Are you the publisher? Claim or contact us about this channel


Embed this content in your HTML

Search

Report adult content:

click to rate:

Account: (login)

More Channels


Showcase


Channel Catalog


Channel Description:

This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

older | 1 | .... | 272 | 273 | (Page 274) | 275 | 276 | .... | 303 | newer

    0 0


    Suswagata Poria

    ফ্রান্সে লড়াই চলছে, নতুন আনা 'লেবার রিফর্ম বিল' এর বিরোধিতা করে। নতুন বিল ব্যাপক ভাবে অস্থায়ী শ্রমিক নিয়োগের কথা বলা হয়েছে এবং কোম্পানী মালিকদের বহু অনৈতিক সুবিধে দেওয়ার কথা বলা হয়েছে। সারা দেশ জুড়ে এক মাসেরও বেশি সময় ধরে শ্রমিকদের সাথে যুবক যুবতীরা রাস্তা দখল করেছে। দফায় দফায় লড়াই চলছে পুলিশ ও সামরিক বাহিনীর সাথে। মিডিয়া কভার করছে না। কভার করলেও বলছে 'দাঙ্গা' বা 'রায়ট'। ব্যাপক পরিবহণ ধর্মঘট হচ্ছে সারা দেশ জুড়েই।

    বেলজিয়ামে পাবলিক সেক্টরের শ্রমিকরা ব্যাপক ধর্মঘট করছে সারা দেশ জুড়ে। মূল লক্ষ্য সরকারের পাবলিক সেক্টরে খরচ কমিয়ে বেসরকারি কোম্পানির হাতে লাগাম তুলে দেওয়া।

    দিল্লীর ওয়াজিরপুরে এক 'পাওয়ার ব্যাঙ্ক' তৈরির কারখানায় মালিক ৪১ জন শ্রমিক কে কাজ থেকে বহিষ্কার করে কারণ তারা নূন্যতম মজুরির দাবী করেছিল। ১০ দিন ধরে কারখানার গেটে লড়াই চালানোর পর আজ মালিক নুন্যতম মজুরি দিতে রাজি হয়েছে। এর সাথে কতক্ষণ কাজ করতে হবে, সেই ব্যাপারেও একটা নিয়ন্ত্রণ আনার কথা ভাবতে বাধ্য হয়েছে।

    খবর গুলোর লিঙ্ক পরপর দিলাম। এই লড়াইগুলোই এই সময়ে খানিক আশার কথা।

    http://anonhq.com/violent-protests-labor-strikes-halt-fran…/

    https://www.facebook.com/telesurenglish/videos/850115925131811/

    https://www.facebook.com/nayandrome/posts/1445234465502807


    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0
  • 06/02/16--13:19: महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता ? Posted:Thu, 02 Jun 2016 19:00:57 +0000 हिमांशु कुमार कुछ लोग मारे गए क्योंकि उनकी दाढ़ियाँ लंबी थीं. और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए क्योंकि उनकी खाल The post आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा... पूरा आलेख पढें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/ सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत Posted:Thu, 02 Jun 2016 18:28:46 +0000 शमशाद इलाही शम्स इसका नाम है हिसैन हब्रे, उम्र 72 साल. 1982 में सी आई ए और फ़्रांस के समर्थन से मध्यअफ्रीकी The post सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में... पूरा आलेख पढें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/ कांग्रेसी मूर्खता की विराटता बनाम बीजेपी भक्ति वैभव Posted:Thu, 02 Jun 2016 18:09:34 +0000 शैलेन्द्र कुमार शुक्ल हम पिछले कई दशकों से मूर्खता की विराटता से मुक्ति पाने के लिए लड़

  • महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत


    हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें


    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0
  • 06/02/16--13:19: महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता ? Posted:Thu, 02 Jun 2016 19:00:57 +0000 हिमांशु कुमार कुछ लोग मारे गए क्योंकि उनकी दाढ़ियाँ लंबी थीं. और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए क्योंकि उनकी खाल The post आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा... पूरा आलेख पढें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/ सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत Posted:Thu, 02 Jun 2016 18:28:46 +0000 शमशाद इलाही शम्स इसका नाम है हिसैन हब्रे, उम्र 72 साल. 1982 में सी आई ए और फ़्रांस के समर्थन से मध्यअफ्रीकी The post सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में... पूरा आलेख पढें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/ कांग्रेसी मूर्खता की विराटता बनाम बीजेपी भक्ति वैभव Posted:Thu, 02 Jun 2016 18:09:34 +0000 शैलेन्द्र कुमार शुक्ल हम पिछले कई दशकों से मूर्खता की विराटता से मुक्ति पाने के लिए लड़
  • महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत


    हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    अस्पृश्य रंगभेदी दुस्समय में मुक्तबाजार में अभूतपूर्व हिंसा का महोत्सव!

    गनीमत है कि मैंने किसी का कत्ल नहीं किया और न खुदकशी का रास्ता अख्तियार किया और न दंगा या  मुठभेड़ में मारा गया!

    पत्रकारिया को लगभग वेशयावृत्ति में बदल देने वाले मसीहावृंद के खिलाफ मेरे अस्पृश्य वजूद में कितना भयंकर गुस्सा होगा,यह भी समझ लें।


    रचनाधर्मिता,जनप्रतिबद्धता और विरासत,लोक और भाषा के साथ बदलाव के ख्वाब मेरी आत्मरक्षा का रक्षाकवच!

    जिनका एजंडा हिंदुत्व है,उनका एजंडा नरसंहारी आर्थिक सुधार और मेहनतकशों के हाथ पांव काटने के श्रम सुधार और अनंत बेदखली का एजंडा कैसे है?


    वैकल्पिक मीडिया इसलिए भी जरुरी है क्योंकि अस्पृश्यों,अल्पसंख्यकों,पिछड़ों और आदिवासियों के अलावा मीडिया सेक्टर स्त्रियों के लिए भी बेहद जोखिमभरा है जहां गुलामी के खाते पर दस्तखत अनिवार्य है।चूंकि वैकल्पिक मीडिया में गुलामी की जंजीरें तोड़ी जा सकती है और इसलीलिए वैकल्पिक मीडिया हमारा नया मिशन है।


    जिस मिशन के साथ सत्तर के दशक के बदलाव के खवाबों के तहत हमने पत्रकारिता का विकल्प आजीविका बतौर अभिव्यक्ति की अबाध स्वतंत्रता के लिए चुना,उसीके लिए जनसत्ता में उपसंपादक बतौर लगातार 25 साल बिना प्रोन्नति,बिना अवसर के बिताने का धैर्य उसी मिशन की निरंतरता बनाये रखने का एकमात्र विकल्प रहा है।

    जिसकी कोई योग्यता नहीं है,जो बाजार का दो टके का दल्ला है,जो भयंकर जातिवादी और निरंकुश मैनेजर हैं,पल दर पल ऐसे लोगों के मातहत अपनी तमाम योग्यता और सामर्थ्य को नजरअंदाज होते हुए देखते हुए,अपने तमाम कार्यों का श्रेय उन्हें देते हुए,उनके हर अक्षम्य अपराध को उनकी महानता मानते हुए,गलती हुई तो हमारी. उपलब्धियां हैं तो उनकी,तजिंदगी संस्करण निकालने की जहमत उठाते हुए उनकी दबंगई की जहालत बर्दाश्त करने की मजबूरी हम पत्रकारों के लिए असह्य नरकयंत्रणा है।हर पत्रकार शाश्वत वही अश्वत्थामा है जो अपने ही रिसते हुए जख्म चाटते हुए पल दर पल महाभारत जीता है और गीता के उपदेश उसके काम नहीं आते।



    पलाश विश्वास

    गनीमत है कि मैंने किसी का कत्ल नहीं किया और न खुदकशी का रास्ता अख्तियार किया और न दंगा या  मुठभेड़ में मारा गया।


    1973 से हाईस्कूल परीक्षा में यूपी बोर्ड की मेरिट लिस्ट में स्थन बनाते हए जिलापरिषद के शरणार्थी दलित बच्चों के शरणार्थी इलाका दिनेशपुर के स्कूल से जीआईसी नैनीताल पहुंचते न पहुंचते व्यवस्था का कल पुर्जा बनने के बजाय रचनाधर्मिता के जरिये जनपक्षधरता के मोर्चे से लगातार पत्रकारिता कर रहा हूं।


    जनपक्षधरता का यह मोर्चा मेरे पुरखों,इस महादेस के किसानों आदिवासियों की समूची विरासत की जमीनहै मेरे लिए अखंड भारत और इंसानियत का मुल्क बी यही है,जिसे जोड़ने का मिशन ही मेरा धम्म है और इसीलिए मेरा अंत न हत्या और न आत्महत्या का कोई चीखता हुआ सनसनीखेज शीर्षक है।यही बाबासाहेब का मिशन है।


    1980 से 16 मई ,2016 तक बिना व्यवधान अखबारों में काम किया है।पच्चीस साल एक्सप्रेस समूह में बिता दिये।सैकड़ों पत्रकारों की नियुक्तियां की हैं और पिछले 36 सालों में सैकड़ों प्रकारों के कैरियर सवांरने का काम भी  किया है और उनमें से दर्जनों लोग बेहद कामयाब हैं और यही मेरी उपलब्धि है।वे लोग मुझे याद करें तो उनका आभार और न करें तो धन्यवाद।बाकी मेरी कोई प्रतिष्ठा नहीं है।फिर भी अधूरा मिशन पूरा करने का कार्यभार मेरा है और उसे पूरा किये बिना मरुंगा नही।


    फिरभी सच यही है कि  रिटायर मैंने उपसंपादक पद पर किया और 36 साल की पत्रकारिता के बाद रिटायर होने की स्थिति में मेरा न कोई वर्तमान है और न कोई भविष्य है।मेरा कोई घर नहीं है और न मेरी कोई आजीविका है और पूरी जिंदगी खपाने के बाद गहराते असुरक्षाबोध के अलावा मेरी कोई पूंजी नहीं है।जीरो ग्राउंड पर जीरो बैलेंस के साथ फिर नये सिरे से जिंदगी शुरु करने की चुनौती है।


    इस देश में अब भी पत्रकारिता में विभिन्न भाषाओं में लाखों की तादाद में काम कर रहे अस्पृश्य पिछड़े अल्पसंख्यक आदिवासी पत्रकारों की नियति कुल मिलाकर यही है।मैंने हत्या या आत्महत्या का रास्ता नहीं चुना लेकिन उनमे से कोई भी मैनाक सरकार कभी भी कहीं भी बन सकता है। गुलामी से भी बदतर हालात में रोजगार की गारंटी के बिना जो उपेक्षा,अपमान का दंश वे रोज रोज झेलते हैं और बमुश्किल जैसे वे गुजारा करते हैं,वे हत्या या आत्महत्या का विकल्प नहीं चुनते तो समझें,गनीमत है।


    जिसकी कोई योग्यता नहीं है,जो बाजार का दो टके का दल्ला है,जो भयंकर जातिवादी और निरंकुश मैनेजर हैं,पल दर पल ऐसे लोगों के मातहत अपनी तमाम योग्यता और सामर्थ्य को नजरअंदाज होते हुए देखते हुए,अपने तमाम कार्यों का श्रेय उन्हें देते हुए,उनके हर अक्षम्य अपराध को उनकी महानता मानते हुए,गलती हुई तो हमारी. उपलब्धियां हैं तो उनकी,तजिंदगी संस्करण निकालने की जहमत उठाते हुए उनकी दबंगई की जहालत बर्दाश्त करने की मजबूरी हम पत्रकारों के लिए असह्य नरकयंत्रणा है।हर पत्रकार शाश्वत वही अश्वत्थामा है जो अपने ही रिसते हुए जख्म चाटते हुए पल दर पल महाभारत जीता है और गीता के उपदेश उसके काम नहीं आते।


    सारे अवसर उनके,गलतियों के बावजूद प्रोन्नतियां उनकी,बड़े पदों पर सीधे उनकी नियुक्ति और बिना काम विदेशा यात्रा के स्टेटस के साथ वातानुकूलित वेतनमान और हमारी हैसियत जरखरीद गुलामी की ,फिरभी अखबारों मे हत्या या आत्महत्या नहीं है,तो रचना धर्मिता और जनप्रतिबद्धता और पेशेवर सक्रियता इसके बड़े कारण हैं जिसके अवसर अन्यत्र होते नहीं हैं।


    इसलिए आज भी पत्रकारिता दूसरे पेशे से बेहतर है क्योंकि गनीमत है कि हम हत्या या आत्महत्या का विकल्प जिंदगीभर की नरकयंत्रणा के बावजूद अपनाने के सिवाय सिर्फ जनप्रतिबद्ध या रचना धर्मी बनकर टाल सकते हैं।यही पत्रकारिता है,इस सच को जाने बिना नये लोग पेशेवर पत्रकारिता न अपनाये तो बेहतर है।


    वैकल्पिक मीडिया इसलिए भी जरुरी है क्योंकि अस्पृश्यों,अल्पसंख्यकों,पिछड़ों और आदिवासियों के अलावा मीडिया सेक्टर स्त्रियों के लिए भी बेहद जोखिमभरा है जहां गुलामी के खाते पर दस्तखत अनिवार्य है।चूंकि वैकल्पिक मीडिया में गुलामी की जंजीरें तोड़ी जा सकती है और इसलीलिए वैकल्पिक मीडिया हमारा नया मिशन है।



    जिस मिशन के साथ सत्तर के दशक के बदलाव के खवाबों के तहत हमने पत्रकारिता का विकल्प आजीविका बतौर अभिव्यक्ति की अबाध स्वतंत्रता के लिए चुना,उसीके लिए जनसत्ता में उपसंपादक बतौर लगातार 25 साल बिना प्रोन्नति,बिना अवसर के बिताने का धैर्य उसी मिशन की निरंतरता बनाये रखने का एकमात्र विकल्प रहा है।


    मैंने विश्वविद्यालय से निकलने के बाद किसी दूसरे काम के लिए सोचा तक नहीं।आज भले ही विश्वविद्यालय का विकल्प सोच रहा हूं।


    पेशेवर पत्रकारिता के इस विकल्प को चुनने के लिए हमने सारे विकल्प छोड़ दिये तो जिस दिन मैंने जनसत्ता ज्वाइन किया,उसी दिन से इस मिशन के ही मुक्तबाजार में तब्दील होते देखते हुए मेरे दिलोदिमाग से लगातार रिसते हुए लहू का कुछ अंदाज लगाइये तो अवसर से वंचित होने की नियतिबद्ध अस्पृश्यता,असमता,अन्याय और रंगभेद के विरुध मेरे भीतर उबले रहे गुस्से की सुनामी का अंदाजा आप लगा सकते हैं।


    पत्रकारिया को लगभग वेशयावृत्ति में बदल देने वाले मसीहावृंद के खिलाफ मेरे अस्पृस्य वजूद में कितना भयंकर गुस्सा होगा,यह भी समझ लें।


    हर रोज जनसत्ता जैसे अखबार की,हिंदी अखबार के सबसे बड़े ब्रांड की जिस जघन्य सुनियोजित तरीके से हत्या होती रही तो पिछले पच्चीस साल में रोज रोज कितना गुस्सा हमने भीतर ही भीतर आत्मसात किया होगा,इसका अंदाजा लगाइये।


    मसीहा बने हुए लोगों के अस्पृश्यता और रंगभेद के आचरण के खिलाफ मैं कितनी दफा उबल रहा हुंगा,इसका भी अंदाजा लगा लीजिये।


    मेरी सीनियरिटी को खत्म करके मेरे मत्थ पर दूसरों को बैठाकर मुझे लगातार बिना मौका खारिज करते रहने और एक बार भी मुझे किसी तरह का मौका न देने की अस्पृशयता के खिलाफ मुझमें कितना बड़ा जव्लामुखी भीतर ही भीतर सुलग रहा होगा,समझ लीजिये और समझ लीजिये कि अभी आपने न आग का जलवा देखा है और जंगल में खिलते फूलों की बंगावत देखी है और केसरिया सुनामी देखने वाले लोगों को बदलाव की सुनामी का कोई अंदाजा है।


    मेरे ही साथी शैलेंद्र को मेरी ही सिफारिश पर साल बर एक्सटेंशन देने वाले लोगों ने एक झटके से दूध में से मक्खी की तरह जैसे मुझे निकाल बाहर फेंक दिया तो समझ लीजिये की अस्पृश्यता  के इस महातिलिस्म में कोई रोहित वेमुला आखिर क्यों आत्महत्या करता है और क्यों खड़गपुर आईआईटी से निकलकर दुनिया जीत लेने वाला कोई एकलव्य महाबलि अमेरिका के सीने पर चढ़पर किसी द्रोणाचार्य के सीने पर गोलियों की बौछार कर देता है।


    अमेरिकी विश्वविद्यालय में बुधवार को अपने प्रोफेसर को गोली मारने के बाद खुदकुशी करने वाले छात्र की पहचान भारतीय मैनाक सरकारके तौर पर हुई है। आईआईटी खड़गपुर का छात्र मैनाक सरकारप्रोफेसर विलियम क्लग द्वारा उसके कंप्यूटर कोड को चुराने और अहम जानकारी दूसरे छात्र को देने से नाराज था। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया लास एंजिलिस में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र मैनाक का सुसाइड नोट प्रोफेसर क्लग के कमरे से बरामद हुआ। 39 वर्षीय क्लग इस यूनिवर्सिटी में मैकेनिकल और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे।


    मैनाक सरकार कोई अपवाद नही है ऐसा स्थगित धमाका सीने में दबाये दांतों से दांत दबाये दुनियाभर में रंगभेदी वर्चस्ववादी पितृसत्ता के कदमों तले रोज लहूलुहान हैं करोड़ों ठात्र छात्राएं और युवा।इनमें से अनेक चेहरे भारत के विश्वविद्यालयों,मेडिकल इंजीनियंरिग कालेजों और कार्यस्थलों पर हत्या या आत्महत्या की चीखती सुर्खियों में हमें रोज रोज नजर आते हैं लेकिन मुक्तबाजार के उपभोक्ताओं के दिलोदिमाग पर उसका कोई असर होताइच नहीं है।


    अवसरहीनता और अवसर डकैती के इस रंगभेदी मुक्तबाजार में असम और अन्याय की निरंकुश वैश्विक सत्ता के मातहत हत्या और आत्महत्या का यह सिलसिला तब तक रुकने वाला नहीं है जबतक न हम इस पृथ्वी को गौतम बुद्ध के धम्म ,बाबासाहेब के जाति उन्मूलन एजंडा औक शहीदे आजम भगत सिंह के आजादी जुनून के रास्ते सिरे से बदल नहीं देते और मार्टिन लुथर किंग के सपने को जमीन पर अंजाम नहीं देते।


    किसी बाराक ओबामा या किसी दलित या शूद्र के सत्ता शिकर तक पहुंचने से ही दुनिया नहीं बदलती,सामज को नये सिरे से व्यवस्थित करके अमन चैन की फिजां मुकम्मल बनाये बिना हम लगातार कुरुक्षेत्र में मारे जाने को नियतिबद्ध हैं।जीते रहेंगे तो फिर वही अशवत्थाम बनकर पल पल महाभारत जीने को अभिशप्त।


    पूरे 36 साल अखबारों के दफ्तरों में जिंदगी खपा दी है।धनबाद में चार साल रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क के कामकाज में चौबीसों घंटे खपकर अकादमिक खिड़कियां हमेशा के लिए बंद कर लीं तो उत्तर प्रदेश में दैनिक जागरण और दैनिक अमर उजाला में शाम ढलते न ढलते भोर होने तक डेस्क संभालने और उसके बाद सारा समय किसी न किसी रुप में निरंतर सक्रियता का सिलसिला घनघोर रहा।


    1991 में जनसत्ता में आने के बाद दफ्तर का काम समयबद्ध और प्रणालीबद्ध हुआ तो दफ्तर के बाहर सारी सक्रियता राष्ट्रव्यापी हो गयी।यही मेरी संजीवनी है।ऊर्जा है।इसीके लिए मैं इंडियन एक्सप्रेस समूह का आभारी हूं।इसीलिए मैंन इस समूह में लगातार पच्चीस साल बीता दिये और आगे मौका मिलता तो शायद पच्चीस साल और बिता भी देता।एक्सप्रेस समूह से मुझे कोई शिकायत नहीं है क्योंकि यह तंत्र तो अस्पृश्यता का है जो सामाजिक क्रांति के बिना बदलेगा नहीं बल्कि मीडिया के केसरिया कायाकल्प से जो गैस चैंबर में तब्दील होने वाला है।


    अब रिटायर करने के बाद घर बैठकर काम कर रहा हूं तो सविताजी को लगता है कि मैं अपने सामर्थ्य से ज्यादा काम कर रहा हूं जबकि मेरी दिनचर्या तनिक बदली नहीं है।हुआ यह कि 1983 से जबसे वे लगातार मेरे साथ हैं,घर से बाहर मेरे कामकाज की निरंतरता का अंदाजा उन्हें नहीं है और वे ठीक ठीक नहीं जानती रही है कि पत्रकारिता में मैंने कितनी ऊर्जा और कितना समय खपाया है।


    वही ऊर्जा और वही समय मैं अपने पीसी के साथ लगातार रचनाधर्मिता और जनप्रतिबद्धता,बदलाव के ख्वाबों में खपा रहा हूं तो सविता को मेरी सेहत की चिंता सताने लगी है जबकि इस बीच मैं नागपुर हो आया हूं और कुल मिलाकर हफ्तेभर भी घर नहीं बैठा हूं।


    अस्पृश्य रंगभेदी दुस्समय में मुक्तबाजार में अभूतपूर्व हिंसा का महोत्सव है यह।

    अमन चैन का कोई रास्ता सत्ता के गलियारे से होकर नहीं निकलता और न यह कानून व्यवस्था का कोई मामला है।


    फिजां में इतनी नफरत पैदा कर दी गयी हैं कि कायनात भी बदलने लगी है जौसा मौसम बदल रहा है और ग्लेशियर भी इस दहकती पृथ्वी की आंच से पिघलने लगे हैं तो समुंदर तक उबलने लगे हैं और आसमान टूटकर कहर बरपाने को तैयार है।


    किसी किस्म का सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार की हिंसा की यह स्वयंक्रिय सुनामी रुकने नहीं जा रही है बल्कि इसकी प्रतिकिया और प्रलंयकर होने वाली है।


    निरंकुश सत्ता ,धर्मोन्मादी अंध राष्ट्रवाद, सैन्य राष्ट्र और वैश्विक मुक्त बाजार में उत्पादन प्रणाली सिरे से लापता है और समाज एकदम बदल गया है।


    संयम और अनुशासन है नहीं और न आम जनता की आस्था के मुताबिक धर्म कहीं है तो नैतिकता और मूल्यबोध भी नहीं है।


    प्रगति का अस्पृश्यवाद मनुस्मृति की अस्पृश्यता से ज्यादा नरसंहारी है और इसका प्रभाव विश्वव्यापी है और हिंसा का रसायन शास्त्र इसीलिए स्थानीय कोई समस्या है ही नहीं कि राष्ट्र और सत्ता अपनी सैन्य शक्ति से उसपर किसी तरह का अंकुश लगा लें।


    बल्कि अब हालात यह है कि जितनी प्रहार क्षमता की सैन्यशक्ति किसी राष्ट्र के पास है,जितनी आंतरिक सुरक्षा का उसका चाकचौबंद इंतजाम है,उसके मुकाबले व्यक्ति और संगठनों के पास उससे कहीं ज्यादा प्रहार क्षमता है क्योंकि राष्ट्र व्यवस्था में जिस तकनीक और विज्ञान के पंख लगे हैं,वे तमाम उपकरण अब मुक्त बाजार में समुचित क्रयशक्ति के बदले सहज ही उपलब्ध है।


    विडंबना यह है कि अब हर राष्ट्र सैन्य राष्ट्र है और विकास अंततः सैन्य प्रहार क्षमता की अंधी पागल दौड़ है और वहीं सैन्य राष्ट्र मुक्त बाजारे के तंत्र मंत्र यंत्र को सर्वशक्तिमान बनाने के लिए अंध राष्ट्रवादा का उपयोग करके यह हिंसा का महोत्सव रच रहा है।


    राष्ट्र की बागडोर की आत्मघाती प्रतिस्पर्द्धा तक सीमाबद्ध हो गयी है विचारधाराएं और राजनीति अब बेलगाम हिंसा का पर्याय है और मुक्त बाजार बसाने के लिए उत्पादन प्रणाली के साथ सात परिवार और समाज का अनिवार्य विघटन है तो किसी भी स्तर पर हत्या और आत्महत्या पर नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है।


    गनीमत है कि मैंने किसी का कत्ल नहीं किया और न खुदकशी का रास्ता अख्तियार किया और न दंगा या  मुठभेड़ में मारा गया।


    रचनाधर्मिता,जनप्रतिबद्धता और विरासत,लोक और भाषा के साथ बदलाव के ख्वाब मेरी आत्मरक्षा का रक्षाकवच।


    जिनका एजंडा हिंदुत्व है,उनका एजंडा नरसंहारी आर्थिक सुधार और मेहनतकशों के हाथ पांव काटने के श्रम सुधार और अनंत बेदखली का एजंडा कैसे है?



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    Centre to amend Citizenship Act,Dr Subodh Biswas Assured!

    Nagpur(Hastakshep).The President of All India Refugee organization NIKHIL Bharat Bangali Udvastu Samanyaya Samiti President has been assured that the Government of India is going to make provision for the citizenship to partition victim Bengali refugees.

    Dr.Biswas and his companions organized rallies in New Delhi and cpitals of states to push for the demand and continued to interact with the central government and the BJP leadership and these meetings were highly controversial as a section of refugee leaders objected these interactions with BJP as BJP introduced this black act way back in 2003.

    Dr.Biswas caliamed that it is the chievement of the continuous efforts of the organization but we could not confirm it on fine prints though BJP leadership has been assuringly publicly to make special provisions for Bengali Refugees and it did not happen.

    We support the continuous movement for citizenship but we may not be asured until it happens.

    Dr.Subodh Biswas wrote:

    ভারত সরকার নাগরিকত্ব আইন ২০০৩ পুনর সংশোধনের পথে.....নিখিল ভারত সমিতির উপলব্ধি

    কোন আন্দোলন ব্যর্থহয়না।কারন নাগরিকত্বের আইন ২০০৩ সংশোধনের দাবীনিয়ে নিখিলভারত বা উ স সমিতি ২০০৫ থেকে আন্দোলন করেচলেছে।দিল্লীর রাজপথে ২০১১,২০১৫ আন্দোলন আমরা করেছি।২০১২ সালে মাভালঙ্কর হলে সর্বভারতীয় সভাকরেছি।মাননীয় গৃহমন্ত্রী শ্রী রাজনাথ সিং মাননীয় পরিবহন মন্ত্রী শ্রী নীতিন গটকরি ,মাননীয় সুষমা স্বরাজ,শ্রী কৈলাশ ভিজয় বর্গী সহ শীর্স্থ্য নেতাদের সংগে আমরা বৈঠক করেছি।
    দেরীহলেও ভারত সরকার আগামীতে নাগরিকত্ব আইন সংশোধন করতে চলেছে। সরকারের এই উদ্দ্যোগ নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির আন্দোলনেরই প্রতিফলন।সেজন্য ভারত সরকারকে নিখিল ভারত সমিতির পক্ষথেকে ধন্যবাদ জানাই,এবং অনুরোধ জানাই ধর্মীয় অত্যাচারের স্বীকার হয়ে ঘেসব বাঙালী হিন্দুরা(সংখ্যালঘুরা) ভারতে আশ্রয় নিয়েছে ,তাদের ভাবাইকে ভারতীয় নাগরিকত্ব দেবার ব্যবস্থা করাহোক। সংগে পেপার কাটিং পোষ্টকরাহোল।জয় নিখিল ভারত।


    -- 
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    Home / Editor's Pick / CBI Raid Part of Vendetta Against Us: Teesta  Teesta Setalvad is a widely respected rights activist known for her pioneering work for the Gujarat 2002 victims. She has been the spirit behind the group, Citizens for Justice and Peace and co-editor of Communalism Combat.   CBI Raid Part of Vendetta Against Us: Teesta  in Editor's Pick, INSIGHT, TEESTA SETALVAD, WHAT'S HOT July 14, 2015	0 2,762 Views          inShare  Activist Teesta Setalvad with Zakia Jafri whose husband Ehsan Jafri, a former MP and Congress leader, who was hacked and burnt alive during the 2002 pogrom.   Activist Teesta Setalvad with Zakia Jafri whose husband Ehsan Jafri, a former MP and Congress leader, who was hacked and burnt alive during the 2002 pogrom.

    Busting the Myth – Teesta Setalvad cheated residents of Gulberg society

    Home / Editor's Pick / CBI Raid Part of Vendetta Against Us: Teesta  Teesta Setalvad is a widely respected rights activist known for her pioneering work for the Gujarat 2002 victims. She has been the spirit behind the group, Citizens for Justice and Peace and co-editor of Communalism Combat.   CBI Raid Part of Vendetta Against Us: Teesta  in Editor's Pick, INSIGHT, TEESTA SETALVAD, WHAT'S HOT July 14, 2015	0 2,762 Views          inShare  Activist Teesta Setalvad with Zakia Jafri whose husband Ehsan Jafri, a former MP and Congress leader, who was hacked and burnt alive during the 2002 pogrom.   Activist Teesta Setalvad with Zakia Jafri whose husband Ehsan Jafri, a former MP and Congress leader, who was hacked and burnt alive during the 2002 pogrom.

    Rukmini Sen

    Myth- Teesta Setalvad cheated residents of Gulberg society. There has been a propoganda against Teesta Setalvad that she had collected money in the name of memorial "for" the victims "from" the victims and others. That she never gave that money to the victims.

    Fact- Teesta Setalvad gave legal aid to the victims/residents of Gulberg society. Yesterday, 2nd of June was the day of the verdict of Gulberg massacre.

    Gulberg Massacre case as it sounds is about the massacre that happened at Gulberg society. 69 people were killed.

    What really happened? 

    Victims of Gulberg society had lost their family members and suffered huge loss of property in the 2002 Gujarat riots. They wanted to sell their property and move to a peaceful place.

    The price of their property had fallen after the riots. They had no support from Gujarat . Many victims across Gujarat had sold off their land and moved lock, stock and barrel after 2002 carnage.

    Teesta requested her friends and people at large to buy off the land so that the victims don't face any further loss. She suggested Gulberg society can be turned into a memorial and the victims will be able to sell their land at market price. The money she collected was not enough. In fact only her friends and close sympathizers donated money for the memorial. The money turned out to be lesser than what the victims were getting otherwise for their land. Teesta informed about this to both the donors and the victims.. No money was taken from victims ever! The money was being collected for them. The donors (in writing) and on record said Teesta should use their donation for any of her other activism work.

    Teesta Setalvad didn't use the collected money for anything else. One reason why even after CBI was unleashed upon her nothing happened to her. Her donors are on record donors. Every detail to the t is maintained. Yesterday, 2nd of June 2016 was the day of verdict for Gulberg massacre where Teesta Setalvad and her organisation Citizens for Justice and Peace had provided legal aid to all the members of Gulberg Society.

    Gulberg Society has in past told all authorities that they had not made any complains against Teesta Setalvad. They had also made an official complain about letter heads of Gulberg Society being stolen for filing a false complain against Teesta Setalvad.

    As a citizen and for the Nation 🙂

    Please do your research and enquiry and decide why will members of Gulberg Society use Teesta Setalvad's office for legal aid (all this while…till yesterday for that matter) and also file a complain against her!

    Why did Teesta Setalvad and the Gulberg Society stand together yesterday in court? and why while it has been like this for years some media houses have reported that residents of Gulberg society have filed a case against Teesta Setalvad

    Why do we forget so easily?

    We forget too much, too soon and to suit the narrative of what we think is our people, our group and our families.

    I firmly believe both Godhra and Gujarat could have been avoided if the central and Gujarat government had taken timely action. This is a sensitive matter. I request you to go through the court papers of what happened in Godhra and how the rest of Gujarat happened after that. You could also refer to the book The Fiction of Fact Finding- Modi and Godhra by Manoj Mitta.

    I support and respect Teesta Setalvad's position of not asking fordeath sentence for even the most gruesome crime. For Justice and Peace must be our aim.

    Any man's death is death of humanity.

    Any man's death diminishes me!


    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    চন্ডাল-নমো-নমশূদ্র 

    Saradindu Uddipan 

    চন্ডাল জাতির নমশূদ্র নামকরণ নিয়ে ইদানিং একটি বিতর্ক বেশ ঘোরাল হয়ে উঠছে। বিভিন্ন আলোচনা সভা, সেমিনার এবং সোস্যাল মিডিয়াতে আলোচনাটি বেশ জায়গা করে নিচ্ছে ইদানীং। একদল গবেষক তাদের বিভিন্ন লেখালেখির মাধ্যমে জোরাল দাবী করে আসছেন যে ১৯১১ সালের লোকগণনার প্রতিবেদনে চন্ডাল জাতিকে যে ভাবে "নমশূদ্র"নামে একটি জাতে অবনমিত করে হিন্দু ধর্মের চতুর্বর্ণের মধ্যে ঢুকিয়ে দেওয়া হয় তা ব্রহ্মন্যবাদী চক্রান্ত ছাড়া কিছু নয়। নমশূদ্র নামের আড়ালে আসলে তারা একটি স্বাধীন স্বতন্ত্র জাতিকে হিন্দু ধর্মের চতুর্বর্ণের বেড়ি পরিয়ে সমাজের একেবারে নিম্ন স্তরে নামিয়ে এনেছে এবং স্থায়ী ভাবে তাদের কপালে শূদ্র নামের কলঙ্ক চিহ্ন এঁকে দিয়েছে।

    অন্য আর একটি দলের ধারণা যে চন্ডাল পরিচয় আসলে একটি গালি। ব্রহ্মনেরা তাদের গ্রন্থগুলিতে এই প্রতিবাদী জাতিকে বিদ্বেষবশতঃ চন্ডাল নামে অভিহিত করেছে এবং এমন নিকৃষ্ট হিসেবে বর্ণনা করেছে যা এই জাতির জীবনযাপন আচার আচরণের সাথে একেবারেই মেলে না। এই চন্ডাল গালি আবার অপভ্রংশ হয়ে একেবারে "চাঁড়াল"এ পরিণত হয়েছে যা জাতির পক্ষে নাকি চরম অপমান। তারা মনে করেন গুরুচাঁদ ঠাকুর আন্দোলন করে এই জাতিকে চন্ডাল বা চাঁড়াল গালি থেকে মুক্ত করেছেন এবং নমশূদ্র নামে একটি নতুন জাত সৃষ্টি করে জাতিকে উচ্চ স্তরে পৌঁছে দিয়েছেন। নমশূদ্র জাতের সৃষ্টিতে যেহেতু গুরুচাঁদের প্রত্যক্ষ সমর্থন রয়েছে সেই হেতু এই নামের বিরুদ্ধে কোন ধরণের সমালোচনা শোনার জন্য এই দলটি প্রস্তুত নয়।

    এই বিবাদ এবং দ্বন্দ্ব পর্বে আর একটি দল আছেন যারা খানিকটা মধ্যপন্থী। এরা চন্ডাল নামের গুরুত্ব এবং ইতিহাসের সাথে পরিচিত। অন্য দিকে এঁরা যুক্তি দিয়ে দাবী করেন যে নমশূদ্র নাম নিয়ে এই জাতির আখেরে কোন উন্নতি হয় নি বরং নম'র সাথে শূদ্র যুক্ত হয়ে এই জাতির চরম অমর্যাদা হয়েছে। ভারতবর্ষে কোথাও এমন জাতি নেই যার সাথে সরাসরি "শূদ্র"শব্দটি যুক্ত। তাছাড়া শূদ্র শব্দটি একটি Sovereign Socialist Secular Democratic Republic দেশের নাগরিকের আত্তপরিচয়ের পক্ষে মোটেও সুখকর নয় বরং এই পরিচয় ভারতীয় সংবিধানের প্রস্তাবনা, আদর্শ ও উদ্দেশ্যের পরিপন্থী। তারা আরো বলেন যে, যদি একান্তই চন্ডাল নামে আপত্তি আসে তবে "শূদ্র"শব্দটি বাদ দিয়ে "নমো"বা "নম"শব্দটি গ্রহণ করা যেতে পারে।

    আমারা বলতে চাই যে সব পক্ষের মতাম নিয়েই একটি আলোচনার সূত্রপাত করা দরকার। এতে হয়ত আমরা একটি আসন্ন বিবাদ থেকে পরিত্রাণ পেতে পারি। আপনাদের সুচিন্তিত মতামত কামনা করি।

    Saradindu Uddipan's photo.

    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0


    Centre to amend Citizenship Act, Dr. Subodh Biswas Assured!


    महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सत्ता की गुलाम मीडिया के चारण और भाटों से सावधान रहने की जरूरत

    हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें


    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    কিছু শান্তির খোঁজ রইল।


    Titir Chakraborty 
    'সকালে ঘুম ভাঙতে দেখি
    সমস্ত মাঠ বৃষ্টিধোয়া
    মাঠের উপর দাঁড়িয়ে আছে
    আধভাঙ্গা গাছ,আধভাঙ্গা ঘর
    সবভাঙ্গা প্রেম
    অপরাজিত!'

    UG'র শেষ সেমেস্টারের শেষ পরীক্ষাটা কাল। এই তিন বছরে কতগুলো সমীকরণ ঘেঁটেছে,আর কোন অসমীকরণ জীবনের মোড় ঘুরিয়েছে,সেই হিসেব করতে মন হয়না। যাদবপুর আমার কাছে লুকোনো ঝাঁপি,আর তুলনামূলক সাহিত্য বিভাগ তার সবথেকে মনকেমন করা চিঠি। এই শেষবেলাতেও যেভাবে সম্পর্কগুলো নতুন নতুন রঙ খুলছে,তাতে অবাকই লাগে! অনেককটা মুখ নেই,তাও এই ছবিটা বড্ড প্রিয়। 

    মনুষ্যত্ব বলে আর কিছু বাকি নেই চারপাশে এটা জানা হয়ে গেছে এতদিনে। প্রশাসন কার শাসন করবে এটা ঠিক করতে করতে সাধারণ মানুষের শ্বাসরোধ হয়ে যাবে। 
    Urmi অনেক শুভেচ্ছা আর সংগ্রামী অভিনন্দন, হাল না ছাড়ার জন্য,এই অমানুষী ব্যবস্থার উল্টোদিকে দাঁতে দাঁত চেপে,বেপরোয়া ভাবে রুখে দাঁড়ানোর জন্য!

    আমরা সবাই সবকিছু পারবোনা। পারার চেষ্টা করিনা তা বলে,এমন নয় কিন্তু। কিন্তু আমাদের বেড়ে ওঠা,আমাদের অতীতের নানা নির্মাণ দিয়ে আমাদের এমন কিছু প্রপার্টি তৈরি হয়,যা অনেক জায়গায় পারার সাধ্যটাকে সীমিত করে দেয়! আমরা বহুদিন হল স্থির হয়ে বসতে ভুলে গেছি। লোডশেডিং-রেনি ডে এইসব মূল্যবান অজুহাত হাতছাড়া হয়ে যাওয়ার পর থেকে,আমাদের ভাবতে বসার সাধ্য কমে গেছে অনেকখানি। এখন সময় পেলে (মানে,সারাদিন যত স্লট করা থাকে নানারকম দায় ও দায়িত্বের,তার বাইরে যে একচিলতে ফাঁকে ভাবনা-চিন্তা করা দরকার বলে ভেবে রাখি) আমরা যেগুলো নিয়ে ভাবি,সেগুলো আগে থেকেই আমাদের প্ল্যান করা। মানে,কারণ ছাড়া অমুক বাড়িটার তমুক পাঁচিলে কেন ইঁটে নোনা পড়েনি,বা এই জামাটার সেলাইয়ের কাজটাকে চিকণ কেন বলে-এইসব অদরকারি কথা আমরা ভাবিনা,বা বলা ভালো লোড নিইনা ভাবার। বরং তার বদলে দুটো ভার্চুয়াল সখ্যতা,চারটে শিডিউলড আউটিং করে নিলে ভালো। আসলে আমরা কোথাও বোধহয় নিজেদের এটা কনভিন্স করিয়ে নিচ্ছি যে এই দায়হীন(আপাতভাবে যদিও),তাৎক্ষনিক বয়ে চলাই জীবন। এই ঘোড়দৌড়ে অংশ নিতে না পারলে আর তোমার জীবন কই?

    কিন্তু,ওই যে,সবাই পারেনা। দৌড়তে পারেনা। আজ যখন হুহু করে চারপাশটা ফেসবুক-হোয়াটসঅ্যাপ,AIB-TVF,ইন্টারেস্টিং ব্রেকিং নিউজের ছকে বাঁধা একটা কারখানা হয়ে উঠছে,তখন তো আমাদের মত কিছুজন,অন্ততঃ কিছুজন, sms'এ গোপন অভিমান লেখে,হঠাৎ ভোরবেলা পুরোনো চিঠির গন্ধ পায়। কোনো কোনোদিন অকারণে হেঁটে বেড়ায়,হয়তো একাই। একা হতে পারাটা কঠিন এখন,কিন্তু একা হয়ে যাওয়াটা বরাবরের জন্য কষ্টের। আরো কষ্টের,নিজের না পারাগুলো,স্বীকার করতে বাধ্য হওয়া। কারণ,ওই মুহূর্ত পর্যন্ত আমরা নিজেদের বিশ্বাস করাতে চাই,আজ না হোক,কাল-পরশু-আগামী বৃষ্টির দিন,কোনোভাবে আমরা পেরে যাবো। চেনা ছকের বাইরে বেরিয়ে,আপাত ইমোশনে না ভেসে,একবার পরস্পরের আঙুল ছুঁয়ে ক্ষত চিনতে শিখবো; স্থির হয়ে একটা রাত অন্যের কথা শুনবো। আমরা শুনতেও ভুলে গেছি!

    অদ্ভুতভাবে,কোথাও-কোনোমতে যখন বিশ্বাস টিকছেনা,তখনো ছোটোবেলায় একলাফে রাস্তার জলজমা গর্ত পেরোতে পারার কনফিডেন্সে মনে হয়,একসময় পেরে যাবো। জানি,পা ফস্কালে বিপদ,তাও রিস্কটুকু নিতে ছাড়বোনা। সাধ এবং সাধ্যের মধ্যে একটা অসমীকরণ তো থাকবেই,তুমি-আমি কিছু ধ্রুবক মাত্র :)

    কিছু শান্তির খোঁজ রইল।



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0


    Titir Chakraborty

    'আসবার কালে কি জাত ছিলে? এসে তুমি কি জাত নিলে?'


    সত্যিই কারোর জন্ম-মৃত্যুর সাথে জাত,ধর্ম,বর্ণ কিচ্ছুটি তৈরি হয়না। এগুলো তৈরি হয় আমাদের চারপাশের সামাজিক ব্যবস্থা দিয়ে,যা আমাদেরকে প্রশ্ন করা শেখায়না,খালি অন্ধের মত মেনে নিতে শেখায়! আর এই মেনে নিতে নিতে,আমরা এতটা নিরুপায় হয়ে যাই যে একটা রোহিত-একটা চুনীকে হারাতে হয়!
    কারণ,আমরা ভয় পাই,উল্টোদিকে কথা বললে সমাজ বাঁচতে দেবে নাকি? তা,এমনিই বা দিচ্ছে কই? মুখ বুজে,মেনে নিয়ে,হতাশায় মরে যাওয়ার থেকে ভালো এই পচে যাওয়া ব্যবস্থাটাকে ভিতর থেকে পালটে ফেলার জন্য একবার আওয়াজ তুলি! যাতে কাল আরো কিছু জনকে আমাদের ভয় পাওয়ার মাশুল না দিতে হয়!

    ৫ই জুন। ভারতসভা হল। বিকেল ৪টে। কথা হবে,সবাই একসাথে মিলে।
    থাকবেন রাধিকা ভেমুলা,রাজা ভেমুলা,ডোন্থা প্রশান্থ,কুনাল দুগগাল,আনন্দ তেমতুম্বরে,তথাগত সেনগুপ্ত এবং আরো অনেকে।



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    'शान्तता !सुलभा देशपांडे दिवंगत!

    ज्येष्ठ अभिनेत्री सुलभा देशपांडे यांचं निधन

    पलाश विश्वास


    'शान्तता !सुलभा देशपांडे दिवंगत!नैनीताल के वे दिन याद आ रहे हैं जब हम इस नाटक की खूब चर्चा करते रहे।मराठी रंगमंच की चर्चा अगर विजय तेंदुलकर के बिना असंभव है और वहीं  से समांतर सिनेमा के डा.शरीराम लागू,अमरीश पुरी और नाना पाटेकर जैसे असंख्य कलाकार भारतीय सिनेमा के चमकते दमकते सितारे रहे हैं,तो हमारी सुलभा देशपांडे न सिर्फ मराठी बल्कि भारतीय नारी का आम चेहरा है,जिसकी चमक किसी स्मिता पाटिल या शबाना आजमी से कम नहीं है।


    मराठी मीडिया की खबर हैः


    मुंबई : ज्येष्ठ अभिनेत्री सुलभा देशपांडे यांचं आज निधन झालं. वृद्धापकाळाने सुलभा देशपांडे यांनी राहत्या घरी त्यांनी अखेरचा श्वास घेतला. त्या 80 वर्षांच्या होत्या.

    मराठीसह हिंदी सिनेमांमध्ये आपल्या अभिनयाची छाप उमटवणाऱ्या सुलभा देशपांडे यांच्या निधनामुळे अवघ्या चित्रपटसृष्टीवर शोककळा पसरली आहे.

    सुलभा देशपांडे यांच्या अनेक भूमिकांनी प्रेक्षकांच्या मनावर छाप पाडली. शांतता! कोर्ट चालू आहे, चौकट राजा या सिनेमातील त्यांच्या भूमिका विशेष गाजल्या. मागील एक-दोन वर्षात आलेल्या  विहीर, हापूस या सिनेमातही त्यांनी काम केलं होतं.

    मराठीच नाही तर आदमी खिलौना है, गुलाम-ए-मुस्तफा, विरासत या हिंदी चित्रपटातील त्यांच्या भूमिका लक्षवेधी होत्या.



    संजोग से आज सुबह मैं न जाने क्यों भारतीय फिल्म की पहली सुपर स्टार कानन बाला की कथा ब्यथा से उलझा रहा।कानन बाला का बचपन सिरे से गुमशुदा है और मुकम्मल अभिनेत्री बतौर क्या अभिनय और क्या गायन वे भारतीय फिल्मों के संगीतबद्ध लोक संस्कृति से गूंथे मथे विकास में शामिल गाती,नाचती अभिनेत्रियों  में हैं,जिन्होंने परदे पर अपनी फिल्म मुक्ति में पहली दफा रवींद्र का गीत लाइव गाया और खुद कविगुरु उनके प्रशंसक थे तो वे शांति निकेतन से भी संबद्ध रही हैं।घर घर बर्तन मांजने वाली ,निषिद्ध बस्ती से संगीत और अभिनय यात्रा शुरु करने वाली कानबाला बुनियादी तौर पर एक भारतीय नारी है,जिसकी कोई जाति,वंश इत्यादि नहीं है।


    अब खबर आ रही है कि प्रज्ञा की सुलू मौसी और बेहतरीन अदाकारा सुलभा देशपांडे नहीं रहीं तो भारतीय सिनेमा से तेजी से गायब होती जा रही श्री चारसौ बीस की आम औरतों के साथ साथ लोकगीतों के देसी परिदृश्य में असल भारतीय स्त्री का चेहरा सिलसिलेवार ढंग से गायब हो रहा है और समूचा लोक भव्य सेट और रंगों के बहार में गायब है क्योंकि बाजार में श्वेत श्याम पृष्ठभूमि गैरजरुरी है।


    इसी श्वेत श्याम लोक भावभूमि में आम औरत का वह गायब जुझारु चेहरा काफी हद तक शबाना और स्मिता का अभिनय का चरमोत्कर्ष रहा  है।लेकिन वह चेहरा किसी सुलभा देशपांडे के बिना अधूरा है।


    हम नैनीताल के उन सनहले दिनों में किसी गहरी नीली झील में पैठ सी गयी हरियाली में घाटी में अपने रंगकर्मी साथियों के सान्निध्य में गिरदा जैसे लोक में रसे बसे करिश्मा के मुखातिब उस आम भारतीय औरत का जो चेहरा भारतीय रंगमंच के साथ साथ भारतीय सिनेमा खोजते रहे हैं,वह चेहरा कानन बाला को हो न हो,सुलभा ताई का ही चेहरा है,जिसे हम स्मिता और शबाना जैसी सितारों की चमक दमक में शायद सही तरीक से कभी जान ही नहीं सके हैं।


    भारतीय समांतर सिनेमा आंदोलन का चेहरा सुलभा देशपांडे के बिना कितना अधूरा है तो उसे इसतरह समझें कि आप हम उन्हें बाज़ार, भूमिका जैसी भूमिकाओं के लिए जानते हैं लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि मराठी में समानांतर रंगमंच को बढ़ाने वाले हरावल दस्ते की वे सदस्य थीं।


    यह एक पूरा आन्दोलन था जिसने अनेक पीढ़ियों को तैयार किया।


    प्रज्ञा के कहने पर उनकी सबसे अविस्मरणीय भूमिका - 'शान्तता ! कोर्ट चालू आहे' में मिस बेणारे.


    बहरहाल मुंबई से खबर यह है कि कैंसर से पीड़ित प्रसिद्ध अभिनेत्री सुलभा देशपांडे का आज निधन हो गया।


    वे 80 साल की थीं।

    सुलभा देशपांडे मराठी के साथ ही हिंदी फिल्मों में भी काम किया था और आज उनके निधन से फिल्म उद्योग में शोक की लहर फैल गयी।


    गौरतलब है कि सुलभा देशपांडे को छोटे परदे पर अंतिम बार 'अस्मिता'सीरियल में देखा गया था।


    सुलभा देशपांडे का जन्म 1937 में मुंबई में हुआ था और अपने कैरियर की शुरूआत दबीलदास हाईस्कूल में एक शिक्षिका के रूप में शुरू किया था।


    शिक्षिका का काम करते हुए सुलभा देशपांडे ने विजय तेंदुलकर के लिए बच्चों का नाटक लिखा था और उसी दरम्यान उनकी मुलाकात विजय मेहता, अरविंद देशपांडे, श्रीराम लागू, विजय तेंदुलकर जैसे कलाकारों से हुयी।


    उन्होंने 1960 के दशक में श्री विजय तेंदुलकर के 'शांतता कोर्ट चालू आहे'नाटक में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।


    महाराष्ट्र के लोगो के लिए वे इतनी खास है कि वे यह कहते नहीं हिचकते कि सुलभा देशपांडे ने मराठी सिनेमा, टीवी और नाटक के अलावा हिंदी फिल्मों में भी काम किया।जैसे कि हिंदी फिल्मों में उनका काम मराठी भावभूमि से तड़ीपार है।इसी तरह बाकी देश के लोगों को भी मालूम नहीं है कि वे किस हद तक अपनी जमीन की मराठा मानुष रही हैं कि उनके लिए मराठी मानुष के दिलों दिमागों में उथल पुथल मची हुई है और बाकी भारत के लिए यह किसी फिल्मी कलाकार की नार्मल मौत से ज्यादा बड़ी कोई घटना नहीं है।यही वर्चस्व वाद का वास्तव है जहां बहुलता और विविधता के बावजूद देश को देश बनाने वाली लोक विरासत की जड़ों से हमारे कटे होने का बेकल इंद्रिय नागरिकत्व है संवेदनाहीन।


    गौरतलब है कि सुलभा ताई ने अपने पति अरविंद देशपांडे के साथ मिल कर आविष्कार संस्था की स्थापना की।यह युगलबंदी भारतीय रंगमंच के इतिहास में अभूतपूर्व है।


    सुलभा ताई नेउन्होंने अरविंद देसाई की अजीब दास्तां, भूमिका, चौकट राजा, जैत रे जैत और आदमी खिलौना है जैसी फिल्मों में काम किया था।


    अरसा हो गया अरविंद देसाई को गये और अब उनके पीछे पीछे सुलभा ताई भी चल दीं।


    'शान्तता !सुलभा देशपांडे दिवंगत!



    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    सुलभा देशपांडे के लिए चित्र परिणाम

    अधिक चित्र


    सुलभा देशपांडे

    अभिनेत्री

    सुलभा देशपांडे हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। विकिपीडिया

    जन्म: 1937, मुम्बई

    जीवनसाथी: अरविंद देशपांडे (विवा. ?–1987)

    पुरस्कार: संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार - रंगमंच - अभिनय (भाषायी आधार पर) - मराठी

    फ़िल्में

    45+ और देखें

    इंग्लिश विंग्लिश (2012)

    इंग्लिश विंग्लिश

    2012

    अवताराची गोश्ता (2014)

    अवताराची गोश्ता

    2014

    जान तेरे नाम (1992)

    जान तेरे नाम

    1992

    शंकरा (1991)

    शंकरा

    1991

    भूमिका (1977)

    भूमिका

    1977

    बाज़ार (1982)

    बाज़ार

    1982



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0


    Let us be united against  Patriarchal Apartheid in India!

    Mourn for the greatest,the man who fought against apartheid in America.

    Ali who kept dancing and punching. Like he said, "I float like a butterfly and sting like a bee."

    The legend, the Champion, the Greatest of all ... Muhammad Ali passes away.

    Palash Biswas

    Babasahed Dr.BR Ambedkar was born as untouchable just becuase he was hindu by birth.

    Babsaheb launched Mission  Annnihilation of caste and the leaders of Hindutva made him the enemy of Hindutva to sustain Manusmriti hegemony of Apartheid!Babasaheb opted for Buddhism to Make India free frm caste,the basic instinct inherent,the brute format of patriarchal hegemony,The mission remained incomplete.


    Kolkata has to witnee unprecedenetd mass convention to annihilate caste as the students and youth jointly take the initiative irrespective of identitites and ideologies.


    It is a new begging.


    On the eve of the most wanted event in Kolkata,the news breaks in as  Ali who kept dancing and punching. Like he said, "I float like a butterfly and sting like a bee."


    The legend, the Champion, the Greatest of all ... Muhammad Ali passes away.


    The greatest had to opt for Islam as he was born a Christan and having become the world Champion. he had to be humiliated just because he was a Black.He punched apartheid very hard and opted for Islam!

    India never has been America and it has been a land with inherent tolerance and unity in diversity.

    Those engaged to make in America of India are engaged in the governance and politics of fascism.

    Baba Saheb converted but the caste system survives getting more strength every day as we stand divide.

    Ali converted but America remains the base of global Apartheid which is essentially patrarchal.

    We have to fight against Manusmriti Hegemony.

    We have to fight against patriarchy.

    Then we have to stand united to fight against the Global apartheid.

    Let us be united against  Patriarchal Apartheid in India!

    Mourn for the greatest,the man who fought against apartheid in America.



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    Saradindu Uddipan 

    আজ সন্ধ্যায় আলিপুর, রবীন্দ্রনগর বিআর আম্বেদকর মিশন বাবা সাহেবের ১২৫তম জন্মদিন পালন করে। দিল্লীর জহরলাল নেহেরু ইউনিভার্সিটি দুই গবেষক এবং হায়দ্রাবাদ ইউনিভার্সিটির এক ছাত্র এই সভায় আমাদের সাথে উপস্থিত ছিলেন। এই ছাত্রছাত্রীরা সরাসরি রোহিত ভেমুলার স্বাধিকার আন্দোলনের সাথে যুক্ত। গবেষকেরা জানান যে সামাজিক পরিবর্তনের সাথে সাথে একটি বিশাল সংখ্যক মূলনিবাসী ছাত্রছাত্রী উচ্চ শিক্ষা গ্রহণ করার জন্য উঠে আসছে। ফলে ছাত্র রাজনীতিতে ঘটে গেছে এক অভাবনীয় পরিবর্তন। এই মূলনিবাসী ছাত্রছাত্রীরা বাবাসাহেব আম্বেদকরের আদর্শে অনুপ্রাণিত হয়ে ক্যাম্পাসে ক্যাম্পাসে ছাত্র সংগঠন গড়ে তুলছে। মূলত মনুবাদী সরকারের গাত্রদাহ এইখানে যে এই ভাবে মূলনিবাসী ছাত্রছাত্রীরা উচ্চ শিক্ষার আঙিনা দখল করে নিলে তাদের হাতের থেকে রাজনীতির রাশ বেহাত হয়ে যাবে। ফলে যে ভাবেই হোক মুলনিবাসী ছাত্রছাত্রীদের উচ্চ শিক্ষার আঙ্গিনায় আসা বন্ধ করতে হবে। সার্বিক ভাবে প্রশাসনিক ক্ষমতা ব্যবহার করেই চলছে অসহিষ্ণুতা ও অসহযোগিতা। এই অসহিষ্ণুতা ও অসহযোগিতার চরম উদাহরণ রোহিত ভেমুলা।

    আশার কথা মনুবাদী সরকার যত ফন্দী ফিকিরি করছে কলেজ ক্যাম্পাসে তত জোরে আওয়াজ উঠছে "জয় ভীম"।



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    महत्वपूर्ण खबरें और आलेख बस्तर जाकर सुरक्षित वापस आ जायें, तो वे 'माओवादी'ही हो सकते हैं!


    हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    The Greatest Human Being, Who refused to join Army against Vietnam rather faced State`s Ban and Punishment, the Artist,the Bengali Ali,Muhammad Ali's greatest quotes thanks to MSN

    Palash Biswas

    © REX/PHOTOREPORTERSThe Greatest is no more and the greatness to fight inequality and injustice remains!

    Bangladesh Included him as a Bangladeshi citizen and Ali was welcome in Dhaka with the eternal Canting Ali Bengali.

    The city of joy mourns its greatest hero who never lost the fight against APERTHEID.He punched as an Artist with the skill of Black Cobra to Change this World.

    Kolkata once chanted Tomaar Naam Vietnaam,Aamar Naam Vietnaam.

    Ali played the greatest ever bout against American IMPERIALISM of Apartheid,when he faced the wrath of the State like a Champion and stood rock solid for Humanity and Nature!

    1. "Float like a butterfly, Sting like a bee, your hands can't hit, what your eyes can't see."
    — Prior to his fight against George Foreman in 1974. 

    2. "I am the greatest, I'm the greatest that ever lived. I don't have a mark on my face." 
    — After he beat competitor Sonny Liston in 1964
    .


    3. "No I'm not going 10,000 miles from home to help murder and burn another poor nation simply to continue the domination of white slave masters of the darker people the world over." 
    — On April 29, 1967, while refusing to fight in the Vietnam war.

    4. "Champions aren't made in the gyms. Champions are made from something they have deep inside them: a desire, a dream, a vision. They have to have last-minute stamina, they have to be a little faster, they have to have the skill and the will. But the will must be stronger than the skill." 
    — Prior to a fight against George Foreman in 1974. 

    © John Rooney/AP Photo

    5. "I am America. I am the part you won't recognize. But get used to me. Black, confident, cocky, my name not yours. My religion, not yours; my goals, my own; get used to me."
    — In 1970 when he was convicted of draft evasion. 

    6. "I hated every minute of training, but I said, 'Don't quit. Suffer now and live the rest of your life as a champion."
    — On working hard

    7. "Ain't no reason for me to kill nobody in the ring, unless they deserve it."
    — Ali commented after the match with Jimmy Ellis in July 1971.

    8. "Boxing is a lot of white men watching two black men beat each other up"
    — In "Chambers Sporting Quotations‎" (1990) by Simon James

    © Adam Berry/Bloomberg News

    9. "To make America the greatest is my goal, so I beat the Russian and I beat the Pole. And for the USA won the medal of gold. The Greeks said you're better than the Cassius of old."  
    — After winning the Olympic light-heavyweight gold medal at the 1960 Games in Rome. 

    10. The man who views the world at 50 the same as he did at 20 has wasted 30 years of his life.
    — Interview in "Playboy" magazine in November 1975.

    11. "My soul has grown over the years, and some of my views have changed. As long as I am alive, I will continue to try to understand more because the work of the heart is never done."
    — "The Soul of a Butterfly: Reflections on Life's Journey" (2004), written with Hana Yasmeen Ali.

    12. "I always bring out the best in men I fight, but Joe Frazier, I'll tell the world right now, brings out the best in me. I'm gonna tell ya, that's one helluva man, and God bless him." 
    — After the 'Thrilla in Manila.'

    © AP/Press Association Images

    13. "Friendship is the hardest thing in the world to explain. It's not something you learn in school. But if you haven't learned the meaning of friendship, you really haven't learned anything."

    14. "Only a man who knows what it is like to be defeated can reach down to the bottom of his soul and come up with the extra ounce of power it takes to win when the match is even."

    15. "It isn't the mountains ahead to climb that wear you out; it's the pebble in your shoe."

    16. "It's lack of faith that makes people afraid of meeting challenges, and I believed in myself."

    © AP Images

    17. "Impossible is just a big word thrown around by small men who find it easier to live in the world they've been given than to explore the power they have to change it. Impossible is not a fact. It's an opinion. Impossible is not a declaration. It's a dare. Impossible is potential. Impossible is temporary. Impossible is nothing."

    18. "I'm the most recognized and loved man that ever lived cuz there weren't no satellites when Jesus and Moses were around, so people far away in the villages didn't know about them."

    19. "Live everyday as if it were your last because someday you're going to be right."

    20. "If you even dream of beating me you'd better wake up and apologize."

    © Timothy D. Easley/AP Photo

    21. "I wish people would love everybody else the way they love me. It would be a better world."

    22. "The best way to make your dreams come true is to wake up."

    23. "At home I am a nice guy: but I don't want the world to know. Humble people, I've found, don't get very far."

    24. "If my mind can conceive it, and my heart can believe it - then I can achieve it."

    25. "If you sign to fight me, you need speed and endurance but what you need most is to increase your insurance."

    © Evan Vucci/AP Images

    26. "It's hard to be humble, when you're as great as I am."

    27. "I won't miss Boxing; Boxing will miss me"

    28. "When you can whip any man in the world, you never know peace."

    29. "The will must be stronger than the skill."

    30. "There are no pleasures in a fight, but some of my fights have been a pleasure to win."

    Slideshow: Muhammad Ali — Life in pictures

    In 1967, he was imprisoned for five years and paid a fine of $10,000 as he was found guilty of draft evasion, a deliberate choice not to obey the military conscription policies of one's nation. This decision was reversed later in 1971.Muhammad Ali: Life in pictures

    Watch: Muhammad Ali — The greatest legacy

    Video player from: Dailymotion (Privacy Policy)


    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    Modi's Two Years and the Plight of Dalits

    Anand Teltumbde

    Narendra Modi, the self proclaimed Ambedkar-bhakt recently completed two years of his boastful rule. Babasaheb Ambedkar, an iconoclast par excellence, was loath having bhakts around but might have relented and been pleased to have a prime minister as his bhakt, with his characteristic pragmatic approach. He had modestly demanded dalit representation in the state structure so that they would safeguard dalit interests from the casteist majority of the caste Hindus. He experienced in his own life time that it did not work. Here he gets an all powerful prime minister, with a dash as his bhakt! A modicum of expectation he would have from Modi is to turn around the country in the direction he prescribed and of course, some concern for the deteriorating condition of dalit masses. It is well known that Ambedkar had warned the new rulers to bring in social and economic democracy at the earliest possible time. He had provided a vehicle to reach there in the form of the Directive Principles for the State Policy. Although not justiciable, they were to be the fundamental principles for governance of the country but were totally ignored in the sixty years of the Congress rule. An Ambedkar bhakt was expected to get them back into focus. So was he expected to stop the worsening trend in condition of dalits.  Two years may not be a long time to show visible results but certainly enough to mark a directional change. Do Modi's two years show it?

    Rhetoric and Reality

    On the eve of the last elections the BJP had a coup over the Congress in buying off all the prominent brokers of dalit votes. This investment paid it rich dividend. Enthused by this win, it went full blast in appropriating Ambedkar by propaganda blitzkrieg and grabbing all possible places where his memorials could be erected.  Modi hasn't left a stone unturned in paying acclamations to Ambedkar, taking it as proxy for the concern for dalits. Paradoxically, whatever Ambedkar stood for was being trampled upon with impunity. There was harassment and brutalities unleashed on dalit students in higher education, who Ambedkar believed would truly represent him. The deliberate delay in scholarships to dalits students, institutional attempts to smother voices of radicals among them, their willful humiliation went on all over, which was eventually exposed by a bright research scholar Rohith Vemula, with the cost of his own life. As such, discriminatory treatments have not been new to dalits but the institutional manner in which they happened during the past two years was certainly conspicuous. Even now, despite countrywide outrage and struggles for justice to Rohith, Modi continues to back his killers.

    Modi repeatedly swore by the Constitution as his sacred text but in actual conduct he trashed it to the dustbin. He not only continued with the ignorance and neglect of the Directive Principles but also did not hesitate to mutilate them. Leave apart the spirit of the Constitution, its words like secularism, equality, liberty, etc. stand slandered in his rule. The basic principle of 'equality before law' in the Constitution, which is the single biggest constitutional solace for the poor and marginalized itself is nearly dismantled as shown in the shocking 'clean chit' for to the Hindutva criminals in Malegaon blast case. Ban on beef eating, Ghar Wapasi, saffronization of education, jingoist promotion of nationalism/patriotism and irrationality are directly detrimental to the dalit interests. Dalits are thwarted in their realization of the sinister import of these subtle shifts of the BJP by their identitarian blinkers but they are the effective reversals of all their gains earned during the last century.

    Deprivation of Dalits

    For want of space, we will see how deprivation of dalits has gone up during Modi's rule just with the budget allocations on two schemes: One, their overall development vide Scheduled Caste Sub Plan (SCSP) and Tribal Sub Plan (TSP) and, two, on the Safai Karmachari-related schemes.   

    The Constitution of India explicitly recognized the need to close the socio-economic gap between these communities and the rest of the Indian population and mandated special protection and provisions for SCs and STs. It was actualized but in prospective terms only in 1974-75 in the Fifth Five Year Plan period by the policy of the Tribal Sub Plan (TSP) and later in 1979-80 in the sixth plan period by the Special Component Plan (SCP), later christened as SCSP. They were the statutory allocations to be made in every budget, central as well as state, to be spent on these communities, respectively, and were mandated to be budgeted plan outlays in proportion to their population. As in any scheme for dalits, the government never kept its promise and blatantly stole their share right from the beginning in the budget itself. Even most of these funds were diverted to unrelated activities and even then the actual spend was far less than the budget. Even with this misdoing, the allocations by the previous regimes might look better than the two budgets (2014-15 being the interim budget) Modi presented. As Table 1 shows, for the year 2015-16 the ratio of the SCSP allocation to total plan outlay worked out to just 6.62 %, by far the lowest since 2007-08 and that for the TSP at 4.29 %, lowest since 2011-12. These ratios should have been 16.62 and 8.6, respectively, as per their population. Although, in view of the important state elections following the budget, these ratios are slightly improved in the current budget to 7.06 and 4.36, respectively, they still remain lower than the earlier ratios. It will show that within these two years Modi has deprived of dalits and Tribals of Rs 13,370,127 crores and 5,689,940 crores from their legitimate share.

    Table 1: SCSP and TSP Allocations in Rs. crores [If the Table does not fit, you could delete first four years]


    2007-08 RE

    2008-09 RE

    2009-10 RE

    2010-11 RE

    2011-12 RE

    2012-13 RE

    2013-14 RE

    2014-15 RE

    2015-16 RE

    2016-17 BE

    Plan Outlay

    158491

    183528

    233386

    284284

    327396

    413625

    475532

    467934

    465770

    550010

    SCP/SCSP

    SCP Allocation

    12368

    14727

    15906

    23183

    29918

    33085

    35801

    43208

    30851

    38833

    %

    7.80

    8.02

    6.82

    8.15

    9.14

    8.00

    7.53

    9.23

    6.62

    7.06

    TSP

    TSP Allocation

    7447

    8771

    8600

    10363

    17959

    18721

    22030

    26715

    19980

    24005

    %

    4.70

    4.78

    3.68

    3.65

    5.49

    4.53

    4.63

    5.71

    4.29

    4.36

        Source: Union Budgets 2007-08 to 2016-17.

    Table 2: Outlays for Safai Karmachari-related Schemes (Rupees crores)


    2013-14 

    BE

    2014-15 

    BE

    2014-15 

    Actual

    2015-16 BE

    2015-16 RE

    2016-17 BE

    Self-Employment Scheme of Liberation and Rehabilitation of Scavengers

    557.00

    439.04

     47.00

    470.19

    10.01

    10.00

    Pre-Matric Scholarship for children of those engaged in  "unclean" occupations

      9.50     

     10.00

     10.00

      10.00

    2.50

    2.00

       Source: Union Budget for respective years.

    Safai Karmacharis, or manual scavengers accounting for about 10% of the total dalit (SC) population, are the dalit among dalits. (See last Margin Speak in EPW, 7 May 2016). An Act was passed in 1993, namely, the Employment of Manual Scavengers & Construction of Dry Latrines (Prohibition) Act, which was substituted by another and stronger Act, namely, Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013. But despite persistent agitation of these hapless people nothing is done. Even with such a backdrop, Modi's concern for these people is evidenced by the drop in the allocation for 'Self-Employment and Rehabilitation scheme' from Rs 557 crores in the last two budgets (as Table 2 shows) to Rs 439.04 crores and Rs 470.19 crores, which were further slashed to a token entry of Rs 10 crores. The allocation for 'Pre-Matric Scholarship for children of manual scavengers' shows still more dismal picture: While the budget allocation was marginally raised to Rs 10 crores from the earlier 9.5 crores, it was slashed to 2 crores in the last budget.  

    Spurt in Caste Atrocities

    While the BJP desperately depends upon dalit votes, it's win in the last elections getting it clear majority in the Lok Sabha for the first time, coupled with the overbearing style of Modi has bolstered the entire Sangh Pariwar. Its aggressive hindutva rhetoric generally emboldened the feudal forces and lumpen elements in rural areas to suppress assertive instincts of dalits, which are associated with their aspiration of liberation. Not all of them internalize the tactical need of the BJP to woo dalits. This dynamics has aggravated the caste contradictions in villages which often manifests into gory atrocities. While the atrocity graph has always scaled skywards right since the economic reforms were instituted, the rise during the Modi's rule appears spectacular. The National Crime Research Bureau has only the 2014 atrocity figures, but they might be enough to reflect the nature of this dynamics. The Table 3 gives a glimpse of the atrocity scene of dalits, which shows an alarming increase of over 19 percent from the incidental peak previous year.

    Table 3: Atrocity on dalits from 2010 to 2015

    Type /Year

    2010

    2011

    2012

    2013

    2014*

    Murder

    570

    673

    651

    676

    794

    Rape

    1349

    1557

    1576

    2073

    2388

    Kidnapping..

    511

    616

    490

    628

    1456

    Dacoity

    42

    36

    27

    45

    37

    Robbery

    75

    54

    40

    62

    92

    Arson

    150

    169

    214

    189

    201

    Grievous hurt..

    4376

    4247

    3855

    4901

    4531

    PCR ct

    143

    67

    62

    62

    101

    PoA Act

    10513

    11342

    12576

    13975

    8887

    Others

    14983

    14958

    14164

    16797

    21541

    Total

    32713

    33719

    33655

    39408

    47064

    Percentage rise

    -

    3.08

    -0.19

    17.04

    19.43

    Source: NCRB, 'Crime in India' for various years.

    * Break-up computed from the figures in Table 7.2, Crime of India 2014.

    These figures are police figures, which are a function of the degree of independence of police from the political formation. The nakedness with which the BJP is using police for promotion of its agenda, the pressure on these figures needs to be understood.      

    In sum, the two years of Modi has been grossly devastating to dalits in short term and utterly ruinous in the long term. Dalits had better realized that the Sangh Pariwar's dream of establishing Hindu Raj, a curious cross of the Hitlarite Ein Volk, Ein Reich, Ein Fuehrer and Manu's Brahmanism, is a deadly antithesis of Ambedkar.    



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    जहां भाजपा दलित वोटों पर बेतहाशा निर्भर है, वहीं पिछले चुनावों में जीत ने इसे लोक सभा में पहली बार साफ बहुमत दिलाया जिसके साथ मोदी की अहंकार भरी शैली ने मिल कर पूरे संघ परिवार को मजबूत किया है. इसके आक्रामक हिंदुत्व की लफ्फाजियों ने देहाती इलाकों में सामंती ताकतों और लंपट तत्वों को इसका हौसला दिया है कि वे दलितों में मुक्ति की उम्मीदों से जुड़ी दावेदारी के रुझान को दबाएं. इस बदलाव ने गांवों में जाति के अंतर्विरोधों को और बदतर बनाया है जो अकसर ही खौफनाक अत्याचारों की शक्ल में सामने आते हैं. हालांकि आर्थिक सुधारों के लागू किए जाने के बाद से ही अत्याचारों के मामलों में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन मोदी की हुकूमत में इन अत्याचारों में बढ़त ने गैरमामूली शक्ल ले ली है. राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो के पास सिर्फ 2014 के अत्याचारों के आंकड़े हैं, लेकिन वे भी इस बदलाव की प्रकृति को जाहिर करने के लिए काफी हैं. तालिका 3 दलितों पर होने वाले अत्याचारों की झलक देती है, जो यह दिखाती है कि उस साल (2014), उसके पिछले साल (2013) के मुकाबले, जब दलितों के खिलाफ अत्याचार पहले से ही अपने चरम पर थे, 19 फीसदी से भी ज्यादा की खतरनाक वृद्धि हुई.


    एक आंबेडकर-भक्त के दो साल और दलितों का दर्द



    जब एक स्वयं-भू आंबेडकर भक्त हुकूमत चला रहा है, तो दलितों को यह उम्मीद हो सकती थी कि सियासत की दिशा में बदलाव उनके पक्ष में होंगे. लेकिन असल में नरेंद्र मोदी सरकार के दो बरसों में वे उपलब्धियां ही हाथ से निकलने लगी हैं, जिन्हें हासिल करने में दलितों को कई दशक लगे हैं.आनंद तेलतुंबड़े का लेख. अनुवाद: रेयाज उल हक

    अपने को आंबेडकर का भक्त बताने वाले नरेंद्र मोदी के शेखीबाज शासन के हाल ही में दो साल पूरे हुए हैं. स्थापित परंपराओं और मूर्तियों के धुर विरोधी बाबासाहेब आंबेडकर अपने आस-पास भक्तों के होने से नाराज रहा करते थे. लेकिन शायद अपने खास व्यावहारिक तौर-तरीकों के कारण हो सकता है कि शायद वे एक प्रधानमंत्री को अपने भक्त के रूप में पाकर उस पर तरस खा जाते और खुश होते. उन्होंने संकोच के साथ राज्य के ढांचे में दलितों के प्रतिनिधित्व की मांग की थी ताकि वे सवर्ण हिंदुओं की जातिवादी बहुसंख्या से दलित हितों की हिफाजत कर सकें. उन्होंने अपनी जिंदगी में अनुभव किया था कि यह कारगर नहीं रहा था. लेकिन अब उन्हें सर्वशक्तिशाली एक प्रधानमंत्री मिला है, जिसकी खूबी यह है कि वह उनका भक्त है! उन्होंने मोदी से जो थोड़ी सी उम्मीद की होती वो यह थी कि वे देश को आंबेडकर की बताई हुई दिशा में ले जाएंगे, और बेशक यह भी कि वो दलित जनता की जारी बदहाली से कुछ सरोकार रखेंगे. यह बात तो जानी हुई है कि आंबेडकर ने नए शासकों को चेतावनी दी थी कि वे जितनी जल्दी संभव हो सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र ले आएं. उन्होंने इसे हासिल करने के लिए राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के रूप में एक साधन भी मुहैया कराया था. हालांकि वे मुनासिब नहीं थे, लेकिन उन्हें देश के शासन के लिए बुनियादी उसूल होना था. लेकिन कांग्रेस के साठ बरसों के शासन में उनकी पूरी तरह अनदेखी की गई. अब एक आंबेडकर भक्त से यह उम्मीद तो होनी ही थी कि वो वापस उन्हें केंद्र में लाएगा. इसी तरह उससे ये उम्मीद भी बननी थी कि वो दलितों की बदहाली के चिंताजनक रुझानों को रोकेगा. अब हो सकता है कि नतीजों के जाहिर होने के लिए दो बरस काफी न हों लेकिन ये यकीनन इसकी झलक देने के लिए तो काफी हैं ही कि बदलाव की दिशा क्या है. क्या मोदी के दो बरसों में इन उम्मीदों की दिशा में बढ़ने की झलक मिली है?
     

    हवाबाजी और हकीकत 

    पिछले आम चुनावों के ठीक पहले भाजपा ने दलित वोटों के दमदार दलालों को खरीदने में कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ दिया. इस निवेश का भारी मुनाफा भी उसे मिला. अपनी जीत के जोश में, इसने आंबेडकर को हथियाने का एक बेलगाम अभियान छेड़ दिया जिसमें तड़क-भड़क वाले प्रचार और हर उस संभावित जगह पर कब्जा शामिल था, जहां आंबेडकर के स्मारक खड़े किए जा सकते हों. मोदी ने आंबेडकर का गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और इन्हीं को दलितों के लिए अपनी चिंताओं के रूप में पेश किया. जबकि असलियत में, आंबेडकर जिन बातों के पक्ष में खड़े थे, हर उस बात को बेधड़क कुचल दिया गया. उच्च शिक्षा में दलित छात्रों के उत्पीड़न और उनके प्रति बेरहमी का एक सिलसिला शुरू हुआ, जिन्हें निशाना बनाया गया वे छात्र वैसे थे जिनके बारे में आंबेडकर मानते थे कि वे उनका असली प्रतिनिधित्व करेंगे. दलित छात्रों की स्कॉलरशिप में जान-बूझ कर देर की गई, उनके बीच की रेडिकल आवाजों का गला घोंटने की संस्थागत कोशिशें हुईं, सोच-समझ कर उनको हर जगह अपमानित किया गया जिसको आखिर में एक जहीन रिसर्च स्कॉलर रोहिथ वेमुला ने अपनी जिंदगी की कीमत पर उजागर किया. वैसे तो भेदभाव से भरा हुआ व्यवहार दलितों के लिए नया नहीं रहा है लेकिन यह जिस संस्थागत रूप में पिछले दो बरसों में हुआ है, वो यकीनन एक खास बात है. अभी भी, देश भर में रोहिथ वेमुला के इंसाफ के लिए फैले गुस्से और संघर्ष के बावजूद रोहिथ के हत्यारों की पीठ पर मोदी का हाथ बना हुआ है.

    मोदी, संविधान को अपना एक पवित्र ग्रंथ बता कर बार-बार उसकी कसमें खाते हैं, लेकिन अपने वास्तविक व्यवहार में उन्होंने संविधान को कूड़ेदान में फेंक दिया है. न सिर्फ उन्होंने नीति निर्देशक उसूलों के प्रति अंजान बने रहने और अनदेखी को जारी रखा है, बल्कि उन्हें तोड़ने-मरोड़ने में भी नहीं हिचके हैं. संविधान की आत्मा को तो छोड़ ही दें, इसमें आए धर्मनिरपेक्षता, बराबरी, आजादी जैसे शब्द इस हुकूमत में बदनाम हो गए हैं. संविधान में 'कानून के आगे बराबरी'का जो बुनियादी उसूल गरीबों और हाशिए के लोगों के लिए अकेला सबसे बड़ा संवैधानिक भरोसा है वो करीब-करीब तहस-नहस कर दिया गया है जैसा कि मालेगांव धमाके के मामले में हिंदुत्ववादी अपराधियों को खौफनाक तरीके से 'क्लीन चिट'देने में दिखाया रहा है. गोमांस (बीफ) खाने पर प्रतिबंध, घर वापसी, शिक्षा का भगवाकरण, राष्ट्रवाद/देशभक्ति को अंधभक्ति के साथ बढ़ावा देना, और अविवेक दलित हितों के लिए सीधे-सीधे नुकसानदेह हैं. दलितों को पहचान (आइडेंटिटी) की अंधी पट्टियों ने यह महसूस करने से रोके रखा है कि भाजपा द्वारा किए जा रहे इन छुपे और बारीक बदलावों का कुटिल मतलब क्या है, लेकिन ये बदलाव पिछली सदी के दौरान हासिल की गई हर उपलब्धि को पूरी तरह से पलट रहे हैं.
     

    दलितों के नुकसान  

    जगह की कमी की वजह से हम यहां सिर्फ दो योजनाओं में बजट आवंटनों के जरिए यह देखेंगे कि मोदी के शासन में दलितों को वंचित रखने में कितना इजाफा हुआ है. पहला, अनुसूचित जाति उप योजना (एससीएसपी) और आदिवासी उप योजना (टीएसपी) के जरिए उनका कुल विकास और दूसरा, सफाई कर्मचारियों से संबंधित योजनाएं.


     



    भारत का संविधान इन समुदायों और बाकी भारतीय आबादी के बीच में सामाजिक-आर्थिक खाई को पाटने की जरूरत की साफ-साफ पहचान करता है और उसने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष सुरक्षा और प्रावधानों के निर्देश दिए हैं. इन पर अमल किया गया, लेकिन काफी देर से, सिर्फ पांचवी पंचवर्षीय योजना की अवधि में 1974-75 में आदिवासी उप योजना की नीति के जरिए और बाद में छठी पंचवर्षीय योजना की अवधि में 1979-80 में विशेष घटक योजना (एससीपी) के जरिए, जिसे बाद में एससीएसपी का नाम दिया गया. ये वैधानिक आवंटन थे, जिनको हर केंद्रीय और राज्य के बजट में किया जाना चाहिए था, ताकि क्रमश: इन समुदायों पर खर्च किया जा सके. उन्हें उनकी आबादी के अनुपात में बजट में रकमों का बंटवारा करने के निर्देश थे. जैसा कि दलितों की किसी भी योजना में होता है, सरकार ने कभी भी अपने वादे नहीं निभाए और बजट में से शुरुआत से ही उनके हिस्से के अधिकारों को सरेआम छीनना शुरू कर दिया. यहां तक कि इनमें से ज्यादातर पैसे ऐसी गतिविधियों में लगाए गए जिनका इन समुदायों की बेहतरी से कोई ताल्लुक ही नहीं था और तब भी खर्च की गई राशि बजट के मुकाबले बहुत कम थी. करतूतों के इस इतिहास में भी, पिछली हुकूमतों की करतूतें मोदी द्वारा पेश किए गए पिछले दो बजटों से शायद बेहतर दिखेंगी (2014-15 अंतरिम बजट था). जैसा कि तालिका 1 दिखाती है, 2015-16 के लिए राशि के कुल बंटवारे में एससीएसपी आवंटन का अनुपात सिर्फ 6.62 फीसदी था, जो 2007-08 के बाद सबसे कम था. इसी तरह टीएसपी का अनुपात 4.29 फीसदी है जो 2011-12 से सबसे कम है. ये अनुपात आबादी के हिसाब से क्रमशः 16.62 और 8.6 फीसदी होने चाहिए. हालांकि बजट के बाद होने वाले अहम राज्यों के चुनावों को देखते हुए मौजूदा बजट में इन अनुपातों में हल्का सा सुधार आया और ये 7.06 और 4.36 फीसदी हैं, लेकिन तब भी ये पहले के अनुपातों के मुकाबले कम ही हैं. यह दिखाता है कि मोदी ने दलितों और आदिवासियों के 13,370,127 करोड़ और 5,689,940 करोड़ रुपए का वाजिब हक मार लिया है. 


    सफाई कर्मचारी कुल दलित (एससी) आबादी के करीब 10 फीसदी हैं और दलितों में भी दलित हैं (देखिए  आंबेडकर के जश्न के मौके पर दलितों के आंसूहाशिया, 21 मई 2016). 1993 में एंप्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट नाम से एक अधिनियम पारित हुआ, और एक दूसरे और ज्यादा मजबूत अधिनियम प्रोहिबिशन ऑफ एंप्लॉयमेंट ऐज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देअर रिहेबिलिटेशन एक्ट 2013 ने उसकी जगह ली है. लेकिन इस बेबस जनता के लगातार संघर्षों के बावजूद कुछ नहीं हुआ है. एक तरफ तो हालात ये हैं, ऐसे में इन लोगों के प्रति मोदी के सरोकारों के सबूत पिछले दो बजटों में मिलते हैं जिनमें 'सफाई कर्मियों के छुटकारे और पुनर्वास के लिए स्वरोजगार योजना (सेल्फ-इंप्लॉयमेंट एंड रिहेबिलिटेशन स्कीम)'के लिए आवंटनों में गिरावट आई है (जैसा कि तालिका 2 बताती है) जो 577 करोड़ रु. से गिर कर 439.04 करोड़ और 470.19 करोड़ रह गया है. इसमें और भी कटौती करते हुए 10 करोड़ की एक रस्मी रकम रख दी गई है. '"अस्वच्छ"पेशों में लगे लोगों के बच्चों के लिए मैट्रिक-पूर्व स्कॉलरशिप (प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप फॉर चिल्ड्रेन ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स)'में तस्वीर तो और भी बुरी है: जहां बजट आवंटन पहले के 9.5 करोड़ रु. से थोड़ा सा बढ़ कर 10 करोड़ रु. हुआ था, यह पिछले बजट में घट कर 2 करोड़ रु. रह गया है.
     

    जाति अत्याचारों में तेजी 

    जहां भाजपा दलित वोटों पर बेतहाशा निर्भर है, वहीं पिछले चुनावों में जीत ने इसे लोक सभा में पहली बार साफ बहुमत दिलाया जिसके साथ मोदी की अहंकार भरी शैली ने मिल कर पूरे संघ परिवार को मजबूत किया है. इसके आक्रामक हिंदुत्व की लफ्फाजियों ने देहाती इलाकों में सामंती ताकतों और लंपट तत्वों को इसका हौसला दिया है कि वे दलितों में मुक्ति की उम्मीदों से जुड़ी दावेदारी के रुझान को दबाएं. इस बदलाव ने गांवों में जाति के अंतर्विरोधों को और बदतर बनाया है जो अकसर ही खौफनाक अत्याचारों की शक्ल में सामने आते हैं. हालांकि आर्थिक सुधारों के लागू किए जाने के बाद से ही अत्याचारों के मामलों में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन मोदी की हुकूमत में इन अत्याचारों में बढ़त ने गैरमामूली शक्ल ले ली है. राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो के पास सिर्फ 2014 के अत्याचारों के आंकड़े हैं, लेकिन वे भी इस बदलाव की प्रकृति को जाहिर करने के लिए काफी हैं. तालिका 3 दलितों पर होने वाले अत्याचारों की झलक देती है, जो यह दिखाती है कि उस साल (2014), उसके पिछले साल (2013) के मुकाबले, जब दलितों के खिलाफ अत्याचार पहले से ही अपने चरम पर थे, 19 फीसदी से भी ज्यादा की खतरनाक वृद्धि हुई.
     

    ये पुलिस के आंकड़े हैं, जिसके पीछे यह तथ्य काम करता है कि पुलिस राजनीतिक ढांचों से कितनी स्वतंत्र है. भाजपा जिस खुलेआम तरीके से अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल कर रही है, उसमें इन आंकड़ों पर पड़ने वाले दबावों को समझने की जरूरत है.
     

    कुल मिला कर देखें तो मोदी के दो साल दलितों के लिए फौरी तौर पर भारी नुकसानदेह रहे हैं और लंबे दौर में ये दलितों को पूरी तरह तबाह कर देने वाले हैं. बेहतर होता कि दलितों को इसका अहसास हो पाता कि हिंदू राज बनाने का संघ परिवार का सपना, जो हिटलर के एक राष्ट्र, एक साम्राज्य, एक नेता और मनु के ब्राह्मणवाद का एक अजीबोगरीब घालमेल है, आंबेडकर के सपने का ठीक उलटा है.

    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    Condemn the casteist patriarchal attack on Rohith's mother Radhika Vemula
    Re-sharing the statement from the Solidarity Forum for Rohith's mother Radhika Vemula-
    Mothers have more than equal rights over children!
    We are shocked by the casteist patriarchal submission made by the police in the High Court of Hyderabad that Rohith is not a Dalit. We believe this is part of the concerted effort being made by the powers-that-be to diffuse the nation-wide mass protests against Dalit research scholar Rohith Vemula's death and caste discrimination in higher educational institutions. They are keen to demonstrate that Rohith did not face caste discrimination by claiming that his mother Radhika is not a Dalit and Rohith belongs to his father's caste Vaddera. These attempts, including the procedurally flawed counter affidavit filed by the police, are blatantly violative of the law of the land and are therefore illegal and unconstitutional. The law laid down by the Supreme Court is very clear on this issue. If a child of an intercaste marriages continues to suffer the indignities and deprivations of his mother's caste, then s/he will be considered an SC. Rohith therefore was/is an SC.
    This malicious and unethical anti-women campaign draws its strength from the Brahminical, patriarchal norms wherein the child belongs only to the father, and the mother is regarded as a mere instrument to bring the children into the world. This is in stark contrast with reality where mothers spend their entire life nurturing and shaping their children, often sacrificing their own interests. In fact women in our society are socialized into the roles of mothers (wives) from very early on and go on to idealize the role of the mother. In ascribing his father's caste to Rohith, the statement filed by the police is seeking to discredit the life-long struggle of not only Radhika but many such mothers in our society. It is also re-legitimizing an irresponsible and callous father who deserted his infant children and wife, leaving the destitute mother to take care of and raise the children.
    Radhika has described in detail her life long struggle as a single mother, as an abandoned wife in an inter-caste marriage and her lived experience as a Dalit woman. She was ill treated in her marriage by her in-laws and suffered domestic violence as a wife. But without losing resolve she brought up her children as a single mother. Rohith's and his brother's lives were shaped by her love, labour and dedication. In a single stroke, this statement wants to delegitimize her many years of struggle as a single parent (and struggles of scores of other women) and reinstate the rule of patriarchal caste hierarchy by making the cruel and unjust claim that a child belongs to the father's caste even after he has abandoned the family.In fact, Rohith's absent father was brought into the story after his death to claim that his deceased son, who he has not met in two decades, was a Vaddera. The local Vaddera association also gave a statement that Rohith was not a Dalit. The Home Minister made a statement on the floor of the Telangana state Assembly that he was not a Dalit.This is in total contrast to what Radhika had to say. She has clearly stated that as a deserted woman she and her sons lived among the SC community and she brought up her children in their midst.
    Rohith has written about the caste discrimination that his mother and he suffered. Throughout his all too short educational life, Rohith held a certificate issued by the Collector of his district, stating that he was S.C. His lived experience, his social identity and his membership of Ambedkar Students' Association clearly demonstrate his identity as a Dalit. Even in his death he chose to identify as a Dalit. By slotting Radhika and Rohith into the category of the wife and son of an upper caste man, this entire social experience of Rohith's family is being erased. It is as if their lived experience, that Radhika narrated even in her statement to the police, does not matter.Even in terms of procedure, the SC caste certificate of Rohith remains valid. Cancellation of a caste certificate requries an elaborate enquiry by the Scrutiny Committee which will submit its findings to the District Collector. This comes within the purview of the revenue department. The District Collector is the sole authority who is vested with the power of cancellation or otherwise of the caste certificate. Such an enquiry is yet to be held. Until it is held and the Collector takes a decision in this regard, Rohith will continue to be considered an SC. The police are well aware of the necessity of such an enquiry and yet stated that Rohith does not belong to SC.
    The ongoing attempt to establish Rohith's identity through the patriarchal principle of father's bloodline amounts to nothing but humiliation, harassment and mental torture of his mother who has been subjected to caste discrimination throughout her life and has tragically lost her son. Radhika's life exemplifies the lives of lakhs of single mothers who survive the caste patriarchal order that smothers them and deprives them of the dignity guaranteed to them by our Constitution. The statement by the police to the High Court is steeped in the values of Manu Smriti and reinforces the denial of equality and human rights.
    We strongly oppose this statement and demand that it should be withdrawn."Solidarity Forum for Rohith's mother Radhika

    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    0 0

    At last Public Convention to annihilate caste!

    "No revolution without annihilation of caste, no annihilation of caste without resolution": Professor Partha Sarathi Roy of IISER-Kolkata.


    Dontha Prasanth quoted Baba saheb Ambedkar to warn that the agenda of Hindu Nation is the ultimate danger we have to resist UNITED as ROCK SOLID.

    The resistance should be replicated in other educational institutions, say academicians!


    Palash Biswas

    A Public Convention on Babsaheb`s Mission forgone,ANIIHILATION of Catse happened in Kolkata,the prime center of Manusmriti Hegemony in India.It happened becuase of involvement os students and youth in Ambedkirte movement after the institutional mureder of Dalit Scholar Rohit Vemula in Central University whereafter RSS and its government engaged everything that Rohith was not Dalit at all.

    Thus,the mother of Rohit Vemula,Radhika Vemeula and Rohith`s brother Raja Vemula could not be present in the convention as scheduled and media persons gathered were quite disappointed despite  overwhelming message from the Mother fighting against patriarchy as well as Manusmriti was presented and it clarified that they had to be present in a court to justify their Dalit Identity.The mother and son have recently converted as Buddhist.

    "No revolution without annihilation of caste, no annihilation of caste without resolution": Professor Partha Sarathi Roy of IISER-Kolkata.

    According to those participating in the convention, after Hyderabad Central University and Jawaharlal Nehru University, Jadavpur University has not only shown solidarity but resistance to the "Hindutva forces".


    At the convention both Anand Teltumbde and Dontha Prasanth hailed the social reformation in West Bengal and said that the State has never been appreciative of caste system. A resolution was later adopted seeking justice for Rohith Vermula and measures that Dalit students do not face discrimination in institutes of higher learning.



    Professor Parth Sarthi Roy teaches maths and he mathematically exposed the phenomenon of caste discrimination in higher education centres in India.Roy and Kunal Duggal another faculty cited real instances of exclusion and execution of the SC ST OBC nad minority students and their persecution whereas Rohith`s friend concentrated on Ambedkarite ideology and Rohiths spectacular project,annihilation of caste!


    The resistance should be replicated in other educational institutions, say academicians!


    Bengali media as expected blacked out the incident as The Hindu and the Economic Times projected Jadavpur Student`s Movement which pinpoints the importance of the silent revolution created by the Generation next which is more Ambedkarite than those claim to be thanks to their Birth Tags and Reserveation Quota Tags.


    Radhika Vemula questioned the justification of this biological identity which makes irrelevant every other thing to invite eternal persecution!


    Nevertheless, Friends of Rohith Vemula, and a section of academicians demanding justice for him, hailed the opposition of Jadavpur University students to the "onslaughts" of the Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (AVBP).


    At a convention, held in the city on Sunday, by the West Bengal Chapter of Joint Action Committee for Social Justice, a forum demanding justice for the deceased Hyderabad Central University student, Anand Teltumbde, a Professor of Indian Institute of Technology, said that "the spirit of resistance put up by Jadavpur University was commendable".


    West Bengal Chapter of Joint Action Committee for Social Justice explained the  theme of the convention as follows:


    The institutional murder of Rohith Vemula has brought to the fore what has always been true in India—a systematic and structural oppression of Dalits and Adivasis by caste Hindus. While this has always been true in India—be it in the dispossessing of people of marginalised community for grabbing resources for industrialisation, or be it in more progressive spaces of education institutions—there is a particularly brazen nature in which these attacks have come down more recently under the current BJP government, the political front of the Fascist Hindutva brigade. It is extremely important that we keep caste at the centre of our struggle for any emancipatory endeavour in the Indian context.


    Keeping this in mind, Joint Action Committee for Social Justice (West Bengal) is organising an open convention on June 5, Sunday at Bharat Sabha Hall at 4:00 pm. The speakers would include Radhika Vemula, Raja Vemulla, Dontha Prashanth, Tathagata Sengupta, Anand Teltumbe, Dalit transgender activists and others. We will hear about individual experiences of many people who have experienced oppression and has also fought back. It is crucial for us to learn from their individual experiences and struggle as we try to get more theoretical clarity on the questions of caste, patriarchy, class and their intersection, as well as understand what it takes to fight back.


    রোহিথ ভেমুলার প্রাতিষ্ঠানিক হত্যা ভারতবর্ষের একটি প্রাচীন ও নির্মম বৈষম্যমূলক প্রথার নগ্ন রূপটি আবার যেন আমাদের ঘা দিয়ে এক সমমিলিত লজ্জার চিনহ হয়ে রইল। এটি আমাদের ব্রাহ্মণ্যবাদী সামাজিক কাঠামোর এক নিয়মিত শোষনব্যাবস্থা। এরই ফল হিসেবে এ দেশে ঘটে চলেছে দলিত, আদিবাসী ও নিম্নবর্গীয়দের ক্রমান্বয়ে প্রান্তিকীকরণ ও আর্থ-সামাজিক শোষণ। পুঁজিবাদী আগ্রাসী নীতি কেড়ে নিচ্ছে তাদের জল, জমি, জংগলের অধিকার, তাদের শিক্ষা ও উপার্জনের সুযোগ।


    এই পরিপ্রেক্ষিতে আমরা জয়েন্ট একশন কমিটি ফর সোশাল জাস্টিস (পশ্চিমবংগ) আগামী ৫জুন ২০১৬, বিকেল 8টায় কলকাতার ভারতসভা হলে একটি জাতিভেদ - বিরোধী গ্ণ কনভেনশনের আয়োজন করছি। বক্তা তালিকায় রয়েছে রাধিকা ভেমুলা, রাজা ভেমুলা,দন্থাপ্রশান্ত,কুণালদুগগাল, আনন্দ তেলতুম্বে,তথাগত সেনগুপ্ত এবংদলিত তৃতীয় লিংগের ব্যক্তিরা সহ আরও অনেকে। এঁদের থেকে আমরা তাদের ব্যক্তিগত জীবন, বঞ্চনা, জাতি,বর্ণ,শ্রেণী বৈষম্য বিষয়ে চিন্তাভাবনা ও তার বিরুদ্ধে লড়াই-এর অভিজ্ঞতা-র কথা শুনব। আশা করি এভাবেই তোইরি হবে আমাদের পারষ্পরিক আদানপ্রদানের পরিসর ও বৈষম্য বিরোধী এক সামাজিক প্রয়াসের সূচনা।


    Right from the panel of the Caste Annihilation convention,underlining that the resistance put up by Jadavpur University students should be replicated in other educational institutions, Professor Teltumbde expressed hope that when colleges and universities reopen after summer vacation more such resistance will be visible. Rohith Vemula's friend and Hyderabad Central University student Dontha Prasanth also welcomed the "resistance" by JU students.


    "We welcome the resistance and this should continue in every academic institution," he said.


    Dontha Prasanth quoted Baba saheb Ambedkar to warn that the agenda of Hindu Nation is the ultimate danger we have to resist UNITED as ROCK SOLID.


    Dontha Prasanth said that the AVBP is trying to enter educational institutions in the country by appointing persons of their choice to key administrative posts and then inciting violence in the campuses.At least on two occasions in the past few months the students of Jadavpur University have been at loggerheads with supporters of ABVP. Only last month a Left-affiliated student organisation of the University and ABVP sparred over the screening of Vivek Agnihotri's film Buddha In a Traffic jam .

    The resolution read by Professor Partha Sarathi Roy of Indian Institute of Science Education and Research (IISER) Kolkata said, "No revolution without annihilation of caste, No annihilation of caste without resolution".

    Prof Anand Teltumbde addresses a gathering in the 'Public Convention for the Annihilation of Caste System' organised by the Joint Action Committee for Social Justice- West Bengal chapter.

    ‪#‎ArrestAppaRaoPodile‬

    ‪#‎JusticeforRohith‬

    Joint Action Committee for Social Justice -UoH's photo.

    Joint Action Committee for Social Justice -UoHLike Page

    18 hrs· Calcutta Bara Bazar·

    Prof Anand Teltumbde addresses a gathering in the 'Public Convention for the Annihilation of Caste System' organised by the Joint Action Committee for Social Justice- West Bengal chapter.

    ‪#‎ArrestAppaRaoPodile‬

    ‪#‎JusticeforRohith‬

    Dr. Tathagata Sengupta addresses the gathering at the 'Public Convention for the Annihilation of Caste System' organised by the Joint Action Committee for Social Justice - West Bengal.

    ‪#‎ArrestAppaRaoPodile‬

    ‪#‎JusticeforRohith‬

    ‪#‎AnnihilateCasteClass‬

    Joint Action Committee for Social Justice -UoH's photo.

    Joint Action Committee for Social Justice -UoHLike Page

    18 hrs· Calcutta Bara Bazar·

    Dr. Tathagata Sengupta addresses the gathering at the 'Public Convention for the Annihilation of Caste System' organised by the Joint Action Committee for Social Justice - West Bengal.

    ‪#‎ArrestAppaRaoPodile‬

    ‪#‎JusticeforRohith‬

    ‪#‎AnnihilateCasteClass‬

    Koonal Duggal, a guest faculty at the University if Hyderabad, and a PhD scholar who was recently served a notice by the EFLU administration barring his entry into the campus for indulging in 'anti-university' activity, addresses the gathering at the 'Public Convention for the Annihilation of Caste System' organised by the Joint Action Committee for Social Justice - West Bengal chapter.

    ‪#‎arrestapparaopodile‬

    ‪#‎justiceforrohith‬

    ‪#‎annihilatecasteclass‬

    Joint Action Committee for Social Justice -UoH's photo.

    Joint Action Committee for Social Justice -UoH's photo.

    Joint Action Committee for Social Justice -UoH added 2 new photos.Like Page

    17 hrs· Calcutta Bara Bazar·



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!


    दुनिया बदलने की जिद न हो तो नहीं बदलेगी दुनिया!

    जाति उन्मूलन के लिए भी कोई मुहम्मद अली चाहिए जो राष्ट्र, राष्ट्रवाद, धर्म, सत्ता, कैरियर, साम्राज्यवाद,युद्ध और रंगभेद के खिलाफ मैदान दिखा दें!

    भद्रलोक कोलकाता के दिल में सामाजिक क्रांति की दस्तक, बाबासाहेब के मिशन को लेकर छात्रों युवाओं ने रचा जाति उन्मूलन पब्लिक कांवेंशन!

    पलाश विश्वास

    इस महादेश में जनमने वाले हर मनुष्य स्त्री या पुरुष या ट्रांस जेेंडर की जैविकी संरचना बाकी पृथ्वी और बाकी ब्रह्मांड के सत्य,विज्ञान और धर्म के विपरीत है क्योंकि हमारी कुल इद्रियां पांच नहीं छह हैं और सिक्स्थ सेंस हमारा जाति है और बाकी सबकुछ नानसेंस हैं।


    पांच जैविकी इंद्रियां भले काम न करें,लेकिन जन्मजात जो सिक्स्थ सेंस का मजबूत शिकंजा हमारे वजूद का हिस्सा होता है,धर्म भाषा क्षेत्र देश काल निरपेक्ष,वह अदृश्य इंद्रिय पितृसत्ता  में गूंथी हुई हमारी जाति है।


    जाति सिर्फ मनुस्मृति नहीं है।

    जाति पितृसत्ता है और वंशवर्चस्व रंगभेद भी है तो निर्मम निरंकुश उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था भी है जिससे हमारा इतिहास भूगोल देश परदेश भूत भविष्य वर्तमान विज्ञान तकनीक सभ्यता संस्कृति कुछ भी मुक्त नहीं है और मुक्तबाजार के फर्जी हिंदुत्व एजंडा के तहत विकास हुआ हो या न हुआ हो,जाति सबसे ज्यादा मजबूत हुई है।


    यही जाति फासिज्म की राजनीति है और फासिज्म का राजकाज मुक्तबाजार है


    हमारे लिए शाश्वत सत्य जाति है।


    हम जो भी कुछ हासिल करते हैं,वह हमारी जाति की वजह से है तो हम जो भी कुछ खो रहे होते हैं,उसकी वजह भी जाति है।


    जाति हमारा धर्म है।

    जाति हमारा कर्म है।

    जाति हमारा ईश्वर है।


    जाति राजनीति है।

    जाति सत्ता है।

    जाति क्रयशक्ति है।

    जाति मान सम्मान है।

    जाति जान है ।

    जाति माल है।


    हमारा कर्मफल हजार जन्मों से हमारा पीछा नहीं छोड़ता,यही हमारा हिंदुत्व है और हिंदुत्व ही क्यों, इस महादेश के हर देश में हर मजहब में इंसानियत का वजूद कुल मिलाकर यही जाति है।कर्मफल है।जाने अनजाने हम हजार जन्मों के पापों का प्रायश्चित्त अपनी अपनी जाति में बंधकर करते रहने को संस्कारबद्ध हैं और परलोक सिधारने से पहले इहलोक का वास्तव समझ ही नहीं सकते।


    पीढ़ियों पहले हुए धर्मान्तरण के बावजूद अगवाड़े पिछवाड़े लगे जाति के ठप्पे से हमारी मुक्ति नहीं है।


    मेधा और अवसर गैरप्रासंगिक हैं,जाति सबसे ज्यादा प्रासंगिक है और वही लोक परलोक का आधार है और बाकी आधार निराधार है।


    हम रिटायर होने के बाद हैसियत से शून्य है और एकदम अकेले मृत्यु की प्रतीक्षा के सिवाय इस समाज की दृष्टि से हमारी कोई दूसरी भूमिका नहीं है क्योंकि हमारे वजूद से नत्थी है हमारी जाति और नौकरी मिली तो हैसियत मिली,नौकरी गयी तो हैसियत गयी और हम फिर वही नंगे आदमजाद और हमारी पहचान जाति।


    सत्ता वर्ग के हुए तो अखंड स्वर्गवास वरना कुंभीपाक नर्कयंत्रणा उपलब्धि।अस्पृश्य दुनिया के मलाई दारों की औकात यही।


    जाति हमारी जैविकी संरचना बन गयी है।


    जाति राष्ट्र है तो जाति राष्ट्रवाद भी।

    जाति देशभक्ति है तो जाति संप्रभुता।


    नागरिक और मानवाधिकार,कानून का राज, संविधान, आजीविका,वजूद,प्रकृति और पर्यावरण,प्राकृतिक संसाधन, संस्कृति,भाषा,साहित्य,माध्यम विधा जीवन के हर क्षेत्र में असमता और अन्याय का आधार है वहीं जाति।


    फिरभी जाति कोई तोड़ना नहीं चाहता।


    जो स्वर्गवासी हैं,वे देव और देवियां न तोड़ें तो बात समझ में आती है,लेकिन रोजमर्रे की जिंदगी जिनकी इस जाति की वजह से कुंभीपाक नर्क है,वे भी जाति से चिपके हुए जीते हैं,मरते हैं।


    यही वजह है कि जाति इस महादेश में हर संस्था की जननी है।


    जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी से बड़ा मिथ्या कुछ नहीं है जैसे सत्यमेव जयते भी सफेद झूठ है।


    यथास्थिति बनाये रखने के अकाट्य सांस्कृतिक मुहावरे और मिथ दोनों।


    हमें से कोई राष्ट्रवादी हो ही नहीं सकता क्योंकि हम जन्मजात जातिवादी हैं।


    हममें से कोई सत्यवादी सत्यकाम हो ही नहीं सकता क्योंकि हम जनम से जातिवादी हैं।


    हममें से कोई बौद्ध हो ही नहीं सकता क्यंकि बुद्धमं शरणं गच्छामि कहने से कोई बौद्ध नहीं हो जाता।


    हमारा धर्म क्योंकि जाति है जो अभूतपूर्व हिंसा का मुक्त बाजार उतना ही है जितना हिंदुत्व का फर्जी ग्लोबल एजंडा और श्वेत पवित्र रक्तधारा का असत्य उससे बड़ा,क्योंकि विज्ञान और जीवविज्ञान एक नियमों के मुताबिक विशुद्धता सापेक्षिक है तो सत्य भी सापेक्षिक है और अणु परमाणु परिवर्तनशील है,यह विज्ञान का नियम है तो प्रकृति का नियम है।


    फिरभी हम प्राणहीन संवेदन हीन जड़ हैं और अमावस्या की काली अंधेरी रात हमारी पहचान है और कीड़े मकोड़े की तरह अंधकार के जीव हैं,इसका हमें अहसास भी नहीं है।


    दुनिया बदलने की जिद न हो तो नहीं बदलेगी दुनिया।


    फिरभी हम प्राणहीन संवेदन हीन जड़ हैं और अमावस्या की काली अंधेरी रात हमारी पहचान है और कीड़े मकोड़े की तरह अंधकार के जीव हैं,इसका हमें अहसास भी नहीं है।


    क्योंकि जाति के आर पार हम किसी सीमा को तोड़ नहीं सकते।

    क्योंकि जाति के आर पार हमारे कोई नागरिक मानवीय संवेदना हो ही नहीं सकते।


    क्योंकि जाति के आर पार हम किसी से दिल खोलकर कह ही नहीं सकते,आई लव यू,आमि तोमाके भालोबासि।


    हमारे सारे संस्कार और हमारे सारे मुल्यबोध,हमारा आचरण और हमारा चरित्र जाति के तिलिस्म में कैद है और उसीके महिमामंडन के अखंड कीर्तन में निष्णात हम निहायत बर्बर और असभ्य लोग हैं जो रोजमर्रे की जिदगी में अपने ही स्वजनों के वध के लिए पल प्रतिपल कुरुक्षेत्र रचते हैं और महाभारत धर्मग्रंथ है।


    हम धम्म के पथ पर चल नहीं सकते जाति की वजह से।

    हम कानून के राज के पक्ष में हो नहीं सकते जाति की वजह से।

    हम समता और न्याय की बात नहीं कर सकते ,जाति की वजह से।


    हमारे लिए संविधान आईन कानून लोकतंत्र ज्ञान विज्ञान इतिहास भूगोल अर्थशास्त्र दर्शन और नैतिकता कुल मिलाकर जाति है।


    हम जनादेश में अपनी ही जाति का वर्चस्व तय करते हैं। हम जीते तो महाभारत और हम हारे भी तो महाभारत और देश कुरुक्षेत्र।


    बाबासाहेब अंबेडकर के जाति तोड़ो मिशन का समर्थन वर्चस्ववादी ब्राह्मणवादी नहीं कर सकते तो इससे भी बड़ा सच यह है कि जो लोग इस जाति व्यवस्था की वीभत्सता के,इसकी निर्मम पितृसत्ता के सबसे ज्यादा शिकार स्त्री पुरुष हैं,बिना कुछ करे जाति के आधार पर उनकी श्रेष्ठता और उनकी हीनता की अभिव्यक्ति ही उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है मनुष्यता के विरुद्ध तो बाबासाहेब के अनुयायी ही उनके इस मिशन के खिलाफ है।


    अंबेडकरी दलित शोध छात्र रोहित वेमुला इसी जाति उन्मूलन की परिकल्पना की बात करते रहे हैं और उनका मानना था व्यक्ति और समूह के तौर पर हर स्तर पर हर पक्ष की ओर से जाति तोड़ने की पहल नहो तो एकतरफा कोई विधि नहीं है जिससे जाति टूटे।


    इस महादेश में वैज्ञानिक ब्राह्मणवादी वर्चस्व की अखंड प्रयोगशाला बंगाल की भद्रलोक राजधानी में शिक्षा और संस्कृति के केंद्र स्थल में रविवार को पर्यावरण दिवस पर जाति उन्मूलन पर गण सम्मेलन का आयोजन उन्हीं रोहित वेमुला की याद में हुआ और सबसे खास बात है कि इसमें बारी संख्या में जाति धर्म भाषा के आर पार छात्र और युवाजनों ने भाग लिया।


    आदरणीय मित्र आंनद तेलतुंबड़े के मुताबिक जाति के इस, स्थाई बंदोबस्त के टूटने की उम्मीद इन्हीं नई पीढ़ी की निरंतर सक्रियताओं से बन रही है।


    रोहित वेमुला के मित्र अंकगणित के प्रोफेसर तथागत सेनगुप्त ने सम्मलन में साफ साफ कहा कि जाति उन्मूलन के बिना कोई क्रांति नहीं हो सकती तो क्रांति के बिना जाति उन्मूलन भी असंभव है।


    इसी मौके पर  बाबासाहेब की विचारधारा और भारतीय संविधान से सिलसिलेवार उद्धरण देते हुए रोहित के मित्र प्रशांत ने इस सम्मेलन के जरिये चेतावनी जारी कि हिंदू राष्ट्र सबसे बड़ा खतरा है और हम कीमत पर इसका मुकाबला करना होगा और अंबेडकर  की बात करने वाले रोहित वेमुला की तरह मार दिये जायेंगे।


    इसी मौके पर  बाबासाहेब की विचारधारा और भारतीय संविधान से सिलसिलेवार उद्धरण देते हुए रोहित के मित्र प्रशांत ने इस सम्मेलन के जरिये चेतावनी जारी कि  मनुस्मृति अनुशासन के लिए शिक्षा दीक्षा का हिंदूकरण किया जा रहा है तो इसका प्रतिरोध भी छात्रों और युवाओं को करना होगा।


    जाहिर है कि पेड़ कहीं गिरता है तो गूंज हिमालय के जख्मी दिल के हर कोने में दर्ज हो जाती है।


    हर बदलाव के लिए एक बेहद मामूली पहल की हिम्मत जरुरी होती है।


    कोलकाता में ठहरे हुए तालाब के पानी में पत्थर पहलीबार पड़ा है तो इसके असरात के बारे में अभी कोई अंदाजा भी नहीं है।


    बहरहाल जाति व्यवस्था के शिकंजे में भयंकर पाखंडी प्रगति के तिलिस्म में फंसे बंगाल में आखिरकार बिना अंबेडकरी आंदोलन या बिना प्रगतिशील भूमिका के होक कलरव की पृष्ठभूमि में रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के खिलाफ केसरिया सुनामी से बार बार लहूलुहान छात्र युवा समाज की पहल से डंके की चोट पर जाति उन्मूलन के मिशन का ऐतिहासिक प्रस्ताव पब्लिक कांवेंशन में पास हो गया।फाइन प्रिंट मिल जाने पर उसे हम साझा भी करेंगे।


    इस मौके पर घोषणा के मुताबिक रोहित की मां राधिका वेमुला और उनके भाई राजा वेमुला अदालत में पेशी हो जाने की वजह से पहुंचे नहीं तो पता नहीं था कि कोलकाता के अखबारों में क्या खबर कैसे छपेगी क्योंकि मौके पर पहुंचे फोटोकार लगातार तस्वीरें खिंचते रहे लेकिन संपादकों की नजर में बिना राधिका वेमुला और राजा वेमुला की मौजूदगी के जाति उन्मूलन के बाबासाहेब के मिशन लागू करने के लिए जातियों और अस्मिताओं के आर पार देश जोड़ने की इस मुहिम खबर है या नहीं,कल तक मीडिया में रहे हमारे लिए भी कहना मुश्किल था।


    कोलकाता के बांग्ला मीडिया,हिंदी मीडिया ने इस घटना को सिरे से नजर्ंदाज किया तो अंग्रेजी अखबारों ने जाति उन्मूलन पर गण सम्मेलन के बजाय रोहित के मित्रों का यादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों को समर्थन की खबर छापी।यह है सूचना विस्फोट का रंगभेद।


    राधिका वेमुला ने इस मौके पर मृत पुत्र की जाति जैविकी पिता के आधार पर तय करने की मुहिम के जरिये उसकी संस्थागत हत्या के सत्ता पहरुए अपराधियों को बचाने की मुहिम का पत दर परत खुलासा करते हुए इस जाति उन्मूलन के सम्मेलन के लिए भेजे अपने संदेश में स्त्री और दलित दोनों वजूद पर होते पितृसत्ता और मनुस्मृति के सिलसिलेवार हमलों और उत्पीड़ना का जो ब्यौरा लिखकर भेजा है,यह भी तय नहीं था कि कारपोरेट मीडिया में सत्ता और मुक्तबाजार को बेनकाब करने वाले उस संदेश की भी कोई खबर होगी या नहीं।मैंने आज सुबह ऐसी कोई खबर नहीं देखी।


    नई दिल्ली के केंद्रीय शिक्षा मंत्रायल से अंबेडकरी छात्रों के सामाजिक बहिस्कार के फतवे के तहत जारी जो पांच पत्र हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति को लिखे गये,जिसके अंजाम के बतौर रोहित वेमुला को खुदकशी अपने जन्म परिचय के अपराध में,जनमजात दलित होने की वजह से करनी पड़ी,उसी सामाजिक बहिस्कार के शिकार अनशन और आंदोलन में उनके साथी प्रशांत ने जाति उन्मूलन के बाबासाहेब के एजंडा और उसे लागू करने के लिए बहुपक्षीय परिकल्पना पर रोहित के वैज्ञानिक शोध को सिलसिलेवार पेश किया।


    उसी विश्वविद्यालय के मैथ्स के प्रोफेसर डा. तथागत सेनगुप्त ने उच्चशिक्षा के पवित्र मंदिर में अनेपक्षित अस्पृश्य बहुजन छात्रों के साथ होने वाले वैज्ञानिक भेदभाव के पूरे फेनोमेनान का खुलासा किया और कोलकाता के अपने नये पुराने अनुभवों के उदाहरण से छात्रों युवाओं की आंखें खोल दी तो हैदराबाद फैकल्टी के ही शिक्षक कुणाल दुग्गल ने फैज अहमद फैज के तख्तोताज पलटने वाली वह नज्म गाकर सुनाया जिसे गाने के अपराध में उन्हें विश्वविद्यालयविरोधी कहा गया।


    प्रशांत ने बाकायदा बाबासाहेब के विचारों,संविधान सभा में उनकी दलीलों,संवैधानिक प्रावधानों के हवाले से देश भर के विश्वविद्यालयों के हिंदू राष्ट्र के एजंडे के तहत केसरियाकरण अभियान का खुलासा करते हुए अंध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के तहत जनपक्षधर तमाम नागरिकों को,खासतौर पर बहुजनों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को राष्ट्रद्रोही करार दिये जाने के संघी तर्कों का सिलसिलेवार खंडन किया और बाबासाहेब का ही उद्धरण देकर मुक्तबाजार के हिंदू राष्ट्र को मनुष्यता और सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए हर कीमत पर इसे रोकने का संकल्प दोहराया और इस संकल्प को दोहराने वाले बंगाल के छात्र युवा भी हैं।


    जाति व्यवस्था और हिंदुत्व,नागरिकता और अर्थव्यवस्था के साथ साथ सामाजिक यथार्थ का विश्लेषण करते हुए डा.आनंद तेलतुंबड़े ने कहा कि शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है और शिक्षा सरकार या समाज का उत्तरदायित्व नहीं है,क्रयशक्ति के आधार पर शिक्षा सेल्फ फाइंनेस में बदलने का यह हिंदुत्व उपक्रम है जिससे सत्तावर्ग के सिवाय किसी के लिए भी मनुस्मृति बंदोबस्त के तहत शिक्षा निषिद्ध होगी और इसे छात्र युवा समझ रहे होगे तो यह आंदोलन किसी एक विश्वविद्यालय एक संस्थान में सीमाबद्ध नहीं रहेगा।लेकिन हर हाल में आंदोलन का प्रसथ्नबिंदू जाति उन्मूलन का एजंडा होना चाहिए क्योंकि जाति हमारी एकता में सबसे बड़ा अवरोध है,जाति के रहते न  हम एक हो सकते हैं और न किसी भी तरह का परिवर्तन संभव है।


    कोलकाता में जाति उन्मलन का यह गण सम्मेलन कोई खबर नहीं है क्योंकि प्रगतिशील बंगाल में पार्टीबद्धता के दायरे से बाहर दलितों पिछड़ों,आदिवासियों,शारणार्थियों और स्त्रियों की खबर सिर्फ आपराधिक मामले में ही बनने की रीत रही है और वर्ण वर्चस्व के रंगभेदी तिलिस्म में किसी हलचल की खबर संघ परिवार के गुप्त एजंडे के मुताबिक कायदे कानून के तहत आरक्षण कोटा में प्रतिनिधित्व दिखाने के लिए जरुरी आंकड़ों के आगे किसी को किसी भी तरह का कोई मौका सत्तावर्ग के हितों के खिलाफ न देने की रघुकुल रीति चली आ रही है।


    बंगाल में बहुजनों के आंदोलन का नेतृत्व भी सत्तावर्ग के पास है और वोटबैंक सत्ता से नत्थी हो जाने के बावजूद जनसंख्या के लोकतंत्र में एक अदद संख्या के अलावा किसी की कोई नागरिक और मानवीय पहचान नहीं है।


    बंगाल में जाति व्यवस्था मिस्टर इंडिया की तरह अदृश्य और सर्वव्यापी है और बिना जाति पूछे रंगभेदी जातिवाद का वर्चस्व इतना प्रबल है कि बंगाल के कामरेड तक सत्ता उपहार की थाली में दक्षिणपंथी ब्राह्मणवाद के हवाले कर देना बेहतर मानते हैं बजाय इसके कि पार्टी के नेतृत्व में जाति वर्ग वर्चस्व खत्म करके सभी समुदायों को बराबर प्रतिनिधित्व दिया जाये।

     

    इस लिहाज से कोलकाता में रविवार को जो हुआ वह निःशब्द रक्तहीन विप्लव का एक दृश्यमात्र है जिसे देशभर के दृश्यों को जोड़कर हम नई फिजां रच सकते हैं।



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

older | 1 | .... | 272 | 273 | (Page 274) | 275 | 276 | .... | 303 | newer