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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    स्त्रियां कभी नहीं हारतीं।हालात बदलने हैं तो पुरुषतंत्र के तमाम किलों और मठों पर गोलाबारी सबसे जरुरी है।


    पलाश विश्वास

    आज का रोजनामचा आनंतमूर्ति जी की स्मृति में।

    आज का रोजनामचा इरोम शर्मिला के जीवट को सलाम।


    आज का रोजनामचा रंगकर्मी शंभू मित्र और तृप्ति मित्र को याद करते हुए।इस 22 अगस्त को शंभू मित्र सौ के हो गये।


    तृप्ति के बिना शंभू अधूरे हैं,इसलिए शंभू के साथ तृप्ति को भी शतवार्षिक प्रणाम।


    इन्हीं शंभू मित्र को बांग्ला भद्रसमाज ने रंगकर्म के लिए मंच से बेदखल किया था कभी।लेकिन आज चर्चा का यह विषय नहीं है।सिर्फ इतना कि तृप्ति के सान्निध्य से जैसे शंभू का कृतित्व व्यक्तित्व है वैसे ही बुनियादी तौर पर हर मनुष्य लेकिन अर्ध नारीश्वर है और यह लोक मान्यता भी है।जिसे हम सिरे से भूल रहे हैं।


    अनंत मूर्ति जी की भी शायद ज्यादा चर्चा न कर सकूं,जैसे मैं शमशेर बहादुर सिंह की चर्चा नहीं कर सकता।महाश्वेतादी और नवारुणदा उन्हें बहुत सम्मान देते थे,इतनी सी निजी स्मृति है।


    इरोम शर्मिला की फिर गिरफ्तारी से जाहिर है कि इस मुक्तबाजारी मृत्यु उपत्यका में न्याय प्रणाली,कानून के राज और लोकतंत्र की दशा दिशा क्या है।


    अभी हमारे युवा पत्रकार साथी मोदी विकास कामसूत्र में इस कदर निष्णात हैं कि वे सोवियतसंघ,चीन से लेकर क्यूबा के साम्यवादी शासन को बड़े जोर शोर से सैन्य शासन बताने से अघा नहीं रहे हैं।बंगाल में वाम कैडरतंत्र के वाम राजकाज की तस्वीरें भी कुछ इसी तरह की बनीं।


    ऐसे आधुनिक पत्रकार,अर्थशास्त्री,विद्वतजन आदिवासियों का सफाया विकास के लिए जितना जरुरी मानते हैं उतना ही जरुरी मानते हैं राष्ट्रका सैन्यीकरण,लोकतंत्र का अवसान और अंततः सैन्यशासन।उन्हें न नाजियों से परहेज है और न फासीवाद का डर।


    वे हर हाल में हिंदू राष्ट्र चाहते हैं इस डिजिटल देश में नागरिक और मानवोधिकारों को तिलांजलि देकर क्योंकि वे प्रकृति और पर्यावरण की नीलामी के पक्षधर हैं और जनपक्षधर हर आवाज उनके नजरिये से राष्ट्रद्रोह है।


    उनके लिए सोनी सोरी और इरोम शर्मिला का दमन बेहद जरुरी है।न्यायपालिका पर अंकुश भी उतना ही जरुरी है।


    कारपोरेट लाबिइंग का राजकाज और वैश्विक इशारे उनके लिए सर्वोत्कृष्ट दिशानिर्देश हैं और वे सिरे से स्त्री विरोधी हैं।


    मैंने कल देर रात एक नया प्रयोग किया बांग्ला ब्लाग पर।प्रेजेंटेशन और न्यूज स्ट्रीम का मिलाजुला प्रयोग।शारदा फर्जीवाड़े के संदर्भ में।

    http://shudhubangla.blogspot.in/2014/08/blog-post_339.html


    रोज नयी गिरफ्तारियां।सारे उज्जवल चेहरों का नक्षत्र समावेश फर्जीवाड़े में।खेलकूद से लेकर मीडिया और दुर्गापूजा तक में चिटफंड।


    पक्ष विपक्ष के नेता,मंत्री,सांसद सारे के सारे चिटफंड के मुलाजिम और इस पर पीपीपी फंडा गुजराती।अपडेट करते करते थक गये।पूरी तस्वीर एक मुश्त पेश करने का यह तरीका सूझा।


    सुबह अभिषेक को फोन लगाया कि तकनीकी तौर पर यह आयोजन कैसे संभव है,उस पर विचार करने क्योंकि बांग्लादेश में पत्रकारिता,साहित्य,संस्कृति और राजनीति में भी जो लोक जनपदीय गूंज भारत में किसी भी क्षेत्र में नहीं,किसी भी भाषा में नहीं है।


    मुक्तबाजार में लोक और जनपदों का साझा चूल्हा तहस नहस है और माइक्रोओवन चिमनियों का प्रदूषण सर्वत्र।घर,समाज और पूरा देश अब शापिंग माल है जहां क्रयशक्ति के अलावा कोई अस्मिता नहीं,अस्तित्व नहीं।


    भरत में स्त्रियों ने अपने भोगे हुए यथार्थ के मुताबिक इस अंतिम सत्य को सबसे पहले,सबसे बेहतर समझा है और इस मुक्त बाजार में वजूद की लड़ाई में स्त्रियां मर्दों से हजारों हजार मील आगे हैं।अपनी संतानों के ताजा स्टेटस के फर्क पर गौर करें तो यह सच बेनकाब होगा।


    स्त्री की सत्यनिष्ठा में कोई मिलावट होती नहीं है,और न कोई पाखंड होता है।


    स्त्री की दासता के बिना इसीलिए अर्थतंत्र और सामाजिक वर्चस्व कायम होना मुश्किल है और इसीलिए स्त्री देह सबसे बड़ी राजनीति है और सर्वोत्तम वाणिज्य भी वहीं।


    चित्रांगदा को जीते बिना अर्जुन अर्जुन नहीं है तो श्री रामचंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम हो न हो,मर्यादा का उत्कर्ष लेकिन माता सीता सबसे जो उत्पीड़िता हैं।


    हमारे साझा परिवार में फैसले तमाम हमारी ताई लेती रही हैं।ताई जी के फैसले के ऊपर मेरे ताउ,पिता और चाचा समेत किसी को कुछ कहने सुनने की नौबत कभी नहीं आयी।


    बसंतीपुर की बुजुर्ग औरतें मसलन मेरी दादी,मेरी नानी,टेक्का की ठाकुमा,अन्ना बूढ़ी वगैरह वगैरह गजब की लड़ाकू औरतें रही हैं।


    बसंतीपुर समेत बंगाल शरणार्थी इलाकों के स्त्री समाज से जो स्नेह मुझे मिला है,वहीं अपनापा मुझे संथाल, मुंडा, बुक्सा, थारु, नगा, त्रिपुरी,गोंड,भील आदिवासी गांव में निरंतर मिलता रहा है और मैं दरअसल खुद को आदिवासी ही मानता हूं इसीलिए।


    इसलिए भी कि आदिवासी समाज में स्त्री गुलाम नहीं है।


    स्त्री कथा का संघर्ष मैंने उत्तराखंड में खूब देखा है और उत्तराखंडी स्त्रियां, इजाएं,दीदियां और वैणियां मेरे लिए प्रेणा और ऊर्जा का अंनत स्रोत है।


    यही स्त्री जीवट झारखंड, ओड़ीशा, गुजरात,राजस्थान और समूचे मध्यभारत,दक्षिण भारत,पूर्वोत्तर और पूरे हिमालयी भूगोल में है।


    जिसका प्रतीक अकेली इरोम शर्मिला नहीं है।सोनी शोरी भी हैं।तो उत्तराखंडी और मणिपुरी महिलाएं भी हैं।


    झुग्गी झोपड़ियों,चायबागानों,चायबागानों,कोयला और दूसरे खानों,गंदी बस्तियों, दंडकारण्य,शरणार्थी शिविरों,सरकारी बेसरकारी कार्यालयों में कार्यरत तमाम स्त्रियां इसका समूह प्रतीक।


    आर्यावर्त का भूगोल इतिहास और धर्मशास्त्र सिरे से स्त्री विरोधी है।ऐसा महाराष्ट्र में भी नहीं है।हिंदी पट्टी इसलिए पिछड़ी है क्योंक स्त्री को उसका यथोचित सम्मान देना यहां जनसमाज को स्वीकार है नहीं।


    हिंदी पट्टी इसीलिए दहेज पट्टी है तो भ्रूण हत्या का भूगोल भी।

    आनरकीलिंग और बलात्कार की संस्कृति हिंदी पट्टी से ही बाकी देश को संक्रमित है।

    अब आप तय करें कि इस पर हम गर्व करें कि पश्चाताप।


    बंगाल में इतिहास और विरासत अनार्य है तो बौद्धमय भी।इसलिए बंगाल में स्त्रियां ज्यादा सशक्त हैं और बंगाली समाज पुरुषतांत्रिक होते हुए भी गहराई में मातृतांत्रिक भी है,देवियां बंगाल में देवों के मुकाबले ज्यादा पुज्यनीया हैं।


    लेकिन लोक के अवसान और जनपदों के नगर महानगर में सिमटने की वजह से बंगाल में भी स्त्री फिर वही मुक्त बाजार की उपभोक्ता सामग्री है और बलात्कार संस्कृति में बंगाल अब सबसे अव्वल है।


    सांढ़ संस्कृति और विकास कामसूत्र इसलिए सिरे से स्त्री विरोधी है।

    बाजार स्त्री देह का ही कारोबार है।


    मुक्त बाजार मुक्त कारोबार है।इसलिए मुक्त बाजार में स्त्री फिर वही शूद्र है।सीता है,गीता है या फिर द्रोपदी या कमसकम जोधाबाई या राधा या मीरा और बहुत हुआ तो झांसी की रानी।


    लेकिन रानी दुर्गावती के लिए वहां कोई जगह है ही नहीं।


    ईमानदारी से सोचें तो इंदिरा गांधी,सोनिया गांधी,मायावती,जयललिता,सुषमा स्वराज,स्मृति ईरानी,सुभाषिणी अली,जयललिता,गौरी अम्मा,मेधा पाटकर,ममता बनर्जी,इंदिरा ह्रदयेश,तारकेश्वरी सिंन्हा,मीरा कुमार जैसी स्त्रियों की राजनीतिक आलोचना राजनीतिक कम है,पुरुषवादी कहीं ज्यादा है।


    हम उनकी उपलब्धियों को सिरे से नकार कर उनकी आलोचना के अभ्यस्त हैं और उनका कृतित्व को पुरुषतांत्रिक सत्ता की आंख की किरकिरी मानने को ही अभ्यस्त हैं हम जाने अनजाने।


    केसरिया कारपोरेट हिंदू ह्रदयसम्राट प्रधान राष्ट्रीय स्वयंसेवक की शौचालय पीपीपी क्रांति का लालकिले की प्राचीर से उदात्त उद्घोष के बाद सेनेटरी नैपकिन  और गोरा बनाने के कारोबार,फैशन स्टेटमेंट,ब्रांडिंग की पूरी मार्केटिंग विधा के साथ भारतीय मीडिया यह साबित करने में एढ़ी चोटी का जोर लगा रहा है कि बिना शौचालय स्त्रियां कैसे हारती रही हैं।


    बिना प्रसाधन, बिना बाजार,बिना स्पांसर,बिना सहवास,बिना कामसूत्र,बिना प्लेब्वाय, बिना थ्री फोर फइव जी के हम समाज में स्त्री की भूमिका और अर्थतंत्र में उसके अनिवार्य योगदान का मूल्यांकन करने के लिए तैयार ही नहीं।


    थ्री डी स्त्री देह के अलावा हमारे पुरुष वर्चस्व के लिए स्त्री का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

    शरतचंद्र कोई वेज्ञानिक दृष्टि के कथाकर नहीं हैं और न वे समाजवास्तव को अभिव्यक्त करने में सिद्धहस्त रहे हैं।लेकिन उनका जैसा स्त्री पक्ष का कथाकार पूरी दुनिया में खोजना मुश्किल है।


    आज सुबह समकालीन तीसरी दुनिया का ताजा अंक पढ़ गया।करीब दस साल बाद दुनिया में जो कहानी पढ़ी,वह स्त्री अस्मिता की कथा है।जो स्त्री हारती नहीं है और अक्लांत योद्धा है जो स्त्री,उसकी यह कथा,जो दरअसल हर स्त्री है भूगोल निरपेक्ष।


    बहस के लिए पहचान की राजनीति पर कात्यायनी का अति महत्वपूर्ण लेंख है।इस विमर्श में अंबेडकर प्रसंग में हमारी असहमति पर हस्तक्षेप में लंबी बहसें चली है।कात्यायनी के ताजा आलेख का मूलाधार भी वही अरविंद न्यास का वक्तव्य है।


    इस पर हम नये सिरे से टिप्पणी नहीं करेंगे।लेकिन वर्गीय ध्रूवीकरण के बारे में कात्यायनी की जो राय है और पहचान को खारिज करने का जो एजंडा है,हम उसका पुरजोर समर्थन करते हैं।


    समकालीन तीसरी दुनिया के इस अंक में आनंद जी के संपादकीय,नेपाल अपडेट,मुशर्रफ अली का आलेख,अभिषेक की रपट और जोहरा सहगल पर संस्मरण अवश्य पठनीय है।पढ़ें और समकालीन तीसरी दुनिया को जारी रखने में सहयोग भी करें।


    हम अपनी जमीन से जुड़ीं औरतों को देखें तो महसूस करेंगे कि स्त्रियां किसी भी परिस्थिति में हारती नहीं है।


    हाल में लिंकड इन के प्रोफ्शनल नेटवरक में जिस तेजी और सक्रियता के साथ फेसबुक पर अनुपस्थित लेकिन जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय और कामयाब स्त्रियों से परिचय हो रहा है,उससे हमारी यह धारणा टूटी है कि आधुनिक स्त्री सिर्फ क्रयशक्ति के पीछे भाग रही हैं।


    उनकी चिंताएं और सरोकार पुरुषों के मुकाबले ज्यादा ईमानदार ही नहीं हैं,समाजवास्तव के मुताबिक हैं और उनके डीएनए के मुताबिक सत्यनिष्ठा का उत्कर्ष भी।


    ऐसी स्त्रियां हार नहीं सकतीं।

    अपने लोक में लौटें और जनपद संस्कृति के मुताबिक स्त्री को नेतृत्व का मौका दें तो हो सकता है कि कयामत के ये हालात बदल भी जायें।


    हमने तो अब तक घर के भीतर या बाहर पुरुषवर्चस्व के दायरे और सांढ़ संस्कृति के व्याकरण से बाहर किसी स्त्री को संबोधित किया ही नहीं है।


    हम अब तक सिर्फ मर्दों को संबोधित करते रहे हैं और इसीलिए हमारे पढ़े लिखे पुरुष वर्चस्ववादी प्रयासों का असर भी नहीं हो रहा है।


    हालात बदलने हैं तो पुरुषतंत्र के तमाम किलों और मठों पर गोलाबारी सबसे जरुरी है।


    अब इस ताजा  विवाद पर भी गौर करेंः


    भगाना बलात्कार कांड पर ईस्टर्न स्काई मीडिया की खास पेशकश आंदोलन को हाईजेक करते आज के पत्रकार व एनजीओ वाले। फॉरवर्ड प्रेस के कार्यकारी संपादक प्रमोद रंजन ,ऐ आई बीएसएफ के अध्यक्ष जीतेन्द्र यादव और नैक्डोर की अनीता भारती ने दलित आंदोलकारिओं के खून पसीना पर निम्न राजनीती की साथ ही आंदोलन के पुरोधा की उपाधी लेने की कोशिश की। क्या कहा भगाना कांड संघरश समिति के आंदोलन करिओं ने।

    http://www.youtube.com/watch?v=TQxLUTqhXug&hd=1#!

    NERIST Employees Association to Stage Indefinite Hunger Strike

    Eastern Sky Media Hindi News Bulletin 23rd August, 2014. For more news, visit our website http://easternskymedia.co.in/

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    इस पर हमारे मित्र दुसाध जी का जवाब यह हैः

    H L Dusadh Dusadh

    15 hours ago· Edited


    मित्रोंभगाणा पीड़ितों को न्याय दिलाने में प्रमोद रंजन,अनीता भारती,जितेन्द्र यादव जैसे सर्व भारतीय स्तर पहचान रखने वाले वंचितों के हितैषियों के साथ जिस तरह तहेलका ने मेरी भी छवि को म्लान करने का कुत्सित प्रयास किया है,उसे देखते हुए बहुजन समाज के ढेरों लोगों की राय है कि मुझे चांचल्य सृष्टि करने वाले तहलका को सबक सिखाने के लिए मानहानि का दावा ठोक देना चाहिए.किन्तु जिस तरह कोर्ट -कचहरियों में सक्षम लोग मामलों को लम्बा खिचवा देते हैं,उसे देखते हुए चाहकर भी मानहानि का मुकदमा दायर नहीं करना चाहता.क्योंकि इससे आर्थिक संकटों में सब समय घिरे रहने वाले मुझ जैसे व्यक्ति का आर्थिक संकट और गहराने के साथ ही सामयिक मुद्दों से ध्यान भटक जाने की भी सम्भावना है.पर,भारत की हिस्ट्री में संभवतः सबसे अधिक किताबे देने वाले मुझ जैसे मिशनरी लेखक की छवि म्लान करने का यदि मनुवादी दुसाहस कर सकते हैं,तो फिर आम बहुजन चिंतकों के साथ वे किस हद तक जा सकते हैं,इसे ध्यान में रखते हुए यौन अपराध का आरोपी तरुण तेजपाल के तहलका के गुनाह को नज़रअंदाज कर देना भी ठीक नहीं लगता.ऐसे में यह देखते हुए कि देश परम्परागत सुविधासंपन्न तबके की किसी भी किस्म की चुनौती दुसाध के लिए झेलना बहुत कठिन है, आप बताएं सेंशेशन क्रियेट करने वाले तहलका के बचकानी(मनुवादी-मार्क्सवादी) षड्यंत्र को नजरंदाज़ कर दिया जाय या ठोक दिया जाय मानहानि का दावा ?



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    We Indians have the Wings of UAVs to destroy ourselves!


    New breed of Moneybags divest Indian retail business and it is drone e commerce all over deregulated!

    Palash Biswas

    US drone attacks on Indian retail market intensified as we Indians have the wings of UAVs to destroy ourselves.New breed of moneybagas divest Indian retail business and it is drone e commerce all over deregulated.Indian textiles lose ground once again as Textile major Arvind's Lifestyle Brands arm has tied up with the US iconic retailer Gap Inc. to franchise its apparels in India through retail format.

    On the other hand,during Clegg's visit, it is expected the UK will strongly raise the issue of British telecom giant Vodafone's Rs 11,217-crore tax dispute when it acquired Hutchison Whampoa's India unit. This has become a significant irritant in bilateral business ties.Clegg, leader of the UK coalition partner Liberal Democrats, will be leading a 50-strong trade delegation to promote investment in three key focus sectors of education, food and retail, and defence and aerospace.  British Deputy Prime Minister Nick Clegg that will visit India for three days from August 25, 2014.


    Mind you,the new government has made its stand clear that it will not allow foreign direct investment in multibrand retail trading but it has not clearly spelt out what will be its stance on the pending proposals.However E tailing is in violent vogue and Amozen, Filpcart and Walmart have already taken over the indigenous retail sector in the digital biometric nation.


    With increasing number of people preferring to shop online, the retail category penetration has increased to 65% and has grown to 53.4 million visitors a month, an overall growth of 15% annually, according to a report.


    However, against the unprecedented boom boom etailing by global retail players the official stance seems to be misleading as Financial Express reports:Several e-commerce firms that operate in the B2C (business-to-consumer) space but whose affiliates in the B2B space have foreign direct investment are likely to be in trouble going by a statement made by commerce and industry minister Nirmala Sitharaman.

    The latest retail war scenerio tells a different story as business because reports, the biggest e-commerce companies have stepped up their hiring of MBAs, as they gear up for rapid expansion in an industry that observers say is poised to boom in the coming years.

    Indian's e-retail market is forecast to enjoy sales of $32 billion by 2020, which would rival China, the biggest e-commerce player by sales growth this year. India's internet users are also predicted to surge to 600 million in numbers in the same period, creating a huge customer base.

    The big e-commerce giants have raised substantial funds to tap into this emerging industry, and are poised to fight for market share.

    Fipkart, founded by two IIT graduates, last month raised $1 billion in new equity for expansion and improvements. A day later, Amazon, which launched in India last year, announced that it had raised another $2 billion to invest in the country. eBay-backed Snapdeal, another e-commerce upstart, is expected to raise funds in the coming months to remain competitive.

    As such, rapid expansion will open up huge job opportunities, agrees Professor Deepa Mani from the information systems group at the Indian School of Business.

    "Hiring by e-commerce firms and start-ups have seen a rapid increase over the last couple of years," he said. "Companies are seeking MBAs who can integrate cutting edge technologies with traditional business functions such as marketing and finance," he added.

    Smaller e-commerce firms have also raised capital or received investment to expand. Jabong.com raised $100 million in February this year, and Pepperfry.com raised $15 million in May.

    Professor Deepa added that e-commerce start-ups had increased hiring at the business school by 50% compared to a year earlier. But Technopak, a New-Delhi-based retail consultancy, said that funding for start-ups has dried up in the past year, with investors focusing on larger companies.

    But there are also thought to be job opportunities in technology consulting, which dominated 40% of total consulting positions taken by ISB's MBA class.

    India's e-commerce industry is smaller than China, which has seen 64% growth in sales this year, but sales of goods over the internet, currently at $2.3 billion, is projected to grow rapidly, according Technopak.

    It is thought that India's expensive real estate prices are giving e-commerce firms an advantage over traditional retailers, and home deliveries have grown in popularity within India's congested urban centres. Flipkart and Snapdeal say the proportion of customers accessing their sites via mobiles has increased from less than 10% last year to more than 50% today.

    There are already signs that hiring at these large firms has started to increase. ISB said that 300 job offers were made by 53 technology companies – the biggest hiring sector – last year, led by Amazon and Apple. About 345 of the MBA's 741 total employment offers were for jobs based in India.

    The Indian Institute of Management, Bangalore – the country's third highest-ranked business school – announced that it saw major e-commerce companies hire their 2014 graduating class.

    Amazon made 11 job offers and led the technology recruiting, the school said, while Flipkart, Jabong and Yepme were the biggest hirers in the e-commerce space.

    E-commerce companies also stepped up their recruitment for the school's summer internship season. The latest figures show that big players took on MBAs, including Amazon with 12 job offers, while Flipkart made 10 offers for a range of different positions.

    At the Indian Institute of Management, Ahmedabad it was a similar story. The leading business school said students showed a keen interest in taking up positions in e-commerce companies, which hired about 7% of the class.

    These companies were particularly keen to hire MBAs for sales and marketing roles. The school said: "E-commerce was represented by a variety of companies such as Flipkart, Ebay, Valyoo, and first time recruiters such as CommonFloor."

    About 27% of the class accepted summer internships in e-commerce and IT firms.

    E-commerce companies have also stepped up hiring across Europe. At Oxford's Saïd Business School, the firm is the top recruiter, and at London Business School last year, Amazon recruited more students than any of the big investment banks.

    In this year's career outlook report, HEC Paris, the leading French business school, said: "Amazon has been a significant recruiter from the program since 2011, and is likely to be our top recruiter for the graduating class of 2014."

    Specialist e-commerce firms are not the only ones targeting India's emerging market.

    Walmart, the world's largest retailer, launched a pilot e-commerce platform last month. The American giant operates in 20 stores in India, and is testing the e-commerce pilot in Lucknow and Hyderabad.

    It is reported that large Indian conglomerates involved in traditional retailing are planning to go viral to expand, including Reliance Industries and Tata Group.

    Miriam Park, Amazon's director of university recruiting, said that the company plans to hire hundreds of MBAs this year, building on an increase every year for the past five years.

    "We recruit top talent wherever it may be around the world," Miriam said, and added that MBAs are able to move across Amazon's businesses throughout their career.

    An 11 to 12 week internship program is also offered to MBAs at the world's largest e-commerce group, which seeds its campus hiring.

    "We see MBAs thriving at Amazon because they love taking ownership of big projects and solving hard problems for our customers," said Miriam.

    "We don't disclose specific numbers, but hire in the hundreds globally. We see them adding long-term value across Amazon," she added.



    "FDI is banned in multi-brand retail and the same applies to e-commerce also," she said at the Indian Express Group's Idea Exchange programme. The minister's clarification comes at a time when authorities suspect that many e-commerce firms have structured their business in such a way that foreign capital coming to their wholesale business indirectly supports the retail e-commerce business. Recent reports said some of the leading e-commerce companies are being probed by the Enforcement Directorate for alleged violations of foreign exchange regulations.


    India permits 100% FDI in B2B e-commerce activities (as in wholesale trade) but foreign investment is not allowed in B2C e-commerce companies. But some foreign firms are present in the country through what is called the marketplace model. Under this model, they do not retail any products but offers a platform for consumers to place orders, which are then retailed by domestic retailers. This is perfectly legal.

    However, there are some domestic B2C e-commerce companies that also operate through the marketplace model but allegedly use their other FDI-funded ventures in the B2B space for retail sales. The minister's reiteration of the policy would mean that such companies would now face the music.


    On the ongoing review of free trade agreements (FTAs), Sitharaman said this was not being done with a view to scrap them but to ensure that Indian manufacturers optimally benefit from these pacts.


    Stating that India's FTA partner countries may be benefiting more from these pacts than India, she said the government was therefore looking at some "remedial measures", which could lead to correcting inverted duties as in the recent Union Budget. The reviews could also allow more careful formulation of future FTAs.


    The FTAs under review are those with Asean, Japan, South Korea and Malaysia.


    India is also planning comprehensive bilateral trade and investment pacts with many countries and blocs including Canada, the European Union and Australia.

    Portals such as snapdeal.com, yebhi.com, myntra.com, jabong.com, firstcry.com and lenskart.com are among the major players in India's roughly $12-billion e-commerce industry that is growing at about 34% a year. According to an investment tracking agency, capital flow into India's e-commerce firms rose 258% to $805 million in 2013-14 from $224.85 million a year ago, indicating



    Apparel, health, home furnishings, fragrances and cosmetics are the few categories which have shown growth in the last 12 years, with apparel being the strongest with 66% followed by fragrances and cosmetics at 12% growth, according to a report by Assocham and comScore, titled 'State of E-commerce in India'.


    The report said that Flipkart group of websites (including recently acquired Myntra) are the most visited retail sites with over 26 million unique visitors for the month of July 2014 (excluding visitors using mobile internet and mobile apps). It was followed by Jabong (with 23.5 million unique visitors), Amazon (with 16.9 million unique visitors).


    It also found that the travel category has also been growing overall and the growth has come from all the sub-categories including car rentals, online travel agents, airlines as well as hotels and travel information sites.


    "Indian Railways is among the most visited sites in India with over 15 million unique visitors a month. MakeMyTrip, Yatra and Cleartrip individually reach over 8.9%, 7.6% and 3.5% of total online users respectively," it said.


    According to the report, age group of 15-24 years has been the fastest growing age segment online with user growth being contributed by the both male and female segments.


    The top 5 popular categories accessed online are social networking, portal, search, entertainment and new sites, according to the report.


    "E-Commerce is increasingly emerging as the fundamental sales channel for growing number of businesses. The internet user base is expanding fast and e-Commerce has opened up a big window of opportunity for businesses to expand to new markets with ease and at low cost," Assocham Secretary General D S Rawat said.


    The report said that India has third fastest share in retail marketing adding over 7 million internet users among the BRIC nations.


    "India, Brazil and Russia are quite close to each other but China has been surging ahead in retail. The China continues on the growth path with over 103 retail million internet users by the end of June 2014. The Russian Federation has also surged ahead with a very high growth rate of 32%," it said.


    It added close to 13 million users in the retail category. Brazil is also growing in double digits at 13% and added 6 million unique visitors in the last year.


    "The growth has come across all retail categories and most of them show promising transactions and conversion rates along with growth in visitors," the report said.

    "We will open about 40 Gap stores to franchise its apparels across the country starting with Mumbai and Delhi early 2015," Arvind chairman Sanjay Lalbhai said in a statement here Friday.

    Arvind, which has been a Gap vendor for long, is extending the partnership to retail for adding the latter's portfolio of brands to retain its leadership in the growing Indian apparel market.

    As the world's second most populous country, India represents an important platform for Gap to bring its casual style to the upwardly mobile Indian consumers.

    "India is an emerging, vibrant market and an important next step in our global expansion strategy," Gap's global president Steve Sunnucks said on the occasion.

    Gap will ship its summer 2015 collection for adults, kids and babies to promote its well-known brands in the Indian market.

    With more than half of the country's 1.2-billion people being under 25 years and the younger generation embracing fashion as never before, Gap plans to cash in on its brand awareness.

    "We look forward to understanding the Indian market place and consumer needs to create our brand experience among the local consumers," Gap global franchise vice-president Ismail Seyis said in the statement.

    As Gap has a huge recall in India and being a favourite among Bollywood stars, Arvind plans to leverage the former's brand awareness to scale up and expand its franchise business.

    The $16-billion Gap, which has about 230 stores across Asia, plans to open an additional 110 stores in China, Hong Kong and Taiwan this year.

    mazon Vs. Flipkart: Stacking The Two Leading Online Retailers In India

    Abhishek BaxiAug 23, 2014, 09.30 AM IST


    Unabashedly modelled on Amazon.com, Flipkart.com was launched in India in 2007, many years ago before the US ecommerce major arrived in the country. After a great initial run and some major acquisitions, the company enjoyed the maturing market riding on the mobile revolution establishing Flipkart.com as the leading online retailer in the country.


    Of course, as was expected, Amazon.in entered the market to spoil the party. The brand reputation carried over across the seas, even to a first time buyer in India, a unique advantage which is uncommon for new players.


    In this piece, I avoid comparing delivery quality, seller confidence, and customer service since the mileage varies for different individuals. The general consensus looks like that while Flipkart was a darling for many for quite long, Amazon is garnering lot of fans with quicker deliveries and overall experience in recent times. It's a huge market, and the competence and deep pockets of either cannot be debated. So, I'll avoid the crystal ball gazing and look at how the two stack against each other right now in terms of few, nifty features they offer.


    Fulfilled by Amazon


    A lot of users I've talked to, and even me in most cases, prefer to avoid products from third-party sellers and place trust in Amazon and Flipkart to undertake the order. The assumption here, based on the trust in the brand, is fair pricing, better delivery, and quick resolution in case of an issue.


    At Flipkart, all products sold by the seller - WS Retail - are the ones that are fulfilled by Flipkart, WSRetail being the company's subsidiary. At Amazon, a 'Fulfilled by Amazon' label assures you of the same.


    A nifty feature at Amazon though is pretty handy. While browsing through products, one of the filters is 'Fulfilled by Amazon'. Once selected, only Amazon-shipped products will be listed. Unfortunately, on Flipkart, there's no way to set a filter like that, and you'll have to go to individual product listing to check the seller, and make your decision.


    Exclusives


    A new trend in the Indian e-commerce market, exclusive partnerships, has been attempted by almost every major players worth its salt. However, Flipkart got all the eyeballs (and of course a huge revenue) with popular and sell out tie-ups with Motorola, Asus, and Xiaomi. Without a doubt, Flipkart was at an advantage here.


    Amazon managed to pull back some mindshare with the exclusive deal with Microsoft for the Xbox One, and looks like both the retailers will see this an important way to 'force' online buying and expect to inculcate that as a habit.


    Flipkart First


    Amazon.com offers a prime subscription which allows customers better shipping deals, exclusive offers, and free access to digital content from its library. However, the company hasn't launched a similar program in India as yet.


    Flipkart launched Flipkart First a few months ago, and walked away with the early mover advantage. Available at ₹500 for an annual subscription, the membership brings free one-day delivery, discounted in-a-day delivery, and some exclusive offers along the way. However, there's no digital content, and not much incentive yet, and I don't see many people interested in subscribing to the service.


    Customer reviews


    Again, worldwide, Amazon is a great source of reading reviews for a product even if you were buying it elsewhere. In India, the same can be said about Flipkart. It's been there since a while, and for most products in popular categories, you'll see a lot of customer reviews giving you a fair idea of the product helping you make a purchase decision.

    Amazon.in only been there for a year, and you'll find a lot of products without any or only a few reviews. The e-tailer cleverly integrates reviews for some of its products, but those of course miss the Indian context.


    Packaging/Delivery


    One of the highlights of the Amazon experience worldwide has been their packaging and delivery. Apart from the Kindle devices, Amazon doesn't sell products in India, so we don't get to see much of those legendary no-tape, flip-to-open boxes.


    Nevertheless, Amazon has a huge focus on packaging as part of its customer experience. Apart from the product and seller review as is at Flipkart, Amazon also allows you to share your feedback on the packaging/delivery of the product. Pretty cool.

    (Image: Thinkstock)

    http://www.gizmodo.in/indiamodo/Amazon-vs-Flipkart-Stacking-The-Two-Leading-Online-Retailers-In-India/articleshow/40738675.cms

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    Aug 22 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    On the Wings of UAVs



    

    

    Small Unmanned Aerial Vehicles are making an impact across sectors and market. The market size for them is expected to reach $33.5 million (`203 crore) by 2019. In India, a number of startups focussing on this new age technology have set up shop. ET's Malavika Murali takes a look at a few of the upcoming players in the country

    EDALL SYSTEMS WHAT IT DOES The Bangalore-based company conducts training sessions on design and development of UAVs for students and builds parts for National Aerospace Labs and the Defence Research and Development Organisation.INVESTMENTS The startup is in talks with MNCs and NRI. It was contacted by the French Trade Commission (UBIFRANCE) last month for potential collaborations with European drone makers LATEST DEVELOPMENTS ­It is 3D printing parts, such as battery compartments, camera housing, electronic wiring connectors and structural elements. Signed deal with Karnataka-based Adhiamman College of Engineering to set up a drone research and manufacturing facility.

    AIRPIX WHAT IT DOES A Mumbai-based company that does affordable aerial drone photography and gives `recommendations' to businesses and industries through analysis of the aerial data. Clients include K Raheja Corp, Reliance Energy, Kalpataru and APM Terminals.INVESTMENTS The startup is looking to raise venture investments this year.LATEST DEVELOPMENTS The drones are now custom-made and include a range of fixed wing and multirotor UAVs and can carry different payloads.

    ATOMS & BYTES WHAT IT DOES Custom-made drones, make-your-own-drone kits and drone accessories are sold both online and offline by this Chennai-based startup for `11,000 to `5 lakh. Clients mainly comprise drone enthusiasts, hobbyists, students and also certain local army units.INVESTMENTS Indian film and television technology company Real Image Media Technologies invested `20 lakh. The company is in talks with angel investors from Bahrain and Dubai and is looking to raise investments in about four weeks' time.LATEST DEVELOPMENTS The company is now looking to introduce drones into the film industry. It is launching two types of drones in the next two weeks.

    PIXELISM WHAT IT DOES A Hyderabad-based photography and advertising company that has used drones for aerial photography and videography.INVESTMENTS The founders are in talks with individual investors and are hoping to raise a `30 lakh investment by October this year.LATEST DEVELOPMENTS The startup is looking to expand its base to Bangalore and Visakhapatnam by the end of this fiscal.

    GARUDA ROBOTICS WHAT IT DOES Singapore-based Garuda Robotics set up by 21-yearold Indian Pulkit Jaiswal sells drone software.INVESTMENTS The startup has raised venture funding since last year and is in talks with investors for potential investments.LATEST DEVELOPMENTS Is looking to introduce agricultural drones by the end of the year. The systems will track the chlorophyll levels of crops in the air.

    IDEAFORGE Has built Nethra UAV in collaboration with DRDO and has the Central Reserve Police Force (CRPF), the Uttar Pradesh Special Task Force and the police forces of about three states as customers.








    

    




    Aug 22 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Seen an iPhone Queue? E-Commerce's is Bigger

    Radhika P Nair & Madhav Chanchani

    Bangalore | Mumbai: likes to miss the bus a s

    

    

    PE funds, hedge funds & even brick-and-mortar cos rush to invest

    No one likes to miss the bus a second time. Investors who missed out on the ecommerce boom in the country that began earlier this decade are keen to make amends this time round.

    These investors, ranging from private equity and venture funds to international hedge funds and brick-and-mortar retailers, are currently evaluating a number of online companies, especially niche single-category retailers in segments such as web-only fashion, babycare and eyewear. "We are very aggressively looking at investing in ecommerce, especially something with local connect or an offline presence," said Manas Tandon, principal at TPG Growth India, which has not invested in a consumer Internet company in India so far."We have seen some interesting businesses," said Tandon, whose fund has backed businesses such as accommodation listings provider Airbnb and messaging app Viber globally.

    Tandon declined to reveal the names of the companies that his fund is in talks with.

    Recently, Hong Kong hedge fund Steadview Capital made its India entry by investing in music streaming service Saavn, furniture site Urban Ladder and taxi ser vice OlaCabs, the back-toback deals indication of the seriousness with which it views the India market.

    The internet sector's scorching pace of growth, and highprofile deals are fuelling the intense interest. The online retail industry, which was valued at $1 billion two years ago, is expected to reach $32 billion (Rs 1.9 lakh crore) in 2020, according to retail advisory firm Technopak. This year has already seen a flurry of deals--Investors have pumped in over $1.6 billion (Rs 9,700 crore) across 24 deals so far this year, compared with $553 million (over Rs 3,300 crore) last year across 36 deals, according to research firm Venture Intelligence.

    Multiples Alternate Asset Management, a private equity fund founded by former ICICI Venture head Renuka Ram nath, is also trying to cash in.The Mumbai-based fund has been watching ecommerce from "time to time," managing director Prakash Nene said. "We don't invest in early stage, but when business models get proven and there is runaway growth with a good management team we would like to invest," he said.

    Supam Maheshwari, cofounder and chief executive of online babycare company Firstcry , said his company is an object of interest for potential newbies. Several have "reached out" to him less than eight months after his firm raised over Rs 90 crore. He declined to reveal names of these investors. "Those who have never invested in internet or those who have not invested in ecommerce in India are now reaching out," he said.

    Large fundraises by indus try leaders, such as Flipkart and Snapdeal, and the entry of investors like Singapore's sovereign wealth fund GIC have boosted investor confidence.

    "There is a lot of interest now," said Manish Chopra, chief executive of web-only fashion brand Zovi, which is in talks with investors to raise about $25 million (Rs 150 crore). The company, backed by SAIF Partners and Tiger Global, has raised about $25.5 million (Rs 153 crore) so far.

    It is the phenomenal rise in valuation of holdings of early investors that has led to this increasing excitement. For instance, Flipkart was valued around Rs 1,000 crore in 2011, according to industry sources. After its most recent fundraise, it is estimated to be worth around Rs 42,000 crore.

    "Privately some PE firms do regret not making investments in the space in 2011-12," said Sanjeev Krishan, leader of private equity and transaction services at advisory firm PricewaterhouseCoopers India.

    Also intervals between fundraises are shrinking. "This time, the inbound interest from investors was tremendous," said Ashish Goel, chief executive of two-year-old Urban Ladder which recently raised $20 million (about Rs 120 crore) within seven months of its previous round.

    Brick-and-mortar retailers who do not want to be left behind are among those making a bid be a part of the ecommerce party. Arvind Mills this week announced setting up its online brand Creyate while others could make their presence felt in the form of investments in online retail sites.


    Aug 22 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Singh Orders Doctrine to Wipe Out Naxal Menace

    Aman.Sharma @timesgroup.com

    New Delhi:

    PTI

    

    

    SOME GROUND-RULES No talks unless Maoists lay down arms, going after top leadership, pushing in more security forces & political commitment to eradicate Left-wing terror

    Aiming to wipe out Leftwing extremism in the next three years, Home Minister Rajnath Singh has ordered the preparation of a new `anti-Maoist doctrine' to codify government's policy for tackling the menace. The consent of all Maoist-affected states and the Union Cabinet will be sought on the same.

    This comes after Singh was told at a recent presentation by the Intelligence Bureau that though Maoists were on the back-foot and violence levels were down, there were concerns about lack of success in Bihar, Jharkhand and Chhattisgarh, necessitating a uniform approach now towards the fight.

    The doctrine aims to set some ground-rules -like no talks with Maoists unless in a bleak scenario where they lay down arms, going after the top Maoist leadership by dedicated security teams, pushing in more security forces into worst-affected areas like Bastar and political commitment from all Maoist-affected states to eradicate the Left-wing extremism.

    A senior IB official told ET that the anti-Maoist doctrine will soon be circulated to all Maoist-affected states by the ministry for their comments and consent and subsequently an "in-principle approval" of the same will be sought from the Cabinet. "Once the doctrine is in place, any wavering from it by any state will mean costs ­ in terms of funds being sent to the state to fight Maoists being curtailed," a home ministry official said. BJP had earlier criticised the UPA government for not having a uniform anti-Maoist policy . Bihar has lately differed with the Centre's stance against Maoists.

    The IB official said Singh has wished for an aggressive approach to eradicate Maoists after a recent presentation to him that said the violence levels were lowest in the last 14 years and Maoists were facing serious challeng es like "decline of their base, loss of leadership, ideological dilution, increased desertions and weakening of urban movement". The presentation put the strength of CPI (Maoist) at 6,000 armed cadres and 36,000 Jan Militia and said they held 4,000 regular and 6,000 country-made weapons. It also pointed out that Sukma and Bijapur in Chhattisgarh and Gadhchirolli in Maharashtra were the worst-affected and the main hub of CPI (Maoist) and needed to be targeted. South Chhattisgarh is the "fountain-head" of Maoism with presence of large Maoist armed formations and location of the top leadership, it added.

    The presentation said the operations had yielded improved results "only in" Maharashtra and Odisha and that Bihar and Jharkhand had a "poor performance". Among other concerns flagged off to the home minister were "movement of large groups of armed Maoist cadres, massive collection of funds through extortion, inability of the security forces to take on large armed groups, heavy security force casualties in IED blasts and administrative vacuum in large areas."

    Singh was also told that Maoists were planning to intensify guerilla and mine warfare against security forces, develop a second line of leadership and focus on issues of "Jal, Jungle and Zameen." He was told Maoists planned more abductions -followed by short negotiations and killings of abductees if demands were not met.

    Rs 1-Cr Maha Bounty on Ultra Boss Ganapathy

    NEW DELHI: Maharashtra government has announced a reward of `1 crore to anyone giving information leading to arrest of chief of CPI (Maoist) Muppala Lakshman Rao, alias Ganapathy.


    Aug 22 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    COMMITTEE OF SECRETARIES TO MEET SOON - Consumer is King, says BJP-led Govt

    Rajesh.Ramachandran @timesgroup.com

    New Delhi

    

    

    Plans Inter-Ministerial Group on Consumer Advocacy to focus on public grievances

    Apart from mega scandals, consumer dissatisfaction, particularly among the middle and lower middle classes, over issues of price rise and inefficient delivery was one of the big reasons for BJP's return to power. Now to address its voters, the BJP government is turning its focus on consumer grievances across the country in a big way , planning an Inter-Ministerial Group on Consumer Advocacy (IMGCA).

    The government has realised that the Department of Consumer Affairs can't do much when, "the response apparatus is fragmented across several line departments.Price monitoring and interventions to moderate market forces to stabilise prices in commodities of common consumption is a case in point". A note was circulated last week for the Committee of Secretaries, which will soon meet to set up the IMGCA.

    The attempt is to make the govern ment responsive to ers' concerns and not wards consumers' concerns and not dump the myriad issues with DCA.The government has identified six key sectors -agriculture, food, healthcare, housing, financial services and transport -and will bring the secretaries of the concerned departments together in IMGCA to ensure a "consumer-centric focus".

    The civil aviation and railway sectors may also be brought into IMGCA 's ambit, but there is no immediate proposal. Code of conduct for ethical behaviour for companies, standardising contracts to ensure they are not unfair to consumers, simple, speedy and affordable grievance redress window and consumer awareness are some of the tools envisaged in the strategy .

    The Cabinet Secretary will chair the group and the Consumer Affairs Secretary will be its member secretary. "The terms of reference of the committee will be to facilitate policy coherence and coordinated action on consumer advocacy for the six key sectors," says the note.


    Aug 22 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    Okhla: Capital's E-commerce Hub



    

    

    In 2010, e-commerce firm Snapdeal's cofounders Kunal Bahl and Rohit Bansal decided to rent an office floor in Okhla Phase-III, then home to Luxor and MapmyIndia. A daily deals site then, loads of boxes with discounted sunglasses and clothes could be seen arriving at their lone office floor, which then would get dispatched to deal buyers.

    Within three years, Snapdeal has changed its model to an online marketplace. With its success, it has become the largest occupant of the area with five buildings. It has tripled its headcount to over 1,200 in Okhla. Snapdeal's success has inspired newer startups such as Sequioa-funded Akosha and Nexus Venture Partners funded-Unicommerce to move to the prime Delhi territory. Another startup Valyoo Technologies, which runs portals such as Lenskart, Jewelskart and Watchkart, started out in 2010 from phase-II of Okhla with eight employees. It has now grown to a 450 people company. Of Okhla's three phases, the third is the most plush with services companies, while the first two are largely housed by entrepreneurs from manufacturing sector. "Presence of lots of vendors nearby makes it an attractive location for ecommerce companies. Despite rent being on the higher side, when compared to Noida and Gurgaon, we chose to setup office here," said Ankit Pruthi, CEO of Unicommerce, a software platform for online sellers. "With metro connectivity to all parts of Delhi and a scalable infrastructure, Okhla has proven conducive to Snapdeal's fast growth," said a spokesperson for Snapdeal, which is targetting to cross $1 billion in gross merchandise sales this year. MapmyIndia, which provides GPS based software solutions, moved here six years ago. It has rented a building space of 20,000 square feet. The company employs 750 people, a large part work out of Okhla. "The lacunae here is the lack of restaurants where people can network. Every startup has to invest in building a cafeteria," said Rakesh Verma, managing director of MapmyIndia.

    OKHLA ANCHOR COMPANY:

    Snapdeal STARTUPS IN THE REGION: Unicommerce, Akosha, MapmyIndia, Lenskart, MeritNation PROS: Presence of Nehru Place Asia's largest IT hardware sellers hub, textile and readymade garments manufacturers CONS: Real Estate expensive compared to Noida, Gurgaon COMPETING HUBS: Noida, Gurgaon


    

    




    

    




    

    





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    Kashmir has been the decisive ,dangerous turnaround on Indian path towards Neo-Imperialism.


    Excalibur Stevens Biswas


    Right after independence India chose a path towards neo-imperialism by sending troops to Kashmir and merging the independent terrain ruled by a hindu king as Pakistan tried to capture it.


    Ultimately Kashir is divided and one part ,the Azad Kashir is captured by Pakistan.It is identical holocaust for the people of Kashmir across the political line.


    It is greater tragedy than the parttion of India as the holocaust continues on the one hand and Indo Pak relations never normalised since than.


    Oveseas players played on this getting hold of economy of this bleeding geopolitics injecting capital in arms race continuous.


    The original military build up is the first inflow of foreign capital in India as well as in Pakistan.


    During the regime of Indira Gandhi , India's relationship with Soviet Union fuelled India's ambition to become  super power in the sub continent and it resulted in the continuity of  war,tussles and tension between India and Pakistan.


    Which further complicated the Kashmir dispute again and again. The bone of contention remains Kashmir which has translated Indian geopolitics into a intensified war playground and Indian economy as well as Indian people have to bear the burns.


    It is the military alliance which  introduced permanent agrarian crisis as the foreign money influx multiplied with green revolution. Further agrarian crisis continued and it created serious internal security problem threatening national integrity,unity and sovereignty and with the new set of formal neoliberal economic reforms complicated the problem so much so that India become the partner of US war against terrorism and it shifted the oilwar zone right into the heart of south asia.


    Amidst green revolution and a violent Naxal insurrectio for land reforms which continues till this date,India intervened with its military might in the civil war for freedom of Bangladesh while the Indian army was fighting against Naxalites.US Naval presence in Indian oceaon could not stop tearing of pakistan apart  into two sovereign contries.


    It was a huge win for India  just nine years later after losing war against China.But it put India on the map of globalisation, ironically  as an emerging superpower,and India kept on empowering its military forces.


    At present India has 2nd largest army after neighbouring China.But this Indian military exercise and continuous militarisation of the state in defence of private and foreign capital, eventually ended into a free hunting ground of foreign capital unabated which destroyed indigenous production system and killed Indian peasantry with its workers altogether.


    Indira  Gandhi enhanced neo-imperialistic ambition of superpower India as the people of  Sikkim mandated annexation  of the traditionally China linked nation with India.


    Mind you,before merging into India , Sikkim was an independent nation without any  democracy.It was under the china supported draconian rule by Chogyal, the king of Sikkim.


    Even just after  independence,during the post independence golden era, under  the monopolistic regime of Jawahar Lal Nehru, Sikkim State Congress was formed by his interference,whose declared goal was the demise the regime of Chogyal(king of Sikkim).But Chogyal soon took control over the  situation and crushed the movement.


    The real problem started when Indira Gandhi came in power and after her huge success in tearing apart Pakistan,she fuelled the movement for democracy in Sikkim by helping Lendup Dorge, and India's secret agency RAW(research naturally tried to finish the China influence in the Himalayas .


    In the book ' Inside RAW : India's Secret Service' written by Ashok Raina,the phenomenon is well described and the writer claimed that annexing of Sikkim with India was decided in New Delhi in 1971 and for two years RAW distilled situation in India's way. It is claimed that RAW used Hindu descendents from Nepal to provoke resistance against Buddhist king Chogyal, to fuel the democratic movement and  the issue was caste based discrimination by buddhist king.



    India from the beginning supported the movement by the rebels against the regime of Thongdup Nangyal. India did call  the rebels several time in Darjeeling.


    Even though Kaji Lendup Dorge did confessed in his recorded interview that ' People from India's Intelligence Bureau visited me thrice in a year'.


    Mind you,he lead the movement by Sikkim State Congress from 1973. The issue created by the hindu nepali descendants , the statement was given that we must merge with India to escape discrimination by Buddhists.


    On 27th March 1975, the Indian Parliament decided to wrap up the merging procedure and Sikkim's parliament gave the green signal too.Parliament's decision was to mobilise  public opinion to bring democracy and within 4 days by taking votes from 57 areas decision was made to bring democracy.


    After the decision Dorge suggested in sikkim  parliament  to merge Sikkim with India, and surprisingly 32 members boards of Sikkim Parliament had 31 members who came from Dorge's Sikkim National Congress.


    On 6th April 1975 early morning Indian army took over Chogyal's palace and it nearly took half an hour to take over 243 guards.While guards were arrested, Sikkim's flag was removed from the palace and it was replaced by India's tri colour.


    Dorge received the payment as becoming Sikkim's Chief Minister until 1979.


    This made Indira Gandhi and India a very powerful nation, win over Pakistan in 1971 and forming Bangladesh, in 1974, successful nuclear test and in 1975 ,merging Sikkim into India which put India into the world's map as a new neo-imperialistic power.


    This neo imperialism made wide open all the floodgates of neoliberalism in India as India has no option left to defend its political border against two hostile neighbours.


    The Arms package included the interests of foreign companies.It was the beginning of the selling off the nation.


    After this several incidents happened when India sent its troops outside India, and used RAW to meet its political and super power ambition. India's interference can be seen while playing with subsidy issues with Bangladesh.And the biggest interference of RAW in Nepal's election to change the political wave of Nepal's communist party, the way it helped Nepal's army, to rig the ballot boxes.


    Now people of Bhutan are under the same threat as Sikkim under, when 2013 elections were held, India wasn't happy with Fensup Donga ,prime minister of Bhutan who was having friendly relations with China, and India took the responsibility to threw his party from power, first it removed subsidy from the cooking gases and kerosene which did put people in trouble, and surprisingly when India's then Prime Minister Manmohan Singh sent greetings to People's democratic party for its win and it was shown on media channels before the results were out.


    This explained that the elections were held under India's surveillance. And which endangered the people of Bhutan from India and they are protesting it on net. A Bhutanese blogger writes,'We are so lucky that we took right decision if we didn't then instead of getting a prime minister we would have rather got a chief minister'.



    Now the situation is very tight  while India's approach as a powerful neo-imperialistic power,of whom the people of neighbouring countries are afraid how safe are the people in India?


    We,the  people think that we are safe but are we really?????



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    Dear Palash,
    Delighted to be linked in with you.

    After my retirement from the army in Jan 1993, I got into doing serious research work and into writing books. I have now authored a book titled 'NOTHING BUT! By Brigadier Samir Bhattacharya. The 3770 page book in six parts tells the true story of the Indian subcontinent in particular and the world in general during the momentous 20th century. It is a saga of 8 Indian families from different religion and castes and one British family and their five generations  who were once very close friends  and colleagues and how circumstances  of history separated them and some became the other's enemy. The families are all fictional.

     The focus of the book is the disputed territory of Jammu and Kashmir and it ends in a tragic love story between a Muslim army officer and a Hindu Bengali girl who belong to the 4th generation. The book covers the period from 1892 to 2002. Since the 5th and the sixth part covered the period from the late 60's onwards and highlighted the various scams and the caste based regional politics by our political leaders no Indian publisher was willing to stick his or her neck out. The book in all its six parts perforce had to be published from  the UK and USA. Since it covers truthfully  of what Pakistan—India and Bangladesh had to go through after the subcontinent was divided and then subdivided, I thought it may be of interest  to you. All the books were published early this year and are available through all major online booksites like from amazon.in---barnes and noble—flipkart—landmark etc  It can also be viewed on my website www.brigadiersamirbhattacharya.com. I will be also eternally grateful if you could pass this on to all your friends and well wishers. My purpose of writing this epic saga was not for getting literary fame or monetary gain. It was only to truthfully narrate history in a story form so that all the coming generations realize  what  their fathers, grandfathers and great grandfathers had to go through during the turbulent and yet momentous 20th century. A candid comment on the book from you will always be welcome.

    With warm regards

    Samir

    Nickname---Shomu

     I am now into serious writing and my epic book Nothing But! By Brigadier Samir Bhattacharya is available on line from all www major book sites. Attaching a review of the book that was written by an Englishman author and a friend. Will be very grateful if you could pass this on to your friends and request them to keep the chain moving.

    warm regards

    Samir

     

    n u l ` � �� fficer and a Hindu Bengali girl who belong to the 4th generation. The book covers the period from 1892 to 2002. Since the 5th and the sixth part covered the period from the late 60's onwards and highlighted the various scams and the caste based regional politics by our political leaders no Indian publisher was willing to stick his or her neck out. The book in all its six parts perforce had to be published from  the UK and USA. Since it covers truthfully  of what Pakistan—India and Bangladesh had to go through after the subcontinent was divided and then subdivided, I thought it may be of interest  to you. All the books were published early this year and are available through all major online booksites like from amazon.in---barnes and noble—flipkart—landmark etc  It can also be viewed on my website www.brigadiersamirbhattacharya.com. I will be also eternally grateful if you could pass this on to all your friends and well wishers. My purpose of writing this epic saga was not for getting literary fame or monetary gain. It was only to truthfully narrate history in a story form so that all the coming generations realize  what  their fathers, grandfathers and great grandfathers had to go through during the turbulent and yet momentous 20th century. A candid comment on the book from you will always be welcome.

    With warm regards

    Samir

    Nickname---Shomu

     Also attaching a few explosive and interesting chapters and will be veyr grateful if this epic book could be added to college and university libraries. I also need good media coverage to make people aware of this book and seek your advise on how to get it the required media attantion. I have yet to do a luunch of the book in India, Thanks again



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  • 08/24/14--15:57: মোতনে এ্যকতা নাই বাঙালির এখন,সঙ্ঘ পরিবার রুখিবে মনস্যান্টো,যেমন বিজিএম ঠ্যাকাইছে লেবার রিফর্ম,বোঝো ঠ্যালা! সঙ্ঘ বিরোধ মারাইতাচে উদিকে আম্বানি বাবুদের খাস চাকর চাকরানিরা বড় বড় কুর্সিতে বহাল তবিয়তে মিড ডি মিল ফাকাইত্যাছেন,প্যাটে সইলেই হয় মনস্যান্টোর অতিথি হইয়া এক্কেবারে চিত্তির রিসর্টে রিসর্টে হানীমুন সম্বত্সর হানিমুন বারো মাস পৌষমাস তাহারা ঠ্যাকাইবেন মনস্যান্টো,কেলোর কীর্তি দ্যাখচো পলাশ বিশ্বাস Palash Biswas
  • মোতনে এ্যকতা নাই বাঙালির এখন,সঙ্ঘ পরিবার রুখিবে মনস্যান্টো,যেমন বিজিএম ঠ্যাকাইছে লেবার রিফর্ম,বোঝো ঠ্যালা!


    সঙ্ঘ বিরোধ মারাইতাচে উদিকে আম্বানি বাবুদের খাস চাকর চাকরানিরা বড় বড় কুর্সিতে বহাল তবিয়তে মিড ডি মিল ফাকাইত্যাছেন,প্যাটে সইলেই হয়

    মনস্যান্টোর অতিথি হইয়া এক্কেবারে চিত্তির রিসর্টে রিসর্টে হানীমুন সম্বত্সর


    হানিমুন বারো মাস পৌষমাস

    তাহারা ঠ্যাকাইবেন মনস্যান্টো,কেলোর কীর্তি দ্যাখচো



    পলাশ বিশ্বাস

    Palash Biswas

    মনস্যান্টোর বিরুদ্ধে

    বিক্ষোভ ৪৩৬শহরে

    সংবাদসংস্থা

    লস এঞ্জেলস, ২৬শে মে- বিশ্বের ৫২টি দেশের ৪৩৬শহরে শনিবার বহুজাতিক বীজ কোম্পানি মনস্যান্টোর বিরুদ্ধে বিক্ষোভ সংগঠিত হলো। জিন-পরিবর্তিত খাদ্য ও বীজের বিরুদ্ধে এবং মনস্যান্টোর বিরুদ্ধে অসততার অভিযোগ এনে মার্কিন যুক্তরাষ্ট্র-সহ বহু দেশে হাজার হাজার মানুষ 'মার্চ এগেইনস্ট মনস্যান্টো'বিক্ষোভে শামিল হয়েছেন। বিক্ষোভকারীরা দাবি করেন, মনস্যান্টোর সুবিধা করে দেওয়ার জন্য আইন তৈরি করা হচ্ছে। বহু ক্ষেত্রে মনস্যান্টোর বিরুদ্ধে উৎকোচের অভিযোগ উঠেছে। বীজের ক্ষেত্রে মনস্যান্টোর একচেটিয়া অধিকার কৃষির সর্বনাশ ঘটাচ্ছে। দাবি ওঠে, জিন-পরিবর্তিত খাদ্য ও বীজ বিক্রির সময়ে তা স্পষ্টভাবে জানানোর ব্যবস্থা করতে হবে।


    মনস্যান্টো সংস্থা বিবৃতিতে দাবি করেছে, তাদের সরবরাহ করা বীজ কৃষির উন্নতিই করছে। তাদের বিরুদ্ধে আনা অভিযোগ ঠিক নয়।

    - See more at: http://ganashakti.com/bengali/news_details.php?newsid=41217#sthash.qN9P9EHR.dpuf

    সঙ্ঘ পরিবার রুখিবে মনস্যান্টো,যেমন বিজিএম ঠ্যাকাইছে লেবার রিফর্ম,বোঝো ঠ্যালা!


    নাযক কমিটির সিফারিশ অনুযায়ী ব্যান্ক ন্যাশন্যালাইজেশান পালটে দিয়ে টাটা বিড়লা আম্বানী ও বিদেশিমাল্টিন্যাশন্যাল কম্পানীর হাতে জনগণের জমা পুঁজি সম্পত্তির অধিকার সঁপে দেওয়ার

    প্রাইভেট ব্যান্কিঙ্গের সমস্ত আয়োজন সম্পূর্ণ


    ব্যান্কিংং রেগুলেশান আইন পাল্টে প্রাইভেড শেয়ারহোল্ডারদের অসীমিত ভোটাধিকার দিয়ে আগে থেকেই রাষ্ট্রায়ত্ত ব্যান্কের বারোটা বাজিয়ে প্রাইভেট ডাইরেক্টার বসিয়ে ব্যাড লোন ও করপোরেট লোন রাইট অফ করে


    প্রাইভেটাইজেশান চুড়ান্ত

    বাকী রইল আরবিআঈ আইন

    ভারতীয় মজদূর সঙঘ সপচেয়ে সোচ্চার ব্যান্ক প্রাইভেটাইজেশানের বিরুদ্ধে


    মাল্টি ব্রান্ড রিটেল এফডিআই পাশ করেও মনমোহন সিং ইমপ্লিমেন্ট করতে পারেননি হঠাত মমতার সমর্থন হারিয়ে

    বিজেপি ও বাম অনাস্থা প্রস্তাব সংসদে ধুলিসাত করে ভারত মার্কিন পরমাণু চুক্তি লাগু করতে পারেন নি প্রধানমন্ত্রিত্বের শেষ দিন পর্যন্ত বিশ্বব্যান্কের পেনশান পানেওয়ালে মনমোহন


    পদ্ম প্রলয়ে দ্যাশ এখন ডিজিটাল,বায়োমেট্রিক নাগরিকত্ব নিরাধার

    নিরাধার নাগরিক ও মানবাধিকার

    বেনিয়া পার্টি বিজেপি খুচরো বাজারে বিদেশি কোম্পানির বসন্ত বাহার বন্দোবস্ত করেছেন বেশ মাল্টি ব্রান্ডে এফডিআই ছাডা়ই



    সেই সিঙুর নন্দী দিদি এখন সারদা কেলেন্কারিতে ল্যাজে গোবর

    রাজ্যসভায় দিদির দল মোদীর ত্রাতা

    প্যাকেজ ত বেশি দুরে নয়ই



    পিপিপি গুজারতমডেলই বাংলার রাস্তা এখন

    প্রতিরক্ষা থেকে খুচরো কারবারে এফডিআই নিরন্কুশ

    বীমাতেও এফডিআই

    সংবিধানে আগুন,সব আইন পাল্টে ঢালাও করপোরেট প্রমোটার রাজত্ব



    শ্রম আইনের জন্য রাজস্তানে প্রোটো

    পিপিপি প্রমোটাররাজের খাতিরে প্রোটো দিদির মোদী বিরোধী বঙ্গে

    বঙ্গে এখন রঙ্গ বড় ন্যাকা ন্যাকা

    সখী সম্প্রদায়ের হামেশা কেত্তনে জনগণ বোকা


    সেই অনাস্থা প্রস্তাবের পার্টি বিজেপির সরকার এফডিআই রাজত্ব,সেজ মহাসেজ স্মার্ট সিটির বুলেটে গণসংহারের রাজসূয় যজ্ঞ শুরু করেচে,বাংলায়এখন গাজনের সঙ হল ক্ষমতার রাজনীতিতে শামিল সমস্ত বিদ্বতজন,সুশীল সমাজ,যাদের পাওনা গন্ডার হিসেব সুদীপ্ত সমঝে দিচ্ছেন ভালোই


    জনতা গিলচে ভালো কেলেন্কারি ভালো রগড় আরো ভালো পিপিপি তার চেয়েও ভালো আরো ভালো উন্নয়ন সিন্ডিকেট,উন্নয়ন পুজো,উন্নয়ন উত্সব উন্নয়ন লোক সংস্কৃতি সাহিত্যবিলাস সব অভিলাস পূর্ণ হইত্যাচে বাঙালির  পাতে ঈলিশ হইলেই দুর্নীতি মুখে রোচে খূব


    যারা মরেচে তাঁরা বেঁছেছে কবে বলো যা গ্যাছে তা গ্যাছে গল্পের গাই গরু বকরি গাছে তোলো তোলাবাজ বোঝো না কত আত্মীয় সে মরে কবে করে দেবে ঠান্ডা উঁছেয়ে তোলো ঝান্ডা যদি পিঠে সয় তবে নয় হবে বিপ্লব



    মুদিখানা দিল্লিতে যেই না চালূু হোল ,যাবতীয় আলু আলুবাঝ গৌরিক হোতি লাগত্যাছে বলো হরিবোল

    লাঠি সড়কি নেই নেই ঢাল তরোওয়াল নিয়ে আয় ঢোল

    বাজা নেতাই বাজা রে খোল বোলো হরিবোল



    মতুয়া মরেছে বেঁচে আচে মৈথিলি বামুন বেঁচে বর্তে আছেন মন্ত্রী সাংসদ আর শকুন মাথা ভর্তি উকুন

    পরির চিন্তা পরে হইব,নিজের ঘাড়ে মাতা কটা,গুইনা দ্যাকুন



    বাংলায় বন্ডেড লেবার ছিল,বাল্যবিধবা নাই,দেহ ব্যাবসা রমরমা নারী পাচার সবচেয়ে বড় ব্যাওসা

    মাদকে আসক্ত ঘরের বউ সিরিযালে আমেরিকা

    সেই আমেরিকা বড়ই আপন মনস্যানটো আরও আপন



    ক্ষ্যাতে বোম মাইরাও ফসল নাই,ফসল হয় ত বিষ খাওনের ট্যাকায় বিষ খাওনের ট্যাকাও নাই

    টুনির মায়ে মিসকলের জবাব দেবে ক্যানে তবু ত বারান্দার রোদ্দুর তেতে আছে


    লগ্নিও সিঙাপুর হইয়া

    আওন লাগতাছে,লন্ডন না সিঙ্গাপুর আগে ঠিক কইরা কওন লাগে কি ক্যামন কইলকাত্তা চাই যা এখন বাঙালি কম রাজস্তানী বেশি বাঙালি শুধু রিক্সা হাতে টানেনা,বাকী কুক্করের দশাও বেটার ঘরে বউ টেঁকে না সন্তান লাথি মারে পেছনে


    পাড়া পড়শি হামেশাই শত্তুর সমাজ ত নয় মোত্তসব মায়ের ভোগে লাগে জ্যান্ত কাটা মুন্ডু,ঘাস চিবিযেমরবে না হালায ত মরবে কোন হালায়

    উন্নয়নে তাই নরবলি বেশি প্রয়োজন,শহীদ হলেই জমি দেব না স্মার্ট সিটি হবে


    হবে যাবতীয় হাব হবে প্রীতি ভাব হবে ফেসবুক প্রোপাইল হবে ঝ্যাচাক কোটিঙ হবে কোচিঙও হবে পাড়ায় পাড়ায়আইটি হবে চাকরি সে গুড়ে বালি যার হবে তার হবে বাকি যারা তাঁদের হবে নাকর ব্যাাটা যত পারিশ প্যারিশ হ চাউমিন

    হ চিলি চেকেন হ হ ফিশ ফ্রাই মস্তান হ হ লিডার টাকরি নৈব নৈব চ

    চাষ বাস উঠে গ্যাছে সে ঠ্যালা চুকে গ্যাছে নটে গাছটি মুড়াল পাড়ায় পাঢ়ায শপিঙ মল হল হল পাড়ারই প্রোমোটার


    সেই প্রোমোটার কল্যাণে রাজকার্য অনিবার্য

    গুপিও নেই বাঘাও নেই ভুতের তিন বর নেই নেই পথের পাঁচালি পুজো মন্ডপ হবে থিম হবে অসুর নিধন হবে


    কিন্তু বাবাধন মাইয়া মাগো চাকরি হইবো না

    বন্ধ হবে কল কারখানা ছারখার হবে আরও জোর হবে লগনি বাতাস

    সুনামি হবে গৌরিক প্রলয় বাবাধন সোনার মাইয়া জান

    চাকরি হইবো না চাষও হইবো না



    জীবনবাবূ শ্যাষও হইবো না হকার হব ক্যাডার হব লিডার হব কুক্কুরের মত বাঁচবে তবু বাঙালি

    চুক্তি চাষের শুরু বাংলায়

    এপবার মনস্যান্টাও হইবে



    খোকাবাবূ সিঙাপুর প্যারিশ আমেরিকা ঠ্যাঙ্গাইয়া ফিলিম করিবো সাংসদী করিবো ফুটবাল পুজো সহ দলে দলে সাংসদ কাগজও করিবো টিভিও করিবো সবজান্তা প্যানেলও করিবো অথচ মনস্যান্টো হইবো না  হইবোই হইবো


    সঙ্ঘ কহিতাছে হইব না তো অবশ্যই হইব

    পরমাণু চুক্তি ক্যালাইছে স্বদেশি বন্দে মাতরম জাত পাত ধরম করম সব করতাছে,চুক্তি চাষও হইতাছে



    দাঙ্গাও হইতাছে তারও চাইতে বেশি অটোমেশান ছাঁটাই আবার কলা রোবোটও আইতাচে থ্রি জি হইল ফোর জি হইছে ফাইব জি হইতাছে কালি এক্স এক্স করো কোন দুকে পাগলা ছাগল


    বাঙালি একুনে মর্তবান কলা পুজোতে বেশ পোলা ফোলা আসলে রেআসের ঘোড়া ছোলা

    সেই ঘোড়া মুদিখানায় দলে দলে যোগদান করতাছে



    বাংলাদ্যাশের সহিত চ্যাদরামি আর নানানা

    দিল্লীর লাড্ডু যে হালায় খাইছে তারে ঠ্যাকায় কোন হালায়- আবার কয়মনস্যানটো হইবো না


    আরবআই আইন পালটাইতাছে,ব্যান্ক বাবুরা এতই টাকা গোনেন পেত্তল সনা কইরা টাকা ঘরে তোলেন আর তাও বোঝেন না খোথাকার বাঁশ কোথাযকার পিছনে লাগতাছে পুজোর তাম্বু ছাডা়ও বাম্বু হয় বাছাধন


    মোতনে এ্যকতা নাই বাঙালির এখন

    সঙ্ঘ বিরোধ মারাইতাচে উদিকে আম্বানি বাবুদের খাস চাকর চাকরানিরা বড় বড় কুর্সিতে বহাল তবিয়তে মিড ডি মিল ফাকাইত্যাছেন,প্যাটে সইলেই হয়

    মনস্যান্টোর অতিথি হইয়া এক্কেবারে চিত্তির রিসর্টে রিসর্টে হানীমুন সম্বত্সর


    হানিমুন বারো মাস পৌষমাস

    তাহারা ঠ্যাকাইবেন মনস্যান্টো,কেলোর কীর্তি দ্যাখচো


    সাধারণের জন্যই লিখতে চেয়েছিলেন

    সিদ্ধার্থ গুপ্ত

    ২৬ জুলাই, ২০১৪, ০০:০১:৫০

    eeeprint

    প্রখ্যাত বিজ্ঞানীদের অনেকেই লেখক-প্রাবন্ধিক হিসেবেও অগ্রগণ্য। বিজ্ঞান এবং সাহিত্য, দুটিই তাঁদের অনায়াস সঞ্চরণের ঊর্বর ক্ষেত্র। বিশ্বের প্রেক্ষিতে কার্ল সাগান,  স্টিফেন হকিং,  জর্জ গ্যামো থেকে আলবার্ট আইনস্টাইন, এরউইন স্রোডিংগার থেকে রিচার্ড ডকিন্স, জেমস ওয়াটসন, র্যাচেল কারসন— কত নাম। বাংলায় জগদীশচন্দ্র বসু, আচার্য প্রফুল্লচন্দ্র, সত্যেন্দ্রনাথ বসু, মেঘনাদ সাহা, রামেন্দ্রসুন্দর, গোপাল ভট্টাচার্য— উদাহরণে ঘাটতি নেই। পদার্থবিজ্ঞানী (নির্দিষ্ট করে বললে কণাবিজ্ঞানী) অভীকান্তি দত্ত মজুমদারের নির্বাচিত রচনা সংকলন পড়তে পড়তে বারবারই মনে হচ্ছিল অকালমৃত অভীকান্তি (১৯৬৮-২০১৩) এই বর্ণময় তালিকায় এক উজ্জ্বল উপস্থিতি। বিজ্ঞানীর প্রত্যাশিত ক্ষুরধার যুক্তি ও বিশ্লেষণ, সংস্কারের মোহমুক্ত আলোকে সব কিছুকে যাচাই করা, বুদ্ধির কষ্টিপাথরে ঘষে ঘষে পরখ করে নেওয়া এবং একমাত্র সেই মানদণ্ডেই গ্রহণ অথবা বর্জন  অভীকান্তির রচনার প্রধান গুরুত্ব। আর তার সঙ্গে যুক্ত হয়েছে ভাষার লালিত্য, স্থানবিশেষে তীব্র শ্লেষ, কঠিন তথ্য ও পরিসংখ্যানকে সাধারণ পাঠকের জন্য পরিবেশনের আপাতদুর্লভ মুন্সিয়ানা। বিভিন্ন আন্তর্জাতিক গবেষণাপত্রে প্রকাশিত তাঁর বৈজ্ঞানিক প্রবন্ধের সংখ্যা পঞ্চাশেরও বেশি। যুক্ত ছিলেন 'সার্ন'-এ ঈশ্বরকণা ও অধঃপারমাণবিক কণা সংক্রান্ত আন্তর্জাতিক গবেষণা প্রকল্পে। তাঁর শেষ কর্মক্ষেত্র ছিল 'সাহা ইনস্টিটিউট অফ নিউক্লিয়ার ফিজিক্স'। দুরারোগ্য কর্কট রোগে আক্রান্ত হয়ে মাত্র পঁয়তাল্লিশ বছর বয়সে তাঁর মৃত্যু হয় গত ডিসেম্বরে।

    নির্বাচিত রচনা সংকলন, অভী দত্ত মজুমদার। শৈলী প্রকাশনী, ২০০.০০

    আলোচ্য সংকলনটি প্রকাশিত হয়েছে বিজ্ঞানীর প্রয়াণের  পর। এর অনেকগুলি প্রবন্ধই আগে পত্রপত্রিকায় বা পুস্তিকা আকারে প্রকাশিত হয়েছিল। মোট ১৯টির মধ্যে ৪টি প্রবন্ধ অপ্রকাশিত। প্রবন্ধগুলি মূলত তিনটি শীর্ষকে বিভক্ত। প্রথম পর্বের শীর্ষক বিজ্ঞান ও বিজ্ঞানের রাজনীতি। প্রথম দু'টি প্রবন্ধে আলোচিত হয়েছে বিশ্বব্রহ্মাণ্ডের জন্ম বিষয়ে প্রাচীন থেকে আধুনিক যুগ পর্যন্ত নানা তত্ত্বের ক্রমবিবর্তন। সহজ ভাষায় দুরূহ বৈজ্ঞানিক তত্ত্বের ব্যাখ্যা পাঠকদের নজর কাড়বে। দ্বিতীয় প্রবন্ধটি চমকপ্রদ: 'বিজ্ঞানের অভিধানে কিন্তু কোনও ঈশ্বরকণা নেই'। সার্ন-এ সরাসরি 'গড পার্টিকল'বা 'গড ড্যাম পার্টিকল'বিষয়ে গবেষণারত এই কণা-বিজ্ঞানী অধঃপারমাণবিক কণার আচরণ নিয়ে চমৎকার প্রবন্ধ লিখেছেন। অন্য প্রবন্ধগুলির অধিকাংশ ২০০৬-'১১ পর্বে, এই রাজ্যে দারুণ রাজনৈতিক ও সামাজিক উপপ্লবের দিনে লেখা। এখানে নিছক পদার্থবিজ্ঞানীর পরিচয় থেকে বেরিয়ে এসেছে এক সমাজবিজ্ঞানীর পরিচয়। উন্নয়ন ও উচ্ছেদ, শিল্পায়ন এবং অনাহার, নির্মাণের ঢক্কানিনাদ ও বিস্থাপনের তীব্র যন্ত্রণার চরম ঘাত-প্রতিঘাত বিজ্ঞানীর কলমে জন্ম দিয়েছে 'কেমিক্যাল হাব: একটি নিঃশব্দ ঘাতক', 'হরিপুর, কোথাও পরমাণু বিদ্যুৎ নয়', 'সেই দিনের ফুড বাস্কেট আজকের ক্যান্সার বেল্ট'প্রভৃতি প্রবন্ধের। এগুলি এর আগেই পুস্তিকা হিসেবে প্রচারিত হয় বহু গণসংগঠন মারফত। অভীকান্তির নেতৃত্বে গড়া একচেটিয়া আগ্রাসন-বিরোধী মঞ্চ তার মধ্যে প্রধান।

    ভারতীয় কৃষি, পুরনো কৃষি ব্যবস্থার পরিবর্তে বিদেশি প্রযুক্তির বহুল ব্যবহারের ক্ষতিকর দিক, কৃষিক্ষেত্রে বহুজাতিক-অধিজাতিক বাণিজ্যিক সংস্থার ক্রমবর্ধমান প্রচ্ছায়া, কৃষকদের আত্মহত্যার মিছিল— এই সব অভীকান্তির প্রবন্ধে এসেছে বার বার। সম্পাদকরাই স্বীকার করেছেন, কিছু কথা নানা ক্ষেত্রে পুনরুল্লিখিত  হয়েছে। অনেক সময়ই তাৎক্ষণিক রাজনৈতিক প্রয়োজন মেটাতে নানা সামাজিক আন্দোলনের নেতা হয়ে ওঠা বিজ্ঞানীকে কলম ধরতে হয়েছে। বারে বারে সজোরে একই কথা বলতে হয়েছে। ফলে সে সব লেখা রচনাসংগ্রহের পাঠকের কাছে পৌনঃপুনিকতা দোষে দুষ্ট মনে হতে পারে। আসলে অভী সময়ের চাহিদা মিটিয়েছেন। ফেলে আসা উত্তাল সময়ের দিকে ফিরে তাকালে মনে হয় অভী-ই ঠিক। দুর্ভাগ্য, তিনি প্রবন্ধগুলি সংশোধনের কোনও সুযোগ পাননি। রচনা নির্বাচনের ভারও বর্তেছে অনুরাগীদের উপর। মনে হতেই পারে প্রবন্ধগুলি যত না বৈজ্ঞানিক, তার চেয়ে বেশি সামাজিক প্রচারধর্মী। আমি একমত। অভী সামাজিক প্রবন্ধই লিখতে চেয়েছিলেন সাধারণের জন্য।

    বহু বিষয়ে অভী প্রতিবাদী। খুচরো ব্যবসায় বৃহৎ বিদেশি পুঁজির অনুপ্রবেশকে অভী দেখেছেন দেশজ অর্থনীতির উপর একচেটিয়া সার্বিক দখলদারি হিসেবে। তাঁর কাছে এ হল নয়া উপনিবেশের সূচনা। কৃষিতে চুক্তিচাষ, বংশাণু পরিবর্তিত বা জি এম ফসলের প্রসার এবং কর্পোরেট রাজকে অভী তুলনা করেছেন নীল চাষের যুগের সঙ্গে। শপিং মল, উড়ালপুল, মাল্টিপ্লেক্স শোভিত উন্নয়নের অন্তর্বস্তু  আসলে যে নূতন রূপে বহুজাতিক আগ্রাসন— এ বিষয়ে অভী নিশ্চিত। দ্বিতীয় সবুজ বিপ্লব প্রকৃতপক্ষে ক্ষুধার্ত ভারতবাসীর জঠরাগ্নি উপশমের জন্য নয় মনস্যান্টো, আর্চার ড্যানিয়েল মিডল্যান্ড আর ওয়ালমার্ট-এর মুনাফার স্বার্থে, তা অভী তাঁর অননুকরণীয় ভঙ্গিমায় তুলে ধরেছেন। আধার কার্ড প্রসঙ্গে অভীর প্রবন্ধ 'কাদম্বরী আধার বুকে লটকাইয়া প্রমাণ করিবেন তিনি ভারতীয়'— যথেষ্ট চিন্তার খোরাক জোগায়। বারবারই মনে হয় অভী সব ধরনের আধিপত্যবাদের বিরোধী। 'মনোকালচার'-এর বিপ্রতীপে বিভিন্ন মানবগোষ্ঠীর আত্মনিয়ন্ত্রণের অধিকার, সার্বভৌমত্বের অধিকার এবং বিকশিত গণতন্ত্রের অধিকারের সমর্থক ও প্রবক্তা। বিজ্ঞানীর অভ্রংলিহ  গজদন্তমিনার  থেকে নেমে এসে দুঃখী দরিদ্র মানুষের সমাজে তাঁর পদচারণা।

    অভীকান্তির প্রতিটি প্রবন্ধই বজ্রগর্ভ। অশেষ চিন্তা, আলোচনা এবং সম্ভাবনার দ্বার খুলে দেয়। রচনাকালের উল্লেখ থাকলে রাজনৈতিক ও সামাজিক প্রেক্ষিত বুঝতে পাঠকদের সুবিধে হত। কিছু কিছু মুদ্রণপ্রমাদ এবং বানানের তারতম্য চোখে লাগে।

    http://www.anandabazar.com/supplementary/pustokporichoi/%E0%A6%B8-%E0%A6%A7-%E0%A6%B0%E0%A6%A3-%E0%A6%B0-%E0%A6%9C%E0%A6%A8-%E0%A6%AF%E0%A6%87-%E0%A6%B2-%E0%A6%96%E0%A6%A4-%E0%A6%9A-%E0%A7%9F-%E0%A6%9B-%E0%A6%B2-%E0%A6%A8-1.53826


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    নরেন্দ্র মোদী: আমেরিকার জন্য ভারতীয় ধাঁধা

    নরেন্দ্র মোদী: আমেরিকার জন্য ভারতীয় ধাঁধা

    @VOR

    ভারতে নির্বাচনী প্রচারের জোরদার সময়ে আমেরিকার রাজনীতিবিদরা এবারে বিরোধী পক্ষ ভারতীয় জনতা দলের নেতা ও প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী নরেন্দ্র মোদীর সঙ্গে যোগাযোগের রাস্তা খুঁজছে. তাঁকে নিমন্ত্রণ করা হয়েছিল "ক্যাপিটাল হিলসে ভারত দিবসে"আমেরিকার কংগ্রেস সদস্যদের সামনে বক্তৃতা দিতে. তবে এটাও ঠিক যে, ব্যক্তিগত ভাবে নয়, স্রেফ ভিডিও যোগাযোগের মাধ্যমে.

    এক সময়ে মোদীকে আমেরিকায় প্রবেশের ভিসা দিতে অস্বীকার করা হয়েছিল ২০০২ সালে তাঁর রাজ্য গুজরাটে মুসলমানদের উপরে দাঙ্গা করার সময়ে যোগাযোগের সন্দেহে. আজ কিন্তু ওবামা প্রশাসন ও তাঁর বিরোধী রিপাব্লিকান দলের লোকরা বুঝতে দিচ্ছেন যে, সমস্যা আসলে অনুপস্থিত, আর যদি মোদী ভারতের প্রধানমন্ত্রী হিসাবে নির্বাচিত হন, তবুও দুই দেশের সম্পর্ক এখনকার মতই ঘনিষ্ঠ থাকবে. কিন্তু সরকারি মুখপাত্ররা যাই বলুন না কেন, ভারতের প্রশাসনে বিজেপি দলের আবির্ভাব হলে, ওয়াশিংটনের "ভারতীয় রাজনীতিতে"নতুন করে সমস্যার সৃষ্টি হতেই পারে, এই রকম মনে করে আমাদের সমীক্ষক সের্গেই তোমিন বলেছেন:

    "বিরোধী দল জনতা পার্টির পক্ষ থেকে প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী নরেন্দ্র মোদী এখন মোটেও আমেরিকার নিষিদ্ধ ব্যক্তিদের তালিকায় নেই, বরং তিনি এখন মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের এক পছন্দের অতিথি হয়েছেন. আমেরিকার রাজনীতিবিদরা তৈরী আছেন তাঁর সঙ্গে কাজ করার জন্য, ২০১৪ সালের লোকসভা নির্বাচনের ফলাফলের উপরে অপেক্ষা না করেই, এই কথা ঘোষণা করেছেন মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের কংগ্রেসে রিপাব্লিকান পার্টির সদস্যা কেটি ম্যাকমরিস রজার্স. তিনি মার্কিন সেনেটে প্রভাবশালী রিপাব্লিকান কনফারেনসের প্রধান. তিনি ঘোষণা করেছেন যে, "আমি আপনাকে ভারতীয় জনতা পার্টির পক্ষ থেকে প্রধানমন্ত্রী পদের জন্য বাছাই হওয়ার জন্য অভিনন্দন জানাতে চাই"আর মোদীকে ভারতীয় বিরোধী দলের নেতা হিসাবে ভিডিও আলাপে আমেরিকার কংগ্রেস সদস্য ও মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রে ভারতীয় বংশোদ্ভূতদের প্রতিনিধিদের প্রতি বক্তব্য জানাতে আহ্বান করেছেন".

    এই প্রসঙ্গে তোমিন আবার বলেছেন:

    "বিশেষ করে মনোযোগ দেওয়ার বিষয়ে ইঙ্গিত, যা দিয়ে আজ মোদীকে আমেরিকার রাজনীতিবিদরা ঘিরে ধরেছেন – তা একটা সুদূর লক্ষ্য করেই পদক্ষেপ, সবার আগে, এই ধরনের ইঙ্গিত করা হয়েছে একটা ভুল ধারণাকে ঢাকা দিতে, যা দ্বিপাক্ষিক সম্পর্কের ক্ষেত্রে রয়েছে যখন থেকে মোদীকে সেই সমস্ত লোকদের তালিকায় রাখা হয়েছে, যাঁদের আমেরিকায় ঢোকা নিষেধ. মোদীকে আগে দেওয়া মার্কিন ভিসা প্রত্যাহার করা হয়েছিল ইমিগ্রেশন ও ন্যাশনালটি অ্যাক্ট প্রয়োগ করে, যে আইন আমেরিকায় প্রবেশ আটকানোর জন্য ব্যবহার করা হয় সেই সব বিদেশী রাজনীতিবিদদের দেশে প্রবেশ করা নিয়ে, যাদের নামে মানুষের অধিকার ও ধর্মীয় স্বাধীনতা খর্ব করার অভিযোগ রয়েছে".

    যদিও মোদীর সেই সময়ে হিন্দু ও মুসলমানদের রক্তক্ষয়ী দাঙ্গায় সরাসরি যোগাযোগের প্রমাণ এখনও করা সম্ভব হয় নি, তবুও আজ অবধি সেই সময়ে মোদীর নেওয়া সিদ্ধান্ত নিয়ে কিছু দ্বর্থ্যবোধক ধারণা রয়েই গিয়েছে.

    এই ধরনের ব্যাপারের উপরে জোর দেওয়া নিয়েই কয়েকদিন আগে বিজেপির এক নেতা শত্রুঘ্ন সিনহার বক্তব্য শোনা গিয়েছে. তিনি জোর দিয়েই বলেছেন যে, মোদী নির্বাচিত হলে ওয়াশিংটন বাধ্য হবে তাঁকে ভিসা দিতে, "কারণ সেই ধরনের পরিস্থিতির কথা ভাবাই যায় না, যখন অন্য দেশের প্রধানমন্ত্রীকে ওয়াশিংটন ভিসা দিতে অস্বীকার করেছে". এই প্রসঙ্গে শত্রুঘ্ন সিনহার বক্তব্যে প্রকাশ পেয়েছে যে, তাঁর দল "আমেরিকার প্রতি সমস্ত রকমের শ্রদ্ধা ও মর্যাদা বোধ থাকা স্বত্ত্বেও তাদের সিদ্ধান্তের সঙ্গে একমত না হতেও পারে".

    নিজের পক্ষ থেকে রাষ্ট্রপতি ওবামার প্রশাসন তাঁর এক "নাম প্রকাশে অনিচ্ছুক"প্রতিনিধিকে দিয়ে ভারতীয় সংবাদ মাধ্যমকে শান্ত করেছেন যে, সংবাদ মাধ্যমেই মোদীকে আমেরিকার ভিসা দেওয়ার প্রসঙ্গকে অহেতুক ফুলিয়ে তোলা হয়েছে, বাস্তবে আমেরিকায় আসা নিয়ে মোদীর কোন অসুবিধাই নেই.

    সব দেখে শুনে মনে হয়েছে যে, সেই রকমই হতে চলেছে. বাস্তবে, কোন ভাবেই চিন্তা করা যায় না যে, বিশ্বের "সবচেয়ে বেশী সংখ্যক মানুষের গণতন্ত্রের"দেশের নেতা বিশ্বের "নেতৃত্ব দেওয়া গণতন্ত্রে"প্রবেশের অধিকার রাখবেন না. সেই ধরনের চিত্রনাট্য একেবারেই আশ্চর্যজনক লাগবে. কিন্তু বিজেপি দলের ভেটেরান শত্রুঘ্ন সিনহা শুধুশুধুই ইঙ্গিত করেন নি যে, নরেন্দ্র মোদী আমেরিকা যাওয়ার ইচ্ছা নি য়ে খুব একটা আগ্রহী নন, আর বিজেপি দল ওয়াশিংটনের সাথে বহু প্রশ্নের ক্ষেত্রেই একমত না হওয়ার অধিকার নিজেদের হাতেই বজায় রাখছে, তাই আবার করে সের্গেই তোমিন বলেছেন:

    "আজকে ওয়াশিংটনের সরকারি মুখপাত্ররা যাই বলুন না কেন, বিজেপি কিন্তু ভারতের চিরন্তন মূল্যবোধের দোহাই দিয়ে আমেরিকা ও তাদের রাজনীতির প্রতি সমালোচনাই করেছে. এর উদাহরণ যথেষ্টই রয়েছে. সিরিয়া সঙ্কটের সব থেকে জোরে জ্বলে ওঠার সময়ে বিজেপি ও বামপন্থী বিরোধী দলেরা মনমোহন সিংহের সরকারকে প্রাথমিক ভাবে ওবামার নীতি হিসাবে গৃহীত সিরিয়াতে সামরিক অনুপ্রবেশের বিরুদ্ধে যথেষ্ট কড়া অবস্থান না নেওয়ার জন্য অনেক সমালোচনা করেছে".

    আরও একটি উদাহরণ হতে পারে ২০১০ সালে জ্বলে ওঠা এক অভূতপূর্ব স্ক্যান্ডাল, যা হয়েছিল মনমোহন সিংহের সরকারের পরিকল্পিত নীতি অনুযায়ী দেশের বাজারে আমেরিকার থেকে আনা জিনের স্তরে পরিবর্তিত মনস্যান্টো কোম্পানীর বেগুন বিক্রী করা নিয়ে. এর প্রতিবাদে তখন বিজ্ঞানী, চাষী, বেসরকারি জন সহায়ক সংস্থার প্রতিনিধিরা ও বিজেপি দল একজোট হয়েছিল. তাদের মতে এই নতুন খাবার ভারতের বহু লক্ষ মানুষের জন্য মৃত্যুর সমান হয়ে দাঁড়াবে আর বিরোধী পক্ষ সরকারকে দোষ দিয়েছিল যে, সরকার ভারতের জাতীয় খাদ্য নিরাপত্তা মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের স্বার্থে তৈরী হয়েছে বিক্রী করে দিতে.

    এই ভাবেই, ভারতের প্রশাসনে নরেন্দ্রে মোদীর উদয় হলে ওয়াশিংটনের ভারত সংক্রান্ত রাজনীতিতে নতুন করে সমস্যা যোগ হয়ে যেতে পারে. মোদীকে শুধু একটা দেশে ঢোকার ভিসা দিয়ে আমেরিকা এই সমস্যার সমাধান করতে পারবে না.

    আমেরিকা, ভারত, মার্কিন, আমেরিকা – হিন্দুস্থান: সম্পর্ক ও সমস্যা সম্বন্ধে রাশিয়ার অবস্থান, নির্বাচন, রাজনীতি

    সম্পূর্ণ পড়তে হলে: http://bengali.ruvr.ru/2013_11_13/markin-bharat-modi/



    বাংলাদ্যাশেও উন্য়নের রগড় লেগেছে

    জনকন্ঠে পড়ুনঃ

    প্রত্যেক জেলায় শিল্পাঞ্চল গড়ে তুলতে প্রধানমন্ত্রীর নির্দেশ

    সাভারে চামড়া শিল্পের জন্য ইটিপি স্থাপনের তাগিদ

    প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা শিল্পের বিকাশে প্রত্যেক জেলায় শিল্পাঞ্চলের জন্য স্থান নির্ধারণ এবং এ লক্ষ্যে জরিপ চালাতে সংশ্লিষ্ট মন্ত্রণালয়কে নির্দেশ দিয়েছেন।

    প্রধানমন্ত্রী বলেন, ২০৪১ সালের মধ্যে একটি উন্নত বাংলাদেশ প্রতিষ্ঠার জন্য এই পরিকল্পনা স্থানীয় সুযোগ-সুবিধার ব্যবহার করে ব্যবসা করতে বিনিয়োগকারীদের উৎসাহিত করবে।

    তিনি রবিবার মতিঝিলে শিল্প মন্ত্রণালয় পরিদর্শনকালে মন্ত্রণালয়ের কর্মকর্তাদের উদ্দেশে ভাষণে এ নির্দেশ দেন। খবর বাসসর।

    শেখ হাসিনা বলেন, শিল্প প্রবৃদ্ধির জন্য বেসরকারী খাতের ওপর গুরুত্ব দেয়া হলেও এ ক্ষেত্রে সরকারী কর্মকর্তাদের মনে রাখতে হবে, বিশেষ করে শিল্পনীতির যথাযথ বাস্তবায়ন ও অন্যান্য বিষয় মনিটরিংয়ে সরকারের বিরাট ভূমিকা রয়েছে। প্রধানমন্ত্রী পরিবেশবান্ধব শিল্প গড়তে কর্মকর্তাদের সতর্কতার সঙ্গে কাজ করার আহ্বান জানিয়ে বলেন, সব সময় পরিবেশবাদীদের হই-চই শুনতে হবে এমন কোন কথা নয়।

    তিনি বলেন, যেখানে সেখানে শিল্প-কারখানা স্থাপনের অনুমতি দেয়া যাবে না। তবে সুচিন্তিত পরিকল্পনার মাধ্যমে মূল্যবান জমি ও পরিবেশ ধ্বংস না করে শিল্পের জন্য নির্ধারিত স্থান গড়ে তুলতে হবে।

    বাংলাদেশ তার কৃষি, শিল্প ও জনশক্তির ভিত্তিতে একটি সুখী ও সমৃদ্ধ দেশে পরিণত হবে- এ আস্থা ব্যক্ত করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, 'আমরা এসব সম্পদ পরিকল্পিতভাবে কাজে লাগাতে পারলে কেউ আমাদের আটকাতে পারবে না।'

    শিল্পমন্ত্রী আমির হোসেন আমু ও মন্ত্রণালয়ের সচিব মোহাম্মাদ মঈনউদ্দিন আবদুল্লাহ অনুষ্ঠানে বক্তৃতা করেন।

    প্রধানমন্ত্রী শিল্পনীতিতে সঙ্গতি বজায় রাখার ওপর গুরুত্বারোপ করে বলেন, অতীতে এ ক্ষেত্রে বিভিন্ন সরকার বিভিন্ন নীতি অনুসরণ করেছে। আমাদের বেসরকারী উদ্যোক্তা প্রয়োজন। তবে সরকারী খাত না থাকলে নিয়ন্ত্রণ ও মান কোনটাই থাকে না।

    তিনি বলেন, বর্তমানে সরকারী খাতের শিল্প-কারখানা পুনর্গঠনের পাশাপাশি বেসরকারী খাতের বিকাশেও খুবই উদার নীতি নেয়া হয়েছে।

    শেখ হাসিনা বলেন, তাঁর সরকার বিশাল জনসংখ্যার এই দেশে শ্রমঘন শিল্প স্থাপন করতে চায়। এ জন্য শ্রমিকদের আধুনিক প্রযুক্তিতে দক্ষ করতে প্রয়োজনীয় প্রশিক্ষণের ওপর গুরুত্ব দেয়া হয়েছে।

    দেশের ৭ অঞ্চলে বিশেষ শিল্পাঞ্চল স্থাপনে বর্তমান সরকারের পরিকল্পনার কথা উল্লেখ করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, এছাড়াও স্থানীয় ও বিদেশী বিনিয়োগের উপযোগী আরও স্থান খুঁজে দেখা হচ্ছে।

    এ প্রসঙ্গে তিনি বলেন, সরকার আর কোন পাটকল বিক্রি করবে না। বরং এসব স্থপনাকে দেশী ও বিদেশী বিনিয়োগকারীদের জন্য শিল্প প্লটে রূপান্তর করা হবে। তিনি সারের উৎপাদন শুরু করতে সাফকোতে গ্যাস সরবরাহের নির্দেশ দেন।

    এদিকে বিডি নিউজ জানায়, সাভারে চামড়া শিল্পের জন্য ইটিপি স্থাপন করে হাজারীভাগ থেকে অপরিকল্পিত শিল্প সরিয়ে 'দ্রুত'শিল্পনগরী বাস্তবায়নের তাগিদ দেন প্রধানমন্ত্রী। একই সঙ্গে খাদ্য প্রক্রিয়াজাত পণ্যের উৎপাদন বাড়িয়ে রফতানি বাড়ানোর বিষয়েও তিনি তাগিদ দেন।

    বঙ্গবন্ধু ও তাঁর পরিবারের অধিকাংশ সদস্যের হত্যাকাণ্ডের স্মৃতি স্মরণ করে শেখ হাসিনা বলেন, 'আমি ও আমার বোন ছাড়া আমাদের পরিবারের সবাইকে আমরা হারিয়েছি। এই ব্যথা বুকে নিয়ে বাংলাদেশকে উন্নত ও সমৃদ্ধ জাতি হিসেবে বিশ্ব সভায় মর্যাদার আসনে সমাসীন করতে আমি সংগ্রাম করে যাচ্ছি।'

    দেশের উন্নয়নে শিল্প প্রবৃদ্ধির ওপর গুরুত্বারোপ করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, বাংলাদেশ কৃষিভিত্তিক দেশ, আমরা কৃষিকে অবহেলা করতে পারি না। তবে কৃষি খাতের শিল্পায়ন ছাড়া অর্থনৈতিক উন্নয়ন সম্ভব নয়।

    তিনি বলেন, এখন হচ্ছে শিল্প উন্নয়নের সময়। বিদেশী বিনিয়োগকারী বাংলাদেশে শিল্প স্থাপনে আগ্রহী। একই সঙ্গে সরকারও বেসরকারী খাতের পাশাপাশি সরকারী খাত ও সমবায়ের ওপর গুরুত্বারোপ করেছে।

    তিনি বলেন, জাতির পিতা বঙ্গবন্ধু শেখ মুজিবুর রহমান ১৯৫৪ সালে যুক্তফ্রন্ট সরকারের শিল্পমন্ত্রী থাকাকালে এদেশে শিল্প প্রবৃদ্ধির সূচনা হয়। স্বল্প সময়ের মধ্যে বঙ্গবন্ধু 'বাংলাদেশ শিল্প ও বাণিজ্যের উপযোগী নয়'পাকিস্তানের এই দৃষ্টিভঙ্গির বিরুদ্ধে এ অঞ্চলে শিল্পের উন্নয়নে অনেক আইনী কাঠামো প্রণয়নসহ বিভিন্ন পদক্ষেপ নিয়েছেন।

    প্রধানমন্ত্রী বলেন, বঙ্গবন্ধু ছিলেন এ দেশে পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনার অগ্রদূত। তাঁর পদাঙ্ক অনুসরণ করেই আওয়ামী লীগ ১৯৯৬ সালে সরকার গঠনের পর পঞ্চম পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনা প্রণয়ন করে।

    বর্তমান ২০০৯ সালের ৬ষ্ঠ পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনার আওতায় দেশে উন্নয়ন কর্মকা- গৃহীত হচ্ছে। এ সঙ্গে রয়েছে ১০ সালা প্রেক্ষিত পরিকল্পনা। এতে শিক্ষা ও কর্মসংস্থান সৃষ্টির ওপর গুরুত্বারোপ করা হয়েছে। এসব পরিকল্পনায় শিল্প প্রবৃদ্ধির ওপর গুরুত্ব দেয়ায় এতে শিল্পের উন্নয়ন হবে এবং যা শিক্ষিত যুবকদের কর্মসংস্থান সৃষ্টি ও দারিদ্র্য বিমোচনের সহায়ক হবে।

    এ প্রসঙ্গে তিনি বিগত বিএনপি সরকারের এক বছর বা দুই বছর মেয়াদী বা এ্যাডহক ভিত্তিক উন্নয়ন পরিকল্পনার সমালোচনা করে বলেন, দেশের উন্নয়নে দীর্ঘমেয়াদী পরিকল্পনা প্রয়োজন।

    বিটি বেগুন সমাচার

    গবেষণার নামে প্রাণ-উপনিবেশীকরণ

    পাভেল পার্থ

    রাষ্ট্রকে এ বহুজাতিক প্রাণ-উপনিবেশীকরণের বিরুদ্ধে ঘাড় সোজা করে দাঁড়াতে হবে। বাংলাদেশের বেগুন নিয়ে যাবতীয় সম্পর্ক, সিদ্ধান্ত, রূপান্তর, বিকাশ ও মালিকানা বাংলাদেশের জনগণের। বিটি বেগুন বাতিল করে জনগণের দেশী বেগুন-অর্থনীতিকেই বিকশিত করতে হবে

    পৃথিবীতে কৃষি ও জুমনির্ভর গ্রামীণ নিম্নবর্গই সম্ভবত সর্বাধিক গবেষিত জনগোষ্ঠী। চলতি সময়ে বৈজ্ঞানিক গবেষণা, 'বায়োপ্রসপেক্টিং'ও জিনপ্রযুক্তি গবেষণার নামে গ্রামীণ নিম্নবর্গের হাজার বছরের প্রাণসম্পদ ও ঐতিহ্যগত জ্ঞানও ছিনতাই ও ডাকাতি হচ্ছে। জাতীয় রাষ্ট্রগুলো নানা উন্নয়ন প্রকল্পের মাধ্যমে বহুজাতিক কোম্পানিকে এ সুযোগ তৈরি করে দিচ্ছে। একসময় অর্থকড়ি, জমিজমা, ধনদৌলতের মতো দৃশ্যমান বস্তুগত বিষয়াদি ছিল লুটতরাজের নিশানা। কলম্বাসের সময় অন্যায়ভাবে দেশ দখল ছিল ঔপনিবেশিক লুটতরাজের প্রধান ক্ষেত্র। আজ সেই ঔপনিবেশিক লুটতরাজের নিশানা পাল্টেছে। এখন লুট হচ্ছে প্রাণের গুরুত্বপূর্ণ ভিত্তি মৌলকণা 'জিন'। জিন মানে হলো বংশগতির ধারক ও বাহক। মানে বেগুন কি মানুষ? আমাদের শরীরে সহস্র কোটি কোষ আছে। কোষে আছে জিন। আর এ জিনের ভিন্ন ভিন্ন বিন্যাসই খুমিদের চেহারার সঙ্গে সাঁওতালদের চেহারার ভিন্নতা তৈরি করেছে। এ জিন বিন্যাসের ভিন্নতাই কোনো বেগুন লম্বা কোনোটা গোল। গরিব দেশের প্রাণসম্পদ ও লোকায়ত জ্ঞানের ওপর চলতি সময়ের এ বহুজাতিক ঔপনিবেশিক দস্যুতার নামই 'প্রাণ-উপনিবেশীকরণ'। মনস্যান্টো, সিনজেনটা, ডুপন্ট, বায়ার ক্রপ সায়েন্স, কারগিল, ফাইজার, কোক-পেপসির মতো বহুজাতিক কোম্পানিরাই এ অন্যায় 'প্রাণ-উপনিবেশীকরণকে'তরতাজা রাখছে। সারা দুনিয়ার গরিব নিম্নবর্গের প্রাণসম্পদ ও লোকায়ত বিজ্ঞান নানা প্রকল্প ও গবেষণার নামে একতরফা ডাকাতি ও নিয়ন্ত্রণ করছে। দুনিয়ার সামগ্রিক বীজ বাজারের ৬৪ শতাংশ আজ দখল করে রেখেছে দশটি বহুজাতিক কোম্পানি। একা মনস্যান্টোই নিয়ন্ত্রণ করে এর এক-পঞ্চমাংশ। ২০০৫ থেকে ২০১৪ সালে সম্পাদিত 'বিটি বেগুন প্রকল্পের'নামে মনস্যান্টো বাংলাদেশের নয়টি বেগুন জাত ছিনতাই করেছে। বেগুনের জিনসম্পদের এত বড় বহুজাতিক ডাকাতি এই প্রথম। এসব বহুজাতিক কোম্পানি আইনি খবরদারির মাধ্যমে ছিনতাই করা প্রাণসম্পদের ওপর নিজেদের একতরফা নিয়ন্ত্রণ ও মালিকানার জন্য এসব পেটেন্ট করে ফেলে; যাতে একটি নির্দিষ্ট সময়ের জন্য পেটেন্টকৃত প্রাণসম্পদের ওপর ওই কোম্পানির একতরফা কর্তৃত্ব ও মালিকানা প্রতিষ্ঠিত হয়। ১৯৯৫ সালে আমেরিকার মিসিসিপি মেডিকেল সেন্টার ইউনিভার্সিটি যখন একতরফাভাবে হলুদ পেটেন্ট করে, তখন এ জিন-দস্যুতার বিরুদ্ধে বৈশ্বিক প্রতিরোধ জোরদার হয়। ২০০০ সালে আমেরিকার ডব্লিউ আর গ্রেস কোম্পানি নিমগাছের পেটেন্ট দাবি করে, ১৯৯৭ সালে আমেরিকার রাইসটেক ইনকরপোরেশন বাসমতি ধানের ওপর পেটেন্ট অধিকার চায়। শামান ফার্মাসিউটিক্যালস এবং বডিশপ আমাজন বর্ষারণ্যের আদিবাসীদের সঙ্গে কাজ করে তাদের ঐতিহ্যগত উদ্ভিদ ব্যবহার থেকে কিছু বাণিজ্যিক পণ্য হিসেবে বিক্রি শুরু করে। ভারতের দি আরায়া বৈদ্য ফার্মেসি কানি আদিবাসীদের ঐতিহ্যগত উদ্ভিদ আরোগ্যপাচ্চাকে পেটেন্ট করে। সাম্প্রতিক প্রাণ-উপনিবেশীকরণ ঘটেছে গ্রামবাংলার বেগুনকে ঘিরে। বিটি বেগুন গবেষণা প্রকল্পের ভেতর দিয়ে বাংলাদেশের উত্তরা, কাজলা, নয়নতারা, শিংনাথ, দোহাজারী, চ্যাগা, খটখটিয়া, ইসলামপুরী ও ঈশ্বরদী লোকাল এ নয়টি বেগুন জাতের ওপর মনস্যান্টোর বহুজাতিক মালিকানা প্রতিষ্ঠিত হয়েছে।

    হাজার বছরের নাম ও স্বভাব পাল্টে গেছে

    বাংলাদেশ বেগুনের জন্মভূমি ও উত্পত্তিস্থল। দেশে এখনো টিকে আছে শিংনাথ, খটখটিয়া, লম্বা, মোটা, তবলা, গোল, কালা, লতা, পুতা, সাদা, লাল, ঝুমকি, ডিম, তিতা, বারোমাইস্যা, কামরাঙ্গা, তাল, টুপরি, কুলি, টোপা, আউশা, হিংলা, ঘি কাঞ্চন, আমঝুপি, কাঁটা নানা নামে নানা স্বাদের বেগুন। আদিবাসী অঞ্চলে আছে বারেং মেকব্রেও, কামরাঙ্গা বারেং, খুমকা, বারেং দচি, বারেং মিগন এ রকম কত জাতের জুম বেগুন। বাংলাদেশে বিভিন্ন প্রতিষ্ঠানে সংরক্ষিত শস্য ফসলের জাতগুলোর একটি প্রাণসম্পদ তালিকা তৈরি হয় ১৯৯৬ সালে। 'জবঢ়ড়ত্ঃ ড়হ ঢ়ষধহঃ মবহবঃরপ ত্বংড়ঁত্পবং ১৯৯৬'নামে সেই তালিকাটিকে মূল তালিকা ধরে ২০০৬ সাল পর্যন্ত আপডেট করা হয়। উক্ত প্রতিবেদনে বাংলাদেশ কৃষি গবেষণা ইনস্টিটিউটে (বারি) বেগুনের (ঝড়ষধহঁস সবষড়হমবহধ) মোট ২৪৮টি একসেশন সংরক্ষণের কথা উল্লেখ করা হয়েছে। মনস্যান্টোর ডাকাতি করা নয়টি বেগুন জাতের ভেতর কেবল নয়নতারা জাতটির উত্পত্তিস্থল ভারত। ১৯৯৮ সালে বারি একে দেশে চাষের অনুমোদন দেয়। নয়টি দেশী বেগুন জাতে বিটি জিন ঢুকিয়ে বিটি বেগুন প্রকল্প শুরু হয় ২০০৫ সালে। জাতীয় বীজ বোর্ড ২০১৩ সালের ৩০ অক্টোবর উত্তরা (বারি-১), কাজলা (বারি-৪), নয়নতারা (বারি-৫) ও বারি-৬কে যথাক্রমে বিটি বেগুন-১, ২, ৩, ৪ নামে ছাড় দেয়। শুধু একটি জিনের বদলের কারণে বেগুনগুলোর ঐতিহ্যগত নাম-পরিচয় ও স্বভাবকে সম্পূর্ণ পাল্টে ফেলা হয়েছে। বেগুনের সঙ্গে জনগণ ও প্রতিবেশের ঐতিহাসিক সম্পর্ক ও বিজ্ঞানকে এক্ষেত্রে গুরুত্ব দেয়া হয়নি। বেগুনের নাম-পরিচয়কে এভাবে পাল্টে দেয়া সংবিধানের ৩২ অনুচ্ছেদের চূড়ান্ত লঙ্ঘন। যেখানে স্পষ্ট বলা হয়েছে, আইনানুযায়ী ব্যতীত জীবন ও ব্যক্তি-স্বাধীনতা হতে কোনো ব্যক্তিকে বঞ্চিত করা যাবে না। রাষ্ট্র বিটি বেগুনের নামে দেশী বেগুনের নাম ও স্বভাব পাল্টে প্রাণ ও প্রকৃতির জীবন ও স্বাধীনতাকে ক্ষুণ্ন করেছে।

    বিটি বেগুনের অন্যায় চুক্তি

    জিনপ্রযুক্তির মাধ্যমে বিকৃত ঘটানো বেগুনের নাম বিটি বেগুন। বেগুনের ফল ও ডগা ছিদ্রকারী পোকা মারার জন্য বেগুনের ভেতর একটি ব্যাকটেরিয়ার জিন ঢুকিয়ে গবেষণাগারে এ কৃত্রিম বেগুন তৈরি করা হয়েছে। বিটি জিন এবং বিটি জিনপ্রযুক্তির মেধাস্বত্ব ও মালিকানা মার্কিন বহুজাতিক কৃষি বাণিজ্য কোম্পানি মনস্যান্টোর। ভারতীয় করপোরেট কোম্পানি মাহিকো মনস্যান্টোর এ বিটি জিনপ্রযুক্তি ব্যবহারের অনুমোদন লাভ করে। পরে মাহিকো কোম্পানির এ প্রযুক্তি ব্যবহার করে বিটি বেগুন উৎপাদন ও ব্যবহারের জন্য 'পাবলিক-প্রাইভেট পার্টনারশিপের'মাধ্যমে বাংলাদেশ, ভারত ও ফিলিপাইনকে নিয়ে দক্ষিণ এশিয়ার জন্য 'কৃষি প্রাণপ্রযুক্তি সহায়তা প্রকল্প-২ নামে ২০০৫ সালে বিটি বেগুন প্রকল্প চালু হয় মার্কিন দাতা সংস্থা ইউএসএইডের সহায়তায়। ২০০৫ সালের ১৪ মার্চ বাংলাদেশের পক্ষে বাংলাদেশ কৃষি গবেষণা ইনস্টিটিউট (বারি), মহারাষ্ট্র হাইব্রিড সিড কোম্পানি লিমিটেড (মাহিকো) এবং কৃষি প্রাণপ্রযুক্তি সহায়তা প্রকল্প-২-এর পক্ষে সত্গুরু ম্যানেজমেন্ট কনসালট্যান্টস প্রাইভেট লিমিটেড এক ত্রিপক্ষীয় 'শতগুরু চুক্তি'স্বাক্ষর করে। যদিও বারি বলছে, মাহিকো ও বারির ভেতর ম্যাটেরিয়াল ট্রান্সফার এগ্রিমেন্ট স্বাক্ষর হয় ১৬/০২/২০০৫ সালে। চুক্তির ১.১৯নং শর্তে স্পষ্ট বলা হয়েছে, বিটি বেগুন প্রকল্পে ব্যবহূত বিটি জিন, বিটিপ্রযুক্তি ও এ প্রযুক্তির মাধ্যমে উদ্ভাবিত বা বিক্রয়যোগ্য সব বিটি বেগুনের ওপর মেধাস্বত্ব অধিকার ও নিয়ন্ত্রণ মনস্যান্টো কোম্পানির। মনস্যান্টোর পেটেন্টকৃত বিটি জিন বাংলাদেশী বেগুনে ঢোকানোর ভেতর দিয়ে উল্লিখিত চুক্তি মোতাবেক এখন মনস্যান্টো বাংলাদেশের উল্লিখিত বেগুনের ওপর তার কর্তৃত্ব ও নিয়ন্ত্রণের বৈধতা পেয়েছে। চুক্তির ১.৬নং শর্তে বলা হয়েছে, বিটি বেগুনের বীজ কোম্পানির কাছ থেকে কিনতে হবে। ৯.২ (গ) শর্তে উল্লেখ আছে, বিটি বেগুন বীজের বাণিজ্যিক ও মেধাস্বত্ব অধিকার মনস্যান্টো-মাহিকো কোম্পানির, বিটি বেগুন বীজ এবং প্রযুক্তির বাণিজ্যিক ও মেধাস্বত্ব অধিকার লঙ্ঘিত হলে কোম্পানি এ চুক্তি বাতিল করার অধিকার রাখে। বিটি বেগুনের মালিকানা প্রশ্নে রাষ্ট্র এখনো কোনো স্পষ্ট উত্তর দিতে পারেনি। বারির মহাপরিচালক বিষয়টি অস্বীকার করতে পারেননি। একবার বলছেন, বিটি বেগুনের বীজের মালিকানা বারির থাকবে, আবার বলছেন বিটি জিন ও প্রযুক্তির মালিকানা মনস্যান্টো ও মাহিকো কোম্পানির (সূত্র: দৈনিক সকালের খবর, ২৩/২/২০১৩)। কৃষকদের মাঝে চারা বিতরণ অনুষ্ঠানে বিটি বেগুনের মেধাস্বত্ব বিষয়ে কৃষিমন্ত্রী বলেন, 'বুদ্ধিবৃত্তিক অধিকার, বাণিজ্য-সংক্রান্ত অধিকার, পেটেন্ট ইত্যাদিসহ বিদ্যমান এবং অনাগত অন্য অনেক বিধি ব্যবস্থা মেনেই জিএম ফসলের বাস্তবতাকে মানবকল্যাণে ব্যবহার করতে হবে। তার মানে আমরা স্পষ্ট হতে পারি যে, আমরা কেবল মনস্যান্টোর একটি বিপজ্জনক প্রযুক্তিকেই সফল করে তুলব, কিন্তু এর ভেতর দিয়ে আমাদের প্রাণসম্পদের কোনো মালিকানা ও মেধাস্বত্ব দাবি করতে পারব না।'

    লঙ্ঘিত সনদ ও রক্তাক্ত বেগুন-মানচিত্র

    সংবিধানের ১৮ (ক) অনুচ্ছেদে বলা হয়েছে, রাষ্ট্র বর্তমান ও ভবিষ্যৎ নাগরিকদের জন্য পরিবেশ সংরক্ষণ ও উন্নয়ন করবেন এবং প্রাকৃতিক সম্পদ, জীববৈচিত্র্য, জলাভূমি, বন ও বন্যপ্রাণীর সংরক্ষণ নিরাপত্তা বিধান করবেন। দেশের বেগুন জাতের নিরাপত্তা নিশ্চিত করা রাষ্ট্রের দায়িত্ব। স্বাধীন সার্বভৌম রাষ্ট্র দেশের সম্পদ অন্যায়ভাবে কোনো বহুজাতিকের মালিকানায় তুলে দিতে পারে না। জাতিসংঘের আন্তর্জাতিক প্রাণবৈচিত্র্য সনদের (১৯৯২) অনুচ্ছেদ-১৫ মতে, কোনো রাষ্ট্রের প্রাণসম্পদের ওপর অন্য কোনো রাষ্ট্রপক্ষের অভিগম্যতা কীভাবে ও কতটুকু হবে, তা নির্ধারণ করবে সংশ্লিষ্ট রাষ্ট্রের সরকার এবং তা জাতীয় আইনের অধীন। দেখা যায়, বহুজাতিক কোম্পানিগুলো এসব ছাড়পত্র ও আইনি গ্রহণযোগ্যতা তৈরিতে জাতীয় আইন ও নীতি তৈরিতেও রাষ্ট্রকে নির্দেশ দেয়। আর তাই বাংলাদেশ বিটি বেগুন প্রকল্প বাস্তবায়নের স্বার্থে ২০০৫ সালে একটি রাষ্ট্রবিরোধী চুক্তি ও একটি বায়োসেফটি গাইডলাইন তৈরি করে, ২০০৬ সালে জাতীয় খাদ্যনীতিতে জিএম খাদ্যকে বৈধতা দেয়, ২০১০ সালে জৈবনিরাপত্তা আইন খসড়া করে। বিশ্ব বাণিজ্য সংস্থা নিয়ন্ত্রিত আজ এ করপোরেট বিশ্বায়িত দুনিয়ায় মানুষের সম্পদ, সম্ভাবনা, জ্ঞান, মেধা সবই একতরফাভাবে গবেষণা ও উন্নয়নের নামে ডাকাতি করে নিয়ে যাওয়া হচ্ছে। বিশ্ব বাণিজ্য সংস্থার 'বাণিজ্য-সম্পর্কিত মেধাস্বত্ব চুক্তির (ট্রিপস) ২৭.৩ (খ) অনুচ্ছেদ প্রাণসম্পদ, জ্ঞান, প্রযুক্তির ওপর পেটেন্টের বৈধতা রাখা হয়েছে। বহুজাতিক কোম্পানিগুলো বাংলাদেশের মতো গরিব দেশকে জিনসম্পদ লুটতরাজের সবচেয়ে নিরাপদ ক্ষেত্র মনে করছে। কারণ উল্লিখিত বিটি বেগুন প্রকল্পটি ভারত, বাংলাদেশ ও ফিলিপাইনে একযোগে শুরু হয়। ভারত ও ফিলিপাইন বিটি বেগুন নিজ দেশে নিষিদ্ধ করে। একমাত্র বাংলাদেশই এ প্রকল্প 'সার্থক ও সফলতার'ভেতর দিয়ে শেষ করে বিটি বেগুনের রাষ্ট্রীয় ছাড় ও অনুমোদন দেয়। এটিই নয়াউদারীকরণ ব্যবস্থার প্রাণ-উপনিবেশীকরণের রাজনৈতিক-অর্থনীতি; যা আজ বাংলাদেশের মতো গরিব দেশের ঘাড়ে বসে সবকিছু নিয়ন্ত্রণ করতে চায়। রাষ্ট্রকে এ বহুজাতিক প্রাণ-উপনিবেশীকরণের বিরুদ্ধে ঘাড় সোজা করে দাঁড়াতে হবে। বাংলাদেশের বেগুন নিয়ে যাবতীয় সম্পর্ক, সিদ্ধান্ত, রূপান্তর, বিকাশ ও মালিকানা বাংলাদেশের জনগণের। বিটি বেগুন বাতিল করে জনগণের দেশী বেগুন-অর্থনীতিকেই বিকশিত করতে হবে।

    লেখক: গবেষক ও লেখক




    নাদিরা মজুমদার

    test@gmail.com

    জিন পরিবর্তিত খাদ্য

    14 October 2012, Sunday

    প্রাণিসত্তা মাত্রেরই জন্মগত বৈশিষ্ট্য খোদাই করা থাকে 'জিনে'। জিনের কাজ হলো প্রাণীজগতের বংশানুগতির নিয়ন্ত্রণ করা, অর্থাৎ সে বংশগত বৈশিষ্ট্যের নিয়ন্ত্রক। বিগত অনেক শতাব্দী ধরে, খাদ্যশস্য ও ব্যবহারযোগ্য বিবিধ পশুর জন্মগত বৈশিষ্ট্যকে পরিবর্তনের উপায় হিসেবে মানুষ 'নির্বাচিত প্রজনন পদ্ধতি'ব্যবহার করে আসছে। পদ্ধতিটি প্রাকৃতিকভাবে করা হয়; জিনের বৈশিষ্ট্য পরিবর্তনে বাইরের কোন সরাসরি হস্তক্ষেপ থাকে না। পছন্দমাফিক ফলাফল পেতে দীর্ঘদিন অপেক্ষা করতে হয়; তদুপরি, তা কতটুকু আশাপ্রদ হবে, দৈব্যের ওপরে ভরসা করে থাকতে হয়।


    কিন্তু আধুনিককালে, জিনভিত্তিক প্রকৌশল (জেনেটিক ইঞ্জিনিয়ারিং) ডজনগত বৈশিষ্ট্যের 'যথাযথ'স্থানান্তরের পরিধিকে আরো প্রসারিত করেছে। উদাহরণস্বরূপ যেমন, অতি শীতল সাগরের জলে যে মাছ নির্বিঘেœ বসবাস করছে, তার ডজন স্ট্রবেরি'নামক ফলে সন্নিবিষ্ট করে দেয়া, যাতে ফলটি হিমে কাবু না হয়ে বরং হিম-সহিষ্ণু হয়। অর্থাৎ সর্বাধুনিক মলিকিউলার বায়োলজী টেকনিক ব্যবহার করে গবেষণাগারেই আমাদের পছন্দমাফিক নির্দিষ্ট কোন বৈশিষ্ট্যকে বর্তমানে

    যথার্থভাবে প্রয়োগ ব্যবহার সম্ভব।


    মানুষের বা গবাদীপশুর প্রয়োজনে এভাবে সৃষ্ট খাদ্যকে 'ডজনগত পরিবর্তিত খাদ্য বা জেনেটিক্যালি মডিফাইড খাদ্য বা জেনেটিক্যালি মডিফাইড প্রাণীসত্তা'বা স্রেফ জিএম খাদ্য বা জিএমও বলা হয়। জিএমও'র প্রথম যুগে সাধারণত খাদ্যশস্যের ডজনগত বৈশিষ্ট্যের পরিবর্তনকে প্রাধান্য দেয়া হয়। যেমন, যে উদ্ভিদ জলহীন অনাবৃষ্টি সহ্য করতে সক্ষম, সেই উদ্ভিদের ক্ষরা-সহিষ্ণু ডজনকে অন্য উদ্ভিদে সন্নিবিষ্ট করে দিলে সে-ও অনাবৃষ্টিজনিত শুষ্কতা সহ্য করার ক্ষমতা অর্জন করবে। একইভাবে অ-উদ্ভিদ প্রাণীসত্তার ডজনও উদ্ভিদে সন্নিবেশ হতে পারে। এর বিখ্যাত উদাহরণ হলো ভুট্টাসহ আরও কয়েকটি খাদ্যশস্যে বহুল আলোচিত বি.টি ডজনের সন্নিবেশ।


    বি. টি ডজন প্রাকৃতিকভাবে জন্ম নেয়া ব্যাকটেরিয়া; সে যে ক্রিস্টাল প্রোটিন তৈরি করে-পোকামাকড়ের শুককীটের জন্য তা মারণাস্ত্র। তাই ভুট্টায় এই বি.টি ডজন সন্নিবিষ্ট হওয়ার ফলে ভূট্টা কীটনাশক নিজস্ব শক্তি অর্জন করে। বাজারে, জিএমও খাদ্যের প্রথম 'পাইকারি হারে'র আবির্ভাব ঘটে নব্বইয়ের দশকে। ১৯৯৭ ও ১৯৯৯ সালের মধ্যেই যুক্তরাষ্ট্রের দুই-তৃতীয়াংশ বাজারই জিএমও পণ্য উপকরণে ছেয়ে যায়। সেই সঙ্গে, বাণিজ্যিক উদ্দেশ্যে প্রাণীসত্তার প্যাটেন্ট করার নতুন এক যুগেরও সূচনা হয়। যুক্তরাজ্যের সেইন্সব্যারি ও সেইফওয়ে স্টোরস দুটো ১৯৯৬ সালের গ্রীষ্মে জিএমও টোম্যাটো বিক্রির মাধ্যমে ইউরোপীয় মহাদেশে জিএমও যুগের সূচনা করে। ইত্যবসরে কীট-প্রতিরোধক তুলা ও কীট-সহিষ্ণু সয়াবীনও বাজারজাত হয়।


    এরপর থেকে জিএম-জাত খাদ্য দ্রুত বিশ্বায়িত হতে থাকে। ১৯৯৫ সাল ও ২০০৫ সালের মধ্যে খাদ্যের প্রয়োজনে জিএম-জাত শস্য আবাদের জমির পরিমাণ ১৭০০০ বর্গ কিলোমিটার (৪.২ মিলিয়ন একর) বেড়ে হয় ৯০০ ০০০ বর্গ কিলোমিটার (২২২ মিলিয়ন একর)। জিএম-জাত খাদ্য আবাদে যুক্তরাষ্ট্র শুরু থেকেই প্রথম স্থান দখল করে রেখেছে; তাছাড়াও, আর্জেন্টিনা, কানাডা, ব্রাজিল, চীন, দক্ষিণ আফ্রিকা, জাপান ইত্যাদি দেশগুলোর অংশও যথেষ্ট গুরুত্বপূর্ণ। ২০০২ সাল থেকে ভারতও নানা ধরনের জিএমও-জাত তুলাগাছের আবাদে মনোনিবেশ করেছে। জিএম-জাত খাদ্যদ্রব্যের কোন সম্পূর্ণ তালিকা এখনও পর্যন্ত তৈরি হয়নি। জিএমও'র সূতিকাগার যুক্তরাষ্ট্রসহ পৃথিবীর কোন উন্নত দেশেই জিএমও সংক্রান্ত কোন আইনগত বিধিব্যবস্থাও এখনো পর্যন্ত তৈরি হয়নি। তবে অনুমান করা হয় যে কমবেশি ৩০ ০০০ রকমের জিএম-জাত পণ্য বাজারে ছাড়া হয়েছে।


    যেমন, অনেক তৈল-উদ্ভিদ, মধু, তুলা, সয়াবিন, ভুট্টা, টোম্যাটো, সুগার বীট, নানা ধরনের ভিটামিন, আলু, অতসী বা শন গাছ, মাংস ও দুগ্ধজাতীয় পণ্য, মটরশুঁটি, কীট-প্রতিরোধক বেগুন, ভেজিটেবল তেল ইত্যাদি জিএমও-জাত। এমনকি আখগাছ বা ধান গাছও জিএমও-জাত করা হয়েছে। তবে জিএমও-জাত চিনি লোকে পছন্দ করেনি বলে তার ব্যাপক প্রসার হতে পারেনি; এবং নতুন এক জিএমও-জাত ধান গাছে রয়েছে প্রচুর পরিমাণে ভিটামিন 'এ'। এই ধানের আবাদ হবে যুক্তরাষ্ট্রে এবং যেহেতু, এতে মানব-ডজন ব্যবহার হয়েছে, তাই এর ব্যবহার খাদ্য হিসেবে না হয়ে হবে তৃতীয় বিশ্বের শিশুদের উদরাময় ও অন্যান্য পেটের অসুখের চিকিৎসার জন্য।


    জিএমও-জাত খাদ্য ও পণ্য উৎপাদনকারীরা মূলত বিশাল আকারের সব রাসায়নিক শিল্প; এবং এদের মধ্যে মনস্যান্টো ও ড্যু পন্ট সুপরিচিত নাম। ভাইরাস-প্রতিরোধক পেপে সৃষ্টির কৃতিত্ব মনস্যান্টো'র; ১৯৯৯ সালে হাওয়াই-য়ে বাণিজ্যিক ভিত্তিতে এর প্রথম আবাদ শুরু হয়। বর্তমানে হাওয়াইয়ের তিন-চতুর্থাংশ পেঁপেই জিএম-জাত। মনস্যান্টো এই প্রযুক্তিটি ভারতের তামিলনাড়ু কৃষি বিশ্ববিদ্যালয়কে উপহার দিয়েছে; 'রিংস্পট'ভাইরাস-প্রতিরোধক পেঁপে সৃষ্টির জন্য মনস্যান্টোর প্রযুক্তিটি ভারতীয় বিজ্ঞানীরা ব্যবহার করবেন।

    জিএম-জাত খাদ্য মানুষের জন্য কতটুকু নিরাপদ- এই সংক্রান্ত তথ্যাবলীর পরিমাণ অত্যন্ত কম। এই প্রসঙ্গে পরে আসছি।


    বর্তমানে, নানা ধরনের উদ্ভিদের, সংখ্যায় চল্লিশটিরও অধিক তো হবেই, বাণিজ্যজাতকরণের প্রয়োজনীয় ব্যবস্থা সম্পন্ন হয়ে গেছে। ভবিষ্যতে জিএম-জাতকরণ প্রক্রিয়া যে আরও বিভিন্ন রকমের ও ধরনের হবে, বলাইবাহুল্য। যেমন, ওষুধযুক্ত খাদ্য হিসেবে হেপাটাইটিস বি'র মতো সংক্রামক ব্যাধি-রোধক কলা, দ্রুত বৃদ্ধি পায় এমন মাছ, ফল বাদাম ইত্যাদির ফলনকাল কমিয়ে আনা, বিশেষ গুণাবলী সম্পন্ন প্লাষ্টিক উৎপাদনকারী গাছ ইত্যাদি।

    জিএম-জাত খাদ্য উৎপাদনের পক্ষে ইতিবাচক কিছু সুবিধা রয়েছে। যেমন, কীট-প্রতিরোধক শস্যের চাষে চিরায়ত কীট-নাশকের ব্যবহারের প্রয়োজন হবে না। তাতে ফলন যেমন বেশি হবে, আবার কীটনাশক বাবদ খরচও বাঁচবে। বা আগাছা-প্রতিরোধক শস্যের ফলন থেকে শুরু করে রোগ-প্রতিরোধক শস্য, হিম-প্রতিরোধক শস্য, অনাবৃষ্টি-প্রতিরোধক শস্য ফলন ইত্যাদি ক্ষেত্রেও আশানুরূপ ফলনের কথা বলা চলে। তাছাড়া, জিএম-জাত পুষ্টি, ওষুধ, ভ্যাকসীন সংশ্লিষ্ট ক্ষেত্রগুলোতে বিরাজমান সমস্যার সমাধানের প্রতিশ্রুতি দিচ্ছে জিএম প্রযুক্তি।


    জিএম-জাত উদ্ভিদ কেবলমাত্র খাদ্যশস্য আবাদের জন্যই ব্যবহার হচ্ছে, তা নয় কিন্তু। মাটি ও ভূ-গর্ভস্থ জলের দূষণের সঙ্গে আমরা কমবেশি সবাই পরিচিত। জিএম প্রযুক্তির মাধ্যমে এই দূষণের সমাধানের চেষ্টা চলছে। যেমন, জিএম-জাত ঝাউজাতীয় পপলার গাছকে দূষিত মাটি ও ভূ-গর্ভস্থ জলের বিশোধন কাজে ব্যবহার হচ্ছে। অন্যভাবে বলা যায় যে, প্রকৃতিপ্রদত্ত 'ডিএনএ'য়ের কাঠামোকে আমরা সুবিধাজনকভাবে অদলবদল করে ব্যবহার করছি, কাজে লাগাচ্ছি।


    আপাতদৃষ্টে, জীবিত প্রাণীসত্তার ওপরে জিএম-জাত কৌশলের প্রয়োগ কৃষিব্যবস্থা, খাদ্য ও ওষুধ উৎপাদন শিল্পে নতুন এক বৈপ্লবিক যুগের সূচনা করেছে, বলা যায়। এই প্রযুক্তির সাহায্যে প্রাণীসত্তার ডজনকে 'অনুভূমিক স্থানান্তর' (হরাইজন্টাল ডজন ট্রান্সফার) করা হয়। 'ডজনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'কথা প্রথম শোনা যায় যুক্তরাষ্ট্রের সিয়েটলে প্রকাশিত এক পেপারে, ১৯৫১ সালে। উদাহরণ হিসেবে ডিপথেরিয়া রোগের চিকিৎসার সম্ভাব্যতার কথা বলা হয়। অর্থাৎ জেমস ওয়াটসন ও ফ্রান্সিস ক্রিকের সুবিখ্যাত 'ডবল হেলিক্স'আবিষ্কারের দুই বছর আগের ঘটনা এটি। পরবর্তী বছরগুলোতে 'ডজনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'ওপরে আরো অনেক পেপার প্রকাশিত হতে থাকে। আশির দশকের মাঝামাঝি সময়ে ভবিষ্যদ্বাণী করা হয় যে, 'জিনের অনুভূমিক স্থানান্তর'টি প্রকৃতিতেও বিদ্যমান রয়েছে, এবং এর জৈব গুরুত্ব অসাধারণ। পৃথিবীতে প্রাণের আবির্ভাবের ঊষালগ্ন থেকেই ক্রমবিকাশের ইতিহাসের সঙ্গে সে ওতপ্রোতভাবে জড়িয়ে পড়ে।


    ২০০৫ সালে রিভারা ও লেইকও প্রকৃতিতে এককোষী প্রাণীসত্তার ক্রমবিকাশে 'জিনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'পুনরুল্লেখ করেন। এই মুহূর্তে বহুকোষী প্রাণীসত্তার ওপরে 'ডজনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'ব্যাপকতা ও গুরুত্ব সম্বন্ধে খুব বেশি কিছু জানা নেই আমাদের। তবে কৃত্রিম পদ্ধতিতে উচ্চশ্রেণীর গাছগাছালি ও প্রাণীর ওপরে 'ডজনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'বিরূপ প্রভাবের অভিজ্ঞতা যথেষ্ট উদ্বেগের সঞ্চার করেছে। বিশেষ করে মানুষ ও প্রকৃতির নিরাপত্তার প্রশ্নে উদ্বেগের ঘনত্ব বেড়েই চলেছে। 'ডজনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'বিষয়টি সম্বন্ধে বিজ্ঞান এখনও এ-তো এ-তো কম জানে যে এর অপব্যবহার বিপজ্জনক হতে বাধ্য।


    আসলে 'ডজনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'বিষয়টি বিজ্ঞানের 'আঁতুর ঘর'পর্ব এখনও অতিক্রম করেনি। তাই জিএম প্রকৌশলের মাধ্যমে আমরা যে এই 'ডজনের অনুভূমিক স্থানান্তরের'পদ্ধতি ব্যবহার করছি, তাতে যে ঝুঁকিপূর্ণ বিপদ লুকিয়ে নেই, কে জানে? ডজনের এই 'অনুভূমিক স্থানান্তর'প্রক্রিয়া প্রাণীজগতের বিভিন্ন প্রজাতির মধ্যে ছড়িয়ে পড়তে পারে, এবং সৃষ্টি হতে পারে অপ্রত্যাশিত অন্য কিছুর।

    জিএম-জাত খাদ্যের সঙ্গে খাদ্যের বাণিজ্যকরণটি নিবিড়ভাবে জড়িত। জিএময়ের বাণিজ্যকরণ মানেই প্যাটেন্ট অধিকার প্রাপ্তির বিষয়টি চলে আসছে। কোন কিছুর প্যাটেন্ট বুদ্ধিজীবিগত সম্পদ অধিকারের (ইনটেলেকচুয়াল প্রপার্টি রাইট-আইপিআর) মধ্যে পড়ছে; যেমন, একজনের গল্প কবিতা, সঙ্গীত, সুর নিজের নামে চালিয়ে দেয়া, বা নামী ঘড়ি প্রস্তুতকারী কি স্পোর্টস কোম্পানির জিনিসপত্র বানিয়ে সেই কোম্পানির নাম ব্যবহার করা, সিডি, ডিভিডির কপি করে বিক্রি করে মুনাফা করা ইত্যাদি সবই আইপিআর-য়ের আওতায় পড়ে। অর্থাৎ নিজের মগজ খাটিয়ে প্রকৃত, খাঁটি কিছু যা করছি এবং প্রয়োজনে আরো নিখুঁত করে উন্নত করছি, সেগুলো প্যাটেন্ট করে একচেটিয়া অধিকার সংরক্ষণের ব্যবস্থা করি আমরা। প্যাটেন্টকৃত একচেটিয়া অধিকারের মেয়াদ ১৭ বছর থেকে বিশ বছর মেয়াদী হতে পারে।


    কিন্তু জিএমও-কে কেন্দ্র করে যুক্তরাষ্ট্র ও ইউরোপের প্যাটেন্ট অফিসগুলো বিভিন্ন প্রজাতির উদ্ভিদ, জিএম-জাত শস্য, উদ্ভিদ ও শস্যের ডজন এবং ডজন 'সিকোয়েন্সের'ওপরে প্যাটেন্ট মঞ্জুর করছে। যেমন, জৈব-বৈচিত্রের দিক দিয়ে পৃথিবীর ধনীতম দেশ ব্রাজিলের কথাই ধরা যাক। পৃথিবীর মোট উদ্ভিদ সম্পদের প্রায় ২২ শতাংশই ব্রাজিলে রয়েছে; প্রজাতির সংখ্যা প্রায় ৫৫০০০। এবং এ পর্যন্ত জানা এই উদ্ভিদ প্রজাতির অর্ধেকেরও বেশি প্রজাতির প্যাটেন্ট করে রেখেছে বড় সব আন্তর্জাতিক কোম্পানিগুলো। ভারত উপমহাদেশে রয়েছে, এ পর্যন্ত জানা, ৪৬০০০ প্রজাতির উদ্ভিদসম্পদ।


    উপমহাদেশীয় কিছু কিছু প্রজাতিও প্যাটেন্ট হয়েছে। আবার কোন কোন প্রজাতির প্যাটেন্ট প্রক্রিয়া ভারত সরকারের উদ্যোগে বানচাল করা হয়। কিছু উদাহরণ দিলে বিষয়টি স্বচ্ছ হবে। তবে বলতে পারি যে প্রকৃতিপ্রদত্ত উদ্ভিদসম্পদের ব্যাপক প্যাটেন্ট প্রক্রিয়া এবং প্যাটেন্ট অর্জনের উদ্যোগ প্রচেষ্টা যে ধরনের নৈতিক পাপের মধ্যে পড়ে, তা প্রকাশের ভাষা এখনো সৃষ্টি হয়নি। ফলস্বরূপ, জিএম-জাত খাদ্য ও জিএম প্রাণীসত্তা বিষয়ক শাখায় 'জৈব-দস্যুতা'ও 'দেশজ জ্ঞানের'চৌর্যবৃত্তি নামক দুটো নতুন পরিভাষার সংযোজন হয়েছে। কারণ, প্রথমত, প্যাটেন্টের মাধ্যমে দেশজ সৃজনশীলতা ও প্রয়োগবিধিকে নিজের দখলে নেয়া হচ্ছে এবং দ্বিতীয়ত, চুরিকৃত জ্ঞানের প্যাটেন্ট, প্যাটেন্টধারীকে উদ্ভিদসম্পদ ও দেশজ জ্ঞানের ওপরে যে একচেটিয়া অধিকার দেয়, তার রয়েছে সুদূরপ্রসারী অর্থনৈতিক প্রভাব।


    উপমহাদেশের ক্ষেত্রে, উদ্ভিদসম্পদ ও দেশজ জ্ঞানের সম্ভবত প্রথম অপহরণের সূত্রপাত হয় ১৯৯৫ সালে। খ্যাতনামা মেগাডজন নিউ সায়েন্টিস্ট ১৯৯৬ সালের অক্টোবর মাসে 'পাইরেটস ইন দি গার্ডেন অব ইন্ডিয়া'শিরোনাম দিয়ে একটি প্রতিবেদন প্রকাশ করে। এই প্রতিবেদন থেকে আমরা জানতে পারি যে, যুক্তরাষ্ট্রের মিসিসিপি বিশ্ববিদ্যালয়ের মেডিক্যাল সেন্টারকে হলুদের প্যাটেন্ট দেয়া হয়েছে। এই হলুদ সেই হলুদ, যাকে ছাড়া আমাদের দৈনন্দিন রান্না অসম্ভব; যে হলুদবাটা ছাড়া বিয়ের হলুদ হতে পারে না; যে কাঁচা হলুদের রস সকালে খালি পেটে আমাদের অনেককেই খেতে হয়েছে।


    ঘা পাঁচড়া সারাতে গুঁড়ো হলুদের মতো ওষুধ হয় না, আলজাইমার, গেঁটেবাত থেকে শুরু করে এমনকি ক্যান্সারকে উৎসাহিত করতে সক্ষম এমন এনজাইমের উৎপাদন রোধসহ আরো অনেক গুণাবলী হলুদ ধারণ করে আছে। হলুদের মাহাত্ম্য বলে শেষ করা যাবে না। বিবিধ কারণে ও উপলক্ষে হলুদের ব্যবহারবিধি আমরা শিখেছি অনেক অনেক বছর, একাধিক প্রজন্ম ধরে। সৃষ্টি হয়েছে দেশজ জ্ঞানের বিশাল ভা-ার, যাতে সবারই প্রবেশাধিকার রয়েছে। আমাদের সবার পরিচিত নামের কথাই ধরা যাক। নিম ডালের মেসওয়াক থেকে শুরু করে, নিমপাতা ভাজা খাওয়া, নিমপাতার গরম জলে গোসল করা, বসন্ত রোগীর নিমপাতা ছড়ানো বিছানায় শোয়াসহ নিমের আরো অনেক মাহাত্ম্য প্রাচীন ভারতের লেখায় উল্লিখিত রয়েছে। নিম বিষয়ে আমাদের জানাশোনাও সবার জন্য প্রবেশগম্য দেশজ জ্ঞান।


    ইউরোপীয় প্যাটেন্ট অফিস ডব্লিউ. আর এ্যান্ড কোম্পানিকে এই নিমের প্যাটেন্ট মঞ্জুর করে। প্যাটেন্টের কাজই এই সার্বজনীন প্রবেশগম্যতাকে শৃঙ্খলবদ্ধ করা, হলুদ বা নিম-ব্যবহার করতে চাও তো, সাদা বাংলায় যার অর্থ-ছাড় কড়ি মাখো তেল। কারণ, বিশ্ববাণিজ্য সংস্থার রয়েছে বাণিজ্য স্বার্থ সংরক্ষণের জন্য 'ট্রেড ইনটেলেকচুয়াল প্রপার্টি'নামে শক্ত এক অস্ত্র। আমাদের কপাল ভাল যে শিবদের মতো কিছু আইকন পৃথিবীতে রয়েছে। ১৯৯৬ সালে এই দুই প্যাটেন্টের বিরুদ্ধে প্রচ- আপত্তি ঘনীভূত হতে থাকে। ভারত শেষ পর্যন্ত প্যাটেন্টবিরোধী যুদ্ধে বিজয়ী হয়; প্যাটেন্ট দুটো শেষপর্যন্ত নাকচ হয়ে যায়। তবে প্যাটেন্ট নামক সমস্যার সম্পূর্ণ সমাধান হতে আরও কিছু সময় লাগবে। কারণ, অনাদিকাল থেকে নিত্যদিনের জীবনে আমরা আরও অনেক অনেক ধরনের লতাপাতা, শিকড়, ডালপালা ব্যবহার করে আসছি, এবং সেগুলোর অনেকগুলোই যুক্তরাষ্ট্রের প্যাটেন্ট অফিসের মঞ্জুরের অপেক্ষায় রয়েছে।


    জিএম-জাত খাদ্য ও প্রাণীসত্তার ক্ষেত্রে, একেই জৈব-দস্যুতা বলা হচ্ছে। এই জৈব-দস্যুতার দরুন কেবল উপমহাদেশই নয়, এশিয়া, আফ্রিকা, লাতিন আমেরিকার সব দেশই ক্ষতির শিকার। কারণ, ইত্যবসরেই কৃষি ও ওষুধ ক্ষেত্রে উন্নয়নশীল দেশগুলোকে রয়্যালটি বাবদই প্রচুর অর্থ দিতে হচ্ছে।

    (বাকি অংশ আগামীকাল)

    উৎসঃ   জনকন্ঠ



    জিন পরিবর্তিত খাদ্য

    নাদিরা মজুমদার

    (গতকালের পর)

    হলুদ ও নিম পর্ব ভারতকে দেশজ জ্ঞান সংগ্রহ করে সংরক্ষণের লক্ষ্যে প্রকা- এক উপাত্ত-ব্যাংক তৈরিতে উৎসাহিত করে; ভারত সেইভাবে কাজও করে যাচ্ছে।

    চালের কথাই ধরা যাক। তার অবস্থাও ভাল নয়। যুক্তরাষ্ট্রের টেক্সাসে অবস্থিত রাইস টেক নামের এক কোম্পানি সুপরিচিত বাসমতি চালের প্যাটেন্ট পায়; এবং এমনকি জিএম-জাত বাসমতি চালও সৃষ্টি করে; কিন্তু বিক্রি করতে থাকে আসল বাসমতি চাল বলে। রাইস টেকের এই 'চাল'ভারত ও পাকিস্তানকে খুবই চটিয়ে দেয়। দুই দেশ যৌথভাবে চ্যালেঞ্জ করে বসে। একইভাবে থাইল্যান্ডও তার জেসমীন চালের প্যাটেন্ট চ্যালেঞ্জ করে বসে। ফলে, রাইস টেকের বাসমতি ও জেসমীন চালের প্যাটেন্ট নাকচ করে দেয়া হয়। তবে দেশজ উদ্ভিদসম্পদের প্যাটেন্ট বিতর্ক আরো ঘনীভূত হতে শুরু করে। প্যাটেন্ট অফিস ও ট্রেডমার্ক অফিস রাইস টেকের কুড়িটি প্যাটেন্টের মধ্যে পনেরোটি নাকচ করলেও জিএম-জাত চালের প্যাটেন্ট বজায় রাখে। বাসমতি ও আমেরিকার দীর্ঘ-দানার চালের মধ্যে ডজন পরিবর্তন করে সৃষ্ট চাল, যেমন, রাইস টেক- টেক্সমাতি, জেসমাতি, কাসমাতি ইত্যাদি নানা নামের চাল বাজারজাত করে থাকে। তাছাড়াও 'এই চাল বাসমতি চালের চেয়েও উত্তম'লেখার অধিকার অর্জন করে। এই প্রসঙ্গে আমাদের খাঁটি আমন কি আউশ চাল বা পোলাউয়ের বিখ্যাত কালোজিরার চালের হাল কি, কে জানে! একইভাবে, ডায়াবেটিসের নিরাময়কারক হিসেবে বেগুনগাছ, তেতো উচ্ছে/করল্লা, মালাবার প্লাম বা রোজ অ্যাপল নামে পরিচিত গাছের (গাছের রসের জন্য) প্যাটেন্ট অর্জনের বেপরোয়া প্রচেষ্টাও ভারত আপাতত রোধ করে। ভারতের আশঙ্কা যে যুক্তরাষ্ট্র ও জাপানের দৃষ্টান্ত ধরে ইউরোপও যদি বেপরোয়া হয়ে ওঠে তো কদ্দিন পর্যন্ত জৈব-দস্যুতা ও দেশজ জ্ঞানের অপহরণ আটকে রাখা যাবে, বলা কঠিন।

    জিএম-জাত খাদ্য ও প্রাণীসত্তার পক্ষে যেমন প্রচুর যুক্তি রয়েছে, তেমনি বিপক্ষেও রয়েছে প্রচুর যুক্তি। আন্তর্জাতিক বিধিব্যবস্থাসহ 'লেবেলিংয়ের অনুপস্থিতির দরুন, প্যাটেন্টের মাধ্যমে জৈব-দস্যুতা ও দেশজ জ্ঞানের বেআইনী দখলি ছাড়াও রয়েছে পরিবেশসম্পর্কিত ঝুঁকি। যেমন, বি.টি. ডজন সন্নিবেষ্টিত শস্যাদি নিজেদের মধ্যে যে প্রাকৃতিক কীটনাশক বিষ তৈরি করছে, সেই শস্যাদির পুষ্পরেণু ভক্ষণের কারণে 'মর্নাক'প্রজাপতির শুককীটসহ বন্ধুসুলভ আরও অন্যান্য পোকামাকড়ও ব্যাপকহারে নিশ্চিহ্ন হয়ে যাচ্ছে। কারণ, ঠিক যেই অবন্ধু শুককীট ও পোকামাকড়কে দমন করতে চাই, কেবল এমন বি.টি.ডজন ডিজাইন আমরা করতে জানি না। ফলে, বন্ধু-অবন্ধু নির্বিশেষে সব শুককীট ও পোকামাকড়কেই বি.টি.ডজন মেরে ফেলে। আবার, জিএম-জাত কীট-নাশকের বিরুদ্ধে পোকামাকড় যে নিজেদের মধ্যে প্রতিরোধ ব্যবস্থা গড়ে তুলবে না, কে জানে! কারণ, বর্তমানে আন্তর্জাতিকভাবে নিষিদ্ধকৃত ডিডিটি নামক কীটনাশকের বিরুদ্ধে কোন কোন মশা প্রতিরোধ ব্যবস্থা গড়ে তুলেছিল। তাই বি.টি. ডজনের বিরুদ্ধে কোন কোন পোকামাকড় প্রতিরোধ ব্যবস্থা গড়ে তুললেও তুলতে পারে। একইভাবে, আগাছা-প্রতিরোধক ডজন সন্নিবিষ্ট শস্যাদির ক্ষেত্রে, ক্রস-ব্রীড বা সংকরপ্রজাতির মাধ্যমে আগাছাও 'আগাছা-প্রতিরোধক'ডজনের স্থানান্তর প্রক্রিয়া ঘটিয়ে 'সুপার আগাছা'র জন্ম দিতে পারে। ফলে, আগাছাও 'আগাছা-প্রতিরোধক হবে। তাছাড়াও, জিএম-জাত শস্য খেতের কাছাকাছি জিএম-জাত নয়, এমন শস্যখেত থাকলে- সেই শস্যাদি সংকর প্রজাতি বা ক্রস-ব্রীডের মাধ্যমে জিএম-জাত হতে পারে; হয়েছেও। অনিচ্ছাকৃত হলেও এমন অবস্থায় কৃষককে তখন প্যাটেন্টবিধি লঙ্ঘনের মামলায় জড়িয়ে পড়তে হয়। জিএম-জায়ান্ট মনস্যান্টো ইত্যবসরেই কৃষকদের বিরুদ্ধে প্যাটেন্টবিধি লঙ্ঘনের মামলা দাখিল করেছে। ডজনের এই অনিচ্ছাকৃত স্থানান্তর বা ক্রস-ব্রীড এড়ানোর একটি উপায় হলো, জিএম-জাত শস্যাদি পুষ্পরেণু উৎপাদনে অক্ষম হবে; আরেক উপায় হলো যে জিএম-জাত এবং অজিএম-জাত শস্য খেতের মধ্যে দূরত্ব এমন হবে, যাকে বাফার-জোন বলা হয়, যেন বাতাসের মাধ্যমে পুষ্প-রেণু বাফার-জোনের সীমানা অতিক্রম করতে না পারে।

    তাছাড়াও, আমাদের দৈনন্দিন স্বাস্থ্যের ওপরে জিএম-জাত খাদ্য ও প্রাণীসত্তা নেতিবাচক প্রভাব কতটুকু ফেলতে পারে, সেই সম্বন্ধে খুব বেশি কিছু আমাদের জানা নেই। তবে সন্নিবিষ্ট জিন এলার্জি সৃষ্টি করতে পারে বলে মনে করা হচ্ছে। এই আশঙ্কার কারণেই তাই সয়াবীণে ব্রাজিল নাটের জিন সন্নিবিষ্টকরণসহ আরো কয়েকটি প্রচেষ্টা র্বজনও করা হয়। তদুপরি, জিএম-জাত খাদ্য আমাদের স্বাস্থ্যের ওপরে সুদূরপ্রসারী প্রভাবও ফেলে থাকে হয়ত। যেমন, সম্প্রতি ফরাসী বিজ্ঞানীরা তাঁদের গবেষণার ফলাফল প্রকাশ করেছেন। দীর্ঘদিন ধরে তাঁরা ইঁদুরকে মনস্যান্টো'র জিএম-জাত ভুট্টা খাওয়ান; বিজ্ঞানীর দলটি দেখেন যে ইঁদুরগুলো, ফলস্বরূপ, টিউমার সমেত কিডনী ও যকৃতের সমস্যায় আক্রান্ত হয়। এই গবেষণার প্রেক্ষিতে ফরাসী সরকারসহ ইউরোপের অনেক দেশই মনস্যান্টো'র জিএম-জাত খাদ্যের আমদানি আপাতত বন্ধ করে দেয়ার কথা ঘোষণা করেছে। এমনকি ইউরোপীয় ইউনিয়নকেও মানুষ ও প্রাণীজগতের স্বাস্থ্য সংরক্ষণের বিষয়টি নতুন করে ভেবে দেখতে বাধ্য করছে। ফরাসীদের গবেষণায় উৎসাহিত বিজ্ঞানীরাও ইঁদুরের ওপরে অনুরূপ গবেষণা পরিচালনার সিদ্ধান্ত নিয়েছেন। ২০১৩ সাল থেকে রুশ গবেষণার শুরু"হবে এবং তাদের গবেষণার চমক হলো যে এটি পরিচালিত হবে 'রিয়েলিটি শো'য়ের কায়দায় এবং পাঁচ প্রজন্মের ইঁদুরের ওপরে পরীক্ষানিরীক্ষা চালানো হবে। রুশ বিজ্ঞানীদের এমন কায়দা গ্রহণের কারণ হয়ত যে ফরাসি গবেষণালব্ধ ফল প্রবল বাক-যুদ্ধের সূচনা করেছে। ফলে, 'রিয়েলিটি শো'হলে, কারো পক্ষেই সন্দেহ পোষণের খুব একটা অবকাশ থাকবে না।

    জেনেটিক প্রকৌশল, মলিকিউলার বয়োটেকনোলজি, জৈব-প্রযুক্তি ইত্যাদি যে নামেই ডাকা হোক না কেন, প্রযুক্তিটি অতি নবীন এবং বিভিন্ন প্রেক্ষিত ও অবস্থাগত ও বেষ্টিত পরীক্ষাপ্রক্রিয়া, মূল্যমান, গুণ, গঠন ইত্যাদির সাফল্যের সঙ্গে অতিক্রম করার কোন ইতিহাস তার নেই, এখনো অর্জন করেনি সে। তদুপরি, উদ্ভিদসম্পদের প্যাটেন্টকরণের ফলে কৃষককে বংশ পরম্পরায় অর্জিত তারই চিরায়ত দেশজ জ্ঞানকে কিনতে হচ্ছে; জৈব-প্রযুক্তি অত্যন্ত ব্যয়বহুল কর্মকা-, তাই গরিব কৃষকের পক্ষে নতুন এই প্রযুতির মালিকানা পেতে বেশ কঠিন হবে। জিএমের আরেকটি বড় সমস্যা হলো- জৈব-বৈচিত্র্যকে সঙ্কুচিত করে আনা; ফলস্বরূপ, রোগ ও পোকামাকড়ের সহজ আক্রমণ উৎসাহিত হবে। জিএম-জাত খাদ্য উন্নয়নশীল দেশের খাদ্য-ঘাটতি ও ক্ষুধা নামক মহাব্যাধির সমাধান করবে কিনা বলা কঠিন। কারণ, বিশ্বায়িত পৃথিবীতে যথেষ্ট পরিমাণে খাদ্য থাকলেও খাদ্য ঘাটতি ও ক্ষুধা-বার বার দেখা দিয়েছে, দেখা দেবে। (সমাপ্ত)


    nadirahmajumdar@gmail.com


    Indira Gandhi packed green revolution with militarisation of the state.It denied the land reforms most essential.Itchanged traditional harvesting and moden farming was tagged with chemicals,frtilizers,machines,big dams,electricity and so on.


    Production cost began to multiply intensifying agrarian crisis which resulted in Operation Blue Star,Bhopal Gas Tragedy and Nuclear energy.


    Economic problems and the problems of production destroyed productive relations and equations.


    Indira did this charishma all on the name of development projecting socialist model.


    Enmasse suicide phenomenon in rural peasantry is the best contribution of disastrous green revolution which killed rural India.Killed cereals all the way promoted market linked cash crops introducing starvation  all round.


    The killing enhanced with it`s ultimate  transformation into genocide  culture with urbanisation on the name of industrialisation divesting  the manufacturing and excluding the entire toiling masses out of production system.


    It resulted in near zero agrarian growth rate as well as zero level industrial growth and the economy simultaneously was tagged with United States of America.


    This is the growth story of exclusion and genocide,internal security problems.


    This is the growth story of strategic selling off the resources and India becoming US periphery.


    The growth saga later was injected with Mandal versus Kamandal war political and the politics became religion.


    This religion became the surrogate mother of all reforms to undermine Indian economy all round.


    This is the basic theme of first round of Green Revolution started with PL 480 and ended in nuclear alliance with United States of America.


    The mandate created to install a default business friendly government to push free inflow of foreign capitals and US weapons,thus,may not stop Monsanto and genetically modified crops to poison Indian people starving for food.


    However,ET reports that A government committee may have given genetically modified crops a shot in the arm but the Sangh Parivar allies are in no mood to allow field trials

    Bhagwati Prakash Sharma, national co-convenor of Swadeshi Jagaran Manch (SJM), is a busy man these days. On August 19, he will lead a meeting of national leaders of 35 mass or ganizations in Delhi, including farmers, traders and even the BJP's student wing. It's just the beginning. In October, between Dussehra and Diwali, a massive jamboree of over 100 groups will meet in an event styled Swadeshi Sangam. The agenda is wide -from genetically modified (GM) crops to foreign direct investment (FDI) to the World Trade Organization (WTO).

    Opposition of monsanto by Swadeshi Sangam sounds like the echo of BJM in opposition to labor reforms.

    Result bound to be ditto.

    As love jihad turnaround happens to be in vogue.

    Meanwhile, Industry body Assocham has pitched for allowing field trials in biotechnology (BT) crops, terming it as a 'pro-poor' step that will help in raising food production to feed the country's rising population.


    On July 18, the Genetic Engineering Approval Committee, that works under the Environment Ministry, had given green signal for field trials of genetically-modified rice, mustard, cotton, chickpea and brinjal.


    The Associated Chambers of Commerce and Industry of India (Assocham) in a paper titled 'Analysis on GM Crops in India' said, "There is a need for the government to take a pro-poor stand by allowing large-scale production of genetically modified (GM) crops.


    "... Develop technologies for long-term agriculture sustainability without considering social discourses which shall hamper food security ambitions to meet growing demands of country's burgeoning population."


    The industry body also said that biotechnology is vital for fulfilling the socio-economic needs of the country's growing population.


    "Biotechnology applications in agriculture should be a part of the package of solutions to address socio-economic needs of our growing population which is likely to reach 150 crore by next decade," said Assocham Director General D S Rawat while releasing the paper.


    With a view to deliver best value of the produce to farmer, the government and the industry should work together to identify high priority crops useful for the country and provide necessary policy support, Rawat added.

    Business Standard reports something different:


    Three weeks after the Bharatiya Janata Party (BJP) overruled field trials for 15 genetically modified (GM) crops, a group of members of Parliament from BJP and the Shiv Sena are heading to the US on a week-long study tour sponsored by global seed giant, Monsanto. The group departs on Saturday.


    The MPs will first attend a 'Farm Progress Show' in Iowa, then visit the Monsanto headquarters in St Louis, Missouri. The trip will cost an estimated $6,000 (Rs 363,540) per head for travel, food and accommodation, according to a Monsanto spokesperson, who confirmed the company would bear these costs.


    "In line with industry practice, we have extended invitations to farmers, industry experts, media and members of Parliament across the political spectrum to visit the show and experience for themselves the advances in agriculture all over the world," said the spokesperson. "Parliamentarians with interest in agriculture and seeking to advance their knowledge of agricultural technology, across party lines, responded to the invitation."


    On July 29, Environment & Forests Minister Prakash Javadekar overruled the recommendations of the Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) and put a halt to the field trials of 15 GM crops, including of brinjal and rice, after protests from pro-Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) bodies, Swadeshi Jagran Manch and Bharatiya Kisan Sangh.


    But, the Monsanto spokesperson said, the trip bore no relation to the ruling party's decision to put GM crop trials on hold. The 'Farm Progress Show' is a three-day event that has been held in Iowa since 1953 and attracts thousands of farmers and delegates every year.


    "The visit is from August 24 to 30. Monsanto has arranged this visit. We will visit their plant to see the latest technology related to the agriculture sector," Prataprao Ganapatrao Jadhav, the Shiv Sena MP from Buldhana, Maharashtra, said in an interview.


    His party colleague in the Lok Sabha, Krupal Balaji Tumane, MP from Ramtek in Maharashtra, confirmed he was part of the group. "Apart from Iowa, we are also scheduled to visit Washington," he said. Tumane and Jadhav said others in the group included two MPs from Andhra Pradesh, one each from Gujarat and Rajasthan and four each from Uttar Pradesh and Bihar.


    Others in the group, such as BJP MP from Siwan Om Prakash Yadav and the party's Bulandshahr MP, Bhola Singh, were unavailable for comment.


    However, BJP MP from Aligarh, Satish Gautam, claimed he had opted out of the visit. Gautam said party president Amit Shah asked all party MPs in Uttar Pradesh to prepare for the by-elections to a dozen Assembly seats in the state. "There will be a by-election to the Noida Assembly seat and I have decided to devote my time to election work," he said. The by-elections are unlikely before mid-October.


    Monsanto declined to reveal the size of the delegation but said invites had been sent to "18 to 20 people". MPs were invited on the basis of their interest in the use of technology in agriculture.


    When contacted, a senior agriculture ministry official said the ministry was not aware of the MPs' visit to the US. "If it is a private visit organised by a company for individual MPs, they are not required to keep us in the loop. Such visits need the agriculture ministry's approval only in cases where the government is involved," the official explained.


    Earlier this month, junior agriculture minister Sanjeev Kumar Balyan said in reply to a Parliament question in the Lok Sabha that the government policy was to allow GM crops after full scientific evaluation of their bio-safety and impact on the environment and on consumers. This is also BJP's stated position, as stated in its election manifesto.


    HIT & TRIAL


    2010 Feb: Then environment minister Jairam Ramesh puts commercial release of Monsanto Bt Brinjal on hold; field test for other varieties and crops continue


    2012 May: Supreme Court sets up expert panel to review the issue


    Aug: Parliament's standing committee on agriculture demands moratorium on field trials of all GM food crops and a complete policy overhaul


    Oct: SC's expert panel suggests a moratorium on GM trials; Centre opposes this, puts its nominee on panel


    2013 Mar-Jun: Genetic Engineering Appraisal Committee recommends trials for some GM food crops but the then minister Jayanthi Natarajan puts the plan on hold


    Jul: SC panel's majority report advises moratorium; govt nominee bats for trials


    Aug: Natarajan writes to PMO opposing trials of GM food crops; the then PM and agriculture minister bat for GM


    2014 Feb: As environment minister, M Veerappa Moily renews lapsed clearances for food crop varieties


    Jul 17: Under Prakash Javadekar GEAC recommends GM trials for 13 food crop varieties


    Jul 29: Swadeshi Jagaran Manch and other RSS affiliates object; Javadekar puts final decision on hold


    Aug 23: MPs from various parties, including BJP and the Shiv Sena, leave for the US on a Monsanto-funded study tour


    PM calls for linking farms to labs

    By KA BadarinathJul 29 2014

    Tags: News

    Urges agriculture scientists to find technology-based solutions to raise output

    Prime minister Narendra Modi pushed for self-sufficiency and export of farm products while seeking to raise farm incomes through scientific innovation and linking farms to labs.


    Modi asked agriculture scientists to find technology-based solutions to increase productivity in the shortest possible time through judicious use of limited land resources.


    He was speaking on the occasion of the foundation day of Indian Council Agriculture Research (ICAR). The prime minister also emphasised on the need to push up the incomes of millions of farmers to make agriculture a viable and profitable preposition.


    Modi's emphasis on higher farm productivity and incomes draw on the government's priority to boosting agricultural growth and ensuring better living standards for farmers and rural folk, besides tackling inflation and ensuring higher productivity.


    In the run up to the Lok Sabha elections, Modi had promised to raise farm incomes by at least 50 per cent by removing price-led distortions, scientific intervention and modernising farmland infrastructure.


    Modi's emphasis on agri-productivity and exports come in the wake of India's tough stand at the recent ministerial conclave at WTO on farm subsidies and stock limits holdings.


    India insisted on a solution to the dispute between developed and developing economies on farm subsidies conditional to signing the trade facilitation agreements.


    India is not comfortable with 10 per cent subsidy limit on farm products being insisted upon by the developed economies, particularly the United States.


    Modi's push for scientific intervention to raise farm productivity and agricultural incomes also figured prominently at the presidential address by Pranab Mukherjee to the new Lok Sabha.


    The government's maiden budget also talked about making farming profitable and competitive by setting up an agriculture technology infrastructure fund. It also announced setting up two more ICAR type institutes in Assam and Jharkhand.


    Several other measures, including the setting up of two new agriculture universities, two horticulture universities, the campaign to gauge soil health and mobile soil testing laboratories were announced, apart from a price stabilisation fund.


    "We have to prove two points. One, how can we make farmers capable of feeding the whole country and the world? Second, how can we fill the pockets of our farmers by making agriculture more profitable?" Modi told the ICAR gathering.


    He also pointed to the fact that India continues to depend hugely on imports for meeting demand for edible oil and pulses despite being an agrarian economy.


    "Even today, production of pulses and oilseeds is a big challenge. There is need to increase production of pulses. The poorest of the poor should also get pulses that have high protein. We need to work in this direction," he said.


    Modi asked ICAR to set clear cut goals for the next 14 years in the run up to its centenary celebrations. He pointed to global concerns on depleting natural resources and challenges posed by climate change. He also proposed the idea of "blue revolution" in fisheries on the lines of green revolution in the farm sector and white revolution in dairying.


    He suggested the setting up of radio stations by agriculture colleges and universities to create awareness among farmers. He also talked about the need to address the challenge of taking farm research from 'lab-to-land' by making efforts to convince farmers about the efficacy of new farm techniques in simple ways.


    "Food demand is huge and this is an opportunity for us. The biggest challenge before us is how do we take research work from lab to land. Unless this work does not reach the fields, we cannot get results," he said.


    He asked ICAR to digitise database of all agriculture research work in the country during the next four-five years, besides harnessing the potential of Himalayan herbal medicine as China was ahead in this area.


    On the impending water crisis, he asked ICAR to explore scientific approach to manage water according to changing weather cycles.

    http://www.mydigitalfc.com/news/pm-calls-linking-farms-labs-808



    Aug 17 2014 : The Economic Times (Bangalore)

    Which Way on GM, PM?

    Suman Layak


    

    

    A government committee may have given genetically modified crops a shot in the arm but the Sangh Parivar allies are in no mood to allow field trials

    Bhagwati Prakash Sharma, national co-convenor of Swadeshi Jagaran Manch (SJM), is a busy man these days. On August 19, he will lead a meeting of national leaders of 35 mass or ganizations in Delhi, including farmers, traders and even the BJP's student wing. It's just the beginning. In October, between Dussehra and Diwali, a massive jamboree of over 100 groups will meet in an event styled Swadeshi Sangam. The agenda is wide -from genetically modified (GM) crops to foreign direct investment (FDI) to the World Trade Organization (WTO).

    Swadeshi Warriors In each of these, the SJM has scored wins since the Narendra Modi government assumed power on May 26. It seems Sharma and the SJM are now moving in quickly to occupy vacant space -vacated by the now defunct National Advisory Council (NAC), which was almost a personal prelature of Congress president Sonia Gandhi. In the past two months, only the SJM has managed to challenge the almost unquestioned authority of Narendra Modi.

    Consider the SJM's recent successes: it has been opposing the Doha round of negotiations at the WTO for sometime now, and it took a BJP-led government to block it, precisely on the points SJM has been advocating. FDI in retail has been another pet peeve and minister of state for commerce and industry Nirmala Sitharaman has ruled out FDI in mul ti-brand retail. But the real deal was GM crops, something the prime minister ap pears keen to push. SJM has been oppos ing GM crops and their field trials too. "If you want to do trials, they must be inside greenhouses," Sharma says.

    The Narendra Modi-led government took two steps forward on GM crops in the two months it has been in office. It was forced to take one back after the SJM as well as former BJP ideologue and envi ronmental activist KN Govindacharya raised their hands in protest.

    The GM crops issue will test the SJM's will as well as the resolve of this government.

    The IB Report Activist organizations like Greenpeace, Vandana Shiva's Navdanya and Suman Sahai's Gene Campaign were named in a report by the Intelligence Bureau. The report's subject line is `Concerted efforts by select foreign-funded NGOs to take down Indian development projects'. The report was leaked soon after the BJP-led National Democratic Alliance (NDA) came into office. It picked on anti-GM crop agitations along with other issues like anti-coal and anti-nuclear movements, and sought to paint these protests as activities controlled by foreign masters that are aiming at slowing down India's growth.

    The widely circulated report (ET Magazine also downloaded a copy) instilled some fear, damaged some credibility, but mostly made the Modi government's intentions clear. It wanted to clear impediments coming in the way of its growth agenda.

    That was till it faced stiff opposition on GM crops from one of its own. It is not that the SJM has now changed its colours; it has always opposed GM crops. But its pedigree, closeness to the RSS and its mooring in swadeshi philosophy make it a large obstacle on the course adopted by this government on GM crops.

    The Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) that had not met for almost two years met on July 18 (53 days after the Modi government took over) and cleared three applications for import of GM soyabean oil. It also accepted 13 requests for confined field trials of different GM crops. In the earlier government, Sharad Pawar as agriculture minister was a strong votary of GM seeds in India and had often spoken in favour of Bt cotton. On the other hand, Jairam Ramesh as environment minister had announced a moratorium on the field trials of Bt brinjal in 2010 and his successor Jayanthi Natarajan had refused to sign off requests for field trials that were already approved by the GEAC.

    The committee thereafter had stopped meeting. Ramesh had queered the pitch further by mandating that each trial must also get a no-objection from respective state governments. When Veerappa Moily took over as the minister, he started clearing the decks for restarting field trials. In February-March 2014 the GEAC revalidated some of its own clearances issued earlier and Moily okayed them.

    The issue is also before the Supreme Court (SC) and there was reason to hurry. Gene Campaign, an organization started by geneticist Suman Sahai, had filed a public interest litigation (PIL) in 2004 on this subject.

    SC Steps in

    Another PIL had been filed later by Aruna Rodrigues and the Supreme Court was hearing the two petitions together -which prayed that the country did not have the wherewithal to deal with the science behind GM crops and field trials should not happen till a proper regulatory mechanism was in place.

    The SC had appointed a committee of six experts. Five of them filed a report recommend ing a 10-year moratorium on field trials in September 2012 while the sixth member, RS Paroda (a former director general of the Indian Council of Agricultural Research and a bureaucrat with a long history in government), filed a dissenting report later. The apex court sought the government's response in April 2014.

    Sahai told ET Magazine: "We have now moved an application with the Supreme Court asking it to accept the report of the five members of the expert committee that proposed a 10-year moratorium."

    Sahai says the BJP election manifesto itself was very cautious. It said: "GM foods will not be allowed without full scientific evaluation on the long-term effects on soil production and biological impact on consumers." The new agriculture minister Radha Mohan Singh had said after taking over that GM crops will be allowed "only if essential".

    Genetically Modi-fied?

    "You have to ask, who is pushing it," says Sahai, clearly hinting that it is the prime minister who is firmly in the GM court. One does not need to look far for confirmations. The agricul tural group of the Association of Biotechnology Led Enterprises (ABLE AG) comprises compa nies that want to produce and market GM seeds in India. Its chairman Ram Kaundinya was in Ahmedabad last week to speak to the students of the IIM there on biotechnology and GM crops. Kaundinya says: "Gujarat was one of the states that ap proved most field trials of GM crops and backed Bt cotton very strongly and we had strong hopes after this government took over."

    ABLE was started by Biocon cofounder Kiran Mazumdar-Shaw for biotech companies and when the agricultural products companies joined up they created the AG within it.

    ABLE AG has among its members MNCs like Monsanto, Bayer, BASF, Dow, Advanta and DuPont as well as Indian companies like Mahyco, Rasi Seeds and Shriram Bioseeds. In the wake of the GEAC's approval for field trials of 15 GM crops, Govindacharya tweeted that it was "an anti-national decision". And when environment minister Prakash Javdekar promptly countered that the GEAC approval did not mean a government approval and then later told the SJM members that the approvals have been put on hold, the seed makers were disappointed. The debate on GM crops can go on.

    Both sides claim science is on their side.

    Kaundinya says: "Gujarat has seen an almost 10-fold increase in production of cotton after it adopted Bt cotton. The results are there for all to see. If you stop trials now you will stop research." Apart from cotton and brinjal, the industry is also working on maize, canola, rice, wheat, potatoes, cauliflowers and some other vegetables.

    Sides Face-off

    SJM has major issues on the need for farmers to buy seeds every year. Kaundinya tried to allay fears over seeds. Hybrid seeds have to be bought every year and GM hybrid seeds are no different. On the other hand normal seeds known as `varieties' do not need to be procured every year, and GM varieties too are one-time purchases for farmers who can then procure their own seeds from their harvest.

    Gene Campaign's Sahai says the GM industry floats two balloons, the science balloon and the hunger balloon. She wishes to puncture both. "What we want is the data," she says. "It is simple. We do not trust the companies so we ask them to show us the data." She laments that even GEAC meeting minutes are now not being made public. Sahai points out that the Gene Campaign PIL was filed in 2004 only after her RTI application seeking data bore no result.

    Sharma of SJM draws attention to a recall in 2000, when over 300 food products were found to contain StarLink corn that had not been approved for human consumption, triggering the first ever recall of GM food. It was approved for animal feed only by the US FDA in 1998, but the corn found its way into products for human consumptions including taco shells of Taco Bell. Traces of StarLink -created by a company called Plant Genetic Systems, which had become Aventis CropScience when the incident took place -were detected as late as August 2013 in Saudi Arabia. Sharma agonizes that soon imported GM soyabean oil will be sold in India and in five years GM rice, wheat and vegetables too will reach the market.

    He is ready to throw down the gauntlet on this one. The seedmakers wish Modi will pick it up. For the industry worldwide the biggest markets for GM crops are small farmers. That makes India crucial. If they can win here, much more of the developing world will follow.

    Bangladesh dares where India fears to tread

    After Jairam Ramesh's moratorium on Bt brinjal announced in 2010, the product travelled to Bangladesh.

    The country is now rife with debate on whether it did the right thing and if the crop failed or succeeded. The agriculture minister of Bangladesh has even accused pesticide companies of bribing protesters to file court cases against the product.

    The seed was developed by Mahyco, the Indian partner of Monsanto, in which Monsanto owns around 25% share. It was donated to public sector partners in India, Bangladesh and the Philippines. In the Philippines too courts have stopped use of Bt brinjal.

    In Bangladesh, the Bangladesh Agricul tural Research Institute aided by Cornell University and USAID have developed the seed and around 20 farmers across the country have cultivated the brinjals.

    Suman Sahai of Gene Campaign claimed that Bt brinjal has failed in Bangaldesh. On the other hand Mahyco and the International Service for Acquisition of Agri-Biotech and Applications (ISAAA) provided ET Magazine with a CD and a 40-page book documenting the success of the crop.

    A June 5 report in UK newspaper The Guardian that claimed to have interviewed 19 out of the 20 farmers who cultivated Bt brinjal said the results were largely mixed, with neighbouring farms in Jamalpur (124 km from Dhaka) showing very different results.

    While no clear view can emerge, what is becoming clear again is the markets of South and Southeast Asia remain crucial for the GM crops industry.





    

    


    পুনর্ভাবনায় পরিবেশের বিজ্ঞান ও রাজনীতি

    পার্থ চক্রবর্তী

    আরো একটি পরিবেশ দিবস পেরিয়ে যাচ্ছি। একটু ফিরে দেখা, কাটা-ছেঁড়া, পরিবেশের বিজ্ঞান ও রাজনীতি নিয়ে প্রচলিত তত্ত্বের পরিসরকে। রইল প্রথম কিস্তি।



    পরিবেশবাদ এখন পৃথিবী জুড়েই রাজনীতির মূলধারায় বয়ে চলেছে। পরিবেশবাদ আজ আমাদের স্কুলপাঠ্যে, যাপিত জীবনে, রাজনৈতিক দর্শনে, রাজনীতির কল্পনায়। সমকালীন পরিবেশের সমস্যার সাক্ষ্যপ্রমাণ সংগ্রহ কিংবা সমর্থন এই লেখার উদ্দেশ্য নয়; আমরা পরিবেশকে ঘিরে গড়ে ওঠা ধারণাসমূহ এবং তাদেরকে ঘিরে গড়ে ওঠা পরিবেশবাদ, আমাদের রাজনৈতিক চর্চা/চর্যায় কিভাবে প্রতিফলিত হয়, তা দেখার চেষ্টা করব। এই লেখায় আমরা পরিবেশবাদের প্রচলিত তত্ত্ব-পরিসরগুলোকে ফিরে দেখব, সমকালীন রাজনৈতিক ভাষ্যের এবং তার অনুসঙ্গে বিজ্ঞানের জ্ঞানের সম্পর্ক দেখার চেষ্টা করব; পরিবেশবাদের ধারণাভূমিকে প্রশ্ন করব, প্রশ্নগুলোকে প্রেক্ষিতে বুঝতে চাইব। কিন্তু কেন এই অনুশীলন? কারণ, পরিবেশবাদের পরিচিত সন্দর্ভ আমাদের কিছুটা সংশয়ী, অনিশ্চিত করে তুলেছে। অনেক ভাবনারা ঘিরে রয় আমাদের; আপাতত আমরা কিছুটা সংক্ষেপিতভাবেই, এই লেখায় পরিবেশবাদের ভাবনার অভ্যন্তরে দুটি প্রশ্নকে, দুটি প্যারাডক্সকে চিহ্নিত করে আলোচনাটা শুরু করতে চাইছি। এই আলোচনা আবার একই সাথে নিজেদের সঙ্গেও।


    প্রথম প্যারাডক্স - আমাদের কাছে "পরিবেশ' নামের ধারণাটি আসে এক নেতির মধ্যস্থতায়; পরিবেশকে আমরা বুঝি না-মানুষের এক নৃকেন্দ্রিক ধারণাভূমিতে। পৃথিবীতে যা কিছু না-মানুষ, না-সমাজ, না-সংস্কৃতি ইত্যাদি, তাই হল প্রকৃতি বা পরিবেশ। অন্যভাবে বললে, প্রকৃতি যেন মানুষ/সমাজ/সংস্কৃতি ইত্যাদি বর্গ বা ক্যাটিগরিগুলির অপর; প্রকৃতি আর সংস্কৃতি যেন এক দ্বৈতবাদী জলবিভাজিকায় দুটি পৃথক ধারণাপ্রবাহ। পরিবেশের সমস্যাগুলিও আমরা দেখি এই নির্মিত দ্বিত্ত্বের মধ্যে দিয়ে প্রতিসরিত হয়ে আসা আলোতে। আমরা যেমন জেনেছি যে সংস্কৃতির দূষিত প্রবাহটি কলুষিত করেছে নিষ্কলুষ প্রাকৃতিক প্রবাহটিকে। অপরদিকে এই সমস্যার সমাধানে, পরিবেশ রক্ষার আন্দোলনে/সন্দর্ভে, আবার মানুষ/সমাজ/সংস্কৃতিরই হস্তক্ষেপের আবেদন আমরা শুনেছি। যেন প্রকৃতির সাথে আরো বেশী (এবং সঠিক) সাংস্কৃতিক নিবিড়তা, সংশ্লিষ্টতা, প্রকৃতিকে সংস্কৃতির দূষণ থেকে রক্ষা করবে। মানুষই না-মানুষকে মানুষের (অ)মানবিকতা থেকে মুক্ত করবে। আমরা প্রশ্ন করি, প্রকৃতি যদি সংস্কৃতির অপর হয়, তা হলে মানবিক সংস্কৃতি দিয়ে কিভাবে এক না-মানবিক প্রকৃতির কল্যাণ হবে? মানবিক সংস্কৃতি কি ভাবে সংজ্ঞায়িত করবে না-মানবিক প্রকৃতির কল্যাণ? মানবিক সংস্কৃতি তবে কি আদৌ না-মানবিক প্রকৃতির কল্যাণ করতে পারে? তা হলে আমরা কিভাবে ভাবব প্রকৃতি/সংস্কৃতি দ্বিত্ত্বকে? দ্বিত্ত্বকে কি নতুনভাবে ভাবব, না কি দ্বিত্ত্বের ধারণাটিকেই প্রশ্ন করব, না কি বহুত্বের কথা বলব, না কি দ্বিত্ত্বের ধারণাকে অতিক্রম করে অন্য কোথাও অন্য কোনখানে যাওয়ার কথা ভাবব?


    দ্বিতীয় প্যারাডক্স - পরিবেশের অবনমনের বাস্তবতা আমরা জেনেছি বিজ্ঞানের পাঠ থেকে (দূষণ, উষ্ণায়ন, ওজোন স্তরের ফুটো ইত্যাদি), আবার একই সাথে পরিবেশের অবনমনের কারণ হিসেবে বিজ্ঞান/প্রযুক্তিকেই জেনেছি এবং আরো জেনেছি যে এই সমস্যার চিকিৎসাও বিজ্ঞান/প্রযুক্তি দিয়েই হবে। তা হলে আমরা কোন বৈজ্ঞানিকতাকে "সঠিক' বলে ধরব? না কি দু-রকম (না কি অনেক রকম) বিজ্ঞান/প্রযুক্তি আছে? না কি বিজ্ঞান এইভাবেই কাজ করে, সমস্যা তৈরী করে আর তার "সমাধান' করে?


    চলতি ধারণার প্রয়োগে পরিবেশবাদ আর বিজ্ঞান


    যেহেতু এই লেখা দুটি আপাত বিচ্ছিন্ন প্রশ্নকে ঘিরে, প্রথমেই আমরা পরিবেশবাদ আর বিজ্ঞানকে মিশিয়ে দেব, দেখতে চাইব প্রচলিত ভাবনায় এই দুই বিভেদিত ধারণা কিভাবে মিলেমিশে যায়। যদিও লেখার পরবর্তী অংশে এই দুই ধারণার পৃথকভাবে আলোচনা থাকবে, কিন্তু আমরা দেখাতে চাইব তারা কেমনভাবে অনেকসময়ই মিথোজীবিতায় সম্পর্কিত। নীচের দুটি উদাহরণে আমরা পরিবেশ আন্দোলনের কয়েকটি ধারণাগত অবস্থান ও তার বৈজ্ঞানিক বৈধতার ভিত্তি খুঁজে দেখতে চাইব।


    ধারণা ১ – পৃথিবী মা ( mother earth )-এর ধারণা। এই ধারণায় প্রকৃতি যেন এক জড় অচেতন আধার, যার মধ্যে গাছপালা, পশুপাখি, মানুষ ঠিক মাপে মাপে লেগে আছে; জীবজগৎ যেন এক অপরিবর্তনীয় মাতৃসমা প্রকৃতির কোলে শিশুর মতো লালিত। জীবজগতের সৃষ্টি এবং নিয়তি প্রকৃতি দ্বারা পূর্বনির্ধারিত; মানুষের নির্মম প্রাকৃতিক লুন্ঠন তাই আদতে মাতৃহত্যার সামিল। এই আপাত মরমি মেটাফর অবশ্যই শুধুমাত্র এক অধিবিদ্যা সঞ্জাত ধারণা নয়, আমরা দেখি সে তার বৈজ্ঞানিক বৈধতাও পেয়েছে ইকলজির সন্দর্ভে। এই ধারণার প্রতিবিম্বিত বৈজ্ঞানিক পরিভাষা হল "ইকলজিক্যাল নিচ' ( ecological niche -এর বাংলা কি তবে "বস্তুতন্ত্রের কুলুঙ্গি'? ইকলজিও অবশ্য সব বিজ্ঞানের টেক্সট-এর মতো মেটাফরের মহামারীতে সংক্রামিত); বিজ্ঞানের ভাষ্যেও জীবজগৎকে যেন প্রকৃতির এক কুলুঙ্গিতে স্থান দেওয়া হল। আমরা দেখি এই কুলুঙ্গির ধারণা বিবর্তনবাদেও প্রসারিত, যেখানে তার পারিভাষিক নাম অভিযোজন বা অ্যাডাপটেশন।


    ধারণা ২ - আর একটি আকর্ষণীয় ধারণা প্রকৃতির ভারসাম্য ( balance of nature )। এই ধারণায় প্রকৃতি বিভিন্নতায় সমৃদ্ধ এক অত্যন্ত জটিল সংস্থান বা সিস্টেম; এবং সিস্টেমের সামান্য পরিবর্তন হলে তা আবার পূর্বাবস্থায় ফিরে আসে। প্রকৃতি চলমান পরিবর্তনশীলতার পরিবর্তে যেন কিছু অন্তর্নিহিত সুস্থিত সম্পর্কের মধ্যেই ক্রিয়াশীল। মানুষের অনিয়ন্ত্রিত অপব্যবহারে এই ভারসাম্য বিঘ্নিত হচ্ছে, ধ্বংস হচ্ছে; প্রকৃতি এই মানবিক অবিচার সহ্য করবে না, "প্রকৃতির প্রতিশোধ' অবশ্যম্ভাবী, মানবসভ্যতার মৃত্যু আসন্ন। বিজ্ঞানেও ভারসাম্যের ইকলজির ( [equilibrium ecology] ) ধারণায় বৈধতা পেয়েছে প্রকৃতির ভারসাম্যের রূপক।


    দ্বিত্ত্বের বিপরীতমুদ্রা: সংস্কৃতি/প্রকৃতি থেকে প্রকৃতি/সংস্কৃতি


    "" In its commonest and most fundamental sense, the term 'nature' refers to everything which is not human and distinguished from the work of humanity"কেট সোপার; হোয়াট ইজ নেচার? কালচার, পলিটিক্স অ্যান্ড দি নন-হিউম্যান


    কেট সোপার তাঁর বইটি শুরু করেছেন প্রকৃতির এই সংজ্ঞা দিয়ে যা পশ্চিমে প্রকৃতির ভাবনায় এক আধিপত্যমূলক ধারণা। এই ভাবনা অবশ্যই পশ্চিমে প্রকৃতির একমাত্র ধারণা নয় এবং এই ধারণা আবার শুধুমাত্র পশ্চিমের ভূগোলেই সীমাবদ্ধ নয়। এই ধারণায় প্রকৃতি কল্পিত হয়েছে মানুষের, মানবিক সংস্কৃতির অপর হিসেবে, আরো অনেক দ্বৈতবাদী ( dualist ) ধারণার আধারে প্রকৃতি/সংস্কৃতির দ্বিত্ত্বে। আধুনিকতার সন্দর্ভে দ্বৈতবাদী ধারণায় মানুষকে আদিম প্রকৃতিকে বশ্যতায়, জয় করায়, নিয়ন্ত্রণে, মনুষ্যত্বের উপযুক্ত করে তোলার তত্ত্বায়ন হয়েছে। তাই প্রাকৃতিক সম্পদের আহরণ, উৎপাটন এবং ধ্বংস তাত্ত্বিক বৈধতা পেয়েছে। সমাজতাত্ত্বিকরা পরিবেশবাদের ইতিহাসের আলোচনায় আমাদের জানিয়েছেন পশ্চিমি সংস্কৃতির প্রকৃতির ওপর আধিপত্যকামিতার শিকড় সম্ভবত ছড়িয়ে আছে আরো প্রাচীন ঐতিহাসিক মুহূর্তে। প্রাক-আধুনিক যুগেও ইউরোপে প্রকৃতির ধ্বংসের তত্ত্বায়ন উঠে এসেছিল জুডিয়-খ্রীষ্টীয় নৃকেন্দ্রিক ধারণার মধ্যে থেকে--যে ধারণায় ঈশ্বর সৃষ্টি করেছে আলো আর অন্ধকার, গ্রহ-নক্ষত্রের সাথে পৃথিবী এবং তার সাথে সেই পৃথিবীতে সকল গাছপালা, পশুপাখি আর মানুষ (পুরুষ অ্যাডাম)। ঈশ্বর সৃষ্ট মানুষের (পুরুষের) অবয়ব/শরীর তৈরী হয়েছে ঈশ্বরের আদলে, যেখানে মানুষই ঈশ্বরের শ্রেষ্ঠ সৃষ্টি আর না-মানুষের জন্ম মানুষের ব্যবহারের জন্য; ফলত, না-মানুষ প্রকৃতির মানবিক লুন্ঠন এক বৈধতা খুঁজে পেয়েছিল। পাশ্চাত্যের খ্রীষ্টীয় সংস্করণ পৃথিবীর ইতিহাসে সম্ভবত সবচেয়ে নৃকেন্দ্রিক ধর্মবিশ্বাস। ভারতবর্ষেও ব্রাহ্মণ্য হিন্দু ভাষ্যে প্রকৃতির ধ্বংসের বৈধতা নির্মাণ করা হয়েছিল ঈশ্বরের ইচ্ছাপূরণে মানবিক কর্মকাণ্ড হিসেবে। মহাভারতে যমুনানদীর তীরে (আজকের দিল্লি) খাণ্ডববন দহন করে অগ্নিদেবের খিদে মেটানোয় যথেচ্ছ বনাঞ্চল ধ্বংস করে কৃষিসভ্যতা পত্তনের গল্প আমরা তো শুনেছি


    ইউরোকেন্দ্রিক আধুনিকতা, প্রকৃতির এই খ্রীষ্টীয় ধারণায় এক বিচ্ছেদ নিয়ে আসে, যাকে "বিজ্ঞানের বিপ্লব'-ও ( [scientific revolution] ) বলা হয়। ধারণাগতবভাবে এই বিপ্লবে অবশ্য না-মানুষ প্রকৃতির ধ্বংসের খ্রীষ্টীয় কাঠামোটি থেকেই গেল, প্রকৃতির সৃষ্টিতত্ত্বের নতুন সন্দর্ভ লেখা হল। বিজ্ঞানের বিপ্লবে প্রথমসারির অন্যতম বিপ্লবী ছিলেন রেনে দেকার্ত, যিনি খ্রীষ্টীয় প্রকৃতিকে পুন:সংজ্ঞায়িত করলেন মন/শরীরের দ্ব্যনুকে। প্রকৃতি হল সেই শরীর যাকে মানুষের মন পর্যবেক্ষণ করতে পারে, পাঠ করতে পারে। এই পাঠে মনই প্রাথমিক বা এসেন্স আর শরীর শুধুমাত্র তার অংশসমূহের এক সম্মিলনী। এই পাঠ একভাবে সর্বশক্তিমান ঈশ্বরের নির্মাণকে বাতিল করে প্রকৃতিকে যন্ত্রের রূপকে, যন্ত্রাংশের রূপকে দেখতে শেখার পাঠ। কার্তেসীয় ধারণায় প্রকৃতি এক বস্তু বা অবজেক্টে খর্বিত হল। অন্য এক বিপ্লবী ফ্রান্সিস বেকন তো প্রকৃতিকে মানুষের দাসীতে রূপান্তরের দাবী তুললেন। পশ্চিমি আধুনিকতার সন্দর্ভে প্রকৃতি/সংস্কৃতি তাই শুধুমাত্র দুটি পৃথক বর্গ নয়, তারা এক ক্রমবিভক্ত কর্তৃত্বের ভিত্তিতে সংগঠিত। ভাবনার এই কাঠামোকে আমরা এঁকেছি গাণিতিক লব/হর-এর রূপকে (চিত্র ১, বাম প্যানেল; যেখানে লব এবং হর যথাক্রমে প্রাথমিক ও গৌণ বর্গ)।


    প্রকৃতির যান্ত্রিক রূপকে কার্তেসীয় খর্বীকরণ ( [Cartesian reductionism] ) এবং তার পরিব্যাপ্ত বিচ্ছিন্নতা ও হতাশা পশ্চিমি চিন্তায় নানান প্রতিক্রিয়ায় আকার পেতে থাকে। খ্রীষ্টীয় বিশ শতকের ষাটের দশক থেকে আধুনিকতার অন্তর্বীক্ষণের বিভিন্ন ধারার মধ্যে পরিবেশচিন্তা ও আন্দোলনেরও সূচনা হয়েছে এবং ক্রমেই তা অন্যত্র ছড়িয়েও পড়েছে। এই অন্তর্বীক্ষণের এক প্রতিক্রিয়ায় প্রকৃতি-সংস্কৃতি দ্ব্যনুককে উলটে দেবার কথা এসেছে, প্রকৃতিকে এসেন্স হিসেবে ভাবার চেষ্টা হয়েছে, প্রকৃতির কাছে ফিরে যাওয়ার কথা হয়েছে (চিত্র ১, ডান প্যানেল)।




    মানুষকে কার্তেসীয় নৃকেন্দ্রিক ধারণা থেকে বেরিয়ে প্রকৃতি-কেন্দ্রিক ( ecocentric ) ধারণায় অন্তর্ভুক্তির রাজনীতি আজকের পরিবেশবাদের স্লোগান। মানুষকে প্রকৃতির "নিয়ম' মেনে তার মতো হয়ে উঠতে হবে ( [back-to-the-land, deep ecology] ) অথবা বৈজ্ঞানিক সংরক্ষণের মধ্যে দিয়ে তাকে মানুষের নাগালের, আয়ত্বের বাইরে রাখতে হবে অথবা যে পরিবেশে মানুষ এখনো বসতি গড়ে নি, তাকে সেইভাবেই পৃথক করে রাখতে হবে ( [wilderness idea] )। প্রকৃতি-কেন্দ্রিকতায় নিহিতার্থে মানুষের কর্মপরায়ণতাই যেন অ-প্রাকৃতিক; তাই প্রকৃতিকে মানুষ থেকে আলাদা করতে হবে, মানুষকে বাদ দিয়ে প্রকৃতির সংরক্ষণ করতে হবে। জীববৈচিত্র ( biodiversity ) সংরক্ষণ করতে হবে, তদের মানুষের এক্তিয়ারের বাইরে রাখতে হবে, সংরক্ষণের রাজনীতি করতে হবে। পশ্চিমে/উত্তরে বামপন্থী উদারনৈতিক রাজনীতিতে এই সংরক্ষণবাদ সক্রিয়; পশুপ্রেমী, ভেগান, নিরামিষী রাজনৈতিক কর্মীর সংখ্যা আজ ক্রমবর্ধমান।


    আত্মসমীক্ষায় তিন উদাহরণ


    প্রকৃতি/সংস্কৃতির দ্ব্যনুকের ধারণা থেকে আমাদের রাজনৈতিক সৃজন ও অবস্থান কখনো সমস্যায়িত এবং কখনো কখনো কিছুটা অস্পষ্ট হয়ে ওঠে। তিনটি পৃথক উদাহরণে প্রকৃতি/সংস্কৃতি দ্বিত্ত্বের ভাবনা কিভাবে আমাদের চর্চা আর চর্যায় জড়িয়ে যায়, তা এবার বুঝতে চেষ্টা করি। প্রথম উদাহরণে আমরা আমাদের রাজনৈতিক প্রতিক্রিয়াকে ফিরে দেখব, দ্বিতীয়টিতে এক পরিবেশবাদীর ভাবনার বিশ্লেষণ করতে চেষ্টা করব আর শেষটিতে শুধুমাত্র একটি আকাদেমিক ভাবনা উদ্ধৃত করব।


    উদাহরণ ১ - আমরা মিজো পাহাড়ের দুর্ভিক্ষের খবর জেনেছি, জেনেছি তার জন্য রাজনৈতিক অস্থিরতার কথা, দেখেছি ১৯৫৯-এর দুর্ভিক্ষের পরে "মিজো ন্যাশনাল ফেমিন ফ্রন্ট' থেকে "মিজো ন্যাশনাল ফ্রন্ট'-এর রাজনৈতিক পালাবদল, লালডেঙ্গার নেতৃত্বে মিজো রাষ্ট্রের দাবীর আন্দোলন। আমরা বলি, লিখি আদিবাসী মানুষের বেঁচে থাকার অধিকারের কথা- প্রগতিশীল রাজনীতিক হিসেবে আদিবাসী জনগোষ্ঠীর আন্দোলনের প্রতি সমব্যাথী হই, তাঁদের প্রতিবাদের শরিক হই। কিন্তু কেন এই দুর্ভিক্ষ? কেন প্রতি পঞ্চাশ বছরে আদিবাসী মানুষেরা দুর্ভিক্ষের কবলে পড়েন? এর একটা বায়লজিক/ইকলজিক উত্তর তাঁরাও জানেন- তাঁরাই আমাদের জানিয়েছেন, প্রতি অর্ধশতাব্দীতে মিজো পাহাড়ের বাঁশবনে ৩/৪ মাসের জন্য একবার করে ফল আসে। এই ফল মাটিতে পড়ে নতুন বাঁশগাছের, বাঁশবনের জন্ম দেয়। আবার সেই ফল খেয়েই প্রতি ৪৮ বছরে একবার করে বাঁশবনের ইঁদুরের অসম্ভব দ্রুত কিন্তু ক্ষণস্থায়ী বংশবৃদ্ধি হয়। আর বাঁশের ফলনের পর ইঁদুরের খাবারও ফুরিয়ে যায়। বিজ্ঞানীরা বলবেন যে এই প্রাকৃতিক নিয়মে বাঁশগাছ আর ইঁদুরের সহাবস্থান তাদের দুই প্রজাতির বেঁচে থাকা এবং বিবর্তন নিশ্চিত করে। এবার যখন আদিবাসী মানুষ এই প্রাকৃতিক "ভারসাম্য' নষ্ট করে চাষবাস শুরু করলেন তখন লক্ষ লক্ষ ইঁদুর আর ৩/৪ মাসের বাঁশফলের ফলনের পরে মারা গেল না - তারা দিব্যি মানুষের তৈরী ধান খেয়ে বহাল তবিয়তে বেঁচে রইল। মিজো পাহাড়ের মানুষ এবার এক ভয়াবহ খাদ্যসঙ্কটে পড়লেন, দুর্ভিক্ষের কবলে পড়লেন। সমস্যা হল এই ইকলজির রাজনীতিতে আমরা শিকারকে জানি কিন্তু শিকারীকে চিনি না; আমাদের চেনা শিকারীরা এখানে নেই, এখানে পুঁজি নেই, কর্পোরেট স্বার্থ নেই, মডার্নিজম নেই, এমনকি রাষ্ট্র-ও সেভাবে নেই। সঙ্গতভাবেই মনে হয় যেন আদিবাসীরা নিজেরাই তাঁদের অবস্থার জন্য দায়ী। তাঁরাই যেন প্রকৃতির মধ্যে প্রবেশ করেছেন, তাকে ধ্বংস করেছেন।


    উদাহরণ ২ - পরিবেশবাদী ভাবনা কিভাবে এক স্ববিরোধী রাজনৈতিক ভাষ্যে আটকা পড়ে, ভারতবর্ষের প্রেক্ষিতে তা আমরা বন্দনা শিভার উদাহরণে বুঝতে চেষ্টা করব। খাদ্য নিরাপত্তার পক্ষে এবং কৃষিতে বহুজাতিক পুঁজির আগ্রাসনের বিরুদ্ধে বন্দনা শিভার ক্রিটিক আমাদের কাছে অত্যন্ত প্রয়োজনীয় এবং গুরুত্বপূর্ণ দলিল। শিভার পরিবেশবাদের পাঠ একদিকে যেমন র‌্যাডিকাল লোকায়তিক কিন্তু কখনো কখনো তাঁর স্বদেশী জাতীয়তাবাদী অবস্থান আমাদের সংশয়ী করে। তিনি যেমন লোকায়তিক অবস্থান থেকে বিদেশী পুঁজির বিরুদ্ধে দেশীয় প্রচলিত কৃষিকে দাঁড় করান, আবার ওয়ার্ল্ড ট্রেড অরগ্যানাইজেসনের বিরুদ্ধে স্বদেশিয়ানার পক্ষে দাঁড়ান। তাই ১৯৯৮ সালের বিজেপি সরকারের অর্থনৈতিক স্বদেশিয়ানার ধারণা বন্দনা শিভার কাছে বিশ্বায়িত পুঁজির বিরুদ্ধে আকর্ষণীয় হাতিয়ার বলে মনে হয়। একই ভাবে গত দু'শ বছরে পৃথিবী জুড়ে জনসংখ্যা বৃদ্ধির মূল কারণ হিসেবে তিনি কৃষি সভ্যতার অন্তর্নিহিত প্রাকৃতিক ভারসাম্য ভেঙ্গে পরার যুক্তি দেন। এই যুক্তির অনুসিদ্ধান্ত হিসেবে তিনি বিজ্ঞান/প্রযুক্তিকে পরিবেশের সকল সমস্যার কারণ স্বরূপ কাঠগড়ায় দাঁড় করান, আবার একই সাথে পরিবেশের সমস্যার ব্যাখ্যায় বৈজ্ঞানিক তথ্য/তত্ত্ব ব্যবহার করেন। এমনকি যখন "স্টোলেন হারভেস্ট' বইতে ট্রাডিশনের পক্ষে দাঁড়িয়ে তিনি বলেন - প্রদীপের সরষের তেলের ধোঁয়া এনভিরনমেনটাল পিউরিফায়ার, তখন তিনি এক যৌক্তিক বিজ্ঞানবাদকেই বৈধতা দিয়ে দেন।


    আবার পরিবেশ আন্দোলনের অংশ হিসেবে পরিবেশবাদ স্বদেশী/সংরক্ষণবাদের সাথে ধারণাগতভাবে জীববৈচিত্র রক্ষার কর্মকাণ্ডে মিশে যায়। এই ধারণাতেও এক অপরিবর্তনশীল প্রকৃতির কল্পনা করা হয় যেখানে বহুবিচিত্র জীবজগতের অস্তিত্ত্ব যেন শুধুমাত্র মানুষের কর্মকাণ্ডের মধ্যে সীমিত। এই ধারণায় স্বাভাবিকভাবেই বাদ পড়ে যায় ইকলজির বিবর্তনের সম্ভাব্যতার কথা, ইকলজির চলমান গতিশীলতার কথা। বাদ পড়ে যায় সেই সব জীবাশ্মের কথা যারা আমাদের অন্তত কিছুটা দুর্বলভাবে হলেও জানিয়েছে যে বিবর্তনের ইতিহাসে পৃথিবীতে মানুষ আসার আগেই ৯৯.৯ শতাংশের বেশী জীবকূল লুপ্ত হয়ে গেছে। লক্ষ বছরের প্রাণের ইতিহাস থেকে সরে এসে আমাদের সন্নিহিত ইকলজির দিকে ফিরলেও জীববৈচিত্রের ধারণা সমস্যায়িতই থাকে, এমনকি উলটেও যায় কখনো। আমরা দেখতে পাই, আজকের জীববৈচিত্র শুধুমাত্র প্রাকৃতিক নির্বাচনের ফল নয়, এটি ভীষণভাবেই মানুষের কার্যক্রমের ফসলও। মনস্যান্টো বা ডিউপন্ট-এর কর্পোরেটীকরণের অনেক আগে থেকেই পৃথিবীর বিভিন্ন প্রান্তের "স্থানীয়' পশু-গাছপালা বিশ্বায়িত হয়েছে, সংস্কৃতিতে আত্তীকৃত হয়েছে। আলু, টমেটো, তেলাপিয়া, কাঁচালঙ্কা তবে কি প্রাকৃতিক, না কি সাংস্কৃতিক? যখন শিভা দেশীয় (প্রাকৃতিক) বীজ-ব্যাঙ্ক গড়ে তোলার কথা বলেন, তখন কোনটা দেশী আর কোনটা বিদেশী বীজ, কি ভাবে তা নির্ধারিত হবে?

    শিভার পরিবেশবাদের আলোচনায় সম্ভবত সবচেয়ে হতাশাজনক প্রবণতা হল আত্মপক্ষ সমর্থনের জন্য অসম্পূর্ণ তথ্যের পরিবেশন। তিনি "স্টোলেন হারভেস্ট' বইয়ে জেনেটিক্যালি পরিবর্তিত সয়াবীনের আলোচনায় মন্তব্য করেন -" infants fed with soy-based formula are daily ingesting a dose of estrogens equivalent to that of 8 to 12 contraceptive pills'। রিচার্ড লিয়নটিন এই বইয়ের আলোচনায় দেখান, শিভা যে লেখা থেকে এই তথ্য পেয়েছেন, সেই লেখাতেই স্পষ্ট উল্লেখ আছে যে এই হরমোন আদতে স্টেরয়েড নয় এবং মানবশরীরে তার সক্রিয়তা অত্যন্ত সীমিত (লিয়নটিন, ২০০০ b )।


    সমকালীন পরিবেশবাদে জেনেটিক ইঞ্জিনিয়ারিং এবং তার উৎপাদিত জেনেটিক্যালি মডিফায়েড অরগ্যানিজম (জিএমও) আরো একটি বিসম্বাদী পরিসর। পরিবেশবাদীদের বায়লজির প্রসঙ্গে জিএমও সম্পর্কিত মূল আপত্তি সবসময়ই থেকেছে প্রকৃতির "স্বাভাবিক' বংশগতির নিয়ম ভেঙ্গে তার ম্যনিপুলেশন করানোর মধ্যে। সমস্যা হল এই ক্রিটিক সংজ্ঞার্থেই কৃষিরও ক্রিটিক। ইতিহাসের প্রথম চাষ এবং পশুপালনের দিন থেকেই মানুষ জীবজগতকে জিনগতভাবে পরিবর্তন ও নির্বাচন করে এসেছে। একভাবে কৃষি আর গৃহপালনের ইতিহাস তো জিনের ম্যানিপুলেশনের "অস্বাভাবিক' ইতিহাস। আজকের চাষবাস হাজার বছরের জেনেটিক নির্বাচন আর তাদের সংকরে তৈরী হওয়া এবং কোন যুক্তিতেই এই নির্বাচন আকস্মিক নয়; মানুষের সক্রিয় ও সুচিন্তিত অংশগ্রহণের (এক্সপেরিমেন্ট?) মধ্যে দিয়ে এই সব হাইব্রীড তৈরী হয়েছে। কৃষি তো শুধুমাত্র "কাজ' নয়, কৃষি এক মানবিক সংস্কৃতিও (হয়ত, ইংরেজি এগ্রিকালচার কথাটা এখানে বেশী উপযুক্ত); জিএমও সৃষ্টি করা রামা কৈবর্ত্ত, রহিম শেখ, গফুর মিঞা কিংবা উপেন আর তাদের পূর্বপুরুষ/নারীদের সংস্কৃতিতে গড়ে ওঠা এক অনুপম (বি)জ্ঞান।


    তা হলে কি আমরা জিএমও -কে বুঝছি, ভাবছি? প্রশ্নাতীতভাবেই কর্পোরেট লালিত বিটি-তূলো চাষ আর কৃষক-কৃষকীর (আত্ম)হত্যার সম্পর্ক প্রথাগত কৃষিসংস্কৃতি থেকে ভিন্ন; শিভা আমাদের দেখিয়েছেন কৃষক-কৃষকীর মৃত্যুতে কর্পোরেট পুঁজির আয়োজন, অংশগ্রহণ আর সম্পাদনের সক্রিয় ভূমিকা। আমরা এখানে শিভার ভাবনাকে আরো একটু প্রসারিত করতে চাইব; আমাদের ভাবনায় জিএমও শুধুমাত্র এক "অস্বাভাবিক' প্রাণ নয়, জিএমও-কে আমরা বিজ্ঞান-প্রযুক্তি-অর্থ ও অর্থনৈতিক উদ্বৃত্ত আহরণ-বৌদ্ধিক সম্পত্তির অধিকার ( intellectual property rights ) ইত্যাদির নেটওয়ার্কে গড়ে ওঠা উৎপাদন হিসেবে দেখছি। এই লেখার পরিসরে জিএমও সম্পর্কীত ভাবনার বিস্তারিত আলোচনা করছি না, পরের অংশে আমরা শুধু বিজ্ঞান-প্রযুক্তি প্রসঙ্গটি ছুঁয়ে যাব।


    উদাহরণ ৩ - প্রকৃতি-সংস্কৃতি দ্বিত্ত্ব আর বৈজ্ঞানিক নির্ধারণবাদের এক (অ)সুন্দর সমাপতন হতে দেখি বিজ্ঞানের ইতিহাসের ভাষ্যে। ভারতবর্ষে এখন তার বৈজ্ঞানিক অতীতকে খোঁজার চেষ্টায় অনেক বই লেখা/সম্পাদনা হচ্ছে। বি ভি সুব্বারায়াপ্পা সম্পাদিত "মেডিসিন অ্যান্ড লাইফ সায়েন্সেস ইন ইন্ডিয়া' ( Volume IV, part 2 of History of Science, Philosophy and Culture in Indian Civilization ) ম্যাগনাম ওপাসটি সুব্বারায়াপ্পা শুরু করছেন এই ভাবে- " The struggle for existence and the survival of the fittest that characterised the biological evolution leading to the emergence of man, were external and internal alike. The incessant human struggle, from pre-historic times to the present, for existence as a distinct biological species overcoming often the hostile environment on the one side and, on the other, the diseases that afflict him both externally and internally has been indeed a fascinating story'. সুব্বারায়াপ্পার ভাষ্যে "আমাদের' বিজ্ঞানের ইতিহাসও পশ্চিমের মতোই প্রকৃতির সাথে যুদ্ধ করে, তাকে পরিবর্তন করে এক স্থূল ডারউয়িনিয় বিবর্তনের মধ্যে দিয়ে "এগিয়েছে'। লেখার শেষে এই প্রাচ্যবাদী ( orientalism ) নির্মাণকে আমরা আবার ফিরে দেখব।


    *(পরবর্তী পর্বে সমাপ্য)


    **(লেখাটি তেপান্তর পত্রিকায় পূর্বপ্রকাশিত)



    মন্তব্য:


    ১। এই লেখায় যা সরাসরি নেই - প্রথমত, পরিবেশের রাজনীতিতে পুঁজিবাদ ও পরিবেশের অবনমনের সম্পর্ককে ঘিরে গড়ে ওঠা প্রশ্নগুলি। পুঁজিবাদী কনজামসনের উদ্বৃত্ত হিসেবে যদি পরিবেশের অবক্ষয় হয়ে থাকে, তা হলে মেইনস্ট্রীম পুঁজিবাদ পরিবেশ শোধন নিয়ে আজ এত উৎসাহিত কেন? এই অনুরাগ কি পুঁজিবাদের "মানবিক মুখ' না কি নমনীয় পুঁজিবাদ এক নতুন বাজারের সন্ধান পেয়েছে? সবুজ-প্রযুক্তি কি পুঁজিবাদী ইউটোপিয়ার নতুন আবিষ্কার? জিজেক যেমন পুঁজিবাদের নমনীয়তার কন্টেক্সটে বলবেন, কুমেরুর বরফ গলে গেলে পুঁজি সেখানে হয়তো একদিন রিয়েল এসটেট-এর দালালি শুরু করবে। তাই পরিবেশ-ব্যবসায়ী আল গোর যখন আমাদের "পীড়াদায়ক সত্য'-এর গল্পে বলেন পৃথিবীর উষ্ণায়ন (রাজ)নৈতিক প্রশ্ন, এবং বলে নোবেল প্রাইজ পান, তারপর প্রাইজ পেয়ে বলেন পরিবেশের রক্ষায় সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণ কাজ হল "কার্বন ক্রেডিট' প্রণয়ন করা, তখন আমরা সংশয়ী হই, ক্রিটিক্যাল হই। ক্রিটিক্যাল হওয়া আমাদের রাজনৈতিক অবস্থান হয়ে দাঁড়ায় (সম্পূর্ণ বক্তৃতাটি এখানে দেখুন- http://nobelprize.org/nobel_prizes/peace/laureates/2007/gore-lecture_e

    n.html ) । দ্বিতীয়ত, প্রকৃতি-ভাবনার কাঠামোয় এবং পরিবেশ ধ্বংসের প্রেক্ষিতে নারীবাদী বিসম্বাদী ক্রিটিক। সরাসরি উদ্ধৃত না করলেও নারীবাদী ভাবনা অনেকসময়ই ছুঁয়ে থেকেছে এই লেখাকে। শেফালি মৈত্রের "নৈতিকতা ও নারীবাদ' (২০০৩) বইতে "নারী-নিসর্গনীতি' প্রবন্ধটি নারীবাদী পরিবেশ ভাবনার একটি সুন্দর সারসংক্ষেপ।


    ২। প্রকৃতির ধ্বংসের ইতিহাসে খ্রীষ্টীয় ভাবনার প্রভাব নিয়ে লিন হোয়াইটের ( 1967 ) বহুল পরিচিত " The Historical Roots of Our Ecological Crisis' Science 155, 3767-3772. পশ্চিমে, বিশেষত আমেরিকায় হোয়াইট ও অন্যান্যদের চিন্তা কিভাবে পরিবেশবাদের ভাবনাকে প্রভাবিত করেছে, তার আলোচনায় দেখুন জন মেয়ার (২০০১)। এই বিষয়ে একটি সমন্বিত সাম্প্রতিক লেখা, Phillip Pattberg ( 2007 ), " Conquest, Domination and Control: Europe's Mastery of Nature in Historic Perspective', Journal of Political Ecology, 14, 1-9.


    ৩। প্রাচীন ভারতের ইতিহাসে কৃষিসভ্যতা পত্তন "আদিবাসী' মানুষ আর তার সভ্যতার পতনের ইতিহাস। এই পতনের ইতিহাস সম্পৃক্ত হয়ে আছে বনাঞ্চল তথা প্রকৃতির ধ্বংসের ইতিহাসে (মাধব গ্যাডগিল ও রামচন্দ্র গুহ (১৯৯৩))।


    ৪। পশ্চিমি ভাবনায় প্রকৃতি/সংস্কৃতি দ্বিত্ত্বের ইতিহাস ও তার বিশ্লেষণ করেছেন অনেকেই। এঁদের মধ্যে গুরুত্বপূর্ণ নারীবাদী ক্রিটিক ডোনা হারাওয়ে, ভ্যাল প্লামউড, কেট সোপার। নৃতত্ত্বের প্রেক্ষিতে ব্রুনো লাতুরের (১৯৯৩) দার্শনিক বিশ্লেষণ; প্রকৃতি/সংস্কৃতি দ্বিত্ত্বের সর্বব্যাপী ও অত্যধিক প্রয়োগের একজন ক্রিটিক জন মেয়ার (২০০১)।


    ৫। পরিবেশবাদের বিভিন্ন ধারার তথ্য রামচন্দ্র গুহ-র "এনভিরনমেন্টালিজম: এ গ্লোবাল হিস্টরি' থেকে অনুসরণ করা হয়েছে।


    ৬। বিজেপি সরকারের অর্থনৈতিক কর্মসূচি নিয়ে দেখুন বন্দনা শিভার " Power Shift in India'http://www.yesmagazine.org/article.asp?ID=841। জনসংখ্যা বৃদ্ধি নিয়ে শিভা একটি সাক্ষাৎকারে এই মন্তব্য করেন- In India, 1800 is the watershed for the consolidation of colonial regimes. For centuries before 1800 our population had been stable. When you depend on the land, you know there are five people who can be supported. You work your society out so you have five. When you are selling your labor power on an uncertain basis, in an unstable wage market, you know that having ten is better than having five. So dispossession from the Earth's natural wealth is at the root of instability and population growth. সম্পূর্ণ সাক্ষাৎকারটি এখানে দেখুন-http://www.yesmagazine.org/article.asp?ID=570

    http://www.guruchandali.com/default/2010/06/06/1275796046259.html#.U_psXMWSxJk





    ৫ই জুন, ২০১০


    প্রকাশঃ 06 June 2010 09:17:26 IST #



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    How Communists failed communist  movement  in India!!!!!


    Excalibur Stevens Biswas


    Communism for all leftist believers is the only thing that can save a nation from the salvation of Capitalism.


    In India Communists came with that promise to save under developed India from capitalist imperialist feudal system .Communist Manifesto,however,remained an academic affair despite trade union activities since pre independence industrial blitz.(The Communist Manifesto - Wikipedia, the free encyclopedia

    en.wikipedia.org/wiki/The_Communist_Manifesto

    The Communist Manifesto (Das Kommunistische Manifest), originally titled Manifesto of the Communist Party (German: Manifest der Kommunistischen Partei), .)



    Communists were never in the mainstream politics as it aligned with Congress during struggle of freedom led by MK Gandhi and Nehru.


    However, British Parliamentary styled representation made communist party of India the main opposition after the partition and transfer of power.


    Nambudiripad was the first elected communist chief minister of India who Nehru removed.Later Comrade Jyoti Basu and Comrade Pramod Dasgupta paved the way to power in Bengal followed by Tripura.


    But the communist movement was made relevant as it adopted the land reform movement which had been the legacy of indigenous insurrections throughout British Raj.Ironically, the movement was, in fact ,really fuelled by the most condemned event of Naxalbadi.


    Naxalites broke away from the mainstream parliamentary politics led by Charu Majumdar and eventually the left disowned its power house,key to power,the land reforms and adopted secular mode adjustable with power politics in the centre.


    Nevertheless,land reforms and Naxalbadi, jointly made communist movement highly relevant once again in National politics after its demise in Maharashtra, thanks to Bal Thakre.


    Mind you, Mumbai being the epicentre of industrial and economic phenomenon in India,Maharashtra was the original base of the communists,not Bengal as it happens the popular myth, neither Kerala.


    The story is quite identical as far as Ambedkarite movement is concerned as Babasaheb Dr.BR Ambedkar began his movement from Maharashtra and it lost the bite in Mharashtra despite a brief Dalit Panther coup.


    Ambedkar movement has been mutilated in cowbelt in quest of power.


    It is the identical saga with communism.Shifting the base th Bengal and Kerala,the power politics killed communism all over India whereever it had strong bases,Communism survived as power brokery as it enhanced during all these twenty three years of full bloom genocide culture.


    The fact remains that Communism revived  with Naxalbadi movement and it promised that the communists would  free the toiling masses,the agrarian as well as working population of India from the damnation from capitalist system dominated by feudal lords in a colonial economy.


    But it deviated in drastic violence.


    At the same time,the communist betrayal was default to make India an US periphery without any resistance whatsoever despite the monopoly of communists in trade union,student`s,women`s,peasant`s movement countrywide.

    The predestined failure deeply rooted because of its elite leadership.representing the interests of landlords and the ruling class in general,not to mention the industrialists.


    Communists criticize business friendly hindutva politics to showcase its secular anti imperialist stance.But the leaders did prove to be as much as pro business during its non challengable long run in power in Bengal.The Polit bureau reduced to become a survival kit for power in Bengal despite hardcore Kerala line.Doubletrack Bengal Kerala communist leadership ejected out each and everyone, the much needed representation from rest of India.


    The naxals transformed,on the other hand,as maoists could not do anything to widen the land reform based mass base and seized within slawa judum.


    The mainstream parliamentary  communist movement eventually has been arrested for life term in the castles of play cards in Bengal,Kerala and Tripura.


    It seems the comrades leading communist movement in India had to do nothing with communist manifesto.


    Thus, it may be concluded that the communist parties  in India did never care to  follow the ideology. They, however, worshipped Marx, Lenin and Mao in the same way as Ambedkarites  made idols of Ambedkar but never followed the icons, never applied the ideology practically nor did try to mobilise,educate and organize  the masses for movement of change.


    Understandably,the impact can be seen amidst different communist clans in India which clearly indicates that there is no ideological or organisational unity, no cadre base which remains a grand myth once again and most importantly no real commitment to toiling India masses.


    There has been  a so called ideological strategical infight for supremacy among the communist leaders themselves and the objective was lost.It is also quite identical syndrom in reference to Post Ambedkarite movement.


    Provided the matter of domination,discrimination and supremacy inflicts as epidemic in a movement or a party,it should be seriously considered how it may face the challenges in an open market economy post modern.


    The ideology never directed that the labor should  fight for  luxuries, rather it always stated that the working class must fight for their rights ,must stand against the exploitation.


    But the trade unions made them to fight for the luxuries, like increment in salaries, more breaks, more casual leaves, which was a total deviation from the main problem.


    Secondly,despite the much glorified legacy of land reforms, no communist party ever concentrated on the real problem and issues faced by the masses in India rather the used the linguistics and genres of abstract kind which reduced them as an obscure bunch of intelligentsia.


    Communists did always explain all problems class based but never did try the polarization of classes which ironically has been achieved by the Sangh Pariwar,the protagonists of Hindutwa and Open market double dhamaka.


    Communists did never read Ambedkar and never addressed the problems of caste based,racial or geographical complexities as factors of economy.Though the fact remains that in India ,the main problem is exploitation on the basis of caste, race and geography.


    Ironically communists never did skip identity based politics as mainstream communism itself seized within Bengali and Malyali idenetities making it irrelevant nationwide.


    Communists misused partition holocaust and the highlight of this story remains the focal point of Marichjhanpi genocide,the prelude of Singur and Nandigram which killed the grand legacy of tebhaga and food movement, Telengana revolt altogether.


    Communists used refugees always as mobile vote bank and never did seriously take up the refugee issue, neither in  1947 nor in 1971. It always supported the centre as far as the refugees are concerned and also supported their deportation.


    This attitude made a huge difference and refugees led by Matuas disassociated with communism as it had been predestined.Communists never stood in their favor but always tried to exploit their rights. They swiftly  turned their back on the exploited people ,the exploited and depressed classes who were mainly the victims of their power politics.For example  slum evacuations, illegal land acquisition and extortion,engagement  with ponzi economics.


    They never followed the ideology as  communism teaches to see the world in a scientific way. It teaches to question every thing.In communism, there is no room for religion,no room for superstition.


    Communists in India fuelled the religion issue, embarked and embraced it for their political motto, they exploited the education system,and health network at their advantage. The employment was a bigger problem as it failed to generate  opportunities but the communist rule  promoted automation as well as PPP.



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    कोयला घोटाले से सबक,नेतृत्व बदलने से व्यवस्था बदलती नहीं!

    संस्कारबद्ध धर्म के डिजिटल देश में भगदड़ और घोटालों का राज्यतंत्र ,जिसे बदले बिना कर्मफल सिद्धांत के शिकंजे में ही मरती खपती रहेगी जनता!


    पलाश विश्वास

    आज सुबह तक लिखता रहा था।मनसेन्टो के संघी विरोध के मध्य भाजपा शिवसेना का मनसेन्टो कारोबार का खुलासा पहले अंग्रेजी में किया तो फिर ठेठ पूर्वबंगीय लोकभाषा में लिखा मूतने की एकता तक न होने वाली मुक्तबाजारी अस्मिताबद्ध संस्कारी व्यवस्था के बारे में।कमसकम अपढ़ लोगों को मजा तो आयेगा।समझ गये तो पौ बारह।पढ़े लिखे समझते हैं हमसे बहुत बेहतर हैं,लेकिन उनके फैसले अपने ही दायरे में कैद जैसा उनका विवेक और मूल्यबोध।स्वर्गवासियों से क्या कहना,नरकवाले समझ लें तो बेहतर।


    सुबह उठकर अभिषेक को फोन लगाया कि कोई जुगाड़ बने कि आर्थिक मुद्दों पर हम अपनी बोलियों में आम जनता को उनके मुहावरों से संबोधित करें, लेकिन वह  किसी कार्यक्रम में था और दोबारा फोन नहीं किया।


    बहरहाल कोलकाता आये रामकुमार कृषक जी से लंबे अरसे बाद लंबी बातें हुईं फोन पर अपने जनसत्ता संपादक कविवर शैलेंद्रे के सौजन्य से,जिनके घर वे आये।


    हमने विधाओं और भाषा के स्तर पर मुद्दों को फोकस करने का विचार उनके समक्ष रखा और यह भी कहा कि अमेरिका से सावधान लिखने के बाद सृजनधर्मी लेखन के लिए संपादकों,आलोचकों और प्रकाशकों का मोहताज बने रहने का वक्त यह नहीं है,इसी लिए साहित्यिक दुनिया क दूर से ही सलाम।


    थोड़ा सोकर उठे तो कोयला बम फट चुका था।इंटरनेट कनेक्शन था लेकिन गुगल खुला नहीं और बिना टूल के हम लिख नहीं सके।कोई अपडेट हो नहीं सका।


    अनंत मूर्ति के अवसान की खबर जनसत्ता में लीड लगी तो आज पहले पेज पर कुमार प्रशांत का आलेख है।दुसाध जी का लिखा कल ही जारी कर दिया था।जनसत्ता में आज संपादकीय भी है।


    अनंत मूर्ति के बारे में लिखना नहीं चाहता था।सत्ता से संपर्कित साहित्य संस्कृति कर्मी होने वाले महान लोगों के लिखे का व्यवहारिक पक्ष समझ में नहीं आता इसीलिए।


    दरअसल पढ़े लिखे लोगों के सामाजिक सरोकार इतने प्रबल होते तो भारतीय जनता कयामत में दम नहीं तोड़ती पल छिन इस अनंत मृत्यु उपत्यका में।गैस चैंबर की दीवारें भी टूट हीं जातीं।


    सत्ता तिलिस्म में आम लोग बेसहारा भटक रहे हैं इसलिए कि समझदार ज्ञानी लोग किसी जनजागरण के लिए कोशिश करने से परहेज करते रहे और इससे जानबूझकर अपनी खाल और चर्बी बचाने को बचते रहे। लेकिन खुद संसदीय राजनीति का हर लाभ,सम्मान, पुरस्कार लेते रहे और अपनी कुशाग्र बौद्धिकता का इस्तेमाल वेदर काक की तरह करते रहे।


    उनकी भूमिका किसी रामविलास,अठावले या उदितराज से कम बमफोड़ू नहीं है।


    अनंतमूर्ति बहुत बड़े कथाकार हैं।उनपर टनों लिखा जायेगा जैसा कि रिवाज है।


    कोलकाता में अभी साठ दशक के एक हिंदी योद्धा श्मशानी पीढ़ी के निर्भय मल्लिक का निधन हो गया।वे राजकमल चौधरी और शलभ श्रीराम सिंह के साथ उसवक्त तूफान मचाये हुए थे जबकि बांगाल में सुनील,बुद्धदेव बसु,शक्ति,संदीपन जैसे लोगों का राज था।उस दौर का विशद विवरण मनमोहन ठाकौर के संस्मरण में है ,जिसमें राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी की प्रेमकथा भी है।


    जनसत्ता जब तक कोलकाता में था यानी शहर से बाहर जब तक न हुए हम,तबतक निर्भय जी अक्सर आकर मिलते रहे।


    वे लगातार लिख रहे थे।संग्रह भी भेंट कर रहे थे,लेकिन हमारे लिए मुश्किल यह थी कि वे तब भी साठ के दशक में जी रहे थे,भाषा और कथ्य के मामले में।शलभ की तरह उन्होंने रचनाकर्म में समसामयिक सामाजिक यथार्थ को जोड़ा नहीं।


    मैं उनका अपराधी हूं कि जीते जागते उस सज्जन कथाकार के बारे में मैंने एक शब्द भी नहीं लिखा।फिर भी माफी नहीं मांगूगा।मरे हुए से माफी मांगने का बड़प्पन महाश्वेता दी में है,मुझ जैसे दो टके के पत्रकार को नहीं सुहाता।


    यह हमारी मजबूरी है,इसे समझिये।


    जो हमें पुस्तकें और पत्रिकाएं निःशुल्क भेजते रहते हैं,उनको बता दूं कि हमारे मुद्दे संबोधित न होंगे तो उनके महान रचनाकर्म को हम देखेंगे भी नहीं।बेहतर हो कि वे हम पर कृपा करना छोड़ दें।


    हम मीडिया में विज्ञापनों के कार्निवालमध्ये  फिलर बतौर प्रकाशित होने के लिए रचनाकर्म करते हैं और न किसी भी स्तर पर इसे बर्दाश्त करने की मानसिकता में जीते हैं।वैसे भी मैं कुख्यात बदतमीज हूं और मेरे सारे अंतरंग भी खासे बदमिजाज हैं।


    अनंतमूर्ति के संस्कार की प्रासंगिकता मध्य प्रदेश में आज हुए ताजा भगदड़ से फिर साबित हो गयी।धर्मनिरपेक्षता से मैं उन्हें तौलता नहीं।लेकिन जो धार्मिक यह मुक्तबाजार है,उन्हें समझने के लिए हमें उन्हें अवश्य पढ़ना चाहिए।


    वैसे समाजवादी लोगों से हमारी खासी एलर्जी रही है।वे सारे के सारे लिखते यकीनन लाजवाब हैं लेकिन मुद्दों को भटकाने में वे सारे के सारे बेजोड़ हैं।रघुवीर सहाय अलग गोत्र के थे जिनका संसदीय राजनीति से लेना देना नहीं था।सर्वेश्वर भी ऐस ही थे।


    आप हमराे पुरातन लेखन को फिर दोबारा देखें तो पायेंगे कि हम बार बार लिखते रहे हैं कि विचारधारा की जुगाली और सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था लेकिन बदलती नहीं है।


    कर्मफल सिद्धांत मुताबिक जो अश्वमेधी नरसंहारी राजसूय है, उससे मुक्ति इस समूचे राज्यतंत्र को बदले बिना असंभव है और इसके लिए जाति उन्मूलन से लेकर अस्मिताओं को तोड़ना बेहद जरुरी है।वर्गों का ध्रूवीकरण जरुरी है,धर्मों,जातियों और भाषाओं का नहीं।नस्लों,लिंगो और पेशेवरों का भी नहीं।


    नरेंद्र मोदी से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है। वे पिछड़े वर्ग से हैं और इस मुकाम तक जैसे भी पहुंचे,उसके लिए उन्हें सलाम।


    जो भी कुछ वे कर रहे हैं,अपनी आस्था और संकल्प के मुताबिक ईमानदारी से कर रहे होंगे।लेकिन नेतृत्व बदलने से व्यवस्था बदलती नहीं है तो जाहिर है कि मोदी के बदले दूसरा कोई प्रधानमंत्री होता तो उनके डिजिटल देश की परियोजनाएं और परिकल्पनाएं कतई भिन्न नहीं होती।


    क्रयशक्ति संपन्न सत्तावर्ग में जब मेधा तबके का समूचा विसर्जन हो और जनता को बुनियादी सूचना तक न हो,उनका प्रतिनिधित्व किसी भी स्तर पर न हो,जनादेश कारपोरेट बनाता हो,संसद और संविधान बेमयाने हों,तब लोकतंत्र और एकनायकतंत्र में कोई खास फर्क नहीं रह जाता।


    अर्थव्यवस्था और वैश्विक इशारे जब संचालित नियंत्रित करते हों राजकाज तो प्रधानमंत्री का नाम बदलने सा कुछ बदलता नही है।


    तानाशाही और सैन्यशासन से बदतर है यह दमघोंटू परिवेश,जहां अभिव्यक्ति पर भी चहारदीवारी चीन का प्राचीर लेकिन बाजार के आगे पिघल जाये हिमालय भी।ज्वालामुखी भी बन जाये शीतल पेय।


    अभी हाल में मनमोहन सिंह और कोयलाघोटाले में औद्योगिक कारपोरेट घराने को बरी करने की बात हमने लिखी थी।अब उसका असली तात्पर्य खुलने लगा है,जैसे बंगाल में शारदा फर्जीवाड़े में समूची राजनीति का चरित्र उजागर हो रहा है,जैसे आर्थिक सुॆधारों की सांढ़ संस्कृति सर्वदलीय है,उसी तरह हर घोटाला लेकिन सर्वदलीय है।


    मुक्त बाजार बंदोबस्त और सैन्य राष्ट्र के लोकतंत्र का असली विपर्यय यही है कि डालर ही सर्वेसर्वा है और डालर वर्चस्व में मूल्यबोध,नैतिकता और विचारधारा सब जनविरोधी है तो सांस्कृतिक तामझाम का सारा कारोबार क्रयशक्ति से सीधे जुड़ा है।


    गणशत्रुओं के इस महागठबंधन समय में कोई प्रचंड वैप्लविक तूफान से ही हालात बदल सकते हैं जबकि हम सब खुद को शूतूरमुर्ग की औलाद साबित करने में लगे हैं।


    कोयले की कोठरी में जब सारे लोग कागद कारे हैं तो तमाम उजली छवियों को बचाने का तकाजा यह होना ही चाहिए था कि सबसे बहवले नवउदारवाद के ईश्वर को दोषमुक्त कर दिया जाये।


    अब 1992 से लेकर अब तक सारे कोयला आबंटन अवैध है,ऐसा सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया तो परस्परविरोधी दोषारोपण से ही सभी पक्ष अपनी अपनी जमानत करा लेंगे और जनता वहीं ठगी की ठगी रहेगी।


    प्रकृति,पर्यावरण और मनुष्य की चौतरफा दुर्गति के इस दुःसमय में क्या हर्ष,तो क्या विषाद।कबीर दास मुओं से कुछ मांगने को मना कर गये हैं।


    मुआ यह पढ़ा लिखा समाज ही इस समाज का सबसे बड़ा शत्रु है जो हर हाल में सत्ता और राजनीति से चस्पां है।उनकी अर्थव्यवस्था सबसे मजबूत है जो सिरे से गिरगिट हैं।


    खबरें तो आप अखबारों से पढ़ ही लेंगे ,इसलिए कतरनें नहीं जोड़ रहा हूं।सार संक्षेप में कुछ जरुरी बातें कर रहा हूं।


    बुरी लगे तोफिर हमें मत पढ़ना।


    समझ में आये तो कदम बढ़ाना साथ साथ हाथों में हाथ।


    तभी बात बनेगी।


    गालियों की बौछार और फतवों से हमे डर नहीं लगता।


    सांपों के तो हम जनमजात हमसफर हैं,सर्पदंश से भी डर नहीं है।


    विषदंत हीन जो भीरु विषैला अवसरवाद है,उसका तिलिस्म बहुत डरावना है।


    उससे डरता हूं।आप भी डरें।


    हो सकें तो गिरदा की तरह हुड़का लेकर लोक और बोलियों के सौंदर्यबोध और कार्यक्रम लेकर जनता के बीच जाना शुरु करें हाथी दात से बंधे बंधाये अपने अपने दायरे तोड़कर।भाषा ,विधा ,प्रतिष्ठान के तिलिस्म फोड़कर।


    लिखना ही है तो नवारुण दा की तरह शब्द दर शब्द गुरिल्ला युद्ध रचें।


    अब कल पीसी कैसे काम करेगी,नहीं जानता।

    लेकिन वेताल जो हूं ,कंधे पर सवार जरुर रहूंगा।





    মোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগেবাংলা এখন মম ময়ে মমরাজনীতির ইয়ে,ওঠ ছেমড়ি লাগল তোর বিয়ে

    মা সারদার সন্তানদল যা যা করেছে,হরেক সরকারের আমলে,হরেক মতাদর্শের নামে,হরেক রংএর রাজনীতি তাহাই করিয়াছে

    মনমোহনকে সাধে কি ছাড় দিল,একে ফাঁসলে সব ব্যাটাকেই জেলে পুরতে হয়

    তা কিন্তু হবে না

    সারদায় সিবিআই হম্বি তম্বির শংস্কার ফসল গুজরাতের বাড়া

    বাংলা এখন তবু গুজরাত হতে বাকী,দেরি হবে নাকি



    পলাশ বিশ্বাস

    দিদি এবার পিপিপি ই নয় শুধু তিনি আবার সাক্ষাত ডিকন্ট্রোল ডিরেগুলেশান সংস্কারের ত্রিভুবনেশ্বরী! মোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগেরিয়েল্টি প্রোমোটিংএ দিলিলীর সংস্কারের আগেই দিদির নগরোন্নয়নমোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগে

    মোদী লালকেল্লার প্রাচীর থেকে শতখানেক স্মার্টমহাসেজ সিটি ঘোষণা করতে না করতে হামলে পড়ে দিদি শান্তিনিকেতন,লূতন কলকাতা সমেত দশ দশটি স্মার্ট শহরের ব্লুপ্রিন্ট তৈরি করে ফেললেন মোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগে

    বাংলায় এখন অকাল গাজনমোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগে

    সবাই ব্যাটা সন্যাসী,যা বাব্বা,রগড় জমবে ভালোমোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগে

    লক্ষ্মী সরস্বতীর খুল্লা জেল্লায় ন দিনের মেগা মহালয়া,তায় আবার দিদি মহিষাসুর মর্দিনীমোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগে

    বাসভাড়া ডিজেল দামের সঙ্গে ওঠাপড়া করবে আর মুদিখানায় ডিজেল তে বাজারের সঙ্গেই ছলাত ছলাতমোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগে


    বাংলা এখন মম ময়ে মম

    মোদী লাগে কোন কাজে,দিদি সবার আগে

    রাজনীতির ইয়ে,ওঠ ছেমড়ি লাগল তোর বিয়ে

    সব দলেই পোয়াবারো পৌষমাস

    সব দলই তলে তলে ডুব মেরে জল খেয়েছে,শিবের বাবা টের পায়নি

    বোঝো ঠ্যালা

    কত পরিবর্তন হল

    বদলে গেল রং,বদলে গেল সঙ,সখির কেত্তন চলছে সমতালে বিলম্বিত লয়ে

    মা সারদার সন্তানদল যা যা করেছে,হরেক সরকারের আমলে,হরেক মতাদর্শের নামে,হরেক রংএর রাজনীতি তাহাই করিয়াছে

    মনমোহনকে সাধে কি ছাড় দিল,একে ফাঁসলে সব ব্যাটাকেই জেলে পুরতে হয়

    তা কিন্তু হবে না

    সারদায় সিবিআই হম্বি তম্বির শংস্কার ফসল গুজরাতের বাড়া

    বাংলা এখন তবু গুজরাত হতে বাকী,দেরি হবে নাকি

    তর যে সয় না

    মায়ের ঝাঁকি মুক্তবাজারি বাজারে রমরমা

    লগ্নি আসছে


    এবার সাড়ে চুয়াত্তরের ররমা



    ১৮৬০০০০০০০০০০ টাকা! কথায় লিখলে, ১ লক্ষ ৮৬ হাজার কোটি টাকা। কয়লা বণ্টন কেলেঙ্কারিতে সরকারি কোষাগারের এই বিপুল পরিমাণ ক্ষতি হয়েছে বলে অভিযোগ উঠেছিল। দেশের সর্বোচ্চ আদালত রায় দিল, ১৯৯৩ থেকে ২০১০ সাল পর্যন্ত যে ২১৮টি কয়লাখনি বণ্টন হয়েছে, তার সবটাই বেআইনি। কারণ, নিলাম না করে সরকারি কমিটির পছন্দমতো বিভিন্ন বেসরকারি সংস্থাকে কয়লাখনি পাইয়ে দেওয়া হয়েছিল। পশ্চিমবঙ্গের বেশ কয়েকটি কয়লাখনিও এই তালিকায় রয়েছে।


    আজকালের প্রতিবেদন: বাস, মিনিবাসের ভাড়া বাড়ল৷‌ সরকারি ও বেসরকারি বাস-মিনিবাসে প্রতি স্তরে ভাড়া বাড়ছে ১ টাকা করে৷‌ অর্থাৎ, সাধারণ বাসে উঠলেই দিতে হবে ৬ টাকা৷‌ মিনিবাসের ক্ষেত্রে ৭ টাকা৷‌ ১৬ কিলোমিটার পর্যম্ত প্রতি স্তরে ১ টাকা করে বাড়বে৷‌ এর পরের স্তরে তার থেকে কিছুটা বেশি বাড়বে৷‌ দু-একদিনের মধ্যেই এই ভাড়া বৃদ্ধির বিজ্ঞপ্তি জারি হবে৷‌ সোমবার নবান্নে মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির সঙ্গে বাস মালিকদের বৈঠকের পর রাজ্য সরকারের এই সিদ্ধাম্তের কথা জানান শিক্ষামন্ত্রী পার্থ চ্যাটার্জি৷‌ এদিনের বৈঠকে সিদ্ধাম্ত হয়েছে আগামী ১ বৈশাখ থেকে ডিজেলের দাম দু টাকা বাড়া বা কমার সমানুপাতিক হারে বাস ভাড়াও নির্ভর করবে৷‌ এর জন্য একটি টাস্ক ফোর্স গঠিত হচ্ছে৷‌ এই হারে ভাড়া বৃদ্ধিতে খুশি নন বাস-মিনিবাস মালিকেরা৷‌ তাঁরা বলেন, বাধ্য হয়ে এই সিদ্ধাম্ত মানতে হচ্ছে৷‌ এক টাকা ভাড়া বৃদ্ধিতে তাঁদের ক্ষতি খুব একটা কমবে না৷‌ ডিজেলের ক্রমাগত মূল্যবৃদ্ধির জন্য বাস ভাড়া বাড়ানোর দাবি জানিয়ে আসছিলেন বাস ও মিনিবাস মালিকেরা৷‌ খুব শিগগিরি বিজ্ঞপ্তি জারি হওয়ার পরই বর্ধিত বাস ভাড়া কার্যকর হবে বলে জানিয়েছেন পরিবহণ সচিব আলাপন বন্দ্যোপাধ্যায়৷‌ এদিনের বৈঠকে ছিলেন অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র, শিক্ষামন্ত্রী পার্থ চট্টোপাধ্যায়, মুখ্য সচিব সঞ্জয় মিত্র, স্বরাষ্ট্র সচিব বাসুদেব ব্যানার্জি ও পরিবহণ সচিব-সহ বাস মালিকদের ৪টি সংগঠনের প্রতিনিধিরা৷‌ বৈঠক শেষে শিক্ষামন্ত্রী জানিয়েছেন, মুখ্যমন্ত্রীর সিদ্ধাম্ত অনুযায়ী শহর ও শহরতলির সব বাসের ভাড়া প্রতি ধাপে এক টাকা করে বাড়ানো হল৷‌ যে বাসের ন্যূনতম ভাড়া আছে তার থেকে এক টাকা করে বাড়ানো হবে৷‌ তবে ১৬ থেকে ২০ কিলোমিটার ও ২০ থেকে ২৬ কিলোমিটারে বাসের ভাড়া ১ টাকার কিছু বেশি বাড়বে৷‌ তিনি বলেন, দীর্ঘদিন ধরে বাস মালিকেরা সরকারের কাছে বাস ভাড়া বাড়ানোর ব্যাপারে আবেদন করে চলেছেন৷‌ তাঁদের দুঃখ কষ্টের কথা বলছেন৷‌ কিন্তু সরকার দায়বদ্ধ মানুষের ওপর দুর্গতি না চাপাতে আর স্বচ্ছ পরিবহণের ব্যবস্হা করতে৷‌ কিন্তু মুখ্যমন্ত্রী যখন সফরে ছিলেন তখন বাস মালিকেরা মানুষের অসুবিধা হবে ভেবে এবং মুখ্যমন্ত্রী রাজ্যের বাইরে রয়েছেন বলে ধর্মঘটের সিদ্ধাম্ত প্রত্যাহার করেন৷‌ অন্য দিকে কেন্দ্রীয় সরকার গত দু'বছরে ২৩ বার ডিজেলের দাম বাড়িয়েছে৷‌ কেন্দ্রের এই নীতির ফলে পরিবহণ ব্যবস্হা সমস্যায় পড়েছে৷‌ বাস মালিকেরা আবেদন করছেন তাঁরা আর এই ব্যবসা চালাতে পারছেন না৷‌ এই সব কথা মাথায় রেখেই মুখ্যমন্ত্রী বাস ভাড়া বাড়ানোর সিদ্ধাম্ত নিয়েছেন৷‌ পাশাপাশি পরিবহণ ব্যবস্হাকে সুস্হ ও স্বাভাবিক ভাবে পরিচালনা করার জন্য এবং বাস ভাড়া নিয়ে সমস্যা মেটাতে ২০১৫ সালের ১৫ এপ্রিল অর্থাৎ বাংলা নববর্ষের প্রথম দিনেই তৈরি করা হবে টাস্ক ফোর্স৷‌ এই কমিটিতে পরিবহণ দপ্তরের প্রতিনিধি ছাড়াও বাস মালিকেরা থাকবেন৷‌ ডিজেলের ২ টাকা দাম বৃদ্ধি বা হ্রাসের ওপরে সমানুপাতিক হারে বাসের ভাড়া বাড়া-কমা নির্ভর করবে৷‌ টাস্ক ফোর্স ঠিক করবে কত টাকা ভাড়া বাড়বে বা কমবে৷‌ বাস মালিকদের ভাড়া ছাড়া অন্য সমস্যাও থাকে৷‌ এর মধ্যে রয়েছে মিনিবাসের প্রতিটি ধাপের পুনর্মূল্যায়ন৷‌ তবে বাস মালিকদেরও স্বাচ্ছন্দ্য দেখতে হবে৷‌ যখন তখন রাস্তা থেকে বাস তুলে নেওয়া যাবে না৷‌ তবে পুলিসি জুলুমের অভিযোগও খতিয়ে দেখবে সরকার৷‌ বেঙ্গল বাস সিন্ডিকেটের নেতা দীপক সরকার বলেন, আমরা ভেন্টিলেশনে ছিলাম৷‌ জেনারেল বেডে এলাম৷‌ অসুখ সারল না৷‌ যেটুকু ভাড়া বাড়ল তাতে ডিজেলের খরচও উঠবে না৷‌ চেষ্টা করব মুখ্যমন্ত্রীর কথা রাখতে৷‌ কমিটি সমস্যা না মেটালে ব্যবসা করতে পারব না৷‌ জয়েন্ট কাউন্সিল অফ বাস সিন্ডিকেটের তপন ব্যানার্জি জানান, এই সিদ্ধাম্ত আমরা আপাতত মেনে নিচ্ছি৷‌ ১লা বৈশাখ পর্যম্ত অপেক্ষা করব৷‌ সমস্যা না মিটলে সঠিক ভাবে পরিষেবা দেওয়া সম্ভব হবে না৷‌ মিনিবাস মালিকদের নেতা অবশেষ দাঁও জানিয়েছেন ভাড়া মানতে বাধ্য হলাম৷‌ ৮ টাকা ভাড়া হলে ভাল হত৷‌ ক্ষতি স্বীকার করেই আমাদের বাস চালাতে হবে৷‌


    তৃণমূল সাংসদ ইমরানকে ৯ ঘণ্টা জেরা ই ডি-র

    বিকেলে সি বি আই জেরা রমেশ গান্ধীকে

    শাম্তনু জামিন পেলেন, সুদীপ্ত-দেবযানীর জেল হেপাজত






    আজকালের প্রতিবেদন: তৃণমূল সাংসদ আহমেদ হাসান ইমরানকে ই ডি ৯ ঘণ্টা জেরা করল৷‌ সুদীপ্ত সেনের টাকায় একটি উর্দু দৈনিক 'কলম'পত্রিকার তিনি সম্পাদক ছিলেন৷‌ ইমরানকে আগে দু'বার নোটিস দিয়েছিল ই ডি৷‌ রমেশ গান্ধীকে সোমবার বিকেলে জেরা করল সি বি আই৷‌ সোমবার তিনি সকাল ১১টা নাগাদ ই ডি দপ্তরে যান৷‌ সুদীপ্ত সেন কত টাকা দিয়েছিলেন কলম পত্রিকা তৈরির জন্য, তাঁর সঙ্গে কীভাবে পরিচয় ইত্যাদি জেনে নেন ই ডি কর্তারা৷‌ ব্যাঙ্কশাল আদালত এদিন জেনাইটিসের কর্ণধার শাম্তনু ঘোষকে জামিন দিল৷‌ ৩০ হাজার টাকা ব্যক্তিগত জামিনে তিনি মুক্তি পান৷‌ তবে বিদেশ যেতে পারবেন না, নির্দেশ দিয়েছে আদালত৷‌ আগামী ৯ সেপ্টেম্বর তাঁকে ফের আদালতে হাজির হতে হবে৷‌ আদালতের কাছে ৬৩ দিন পার হয়ে গেলেও চার্জশিট না দিতে পারায় তাঁকে জামিন দেওয়া হল৷‌ সুদীপ্ত ও দেবযানীকে সোমবার আদালতে তোলা হয়৷‌ দেবযানীর আইনজীবী এদিন আসেননি৷‌ আগামী ৬ সেপ্টেম্বর পর্যম্ত তাঁদের জেল হেপাজতে রাখার নির্দেশ দেয় আদালত৷‌ আলিপুর আদালতে সি বি আই এদিন সরকারিভাবে জানায়, সারদা তদম্তে অনেক নথি নিখোঁজ৷‌ তবে সেগুলির তদম্ত করা হচ্ছে৷‌ সোমবার বিকেলে সি বি আই দপ্তরে আসেন শিল্পপতি রমেশ গান্ধী৷‌ সি বি আই আধিকারিকেরা তাঁর সঙ্গে কথা বলেন৷‌ রমেশ গান্ধী পরে সাংবাদিকদের বলেন, সি বি আই যে সমস্ত প্রশ্ন জানতে চেয়েছিল, আমি তার উত্তর দিয়েছি৷‌ সি বি আই সূত্রে জানা গেছে, সারদা গোষ্ঠীর টাকায় উত্তর-পূর্ব ভারতে একটি টিভি চ্যানেলের বিষয়ে তাঁকে প্রশ্ন করা হয়েছিল৷‌ টাকা কীভাবে লগ্নি করেছিলেন সুদীপ্ত সেন, সে ব্যাপারেই জিজ্ঞাসাবাদ করা হয়েছে৷‌ ই ডি-র জেরার পর আহমেদ হাসান ইমরান সাংবাদিকদের বলেন, সুদীপ্ত সেন আমার বিরুদ্ধে যে সমস্ত অভিযোগ করেছেন, তা মিথ্যা৷‌ আমি ই ডি-র সব প্রশ্নেরই উত্তর দিয়েছি৷‌ আজ, মঙ্গলবার ইস্টবেঙ্গল কর্তা দেবব্রত সরকার ওরফে নীতুকে আদালতে তোলা হবে৷‌ ই ডি-র তদম্তে ইতিমধ্যেই আর্থিক লেনদেনের বিষয়টি স্পষ্ট হয়েছে৷‌ আরও কয়েকজন প্রভাবশালীকে চিঠি দিয়েছে ই ডি৷‌ তাঁরা এ সপ্তাহেই সল্টলেকে ই ডি দপ্তরে দেখা করবেন৷‌ সি বি আই সারদা তদম্তে এখনও কিছু নথিপত্রের খোঁজ করছে৷‌



    রাজীব চক্রবর্তী, দিল্লি


    ২৫ আগস্ট– ১৯৯৩ থেকে ২০০৯ পর্যম্ত কেন্দ্র সরকারের সমস্ত কয়লা ব্লক বণ্টনকে অবৈধ বলে ঘোষণা করল সুপ্রিম কোর্ট৷‌ সোমবার৷‌ কয়লা ব্লকগুলির ভবিষ্যৎ নির্ধারণ করতে ১ সেপ্টেম্বর থেকে একটানা শুনানি চালাবে শীর্ষ আদালত৷‌ তার পর ঘোষিত হবে চূড়াম্ত সিদ্ধাম্ত৷‌ নিলাম-পর্বের আগে বেসরকারি বাণিজ্যিক সংস্হাকে বণ্টিত সমস্ত কয়লা ব্লক বণ্টনকে বেআইনি আখ্যা দিয়েছে সুপ্রিম কোর্ট৷‌ কয়লার ব্লক বণ্টনের সময়কালে ১৯৯৩ থেকে ২০০৯ পর্যম্ত সবই অবৈধ ঘোষিত হওয়ায় ইউ পি এ ১ ও ২ সরকারের আমল তো বটেই, জড়িয়ে গেল পূর্বতন বাজপেয়ী সরকারের এন ডি এ আমলও৷‌ এতদিন কয়লার ব্লক বণ্টনে দুর্নীতির অভিযোগ তুলে প্রাক্তন প্রধানমন্ত্রী মনমোহন সিংয়ের কঠোর সমালোচনায় মুখর বি জে পি আজ সুপ্রিম কোর্টের রায়ে বেশ ফাঁপরে পড়ে গেছে৷‌ আজ সতর্ক বিবৃতি দিয়ে বি জে পি মুখপাত্র শাহনওয়াজ হুসেন বলেছেন, আগে সুপ্রিম কোর্টের বয়ানটি ভালভাবে খতিয়ে দেখে নিয়েই এ বিষয়ে প্রতিক্রিয়া জানানো হবে৷‌ অন্য দিকে কংগ্রেস কিছুটা হাঁফ ছেড়ে বাঁচার বাতাস পেয়েছে৷‌ কংগ্রেস মুখপাত্র মণীশ তিওয়ারি বলেছেন, গোড়া থেকেই তো কংগ্রেস বলে আসছে, ইউ পি এ সরকার কয়লার ব্লক বণ্টনে পূর্বতন এন ডি এ সরকারের নীতিই অনুসরণ করেছে৷‌ ২০০৪ থেকে ২০০৯-এ ইউ পি এ সরকার আগের ১৯৯৩-২০০৪-এর এন ডি এ আমলের নীতিতেই কয়লার ব্লক বণ্টন করেছে৷‌ আজ সর্বোচ্চ আদালতের পর্যবেক্ষণ, জনস্বার্থে কয়লা ব্লকের ব্যবহার হয়নি৷‌ কোনও রাজ্য সরকার অথবা রাজ্যের কোনও সংস্হা বাণিজ্যিক কারণে কয়লা ব্লকের ব্যবহার করতে পারে না৷‌ অথচ, এই সময়ের মধ্যে সরকারের স্ক্রিনিং কমিটি ৩৬টি বৈঠক করে যতগুলি কয়লা ব্লক বণ্টন করেছিল তার কোনওটিতে স্বচ্ছতা ছিল না৷‌ বণ্টনের সময় নির্ধারিত শর্ত মানা হয়নি৷‌ এমনকী এই সংক্রাম্ত কোনও নিয়মনীতির পরোয়া পর্যম্ত করেনি কেন্দ্র সরকার৷‌ ফলে, সমস্ত কয়লা ব্লকের বণ্টন অবৈধভাবে হয়েছে৷‌ একতরফা বণ্টনের চিত্র স্পষ্ট৷‌ একইসঙ্গে আদালতের কড়া নির্দেশ, পরবর্তী নির্দেশ না দেওয়া পর্যম্ত কয়লা ব্লকগুলি থেকে বাণিজ্যিক স্বার্থে কোনও কয়লা উত্তোলন করা চলবে না৷‌ ওই সময়ে কয়েকটি বেসরকারি স্টিল, বিদ্যুৎ ও সিমেন্ট কোম্পানিকে তাদের প্রয়োজনে প্রায় ২০০টির বেশি কয়লা ব্লক বণ্টন করেছিল কেন্দ্রীয় সরকার৷‌ আইনজীবী এম এল শর্মা এবং একটি এন জি ও-র করা মামলার প্রেক্ষিতে এদিন সুপ্রিম কোর্টের এই পর্যবেক্ষণ৷‌ শীর্ষ আদালতের এদিনের পর্যবেক্ষণ সামনে আসার সঙ্গে সঙ্গে জিন্দাল স্টিল অ্যান্ড পাওয়ার এবং হিন্ডালকো ইন্ডাস্ট্রিজের মতো কোম্পানিগুলির (ওই সময়ে কয়লা ব্লকের বরাত পাওয়া সংস্হা) শেয়ার দর পড়তে শুরু করেছে৷‌ এদিন প্রধান বিচারপতি আর এম লোধা স্পষ্ট বলেন, 'কয়লা ব্লক বণ্টনের ক্ষেত্রে সংশ্লিষ্ট কোম্পানি এবং কেন্দ্র সরকার কোনও পক্ষের মধ্যেই বিন্দুমাত্র স্বচ্ছতা ছিল না৷‌ বেশিরভাগ ক্ষেত্রেই নিয়মকানুনের পরোয়া করা হয়নি৷‌ পুরো প্রক্রিয়াটি অবৈধ৷‌'সুপ্রিম কোর্টের এদিনের রায় প্রাক্তন সি এ জি প্রধান বিনোদ রাইয়ের ২০১২-র রিপোর্টকে সত্য প্রমাণ করল৷‌ রবিবারই এক অনুষ্ঠানে সি এ জি-র প্রাক্তন প্রধান আরও এক বিস্ফোরক মম্তব্য করেছিলেন৷‌ প্রকাশ্যে তিনি বলেছেন, সে সময় ইউ পি এ সরকারের পক্ষ থেকে কয়লা ব্লক বণ্টন কেলেঙ্কারি-সংক্রাম্ত সি এ জি রিপোর্ট থেকে কয়েকজনের নাম বাদ দেওয়ার জন্য তাঁর ওপর চাপ সৃষ্টি করা হয়েছিল৷‌


    প্রসঙ্গত, ২০১২-র মার্চে সংবাদ মাধ্যমে প্রথম কয়লা ব্লক বণ্টনের দুর্নীতির সংবাদ প্রকাশিত হয়৷‌ কম্পট্রোলার অ্যান্ড অডিটর জেনারেল অফ ইন্ডিয়া'র একটি খসড়া রিপোর্ট উদ্ধৃত করে ওই সংবাদে বলা হয়, নিলাম পদ্ধতি এড়িয়ে বেসরকারি বাণিজ্য সংস্হাকে একতরফা বরাত দেওয়ায় সরকারের ১০ লাখ ৭০ হাজার কোটি টাকা ক্ষতি হয়েছে৷‌ যদিও সে সময় সি এ জি-র তরফে ওই সংবাদের বিরোধিতা করে বলা হয়েছিল, সংস্হার পর্যবেক্ষণকে অতিরঞ্জিত করা হয়েছে৷‌ সে বছরের আগস্টে সি এ জি-র চূড়াম্ত রিপোর্টে বলা হয়, কয়লা ব্লক বণ্টনের ক্ষেত্রে নিলাম না করায় ২০০৪ থেকে ২০০৯ পর্যম্ত সরকারের ১ লাখ ৮৬ হাজার কোটি টাকার ক্ষতি হয়েছে৷‌ যা সংবাদ মাধ্যমে প্রকাশিত রিপোর্টের প্রায় এক দশমাংশ৷‌ সি এ জি-র ওই রিপোর্টে আরও মারাত্মক যে বিষয়টির উল্লেখ ছিল তা হল, কেন্দ্রীয় আইন মন্ত্রকের একটি সুপারিশ মেনে সরকারের হাতে ২০০৬-এর মাঝামাঝি কয়লা ব্লক বণ্টনে প্রতিযোগিতামূলক নিলাম করার সুযোগ ছিল৷‌ কিন্তু তা করা হয়নি৷‌ এই সব ঘটনা একের পর এক যখন প্রকাশিত হচ্ছে সে সময় ইউ পি এ সরকারের প্রধানমন্ত্রী ছিলেন মনমোহন সিং৷‌ ২০০৪ সালে তিনিই কয়লামন্ত্রী ছিলেন৷‌ ২০১২-তেই বি জে পি-র দুই নেতার অভিযোগের ভিত্তিতে সেন্ট্রাল ভিজিলেন্স কমিশন সি বি আইকে পুরো ঘটনার তদম্তের নির্দেশ দেয়৷‌ এর পর গত বছর আগস্টের মাঝামাঝি সুপ্রিম কোর্ট কেন্দ্র সরকারকে সি বি আইয়ের তদম্তে সহযোগিতার নির্দেশ দেওয়ার পর তৎকালীন কয়লামন্ত্রী শ্রীপ্রকাশ জয়সওয়াল সুপ্রিম কোর্টে জানান, ১৯৯৩ থেকে ২০০৪ পর্যম্ত তদম্তাধীন সময়ের কয়লা ব্লক বণ্টন-সংক্রাম্ত বেশকিছু গুরুত্বপূর্ণ ফাইল উধাও হয়ে গেছে৷‌ স্বভাবতই এই কেলেঙ্কারি আরও নাটকীয় মোড় নেয়৷‌ সি বি আই তদম্ত এবং কয়েকজন আমলা ও মন্ত্রীর সততা নিয়ে প্রশ্ন ওঠায় 'কোলগেট'কেলেঙ্কারি বিশেষ উল্লেখযোগ্য ঘটনা হয়ে ওঠে৷‌ ২০১৩-র শুরুর দিকে সি বি আই ডিরেক্টর রণজিৎ সিন‍্হা সুপ্রিম কোর্টে স্বীকার করে নেন যে, এই কেলেঙ্কারির তদম্তের প্রাথমিক রিপোর্টটি আইন মন্ত্রক, কয়লা মন্ত্রকের কয়েকজন আমলা এবং প্রধানমন্ত্রীর দপ্তরকে দেখানো হয়েছে৷‌ এবং শুধু তাই নয়, তার পর সি বি আইয়ের রিপোর্টে বেশকিছু পরিবর্তন করা হয়েছে৷‌ এই প্রসঙ্গেই সি বি আইকে 'খাঁচাবন্দী তোতা পাখি'বলে মম্তব্য করে সুপ্রিম কোর্ট৷‌ পুরো ঘটনা স্বীকার করে নিয়ে মন্ত্রিত্ব ছাড়তে বাধ্য হন আইনমন্ত্রী অশ্বিনী কুমার৷‌ এই কেলেঙ্কারিতে দেশের কয়েকটি নামজাদা কোম্পানির নামও জড়িয়েছে৷‌ তবে এই কেলেঙ্কারির তদম্তে সি বি আই এখনও প্রাক্তন প্রধানমন্ত্রী মনমোহন সিং এবং ওড়িশার মুখ্যমন্ত্রী নবীন পটনায়েককে জিজ্ঞাসাবাদ করেনি৷‌ আজকের সুপ্রিম কোর্টের রায়ের পর এখন দেখার সি বি আইয়ের তদম্ত-নজরে বাজপেয়ী সরকারের আমলের এন ডি এ মন্ত্রী, বি জে পি নেতৃবৃন্দও পড়েন কি না৷‌



    সব্যসাচী সরকার


    ওড়িশায় সারদা তদম্তে এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেট শেষ পর্যম্ত ব্যাঙ্ক অ্যাকাউন্টে খুঁজে পেল ২ হাজার ৭৪০ টাকা৷‌ বাকি টাকা আর নেই! সারদা রিয়েলটি ইন্ডিয়া লিমিটেড বালেশ্বরে ১৩ দশমিক ৫৪ একর জমি কিনেছে৷‌ জমি কেনার ক্ষেত্রে মালিকানা মাত্র দু'জনের৷‌ দেবিকা দাশগুপ্ত আর সুদীপ্ত সেন৷‌ বালেশ্বরে সারদা রিয়েলটির নামে আই ডি বি আই ব্যাঙ্কে অ্যাকাউন্ট খোলা হয়েছিল৷‌ তাতে পড়ে আছে সামান্য টাকা৷‌ বাকি কোনও টাকার সন্ধান পায়নি ই ডি৷‌ পশ্চিমবঙ্গ ও ওড়িশায় সারদার জমি কেনা সংক্রাম্ত সম্পত্তির সন্ধানে গিয়ে ই ডি বেশ অবাক৷‌ আই ডি বি আই ব্যাঙ্কে যে অ্যাকাউন্টটি খোলা হয়েছিল, সেটির নম্বর (৩২৮১০২০০০০০১০০৭)৷‌ ওড়িশা সরকারের অর্থ দপ্তর সারদার জমি সংক্রাম্ত যে তালিকা তৈরি করেছে, তাতে সব চাষের জমি কিনে নেওয়া হয়েছিল৷‌ সেগুলির মালিকানাতেও দু'জন! খড়গপুরের বাসিন্দা দেবিকা দাশগুপ্ত সারদা রিয়েলটির ডিরেক্টর পদে ছিলেন৷‌ অর্থ দপ্তরের যে তালিকা ই ডি সূত্রে পাওয়া গেছে, তাতে দেবিকা দাশগুপ্ত বালেশ্বরের শ্রীকোনা অঞ্চলে ৪টি জমি কেনার ক্ষেত্রে যুক্ত ছিলেন৷‌ সুদীপ্ত সেন ছিলেন ৫টিতে যুক্ত৷‌ দু'জনে মিলে সারদা রিয়েলটির হয়ে যত একর জমি কিনেছিলেন, তার এই মুহূর্তে বাজার মূল্য ৫০-৬০ লাখের কাছাকাছি৷‌ জমিগুলি এখনও চাষের জমি৷‌ সেগুলি বাস্তুজমিতে আইনগতভাবে পরিবর্তন করা হয়নি৷‌ ই ডি সূত্রের খবর, চাষের জমি কিনে সেগুলিকেই বাড়ি তৈরির, হোটেল তৈরির ব্যবসার কাজে লাগানো হবে বলে দেখানো হয়েছিল আমানতকারী আকৃষ্ট করতে৷‌ প্রায় ১০ লাখ আমানতকারী সে রাজ্যে প্রতারিত হয়েছেন৷‌ ইতিমধ্যেই পশ্চিমবঙ্গের মতো ওড়িশাতেও আমানতকারীদের অভিযোগ নেওয়ার জন্য কমিশন তৈরি করেছে ওড়িশা সরকার৷‌ মজার বিষয়, বালেশ্বরের শ্রীকোনায় যে দশটি ভাগে জমি কেনা হয়েছে, তা বিভিন্ন ভাগে ভাগ করা৷‌ ১৩ দশমিক ৫৪ একর চাষের জমি সুদীপ্ত আর দেবিকা দু'জনে কিনেছেন৷‌ জমি হাতানোর এই প্রক্রিয়াটি একই মডেলে হয়েছে এ রাজ্যেও৷‌ ওড়িশার অর্থ দপ্তর ই ডি-কে যে রিপোর্ট দিয়েছে, তাতে স্পষ্টই বলা আছে....৷‌ 'ইট ইজ রিভিলড দ্যাট দি ফিনান্সিয়াল এস্টাবলিশমেন্টস আর অ্যাক্টিং ইন এ ক্যালকুলেটেড ম্যানার উইথ অ্যান ইনটেনশন টু ডিফ্রড দি ইনভেস্টরস ফ্রম পেমেন্ট অফ দেয়ার লেজিটিমেট ডিউস...'অর্থাৎ সারদা কর্তা সুদীপ্ত সেন জমি কিনে টাকা সরিয়ে ফেলেছিলেন, যাতে আমানতকারীদের তা ফেরত না দিতে হয়৷‌ যদিও অর্থ দপ্তর ই ডি-কে বলেছে, প্রকৃত কারণ অনুসন্ধান করে যথোপযুক্ত আইনি পদক্ষেপ নিতে৷‌ সুদীপ্ত সেন কিন্তু মুখে বারে বারেই বলেছেন, তিনি জমি বিক্রি করে আমানতকারীদের টাকা ফেরত দিতে চান! ওড়িশা সরকার ওই জমিগুলি ইতিমধ্যেই বাজেয়াপ্ত করেছে৷‌ এবং সেগুলি বিক্রি করে আমানতকারীদের টাকা ফেরত দেওয়ার আইনি পথে হাঁটছে৷‌ ই ডি-র এক কর্তা জানান, ওই জমি কেনার জন্য সারদা গোষ্ঠী কত টাকা লগ্নি করেছিল এবং কাদের থেকে কিনেছিল, তাদের সঙ্গে যোগাযোগ করা হচ্ছে৷‌ বালেশ্বরে সুদীপ্ত সেন জমি কিনে কীসের ব্যবসা ভবিষ্যতে করতেন, তা তিনিই জানেন, কিন্তু আমানতকারীদের যে টাকা ফেরত দেওয়ার বাসনা তাঁর ছিল না, তা সরকারি রিপোর্টেই স্পষ্ট৷‌ আমানতকারীদের টাকা ফেরত দেওয়ার উদ্যোগ কী ছিল তাও খুঁজছে ই ডি.



    সম্পর্কের কথা বাড়িতে বলায় প্রমিকার বান্ধবীকে খুন করল প্রেমিক সম্পর্কের কথা বাড়িতে বলায় প্রমিকার বান্ধবীকে খুন করল প্রেমিক

    সম্পর্কের কথা বাড়িতে জানিয়ে দেওয়ায় ধারালো ছুরি দিয়ে প্রেমিকার বান্ধবীর গলা কেটে দিল প্রেমিক। অভিযুক্ত যুবককে ধরে ফেলে গণপিটুনি দেয় এলাকার মানুষ। দুজনকেই আশঙ্কাজনক অবস্থায় উলুবেড়িয়া মহকুমা হাসপাতালে ভর্তি করা হয়েছে। আজ হাওড়ার উলুবেড়িয়ার গোয়ালিয়র গদাইপুরের এই ঘটনায় ব্যাপক চাঞ্চল্য ছড়িয়েছে।

    ধুঁকছে স্কুলবাড়ি, মিড ডে মিল অনিয়মিত, হুঁশ নেই প্রধানশিক্ষকের

    ভেঙে পড়ছে স্কুলবাড়ি। পানীয় জলের ব্যবস্থা নেই। মিড ডে মিলও নিয়মিত পায় না পড়ুয়ারা।  অভিভাবকরা ক্ষোভে সরব। কিন্তু প্রধান শিক্ষকের হুঁশ নেই বলে অভিযোগ। চরম অবহেলায় ধুঁকছে খড়গপুরের আরামবাটির সিদ্ধেশ্বরী হাইস্কুল।

    রাষ্ট্রপতির স্বপ্নপুরণ রাষ্ট্রপতির স্বপ্নপুরণ

    প্রাক্তন সাংসদ এবং বর্তমান রাষ্ট্রপতি প্রণব মুখোপাধ্যায় স্বপ্ন দেখেছিলেন জঙ্গিপুরের বুকে তৈরি হবে একটি বিশ্বমানের ম্যানেজমেন্ট কলেজ। সঙ্গে থাকবে আন্তর্জাতিক মানের ফুডপার্ক। ম্যানেজমেন্ট কলেজ থেকে পাশ করবে দেশের অন্যতম সেরা ছাত্রছাত্রীরা। আর ফুডপার্কে কাজ শিখবেন স্থানীয় যুবকরা। রাষ্ট্রপতির উপস্থিতিতেই পথ চলা শুরু করল তাঁর স্বপ্নের ম্যানেজমেন্ট কলেজ। কিন্তু ফুডপার্ক এখনও বিশ বাঁও জলে।

    কারখানা খুলতে আগামিকাল স্টার পেপার মিল কতৃপক্ষের সঙ্গে বৈঠক প্রশাসনের কারখানা খুলতে আগামিকাল স্টার পেপার মিল কতৃপক্ষের সঙ্গে বৈঠক প্রশাসনের

    দুর্গাপুরে নির্মীয়মান স্টার পেপার মিলের কাজ ফের শুরু করতে আগামী কাল কর্তৃপক্ষের সঙ্গে বৈঠকে বসছে প্রশাসন। বৈঠকে উপস্থিত থাকার কথা রাজ্যের শ্রমমন্ত্রী মলয় ঘটকের। শুক্রবার ওই কাগজ কলের মালিক সিন্ডিকেটের বিরুদ্ধে অভিযোগ এনে  সাসপেনশন অব ওয়ার্কের নোটিশ ঝোলান কারখানায়।

    জঙ্গিপুরে এসে পাকিস্তানকে ফের কড়া বার্তা প্রতিরক্ষামন্ত্রী অরুণ জেটলির

    নিয়ন্ত্রণরেখায় বারবার সংঘর্ষ বিরতি লঙ্ঘনের জন্য পাকিস্তানকে কড়া বার্তা দিলেন কেন্দ্রীয় প্রতিরক্ষামন্ত্রী অরুণ জেটলি। মুর্শিদাবাদের জঙ্গিপুরে এ নিয়ে প্রশ্ন করা হলে প্রতিরক্ষা মন্ত্রী বলেন, নিয়ন্ত্রণরেখায় মোতায়েন ভারতীয় জওয়ানরাও তৈরি রয়েছেন। পাক তরফ থেকে কোনওরকম প্ররোচনা দেওয়া হলে উপযুক্ত জবাব দেওয়া হবে।  

    টাকা দিয়ে ছাত্রীকে ধর্ষণের শাস্তি থেকে বাঁচার চেষ্টা শিক্ষকেরটাকা দিয়ে ছাত্রীকে ধর্ষণের শাস্তি থেকে বাঁচার চেষ্টা শিক্ষকের

    তাঁরই স্কুলের ছাত্রীকে ধর্ষণের অভিযোগ এক অশিক্ষক কর্মচারীর বিরুদ্ধে। আর সেই অভিযুক্তের থেকে টাকা নিয়েই বিষয়টি মিটিয়ে ফেলার জন্য নাকি তদবির করেছিলেন প্রধান শিক্ষক। এমনই অভিযোগ উঠেছে নৈহাটি ব্লাইন্ড স্কুলের প্রধান শিক্ষক সন্দীপ দত্তের বিরুদ্ধে। গ্রেফতার হয়েছে মূল অভিযুক্ত। জিজ্ঞাসাবাদ করা হয়েছে প্রধান শিক্ষককেও।

    শিলিগুড়ির সাফারি পার্কে এবার নাইট সাফারি?শিলিগুড়ির সাফারি পার্কে এবার নাইট সাফারি?

    শিলিগুড়ির সাফারি পার্কে কি নাইট সাফারি হবে?  সিঙ্গাপুরে নাইট সাফারি দেখে মুগ্ধ মুখ্যমন্ত্রী।  বৈকুণ্ঠপুরের জঙ্গলে তৈরি হতে চলা সাফারি পার্কে কি তারই প্রতিফলন হবে? জল্পনা এখন তুঙ্গে।

    বাঁকুড়ায় অর্থলগ্নি সংস্থার বিরুদ্ধে প্রতারণার অভিযোগবাঁকুড়ায় অর্থলগ্নি সংস্থার বিরুদ্ধে প্রতারণার অভিযোগ

    বাঁকুড়ায় এক অর্থলগ্নি সংস্থার বিরুদ্ধে প্রতারণার অভিযোগ দায়ের করলেন সংস্থার এজেন্ট, আমানতকারী এবং কর্মীরা। রাজ্যের মন্ত্রী শ্যামাপদ মুখোপাধ্যায়কে দেখেই ওই সংস্থায় টাকা রাখার ভরসা পেয়েছিলেন বলে দাবি করেছেন তাদের অনেকে। যদিও নিউল্যান্ড গ্রুপ অব কোম্পানি নামে ওই সংস্থার সঙ্গে তাঁর কোনও রকম যোগাযোগ নেই বলে দাবি করেছেন মন্ত্রী শ্যামাপদ মুখোপাধ্যায়।

    নকল সোনা বন্ধক রেখে জালিয়াতি সাঁতরাগাছির কোঅপারেটিভ ব্যাঙ্কেনকল সোনা বন্ধক রেখে জালিয়াতি সাঁতরাগাছির কোঅপারেটিভ ব্যাঙ্কে

    নকল সোনা বন্ধক রেখে  কয়েক কোটি  টাকা ঋণ নেওয়ার অভিনব জালিয়াতি চলছিল সাঁতরাগাছি কো অপারেটিভ ব্যাঙ্কে।  জালিয়াতি চক্রটি চালাচ্ছিলেন ব্যাঙ্কেরই কয়েক জন কর্মী।

    দুদিনের ঠাসা কর্মসূচি নিয়ে রাজ্যে রাষ্ট্রপতিদুদিনের ঠাসা কর্মসূচি নিয়ে রাজ্যে রাষ্ট্রপতি

    দুদিনের সফরে ঠাসা কর্মসূচি নিয়ে আজ রাজ্যে রাষ্ট্রপতি  প্রণব মুখোপাধ্যায়। আজ মুর্শিদাবাদের ডোমকলে গার্লস কলেজ এবং বহরমপুরের কৃষ্ণলাথ কলেজের অডিটরিয়াম  উদ্বোধন করেন তিনি। পরে  জঙ্গিপুরে বাবা কামদাকিঙ্কর মুখোপাধ্যায়ের নামাঙ্কিত ফুটবল টুর্নামেন্ট উদ্বোধন করেন রাষ্ট্রপতি।  

    ফের দুর্গাপুরে বন্ধ কারখানা ফের দুর্গাপুরে বন্ধ কারখানা

    রাজনৈতিক চাপে দুর্গাপুরে ফের বন্ধ হয়ে গেল একটি বেসরকারি কারখানা পুনরায় খোলার উদ্যোগ। সংস্থার গেটে কর্মবিরতির নোটিস ঝুলিয়ে দেয় কর্তৃপক্ষ। ফলে পুজোর আগে আবারও কাজ হারালেন কয়েকশো শ্রমিক। তবে কারখানা খুলতে কর্তৃপক্ষকে সবরকম সাহায্যের আশ্বাস দিয়েছে প্রশাসন।

    কাঁথি ধর্ষণ কাণ্ড: প্রশাসনের তীব্র সমালোচনায় বাম বুদ্ধিজীবীরাকাঁথি ধর্ষণ কাণ্ড: প্রশাসনের তীব্র সমালোচনায় বাম বুদ্ধিজীবীরা

    কাঁথিকাণ্ডে প্রশাসনের ভূমিকা নিয়ে তীব্র ক্ষোভ জানালেন বাম বুদ্ধিজীবীরা। প্রয়োজনে আদালতের দ্বারস্থ হবেন তাঁরা। অভিযোগ, ঠিকমতো খাবার পাচ্ছেন না মৃতার বৃদ্ধ শ্বশুর-শাশুড়ি। এই নিয়ে বচসায় জড়িয়ে পড়েন বাম বুদ্ধিজীবী এবং ক্যাম্পের পুলিসকর্মীরা।

    সরকারি নিয়মকে বুড়ো আঙুল দেখিয়ে দামোদরের চর থেকে অবাধে তোলা হচ্ছে বালিসরকারি নিয়মকে বুড়ো আঙুল দেখিয়ে দামোদরের চর থেকে অবাধে তোলা হচ্ছে বালি

    সরকারি নিয়মের তোয়াক্কা না করেই বর্ধমানে দামোদর নদীর চর থেকে অবাধে তোলা হচ্ছে বালি।  অবৈধভাবে বালি তোলায় ক্ষতিগ্রস্ত হচ্ছে নদীবাঁধ। স্থানীয় পঞ্চায়েত থেকে বিডিও, মহকুমা শাসক  জেলাশাসক সবাইকে জানিয়েও বন্ধ করা যায়নি অবাধে বালি তোলা।

    দামোদর চর থেকে বালি চুরি দামোদর চর থেকে বালি চুরি

    সরকারি নিয়মের তোয়াক্কা না করেই বর্ধমানে দামোদর নদীর চর থেকে অবাধে তোলা হচ্ছে বালি। গ্রামবাসীদের অভিযোগ, নদী বাঁধের একেবারে কাছ থেকে অবৈধভাবে বালি তোলায় ক্ষতিগ্রস্ত হচ্ছে বাঁধ। স্থানীয় পঞ্চায়েত থেকে বিডিও, মহকুমা শাসক থেকে  জেলাশাসক সকলে জানিয়েও বন্ধ কা যায়নি অবাধে বালি তেলা।

    ভারী বৃষ্টির দোসর ডিভিসি-র জল, প্লাবিত হওয়ার আশঙ্কায় হুগলির বিস্তীর্ণ অংশভারী বৃষ্টির দোসর ডিভিসি-র জল, প্লাবিত হওয়ার আশঙ্কায় হুগলির বিস্তীর্ণ অংশ

    দফায় দফায় ভারী বৃষ্টি ও ডিভিসির ছাড়া জলে আবারও প্লাবিত হতে পারে আরামবাগ মহকুমার নদীর তীরবর্তী গ্রামগুলি। বাড়ছে দারকেশ্বর, মুক্তেশ্বরী, রূপনারায়ণ ও দামোদর নদীর জল। গ্রামবাসীদের অভিযোগ, প্রতিবছর এই অঞ্চল বন্যার কবলে পড়লেও বন্যা প্রতিরোধে  কোন ব্যবস্থাই নেয়নি সরকার।

    এনসেফ্যালাইটিস আতঙ্কের মাঝেই রাজ্যে ম্যালিগন্যান্ট ম্যালেরিয়ার ভ্রূকুটি

    এনসেফ্যালাইটিস আতঙ্কের মাঝেই রাজ্যে ম্যালিগন্যান্ট ম্যালেরিয়ার ভ্রূকুটি

    এনসেফ্যালাইটিসের প্রকোপের মাঝেই রাজ্যের জঙ্গলমহলে থাবা বসাল ম্যালিগন্যান্ট ম্যালেরিয়া। শুধুমাত্র জুলাই মাসেই আমলাশোলের একশো সাত জনের রক্তে ম্যালিগন্যান্ট ম্যালেরিয়ার উপস্থিতি ধরা পড়েছে। সাধারণ ম্যালেরিয়ার চেয়ে কয়েকগুণ বেশি সংখ্যায় ম্যালিগন্যান্ট ম্যালেরিয়া ধরা পড়ায় আতঙ্কে রয়েছেন ওই এলাকার মানুষ।আমলাশোল। জঙ্গলমহলের পিছিয়ে পড়া এই এলাকা বরাবরই ম্যালেরিয়া প্রবণ। ফলে এই এলাকার বাসিন্দাদের রক্তে প্রায়শই সাধারণ ম্যালেরিয়ার পরজীবী প্লাসমোডিয়াম ভাইভ্যাক্সের উপস্থিতি পাওয়া যায়। কিন্তু গত কয়েকমাসে এই আমলাশোলেরই ঘুম কেড়েছে ম্যালিগন্যান্ট ম্যালেরিয়া।



    ব্যবসায় নিয়ম নীতির তোয়াক্কা না করায় ১৪টি গাড়ি প্রস্তুতকারী সংস্থাকে আর্থিক জরিমানা সিসিআই-এরব্যবসায় নিয়ম নীতির তোয়াক্কা না করায় ১৪টি গাড়ি প্রস্তুতকারী সংস্থাকে আর্থিক জরিমানা সিসিআই-এর

    যন্ত্রাংশ বিক্রি এবং গাড়ি বিক্রয়ের পরে সার্ভিসিংয়ের ক্ষেত্রে ব্যবসার নিয়ম নীতির তোয়াক্কা না করে অনৈতিক উপায় নেওয়ার জন্য ১৪টি গাড়ি প্রস্তুতকারক সংস্থাকে আর্থিক জরিমানা করল কম্পিটিশন কমিশন অফ ইন্ডিয়া বা সিসিআই।

    ২৮ অগাস্ট থেকে দেশ জুড়ে চালু হচ্ছে মোদীর জন ধন যোজনা প্রকল্প২৮ অগাস্ট থেকে দেশ জুড়ে চালু হচ্ছে মোদীর জন ধন যোজনা প্রকল্প

    এ মাসের ২৮ তারিখ থেকে দেশজুড়ে চালু হচ্ছে প্রধানমন্ত্রীর জন ধন যোজনা প্রকল্প। জাতীয় অগ্রাধিকারের তালিকায় রয়েছে এই প্রকল্প। প্রকল্প রূপায়নে প্রয়োজনীয় ব্যবস্থা নিতে প্রত্যেক ব্যাঙ্ক অফিসারকে ই-মেল করেছেন নরেন্দ্র মোদী।

    ইবোলা আক্রান্ত লাইবেরিয়া থেকে ভারতের উদ্দেশ্যে রওনা দেওয়া ১১২ জনের জন্য বিমানবন্দরে বিশেষ সতর্কতা জারি ইবোলা আক্রান্ত লাইবেরিয়া থেকে ভারতের উদ্দেশ্যে রওনা দেওয়া ১১২ জনের জন্য বিমানবন্দরে বিশেষ সতর্কতা জারি

    ইবোলা আক্রান্ত লাইবেরিয়া থেকে বিভিন্ন বিমানে ১১২ জন ভারতীয়র ফেরা নিয়ে মঙ্গলবার দিল্লি ও মুম্বই আন্তর্জাতিক বিমান বন্দরে সতর্কতা জারি করা হল।

    'ধর্ম' যুদ্ধ, ছত্তিসগড়ে সাই বাবা ভক্তদের সঙ্গে হাতাহাতিতে লিপ্ত হলেন শঙ্করাচার্য্যের অনুগামীরা 'ধর্ম' যুদ্ধ, ছত্তিসগড়ে সাই বাবা ভক্তদের সঙ্গে হাতাহাতিতে লিপ্ত হলেন শঙ্করাচার্য্যের অনুগামীরা

    ধর্মের সংঘাত! সোমবার ছত্তিসগড়ের কাওয়ারধাতে শিরডি সাই বাবার ভক্তদের সঙ্গে শঙ্করাচার্য্য স্বরূপানন্দ সরস্বতীর অনুগামীরা ভয়ানক হাতাহাতিতে জড়িয়ে পড়ল। একটি ধর্ম সংসদ চলাকালীন এই ঘটনা ঘটে।

    কাশ্মীরে হামলা হলে উচিত জবাব দেবে ভারত, সাফ জানালেন অমিত শাহ কাশ্মীরে হামলা হলে উচিত জবাব দেবে ভারত, সাফ জানালেন অমিত শাহ

    কাশ্মীরে  হামলা হলে তার উচিত জবাব দেবে ভারত।  বিজেপি সভাপতি হওয়ার পর প্রথমবার জম্মু-কাশ্মীরে গিয়ে মন্তব্য করলেন অমিত শাহ। জম্মু-কাশ্মীরের বিধানসভা নির্বাচনের আগে ওমর আবদুল্লাকে নিশানা করে রাজনীতির লড়াইয়েও সুর চড়ান তিনি। বুঝিয়ে দেন, লোকসভার পর এবারের বিধানসভা ভোটে বিজেপির পাখির চোখ জম্মু-কাশ্মীর।

    ২৬/১১-এর আতঙ্ক ভুলে আজ খুলছে নারিমান হাউস২৬/১১-এর আতঙ্ক ভুলে আজ খুলছে নারিমান হাউস

     ছাব্বিশ এগারোর সন্ত্রাস হানার স্মৃতি এখনও তাজা। এখনও রয়েছে দেওয়ালে বুলেটের চিহ্ন । সন্ত্রাসের সেইসব ভয়ঙ্কর স্মৃতি সঙ্গে নিয়ে  আজ খুলছে নারিমান হাউজ।

    লালু-নীতিশ-কংগ্রেসের মহাজোটে ম্লান মোদী ম্যাজিকলালু-নীতিশ-কংগ্রেসের মহাজোটে ম্লান মোদী ম্যাজিক

    বিহারে বিধানসভা উপনির্বাচনে বড় ধাক্কা বিজেপির। লালু-নীতীশ-কংগ্রেসের মহাজোটের কাছে ম্লান মাত্র তিন মাস আগেকার মোদী ম্যাজিক।

    উত্‍সবে মরসুমে বিমানে সফর করুন মাত্র ১,৮৮৮ টাকায় উত্‍সবে মরসুমে বিমানে সফর করুন মাত্র ১,৮৮৮ টাকায়

    উত্‍সবের মরসুমে নতুন বাজেট অফার নিয়ে এল স্পাইসজেট। মাত্র ১,৮৮৮ টাকায় মিলবে বিমান টিকিট। আগামী ২৭ অগাস্ট থেকে ২৫ সেপ্টেম্বর এই মূল্যে মিলবে টিকিট। শুধুমাত্র দেশের মধ্যে সফর করলেই এই মূল্যে পাওয়া যাবে টিকিট।

    ১৯৯২ থেকে সব কয়লা বণ্টন অবৈধ বলে ঘোষণা সুপ্রিম কোর্টের ১৯৯২ থেকে সব কয়লা বণ্টন অবৈধ বলে ঘোষণা সুপ্রিম কোর্টের

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    চার রাজ্যের উপনির্বাচন LIVE TALLYচার রাজ্যের উপনির্বাচন LIVE TALLY

    লোকসভা নির্বাচনের পর প্রথম বড় পরীক্ষার ফল প্রকাশিত হচ্ছে। লোকসভা ভোটের পর বিজেপি, কংগ্রেস, লালুপ্রসাদ যাদব, নীতীশ কুমার কোন জায়গায় আছেন তার লাইভ পোল ট্যালি দেখুন- (

    মধ্যপ্রদেশের চিত্রকূটের মন্দিরে পদপিষ্ট হয়ে মৃত্যু ১০জনেরমধ্যপ্রদেশের চিত্রকূটের মন্দিরে পদপিষ্ট হয়ে মৃত্যু ১০জনের

    মধ্যপ্রদেশের চিত্রকূটের মন্দিরে পদপিষ্ট হয়ে মৃত্যু হল দশজনের। আজ সকাল ছাটা নাগাদ দুর্ঘটনাটি ঘটে মধ্যপ্রদেশের চিত্রকূটের কামতানাথ মন্দিরে। মৃতদের মধ্যে ছজন মহিলা। জখম হয়েছেন কমপক্ষে ষাটজন। সোমবতী অমাবস্যা উপলক্ষে মন্দিরে ভিড় করেন পূর্ণ্যার্থীরা। হুড়োহুড়ির চোটে ঘটে দুর্ঘটনা। মৃতদের পরিবার পিছু দু লক্ষ টাকা করে ক্ষতিপূরণ দেওয়ার কথা ঘোষণা করা হয়েছে।

    চার রাজ্যে উপনির্বাচনের ফলাফল-Track Live-বিহারে মহাজোটের কাছে মৃদু ধাক্কা খেল বিজেপি, কর্নাটকে চমকপ্রদ জয় কংগ্রেসেরচার রাজ্যে উপনির্বাচনের ফলাফল-Track Live-বিহারে মহাজোটের কাছে মৃদু ধাক্কা খেল বিজেপি, কর্নাটকে চমকপ্রদ জয় কংগ্রেসের

    লোকসভা নির্বাচনের পর প্রথম বড় পরীক্ষার ফল প্রকাশিত হল...

    মিজোরাম যেতে নারাজ, পদত্যগ করলেন মহারাষ্ট্রের রাজ্যপাল মিজোরাম যেতে নারাজ, পদত্যগ করলেন মহারাষ্ট্রের রাজ্যপাল

    বিতর্কের মধ্যেই মহারাষ্ট্রের রাজ্যপাল পদে ইস্তফা দিলেন কে শঙ্করনারায়ণন। সম্প্রতি তাঁকে মিজোরামের রাজ্যপাল করা হয়েছিল। কিন্তু মিজোরামের রাজ্যপালের দায়িত্বভার নিতে নারাজ কে শঙ্করনারায়ণন। তারই জেরে ইস্তফার সিদ্ধান্ত নেন কে শঙ্করনারায়ণন। ইউপিএ সরকারের আমলে তাঁকে মহারাষ্ট্রের রাজ্যপাল করা হয়েছিল। কেন্দ্রে নতুন সরকার ক্ষমতায় আসার পর তাঁকে ইস্তফা দিতে বলা হয়েছিল। কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করেন।

    ফিল্মি কায়দায় ট্রেন থেকে চম্পট দিল হেফাজতে থাকা জঙ্গিফিল্মি কায়দায় ট্রেন থেকে চম্পট দিল হেফাজতে থাকা জঙ্গি

    ধানবাদ: পুলিসের হেফাজত থেকে পালিয়ে গেল হায়দরাবাদের মক্কা মসজিদ বিস্ফোরণে অভিযুক্ত। মুম্বইয়ে আর্থার রোড জেলের মকোকা আদালতে নিয়ে যাওয়ার পথে ট্রেন থেকে চম্পট দেয় আবদুল নঈম ওরফে সামির।

    জম্মু-কাশ্মীরে ২৫টি বিএসএফ শিবিরে হামলা পাক সেনার, গুলির জবাব দিল ভারত জম্মু-কাশ্মীরে ২৫টি বিএসএফ শিবিরে হামলা পাক সেনার, গুলির জবাব দিল ভারত

    এখনও গুলির লড়াই অব্যাহত ভারত-পাক সীমান্তে। শনিবার রাত থেকেই জম্মু কাশ্মীরের ২৫টি বিএসএফ ক্যাম্প লক্ষ্য করে গুলি চালিয়েছে পাকিস্তান। জবাব দিতে বাধ্য হয় ভারতও। রাত ১০টা থেকে গুলির লড়াই শুরু হয়েছে।

    প্রাণ বাঁচাতে খালি হাতে চিতাবাঘের সঙ্গে যুদ্ধ করে জিতলেন উত্তরাখণ্ডের সাহসিনী

    প্রাণ বাঁচাতে খালি হাতে চিতাবাঘের সঙ্গে যুদ্ধ করে জিতলেন উত্তরাখণ্ডের সাহসিনী

    প্রাণ বাঁচাতে চিতা বাঘের সঙ্গে খালি হাতে যুদ্ধ করে বাঘটিকে মারতে বাধ্য হলেন উত্তরাখণ্ডের এক মহিলা।

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    ১৭ বছরের বণ্টন অবৈধ, বলল কোর্ট

    ১৮৬০০০০০০০০০০ টাকা! কথায় লিখলে, ১ লক্ষ ৮৬ হাজার কোটি টাকা। কয়লা বণ্টন কেলেঙ্কারিতে সরকারি কোষাগারের এই বিপুল পরিমাণ ক্ষতি হয়েছে বলে অভিযোগ উঠেছিল। আজ দেশের সর্বোচ্চ আদালত রায় দিল, ১৯৯৩ থেকে ২০১০ সাল পর্যন্ত যে ২১৮টি কয়লাখনি বণ্টন হয়েছে, তার সবটাই বেআইনি। কারণ, নিলাম না করে সরকারি কমিটির পছন্দমতো বিভিন্ন বেসরকারি সংস্থাকে কয়লাখনি পাইয়ে দেওয়া হয়েছিল। পশ্চিমবঙ্গের বেশ কয়েকটি কয়লাখনিও এই তালিকায় রয়েছে।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    কয়লা কেলেঙ্কারিতে সুপ্রিম কোর্টের রায়ের বিরূপ প্রভাব বাজারে

    গত ১৯৯৩ থেকে ২০১০ সাল পর্যন্ত কোনও কয়লা ব্লক বণ্টনই আইন মেনে হয়নি শীর্ষ আদালতের এই রায় সোমবার বিরূপ প্রভাব ফেলল শেয়ার বাজারে। যার জেরে এ দিন লেনদেনের শেষের দিকে হু হু করে পড়ে যায় সূচক। সারা দিন জুড়ে সেনসেক্সের পতন হয় প্রায় ২০০ পয়েন্ট। এ দিন ডলারের তুলনায় টাকার দামও পড়েছে ৯ পয়সা। ফলে বাজার বন্ধের সময়ে প্রতি ডলারের দাম দাঁড়ায় ৬০.৫৬ টাকা।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    'স্বজন'চিনে নয়া রেপার্টরি গড়ছে পুরসভা

    কারা 'স্বজন', কারাই বা ব্রাত্যজন মোটা দাগে সেই সূক্ষ্ম বিচার করে ফেলল কলকাতা পুরসভা। নগরবাসীর করের টাকায় শহরে নাট্যচর্চা কেন্দ্র করতে বাৎসরিক সাড়ে ১৬ লক্ষ টাকা বরাদ্দের পুর-ঘোষণা হল সোমবার। নাট্যচর্চা পুর-পরিষেবার অন্তর্ভুক্ত কি না, সে বিতর্ক আছেই। এ দিন তাকে ছাপিয়ে গেল নাট্যচর্চার বরাত কারা পেল, সেই প্রশ্ন। কারণ পাইকপাড়ার মোহিত মৈত্র মঞ্চে 'বিনোদিনী রেপার্টরি'গড়তে নাট্যস্বজন নামে যে সংস্থার হাতে দায়িত্ব যাচ্ছে, তার দুই স্তম্ভ হলেন রাজ্যের পর্যটনমন্ত্রী ব্রাত্য বসু এবং তৃণমূল সাংসদ অর্পিতা ঘোষ।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    মাত্র ১ টাকা দাওয়াইয়ে খুশি নন বাস মালিকরা

    জেদ ছেড়ে শেষ পর্যন্ত বাসভাড়া বাড়াতে রাজি হলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। যদিও গত দু'বছরে জ্বালানি-সহ পরিবহণের বিভিন্ন খরচ যে হারে বেড়েছে, তার তুলনায় সামান্যই। সরকারি-বেসরকারি সব বাস ও মিনিবাসের ভাড়া প্রতি ধাপে বাড়ছে এক টাকা করে। দীর্ঘ টালবাহানার পরে সরকারের এই সিদ্ধান্তে মোটেই খুশি নন বাস মালিকরা। শনিবার সরকারের সিদ্ধান্ত জানার পরই তাঁরা বলেছেন, "ভেন্টিলেশনে ছিলাম। বেডে এলাম। কিন্তু এতে সুস্থ হওয়ার কোনও সম্ভাবনা নেই।"

    নিজস্ব সংবাদদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    লালু-নীতীশ যুগলবন্দি সফল, উপনির্বাচনে ধাক্কা বিজেপির

    লোকসভা ভোটের ফল দেখে দু'জনেরই প্রমাদ গুনেছিলেন। তার পর দীর্ঘ দ্বৈরথ সরিয়ে রেখে হাত মিলিয়েছিলেন পরস্পরের। সোমবার উপনির্বাচনের ভোটবাক্স খোলার পরে দেখা গেল, লালু প্রসাদ-নীতীশ কুমার যুগলবন্দি রুখে দিয়েছে বিজেপির জয়রথ। তাঁদের সঙ্গে যোগ্য সঙ্গত করেছে কংগ্রেসও। ১০-এর মধ্যে ৬-৪ আসনে এই জোট হারিয়ে দিয়েছে বিজেপি-কে।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    মোদীর একশো দিনে হারের খোঁচা

    তিন মাস আগে লোকসভা ভোটের ফল প্রকাশের পরে চূড়ান্ত হতাশায় ডুবে গিয়েছিল কংগ্রেস। আজ সেই ঘরেই সামান্য হলেও খুশির হাওয়া। বিহার তো বটেই, কর্নাটক, মধ্যপ্রদেশ এবং পঞ্জাবের উপনির্বাচনের ফল থেকে ভাল খবর পেয়েছে ২৪ আকবর রোড। তবু কংগ্রেস নেতৃত্ব মনে করছেন, মোদী-ঝড়ের গতি হয়তো কমেছে, কিন্তু এখনও তা শেষ হয়ে যায়নি।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    লালুর ছবিতেই মিষ্টিমুখ, উৎসবে মাতলেন নীতীশ

    এমন খুশির দিনে পটনায় থাকতে পারলেন না শুধু লালুপ্রসাদ যাদব। তাই ছবিতেই তাঁকে মিষ্টিমুখ করালেন অনুগামীরা! মাস তিনেকের মধ্যে এ ভাবেই পাল্টে গেল বিহারের রাজনীতির ছবি। লোকসভা ভোটের ফল ঘোষণার দিন শুনশান থাকা পটনার আরজেডি, জেডিইউ অফিসের সামনে আজ ভিড় জমল। ফাটলো আতসবাজি। স্লোগান উঠল নরেন্দ্র মোদীর বিরুদ্ধে। উল্টো দিকে, বিকেলে প্রদেশ বিজেপি অফিসে সাংবাদিকদের সঙ্গে কথা বলতে হাজির হলেন হাতে গোনা কয়েক জন নেতা।

    স্বপন সরকার

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    সারদার 'কলম'নিয়ে জেরা সাংসদকে

    সারদা কেলেঙ্কারিতে ফের এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেটের (ইডি) জিজ্ঞাসাবাদের সামনে শাসক দলের সাংসদ। সোমবার তৃণমূলের রাজ্যসভার সাংসদ আহমেদ হাসান ইমরানকে দিনভর জেরা করেন ইডির তদন্তকারীরা। ইডি সূত্রের খবর, ২০১০ সালে আজাদ হিন্দ নামে একটি উর্দু পত্রিকা এবং ২০১২ সালে কলম নামে একটি বাংলা পত্রিকা কিনেছিলেন সারদা কর্তা সুদীপ্ত সেন। সেই দু'টি পত্রিকারই সম্পাদক ছিলেন ইমরান। পরে তিনি তৃণমূল কংগ্রেসের রাজ্যসভার সাংসদ হিসেবে নির্বাচিত হন।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    সিবিআই, ইডির দফতরে বাড়ল নিরাপত্তা

    পাঁচিলের উপর লোহার রেলিং তো ছিলই। এ বার তার উপর বসছে কাঁটাতারও। সল্টলেকের সিজিও (সেন্ট্রাল গভর্নমেন্ট অফিস) কমপ্লেক্সে। যেখানে রয়েছে সারদা কেলেঙ্কারির দুই কেন্দ্রীয় তদন্তকারী সংস্থা সিবিআই ও ইডি-র দফতর। যেখানে ডেকে পাঠানো হচ্ছে বিভিন্ন প্রভাবশালী মানুষকে, যাঁদের নাম সারদা-তদন্তে কোনও না কোনও ভাবে উঠে আসছে।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    ধর্ষণ-খুনের হুমকির মামলা শুরু, অধরাই তৃণমূল নেতা

    জমি বিক্রির বকেয়া টাকা চাইতে বাড়িতে গেলে উপ-পুরপ্রধান তাঁর মেয়েকে ধর্ষণ ও খুনের হুমকি দিয়েছেন বলে অভিযোগ করেছিলেন মেদিনীপুর শহরের শরৎপল্লির এক বিধবা। সোমবার তাঁর অভিযোগ, ওই হুমকির দু'দিন পরে বাড়ি বয়ে এসেও মেদিনীপুরের তৃণমূল উপ-পুরপ্রধান জিতেন্দ্রনাথ দাস ফের মেয়েকে ধর্ষণ ও খুনের হুমকি দিয়েছেন।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    এ বার বোর্ড বনাম ধোনি

    বোর্ডের ঘরের ছেলে কি এ বার বিদ্রোহী? এই প্রশ্নে তোলপাড় দেশের ক্রিকেট মহল। জাডেজা-অ্যান্ডারসন বিতর্কেও ধোনি কার্যত বোর্ডের বিরুদ্ধে গিয়েই নিজের অবস্থানে অনড় ছিলেন। এ বার বুঝিয়ে দিলেন রবি শাস্ত্রীকে ডানকান ফ্লেচারের মাথার উপর বসানোর সিদ্ধান্ত মোটেই পছন্দ নয় তাঁর। তাই বোর্ডের একাংশ এ বার এই বিদ্রোহী অধিনায়ককে দমাতে মরিয়া হয়ে উঠল।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    ফেডেরারকে 'বেটারার'করছে ফিটনেস আর এডবার্গ

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    সাফল্য পাওয়ার জন্য আমার তারকা ফুটবলার দরকার নেই

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    পায়ে বল আর চোখে জল নিয়ে কয়েদিদের আবেগ হারাল ফুটবলকে

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    সুভাষের ধমকানি আর্মান্দোকে প্রশংসা


    পাক হামলা নিয়ে বৈঠক রাজনাথের

    বুলেটের জবাব বুলেট সীমান্ত সংঘর্ষ নিয়ে পাকিস্তানকে রবিবারই হুঁশিয়ারি দিয়েছিল ভারত। তার পর কয়েক ঘণ্টাও কাটেনি, আক্রমণের তীব্রতা বহু গুণ বাড়িয়ে দিল পাক রেঞ্জার্স। কাল সারা রাত ধরে নিয়ন্ত্রণরেখা বরাবর ৪০টি সেনা ছাউনি ও ২৪টি গ্রামের দিকে গুলিগোলা ও মর্টার ছুড়েছে তারা। একই ক্ষমতার অস্ত্র দিয়ে প্রতি-আক্রমণ করেছে ভারতও। গুলির লড়াইয়ে আহত হয়েছেন তিন জন। কুপওয়ারায় শনিবার রাতে জঙ্গি দমন অভিযান শুরু করেছিল সেনা। আজ সেখানকার কেরন ও কালারুসে দুটি পৃথক ঘটনায় প্রাণ হারিয়েছে এক জঙ্গি। মৃত্যু হয়েছে এক জওয়ানেরও।

    নিজস্ব প্রতিবেদন

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    শূন্য আসন ভরাতে যাদবপুরে মুক্ত কাউন্সেলিং

    ইদানীং প্রায় প্রতি বছরই ইঞ্জিনিয়ারিংয়ে আসন ফাঁকা থাকছে। এ বার কিন্তু একেবারে রেকর্ড গড়েছে ফাঁকা আসনের সংখ্যা! এই অবস্থায় ইঞ্জিনিয়ারিংয়ের ফাঁকা আসন পূরণের জন্য 'ওপেন'বা মুক্ত কাউন্সেলিংয়ের ব্যবস্থা করছে যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়। অর্থাৎ বিশ্ববিদ্যালয় নিজেই কাউন্সেলিংয়ের মাধ্যমে ওই সব আসনে ছাত্রছাত্রী ভর্তি করবে। এ ভাবে ওপেন কাউন্সেলিংয়ের মাধ্যমে যাদবপুরের ইঞ্জিনিয়ারিংয়ে ভর্তি এ বারেই প্রথম।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    জমি দখলে পুর-মদত, তির মেয়রের দিকে

    পঁচিশ বছর আগের ঘটনারই যেন পুনরাবৃত্তি। তবে রাজনৈতিক প্রেক্ষাপটের রংটা বদলে গিয়েছে। আড়াই দশক আগে বেহালার পর্ণশ্রীতে কেন্দ্রীয় সরকারি উদ্বাস্তু আবাসনের ফাঁকা জমি পুরসভার মদতে বেহাত হওয়ার অভিযোগ তুলেছিলেন এলাকার তদানীন্তন সাংসদ মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। প্রতিকার চেয়ে তিনি তখন চিঠি লিখেছিলেন কেন্দ্রকে। এখন আবার একই অভিযোগের তিরে বিদ্ধ কলকাতা পুরসভা।

    অনুপ চট্টোপাধ্যায়

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    আমির রেজার কণ্ঠস্বরই শনাক্তকরণের হাতিয়ার

    দু'টি ফোনকল। একটি পেয়েছিলেন কলকাতার এক হোটেল-মালিক। অন্য ফোনটি 'কলার'করেছিলেন কলকাতার বাড়িতে নিজের মা-কে। কলকাতা পুলিশের হাতে থাকা ওই দু'টি টেলিফোন-কথোপকথনের রেকর্ডিং কলকাতারই পার্ক সার্কাসের আমির রেজা খানকে শনাক্ত করার ক্ষেত্রে বড় ভূমিকা নিতে পারে বলে জাতীয় তদন্তকারী সংস্থা (এনআইএ) মনে করছে। কারণ, কলকাতায় ওই দু'টি ফোনকল-ই করেছিলেন আমির রেজা স্বয়ং।

    সুরবেক বিশ্বাস

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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    শিক্ষা আর লোক-উৎসবই গর্ব হাবরাবাসীর

    'হাবরা'শহরের নামটির সঙ্গে জড়িয়ে রয়েছে রাজ্যের মধ্যে অন্যতম সেরা শিক্ষা পরিকাঠামো ও ঐতিহ্যবাহী লোক উৎসবের নাম। পাশাপাশি এখানকার মিষ্টি, বিশেষ করে দই-কাঁচাগোল্লার সুখ্যাতি তো গোটা দেশেই ছড়িয়ে পড়েছে। মূলত ও পার বাংলা থেকে মানুষ এসে হাবরায় বসতি গড়ে তোলেন। এলাকার পুরনো বাসিন্দাদের সঙ্গে মিলেমিশে তাঁরাই গড়ে তোলেন হাবরা শহর। পরবর্তী সময়ে বহু উন্নয়নের সাক্ষী থাকলেও যানজটের যন্ত্রণা থেকে শহরবাসীর রেহাই মেলেনি।

    সীমান্ত মৈত্র

    ২৬ অগস্ট, ২০১৪

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