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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    Urgent Alert

    Firing in Sonbhadra, UP 

    Police firing in Kanhar anti dam proterstors early morning today

                   against illegal land acquisition by UP Govt

                  Firing done on the day of Ambedkar Jyanti 

    Police firing on anti land acquisition protesters at Kanhar dam early morning today. One tribal leader Akku kharwar from Sundari village,  Around 8 people have been grivieously injured in the firing and lathi charge by the police. Thousands of men and women are assembled at the site to intensify the protest against on Ambedkar jyanti. The protesters were carrying the photo of Baba Saheb to mark the day as " Save the Constitution Day". Akhilesh Govt fired arbitrarily on the protesters among whom women are in the forefront. Most of the women have injured. The firing is being done by the Inspector of Amwar police station Duddhi Tehsil, Sonbhdara, UP.

    Condemn this criminal Act and join in the struggle of the people who are fighting against the illegal land acquistion and constructing illegal Dam on kanhar river. 


    Roma
    Dy Gen Sec
    All India Union of Forest Working People 

    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com

    Delhi off - C/o NTUI, B-137, Dayanand Colony, Lajpat Nr. Phase 4, NewDelhi - 110024, Ph - 011-26214538

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    আসামকে বাইরে রেখেই স্থলসীমান্ত চুক্তি?

    ভারত-বাংলাদেশের মধ্যে বহু প্রতীক্ষিত স্থলসীমান্ত চুক্তি থেকে এবার আসামকে বাদ রেখেই অনুমোদন করানোর উদ্যোগ নিয়েছে দিল্লি। আর একেবারে না হওয়ার থেকে অন্তত ভাল, এই মনোভাব থেকে কিছুটা নিমরাজিও হয়ে গেছে ঢাকার ক্ষমতাসীন সরকার।

    না, এ ব্যাপারে কোনও অনুষ্ঠানিক ঘোষণা হয়নি ঠিকই, আর বিষয়টি এতটাই স্পর্শকাতর যে, ভারত সরকারের কর্তাব্যক্তিরাও প্রকাশ্যে একেবারেই মুখ খুলতে চাইছেন না। কিন্তু ভারতের প্রথম সারির বাণিজ্যিক পত্রিকা ইকোনমিক টাইমস রিপোর্ট করেছে, শাসক দল বিজেপির একাধিক শীর্ষস্থানীয় নেতার সঙ্গে কথা বলে তারা এ বিষয়টি সম্পর্কে নিশ্চিত হয়েছেন। আর এই পুরো সিদ্ধান্তটাই নেওয়া হয়েছে আসামে আসন্ন নির্বাচনের কথা মাথায় রেখেই।

    আসলে স্থলসীমান্ত চুক্তি নিয়ে বিজেপির ভেতরে যে বিরোধিতা, তার তীব্রতা সবচেয়ে বেশি ছিল আসামেই। এই চুক্তি ভারতের চারটি সীমান্তবর্তী রাজ্যকে প্রভাবিত করবে– পশ্চিমবঙ্গ, আসাম, মেঘালয় আর ত্রিপুরা। চুক্তির খসড়ায় যে ব্যবস্থা সুপারিশ করা হয়েছে, তাতে এর মধ্যে সবচেয়ে ক্ষতিগ্রস্ত হবে আসামই। কারণ সে রাজ্যে বাংলাদেশ সীমান্তে বিতর্কিত ৬.১ কিলোমিটার অংশ নিয়ে বিরোধ নিষ্পত্তির বিনিময়ে আসামকে প্রায় ২৬৮ একর জায়গা বাংলাদেশের হাতে তুলে দিতে হবে।

    আপত্তিটা উঠছে ঠিক এখানেই, কারণ এই জমি ছাড়ার বিষয়টা আসামে ভীষণ আবেগের ইস্যু, সংবেদনশীলতার ইস্যু। বাংলাদেশ থেকে আসামে বাংলাদেশি অনুপ্রবেশের লাগাতার বিরোধিতা করেই বিজেপি ভারতের এই রাজ্যে ধীরে ধীরে পায়ের তলায় জমি তৈরি করেছে, সেখানে কেন্দ্রের বিজেপি সরকারই যদি বাংলাদেশের কাছে নিজেদের ভূখণ্ড বিকিয়ে দেয় তাহলে বিজেপি কোন মুখে আসামে ভোট চাইবে? ঠিক এই প্রশ্নটা নিয়েই গত একমাস ধরে দলীয় সভাপতি অমিত শাহ'র কাছে দরবার করে আসছেন আসামের ছোট-বড় দলীয় নেতারা।

    গত ডিসেম্বরেই আসামে এক জনসভায় ভাষণ দিতে গিয়ে প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদি বলেছিলেন, স্থলসীমান্ত চুক্তি অবিলম্বে পাস করানো দরকার, আর এতে আসামের সাময়িক ক্ষতি হলেও দীর্ঘমেয়াদে তাতে রাজ্যের ভালই হবে, আর ক্ষতিটাও তিনি পুষিয়ে দেওয়ার ব্যবস্থা করবেন। মোদির এই কথা শুনে বিজেপির রাজ্য নেতারা নাকি স্তম্ভিত হয়ে গিয়েছিলেন, কারণ তাদের আশঙ্কা ছিল দলকে রাজি করালেও বাকি আসামকে তারা মোটেই এই যুক্তি গেলাতে পারবেন না!

    অথচ বিজেপি ধরে রেখেছে আগামী বছরের বিধানসভা নির্বাচনে তারা প্রথমবারের মতো আসামের ক্ষমতায় আসতে চলেছে। গত বছরের লোকসভা নির্বাচনে রাজ্যের ১৪টি আসনের মধ্যে ৭টিই পেয়েছে তারা। ৩৬.৫ শতাংশ ভোট পেয়ে অনেকটা পেছনে ফেলে দিয়েছে টানা তিন মেয়াদে ক্ষমতায় থাকা কংগ্রেসকেও। এখন স্থলসীমান্ত চুক্তির ভূত যদি তাদের সেই বাড়া ভাতে ছাই দেয়, সেই আশঙ্কা থেকেই আসামের বিজেপি নেতারা তাদের হাই কমান্ডের কাছে চুক্তির বিরুদ্ধে তদবির শুরু করে দেন।

    আর সেই পটভূমিতেই এখন মোটামুটি স্থির করা হয়েছে :

    (ক) বিরতির পর ভারতীয় সংসদের বাজেট অধিবেশন ফের বসবে ২০ এপ্রিল থেকে, আর সেই অধিবেশনেই সরকার স্থলসীমান্ত বিলটি পেশ করবে।

    (খ) কিন্তু আপাতত পশ্চিমবঙ্গ আর মেঘালয় সীমান্তের বিষয়টিই চুক্তিতে উল্লিখিত থাকবে, আসামকে চুক্তির বাইরে রাখা হবে কিনা সেটা সরকারের সর্বোচ্চ পর্যায়ে বিবেচনা করা হচ্ছে। চুক্তিতে আসাম জমি হারালে তার কি রাজনৈতিক প্রভাব পড়ছে, খতিয়ে দেখা হচ্ছে সেটাও।

    (গ) তবে ইকোনমিক টাইমসের মতে, এখনও এ ব্যাপারে চূড়ান্ত সিদ্ধান্ত নেওয়া হয়নি, প্রধানমন্ত্রী মোদি তার ইউরোপ ও কানাডা সফর থেকে ফিরেই এ ব্যাপারে শেষ কথা বলবেন।

    আরও একটি গুরুত্বপূর্ণ বিষয় হল, এই চুক্তি নিয়ে সমঝোতা হয়েছে দুটো স্বাধীন-সার্বভৌম দেশের মধ্যে। ভারত কিন্তু একতরফাভোবে এই চুক্তি নিয়ে কোনও সিদ্ধান্ত নিতে পারে না। তবে তার পরও আসাম নিয়ে তাদের এই রাজনৈতিক বাধ্যবাধকতার বিষয়টি দিল্লি সুকৌশলে ঢাকার কাছেও উত্থাপন করেছে এবং জানা যাচ্ছে, আসামকে বাদ রেখেই আপাতত যদি চুক্তিটি পাস করাতে হয়, বাংলাদেশের তাতে তেমন আপত্তি নেই বলেও আভাস দেওয়া হয়েছে।

    আসলে চুক্তিটি বেশ কয়েক বছর ধরে ঝুলে আছে এবং একেবারে না হওয়ার থেকে কিছুটা অন্তত হয়ে গেলে সেটা বাংলাদেশের জন্যও কাম্য। তারপর ২০১৬তে আসামের নির্বাচন মিটে গেলে আসাম-বাংলাদেশ সীমান্ত নিয়ে চুক্তিতে ঠিক কি করা যায়, হারানো জমির ক্ষতি অন্যভাবে পুষিয়ে দেওয়া যায় কিনা সেগুলো তখন দেখা যাবে– এমনটাই আপাতত ভাবা হচ্ছে।

    ফলে আগামী কয়েক দিনের মধ্যে স্থলসীমান্ত চুক্তি ভারত যদি অনুমোদনও করে ফেলে– সেটা হবে আসাম-বর্জিত ও আংশিক, এই সম্ভাবনা কিন্তু থাকছে ষোলো আনাই!

    http://www.banglatribune.com/%E0%A6%86%E0%A6%B8%E0%A6%BE%E0%A6%AE%E0%A6%95%E0%A7%87-%E0%A6%AC%E0%A6%BE%E0%A6%87%E0%A6%B0%E0%A7%87-%E0%A6%B0%E0%A7%87%E0%A6%96%E0%A7%87%E0%A6%87-%E0%A6%B8%E0%A7%8D%E0%A6%A5%E0%A6%B2%E0%A6%B8


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    अन्याय की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो

    Posted by Reyaz-ul-haque on 4/14/2015 02:34:00 AM


     आज एदुआर्दो गालेआनो नहीं रहे। दुनिया में हर तरह के शोषण, गैरबराबरी और नाइंसाफी के खिलाफ लिखने-बोलने वाले इस बहादुर योद्धा पत्रकार और लेखक गालेआनो का एक और लेख। दुनिया जिस ढांचे पर चल रही है और इसके बारे में जो झूठ प्रचारित किया जाता है गालेआनो ने पूरे जीवन अपने लेखन में उसको रेशा रेशा उधेड़ दिया है- चाहे उनकी डायरीनुमा किताबें हों या लातीन अमेरिका (मेमोरीज ऑफ फायर) और दुनिया (मिरर्स) के इतिहास का पुनर्लेखन। उनका लेखन विडंबनाओं और व्यंग्यों का एक लंबा सिलसिला है। यहां पेश लेख यह उनकी किताब पातास आरीबा से लिया गया है। अनुवाद पी. कुमार मंगलम का है। गालेआनो के दूसरे लेखों और साक्षात्कारों को यहां पढ़ा जा सकता है।

    रंग-रंगीले विज्ञापन बुलाते हैं कि आओ खरीदो और खर्च करो, वहीँ आज की आर्थिक व्यवस्था यूँ रोकती है, मानो कहती हो, चलो पास भी न फटको! खरीदने-खर्चने के ये बुलावे, जो हम सभी पर थोप दिए गए हैं, ठीक उसी वक्त ज्यादातर लोगों की पहुँच से बाहर भी रखे गए हैं। न्योता देकर दुत्कार देनेवाले बाजारी हिसाब-किताब का कुल जोड़ फिर यह निकलता है कि कुछ और कदम अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। अखबारों में आए दिन छप रही अपराध की ख़बरें हमारे समय की ऐसी ही विडंबनाओं को किसी आर्थिक और राजनीतिक रपट से कहीं ज्यादा उजागर करती हैं! 

    अपने बाजारी सज-धज की दावत में यह दुनिया सबको मोहती और बुलाती तो है, लेकिन बहुतों के लिये अपना दरवाजा बंद ही रखती है। इस तरह, यहाँ एक ही समय बराबरी और गैरबराबरी दोनों का खेल खेला जाता है। सभी को एक ही तरह की सोच और आदतों में ढालते हुए जहाँ 'बराबरी'का डंडा चलाया जाता है, वहीं बात जब सबको समान अवसर देने की आती है, तो यहाँ मौजूद गैरबराबरी छिपाए नहीं छिपती!

    'बराबरी'का डंडा और गैरबराबरी

    सिर्फ खरीदने और खर्च कर देने का हुक्म देनेवाली सोच आज हम सब पर बुरी तरह हावी है। पूरी दुनिया में आज जो गैरबराबरी की 'व्यवस्था'कायम की जा रही है, वह इस सोच से अलग देखी ही नहीं जा सकती। इस तरह एक-दुसरे की जड़ें सेंकती और चेहरा बनाती-छुपाती इन दो जुड़वा बहनों की हुकूमत बिना किसी भेदभाव के हम सब के ऊपर थोप दी गयी है।

    सबको एक जैसा बना देने पर तुली यह पूरी व्यवस्था इंसानियत के सबसे खूबसरत अहसास को ख़त्म किए दे रही है। वही अहसास जिसके हम सबमें मौजूद कई-कई रंग आपस में कहीं गहरे जुड़े भी हुए हैं। आखिर, इस दुनिया का सबसे बड़ा खजाना इसी एक दुनिया में बसी बहुत सारी अलग-अलग दुनियायें ही तो हैं, जिनके अपने अलग-अलग संगीत, दुख-दर्द, रंग, जीवन जीने, कुछ कहने, सोचने, कुछ बनाने, खाने, काम करने, नाचने, खेलने, प्यार करने, पीड़ा झेलने और खुशी मनाने के हजारों तरीके हैं, जिन्हें हमने धरती पर अपने लाखों साल के सफर में ढूंढ़ा है।

    हम सबको सिर्फ मुंह बाए तमाशा देखते रहने वालों में तब्दील कर देने वाली 'बराबर'व्यवस्था किसी हिसाब में नहीं समाती। ऐसा कोई कम्प्यूटर नहीं बना, जो यह बता सके कि कैसे 'मास कल्चर'का कारोबार हमारी सतरंगी दुनियाओं और अस्मिता के बिलकुल बुनियादी हक़ पर रोज ही हमले कर रहा है। हकीकत, हालांकि, यही है कि इस कारोबार के टूजी-थ्रीजी फाड़[1]  'तरक्की'ने हमारा देखना-सोचना ख़त्म कर दिया है। हाल यह है की समय अपने इतिहास से तथा जगहें अपनी अद्भुत विविधताओं से खाली और अनजान होने लग गई हैं। दुनिया के मालिक लोग, माने वही जिनके पास संचार-सूचना के 'बड़े'माध्यमों की लगाम है, हमें खुद को हमेशा एक ही आईने में देखते रहने की हिदायत देते हैं। वही आईना, जहां दूसरी तरफ से सिर्फ खरीदने और खर्च डालने की सीखें निकलती हैं। 

    जिसके पास कुछ नहीं है, वह कुछ नहीं है। जिनके पास कार नहीं है, जो ब्रांडेड जूते या विदेशी परफ्यूम इस्तेमाल नहीं करते वे तो जीने का दिखावा ही कर रहे हैं। आयात पर पलती अर्थव्यवस्था और पाखण्ड फैलाती संस्कृति! ऐसे ही बकवासों के राज में हम सभी ठेल-ठेलकर एक बड़े और भड़कीले जहाज पर बिठा दिए गए हैं। उपभोक्तावाद का पाठ रटाता यह जहाज बाजार की उठती-मचलती लहरें नापता है। जाहिर है, ज्यादातर लोग इस जहाज से बाहर फेंक दिए जाने को अभिशप्त हैं। लेकिन सफर का पूरा मजा लेने वालों का खर्च, जो विदेशी कर्जे लेकर चुकाया जाता है, सबके मत्थे चढ़ता है। कर्जे की रकम से यह इंतजाम किया जाता है कि एक बहुत ही छोटा-सिमटा तबका अपने-आप को 'नए फैशन'की तमाम गैरजरूरी चीजों से भर ले। यह हमारे उस मध्यवर्ग के लिए होती है, जो कुछ भी खरीद कर 'बड़ा'और हाई-फाई दिख जाना चाहता है। और उस ऊँचे तबके के लिए भी, जो अपने जैसे लोगों की नकल कर उनसे भी ऊँचा हो जाने की जुगत भिड़ाए रहता है। फिर टीवी तो है ही इन सारे तबकों को यह भरोसा देने के लिए कि वे तमाम मांगें कितनी जरुरी है जो, दरअसल, दुनिया का उत्तर बिना रूके बनाता और पूरी कामयाबी से दक्षिणी हिस्से को भेजता रहता है।[2] 

    लातिन अमेरिका के उन करोड़ों बच्चों के इस जिंदगी के क्या मायने हैं जो इस पूरे दौर में बड़े हो रहे हैं और बेकारी और भुखमरी देखने के लिये जवान हो रहे हैं। विज्ञापनों दुनिया विचित्र दुनिया। मांग बढ़ाती है या हिंसा? टेलीविजन भी बाजार को अपनी पूरी सेवा देता है। यह हमें सामानों के विज्ञापन के ढेर बिठाकर हमें जिंदगी के अच्छी-भली चलने का भ्रम पालना सिखाता है, साथ ही रोज हिंसा की ऑडियोविजुअल'खुराक भी देता है। जिसकी लत 'विडियोगेम्स'से हमें पहले ही लग चुकी होती है। अपराध टी।वी। पर आने वाला सबसे मनोरंजक कार्यक्रम बन गया है। विडियोगेम्स की हिंसा से भरी दुनिया हमें रोज और ज्यादा हिंसक और बर्बर होने के नए मंत्र देती है। जैसे कि 'मारो उन्हें, इससे पहले कि वे तुम्हें मारें'या 'आप अकेले हैं, सिर्फ खुद पर भरोसा करें'। इस सब उथल-पुथल की गवाह बन रहे आधुनिक शहर बढ़ रहे हैं। लातिन अमेरिका के शहर बढ़कर दुनिया के बड़े शहरों में शुमार हो रहे हैं। बढ़तो शहरों के साथ अपराध भी उससे या उससे कहीं ज्यादा घबरा देने वाली, रफ्तार से बढ़ रहे हैं। 

    आज की आर्थिक व्यवस्था को बढ़ते उत्पादन की खपत और फायदा बनाए रखने के लिये बाजार बढ़ाते जाने की जरूरत है। साथ ही लागत कम बनाए रखने के लिये यह सबसे सस्ते मजदूर और कच्चा माल भी चाहता है। यह अंतर्विरोध ही बाजार का मूलमंत्र है जो हम हर दिन बढ़ते दामों और मजदूरों को उनकी न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दिये जाने के आम होते मामलों में देख सकते हैं। यह अंतर्विरोध ही दुनिया के दो गैरबराबर हिस्सों में बंटे रहने के मूल में है, जब विकसित उत्तरी भाग साम्राज्यवाद दक्षिणी और पूर्वी भागों को अपनी कंपनियों के लिये खरीदार बना रहा है। यह साम्राज्यवाद का नया रूप है जो बड़े और विकसित देशों की बाजारवादी धौंस से जाहिर होता है। खरीददार बढ़ाते रहने की इस अंधाधुन्ध रफ्तार से बढ़ाया है तो तो सिर्फ हाशिये पर खड़े लोगों की संख्या जो अपराधी बनने को मजबूर है। सब कुछ खरीद लेने की इस सनक में हर आदमी वो सब कुछ खरीद लेना चाहता है, जो वह दूसरों के पास देखता है और इसके लिये उसे हिंसा से भी कोई परहेज नहीं है। सभी इस आपधापी और मुठभेड़ के लिये खुद को तैयार कर रहे हैं। कोई भी कभी भी मार दिया जा सकता है, वे लोग जो भूख से मर रहे हैं और वे भी जिनके पास खाने को जरूरत से ज्यादा है।

    सांस्कृतिक विविधताओं को खत्म कर सबको एक जैसा खरीदार बना देने की यह पूरी प्रक्रिया कैसे काम कर रही है, इसे आंकडों से नहीं दिखाया जा सकता। हालांकि इसके उलट व्यवस्था की आर्थिक गैरबराबरी बयां करने को कई आंकड़े हैं। हम इसे देख सकते हैं। इस पूरी व्यवस्था को बनाए रखने के लिये विश्वबैंक इस कड़वी सच्चाई को स्वीकारता है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र के कई संगठन भी इसकी पुष्टि करते हैं। दुनिया की अर्थव्यवस्था कभी भी इतनी गैरबराबरी बढ़ाने वाली नहीं रही और न कभी दुनिया इतनी क्रूर अन्याय की गवाह बनी थी। 1960 में दुनिया की आबादी का सबसे धनी 20 फीसदी हिस्सा सबसे गरीब 20 फीसदी के मुकाबले 30 गुना ज्यादा धनी और साधन सम्पन्न था। इसके बाद तो यह खाई और चैड़ी होती रही है। सन 2000 तक यह अंतर बढ़कर 90 गुना हो जाएगा।

    अनुवादकीय टिप्पणी

    1. मूल लेख में "demoledores progresos" phrase का उपयोग हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ विध्वंसक विकास होगा। लेकिन भारत के सन्दर्भ में बात को और मौजूं बनाने के लिए "टूजी-थ्रीजी फाड़ तरक्की"का प्रयोग किया गया है। 
    2. उत्तर और दक्षिण से यहां तात्पर्य धरती पर मौजूद संसाधनों के वितरण से है और यह सभी मामलों में भौगोलिक संकल्पना नहीं है।

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    'मर्द'तैयार करती सोच की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो

    Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2015 08:16:00 PM


    आज उरुग्वे निवासी, लातीन अमेरिकी लेखक-पत्रकार एदुआर्दो गालेआनो का निधन हो गया. वे लेखकीय और पत्रकारीय साहस की मिसाल थे. राजकीय दमन को बहुत करीब से देखने वाले, प्रतिरोध और जनसंघर्षों के साथ अडिग रूप से खड़े और बदलाव की उम्मीद को हमेशा जिंदा रखनेवाले और गालेआनो का जाना मायूस कर देनेवाला है. उनके निधन पर उनकी किताब पातास आरीबा (अपसाइड डाउन) का एक अंश। इस किताब का अनुवाद अनुवाद जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में लातीनी अमरीकी साहित्य के शोधार्थी पी. कुमार मंगलम कर रहे हैं। साथ में दिए गए नोट्स अनुवादक के हैं।

    नजरिया 1

    जरा सोचिए अगर ईसाई उपदेश धर्मप्रचारिकाओं की कलम से निकले होते तो क्या होता! ईसा युग की पहली रात का बखान कैसे होता? उनकी कलम यही बताती कि संत खोसे उस रात कुछ उखड़े-उखड़े से थे। भीड़भाड़ और होहल्ले से भरी उस जगह में घास-फूस और पंखों के पालने में झुलते नवजात ईसा के करीब होकर भी वह अनमने ही बने रहे। वर्जिन मेरी, फरीश्तों, चरवाहों, भेड़ों, बैलों, खच्चरों, पूरब से आए जादूगरों और बेलेन तक का रास्ता दिखाते सितारे के मदमस्त झुंड में वह अकेले ही, उदास खड़े थे। कुरेदे जाने पर कुछ अस्पष्ट-सी आवाज़ में उन्होंने कहा: "मुझे तो एक बच्ची चाहिए थी"!


    नजरिया 2

    क्या होता अगर हव्वा ने जेनेसिस[1] लिखी होती! इंसानी सफर की पहली रात तब कैसी होती ! उसने किताब की शुरुआत ही यह बताते हुए की होती कि वह न तो किसी जानवर की हड्डी से पैदा हुई थी न ही वह किसी सांप को जानती थी; उसने किसी को सेब भी नहीं दिए थे। ईश्वर ने उससे यह नहीं कह था कि बच्चा जनते समय उसे दर्द होगा और उसका पति उसपर हुकूमत करेगा। वह बताती कि यह सब तो सिर्फ़ झूठ और झूठ है जिसे आदम ने प्रेसवालों को बताकर 'इतिहास'और 'सच'का रूप दे दिया था।

    ''अरे छोड़ो भाई, ये सब औरतों की बाते हैं।''अक्सर हम यह कह-सुन लेते हैं। दुनिया में रंगभेद और मर्दों की हुकूमत का सिलसिला साथ ही शुरू हुआ और चलता रहा है। अपनी धमक बनाए रखने के उनके दावे-हवाले भी एक जैसे ही होते हैं। इस दोहरे लेकिन घुले-मिले खेल को उजागर करते एउखेनिओ राउल साफ्फारोनि स्पेन में 1546[2]  में बने कानून 'एल मार्तिल्यो दे लास ब्रुखास'का हवाला देते हैं। 'डायन'करार दी गई औरतों को 'ठीक'करने वाला यह फरमान बाद में आधी आबादी के खिलाफ़ कई कानूनों का आधार बना। वह यह भी बताते हैं कि धर्म-ईमान के 'पहरेदारों'ने कैसे यह पूरा पोथा ही औरतों पर जुल्म को जायज़ ठहराने और मर्दों के मुकाबले उनकी  'कमजोरी'बार-बार साबित करने के लिए लिख डाला था! 

    वैसे भी, बाइबिल और यूनानी किस्सों-कहावतों के जमाने से ही औरतों को कमतर बताने-बनाए जाने की शुरुआत हो चुकी थी। तभी से यह याद दिलाया जाता रहा है कि वो हव्वा ही थी जिसकी बेवकूफी ने इंसान को स्वर्ग से धरती पर ला पटका। और, दुनिया को मुसीबतों से भर देने वाले पिटारे का ठीकरा भी एक औरत पांडोरा पर ही फोड़ा जाता है। अपने चेलों को संत पाब्लो यही सबक रटाया करते थे कि ''औरत के शरीर का एक ही हिस्सा मर्दों वाला होता है, और वह है उसका दिमाग''! वहीं, उनसे उन्नीस सौ साल बाद सामाजिक मनोविज्ञान के आरंभकर्ताओं में रहे गुस्ताव ले गोन भी इसी धूर्त खेल को बढ़ाते रहे। और तो और, वह यह भी फरमा गए कि ''किसी औरत का अक्लमंद होना उतना ही अजूबा है, जितना दो सिरों वाले चिम्पांजी का पाया जाना ''!  घटनाओं का अंदाजा लगा सकने की औरतों की खूबियां गिनाने वाले चार्ल्स डार्विन भी इसे 'नीची'नस्ल की खासियत ही बताते रहे। 

    अमरीकी महादेशों पर यूरोपीय हमलों के समय से ही वहां समलैंगिकों को मर्दानगी के 'कुदरती ढांचों'के खिलाफ़ ठहरा दिया गया था। अपने नाम से ही पुरूष जान पड़ते ईसाई भगवान के लिए मूलवासियों में मर्दों का औरतों की तरह होना सबसे बड़ा पाप था। ऐसे  ईश्वर के 'सभ्य'सेवकों के लिए मूलवासी मर्द "बिना स्तन और प्रजनन क्षमता वाली स्त्री"ही रहे। इसी वजह से कि वे व्यवस्था के लिए जरूरी मजदूर नहीं पैदा करतीं, आजकल भी समलैंगिक औरतें 'स्त्री'होने के 'कायदों'के उलट बता दी जाती हैं। 

    गढ़ी और बार-बार दुहराई गई धारणाओं में एक औरत बच्चे पैदा करने, नशेड़ियों को आनंद देने और 'महात्माओं'के पापों को अपनी चुप्पी से ढंकने वाली ही रही है। यही नहीं, वह मूलवासियों और अश्वेतों की तरह ही स्वभाव से पिछड़ी भी बताई जाती रही है। आश्चर्य नहीं कि इन्हीं तबकों की तरह वह भी इतिहास के हाशिए पर फेंक दी गई है! अमरीकी  महादेशों के सरकारी इतिहास में आज़ादी के 'महान'जंगबाजों की मांओं और विधवा औरतों की बहुत धुंधली मौजूदगी यही साबित करती है। इस इतिहास में मर्द नए मुल्कों के झंडों की अगुवाई हासिल करते हैं और औरतों को कढ़ाई और मातम की घरेलू सीमाओं में बांध दिया गया है।

    यही इतिहास यूरोपीय हमलों में आगे-आगे रही औरतों और फिर आज़ादी की लड़ाईयों की क्रियोल[3] महिला योद्धाओं को विरले ही याद करता है। युद्ध और मार-काट का बखान करने वाले इतिहासकार इन औरतों की 'मर्दाना'बहादुरी का जिक्र तो कर ही सकते थे![4] इतना ही नहीं, गुलामी के खिलाफ़ खड़ी हुई अनगिनत मूलवासी और अश्वेत नायिकाओं का तो यहां कोई जिक्र ही नहीं है। इतिहास से गायब कर दी गईं इनकी आवाज़ें कभी-कभार और अचानक ही किसी जादू की तरह सामने आती, बहुत कुछ कह जाती हैं। मसलन, हाल ही में सूरीनाम पर लिखी एक किताब पढ़ते हुए,  मैंने मुक्त हुए गुलामों की नेता काला को जाना। पूजे जाने वाले अपने डंडे से वह दूर-दूर से भाग कर आते गुलामों की अगुवाई किया करती थी। उसकी एक और खास बात यह लगी कि उसने अपने निहायत ही नीरस पति को छोड़ा और पीट-पीट कर मार डाला था। 

    अश्वेतों और मूलवासियों की तरह ही औरत का 'पिछड़ापन'भी सभी तरह से साबित कर दिया गया है।  हालांकि, वह एक संभावित "खतरा"भी रही है। ''भाई, एक औरत की तमाम अच्छाइयों से एक मर्द की बुराई कहीं अच्छी'', यह सीख ईसाई गुरू एक्लेसियास्तेस की थी! वहीं, सुनी-सुनाई कहानियां यही गाती आई हैं कि यूनानी लड़ाका उलिसेस कैसे मर्दों को भरमाने वाली सुरीली आवाज़ों को बखूबी भांप लेता था। वहां सभी मानते थे कि ये आवाज़ें जलपरी का रूप धर मर्दों को गायब करने वाली औरतों की ही होती हैं। हथियारों और शब्दों पर मर्दों का कब्जा जायज़ ठहराती ऐसी ही रीतियों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। फिर, उन्हें नीचा दिखाए जाने या एक खतरा बताए जाने की हामी भरने वाली मान्यताएं भी अनगिनत हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे मुहावरे सबक देते हैं: ''औरत और झूठ इस दुनिया में एक ही दिन आए थे''। यह और जोड़ा जाता है कि ''औरत के बात की कीमत एक रत्ती भी नहीं होती''। ऐसे ही विश्वासों के साथ पले-बढ़े लातीनी अमरीकी किसान  मानते आए हैं कि रात में राहगीरों पर घात लगाए, बदले की प्यासी बुरी आत्माएं औरतों की ही होती हैं। बातों से होकर चौकन्नी आंखों और सपनों तक पसरे इन भ्रमजालों का आखिर मतलब क्या है! यह सब कुछ आनंद और सत्ता के मौकों पर औरतों के संभावित दावे से उपजती मर्दाना बेचैनी ही जाहिर करता है।

    बात की बात में 'डायन'  बतलाकर सरेआम मार दिया जाना औरतों की नियति रही है। और यह स्पेनी 'धर्म अदालतों'तक ही सीमित नहीं रहा है। अपनी यौनिकता और, सबसे बढ़कर, इसका अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकने की संभावनाएं औरतों को बौखलाई निगाहों, धमकियों और कड़वे बोल का 'तोहफ़ा'देती आई हैं। तमाम पहरों-पाबंदियों से छिटकती ऐसी 'विस्फोटक'[5] संभावनाओं को कुचलने के उपाय भी सदियों पुराने हैं। इनका हौवा खड़ा कर औरतों को शैतान का रूप बताया जाना, इसी सिलसिले की शुरुआत है। फिर, मानो यह दिखाते हुए कि आग की सजा आग ही होती है, इन 'गंदी'औरतों को ईश्वर की 'मर्जी'से जिंदा भी जलाया जाता रहा है।

    इस तरह की तमाम करतूतों में जाहिर होती बौखलाहट को यही डर हवा देता आया है कि औरत भी जिंदगी खुल कर और मजे से जी सकती है।  सालों-साल से अलग-अलग जगहों की कई संस्कृतियों में दुहराई गई एक खास मान्यता के मायने कुछ यही हैं। योनि को मुंह फाड़े किसी भयंकर मछली की तरह पेश करता इसका 'सच'यह सिखाता है: "औरत तो नरक का द्वार होती है"[6]।और आज भी जब एक सदी खत्म होकर नई शुरू हो चुकी है, करोड़ों औरतों के यौनांगों पर हमला बदस्तूर जारी है। 

    ऐसी कोई भी औरत नहीं मिलेगी जिसपर बुरी "चाल-चलन"का ठप्पा न लगा हो। लातीनी अमरीका के लोकप्रिय नृत्यों बोलेरो और तांगो में सभी औरतें धोखेबाज और वेश्या (मां को छोड़कर) ही रही हैं। वहीं, दुनिया के दक्षिणी देशों में हर तीसरी शादीशुदा औरत रोज़ाना घरेलू हिंसा झेलती है। "सात जन्मों के बंधन"का यह 'तोहफ़ा'उसे उन सब कामों की सजा देता है, जो वह करती है या फिर कर सकती है।

    मोंतेवीदियो[7] की बस्ती कासाबाये की एक मजदूरिन बताती है :

    "सोते में ही किसी बड़े घर का लड़का आकर हमें चूमता और हमारे साथ सोता है। जगने पर वही हमें मारता-दुत्कारता है"।
     

    वहीं, दूसरी कहती है: 

    "मुझे अपनी मां से डर लगता है, मेरी मां भी मेरी नानी से डरा करती थी।"

    समाज और परिवार में 'संपत्ति के अधिकार'को मनवा लिए जाने की ऐसी मिसालें और भी हैं। जैसे,  मार-पीटकर औरत  पर अपनी हुकूमत चलाते मर्द  और बच्चों पर अपनी जबर्दस्ती थोपते औरत-मर्द दोनों। और क्या बलात्कार इसी हुकूमत को मनवा लेने की सबसे हिंसक और खौफ़नाक नुमाईश नहीं है?

    एक बलात्कारी को सिर्फ आनन्द नहीं चाहिए। वह तो उसे मिलता भी नहीं। उसे चाहिए औरत के शरीर पर अपना पूरा और मनमाना कब्जा। हर बार और बर्बर होता बलात्कार अपने शिकारों की देह पर संपत्ति के ऐसे ही दावों के कभी न भरने वाले घाव छोड़ जाता है। और, यह हमेशा से तीर, तलवार, बंदूक, मिसाइल और दूसरे साजो-सामान के साथ चले सत्ता के मर्दाना खेल का सबसे भयानक चेहरा है। संयुक्त राज्य अमेरिका में हर छ्ह मिनट और मेक्सिको में हर नौ मिनट में एक औरत सत्ता का यह 'अधिकार'झेलती है। मेक्सिको की एक महिला कहती हैं:

    ''बलात्कार का शिकार होना और किसी गाड़ी के नीचे आ जाना एक बराबर ही है, सिवाय इसके कि बलात्कार के बाद मर्द यह पूछते हैं कि जो हुआ उन्हें पसंद आया कि नहीं।'' 

    आंकड़ों से बलात्कार के सिर्फ़ उन मामलों का पता चलता है, जिनकी रपट लिखाई जाती है। लातीनी अमरीका में ऐसे मामले सच्चाई के आंकड़ों से हमेशा बहुत कम होते हैं। बलात्कार झेलने वाली ज्यादातर औरतें तो डर की वजह से चुप रह जाती हैं। अपने ही घर में  बलात्कार का शिकार हुई बच्चियां  'अवैध'संतानों को किसी सड़क पर जन्म देती हैं। यहीं पलने वाले लड़कों की तरह, इन 'सस्ती'देहों का आसरा भी यह सड़कें ही रह जाती हैं। रियो दी जानेइरो[8]  की गलियों में "भगवान भरोसे" पली-बढ़ी चौदह साल की लेलिया बताती है:

    "हाल यह है कि चारों ओर लूट है। मैं किसी को लूटती हूं, और कोई मुझे।"

    देह बेचने के एवज में लेलिया को या तो बहुत कम मिलता है या फिर मिलती है सिर्फ़ मार और दुत्कार।  और जब कभी गुजारे की गरज से वह चोरी करती है, तब पुलिस उससे वह भी  झपट लेने के अलावा उसकी इज्जत भी लूटती है। मेक्सिको सिटी[9] की गलियों में भटकते हुए बड़ी हुई सोलह साल की आंखेलिका बताती है:

    ''मेरे यह बताने पर कि मेरा भाई मेरा शारीरिक शोषण कर रहा है, मां ने मुझे ही घर से बाहर कर दिया। अब मैं एक लड़के के साथ रह रही हूं और पेट से हूं। वह कहता है कि अगर लड़का हुआ तो  मेरी मदद करेगा। लड़की होने की सूरत में उसने कुछ भी वायदा नहीं किया।''

    यूनिसेफ[10] की निदेशिका का मानना है: ''आज की दुनिया में लड़की होना खतरों से खाली नहीं है"। यहां वह नारीवादी  आंदोलनों की तमाम सफल मांगों के बावजूद बचपन से ही  औरतों के खिलाफ़ चले मारपीट और भेदभाव को भी सामने लाती हैं। 1995 में बीजिंग में स्त्री-अधिकारों पर हुई अंतर्राष्ट्रीय बैठक में यह बात खुली कि एक ही काम के एवज में उन्हें मर्दों के मुकाबले तिहाई मजदूरी ही मिलती है। किन्हीं दस गरीबों में सात तो औरतें ही होती हैं, वहीं सौ में से बमुश्किल एक  के पास कोई संपत्ति होती है। यह सब 'तरक्की'और 'खुशहाली'के रास्ते पर इंसानियत की अधूरी उड़ान ही जाहिर करता है।  वहीं, संसदों की बात करें तो औसतन दस सांसदों में एक  और कहीं-कहीं तो एक भी महिला सांसद नहीं है।

    जब औरतों की जगह घर, कारखानों तथा  दफ्तरों में थोड़ी-बहुत  और रसोई घर तथा बिस्तर में पूरी तरह पक्की कर दी गई है, सत्ता और युद्ध की चाभी मर्दों के हाथ ही है। ऐसे में यूनिसेफ की निदेशिका कारोल बेल्लामी जैसी मिसालें इक्का-दुक्का ही हैं। संयुक्त राष्ट्र समानता के अधिकारों की बात करता है, उसे खुद के ऊपर लागू नहीं करता। दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत में हर दस अहम पदों में आठ पर मर्द काबिज हैं।

    अनुवादक के नोट्स

    1. बाईबिल की पहली किताब
    2. यह मध्ययुग में कायम रहे तथाकथित धर्म अदालतों 'इन्किसिसीयोन'के दौर की बात है। ये कचहरियां नए ईसाई बने मुस्लिमों और यहूदियों की 'पवित्रता'जांचने के साथ-साथ 'अधर्मियो'की पहचान कर उन्हें सजा भी देती थीं।
    3. लातीनी अमरीका में गुलामी के दौर में स्पेनी, पुर्तगाली, मूलवासी और अफ्रीकी समुदायों के मेल से कई जाति और उपजातियां बनी थीं। 'शुद्ध'यूरोपीय खून के अपने दावे के साथ क्रियोल खुद को इस बहुरंगी सामाजिक सीढ़ी के सबसे ऊपर रखते थे।
    4. ठीक उसी तरह जैसे झांसी की रानी की वीरता समझने-समझाने के लिए उनकी बहादुरी को मर्दाना होने का तमगा दिया जाता रहा है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता बताती है: "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी"
    5. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, हिंदू लड़कियों व मुस्लिम लड़कों की शादियों को देश की एकता-अखंडता के लिए गंभीर खतरा मानने वाले बाबू बजरंगी ने यह बयान दिया था "हिंदू घरों में बैठी हर कुंवारी लड़की एक बम है जो अपनी मर्जी से चल जाए तो हिंदू समाज के लिए बड़ा खतरा है"।
    6. हाल में बिहार में लोगों की जुबान पर चढ़े एक गाने के बोल थे "मिस काल करताड़ु किस/देबू का हो, अपना मशीनिया में पीस देबू का हो"।
    7. लातीनी अमरीकी देश उरुग्वे की राजधानी।
    8. ब्राजील का सबसे बड़ा शहर
    9. लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको की राजधानी
    10. UNICEF (UNITED NATIONS CHILDREN EMERGENCY FUND) संयुक्त राष्ट्र की एक महत्वपूर्ण संस्था जो बच्चों के हित में काम करती है।

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    उलटबाँसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला

    Posted by Reyaz-ul-haque on 11/09/2014 03:17:00 PM

    एदुआर्दो गालेआनो 
    अनुवाद: पी.के. मंगलम

    अगर एलिस वापस आती

    आज से एक सौ तीस साल पहले, आश्चर्यों भरी दुनिया घूमने के बाद एलिस उल्टी दुनिया की खोज में एक आईने के भीतर गई थी। अगर एलिस हमारे जमाने में वापस आती तो उसे किसी शीशे से होकर जाने की जरूरत नहीं होगी; बस खिड़की से बाहर देखना होगा।
    इस सदी के खत्म होते होते उल्टी दुनिया हम सबके सामने है; वही दुनिया जिसमें हम रहते हैं  और जहां बायां दाईं तरफ, पेट पीठ में और सिर पैरों में है। 
                                               मोंतेविदियो, 1998 के मध्य में

    विषय-क्रम

    आभार
    भाईयों और बहनों, आगे बढ़ते रहिए!
    पाठ का हिसाब
    माता-पिता के नाम संदेश
    अगर एलिस वापस आती
    उल्टी दुनिया की पाठशाला
    सीखाना उदाहरणों के साथ
    विद्यार्थी
    अन्याय का शुरुआती पाठ
    रंगभेद और पुरुष वर्चस्ववाद के शुरुआती पाठ
    पुरोहिती डर की
    डर की पढ़ाई
    डर का उद्योग
    दुश्मनों को अपने हिसाब से कैसे बनाएं: कांट-छांट और दर्जीगिरी के सबक
    मठ नीतिशास्त्र का
    जमीनी काम: सफल जिंदगी और नए दोस्त कैसे बनाएं
    सबक बेकार की आदतों से निबटने के 
    कुछ भी कर बच निकलने की महाविद्या
    मिसालें पढ़ने के लिए
    सीनाजोरी हत्यारों की
    सीनाजोरी धरती के विनाशकों की
    सीनाजोरी चंहुओर पुजाते मोटरइंजन की
    सीख अकेलेपन की
    सबक उपभोक्ता समाज के
    अलग-थलग पड़ने की पूरी तैयारी
    एक पाठशाला इन सबके खिलाफ़ भी
    खत्म होती सहस्राब्दी के छल और उम्मीद
    उन्मुक्त उड़ान का अधिकार
    नामों की फेहरिस्त

    विद्यार्थी

    दिन-प्रतिदिन बच्चों को बचपन के अधिकार से दूर किया जा रहा है। इस अधिकार की हँसी उड़ाते सच अपनी सीखें हम तक रोज़ाना पहुँचाते हैं। हमारी दुनिया धनी बच्चों को यूँ देखती है मानो वे कोई चलती-फिरती तिजोरी हों! और फिर होता यह है कि ये बच्चे असल जिंदगी में भी खुद को रुपया-पैसा ही समझने लग जाते हैं। दूसरी ओर, यही दुनिया गरीब बच्चों को कूड़ा-कचरा समझते हुए उन्हें घूरे की चीज बना डालती है।  और मध्यवर्ग के बच्चे, जो न तो अमीर हैं न गरीब, यहाँ टी.वी से यूँ बांध दिए गए हैं कि बड़ी छोटी उमर से ही वो इस कैदी जीवन के ग़ुलाम हो जाते हैं। वे बच्चे जो  बच्चे  रह पाते हैं, फिर किस्मत के धनी और एक अजूबा ही माने जाएंगे।

    ऊपर, नीचे और बीच वाले

    चारों ओर फैले उपेक्षा के अथाह समंदर में सुख-सुविधाओं के टापू गढ़े जा रहें हैं। ये ऐशो-आराम के सामानों से भरपूर, किसी जेलखाने की निगरानी और चुप्पी लेती जगहे हैं। यहाँ  धन और बल के महारथी, जो अपनी ताकत के अहसास को एक पल भी छोड़ नहीं सकते हैं, सिर्फ़ अपने जैसे लोगों से घुलते-मिलते हैं। लातीनी अमरीका के कुछ बड़े शहरों में अपहरण बिल्कुल रोज की बात हो गई है।  ऐसे में यहाँ के अमीर बच्चे लगातार फैलते डर के साए में ही बड़े होते हैं। चारदीवारीयों वाली कोठियाँ और बिजली के बाड़ों से घिरे बंगले इनका ठिकाना होते हैं। यहाँ सुरक्षागार्ड और क्लोज सर्किट कैमरे धन के इन संतानों की रखवाली दिन-रात किया करते हैं। ये बाहर निकलते भी हैं तो रूपये-पैसों की तरह हथियारों से लैस गाड़ियों में बंद होते हैं।  सिवाय सिर्फ़ दूर से देखते रहने के, अपने शहर को ये ज्यादा नहीं जानते। पेरिस  या न्यूयार्क की भूमिगत सुविधाओं का तो इन्हें खूब पता रहता है, लेकिन साओं पाओलो [1] या मेक्सिको [2] की राजधानी की ऐसी ही चीजों का ये कभी इस्तेमाल नहीं करते।

    देखा जाए तो ये बच्चे उस शहर में रहते ही नहीं, जहां के वो रहने वाले हैं। अपने छोटे-से जन्नत के चारों ओर पसरी भयावह सच्चाईयों से ये बिल्कुल दूर खड़े होते हैं।  आखिर इस जन्नत के बाहर ही वह भयानक दुनिया शुरू होती है, जहां लोग बहुत ज्यादा, बदसूरत, गंदे और उनकी खुशियों से जलने वाले हैं। जब पूरी दुनिया के एक गाँव बनते जाने की बात बड़े जोर-शोर से फैलाई जा रही है, बच्चे किसी एक जगह के नहीं रह गए हैं। लेकिन जिनकी अपनी दुनिया छोटी-से-छोटी होती गई है, उन्हीं की आलमारियाँ  सामान से भरी भी हुई हैं। ये वो बच्चे हैं, जो जड़ो से कटे और बिना किसी सांस्कृतिक पहचान के ही बड़े होते हैं। इनके लिए समाज का कुल मतलब यही यक़ीन होता है कि बाहरी दुनिया की सच्चाईयाँ  खतरनाक हैं। पूरी दुनिया पर छाए ब्रांड ही अब इन बच्चों का देश बन गए हैं, जहां ये अपने कपड़ों और बाकी चीजों को अलग-अलग दिखाने की जुगत में लगे रहते हैं। और भाषा के नाम पर इनके लिए अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक संकेत ही सब कुछ हैं। एक-दुसरे से जुदा शहरों और मीलों दूर खड़ी जगहों में पलती-बढ़ती धन की ये संताने अपनी आदतों और रूझानों में एक जैसी दिखाई देने लगी हैं। ठीक अपने समय और स्थान के सरोकारों से बाहर खड़े, एक-दूसरे की नकल करते मॉलों और हवाईअड्डों की तरह। सिर्फ दिखने वाले सच का पाठ पढ़े ये बच्चे जमीनी हकीकत से बिल्कुल बेखबर होते हैं। वही हकीकत जो उनके लिये सिर्फ डराने वाली या फिर पैसे के बल पर जीत  ली जाने वाली चीज होती है।

    बच्चों की दुनिया

    'सड़क बहुत देख-भाल कर पार करनी चाहिए' 

    कोलम्बिया  [3] के शिक्षक गुस्ताव विल्चेस बच्चों के एक समूह को समझा रहे थे:

    'चाहे बत्ती हरी ही क्यों न हो, कभी भी सड़क दोनों ओर देखे बगैर पार नहीं करनी चाहिए'।

    विल्चेस ने उन्हें यह भी बताया कि कैसे एक बार वह एक कार से कुचले जाने के बाद बिल्कुल बीच सड़क पर गिरे पड़े थे। उन्हें अधमरा कर छोड़ देने वाली उस दुर्घटना को याद कर विल्चेस का चेहरा पीला पड़ गया था।

    लेकिन बच्चों ने उनसे यह पूछा:
    किस ब्रांड की कार थी वह?

    क्या उस कार में एयर कंडीशनर की सुविधा थी?

    वो कार क्या सौर ऊर्जा से चलने वाली थी?

    बर्फ हटाने वाली मशीन थी न उसमें?

    कितने सिलेंडरों वाली कार थी वह?

    दुकान के शीशे

    लड़कों के खिलौने; रैंबो, रोबोकौप, निंजा [4], बैटमैन, राक्षस, मशीनगन, पिस्तौल, टैंक, कार, मोटरसाईकिल, ट्रक, हवाई जहाज, अंतरिक्षयान

    लड़कियों के खिलौने: बार्बी गुड़िया, हाइडी, इस्तरी करने की मेज, रसोई का सामान, सिल-बट्टा, कपड़े धोने की मशीन, टीवी, बच्चे, पालना, दूध की बोतल, लिपिस्टीक, बाल घुंघराले करने की मशीन, सुर्खी पाउडर, आईना

    फास्ट फूड, तेज कारें, तेज जिंदगी: इस दुनिया में आते ही धनी बच्चों को यह सिखाया जाने लगता है कि सभी चीजें सिर्फ कुछ पलों की और इसीलिए खर्चने की होती हैं। इनका बचपन यही देखते-दिखाते बीतता है कि मशीने इंसानों से ज्यादा भरोसे लायक हैं। और  जब ये बड़े होंगे [5] तब बाहर की "खतरनाक"दुनिया से हिफाजत के लिए इन्हें पूरी धरती नापने को तैयार चारपहिया सौंपी जाएगी! जवानी की ओर कदम बढ़ाते-बढ़ाते ये बच्चे साइबर दुनिया की सरपट सड़कों पर फर्राटे भरने लग जाते हैं। अपने कुछ होने का अहसास ये तस्वीर और सामान निगलते, टी.वी. के चैनल बदलते और बड़ी-बड़ी खरीददारीयाँ करते हुए पाते हैं। साइबर दुनिया में घूमते इन साइबरी बच्चों का निपट अकेलापन शहरों की गलियों में भटकते बेसहारा बच्चों की तरह ही होता है।
     

    धनी बच्चे जवान होकर अकेलापन खत्म करने और तमाम डर भुलाने के लिए नशीली दवाएं ढूँढें, इसके बहुत पहले से ही गरीब बच्चे पेट्रोल और गोंद में छुपा नशा ले रहे होते हैं। वहीं, जब धनी बच्चे लेज़र बंदूकों के साथ युद्ध का खेल खेलते हैं, गली के बच्चों को असली गोलियाँ निशाना बना रही होती हैं। 

    लातीनी अमरीका की आबादी का लगभग आधा हिस्सा बच्चों और जवान होते लड़कों-लड़कियों का है।  इस आधे हिस्से का आधा बहुत बुरे हाल में जी रहा है।  इस बुरे हाल से वही सौ बच्चे बच पाते हैं, जो हर घंटे यहाँ  भूख या ठीक होने वाली बीमारीयों से मर जाते हैं! फिर भी, गलियों और खेतों [6] में ग़रीब बच्चों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। यह दुनिया के उस हिस्से की बात है, जो दिन-रात ग़रीब पैदा करता है और ग़रीबी को गुनाह भी मानता है! यहाँ ज्यादातर ग़रीब बच्चे और ज्यादातर बच्चे ग़रीब हैं। और, व्यवस्था से बाँध दी गई जिंदगियों में ग़रीबी की सबसे ज्यादा मार इन्हीं बच्चों पर पड़ती है। इन्हें निचोड़ कर रख देने वाला समाज इनको हमेशा शक के दायरे में रखता है। इतना ही नहीं, यहाँ ग़रीबी के इनके 'अपराध'की सजा भी सुनाई जाती है, जो कभी-कभी मौत होती है। वे क्या सोचते और महसूस करते हैं, यह कोई नहीं सुनता, उन्हें समझने की बात तो फिर बहुत दूर  है। 

    ये बच्चे, जिनके माँ-बाप या तो काम की तलाश में भटकते रहते हैं या फिर बिना किसी काम और ठिकाने के ही रह जाते हैं, बड़ी छोटी उमर से ही कोई भी छोटा-मोटा काम कर जीने को मजबूर होते हैं। सिर्फ पेट भरने या उससे थोड़ा ज्यादा पा लेने के बदले ये पूरी दुनिया में कहीं भी कमरतोड़ खटते हुए मिल जाएंगे। चलना सीखने के बाद ये यही सीखते हैं कि अपना काम 'ठीक'से करने वाले ग़रीबों को क्या क्या ईनाम मिलते हैं। इन लड़के-लड़कियों की "बढ़िया"मजदूर बनने की शुरूआत गराजों, दुकानों और छोट-मोटे, घर से चलाए जाने वाले ढाबों से होती है, जहाँ इनसे मुफ्त काम लिया जाता है। या फिर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खेलकूद  के कपड़े बनाने वाले कारखानों से, जहाँ इनकी मजदूरी कौड़ियों के मोल खरीदी जाती है। खेतों या लोगों से ठसमठस शहरों या फिर घरों में काम करते हुए ये अपने मालिकों की मर्जी से बँधे रहते हैं। कुल मिलाकर इनकी हालत घरेलू या वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के 'असंगठित'कहे जाने वाले क्षेत्र के गुलामों की है। पूरी दुनिया में फैलते बाज़ार की चाकरी करते ये बच्चे उसके सबसे शोषित मजदूर भी हैं।

    नोट्स

    1. लातीनी अमरीकी देश ब्राजील का एक महानगर
    2. लातीनी अमरीकी देश
    3. लातीनी अमरीकी देश
    4. एक जापानी मार्शल आर्ट के लड़ाके।
    5. मूल शब्द हैं "la hora del ritual de iniciacion"जिसका शाब्दिक अर्थ होता है "प्रवेश के अनुष्ठान की घड़ी"।
    6. मूल शब्द "campo"है जिसके मायने गाँव या खेत दोनों ही होते हैं। 

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         COMMUNIST PARTY OF INDIA (MARXIST)
    21st Congress
    Samar Mukherjee Nagar
    Visakhapatnam, April 14-19, 2015


    Resolution

    On the Occasion of 125th Birth Anniversary of Dr. B. R. Ambedkar
    For a Special Session of Parliament

    On the occasion of the 125th birth anniversary of Dr. B. R. Ambedkar, the
    21st Congress of the CPI(M) demands that the Government hold a special
    session of Parliament to discuss issues connected with the status of
    Scheduled Caste communities in India.

    With the advent of neo-liberal policies,  the condition of  dalits has
    worsened.  The practice of untouchability and different forms of violence
    against Scheduled Caste communities continue, the conviction rate of
    people accused in such cases continues to be low. Laws such as The
    Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act
    need to be strengthened and fully implemented. The Manual Scavengers Act
    is also yet to be implemented. Large sections of Dalits in rural India are
    landless workers without assets. There is a huge backlog in filling up
    reserved posts. Development schemes lie unimplemented. Dalit Christians
    and Muslims have been denied recognition as Scheduled Castes, and are
    consequently excluded from benefits to which Scheduled Castes are
    entitled, in addition to existing quotas. These and other issues need
    separate discussion and resolution by Parliament. A special session would
    ensure that the attention of the entire country is focused on this
    shameful scourge of Indian society -- inequality on the basis of birth and
    descent -- and on the urgent need to take comprehensive and strong
    measures to eliminate it.

    The 21st Party Congress calls upon the entire Party to integrate struggles
    against social and caste based discrimination and for the rights of Dalits
    with the class struggle, to fight against atrocities against Dalits, to
    fight for the elimination of untouchability and the caste system, to
    encourage inter-caste marriage, and to counter the efforts of those who
    seek to keep Dalits away from democratic mobilisation and movements.

    ***


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    COMMUNIST PARTY OF INDIA (MARXIST)
    21st Congress
    Samar Mukherjee Nagar
    Visakhapatnam, April 14-19, 2015


    Resolution
    Against the Land Grab Bill

    The 21st Party Congress of the Communist Party of India (Marxist) strongly
    protests against and condemns the pro-corporate and anti-farmer amendments
    to the Right to Fair Compensation, Transparency in Land Acquisition,
    Rehabilitation and Resettlement Act, 2013, that the Modi Government is
    trying to push through Parliament by using its single-party majority
    status in the Lok Sabha.

    It has failed to push the Bill through the Rajya Sabha because of the
    united stand of most opposition parties. The Government response, that of
    promulgating the Ordinance a second time, underlines the authoritarian
    nature of the Government.

    The scrapping of the draconian colonial Land Acquisition Act of 1894 and
    the unanimous adoption of the new law in 2013 came after much struggle
    against forcible land acquisition and sacrifice by peasants and the rural
    poor and their organisations.

    Although the 2013 Act had several weaknesses as far as protecting food
    security, farmers and the rural poor were concerned, with respect to which
    the CPI(M) had moved amendments in Parliament at the time, the present
    Amendments moved by the Modi Government seek to eliminate whatever
    protection the 2013 Act provides farmers. It is noteworthy that, at the
    time, the BJP itself had voted for the Bill.

    The CPI(M) and the Left seek to strengthen the Act to benefit farmers and
    the rural poor, while the Modi Government aggressively pursues the line of
    helping business corporations at the cost of the farmers and the rural
    poor.

    This Party Congress rejects the false propaganda of the Modi Government
    that those who oppose the Land Bill are anti-development. As the
    amendments to the Bill clearly show, the path of development of the Modi
    Government is corporate development and not people-centric development.

    The main thrust of the Modi Government amendments are to weaken the
    mandatory requirement for consent of farmers by expanding the list of
    projects for which consent of farmers is exempted. These are now to
    include industrial corridors as well as infrastructure projects in the PPP
    mode, which will cover the majority of projects. Equally objectionable is
    the exemption given to these projects from any social impact assessment.
    This means that the numbers of those affected, cost-benefit analyses of
    projects in terms of their social impact, and even objective assessments
    of the actual extent of land required for individual projects will not be
    undertaken, and that corporates will have a free run. The protection given
    in the 2013 Act against the acquisition of multi-cropped irrigated land,
    though inadequate in itself, has been scrapped altogether. The special
    reference to maintaining the requirements of food security has also been
    scrapped. The provision for the return of unused land within 5 years has
    been weakened.

    The amendment permits acquisition for one kilometer of land on each side
    of a designated road or railway line of an industrial corridor to be
    handed over to corporates, which will mean the acquisition of a very large
    amount of land without having to obtain the consent of farmers. If the
    Government is so sure that this is in the interests of the farmers then
    why is it afraid of taking farmers' consent? The fact is that there is
    mounting discontent and anger against the Land Bill across the country.

    The 21st Party Congress of the CPI(M) notes that the Government amendments
    are coming at a time when official records show that land previously
    acquired for industry is either unused or misused for real estate
    purposes. The Comptroller and Auditor General found gross violations of
    regulations in 17 States. He also noted that, out of a total of 45635.63
    hectares of SEZ land allotted until 2014, work had begun in only 28488.49
    hectares.

    The 21st Congress of the CPI(M) calls upon its units to mobilise people
    against the Land Acquisition Amendment Bill. The CPI(M) will resist any
    attempts at unjust land acquisition and land grab. The Party will build
    the broadest possible unity against such moves and will intensify efforts
    to ensure that land is distributed to the landless.

    This Congress resolves to intensify its protests against the Bill, and to
    support all struggles of kisans, agricultural workers, Adivasis and all
    other affected sections for the withdrawal of this anti-farmer Bill.

    ***


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       COMMUNIST PARTY OF INDIA (MARXIST)
    21st Congress
    Samar Mukherjee Nagar
    Visakhapatnam, April 14-19, 2015



    April 15, 2015

    Press Release

    The delegate session of the 21st Congress of the CPI(M) began in the
    afternoon of April 14. A seven member Presidium was elected to conduct the
    Congress. It consisted of:

    S. Ramachandran Pillai (Chairman), A.K Balan, M.A. Gafoor, Madan Ghosh,
    Mariam Dhawale, Jitendra Chowdhury, Rakesh Singha.

    The Congress elected the Polit Bureau as the Steering Committee. A
    Resolutions Committee consisting of Brinda Karat (Chairperson), Thomas
    Issac, Nilotpal Basu, K Hemalata, V.K. Ramachandran, and a Credentials
    Committee consisting of Sudha Sundararaman (Convener) K.K. Shailaja,
    Tikender Singh Panwar & Mridul De were also elected.

    Draft Review Report
    On the Political Tactical Line

    Prakash Karat, General Secretary, presented the Draft Review Report on the
    Political Tactical Line. The main features of the Review Report were
    highlighted in his two hour presentation. The Review covers the period of
    the past 25 years, from 1990-91 and the evolution of the successive
    political-tactical lines in this period. The review focused on assessing
    how the political-tactical line has helped the independent growth of a
    Left and democratic alliance.

    The report on the pre-Congress amendments was placed after this. The
    report was processed all the amendments received from Party members and
    Party units on the Draft Review Report. Altogether 1432 amendments and 136
    suggestions were received. Out of these 29 amendments have been accepted.

    April 15 morning Session

    The discussion on the Draft Review Report began in the morning session. So
    far 13 delegates have participated in the discussion. They are: P Rajeev
    (Kerala), Amal Halder (West Bengal), Bhanulal Saha (Tripura), Kanakaraj
    (Tamilnadu), Ananta Deka (Assam), Dulichand (Rajasthan), Tikender Singh
    Panwar (Himachal Pradesh), V.V Dakshinamurthy (Kerala), Surender Singh
    (Haryana), K.G Das (Andaman & Nicobar), Mahendra Singh (Maharashtra), S
    Venkat Rao (Andhra Pradesh), Nityananda Swamy (Karnataka) & Vijay Misra
    (Punjab).

    Resolutions

    The Congress adopted two resolutions – "Against the Land Grab Bill" and
    "On the Occasion of 125th Birth Anniversary of Dr. B.R. Ambedkar -- For a
    Special Session of Parliament".








    (Hari Singh Kang)
    For Central Committee Office


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    Fatwa issued against celebration of Bangla NABA BARSHA in Bangladehs
    পহেলা বৈশাখ পালন করা থেকে বিরত থাকা সকল মুসলমানের জন্য ফরয।

    নূরে মুজাসসাম হাবীবুল্লাহ হুযূর পাক ছল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তিনি ইরশাদ মুবারক করেন, তোমরা ইহুদী-নাছারা, মজুসী ও মুশরিকদের খিলাফ করো।

    কথিত বাংলা প্রকৃতপক্ষে ফসলী নববর্ষ, ইংরেজি নববর্ষ, আরবী নববর্ষ ইত্যাদি সবই মজুসী-মুশরিক, হিন্দু, বৌদ্ধ, ইহুদী, নাছারা তথা বিধর্মীদের তর্জ-তরীক্বা।

    অতএব, কোনো মুসলমানের পক্ষে বিধর্মীদের কোনো তর্জ-তরীক্বা পালন করা কখনোই জায়েয নেই; বরং পালন করা কাট্টা কুফরী।

    কাজেই যে মুসলমান পহেলা বৈশাখ পালন করবে সে মুরতাদ হবে। ফলে তার জিন্দেগীর সমস্ত আমল নষ্ট হয়ে যাবে। তার ওয়ারিছস্বত্ব বাতিল হয়ে যাবে। সে হজ্জ করে থাকলে তার হজ্জ বাতিল হয়ে যাবে এবং সে বিবাহ করে থাকলে তার বিবাহও ফাছেদ হয়ে যাবে।

    সুতরাং পহেলা বৈশাখ পালন করা থেকে বিরত থাকা সকল মুসলমানের জন্য ফরয।

    উল্লেখ্য, পহেলা বৈশাখ বা নববর্ষ পালনের নামে বেপর্দা, বেহায়াপনা, হুজ্জোতি, বেলেল্লাপনা, মাতলামি করাও সম্পূর্ণরূপে হারাম।

    অতএব, ৯৭ ভাগ মুসলমানের দেশের সরকারের জন্য ফরয হচ্ছে- সরকারিভাবে এ সমস্ত হারাম ও কুফরী কাজ থেকে সকল মুসলমানদেরকে বিরত রাখা।

    পহেলা বৈশাখ পালনের ইতিহাস পবিত্র দ্বীন ইসলাম উনার সাথে সম্পৃক্ত নয়। এটা পালন মুসলমানগণ উনাদের কাজ নয়। ইতিহাসের তথ্য অনুযায়ী, নওরোজ বা পহেলা বৈশাখ পালনের সংস্কৃতি মজুসি, বৌদ্ধ ও হিন্দুদের থেকে এসেছে। মনে রাখতে হবে, ফসলী সন বা পহেলা বৈশাখ বাঙালি দ্বারা প্রবর্তিত নয়। বাদশাহ আকবর ফসলী সন হিসেবে এর প্রবর্তন করে। আর বাদশাহ আকবর ছিল মঙ্গলীয় এবং ফারসী ভাষী। তাহলে এটা কি করে বাঙালি সংস্কৃতি হতে পারে? কাজেই বাঙালিদের জন্য এটা অনুসরণীয় নয়, আর মুসলমানগণ উনাদের জন্য তো এটা অনুসরণ করার প্রশ্নই আসে না। কারণ মুসলমানগণ উনাদের জন্য বিধর্মী ও বিজাতীদের অনুসরণ করা কাট্টা হারাম, নাজায়িয ও কুফরী।

    সাধারণভাবে প্রাচীন পারস্যের পরাক্রমশালী সম্রাট জমশীদ খ্রিস্টপূর্ব ৮০০ সালে এই নওরোজের প্রবর্তন করেছিল এবং এ ধারাবাহিকতা এখনো পারস্য তথা ইরানে নওরোজ ঐতিহ্যগত নববর্ষের জাতীয় উৎসব পালিত হয়। ইরান থেকেই এটা একটি সাধারণ সংস্কৃতির ধারা বেয়ে মধ্যপ্রাচ্যের বিভিন্ন মুসলিম দেশ এবং ভারত উপমহাদেশে প্রবেশ করে।

     ফসলী সনের পহেলা বৈশাখ বা ফসলী নববর্ষ উপলক্ষে শহরে ও গ্রামে যে ভোজ, মেলা উৎসব হয় তাও ইরানের নওরোজ হতে পরোক্ষভাবে এদেশে এসেছে। মোঘল পূর্ববর্তী আমলে এদেশে নওরোজ বা নববর্ষ পালনের রীতি প্রচলিত ছিল না।

    ফসলী নববর্ষ হিন্দুদের খাছ ধর্মীয় উৎসবের দিন। এর আগের দিন তাদের চৈত্র সংক্রান্তি। আর পহেলা বৈশাখ হলো ঘটপূজার দিন।

    হযরত ইমাম আবু হাফস কবীর রহমতুল্লাহি আলাইহি তিনি বলেন, 'নওরোজ বা নববর্ষ উপলক্ষে যদি কেউ একটা ডিমও দান করে তবে তার ৫০ বৎসরের আমল থাকলে তা বরবাদ হয়ে যাবে।'অর্থাৎ নওরোজ বা নববর্ষ পালনের কারণে তার জিন্দেগীর সমস্ত আমল বরবাদ হয়ে যাবে। নাঊযুবিল্লাহ!

     আজকে অনেক মুসলমান কথিত বাংলা নববর্ষসহ বিভিন্ন নববর্ষ পালন করছে। আর এতে করে তারা বিজাতি ও বিধর্মীদের সাথেই মিল রাখছে। তাদেরই অনুসরণ অনুকরণ করছে। নাঊযুবিল্লাহ!

    পবিত্র কালামুল্লাহ শরীফ উনার মধ্যে ইরশাদ মুবারক হয়েছে, "নিশ্চয়ই সমস্ত প্রাণীর মাঝে মহান আল্লাহ পাক উনার নিকট কাফিরেরাই নিকৃষ্ট, যারা ঈমান আনেনি।" (পবিত্র সূরা আনফাল শরীফ : পবিত্র আয়াত শরীফ ৫৫)

    আর নববর্ষ বা নওরোজ পালনের দ্বারা সেই কাফিরদেরই অনুসরণ-অনুকরণ করা হয়। নাঊযুবিল্লাহ!

    পবিত্র হাদীছ শরীফ উনার মধ্যে ইরশাদ মুবারক হয়েছে, "হযরত আব্দুল্লাহ ইবনে উমর রদ্বিয়াল্লাহু তায়ালা আনহু উনার থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, নূরে মুজাসসাম হাবীবুল্লাহ হুযূর পাক ছল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তিনি ইরশাদ মুবারক করেন, "যে ব্যক্তি যে সম্প্রদায়ের সাথে মিল রাখে, সে তাদের দলভুক্ত এবং তার হাশর-নশর তাদের সাথেই হবে।" (সুনানে আহমদ শরীফ, সুনানে আবূ দাউদ শরীফ)

     বর্তমান যামানার পবিত্র দ্বীন ইসলাম উনার নাম ভাঙ্গিয়ে ব্যবসাকারীদের মুখপত্র দৈনিক-মাসিক পত্রিকাগুলো ফসলী নববর্ষকে মহান আল্লাহ পাক উনার নিয়ামত বলে তা পালন করার পক্ষে প্রচারণা চালাচ্ছে; নাঊযুবিল্লাহ! অথচ এটা সম্পূর্ণ কুফরী কাজ। প্রকৃতপক্ষে তারাসাধারণ মানুষকে বিভ্রান্ত করে কুফরী, শিরকী ও বেশরা-বিদয়াতের দিকে আহ্বান করছে।

    তাদের হাক্বীক্বত প্রকাশ করা না পর্যন্ত মুসলমান উনাদের আমল নিরাপদ নয়। ধর্মব্যবসায়ীরা সৃষ্টির নিকৃষ্ট। এদের চিহ্নিত করতে পারলেই মুসলমান সত্যিকার ইসলামী চেতনা ও আক্বীদা ফিরে পাবে, মুসলমান উনাদের আমল ইছলাহ হবে। ফলে পহেলা জানুয়ারি ও পহেলা বৈশাখের মতো হারাম আমল ও তার আবহ থেকে তারা নাজাত পাবে।

    কথিত বাংলা প্রকৃতপক্ষে ফসলী নববর্ষ, ইংরেজি নববর্ষ, আরবী নববর্ষ ইত্যাদি সবই মজুসী-মুশরিক, হিন্দু, বৌদ্ধ, ইহুদী, নাছারা তথা বিধর্মীদের তর্জ-তরীক্বা। অতএব, কোনো মুসলমানের পক্ষে বিধর্মীদের কোনো তর্জ-তরীক্বা পালন করা কখনোই জায়িয নেই; বরং পালন করা কাট্টা কুফরী। কাজেই যে মুসলমান পহেলা বৈশাখ পালন করবে সে মুরতাদ হবে। ফলে তার জিন্দেগীর সমস্ত আমল নষ্ট হয়ে যাবে। তার ওয়ারিছস্বত্ব বাতিল হয়ে যাবে। সে হজ্জ করে থাকলে তার হজ্জ বাতিল হয়ে যাবে এবং সে বিবাহ করে থাকলে তার বিবাহও ফাছেদ হয়ে যাবে। সুতরাং পহেলা বৈশাখ পালন করা থেকে বিরত থাকা সকল মুসলমানের জন্য ফরয।


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    Making Prime Minister Hasina Blink: The Delhi Route 

      by B. Z. Khasru

    Sheikh Hasina, Bangladesh's prime minister, has been under bulldozer at home and abroad to hold talks with her opponents who have been campaigning violently since January for fresh polls under a neutral interim government. So far, the battle has cost the nation more than 100 lives and bruised its thriving economy, but she has vowed not to budge.

    What made her so defiant? Who can make her blink?

    Acrimony between Hasina and Khaleda Zia, who leads the main opposition group, the Bangladesh Nationalist Party, dates to 1975. That was when Hasina's father Sheikh Mujibur Rahman was assassinated in a military coup. Hasina thinks Khaleda's late husband, military ruler Gen. Ziaur Rahman, masterminded the putsch in which Bangladesh's founder was killed, along with most of his family members.

    Hasina put her venom toward Khaleda on public display way back in 1987 at a National Democratic Institute dinner in San Francisco. Both the ladies, who were then jointly fighting to topple Gen. H.M. Ershad's regime, graced the banquet. They were sitting in the same row, with their American host in between them. When Hasina was asked to introduce herself, she said: "I am Sheikh Hasina. The woman on your left, her husband assassinated my father."

    Her latent covenant to wipe off the BNP from the land of the Bengalis took center stage recently after Khaleda's son and heir apparent, Tarique Rahman, hurled personal insults at Hasina's father and family earlier this year. Tarique, who lives in exile in London, called Hasina's father, who championed Bengali causes all his
    life, a "friend of Pakistan," and refused to accept him as Bangladesh's founder. He described Hasina as "wrong-headed," and her family as a "curse for Bangladesh." His remarks stoked Hasina's already poisoned mind, prompting her to rebuke Tarique in parliament and admonish Khaleda to rein in her son.

    Khaleda, who was prime minister twice and is as iron-willed as Hasina, started the current round of protests to force the government to resign and hold new polls, saying last year's elections were fraud. Hasina is blowing an air of defiance.

    Hasina Emboldened

    Several domestic factors have fortified Hasina to dare to ignore both domestic and foreign pressures. After her 2008 election victory, she renamed Zia International Airport to wipe off BNP founder Ziaur Rahman's legacy; she threw out Khaleda from a military palace given to her by the government after her military-strongman-turned-president husband's assassination in a 1981 failed mutiny. Hasina hanged several ex-military officers for murdering her father. Most recently, she sent to the gallows two Islamist opposition politicians for atrocities committed during Bangladesh's liberation war in 1971. She got bad press abroad for dispensing what has been termed as flawed justice, but encountered no recriminations at home.

    Furthermore, she deftly handled a bloody rampage by Bangladesh's border guards who slaughtered more than 50 top army bosses in 2009. In its wake, Hasina displayed nerves of steel by venturing into the army headquarters in Dhaka, Bangladesh's capital, ignoring advice from her cabinet colleagues to face howling military officers. She has appeased the armed forces by opening up the purse strings for their spending spree. For the first time since the South Asian nation's birth, a ruler spends less time worrying about being toppled by the military than ruling the country.

    On top of all this, Hasina has been blessed by emerging regional power configurations. India has replaced the United States as the arbiter in the nation of 165 million Bengalis. With Bangladesh's economy humming and food production keeping up with demand, Hasina no longer needs to trek to Washington with a bowl in her hand.

    India, for its part, has made abundantly clear its preference for Hasina over Khaleda. Delhi worked hard to put her back to power in 2008. Nonreligious political philosophy of Hasina's Awami League and her government's India-friendly posture have helped her win Delhi's hearts and minds. India detests Khaleda for she played the
    China card and pursued anti-India politics when she was prime minister. She has also built a Great China Wall between herself and Delhi by banding with Jamaat-e-Islami, the potent proponent of a theocratic Bangladesh.

    India has other reasons, too. It has been under fire at home for failing to assert its regional supremacy. Stung by such virulent attacks, Delhi has assumed an assertive role in Bangladesh affairs. Prime Minister Narendra Modi is hell-bent upon upholding India's primacy. Delhi fears Beijing's inroads into Dhaka, which abuts
    seven restive Indian states where China can foment trouble. So India now single-mindedly pursues its interests, even if it means defying America. India stumped for Hasina when she decided to go ahead with elections last year excluding Khaleda despite stiff U.S. opposition.

    Diplomatic Stalemate

    So, efforts by the United States or European Union are unlikely to succeed in ending Bangladesh's political mayhem without India's seal of approval. The road to Dhaka now goes through Delhi bypassing Washington. Even though EU is Bangladesh's largest trading partner, the government will ignore European diktat if it hurts the prime minister's political interest. By going solo, the United States will be unable to sway Hasina, who deeply distrusts Washington. Only Delhi can push Hasina to get off the ground. America can impress upon India that a vibrant multiparty system will make the Bengali nation a fortress of democracy and that a stable Bangladesh will serve both Delhi and Washington well in the long run. The reverse may spell doom and gloom for all.

    It, however, remains doubtful at this juncture if India and the United States will see eye- to-eye on Bangladesh in this matter. America thinks Bangladesh can be a well-balanced democracy by having two major political groups in the mold of the United States or Britain. In America's view, such a system should also give space to those seeking to play by the rule, including religious outfits.

    On the contrary, India believes its interests are best served by having a political party in power that espouses secular philosophy and adopts a Delhi-friendly policy. Hasina's party -— the Awami League — perfectly fits the bill. So there is no incentive for Delhi to reach out to Khaleda, who tilts toward China. India will be rather happy to see Hasina crushes Khaleda and erases Jamaat-e-Islami. Delhi won't mind at all if Bangladesh ends up with a political system that pretty much resembles the setup that existed in India under Congress.

    The United States, meanwhile, has shifted its gear to realpolitik and softened attitude toward Hasina. America no longer at least publicly presses her too hard to accommodate Khaleda. This strategic rethinking stemmed from setbacks the U.S. administration suffered in diplomatic war games with the prime minister. But the new strategy will hardly impress Hasina. To make any headway, Washington must persuade Delhi that it is in India's as well as America's long-term interest to help Bangladesh find a durable mechanism to conduct fair elections and transfer power without street violence.

    Durable Solution

    A key component in devising such a lasting governance system will be changing the country's constitution to share power with the parliamentary opposition party in the form of a shadow cabinet. Bangladesh's existing winner-takes-all setup leaves the opposition high and dry, which breeds discontent and street protests. By giving the opposition privileges and perks, the government can defuse prospects for mass agitations and ensure its smooth functioning.

    In fact, in the wake of her massive election victory in 2008, Hasina expressed her willingness to share power with the opposition. "As winners, we have to deal with everything with a sense of forgiveness and accommodation, instead of vengeance, to take the country forward," she told journalists in Dhaka in her victory speech. She was prepared to give opposition members parliamentary and ministerial posts if they were willing to cooperate with her government.

    With the current national and international climates in her favor, Hasina will be less generous. There are also other reasons for her to be a hard nut to crack. She figures Khaleda's ongoing movement will fizzle out. On top of that, her grip on civil service and military as well as judiciary is firm enough to enable her to sail through, as long as the economy marches on at a healthy clip. These realities make the prime minister even more steadfast.

    Nevertheless, one may see optimism in the words of a former Bengali diplomat. "Many of the newly independent developing countries are fledgling democracies and perhaps need more time to attain political maturity," Humayun Kabir, Bangladesh's ambassador to Washington, told the Washington Report on Middle East Affairs in 1996. "We regret our inexperience. This may be described as our teething period. What is a mere 25 years in a nation's history? It took the West over 200 years to get to where it is now."

    B. Z. Khasru, is author of "Myths and Facts Bangladesh Liberation War" and "The Bangladesh Military Coup and the CIA Link." He is working on a new book, "The King's Men, One Eleven, Minus Two, Secrets Behind Sheikh Hasina's War on Yunus and America."

    http://www.eurasiareview.com/13042015-making-prime-minister-hasina-blink-the-delhi-route-analysis/?utm_source=feedburner&utm_medium=email&utm_campaign=Feed%3A+eurasiareview%2FVsnE+%28Eurasia+Review%29

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    http://naukarshahi.in/archives/20873

    और अमित शाह के पीए ने डिलीट कर दी फोटो


    भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह की तस्‍वीर खींचना आज सुबह मेरे लिए महंगा साबित हुआ। पटना के राजकीय अतिथिशाला के कमरा नंबर दो में कार्यकर्ताओं से साथ बातचीत करते हुए हमने उनकी तस्‍वीर खींची थी, लेकिन अमित शाह के निर्देश पर उनके पीए ने मेरे हाथ से मोबाइल छीना और सभी तस्‍वीरें डिलीट कर दीं।amit

    वीरेंद्र यादव, बिहार ब्‍यूरो प्रमुख  

     

    भाजपा अध्‍यक्ष से मुलाकात करने की अपेक्षा से सुबह करीब साढ़े सात बजे हम राजकीय अतिथिशाला पहुंचे। वे वहीं ठहरे हुए थे। उनसे मिलनेवालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। पार्टी के प्रभारी भूपेंद्र यादव व संगठन महामंत्री नागेंद्र भी पहुंच चुके थे। इस दौरान कार्यकर्ताओं को बताया गया कि अध्‍यक्षजी के पास 49 लोगों की लिस्‍ट है, उन्‍हीं से मुलाकात करेंगे। वह कमरा नंबर दो में ठहरे हुए थे और लोग बाहर वेटिंग रूम में इंतजार कर रहे थे। नौ बजे सूचना बाहर आयी कि अध्‍यक्षजी सवा नौ बजे से मिलेंगे। पहले उन्‍होंने महिला कार्यकर्ताओं को बुलाया। उस टोली के साथ हम भी अंदर प्रवेश कर गए। वहां नागेंद्र और भूपेंद्र के अलावा कई और लोग मौजूद थे। महामंत्री नागेंद्र सबका परिचय करा रहे थे। कार्यकर्ताओं में कुछ लोग चरणस्‍पर्श कर आशीर्वाद ले रहे थे तो कुछ अलग से हाथ जोड़कर अभिवादन कर रहे थे।

     

    शाह की 'तानाशाही'

    इस बीच हमने कार्यकर्ताओं से बातचीत करते कुछ तस्‍वीर उतारी। लेकिन तब तक अध्‍यक्ष की अकेली तस्‍वीर हम नहीं ले पाए थे। इस बीच अमित शाह से मुझे तस्‍वीर लेने से मना किया। मैंने आग्रह किया कि एक तस्‍वीर और। फिर एक तस्‍वीर हमने उतारी। इसके बाद हम बाहर निकल पर वेटिंग रूम में बैठ गए। तब तक पीछे से अमित शाह के पीए आए और कहा कि सभी फोटो डिलीट कीजिए। मैंने कहा- अगर आपके अध्‍यक्षजी को आपत्ति है तो फोटो हटा दे रहे हैं। हालांकि हम प्रेस से जुड़े हैं। अभी हम फोटो हटाने का प्रयास ही कर रहे थे कि पीए ने मेरे हाथ से मोबाइल छीन लिया। उन्‍होंने अमित शाह से जुड़ी सारी तस्‍वीरें हटा दीं। इसके बाद संतुष्‍ट होकर हमें मोबाइल वापस कर दिया। हालांकि हमने जो तस्‍वीर उतारी थी, उसमें कोई आपत्तिजनक तस्‍वीर नहीं थी। कार्यकर्ताओं के साथ वह बातचीत कर रहे थे। संभव है कि उनके मना करने के बाद भी एक तस्‍वीर लेना उनके आदेश की अवहेलना लगी हो। खैर, मोबाइल वापस मिलने के बाद हम राजकीय अतिथिगृह से बाहर निकल गए।


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    guardian logo

    The truth about Israel's secret nuclear arsenal 


    Israel's nuclear reactor at Dimona.


    Julian Borger

    Israel has been stealing nuclear secrets and covertly making bombs since the 1950s. And western governments, including Britain and the US, turn a blind eye. But how can we expect Iran to curb its nuclear ambitions if the Israelis won't come clean?

    eep beneath desert sands, an embattled Middle Eastern state has built a covert nuclear bomb, using technology and materials provided by friendly powers or stolen by a clandestine network of agents. It is the stuff of pulp thrillers and the sort of narrative often used to characterise the worst fears about the Iranian nuclear programme. In reality, though, neither US nor British intelligence believe Tehran has decided to build a bomb, and Iran's atomic projects are under constant international monitoring.

    The exotic tale of the bomb hidden in the desert is a true story, though. It's just one that applies to another country. In an extraordinary feat of subterfuge, Israel managed to assemble an entire underground nuclear arsenal – now estimated at 80 warheads, on a par with India and Pakistan – and even tested a bomb nearly half a century ago, with a minimum of international outcry or even much public awareness of what it was doing.

    Despite the fact that the Israel's nuclear programme has been an open secret since a disgruntled technician, Mordechai Vanunu, blew the whistle on it in 1986, the official Israeli position is still never to confirm or deny its existence.

    When the former speaker of the Knesset, Avraham Burg, broke the taboo last month, declaring Israeli possession of both nuclear and chemical weapons and describing the official non-disclosure policy as "outdated and childish" a rightwing group formally called for a police investigation for treason.

    Meanwhile, western governments have played along with the policy of "opacity" by avoiding all mention of the issue. In 2009, when a veteran Washington reporter, Helen Thomas, asked Barack Obama in the first month of his presidency if he knew of any country in the Middle East with nuclear weapons, he dodged the trapdoor by saying only that he did not wish to "speculate".

    UK governments have generally followed suit. Asked in the House of Lords in November about Israeli nuclear weapons, Baroness Warsianswered tangentially. "Israel has not declared a nuclear weapons programme. We have regular discussions with the government of Israel on a range of nuclear-related issues," the minister said. "The government of Israel is in no doubt as to our views. We encourage Israel to become a state party to the nuclear Non-Proliferation Treaty [NPT]."

    But through the cracks in this stone wall, more and more details continue to emerge of how Israel built its nuclear weapons from smuggled parts and pilfered technology.

    The tale serves as a historical counterpoint to today's drawn-out struggle over Iran's nuclear ambitions. The parallels are not exact – Israel, unlike Iran, never signed up to the 1968 NPT so could not violate it. But it almost certainly broke a treaty banning nuclear tests, as well as countless national and international laws restricting the traffic in nuclear materials and technology.

    The list of nations that secretly sold Israel the material and expertise to make nuclear warheads, or who turned a blind eye to its theft, include today's staunchest campaigners against proliferation: the US, France, Germany, Britain and even Norway.

    Meanwhile, Israeli agents charged with buying fissile material and state-of-the-art technology found their way into some of the most sensitive industrial establishments in the world. This daring and remarkably successful spy ring, known as Lakam, the Hebrew acronym for the innocuous-sounding Science Liaison Bureau, included such colourful figures as Arnon Milchan, a billionaire Hollywood producer behind such hits as Pretty Woman, LA Confidential and 12 Years a Slave, who finally admitted his role last month.

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    "Do you know what it's like to be a twentysomething-year-old kid [and] his country lets him be James Bond? Wow! The action! That was exciting," he said in an Israeli documentary.

    Milchan's life story is colourful, and unlikely enough to be the subject of one of the blockbusters he bankrolls. In the documentary, Robert de Niro recalls discussing Milchan's role in the illicit purchase of nuclear-warhead triggers. "At some point I was asking something about that, being friends, but not in an accusatory way. I just wanted to know," De Niro says. "And he said: yeah I did that. Israel's my country."

    Milchan was not shy about using Hollywood connections to help his shadowy second career. At one point, he admits in the documentary, he used the lure of a visit to actor Richard Dreyfuss's home to get a top US nuclear scientist, Arthur Biehl, to join the board of one of his companies.

    According to Milchan's biography, by Israeli journalists Meir Doron and Joseph Gelman, he was recruited in 1965 by Israel's current president, Shimon Peres, who he met in a Tel Aviv nightclub (called Mandy's, named after the hostess and owner's wife Mandy Rice-Davies, freshly notorious for her role in the Profumo sex scandal). Milchan, who then ran the family fertiliser company, never looked back, playing a central role in Israel's clandestine acquisition programme.

    He was responsible for securing vital uranium-enrichment technology, photographing centrifuge blueprints that a German executive had been bribed into temporarily "mislaying" in his kitchen. The same blueprints, belonging to the European uranium enrichment consortium, Urenco, were stolen a second time by a Pakistani employee, Abdul Qadeer Khan, who used them to found his country's enrichment programme and to set up a global nuclear smuggling business, selling the design to Libya, North Korea and Iran.

    For that reason, Israel's centrifuges are near-identical to Iran's, a convergence that allowed Israeli to try out a computer worm, codenamed Stuxnet, on its own centrifuges before unleashing it on Iran in 2010.

    Arguably, Lakam's exploits were even more daring than Khan's. In 1968, it organised the disappearance of an entire freighter full of uranium ore in the middle of the Mediterranean. In what became known as the Plumbat affair, the Israelis used a web of front companies to buy a consignment of uranium oxide, known as yellowcake, in Antwerp. The yellowcake was concealed in drums labelled "plumbat", a lead derivative, and loaded onto a freighter leased by a phony Liberian company. The sale was camouflaged as a transaction between German and Italian companies with help from German officials, reportedly in return for an Israeli offer to help the Germans with centrifuge technology.

    When the ship, the Scheersberg A, docked in Rotterdam, the entire crew was dismissed on the pretext that the vessel had been sold and an Israeli crew took their place. The ship sailed into the Mediterranean where, under Israeli naval guard, the cargo was transferred to another vessel.

    US and British documents declassified last year also revealed a previously unknown Israeli purchase of about 100 tons of yellowcake from Argentina in 1963 or 1964, without the safeguards typically used in nuclear transactions to prevent the material being used in weapons.

    Israel had few qualms about proliferating nuclear weapons knowhow and materials, giving South Africa's apartheid regime help in developing its own bomb in the 1970s in return for 600 tons of yellowcake.

    Pictures of the secret Dimona nuclear reactor in Israel, showing where the plant has allegedly been
    Pictures of the secret Dimona nuclear reactor in Israel, showing where the plant has allegedly been camouflaged. Photograph: space imaging

    Israel's nuclear reactor also required deuterium oxide, also known as heavy water, to moderate the fissile reaction. For that, Israel turned to Norway and Britain. In 1959, Israel managed to buy 20 tons of heavy water that Norway had sold to the UK but was surplus to requirements for the British nuclear programme. Both governments were suspicious that the material would be used to make weapons, but decided to look the other way. In documents seen by the BBC in 2005 British officials argued it would be "over-zealous" to impose safeguards. For its part, Norway carried out only one inspection visit, in 1961.

    Israel's nuclear-weapons project could never have got off the ground, though, without an enormous contribution from France. The country that took the toughest line on counter-proliferation when it came to Iran helped lay the foundations of Israel's nuclear weapons programme, driven by by a sense of guilt over letting Israel down in the 1956 Suez conflict, sympathy from French-Jewish scientists, intelligence-sharing over Algeria and a drive to sell French expertise and abroad.

    "There was a tendency to try to export and there was a general feeling of support for Israel," Andre Finkelstein, a former deputy commissioner at France's Atomic Energy Commissariat and deputy director general at the International Atomic Energy Agency, told Avner Cohen, an Israeli-American nuclear historian.

    France's first reactor went critical as early as 1948 but the decision to build nuclear weapons seems to have been taken in 1954, after Pierre Mendès France made his first trip to Washington as president of the council of ministers of the chaotic Fourth Republic. On the way back he told an aide: "It's exactly like a meeting of gangsters. Everyone is putting his gun on the table, if you have no gun you are nobody. So we must have a nuclear programme."

    Mendès France gave the order to start building bombs in December 1954. And as it built its arsenal, Paris solds material assistance to other aspiring weapons states, not just Israel.

    "[T]his went on for many, many years until we did some stupid exports, including Iraq and the reprocessing plant in Pakistan, which was crazy," Finkelstein recalled in an interview that can now be read in a collection of Cohen's papers at the Wilson Centre thinktank in Washington. "We have been the most irresponsible country on nonproliferation."

    In Dimona, French engineers poured in to help build Israel a nuclear reactor and a far more secret reprocessing plant capable of separating plutonium from spent reactor fuel. This was the real giveaway that Israel's nuclear programme was aimed at producing weapons.

    By the end of the 50s, there were 2,500 French citizens living in Dimona, transforming it from a village to a cosmopolitan town, complete with French lycées and streets full of Renaults, and yet the whole endeavour was conducted under a thick veil of secrecy. The American investigative journalist Seymour Hersh wrote in his book The Samson Option: "French workers at Dimona were forbidden to write directly to relatives and friends in France and elsewhere, but sent mail to a phony post-office box in Latin America."

    The British were kept out of the loop, being told at different times that the huge construction site was a desert grasslands research institute and a manganese processing plant. The Americans, also kept in the dark by both Israel and France, flew U2 spy planes over Dimona in an attempt to find out what they were up to.

    The Israelis admitted to having a reactor but insisted it was for entirely peaceful purposes. The spent fuel was sent to France for reprocessing, they claimed, even providing film footage of it being supposedly being loaded onto French freighters. Throughout the 60s it flatly denied the existence of the underground reprocessing plant in Dimona that was churning out plutonium for bombs.

    Israel refused to countenance visits by the International Atomic Energy Agency (IAEA), so in the early 1960s President Kennedy demanded they accept American inspectors. US physicists were dispatched to Dimona but were given the run-around from the start. Visits were never twice-yearly as had been agreed with Kennedy and were subject to repeated postponements. The US physicists sent to Dimona were not allowed to bring their own equipment or collect samples. The lead American inspector, Floyd Culler, an expert on plutonium extraction, noted in his reports that there were newly plastered and painted walls in one of the buildings. It turned out that before each American visit, the Israelis had built false walls around the row of lifts that descended six levels to the subterranean reprocessing plant.

    As more and more evidence of Israel's weapons programme emerged, the US role progressed from unwitting dupe to reluctant accomplice. In 1968 the CIA director Richard Helms told President Johnson that Israel had indeed managed to build nuclear weapons and that its air force had conducted sorties to practise dropping them.

    The timing could not have been worse. The NPT, intended to prevent too many nuclear genies from escaping from their bottles, had just been drawn up and if news broke that one of the supposedly non-nuclear-weapons states had secretly made its own bomb, it would have become a dead letter that many countries, especially Arab states, would refuse to sign.

    The Johnson White House decided to say nothing, and the decision was formalised at a 1969 meeting between Richard Nixon and Golda Meir, at which the US president agreed to not to pressure Israel into signing the NPT, while the Israeli prime minister agreed her country would not be the first to "introduce" nuclear weapons into the Middle East and not do anything to make their existence public.

    In fact, US involvement went deeper than mere silence. At a meeting in 1976 that has only recently become public knowledge, the CIA deputy director Carl Duckett informed a dozen officials from the US Nuclear Regulatory Commission that the agency suspected some of the fissile fuel in Israel's bombs was weapons-grade uranium stolen under America's nose from a processing plant in Pennsylvania.

    Not only was an alarming amount of fissile material going missing at the company, Nuclear Materials and Equipment Corporation (Numec), but it had been visited by a veritable who's-who of Israeli intelligence, including Rafael Eitan, described by the firm as an Israeli defence ministry "chemist", but, in fact, a top Mossad operative who went on to head Lakam.

    "It was a shock. Everyody was open-mouthed," recalls Victor Gilinsky, who was one of the American nuclear officials briefed by Duckett. "It was one of the most glaring cases of diverted nuclear material but the consequences appeared so awful for the people involved and for the US than nobody really wanted to find out what was going on."

    The investigation was shelved and no charges were made.

    A few years later, on 22 September 1979, a US satellite, Vela 6911, detected the double-flash typical of a nuclear weapon test off the coast of South Africa. Leonard Weiss, a mathematician and an expert on nuclear proliferation, was working as a Senate advisor at the time and after being briefed on the incident by US intelligence agencies and the country's nuclear weapons laboratories, he became convinced a nuclear test, in contravention to the Limited Test Ban Treaty, had taken place.

    It was only after both the Carter and then the Reagan administrations attempted to gag him on the incident and tried to whitewash it with an unconvincing panel of enquiry, that it dawned on Weiss that it was the Israelis, rather than the South Africans, who had carried out the detonation.

    "I was told it would create a very serious foreign policy issue for the US, if I said it was a test. Someone had let something off that US didn't want anyone to know about," says Weiss.

    Israeli sources told Hersh the flash picked up by the Vela satellite was actually the third of a series of Indian Ocean nuclear tests that Israel conducted in cooperation with South Africa.

    "It was a fuck-up," one source told him. "There was a storm and we figured it would block Vela, but there was a gap in the weather – a window – and Vela got blinded by the flash."

    The US policy of silence continues to this day, even though Israel appears to be continuing to trade on the nuclear black market, albeit at much reduced volumes. In a paper on the illegal trade in nuclear material and technology published in October, the Washington-based Institute for Science and International Security (ISIS) noted: "Under US pressure in the 1980s and early 1990s, Israel … decided to largely stop its illicit procurement for its nuclear weapons programme. Today, there is evidence that Israel may still make occasional illicit procurements – US sting operations and legal cases show this."

    Avner Cohen, the author of two books on Israel's bomb, said that policy of opacity in both Israel and in Washington is kept in place now largely by inertia. "At the political level, no one wants to deal with it for fear of opening a Pandora's box. It has in many ways become a burden for the US, but people in Washington, all the way up to Obama will not touch it, because of the fear it could compromise the very basis of the Israeli-US understanding."

    In the Arab world and beyond, there is growing impatience with the skewed nuclear status quo. Egypt in particular has threatened to walk out of the NPT unless there is progress towards creating a nuclear-free zone in the Middle East. The western powers promised to stage a conference on the proposal in 2012 but it was called off, largely at America's behest, to reduce the pressure on Israel to attend and declare its nuclear arsenal.

    "Somehow the kabuki goes on," Weiss says. "If it is admitted Israel has nuclear weapons at least you can have an honest discussion. It seems to me it's very difficult to get a resolution of the Iran issue without being honest about that."

    http://www.theguardian.com/world/2014/jan/15/truth-israels-secret-nuclear-arsenal


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    The U.S. Military's Battlefield of Tomorrow

     
     
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    The U.S. Military's Battlefield of Tomorrow
    by Nick Turse For three days, wearing a kaleidoscope of camouflage patterns, they huddled together on a military base in Florida. They came from U.S. Special Operat...
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    Mohammad Basir-ul Haq Sinha
    Journalist,
    Dhaka,Bangla Desh



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    ভারত কেন বাংলাদেশকে বিদ্যুৎ দিচ্ছে

    বি.ডি.রহমতউল্লাহ্

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    বিদ্যুৎ ঘাটতির দেশ ভারত থেকে বাংলাদেশ বেশি দামে আরো বিদ্যুৎ আনবে। জাতীয় অর্থনৈতিক কাউন্সিলের (একনেকনির্বাহী কমিটি তার শেষ সভায় এর জন্য ১৬০০ কোটি টাকা অনুমোদন দিয়েছে। এর মধ্যে ভারতের বহরমপুর থেকে বাংলাদেশের ভেড়ামাড়ায় গ্রীড নির্মাণ খাতে এবং ভেড়ামাড়া-ঈশ্বরদী ২৩০ কেভি ডাবল সার্কিট সঞ্চালন লাইন নির্মানের জন্য বরাদ্দ দেয়া হয়েছে। এ লাইন দিয়ে ৫০০ মেগাওয়াট বিদ্যুৎ আনার কথা ঘোষণা করা হয়েছে। এ বিদ্যুতের ট্যারিফও ধরা হয়েছে অনেক বেশী। বাংলাদেশ-ভারত বিদ্যুৎ ক্রয়-বিক্রয়ে ট্যারিফ নির্ধারনে বাংলাদেশের কোন ভূমিকা নেই ।

    এ বিষয়ে ২০১০-এর ফেব্রুয়ারিতে অনুষ্ঠিত ভারত-বাংলাদেশের সচিব পর্যায়ের বৈঠকে ঘোষিত কিছু সিদ্ধান্ত উল্লেখযোগ্য। বৈঠক চলাকালে সংবাদ ব্রিফিংয়ে তৎকালীন বিদ্যুৎ সচিব আবুল কালাম আজাদ বলেন,বাংলাদেশ-ভারত গ্রীড লাইন স্থাপন প্রকল্প চূড়ান্ত করা হয়েছে। এ প্রকল্পের আওতায় মোট ১৩০ কিলোমিটার (বাংলাদেশে ৮৫ ও ভারতে ৪৫ কিলোমিটারলাইন স্থাপন ও বাংলাদেশে একটি গ্রীড উপকেন্দ্রও স্থাপন করতে হবে। এ জন্য বাংলাদেশের মোট ব্যয় হবে প্রায় এগারোশ কোটি টাকা। সরকার ও পাওয়ার গ্রীড কোম্পানী অব বাংলাদেশ (পিজিসিবি)যৌথভাবে এই ব্যয় বহন করবে। গ্রীড লাইন ব্যবহারের জন্য হুইলিং চার্জ দিতে হবে। এ প্রকল্পটি ভেড়ামাড়ার ষোলদাগে নির্মিতব্য গ্রীড ও বাংলাদেশ-ভারত ১৩০ কিলোমিটার লাইনের বিষয়ে বলা হলেও এটিই হচ্ছে বাংলাদেশ-ভারত বিদ্যুৎ বাণিজ্যের মৌলিক দৃষ্টি ভঙ্গি। ওই সভায় বিদ্যুৎ সচিব আরো জানানভারত থেকে আনা বিদ্যুতের দাম নির্ধারণ করবে ভারতের এনার্জি রেগুলেটরি কমিশন। অথচ আন্তর্জাতিক বিদ্যুৎ বাণিজ্যে একপক্ষীয় দর নির্ধারন অযৌক্তিক এবং একপক্ষীয়। হুইলিং চার্জসহ প্রতি ইউনিট বিদ্যুতের সম্ভাব্য দাম সাড়ে তিন টাকার মতো হতে পারে বলে ঘোষণা দেয়া হয় যা গ্রাহক প্রান্তে শেষ পর্যন্ত পাঁচ টাকা হতে পারে। সভায় ভারতের বিদ্যুৎ সচিব জানানভারতে এখন গ্রাহক বিদ্যুৎ পায় প্রতি ইউনিট সাড়ে তিন টাকা দামে। বাংলাদেশে তখন বিদ্যুতের গড় দাম ছিলো প্রতি ইউনিট চার টাকার মতো। বাংলাদেশের বিদ্যুৎ সচিব বলেনভারতের বিভিন্ন বেসরকারী বিদ্যুৎ কোম্পানী যথা টাটাআদানি,ল্যাংকোবিড়লা ইত্যাদি এই লাইন দিয়ে বাংলাদেশে বিদ্যুৎ সরবরাহ করতে পারবে।

    যৌথ সংবাদ ব্রিফিংয়ে ভারতের বিদ্যুৎ সচিব বলেনদ্বিপক্ষীয় সহযোগিতার পথে ভারত বেশ কিছুদূর এগিয়েছে। আরও অনেক দূর যেতে হবে। বাংলাদেশকে এগোতে হবে বেশ কিছুটা দ্রতলয়ে। এ ক্ষেত্রে সব ধরনের সহযোগীতা করতে ভারত প্রস্তুত। বাংলাদেশের বিদ্যুৎ সচিব বলেনভারতে সঙ্গে বিদ্যুৎ খাতে এসব কার্যক্রম কোনোটাই বাণিজ্যিক ভিত্তিতে হচ্ছে না। সব কাজের ভিত্তি হচ্ছে সহযোগিতা।

    প্রধানমন্ত্রী গত ৯ এপ্রিল বিদ্যুৎ ও জ্বালানী মন্ত্রনালয়ে সভা করেন। সভায় প্রধানমন্ত্রী বলেন,'আমরা নিজেরা বিদ্যুৎ উৎপাদন না করে যদি বিদ্যুৎ আমদানি করে চালাতে পারিতাহলে বিদ্যুৎ কেন্দ্র স্থাপনের ব্যয়,পরিচালন ও সংরক্ষণ ব্যয় এবং নানারকম ঝক্কি-ঝামেলা থেকে মুক্ত থাকা যাবে। সে সব চিন্তা ভাবনা করে আমরা ভারত থেকে আরও ৬০০ মেগাওয়াট বিদ্যুৎ কেনার কথা ভাবছি'। প্রধানমন্ত্রীর এ ধরনের মন্তব্যে ধরে নেয়া যায় যেএটি বর্তমানে রাষ্ট্রীয় মূল নীতির আওতার অর্ন্তভূক্ত। জ্বালানী ও বিদ্যুৎ নিরাপত্তা তখনই বিঘ্নিত হয়যখন জ্বালানী ও বিদ্যুৎ সরবরাহ অনিশ্চিত হয়ে উঠেঘাটতিনিম্নমানঅনিরাপদট্যারিফ বেশী হওয়া কিংবা ভোক্তাদের ক্রয়ক্ষমতার বেশী।

    জ্বালানীর যে সংকট দেখানো হচ্ছে তা ইচ্ছে করে তৈরী করা হয়েছে। আমাদের দেশে জ্বালানীর কোন সংকট নেই। একটি চক্র ইচ্ছে করে এ জ্বালানী সংকট সৃষ্টি করে রেখেছে এবং বড়ভাবে তা প্রচার-প্রচারণা করছে। বর্তমানে ব্যবহৃত প্রায় সবগুলো গ্যাস কূপের সংরক্ষণ ও ওয়ার্ক ওভার কাজ করে এবং একই সাথে নতুন কূপ খনন করে কয়েকশ টিসিএফ প্রাকৃতিক গ্যাস উত্তোলন করা যেতো। এজন্য সর্বাধিক সময় প্রয়োজন ছিলো ৩ থেকে ৪ বছর। বর্তমান ব্যবহারের পরিমান ও ধরন অনুযায়ী আমাদের এক বছরের গ্যাসের চাহিদা মাত্র এক টিসিএফ। এছাড়াও বাংলাদেশ নবায়নযোগ্য জ্বালানীর প্রাপ্ততা বিশ্বের যে কোন দেশের তুলনায় অগ্রগামী। প্রশ্ন হচ্ছে বিদ্যুত ঘাটতির দেশ ভারত কেন বাংলাদেশকে বিদ্যুৎ দিচ্ছে?

    ভারত প্রায় ১২৪ কোটি জনসংখ্যার ৩৩ লাখ বর্গ কিলোমিটারের দেশ। আর জনসংখ্যার দিক থেকে বিশ্বের দ্বিতীয়। ভারতের বর্তমানে মোট বিদ্যুৎ উৎপাদন ক্ষমতা ২ লাখ ৫৫ হাজার মেগাওয়াট। এছাড়াও আছে ৪০ হাজার মেগাওয়াটের ক্যাপটিভ বিদ্যুৎ। মোট এই ২ লাখ ৯৫ হাজার মেগাওয়াট বিদ্যুতের মধ্যে ৪০ হাজার মেগাওয়াট বিদ্যুৎ আসে নবায়নযোগ্য জ্বালানী থেকে। এ হলো স্থাপিত ক্ষমতা। কিন্তু মূল প্রশ্নটি হলো উৎপাদন সামর্থ্য সক্ষমতা কতো মেগাওয়াটভারতের বিদ্যুৎ চাহিদা হলো ২ লাখ মেগাওয়াট। আর উৎপাদন সক্ষমতা হলো ১ লাখ ৫০ হাজার মেগাওয়াট। তাহলে স্পষ্টতই ঘাটতি হলো ৫০ হাজার মেগাওয়াটের ঘাটতির শতকরা হার হলো ২৫ শতাংশ। ভারত বর্তমানে অর্থনৈতিকভাবে ৩য় বৃহৎ দেশ। ভারতের জিডিপি বার্ষিক ২ দশমিক ০৪৭ ট্রিলিয়ন ইউএস ডলার। যেখানে ভারতের জনপ্রতি বার্ষিক বিদ্যুৎ ব্যবহারের পরিমান ৯২০ কিলোওয়াট ঘন্টাঅথচ বিশ্বের গড় হচ্ছে ২৬০০ কিলোওয়াট ঘন্টা আর ইইউ রাষ্ট্রসমূহের গড় হচ্ছে ৬২০০ কিলোওয়াট ঘন্টা। ভারতে এখনো বিদ্যুৎ সংযোগই পায়নি ৩০ কোটি মানুষযা শতকরা হিসেবে দাঁড়ায় ২৪ শতাংশআর যে ৯৪ কোটি মানুষ বিদ্যুৎ সংযোগ পেয়েছেতাঁদের মধ্যে অনিরাপদঅনির্ভরশীলনিম্নমানসম্পন্নঅস্থায়ীস্বাস্থ্য ও বায়ু দূষণকারী বিদ্যুৎ গ্রাহকের সংখ্যা হলো ১৫ কোটি। বিশ্ব স¦াস্থ্য সংস্থার এক সমীক্ষায় দেখা গেছে যেভারতে প্রায় ৮০ কোটি মানুষই বিদ্যুৎ প্রাপ্তির স্বল্পতার জন্য তাঁর ব্যবহৃত জ্বালানীর অধিকাংশই ব্যবহার করে বায়ু দূষনকারী ও জীববৈচিত্র্য বিনাশী ফুয়েল যার মধ্যে রয়েছে ফুয়েল উড,কৃষি বর্জ্জবায়ো কেক ইত্যাদি। এগুলো বায়ুতে প্রচন্ড বিষযুক্ত ধোঁয়া উদগীরন করে। বিশ্ব স¦াস্থ্য সংস্থার ওই সমীক্ষায় বলা হয়েছে যে,ভারতে প্রতি বছর শুধু জ্বালানীর দূষণেই ৩ থেকে ৪ লাখ মানুষ মারা যায়। আর অসুস্থ হয় অসংখ্য মানুষ। ভারতের বিদ্যুতের অবস্থা যেখানে ২ লাখ ৯৫ হাজার মেগাওয়াটসেখানে উৎপাদন সামর্থ হচ্ছে মাত্র ১ লাখ ৫০ হাজার মেগাওয়াট। অথচ মোট চাহিদা হচ্ছে ২ লাখ মেগাওয়াট।

    ভুটানের জ্বালানী ও বিদ্যুৎ খাত

    ভুটান প্রায় ৮ লাখ অধ্যুষিত মাত্র ৩৮ হাজার বর্গ কিলোমিটারের দেশ,ভুটান চীন ও ভারত পরিবেষ্টিত। ভুটানের ড্রুক গ্রীন নামক রিসার্চ সংস্থার পর্যবেক্ষন অনুযায়ীভুটানের জলবিদ্যুৎ উৎপাদনের সম্ভাব্য কারিগরী পরিমান হচ্ছে ৩০ হাজার মেগাওয়াট। এর মধ্যে কারিগরী ও আর্থিকভাবে সম্ভাব্য পরিমান হচ্ছে ২৪ হাজার মেগাওয়াট।

    এতো সহজপ্রাপ্যসাশ্রয়ী ও পরিবেশবান্ধব জ্বালানী থাকা সত্ত্বেও ভুটানের ৬০ শতাংশ মানুষ অর্থাৎ ৮ লাখ মানুষের মধ্যে মাত্র সাড়ে চার লাখ মানুষ এ পর্যন্ত বিদ্যুৎ পেয়েছে। কারণ পাশেই বিদ্যুত ঘাটতির ভারতের অবস্থান। ভারত পররাষ্ট্র নীতিসহ সামগ্রিকভাবে ভুটানের উপরে প্রভাব বিস্তার করে থাকে। বর্তমানে ভুটানে প্রায় দেড় হাজার মেগাওয়াট জলবিদ্যুৎ কেন্দ্র ভারত নির্মান করছে।

    এ দেড় হাজার মেগাওয়াটের প্রায় ৯৫ শতাংশ বিদ্যুতই ভারতে সরবরাহের জন্য ভারত থেকে প্রাপ্ত ঋণ ও গ্রান্টের অর্থে নির্মান করা হয়েছে। এ বিদ্যুৎ ভারতের পশ্চিম বঙ্গঝাড়খন্ডবিহারউড়িষ্যা,সিকিমনাগপুরএলাহাবাদ অঞ্চলে সরবরাহ করা হয়। এজন্য ভারত ভুটানকে ৬০ শতাংশ অনুদান ও ৫ শতাংশ হারে সরল সুদে কিছু কঠিন শর্তে ৪০ শতাংশ ঋণ দিয়েছে। শর্তের অধীনে আছে ভারত থেকে বিদ্যুৎ কেন্দ্রের শুধু মালামালই নয়এর যাবতীয় প্ল্যানডিজাইনপরামর্শক,প্রকৌশলী এবং জনবল ভারত থেকে আনতে হবে। এছাড়া ভারতের অনুমতি ছাড়া বিদ্যুৎ কেন্দ্রের নির্মাননক্সা বা ডিজাইনের কোন পরিবর্তন বা পরিবর্ধন করা যাবে না ।

    ভারতে সরবরাহকৃত বিদ্যুতের মূল্য ভুটান নয়অবশ্যই ভারত কর্তৃক নির্ধারিত হবে। বিদ্যুৎ কেন্দ্র থেকে সরবরাহকৃত বিদ্যুৎ ইতোমধ্যেই ভারত নির্ধারণ করেছে। ভারতে সরবরাহকৃত প্রতি ইউনিট বিদ্যুতের মূল্য ৩ দশমিক ২ ইউএস সেন্টস ধরা হয়েছে। যেখানে ভুটান একই বিদ্যুৎ কেন্দ্র থেকে তার নিজস্ব বিদ্যুৎ ভুটানবাসীর জন্য নির্ধারন করেছে ৫ দশমিক ২ ইউএস সেন্টস। এছাড়া ভুটান যদি চায় অন্য দেশের কাছে বিদ্যুৎ বিক্রি করতে তাও সম্ভব নয়।

    নেপালের জ্বালানী ও বিদ্যুৎ খাত

    নেপাল প্রায় ৩ কোটি জনঅধ্যুষিত ১ লাখ ৪৭ হাজার ৩৮০ বর্গ কিলোমিটারের একটি দেশ। নেপাল চীনের পার্বত্য অংশ বাদ দিলে বেশীরভাগ এলাকাই ভারত পরিবেষ্টিত। নেপালের সরকারী বিদ্যুৎ সংস্থা এনই-র পর্যবেক্ষন অনুযায়ী নেপালের জলবিদ্যুৎ উৎপাদনের ক্ষমতা হচ্ছে প্রায় ৮৩ হাজার মেগাওয়াটযার মধ্যে কারিগরী ও আর্থিকভাবে সম্ভাব্য পরিমান ৪৩ হাজার মেগাওয়াট। নেপাল ৪ হাজার মেগাওয়াট চাহিদার বিপরীতে এ পর্যন্ত মাত্র ১ হাজার মেগাওয়াট বিদ্যুৎ উৎপাদন করছে। সঙ্গত কারণেই কাঠমুন্ডুসহ সারা নেপালে দৈনিক প্রায় ২০ ঘন্টা লোড শেড থাকে ।

    এতো সহজপ্রাপ্যসাশ্রয়ী ও পরিবেশবান্ধব জ্বালানী থাকা স্বত্ত্বেও নেপালের ৫৪ শতাংশ মানুষ অর্থাৎ ১ কোটি ৬০ লাখ মানুষ এ পর্যন্ত বিদ্যুৎ পেয়েছে। আর যারাও বিদ্যুৎ পাচ্ছে তারাও তা মাত্র ৪ ঘন্টা ব্যবহার করতে পারছে। নেপাল তার সম্ভাব্য জলবিদ্যুতের সিংহভাগ ভারত নিয়ে নেয়। নেপালের প্রয়োজনীয় বিদ্যুৎ ছাড়া অর্থাৎ নেপাল ইলেকট্রিসিটি অথরিটি (এনইএ)-এর প্রতিবেদন অনুযায়ী ভবিষ্যতে নেপালের জন্য সর্বোচ্চ চাহিদা ১০ হাজার মেগাওয়াট রেখে বাকী সম্ভাব্য ৭০ হাজার মেগাওয়াট ভারত নিয়ে থাকে নেপালের সাথে দ্বিপক্ষীয় চুক্তির কারণে। এসব নানা কারণে এবং সিভিল সোসাইটিবামপন্থীসহ প্রগতিশীল গোষ্ঠীর প্রচন্ড বিরোধিতার মুখে ভারতের সাথে চুক্তিগুলো বাস্তবায়ন হচ্ছে না। নেপাল তার বিদ্যুৎ খাতকে উন্নত করতে এডিবিবিশ্ব ব্যাঙ্কসহ বিভিন্ন আর্থিক সংস্থা ও দেশের সাথে বহু দেন দরবার করলেও কোনো কাজ হচ্ছে না।

    ভারতে তার মোট বিদ্যুৎ উৎপাদনের (২ লাখ ৯৫ হাজার মেঃওঃ১ লাখ ৫০ হাজার মেঃওয়াটই উৎপাদিত হয় কয়লা থেকে যা শতকরা হিসেবে দাঁড়ায় প্রায় ৫১ শতাংশ। বিশ্বে যেসব দেশ কয়লাভিত্তিক বিদ্যুৎ উৎপাদন কেন্দ্র বসিয়েছেসেসব দেশ বৈশ্বিক বায়ু দূষণজীববৈচিত্র্য ধ্বংসকরন,কার্বন উদগীরনSO2,NO2জলবায়ুর উষ্ণতা বৃদ্ধিসহ পানি দূষণের জন্য এরাই প্রধানত দায়ী। আবার বিশ্বে মোট কয়লাভিত্তিক বিদ্যুৎ উৎপাদনের শতকরা মোট ৩০ শতাংশই ভারতচীন ও যুক্তরাষ্ট্র উৎপাদন করছে। ইতোমধ্যেই বিশ্বের পরিবেশবাদী সংস্থাগুলো এ ৩টি রাষ্ট্রের বিরুদ্ধে প্রথাগত পদ্ধতিতে কয়লাভিত্তিক বিদ্যুৎ উৎপাদন কেন্দ্র পরিহার করে 'ক্লীন কোল'পদ্ধতিতে বিদ্যুৎ উৎপাদনের জন্য চাপ দিচ্ছে। ২০১০ সালে কোপেনহেগেনে জলবায়ুর সম্মেলনসহ বিশ্বের বিভিন্ন স্থানে পরিবেশবাদীদের আন্দোলনের তীব্রতা লক্ষ্য করা যাচ্ছে।

    ভারতকে অবশ্যই তার কয়লাভিত্তিক বিদ্যুৎ উৎপাদন কেন্দ্র পরিহার করতে হবে। আর এ কারণেই পার্শ্ববর্তী দেশগুলো থেকে ভারতকে বিদ্যুৎ যোগাড় করতে হবে। নেপাল এবং ভুটান থেকে ১ লাখ ২০ হাজার মেগাওয়াট প্রাপ্তির বিষয়ে ভারত নিশ্চিত করেছে।

    বর্তমানে ভারতের বিদ্যুৎ ঘাটতি হচ্ছে ৫০ হাজার মেগাওয়াট। আমরা জানি আগামী ২০৩০ সালে ভারতের বিদ্যুৎ চাহিদা বেড়ে দাঁড়াবে প্রায় ৯ লাখ ৫০ হাজার মেগাওয়াট। কাজেই ২০৩০ সালে ভারতের বিদ্যুৎ ঘাটতি দাঁড়াবে প্রায় ৭ লাখ ৫০ হাজার মেগাওয়াট। আর নেপাল ও ভুটানের মোট সম্ভাব্য জলবিদ্যুতের পরিমান ১ লাখ ২০ হাজার মেগাওয়াট। ভারতের নিজস্ব সম্ভাবনাময় অব্যবহৃত জলবিদ্যুতের পরিমান প্রায় ৩ লাখ মেগাওয়াট। নেপাল ও ভুটানের ১ লাখ ২০ হাজার ও অন্যান্য সম্ভাব্য পন্থায় আরও ১ লাখ মেগাওয়াট যোগ করলে দাঁড়ায় মোট ৫ লাখ ২০ হাজার মেগাওয়াট। তখনো ভারতের ঘাটতি থেকে যায় প্রায় ২ লাখ মেগাওয়াট। মিয়ানমারের সম্ভাব্য জলবিদ্যুতের পরিমান প্রায় ১ লাখ ৫০ হাজার মেগাওয়াট। সুতরাং মিয়ানমারের এই বিদ্যুৎ আনার কথা চিন্তা করছে ভারত।

    আগেই বলা হয়েছেভারত একটি প্রচন্ড বিদ্যুৎ ও জ্বালানী ঘাটতির দেশ। বিদ্যুৎ ও জ্বালানী ঘাটতির দেশ হওয়া স্বত্ত্বেও ভারত বাংলাদেশকে কোন স্বার্থে ভেড়ামারা দিয়ে ৫০০ মেগাওয়াট দেবার পরও আগরতলার পালাটানা বিদ্যুৎ কেন্দ্র থেকে কুমিল্লায় আরও ১০০ মেগাওয়াট বিদ্যুৎ দিতে যাচ্ছেভারত অচিরেই বাংলাদেশের দিনাজপুর বা তেতুলিয়া দিয়ে আরও ১০০ মেগাওয়াট বিদ্যুৎ সরবরাহের প্রস্তাব দেবে। কারণ হলো,ভারত যখন নেপালভুটান ও মিয়ানমার থেকে প্রায় ২ লাখ ৭০ হাজার মেগাওয়াট জলবিদ্যুৎ নেবেতখন ভারতকে এ বিদ্যুৎ নিজের দেশে নিতে গেলে বাংলাদেশের গ্রীডকেই ব্যবহার করতে হবে। বাংলাদেশ তার নিজস্ব অর্থে নির্মিত এ গ্রীড ব্যবহার করে ভারত বাংলাদেশের চারদিকে পাটনা,গয়াকলকাতাআসামদিনাজপুর (ভারত), হাওড়াজামশেদপুর সংলগ্ন এলাকায় বিদ্যুৎ দিতে পারবে। নতুবা ভারতকে এ জলবিদ্যুৎ নিতে যে গ্রীড নতুন করে বানাতে হবে তা শুধু ব্যয় বহুলই হবে নাএ গ্রীড এতো দীর্ঘ হবে যে তাতে সিস্টেমলসসহ ভল্টেজ ড্রপ হবে। আর আর্থিক ও কারিগরী দিক থেকে অগ্রহনীয় ও সম্পূর্ণ বাতিলযোগ্য হবে।

    ভারত এ কারণেই ইতোমধ্যে বাংলাদেশের ব্যয় করা কোটি কোটি টাকায় নির্মিত এবং ভবিষ্যতে নির্মাণ করা হবে এমন গ্রীড দিয়েএ দেশকে করিডোর বানিয়ে বিদ্যুৎ নিতে চায়। আর এতে ভারত এক অংশ থেকে আরেক অংশকে বিদ্যুৎ সংযোগে যুক্ত করতে আগ্রহী। কিন্তু বাংলাদেশ এটা বুঝেও বলছেবাংলাদেশের স্বার্থেই বিদ্যুৎ দেয়া হচ্ছে।।

    http://www.amaderbudhbar.com/?p=6486


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    What is the use of remembering DR BR Ambedkar,Comrade General Secretary?
    It is failed a Parliament which may not defend constitution,rule of law and democratic institutions,dear Comrade General Secretary.
    Palash Biswas

    I am very sorry comrade General Secretary that our Marxist friends are still indulged in either ideological debate or Vote Bank equation neglecting the present social realism under the fascist free market racial hegemony regime and ignoring the challenge to initiate the most important process of resistance from the grass root level.

    CPM failed to break paradigm of Congress, BJP benefitting from each other's loss,you said.

    What does it mean?

    Why the Marxist always fail to assess the reality?

    Respected comrade,You always tend to ignore the reality and its challenges and try to adjust in an opportunist style with political correctness irrelevant to ideology and commitment.

    Thus,as the media reports,at the end of day two of the CPM party congress,comrade General Secretary,you have expressed concern over the party's lack of growth in the last 25 years and spoke about the need to adopt flexible tactics to remain relevant.

    It has been the flexible tactics that our Marxist friends allowed the children of the neoliberal fascist genocide culture ie the Hindu Imperialism to sustain the Manusmriti racial zionist glabal order and never did address the majority bahujan excluded from every sphere of life.

    Comrade General Secretary!CPIM has passed the Dalit agenda way back in Hyderabad Congress and you never tried to implement it.

    We may not see the Bahujan representation in party leadership and organization whereas Hindu Imperialism despite its Brahaminical bias,despite racial apartheid against SC,ST,OBC and minorities,chose Narendra Bahi Modi OBC as the person to implement its fascist free market ethnic cleaning agenda and mobilized the support of Bahujan majority including the more than forty percent population of the country OBC along with SC and ST.

    Now On the occasion of the 125th birth anniversary of Dr. B. R. Ambedkar, the 21st Congress of the CPI(M) demands that the Government hold a special
    session of Parliament to discuss issues connected with the status of Scheduled Caste communities in India.

    The Parliament is bypassed in legislation and legislation is all about corporate lobbying and the Parliamentary politics is reduced to Billionaire Millionaire detached identity vote bank Politics.

    It is failed a Parliament which may not defend constitution,rule of law and democratic institutions,dear Comrade General Secretary.

    You should understand and then explain what purpose would solve the special session of Parliament?Better our Marxist friends should understand the Ambedkar phenomenon afresh and recognize his movement reduced to identity politics whereas DR BR Ambedkar addresses the majority as depressed Class .

    Please discuss issues connected with the status of  the status of all Bahujan victimes of Hindu Imperialism .

    Dear General Secretary,please relook into the the Dalit agenda passed in Hyderabad conference.

    What is the use to remember DR.BR Ambedkar,Dear General Secretary as our Marxist friends failed to defend the labour laws and the Golden Mineral India is on sale?

    Failed to defend fifth and sixth schedule and constitutional safeguards?

    What is the use to remember DR.BR Ambedkar,Dear General Secretary as our Women have to suffer as usual despite so called inclusion and empowerment and have to be victims of patriarchal free market hunting reducing them to commodity?

    What is the use to remember DR.BR Ambedkar,Dear General Secretary as converted NON Hindus have to be obliged for Ghar Wapasi as Modi regime to deny  reservation to NON Hidnus and RSS does implement the agenda of cent precent Hindu Rashtra free of Islam,Cristialnity,Buddhisim and sikhis?

    What is the use to remember DR.BR Ambedkar,Dear General Secretary as the parliament is meant to endorse  all the antipeople  bills to kill the Indian people with parliamentary consensus.


    What is the use to remember DR.BR Ambedkar,Dear General Secretary as the fundamental rights and civic and human right violated and the state is made in am imperialist fascist zionist state to kill the majority population?

     However,COMMUNIST PARTY OF INDIA (MARXIST)says that 

    with the advent of neo-liberal policies, the condition of dalits has worsened. The practice of untouchability and different forms of violence against Scheduled Caste communities continue, the conviction rate of people accused in such cases continues to be low!

     Laws such as The Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act
    need to be strengthened and fully implemented. The Manual Scavengers Actis also yet to be implemented. Large sections of Dalits in rural India are
    landless workers without assets. 

    There is a huge backlog in filling up reserved posts. Development schemes lie unimplemented. 

    Dalit Christians and Muslims have been denied recognition as Scheduled Castes, and are
    consequently excluded from benefits to which Scheduled Castes areentitled, in addition to existing quotas. 

    However,COMMUNIST PARTY OF INDIA (MARXIST)says that these and other issues need separate discussion and resolution by Parliament. A special session would
    ensure that the attention of the entire country is focused on thisshameful scourge of Indian society -- inequality on the basis of birth and descent -- and on the urgent need to take comprehensive and strong
    measures to eliminate it.

    The 21st Party Congress calls upon the entire Party to integrate struggles against social and caste based discrimination and for the rights of Dalits with the class struggle, to fight against atrocities against Dalits, to
    fight for the elimination of untouchability and the caste system, to encourage inter-caste marriage, and to counter the efforts of those who seek to keep Dalits away from democratic mobilisation and movements.

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  • 04/16/15--01:50: विष्णु भागवान के कल्कि अवतार के बाद अब अंबेडकर अवतार का खुल्ला आवाहन धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।। ओबीसी नरेंद्र भाई मोदी के प्रधानमंत्रित्व के परमाणु बम से बाकी विध्वंस जो बहुजनों का हो रहा है,जो शत प्रतिशत हिंदुत्व की सुनामी और विदेशी पूंजी के हितों में सोने की चिड़ियाको बेचने की मुहिम है और जो देश को परमाणु भट्टी बनाकर बहुजनों को जिंदा सिक कबाब बनाने की तैयारी है,सो ग्लोबल हिंदुत्व,अमेरिकी समाम्राज्यवाद और जायनी इजराइली इस्लामविरोधी जिहाद के त्रिशुल की अलौकिक लीला है,इससे बड़ी बात भारत की आधी आबादी ओबीसी अब केसरिया कबंध हैं,जिन्हें हम बजरंगी कहते हैं। जो असली आबादी है,यानी भारती की आधी जनसंख्या महिला,वह हिंदी साम्राज्यवादी पुरुषतांत्रिक व्यवस्ता में यौनदासी के सिवायकुछ भी नहीं है।अब बाकी आबादी की शामत है और इस शामत को कयामत बनाने के लिए भारत फिर महाभारत है।
  • विष्णु भागवान के कल्कि अवतार के बाद अब अंबेडकर अवतार का खुल्ला आवाहन

    धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।


    ओबीसी नरेंद्र भाई मोदी के प्रधानमंत्रित्व के परमाणु बम से बाकी विध्वंस जो बहुजनों का हो रहा है,जो शत प्रतिशत हिंदुत्व की सुनामी और विदेशी पूंजी के हितों में सोने की चिड़ियाको बेचने की मुहिम है और जो देश को परमाणु भट्टी बनाकर बहुजनों को जिंदा सिक कबाब बनाने की तैयारी है,सो ग्लोबल हिंदुत्व,अमेरिकी समाम्राज्यवाद और जायनी इजराइली इस्लामविरोधी जिहाद के त्रिशुल की अलौकिक लीला है,इससे बड़ी बात भारत की आधी आबादी ओबीसी अब केसरिया कबंध हैं,जिन्हें हम बजरंगी कहते हैं।


    जो असली आबादी है,यानी भारती की आधी जनसंख्या महिला,वह हिंदी साम्राज्यवादी पुरुषतांत्रिक व्यवस्ता में यौनदासी के सिवायकुछ भी नहीं है।अब बाकी आबादी की शामत है और इस शामत को कयामत बनाने के लिए भारत फिर महाभारत है।

    पलाश विश्वास

    धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

    संघ परिवार के पांज्यजन्यविशेशांक में अंबेडकर को मुसलमानों के खिलाफ विषवमन करते दिखाया गया है और उन्हें हिंदुत्व के उत्थान में गुरु गोलवलकर से भी  बहुतऊपर दिखाया गया है।ओबीसी नरेंद्र भाई मोदी के प्रधानमंत्रित्व के परमाणु बम से बाकी विध्वंस जो बहुजनों का हो रहा है,जो शत प्रतिशत हिंदुत्व की सुनामी और विदेशी पूंजी के हितों में सोने की चिड़ियाको बेचने की मुहिम है और जो देश को परमाणु भट्टी बनाकर बहुजनों को जिंदा सिक कबाब बनाने की तैयारी है,सो ग्लोबल हिंदुत्व,अमेरिकी समाम्राज्यवाद और जायनी इजराइली इस्लामविरोधी जिहाद के त्रिशुल की अलौकिक लीला है,इससे बड़ी बात भारत की आधी आबादी ओबीसी अब केसरिया कबंध हैं,जिन्हें हम बजरंगी कहते हैं।


    जो असली आबादी है,यानी भारती की आधी जनसंख्या महिला,वह हिंदी साम्राज्यवादी पुरुषतांत्रिक व्यवस्ता में यौनदासी के सिवायकुछ भी नहीं है।अब बाकी आबादी की शामत है और इस शामत को कयामत बनाने के लिए भारत फिर महाभारत है। विष्णु भागवान के कल्कि अवतार के बाद अब अंबेडकर अवतार का खुल्ला आवाहन है।


    इस सिलसिले मेंं हम पहले ही चेतावनी जारी कर चुके हैं।देखें हस्तक्षेपः

    हिंदू साम्राज्यवाद के सबसे बड़े शत्रु डॉ. अंबेडकर का जन्मदिन किसी पुण्यपर्व की तरह क्यों मना रहा है संघ परिवार

    संघ परिवार के हिंदू राष्ट्र एजेंडा में बाबासाहेब की प्रासंगिकता क्या है

    मुक्तबाजारी हिंदू साम्राज्यवादियों के शिकंजे में बाबासाहेब

    उनकी रिहाई के लिए संघपरिवार और कांग्रेस की तर्ज पर अंबेडकर जयंती न मनाकर उनकी विचारधारा, उनके जाति उन्मूलन एजंडा और उनके आंदोलन की जयंती मनायें

    http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/issue/2015/04/12/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%82-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%AC


    अब देखें पांच्यजन्य का अंबेडकर विशेषांकः

    आवरण कथा


    आवरण कथा

    आवरण कथा

    आवरण कथा

    विवेक शुक्लाभीमराव ऑबेडकर ने पंडित नेहरू की कैबिनेट से 31 अक्तूबर,1951 को इस्तीफा दे दिया था और उसके अगले ही दिन वे 26 अलीपुर रोड के बंगले में आ गए थे। आप जब राजधानी में अन्तरराष्ट्रीय बस अड्डे के रास्ते सिविल लाइंस मेट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ते हैं तो आपको ..  आगे पढ़िए…

    http://panchjanya.com/Default.aspx?NB=&lang=5&m1=m8&m2=m8.24&p1=&p2=&p3=&p4=


    हमने इस इतिहास विकृति का खंडन करने का फैसला किया है।इस सिलसिले में हमारी सबसे पहले बातचीतआदरणीयराम पुनियानी जी से हुई है।सुबह ही हमने अमलेंदु से बात कर ली है।हम इतिहासकारों और दूसरे विशेषज्ञों के आलेखों और मतामत का स्वागत तो करेंगे ही,इस बहस में आप सबका स्वागत है।


    हम घृणा अभियान के सख्त खिलाफ है।तथ्यात्मक तार्किक मतामत के लिए हस्तक्षेप पर किसी का भी स्वागत है।


    मुसलमानों और बहुजनों,खासकर दलितों और अंबेडकर के अनुयायियों से निवेदन हैं कि वे सच का समाना करें।


    संघ परिवार किताना सच बोल रहा है और कितना झूठ,इसकी चीरफाड़ अवश्य हो।अगर अंबेडकर के विचार सचमुच हिंदुत्व के फासीवाद के पक्ष के मजबूत करते हैं,तो हमें तुरंत ही अंबेडकर की सारी मूर्तियों को विसर्जित कर देना चाहिए और नीले झंडे को फेंक देना चाहिए।अगर ऐसा नहीं है,तो आइये समाना करें हिंदुत्व की इस कयामती दुष्प्रचार सुनामी का।



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    Monsur Haider <haidermonsur@gmail.com> wrote:

    প্রভাবশালী সিন্ডিকেট| বন্ডেড ওয়্যারহাউসের নামে বছরে প্রায় পাঁচ হাজার কোটি টাকার রাজস্ব ফাঁকি দিয়ে নিজেদের মধ্যে ভাগবাটোয়ারা করে নিচ্ছে একদল অসৎ ব্যবসায়ী। এরা ঘুষখোর-দুর্নীতিবাজ কাস্টমস কর্মকর্তাদের সমন্বয়ে গড়ে উঠা একাধিক প্রভাবশালী সিন্ডিকেটের মাধ্যমে দেশ ধ্বংসের এই লুটপাটে লিপ্ত। চক্রটি বন্ড সুবিধায় বিভিন্ন বন্ধ কারখানার নামে অবৈধ আমদানিতে জড়িয়ে পড়েছে। সম্প্রতি এমন একটি চালান আটকও হয়েছে বেনাপোলে।

    খোঁজ নিয়ে জানা গেছে, দেশে বন্ড লাইসেন্সপ্রাপ্ত প্রতিষ্ঠানগুলো পুনঃরফতানীর শর্তে শুল্কমুক্ত পণ্য আমদানির সুবিধা পায়। কিন্তু শর্ত ভঙ্গ করে কারচুপি ও জালিয়াতির মাধ্যমে ওইসব প্রতিষ্ঠান কালোবাজারে পণ্য বিক্রি করছে। এতে সরকার হারাচ্ছে রাজস্ব।

    বন্ড লাইসেন্স ইস্যুর সময় ভালো করে পরীক্ষা-নিরীক্ষা করা হয় না। লাইসেন্স প্রদানের ক্ষেত্রে কোন্ প্রতিষ্ঠান যোগ্য আর কে অযোগ্য, তাও বিবেচনা করা হয় না। এই লাইসেন্স পাওয়ার পর প্রতিষ্ঠানগুলো বড় যে জালিয়াতি বা কারচুপি করে সেটি হলো- অনেক প্রতিষ্ঠান আছে, যারা প্রয়োজনের তুলনায় অধিক পণ্য আমদানি করে কালোবাজারে বিক্রি করে। এতে সরকারের হাজার হাজার কোটি টাকা রাজস্ব ক্ষতি হয়।

    খোঁজ নিয়ে জানা গেছে, শতভাগ রফতানীমুখী শিল্পে শুল্কমুক্ত সুবিধায় উচ্চ শুল্কের পণ্য আমদানির সুযোগ দেয়া আছে। ওই পণ্য কালোবাজারে বিক্রি করে দিয়ে সরকারের রাজস্ব ফাঁকি নিরুৎসাহিত করতে আছে কঠোর নীতিমালা। এ ধরনের পাঁচ হাজারেরও বেশি প্রতিষ্ঠান নিয়ন্ত্রণ করছে ঢাকা কাস্টম বন্ড কমিশনারেট। কিন্তু কমিশনারেটের শীর্ষ কর্মকর্তাদের যোগসাজশে বন্ড সুবিধাপ্রাপ্ত ৭০ শতাংশেরও বেশি প্রতিষ্ঠান বিপুল অঙ্কের রাজস্ব ফাঁকি দিয়ে তা আত্মসাতের সুযোগ নিচ্ছে। কাগজে-কলমে অস্তিত্ব আছে, কিন্তু বাস্তবে নেই, এমন শত শত প্রতিষ্ঠানকে নীতিমালা ভঙ্গ করে দেয়া হয়েছে বন্ড লাইসেন্স। নির্দিষ্ট মেশিনারিজের ক্যাপাসিটির অনেক বেশি উৎপাদন দেখিয়ে অস্বাভাবিক হারে আমদানিপ্রাপ্যতা বাড়ানো হচ্ছে, যার ৫০ শতাংশই ভুয়া। আর এ সুযোগে সরকার হারাচ্ছে প্রতিবছর পাঁচ হাজার কোটি টাকারও বেশি রাজস্ব। আর ভুয়া রফতানী দেখিয়ে সমপরিমাণ বৈদেশিক মুদ্রা পাচার করা হচ্ছে।

    এ সম্পর্কে শুল্ক গোয়েন্দা ও তদন্ত অধিদপ্তরের এক প্রতিবেদনে বলা হয়, প্রতিষ্ঠান না থাকা সত্ত্বেও অথবা মেশিনারিজ স্থাপিত হয়নি কিংবা সংশ্লিষ্ট মেশিনারিজের উপযোগিতা যাচাই না করেই বন্ড লাইসেন্স দেয়া হচ্ছে। কঠিন শর্তাবলী প্রতিপালনের পর অতি অল্প সময়ে একটি বন্ড প্রতিষ্ঠান অস্তিত্বহীন হওয়ার বিষয়টি কোনোক্রমেই গ্রহণযোগ্য নয়।

    অন্যদিকে বন্ডেড ওয়্যারহাউসের মাধ্যমে শুল্কমুক্ত সুবিধায় যেসব পণ্য আসে এর তদারকির দায়িত্ব বন্ড কমিশনারেটের। ঢাকা ও চট্টগ্রামের জন্য আলাদা বন্ড কমিশনারেট আছে। তবে দুটি প্রতিষ্ঠানই লোকবল ও সরঞ্জামের অভাবে ধুঁকছে। এর সঙ্গে আছে দুর্নীতি আর অনিয়মের অভিযোগ।

    বন্ডের আওতায় আমদানিকৃত পণ্য বন্দর থেকে খালাস করে বন্ড কর্মকর্তার উপস্থিতিতে কারখানায় নেয়া এবং কনটেইনার খুলে কারখানার গুদামে রাখার নিয়ম রয়েছে। কিন্তু প্রতিদিন বন্দর থেকে যে বিপুল পরিমাণ বন্ডেড পণ্য আসে, এর ১ শতাংশের ক্ষেত্রেও এ নিয়ম মানা হয় না। এমনকি সহকারী রাজস্ব কর্মকর্তার উপস্থিতিতে পণ্য গুদামজাত করে সিলগালা করার নিয়মও মানা হয় না। কিন্তু সরকারের সংশ্লিষ্ট কর্মকর্তারা সে বিষয়ে আদৌ কোনো দায়িত্ব পালন করে না।

    এতে করে লাইসেন্সপ্রাপ্ত প্রতিষ্ঠানের মাধ্যমে আমদানিকৃত পুনঃরফতানীযোগ্য যে পণ্য এখানকার শিল্প-কারখানায় ব্যবহারের পর আবার রফতানী হওয়ার কথা, সেই পণ্য চলে যাচ্ছে খোলাবাজারে। বন্ড সুবিধায় পণ্য আমদানির ক্ষেত্রে চুক্তির শর্তই হচ্ছে, এই পণ্য খোলাবাজারে বিক্রি করা যাবে না। কিন্তু দেশে এরই মধ্যে ৮৩টি রফতানীমুখী প্রতিষ্ঠান চিহ্নিত করা হয়েছে, যেগুলো বন্ড সুবিধায় শুল্কমুক্তভাবে কাঁচামাল আমদানি করে তা বিক্রি করে দিচ্ছে খোলাবাজারে। সাময়িকভাবে স্থগিত করা হয়েছে কিছু প্রতিষ্ঠানের আমদানি-রফতানীসংক্রান্ত কার্যক্রম। কিন্তু দুর্নীতি বন্ধ করা যায়নি। বন্ডেড ওয়্যারহাউসের নামে আমদানি করা এসব পণ্য থেকে দেশ বিপুল পরিমাণ রাজস্ব হারাচ্ছে, পাশাপাশি ক্ষতিগ্রস্ত হচ্ছে দেশের শিল্প। জানা গেছে, শুধু একটি প্রতিষ্ঠানই গত মাসের (মার্চ-২০১৫) শেষ সপ্তাহে আমদানি করা ৮১ কোটি টাকার ডুপ্লেক্স বোর্ড ও প্লাস্টিক দানার মধ্যে ৫০ কোটি টাকার পণ্য খোলাবাজারে বিক্রি করে দেয়ায় সরকার ১৫ কোটি টাকার রাজস্ব হারিয়েছে। বন্ড সুবিধায় সবচেয়ে বড় দুর্নীতি হয় গার্মেন্টসে। এই খাতের বন্ড সুবিধায় আমদানি হচ্ছে আর্ট বোর্ড, হার্ড টিস্যু, ডুপ্লেক্স বোর্ড ও সাদা প্রিন্টিং পেপার। এসব পণ্য গার্মেন্টস অ্যাক্সেসরিজ উৎপাদনকারী কারখানায় ব্যবহৃত হবে- এমন শর্ত থাকলেও তা খোলাবাজারে বিক্রি করে দেয়া হচ্ছে। তাতে ক্ষতিগ্রস্ত হচ্ছে দেশের শিল্পপ্রতিষ্ঠান। বিশেষ করে দেশের কাগজ উৎপাদনকারী প্রতিষ্ঠানগুলো এক ধরনের অসম প্রতিযোগিতায় পড়ে গেছে। দেশের ৭১টি পেপার মিল স্থানীয় বাজারের ১০ লাখ টনের চাহিদা পূরণ করে বাইরেও রফতানী করার সক্ষমতা অর্জন করেছে। কিন্তু এই শিল্প আজ কিছু অসৎ ব্যবসায়ীর কারণে হুমকির মুখে পড়েছে। ১০ হাজার কোটি টাকা বিনিয়োগে ১৫ লাখ লোকের কর্মসংস্থানের সুযোগ সৃষ্টিকারী কাগজশিল্প ধ্বংস করার কাজে উঠেপড়ে লেগেছে কিছু প্রতিষ্ঠান।

    দেশের শিল্প ধ্বংসের চক্রান্তকারীদের দেশের শত্রু হিসেবে বিবেচনা করে প্রয়োজনীয় ব্যবস্থা নিতে সরকারকে সর্বোচ্চ সক্রিয় হতে হবে। কর্মসংস্থান ও বাণিজ্যিক সম্ভাবনা সৃষ্টিকারী শিল্প বাঁচাতে এবং জনসাধারণের স্বার্থ রক্ষার বিপরীতে সরকারের উদাসীনতা কোনোক্রমেই বরদাশতযোগ্য নয়।


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    GULABI GANG OF GUJARAT-
    महिलाओं के आत्म सम्मान और स्वयं निर्भरता की ओर कदम
    Meeting every Saturday and Sunday, bet- 12 to 4 noon.,
    shramjivi sevalaya conference,near central bus stand,beside alankar
    talkies,opp – railway station, surat, Coordinator-lageraho
    natubhai,lagerahonatubhai@gmail.com,m-07802050596,
    ____________________________________________________________
    ગુલાબી ગેંગ ઓફ ગુજરાત સુરતના આયોજન
    1.મહિલા રોજગાર માહિતી અને તાલીમ કેન્દ્ર શરુ કરી જરૂરતમંદ બહેનો ને ઘર
    બેઠા કામ ,પાર્ટ ટાઈમ નોકરી , ફૂલ ટાઈમ નોકરી,ગૃહ ઉદ્યોગ ,કમીશન બેઝ
    ,કોન્ટ્રાકટ બેઝ ,જોબ વર્ક ,નાઈટ ડ્યુટી, મારકેટ સર્વે ,સેમ્પલીંગ
    ,પ્રોડક્ટ કે સેવા ના વેચાણ-પ્રચાર પ્રસાર જેવા કોલ બેઝ ,રીઝલ્ટ
    બેઝ,કેમ્પેનીંગ ,ડેમો વિગેરે જેવા કામો મેળવવા વિના મુલ્યે માહિતી અને
    તાલીમ અપાશે .
    2. વિશ્વ મહિલા દિવસ 8 માર્ચ નારી સન્માન કાર્યક્રમ ઉજવવો .
    3.મહિલાઓં ને સ્વ નિર્ભળ થવા ,સ્વમાન સાથે ,સુરક્ષા સાથે જીવવા તાલીમ
    ,માહિતી, માર્ગદર્શન અને કાનૂની મદદ વિનામૂલ્યે આપવી , દર શનિ –રવિ વારે
    બપોરે 3થી 6 માં ,પોલીસ હેડ ક્વાર્ટર ના તાલીમ હોલ ,અઠવા લાઈન્સ ખાતે
    ,સુરત શારીરિક સુરક્ષા તાલીમ અપાય છે .દરેક વિસ્તારમાં આયોજન ગોઠવવા
    4.ગર્લ શાળા -કોલેજો માં જઈ ગુલાબી ગેંગ ઓફ ગુજરાત ના કામો કરવા .
    5.ગુલાબી ગેંગ ઓફ ગુજરાત ના વિકાસ વિસ્તાર પ્રચાર ના આયોજનો ,શાંખા ખોલવી
    ,સભ્યો નોધવા ,કાર્યક્રમો કરવા ,અન્ય સંસ્થા સાથે જોડાવું અને નારી શક્તિ
    ઉત્થાન ના પ્રયત્નો કરવા .
    6.સ્ત્રીઓં ના પ્રશ્નો માટે સરકાર ,કોર્ટ માં કેસ દાખલ કરવા .
    7.સામાજિક દુષણો સામે અવાજ ઉઠાવવો ,આંદોલનો કરવા ,સ્ટીંગ ઓપેરેશન કરવા
    ,સવિનય કાનુન ભંગ કરી અસામાજીક તત્વો ને પકડી કાનુન હવાલે કરવા .
    8.સરકારી કે અન્ય મહિલાઓં માટે ના શક્ય લાભો અપાવવા માળખું ગોઠવવું .
    9.બેટી તારુ સ્વાગત હૈ -પ્રથમ બેટી જન્મ વધાઈ ગીતો ,મીઠાઈ અને
    ,પ્રમાણપત્ર,આપવા અને ભ્રુણ હત્યા વિષે જાગૃતિ અને કાનૂની કાર્યો કરવા.
    10 અન્ય નિયમિત મીટીંગ માં સર્વાંનુંમતે લેવાતા નિર્ણય પર કામો કરવા
    નિયમિત ભરતી મેળા - માત્ર સ્ત્રી સ્ટાફ મેળવવા માટે અને બહેનો ને વિના
    મુલ્યે નોકરી મેળવવા માટે અથવા ઘરબેઠા કામ ,પાર્ટટાઈમ-ફૂલટાઈમ
    નોકરી,,ગૃહઉદ્યોગ,વિગેરે આવક મેળવવા
    ગુલાબી ગેંગ ઓફ ગુજરાત સુરત-મહિલા રોજગાર માહિતી-તાલીમ કેન્દ્ર-
    m-7802050596,9879290601,8460407074 .-કેન્દ્રિય બસસ્ટેશન બાજુના સેવાલય
    કોન્ફરન્સ હોલ ખાતે બરોડા બેન્ક ઉપર, સુરત સ્ટેશન નજીક,
    પ્રથમ અને ત્રીજા શનિવાર 11 થી 2 વચ્ચે રીસેપ્શનીસ્ટ, telecaller,
    કાઉન્સેલર, ફ્રન્ટ ડેસ્ક સ્ટાફ, જેવા
    પ્રથમ અને ત્રીજા શનિવાર 2 થી 5 વચ્ચે ઓપરેટરો, પ્રોગ્રામરો, શિક્ષકો
    વગેરે જેવી કમ્પ્યુટર સંબંધિત સ્ત્રી સ્ટાફ
    પ્રથમ અને ત્રીજા રવિવાર 11 થી 2 વચ્ચે એકાઉન્ટિંગ ક્ષેત્ર, વેચાણ ખરીદી,
    ઇન્વેન્ટરી-ગુણવત્તા નિયંત્રણ, સંબંધિત સ્ત્રી સ્ટાફ
    પ્રથમ અને ત્રીજા રવિવાર 2 થી 5 વચ્ચે નર્સ,મદદનીશ, ડોકટરો, આયા,
    હોસ્પિટલ, ફાર્મા, તબીબી, લેબ વગેરે સંબંધિત સ્ત્રી સ્ટાફ
    બીજા અને ચોથા શનિવાર 11 થી 2 વચ્ચે કલા ડિઝાઇન ક્ષેત્રમાં, ફેશન,
    જ્વેલરી, આંતરિક, આર્કિટેક્ટ, dtp, AutoCAD, વિડિઓ સંપાદન, વેબ
    ડિઝાઇનર,પ્રકારના સંબંધિત સ્ત્રી સ્ટાફ
    બીજા અને ચોથા શનિવાર 2 થી 5 વચ્ચે તમામ ટેકનિકલ આઈ.ટી.આઈ., ટૂંકા
    ગાળાના, ડિપ્લોમા,, BE, ME ઇજનેરો વગેરે જેવી તમામ ટેક્નિકલ સંબંધિત
    સ્ત્રી સ્ટાફ
    બીજા અને ચોથા રવિવાર 11 થી 2 વચ્ચે વેચાણ અને માર્કેટિંગ સ્ત્રી સ્ટાફ
    બીજા અને ચોથા રવિવાર 2 થી 5 વચ્ચે બધા ગૃહઉદ્યોગ સંબંધિત કામ, નોકરી
    કામ, ફક્ત સ્ત્રીઓ માટે ઘરેથી કામ
    દરેક સોમવાર 11 થી 5 વચ્ચે ઓનલાઈન ફોર્મ ભરવા, કારકિર્દી માર્ગદર્શન,
    વેકેશન નોકરી, GPSC- યુપીએસસી-બેંક-રેલ્વે વગેરે નોકરી મદદ, અભિરુચિ
    કસોટી, ઇંગલિશ, વ્યક્તિત્વ વિકાસ તાલીમ
    દરેક શુક્રવાર 11 થી 5 વચ્ચે ગુલાબી ગેંગ સ્ટાફ, ટ્રેનર્સ, સુપરવાઇજર,
    શાખા સ્ટાફ તાલીમ
    https://docs.google.com/…/1_eB62_FLXE3sdAgqXpNDL-7COb…/edit…
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    noon.
    Send bio data or list of interested work to us by email to
    lagerahonatubhai@gmail.com,m-07802050596,surat.
    https://docs.google.com/document/d/1lvUth1t4VDkShKIhiGhulkRdqaLlSHwDt1l0lOfQshw/edit
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    PUCL कानपुर तसलीमा नसरीन के फेसबुक अकाउंट बंद किये जाने का विरोध करता है |
     फेसबुक कंपनी द्वारा तसलीमा नसरीन के फेसबुक अकाउंट को बंद किया जाना न सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का हनन है बल्कि सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी उल्लंघन है जिसके तहत सुप्रीम कौर्ट ने धारा 66 A को असंवैधानिक माना है | फेसबुक विचार और भावनाए प्रस्तुत करने का एक सार्वजानिक स्पेस है जहाँ सभी को अपने विचार प्रस्तुत करने की आजादी है ऐसे में सिर्फ रुढ़िवादियों और कट्टरपंथियों की शिकायत पर एक लेखक को उसकी भावनाये व्यक्त करने से रोकना उचित नहीं लगता| इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है | तसलीमा नसरीन स्वतंत्र विचारों की लेखिका है जिसने इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा महिलाओं के साथ किये गए अत्याचार और शोषण को समाज के सामने लाया है | एक निर्वासित लेखिका होने के बाद भी तसलीमा ने धार्मिक अशहिष्णुता एवं कट्टरपंथ के खिलाफ लेखन बंद नहीं किया और इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ अपने घुटने नहीं टेके तो ऐसे में इस्लामिक रुढ़िवादियों द्वारा उसे फेसबुक का इस्तेमाल करने से रोकना बेहद शर्मनाक मामला है |  

    PUCL कानपुर इकाई इस पूरे प्रकरण का विरोध करते हुए फेसबुक अधिकारियों से तसलीमा नसरीन के अकाउंट को पुनः संचालित करने की मांग करती है | 

    सम्बंधित ख़बरें - 




    द्वारा जारी - 

    के एम् भाई 
    PUCL कानपुर 
    8756011826, 9415045873,

    Blog  - puclup.blogspot.in 

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    তসলিমার ফেসবুক পেজ বন্ধ
    Controversial Bangladeshi writer Taslima Nasreen's Facebook account was disabled after her posts were reported by Islamic fundamentalists, the author said.


    বাংলাদেশি লেখিকা তসলিমা নাসরিনের ফেসবুক অ্যাকাউন্ট বন্ধ (ডিজ্যাবল) করে দেওয়া হয়েছে। গত মঙ্গলবার সকাল থেকে তাঁর অ্যাকাউন্ট আর দেখা যাচ্ছে না। বহু ইসলামপন্থী ফেসবুক ব্যবহারকারী অনলাইনে সামাজিক যোগাযোগের এ মাধ্যমে তসলিমার স্ট্যাটাস নিয়ে 'অভিযোগ' করার পর ফেসবুক কর্তৃপক্ষ এ ব্যবস্থা নিল।

    ফেসবুকে তসলিমার নামে বহু ভুয়া অ্যাকাউন্ট রয়েছে। তিনি নিজে 'নাসরিন তসলিমা' নামের অ্যাকাউন্ট ব্যবহার করতেন। জার্মানির নোবেল বিজয়ী সাহিত্যিক গুন্টার গ্রাসের মৃত্যুর পর এ নিয়ে একটি স্ট্যাটাস পোস্ট করতে গিয়ে গত মঙ্গলবার তসলিমা দেখেন তাঁর অ্যাকাউন্টটি বন্ধ হয়ে গেছে।

    এরপর ক্ষুব্ধ তসলিমা এক টুইট বার্তায় বলেন, 'মূর্খ ইসলামপন্থীরা যখনই আমার ফেসবুক পোস্টের ব্যাপারে অভিযোগ করে বেকুব ফেসবুক কর্তৃপক্ষ আমার অ্যাকাউন্ট বন্ধ করে দেয়।' তসলিমা দৈনিক বাংলাদেশ প্রতিদিনকে বলেন, 'ফেসবুকের সামাজিক যোগাযোগ ওয়েবসাইটের কাছ থেকে আমি এ ধরনের আচরণ কখনোই আশা করিনি। এর আগেও কয়েকবার তারা এই কাজটি করেছে। তবে প্রতিবারই আমি নানাভাবে অ্যাকাউন্ট উদ্ধার করতে পেরেছি।' তিনি আরো বলেন, 'আমি ফেসবুক কর্তৃর্পক্ষের সঙ্গে কথা বলেছি। আমি তাদের বলেছি, যারা আমার বিরুদ্ধে অভিযোগ করেছে, তারা মুক্তচিন্তায় বিশ্বাস করে না। তারা মত প্রকাশের স্বাধীনতায় বাধা দিতে চায়। তবে বার বার অনুরোধ করার পরও ফেসবুক কর্তৃপক্ষ আমার অ্যাকাউন্টটি চালু করেনি।'

    ফেসবুকে তসলিমা নাসরিনের লক্ষাধিক অনুসারী রয়েছে। অ্যাকাউন্ট ডিজ্যাবল হওয়ার ফলে তাদের সঙ্গে তসলিমার আর যোগাযোগ রইল না। তসলিমা বলেন, 'সম্প্রতি আমার ওয়ালে যে পোস্টগুলো দেওয়া হয়েছে, তার আর কোনো অনুলিপি রাখা হয়নি।'

    লেখিকা বলেন, 'বহু অনুসারী আমাকে নতুন আইডি দিয়ে নতুন অ্যাকাউন্ট খোলার কথা বলেছিল। আমার সাতটি ই-মেইল ঠিকানা রয়েছে। ফেসবুক এর কোনোটিকেই গ্রহণ করছে না। নতুন অ্যাকাউন্ট খোলার মনোবল আমার আর নেই।' তিনি প্রশ্ন করেন, 'ফেসবুকটি আইএস-এর (ইসলামিক স্টেট) মতো ইসলামপন্থী মৌলবাদী সংগঠনের দখলে গেল? তারা (মৌলবাদী) ঠিক করবে ফেসবুকে কে থাকবে আর কে থাকবে না?'

    তিনি বলেন, 'ফেসবুক নিয়ে আমার ধৈর্য পুরোপুরি ফুরিয়ে গেছে। আমার বহু লেখা নষ্ট হয়ে গেছে।

    উৎসাহ হারিয়ে ফেলেছি আমি।' সূত্র : ইন্ডিয়া টিভি।

    - See more at: http://www.kalerkantho.com/print-edition/news/2015/04/16/210826#sthash.Cyd97Qux.dpuf

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