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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    महिषासुर को लेकर इतना हंगामा,राम को खलनायक बनाकर मेघनाथ काव्य रचनेवाले महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त को हम क्यों याद करेंगे?

    पलाश विश्वास

    Meghnad Badh Kabya | Naye Natua | Goutam Halder | মেঘনাদবধ কাব্য | Trailer

    https://www.youtube.com/watch?v=PwBWXwJgUns

    बांग्ला रंगमच में विश्वविख्यात रंगकर्मी गौतम हाल्दार ने मेघनाथ वध का का आधुलिकतम पाठ मंचस्थ किया है।

    Meghnad Badh - Some Portion : Debamitra Sengupta

    https://www.youtube.com/watch?v=SDIJnutmLUA

    Michael Madhusudan Dutt's House at Jessore

    https://www.youtube.com/watch?v=IUJlVyJ4nT8

    Meghnad Badh | Mythological Bengali Film

    https://www.youtube.com/watch?v=LK1XIDVyPu0

    मेघनाथ वध काव्य पर बनी इस बांग्ला फिल्म तेलुगु फिल्म का भाषांतर है और इस फिल्म में रावण की भूमिका एनटी रामाराव ने निभाई है।


    माइकल मधुसूदन दत्त

    माइकल मधुसूदन दत्त

    पूरा नाम

    माइकल मधुसूदन दत्त

    जन्म

    25 जनवरी, 1824

    जन्म भूमि

    जैसोर, भारत (अब बांग्लादेशमें)

    मृत्यु

    29 जून, 1873

    मृत्यु स्थान

    कलकत्ता

    अभिभावक

    राजनारायण दत्त, जाह्नवी देवी

    कर्म भूमि

    भारत

    मुख्य रचनाएँ

    'शर्मिष्ठा', 'पद्मावती', 'कृष्ण कुमारी', 'तिलोत्तमा', 'मेघनाद वध', 'व्रजांगना', 'वीरांगना' आदि।

    भाषा

    हिन्दी, बंगला, अंग्रेज़ी

    प्रसिद्धि

    कवि, साहित्यकार, नाटककार

    नागरिकता

    भारतीय

    अन्य जानकारी

    माइकल मधुसूदन दत्त ने मद्रासमें कुछ पत्रों के सम्पादकीय विभागों में काम किया था। इनकी पहली कविता अंग्रेज़ी भाषा में 1849 ई. प्रकाशित हुई।

    इन्हें भी देखें

    कवि सूची, साहित्यकार सूची



    भारतभर के आदिवासी अपने को असुर मानते हैं और भारतभर में हिंदू अपनी आस्था और उपासना को महिषासुर वध से जोड़ते हैं जो पूर्वी भारत में अखंड दुर्गोत्सव है और मिथकीय इस दुर्गा को आदिवासी अपने राजा की हत्यारी मानते हैं।इस विवाद से परे असुर भारतीय संविधान के मुताबिक अनुसूचित जनजातियों में शामिल हैं।असुर वध अगर हारा सांस्कृतिक उत्सव है तो असुरों को अपने पूर्वज महिषासुर को याद करने का लोकतांत्रिक अधिकार होना चाहिए।धर्मसत्ता में निष्णात राजसत्ता ने मनुस्मृति के पक्ष में जेएनयू को खत्म करने के मुहिम में संसद से सड़क तक जो दुर्गा स्तुति की और जैसे महिषासुर महोत्सव का विरोध किया,उस सिलसिले में कल रांची में छह असुरों के वध के साथ झारखंड में हिंदुओं की नवरात्री शुरु हो गयी तो बंगाल में उत्र 24 परगना में बारासात के पास बीड़ा में पुलिस ने महिषासुर महोत्सव को रोक दिया।पूरे बंगाल में महिषासुर महोत्सव जारी है और उसे सिरे से रोक देने की कोशिशें तेज हो रही हैंषपुरुलिया में मुख्य समारोह का आयोजन भी बाधित है।

    तो समझ लीजिये कि हम माइकेल मधूसूदन दत्त को क्यों याद नहीं करते।

    महिसासुर को लेकर इतना हंगामा,राम को खलनायक बनाकर मेघनाथ काव्य रचनेवाले महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त को हम क्यों याद करेंगे?

    माइकेल मधुसूदन दत्त ने इस देश में पहली बार मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मिथक तोड़कर रावण के पक्ष में मेघनाथ काव्य लिखकर साहित्य और समाज में नवजागरण दौर में खलबली मचा दी,लेकिन नवजागरण के संदर्भ में उनकी कोई चर्चा नहीं होती।बंगाल में उन्हें शरत चंद्र और ऋत्विक घटक की तरह दारुकुट्टा और आराजक आवारा के रुप में जाना जाता है और हाल में भारत के लड़ाकू टेनिस स्टार लिएंडर पेस के पुरखे के बतौर पेस की उपलब्धियों के सिलसिले में उनकी चर्चा होती है।बाकी दोस यह भी नहीं जानता।

    भारत में छंद और व्याकरण तोड़कर देशज संस्कृति के समन्वय और दैवी,राजकीय पात्रों के बजाय राधा कृष्ण को आम मनुष्य के प्रेम में निष्णात करने वाले जयदेव के गीत गोविंदम् से संस्कृत काव्यधारा का अंत हो गया,लेकिन निराला से पहले तक हिंदी में वहीं छंदबद्ध काव्यधारा का सिलसिला बीसवीं सदी में आजाद भारत में भी खूब चला हालांकि बंगाल में रवींद्र नाथ के काव्यसंसार में बीसवी संदी की शुरुआत में मुक्तक छंद का प्रचलन हो गया था। इस हिसाब से 1857 की क्रांति से पहले मेघनाद वध काव्य में भाषा,छंद औरव्याकरण के अनुशासन को तहस नहस करके रावण के समर्थन में राम के खिलाफ लिखा मेघनाद वध काव्य की प्रासंगिकता के बारे में बंगाल में भी कोई चर्चा कायदे से शुरु नहीं हुई।

     नवजागरण में हिंदू धर्म सत्ता और मनुस्मृति अनुशासन की जमीन तोड़ने में मेघनाथ वध के कवि माइकेल मधुसूदन दत्त की भूमिका उसी तरह है जैसे महात्मा ज्योतिबा फूले या बाबासाहेब अंबेडकर का हिंदू धर्म ग्रंथों और मिथकों का खंडन मंडन,मनुस्मृति दहगन की है।लेकिन इस देश के बहुजन समाज को माइकेल मधुसूदन दत्त का नाम भी मालूम नहीं है।रवींद्र को जानते हैं लेकिन उनकी अस्पृश्याता के बारे में ,उनके भारत तीर्त के बारे में बहुसंख्य भारतीय जनता को कुछ भी मालूम नहीं है।

    धर्मसत्ता से टकराने के कारण ईश्वर चंद्र विद्यासागर लगभग सामाजिक बहिस्कार का शिकार होकर हिंदू समाज से बाहर आदिवासी गांव में शरणली और वहां उन्होंने आखिरी सांस ली।तो राजा राममोहन राय की बहुत कारुणिक मृत्यु लंदन में हुई। भरतीय समाज,धर्म और संस्कृति के आधुनिकीकरण की उस महाक्रांति के सिलसिले में राजा राममोहन राय के बारे में समूचा देश कमोबेश जानता है और लोग शायद ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बारे में भी कुछ कुछ जानते होंगे।लेकिन इस क्रांति में महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त की भी एक बड़ी भूमिका है जिन्होंने हिंदुत्व का अनुशासन तोड़ने के लिए ईसाई धर्म अपनाया महज अठारह साल की उम्र में।फिर रावण के पक्ष में मेघनाद को महानायक बनाकर मेघनाद वध काव्य लिखकर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मिथक तोड़ा।उनके बारे में हम कुछ खास जनाते नहीं हैं।

    आज महिषासुर उत्सव का संसद और संसद के बाहर जैसा विरोध हो रहा है,रामलीला के बजाय रावण लीला का आयोजन बहुजन करने लगे तो कितनी प्रतिक्रिया होगी,इसको समझें तो सतीदाह,विधवा उत्पीड़न, स्त्री को गुलाम यौन दासी बनाकर रखने, स्त्री और शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखने,उन्हें नागरिकऔर मानवाधिकार से वंचित रखने, संपत्ति,संसादन और अवसरों से वंचित रखने, बाल विवाह, बहुविवाह, मरणासण्णके साथ शिशुकन्या के विवाह और पति के सात उनकी अतंरजलि यात्रा  के समर्थक हिंदू समाज में राम को खलनायक बनाने की क्या सद्गति रही होगी,अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।वही प्रेमचंद लिखित सद्गति बंगाली भद्र समाज ने माइकेल मदुसूदन दत्त की कर दी है और उनकी कोई स्मृति इस भारत देश के हिंदू राष्ट्र में बची नहीं है।

    वैसे बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर ने भी हिंदू धर्मग्रंथों का खंडन किया,मिथक तोड़े,हिंदुत्व छोड़कर हिंदुओं के मुताबिक विष्णु के अवतार तथागत गौतम बुद्ध की शरण में जाकर बोधिसत्व बने,लेकिन बहुजन समाज का वोट हासिल करन के लिए अंबेडकर सत्तावर्ग की मजबूरी है।

    माइकेल मधुसूदन दत्त के नाम पर वोट नहीं मिल सकते,जैसे शरतचंद्र, प्रेमचंद,मुक्तिबोध या ऋत्विक घटक या कबीर दास के नाम पर वोट नहीं मिल सकते।जब वोट इतना निर्णायक है तो हम वोट राजनीति के खिलाफ जाकर अपने पुरखों को याद कैसे कर सकते हैं?

    माइकेल मधुसूदन दत्त जैशोर जिले के सागरदाढ़ी गांव से थे और बांग्लादेश ने उनके प्रियकवि की स्मृति सहेजकर रखी है।जैशोर में माइकेल के नाम संग्रहालय से लिकर विश्वविद्यालय तक हैं और उन पर सारा शोध बांग्लादेश में हो रहा है।कोलकाता में मरने के बाद उनकी सड़ती हुई लाश के लिए न ईसाइयों के कब्रगाह में कोई जगह थी और न हिंदुओं के श्मशान घाट में।चौबीस घंटे बाद उन्हें आखिरकार ईसाइयों के एक कब्रगाह में दफनाया गया।हिंदू समाज में तब से लेकर आज तक अस्वीकृत माइकेल की एकमात्र स्मृति उन्हींका बांग्ला में लिखा् एक एपिटाफ है,जिसका स्मृति फलक कोलकता के सबसे बड़े श्माशानघाट केवड़ातल्ला में है,जहां उनकी अंत्येषिटि हुई ही नहीं।

    राजसत्ता के खिलाफ बगावत से जान बच सकती है लेकिन धर्म सत्ता हारने के बावजूद विद्रोह को कुचल सकें या न सकें,विद्रोहियों का वजूद मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।भारत में बंगाल के नवजागरण के मसीहावृंद ने ब्राह्मण धर्म की सत्ता की चुनौती दी थी और वे ईस्ट इंडिया कंपनी से नहीं टकराये।उन्होंने बंगाल और पूर्वी भारत में जारी किसान आदिवासी विद्रोहों का समर्थन नहीं किया और न वे 1857 में क्रांति के लिए पहली गोली कोलकाता से करीब तीस किमी दूर बैरकपुर छावनी में मंगल पांडेय की बंदूक से चलने के बाद कंपनी राज के बारे में कुछ अच्छा बुरा कहा।बिरसा मुंडा के मुंडा विद्रोह और सिधु कान्हो के संथाल विद्रोह के बार में भी वे कुछ बोले नहीं।

    राजसत्ता के समर्थन से धर्म सत्ता की बर्बर असभ्यता को खत्म करना उनका मिशन था।सतीदाह प्रथा को बंद करना कितना कठिन था,आजाद भारत में भी रुपकुंवर सतीदाह प्रकरण से साफ जाहिर है।आज भी आजाद भारत में हिंदुओं में विधवा विवाह कानूनन जायज होने के बावजूद इस्लाम या ईसाई अनुयायियों की तरह आम नहीं है।बाल विवाह अब भी धड़ल्ले से हो रहे हैं।बेमेल विवाह भी हो रहे हैं।सिर्फ बहुविवाह पर रोक पूरी तरह लग गयी है,ऐसा कहा जा सकता है।

    समझा जा सकता है कि मनुस्मृति अनुशासन के मुताबिक हिंदू समाज की आंतरिक व्यवस्था में हस्तक्षेप न करने की मुगलिया नीति पर चल रही कंपनी की हुकूमत को हिंदू समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए बंगाल के कट्टर ब्राह्मण समाज से टकराने के लिए कतंपनी के राज काज के खिलाप उन्हें क्यों चुप हो जाना पड़ा।क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फत नवजागरण आंदोलन के वे सामाजिक सुधार कानून लागू न होते तो आज ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान के अंध राष्ट्रवाद के दौर में हम उस मध्ययुगीन बर्बर असभ्य अंधकार समय से शायद ही निकल पाते।

    विद्रोह चाहे किसी धर्म के खिलाफ हो,विद्रोही के साथ कोई धर्म खड़ा नहीं होता।उसकी स्थिति में धर्मांतरणसे कोई फर्क नहीं पड़ता।जैसे तसलिमा नसरीन नास्तिक है और वह धर्म को दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और स्त्रियों के मौलिक अधिकारों के लिए सबसे बड़ी बाधा मानती हैं।उनका विरोध और टकराव इसल्म के मौलवीतंत्र से है।लेकिन किसी भी धर्म सत्ता से उसे कोई समर्थन मिलने वाला नहीं है और कहीं और किसी धर्म में उन्हें शरण नहीं मिलने वाली है।

    माइकेल मधुसूदन दत्त ने हिंदुत्व से मुक्ति के लिए ईसाई धर्म अपनाया।ईसाई धर्म अपनाने की उनकी पहली शर्त यह थी कि उन्हें पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया जाये।फोर्ट विलियम में ईस्ट इंटिया कंपनी के संरक्षण में उनका धर्मांतरण हुआ,लेकिन शर्त के मुताबिक उन्हें इंग्लैड भेजा नहीं जा सका।वे साहेब बनना चाहते थे शेक्सपीअर और मलिटन से बड़ा कवि अंग्रेजी में लिखकर बनाना चाहते थे।लेकिन धर्मांतरण के बाद आजीविका के लिए उन्हें चेन्नई भागना पड़ा।

    माइकेल इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर भी बने तो वह धर्म सत्ता की मदद से नहीं,नवजागरण के मसीहा ईश्वर चंद्र की लगातार आर्थिक मदद से वे बैरिस्टर लंदन में रहकर बन पाये।भारत में कोलकाता लौट आये तो शुरुआत में ही अंग्रेजी में लिखना छोड़कर बांग्ला काव्य और नाटक के माध्यम से मिथकों को तोड़ते हुए मनुस्मृति शासन से कोलकाता को जो उन्होंने हिलाकर रख दिया,उसके नतीजतन ईसाई धर्म में भी उन्हें शरण नहीं मिली।ईसाइयों ने कोलकाता में उन्हें दफनाने के लिए दो गज जमीन भी नहीं दी।जबकि उनकी दूसरी पत्नी हेनेरिटा की तीन दिन पहले 26 जून को मौत हो गयी तो उन्हें ईसाइयों के कब्रगाह में दफना दिया गया।माइकेल की देह सड़ने लगी तो आखिरकार ऐंगलिकन चर्च के रेवरेंड पीटर जान जार्बो कीपहल पर उन्हें हेनेरिया के बगल में मृत्यु के 24 घंयेबाद लोअर सर्कुलर रोड के कब्रिसतान में दफनाया गया।

    पिता राजनाराय़ण दत्त कोलकाता के बहुत बड़े वकील और हिंदू समाज के नेता थे।इसलिए यह धर्मांतरण गुपचुप फोर्ट विलियम में हुआ।माइकेल ने शेक्सपीअर और मिल्टन का अनुसरण करते हुए सानेट लिखा और संस्कृत कालेज में एक ब्राह्मणविधवा के बेटे को दाखिला देने के खिलाफ कोलकता के ब्राह्मण समाज ने जो हिंदू कालेज शुरु किया,उससे बहिस्कृत होने के बाद बिशप कालेज में दाखिले के बावजूद कहीं किसी तरह की प्रतिष्ठा और आजीविका से वंचित होने की वजह से 18 जनवरी,1848 को चेन्नई जाकर एक ईसाई अनाथ कालेज में शिक्षक की नौकरी कर ली और उसी अनाथालय की अंग्रेज किशोरी रेबेका से विवाह किया।

    चेन्नई में रहते हुए मद्रास सर्कुलर पत्रिका के लिए उन्होंने अंग्रेजी में कैप्टिव लेडी सीर्ष क कव्या लिखा और कर्ज लेकर इस पुस्तकाकार प्रकाशित किया तो सिर्फ अठारह प्रतियां ही बिक सकीं।कोलकाता में उनके लिखे की धज्जियां उड़ा दी गयीं।बेथून साहेब ने लिक दिया कि माइकेल को अंग्रेजी शिक्षा से उनकी रुचि और मेधा का जो परिस्कार हुआ है,उससे वे अपनी मातृभाषा को समृद्ध करें तो बेहतर।

    पिता कीमृत्यु के बाद पत्नी रेबेका को चन्नई में छोड़कर प्रेमिका हेनेरिटा को लेकर कोलकता लौटे माइकेल तो साहित्य और समाज में आग लगा दी उनके मेघनाथ वध काव्य ने।इसी दौर में महज पांच साल में  उन्होंने लिखा-शर्मिष्ठा,पद्मावती,कष्णकुमारीस मायाकानन,बूढ़ों शालिकेर घाड़ेरों जैसे नाटक और तिलोत्तमा काव्य,ब्रजांगना काव्य,वीरांगना काव्य।

    राजसत्ता और राष्ट्र के विरुद्ध विद्रोह का नतीजा दमन और नरसंहार है तो अक्सर अग्निपाखी की तरह किसी मृत्यु उपत्यका में बार बार स्वतंत्रता और लोकतंत्र भी उसी विद्रोह का परिणाम होता है।विश्व के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं।लेकिन धर्मसत्ता के खिलाफ विद्रोह का नतीजा नागरिक जीवन के लिए कितना भयंकर है ,उसका जीती जागती उदाहरण तसलिमा नसरीन है,जिसका किसी राष्ट्र या राष्ट्र सत्ता से कोई खास विरोध नहीं है।उन्होने धर्म सत्ता को भारी चुनौती दी है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने धर्म का अनुशासन नहीं माना है।राष्ट्र उन्हें धर्मसत्ता के खिलाफ जाकर अपनी शरण में नहीं ले सकता।बंगाल के वाम शासन के दरम्यान प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष विचारधारा ने अंततः धर्मसत्ता के साथ खड़ा होकर बांग्लादेश की तरह बंगाल से भी तसलिमा को निर्वासित कर दिया और धार्मिक राष्ट्रवाद की सत्ता नई दिल्ली में होने के बावजूद अधार्मिक,नास्तिक ,धर्मद्रोही तसलिमा को भारत सरकार नागरिकता नहीं दे सकती,वही भारत सरकार जिसके समर्थन में तसलिमा अक्सर कुछ नकुछ लिकती रहती है।

    धर्मसत्ता के खिलाफ यह विद्रोह लेकिन सभ्यता,स्वतंत्रता,गणतंत्र,मनुष्यों के मौलिक नागरिक और मानवाधिकार के लिए अनिवार्य है।यूरोप से बहुत पहले पांच हजार साल पहले सिंधु घाटी, चीन, मिस्र,  मेसोपोटामिया, इंका और माया की सभ्यताएं बहुत विकसित रही है।

    बौद्धमय भारत के अवसान के बाद भी समूचे यूरोप में बर्बर असभ्य अंधकार युग की निरंतरता रही है।आम जनता दोहरे राजकाज और राजस्व वसूली के शिकंजे में थीं।राजसत्ता समूचे यूरोप में रोम की धर्मसत्ता से नियंत्रित थी।इंग्लैंड और जरमनी के किसानों की अगुवाई में धर्मसत्ता के खिलाफ यूरोप में महाविद्रोह के बाद रेनेशां के असर में वहां पहली बार सभ्यता का विकास होने लगा और औद्योगिक क्रांति की वजह से यूरोप बाकी दुनिया के मुकाबले विकसित हुआ।अमेरिका और आस्ट्रेलिया तो बहुत बाद का किस्सा है।

    मनुष्यता का बुनियादी चरित्र बाकी जीवित प्राणियों से एकदम अलग है।बाकी प्राणी अपनी इंद्रियों की क्रिया प्रतिक्रिया की सीमा नहीं तोड़ सकते या हाथी,मधुमक्की और डाल्फिन जैसे कुछ जीव जंतु सामूहिक जीवन के अभ्यास में मनुष्य से बेहतर चेतना का परिचये तो दे सकते हैं किंतु अपनी ही इंद्रियों को काबू में करने का संयम मनुष्यता का सबसे बड़ा गुण है और वह अपने विवेक से सही गलत का चुनाव करके क्रिया प्रतिक्रिया को नियंत्रत कर सकता है और स्वभाव से वह प्रतिक्रियावादी नहीं होता।

    मुक्तबाजार में लेकिन हम अनंत भोग के लिए अपनी इंद्रियों को वश में करने का संयम खो रहे हैं और विवेक या प्रज्ञा के बदले हमारी जीवन चर्या निष्क्रियता के बावजूद प्रतिक्रियाओं की घनघटा है।

    सोशल मीडिया और मीडिया में पल दर पल वहीं प्रतिक्रियाएं हमारे मौजूदा समाज का आइना है,हमारा वह चेहरा है,जिसे हम ठीक से पहचानते भी नहीं है।सामूहिक सामाजिक जीवन के मामले में मनुष्यों की तुलना में हाथी,मधुमक्खी,भेड़िये और डाल्फिन जैसे असंख्य जीव जंतु हमसे अब बेहतर हैं और हम सिर्फ जैविक जीवन में जंतु बनने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।इसीलिए यह अभूतपूर्व हिंसा, गृहयुद्ध,युद्ध और आतंकवाद का सिलसिला तमाम वैज्ञानिक और तकनीकी चमत्कार के बावजूद हमें विध्वंस की कगार पर खड़ा करने लगा है और हम अब भी निष्क्रिय प्रतिक्रियावादी हैं।

    सबकुछ हासिल कर लेने की अंधी दौड़ में हम सभ्यता के विनाश पर तुल गये हैं और जैविकी जीवनयापन में हम फिर असभ्य बर्बर अंधकार युग की यात्रा पर हैं और आगे ब्लैक होल के सिवाय कुछ नहीं है।हमने मनुष्यता के विध्वंस के लिए परमाणु धमाकों का अनंत सिलसिला सुनिश्चित कर लिया है।इसी को हम विकास कहते और जानते हैं,जिसमें विवेकहीन इंद्रिय वर्चस्व के भोग के सिवाय मनुष्यता की कोई बुनियादी सत्ता नहीं है।

    माइकल मधुसुदन दत्त

    https://hi.wikipedia.org/s/13af

    मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

    माइकल मधुसुदन दत्त

    माइकल मधुसुदन दत्त (बांग्ला: মাইকেল মধুসূদন দত্ত माइकेल मॉधुसूदॉन दॉत्तॉ) (1824-29 जून,1873) जन्म से मधुसुदन दत्त, बंगला भाषाके प्रख्यात कवि और नाटककार थे। नाटक रचना के क्षेत्र मे वे प्रमुख अगुआई थे। उनकी प्रमुख रचनाओ मे मेघनादबध काव्य प्रमुख है।

    जीवनी[संपादित करें]

    मधुसुदन दत्त का जन्म बंगाल के जेस्सोर जिले के सागादरी नाम के गाँव मे हुआ था। अब यह जगह बांग्लादेशमे है। इनके पिता राजनारायण दत्त कलकत्तेके प्रसिद्ध वकील थे। 1837 ई0 में हिंदू कालेजमें प्रवेश किया। मधुसूदन दत्त अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के विद्यार्थी थे। एक ईसाई युवती के प्रेमपाश में बंधकर उन्होंने ईसाई धर्म ग्रहण करने के लिये 1843 ई0 में हिंदू कालेज छोड़ दिया। कालेज जीवन में माइकेल मधुसूदन दत्त ने काव्यरचना आरंभ कर दी थी। हिंदू कालेज छोड़ने के पश्चात् वे बिशप कालेज में प्रविष्ट हुए। इस समय उन्होंने कुछ फारसीकविताओं का अंग्रेजीमें अनुवाद किया। आर्थिक कठिनाईयों के कारण 1848 में उन्हें बिशप कालेज भी छोड़ना पड़ा। तत्पश्चात् वे मद्रासचले गए जहाँ उन्हें गंभीर साहित्यसाधना का अवसर मिला। पिता की मृत्यु के पश्चात् 1855 में वे कलकत्ता लौट आए। उन्होंने अपनी प्रथम पत्नी को तलाक देकर एक फ्रांसीसी महिला से विवाह किया। 1862 ई0 में वे कानून के अध्ययन के लिये इंग्लैंडगए और 1866 में वे वापस आए। तत्पश्चात् उन्होंने कलकत्ता के न्यायालय मे नौकरी कर ली।

    19वीं शती का उत्तरार्ध बँगला साहित्य में प्राय: मधुसूदन-बंकिम युग कहा जाता है। माइकेल मधुसूदन दत्त बंगाल में अपनी पीढ़ी के उन युवकों के प्रतिनिधि थे, जो तत्कालीन हिंदू समाज के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन से क्षुब्ध थे और जो पश्चिम की चकाचौंधपूर्ण जीवन पद्धति में आत्मभिव्यक्ति और आत्मविकास की संभावनाएँ देखते थे। माइकेल अतिशय भावुक थे। यह भावुकता उनकी आरंभ की अंग्रेजी रचनाओं तथा बाद की बँगला रचनाओं में व्याप्त है। बँगला रचनाओं को भाषा, भाव और शैली की दृष्टि से अधिक समृद्धि प्रदान करने के लिये उन्होनें अँगरेजी के साथ-साथ अनेक यूरोपीय भाषाओं का गहन अध्ययन किया। संस्कृततथा तेलुगुपर भी उनका अच्छा अधिकार था।

    मधुसूदन दत्त ने अपने काव्य में सदैव भारतीय आख्यानों को चुना किंतु निर्वाह में यूरोपीय जामा पहनाया, जैसा "मेघनाद वध" काव्य (1861) से स्पष्ट है। "वीरांगना काव्य" लैटिन कवि ओविड के हीरोइदीज की शैली में रचित अनूठी काव्यकृति है। "ब्रजांगना काव्य" में उन्होंने वैष्णव कवियों की शैली का अनुसरण किया। उन्होंने अंग्रेजी के मुक्तछंद और इतावली सॉनेट का बंगला में प्रयोग किया। चतुर्दशपदी कवितावली उनके सानेटों का संग्रह है। "हेक्टर वध" बँगला गद्य साहित्य में उनका उल्लेखनीय योगदान है।


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    क्या नरसंहारी सियासती मजहब पर हम खुले संवाद के लिए तैयार हैं?

    महिषासुर का पक्ष दुर्गोत्सव के मौके पर रखने के लिए कोलकाता आ रही हैं सुषमा असुर!

    पलाश विश्वास

    सुषमा असुर का नाम अब हिंदी समाज के लिए अनजाना नहीं है।सुषमा असुर पिछले अनेक वर्षों से महिषासुर वध महोत्सव बंद करने की अपील करती रही है।वह झारखंड और बंगाल में महिषासुर के वंशजों का प्रतिनिधित्व करती है।अब देश भर में जारी महिषासुर विमर्श में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है।वही सुषमा असुर कोलकाता में सार्वजनीन दुर्गोत्सव के पंडाल का उद्घाटन करने आ रही है।बांग्ला दैनिक एई समय ने इस बारे में ब्यौरेवार समाचार पहल पृष्ठ पर छापा है और उस समाचार में सुषमा असुर का एक अन्य वक्तव्य भी प्रकाशित किया है।

    महिषासुर वध का विरोध छोड़कर वे कोलकाता के दुर्गोत्सव में महिषमर्दिनी की पूजा के लिए नहीं आ रही है,बल्कि कोलकाता और बंगाल को महिषासुर का पक्ष बताने आ रही हैं।भारतभर के आदिवासियों के हक में असुरों की कथा व्यथो को लेकर बहुसंख्य हिंदू जनता से संवाद शुरु करने आ रही हैं।इस वक्त जेएनयू और गोंडवाना समेत देश के दूसरे हिस्सों में महिषासुर और रावण के वंशजों के खिलाफ जो नरसंहार अभियान के तहत फासीवादी हमले जारी हैं,जिसके तहत बंगाल में भी पुलिस महषासुर उत्सव रोक रही है,सुषमा असुर की यह पहल बहुत महत्वपूर्ण है।

    कोलकाता में भारत विभाजन से पहले मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन और इसके साथ पूर्वी बंगाल के नौआखाली दंगों के दौरान कोलकाता में अमनचैन के लिए सत्ता की छिनाझपटी की नई दिल्ली से दूर जिस बेलेघाटा में आकर कोी मोहनदास कर्मचंद गांधी आकर ठहरे थे,जहां से वे नोआखाली गये थे और फिर दंगा और  भारत विभाजन रोक पाने में विफल होकर सोदपुर पानीहाटी के गांधी आश्रम में ठहरे थे,उसी बेलेघाटा के बहुत पास फूलबागान पूर्व कोलकाता सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति ने महापंचमी पर दुर्गा पूजा के उद्घाटन के लिए सुषमा असुर को न्यौता है और सुषमा असुर इसके लिए राजी भी हो गयी है।इस संवाद से बाकी देश के लोग कोई सबक सीखें तो हमारी बहुत सी मुश्किलें आसान हो सकती हैं।फूलबागान के लोगों को महिषासुर के वंशंजों को इसतरह आत्मीय जन बना लेने के लिए बधाई।

    सुषमा असुर ने कहा कि हमारे समुदाय के बच्चे जब स्कूल कालेज में जाते हैं तब उन्हें राक्षस कहकर उनका उत्पीड़न और बहिस्कार होता है।हम कोई राक्षस दैत्य वगैरह नहीं ,हम भी दूसरों की तरह मनुष्य हैं, हम कोलकाता और बंगाल को यह बताने के लिए यहां आ रहे हैं। गौरतलब है कि गोंडवाना में भी आदिवासी खुद को असुर मानते हैं और वहां भैंसासुर की पूजा व्यापक पैमाने पर होती है,जहां दुर्गापूजा का चलन कभी नहीं रहा है।

    हम पहले लिख चुके हैं कि दुर्गाभक्तों का एक हिस्सा आदिवासियों और महिषासुर एवम् रावण के वंशजों की कथा व्यथा से अनजान नहीं है और उनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा उनके हक हकूक की लड़ाई का कमोबेश समर्थन भी करते हैं।वे दुर्गा के मिथक में महिषासुर प्रकरण के तहत दुर्गापूजा की पद्धति में संशोधन के पक्षधर हैं।सुषमा असुर भी यह बार बार कहती रही हैं कि महिषासुर वध के बिना अपनी आस्था के मुताबिक कोई दुर्गापूजा करें तो असुर के वंशजोंको इसपर आपत्ति नहीं होगी।

    उदार दुर्गाभक्तों का एक हिस्सा सुषमा असुर की इसी अपील के मुताबिक दुर्गापूजा में महिषासुर वध रोकने के पक्ष में है।लेकिन इस पर कोई सार्वजनिक संवाद अभीतक शुरु हुआ नहीं है।सुषमा असुर यह संवाद शुरु करने जा रही हैं।

    यह संवाद कोलकाता में दुर्गोत्सव के मौके पर शुरु करने की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।इसके सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं।बशर्ते की हम नरबलि की परंपरा को सतीदाह की तरह खत्म करने के लिए तैयार हो और नरसंहार संस्कृति की वैदिकी पररंपरा के पुलरूत्थान के आशय को समझने के लिए तैयार हों। ऐसा हुआ तो भारत की एकता और अखंडता और मजबूत होगी जिसे हम अपने धतकरम से चकनाचूर करते जा रहे हैं।

    भारतीय सभ्यता की विकास यात्रा आर्य अनार्य संस्कृति के एकीकरण के तहत हुआ है।सती कथा के तहत तमाम अनार्य देव देवियों को चंडी और भैरव बनाकर एकीकरण की प्रक्रिया कामाख्या और कालीघाट जैसे अनार्य शाक्त धर्मस्थलों को भी सती पीठ में शामिल करने के तहत हुआ है।

    गोंडवाना से लेकर पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में करीब एक लाख साल पहले मनुष्यों की पाषाणकालीन सभ्यता के पुरावशेष मिले हैं।मोहनजोदोडो़ और हड़प्पा की सिंधु सभ्यता का विंध्य और अरावली पर्वतों तक विस्तार हुआ है।खास तौर पर बिहार, झारखंड,बंगाल और ओड़ीशा में वैदिकी और ब्राह्मण काल  के बाद बौद्ध और जैन धर्म का बहुत असर रहा है।जो अब तक खत्म हुआ नहीं है।गोंडवाना के अंतःस्थल में जाये बिना हम भारत की एकात्मकता को समझ नहीं सकते।सांस्कृतिक एकता के तहत अवसरों और संसाधनों के बंटवारे के बिना समता और न्याय की दिशा खुल नहीं सकती और समरसता के पाखंड के बावजूद भारत कानिर्माण हो नहीं सकता तो हिंदू राष्ट्र का एजंडा भी हिंदूधर्म के सर्वनाश का कारण बना रहेगा।यही फासिज्म है।

    बिहार और बंगाल में असुर आदिवासी दुर्गोत्सव और रावण दहन के दौरान महिषासुर और रावण के लिए शोक मनाते हैं और घरों से भी नहीं निकलते हैं।इसके साथ ही महायान बौद्धधर्म के असर में तंत्र के आाधार में जंगल महल में झारखंड औऱ बंगाल में आसिनी वासिनी सर्वमंगला आदि बौद्ध देवियों की पूजा प्रचलित है और मेदिनीपुर में दामाोदर पार दुर्गोत्सव उन जनसमूहों के लिए निषिद्ध है जो असुर नहीं है लेकिन इन तमाम देवियों की पूजा करते हैं।इसीतरह बंगाल बिहार झारखंड और ओड़ीशा में शिव की मूर्तियों के साथ बौद्ध और जैन मूर्तियों की भी पूजा होती है।

    वैसे भी बहुसंख्य भारतीय तथागत गौतम बुद्ध और पार्शनाथ भगवान और सभी जैन तीर्थाकंरों की उपासना अपने देव देवियों के साथ उसीतरह करते हैं जैसे अविभाजित पंजाब में हिंदुओं और सिखों के साथ मुसलमानों के लिए भी गुरद्वारा तीर्थ स्थल रहा है और अंखड भारत में तो क्या खंड खंड भारत में अजमेर शरीफ में गरीबनवाज  या फतेहपुर सीकरी की शरण में जाने वाले किसी मजहब के पाबंद जैसे नहीं होते वैसे ही तमाम सीमाओं के आर पार अब भी पीरों फकीरों की मजार पर गैरमुसलमान भी खूब चादर चढ़ाते हैं।हमारे ही देश में हजारों साल से अइलग अलग मजहब के लोग एक ही परिसर में मंदिर मस्जिद में पूजा और नमाज पढ़ते रहे हैं बिना किसी झगड़े और फसाद के।

    आजादी के बाद अयोध्या ,खाशी और वृंदावन को लेकर मजहबी सियासत ने जो फसाद खड़े कर दिये,वे हजारों साल से हुए रहते तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की हाल यूनान और रोम,मेसोपोटामिया का जैसा होता।जाहिर है कि पीढ़ियों से भारतीय की सरजमीं को हमारे पुरखों ने जो अमन चैन का बसेरा बनाया है,हमने उस उजाड़ने का चाकचौबंद इंतजाम कर लिया है।नफरत की यह आंधी हमने ही सिरज ली है।

    झारखंड में जैनों का महातीर्थ पार्श्वनाथ का तीर्थस्थल पारसनाथ गोमो जंक्सन के बाद है तो बंगाल के बांकुड़ा से लेकर ओड़ीशा और मेदिनीपुर के प्राचीन बंदरगाह ताम्रलिप्त तक जैन मूर्तियों,स्तूपों और मंदिरों के अवशेष सर्वत्र है तो बौद्ध धर्म का भी असर सर्वत्र हैं।

    मगध,पाटलिपुत्र,राजगीर और बोधगया से झारखंड के रास्ते ताम्रलिप्त होकर विदेश यात्राएं तब होती थीं।सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा इसी रास्ते से ताम्रलिप्त होकर श्रीलंका पहुंची थी तो चीनी पर्यटक व्हेन साङ के चरण चिन्ह भी इसी रास्ते पर हैं।झारखंड के असुर एक लाख साल से पाषाणकालीन युग से पत्थरों के हथियारों से लेकर मुगल शासकों के हथियार तक बनाने में अत्यत दक्ष कारीगर रहे हैं और उनमें से ज्यादार लोग लुहार हैं।

    हम इस इतिहास के मद्देनजर बीसवी संदी की जमींदारी के जल जंगल जमीन पर कब्जे के जश्न के तहत नरबलि की प्रथा महिषासुर वध के मार्फत जारी रखे हुए हैं तो इस जितनी जल्दी हम समझ लें उतना ही बेहतर है।जल जमीन जंगल के दावेदार इस सत्ताव्रक के नजरिये से राक्षस, दैत्य, दानव, असुर, किन्नर, गंधर्व,वानर वगैरह वगैरह है और नरबलि की प्रथा उनकी ह्त्या को वैदिकी वध परंपरा में परिभाषित करने की आस्था है जो अब दुर्गोत्सव में महिषासुर वध है या रामलीला के बाद रावण दहन है और रावण को तीर मारकर जलाने वाले सत्ता शिखर के सर्वोच्च लोग हैं जो रमालीला मैदान पर इस नरसंहार को महोत्सव मनाते हैं।

    गौरतलब है कि गोंडवाना से लेकर पूर्व और पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी भूगोल में आदिवासियों के टोटेम और शरणा धर्म के साथ साथ जैन और बौद्ध धर्म और हिंदुत्व की मिली जुली संस्कृति हजारों साल से जारी है,जिसमें दुर्गोत्सव में महिषासुर वध और रावण दहन की ब्रिटिश हुकूमत के दौरान सार्वजनीन आस्था उत्सवों की वजह से भारी उथल पुथल मची है।

    दुर्गोत्सव बीसवीं सदी से पहले जमींदारों और राजाओं की निजी उत्सव रहा है और उसमें प्रजाजनों की हिस्सेदारी नहीं रही है।दुर्गोत्सव नरबलि से शुरु हुआ और जाहिर है कि इस नरबलि के शिकार प्रजाजन ही रहे हैं,जिसके प्रतीक अब महिषासुर हैं।जाहिर है कि अलग अलग उपासनापद्धति,आस्था और धर्म के बावजूद आम जनता के दिलो दिमाग में कोई दीवार भारत के इतिहास में बीसंवी सदी से पहले नहीं थी।भा्रत विबाजनके सात दिलोदिमाग का यह बंटवारा सियासत के मजहबी बना दिये जाने से हुआ है और सत्ता की इस सियासत से हमेशा मजहब और मजहबू जनता को सबसे बड़ा नुकसान होता रहा है।

    दूसरी तरफ, गोस्वामी तुलसीदास के लिख रामायण से ही मर्यादा पुरुषोत्तम की सर्व भारतीय छवि  मुगलिया सल्तनत के खिलाफ आम जनता के हक हकूक की लड़ाई को संगठित करने और संत फकीर पीर बाउल बौद्ध सिख जैन आदिवासी किसान आंदोलनों की परंपरा के तहत दैवीसत्ता का मानवीयकरण के नवजागरण की तहत बनी।

    विडंबना यह है कि सत्ता और सामंतवाद के खिलाफ तैयार गोस्वामी तुलसीदास के अवधी मर्यादा पुरुषोत्तम राम अब रावण दहन के मार्फत देश के बहुजनों के खिलाफ जारी वैदिकी मुक्तबाजारी फासिस्ट नरसंहार अभियान का प्रतीक बन गये हैं।यही नहीं, राम के इस कायाकल्प से युद्धोन्मादी धर्मोन्माद अब हमारी राष्ट्रीयता है।

    दक्षिण पूर्व एशियाई देशों तक में बोली समझी जानेवाली तमिल भाषा हमें आती नहीं है,जिसके तहत हम कम से कम आठ हजार साल का संपूर्ण भारतीय इतिहास जान सकते हैं।हम इसलिए द्रवि़ड़, आर्य, अनार्य, शक,  कुषाण, मुगल, पठान, जैन, बौद्ध, आदिवासी संस्कृतियों के विलय से बने भारत तीर्थ को समझते ही नहीं है तो दूसरी तरफ भारत की किसी भी भाषा के मुकाबले ज्यादा लोगों की भाषा,समूचे मध्य भारत के गोंडवाना की गोंड भाषा को जानने का प्रयत्न नहीं किया है।

    तमिल भाषा  तमिलनाडु की अस्मिता से जुड़कर अपनी पहचान बनाये हुए है बाकी भारत से अलगाव के बावजूद।लेकिन गोंडवाना और दंडकारण्य के आदिलवासियों की गोंड भाषा के साथ साथ मुंडारी, कुड़मी, संथाल,हो जैसी आदिवासी भाषाओ के साथ साथ हमने भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मगही, ब्रज, बुंदेलखंडी, मालवी,कुमांयूनी और गढ़वाली और बंगाल समेत इस देश की सारी जनपद भाषाओं के विकास और  संरक्षणके बदले उन्हें तिलांजलि दी है।

    जो वीरखंभा अल्मोड़ा में है,वहीं वीरस्तंभ फिर पुरुलिया और बांकुड़ा में है और वहीं,मणिपुर और नगालैंड के सारे नगा जनपदों के हर गांव में मोनोलिथ है।संस्कृति और भारतीयता की नाभि नाल के इन रक्त संबंधों को जानने के लिए जैसे तमिल जानना द्रविड़ जड़ों को समझने के लिए अनिवार्य है वैसे ही सिंधु सभ्यता के समय से आर्यावर्त के भूगोल के आर पार हिमालयी क्षेत्रों और विंध्य अरावली के पार बाकी भारत के इतिहास की निरंतरता जानने के लिए आदिवासी भाषाओं के साथ साथ तमाम जनपदों भाषाओं का जानना समझना अनिवार्य है।गोंड भाषा में ही इतिहास की अनेक गुत्थियां सुलझ सकती है मसलन सिंधु सभ्यता के अवसान के बाद वहां के शरणार्थियों का स्थानांतरण और पुन्रवास कहां कहां किस तरह हुआ है।इन भाषाओं को जानने के लिए संस्कृति नहीं,पाली भाषा जानना ज्यादा जरुरी है।

    हिमालयी क्षेत्र में मुगल पठानकाल में पराजित जातियों का प्रवास हुआ है और वे अपनी मौलिक पहचान भूल चुके है।इसी तरह भारत विभाजन के बाद इस देश में विभिन्न जनसमूहों के शरणार्थियों का जैसे स्थानातंरण और पुनर्वास हुआ,वैसा मध्य एशिया के शक,आर्य,तुर्कमंगोल आबादियों के साथ पांच हजार सालों से होता रहा है तो उससे भी पहले सिॆंधु घाटी से निकलकर द्रविड़ भूमध्य सागर के आर पार मध्यएशिया से लेकर सोवियात संघ,पूर्व और पश्चिम  यूरोप तक और उससे भी आगे डेनमार्क स्वीडन और फिनलैंड तक फैलते रहे हैं।जैसे तमिल जनसमूह दक्षिण पूव एशिया में सर्वत्र फैले गये हैं और विभाजन के बाद बंगाल और पंजाबी के लिए सारी दुनिया अपना घर संसार बन गया है।पांच हजार साल तो क्या पांच सौ साल तक उनकी पहचान वैसे ही खत्म हो जायेगी जैसे हिमालय से उतरने वाले कुंमायूनि गढवाली गोरखा डोगरी लोगों की हो जाती है।वे न अइपनी भाषा बोल सकते हैं और न पीछे छूट गये हिमालय को याद करने की फुरसत उन्हें है।हममें से कोई नहीं कह सकता कि पांच हजार साल पहले हमारे पुरखे कौन थे और कौन नहीं।डीएनए टेस्ट से भी नहीं।

    जाहिर है कि विविधताओं और बहुलताओं का जैसा विलय भारत में हुआ है ,विश्वभर में वैसा कहीं नहीं हुआ है और इसी वजह से विश्व की तमाम प्राचीन सभ्यताओं इंका, माया, मिस्र, रोम,यूनान,मंगोल,मेसापोटामिया,चीन की सभ्यताओं के अवसान के विपरीत हमारी पवित्र गंगा यमुना और नर्मदा नदी की धाराओं की तरह अबाध और निरंतर है।रंग नस्ल,जाति,धर्म निर्विशेष हमारे पुरखों ने विविधताओं और बहुलताओं से जिस भारत तीर्थ का निर्माण किया है,हम अंग्रेजी हुकूमत में जमींदारों और राजारजवाड़ों की जनविरोधी नरसंहारी रस्मों को सार्वजिनक उत्सव बनाकर उस भारत तीर्थ को तहस नहस करने में लगे हैं।धर्म का लोकतंत्र को खत्म करके ङम फासिज्म के राजकाज की वानरसेना बन रहे हैं।

    अगर नर बलि से लेकर पशुबलि तक की वीभत्स पंरपराओं का अंत करने के बावजूद धर्म और आस्था की निरंतरता में असर नहीं हुआ है तो समूचे देश को और खासतौर पर अनार्य असुर द्रविड़ जनसमूहों और इस देश के आदिवासियों को बहुसंख्य जनगण में विविधता और बहुलता की भारतीय संस्कृति के मुताबिक शामिल करने के लिए महिषासुर वध और रावण दहन पर पुनर्विचार और संवाद की जरुरत है।

    खुशी की बात यह है कि सुषमा असुर दुर्गोत्सव के दौरान महिषासुर उत्सवों के मध्य महिषासुर वध की पुनरावृ्त्ति कर रहे बहुसंख्य जनता को सीधे संबोधित कर रही हैं।


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    Chhattish Gargh Refugees on indefinite Hunger Strike for the right to Mother Tongue. CM Raman Singh betrayed!

    Bhasha Andolan in East Bengal and Assam repeated in Chhattish Gargh!

    Palash Biswas


    Bengali refugees denied right to mother tongue in most of the states where they have been systematically scattered to kill the Adivasi Kissan Bahujan Majority uprising continued until the partition of India.


    In Assam,Bengalies launched Bhasha Andolan and police killed the leadership with the fire power of the State Power.In undivided Uttar Pradesh,specifically in Dineshpur,now in Uttarakhand the refugee students continued the fight.the movement began in sixties by the students of Zila Parishad Higher Secondary School Dineshpur.In 1970, I was reading in class eight in the school and my father was very close with District board Chairman Shyam Lal Varma.I had to lead the students in indefinite strike with senior students.


    We could not mobilize mass support as Bengali refugees were quite insecure in adverse condition and they could not organize themselves.My father thought I was responsible for the unwanted encounter which could desettle the vulnerable refugee colonies all over in Uttar Pradesh.


    We were protesting against printing of printing of Bengali question paper in Devnagari in school exams.My father and others thought they could have solved the issue without the stirke.The insisted to end the strike as powerful leaders like ND Tiwari and KC Pant intervened.


    My father publicly disowned me as he disowned me yet again during emergency while I was leading students in Uttarakhand and Bengali refugees supported Mrs Gandhi.


    This was  a great crisis faced by Bengali refugees all over India until MarichJhanpi movement in seventies which began in refugee camps of Madhy Pradesh and turminated in Genocide whent the refugees tried to get home yet again in West Bengal


    We could not hold on because the refugees settled in Uttar Pradesh felt themselves vulnerable and tended to compromise.I was spared but my seniors were restricted and they lost their career.I was sure that they spared me just because  to manage the Bengali leadership in the resettlement colonies.

    Though I passed the class eight board exams in second division with 88 percent marks in Bengali, I had no ineteres to continue my studies.


    Hence,I was sent to Shaktifarm Government High School so that I may continue my studies there.I passed class Nine from there and the principal of Dineshpur Highschool Mr.Dalakoti convinced my father to get back me there as they wanted me to appear in UP board exam from the school.


    In Kachhar,Bengali refugees always had been united.But it was not the same in other states.


    I stand with NIKHIL BHARAT Bengali Udvastu Samanyay Samiti because it has organized Bengali refugees in twenty two states where they have been resetttle irespective of my ideology and opinion.I appeal to all refugees including Bengali,Sikh,Tamil,Tibetan,Burmese,Bhutanese to stand together with our differences to ensure the civic and human rights and citizenship without any discrimination.

    Nikhil Bharat has organized Bengali refugees in Dandkarny in complete Solidrity.

    Lacs of refugees earlier gheraoed CG Assembly t o press their demands and CM Raman Singh assured them to solve their problems.It was not to happen.

    Hence,Bengali refugees have launched indefinite hunger strike and right to mother tongue is their prime demand.



    --
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    हम असुर लोग इस धोखा का निंदा करते हैं - सुषमा असुर

    सुषमा असुर कोलकाता नहीं आ रही हैं।

    साजिश की शिकार सुषमा असुर?

    पलाश विश्वास
    सुषमा असुर कोलकाता नहीं आ रही हैं।

    हम असुर लोग इस धोखा का निंदा करते हैं - सुषमा असुर
    कोलकाता की एक संस्था ने धोखे से हम असुरों को बुलाकर महिषासुर शहादत अभियान को बदनाम करने की कोशिश की, इसका हम असुर समुदाय घोर निंदा करते हैं. हम असुर कोलकाता के किसी आयोजन में शामिल होने नहीं जा रहे हैं. हमारे संगठन की महासचिव वंदना टेटे ने आयोजकों को बता दिया है दुर्गा पूजा के किसी आयोजन में असुर लोग भाग नहीं लेंगे. यह आर्यों का छल-बल का पुराना तरीका है. मुझसे संपर्क करने वाले व्यक्ति सुभाष राय ने खुद को 'साल्टलेक एफई ब्लॉक रेसिडेंट एसोसिएशन'का सदस्य बताया था और कहा था कि हमलोग शरद उत्सव का सांस्कृतिक उत्सव कर रहे हें, उसमें आपलोग आइए. आने के लिए 9 लोग का स्लीपर टिकट भी भेजा था. लेकिन जब हमलोग को मालूम हुआ कि बंगाल का अखबार में ऐसा खबर छपा है कि सुषमा असुर और उसके साथ दुर्गा पूजा का उद्घाटन करेंगे तो हम असुरों को बहुत धक्का लगा. हमने अपने संगठन का महासचिव दीदी वंदना से इस बारे में बात किया और पूरे मामले की पड़ताल की. तब सच्चाई उजागर हुआ कि हम असुरों को धोखे से बुलाया जा रहा था.

    -- सुषमा असुर, सखुआपानी नेतरहाट झारखंड

    नीचे उन दोनों खबरों का लिंक है जिससे हमलोगों को सच्चाई का पता लगा.

    http://timesofindia.indiatimes.com/…/articlesh…/54654058.cms

    http://navbharattimes.indiatimes.com/…/article…/54655130.cms

    बंगाल में दुर्गोत्सव के मौके पर सात सौ स्थानों में महिषासुर उत्सव मनाया जा रहा है।कोलकाता और हावड़ा के अलावा उत्तर और दक्षिण 24 परगना,पुरुलिया और बांकुड़ा,मालदह,मुर्शिदाबाद से लेकर बंगाल के कोने कोने में आदिवासियों के साथ बहुजन वर्षों से महिषासुर उत्सव मना रहे हैं।कभी अखबारों में इस बारे में कोई खबर नहीं छपी है।लेकिन इस बार टाइम्स आफ इंडिया समूह के बांगाल अखबार एई समय में पहले पेज पर सुषमा असुर को महिषासुर का वंशज बताते हुए खबर छपी है कि अने पूर्वज की बदनामी दूर करने के लिए सुषमा असुर कोलकाता में दुर्गा पूजा का उद्गाठन करने आ रही हैं।
    हम इसे महिषासुर विमर्श आम जनता के बीच शुरु करने और उदार आस्थावान लोगों की ओर से महिषासुर वध के बहना वैदिकी कर्मकांड में नरबलि और नरसंहार के आत्मे की पहल का मौका मान रहे थे।
    कल दिन भर मुझे दिल्ली और अन्य स्थानों से फोन आते रहे कि क्या सुषमा असुर को इसलिए बुलाया जा रहा है कि कोलकाता में फूलबागान पूर्व कोलकाता सार्वजनीन दुर्गोत्सव के आयोजक महिषासुर वध के बिना पूजा का आयोजन कर रहे हैं।
    सुषमा असुर के हवाले से जो खबर छपी उसमें हम सुषमा के जिस वक्तव्य से परिचित हैं ,उसका कोई जिक्र नहीं है।बंगाल और बिहार में असुर आदिवासियों के अपने पूर्वज का शोक मनाने का ब्यौरा जरुर है और सुषमा के हवाले से इतना कहा गया है कि वे महिषासुर और असुरों का पक्ष रखने आ रही हैं।वे कोलकाता वालो ं को बताने आ रही हैं कि असुर भी उनकी तरह का मनुष्य है।
    इस बीच पहलीबार उत्तर 24 परगना में महिषासुर वध उत्सव को बंगाल पुलिस ने रोक दिया है और आदिवासी बहुल इलाकों में भी महिषासुर वध का आयोजन रोका जा रहा है।
    दिल्ली के साथियों ने आयोजन केबारे में मुझे बार बार फोन से पूछा तो मैं उन्हें न आयोजकों के बारे में और न उनके आयोजन और मकसद के बारे में कुछ बता सका।बंगाल में यह खबर छपने के बाद जैसे मैं समझ रहा था,वैसे ही भारी खलबली मच गयी है।
    कल भी मैंने मित्रों को बताया था कि फूलबागान पूजा कोलकाता के पूजा मैप में कहीं नहीं है जबकि सियालदह से या विधाननगर से इसकी दूरी बहुत नहीं है।हो सकता है कि महज सनसनी फऱैलाकर विज्ञापन और पब्लिसिटी के लिए आयोजकों ने बतौर स्टंट यह करतब कर दिखाया है कि दुर्गोत्सव के दौरान महिषासुर के वंशज को ही पेश कर दिया जाये।उनका वश चलता तो वे महिषासुर को ही पेश करते और हम नहीं जानते कि इस सिलसिले में सुषमा असुर ने क्या सोचकर सहमति दे दी है।
    दिल्ली के मित्रों ने कहा कि सुषमा असुर फोन पर उपलब्ध नहीं हैं।हम यह भी नहीं जानते कि क्या सचमुच सुषमा असुर कोलकाता आ भी रही हैं या नहीं।
    हमसे जिन्होेंने बात की है,उनसे मैंने यही कहा है कि दंडकारण्य,गोंडवाना  से लेकर आदिवासी भूगोल में सर्वत्र रावण और महिषासुर के वंशज हैं जो दुर्गोत्सव और रामलीला के भूगोल के बाहर है और जेएऩयू के महिषासुर विमर्श और संसद से लेकर सड़कों तक इसके राजनीतिक विरोध के बावजूद आम जनता को आदिवासियों और बहुजनों का पक्ष मालूम नहीं है।कोलकाता वाले चाहे मार्केंटिग या पब्लिसिटी ,जिस वजह से भी सुषमा असुर को दुर्गोत्सव का मंच देने को तैयार है,हमें इस विमर्श को आम जनता तक ले जाने का मौका बनाना चाहिए।
    इसलिए मैंने महिषासुर और रावणके इतिहास भूगोल पर पिछले दिनों लिखा है और मेघनाथ वध की चर्चा भी सिलसिलेवार की है।
    बंगाल के बहुजनों को लगता है कि सुषमा असुर एक गहरी साजिश की शिकार ोह रही हैं और उनका सिर्फ पूजा बाजार में इस्तेमाल होना है और उन्हें कुछ भी कहने का मौका नहीं मिलने वाला है।


    বাংলার বাঁশের উৎসবে সুষমা অসুর !!! 

    Saradindu Uddipan

    এক ভয়ঙ্কর ষড়যন্ত্রের শিকার হয়েছেন সুষমা অসুর। দীর্ঘদিনের অসুর আন্দোলনের অগ্রপথিক সে। তাকে কোলকাতায় এনে দুর্গা পূজার প্রতিমা উদ্বোধন এক শ্যতানী পদক্ষেপ। এই কাজ ব্রহ্মন্যবাদী মানসিকতার দাম্ভিক প্রকাশ। আমরা উৎকণ্ঠিত।

    সুষমার অসুর কীর্তন শোণার জন্য কর্তৃপক্ষ নিশ্চয়ই তাকে নিয়ে আসেনি। যদি তাই হত তবে কর্তৃপক্ষ অসুরের পূজার জন্য বিজ্ঞাপন দিতেন। প্রজাপালক, ন্যায়প্রায়ন মহিষাসুরের মূর্তিকে স্বমহিমায় প্রতিষ্ঠিত করতেন। সেটা না করে দুর্গা পূজার উদ্বোধন করানোর মানে কি?

    নিশ্চয়ই আপনারা বুঝতে পারছেন যে এই কর্পোরেট দেবী দুর্গাপূজাও এক ভয়ঙ্কর প্রশ্ন চিহ্নের মুখে পড়ে গেছে। ধাক্কা আরো জোর লাগান ভাই। নিজেদের সাংস্কৃতিক সদ্ভাবনাকে আরো তেজস্বী করে তুলুন। তবে দেখতে পাবেন বাংলাকে এই "বাঁশ দেওয়ার উৎসব" ফেঁকাসে হয়ে যাবে।

    জয় মহিষাসুর।






    হিমালয় থেকে কন্যাকুমারী সর্বত্র শোনা যাচ্ছে অসুরের জয়গান। ভারতের ৮৫% মানুষ দাবী করছে তারা অসুরের বংশজ। এই মূল ভারতীয় সংস্কৃতির তারাই আসল দাবীদার। ধাক্কা আরো জোর মারো সাথী।

    জয় মহিষাসুর

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    #SS17

    अगर आपको नहीं लगता की समय का पहिया फिर घूम रहा तो ये तस्वीरे देखिये !
    ये बुद्ध से लेकर #सम्राट_अशोक#महाराज_वृहदथ#महाराज_बलि#महाबली_महिषासुर#फूल,#आंबेडकर#पेरियार#कांशीराम की मानस संताने है, जो आतुर है अपने इतिहास को खोद निकालने और अपने भविष्य को उस इतिहास जैसा स्वर्णमय बनाने के लिए !
    29 सितंबर 2016 को ये कार्यक्रम #Mysore के #चमुन्डि पहाड़ पर #Dalit_Welfare_Trust के अंतर्गत हुआ!
    Prof. Dr. #Mahesh_Chand_Guru और #Dalit_Minority_Sene (Sena) #Karnataka के कार्यकारी अध्यक्ष #A_J_Khan #Pro_Bhagwaan ने इसे खाश कार्यक्रम को सुशोभित किया !

    उम्मीद है अगली इंडिया टुडे की रिपोर्ट में महिषासुर की शहादत दिवश की संख्या बढ़कर 1000 तक हो जाएगी जो अबकी फरवरी में केवल उत्तर भारत में 470 के आस पास थी !

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    Jugasankha published Chhattishgargh  Bhasha Andolan Report!Whereas Bengali Refugees have no support from Kolkata Media.Hindi Media stands with Bengalies countrywide!


    Bhadralok Bengal has no sympathy for anyone out of Bengal within the country and glorifies NRI activities. 

    Bengali Media skips news about Bengali Refugees in West Bengal.Bengal NEVER NEVER fought for the right to Mother Tongue as Bangaldesh fought.As Bengalies in Assam became Bhasha Shaeed.As Karnatak Bengalies made Bengali second language there.In UP and Uttarakhand,the fight continues.


    Bengalies do not support Bangla Bhasha as they are literally Bengali,those who identify themselves with Britsh Raj and who want to make Kolkata London,who consider Bengali urban demography as their lost colonies in Bihar,Jharkhand,Orissa and so on.


    Anglican Bengalies hence has no love for Bangla at all and their language is Bengali not Bangla.


    Mind you,United Nations consider Bangla as language,the language of Bangladesh.Bengali is not the language of the toiling masses and they claim to be Banga!

    They claim to be Banga dismissing the Bangali Demography in this geopolitics,the Banagali refugees and Bangali and Bangla worlwide.


    Thanks Jugasankha originally published from Assam to carry the flag of Indigenous Bangla and partition victim Bengalai!

    Palash Biswas


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    Bangla has to be taught in Chhattish Gargh Schools from next Session!Bhasha Andolan creates another history!

    Refugees had no support whatsoever from West Bengal.Refugees were NEVER supported by West Bengal since partition of India.


    Media reports from Raipur that CM has met two of the four demands of resettled Bengali Refugees in Chhattish Gargh.

    Hunger strike is withdrawn for the time being.


    Media reports, Bangla has to be taught in Chhattish Gargh Schools from next Session!Bhasha Andolan creates another history!Earlier refugees led and united by Nikhil Bharat made Bangla second language in Karnataka.


    Refugees had no support whatsoever from West Bengal.Refugees were NEVER supported by West Bengal since partition of India.


    It proves again that we ourselves may solve our problems if we stand united with our differences.Refugees in Chhattishgargh proved it as Refugees in Uttarakhand proved it earlier in 2003 while BJP government headed by Nityanand Swami then declared all Bengali refugees illegal migrants and denied citizenship even before the Black Citizenship Bill presented in the Parliament in 2003.


    United Refugee movement was supported by everyone in Hills and plains in Uttarakhand then  except the BJP supporters and the movement became mass movement and the UK BJP government had to eat its GO.


    It was a lesson we should have learnt that no politics would save us unless we stand united Rock solid and join hands with the people of India as they have always supported refugees in their plight all over India excluding Bengal!


    NIKHIL BHARAT UDVASTU SAMANYAY SAMITI General Secretary AMBIKA Ray wrote on his FB Wall:

    Nikhil Bharat Bengali udbastu samanway samiti Chattisgarh state committee in presence of National president Dr.Subodh Biswas and huge numbers of crowed about one Lakh yesterday temporarily stalled the hunger strike after assurance from the Chief Minister to have meeting this evening. Nikhil Bharat could manage to gather support from all sections of Matuas, disciples of Anukul thakur, Krishna panthi and above all local tribals as well is very significant.


    Palash Biswas


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    The Fraud to justify Genocide and Salwa Judum Contiues!
    Palash Biswas
    It has proved that it was a fraud to market the ignored Puja Pandal which badly needs fund.It was a naked attempt to raise fund to glorify the mythical genocide culture making human sacrifice a ritual acepted in a post modern democratic society.

    Sushama Asur and Vandana Tete and Jharkhand Akhada Parishad has already issued a statement to expose the fraud which also exposes media involvement. Asuras all over tribal demogrphy including Gondwana, Orissa,Bengal Jungle Mahal,Bihar Jharkhand and North Bengal have been fighting against British Raj and Zamindari for centuries for Jal Jungal and Jameen.

    They may not support the worship of the mythical goddess to destroy them ,to justify genocide culture of Salawa Judum.

    In fact they are in mourning status during Navratra and mourn for the dravid, negroid,proto austolide Non Aryan martyrs and Mahishasur is their hero.

    Only in Bengal,the Asuras are celebrating Mahishasur Utsav and police obstructing.No news published hitherto.It exposes the media itself.

    The media talked to the Durga worshippers and skipped Sushma Asuara and Asuras,the tribal people in general.It is media Salwa Judum all the way.But a section of media misled the masseses falsefully quoting Sushama Asura.

    Meanwhile Asura Mahotsav is in Vogue in Salwa Judum Zone of Gondwana and the Asura epicentre remains Bastar where genpcide culture is being justified by the media.

    Meanwhile,Disham Guru EX CM Shibu Soren claiming all Adivasi being Asura called for Mahishsur Utsav celebration all over in Indian Adivasi Geography.

    Just because decisive vote bank has the lion`s share while minority inconclusive sections of the society has no say in politics or democracy and they are subjected to infinite persecution and repression in the best interest of the decisive vote bank appeasement.Hence inherent inequality and injustice has to be sustained.It makes the phenomenon of racist patriarchal apartheid!May we ensure participation of every Indian citizen in democratic institutions beyond money muscle captured voting machine turned autocratic fascism?

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    नरसंहारी मुक्तबाजारी धर्मोन्मादी फासिज्म के अंध राष्ट्रवाद का जबाव फिर वही लोकायत का जनवाद है।


    पलाश विश्वास


    नरसंहारी मुक्तबाजारी धर्मोन्मादी फासिज्म के अंध राष्ट्रवाद का जबाव फिर वही लोकायत का जनवाद है।यही विविधता बहुलता का लोकायत जनवाद सिंधु सभ्यता के समय से तमिल इतिहास की निरंतरता के तहत करीब सात हजार साल की भारतीय सभ्यता की विरासत है और जिसकी वजह से दुनियाभर में तमाम प्राचीन सभ्यताओं जैसे रोमन,यूनानी,मेसोपोटामिया,मिस्र,इंका और माया सभ्यताओं के अवसान के बावजूद भारतीय सभ्यता हिमालय से निकली पवित्र नदी गंगा की जलधारा की तरह भारतीय राष्ट्र और भारतीय नागरिकों के तन मन में प्रवाहमान है,जिसे हम अवरुद्ध करके आपदाओं का सृजन कर रहे हैं।

    इसके विपरीत, प्राचीनतम सभ्यताओं की अनंत धारा में एशिया और यूरोप के संजोगस्थल पर यूनान और भूमध्यसागर के पार तुर्क साम्राज्य का आधुनिकीकरण हुआ है।सीरिया और समूचे अरब दुनिया जब युद्ध और गृहयुद्ध में कबीलाई विरासत को जीते हुए आतंकवाद और शरणार्थी सैलाब के शिकंजे में हैं,वहां इस्लाम देश होने के बावजूद यूरोप और अमेरिका की तुलना में तुर्की का जीवन यापन कम आधुनिक नहीं है।खास बात यह है कि सिंधु सभ्यता के समय से और वैदिकी काल में भारत के नेतृत्व में मौलिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया में मध्य एशिया के साथ भारत की संस्कृति का इसी तुर्की से नाभिनाल का संबंध रहा है।इस पर हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।

    ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत में सत्तावर्ग के सत्ताकेंद्रों के रुप में रचे बसे और उत्तर आधुनिक अमेरिकी मुक्तबाजारी उन्मुक्तता में विकसित स्मार्ट महानगरों कोलकाता ,नई दिल्ली, चेन्नई, बंगलूर, मुंबई,चंडीगढ़ से लेकर प्राचीन भारतीय नगर सभ्यता के अवशेष और भारतीय संस्कृति और इतिहास के महत्वपूर्ण केंद्रों लखनऊ, अमृतसर, हैदराबाद, नागपुर ,कानपुर,कोयंबटुर,मदुरै, कोच्चि, वाराणसी, उज्जैन, इंदौर,भुवनेश्वर,अमदाबाद,इलाहाबाद,रांची और पटना में कहीं दीखते नहीं है।

    जनपदों का यह कत्लेआम,लोकायत और लोक की सासंस्कृतिक विरासतों की जड़ों से कटकर जो सीमेंट का महारण्य हम वनों और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश के तहत मुक्तबाजारी अमेरिकी उपनिवेश बनने के लिए धर्मोन्मादी युद्धक राष्ट्रवाद के तहत रच रहे हैं,वहां हम बुलेट गति से अरब और मध्यपूर्व की दिशा में ही दौड़ रहे हैं।

    आज इस आलेख का उद्देश्य उन्हीं लोक विरासत,विविधता और बहुलता की अनंत धारा को स्पर्श करने के लिए है और हो सकता है है कि इससे हमारी प्रेतमुक्ति की दिशा खुले।हमारी मध्ययुगीन सामंती जंजीरों की कैद का तनिक अहसास हो और हममें आजादी का कोई ख्वाब जनमे।

    कारण जो भी हो,हमारे पास सिंधु सभ्यता का इतिहास या साहित्य उपलब्ध नहीं है।इतिहास हमारे पास वैदिकी सभ्यता का भी नहीं है।वैदिकी इतिहास का जो हम महिमामंडन करते अघाते नहीं हैं,वह मिथकों का जंजाल है,जिसमें आम जनता के जीवन यापन,जीवन यंत्रणा,सामाजिक यथार्थ सिरे से लापता हैं।फिरभी विविधता और बहुलता के लोकतंत्र की यह धारा बुद्धमय बंगाल की विरासत है,जिसकी जड़ें अब भी मौजूद हैं।

    सिंधु सभ्यता के अवसान के बाद संक्रमणकाल और वैदिकी समय में आर्य अनार्य संघर्षों के बीच समन्वय और समाोजन के तहत एकीकरण की प्रक्रिया,फिर एकाधिकारवादी रंगभेदी ब्राह्मण धर्म और तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति का यह पूरा इतिहास बुद्धमय बंगाल से लेकर बंगाल के इतिहास,साहित्य और लोकायत, वैष्णव और बाउल आंदोलन,चर्यापद,पदावली साहित्य,मंगल काव्य,किसान आदिवासी विद्रोहों और आंदोलनों की निरंतरता,उत्पादन प्रणाली के विकास और उत्पादन संबंधों में बदलाव, भारत विभाजन और मतुआ आंदोलन के साथ साथ जंगल महल के पुरात्तव अवशेषों से हम सामाजिक यथार्थ की वैज्ञानिक दृष्टि से जांच परख सकते हैं।

    फासिज्म के राजकाज में धर्मोन्मादी अंध मुक्तबाजारी युद्धक राष्ट्रवाद की वानर सेनाओं की तरफ से जिस विविधता और बहुलता पर सबसे ज्यादा हमले तेज हैं,वह सिंधु सभ्यता और वैदिकी सभ्यता की अखंड विरासत है।

    हड़प्पा और सिंधु घाटी के लोग अपढ़ नहीं थे और वे वैश्वीकरण और विश्वबंधुत्व की नींव करीब सात हजार साल पहले डाल चुके थे और उनका तैयार रेशम पथ के जरिये ही वैदिकी सभ्यता का विकास हुआ।वह रेशम पथ भी खोया नहीं है।

    सिंधु सभ्यता के अवसान से पहले मध्य एशिया और भूमध्यसागर के तटवर्ती इलाकों से लगातार विदेशी खानाबदोस लोग सिंधु सभ्यता के समय से भारत आते रहे हैं और भारतीय संस्कृति की बहुलता औक विविधता की  एकात्मता में शामिल होते रहे हैं।इसी क्रम में वैदिकी समय में ही विविधता और बहुलता की भारतीय संस्कृति का विकास बहुत तेज हुआ जिसके तहत शक और खस जातियों का मध्यपूर्व से भारत आगमन आर्य अनार्य संघर्ष के परिदृश्य से संदर्भ और प्रसंग में  सर्वथा भिन्न है क्योंकि ये जातियां लगातार भारतीय संस्कृति में एकाकार होती रही हैं।

    तो दूसरी तरफ वेदों में भी लोकायत की गूंज है तो वैदिकी देवमंडल में यूनान और मध्य एशिया के देव मंडल जैसे समाहित हैं,वैदिकी समय से सती पीठों के रचना समय के आधुनिक काल तक पुराणों और महाकाव्यों के मिथकों और प्रक्षेपण की अनंत धारा के मध्य वेद वेदांत चार्वाक उपनिषद संहिता ब्राह्मण शतपथ समय से अनार्य द्रविड़ लोक देव देवियों के साथ साथ बौद्ध और जैन देवदेवियों, अवतारों का आर्य देवमंडल में समायोजन हुआ है,जिसमें शिव और चंडी के विविध बहुल रुप है।इसे समझे बिना हम भारतीय लोकतंत्र को कायदे से समझ नहीं सकते।

    हमारा यह लोकतंत्र सिर्फ प्राचीन जनपदों के गणराज्यों या पश्चिमी आधुनिक गणतंत्र की विरासत नहीं है,बल्कि यह एकमुश्त सिंधु सभ्यता और वैदिकी सभ्यता की निरंतरता है,जिसमें बौद्ध,सिख,जैन जैसे भारतीय धर्मों और संस्कृतियों के साथ साथ इस्लामी और ईसाई संस्कृतियों, तुर्क और मंगोल जनधाराओं का समायोजन हुआ है।अठारहवीं शताबादी के नवजागरण और चौदहवीं सदी से लगातार जारी संत फकीर पीर बाउल समाज लिंगायत बहुजन समाज सुधार आंदोलनों,मतुआ चंडाल आंदोलनों, फूले अंबेडकर भगतसिंह की विचारधाराओं का साझा आधार इसी विविधता बहुलता की ठोस लोकायत जनपदीय जमीन है।चार्वाक दर्शन परंपरा की निरंतरता है।

    बंगाल में चैदहवीं सदी में सेन वंश के राजकाज के दौरान ब्राह्मण धर्म, अस्पृश्यता, पुरोहित तंत्र और जाति व्यवस्था जिस तरह बौद्ध और जैन संस्कृतियों के धारक वाहक आम जनता पर थोंपा गया,उसके खिलाफ वैष्णव आंदोलन और बाउल आंदोलन का महाविद्रोह है,जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ फिर किसान आदिवासी विद्रोहों के लगातार महाविस्फोट और बंगाल की अंत्यज जनता के 1776 में कंपनी राज और ब्राह्मण धर्म के रंगभेद के खिलाफ हुई पहली बहुजन हड़ताल से लेकर मतुआ आंदोलन और बीसवीं सदी के पहले दशक में चंडाल आंदोलन में निरंतर जारी रहा है।

    इसीलिए सिर्फ बंगाल ही नहीं,बल्कि समूचा पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत बाकी भारत और आर्यावर्त के धर्मोन्माद के विपरीत आज भी कहीं ज्यादा धर्मनरिपेक्ष,उदार और प्रगतिशील है।इसीलिए फासिज्म के राजधर्म का प्रतिरोध इन्हीं इलाकों में सबसे ज्यदा है और इसीलिए शेष भारत के मुकाबले फासीवादी नरसंहारी अश्वमेध के घोड़े यही सबसे तेज दौड़ाये जा रहे हैं और असम को गुजरात बनाया जा रहा है।

    इसके विपरीत यथार्थ यह है कि पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में,सिर्फ बंगाल में नहीं, बंगाल में सारे धर्मों के सारे पर्व त्योहार आज भी आम जनता के साझा पर्व और त्योहार है,जो वैदिकी सभ्यता के दौरान विकसित बहुलता और विविधता की बहती हुई लगातार संकुचित हो रही,लगातार बंध रही,लगातार बेदखल हो रही,लगातार प्रदूषित हो रही गंगा जल की पवित्र धारा है।इसीलिए ब्राह्मण धर्म के पुनरूत्थान के विरुद्ध महिष मर्दिनी के मिथ्या मिथक के प्रतिरोध में महिषासुर उत्सव प्रासंगिक है।

    इस इतिहास को समझने के लिए कवि जयदेव और उनके गीत गोविंदम् की भूमिका को सिलसिलेवार समझने की जरुरत है।महाकवि जयदेव संस्कृति काव्य धारा के अंतिम महाकवि हैं जिन्होंने दैवी और राजकीय नायक नायिका के बदले राधा कृष्ण प्रणय लीला के मार्फत देशज लोकायत के तहत साहित्य और संस्कृति में संस्कृत जानने वाले पुरोहितों और कुलीनों के वर्चस्व को तोड़ा है।

    भागवत पुराण की कथा को महाकवि जयदेव ने एकमुश्त लोकायत और बंगाल की बौद्ध जैन विरासत से जोड़कर वैष्णव और बाउल आंदोलन के तहत बहुजन आंदोलन की नींव डाली है।भागवत पुराणकी तरह गीतगोविंदम कोई दैवी शक्ति का महिमामंडन या मोक्ष अन्वेषण या स्व्रग नर्क का मिथक नहीं है बल्कि प्रकृति और प्रकृति से जुड़ी मनुष्यता की रौजमर्रे की जिदगी की कथा व्यथा,प्रेम विरह राग रास अनुराग श्रृंगार मिलन की हाड़ मांस का देहत्तव का वैज्ञानिक दर्शन है और वैष्णव आंदोलन में जैविकी जीवन को मनुष्यता में तब्दील करने के लिए इंद्रियों को साधने की साधना है तो मोक्ष का निषेध है जो बौद्ध जैन विरासत की जमीन पर फिर चार्वाक और लोकायत के जनवादी लोकतंत्र की निरंतरता है।जिसमें मेहनतकशों के उत्पादन संबंधों की देह सुगंध जंगल की खुशबू की तरह प्राकृतिक और मानविक हैं।

    गौरतलब है कि राजा बल्लाल सेन ने बंगाल में बौद्धों का सफाया करके जो ब्राह्मणधर्म को प्रचलित किया ,उसीसे बंगाल में बुद्धमय भारत के अंतिम द्वीप का जो पतन हुआ ,सो हुआ, लेकिन इससे बंगाल में क्षत्रिय अनुपस्थिति से बहुजनों के हिंदूकरण और उन्हीें के जनेऊधारण से  वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था पहलीबार लागू हुई बेहद निर्ममता के सात,जिसके तहत जबरन धर्मांतरित बौद्धों को शूद्र और चंडाल बना दिया गया और अस्पृश्यता लागू हो गयी।बंगाल में अभिजात कुलीनतंत्र और पुरोहित तंत्र का जन्म हुआ जो आद भी फल फूल रहा है और जो आज भी बंगाल के बहुजनों के दमन और उत्पीड़न की राजनीति के महिषासुर वध उत्सव में सक्रिय है।

     बंगाल के इसी सत्तावर्ग ने पूरे भारतवर्ष में बहुजनों के सफाये में हमेशा निर्णायक पहल की है।इसी ने भारत विभाजन में निर्णायक भूमिका अदा की और अपने ब्राह्मण धर्म के हितों के मद्देनजर भारत में ब्राह्मण धर्म और मनुस्मृति के पुनरूत्थान में निर्णायक भूमिका अदा करते हुए भारतीय साम्यवादी आंदोलने को सिरे से गैरप्रासंगिक बना दिया।

    अंबेडकर को इन्हीं ब्राह्मण धर्म के कुलीन तबके  के सत्तावर्ग ने कम्युनिस्ट आंदोलन से अलग थलग किया तो नेताजी का देश निकाला इन्ही के रकारण हुआ और आजादी में सबसे ज्याद खूनदेने वाले पंजाब और बंगाल से बहुजन आंदोलन और बहुजनों के सफाये के लिए दिल्ली में सत्ता के केंद्रीयकरण में भी इसी जमींदारी तबके की कारस्तानी है। तो इसके प्रतिरोध में बंगाल के बहुजनों ने ही उसी बौद्ध मतुआ वैष्णव विरासत की जमीन पर खड़े होकर बाबासाहेब को संविधानसभा पहुंचाया, जिन्होंने भारतीय संविधान के तहत फिर धम्म प्रवर्तन की तर्ज पर समता और न्याय को भारतीयता का मुख्य विमर्श बना दिया।

    उसी बल्लाल सेन के पुत्र लक्ष्मण सेन के सभाकवि जयदेव ने जब वैदिकी काल के लोकायत को गीत गोविंदम के तहत नये सिरे से स्थापित किया तब भी चर्यापद लिखे जा रहे थे,जो सभी भारतीय भाषाओं का मौलिक साहित्य है।

    कवि जयदेव के बाद, बौद्ध चर्यापद के तुरंत बाद बंगाल में पदावली और मंगल काव्य के मार्फत आम जनता का लोकजीवन और लोकायत  के जनपद साहित्य के माध्यम से ही संतों के भक्ति आंदोलन की धारा में लगभग कबीर के समसामयिक चैतन्य महाप्रभु के वैष्णव आंदोलन के मार्फत बंगाल का सांस्कृतिक विकास हुआ।यह धारा चुआड ,नील,मुंडा,भील,संथाल विद्रोहों के मध्य जारी जल जंगल जमीन और आजीविका की लड़ाई से निबटने के लिए  ब्रिटिश हुकूमत द्वारा कंपनी राज में सामंती और साम्राज्यवादी हितों के मुताबिक संसाधनों से बहुजनों को बेदखल करने की कार्रवाई के तहत  स्थाई बंदोबस्त लागू करके जमींदारी पत्तन तक जारी रहा और जल जगंल जमीन की मिल्कियत पर एकाधिकार के बाद इसी जमींदार वर्ग ने जनपदों और लोकायत की विरासत की हत्या करके सारे माध्यमों और विधाओं पर एकाधिकार कायम करके मुख्यधारा से बहुजनों को निकाल बाहर किया।बाकी भारत में भी धर्म कर्म,राजनीति,समाज,अर्थव्यवस्था,साहित्य,संस्कृति,माध्यमों और विधाओं में यही मनुस्मृति जमींदारी बहाल है।

    बंगाल की विविध बहुल संस्कति में महाकवि जयदेव,चैतन्य महाप्रभू,हरिचांद गरुचांद ठाकुर के अलावा कवि चंडीदास और मैथिल कवि विद्यापति की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है,मौका मिला तो इस पर हम बाद में सिलसिलेवार चर्चा करेंगे।

    जिन्हें यह विमर्श प्रासंगिक लगता है ,उनसे विनम्र निवेदन है कि इसे अपने अपने माध्यम से प्रचारित प्रसारित करें ताकि हम आगे भी यह संवाद जारी रख सकें।

    इस धम्म प्रवर्तन की प्रक्रिया में कुछ बौद्ध संगठनों के स्वयंभू कार्यकर्ता व्यवधान पैदा कर रहे हैं जो इस विमर्श को न सिर्फ अपने नाम से छाप रहे हैं बल्कि उसे संदर्भ और प्रसंग से काटकर अपना मिथ्या अहंकार साध रहे हैं।हम उन तक पहले यह सारा विमर्श पहुंचाते रहे हैं और मेरे प्रकाशित सामग्री को अपने नाम से छाप कर वे  43 सालों से बनी मेरी साख खराब करने में लगे हैं।उनके साथ आगे काम करना असंभव है।उन्हे अलग से सामग्री उनके नाम से प्रकाशित करने के लिए भेजते रहने के बावजूद वे मरी विश्वसीनयता को दांव पर लगा रहे हैं।इसलिए मैं उन्हें अब मेरी कोई सामग्री आगे प्रकाशित करने की इजाजत नहीं दे रहा हूं।विडंबना यही है कि वे इस वक्त बाकी बचे खुचे बौद्धों के संगठनों के नेता,संपादक वगैरह वगैरह हैं।मैंने पहले इस बारे में अंग्रेजी में लिखकर उन्हें चेताया है लेकिन खुद अपनी बात कहने की कवायद से बचते हुए वे सुधरने की कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं।मेरे ऐतराज पर उन्होंने खेद बी नहीं जताया है।मेरे लिखे को पढ़ने के बाद उनके अखबारों और उनकी पत्रिकाओं में उनके नाम से लिखी सामग्री को पढ़कर आप जांच लें कि वे कैसे बौद्ध हैं।

    बहरहाल,स्वर्ग नर्क जन्म जन्मांतर कहीं वैदिकी साहित्य में नहीं है।सिंधु सभ्यता के अवसान के बाद आर्य अनार्य संस्कृतियों के संघर्ष और समन्वय के मध्य कृषि बतौर अर्थव्यवस्था कायम होने लगी तो पराजित जातियों के गुलामों और सभी समुदायों की स्त्रियों के सार हक हकूक छीनने की जो रीति चली आयी,उसके तहत उत्पादन प्रणाली पर पितृसत्ता का वर्चस्व बनता चला गया और वैदिकी कर्मकांड से पुरोहित तंत्र मजबूत होता गया।

    भूसंपदा पर काबिज आभिजात वर्गो के संपन्न जीवन यापन के मुकाबले गुलामों और स्त्रियों की,आम प्रजाजनों की उत्पीड़ित जीवनयंत्रणा को नियतिबद्ध बताकर वर्गीय ध्रूवीकरण की संभावना रोकने के लिए ये सारे किस्से बाद में गढ़े गये ताकि संसाधनों और अवसरों पर एकाधिकार का सिलसिला कायम रह सकें।यही मौलिक जन्मजात आरक्षण है और हजारों साल से इसी जन्मजात आरक्षण से सत्ता का स्वर्गसुख भोगते हुए आम जनता को नर्क जीने के लिए मजबूर करने वाले लोग हजारों साल से वंचित उत्पीड़ियों को अवसर देने की गरज से सवैधानिक आरक्षण के खिलाफ योजनाबद्ध प्रतिक्रांति के तहत युद्धोन्मादी हिंदुत्व की वानरसेना बना रहे हैं बहुजनों को।

    चार्वाक दर्शन में इसी एकाधिकार के खिलाफ विद्रोह के बतौर वैदिकी और गैरवैदिकी जनविरोधी धर्मग्रंथों में रचे गये संसाधनों और अवसरों पर पुरोहित तंत्र और सत्तावर्ग के रंगभेदी एकाधिकार के स्थाई बंदोबस्त के सारे सिद्धांत खारिज कर दिये गये।वैदिकी धर्म भूस्वामियों की संपन्नता बढ़ने के साथ साथ उत्पादन प्रणाली में लगातार हुए परिवर्तन और मध्य एशिया और उसके आर पार वाणिज्य का सिलसिला शुरु हो जाने से आर्यों अनार्यों के युद्धों के मध्य वर्गीय ध्रूवीकरण लगातार तेज होता गया  जिसकी तार्किक और वैज्ञानिक परिणति तथागत गौतम बुद्ध का धम्म और उनकी सामाजिक क्रांति है।

    एैसा जानकर चलें तो सही मायने में वैदिकी साहित्य कोई धर्मग्रंथ हैं ही नहीं और उनके साथ रचे गये ब्राह्मण,संहिता,शतपथ से लेकर उपनिषद और पुराण तक सत्ता वर्ग के हित में लिखा गया साहित्य है जिसका मकसद संसाधनों और अवसरों पर एकाधिकार बहाल रखना है।वैदिकी साहित्य में इतिहास भी कुछ नहीं है किंवदंतियों के सिवाय जो सिरे से कपोलकल्पित और परस्परविरोधी हैं।जिसका इतना महिमामंडन किया जाता है,उसका कोई ऐतिहासिक यथार्थ आधार ही नहीं है।

    मनुस्मृति और जाति व्यवस्था भारतीय समाज के सामंती ढांचे को बनाये रखकर सत्तावर्ग के हितों का बहाल रखने का स्थाई बंदोबस्त है,जिनकी उत्पत्ति तथागत की सामाजिक क्रांति और उनके धम्म से आम जनता को किस्से कहानियों के तिलिस्म में कैद करने के मकसद से हुई।जो अब फासिज्म का नया एजंडा है।

    मेरे बचपन में नैनीताल की तराई में विभाजन पीड़ित बंगाली शरणार्थी गांवों में साठ के दशक के अंत तक संकीर्तन और प्रभात फेरी की परंपरा रही है जो वे पूर्वी बंगाल से लेकर गये थे।रोग शोक प्राकृतिक आपदाओं में बार बार संकीर्तन और प्रभातफेरी का सिलसिला तेज होता रहा,जो अंततः सत्तर के दशक की शुरुआत में खत्म हुई।

    इसीतरह वैदिकी और ब्राह्मणकाल में पूजा पाठ और यज्ञ पर पुरोहित तंत्र के वर्चस्व और इन कर्मकांड में होने वाले खर्च के मद्देनजर जादू टोना,झांड़ फूंक मंत्र तंत्र इत्यादि के जरिये रोग शोक आपदा विपदा टालने के लोकायत जो विकल्प रहा है,वह अब भी भारतीय जनपदों में धूम धड़ाके के साथ जारी है।

    उत्पादन प्रणाली से बेदखल,जल जंगल जमीन और आजीविका से बेदखल साधन हीन अवसरों से वंचित लोगों के लिए राहत का विकल्प इसके सिवाय कोई दूसरा  नहीं है या फिर जन्म जन्मांतर के पापों की दुहाई देकर कर्मफल के लिए परलोक में स्वर्ग सिधारकर धरती के स्वर्ग में रहने वाले सत्तावर्ग के सुख सुविधाओं ,भोग विलास की इच्छा से कर्मकांड मार्फत पलोक सुधारने की गरज से इहलोक में नर्क भोगने के लिए नियतिबद्ध हैं गुलाम और स्त्रियां लाखों अस्मिताओं में कैद एक दूसरे के  खिलाफ लड़ते हुए अति अल्पसंख्यक सत्ताव्रग के खिलाफ वर्गीय ध्रूवीकरण के तहत न गोलबंद हो सकते हैं और न जन्म जन्मांतर के पापों के बोझ तले दबे अपनी नर्क यंत्रणा के कारणों और कारकों के बारे में कुछ जान सकते हैं।शिक्षा और ज्ञान के अधिकरार से बहुसंख्या गुलामों और स्त्रियों को हजारों साल से वंचित किये जाने के फलस्वरुप आज वैज्ञानिक और तकनीक के चरमोत्कर्ष समय में भी अज्ञानता का वह अंधकार हमें लगातार मध्ययुगीन बर्बरता के युग में वापस खींच रहा है।

    वैदिकी काल से अब तक धर्म कर्म का यह सारा सिलसिला मनुष्यता के खिलाफ निरंतर जारी युद्ध है और यही हमारे युद्धोन्माद की खास वजह है।

    ग्यारहवीं सदी तक पाल वंश के राजकाज में बाकी भारत में बौद्धधर्म के अवसान के बहुत बाद तक बंगाल बौद्धमय रहा है।गौरतलब है कि सेनवंश के पहले दो शासकों वीरसेन और विजयसेन के राजकाज में कोई हिंदूकरण अभियान चलने का विवरण अभीतक नहीं मिला है।

    कन्नौज से पांच ब्राह्मण बुलाकर विजय सेन के पुत्र बल्लाल सेन ने बंगाल में ब्राह्मण धर्म की नींव डाली।बल्लाल सेन के राजकाज के दौरान ही बौद्धों का उत्पीड़न हुआ और उनका हिंदू धर्म में धर्मांतरण हुआ।यह मारकाट सिर्फ राजा बल्लाल सेन के राजकाज के दौरान हुई जिसके नतीजतन बांकुडा़ पुरुलिया मेदिनीपुर के जंगल महल को छोड़कर बाकी बंगाल में बौद्धों का पूरा सफाया या धर्मांतरण हो गया।

    फिर राजा बल्लाल सेन के पुत्र लक्ष्मण सेन के सभाकवि संस्कृत के महाकिव जयदेव ने वैदिकी हिंदुत्व के ब्राह्मणधर्म के बदले बंगाल में वैष्णव धर्म अपने गीत गोविंदम् से शुरु किया और गौरतलब है कि गीत गोविंदम् के दर्शन के मुताबिक बंगाल में धर्म निरपेक्ष बाउल आंदोलन की शुरुआत हुई।बाउल तब से लेकर अबतक जयदेव को ही अपना गुरु मानते रहे हैं।

    इसका इतना बड़ा असर हुआ कि सारा का सारा रवींद्र साहित्य बाउल आंदोलन के लोकायत पर आधारित है,जिसे फिर भारतीयता और भारततीर्थ की बहुलता विविधता की एकात्मकता के साथ नये भारत का राष्ट्रवाद जनमा,जिसका निषेध अब फिर ब्राह्मणधर्म का पुनरुत्थान का यह मुक्तबाजार है।फासिज्म का राजकाजहै।

    वैष्णव और बाउल आंदोलन के दर्शन में स्थाईभाव श्रृंगार तत्व है,जिसमें फिर राथा कृष्ण का प्रेम और मिलन केंद्र में है।

    मूल वैष्णव और बाउल दर्शन में मोक्ष का निषेध है जो ब्राह्मण धर्म का अंतिम लक्ष्य है।चरित्र से इसलिए वैष्णव और बाउल आंदोलन चार्वाक दर्शन के लोकायत की निरंतरता है और धर्म परंपरा की दृष्टि से यह सहजिया जीवन शैली सहजयान है जिसमें बौद्धधर्म के महायान और वज्रयान दोनों का प्रभाव है।वज्रयान की तांत्रिकता कमाख्या और काली की उपासना पद्धति में भी देखी जा सकती है।

    वैष्णव और बाउल आंदोलन पूरी तरह नैसर्गिक जीवनधारा के पक्ष में है और सृष्टि और विज्ञान के नियम की तरह जीवन चक्र के लिए चार्वाक दर्शन की तरह भोग को केंद्र में मानता है,जिसमें जीवन चक्र जारी रखने के लिए अनिवार्य काम की वंदना है, लेकन वह काम जैविक नहीं है बल्कि ईश्वर और प्रकृति के मिलन के मध्य इंद्रियों को वश में करके मनुष्यता के विकास का लक्ष्य ही वैष्णव धर्म है,जहां पुरोहित तंत्र और वैदिकी कर्मकांड निषिद्ध हैं।

    गीत गोविंदम के बाइस सर्ग में कृष्ण की रासलीला से राधा की ईर्षा, विरह, अभिमान, राग ,अनुराग और मिलन का ब्यौरा है,जिसे ऋषि बंकिम चंद्र ने अश्लील करार दिया था। गीत गोविंदम में मिलन और प्रेम का उत्कर्ष भाववादी नहीं है ,यहां छायावादी उटोपियन प्लोटोनिक प्रम नहीं है।विशुध सचेतन शारीरिक मिलन है,जो जैविक भी नहीं है,मनुष्यता का उत्सव है वह।रास है अखंड।लीला भी अखंड है।ईश्वर के प्रति समर्पण है।ईश्वर और मनुष्यता एकाकर है।जिसके सजीव ब्योरे भी हैं, लेकिन श्लोक रचने की अद्भुत कला और विद्यता की वजह से पंक्ति दर पंक्ति गीतगोविंदम दर्शन है,बंकिम के मुताबिक अश्लील कहीं नहीं है।

    गीत गोविंदम् संस्कृत काव्य परंपरा से अलग रचना है क्योंकि जयदेव ने काव्यभाषा,श्लोक संरचना और छंद बिंबविन्यास संस्कृति काव्य के मुताबिक बनाये रखते हुए उसमें देशज जनपदीय भाषा,लोकजीवन और पंरपराओं का समायोजन एकदम अपनी विशिष्ट शैली में किया है।व्याकरण को भी तोड़ा है तो अलंकार नये तरीके से गढ़े हैं।लेकिन हर श्लोक गागर में सागर है।बांग्लाभाषा के विकास में गीत गोविंदम् के इन प्रयोगों की बड़ी भूमिका रही है। कुल मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत से पहले तक आम जनता के साहित्य और रचनाधर्मिता इसी लोकायत परंपरा में विकसित हुई।

    चर्या पदों के बाद मंगल काव्यधारा के सिलसिले में दर्शन और साहित्य दोनों मायने में गीत गोविंदम् से शुरु वैष्णव बाउल आंदोलन नवजागरण से पहले नवजागरण था जो बल्लाल सेन के ब्राह्मण धर्म के खिलाफ तो था ही,जिसमें तथागत गौतम बुद्ध के धम्म की निरंतरता पुरोहित तंत्र और वैदिकी कर्म कांड के खिलाफ जनांदोलन की शक्ल में रहा है,जो शुरु से लेकर अंत तक सत्ता और सत्ता वर्ग के विरुद्ध रहा है।यही जनविद्रोह बंगाल और बाकी देश में किसान आदिवासी विद्रोहों और जनांदोलनों की निरंतरता भी है।इसी से बहुजन समाज आकार लेता रहा।

    इस आंदोलन के दार्शनिक अगर कवि जयदेव हैं तो इस महान जनांदोलन के तहत हुई सांस्कृतिक क्रांति के महानायक चैतन्य महाप्रभु रहे हैं।चैतन्य महाप्रभु और उनके अनुयायी नित्यानंद ने अपने आंदोलन के जरिये पाल वंश के अंत से बुद्धमय बंगाल के अवसान के बाद और सेनवंश के अवसान के बाद इस्लामी राजकाज के मध्य इस वैष्णवधर्म के तहत बंगाल में धम्म प्रवर्तन नये सिरे से कर दिया।

    चैतन्य महाप्रभु बंगाल से ओड़ीशा में वैष्णव मत के प्रचार के लिए गये और वहां उनकी हत्या कर दी गयी।वह हत्या रहस्य अभीतक अनसुलझा है।

    चूंकि वैष्णव और बाउल आंदोलन में पुरोहित तंत्र और कर्मकांड के ब्राह्मण धर्म का निषेध है और वैष्णव और बाउल दोनों देह को ही सारे तीर्थस्थलों और तैतीस करोड़ देवी देवताओं का आधार मानते हैं,इसलिए वैष्णव आंदोलन और उसके साथ ही बाउल आंदोलन आम जनता में इतना लोकप्रिय हुआ,जिसका प्रभाव ओडीशा से लेकर समूचे पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में व्यापक पैमाने पर रहा और आज भी मणिपुरी संस्कृति वैष्णव ही है।यह धम्म के साथ लोकायत की भी निरंतरता है।

    प्रकति की उपासना वैष्णव दर्शन की मौलिक आस्था है और विश्व ब्रह्मांड में सबकुछ प्रकृति की लीला है।यह दर्शन अलौकिक आध्यात्म का खंडन करता है जो वैज्ञानिक दृष्टि और लोकायत के हिसाब से बराबर है।देहतत्व का रहस्यवाद भी यहां प्राकृतिक रहस्यवाद है जो प्रकृति और ईश्वर के संबंध पर आधारित है।यह सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ी मनुष्यता का जीवन दर्शन है।

    वैष्णव दर्शन के मुताबिक राधा प्रकृति है तो ईश्वर कृष्ण है।वैष्णव धर्म का अनुशीलन स्थाई राधा भाव है। क्योकि राधा कृष्ण की प्रेमलीला में ही प्रकृति का सृष्टि रहस्य और देहतत्व है।

    गौरतलब है कि पदावली और मंगल काव्य बांग्ला साहित्य की दोनों धाराओं में धर्म लेकिन ब्राह्मणधर्म और वैदिकी कर्मकांड के विरुद्ध है।चंडी मंगल, मनसामंगल, शिवायन और धर्म मंगल काव्यों में भी यही लोकायत है,तो विद्यापति और चंडीदास की पदावली में भी यही लोकायत की गूंज है जो लालन फकीर से होकर रवींद्र नाथ की गीतांजलि में भी प्रतिध्वनित हुई है।रचनाधर्मिता यहां सही मायने में जहां जनजीवन का आइना है वह विरासत,परंपरा और इतिहास का धारक वाहक भी है। जिसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति फिर बाउल गीतों या सूफी संगीत में है।वैष्णव,बाउल और सूफी आंदोलन तरह धर्मनिरपेक्ष है और उसमें जनपदों की धड़कनें मुख्य हैं।

    गौरतलब है कि तथागत गौतम बुद्ध के परानिर्वाण के तुरंत बाद उनके शिष्य दो मुख्य धाराओं में बंट गये थे।इन्हीं दो धाराओं से आगे चलकर सहजयान बौद्ध धर्म का प्रचलन है और सहज यान की वह सहजिया दर्शन ही वैष्णव आंदोलन और बाउल आंदोलन का स्थाई भाव है।खेर पंथी मानते थे कि बुद्ध पहले हैं और धम्म बाद में है। जबकि सांघिकों का मत था कि पहले धम्म  है,उसके बाद बुद्ध और संघ है।नागार्जुन के नेतृत्व में महायान बौद्ध धम्म का प्रवर्तन हुआ और बंगाल में महायान बौद्धधर्म का प्रचलन  ग्यारहवीं शताब्दी तक पालवंश के अवसान के बाद भी राजा विजय सेन के शासन काल तक जारी रहा।

    पहली शकाब्द शताब्दी में नागार्जुन के नेतृ्त्व में शुरु महायान बौद्ध धम्म में प्रज्ञा(धम्म),उपाय(बुद्ध) और बोधिसत्व की उपासना पद्धति चालू हुई।

    शकाब्द सातवीं शताब्दी में ओड्डीयन के राजा इंद्रभूति,उनके पुत्र पद्मसंभव के नेतृत्व में सहजयान बौद्ध धर्म से ही वज्रयान तांत्रिक बौद्ध धम्म का प्रवर्तन हुआ और इनके अनुयायी पद्म,वज्र और बोधिस्तव की उपासना करते थे।इतिहास यह है कि यह ओड्डियन आधुनिक ओड़ीशा नहीं है बल्कि पाकिस्तन में स्थित वर्तमान स्वात है, लेकिन जनता उन्हें ओड़िया मूल का मानती है।चैतन्य महाप्रभु और कवि जयदेव के भी ओड़ीशा के होने की कथाएं प्रचलित है।

    ये पद्मसंभव नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षक थे और वहीं से वे राजा ठी स्त्रीङ के आमंत्रण पर सिक्किम के रास्ते सन् 747 में तिब्बत पहुंच गये।उन्होंने 749 में तिब्बत में पहले बौद्ध मठ की स्थापना करके तांत्रिक उपासनापद्धति का श्रीगणेश किया था।वे ही वज्रयान के तहत तांत्रिक बौद्ध उपासना पद्धति के जनक हैं।

    गुरु पद्मसंभव ने ही तिब्बत और सिक्किम में बौद्धधर्म का प्रचार प्रसार किया और तिब्बत में बौद्ध अनुयायी उसी तांत्रिक बौद्धधर्म के अनुयायी हैं,जिसका असर बिहार,बंगाल,ओड़ीशा से लेकर असम और पूर्वोत्तर में खूब रहा है।

    असम में कामाख्या और बंगाल में काली की तांत्रिक उपासना पद्धति का पद्मसंभव के वज्रयान से कोई  संबंध है या नहीं,यह हालांकि शोध का विषय है।

    बंगाल का वैष्णव बाउल आंदोलन तंत्र उपासना पद्धति के वज्रयान, कापालिक शाक्त धर्म के विपरीत सहजयान बौद्ध धम्म की परंपरा में है जिसका दर्शन सहजिया है।

    सहजयान में भी नर नारी के मिलनपर आधारित देहत्व का दर्शन प्रमुख था।बंगाल में वैष्णव आंदोलन और बाउल आंदोलन की जड़ें उसी सहजयान का सहजिया दर्शन है।उनके लिए राधा कृष्ण का मिलन ही देहतत्व का आाधार है,जो वैदिकी काल के लोकायत दर्शन की ही निरंतरता है और वैदिकी और ब्राह्मण धर्म दोनों का निषेध है।यही परंपरा फिर मतुआ आंदोलन का ब्राह्मणधर्म निषेध है।

    साफ जाहिर है कि हम गौर से देखें तो बंगाल में बौद्ध धम्म की निरंतरता वैष्णव,बाउल और मतुआ आंदोलन के मार्फत आज भी जारी है और इसी वजह से भारत में शायद एकमात्र बंगाल में सत्ता पर एकाधिकार के बावजूद जन जीवन में ब्राह्मण धर्म के बजाय धर्म निरपेक्ष लोकायत ही प्रचलित है और बंगाल में हिंदुत्व गाय पट्टी और बाकी भारत के ब्राह्मणवादी पुनरुत्थान से अलग है।

    ब्रिटिश हुकूमत से औद्योगिक उत्पादन प्रणाली के तहत यह धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील भौतिकवादी परंपरा और मजबूत होती गयी।

    नरसंहारी मुक्तबाजारी धर्मोन्मादी फासिज्म के अंध राष्ट्रवाद का जबाव फिर वही लोकायत का जनवाद है।







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    নিখিল ভারতের আন্দোলনের ফলে আসামের ভাষা শহীদদের সম্মানে কর্ণাটকে এবং ছত্তীশগড়ে বাংলা ভাষার অধিকার ছিনিয়ে নিল ভিটেহারা বাঙালিরা!
    মাতৃভাষার অধিকার থেকে যারা বন্চিত, তাঁরা হিন্দীতে বললে,লিখলেই কুলাঙার- যারা হিন্দি সিনেমা, সিরিয়ালে গানের সঙ্গ যুক্ত তাঁরা কি? যারা স্বভাব ইংরেজ তাঁরা?
    আমি চাই ভারতবর্ষের বাইশিটি রাজ্যের উদ্বাস্তু সন্তানদের মাতৃভাষার জন্য আমরণ লড়াই যার ফলে অন্ততঃ আমার মত কুলাঙার তাঁদের যাতে না হতে হয়।
    পলাশ বিশ্বাস
    ভারত ভাগের বলি বাঙালিরা কতটা বাঙালি,তা আমার জানার কথা নয়।দেশ ভাগ তাঁদের শুধু ভিটেছাডা়,দেশ ছাড়া,নাগরিকত্ব ছাড়া করেনি,তাঁদের বাঙালিত্বও ছিনিয়ে নিতেও তেমন কসুর করেনি।দেশভাগের ফলে প্রথমতঃ পূব বাংলা থেকে উত্খাত হওয়ার পর পরই পশ্চিম বঙ্গ থেকে বিতাড়িত হওয়ার পর ভিটে মাটি নাগরিকত্ব,পরিচয়ের সঙ্গে সঙ্গে তাঁদের মাতৃভাষা আ মরি বাংলাভাষার অধিকারও ছিনিয়ে নেওয়া হয়েছে।যদিও তাঁরা আসামে এবং ত্রিপুরায় প্রথম থেকেই মাতৃভাষায় লেখাপড়া করার অধিকার পেয়েছে।ত্রিপুরায় তাঁরা বহুসংখ্য কিন্তু আসামে মাতৃভাষার অধিকারের জন্য রাজপথে রাঙিয়ে যে বাঙালিরা বাংলাদেশের ভাষা আন্দোলনের চাইতে কোনো অংশে কিছু কম মাতৃভাষা প্রেম প্রমাণিত করন নি,সেই আসামে এবং ত্রিপুরায় বাংলা ভাষা চর্চার কতটা স্বীকৃতি পশ্চিম বঙ্গ অথবা বাংলাভাষা দিয়ে থাকে,তার উল্লেখ না করেই বলতে পারি,বাংলাভাগের অনেক আগে থাকতেই সংযুক্ত বিহারে রাতিমত বাংলাভাষার চর্চা ছিল।শুধু তাই নয়,শরত্ চন্দ্র, বিভুতিভূষণ বন্দোপাধ্যায়, বিধান রায়, সুবোধ রায়, বনফূলসহ অনেক বরেণ্য বাঙালিরা বিহার থেকেই বাংলা সাহিত্যে,বাংলা সংস্কৃতিতে এবং বাংলার রাজনীতিতে গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা গ্রহণ করেছেন।সে সুযোগ বাংলার ইতিহাস ভূগোল থেকে বহিস্কৃত উদ্বাস্তু বাঙালিদের নেই।
    বাংলার বাইরের বাঙালিদের বাঙালিত্ব বোঝাতে গেলে একটি উদাহরণই বোধ হয় যথেষ্ট, বিধান রায় বিহার থেকে বাংলায় এসে বাংলার যশশ্বী মুখ্যমন্ত্রী হয়েছিলেন,অথচ দন্ডকারণ্য থেকে বাংলা মায়ের ডাক শুনে পশ্চিমবঙ্গে এসে সুন্দরবনের মরিচঝাঁপিতে তাঁদের উদ্বাস্তু বাঙালিদের  বাঙালি আধিপাত্যবাদের বলি হতে হল গুলি খেয়ে,বাঘের খাদ্য হয়ে।সেই গণসংহারের আঝ অবধি কোনো তদন্ত হয় নি।বিচারের বাণী নিভৃতে শুধু কাঁদে।
    শিশুদের পানীয় জলে এই বাঙালিত্বের শাসকেরা সেদিন বিষ মিশিয়ে দিয়েছিল।
    তাঁদের মৃতদেহ বাদাবনের নদীবক্ষে ভাসিয়ে বাঘ ও কুমিরের খাদ্যে পরিণত করেছিল।
    নন্দীগ্রাম অথবা সিঙ্গুর অথবা জঙ্গলমহলের অনেক আগে হার্মাদবাহিনী  সেই গণ সংহারের বোধন উত্সবে উদ্বাস্তু মায়েদের ঠিক তেমন করেই আবার ধর্ষিতা করে দিয়েছিল,বেইজ্জত করেছিল.যেমনটা দেশভাগের আগে ও পরে সীমান্তের ওপারে হতে হয়েছিল এবং হতে হয়।যার কোনো প্রতিকার .বিচটার কোনোদিন হয়নি,হয়না।
    বাঙালি উদ্বাস্তুদের নিয়তি বিপর্যয়ের আরেকটি উদাহরণ দিতেই হয়,ভারত ভাগের বলি হয়ে জেনারেল মুশার্রফ যেমন নয়া দিল্লী থেকে মুহাজির পরিচয় বহন করে পাকিস্তানের রাষ্ট্রপতি হয়েছেন,তেমনিই কোনো এক ডঃ মনমোহনসিং ভারতের প্রধানমন্ত্রী হয়েছেন পাকিস্তান থেকে আগত শরণার্থী পরিবারের সন্তান হয়েও।কোনো এক লালকৃষ্ণ আদবাণী ভারতের উপ প্রধানমন্ত্রী হয়েছেন এবং এখনো তিনি ভারতবর্ষের প্রধানমন্ত্রী বা রাষ্ট্রপতি হলেও হতে পারেন।
    অথচ বাংলাদেশ এবং পশ্চিমবঙ্গ থেকে বাইরে ভারতবর্ষের মোট বাইশটি রাজ্যে আসাম এব ত্রিপুরা বাদে কোথাও এই উদ্বাস্তু বাঙালিদের একজন এমএলএ বা একজন এমপি হয় না।জনসংখ্যা অনুপাতে তাঁদের কোনো রাজনৈতিক প্রতিনিধিতত্ব যেমন পশ্চিম বঙ্গে নেই তেমনি সারা ভারতে তাঁদের ভোটে তাঁদের কোনো জন প্রতিনিধি নির্বাচিত হয় না।
    দন্ডকারণ্যে এবং উত্তরাখন্ডের একটি দুটি সীটে তাঁরা যখন একতাবদ্ধ হয়ে নিজেদের এমএলএ নির্বাচিত করতে পারলেন ,তখন সেই সীটগুলিতে বাঙালি ভোট ভাগ করে দেওয়া হল নূতন বিন্যাসে।উড়াষ্যার মালকানগিরি ও ছত্তিশগড়ের পাখানজোড়ে আশি শতাংশ বাঙালি ভোট থাকা সত্বেও সেই সীটগুলি আদিবাসীদের জন্য সংরক্ষিত করা হল উদ্বাস্তু বাঙালিদের বিধানসভায় ঢোকা নিষিদ্ধ করতে।
    বলা বাহুল্য,আসাম,ত্রিপুরা এবং উড়ীষ্যা ছাড়া বাংলাদেশ ও পশ্চিমবঙ্গের বাইরে বাঙালি উদ্বাস্তুদের বাংলায় লেখা পড়ার সুযোগ ছিল না বা নেই।আসামে কাছাড়ের ভাষা শহীদদের মাতৃভাষা আন্দোলনের ফলে বাংলা ভাষার অধিকার স্বীকৃত হয়।কিন্তু ত্রিপুরা,উড়ীষ্যা ছাড়া অন্য কোথাও সেই অধিকার বাঙালি উদ্বাস্তুদের নেই।কিন্তু মাতৃভাষার দাবি নিয়ে তাঁদের আন্দোলন কোনো দিনও থামেনি।কিন্তু সেই দাবি আদায়ের সাগঠনিক ক্ষমতা উদ্বাস্তুদের হয়নি।
    এখন হয়েছে।ইতিমধ্যে নিখিল ভারত উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির আন্দোলনে বাইশটি রাজ্যে বাঙালি উদ্বাস্তুরা সংগঠিত হয়েছে।তাই কর্নাটকে রক্ত না ঝরিয়েও বাংলা এখন দ্বিতীয রাজভাষা।ছত্তিশগড়ের পাখানজোড়ে নিখিল ভারতের নেতৃত্বে লাখোলাখ উদ্বাস্তু বাঙালিদের আন্দোলন এবং আমরণ অনশনের ফলে আগামী সেশান থেকে বাংলা পড়ার অধিকার মিলছে।তাঁরা এখন অন্যান্য অধিকারও আদায় করে নেবে,আমার দৃঢ় বিশ্বাস।
    বাংলায় বা বাংলাদেশে ঔ ভিটেছাড়া বাঙালিরা এসে যখন তাঁদের রক্তে মেশা বাংলা ভাষায় কথা বলেন,তখন তাঁদের ভিন রাজ্যের ভিন ভাষার টান নিয়ে সমালোচনা হয়। প্রথাগত শিক্ষা না থাকার ফলে নিজের রাজ্যে বাংলা ভাষা চর্চা করলেও সেই বাংলার স্বীকৃতি বাংলাদেশ এবং পশ্চিমবঙ্গ দেয় নি।এমনকি আসাম এবং ত্রিপুরার বাংলাভাষা চর্চা সম্পর্কে বাংলাদেশ বা পশ্চিমবঙ্গে আজ অবধি কোনো গবেষণার কথা আমার জানা নেই।
    আমরা বিভিন্ন রাজ্যে ভিন ভিন ভাষার মাধ্যমে পড়াশুনা করেছি।হিন্দি ও ইংরেজি মাধ্যমে সবচেয়ে বেশি।যে বিহারের, ঝাড়খন্ডের অবদান বাংলা সাহিত্যে সব চেয়ে বেশি স্বীকৃত, সেখানেও উদ্বাস্তু ছেলেমেযেদের বাংলা শেখার সুযোগ নেই।আজ পশ্চিম বঙ্গেও চাকরি ও জীবিকার প্রয়োজনে মাতৃভাষা ছেড়ে ইংরেজি ও হিন্দী মাধ্যমে পড়াশুনা কম হচ্ছে না।কিন্তু পশ্চিমবঙ্গের ক্ষেত্রে স্বেচ্ছায মাতৃভাষা ববহলা ও অসম্মান মেধা বিকাশের পরিচয়,অথচ বাংলার বাইরে মাতৃভাষার অধিকার থেকে বন্চিত মানুষরা যে ভাষা জানেন,সেই ভাষায় কথা বললে বা লিখলেই মাতৃভাষার অবহেলা ও অসম্মান ঘটে। দেশভাগের দায়ী যারা ,তাঁরাই বাঙালিত্বের সর্বশ্রেষ্ঠ সন্তান,অথচ দেশ ভাগের বলি যারা,দেশভাগের ফলে তাঁদের এই ভাষা বিপর্যয়ের দজন্য তাঁরাই কুলাঙার।আমদার বাংলা লেখার সুযোগ হযনি,তাই বলে কি নিজেদের কথা অন্য ভাষায় বলা বা লেখা আমদাদের অপরাধ,তাহলে সেই অপরাধকর্মই আমার জীবন ও জীবিকা।
    আমরা বাংলা ভাষায় লেখা পড়ার সুযোগ পাইনি।যে রাজ্যে আমাদের জন্ম সেই রাজ্যের ভাষা আমাদের শিখতে হয়েছে এবং জীবনজীবিকার যাবতীয সমস্যা নিয়ে সেই সব ভাষায় কথা বলতে হয়েছে,লিখতে হয়েছে,কিন্তু আমরা মাতৃভাষাকে অবজ্ঞা যেমন করিনি, অবহেলাও তেমনি করিনি।
    বাইশটি রাজ্যের সবকটি বাঙালি উপনিবেশে কম বেশি বাংলা চর্চা প্রথাগত শিক্ষা ছাড়া ভারত ভাগের পর থেকেই চলছে এবং সেখানে যারা থাকেন তাঁরা বাংলা ভাষা এবং বাংলা সংস্কৃতি ভোলেননি।জাত পাঁতে বা ধর্মে নয়,বাঙালিত্বেই তাঁদের পরিচয়।যদি বাঙালিত্বর শিকড় কোথাও খুঁজতে হয,তা আছে এই সমস্ত ভিটেহারা মানুষদের জীবনে, জীবিকায়, জীবন যন্ত্রণায়।তাঁদের মধ্যে একবার কষ্ট করে গিয়ে দেখতে পারেন।
    প্রথাগত শিক্ষা না থাকার ফলে মাইকেল মধুসূদন দত্ত.ড.অশোক মিত্র বা নীরদ সি চৌধুরির সমকক্ষ হয়ে অন্নান্য ভাষায় শিক্ষা সত্বেও বাংলায় লিখে সাডা় ফলার ক্ষমতা বা প্রতিভা আমাদের নেই।অন্ততঃ আমার নেই।আমি মাইকেলের মত রাতারাতি ইতিহাশ ভাঙা ভাষায়.ছন্দে ,ভঙ্গিমায় কোনো কাল লিখতে পারব না।এখন সে সুযোগ যেমন নেই,সময়ও আমার নেই।আমাকে জীবিকার প্রয়োজনে নিযমিত হিন্দী ও ইংরেজিতে লিখতেই হবে।শখের বাংলা লেখার সুযোগ ও সময় আমার নেই।আমি যা পারি তাই দিয়েই আমি আমারা মানুষদের জন্য আমৃত্যু লড়ে যাব।যে কোনো ভাষাই আমার মাতৃভাষা,সব ভাষাকেই আমি সম্মান করি এবং সব ভাষাতেই আমি লেখা পড়া করতে চাই,যদিও সেই মেধা,শিক্ষা,দক্ষতা বা ক্ষমতা কোনটাই আমার নেই ।তবু আমি যেমন করেই পারব,সবাই আমার সঙ্গে বিচ্ছেদ করলেও আমি আমার মানুষদের কথা বলা,লেখা বন্ধ করছি না।
    তাছাড়া,সারা পৃথীবীর বাঙালিদের সঙ্গে নাড়ীর টান থাকলেও সারা ভারতে ছড়িয়ে ছিটিয়ে থাকা,এমনকি এই পশ্চিম বঙ্গেও খালধারে বিলধারে রেলধারে বাদাবনে বসতি করে থাকা পূব বাংলার ভিটেহারা ভারতভাগের বলি,পোকা মাকড়ের মত বেঁচে থাকতে বাধ্য  মানুষদের জীবন যন্ত্রণার কোনো খবর বাংলা কাগজে হয় না,জীবনের কোনো ক্ষেত্রেই তাঁদের প্রতিনিধিত্ব নেই এমনকি রাজনীতিতেও নেই।
    ইদানীং যুগশঙ্খে নিযমিত বাংলা ও বাংলার বাইরের ভিটেহারা আখ্যান প্রকাশিত হচ্ছে।অন্যত্র কোথাও নয়।
    আমি একজন সাংবাদিক।নৈনীতালে আমার জন্ম।আমি ইন্ডিয়ান এক্সপ্রেসের মত কাগজে পচিঁশ বছর সম্পাদকীয় বিভাগে কাজ করেছি।বলা বাহুল্য,সারা ভারতের উদ্বাস্তু সন্তানদের মত বাংলা ভাষায় আমার প্রথাগত শিক্ষা বা দক্ষতা কোনটাই নেই।সেই অর্থে  আমার মত অতি সাধারণ মেধার মানুষের পক্ষে বাংলায় পচিঁশ বছর বসবাসা করার পরও বাংলা পড়ার যথেষ্ট সুযোগ থাকা সত্বেও বাংলায় লেখার কোনো সুযোগ আদৌ হয়নি।
    আমি হাইস্কুল পর্যন্ত হিন্দী ও তারপর ইংরেজী মাধ্যমে পড়াশুনা করেছে।1973 সাল থেকে আমি সংবাদপত্রে নিযমিত লিখে চলেছি হিন্দিতে এবং ইংলিশে।
    আমার হিন্দী ও ইংলিশে লেখা সিংহভাগ লেখাই উদ্বাস্তু সমাজ নিযে,যা বাংলা সাহিত্যে ,সিনেমায় বা সাংবাদিকতায় রীতিমত নিষিদ্ধ বিষয়।এই অপরাধে ঋত্বিক ঘটকের মত অসামান্য একজন মানুষ বাংলা থেকে বিতাড়িত।উদ্বাস্তুদের জীবন,জীবিকা,সংস্কৃতি, ইতিহাস নিয়ে।বিভিন্ন রাজ্যে তাঁদের সমস্যা ও তাঁদের আন্দোলন নিয়ে।যেমনটা লেখার কোনো সুযোগ আমরা মাতৃভাষা বাংলায় আমি পাইনি।আজ অবধি পাইনি।লিটিল ম্যাগেও নয়।তাহলে যারাআমার লেখা পড়ে,যে ভাষায় পড়ে ,তাঁদের সঙ্গে সেই ভাষায় যোগাযোগ বন্ধ করা আমার পক্ষে একেবারই সম্ভব নয়।
    অন্য ভাবে বললে বলতে হয়,হিন্দী বা ইংরেজিতে না লিখলে আমার মানুষদের জীবন যন্ত্রণা নিয়ে কোথাও কিছু লেখা অন্ততঃ আমার পক্ষে সম্ভব ছিল না।এখনো সম্ভব নয়।
    তাছাড়া,হিন্দী ও ইংরেজি জানার জন্য আমি চত্রিশ বছর বিভিন্ন  প্রথম শ্রেণীর কাগ্জে সারা ভারতবর্ষে কাজ করেছি এবং সারা ভারতবর্ষে আমার সেই পরিচিতি আছে।উপরন্তু সাংবাদিকতা আজও আমরা জীবিকা।
    বাংলা ভাষায় সংবাদিকতায় আমার জীবিকার কোনো সুযোগ নেই। আমি যদি হিন্দীতে লেখা বন্ধ করি,তাহলে আমাকে আমার জীবিকা থেকে বন্চিত হতে হয় এবং উদ্বাস্তুদের জন্য আমি যে দীর্ঘ তেতাল্লিশ বছর লাগাতার লিখথে আসছি, তাও বন্ধ করতে হয়।বাংলা ভাষা তেমন না জনতে পারি,যে ভাষায় আমার লেখা নিয়মতি দৈনিক সংবাদপত্রে এবং সাহিত্যপত্রিকাতেও সারা দেশে প্রকাশিত হয়,সে ভাষায় লেখা বন্ধ করলে আমি আমার মানুষদের ব্যথা কথা সর্বসমক্ষে কিভাবে তুলব,আমি জানিনা।
    হিন্দিতে লিখলে দোষ,কিন্তু যারা ইংরেজিতে লেখেন,তাঁরা কি ধোয়া তুলসী পাতা?
    হিন্দিতে সাহিত্যচর্চা বা সাংবাদিকতা দোষের,কিন্তি যারা সারা জীবন হিন্দি সিনেমায় কাজ করেন এবং বাংলা বলেনও না,তাঁরাই আবার বাঙালি সংস্কৃতির গৌরব,হিন্দি সিনেমা ও হিন্দী সীরিয়াল বা হিন্দী গান আমাদের প্রাণ,অথচ হিন্দিতে লিখলেই কুলাঙার?
    আমিও মনে করি ,সত্যি সত্যিই আমি কুলাঙার যেহেতু আমি ঔ রকম বিশুদ্ধ ঝরঝরে বাংলা লিখতে পারিনা,যেমনটা পশ্চিম বঙ্গ বা বাংলাদেশের বাঙালিরা পারেন।

    আমি চাই ভারতবর্ষের বাইশিটি রাজ্যের উদ্বাস্তু সন্তানদের মাতৃভাষার জন্য আমরণ লড়াই যার ফলে অন্ততঃ আমার মত কুলাঙার তাঁদের যাতে না হতে হয়।

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    দৈনিক যুগসঙ্খ পত্রিকায় নিখিল.ভারত বাঙালি.উদ্বাস্তু সমন্বয়.সমিতির সংবাদ। ১৩/১০/২০১৬

    Thanks Bangla dainik  Jugasankha which is echoing the voices of Indian Bengali Refugees countrywide continuously!Refugees have no space elsewhere in Bangla Print or Electronic media. Nikhil Bharat Udvastu Samanyaya Samiti .thus,urges all refugees to read Jugasankha daily.

    Thanks Jugashankha editor,editorial and reporting team for this long waited support from any Bengali Media.Thanks Raktim Dash,our brother!




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    निषिद्ध होने लगा शरणार्थी,रंगभेदी अभियान में प्रियंका चोपड़ा भी शामिल?

    इसके उलट डोनाल्ड ट्रंप के रंगभेद के खिलाफ छह नोबेल विजेताओं ने जारी किया बयान

    Amid debate, all 2016 American Nobel laureates are immigrants

    पलाश विश्वास

    डोनाल्ड ट्रंप के रंगभेदी चुनाव अभियान में आप्रवासियों,शरणार्थियों और बाहरी लोगों के खिलाफ जारी घृणा अभियान के खिलाफ 2016 के अमेरिका के सभी छह नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने बयान जारी किया है ,जिनमें से किसी का जन्म अमेरिका में नहीं हुआ है।गौरतलब है कि अमेरिका में सन 2000 से लेकर जिन 71 लोगों ने नोबेल पुरस्कार जीते,उनमें से चालीस ऐसे हैं,जिनका जन्म अमेरिका में नहीं हुआ है।

    इन छह नोबेल विजेताओं के मुताबिक आप्रवासी नहीं होते तो अमेरिका बनता ही नहीं है।गौरतलब है कि अमेरिका और लातिन अमेरिका में मूलनिवासियों के ध्वंस पर इंग्लैंड से भगाये गये अपराधिक तत्वों ने कोलबंस के जलदस्युओं की फौज द्वारा इंका और माया सभ्यताओं के विनाश के बाद अश्वेतों को गुलाम बना लिया और रंगभेदी श्वेत वर्चस्व का सत्ता वर्ग खुद बाहरी होते हुए मूलतः अश्वेतों को आप्रवासी,बाहरी और शरणार्थी करार दे रहा है।

    The Hill ने इस सिलसिले में खबर ब्यौरे वार छापी हैः

    In a year in which Republican presidential nominee Donald Trump is proposing a crackdown on immigration, all six of the 2016 American Nobel laureates announced to date are immigrants.

    "I think the resounding message that should go out all around the world is that science is global," Sir J. Fraser Stoddart, one of three laureates in chemistry, told The Hill on Monday.

    Stoddart, born in Scotland, credited American openness with bringing top scientists to the country. He added, however, that the American scientific establishment will only remain strong "as long as we don't enter an era where we turn our back on immigration."

    Stoddart said the United States should be "welcoming people from all over the world, including the Middle East."

    Stoddart naturalized as a U.S. citizen in 2011, but said he would likely not vote on Nov. 8.

    "I find it very difficult to handle the situation and certainly don't have much time to think about it between now and December when I go to Stockholm," said Stoddart, a researcher at Northwestern University, who won the prize in chemistry in collaboration with Jean-Pierre Sauvage and Bernard Feringa, French and Dutch researchers. They won their prize for "for the design and synthesis of molecular machines."

    Trump has focused his campaign on immigration and the revocation of free trade deals, targeting globalization as a movement that "has left millions of our workers with nothing but poverty and heartache." The billionaire has proposed strengthening immigration laws and "extreme vetting" of potential immigrants from countries with a history of terrorism.

    "It's particularly pertinent to have these discussions in view of the political climate on both sides of the pond at the moment," said Stoddart. "I think the United States is what it is today largely because of open borders."

    Stoddart added that political leaders today are not "people of the times."


    साभारः http://thehill.com/latino/300237-all-american-2016-nobel-prize-honorees-are-immigrants



    यही किस्सा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का है।पूरे अफ्रीका और लातिन अमेरिका,मध्य अमेरिका का है।

    भारत विभाजन करने वाले लोग भारत में भी शरणार्थियों का सफाया करने में लगे हैं तो सीमापार से कहीं ज्यादा शरणार्थी जल जंगल जमीन से बेदखल इस देश के आदिवासी,दलित और पिछड़ों के साथ आम जनता है और यही मुक्त बाजार के सबसे अच्छे दिन हैं।

    दक्षिण अफ्रीका के इस रंगभेद के खिलाफ अश्वेत जनता ने दशकों से आंदोलन जारी रखकर आजादी हासिल की है।

    भारत में भी रंगभेदी वर्चस्व कुल मिलाकर विदेशी वर्चस्व है,जिसके तहत आम जनता को आजादी अभी हासिल नहीं हुई है और भारत में भी जल जंगल जमीन, आजीविका और नागरिकता से मूलनिवासी बहुसंख्य अश्वेत जनता बेदखल होते जा रहे हैं।शरणार्थी भारत में भी निषिद्ध हैं।

    इसी बीच बालीवूड की तरह हालीवूड में धूम मचाने वाली हमारी प्यारी अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा में ने हाल में एक बड़ा धमाका कर दिया है।

    एक प्रमुख लाइफस्टाइल मैगजीन के कवर पर वह जो टाप पहनकर प्रगट हुई हैं,उस पर चार शब्द लिखे हैं।शरणार्थी,आप्रवासी,बाहरी और सैलानी।सैलानी शब्द को छोड़कर बाकी तीनों शब्द लाल स्याही से काट दिये गये हैं।

    प्रियंका ने Conde Nast Traveller के कवर पर छपी यह त्सवीर सोशल मीडिया पर शेयर किया है।गौरतलब है कि अमेरिका और ब्रिटेन में ये तीनों शब्द निषिद्ध होने को हैं तो भारत में भी शरणार्थी शब्द को निषिद्ध माना जाता है।

    डोनाल्ड ट्रंप के रंगभेदी चुनाव अभियान के अलावा यह अमेरिका और इंग्लैंड में रंगभेदी श्वेत प्रभुत्ववाद के पक्ष में जा री एक कु क्लाक्स अभियान है,जिसमें प्रियंका जाने अनजाने शामिल हो गयी हैं।

    ट्विटर पर यह तस्वीर जारी करने के बाद प्रियंका को बड़ी संख्या में लोग इलीटिस्ट,आफेनसिव और इनसेनसिटिव कह रहे हैं।

    दरअसल शरणार्थियों के खिलाफ यह रंगभेदी कुलीनत्व,आक्रामक रवैया और संवेदनहीनता दुनियाभर में सामंती और साम्राज्यवादी रंगभेदी सत्ता वर्चस्व का चरित्र है,जो पहले युद्ध,गृहयुद्ध और आतंकवाद के जरिये शरणार्थी पैदा करता है और फिर उनके सफाये को लिए कोई कसर नहीं छोड़ता।

    अब प्रियंका की सफाई आने से पहले उस पत्रिका की ओर से कहा गया है कि वह दरअसल इन तीन शब्दों को लेकर मचे बवाल के उलट सीमाओं की सारी दीवारें तोड़ने की मुहिम में शामिल हैं।

    गौरतलब है कि सीमाओं को खत्म करना मार्क्सवादी एजंडा रहा है तो राष्ट्र व्यवस्था को सर्वशक्तिमान करके नागरिकता, मनुष्यता और प्रकृति को तहस नहस करके,उत्पादन प्रणालियों और अर्थ व्यवस्थाओं पर काबिज वैश्विक मुक्तबाजार भी सीमाएं नहीं चाहता,बाजार पर राष्ट्र का नियंत्रण नहीं चाहता,संविधान और कानून का राज नहीं चाहता,क्रय क्षमता ही इस मुक्तबाजारी उदारवाद के लिए न्याय और समता है।

    गौरतलब है कि  अपने चुनाव अभियान की शुरुआत से ही ट्रंपमुसलमानों और सीरियाई शरणार्थियोंके अमेरिका में प्रवेश पर पाबंदी की मांग करते रहे हैं।अमेरिका के राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन दावेदार डोनाल्ड ट्रंपके बेटेडोनाल्ड ट्रंपजूनियर ने सोमवार रात एक तस्वीर ट्वीट किया, जिसमें सीरियाईशरणार्थियोंकी तुलना स्किटल्स (फलों के स्वाद वाली कैंडी) से की गई है।

    गौरतलब है कि अमेरिकी चुनाव के पहले राष्‍ट्रपति पद के उम्‍मीदवार डोनाल्डट्रम्प और हिलेरी क्लिंटन के बीच दूसरी टीवी डिबेट समाप्त हो चुकी है। इस डिबेट में ट्रंपऔर हिलेरी ने एक दूसरे को ई-मेल्स, सेक्स कांड, सीरिया, रूस और आईएस जैसे मुद्दों पर जमकर घेरा। सेंट लुईस की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में डिबेट शुरू होने से पहले जब दोनों नेता मंच पर आए तो उस वक्‍त दोनों ने हाथ तक नहीं मिलाया। ट्रंपने अपनी भाषण की शुरुआत करते ही कहा कि हिलेरी के दिल में उनके लिए हद से ज्यादा नफरत है। वहीं हिलेरी ने भी ट्रंपको लेकर कहा कि वो राष्‍ट्रपति बनने लायक नहीं है।

    ट्रंपने मांग की कि हिलेरी 33000 ईमेल डिलीट कर देने पर माफी मांगें। हिलेरी पर आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2009-2013 के दौरान ओबामा की प्रमुख राजनयिक रहते हुए निजी ईमेल का इस्तेमाल किया और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला। कुल 90 मिनट की बहस में हिलेरी ने जोर देकर कहा कि उन्होंने ईमेल के मुद्दे पर गलती की है और वह इसकी जिम्मेदारी लेती हैं। इसके अलावा, राष्ट्रपति पद की डेमोकेट्रिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिका में मुस्लिमों का प्रवेश प्रतिबंधित करने की डोनाल्ड ट्रंपकी योजना को लेकर आज उन्हें आड़े हाथों लिया और कहा कि (मुस्लिम) समुदाय के बारे में उनकी 'भड़काऊ भाषणबाजी' में उलझना 'अदूरदर्शी' और 'खतरनाक' होगा।

    मैडम हिलेरी ने कहा कि राष्ट्रपति बनने पर वह ऐसे किसी व्यक्ति को देश में नहीं रहने देंगी, जो उनके हिसाब से अमेरिका के लिए खतरा होगा लेकिन बहुत से शरणार्थियोंको…जिनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे होते हैं…उन्हें सिर्फ इस आधार पर अमेरिका में प्रवेश देने से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे मुस्लिम हैं। उन्होंने कहा, 'लेकिन हम जांच करवाएंगे। हमारे पेशेवरों, खुफिया जानकारी के विशेषज्ञों और अन्य की ओर से इस जांच को जितना कड़ा करने की जरूरत होगी, इसे किया जाएगा।


    अमेरिका सीमाओं के आर पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ है और  पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर भारत की सर्जिकल स्ट्राइक को अमेरिकी विदेश विभाग जायज बता रहा है।तो पाकिस्तान ने अमेरिकाको पतनशील साम्राज्यवाद कहा है।इस कूटनीतिक लड़ाई में अमेरिका किस हद तक भारत का साथ देगा,यह समझने वाली बात है।

    अमेरिकी विदेश विभाग के हालिया बयान भारत पाक युद्ध परिस्थितियों को युद्धोन्माद में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।दुनियाभर में अमेरिकी की इस पुलिसिया विदेश नीति की असली वजह उसकी युद्धक अर्थव्यवस्था है,जो संकट में है और दुनियाभर में हथियारों के बाजार में कड़ी प्रतिद्वंद्विता से अमेरिका मंदी की चपेट से अभी निकला नहीं है।उसकी अर्थव्यवस्था अभी तेलकुंओं में फंसी है।

    अब हम उनके आर्थिक हितों के लिए उनकी मर्जी से अपने पड़ोसी के साथ सीधे युद्ध शुरु करें तो भारत पाक युद्ध का नतीजा चाहे कुछ हो,उससे अमेरिका को सबसे ज्यादा फायदा होना है।

    अमेरिकी विदेश नीति भी उसकी अर्थ व्यवस्था की तरह युद्धक है,जो दुनियाभर में शरणार्थी समस्या की असल वजह है।

    मजे की बात है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा वहां की शरणार्थी आबादी है तो यूरोपीय समुदाय से बाहर निकलने के लिए ब्रिटेन के ब्रेक्सिट का विकल्प अपनाने के पीछे भी इंग्लैंड समेत समूचे यूरोप में शरणार्थी सैलाब है।

    डोनाल्ड ट्रंप जीते या फिर मैडम हिलेरी,अमेरिका में आप्रवासी जनता के खिलाफ रंगभेदी हिंसा का सिलसिला तेज होना है तो इंग्लैंड के यूरोपीय समुदाय से बाहर निकलने के बाद दुनियाभर में तमाम सीमाएं शरणार्थियों के लिए सीलबंद होना है।

    दूसरी तरफ,इन्हीं ब्रिटेन और अमेरिका की अगुवाई में समूचे मध्यपूर्व,दक्षिण पूर्व एशिया,मध्य और लातिन अमेरिका,अफ्रीका,पूर्व और पश्चिम एशिया में युद्ध और गृहयुद्ध के खेल और कारोबार का वैश्विक मुक्तबाजारी वसंत की वजह से दुनियाभर की तमाम देशों में सीमाओं के आर पार नक्शों में भारी उथल पुथल,बंटवारा,विखंडन और प्राकृतिक संसाधनों की अबाध लूटपाट और इस विध्वंस को अंजाम देने के लिए दुनियाभर में अमेरिकी सुनियोजित आतंकवादी हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की अबाध पूंजी प्रवाह से पल दर पल मनुष्यता शरणार्थी में तब्दील हो रही है।

    जाहिर है,तमाम देशों में शरणार्थियों के लिए सीमाएं सीलबंद कर देने से शरणार्थी समस्या सुलझने वाली नहीं है।बेदखली,लूटपाट,आतंकवाद,युद्ध और गृहयुद्ध का कारोबार अब विश्वव्यवस्था है तो जब जब प्रकृति का विध्वंस होना है,जब जब मनुष्यता सीमाओं के आर पार लहूलुहान होनी है,शरणार्थी सुनामी तेज होनी है,जिससे अब अमेरिका और इंग्लैंड की भी रिहाई असंभव है।


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    বিয়ের রাতে ধর্ষিতা। পেশায় পরিচারিকা। তবু আজ বিশ্ববিখ্যাত লেখিকা এই বাঙালিনী---------

    Sarker Lipi added 8 new photos.

    মোট ২১টি ভাষায় অনূদিত হয়েছে তাঁর লেখা বই, যার মধ্যে রয়েছে ১৩টি বিদেশি ভাষা। ফ্রান্স, জার্মানি এবং জাপানে রয়েছেন তাঁর বইয়ের পাঠক-পাঠিকা। সারা দেশে বিভিন্ন সাহিত্য উৎসবে তিনি আমন্ত্রিত হন তাঁর লেখা পাঠের জন্য।
    এক দুঃস্বপ্নময় শৈশব কেটেছে তাঁর। কাজ করেছেন পরিচারিকা হিসেবে। সত্যি বলতে কী, এখনও পেশাগত পরিচয়ে তিনি একজন পরিচারিকাই। কিন্তু এটাই তাঁর একমাত্র পরিচয় নয়। তিনি একজন স্বনামধন্য লেখিকা। নিজের বই নিয়ে তিনি হাজির হয়েছেন প্যারিস, ফ্রাঙ্কফুর্ট বা হংকং-এর মতো শহরে। মোট ২১টি ভাষায় অনূদিত হয়েছে তাঁর লেখা বই, যার মধ্যে রয়েছে ১৩টি বিদেশি ভাষা। ফ্রান্স, জার্মানি এবং জাপানে রয়েছেন তাঁর বইয়ের পাঠক-পাঠিকা। সারা দেশে বিভিন্ন সাহিত্য উৎসবে তিনি আমন্ত্রিত হন তাঁর লেখা পাঠের জন্য। তিনি বেবি হালদার। 
    বর্তমানে ৪১ বছর বয়সি বেবির জন্ম হয় কাশ্মীরে। বাবা পেশায় ছিলেন গাড়ি চালক, মদের নেশায় চুর হয়ে থাকা ছিল তাঁর স্বভাব। এই মদ্যপানের অভ্যাসের কারণেই বেবির মা স্বামী ও সন্তানকে ছেড়ে চলে যান। বেবির বয়স তখন মাত্র ৪ বছর। দ্বিতীয় বিয়ে করেন বেবির বাবা। বেবিকে নিয়ে তাঁরা চলে আসেন মুর্শিদাবাদে, তারপর বসত গড়েন দুর্গাপুরে। মদ্যপ বাবা ও সৎ মায়ের হাতে ছোটবেলায় অনেক নির্যাতন সয়েছেন বেবি। মেয়ের বয়স যখন ১২, তখনই এক ২৬ বছর বয়সি পুরুষের সঙ্গে বেবির বিয়ে দিয়ে দেন বেবির বাবা। বিয়ের রাত্রেই স্বামীর হাতে ধর্ষিতা হন কিশোরী বেবি। ১৩ বছর বয়সে বেবির প্রথম সন্তানের জন্ম হয়। পরবর্তী কয়েক বছরের মধ্যে আরও দু'টি সন্তানের জন্ম দেন বেবি। 
    স্বামীগৃহে নিয়মিত মারধর ও যৌন নির্যাতন সহ্য করতে না পেরে ২৫ বছর বয়সে তিন সন্তানকে নিয়ে বেবি চড়ে বসেন দিল্লির ট্রেনে। কিন্তু দিল্লিতে নিজের পেট চালানো সহজ ছিল না। বাধ্য হয়ে পরিচারিকার কাজ নেন তিনি। কিন্তু সেখানেও জোটে অসম্মান। যাঁর বাড়িতে কাজ করতেন তাঁর কাছ থেকে আসতে থাকে অশালীন প্রস্তাব। কাজ ছেড়ে দেন বেবি। নতুন কাজ নেন গুরগাঁও নিবাসী প্রবোধ কুমারের বাড়িতে। এর পরেই নতুন বাঁক নেয় বেবির জীবন। 
    প্রবোধ কুমার শুধু প্রখ্যাত হিন্দি সাহিত্যিক মুন্সি প্রেমচাঁদের নাতি নন, তিনি নিজেও একজন সাহিত্যরসজ্ঞ। তিনি লক্ষ্য করেছিলেন, মাঝেমধ্যেই নিজের কাজ থামিয়ে কৌতূহলী দৃষ্টিতে বেবি তাকিয়ে থাকেন প্রবোধের বইয়ের আলমারিগুলির দিকে। প্রবোধ বুঝতে পারেন, বইয়ের প্রতি টান রয়েছে বেবির। প্রবোধের আলমারিতে বাংলা বইয়ের সংখ্যাও নেহাৎ কম ছিল না। প্রবোধ সেই বইগুলি একটি একটি করে তুলে দিতে থাকেন বেবির হাতে। বেবি আগ্রহভরে পড়ে ফেলতে শুরু করেন প্রতিটি বই। স্কুলে ক্লাস সেভেন পর্যন্ত পড়াশোনা করা বেবিকে আরও ভাল করে লেখাপড়াও শেখান প্রবোধ। 
    কিন্তু প্রবোধের মনে হয়েছিল, বেবির মধ্যে সুপ্ত রয়েছে এক লেখিকা সত্তা। সেই সত্তাকে উদ্বোধিত করতে চেয়েই একদিন বেবির হাতে খাতা-কলম তুলে দেন প্রবোধ। বলেন, নিজের কাহিনি লিপিবদ্ধ করতে। লেখার কথায় প্রথমটা একটু ঘাবড়েই গিয়েছিলেন বেবি। কিন্তু তারপর তসলিমা নাসরিন, আনা ফ্রাঙ্ক, ঝুম্পা লাহিড়ির লেখার ভক্ত বেবির মনে হয়, তাঁর লেখাই হয়ে উঠতে পারে তাঁর ভিতরে জমে থাকা যন্ত্রণা প্রকাশের মাধ্যম। ২০০২ সালে প্রকাশিত হয় তাঁর আত্মজীবনীর প্রথম খণ্ড 'আলো আঁধারি'। ২০০৬ সালে প্রবোধের উদ্যোগে সেই বইয়ের ইংরেজি অনুবাদ প্রকাশ পায় 'আ লাইফ লেস অর্ডিনারি: আ মেমোয়ার'নামে। প্রকাশের সঙ্গে সঙ্গে সাড়া ফেলে দেয় বইটি। কয়েক বছর পরে প্রকাশিত হয় বেবির আত্মকাহিনির পরবর্তী খণ্ড— 'ঈষৎ রূপান্তর'। বই দু'টি লেখিকা হিসেবে প্রতিষ্ঠা দেয় বেবিকে। 
    আজ বেবি স্বনামধন্য লেখিকা। তাঁর আত্মকাহিনি প্রশংসা কুড়িয়েছে বহু পাঠক ও সমালোচকের। কিন্তু এখনও প্রবোধের বাড়িতে পরিচারিকার কাজই করেন বেবি। তাঁর বক্তব্য, 'প্রবোধবাবু আমার নিজের বাবার মতোই। তাঁর বাড়িতে কাজ করতে আমার ভালো লাগে। তাঁকে ছেড়ে চলে যাওয়ার কথা আমি ভাবতেই পারি না।'শুধু তাই নয়, বেবিকে কেউ 'লেখিকা'বললে তিনি বরং বিব্রতই বোধ করেন। বেবি বলেন, 'আমি সামান্য পরিচারিকা মাত্র'।
    সে তিনি যা-ই বলুন, পাঠক তাঁকে চেনে এক অসামান্য আত্মকাহিনির লেখিকা হিসেবেই। নিজের প্রথম জীবনে অজস্র যন্ত্রণা সহ্য করতে হয়েছে তাঁকে। কিন্তু এখন পাঠক আর সমালোচকদের ভালবাসা আর শ্রদ্ধায় পরিপূর্ণ তাঁর বেঁচে থাকা। নিজের জীবনকে কীভাবে সৎ প্রচেষ্টার মাধ্যমে দুর্ভাগ্যের অন্ধকার থেকে আলোর দিকে নিয়ে যাওয়া যায়, তারই এক জীবন্ত দৃষ্টান্ত বেবি হালদার। সেই সঙ্গে বহু মানুষের অনুপ্রেরণাও তিনি। 
    কুর্নিশ তাঁকে।


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    अमेरिकी बाउल गायक गीतकार बॉब डिलान के रंगकर्म को साहित्य का नोबेल पुरस्कार

    रवींद्र की गीताजंलि के बाद संगीतबद्ध लोकसंस्कृति और विविधता बहुलता को मिले इस नोबेल से विश्वव्यापी अभूतपूर्व हिंसा और अविराम युद्धक घृणा के खिलाफ रंगभेदी शास्त्रीयता तोड़कर भारत की विविधता और बहुलता की ही जीत यह

    बाउल कवि के रंगकर्म को नोबेल पुरस्कार से हम इप्टा आंदोलन को नये सिरे से पुनर्जीवित कर सकें तो इस दुस्समय में आम जनता के सुख दुःख,उसके रोजमर्रे की जिंदगी और जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता के हक हरकूक की लड़ाई के प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता साबित कर सकते हैं।

    पलाश विश्वास

    Bob Dylan - A Hard Rain's A Gonna Fall - Live at the Gaslight - 1962 ...

    Video for i heard the song of a poet who died in the gutter▶ 6:42

    https://www.youtube.com/watch?v=wNBmn0kgTv4

    Apr 28, 2015 - Uploaded by Edward R. Jenkins

    I've been out in front of a dozen dead oceans ... And what did you hear, my blue-eyed son? .


    नोबेल पुरस्कारों की नींव में बिछी बारुदी सुरंगों की वजह से,युद्धबाजों और मुक्तबाजारियों को नोबेल शांति पुरस्कार और अर्थशास्त्र के लिए नोबेल मान्यता की वजह से,आस्कर में रंगभेदी श्वेत वर्चस्व की वजह से निजी तौर पर किसी नोबेलिये के महिमामंडन मैं करता नहीं हूं।इसबार अमेरिकी बाउल कविअत्यंत लोकप्रिय गायक गीतकार बॉब डिलान को साहित्यका नोबेल पुरस्कारमिला है।खास बात यह है कि पिछले 50 वर्षो से तमाम युवा पीढ़ियो की आवाज माने जाने वाले अमेरिकी गीतकार और गायक बॉब डिलन को इस वर्ष के साहित्यके नोबेल पुरस्कारके लिए चुना गया है। हालांकि ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी गीतकार और गायक को यह पुरस्कारदिया जा रहा है।इससे पहले भारतीय कवि रवींद्र नाथ को गीतांजलि के गीतों के लिए नोबेल पुरस्कार मिला है।

    गायक बॉब डिलन को इससे पहले उनके गीतों के रंगकर्म के लिए आस्कर मिल चुका है।महान नाटककार जार्ज बर्नार्ड शा के बाद वे शायद पहले रंगकर्मी हैं,जिन्हें आस्कर और नोबेल पुरस्कार दोनों मिले हैं।वियतनाम युद्ध और आसमान से तेजाब वर्षा को एकसाथ जोड़ते हुए कोलकाता और वियतनाम में गटर में कवि और कविता की मौत पर उन्होंने लिखाः

    I heard the song of a poet who died in the Gutter!

    दक्षिण एशिया में गहराते युद्धोन्माद के खिलाफ वियतनाम युद्धविरोधी या

    तेल युद्ध के खिलाफ अमेरिका में हुए संस्कृतिकर्मियों के किसी आंदोलन बारे में हमें सोचने तक की आजादी नहीं है,जाहिर है इस दुस्समय में ब्राह्णण धर्म के फासिज्म के पुनरूत्थान के मुकाबले सिंधु सभ्यता,वैदिकी साहित्य और बुद्धमय भारत की निरंतरता के सिलसिले में बाउल आंदोलन की यह वैश्विक मान्यता रवींद्र को नोबेल पुरस्कार की तरह भारत में भी विविधता और बहुलता की संस्कृति और रचनाधर्मिता की विधाओं को नये सिरे से पुनर्जीवित करेगी,इसी दृष्टि के साथ यह आलेख है।

    रवींद्रनाथ ने गीतों और नाटकों के अलावा सभी विधाओं में लिखा है,लेकिन उन्हें पुरस्कार उनके बाउल गीतों के लिए ही मिला तो अमेरिकी बाउल कवि बॉब डिलान का लेखन तो सिरे से उपन्यास, कविता या किसी अन्य परंपरागत विधा में नहीं आता है, जिसके लिए अब तक यह पुरस्कारदिया जाता रहा है।

    स्वीडिश एकेडमी ने कहा कि 75 साल के डिलान को ''अमेरिकी गीतों की लंबी परंपरा में नयी काव्य शैली विकसित करने के लिए'' नोबेल पुरस्कार दिया गया है। पुरस्कार की घोषणा के कार्यक्रम में मौजूद पत्रकारों ने हैरान होने के बाद तालियां बजाकर इसका स्वागत किया।पूर्व में भी नोबेल के लिए गायक के नाम की अटकलें लगी थी लेकिन उनकी दावेदारी को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया था।

    नोबेल समिति ने इस बारे में घोषणा करते हुए कहा कि अमरीकी गीतों को नया आयाम देने के लिए बॉब डिलन को यह पुरस्कारदिया जा रहा है।किसी गीतकार गायक को संभवत: पहली बार उनके गीतों के लिए नोबेलदिया गया है। गीतों के लिए कवियों को नोबेल पुरस्कारदिए जा चुके हैं। बॉब डिलान के गीत पूरी दुनिया में बेहद लोकप्रिय रहे हैं। उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में मिस्टर टैंबूरिन मैन से लेकर लाइक ए रोलिंग स्टोन, ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर चेजिंग शामिल हैं।

    बंगाल के बाउलों को अमेरिका ले जाकर इन्हीं  बॉब डिलोन ने सालभर उनके साथ मंच साझा किया है अमेरिका के कोने कोने में और उनके नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बाद बंगाल के सबसे बुजुर्ग और प्रतिष्ठित बाउल कवि और गायक पूर्णचंद्र बाउल ने बाउल गायकों के साथ बॉब डिलोन की उस साझे चुल्हे का संस्मरण बांग्ला दैनिक आनंद बाजार के पाठकों के साथ शेयर किया है।बॉब डिलोन उनके छोटे बेटे की शादी के मौके पर बंगाल आये थे।

    साठ के दशक से बांग्ला कविता में अमेरिकी युद्धविरोधी संगीत का गहरा असर रहा है।इसी सिलसिले में सुनील गंगोपाध्याय जैसे कवियों की अमेरिकी कवि ऐलेन जींसबर्ग से दोस्ती हुई और वियतनाम युद्ध के खिलाफ बंगाल में भी भारी आंदोलन हुआ है।जिसका असर भारत में साहित्य की विभिन्न विधाओं में होने वाले आंदोलनों पर होता रहा है।

    भारत में वियतनाम या खाड़ी युद्ध के खिलाफ आंदोलन होते हैं,जिनका सीधा संबंध भारत के शासक तबके के हितों से न था।

    अमेरिका में युद्धविरोधी आंदोलन लेकिन राष्ट्र के सैन्यकरण,पागल दौड़ के उपभोक्तावाद और स्त्री उत्पीड़न के खिलाफ हुआ है जो सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्र के साम्राज्यवाद के खिलाफ और अमेरिकी राष्ट्रपतियों के युद्धोन्माद और अमेरिकी युद्धक अर्थ व्यवस्था और राजनीति के खिलाफ रहा है।

    इस युद्धविरोधी बाउल विमर्श का प्रतिनिधित्व जैसे ऐलेन जींसवर्ग के नेतृत्व में अमेरिकी संस्कृतिकर्मियों ने साठ के दशक में किया,वह सिलसिला करीब पांच दशकों से बॉब डिलान करते आ रहे हैं और बाउल दर्शन उनके रंगकर्म की अंतरात्मा है,जो एकमुश्त सिंधु सभ्यता, वैदिकी साहित्य और बुद्धमय भारत की विविधता और बहुलता की संगीतबद्धता है।

    नोबेल कमिटी के मुताबिक अमेरिकी संगीत परंपरा में पठनीय गीत रचने के लिए बॉब डिलान को यह पुरस्कार दिया जा रहा है और इस सिलसिले में यूनानी महाकवि होमर और नाटककार सोफोक्लीज के पठनीय साहित्य के रंगकर्म का उल्लेख किया गया है।लेकिन गौर से देखें तो यह पुरस्कार भारत में लालन फकीर के आध्यात्म, देहतत्व और दर्शन,बाउल आंदोलन की परंपरा में रवींद्र काव्यधारा की,और उससे भी ज्यादा डोनाल्ड ट्रंप जैसे फासिस्ट के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की प्रबल संभावना के खिलाफ भारत की बुद्धमय विविधता बहुलता की सिंधु सभ्यता  के लिए इस बार का यह नोबेल पुरस्कार है।

    हालांकि यह पुरस्कार औपचारिक तौर पर आंग्ल अमेरिकी साहित्य के लिए दिया गया है तो संगीतबद्ध गीतों को पुरस्कार का औचित्य सिद्ध करने के लिए साहित्य के परफरमैंच यानी रंगकर्म की पठनीयता और पाठ पर इतना जोर दिया गया है।

    इसके मद्देनजर भारतीय रंगकर्म में साहित्य और बाकी कलामाध्यमों,विधाओं के समावेश की प्रासंगिकता फिर साबित होती है,जिसे ऋत्विक घटक के कोमल गांधार के मुताबिक,गायक देवव्रत विश्वास के अवरुद्ध संगीत के मुताबिक,सोमनाथ होड़ और चित्तोप्रसाद की पेंटिंग बजरिये भुखमरी की रिपोर्टिंग के मुताबिक और भारतीय सिनेमा में लोक संस्कृति की गण नाट्य परंपराओं के मुताबिक कहा जा सकता है कि वाम आत्मघाती जनविमुख सत्ता राजनीति ने मार देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।

    फिर भी जनप्रतिबद्धता के मोर्चे पर लोकसंस्कृति की जमीन पर इप्टा आंदोलन जारी है,उसकी विविध बहुल भारतीयता पर फासिज्म का प्रहार इसीलिए इतना तेज होता जा रहा है।

    बाउल कवि के रंगकर्म को नोबेल पुरस्कार से हम इप्टा आंदोलन को नये सिरे से पुनर्जीवित कर सकें तो इस दुस्समय में आम जनता के सुख दुःख,उसके रोजमर्रे की जिंदगी और जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता के हक हकूक की लड़ाई के प्रति हम अपनी प्रतिबद्धता साबित कर सकते हैं।

     गौरतलब है कि अब तक साहित्यमें सबसे अधिक नोबेलपुरस्कार  जीतने वाले अंग्रेजी के लेखक (27) रहे हैं। उसके बाद फ्रेंच (14) और तीसरे नंबर पर (13) जर्मन हैं।

    गौरतलब है कि अफ्रीकी साहित्यकार न्गुगी वा थ्योंगो इस बार इस पुरस्कार के जबरदस्त दावेदार थे।उनकी कृति का अनुवाद आंनदस्वरुप वर्मा ने मूल अफ्रीकी भाषा में अफ्रीकी साहित्य और विद्वता का भविष्य शीर्षक से किया है।

    इस अश्वेत अफ्रीकी साहित्यकार के लिए दरअसल हमें साहित्य के लिए इस बार के नोबेल पुरस्कार का इंतजार था।इसके विपरीत,अमेरिकी बाउल गायक गीतकार बॉब डिलानको साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला रवींद्र की गीतांजलि को पुरस्कार की याद दिलाते हुए तो बंगाल की सिंधु सभ्यता और संस्कृति की बुद्धमय विविधता और बहुलता को विश्वव्यापी  इन युद्ध परिस्थितियों के मद्देनजर यह सर्वोचच मान्यता की प्रासंगिकता से मुझे कोई संदेह नहीं।

    खास तौर पर वियतनाम युद्ध के खिलाफ अमेरिकी युवा पीढियों में जो वैकल्पिक लोक संस्कृति की विद्रोही धारा है,बॉब डिलोन उसके पचास साल से निरंतर प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और संजोग से वे न सिर्फ बाउल है ,बल्कि भारत के बाउल गीतकारों गायकों से उनका नाभि नाल का संबंध भी दशकों पुराना है।

    अभी हाल में  हस्तक्षेप और अन्यत्र आपने गीतगोविंदम,महाकवि जयदेव और चैतन्य महाप्रभु के वैष्णव और बाउल आंदोलन में सिंधु सभ्यता और बुद्धमयबंगाल की निरंतरता पर मेरा आलेख पढ़ा होगा।वेव पर यह लंबा आलेख था,जो सही मायने में शोध निबंध होना चाहिए था,लेकिन उस तरह लिखने का मेरे पास कोई अवसर नहीं है।क्योंकि मुझे कहीं प्रकाशित होने की उम्मीद न होने की वजह से मैं सीधे जनता को संबोधित करता हूं।

    दरअसल बाउल और सिंधु सभ्यता,वैदिकी साहित्य से लेकर यूनानी शास्त्रीय साहित्य तक साहित्य रंगकर्म से बहुत गहराई तक जुड़ा रहा है।जिसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति भारत में इप्टा के आंदोलन में होती रही है,जिसमें सभी माध्यम और विधायें रंगकर्म में एकाकार है।

    रंगकर्म यानी अभिव्यक्ति की तमाम दीवारों को लोकसंस्कृति के समुंदरी सैलाब से ढहाने के लिए आम जनता के मुखातिब होकर सामाजिक यथार्थ को सीधे संबोधित करना है।इसलिए रवींद्र की गीताजंलि के बाद संगीतबद्ध लोकसंस्कृति और विविधता बहुलता को मिले इस नोबेल से विश्वव्यापी अभूतपूर्व हिंसा और अविराम युद्धक घृणा के खिलाफ रंगभेदी शास्त्रीयता तोड़कर भारत की विविधता और बहुलता की ही जीत है यह।इसे गहराई से समझने की जरुरत है।समझेंगे तो हम नया रंगकर्म सिरज सकेंगे।कविता और गीतों के रंगकर्म की यह परंपरा विशुध भारतीय है।भारतीय काव्यधारा की विरासत भी यूनानी काव्यधारा की तरह हमारी गौरवशाली रंगकर्म परंपरा है।इसे हम जितनी जल्दी समझें,हम आम जनता के उतने नजदीक होंगे।

    1941 में मिनेसोटा के डुलुथ में एक साधारण परिवार में जन्मे रॉबर्ट एलेन जिमेरमन उर्फ बॉब डिलेन ने बड़े होने के साथ हार्मोनिका, गिटार और पियानो बजाना सीखा। डिलेन को पुरस्कारके साथ 80 लाख क्रोनोर (9,06,000 डॉलर) की धनराशि मिलेगी। साहित्यके नोबेल पुरस्कारकी घोषणा के साथ इस साल के नोबेल पुरस्कारोंके सभी विजेताओं की सूची पूरी हो गयी। इससे पहले चिकित्सा, भौतिकी, रसायनशास्त्र, अर्थशास्त्र और शांति के नोबेल पुरस्कारोंकी घोषणा की जा चुकी है।

    बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रॉक सिंगर बॉब डिलन (75) को यह पुरस्कारअमेरिकी गायन परंपरा में नया काव्य भाव जोड़ने के लिए दिया गया है। डिलन का नाम रॉबर्ट जिम्मरमैन था। उनका जन्म सन् 1941 में हुआ था। मिनेसोटा के कॉफी हाउस में प्रदर्शन करते हुए उन्होंने संगीत के क्षेत्र में अपना करियर सन् 1959 में शुरू किया था।

    Top 10 Bob Dylan Songs - YouTube

    Video for bob dylan▶ 13:18

    https://www.youtube.com/watch?v=BG8y0rRYjEI

    Jul 13, 2014 - Uploaded by WatchMojo.com

    He's tangled up in blue. Welcome to WatchMojo.com, and today we're counting down our picks for the top 10 ...

    BOB DYLAN - Mr Tambourine Man - YouTube

    Video for bob dylan▶ 5:27

    https://www.youtube.com/watch?v=PYF8Y47qZQY

    Dec 5, 2013 - Uploaded by Bankymen

    I'm "here because of the Nobel" but I actually DO listen to Dylan and have my ... The point is that it ISNT Bob ...

    Bob Dylan The Times They Are A Changin' 1964 - YouTube

    Video for bob dylan▶ 2:38

    https://www.youtube.com/watch?v=e7qQ6_RV4VQ

    Dec 27, 2013 - Uploaded by 54321p

    TV Movie, The Times They are a Changing' (1964) Directed by: Daryl Duke Starring: Bob Dylan.

    Bob Dylan - Knockin' On Heaven's Door (Unplugged) - YouTube

    Video for bob dylan▶ 4:33

    https://www.youtube.com/watch?v=cJpB_AEZf6U

    Oct 25, 2009 - Uploaded by BobDylanVEVO

    Originally recorded in 1973 for the soundtrack of "Pat Garrett and Billy the Kid," Knockin' on Heaven's Door ...

    Bob Dylan - Songwriter, Singer - Biography.com

    Video for bob dylan

    www.biography.com/people/bob-dylan-9283052

    Biography.com offers a glimpse at legendary singer-songwriterBob Dylan, whose songs chronicle social ...

    Bob Dylan - Subterranean Homesick Blues - YouTube

    Video for bob dylan▶ 2:19

    https://www.youtube.com/watch?v=MGxjIBEZvx0

    Oct 9, 2015 - Uploaded by BobDylanVEVO

    In 1965, Bob Dylan released his fifth studio album, Bringing it All Back Home - watch the official music video ...

    How Bob Dylan Made Pre-Rock Masterpiece 'Love and Theft' - Rolling ...

    Video for bob dylan

    www.rollingstone.com/.../how-bob-dylan-made-pre-ro...

    Sep 11, 2016

    Read how Bob Dylan drew on Chicago blues, Tin Pan Alley crooning, jump blues and Western swing to create ...

    Like a Rolling Stone - Bob Dylan - YouTube

    Video for bob dylan▶ 6:21

    https://www.youtube.com/watch?v=4F0ytNzHDj8

    Feb 2, 2013 - Uploaded by SomDRock

    Like a Rolling Stone é uma canção de rock de 1965 escrita pelo cantor e compositor Bob Dylan, contida ...

    BobDylanVEVO - YouTube

    https://www.youtube.com/user/BobDylanVEVO

    Music video by Bob Dylan performing Forever Young (Slow Version) [audio]. (C) 1974 Columbia Records, a division of Sony Music Entertainment

    Bob Dylan - "Melancholy Mood (Audio)" - YouTube

    Video for bob dylan▶ 2:49

    https://www.youtube.com/watch?v=T2xBaX5awlc

    Apr 6, 2016 - Uploaded by BobDylanTV

    Melancholy Mood" from Bob Dylan's album 'Fallen Angels' out now! Amazon: http://smarturl.it ...

    Bob Dylan Hurricane - YouTube

    Video for bob dylan▶ 5:01

    https://www.youtube.com/watch?v=1FOlV1EYxmg

    Feb 20, 2014 - Uploaded by guitriff33

    Bob dylan, hurricane carter. ... I am from Scotland and I love this song I just love bob ... this is not bob dylan. good ...

    Bob Dylan wins 2016 Nobel Prize in literature - CNBC.com

    Video for bob dylan

    www.cnbc.com/.../bob-dylan-wins-2016-nobel-prize-i...

    16 hours ago

    Bob Dylan, regarded as the voice of a generation for his influential songs from the 1960s onwards, has won ...

    Bob Dylan wins the Nobel Prize for literature | Daily Mail Online

    Video for bob dylan

    www.dailymail.co.uk/.../Bob-Dylan-wins-Nobel-Prize-...

    17 hours ago

    Bob Dylan has been named the winner of the 2016 Nobel Prize in literature - the first time the prestigious ...

    Bob Dylan - Subterranean Homesick Blues - YouTube

    Video for bob dylan▶ 2:19

    https://www.youtube.com/watch?v=MGxjIBEZvx0

    Oct 9, 2015 - Uploaded by BobDylanVEVO

    In 1965, Bob Dylan released his fifth studio album, Bringing it All Back Home - watch the official music video ...

    Bob Dylan Awarded Nobel Prize in Literature - Rolling Stone

    Video for bob dylan

    www.rollingstone.com/.../bob-dylan-awarded-nobel-pr...

    16 hours ago

    Bob Dylan won the Nobel Prize in literature for "having created new poetic expressions within the great ...

    Bob Dylan - Forever Young (Slow Version) [audio] - YouTube

    Video for bob dylan▶ 4:59

    https://www.youtube.com/watch?v=Frj2CLGldC4

    Dec 24, 2015 - Uploaded by BobDylanVEVO

    Music video by Bob Dylan performing Forever Young (Slow Version) [audio]. (C) 1974 Columbia Records, a ...

    'Greatest living poet' Bob Dylan wins Nobel literature prize | Reuters

    Video for bob dylan

    www.reuters.com/.../us-nobel-prize-literature-idUSKC...

    15 hours ago

    Bob Dylan, regarded as the voice of a generation for his influential songs from the 1960s onwards, has won ...

    Bob Dylan - Desolation Row - Desert Trip - Indio CA - October 7, 2016 ...

    Video for bob dylan▶ 7:52

    https://www.youtube.com/watch?v=4QeFBhf6VJ0

    2 days ago - Uploaded by Fake Fan

    Bob Dylan performs Desolation Row at Desert Trip in Indio California on October 7, 2016.

    Bob Dylan wins the Nobel Prize for Literature 2016 | The Independent

    Video for bob dylan

    www.independent.co.uk› Culture › Books › News

    14 hours ago

    US folk singer-songwriter Bob Dylan has been awarded the Nobel Prize for Literature for having "created new ...

    Bob Dylan - To Fall In Love With You - YouTube

    Video for bob dylan▶ 5:14

    https://www.youtube.com/watch?v=Fqi9BNl1OhA

    Dec 20, 2015 - Uploaded by Pete Sugarman

    Bob Dylan - To Fall In Love With You. ... G.E. Smith on touring with Bob Dylan - EMMYTVLEGENDS.ORG ...




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    बाबू वृत्तांत में फ्रंटियर प्रसंग:

    समर सेन

    अनुवादः पलाश विश्वास

    Image result for Babu Brittanto by Samar Sen

    समयांतर,अक्तूबर,2016 में प्रकाशित

    (बाबू वृतांत समर सेन की आत्मकथा है,जो भारतीय सीहित्य में बेमिसाल है।  महज तीस साल की उम्र में कविताएं लिखना उन्होंने चालीस के दशक में छोड़ दी थी। स्टेट्समैन,नाउ और फ्रंटियर के मार्फत भारतीय पत्रकारिता में संपादन और लेखन के उत्कर्ष के लिए वे याद किये जाते हैं।बाबू वृतांत में आत्मकथा में अमूमन हो जाने वाली हावी निजी व्यथा कथा की चर्बी कहीं भी नहीं है और न उन्होंने पारिवारिक पृष्ठभूमि या परिजनों की कोई कथा लिखी है।वे मास्को में रहे हैं और वहां भी उन्होंने पत्रकारिता की है लेकिन बेवजह उस प्रसंग को भी उन्होंने ताना नहीं है।करीब सत्तर पेज के बाबू वृत्तांत में समकालीन सामाजिक यथार्थ को ही उन्होंने वस्तुनिष्ठ पद्धति से संबोधित किया है,जो आत्मकथामें आत्मरति की परंपरा से एकदम हटकर है। बमुश्किल चार पेज में उन्होंने फ्रंटियर निकालने की कथा सुनायी है और उसमें भी आपातकाल की चर्चा ज्यादा है। बाबू वृतांत अनिवार्य पाठ है।जिसमें से हम सिर्फ फ्रंटियर प्रसंग को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।- पलाश विश्वास)


    फ्रंटियर 1968 में 14 अप्रैल को बांग्ला नववर्ष के दिन पहली बार प्रकाशित हुआ। पहले पहल आशंका थी कि हो सकता है पैसे के बिना यह अटक ही जायेगा,किंतु शुरु से जोरदार खपत हो जाने से मामला मछली के तेल से मछली तलने का जैसा हो गया। शुरु के दो एक साल में जान लगाकर मेहनत और निजी आर्थिक संकट को छोड़ दें तो विशेष कोई असुविधा नहीं हुई। (नाउ के लिए व्यवसाय का मामला और आर्थिक चिंता मेरी जिम्मेदारी नहीं थी)। नाउ की तुलना में पहले साल वेतन आधे से कम था।इसके बाद तो वेतन आर्थिक हालात के मद्देनजर सांप सीढ़ी का खेल हो गया,कभी बढ़ जाये तो कभी घटता रहे। दस साल निकल गये, अक्सर लगता था कि घर में खा पीकर वन में भैंस हांक रहे हैं- वैसे भारतीय भैंसों को हांकना किसी पत्रिका के सामर्थ्य में होता नहीं है। विशेष तौर पर जब विज्ञापन संस्थाओं के अनेक लोग कहने लगे,फ्रंटियर के लिए `आपका सम्मान करते हैं',तब यह अहसास होता था,सम्मान से कोई बात बनती नहीं है।

    वह दिनकाल उत्तेजना का था।1968 में चारों दिशाओं में गर्म हवा,देश में और विदेश में भी। देश में नक्सलबाड़ी आंदोलन से नयी परिस्थिति बन गयी।1969 के चुनाव में फ्रंटियर में संयुक्त फ्रंट का समर्थन किया गया,लेकिन द्वितीय संयुक्त मोर्चा सरकार के कारनामे उजले नहीं लग रहे थे।बहुतों को अब याद ही नहीं होगा कि फ्रंट सरकार के घटकों में सत्ता पर वर्चस्व विस्तार के `संग्राम'के साथ खून खराबा का वह दौर शुरु हुआ। इसके बाद नक्सलपंथियों के साथ संघर्ष शुरु हो गया।ज्योतिबाबू, प्रमोदबाबू अब भी मारे गये मार्क्सवादियों के बारे में बात बात में चर्चा करते रहते हैं। बाहैसियत गृहमंत्री ज्योतिबाबू के लिए यह जानना जरुरी था कि एक मार्क्सवादी के मारे जाने पर कमसकम चार नक्सलवादी खत्म हो रहे थे।इसके अलावा थाना  पुलिस उन्हीं के नियंत्रण में थे,जहां तक नक्सलियों के जाने का कोई रास्ता ही नहीं था।

    फ्रंटियर की ख्याति कुख्याति नक्सल समर्थक पत्रिका बतौर अर्जित हो गयी। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद  पत्रिका के संपादकीय में इंदिरा समर्थक  उच्छ्वास पढ़कर अब मुझे परेशानी होती है।`बूढ़ों की टीम'की विदाई से बुरा महसुस तो नहीं हुआ,लेकिन भद्र महिला को लेकर भावुकता का कोई मायने न था।

    1970-71 के दौरान नक्सलपंथियों के सफाये के बारे में सीपीएम की भूमिका? वह बासी रायता फिर फैलाने का कोई फायदा नहीं है।किंतु मुजीब के मामले में भारतीय सशस्त्र वाहिनी के हस्तक्षेप के सिलसिले में रातोंरात सीपीएम के पलटी मारने के बारे एक बात कहना जरुरी है।अभ्यंतरीन मामलों में इंदिराविरोधी और किसी विदेशी राष्ट्र के साथ संघर्ष हो जाने की स्थिति में केंद्र सरकार को समर्थन- द्वितीय आंतर्जातिक की यह भूमिका सीपीएम ने काफी हद तक बनाये रखी है - हालांकि 1962 में चीन के साथ संघर्ष का मामला कुछ अपवाद जैसा है।

    1972 के चुनाव में भारी गड़बड़ी हुई थी।किंतु इंदिरा गांधी का जय अवश्यंभावी था।तब वे इस महादेश की सुलताना थीं।उसकी गुणमुग्ध सीपीएम को निर्वाचन में कोई विशेष सुविधा नहीं मिलनी थी,पार्टी को जान लेना चाहिए था।किंतु मात्र 13-14 सीटें। इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

    साठ सत्तर के दशक में वियतनाम युद्ध के महाकाव्य ने लोगों की आस्था को जिंदा रखा।चीन की सांस्कृतिक क्रांति से नये आदर्श की रचना हो गयी।उत्पादन क्षमता हाथों में आने से ही समाजवादी क्रांति का पथ अबाध नहीं हो जाता।हजारों साल की स्तुपीकृत मानसिक, राजनीतिक और आर्थिक कचरा की सफाई,मन की संरचना, अभ्यास में परिवर्तन के लिए संग्राम न करने से संशोधनवाद बार बार वापस चला आता है।

    देश के हालात क्रमशः बिगड़ते चले गये।महान नेत्री की महिमा ज्यादा दिनों तक बनी नहीं रही।1974 की रेलवे हड़ताल के नृशंस दमन, कानकटा मिथ्याचार के जो संकेत थे, वे बहुतों की पकड़ में नहीं आये।हमारी राजनीतिक पार्टियों में मैं विशष दूरदर्शिता देखता नहीं हूं।किस वक्त किससे समझौता करना चाहिए,यह हम नहीं जानते। इसके अलावा इंदिरा के समर्थन में महान सोवियत देश खड़ा था, नेतृत्व भले संशोधनवादी रहा हो, लेकिन वैदेशिक कार्यकलाप अति विप्लवी थे!

    पूर्व पाकिस्तान और श्रीलंका में आंदोलन के वक्त चीनी नेताओं के बयान निजी तौर पर मुझे अच्छे नहीं लगे। बांग्लादेश की परवर्ती घटनावली हांलांकि चीन के विश्लेषण का काफी हद तक समर्थन करती है क्योंकि चीन को भारतीय हस्तक्षेप पर मुख्य आपत्ति थी।`एक करोड़'शरणार्थी आगमन से पहले,लगभग अप्रैल की शुरुआत से भारत सरकार ने पूर्व पाकिस्तान में हथियार भेजने शुरु कर दिये थे,इसके प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं।

    देश में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन बिहार और अन्यत्र तेज होता रहा।इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला,गुजरात में कांरग्रेस सरकार की परायज- सब मिलाकर भद्रमहिला अत्यंत घिर चुकी थीं। तय था कि गणतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए जयप्रकाश नारायण के साथ सीपीएम पंथी चल सकते हैं। मैदान में विशाल रैली में इस नीति की घोषणा हो गयी। हांलांकि उस नीति का पालन नहीं हुआ।

    26 जून को ट्राम से दफ्तर जाते हुए आपातकाल के ऐलान के बारे में सुनकर पहले तरजीह नहीं दी- एक आपातकाल तो जारी था,और एक कहां से आना था? काफी हाउस में मालूम पड़ा,प्री सेसंरशिप चालू हो रही है। फ्रंटियर तब प्रेस में था-तारीख 28 जून का लगना था।उस अंक में इंदिरा गांधी विषय पर एक अतिशय तीव्र संपादकीय (मेरा लिखा हुआ नहीं) जा रहा था।उसे तब भी रोका जा सकता था,लेकिन मैंने कोई  परवाह नहीं की। बाद में वह अंक जब्त हो गया।5 जुलाई के अंक में  प्रीसेंसरशिप की वजह से हो रही नाना असुविधाओं के बारे में एक नोटिस छापा गया।  प्रशासन ने लिखा वह highly objectionable है।दो एक को  छोड़कर सरकारी विज्ञापन बहुत पहले 1971 में रेडियो पाकिस्तान पर फ्रंटियर के संपादकीय से एक दो उद्धरण सुनाये जाने के बाद बंद हो गया था।

    पहले एक दो दिन प्रीसेंसरसिप का मसला क्या है,कैसे लागू होगी,इस बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता था।इसके बाद कुछ हफ्ते लेख, वगैरह राइटर्स दे आता था,जो अगले दिन वापस मिलते थे।आखिरकार राइटर्स को लिखा,इस तरह कोई साप्ताहिक नियमित निकाला नहीं जा सकता,बहुत कुछ आखिरी पल छापना पड़ता है एवं संपूर्ण जिम्मेदारी संपादक की होती है।छापेखाने में विश्रृंखला और पैसों की किल्लत से कामकाज अच्छा हो नहीं पा रहा था।इसलिए राइटर्स को लेख भेजना  बंद कर दिया। विदेशी मामलों में अनेक मूल्यवान लेख निकलते थे, देश के संदर्भ में From the Press स्तंभ के तहत विभिन्न पत्र पत्रिकाओं से उद्धरण छापे जाते थे।बीच बीच में जरुर लगता था,इस तरह पत्रिका चलाना निरर्थक है।किंतु मनुष्य अभ्यास और रोजगार का दास है।पत्रिका बंद होने पर कई लोग बेरोजगार हो जाते।

    इमरजेंसी के वक्त पुराने लेखकों से संपर्क छिन्न हो गया।इसका मुख्य कारण यह था कि देश के बारे में खुलकर कुछ लिखने का उपाय नहीं था।किसी तरह एक संपादकीय लिख दिया तो वह पर्याप्त।इच्छा होती कि कुछ ऐसा छाप दूं, जिससे पत्रिका बंद हो जाये।किंतु यह स्वीकार करने के लिए बाध्य हूं कि उत्तर भारत की तुलना  में पश्चिम बंगाल में सख्ती कम थी।यहां इंदिरा संजय के चेले चामुंडे अंग्रेजी खास समझते न थे, इस वजह से फ्रंटियर के लिए थोड़ी सुविधा थी।एक मंत्री ने तो रात में स्टेट्समैन के दफ्तर से निकलकर गर्व से कहा कि वे सबकुछ `census'करके निकले हैं।

    एकबार वियतनाम के गुरिल्ला युद्ध पर केंद्रित चार पृष्ठ की एक कहानी कंपोज कराकर प्रेस में निश्चिंत बैठा था कि खबर आ गयी,उसे छापा नहीं जा सकता- गुरिल्ला युद्ध की चर्चा न हो तो बेहतर।यह खबर दिल्ली स्थित वियतनाम दूतावास में एक विदेशी पत्रकार के मार्फत पहुंचने पर उन्होने हैरत जताई। `फासिस्टविरोधी 'संग्राम में बीच बीच में विचलन अस्वाभाविक नहीं है।संभवतः इसीलिए पटना के फासिस्टविरोधी  सम्मेलन में हनोई से प्रतिनिधि शामिल हो गये (यह अंश जब लिखा,तब चीन का वियतनाम से झमेला शुरु नहीं हुआ था)।

    दिन कट रहे थे,दिन गत,पाप क्षय।1976 में मार्च के अंत में दफ्तर में बैठा था, फ्रंटियर का का एक फर्मा छप चुका थाऔर दूसरा मशीन पर लगने वाला था, हठात् सशस्त्र पुलिस वाहिनी ने आकर छापाखाना जब्त कर लिया। दर्पण पत्रिका की ओर से कोई लेख राइटर्स भेजा नहीं जाता था (हम भी नहीं भेजते थे),उस दर्पण के मुद्रण के अपराध में प्रेस को बंद कर दिया गया,सरकार ने दर्पण के संपादक को कोई पत्र लिखने की जरुरत भी महसूस नहीं की।छापेखाने पर चौबीसों घंटे पालियों में सशस्त्र पहरा। फ्रंटियर छपना बंद हो गया। डेढ़ महीने बाद सरकारी की इजाजत लेकर हम अपने  न्यूज प्रिंट,लेख इत्यादि निकालने पहुंचे तो वहां जाकर सुना कि छापेखाने में पीछे की ओर रखा कुछ भारी और कीमती यंत्र, वगैरह की तस्करी हो गयी।एक सशस्त्र प्रहरी ने कहा,`बाबा रात में उधर कौन जायेगा,रोंगटे खड़े हो जाते हैं। '

    अप्रैल में फ्रंटियर बंद रहा (बंद न रहता तो ऋत्विक घटक के कई फिल्में पहले देखने की आश्चर्यजनक अभिज्ञता न होती)।दूसरे छापाखाना जाना संभव नहीं था, क्योंकि तब उसी छापेखाने पर प्रशासन तोप दाग रहा होता। बाद में एक अत्यंत छोटे से छापेखाने की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रशासन से निवेदन किया कि उन्हें जरुरी लगे तो वे अवश्य पत्रिका के खिलाफ action लें, छापेखाने के खिलाफ नहीं। पहले पहल उन्हें कुछ गैलि प्रूफ भेजते थे, मुंह बंद रखने के लिए! किंतु तब 24 घंटा नहीं,लेख, आदि वापस मिलने में 26 घंटे इंतजार करना होता।साप्ताहिक इस तरह नहीं चल  सकता। लेख भेजना फिर बंद कर दिया।तब तक इरजेंसी में कुछ शिथिलता आ गयी थी, कमसकम पूर्व भारत में।


    आपातकाल में बुद्धिजीवियों की भूमिका

    समरसेन

    (यह बाबू वृत्तांत का अंश नहीं है,स्वतंत्र आलेख है)

    आपातकाल की घोषणा से करीब पंद्रह दिन पहले लगभग दो सौ बुद्धिजीवियों ने एक फासिस्टविरोधी बयान जारी कर दिया।वे तमाम बुद्धिजीवी इंदिरा सरकार को प्रगतिशील मानते हैं-या मानते थे।इनके लिए जयप्रकाश का आंदोलन फासीवाद था। दस्तखत करने वालों में साहित्यकार,अध्यापक,पत्रकार,कलाकार वगैरह शामिल थे।26 जून को इंदिरा गांधी ने अपने भाषण में इन्हीं के वक्तव्य को दोहरा दिया।उस विशेष बुद्धिजीवी महल में आपातकाल से विशेष उल्लास का सृजन हो गया।

    मुझे अब्यंतरीन आपातकाल की खबर दफ्तर जाते हुए ट्राम में मिली,तब ध्यान नहीं दिया। दफ्तर पहुंचने पर एक प्रख्यात प्रगतिशील फिल्म निर्देशक ने अत्यंत उत्तेजित भाव के साथ फोन किया।ब्यौरेवार वृत्तांत चित्तरंजन एवेन्यू के काफी हाउस में सुना, दोपहर एक बजे के बाद।वहां जो लोग थे,उनमें अनेक लोग बुद्धिमान थे।इंदिरा गांधी के किसी समर्थक को वहां नहीं देखा।

    इसके  दो सप्ताह बाद अखबार में पढ़ा कि हमारे परिचित दो तीन प्रगतिशील बंगाली फिल्म निर्देशक और रंगकर्मी नेता श्रीमान सुब्रत मुखोपाध्याय के नेतृत्व में मास्को फिल्मोत्सव की यात्रा पर गये हैं। इनमें से एक की आर्थिक स्थिति अत्यंत अच्छी  थी- वे ना जाते तो भविष्य में उन्हें क्षति नहीं होती।दूसरे की हालत सुविधाजनक न थी।किंतु काम या किसी और बहाने वे भी नहीं जा सकते थे।

    पहलेजिन बुद्धिजीवियों का उल्लेख किया है,उनमें अधिकांश  समाज और सरकार में विभिन्न स्तर पर प्रतिष्ठित थे,ये सीपीआई मास्को के समर्थक थे।यह सोचने की बात थी कि तथाकथित बुद्धिजीवियों की संख्या सबसे ज्यादा सीपीआई में थी। सांस्कृतिक क्षेत्र में,पुरस्कार वितरण या विदेश यात्रा के मामले में ये कांग्रेसी जमाने में कांग्रेसियों से भी आगे निकल गये थे। नवीन कांग्रेसियों में शिक्षित बाहुबली हावभाव वाले व्यक्तियों की संख्या ज्यादा थी।

    सेंसरशिप और समाचार के बावजूद थोड़ी बहुत खबरें और अफवाहें बंद नहीं हुईं। अनीक पत्रिका के दीपंकरबाबू गिरफ्तार हो गये।उसके भी उपरांत `कोलकाता'पत्रिका में लिखने के अपराध में गौरकिशोर घोष गिरफ्तार कर लिये गये।दीपंकर बाबू माओपंथी थे तो गौरकिशोर घोष कम्युनिस्टों की विरोधिता लगातार करते रहे, किंतु आर्थिक लाभ या अपने विकास के लिए नहीं।वरुण सेनगुप्त सिद्धार्थशंकर की आंखों की किरकिरी बने हुए थे,जेल में डाल दिये गये।उनके बहुत बाद भूमिगत `कोलकाता' के संपादक ज्योतिर्मय दत्त।सीपीआई पंथियों के मुताबिक वामपंथी और दक्षिणपंथियों का यह गठजोड़ सीआईए के कार्यकलापों और प्रभाव का नतीजा था- जैसा इंदिरा गांधी का भी मानना था।विदेश में विशेष तौर पर समाजवादी देशों (चीन,उत्तर कोरिया और अलबेनिया को छोड़कर) ने इंदिरा गांधी का समर्थन कर दिया,वियतनाम ने भी।कितने वामपंथी जेल में ठूंस दिये गये,वह शायद इन देशों के जनगण को मालूम न था। जयप्रकाश के आंदोलन में जो दल एकजुट हुए,वे दक्षिणपंथी रुप में परिचित थे। इमरजेंसी से पहले कोलकाता मैदान में ज्योति बसु ने जयप्रकाश नारायण के साथ एक ही मंच पर खड़े होकर आश्वासन दे दिया कि जनता के अधिकार खत्म हुए तो उनकी पार्टी जयप्रकाश का समर्थन करेगी।भारतवर्षव्यापी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद,जन साधारण के सारे अधिकार जब खत्म होने लगे, तब भी पश्चिम बंगाल में किसी आंदोलन की कोई खबर हमें नहीं मिली।चुएन लाई की मृत्यु पर शोकसभा बुलाई गयी, पुलिस में इजाजत नहीं दी और आयोजक मान भी गये।माओ त्से तुंग की मृत्यु के बाद हालांकि छोटे छोटे हाल में कुछेक शोकसभाएं हुई थीं।

    देश में अन्यत्र क्या हो रहा था, जानने का कोई उपाय नहीं था।विदेशी पत्र पत्रिकाएं काफी कम पाठकों तक पहुंचती थीं।पहले दौर में इंदिरा गांधी के लिए सेंसरशिप बहुत काम की चीज साबित हुई क्योंकि दूसरे स्थानोंसे आंदोलन की खबरें न मिलने से विरोधियों का मनोबल टूट जाता है,असहाय लगता है और यह भी लगता है कि शायद जनगण बछड़ों में तब्दील हैं। इसके अलावा संस्कृति में जो लोग खुद को अग्रगामी समझते थे,वे रेडियो,टेलीविजन एवं वृत्तचित्रों केमाध्यम से सरकार से सहयोग कर रहे थे।रवींद्रभक्त उनके नाना गान पर निषेधाज्ञा के बावजूद गला खुलकर उन्हीं के दूसरे गान गा रहे थे।विगत एक लेखक ने कहा था कि उन्हें उनकी लिखी एक निराशावादी कविता का पाठ रेडियो पर करने नहीं दिया गया।दूसरी कविता का पाठ उन्होंने क्यों किया,मैंने यह उनसे पूछा नहीं।

    इमरजेंसी के दौरान वामपंथी पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद नहीं हुआ।जोर था पार्टी की पत्रिका के बजाय संस्कृतिके मूल्यांकन पर।किंतु कविताओं में विद्रोह का स्वर था। तब बीच बीच में लगता था कि कड़े बंधन निषेध के नतीजतन जब स्पष्ट कुछ भी लिखा नहीं जा रहा है,तब पत्रिका निकालकर क्या फायदा?अवश्य ही मामा न हो तो कना मामा भी अच्छा है,यदि सही आंख भी सरकारी न हो जाये।

    बुद्धिजीवियों की भूमिका जरुर होती है।किंतु कितनी? मोटे तौर पर इमरजेंसी के दौरान उन्होंने कुछ विशेष किया ही नहीं,विशेष तौर पर पूर्व भारत में।हमारे देश में सत्तर प्रतिशत अनपढ़ हैं।रेडियो के मार्फत वामपंथियों के लिए उतक पहुंचना असंभव था। इसके अलावा यहां के बुद्धिजीवियों के साथ देश के लोगों का नाड़ी का कोई संबंध कहें तो है ही नहीं।वे गुटबद्ध हैं।मतामत में कोई खास फर्क है नहीं, लेकिन असंख्य पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है-इससे लोकबल और धनबल का सम्यक प्रयोग नहीं हो पाता।

    निर्वाचन में बुद्धिजीवियों की कुछ भूमिका जरुर थी।शहरी इलाकों में बहुत बड़ी भूमिका छात्रों की थी.जो बिहार,उत्तर प्रदेश,पंजाब,हरियाणा,मध्यप्रदेश,राजस्थान में गांव गांव जाकर प्रचार अभियान चलाते रहे किंतु सबसे ज्यादा राजनीतिक बुद्धि का परिचय दे दिया-दक्षिण भारत के राज्यों को छोड़कर- किसानों और मजदूरों ने,जिन तक बुद्धिजीवियों का कोई संदेश नहीं पहुंचता।मेहनतकश इंसानों ने हड्डियों तलक अपने भोगे हुए यथार्थ का जबाव वोट के माध्यम से दे दिया। वोट से अवश्य ही क्रांति नहीं होती।उसके लिए दूसरा रास्ता जरुरी है।बुद्धिजीवियों को गांवों में जाकर काम करना चाहिए- लेकिन अभी तक यह स्वप्नविलास है।जिस देश में मातृभाषा के माध्यम में  सभी स्तरों पर शिक्षा अभी लागू हुई नहीं है, अंग्रेजी का मोह और वर्चस्व प्रबल है,वहां जनगणतांत्रिक क्रांति की तैयारी अत्यंत कठिन है,बुद्धिजीवियों की भूमिका वहां आत्मकंडुयन की तरह है।

    मई,1977

    अनुवादःपलाश विश्वास

    (साभारःदेज पब्लिशर्स,13 बंकिम चटर्जी स्ट्रीट।कोलकाता700073

    बाबू वृतात का पहला संस्करण 1978 में प्रकाशित हुआ है।देज पब्लिशर्स ने यह चौथा संस्करण टीका, टिप्पणी और विश्लेषण के साथ,समर सेन की कविताओं और रचनाओं के संकलन समेत प्रकाशित किया है।जो संग्रहनीय अनिवार्य पुस्तक है।


    बाबू वृत्तांतःपेज 398,मूल्य 250 रुपये।)

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    Nityanand Gayen
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    बंगाल में एक समय पर जो लोग सीपीएम और वामपंथी दलों के लिए निचले स्तर (जमीनीस्तर नहीं कह सकता, क्योंकि जो जमीनी स्तर पर काम करते हैं उन्हें पार्टी में कोई पूछता नहीं था) काम करते थे , वे सभी सत्ता बदलने के साथ ही ममता के साथ हो लिए | खुद मेरा गाँव सीपीएम का गढ़ हुआ करता था कभी अब वहां के सभी बुजुर्ग ममता को पसंद करते हैं | सुंदरवन के सीपीएम सांसद कांति गांगुली ने अपने कार्यकाल में उस क्षेत्र के लिए बहुत काम किया था , मौली नदी पर ब्रिज बनवाया था पहले नदी पार करने के लिए घंटो ज्वार का इंतज़ार करना पड़ता था किन्तु पुल बनने के बाद लोगों को बहुत आसानी हुई फिर भी वहां के लोगों ने चुनाव के वक्त तृणमूल उम्मीदवार को चुना ! 
    मेरे होश में मुझे याद है कि हमारे घर से कभी भाजपा को किसी ने वोट दिया हो ऐसा कभी नहीं हुआ , किन्तु खुद वामपंथ पार्टी के लोगों ने कांग्रेस को वोट देने के लिए कहा जरुर | 
    सीपीएम के शासन काल में बंगाल में राशन व्यवस्था बहुत बढ़िया था , किन्तु अब उससे भी बेहतर है और वामपंथी दलों की दिक्कत यह है कि उन्हें बर्दस्त नहीं कि उनके कार्य शैली पर कोई सवाल करें ! तो भाजपा और अन्य पार्टियों से कैसे अलग हुए आप ? 
    आपकी 35 साल के शासनकाल में बंगाल में दुर्गापूजा और बाकी धार्मिक कार्यक्रम मजबूत से मजबूत होता गया और पहले ममता आई और अब भाजपा जैसी धार्मिक पार्टी को भी वहां वोट मिलने लगा है | क्या आपने सोचा इस मुद्दे पर ? दिवंगत कमुनिस्ट नेता और पूर्व परिवहनमंत्री सुभाष चक्रबर्ती ने सरेआम कहा कि वह पहले एक ब्राह्मण हैं फिर कमुनिस्ट | क्यों महान नेता ज्योति बसु देश के पहले कमुनिस्ट प्रधानमंत्री बनने से रह गये ? क्यों सोमनाथ चैटर्जी को पार्टी से अलग होना पड़ा था ? क्यों पार्टी का पत्र (स्वाधीनता) शारदीय विशेषाकं निकालता है ? 
    ऐसे अनेक सवाल है | क्यों मानिक सरकार को कभी राष्ट्रीय फ्रंट पर आगे नहीं किया गया ?
    यदि ये सवाल करना गलत है , तो मैं गलत ही होना पसंद करूँगा , मुझ पर आप संदेह बे-झिझक कर सकते हैं , यह आपका लोकतांत्रिक अधिकार है | मैं समय और मुहर्त देख कर सवाल नहीं करता |

    मैं कमुनिस्ट मानता हूँ खुद को, और यही मानता रहूँगा | पर आपकी आलोचना के डर से सवाल करना नहीं छोडूंगा |


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