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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ? ~बाबा नागार्जुन~
    =========================

    किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?
    कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है ?
    सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है, 
    गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है,
    चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है, 
    कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है,
    जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला,
    शासन के घोड़े पर वह भी सवार है,
    उसी की जनवरी छब्बीस,
    उसी का पंद्रह अगस्त है !

    बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है,
    कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है,
    कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है,
    खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा,
    मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है,
    सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है,
    उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है !

    पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
    मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
    फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
    फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
    पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है,
    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
    मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है !
    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
    मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है !
    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
    घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है !
    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,
    बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है !
    देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो,
    पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

    मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,
    पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,
    फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,
    फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,
    महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है,
    गरीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है,
    धतू तेरी, धतू तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्छो नहीं,
    ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
    ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं,
    पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है,
    कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं,
    ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,
    पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

    किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है !
    कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है !
    सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है,
    मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है,
    उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है ।

    ~बाबा नागार्जुन~

    विचार कर लें....बधाई देनें की कोई एक वजह तो हो ?


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    जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो

    जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो

    पलाश विश्वास

    खबर है कि उत्तराखंड में कई स्थानों पर हुई बारिशके कारण कई जगहों पर भूस्खलनहो गया। इससे चार धामों को जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों सहित कई सड़कों पर ट्रैफिक थम गया। नेपाल में पिछले तीन दिनों से बारिशजारी है इससे वहां बाढ़ का कतरा मंडरा रहा है। नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलनसे अबतक 34 लोगों की जान जा चुकी है।  


    खबर है कि दक्षिणी-पश्चिमी चीन के सिचुआन सूबे में हुई मूसलाधार बारिशके बाद वहाँ हुए भूस्खलनमें फँसे क़रीब डेढ़ हज़ार लोगों को बचाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया गया है। चीन के सूखा और बाढ़ बचाव विभाग ने यह जानकारी दी है।


    खबर है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाहकी नई टीम का ऐलान कर दिया गया है। टीम में 8 महासचिव और 11 उपाध्यक्ष शामिल हैं। जेपी नड्डा, राजीव प्रताप रूडी, मुरलीधर राव, राम माधव, सरोज पांडेय, भूपेंद्र यादव, आरएस कटेरिया और राम लाल (संगठन) को महासचिव बनाया गया है। पार्टी के संविधान के अनुसार दो और नेताओं को महासचिव बनाया जा सकता है। लेकिन बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की टीम में महासचिव रहे वरुण गांधी का नाम अमित शाह की नई टीम से गायब है। जबकि उनके नाम को तय माना जा रहा था।


    बीजेपी ने बी दत्तात्रेय, बीएस येदियुरप्पा, सतपाल मलिक, मुख्तार अब्बास नकवी, पुरुषोत्तम रुपाला, प्रभात झा, रघुवर दास, किरण माहेश्वरी, रेनू देवी, दिनेश शर्मा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है।

    मुक्तबाजार का जलवा ऐसा कि धर्मप्राण भारत के मनुस्मृति अनुशासन को कृतार्थ करते हुए प्लेब्वॉय पत्रिका ने मॉडल शर्लिन चोपड़ा का न्यूड फोटो जारी किया है। यह फोटो शूट उन्होंने दो साल पहले करवाया था। इसके साथ ही वह भारत की ऐसी पहली मॉडल बन गईं हैं जिसका न्यूड फोटो प्लेब्वॉय में छापा गया है। शर्लिन कामसूत्र 3डी से चर्चा में आयीं थीं।


    बाबा नागार्जुन की कविता से भी लोगों को एलर्जी होने लगी है।उनकी कविता पोस्ट करने से देशभक्ति के अजब गजब माहौल में व्यवधान पड़ता नजर आ रहा है केसरिया पहाड़ के लोगों को।चंद्रशेखर करगेती ने अपने पोस्ट के पक्ष में क्या कोट किया है।


    जो धर्मप्राण आस्थासंपन्न लोग हैं,उन्हें केसरिया नवउदारवाद की भाषा समझ में नहीं आ रही है,वे आनंद तेलतुंबड़े को अवश्य पढ़ लें,तभी करगेती का कहा समझ में आयेगा।


    समयांतर के ताजा अंक से ऐसी धर्मोन्मादी धार्मिक देवभूमि भूगोल के लोगों की मदद के लिए आनंद का नियमित स्तंभ शुरु किया गया है।जाहिर है कि हम उनकी तरह अवधारणाओं के स्तर पर गहराई से प्याज की परतें निकाल नहीं सकते।


    बहरहाल करगेती का यह उद्धरण एक भुलाये हुए शख्स से जुड़ा है,जो हिंदी दुनिया में काफी बदतमीज माने जाते रहे हैं और हाल में दिवंगत होने के बाद किसी ने कायदे से उन्हें याद नहीं किया है।


    समयांतर के ताजा अंक में आनंद तेलतुंबड़े के केसरिया नवउदारवाद वाला लेख और पंकज दाज्यू का संपादकीय जरुर पढ़ लेना।सुबह ही पंकज दाज्यू से लंबी बात हुई,उन्होंने कंटेट भेजा भी,खुल नहीं रहा है।फिलहाल आपका कोटः


    आपको कुछ और अधिक समझने में आसानी होगी.......


    नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम

    बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

    घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    ज़िन्दाबाद इन्क़लाब – २


    जहाँ आवाम के ख़िलाफ़ साज़िशें हो शान से

    जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

    जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो

    जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो

    वहाँ न चुप रहेंगे हम

    कहेंगे हाँ कहेंगे हम

    हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

    जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    इन्क़लाब इन्क़लाब -२


    यक़ीन आँख मूँद कर किया था जिनको जानकर

    वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तान कर

    उन्ही की सरहदों में क़ैद हैं हमारी बोलियाँ

    वही हमारी थाल में परस रहे हैं गोलियाँ

    जो इनका भेद खोल दे

    हर एक बात बोल दे

    हमारे हाथ में वही खुली क़िताब चाहिए

    घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    ज़िन्दाबाद इन्क़लाब


    उन्ही की आह बेअसर उन्ही की लाश बेकफ़न

    लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके

    करें तो क्या करें भला जो जी सके न मर सके

    स्याह ज़िन्दगी के नाम

    जिनकी हर सुबह और शाम

    उनके आसमान को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिए

    घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    ज़िन्दाबाद इन्क़लाब -2


    तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर

    निगाह डाल सोच और सोचकर सवाल कर

    किधर गए वो वायदे सुखों के ख़्वाब क्या हुए

    तुझे था जिनका इन्तज़ार वो जवाब क्या हुए

    तू इनकी झूठी बात पर

    ना और ऐतबार कर

    के तुझको साँस-साँस का सही हिसाब चाहिए

    घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

    जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    ज़िन्दाबाद इन्क़लाब


    नफ़स-नफ़स, क़दम-क़दम

    बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

    घिरे हैं हम सवाल से, हमें जवाब चाहिए

    जवाब दर-सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए

    इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

    ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

    जहाँ आवाम के ख़िलाफ साज़िशें हों शान से

    जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

    वहाँ न चुप रहेंगे हम, कहेंगे हाँ कहेंगे हम

    हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

    इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

    ज़िन्दाबाद इन्क़लाब


    साभार : शलभ श्रीराम सिंह


    दिखने में वामपंथी,लेकिन हिंदी के मौजूदा परिदृश्य पर  भीतर से घनघोर संघी अमेरिकापरस्त प्रतिष्ठानिक बाजारु जेएनयू वर्चस्व का यह नतीजा कि प्रेमचंद भी गैरप्रासंगिक करार दिये जा रहे हैं।


    लगता है कि इस जेएनयू विशेषज्ञों की खबर भी लेनी पड़ेगी।हम भी शलभ श्रीराम सिंह या ओम थानवी से कोई कम बदतमीज नहीं हैं।यह बदतमीजी इस बदतमीज दौर के मुकाबले के लिए बेहद जरुरी है।


    इतिहास बदल रहा है,साहित्य बदल रहा है,संस्कृति बदल रही है,समाज बदल रहा है,शहर बदल रहे हैं,देहात बदल गया है,बदलने लगे जल जंगल जमीन समुंदर घाटियां,उत्तुंग शिकर और हिमप्रवाह  और हिमालय साक्षी है कि भूगोल भी बदल दिया जा रहा है।


    लगे रहो करगेती भाई।इस बहस से बचने की कोशिश न करना।क्योंकि सेज स्मार्ट सिटी नवधनाढ्य सांढ़ संस्कृति का पहला बलि हिमालय ही होगा।गंगा अब मैदानों में गंगा शुद्धिकरण के बावजूद कब तक बह सकेगी,इस पर विचार करना जरुर।


    देहरादून में पुणे जैसी पहाड़ धंसने से अभी सात लोग मरे हैं और बचाव अभियान लाइव है।पुणे में कितने मरे,लोग बहुत जल्दी भूल गये जैसे केदार जलप्रलय की लाशों को भूल गया है देश।जैसे भूस्खलन,बाढ़,भूकंप,सुनामी से ध्वस्त विध्वस्त जनपदों के रेगिस्तान में होता है निर्माण विनिर्माण।


    देहरादून फिर भी मुक्तबाजारी उत्तराखंड की राजधानी है।


    बाकी पहाड़ के भूगोल में,हिमालय के अंतःस्थल में जो जलप्रलय जारी है,उसे बयां करने के लिए गौर्दा या कमसकम गिर्दा जैसी लोक विरासत के जानकार न हम हैं और न आप है।


    बलि,गिर्दा को याद रखने वाले लोग अब भी पहाड़ में हैं।भास्कर उप्रेती में शैले हाल में एक आयोजन की खबर की है।गिर्दा को ब्रांड में तब्दील करना है तो दिल्ली मुंबई से उन्हें लांच करना बेहतर होगा।


    वरना इस व्यवस्था पर थूकने वाले बेतरतीब महाबदतमीज गिर्दा की असली विरासत तो पहाड़ों और मैदानों में अविराम जारी विनाश लीला के खिलाप हुड़किया अलख जगाने का अविराम जागर  जनजागरण है।


    गिर्दा आदमी नहीं,जिंदा आंदोलन है,जो मरा नहीं,राख के नीचे सुलग रहा है अब भी।गिर्दा को याद करे से पहले राख में खाक उस आग की तपिश को दिलो दमिमाग में महसूसे तो कोई बात बने।फिर बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी बातें।


    हिमालयी यंत्रणा संसाधनों के अधिकतम उपयोग के मुक्तबाजार में कैसे कैसे अभिव्यक्त होनी है,इसकी कल्पना करने की तकलीफ उठाना भी जरुरी नहीं है।

    यह ज्वलंत वास्तव है इस देश का,जिसेस हम पल छिन मुंह चुराने की कला में पारंगत अभ्यस्त हैं।क्योंकि यह वास्तव ने शर्लिन चोपड़ा है, नसनी लिओन और न ही करीना कैटरीना और न हालीवूडी बालीवूड फिल्में न जोधा अकबर है और न डीवी का महाभारत रामायण।


    हिमाचल और उत्तराखंड देवभूमियों में हिंदू शास्त्रों के सकल देवदेवियों के साथ साथ गांव गांव में गोल्ल ज्यू महाराज और खासतौर पर हिमाचल में दैवी राजकाज,दैवी पंचायत की अटल उपस्थिति  के बावजूद प्रलयंकारी जो परिश्तितियां घनघोर है,उनसे निपटने के लिए वस्तुनिष्ठ अध्ययन,वैज्ञानिक दृष्टि और जनप्रतिब्धता के साथ ज्वलंत पर्यावरण प्रेम चिपको की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


    चार धामों की यात्रा,माता वैष्मो देवी और बाबा अमरनाथ के पुण्यप्रताप, पशुपतिनाथ की सिंह गर्जना से अब इस हिमालय का बचे रहना मुश्किल ही है।


    देहरादून तलक ढहते पहाड़ का मलबा आबादी को तहस नहस करने लगा है और फिर जलप्रलय की जद में है पहाड़।


    केदार सुनामी में गायब जनपदों की लाशें लेकिन अभी लापता हैं और पहाड़ को मुर्दाघर बनाने की तैयारी है।


    नवी मुंबई में सेज के उद्घाटन के मौके पर लबालब समुंदर के माफिक जनसैलाब से साफ जाहिर है कि बाजार मौत के सामान की तिजारत किस मुलम्मे के भरोसे कर रहा है।उस मुलम्मे को उतारना जरुरी है।


    खबर यह भी है कि अच्छे दिनों की नई सौगात बतौर जल्द ही आप अपने ही बैंक के एटीएम का सीमित इस्तेमाल करने पर मजबूर हो जाएंगे। इस साल नवंबर से आप अपने बैंक के एटीएम से हर महीने सिर्फ 5 और अन्य बैंक के एटीएम से सिर्फ 3 ट्रांजैक्शन ही मुफ्त कर सकेंगे। इसके बाद एटीम से हर ट्रांजैक्शन पर आपको 20 रुपए की रकम चुकानी होगी। यह रकम आपके खाते से ही काट ली जाएगी। ट्रांजैक्शन में सिर्फ रकम निकालना ही शामिल नहीं है, बल्कि खाते की जानकारी, चेक बुक रिक्वेस्ट, पिन बदलना और मोबाइल रिचार्ज को भी लेन-देन माना जाएगा। नया नियम देश के 6 मेट्रो शहरों में इस साल नवंबर से लागू होगा।


    खबर यह भी कि बीजेपी ने 16वीं लोकसभा चुनाव में अपने दम पर 282 सीटें जीतीं, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का कहना है कि इसका श्रेय कांग्रेस को ज्यादा जाता है। आडवाणी ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी ने भी बीजेपी की जीत में अहम भूमिका अदा की, लेकिन इसमें सबसे बड़ा योगदान विपक्ष यानि कांग्रेस का रहा है। आडवाणी ने कहा कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चले विशाल अभियान ने भी जीत में योगदान दिया, लेकिन सबसे बड़ा योगदान हमारे विपक्ष का रहा।


    उधर,नेपाल में पिछले तीन दिनों से बारिश जारी है इससे वहां बाढ़ का कतरा मंडरा रहा है। नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलन से अबतक 34 लोगों की जान जा चुकी है। वहां सेना और पुलिस के जवान राहत और बचाव कार्यों में जुटे हैं। बाढ़ और भूस्खलन से जानमाल का सबसे ज्यादा नुकसान पश्चिमी नेपाल के सुरखेत जिले में हुआ है।



    फिलहाल नजारा यह कि उत्तराखंड में भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने की अलग-अलग घटनाओं में 26 लोगों के मारे जाने की सूचना है। राजधानी देहरादून में ही पिछले 48 घंटे में हुई मुसलाधार बारिश से काफी नुकसान हुआ। राजपुर के काठ बंगला क्षेत्र में शुक्रवार की देर रात दो बजे पहाड़ी दरकने से तीन मकान टूट गए। जिसमें सात लोग जिंदा दफन हो गए। एक महिला चंद्रकला को छह घंटे बाद मलबे पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने निकाला। एक छात्र नेता तेज बहाव में बह गया। उसका कुछ पता नहीं चला।


    रायपुर के मालदेवता में 500 मीटर सड़क बहने से दर्जनों गांव का राजधानी से संपर्क कट गया है। जबकि रिस्पना और बिंदाल के तट पर बसी बस्तियों में भी काफी नुकसान हुआ है। प्रशासन ने स्कूलों में एहतिहात के तौर पर छुट्टी कर दी है।


    पौड़ी जिले में दो जगह बादल फटने की घटनाओं में 10 लोग मारे गए। तहसील यमकेश्वर के ग्राम दियूली व जामल में पांच लोग मारे गए, दो भवन पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हुए। तहसील पौड़ी के कल्जीखाल ब्लाक के ग्राम नौड़ी में दो व्यक्ति (एक पुरुष एक महिला) की मौत हो गई। दो भवन पूरी तरह से क्षतिगस्त हो गए।


    तहसील लैंसडाउन के ब्लाक द्वारीखाली के तहत ग्राम परसोली और सिमली कुटी में बादल फटने से पांच लोग मारे गए। 4 भवन पूरी तरह से ध्वस्त हो गए। जिले में कुल 14 लोग मारे गए और 8 भवन पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हो गए।


    पिथौरागढ़ जिले की मुनस्यारी तहसील के अंतर्गत गिनीबैंड व गिरगांव के बीच गड्यार गाड में 3 व्यक्तियों की पानी के तेज बहाव में बहने की सूचना है। एक व्यक्ति की मौत हो गई है। दो घायल बताए जा रहे हैं।



     

    दूसरी ओर,नेपाल के सुरखेत जिले में 11 लोग, गोरखा जिले में नौ, चितवन, रुकुम जिले में नौ, ललितपुर, उदयपुर, दांग और मनांग जिले में आठ और नवलपरासी, खोतांग, सिंधुली, धनुषा, मकवनपुर जिलों में छह लोग मारे गए हैं।सुरखेत जिले के चीसापानी गांव में भूस्खलन से कई मकान जमीदोंज हो गए। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता शंकर कोइराला के अनुसार मलबे से 20 शव बाहर निकाले गए हैं। बहेरी नदी में आई बाढ़ से कई पुल बह गए. हजारों लोग विस्थापित हो गए हैं और देश भर में हजारों एकड़ जमीन में बाढ़ का पानी और पहाड़ों से आई गाद व मलबे से भर गया है।


    पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन हुआ है जबकि तराई के मैदान डूबे हुए हैं। मैदानी इलाके में जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है। कई लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे हैं और सरकार से अविलंब सहायता की मांग की है।


    गोरखा जिले के पंथेश्वर गांव में स्कूल की दीवार ढहने से तीन लोग मारे गए। घटना के वक्त एक कोरियाई नागरिक स्कूल में बच्चों को जरूरी सामान बांट रहा था। हादसे में मरनेवालों में स्कूल में काम करने वाली दो महिलाएं और एक पुरुष शामिल हैं। हालांकि सभी बच्चे सुरक्षित हैं।बाढ़ और भूस्खलन के कारण देश में करोड़ों रुपये की संपत्ति को नुकसान पहुंचा है। 2 अगस्त को सुनकोसी नदी में भूस्खलन के कारण नदी पूरी तरह अवरुद्ध हो गई थी और इस हादसे में 150 से ज्यादा लोग मारे गए थे। सुनकोसी की घटना से भारत के बिहार के कोसी क्षेत्र में भी भारी अफरा-तफरी मच गई थी और लोगों को खाली कराना पड़ा था।


    लालकिले के मैदान से जनता केखिलाफ कारपोरेट युद्ध की घोषणा प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग के सूक्तिवाक्य माध्यमे करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज आईएनएस कोलकाता राष्ट्र को समर्पित किया। स्वदेशी तकनीक से निर्मित देश का यह सबसे बड़ा युद्धपोत है। प्रधानमंत्री के साथ इस मौके पर रक्षा मंत्री अरुण जेटली व नौसेना प्रमुख एडमिरल आरके धवन भी मौजूद थे।


    मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में प्रतिरक्षा तैयारियां अहम हैं।छायायुद्ध बहाने सैन्यीकरण और सैन्य राष्ट्र का अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध पर्तिरक्षा का यह मुक्तबाजारी समीकरण है।जो सबसे पहले प्रकृति,पर्यावरण और प्रकृति से जुड़े जनसमुदायों के नरसंहार का अटल सत्य भी है।


    गौर करें कि यह जलवा प्रतिरक्षा में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और प्रतिरक्षा से संबंधित सरकारी उपक्रमों के निजीकरण का है।


    गौर करें कि ओबामा से शिखर वार्ता से पहले समूते पोलिटिकल क्लास को हाशिये पर रखकर नई बाबू संस्कृति, संपूर्ण महाकाव्यिक शिक्षा और अनुशासन के जरिये मुक्त बाजार के सारे दरवाजे खोलते हुए भारत अमेरिकी परमाणु संधि को ही लागू नहीं कर रहे हैं नरेंद्र मोदी,संविधान और कानून के राज को इतिहास बना रहे हैं वे।


    गौर करें कि एफडीआई राज के मेक इन को उन्होंने मेडइन इंडिया के सफाये कि लिए मनुस्मृति में तब्दल कर दिया है।


    इस खबर को पूरी तरह देखने से पहले इसे भी देख लें कि  चीन के एक कदम से भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। भारतीय सीमा से लगे रेल नेटवर्क को मजबूत करने की कोशिशों में लगे चीन ने तिब्‍बत क्षेत्र में मौजूद अपनी दूसरी रेलवे लाइन का उद्घाटन कर दिया है। यह रेलवे लाइन सिक्किम तक आती है। इसकी निर्माण लागत करीब 216 करोड़ डॉलर है। भारत के लिए अलार्म, सिक्किम तक पहुंची चीन की रेलवे लाइन. यह रेलवे लाइन जो सिक्किम के बहुत पास है, उसकी मदद से चीन की सेना बहुत ही आसानी से भारत के लिए सबसे अहम हिमालयन रिजन में आ जा सकती है। चीन की यह रेलवे लाइन तिब्‍बत की राजधानी ल्‍हासा को इस क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े शहर शिगाजे से जोड़ती है।


    रडार की पकड़ में नहीं आने वाले 6,800 टन वजनी कोलकाता श्रेणी के इस युद्धपोत का डिजाइन भारतीय नौसेना के डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है। मझगांव डॉक लिमिटेड (एमडीएल) ने इसके निर्माण का काम सितंबर, 2003 में शुरू किया था। यह अपनी श्रेणी का पहला युद्धपोत है। भारत की इसी तरह के दो अन्य युद्धपोत बनाने की योजना है। इस जंगी पोत में अत्याधुनिक हथियार प्रणालियां लगाई गई हैं, जिसमें पनडुब्बी रोधी प्रौद्योगिकी भी शामिल है।


    इस युद्धपोत में सतह से सतह पर मार करने वाली अत्याधुनिक ब्रह्मोस मिसाइलें, रॉकेट लांचर, टॉरपीडो ट्यूब लांचर, सोनार हमसा, ईडब्ल्यूएस एलोरा व एके-630 बंदूकें मौजूद हैं, जो समुद्री व हवाई हमले के दौरान दुश्मन के दांत खंट्टे करने में सक्षम हैं।


    भारतीय नौसेना में शामिल होने जा रहा युद्धपोत आईएनएस कोलकाता दुश्मनों के रडार को चकमा देने में तो सक्षम होगा ही, ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस होने के कारण यह 400 किलोमीटर की दूरी तक मार भी कर सकेगा।


    प्रधानमंद्दी नरेंद्र मोदी के हाथों शनिवार को देश को समर्पित होने जा रहा यह पोत इस वर्ष स्वतंद्दता दिवस का उपहार माना जा रहा है। कई खूबियों से लैस इस पोत को मुंबई के ही मझगांव डॉकयार्ड में तैयार किया गया है। अपनी विशिष्ट बनावट के कारण यह दुश्मनों के रडार को चकमा देने में सक्षम है। नौसेना अधिकारियों के अनुसार 164 मीटर लंबा एवं 18 मीटर चौड़ा 7500 टन का यह पोत दुश्मनों के रडार पर किसी छोटी नौका जैसा दिखाई देगा। जिसके दम पर यह उन्हें भ्रमित करता हुआ उनके काफी नजदीक पहुंचकर हमला कर सकता है।


    इस पर स्वदेशी ब्रह्मोस मिसाइलों की तैनाती भारत को दुनिया के उन चंद देशों की कतार में खड़ा कर देती है, जो अपनी नौसेना के युद्धपोत से 400 किलोमीटर तक निशाना साध सकते हैं। ब्रह्मोस के अलावा कम दूरी तक मार कर सकनेवाली मिसाइलों एवं अतिसंवेदनशील रडार भी इस पोत की विशिष्टता में चार चांद लगा रहे हैं।


    नौसेना के दो सी-किंग हेलीकॉप्टर अपने साथ ले चल सकने की क्षमता वाले आईएनएस कोलकाता की रफ्तार 30 नॉटिकल मील प्रति घंटा होगी। ऊर्जा आपूर्ति के लिए इसमें लगे चार गैस टर्बाइन जेनरेटर एवं एक डीजल ऑल्टरनेटर किसी छोटे-मोटे शहर को भी रोशन करने की क्षमता रखते हैं। इस पर 30 अधिकारी एवं 330 नौसैनिक तैनात होंगे।


    इसका नामकरण भारत के सांस्कृतिक शहर कोलकाता के नाम पर किया गया है और इसका घोष वाक्य है-युद्धाय सर्वसन्नद्ध अर्थात युद्ध के लिए सदा तैयार। आईएनएस कोलकाता श्रेणी के ही स्वदेश निर्मित दो और विध्वंसक युद्धपोत कोच्चि एवं चेन्नई भी कुछ ही वर्षों में भारतीय नौसेना को प्राप्त हो जाएंगे।

    SEZ प्रोजेक्ट का उद्घाटन कर बोले PM मोदी, 'राज्य-केंद्र मिलकर करें काम'



    नरेंद्र मोदी

    नरेंद्र मोदी

    आईएनएस कोलकाता को देश को समर्पित करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवी मुंबई में छह हजार करोड़ के स्पेशल इकोनॉमिक जोन(एसईजेड) प्रोजेक्ट की शुरुआत की. इस मौके पर मोदी ने कहा कि हमारी कोशिश सरलीकरण की तरफ है. देश को आयात से ज्यादा निर्यात पर ध्यान देना चाहिेए.

    मोदी ने कहा, 'निर्माण उद्योग को बढ़ावा देना प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए. अगर देश के विकास की गति को तेज करना है. तो हमें शिक्षा, रोजगार पर ध्यान देना होगा. यह युग विश्व व्यापार का युग है. विश्व व्यापार के इस युग में सामुंद्रिक व्यापार पर ध्यान देना जरूरी हो गया है.'

    बंदरगाहों पर देश के लिए उपयोगी बताते हुए मोदी ने कहा, 'हमनें सागरमाला योजना की शुरुआत की. कंटेनर का करीब 50 फीसदी व्यापार हिंद महासागर के जरिए होता है. आने वाले दिनों में यह व्यापार निश्चित रूप से बढ़ेगा. भारत के समुद्र तट पर जो राज्य हैं उसे सागरमाला योजना का लाभ मिले. ऐसी हमारी कोशिश होगी.'

    दुनिया के बाकी देशों का उदाहरण देते हुए मोदी ने बताया,' दुनिया में जिन जिन राष्ट्रों का विकास हुआ है उन सभी देशों में यह बात कॉमन है कि वो सभी शहर समुद्र किनारे स्थित होते हैं, ऐसे राज्यों की वजह से ही उस देश का अधिक आर्थिक विकास हुआ है. इसी को देखते हुए भारत में बंदरगाहों के विकास और सागरमाला परियोजना पर ध्यान दिया गया है. अगर हमें विकास करना है तो हमें पोर्ट लेड पर ध्यान देना होगा.

    मोदी ने कहा, 'हम व्यवस्था को विकसित करना चाहते हैं. देश में उत्पादन बढ़े, नौजवानों को रोजगार मिले. इसी के लिए ऐसी एसईजेड परियोजना को शुरू किया गया है. अगर हम निर्यात पर ध्यान नहीं देंगे तो हम विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाएंगे. राज्य और केंद्र मिलकर इसपर अच्छा काम कर सकते हैं.'

    काम करने के नए तरीकों पर जोर देते हुए मोदी ने कहा, 'इनोवेशन, डिजाइनिंग पर अगर हम काम करें तो हम बेहतर कर सकते हैं. मुझे आने वाले दिनों में यकीन है कि हम निर्यात की दुनिया पर भी भारत का डंका बजा सकते हैं.' गडकरी की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा, 'हमारी कोशिश सरलीकरण की तरफ है. इसी के चलते शिपिंग के लिए अब लाइफटाइम शिपिंग का लाइसेंस दिया जाने लगा है.'

    कांग्रेस पर मोदी ने ली चुटकी

    कांग्रेस पर चुटकी लेते हुए कहा, सीएम पृथ्वीराज चव्हाण को इसकी योजना की जरूरत पहले से रही होगी. लेकिन चव्हाण बोल नहीं पाए होंगे. मैं उनकी चिंता समझ सकता हूं. अक्सर बीमारियों को दूर करने के लिए डॉक्टरों की जरूरत होती है.



    और भी... http://aajtak.intoday.in/story/prime-minister-innaugrates-sez-project-in-maharashtra-1-776204.html





    अब पूरी बहस जो गौर तलब भी हैः


    चन्द्रशेखर करगेती

    Yesterday at 7:09am· Edited·

    किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?

    =========================

    किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?

    कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है ?

    सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है,

    गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है,

    चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है,

    कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है,

    जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला,

    शासन के घोड़े पर वह भी सवार है,

    उसी की जनवरी छब्बीस,

    उसी का पंद्रह अगस्त है !

    बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है,

    कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है,

    कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है,

    खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा,

    मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है,

    सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है,

    उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है !

    पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,

    मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,

    फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,

    फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,

    पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है,

    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

    मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है !

    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

    मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है !

    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

    घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है !

    गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

    बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है !

    देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो,

    पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

    मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,

    पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,

    फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,

    फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,

    महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है,

    गरीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है,

    धतू तेरी, धतू तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्छो नहीं,

    ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,

    ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं,

    पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है,

    कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं,

    ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,

    पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

    किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है !

    कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है !

    सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है,

    मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है,

    उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है ।

    ~बाबा नागार्जुन~

    विचार कर लें....बधाई देनें की कोई एक वजह तो हो ?

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    • You, Rajiv Lochan Sah, Surendra Grover, Bhaskar Upreti and 99 others like this.

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    • Gopal Gururani baba nagarjun ki jay

    • Yesterday at 7:10am· Like· 1

    • Jagdish Kalauniअति प्रासंगिक रचना.....

    • Yesterday at 7:43am· Unlike· 3

    • Digvijay Pant Well said

    • Yesterday at 9:02am· Like· 1

    • Kiran Balaक्षमा करें आज सकारात्मकता की बात होनी चाहिए...हम सभी जानते हैं कि परेशानियां हैं..समस्याएं हैं..मगर आज के दिन ये संकल्प लें कि हम अपना काम ईमानदारी से करेंगे...देश की सरकार को, लोगों को, कोसना छोड़ कर..और समस्याओं की दुहाई देकर नहीं बल्कि देशभक्ति का जज्बा जगाकर दृढ़ संकल्प होकर आज के दिन का आनंद लें तो अधिक बेहतर होगा...

    • Yesterday at 9:52am· Like· 1

    • चन्द्रशेखर करगेती Kiran Bala जी आज अगर देश में कुछ सकारात्मक अगर कुछ दिखाई दे रहा है तो वह इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से काम करने वाले लोगो की वजह से ही हुआ हैं, देश के अगर हालात अगर बदतर है तो अगस्त और जनवरी में बड़े बड़े भाषण देनें वालो की वजह से ही हुआ है, और इसी को बाबा की यह कविता बताती है.....आखिर सच्चाई से मुंह कब तक मोड़ा जा सकता है......आप कविता का भाव समझें....

    • Yesterday at 10:36am· Edited· Unlike· 8

    • Rajesh Sharmaआज के शुभ अवसर पर देश के प्रधान मंत्री जी ने देशवासियों को एक सूत्र में बांध दिया ! आज भारत माता का तिरंगा देश के प्रधान सेवक के हाथों से लहराकर आप ने अपने देशदेशवासियों का मनोबल बढाया है जिसके लिए देश आपको आगे बढने का आशीर्वाद दे रहा है

    • Yesterday at 10:42am· Like· 1

    • चन्द्रशेखर करगेती Rajesh Sharma जी आज से २० साल पहले का अगस्त यद् करो तो तब का उत्साह और आज में कुछ फर्क नजर आता...अगर हाँ तो इस उत्साह में कमी के कारण भी खोजियेगा...

    • Yesterday at 10:52am· Unlike· 2

    • Kiran Balaमैं सहमत नहीं हूँ...ये सब तो हम जानते ही हैं..कोई नयी बात तो नहीं...ये बातें कहके तो केवल आप हतोत्साहित ही कर रहे हैं सभी को...कोई सकारात्मक सन्देश दीजिए...स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सकारात्मकता ने ही सेनानियों के मन में अलख जगाए रखा...सचाई केवल इस कविता के माध्यम से ही पता चले ये ज़रूरी तो नहीं..हम सभी इस सच का हिस्सा हैं...रोज जीते हैं ये जीवन...जिसमें निराशा है...भ्रष्टाचार है..मगर आज का दिन अलग है...सोचिये आजादी से पहले का जीवन कैसा था..आज हम आज़ाद तो हैं...ज़रूरत है तो हालत को सँभालने की..जो सकारात्मक सोच से ही संभव हो सकता है...

    • Yesterday at 10:55am· Like· 1

    • चन्द्रशेखर करगेतीहतोत्साहित वे लोग हो रहें है जो सच्चाई देखकर भी समझना नहीं चाहते कि आज देश के हालात क्या है, जो समझ रहें हैं वे तो प्रण लिए ही हुए हैं कि उन्हें इस देश के हालत बदलने हैं, विचार से, कर्म से, परिश्रम से......

    • Yesterday at 11:13am· Edited· Unlike· 4

    • Prerna Garg Aaj pahli bar man nahi hua tv chalane ka... Aazadi milegi hame in kale angrejon se...tab jan aur aug dono manaenge...

    • Yesterday at 11:28am· Like

    • Kiran Bala aap sachayi deshvasiyon ko dikha rahe hain..jaise aapke n dikhane se kisi ko desh k haalat pta hi nhi chalenge..post ka samarthan karna achhi baat hai..mgr kewal rote rahna bhi to hal.nahi..aapne avashya pran liya hoga mujhe yakin hai..mgr jo aapse prerna lete hn unko yahi sandesh milega ki kuchh bhi kr lo kuch nhi hoga is desh ka..there is no hope..kyonki wo bachna chahte hn apne krtavyo se..aur isme ye kavita unki madad kregi.

    • 21 hrs· Like

    • चन्द्रशेखर करगेती Kiran bala ji, yah to samjhane wale ko sochna hai ki vah kise samjha raha hai........vaise bhi jo haalaat ko apane aap na samjhe usei koe dusra samjha bhi nahi sakta.

    • 20 hrs· Unlike· 2

    • Navnish Negi Bhook se ladta hua AADMI / AAZAADI kE Parcham ka kya kare

    • 20 hrs· Like· 1

    • Manoj Pandeकरगेती जी यह दिन वास्तव में यही सोचना है की स्वाधीनता से हमने क्या पाया। क्यूँ हमारे बड़े बूढ़े हमसे यह कहते है की अंग्रेजी हुकूमत इससे अच्छी थी। क्यूँ बार बार यह महसूस कराया जाता है की भूरे अँगरेज़ हम पर शासन कर रहे है। क्यूँ आज प्रधान मंत्री जी ने कहा में आपका प्रधान सेवक हूँ। क्या इस बात में यह जाहिर नहीं होता की देश का प्रधानमंत्री इस बात को स्वीकारता है प्रधान सेवक कहलाना उचित है।

    • 19 hrs· Like· 1

    • Sharad Dixit Kargeti ji jinke pet bhare hai wo kaha samjhegey is kavita ko.....

    • 19 hrs· Like· 1

    • चन्द्रशेखर करगेती Kirna Bala जी आपके लिए एक और समसामयिक कविता, शायद इससे आपको कुछ और अधिक समझने में आसानी होगी.......

    • नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम

    • बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

    • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब – २

    • जहाँ आवाम के ख़िलाफ़ साज़िशें हो शान से

    • जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

    • जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो

    • जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो

    • वहाँ न चुप रहेंगे हम

    • कहेंगे हाँ कहेंगे हम

    • हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

    • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    • इन्क़लाब इन्क़लाब -२

    • यक़ीन आँख मूँद कर किया था जिनको जानकर

    • वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तान कर

    • उन्ही की सरहदों में क़ैद हैं हमारी बोलियाँ

    • वही हमारी थाल में परस रहे हैं गोलियाँ

    • जो इनका भेद खोल दे

    • हर एक बात बोल दे

    • हमारे हाथ में वही खुली क़िताब चाहिए

    • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

    • क्रमश...

    • 17 hrs· Unlike· 2

    • चन्द्रशेखर करगेतीवतन के नाम पर ख़ुशी से जो हुए हैं बेवतन

    • उन्ही की आह बेअसर उन्ही की लाश बेकफ़न

    • लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके

    • करें तो क्या करें भला जो जी सके न मर सके

    • स्याह ज़िन्दगी के नाम

    • जिनकी हर सुबह और शाम

    • उनके आसमान को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिए

    • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब -2

    • तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर

    • निगाह डाल सोच और सोचकर सवाल कर

    • किधर गए वो वायदे सुखों के ख़्वाब क्या हुए

    • तुझे था जिनका इन्तज़ार वो जवाब क्या हुए

    • तू इनकी झूठी बात पर

    • ना और ऐतबार कर

    • के तुझको साँस-साँस का सही हिसाब चाहिए

    • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

    • नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

    • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

    • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

    • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

    • नफ़स-नफ़स, क़दम-क़दम

    • बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

    • घिरे हैं हम सवाल से, हमें जवाब चाहिए

    • जवाब दर-सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए

    • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

    • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

    • जहाँ आवाम के ख़िलाफ साज़िशें हों शान से

    • जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

    • वहाँ न चुप रहेंगे हम, कहेंगे हाँ कहेंगे हम

    • हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

    • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

    • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

    • साभार : शलभ श्रीराम सिंह

    • 17 hrs· Like

    • Kiran Bala main aapko un logo se bahut upar manti thi jo aalochna ko sakaratmak roop se lete hai ..par aap bhi unhi logo me se ek nikle jo apni post pr ek bhi negative comment bardasht nahi kr skte...afsos hua mujhe..maaf kijiyega..aage se mai kewal like kr diya krungi..shubh sandhya.

    • 15 hrs· Like· 1

    • चन्द्रशेखर करगेती Kiran Bala जी जैसा आप समझ रही हैं वैसा नहीं हैं, जो पूर्व में कवियों ने अपनी रचनाओं में जो लिखा है, क्या आज भी स्थितियां कुछ बदली हैं ? मैं आलोचनाओं को सार्थक रूप से ही लेता हूँ, लेकिन जब स्थितियों को नकारा जाय तब नहीं ?

    • 15 hrs· Unlike· 1

    • Manoj Pandeमुझे अपने देश से प्रेम है। पर प्रेम होने का मतलब symbolism से नाता जोड़ लेना नहीं है। देश प्रेम देश वासियों से प्रेम है। उनके दर्द समझना है।

    • अगर साहिर कहते है...रहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा। तो वस्त्व्स में सोच्निये विषय है। सडको पर imhuman conditions पर रहते बच्चे जिन्हें दो जून की रोटी नसीब नहीं है भारत की सत्यता है। औरत के ऊपर होते अन्याय। बेशुमार गन्दगी सत्य है। शायद प्रधानमंत्री ने इसी लिए इन बिन्दुओं पर इंगित किया। क्यों हम प्रधानमंत्री को regressive और pessimist नहीं कहते। वर्तमान स्थिति पर यथार्थ के धरातल पर देखना कोई गलत बात नहीं है।

    • 15 hrs· Unlike· 2

    • Sonu Kanyalकभी भी कुछ भी नहीं सुधरेगा। बिगाड़ना आसान होता है। खूब बिगाड़ लिया। अब बस ख़ास ही लोग होंगे सुखी, क्रान्ति तक।

    • 14 hrs· Unlike· 2

    • Rakesh Kargetiसिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा......... सोच बदलनी होगी........ हालात हमेशा एक से नहीं रहते हैं....हज़ारो साल से नरगिस अपनी बेनूरी पर क्यों रोये...............

    • 14 hrs· Edited· Unlike· 3

    • Palash Biswas Thanks for the most relevant quote.blogging.

    • 13 hrs· Like· 2

    • Anjana Srivastava very true per koi upay karger nahi hia

    • 24 mins· Like

    प्रधानमंत्री मोदी का स्वतंत्रता दिवस भाषण ज्यों का त्यों

    मेरे प्यारे देशवासियो,

    आज देश और दुनिया में फैले हुए सभी हिन्दुस्तानी आज़ादी का पर्व मना रहे हैं। इस आज़ादी के पावन पर्व पर प्यारे देशवासियों को भारत के प्रधान सेवक की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ।


    मैं आपके बीच प्रधान मंत्री के रूप में नहीं, प्रधान सेवक के रूप में उपस्थित हूँ। देश की आज़ादी की जंग कितने वर्षों तक लड़ी गई, कितनी पीढ़ियाँ खप गईं, अनगिनत लोगों ने बलिदान दिए, जवानी खपा दी, जेल में ज़िन्दगी गुज़ार दी। देश की आज़ादी के लिए मर-मिटने वाले समर्पित उन सभी आज़ादी के सिपाहियों को मैं शत-शत वंदन करता हूँ, नमन करता हूँ।


    आज़ादी के इस पावन पर्व पर भारत के कोटि-कोटि जनों को भी मैं प्रणाम करता हूँ और आज़ादी की जंग के लिए जिन्होंने कुर्बानियां दीं, उनका पुण्य स्मरण करते हुए आज़ादी के इस पावन पर्व पर मां भारती के कल्याण के लिए हमारे देश के गरीब, पीड़ित, दलित, शोषित, समाज के पिछड़े हुए सभी लोगों के कल्याण का, उनके लिए कुछ न कुछ कर गुज़रने का संकल्प करने का पर्व है।


    मेरे प्यारे देशवासियो, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय चरित्र को निखारने का एक अवसर होता है। राष्ट्रीय पर्व से प्रेरणा ले करके भारत के राष्ट्रीय चरित्र, जन-जन का चरित्र जितना अधिक निखरे, जितना अधिक राष्ट्र के लिए समर्पित हो, सारे कार्यकलाप राष्ट्रहित की कसौटी पर कसे जाएँ, अगर उस प्रकार का जीवन जीने का हम संकल्प करते हैं, तो आज़ादी का पर्व भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का एक प्रेरणा पर्व बन सकता है।


    मेरे प्यारे देशवासियो, यह देश राजनेताओं ने नहीं बनाया है, यह देश शासकों ने नहीं बनाया है, यह देश सरकारों ने भी नहीं बनाया है, यह देश हमारे किसानों ने बनाया है, हमारे मजदूरों ने बनाया है, हमारी माताओं और बहनों ने बनाया है, हमारे नौजवानों ने बनाया है, हमारे देश के ऋषियों ने, मुनियों ने, आचार्यों ने, शिक्षकों ने, वैज्ञानिकों ने, समाजसेवकों ने, पीढ़ी दर पीढ़ी कोटि-कोटि जनों की तपस्या से आज राष्ट्र यहाँ पहुँचा है। देश के लिए जीवन भर साधना करने वाली ये सभी पीढ़ियां, सभी महानुभाव अभिनन्दन के अधिकारी हैं। यह भारत के संविधान की शोभा है, भारत के संविधान का सामर्थ्य है कि एक छोटे से नगर के गरीब परिवार के एक बालक ने आज लाल किले की प्राचीर पर भारत के तिरंगे झण्डे के सामने सिर झुकाने का सौभाग्य प्राप्त किया। यह भारत के लोकतंत्र की ताकत है, यह भारत के संविधान रचयिताओं की हमें दी हुई अनमोल सौगात है। मैं भारत के संविधान के निर्माताओं को इस पर नमन करता हूँ।


    भाइयो एवं बहनो, आज़ादी के बाद देश आज जहां पहुंचा है, उसमें इस देश के सभी प्रधान मंत्रियों का योगदान है, इस देश की सभी सरकारों का योगदान है, इस देश के सभी राज्यों की सरकारों का भी योगदान है। मैं वर्तमान भारत को उस ऊँचाई पर ले जाने का प्रयास करने वाली सभी पूर्व सरकारों को, सभी पूर्व प्रधान मंत्रियों को, उनके सभी कामों को, जिनके कारण राष्ट्र का गौरव बढ़ा है, उन सबके प्रति इस पल आदर का भाव व्यक्त करना चाहता हूँ, मैं आभार की अभिव्यक्ति करना चाहता हूं। यह देश पुरातन सांस्कृतिक धरोहर की उस नींव पर खड़ा है, जहाँ पर वेदकाल में हमें एक ही मंत्र सुनाया जाता है, जो हमारी कार्य संस्कृति का परिचय है, हम सीखते आए हैं, पुनर्स्मरण करते आए हैं- "संगच्छध्वम् संवदध्वम् सं वो मनांसि जानताम्।" हम साथ चलें, मिलकर चलें, मिलकर सोचें, मिलकर संकल्प करें और मिल करके हम देश को आगे बढ़ाएँ। इस मूल मंत्र को ले करके सवा सौ करोड़ देशवासियों ने देश को आगे बढ़ाया है। कल ही नई सरकार की प्रथम संसद के सत्र का समापन हुआ। मैं आज गर्व से कहता हूं कि संसद का सत्र हमारी सोच की पहचान है, हमारे इरादों की अभिव्यक्ति है। हम बहुमत के बल पर चलने वाले लोग नहीं हैं, हम बहुमत के बल पर आगे बढ़ना नहीं चाहते हैं। हम सहमति के मजबूत धरातल पर आगे बढ़ना चाहते हैं। "संगच्छध्वम्" और इसलिए इस पूरे संसद के कार्यकाल को देश ने देखा होगा। सभी दलों को साथ लेकर, विपक्ष को जोड़ कर, कंधे से कंधा मिलाकर चलने में हमें अभूतपूर्व सफलता मिली है और उसका यश सिर्फ प्रधान मंत्री को नहीं जाता है, उसका यश सिर्फ सरकार में बैठे हुए लोगों को नहीं जाता है, उसका यश प्रतिपक्ष को भी जाता है, प्रतिपक्ष के सभी नेताओं को भी जाता है, प्रतिपक्ष के सभी सांसदों को भी जाता है और लाल किले की प्राचीर से, गर्व के साथ, मैं इन सभी सांसदों का अभिवादन करता हूं। सभी राजनीतिक दलों का भी अभिवादन करता हूं, जहां सहमति के मजबूत धरातल पर राष्ट्र को आगे ले जाने के महत्वपूर्ण निर्णयों को कर-करके हमने कल संसद के सत्र का समापन किया।


    भाइयो-बहनो, मैं दिल्ली के लिए आउटसाइडर हूं, मैं दिल्ली की दुनिया का इंसान नहीं हूं। मैं यहां के राज-काज को भी नहीं जानता। यहां की एलीट क्लास से तो मैं बहुत अछूता रहा हूं, लेकिन एक बाहर के व्यक्ति ने, एक आउटसाइडर ने दिल्ली आ करके पिछले दो महीने में, एक इनसाइडर व्यू लिया, तो मैं चौंक गया! यह मंच राजनीति का नहीं है, राष्ट्रनीति का मंच है और इसलिए मेरी बात को राजनीति के तराजू से न तोला जाए। मैंने पहले ही कहा है, मैं सभी पूर्व प्रधान मंत्रियों, पूर्व सरकारों का अभिवादन करता हूं, जिन्होंने देश को यहां तक पहुंचाया। मैं बात कुछ और करने जा रहा हूं और इसलिए इसको राजनीति के तराजू से न तोला जाए। मैंने जब दिल्ली आ करके एक इनसाइडर व्यू देखा, तो मैंने अनुभव किया, मैं चौंक गया। ऐसा लगा जैसे एक सरकार के अंदर भी दर्जनों अलग-अलग सरकारें चल रही हैं। हरेक की जैसे अपनी-अपनी जागीरें बनी हुई हैं। मुझे बिखराव नज़र आया, मुझे टकराव नज़र आया। एक डिपार्टमेंट दूसरे डिपार्टमेंट से भिड़ रहा है और यहां तक‍ भिड़ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खट-खटाकर एक ही सरकार के दो डिपार्टमेंट आपस में लड़ाई लड़ रहे हैं। यह बिखराव, यह टकराव, एक ही देश के लोग! हम देश को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं? और इसलिए मैंने कोशिश प्रारम्भ की है, उन दीवारों को गिराने की, मैंने कोशिश प्रारम्भ की है कि सरकार एक असेम्बल्ड एन्टिटी नहीं, लेकिन एक ऑर्गेनिक युनिटी बने, ऑर्गेनिक एन्टिटी बने। एकरस हो सरकार - एक लक्ष्य, एक मन, एक दिशा, एक गति, एक मति - इस मुक़ाम पर हम देश को चलाने का संकल्प करें। हम चल सकते हैं। इन दिनों अखबारों में चर्चा चलती है कि मोदी जी की सरकार आ गई, अफसर लोग समय पर ऑफिस जाते हैं, समय पर ऑफिस खुल जाते हैं, लोग पहुंच जाते हैं। मैं देख रहा था, हिन्दुस्तान के नैशनल न्यूज़पेपर कहे जाएं, टीवी मीडिया कहा जाए, प्रमुख रूप से ये खबरें छप रही थीं। सरकार के मुखिया के नाते तो मुझे आनन्द आ सकता है कि देखो भाई, सब समय पर चलना शुरू हो गया, सफाई होने लगी, लेकिन मुझे आनन्द नहीं आ रहा था, मुझे पीड़ा हो रही थी। वह बात मैं आज पब्लिक में कहना चाहता हूं। इसलिए कहना चाहता हूं कि इस देश में सरकारी अफसर समय पर दफ्तर जाएं, यह कोई न्यूज़ होती है क्या? और अगर वह न्यूज़ बनती है, तो हम कितने नीचे गए हैं, कितने गिरे हैं, इसका वह सबूत बन जाती है और इसलिए भाइयो-बहनो, सरकारें कैसे चली हैं? आज वैश्विक स्पर्धा में कोटि-कोटि भारतीयों के सपनों को साकार करना होगा तो यह "होती है", "चलती है", से देश नहीं चल सकता। जन-सामान्य की आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, शासन व्यवस्था नाम का जो पुर्जा है, जो मशीन है, उसको और धारदार बनाना है, और तेज़ बनाना है, और गतिशील बनाना है और उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं और मैं आपको विश्वास देता हूं, मेरे देशवासियो, इतने कम समय से दिल्ली के बाहर से आया हूं, लेकिन मैं देशवासियों को विश्वास दिलाता हूं कि सरकार में बैठे हुए लोगों का सामर्थ्य बहुत है - चपरासी से लेकर कैबिनेट सेक्रेटरी तक हर कोई सामर्थ्यवान है, हरेक की एक शक्ति है, उसका अनुभव है। मैं उस शक्ति को जगाना चाहता हूं, मैं उस शक्ति को जोड़ना चाहता हूं और उस शक्ति के माध्यम से राष्ट्र कल्याण की गति को तेज करना चाहता हूं और मैं करके रहूंगा। यह हम पाकर रहेंगे, हम करके रहेंगे, यह मैं देशवासियों को विश्वास दिलाना चाहता हूं और यह मैं 16 मई को नहीं कह सकता था, लेकिन आज दो-ढाई महीने के अनुभव के बाद, मैं 15 अगस्त को तिरंगे झंडे के साक्ष्य से कह रहा हूं, यह संभव है, यह होकर रहेगा।


    भाइयो-बहनो, क्या देश के हमारे जिन महापुरुषों ने आज़ादी दिलाई, क्या उनके सपनों का भारत बनाने के लिए हमारा भी कोई कर्तव्य है या नहीं है, हमारा भी कोई राष्ट्रीय चरित्र है या नहीं है? उस पर गंभीरता से सोचने का समय आ गया है।


    भाइयो-बहनो, कोई मुझे बताए कि हम जो भी कर रहे हैं दिन भर, शाम को कभी अपने आपसे पूछा कि मेरे इस काम के कारण मेरे देश के गरीब से गरीब का भला हुआ या नहीं हुआ, मेरे देश के हितों की रक्षा हुई या नहीं हुई, मेरे देश के कल्याण के काम में आया या नहीं आया? क्या सवा सौ करोड़ देशवासियों का यह मंत्र नहीं होना चाहिए कि जीवन का हर कदम देशहित में होगा? दुर्भाग्य कैसा है? आज देश में एक ऐसा माहौल बना हुआ है कि किसी के पास कोई भी काम लेकर जाओ, तो कहता है, "इसमें मेरा क्या"? वहीं से शुरू करता है, "इसमें मेरा क्या" और जब उसको पता चलेगा कि इसमें उसका कुछ नहीं है, तो तुरन्त बोलता है, "तो फिर मुझे क्या"? "ये मेरा क्या" और "मुझे क्या", इस दायरे से हमें बाहर आना है। हर चीज़ अपने लिए नहीं होती है। कुछ चीज़ें देश के लिए भी हुआ करती हैं और इसलिए हमारे राष्ट्रीय चरित्र को हमें निखारना है। "मेरा क्या", "मुझे क्या", उससे ऊपर उठकर "देशहित के हर काम के लिए मैं आया हूं, मैं आगे हूं", यह भाव हमें जगाना है।




    भाइयो-बहनो, आज जब हम बलात्कार की घटनाओं की खबरें सुनते हैं, तो हमारा माथा शर्म से झुक जाता है। लोग अलग-अलग तर्क देते हैं, हर कोई मनोवैज्ञानिक बनकर अपने बयान देता है, लेकिन भाइयो-बहनो, मैं आज इस मंच से मैं उन माताओं और उनके पिताओं से पूछना चाहता हूं, हर मां-बाप से पूछना चाहता हूं कि आपके घर में बेटी 10 साल की होती है, 12 साल की होती है, मां और बाप चौकन्ने रहते हैं, हर बात पूछते हैं कि कहां जा रही हो, कब आओगी, पहुंचने के बाद फोन करना। बेटी को तो सैकड़ों सवाल मां-बाप पूछते हैं, लेकिन क्या कभी मां-बाप ने अपने बेटे को पूछने की हिम्मत की है कि कहां जा रहे हो, क्यों जा रहे हो, कौन दोस्त है? आखिर बलात्कार करने वाला किसी न किसी का बेटा तो है। उसके भी तो कोई न कोई मां-बाप हैं। क्या मां-बाप के नाते, हमने अपने बेटे को पूछा कि तुम क्या कर रहे हो, कहां जा रहे हो? अगर हर मां-बाप तय करे कि हमने बेटियों पर जितने बंधन डाले हैं, कभी बेटों पर भी डाल करके देखो तो सही, उसे कभी पूछो तो सही।


    भाइयो-बहनो, कानून अपना काम करेगा, कठोरता से करेगा, लेकिन समाज के नाते भी, हर मां-बाप के नाते हमारा दायित्व है। कोई मुझे कहे, यह जो बंदूक कंधे पर उठाकर निर्दोषों को मौत के घाट उतारने वाले लोग कोई माओवादी होंगे, कोई आतंकवादी होंगे, वे किसी न किसी के तो बेटे हैं। मैं उन मां-बाप से पूछना चाहता हूं कि अपने बेटे से कभी इस रास्ते पर जाने से पहले पूछा था आपने? हर मां-बाप जिम्मेवारी ले, इस गलत रास्ते पर गया हुआ आपका बेटा निर्दोषों की जान लेने पर उतारू है। न वह अपना भला कर पा रहा है, न परिवार का भला कर पा रहा है और न ही देश का भला कर पा रहा है और मैं हिंसा के रास्ते पर गए हुए, उन नौजवानों से कहना चाहता हूं कि आप जो भी आज हैं, कुछ न कुछ तो भारतमाता ने आपको दिया है, तब पहुंचे हैं। आप जो भी हैं, आपके मां-बाप ने आपको कुछ तो दिया है, तब हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं, कंधे पर बंदूक ले करके आप धरती को लाल तो कर सकते हो, लेकिन कभी सोचो, अगर कंधे पर हल होगा, तो धरती पर हरियाली होगी, कितनी प्यारी लगेगी। कब तक हम इस धरती को लहूलुहान करते रहेंगे? और हमने पाया क्या है? हिंसा के रास्ते ने हमें कुछ नहीं दिया है।


    भाइयो-बहनो, मैं पिछले दिनों नेपाल गया था। मैंने नेपाल में सार्वजनिक रूप से पूरे विश्व को आकर्षित करने वाली एक बात कही थी। एक ज़माना था, सम्राट अशोक जिन्होंने युद्ध का रास्ता लिया था, लेकिन हिंसा को देख करके युद्ध छोड़, बुद्ध के रास्ते पर चले गए। मैं देख रहा हूं कि नेपाल में कोई एक समय था, जब नौजवान हिंसा के रास्ते पर चल पड़े थे, लेकिन आज वही नौजवान संविधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हीं के साथ जुड़े लोग संविधान के निर्माण में लगे हैं और मैंने कहा था, शस्त्र छोड़कर शास्त्र के रास्ते पर चलने का अगर नेपाल एक उत्तम उदाहरण देता है, तो विश्व में हिंसा के रास्ते पर गए हुए नौजवानों को वापस आने की प्रेरणा दे सकता है।


    भाइयो-बहनो, बुद्ध की भूमि, नेपाल अगर संदेश दे सकती है, तो क्या भारत की भूमि दुनिया को संदेश नहीं दे सकती है? और इसलिए समय की मांग है, हम हिंसा का रास्ता छोड़ें, भाईचारे के रास्ते पर चलें।


    भाइयो-बहनो, सदियों से किसी न किसी कारणवश साम्प्रदायिक तनाव से हम गुज़र रहे हैं, देश विभाजन तक हम पहुंच गए। आज़ादी के बाद भी कभी जातिवाद का ज़हर, कभी सम्पद्रायवाद का ज़हर, ये पापाचार कब तक चलेगा? किसका भला होता है? बहुत लड़ लिया, बहुत लोगों को काट लिया, बहुत लोगों को मार दिया। भाइयो-बहनो, एक बार पीछे मुड़कर देखिए, किसी ने कुछ नहीं पाया है। सिवाय भारत मां के अंगों पर दाग लगाने के हमने कुछ नहीं किया है और इसलिए, मैं देश के उन लोगों का आह्वान करता हूं कि जातिवाद का ज़हर हो, सम्प्रदायवाद का ज़हर हो, आतंकवाद का ज़हर हो, ऊंच-नीच का भाव हो, यह देश को आगे बढ़ाने में रुकावट है। एक बार मन में तय करो, दस साल के लिए मोरेटोरियम तय करो, दस साल तक इन तनावों से हम मुक्त समाज की ओर जाना चाहते हैं और आप देखिए, शांति, एकता, सद्भावना, भाईचारा हमें आगे बढ़ने में कितनी ताकत देता है, एक बार देखो।


    मेरे देशवासियो, मेरे शब्दों पर भरोसा कीजिए, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं। अब तक किए हुए पापों को, उस रास्ते को छोड़ें, सद्भावना, भाईचारे का रास्ता अपनाएं और हम देश को आगे ले जाने का संकल्प करें। मुझे विश्वास है कि हम इसको कर सकते हैं।





    भाइयो-बहनो, जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ रहा है, आधुनिकता का हमारे मन में एक भाव जगता है, पर हम करते क्या हैं? क्या कभी सोचा है कि आज हमारे देश में सेक्स रेशियो का क्या हाल है? 1 हजार लड़कों पर 940 बेटियाँ पैदा होती हैं। समाज में यह असंतुलन कौन पैदा कर रहा है? ईश्वर तो नहीं कर रहा है। मैं उन डॉक्टरों से अनुरोध करना चाहता हूं कि अपनी तिजोरी भरने के लिए किसी माँ के गर्भ में पल रही बेटी को मत मारिए। मैं उन माताओं, बहनों से कहता हूं कि आप बेटे की आस में बेटियों को बलि मत चढ़ाइए। कभी-कभी माँ-बाप को लगता है कि बेटा होगा, तो बुढ़ापे में काम आएगा। मैं सामाजिक जीवन में काम करने वाला इंसान हूं। मैंने ऐसे परिवार देखे हैं कि पाँच बेटे हों, पाँचों के पास बंगले हों, घर में दस-दस गाड़ियाँ हों, लेकिन बूढ़े माँ-बाप ओल्ड एज होम में रहते हैं, वृद्धाश्रम में रहते हैं। मैंने ऐसे परिवार देखे हैं। मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं, जहाँ संतान के रूप में अकेली बेटी हो, वह बेटी अपने सपनों की बलि चढ़ाती है, शादी नहीं करती और बूढ़े माँ-बाप की सेवा के लिए अपने जीवन को खपा देती है। यह असमानता, माँ के गर्भ में बेटियों की हत्या, इस 21वीं सदी के मानव का मन कितना कलुषित, कलंकित, कितना दाग भरा है, उसका प्रदर्शन कर रहा है। हमें इससे मुक्ति लेनी होगी और यही तो आज़ादी के पर्व का हमारे लिए संदेश है।


    अभी राष्ट्रमंडल खेल हुए हैं। भारत के खिलाड़ियों ने भारत को गौरव दिलाया है। हमारे करीब 64 खिलाड़ी जीते हैं। हमारे 64 खिलाड़ी मेडल लेकर आए हैं, लेकिन उनमें 29 बेटियाँ हैं। इस पर गर्व करें और उन बेटियों के लिए ताली बजाएं। भारत की आन-बान-शान में हमारी बेटियों का भी योगदान है, हम इसको स्वीकार करें और उन्हें भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ लेकर चलें, तो सामाजिक जीवन में जो बुराइयाँ आई हैं, हम उन बुराइयों से मुक्ति पा सकते हैं। इसलिए भाइयो-बहनो, एक सामाजिक चरित्र के नाते, एक राष्ट्रीय चरित्र के नाते हमें उस दिशा में जाना है। भाइयो-बहनो, देश को आगे बढ़ाना है, तो विकास - एक ही रास्ता है। सुशासन - एक ही रास्ता है। देश को आगे ले जाने के लिए ये ही दो पटरियाँ हैं - गुड गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट, उन्हीं को लेकर हम आगे चल सकते हैं। उन्हीं को लेकर चलने का इरादा लेकर हम चलना चाहते हैं। मैं जब गुड गवर्नेंस की बात करता हूँ, तब आप मुझे बताइए कि कोई प्राइवेट में नौकरी करता है, अगर आप उसको पूछोगे, तो वह कहता है कि मैं जॉब करता हूँ, लेकिन जो सरकार में नौकरी करता है, उसको पूछोगे, तो वह कहता है कि मैं सर्विस करता हूँ। दोनों कमाते हैं, लेकिन एक के लिए जॉब है और एक के लिए सर्विस है। मैं सरकारी सेवा में लगे सभी भाइयों और बहनों से प्रश्न पूछता हूँ कि क्या कहीं यह 'सर्विस' शब्द, उसने अपनी ताकत खो तो नहीं दी है, अपनी पहचान खो तो नहीं दी है? सरकारी सेवा में जुड़े हुए लोग 'जॉब' नहीं कर रहे हैं, 'सेवा' कर रहे हैं, 'सर्विस' कर रहे हैं। इसलिए इस भाव को पुनर्जीवित करना, एक राष्ट्रीय चरित्र के रूप में इसको हमें आगे ले जाना, उस दिशा में हमें आगे बढ़ना है।


    भाइयो-बहनो, क्या देश के नागरिकों को राष्ट्र के कल्याण के लिए कदम उठाना चाहिए या नहीं उठाना चाहिए? आप कल्पना कीजिए, सवा सौ करोड़ देशवासी एक कदम चलें, तो यह देश सवा सौ करोड़ कदम आगे चला जाएगा। लोकतंत्र, यह सिर्फ सरकार चुनने का सीमित मायना नहीं है। लोकतंत्र में सवा सौ करोड़ नागरिक और सरकार कंधे से कंधा मिला कर देश की आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए काम करें, यह लोकतंत्र का मायना है। हमें जन-भागीदारी करनी है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के साथ आगे बढ़ना है। हमें जनता को जोड़कर आगे बढ़ना है। उसे जोड़ने में आगे बढ़ने के लिए, आप मुझे बताइए कि आज हमारा किसान आत्महत्या क्यों करता है? वह साहूकार से कर्ज़ लेता है, कर्ज़ दे नहीं सकता है, मर जाता है। बेटी की शादी है, गरीब आदमी साहूकार से कर्ज़ लेता है, कर्ज़ वापस दे नहीं पाता है, जीवन भर मुसीबतों से गुज़रता है। मेरे उन गरीब परिवारों की रक्षा कौन करेगा?


    भाइयो-बहनो, इस आज़ादी के पर्व पर मैं एक योजना को आगे बढ़ाने का संकल्प करने के लिए आपके पास आया हूँ - 'प्रधान मंत्री जनधन योजना'। इस 'प्रधान मंत्री जनधन योजना' के माध्यम से हम देश के गरीब से गरीब लोगों को बैंक अकाउंट की सुविधा से जोड़ना चाहते हैं। आज करोड़ों-करोड़ परिवार हैं, जिनके पास मोबाइल फोन तो हैं, लेकिन बैंक अकाउंट नहीं हैं। यह स्थिति हमें बदलनी है। देश के आर्थिक संसाधन गरीब के काम आएँ, इसकी शुरुआत यहीं से होती है। यही तो है, जो खिड़की खोलता है। इसलिए 'प्रधान मंत्री जनधन योजना' के तहत जो अकाउंट खुलेगा, उसको डेबिट कार्ड दिया जाएगा। उस डेबिट कार्ड के साथ हर गरीब परिवार को एक लाख रुपए का बीमा सुनिश्चित कर दिया जाएगा, ताकि अगर उसके जीवन में कोई संकट आया, तो उसके परिवारजनों को एक लाख रुपए का बीमा मिल सकता है।


    भाइयो-बहनो, यह देश नौजवानों का देश है। 65 प्रतिशत देश की जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा नौजवान देश है। क्या हमने कभी इसका फायदा उठाने के लिए सोचा है? आज दुनिया को स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है। आज भारत को भी स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है। कभी-कभार हम अच्छा ड्राइवर ढूँढ़ते हैं, नहीं मिलता है, प्लम्बर ढूँढ़ते हैं, नहीं मिलता है, अच्छा कुक चाहिए, नहीं मिलता है। नौजवान हैं, बेरोजगार हैं, लेकिन हमें जैसा चाहिए, वैसा नौजवान मिलता नहीं है। देश के विकास को यदि आगे बढ़ाना है, तो 'स्किल डेवलपमेंट' और 'स्किल्ड इंडिया' यह हमारा मिशन है। हिन्दुस्तान के कोटि-कोटि नौजवान स्किल सीखें, हुनर सीखें, उसके लिए पूरे देश में जाल होना चाहिए और घिसी-पिटी व्यवस्थाओं से नहीं, उनको वह स्किल मिले, जो उन्हें आधुनिक भारत बनाने में काम आए। वे दुनिया के किसी भी देश में जाएँ, तो उनके हुनर की सराहना हो और हम दो प्रकार के विकास को लेकर चलना चाहते हैं। मैं ऐसे नौजवानों को भी तैयार करना चाहता हूँ, जो जॉब क्रिएटर हों और जो जॉब क्रिएट करने का सामर्थ्य नहीं रखते, संयोग नहीं है, वे विश्व के किसी भी कोने में जाकर आँख में आँख मिला करके अपने बाहुबल के द्वारा, अपनी उँगलियों के हुनर के द्वारा, अपने कौशल्य के द्वारा विश्व का हृदय जीत सकें, ऐसे नौजवानों का सामर्थ्य हम तैयार करना चाहते हैं। भाइयो-बहनो, स्किल डेवलपमेंट को बहुत तेज़ी से आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर मैं यह करना चाहता हूं।



    भाइयो-बहनो, विश्व बदल चुका है। मेरे प्यारे देशवासियो, विश्व बदल चुका है। अब भारत अलग-थलग, अकेला एक कोने में बैठकर अपना भविष्य तय नहीं कर सकता। विश्व की आर्थिक व्यवस्थाएँ बदल चुकी हैं और इसलिए हम लोगों को भी उसी रूप में सोचना होगा। सरकार ने अभी कई फैसले लिए हैं, बजट में कुछ घोषणाएँ की हैं और मैं विश्व का आह्वान करता हूँ, विश्व में पहुँचे हुए भारतवासियों का भी आह्वान करता हूँ कि आज अगर हमें नौजवानों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार देना है, तो हमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देना पड़ेगा। इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट की जो स्थिति है, उसमें संतुलन पैदा करना हो, तो हमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बल देना होगा। हमारे नौजवानों की जो विद्या है, सामर्थ्य है, उसको अगर काम में लाना है, तो हमें मैन्युफैक्चरिंग की ओर जाना पड़ेगा और इसके लिए हिन्दुस्तान की भी पूरी ताकत लगेगी, लेकिन विश्व की शक्तियों को भी हम निमंत्रण देते हैं। इसलिए मैं आज लाल किले की प्राचीर से विश्व भर में लोगों से कहना चाहता हूँ, "कम, मेक इन इंडिया," "आइए, हिन्दुस्तान में निर्माण कीजिए।" दुनिया के किसी भी देश में जाकर बेचिए, लेकिन निर्माण यहाँ कीजिए, मैन्युफैक्चर यहाँ कीजिए। हमारे पास स्किल है, टेलेंट है, डिसिप्लिन है, कुछ कर गुज़रने का इरादा है। हम विश्व को एक सानुकूल अवसर देना चाहते हैं कि आइए, "कम, मेक इन इंडिया" और हम विश्व को कहें, इलेक्ट्रिकल से ले करके इलेक्ट्रॉनिक्स तक "कम, मेक इन इंडिया", केमिकल्स से ले करके फार्मास्युटिकल्स तक "कम, मेक इन इंडिया", ऑटोमोबाइल्स से ले करके ऐग्रो वैल्यू एडीशन तक "कम, मेक इन इंडिया", पेपर हो या प्लास्टिक "कम, मेक इन इंडिया", सैटेलाइट हो या सबमेरीन "कम, मेक इन इंडिया"। ताकत है हमारे देश में! आइए, मैं निमंत्रण देता हूं।


    भाइयो-बहनो, मैं देश के नौजवानों का भी एक आवाहन करना चाहता हूं, विशेष करके उद्योग क्षेत्र में लगे हुए छोटे-छोटे लोगों का आवाहन करना चाहता हूं। मैं देश के टेक्निकल एजुकेशन से जुड़े हुए नौजवानों का आवाहन करना चाहता हूं। जैसे मैं विश्व से कहता हूं "कम, मेक इन इंडिया", मैं देश के नौजवानों को कहता हूं - हमारा सपना होना चाहिए कि दुनिया के हर कोने में यह बात पहुंचनी चाहिए, "मेड इन इंडिया"। यह हमारा सपना होना चाहिए। क्या मेरे देश के नौजवानों को देश-सेवा करने के लिए सिर्फ भगत सिंह की तरह फांसी पर लटकना ही अनिवार्य है? भाइयो-बहनो, लालबहादुर शास्त्री जी ने "जय जवान, जय किसान" एक साथ मंत्र दिया था। जवान, जो सीमा पर अपना सिर दे देता है, उसी की बराबरी में "जय जवान" कहा था। क्यों? क्योंकि अन्न के भंडार भर करके मेरा किसान भारत मां की उतनी ही सेवा करता है, जैसे जवान भारत मां की रक्षा करता है। यह भी देश सेवा है। अन्न के भंडार भरना, यह भी किसान की सबसे बड़ी देश सेवा है और तभी तो लालबहादुर शास्त्री ने "जय जवान, जय किसान" कहा था।


    भाइयो-बहनो, मैं नौजवानों से कहना चाहता हूं, आपके रहते हुए छोटी-मोटी चीज़ें हमें दुनिया से इम्पोर्ट क्यों करनी पड़ें? क्या मेरे देश के नौजवान यह तय कर सकते हैं, वे ज़रा रिसर्च करें, ढूंढ़ें कि भारत कितने प्रकार की चीज़ों को इम्पोर्ट करता है और वे फैसला करें कि मैं अपने छोटे-छोटे काम के द्वारा, उद्योग के द्वारा, मेरा छोटा ही कारखाना क्यों न हो, लेकिन मेरे देश में इम्पोर्ट होने वाली कम से कम एक चीज़ मैं ऐसी बनाऊंगा कि मेरे देश को कभी इम्पोर्ट न करना पड़े। इतना ही नहीं, मेरा देश एक्सपोर्ट करने की स्थिति में आए। अगर हिन्दुस्तान के लाखों नौजवान एक-एक आइटम ले करके बैठ जाएं, तो भारत दुनिया में एक्सपोर्ट करने वाला देश बन सकता है और इसलिए मेरा आग्रह है, नौजवानों से विशेष करके, छोटे-मोटे उद्योगकारों से - दो बातों में कॉम्प्रोमाइज़ न करें, एक ज़ीरो डिफेक्ट, दूसरा ज़ीरो इफेक्ट। हम वह मैन्युफैक्चरिंग करें, जिसमें ज़ीरो डिफेक्ट हो, ताकि दुनिया के बाज़ार से वह कभी वापस न आए और हम वह मैन्युफैक्चरिंग करें, जिससे ज़ीरो इफेक्ट हो, पर्यावरण पर इसका कोई नेगेटिव इफेक्ट न हो। ज़ीरो डिफेक्ट, ज़ीरो इफेक्ट के साथ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का सपना ले करके अगर हम आगे चलते हैं, तो मुझे विश्वास है, मेरे भाइयो-बहनो, कि जिस काम को ले करके हम चल रहे हैं, उस काम को पूरा करेंगे।


    भाइयो-बहनो, पूरे विश्व में हमारे देश के नौजवानों ने भारत की पहचान को बदल दिया है। विश्व भारत को क्या जानता था? ज्यादा नहीं, अभी 25-30 साल पहले तक दुनिया के कई कोने ऐसे थे जो हिन्दुस्तान के लिए यही सोचते थे कि ये तो "सपेरों का देश" है। ये सांप का खेल करने वाला देश है, काले जादू वाला देश है। भारत की सच्ची पहचान दुनिया तक पहुंची नहीं थी, लेकिन भाइयो-बहनो, हमारे 20-22-23 साल के नौजवान, जिन्होंने कम्प्यूटर पर अंगुलियां घुमाते-घुमाते दुनिया को चकित कर दिया। विश्व में भारत की एक नई पहचान बनाने का रास्ता हमारे आई.टी. प्रोफेशन के नौजवानों ने कर दिया। अगर यह ताकत हमारे देश में है, तो क्या देश के लिए हम कुछ सोच सकते हैं? इसलिए हमारा सपना "डिजिटल इंडिया" है। जब मैं "डिजिटल इंडिया" कहता हूं, तब ये बड़े लोगों की बात नहीं है, यह गरीब के लिए है। अगर ब्रॉडबेंड कनेक्टिविटी से हिन्दुस्तान के गांव जुड़ते हैं और गांव के आखिरी छोर के स्कूल में अगर हम लॉन्ग डिस्टेंस एजुकेशन दे सकते हैं, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि हमारे उन गांवों के बच्चों को कितनी अच्छी शिक्षा मिलेगी। जहां डाक्टर नहीं पहुंच पाते, अगर हम टेलिमेडिसिन का नेटवर्क खड़ा करें, तो वहां पर बैठे हुए गरीब व्यक्ति को भी, किस प्रकार की दवाई की दिशा में जाना है, उसका स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सकता है।


    सामान्य मानव की रोजमर्रा की चीज़ें - आपके हाथ में मोबाइल फोन है, हिन्दुस्तान के नागरिकों के पास बहुत बड़ी तादाद में मोबाइल कनेक्टिविटी है, लेकिन क्या इस मोबाइल गवर्नेंस की तरफ हम जा सकते हैं? अपने मोबाइल से गरीब आदमी बैंक अकाउंट ऑपरेट करे, वह सरकार से अपनी चीज़ें मांग सके, वह अपनी अर्ज़ी पेश करे, अपना सारा कारोबार चलते-चलते मोबाइल गवर्नेंस के द्वारा कर सके और यह अगर करना है, तो हमें 'डिजिटल इंडिया' की ओर जाना है। और 'डिजिटल इंडिया' की तरफ जाना है, तो इसके साथ हमारा यह भी सपना है, हम आज बहुत बड़ी मात्रा में विदेशों से इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ इम्पोर्ट करते हैं। आपको हैरानी होगी भाइयो-बहनो, ये टीवी, ये मोबाइल फोन, ये आईपैड, ये जो इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ हम लाते हैं, देश के लिए पेट्रोलियम पदार्थों को लाना अनिवार्य है, डीज़ल और पेट्रोल लाते हैं, तेल लाते हैं। उसके बाद इम्पोर्ट में दूसरे नम्बर पर हमारी इलैक्ट्रॉनिक गुड्ज़ हैं। अगर हम 'डिजिटल इंडिया' का सपना ले करके इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ के मैन्युफैक्चर के लिए चल पड़ें और हम कम से कम स्वनिर्भर बन जाएं, तो देश की तिजोरी को कितना बड़ा लाभ हो सकता है और इसलिए हम इस 'डिजिटल इंडिया' को ले करके जब आगे चलना चाहते हैं, तब ई-गवर्नेंस। ई-गवर्नेंस ईजी गवर्नेंस है, इफेक्टिव गवर्नेंस है और इकोनॉमिकल गवर्नेंस है। ई-गवर्नेंस के माध्यम से गुड गवर्नेंस की ओर जाने का रास्ता है। एक जमाना था, कहा जाता था कि रेलवे देश को जोड़ती है । ऐसा कहा जाता था। मैं कहता हूं कि आज आईटी देश के जन-जन को जोड़ने की ताकत रखती है और इसलिए हम 'डिजिटल इंडिया' के माध्यम से आईटी के धरातल पर यूनिटी के मंत्र को साकार करना चाहते हैं।


    भाइयो-बहनो, अगर हम इन चीजों को ले करके चलते हैं, तो मुझे विश्वास है कि 'डिजिटल इंडिया' विश्व की बराबरी करने की एक ताकत के साथ खड़ा हो जाएगा, हमारे नौजवानों में वह सामर्थ्य है, यह उनको वह अवसर दे रहा है।


    भाइयो-बहनो, हम टूरिज्म को बढ़ावा देना चाहते हैं। टूरिज्म से गरीब से गरीब व्यक्ति को रोजगार मिलता है। चना बेचने वाला भी कमाता है, ऑटो-रिक्शा वाला भी कमाता है, पकौड़े बेचने वाला भी कमाता है और एक चाय बेचने वाला भी कमाता है। जब चाय बेचने वाले की बात आती है, तो मुझे ज़रा अपनापन महसूस होता है। टूरिज्म के कारण गरीब से गरीब व्यक्ति को रोज़गार मिलता है। लेकिन टूरिज्म के अंदर बढ़ावा देने में भी और एक राष्ट्रीय चरित्र के रूप में भी हमारे सामने सबसे बड़ी रुकावट है हमारे चारों तरफ दिखाई दे रही गंदगी । क्या आज़ादी के बाद, आज़ादी के इतने सालों के बाद, जब हम 21 वीं सदी के डेढ़ दशक के दरवाजे पर खड़े हैं, तब क्या अब भी हम गंदगी में जीना चाहते हैं? मैंने यहाँ सरकार में आकर पहला काम सफाई का शुरू किया है। लोगों को आश्चर्य हुआ कि क्या यह प्रधान मंत्री का काम है? लोगों को लगता होगा कि यह प्रधान मंत्री के लिए छोटा काम होगा, मेरे लिए बहुत बड़ा काम है। सफाई करना बहुत बड़ा काम है। क्या हमारा देश स्वच्छ नहीं हो सकता है? अगर सवा सौ करोड़ देशवासी तय कर लें कि मैं कभी गंदगी नहीं करूंगा तो दुनिया की कौन-सी ताकत है, जो हमारे शहर, गाँव को आकर गंदा कर सके? क्या हम इतना-सा संकल्प नहीं कर सकते हैं?


    भाइयो-बहनो, 2019 में महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती आ रही है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती हम कैसे मनाएँ? महात्मा गाँधी, जिन्होंने हमें आज़ादी दी, जिन्होंने इतने बड़े देश को दुनिया के अंदर इतना सम्मान दिलाया, उन महात्मा गाँधी को हम क्या दें? भाइयो-बहनो, महात्मा गाँधी को सबसे प्रिय थी - सफाई, स्वच्छता। क्या हम तय करें कि सन् 2019 में जब हम महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती मनाएँगे, तो हमारा गाँव, हमारा शहर, हमारी गली, हमारा मोहल्ला, हमारे स्कूल, हमारे मंदिर, हमारे अस्पताल, सभी क्षेत्रों में हम गंदगी का नामोनिशान नहीं रहने देंगे? यह सरकार से नहीं होता है, जन-भागीदारी से होता है, इसलिए यह काम हम सबको मिल कर करना है।


    भाइयो-बहनो, हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। क्या कभी हमारे मन को पीड़ा हुई कि आज भी हमारी माताओं और बहनों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है? डिग्निटी ऑफ विमेन, क्या यह हम सबका दायित्व नहीं है? बेचारी गाँव की माँ-बहनें अँधेरे का इंतजार करती हैं, जब तक अँधेरा नहीं आता है, वे शौच के लिए नहीं जा पाती हैं। उसके शरीर को कितनी पीड़ा होती होगी, कितनी बीमारियों की जड़ें उसमें से शुरू होती होंगी! क्या हमारी माँ-बहनों की इज्ज़त के लिए हम कम-से-कम शौचालय का प्रबन्ध नहीं कर सकते हैं? भाइयो-बहनो, किसी को लगेगा कि 15 अगस्त का इतना बड़ा महोत्सव बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने का अवसर होता है। भाइयो-बहनो, बड़ी बातों का महत्व है, घोषणाओं का भी महत्व है, लेकिन कभी-कभी घोषणाएँ एषणाएँ जगाती हैं और जब घोषणाएँ परिपूर्ण नहीं होती हैं, तब समाज निराशा की गर्त में डूब जाता है। इसलिए हम उन बातों के ही कहने के पक्षधर हैं, जिनको हम अपने देखते-देखते पूरा कर पाएँ। भाइयो-बहनो, इसलिए मैं कहता हूँ कि आपको लगता होगा कि क्या लाल किले से सफाई की बात करना, लाल किले से टॉयलेट की बात बताना, यह कैसा प्रधान मंत्री है? भाइयो-बहनो, मैं नहीं जानता हूँ कि मेरी कैसी आलोचना होगी, इसे कैसे लिया जाएगा, लेकिन मैं मन से मानता हूँ। मैं गरीब परिवार से आया हूँ, मैंने गरीबी देखी है और गरीब को इज़् ज़त मिले, इसकी शुरूआत यहीं से होती है। इसलिए 'स्वच्छ भारत' का एक अभियान इसी 2 अक्टूबर से मुझे आरम्भ करना है और चार साल के भीतर-भीतर हम इस काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं। एक काम तो मैं आज ही शुरू करना चाहता हूँ और वह है- हिन्दुस्तान के सभी स्कूलों में टॉयलेट हो, बच्चियों के लिए अलग टॉयलेट हो, तभी तो हमारी बच्चियाँ स्कूल छोड़ कर भागेंगी नहीं। हमारे सांसद जो एमपीलैड फंड का उपयोग कर रहे हैं, मैं उनसे आग्रह करता हूँ कि एक साल के लिए आपका धन स्कूलों में टॉयलेट बनाने के लिए खर्च कीजिए। सरकार अपना बजट टॉयलेट बनाने में खर्च करे। मैं देश के कॉरपोरेट सेक्टर्स का भी आह्वान करना चाहता हूँ कि कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत आप जो खर्च कर रहे हैं, उसमें आप स्कूलों में टॉयलेट बनाने को प्राथमिकता दीजिए। सरकार के साथ मिलकर, राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक साल के भीतर-भीतर यह काम हो जाए और जब हम अगले 15 अगस्त को यहाँ खड़े हों, तब इस विश्वास के साथ खड़े हों कि अब हिन्दुस्तान का ऐसा कोई स्कूल नहीं है, जहाँ बच्चे एवं बच्चियों के लिए अलग टॉयलेट का निर्माण होना बाकी है।


    भाइयो-बहनो, अगर हम सपने लेकर चलते हैं तो सपने पूरे भी होते हैं। मैं आज एक विशेष बात और कहना चाहता हूँ। भाइयो-बहनो, देशहित की चर्चा करना और देशहित के विचारों को देना, इसका अपना महत्व है। हमारे सांसद, वे कुछ करना भी चाहते हैं, लेकिन उन्हें अवसर नहीं मिलता है। वे अपनी बात बता सकते हैं, सरकार को चिट्ठी लिख सकते हैं, आंदोलन कर सकते हैं, मेमोरेंडम दे सकते हैं, लेकिन फिर भी, खुद को कुछ करने का अवसर मिलता नहीं है। मैं एक नए विचार को लेकर आज आपके पास आया हूं। हमारे देश में प्रधान मंत्री के नाम पर कई योजनाएं चल रही हैं, कई नेताओं के नाम पर ढेर सारी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन मैं आज सांसद के नाम पर एक योजना घोषित करता हूं - "सांसद आदर्श ग्राम योजना"। हम कुछ पैरामीटर्स तय करेंगे और मैं सांसदों से आग्रह करता हूं कि वे अपने इलाके में तीन हजार से पांच हजार के बीच का कोई भी गांव पसंद कर लें और कुछ पैरामीटर्स तय हों - वहां के स्थल, काल, परिस्थिति के अनुसार, वहां की शिक्षा, वहां का स्वास्थ्य, वहां की सफाई, वहां के गांव का वह माहौल, गांव में ग्रीनरी, गांव का मेलजोल, कई पैरामीटर्स हम तय करेंगे और हर सांसद 2016 तक अपने इलाके में एक गांव को आदर्श गांव बनाए। इतना तो कर सकते हैं न भाई! करना चाहिए न! देश बनाना है तो गांव से शुरू करें। एक आदर्श गांव बनाएं और मैं 2016 का टाइम इसलिए देता हूं कि नयी योजना है, लागू करने में, योजना बनाने में कभी समय लगता है और 2016 के बाद, जब 2019 में वह चुनाव के लिए जाए, उसके पहले और दो गांवों को करे और 2019 के बाद हर सांसद, 5 साल के कार्यकाल में कम से कम 5 आदर्श गांव अपने इलाके में बनाए। जो शहरी क्षेत्र के एम.पीज़ हैं, उनसे भी मेरा आवाहन है कि वे भी एक गांव पसंद करें। जो राज्य सभा के एम.पीज़ हैं, उनसे भी मेरा आग्रह है, वे भी एक गांव पसंद करें।


    हिन्दुस्तान के हर जिले में, अगर हम एक आदर्श गांव बनाकर देते हैं, तो सभी अगल-बगल के गांवों को खुद उस दिशा में जाने का मन कर जाएगा। एक मॉडल गांव बना करके देखें, व्यवस्थाओं से भरा हुआ गांव बनाकर देखें। 11 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण जी की जन्म जयंती है। मैं 11 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण जी की जन्म जयंती पर एक "सांसद आदर्श ग्राम योजना" का कम्प्लीट ब्ल्यूप्रिंट सभी सांसदों के सामने रख दूंगा, सभी राज्य सरकारों के सामने रख दूंगा और मैं राज्य सरकारों से भी आग्रह करता हूं कि आप भी इस योजना के माध्यम से, अपने राज्य में जो अनुकूलता हो, वैसे सभी विधायकों के लिए एक आदर्श ग्राम बनाने का संकल्प करिए। आप कल्पना कर सकते हैं, देश के सभी विधायक एक आदर्श ग्राम बनाएं, सभी सांसद एक आदर्श ग्राम बनाएं। देखते ही देखते हिन्दुस्तान के हर ब्लॉक में एक आदर्श ग्राम तैयार हो जाएगा, जो हमें गांव की सुख-सुविधा में बदलाव लाने के लिए प्रेरणा दे सकता है, हमें नई दिशा दे सकता है और इसलिए इस "सांसद आदर्श ग्राम योजना" के तहत हम आगे बढ़ना चाहते हैं।


    भाइयो-बहनो, जब से हमारी सरकार बनी है, तब से अखबारों में, टी.वी. में एक चर्चा चल रही है कि प्लानिंग कमीशन का क्या होगा? मैं समझता हूं कि जिस समय प्लानिंग कमीशन का जन्म हुआ, योजना आयोग का जन्म हुआ, उस समय की जो स्थितियाँ थीं, उस समय की जो आवश्यकताएँ थीं, उनके आधार पर उसकी रचना की गई। इन पिछले वर्षों में योजना आयोग ने अपने तरीके से राष्ट्र के विकास में उचित योगदान दिया है। मैं इसका आदर करता हूं, गौरव करता हूं, सम्मान करता हूं, सत्कार करता हूं, लेकिन अब देश की अंदरूनी स्थिति भी बदली हुई है, वैश्विक परिवेश भी बदला हुआ है, आर्थिक गतिविधि का केंद्र सरकारें नहीं रही हैं, उसका दायरा बहुत फैल चुका है। राज्य सरकारें विकास के केन्द्र में आ रही हैं और मैं इसको अच्छी निशानी मानता हूँ। अगर भारत को आगे ले जाना है, तो यह राज्यों को आगे ले जाकर ही होने वाला है। भारत के फेडेरल स्ट्रक्चर की अहमियत पिछले 60 साल में जितनी थी, उससे ज्यादा आज के युग में है। हमारे संघीय ढाँचे को मजबूत बनाना, हमारे संघीय ढाँचे को चेतनवंत बनाना, हमारे संघीय ढाँचे को विकास की धरोहर के रूप में काम लेना, मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री की एक टीम का फॉर्मेशन हो, केन्द्र और राज्य की एक टीम हो, एक टीम बनकर आगे चले, तो इस काम को अब प्लानिंग कमीशन के नए रंग-रूप से सोचना पड़ेगा। इसलिए लाल किले की इस प्राचीर से एक बहुत बड़ी चली आ रही पुरानी व्यवस्था में उसका कायाकल्प भी करने की जरूरत है, उसमें बहुत बदलाव करने की आवश्यकता है। कभी-कभी पुराने घर की रिपेयरिंग में खर्चा ज्यादा होता है लेकिन संतोष नहीं होता है। फिर मन करता है, अच्छा है, एक नया ही घर बना लें और इसलिए बहुत ही कम समय के भीतर योजना आयोग के स्थान पर, एक क्रिएटिव थिंकिंग के साथ राष्ट्र को आगे ले जाने की दिशा, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की दिशा, संसाधनों का ऑप्टिमम युटिलाइजेशन, प्राकृतिक संसाधनों का ऑप्टिमम युटिलाइजेशन, देश की युवा शक्ति के सामर्थ्य का उपयोग, राज्य सरकारों की आगे बढ़ने की इच्छाओं को बल देना, राज्य सरकारों को ताकतवर बनाना, संघीय ढाँचे को ताकतवर बनाना, एक ऐसे नये रंग-रूप के साथ, नये शरीर, नयी आत्मा के साथ, नयी सोच के साथ, नयी दिशा के साथ, नये विश्वास के साथ, एक नये इंस्टीट्यूशन का हम निर्माण करेंगे और बहुत ही जल्द योजना आयोग की जगह पर यह नया इंस्टीट्यूट काम करे, उस दिशा में हम आगे बढ़ने वाले हैं।


    भाइयो-बहनो, आज 15 अगस्त महर्षि अरविंद का भी जन्म जयंती का पर्व है। महर्षि अरविंद ने एक क्रांतिकारी से निकल कर योग गुरु की अवस्था को प्राप्त किया था। उन्होंने भारत के भाग्य के लिए कहा था कि "मुझे विश्वास है, भारत की दैविक शक्ति, भारत की आध्यात्मिक विरासत विश्व कल्याण के लिए अहम भूमिका निभाएगी"। इस प्रकार के भाव महर्षि अरविन्द ने व्यक्त किए थे। मेरी महापुरुषों की बातों में बड़ी श्रद्धा है। मेरी त्यागी, तपस्वी ऋषियों और मुनियों की बातों में बड़ी श्रद्धा है और इसलिए मुझे आज लाल किले की प्राचीर से स्वामी विवेकानन्द जी के वे शब्द याद आ रहे हैं जब स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था, "मैं मेरी आँखों के सामने देख रहा हूँ।" विवेकानन्द जी के शब्द थे - "मैं मेरी आँखों के सामने देख रहा हूँ कि फिर एक बार मेरी भारतमाता जाग उठी है, मेरी भारतमाता जगद्गुरु के स्थान पर विराजमान होगी, हर भारतीय मानवता के कल्याण के काम आएगा, भारत की यह विरासत विश्व के कल्याण के लिए काम आएगी।" ये शब्द स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने तरीके से कहे थे। भाइयो-बहनो, विवेकानन्द जी के शब्द कभी असत्य नहीं हो सकते। स्वामी विवेकानन्द जी के शब्द, भारत को जगद्गुरु देखने का उनका सपना, उनकी दीर्घदृष्टि, उस सपने को पूरा करना हम लोगों का कर्तव्य है। दुनिया का यह सामर्थ्यवान देश, प्रकृति से हरा-भरा देश, नौजवानों का देश, आने वाले दिनों में विश्व के लिए बहुत कुछ कर सकता है।


    भाइयो-बहनो, लोग विदेश की नीतियों के संबंध में चर्चा करते हैं। मैं यह साफ मानता हूं कि भारत की विदेश नीति के कई आयाम हो सकते हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण बात है, जिस पर मैं अपना ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं कि हम आज़ादी की जैसे लड़ाई लड़े, मिल-जुलकर लड़े थे, तब तो हम अलग नहीं थे, हम साथ-साथ थे। कौन सी सरकार हमारे साथ थी? कौन से शस्त्र हमारे पास थे? एक गांधी थे, सरदार थे और लक्षावती स्वातंत्र्य सेनानी थे और इतनी बड़ी सल्तनत थी। उस सल्तनत के सामने हम आज़ादी की जंग जीते या नहीं जीते? विदेशी ताकतों को परास्त किया या नहीं किया? भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया या नहीं किया? हमीं तो थे, हमारे ही तो पूर्वज थे, जिन्होंने यह सामर्थ्य दिखाई थी। समय की मांग है, सत्ता के बिना, शासन के बिना, शस्त्र के बिना, साधनों के बिना भी इतनी बड़ी सल्तनत को हटाने का काम अगर हिंदुस्तान की जनता कर सकती है, तो भाइयो-बहनो, हम क्या गरीबी को हटा नहीं सकते? क्या हम गरीबी को परास्त नहीं कर सकते हैं? क्या हम गरीबी के खिलाफ लड़ाई जीत नहीं सकते हैं? मेरे सवा सौ करोड़ प्यारे देशवासियो, आओ! आओ, हम संकल्प करें, हम गरीबी को परास्त करें, हम विजयश्री को प्राप्त करें। भारत से गरीबी का उन्मूलन हो, उन सपनों को लेकर हम चलें और पड़ोसी देशों के पास भी यही तो समस्या है! क्यों न हम सार्क देशों के सभी साथी दोस्त मिल करके गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने की योजना बनाएं? हम मिल करके लड़ाई लड़ें, गरीबी को परास्त करें। एक बार देखें तो सही, मरने-मारने की दुनिया को छोड़ करके जीवित रहने का आनंद क्या होता है! यही तो भूमि है, जहां सिद्दार्थ के जीवन की घटना घटी थी। एक पंछी को एक भाई ने तीर मार दिया और एक दूसरे भाई ने तीर निकाल करके बचा लिया। मां के पास गए - पंछी किसका, हंस किसका? मां से पूछा, मारने वाले का या बचाने वाले का? मां ने कहा, बचाने वाले का। मारने वाले से बचाने वाले की ताकत ज्यादा होती है और वही तो आगे जा करके बुद्ध बन जाता है। वही तो आगे जा करके बुद्ध बन जाता है और इसलिए, मैं पड़ोस के देशों से मिल-जुल करके गरीबी के खिलाफ लड़ाई को लड़ने के लिए सहयोग चाहता हूं, सहयोग करना चाहता हूं और हम मिल करके, सार्क देश मिल करके, हम दुनिया में अपनी अहमियत खड़ी कर सकते हैं, हम दुनिया में एक ताकत बनकर उभर सकते हैं। आवश्यकता है, हम मिल-जुल करके चलें, गरीबी से लड़ाई जीतने का सपना ले करके चलें, कंधे से कंधा मिला करके चलें। मैं भूटान गया, नेपाल गया, सार्क देशों के सभी महानुभाव शपथ समारोह में आए, एक बहुत अच्छी शुभ शुरुआत हुई है। तो निश्चित रूप से अच्छे परिणाम मिलेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है और देश और दुनिया में भारत की यह सोच, हम देशवासियों का भला करना चाहते हैं और विश्व के कल्याण में काम आ सकें, हिन्दुस्तान ऐसा हाथ फहराना चाहता है। इन सपनों को ले करके, पूरा करके, आगे बढ़ने का हम प्रयास कर रहे हैं।


    भाइयो-बहनो, आज 15 अगस्त को हम देश के लिए कुछ न कुछ करने का संकल्प ले करके चलेंगे। हम देश के लिए काम आएं, देश को आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर चलेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाता हूं भाइयो-बहनो, मैं मेरी सरकार के साथियों को भी कहता हूं, अगर आप 12 घंटे काम करोगे, तो मैं 13 घंटे करूंगा। अगर आप 14 घंटे कर्म करोगे, तो मैं 15 घंटे करूंगा। क्यों? क्योंकि मैं प्रधान मंत्री नहीं, प्रधान सेवक के रूप में आपके बीच आया हूं। मैं शासक के रूप में नहीं, सेवक के रूप में सरकार लेकर आया हूं। भाइयो-बहनो, मैं विश्वास दिलाता हूं कि इस देश की एक नियति है, विश्व कल्याण की नियति है, यह विवेकानन्द जी ने कहा था। इस नियति को पूर्ण करने के लिए भारत का जन्म हुआ है, इस हिन्दुस्तान का जन्म हुआ है। इसकी परिपूर्ति के लिए सवा सौ करोड़ देशवासियों को तन-मन से मिलकर राष्ट्र के कल्याण के लिए आगे बढ़ना है।


    मैं फिर एक बार देश के सुरक्षा बलों, देश के अर्द्ध सैनिक बलों, देश की सभी सिक्योरिटी फोर्सेज़ को, मां-भारती की रक्षा के लिए, उनकी तपस्या, त्याग, उनके बलिदान पर गौरव करता हूं। मैं देशवासियों को कहता हूं, "राष्ट्रयाम् जाग्रयाम् वयम्", "Eternal vigilance is the price of liberty". हम जागते रहें, सेना जाग रही है, हम भी जागते रहें और देश नए कदम की ओर आगे बढ़ता रहे, इसी एक संकल्प के साथ हमें आगे बढ़ना है। सभी मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए -


    भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

    जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द।

    वंदे मातरम्, वंदे मातरम्, वंदे मातरम्!


    (साभार: PIB)



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    दिनेश कुमार

    जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : जब कोई बड़ा आलोचक किसी बड़े कवि पर किताब लिखता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह कोई नई बात कहेगा या कम से कम उसे और बेहतर ढंग से समझने में हमारी मदद करेगा। दूधनाथ सिंह की पुस्तक मुक्तिबोध साहित्य में नई प्रवृत्तियां में मुक्तिबोध को लेकर न तो कोई नई स्थापना है और न ही ऐसा कुछ, जो मुक्तिबोध साहित्य के बारे में हमारे ज्ञान को समृद्ध करे। इस पुस्तक में छोटे-छोटे कुल बारह अध्याय हैं। इन अध्यायों में मुक्तिबोध के समस्त साहित्य पर चलताऊ ढंग से विचार किया गया है। यह पुस्तक उच्च अध्ययन संस्थान शिमला की परियोजना के तहत लिखी गई है। 

    दूधनाथ सिंह ने इससे पहले निराला और महादेवी पर उत्कृष्ट पुस्तकें लिखी हैं। उन दोनों पुस्तकों का हिंदी समाज कायल रहा है, पर मुक्तिबोध के साथ वे न्याय नहीं कर पाए हैं। इस पुस्तक में उन्होंने मुख्य रूप से मुक्तिबोध की कविताओं का विवेचन-विश्लेषण किया है। मुक्तिबोध की कविताएं जितनी जटिल हैं, उतनी ही जटिल दूधनाथ सिंह की आलोचना भी है। मुक्तिबोध की कविता को समझना अगर कठिन है तो दूधनाथ सिंह की आलोचना को समझना भी कम मुश्किल नहीं है। अपनी तमाम जटिलताओं के बावजूद मुक्तिबोध की कविताओं का एक कथ्य होता है, पर लेखक की आलोचना का कथ्य स्पष्ट नहीं हो पाता है। वे भारी-भरकम और गंभीर शब्दों द्वारा एक वातावरण तो बनाते हैं, पर नया क्या कहना चाहते हैं, स्पष्ट नहीं हो पाता। बावजूद इसके इस पुस्तक में कहीं-कहीं उन्होंने मुक्तिबोध के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कहीं हैं, जिसकी तरफ धयान देना चाहिए। 

    मुक्तिबोध की कविताओं के अनगढ़पन पर अज्ञेय ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि, ''मुक्तिबोध में यह अनगढ़पन इतना बना न रह गया होता, अगर वास्तव में उनकी जो बेचैनी थी वह कविकर्म को लेकर हुई होती। या कि कविता को लेकर हुई होती। उनमें बड़ा एक ईमानदार सोच तो है, उनकी चिंताएं बड़ी खरी चिंताएं हैं, लेकिन शायद वे कविता के बारे में नहीं हैं। वह ज्यादा कवि और समाज के बारे में हो जाती हैं।... और मैं यह कहूं कि अंत तक वे एक बहुत ही खरे और तेजस्वी चिंतक तो रहे हैं और उनमें बराबर सही ढंग से सोचने की छटपटाहट भी दीखती है, लेकिन अंत तक वे समर्थ कवि नहीं बन पाए।''अज्ञेय का कहना है कि एकाध को छोड़ कर उनकी कोई भी कविता पूरी नहीं हुई और जो लगभग पूरी कविताएं हैं वे 'तार सप्तक'में आ गर्इं। 

    लेखक ने मुक्तिबोध की कविताई के बारे में अज्ञेय के इस वक्तव्य को विचित्र और गलत कहा है। ऐसा मानना तो ठीक है, पर अज्ञेय के इस वक्तव्य का तार्किक खंडन भी आवश्यक है। मुक्तिबोध के प्रतिपक्ष में यह सबसे मजबूत तर्क है। इसलिए सिर्फ इतना कहने से काम नहीं चलेगा कि ''खरा चिंतन और सामाजिक चिंता ही मुक्तिबोध को एक समर्थ कवि और हिंदी कविता के इतिहास में एक अलग तरह का कवि बनाती है।''अज्ञेय के वक्तव्य का यह मुकम्मल जवाब नहीं है। खरा चिंतन और सामाजिक चिंता के कारण मुक्तिबोध विशिष्ट कवि नहीं हैं। यह तत्त्व तो सभी प्रगतिशील कवियों में मिल जाएगा। इस चिंतन और चिंता को जिस तरह वे कविता में ढालते हैं और उसके लिए जिस तरह मिथकों, बिंबों और कथाओं का सृजन करते हैं, उसके कारण वे समर्थ और विशिष्ट कवि हैं। 

    दरअसल, मुक्तिबोध जीवनपर्यंत इसी समस्या से जूझते रहे कि अपने चिंतन और चिंता को रचना का विषय कैसे बनाया जाए, जिससे कि साहित्य के स्वधर्म पर कोई आंच न आए। मुक्तिबोध किसी भी कीमत पर साहित्य के स्वधर्म से समझौता नहीं कर सकते थे चाहे उन्हें अपनी कविताओं को कई बार लिखना ही क्यों न पड़े या उसे अधूरा ही क्यों न छोड़ना पड़े। एक रचनाकार के रूप में मुक्तिबोध की चिंताएं साहित्यिक ही थीं, इसीलिए वे अपनी रचनाओं से लगातार जूझ रहे थे। इसलिए अज्ञेय का यह कहना उचित प्रतीत नहीं होता कि मुक्तिबोध की बेचैनी के केंद्र में कविकर्म न होकर समाज है। 

    यहां एक और बात समझ लेने की है कि अज्ञेय समाज को छोड़ कर साहित्य की चिंता कर सकते थे, उसी तरह अन्य प्रगतिशील कवि साहित्य को छोड़ कर समाज की चिंता कर सकते थे, पर मुक्तिबोध न साहित्य को छोड़ सकते थे और न समाज को। उनके लिए साहित्यिक चिंता और सामाजिक चिंता अलग-अलग न होकर अभिन्न थे। अज्ञेय द्वारा मुक्तिबोध के कविकर्म को लेकर उठाए गए बुनियादी सवाल का व्यवस्थित और तर्कपूर्ण जवाब दूधनाथ सिंह को देना चाहिए था, क्योंकि वे अज्ञेय के मत से असहमत हैं। वे मुक्तिबोध की कविताओं में बिखराव को स्वीकार करते हुए यह कह कर उसका बचाव करते हैं कि यह संयोजनहीनता ही आधुनिक कला का मूल तत्त्व है। 

    लेखक ने पुस्तक में मुक्तिबोध की प्रेम कविताओं का भी विश्लेषण किया है। मुक्तिबोध के आलोचकों ने प्राय: इन कविताओं पर ध्यान नहीं दिया है। छोटी-छोटी प्रेम कविताएं उनके आरंभिक दौर की हैं। लेखक का कहना है कि लोगोें द्वारा प्रखर चिंतन और विचारधारा के कवि माने जाने के कारण मुक्तिबोध की कविताओं में छिपी हुई दूसरी अंतरधाराओं की व्याख्या नहीं हो पाई है। हालांकि वे दूसरी तरफ यह भी स्वीकार करते हैं कि मुक्तिबोध की कविताओं के विशाल ढेर में प्रेमानुभव की कविताएं संख्या में कम हैं और वे उतनी महत्त्वपूर्ण भी नहीं हैं। 

    मुक्तिबोध की प्रेम कविताओं का विश्लेषण पढ़ कर ऐसा लगता है कि दूधनाथ सिंह ने अपना पूरा बौद्धिक प्रेमचिंतन उनकी कविताओं पर आरोपित कर दिया है और उनके न चाहते हुए भी आखिरकार यही साबित होता है कि मुक्तिबोध सिर्फ प्रखर चिंतन और विचारधारा के ही कवि हैं, प्रेम के नहीं। 

    मुक्तिबोध की एक लंबी कविता 'मालव निर्झर की झर-झर कंचन रेखा'को प्रेम कविता के रूप में व्याख्यायित कर लेखक ने प्रेम पर गंभीर बौद्धिक विमर्श प्रस्तुत करते हुए मुक्तिबोध के प्रेम संबंधी दृष्टिकोण में मौलिकता की भी खोज की है, पर जहां गंभीर बौद्धिक विमर्श की वाकई जरूरत थी, वहां उन्होंने अपने को प्राय: कविता की पंक्तियों की व्याख्या करने तक ही सीमित रखा है। उदाहरण के लिए 'अंधेरे में'शीर्षक अध्याय को देखा जा सकता है। मुक्तिबोध की सर्वाधिक चर्चित इस कविता की पंक्तियां उद्धृत करने की जगह रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, नंदकिशोर नवल आदि की इस कविता संबंधी मान्यताओं से सहमति-असहमति व्यक्त करते हुए अपनी बात कहते या कोई बौद्धिक विमर्श प्रस्तुत करते तो अधिक बेहतर होता। ऐसा करने की प्रक्रिया में अपनी बातों के समर्थन में कविता की पंक्तियां उद्धृत करना अधिक सुसंगत होता। 

    मुक्तिबोध की महत्त्वपूर्ण कविताओं के विश्लेषण के साथ ही लेखक ने उनके राजनीतिक लेखों और कहानियों पर भी विचार तो किया है, पर बहुत 'स्केची'ढंग से। ऐसा लगता है कि संबंधित अध्यायों को सिर्फ खानापूर्ति के लिए जोड़ दिया गया है। कहानियों पर टिप्पणी करते हुए नामवर सिंह की इस बात से वे अपनी असहमति व्यक्त करते हैं कि मुक्तिबोध का कहानी लेखन उनके संपूर्ण लेखन का आनुषंगिक है। उनका मानना है कि मुक्तिबोध की कहानियां अपने समय से आगे की, बल्कि आज की कथा हैं। कहानी कविता से अलग स्थितियों को उपयुक्त संदर्भ में प्रस्तुत करती हैं। 

    कविताओं, कहानियों के अलावा मुक्तिबोध के लेखन का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण हिस्सा उनके आलोचनात्मक निबंधों का है। आलोचक के रूप में भी मुक्तिबोध की कम ख्याति नहीं है। उनके आलोचक रूप को नजरअंदाज करके उन पर कोई भी अध्ययन या पुस्तक पूर्ण नहीं हो सकती। इस पुस्तक में उनके इस पक्ष को छुआ तक नहीं गया है। मुक्तिबोध की रचनाओं को समझने के लिए उनके आलोचनात्मक चिंतन को समझना भी अत्यंत आवश्यक है। 

    मुक्तिबोध साहित्य में नई प्रवृत्तियां: दूधनाथ सिंह; राजकमल प्रकाशन, 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए। 


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    प्रभु जोशी

     जनसत्ता 16 अगस्त, 2014 : जब भी इतिहास से मुठभेड़ होती है, हम हमेशा उसको दुरुस्त करने की कोशिश में भिड़ जाते हैं। अब जबकि देश में फिर से कश्मीर विवाद को बहस में लाया जा रहा है, हमें उसके अतीत कोे एक बार खंगाल लेना जरूरी है। खासकर तब तो यह और जरूरी हो जाता है, जब वहां के मुख्यमंत्री इतिहास और निकट अतीत को भुला कर भारतीय संविधान को एक फटी-पुरानी पोथी की तरह खारिज करने वाले अंदाज में अपना भाषण दे रहे हों। 

    अमूमन मान लिया जाता है कि जम्मू-कश्मीर की समस्या 1947 के बाद शुरू हुई, जबकि हकीकत यह नहीं है। उसकी शुरुआत तो उसी समय हो गई थी, जब 'ईस्ट इंडिया कंपनी'ने जम्मू के महाराजा गुलाबसिंह के दरबार में एक 'अंगरेज रेजीमेंट'को दाखिल कराने की कूटनीतिक कोशिश की। लेकिन कंपनी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद इसमें विफल रही। पर जब कश्मीर के दूसरे राजा रणवीर सिंह की मृत्यु हुई तो अंगरेज फिर सक्रिय हुए और आखिरकार उन्होंने 1885 में अपना मंसूबा पूरा कर ही लिया। क्योंकि उन्हें किसी भी तरह गिलगित क्षेत्र को अपने अधीन करना था, ताकि वहां भविष्य में अमेरिका की सैन्य गतिविधियों के लिए एक मुकम्मल और सर्वाधिक सुविधाजनक क्षेत्र उपलब्ध हो सके। अमेरिका के लिए सोवियत संघ को घेरने में इस क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लेना बहुत कारगर युक्ति मानी जा रही थी। नतीजतन उन्होंने अपनी कूटनीतिक चालाकियों से गिलगित क्षेत्र को गिलगित एजेंसी के नाम पर सन 1889 में 'प्रशासनिक नियंत्रण'में ले लिया। क्योंकि इससे सिंधु नदी के पूर्व और रावी नदी के पश्चिम तट का संपूर्ण पर्वतीय प्रदेश उनके अधीन आ गया। 

    इस सफलता पर वे प्रसन्न थे, लेकिन 1925 में प्रतापसिंह के उत्तराधिकारी के रूप में जब महाराजा हरिसिंह को षड्यंत्र की हकीकत समझ में आई तो उन्होंने अविलंब गिलगित क्षेत्र से अंगरेज सैनिकों को हटाया और अपने सैनिक तैनात कर दिए। यह उनकी समझ और सामर्थ्य भी थी कि उन्होंने यूनियन जैक उतार दिया। 

    इसी के समांतर 1930 में, जबकि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन देशव्यापी हो चुका था, भारत की राजनीतिक समस्या के संदर्भ में लंदन में गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया था। उसमें भारतीय नरेशों के प्रवक्ता और प्रतिनिधि के रूप में महाराजा हरिसिंह ने शिरकत की। उन्होंने जो वक्तव्य दिया, उसमें प्रस्तावित संघीय शासन में जम्मू-कश्मीर को शामिल किए जाने की पुरजोर वकालत की गई थी। जबकि अंगरेज यह चाहते ही नहीं थे, क्योंकि कश्मीर का गिलगित और उससे जुड़ा समूचा पर्वतीय क्षेत्र उन्हें अपने नियंत्रण में लेना था। परिणामस्वरूप वे क्रुद्ध हो गए। उन्होंने महाराजा हरिसिंह के खिलाफ व्यापक षड्यंत्र शुरू किया। औपनिवेशक कूटनीति के चलते शेख अब्दुल्ला की छवि उस समय कश्मीर में एक जन-आंदोलन के नेता की बना दी गई।

     अंगरेजों ने महाराजा हरिसिंह का मनोबल तोड़ने के लिए कुछेक विद्रोह भी करवाए, लेकिन वे हर बार विफल रहे। बाद में 1935 के मार्च में अंगरेजों ने गिलगित क्षेत्र के 'प्रशासनिक सुधार'की आड़ में उसे साठ वर्षों के पट्टे पर हथिया लिया। इसमें निश्चय ही शेख अब्दुल्ला का उपयोग एक शिखंडी की तरह किया गया था, क्योंकि उन्हें जन-आंदोलन का अग्रणी नेता बताया और बनाया जा रहा था। 

    जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की खतरनाक चालाकियों को समझा ही नहीं, कि वे अंगरेजों का इस्तेमाल करते हुए अपनी आंखों में 'स्वतंत्र कश्मीर का सुल्तान'बनने का ख्वाब पाले हुए हैं। उन्होंने महाराजा हरिसिंह को कश्मीर से सत्ता छोड़ कर भागने को मजबूर करने के लिए 'कश्मीर छोड़ो आंदोलन'चलाया और जब महाराजा हरिसिंह के सामने इसके पीछे छिपी पूरी साजिश का नक्शा साफ हो गया, तो उन्होंने शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया। 

    तभी नेहरू, जो शेख अब्दुल्ला के अभिन्न मित्र थे, कश्मीर पहुंचे और उन्होंने राजा हरिसिंह के खिलाफ 'सत्याग्रह'की घोषणा कर दी। यह नेहरू की शेख अब्दुल्ला के समर्थन में राजनीतिक भविष्य की तरफ आंख मूंदकर चलने वाली ऐतिहासिक भूल थी। वे मैत्री के मुगालते में जी रहे थे। हालांकि महाराजा हरिसिंह ने नेहरू को बहुत स्पष्ट सलाह भी दी थी कि वे शेख अब्दुल्ला के पक्ष में सत्याग्रह करने के मंसूबे के साथ कश्मीर कतई न आएं, लेकिन नेहरू तब तक स्वतंत्रता सेनानी की एक राष्ट्रव्यापी छवि अर्जित कर चुके थे। और जिद पहले से ही उनके स्वभाव का हिस्सा रही आई थी। अत: उन्होंने महाराजा की सलाह को सामंतवादी तानाशाही धमकी मान कर एक सिरे से ठुकरा दिया और तत्काल कश्मीर में 'सत्याग्रह'करने पहुंच गए। 

    महाराजा ने उन्हें गिरफ्तार करवाया और कश्मीर की सीमा से बाहर ले जाकर रिहा कर दिया। नेहरू ने अपने साथ किए गए इस व्यवहार के लिए, महाराजा के विरुद्ध मन में एक अमिट गांठ बांध ली और वे जीवन भर उस ग्रंथि से मुक्त नहीं हुए। और इसी ग्रंथि के चलते आजादी के बाद कश्मीर मसले को हल करने के लिए तैयार वल्लभ भाई को उन्होंने बरज दिया। वे इस उलझे हुए मसले को स्वयं निपटाने की जिद में थे। यह अपने उस अपमान की स्मृति ही थी, जो महाराजा ने उन्हें बंदी बना कर किया था। 

    बाद इसके, 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, तो महाराजा हरिसिंह को यह स्पष्ट हो गया था कि गिलगित क्षेत्र को बचाए रखने के लिए हिंदुस्तान के साथ रहना जरूरी होगा। वैसे इसके पूर्व वे गोलमेज सम्मेलन में भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रकट कर चुके थे। लेकिन जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र काक हुआ करते थे, जिनकी पत्नी यूरोपियन थी और इसी वजह से काक के बहुत सूक्ष्म ताने-बाने अंगरेजों से मजबूत हो पाए थे। अंगरेजों ने काक को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया और महाराजा हरिसिंह को यह विकल्प गले उतारने के लिए तैयार कर लिया कि उन्हें न तो भारत में रहना चाहिए और न ही पाकिस्तान में। कश्मीर तो बस स्वतंत्र ही रहेगा। 

    स्मरण रहे, ब्रिटिश सरकार ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के राजनीतिक हालात देख कर इस विकल्प के लिए महाराजा हरिसिंह को तैयार करने का एजेंडा रामचंद्र काक को सौंप रखा था। लेकिन नेहरू ने अपनी उसी पुरानी घटना की रोशनी में देखते हुए इसका अभिप्राय यह निकाला कि महाराजा हरिसिंह के अंदर उनके प्रति कोई स्थायी घृणा है और वही उनके ऐसे विकल्प की आधारभूमि बन रही है। उन्हें यह भी याद था कि उन्हें शेख अब्दुल्ला के समर्थन में 'सत्याग्रह'करने से न केवल रोका गया था, बल्कि बंदी बना लिया गया था। यह उन्हें स्वयं और शेख अब्दुल्ला के द्वारा किए जा रहे आंदोलन का अपमान लगा था। 

    इसलिए जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया और मेहरचंद महाजन की मध्यस्थता से महाराजा हरिसिंह ने पाकिस्तान के आक्रमण के विरुद्ध भारत से मदद मांगी, जिसमें भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय की बात थी तो नेहरू को अपनी तरफ से शेख अब्दुल्ला की मैत्री याद आई और उन्होंने प्रस्ताव किया कि इस विलय पत्र पर शेख अब्दुल्ला की भी स्वीकृति होनी चाहिए। वे जनप्रतिनिधि हैं। जबकि वल्लभभाई पटेल ने आजादी के बाद जितनी भी रियासतों का भारत में विलीनीकरण करवाया था, वहां किसी में भी किसी स्थानीय जननेता के हस्ताक्षर का कोई प्रावधान नहीं था। केवल रियासत के शासक के हस्ताक्षर होते थे, मगर शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के मोह ने कश्मीर को भारत के भविष्य की एक निरंतर सालने वाली फांस बनाने के बीज बो दिए। 

    दरअसल, माउंटबेटन चाहते थे कि कश्मीर मसले को नेहरू द्वारा राष्ट्रसंघ वाली उलझन में डालने की वजह से भारतीय 'सैनिक गतिविधि'ढीली पड़ेगी और तब तक पाकिस्तान पूरा गिलगित क्षेत्र हथिया चुकेगा। नेहरू ने तब वहां तैनात सेना के 'संचालन सूत्रों'को शेख अब्दुल्ला के हाथों सौंप दिया।  

    नेहरू को इसका तनिक भी पूर्वानुमान नहीं था कि यही इतिहास की सबसे बड़ी भूल साबित होगी। शेख अब्दुल्ला की मैत्री पर उन्हें अटूट विश्वास था। लेकिन सैन्य सूत्र के अपने हाथ में आते ही शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर की घाटी हमलावरों से खाली हो चुकने के बाद भी मीरपुर, कोटली, पुंछ और गिलगित क्षेत्र में भारतीय सेना को आगे नहीं बढ़ने दिया। चूंकि माउंटबेटन के साथ शेख अब्दुल्ला की चुपचाप एक दूसरी ही खिचड़ी पक रही थी। 

    दरअसल, ब्रिटिश उस क्षेत्र को एक दूरगामी कूटनीतिक संभावना की तरह देख रहे थे। नतीजतन पहले मीरपुर फिर कोटली, मिम्बर, देवा, बुराला आदि का पतन हो गया और जम्मू क्षेत्र की सुरक्षा के सामने खतरा खड़ा हो गया। नेहरू शेख अब्दुल्ला और माउंटबेटन के बीच की इस 'दुरभि-संधि'को तब समझ ही नहीं पाए और संयुक्त राष्ट्रसंघ के निर्देश पर भारत ने 2 जनवरी 1949 को इकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी। 

    यहां याद दिलाना जरूरी होगा कि तत्कालीन राजनीतिक टिप्पणीकारों ने कश्मीर मसले को राष्ट्रसंघ में ले जाने की नेहरू की इस तत्परता को स्वयं को 'शांतिदूत की छवि'में देखने का व्यामोह कहा था। इसके कारण गिलगित जैसे सामरिक महत्त्व के क्षेत्र का एक तिहाई से कुछ अधिक भाग पाकिस्तान के कब्जे में रह गया; जो हमारे हलक का कांटा बन गया। 

    शेख अब्दुल्ला ने नेहरू से अपनी तथाकथित मैत्री को भुनाते हुए भारतीय संविधान सभा से जम्मू-कश्मीर को 'विशेष दर्जा'देने वाला घातक अनुच्छेद पारित करवाया, जबकि एक गहरे राजनीतिक भविष्यद्रष्टा की तरह इस अनुच्छेद को देखते हुए आंबेडकर इसके विरुद्ध थे। शेख अब्दुल्ला इस अनुच्छेद के चलते भविष्य में कश्मीर के सर्वेसर्वा बन गए और बाद में 'स्वतंत्र कश्मीर'का स्वप्न साकार करने की कुटिल योजना अपने जेहन में पालते रहे। 

    कहना न होगा कि इस अनुच्छेद ने कश्मीर में एक स्थायी अनिश्चितता को जन्म दिया, जो कि शेख अब्दुल्ला चाहते ही थे। याद कीजिए कि इसे एक 'अस्थायी और संक्रमणकालीन व्यवस्था'घोषित करके पारित करवाया गया था। दरअसल, नेहरू की आंखें तो तब खुलीं, जब डॉ कैलाशनाथ काटजू- जो भारत के तत्कालीन गृहमंत्री थे- और जीके हांडू ने शेख अब्दुल्ला के ब्रिटिश एजेंट होने संबंधी दस्तावेज और नेहरू का एक महत्त्वपूर्ण गोपनीय पत्र, जिसे दिल्ली पुलिस ने बरामद किया था, उनके समक्ष रखा, तो उन्होंने 9 अगस्त 1957 को शेख अब्दुल्ला को अपदस्थ करके राष्ट्रद्रोह के अपराध में बंदी बना लिया। इससे घाटी में शेख अब्दुल्ला की साख पर बट््टा लग गया। 

    इसके बाद इतिहास को दुरुस्त किया जा सकता था, लेकिन नवस्वतंत्र राष्ट्र की एक किस्म की जनतांत्रिक भीरुता ने उस अनिश्चितता को खत्म करने में लगातार जो हिचकिचाहट प्रदर्शित थी, वह नासूर की तरह आज भी मौजूद है।


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    अफलातून

     जनसत्ता 15 अगस्त, 2014 : गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राज्यसभा में कहा, 'मत भूलिए कि महात्मा गांधी, जिनको हम आज भी अपना पूज्य मानते हैं, जिन्हें हम राष्ट्रपिता मानते हैं,

    उन्होंने भी आरएसएस के कैंप में जाकर 'संघ'की सराहना की थी।' 

    1974 में 'संघ'वालों ने जयप्रकाशजी को बताया था कि गांधीजी अब उनके 'प्रात: स्मरणीयों'में एक हैं। संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका क्रमांक-2, सितंबर-अक्तूबर, 2003 में अन्य बातों के अलावा गांधीजी के बारे में पृष्ठ 9 पर लिखा गया है: ''देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।''संघ के कार्यक्रमों के दौरान बिकने वाले साहित्य में 'गांधी वध क्यों?'नामक किताब भी होती है। 

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदू राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और समाचार-पत्रों द्वारा दंगों की रिपोर्टिंग की बाबत खुद गांधीजी का ध्यान खींचा जाता रहा और उन्होंने इन विषयों पर साफगोई से अपनी राय रखी। विभाजन के बाद संघ के कैंप में गांधीजी के जाने का विवरण उनके सचिव प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक 'पूर्णाहुति'में दिया है। इसके पहले, 1942 से ही संघ की गतिविधियों को लेकर गांधीजी का ध्यान उनके साथी खींचते रहते थे। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष आसफ  अली ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों के बारे में प्राप्त एक शिकायत गांधीजी को भेजी और लिखा था कि वे शिकायतकर्ता को नजदीक से जानते हैं, वे सच्चे और निष्पक्ष राष्ट्रीय कार्यकर्ता हैं। 

    9 अगस्त, 1942 को हरिजन (पृष्ठ: 261) में गांधीजी ने लिखा: ''शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ  अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके तीन हजार सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- 'पहले अंगरेजों को निकाल बाहर करो उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे, अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।'बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसे ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है। 

    ''नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा। 

    ''धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी, तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंगरेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंगरेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।'' 

    गांधीजी विभाजन के बाद हुए व्यापक सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ 'करो या मरो'की भावना से  दिल्ली में डेरा डाले हुए थे। 21 सितंबर '47 को प्रार्थना-प्रवचन में 'हिंदू राष्ट्रवादियों'के संदर्भ में उन्होंने टिप्पणी की: ''एक अखबार ने बड़ी गंभीरता से यह सुझाव रखा है कि अगर मौजूदा सरकार में शक्ति नहीं है, यानी अगर जनता सरकार को उचित काम न करने दे, तो वह सरकार उन लोगों के लिए अपनी जगह खाली कर दे, जो सारे मुसलमानों को मार डालने या उन्हें देश निकाला देने का पागलपन भरा काम कर सके। यह ऐसी सलाह है कि जिस पर चल कर देश खुदकुशी कर सकता है और हिंदू धर्म जड़ से बरबाद हो सकता है। मुझे लगता है, ऐसे अखबार तो आजाद हिंदुस्तान में रहने लायक ही नहीं हैं। प्रेस की आजादी का यह मतलब नहीं कि वह जनता के मन में जहरीले विचार पैदा करे। जो लोग ऐसी नीति पर चलना चाहते हैं, वे अपनी सरकार से इस्तीफा देने के लिए भले कहें, मगर जो दुनिया शांति के लिए अभी तक हिंदुस्तान की तरफ ताकती रही है, वह आगे से ऐसा करना बंद कर देगी। हर हालत में जब तक मेरी सांस चलती है, मैं ऐसे निरे पागलपन के खिलाफ अपनी सलाह देना जारी रखूंगा।'' 

    प्यारेलाल ने 'पूर्णाहुति'में सितंबर, 1947 में संघ के अधिनायक गोलवलकर से गांधीजी की मुलाकात, विभाजन के बाद हुए दंगों और गांधी-हत्या का विस्तार से वर्णन किया है। प्यारेलालजी की मृत्यु 1982 में हुई। तब तक संघ द्वारा इस विवरण का खंडन नहीं हुआ था। 

    गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी मंडली के एक सदस्य बोल उठे- 'संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।'गांधीजी ने उत्तर दिया- 'पर यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।'उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 'तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था'बताया। (पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ: 17) 

    अपने एक सम्मेलन (शाखा) में गांधीजी का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता  गोलवलकर ने उन्हें 'हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष'बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ''मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है। पर मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी। हिंदू धर्म की विशिष्टता जैसा मैंने समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। यदि हिंदू यह मानते हों कि भारत में अहिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दरजे से संतोष करना होगा- तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा... मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही हो कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।'' 

    इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उन२में गांधीजी से पूछा गया- 'क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? यदि नहीं देता, तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?' 

    गांधीजी ने कहा- ''पहले प्रश्न का उत्तर 'हां'और 'नहीं'दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने से पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आतताई कौन है? दूसरे शब्दों में, हमें ऐसा अधिकार तभी मिल सकता है जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की। यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भलीभांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद दोनों एक साथ बन जाएं, तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे- उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए, कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।'' 

    तीस नवंबर '47 के प्रार्थना प्रवचन में गांधीजी ने कहा: ''हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विचार है कि हिंदुत्व की रक्षा का एकमात्र तरीका उनका ही है। हिंदू धर्म को बचाने का यह तरीका नहीं है कि बुराई का बदला बुराई से। हिंदू महासभा और संघ दोनों हिंदू संस्थाएं हैं। उनमें पढ़े-लिखे लोग भी हैं। मैं उन्हें अदब से कहूंगा कि किसी को सता कर धर्म नहीं बचाया जा सकता।'' 

    अखिल भारतीय कांग्रेस समिति को अपने अंतिम संबोधन (18 नवंबर '47) में उन्होंने कहा, ''मुझे पता चला है कि कुछ कांग्रेसी भी यह मानते हैं कि मुसलमान यहां न रहें। वे मानते हैं कि ऐसा होने पर ही हिंदू धर्म की उन्नति होगी। परंतु वे नहीं जानते कि इससे हिंदू धर्म का लगातार नाश हो रहा है। इन लोगों द्वारा यह रवैया न छोड़ना खतरनाक होगा... मुझे स्पष्ट यह दिखाई दे रहा है कि अगर हम इस पागलपन का इलाज नहीं करेंगे, तो जो आजादी हमने हासिल की है उसे हम खो बैठेंगे।... मैं जानता हूं कि कुछ लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अपनी आत्मा को मुसलमानों के चरणों में रख दिया है, गांधी? वह जैसा चाहे बकता रहे! यह तो गया बीता हो गया है। जवाहरलाल भी कोई अच्छा नहीं है। 

    ''रही बात सरदार पटेल की, सो उसमें कुछ है। वह कुछ अंश में सच्चा हिंदू है। परंतु आखिर तो वह भी कांग्रेसी ही है! ऐसी बातों से हमारा कोई फायदा नहीं होगा, हिंसक गुंडागिरी से न तो हिंदू धर्म की रक्षा होगी, न सिख धर्म की। गुरु ग्रंथ साहब में ऐसी शिक्षा नहीं दी गई है। ईसाई धर्म भी ये बातें नहीं सिखाता। इस्लाम की रक्षा तलवार से नहीं हुई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में मैं बहुत-सी बातें सुनता रहता हूं। मैंने यह सुना है कि इस सारी शरारत की जड़ में संघ है। हिंदू धर्म की रक्षा ऐसे हत्याकांडों से नहीं हो सकती। आपको अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी। वह रक्षा आप तभी कर सकते हैं जब आप दयावान और वीर बनें और सदा जागरूक रहेंगे, अन्यथा एक दिन ऐसा आएगा जब आपको इस मूर्खता का पछतावा होगा, जिसके कारण यह सुंदर और बहुमूल्य फल आपके हाथ से निकल जाएगा। मैं आशा करता हूं कि वैसा दिन कभी नहीं आएगा। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लोकमत की शक्ति तलवारों से अधिक होती है।'' 

    इन सब बातों को याद करना उस भयंकर त्रासदाई और शर्मनाक दौर को याद करना नहीं है, बल्कि जिस दौर की धमक सुनाई दे रही है उसे समझना है। गांधीजी उस वक्त भले एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी! इस बार हमें पहले से भी बड़ी कीमत अदा करनी होगी।


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    नेहरु जमाने का पटाक्षेप,लेकिन इसकी कीमत क्या,इसे भी बूझ लीजिये,बंधु!

    पलाश विश्वास

    नेहरु जमाने का पटाक्षेप,लेकिन इसकी कीमत क्या,इसे भी बूझ लीजिये,बंधु!

    दरअसल दो दलीय वेस्टमिनिस्टर शैली की लोकतांत्रिक वर्चस्ववादी इस राज्यतंत्र में संघ पिरावर का जैसे कभी अंत हुआ नहीं है,वैसे ही कांग्रेस का अंत भी असंभव है।


    नेहरु गांधी वंश अश्वत्थामा की तरह अमर है तो संघ परिवार उसीका प्रतिरुप है।


    भारतीय लोकतंत्र में इन दो विकल्पों के अलावा किसी तीसरे विकल्प को चुनने का कोई रास्ता अभी तक नहीं खुला है क्योंकि तीसरे विकल्प का दावा जो लोग करते हैं वे इन्हीं दो समूहों में समाहित हो जाने को अभिशप्त है।


    जैसे अटल शौरी आडवानी जमाने को खारिज करके मनमोहिनी प्रधानमंत्रित्व के माध्यमे आर्थिक सुधारों के अमेरिकी एजंडे को परवान चढ़ाया जाता रहा है,वैसे ही मुक्त बाजार ने दूसरे चरण के जनसंहारी आर्थिक सुधारों के लिए नमो सुनामी की रचना कर दी।


    याद करें कि वाम सहयोगे भाजपा ने भारत अमेरिका परमाणु संधि को खारिज करने के लिए संसद में क्या हंगामा नहीं किया था,जिसकी नींव लेकिन अटल ने डाली थी।संसद के उस लाइव प्रसारण और देशभक्ति के उन महानतम उद्गारों को याद कीजिये।


    अब संघ परिवार के कार्यकर्ता बतौर प्रधान सेवक उसी भारत अमेरिकी परमाणु संधि को लागू करने की कवायद में हर अमेरिकी शर्त पूरी कर रहे हैं।


    एफडीआई,विनिवेश,निजीकरण,निर्माण विनिर्माण,सेज महासेज,स्मार्ट सिटी,औद्योगिक गलियारा,निरंकुश बेदखली  और अबाध विदेशी पूंजी के साथ सरकार और सरकारी हर चीज तके साथ संविधान और लोकतंत्र का सफाया हो रहा है तो नागरिकमानवाधिकारों की क्या बिसात।


    अब दूसरे चरण के बाद गणीतीय हिसाब ऐसे तीसरा चरण भी आयेगा।वैसे ही जैसे कंप्यूटर के बाद रबोट चला आया।


    विकेंद्रीकरण के बाद केंद्रीकरण का महाविस्फोट हो गया।


    तीसरे चरण के एजंडे को लागू करने में राजनीतिक वैचारिक बाध्यताओं से अगर फिर नीतिगत विकलांगकता का पुनरूत्थान हुआ,तो वैश्विक जायनी व्यवस्था मोदी को बख्शेगी नहीं तो फिर वही कांग्रेस ही विकल्प।वृत्त फिर घूमे जायेगा।


    दरअसल यह नेहरुगांधी वंश का पटाक्षेप है नहीं,यह भारतीयइतिहास का महाप्रस्थान है।सशरीरे स्वार्गारोहण अभियान है यह।


    जिसे हम मुक्त बाजार का भारतीय जनगण और भारतीय लोकगणराज्य,भारतीय संविधान और भारत की संप्रभुता के विरुद्ध,प्रकृति और पर्यावरण के विरुद्ध परमाणु विस्फोट कहें तो कयामत का सही मंजर नजर आयेगा,जिसकी झांकियां हम पंजाब,यूपी, भोपाल,गुजरात,असम,मध्य भारत और बाकी देश में खंड खंड विस्फोट मध्ये पिछले तेईस सालों से देखते देखते अभ्यस्त हो गये हैं और किसी को न आंच का अहसास है और न किसीको तपिश महसूस होती है।



    मुक्त बाजार ने रक्तरंजित यूरोप,तेल युध्द में झुलस रहे मध्यपूर्व और भारतीय महादेश का साझा भूगोल बना दिया है और इसी भूगोल के मध्य खड़े हमारी इतिहासदृष्टि सिरे से विस्मृति विपर्यय है।


    आज के अखबारों में नेहरु जमाने के पटाक्षेप का कार्निवाल सजा है।टीवी पर तो यह सिलसिला मोदी के प्रधानमंत्रित्व की संघी उम्मीदवारी तय होते ही शुरु हो गया था।


    नेपाल में राजतंत्र की वापसी की कवायद में लगे तमाम तत्व तभी से बाग बाग हैं।


    यह कार्निवाल और जश्न कोई मौलिक भी नहीं है।


    आपातकालउपरान्ते मध्यावधि चुनाव में इंदिरागांधी की भारी शिकस्त के दिनों को याद करें या फिर नवउदारवाद के शुरुआती दौर में नरसिंह राव के शासनकाल को याद करें,तो बारबार हो रही पुनरावृत्तियों की ओर शायद ध्यान जाये।


    बहरहाल नेहरु गांधी वंश के बदले मुखर्जी गोवलकर वंशजों की जयजयकारमध्ये सच यह है कि शायद अंतिम तौर पर गुजराती पीपीपी माडल ने सोवियत नेहरु विकास के माडल का निर्णायक खात्मा कर दिया है।


    इसी परम उपलब्धि की वजह से मीडिया के अंदरमहल में भी अश्वमेध अश्वों की टापें प्रलयंकर हैं।नौसीखिये पत्रकार बिरादरी केसरिया हुई जाये तो बाकी समाज अपनी पुरानी सारी विरासत तिलांजलि देने के मूड में है।


    इसी के मध्य हैरतअंगेज ढंग से जनसत्ता में जो प्रभू जोशी जैसे लोग लिखने लगे हैं या मुक्तिबोध की विरासत पर चर्चा होने लगी है,वह राहत की बात है।हिंदी समाज इस वक्त के जनसत्ता के संपादकीय पेज को पढ़ने की तकलीफ करें तो सूचनाओं के महातिलिस्म से बाहर निकलने का रास्ता भी निकल सकता है।


    हमने आज सुबह पहला काम यह किया कि समयांतर में छपे आनंद तेलतुम्बड़े का मोदी का नवउदारवाद वाला आलेख अपने ब्लागों में लगाने के बाद फेसबुक दीवालों पर भी उसे टांग दिया।


    इससे पहले कि मेल खुलने पर पंकजदा के सौजन्य से यह लेख मिलता,आज ही के जलसत्ता रविवारी में छपे मुख्य आलेख प्याली से थाली तक जहर के लेखक अभिषेक का अता पता खोजने के लिए अपने अभिषेक को फोन लगाया।एक कवि भी अभिरंजन हैं।


    गाजीपुर के रास्ते अभिषेक मिला तो ट्रेन में उनके साथ अपने महागुरु आनंद स्वरुप वर्मा भी थे।उनसे अरसा बाद बातें हुई और मैंने कह ही दिया कि सबकी उम्र हो रही है,कब कौन लुढ़क जाये,इससे पहले दिल्ली आकर एक और मुलाकात की मोहलत चाहिए।


    आनंदजी भी बोले कि गिर्दा के अवसान के बाद नैनीताल जाना नहीं हुआ।


    मैं एक बार गया था और हीरा भाभी से मिलकर भी आया।लेकिन सच तो यह है कि अब गिर्दा के बिना नैनीताल नैनीताल नहीं लगता।


    शेखर और उमाभाभी इन दिनों मुक्त विहंग हैं,जिनसे नैनीताल में मुलाकात की उम्मीद न रखिये।तो राजीव लोचन शाह भी अब शायद ज्यादातर वक्त हल्दानी में बिताते हैं।हरुआ भी वहीं बस गया है।


    बाकी पवन राकेश और जहूर से मिलने के लिए फिर भी नैनीताल जाने की तलब लगी रहती है,लेकिन गिर्दा बिना नैनीताल सचमुच सूना सूना है।

    ये निजी बातें इसलिए कि जिस पहाड़ की अभिव्यक्ति गिर्दा के हुड़के के बोल से मुखर हुआ करती थी,वहां अब मुक्तिबोध,प्रेमचंद और बाबा नागार्जुन के नामोल्लेख से बमकने लगे हैं लोग।


    गिर्दा की यादें सिर्फ मित्रमंडली की तसल्ली में तब्दील है,पहाड़ की चेतना पर उसका कोई चिन्ह नहीं बचा है।


    बाकी देश में भी वही हादसा है।


    बांग्ला अखबारों में तो नेहरु गांधी वंश के अंत का आख्यान भरा पड़ा है।


    बंगाली होने की वजह से ,खास तौर पर पूर्वी बंगाल से विस्थापित शरणार्थी पिवार की संतान होने की वजह से इस घृणा का वारिस मैं भी हूं।


    नेताजी के भारतीय राजनीति में हाशिये पर चले जाने से लेकर उनके मृत्युरहस्य के बवंडर की वजह से बंगीयमानस राजनीति भले कांग्रेस की करें,लेकिन नेहरु गांधी वंश से अंतरंग हो ही नहीं सकता।


    फिर विभाजन का ठीकरा भी तो वही नेहरु गांधी जिन्ना पर फोड़ा गया है।


    भारत विभाजन में मुस्लिम लीग के दो राष्ट्र सिद्धांत को भारत में धर्मांध राष्ट्रीयता का आलोकस्तंभ बना दिया गया है और पाकिस्तान को इस राष्ट्रीयता का मुख्य शत्रु।इस्लामी चूंकि शत्रूदेश है,इसलिए इस्लाम भी शत्रुओं का धर्म है और चूंकि भारत विभाजन में मुख्यभूमिका जिन्ना और मुस्लिम लीग की है,तो सारे मुसलमान पाकिस्तानी हैं।


    इसी दलील पर हिंदुस्तान में सारे विधर्मियों के हिंदू बनाये जाने का अभियान है।

    इतिहास विरोधी यह मिथ भारत विभाजन में हिंदू महासभा और राष्ट्रीयस्वयं सेवक संघ और उनसे नेहरु गांधी वंश वंशजों के अविरल संपर्कसूत्र की नजरअंदजी के तहत गढ़ा गया है।


    दरअसल दो राष्ट्र सिद्धांत की रचनाप्रक्रिया में संघ की भूमिका,औपनिवेशिक काल में संघी सक्रियता और भारत विभाजन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिंदू महासभा की खास भूमिका पर शोध धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों ने भी नहीं किया है।


    धर्मनिरपेक्ष वर्णवर्चस्वी नस्ली पाखंड का यह चरमोत्कर्ष है।


    कल ही पंकजदा से मैंने कहा भी कि समझ लीजिये कि वाम कैडर और जनाधार पूरी तरह संघी कैडर और संघी जनाधार में अनूदित है,इतनी भयावह स्थिति है।


    वाम ने भी बंगाली राष्ट्रीयता की घृणा पूंजी अस्मिता के तहत राष्ट्रीय राजनीति करने की हिमालयी भूल धर्मोन्मादी तौर तरीके से किये,जिसके नतीजतन बंगाल की भूमि सुधार आंदोलन की विरासत सिरे से गायब हो गयी है।


    अब यह समझना जरुरी है कि भारत जो आज अमेरिकी उपनिवेश है,उसमें गैर कांग्रेसवाद की क्या भूमिका है।


    गैरकांग्रेसवाद के समाजवादियों और वामदलों ने जो संघ परिवार के साथ आपातकालउरांते चोली दामन का साथ बनाया,जो वीपी के मंडल के जवाब में केसरिया कमंडल मध्ये हिंदुत्व के पुनरूत्थान,सिखों का संहार और बाबरी विध्वंस के बाद गुजरात नरसंहार तक राजकाज और संसदीय सहमति के मध्य राजनैतिक समीकरणों के समांतर जारी रहा लगातार,उसीसे मोदी का यह केसरिया नवउदारवादी कारपोरेट युद्द घोषणा है आम जनता के खिलाफ।


    अंबेडकरवादी तो इस अवसरवादी सत्ताखिचडी में दाल चावल आलू कुछ भी बनकर अंबेडकर की ही हत्या के दोषी हैं।


    मोदी के प्रधानमंत्रित्व के साथ ही मनमोहनी अधूरे दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों के  एजंडे को सर्वोच्च प्रातमिकता दी जा रही है जो दरअसल अमेरिकी हितों को ही सर्वोच्च प्राथमिकता है।


    परमाणु संधि लागू करने से पहले प्रतिरक्षा,बीमा,मीडिया,खुदरा कारोबार समेत तमाम क्षेत्रों में एफडीआई अमेरिकी युद्धक अरथव्यवस्था की जमानत की सबसे बड़ी शर्ते हैं।


    तो आतंक के विरुद्ध जो अमेरिका का युद्ध है,मध्यपूर्व में तेल युद्ध जो अनंत है और गाजापट्टी में इस्लाम के खिलाफ जो धर्मयुद्ध है,उसमें साझेदार केसरिया सत्ता की भूमिका की जाच करें तो कश्मीर,पंजाब,यूपी या असम में बदलते मंजर का रहस्य समझ में आयेगा और इसका बंग कनेक्शन भी खुलता जायेगा।


    इस पूरे जनविरोधी तंत्र मंत्रयंत्र को समझने के लिए जो इतिहास बोध,वैज्ञानिक दृष्टि,विवेक,साहस,आर्थिक समझ,लोक विरासत,सांस्कृतिक जमीन और साहित्यिक मानवता की आवश्यकता है,शिक्षा मंत्रालय के डायरेक्ट टेकओवर और एफडीआई पर जी रहे मीडिया के मिथ्या अभियान से वह हर स्तर पर खत्म होने को है।

     

    अब नागार्जुन,मुक्तिबोध और प्रेमचंद को,माणिक और मंटो को,भीष्म साहनी को और भाषाई बहुलता को खत्म करने का वक्त है।जो दरअसल जनपक्षधर हैं,उनको ही राष्ट्रद्रोही और जनशत्रू बनवाने के तंत्र को मजबूत करने का यह कुरुक्षेत्र बन गया है सारा भारत।वे तमाम लोग अब ब्रह्मराक्षस हैं।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच इतिहास का अंत है।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच अर्थव्यवस्था और उत्पादनप्रणाली,श्रमशक्ति और कृषि का अंत है।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच प्रकृति और पर्यावरण का अंत है।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच जनचेतना,जनांदोलन, विचारधारा ,विवेक और साहस का अंत है।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच भाषाओं,सौदर्यशास्त्र,विधाओं का अंत है।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच संस्कृति,अस्मिता,राष्ट्रीयता,स्वतंत्रता और संप्रभुता का अंत है।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच नागरिककता,निजता,बहुलता,नागरिक और नमानवाधिकारों का अंत है।


    मुक्त बाजार में अब सचमुच अब राष्ट्र और राष्ट्रीय सरकार का अंत है।


    बाकी बचा पद्म प्रलय अनंत गाथा।


    बाकी बचा रामायण ,महाबारत और कुरुक्षेत्रे धर्मक्षेत्रे अनंत विनाशलीला।

    बाकी बचा हिमालयी जल सुनामी का अनंत सिलसिला।


    बाकी बचे वे विद्वतजन जो मारे जा रहे जनगण,मारे जाने वाले जनगण की कीमत पर संस्थानों,विश्वविद्यालयों में अनंत मैथुन मध्ये नये नये विमर्श और नये नये सौंदर्यशास्त्र की रचना कर रहे हैं।


    जनता के हक में पल छिनसंध्यासकाले हर शब्द में गुरिल्ला युद्ध की तैयारी कर रहे नवारुण दा के इस मृत्यु उपत्यका से महाप्रस्थान के बाद मैंने लिखा था, यह सत्ता दशक का अंत है।


    लीजिये,लालेकिले की प्राचीर से अंततः घोषणा हो गयी कि यह भारत का अंत है और महाभारत का पुनरूत्थान है।


    একগুচ্ছ পরিকল্পনা, উঠে যাবে যোজনা কমিশন

    লালকেল্লায় চমকপ্রদ 'প্রধান সেবক'

    দিল্লি, ১৬ আগস্ট (সংবাদ সংস্হা)– স্বাধীনতা দিবসে চমক দেবেন নরেন্দ্র মোদি, তেমন খবর আগেই ছিল৷‌ হলও তাই৷‌ লালাকেল্লা থেকে প্রধানমন্ত্রীর ভাষণটি ছিল এবার তাৎক্ষণিক৷‌ লিখিত ভাষণ পড়ার প্রথা থেকে বেরিয়ে এলেন মোদি৷‌ নিজস্ব ঢঙে হিন্দিতে টানা ৭৫ মিনিট ভাষণে মোদি বললেন, বোঝাতে চাইলেন, 'প্রধানমন্ত্রী নয়, আজ আমি আপনাদের সামনে দাঁড়িয়ে আছি প্রধান সেবক হিসেবে৷‌'তাঁর আবেগঘন ভাষণের ছত্রে ছত্রে ভারতের জয়গান৷‌ একই সঙ্গে বেশ কিছু গুরুত্বপূর্ণ সিদ্ধাম্তও ঘোষণা করেছেন৷‌ যা একই সঙ্গে সাহসী এবং চমকপ্রদ৷‌ আবার বিতর্কের ইন্ধন জোগানকারীও বটে৷‌ যেমন, ১৯৫০-এ প্রতিষ্ঠিত যোজনা কমিশন তুলে দেওয়ার কথা ঘোষণা করেছেন তিনি৷‌ জানিয়েছেন, তার পরিবর্তে গঠন করা হবে একটি নতুন প্রতিষ্ঠান৷‌ স্বভাবতই তাতে আলোড়িত হয় সমবেত জমায়েত৷‌ দেশ-বিদেশের বহু অতিথি অভ্যাগতরা, রাষ্ট্রপ্রধানদের প্রতিনিধিরা ছিলেন দর্শকাসনে৷‌ তাঁদের উদ্দেশে ছিল বিনিয়োগের আহ্বান৷‌ বিদেশি বিনিয়োগকারীদের প্রতি তাঁর বার্তা ছিল, আসুন, এদেশে কিছু করুন৷‌ স্বাধীনতা দিবসের ভাষণে মোদির সবচেয়ে বড় চমক 'প্রধানমন্ত্রী জন-ধন যোজনা'৷‌ এই যোজনার আওতায় দেশের প্রতিটি অম্ত্যজ পরিবার ব্যাঙ্ক অ্যাকাউন্ট খোলার সুবিধা পাবে৷‌ পাবে ডেবিট কার্ড. এবং ১ লক্ষ টাকার বিমা৷‌ ব্যক্তিগত অভিজ্ঞতা প্রসঙ্গ তুলে বলেন, হতদরিদ্র পরিবারের সম্তান হয়ে আজ দেশের সর্বোচ্চ পদে তিনি৷‌ এটাই গণতন্ত্র৷‌ ই-গভর্নেন্সের মাধ্যমে দেশকে ডিজিটাল গড়ে তোলার কথা বলেন প্রধানমন্ত্রী৷‌ গতকাল লালকেল্লার সামনে জড়ো হয়েছিলেন কমপক্ষে ১০ হাজার সাধারণ মানুষ৷‌ এই প্রথম জনসাধারণের জন্য অবারিত ছিল রাজপথ৷‌ মোদি সরকার নজির গড়েছে সেখানেও৷‌ ট্রেড মার্ক মোদি কুর্তা এবং খাস গুজরাটি বুটিদার গেরুয়া পাগড়ি পরে থেকে থেকে তাঁদের অভিবাদন, জয়ধ্বনি গ্রহণ করছিলেন প্রধানমন্ত্রী৷‌ একের পর এক সামাজিক বিষয়ও ছুঁয়ে গেছেন তিনি৷‌ বৈদিক যুগের উদাহরণ দিয়ে জাতীয় চরিত্র গঠনের ওপর জোর দিয়েছেন৷‌ লিঙ্গ-বৈষম্য বেড়েই চলেছে৷‌ এই অবস্হায় সোচ্চার হয়েছেন কন্যাভ্রূণ হত্যা নিয়ে৷‌ যেসব অসাধু চিকিৎসক এই অন্যায় কাজ করেন, তাঁদের উদ্দেশে প্রধানমন্ত্রী বলেছেন, দয়া করে এসব বন্ধ করুন৷‌ অভিভাবকদের বলেছেন, ছেলে-মেয়ের মধ্যে ভেদাভেদ করবেন না৷‌ মেয়েদের সুযোগ দিন৷‌ নিজের পায়ে দাঁড়াতে দিন৷‌ মেয়ে বাড়ির বাইরে থেকে ফিরলে কোথায় গেছে, কী করেছে, সব জানতে চান৷‌ ছেলেদের ক্ষেত্রে কি তা করেন? প্রশ্ন ছুঁড়ে দেন প্রধানমন্ত্রী৷‌ বলেন, ধর্ষণের মতো সামাজিক অপরাধ লজ্জায় দেশের মাথা নিচু করেছে৷‌ এই ধরনের ঘটনা রুখতে মেয়েদের স্বাধীনতা নিয়ন্ত্রণ নয়৷‌ বরং ছেলেদের সুশিক্ষা দিতে বার্তা দিয়েছেন তিনি৷‌ গুজরাট-দাঙ্গার সঙ্গে জড়ানো নিজের অতীত-পরিচয় থেকে বেরিয়ে আসার চেষ্টাও করেছেন মোদি৷‌ জাতপাত এবং সাম্প্রদায়িকতার বিরুদ্ধে রুখে দাঁড়াতে আহ্বান জানিয়েছেন৷‌ প্রশ্ন তুলেছেন, আর কতদিন এই বিষ ছড়াবে? এতে কার কী লাভ? তাঁর কথায়, 'অনেক হানাহানি, খুনোখুনি হয়েছে৷‌ তাকিয়ে দেখুন এতে ভারতমাতার ভাবমূর্তি কলুষিত হয়েছে শুধু৷‌'২০১৯-এ মহাত্মা গান্ধীর জন্ম সার্ধশতবর্ষের মধ্যে 'পরিছন্ন ভারত'-এর লক্ষ্যমাত্রা পূরণ করতে চান প্রধানমন্ত্রী৷‌ এ বছর গান্ধীজয়ম্তীতে তার সূচনা করার কথা বলেছেন তিনি৷‌ দেশের শহরে শহরে, গ্রামে গ্রামে রাস্তাঘাট, হাসপাতাল, স্কুল, উপসনালয়ে– কোথাও যেন এক এক কণা ধুলো না থাকে৷‌ দেশবাসীকে এ বিষয়ে প্রতিশ্রুতিবদ্ধ হতে বলেছেন প্রধানমন্ত্রী৷‌ জোর দিয়েছেন মেয়েদের স্কুলে শৌচালয় গড়ায়৷‌ নির্বাচিত সাংসদেরা যাতে তাঁদের কেন্দ্রে অম্তত একটি করে 'মডেল গ্রাম'গড়তে করতে পারেন, তার জন্য 'সাংসদ আদর্শ গ্রাম যোজনা'র পরিকল্পনা ঘোষণা করেছেন প্রধানমন্ত্রী৷‌ পাঁচ বছর সাংসদ থাকাকালে সাংসদদের কাছে কমপক্ষে ৫টি মডেল গ্রাম গড়ে তোলার লক্ষ্যমাত্রা দিয়েছেন তিনি৷‌ আগামী ১১ অক্টোবর জয়প্রকাশ নারায়ণের জন্মবার্ষিকীতে 'সাংসদ আদর্শ গ্রাম যোজনা'র আনুষ্ঠানিক সূচনা হবে৷‌ দীর্ঘ ভাষণে পাকিস্তানের নাম পর্যম্ত উল্লেখ করেননি প্রধানমন্ত্রী৷‌ তবে সদ্য নেপাল ও ভুটানে সফর করা মোদি ওই দুই দেশের জন্য কিছু প্রশংসাসূচক কথা বলেছেন৷‌ দেশের ইতিহাসে মোদিই প্রথম প্রধানমন্ত্রী, যাঁর জন্ম স্বাধীনতার পরে৷‌




    হটিয়ে দিলেন কাচের বর্ম


    রাজীব গান্ধীর পর, নিরাপত্তার ঝুঁকি সব থেকে বেশি নাকি বর্তমান প্রধানমন্ত্রীরই৷‌ গোয়েন্দাবাহিনীর বক্তব্য সেরকমই৷‌ কিন্তু কাচের ঘেরাটোপে থেকে স্বাধীনতা দিবসের ভাষণ দেওয়াটা একেবারেই মেনে নিতে পারেননি তিনি৷‌ লাল কেল্লার ভাষণে এবার তাই ছিল না সেই বুলেট-প্রুফ কাচের বর্ম৷‌ ১৯৮৫ সালে প্রথম এই কাচের ঘেরাটোপের সুরক্ষা চালু হয়৷‌ রাজীব গান্ধীর জন্য৷‌ প্রধানমন্ত্রী হওয়ার পর ভি পি সিংয়ের এই নিয়ে অস্বস্তি থাকায় ১৯৯০-এর স্বাধীনতা দিবসে এই ঘেরাটোপের উচ্চতা কমিয়ে অর্ধেক করে দেওয়া হয়৷‌ পি ভি নরসিংহ রাও আসার পর আবার মানুষ-প্রমাণ উঁচু ঘেরাটোপ৷‌ মোদি এবার তাতে বাদ সাধলনে৷‌ তাঁর যুক্তি, মানুষের সঙ্গে সরাসরি সংযোগের বোধে এই ঘেরাটোপ একটি বাধা৷‌ শুক্রবার অনুষ্ঠানের ঘণ্টা কয়েক আগে সরিয়ে দেওয়া হয় ঘেরাটোপ৷‌ বলাই বাহুল্য, নিরাপত্তা-কর্তারা সমস্যাতেই পড়েন প্রধানমন্ত্রীর সিদ্ধাম্ত নিয়ে৷‌ ঘণ্টা তিনেকের এক বৈঠকের পর অন্যভাবে নিরাপত্তা আরও আঁটোসাঁটো করার সিদ্দাম্ত নেন তাঁরা৷‌ প্রধানমন্ত্রীকে কাছ থেকে ঘিরে রাখা এস পি জি রক্ষীদের সংখ্যা বাড়ানো হয়৷‌ গৌরাশঙ্কর মন্দির, দিগম্বর জৈন মন্দির, বাস টার্মিনাস-সহ লাল কেল্লার আশপাশের সমস্ত উঁচু বাড়িগুলির মাথায় মোতায়েন করা হয় সুদক্ষ বন্দুকবাজদের৷‌ রাতে রাষ্ট্রপতি ভবনের অনুষ্ঠানে প্রধানমন্ত্রী মোদি আরও একবার ব্যতিব্যস্ত করে তোলেন তাঁর রক্ষীদের৷‌ নিরাপত্তার বেষ্টনী ভেঙে এগিয়ে গেলেন অতিথি-অভ্যাগতদের কাছে৷‌ হাত মেলালেন তাঁদের সঙ্গে৷‌ শিশুদের অটোগ্রাফও দিলেন৷‌


    ফৌজি শক্তিই যুদ্ধ ঠেকাতে পারে: মোদি

    মুম্বই, ১৬ আগস্ট (পি টি আই)– দেশীয় প্রযুক্তিতে তৈরি বৃহত্তম যুদ্ধজাহাজ আই এন এস কলকাতা যুক্ত হল নৌবাহিনীতে৷‌ শনিবার এক অনুষ্ঠানে মাজগাঁও ডকইয়ার্ডসে তৈরি জাহাজটিকে ওয়েস্টার্ন ফ্লিটের হতে তুলে দিলেন প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদি৷‌ 'কেউ যাতে আমাদের চ্যালেঞ্জ জানাতে না পারে'সে জন্য সেনাবাহিনীর সর্বস্তরে আধুনিকীকরণের প্রতিশ্রুতি দিয়ে প্রধানমন্ত্রী বলেন, সর্বাধুনিক অস্ত্রে সজ্জিত শক্তিশালী সেনাবাহিনীই এখন যুদ্ধের বিরুদ্ধে সেরা গ্যারান্টি৷‌ যুদ্ধ প্রতিরোধী৷‌ ক্রমশ বাড়তে থাকা আম্তর্জাতিক বাণিজ্যে সামুদ্রিক নিরাপত্তা গুরুত্বপূর্ণ হয়ে উঠেছে৷‌ প্রধানমন্ত্রী আশা প্রকাশ করেন, উন্নত যোগাযোগ ব্যবস্হা-সহ আই এন এস কলকাতা এক্ষেত্রে উল্লেখযোগ্য ভূমিকা নেবে৷‌ প্রতিরক্ষায় ৪৯শতাংশ বিদেশি বিনিয়োগের অনুমতি দেওয়ার সিদ্ধাম্তের উল্লেখ করে তিনি বলেন, সামরিক প্রয়োজনে ছোটখাটো জিনিস আমদানি করার পরিবর্তে ভারত এবার সেগুলি রপ্তানি করবে৷‌ প্রধানমন্ত্রী উদ্বোধন করে দিলেও জাহাজটির প্রধান লং রে? সারফেস টু এয়ার ক্ষেপণাস্ত্র ব্যবস্হা এখনও তৈরি নয়৷‌ ইজরায়েল এখনও ক্ষেপণাস্ত্রগুলি সরবরাহ করতে পারেনি৷‌ জাহাজটির জন্য নিজস্ব প্রযুক্তিতে বিশেষ রেডার ব্যবস্হা তৈরি করছে ডি আর ডি ও৷‌ কিন্তু সেটাও এখন প্রস্তুত নয়৷‌ তার প্রথম পরীক্ষা ব্যর্থ হয়েছে৷‌ এদিন অনুষ্ঠানে ছিলেন প্রতিরক্ষামন্ত্রী অরুণ জেটলি, রাজ্যপাল কে শঙ্করনারায়ণন, মুখ্যমন্ত্রী পৃথ্বীরাজ চৌহান প্রমুখ৷‌


    অবসান ঘটাবেন নেহরু যুগের, ইঙ্গিত লালকেল্লার বক্তৃতায়

    জয়ন্ত ঘোষাল

    নয়াদিল্লি, ১৭ অগস্ট, ২০১৪, ০২:৪৫:৫৬

    স্বাধীনতার পর থেকে আজ পর্যন্ত ১৫ অগস্ট লালকেল্লায় কোনও প্রধানমন্ত্রী লাল পাগড়ি পরে বক্তৃতা দেননি। ইদানীং কালে বুলেটপ্রুফ জ্যাকেট না-পরে, বুলেটপ্রুফ কাচের ঘেরাটোপে না দাঁড়িয়ে এমনকী মাথার উপর কালো ছাতা না রেখেও বক্তৃতা দেননি কেউ।

    সেই রীতি বদলালেন নরেন্দ্র দামোদরদাস মোদী। কিন্তু চোখে পড়া এই বদলের বাইরে দীর্ঘ এক ঘণ্টার বক্তৃতায় আরও একটা বদল নিঃশব্দে করে ফেললেন তিনি। ভারতের সুদীর্ঘ নেহরুবাদী রাজনৈতিক সংস্কৃতির অবসান ঘটিয়ে শুরু করলেন নতুন বিজেপি যুগ।

    লোকসভা ভোটের প্রচারপর্বেই 'কংগ্রেসমুক্ত ভারত'গড়ার কথা বলেছিলেন মোদী। সরকার গড়ার পরে সর্দার বল্লভভাই পটেলের ১৮২ মিটার উঁচু মূর্তি স্থাপনের জন্য বাজেটে আড়াই হাজার কোটি টাকা বরাদ্দ করা থেকে শুরু করে অটলবিহারী বাজপেয়ী এবং সুভাষচন্দ্র বসুকে ভারতরত্ন দেওয়ার প্রস্তাব হাওয়ায় ভাসিয়ে সেই পথেই হাঁটতে শুরু করেছেন তিনি। শুক্রবার স্বাধীনতা দিবসের বক্তৃতায় উৎপাদনমুখী এক নতুন ভারত নির্মাণের কথা বললেন প্রধানমন্ত্রী। এবং সমাজতান্ত্রিক নেহরুকে স্মরণ করার প্রয়োজন নেই।

    যোজনা কমিশন বিলোপ করার ঘোষণা বিজেপি-যুগ সূচনার লক্ষ্যে সবচেয়ে বড় পদক্ষেপ। কারণ, নেহরুর সমাজতান্ত্রিক মডেলের সঙ্গে যোজনা কমিশন ওতপ্রোত ভাবে জড়িত। সমাজতান্ত্রিক সোভিয়েত ইউনিয়নের ধাঁচে নিজে এই সংস্থা গড়েছিলেন তিনি। বলতেনও, 'আমি সমাজতন্ত্রী'। (যদিও অনেকের মতে, নেহরু প্রকাশ্যে নিজেকে সমাজতন্ত্রী দাবি করলেও তিনি উৎপাদনমুখী বৃদ্ধিই চেয়েছিলেন। সোভিয়েত ইউনিয়নের ঘনিষ্ঠ হওয়া সত্ত্বেও উৎপাদনে জোর দিয়েছিলেন ইন্দিরা গাঁধীও।) মোদী বলেছেন, "সাবেকি সমাজতন্ত্রের সোভিয়েত মডেলের তো কবেই অপমৃত্যু ঘটেছে। এখন আমাদের প্রয়োজন ভারতের শিল্পক্ষেত্রে জোয়ার আনার জন্য উৎপাদন বৃদ্ধি।"

    যে ঘোষণাকে সনিয়া গাঁধীর বিপরীত অবস্থান হিসেবেই দেখা হচ্ছে। ইউপিএ-র চেয়ারপার্সন এবং জাতীয় উপদেষ্টা পরিষদের প্রধান হিসেবে উৎপাদনের চেয়ে সরবরাহের উপরেই গুরুত্ব দিয়েছিলেন সনিয়া। সেই অভিমুখ ১৮০ ডিগ্রি ঘুরিয়ে দিতে চান মোদী। সরকারি প্রকল্প থেকে মুছে ফেলতে চান গাঁধী পরিবারের ছাপ।

    তবে এত দিন ধরে চলে আসা সামাজিক প্রকল্পগুলির উপরে তিনি যে স্টিমরোলার চালাতে চান না, সেটাও বুঝিয়ে দিয়েছেন মোদী। তাই বলেছেন, তিনি চান প্রতিটি সাংসদ একটি করে গ্রামকে দত্তক নিয়ে তার উন্নয়ন করুন। বলেন, মেয়েদের স্কুলে শৌচাগার নির্মাণকে অগ্রাধিকার দেওয়ার কথা। অনেকের মতে, সামাজিক সমস্যাগুলিকে চিহ্নিতের মধ্যে একটা জিনিস স্পষ্ট। তা হল, বিপুল সংখ্যাগরিষ্ঠতার জোরে মোদীর রাজনৈতিক কর্তৃত্ব প্রবল হলেও তিনি তাঁর দক্ষিণপন্থী সংস্কারের অভিমুখকে সুকৌশলে বাস্তবায়িত করতে চান।

    লিখিত বক্তৃতা নিয়ে লালকেল্লায় যাননি মোদী। কয়েকটা পয়েন্ট লেখা কাগজ দেখে তাৎক্ষণিক বক্তৃতা দিয়েছেন। কিন্তু এতটুকু অগোছালো ছিল না সেই ভাষণ। যেখানে যে বার্তা দেওয়ার, দিয়েছেন সুকৌশলে। যেমন বলেছেন, তিনি সকলকে নিয়ে চলতে চান। প্রতিটি রাজনৈতিক দল, এমনকী বিরোধীদেরও নিয়ে। বোঝাতে চেয়েছেন, কংগ্রেস যদি অসহযোগিতার পথে হাঁটে, সেই দায় তাঁর নয়।

    বন্ধুত্বের বার্তা দিয়েছেন প্রতিবেশী দেশগুলিকে। তাদের সঙ্গে হাত মিলিয়ে আর্থিক বিকাশ ঘটিয়ে এই অঞ্চলে দারিদ্র দূর করতে চেয়েছেন। এমনকী তীব্র করেননি পাকিস্তান বিরোধিতাও। অতীতে অনেক প্রধানমন্ত্রীই যা করেছেন। দু'দিন আগে কার্গিলে গিয়ে পাকিস্তান সম্পর্কে যা বলার বলেছেন মোদী। ১৫ অগস্ট এড়িয়েছেন নতুন করে সংঘাতের আবহ। বরং তাৎপর্যপূর্ণ ভাবে বলেছেন, "যে মারে, তার চেয়ে যে বাঁচায় তার শক্তি বেশি।"

    সরকার পরিচালনা থেকে কূটনীতি, সর্বত্রই নয়া পথে হাঁটতে চান মোদী। কিন্তু দার্শনিক ম্যাকিয়াভেলি তাঁর 'প্রিন্স'বইয়ে লিখেছিলেন, "রাজার পক্ষে সবচেয়ে কঠিন কাজ হল নতুন কিছু করা। স্থিতাবস্থা বজায় রাখা সহজ।"নতুন 'প্রিন্স'বক্তৃতায় যা-ই বলুন, বাস্তবে থোড় বড়ি খাড়ার বদলে সত্যিই নতুন ভারত গড়তে পারবেন তো প্রশ্ন বিরোধীদের।

    • প্রধানমন্ত্রী নই, আমি আপনাদের প্রধান সেবক।

    • দিল্লিতে এসে, ক্ষমতার অলিন্দে তাকিয়ে চমকে উঠেছি। সরকারের ভিতরে যেন ডজন সরকার চলছে। মনে হচ্ছে আলাদা আলাদা জমিদারি।

    • মেয়ে হলে এতো প্রশ্ন, কিন্তু ছেলেদের কি আমরা প্রশ্ন করি, কোথায় যাচ্ছে, বন্ধু কে? ধর্ষণকারীরা তো কারও না কারও ছেলে।

    • কাঁধে বন্দুক নিয়ে মাওবাদীরা মাটিকে লাল করে তুলতে পারে। কখনও কি ওরা ভেবেছে, যদি কাঁধে হাল হতো, তা বলে মাটি কেমন সবুজ হয়ে উঠতে পারত।

    • জাতিবাদ, সাম্প্রদায়িকতা নিয়ে লড়াই বন্ধ থাকুক। পরের দশ বছর এই অশান্তি থেকে দূরে থাকার মন তৈরি করুন।

    • সরকারি কর্মীদের প্রতি আমার প্রশ্ন, তাঁরা যে পরিষেবা দেওয়ার কথা বলেন, সেই শব্দটা জোর হারিয়ে ফেলেনি তো?

    • সাংসদরা প্রত্যেকে একটা করে গ্রাম দত্তক নিক।

    http://www.anandabazar.com/national/modi-calls-the-end-of-nehru-age-1.60146

    বিদেশি বিনিয়োগ টানতে এ বার ১০টি স্মার্ট সিটি চিহ্নিত করল রাজ্য

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ১৭ অগস্ট, ২০১৪, ০১:১১:৪৬


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    বিদেশি লগ্নি ও কেন্দ্রীয় আর্থিক সহায়তা টানতে দশটি জায়গাকে 'স্মার্ট সিটি'হিসেবে চিহ্নিত করেছে রাজ্য। আজ থেকে মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের সিঙ্গাপুর সফরের পরিপ্রেক্ষিতে বিষয়টি গুরুত্বপূর্ণ বলে মনে করছে সংশ্লিষ্ট শিল্পমহল।  তার কারণ বিদেশমন্ত্রী সুষমা স্বরাজ শনিবারই তাঁর একদিনের সিঙ্গাপুর সফর শেষে বলেছেন, স্মার্ট সিটি প্রকল্পে সহায়তা করতে রাজি সিঙ্গাপুর।

    শনিবার ন্যাশনাল অ্যাসোসিয়েশন অব রিয়েলটর্স এবং রিয়েলটর্স অ্যান্ড এস্টেট কনসালট্যান্টস অ্যাসোসিয়েশন অব কলকাতা আয়োজিত আলোচনাসভায় জানানো হয়, স্মার্ট সিটি-র তকমা দেওয়া হচ্ছে, নিউটাউন, বোলপুর, দুর্গাপুর, বাউড়িয়া, রঘুনাথপুর, জয়গাঁ, ফুলবাড়ি, গঙ্গাসাগর, হুগলি, কল্যাণীকে। নগরোন্নয়ন সচিব দেবাশিস সেন সভায় জানান, এই তালিকা-সহ পরিকল্পনার খুঁটিনাটি কেন্দ্রের কাছে পাঠানো হবে।

    পুর ও নগরোন্নয়নমন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম ওই সভায় বলেন, "স্মার্ট সিটিগুলি মূলত গড়ে উঠবে তথ্যপ্রযুক্তির উপর নির্ভর করে। সেই কারণে আমরা যে সিঙ্গাপুর যাচ্ছি, সেখানে একই সঙ্গে তথ্যপ্রযুক্তি পার্ক তৈরি এবং আবাসন-সহ বিভিন্ন পরিকাঠামোর কাজে দক্ষ সংস্থার সঙ্গে আলোচনা করব। পাশাপাশি, মোনো-রেল-এর মতো গণ পরিবহণ ব্যবস্থা তৈরি করতে সরকার পিপিপি মডেলে কাজ করতে চায়। সে জন্য এই ধরনের কাজে দক্ষ, এমন সব বিদেশি সংস্থার সঙ্গেও কথা বলা হবে।"

    গত জুলাই মাসে পেশ হওয়া কেন্দ্রীয় বাজেটে 'স্মার্ট সিটি'-র প্রসঙ্গ উঠে আসে। অর্থমন্ত্রী অরুণ জেটলি জানান, উন্নয়নের ফলে গ্রাম ছেড়ে শহরে বাস করার প্রবণতা বাড়ছে। তৈরি হচ্ছে নতুন মধ্যবিত্ত শ্রেণি। যাদের লক্ষ্য উন্নতমানের জীবনযাত্রা। আর এই নতুন মধ্যবিত্তদের জন্য চাই নতুন শহর। বর্তমান বড় শহরগুলির পাশে ছোট ছোট এ সব শহরে গড়ে উঠবে আবাসন-সহ অন্যান্য পরিকাঠামো। এ ধরনের শহরকেই 'স্মার্ট সিটি'বলেছেন জেটলি। দেশ জুড়ে ১০০টি স্মার্ট সিটি তৈরির পরিকল্পনা করেছে কেন্দ্র। বরাদ্দ হয়েছে ৭০৬০ কোটি টাকা।

    দেবাশিসবাবু জানান, এ ধরনের স্মার্ট সিটির নাগরিক পরিকাঠামো গড়ে তুলবে রাজ্য। রাস্তাঘাট, নিকাশি, আলো ও জলের মতো ন্যূনতম পরিষেবা ব্যবস্থার দায় সরকার নেবে। তবে আবাসন ও সামাজিক পরিকাঠামো তৈরির জন্য দেশি-বিদেশি নির্মাণ সংস্থার লগ্নির দিকেই তাকিয়ে রয়েছে রাজ্য। মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের সিঙ্গাপুর সফর চলাকালীন এ ধরনের প্রকল্পে বিনিযোগ করতে আগ্রহী সংস্থা এগিয়ে আসতে পারে বলে তিনি মনে করেন। প্রসঙ্গত, সিঙ্গাপুরের সংস্থা কেপেল ম্যাগাস রাজারহাটে আবাসন তৈরিতে বিনিয়োগ করেছিল। কিন্তু সেই ব্যবসা বিভিন্ন স্থানীয় সংস্থাকে বিক্রি করে দিয়ে প্রকল্প থেকে সরে গিয়েছে এই সংস্থা।

    সংশ্লিষ্ট মহলের দাবি, এ ধরনের শহরে আবাসন তৈরির জন্য প্রত্যক্ষ বিদেশি লগ্নি টানতে কেন্দ্র প্রকল্পের মাপ ২০ হাজার বর্গ মিটারে নামিয়ে এনেছে। আগে ৫০ হাজার বর্গ মিটারের নীচে কোনও প্রকল্প প্রত্যক্ষ বিদেশি লগ্নি নেওয়ার ছাড়পত্র পেত না। একই সঙ্গে নামিয়ে আনা হয়েছে লগ্নির পরিমাণ। নতুন নিয়মে ন্যূনতম লগ্নির পরিমাণ ৫০ লক্ষ মার্কিন ডলার (৩০ কোটি ডলার)। আগে তা ছিল ১ কোটি ডলার। প্রকল্প থেকে বেরিয়ে যাওয়ার সময়সীমা অবশ্য তিন বছরই রয়েছে।

    http://www.anandabazar.com/business/%E0%A6%AC-%E0%A6%A6-%E0%A6%B6-%E0%A6%AC-%E0%A6%A8-%E0%A7%9F-%E0%A6%97-%E0%A6%9F-%E0%A6%A8%E0%A6%A4-%E0%A6%8F-%E0%A6%AC-%E0%A6%B0-%E0%A7%A7%E0%A7%A6%E0%A6%9F-%E0%A6%B8-%E0%A6%AE-%E0%A6%B0-%E0%A6%9F-%E0%A6%B8-%E0%A6%9F-%E0%A6%9A-%E0%A6%B9-%E0%A6%A8-%E0%A6%A4-%E0%A6%95%E0%A6%B0%E0%A6%B2-%E0%A6%B0-%E0%A6%9C-%E0%A6%AF-1.60073

    কোমায় যাওয়ার পথে শহরের পরিবহণ

    17 Aug 2014, 08:50

    কোমায় যাওয়ার পথে শহরের পরিবহণমুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় সোমবার থেকে প্রায় এক সপ্তাহ শহরে থাকবেন না৷ তাঁর অনুপস্থিতিতে কাল সোমবার থেকে সপ্তাহের চার দিনই ট্যাক্সিচালকদের ধিক্কার আন্দোলন এবং বাস-মিনিবাসের ধর্মঘটের জেরে রাজ্যে গণ পরিবহণ অচল হওয়ার মুখে৷

    লগ্নির খোঁজে আজ মমতার সিঙ্গাপুর পাড়ি

    17 Aug 2014, 08:56

    বিদেশি বিনিয়োগ আনার লক্ষ্যে আজ, রবিবার সিঙ্গাপুর যাচ্ছেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৷ মুখ্যমন্ত্রী হওয়ার পর মমতার এই প্রথম বিদেশ সফরকে ঘিরে রাজ্যের শিল্প ও বণিক মহলে প্রত্যাশার পাশাপাশি উন্মাদনাও তৈরি হয়েছে৷

    ইবোলা নিয়ে হয়রানি দেশে ফেরা বাঙালির

    17 Aug 2014, 09:05

    পুলিশ যেমন মাঝেসাঝে সন্দেহভাজন জঙ্গি ধরে নিজেদের দর বাড়ায়, জেলা প্রশাসনের কোথাও কোথাও তেমন সন্দেহভাজন রোগী ধরে নিজেদের করিত্‍কর্মা প্রমাণ করতে তত্‍পর হয়ে উঠেছে৷ এই অতি সক্রিয়তার মাসুল গুনতে হল নাইজিরিয়া প্রবাসী বার্নপুরের এক বাঙালি পরিবারকে৷

    শীর্ষ খবর

    এই শহর

    নির্বাচন করাকলকাতাহাওড়া

    http://eisamay.indiatimes.com/



    নেপথ্য ভাষন -অশোক দাশগুপ্ত

    অমিত শাহ এখানে এসে কী করবেন?

    প্রয়াত, প্রখ্যাত ঐতিহাসিক ড. অশীন দাশগুপ্ত ১৯৯২ সালে বাবরি মসজিদ ধ্বংসের পর আজকাল-এ একটি নিবন্ধ লিখেছিলেন৷‌ বাবরি ধ্বংসের তীব্র নিন্দা করলেও, ধর্মনিরপেক্ষ দেশের পক্ষে সওয়াল করলেও, লিখেছিলেন, এই অপরাধের জন্য বি জে পি-কে ভারতীয় রাজনীতিতে অচ্ছুৎ করে দিলে ভুল হবে৷‌ তাহলে আরও দায়-দায়িত্বহীন হয়ে যাবে ওরা৷‌ বরং সংসদীয় গণতন্ত্রের কাঠামোর মধ্যেই রেখে ওদের নিয়ন্ত্রণ করতে হবে৷‌


    ১৯৯৮-৯৯ সালে এসেছে বি জে পি তথা এন ডি এ সরকার৷‌ ক্ষমতায় থেকে ৬ বছরে অযোধ্যায় রামমন্দির গড়ার কর্মসূচিতে ঢুকতে পারেনি বি জে পি৷‌ পরেও না৷‌ ভারতের সংসদীয় গণতন্ত্রে থেকেই দলটা উগ্রতর হতে পারেনি৷‌ সাম্প্রদায়িকতার বিষ ছড়িয়েছে, গুজরাটে গণহত্যা করেছে, কিন্তু প্রচারের মূল অভিমুখ সব মিলিয়ে উন্নয়নের আওয়াজের সঙ্গে মিশিয়ে দিতে হয়েছে৷‌ জোটের স্বার্থে নিজেদের অ্যাজেন্ডা সিন্দুকে ভরে রেখেছে৷‌ এবার বি জে পি নিরঙ্কুশ সংখ্যাগরিষ্ঠ৷‌ তবু, চূড়াম্ত সাম্প্রদায়িক পথে প্রকাশ্যে বিচরণ সম্ভব নয়৷‌ শিক্ষায় ও প্রশাসনে গৈরিক ছাপ পড়ছেই, কিন্তু দেশটাকে চূর্ণ-বিচূর্ণ করে দেওয়ার পথে এগনো যাবে না৷‌ ধর্মনিরপেক্ষ ভারতবাসী অম্তত এটুকু নিশ্চিত করতে পেরেছেন৷‌


    রাজনাথ সিং সাম্প্রতিক লোকসভা নির্বাচনে পশ্চিমবঙ্গে দলের সাফল্যকে গুরুত্ব দিয়ে বলে গেছেন, ভবিষ্যৎ খুবই উজ্জ্বল৷‌ নতুন সভাপতি অমিত শাহর লক্ষ্য, 'দেশের সব রাজ্যে সরকার গড়া৷‌'তিনি আসছেন বাংলায়, সেপ্টেম্বরে৷‌ উত্তরপ্রদেশে ৮০-র মধ্যে ৭১ আসন তুলে নিয়ে তিনি মোদির 'ম্যান অফ দি ম্যাচ'৷‌ সেই মহাতারকা এখানে এসে কী করবেন?


    ৬ থেকে ১৭ শতাংশ৷‌ ভোটের অঙ্কে এই অগ্রগতি বি জে পি নেতাদের উদ্দীপ্ত করেছে৷‌ তৃণমূল ও কংগ্রেস থেকে কিছু, বাম দলগুলোর থেকেও অনেক লোক পদ্ম-জাহাজে উঠে পড়ছেন৷‌ রাহুল সিনহাদের দলকে গুরুত্ব না দিয়ে উপায় নেই৷‌ লক্ষ্য ২০১৬, তার আগে বিশেষত কলকাতা ও শিলিগুড়ি পুরসভা ভোটে চমকপ্রদ সাফল্য আশা করছেন নেতারা৷‌


    খুচরো হিসেবটা আগে হয়ে যাক৷‌ না৷‌ কলকাতা বা শিলিগুড়ি পুরসভা দখল করা সম্ভব নয়৷‌ শিলিগুড়িতে তৃণমূল এবং বামফ্রন্ট তো আছেই, কংগ্রেসও একটা শক্তি৷‌ চতুর্মুখী লড়াই জমতে পারে, বি জে পি কয়েকটা আসন পেতে পারে, কিন্তু ক্ষমতা দখল দিবাস্বপ্ন৷‌ মোর্চার হাত ধরে দার্জিলিং আসনে জয় এসেছে, কিন্তু সেজন্যই শিলিগুড়িতে বি জে পি ঝড় উঠবে না৷‌ এগোতে পারে অবশ্যই৷‌


    কলকাতা পুরসভাও যে আসন্ন ভোটে তৃণমূলের দখলে যাবে, বলে দেওয়া যায়৷‌ কংগ্রেস শূন্য হবে না, বামপম্হীরা নিশ্চয়ই কিছু আসন পাবেন৷‌ বি জে পি-র বাস্তব লক্ষ্য হতে পারে পুরসভার প্রধান বিরোধী দল হওয়া৷‌ দক্ষিণ কলকাতায় লোকসভা ভোটে কিছু এলাকায় দারুণ ফল করেছে বি জে পি৷‌ একটা কারণ, সম্পন্ন অবাঙালিরা ঢেলে ভোট দিয়েছেন৷‌ বি জে পি-কে নয়, মোদিকে৷‌ সেই জায়গাটা মজবুত করার জন্য উঠেপড়ে লেগেছে তৃণমূল৷‌ ওখানে মোদি এখানে মমতা, এই সূত্র কাজ করতে পারে৷‌


    সঙঘপ্রধান মোহন ভাগবত বলে দিয়েছেন, কোনও বিশেষ ব্যক্তির জোরে বি জে পি জেতেনি, দেশবাসী কংগ্রেসকে সরাতে চেয়েছে, তাই নতুন সরকার৷‌ অর্ধসত্য৷‌ চমকপ্রদ জয়ে বড় ভূমিকা অবশ্যই নরেন্দ্র মোদির, যে হাওয়া পুরভোটে থাকবে না৷‌


    ২০১৬ বিধানসভা ভোট বড় লক্ষ্য৷‌ অমিত শাহ বলছেন, সরকার দখলের স্বপ্ন দেখতে হবে৷‌ শমীক ভট্টাচার্য বলছেন, 'পরিবর্তন'দেখেছেন মানুষ, এখন চাইছেন 'পরিত্রাণ'৷‌ কে পরিত্রাতা? বি জে পি? ওদের উত্থানে মমতা ব্যানার্জি উদ্বিগ্ন৷‌ ক্ষতিগ্রস্ত বামফ্রন্ট৷‌ তৃণমূলবিরোধী ভোট ভাগ হয়ে গেছে৷‌ বেশ কিছু বাম কর্মী আম্তর্জাতিক মানের ডিগবাজি খেয়ে বি জে পি-র দিকে গেছেন৷‌ অনেকেই ভয়ে, বি জে পি-কে নিরাপদ আশ্রয় ভেবে৷‌ এই নব্য গেরুয়ারা অধিকাংশ ক্ষেত্রেই দলের বোঝা হবেন৷‌ 'পরিত্রাণ'আনার শক্তি (বা 'নিষ্ঠা') এদের নেই৷‌


    বাপী লাহিড়ী কোথায়? চন্দন মিত্রর মতো পরিণত রাজনীতিকই বা রাজ্যে এখন কতটা সক্রিয়? বাবুল সুপ্রিয় শুধু কঠিন কেন্দ্রে জেতেননি, সাংসদ হিসেবেও ছাপ রাখছেন৷‌ হাওড়া কেন্দ্রে পরাজিত জর্জ বেকার 'যথাসাধ্য'খাটছেন৷‌ তথাগত রায়ের মতো প্রবীণ নেতা আছেন, বাবুল সুপ্রিয় উঠে এসেছেন, শমীক ভট্টাচার্য দুরম্ত বক্তা, সংগঠনের দায়িত্ব খুব ভালভাবে সামলাচ্ছেন রাহুল সিনহা৷‌ কিন্তু, রাজ্যবাসীর সামনে বিকল্প মুখ্যমন্ত্রী হিসেবে কাউকে তুলে ধরা যাচ্ছে কি?


    পরবর্তী বিধানসভা ভোটে মোদি হাওয়া থাকবে না৷‌ বিপুল প্রত্যাশা ফেরি করে ক্ষমতায় এসেছেন মোদি৷‌ আড়াই মাসে মনে হয়নি, দারুণ কিছু করে দেখাতে পারছেন৷‌ এই ধারা যদি অব্যাহত থাকে, ২০১৬ সালে এ রাজ্যেও এক ধরনের প্রতিষ্ঠান-বিরোধিতা মুশকিলে ফেলতে পারে বি জে পি-কে৷‌


    তা, অমিত শাহ এসে কী করবেন? উত্তরপ্রদেশে সাম্প্রদায়িক মেরুকরণ ঘটিয়ে আশাতীত সাফল্য পেয়েছেন 'ম্যান অফ দি ম্যাচ'৷‌ উত্তরপ্রদেশ আর পশ্চিমবঙ্গ এক নয়৷‌ একজন মুলায়মের ওপর এখানে সাম্প্রদায়িক শক্তির বিরোধিতা নির্ভরশীল নয়৷‌ গ্রহণযোগ্য বিকল্প হিসেবে উঠে আসার জন্য এ রাজ্যে উপযুক্ত প্রমাণিত হতে পারেন না অমিত শাহ৷‌ যা করার করতে হবে রাজ্য নেতাদেরই৷‌ অমিতজির উপস্হিতি ও ভাষণ নিশ্চয় বি জে পি নেতা ও কর্মীদের উৎসাহিত করবে৷‌ কিন্তু সে উৎসাহের আয়ু সাত দিনের বেশি নয়৷‌ মনে হয়, রাহুল সিনহারাও জানেন৷‌



    মুম্বই, ওড়িশায় ৬০ জায়গায় তল্লাশিতে মিলল সূত্র

    বরেন্দ্রকৃষ্ণ ধল, ভুবনেশ্বর প্ত সোমনাথ মণ্ডল, কলকাতা


    সারদা-কাণ্ডে আরও কড়া পদক্ষেপ করতে চলেছে সি বি আই৷‌ গ্রেপ্তার হতে পারেন দুই প্রভাবশালী ব্যক্তি৷‌ বৃহস্পতিবার কলকাতা, ওড়িশা ও দিল্লিতে ম্যারাথন তল্লাশি চালিয়ে কেন্দ্রীয় গোয়েন্দাদের হাতে এসেছে বেশ গুরুত্বপূর্ণ নথি৷‌ সেগুলি খতিয়ে দেখার পর ওই দুই প্রভাবশালী ব্যক্তিকে নিজেদের হেফাজতে নিতে চাইছে সি বি আই৷‌ অন্যদিকে, শনিবারও মুম্বই, ওড়িশার৬০টি জায়গায় সকাল থেকেই তল্লাশি অভিযান চালান গোয়েন্দারা৷‌ তল্লাশিতে মিলেছে কিছু সূত্রও৷‌ সারদার আর্থিক কেলেঙ্কারি এ রাজ্যের সীমানা ছাড়িয়ে দেশের বিভিন্ন প্রাম্তে ছড়িয়ে পড়ার পেছনে পুলিস-প্রশাসন থেকে শুরু করে রাজনীতিকদের গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা রয়েছে বলে মত সি বি আইয়ের৷‌ কোটি কোটি টাকার হদিশ পেতে হলে, তাদের জেরা করার পাশাপাশি তল্লাশির প্রয়োজন রয়েছে বলে মনে করছেন গোয়েন্দারা৷‌ সি বি আইয়ের ডিরেক্টর রঞ্জিত সিনহা জানিয়েছেন, সারদা তদম্তে সব দিক খতিয়ে দেখা হবে৷‌ কাউকেই রেয়াত করা হবে৷‌ সি বি আইয়ের স্পেশাল ইনভেস্টিগেশন টিম (সিট)-এর অফিসারদের নিয়ে একটি বৈঠক করেন তিনি৷‌ তদম্তের গতিপ্রকৃতি কী হবে? প্রভাবশালীদের গ্রেপ্তারের বিষয় নিয়েও আলোচনা হয়৷‌ এই বৈঠক থেকে নির্দেশ পাওয়ার পরই সারদা তদম্তে আরও চাপ বাড়াতে শুরু করে তদম্তকারীরা৷‌ শুক্রবার কলকাতার ২২ জায়গায় তল্লাশি চালানো হয়৷‌ ইস্টবেঙ্গল কর্তা দেবব্রত সরকার (নীতু) থেকে শুরু করে প্রাক্তন পুলিসকর্তা রজত মজুমদার-সহ সারদার কর্মীদের বাড়িতে চিরুনি তল্লাশি চলে৷‌ শনিবার ওড়িশার বি জে ডি বিধায়ক প্রভাত ত্রিপাঠীর বাড়িতে হানা দেন গোয়েন্দারা৷‌ তিনি একটি স্হানীয় সংবাদপত্রের মালিকও৷‌ কলকাতা থেকে সি বি আইয়ের অফিসারেরা গিয়ে তাঁকে বেশ কয়েক ঘণ্টা জেরা করেছে বলে জানা গেছে৷‌ ওড়িশার ভুবনেশ্বর, বালেশ্বর এবং বেহেরামপুর-সহ সারদার ৫৬ টি জায়গায় বিভিন্ন আস্তানা থেকে উদ্ধার হয়েছে নথিপত্র৷‌ ওড়িশা ক্রিকেট অ্যাসোশিয়েশনের সচিব আশীর্বাদ বেহরা এবং প্রাক্তন যুব কংগ্রেস নেতা সন্দীপ কুম্তিয়ার বাড়িতেও তল্লাশি চালানো হয়৷‌ আশীর্বাদ বেহরা সাংবাদিকদের বলেন, সারদা-কাণ্ডের সঙ্গে তিনি কোনওভাবেই যুক্ত নন৷‌ সি বি আই সূত্রে খবর, ওড়িশা ক্রিকেট অ্যাসোশিয়েশনের সচিবের খুর্দা, কটক ও ভুবনেশ্বরের বাড়ি থেকে মিলেছে বেশ কিছু সূত্র৷‌ ওড়িশায় ব্যবসা চালানোর জন্য কোটি কোটি টাকা নিয়েছিলেন বি জে ডি-র বিধায়ক প্রভাত ত্রিপাঠী৷‌ তাঁর বিরুদ্ধে নির্দিষ্ট তথ্যপ্রমাণও রয়েছে সি বি আইয়ের হাতে৷‌ ত্রিপাঠীর দাবি, তিনি সারদার কয়েকটি মিটিংয়ে উপস্হিত ছিলেন ঠিকই, কিন্তু তিনি তছরুপের সঙ্গে কোনওভাবেই যুক্ত নন৷‌ এছাড়া ওড়িশার সংবাদপত্র 'সূর্যপ্রভা'র মালিক বিকাশ সোয়েন, চিটফান্ড 'অর্থতত্ত্ব'র চেয়ারম্যান তথা ম্যানেজিং ডিরেক্টর প্রদীপ শেঠির বাড়িতেও হানা দেয় সি বি আই৷‌ তাঁদেরও জেরা করা হয়৷‌ সি বি আই সূত্রে খবর, প্রাক্তন যুব কংগ্রেস নেতা সন্দীপ কুম্তিয়াকে রাতে জেরা করার পর গ্রেপ্তার করে সি বি আই৷‌ তিনি 'অর্থতত্ত্ব'র ডিরেক্টরের পদে ছিলেন৷‌ এর পাশাপাশি মুম্বইয়ের সারদা গোষ্ঠীর দু'টি অফিসে হানা দেয় সি বি আই৷‌ সারদা ট্যুর অ্যান্ড ট্রাভেলসের লেনদেনের নথিপত্র সেখান থেকে উদ্ধার হয়েছে৷‌ টিভি সিরিয়ালের প্রযোজক প্রীতি ভাটিয়া এবং স্টক ব্রোকার দীপক পারেখের বাড়িতে তল্লাশি চলে৷‌ দীপক পারেখ 'অর্থতত্ত্ব'গোষ্ঠীর সঙ্গে সেবি এবং এম সি এক্সের অফিসারদের সঙ্গে পরিচয় করিয়ে দেয়৷‌ প্রীতি ভাটিয়া এই গোষ্ঠীর সঙ্গে মিডিয়া ব্যাবসায় নেমেছিলেন৷‌ তখনই আলাপ হয় দু'জনের৷‌ জানা গেছে, সি বি আই 'কামেয়াব টিভি'র মালিক মনোজ দাস, সহযোগী সত্যব্রত দাসকেও জেরা করা হয়েছে. সি বি আই সূত্রে খবর, সুদীপ্ত সেনের সঙ্গে প্রাক্তন পুলিসকর্তা রজত মজুমদারের পরিচয় হয় ২০১১ সালে৷‌ এক মধ্যস্হতাকারী আমেরিকায় বঙ্গ সম্মেলনে স্পনসরের জন্য রজতবাবুকে সুদীপ্তর কাছে নিয়ে যায়৷‌ তার বিনিময়ে ওই মধ্যস্হতাকারী মোটা টাকাও নিয়েছিল৷‌ বিভিন্ন সময় সুদীপ্তর হয়ে এই 'ব্যক্তি'প্রভাবশালীদের সঙ্গে আলাপ করিয়ে দিত৷‌ সারদার আবাসন প্রকল্পের জন্য রজতবাবুকে নিরাপত্তা পরামর্শদাতা নিয়োগ করেন সুদীপ্ত সেন৷‌ তার জন্য মাসে কয়েক লক্ষ টাকা তিনি পেতেন৷‌ সুদীপ্ত জেরায় জানিয়েছে, চুক্তির পরেও রজতবাবুকে টাকা দিতে হত৷‌ অভিযোগ, জোর করেই এই টাকা আদায় করতেন ওই পুলিসকর্তা৷‌ সুদীপ্তর কাছ থেকে এই তথ্য পেয়েই সি বি আই প্রাক্তন ডি জি-কে ফোন করে৷‌ বৃস্পতিবার তাঁকে নিজের ফ্ল্যাটে আসতে বলেন গোয়েন্দারা৷‌ সেখানে কয়েক ঘণ্টা ধরে চলে জেরা করে অনেক নাম উঠে এসেছে বলে দাবি সি বি আইয়ের৷‌ পাশাপাশি ইস্টবেঙ্গল কর্তা দেবব্রত সরকারের বাড়িতেও তল্লাশি চালিয়ে মিলেছে নথি৷‌ তাঁকে জেরা করে জানতে চাওয়া হয়, কেন তিনি সেবি এবং রেজিস্ট্রার অফ কোম্পানিজের অফিসারদের সঙ্গে সুদীপ্ত সেনের পরিচয় করে দিতে বলেছিলেন৷‌ এর পেছনে কোনও উদ্দেশ্য ছিল কি না, তা জানতে চাওয়া হয়৷‌ সারদার সঙ্গে ইস্টবেঙ্গলের চুক্তির পরিমাণ ঠিক কত টাকার, তা নিয়েও বিভ্রাম্তি রয়েছে বলে সি বি আই সূত্রে খবর৷‌ এদিন পুর ও নগরন্নোয়নমন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম সারদা প্রসঙ্গে সাংবাদিকদের প্রশ্নের উত্তরে বলেন, 'আগে আমানতকারীদের টাকা ফেরতের উদ্যোগ নেওয়া হয়েছিল, এখন তদম্ত নিয়ে রাজনীতি হচ্ছে৷‌'




    তল্লাশি, জেরা


    প্ত ওড়িশার বি জে ডি বিধায়ক প্রভাত ত্রিপাঠী


    প্ত ওড়িশা ক্রিকেট অ্যাসোশিয়েশনের সচিব আশীর্বাদ বেহরা


    প্ত 'অর্থতত্ত্ব'র ডিরেক্টর, প্রাক্তন যুব কংগ্রেস নেতা সন্দীপ কুম্তিয়া গ্রেপ্তার৷‌


    প্ত ওড়িশার সংবাদপত্র 'সূর্যপ্রভা'র মালিক বিকাশ সোয়েন৷‌


    প্ত চিটফান্ড 'অর্থতত্ত্ব'র চেয়ারম্যান তথা ম্যানেজিং ডিরেক্টর প্রদীপ শেঠি৷‌


    প্ত সিরিয়ালের প্রযোজক প্রীতি ভাটিয়া এবং স্টক ব্রোকার দীপক পারেখে৷‌




    এক সরকারে এত সরকার কেন: মোদী

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি, ১৭ অগস্ট, ২০১৪, ০২:৪৭:৪২

    উত্তর নেই। বরং প্রশ্ন তুলতেই আরও গাঢ় হল রহস্য।

    স্বাভাবিক। যখন লাল পাগড়ি মাথায় দিয়ে লালকেল্লায় দাঁড়িয়ে প্রশ্নটা ছুড়ে দেন স্বয়ং প্রধানমন্ত্রী! এক মাস আগেও বলেছিলেন। ফের বললেন।

    কী সেই বিষয়, যা চমকে দিয়েছে বিপুল ভোটে জিতে আসা প্রবল ক্ষমতাশালী নরেন্দ্র মোদীকেও? সরকার গড়ার দু'মাস পরে স্বাধীনতা দিবসে প্রথম বক্তৃতাতেও তা মেলে ধরতে হয় জনসাধারণের কাছে?

    গত কাল এক ঘণ্টার বেশি বক্তৃতার প্রায় গোড়ার দিকেই প্রসঙ্গটা তোলেন মোদী। তাঁর বক্তব্য, দিল্লিতে তিনি 'আউটসাইডার' (বহিরাগত)। দিল্লির অভিজাত শ্রেণির কাছেও অচ্ছুৎ! প্রধানমন্ত্রী এখানেই থেমে গেলে তার একটা মানে করা যেত। কিন্তু লালকেল্লার মঞ্চে স্বাধীনতা দিবসের বক্তৃতায় প্রধানমন্ত্রী অনেক বেশি সোজাসাপটা। বললেন, নিজে 'আউটসাইডার'ঠিকই, কিন্তু গত দু'মাসে 'ইনসাইডার'হয়ে ভিতরের হাল দেখে চমকে গিয়েছেন তিনি। কেন? প্রধানমন্ত্রীর কথায়, "আমার মনে হল, একটি সরকারের ভিতরেও কয়েক ডজন সরকার চলছে! প্রত্যেকের যেন নিজের নিজের জমিদারি তৈরি হয়ে রয়েছে! আমি দেখলাম সকলে ছত্রভঙ্গ, যুযুধান! এতটাই যে, এক বিভাগ অন্য বিভাগের সঙ্গে লড়াই করার জন্য সুপ্রিম কোর্ট পর্যন্ত চলে যায়!"

    মোদীর এই বিস্ময়, প্রশ্ন নতুন নয়। সরকারের এক মাস পূর্ণ হওয়ার পর মোদী নিজের ব্লগে কতকটা এই ভাষাতেই লিখেছিলেন, সরকারের মধ্যে একটি 'সিলেক্ট গ্রুপ'কাজ করছে। দিল্লির অলিন্দের পরিভাষায় যাকে বলা হয় 'পাওয়ার ব্রোকার'। শুক্রবার সেই বক্তব্যকে আরও খোলসা করে তুলে ধরলেন তিনি। কিন্তু কারা এই পাওয়ার ব্রোকার? কারা সরকারের মধ্যে আরও কয়েক ডজন সরকার তৈরি করে রেখেছেন? মোদীর মতো একজন প্রধানমন্ত্রীকেও কেনই বা বারবার বিষয়টি প্রকাশ্যে আনতে হচ্ছে? উত্তর অবশ্য দেননি প্রশ্নকর্তা, স্বয়ং মোদী। কিন্তু তাঁর তোলা প্রশ্নই এখন ঘুরপাক খাচ্ছে দিল্লির অলিন্দে। চায়ের পেয়ালায়, কফিশপের টেবিলে। এমনকী প্রশাসনের কড়িকাঠেও।

    মোদীর কড়া শাসনের সামনে এমনিতেই ত্রস্ত তাঁর মন্ত্রীরা। কেউ আর মুখ খুলতে চান না। কিন্তু মোদীর তোলা প্রশ্ন তাঁদেরও ভাবাচ্ছে। এমনই এক শীর্ষ মন্ত্রীর কথায়, "কোনও দ্বিমত নেই, দিল্লিতে এমন ক্ষমতার ভরকেন্দ্র অনেক রয়েছে। ইউপিএ-র এক দশকের জমানায় প্রশাসনের বিভিন্ন স্তরে 'ল্যান্ডমাইন'পুঁতে রাখা হয়েছে! মোদী সেগুলিই দূর করতে চাইছেন!"মন্ত্রীদের শাসনে রাখতে গিয়ে তাঁদের সচিব নিয়োগের পদ্ধতি পর্যন্ত বদলে ফেলেছেন মোদী। এমনকী এখন স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী রাজনাথ সিংহকেও কিছুটা অপ্রাসঙ্গিক করে যাবতীয় রাশ নিজের হাতে তুলে নিয়েছেন। কিন্তু দেখেছেন, তাতেও সমস্যা মেটেনি। দেখেছেন, মন্ত্রকে-মন্ত্রকে তুমুল বিবাদ। এক মন্ত্রকের সুপারিশ খারিজ করে দেয় অন্য মন্ত্রক। এটি মূলত হয় আমলা স্তরেই। আর এর পিছনে থাকে কোনও না কোনও গোষ্ঠীর হাত। এই চাপ ঘুরপথে আসে মন্ত্রীদের উপরেও। মোদী-ঘনিষ্ঠ মন্ত্রীদের অনেকেই বলছেন, সম্ভবত এই সব কথাই মোদী বারবার বলতে চাইছেন। যে কারণে এই সমস্যা থেকে বেরোনোর পথ বাতলাতে গিয়ে তিনি বারবার আমলাতন্ত্রের উপরেই খড়্গহস্ত হয়েছেন। মোদী বলেছেন, "এই ছত্রভঙ্গ অবস্থা, যুযুধান দশা কাটাতে আমি চেষ্টা শুরু করেছি। যাতে এই দেওয়াল ভেঙে একটি ইউনিট হিসেবে এক সরকারের এক লক্ষ্য, এক মন, এক দিশা, এক গতিতে কাজ করতে পারি। চাপরাশি থেকে ক্যাবিনেট সচিব সকলের মধ্যেই ক্ষমতা রয়েছে। সেই শক্তিকে জাগিয়ে দেশের উন্নয়নে ব্যবহার করাই আমার লক্ষ্য।"অফিসারদের এক হাত নিয়ে প্রধানমন্ত্রীর কটাক্ষ, "নতুন সরকারে অফিসারেরা সময় মতো অফিস আসছেন, খবরে এটি শুনে সরকারের মুখিয়া হিসেবে আমি খুশি হতে পারতাম। কিন্তু এটিই যদি খবর হয়, তা হলে আমরা কতটা নীচে নেমে গিয়েছি, তার প্রমাণ হয়ে যায়।"

    লালকেল্লায় প্রথম বক্তৃতায় আমলাতন্ত্রের প্রতি এমন তীক্ষ্ন আক্রমণের কারণ ব্যাখ্যা করতে গিয়ে বিজেপির এক নেতা আজ বলেন, "যোজনা কমিশনকেই বিলোপ করে প্রধানমন্ত্রী ক্ষমতার বিকেন্দ্রীকরণ করতে চাইতে পারেন। রাজ্যের হাতেও আরও ক্ষমতা তুলে দিতেও চান তিনি। কিন্তু কেন্দ্রে গোটা সরকারের রাশ তিনি নিজের হাতেই রাখতে চান। যেমনটি গুজরাতের মুখ্যমন্ত্রী হিসেবে তিনি করতে পেরেছেন।"

    বিজেপির ওই নেতা যা-ই বলুন, বাস্তব হল, মোদী এখন গোটা দেশের প্রধানমন্ত্রী, গুজরাতের মুখ্যমন্ত্রী নন। আর রাজধানী দিল্লি, আমদাবাদ নয়। অভিজ্ঞরা জানেন, বিভিন্ন ক্ষেত্রের রাঘব-বোয়ালরা বহু আগে থেকেই এখানে বসে রয়েছেন। মোদী তাঁদেরই শায়েস্তা করতে চান। বলা ভাল, আনুগত্যে আনতে চান। তাঁর পূর্বসূরি মনমোহন সিংহ যে কাজ করতে পারেননি, সেই ব্যবস্থা বদলে সকলকে এক সুরে বাঁধতে তিনি মরিয়া। একটি বিষয় স্পষ্ট, সে কাজে এখনও তিনি সফল হননি। তাই বারবার বিষয়টি প্রকাশ্যে এনে ঘা দিচ্ছেন ব্যবস্থার মূলে। সময়ই বলবে, পোড় খাওয়া এই প্রাচীন দেওয়ালকে তিনি কতটা বদলাতে পেরেছেন।

    কংগ্রেস অবশ্য মোদীর এই প্রয়াসকে ব্যঙ্গ করতে ছাড়েনি। দলের নেতা অভিষেক মনু সিঙ্ঘভি বলেন, "মোদী নিজেকে 'আউটসাইডার'বলে আসলে নির্দোষ হওয়ার ভান করছেন। যাতে নির্বাচনী প্রতিশ্রুতি পূরণের ব্যর্থতাকে ঢাকতে পারেন।"

    http://www.anandabazar.com/national/modi-comments-on-government-policies-1.60148



    যোজনাই বহির্ভূত

    ইতিহাসের ইতি

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি, ১৭ অগস্ট, ২০১৪, ০২:৫৫:০১


    1

    বিদায়, যোজনা কমিশন।

    দিল্লির সাবেক বাবুতন্ত্রের অন্যতম প্রতীক অ্যাম্বাসাডর গাড়ির শেষের ঘণ্টা বেজেছে এই সে দিন। এ বার সোভিয়েত যুগের নিদর্শন যোজনা কমিশনের পালা। গত কাল লালকেল্লা থেকে তাঁর প্রথম স্বাধীনতা দিবসের ভাষণে প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদী বলেন, যোজনা কমিশনের বদলে শীঘ্রই তৈরি হবে একটি নতুন প্রতিষ্ঠান। অর্থ বরাদ্দ আর উন্নয়ন প্রকল্পের নকশা তৈরি যার কাজ হবে না। কাজ হবে উদ্ভাবনী চিন্তাভাবনার জোগান দেওয়া।

    সোভিয়েত ইউনিয়নের সমাজতান্ত্রিক ভাবনা ধার করে ১৯৫০ সালে যোজনা কমিশন গঠন করেছিলেন জওহরলাল নেহরু। তিনিই হয়েছিলেন প্রথম চেয়ারম্যান। তার পর থেকে প্রধানমন্ত্রীরাই বসেছেন যোজনা কমিশনের মাথায়। কিন্তু সময়ের সঙ্গে সঙ্গে এর উপযোগিতা যে কমে এসেছে, তা উপলব্ধি করেছেন একাধিক প্রধানমন্ত্রী। কমিশন ভেঙে দেওয়ার কথা বলেছেন কেউ কেউ। যেমন, রাজীব গাঁধীই যোজনা কমিশনকে 'সাদা হাতি'বলেছিলেন। এমনকী, কমিশনের সদস্যদের 'এক পাল ভাঁড়'আখ্যা দেন বলেও দাবি কারও কারও। মনমোহন সিংহ তখন যোজনা কমিশনের ডেপুটি চেয়ারম্যান।

    সংসদ মার্গে যোজনা কমিশনের বাড়িটা যে আসলে অকর্মণ্য আমলাদের বৃদ্ধাশ্রম হয়ে দাঁড়িয়েছে, তা প্রধানমন্ত্রী হওয়ার পরে বুঝেছিলেন মনমোহন নিজেও। গত মার্চে কমিশনের বৈঠকে সেটা বলেওছিলেন তিনি। তাঁর মত ছিল, সময়ের সঙ্গে বদলাতে হবে যোজনা কমিশনকে। কিন্তু সেই বদলের গতি ছিল নেহাতই শ্লথ। কমিশনের বিদায়ী সদস্য সঈদা হামিদের কথায়, "দ্বিতীয় ইউপিএ-সরকারের জমানায় বারবার যোজনা ভবনে আলোচনা হয়েছে, কমিশনের আকার বদলের সময় এসেছে কি না, তা নিয়ে। নীল নকশা তৈরি হয়েছে।"কিন্তু কিছুরই রূপায়ণ হতে দেখা যায়নি। তার বদলে মনমোহন সিংহের আমলে যোজনা কমিশনের ডেপুটি চেয়ারপার্সন হয়ে কেন্দ্রের বিভিন্ন মন্ত্রকের উপর নিজের নিয়ন্ত্রণ অনেকটাই বাড়িয়ে ফেলেন মন্টেক সিংহ অহলুওয়ালিয়া। যোজনা কমিশনের সঙ্গে নানা মন্ত্রকের সংঘাত বাধে। যোজনা কমিশনের প্রাসঙ্গিকতা নিয়ে প্রশ্ন ওঠে আরও বেশি করে।

    এই অবস্থায় শুক্রবার সকালে এক ধাক্কায় জুরাসিক যুগের অবসান ঘটালেন নরেন্দ্র মোদী। বললেন, "কখনও কখনও পুরনো বাড়ি মেরামতে খরচ বেশি পড়ে, অথচ আমরা তাতে সন্তুষ্টও হই না। তাই আমাদের মনে হয়, সবাই মিলে একটা নতুন বাড়ি তৈরি করলেই ভাল।"যে ঘোষণাকে নব্বইয়ের দশকে লাইসেন্স রাজ অবসানের পরে সবচেয়ে বড় সংস্কার হিসেবে দেখা হচ্ছে। কমিশনের বিদায়ী সদস্য অরুণ ময়রার কথায়, "যোজনা কমিশন বদলাচ্ছিল ঠিকই। কিন্তু দ্রুত গতিতে নয়। এই কাজ বলে বলে করানো যেত না। এক ঝটকায় করতে হতো। মোদী তাই করেছেন।"

    বিরোধীরা অবশ্য মোদীর ঘোষণা নিয়ে ইতিমধ্যেই প্রশ্ন তুলেছে। কংগ্রেস নেতা জয়রাম রমেশের কথায়, "যোজনা কমিশন তুলে দিতে চাইলে আবার আলাদা সংস্থা গড়ার কথা বলা হচ্ছে কেন! এটা কি তা হলে নিছকই নাম বদল? যোজনা কমিশনের কাজই করবে নতুন সংস্থা?"

    যোজনা কমিশনের কাজ কী ছিল?

    এক কথায়, উন্নয়ন ও বিনিয়োগ বাবদ অর্থের জোগান এবং কোথায়, কোন ক্ষেত্রে সেই অর্থ খরচ করা প্রয়োজন এই দু'টিকে মিলিয়ে দেওয়া। অর্থাৎ এক দিকে পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনা তৈরি করে বিভিন্ন রাজ্য বা কেন্দ্রীয় মন্ত্রকের জন্য অর্থ বরাদ্দ। অন্য দিকে উন্নয়নমুখী প্রকল্পের নকশা তৈরি। কিন্তু নেহরুর যুগে প্রায় সবটাই ছিল সরকারি বিনিয়োগ। রাষ্ট্রায়ত্ত সংস্থা কোথায় ইস্পাত কারখানা বসাবে, কোথায় বিদ্যুৎ উৎপাদন কেন্দ্র তৈরি করবে, তা যোজনা কমিশনই ঠিক করে দিত। কিন্তু '৮০ থেকে '৯০-এর দশকে বেসরকারি বিনিয়োগ বাড়তে শুরু করল। কমতে থাকল যোজনা কমিশনের ভূমিকাও।

    সোভিয়েত ইউনিয়নে উন্নয়নের পরিকল্পনা তৈরির কাজটি করত 'গসপ্ল্যান'। যা দেখেই নেহরুর মাথায় যোজনা কমিশনের ভাবনা আসে। সোভিয়েতের পতনের সঙ্গে সঙ্গে 'গসপ্ল্যান'-ও উঠে যায়। বিশ্বের বহু দেশেই যোজনা কমিশন বলে কোনও বস্তু নেই। কারণ সেখানে বেসরকারি বিনিয়োগই এখন প্রধান বিনিয়োগ। এমনকী চিনেও যোজনা কমিশন চরিত্র বদলেছে, নামও। সে দেশের 'ন্যাশনাল ডেভেলপমেন্ট অ্যান্ড রিফর্ম কমিশন'এখন ত্রয়োদশ যোজনা তৈরির কাজ করছে। মূলত তার কাজ হল, যেখানে উন্নয়নের অভাব রয়েছে, সরকারি-বেসরকারি যৌথ উদ্যোগে তৈরি প্রকল্পগুলি সেখানে নিয়ে যাওয়া।

    মোদীর প্রস্তাবিত নতুন প্রতিষ্ঠানও অনেকটা এই পথেই চলবে বলে মনে করা হচ্ছে। মোদী বলেন, নয়া প্রতিষ্ঠানের কাজ হবে উদ্ভাবনী চিন্তাভাবনার জোগান দেওয়া। মোদী ক্ষমতায় আসার পরই যোজনা কমিশনের অধীনস্থ স্বাধীন মূল্যায়ন দফতরের সুপারিশও তেমনটাই ছিল। বলা হয়েছিল, কেন্দ্র ও রাজ্য সরকারের পাশাপাশি বেসরকারি ক্ষেত্রের অগ্রাধিকার কী হওয়া উচিত, তার রূপরেখা বাতলানোর মধ্যেই সীমাবদ্ধ থাকুক নতুন সংস্থার ভূমিকা।

    এত দিন উন্নয়নের অর্থ চাইতে ফি বছর মুখ্যমন্ত্রীদের যোজনা কমিশনের ডেপুটি চেয়ারম্যানের দরবারে আসতে হতো। প্রধানমন্ত্রী বলেছেন, "সময় পাল্টেছে। দেশকে এগিয়ে নিয়ে যেতে হলে রাজ্যগুলিকে সঙ্গে নিয়ে চলতে হবে।"যার অর্থ স্পষ্ট। আগামিদিনে অর্থ ব্যয় করার ক্ষেত্রে রাজ্যগুলির হাতে অনেক বেশি ক্ষমতা থাকবে। যুক্তরাষ্ট্রীয় কাঠামোটাই বদলে যাবে।

    প্রস্তুতি আগে থেকেই চলছে। সরকারি সূত্র বলছে, এক সপ্তাহের মধ্যেই নতুন সংস্থার বিষয়ে ঘোষণা হবে। বুধবার ক্যাবিনেট সচিবালয়ে যোজনা কমিশনের সচিব সিন্ধুশ্রী খুল্লারকে ডেকে পাঠানো হয়। অনেক রাত পর্যন্ত বৈঠক চলে। বৃহস্পতিবারও বৈঠক হয়েছে।

    মনে করা হচ্ছে, আমেরিকায় অর্থনৈতিক উপদেষ্টাদের নিয়ে যেমন পরিষদ রয়েছে, নতুন সংস্থার ধাঁচ হবে অনেকটা সেই রকম। প্রথমে ঠিক হয়েছিল, নতুন সংস্থার নাম হবে 'ন্যাশনাল ডেভেলপমেন্ট অ্যান্ড রিফর্ম কমিশন'। কিন্তু চিনেও একই নামের সংস্থা রয়েছে। তাই অন্য নাম নিয়ে চিন্তাভাবনা চলছে। নতুন সংস্থার মাথায় আসতে পারেন সুরেশ প্রভু। যিনি অটলবিহারী বাজপেয়ীর জমানায় বিদ্যুৎ ক্ষেত্রের সংস্কারে বড় ভূমিকা নিয়েছিলেন। নাম রয়েছে প্রাক্তন বিলগ্নিকরণ মন্ত্রী অরুণ শৌরিরও।


    • আর্থিক পরিকল্পনার কথা প্রথম ভাবেন সুভাষচন্দ্র বসু, ১৯৩৮ সালে। যার খসড়া তৈরি করেন মেঘনাদ সাহা।

    • পরাধীন ভারতেই ১৯৪৪ সালে পরিকল্পনা বোর্ড তৈরি করে ব্রিটিশরা। ১৯৪৬ পর্যন্ত তিনটি পরিকল্পনা তৈরি হয়।  যোজনা কমিশনের যাত্রা শুরু ১৯৫০-এর ১৫ মার্চ। সরকারি নির্দেশ জারি করে এটি গড়েন জওহরলাল নেহরু।

    • ১৯৫১ সালে ঘোষিত হল প্রথম পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনা।

    • পরের দু'টি পরিকল্পনা ১৯৫৬ ও ১৯৬১ সালে।

    • ১৯৬৬-তে পরিকল্পনা ঘোষণা স্থগিত রইল ভারত-পাক যুদ্ধের আবহে। তার পরের দু'বছরও।

    • পঞ্চম পরিকল্পনার (১৯৭৪-১৯৭৯) মেয়াদ বাড়ানো হয় এক বছর। ষষ্ঠ পরিকল্পনা শুরু হল ১৯৮০-তে।

    • রাজনৈতিক টালমাটালের কারণে পরিকল্পনা রচনা করা হয়নি ১৯৯০ ও ১৯৯১ সালেও।

    • ২০১২ সালে শেষ হয়েছে একাদশ পরিকল্পনার মেয়াদ।

    • ১৫ অগস্ট ২০১৪, যোজনা কমিশনের অবলুপ্তি ঘোষণা করলেন নরেন্দ্র মোদী।

    http://www.anandabazar.com/national/end-of-history-1.60149



    Aug 17 2014 : The Economic Times (Bangalore)

    Freedom of Speeches



    

    

    Narendra Modi has ended 10 years of soporific Independence Day speeches with his maiden address to the nation. His speech had more drama, announcements and pep than his predecessors' maiden I-day speeches put together. Here's why:




    Aug 16 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    NO NEHRU-GANDHI EULOGISING - Mookerjee and Savarkar Turn Central Figures


    New Delhi:

    Our Political Bureau

    

    

    PM Modi's first I-day speech was strong on symbolisms that sought to replace the Nehruvian tradition with the Hindutva model.

    At national broadcaster Doordarshan, the tone was set early when it ran a programme showing archival footage of RSS icon Veer Savarkar and Shyama Prasad Mookerjee, founder of Jan Sangh, the predecessor of BJP. This marked a departure from the past where Doordarshan would stick to eulogizing those members of the Nehru-Gandhi f a m i l y wh o b e c a m e P r i m e Ministers.

    T h e n a t i o n a l s o n g Va n d e Mataram, although played in Parliament at the end of each session, is nor session, is normally kept away from public functions since it is considered a Hindu hymn. But M o d i ' s Independence Day speech ended with the chant.

    Today's celebra tions were not an exception but a continuation of the process that began soon after Narendra Modi took over as Prime Minister in May like setting up a dedicated ministry to clean the holy river Ganga to setting up a panel to find the source of the mythical Saraswati river.

    The first budget of the BJP gover nment had also launched a slew of welfare schemes that carry the names of Mookerji and ideolo gues Deen Dayal Upadhyay and Madan Mohan Malviya.



    

    




    Aug 16 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Keeping it Simple, Straight



    

    

    IDENTIFYING PROBLEMS AND OFFERING SOLUTIONS Prime Minister Narendra Modi not only spoke at length on issues that impact everyday life in India, but also offered a glimpse of how he plans to address these problems in a time-bound manner

    WHY THIS HOMEWORK IS DIFFICULT... In his first I-Day speech, PM Narendra Modi talked about finding ways to address the ills in the society, and highlighted the role of technology in providing basic economic and health ser vices to the masses.

    A look at the numbers shows why the task is difficult...


    

    



    Aug 16 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Plan Panel's Loss may be Jaitley's Gain

    Vinay.Pandey2 @timesgroup.com

    New Delhi:

    

    

    FM's clout may grow as most functions of body may come under finance ministry

    The biggest gainer when the Planning Commission is consigned to history could be finance minister Arun Jaitley , widely regarded as the most influential minister in the Modi government, as most of its functions are likely to move to the finance ministry .

    In the ten years of the UPA government, the Commission had acquired considerable clout, with a substantial role in policymaking besides its traditional function of dispensing money to the states. The heightened influ heightened influence was also partly because it was headed by Montek Singh Ahluwalia, a renowned economist and close associate of former Prime Minis ter Manmohan Singh. But with its historic rival out of the way , North Block, as the finance ministry is often referred to, will become the hub of economic planning and policymaking while its expenditure wing will now allocate plan resources, almost a third of government spending, to the states.

    The Planning Commission is likely to be replaced by a think tank, which could be headed by Shiv Sena leader and former minister Suresh Prabhu.

    Former disinvestment minister Arun Shourie's name is also doing the rounds as a possible head of the body The original thinking in the government was to name the body as National Development and Reforms Commission. But since a similarsounding body exists in China, the government is now thinking of a new name. A formal announcement is likely to be made early next week.

    "Removing the commission would cut a layer from decision making. Most of its functions would logically flow to the finance ministry," an official said, adding that North Block's expenditure and the budget division will have a much bigger role.

    On Friday, Prime Minister Modi clearly indicated that the panel's glory days were over.

    "We will very soon set up a

    new institution in place of the Planning Commission...We need an institution of creative thinking and for optimum utilisation of youth capability," Modi said in his Independence Day address from the historic Red Fort.

    A committee headed by C Rangarajan -an economic advisor to the previous PM -tasked with reviewing the role of the commission had come to a similar conclusion, suggesting that the finance ministry should manage government funds while the Planning Commission should morph into a recommendatory body providing direction to the government.

    The commission, a post-Independence institution created in 1950 to chart the nation's destiny through planned, public sector-led development, derived most of its importance from the power to allocate money. It had to draw up

    five-year plans and allocate funds to achieve various social and economic goals.

    In 2014-15, Rs 5.75 lakh crore, or 32% of the government budget, was set aside for plan expenditure, funds that are usually moved though the Planning Commission to the states, giving it more clout than most other government institutions.

    The Prime Minister's role as the ex-officio head of the institution added to its authority.

    The day-to-day functioning of the commission is overseen by the deputy chairman, a position of immense political importance and prestige.

    States lined up before the commission, presenting their demand for funds.

    But with the commission becoming a think tank, the days of states queuing up for funds are over. Instead there should be a project-specific approach to allocating funds, said an official.

    With the expenditure department in the finance ministry getting full control over the country's purse, the task of federal-state interaction, a recurrent theme of Prime Minister Modi, will have to be overseen by Jaitley, who is also the defence minister. A key priority for Jaitley will be build a consensus on the goods and services tax and get all states on board. The department of economic affairs in the finance ministry becoming the hub of economic thinking.

    Not everyone is enthused by the idea of a bigger role for the finance ministry.

    "It will give the finance ministry too much authority without any checks and balances.

    The Planning Commission played the check-and-balance mechanism," said Pronab Sen, Chairman of the National Statistical Commission and formerly principal adviser at the Planning Commission.



    

    





    Aug 16 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Freedom from Old India


    New Delhi:

    Our Bureau

    

    

    BOLD & BEAUTIFUL In an electrifying speech, Narendra Modi makes a strong case for manufacturing, stresses on improving hygiene and wants a 10-yr moratorium to rid India of communal, sectarian tensions

    For the first time in more than 30 years, an Indian Prime Minister addressed the nation without the customary bullet-proof glass shield from the ramparts of the historic Red Fort, in a speech that blended political rhetoric with an action plan for inclusive development, public hygiene and skill development.

    Prime Minister Narendra Modi's maiden Independence Day speech also marked the end of the Planning Commission as an overarching authority on development planning, and, according to the PM, a new institution "that would respect the federal structure of the country" will replace it.

    Calling himself the "Pradhan Sevak" (chief servant) of the country , the PM seemed to make a case for economic nationalism with a call to focus on manufacturing so as to minimise imports while maximising exports. "Come and make in India," he said, inviting manufacturers from across the world. He called upon the youth to unleash their entrepreneurial spirit and work to ward manufacturing in India various items that add to India's import bill.

    "Let `Made in India' become a synonym of excellence," he added.

    The speech, in trademark Modi style, was replete with catchy slogans -`Make in India', `Ze ro Defect, Zero Effect', `Mera Kya, Mujhe Kya'-and touched upon aspects of public conduct, manufacturing, women's safety and bringing technology closer to people.

    Earlier in the speech, Modi said he was an outsider in New Delhi who has been trying to understand it for the last two months. Expressing dismay at the workings of the bureaucracy , he said there were "dozens of governments" within a government and that he has initiated steps to "demolish walls" that had come up between various departments. "People used to consider departments as their personal fiefdom. There was disintegration and fights between departments. These fights landed up in the Supreme Court. How can you go forward in this situation?" he said. The address was hailed for its tone of exhortation although lack of policy reform announcements appeared to have been a dampener. "What a relief to have a PM who understands that today's speeches have to essentially be conversations & not formal & stodgy elocution," tweeted industrialist Anand Mahindra.

    "It was a powerful and passionate speech by the Prime Minister which will generate tremendous energy in aligning over a billion Indians towards a better future," said Sunil Bharti Mittal, chairman, Bharti Enterprises Social scientist Shiv Visvanathan said it was interesting that Modi chose to speak about civic virtues and values such as punctuality and cleanliness, and not corruption.

    "The speech was about the relation between the family and the government and how everyday values when followed in a certain way can build character, make history.

    He set terms for his own report card, asking people to judge him by results of his actions.

    Hence it was all about social indicators this time, nothing rhetorical," he told ET.

    Modi began the speech on an inclusive note, acknowledging the contributions made to nation building by his predecessors, and said his government wanted to move forward on the basis of consensus. Asking the youth of the country to learn from Nepal and shun the path of violence, Modi said that the poison of casteism, communalism and sectarianism was a hindrance to the country's progress. He asked for a 10-year moratorium to rid the country of all such tensions.

    But the core of his speech was on manufacturing, an area where he repeatedly asked the country not to compromise on quality. "We want to give a collective opportunity to the world… Come, make in India, we have the strength, come to our country, I invite you," he said. "Youth should resolve that may be at a small level, they will make at least one article that the country imports, so that it may never need be imported in future," he said.

    Laying out his vision for financial inclusion, Modi announced the Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana that will see all Indians opening bank accounts. The account holder will be provided with a debit card and insurance of Rs 1 lakh.








    

    






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    PSB:All set to be lost in BANKING'S BIG BLACK HOLE

    Palash Biswas

    Arun-Jaitley-bank

    Finance minister Arun Jaitely has approved move to improve the quality of independent directors in public sector banks.


    You might expect renowned financial or business experts to sit on the boards of banks, but that isn't always true in the case of state-run banks. Petrol pump owners, a Doordarshan anchor, the head of a women's club, trustees of religious boards and a clutch of small-time politicians are some of the independent directors on boards of public sector banks.Times of India reports.

    Our dearest ones,the ladies,specifically,Female employees of public sector banks will soon be entitled to a major benefit of getting transfers of their choice.But it would not help PSB employees in general irrespective of gender status.Free Market economists have taken over planning commission and the business friendly government of India is all set to throw the PSBs into the black hole,which has been created by private players for all PSBs shaped in as bad loans to level PSBs non profitable and their employees inefficient to justify disinvestment and privatisation.It is only matter of time to acomplish the agenda to send all PSB employees to hell who live in ivory towers of pay scale,allowances and quota and reservation.This is it that nayak committee reccomendations are being implemented irrespectiive of PSB trade unions` stance whatsoever.The government has made major allowances for public sector employees by giving preferential treatment in transfers to women staff separated from families. It has also asked banks to reintroduce 'compassionate employees' for relatives of employees who die in service and has asked the Indian Banks Association to to include a board-approved employee home loan scheme as part of wage negotiations.


    Raghuram Rajan in the beginning of August said in an interview to Zee Media, that public sector banks needed an overhaul in the way they were governed, especially in the post of the chairman-managing director (CMD). In the wake of the arrest of the Syndicate Bank chairman, he said though one need not worry about all public sector banks, but the basic framework in which the CMD works needs to be changed.

    The Times of India reported today that the government split the role of the chairman and managing director of the PSU banks. It says that the chairman would be a reputed person from the industry while the managing director-CEO will run the daily functioning of the bank. The MD would have a fixed term of three years which could be extended by two more years. Rajan has said in the Zee interview that the MD would need a longer tenure to implement his vision.

    There could be new norms coming in for the independent directors on the board of a bank. They could be economists, journalists, management professionals or other such experts.

    Rajan had said that the PSU banks would have to focus on hiring on good mid level executives for the bank for which they would have to hike salaries of the executives. Even if the salary did not match the private banks, they would have to go up from current levels. He agreed that though PSU banks might earn lower margins than their private counterparts keeping national interest in mind for certain projects, the viability and profitability of the project would have to be considered before dolling out funds to them.


    However, we welcome the development as far as it concerns our ladies working in PSBs that the Finance Ministry has asked the banks to formulate women-friendly transfer policies so that they can get transfers at places where their husbands are working or parents are living.

    The Department of Financial Services, sources said, has asked Public Sector Banks (PSBs) to formulate transfer and posting polices in such way so as to minimise "hardship" of women employees.

    "It has been decided to accommodate as far as possible placement/transfer of married employees, on her request, at a place where her husband is stationed or as near as possible to that place or vice versa," said a communication of the Department to head to PSBs.

    In case of unmarried female employees, the banks have been asked to accommodate them "at a place where their parents" are stationed or as near as possible.

    While giving directions to PSBs, the Department said it has come to its notice that female employees, both married and unmarried, "when place/transfered away from their husband or parents...To distant locations face a genuine hardship or develop a feeling of insecurity".

    There are 27 PSBs, including the latest Bharatiya Mahila Bank. Of the nearly 8 lakh employees in PSBs, about 2.5 lakh are females.

    The PSBs have been asked to frame the policy in this regard with the approval of their Board and "take immediate action for implementation and compliance".

    Also, they have been asked to consider pending requests under the new guidelines.

    SPOTLIGHT



    Meanwhile,the finance ministry has decided to take a relook at recent appointments of top-level public sector bank executives as well as a clutch of proposals to designate chairmen just before the UPA demitted office, in what is seen as a direct fallout of the recent arrest of the Syndicate Bank chief by CBI on alleged corruption charges. as reports Times of India.


    Senior finance ministry officials told TOI that a review has become necessary in view of the irregularities that have come to light.


    Finance minister Arun Jaitley has written to the Reserve Bank of India governor Raghuram Rajan, who heads the appointment board that selects state-run bank chiefs, as well as cabinet secretary Ajit Seth, who processes all papers for the appointments committee of cabinet, sources said. Some of the appointments processed during UPA's closing days lacked transparency and there are indications that some political considerations may have played a part, they added.


    In a letter to the finance ministry, CBI chief Ranjit Sinha has pointed to some irregularities that have been noticed by the investigative agency during the Syndicate Bank probe. Sources said CBI has suggested a "legal scrutiny" as it has found clues suggesting that ACRs and interviews "were managed" and some middlemen also played a role.


    Sinha said Jain was appointed despite having "poor" ACRs. "We have told the government that appointments deserve to go under legal scrutiny. The government has to take a call. There are reports of irregularities in several appointments. We have informed the government about it," the CBI chief said.


    For the past few years, appointment of several bank chiefs, executive directors as well as independent directors have been viewed with a degree of suspicion and have often resulted in controversy. The candidates are selected on the basis of an appraisal of the confidential reports (ACRs), which carry 70 marks, and candidates appearing for interviews for executive directors and CMDs can get another 30 marks. Apart from the RBI governor, financial services secretary, an RBI deputy governor and external experts are part of the appointments board.

    Similarly, there is no clarity on what goes into deciding the allotment of banks.

    Politicians, TV anchors, pump owners on boards of public sector banks


    Surojit Gupta & Sidhartha, TNN | Aug 6, 2014, 02.21AM IST

    NEW DELHI: You might expect renowned financial or business experts to sit on the boards of banks, but that isn't always true in the case of state-run banks. Petrol pump owners, a Doordarshan anchor, the head of a women's club, trustees of religious boards and a clutch of small-time politicians are some of the independent directors on boards of public sector banks.


    The presence of this motley bunch seems to have driven the government to initiate a clean-up. "We have moved a proposal to improve the quality of independent directors. We are addressing the issue. The finance minister (Arun Jaitley) has approved in-principle the move to improve the quality. We are addressing the issue and the guidelines are expected within a month," financial services secretaryG S Sandhu told TOI.


    Such a step is long overdue. Over the past few years, every bank board has seen a series of appointments of individuals who seem to have little to do with the sector. Look at any bank board, and you are likely to find a Congress party nominee as a director.

    The Allahabad Bank website lists Ajay Shukla, who has experience in agriculture and runs a packaging business, as a member of the UP Pradesh Congress Committee. Anusuiya Sharma, his colleague from the state, is on the Union Bank board, while Chattisgarh PCC's Paras Chopda is a director in Oriental Bank of Commerce.

    Life Insurance Corporation has Amardeep Singh Cheema, a Punjab Congressman. But it isn't just the Congress. Bhupinder Singh Suri, a former hockey player and owner of a petrol pump on Delhi's Race Course Road, was director on the board of Syndicate Bank for nearly nine years. By his own account, he landed the job on then prime minister Atal Bihari Vajpayee's recommendation. His daughter, Jasleenn, now sits on the bank board as a shareholder director after contesting an election. Industry veterans point out that there are brothers who have served on different bank boards.


    Anita Karnavar is a part time independent director at Punjab and Sind Bank. She is an entrepreneur, a news reader in Doordarshan and also runs an NGO. NVR Reddy is another example of a part time director. He is on the board of Andhra Bank and is a graduate in agriculture. He has worked as a consultant and dabbles in politics as well.


    Reddy said he was appointed to the post because he is from the vital farm sector. He said he gets paid Rs 10,000 for attending board meetings and airfare if the venue is away from his city.


    Some directors have political links but also come with professional training.



    For instance, chartered accountant Sanjay Maken, whose brother Ajay Maken was a UPA minister, sits on the Indian Bank board. Investment banker Piyush Goyal, now coal and power minister in the Narendra Modi cabinet, has served as director on the board of State Bank of India and Bank of Baroda. While the Companies Act has mandated independent directors for all companies only recently, the government has followed the practice of nominating non-official directors for years, with a majority of them being chartered accountants.


    But over the years, good talent has eluded state-run bank boards. Independent directors are expected to bring in expertise from their respective fields and provide an oversight on the management.

    http://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/Politicians-TV-anchors-pump-owners-on-boards-of-public-sector-banks/articleshow/39711022.cms


    By all accounts, Prime Minister Narendra Modi is not a privatiser. He prefers to make the public sector companies work better by appointing competent people to lead them. His finance minister, Arun Jaitley, too has gone on record to say that disinvestment in public sector banks will not mean reducing the government's stake below 51 percent.

    Both Modi and Jaitley may have to rethink their options, especially when it comes to banking. Reason: banks need capital to grow all the time. In the case of public sector banks that are being given wider and wider mandates for financial inclusion, including lending more to non-prime borrowers, more capital is like oxygen.

    This means, sooner or later, the government has to bite the bullet and let its holdings fall below 51 percent. That is, privatise banks. Both Modi and Jaitley would do well to read Yashwant Sinha's budget address of 2000-01, when he first proposed the idea.

    Rajiv Lall, Executive Chairman of infrastructure lender IDFC, reckons that letting go of public sector banks may have to be done sooner than later. His argument is simple: if public sector banks have to be compliant with Basel III norms, which call for more risk capital, the government will be forced to go below 51 percent pretty soon. The PJ Nayak Committee which looked into the question said public sector banks would require Rs 3,10,000 crore of capital if they have to grow their loan books by 16 percent a year, and if 30 percent of the restructured assets (ie, rescheduled loans) go bad.

    Writing in Business Standard, Lall says: "The total market capitalisation of PSU banks at today's equity prices is about Rs 4 lakh crore and the weighted average government ownership is about 62.5 percent. Raising even Rs 2 lakh crore would dilute the government's ownership share to under 42 percent."

    In other words, recapitalisation needs alone will force privatisation over the next three to four years.

    In a recent article on State Bank of India's own capital needs, I had argued that the SBI can raise capital by selling some of its own subsidiaries.

    NDA-2 under Modi has been more cautious that NDA-1, where Yashwant Sinha, in tougher circumstances, started talking about bringing government stakes below 51 percent as early as in February 2000.

    In that speech, Sinha as Finance Minister had this to say: "To meet the minimum capital adequacy norms set by RBI and to enable the banks to expand their operations, public sector banks will need more capital. With the government budget under severe strain, such capital has to be raised from the public which will result in reduction in government shareholding. To facilitate this process, government have decided to accept the recommendations of the Narasimham Committee on Banking Sector Reforms for reducing the requirement of minimum shareholding by Government in nationalised banks to 33 percent. This will be done without changing the public sector character of banks and while ensuring that fresh issue of shares is widely held by the public."

    The fudge here is his claim that 33 percent ownership will not change the public sector character of banks.

    The Indian budget is not in much better shape today than it was in 2000, but the challenges of a fast-growing economy are even greater now, what with the demographic bulge calling for more job creation. This needs a well-capitalised financial sector which can finance entrepreneurship.

    Both Modi and Jaitley need to re-read Yashwant Sinha's 2000 budget speech even though Sinha didn't actually reduce government holdings in any bank to 33 percent.

    With a government majority in place, Modi and Jaitley need to bite the bullet on privatising at least some banks over the next two-three years. They have, as Rajiv Lall suggests, no other choice.

    http://firstbiz.firstpost.com/finance/govt-may-cut-psu-bank-stake-51-jaitley-read-sinhas-2000-budget-speech-92809.html

    CORPORATEAug 7, 2014

    Rajan hears Modi, says govt need not cut stake in banks below 51 percent

    By R Jagannathan 

    nor Raghuram Rajan seems to be giving Prime Minister Narendra Modi a way out where government stakes in public sector banks can be kept above 51 percent.

    Modi has not been a great fan of the idea of privatisation, but the public sector banks pose a big challenge in view of their constant need for capital when government is strapped for cash. Moreover, in the context of the recent bribery allegations made against the Chairman of Syndicate Bank and the huge bad loans portfolio of public sector banks, there are apparent governance issues that need addressing.

    The PJ Nayak committee report on public sector banks had suggested government stakes be brought below 51 percent, but Rajan has now said that may not (always) be necessary.

    In this interview toBusiness Standard given soon after the credit policy was announced on 5 August, Rajan said: "To implement the PJ Nayak committee report, privatisation of public sector banks (PSBs) is not required…. There are (other) recommendations which could be implemented without bringing the stake below this. For example, appointing a bank board, putting the shares of banks in some kind of investment company structure, then manage by entities different from the government."

    Rajan also said in an interview to The Economic Times that bank CEOs needed a longer tenure – perhaps at least three or five years – to deliver results. "You need managing directors for longer terms…some come for eight months and that's too short."

    However, it is not clear if putting bank shareholdings in a separate structure will reduce their capital requirements in the short run.

    The other day, IDFC's Executive Chairman Rajiv Lall speculated that the capital needs of public sector banks under Basel III would be so high (over Rs 3 lakh crore) that the government may have to bring its equity below 51 percent. Lall wrote in Business Standard: Lall says: "The total market capitalisation of PSU banks at today's equity prices is about Rs 4 lakh crore and the weighted average government ownership is about 62.5 percent. Raising even Rs 2 lakh crore would dilute the government's ownership share to under 42 percent."

    If we take Lall's analysis, shifting public sector bank shareholdings into an investment company and professionalising management may not make a substantial immediate difference to their capital requirements. However, the structure would at least recognise the fact that governance could improve, and that government should be kept at an arm's length from bank management.

    The real issue is the timeframe. If the structural change is done immediately – say by the end of this calendar year – and the new CEOs of banks are given a minimum of three years, it would ideally take them at least two years to reduce bad loans, write some off, and show results. This means their capital requirements will start falling only from 2017-18, or even the year after that.

    Moreover, during the revamp, some banks – especially weak ones like United Bank of India – may need additional capital support.

    This means while this year's capital requirements can be met from the market in most cases (given that average government holdings are at 62.5 percent), in the following years (2015-16 and 2016-17) either the government will have to pump in more cash or allow some banks to dilute below 51 percent.

    Rajan's idea of putting some distance between professional management and politicians is nevertheless a good one – and not only for public sector banks. It should be the norm for all public sector undertakings.

    http://firstbiz.firstpost.com/corporate/rajan-hears-modi-says-govt-need-cut-stake-banks-51-percent-93017.html













    Aug 17 2014 : The Economic Times (Bangalore)

    BANKING'S BIG BLACK HOLE

    G Seetharaman, Shantanu Nandan Sharma & Avinash Celestine


    

    

    Why public sector banks throw good money after bad and how the vicious cycle can be stopped

    For every chairman of a public sector bank (PSB) who waxes eloquent about cracking down on the dodgy universe of middlemen that exists between lenders and borrow ers, there are several in the PSB system who will tell you it's not the simplest of tasks.

    Reason: in many instances, the middlemen aren't chartered accountants or non bankers but retired PSB honchos who know the ins and outs of the loans business and who often join the corporate houses whose loan cases they would have dealt with while in service. Once they're out of it, they begin canvassing for sanctions of additional limits or loans.

    No banker worth his pinstripes will come on record with such examples, but in private they may just narrate to you the curious case of a retired deputy managing director at one of India's biggest PSBs who was seen carrying the briefcase of the promoter of a company he had joined on retirement. Guess where they were headed: to the headquarters of the bank he served at, of course! Or consider another retired PSB deputy MD who would park in front of a desk officer at one of the bank's zonal offices, pleading with him to process the loan proposal of the company he had joined. And then there's the tale of a chief general manager who was compulsorily retired after the Harshad Mehta stock scandal in the early '90s -he joined a sugar mill that was sanctioned credit way back in the '70s when the CGM (now retired) was head of the bank's credit division in one of its circles in the north. You would have by now guessed his post-retirement mandate: to push through proposals for enhancing his company's credit limits.

    Men With Inside Knowledge "This category of ex-bankers-turned-middlemen is far more dangerous because they quite often bully their ex-subordinates and make their companies offer them allurements into clearing their proposals," says a retired banker who, mercifully, isn't playing middleman.

    He adds that candidates for the top positions in PSBs shell out a hell of a lot of money to get the positions. And it is in that bid to recoup the money that they resort to gaming the system.

    That may sound like an exaggeration -but perhaps less so after the second day of August when the Central Bureau of Investigation (CBI) arrested SK Jain, chairman and managing director of Syndicate Bank, for allegedly taking bribes to increase the credit limit of some companies. The reputation of PSBs took a further knock when reports emerged a week later of the CBI probing `900 crore loans extended by IDBI Bank to the debt-ridden and now-defunct Kingfisher Airlines when it had a negative net worth and a poor credit rating.

    The Syndicate Bank case also brought the middlemen onto centre stage. Among those arrested was Pawan Bansal, MD, Altius Finserv, who is alleged to have helped companies get loans from the bank in return for bribes. The CBI also arrested 10 others, including Neeraj Singhal, vice-chairman and managing director of Bhushan Steel, who is alleged to have paid Jain `50 lakh, and Ved Prakash Agarwal, chairman and managing director of Prakash Industries, who is reported to have paid Jain `3.5 crore. Fi nance minister Arun Jaitley has said the government is probing recent appointments in PSBs in the light of Jain's arrest.

    These incidents have reignited the longstanding de bate on reforms in stateowned banks which, according to some, are relics of a bygone era.

    They are subject to meddling by the government and lobbying for posts and loans by vested interests and, despite their wide reach, leave a lot to be desired when compared to their private sector peers. The urgency of their overhaul cannot be overstated given that they control over three fourths the country's banking sector deposits and loans. Moreover, without a revamp, they are sure to lose their market share to private banks at an even faster rate.

    Collection Concerns State-run banks have become notorious for their high share of bad loans, or nonperforming assets (NPAs, which are loans where the interest or principal has been overdue for over 90 days). PSBs' gross NPA (GNPA), as a share of total advances, has shot up from 1.84% in March 2011 to 5.07% in December 2013. Private banks, on the other hand, saw their GNPA fall from 2.29 % to 2.06% in the same period. What is even more alarming are PSBs' stressed assets, where interest or principal payment has not be made up to 90 days, which at over 12% of their total advances are three times as high as private banks'. Moreover, about 7% of PSBs' total loans were restructured in December 2013, compared to just over 2% for private banks.

    What explains this marked difference?

    Does the credit appraisal process of PSBs lack the requisite vigour? MD Mallya, former CMD of Bank of Baroda, does not think so: "It is robust. But what is equally important is monitor ing of loans for early warnings, which could be improved. One should not wait for a default."

    According to the guidelines of the Reserve Bank of India (RBI), banks should watch out for `in banks should watch out for `in cipient stress' even in accounts where repayment is overdue for less than a month. Saurabh Mukherjea, CEO, in stitutional equities, Ambit Capital, believes the credit assessment skills of PSBs are on a par with private banks.

    "But credit collection is a huge challenge for the PSBs. In fact, the private sector banks' aggression on this issue could be extending into murky territory," he adds.

    Diwakar Gupta, exMD and chief financial officer, State Bank of India (SBI), India's largest bank, agrees with Mukherjea that col lection is a bigger worry than appraisal: "Processes have changed with core banking. You can't do the kind of relationship banking like you used to. If you decide to do a surprise check on an account, the branch manager will not even know which village the account belongs to." He adds that since most large corporate loans are given by a consortia of banks, smaller PSBs rely on the credit appraisal expertise of the likes of SBI and ICICI Bank in case of consortium lending.

    Have Money, Won't Repay The RBI in 1996 did away with the rule that loans above `50 crore had to be given only through a consortium of banks, which Mallya says could have led to a slackening of discipline in PSBs. "But they have realized the importance of consortium lending, which results in exchange of information between banks," notes Mallya. VR Iyer, CMD, Bank of India, says the poor asset quality of PSBs is a result of the slowdown in the economy and infrastructure. Outside of budgetary support, commercial banks -primarily PSBs are the largest source of finance for infrastructure, which has been plagued by multiple issues in the past few years. GNPA in infrastructure rose from 3.23% in March 2011 to 8.22% in March 2014. "No one could have foreseen what happened. It has been a great learning for banks," says Iyer.

    PSBs, not surprisingly, account for eight of the top 10 spots on the list of banks with the highest wilful defaults (see Bank-wise Wilful Defaults). When asked about Kotak Mahindra Bank taking the second spot, a spokesperson from the bank says that most of the wilful defaults are in NPAs acquired by the bank from other banks. "We have been in the business of bad loan recovery for the past 15 years. We believe a strong bank should be in a position to recover all kinds of loans including bad loans," he notes.

    He adds that the bank does not differentiate between acquiring an NPA and a loan classified as a wilful default, since "our major consideration before purchase is based on underlying business and assets, and not on wilful defaults or normal defaults".

    A loan is categorized as a `wilful default' if, among other things, the borrower does not repay despite having the ability to do so or diverts the funds for purposes other than that for which the loan was availed. Vijay Mallya-owned Kingfisher Airlines, which has been grounded since late 2012, reportedly owes a 17-bank consortium `7,500 crore, of which lead lender SBI's share is over `1,500 crore. The banks are said to be planning to declare the company a wilful defaulter. Prakash Mirpuri, spokesperson for Mallya's UB group, says the company will contest the move. "We have no communication or knowledge about al leged diversion of funds which we stoutly deny," he adds.

    Kingfisher Gets More IDBI Bank, whose loans to Kingfish er are being probed by the CBI, ear lier this week told the stock exchanges that the airline and not the bank was under investigation. The bank's CMD MS Raghavan has stated the loan was given when the airline was doing well. But ET reported in July 2010 that despite the bank's internal reports questioning the airline's credit worthiness, the bank extended two loans in 2011 -a shortterm loan of `150 crore and another of `750 crore. The second loan was sanctioned in November 2009, according to documents submitted by Kingfisher to the corporate affairs ministry. This despite the airline having a negative net worth of `2,125 crore and cash of less than `50 crore as of March 2009.

    Interestingly, a few other banks also extended fresh loans to Kingfisher after IDBI.

    Yes Bank and Central Bank of India, for instance, advanced `67 crore and `350 crore, respectively, in July and October 2010, by which time the airline's negative net worth was nearly `4,000 crore; and Corporation Bank sanctioned `100 crore in March 2011. Questions sent to these banks remained unanswered.

    Bank of India's Iyer says there are no norms precluding a bank from lending to a company with a negative net worth, if the bank believes the company's fortunes will turn around and the bank can get its money back. "If the branch, the risk management committee, EDs [executive directors] and the board okay it, then we are satisfied," she notes. Some in the banking fraternity argue that if a company faces a severe cash-flow problem, PSBs must come forward.

    "It's the duty of a PSB to lend to a company facing a fund crunch if the company has sizeable productive assets, and there is a chance of a turnaround. No one should put the employees working there at risk," says a former CMD of a PSB who does not want his name to be drawn into the ongoing controversy.

    Mukherjea believes it should be left to the discretion of the bank to decide on what basis they grant a loan after analyzing the risks. "If the regulator were to lay down norms [for this] then we would start going back to a command-and-control economy," he says. A former deputy governor questions the practice of PSBs having to seek their boards' approvals for large loans: "Where else in the world do bank boards approve loans? Even private banks in India don't have this practice.

    Boards are supposed to provide a strategic direction to the bank, not approve loans."

    Lending Experience

    Krishnamurthy Subramanian, assistant professor at the Indian School of Business, believes PSBs' poor credit quality is a symptom of a deeper malaise which starts with the compromised boards. Save the RBI representative, appointments on the board are politically influenced, including the director representing minority investors who is from the Life Insurance Corporation, a major shareholder in many of these banks. "The umbilical cord of PSBs is very closely tied to government and they are governed by anachronistic acts like the Banks Nationalization Act (1974) and the State Bank of India Act (1955)," says Subramanian, who was on the eight-member committee appointed by the RBI to review the governance of bank boards. The committee, which submitted its report in May and was headed by PJ Nayak, former chairman and CEO of Axis Bank, called for a revamp of state-run banks.

    Among its suggestions were the reduction of the government's stake in PSBs below 50% -which could help the banks raise much needed capital and make them more transparent -a minimum tenure of five years for bank chairmen, increase in compensation of top executives and elimination of oversight of agencies like CBI and Central Vigilance Commission (CVC). "It [external vigilance enforcement] does not provide a level-playing field to PSBs as private banks freely operate without any oversight of these agencies notwithstanding the fact that they also deal with public money," says a former CMD of a large state-owned bank.

    Talking of the Syndicate Bank case after the monetary policy review on August 5, RBI governor Raghuram Rajan said: "While we do a thorough investigation and culprits are brought to book it should not become a witch hunt which then stalls the entire credit process."

    Though many believe a former CMD of a government-owned bank should be held accountable in case of imprudent lending which comes to light after his term is over, there are those who find it unreasonable.

    "Can anyone reconstruct the sequence of events leading to a disbursal of a loan five years ago? For example, success of a power project depends on many things including fuel supply, environmental clearances etc.

    Will you hold the bank responsible for a loan which turned bad later?" asks another banker who retired as an executive director of a mid-size public sector bank.

    Hawk-eyed Watch

    It was the CVC -the country's apex vigilance institution -which forwarded a number of bank fraud cases to the CBI to investigate, some of which have surfaced recently.

    Without going into the details of any individual case, central vigilance commissioner Pradeep Kumar says his organization sent only those cases to the CBI where it found prima facie that there could be some criminal intent.

    "I do agree that there are always some risks involved in lending. But how can a bank flout basic lending norms? For example, there is a case whether the land [of the borrower] has not been securitized. Is it not a fraud if a company takes a loan by showing a number of pieces of machinery when it has just one machine," asks Kumar (see "The Socalled Power Club...", page 04).

    While the issue of reforms in PSBs crops up periodically and government after government pays lip-service to it, it has to be taken up in earnest immediately before inefficiency and impropriety define these banks better than their government ownership. Till that happens, expect more bankers to cross over to the dark side after retirement.








    

    












     
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    Central Bank of India  www.centralbankofindia.co.in 
    Corporation Bank  www.corpbank.com 
    10  Dena Bank  www.denabank.com 
    11  IDBI Bank Limited  www.idbi.com 
    12  Indian Bank  www.indianbank.in 
    13  Indian Overseas Bank  www.iob.in 
    14  Oriental Bank of Commerce  www.obcindia.co.in 
    15  Punjab & Sind Bank  www.psbindia.com 
    16  Punjab National Bank  www.pnbindia.com 
    17  State Bank of India  www.statebankofindia.com 
    18  Syndicate Bank  www.syndicatebank.in 
    19  UCO Bank  www.ucobank.com 
    20  Union Bank of India  www.unionbankofindia.co.in 
    21  United Bank of India  www.unitedbankofindia.com 
    22  Vijaya Bank  www.vijayabank.com 
    Monday, August 18, 2014
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    List of banks in India

    From Wikipedia, the free encyclopedia
    Page semi-protected

    This is a partial list of corporations engaged in banking business within the territory of India. There are currently nationalised banks in India.

    Nationalised banks / Public-sector banks

    SBI and associate banks

    1. State Bank of India
    2. State Bank of Bikaner & Jaipur
    3. State Bank of Hyderabad
    4. State Bank of Mysore
    5. State Bank of Patiala
    6. State Bank of Travancore
    7. State Bank of Saurashtra (merged into SBI in 2008)
    8. State Bank of Indore (merged into SBI in 2010)

    Regional rural banks

    1. Allahabad UP Gramin Bank
    2. Andhra Pradesh Grameena Vikas Bank
    3. Andhra Pragathi Grameena Bank
    4. Arunachal Pradesh Rural Bank
    5. Aryavart Gramin Bank
    6. Assam Gramin Vikash Bank
    7. Baitarani Gramya Bank
    8. Ballia –Etawah Gramin Bank
    9. Bangiya Gramin Vikash Bank
    10. Baroda Gujarat Gramin Bank
    11. Baroda Rajasthan Gramin Bank
    12. Baroda Uttar Pradesh Gramin Bank
    13. Bihar Kshetriya Gramin Bank
    14. Cauvery Kalpatharu Grameena Bank
    15. Chaitanya Godavari Grameena Bank
    16. Chhattisgarh Gramin Bank
    17. Chikmagalur-Kodagu Grameena Bank
    18. Deccan Grameena Bank
    19. Dena Gujarat Gramin Bank
    20. Durg-Rajnandgaon Gramin Bank
    21. Ellaquai Dehati Bank
    22. Gurgaon Gramin Bank
    23. Hadoti Kshetriya Gramin Bank
    24. Haryana Gramin Bank
    25. Himachal Gramin Bank
    26. Jaipur Thar Gramin Bank
    27. Jhabua Dhar Kshetriya Gramin Bank
    28. Jharkhand Gramin Bank
    29. Kalinga Gramya Bank
    30. Karnataka Vikas Grameena Bank
    31. Kashi Gomti Samyut Gramin Bank
    32. Kerala Gramin Bank
    33. Krishna Grameena Bank
    34. Kshetriya Kisan Gramin Bank
    35. Langpi Dehangi Rural Bank
    36. Madhumalti Building Gupte Marg
    37. Madhya Bharat Gramin Bank
    38. Madhya Bihar Gramin Bank
    39. Mahakaushal Kshetriya Gramin Bank
    40. Maharashtra Gramin Bank
    41. Malwa Gramin Bank
    42. Manipur Rural Bank
    43. Marwar Ganganagar Bikaner Gramin Bank
    44. Meghalaya Rural Bank
    45. Mewar Anchalik Gramin Bank
    46. Mizoram Rural Bank
    47. Nagaland Rural Bank
    48. Uttrakhand Gramin Bank[1]
    49. Narmada Malwa Gramin Bank
    50. Neelachal Gramya Bank
    51. Pallavan Grama Bank
    52. Pandyan Grama Bank
    53. Parvatiya Gramin Bank
    54. Paschim Banga Gramin Bank
    55. Pragathi Gramin Bank
    56. Prathama Bank
    57. Puduvai Bharathiar Grama Bank
    58. Pune District Central Cooperative Bank Ltd.
    59. Punjab Gramin Bank
    60. Purvanchal Gramin Bank
    61. Rajasthan Gramin Bank
    62. Rewa-Sidhi Gramin Bank
    63. Rushikulya Gramya Bank
    64. Samastipur Kshetriya Gramin Bank
    65. Saptagiri Grameena Bank
    66. Sarva UP Gramin Bank
    67. Satpura Narmada Kshetriya
    68. Saurashtra Gramin Bank
    69. Sharda Gramin Bank
    70. Shreyas Gramin Bank
    71. Surguja Kshetriya Gramin Bank
    72. Sutlej Kshetriya Gramin Bank
    73. Tripura Gramin Bank
    74. Utkal Gramya Bank
    75. Uttar Banga Kshetriya Gramin Bank
    76. Uttar Bihar Gramin Bank
    77. Vananchal Gramin Bank
    78. Vidharbha Kshetriya Gramin Bank
    79. Visveshvaraya Grameena Bank
    80. Wainganga Krishna Gramin Bank

    [2]

    Private-sector banks

    Foreign banks operating in India

    Foreign banks with business in India

    Banks with branches in India.[4]

    Foreign banks with representative offices in India

    Indian banks with business outside India

    List of subsidiaries of Indian banks abroad as on November 30, 2007:[5]

    Name of the Bank Name of the Centre Notes
    Andhra Bank DubaiMalaysia
    all India bank Hongkong
    AXIS BANK Ltd. HongkongSingaporeDubaiSri-LankaUnited Kingdom
    SBI (Canada) Ltd. TorontoVancouverMississauga
    SBI (Japan) Ltd. TokyoOsaka
    SBI (California) Ltd. Los AngelesArtesiaSan Jose (Silicon Valley)
    SBI Finance Inc. DelawareU.S.A.
    SBI International (Mauritius) Mauritius (Off-shore Bank)
    SBI (INDIA) Ltd. Shanghai
    SBI (Singapore) Ltd. Singapore
    Bank of Baroda (Uganda) Ltd. Uganda
    Bank of Baroda (Kenya) Ltd. Kenya
    Bank of Baroda (Ghana) Ltd. AccraGhana
    Bank of Baroda (U.K.) Nominee Ltd. LondonUnited Kingdom
    Bank of Baroda (Hong Kong) Ltd. Hong Kong (Converted into Restricted Licensed Bank)
    Bank of India (Japan) Ltd. TokyoOsaka
    Bank of India Finance (Kenya) Ltd. Kenya
    Canara Bank HongkongUnited Kingdom
    IOB Properties Pte Ltd. Singapore
    Bank of Baroda (Botswana) Ltd. GaboroneBotswana
    Bank of Baroda (Guyana) Inc. Georgetown, Guyana (South America)
    ICICI Bank (U.K.) Ltd London (U.K.)
    ICICI Bank (Canada)Ltd Toronto (Canada)
    Bank of Baroda (Tanzania) Ltd. Tanzania
    Bank of Baroda (United Arab Emirate) DubaiAbu DhabiRas Al KhaimahDeiraDammamSalalahAl Ain
    Bank of Baroda MuscatOman
    Bank of Baroda BrusselsBelgium
    ICICI Bank Eurasia LLC Russia
    PT Bank Indomonex Indonesia
    Indian Ocean International Bank Ltd. (IOIB) Port LouisMauritius
    Punjab National Bank International Limited (PNBIL) LondonUnited Kingdom
    Bank of Baroda (Trinidad and Tobago) Limited Trinidad & Tobago
    PT Bank Swadesi Tbk Indonesia
    Bank of Baroda (Trinidad and Tobago) Limited Trinidad & Tobago
    Syndicate Bank United Kingdom
    UCO Bank HongkongSingapore

    See also

    References

    1. Jump up^ Merger of Nainital Almora Kshetriya Gramin Bank and Uttaranchal Gramin Bank on 01-11-2012 www.uttarakhandgraminbank.com
    2. Jump up^ http://time4education.com/bankexams/List_of_RRBs.aspx
    3. Jump up^ First branch in India, opened at Chennai (18 April 2012). "Woori Bank opens in India"The Hindu (Chennai, India). Retrieved 23 September 2012.
    4. Jump up^ http://www.rbi.org.in/commonman/Upload/English/Content/PDFs/71207.pdf
    5. Jump up^ Page 2 of http://www.rbi.org.in/commonman/Upload/English/Content/PDFs/71206.pdf







    कारपोरेट केसरिया रंगसाज ने मुक्तबाजार के चुनिंदा कारीगरों के स्वयंसेवी केसरिया पैनल में समूचे योजना आयोग को समाहित न कर दिया

    फिक्र न करें गुसाई,सभै कर्मफल है साधो

    मोक्ष के लिए गंगा नहाओ सावन हो या भादो

    अनाज को मयस्सर हो जमाना त सीमेंट के इस चमचमाते जंग में बो डालो कोंदो

    पलाश विश्वास

    कारपोरेट केसरिया रंगसाज ने मुक्तबाजार के चुनिंदा कारीगरों के स्वयंसेवी केसरिया पैनल में समूचे योजना आयोग को समाहित न कर दिया

    फिक्र न करें गुसाई,सभै कर्मफल है साधो

    मोक्ष के लिए गंगा नहाओ सावन हो या भादो

    अनाज को मयस्सर हो जमाना त सीमेंट के इस चमचमाते जंग में बो डालो कोंदो

    ug 18 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    India Inc Scores High in First Qtr



    

    

    The June quarter has turned out to be a bumpe one for India Inc, with record net profit growth and a stable top line, but sustaining the high profi growth may be difficult because of the base effect, reports


    विवेक देवराय और डा. अमर्त्य सेन बंगाल में पूंजी के स्वर्णिम राजमार्ग पर वामसत्ता की अंधी आत्मघाती दौड़ के कोच रहे हैं।दोनों फिर दीदी के स्मार्ट सिटी पीपीपी वास्तुकार हैं।मंटेक सिंह डूबे तो डूब गया योजना आयोग भी।


    कांग्रेस भी योजना आयोग को बोझ मान रही थी।


    योजना आयोग  कांग्रेसी जमाने में मंटेक के नेतृत्व में वैश्विक हितों के ग्लोबीकरण विश्वबैंकीय असंवैधानिक तत्वों का कबूतरखाना पूरे भारत की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करते हुए कृषि और उत्पादन के सर्वानाश का सारा सामान तैयार कर रहा था और यह सिलसिला राजीव की तकनीकी क्रांति के साथ शुरु हो गया था तो नब्वे में मनमोहनी नवउदारवादी अवतरण के साथ ही सोवियत माडल को अलविदा कहने की रस्म निभा दी गयी थी।


    लालकिले की प्रचीर से प्रधानतम,सुप्रीम स्वयंसेवक की योजना आयोग के अवसान की घोषणा का इसलिए कोई खास तात्पर्य नहीं होता,अगर कारपोरेट केसरिया रंगसाज ने मुक्तबाजार के चुनिंदा कारीगरों के स्वयंसेवी केसरिया पैनल में समूचे योजना आयोग को समाहित न कर दिया होता।


    इन कारीगरों में खासमकास विवेक देवराय है,बंगाल परिप्रेक्ष्य में जिनमें जितना वाम है ,उससे ज्यादा अवाम है और तबाह आवाम है।


    अब संघ परिवार ने अपने बुनियादी एजंडा के तहत इतिहास भूगोल शिक्षा संस्कृति जनमानस विवेक ज्ञान गरिमा सबकुछ गौरिक बनाने की ठान ली है।उसकी तैयारियां भी जोरों पर है।


    स्मृति की तुलसी भूमिका की योग्यता पर मत जाइये,उनपर जो छत्रछाया है और जो सुदर्शन चक्र का वध विशेषज्ञ काया है,उससे संभल जाइये।


    अब तक बंगाल के सुशील समाज के पुरस्कृत सम्मानित होने के कारण तालियां पीट रही थी दिल्ली,अब सबकी पूंछ उठाने की बारी है कि खबर है कि ज्ञानपीठ,साहित्य अकादमी से लेकर साहित्य और संस्कृति का केसरियाकरण होने ही वाला है।


    भारत भवन के दरवज्जे मत्था टेकने वाले झंडेवालान के सामने कैसे कैसे अपनी रीढ़ बचायेंगे दिखना वाकई दिलचस्प ही होगा।


    वैसे सत्ता की ज्ञानपीठ वामरंगे जेएनयू का केसरिया कायाकल्प तो पूरा ही गया दीख्या जी।प्रवचन गुसाई से लेकर जनसंस्कृति तक की यात्रा अब अस्मिता कारोबार का केसरिया कारोबार है ,जिसपर मंडल का मुलम्मा भी भीषण है।


    नजारा वही डीपीटीसे कराटयेचुरी पीपीपीटी है।


    हमें नहीं मालूम कि कितने दिनों तक फिर यह लेखन संभव है।कल यकायक मेरे मेल आउटबाक्स से संदेश का बहिर्गमन रोक दिया गया।अभी बमुश्किल एक खाता ओपन हो सका है,बाकी अब भी बंद हैं।


    ब्लाग तो उड़ाये ही जाते रहे हैं,आईडी डीएक्टिव किये ही जाते रहे हैं,माडरेट करने के बहाने रोक भी लगती रही है,लेकिन अंतर्जाल के केसरिया एकाधिकार का लघुपत्रिका हश्र होने लगा है।


    फ्लिपकार्ट अमाजेन क्रांति ने विमर्श का स्पेस फूंक दिया है और समर्थ लोग भी टीआरपी के मुरीद हो गये हैं।


    जंगल में लगी है आग और कंगारु बच्चादानी के साथ सबसे ऊंची छलांग के साथ फेंस बदलने लगे हैं।


    कंगारु जो है नहीं,उन शूतूरमुर्ग की मेंढक नींद भी मौसम के शबाब कबाब शराब में शामिल हैं।उनकी भी अजब गजब कारस्तानी है।




    जब तोपखानों पर जंग लग गया हो तो पर्चा निकालना चाहिए

    जब आसमान में लगी हो आग और हवाएं भी लहूलुहान हो

    तो पांव जमीन पर रखकर जमाने के खिलाफ बाबुलंद

    आवाज दहाड़ लगानी चाहिए,हालात बदले न बदले

    मारे जा रहे लोगों की नींद में हर हाल में

    खलल डालनी चाहिए कि बहुत तेज है

    दस्तक सिंहद्वार पर,अब न जाग्यो

    तो कब जागणा है मुसाफिर

    तेरी गठरी ले चोर भाग्यो


    लाल किले की प्राचीर से प्रधान सुप्रीम स्वयंसेवक ने संसाधनों और श्रम के अधिकतम इस्तेमाल का हुंकारा भरते हुए नक्सलियों को देख लने की चेतावनी भी दी थी।


    कानाफूसी किसी मुघलिये खून की डीएनए जांच की भी है,जिनने कहा जाता है कि लाल किले और चांदनी चौक पर दावा ठोंकने की तैयारी की है।


    ऐसे मुघलिये बैरम खां अनेकानेक हैं,जो तमाम सरकारी महकमों और उपक्रमों पर दावा ठोंके बैठे हैं और उनमे से जाहिर है कि कोई इस्लाम का बंदा है ही नहीं।सबै दीनेईमान हैं।हिंदुत्व की खान रसखान हैं।


    अब इस पर गौर करें कि कभी बंगाल के किसी मरणासण्ण जराजीर्ण वृद्ध को रात के अंधेरे में लालबाजार उठाकर ले जाया गया और बाकी जो कुछ हुआ तो सिद्धार्थ बाबू जानते रहे हैं जिन्होंने पंजाब के खाढ़कुओं को भी गिल के साथ गिल्ली डंडा खेलते खेलते ठिकाने लगा दिया।हालांकि उनके शागिर्द और तब बंगाल के पुलिस मंत्री सुब्रत मुखर्जी अब भी मां माटी मानुष सरकार में वजनदार मंत्री बने हुए हैं।


    मुठभेड़ विशेषज्ञ का मां माटी मानुष से कितना गहरा ताल्लुक है,यह तो दीदी ही बता सकती हैं जो बंगाल में सबसे पहले दसों स्मार्टसिटी का लवासा मैप जारी करके सुषमा स्वराज पदचिह्ने सिंगापरु निकल पड़ी है बैंड बाजे गवइया नचनिया के साथ पूंजी को ललचाने,क्योंकि उन्हें मोदी के खिलाफ लड़ाई जारी रखनी है और बंगाल को हर हालत में गुजरात बना देना है।


    दूसरी ओर,करोड़ों रुपए के शारदा चिटफंड घोटाले के सिलसिले में धनशोधन की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पश्चिम बंगाल के वस्त्र मंत्री श्यामपद मुखर्जी और ऐक्ट्रेस-डायरेक्टर अपर्णा सेन से पूछताछ की।


    अपर्णा सेन केंद्रीय जांच एजेंसी के साल्ट लेक कार्यालय पहले पहुंचीं। ईडी ने उनका बयान दर्ज किया।


    ईडी सारदा समूह द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका की संपादक के रूप में उनकी भूमिका की जांच कर रहा है।


    घटनाक्रम से जुड़े सूत्रों ने बताया, 'सेन का बयान धनशोधन निवारण कानून की धारा 50 के तहत दर्ज किया गया।


    जाहिर है कि इस विकास पीपीपी प्रकल्प में सिद्धार्थ के शागिर्द की खासी भूमिका है,जो दीदी के सियासी उस्ताद भी हैं और जिनकी सिफारिश पर सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ दीदी को जंगे मैदान में 1984 में उतार दिया था राजीव गांधी ने।


    ज्यादा कयास लगाने की जरुरत भी नहीं है,उन चारु मजुमदार को लालबाजार में ठिकाना लगा दिया गया क्योंकि उन्होंने पहले तो भूमि सुधार मुद्दे पर एक के बाद एक दस्तावेज जारी करके सत्ताधारी वाम की नींद हराम कर दी और फिर वे कहने लगे,चीख चीखकर,चीनेर चेयरमैन,आमादेर चेयरमैन।


    चीन के खिलाफ छायायुद्ध संघियों का सबसे प्रिय खेल हैं और संघ के प्रधानतम स्वयंसेवक प्रधानमंत्री अब बांसो उछल उछलकर नारा बुलंद कर रहे हैं कि चीन का रास्ता हमारा रास्ता।इसका क्या कहिये।


    खास बात तो यह है कि स्वर्ग के सारे देव देवी एकमत हैं योजना आयोग के खात्मे पर जैसे कि वे विकास का एक ही नजरिया एफडीआई पूंजी जहां से आई,मारठी में बोले ते अपनी आई यानी कि अम्मा और पुरुषवर्स्व वर्णवर्च्सव नस्ल वर्चस्व लिंग वैषम्य की सारी संतानें असंभव मातृभक्त है।


    यानी वे भी पूंजी की संतानें हैं और इसे साबित करने के लिए किसी डीएनए जांच की जरुरत नहीं है,झुठलाने के लिए बल्कि ऐसे करतब किये जा सकते हैं।


    विदेशी पूंजी का रंग देखना तो साक्षात लक्ष्मी के विरुद्ध अनास्था,घनघोर पापकर्म है और इसीलिए पीपीपी है।


    विनिवेश पर एकमत सर्वसम्मत तो पीपीपी के लिए तो अपना अपना हिस्सा कमीशन पैकेज बूझ लेने की बाकायदा मारामारी है।अरबोंअरबपति मालामाल लाटरी जो है।


    इस लाटरी में हिस्सेदारी के लिए योजना आयोग और संस्थागत तमाम प्रतिष्ठानों का सफाया और बगुला भगतों के पैनल दर पैनल हीरक बुलेटचतुर्भुज है।देवदेवियों के लि हीरा और जनता के लिए बुलेट।


    बाकी जो जनता पापफल का भुगतान कर रहे हैं,उनपर सार्वजनिक आंसू क्या कम हैं।


    मुश्किल सिर्फ इतनी सी है कि खून की नदियों में बाढ़ है और ग्लेशियरों से भी खूनैखून हैं,आंसू में ग्लिसरीन माफिक नहीं पड़ा तो मन्नू भाई विदा हैं,इसीलिए अभिनेता अभिनेत्रियों का बाजारभाव राजनीति में सबसे ऊंचा है।


    पेट में नहीं खाना तो

    फिर गाना बजाना खाना खजाना

    सर पर नहीं छत तो

    फिर गाना बजाना खाना खजाना

    बेदखली की हो इंतहा तो

    आन पड़ी आपदा भारी

    फिर गाना बजाना खाना खजाना


    इसीलिए  बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स आज 287 अंक से अधिक की तेजी के साथ 26,390.96 के नये रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी करीब 83 अंक की बढ़त के साथ 7,874.25 के रिकार्ड स्तर पर बंद हुआ। यह लगातार पांचवां कारोबारी सत्र है, जब बाजार में तेजी आई है। कारोबारियों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त के संबोधन का असर बाजार पर पड़ा। उन्होंने बुनियादी ढांचा तथा विनिर्माण पर जोर दिया जिससे निवेशकों में उत्साह है और इसका असर बाजार पर पड़ा।


    इसीलिए नकदी संकट से जूझ रही भूषण स्टील पर घेरा और कसते हुए उसे कर्ज देने वाले बैंकों के समूह ने कंपनी के बही खातों के फॉरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया है। साथ ही प्रवर्तकों से कहा गया है कि वे कंपनी में और पूंजी डालें जिससे भूषण स्टील को दिवालिया होने से बचाया जा सके। भूषण स्टील को ऋण देने वाले बैंकों की आज हुई बैठक में यह फैसला किया गया। उल्लेखनीय है कि सीबीआई ने सिंडिकेट बैंक के चेयरमैन एसके जैन की संलिप्तता वाले कर्ज के लिए रिश्वत घोटाले में भूषण स्टील के वाइस चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक नीरज सिंघल को गिरफ्तार किया गया है।


    इसीलिए किंग ऑफ गुड टाइम्स विजय माल्या जल्द डिफॉल्टर घोषित हो सकते हैं। यूनाइटेड बैंक के बाद अब आईडीबीआई बैंक ने भी विजय माल्या को डिफॉल्टर घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उधर सीबीआई ने माल्या को भारी मरकम लोन देने वाले बैंकों की जांच शुरू कर दी है। आईडीबीआई बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया ने विजय माल्या को डिफॉल्टर घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके अलावा आईडीबीआई बैंक से 5 साल पहले मिले लोन की सीबीआई जांच शुरू हो चुकी है। बताया जा रहा है कि एसबीआई, पीएनबी भी विजय माल्या को डिफॉल्टर घोषित कर सकते हैं।


    इसीलिए जेल में बंद सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय के तीन होटलों को ब्रुनेई के सुल्तान से जुड़ी एक एक इन्वेस्टमेंट फर्म ने 2.2 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदने की पेशकश की है। सुल्तान हसन्नल बोलकिया से संबंधित फर्म ने सहारा के जिन होटलों को खरीदने की पेशकश की है, उनमें न्यूयॉर्क के प्लाजा, ड्रीम और लंदन का ग्रोसवेनॉर हाउस होटल शामिल हैं। विश्व के सबसे धनी लोगों में शुमार सुल्तान बोलकिया के पास लंदन में पहले से ही काफी रियल एस्टेट प्रॉपर्टी है। इसमें पार्क लेन का डॉचेस्टर होटल भी शामिल है।



    इसी के मध्य चीन का रास्ता साफ होजाने के बाद हांलांकि  भारत ने पाकिस्तान के साथ होने वाली विदेश सचिव स्तर की बातचीत स्थगित कर दी। सचिव स्तर की बातचीत 25 अगस्त को होनी थी। आज पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने कश्मीरी अलगाववादियों को बातचीत के लिए बुलाया था जिसे लेकर काफी विरोध हो रहा था। उधर नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान फौज की तरफ से भी लगातार गोलीबारी जारी है। इन्हें लेकर भारत सरकार नाराज थी और उसने बातचीत रद्द करने का कदम उठाया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने भी साफ कर दिया कि भारत ने अलगाववादियों को पाकिस्तान उच्चायुक्त की तरफ से मिले बातचीत के न्योते के बाद ये फैसला लिया है।


    तमाशा यह भी कम नहीं,मसलन जो है सो आगरा बाजार है।इस तमाशे के मध्य हलाल हलाली घनघोर है।घौगौर करेंः


    संघ प्रमुख मोहन भागवत के भारत को हिंदू राष्ट्र बताने वाले बयान पर बवाल छिड़ गया है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने इसे हिटलरी बयान करार दिया है। जबकि समाजवादी पार्टी ने भागवत के बयान को देश के संवैधानिक ढांचे के लिए खतरनाक बताया है। हालांकि बीजेपी पूरी तरह संघ प्रमुख के बयान के साथ खड़ी दिखाई दे रही है।

    वीएचपी के स्वर्ण जयंती समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम में हिस्सा लेने मुंबई पहुंचे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। हिंदुत्व इसकी पहचान है और यह अन्य को स्वयं में समाहित कर सकता है। पढ़ें भागवत के बयान पर किसने क्या कहाः-

    याहया बुखारी:ये बचकाना और बेवकूफी का बयान है। इसे सुनकर हंसी आती है। ये बयान सक्रिय राजनीति में आने की शुरुआत है। मोदी जी को सोचना होगा कि संविधान के दायरे से बाहर के ऐसे लोगों पर लगाम नहीं लगाई गई तो सही नहीं होगा।

    आरएसएस समर्थक विचारक राकेश सिन्हा:मोहन भागवत जी ने सही कहा है। मैं उनके बयान का समर्थन करता हूं। भारत की पहचान ही उसकी हिंदू संस्कृति है। अगर ये हिंदू राष्ट्र नहीं तो और क्या है?

    केंद्रीय इस्पात और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर:आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू धर्म के बारे में जो कहा है, वो बिल्कुल सही है।

    आरएसएस के समर्थक विराग पचपोरे:भारत हिंदू राष्ट्र है, सरसंघ चालक जी का ये सुझाव सही है। मैं इसका स्वागत करता हूं।

    बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बंगारू दत्तात्रेयःआरएसएस प्रमुख ने कुछ गलत नहीं कहा है। इस पर कोई विवाद करने की जरूरत नहीं है। हिंदुस्तान और भारत एक ही हैं। हमें हिंदू होने पर गर्व है। कांग्रेस और अन्य पार्टियां चुनाव में हार गई हैं इसलिए ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही हैं। उन्हें अपनी मानसिकता बदलनी होगी।

    सीपीएम नेता वृंदा करात: हम मोहन भागवत के बयान को बिल्कुल सपोर्ट नहीं करते। ऐसा लगता है कि सत्ता में बैठे लोग ही इस तरह के बयानों को सपोर्ट कर रहे हैं। हम इसके खिलाफ हैं।

    कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी:मोदी सरकार की कथनी और करनी में अंतर है। मोदी सरकार को संघप्रमुख मोहन भागवत, योगी आदित्यनाथ और गिरिराज किशोर के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

    आरजेडी नेता मनोज झा: मोहन भागवत, तोगड़िया और योगी आदित्यनाथ जैसे लोगों को शांत समाज पसंद नहीं है। मारकाट-खूनखराबा इनके डीएनए में है। अगर सरकार ने इन्हें नही रोका तो मैं समझूंगा कि सरकार इनसे ये बयान दिलवा रही है।

    एनसीपी नेता माजिद मेनन:बार-बार हिंदुत्व की बात करना और धार्मिक सद्भाव बिगाड़ना गलत है। सभी धर्मों का आदर करना चाहिए।

    बीजेडी के जय पांडा:भारत में बहुमत हिंदुओं का है पर संस्कृति और कानूनी रंग-ढंग संविधान के मुताबिक है।

    समाजवादी पार्टी नेता राजेंद्र चौधरी:ये आरआरएस की राजनीति का दांव पेच है। इस तरह की भाषा जिससे देश के संवैधानिक ढांचे को चोट पहुंचती हो, इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

    एनसीपी नेता तारिक अनवर:मैं आरएसएस के कमेंट से सहमत नहीं हूं। सबकी अपनी-अपनी आस्था है। कोई केवल एक धर्म के बारे में बात करता है तो वो इस मुल्क के लिए खतरनाक है।

    फतेहपुर सीकरी मस्जिद के इमाम मुफ्ती मुकर्रम:हम कहते हैं कि भारत एक सेकुलर मुल्क है और सब मिल-जुलकर रहें। वो जो चाह रहे हैं वो कभी पूरा नहीं हो सकता। भारत के प्रधानमंत्री ने खुद ही हिंदुत्व की बात को नकार दिया है।

    कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह:क्या कोई व्यक्ति जो इस्लाम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्य किसी धर्म में विश्वास रखना है वो भी हिंदू है? क्या मोहन भागवत स्पष्ट करेंगे? मुझे लगता था कि हमारे पास सिर्फ एक हिटलर है... पर अब लगता है दो हैं...भगवान बचाए।


    योजना आयोग होगा 5 MEMBER थिंक टैंक

    Published : 18-08-2014

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    योजना आयोग होगा 5 Member थिंक टैंक news five members think tank will take place of planning commision

    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योजना आयोग को खत्म करने की बात कहे जाने के बाद उसकी वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में कई तरह के प्रयास लगाए जा रहे हैं। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शक्तियां लेने वाला 5 सदस्यीय थिंक टैंक योजना आयोग की जगहर ले सकता है। अखबार ने सूत्रों के हवाले से संभावना जताई है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री और शिवसेना नेता सुरेश प्रभु इस थिंक टैंक का सबसे अहम चेहरा हो सकते हैं। इस थिंक टैंक में मुक्त बाजार के हिमायती अर्थशास्त्री अरविंद पानगडिया और बिबेक देबरॉय को भी जगह मिल सकती है। औपचारिक तौर पर इस पैनल की अध्यक्षता प्रधानमंत्री ही करेंगे। अखबार ने चर्चा में शरीक रहे अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि इस थिंक टैंक के बारे में ऎलान सोमवार या अगले एक-दो दिन में ही किया जा सकता है। विस्तृत विज्ञान आऎर तकनीकी विशेषज्ञता वाला एक अकादमिक व्यक्ति, जो संभवत: आईआईटी से होगा और संघ परिवार की सोच से इत्तेफाक रखने वाला सामाजिक विज्ञान का एक विशेषज्ञ भी इस थिंक टैंक में शामिल किया जा सकता है। हालांकि इन दोनों पदों के लिए अभी नाम सामने नहीं आए हैं। सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर अखबार को बताया कि विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों के नाम फाइनल होने की प्रक्रिया में हैं। अर्थशास्त्री देबरॉय और पानगडिया लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी की कोर टीम से बतौर सलाहकार जुडे हुए थे। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने बताया कि थिंक टैंक पर सोच-विचार पूरा हो चुका है और सिर्फ दो सवाल रह गए हैं।


    पहला, इसका नाम क्या हो। एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार को बताया कि चीन के डेवलपमेंट एंड रिफॉम्र्स कमिशन से अलग एक नाम खोजा जा रहा है। पैनल में सदस्यों की संख्या पर अधिकारी ने कहा कि एक राय यह भी थी कि ज्यादा सदस्य होंगे तो जाति और प्रदेश जैसे प्रतिनिधित्ववादी राजनीतिक मुद्दों को उपयुक्त जगह मिल सकेगी। हालांकि एक छोटा और दक्ष पैनल ज्यादा लोगों की पसंद बताया जा रहा है, क्योंकि वह मौजूदा आठ सदस्यीय योजना आयोग से अलग होगा।


    �अधिकारी ने बताया कि दूसरे क्षेत्रों से विशेषज्ञ लेने का अधिकार होगा। हालांकि अभी विस्तृत दिशा-निर्देश तय किए जाने हैं। यह थिंक टैंक सबसे पहले सरकारी बजट के साइज पर काम कर सकता है। केलकर कमिटी ने कहा था कि राजस्व घाटा और जीडीपी अनुपात को 2017 तक 3 फीसदी पर लाया जाना चाहिए। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने भी बजट में इस वित्त वर्ष के लिए राजस्व घाटे का लक्ष्य 4.1 फीसदी पर रखा है, जिसे चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। ए


    क अन्य ऑफिसर ने कहा कि प्रधानमंत्री के मन में थिंक टैंक को लेकर सोच बिल्कुल साफ है क्योंकि वह योजना आयोग के हमेशा से आलोचक रहे हैं। 2013 में गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी ने योजना आयोग के सामने एक प्रेजेंटेशन दिया था। इसमें उसकी गलतियों के बारे में बताया गया था। उन्होंने यह भी कहा था कि आयोग को किस तरह से काम करना चाहिए।


    �कौन हैं सुरेश प्रभु!


    �महाराष्ट्र की राजापुर लोकसभा सीट से शिवसेना सांसद सुरेश प्रभु पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सदस्य हैं। वह चौथी बार राजापुर से सांसद चुने गए हैं। वह राजग सरकार के अलग-अलग कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री और पर्यावरण व वन मंत्री रह चुके हैं। मोदी सरकार ने उन्हें एडवाइजरी ग्रुप फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ पावर, कोल एंडरिन्यूएबल एनर्जी के उच्चा स्तरीय सलाहकार पैनल का मुखिया नियुक्त किया है।


    बिहार के सैकडों गांवों में बाढ का पानी

    Published : 16-08-2014

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    बिहार के सैकडों गांवों में बाढ का पानी hundreds of villages inundated in bihar, major rivers swollen

    पटना। बिहार और नेपाल के तराई क्षेत्रों में हो रही बारिश के कारण बिहार की सभी प्रमुख नदियां विभिन्न स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं, वहीं बिहार के सुपौल, मुजफ्फरपुर, खगडिया, दरभंगा, सहरसा, बगहा, अररिया समेत कई जिलों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो गई है। सैकडों गांवों में बाढ का पानी प्रवेश कर गया है। इधर, सरकार ने एनडीआरएफ को बाढ प्रभावित इलाकों में लगाया है। पटना स्थित बाढ नियंत्रण कक्ष के मुताबिक बिहार की सभी प्रमुख नदियों के जलस्तर में वृद्घि दर्ज की जा रही है। वीरपुर बैराज में कोसी नदी के जलस्तर में वृद्घि हो रही है। शाम चार बजे वीरपुर बैराज में कोसी नदी का जलस्तर 2.97 लाख क्यूसेक दर्ज किया गया जबकि वाल्मीकीनगर बैराज में गंडक का जलस्तर 3.14 लाख क्यूसेक दर्ज किया गया।


    गंगा नदी कहलगांव में तथा बूढी गंडक चनपटिया में, बागमती नदी बेनीबाद में, कमला बलान जयनगर और झंझारपुर में तथा कोसी बराह, वीरपुर, कुर्सेला और बसुआ में खतरे के निशान के उपर बह रही है। महानंदा नदी ढेंगराघाट में खतरे के निशान को पार कर गई है। मुजफ्फरपुर में बागमती नदी के जलस्तर में बढोतरी के कारण औराई, कटरा, गायघाट, के 25 से ज्यादा गांवों में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया है।


    पूर्वी चंपारण के करीब तीन दर्जन गांवों में बाढ का पानी तबाही मचा रहा है जबकि पश्चिमी चंपारण के बौरिया, बगहा, मंगलपुर, नौतन समेत छह प्रखंडों के गांवों में बाढ का पानी प्रवेश कर गया है। कोसी के पूर्वी तटबंध पर सहरसा के बराही गांव के पास दबाव बना हुआ है। जिले के नौहट्टा और महिषी प्रखंड के कई गांवों में बाढ का पानी प्रवेश कर गया है। नवादा और नालंदा जिले को जोडने वाली सडक पर गौंडापुर के पास बाढ का पानी ऊपर से बह रहा है जिस कारण इस मार्ग पर आवागमन रोक दिया गया है। लोग ऊंचे स्थानों की ओर जाने लगे हैं। read more...



    Aug 18 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Modi-Blessed Think Tank of 5 to Replace Plan Panel

    Deepshikha Sikarwar & Vinay Pandey

    New Delhi:

    

    

    New Dispensation Suresh Prabhu likely to lead team of top economists Panagariya & Bibek Debroy as well as science & social science experts

    A small, handpicked, five-member think tank, which will draw its power and prestige from Prime Minister Narendra Modi's clear backing, is likely to replace the Planning Commission.

    The new panel will most likely be led in an executive capacity by former union minister Suresh Prabhu, with free market economists Arvind Panagariya and Bibek Debroy as two more likely members. It will be formally chaired by the prime minister and the announcement can come as early as Monday or a day or two after that, officials familiar with discussions said. An academic with wide science and technology expertise, perhaps from IITs, and a social science expert familiar with wider Sangh Parivar thinking are likely to be two other members of the as-yet-unnamed advisory body.

    Economists Debroy and Panagariya have both been involved in advisory capacities with Narendra Modi's core team before Modi-led BJP won the general election in a landslide in May this year.

    Officials who spoke to ET for this report, on the condition they not be identified, said the names of science and social science experts are in the process of being finalised.

    One senior official said while most thinking on the new panel's formation is over, two questions being addressed now are: first, the name of the think tank and, second, whether to accommodate at least partially a counter-view on the size of the panel. This official said a name distinct from China's Development and Reforms Commission is being sought but hasn't been decided as yet.

    On the size of the panel, the official said there has been a view that a larger think tank may be able to accommodate representational political issues such caste and states. However, a smaller, nimbler panel is the more likely option, he added, because it will be distinct from the nowabolished eight-member Plan Panel.

    However, the think tank will have the mandate to co-opt experts from other domains, another official said. He also said while terms of reference of the new body haven't been fixed yet, broad guidelines have been decided.

    One immediate focus is likely to be the size of government budget, given the Kelkar committee's recommendation that the fiscal deficit-toGDP ratio be brought down to 3% by 2017. The finance minister's deficit target for this fiscal year is 4.1%.

    Advice on government spending by keeping the Kelkar target in mind and devising economic and social sector strategies within that constraint is likely to be the think tank's first priority, said the official quoted earlier.

    Another official said the PM has a very clear role for the new body as "he has always been a Planning Commission sceptic". "Back in early 2013, as the chief minister of Gujarat, Modi had made a presentation to the Planning Commission pointing out its shortcomings and the role it should play," this official said. The new panel, according to senior officials, will be a strategic advisor, doing big thinking and thinking for the future. Among other priorities will be a blueprint for a manufacturing revival -a theme in the PM's Independence Day speech. Resource allocation to states, as reported by ET earlier, will move to the finance ministry.

    As for the existing staff of the Planning Commission, most staffers are on deputation. The commission's core staff strength is less than 100 and can either be absorbed or deployed elsewhere, officials said.




    চিনের সংস্কার আমাদের সংস্কার, মন্ত্র প্রধানমন্ত্রীর

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি, ১৮ অগস্ট, ২০১৪, ০৩:৪৭:৫৮

    সাতের দশকে চারু মজুমদার অনুপ্রাণিত কলকাতার দেওয়ালে লেখা হয়েছিল, 'চিনের চেয়ারম্যান, আমাদের চেয়ারম্যান।'১৫ অগস্টের সকালে লালকেল্লার দেওয়ালে নরেন্দ্র মোদী যেন লিখে দিয়েছেন, 'চিনের সংস্কার, আমাদের সংস্কার।'

    যোজনা কমিশনের জায়গায় যে নতুন প্রতিষ্ঠান তৈরির কথা ভাবছে মোদী সরকার, তার গায়ে 'মেড ইন চায়না'র ছাপই দেখা যাবে বলে দিল্লি দরবারের খবর। অর্থনৈতিক ও মানব উন্নয়নে নতুন চিন্তাভাবনার জোগান দেওয়ার জন্য মোদীর ভাবনায় রয়েছে চিনের 'জাতীয় উন্নয়ন ও সংস্কার কমিশন'-এর আদল।

    শুধু 'সংস্কার কমিশন'নয়। মোদী সরকার আরও বেশ কিছু ক্ষেত্রে চিনের সাফল্য অনুকরণ করতে চাইছেন। প্রধানমন্ত্রী হওয়ার আগে গুজরাতের মুখ্যমন্ত্রী হিসেবেই চিন সফরে গিয়েছিলেন। সে সময় চিনের জাতীয় উন্নয়ন ও সংস্কার কমিশনের কর্তাদের সঙ্গে কথা হয়েছিল তাঁর। মোদীর ঘনিষ্ঠ মহল মনে করে, সে সময়ই চিনের অনুকরণীয় পদক্ষেপগুলি নোটবুকে লিখে এনেছিলেন তিনি। গুজরাতে তার কিছু নিদর্শন ইতিমধ্যেই দেখা গিয়েছে। প্রধানমন্ত্রী হওয়ার পরে দেশ গড়ার কাজেও এ বার সেই পথে হাঁটছেন মোদী। চিনের মতোই ভারতে 'ম্যানুফ্যাকচারিং হাব'তৈরির স্বপ্ন যার অন্যতম। যেখানে দেশীয় সংস্থা ছাড়াও বহুজাতিক সংস্থাগুলিও এসে পণ্য উৎপাদন করবে।

    মজার কথা হল, নরেন্দ্র মোদী শুধু চিনের অনুকরণই করছেন না। কিছু ক্ষেত্রে চিনের সাহায্য নিচ্ছেন। আবার চিনের সঙ্গেই টক্কর দিতে চাইছেন। সরকারি সূত্র বলছে, চিনের আদলে যে উন্নয়ন ও সংস্কার কমিশন তৈরি করতে চাইছেন নরেন্দ্র মোদী, তার অন্যতম কাজ হবে এই জাপান, কোরিয়া, এমনকী চিনের সংস্থাগুলিকেও বুঝিয়ে এ দেশে কারখানা তৈরির জন্য ডেকে নিয়ে আসা। সেই স্বপ্ন সাকার করার ডাক দিয়েই স্বাধীনতা দিবসে লালকেল্লা থেকে মোদী বলেছেন, 'আসুন, ভারতে পণ্য তৈরি করুন। বিশ্বের যে কোনও দেশ সেই পণ্য তৈরি করুক। কিন্তু এখানে তৈরি করুক।'অর্থাৎ পৃথিবীর যে কোনও দেশের বাজারে এ বার 'মেড ইন চায়না'র মতোই 'মেড ইন ইন্ডিয়া'ছাপ দেখতে চান মোদী।

    অর্থমন্ত্রী অরুণ জেটলি মানছেন, চিনের আসল শক্তি হল, সস্তার পণ্য উৎপাদন। সুতরাং তিনি বলেই দিচ্ছেন, "ভারতীয় পণ্যকে প্রতিযোগিতায় টিকতে হলেও সস্তায় সুদ, নিচু হারে কর, বিশ্বমানের পরিকাঠামো, কম দামে বিদ্যুৎ, দ্রুত ছাড়পত্র এবং শ্রমিক নিয়োগের ক্ষেত্রে যথেষ্ট স্বাধীনতার ব্যবস্থা করে দিতে হবে।"

    ক্ষমতায় আসার এক মাসের মাথাতেই মোদীর মন্ত্রিসভা এ দেশে ইন্ডাস্ট্রিয়াল পার্ক তৈরির জন্য চিনের সঙ্গে সমঝোতা-চুক্তিতে সিলমোহর বসিয়েছে। সস্তায় পণ্য তৈরির জন্য এ দেশেই বিশেষ অর্থনৈতিক অঞ্চল তৈরি হবে। সেখানে বিনিয়োগ করবে চিন। অর্থ মন্ত্রকের এক কর্তা বলেন, "সস্তায় পণ্য উৎপাদনের পিছনে চিনের সবথেকে বড় শক্তি ছিল কম বেতনের শ্রমিক। কিন্তু এখন চিনেও শ্রমিকদের পিছনে খরচ বাড়ছে। নতুন সরকার তার ফায়দা তুলতে চায়। তাই শ্রম আইনের সংশোধন হয়েছে।"

    শিল্প ও প্রশাসনিক মহল অবশ্য মনে করে, আরও বেশ কিছু ক্ষেত্রে চিনের অনুকরণ করতে পারে মোদী সরকার। কী রকম?

    সরকারের বহর কমানোর কথাই ধরা যাক। চিনের জনসংখ্যা ১৩৫ কোটি। সরকারে মন্ত্রক রয়েছে ২২টি। ভারতের জনসংখ্যা চিনের থেকে ১২ কোটি কম হলেও মন্ত্রকের সংখ্যা চিনের থেকে ২৯টি বেশি। শিল্প মহলের সুপারিশ ছিল, মন্ত্রকের সংখ্যা কমানো হোক। রেল, বিমান, সড়ক পরিবহণ, জল পরিবহণের মতো মন্ত্রকগুলি মিশিয়ে দেওয়া হোক। বিদ্যুৎ মন্ত্রকের সঙ্গে কয়লা বা অপ্রচলিত শক্তি মন্ত্রক মিশে যাক। অনাবাসী মন্ত্রক বা ক্রীড়া ও যুব কল্যাণের অপ্রাসঙ্গিক মন্ত্রক বিলুপ্ত হোক। এই সব মন্ত্রক ছাঁটা হলে সরকারের ব্যয়ভার কমবে। লাল ফিতের ফাঁসও কাটবে।

    নরেন্দ্র মোদী এখনও অবধি একই মন্ত্রীকে একাধিক মন্ত্রকের দায়িত্ব দিয়েছেন। বিভিন্ন মন্ত্রকের মধ্যে বার্লিন-প্রাচীর ভাঙার কাজ শুরু করেছেন। কিন্তু কোনও মন্ত্রক একেবারে তুলে দেননি। মন্ত্রকের সংখ্যা কমিয়ে মোদী কবে 'মিনিমাম গভর্নমেন্ট'-এর পথে হাঁটবেন, অনেকেই তার দিকে তাকিয়ে রয়েছেন।

    চিনে কে মন্ত্রী হবেন, সরকারের উচ্চপদে কে বসবেন সে বিষয়ে পাণ্ডিত্য ও নির্দিষ্ট ক্ষেত্রে দক্ষতাই শেষ মাপকাঠি। পরিসংখ্যান বলছে, চিনের মন্ত্রিসভা বা সরকারি পদে যত জন ডক্টরেট রয়েছেন, আর কোনও দেশে তা নেই। মোদীর সরকারে পিএইচডি ডিগ্রিধারীর সংখ্যা মাত্র এক জন। মনমোহন মন্ত্রিসভায় দু'জন ডক্টরেট ছিলেন। মোদী সরকারের শিক্ষামন্ত্রী স্মৃতি ইরানির শিক্ষাগত যোগ্যতা নিয়ে প্রশ্ন রয়েছে। নিদেনপক্ষে স্নাতক না হয়েও স্মৃতি কী ভাবে শিক্ষামন্ত্রীর গদিতে বসেন, তা নিয়ে বিতর্ক চলছে। রাজনৈতিক বাধ্যবাধকতা মেনে যে দেশে মন্ত্রী বাছাই করতে হয়, সেখানে মোদী শেষ পর্যন্ত বেজিংকে কতটা অনুসরণ করতে পারেন, সেটাই দেখার।

    শিল্পমহল বলছে, সরকারি নিয়ন্ত্রণের ক্ষেত্রে সংস্কারের কাজটা করাটাও মোদীর পক্ষে একেবারেই কঠিন নয়। এ দেশে মাটির তলায় যত কয়লা রয়েছে, তার মালিকানা কয়লা মন্ত্রকের। কাকে কোথায় কয়লা খননের সুযোগ দেওয়া হবে, তা ঠিক করে মন্ত্রক। আবার মন্ত্রক নিজেই কোল ইন্ডিয়া চালায়। বিমান মন্ত্রক নিজে এয়ার ইন্ডিয়া চালায়। আবার অন্যান্য বিমান সংস্থার জন্য তারাই নীতি তৈরি করে। অর্থাৎ মন্ত্রক একাধারে নিজেই প্রতিযোগী, নিজেই নীতি নির্ধারক। কিন্তু এ দু'টি সম্পূর্ণ পৃথক করতে না পারলে নীতি নির্ধারণ কখনও পক্ষপাতশূন্য ও নৈর্ব্যক্তিক হতে পারে না। চিনে এই ব্যবস্থাটা সফল ভাবে রূপায়িত হয়েছে। নরেন্দ্র মোদীও এ দেশে সেই ভাবনা বাস্তবায়িত করতে পারেন।

    কৃষির উৎপাদন বাড়ানোর ক্ষেত্রেও চিনকে অনুকরণ করা যেতে পারে বলে কৃষি মন্ত্রকের অনেকের মত। শুধু ধানের ক্ষেত্রেই তুলনা করলে, চিনের হেক্টর প্রতি ধান উৎপাদন ভারতের তুলনায় দ্বিগুণ। ফলে ভারতের থেকে অনেক কম জমিতে ধান চাষ করেও বেশি ধান উৎপাদন করে চিন। কারণ ষাটের দশক থেকেই ধানে হাইব্রিড বীজ ব্যবহার শুরু করেছে চিন। ভারত এখনও সেই ক্ষেত্রে পিছিয়ে রয়েছে।

    http://www.anandabazar.com/national/new-era-to-begin-after-dissolve-of-yojona-commission-1.60450

    Aug 18 2014 : The Times of India (Delhi)

    LEARNING WITH THE TIMES - '90s' liberalism triggered decline of planning era



    

    

    What was the need to have a Planning Commission?

    The early days of Independence were chaotic in terms of economic planning. The geographical and economic statistics of the country required drastic revision. India was formed after the integration of many former Indian states that were earlier being governed in different ways.

    The influx of several million people after partition had aggravated the country's food supply problems. The econo my had also inherited the in flationary pressure caused by World War II and the private sector was not strong and confident enough to step forth. A fresh assessment of the financial and other resources was required and in 1949 the Advisory Plan ning Board appointed by the interim government recom mended the appointment of a Planning Commission.

    When was the Planning Commission formed?

    The Planning Commission was set up in March 1950 as an executive arm of the Union government and was chaired by Pandit Jawaharlal Nehru, the PM at that time. It was responsible for making an assessment of all the country's resources and planning how they could be used most efficiently. Also, it was supposed to identify the most important priorities of the govern ment. In 1953, scientist and statistician PC Mahalanobis joined the commission.

    Are five-year plans (FYPs) unique to India? FYPs were first im plemented by Joseph Stalin in Soviet Un ion in the late 1920s.

    This method was ad opted by many other countries. Among the bigger economies, China and India both have continued to use FYPs. China, howev er, has renamed its eleventh FYP (2006-2010) as a guideline (guihua) rather than a plan (jihua). This is seen as the central govern ment signalling a relatively non-interventionist appr oach in economic planning.

    What were the focuses of different five-year plans?

    The first FYP was focused on agriculture, price stability , power and transport. The sec ond focused on rapid industri alization and was moderately successful at a time when the country faced an acute short age of foreign exchange. The third gave top priority to agriculture to support industries and export, but was a complete failure because of the Indo-China war (1962), Indo-Pak war (1965) and severe drought 1965-66. Defence became an important priority. Thus, the first three FYPs saw resources being spent on creating the massive public sector (steel, rail, power) and building of key infrastructure (hydel projects). Subsequent plans encouraged the Green Revolution, making India self-reliant in food and so on. Since the eighth Plan (1992-97), focus shifted to liberalization and, with that, the decline of the planning process itself.

    What are plan holidays? Plan holidays are declared for years when government is not in the position to make a five-year plan. The Indo-Pak conflict of 1965 caused the first break. Between 1966 and 1969, the government operated through three annual plans. Similarly in 1990, the eighth FYP could not take off because of an unstable political situation.



    বাস্তবতা হারিয়েই আজ বিদ্রুপের পাত্র কমিশন

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি, ১৮ অগস্ট, ২০১৪, ০৩:৪৪:৩১


    সেই কবে ১৯৮৫ সালে যোজনা কমিশনের সদস্যদের 'একদল জোকার'বলে বিদ্রুপ করেছিলেন রাজীব গাঁধী। মুখ পাল্টালেও সেই 'জোকার'-দের লোক হাসানো যে এখনও চলছে, দিল্লিকে ঘিরে এক্সপ্রেসওয়ের কাজ আটকে থাকাই তার উদাহরণ। নরেন্দ্র মোদী সরকারের যোজনামন্ত্রী রাও ইন্দরজিৎ সিংহ নিজে হরিয়ানার সাংসদ। মন্ত্রী হয়েই তিনি চার বছরের পুরনো বিবাদ এক কথায় বন্ধ করে দেন। নিদান দেন, আগে জমি অধিগ্রহণ করে রাস্তা তৈরি হোক। টোল কী হবে, তা পরে দেখা যাবে।

    নরেন্দ্র মোদী আরও এক ধাপ এগিয়ে যোজনা কমিশনটাই তুলে দিয়েছেন। তাতে সব থেকে বেশি মন খারাপ এক শ্রেণির অর্থনীতিবিদের। কারণ যোজনা কমিশনের চেয়ারে বসে পরামর্শ দেওয়ার দিন ফুরলো। এক সময় টেস্ট ক্রিকেটারদের মতোই জনপ্রিয় ছিলেন এই সব অর্থনীতিবিদ। প্রশান্ত মহলানবীশ থেকে সুখময় চক্রবর্তী যারাই পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনা তৈরির ক্ষেত্রে গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা নিয়েছেন, তাঁদের নাম স্বর্ণাক্ষরে লেখা হয়েছে।

    সময় পাল্টেছে। সরকারি বিনিয়োগকে ছাপিয়ে গিয়েছে বেসরকারি লগ্নি। অর্থনীতিতে সরকারি ব্যয়বরাদ্দের থেকে এখন আন্তর্জাতিক পুঁজি অনেক বেশি গুরুত্বপূর্ণ। ফলে সরকারি ব্যয়বণ্টনের থেকেও বেশি গুরুত্ব পায় সুদ-নীতি। স্বাভাবিক ভাবেই মন্টেক সিংহ অহলুওয়ালিয়া নন, প্রচারমাধ্যমে বেশি গুরুত্ব পান রঘুরাম রাজন। বর্তমান পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনায় কোন ক্ষেত্রে অগ্রাধিকার দেওয়া হচ্ছে, এখন অর্থনীতির ছাত্ররাও তার খোঁজ রাখে না। অর্থনীতির পাঠক্রমেও সে সব পড়ানো হয় না। যোজনা কমিশনের এক উপদেষ্টাই ঠাট্টাচ্ছলে বলেন, "যোজনা কমিশন এর পরেও আগের চেহারায় থেকে গেলে তার কাজ হত ৩০৩০ সালে আলুর দাম কত হবে, সেই ভবিষ্যদ্বাণী করা।"

    সংসদ ভবন থেকে বেরিয়ে সংসদ মার্গ ধরে হাঁটলে তিনটি বাড়ির পরেই যোজনা ভবন। কমিশন উঠে গেলে ১৯৫৪ সালে তৈরি যোজনা ভবনের নামটাও পাল্টে যাবে। তা সে যত ওজনদার ব্যক্তিই হোন, প্রথম থেকেই এই বাড়ির কর্তারা ব্যঙ্গ-বিদ্রুপের শিকার। রাজীব গাঁধী যে যোজনা কমিশনকে 'জোকারের দল'বলেছিলেন, তখন তার উপাধ্যক্ষ ছিলেন স্বয়ং মনমোহন সিংহ। কমিশনের সচিব সি জি সোমাইয়া পরে তাঁর স্মৃতিকথায় লিখেছিলেন, রাজীবের কথা শুনে পদত্যাগ করতে চেয়েছিলেন মনমোহন। সোমাইয়া অনেক বুঝিয়ে তাঁকে ধরে রাখেন।

    জওহরলাল নেহরু যখন প্রশান্তচন্দ্র মহলানবীশকে যোজনা কমিশনে আনেন, সে সময়ও সব থেকে অখুশি হয়েছিলেন অর্থমন্ত্রী টি টি কৃষ্ণমাচারি। মহলানবীশ যখন দ্বিতীয় পঞ্চবার্ষিকী পরিকল্পনা তৈরি করছেন, অর্থমন্ত্রী সে সময় ঘনিষ্ঠ মহলে ক্ষোভ প্রকাশ করে বলেছিলেন প্রধানমন্ত্রী এক জন 'সুপার ফিনান্স মিনিস্টার'বসিয়েছেন!

    গত দশ বছরের ইউপিএ-আমলে মন্টেক সিংহের জমানায় কেন্দ্রীয় সরকারের বিভিন্ন মন্ত্রকের সঙ্গে যোজনা কমিশনের সংঘাত আরও বেড়েছে। মনমোহনের সঙ্গে ঘনিষ্ঠতার সুবাদে বিভিন্ন মন্ত্রকের ওপর ছড়ি ঘোরাতে চেয়েছেন মন্টেক। তাতে হয় প্রকল্পের কাজ আটকে থেকেছে, অথবা যোজনা কমিশনকে পাত্তা না দিয়ে মন্ত্রকগুলি নিজেদের মতো কাজ করে গিয়েছে। যোজনা কমিশনের তৈরি দিস্তা দিস্তা নথি আলমারিতেই সাজানো থেকেছে।

    এর সব থেকে বড় উদাহরণ বিভিন্ন ক্ষেত্রে সরকারি-বেসরকারি যৌথ উদ্যোগের জন্য তৈরি চুক্তি বা 'মডেল কনসেশন এগ্রিমেন্ট'-এর খসড়া। প্রায় গোটা পঞ্চাশেক এমন খসড়া ছাপিয়েছিলেন মন্টেক। দামি কাগজে, সুন্দর করে বাঁধানো সেই সব বই যোজনা কমিশনের আমলাদের ঘরে ঘরে সাজানো। কিন্তু একমাত্র বন্দর সংক্রান্ত চুক্তি বাদ দিলে কোনওটিতেই কেন্দ্রীয় মন্ত্রিসভার অনুমোদন মেলেনি। মন্টেক সেই সব চুক্তি মন্ত্রকগুলির উপর চাপিয়ে দিতে চেয়েছিলেন। জাতীয় সড়ক কর্তৃপক্ষ বা জাহাজ মন্ত্রক কিন্তু নিজেদের মতোই কাজ করে গিয়েছে।

    বিভিন্ন শহরে মেট্রো রেল তৈরির ক্ষেত্রেও যোজনা কমিশনের নীতি বাধা হয়ে দাঁড়িয়েছে। নগরোন্নয়ন মন্ত্রক ও রাজ্য সরকারের যৌথ উদ্যোগে হায়দরাবাদ, জয়পুরের মতো শহরে মেট্রো তৈরির পরিকল্পনা হয়েছে। যোজনা কমিশন বলে দিয়েছে, নগরোন্নয়ন মন্ত্রক ও যোজনা কমিশনের সমান অংশীদারিত্ব থাকবে। কিন্তু যৌথ উদ্যোগে যে কোনও সংস্থা চালাতে গেলে কোনও এক জন লগ্নিকারীর অংশীদারিত্ব অন্তত ৫১ শতাংশ হওয়া প্রয়োজন। না হলে সংস্থায় সিদ্ধান্ত নেওয়া যায় না। হায়দরাবাদ, জয়পুরে মেট্রো রেলের কাজও একই সমস্যায় থমকে গিয়েছে।

    বার বার কাজ আটকে দেওয়া মন্টেকের সেই যোজনা কমিশনই এ বার তুলে দিলেন নরেন্দ্র মোদী। কমিশনের এক প্রাক্তন সদস্যের কথায়, "আসলে বাস্তবের সঙ্গে সম্পর্কটাই মুছে গিয়েছিল কমিশনের। যে যোজনা ভবনে ৩৫ লক্ষ টাকার শৌচাগার তৈরি হয়,সেই যোজনা ভবন থেকেই ঘোষণা হয় দেশে এক জন গরিব মানুষ মাত্র ২৮ টাকাতেই দিব্যি দিন গুজরান করতে পারেন।"

    http://www.anandabazar.com/national/planning-commission-losing-reality-today-satire-1.60444


    দাদাগিরি ঘোচায় আঞ্চলিক দলগুলি খুশি, প্রশ্ন বিকল্প কী

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি, ১৮ অগস্ট, ২০১৪, ০৩:৪৫:৪১

    যোজনা কমিশনের খবরদারি খর্ব হওয়ায় খুশি আঞ্চলিক দলগুলি ও তাদের সরকার। বিজেপির সঙ্গে সঙ্গে আঞ্চলিক দলগুলিও মনে করছে, যোজনা কমিশন বিলোপের ফলে যুক্তরাষ্ট্রীয় কাঠামো আরও মজবুত হবে, উন্নতি হবে কেন্দ্র-রাজ্য সম্পর্কের। রাজ্যগুলি তার অর্থ আরও স্বাধীন ভাবে খরচ করার সুযোগ পাবে। রাজ্যের হাতে বাড়তি ক্ষমতা তুলে দেওয়ার সিদ্ধান্তকে তাই সামগ্রিক ভাবে স্বাগত জানিয়েছেন তামিলনাড়ুর মুখ্যমন্ত্রী তথা এডিএমকে নেত্রী জয়ললিতা বা জেডিইউ-এর নীতীশকুমার। ঘনিষ্ঠ মহলে ওই সিদ্ধান্তে সায় দিয়েছেন অখিলেশ সিংহ যাদবও। সকলেই মনে করছেন, মোদীর এই সিদ্ধান্তে যোজনা কমিশনের বাড়াবাড়ির দিন শেষ হল।

    যদিও মোদীর সিদ্ধান্তকে প্রকাশ্যে সমর্থন করার ক্ষেত্রে সমস্যা রয়েছে কিছু দলের। তারা মোদীর খোলাখুলি প্রশংসা করতেও নারাজ। ঘরোয়া আলোচনায় যোজনা কমিশনের বিদায়কে ইতিবাচক পদক্ষেপ বলে মেনে নিয়েও তাই প্রকাশ্যে ঢোক গিলছে তারা। তৃণমূল, সিপিএম, আরজেডি বা জেডিইউয়ের মতো দলের নেতারা জানতে চান, যোজনা কমিশন তুলে দেওয়ার পরে বিকল্প ব্যবস্থার ধরন-ধারণ কী হবে?

    রাজ্যের টাকা কোন উন্নয়ন প্রকল্পে কত খরচ হবে, এত দিন কার্যত সেটাই নিয়ন্ত্রণ করে আসত যোজনা কমিশন। তাদের এই অহেতুক হস্তক্ষেপকে কেন্দ্র করে বিগত দশকগুলিতে কম বিতর্ক হয়নি। রাজ্যের যোজনা বরাদ্দ ঠিক করে দেওয়ার ক্ষেত্রে কমিশনের ছড়ি ঘোরানোর বিরুদ্ধে বিভিন্ন সময়ে সরব হয়েছেন আঞ্চলিক দলের নেতারা। চতুর্থ অর্থ কমিশনের সদস্য হিসেবে অর্থনীতিবিদ ভবতোষ দত্ত সেই ষাটের দশকেই যোজনা কমিশনের ভূমিকার সমালোচনায় সরব হয়েছিলেন। ভবতোষবাবু ব্যক্তিগত ভাবে যোজনা কমিশনের হাতে বাড়তি ক্ষমতা থাকার বিরোধী ছিলেন। তাঁর মতে, সংবিধানের রূপকার হওয়া সত্ত্বেও বি আর অম্বেডকর যোজনা কমিশনের হাতে ওই বাড়তি ক্ষমতা মেনে নিতে পারেননি। অম্বেডকর মনে করতেন, বরাদ্দ বণ্টনের দায়িত্ব কেবলমাত্র অর্থ কমিশনের হাতে থাকা উচিত। এটি একটি সাংবিধানিক প্রতিষ্ঠান। কিন্তু যোজনা কমিশনের অকারণ হস্তক্ষেপে তা সম্ভব হচ্ছে না।

    অর্থনীতিবিদদের একাংশ এখন মনে করছেন, যোজনা কমিশন বিলোপের পরে অর্থ কমিশন তার গুরুত্ব ফিরে পাবে। শুধু তাই নয়, এর ফলে যুক্তরাষ্ট্রীয় ব্যবস্থাও আরও শক্তিশালী হবে বলে মনে করছে বিজেপি শিবির।

    মুখ্যমন্ত্রী থাকার সময় বরাবর রাজ্যগুলিকে অধিক ক্ষমতা দেওয়ার পক্ষে সওয়াল করে এসেছেন মোদী। প্রধানমন্ত্রী হয়ে রাজ্যগুলির দীর্ঘদিনের দাবি তিনি পূরণ করলেন বলেই দাবি করছেন বিজেপি নেতারা। এই সিদ্ধান্তে কেন্দ্র-রাজ্য সম্পর্কেও উন্নতি হবে বলে মনে করছেন তাঁরা।

    যোজনা কমিশনের হস্তক্ষেপ নিয়ে সরব ছিলেন তামিলনাড়ুর মুখ্যমন্ত্রী তথা এডিএমকে নেত্রী জয়ললিতাও। ২০১২ সালে দিল্লিতে যোজনা কমিশনের কর্তাদের সঙ্গে বৈঠকের পরে অসন্তুষ্ট জয়ললিতা মন্তব্য করেছিলেন, "আমাদের নিজেদের টাকা আমরা কী ভাবে খরচ করব তা বলে দেওয়াই যেন যোজনা কমিশনের কাজ!"তিনি মনে করেন, নতুন সিদ্ধান্তে রাজ্যগুলি নিজেদের মতো করে অর্থ খরচ করতে পারবে। আর জেডিইউ-এর রাজ্যসভা সদস্য তথা দলের মুখ্যপাত্র কে সি ত্যাগীর মতে, "এই সিদ্ধান্ত স্বাগত। দল দীর্ঘদিন ধরেই রাজ্যের হাতে বাড়তি ক্ষমতা দেওয়ার দাবি জানিয়ে আসছিল।"

    তবে রাজ্যগুলির দীর্ঘদিনের দাবিপূরণ হওয়া সত্ত্বেও মোদীকে পুরো নম্বর দিতে রাজি নন জেডিইউয়েরই নীতীশকুমার। বিহারের এই প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী ঘনিষ্ঠ মহলে জানিয়েছেন, সরকার কী বিকল্প ব্যবস্থা আনছে, সেটা খতিয়ে দেখা দরকার। আসলে রাজনৈতিক বাধ্যবাধকতায় মোদীর পাশে দাঁড়াতে পারছেন না অনেক নেতাই। যেমন লালুপ্রসাদ যাদব। মুখ্যমন্ত্রী থাকার সময় একাধিক বার যোজনা কমিশনের অতিরিক্ত হস্তক্ষেপের বিরুদ্ধে সওয়াল করেছেন এই যাদব নেতা। কিন্তু এখন কিছুটা সতর্ক ভাবেই তিনি বলছেন, ''বিকল্প ব্যবস্থাটি কী, তা আগে জানা দরকার। কেননা, মোদী নিজেকেই তো যোজনা কমিশন বলে মনে করেন!"

    কেন্দ্র-রাজ্য সম্পর্কের প্রশ্নে সিপিএম নেতৃত্ব বরাবরই রাজ্যের হাতে বেশি ক্ষমতা দেওয়ার পক্ষে। রাজ্যকে বেশি কর আদায়ের ক্ষমতা, প্রয়োজনে বাজার থেকে বেশি ধার নেওয়ার সুবিধা, ঋণ মকুব করা, কেন্দ্র-রাজ্য যৌথ প্রকল্প রূপায়ণে বাড়তি কেন্দ্রীয় সাহায্যের দাবিতে বরাবরই সরব থেকেছেন সিপিএম নেতৃত্ব। কিন্তু মোদীর ওই সিদ্ধান্ত প্রসঙ্গে রাজ্যের প্রাক্তন অর্থমন্ত্রী অসীম দাশগুপ্তের বক্তব্য, "আমরা যোজনা কমিশনের পক্ষে। ওখানে আলোচনা করলে অনেকগুলি মতামত পাওয়া যেত। তার মধ্য থেকে একটি পথ বেছে নেওয়া হতো। এর আগে নেতাজি যখন প্ল্যানিং কমিশনের পরিকল্পনা দেন, তখন পশ্চিম ভারতের শিল্পপতিরা এর বিরোধিতা করেন। এখনও সেটা দেখা যাচ্ছে।"অসীমবাবুও বলেছেন, "সরকার বিকল্প কী ব্যবস্থা আনছে, তা জানা গেলে তবেই গোটা বিষয়টি স্পষ্ট হবে। তার আগে মন্তব্য করা অর্থহীন।"

    নীতিগত ভাবে রাজ্যের হাতে বাড়তি ক্ষমতার পক্ষ নিলেও সিপিএমের আশঙ্কা, ওই সিদ্ধান্তের জেরে ধীরে ধীরে জনকল্যাণমুখী প্রকল্পগুলি বন্ধ হয়ে যাবে। দলের পলিটব্যুরো সদস্য সীতারাম ইয়েচুরি মনে করছেন, এর ফলে সামাজিক প্রকল্পগুলির মাধ্যমে পিছিয়ে পড়া মানুষের জন্য যে কাজ বা উন্নয়নমুখী প্রকল্পগুলি চলছিল তা-ও বন্ধ হওয়ার উপক্রম হবে। ইয়েচুরির কথায়, "এই সিদ্ধান্তে শিশুদের জন্য আইসিডিএস বা ১০০ দিনের কাজের মতো সামাজিক সুরক্ষা প্রকল্পগুলির ভবিষ্যৎ নিয়ে সংশয় তৈরি হল।"

    দ্বিধায় তৃণমূলও। যোজনা কমিশনের বাড়তি হস্তক্ষেপ খর্ব হওয়ায় দল খুশি। কিন্তু কেন্দ্র একতরফা ভাবে যোজনা কমিশন তুলে দেওয়ার সিদ্ধান্ত নেওয়ার সংসদে এর বিরোধিতায় সরব হওয়ারও পরিকল্পনা নিয়েছেন তৃণমূল নেতৃত্ব। ফলে তৃণমূলের রাজ্যসভা সাংসদ ডেরেক ও'ব্রায়েন আজ বামেদের সঙ্গে একই সুরে বলেছেন, "নতুন প্রস্তাব আসার পর তা বিশ্লেষণ করলে তবেই তার ভাল-মন্দ বোঝা যাবে।"কিন্তু লোকসভায় তৃণমূলের দলনেতা সুদীপ বন্দ্যোপাধ্যায় অপেক্ষায় থাকতে নারাজ। তিনি বলেছেন, "১৪ অগস্ট পর্যন্ত সংসদের অধিবেশন চলল। সেখানে যোজনা কমিশন তুলে দেওয়া নিয়ে আলোচনা হল না। কিছু জানানোই হল না। আচমকা ১৫ অগস্ট প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ থেকে এত বড় একটা সিদ্ধান্ত জানা গেল। তৃণমূল এই সিদ্ধান্ত সমর্থন করে না।"সুদীপবাবুর আরও বক্তব্য, "কেন্দ্র এবং রাজ্যগুলির মধ্যে সুসম্পর্ক বজায় রাখতে যোজনা কমিশন সেতুর ভূমিকা পালন করে। কমিশনের সচিবদের সঙ্গে রাজ্য সরকারগুলির বৈঠকে কমিশনের তরফে সদর্থক বার্তা পাওয়া যায়। সেই কমিশন কী এমন ক্ষতি করল যে, তাকে বিলুপ্ত করে দিতে হল?"



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  • 08/19/14--04:36: अब शौचालयों के लिए पांत में खड़ी कारपोरेट कंपनियां सलेम के खिलाफ जिहाद की वजह से कोलकाता वेस्ट को प्रेतनगरी बनाकर बाटा उपनगरी के लिए सिंगापुर की जीआईएस से 200 करोड़ झटक लिये दीदीदी ने आज हम जो देश भर में किसान,कामगार कर्मचारी और आमजनता को सर्पदंश से दम तोड़ते देख रहे हैं,वह बसंतीपुर के अवस्थान से ही और कोलकाता का इस नजरिये में कोई अवदान नहीं हैं.हम अगर सिरे सेबदतमीज है तो इस बदतमीजी का संक्रमण छात्रजीवन में अनवरत गिर्दा सोहबत से ही हुआ है। पलाश विश्वास