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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    Biggest caste survey: One in four Indians admit to practising untouchability - See more at: http://indianexpress.com/article/india/india-others/one-in-four-indians-admit-to-practising-untouchability-biggest-caste-survey/?utm_source=twitterfeed&utm_medium=linkedin+company+page#sthash.VGhjOdyX.dpuf

    Those who admit to practising untouchability belong to virtually every religious and caste group, including Muslims, Scheduled Castes and Scheduled Tribes.

    Going by respondents' admissions, untouchability is the most widespread among Brahmins, followed by OBCs. Among religious communities, it is the most widespread among Hindus, Sikhs and Jains, shows the survey, which was conducted in over 42,000 households across India by the National Council of Applied Economic Research (NCAER) and the University of Maryland, US.

    Source: The India Human Development Survey (IHDS-2)Source: The India Human Development Survey (IHDS-2)

    NCAER, established in 1956, is India's oldest and largest independent, non-profit economic policy research institute. The results are part of the India Human Development Survey (IHDS-2) — the largest pan-Indian non-government household survey — carried out in 2011-12 for economic and social variables across multiple categories. The full results of the survey will be available in 2015.

    Surveyors asked respondents, "Does anyone in your family practise untouchability?" and, in case the answer was "No", asked a second question: "Would it be okay for a Scheduled Caste person to enter your kitchen or use your utensils?"

    Across India, 27 per cent respondents agreed that they did practised untouchability in some form. The practice was most prevalent among Brahmin respondents (52 per cent). 24 per cent of non-Brahmin forward caste respondents admitted to it — lower, interestingly, than OBC respondents, 33 per cent of whom confirmed its prevalence in their homes. 15 per cent of Scheduled Caste and 22 per cent of Scheduled Tribe respondents admitted to the practice.

    Broken up by religious groups, data from the survey shows almost every third Hindu (30 per cent) admitted to the practice, followed by Sikhs (23 per cent), Muslims (18 per cent) and Christians (5 per cent).

    Jains topped the list, with 35 per cent respondents accepting that they practised untouchability. The survey has, however, warned that the result for Jains is "not conclusive" because of the small size of the sample.

    Lead researcher Dr Amit Thorat, an associate fellow at NCAER, said, "These findings indicate that conversion has not led to a change in mindsets. Caste identity is sticky baggage, difficult to dislodge in social settings." Currently, as per a government order of 1950, the SC quota in government jobs applies only to Hindu, Sikh and Buddhist Dalits, not Christian and Muslim Dalit caste groups.

    Spatially, untouchability is most widespread in the Hindi heartland, according to the survey. Madhya Pradesh is on top (53 per cent), followed by Himachal Pradesh (50 per cent), Chhattisgarh (48 per cent), Rajasthan and Bihar (47 per cent), Uttar Pradesh (43 per cent), and Uttarakhand (40 per cent).

    West Bengal appears to be the most 'progressive'— with only 1 per cent of respondents confirming they practised untouchability. Kerala comes next in the survey, with 2 per cent, followed by Maharashtra (4 per cent), the Northeast (7 per cent), and Andhra Pradesh (10 per cent).

    Survey results suggest that high incomes do not dent the practice, but education, especially among Brahmins and OBCs, makes a difference.

    - See more at: http://indianexpress.com/article/india/india-others/one-in-four-indians-admit-to-practising-untouchability-biggest-caste-survey/?utm_source=twitterfeed&utm_medium=linkedin+company+page#sthash.VGhjOdyX.dpuf

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    मेहनतकश जनता का कत्लेआम केसरिया कारपोरेट राष्ट्र के एजंडे पर सबसे टाप पर

    श्रमसुधारों को संसद की मंजूरी

    पलाश विश्वास

    विपक्ष के कड़े विरोध के बावजूद लोकसभा में शुक्रवार को श्रम विधि संशोधन विधेयक 2014 के पारित होने के साथ ही इसे संसद की मंजूरी मिल गई।अब सिर्फ राष्ट्रपति का दस्तखत नये कानून को अमल में लाने के लिए बाकी है,जो कहना न होगा , महज औपचारिकता मात्र है।


    मेहनतकश जनता का कत्लेआम केसरिया कारपोरेट राष्ट्र के एजंडे पर सबसे टाप पर,इसीलिए लोकसभा में श्रम कानूनों में सशोधन को हरी झंडी! संगठित और असंगठित मजदूरों में इन संशोधनों के बाद भारी समानता हो जायेगी,अच्छी बात यह है।आज मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स अधिनियम 1961, अंतर राज्यीय प्रवासी मजदूर (रोजगार और सेवा शर्तों का विनियमन) अधिनियम 1976, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 आदि सहित सात नए कानून बन गए।


    सरकार ने हाल ही में 'श्रमेव जयते' का नारा देकर श्रम कानूनों को सरल बनाने और इंस्पेक्टर राज को खत्म करने की बात कही थी।


    लोकसभा ने तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय द्वारा सुझाए संशोधनों को खारिज करते हुए श्रम कानून (रिटर्न प्रस्तुति तथा कुछ प्रतिष्ठानों द्वारा रजिस्टरों को बनाए रखने से छूट) संशोधन विधेयक, 2011 को मंजूर कर लिया। राज्यसभा द्वारा मंगलवार को पारित किया गया विधेयक श्रम कानूनों (रिटर्न प्रस्तुति तथा कुछ प्रतिष्ठानों द्वारा रजिस्टरों को बनाए रखने से छूट) संशोधन तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1988 में सुधार करता है।


    जाहिर है कि मालिकान जब बहीखाता रखने को मजबूर न होंगे और किसी को कोई लेखा जोखा रिकार्ड दिखाने को बाध्य नहीं किये जा सकेंगे,लेबर कमीशन और ट्रेढ यूनियन के अधिकार भी खत्म है।


    अयंकाली,नारायणराव लोखंडे और बाबासाहेब की विरासतें भी खत्म है और खत्म है शिकागो में खून से लिखी गयीं मजदूर दिवस की इबारतें।


    पूरा देश अब आईटी उद्योग है और आउटसोर्सिंग है।


    अमेरिका हो गये हैं हम।


    न काम के घंटे तयहै और न पगार तय है।भविष्य में न वेतनमान होंगे न होंगे भत्ते।न होंगे पीएफ और न ग्रेच्युटि।श्रम को भी संघ परिवार ने विनियंत्रित कर दिया जैसे कृषि को कर दिया है और कारोबार को कर रहे हैं एफडीआई और ईटेलिंग मार्फत।


    न किसान गोलबंद है,न मेहनतकश जनता।ने कारोबरी गोलबंद हैं और न कर्मचारी।


    झंडे छोड़कर सभै मिलकर इस स्थाई बंदोबस्त के खिलाफ खड़े होंगे,इसके आसार भी नहीं है।


    बिना लड़े लड़ीई की खुशफहमी में जीते हुए अपने किले हार रहे हैं हम।


    गौरतलब है कि राष्ट्रपति ने हाल ही में राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तावित तीन श्रम संबंधी केंद्रीय कानूनों में बदलाव को मंजूरी दे दी जिससे अब राज्य में संशोधित श्रम कानून लागू होंगे। हालांकि इसे लेकर छिटपुट उत्साह देखने को मिल रहा है लेकिन यह बहुत प्रसन्न होने की बात नहीं है।


    कारपोरेटखेमे की युक्ति है कि ऐसा लगता है मानो हम देश के किसी कोने में श्रम कानून में हुए मामूली से मामूली बदलाव पर भी खुशी मनाने को तैयार बैठे हैं जबकि जरूरत यह है कि इन कानूनों में देशव्यापी बदलाव हों।


    संसद में श्रम कानूनों में संसोधन इसी कारपोरेट लाबिइंग की लहलहाती फसल है जिसक जहर अब हमारी जिंदगी है।


    राजस्थान में जो बदलाव किए गए हैं उनमें सबसे अहम यह है कि अगर किसी कंपनी में 300 से कम कर्मचारी हैं तो उसे कर्मचारियों की छंटनी करने अथवा किसी उद्यम को बंद करने के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं होगी।


    पहले इसकी सीमा 100 कर्मचारियों की थी।हालांकि दिलासा यह दिलाया जा रहा है  कि अगर किसी कंपनी को यह सुविधा हासिल हो कि वह जरूरत के मुताबिक छंटनी कर सकती है तो उसके नए लोगों को भर्ती करने की संभावना भी बढ़ जाती है।ताजा नौकरियों,नियुक्तियों और भर्तियों का हाल क्या बयान करने की जरुरत है।


    हम दस साल से अल अलग सेक्टरं में जाकर कर्मचारियों का प्रोजेक्शन के साथ कारपोरेटएजंडा समझाते रहे हैं और बजट का भी विश्लेषण करते रहे हैं और हम कुछ भी नहीं कर सकें।हिंदी ,बांग्ला और अंग्रेजी में निरंतर लिखते रहे चौबीसों घंटे और हम कुछ भी कर नहीं सकें।हमारे लोगों ने हमारी चीखों को सुनने की कोशिस ही नहीं की और नतीजा कितना भयावह है,इसका अंदाजा भी उन्हें नहीं है।


    विडंबना यह है कि अस्मिताओं में खंड खंड भारतमाता के लिए आत्मरक्षा का कोी उपाय नहीं है जैसे फेसबुक पर चांदनी अपने को बेचने की पेशकश की,तो खलबली मची ङुई है और इस देश की राजनीति जो देश को ही बेच रही है,उससे हमें कोई फर्क पड़ता नहीं है।हम लोग राष्ट्रद्रोही करोड़पति अरबपति तबके के सत्ता वर्चस्व के खिलाफ खड़े होने का जोखिम उठाने के बजाये उनके फैंके टुड़े बीनने में गले हुए हैं।


    विडंबना यह है कि बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने बिना आरक्षण,बिना कोटा,बिना मंत्रियों ,सांसदों,विधायकों, पढ़े लिखे बहुजनों की बेिंतहा फौज के प्रकृति,पर्यावरण और मनुष्यता के जो अधिकार सुनिश्चित किये,उसके वारिशान हम अपनी विरासत के बारे में सिरे से अनजान है और जयभीम,जयमूलनिवासी ,नमोबुद्धाय कहकर अपने को बाबा के सबसे बड़े भक्त साबित करने में लगे हैं ।


    और हमें मालूम ही नहीं चल रहा है कि सत्तापक्ष की जनसंहारी कारपोरेट राजकाज और नीतियों की वजह से न सिर्फ कृषि जीवी जनता,पूरू कू पूरी महनताकश जमात के साथ साथ कारोबार में खपे हमारी सबबसे बड़ीआबादी का खातमा ही केशरिया कारपोरेट एजंडा है।


    बाबासाहेब ने बाहैसियत ब्रिटिश सरकार के श्रम मंत्री और बाद में संविधान रचयिता बतौर मेहनतकश जनाते के लिए जो उत्पादन प्रणाली में जाति धर्म लिंग नस्ल भाषा क्षेत्र निर्विशेष जो श्रमकानून बना दिये,एक ओबीसी समुदाय के नाता को देश की बागडोर सौंपकर संघपरिवार उसे खत्म करते हुए विदेशी पूंजी का मनुस्मृति शासन लागू कर रहा है।वैदिकी सभ्याता का पुनरूत्तान हो रहा है नवनाजी जयनी कायाकल्प के साथ,जिसमें वर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणों की भी शामत आने वाली है कारपोरेट निरंकुश आवारा पूंजी के राज के लिए,करोड़पति अरबपति के नये वर्ण श्रेष्ट वर्ण के लिए,नये भूदेवताओं के लिए।


    संघ परिवार की रमनीति के तहत अब बहुजन समाज एक दिवास्वप्न है क्योंकि बहुसंख्यओबीसी समुदाय के लोग ही संघ परिवारक के सबसे बड़े सिपाहसालार हैं केंद्र और राज्यों में और सारे क्षत्रप गरजते रहते हैं,बरसते कभी नहीं,कभी नहीं और किसी बंधुआ मजदूरसे बेहतर न उनकी हैसियत है और न औकात है।


    शिक्षा,चिक्तिसा,आजीविका,जल जंगल हवा जमीन पर्यावरण नागरिकता से लेेकर खाद्य के अधिकार असंवैधानिक तौर तरीके से कारपरेटलाबिइंग के तहत खत्म किये जा रहे हैं एक के बाद एक।दुनियाभर में तेल की कीमतें कम हो रही हैं और भारत में सत्ता वर्ग ने तेल की कीमतें बाजार के हवाले कर दी हैं।


    अब विदेशी पूंजी के हित में,विदेशी हित में निजीकरण,उदारीकरण,विनिवेश,प्रत्यक्ष निवेश,छंटनी,लाक आउट,बिक्री के थोक अवसरों के लिए तमाम श्रम कानून बदले जा रहे हैं और खबरों में कानून बदले जाने के वक्त कभी सकारात्मक पक्ष को हाईलाइट करने के अलावा उसके ब्यौरे या उसके असली एजंडे का खुलासा होता ही नहीं है।


    हमारे लोगो को मालूम ही नहीं चला कि बाबासाहेब ने भारतीय महिलाओं और मेहनतकश जनता की सुरक्षा के लिए जो शर्म कानून बनाये उसे खत्म करने के लिए देश के सभी क्षेत्रों से चुने हुए करोड़पति अरबपति जनप्रतिनिधियों ने हरी झंडी देदी है।


    मेहनकशों के जो झंडेवरदार हैं जुबानी जमाखर्च के अलावा सड़क पर उतरकर विरोध तक दर्ज कराने की औकात तक उनकी नहीं है और जो अंबेडकरी एटीएम से हैसियतों के हाथीदांत महल के वाशिंदे अस्मिता दुकानदार हैं,उन्हें तो संविधान दिवस मनाने की भी हिम्मत नहीं होती।


    बाबासाहेब ने संविधान रचा है,बार बार इस जुगाली के साथ जयभीम,नमोबुद्धायऔर जयमूलनिवासी कहने वाले तबके के लोगों को मालूम है ही नहीं कि उस संविधान को कैसे खत्म किया जा रहा है और उसी संविधान को हमारी संसद और हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों के जरिये पूना समझौते की अवैध संतानें कैसे कैसे मनुस्मृति में बदल लगी हैं।


    इसी वास्ते जनजागरण के लिए हमने देशभर में संविधान दिवस को लोकपर्व बनाने की अपील की थी।महाराष्ट्र में तो भाजपा सरकार ने ही संविधान दिवस का शासकीयआयोजन किया था,लेकिन भीमशक्ति को संविधान दिवस तक मनाने की फुरसत नहीं हुई तो बाबासाहेब की विरासत बचाने के लिए उनसे क्या अपेक्षा रखी जा सकती है।


    रंग बिरंगे झंडो में बंटे हुए हैं इस देश के लोग और एक दूसरे के खिलाफ मोर्चाबंद है इस देश केलोग।सड़क से संसद तक इसीलिए कत्लेआम के खिलाफ सन्नाटा है और मौत के सौदागरों की महफिल में तवावफ को रोल निभा रहे हैं हम लोग।


    अपनी फिजां को कयामत बना रहे हैं हमी लोग ही।


    गौर तलब है कि लोकसभा में शुक्रवार को श्रम कानून संशोधित बिल, 2011 पास कर दिया गया। यह बिल 1988 के वास्तविक श्रम कानून में कुछ बदलावों के साथ पास किया गया। नए संशोधित बिल में छोटी यूनिट्स को रिटर्न फाइल करने, रजिस्टर मेंटेन करने जैसे काम में छूट दी  गई है। साथ ही 7 नए एक्ट भी शामिल किए गए हैं।


    असली मामला इन नये सात कानूनों का है जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और निजीकरण का खुल्ला केल फर्रऊकाबादी है और जो परदे के पीछे खेला जा रहा है।


    सात नए एक्ट शामिल

    इस संशोधित कानून में सात नए एक्ट शामिल किए गए हैं। इनमें मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एक्ट-1961, पेयमेंट ऑफ बोनस एक्ट-1965,  इंटर स्टेट वर्कमेन एक्ट- 1979,  और बिल्डिंग एंड अदर्स कंस्ट्रक्शन एक्ट 1996 को शामिल किया गया है।



    यह हैं श्रम कानून में नए बदलाव

    संशोधित बिल के मुताबिक 9 से 16 यानी छोटी यूनिट्स को रिटर्न देने या रजिस्टर व्यवस्थित नहीं करना होगा। छोटी यूनिट्स की परिभाषा में भी बदलाव किया गया है। पहले लेबर लॉ के तहत छोटी यूनिट्स उन्हें माना जाता था जहां 19 लेबर्स होते थे, अब नई परिभाषा के मुताबिक 10 से 40 लेबर्स वालों को भी छोटी यूनिट के दायरे में माना जाएगा।


    असली मजा तो यह है कि देशभक्त संघ परिवार अब भी स्वदेशी का अलख जगाकर विदेशी पूंजी और एफडीआई का कारपरेट राज चला रहा है और प्रचार यह दिखाने के लिए,हिंदुत्व की पैदल फौजों को काबू में रखने के लिए कि केंद्र की मोदी सरकार आर्थिक सुधारों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐतराज को दरकिनार कर आगे बढ़ने की तैयारी में है। श्रम कानून में सुधार संबंधी बिल संसद से पास कराकर सरकार ने अपना पहला कदम बढ़ा भी दिया है।


    खल यह है मनुस्मृति कारपोरेट राजकाज और राजकरण का कि आर्थिक सुधार के लगभग 6 मुद्दों पर अपनी आपत्ति जताने के बाद संघ ने निर्णय का अधिकार सरकार के विवेक पर छोड़ दिया है। मजा यह भी कि संघ के विभिन्न संगठनों ने बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने, श्रम कानून में सुधार, रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश, जीएम फसलों के ट्रायल जैसे मुद्दों पर अपनी आपत्ति जताई थी।


    हालांकि सरकार ने आर्थिक सुधारों के मामले में तेजी से आगे बढ़ने का फैसला किया है। भाजपा के मार्गदर्शक मंडल में शामिल एक नेता का कहना है कि सरकार को जनादेश मिला है इसलिए संघ ने भी कुछ मुद्दों पर आपत्ति जताने के बाद निर्णय का हक सरकार के विवेक पर छोड़ दिया है।


    सविता बाबू को संगीत से फुरसत नहीं है और हमें हमीं से।


    गृहस्थी रामभरोसे है।


    हम लोग बाजार साथ साथ जा नहीं पाते।छुट्टी में भी कहीं निकल नहीं पाते।सामाजिक सारे संपर्क सविताबाबू के हवाले है।घर के ज्यादातर काम वही निपटाती है।


    जाहिर है कि आम बंगालियों की तरह रोज सुबह लुंगी उठाकर हम बाजार में मछलियां और सब्जियां खरीदने नहीं जाते।लेकिन इस सोदपुर में पूरे तेईस साल बीता दिये।इतना वक्त तो हमने बसंतीपुर में भी नहीं बिताया लगातार।मेरठ में जरुर छह साल रहे हैं और धनबाद में चार साल।जाहिर है कि यहां के लोगों से आत्मीय संबंध भी बन गये हैं,जिससे भारी गड़बड़ी होने वाली हैक्योंकि रिटायर करने के बाद हम यहां रह नहीं सकेंगे और सिवात को यहां से निकाल पाना लगभग नामुमकिन है।अपने गांव की माटी में मिल जाना शायद इस जनम में संभव नहीं होगा।


    सब्जी बाजार के तमाम दुकानदारों से लंबी आत्मीयता बन गयी है मौहल्ले वालों और बाजारों के छोटे दुकानदारों की तरहय़चारों तरफ बहुमंजिली इमारतों ने जनसंख्या का चरित्र बदल दिया है लेकिन अब भी घर से बाहर निकलता हूं किसी बहाने तो लोगों से बतियाते हुए वक्त कहां निकल जाता है ,होश सविता बाबू के फोन पर ही आता है।


    आज अरसे बाद सब्जी बाजार जाना हुआ।हाट फिर भी नहीं जा सकें।जहां देहात के लोग अपने खेतों की पैदावर लेकर आते हैं सीमावर्ती गांवों से।खासकर सौ सौ मील की दूरी के दूर दराज के गांवों से आनेवाली मेहनतकश महिलाओं के जीने के संघर्ष और परिवार और समाज को बचाये रखने की उनकी संवेदनाओं से भींजता रहा हूं।


    बहुतों के गांव घर बच्चों के बारे में जानता हूं जैसे मछलियां कााटने कूटने वाली महुलाएं अपनी दिहाड़ी से अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला रही हैं,उसे हर रोज सलाम करने का मन होता है।


    मैं फिर भी लिखने के लिए कहीं जा नहीं पाता।लिखकर अगर उनकी कोई मदद कर पाया तो जीवन धन्य हो जाये।


    मेरे लिखने का असली मकसद भी वही है अपनी मेहनतकश भारतमाताओंके हक हकूक के हक में खड़ा होने की कोशिश है यह,जो जबतक सांसे जारी हैं,जारी रहेगी यकीनन। लेकिन इसी वजह से मैं उन लोगों के बीच जा नहीं पाताय़जब जाता हूं तो उनके बेइंतहा प्यार में मुझे देशभर में बसंतीपुर का ही विस्तार मिलता है और इसी बसंतीपुर की जमीन में ,कीचड़में,गोबर में धंसकर मुक्तबाजारी नस्ली विध्वंसक सत्तावर्चस्व मोर्चाबंदी में हम आपके मन कीखिड़कियों और दिमाग के दरवाज्जे पर दस्तक देते रहने की बदतमीजियां करता रहता हूं।


    लोग सवाल करते हैं कि इतना क्यों लिखते हो और लिखने से क्या होता है।मेरे लिए इससे बड़ा सवाल है कि मैं लिखने के अलावा कर ही क्या सकता हूं।इसी बेहद बुरी आदत के लिए मैं अपने स्वजनों से कभी ठीकठाक मिल नहीं पाता और कोई माफीनामा इसके लिए काफी नहीं है।


    हमें इन्हीं लोगों की परवाह है।आज भी उन लोगों ने घेर लिया और सवालों से घिरे हम जवाब खोजते रहे लेकिन फिर बी यह खुलासा यकीनन नहीं कर सकें कि दरअसल माजरी क्या है।


    संकट यही है कि आम जनता के सवालों का जवाब जाहिर है कि राजनीति और स्ता से नहीं मिलने वाला है।मीडिया को उन सवालों की परवाह नहीं है वह तो रोज अपनी सुविधा और कारपोरेटदिशा निर्देशन में सवाल औरमुद्दे गढञकर असली सवालों को हाशिये पर फेंकने का ही काम करता है।

    जनता के सवालों के मुखातिब होकर उन सवालों का जवाब खोजने वाले लोगों की तलाश में भटक रहा हूं।


    बहर हाल लोकसभा ने आज श्रम कानूनों को सरल बनाने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी। इस विधेयक राज्यसभा में इस सप्ताह की शुरुआत में ही पास किया गया था, जिसमें 40 तक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों को रिटर्न दाखिल करने और दस्तावेजों का रखरखाव करने से छूट दी गई है। वर्तमान में यह सीमा 19 कर्मचारियों की है।


    तृणमूल कांग्रेस की अगुआई में आम आदमी पार्टी, माकपा जैसे विपक्षी दलों ने विधेयक का विरोध किया और इसे मजदूर विरोध बताया। तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय द्वारा  प्रस्तावित संशोधनों के खारिज होने के बाद सदन ने विधेयक को पास कर दिया।


    श्रम राज्य मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने विपक्ष की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की और कहा कि सरकार मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन ज्यादा रोजगारों के सृजन के लिए सुधारों को भी आगे बढ़ाया जाएगा।


    भारतीय जनता पार्टी के (भाजपा) के हुकुम सिंह ने कहा कि नए कानून से 'इंस्पेक्टर राजÓ को खत्म करने में मदद मिलेगी, जिसके चलते देश भर में बड़ी संख्या में छोटे स्तर की वर्कशॉप बंद हो गई हैं।


    लोकसभा में दवा, रक्षा समेत कई मुद्दे छाए रहे केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी देते हुए कहा कि वह दवाओं की कीमतों को कम करने के लिए प्रयासरत है। इसके साथ ही तमिलनाडु सरकार द्वारा मरीजों को रियायती दरों पर दवाएं उपलब्ध कराने के फार्मूले जैसे ही कोई योजना लाए जाने पर विचार कर रही है।


    1. Republican Proposal For Labor Law Reform 'A Disgrace ...

    2. www.huffingtonpost.com/2014/09/.../labor-law-reform_n_5838922.htm...

  • Republican Proposal For Labor Law Reform 'A Disgrace,' Says Labor Leader. Posted: 09/17/2014 6:28 pm EDT Updated: 09/18/2014 11:59 am EDT ...

  • Govt introduces two labour reform Bills in Lok Sabha ... - Mint

  • www.livemint.com/.../Govt-introduces-two-labour-reform-Bills-in-Lok-S...

  • Aug 7, 2014 - ... two labour reforms Bills—the Factories (Amendment) Bill 2014 and the ... The draft laws were introduced by labour minister Narendra Singh ...

  • Rajasthan Assembly passes labour law changes | Business ...

  • www.business-standard.com/.../rajasthan-assembly-passes-four-labour-re...

  • Aug 1, 2014 - Saturday, November 29, 2014 | 07:04 AM IST ... The Contract Labour Act is now sought to be applicable only to companies that employ ... public works minister, said Rajasthan would now be known as a "labour reform state".

  • RS Passes Labour Reforms Bill Amid Left Protest - The New ...

  • www.newindianexpress.com/.../2014/...Labour-Reforms-Bill.../article254...

  • 3 days ago - Last Updated: 26th November 2014 06:00 AM ... The Labour LawAmendment Bill 2011 aims to benefit establishments employing up to 40 ...

  • Budget 2014: Factories Act revamp may signal labour law ...

  • timesofindia.indiatimes.comBudget 2014

  • Jul 8, 2014 - Budget 2014: Factories Act revamp may signal labour law reforms ... NEW DELHI: Just days before the 2014-15 Union Budget, the government ...

  • Key labour reforms get Central push | The Indian Express

  • indianexpress.com/article/india/.../key-labour-reforms-get-central-push/

  • The 54 amendments cleared in the Factories Act include increasing the limit of overtime for ... Written by Surabhi | New Delhi | Posted: July 31, 2014 1:58 am.

  • Labor Law Reform | UAW

  • www.uaw.org/page/labor-law-reform

  • 2014 UAW Community Action Program (CAP) · Latest UAW political news · Right ... The National Labor Relations Act (NLRA) was enacted in 1935 to protect the right ... Choice Act, has repeatedly said he will sign a labor law reform bill when it ...

  • Abbott's Political Agenda in Industrial Relations & Labor ...

  • www.woroni.com.auAustralian Politics

  • Sep 24, 2014 - On Wednesday, the 10th of August, the ANU College of Law hosted an ... behind the Abbott Government's industrial relations and labor law reforms. ... The Fair Work Amendment Bill 2014 will change the conditions for a ...

  • PM Modi Brings Labour Reforms To Ease Doing Business In ...

  • trak.inBusiness

  • Oct 18, 2014 - In a view to make the already complicated labor laws work in harmony for a business setup, PM Modi announced some transformational labor reforms. ... From Oct 17th,2014, one labor compliance of 16 labor laws has kicked off. ... out that The Factories Act, 1948, Apprentices Act, 1961 and Labor Laws Act, ...


  • 44 श्रम कानूनों का पुनर्गठन 5 श्रम कानूनों में किया जायेगा

    • भारत सरकार श्रम कानूनों के पुनर्गठन पर विचार कर रही है तथा कुल 44 श्रम कानूनों को केवल 5 समन्वित कानूनों में समाहित करने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार सभी 44 श्रम कानूनों पर पुनर्विचार करेगी तथा केवल 5 श्रेणी में इन्हें पुनगर्ठित कर सकती है। इस प्रकार सरकार शीघ्र ही श्रम सुधारों को त्वरित स्तर पर लागू करने का प्रयास कर रही है। सरकार ने 20002 में दी गई एक श्रम सुधार रिपोर्ट पर सफाई के साथ कार्य शुरू कर दिया है। सरकार का यह प्रयास है कि सभी प्रकार के श्रम कानूनों में श्रमिक की पहचान व उसकी परिभाषा समान है। इससे श्रमिकों को किसी प्रकार के विवाद होने पर उसको हल करवाने में भी सुविधा होगी। श्रम कानूनों में सुधार को लेकर मंत्रिमंडल ने एक समूह का गठन किया है। इसकी पहली बैठक शीघ्र ही आयोजित होने की सम्भावना है।

    • दूसरे राष्ट्रीय श्रम आयोग के सुझावों के आधार पर श्रम कानून के पांच कोड पर एक प्रारूप का निर्माण किया गया है और इसकी समीक्षा अब अन्त:मंत्रिमंडलीय समूह के द्वारा किये जाने का प्रस्ताव है ओर इसके बाद इस सम्बन्ध में अन्तिम नोट तैयार किया जायेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इससे वर्तमान कानूनों में व्याप्त विसंगतियां समाप्त हो जाने की सम्भावना है क्योंकि सरकार एक समान परिभाषा तैयार कर रही है, यह प्रयास श्रमिकों के हितों को केन्द्र में रखकर ही किया जा रहा है तथा समान कोड को तैयार किये जाने के साथ 44 भिन्न-भिन्न कानूनों में व्याप्त अन्तर को समाप्त किया जा सकेगा।

    http://www.nafanuksan.com/news/44-%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%A0%E0%A4%A8-5-%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87%E0%A4%97%E0%A4%BE/44139


    श्रम सुधारों का गुजरात माडल



    गुजरात

    श्रम सुधार

    सरकार दृढ़ता से अनुभव करती है कि संकल्पना प्राप्ति के लिए विभिन्न स्तरों पर कुशल श्रमशक्ति की उपलब्धता और एक अनुकूल वैधानिक ढांचा दोनों के संदर्भ में एक प्रेरक श्रम वातावरण का होना अत्यंत आवश्यक है।

    गुजरात सरकार इस तथ्य को भी स्वीकार करती है कि नियम, विनियम और प्रक्रियाए उपयुक्त रूप से सही दिशा में प्रयास करने के लिए दिशानिर्देशों के रूप में हों और ये किसी भी रूप में औद्योगिक विकास में बाधा डालने वाले औज़ार नहीं होने चाहिए। इसलिए, विद्यमान नियमों की समीक्षा और सरलीकरण की दिशा में प्रयास किए जाएंगे। निरीक्षण प्रणाली में अधिक पारदर्शिता की दृष्टि से और उद्यमियों को व्यापार संबंधी प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाने हेतु स्व-प्रमाणन प्रणाली का समर्थन करते हुए एक साहसी कदम उठाया गया है। बेरोज़गारी के मुद्दे पर बात किए बिना श्रम सुधार प्रक्रिया अधूरी रहेगी। इसलिए सरकार निजी रोज़गार एक्सचेंज को प्रेरित करने की योजना भी बना रही है।

    नियमों और प्रक्रियाओं का सरलीकरण


    सरकार श्रम कानूनों में सुधार करने के लिए प्रतिबद्ध है। जहां तक बीआरयू अधिनियम, बीआईआर अधिनियम, बम्बई दुकानें और स्थापनाएं अधिनियम आदि जैसे राज्य श्रम कानूनों का संबंध है, परिवर्तनशील वातावरण में इन अधिनियमों के औचित्य का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा। श्रम विभाग स्वयं भी पहले ही अनेक प्रावधानों में संशोधन करने पर विचार कर रहा है।

    विकास दौरे

    श्रम विभाग पहले ही अपने नियंत्रणाधीन निरीक्षकों यथा श्रम अधिकारी, कारखाना निरीक्षक, बॉयलर निरीक्षक, रोज़गार अधिकारी, प्रशिक्षु सलाहकार आदि द्वारा किए जाने वाले सभी निरीक्षणों को तर्कसंगत बनाने का कार्य प्रारंभ कर चुका है। श्रम और रोज़गार विभाग ने अपने सकल संसाधनों के भीतर सहकार्य के मार्ग खोजने के लिए अपने नियंत्रणाधीन सभी प्रभागों की गतिविधियों पर सम्मेलनों की एक श्रृंखला भी आयोजित की है। अपने उत्तरदायित्व के दायरे में विभिन्न कानूनों के प्रवर्तन के लिए प्रत्येक प्रभाग द्वारा अलग-अलग कार्रवाई करने के बजाय, विभाग का संपूर्ण प्रतिनिधित्व करने के लिए सभी नियामक और गैर-नियामक प्रभागों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संयुक्त टीमें बनाने का निर्णय किया गया है। इन टीमों के दौरों को विकास दौरे कहा जाता है जिसमें सभी प्रभागों के अधिकारियों की एक संयुक्त टीम विभिन्न इकाइयों का दौरा करेगी। इसमें भाग लेने वाले अधिकारियों में स्थानीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के प्रधानाचार्य, रोज़गार अधिकारी, प्रशिक्षु सलाहकार, कारखाना निरीक्षक, श्रम अधिकारी और बॉयलर निरीक्षक होंगे। इससे औद्योगिक इकाइयों को इनमें से प्रत्येक से अलग-अलग निपटने में होने वाली असुविधा में कमी आएगी। पारदर्शिता के लिए, वर्ष में केवल एक बार होने वाले दौरे की योजना का निर्णय स्थानीय वाणिज्य और उद्योग चैंबर के परामर्श से श्रम आयुक्तालय और रोज़गार एवं प्रशिक्षण निदेशालय के क्षेत्रीय प्रमुखों द्वारा किया जाएगा। दौरे का उद्देश्य आक्रामक निरीक्षण नहीं है अपितु इस सूचना का आदान-प्रदान करना कि स्थानीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के पास उद्योग को प्रस्तुत करने के लिए क्या है, रोज़गार अभ्यर्थियों के उपलब्ध ऑनलाइन डाटाबेस तक नि:शुल्क पहुंच को लो‍कप्रिय बनाना, आवंटित प्रशिक्षु सीटों के उपयोग के लिए इकाइयों को प्रेरित करना, एवीटीसी और एचटीटीसी में इकाइयों के श्रमिकों को उन्नत प्रशिक्षण प्रदान करना, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के प्रशिक्षार्थियों के लिए अंत:संयंत्र प्रशिक्षण की व्यवस्था करना, श्रम कानूनों के अनुपालन संबंधी दिशानिर्देश आदि प्रदान करना है। यदि श्रम कानूनों का उल्लंघन अनजाने में हुआ है तो विभाग उनसे अनुपालन भी कराएगा, किंतु जानबूझकर उल्लंघन के मामले में कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा की जाएगी। यद्यपि औद्योगिक सुरक्षा संबंधी कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाएगा क्योंकि किन्हीं संभावित औद्योगिक दुर्घटनाओं के शमन के लिए कोई छूट नहीं दी जा सकती है। इस प्रकार श्रम और रोज़गार विभाग के अधिकारी मित्रों और पथप्रदर्शकों के रूप में इकाइयों का दौरा करेंगे।

    वार्षिक समेकित रिटर्न

    उद्योगों से बार-बार प्राप्त होने वाली शिकायतों में से एक ढेर सारे कानूनी प्रावधानों और रिटर्न भरने की अनुपालना की आवश्यकता है। श्रम विभाग ने एक वार्षिक समेकित रिटर्न भरना निर्धारित किया है। यह पिछले एक वर्ष से लागू है। सरकार निरीक्षण नीति को तर्कसंगत बनाने पर सहमत है। श्रम कानूनों के कार्यान्वयन की लागत वहन करने के लिए बहुत बड़ी इकाइयों के पास आवश्यक संसाधन हैं। इसलिए बड़ी इकाइयों का वर्ष में केवल एक बार दौरा किया जा सकता है और उनकी वार्षिक समेकित रिटर्न ही पर्याप्त होनी चाहिए। जहां तक लघु और मध्यम उद्यमों का संबंध है, भारत सरकार ने स्व-प्रमाणन की एक धारा के साथ पहले ही एक विधेयक परिचालित कर दिया है। लघु और मध्यम उद्यमों के संबंध में भी सरकार वर्ष में केवल एक बार निरीक्षण की योजना बना रही है।

    विशेष आर्थिक क्षेत्रों/औद्योगिक पार्कों में श्रम कानूनों में छूट

    गुजरात सरकार ने हाल ही में विशेष आर्थिक क्षेत्रों और औद्योगिक पार्कों की स्थापना के लिए एक अध्यादेश जारी किया है। इस अध्यादेश के प्रावधानों के अनुसार, औद्योगिक विवाद अधिनियम के अनुच्छेदों 5(क), 5(ख), 5(ग) और 5(घ) के अंतर्गत श्रम कानूनों के अनुपालन में कुछ छूट दी गई हैं। औद्योगिक इकाइयों और पार्कों जो अपने श्रमिकों के लिए आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करेंगे और इन अनुच्छेदों के अन्य प्रावधानों का ध्यान भी रखेंगे, को स्व-प्रमाणन के आधार पर श्रम विभाग की आवश्यकताओं के अनुसार रिटर्न दाखिल करने से छूट दी जाएगी।

    प्रस्तावित अन्य नवीन कदम

    सरकार कुछ नवीन कदम उठाने पर भी विचार कर रही है, जैसे:

    • प्रत्येक एस्टेट में, एक पैनल रखा जाएगा जिस पर इकाइयां श्रमिकों के लिए अपनी आवश्यकताओं को चिपका सकती हैं। बोर्ड पर अपनी आवश्यकताओं को चिपकाने की इच्छुक इकाई को बोर्ड पर अपनी उपस्थिति को अधिकतम सात दिनों की अवधि की अनुमति दी जाएगी। यह नई पहल विभिन्न किस्म के कौशलों वाले श्रमिकों के एक पूल और विशिष्ट प्रकार के कौशल वाले श्रमिकों को नियुक्त करने की इच्छुक इकाइयों को निकट लाने में सहायता करेगी।

    • रोज़गार और प्रशिक्षण निदेशालय उद्योगों से उनकी श्रमशक्ति संबंधी आवश्यकताओं की जानकारी एकत्र कर रहा है और इसे उनकी वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाता है। बेरोज़गार युवाओं द्वारा ऑनलाइन पंजीकरण की एक प्रणाली भी कार्यरत है।

    • बॉयलर की तकनीकी विशिष्टताओं पर निर्भर करते हुए, दौरों की आवृत्ति को वर्ष में एक बार से घटाकर चार वर्षों में एक बार करने के लिए बॉयलर अधिनियम में संशोधन किया जाएगा।

    • सरकार मानती है कि आउटसोर्सिंग वैश्विक व्यापार गतिविधि का एक अभिन्न अंग बन गई है। लागत प्रभावी प्रबंध को सुविधाजनक बनाने के लिए, अनुबंध अधिनियम के उदार प्रवर्तन के माध्यम से आउटसोर्सिंग पर विचार किया जाएगा।

    स्व-प्रमाणन: इंस्पेक्टर राज की समाप्ति की दिशा में एक कदम

    विभिन्न कानूनों और संवैधानिकताओं के अंतर्गत वैयक्तिक औद्योगिक इकाइयों द्वारा वांछित सभी तकनीकी मानदंडों के लिए स्व-प्रमाणन की अवधारणा को प्रारंभ किया जाएगा। कानून के विभिन्न प्रावधानों के लिए विभिन्न प्रकार के निरीक्षणों से उद्योगपतियों को बचाने के लिए, एक एकल व्यवसाय अधिनियम बनाने पर विचार किया जाएगा। इस एकल व्यवसाय अधिनियम में उद्योगों से संबंधित लगभग सभी आधारभूत कानूनों के सार को एक छत्र के अंतर्गत परिवृत करने का विचार है। इस उद्देश्य के लिए, कानून की आवश्यकतानुसार विशेष इकाइयों के निरीक्षण और आवश्यक प्रमाणपत्र जारी करने का कार्य करने हेतु संबंधित क्षेत्रों में विशेषज्ञों सहित निजी एजेंसियों के एक पूल को मान्यता प्रदान की जाएगी। यद्यपि, विभिन्न विभागों के सरकारी निरीक्षकों की एक संयुक्त टीम वर्ष में केवल एक बार ही इकाई का निरीक्षण करेगी। गड़बड़ी करने वालों के साथ-साथ झूठे प्रमाणपत्र जारी करने वाली मान्यताप्राप्त एजेंसियों को लाइसेंस निरस्त करने सहित कड़े दंड दिए जाएंगे। स्व-प्रमाणन की प्रणाली सरकार और उद्योग दोनों के लिए सुखद स्थिति होगी क्योंकि यह सरकार के लिए प्रणाली में पारदर्शिता को सुनिश्चित करेगी और उद्योग के लिए यह उपयुक्त समयांतरालों पर पेशेवर निरीक्षण संव्यवहारों का मामला होगा। इस अवधारणा को समयबद्ध रूप में कार्यान्वित करने के लिए माननीय श्रम मंत्री की अध्यक्षता में एक अंतर-विभागीय समिति गठित की जाएगी।

    उपरोक्त का संक्षिप्तिकरण करते हुए, उद्योगों का आवश्यक सुविधाएं प्रदान करने के लिए निम्नलिखित नई पहलें सरकार के विचाराधीन हैं:

    • क.नियमों और प्रक्रियाओं के सरलीकरण के लिए एकल व्यवसाय अधिनियम लाना।

    • ख. स्व-प्रमाणन की अवधारणा और मान्यताप्राप्त परामर्शदाताओं द्वारा लेखापरीक्षा सिद्धांत को प्रारंभ करना तथा जानबूझकर उल्लंघन करने वालों के लिए कड़े दंड का प्रावधान/

    • ग.सरकारी अधिकारियों द्वारा वर्ष में एक बार केवल एक समेकित दौरा जिन्हें इकाई के कार्य के पैमाने के आधार पर चिह्नित किया जाएगा।

    • http://laghu-udyog.gov.in/policies/state/gujrat/pstguj07x.htm



    जयंतीलाल भंडारी ने खूब लिखा  हैः


    बीते 17 नवम्बर को प्रकाशित बैंक ऑफ अमेरिका की रिपोर्ट के मुताबिक भारत पर विदेशी निवेशकों और विदेशी संस्थागत निवेशकों का भरोसा बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है.

    स्थिति यह है कि शेयरों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी पिछले पांच वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है. गौरतलब है कि इन दिनों प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से संबंधित कई वैश्विक अध्ययन रिपोर्टों में यह तथ्य उभरकर आ रहा है कि भारत में अब एफडीआई बढ़ेगा.


    उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ऑस्ट्रेलिया में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन तथा म्यांमार में आयोजित 12वें भारत-आसियान सम्मेलन में भारत के आर्थिक, औद्योगिक और कारोबारी माहौल में सुधार लाने के लिए उठाए गए रणनीतिक कदमों का जो प्रभावी परिदृश्य प्रस्तुत किया गया, उससे एफडीआई की नई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. ऐसा ही प्रभावी संदेश प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा के समय 'मेक इन इंडिया' के नारे के रूप में दुनिया भर में पहुंचा है. पिछले तीन महीनों में विदेश यात्राओं के दौरान मोदी ने विदेशी निवेशकों को भारत के बुनियादी ढांचा क्षेत्र में एफडीआई लाने का जो न्योता दिया है, उसके सार्थक परिणाम आने की संभावनाएं दिख रही हैं.


    वस्तुत: इस समय देश को बुनियादी ढांचा निर्माण और उच्च विकास दर प्राप्त करने के लिए विदेशी निवेश की भारी दरकार भी है. लेकिन पिछले कुछ वर्षो से विदेशी निवेशक भारत से लगातार दूरी बनाए हुए हैं. देश में एफडीआई का प्रवाह 2013-14 के दौरान 24.3 अरब डॉलर रहा है. भारत में एफडीआई कितना निराशाजनक है, इसका अनुमान इससे लगा सकते हैं कि वर्ष 2008-09 की वैश्विक मंदी के दौरान भी भारत में 40.4 अरब डॉलर का एफडीआई आया था. विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013-14 में  जहां चीन को कुल वैश्विक एफडीआई प्रवाह का करीब आठ फीसद प्राप्त हुआ है, वहीं भारत के पास इसका केवल 0.8 फीसद ही आ पाया है.

    विडंबना ही है कि विदेशी निवेश को आकर्षित करने वाले कई महत्वपूर्ण आधार भारत के पास हैं, पर यहां एफडीआई बहुत कम है. भारत के  पास विशाल शहरी और ग्रामीण बाजार, दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ मध्यवर्ग, अंग्रेजी बोलने वाली नई पीढ़ी के साथ-साथ विदेशी निवेश पर अधिक रिटर्न जैसे सकारात्मक पहलू मौजूद हैं. इतना ही नहीं, क्रयशक्ति क्षमता यानी परचेजिंग पॉवर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. भारत के पास आईटी, सॉफ्टवेयर, बीपीओ, फार्मा, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स एवं धातु क्षेत्र में दुनिया की जानी-मानी कंपनियां हैं, आर्थिक व वित्तीय क्षेत्र की शानदार संस्थाएं हैं.  



    इन अनुकूलताओं के बावजूद एफडीआई का प्रवाह न बढ़ पाने की तीन प्रमुख वजहें रही हैं. एक, भारत में प्रभावी नेतृत्व और मजबूत केंद्र सरकार का अभाव रहा है. देश का व्यावसायिक वातावरण उन विदेशी निवेशकों के लिए जटिल रहा है जो नीतिगत स्थिरता चाहते हैं.  दो, भारत में कारोबार में आसानी की कमी रही है. मसलन सरकारी नीति का स्पष्ट न होना, भूमि अधिग्रहण से संबंधित मसले, पर्यावरण मंजूरी मिलने में देरी. ईधन की आपूर्ति के लिए लिंकेज और परियोजनाओं के तीव्र क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक तंत्र की कमजोरियां. विश्व  बैंक के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट 'डूइंग बिजनेस 2015' के अनुसार कारोबार करने में आसानी के लिहाज से 189 देशों की सूची में भारत 142वें पायदान पर है. तीन, भारत की टैक्स व्यवस्था जटिल बनी हुई है. भारत दुनिया के ऊंची टैक्स दरों वाले देशों में शामिल हैं.


    लेकिन अब नई सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों और इंफ्रास्ट्रक्चर तथा अन्य क्षेत्रों में उठाए जा रहे कदम विदेशी निवेश के लिए उत्साह पैदा कर रहे हैं. भारत को बेहतर और आसान कारोबारी देश बनाने के लिए मोदी सरकार ने बीमा तथा रक्षा क्षेत्र में 49 फीसद एफडीआई की स्वीकृति दी है. रेलवे के बुनियादी ढांचे में 100 फीसद एफडीआई की स्वीकृति दी गई है. इनके अलावा सड़क, जहाजरानी, नागरिक उड्डयन समेत 10 क्षेत्रों की 20 परियोजनाओं में 100 फीसद एफडीआई की स्वीकृति दी गई है. पुराने और बेकार कानूनों को समाप्त करने के लिए सरकार आगे बढ़ी है. सरकार ने 287 ऐसे पुराने कानूनों की पहचान की है, जिन्हें संसद के शीतकालीन सत्र में रद्द कर दिया जाएगा. प्रवासी भारतीयों ने भी भारत में बड़ी मात्रा में एफडीआई के संकेत दिए हैं. इन सब कारणों से भारत में विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है.  



    देश में एफडीआई बढ़ने के इन सकारात्मक पहलुओं के अलावा एक और वैश्विक पहलू चीन के आर्थिक मॉडल में आ रहे बदलाव के कारण भी दिखाई दे रहा है. दुनिया का कारखाना कहा जाने वाला चीन अब सेवा क्षेत्र की ओर रुख करना चाहता है जहां बहुत अधिक विदेशी निवेश की आवश्यकता नहीं होती. इतना ही नहीं, चीन की आबादी बहुत तेजी से उम्रदराज हो रही है और कामकाजी युवा आबादी तेजी से कम हो रही है. ऐसे में अगले एक दशक में चीन में विदेशी पूंजी निवेश की दर में कमी आने की उम्मीद की जा रही है. इसकी बदौलत आगामी वर्षो में दुनिया भर में बहुत बड़ी मात्रा में सस्ती विदेशी पू़ंजी उपलब्ध होगी. भारत कम ब्याज दर वाले इस दौर का बड़ा लाभ ले सकता है, विशेष रूप से भारत के बुनियादी ढांचे और विनिर्माण क्षेत्र को नए वैश्विक निवेश का बड़ा लाभ मिल सकता है.


    निसंदेह विदेशी निवेशकों के कदम तेजी से भारत की ओर मोड़ने तथा देश की विभिन्न परियोजनाओं में एफडीआई की आवक को ऊंचाई देने के लिए हमें देश में आर्थिक, औद्योगिक और कारोबारी सुधारों को अमली जामा पहनाना होगा. औद्योगिक विकास और निवेश बढ़ाने के अभियान को सफल बनाने के लिए उद्योगों की अड़चनें दूर करना सबसे पहली जरूरत है. प्रधानमंत्री ने उद्योगों को इंस्पेक्टर राज से बचाने के लिए जो घोषणाएं की हैं, वे शीघ्र कार्यान्वित होनी चाहिए. वस्तुत: अब समय आ गया है कि सरकार औद्योगिक परिदृश्य सुधारे और उद्योगों में जान फूंकने के लिए नीतिगत फैसले ले.


    उदाहरण के तौर पर कोयले के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं कि क्या निर्णय होने जा रहा है? कोल इंडिया का कहना है कि वह एक भी नए ब्लॉक का काम हाथ में नहीं ले सकती क्योंकि इसके लिए उसके पास मानव संसाधन की भारी कमी है. इसी तरह गैस कीमतों का फैसला भी बार-बार टलता जा रहा है. ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय नहीं होने से बिजली से लेकर उर्वरक जैसे कई क्षेत्रों के उद्योगों का भविष्य अधर में है. जमीन अधिग्रहण और श्रम जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए सिंगल विंडो मंजूरी के साथ बेहतर अवसंरचना और आसान नियमों की जरूरत है. उद्योगों के लिए ब्याज दरों में कटौती से औद्योगिक उत्पादन सुधारने में मदद मिल सकती है.


    कारोबार और उद्योगों के चमकीले विकास का सपना साकार करने के लिए सरकार को ऐसी रणनीति पर काम करना होगा, जिसके तहत गैर जरूरी कानून शीघ्रतापूर्वक हटाए जाएं. ऐसा होने पर देश की ढांचागत परियोजनाओं के लिए एफडीआई हेतु विदेशी निवेशक आगे बढ़ेंगे और उससे रोजगार अवसर बढ़ने के साथ देश के आर्थिक विकास को गति भी मिलेगी.


    (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

    http://www.samaylive.com/editorial/294742/new-possibilities-of-fdi.html



    श्रम कल्‍याण से संबंधित कानून

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    श्रम कल्‍याण का अभिप्राय कर्मचारियों को दी जाने वाली ऐसी सभी सेवाओं, सुख साधनों और सुविधाओं से है जो उनकी कार्य परिस्थिति तथा जीवन स्‍तर में सुधार लाती हैं। श्रम कल्‍याण शब्‍द की व्‍याख्‍या देशनुदेश और समय समय पर अलग-अलग हैं और यहां तक कि एक ही देश में, इसकी मूल्‍य प्रणाली के अनुसार, सामाजिक संस्‍था, औद्योगिकीकरण की डिग्री और सामाजिक एवं आर्थिक विकास के सामान्‍य स्‍तर के अनुसार अलग-अलग है। सामान्‍यत: श्रम कल्‍याण सेवाएं दो समूहों में विभाजित हैं :-

    • प्रतिष्‍ठान के परिवेश के भीतर कल्‍याण - इसमें चिकित्‍सा सहायता, शिशु गृह, कैन्‍टीन, स्‍वच्‍छ पेय जल की आपूर्ति, चिकित्‍सा सेवाएं, वर्दी और रक्षात्‍मक परिधान, आराम करने की जगह आदि शामिल हैं। यह नियोक्‍ता की जिम्‍मेदारी है कि वह अपने कर्मचारियों को ये सुविधाएं मुहैया कराए और इन सुविधाओं की व्‍यवस्‍था करने के लिए न्‍यूनतम मानक निर्धारित करने हेतु अनेकानेक विधान अधिनियमित किए गए हैं।

    • प्रतिष्‍ठान के बाहर कल्‍याण - इसमें सामाजिक बीमा के उपाय शामिल हैं जैसे उपदान, पेंशन निधि, भविष्‍य निधि आदि; शैक्षिक सुविधाएं, आवास सुविधाएं, मनोरंजक सुविधाएं, कामगार सहकारिताएं, व्‍यावसायिक प्रशिक्षण आदि शामिल हैं।

    असंगठित क्षेत्रक में कामगारों के लिए सामाजिक सहायता के उपायों का विस्‍तार करने के‍ लिए 'श्रम कल्‍याण निधि' की अभिकल्‍पना विकसित की गई। तदनुसार आवास, चिकित्‍सा देखभाल, शैक्षिक और मनोरंजक सुविधाएं, बी‍डी उद्योग, कुछ गैर कोयला खानों में नियुक्‍त कामगारों और सिनेमा कामगारों को मुहैया कराने के लिए श्रम एवं रोजगार मंत्रालयके अधीन पांच कल्‍याण निधियां स्‍थापित की गई हैं। इन निधियों का वित्तपोषण संबंधित उपकर/निधि अधिनियमों के अधीन लगाए कर उपकर से प्राप्‍त लाभ में से किया जाता है। इस प्रकार अधिनियमित किए गए विभिन्‍न कानूनों में निम्‍नलिखित शामिल हैं :-

    उपयुक्‍त अधिनियम यह व्‍यवस्‍था करते हैं कि संबंधित कामगारों के कल्‍याण की व्‍यवस्‍था करने के लिए अनिवार्य उपायों और सुविधाओं के संबंध में किए गए व्‍यय को पूरा करने के लिए निधि का प्रयोग केन्‍द्र सरकार द्वारा किया जाए।

    श्रम कल्‍याण संगठनइन धनराशियों का प्रशासन करता है और महानिदेशक (श्रम कल्‍याण) / संयुक्‍त सचिव इनकी अध्‍यक्षता करते हैं। इनकी सहायता निदेशक स्‍तर के कल्‍याण आयुक्‍त करते हैं, जो राज्‍यों में इन धनराशियों के प्रशासन के लिए नौ क्षेत्रीय कल्‍याण आयुक्‍तोंका पर्यवेक्षण करते हैं। इन कार्यालयों के क्षेत्रीय आयुक्‍त इलाहाबाद, बैंगलोर, भीलवाड़ा, भुवनेश्‍वर, कोलकाता, हैदराबाद, जबलपुर, करमा (झारखंड) और नागपुर में स्थित हैं। ये अभ्रक, चूना पत्‍थर और डोलोमाइट, लौह अयस्‍क, मैंगनीज़ और क्रोम अयस्‍क खान तथा बीड़ी और सिनेमा उद्योगों में कार्यरत कामगारों को कल्‍याण सुविधाएं प्रदान करने के लिए उत्‍तरदायी हैं।

    मुख्‍य सलाहकार (श्रम कल्‍याण) सहायक श्रम कल्‍याण आयुक्‍तों (एएलडब्‍ल्‍यूसी) उप श्रम कल्‍याण आयुक्‍तों (डीएलडब्‍ल्‍यूसी) और श्रम कल्‍याण आयुक्‍तों (एलडब्‍ल्‍यूसी) के कार्यों का पर्यवेक्षण करता है। एएलडब्‍ल्‍यूसी और डीएलडब्‍ल्‍यूसी तैनाती रक्षा एवं अन्‍य प्रतिष्‍ठानों में की गई है जैसाकि सीपीडब्‍ल्‍यूडी, प्रतिभूति मुद्रणालयों, टकसालों, बारूद फैक्‍टरियों, दूरसंचार, फैक्‍टरियों और अस्‍पतालों आदि में, जो केन्‍द्रीय सरकार के नियंत्रणाधीन हैं। श्रम कल्‍याण आयुक्‍तों की तैनाती इन प्रतिष्‍ठानों के मुख्‍यालयों में की गई है। एक साथ मिलकर ये अधिकारी अपने संबंधित प्रतिष्‍ठानों में सदभाव पूर्ण संबंध सुनिश्चित करते हैं। वे कामगारों के कल्‍याण, उनकी शिकायतों का समाधान कल्‍याणकारी योजना के प्रशासन की भी देखरेख करते हैं और प्रबंधन को विभिन्‍न श्रम संबंधी मामलों पर सुझाव देते हैं जिसमें द्विपक्षीय समितियों का गठन शामिल है जैसे कि दुकान परिषद कार्य समितियां आदि।

    कल्‍याण निधियों की योजना नियोक्‍ता और कर्मचारी संबंध के ढांचे के बाहर है, जहां तक संसाधन सरकार द्वारा जुटाए जाते हैं जो गैर अकादमी आधार पर होते हैं और कल्‍याणकारी सेवाओं का प्रदाय बिना व्‍यष्टि कामगार के अंशदान के ही प्रभावी होता है।

    उपयुक्‍त निधियों के प्रशासन से संबंधित मामले संबधी केन्‍द्रीय सरकार को सुझाव देने के लिए त्रिपक्षीय केन्‍द्रीय सलाहकार समितियों का गठन संबंधित कल्‍याण का अध्‍यक्ष केन्‍द्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री है।

    http://business.gov.in/hindi/legal_aspects/labour_welfare.php





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    प्रेस विज्ञप्ति_29 Nov 2014_सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों के बजट में कटौती का विरोध

    प्रेस विज्ञप्ति

    सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों के बजट में कटौती का विरोध

     

    नई दिल्ली, 29 नवंबर, 2014 मौजूदा वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों के बजट आवंटन में कटौती संबंधी कई ख़बरें मीडिया में आईं है. इसका मतलब है कि 2014-15 के बजट पूर्वानुमान जो इस साल जुलाई में पेश किया गया था, उसे संशोधित करते हुए इन आवंटनों में कटौती होगी. इस मुद्दे की गंभीरता से पड़ताल करने और इस पर विस्तृत बहस कराने की जरूरत है.

    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और प्रमुख अर्थशास्त्री जयति घोष कहती हैं, "बजट में इस तरह की कटौती अमानवीय और गलत है. सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटन पहले से काफी कम है और उसमें और कमी की जा रही है. लेकिन यह किस कीमत पर हो रहा है.?" जयति घोष ने सरकार से अपील की है कि वह संसद, मीडिया और देश के आमलोगों की राय के उलट जाकर चुपके चुपके इन कटौतियों को लागू नहीं करे.

    प्रस्तावित कटौती से आने वाले संकट की ओर संकेत करती हुई पॉजिटिव वीमेन नेटवर्क की कौशल्या ने बताया कि एचआईवी संक्रमण का बजट 1785 करोड़ से घटाकर 485 करोड़ रुपये किया जा रहा है. कौशल्या के मुताबिक, "यह कटौती एचआईवी संक्रमित हजारों महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र जैसा है." कौशल्या के मुताबिक बजट आवंटन में इस कटौती से एचआईवी संक्रमित लोगों के जीवन पर असर तो पड़ेगा ही साथ में एचआईवी महामारी के तौर पर भी फैल सकता है.

    पिछले कुछ सालों के दौरान, वित्त मंत्रालय द्वारा इस बजट कटौती के पक्ष में एक तर्क ये दिया जा रहा है कि सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों के लिए दिए गए पैसे खर्च नहीं होते. यानी की राज्य सरकारों द्वारा इन कार्यक्रमों को लागू करने वाली एजेंसिया स्वीकृत आवंटन का पूरा हिस्सा इस्तेमाल नहीं कर पातीं, इसलिए साल के मध्य में संशोधित आकलन के दौरान आवंटन में कटौती की जाती है. विडंबना ये है कि ये तर्क एकदम मान्य नहीं है, क्योंकि पिछले कुछ सालों के दौरान सामाजिक क्षेत्र के आवंटन के इस्तेमाल में लगातार सुधार हुआ है.

    सेंटर फॉर बजट एंड गर्वनेंस एकाउंटिबलिटी (सीबीजीए) के सुब्रत दास कहते हैं, "समय आ गया है कि संशोधित बजट पूर्वानुमान की प्रक्रिया को संसद के अंदर किया जाना चाहिए और पब्लिक डोमेन के तहत इस पर बहस होनी चाहिए. ताकि कोई कार्यकारी प्राधिकरण संसदीय प्रक्रिया को कमतर नहीं आंक पाए." सीबीजीए के अध्ययन बताते हैं कि अगर तीन समस्याओं का हल तलाश लिया जाए तो सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों का बजट का इस्तेमाल और उसे खर्च करने की गुणवत्ता दोनों में काफी सुधार होता है. ये तीन समस्याएं हैं- योजनाओं के विकेंद्रीकरण में कमी, केंद्र की पैसे मिलने में दरी और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों की कमी के चलते अपर्याप्त संस्थागत क्षमता.

    ऐसे में जरूरत केंद्र सरकार द्वारा उन नीतिगत बदलावों की शुरुआत की है जिससे संस्थागत समस्याओं को दूर किया जा सके ना कि सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के आवंटन में कटौती करने की. जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रवीण झा ने इस मुद्दे पर कहा, "इन कटौतियों के बारे में पब्लिक डोमेन में चर्चा होनी चाहिए. ताकि हमें सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अलग अलग मंत्रालयों के मतभेदों के बारे में पता चलेगा. वित्त मंत्रालय ने इन कटौतियों को बिना किसी वजह के थोपा है क्योंकि उनका लक्ष्य राजकोषीय घाटे की दर को 4.1 फ़ीसदी पर लाना है."

    मनरेगा में तो कई राज्यों की मांग को पूरा नहीं किया जाएगा. दस राज्यों ने तो पिछले दो-तीन महीनों में केंद्र से ज्यादा संसाधनों की मांग की है. ऐसे में आवंटित राशि के कम इस्तेमाल का तर्क तो मनरेगा के मामले में सही नहीं है. राइट टु फूड कैंपेन की दीपा सिन्हा और जन आवाज के निखिल डे बजट में कटौती से होने वाले नुकसान की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं कि इससे आम गरीबों की  शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और रोजगार संबंधी मुश्किलें कई गुना बढ़ेंगी. उन्होंने कहा,लोगों के पास काम नहीं है, मनरेगा के तहत मिलने वाली मज़दूरी भी नहीं है ऐसे में 3000 करोड़ रुपये की कटौती तो मानवाधिकार के उल्लंघन का मामला है."

    ऐसे में जाहिर है कि बजच आवंटन में कटौती की सबसे अहम वजह यही है कि केंद्र वित्त मंत्रालय 2014-15 के संशोधित बजट पूर्वानुमान में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.1 फीसदी की दर तक लाना चाहता है. चूंकि जीडीपी उम्मीद के विपरीत बहुत धीमी गति से बढ़ रही है, ऐसे में बजट में अनुमानित कर राजस्व की प्राप्ति नहीं होगी. ऐसे में साफ है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय राजकोषीय घाटे को कम करने के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों के बजट में कटौती को आसान विकल्प मान रहा है. आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर रितिका खेड़ा कहती हैं, संशोधित पूर्वानुमान हमेशा गरीबों और सामाजिक क्षेत्र के हितों के खिलाफ में होते हैं. भारत का कर-जीडीपी का अनुपात बेहद कम है और इस तरह यह और भी बदतर होगा."

    बजट में प्रस्तावित कटौतियों से ये भी संकेत मिलता है कि नई सरकार बजट में अपनी प्राथमिकताओं को बदल सकती है. केंद्र सरकार पिछले कुछ महीनों में घोषित प्रमुख योजनाओं, मसलन स्मार्ट सिटी योजना, गंगा की सफ़ाई और जीर्णोद्वार योजना, स्वच्छ भारत अभियान और आधारभूत ढांचों के निर्माण के लिए बजट आवंटन की घोषणा कर सकती है. एक विकास के काम को दूसरे विकास के काम पर प्राथमिकता देकर मौजूदा वित्तीय संसाधनों में ही राशियों के वितरण के बजाए सरकार को बजट को विस्तार देने की कोशिश करनी चाहिए और यह टैक्स-जीडीपी के अनुपात को बढ़ाकर किया जा सकता है.

    सामाजिक क्षेत्र के बजट आवंटन में कटौती से देश में बड़ी संख्या में जीवन यापन कर रहे गरीब और हाशिए के लोगों का जीवन प्रभावित होगा. ऐसे में सरकार को मौजूदा वित्तीय साल में सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों के लिए बजट में कटौती नहीं करनी चाहिए और अगले वित्तीय साल के दौरान इसे बढ़ाने पर जोर देना चाहिए.

    - सुब्रत दास ( सेंटर फॉर बजट एंड सोशल एकाउंटिबलिटी), निखिल डे (जन आवाज)

    --------------------------------------

    मौजूदा समय में उन आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के बजट आवंटन में कटौती की जा रही है जिन्हें आम लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया था. पिछले दशक में कई अभियानों और आंदोलन के लंबे संघर्ष के बाद देश के सबसे कमजोर और हाशिए के लोगों को गरिमामयी ढंग से जीवनयापन के मामूली से कानूनी अधिकार मिले थे. लेकिन कारपोरेट घरानों को दी जाने वाली छूट का लालच गरीब और हाशिए के लोगों को मामूली अधिकार भी नहीं देना चाहती, इसलिए इन अधिकारों को बेजा खर्च बता इसपर हमले किए जा रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मौजूदा केंद्र सरकार ने श्रम कानून, मनरेगा, भूमि अधिग्रहण, वन अधिकारों में कटौती का प्रस्ताव लाने के बाद उस पर अमल भी शुरू कर दिया है. इतना ही नहीं वित्त मंत्रालय ने इन कार्यक्रमों का बजट आवंटन भी कम करने का प्रस्ताव किया है, जो पूरे सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए बड़ा झटका है.


    ऐसी सूरत में, देश भर में विभिन्न आंदोलन, अभियानों, नागरिक संगठनों और नागरिक समूहों से जुड़े हजारों मज़दूर, किसान, पेंशनभोगी, झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले तीन दिनों के लिए नई दिल्ली में जमा हो रहे हैं. ये लोग अपने जमीन के अधिकार, श्रम, रोजगार, वन, सूचना, खाद्य, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, पेंशन, अल्पसंख्यक और दूसरे आर्थिक सामाजिक अधिकारों की मांग करते हुए'अबकी बार, हमारा अधिकार' के नारे के साथ रैली निकालेंगे।

     

    दिनांक30 नवंबर और एक दिसंबर, 2014

    कार्यक्रमजनसभा

    अनुमानित भागीदारीदेश भर में चल रहे विभिन्न आंदोलनों के 300 प्रतिनिधि

    आयोजन स्थलआंबेडकर भवन, रानी झांसी रोड, झंडेवालन मेट्रो स्टेशन के नजदीक, नई दिल्ली

    समयसुबह 10.30 बजे से शाम 6.30 बजे तक

    प्रारूपप्रत्येक दिन तीन सत्र का आयोजन, छह थीम पर चर्चा

    1.        सामाजिक सेवा और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार सुनिश्चित करना

    2.        श्रम अधिकारों की रक्षा और उसका विस्तार

    3.        प्राकृतिक संसाधनों पर आम लोगों का अधिकार

    4.        लोकतंत्र, जबावदेही और पारदर्शिता की रक्षा

    5.        विविधता और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा, अल्पसंख्यकों के अधिकार को सुनिश्चित करना, सामाजिक न्याय और लैंगिक न्याय

    6.        विभिन्न आंदोलनों में संयोजन विकसित करना और आगे के संघर्ष पर विचार

     

    दिनांक2 दिसंबर, 2014

    कार्यक्रमरैली और सार्वजनिक बैठक

    रैली का नाराअबकी बार हमारा अधिकार

    अनुमानित भागीदारीदेश के 20 से भी ज़्यादा राज्यों के मज़दूर, किसान, पेंशनभोगी, झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले और हाशिए पर रहे 10 से 15 हज़ार लोग.

    रैली का रास्ताआंबेडकर स्टेडियम से संसद मार्गजंतर मंतर

    आयोजन स्थलआंबडेकर स्टेडियम ( दरियागंज, लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल, नई दिल्ली) वहां से संसद मार्ग और जंतर मंतर तक यात्रा, फिर दिन पर की जन बैठक


    शिड्यूल आंबेडकर स्टेडियम में सुबह 10 बजे बैठक, दोपहर से शाम 5.30 बजे तक संसद मार्गजंतर मंतर पर जन बैठक

    आमंत्रित सदस्यसभी राजनीतिक दलों के नेता

    आयोजक संस्थाएं: अखिल भारतीय रेलवे खान-पान लाइसेंस वेलफेयर एसोसिएशन, ऑल इंडिया एग्रीकल्चर लेबरर्स एसोसिएशन (एआईएएलए), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस एसोसिएशन(एडवा), ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन (एपवा), ऑल इंडिया स्टुडेंट एसोसिएशन (एआईएसए), ऑल इंडिया सेक्यूलर फॉरम, अनहद, बंधुआ मुक्ति मोर्चा, भावनगर जिला ग्राम बचाओ समिति, कैंपेन फॉर हाउसिंग एंड टेन्यूरियल राइट्स (सीएचएटीआरआई), कैंपेन फॉर सरवाइवल एंड डिग्निटी (सीएसडी), सिविक बेंगलोर, छत्तीसगढ़ किसान मज़दूर आंदोलन, कम्यूनलिज्म कॉम्बैट, एकता परिषद, ग्रीन पीस, आईसीएएन, जामिया टीचर्स सॉल्डिरिटी कैंपेन, जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए), खेत मज़दूर शभा, लोक आह्वान मंच, मोंटफोर्ट सोशल इंस्टीच्यूट (एमएसआई), नेशनल एलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स (एनएपीएम), नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्मूयन राइट्स (एनसडीएचआर), नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन (एनएफआईडब्ल्यू), न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव (एनटीयूआई), पीएडीएस, पेंशन परिषद, राष्ट्रीय मज़दूर अधिकार मोर्चा (आरएमएएम), राइट टु फूड कैंपेन (आरटीएफसी), सार्थक पहल और अन्य संस्थाएं.


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    Narmada Bachao                          Manav Bachao

    Narmada Bachao Andolan

    Join us !

    Dharna at Jantar Mantar

    December 1, 2014

    •  Against Permission to Raise Height of Sardar Sarovar Dam

    •  Permission for Resulting Massive Submergence

    •  Denial of Justice for 2.5 Lakh People

    •  Incomplete R&R in Narmada Valley

    •  No Comprehensive Review of Social, Economic and Environmental Cost Benefit of the Project

    Hundreds from Narmada Valley to converge at Jantar Mantar on December 1st at 10am and join Massive Demonstration of Movements from Across Country onDecember 2.

    Stand with us in demanding justice for farmers, workers, fisherfolks, potters of the Narmada Valley.

    See background here:

    http://www.napm-india.org/content/sardar-sarovar-dam-height-raised-violation-law-non-compliance-nwdt-award-and-sc-2000-order

    For more details contact: 9958797409, 9958660556


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    Mission privatisation relaunched as labour reforms passed in Parliament and Indian Railway is the first victim!

    Railways should be vehicle of India's growth story,Modi said,understand this.Modi favours privatization, modernization of railway stations!



    Palash Biswas


    Railways should be vehicle of India's growth story,Modi said,understand this.Modi favours privatization, modernization of railway stations!

    "I want both horizontal and vertical development in railways. Horizontal means better network and vertical means better facilities," said Modi.


    Most noteworthy,Modi also said that more money will flow into railways in the days to come as the government has wanted to privatise some railway stations in the country. "We want railways stations to be privatised. I believe railways should have even better facilities than airports as the common man travels through trains," Modi added.


    Prime Minister Narendra Modi hinted so many time that his government would welcome greater private investment in Indian Railways.The India incs and foreign capital stress that during the general election campaign, Narendra Modi had professed that Government has no business to do business. As chief executive of the new administration, Prime Minister Modi should practice that principle.


    Shafron governmet of India has decided to close down no less than seventy PSUs as it has endorsed the private party which declared these PSUs should not continue.No sell off,direct shutter down.Mission privatisation relaunced as labour reforms passed in Parliamnt and Indian Railway is the first victim already selected.


    Prime Minister Narendra Modi said at the Northeast Frontier Railway (NF Railway) Stadium in Guwahati on Saturday evening that the Indian Railways should be a vehicle of India's growth story and hoped that under the leadership of new railway minister Suresh Prabhu, the Indian Railways would make rapid progress in the days to come.


    Just read between the lines.


    Good luck to the emplyees of Indian Railway and Trade Unions active in this life line sector to be revitalised with privatisation and automation before bullet trains are introduced,that the hegemony may not afford to close down Indian Railway.It is going to close down Indian Railway.It is simply selling off Indian Railway.


    It is not that the Railway employees and trade unions are ignorant of the disastrous development but they are not capable anyway to stop the guillotine and have surrendered as two of the Railway trade unions already prayed the merciless super slaves of foreign capital that they are ready to generate fund torun Indian Railway and Railway should not be privatised.


    Just read again the reports of disinvestment council and disinvestment commissions once again which I posted several times during last ten years and quoted often.


    Most profitable PSUs have to privatised and irrespective of sector situations ,everysector bankingr, ports, aviation, insurance, mining energy, trasport, education, health, food and suppply,Post,telecom, mining, steel, coal and so on,has to bear the burns sooner or later.


    It is the turn of the Railway.Railway is subjected to privatisation since long. Railway ministers like Ram Vilas Paswan,Nitish Kumar,Mamata Banerjee and others have come a long way to privatise the premises, booking, catering,maintenance and construction in the sector.Only operation and signal  are the departments which have to be set free.


    Even Railway fares have been decontrolled on the line of Oil and sugar,deregulated as it has been in sectors like health ,education,energy and so on.


    As soon as NDA Two succeeded to pass labour reforms in the parliament it has become the killing fields all the way as labour rights being irrelevant,unwanted workers may well be shunted out to streamline Indian Railway on the privatisation bullet track.


    Mind you,Parliament on Friday set the ball rolling for labour sector reforms by passing a Bill that seeks to exempt lakhs of small establishment from furnishing returns and maintaining registers.


    The changes were in tune with the Modi government's efforts to amend the archaic labour laws to boost India's ranking in the ease of doing business index and boost the manufacturing sector to help create jobs.


    The Lok Sabha passed the Labour Laws (Exemption from Furnishing Returns and Maintaining Registers by Certain Establishments) Amendment Bill, 2011, after rejecting amendments moved by Saugata Roy of the Trinamool Congress (TMC).

    The bill was passed by the Rajya Sabha on Wednesday.


    Thus,the prime minister of India on his four day visit to Northeast declared at Guwahati that his government has decided to allow 100 percent Foreign Direct Investment in railways, to spur the process of modernisation of Indian Railways and added that the government was also considering privatisation of railway stations to promote economic activities. The Government would also set up four Universities for the Railways, and graduates from these Universities would be able to contribute to the Indian Railways, also getting employment in the process, he added.



    He, however, expressed disappointment that while the railways can be an engine of economic growth such a huge potential had not been properly recognised. Assuring that his government would expand and modernise the India railways he called for both horizontal expansion of railways – expanding the network to connect every nook and corner of the country, and vertical expansion of railways – which means capacity building, technology upgradation and better services.


    As the Hindu reports,the Prime Minister, who drove straight to the venue immediately on his arrival at Lokapriya Gopinath Bardoloi international airport, said India now needs next-gen infrastructure – consisting of both highways and i-ways (information ways). He said there should be no digital divide, and the vision of Digital India should also encompass the North-East and the people living on the hills of THE region should have equal access to information technology as those living in the national capital and other cities. Why should there not be a gas-grid, why should we not get electricity for 24 hours, the Prime Minister asked, expressing confidence that next-gen infrastructure would be the key to building a modern India.


    Mr. Modi, who arrived in Guwahati on a three-day visit to Assam, Manipur, Nagaland and Tripura, said this while addressing a public function held at the Railway Stadium, Maligaon, in which he pressed remote buttons to flag off the first passenger train from Mendipathar in Meghalaya's North Garo Hills district to Guwahati and unveil the plaque of a foundation stone for a Broad Gauge railway line from Bhairibi to Sairang in Mizoram.


    Narendra Modi and the case for Privatisation


    RAJIV MANTRI


    During the general election campaign, Narendra Modi had professed that Government has no business to do business. As chief executive of the new administration, Prime Minister Modi should practice that principle.

    India began liberalising its economy in 1991 but cartels and monopolies persist across sectors, with truly horrific consequences in some instances. Rail transportation remains a Government-owned monopoly. The sector is in the same state as telecommunications used to be before the game-changing New Telecom Policy of 1999. All administrative, commercial, operational and regulatory responsibilities are vested in the behemoth that is the Union Railways Ministry. And this has disastrous consequences for economic efficiency and consumer safety. According to official figures put out by the Railways Ministry, over 50,000 people were killed between 2009-2012 alone for trespassing and encroaching on railway tracks. This number doesn't include train accidents. It would be fair to say that lakhs of people would have died over the decades owing to the Railways Ministry's lax safety measures and out-of-date practices. We have become dinned into accepting train accidents – it doesn't even evince a public reaction anymore.

    Coal mining is in a similar mess. India is a net importer of coal even though it has the world's fifth coal reserves. There is a mafia and organised crime ecosystem that has entwined itself with coal mining. Coal India Limited, a Government-owned monopoly, is a cesspool of corruption and a company that is criminally wasteful that runs roughshod over local communities with impunity. The Wall Street Journal reported in 2010 how Bokapahari village in Jharkhand had become the "Biblical vision of hell", as coal fires raged below the ground and made it hard to walk. The villagers, who work as coal pickers, have witnessed their dwellings collapse into the ground, consumed by the fires below. It would not be surprising if this incredible reality holds true in many more villages in coal mining regions

    Banking, pensions and insurance continue to be dominated by state-owned companies. Every so often, India's public sector banks are bailed out by the Government and the bailouts are euphemistically hailed as a "recapitalisation". The pensions and insurance industry is dominated by Government-controlled behemoths. It has become an accepted norm that pension funds are vassals for the Government of India, who are forced to buy Government debt – they are restrained from investing in other financial instruments and managing their fund corpus professionally. Successive Governments have maintained this repressive system, but the UPA Government went one step ahead. It turned public financial institutions into reliable ATMs – they were regularly called upon to buy shares in other public sector units, and the Government deemed this farcical, fraudulent exercise to be 'disinvestment'.

    Before liberalisation, aviation was the sole preserve of Government airlines. In recent years, the private sector has entered civil aviation and today dominates the industry in terms of market share, with private airlines emerging as preferred operators for consumers. But white elephants like Air India persist, and have guzzled up tens of thousands of crores of rupees over the years. The sloth-like Government grandee is simply not as nimble and innovative enough as its private sector competitors. Lately, in an astonishing display of its sense of entitlement, Air India sought permission to issue tax-free bonds (even though it already has a crushing debt burden of over Rs 40,000 crore). One should also ask why the Government should give Air India such special treatment, and why private sector airlines too shouldn't be allowed to issue tax-free bonds. Direct and indirect subsidies given to the Government air carrier distort the civil aviation industry and discriminate against the private sector.

    Last year, Air India doled out 24,000 free tickets to employees and their extended families, even as it ran up a loss of almost Rs 4,000 crore – Air India's definition of 'family' includes not just an employee's children, spouse and parents, but siblings, sons-in-law and daughters-in-law too. The airline management has been allowed by the Government to carry on this grotesque and shameless wastage of public money with impunity.

    It would be unacceptable, even criminal, if any private sector firm would get away with what the Government of India has been in the railways, financial and coal mining sectors. No private sector company could possibly operate with the carte blanche from promoters that Air India is allowed at the expense of Indian taxpayers.

    Where are the legions of NGOs and activists when thousands die year after year due to negligence on part of the Railways, when Coal India's mining practices subject local communities to a "Biblical hell", when public money is frittered away by the gargantuan wastage of PSU financial institutions and rapacious organisations like Air India?

    But unions and activists can be counted upon to swing into action should the Government utter the P-word – the mere mention of privatisation raises the hackles of this extractive lobby that is able to scuttle change and reform simply by being the noisiest.

    The Prime Minister made a bold statement when he said during the general election campaign that "Government has no business to do business." The mandate he has received does provide space to follow the principle in Government. But based on his record running the Gujarat Government, the Prime Minister is reputed as one who also thinks that Government-owned companies can be "professionalised". It may have been possible to professionalise and improve the operations of certain sector-specific businesses in one State – but it is debatable whether ginormous bureaucracies and national monopolies like Coal India and Indian Railways can be professionalised.

    The challenge with privatisation is that those who gain from it are a diffuse group, while those who stand to lose are a concentrated lobby. The latter is able to derail the process because it is organised and vocal. Atal Bihari Vajpayee's Government broke with all precedent and successfully sold off Government-owned companies in sectors such as food processing, telecom and hotels. After the 2004 general election defeat, it was suggested that one of the reasons for the loss was the Government's antagonisation of powerful unions and organised lobbies that lost out due to the privatisation policy. It is also notable that when the Vajpayee Government pursued this policy, it received almost no support from the mainstream media or the intellectual establishment.

    Today, the context has changed. Were the Modi Government to privatise companies, one can say with confidence that the social media army that powered his rise will back him to the hilt, for it is to implement game-changing policies like these that Narendra Modi won people's support. In the decade since 2004, liberal economic ideas have gained wider acceptance in media and intellectual circles too — Centre-Right thinkers who shape public opinion will also support the Government's efforts. The Government has taken an excellent step by allowing 100 per cent FDI in Railways infrastructure, and predictably railway unions have launched protests — the corporatisation of Railways, on the lines of how BSNL was created by Prime Minister Atal Bihari Vajpayee, should be the next step. When Vajpayee took this step, 400,000 Department of Telecommunication employees went on a prolonged strike, but he faced up to them – this Government too should muster the courage to take on the unions instead of get bogged down by them. A clutch of special interests should not be allowed to hold the country's interest to ransom.

    By privatising wasteful public sector companies such as Air India, and breaking Government monopolies such as Indian Railways and Coal India, the Modi Government would send the strongest signal that it represents a clean break from Nehruvian policies that impoverished Indians. Time is of essence – the Prime Minister should forge ahead trusting that the people, who gave him this historic mandate, will back him up.

    http://www.niticentral.com/2014/08/26/narendra-modi-and-the-case-for-privatisation-236610.html

    Search Results

    1. Prime Minister's Council on Trade and Industry - India Image

    2. indiaimage.nic.in/pmcouncils/reports/disinvest/disinvest.html

  • Then there are departmental enterprises like railways, post offices or .... TheDisinvestment Commission examined 50 PSUs, ostensibly non-strategic and ...

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  • JESSOP & Co. Ltd. - Department of Disinvestment - Ministry ...

  • www.divest.nic.in/judgementjessop.asp

  • The Board for Industrial and Financial Reconstruction a statutory authority created ... It was submitted that JCL is a main manufacturing company of the railway ...

  • Trade unions oppose govt's move on labour, FDI ...

  • www.business-standard.com/.../trade-unions-oppose-centre-s-move-on-la...

  • Aug 9, 2014 - Trade unions oppose govt's move on labour, FDI, disinvestment ... over by G.Sanjiva Reddy, President of Indian National Trade Union Council (INTUC). ... In some railway operations and projects, FDI was allowed up to 100%.

  • Sarkaritel.com, : Ministries, Government of IndiaDisinvestment

  • www.sarkaritel.comMinistries / Departments

  • Check Railway Reservation Status · 04. Check your Passport ... Officers in the Ministry of Disinvestment ... Department of Disinvestment Commission Address ...

  • Ministry of Finance (India) - Wikipedia, the free encyclopedia

  • en.wikipedia.org/wiki/Ministry_of_Finance_(India)

  • The following cadre controlling authority of the Civil Services (including Indian ... 2.4 Department of Financial Services; 2.5 Department of Disinvestments ... is the preparation of the Union Budget annually (excluding the Railway Budget).

  • World Council of Churches Endorses Fossil Fuel Divestment

  • 350.org/press.../world-council-of-churches-endorses-fossil-fuel-divestme...

  • Jul 11, 2014 - World Council of Churches Endorses Fossil Fuel Divestment ... endorsed fossil fuel divestment this week, agreeing to phase out its own holdings and encourage its members to do the ... Convergences to train climate leaders.

  • Disinvestment in India's Public Sector

  • pib.nic.in/feature/feyr2001/fmar2001/f150320012.html

  • A Disinvestment Commission was set up in 1996 to carefully examine ... atomic energy undertakings and railway transport among strategic enterprises and treat ...

  • Master list of Central Public Sector Enterprises - bsepsu.com

  • www.bsepsu.com/list-cpse.asp

  • The most authentic & comprehensive website on Disinvestments in India�A ... 2, AIRPORTS AUTHORITY OF INDIA, HOLDING ... 49, RAIL VIKAS NIGAM LTD.

  • [PDF]Policy for India's Services Sector - Ministry of Finance

  • finmin.nic.in/.../policy%20Paper%20on%20Services%20Sector.pdf

  • by HAC Prasad - ‎2010 - ‎Cited by 7 - ‎Related articles

  • insurance. Policies for disinvestment include a listing of PSUs in services sector .... thought of which can help in modernization of railways. • Besides the .... commissionand finance charges, general insurance services including P&I insurance ...

  • PSU divestment - The Economic Times

  • economictimes.indiatimes.comTopics

  • PSU divestment Latest Breaking News, Pictures, Videos, and Special Reports from The Economic Times. ... These include the inter-state council, planning and monitoring divand Unique ... 3Indian Railways team in China for Delhi-Chenn.


  • Should you privatise Indian Railways?? | A conversation on ...

    www.ted.com/conversations/13397/should_you_privatise_indian_ra.html

    Indian railways, one of the largest employer in the globe has been under Government stake over the last 65 years... there has not been any great improvement...

    BJP not in favour of privatisation of railways: Rajnath Singh ...

    articles.economictimes.indiatimes.comCollectionsNarendra Modi

    Apr 28, 2014 - LUCKNOW: BJP president Rajnath Singh today said his party was not at all in favour of privatisation of Indian Railways, and added no such ...

    Protest meeting on Sept 19 against railways' privatization ...

    timesofindia.indiatimes.comCity

    Sep 16, 2014 - The government is planning to hand over Indian Railways to the private sector by taking recourse to FDI and PPP model, alleged divisional ...

    should Indian railways be privatised? - TooStep

    toostep.com/debate/should-indian-railways-be-privatised

    Railwaysn is most valuable asset of country.It is symbol of democracy and indianculture.It is one of the largest network in India and much more efficient and ...

    Unions trash Railways' dreams of FDI, privatization | Latest ...

    www.dnaindia.comNewsIndiaMumbai

    Aug 15, 2014 - M Raghavaiah, general secretary of the Congress-backed National Federation of Indian Railwaymen (NFIR), tore into the railway's privatization ...

    Narendra Modi flags off 1st train connecting Meghalaya ...

    www.dnaindia.comNewsIndia

    2 hours ago - Privatise the railway stations and modernise them," he said after flagging off ... Modi said the Indian Railways have the potential to become the ...

    Privatising the Railways - The New Indian Express

    www.newindianexpress.com/.../Privatising...Railways/.../article2497521.e...

    Oct 29, 2014 - It's common knowledge that the finances of Indian Railways have been severely stressed for several years. Its internal generation of revenues ...

    Should Indian Railways Be Privatised? - JStor

    www.jstor.org/stable/4402262

    by MQ Dalvi - ‎1995 - ‎Cited by 5 - ‎Related articles

    One suCh struictural refoirm suggested is the privatisation of railways. ... catse forprivatisation of railways inuist be ... organisational ills of Indian Railways.

    Should Indian Railways be Privatised? - Yahoo Answers

    https://in.answers.yahoo.com/question/index?qid...

    Jan 12, 2014 - According to my opinion public sectors should be privatized, because in private sectors there is no reservation and we cannot find that boon in private ...

    Coming, privatisation of railway passenger segment - The ...

    www.thehindu.comNewsNational

    Oct 30, 2013 - The Railways on Tuesday set the ball rolling for privatising its ... Keywords: High Speed Rail Corporation, Indian Railways, Rail Vikas Nigam ...

    1. Why India's Railways Must Be Privatized | The Broad Mind

    2. broadmind.nationalinterest.in/2011/03/25/indian-railways-privatization/

  • Mar 25, 2011 - Indian Railways, which enjoys a monopoly on railroad transportation in the world's second fastest ... PrivatisationIndia is not yet ready I think.

  • Corporatise Railways, do not privatise it, says senior IMF ...

  • www.thehindubusinessline.com/...railways...privatise.../article5960250.ec...

  • Apr 29, 2014 - I don't believe in privatising the Railways," Mohan told Business Line ... He said India already had the "ingredients" to go on this path, citing the ...

  • 1 - Indian Railways Institute of Civil Engineering

  • iricen.indianrailways.gov.in› ... › General Forum

  • Aug 26, 2012 - Railways abroad have been privatized to the extent that private players are ..... "I can assure you there is no move to privatise Indian Railways.

  • Should Indian Railways be privatised? - India Hindustan org forums

  • hindustan.org/forum/showthread.php?t=13123

  • May 26, 2011 - 2 posts - ‎1 author

  • Indian Railways (IR) is the largest employer in India providing employment to around 1.6 million people. In spite of having many firsts and ...

  • On Track: FDI in Railways - Business World

  • www.businessworld.inHomeEconomyIndia

  • Jan 9, 2014 - Indian Railways is in fact set to undergo major transformation in the next five years, from the current move of privatising a section of its ...

  • Privatization of Indian Railways - Essays - Anuragiiml

  • www.studymode.comHomeHealthHygiene

  • The aim of this study is to discuss the issues necessitating privatization of Indian railways and options available for improving efficiency without letting the ...

  • Is Indian Railways being privatised without our knowledge ...

  • www.firstpost.comIndia News

  • Mar 26, 2012 - Is the Dinesh Trivedi drama and the furore over the rail fare hike and its partial ... Is the Indian Railways, in fact, being privatised block by block?

  • Indian Railways announces privatization of new rail lines

  • railways.industry-focus.net/.../96-indian-railways-announces-privatizatio...

  • Indian Railways announces privatization of new rail lines. ... stalling of various newrailway line projects, the Indian railways has announced a new policy termed ...

  • Privatisation: Latest News on Privatisation, Read Breaking ...

  • ibnlive.in.com/newstopics/privatisation.html

  • After oppositions' protest, Ajit Singh says no intention to privatise Air India October 6, 2013 .... 'No reckless privatisation of Railways' February 9, 2007.

  • Indian Railways Privitization Plans Must Be opposed By ...

  • www.countercurrents.org/wankhede290114.htm

  • Jan 29, 2014 - It pains to hear of such news when it will affect billions who travel on theIndian Railway network each year. Not only will privatization increase ...

  • WSJIDEBATE: Should Indian Railways Be Privatized? - WSJ

    online.wsj.com/articles/SB126698836383250675

    Feb 24, 2010 - No other sector demonstrates the ingenuity and wits of the public sector as vividly as Indian Railways. Consequently, calls for privatization of ...

    Railway Minister on Privatisation | Indian Railway Employee

    indianrailwayemployee.com/d6ire/node/85

    Railway Minister Mamata Banerjee announced in the Rajya Sabha that Railways are trying to rope in private players to utilise its assets. "Railways are not being ...

    RSS affiliates oppose FDI and large scale privatisation of ...

    www.business-standard.com/.../rss-affiliates-oppose-fdi-and-large-scale-p...

    Jul 8, 2014 - RSS affiliates oppose FDI and large scale privatisation of Railways ... The move to open Indian Railways to FDI is an indirect way of privatizing ...

    Privatisation of railways: Why India should follow the ...

    www.thenewsminute.com/.../Privatisation%20of%20railways:%20Why%...

    Jul 11, 2014 - It may work for India if we decide to privatise our suburban railways and underground railway systems, because they involve a few routes.

    Blogateurs: Privatization Of Indian Railways – Is It Possible?

    blogateur.blogspot.com/2013/.../privatization-of-indian-railways-is-it.ht...

    Jan 13, 2013 - Indian Railways is the largest employer in India providing employment to around 1.6 million people. For the first time in a decade, the ...

    Modi to target record asset sales in budget - source | Reuters

    in.reuters.com/.../india-budget-modi-privatisation-psus-idINKBN0FB03B...

    Jul 6, 2014 - ... after inaugurating a train on a new stretch of railway to the town of Katra, ... The privatisation target could reach 700 billion rupees, almost equal to all ... Leading the pack is Indian Oil, which has gained 62 percent in 2014.

    PM flags-off Katra-Udhampur rail link, privatisation on cards ...

    www.oneindia.comNewsFeature

    Jul 4, 2014 - By putting Katra on the railway map of India, Modi has begun his journey to improvise the railways connectivity in the country. In his bid to make ...

    Privatisation in India - Page 163 - Google Books Result

    books.google.co.in/books?isbn=8170997771

    G. Ganesh - 2001 - ‎Government business enterprises

    Relevance During the 145 years of its existence, the Railways in India have played an important role in the economic development and social integration of the ...

    Bullet To The Trains | Lola Nayar - Outlook

    www.outlookindia.com/article/Bullet-To-The-Trains/292594

    Nov 15, 2014 - Privatisation is the pill the government has prescribed for all the ills of the Indian Railways. With a new, savvy minister in charge, the country's ...

    A budget that encourages privatisation in Railways | Popular ...

    www.popularfrontindia.org/?q=sun-07132014-1219

    Jul 13, 2014 - The Railway budget presented by the Railway Minister Sadanada Gowda has clearly stated that the Indian railways will move in the path of ...




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    अशोक सेकसरिया नहीं रहे,हमने अपना अभिभावक खोया

    पलाश विश्वास

    प्रख्यात समाजवादी चिंतक और लेखक अशोक सेकसरिया अब हमारे बीच नहीं रहे।वे अविवाहित थे।



    तीन दिन पहले अचानक घर में पैर फिसल जाने से उनकी कमर की हड्डी टूट गयी थी और रीढ़ की डिस्क भी खिसक गयी थी।उनका आपरेशन कोलकाता के एक निजी अस्पताल में परसो हुआ। वे ठीक भी  हो रहे थे कि अचानक आज देर रात हृदयाघात से उनका देहावसान हो गया।


    इसके साथ ही कोलकाता के साहित्यिक सांस्कृतिक जगत को अपूरणीय क्षति हो गयी और उनके जानने वालों के आंसू थम ही नहीं रहे हैं।


    पारिवारिक सूत्रों के अनुसार कल उनकी अंत्येष्टि होगी और इस बारे में अभी मालूम नहीं चला है।


    अशोक जी का जनसत्ता परिवार से बेहद अंतरंग संबंध थे और वे प्रभाष जोशी जी के निजी मित्र थे।स्वयं जोशी जी ने कोलकाता में जनसत्ता शुरु होने पर उनसे संपादकीय के सभी साथियों से मिलाया था।


    हमसे तब जो मुलाकात हुई तो अंतरंगता तो उतनी नहीं हुई लेकिन वे बीच बीच में फोन करते रहते थे।हालचाल जानते रहते थे और सबके साथ उनका यही बर्ताव था।


    हमारी सामाजिक सक्रियता से वे चिंतित भी रहते थे कि कहीं हमें कोई नुकसान न हो जाये।नंदीग्राम सिंगुर प्रकरण में जब हमने अनशन कर रही ममता बनर्जी का उनके अनशन मंच से समर्थन किया तो वे अरसे तक परेशान करते रहे और हमें जोखिम उठाने से मना करते रहे।


    हालांकि वे भी उस दौरान हमारे साथ जबरन भूमि अधिग्रहण का विरोध करने वाले कोलकाता के चुनिंदा लेखकों में थे।


    ऐेसे थे हमारे अशोक सेकसरिया।

    जनसत्ता में गंगा प्रसाद,कृष्णकुमार शाह,साधना शाह,अरविंद चतुर्वेद और जयनारायण के अलावा शैलेंद्र जी से उनके निजी संबंध थे।


    कोलकाता और नई दिल्ली के अलावा देशभर में हिंदी अहिंदी जगत के साहित्यकारों पत्रकारों और समाजसंस्कृतिकर्मियों  से उनके निजी ताल्लुकात थे और वे सबकी परवाह करते थे।


    वे बेहतरीन लेखक थे।इस पर बाद में हम चर्चा करेंगे।


    समझा जाता है कि अलका सरावगी के उपन्यास कलि-कथा वाया बाईपास के केंद्रीय चरित्र भी वे ही थे।


    हाल में भारतीय भाषा परिषद के अस्तित्व को लेकर भी उन्होंने लंबी लड़ीई लड़ी।



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    বিশ্ব ঐতিহ্যের সম্মান হারাবে সুন্দরবন!

    UNESCO has warned that the exceptional and globally important natural resources of the Sundarbans could be endangered.

    It is perhaps the worst time in the history of this part of the world where the culture has been all about the worship and celebration of nature.

    Palash Biswas

    Please know Sundarbans:

    Sundarbans

    From Wikipedia, the free encyclopedia


    Most disturbing news item in recent times breaks in a Bangladesh main newspaper, Prothom Alo should be quite disturbing that Sundarbans may lose world heritage status sooner or later which is the real coast guard of humanity across political borders in south asia.Specifically Kolkata survives from tsunami and cyclone just because of the lost mangrove.


    Not only Kolkata,Mumbai also lost the mangrove cover just because of the so called growth of Indian open market economy headed by some Mukesh Ambani and his infra interests.


    It is perhaps the worst time in the history of this part of the world where the culture has been all about the worship and celebration of nature.


    The glaciers are melting,water resources being killed,sea coastline is mutilated all the way from Arabian sea to bay of Bengal,deforestation is the name of urbanisation and destruction of agrarian civilization and ethnic cleansing of peasantry is all about growth story.


    No body cares for ecology or environment,nobody seems concerned to sustain the ecology and environment in defence of weather,biocycle and climate.We have to live without oxygen and water in near future as humanity should reduced to robotics.


    The great Himalayas as well as the Sundarvan has no priority in the day to day life and governance and core areas which have to be protected,are gifted to PPP foreign capital.

    Prothom Alo reports:

    UNESCO has warned that the exceptional and globally important natural resources of the Sundarbans could be endangered. UNESCO's World Heritage Centre feared that this forest was at risk due to the construction of Rampal power plant at Bagerhat, vessels navigating through the Sundarbans and industries being set up near the area.

    The United Nations Educational, Scientific and Cultural Organisation (UNESCO) has issued a letter to the government saying that that the Sundarbans would lose its world heritage status if the government failed to protect the natural resources of this forest which was akin to the lungs of Bangladesh. The Sundarbans would then be moved from the 'world heritage list' to the 'endangered world heritage list'.

    UNESCO's world heritage commission has also raised objections to using the river Pasur as a navigation route. Referring to the government's plans to dredge the river, UNESCO has said that these three activities will harm the natural resources of the Sundarbans.

    UNESCO issued a letter to the government in this regard, mentioning that that due to the Rampal power plant and the river channel being started up, more power plants and polluting industries were being planned in the area.

    UNESCO has asked for a report by 1 February, detailing the initiatives, which have been taken to protect the Sundarbans.

    Pointing out that the power plant, river channel, industries and river dredging would to the Sundarbans irreparable damage, the UN organisation called upon the government to stop these initiatives. It said that no activities should be allowed near the Sundarbans that would cause it irreparable harm.

    A letter signed by Kishore Rao, director of UNESCO's world heritage centre, was sent to the Bangladesh ambassador at UNESCO on 11 July this year. Then on 18 July the ambassador Shahidul Islam sent letters to the environment and forest ministry, the foreign ministry, the power division and the Bangladesh UNESCO commission, informing them of the matter. He called upon the environment and forest to take the main responsibility regarding possible damage to the Sundarbans.

    Minister for environment and forest Anwar Hossain Manju told Prothom Alo that he had not received any such letter. The ministry hadn't informed him anything about the matter either. However, he said, the environment and forest ministry would continue to work for the protection of the Sundarbans as it had in the past.

    The letter from UNESCO stated, according to the rules, the countries, which had world heritage sites, would have to submit reports annually to UNESCO, with an update on the conservation status of the heritage sites. Bangladesh was supposed to have submitted its report on 1 February, but failed to do so.

    On 8 September, senior assistant secretary Zillur Rahman of the power, energy and mineral resources division, sent a letter to the Bangladesh Power Development Board and the Bangladesh-India Friendship Power Company regarding the conservation of the Sundarbans. It mentioned that a report would have to be submitted to UNESCO. On 25 August, UNESCO's national commission secretary Manzur Hossain also sent a letter in this regard to the power division secretary.

    The conservation of the Sundarbans was also discussed at UNESCO's annual meeting at Doha, Qatar, in June this year. Last month UNESCO posted the minutes of that meeting on its website.

    It was stated there that the world heritage centre wanted to know the details about the coal-fired power plant being set up 10km from the Mongla port, by the side of the river Pasur.

    The UNESCO minutes stated that Rampal power plant wasn't the only major problem. The power plant would be a catalyst to even worse polluting industries cropping up near the Sundarbans.

    UNESCO has asked the government on 11 April for information about another power plant to be constructed next to the Rampal project. Bangladesh has not responded.

    Environmental expert and Emeritus professor of Brac University Ainun Nishat told Prothom Alo the Bangladesh has added the issue of protection of the environment, water bodies and biodiversity, to the constitution. The government had committed itself to the protection of all three. Therefore, for constitutional reasons, the government should place importance on UNESCO's concern.

    Pointing to UNESCO's assessment of the Rampal coal-fired power plant, the letter said that the Rampal power plant was 65km from the Sundarban world heritage site and wildlife sanctuary. The smoke and ashes that would be emitted from the power plant would seriously harm the biodiversity and natural resources of the forest. The transportation of coal would also pollute the air and water of the Sundarbans.

    The report said that the large vessels to be used to carry coal would cause erosion of the river banks. The Sundarbans was the home to the endangered Bengal Tiger and Sundarbans' river Pasur was home to the endangered dolphin and the river terrapin (batagur baska). Then there was the otter, local fish and other endangered animals. The power plant would push these animals rapidly towards extinction.

    Earlier, in September, the Ramsar authorities, the UN organisation dealing with the conservation of globally important wetlands, expressed its concern about the Sundarbans. They issued a letter to the government expressing their concern about Rampal power plant being set up next to the Sundarbans and asked the government for information in this regard.

    http://en.prothom-alo.com/bangladesh/news/56677/Sundarbans-may-lose-its-heritage-status-UNESCO



    The Sundarbans (Bengali: সুন্দরবন, Shundorbôn) is a natural region inBengal. It is the largest single block of tidal halophyticmangrove forest in the world.[2] The Sundarbans covers approximately 10,000 square kilometres (3,900 sq mi) of which 60 percent is in Bangladesh with the remainder in India.[3] The Sundarbans is a UNESCO World Heritage Site.[3]

    The Sundarbans National Park is a National Park, Tiger Reserve, and aBiosphere Reserve located in the Sundarbans delta in the Indian state ofWest Bengal. Sundarbans South, East and West are three protected forests in Bangladesh. This region is densely covered by mangroveforests, and is one of the largest reserves for the Bengal tiger.

    Contents

     [hide]

    http://en.wikipedia.org/wiki/Sundarbans

    'অসামান্য এবং বৈশ্বিকভাবে গুরুত্বপূর্ণ'সুন্দরবনের প্রাকৃতিক সম্পদ বিপন্ন হতে পারে বলে মন্তব্য করেছে ইউনেসকো। বাগেরহাটের রামপালে বিদ্যুৎকেন্দ্র নির্মাণ, সুন্দরবনের ভেতর দিয়ে নৌযান চলাচল ও বন-সংলগ্ন এলাকায় দূষণকারী শিল্পকারখানা স্থাপনের ফলে এ আশঙ্কা করছে ইউনেসকোর বিশ্ব ঐতিহ্য কেন্দ্র।জাতিসংঘের শিক্ষা, সংস্কৃতি ও বিজ্ঞানবিষয়ক সংস্থা ইউনেসকো সরকারকে চিঠি দিয়ে বলেছে, বিশ্বের সবচেয়ে বড় শ্বাসমূলীয় এই বনের প্রাকৃতিক সম্পদ রক্ষায় সরকার ব্যর্থ হলে বিশ্ব ঐতিহ্যের সম্মান হারাবে সুন্দরবন। বিশ্ব ঐতিহ্যের তালিকা থেকে সুন্দরবন নাম লেখাবে 'বিপন্ন বিশ্ব ঐতিহ্যের'তালিকায়।ইউনেসকোর বিশ্ব ঐতিহ্য কমিশন থেকে সুন্দরবনের ভেতরে পশুর নদ দিয়ে নৌপথ চালুর ব্যাপারেও আপত্তি তোলা হয়েছে।


    http://www.prothom-alo.com/bangladesh/article/384670/%E0%A6%AC%E0%A6%BF%E0%A6%B6%E0%A7%8D%E0%A6%AC-%E0%A6%90%E0%A6%A4%E0%A6%BF%E0%A6%B9%E0%A7%8D%E0%A6%AF%E0%A7%87%E0%A6%B0-%E0%A6%B8%E0%A6%AE%E0%A7%8D%E0%A6%AE%E0%A6%BE%E0%A6%A8-%E0%A6%B9%E0%A6%BE%E0%A6%B0%E0%A6%BE%E0%A6%AC%E0%A7%87-%E0%A6%B8%E0%A7%81%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%A6%E0%A6%B0%E0%A6%AC%E0%A6%A8

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    मांझी, मीडिया और बिहार की सियासत


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    विश्व हिन्दू कांग्रेस, दिल्ली

    दिल्ली में 21 से 23 नवबंर के बीच हुई विश्व हिंदू कांग्रेस में चरमपंथ, नारीवाद, भौतिकतावाद, भाषा आदि कई विषयों पर बात हुई.

    इसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को समाप्त करने और सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त निजी शिक्षण संस्थानों की भी वकालत हुई.

    पढ़ें संजीव चंदन की पूरी रिपोर्ट

    'हिंदू' शब्द के साथ साधारणतया बिंब बनते हैं नदियों के किनारे स्नान करते श्रद्धालुओं के या मंदिरों की क़तार में खड़े दर्शनार्थियों के (प्रायः गरीब और मध्यवर्गीय), जटा बढ़ाए तिलकधारी साधुओं के या संगम स्नान के लिए आक्रामक अंदाज में घाटों पर उमड़े नागा साधुओं के.

    विश्व हिन्दू कांग्रेस, दिल्ली

    ये बिम्ब बदले पिछले दिनों राजधानी के दो बड़े होटलों अशोका और सम्राट में हुए तीन दिवसीय विश्व हिंदू कांग्रेस के आयोजन में.

    सम्मेलन में शामिल थे टेक्नोक्रेट, बुद्धिजीवी और 'स्त्रीवादी' दावों से लैस महिलाएं.

    सम्मलेन के वक्ताओं के अनुसार, यह हिंदुत्व के उत्साह का वर्ष है और 1947 के बाद 2014 दूसरा महत्वपूर्ण वर्ष है.

    यह उत्साहित जमात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सैकड़ों साल बाद 'पूर्ण हिंदू राज' का सपना साकार होता देख रही है.

    'यूजीसी भी ख़त्म हो'

    मोहन भागवत, अशोक सिंघल

    हिंदुत्व का यह चेहरा वेदों में संपूर्ण आधुनिक ज्ञान–विज्ञान की मौजूदगी के प्रति आश्वस्त है. विमान से सर्जरी तक में निपुण अपने हिंदू पूर्वजों की विरासत से खुद को संपन्न मानते हुए व्यावहारिक भी है.

    यह हिंदुत्व नए मुहावरों और शब्दावली के साथ हिंदू कॉर्पोरेट हित के प्रति सचेत है. इसीलिए 'शिक्षण सत्र'के वक्ता 'राइट टू टीच'के नारे के साथ सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त निजी शिक्षण संस्थानों की वकालत करते दिखे.

    एआईसीटीई (ऑल इंडिया टेक्निकल एजुकेशन) और यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) को अप्रासंगिक बताते हुए इन्हें ख़त्म करने की पुरज़ोर मांग उठा रहा है. इसके लिए वे प्रधानमंत्री की 'विज़डम'के प्रति आश्वस्त भी हैं क्योंकि उनके अनुसार 'योजना आयोग को समाप्त कर'प्रधानमंत्री ने इसकी पहल कर दी है.

    ख़तरे

    निर्मला सीतारमण, किरण बेदी

    फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन कहते हैं, "पाठ्यपुस्तकों में बदलाव के अलावा शिक्षा में ढांचागत बदलाव का यह हिंदू दबाव साफ़ संकेत देता है कि शिक्षा गुरुकुलों आचार्यों की इच्छा के अनुरूप तय हो– वे ही तय करेंगे कि किसे और कैसी शिक्षा दी जानी है. मनुकाल की वापसी का डर है."

    हिंदुत्व के रणनीतिकार वाकिफ़ हैं कि महज़ उत्साह से लोगों को 'हिंदुत्व के दिग्विजय अभियान'में शामिल नहीं किया जा सकता.

    इसीलिए हिंदू कांग्रेस जहां नई शासन व्यवस्था के प्रति आश्वस्त दिखी, वहीं डर का वातावरण भी दिखा. वक्ताओं के अनुसार आस्था में 'आत्मतुष्ट हिंदुओं'पर 'धर्मांतरण का ख़तरा'है.

    वक्ताओं ने 20वीं सदी को सबसे ख़तरनाक सदी बताया जिसमें उनके अनुसार मुसलमानों और ईसाइयों की आबादी 10 प्रतिशत बढ़ गई है. अलग–अलग सत्रों में कई ख़तरों की भयावह तस्वीरें पेश की गईं, जैसे लव जिहाद, मुस्लिम चरमपंथ, मार्क्सवाद, मैकालेवाद और मिशनरियों से ख़तरा.

    किरण बेदी, विश्व हिन्दू कांग्रेस, दिल्ली

    प्रमोद रंजन कहते हैं, "यह हिंदू उत्साह भारत की बहुलतावादी संस्कृति के ख़िलाफ़ माहौल बना रहा है. इसके प्रति सचेत होने का समय आ गया है."

    महिला सत्र में 'लव जिहाद'एक बड़ा मुद्दा था. वक्ताओं ने हिंदू महिलाओं की कोख पर ख़तरे की तस्वीरें पेश की. वक्ताओं ने ऐसी हिंदू लड़कियों के उदाहरण रखे जो इसकी शिकार हुईं.

    सत्र में महिलाओं की मुख्य चिंता भी हिंदुत्व के प्रति ख़तरा ही थी, न कि उनके अपने अधिकार.

    'सिंहासन' दिल्ली

    विश्व हिन्दू कांग्रेस, दिल्ली

    सम्मलेन का मुख्यभाव था कि दिल्ली की गद्दी पर सैकड़ों साल बाद एक हिंदू नेतृत्व बैठा है. कई लोगों का मानना था कि पहली बार हिंदुओं और संघ को आगे बढ़कर सक्रियता दिखाने का मौक़ा मिला है, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में यह छूट नहीं थी.

    शायद इसीलिए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इसे शिक्षा, मीडिया और नेतृत्व को हिंदुत्व के विचारों से संपन्न बनाने के अवसर के रूप में देखा, तो विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव प्रवीण तोगड़िया ने इसे 'सुरक्षित, समृद्ध और संयुक्त हिन्दू समाज'के लिए अनुकूल अवसर माना.

    प्रवीण तोगड़िया, विश्व हिन्दू कांग्रेस, दिल्लीविश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया विश्व हिन्दू कांग्रेस, दिल्ली में बोलते हुए.

    हिंदू विश्व कांग्रेस में शामिल होने वालों में वर्द्धा हिंदी विश्वविद्यालय के चांसलर प्रोफ़ेसर कपिल कपूर, सीबीएसई के चेयरमैन विनीत जोशी, जेएनयू के प्रोफ़ेसर रजनीश मिश्रा और सीएसआईआर की वैज्ञानिक अलकनंदा सिंह के अलावा कई प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों के लोग लोगों के नाम थे.

    इसके अलावा वक्ताओं में देश की पहली महिला आईपीएस अफ़सर रहीं किरण बेदी भी थीं.

    पहली विश्व हिंदू कांग्रेस बुद्धिजीवियों के लिए 'त्रिदिवसीय वैदिक यज्ञ शिविर'सा था, जहां हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के प्रवक्ताओं ने ज़्यादातर अंग्रेजी में अपनी बात रखी, यानी 'मैकाले'की भाषा में, जिसके ख़िलाफ़ वहां पर्चे बंट रहे थे और जिसे पांच 'मयासुरों' में शुमार किया गया था. चार अन्य मयासुर हैं - मार्क्सवाद, मिशनरी, भौतिकतावाद और मुस्लिम चरमपंथ.

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    From: Hastakshep समाचार पोर्टल<news.hastakshep@gmail.com>
    Date: 2014-11-30 0:30 GMT+05:30
    Subject: (हस्तक्षेप.कॉम) Mission privatisation re-launched as labour reforms passed in Parliament and Indian Railway is the first victim!
    To: hastakshep@googlegroups.com


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    Muslims are not terrorists! Islam does not support terrorism!

    Silverlining not to be missed as Muslim humanscape in Bengal stands rock solid and pledges to defend secular secular democratic India resisting the onslaught of Hindutva against Bengal and overwhelming Hindu Nation across the borders.

    Palash Biswas


    Silverlining not to be missed as Muslim humanscape in Bengal stands rock solid and pledges to defend secular secular democratic India resisting the onslaught of Hindutva against Bengal and overwhelming Hindu Nation across the borders.


    Islam does not support terrorism and Muslim youth should choose the 'correct path' to help the country progress, Jamiat Ulama-E-Hind Secretary General M A Madani said on Saturday.


    "We Muslims are not terrorists but its those who refer to us so... Islam does not support terrorism... I would like to tell the youngsters that you are our backbone, our future.


    "You should choose the right path... Good education will help us do it. Good health would help you to think better and thus help the country to flourish," he told a public meeting in Kolkata.



    Not only biometric digital nation,it is going to be a smart police state apart from being a military state all the way as in Guwahati, Advocating the concept of 'SMART' policing, Prime Minister Narendra Modi on Sunday said a country which has an efficient intelligence network does not need any arms and ammunition to run the government.Mind you,India remains the best ally of United States Of America under strategic atomic alliance with zionist Israel.


    The national media is focusing on Kolkata today as under judicial intervention as well proactive judicial supervision Sangh Pariwar launched an ultimate aggression to capture Bengal as it seems it has failed to capture Kashmir and it intends to grab Tamilnadu, Punjab and the North East.Incidentally,the Prime minister is holding a public rally in Guwahati also as his righthand man,Amit Sah is addressing Bengal from Kolkata.A day after the Calcutta High Court gave conditional permission to Bharatiya Janata Party (BJP) chief Amit Shah to hold a rally in Kolkata on Sunday, the city's municipal corporation on Saturday finally granted the leader a go ahead for his venture.


    But kolkata has a silverling also and we should not miss it as day before the so much so hyped BJP rally in the heart of Kolkata, more than Two lac Muslims pledged to sustain the secular and democratic India.The Ambedkarites as well as the Left and all whoever is concerned for Indian democratic republic should weigh this emerging equation in resistance of the economic ethnic cleansing,racial apartheid and environmental disaster against omnipotent, omnipresent US interest and the foreign capital all on name of war against terror.


    Traffic in the eastern metropolis virtually came to a standstill Saturday as lakhs of supporters of the West Bengal unit of Jamiat Ulema-e-Hind held a massive rally protesting the branding of madrassas as "breeding ground of terrorist activities" following the Oct 2 Burdwan blast.


    Indian Express reports:A public meeting called by the Jamiat Ulema-e-Hind (JUH) to protest "the campaign against madrasas" saw the protesters clashing with police and damaging several vehicles and one of the oldest clubs in central Kolkata after a rumour spread about a youth from the minority community allegedly suffering grievous injuries in an accident during the rally. The clash left 11 police personnel, including two assistant commissioners, injured even as the traffic management collapsed resulting in bottlenecks at several locations causing inconvenience to the commuters. - See more at:

    http://indianexpress.com/article/india/india-others/juh-rally-protesting-campaign-against-madrasas-targets-police/#sthash.xx5mv9x4.dpuf



    Truckloads of associates of the Jamiat Ulema-e-Hind converged at the Shahid Minar grounds in the central part of the city to raise their voices against the linking of terrorist activities with madrassas.


    Arterial stretches connecting the north and southern parts of Kolkata to the central hub were clogged with vehicles as the rallyists marched towards the Minar from key locations in the city like Howrah, Sealdah and Park Circus railway stations.


    According to the organisation's Bengal unit president Siddiqullah Chowdhury, the allegations were creating a divide between Hindus and Muslims.


    "Madrassas are not centres for promoting terrorist activities. It is an insult to us... the anti-Islamic comments that are circulating, blaming Muslims for terrorist activities in the state," he said.


    The accidental bomb explosion in a house in Khagragarh in Burdwan district left two suspected Jamaat-ul-Mujahideen Bangladesh (JMB) militants dead and another injured and broke the lead on the most sensational jihadi terrorist conspiracy in the state in recent times.


    The incident brought the madrasas under scanner with the National Investigation Agency, that is probing the blasts, claiming that the accused and other recruits were trained at madrassas in Simulia and Lalgola in Burdwan and Murshidabad districts, respectively.


    "There are terrorist forces which are trying to put a blot on our image and force us to go the wrong path," said the organisation's general secretary Mahmood Madani.


    "After several hurdles and obstacles by the state government,i will address a public rally in Kolkata today.The permission given by the High court is the victory of masses," Shah posted in a Facebook post.

    Shah, who is addressing  the rally, arrived in Kolkata on Sunday morning.

    The address comes after the city's municipal corporation on Saturday finally granted the leader a go ahead for his venture.

    "The Kolkata Municipal Corporation (KMC) has granted permission to BJP President Amit Shah's rally tomorrow," Mayor in-council Debasish Kumar told media on Saturday.

    In fact, the fire brigade in Kolkata had also given its nod to the party.

    While the NOCs from both the bodies were received later in the day, the party began its preparations for the rally in front of the famous Victoria House at the heart of the city from Saturday morning.

    State party spokesman Ritesh Tiwari was quoted by media as hailing the move a "moral victory" of BJP, which has accused the ruling Trinamool Congress (TMC) of trying to create hurdles in order to stall the rally.

    The Calcutta High Court on Friday allowed the BJP chief to hold rally outside the Victoria House, a popular venue for political meetings in Kolkata on Sunday.

    The High Court however asked the BJP to "comply with statutes" of the city's civic body and fire brigade and appointed two special officers to assist the party.

    The Calcutta High court had also directed the BJP to have technical experts to carry out the compliance order of the special officers.

    The court had relaxed the municipal norm of leaving 20 feet open space in front of the stage on grounds of reasonable logistics.

    The move comes after Trinamool Congress-run KMC and Fire Services on Thursday refused to grant permission to BJP president Amit Shah's rally.

    Meanwhile on Saturday, clashes erupted between BJP and TMC party workers in the Parui area of Birbhum.


    Indian Express reports:Alleging that the Burdwan blast incident was being used by certain circles with vested interests to malign the entire madrasa system and those associated with it, speakers under the banner of the state unit of Jamiat Ulema-e-Hind organised a rally in Burdwan on Monday to condemn the attack on madrasas as breeding ground for terror activities.


    Claiming that such attacks on madrasas will not help the community, Siddiqullah Chowdhury, general secretary of the state committee of the Jamiat Ulema-e-Hind said no madrasa in West Bengal should be closed down either on account of panic or as an administrative measure. Urging all madrasas to resume normal classes and teachings, Chowdhury said any attack on madrasas will have serious repercussions.


    "Some bearded criminals are involved in the Burdwan bomb blast. But this incident of criminals should not be used to malign an entire madrasa system,"

    Chowdhury said, while demanding exemplary punishment for the culprits. He added that people linked to madrasas should take a vow that no untoward incident be allowed to be perpetrated in these.


    Chowdhury said that the previous government under Buddhadeb Bhattacharjee fell soon after he described illegal madrasas as cradle of terrorist activities that spewed anti-national elements, adding that the present Mamata Banerjee-led  government will also have to face the same fate if it does not restrain the police excesses. "You do not need to take shelter behind a madrasa to indulge in a subversive activity. One can do it from any platform," he said.


    The Muslim leader said if one goes by the BJP's analysis of five to seven per cent of Muslims in madrasas to be involved in "jihadi activity" in West Bengal, this would imply that no less than 15 lakh Muslims have a "jihadi" background. "These are dangerous utterances," Siddiquallah warned, adding that these could alienate the entire community.


    Earlier, Rafiqul, a spokesperson of the All India United Democratic Front, said it was pointless to malign the entire madrasa system. "The land of Bengal is the land of democracy and communal harmony. It should not be vitiated by narrow political gains," he said.

    Maulana Imtiaz, a Burdwan-based leader of the Jamiat Ulema-e-Hind said a madrasa is no place for violence. "It preaches peace and amity. Muslims are as much patriotic and nationalist as any other citizen in the country," Imtiaz said.


    Asim Chatterjee, a former Naxalite, who joined the rally said Muslims should not think they are alone and assured them that thousands of Hindus will stand to support them if any attack was launched on their community.

    - See more at: http://indianexpress.com/article/cities/kolkata/dont-malign-all-madrasas/#sthash.Fc528TnN.dpuf



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    अब नहीं तो कभी नहीं,बंगाल को केसरिया बनाने के लिए निर्णायक शाही हमला

    भरोसा धार्मिक ध्रूवीकरण, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि पंजाब ,तमिलनाडु और पूर्वोत्तर में फैसला होने से पहले बंगाल संघ परिवार के लिए वाटरलू न हो जाये।

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    बागी बंगाल को कब्जाने के लिए भाजपा ने आज की कोलकाता रैली को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था।मां माटी मानुष की सरकार के सत्ता में आने के बाद मध्य कोलकाता में सत्ता पक्ष के अलावा किसी को किसी कार्यक्रम की इजाजत नहीं है।भाजपा को भी इजाजत नहीं मिली थी जो उसने हाईकोर्ट के हस्तक्षेप में,हाईकोर्ट की देकरेख के तहत हासिल कर लिया और इससे बंगालभर में ममता बनर्जी की आत्मघाती जिद की वजह से हौसला बुलंद हो गया है जिसकी झलकियां आज की रैली में दिखी।



    ममता बनर्जी की शारदा घोटाले में मंत्रियों ,सांसदों,विधायकों समेत तमाम दागी नेताओं को बचाने की कवायदसे वे और उनके परिजन कठघरे में खड़े हैं।हालांकि पिछले चुनावों में शारदा घोटाले का कोई असर नहीं हुआ है लेकिन अब की दफा एकमात्र शारदा मुद्दे को लेकर संघ परिवार धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण के तहत बंगाल जीत लेने की तैयारी में है।लोकसभा चुनाव के बाद से अपनी लगातार जीत से उत्साहित बीजेपी अब पश्चिम बंगाल में सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस से भिड़ने को तैयार है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कोलकाता में रैली के माध्यम से 2016 के विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया। शाह ने कहा कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के विकास में रोड़े अटका रही हैं।


    शारदा मामले में दोषियो को सजा दिलाने के बदले केंद्र के खिलाफ अचानक बागी तेवर अपनाकर दीदी ने दिल्ली और कोलकाता में भाजपा विरोधी धर्मनिरपेक्ष तेवर जो अपना लिया है,उससे उनकी साख तेजी से गिरती जा रही है।दागी नेताओं के बचाव में भाजपी रैली से पहले पदयात्रा में खुद शामिल होकर दीदी ने बुध्धिजीवियों के जुलूस के नाम पर सीरियल कन्याओं का मजमा खड़ा कर दिया,जिससे उनकी हालत हास्यास्पद हो गयी है जबकि रोजगार सृजन और बंद कल काऱकाने खोलने की दिशा में वे अभी कोई पहल कर नहीं सकी।विकास परियोजनाओं का शिलान्यास तो थोक भाव से हो रहा है लेकिन पीपीपी माडल के भरोसे घोषित इन योजनाओं के लिए दीदी की नंदीग्राम सिंगुर पृष्ठभूमि आड़े आ रही है।


    मसलन अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर जमकर हमला बोला।


    अमित शाह ने कहा कि वह वह पश्चिम बंगाल से 'भ्रष्ट' तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए कोलकाता आए हैं। अमित शाह ने शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर ममता पर आरोप लगाया कि वह घोटाले के आरोपियों को बचा रही हैं।


    शाह ने कहा, मैं ममता बनर्जी को चुनौती देता हूं कि वह यह कहें कि जिन लोगों को शारदा चिटफंड घोटाले में गिरफ्तार किया गया है, वे दोषी नहीं हैं। बीजेपी अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि शारदा चिटफंड घोटाले के पैसे का इस्तेमाल बर्धमान विस्फोट में किया गया।

    अमित शाह ने कहा कि एनआईए को बर्धमान विस्फोट मामले की सही से जांच करने की इजाजत नहीं मिल रही है, क्योंकि इसमें तृणमूल कांग्रेस के नेता 'शामिल' हैं। अमित शाह ने कहा, मैं ममता दी से अपील करना चाहता हूं कि वह अपनी वोट बैंक की राजनीति करती रहें, लेकिन देश की सुरक्षा की कीमत पर बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देना बंद करें।



    वाम दलो में भगदड़ के चलते और नेतृत्व में परिवर्तन न करने की जिद की वजह से बंगाल में उनकी उपस्थिति मीडिया और जनता दोनों की तरफ से सिरे से नजरअंदाज है।लेकिन अब भी बंगाल में वाम राजनीति की जड़ें पूरी तरह उखड़ी नहीं है,इसे भूलते हुए बंगाल के केसरिया हो जाने के ख्याली पकाव पकाने में अमित शाह को कोई रोकने टोकने वाला नही है।


    यूपी और बिहार में लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद उपचुनावों में जो संघ परिवार को मुह की खानी पड़ी,उससे छोटे राज्यों की सत्ता में काबिज होने की वजह से संघ परिवार भले गौर नहीं करें लेकिन कश्मीर गाटी में धार्मिक ध्रूवीकरण से उनको कितना नुकसान हुआ है,यह चुनाव नतीजे बतायेंगे।


    बंगाल में अब भी तीस फीसद वोटर मुसलमान है।उनमें से हर किसी को विदेशी घुसपैठिया भी साबित नहीं किया जा सता और न बंगाली हिंदू शरणार्थी सारे के सारे बाग्लादेशी हैं और ये सारे लोग वोट डालने वाले हैं।बंगाल के अनेक जिलों में,खासकर विधानसभाा क्षेत्रों में मुस्लिम वोट निर्णायक हैं।


    इसी के मद्देनजर भाजपी रैली से पहले वर्धमान और कोलकाता में हुई जमायते हिद की रैलियों में उमड़ी लाखों की भीड़ ने जो खुल्ला ऐलान किया है कि इस देश के मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं और न इस्लाम में आतंकवाद की कोई जगह है,इस पर गौर करने की जरुरत है।


    बंगाल के मुसलामानों ने शपथ ली है कि वे भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र को बनाये रखने में हरसंभव कोशिस करेंगे और भारत को हिंदू राष्ट्र बने की इजाजत नहीं देंगे,इस पर भी गौर करने की जरुरत है।


    कहीं ऐसा न हो कि पंजाब ,तमिलनाडु और पूर्वोत्तर में फैसला होने से पहले बंगाल संघ परिवार के लिए वाटरलू न हो जाये।


    संघ पिरवर को इसका अंदेशा नहीं है ,ऐसा भी नहीं है ।गौरतलब है  कि शाह ने कहा कि अगर राज्य में बीजेपी को बहुमत मिलता है तो 5 साल में पश्चिम बंगाल को विकसित राज्य बना देंगे। लेकिन भाषण के दौरान नमाज शुरू होने पर अमित शाह ने कुछ देर के लिए अपना भाषण रोक दिया था।ऐसा सोची समझी रणनीति के तहत इक्के दुक्के मुसलमानों के केसरिया होते जाने की उम्मीद में किया गया है,जाहिर है।लेकिन कश्मीरी पंडितों के बरोसे जैसे कश्मीर में फिजां बदलने वाली नहीं है वैसे ही केसरिया हो जा रहे मुसलमानों और हर दल के नाराज लोगों को भाजपा में शामिल करके भाजपा 2016 में बंगाल पर कब्जा कर लेगी,यह दिवास्वप्न के अलावा कुछ भी नहीं है।


    उसके बाद उन्होंने दोबारा भाषण शुरू किया और ममता को जमकर कोसा। शाह ने ममता पर चिटफंड में पकड़े गए अपने टीएमसी सांसद का बचाव करने का आरोप लगाया। शाह ने कहा कि आखिर ममता चिटफंट के दोषियों को क्यों बचा रही हैं। दीदी इस मामले में चुप क्यों हैं।



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    ---------- Forwarded message ----------
    From: Hastakshep समाचार पोर्टल<news.hastakshep@gmail.com>
    Date: 2014-11-30 23:52 GMT+05:30
    Subject: (हस्तक्षेप.कॉम) क्या वे मूर्ख हैं जो मोदी जी को ही अर्जुन समझ बैठे हैं ?
    To: hastakshep@googlegroups.com


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    • आधी दुनिया की हुंकार

      Posted:Sat, 29 Nov 2014 15:31:28 +0000
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    Dec 01 2014 : The Times of India (Ahmedabad)
    Tripura's Marxist CM invites Modi to address his cabinet
    Agartala:
    
    
    PM Accepts, Will Speak On Good Governance
    PM Narendra Modi's vision of a Swachh Bharat appears to have conquered the Tripura government's imagination even before he steps foot on Monday in the last citadel of the Left. Accepting chief minister Ma nik Sarkar's invitation, Mo di is expected to address the state cabinet on his theme of good governance.The meeting is going to be the first of its kind. In the backdrop of intense political partisanship in Centre-State relationships, it is being seen as a harbinger of a new trend. Ever since becoming Prime Minister, Modi has made it clear that there was no place for politics when it came to working with the states for development.
    Modi is coming here to switch on the second unit of the 726 mw power plant constructed by ONGC-Tripura Power Company Ltd at Palatana, some 70 km from the state capital. Sources in the know said the PM is expected to meet members of Sarkar's cabinet after the inaugural function.
    The invitation from Sarkar, who leads the sole surviving Marxist regime in the country, also stands out since the chief minister had earlier this month wrote to the PM expressing apprehension that changes in the structure of the rural employment scheme -MGNREGA -would reduce the money allotted for his state.
    Sarkar, who has been chief minister since 1998 and is serving his fourth term, had maintained that the proposed changes would make "the people from rural areas, particularly of Scheduled Tribes, Scheduled Castes and minority community losers". PM Narendra Modi on Sunday said the Union government was taking steps to check illegal migrants from Bangladesh by enforcing the land swapping deal for a lasting solution.
    The PM also stressed on making a "smart" police force, which lays store by preventing crimes through more evolved intelligence gathering and network.
    Speaking on infiltration, Modi said, "I will make such arrangements, after which all roads will be closed for Bangladeshis coming and destroying Assam every day .Believe in my word that land swapping deal will be done for a permanent solution to this problem of Assam," Modi told a mammoth gathering of party workers. Once the deal is ratified in Parliament, infiltration from Bangladesh will stop for good, Modi said.
    "I understand the sentiments of the people associated with the deal. I won't allow any forces to harm Assam's and India's interests. The deal will help ensure Assam's security ," Modi told a packed stadium of over 35,000 people.
    The pact also seeks to exchange enclaves on both sides to facilitate the demarcation of a proper boundary between India and Bangladesh.
    The department related parliamentary standing committee on external affairs, led by Shashi Tharoor, is likely to place its report on the Constitution (119th Amendment) Bill in Parliament on December 1, which seeks to redraw India's boundary with Bangladesh through a land-swap in four states: Assam, Tripura, Meghalaya and Bengal.
    The deal, signed by previous PM Manmohan Singh in Dhaka in 2011, had triggered a political war with BJP opposing it charging that the state's people weren't consulted.
    The PM, presenting his concept of `SMART police', told the annual conference of DGPs and IGPs here, "When I talk about `SMART' concept, I mean police need to be `strict and sensitive' at the same time, `modern and mobile', `alert and accountable', `reliable and responsive', and `techno-savvy and trained'. I am putting this concept for you to discuss."
    `Ensure swachh venue after rally'
    PM Modi asked BJP workers to ensure that the Indira Gandhi Athletic Stadium in Sarusajai, where he spoke at a rally on Sunday, was cleaned up after the meet. "Cleaning the stadium is our responsibility," Modi said, saying the spirit of Swachh Bharat should be demonstrated by BJP workers in every sphere.








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    Dec 01 2014 : The Times of India (Ahmedabad)
    Saradha scam money funded Burdwan blast, says Amit Shah
    Kolkata:
    TNN
    
    
    BJP president Amit Shah tore into the role of the Trinamool Congress government in the Saradha chit fund scam here on Sunday and said the ill-gotten money was used to fund bomb-making in Burdwan.Addressing a large rally at the landmark Victoria House in face of objections from the West Bengal government, Shah said, "TMC MPs protested against black money in Parliament. I want to ask Didi whether the Saradha chit fund money is black or white?" Attacking the state government, he told the crowds, "You'll be surprised to know that when investigations began into the Saradha chit fund scam, it was found the scam money was used in Burdwan blast."
    Alleging that chief minister Mamata Banerjee tried to stall the National Investigation Agency probe into the Burdwan blast for political gains, Shah said she is protecting those involved in "subversive activities" and dared her to declare that her MPs, arrested by the CBI for their involvement in the Saradha scam, are innocent.
    "Mamata Didi, aap Bangal per raaj karna chahti hain Bangladeshi ghuspaithiyo ke bal par. Ye to ulti buddhi ka parichay hay (Mamata Didi, you wish to rule Bengal with votes from illegal migrants from Bangladesh. This is not an example of a sane mind)," Shah thundered. Considering the political developments in Kolkata over the last few weeks, sparks were expected to fly when Shah took centre-stage, but few would've imagined it would be such blistering offensive against Mamata.
    Shah's jibed and poked on the Saradha issue and attacked Mamata for her alleged affinity towards those who illegally cross over from Bangladesh into India. "Ulti ginti shuru ho gayi hay (the countdown has started). Paying little heed to national security, Mamata is protecting those responsible for the Khagragarh blasts," he said.
    "She is accusing the CBI of hounding her party leaders. It's for the court to decide whether or not those arrested are guilty .I challenge her to make a public statement saying those arrested are innocent. Why can't she say who purchased her painting?
    Why was Justice Shyamal Sen commission wound up?" Shah, considered the brains behind BJP's majority in the Lok Sabha elections, made it clear that Bengal was his party's top priority . The BJP , he said, will go the whole hog to try and clinch the 2016 assembly polls in the state. For this, the elections to the Kolkata Municipal Corporation and other civic bodies in 2015 are crucial. In return for votes, Shah promised to take Bengal to No. 1 position in the country ­ the same level as Gujarat and Maharashtra.
    Strong minority presence at rally
    From a four-minute pause at 3.20pm halfway through his speech to allow azaan, to handing over Rs 50,000 in cheques to four Muslim families who had died in political clashes, BJP chief Amit Shah on Sunday stepped beyond mere words to woo an electorate that is increasingly flocking to his party in south Bengal, particularly Birbhum. Significantly, a considerable portion of the huge turnout in the heart of central Kolkata comprised members of the minority community.



    
    


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