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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    इंद्रेश मैखुरी


    उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान 1994 में आज ही के दिन-1 सितम्बर को खटीमा में जघन्य गोलीकांड हुआ,जिसमे 7-8 लोगों को अपनी जान गंवानी पडी.शांतिपूर्ण तरीके से जुलूस निकाल रहे लोगों पर गोली चलाना एक बर्बर कृत्य था.लोगों के अहिंसक आन्दोलन को भी तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बेहद क्रूर तरीके से निपटने का रास्ता चुना ,जिसमें लोगों के हताहत होने का सिलसिला खटीमा से शुरू हो कर मसूरी,मुजफ्फरनगर तक जारी रहा.राज्यपाल का शासन हुआ तो श्रीयंत्र टापू गोलीकांड हुआ.एक आजाद देश में लोकतान्त्रिक तरीके से अलग राज्य की मांग की कीमत हमने 40 से अधिक शहादतों के रूप में चुकाई.हैरत यह है कि इन जघन्य हत्याकांडों के घटित होने के 22 वर्षों के बाद भी हम न्याय का इन्तजार कर रहे हैं.इसी बीच में जिसके लिए ये शहादतें हुई, वह राज्य भी अस्तित्व में आ चुका है.लेकिन पिछले 15 सालों में कांग्रेस-भाजपा के बारी-बारी सत्ता में आने के चक्रानुक्रम के साथ जैसा राज्य बना है,क्या ऐसे राज्य के लिए तमाम शहादतें और कुर्बानियां थी? जमीन,शराब और खनन के माफिया के वर्चस्व वाले,नेताओं-नौकरशाहों के भ्रष्टाचारी गठबंधन वाले,राज्य को देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि ऐसे जनता के हितों पर कुठाराघात करते राज्य के लिए किसी को भी शहीद होना चाहिए.हत्याकांडों के शहीदों के लिए न्याय मांगते हुए ऐसा लगता है कि उन शहीद हुए लोगों और राज्य के लिए लड़ने वालों को, सिर्फ हत्याकांडों के लिए ही न्याय नहीं चाहिए,बल्कि जैसा राज्य बन गया है,उसका इन्साफ किये जाने की भी दरकार है.

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    The mixed response and partial strike may not stop the Killing Machine until the peasantry bails out the trade union movement!

    Palash Biswas

    We have witnessed Total Bengal Bandh so many times whenever a strike was called by trade unions.It is a miserable departure from the past as the All India Trade Union Strike showed little impact in the strongest trade union movement base in Bengal while ten central trade unions across the country have called for a nationwide strike against the "anti-labour policies" of the government.


     Mind you,Bengal had to witness the first strike called by the various trade unions in the second tenure of Chief Minister Mamata Banerjee. Mamta Banerjee simply banned the strike and the Left and its trade unions stranded as the Supreme court order to dismiss land acquisition in Singur turned to be a bolt from the sky.Development without public consent destroyed Left in Bengal and it also failed its trade unions.


    The leadership is still not ready for self criticism while the Leftists have become non relevant as fare as the fight for civic and human rights are concerned. Without which the trade union movement has lost its real base and become Hawa Hawai ritual.For which the Haq Haquk of the workers have been killed as the response seems very late as the Left has no guilty consciousness for its betrayal to Indian peasantry for political power which lost like the going wind.


    For twenty five years trade unions did a little to resist the destruction of production system systematically and the workers lost everything.It seems to be very late to respond as the labour reforms have been passed without any resistance whatsoever in  Parliament or the streets.Trade unions also lost its hold in production units countrywide as they engaged themselves in economics of bargaining with a managerial status.


    The mixed response and partial strike may not stop the Killing Machine until the peasantry bails out the trade union movement!


    In fact no resistance is possible without the involvement of peasantry which has led all the movements in India for centuries. 


    The first ever strike was called by Ayyan Kali which recorded grand success as the workers were supported by the peasantry.


    The left base in the peasantry always strengthened the trade union movement in India.


    But merciless brute neo liberal displacement drive destroyed Indian peasantry and the trade unions had nothing to do nor the Left Politics responded.


    Moreover,indiscriminate urbanization and industrialization against the peasantry resultant in ethnic cleansing with monopolistic capitalist and imperialist aggression aligned with apartheid.


    Because Indian peasantry lost the sting and the Left lost the credit in peasantry,it lost the political power to lead the trade union movement.It is the consequence of departure from land reforms.


    Thus,opposing the country-wide strike on September 2 called by central trade unions, West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee said her government would take strongest possible action against "miscreants" who try to disrupt public life and will ensure compensation for any damage to shops or vehicles.No one seems to dare,such is the misery.


    "Bengal will not be stopped on September 2, 2016. On September 2, all educational institutions, shops, institutions, offices and factories will remain open. Vehicles will ply normally and public transport will not be hindered. There will be strongest possible action against any miscreant who will try to disrupt public life," Banerjee tweeted.


    "The government will arrange for due compensation for any damage caused by miscreants to any shop, vehicle or establishment," Banerjee tweeted.


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    कोलकाता की संत टेरेसा और
    अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म धर्मोन्मादी राष्ट्र
    पलाश विश्वास
    आज कोलकाता के अखबारों में मातृसत्ता की जयजयकार है और बाकी देश के मीडिया में भी सुर्खियों में कोलकाता की मां संत टेरेसा है।महिषासुर और असुर विमर्श के संदर्भ में निवेदन है कि मेरी बंगाल के दुर्गा भक्तों से हाल के वर्षों में बहस होती रही है और उनमें से एक बड़े हिस्से का भी मानना है कि मातृसत्ता की दुर्गा प्रतिमा से महिषासुर वध प्रकरण को अलहदा करने की जरुरत है।

    इस विमर्श का प्रस्थानबिंदू यही है कि अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म राष्ट्र है और यही अविद्या राष्ट्र पर काबिज पूंजी है।सत्ता वर्ग की लोकतंत्र विरोधी फासिस्ट निरंकुश सत्ता भी वही अविद्या है जो मुक्तबाजारी माया का संसार है तो ज्ञानविरोधी अस्मितापरक विमर्श में लोकतंत्र और जनवाद का विध्वंस है।

    आम जनता की तकलीफों और रोजमर्रे की नरकयंत्रणाओं के मूल में भी सत्ता समर्थित इस अविद्या की संस्थागत संरचना है,जो कुल मिलाकर पितृसत्ता की नरसंहारी नस्ली संस्कृति है।इसे सिरे से तोड़े बिना कोई परिवर्तन या परिवर्तन का सपना भी असंभव है।

    महिषासुर वध के प्रक्षेपण को अलग कर दें तो मातृसत्ता  अनार्य द्रविड़ असुर विरासत है,जिसका भारतीयकरण हुआ है।

    इसी मातृसत्ता का आवाहन का महोत्सव बंगाल में धर्मनिरपेक्ष दुर्गोत्सव है और कोलकाता की संत मां टेरेसा को अनार्य बंगाल इसी दुर्गा प्रतिमा में स्थापित कर रहा है,उनके ईसाई मिशनरी होने से कोई फर्क नहीं पड़ा है।

    जाहिर है कि महिषासुर वध की नरसंहारी संस्कृति और मनुस्मृति आधारित मिथक का विरोध अनिवार्य है क्योंक यह मिथक अपने आप में बंगाल के इतिहास,भूगोल,लोक परंपरा और विरासत के खिलाफ है।तो यह भारतीयता के आध्यात्म और धर्म निरपेक्ष जनवादी लोकतंत्र के खिलाफ भी मिथ्या का सर्वव्यापी तंत्र मंत्र यंत्र  है।

    दुर्गापूजा की धर्मनिरपेक्ष मातृसत्ता अनार्य द्रविड़ नृवंश की निरंतरता है,जो असुर संस्कृति भी है पितृसत्ता के ब्राह्मणधर्म के खिलाफ।

    हमारे विद्वान मित्र इस पर गौर करें कि मातृसत्ता के आवाहन का विरोध करके कहीं वे कहीं पितृसत्ता के ब्राह्मण धर्म की निरंतरता का आत्मघाती अस्मिता युद्ध में निष्णात तो नहीं हो रहे हैं।यह आत्मालोचना निहायत जरुरी है अगर वे बदलाव के हक में हैं।

    हम मातृसत्ता के विरोध को आत्मध्वंस मानते हैं।बंगाल में हाल के परिवर्तनों से लेकर सामंतवाद, साम्राज्यवाद और यहां तक कि ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता के विरोध की मातृ आराधना की लोक परंपरा पर हम नये सिरे से संवाद कर सकें तो बेहतर।

    मां टेरेसा के कोलकाता के संत बन जाने के मौके से बेहतर कोई अवसर नहीं है कि हम मातृसत्ता के जनवाद और लोकतंत्र पर नये विमर्श की शुरुआत करें।

    कोलकाता में दक्षिणेश्वर और कालीघाट की काली के अलावा एक और काली है,एटंनी फिरंगी की काली।एंटनी फिरंगी जाहिर है कि भारतीय नहीं थे और वे जन्मसूत्र से अंग्रेज भी नहीं थे।वे भारत में पुर्तगीज विरासत के वारिस थे और उन्होंने सती दाह से बचाकर एक हिंदू विधवा से विवाह कर लिय़ा था,हिंदुत्ववादियों ने फिर एंटनी की अनुपस्थिति में उस विधवा का अपहरण करके उसे जिंदा जला दिया था।

    यही एंटनी फिरंगी की व्यथा कथा है जो उन्होंने कवि गान में जिया है। उन्होंने बांग्ला कविगान में अपना जीवन समर्पित किया तो वे मां काली के उपासक भी थे।

    एंटनी फिरंगी के इस आख्यान का मंगल पांडे पर बनी फिल्म में अच्छा उपयोग किया गया है।क्योंकि भारत की पहली स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ था बंगाल का ब्राह्मण तंत्र और उसकी निरंकुश निर्ममता का  आइना यह आख्यान है जो फिर फिर लौटकर आ रहा है और गुजरात के वधस्थल तक उसकी निरंतरता है जो ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान है।विडंबना है कि भारतभर में इसकी पुनरावृत्ति का मुक्तबाजारी वैश्विक उपक्रम है।

    जाहिर है कि एटंनी फिरंगी की काली पूजा दैवी काली की आध्यात्मिक उपासना नहीं है,बल्कि मातृसत्ता के लोक में गहरे पैठकर लोक गीतों के अंतःस्थल में गहरे पैठने की धर्मनिरपेक्ष रचना प्रक्रिया है।बंगाल में प्राकृति विपदाओं से बचने के लिए रक्षा काली की पूजा बंगाल में ब्राह्मण धरम से पहसे शिव की उपसना के साथ होती रही है।चंडी तो उसे बाद में बनाया गया है और चंडी बनकर ही काली रणचंडी है।

    इसमें कोई शक नहीं है कि जो भी कुछ हम भारतीय बताते हैं,उसका मूल स्रोत अनार्य द्रविड़ लोक जीवन है।अनार्य द्रविड़ संसाधनों,सभ्यता और विरासत का भारतीयकरण हिंदुत्व के एकीकरण अभीयान के तहत इसीतरह होता रहा है।

    जैसे ढाई हजार सा पहले बौद्ध धम्म और जैन धर्म के दर्शन को आत्मसात करके ब्राह्मण धर्म सनातन वैदिकी कर्म कांड से अलग होकर हिंदुत्व में आहिस्ते आहिस्ते आकार लेता रहा विविधता और बहुलता को आत्मसात करते हुए,वैसे ही लोक पंरपराओं और विरासत का लोक जीवन का भी समायोजन हिंदुत्व में हुआ है और अनार्य द्रविड़ मातृसत्ता का भी हिंदुत्वकरण हुआ है लोक देवियों के चंडी रुप में आवाहन और सतीपीठों के माध्यम से।

    विडंबना है कि ब्राह्मण धर्म ने मातृसत्ता का आवाहन भी हमेशा पितृसत्ता को मजबूत बनाकर मनुस्मृति अनुशासन और सख्ती से लागू करने की रणनीति के तहत सुनियोजित रंगभेद की पितृसत्ता के तहत  किया है और अपनी विरासत की जड़ों से कटे हुए हमें ठीक से भी मालूम नहीं है कि किस बिंदू पर विरोध करें और किस पर विरोध न करें।हमें मालूम भी नहीं है कि मातृसत्ता हमारी विरासत है और ब्राह्मणधर्म स्त्री को शूद्र बनाकर स्त्री अस्मिता के निषेध पर आधारित मातृसत्ता का निरंकुश दमन है।

    काली और दुर्गा के मिथकों में अंततः निग्रोइड द्रविड़ और असुर विरासत की ही निरंतरता है और इसे महिषासुर वध से जोड़कर उसका ब्राह्मणीकरण कर दिया गया है।

    इस प्रस्थान बिंदु पर मातृसत्ता की धर्मनिरपेक्षता और सामंती साम्राज्यवादी व्यवस्था के विरुद्ध इस मातृसत्ता के प्रतिरोध की जमीन को पहचानने की बहुत जरुरत है।

    बुद्धमय बंगाल में हिंदुत्वकरण के बाद आक्रामक वर्चस्ववादी रंगभेदी जाति व्यवस्था के कठोर मनुस्मृति अनुशासन लागू कर दिये जाने से ब्राह्मणधर्म का सामंतवाद कितना भयंकर था,यह शरत साहित्य में सिलसिलेवार है और रवींद्र ने इसका दार्शनिक और रचनात्मक तौर पर बौद्ध दर्शन की लोक परंपरा के तहत खूब प्रतिरोध किया है।चंडालिका से लेकर रथेर रशी और राशियार चिठि  से लेकर गीतांजलि तक नास्तिकता का दर्शन बौद्ध परंपरा या चार्वाक चिंतन या फिर वेदांत आधारित जीवन दर्शन है रवींद्र का।

    राजा राममोहन राय से लेकर माइकेल मधुसूदन दत्त के मेघनाद वध काव्य में राम को खलनायक रुप में दिखाकर मेघनाद के नायकत्व को बांग्ला राष्ट्रीयता की अस्मिता बन जाने के निरीश्वरवाद और बाद में रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के वेदांत,सर्वेश्वरवाद और ब्राह्मण धर्म  की कुप्रथार्ओं के खिलाफ नवजागरण के सुधार आंदोलन के निरीशवरवाद और नास्तिकता को सिलसिलेवार देखने की जरुरत है।

    और यह भी समझने की जरुरत है कि कर्म कांडी ब्राह्मण धर्म के खिलाफ दयानंद सरस्वती का आर्य समाज आंदोलन दर असल बंगाल के नवजागरण का सर्व भारतीय विस्तार है और इन्हीं प्रक्रियाओं के तहत बंगाल और पंजाब में केंद्रित बहुजन समाज का वास्तविक उत्थान है,जिसे हम गायपट्टी  और महाराष्ट्र में ही सीमाबद्ध मान और देख रहे हैं और इसकी सर्व भारतीय विरासत,बंगीय भूमिका को समझने से इंकार कर रहे हैं।

    बाकी भारत के लोगों को 19वीं सदी के पुर्तगीज मूल के साहब  एंटनी फिरंगी की कथा शायद ही मालूम हो,जिसने सतीदाह से बचाकर विधवा विवाह करने के बावजूद कंपनी राज में जमींदारियों और ब्राह्मण धर्म के कट्टरपंथ से लड़ने के लिए बंगाल की प्राचीन अनार्य द्रविड़ काली की उपासना को सामंतवाद के खिलाफ अपना अचूक हथियार बना लिया,जो उनके कवि गान की भी लोक जमीन है।एंटनी फिरंगी पर बनी लोकप्रिय फिल्म में एंटनी उत्तम कुमार बने तो उनकी प्रेमिका बनी हिंदी फिल्मों की तनूजा।

    हाल में मशहूर बांग्ला फिल्मकार सृजित मुखर्जी ने एंटनी फिरंगी के अंतर्द्वंद्व,उनके प्रेम, उनके आध्यात्म और उनकी रचनाधर्मिता के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्जन्म की कथा लिखकर एक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म  जातिस्मर बनायी है।

    पिछले जन्म की यादों पर केंद्रित सत्यजीत राय की फिल्म सोनार केल्ला के बारे में कमोबेश सबको मालूम है,लेकिन सृजित की इस फिल्म में एंटनी बने प्रसेनजीत और उनकी प्रमेमिका बनी भूतेर भविष्यत् की स्वस्तिका मुखोपाध्याय के मार्फत 19वीं सदी के उस सामंती समाज को आज के मुखातिब कर दिया है।

    इस फिल्म में कबीर समुन भी हैं।यह उत्तर आधुनिक बंगाल के आइने में बंगाली राष्ट्रीयता की विकास यात्रा को परदे पर उतारने की बेहतरीन  कोशिश है।

    ये दोनों फिल्में अगर आप देख लें तो बंगाल में लोक जीवन और रचनात्मकता के विविध लोकायत आयाम खुल सकते हैं।

    मदर टेरेसा के बंगाल में इस तरह सार्वजनीन मां बन जाना और पश्चिमी मीडिया में उनकी सेवा के जरिये कोलकाता के नारकीय बस्ती चित्रों की निरंतरता के बावजूद उनकी मिशनरी गतिविधियों की निर्विकल्प स्वीकृति दरअसल उसी परंपरागत अनार्य द्रविड़ बौद्ध मातृसत्ता का विस्तार है जो मां टेरेसा के कोलकाता की संत बन जाने से अब वैश्विक है।इसके सकारात्मक पक्ष को धर्म सत्ता के संदर्भ से अलग रखकर समझना भी बेहद जरुरी है इस कयामती फिजां के माहौल में।

    अंध धर्मोन्मादी हिंदू राष्ट्र के सैन्यीकरण और निरंकुश सत्ता के संदर्भ में मातृसत्ता का यह आवाहन और महोत्सव भारतीयता का असल यथार्थ चेहरा है,जिसकी अखंड भाव भूमि और लोक परंपरा में मां टेरेसा का कोलकाता का संत बनना हुआ है।

    सामंतवाद और साम्राज्यवाद के प्रतिरोध में मुक्तबाजारी नरसंहारी तानाशाही की संस्कृति के खिलाफ इसी मातृसत्ता की धर्म निरपेक्षता और प्रगतिशीलता में भारत में अनार्य द्रविड़ इतिहास के रेशम पथ है,जहां से होकर हम फिर मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा की सिंधु सभ्यता तक पहुंच सकते हैं।इसी इतिहास को बदला जा रहा है।

    गौरतलब है कि भारत विभाजन के तहत सत्ता पर काबिज ब्राह्मणवादी मनुस्मृति धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद ने मोहंजोदाड़ो और हड़प्पा का विभाजन करके हमें इस रेशम पथ से बेदखल कर दिया है।यह दो राष्ट्रों का सिद्धांत नहीं है,सीधे तौर पर ब्राह्मण धर्म का यह पुनरुत्थान है जो एकमुश्त बौद्ध धम्म,जैनधर्म और सिख धर्म की गुरु परंपराओं के साथ साथ नवजागरण और आर्य समाज आंदोलन का निषेध और बजरंगी हिंदुत्व है।

    महिष्सुर वध की कथा के इतिहास के मद्देनजर हम नरसंहारी संस्कृति का जितना विरोध करते हैं,उससे अगर मातृसत्ता के जनवाद और लोकतंत्र की भारतीयता को पृथक करने का हम कोई विमर्श शुरु कर सकें तो जैसे हमने लिखा है,बंगाल में कट्टर दुर्गाभक्तों को दुर्गापूजा में महिषासुर वध के मिथक के बहिस्कार से कोई खास ऐतराज नहीं है।

    इसी सिलसिले में कहना होगा कि हम हिंदू राष्ट्रवाद में जो धर्मोन्माद देख रहे हैं,उसका भारतीय दर्शन परंपरा से कोई लेना देना नहीं है और न ही भारतीय आध्यात्म और लोक से उसका कोई लेना देना है, और न ही वेद वेदांत से।

    यह मिथ्या मिथकों का तिलिस्म अविद्या के मायाजाल का मुक्तबाजारी अमावस्या है।इसके विपरीत भारतीयता संघ परिवार के हिंदुत्व और ब्राह्मणधर्म के मनुस्मृति अनुशासन के विरुद्ध एक ही साथ द्वैत और अद्वैत दोनों है और सर्वेश्वर वाद के वेदांत तक जिसका विस्तार है जो रवींद्र नाथ, नेताजी औस स्वामी विवेकानंद जैसे शूद्र मनीषियो का जीवन दर्शन है और जिसकी भावभूमि ही मां टेरेसा की कोलकाता की संत होने की कथा है।तो 19 वीं सदी के यह एंटनी फिरंगी के कविगान की कथा व्यथा भी है।

    भारतीय सांख्य दर्शन अपने प्राचीनत्व के बावजूद बहुत प्रांसगिक है और उसकी वैज्ञानिक दृष्टि हैरतअंगेज है,जो यहां तक कि द्वांद्वात्मक भौतिकवाद और इतिहास की भौतिकवाद की सीमाबद्धता को तोड़ने तक में मददगार साबित हो सकती है।

    वैसे भी भारतीय दर्शन चरित्र से अवधारणात्मक होने के बजाय काफी हद तक व्यवहारिक है और जनजीवन में आचरण,व्यवहार ,समाज और राष्ट्र निर्माण में उसकी सक्रिय भूमिका हमेशा रही है।

    इसी परंपरा में ही तथागत गौतम का बौद्ध धम्म, जैन धर्म और यहां तक कि सिख धर्म में आचरण और अनुशीलन की सामाजिकता और सत्य,अहिंसा और प्रेम का वैश्विक मानवबंधन है,जिसका नये सिरे से नवजागरण जरुरी है।

    लोक जीवन में भारतीय दर्शन की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है,जिस हम आध्यात्म कहकर अक्सर खारिज कर देने की गलती करते हुए बदलाव के मिशन,समता और न्याय की मंजिल हासिल करने,जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता नागरिक और मानवाधिकार, मेहनतकशो की हक हकूक की लडाई में अपने इतिहास और विरासत की जमीन पर खड़े होने से सीधे इंकार कर देते हैं।यह आत्मघाती अविद्या है।

    गौरतलब है कि बाबासाहेब ने मनुस्मृति बंदोबस्त को मजबूत बनाने वाले महाकाव्यों और पुराणों के मिथकों का खंडन किया है और इन्हें छोड़ भारतीय दर्शन परंपरा की मनुस्मृति जैसी आलोचना नहीं की है और दहन उन्होंने सिर्फ मनुस्मृति का किया है।

    गौरतलब है कि वैदिकी साहित्य को पढ़ने या शिक्षा के अधिकार से वंचित होने के बावजूद हमारे लोक जीवन में भारतीय दर्शन के मुताबिक आम जनता के व्यवहार,आचरण और सामाजिकता में कोई व्यवधान नहीं है।शाश्वत निरंतरता है और भारत का वजूद यही है।

    जैसे ब्राह्मणों के द्विज बनने के लिए दीक्षा जरुरी है,शूद्रों और अछूतों में,आदिवासियों में भी दीक्षित होने की परंपरा है और इस मामले में गुरुओं की निश्चित भूमिका रही है।

    भारतीय संत परंपरा ने भारतीय सामाजिक जीवन में इसी दर्शन पंरपरा की व्यावहारिकता के आध्यात्म के नाम संप्रेषित किया है।

    संत बाउल पीर फकीर का साझा चूल्हा इसीतरह भारत को भारत तीर्थ बनाता रहा है।

    दो दिन पहले भुवनेश्वर से अभिराम मलिक ने दार्शनिक रजनीश ओशो का गुजरात के आरक्षणविरोधी आंदोलन के संदर्भ में हिंदू राष्ट्रवाद के दुराग्रह के खिलाफ समता और न्याय के पक्ष में प्रवचन का वीडियो शेयर किया है।अद्भुत दार्शनिक रजनीश ने भी हजारों साल से शूद्रों और अछूतों की शिक्षा के अधिकार से वंचित करने की ब्राह्मणधर्म के मनुस्मृति अनुशासन को समता और न्याय के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध बताया है।

    सांख्य दर्शन के मुताबिक पुरुष और प्रकृति को सृष्टि का दो मूल तत्व बताया गया है।पुरुष ही सांख्य दर्शन के मुताबिकआत्मा हैजो देह,मन,इंद्रिय,बुद्धि या जड जगत का कोई वस्तु नहीं है।पुरुष की अभिव्यक्ति चेतना है।जबकि जड़ जगत की भौतिकता प्रकृति है।यही द्वंद्वात्म भौतिकवाद की नींव है।

    अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म धर्मोन्मादी राष्ट्र पुरुष और प्रकृति के संजोग से ही सृष्टि की सिंथेसिस  है।

    पुरुष और प्रकृति को लेकर सांख्य कुल पच्चीस हैं।

    यह सांख्य दर्शन गौर करें, निरीश्वर वादी है और इसमें चार्वाक दर्शन परंपरा की निरंतरता है।पुरुष और प्रकृति का अविवेक अर्थात अभेद ज्ञान ही पुरुष यानी चेतना का बंधन है।

    सांखय दर्शन के मुताबिक यही अविवेक, चेतनाहीनता ही बंधन और दुःख का कारण है। भारतीय दर्शन में आम तौर पर इसे फिर माया का बंदन कहा गया है।

    सांख्यदर्शन के मुताबिक दुःख निवारणके लिए विवेकज्ञान और प्रकृति और पुरुष का भेद ज्ञान अनिवार्य है।विवेक ज्ञान से ही दुःखों से निवृत्ति का मार्ग है।

    गौरतलब है कि भारतीय दर्शन और संत परंपरा धर्म निरपेक्ष प्रगतिशील विवेक या चेतना की वैज्ञानिक दृष्टि और प्रज्ञा का निरंतर अनुसंधान और अनुशीलन है,साधना परंपरा है और जनजागरण अभियान भी है,जिसे हम आध्यात्म कहते हैं।

    इसी प्रस्थाबिंदू पर फिर  सर्वेश्वरवाद और वेदांत दर्शन है जो हमें नर में नारायण देखने की सम्यक दृष्टि से समृद्ध करती है और रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के इस वेदांत और सर्वेशवर वाद में फिर अनार्य द्रविड़ मातृसत्ता का आवाहन है।

    चेतना के लिए नव जागरण में ही भारत में नास्तिकता के आधार पर जैन और बौद्ध धर्म है तो समूची चार्वाक चिंतन परंपरा है और बौद्ध दर्शन के मुताबिक भी दुःख और अविद्या तक बारह निदान हैं।

    बौद्ध दर्शन के मुताबिक भी दुःख की मूल वजह अविद्या है।

    चार्वाक दर्शन में फिर भौतिकवादी व्याख्या के तहत ईश्वर से लेकर पुनर्जन्म, कर्मफल, लोक परलोक,स्वर्ग नर्क और कर्मकांड के ब्राह्मण धर्म का खंडन है जो अंध राष्ट्रवाद और उसके मिथक औक कुसंस्कारों पर आधारित मिथकीय वैदिकी और बाद में बुद्धमय भारत के अवसान के बाद मनुस्मृति अनुशासन के प्रतिरोध में अखंड जनजागरण है।

    इसी तरह जैन धर्म में भी जीव को चेतना की अभिव्यक्ति के रुप में देखा गया है।

    इन तमाम बिंदुओं पर सिलसिलेवार विमर्श जरुरी है।

    इस अनिवार्य विमर्श में फिर बाधा ज्ञानविरुद्ध अविद्या का धर्मोन्मादी अंध राष्ट्रवाद है।दरअसल अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म ही अंध धर्मोन्मादी राष्ट्र है और यही माया और मिथ्या का अखंड वर्चस्ववादी मुक्ताबाजारी आक्रामक विध्वंसक रंगभेद है।जो असल में फासिस्ट वैश्विक रंगभेदी नरसंहार संस्कृति है और हम उसके उपनिवेश हैं।

    इसी संदर्भ में हड़प्पा और मोहनोजोदाडो़ के रेशम पथ का नया आविष्कार जितना अनिवार्य है,उससे भी ज्यादा अनिवार्य है कि पितृसत्ता के इस ब्रह्मण धर्म के प्रतिरोध में मातृसत्ता का नवजागरण हो और इसी सिलसिले में महिषासुर विमर्श पर मातृसत्ता की धर्मनिरिपेक्षता के संदर्भ में नये सिरे से संवाद अनिवार्य है।
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    नकली राजमहल में नारायणी सेना का प्रशिक्षण जारी,कूच बिहार बनने लगा सरदर्द का सबब

    बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्य बन रहे हैं जिहादियों के अड्डे

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप संवाददाता

    सिलिगुड़ी।उत्तर बंगाल के हालात आहिस्ते आहिस्ते बेकाबू हो रहे हैं।ममता बनर्जी के कड़े विरोध पर नारायणी सेना को प्रशिक्षण देना बंद कर दिया है भारतीय सीमा सुरक्षा बल ने।फिरभी कूचबिहार में अलग राष्ट्र न सही,नगर के बाहर पांचएकड़ जमीन पर नकली राजप्रासाद बनाकर अलगाववादी संगठन कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन के एक गुट ने नारायणी सेना का उसी राजप्रासाद में प्रशिक्षण जारी रखा है।


    उसी राजप्रासाद में वर्दीधारी पुरुष और महिला राजकर्मियों के लेकर संगय़न के नेता बाकायदा राजसिंहासन पर बैठकर राजकाज चलाते हैं।अलग कूचबिहार के लिए यह अभूतपूर्व तैयारी है।प्रशासन के सारी खबर है।लेकिन इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी नहीं मिल रही है।


    आदिवासी विकास परिषद और गोरखालैंड की राजनीति अलग है।कूचबिहार में विभिन्न समुदाओं कामतापुरी सर्थकों,आदिवासियों और गैरकामतापुरी और गैरआदिवासी समुदायों के बीच टकराव के हालात हैं,जो विस्फोटक हो सकते हैं।


    वेटिकन सिटी में मद टेरेसा को संत की उपाधि के मौके पर वहां पहुंचकर ममता दीदी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उनकी टीम से दूरी बनाये रखकर वापंथिययों के नक्से कदम पर कोलकाता और बांग्ला राष्ट्रीयता का झंडा बुलंद किया है।इसे उनके समर्थक उनकी ऐतिहासिक जीत मान रहे हैं।


    जाहिर है कि सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के ऐतिहासिक फैसले से दीदी को बहुतभारी जीत मिली है और वामपंथियों को भी निर्मायक तौर पर उन्होंने शिकस्त जरुर दी है लेकिन राज्यभर में अन्यत्र भूमि अधिग्रहण खारिज करने का जो आंदोलन शुरु हो गया है,उससे पूंजी निवेश का मामला फिर खटाई में है।


    सिंगुर फैसले के साथ साथ दीदी ने वर्धमान में तैयार हो रहे आधे अधूरे मिष्टि हब को अन्यत्र हाटोने का ऐलान कर दिया है।इससे उनके ही पीपीपी माडल के विकास के माडल को गहरा झटका लगा है।बाकी देश में बीि इसका असर होना है।


    कोचबिहार में राजतंत्र के तौर तरीके के साथ अलग कूचबिहार का जो आंदोलन नारायणी सेना को प्रशिक्षण के साथ उग्रतर होता जा रहा है,वह सिर्फ ममता बनर्जी नहीं,बाकी देश के लिए भी सरदर्द का सबब बनता जा रहा है।

    इसी बीच केंद्र सरकार की खुफिया एजंसियों के हवाले से बंगाल और पूर्वोत्तर में जिहादियों की घुसपैठ और उनके अड्डों की खबर मौजूदा अलगाववादी संगठनों के साथ उनके मिलकर भारतविरोधी गतिविधियां चलाने के नतीजे कितने खतरनाक हो सकते हैं,यह मामला भी गरमाने लगा है।


    बांगलादेश में हाल में हुई आतंकवादी हरकतों के तार सीधे तौर पर इन्ही राज्यों से जुड़ रहे हैं,इसके बावजूद आत्मघाती राजनीति का जलवा बहार है।


    जो राजनीतिक उतना नहीं है जितना सीधे तौर पर कानून और व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है और इस सिलसिले में राज्य और केंद्र सरकार दोनों की खास जिम्मेदारियां हैं।


    इसके उलट उत्तर बंगाल में पांव जमाने के लिए केंद्र की सत्ता पर काबिज कसरिया पल्टन जिस तरह कामतापुरी से लेकर अल्फा को खुल्ला समर्थन दे रहे हैं,उससे असम अल्फा के हवाले तो हो ही गया है,अब कूचबिहार के हालातभी संगीन है।


    गनीमत है कि गोरखालैंड आंदोलन अभी ठंडा है और विमल गुरुंग और उनके प्रतिद्वंद्वी फिलहाल मौन हैं।दार्जिलिंग से सांसद भाजपा के हैं।इसके मद्देनजर गोरखा आंदोलन की कमान भी अब संघियों के हाथ में है।


    दीदी वेटिकन सिटी से जर्मनी की ओर कूच कर गयी हैं विदेशी पूंजी की तलाश में।लेकिन विपक्ष के सफाये के बावजूद गैरसंवैधानिक संगठनों की अनदेखी से लोकतांत्रिक विपक्ष से बड़ी चुनौती देर सवेर उन्हें मिलने जा रही है।


    प्रशासन और पुलिस को सबकुछ मालूम है लेकिन वे दीदी की हरी झंडी के बिना कुछ भी करने में असमर्थ है।


    असम आंदोलन में आठवे दशक के दौरान हुए खूनखराबे के बाद गैरअसमिया कारोबारियों ने अपना कारोबार सिलीगुड़ी में स्थानांतरित कर लिया है।बाकी भारत से असम और पूर्वोततर को जोड़ने वाला सबसे बड़ा जंक्शन है जहां पूरे बंगाल में कारोबर की स्थिति सबसे बेहतर है और पूंजी निवेश का माहौल भी है।


    यह सब कभी भी गुड़गोबर हो सकता है।


    जाहिर है कि राजनीतिक सत्ता के लिए राष्ट्रहित को बलि चढ़ाने में राजनेताओं को कोई खास परेसानी नहीं होती,इसलिए बंगाल और असम समेत समूचे पूर्वोत्तर के मौजूदा हालात कश्मीर की तुलना में भी ज्यादा पेचीदा होते जा रहे हैं।जिसे लेकर फिलहाल केंद्र या राज्यसरकार को खास तकलीफ नहीं हो रही है।



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    लगातार गहराते जल महायुद्ध गृहयुद्ध से कैसे बच सकें हम?

    तमिलनाडु का जल संकट कश्मीर विवाद से कम जटिल नहीं है क्योंकि कावेरी से ही भारत के साथ जुड़ा है तमिलनाडु।

    कृषि संकट में उलझे कर्नाटक के किसानों के पास भी क्या विकल्प है?

    आइये याद करें रोहिणी जल विवाद हल करने में राजकुमार सिद्धार्थ की भूमिका!

    पलाश विश्वास

    बेहतर होता कि हम यह विमर्श तमिल और कन्नड़ में शुरु कर पाते।क्योंकि इसके संदर्भ और प्रसंग दोनों कावेरी जलविवाद को लेकर घमासान से जुड़ते हैं।तमिलनाडु को पानी देने के लिए सुप्रीम कोर्ट को फिर हस्तक्षेप करना पड़ा है और इसके खिलाफ कर्नाटक में जबर्दस्त प्रदर्शन हो रहा है। हम तमिल या कन्नड़ भाषा नहीं जानते।अंग्रेजी दक्षिण भारत में  आम जनता की बोली उसीतरह नहीं है,जैसे बाकी भारत में।


    यह मसला सिर्फ कावेरी जलविवाद से जुड़ा नहीं है,यह गहराते जल संकट की युद्ध परिस्थितियों के साथ जल जंगल जमीन और आजीविका से कृषि प्रधान भारत को सुनियोजित तरीके से ध्वस्त करने का मामला है और इस पर यथासंभव हर जनभाषा और बोली में हम जितनी जल्दी संवाद कर सकें, बेहतर है।


    फासिस्ट राजकाज की निरंकुश सत्ता दिल्ली में केंद्रित होकर जीवन का हर क्षेत्र अब सामंती और साम्राज्यवादी उपनिवेश है तो देश के कोने कोने में आम बहुसंख्या जनता पर एकाधिकार कारपोरेट हमले हो रहे हैं।


    इसी वजह से सत्ता की राजनीति चूंकि गाय पट्टी से आकार लेती है,तो वहां की मातृभाषा के राजभाषा बन जाने से हिंदी का हिंदी क्षेत्र से बाहर राजनीतिक विरोध प्रबल है।वरना तमिलनाडु से लेकर पूरे दक्षिण भारत में,बंगाल में और पूर्वोत्तर में लोग हिंदी पढ़े या लिखें न भी तो हिंदी खूब समझते हैं।


    हिंदी की सार्वभौम इस ग्रहणीयता और संवाद की भाषा बनने के लिए भारतीय सिनेमा का आभार मानना चाहिए।साहित्य हिंदी का लोग जाने या न जाने,हिंदी फिल्में देखे बिना देश के किसी भी हिस्से में जनता के सारे ख्वाब खत्म हैं,जान लीजिये।


    कावेरी जलविवाद की समस्या है तो जलविवाद अब सार्वभौम है।


    क्योंकि हम अपनी जरुरत के मुकाबले कई कई पृथ्वी के अतिरिक्त संसाधनों का दोहन करके इस पृथ्वी का रोज दसों दिशाओं में सत्यानाश कर रहे हैं।


    नतीजतन हमारा हिमालय मर रहा है तो हम समुद्रतटों को रेडियोएक्टिव बना रहे हैं और हरियाली को खत्म करके सबकुछ गेरुआ बनाने में लगे हैं।बड़े बांधों का कहर अभी पूरी तरह टूटा नहीं है हालांकि सालाना मनुष्यकृत आपदाओं का मुक्तबाजारी महोत्सव और राहत सहायता के पाखंड का अनंत सिलसिला जारी है।

    गहराते जलसंकट की वजह पिघलते हुए ग्लेशियर है,ग्लोबल वार्मिंग है,अनियमित मानसून है,बदलता हुए मौसम और जलवायु हैं,तो इन सारे कुकृत्यों की वजह विकास के नाम हमारा नरसंहारी धतकरम है।अबाध पूंजी की अंधी दौड़ बेलगाम है।


    अब यह तनिक विचार कर लें कि ब्रह्मपुत्र नदी के मुहाने को बांधने की चीन की हरकत को अगर हम भारत और समूचे दक्षिण एशिया के खिलाफ खुला युद्ध मानते हैं तो फरक्का में पद्मा नदी का पानी रोक लेने पर बांग्लादेश की प्रतिक्रिया जन्मजात मानवबंधन और साझा इतिहास,साझा विरासत,साझा संस्कृति के बावजूद इसतर भारतविरोधी क्यों हो जाती है।


    इसीतरह तनिकमझ भी लें कि बांग्लादेश को पानी देने के किसी समझौते के सवाल पर बंगाल के किसानों के हितों को लेकर बंगाल की अग्निकन्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सिरे से इंकार कर देती है। फिर बिहार के मुख्यमंत्री अपने राज्य को बाढ़ से बचाने के लिए फरक्का बांध को ही तोड़ देने की वकालत क्यों करने लगते हैं। फिर ममता बनर्जी भी बंगाल में बाढ़ के लिए  दामोदर वैली निगम के बांध के खिलाफ एतनी आगबबूला क्यों हैं।अभी तो हमने नर्मदा बांध और टिहरी बांधों के नतीजों का समाना नहीं किया है,जो और भयंकर होने वाले हैं।


    सिंधु घाटी के इतिहास को बांचे बिना हम अपनी नगर केंद्रित सभ्यता को समझ नहीं सकते।विश्वभर की प्राचीन सभ्यताओं में जीवन सीधे नदियों से जुड़ा से है क्योंकि जल के बिना जीवन असंभव है।


    हम जिसतरह गंगा यमुना नर्मदा समेत तमाम नदियों को मां मानते हैं उसीतरह प्राचीन मिस्र में भी नील नदी की पूजा होती रही है।गंगा की तरह नील भी देवी है।मोसापिटामिया की सभ्यता में भी दजला और फरात का वही महत्व है जैसे आर्यों के आगमन के बाद भारतीयता की सारी कथाएं गंगा और यमुना से जुड़ती है।


    थेम्स से लंदन है तो सीन से पेरिस।रूस की कल्पना दोन के बिना की ही नहीं जा सकती।अबाध जल प्रवाह ही सभ्यता की विकासयात्रा है।उसी अबाध जलप्रवाह को विकास के नामपर बांधते रहकर जल को राष्ट्रीयता के नाम  किसी व्यक्ति और समुदाय की निजी और कारपोरेट संपत्ति बना देने की वजह से आज यह जलहायुद्ध है।


    तमिलनाडु या बांगल्लादेश की समस्या शायद हम तभी समझ सकेंगे जब राजधानी नई दिल्ली और उससे जुड़े तमाम नगर उपनगर टिहरी जलाशय के पानी पर निर्भर हो जाये और उत्तराखंड की शक्ति इतनी बड़ी हो जाये कि वह टिहरी का जल दिल्ली और यूपी ,पंजाब, हरियाणा को देने से मना कर दें।तभी हम तमिलनाडु का दर्द और उसके लिए बिन पानी गहराते अस्तित्व संकट को समझने की मनःस्थिति बना सकेंगे।


    भारत में गंगा यमुना के मैदानों से जुड़े राज्यों के अलावा बंगाल और पंजाब कमसकम दो सूबे हजारों सालों से नदियों पर निर्भर रहे हैं।


    अखंड बंगाल नदीमातृतक है और यहां की जीवन यात्रा नदी से शुरु होती है तो नदी में खत्म होती है और लोगो की भाषा और लोक संस्कृति में सर्वत्र ये नदियां अबाध बहती रहती हैं।बंगाल में हजारों तरह के लोकगीत नदी के साथ जुड़े हैं तो गाय पट्टी में भी तीज त्योहार, धर्म संस्कार,रीति रिवाज ,जनम मृत्यु पवित्र गंगा जल के बिना असंभव है।


    इसीतरह पांच नदियों से ही पंजाब है।नदियों की बहती धार ही पंजाब की मस्ती है।पंजाब की समृद्ध संस्कृति और जिंदगी अपने तरीके से जीने की जिद है।


    तमिलनाडु के प्रसंग में यह मामला बेहद संवेदनशील है क्यंकि बाकी भारत से उसकी भाषा,संस्कृति एकदम अलहदा है।


    जैसे कश्मीर की समस्या इसीलिए जटिल है कि वह बाकी भारत से हर मायने में अलहदा है।


    बंगाली,मराठी और पंजाबी जैसी राष्ट्रीयताएं कम ताकतवर या कम आजाद नहीं है।


    पंजाब में धर्म भी हिंदुत्व से अलग है।लेकिन पंजाब हजारों सालों से आर्यावर्त का हिस्सा रहा है और बंगाल आर्यावर्त स बाहर व्रात्य और अनार्य होने के बावजूद बुद्धमय बंगाल के पतन के बाद चैतन्य महाप्रभु और कवि जयदेव की वजह से बाकी भारत से जुड़ गया तो अंग्रेजी हुकूमत,आदिलवासी किसान आंदोलनो और जनविद्रोहों के साथ सात नवजागरण और बहुजन दलित आंदोलन के मार्फत बाकी भारत से उसका अलगाव लगातार खत्म होता रहा है।


    महाराष्ट्र आदिकाल से आर्यावर्त से बाहर रहा है बंगाल की तरह तो उसका नाता बुद्धमय बंगाल से ज्यादा गहरा है और पंजाब को मिला ले तो ये तीनों राज्य ब्राह्माण धर्म की निरंकुश सत्ता के खिलाफ युद्ध के सबसे बड़े मोर्चे हैं।


    अब भी पूर्वोत्तर में  भारत को विदेश माना जाता है और पूर्वोत्तर से आने वालों से राजधानी नई दिल्ली में विदेशियों से भी बुरा सलूक उसी तरह किया जाता है जैसे कश्मीर के लोगों के साथ।पूर्वोत्तर में चीन और म्यांमार की चीजों की कदर ज्यादा है भारतीय उपभोक्ता समाग्रियों की तुलना में।


    पूर्वोत्तर के इस अलगाव की का खास वजह राजनीति है तो इसकी एक बड़ी वजह हैकि हमारी गंगा या यमुना या नर्मदा या कृष्णा या कावेरी जैसी कोई नदी पूर्वोत्तर को बाकी भारत से जोड़ती नहीं है।


    यही खास मुद्दा है।


    मूलतः अनार्य द्रविड़ भाषा और संसकृति की पहचान के सवाल पर आत्म सम्मान के द्रविड़ आंदोलन की भाव भूमि को बाकी देश से कावेरी नदी ही जोड़ती है।


    इसलिए कावेरी का जल विवाद सिर्फ जल विवाद नहीं है,यह बाकी भारत से तमिलनाडु के नाभि नाल का संबंध सेतु है।मैसूर जब था कर्नाटक,तबसे यह जलविवाद बार बार पेचीदा होता रहा है।


    मसला पेचीदा इसलिए भही है क्योंकि बाकी देश की तरह कर्नाटक के किसानों के लिए भी कृषि संकट गहरा जाने से वे लोकतातंत्रिक तरीके से तमिलनाडु को पानी का हिस्सा देने को तैयार नहीं है और पानी उनके लिए भी जीवन मरण की समस्या है।


    बड़े बांधों ने जो विषम परिस्थितियां बना दी है,उससे अब बहुत देर तक जल युद्ध को चाटाल पाना असंभव है और पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों की जो काररपोरेट एकाधिकारवादी नरसंहारी लूटखसोट मची है, उस लिहाज से जल भी अब बहुत तेजी से निजी कारपोरेट संपदा में बदले लगी है।


    जैसे जंगल के अब कारपोरेट राष्ट्रीयता की आड़ में कारपोरेट संपदा बन जाने से जंगल से जुड़े आदिवासी भूगोल में सलवा जुड़ुम सार्वभौम है,उसीतरह नदियों के बंध जाने और जल के निजी कारपोरेट संपदा में बदल जाने से राष्ट्रीयता की आड़ में राष्ट्रों और राज्यों के बीच युद्ध और गृहयुद्ध परिसि्थतियां गगनघटा गहरानी है।


    तमिलनाडु जैसे राज्य के मामले में यह कश्मीर से जटिल समस्या है क्योंकि कावेरी के अलावा बाकी भारत के साथ तमिलनाडु का शायद ही कोई वास्तविक संबंध है जिससे चरमराते हुए संघीय लोक गणराज्य के ढांचे में फासिस्ट निरंकुश सत्ता की नई दिल्ली बहाल रख सकें।संसदीय लोकतंतत्र से नाता भी कावेरी का जलसेतु है,इसे समझ लें।


    नदी जल बंटवारा कोई नयी समस्या है,ऐसा भी नहीं है।


    भारत के गणरज्यों ने मोहनजोदाड़ो हड़प्पा के सिंधु सभ्यता समय से इस समस्या का सामना बार बार किया है और हर बार इसे सामाजिक यथार्थ के मुताबिक सुलझाया है।


    इसी प्रकरण में कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ के तथागत गौतम बुद्ध बनने की कथा है।जल महायुद्ध और गृहयुद्ध के प्रसंग में जल संकट सुलझाने की भारतीय गणराज्यों की गौरवशाली पंरपरा में लौटने के लिए तथागत के जीवन में निर्णायक रोहिणी जल विवाद को समझने की जरुरत है।


    इसी विवाद की वजह से राजकुमार सिद्धार्थ ने स्वेच्छा निर्वासन स्वीकार किया था क्योंकि जल विवाद में उलझे शाक्य और कोलियों के विवाद में उनके मत के खिलाफ बहुमत था और इसी बहुमत के सामने सर झुकाकर सिद्धार्थ ने राजमहल त्याग करके देशाटन का विकल्प चुना था।शाक्य गणराज्य ने कोलियों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी और राजकुमार सिद्धार्थ इस आत्मघाती युद्ध के विरुद्ध थे।


    शाक्यों ने चूंकि बहुमत से राजकुमार सिद्धार्थ का युद्धविरोधी तर्क खारिज कर दिया था,इसलिए उन्होंने कपिलवस्तु को छोडने का निर्णय किया।


    जाहिर है,रोग शोक जरा मृत्यु और सन्यास के यथार्थ से आकस्मिक मोहभंग की कथा से राजकुमार गौतम के गृहत्याग की किंवंदती से कोई लेना देना नहीं है।यह प्रक्षेपण बुद्धमय भारत के अवसान के बाद ब्राह्मण धर्म के विष्णुपद और पिंडदान की कथा की तरह  समता और न्याय के लिए गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति को रद्द करने की प्रतिक्रांति के तहत उनके बुद्धत्व के निर्वाण को ब्राह्मणत्व के अवतारवाद के तहत मोक्ष की आध्यात्मिक खोज में बदलने के मकसद से गढी हुई कथा है।


    इसके विपरीत सिद्धार्थ के गृहत्याग की असल वजह शाक्यों और कोलियों  के जलविवाद की वजह से बनी युद्ध परिस्थितिया हैं।


    गौरतलब है कि गौतम बुद्ध के गृहत्याग के बाद हालांकि शाक्यों और कोलियों ने उन्हीेंके बताये रास्ते पर जलविवाद का समाधान कर लिया,लेकिन तब तक सत्य की खोज में गौतम बुद्ध की अनंत यात्रा शुरु हो चुकी थी और वे फिर कभी राजमहल में लौटे नहीं।


    मौजूदा जल संकट को सुलझाने के लिए ढाई हजार साल पहले हमारे ही प्राचीन गणराज्यों की उस लोकतांत्रिक परंपरा में लौटने की जरुरत है और विस्तार से इस कथा को जाने समझने की अनिवार्यता है।


    वीकिपीडिया में इस विवाद का ब्यौरा इस प्रकार हैः

    बुद्ध शाक्य वंश के थे--देखे सुत्तनिपात पालि और उनका वास्तविक नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म कपिलवस्तु (शाक्य महाजनपद की राजधानी) के पास लुंबिनी (वर्तमान में दक्षिण मध्य नेपाल) में हुआ था। इसी स्थान पर, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोकने बुद्ध की स्मृति में एक स्तम्भ बनाया था।

    सिद्धार्थ के पिता शाक्यों के राजा शुद्धोदन थे। परंपरागत कथा के अनुसार, सिद्धार्थ की माता महामाया उनके जन्म के कुछ देर बाद मर गयी थी। कहा जाता है कि उनका नाम रखने के लिये 8 ऋषियो को आमन्त्रित किया गया था, सभी ने 2 सम्भावनाये बताई थी, (1) वे एक महान राजा बनेंगे (2) वे एक साधु या परिव्राजक बनेंगे। इस भविष्य वाणी को सुनकर राजा शुद्धोदन ने अपनी योग्यता की हद तक सिद्धार्थ को साधु न बनने देने की बहुत कोशिशें की। शाक्यों का अपना एक संघ था। बीस वर्ष की आयु होने पर हर शाक्य तरुण को शाक्यसंघ में दीक्षित होकर संघ का सदस्य बनना होता था। सिद्धार्थ गौतम जब बीस वर्ष के हुये तो उन्होंने भी शाक्यसंघ की सदस्यता ग्रहण की और शाक्यसंघ के नियमानुसार सिद्धार्थ को शाक्यसंघ का सदस्य बने हुये आठ वर्ष व्यतीत हो चुके थे। वे संघ के अत्यन्त समर्पित और पक्के सदस्य थे। संघ के मामलों में वे बहुत रूचि रखते थे। संघ के सदस्य के रुप में उनका आचरण एक उदाहरण था और उन्होंने स्वयं को सबका प्रिय बना लिया था। संघ की सदस्यता के आठवें वर्ष में एक ऐसी घटना घटी जो शुद्धोदन के परिवार के लिये दुखद बन गयी और सिद्धार्थ के जीवन में संकटपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी। शाक्यों के राज्य की सीमा से सटा हुआ कोलियों का राज्य था। रोहणी नदी दोनों राज्यों की विभाजक रेखा थी। शाक्य और कोलिय दोनों ही रोहिणी नदी के पानी से अपने-अपने खेत सींचते थे। हर फसल पर उनका आपस में विवाद होता था कि कौन रोहिणी के जल का पहले और कितना उपयोग करेगा। ये विवाद कभी-कभी झगड़े और लड़ाइयों में बदल जाते थे। जब सिद्धार्थ २८ वर्ष के थे, रोहणी के पानी को लेकर शाक्य और कोलियों के नौकरों में झगड़ा हुआ जिसमें दोनों ओर के लोग घायल हुये। झगड़े का पता चलने पर शाक्यों और कोलियों ने सोचा कि क्यों न इस विवाद को युद्ध द्वारा हमेशा के लिये हल कर लिया जाये। शाक्यों के सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के प्रश्न पर विचार करने के लिये शाक्यसंघ का एक अधिवेशन बुलाया और संघ के समक्ष युद्ध का प्रस्ताव रखा। सिद्धार्थ गौतम ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और कहा युद्ध किसी प्रश्न का समाधान नहीं होता, युद्ध से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी, इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण होगा। सिद्धार्थ ने कहा मेरा प्रस्ताव है कि हम अपने में से दो आदमी चुनें और कोलियों से भी दो आदमी चुनने को कहें। फिर ये चारों मिलकर एक पांचवा आदमी चुनें। ये पांचों आदमी मिलकर झगड़े का समाधान करें। सिद्धार्थ का प्रस्ताव बहुमत से अमान्य हो गया साथ ही शाक्य सेनापति का युद्ध का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया। शाक्यसंघ और शाक्य सेनापति से विवाद न सुलझने पर अन्ततः सिद्धार्थ के पास तीन विकल्प आये। तीन विकल्पों में से उन्हें एक विकल्प चुनना था (1) सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना, (2) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिए राजी होना, (3) फाँसी पर लटकना या देश निकाला स्वीकार करना। उन्होंने तीसरा विकल्प चुना और परिव्राजक बनकर देश छोड़ने के लिए राज़ी हो गए।(साभार वीकिपीडिया)।



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    सिक्किम में कनक नदी में भागीरथी जैसी कृत्तिम झील,मूसलाधार बारिश से कहर बरपने का अंदेशा

    एक्सेकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप संवाददाता

    सिक्किम में कनक नदी में कृत्रिम जलाशय के लिए वीडियो

    गांतोक।1978 में गंगोत्री के ऊपर भागीरथी के उत्स में भूस्खलन से कृत्तिम झील बन जाने से आयी बाढ़ से बंगाल तक के बह जाने के हालात बन गये थे।गंगा के किनारे गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक उस तबाही के आलम के फिर हिमालय के दूसरे छोर पर करीब चार दशक बाद सिक्किम की कनक और तीस्ता नदियों के संगम के मुख पर बनी कृत्तिम झील के निर्माण से दोहराये जाने का अंदेशा है,इसका विध्वंसक असर सिक्किम में उतना न भी हो तो  सिक्किम से आने वाली तीस्ता जैसी नदियों के उफने जाने की हालत में उत्तर बंगाल के जनजातिबहुल तमाम इलाकों से लेकर बांग्लादेश तक कहर टूटने  की आशंका है।


    मीडिया के मुताबिक सिक्किम में तीस्ता नदी की सहायक नदी कनक पर एक कृत्रिम झील बन जाने से निचले इलाकों पर अचानक बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया है।150 फीट चौड़ी इस झील से सिक्किम के निचले इलाकों और उत्तरी बंगाल में खतरा बढ़ गया है।दरअसल गंगटोक से 70 किलोमीटर दूर जोंगू में भारी बारिश से पहाड़ का बहुत बड़ा हिस्सा नीचे बह रही कनका नदी में गिर गया।अचानक गिरे मलबे से कनक नदी ब्लॉक हो गई...और उसमें कृत्तिम  झील बन गयी..अब मुश्किल यह है कि इस झील में पानी लगातार जमा हो रहा है...और वक्त के साथ खतरा बढ़ता ही जा रहा है..


    केंद्रीय जल आयोग  यानी सीडब्ल्यूसी ने पहाड़ों में भूस्खलन से की वजह से कनक नदी के रास्ते में रुकावट आने से झील के खतरे पर एक रपट तैयार की है।


    इस रपट के मुताबिक, कनक नदी पर बनी कृत्रिम झील में बहुत भारी मात्रा में पानी जमा हो रहा है और इसपर बने अवरोध के फटने से कनक और तीस्ता नदी में पानी का स्तर बहुत तेजी से 4.5 मीटर से ऊपर तक चढ़ जाएगा


    वैसे भी तिस्ता हमेशा बरसात में प्रलंयकर बन जाती है और अपने दोनों किनारों पर कगार तोड़कर कहर बरपाती है।उत्तर बंगाल में सालाना बाढ़ आम बात है और इस वक्त भी उत्र बंगाल बाढ़ के शिंकजे से कतई रिहा हुआ नहीं है।


    पिछले तेरह अगस्त को हुए भूस्खलन से यह कृत्तिम जझील बनी है।भूस्खलन से सिक्किम के ऊंचे पहाड़ों के मध्य मंगन के पास नदी बंध गयी है और उसमें पाहड़ का हिस्सा गिरने से प्राकृतिक बांध जैसा बनकर कनक नदी का अबाध जलप्रवाहझील में तब्दील है और मूसलाधार बारिश से उसके कभी भी टूट जाने की आशंका है।


    गांतोक में फिर भारी वर्षा की चेतावनी जारी कर दी गयी है और गांतोक में बैठे अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आपदा प्रबंधन के लिए सिक्किम के बाहर खासकर उत्तर बंगाल में क्या एहतियाती इंतजाम किये जा रहे हैं।


    गौरतलब है कि हाल के वर्षों में समुद्री तूफान से पहले मिली चेतावनी के बाद प्रभावित होने वाले इलाकों से जनसंख्या हटाने की कवायद कामयाब होते रहने की वजह से जान माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सका है।


    बहरहाल समुद्री तूफान से प्रभावित होने वाले समुद्रतट के सीमित क्षेत्र से जनसंख्या को हटाना जितना सरल है,पहाडों और तराई के दुर्गम इलाकों में वह करना बेहद मुश्किल है।फिर बाढ़ की चपेट में कमोबेश पूरा देश है।


    केदार जलप्रलय के अनुभव के मद्देनजर हुए मौसम भविष्यवाणी के मुताबिक देश में भारी वर्षा,भूस्खलन और बाढ़ से जान माल की हानि कम करने के लिहाज से समुद्री तूफान से निपटने की तर्ज पर अभी कुछ हुआ हो,ऐसी जानकारी नहीं मिली है।


    बहरहाल सूखे से किसानों की कमर टूट जाने के बाद देश भर में अतिवृष्टि और बाढ़ का सिलसिला शुरु हो गया है।हर साल की तरह राहत और सहायता की तैयारी जितनी है,आपदा प्रबंधन की कवायद उस हिसाब से नहीं के बराबर है।केंद्र और राज्यों की राजनीति जितनी गरमा रही है,हकीकत की जमीन पर आपदा प्रभावितों की जान माल की परवाह उतनी नहीं है।


    इस लिहाज से गांतोक,कोलकाता और दिल्ली या देश के किसी भी राजधानी क्षेत्र के मिजाज और मौसम में बुनियादी कोई फर्क नहीं है न पर्यावरण चेतना है।


    गांतोक में राज्य सरकार की कमान दशकों से पवन चामलिंग के हाथों में है,जो बहुत जल्द कामरेड ज्योति बसु के लगातार मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड तोड़ देने वाले हैं।


    सिक्कम के सीमावर्ती इलाकों में सेना ही मुख्य तौर पर आपदाओं से निबटती है और इसलिए पवन चामलिंग को आपदा प्रबंधन को लेकर खास सरदर्द नहीं है।


    वैसे भी बाकी हिमालयी क्षेत्रों कीतुलना में कश्मीर संकट के बाद पर्यटन के लिहाज से गांतोक और बाकी सिक्किम का खूब विकास हुआ है और गांतोक से ऊपर बर्फ छके पहाड़ों तक पहुंचने वाले तमाम रास्ते सेना के हवाले है।


    गांतोक में भी एक कदम पैदल चलेन की गुंजाइश नहीं है क्योंकि शहर के चप्पे चप्पे पर ऊंचाइयों और ढलान पर उतरने चढ़ने के लिए हर कदम पर टैक्सी है।पर्यटकों को दो चार दिन गांतोक अगर टहरना बी पड़े तो उनकी सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।


    सिक्किम में भारी पैमाने पर पूंजी निवेश हो रहा है।पर्यटन और पूंजी के इस खेल में आम जनता की जाम माल को लेकर जाहिर है कि सत्तावर्ग को कोई ज्यादा फिक्र भी नहीं है।


    जाहिर है,मूसलाधार बारिश से पर्यटन को होने वाले नुकसान से ही पवन चामलिंग को सरदर्द हो सकता है।आपदा प्रबंधन को लेकर नहीं।लेकिन भारत सरकार या बंगाल की राज्य सरकार को कनक नदी में कृत्तिम जलाशय के निर्माण से भागीरथी की 1978 जैसी बाढ़ के हालेता से निपटने की कितनी चिंता है,इसका अभी पता नहीं चला है।


    हांलाकि अबकी दफा मौसम चेतावनी के मुताबिक मूसलाधार बारिश होने से वह कृत्तिम झील टूटने ही वाली है।


    गौरतलब है कि इसी कनक नदी पर एनएचपीसी के कई बिजली संयंत्र लगे हैं और उन्हें सबसे ज्यादा खतरा है।एनएचपीसी में इसे लेकर खलबली मची है।सिक्किम में एनएचपीसी के कई पनबिजली उत्पादन केंद्रों के खतरे में पड़ जाने का अंदेशा है।


    बहरहाल सीडब्ल्यूसी की टीम ने कनक नदी पर बनी इस कृत्रिम झील से उत्पन्न खतरे का आंकलन किया है और अपनी रपट सिक्किम सरकार, एनडीएमए और एनएचपीसी को सौंप दी है। इस रपट में इस बात का आंकलन किया गया है कि कृत्रिम झील के अंदर कितना पानी जमा है? साथ ही इसमें कितनी तेजी से इजाफा हो रहा है?

    65 मीटर है डैम की ऊंचाई

    सीडब्ल्यूसी के ताजा रपट के मुताबिक, कनका नदी पर बनी कृत्रिम झील के डैम की ऊंचाई 65 मीटर है। नदी में पानी इस डैम से ओवरफ्लो कर रहा है। गौरतलब है कि कनक नदी तीस्ता नदी की सहायक नदी है और ये मंगन से तीन किलोमीटर पहले तीस्ता नदी में मिलती है। तीस्ता और कनका के संगम स्थान से चार किलोमीटर पहले कनका नदी पर भूस्खलन से यह कृत्रिम झील बनी है।

    गौरतलब है कि कृत्रिम झील से 21 किलोमीटर की दूरी पर तीस्ता नदी पर एनएचपीसी का पनबिजली डैम है।

    रपट के मुताबिक, कनका नदी का कैचमेंट एरिया 739 वर्ग किलोमीटर का है और इसमें से 264 वर्ग किलोमीटर 4500 मीटर से ऊपर की ऊंचाई पर है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 475 वर्ग किलोमीटर के इलाके में होने वाली बारिश से कनक नदी पर बनी कृत्रिम झील में पानी जा रहा है। सीडब्ल्यूसी की मानें तो, 65 मीटर गहरी झील में तकरीबन 75.5 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका है।


    ऐसे में वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि मानसून की झमाझम बारिश के बीच कृत्रिम झील के फटने का खतरा है। ऐसी स्थिति में क्या होगा इसका आंकलन भी किया गया है।



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    राजद्रोह का राष्ट्र: आनंद तेलतुंबड़े


    कोई कार्रवाई सचमुच राजद्रोह है, या फिर इसके नाम पर किसी तरह से बोलने की आजादी को कुचलने की कोशिश हो रही है, इसकी पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 'फौरन हिंसा'भड़काने की जो कसौटी रखी है, उस पर वो अपने फैसलों में बार-बार जोर देता रहा है जैसा कि एस. रंगराजन वगैरह बनाम पी. जगजीवन राम; इंद्र दास बनाम असम राज्य, और अरुप भुइंयां बनाम बनाम असम राज्य मामलों में देखा जा सकता है. इस संदर्भ में सबसे अहम फैसलों में से एक बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य है, जिसमें दो सिखों पर इंदिरा गांधी की हत्या के दिन खालिस्तान के पक्ष में और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया गया था. नारे साफ तौर पर भारतीय सार्वभौमिकता और सरकार को कमजोर करते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया क्योंकि उन्होंने फौरी तौर पर कोई हिंसा नहीं भड़काई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे साफ किया कि देश से अलग होने या हिंसक तरीके से सरकारों को उखाड़ फेंकने की हिमायत करना भी राजद्रोह के दायरे में नहीं आता, जब तक कि यह फौरी तौर पर हिंसा को उकसावा न देता हो.

    राजद्रोह का राष्ट्र: आनंद तेलतुंबड़े


    आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे आलोचना और असहमति को कुचलने के लिए तथा बोलने की आजादी को खत्म करने के लिए राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है. अनुवाद:रेयाज उल हक
    धारा 124 ए... भारतीय दंड विधान की राजनीतिक धाराओं का शायद सरताज है, जिसे नागरिकों की आजादी को कुचलने के लिए बनाया गया है.
    -महात्मा गांधी

    राजद्रोह (जिसे गलत तरीके से और शायद जानबूझ कर देशद्रोह कहा जा रहा है) फिर से सुर्खियों में है. इस बार इसका आरोप एक समूचे संगठन पर लगा है. दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले एक अग्रणी एनजीओ की शाखा एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने 13 अगस्त को 'ब्रोकेन फेमिलीज़'नाम का एक सेमिनार आयोजित किया था. यह जम्मू और कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का इंसाफ मांगने के अभियान का हिस्सा था. कार्यक्रम के दौरान जब पीड़ित अपनी आपबीती सुना रहे थे तो दक्षिणपंथी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों ने विरोध करना शुरू किया. इसके बाद हुई कहासुनी में कुछ कश्मीरी छात्रों ने आजादी के पक्ष में नारे लगाए. एबीवीपी ने एक एफआईआर दर्ज कराया और बैंगलोर पुलिस को इसके लिए मजबूर किया कि वो एमनेस्टी इंडिया पर 'दुश्मनी को बढ़ावा देने'के आरोप में और धारा 124-ए के तहत मुकदमा दर्ज करे जिसमें अगर कसूर साबित हो गया तो आजीवन कैद की सजा हो सकती है. राज्य की कांग्रेस सरकार ने फजीहत से बचते हुए कहा कि वो जांच के बाद ही इस दिशा में कोई फैसला करेगी. इस बेमतलब के बयान के बावजूद, अगर नारे भारत-विरोधी और पाकिस्तान के पक्ष में थे, तब भी सरकार को यह पता होना चाहिए कि कानूनन यह राजद्रोह के दायरे में नहीं आता.

    मौजूदा सत्ताधारी गिरोह द्वारा इस पुराने पड़ चुके कानून का जिस तरह गलत इस्तेमाल किया जा रहा है वो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की पूरी तरह अवमानना है. इसका मतलब हरेक असहमति को राजद्रोह बना देना है. इस गिरोह ने सरकार, राज्य, राष्ट्र और देश के बीच के फर्क को मिटा दिया है और वो खुद को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का साकार रूप मानने लगा है, इसलिए जो कोई भी इसके सामने खड़ा होता है वो खुद ब खुद राजद्रोही बन जाता है. पिछले चुनावों में 69 फीसदी भारतीयों ने उनके पक्ष में वोट नहीं डाला था और उनके प्रति कुछ असहमति जाहिर की थी, और इस दलील के मुताबिक वे संभावित रूप से राजद्रोही हैं, और इस तरह यह दलील इस देश को राजद्रोही लोगों का एक राष्ट्र बना देती है.

    औपनिवेशिक विरासत

     
    धारा 124-ए का मसौदा मूल रूप से मैकाले के 1837-39 के ड्राफ्ट पीनल कोड (मसौदा दंड संहिता) में बनाया गया था, लेकिन 1860 में लागू हुई आईपीसी में से इसे हटा दिया गया था. इसको 1870 में भारतीय मीडिया, बुद्धिजीवियों और आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की असहमत आवाजों को दबाने के लिए लागू किया गया. इसके सबसे शुरुआती मुकदमों में से एक 1891 में  बंगोबासी के संपादक जोगेंद्र चंद्र बोस का मुकदमा था, जो एज ऑफ कॉन्सेंट बिल की आलोचना करने और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के नकारात्मक आर्थिक प्रभावों पर टिप्पणी करने के लिए उन पर चला था. इसके बाद अनेक मुकदमे चले, सजाएं हुईं. लोकमान्य तिलक को इस अधिनियम के तहत 1897 में कसूरवार ठहराया गया लेकिन उन्हें 1898 में मैक्स वेबर जैसी अंतरराष्ट्रीय रूप से मशहूर शख्सियत के दखल के साथ इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे, न लिखेंगे और न बोलेंगे जिससे सरकार के प्रति नाखुशी को बढ़ावा मिलता हो. यह कानून 'नाखुशी' (disaffection) की अजीबोगरीब बात की ओट में सरकार के प्रति वफादारी की मांग करती है, जिसको तिलक के खिलाफ मुकदमे के दौरान परिभाषित करते हुए जज ने बताया था कि नाखुशी का मतलब मतलब सरकार के प्रति 'प्यार की कमी'है. आगे चल कर इसका शिकार बने गांधी ने इसकी साफ-साफ आलोचना करते हुए कहा था, 'कानून के जरिए आप प्यार नहीं जगा सकते और न इसको अपनी मर्जी से चला सकते हैं. अगर किसी को किसी इंसान से प्यार नहीं है, तो उसे अपनी नाखुशी को जाहिर करने की इसकी पूरी आजादी होनी चाहिए, बशर्ते वो हिंसक तरीके नहीं अपनाता और इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित करने और भड़काने नहीं लग जाता.'आगे चल कर गांधी राष्ट्रपिता बने और भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना, लेकिन यह कठोर औपनिवेशिक कानून, बल्कि पूरा का पूरा आईपीसी ही अच्छे लगने वाले जुमलों और बातों के संवैधानिक मुलम्मे के साथ जस का तस अपना लिया गया.

    संविधान सभा में राजद्रोह को हटाने के लिए एक संशोधन पेश किया गया था, लेकिन के.एम. मुंशी की दखल ने इसे बचा लिया, जिनकी दलील थी कि सरकार की आलोचना और सुरक्षा और व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले उकसावे के बीच में फर्क किया जा सकता है. पहले संविधान संशोधन के वक्त प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने साफ साफ कहा था कि राजद्रोह कानून बुनियादी तौर पर असंवैधानिक है. इसके बावजूद राजद्रोह कानून कानून की किताब में बना रहा और केंद्र और राज्य सरकारें बार-बार इसका इस्तेमाल राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए करती रहीं. इस कानून को पहली बड़ी संवैधानिक चुनौती पचास के दशक में मिली जब तारा सिंह गोपी चंद (1951), साबिर रजा (1955) और राम नंदन (1958) के तीन मामलों में इसे बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया गया. पहले मामले में मुख्य न्यायाधीश एरिक वेस्टन ने लिखा, "भारत अब एक सार्वभौम लोकतांत्रिक राज्य है. ...विदेशी शासन के वक्त जरूरी माना गया राजद्रोह का कानून अब इस बदलाव की वजह से ही नामुनासिब हो गया है."बाद में राम नंदन के मामले में, जिनको खेतिहरों और मजदूरों को अपनी सेना बना कर सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रोत्साहित करने के भड़काऊ भाषण का कसूरवार ठहराया गया था, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में धारा 124-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई. अदालत ने राम नंदन को कसूरवार माने जाने को खारिज कर दिया और धारा 124-ए को असंवैधानिक घोषित किया.

    कानून की वापसी
     

    लेकिन 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में इस फैसले को पलट दिया. केदार नाथ सिंह बिहार में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के एक सदस्य थे, उन्होंने कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और तानाशाही का आरोप लगाया था और जमीन के फिर से बंटवारे की विनोबा भावे की कोशिशों को निशाना बनाया था. उन्होंने क्रांति की बात की थी, जो पूंजीपतियों, जमींदारों और कांग्रेस नेताओं को उखाड़ फेंकेगी. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आईपीसी की 124-ए और 505-बी के तहत कसूरवार ठहराया. उन्होंने इस फैसले के तहत अपील किया. पटना उच्च न्यायालय ने उनकी अपील को खारिज कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को तो कायम रखा, लेकिन इसे सिर्फ उन्हीं कार्रवाइयों में लागू किए जाने लायक बताया जिनमें कानून-व्यवस्था भंग किए जाने का रुझान मिलता है  या फिर जिनमें फौरन हिंसा भड़काई गई हो. जजों ने साफ-साफ यह कहा कि अगर राजद्रोह कानून की व्याख्या व्यापक हुई तो यह संवैधानिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा. इसलिए अदालत ने अमेरिकी कानून की तर्ज पर राजद्रोह के मामलों को तय करने के लिए इस बात पर जोर दिया कि उस कार्रवाई का असर क्या था, न कि अपने आप में वह कार्रवाई क्या थी. इसने बहुत साफ-साफ कहा कि अगर 'लिखे या बोले गए शब्द, जिनसे सरकार के खिलाफ सिर्फ नाराजगी या दुश्मनी पैदा होती हो'के मामले में धारा 124-ए को लागू किया गया तो ऐसे में यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के अधीन होगी. यह अनुच्छेद अन्य बातों के अलावा सभी नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति के, शांति पूर्ण रूप से जमा होने और संगठित होने के अधिकार देता है.

    कोई कार्रवाई सचमुच राजद्रोह है, या फिर इसके नाम पर किसी तरह से बोलने की आजादी को कुचलने की कोशिश हो रही है, इसकी पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 'फौरन हिंसा'भड़काने की जो कसौटी रखी है, उस पर वो अपने फैसलों में बार-बार जोर देता रहा है जैसा कि एस. रंगराजन वगैरह बनाम पी. जगजीवन राम; इंद्र दास बनाम असम राज्य, और अरुप भुइंयां बनाम बनाम असम राज्य मामलों में देखा जा सकता है. इस संदर्भ में सबसे अहम फैसलों में से एक बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य है, जिसमें दो सिखों पर इंदिरा गांधी की हत्या के दिन खालिस्तान के पक्ष में और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया गया था. नारे साफ तौर पर भारतीय सार्वभौमिकता और सरकार को कमजोर करते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया क्योंकि उन्होंने फौरी तौर पर कोई हिंसा नहीं भड़काई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे साफ किया कि देश से अलग होने या हिंसक तरीके से सरकारों को उखाड़ फेंकने की हिमायत करना भी राजद्रोह के दायरे में नहीं आता, जब तक कि यह फौरी तौर पर हिंसा को उकसावा न देता हो.

    कानून का राज कहां है

    कानून भले ही ऐसा हो, लेकिन सरकारें इसे राजनीतिक असहमति को कुचलने या फिर लोगों को काबू में करने की खातिर उन्हें आतंकित करने के लिए इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती रही हैं. बदकिस्मती ये है कि अरुंधति रॉय, एसएआर गीलानी, डॉ. बिनायक सेन और हाल ही में जेएनयू के छात्रों, तमिल लोक गायक कोवन, हार्दिक पटेल और असीम त्रिवेदी जैसे कुछ मशहूर मामले ही मीडिया में जगह बना पाते हैं. दिलचस्प बात ये है कि गीलानी और रॉय के मामले में राजद्रोह के मुकदमे पुलिस द्वारा नहीं बल्कि निचली अदालत द्वारा थोपे गए. कुछ कम जाने माने मामलों में शामिल है एक कश्मीरी स्कूली शिक्षक का मामला जिसको कश्मीर घाटी में अशांति से संबंधित सवाल वाला एक प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए राजद्रोही बताया गया, दलित सामाजिक कार्यकर्ता और विद्रोही के संपादक सुधीर धवले को माओवादी संपर्कों के लिए गिरफ्तार किया गया, अहमदाबाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय संपादक भारत देसाई को अपने एक वरिष्ठ रिपोर्टर और फोटोग्राफर के साथ इस आरोप का सामना करना पड़ा, जिन्होंने पुलिस अधिकारियों की काबिलियत पर सवाल उठाए थे और उनके और माफिया के बीच रिश्तों का आरोप लगाया था; एक भारत-पाक क्रिकेट मैच के दौरान पाकिस्तान के लिए खुशी मनाने वाले कश्मीरी छात्रों पर इसका आरोप लगाया गया. लेकिन गरीब आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों के ऐसे बेशुमार मामले हैं, जिन पर किसी की भी निगाह नहीं जाती.

    एक तरफ जहां अवाम के हक में खड़े कार्यकर्ता और बुद्धिजीवियों को राजद्रोह के आरोपों में परेशान किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ असली अपराधियों को महान देशभक्त बताया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजद्रोह की जो परिभाषा दी गई है, उसकी सबसे अच्छी मिसाल 1992-93 में बंबई दंगों के पहले और उसके दौरान बाल ठाकरे के भाषण हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णा आयोग के मुताबिक मुसलमानों की हत्याओं के लिए सीधे-सीधे उकसाया. उसके पहले भाजपा नेताओं द्वारा रथ यात्रा के दौरान और अयोध्या में 1992 में दिए गए भाषण हैं, जिनका अंजाम ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की तबाही और खौफनाक सांप्रदायिक दंगे रहे. ये राजद्रोह के सटीक मामले हैं. खुद नरेंद्र मोदी द्वारा 2002 में दिए गए सांकेतिक बयान भी राजद्रोह की मिसाल हो सकते हैं, जो गुजरात में 2000 मुसलमानों के कत्लेआम की वजह बने. और बेशक साधुओं और साध्वियों और प्रवीण तोगड़िया और प्रमोद मुतलिक जैसों द्वारा लगातार जहर उगलना तो पक्के तौर पर राजद्रोह है, जो सीधे-सीधे मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काते हैं.

    राजद्रोह के मामलों के इतिहास को देखें तो उनमें से शायद ही कोई अदालत में टिक पाता है, लेकिन पुलिस बेधड़क इसका इस्तेमाल करती जा रही है, जैसा कि एमनेस्टी के मौजूदा मामले में देखा गया है. इस मामले में विडंबना ये है कि सेमिनार में एबीवीपी की हरकत को राजद्रोही कहा जा सकता है, क्योंकि इसने सीधे-सीधे एक भीड़ को एमनेस्टी के दफ्तर पर हमला करने के लिए उकसाया और सार्वजनिक व्यवस्था को भंग किया, जबकि कश्मीरी छात्रों द्वारा लगाए गए आजादी के नारों से कुछ भी नहीं हुआ था. अनुभव के आधार पर साबित तथ्य यह है कि सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा तभी होता है जब एक प्रभावशाली इंसान, जो हरेक मामले में एक ऐसा राजनेता होता है जिसे राज्य का समर्थन हासिल होता है, कोई विवादास्पद बयान देता है. कार्यकर्ता भले ही लोगों को विद्रोह में उठ खड़े होने को उकसाएं, उन्हें जनता की तरफ से ऐसी कोई प्रतिक्रिया मुश्किल से ही मिलती है.

    लेकिन फिर यह अधिनियम कानून का हिस्सा अभी तक क्यों बना हुआ है, जो लोकतंत्र के इतने अयोग्य है? हमारे भलेमानस जजों ने इसकी व्याख्या की है, लेकिन जिस भाषा में यह व्याख्या की गई है वह अभी भी पुलिस को इसके लिए एक पर्याप्त ओट देती है कि वह लोगों को परेशान करती रहे. और शासकों का मकसद ही यही है. संविधान की संरक्षक अदालतों को इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर देना चाहिए, क्योंकि यह संविधान की आत्मा को पूरी तरह से नकारता है. अगर जनता सार्वभौम है और उसने ही सरकार बनाई है, तो फिर जनता को ही कैसे राजद्रोही कहा जा सकता है? जिन चुने हुए प्रतिनिधियों पर भरोसा करते हुए जनता ने उन्हें सत्ता सौंपी है, अगर वो गलत आचरण करते हैं और इस भरोसे का उल्लंघन करते हुए अपनी सत्ता का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो असल में राजद्रोह तो इसे होना चाहिए.

    वक्त आ गया है कि हमारा सर्वोच्च न्यायालय इस कानून को और ऐसे ही दूसरे कठोर कानूनों को खत्म करे और हमें इस मजाक से राहत दिलाए.
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    শম্বূক, একলব্য, চুনি কোটাল থেকে রোহিত ভেমুলা, দাদরী থেকে কালাহাণ্ডি মৃত্যু উপত্যকায় আমাদের মিছিলঃ

    Saradindu Uddipan 

    গতকাল ১১ই সেপ্টেম্বর, ২০১৬ কোলকাতার সেবা কেন্দ্রে অনুষ্ঠিত হল দলিত-বহুজন স্বাধিকার আন্দোলনের প্রথম কনভেনশন। কনভেনশনে উপস্থিত ছিলেন গবেষক বিরাট বৈরাগ্য, সাহিত্যিক মনোরঞ্জন বেপারী, নাট্যকার রাজু দাস, যুক্তিবাদী লেখক সাধন বিশ্বাস, হায়দরাবাদ বিশ্ববিদ্যালয়ের গবেষক ছাত্র এবং Justice for Rohit Vemula আন্দোলনের সদস্য বিকাশ মুলা, বহুজন সমাজ আন্দোলনের নেত্রী স্মৃতিকনা হাওলাদার, কর্নেল সিদ্ধার্থ ভার্বে, যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়, প্রেসিডেন্সী কলেজ, কোলকাতা মেডিকাল কলেজের ছাত্রছাত্রী সহ ৫০ জন কর্মকর্তা।

    মূলত এই কনভেনশনের উদ্দেশ্য ছিল দলিত, বহুজন মূলনিবাসী সমাজের সার্বিক মুক্তি আন্দোলনের অভিমুখ নির্ধারণ করা। আলোচনার মাধ্যমে উঠে আসে বহুজন, মূলনিবাসী সমাজের উপর ব্রাহ্মন্যবাদী শাসনের দমন পীড়ন, শোষণের ইতিহাস। প্রকাশিত করা হয় এই আন্দোলনের অভিমুখ পত্র।

    এই অভিমুখ পত্রের কিছুটা অংশ এখানে যুক্ত করা হল।

    "The reasons that led Chuni, a unique woman, to take her own life, are palpable ones and she became a victim of sheer injustice and callousness of the university authorities and the West Bengal government" (The Statesman, 23/08/1992)
    বলতে দ্বিধা নেই যে চুনি কোটালের মৃত্যু ছিল ব্রাহ্মন্যবাদী রাষ্ট্রীয় ব্যবস্থার চরম দৃষ্টান্ত। চুনির মৃত্যুতে প্রমানিত হয়েছিল যে ব্রাহ্মন্যবাদ ভেদভাব, ঘৃণা ও নরহত্যার ঐতিহাসিক মার্গ। ব্রাহ্মন্যবাদ কখনোই সাম্য এবং বৈচিত্রের মধ্যে সহাবস্থান মেনে নেয় না। ব্রাহ্মন্যবাদ মনুর শাসন দ্বারা নিয়ন্ত্রিত যেখানে দলিত-বহুজনের ভাগিদারী এবং স্বাধিকার প্রতিষ্ঠা ব্রাহ্মণ সমাজের কাছে উতকন্ঠা ও উদ্বেগের কারণ হিসেবে বর্ণিত। ২০১৬ সালের ১৭ই জানুয়ারী রোহিত ভেমুলার প্রাতিষ্ঠানিক হত্যাকাণ্ডে আবার প্রমানিত হয়েছে যে ব্রাহ্মন্যবাদ ভারত বিধ্বংসী বিষ এবং এই বিষের প্রভাব এখনো সমান ভাবে কার্যকরী। সমাজ পাল্টালেও ব্রাহ্মন্যবাদের ঘৃণ্য প্রভাব একেবারে পাল্টায়নি বরং উপযুক্ত পরিবেশ ও রাষ্ট্রীয় ইন্ধন পেয়ে দ্রুত ছড়িয়ে পড়ছে ভারতবর্ষের সমগ্র শরীরে। মুজাপফরনগর, দাদরি, উনা, কালাহান্ডি সর্বত্র চলছে মৃত্যুর মিছিল। ভারত মাতার মৃত শরীর উঠে আসছে দানা মাঝিদের শক্ত কাঁধে। উন্নত শির, শক্ত হাত, শক্ত গতর। পাথরের মত কঠিন। গো-রক্ষকদের নৃশংস ডাণ্ডাকেও ক্লান্ত করে ছেড়েছে প্রতিরোধের এই শক্ত গতর। চুনি কোটালের সময় থেকে যে প্রতিরোধ শুরু হয়েছিল আজ তা উচ্চকিত হয়ে এক ঘূর্ণি ঝড়ের আকার নিয়েছে। ইউনেস্কোর বিশেষ সভায় ধিক্কার জানানো হয়েছে ভারতের ব্রাহ্মণ্য শাসন ব্যবস্থাকে। ভারতের পার্লামেন্টে ঝড় বয়ে গেছে। ধিক্কার জানানো হয়েছে আপ্পা রাও, বাঙ্গারু দত্তাত্রেয় ও স্মৃতি ইরানীকে। উনার ঘটনায় প্রতিবাদের ঝড় উঠেছে সর্বত্র। চর্মকার ভাইদের সমর্থনে এগিয়ে এসেছে দলিত মুসলিম ভাইয়েরা। তাদের সম্মিলিত বিপুল প্রতিরোধের কাছে নতিস্বীকার করে গদি ছাড়তে হয়েছে গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রীকে। ভারতের প্রতি কোনে কোনে সংঘটিত হয়েছে দীপ্ত মিছিল। দেশের জনগণের মধ্যে সংহতির চেতনা জাগ্রত কারার জন্য জাতপাতের ভেদভাবকে উপেক্ষা করে মিছিলে মিলিত হয়েছে অগণিত মানুষ। তারা দীপ্ত ভাবে ঘোষণা করেছে ব্রাহ্মন্যবাদ নিপাত যাক, জাতপাত নিপাত যাক, মনুর শাসন ধ্বংস হোক। তারা হুঁশিয়ার করেছে সেই সব দাঙ্গাবাজদের যারা নিজের হাতে আইন তুলে নিয়ে ভারতীয় শাসনব্যবস্থাকে ভেঙ্গে ফেলার চক্রান্তে সামিল হয়েছে। তারা দাবী করেছে যে সব কাজের জন্য জাতপাত নির্ণয় করা হয় সেই কাজ আর তারা করবেনা। তারা দাবী করেছে সরকারকে তাদের প্রাপ্য জমি ফেরত দিতে হবে এবং সেই জমিতে খাদ্য উৎপাদন করে তারা মর্যাদার সাথে জীবনযাপন করবে। তারা ঘোষণা করেছেন যে বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকরের প্রদর্শিত পথেই তারা এগিয়ে চলবে এবং ভারতবর্ষকে এক কল্যাণকারী রাষ্ট্র হিসেবে গড়ে তুলবে। 
    আমাদের প্রতিবাদের ভাষাঃ 
    "অর্থনৈতিক ও সামাজিক শোষণের অন্তরায় সমস্ত উপাদানগুলিকে দূর করতে হবে। আমরা জমিদারতন্ত্রের দখলদারী ও ভূমিহীন সর্বহারা শ্রমিক দেখতে চাইনা। আদর্শ অর্থনীতির ভিত্তি হল স্বাধীনতা ও কল্যাণ। পুঁজিপতিদের দ্বারা পরিচালিত সামজিক ও অর্থনৈতিক ভারসাম্যহীন উৎপাদনের পরিসমাপ্তি ঘটাতেই হবে"। অবৈধ অধিগ্রহণের পক্ষে আম্বেদকরের এই ঘোষণা এবং তার রচিত সংবিধান নব্য সামন্তদের কাছে এক বড় বাঁধা। আশার কথা, জনগণ ক্রমশ উপলব্ধি করতে শুরু করেছে যে ভারতীয় সংবিধান তাদের স্বাধিকারের রক্ষার পক্ষে এক দুর্ভেদ্য রক্ষাকবজ। এই রক্ষাকবজের জন্যই দলিত বহুজনের জমি জোর করে অধিগ্রহণ করা যায় না। কোন স্বৈরাচারী সরকার জোর করে জমি অধিগ্রহণ করলে ন্যায়পালিকা তাকে ফিরিয়ে দিতে বাধ্য হয়। দলিত-বহুজন মানুষ বুঝতে পারছেন যে ভারতীয় সংবিধানের স্রষ্টা বাবা সাহেব আম্বেদকর এমন এক মহাশক্তির আঁধার যিনি সীমাহীন প্রজ্ঞা ও আন্তরিকতা দিয়ে মানুষকে সমমর্যাদার আসনে প্রতিষ্ঠা করে দিয়েছেন। মানুষ বুঝতে পারছে যে আম্বেদকরের নির্দেশিত ভাগিদারী দর্শনের পথ ধরেই প্রকৃত পক্ষে সাম্যবাদ প্রতিষ্ঠিত হবে। 
    আমাদের লক্ষ্যঃ 
    · ভারতে গণতান্ত্রিক পরিবেশ ফিরিয়ে এনে ন্যায়ের শাসন প্রতিষ্ঠা করা।
    · মানবাধিকার সুরক্ষিত করা। 
    · দলিত-বহুজনের মধ্যে সচেতনতা ও সংহতি অটুট করে দাঙ্গাবাজদের বিরুদ্ধে প্রতিরোধ গড়ে তোলা।
    · আইনের শাসন বলবত করে তোলার জন্য নাগরিক সমাজকে সক্রিয় ভূমিকা পালন করার জন্য উৎসাহিত করা।
    · ভারতের সংবিধানের প্রস্তাবনা অনুসারে জাতপাত মুক্ত ভারত এবং ন্যায়, সাম্য, স্বাধীনতা ও ভ্রাতৃত্বপূর্ণ সমাজ গড়ে তোলার প্রচেষ্টা করা।

    আমাদের দাবীঃ 
    · সাম্প্রদায়িক সম্প্রীতি রক্ষার জন্য "আন্টি কম্যুনাল ভায়োলেন্স বিল"পাশ করা।
    · এসসি/এসটি আট্রোসিটিস অ্যাক্ট ১৯৮৯কে কঠোর ভাবে কার্যকরী করা।
    · সরকারী উচ্চপদে প্রমোশনের জন্য এসসি/এসটি, ওবিসি বিল পাশ করা।
    · অবিলম্বে রোহিত আইন চালু করা যাতে আর কোন ছাত্রছাত্রীকে আত্মহত্যা না করতে হয়।
    · রোহিতের মৃত্যুর জন্য দায়ী সমস্ত ব্যক্তিকে অবিলম্বে গ্রেপ্তার করা। 
    · দেশপ্রেমের নামে গুন্ডামী বন্ধ করা।
    · এসসি/এসটি, ওবিসি শংসাপত্র পাওয়া সুনিশ্চিত করা।
    · এসসি/এসটি, ওবিসিদের জন্য সমস্ত ব্যাকলগ চাকরীগুলি অবিলম্বে পূরণ করা। 
    · ২০০৩ সালের নাগরিকত্ব আইন বাতিল করে সমস্ত উদ্বাস্তুদের ভারতীয় নাগরিকত্ব দান সুনিশ্চিত করা।

    আমাদের কর্মসূচীঃ

    · প্রচার অভিযান সংগঠিত করা।
    · সভা সমাবেশ ও অবস্থান বিক্ষোভের মাধ্যমে কর্মসূচীগুলিকে বলবত করার জন্য আন্দোলন সংঘটিত করা।
    · একটি চালিকা সমিতি গঠন করে আন্দোলন কর্মসূচীর রণনীতি এবং রণকৌশল নির্ধারণ করা।
    · সম মানসিকতা সম্পন্ন সংগঠগুলিকে নিয়ে একটি সামাজিক ও সাংস্কৃতিক আন্দোলন মঞ্চ এবং নেটওয়ার্ক গড়ে তোলা।
    · বহুজন মনিষীদের স্মরণীয় দিবসগুলি পালন করা এবং মানুষকে ন্যায়, সাম্য, স্বাধীনতা ও ভ্রাতৃত্ব প্রেমে আবদ্ধ করে বহুজন সেবিত ভারতবর্ষ গড়ে তোলা।

    দলিত-বহুজন স্বাধিকার আন্দোলনের পক্ষে
    শরদিন্দু উদ্দীপন
    জয় ভীম, জয় ভারত


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    Bengali Students launched indefinite strike in Chhattishgargh Demanding right to mother tongue!They have gathered in Pakhanjore. Students in large are sitting there demanding inclusion of Bengali in Chhattishgargh scholls.

    They expect support form Bengal and elsewhere,from rest of India,from those who happen to be deprived of the right to their mother tongue!

    Bengali refugees earlier did Gherao of the Chhttishgargh State assembly in 1015 and the stated government then assured to solve their problems.Which never solved at all.

    Now the Bengali students have gathered to demand right to mother tongue and Nikhil Bharat Udvastu Samanyay Samiti is leading the students

     President NIBBUS ,Dr Subodh Biswas and General Secretary Advocate Ambika Roy have supported the movement and assured that the mother tongue movement would be launched in other states also.

    See the vedio:

    https://www.facebook.com/hiranmaysarkar07/videos/pcb.323258318008829/1095774250458663/?type=3&theater


    Palash Biswas






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    Subject: Toba Tek Singh, Netaji and Singur Nandigram
    Newsgroups: gmane.culture.region.indonesia.ppi-india
    Date: Saturday 17th February 2007 18:30:40 UTC (over 9 years ago)
    Toba Tek Singh, Netaji and Singur - Nandigram    Palash Biswas    (Contact: Palash Biswas, C/O Mrs Arati Roy, Gosto Kanan,Sodepur,   Kolkata- 700110, India. Phone: 91-33-25659551)      Saadat Hasan Manto (1912-55) was the leading Urdu short-story writer   of the twentieth century. He was born in Samrala in the Ludhiana   district of Punjab. He worked for All India Radio during World War   II and was a successful screenwriter in Bombay before moving to   Pakistan at Partition. During his controversial two-decade career,   Manto published twenty-two collections of stories, seven collections   of radio plays, three collections of essays, and a novel.     Toba Tek Singh     Translated from the Urdu by Richard McGill Murphy     (click here for a downloadable PDF formatted version of the original   Urdu text)       Two or three years after Partition, the governments of Pakistan and   India decided to exchange lunatics in the same way that they had   exchanged civilian prisoners. In other words, Muslim lunatics in   Indian madhouses would be sent to Pakistan, while Hindu and Sikh   lunatics in Pakistani madhouses would be handed over to India.    I can't say whether this decision made sense or not. In any event, a   date for the lunatic exchange was fixed after high level conferences   on both sides of the border. All the details were carefully worked   out. On the Indian side, Muslim lunatics with relatives in India   would be allowed to stay. The remainder would be sent to the   frontier. Here in Pakistan nearly all the Hindus and Sikhs were   gone, so the question of retaining non-Muslim lunatics did not   arise. All the Hindu and Sikh lunatics would be sent to the frontier   in police custody.    I don't know what happened over there. When news of the lunatic   exchange reached the madhouse here in Lahore, however, it became an   absorbing topic of discussion among the inmates. There was one   Muslim lunatic who had read the newspaper Zamindar1 every day for   twelve years. One of his friends asked him: "Maulvi Sahib! What is   Pakistan?" After careful thought he replied: "It's a place in India   where they make razors."     Hearing this, his friend was content.    One Sikh lunatic asked another Sikh: "Sardar ji, why are they   sending us to India? We don't even speak the language."    "I understand the Indian language," the other replied,   smiling. "Indians are devilish people who strut around haughtily,"   he added.    While bathing, a Muslim lunatic shouted "Long live Pakistan!" with   such vigor that he slipped on the floor and knocked himself out.     One lunatic got so involved in this India/Pakistan question that he   became even crazier. One day he climbed a tree and sat on one of its   branches for two hours, lecturing without pause on the complex   issues of Partition. When the guards told him to come down, he   climbed higher. When they tried to frighten him with threats, he   replied: "I will live neither in India nor in Pakistan. I'll live in   this tree right here!" With much difficulty, they eventually coaxed   him down. When he reached the ground he wept and embraced his Hindu   and Sikh friends, distraught at the idea that they would leave him   and go to India.     One man held an M.S. degree and had been a radio engineer. He kept   apart from the other inmates, and spent all his time walking   silently up and down a particular footpath in the garden. After   hearing about the exchange, however, he turned in his clothes and   ran naked all over the grounds.     There was one fat Muslim lunatic from Chiniot who had been an   enthusiastic Muslim League activist. He used to wash fifteen or   sixteen times a day, but abandoned the habit overnight. His name was   Mohammed Ali. One day he announced that he was the Qaid-e-Azem,   Mohammed Ali Jinnah. Seeing this, a Sikh lunatic declared himself to   be Master Tara Singh. Blood would have flowed, except that both were   reclassified as dangerous lunatics and confined to separate   quarters.     There was also a young Hindu lawyer from Lahore who had gone mad   over an unhappy love affair. He was distressed to hear that Amritsar   was now in India, because his beloved was a Hindu girl from that   city. Although she had rejected him, he had not forgotten her after   losing his mind. For this reason he cursed the Muslim leaders who   had split India into two parts, so that his beloved remained Indian   while he became Pakistani.     When news of the exchange reached the madhouse, several lunatics   tried to comfort the lawyer by telling him that he would be sent to   India, where his beloved lived. But he didn't want to leave Lahore,   fearing that his practice would not thrive in Amritsar.     In the European Ward there were two Anglo-Indian lunatics. They were   very worried to hear that the English had left after granting   independence to India. In hushed tones, they spent hours discussing   how this would affect their situation in the madhouse. Would the   European Ward remain, or would it disappear? Would they be served   English breakfasts? What, would they be forced to eat poisonous   bloody Indian chapattis instead of bread?    One Sikh had been an inmate for fifteen years. He spoke a strange   language of his own, constantly repeating this nonsensical   phrase: "Upri gur gur di annexe di be-dhiyan o mung di daal of di   lalteen."2 He never slept. According to the guards, he hadn't slept   a wink in fifteen years. Occasionally, however, he would rest by   propping himself against a wall.    His feet and ankles had become swollen from standing all the time,   but in spite of these physical problems he refused to lie down and   rest. He would listen with great concentration whenever there was   discussion of India, Pakistan and the forthcoming lunatic exchange.   Asked for his opinion, he would reply with great seriousness: "Upri   gur gur di annexe di be-dhiyana di mung di daal of di Pakistan   gornament."    There were also some lunatics who weren't really crazy. Most of   these inmates were murderers whose families had bribed the madhouse   officials to have them committed in order to save them from the   hangman's noose. These inmates understood something of why India had   been divided, and they had heard of Pakistan. But they weren't all   that well informed. The newspapers didn't tell them a great deal,   and the illiterate guards who looked after them weren't much help   either. All they knew was that there was a man named Mohammed Ali   Jinnah, whom people called the Qaid-e-Azem. He had made a separate   country for the Muslims, called Pakistan. They had no idea where it   was, or what its boundaries might be. This is why all the lunatics   who hadn't entirely lost their senses were perplexed as to whether   they were in Pakistan or India. If they were in India, then where   was Pakistan? If they were in Pakistan, then how was it that the   place where they lived had until recently been known as India?      Later he replaced "of di Pakistan gornament" with "of di Toba Tek   Singh gornament." He also started asking the other inmates where   Toba Tek Singh was, and to which country it belonged. But nobody   knew whether it was in Pakistan or India. When they argued the   question they only became more confused. After all, Sialkot had once   been in India, but was apparently now in Pakistan. Who knew whether   Lahore, which was now in Pakistan, might not go over to India   tomorrow? Or whether all of India might become Pakistan? And was   there any guarantee that both Pakistan and India would not one day   vanish altogether?    This Sikh lunatic's hair was unkempt and thin. Because he washed so   rarely, his hair and beard had matted together, giving him a   frightening appearance. But he was a harmless fellow. In fifteen   years, he had never fought with anyone.     The attendants knew only that he owned land in Toba Tek Singh   district. Having been a prosperous landlord, he suddenly lost his   mind. So his relatives bound him with heavy chains and sent him off   to the madhouse.     His family used to visit him once a month. After making sure that he   was in good health, they would go away again. These family visits   continued for many years, but they stopped when the India/Pakistan   troubles began.     This lunatic's name was Bashan Singh, but everyone called him Toba   Tek Singh. Although he had very little sense of time, he seemed to   know when his relatives were coming to visit. He would tell the   officer in charge that his visit was impending. On the day itself he   would wash his body thoroughly and comb and oil his hair. Then he   would put on his best clothes and go to meet his relatives.     If they asked him any question he would either remain silent or   say: "Upri gur gur di annexe di be-dhiyana di mung di daal of di   laaltein."     Bashan Singh had a fifteen-year-old daughter who grew by a finger's   height every month. He didn't recognize her when she came to visit   him. As a small child, she used to cry whenever she saw her father.   She continued to cry now that she was older.    When the Partition problems began, Bashan Singh started asking the   other lunatics about Toba Tek Singh. Since he never got a   satisfactory answer, his concern deepened day by day.     Then his relatives stopped visiting him. Formerly he could predict   their arrival, but now it was as though the voice inside him had   been silenced. He very much wanted to see those people, who spoke to   him sympathetically and brought gifts of flowers, sweets and   clothing. Surely they could tell him whether Toba Tek Singh was in   Pakistan or India. After all, he was under the impression that they   came from Toba Tek Singh, where his land was. ...      A few days before the day of the exchange, one of Bashan Singh's   Muslim friends came to visit from Toba Tek Singh. This man had never   visited the madhouse before. Seeing him, Bashan Singh turned   abruptly and started walking away. But the guard stopped him.    "He's come to visit you. It's your friend Fazluddin," the guard said.    Glancing at Fazluddin, Bashan Singh muttered a bit. Fazluddin   advanced and took him by the elbow. "I've been planning to visit you   for ages, but I haven't had the time until now," he said. "All your   relatives have gone safely to India. I helped them as much as I   could. Your daughter Rup Kur . . ."    Bashan Singh seemed to remember something. "Daughter Rup Kur," he   said.    Fazluddin hesitated, and then replied: "Yes, she's . . . she's also   fine. She left with them."    Bashan Singh said nothing. Fazluddin continued: "They asked me to   make sure you were all right. Now I hear that you're going to India.   Give my salaams to brother Balbir Singh and brother Wadhada Singh.   And to sister Imrat Kur also . . . Tell brother Balbir Singh that   I'm doing fine. One of the two brown cows that he left has calved.   The other one calved also, but it died after six days. And . . . and   say that if there's anything else I can do for them, I'm always   ready. And I've brought you some sweets."     Bashan Singh handed the package over to the guard. "Where is Toba   Tek Singh?" he asked.    Fazluddin was taken aback. "Toba Tek Singh? Where is it? It's where   it's always been," he replied.    "In Pakistan or in India?" Bashan Singh persisted.    Fazluddin became flustered. "It's in India. No no, Pakistan."    Bashan Singh walked away, muttering: "Upar di gur gur di annexe di   dhiyana di mung di daal of di Pakistan and Hindustan of di dar fatay   mun!"     Finally all the preparations for the exchange were complete. The   lists of all the lunatics to be transferred were finalized, and the   date for the exchange itself was fixed.....     Most of the lunatics were opposed to the exchange. They didn't   understand why they should be uprooted and sent to some unknown   place. Some, only half-mad, started shouting "Long live Pakistan!"   Two or three brawls erupted between Sikh and Muslim lunatics who   became enraged when they heard the slogans.     When Bashan Singh's turn came to be entered in the register, he   spoke to the official in charge. "Where is Toba Tek Singh?" he   asked. "Is it in Pakistan or India?"     The official laughed. "It's in Pakistan," he replied.     Hearing this, Bashan Singh leapt back and ran to where his remaining   companions stood waiting. The Pakistani guards caught him and tried   to bring him back to the crossing point, but he refused to go.     "Toba Tek Singh is here!" he cried. Then he started raving at top   volume: "Upar di gur gur di annexe di be-dhiyana mang di daal of di   Toba Tek Singh and Pakistan!"     The officials tried to convince him that Toba Tek Singh was now in   India. If by some chance it wasn't they would send it there   directly, they said. But he wouldn't listen.    Because he was harmless, the guards let him stand right where he was   while they got on with their work. He was quiet all night, but just   before sunrise he screamed. Officials came running from all sides.   After fifteen years on his feet, he was lying face down on the   ground. India was on one side, behind a barbed wire fence. Pakistan   was on the other side, behind another fence. Toba Tek Singh lay in   the middle, on a piece of land that had no name.    Fresh Violence    Fresh violence today erupted at the trouble-torn Nandigram block-I   in West Bengal's East Midnapore district today as many houses were   set ablaze by mobs."There were reports of clashes at Nandigram since   last night and this morning. Some houses were set on fire there,"   IGP (Law and Order) Raj Kanojia told reporters in Kolkata.Though   there was no information about the arsonists, he said.Nandigram has   been witnessing sporadic clashes between supporters of the CPI-M and   the Bhumi Ucched Pratirodh Committee, which is spearheading the   agitation against land acquisition for a SEZ there.Meanwhile,with   the CPI(M) struggling to convince farmers in West Bengal to accept   acquisition of agricultural land for industry, its peasant wing, the   Krishak Sabha, has suggested to the Left Front government to offer a   better compensation package to share-croppers to contain the raging   controversy.The registered share-croppers should be given a better   compensation including crop compensation for a year besides the   compensation they have been paid, Dibakar Das, a Krishak Sabha   leader at Singur said.The state government has already acquired a   total of 997 acres at Singur for the Tata Motors' small car project   evoking violent protests from farmers, mainly share-croppers and   landless labourers.The share-croppers, affected by the land   acquisition at Singur, have been given 25 per cent of the market   value of the land, besides 10 per cent solatium and 12.5 per cent   interest, by the West Bengal Industrial Development Corporation.    Ilyas Muhammad, CPI MLA from Nandigram, a partner in the ruling Left   Front, said that 90 per cent of the people were against land   acquisition there. (Agencies)     Panic gripped Talpatti, Bhangabera localities of Nandigram last   night, as bombs were hurled at random, even as several village roads   remained dug up during the night, in a bid to prevent entry   of "outsiders". BUPC senior member Abu Taher said bamboo planks were   put on dug up roads at Hazrakata, Chowringheebazar and several other   spots towards Sonachura during daytime to enable students to attend   schools, but the planks were being removed during night hours as   they were still wary about entry of outsiders "to foment trouble".   Sonachura witnessed the most violent clash in Nandigram on the night   of January seven which claimed six lives.Police sources said they   were looking into the charges made by villagers, including members   of Bhumi Ucched Pratirodh committee that some miscreants hurled the   bombs from the side of neighbouring Khejuri.      Two days back, an all-party meeting had resolved to restore peace in   the area.    A senior member of the Bhumi Uchhed Pratirodh Committee (BUPC),   agitating against farm land acquisition for the proposed SEZ,   alleged that the bombs were hurled from the side of Khejuri towards   Nandigram and CPI(M)-sheltered miscreants were behind it.District   Congress Working President Manik Bhowmik also alleged that bombs   were being hurled at some localities in Nandigram and CPI(M) was   harbouring those behind the attack.However, East Midnapore CPI(M)   leadership rubbished the charge and alleged that the Trinamool   Congress and others were trying to create unrest in the area.     Singur issue: Mamata makes another appeal to Buddhadeb   Kamarkundu (WB), Feb. 17 (PTI): Making a "last appeal" to Chief   Minister Buddhadeb Bhattacharjee, Trinamool Congress chief Mamata   Banerjee today told the West Bengal government to halt work on the   boundary wall for the Tata small car project in Singur and sit for   talks.     "I have made repeated appeals for the return of the forcibly   acquired farmland. This is my last appeal to the government. They   should stop work on the boundary wall and sit for discussion,"   Banerjee said referring to Chief Minister Buddhadeb Bhattacharjee's   offer of talks.     "In a democracy there is no harm in admitting mistakes and the Chief   Minister should announce that forcibly acquired land will be   returned to pave the way for talks. As Railway minister I had also   made some mistakes," she said.     Addressing a meeting for the first time here at Singur proper in   Hooghly district after prohibitory orders were quashed by the   Calcutta High Court, she said "If the government does not respond to   our appeal, they will be responsible for the consequences. We don't   want violence, but it cannot be a one way affair." She warned that   the government might guard the boundary wall of the Tata project,   but would not be able to save it. "It will crumble in a day."   Calling upon farmers who had opposed the acquisition of their land,   not to give consent and accept compensation cheques, she said "You   should sit inside the boundary wall and cook there." Warning the   administration against re-imposition of prohibitory orders, the TC   chief warned that the government would be responsbile for the   consequence.     The prohibitory order at Singur was struck down as an abuse of power   by the administration on February 14 by the High Court.     Without naming the Tatas, she said it was a shame that in the   interest of a "multi-billionaire", people at Singur did not have the   freedom to assemble due to promulgation of Section 144 CrPC for 75   days. Challenging the Chief Minister's statement that 96 per cent of   the people there had given consent for land acquisition, Banerjee   claimed farmers had not given consent for acquisition of 400 acre of   the 997 acre acquired. "If 96 per cent had given consent, why was   prohibitory orders clamped and why were the police deployed to guard   the project site ?" she asked and asserted that the Tatas would not   be able to build their car plant at Singur.     "As long I am alive, I will not back out and ensure that you get   back land forcibly acquired," she said while assuring the people of   Singur that she would be with them in their fight.     In an indirect appeal to the Congress, the TC chief said "Let us put   up a united fight. It is not a political movement, but a fight to   safeguard the interest of farmers."       No information on Netaji: RAW    Officially it is confirmed that Netaji died on 18th August 1945 in a   plane crash over Taiwan while flying to Tokyo. But his body was   never recovered. This led to many theories regarding his possible   survival. One theory says that Netaji actually died in Siberia,   while in Soviet captivity. Many committees have been set up from   time to time by the Government of India to probe into his death.     In May 1956, Shah Nawaz Committee was set up. A four member team of   this committee visited Japan to probe into the circumstances of   Netaji's alleged death.     Justice Mukherjee Commission was set up from 1999-2005. This   committee approached Taiwan government for information regarding   Netaji's death. It submitted its report on 8th November, 2005. The   report was tabled in Parliament on 17th May, 2006. The report says   that Netaji did not die in the plane crash and the ashes at Renkoji   temple in Tokyo are not his. However the Indian government rejected   the findings of the commission.     In 1992 Netaji was awarded the The Bharat Ratna, the highest   civilian award posthumously. It was later withdrawn after a Supreme   Court directive. A Public Interest Litigation was filed in the   Supreme Court against the posthumous nature of the award. Since   there was no conclusive evidence regarding Netaji's death, this   invalidated the posthumous award.        In its first-ever response to an unofficial body, the country's   premier external intelligence agency Research and Analysis wing has   informed 'Mission Netaji' that it was not holding any information on   Subhas Chandra Bose.Mission Netaji is conducting its own   investigation into the mysterious disappearance of the hero and   moving various government agencies for information on the matter. It   had requested the RAW under the Right To Information Act for   disclosure of any information that it might hold on the issue."I am   directed to inform you... that the RAW does not have any information   pertaining to Netaji. As such no list as requested by you .. can be   provided," Under Secretary in the Cabinet Secretariat P N Ranjit   Kumar told Mission Netaji's Anuj Dhar in a letter dated January   19.Kumar also reminded Dhar that the RAW was not obliged to provide   any information under the RTI Act.Dhar, however, is skeptical about   RAW's response. "In 2001, the then Home Secretary Kamal Pande filed   an affidavit before the Mukherjee Commission (which was probing   Netaji's mysterious disappearance). This affidavit listed out   several Top Secret/Secret records whose disclosure was likely to   evoke widespread reactions and harm India's relations with friendly   countries," Dhar said.Dhar said among these records some are with   RAW.    It was an 'Under Office' note under the identification number   11/1/94-IC-2829 dated March 25, 1994, concerning certain articles   based on classified KGB records published in a Russian journal.  Dhar claimed that the RAW had initially informed Mission Netaji that   it had no record or files relating to the alleged disappearance of   Netaji as the organisation was formed on September 21, 1968."And   now, P N Ranjit Kumar has made a sweeping statement that RAW does   not have any information pertaining to Netaji and that RAW is under   no obligation to spill the beans. But it has no licence to mislead   either," Dhar said.  The main reason behind Netaji going to Europe was to join hands with   the Indian soldiers in the British Indian Army who were made   prisoners of war. He was of the opinion that loyalty of the Indian   soldiers to the Raj should be tilted towards their motherland than   the British. He believed this would be a crucial part in the last   phase of the freedom movement.      Netaji joined hands with the Axis powers. They assured him of   military and other help to fight the British. He struck alliance   with both Japan and Germany. Reports say that he was last seen near   Keil canal in Germany in 1943. He undertook the most hazardous   journey covering thousands of miles. He went to the Atlantic Ocean,   the Middle East, Madagascar and the Indian Ocean.     He formed the Indian National Army and the Azad Hind Government was   declared on the 21st of October 1943. The Andaman and Nicobar   Islands were freed from the British by the INA. It was named as the   Swaraj and Shaheed islands.     On the historic day, March 18, 1944, INA crossed the Burmese border   to reach Manipur. Free India's banner was raised amidst slogans   of `Jai Hind.' But rain played a spoilsport and the units had to   fall back. On August 17, 1945 he ordered INA that Delhi was still   their goal.     Netaji then wanted to go to Russia to get Soviet help to fight the   British. But fate had other things in store for him. It is said that   the plane in which he was flying crashed in Taipei on August 18,   1945. With it came the end of a hero who truly lived for his   motherland.     When Netaji was 15 he wrote to his mother "India is God's beloved   land." Thirty three years later, towards the end of his known life   he told the countrymen "never for a moment falter in your faith in   India's destiny. There is no power on earth that can keep India   enslaved. India shall be free and before long."      State Pulse: West Bengal: SEZ plan on hold    West Bengal Chief Minister has gone on record to say that he would   not set up any SEZ "if that is what the Left parties want"- Insaf  All is not well with the industrialization model of the Left Front   Government in West Bengal, headed by Buddhadeb Bhattacharjee of the   CPM. It is not only the Trinamool Congress Chief Mamata Bannerjee,   who has been breathing fire against the acquisition of farmlands for   industries, but also the Left allies CPI, RSP and Forward Block.   They are dead against the Special Economic Zones (SEZs) projects.   After a resolute fight to bring the Tata Motors at Singur,   Bhattacharjee is showing signs of cracking and has gone on record to   say that he would not set up any SEZ "if that is what the Left   parties want". After a CPM Politburo meeting at Kolkata over the   week-end, General Secretary Prakash Karat announced that all SEZs,   including the one at Nandigram have been put on hold. However, the   Singur project of Tatas is on, notwithstanding Mamata's threat to   continue the stir against it.     Farmer's suicides: 6 in 3 days    Even though the suicide spree of the cash-starved farmers in   Maharashtra's Vidarbha region continues; with six of them ending   their lives in three days last week, not more than 10 per cent of   the promised relief is reaching the sufferers. According to   Maharashtra's Finance Minister Jayant Patil, a paltry sum of Rs.248   crore has been released by the Centre out of the relief package of   Rs.3,750 crore, which Prime Minister Manmohan Singh had announced in   July last. Patil has now disclosed that most of the Centre's share   has been earmarked to complete the pending irrigation projects in   the area, with the stated objective of increasing agriculture   productivity in the suicide belt. This has been communicated to the   Planning Commission by the State Government last week. The   Commission was told that only 17.8 per cent of the net sown area in   the State has access to irrigation, as against the national average   of 38 per cent.     Nandigram makes Bengal look at unlocking land from sick industry  Jayanth JacobPosted online: Saturday, February 17, 2007 at 0000 hrs   Print  Email  NEW DELHI, FEBRUARY 16: After Singur and Nandigram, the CPI(M) is   looking at a different route to industrialisation. With the   acquisition of agricultural land becoming increasingly tough, the   government in West Bengal is exploring the option of making use of   the land of closed and sick industries.   Tech training to sewing: 3,000 from Singur families who gave land   join govt, Tata schemes   Since such plots are not large, the government plans to use them for   small and medium enterprises (SME). According to sources, the   government has plans to start hundred such SMEs across the state.     Though some of the plots are privately owned or caught in legal   wrangles, the CPI(M) hopes to reach a consensus— and get the go-  ahead from allies and workers of these units.     Party leaders say even the new investors would benefit from the   existing infrastructure since the land is available in the already   industrialised areas like Kolkata, North and South 24 Parganas,   Howrah, Hooghly and parts of Bardhaman district.     A survey undertaken by Webcon, a consultant of the West Bengal   government, which surveyed 500 large and medium closed, sick or loss-  makking units had found that "substantial land amounting to 41,   078.58" acres was locked in such industries.     The Board for Industrial & Financial Reconstruction (BIFR) can also   throw up more hurdles. If an industry can't be revived, a cell is   created to oversee the sale of land and company assets through   auction. "Land of closed units for industrialization, as things   stand now, can't be the only solution. But we have to look at all   the options since investors can go elsewhere," a senior CPM leader   said.       An urgent need: CPI (M)     Special Correspondent     Industrialisation not at the cost of land reform programme      NEW DELHI: Ahead of its Polit Bureau meeting this weekend, the   Communist Party of India (Marxist) has pointed out that   industrialisation was given foremost priority in the electoral   agenda of the Left Front in the West Bengal Assembly elections last   year. Arguing that industrialisation of the State has become   an "urgent necessity", the party has - in an article posted on its   website - stated that "this drive towards industrialisation will not   be at the cost of the land reform programme and further efforts   towards improving agriculture".     The article has been written as a rebuttal of the interim report of   the Citizens Committee on Singur and Nandigram, which was released   on January 29. After putting up a point-by-point defence of its   position on land acquisition in Singur for the Tata car project and   Nandigram for setting up a Special Economic Zone, the CPI (M)   described the fact-finding team as "politically-driven" and its   report made a "travesty of truth".     On the two projects which will come up for discussion at the Polit   Bureau meeting, the CPI (M) position is that the rehabilitation of   the people whose livelihood will be affected as a result of such   conversion is a critical issue. "The State Government has made it   abundantly clear that no land will be acquired without adequate   consultation and without ensuring an improved alternative livelihood   security for the affected people.'' Advocating a "more vigorous push   towards industrialisation of the State" since agriculture in West   Bengal cannot escape the adverse effects of the "overall anti-people   policy orientation of the Central Government", the CPI(M) counter   dwells on the fact that the Left Front articulated its plans on   industrialisation clearly during the elections.     Scrap SEZ Act: civil society groups     It violates right to life : plea to Pranab        NEW DELHI: Even as local protests against "forcible acquisition" of   agricultural land for creation of SEZs in Punjab, West Bengal and   Maharashtra continue, civil society groups are demanding the repeal   of the "anti-democratic and unconstitutional" Special Economic Zones   Act, 2005.     The Act violates the right to life and livelihood of people, who are   being forcibly displaced for implementation of projects, says a   petition addressed by over 100 civil society groups and individuals   to Pranab Mukherjee, chairman of the Empowered Group of Ministers on   SEZs.     They have sought cancellation of the approved and notified SEZs and   return of land. Talks should be held with people's groups,   communities and panchayat representatives to seek their opinion on   strengthening local economies.     A critique enclosed with the petition raises issues of land-based   livelihood displaced by the SEZs, environmental concerns and labour   exploitation.     Land grabbing       On the question of land grabbing, the petition says the principle of   ``eminent domain,'' which is the basis of the Land Acquisition Act   (1894), is being misused and even given priority over the principles   in the 73rd and 74th Amendments of the Constitution that give   primacy to gram sabhas as autonomous decision-making entities. The   status of ``deemed foreign territory'' being granted to the SEZs   will further undermine the sovereignty of local governance systems.   However, what is really going to challenge the governance system is   the concentration of power in the hands of the Development   Commissioner at the State level and in the Board of Approvals at the   Centre, says the petition.     Ironically, the SEZs are being granted approvals, with no single   mention of studies being carried out on social environment impact   and damage. India is already going through a crisis in terms of   water scarcity as well as loss of forests and biodiversity. The   point is that in the current framework of economic development the   costs of loss of forest and other common lands, large scale   exploitation of water resources, coastal land, and environmental   pollution are not even being computed.'' It has been repeatedly   highlighted that the very legislative framework of SEZs is   problematic, making it a draconian Act that promotes large scale   privatisation and monopoly of resources in the hands of a few   private developers at huge costs to the State exchequer as well as   the economy and environment.     The Board of Approvals, under the Commerce Ministry, has already   granted formal approval for 237 projects, of which 63 have been   notified, while hundreds are still awaiting approval, says the   petition.     The memorandum has been endorsed by eminent individuals, farmers,   Dalits, Adivasis, fisherworker and women's rights groups, non-  governmental organisations, researchers and intellectuals. 
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    Ambedkar NOT Allowed in Bengal!

    দম দম নতুন বাজারে অাম্বেদকরের মূর্তি স্থাপনের অনুমতি দিয়ে পরে স্থানীয় কাউন্সিলর তা প্রত্যাহার করে। ইতিমধ্যে ২লাখ টাকা খরচ করে মূর্তি তৈরী করা হয়ে গেছে কিন্তু তা বসানো যাচ্ছে না এই নিয়ে দূর্গানগর ফ্রেন্ডস মিশনে মিটিং হল ১৩/৯/১৬ প্রায় ১০০ অাম্বেদকরবাদী সিদ্ভান্ত নেয় যেভাবেই হোক মূর্তি অামরা বসাবোই


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    Donald Trump's worst nightmare 


    t's working -- over 40,000 shares in just 24 hours. But there are millions of Americans abroad we haven't reached yet! 

    Share this with EVERYONE




    Want to stop Trump? Here's an awesome way that anyone, anywhere, can help end his politics of fear and hate. Click to use the Stop Trump tool, and share it with EVERYONE: 

    SHARE NOW

    Dear friends, 

    Here's an amazing new way for ALL of us to help stop Trump, and bury his hateful, fear-mongering, sexist, racist politics forever: 

    Over eight million US citizens live outside the US -- enough to deliver an election landslide. Most of them are as horrified by Trump as the rest of us, but only 12% of them vote! 

    So Avaaz has built a simple tool to help Americans vote from overseas! Registration closes in days -- we need to get this tool RIGHT AWAY to every American we or our friends know - share it with EVERYONE: 

    Click to stop Trump now 

    "President Trump" terrifies all of us -- he wants to ban Muslims, tear up the world's agreements on climate change, murder the families of suspected terrorists and doesn't understand why he can't use nukes! 

    Many of us who can't vote in the US have felt helpless to stop this rise of proto-fascism. Now we can help, by helping our US friends to get in the fight. The crazy thing is no one else is doing this, not even Hillary Clinton's campaign! 

    This could be a game-changer, but we have to make it massive and fast, before registration closes:

    Click to stop Trump now 

    Trump is all about dividing us, pitting Americans against each other, and against the rest of the world. What better way to defeat him than coming together in unity like never before, with globally aware Americans at the forefront of an unprecedented global get-out-the-vote effort? 

    Imagine if love and unity didn't just defeat Trump's hate and division, but created an historic landslide defeat. THAT would send the message we need to send to the Donald Trumps in all our countries, and be a powerful positive lesson for all of us and our children and grandchildren. 

    With hope, 

    Allison, Rewan, Emma, Oli, Ben, Nick and the whole Avaaz team 


    More Information: 

    Expatriate Americans are the most important voting bloc you've never heard of (London School of Economics)
    http://blogs.lse.ac.uk/usappblog/2016/03/24/expatriate-americans-are-the-most-important-voting-bloc-youve-never-heard-of/ 

    America's Overseas Voters Are Not Impressed (Bloomberg)
    https://www.bloomberg.com/view/articles/2016-03-01/america-s-overseas-voters-are-not-impressed 

    Democrats Abroad: What the Democratic Party could learn from its overseas footsoldiers (Salon)
    http://www.salon.com/2016/08/06/democrats-abroad-what-the-democratic-party-could-learn-from-its-overseas-footsoldiers_partner/ 

    Clinton's lead over Trump narrows to less than three points: Reuters/Ipsos poll (Reuters) 
    http://www.reuters.com/article/us-usa-election-poll-idUSKCN10G2BQ

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    भारतीय रेल के लाइफ लाइन वजूद पर सवालिया निशान

    पलाश विश्वास

    indian railway के लिए चित्र परिणाम

    रेल बजट का अवसान नवउदारवादी अर्थशास्त्री विवेक देवराय की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के मुताबिक हुआ है।देवराय नीति आयोग के सदस्य हैं।वे सिंगुर नंदीग्राम प्रकरण में वाम सरकार के खास सलाहकार थे,जिन्होंने डा.अशोक मित्र के सामाजिक अर्थशास्त्र से वामदलों के संबंध तड़ने में बड़ी भूमिका निभाई और बाकी इतिहास सबको मालूम है।हालांकि मीडिया के मुताबिक यह अर्थ व्यवस्था में सुधार की दिशा में  बहुत बड़ी छलांग है।


    होगाो,इसमें दो राय नहीं।ब्रिटिश हुकूमत के बाद आजाद भारत में भी भारतीय रेल की देश की अर्थव्यवस्था में भारी योगदान रहा है और अर्थव्वस्था का समारा ढांचा ही भारतीय रेल से नत्थी रहा है।उसे तोड़कर कार्पोरेट अर्थव्यवस्था किसी राकेट की तरह हो सकता है कि हमें मंगल या शनिग्रह में बसा दें। लेकिन इसका कुल मतलब यह हुआ कि रेल अब सार्वजनिक परिवहन या देश की लाइफ लाइन या अर्थ व्यवस्था का बुनियादी ढांचा जैसा कोई वजूद भारतीय रेल का बिल्कुल नहीं रहने वाला है।


    शिक्षा, चिकित्सा, ऊर्जा, बैंकिंग, बीमा,भोजन,पेयजल,आपूर्ति,सार्वजनिक निर्माण के निजीकरण के बाद भारतीय रेलवे के निजीकरण की दिशा में यह बहुत बड़ी छलांग है।


    गौरतलब है कि 1923 में ब्रिटिश हुकूमत के अंतर्गत रेल बोर्ड के नये सिरे से गठन के साथ अलग रेल बजट की सिफारिश विलियम मिशेल ऐकओवार्थ कमिटी ने की थी। जिसके तहत 1924 से बजट के अलावा अलग रेल बजट का सिलसिला शुरु हुआ जो बहुत अरसे से मूल बजट से कहीं बड़ा हुआ करता था।


    आजाद भारत में बजट भारी बना शुरु हुआ और बेतहाशा बढ़ते रक्षा खर्च,सड़क परिवहन, ईंधन व्यय और संरचना व्यय के मुकाबले भारतीय रेल के लिए अब बजट का कुल चार प्रतिशत ही खर्च हो पाता है।जबकि शुरुआत में भारतीय अर्थव्यवस्था भारतयी रेल को केंद्रित रही है और लंबे अरसे तक बजट का 75 से 80 फीसद भारतीय रेलवे पर खर्च होता रहा है,जो अब चार फीसद तक सिमट गया है।


    अब भारतीय अर्थव्यवस्था कमसकम रेलवे पर निर्भर नहीं है।कच्चे माल की ढुलाई और सार्वजनिक परिवहने के सड़क परिवहन के विकल्प का हाईवे संस्कृति में बहुत विकास होता रहा है तो आम जनता की आवाजाही की,उनके रोजमर्रे की जिंदगी और आजीविका के सिलसिले में रेलवे की भूमिका 1991 से लगातार खत्म होती जा रही है और सार्वजनिक उपक्रम की बजाय रेलवे अब किसी कारपोरेट कंपनी की तरह मुनाफा वसूली का उपक्रम बनता रहा है। जिसका लोक कल्याण या देश की लाइफ लाइन के कोई नाता नहीं रह गया है।उसके नाभि नाल का संबंध भारतीय जनगण से नहीं, बल्कि शेचर बाजार में दांव पर रखे कारिपोरेट हितों के साथ है।


    वैसे भी भारतीय संसद की नीति निर्माण में कोई निर्णायक भूमिका  रह नहीं गयी है और नवउदारवाद की वातानुकूलित संतानें कारपोरेट हितों के मुताबिक विशेषज्ञ कमिटियों के मार्फत नीतियां तय कर देती हैं और भारत सरकार सीधे उसे लागू कर देती है,जिसमें संसद की कोई भूमिका होती नहीं है।


    रेल बजट के खात्मे के साथ सुधार का संबंध यही है कि रेलवे को सीधे बाजार के कारपोरेट हितों से जोड़ दिया जाये और मनाफावसूली भी किसी कारपोरेट कंपनी की तरह हो।रेलवे पर जनता के सारे हक हकूक एक झटके से खत्म कर दिये जायें।


    रेल सेवाओं के लगातार हो रहे अप्रत्यक्ष निजीकरण की वजह से इस मुनाफ वसूली में कारपोरेट हिस्सेदारी बहुत बड़ी है।रेलवे के उस मुनाफे से देश की आम जनता को कोई लेना देना उसी तरह नहीं होने वाला है,जैसे मौजूदा भारतीय रेल का आम जनता के हितों से उतना ही लेना देना है,जितना किसी नागरिक की क्रय क्षमता से है।आम जनता की आवाजाही या देश जोड़ने के लिए नहीं,जो जितना खर्च कर सके,भारतीय रेल की सेवा आम जनता के लिए उतनी तक सीमित होती जा रही है।


    जाहिर है कि भारतीय रेल में गरीबों के लिए अब कोई जगह उसी तरह नहीं बची है जैसे आम जनता के लिए चमकदार वातानुकूलित तेज गति की ट्रेनों में उनके लिए जनरल डब्बे भी नहीं होते।कुल मिलाकर,गरीबों के लिए रेलवे हवाी यात्रा की जैसी मुश्किल और खर्चीली होती जा रही है।अब संसद से भी रेल का नाता टूट गया है।


    इस देश की गरीब आम जनता की लाइफ लाइन बतौर जिसतरह भारतीय रेल का इतिहास रहा है,वह सारा किस्सा खत्म है।अब भारतीय रेल स्मार्ट, बुलेट, राजधानी, दुरंतो, शताब्दी या पैलेस आन व्हील जैसा कुछ है,जो लोहारदगा रेलगाड़ी,कोंकन रेलवे जैसी मीठी यादों कोसिरे से दफन करने लगी है।


    कारपोरेट बंदोबस्त करते हुए रेलवे के अभूतपूर्व  व्तार और विकास के मुकाबले रेल कर्मचारियों की संख्या सत्रह लाख से घटते घटते बहुत तेजी से दस लाख तक सिमट जाने वाली है और इसे अंततः चार लाख तक कर देने की योजना है।रेलबजट के बहाने भारतीय संसद में जो भारतीय रेल की दशा दिशा पर बहसें होती रही हैं और कुछ हद तक जनसुनवाई जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिये कमोबेश होती  रही है,वह सिलसिला जाहिर है कि अब बंद है।


    भारतीय रेल पर रेल बजट के अवसान के बाद संसद में या सड़क पर किसी सार्वजनिक बहस की फिर कोई गुंजाइश रही नहीं है।


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    जन्मशताब्दी वर्ष के मौके पर बिजन भट्टाचार्य के रंगकर्म का तात्पर्य

    पलाश विश्वास

    भारतीय गण नाट्य आंदोलन ने इस देश में सांस्कृतिक क्रांति की जमीन तैयार की थी, हम कभी उस जमीन पर खड़े हो नहीं सके।लेकिन इप्टा का असर सिर्फ रंग कर्म तक सीमाबद्ध नहीं है। भारतीय सिनेमा के अलावा विभिन्न कला माध्यमों में उसका गहरा अर हुआ है।सोमनाथ होड़ और चित्तोप्रसाद जैसे यथार्थवादी चित्रकारों से लेकर,देवव्रत विश्वास जैसे रवींद्र संगीत गायक,सलिल चौधरी और भूपेन हजारिका जैसे संगीतकार, माणिक बंदोपाध्याय से लेकर महाश्वेता देवी तक जनप्रतिबद्धता और रचनाधर्मिता के मोर्चे पर लामबंदी का सिलसिला उसी इप्टा की विरासत है।

    यह भारतीय रंगकर्म और भारतीय सिनेमा में संगीतबद्ध लोक के स्थाई भाव का सर्वव्यापी सौंदर्यबोध है, जो एकमुश्त भारतीय सिनेमा के साथ भारतीय रंगकर्म, भारतीय साहित्य और संस्कृति की जमीन और लोक की जड़ों का रचनासंसार भी है।


    बिजन भट्टाचार्य की जन्मशताब्दी के मौके पर पटना के रंगकर्मियों के आयोजन का न्यौता मिला है। लेकिन हम वहां जा नहीं पा रहे हैं।नवारुण भट्टाचार्य और महाश्वेता देवी के साथ दशकों के संवाद के जरिये बिजन भट्टाचार्य के रंगकर्म के अनेक अंतरंग आयाम से उसी तरह आमना सामना हुआ है,जिस तरह ऋत्विक घटक की फिल्मों मेघे ढाका तारा,कोमल गांधार और सुवर्णरेखा के मार्फत रंग कर्म आंदोलन के विस्तार का साक्षात्कार हुआ है।


    नवान्न के लेखक,अभिनेता बतौर रवींद्र की नृत्य नाटिकाओं से लेकर ऋत्विक घटक की रचना संसार तक इप्टा के रंगकर्म का जो विशाल विस्तार है,इस मौके पर उसकी चर्चा करना चाहुंगा।यह आलेख थोड़ा लंबा हो जाये,तो पाठक माफ करेंगे।हम नहीं जानते कि इस आयोजन में कितने लोगों तक यह आलेख पूरा का पूरा पहुंच सकेगा,लेकिन हिंदी में भारतीय पाठकों को अपनी परखौती की इस विरासत को शेयर करने के लिए इस हम अपने ब्लागों पर भी साझा कर रहे हैं।हमारा भी नैनीताल में युगमंच और गिरदा के जरिये,फिर शिवराम जैसे नुक्कड़ रंगकर्मी के जरिये सत्तर के दशक में रंगकर्म से थोडा़ नाता रहा है तो कोलकाता में नांदीकार के साथ भी थोड़ा रिश्ता रहा है तो बिजन भट्टाचार्य के परिजनों को भी दशकों से बहुत नजदीक से जानना हुआ है।हम चाहेंगे कि रंगकर्म और साहित्य संस्कृति से जड़ि पत्रिकाएं इस पूरे आलेख को पाठकों तक पहुंचाने में हमारी मदद करें ताकि बिजन भट्टाचार्य के बहाने हम भारतीय रंग कर्म और कलामाध्यमों का एक संपूर्ण छवि नई पीढ़ियों के समाने पेश कर सकें।

    पहले इस तथ्य पर गौर करें कि भारतीय रंगकर्म की मौजूदा संरचना और उसी शैली, कथानक, सामाजिक यथार्थ में विभिन्न कलाओं के विन्यास की जो संगीबद्धता है,उसकी शुरुआत नौटंकी और पारसी थिएटर की देशज विधाओं की नींव पर नाट्यशास्त्र और संस्कृत नाटकों की शास्त्रीय विशुद्ध नाट्य परंपरा के विपरीत रवींद्र नाथ के भारततीर्थ की विविधता और बहुलता वाली राष्ट्रीयता में रची बसी उनकी नृत्य नाटिकाओं से शुरु है।भारतीय नाटकों में संस्कृत और देशज नाटकों में नृत्यगीत बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं,लेकिन रवींद्र नाथ ने नाटक की समूची संरचना और कथानक का विन्यास नृत्य गीत के माध्यम से किया है।बिजन भट्टाचार्य के लिखे नाटक नवान्न ने नृत्यगीत की उस शास्त्रीय तत्सम धारा को अपभ्रंश की लोक जमीन में तोड़कर अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम बतौर नाटक की जमीन तैयार की।जिसमें इप्टा आंदोलन के मंच से चित्रकला, साहित्य की विभिन्न धाराओं का समायोजन हुआ है और आधुनिक रंगकर्म में उन सभी धाराओं को हम एकमुश्त मंच पर बहते हुए देख सकते हैं।

    रवींद्र नृत्य नाटिकाओं में चंडालिका,विसर्जन,चित्रांगदा,रक्करबी आधुनिक रंगकर्म के लिए तत्सम संस्कृत के वर्चस्व के बावजूद उसीतरह सामाजिक यथार्थ को सोंबोधित है जैसे मुक्तिबोध की भाषा और शिल्प,निराला के छायावाद की नींव पर आधुनिक हिंदी साहित्य के जनप्रतिबद्ध यथार्थवाद का विस्तार हुआ है।रवींद्र के इन चारों नृत्यनाटिकाओं में नृत्य के ताल में छंदबद्ध कविताओं के मार्फत स्त्री अस्मिता, अस्पृश्यता के खिलाफ बुद्धमं सरणमं गच्छामि और पराधीन भारत की स्वतंत्रतता की मुक्ति आकांक्षा का जयघोष है।चंडालिका,चित्रांगदा और नंदिनी तीनों मुक्ति संग्राम में नेतृत्वकारी भूमिका में है।

    इसी सिलसिले में तत्सम से अपभ्रंश की लोक जमीन पर इप्टा आंदोलन के तहत भारतीय थियेटर का सामाजिक यथार्थ पर केंद्रित भारतीय रंगकर्म और संस्कृति कर्म का नया सौंदर्यबोध बना है, जिसे मार्क्सवादी सौंदर्यबोध से जोड़कर हम अपने लोक जीवन की मेहनतकश दुनिया के कला अनुभवों को ही नजरअंदाज करते हैं।बिजन भट्टाचार्य से वह शुरुआत हुई जब भारतीय रंगकर्मियों ने लोक जीवन को रंगकर्म का मुख्य विन्यास,संरचना और माध्यम बनाने में निरंतर काम किया है। भारतीय कला माध्यमों की समग्र समझ  के साथ भारतीय रंगकर्म को देखने परखने के लिए बिजन भट्टाचार्य को जानना इसलिए बेहद जरुरी है।

    नया रंगकर्म और रंगकर्म के नये प्रयोगों के लिए बिजन भट्टाचार्य का पाठ महाश्वेता देवी और नवारुण भट्टाचार्य के पाठ से ज्यादा जरुरी है।बिजन के बाद उनके ग्रुप थिएटर का निर्देशन करने वाले उनके बेटे नवारुण दा की मृत्यु उपत्यका में फिर वही नवान्न की भुखमरी की चीखें हैं तो अरबन लेखक नवारुण के उपन्यासों में फिर अंडरक्लास, अछूत, असभ्य, जातिहीन,अंत्यज सर्वहारा फैताड़ु या हर्बर्ट का धमाका गुलिल्ला युद्ध शब्द दर शब्द है।नवारुण दा और महाश्वेता दी के लेखन में वही फर्क है,जो ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों में है।यह रंगकर्म के अनुभव का फर्क है जो नीलाभ या मंगलेश डबराल,वीरेन डंगवाल या गिरदा को दूसरे कवियों से अलग खड़ा कर देता है।

    नवान्न के बिजन भट्टाचार्य और ऋत्विक घटक की युगलबंदी से सामाजिक यथार्थ की संगीदबद्ध सिनेमा का भी विकास हुआ जो दो बीघा जमीन  की कथा से अलहदा है।लोक को रंगकर्म का आधार बनाने का मुख्य काम बिजन भट्टाचार्य के नवान्न से ही शुरु हुआ जो गिरदा के नाट्य प्रयोगों में कुमांयूनी और गढ़वाली लोक जीवन है तो हबीब तनवीर के नया थिएटर में फिर वही छत्तीसगढ़ी नाचा गम्मत के साथ तीखा परसाईधर्मी व्यंग्य है तो मणिपुर में इस धारा में मणिपुरी नृत्य और संगीत के साथ साथ मार्शल आर्ट का समावेश है।शिवराम से लेकर सफदर हाशमी की नुक्कड़ यात्रा में भी वही लोक जमीन ही रंगकर्म की पहचान है।

    बिजन भट्टाचार्य की पत्नी महाश्वेता देवी थीं।महाश्वेता देवी के चाचा थे ऋत्विक घटक और महाश्वेता देवी के साथ बिजन भट्टाचार्य का विवाह टूट गया तो महाश्वेता देवी ने दूसरा विवाह कर लिया। नवारुण अपनी मां के साथ नहीं थे और वह अपने रंगकर्मी पिता के साथ थे।नवारुणदा ने मेघे ठाका तारा से लेकर सुवर्ण रेखा तक भारत विभाजन की त्रासदी को बिजन और ऋत्विक के साथ जिया है लेकिन अपने रचनाकर्म में छायावादी भावुकता के बजाय चिकित्सकीय चीरफाड़ नवारुणदा की खासियत है और बिजन और ऋत्विक की संगीतबद्धता की बजाय ठोस वस्तुनिष्ठ गद्य उनका हथियार है, लेकिन शुरु से लेकर आखिर तक नवारुणदा उसी नवान्न की जमीन पर खड़े हैं और भद्र सभ्य उपभोक्ता नागरिकों के साथ नहीं,मेहनतकश दुनिया के हक हकूक के साथ वे खड़े हैं लगातार लगातार शब्द शब्द युद्ध रचते हुए तो नवान्न में साझेदार महाश्वेता दी की रचनाओं में शहरी सीमेंट के जंगल के बजाय तमाम जंगल के दावेदार हैं,आदिवासी किसान विद्रोह का सारा इतिहास है और वह हजार चौरसवीं की मां से लेकर महाअरण्य की मां या सिंगुर नंदीग्राम जंगलमहल लोधा शबर की मां भी है।महाश्वेता दी रचनाकर्मी जितनी बड़ी हैं उससे बड़ी सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता है और वे विचारधारा के पाखंड को तोड़कर भी आखिरतक जंगल की गंध से अपनी वफा तोड़ती नहीं हैं।

    सविताजी और मुझे उन्हीं महाश्वेता देवी के एकांत में उनके कंठ से दशकों बाद नवान्न के वे ही गीत सुनने को मिले हैं। पारिवारिक संबंध जैसे भी रहे हों,मेहनतकशों के हक हकूक की लड़ाई में नवान्न का रंगकर्म उनका हमेशा साझा रहा है।यही इप्टा को लेकर कोमल गांधार के विवाद और रंगकर्म पर नेतृत्व के हस्तक्षेप के खिलाफ ऋत्विक, देवव्रत विश्वास,सोमनाथ होड़ वगैरह की बगवात की कथा व्यथा भी है।यह कथा यात्रा भी सर्वभारतीय है,जिसमें भारतीय सिनेमा और उसके बलराज साहनी,एके हंगल जैसे तमाम चमकदार चेहरे भी शामिल हैं।

    नवान्न बिजन भट्टाचार्य ने लिखा और 1944 में भारतीय गण नाट्य संघ(इप्टा) ने किंवदंती रंगकर्मी शंभू मित्र के निर्देशन में इस नाटक कामंचन भुखमरी के भूगोलको संबोधित करते हुए लिखा है।बाग्ला ग्रुप थिएटर आंदोलन की कथा जैसे शंभू मित्र के बिना पूरी नहीं होती तो बिजन की चर्च के बिना वह कहानी  फिर अधूरी है।इन्हीं शंभू मित्र ने फिर राजकपूर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म जागते रहो का निर्देशन किया।वहा भी मैं क्या झूठ बोल्या की गूंज राजकपूर और नर्गिस के करिश्मा से बढ़कर है और यह फिल्म इसीलिए महान है।भुखमरी के इसी भूगोल से सोमनाथ होड़ और चित्तोप्रसाद की चित्रकला जुड़ी है तो देवव्रत विश्वास के रवींद्र संगीत में भी भूख का वही भूगोल है जो माणिक बंद्योपाध्या का समूचा कथासंसार है।जो दरअसल रवींद्र की चंडालिका, रक्तकरबी और चित्रांगदा का भाव विस्तार है तो नया थिएटर से लेकर मणिपुरी थिएटर का बीज है और इसी परंपरा में मराठी रंगकर्म में तमाशा जैसे लोक विधा का समायोजन है तो दक्षिण भारतीय रंगकर्म में शास्त्रीय नृत्य भारत नाट्यम और कथाकलि विशुध लोक के साथ एकाकार हैं।

    1944 में शंभू मित्र के निर्देशन में गणनाट्य संघ की प्रस्तुति के बाद 1948 में आजाद भारत में शंभू मित्र के ग्रुप थिएटर बहुरुपीके मच से कुमार राय के निर्देशन में फिर नवान्न का मंचन हुआ।ब्रिटिश भारत के बंगाल में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक भी मृत्यु बमवर्षा से न होकर लाखों लोग खामोशी से भुकमरी के शिकार हो गये।1943  की बंगाल की उस भुखमरी के शिकार लोगों की मदद के लिए इप्टा ने वायस आप बेंगल उत्सव के जरिये देशभर में एक लाख रुपये से बड़ी रकम इकट्ठा की थी। नवान्न सिर्फ नाटक का मंचन नहीं था,वह सामाजिक यथार्थ का कला के लिए कला जैसा कला कौशल भी नहीं था,भुखमरी के शिकार लोगों के लिए देशव्यापी राहत सहायता अभियान भी था वह ,जो इप्टा का सामाजिक क्रांति उपक्रम था,जिसमें सारे कला माध्यमों का संगठनात्मक ताना बाना था,जो पराधीन भारत में बना लेकिन भारत के आजाद होते ही टूटकर बिखर गया।इप्टा से नवान्न का बहुरुपी के मंच तक स्थानांतरण इसी विघटन का प्रतीक है।


    बिजन भट्टा चार्य जितने बड़े लेखक थे,उससे कहीं ज्यादा सशक्त वे थिएटर और सिनेमा दोनों विधायों के अभिनेता थे।बांग्ला थिएटर आंदोलन में गिरीश चंद्र भादुडी़ के बाद त्रासदी जिनके नाम का पर्याय है,वे बिजन भट्टाचार्य है,जिन्होंने मेघे ढाका तारा में नीता के पिता की भूमिका अदा किया है तो विभाजन की त्रासदी को नाटक दर नाटक, फिल्म दर फिल्म भुखमरी की नर्क यंत्रणा के साथ जिया है,नवारुण दा ने उस पिता का हाथ कभी नहीं छोड़ा और यही उनकी आजीवन त्रासदी का सुखांत कहा जा सकता है।

    विजन भट्टाचार्य और ऋत्विक घटक हमारी तरह ही पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ित विस्थापित थे, जिन्हें उनकी सक्रिय रचनाधर्मिता और भारतीय संस्कृति,रंगकर्म और सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के बावजूद  बंगाली भद्रलोक समाज ने कभी मंजूर नहीं किया।

    ऋत्विक को बाकायदा बंगाल के इतिहास भूगोल से पूर्वी बंगाल से आये बंगाली विभाजनपीड़ितों की तरह  खदेड़ दिया गया और बिजन भट्टाचार्य लगभग गुमनाम मौत मरे और बंगाल के सांस्कृतिक जगत में उनकी जन्मशताब्दी को लेकर वह हलचल नहीं है, जो बंगाल के किसी भी क्षेत्र में कुछ भी करने वाले किसी की भी जन्मशताब्दी को लेकर दिखती है।बल्कि यूं कहे कि बंगाली भद्रसमाज को भूख के भूगोल के इस महान शरणार्थी कलाकार की कोई याद नहीं आती वैसे ही जैसे उन्हें ऋत्विक घटक कभी रास नहीं आये।


    हमारे पुरखे जैशोर जिले में रहते थे जो मधुमति नदी के किनारे नड़ाइल थाना इलाके के वाशिंदा थे और वे हरिचंदा ठाकुर के मतुआ आंदोलन से लेकर तेभागा तक के सिपाही थे।वह नड़ाइल अब अलग जिला है।मधुमति नदी भी सूख सी गयी है ,बताते हैं।उसी मधुमति नदी के उस पार फरीदपुर जिले के खानखानापुर में 1906 को बिजन भट्टाचार्य का जन्म हुआ था।उनके पिता क्षीरोद बिहारी स्कूल शिक्षक थे।पेशे के लिहाज से बदली होते रहने के कारण बंगाल भर में पिता के साथ सफर करते रहने की वजह से बंगाल के विबिन्ऩ इलाकों के लोकत में उनकी इतनी गहरी पैठ बनी।उनके लिखे में इसलिए भद्रलोक तत्सम भाषा के बजाय बोलियों के अपभ्रंश ज्यादा हैं,जिन्हें उन्होंने नवान्न मार्फत भारतीय रंगकर्म का सौंदर्यशास्त्र बना दिया।


    नवान्न के बारे में बिजन भट्टाचार्य ने खुद कहा है,आवेग न हो तो कविता का जन्म नहीं होता-संवेदना न हो,जीवन यंत्रणा न हो तो शायद कोई रचना संभव नहीं है।


    इसतरह गणनाट्य आंदोलन भी दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत संघ पर हिटलर के हमले की वजह से शुरु फासीवादविरोधी आंदोलन के तहत फासीवाद विरोधी लेखक संसकृतिकर्म संगठन से लेकर इप्टा तक का सफर रहा है।1943 की भुखमरी के मुश्किल हालात के मुकाबले समस्त कला माध्यमों के समन्वय से ही इस आंदोलनका इतना व्यापक असर भारतीय विधाओं और कला माध्यमों पर हुआ,जिसके लिए नवान्न का मंचन प्रस्थानबिंदू रहा है।







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    Thus, RAFALE deal struck!Thanks to Kashmir!

    Palash Biswas

    It is unprecedented war campaign making in public opinion at home as well as worldwide for yet another Indo Pak clash in the border. It reminds the pattern of war campaign launched by Bush War Machine activated in United States of America as the corporate media worldwide campaign to build up a false resistance against so called weapons of mass destruction in Iraq to launch the war against the middle east to capture oilfields and resultant in Taliban to ISIS which made entire middle East And Africa subjected to American Spring.

    Having signed nuclear deal with India,Bush injected the American Spring in Indian psyche to make Indian ocean peace zone a burning oil field for the survival of US War Economy in turmoil with the burns of wars since Vietnam and which have to be continued at any cost to bring home the dead soldiers and marines or those live dead humanity inflicted with personality disorder.

    This war cry is being presented as a consumer product with strategic marketing in media and social media as the offspring of neoliberal reforms divested the unity and integrity of Indian nation, its democracy, its natural and human resources along with everything public including defence and internal security just to serve the interests of the desi videsi companies selling the weapons of mass destruction and we have been subjected to radioactive environment as nuclear plants have become viral in our veins so dangerously.This blind nationalism happens to be most antinational in this sense.

    This war cry all on the name of false patriotism is nothing but simple business interests with huge stakes by those praivate companies around the world in the wide open Indian Weapon market.

    Unfortunately,Indian people,specifically the people in Kashmir vally,a different demography with majority Muslim population  have to be the victims as well as those human beings across the borders who would be sacrificed in border clash which might well be resolved with diplomatic bilateral exercise.

    Those vomiting venom against humanity and nature have not to pay anything,the taxpayers have to pay the bill of commission to be paid as it has been the story of all defence purchase.Millions of people around this geopolitics have to be desettled yet again as the partition holocaust continues. Specifically those,who have to lose their sons converted into martyrs.

    No conscience seems to relevant as it was not there anywhere to skip the war in the oilfields and the media misled the humanity.


    Media reports:

    Rafale fighters are 4.5 generation jets and with the deal for 36 aircraft being signed today, the Indian Air Force's (IAF) combat power will be enhanced significantly. The Rafale fighter jet is equipped to carry out both air-to-ground strikes, as well as air-to-air attacks and interceptions during the same sortie. 


    Rafale is an "omni-role" aircraft, with a full-range of advanced weapons such as Meteor Beyond-Visual-Range (BVR) missile, SCALP long-range missile, helmet mount system, AESA (Active Electronically Scanned Array) radar and latest warfare systems.


    Dassault Aviation says that the aircraft has the ability to track targets and generate real time three-dimensional maps. It has a wing span of 10.90m; length of 15.30m; and a height of 5.30m.


    The digital 'Fly-by-Wire' Flight Control System is aimed at providing longitudinal stability. But, more than anything else, it is the missiles that are integrated on the Rafale that add to the IAF's firepower.



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    हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर!

    पलाश विश्वास

    पहलीबार टीवी पर युद्ध का सीधा प्रसारण खाड़ी युद्ध के दौरान अमेरिकी मीडिया ने किया अमेरिका के उस युद्ध को अमन चैन के लिए  इराक के खिलाफ पूरी दुनिया का युद्ध साबित करने के लिए।दुनियाभर का मीडिया उसीके मुताबिक विश्व जनमत तैयार करता रहा और तेल कुंओं की आग में तब से लेकर अबतक सारी दुनिया सुलग रही है।

    नतीजतन आधी दुनिया अब शरणार्थी सैलाब से उसीतरह लहूलुहान है,जैसे हम इस महादेश के चप्पे चप्पे पर सन सैंतालीस के बाद से लगातार लहूलुहान होने को अभिशप्त हैं।अमेरिका के उस युद्ध की निरंतरता से महान सोवियत संघ का विखंडन हो गया और सारा विश्व ग्लोब में तब्दील होकर अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील है।सारी सरकारें और अर्थव्यवस्थाएं अब वाशिंगटन की गुलाम हैं और उसीके हित साध रही हैं।

    मनुष्यता अब पिता की हाथों से बिछुड़कर समुंदर में तैरती लाश है और फिंजा सरहदों के आर पार कयामत है।

    सरकारी आधिकारिक बयान के अलावा अब तक किसी सच को सच मानने का रिवाज नहीं है और वाशिंगटन का झूठ ही सच मानती रही है दुनिया।दो दशक बाद उस सच के पर्दाफाश के पर्दाफाश के बावजूद  दहशतगर्दी और अविराम युद्धोन्माद, विश्वव्यापी शरणार्थी सैलाब,गृहयुद्धों और प्राकृतिक संसाधनों के लूटखसोट पर केंद्रित नरसंहारी मुक्तबाजार में कैद मनुष्यता की रिहाई के सारे दरवाजे खिड़किया बंद हैं और हम पुशत दर पुश्त हिरोशिमा और नागाशाकी,भोपराल गैस त्रासदी,सिख नरसंहार, असम त्रिपुरा के नरसंहार,आदिवासी भूगोल में सलवा जुड़ुम और बाबरी विध्वंस के बाद गुजरात प्रयोग की निरंतरता के मुक्तबाजार के तेल कुंओं में झलसते रहेंगे।मेहनतकशों के हाथ पांव कटते रहेंगे,युवाओं के सपनों का कत्लगाह बनता रहेगा देश,स्त्री दासी बनी रहेगी,बच्चे शरणार्थी होते रहेंगे और किसान खुदकशी करते रहेंगे।दलितों,आदिवासियों और आम जनता पर जुल्मोसिताम का सिलसिला जारी रहेगा।

    इसलिए सर्जिकल स्ट्राइक के सच झूठ के मल्टी मीडिया फोर जी ब्लिट्ज और ब्लास्ट पर मुझे फिलहाल कुछ कहना नहीं है।मोबाइल पर धधकते युद्धोन्माद पर कुछ कहना बेमायने है।राष्ट्रद्रोह तो मान ही लिया जायेगा यह।

    हम अमेरिकी उपनिवेश हैं और अमेरिकी नागरिकों की तरह वियतनाम युद्ध और खाड़ी युद्ध के विरोध की तर्ज पर किसी आंदोलन की बात रही दूर,विमर्श,संवाद और अभिव्यक्ति के लिए भी हम आजाद नहीं है क्योंकि यह युद्धोन्माद भी उपभोक्ता सामग्री की तरह कारपोरेट उपज है और हम जाने अनजाने उसके उपभोक्ता हैं। उपभोक्ता को कोई विवेक होता नहीं है।सम्यक ज्ञान और सम्याक प्रज्ञा की कोई संभावना कही नहीं है और न इस अनंत युद्धोन्माद से कोई रिहाई है।धम्म लापता है।

    हम लोग ग्लोबीकरण की अवधारणा के तहत इस दुनिया को अपनी मुट्ठी में लेने की तकनीक के पीछे बेतहाशा भाग रहे हैं।यह वह दुनिया है जिसके पोर पोर से खून चूं रहा है।हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर हैं।जिसमें हमारे अपनों का खून भी पल दर पल शामिल होता जा रहा है।अपनी मुट्ठी में कैद इस दुनिया की हलचल से लेकिन हम बेखबर हैं।खबरें इतनी बेहया हो गयी हैं कि उनमें विज्ञापन के जिंगल के अलावा जिंदगी की कोई धड़कन नहीं है।सच का नामोनिशां बाकी नहीं है।

    1991 के बाद,पहले खाड़ी युद्ध के तुरंत बाद से पिछले पच्चीस सालों से हम अमेरिकी उपनिवेश हैं।हमें इसका कोई अहसास नहीं है।सूचना क्रांति के तिलिस्म में हम दरअसल कैद हैं और प्रायोजित पाठ के अलावा हमारा कोई अध्ययन, शोध, शिक्षा, माध्यम,विधा,लोक,लोकायत,परंपरा ,संस्कृति या साहित्य नहीं है।सबकुछ मीडिया है।

    हालांकि उपनिवेश हम कोई पहलीबार नहीं बने हैं।फर्क यह है कि करीब दो सौ साल के ब्रिटिश हुकूमत का उपनिवेश बनकर इस महादेश का एकीकरण हो गया। अब अमेरिकी उपनिवेश बन जाने की वजह से गंगा उल्टी बहने लगी है।भारत विभाजन के बाद बचा खुचा भूगोल और इतिहास लहूलुहान होने लगा है और किसानों ,मेहनतकशों की दुनिया में नरसंहारी अश्वमेधी सेनाएं दौड़ रही हैं।साझा इतिहास भूगोल समाज और संस्कृति का ताना बाना बिखरने लगा है।उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो गयी है और औद्योगीकीकरण से जो वर्गीय ध्रूवीकरण की प्रक्रिया शुरु हो गयी थी,जो जाति व्यवस्था नये उत्पादन संबंधों की वजह से खत्म होने लगी थी,मनुस्मृति अनुशासन के बदले जो कानून का राज बहाल होने लगा था और बहुजन समाज वर्गीय ध्रूवीकरण के तहत आकार लेने लगा था,वह सबकुछ इस अमेरिकी उपनिवेश में अब खत्म है या खत्म होने को है।

    ब्राह्मण धर्म जो तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति से खत्म होकर उदार हिंदुत्व में तब्दील होकर ढाई हजार साल तक इस महादेश की विविधता और बहुलता को आत्मसात करते रहा है,फिर मुक्तबाजार का ब्राह्मणधर्म है,जो भारतीय संविधान की बजाय फिर मनुस्मृति लागू करने पर आमादा है।धम्म फिर सिरे से गायब है।

    एकीकरण की बजाय अब युद्धोन्माद का यह मुक्तबाजार हिंदुत्व का ब्राह्मणधर्म है और हमारी राष्ट्रीयता कारपोरेट युद्धोन्माद है।महज सत्तर साल पहले अलग हो गये इस महादेश के अलग अलग राजनितिक हिस्से परमाणु युद्ध और उससे भी भयंकर जलयुद्ध के लिए निजी देशी विदेशी कंपनियों की कारपोरेट फासिज्म के तहत एक दूसरे को खत्म करने पर आमादा हैं जबकि विभाजन के सत्तर साल के बाद भी इन तमाम हिस्सों में संपूर्ण कोई ऐसा जनसंख्या स्थानांतरण हुआ नहीं है कि इस युद्ध में सीमाओं के आरपार बहने वाली खून की नदियों में हमारा वजूद लहूलुहान हो।अकेले बांग्लादेश में दो करोड हिंदू है तो भारत में मुसलमानों की दुनियाभर में सबसे बड़ी आबादी है और कुलस मिलाकर यह महादेश कुलमिलाकर अब भी एक सांस्कृतिक अविभाज्य ईकाई है,जिसे हम तमाम लोग सिरे से नजर्ंदाज कर रहे हैं।

    कलिंग युद्ध से पहले,सम्राट अशोक के बुद्धमं शरणं गच्छामि उच्चारण से पहले सारा देश कुरुक्षेत्र का महाभारत बना हुआ था।सत्ता की आम्रपाली पर कब्जा के लिए हमारे गणराज्य खंड खंड राष्ट्रवाद से लहूलुहान हो रहे थे। दो हजार साल का सफर तय करने के बाद हमने बरतानिया के उपनिवेश से रिहा होकर अखंड भारत न सही,उसी परंपरा में नया भारतवर्ष  साझा विरासत की नींव पर बना लिया है।अबभी हमारा राष्ट्रवाद अंध खंडित राष्ट्रवाद युद्धोन्मादी है।धम्म नहीं है कहीं भी।

    हमारी विकास यात्रा सिर्फ तकनीकी विकास यात्रा नहीं है और न यह कोई अंतरिक्ष अभियान है।हम इतिहास के रेशम पथ पर सिंधु घाटी से लेकर अबतक लगातार इस महादेश को अमन चैन का भूगोल बनाने की कवायद में लगे रहे हैं। तथागत गौतम बुद्ध ने जो सत्य अहिंसा के धम्म के तहत इस महादेश को एक सूत्र में बांधने का उपक्रम शुरु किया था,वह सारा इतिहास अब धर्मोन्मादी युद्धोन्माद है।

    आज मुक्त बाजार का कारपोरेट तंत्र मंत्र यंत्र फिर उसी युद्धोन्माद का आवाहन करके हमें चंडाशोक में तब्दील कर रहा है और हम सबके हाथों में नंगी तलवारें सौंप रहा है कि हम एक दूसरे का गला काट दें।

    ब्रिटिश राज के दरम्यान अफगानिस्तान से लेकर म्यांमर,सिंगापुर,श्रीलंका से लेकर नेपाल तक हमारा भूगोल और इतिहास की साझा विरासत हमने सहेज ली। सामंती उत्पादन प्रणाली के नर्क से निकलकर हम औद्योगिक उत्पादन प्रणाली में शामिल हुए।ब्रिटिश हुक्मरान ने देश के बहुजनों को कमोबेश वे सारे अधिकार दे दिये, जिनसे मनुस्मृति की वजह से वे वंचित रहे हैं।मनुस्मृति अनुशासन के बदले कानून का राज बहाल हुआ तो नई उत्पादन प्रणाली के तहत जनमजात पेशे की मनुस्मृति अनिवार्यता खत्म हुई और शिक्षा का अधिकार सार्वजनिक हुआ।

    शूद्र दासी स्त्री की मुक्ति की खिड़कियां खुल गयीं।अछूतों को सेना और पुलिस में भर्ती करके उन्हें निषिद्ध शस्त्र धारण का अधिकार मिला।तो संपत्ति और वाणिज्य के अधिकार भी मिले।मुक्तबाजार अब फिर हमसे वे सारे हकहकूक छीन रहा है।

    औद्योगीकरण और शहरीकरण के मार्फत नये उत्पादन संबंधों के जरिये मेहनतकशों का वर्गीय ध्रूवीकरण एक तरफ जाति व्यवस्था के शिकंजे से भारतीय समाज को मुक्त करने लगा तो वर्गीय ध्रूवीकरण के रास्ते देश भऱ में,बल्कि पूरे महादेश में बहुजन समाज का एकीकरण होने लगा और सत्ता में भागेदारी का सिलसिला शुरु हो गया।जो अब भी जारी है।जिसे खत्म करने की हर चंद कोशिश इस युद्धोन्मादी हिंदुत्व का असल एजंडा है।

    आदिवासी और किसान विद्रोह के अविराम सिलसिला जारी रहने पर जल जंगल जमीन और आजीविका के मुद्दे,शिक्षा और स्त्री मुक्ति,बुनियादी जरुरतों के तमाम मसले अनिवार्य विमर्श में शामिल हुए,जिसकी अभिव्यक्ति भारत की स्वतंत्रतता के लिए पूरे महादेश के आवाम की एकताबद्ध लड़ाई है,आजाद हिंद फौज है।सामाजिक क्रांति की दिशा में संतों के सुधार आंदोलन का सिलसिला जारी रहा तो नवजागरण के तहत सामंतवाद पर कुठाराघात होते रहे और किसान आंदोलनों के तहत मेहनतकश बहुजनों का राजनीतिक उत्थान होने लगा।

    यह साझा इतिहास अब हमारी मुट्ठी में बंद सात समंदर का खून है।

    हमारे दिलो दिमाग में अब मुक्तबाजार का युद्धोन्माद है।

    हम आत्मध्वंस के कार्निवाल में शामिल हम कबंध नागरिक हैं और इस युद्धोन्माद के खिलाफ अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता एक दूसरे को भी देने को तैयार नहीं है।फासिज्म की पैदल सेना में तब्दील हमारी देशभक्ति का यही युद्धोन्माद है।



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    कारपोरेट प्रायोजित युद्धोन्माद में निष्णात हम भारतीय नागरिक परमाणु विध्वंस का रास्ता चुन रहे हैं और यह हमारे इतिहास और भूगोल का सबसे बड़ा संकट है।

    नवजागरण की जमीन पश्चिम की रेनेशां कतई नहीं है!

    यह सिंधु घाटी और बौद्धमय भारत,चार्वाक दर्शन,संत फकीर पीर बाउल,किसान आदिवासी आंदोलनों की निरंतरता है!

    पलाश विश्वास

    ईस्ट इंडिया कंपनी के राजकाज के खिलाफ पलाशी की लड़ाई में बंगाल के नवाब सिराजदौल्ला की हार के बाद लार्ड क्लाइव के भारत भाग्यविधाता बन जाने के बारे में बहुत ज्यादा चर्चा होती रही है।लेकिन 1757 से बंगाल बिहार और मध्य भारत के जंगल महल में चुआड़ विद्रोह से पहले शुरु आदिवासी किसान विद्रोह के अनंत सिलसिले के बारे में हम बहुत कम जानते हैं।हम चुआड़ विद्रोह के बारे में भी खास कुछ नहीं जानते और कंपनी राज के खिलाफ साधु, संत, पीर, बाउल फकीरों की अगवाई में बिहार और नेपाल से लेकर समूचे बंगाल में हुए हिंदू मुसलमान बौद्ध आदिवासी किसानों के आंदोलन को हम ऋषि बंकिम चंद्र के आनंदमठ और वंदे मातरम के मार्फत सन्यासी विद्रोह कहकर भारतीय राष्ट्रवाद और राष्ट्र को इसकी विविधता और बहुलता को सिरे से खारिज करते हुए हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र का निर्माण करते हुए बहुसंख्य जनता के हक हकूक खत्म करने पर आमादा हैं।

    बौद्धमय भारत के धम्म के बदले हम वैदिकी कबाइली युद्धोन्माद का अपना राष्ट्रवाद मान रहे हैं।जिसका नतीजा परमाणु युद्ध, जल युद्ध जो भी हो,सीमा के आर पार हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो के नगर अवशेषों  की जगह अंसख्य हिरोशिमा और नागासाकी का निर्माण होगा और करोड़ों लोग इस परमाणु युद्ध में शहीद होंगे तो जलयुद्ध के नतीजतन इस महादेश में फिर बंगाल और चीन की भुखमरी का आलम होगा।भारत विभाजन के आधे अधूरे जनसंख्या स्थानांतरण की हिंसा की निरतंरता से बड़ा संकट हम मुक्त बाजार के विदेशी हित में रचने लगे हैं। सीमाओं के आर पार ज्यादातर आबादी शरणार्थी होगी और हमारी अगली तमाम पीढिंया न सिर्फ विकलांग होंगी,बल्कि उन्हें एक बूंद दूध या एक दाना अनाज का नसीब नहीं होगा।अभी से बढ़ गयी बेतहाशा महंगाई और लाल निशान पर घूम फिर रहे अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतों को नजर अंदाज करके कारपोरेट प्रायोजित युद्धोन्माद में निष्णात हम भारतीय नागरिक आत्म ध्वंस परमाणु विध्वंस का रास्ता चुन रहे हैं और यह हमारे इतिहास और भूगोल का सबसे बड़ा संकट है।

    गौरतलब है कि किसान आदिवासी आंदोलनों के हिंदुत्वकरण की तरह जैसे उन्हें हम ब्राह्मणवादी समाजशास्त्रियों के आयातित विमर्श के तहत सबअल्टर्न कहकर उसे मुख्यधारा मानेन से इंकार करते हुए सत्तावर्ग का एकाधिकार हर क्षेत्र में स्थापित करने की साजिश में जाने अनजाने शामिल है,उसीतरह  बंगाल के नवजागरण को हम यूरोप के नवजागरण का सबअल्टर्न विमर्श में तबादील करने से नहीं चुकते और नवजागरण के पीछे कवि जयदेव के बाउल दर्शन,चैतन्य महाप्रभु के वैष्णव आंदोलन के साथ साथ संत कबीर दास के साथ शुरु सामंतवाद और दिव्यता के विरुद्ध मनुष्यता की धर्मनरपेक्ष चेतना और इन सबमें तथागत गौतम बु्द्ध की सामाजिक क्रांति की निरंतरता के इतिहास बोध से हम एकदम अलग हटकर इस वैदिकी और ब्राह्मणी कर्मकांड के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन को पश्चिम की जुगाली साबित करने से चुकते नहीं है।

    इसी तरह मतुआ आंदोलन की पृष्ठभूमि 1857 की क्रांति से पहले कंपनी राज के खिलाफ किसानों के ऐतिहासिक विद्रोह नील विद्रोह से तैयार हुई और इस आंदोलन के नेता हरिचांद ठाकुर नें बंगाल बिहार में हुए मुंडा विद्रोह के महानायक बिरसा मुंडा की तर्ज पर सत्ता वर्ग के धर्म कर्म का जो मतुआ विकल्प प्रस्तुत किया,उसके बारे में हम अभी संवाद शुरु ही नहीं कर सके हैं।यह तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति को बंगाल में तेरहवीं सदी से आयातित ब्राह्मणधर्म के खिलाफ फिर बौद्धमय बगाल बनाने के उपक्रम बतौर हमने अभीतक देखा नहीं  है और विद्वतजन इस भी सबअल्टर्न घोषित कर चुके हैं और मुख्यधारा से बंगाल के जाति धर्म निर्विशेष बहुसंख्य आम जनता, किसानों और आदिवासियों को अस्पृश्यता की हद तक काट दिया है और इसी साजिस के तहत बंगाली दलित शरणार्थियों को बंगाल से खदेड़कर उन्हें विदेशी तक करार देनें में बंगाल की राजनीति में सर्वदलीय सहमति है।

    बंगाल में मतुआ आंदोलन भारत और बंगाल में ब्राह्मण धर्म और वैदिकी कर्मकांड के विरुद्ध समता और न्याय की तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति की निरंतरता रही हैऔर जैसे गौतम बुद्ध को आत्मसात करने के लिए विष्णु का आविस्कार हुआ वैसे ही हरिचांद ठाकुर को भी विष्ण का अवतार मैथिली ब्राह्मण बाकी बहुसंख्य जनता की अस्पृश्यता बहाल रखने की गहरी साजिश है जिसके तहत मतुआ आंदोलन अब महज सत्ता वर्ग का खिलौना वोट बंके में तब्दील है।यह महसूस न कर पाने की वजह से हम मतुआ आंदोलन का ब्राह्मणीकरण रोक नहीं सके हैं और इसी तरह दक्षिण भारत में सामाजिक क्रांति की पहल जो लिंगायत आंदोलन ने की,ब्राह्मणधर्म विरोधी सामंतवाद विरोधी अस्पृश्यता विरोधी उस आंदोलन का हिंदुत्वकरण भी हम रोक नहीं सके हैं।

    इसीलिए बंगाल में मतुआ आंदोलन के हाशिये पर चले जाने के बाद कर्नाटक में भी जीवन के हर क्षेत्र में लिंगायत अनुयायियों का वर्चस्व होने के बावजूद वहां केसरिया एजंडा गुजरात की तरह धूम धड़के से लागू हो रहा है।वहीं,महात्मा ज्योतिबा फूले और अंबेडकर की कर्मभूमि में शिवशक्ति और भीमशक्ति का महागठबंधन वहां के बहुजनों का केसरियाकरण करके उनका काम तमाम करने लगा है और बहुजनों के तमाम राम अब हनुमान है तो अश्वमेधी नरसंहार अभियान में बहुजन उनकी वानरसेना है।

    दक्षिण भारत में पेरियार और नारायण गुरु ,अय्यंकाली सिनेमाई ग्लेमर में निष्णात है और उसकी कोई गूंज न वहां है और न बाकी भारत में।पंजाब में सिखों के सामाजिक क्रांतिकारी आंदोलन भी हिंदुत्व की पिछलग्गू राजनीति के शिकंजे में है और अस्सी के दशक में हिंदुत्व के झंडेवरदारों ने उनका जो कत्लेआम किया,उसके मुकाबले गुजरात नरसंहार की भी तुलना नहीं हो सकती।लेकिन सिखों को अपने जख्म चाटते रहने की नियति से निकलने के लिए गुरु ग्रंथ साहिब में बतायी दिशा नजर नहीं आ रही है।तमिल द्रविड़ विरासत से अलगाव,सिंधु सभ्यता के विभाजन के ये चमत्कार हैं।

    सिंधु घाटी के नगरों में पांच हजार साल पहले बंगाल बिहार की विवाहित स्त्रियों की तरह स्त्रियां शंख के गहने का इस्तेमाल करती थींं,हड़प्पा और मोहंजोदोड़़ो के पुरात्तव अवशेष में वे गहने भी शामिल हैं।लेकिन गौतम बुद्ध के बाद अवैदिकी विष्णु को वैदिकी कर्मकांड का अधिष्ठाता बनाकर तथागत गौतम बुद्ध को उनका अवतार बनाने का जैसे उपक्रम हुआ,वैसे ही भारत में बौद्धकाल और उससे पहले मिली मूर्तियों को,यहां तक की गौतम बुद्ध की मूर्तियों को भी विष्णु की मूर्ति बताने में पुरतत्व और इतिहास के विशेषज्ञों को शर्म नहीं आती।

    सिंधु सभ्यता का अवसान भारत में वैदिकी युग का आरंभ है तो बुद्धमय भारत में वैदिकी काल का अवसान है।फिर बौद्धमय भारत का अवसान आजादी के सत्तर साल बाद भी खंडित अखंड भारत में मनुस्मृति के सामांती बर्बर असभ्य फासिस्ट रंगभेदी मनुष्यता विरोधी नरसंहारी राजनीति राजकाज है।मुक्तबाजार है।युद्धोन्माद यही है।

    इस बीच आर्यावर्त की राजनीति पूरे भारत के भूगोल पर कब्जा करने के लिए फासिस्ट सत्तावर्ग यहूदियों की तरह अनार्य जनसमूहों आज के बंगाली, पंजाबी, सिंधी, कश्मीरी, तिब्बती, भूटिया,आदिवासी, तमिल शरणार्थियों की तरह भारतभर में बहुजनों का सफाया आखेट अभियान जारी है।क्योकि वे अपनी पितृभूमि से उखाड़ दिये गये बेनागरिक खानाबदोश जमात में तब्दील हैं। जिनके कोई नागरिक और मानवाधिकार नहीं हैं तो जल जंगल जमीन आजीविकता के हरक हकूक भी नहीं हैं।मातृभाषा के अधिकार से भी वे वंचित हैं।भारत विभाजन का असल एजंडा इसी नरसंहार को अंजाम देने का रहा है,जिससे आजादी या जम्हूरियता का कोई नाता नहीं है। सत्ता वर्ग की सारी कोशिशें उन्हें एकसाथ होकर वर्गीय ध्रूवीकरण के रास्ते मोर्चबंद होने से रोकने की है और इसीलिये यह मिथ्या राष्ट्रवाद है,अखंड धर्मोन्मादी युद्ध परिस्थितियां हैं।

    भारत से बाहर रेशम पथ के स्वर्णकाल से भी पहले सिंधु सभय्ता के समय से करीब पांच हजार साल पहले मध्यएशिया के शक आर्य खानाबदोश साम्राज्यों के आर पार हमारी संस्कृति और रक्तधाराएं डेन मार्क,फिनलैंड,स्वीडन से लेकर सोवियात संघ और पूर्वी एशिया के स्लाव जनसमूहों के साथ घुल मिल गयी हैं और वहीं प्रक्रिया करीब पांच हजार साल तक भारत में जारी रही हैं।जो विविधता और बहुलता का आधार है,जिससे भारत भारततीर्थ है।यही असल में भारतीयता का वैश्वीकरण की मुख्यधारा है और फासिज्म का राजकाज इस इतिहास और भूगोल को खत्म करने पर तुला है।

    पांच हजार साल से भारतीय साझा संस्कृति और विरासत का जो वैश्वीकरण होता रहा है,उसे सिरे से खारिज करके युद्धोन्मादी सत्तावर्ग बहुसंख्य जनता का नामोनिशान मिटाने पर तुला ब्राह्णधर्म की मनुस्मृति लागू करने पर आमादा है और व्यापक पैमाने पर युद्ध और विध्वंस उनका एजंडा है, उनका अखंड भारत के विभाजन का एजंडा भी रहा है ताकि सत्ता,जल जंगल जमीन के दावेदारों का सफाया किय जा सकें, और अब उनका एजंडा यही है कि मुक्तबाजार में हम अपने लिए सैकड़ों हिरोशिमा और नागासाकी इस फर्जी नवउदारवाद,फर्जी वैश्वीकरण के भारत विरोधी हिंदू विरोधी,धम्म विरोधी,मनुष्यता और प्रकृति विरोधी अमेरिकी उपनिवेश में सत्ता वर्ग के अपराजेय आधिपात्य के लिए अंध राष्ट्रवाद के तहत परमाणु विध्वंस चुन लें।यही राजनीति है।यही राजकाज है और यही राजनय भी है।यह युद्धोन्माद दरअसल राजसूय यज्ञ का आयोजन है और अश्वमेधी घोड़े सीमाओं के आर पार जनपदों को रौंदते चले जा रहे हैं।हम कारपोरेट आंखों से वह नजारा देख कर भी देख नहीं सकते।

    मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा की सिंधु घाटी के शंख के गहने अब बंगाल बिहार और पूर्वी भारत की स्त्रियां पहनती हैं।पश्चिम भारत और उत्तर भारत की स्त्रियां नहीं। इसीतरह सिंधु सभ्यता में अनिवार्य कालचक्र इस देश के आदिवासी भूगोल में हम घर में उपलब्ध है।हम इतिहास और भूगोल में सिंधु सभ्यता की इस निरंतरता को जैसे नजरअंदाज करते हैं वैसे ही धर्म और संस्कृति में एकीकरण और विलय के मार्फत मनुष्यता की विविध बहुल धाराओं की एकता और अखंड़ता को नामंजूर करके भारतीय राष्ट्रवाद को सत्ता वर्ग का राष्ट्रवाद बनाये हुए हैं और भारत राष्ट्र में बहुजनों का कोई हिस्सा मंजूर करने को तैयार नहीं है।इसलिए संविधान को खारिज करके मनुस्मृति को लागू करने का यह युद्ध और युद्धोन्माद है।

    इसीतरह सिंदु सभ्यता से लेकर भारत में साधु,संत,पीर,फकीर ,बाउल, आदिवासी, किसान विरासत की जमीन पर शुरु नवजागरण को हम देशज सामंतवाद विरोधी,दैवीसत्ता धर्मसत्ताविरोधी,पुरोहित तंत्र विरोधी  मनुष्यता के हक हकूक के लिए सामाजिक क्रांति के बतौर देखने को अभ्यस्त नहीं है। मतुआ, लिंगायत, सिख, बौद्ध, जैन आंदोलनों की तरह यह नवजागरण सामंती मनुस्मृति व्यवस्था,वैदिकी कर्म कांड और पुरोहित तंत्र के ब्राह्मण धर्म के खिलाफ महाविद्रोह है,जिसने भारत में असभ्य बर्बर अमानवीय सतीदाह,बाल विवाह,बेमेल विवाह जैसी कुप्रथाओं का अंत ही नहीं किया,निरीश्वरवाद की चार्वाकीय लोकायत और नास्तिक दर्शन को सामाजिक क्रांति का दर्शन बना दिया।जिसकी जमीन फिर वेदांत और सर्वेश्वरवाद है।या सीधे ब्रह्मसमाज का निरीश्वरवाद।वहीं रवींद्रकाव्य का दर्शन है।

    नवजागरण के तहत शूद्र दासी देवदासी देह दासी  स्त्री को अंदर महल की कैद से मुक्ति मिली तो विधवाओं के उत्पीड़न का सिलसिला बंद होकर खुली हवा में सांस लेने की उन्हें आजादी मिली।सिर्फ साड़ी में लिपटी भारतीय स्त्री के ब्लाउज से लेकर समूचे अंतर्वस्त्र का प्रचलन ब्रह्मसमाज आंदोलन का केंद्र बने रवींद्र नाथ की ठाकुर बाड़ी से शुरु हुआ तो नवजागरण के समसामयिक मतुआ आंदोलन का मुख्य विमर्श ब्राह्मण धर्म और वैदिकी कर्मकांड के खिलाफ तथागत गौतम बुद्ध का धम्म प्रवर्तन था तो इसीके साथ नवजागरण,मतुआ आंदोलन,लिंगायत आंदोलन से लेकर महात्मा ज्योतिबा फूले और माता सावित्री बाई फूले के शिक्षा आंदोलन का सबसे अहम एजंडा शिक्षा आंदोलन के तहत स्त्री मुक्ति का रहा है।

    मतुआ आंदोलन का ज्यादा मह्तव यह है कि इसके संस्थापक हरिचांद ठाकुर न सिर्फ नील विद्रोह में किसानों का नेतृत्व कर रहे थे,बल्कि उनके मतुआ आंदोलन का सबसे अहम एजंडा भूमि सुधार का था।जो फजलुल हक की प्रजा समाज पार्टी का मुख्य एजंडा रहा है और फजलुल हक को हरिचांद ठाकुर के पुत्र गुरुचांद ठाकुर और उनके अनुयायियों जोगेंद्र नाथ मंडल  का पूरी समर्थन था।इसी भूमि सुधार एजंडे के तहत बंगाल में 35  साल तक वाम शासन था और 1901 में ढाका में मुस्लिम लीग बन जाने के बावजूद मुस्लिम लाग और हिंदू महासभा के ब्राह्मण धर्म का बंगाल में कोई जमीन या कोई समर्थन नहीं मिला।इन्हीं जोगेंद्र नाथ मंडल ने भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान का संविधान लिखा तो विभाजन से पहले बैरिस्टर मुकुंद बिहारी मल्लिक के साथ बंगाल से अंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाया।बाद में 1977 का चुनाव जीत कर बंगाल में वाममोर्चा ने भूमि सुधार लागू करने की पहल की।बहुजन समाज की इस भारतव्यापी मोर्चे को तोड़ने के लिए ही बार बार विभाजन और युद्ध के उपक्रम हैं।

    ऐसा पश्चिमी नवजागरण में नहीं हुआ। नवजागरण के नतीजतन फ्रांसीसी क्रांति,इंग्लैंड की क्रांति या अमेरिका की क्रांति में स्त्री अस्मिता या स्त्री मुक्ति का सवाल कहीं नहीं था और न ही भूमि सुधार कोई मुद्दा था।भारत के स्वतंत्रता संग्राम में किसानों और आदिवासियों के आंदोलन की विचारधारा और दर्शन के स्तर पर जर्मनी और इंग्लैंड से लेकर समूचे यूरोप में धर्म सत्ता और राजसत्ता के खिलाफ विद्रोह से हालांकि तुलना की जा सकती है,जो अभी तक हम कर नहीं पाये हैं।

    इसलिए नवजागरण की सामाजिक क्रांति के धम्म के बदले राजसत्ता और धर्मसत्ता में एकाकार ब्राह्मण धर्म के हम शिकंजे में फंस रहे है।इससे बच निकलने की हर दिशा अब बंद है।रोशनदान भी कोई खुला नजर नहीं आ रहा है।

    नवजागरण आंदोलन और भारतीय साहित्य में माइकेल मधुसूदन ने जो मेघनाथ वध लिखकर लोकप्रिय आस्था के विरुद्ध राम को खलनायक बनाकर मेघनाथ वध काव्य लिखा और आर्यावर्त के रंगभेदी वर्चस्व के मिथक को चकनाचूर कर दिया, नवजागरण के सिलसिले में उनकी कोई चर्चा नहीं होती और अंबेडकर से बहुत पहले वैदिकी,महाकाव्यीय मनुस्मृति समर्थक मिथकों को तोड़ने में उनकी क्रांतिकारी भूमिका के बारे में बाकी भारत तो अनजान है है,बंगाल में भी उनकी कोई खास चर्चा छंदबद्धता तोड़क मुक्तक में कविता लिखने की शुरुआत करने के अलावा होती नही है।

    हम अपने अगले आलेख में उन्हीं माइकेल मधुसूदन दत्त और उनके मेघनाथ वध पर विस्तार से चर्चा करेंगे।अभी नई दिहाड़ी मिली नहीं है,तो इस मोहलत में हम भूले बिसरे पुरखों की यादें ताजा कर सकते हैं।तब तक कृपया इंतजार करें।



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