजन जादवपुर विश्वविद्यालय के त्रिगुमा सेन आडिटोरियम 20 जनवरी से यानि सोमवार से हो रहा है।आगामी 22 जनवरी तक होने वाले इस समारोह में महत्वपूर्ण  फिल्मों के प्रदर्शन के अलावा फिल्म विधा पर सेमिनार,परिचर्चा और संवाद के तहत अन्य गतिविधियों का भी आयोजन है। कस्तूरी और उनकी टीम ऐतिहासिक शुरुआत कर रही हैं।


    इस फिल्मोत्सव के सारे कार्यक्रम सुबह ग्यारह बजे से लेकर रात आठ बजे तक चलेंगे। प्रवेश अबाध है।हाल में जयपुर के कारपोरेट साहित्य उत्सव के मुकाबले इस नगण्य लेकिन अत्यंत संवेदनशील फिल्मोत्सव का कोई प्रायोजक भी नहीं है। किसी महानगर के वाणिज्यिक चरित्र के मद्देनजर यह अतिशय महत्वपूर्ण है।


    इस फिल्मोत्सव में आनंद के अलावा तारिक मसूद,कैथरीन मसूद,मंजिरा दत्त,वसुधा जोशी,रंजना पालित और गुरविंदर सिंह की फिल्में भी दिखायी जायेंगी।मुजफ्फरनगर दंगों पर फिल्म मिस की नहीं जा सकती तो ओड़ीसा के प्रतिरोध संघर्ष की दास्तां भी पेश करेंगेफिल्मकार सूर्यकांत दास।


    सोमवार को सुबह 11 बजे फिल्म व नाट्य समीक्षक शमीक बंद्योपाध्याय समारोह का उद्घाटन करेंगे।इल मौके पर संजय काक,सूर्यकांत दास,संजय जोशी,नकुल सिंह साहनी,रानू घोष,विक्रमजीत गुप्ता, मैनाक विश्वास, मौसमी भौमिक,राजीव कुमार और सूर्यकांत मजुमदार जैसे लोग उपस्थित रहेंगे।




    Cinema of Resistance National Initiative

    Kolkata Chapter

    Address: K-231/4 B. P. Township

    Flat No. 32, Kolkata 700094

    Phone:+91-8902550931

    Email:cor.kolkata@gmail.com

    Website: http://corkolkata.wordpress.com/

    To: the News Editor

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    Press Release

    KOLKATA, 16th January 2014

    During January 20-22, the Kolkata Chapter of 'Cinema of Resistance' national initiative will organize the 1st Kolkata People's Film Festival. This festival is the 35th edition of a series of peoplefunded independent film festivals organized regularly by 'Cinema of Resistance' in cities and towns of north India over the past eight years. This is the first time that such a film festival is being organized in West Bengal. The festival will be attended by a number of filmmakers, including Sanjay Kak, Moinak Biswas, Ranu Ghosh, Bikramjit Gupta, Nakul Singh Sawhney, Surya S Dash and ethnomusicologist Moushumi Bhowmik.


    A pre-festival Press Meet will be held at the Buddhadeb Basu Sabhaghar auditorium (inJadavpur University campus) on Saturday, 18th January 2014 at 2:00 pm. You are cordially invited to attend.


    Kasturi Basu. Convener, Cinema of Resistance (Kolkata Chapter)

    Sanjay Joshi. National Convener, Cinema of Resistance

    1st Kolkata People's Film Festival

    Co-organized by People's Film Collective (Kolkata) and

    The Group (Jan Sanskriti Manch)

    Welcome to Kolkata People's Film Festival 2014  

    Dates: 20-22 January 2014

    Venue: Triguna Sen Auditorium, Jadavpur

    Time: 11 am to 9 pm

    Tickets/passes: None!

    Organized by- Cinema of Resistance (Kolkata Chapter), People's Film Collective and The Group (Jan Sanskriti Manch)

    RSVP at Facebook event page or cor.kolkata@gmail.com



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    कोसी घाटी की विरासत


    पिछले कुछ दिनों से सोमेश्वर की कोसी घाटी लगातार सुर्खियों में है. अल्ट्राटेक कम्पनी की ओर से यहां पर 20 लाख टन उत्पादन क्षमता का एक सीमेंट प्लांट लगाये जाने के प्रस्तावित मामले ने इस घाटी में निवास करने वाले लोगों और पर्यावरण प्रेमियों को भारी चिन्ता में डाल दिया है...

    चंद्रशेखर तिवारी


    'कदाचित पहाड़ी इलाकों में सोमेश्वर के समीप बौरारौ की कौशिला (कोसी) से अधिक सुन्दर और कोई घाटी नहीं है. यहां की नैसर्गिकता, नदी-नाले और जंगल, उपजाऊ खेत, सुन्दर वास्तुकला से युक्त लोगों के घर कुल मिलाकर एक ऐसा दृश्य उत्पन्न करते हैं, जो कि सम्भवत पूरे एशिया में कहीं न हो.'

    someshwar-ghati

    तकरीबन 20 किमी लम्बी व 5 किमी चौड़ी सोमेश्वर की इस अदभुत घाटी पर यह टिप्पणी 1851 में मिस्टर जे0 एच0 बैटन नाम के एक ब्रिटिश अधिकारी द्वारा ऑफिसियल रिपोर्ट ऑन द प्रोविन्स ऑफ कुमांऊ में दी गयी थी.

    पिछले कुछ दिनों से सोमेश्वर की यह कोसी घाटी लगातार सुर्खियों में है. अल्ट्राटेक कम्पनी की ओर से यहां पर 20 लाख टन उत्पादन क्षमता का एक सीमेंट प्लांट लगाये जाने के प्रस्तावित मामले ने इस घाटी में निवास करने वाले लोगों और पर्यावरण प्रेमियों को भारी चिन्ता में डाल दिया है. हालांकि मामला अभी शुरुआती दौर में ही है.

    सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाले तमाम लोग सोमेश्वर घाटी के लिए इस प्रस्तावित सींमेंट प्लांट को कतई भी मुफीद नहीं मान रहे. दरअसल, सीमेंट बनाने में चूना पत्थर खडि़या पत्थर, रेत आदि के इस्तेमाल होने के कारण इनका अत्यधिक दोहन होगा, जिससे यहां के पहाड़ छलनी हो जायेंगे.

    सीमेंट निर्माण में अत्यधिक उच्च तापमान की आवश्यकता से वातावरण में तापमान बढ़ने और उत्सर्जित होने वाली हानिकारक गैसों से वनस्पति को नुकसान पहुंचने की आशंका होगी. यही नहीं प्लांट से निकलने वाली धूल के दुष्प्रभाव का असर मानव के स्वास्थ्य पर भी पडे़गा.

    सोमेश्वर क्षेत्र में जहां इस प्लांट को लगाये जाने की बात कही जा रही है, वह अल्मोड़ा जिले की एक अत्यन्त उपजाऊ घाटी में स्थित है. कौसानी के समीपवर्ती उच्च शिखर भटकोट (2400 मीटर) से निकलने वाली कोसी (कौशिकी, कोशिला अथवा कौशल्या नाम भी) इस घाटी के बीच से होकर बहती है.

    अपने मूल स्रोत से तकरीबन 170 किमी की यात्रा पूरी कर कोसी नदी सुल्तानपुर पट्टी के बाद पश्चिमी रामगंगा में मिल जाती है. कुमाऊं में कोसी समेत करीब एक दर्जन से अधिक नदी घाटियां हैं. कुमाउंनी भाषा में इस तरह की सिंचित व चैरस घाटियों को सेरा या बगड़ कहा जाता है. नदियों द्वारा बहाकर लायी मिट्टी-कंकड़ व गोल पत्थरों से निर्मित इस तरह की घाटियां प्रायः नदी तट से लगी हुयीं अथवा उससे कुछ ऊपर होती हैं.

    तकरीबन 150 गांवों को अपने गोद में समेटे सोमेश्वर की यह घाटी अपनी नैसर्गिक सुन्दरता, विपुल प्राकृतिक सम्पदा, उपजाऊ खेती के लिए विख्यात है. इस घाटी में धान, गेहूं, सरसों, अदरक, प्याज व आलू की भरपूर फसल होती है. सामाजिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक संदर्भों में भी यह घाटी विशेष है.

    आजादी के दौर में चनौदा में स्थापित उत्तराखण्ड का पहला गांधी आश्रम, प्रसिद्ध समाज सेविका सरला बहन द्वारा महिला उत्थान व पर्यावरण संरक्षण के लिए खोला गया कौसानी का लक्ष्मी आश्रम, ऐतिहासिक व पुरातत्व की दृष्टि से सोमेश्वर, व गणानाथ के प्राचीन मन्दिर, ऐड़ाद्यौ, पिनाकेश्वर, रुद्रधारी जैसे तपोस्थल... और परम्परा में रची-बसी तमाम लोक गाथाएं, किस्से व कहानियां....यह सब इस घाटी को एक समृद्ध विरासत का स्वरुप प्रदान करती हैं.

    धान की रोपाई के दौरान लगने वाले हुड़किया बौल ( खेती से जुड़ा लोकगीत) यहां की लोक परम्परा का एक जीवन्त उदाहरण है -

    ये सेरी का मोत्यूं तुम भोग लगाला होऽ
    सेवा दिया बड़ा हो ऽ
    ये गौं का भूमिया परो दैणा होया होऽ
    हलिया व बल्दा बरोबरी दिया होऽ
    हाथों दिया छावो हो, बिंया दिया फारो होऽ
    पंचनामो देवा होऽ

    (अर्थात हे देवता! इन खेतों में उगे मोती के समान धान आपको भोग के लिए अर्पित हैं. हे भूमि देवता! हमारी इन फसलों पर अपनी कृपा निरन्तर बनाये रखना. रोपाई लगाने वाले और पाटा फेरने वाले को बराबर मान देना. हलवाहे और बैलों को एक समान गति प्रदान करना. रोपाई लगाने वाले के हाथ अनवरत चलते रहें और रोपाई के ये पौंध सभी खेतों के लिए पूर्ण हों हे पंचनाम देवता!)

    यह वही घाटी है, जिसके चन्द दूरी पर स्थित कौसानी नामक स्थान में महात्मा गांधी ने कुछ दिन प्रवास करने के उपरान्त यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य की तुलना स्विटजरलैण्ड से की थी. धर्मवीर भारती की पुस्तक 'ठेले पर हिमालय'के सभी मनमोहक दृश्यों के वे तमाम रंग -....कल-कल करती हुई कोसी... सुन्दर गांव और हरे मखमली खेत... पहाड़ी डाकखाने, चाय की दुकानें व.....नदी-नालों पर बने हुए पुल... इस घाटी के कैनवास में अब भी मौजूद हैं.

    लद्दू घोडे़ की चाल चलते घराटों की खिचर-खिचर आवाज के बीच कोसी का घटवार (शेखर जोशी की कहानी) के मुख्य पात्र गुसांईं व लछमा के सुख-दुखों को अब भी यहां के जनजीवन में निकट से देखा जा सकता है.

    सही मायने में कोसी घाटी की समृद्ध विरासत से जुड़ा यह प्रश्न पहा़ड़ के संवेदनशीलता और उसके विशिष्ट भौगोलिक परिवेश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. सरकार को इस प्रकार के त्वरित विकासों के बदले उन दीर्घकालिक विकास परियोजनाओं को वरीयता देने की पहल करनी होगी, जिससे देर-सबेर सीमित मात्रा में ही सही पर उसका लाभ बगैर किसी प्रतिकूल प्रभाव के निरन्तर मिलता रहे.

    बेहतर होगा यदि सरकार इस प्लांट को लगाने के बजाय यहां के जल, जंगल व जमीन के संरक्षण पर अपना ध्यान केन्द्रित करे और स्थानीय खेती-बाड़ी को बढ़ावा देकर उसे रोजगार से जोड़ने का यत्न करे. खैर, अब भी बहुत वक्त है. आखिर हम सभी को इस सुरम्य घाटी को ग्रहण लगने से पूर्व बचाने का यत्न करना ही चाहिए.

    chandrashekhar-tiwariचंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय में रिसर्च एसोसिएट हैं.


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    माकपाई नेतृत्व पर ऊंची जातियों के वर्चस्व के खिलाफ बंगाल में बगावत तेज


    'উচ্চবর্ণ'সিপিএম নেতৃত্বের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ দাবানল প্রায়


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    Read:http://antahasthal.blogspot.in/


    भरतीय ही नहीं,विश्वभर में कम्युनिस्ट आंदलोन में विचारधारा पर सहमति असहमति के मुद्दे पर पार्टी का विभाजन आम है।भारत में ऐसे ही मतभेद की वजह से क्मुनिस्ट पार्टी दो फाड़ हो गयी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का जनम हो गया। साठ के दशक में कामरेड चारु मजुमदार के दस्तावेजों के तहत नक्सल आंदोलन शुरु हुआ जो अब अनेक धड़ों में विभाजित है। हाल में माकपा की जेएनयू शाखा ने भी विचाधारात्मक मुद्दे पर प्रसेनजीत बोस के नेतृत्व में बगावत कर दी। बंगाल में समीर पुतुतुंडु की अगुवाई में पीडीएस पहले से है।


    संगठनात्मक स्तर पर खासकर माकपा बहुत संगठित पार्टी रही है। खासकर बंगाल में पैंतीस साल के वामराज में उसके कैडरतंत्र की देश विदेश में धूम रही है।कामरेड ज्योति बसु ने ऐतिहीसक भूल मानने के बावजूद पार्टी के फैसले के मुताबिक प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया। हाल में लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने बारत अमेरिका परमाणु संधि पर पार्टी फैसले के खिलाफ जाकर बतौर लोकसभाध्यक्ष अपनी भूमिका निभायी तो उन्हें पार्टी ने बाहर का दरवाजा दिखा दिया। फिर बंगाल के नेतृत्व की जबर्दस्त जोर आजमाइश के बावजूद अभी उनकी पार्टी में वापसी हो नहीं सकी है।


    लेकिन केरल में विजयन अच्युत्यानंदन विवाद के बाद दोनों को पार्टी में बनाये रखने के बाद से पार्टी संगठन पर माकपा नेतृत्व का नियंत्रण लगता है कि खत्म ही हो गया है।जिसे जो मन हो रहा है,सार्वजनिक मंच से दूसरी बुर्जुआ पार्टी के आम रिवाज की तर्ज पर बोल रहा है।याद करें कि बंगाल के दिवंगत कामरेड सुभाष चक्रवर्ती अपने विवादास्पद वक्तव्यों के लिए कितनी बार अनुशासित किये गये।


    बंगाल में तख्ता पलट के बाद और केरल में विजयन अच्युत्यानंदन प्रकरण के बाद पार्टी नेतृत्व का अंकुश ढीला पड़ गया है। कामरेड महासचिव प्रकाश कारत ने परेशान होकर सोशल मीडिया पर मतामत को रोकने के लिए फतवा भी जारी कर दिया कि पार्टीजन सोशल नेटवर्किंग का कोई खाता न रखें। बंगाल में माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती और ऋतवर्त जैसे दिग्गज कामरेड बदस्तूर फेसबुक परबने हुए हैं।


    पार्टी नेतृत्व की हुक्म उदुली का सिलसिला हालांकि जनाधार वापस लेने की मुहिम से शुरु हुई। बंगाल राज्य व जिला नेतृत्व में फेरबदल की मांग सभी स्तरों से उठायी गयी,जो सिरे से खारिज करदी गयी। किसान सभा के राष्ट्रीय नेता रज्जाक मोल्ला ने अखबारों में बाकायदा बयान देकर कहा कि माकपा नेतृत्व पर ऊंची जातियों का वर्चस्व है।उनके मुताबिक जब तक अनुसूचितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यक समुदायों को संगठन के सभी स्तरो पर नेतृत्व में लाया नहीं जाता,जनाधार वापस नहीं होगा। लेकिन बंगाल में सांगठनिक चुनावों में नेतृत्व के ढांचे में कोई बुनियादी परिवर्तन हुआ नहीं।जबकि रज्जाकमोल्ला का अभियान जारी है।


    वंचित समुदायों की ओर से वामपंथी विचारधारा और आंदोलन पर जाति वर्चस्व और वर्ण वर्चस्व के आरोप लगते रहे हैं।बंगाल में चूंकि बाकी दलों में भी हालत कमोबेश एक सी है। इसलिए ऐसे आरोप को कामरेड नेतृत्व ने कभी तवज्जो नहीं दी है।इसी बीच बंगाल में पैंतीस साल के वाम शासन का सबसे बड़ा आधार अल्पसंख्यक वोट बैंक से ममता बनर्जी ने कामरेडों को बेदखल कर दिया है।कामरेड मोल्ला बंगाल में सबसे ऴजनदार अल्पसंख्यक कामरेड हैं। लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई और न सार्वजनिक मंचों से पार्टी परवर्ण वर्चस्व और जाति वर्चस्व के आरोप लगाने के लिए उन्हें दिवंगत कामरेड सुभाष चक्रवर्ती की तरह अनुशासित किया जा रहा है।


    इस बीच यह विवाद दावानल की तरह भड़कने लगा है। पार्टी संगठन पर ऊंची जातियों के वर्चस्व के खिलाफ नंदीग्राम जनसंहार मामले में मुख्य अभियुक्त पूर्व सांसद लक्ष्मण सेठ भी मुखर हो गये हैं।अल्पसंख्यकों की तरह अनुसूचितों के वोट बैंक से भी ममता दीदी ने कामरेडों को बेदखलकर दिया।सत्ता में रहते हुए जो लोग वर्ण व्यवस्था के मुताबिक सत्ता सुख बोग रहे थे,वे अब एक एक करके मुकर होने लगे हैं।


    लक्ष्मण सेठ के मुताबिक वंचित समुदाय से होने की वजह से ही इस्तेमाल करके पार्टी ने उनको बलि का बकरा बना दिया है।इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भी देदी है कि अगर पार्टी नेतृत्व पर ऊंची जातियों का वर्चस्व इसीतरह बना रहेगा तो जनाधार तो वापस होगा ही नहीं,राजनीति की  मुख्यधारा में पार्टी की वापसी का सपना भी कभी पूरा नही होगा।उन्होंने माकपा के मौजूदा संकट के लिए पार्टी नेतृत्व को ही जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में नंदी ग्राम और सिंगुर से शुरु भूमि आंदोलन का मुकाबला करने में पार्टी नेतृत्व बुरीतरह नाकाम रहा है।


    गौरतलब है कि  प्रकाश कारत को शायद अब यह समझ में नहीं रहा है कि जनसंवाद के जरिये पार्टी के जनाधार को विस्तार दें या बंगाल और केरल में कामरेडों को अनुशासित रखें। जो लोग आप प्रसंग में कामरेड महासचिव के बयानों से उत्साहित होकर सोच रहे थे कियुवाओं की समस्याओं को समझने और उनसे संवाद करने को उन्होंने जरूरी नहीं समझा,वे शायद गलत हैं।आप की टीम में सूचना तकनीक के विशेषज्ञ बेहतरीन लोग हैं और उनके दिल्ली करिश्मे से उत्साहित होकर कारत ने पार्टीजनों को आप  के तौर तरीके से सीखने का सबक दिया,यह बहुत पुराना किस्सा नहीं है।लेकिन अब उन्होंने कोच्चिं से बयान जारी करके फतवा दिया है कि सोशल मीडिया में अपनी राय दर्ज कराना अनुशासन भंग में शामिल है।यह ममला संगीन है क्योंकि लोकसभा चुनाव के पहले माकपा अपने कैडरों को उत्साहित करने के लिए तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन (सीधा हमला) करने की घोषणा की है। इस नये फतवे से कैडर कितने उत्साहित होंगे ,इसपर ही सवालिया निशान लग गया है।हालांकि माकपाई हमेशा की तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन लगाने से अब भी बच रहे हैं।


    जैसा कि हमने पहले ही लिखा है कि वामदलों को आप के उत्थान में नमोमय भारत निर्माण में उतनी दिलचस्पी नहीं है जितना कि ममता बनर्जी को हाशिये पर रखकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने और खासकर बंगाल और केरल में अपना वजूद कायम रखने की है।हम यह भी लिख चुके है ंकि दीदी एकझटके के साथ एक दो सीटें आप को बंगाल में देकर माकपा का खेल बिगाड़  सकती हैं। मोदी का समर्थन करने पर उनका वोट बैंक समीकरण गड़बड़ा सकता है  लेकिन आप से समझौता करने पर ऐसा कोई खतरा नहीं है।


    आप ने कारत का बयान आते ही वामशासन में वाम के बंगाल में किये कराये के मद्देनजर वाम के साथ तीसरे मोर्चे के गठन की संभावना सिरे से खारिज कर दिया तो दीदी अब आप की तारीफ करने लगी हैं।यानी तीसरे मोर्चे की वाम परियोजना में मुलायम सिंह के अलावा कोई और वामपक्ष में नहीं दीख रहा है।


    कांग्रेस की हालत पतली देखकर पहले ही मुलायम भाजपा की तारीफ कर चुके हैं और मुजफ्फरनगर दंगों के बाद अल्पसंख्यकों में उनकी साख खराब हो गयी है,इसपर तुर्रा यह कि कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश में  पूरे पचास सीटें देकर उससे महाराष्ट्र,पंजाब और हरियाणा मे ंगठबंधन करने जा रही है।


    बिहार में भी कांग्रेस के साथ राजद और लोजप के गठबंदन के बाद नीतीश कुमार के उस गठबंधन में शामिल होने की संबावना नहीं है। ऐसे में मुलायम और नीतीश के सामने सारे दूसरे विकल्प खुले हैं,ऐसे विकल्प जो वाम दलों को मंजूर होगा नहीं।


    राष्ट्रीय राजनीति में एकदम अकेले हो जाने के सदमे में लगता है कि कामरेड महासचिव को आप की तारीफ में वाम कार्यकर्ताओं को दी गयी नसीहत याद नहीं है।अब वे फेसबुक,ट्विटर और ब्लाग के खाते खोलकर अपनी राय देने वाले माकपाइयों को अनुशासित करने लगे हैं।


    बंगाल में सुजन चक्रवर्ती और ऋतव्रत जैसे तमाम खास कार्यकर्ता सोशल नेटवर्किंग में बेहद सक्रिय हैं। कारत उन सभी पर अंकुश लगायेंगे तो सोशल नेटवर्किंग के जरिये आप की तरह वामदलों का जनादार बनेगा कैसे,इसका कोई खुलासा लेकिनकामरेड ने नहीं किया है।धर्म कर्म की आजादीकी तरह लगता है कि केरल की कट्टर पार्टी लाइन से बाहर निकलने में कामरेड को अब भी दिक्कत हो रही है।गौरतलब है कि बंगाल में माकपाइयों को जनता से जुड़ने के लिए धर्म कर्म की इजाजत दे दी गयी है लेकिन केरल में नहीं।


    गौरतलब है कि करात ने अगरतला में  पहलीबार हुई माकपा की केंद्रीय समिति की बैठक के दौरान संवाददाताओं से कहा, विधानसभा चुनाव में आप कांग्रेस और भाजपा के सामने एक सशक्त विकल्प के रूप में उभरी है। हमें आप को समर्थन देने से पहले उनके राजनीतिक कार्यक्रमों, नीतियों और योजनाओं को देखना है।इसके अलावा मीडिया में उन्होंने आप को वाम विरासत वाली पार्टी भी कह दिया और जनाधार बनाने के लिए कैडरों से आप से सीखने की सलाह भी दे दी।बाद में हालांकि उन्होने अगरतला से कोच्चिं पहुंचकर यह भी कह दिया कि आम आदमी पार्टी बुर्जुआ दलों का विकल्प बन सकती है, लेकिन यह वामपंथी दलों का नहीं। उन्होंने कहा कि 28 दिसंबर को दिल्ली में अल्पमत सरकार बनाने वाली आप पर अभी भी कोई राय बनाना बहुत जल्दबाजी है। करात ने यहां मीडिया से कहा,आप ने दिल्ली में अच्छा प्रदर्शन किया और यह एक महत्वपूर्ण ताकत है, लेकिन मैं अन्य राज्यों के लिए निश्चिंत नहीं हूं।


    उन्होंने कहा,वे बुर्जुआ दलों के लिए विकल्प हो सकते हैं, वामपंथी दलों के नहीं। यह अच्छी बात है कि उन्होंने मध्य वर्ग से सहयोग लिया है। लेकिन हम उनसे उनके कार्यक्रमों और नीतियों का इंतजार कर रहे हैं। करात ने कहा कि महानगरों में माकपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। हमें मध्य वर्ग की वर्तमान पीढी के साथ समस्या हो रही है और इसलिए माकपा और वामपंथियों ने खुद को अनुकूल बनाना शुरू कर दिया है।


    आप के साथ वामपंथी दलों के गठबंधन के सवाल पर करात ने कहा कि ऎसा लगता है कि उन्हें गठबंधन में कोई दिलचस्पी नहीं है और इस समय वे खुद को स्थापित करने को लेकर चिंतित हैं। करात ने कहा,हमें नव उदारवादी नीतियों और सांप्रदायिकता पर उनका दृष्टिकोण जानने में दिलचस्पी है।


    जाहिर है कि माकपा केरल लाइन के शिकंजे से बाहर निकली नहीं है।कामरेड महासचिव के ताजा फतवे से तो यह साबित हो रहा है।



    'উচ্চবর্ণ'সিপিএম নেতৃত্বের বিরুদ্ধে ক্ষোভ লক্ষ্মণ শেঠের



    তমলুক: রেজ্জাক মোল্লার পর লক্ষ্মণ শেঠ, সিপিএমের বিদ্রোহী তালিকায় নতুন সংযোজন৷ অতীতে তমলুকের দাপুটে সিপিএম নেতা দলের বিরুদ্ধে বিষোদ্গারে গলা মেলালেন৷ কাজ করিয়ে নেওয়ার পর দল তাঁকে ছুড়ে ফেলে দিয়েছে বলে প্রকাশ্যে আক্ষেপ করলেন তিনি৷ জানিয়ে দিলেন, নেতৃত্বে উচ্চ বর্ণের আধিপত্য থাকলে সিপিএমের ঘুরে দাঁড়ানোর স্বপ্ন কোনদিন পুরণ হবে না৷ রাজ্যের ক্ষমতায় থাকার সময় নন্দীগ্রাম, সিঙ্গুর নিয়ে তৃণমূলের মোকাবিলা করতে রাজ্য ও পুর্ব মেদিনীপুর জেলা নেতৃত্ব ব্যর্থ হয়েছিল বলে কড়া সমালোচনা করেন অতীতে হলদিয়া ভবনের অধিকারী৷


    রেজ্জাক মোল্লা যে সংখ্যালঘু মঞ্চ গঠনের চেষ্টা করছেন, তার প্রয়োজন মানছেন লক্ষ্মণ শেঠ৷ সিপিএমের রাজ্য কমিটির প্রাক্তন এই সদস্য নন্দীগ্রাম মামলায় হাজিরা দিতে বৃহস্পতিবার তমলুক জেলা আদালতে এসেছিলেন৷ মামলার পরবর্তী দিন ধার্য হয়েছে ২৪ জানুয়ারি৷ ওই দিন মামলার চার্জ গঠন হতে পারে বলে আদালত সূত্রে জানা গিয়েছে৷ সেক্ষেত্রে তাঁর উপর আইনের রোষ নেমে আসা যে সময়ের অপেক্ষা তা আঁচ করতে পারছেন পুর্ব মেদিনীপুরে সিপিএমের এই দুঁদে নেতা৷


    এমন দুঃসময়ে দলকে তেমন ভাবে পাশে পাচ্ছেন না বলে তিনি অনুভব করছেন৷ আগেই তাঁকে রাজ্য কমিটি থেকে সরিয়ে দিয়েছেন সিপিএম নেতৃত্ব৷ আসন্ন লোকসভা নির্বাচনে তমলুক আসনে দল তাঁকে মনোনয়ন দেবেও না বলে বুঝে গিয়েছেন তিনি৷ ফলে রাগে, ক্ষোভে, হতাশায় সাংবাদিকদের প্রশ্নের উত্তরে আদালত চত্ত্বরে দাঁড়িয়েই দলীয় নেতৃত্বের বিরুদ্ধে ক্ষোভে ফেটে পড়লেন লক্ষ্মণবাবু৷


    নন্দীগ্রামের প্রসঙ্গেই তমলুকের প্রাক্তন সাংসদ বলেন, 'নন্দীগ্রামকে প্রচারে এনে তখনকার বিরোধীরা বাজিমাত করলেও সিপিএম শাসকদলে থেকেও সেই ঘটনাটি থেকে কোনও রাজনৈতিক ফায়দা তুলতে পারেনি৷ সে সময় নন্দীগ্রামে আমাদেরও অনেক কর্মী খুন হয়েছেন৷ অনেক পার্টি অফিস ভেঙে বা পুড়িয়ে দেওয়া হয়েছে৷ কিন্ত্ত তা নিয়ে রাজ্য বা জেলা নেতৃত্ব প্রচারে ব্যর্থতা দেখিয়েছেন৷ তৃণমূল ফায়দা তুলতে পারার জন্য দায়ী আমাদের নেতাদের ব্যর্থতা৷'


    তা হলে রাজ্য নেতৃত্বের উপর কি আপনার ক্ষোভ আছে? লক্ষ্মণবাবু উত্তর দেন, 'আমার ক্ষোভ থাকবে কেন? আমার উপর দলীয় নেতৃত্বের ক্ষোভ আছে৷ তাই আমি যখন একটার পর একটা মামলায় জর্জড়িত, তখন আমাকে রাজ্য কমিটি থেকে বাদ দেওয়া হয়েছিল৷' এরপরই ক্ষোভ উগরে তিনি বলেন, 'দলে এমন ভাবে উচ্চ বর্ণের সংখ্যাগরিষ্ঠতা চলতে থাকলে বামপন্থা ধুলিস্যাত্‍ হয়ে যাবে৷ যতদিন নেতৃত্বে আদিবাসী, তপশিলি বা সংখ্যালঘুদের প্রাধান্য থাকবে না, ততদিন বামপন্থার উন্নতি হবে না৷'


    অস্বস্তিতে পড়ে প্রতিক্রিয়ায় সাবধানী সিপিএম নেতারা৷ দলের পুর্ব মেদিনীপুর জেলা সম্পাদক কানু সাহু বলেন, 'লক্ষ্মণবাবুর বক্তব্য না শুনে আমি কিছু বলতে পারব না৷'



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    1st Kolkata People's Film Festival
    By Sanjay Joshi
    Cinema of Resistance: 1st People's Film Festival Kolkata

    In memory of Zainul Abedin
    Celebrating 'Resistance and People's Movements'

    20 Jan, 2014 Kolkata...See More
    Photo: Shamik Bandhyopadhay speaking in the inaugural session of 1st KPFF
    Photo: Mrityuanjay  in preparation
    Photo: Kasturi, Convener,  Kokata chapter of Cinema of Resistance addressing the inaugural session
    Photo: Kolata audience

    Cinema of Resistance: 1st People's Film Festival Kolkata

    In memory of Zainul Abedin
    Celebrating 'Resistance and People's Movements'

    20 Jan, 2014 Kolkata

    The 1st People's film Festival of Kolkata, organized by Jan Sanskriti Manch & People's Film Collective, was inaugurated today at Triguna Sen Auditorium, Kolkata today and is scheduled to run till 22nd January. The film festival celebrates 'Resistance & People's Movements' in the memory of Zainul Abedin, the revolutionary artist, in the year of his birth centenary. Within the next two days, the film festival will present several films & documentaries focusing upon people's struggle across the world and country. These films are testimonies of the valiant resistance of people against corporate fascism and communalism. Filmmakers like Sanjay Kak, Moinak Biswas, Ranu Ghosh, Suryashankar Dash, Nakul Singh Shawney, Bikramjit Gupta, Moshumi Bhowmick and Sukant Majumdar were present at the film festival for discussions.

    At the inauguration of the festival the renowned film critic Shamik Bandopadhyay stated that the arts & culture are under an 'undeclared censorship'. The state does not allow for the people to be informed about people's struggle, democratic voices are being silenced. In such times the use of new technology by this initiative to disseminate the voices of resistance marks the beginning of a new chapter. The birth of Cinema of Resistance in Gorakhpur, infamous as a laboratory of communalism, has immense significance. He compared mainstream cinema to what the poet Mayakovsky's referred to as 'sick cinema', and expressed hope that the Cinema of Resistance would effectively counter it and further the cause of people's struggle far and wide. 

    Poet Sabyasachi Dev wished the festival would meet success and emphasized upon the power of cinema. Such initiatives would strengthen the resistance of the people. Nakul Singh Shawney, who has made a film on the recent pogrom in Muzzafarnagar, claimed that he was not a guest but a comrade of the festival. He said such festivals brought forth an unseen world to audiences as well as enable filmmakers like him to engage and learn from audiences. He emphasized that making and screening documentaries was extremely important today; and there should be many more such initiatives. 

    The national convener of Cinema of Resistance, Sanjay Joshi, in his welcome speech narrated the story of the festival and how it began in a small town of Uttar Pradesh, Gorakhpur, and has since travelled to various parts of Uttar Pradesh, Bihar, Uttarakhand, Rajasthan, Delhi, and other places. He claimed that the real strength of the festival were common people who have been marginalized by the propaganda of the state, corporate media and mainstream cinema. This festival has not sought patronage from any Govt. organization or multi-national corporations, rather has thrived upon people's participation and financial contributions. He stressed that this was the 'Cinema of Resistant and not Cinema of Revenge'. In a time where corporate and communal fascism is marching ahead rapidly, people's cinema can be torchbearer of people's struggle. Also present on the dais were filmmaker Surya Shankar Dash, film critic Vidyarthi Chatterjee and Amit Dasgupta, Jt. Secy Gana Sanskruti Parishad (West Bengal). 

    A souvenir featuring summaries of the films featured in the festival as well as articles by filmmakers like Sanjay Kak, Surya Shankar Dash, Nakul Singh Shawney, Bikramjit Gupta, Moinak Biswas and film critics like Biren Dasgupta and Sanjay Mukhopadhyay was released at the inauguration. Along with, a fact finding report by CPI-ML Liberation on the communal violence in Muzzafarnagar titled 'Ek Rajnitik-Apradhik Sazish' was released. Also to celeberate the birth centenary year of Zainul Abedin four posters designed by renowned artist Ashok Bhowmick were released. The session was conducted by Kasturi, the Convener of People's Film Collective Kolkata. 

    In the following session, 'Anhey Ghore Da Daan' by Gurvinder Singh was screened. The film not only depicts the trials & tribulations of Dalits with a sharp class critique in the rural milieu of Punjab, but also merges questions of land & dignity very effectively. The film also addresses the tragic consequences of displacement of Dalits in urban areas. Noted film critic Vidyarthi Chatterji appreciated the 'minimalist style' of the film and its effectiveness in presenting ground realities. The second film to be screened was 'Voices from Baliapal' by Ranjan Palit and Basudha Joshi. Made in 1989 this acclaimed film won the National Award for Best Documentary and captures the spirited non-violent resistance of more than 70,000 peasants & fishing communities in coastal Odisha resisting land grab for a missile testing center.

    After tea break the festival resumed with a presentation by filmmaker Surya Shankar Dash, titled 'Repression Diary: The Case of Odisha'. It included an evocative montage of short videos which narrate unheard tales of the ongoing loot of mineral resources and brutal state repression. The presentation portrayed the valiant struggle of Adivasis and peasants for 'jal, jangal, jameen' and weaved together the necessity and perseverance of ordinary people to fight against the humiliation & repression of the corporate ruling class. In the discussion with the audience, the filmmaker claimed that big media houses & newspapers had become agents for corporates and in such times the Cinema of Resistance initiative is an ideal platform for people like him. He emphasized on the importance of videos emerging from people's struggles and said wherever there was repression and resistance we all need to participate in these struggles with our cameras. 

    In the next session acclaimed filmmaker Sanjay Kak, whose earlier work Jashn-e-Azadi remains to be one of the finest documentaries on the issues of Kashmir, presented his latest documentary 'Red Ant Dreams'. The film interweaves stories of people's struggle from Punjab, Chattisgarh & Odisha into one narrative while exploring different forms of resistance in these areas. The film exposes the brutal reality of Indian democracy, presents a nuanced analysis of the war being waged against the people by the state and underlines the dreams of the people for change. While answering questions from the audience, Sanjay Kak said that the Govt. and the ruling class was waging a war against Adivasis, workers and peasants. He said that the forms of resistance would be decided by the people themselves. 

    The last film of the day, 'Muzzafarnagar Testimonies', by young filmmaker Nakul Singh Shawney is a reportage of the pogrom against Muslims in Uttar Pradesh that erupted on 7th Sep 2013 and claimed several lives and displaced thousands from their villages. The displaced were further removed from relief camps by the Govt. to cater to vote banks in the upcoming Parliamentary elections. Nakul Singh's camera shows us the harsh & cruel realities that the mainstream media has totally censored. While more than 95% of the victims were Muslims the media portrayed it as a two-sided riot. The film exposed campaigns by the Sangh parivar like 'Bahu Bachao Beti Bachao' to fuel communal strife while revealing the real face of the Samjwadi Party Govt and its police. In the discussion following the screening, Nakul Singh elaborated upon the experiments in communalism in Muzzafarnagar and across Uttar Pradesh.


    The festival also included an exhibition of sketches and artworks by revolutionary artists Chittoprasad and Zainul Abedin. These artworks depict the everyday struggle of peasants and workers as well as the horrors of the Bengal famine, and left a deep impact on the viewers. Another attraction for the audience was an exhibition of photographs by young photographers of Kolkata. 

    1st Kolkata People's Film Festival
    By Kasturi, Convener, Cinema of Resistance, Kolkata
    Tel: +91-9163736863 Mail: cor.kolkata@gmail.com



    जायनवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीरें और गरीबों के सफाये में भारत पर निशाना


    दुनिया में अमीर और गरीब के बीच का फासला इस कदर बढ़ा है कि दुनिया की आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है उतनी संपत्ति दुनियाभर के केवल 85 धनी व्यक्तियों के पास है।

    Election results could impact growth prospects, says Moody's


    पलाश विश्वास


    The Economic Times

    4 hours ago

    Hole in the employees' pension scheme rises to Rs 62,000 crore

    http://ow.ly/sP0fm

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    चुनाव सर्वेक्षण की दुकानें महकने लगी हैं।जनादेश निर्माण की वैज्ञानिक पद्धति में मीडिया वर्चस्व का अनिवार्य अंग।अब ममता बनर्जी,मायावती और जयललिता के त्रिकोण को भारत का भविष्य बताया जा रहा है।


    ममता बनर्जी और मायावती अपने अपने तरीके से प्रधानमंत्रित्व की प्रबल दावेदार हैं।खास बात है कि निर्णायक गायपट्टी में काबिज पुरुष वर्चस्व को ये दोनों विकल्प मंजूर नहीं है।


    इसी से सीख लेकर संघ परिवार ने लगभग निर्विवाद स्वच्छ छवि की सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्रित्व का दावेदार बनाने से साफ इंकार कर दिया और महिला के बजाय ओबीसी पांसा फेंका है।


    अब आधिकारिक तौर पर जयललिता ने भारतीय राजनीति में आर्य वर्चस्व और नरसिंह राव व देवे गौड़ा के अपवादों को छोड़कर उत्तर भारत के वर्चस्व के मद्देनजर प्रधानमंत्रित्व पर जयललिता की सुदूर दक्षिणात्य से यह दावेदारी अंततः भारत में पुरुषतंत्र पर कारगर आघात होगा,हम ऐसी उम्मीद कर भी सकते हैं।जैसे कि टीवी पर अवतरित होकर वरिष्ट पत्रकार प्रभु चावला ने कह दिया कि भारत का प्रधानमंत्री कौन होगा ,यह ये तीनों महिलाएं तय करेंगी।तीनों मिलकर सौ सीटें भी हासिल कर लें तो एकजुट होकर तीनों बहुत कुछ कर सकती हैं।सहमत।


    टीवी खबरों की माने तो जयललिता के प्रधानमंत्रित्व को ममतादीदी और मायावती का समरथन भी बताया जाता है।


    तीनों महिलाओं ने समय समय पर भारतीय राजनीति और संसद के अलावा अपने अपने राज्य में लगातार घमासान किया हुआ है।


    वे तीनों एकजुट हो जायें,देश की गुलाम आधी आबादी के लिए इस अबाध नरसंहार काल में बचाव का सबसे खुला राजमार्ग हो सकता है।


    लेकिन तीनों की व्यक्तिवादी राजनीति,तीनों की उत्कट महत्वाकांक्षाएं और तीवनों के तानाशाह तौर तरीके से फिलहाल यह असंभव है।लेकिन टीवी सर्वेक्षणों और पैनलों के डिस्कसन से लगता है कि कारपोरेट राज का ताजातरीन लोकलुभावन विकल्प यह भी है।


    26 जनवरी के राष्ट्रवादी महोत्सव से पहले संवैधानिक संकट जैसा पैदा करते हुए अरविंद केजरीवाल की अराजकता का जो महाविस्फोट हो गया,उसके मद्देनजर कारपोरेट मीडिया का तेवर भी बदला है।आप को आसमान पर चढ़ाने वाले लोग अब आप के विरोध में हैं।


    इसी बीच वैश्विक जायनवादी अर्थव्यवस्था के शीर्ष संस्थान अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष,रेटिंग संस्थाओं ने अगले चुनाव परिणामों के मद्देनजर तरह तरह की शंकाएं भी डाल रखी है।विकास दर के शीर्षासन से,सेनसेक्स की उछल कूद और विदेशी विनिवेशकों की कठपुतलियों के जरिये जनादेश साधने का प्रयास चल रहा है तो तकनीक ईश्वर बिल गेट्स ने मुक्त बाजार की अब तक की सबसे गुलाबी तस्वीर पेश कर दी है कि 2035 तक दुनिया में गरीबी का सफाया हो जायेगा।


    जबकि तथ्य यह है कि दुनिया में अमीर और गरीब के बीच का फासला इस कदर बढ़ा है कि दुनिया की आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है उतनी संपत्ति दुनियाभर के केवल 85 धनी व्यक्तियों के पास है।


    भुखमरी विशेषज्ञ और राथचाइल्ड्स घराने के दामाद के जयपुर अवतार से साहित्य,कला विधाओं और माध्यमों मे राथचाइल्ड्स छाया का विस्तार भी होने लगा है।इसी छाया मध्य छनछनाती विकास रोशनी के जरिये अगले इक्कीस लाल में दुनियाभर में गरीबी हटाने की यह युद्धगोषमा मुक्त बाजार का अबतक का सबसे बड़ा दांव है और मुझे कोई शक नहीं है कि गरीबों के खात्मे का सबसे बड़ा निशाना भारत ही है।


    आगामी लोकसभा चुनाव में राजनीतिक शतरंज की जो बिसात बिछायी गयी है,वह अब तक की सबसे भयंकर पहेली है,जो किसी विषकन्या से कम आकर्षक नहीं है और देवमंडल के सारे आयुधों से उस विषकन्या को तिलोत्तमा बनाने की कवायद हो रही है।


    कल दिनभर प्रतिरोध के सिनेमा के तहत बेदखली और विस्थापन के यथार्थ से मुठबेड़ होती रही।यादवपुर विश्वविद्यालय कैंपस में त्रिगुणासेन आडिटोरियम में साउथसिटी माल में बेदखली और बेदखली के खिलाफ लड़ रहे उषा मार्टिन श्रमिक शंभुनाथ सिंह की अथक लड़ाई और रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मौत पर 2011 में बनी रानू घोष निर्देशित फिल्म क्वार्टर नंबर 4/11,जिसमें अपनी मौत से पहले की पूरी भूमिका बेदखली विरोधी योद्धा शंभुनाथ सिंह ने निभायी है ,के बाद दर्शकासन से आडोटोरियम और निर्देशक को संबोधित करते हुए मेंने इस फिल्म को मुक्त बाजार भारत का सर्वव्यापी  प्रतिबिंब बताते हुए करमुक्त भारत और भावी फ्रधानमंत्री के एजंडे के विमर्श को शहरों और देहात में सर्वत्र जमीन लूटो के नये अशनिसंकेत बतौर चिन्हित किया।


    आज सुबह हमारे विद्वान मित्र आनंद तेलतुंबड़े से बात हुई लंबी।हम दोनों इस मुद्दे पर सहमत हैं और सांस्कृतिक क्षेत्र में अर्थसास्त्र की दखलंदाजी से हम दोनों समान रुप से आशंकित हैं। ईपीडब्लू में अपने कालम में आनंद ने आप पर लिखा भी है।हमारी अति प्रिय लेखिका अरुंधति राय की मां भी अब आप में शामिल हैं।


    देशभर के जनसरोकार के लोग जिस तेजी से आप से जुड़ रहे हैं,उससे कारपोरेट राज भी हिल गया है और इसकी अराजकता के महाविस्फोट से मुक्त बाजार के एजंडे के तहत उसकी आगामी भूमिका पर सवालिया निशान लग गये हैं।प्रथम वरीयता से खिसक गया है आप और महिला सशक्तीकरण को जनादेश का नया विकल्प बतौर पेश किया जा रहा है।


    विदेशी निवेशकों की लक्ष्मी सुलभ चंचल मति के मद्देनजर कारपोरेट विकल्प के जनादेश में ताबड़तोड़ बदलाव हो सकते हैं।आप के जरिये सामाजिक शक्तियों की जो गोलबंदी हो रही है,उसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते।


    इस वर्ग से हमें निरंतर संवाद करने की जरुरत है और इस बदलाव को हमें अस्मिताओं के चश्मे से देखने यानी सीधे उन्हें अंबेडकर या आरक्षणविरोधी बता देने के विकल्प से बचना चाहिए।


    बहुत संभव है कि बाकी विकल्पों की अराजकता के मद्देनजर फिर वरीयता पर सर्वोच्च हो जाये नमोमय भारत।तो उस दशा में नरसंहार के अगले अध्याय के मुकाबले सामाजिक शक्तियों की गोलबंदी ही हमारे सबसे काम की चीज होंगी और तेलतुंबड़े और मेरा मानना है कि हमें दुसाध जी की तरह अरविंद केजरीवाल को कवई मछली तक बता देने के फतवे से बचना चाहिए।


    नमोमय भारत का परिदृश्य बना तो उसके मुकाबले हमें हो सकता है कि फिर इसी अरविंद केजरीवाल की अपने मोर्चे पर सबसे ज्यादा जरुरत होगी,जो अपनी अराजकता से कभी भी सत्ता से बाहर किये जा सकते हैं।उनके साथ जुड़ती सामाजिक शक्तियों और अपने पुराने साथियों,मित्रों पर हमलावर रुख अपनाकर हम लोग कारपोरेट राज को ही उनका अपना विकल्प चुन लेने में मदद कर सकते हैं और वह विकल्प नरेंद्र मोदी भी हो सकते हैं।राहुल गांधी नहीं।


    कल ही हमने हारकर दिलीप मंडल के रवैये पर लिखा।लिखा पोस्ट करने के बाद फिर फेसबुक पर उनका मंतव्य आया कि संविधान और आरक्षण के कारण सुधारों की वजह से बहुजन मध्यवर्ग का उत्थान हुआ है और इसे रोकने के लिए ही आप का उत्थान है।यह अति सरलीकरण है।


    बहुजन मध्यवर्ग का बहुजन हित से कोई लेना देना नहीं है । होता तो भारत में अब तक समता और सामाजिक न्याय का लक्ष्य हासिल हो गया होता।दरअसल यह बहुजन मध्यवर्ग ही नरमेध अभियान की सबसे बड़ी पैदल सेना है।चंद्रभान प्रसाद और दिलीप मंडल जैसे लोग इसी पैदल सेना के सिपाहसालार हैं।


    गौरतलब है कि बिल गेट्स ने कहा है कि आने वाले कुछ सालों के बाद दुनिया में कोई भी देश गरीब देश की श्रेणी में नहीं रहेगा। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक और दुनिया के सबसे धनी लोगों में शुमार बिल गेट्स का दावा है कि 2035 तक कोई गरीब देश नहीं होगा। बिल गेट्स का कहना है कि धनी देश जिन तकनीक और सुविधाओं का इजाद कर रहे हैं, उसका लाभ इन गरीब देशों को भी मिलेगा और ऐसा होने पर ये देश इससे उबर जाएंगे.।


    बिल गेट्स ने हाल ही में बिल एवं मिलिन्डा गेट्स फाउंडेशन के वार्षिक पत्र में कहा कि मैं अनुमान लगा रहा हूं कि 2035 तक दुनिया में लगभग कोई भी देश गरीब नहीं रह जाएगा। उन्होंने कहा कि लगभग सभी देश उस स्थिति में होंगे, जिसे हम अभी धनी देश कहते हैं। देशों को अपने सबसे ज्यादा उत्पादक पड़ोसी देशों से सीखने को मिलेगा और वे नए टीका, अच्छे बीज और डिजिटल क्रांति जैसी खोजों से लाभान्वित होंगे. इसका लाभ हर देश को मिलेगा।


    बिल गेट्स ने कहा कि शिक्षा के विस्तार के साथ उनकी श्रम शक्तियां नए निवेशों को आकर्षित करेंगी। 2035 तक अधिकांश देशों में चीन के मौजूदा स्तर के मुकाबले कहीं अधिक प्रति व्यक्ति आय होगी। गेट्स ने कहा कि अमीर और गरीब के बीच की खाई को चीन, भारत, ब्राजील और अन्य देश दूर कर लेंगे. वर्ष 1960 के बाद से चीन की प्रति व्यक्ति वास्तविक आय आठ गुना बढ़ी है। भारत की प्रति व्यक्ति वास्तविक आय चार गुना और ब्राजील की प्रति व्यक्ति वास्तविक आय पांच गुना बढ़ी है।


    बिल गेट्स ने अपने इसमें लिखा कि यह मानना कि दुनिया बद से बदतर हुई है, जो अत्यधिक निर्धनता एवं रोगों को ठीक नहीं कर सकती, केवल गलत ही नहीं है, यह नुकसानदेह भी है। किसी भी पैमाने से जो दुनिया पहले थी, वह उससे कहीं बेहतर हुई हैं। दो दशक में यह कहीं और बेहतर होगी। हालांकि बिल गेट्स ने यह बात भी साफ की है कि उन्होंने गरीबी को लेकर जो कुछ कहा है, वह वर्तमान परिभाषा के अनुसार है।


    भारतीय यथार्थ के उलट पुराण की रचना स्वयं बिल गेट्स कर रहे हैं तो समझ जाइये कि आगे क्या क्या होने वाले है।


    कोई गरीब देश 2035 के बाद रहेगा नहीं तो क्या हम मान लें कि 2035 तक भारत अमेरिका हो जायेगा और अमेरिका के उपनिवेश की हैसियत से मुक्त हो जायेगा,यह विचारणीय है।


    दुनिया में अमीर और गरीब के बीच का फासला इस कदर बढ़ा है कि दुनिया की आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है उतनी संपत्ति दुनियाभर के केवल 85 धनी व्यक्तियों के पास है। दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक से पहले आक्सफैम की वर्किंगग फार द फ्यू शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में यह बात कही गई है।


    इसमें विकसित एवं विकासशील दोनों तरह के देशों में बढ़ती असमानता का विस्तार से उल्लेख किया गया है। आक्सफैम का दावा है कि धनाढ्यों ने आर्थिक खेल के नियम अपने हित में करने तथा लोकतंत्र को कमजोर करने के इरादे से राजनीतिक रास्ता भी अख्तियार किया है। दुनिया के सर्वाधिक 85 धनाढ्यों के पास इतनी संपत्ति है जो दुनिया की आधी आबादी की संपत्ति के बराबर है।


    रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक में धनवानों के मामले में कर की दरें 30 देशों में से 29 में कम हुई हैं। ये वे देश हैं जिनके बारे में आंकड़ें उपलब्ध हैं। इसका मतलब है कि कई जगहों पर धनवान न केवल खूब धन अर्जित कर रहे हैं बल्कि उस पर कर भी कम दे रहे हैं।


    इसमें कहा गया है कि पिछले 25 साल में धन कुछ लोगों तक केंद्रित हुआ है और यह दुनिया के एक प्रतिशत परिवार के पास इतनी संपत्ति है जो दुनिया की करीब आधी आबादी (46 प्रतिशत) के बराबर है। आक्सफैम चाहती है कि सरकार इस प्रवत्ति को बदलने के लिये तत्काल कदम उठाये। विश्व आर्थिक मंच में भाग लेने वाले लोगों से इस समस्या से निपटने के लिये व्यक्गित संकल्प लेने को कहा गया है।


    ओक्सफैम के कार्यकारी निदेशक विनी बयानयिमा ने कहा कि यह चौंकाने वाला है कि 21वीं सदी में दुनिया की आधी आबादी के पास इतनी संपत्ति नहीं है जितनी कि 85 लोगों के पास। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि धनाढ्य व्यक्तियों तथा कंपनियां कर अधिकारियों से खरबों डॉलर छिपाती हैं। एक अनुमान के अनुसार 21,000 अरब डॉलर बिना रिकॉर्ड के हैं और राशि विदेशों में पड़ी है।


    इसमें कहा गया है कि पिछले दशक में भारत में अरबपतियों की संख्या दस गुणा बढ़ी है। प्रतिगामी कर ढांचा तथा सरकारी तंत्र में पैठ का लाभ उठाते हुये उनकी संपत्ति बढ़ती जा रही है। वहीं दूसरी तरफ गरीबों पर होने वाला खर्च उल्लेखनीय रूप से कम है।


    रिपोर्ट के अनुसार दस में से सात लोग ऐसे देशों में रहते हैं जहां पिछले 30 वर्षों के दौरान असमानता बढ़ी है। दूसरी तरफ 26 में से 24 देशों में सबसे धनी लोगों ने अपनी आय में एक प्रतिशत वृद्धि की है। ये आंकड़े उन देशों के हैं जिनके बारे में 1980 से 2012 के आंकड़े उपलब्ध हैं।


    इसी बीच ध्यान दें कि रेल भवन के बाहर आम आदमी पार्टी के धरने के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। संसद मार्ग थाने में धारा 144 का उल्लंघन, पुलिस से भिड़ंत और बिना अनुमति के लाउड स्पीकर के प्रयोग का मामला दर्ज किया गया है। इस बीच, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तबीयत खराब हो गई। केजरीवाल को कौशांबी स्थिति यशोदा अस्पताल ले जाया गया। हालांकि कुछ देर बाद उन्हें छुट्टी भी दे दी गई। इस बारे में आप नेता संजय सिंह ने कहा है कि घबराने की कोई बात नहीं है। तबीयत खराब होने की वजह से केजरीवाल आज दिल्ली सचिवालय नहीं जाएंगे।


    इसी बीच दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की दिक्कतें कम होती नजर नहीं आ रही है और मालवीय नगर के खिड़की एक्सटेंशन में रात को छापा मारने के मामले में उन पर इस्तीफे का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

          

    पंद्रह जनवरी की रात को खिड़की में रात को छापा मारने गए भारती को उस समय वहां मौजूद युगांडा की एक महिला ने पहचाना है। साकेत स्थित अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान में महिला ने टेलीविजन और प्रिंट मीडिया की फुटेज देखने के बाद भारती की पहचान की है।  

          

    साकेत मजिस्ट्रेट की अदालत में दो महिलाओं ने बयान दर्ज कराये हैं। इनमें से एक युगांडा की है, जबकि दूसरी महिला की राष्ट्रीयता का अभी पता नहीं चल पाया है। युगांडा की महिला ने दर्ज कराये अपने बयान में कहा है कि बुधवारकी रात को भारती की अगुवाई में भारतीयों ने हम पर हमला किया। महिला ने कहा कि हमला करने वाले दावा कर रहे थे कि हम काले हैं और हमें देश छोड़ देना चाहिए। हमें प्रताड़ित किया गया, मारा गया।


    हमलावरों के हाथ में लंबी छड़ी थी, उनका कहना था कि हम यहां से चले जायें अथवा वह हमें मार देंगे। मैंने उन्हें पहचाना है, क्योंकि वह रात में आये थे और अगले दिन उनकी तस्वीर देखी और वह उन्हीं कपड़ों में थे, जो रात को पहने हुए थे। पुलिस ने समय पर आकर हमें भीड़ से बचाया।  

        

    उधर दिल्ली महिला आयोग ने भारती को युगांडा की महिला की र्दुव्‍यवहार की शिकायत पर पुलिस के जरिये दूसरा सम्मन भेजा है। उधर आप सूत्रों के अनुसार भारती को चेतावनी दी है कि वह संभलकर बोलें।



    इसी बीच आईएमएफ का ग्लोबल और भारत की ग्रोथ पर भरोसा कुछ बढ़ता हुआ दिख रहा है। आईएमएफ ने वित्त वर्ष 2015 के लिए भारत का जीडीपी अनुमान 5 फीसदी से बढ़ाकर 5.4 फीसदी कर दिया है। वहीं 2014 के लिए ग्लोबल जीडीपी ग्रोथ अनुमान 3.6 फीसदी से बढ़ाकर 3.7 फीसदी किया है। साल 2015 में ग्लोबल इकोनॉमी 3.9 फीसदी की रफ्तार से बढ़ सकती है।


    हालांकि आईएमएफ ने वित्त वर्ष 2014 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 4.6 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। वहीं आईएमएफ के मुताबिक वित्त वर्ष 2016 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.4 फीसदी रह सकती है।


    साल 2015 में अमेरिकी इकोनॉमी के 3 फीसदी की दर से विकास करने की संभावना है। वहीं 204 में यूरोपीय क्षेत्र की ग्रोथ 1 फीसदी रहने का अनुमान है जो पहले अनुमान के बराबर ही है। हालांकि यूरोप एरिया की जीडीपी ग्रोथ 1.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। आईएमएफ ने चीन का जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7.3 फीसदी से बढ़ाकर 7.5 फीसदी किया है। वहीं साल 2015 में चीन की जीडीपी ग्रोथ 7.3 फीसदी रह सकती है।


    आईएमएफ ने साल 2015 के लिए इमर्जिंग मार्केट्स के ग्रोथ का पूर्वानुमान बिना किसी बदलाव के 5.1 फीसदी पर स्थिर रखा है। वहीं साल 2014 के लिए विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए ग्रोथ का अनुमान 2.2 फीसदी तय किया है।


    गौरतलब है कि अफरातफरी के 32 घंटों के बाद दिल्ली पुलिस के तीन अफसरों के निलंबन की मांग कर रही केजरीवाल सरकार ने अपना धरना मंगलवार शाम वापस ले लिया। उपराज्यपाल की ओर से दो अफसरों को छुट्टी पर भेजने का आश्वासन देने पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने धरना खत्म करने का ऐलान किया।


    रेल भवन के बाहर सोमवार दोपहर से अपने नेताओं के साथ धरने पर बैठे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि उपराज्यपाल ने हमें 26 जनवरी और सुरक्षा का हवाला दिया। उन्होंने मालवीय नगर थाने के एसएचओ और पहाड़गंज के पीसीआर इंचार्ज को छुट्टी पर भेजने का आश्वासन दिया है। सागरपुर में महिला को जिंदा जलाने के मामले में भी पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया।


    आफत बन गया था धरना

    सोमवार सुबह 12 बजे से मंगलवार रात 8 बजे तक चला धरना लोगों के लिए आफत बन गया था। इसके चलते सड़कों पर लोग जाम से जूझते रहे। चार मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के आफत और बढ़ गई। केजरीवाल सरकार के रवैये के प्रति उनके कई समर्थक भारी नाराज भी दिखे।


    उग्र हो गया था धरना

    खराब मौसम और बारिश के बीच आप समर्थक बैरिकेड तोड़कर धरनास्थल की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें रोका तो कुछ लोगों ने पथराव कर दिया। जवाब में पुलिसकर्मियों ने जमकर लाठियां चलाईं। इसमें 12 लोग व 2 पुलिसकर्मी घायल हो गए। बाद में भी झड़पों को सिलसिला जारी रहा।


    भाजपा ने भी किया प्रदर्शन

    भाजपा नेता विजय गोयल की अगुवाई में युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने मंत्री सौरभ भारद्वाज और सोमनाथ भारती के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रदर्शन किया। इस बीच पुलिस ने विजय गोयल को हिरासत में भी लिया।


    बातचीत से निकाला रास्ता

    शाम को आप के एक वरिष्ठ नेता ने उपराज्यपाल से बात की। इसके बाद पार्टी के शीर्ष नेताओं की बैठक हुई। एलजी से आश्वासन मिलने पर धरना खत्म किया गया।


    खुल जाएंगे सभी मेट्रो स्टेशन

    धरना खत्म होने पर बुधवार से सभी मेट्रो स्टेशन खुलेंगे। सारी व्यवस्था पहले जैसी रहेगी।

    फर्टिलाइजर कंपनियों को सरकार ने दी बड़ी राहत

    फर्टिलाइजर कंपनियों को बड़ी राहत मिलती दिख रही है। वित्त मंत्रालय ने फर्टिलाइजर कंपनियों को करीब 9,000 करोड़ रुपये की राहत दी है। सोमवार को वित्त मंत्रालय की ओर से फर्टिलाइजर कंपनियों को 9,000 करोड़ रुपये की रकम जारी की गई है।


    वित्त मंत्रालय की ओर से जारी 9,000 करोड़ रुपये की रकम में से सबसे ज्यादा 2,000 करोड़ रुपये नेशनल फर्टिलाजर (एनएफएल)को दिए जाएंगे। एनएफएल के अलावा राष्ट्रीय केमिकल फर्टिलाजर्स (आरसीएफ), इफ्को समेत 40 फर्टिलाइजर कंपनियों में 9,000 करोड़ रुपये की रकम बांटी जाएगी।


    वित्त मंत्रालय की ओर से जारी 9,000 करोड़ रुपये की रकम से फर्टिलाइजर कंपनियों को 15 नवंबर तक की पूरी सब्सिडी का भुगतान कर दिया जाएगा। वित्त मंत्रालय ने फर्टिलाइजर कंपनियों को 9,000 करोड़ रुपये की रकम सॉफ्ट बैंकिंग लोन अरेजमेंट के तहत दी है।

    आज से देश भर में लागू हुई एलपीजी पोर्टेबिलिटी

    आज से आपको अपना एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर बदलने की आजादी मिल जाएगी। पायलट प्रोजेक्ट की कामयाबी के बाद सरकार ने आज से एलपीजी पोर्टेबिलिटी को देश भर में लागू करने का फैसला किया है। एलपीजी पोर्टेबिलिटी के तहत कोई भी ग्राहक एलपीजी पोर्टल पर जा कर अपनी पसंद का डिस्ट्रीब्यूटर चुन सकेगा।


    एलपीजी पोर्टेबिलिटी के तहत ग्राहकों को अपनी पसंद का एलपीजी डीलर चुनने की आजादी होगी। एलपीजी डिस्ट्रिब्यूटर के साथ-साथ ग्राहक कंपनी भी बदल सकेंगे। mylpg.inके जरिए एलपीजी पोर्टेबिलिटी लागू होगी। वहीं एलपीजी पोर्टेबिलिटी के लिए कोई कागजी प्रक्रिया नहीं होगी।


    गौरतलब है कि एलपीजी डिस्ट्रिब्यूटरों की रेटिंग की प्रक्रिया पहले ही शुरू की गई है। डिलीवरी के आधार पर डिस्ट्रिब्यूटर को 5 स्टार तक रेटिंग मिलती है। लिहाजा ग्राहक रेटिंग और डिलीवरी रिकॉर्ड को देखकर डिस्ट्रिब्यूटर चुन सकते हैं।

    प्रॉविडेंट फंड की पेंशन स्कीम में 62000 करोड़ का घाटा

    ईटी | Jan 22, 2014, 02.43PM IST


    विकास धूत, नई दिल्ली

    एम्प्लॉयीज पेंशन स्कीम का घाटा साल 2009 में बढ़कर 62,000 करोड़ रुपये हो गया। साल 2008 में यह 54,200 करोड़ रुपये था। इस स्कीम की काफी देर से आई वैल्यूएशन रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।


    यह स्कीम साल 1995 में प्रॉविडेंट फंड एकाउंट होल्डर्स के लिए लॉन्च की गई थी, जब मनमोन सिंह फाइनेंस मिनिस्टर थे। वैल्यूएशन रिपोर्ट पिछले साल सरकार को सौंपी गई थी, लेकिन पीएफ के ट्रस्टियों को यह पिछले हफ्ते ही मिली। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि पेंशन स्कीम का फंड 'पूरी तरह फिक्स्ड इंटरेस्ट इंस्ट्रूमेंट्स में इनवेस्ट करने'के बजाय इसका एक हिस्सा 'इक्विटीज जैसी रियल एसेट्स'में लगाया जाए।

    इसमें यह सुझाव भी दिया गया है कि स्कीम के तहत रिटायरमेंट एज 58 साल से बढ़ाकर 60 साल कर दी जाए। साल 2013-14 के अंत तक पेंशन स्कीम में करीब 8 करोड़ मेंबर्स और इसमें 2 लाख 20 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।


    पेंशन स्कीम के तहत सभी रिटायर्ड मेंबर्स को मिनिमम 1,000 रुपये की मंथली पेंशन देने का प्रस्ताव यूपीए सरकार लंबे समय से दबाए हुए है क्योंकि फाइनेंस मिनिस्ट्री ने इसे लागू करने पर चिंता जताई है। प्रॉविडेंट फंड के वही मेंबर इस पेंशन स्कीम का हिस्सा हो सकते हैं, जिनकी मंथली सैलरी 6,500 रुपये हो। इसे बढ़ाकर 15,000 करने का प्रस्ताव भी चार साल से लटका हुआ है।


    इसमें डर यह है कि इसके चलते पेंशन स्कीम की देनदारी बहुत बढ़ जाएगी। साल 2001 में जब सैलरी लिमिट 5,000 से बढ़ाकर 6,500 रुपये की गई थी तो पेंशन स्कीम की देनदारी में 10,000 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ था। 6,500 रुपये की सैलरी वाले कर्मचारी के वेतन का जितना हिस्सा पीएफ में जाता है, उसकी एक तिहाई से कुछ ज्यादा रकम पेंशन स्कीम में जाता है। सेंट्रल गवर्नमेंट पेंशन स्कीम पर 1.16 पर्सेंट की सब्सिडी देती है। इस तरह इसमें कंट्रीब्यूशन बढ़कर सैलरी का 9.49 पर्सेंट हो जाता है।


    इस स्कीम के तहत एक्टिव मेंबर्स और पेंशनर्स के लिहाज से कुल देनदारी 31 मार्च 2009 तक 1.71 लाख करोड़ रुपये थी। हालांकि, उस वक्त उसके पास 1.1 लाख करोड़ रुपये की ही एसेट्स थीं। वैल्यूएशन रिपोर्ट में एक्चुअरी पी ए बालासुब्रमण्यन ने कहा है कि इसके चलते 61,608 करोड़ रुपये का डेफिसिट दिख रहा है, जो एक साल पहले 54,203 करोड़ रुपये था। इस स्कीम के घाटे पर काबू पाने के लिए एक सुझाव यह दिया गया है कि भविष्य में 9 पर्सेंट एन्युअल रिटर्न हासिल करने का इंतजाम हो और मेंबर्स के लिए कंट्रीब्यूशन रेट बढ़ाकर सैलरी का कम से कम 12.49 पर्सेंट कर दिया जाएगा। 2009-10 से 2011-12 तक के तीन वर्षों की वैल्यूएशन रिपोर्ट्स अभी पेंडिंग हैं।


    The Economic Times

    32 minutes ago

    To professionals, entrepreneurs in #AAP, why are you silent? Read this Opinion column by Saubhik Chakrabarti & tell us your viewshttp://ow.ly/sPicz

    The Economic Times

    about an hour ago

    Finance Minister Chidambaram attacks Modi from Davos; says BJP has a blood-eyed economics model http://ow.ly/sPbfb

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    India Today

    Delhi govt should have been dismissed for violating law, says Kiran Bedihttp://indiatoday.intoday.in/story/delhi-govt-should-have-been-dismissed-for-violating-law-says-kiran-bedi/1/339113.html

    Delhi govt should have been dismissed for violating law, says Kiran Bedi : Delhi, News - India Today

    indiatoday.intoday.in

    Talking to Headlines Today the former IPS officer said the Delhi government should have been dismissed for violating law rather than being appealed to for ending the dharna outside Rail Bhavan.

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    Priya Ranjan

    http://apnaskool-kanpur.blogspot.in/2014/01/blog-post.html

    Apna Skool: प्रवासी मजदूरों का बंधुआ मजदूरी से मुक्ति का आगाज

    apnaskool-kanpur.blogspot.com

    Satya Narayan

    एक ऐसे समय में जब दिल्‍ली में आयी फर्जी क्रान्ति से जनता का मोहभंग हो रहा है, आइये जानते हैं कि क्‍या होता है जब किसी समाज में असली क्रान्‍ति होती है:


    अक्टूबर क्रान्ति के कुछ ही दिनों के भीतर नवनिर्मित सोवियत सरकार ने रूस की जनता की बुनियादी माँगों को पूरा करने के मद्देनज़र कुछ अहम आज्ञप्तियाँ जारी कीं। क्रान्ति के अगले ही दिन यानी 26 अक्टूबर ( नये कैलेण्डर के अनुसार 8 नवंबर) सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस ने ऐतिहासिक महत्व की शान्ति आज्ञप्ति अंगीकार की जिसमें सोवियत सरकार ने प्रथम विश्वयुद्ध में शामिल सभी देशों और उनकी सरकारों के सामने प्रस्ताव रखा कि न्यायसंगत और जनवादी शान्ति के लिए तुरन्त वार्तायें आरम्भ की जायें। उसी दिन कांग्रेस ने भूमि आज्ञप्ति भी जारी की, जिसके अनुसार सभी जमींदारों, मठों और गिरजों की भूमि और उससे संलग्न चल व अचल सम्पत्ति को बिना मुआवजा ज़ब्त कर लिया गया। किसानों को 15 करोड़ हेक्टेयर भूमि मुफ़्त में आवंटित की। अपनी स्थापना के चौथे दिन सोवियत सरकार ने एक आज्ञप्ति जारी करके 8 घण्टे का कार्य-दिवस निर्धारित कर दिया (जिसको कुछ वर्षों बाद 7 घण्टे कर दिया गया)। इसके बाद मज़दूरों और कर्मचारियों के लिए निःशुल्क राज्य बेरोज़गारी तथा स्वास्थ्य बीमा प्रणाली भी लागू की गयी।


    राष्ट्रीयताओं के मसले पर भी सोवियत सरकार ने मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार उत्पीड़न रहित संघ बनाने की दिशा में ठोस क़दम उठाये। ज़ारशाही के दौर में समूचे रूसी साम्राज्य को राष्ट्रीयताओं का जेलखाना कहा जाता था। नये कैलेंडर के अनुसार 15 नवंबर 1917 को सोवियत सरकार ने ''रूस की जनता के अधिकारों का घोषणापत्र''प्रकाशित किया, जिसमें जातीय उत्पीड़न का अन्त, रूस की सभी जातियों की समानता, सर्वमत्ता, अलग होने के अधिकार समेत आत्मनिर्णय के अधिकार, स्थापित करने का अधिकार भी शामिल था, और सभी जातीय व धार्मिक विशेषाधिकारों व प्रतिबंधों के उन्मूलन की उद्घोषणा की गयी थी। इस घोषणापत्र पर अमल करते हुए दिसंबर 1917 में सोवियत सरकार ने फिनलैण्ड की स्वतन्त्रता को मान्यता दे दी, जो अब तक रूस का हिस्सा था। इसी तरह उक्रइना की स्वाधीनता, आर्मीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार, आदि को भी मान्यता दी गयी। इसके फलस्वरूप उक्रइनी, बेलोरूसी, एस्तोनियाई, लातवियाई, लिथुआनियाई, आज़रबैजानी, आरमीनियाई और जार्जियाई जनों ने अपने को स्वतन्त्र सोवियत गणराज्य घोषित किया जिन्हें रूसी सोवियत सरकार ने तुरन्त मान्यता प्रदान की। जनवरी, 1918 में रूसी गणराज्य ने अपने आप को संघात्मक गणराज्य घोषित कर दिया, जिसके अस्तित्व के आरम्भिक वर्षों में उसके अन्तर्गत अनेक स्वायत्त गणराज्य और प्रदेश पैदा हुए, जैसे तातार, बश्कीर, तुर्कीस्तान आदि।


    पूरा लेख यहां पढिये : http://www.mazdoorbigul.net/archives/2662

    कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (पच्चीसवीं किस्त) - मज़दूर बिगुल

    mazdoorbigul.net

    समाजवादी क्रान्ति की वजह से सोवियत संघ की महिलाओं की स्थिति में जबर्दस्त सुधार आया। सोवियत संघ उन पहले देशों में एक था जिसने महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया। सोवियत सरकार ने ऐसी नीतियाँ बनायी जिससे महिलायें अपने घर की चारदिवारी को लाँघकर सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र में बढ़चढ़ कर हिसा लेने लगीं। बड़े…

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    Economic and Political Weekly

    Temperatures are rising in Kullu in Himachal Pradesh where farmers are dependent on the rains for agriculture. This article uses meteorological data to provide evidence of gradual climate change in the region that might affect livelihoods.


    Read: http://www.epw.in/commentary/climate-change-himachal.html

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    सर्वेः दक्षिणी राज्यों में कैसी रहेगी चुनावी बयार!

    प्रकाशित Tue, जनवरी 21, 2014 पर 20:46  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

    जैसे-जैसे आम चुनाव की तारीख करीब आ रही है, राजनीतिक सरगर्मी तेज होती जा रही है। हर पार्टी वोटर को अपनी ओर खींचने के लिए तरह-तरह के हथकंड़े अपना रही है। ऐसे में लोगों को मूड क्या है, एक वोटर क्या चाहता है ये जानने के लिए लोकनीति और नेटवर्क18 ने एक देशव्यापी सर्वे किया है। आज इस सर्वे में हम बात करेंगे दक्षिण भारत के 4 राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडू, केरल और आंध्र प्रदेश की।


    पूरे देश में नरेंद्र मोदी का जादू चल रहा है, लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी है। तमाम बुरी खबरों के बावजूद कर्नाटक का वोटर कांग्रेस पार्टी से खुश है। लोकनीति आईबीएन नेशनल ट्रैकर के पोल के मुताबिक कर्नाटक में 42 फीसदी वोट के साथ कांग्रेस सबसे आगे है। वहीं बीजेपी का वोट प्रतिशत 42 फीसदी से घटकर 32 फीसदी हो सकता है। साथ ही कर्नाटक में जेडीएस का वोट शेयर 13 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी होने का अनुमान है।


    सर्वे के मुताबिक कर्नाटक में आज चुनाव हुए तो कांग्रेस को 10-18 सीटें, बीजेपी को 6-10 सीटें और जेडीएस को 4-8 सीटें मिलने के आसार हैं। दिलचस्प ये है कि कर्नाटक में प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी 28 फीसदी लोगों की पसंद हैं, जबकि 19 फीसदी लोग राहुल गांधी को पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं।


    सर्वे के तहत तमिलनाडू में एआईडीएमके गठबंधन को 15-23 सीटें मिलने के आसार हैं, जबकि डीएमके को 7-13 सीटें मिल सकती हैं। तमिलनाडू में कांग्रेस को 1-5 सीटें मिल सकती हैं और अन्य को 4-10 सीटें मिलने के आसार हैं। तमिलनाडू में बीजेपी को फायदा होने का अनुमान है। तमिलनाडू में बीजेपी का वोट शेयर 2 फीसदी से बढ़कर 16 फीसदी होने के आसार हैं।


    तमिलनाडू में एआईडीएमके का वोट शेयर 23 फीसदी से बढ़कर 27 फीसदी, जबकि डीएमके का वोट शेयर 25 फीसदी से घटकर 18 फीसदी हो सकता है। लेकिन कांग्रेस का वोट शेयर 15 फीसदी से बढ़कर 17 फीसदी हो सकता है। सर्वे में सामने आया है कि तमिलनाडू में 17 फीसदी लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनता हुआ देखना चाहते हैं। तमिलनाडू में 11 फीसदी लोग राहुल गांधी को पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं।


    वहीं केरल में कांग्रेस की गठबंधन वाली यूडीएफ को सबसे ज्यादा फायदा होने की तस्वीर सामने आ रही है। सर्वे के मुताबिक केरल में यूडीएफ का वोट शेयर 48 फीसदी से बढ़कर 50 फीसदी होने के आसार हैं, जबकि लेफ्ट पार्टियों के गठबंधन वाले एलडीएफ के वोट शेयर में 11 फीसदी की कमी संभव है। केरल में बीजेपी का वोट शेयर 6 फीसदी से बढ़कर 9 फीसदी होने का अनुमान है।


    सर्वे के मुताबिक केरल में यूडीएफ को 12-18 और एलडीएफ को 2-8 सीटें मिलने का अनुमान है। केरल में प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी 7 फीसदी लोगों की पसंद हैं, जबकि राहुल गांधी को 21 फीसदी लोग पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं।


    आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस को सबसे ज्यादा फायदा होने की तस्वीर सामने आ रही है। सर्वे के मुताबिक आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस का वोट शेयर 22 फीसदी होने के आसार हैं, जबकि कांग्रेस के वोट शेयर में 14 फीसदी की कमी संभव है। आंध्र प्रदेश में बीजेपी का वोट शेयर 4 फीसदी से बढ़कर 10 फीसदी होने का अनुमान है। आंध्र प्रदेश में टीडीपी का वोट शेयर 25 फीसदी से घटकर 21 फीसदी, जबकि टीआरएस का वोट शेयर 6 फीसदी से बढ़कर 11 फीसदी रह सकता है।


    सर्वे के मुताबिक आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस को 11-19 और कांग्रेस को 5-9 सीटें मिलने का अनुमान है। आंध्र प्रदेश में टीडीपी को 9-15 सीटें और अन्य को 0-4 सीटें मिलने के संकेत हैं। आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी 20 फीसदी लोगों की पसंद हैं, जबकि राहुल गांधी को 22 फीसदी लोग पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं। वहीं सीमांध्र में 23 फीसदी लोगों की पसंद नरेंद्र मोदी, जबकि 9 फीसदी लोगों की पसंद राहुल गांधी हैं।

    The Economic Times shared ETWealth's photo.

    5 hours ago

    As with anything related to the business, there are many caveats, but this could still end up being the next big thing in health insurance — cashless OPD.

    Insurance companies line up cashless OPD plans to make life easier

    http://ow.ly/sOWX1

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    The Economic Times

    18 hours ago

    Interesting images of AAP's dharna in Central Delhihttp://ow.ly/sNDff

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    The Economic Times

    20 hours ago

    Eight 'khaas' cartoons: Check it out & tell us which one you like best http://ow.ly/sMRLn

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    The Economic Times

    Yesterday

    It's now three years since 2011, Infosys is not the company it was and its leadership is: NRN is executive chairman, Shibulal is CEO and the COO post is vacant. Here's why Narayana Murthy should hire a foreign CEO http://ow.ly/sMwLn

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    The Economic Times

    Yesterday

    Interest rates may come down without Raghuram Rajan's helphttp://ow.ly/sMeeM

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    The Economic Times

    January 20

    BJP has made Narendra Modi bigger than party; we failed to market UPA: Digivijaya Singh. Read full interview at ET Opinion& tell us your views.

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    The Economic Times

    January 20

    Double-digit returns seen from IT stocks http://ow.ly/sKqVE | 5 tech stocks to buy http://ow.ly/sKqX5

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    The Economic Times

    January 20

    Kiran Bedi slams AAP govt, says Delhi is under 'unruly political leadership.' Do you agree/disagree? http://ow.ly/sKhHS

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    Aam Aadmi Party

    19 minutes ago

    Yogendra Yadav: What appears to be a partial success today might prove to be a turning point in the history of Delhi's governance.


    This is just the beginning of delivering what we had promised. Our words will never change.


    "We were fighting for Aam Aadmi, We are fighting for Aam Aadmi, We will fight for Aam Aadmi".


    Jai Hind.— with Sarabjot Singh Dilli and 3 others.

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    Aam Aadmi Party

    3 hours ago

    We are not afraid of any hurdles in our way. We knew that this fight against corruption would not be easy.


    Our determination is our strength.


    Jai Hind.— with Nirmal Singh and 6 others.

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    Aam Aadmi Party shared a link.

    5 hours ago

    Yesterday's protest was seeking justice for Neha too!


    TOI: "The day chief minister Arvind Kejriwal began his dharna outside Rail Bhavan, demanding that some policemen, including one dealing with an alleged dowry burning case in Sagarpur, be suspended, the victim, Neha, would have celebrated her 29th birthday. However, she was fighting for her life at Safdarjung Hospital with 45% burns.


    Within 24 hours of the CM voicing his demand, Neha's mother-in-law, Sumitra, sister-in-l...See More

    Sagarpur dowry victim gets some justice after a week - The Times of India

    timesofindia.indiatimes.com

    Within 24 hours of the CM voicing his demand, Neha's mother-in-law, Sumitra, sister-in-law Reena and brother-in-law Rajbir were arrested from their hideout in Dwarka.The father-in-law, Abhay, is already in custody.

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    Aam Aadmi Party

    18 hours ago

    सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

    मेरी कोशिश ये है के सूरत बदलनी चाहये|


    Arvind Kejriwal calls off protest after Delhi Lieutenant Governor sends errant S.H.O's on leave. First step towards police accountability to people.


    We won't stop our fight against corruption. We are here to change the system. We will deliver what we had promised.


    Jai Hind.— with Jarnail Singh Aap and 7 others.

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    Panini Anand

    कल तक वो गांधी थे. फिर मंडेला की चमड़ी को गाली दी और अराजक हो गए. कुछ को इसमें भगत सिंह नज़र आ रहे हैं. वैसे एक और दावेदार पिछले दिनों प्रशांत भूषण के चैंबर में चला गया था. अब दावा तो वो भी कर रहा है. मुझे दोनों दावों पर संदेह है. दिल्ली पुलिस सांडर्स है. बनी रहेगी. पहले भी थी. लेकिन ये गांधी उर्फ़ जेपी उर्फ़ अन्ना उर्फ़ भगत सिंह अभी आगे-आगे क्या बनते हैं, पता नहीं. इनके बनने के चक्कर में बकिया लोग (माने लेफ्ट से झटके हुए, व्यवस्था में अटके हुए, अपना थूक सटके हुए और इस मृतनगर में लटके हुए) क्या क्या बन गए हैं और बनेंगे, यह भी नज़र आने लगा है. और हम, हम देखेंगे, लाज़िम है भई.

    Like·  · Share· 21 hours ago near New Delhi·


    Dilip C Mandal

    अपनी सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखकर सोचिए कि क्या हिंसा के द्वारा आपको कभी कुछ मिला है. क्या SC-ST आरक्षण हिंसा से मिला है? क्या OBC कोटा हिंसा में हासिल हुआ था? क्या SC-ST छात्रों की फेलोशिप हिंसा, उत्पात या अराजकता से मिली है?


    सामाजिक न्याय, शिक्षा, नौकरी और विकास की आवाज बुलंद हो, इसके लिए शांतिकाल चाहिए.


    इस समय संविधान समीक्षा आयोग-2 का दिल्ली में जो आंदोलन चल रहा है, वह राम जन्मभूमि आंदोलन, 1990 के आरक्षण विरोधी आंदोलन और 2006 के OBC आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान हुए उत्पात का दोहराव है.


    सामाजिक न्याय का कोई भी आंदोलन संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से चलता है. उत्पात, अराजकता और हिंसा सामाजिक न्याय विरोधियों का रास्ता है.

    Like·  · Share· Yesterday at 4:17pm·