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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    मशहूर गम्मत कलाकार श्री रामलाल निर्मलकर का दुःखद निधन १०.०३.२०१५ को लंबी बीमारी के चलते ...७० वर्ष कीआयु में हो गया ....
    हबीब तनवीर के चरण दास चोर..मिट्टी की गाड़ी ..गांव नाम ससुराल ..आगरा बाज़ार आदि नाटको में उन्होंने अभिनय किया था ...
    नाचा थियेटर के विभिन्न आयोजनों में उन्होने सक्रिय हिस्सेदारी की थी ....
    लंबे समय तक अछोटा नाच पार्टी के जोक्कड़(मुख्य अभिनेता )के रूप में उन्होने अंग्रेजी बहू..बावा..गपशप ..आदि गम्मतों के सैकड़ों प्रदर्शन कर प्रसिद्धि पाई ...
    नाचा गम्मत के इस महत्वपूर्ण कलाकार को ग्राम मढ़ी में नाचा थियेटर परिवार ने सभा कर श्रद्धांजलि अर्पित की .......

    'मशहूर गम्मत कलाकार श्री रामलाल निर्मलकर का दुःखद निधन १०.०३.२०१५ को लंबी बीमारी के चलते ...७० वर्ष कीआयु में हो गया ....  हबीब तनवीर के चरण दास चोर..मिट्टी की गाड़ी ..गांव नाम ससुराल ..आगरा बाज़ार आदि नाटको में उन्होंने अभिनय किया था ...  नाचा थियेटर के विभिन्न आयोजनों में उन्होने सक्रिय हिस्सेदारी की थी ....  लंबे समय तक अछोटा नाच पार्टी के जोक्कड़(मुख्य अभिनेता )के रूप में उन्होने अंग्रेजी बहू..बावा..गपशप ..आदि गम्मतों के सैकड़ों प्रदर्शन कर प्रसिद्धि पाई ...  नाचा गम्मत के इस महत्वपूर्ण कलाकार को ग्राम मढ़ी में नाचा थियेटर परिवार ने सभा कर श्रद्धांजलि अर्पित की .......'


    मुक्तबाजारी कारपोरेट फासीवाद को खिलाफ लड़ाई बहुजनों की सक्रिय हिस्सेदारी के बिना असंभव है

    फासिस्ट कारपोरेट संघ परिवार ने इस पूरी बहुजन कवायद को न सिर्फ समझा है बल्कि उसे सिरे से आत्मसात करके महाबलि बनकर खड़ा है और हम चुनिंदे लोग फासीवाद के खिलाफ चीख चिल्ला रहे हैं जबकि बहुजन समाज के आकार में जो सर्वहारा वर्ग है,वह केसरिया केसरिया कमल कमल है।


    पलाश विश्वास




    आज मान्यवर कांशीराम जी की जयंती है।


    जाहिर है कि जयंती पालन करने में बहुजन समाज सबसे आगे होता है।सुबह ही कर्नल साहब ने याद दिलाया कि मान्यवर का जन्मदिन है आज।कर्नल साहेब से मौजूदा बहुजन आंदोलन और कारपोरेट फासीवाद के खिलाफ लड़ाई के सिलसिले में आर्थिक मुद्दों को लेकर अस्मिता के आर पार बहुजनों की लामबंदी की चुनौतियों पर लंबी बातचीत चली।


    कर्नल साहब मानते हैं कि बहुजन कार्यकर्ता आऱ्थिक मुद्दों और कारपोरेट फीसीवाद को समझते तो हैं लेकिन उनको गोलबंद करके प्रतिरोध की जमीन बनाने में हम कोई पहल नहीं कर पा रहे हैं।


    पीसी खोला तो विद्याभूषण  रावत और एचएल दुसाध के दो आलेखों के अलावा बहुजनों की ओर  से तमाम पोस्ट देखने को मिले।


    फेसबुक के स्टेटस पर पहला पैरा लगाते न लगाते हमारे मित्र डा. लेनिन  का मंतव्य आ गयाः

    Lenin Raghuvanshi Udit Raj ji kar rahe hai. Bina Neo Dalit movement Ke Kuchh nahi hoga


    इधर महीनेभर से लागातार अस्वस्थ होने के कारण लिखने पढ़ने पर बिगड़ती सेहत ने अंकुश लगा दी है।


    मान्यवर कांसीराम जी के महिमामंडन के लिए मेरे लिए कुछ भी लिखना संभव नहीं है।हम मौजूदा चुनौतियों के मुकाबले उनके बहुजन आंदोलन की प्रासंगिकता पर बात करना चाहेंगे जो कि मुक्तबाजारी फासीवाद से जूझने के लिए जरुरी भी है।


    परसो शाम नई दिल्ली में हमारे मित्रों ने अन्वेषा की ओर से आयोजित संगोष्ठी में फासीवाद के खिलाफ राजनीतिक तौर पर सक्रिय संस्कृतिकर्म पर विचार विमर्श किया है।


    एक तो नौकरी की आखिरी पायदान में हूं,सेहत दगा देने लगी है और आगे नये सिरे से जिंदा रहने की तैयारी भी बड़ी चुनौती है।मैं दिल्ली या आसपास कहीं,यहां तक कि कोलकाता तक दौड़ लगाने की हालत में नहीं हूं।


    कविता कृष्णपल्लवी के लेखन से मैं हमेशा प्रभावित रहा हूं और दिल्ली में इस आयोजन की वे संयोजक थी।संगोष्ठी में हमारे दो प्रिय कवि मंगलेश डबराल और विष्णु नागर हाजिर थे।सक्रिय लेखक कार्यकर्ता आशुतोष भी वहां थे।इसके अलावा वैकल्पिक मीडिया में सबसे जुझारु और सक्रिय हमारे दो साथी अमलेंदु और अभिषेक भी वक्ताओं में थे।कविता सोलह मई के संयोजक और बेहतरीन समकालीन कवि रंजील वर्मा भी वहां थे।


    कविता जी और हमारे दूसरे प्रतिबद्ध साथी मुझे माफ करें,इस गोष्ठी में दिल्ली में बसे संस्कृतिकर्मियों की जिस भागेदारी की मुझे उम्मीद थी,वह दिखी नहीं।राजनैतिक और वैचारिक वक्तव्यों से भी मुझे दिशा निकलती दीख नहीं रही है।


    हमने सुबह सुबह अमलेंदु को फोन लगाया कि गोष्ठी में क्या कुछ हुआ और कुल कितने लोग और कौन लोग शामिल थे।उनसे आगे की योजनाओं पर चर्चा हुई और अपने मोर्चे को और संगठित और व्यापक बनाने पर लंबी चर्चा के साथ हस्तक्षेप को जारी रखने की फौरी चुनौती पर भी बात हुई।


    मुझे भारी निराशा है कि हम कारपोरेट मुक्तबाजारी फासीवाद के खिलाफ  इस लड़ाई के दायरे में पुराने परिचित और आत्मीय चेहरों को ही देख पा रहे हैं।


    हम तो हस्तक्षेप की टीम का भी विस्तार चाहते हैं और चाहते हैं कि आर्थिक मुद्दों को हम बेहतर तरीके से संबोधित कर सकें।


    संसाधनों और मदद का हाल यह है कि सिर्फ आर्थिक सूचनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में बतौर समाचार लगाते रहने का उपाय नहीं है और एजंसियों की सेवा लेने के पैसे नहीं हैं।जबकि आर्थिक सूचनाएं वस्तुगत ढंग से तुरंत जारी किये बिना,लगों को सचेत किये बिना हम दरअसल कुछ भी नहीं कर सकते हैं।


    हम कारपोरेट पत्रकार हैं नहीं और न हम कारपोरेट संस्कृतिकर्मी हैं।दरअसल हम पर अपने पिता और बहुजनों के पुरखों की विरासत का दबाव है कि हमें हर हाल में सीने पर जख्म खाकर भी पीठ दिखाना नहीं है और लड़ते जाना है।यह गांव बसंतीपुर के वजूद का मामला भी है जो हम पीछे हट नहीं सकते।वरना हालात यह है कि हम जिंदा रहने लायक भी नहीं हैं।


    हमारे बच्चे अगर इस विरासत के प्रति तनिकों गंभीर होते या कमसकम आतमनिर्भर होते तो हम मदद की गुहार भी न लगाते।हमारी मजबूरी समझें।हम बहुजनों के संसाधनों की लूटभी रोक नहीं सके हैं और न उनको जनमोर्चा का हिस्सा बना सके हैं,इससे हम इतने असहाय हैं।वरना पेशेवर दक्षता तो इतनी कम से कम है कि वैकल्पिक मीडिया का कम से कम एक तोपखाना जारी रखें।


    जेएनयू जामिया मिलिया में हमारे जो प्रतिबद्ध आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं और जो सचमुच कारपोरेटमुक्त बाजारी फासीवाद के खिलाफ देशबर में किसी न किसी स्तर पर सक्रिय हैं और आर्थिक मुद्दों को संबोधित कर सकते हैं,वे लगातार लिखें तो हम यह बहस चला सकते हैं।


    हस्तक्षेप को जारी रखने के लिए मित्रों से सहयोग और सक्रिय पहल की जरुरत है क्योंकि अगर हम यह मोर्चा जारी रख सकें तो सूचनाओं को बेनकाब करने का काम चलेगा।


    चूंकि आज कांशीराम जी का जन्मदिन भी है तो मैं शुरु से ही यह बताना चाहता हूं कि मुक्तबाजारी फासीवाद की निरंकुश कामयाबी के पीछे बहुजनों का भगवाकरण है और इसे हम समझने से इंकार कर रहे हैं।


    इसे समझे बिना और इसकी तोड़ निकाले बिना फासीवाद के खिलाफ लड़ाई हवा में लाठियां भांजने के सिवाय कुछ भी नहीं हैं,हमें ऐसा लिखना पड़ रहा है और इसके लिए हमारे प्रतिबद्ध और समझदार साथी हमें माफ करें।


    फासीवाद का तिलिस्म अगर बहुजनों की धर्मोन्मादी पैदल सेना बन जाने से तामीर हो पााया है तो इस तिलिस्म के खिलाफ बहुजनों को लामबंद किये बिना सिर्फ वैचारिक और बौद्धिक सक्रियता से हम कारपोरेट केसरिया फासीवाद का जमीन पर हर्गिज मुकाबला कर नहीं सकते।


    अन्वेषा की संगोष्ठी के आयोजकों की वैचारिक राजनीतिक आर्थिक समझ का मैं हमेशा कायल रहा हूं।वे लोग हमसे कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध हैं और सक्रिय भी हैं,लेकिन वे लोग कुल मिलाकर कितने लोग हैं।


    फिरभी मुझे कहना ही होगा कि जिस मेहनकश सर्वहारा की बात हम लोग करते हैं,जिस वर्गीय ध्रूवीकरण के तहत गोलबंदी के जरिये हम राज्यतंत्र में बदलाव का मंसूबा बांधते हैं,उनके सामाजिक आधार और मौजूदा अवस्थान को समझे बिना हमारी लड़ाई शुरु ही नहीं सकती।


    फासीवाद,सम्राज्यवाद,उत्पादन संबंधों,आर्थिक मुद्दों ,राजनीतिक और वैचारिक मुद्दों पर हमारे कामरेड शुरु से गजब के जानकार रहे हैं। लेकिन रिजल्ट फिरभी सिफर क्यों है,यह हमारी परेशानी का सबब है।


    हम संसदीय वामपंथ की बात नहीं कर रहे हैं,बदलाव की लड़ाई में जो सबसे प्रतिबद्ध और ईमानदार लोग हैं,उनकी बात कर रहे हैं।


    वैचारिक और राजनीतिक बहस के अलावा हरित क्रांति की शुरुआत और किसानों के जनविद्रोह के जमाने से लेकर अबतक फासिस्ट ताकतें लगातार मजबूत होती रही मेहनतकश सर्वहारा वर्ग के भगवेकरण की कामयाब राजनीति और रणनीति के तहत और उनके धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के मुकाबले हम अभी लड़ाई की पहल भी नहीं कर सकें।


    तो इसका सीधे सीधे मतलब है कि हमने न जनता के बीच जाने की तकलीफें उठायी हैं और जनता से सीखने की कोशिश की है।अप्रिय सत्य कहने के लिए माफ जरुर करें।


    जनता के मौजूदा संकट.उसके खिलाफ नरसंहारी कारपोरेट फासीवादी अश्वमेध,उसकी बेदखली और उत्पदान प्रणाली ,संसाधनों और अर्थव्यवस्था से उसके निष्कासन का जिम्मेदार जनता को बताकर हम बौद्धिक लोग लेकिन अपनी हैसियत खो देने को कोई जोखिम उठा नहीं रहे हैं और फासीवाद हर किसी को शहीद भी नहीं बनाता।


    हम महज जनता को शिक्षित करने का अहंकार जीते रहे हैं।


    वातानुकूलित बंद सभागृहों से हम फासीवाद के खिलाफ लड़ ही नहीं सकते।


    जो मीडिया का कारपोरेट तंत्र है,वहां फासीवाद के खिलाफ राजनीतिक और वैचारिक सोच को संप्रेषित करने के रास्ते बंद है।


    इसीलिए हम हस्तक्षेप,समकालीन तीसरी दुनिया,समयांतर और वैकल्पिक मीडिया के तमाम मंचों को जीवित रखने के लिए जनहिस्सेदारी की बात बार बार कर रहे हैं।


    हमारे प्रतिबद्ध लोग चाहे कितने समझदार और परिपक्व है,यह सिरे से बेमायने हैं अगर हम फासीवादी तिलिस्म में फंसे बहुसंख्य बहुजन मेहनतकश सर्वहारा वर्ग के वर्गीय ध्रूवीकरण की कोई सही और कारगर रणनीति बनाकर उसे जमीन पर अमली जामा पहनाने की कोशिश नहीं करते और कार्पोरेट केसरिया मुक्तबाजारी धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण से तोड़कर मेहनतकश तबके को मुक्तिकामी सर्वहारा वर्ग में तब्दील नहीं कर सकते।


    कल भी हमने लिखा है कि जो बहुजन पैदल सेनाएं हैं और उनके किसिम किसिम के रंगबाज सिपाहसालार हिंदुत्व के बजरंगी है,उन्हें मालूम ही नहीं है कि जिस विधर्मी अल्पसंख्यक भारत के खिलाफ धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण फासिस्ट हिंदू साम्राजवाद के कारपोरेट ग्लोबल हिंदुत्व की पूंजी है,वह तबका उनका अपना खून है और उनसे कमसकम बहुजनों और मेहनतकशों का कोई वैमनस्य नहीं है।


    धर्मांतरित बहुसंख्य लोग कृषि समुदायों की अछूत अंत्यज जातियां रही हैं और हिंदुत्व की जातिव्यवस्था जिनके लिए नर्क है।वे सारे लोग बहुजनसमाज के ही लोग हैं।उनका हमारा खून एकचआहे।


    यह नर्क कितनी भयंकर है ,उसे समझने के लिए बाबासाहेब के बौद्धमयभारत बनाने के महासंकल्प से पहले दिये गये वक्तव्यको उसकी पूरी बावना के साथ समझना बेहद जरुरी है।


    बाबासाहेब ने कहा था,मैं हिंदू होकर जनमा हूं,लेकिन मैं हिंदू रहकर मरुंगा नहीं।


    बाबासाहेब का यह वक्तव्य भारत का वर्गीय सामाजिक यथार्थ है,जिसे समझने से हम अब भी इंकार कर रहे हैं।


    इसी सिलसिले में यह ध्यान दिलाना बेहद जरुरी है कि भारत में तमाम आदिवासी और किसान विद्रोहों में बहुजन नायकों की भूमिका निर्णायक रही है,जो साम्राज्यवाद और सामंतवाद के खिलाफ बहुजन समाज की लामबंदी से संभव हुए।


    हम अपनी क्रांति के बौद्धिक उत्सव में इतिहास की उस निरंतरता को बनाये रखने में इसलिए भी नाकाम रहे कि बहुजनों के वर्गीय ध्रूवीकरण के लिए जिन सामाजिक यथार्थों से हमें टकराने की दरकार थी,हम उससे टकराने से बचते रहे हैं।


    कांशीराम जी ने बहुजनों के लिए सत्ता में भागीदारी का रास्ता तैयार किया है,इसके लिए हम उन्हें महान नहीं मानते हैं क्योंकि सत्ता या सत्ता की चाबी से हमें कुछ लेना देना नहीं है।


    फासिस्ट कारपोरेट सत्ता में हिस्सेदारी तो सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों को मजबूत करने का ही काम है।


    बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर ने कभी जाति अस्मिता की बात की हो या जाति अस्मिता के आधार पर समता और सामाजिक न्याय की बात की हो,हमें नहीं मालूम। वे शुरु से आखिर तक डीप्रेस्ड क्लास की बात कर रहे थे।


    बाबासाहेब के राजनीति और आर्थिक विचारों को लेकर विवाद हो सकते हैं,उनके रचे संविधान की भी आलोचना कर सकते हैं,लेकिन डीप्रेस्ट क्लास के अंबेडकरी सामाजिक यथार्थ को नजरअंदाज करके और अंबेडकरी जाति उन्मूलन के एजंडा के आधार पर बहुजनों को अस्मिता मुक्त जाति मुक्त मुक्तकामी मेहनतकश सर्वहारा वर्ग में तब्दील करने की राजनैतिक वैचारिक चुनौती का हम कितना निर्वाह कर पाये,इसकी समीक्षा भी अनिवार्य है।


    कांसीराम के मुकाबले बाबासाहेब का कद और योगदान को किसी भी स्तर पर रखा नहीं जा सकता। लेकिन यह ऐतिहासिक सच है कि भारते के डीप्रेस्ड क्लास को बाबासाहेब किसी भी स्तर पर संगठित नहीं कर पाये।विचारक और मनीषी बाबासाहेब बहुत बड़े हैं,लेकिन बतौर संगठक उनका कृतित्व बेहद कम है।


    इसे मानने में किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए कि कांशीराम जी ने अपनी सांगठनिक दक्षता से बहुजनसमाज को आकार ही नहीं दिया ,उसे संगठित करके राजनीतिक अंजाम तक भी पहुंचाया।


    बामसेफ का गटन ही बहुत बड़ा क्रांतिकारी काम रहा है।लेकिन बामसेफ आखिरकार धनवसूली ,मसीहा पैदा करने वाली मशीन और सामाजिक जनजागरण के बजाय विशुद्ध घृणा अभियान में जो तब्दील हुआ,उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कि बामसेफ में फिर दूसरा कोई कांसीराम नहीं हुआ।


    बामसेफ के तहत गोलबंद बहुजनों की ताकत और संभावनाओं को,जाति अस्मिता को वर्गीय ध्रूवीकरण  में बदलने और सवर्णों के खिलाफ अंध घृणा के बजाय उसे सामंती और साम्राज्यवादी सत्ता वर्चस्व के खिलाफ खड़ा कर पाने की चुनौती हम मंजूर नहीं कर सकें।


    बामसेफ को बहुजनों के जल जंगल जमीन नागरिकता आजीविका के हक हकूक की लड़ाई का मोर्चा हम बना नहीं सकें और आर्थिक मुद्दों पर बहस हम तेज कर सकें और बहुजनों की आंखें खोलकर उन्हें फासिस्ट कारपेरट वर्ण वर्चस्व के मनुस्मृति राज का असली चेहरा दिखा पाये हैं।


    इसके लिए बामसेफ के लोग उतने जिम्मेदार नहीं हैं जितने कि बामसेफ के बाहर तमाशबीन जमीन से कटे वैचारिक और प्रतिबद्ध समूह।उन्होंने बहुजनों को संबोधित करने की कोई कोशिश ही नहीं की और जाति वर्चस्व के तहत वे बहुजनों से अस्पृश्यता का रंगभेदी अमानविकआचरण करते हुए सिर्फ अपनी मेधा और बौद्धिकता,अपनी कुलीनता का ढोल बजाने का काम करते रहे।यही उनकी राजनीति है,जिसका सामाजिक यथार्थ से कोई वास्ता नहीं है।


    बहरहाल,जिस जाति की वजह से बहुजनों की नर्कदशा है,बामसेफ उसी जाति को मजबूत करता रहा और जाति वर्चस्व और जाति संघर्ष के जरिये मान्यवर कांशीराम का बहुजन समाज बिखरता रहा।


    अछूतों की राजनीतिक गोलबंदी को चूंकि वैचारिक औरक बौद्धिक लोगों ने समझने की कोशिश ही नहीं की तो बहुजनों से संवाद के हालात कभी बने नहीं हैं।


    बेहद निर्मम है यह सामाजिक यथार्थ कि भारत में बहुजन, अल्पसंख्यक और अछूत सिर्फ वर्णवर्चस्वी मनुस्मृति रंगभेदी सवर्ण हेजेमनी का वोट बैंक है।


    और यही लोकतंत्र है जिसका फासीवादी कायाकल्प इस मसामाजिक यथार्थ की तार्किक परिणति है क्योंकि इस लोकतंत्र में बहुजनों,अल्पसंख्यकों और अछूतों का,महिलाओं का भी कोई हिस्सा नहीं है।


    इसके विपरीत फासिस्ट कारपोरेट संघ परिवार ने इस पूरी बहुजन कवायद को न सिर्फ समझा है बल्कि उसे सिरे से आत्मसात करके महाबलि बनकर खड़ा है और हम चुनिंदे लोग फासीवाद के खिलाफ चीख चिल्ला रहे हैं जबकि बहुजन समाज के आकार में जो सर्वहारा वर्ग है,वह केसरिया केसरिया कमल कमल है।



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    Has Modi Raj  launched a PPP project to make entire India a big Gujarat?Church vandalised and Cross replaced with the Idol of Hanuman!
    Palash Biswas

    Back to back Nadia Gangrape with 72 years old Mother Superior in a missionary school in Nadia District of West Bengal,Cent pecent Hindutva Campaign shows its real color in Dalit Dominated Haryana,Where in accordance with media reports.An under-construction church in Kaimri village near Hissar was vandalised by a group and the cross replaced with an idol of Hanuman, triggering tension.Mind you,Hryana is ruled by RSS now.
    In Bengal,the protest continues amidst swift administrative action as eight persons have been nabbed.

    Father Subhash Chand of Williwarsh church lodged a complaint against 14 people, following which a case was registered by police under sections 147 (Punishment for rioting), 153A (promoting enmity between groups), 295 (destroying, damaging a place of worship with intent to insult the religion of any class of persons), 380 (theft in a building), 506 (criminal intimidation) of IPC.

    The complainant stated that the accused fragmented the cross and installed the statue of Hanuman and a flag depicting Lord Ram and threatened to kill him.

    He alleged that they stole a cooler and some items from the worship place that was under construction.

    Hisar range Deputy Inspector General (DIG) Saurabh Singh said that the situation was under control.

    Meanwhile, Christian Front Haryana has condemned the incident and has demanded immediate arrest of the accused, all residents of Kaimri.

    What is happening around?
    RSS declared very proudly that it has to accomplish  the Ram Mandir agenda.Ministers and Members of Parliament are indulged in fireworks with most intense hate campaign against all non Hindus.
    RSS has already declared its timeline to make India free of Islam and Christiantywithin 2021.Meanwhile attacks against churches intensified countrywide including the Capital of India,New Delhi.
    RSS claims that every India is essentially a Hidnu.
    It justifies the agenda of cent percent Hindutva.But the question remains unanswered if every Inidian is Hindu,what should be the citizenship status on Non Hindu citizens in India,including the current status of Non Hindus working as RSS men and Women.

    But the question remains unanswered if every Inidian is Hindu,why a mass conversion campaign is launched.
    No body would answer.
    The business friendly government of India seems to have specific apathy against non Hindus and seems to be in no mood to behave Rajdharma as we earlier saw in Gujarat Genocide case during Atal Raj.
    Has Modi Raj  launched a PPP project to make entire India a big Gujarat?

     

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    ਇਕ ਅਬਲਾ ਦੀ ਦਰਦ ਭਰੀ ਪੁਕਾਰ ?

    http://www.thekhalsa.org/frame.php?path=356&article=7555

    ਇਕ ਅਬਲਾ ਦੀ ਦਰਦ ਭਰੀ ਪੁਕਾਰ ?
    ਮਾਨਯੋਗ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਪੁਲਿਸ ਲੁਧਿਆਣਾ ਵੱਲੋਂ ਗਠਿਤ ਮਾਨਯੋਗ ਡੀ .ਸੀ. ਪੀ ਲੁਧਿਆਣਾ ਦੀ ਨਿਗਰਾਨੀ ਹੇਠ ਮਾਨਯੋਗ ਏ.ਡੀ.ਸੀ .ਪੀ ਕਰਾਇਮ , ਏ .ਸੀ.ਪੀ . ਟਰੈਫਿਕ ਅਤੇ ਏ.ਸੀ.ਪੀ . ਆਤਮ ਨਗਰ ਲੁਧਿਆਣਾ ਦੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਟੀਮ ਜਿਲ੍ਹਾ ਲੁਧਿਆਣਾ ।
    ਸਬੰਧੀ: ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਆਨ ਲਾਈਨ ਨੰ: 181 ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨੰ: LDH -CT- 516998 ਮਿਤੀ 2 0 ਜਨਵਰੀ 2 01 5  ਸਮਾਂ10-51 : ਸ਼ਾਮ (ਰਾਤ) ਵਿਰੁੱਧ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਪੁੱਤਰ ਸ. ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ , MD,ਫਾਸਟਵੇਅ ਟਰਾਂਸਮਿਸ਼ਨ ਲਿਮਟਿਡ ਵਾਸੀ 5 7  ਬੀ ਰਾਜਗੁਰੂ ਨਗਰ ,ਲੁਧਿਆਣਾ 
    ਨੋਟਸ: ਪਰਵਾਨਾ ਮਿਤੀ 6 ਮਾਰਚ 2 01 5 , 1: 53: 09  PM (IST)ਦੇ ਜਵਾਬ ਵਿਚ ਬਿਆਨ ਵੱਲੋਂ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਕਮਲਜੀਤ ਕੌਰ ਪੁੱਤਰੀ ਸ. ਬਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਸੂਚ, ਵਾਸੀ 119 - ਏ ,ਮਾਡਲ ਟਾਊਨ ਐਕਸਟੈਨਸ਼ਨ, ਲੁਧਿਆਣਾ ਉਪਰੋਕਤ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਆਨ ਲਾਈਨ ਨੰ: 181ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨੰ: LDH -CT  - 516998 ਮਿਤੀ 2 0 ਜਨਵਰੀ 2 01 5  ਸਮਾਂ10-51 ਸ਼ਾਮ (ਰਾਤ) ਅਤੇ ਬਿਆਨ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਦੀ ਲੜੀ ਵਿਚ ਨੋਟਸ ਦੇ ਜਵਾਬ ਵਿਚ ਬਿਆਨ ।
    ਸ੍ਰੀਮਾਨ ਜੀ ,
    ਬਿਆਨਕਰਤਾ ਕਮਲਜੀਤ ਕੌਰ ਪੁੱਤਰੀ ਸ. ਬਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਸੂਚ, 119 - ਏ ,ਮਾਡਲ ਟਾਊਨ ਐਕਸਟੈਨਸ਼ਨ, ਲੁਧਿਆਣਾ ਹੇਠ ਲਿਖਤ ਬਿਆਨ ਕਰਦੀ ਇਨਸਾਫ਼ ਦੀ ਪੁਕਾਰ ਕਰਦੀ ਹੈ :
    2. ਇਹ ਕਿ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਕਰਤਾ ਨੂੰ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨੰ: : 181 ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨੰ: LDH –CT- 516998 ਮਿਤੀ 2 0 ਜਨਵਰੀ 2 01 5  ਸਮਾਂ10-51 ਸ਼ਾਮ (ਰਾਤ) ਦੇ ਸਬੰਧ ਵਿਚ ਮਿਤੀ 29 ਜਨਵਰੀ  2 01 5  , 07-42 PM ਨੂੰ ਟੈਲੀਫੋਨ ਨੰ: 0172-6672300 (ਪੰਜਾਬ ਪੁਲਿਸ ਹੈਲਪ ਲਾਈਨ,ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ) ਤੋਂ ਹਦਾਇਤ ਹੋਈ ਕਿ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਕਰਤਾ ਮਾਨਯੋਗ ਕਮਿਸਨਰ ਪੁਲਿਸ, ਲੁਧਿਆਣਾ ਨਾਲ ਸੰਪਰਕ ਕਰੇ ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਕਰਤਾ ਨੇ ਬਿਨਾਂ ਦੇਰੀ ਕੀਤਿਆਂ ਮਾਨਯੋਗ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਪੁਲਿਸ , ਲੁਧਿਆਣਾ ਨਾਲ ਮੋਬਾਈਲ ਰਾਹੀਂ ਸੰਪਰਕ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ   ਅੱਗੋਂ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਕਰਤਾ ਨੂੰ 02-02-2015 ਨੂੰ ਸਵੇਰੇ 11.30 ਵਜੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਸਬੰਧੀ ਮਿਲਣ ਦੀ ਹਦਾਇਤ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਉਹ ਦਿੱਤੇ ਹੁਕਮ ਅਨੁਸਾਰ ਆਪਣੀ ਮਾਤਾ ਨਾਲ ਦਿੱਤੇ ਸਮੇਂ ਮੁਤਾਬਿਕ ਮਿਲੀ ।
    3. ਇਹ ਕਿ ਮਾਨਯੋਗ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਪੁਲਿਸ ਲੁਧਿਆਣਾ ਨੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਨੂੰ ਬੜੀ ਹਮਦਰਦੀ ਨਾਲ ਸੁਣਿਆ ਅਤੇ ਸੁਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਇਨਸਾਫ਼ ਦੇਣ ਦਾ ਭਰੋਸਾ ਦਿਵਾਇਆ ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੀ ਹਾਲਤ ਖਰਾਬ ਦੇਖਦਿਆਂ , ਉਸਨੂੰ ਕੁਝ ਦਿਨਾਂ ਬਾਅਦ ਆਪਣਾ ਬਿਆਨ ਦਰਜ ਕਰਾਉਣ ਲਈ   ਕਿਹਾ ਅਤੇ ਫਿਰ ਦਰਖ਼ਾਸਤਕਾਰ ਨੇ ਆਪਣੇ ਅੰਗਰਜ਼ੀ ਵਿਚ ਹੱਥ ਲਿਖ਼ਤ ਬਿਆਨ ਜੋ ਚਾਰ ਸਫ਼ਿਆਂ ਵਿਚ ਹਨ ਸਪੀਡ ਪੋਸਟ ਰਸੀਦ ਨੰ: EP255725353IN ਰਾਹੀਂ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਸਮਾਂ 12:31 ਨੂੰ ਭੇਜੀ ਅਤੇ ਨਾਲ ਹੀ ਇਹੀ ਬਿਆਨ ਈ.ਮੇਲ ਰਾਹੀਂ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਸਮਾਂ 01:40 PM ਮਾਨਯੋਗ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਪੁਲਿਸ ਲੁਧਿਆਣਾ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਦਫ਼ਤਰੀ ਈ.ਮੇਲ ਤੇ ਭੇਜ ਦਿੱਤੇ ।
    4. ਇਹ ਕਿ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਪਿਤਾ ਨੇ ਉੱਚਕੋਟੀ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਅਤੇ ਹੋਰਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਧੀ
    ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦਾ ਦਰਦ ਭਰਿਆ ਉਪਰੋਕਤ ਬਿਆਨ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ ਤਾਂ ਪੁਲਿਸ ਹਰਕਤ ਵਿਚ ਆਈ ਅਤੇ ਫਿਰ ਏ.ਸੀ.ਪੀ ਟਰੈਫਿਕ ਰਿਚਾ ਅਗਨੀਹੋਤਰੀ ਨੇ  ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਨੂੰ ਟੈਲੀਫੋਨ ਰਾਹੀਂ 11-02-2015  ਸਮਾਂ 11:27 AM ਨੂੰ ਉਸੇ ਦਿਨ ਸ਼ਾਮ ਦੇ ਦੋ ਵਜੇ ਆਪਣੀ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਦੇ ਸਬੰਧ ਵਿਚ ਆਉਣ ਲਈ ਹੁਕਮ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਹੁਕਮ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦੀ ਪਾਲਣਾ ਕਰਦੇ ਹੋਏ , ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਆਪਣੀ ਮਾਤਾ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕਹਿਣ ਅਨੁਸਾਰ ਪੁਲਿਸ ਲਾਈਨ ਲੁਧਿਆਣਾ ਪਹੁੰਚੀ ਜਿੱਥੇ ਉਹ ਕਰਾਇਮ ਬਰਾਂਚ ਏ.ਡੀ.ਸੀ.ਪੀ ਮੁਖਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਭੁੱਲਰ ਸਮੇਤ ਹਾਜ਼ਰ ਸੀ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਬਿਆਨ ਲਿਖਣੇ ਹਨ ਅਤੇ ਮੈਂ (ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ) ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਉਸਦੇ ਬਿਆਨ ਜੋ ਉਸਨੇ ਬਿਆਨ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਵਿਚ ਚਾਰ ਸਫ਼ਿਆਂ ਦੇ ਬਿਆਨ ਭੇਜੇ ਹਨ ਉਹੀ ਬਿਆਨ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਅੱਜ ਵੀ ਹਨ ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ (ਏ.ਸੀ.ਪੀ ਟਰੈਫਿਕ ਰਿਚਾ ਅਗਨੀਹੋਤਰੀ ਏ.ਡੀ.ਸੀ.ਪੀ ਮੁਖਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਭੁੱਲਰ) ਨੇ ਇਹ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦਾ ਇੱਕ ਲਾਈਨ ਦਾ ਬਿਆਨ ਲਿਖਣਾ ਮਨਜ਼ੂਰ ਨਾ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਇਤਨਾ ਕਹਿ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਤੁਹਾਨੂੰ ਫਿਰ ਬੁਲਾਵਾਂਗੇ ।
    5. ਇਹ ਕਿ ਮੁੜ ਬੁਲਾਉਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਮਾਨਯੋਗ ਉੱਪ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ , ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਪਿਤਾ ਨੂੰ ਈ.ਮੇਲ ਆ ਗਈ ਕਿ ਬਿਆਨ ਮਿਤੀ 07-02-2015 'ਤੇ ਗੌਰ ਕਰਦਿਆਂ ਜ਼ਰੂਰੀ ਕਾਰਵਾਈ ਲਈ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਮਾਨਯੋਗ ਏ.ਡੀ.ਜੀ.ਪੀ . ਲਾਅ ਅਤੇ ਆਡਰ, ਪਰਸਨਲ, ਪਾਸ ਭੇਜ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ।ਇਹ ਈ.ਮੇਲ ਮਿਤੀ 12 -02-2015  ਸਮਾਂ 2:33 PM ਨੂੰ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਨੂੰ ਮਿਲੀ ।ਪਰ ਇਸ 'ਤੇ ਵੀ ਕਈ ਦਿਨ ਬੀਤ ਜਾਣ ਬਾਅਦ ਕੋਈ  ਅਮਲ ਨਾ ਹੋਇਆ ਫਿਰ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਪਿਤਾ ਨੇ ਮਿਤੀ 19-02-2015 ਨੂੰ ਇਸ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਦੀ ਮੁੜ ਯਾਦ ਕਰਾਉਣ ਲਈ ਈ.ਮੇਲ ਭੇਜੀ ।ਇਸ ਉਤੇ ਮਾਨਯੋਗ ਏ.ਸੀ.ਪੀ ਟਰੈਫਿਕ ਰਿਚਾ ਅਗਨੀਹੋਤਰੀ ਕਿਸੇ ਦਬਾਅ ਜਾਂ ਮਜ਼ਬੂਰੀ ਅਧੀਨ ਖ਼ਫਾ ਹੋ ਗਈ ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਨੂੰ ਮਿਤੀ 20-02-2015  ਸਮਾਂ 3:38 PM ਮਾਨਯੋਗ ਏ.ਸੀ.ਪੀ ਟਰੈਫਿਕ ਰਿਚਾ ਅਗਨੀਹੋਤਰੀ ਨੇ  ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਨੂੰ ਟੈਲੀਫੋਨ ਰਾਹੀਂ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤੀ ਕਿ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਨੂੰ ਕਹੋ ਕਿ ਉਹ ਈ.ਮੇਲ ਵਗੈਰਾ ਕਰਨੀ ਬੰਦ ਕਰਨ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਸਿੱਟੇ ਮਾੜੇ ਨਿਕਲਣਗੇ।
    ਇਸ ਤੋਂ ਸਾਫ਼ ਨਜ਼ਰ ਆ ਰਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਦੇ ਦਬਾਅ ਅਤੇ ਸਿਆਸੀ ਅਸਰ ਕਾਰਣ ਹੁਣ ਲੁਧਿਆਣਾ ਪੁਲਿਸ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਪਿਤਾ ਨੂੰ ਬਲੀ ਦਾ ਬੱਕਰਾ ਬਣਾਕੇ ਉਕਤ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੀ ਕੀਤੀ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨੂੰ ਖੁਰਦ ਬੁਰਦ ਕਰ ਦੇਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਸੀ ਅਤੇ ਅਜੇ ਵੀ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਪਿਛੋਕੜ 'ਚ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਬਿਮਾਰ ਮਾਤਾ ਪਿਤਾ ਨੂੰ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਅਤੇ ਸੁਣਵਾਈ ਤੋਂ ਕੰਨੀ ਕਤਰਾਉਂਦੇ ਆ ਰਹੇ ਹਨ ਕਿ ਇਨਸਾਫ਼ ਮਿਲੂ ਜਾਂ ਨਹੀਂ ਮਿਲੂ ।
    6. ਇਹ ਕਿ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਬਣੇ ਹਾਲਾਤ ਕਾਰਨ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਲੁਕਛੁਪ ਕੇ ਆਪਣਾ ਬਚਾ ਕਰਦਿਆਂ 20-02-2015 ਤੋਂ ਹੀ ਮਾਨਯੋਗ ਹਾਈਕੋਰਟ ਪੰਜਾਬ ਅਤੇ ਹਰਿਆਣਾ ,ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ ਆਸਰਾ ਲੈਣਾ ਪਿਆ ਅਤੇ ਹਾਈਕੋਰਟ ਸਾਹਮਣੇ ਬੀਤ ਰਹੇ ਦੁਖਾਂਤ ਦੀ ਕਹਾਣੀ ਆਪਣੇ ਵਕੀਲ ਸਾਹਿਬ ਸ੍ਰੀ ਰਾਜਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਬੈਂਸ ਰਾਹੀਂ ਜਾ ਲਿਖ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੀ ।ਇਹ ਸਾਰੇ ਦਸਤਾਵੇਜਾਂ ਅਤੇ ਪਟੀਸ਼ਨ ਦੀ ਖ਼ੁਦ-ਆਪ ਤਸਦੀਕਸ਼ੁਦਾ ਫੋਟੋਸਟੇਟ ਕਾਪੀਆਂ ਨਾਲ ਵੇਰਵੇ ਸਹਿਤ ਨਾਲ ਨੱਥੀ ਹਨ ।
    7. ਇਹ ਕਿ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੀ ਸਰੀਰਕ ਤੇ ਮਾਨਸਿਕ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ ਪਿਛਲੇ ਕਾਫ਼ੀ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਉਸ ਦੇ ਬਰਖਿਲਾਫ਼ ਬਣਾਏ ਹਾਲਾਤ ਕਾਰਨ ਵੱਧਦੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਚੱਲੇ ਆ ਰਹੇ ਬਿਮਾਰ ਮਾਤਾ -ਪਿਤਾ ਦੀ ਦਾਸਤਾਂ ਹੋਰ ਵੀ ਤਰਸਯੋਗ ਹੈ ਜਿਸ ਸਬੰਧੀ ਡਾਕਟਰੀ ਰਿਪੋਰਟਾ ਨਾਲ ਨੱਥੀ ਹਨ ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਝੱਲ ਰਹੇ ਕਸਟ ਦੀ ਮੂੰਹ ਬੋਲਦੀ ਤਸਵੀਰ ਹਨ । ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਮਾਤਾ-ਪਿਤਾ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਚੁਪ ਕਰਵਾ ਦਿੰਦਾ ਸੀ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਸਾਡੇ ਰਿਸ਼ਤੇ ਵਿਚ ਦਖ਼ਲ ਨਹੀਂ ਦੇਣਾ ਅਤੇ ਮੈਂ ਬੱਚਾ ਨਹੀਂ ਹੋਣ ਦੇਣਾ ,ਮੈਨੂੰ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਹੈ ਅਤੇ ਕਮਲ (ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ) ਨੂੰ ਇਸੇ ਪ੍ਰਕਾਰ ਹੀ ਮੇਰੇ (ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ )ਨਾਲ ਮਾੜੇ ਚੰਗੇ ਦਿਨ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਹੀ ਗੁਜ਼ਾਰਨੇ ਪੈਣਗੇ ਅਤੇ ਮੈਂ ਇਸ ਨਾਲ ਬਤੌਰ ਪਤੀ-ਪਤਨੀ ਸਮਾਜ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਚਲ ਸਕਦਾ ।
    8. ਇਹ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਮਿਤੀ 02-02-2015  ਦੇ ਬਿਆਨਾਂ ਵਿਚ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਨੇ ਉਸ ਨਾਲ  ਉਪਰੋਕਤ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਵੱਲੋਂ ਧੱਕਾ ਵਰਤਦੇ ਹੋਏ ,ਉਸਦੇ ਗਰਭਪਾਤ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਕਰਵਾਏ ਜੋ ਲਗਭੱਗ ਜੁਲਾਈ –ਅਗਸਤ 2009,ਅਕਤੂਬਰ 2009, 9 ਦਸੰਬਰ 2009 , ਅਕਤੂਬਰ2010, 4 ਨਵੰਬਰ 2011, ਇਹ ਲੋਕਲ ਹਸਪਤਾਲਾਂ ਲੁਧਿਆਣਾ ਵਿਚ ਹੋਏ ਜਿੰਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਵੇਰਵਾ ਮੇਰੇ ਉਪਰੋਕਤ ਬਿਆਨਾਂ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਵਿਚ ਦਰਜ ਹਨ ਅਤੇ ਇਹ ਬਿਆਨ ਮੇਰੇ ਖ਼ੁਦ-ਆਪ (ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ) ਤਸਦੀਕਸ਼ੁਦਾ ਨਾਲ ਨੱਥੀ ਹਨ ।ਗਰਭਪਾਤ ਸਬੰਧੀ ਹੋਏ ਇਲਾਜ ਤੇ ਕਾਰਵਾਈ ਵਾਰੇ ਡਾਕਟਰੀ ਰਸੀਦਾਂ ਮਿਤੀ 11.10.2011, 04.11.2011 ਅਤੇ  17.11.2011  ਦੀਆਂ ਖ਼ੁਦ-ਆਪ ਕੀਤੀਆਂ ਤਸਦੀਕਸ਼ੁਦਾ ਕਾਪੀਆਂ ਨਾਲ ਨੱਥੀ ਹਨ ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਦੱਸੇ ਹਸਪਤਾਲਾਂ ਤੋਂ ਹੋਰ ਵੇਰਵੇ ਆਪ ਜੀ ਵੱਲੋਂ ਇੱਕਠੇ ਕਰਨੇ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਨਹੀਂ ਹਨ ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਹਸਪਤਾਲਾਂ ਦੇ ਬਣੇ ਰਿਕਾਰਡ ਅਨੁਸਾਰ ਹਨ ਜਿਸਨੂੰ ਪੜਤਾਲ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਬਣਾਇਆ ਜਾਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਇਹ ਵਰਣਨਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਜਦੋਂ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਨੇ ਫਾਸਟਵੇਅ ਟਰਾਂਸਮਿਸ਼ਨ ਲਿਮਟਿਡ ਵਿਚ ਬਤੌਰ ਮੈਨੇਜ਼ਰ HR & legal ਨੌਕਰੀ ਜੂਨ 2009 ਤੋਂ ਅਗਸਤ 2010 ਤੱਕ ਕੀਤੀ ਤਾਂ ਉਸ ਵੇਲੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਛੁੱਟੀ ਜਾਣ ਦਾ ਕਾਰਨ ਵੀ ਉਸਦੇ ਗਰਭਪਾਤ ਦੀ ਪੀੜਾ ਦਾ ਕਾਰਨ ਸੀ ਜੋ ਰਿਕਾਰਡ ਦੇਖਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ।
    9. ਇਹ ਕਿ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦਾ ਬਤੌਰ ਪਤੀ- ਪਤਨੀ ਹੋਰ ਭਰੋਸਾ ਜਿੱਤਣ ਲਈ ਉਸ ਨਾਲ ਇਕ ਸਿਹਤ ਸੁਧਾਰ ਕੈਂਪ ਵੀ ਲਾਇਆ ਜੋ ਜਿੰਦਲ ਨੇਚਰ ਕੇਅਰ ਇੰਨਸੀਚਿਊਟ ਜੋ ਬੰਗਲੋਰ ਵਿਚ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਸਾਡੇ ਨਾਲ ਯੁਗੇਸ਼ ਦੱਤਾ ਵੀ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਅਸੀਂ ਉੱਥੇ ਕੈਂਪ ਵਿਚ ਜਾਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ 23.04.2011 ਤੋਂ 24.04.2011 ਵਿਚ ਰਹੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਤੇ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਇੱਕਠੇ ਹੋਟਲ ਮੋਨਾਰਕ ਬੰਗਲੋਰ ਕਮਰਾ ਨੰ:318 ਵਿਚ ਬਤੌਰ ਪਤੀ-ਪਤਨੀ ਰਹੇ ਅਤੇ ਮਿਸਟਰ ਯੁਗੇਸ਼ ਦੱਤਾ ਇਸੇ ਸਮੇਂ ਕਮਰਾ ਨੰ: 317 ਵਿਚ ਠਹਰਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ ਜਿਸਨੂੰ ਕਿ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਆਪਣਾ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਦੋਸਤ ਦੱਸਦਾ ਹੈ । ਅਸੀਂ ਇਸ ਜਿੰਦਲ ਨੇਚਰ ਕੇਅਰ ਇੰਨਸੀਚਿਊਟ ਵਿਚ ਰਹਿ ਕੇ 24 ਅਪ੍ਰੈਲ 2011 ਤੋਂ 1 ਮਈ 2011 ਤੱਕ ਡਾਕਟਰ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਦੀ ਦੇਖਰੇਖ ਵਿਚ ਰਹੇ ਜਿਸ ਸਬੰਧੀ ਸਭ ਸਬੂਤ ਨਾਲ ਨੱਥੀ ਹੈ ।ਇਸ ਸਬੰਧੀ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਤੇ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਇੱਕਠੀਆਂ ਫੋਟੋਆਂ ਵੀ ਨਾਲ ਨੱਥੀ ਹਨ ।
    10. ਇਹ ਕਿ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਨੂੰ ਹੋਰ ਭਰੋਸਾ ਦੇਣ ਲਈ 16 ਦਸੰਬਰ 2009  ਨੂੰ ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ ਵਿਖੇ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸ੍ਰੀ ਕਲਗੀਧਰ ਨਿਵਾਸ, ਸਬ ਆਫਿਸ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਬੰਧਕ ਕਮੇਟੀ ਸੈਕਟਰ 27,ਉਸ ਨਾਲ ਵਿਆਹ ਵੀ "ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ" ਜੀ ਦੀ ਹਾਜ਼ਰੀ ਵਿਚ ਕੀਤਾ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਉਪਰੋਕਤ ਦੱਸੇ ਪਹਿਲੇ ਬਿਆਨਾਂ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਨੂੰ ਜ਼ਿਕਰ ਕੀਤਾ ਜਾ ਚੁੱਕਾ ਹੈ ਕਿ ਸਿਆਸੀ ਸਕੱਤਰ ,ਪਰਮਜੀਤ ਸਿੱਧਵਾਂ ਜਿਸਦਾ ਇਸੇ ਉਕਤ ਕਲਗੀਧਰ ਨਿਵਾਸ ਵਿਚ ਦਫ਼ਤਰ ਵੀ ਸੀ ਦੀ ਹਾਜ਼ਰੀ ਵਿਚ ਜਿਸਨੇ ਵੱਧਚੜ੍ਹ ਕੇ ਤੇ ਹੋਰਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ ,ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦਾ ਵਿਆਹ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ।
    11. ਇਹ ਕਿ ਆਪ ਜੀ ਨੂੰ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਇਹ ਬਿਆਨਾਂ ਸਹਿਤ ਦਰਖ਼ਾਸਤ ,ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਦੇ ਉਪਰੋਕਤ ਪਹਿਲੇ ਬਿਆਨ ਜੋ ਮਿਤੀ 07-02-2015 ਨੂੰ ਭੇਜੇ ਜਾ ਚੁੱਕੇ ਹਨ ਉਸਦੇ ਹਿੱਸੇ ਵਜੋਂ ਪੜ੍ਹੇ ਜਾਣ ਤੇ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੇ ਤੱਥਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ ਉਪਰੋਕਤ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਬਰਖ਼ਿਲਾਫ ਬਣਦੀ ਕਾਨੂੰਨੀ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਦਿਆਂ ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਪਰਿਵਾਰ ਦੀ ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਪਰਿਵਾਰ ਤੋਂ ਸੁਰੱਖਿਆ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਉਦਿਆਂ ਇਨਸਾਫ਼ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ ।
    ਮਿਤੀ  10.03.2015
    ਬਿਆਨਕਰਤਾ / ਦਰਖ਼ਾਸਤਕਾਰ
    "Sikh Vichar Manch" svmanch@gmail.com 
    ……………………………………………………….
    ਟਿੱਪਣੀ :- ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤ੍ਰੀ ਦਫਤਰ ਨੂੰ ਥੋੜਾ ਸਮਾ ਕੱਢ ਕੇ ਏਧਰ ਵੀ ਧਿਆਨ ਦੇਣ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ, ਸਮਾਜ ਵਿਚ ਲਗਾਤਾਰ ਜਨਾਨੀਆਂ ਨਾਲ ਵਧੀਕੀਆਂ ਹੋ ਰਹੀਆਂ ਹਨ, ਹਰ ਰੋਜ਼ ਹੀ ਕਿਤੇ ਨਾ ਕਿਤੇ ਸਮੂਹਕ ਬਲਾਤਕਾਰ ਮਗਰੋਂ ਬਰਬਰਤਾ ਨਾਲ ਜਨਾਨੀਆਂ ਦੇ ਕਤਲ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਸਮਾਜ ਦੀ ਸੋਚ ਬਦਲਣ ਲਈ ਕੁਝ ਨਿੱਗਰ ਫੈਸਲੇ ਲੈਣ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ। 
      ਅਮਰ ਜੀਤ ਸਿੰਘ ਚੰਦੀ 
    P.S:


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    तेलतुंबड़े का कहना है,

    अस्मिता और भावना के आधार पर संगठन बनाना  आसान,

    लेकिन बाबासाहेब  इस आसान रास्ता के खिलाफ थे।

    पलाश विश्वास

    मित्रों, बेहद शर्मिदा हूं कि वायदे के मुताबिक निरंतर अबाध सूचनाओं का सिलसिला बनाये रखने में शारीरिक तौर पर फिलहाल अक्षम हूं।


    सारे दिन सोये रहने के बाद अब जाकर पीसी के मुखातिब हूं।ऐसा अमूमन रोज हो रहा है।


    आज का ताजा स्टेटस है,खूब डीहाइड्रेशन हुआ है।डाक्टर ने रोजाना तीन लीटर ओआरएस रोजाना पीने का नूस्खा दिया है।रक्तचाप तेजी से गिरता नजर आ रहा है।आज डाक्टर ने जब देखा,तब 100-60 था।बीच बीच में इससे नीचे रक्तचाप गिर जाता है।जिससे पूरे शरीर में ऐंठन और कंपकंपी का दौर हो जाने से लाचार हूं।


    1980 से लगातार पेशेवर पत्रकारिता में हूं।फिल्मों में काम के लिए मैंने महीन महीने भर की छुट्टी ली है।देश में कहीं भी दौड़ने के लिए,पिता की राह पर चलते हुए मेहनतकश सर्वहारा जनता के साथ खड़ा होने के लिए जब तब छुट्टी लेने से हिचकिचिया नहीं है।लेकिन हमेशा कोशिश की है कि वैकल्पिक व्यवस्था जरुर रहे और मेरी वजह से अखबार के कामकाज में असुविधा न हो।बेवजह छुट्टी कभी किसी बहाने ली नहीं है कभी।घर बैठने की कभी कोशिश नहीं की।


    मैंने अपने पत्रकारिता के जीवन में सिर्फ एकबार मलेरिया हो जाने से 1997 में सिक लिव लिया है।विडंबना है कि मेरी पत्रकारिता के आखिरी साल मैं इस बार हफ्ते मैं दो बार सिक लिव लेने को मजबूर हूं।


    बाकायदा पेशेवर पत्रकार शर्मिदा हूं।मुद्दों को तुरंत संबोधित करने का वायदा निभा नहीं पा रहा हूं।और न भाषा से भाषांतर जा पा रहा हूं।


    लेकिन यकीन मानिये,जब तक आंखें दगा न दें और सांसे टूटे नहीं,तब तक कमसकम दिन में एकबार आपके मुखातिब खड़े होकर सच बोलने की बदतमीजी करता रहुंगा।


    अब करीब 24 साल से जिस अखबार में काम कर रहा हूं,उस अखबार के प्रबंधन का मैं आभारी हूं कि उसने मेरे निरंतर बागी तेवर को बर्दाश्त किया है।


    संपादकों और जीएम तक से भिड़ जाने,सीईओ शेखर गुप्ता ,प्रधान संपादक प्रभाष जोशी और फिलवक्त कार्यकारी संपादक ओम थानवी तक की सार्वजनिक आलोचना करते रहने के बावजूद न मेरे खिलाफ कभी अनुशासनात्मक कोई कार्यवाही हुई है और ने मेरे लेखन या मेरी गतिविधिययों पर कभी अंकुश लगा है।पेशेवर पत्रकारिता में इस आजादी के लिए मेरी सक्रियता में कभी व्यवधान नहीं पड़ा है।


    रिटार मैं इसअखबार में काम करते हुए पच्चीस साल पूरे होने के चंद महीने पहले हो जाउंगा।मैं चाहता हूं कि रिटायर होने तक मैं मुश्तैदी से पेशेवर पत्रकारिता के काम निबटाउ।


    इस सामयिक व्यवधान की पीड़ा मुझे इसलिए ज्यादा है कि एकस्प्रेस समूह के तमाम कर्मचारी मेरे निजी संकट पर मेरा साथ देते रहे हैं,मेरे गुस्से और मेरी बदतमीजियों को उन्होंने हमेशा नजरअंदाज करके मुझे भरपूर प्यार दिया है तो प्रबंधन ने भी मुझे मुकम्मल आजादी दी है।


    मुझे किसी ने कारपोरेट पत्रकार बनने के लिए मजबूर नहीं किया।मुझे किसी ने मेरे मुद्दों के अलावा  लिखने पर मजबूर नहीं किया है।मेरी असहमति और आलोचना का सम्मान किया है।इससे उनका यह हक तो बनता है कि आखिरी वक्त तक मैं पूरी मुश्तैदी से काम करुं।लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है।


    आज भी बीमार होने की वजह से छुट्टी लेनी पड़ी कि सविता बाबू को बहुत फिक्र हो गयी है और जोखिम उठाकर उनने मुझे दफ्तर जाने से रोक दिया।


    मेरी तरह मेरे अभिन्न मित्र और सहकर्मी डा. मांधाता सिंह भी बीमार चल रहे हैं।वे भी एंटी बायोटिक जी रहे हैं।फ्लू महामारी की तरह कोलकाता और आसपास के इलाके को अपने शिकंजे में ले लिया है।


    डाक्टर साहेब बाकायदा बनालरस हिंदू विश्वविद्यालय से इतिहास से पीएचडी करके निकले हैं।प्रोफेसरी के बदले उनने भी पत्रकारिता को पेशा बनाया है।हमसे ज्यादा पढ़े लिखे होने के बावजूद उन्होंने कभी महसूस ही होने नहीं दिया कि हम सिर्फ सहकर्मी हैं।आज डाक्टर साहेब दफ्तर में अकेले हैं।मुझे इसके लिए भी शर्म आ रही है।


    हमारे इलाहाबाद के दिनों से मित्र शैलेंद्र से मई में लंबे समय का साथ का अंत हो रहा है ,जब वे रिटायर हो जायेंगे।उनकी संपादकीय क्षमता का केंद्रीयकरण की वजह से परीक्षण हुआ नहीं है।लेकिन करीब एक दशकसे ज्यादा समय तक संपादक रहते हुए उन्होंने किसी मौके पर अपने संपादक के लिए हमें शर्मिंदा होने नहीं दिया और कोलकाता में जैसे व्यापार और उद्योदगजगत की गोद में बैठ जाने की संपादको की रीति है,उसके उलट उन्होंने बाजार से हमेशा अपने को अलग रखा है।


    अखबार के कामकाज के सिलसिले में गाहे बगाहे मैंने कभी कभार गुस्से में आकर उन्हें बहुत खरी खोटी भी सुनायी,लेकिन कवि संपादक शैलेंद्र ने इसे कभी दिल से नहीं लिया और न हमारी मित्रता के रिश्ते पर आंच आयी।बतौर मित्र मैं उनके लिए गर्वित हूं।मैं चाहता था कि आखिरी वक्त तक यह साथ न छूटे और कमसकम हमारे रिटायर होने तक उनका एक्सटेंशन हो जाये।लेकिन इसके आसार नहीं लगते।


    शैलेंद्र ने फोन पर आज कहा कि थोड़ा आराम भी कर लिया करो और कभी कभार देश दुनिया के मुद्दों के भोज से अपने को रिहा कर लिया करो।यह असंभव है।थोड़ी सी हीलत बेहतर होते ही मोर्चे पर जमने की बुरी आदत से मैं बाज नहीं आ सकता।


    अभी हाल में डाक्टर मांधाता सिंह कह रहे थे कि भारत के किसी नागरिक को नैसर्गिक रुप में अब स्वस्थ रहने का अधिकार नहीं है।विदेशी पूंजी के हित में हम सबको बीमार होते जाना है।विदेशी कंपनियां जो मुनाफे के लिए पूंजी लगा रही हैं,वे पहले बीमारियां पैदा कर रही हैं और महंगी दवाइयां बेच रही हैं।


    भारत के मौसम और जलवायु के हिसाब से खानपान की जो देशज व्यवस्था थी, पूंजी के फायदे के लिए वह छिन्न भिन्न है।खेती अब कीटनाशक और रासायनिक मिलावट के बिना होती नहीं है।

    मनसैंटो राज का करिश्मा यही है।


    दूध संपूर्ण आहार है।

    उस दूध में क्या क्या मिल जाता है,हम जान नहीं सकते।


    जीवन धारण के लिए जो अनाज है,वह मनसैंटो के शिकंजे में हैं।


    हरित क्रांति से लेकर दूसरी हरित क्रांति तक का सफर भोपाल गैस त्रासदी का सफर साबित हो चुका है।हवाओं और पानियों में रेडियोएक्टिव हस्तक्षेप है और सारी कायनात जहरीली बना दी गयी है।


    अब तक तो कुछ एनजीओ जीएम सीड्स (जेनेटिकली मॉडिफाइड सीड्स) पर सवाल उठाती थीं, अब सुप्रीम कोर्ट भी इन्हें खतरनाक मान रहा है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान जीएम सीड्स को खतरनाक माना हैं।


    कारपोरेट दलील लेकिन अलग है जो केसरिया कारपोरेट राजकाज के मुताबिक है।


    कारपोरेट दलील है कि हालांकि जीएम सीड्स को लेकर कुछ चिंताएं बनी हुई है लेकिन इनके लिए अच्छी तरह से टैस्ट किए जाने चाहिए। जीएम सीड्स का किसानों, कंपनियों को फायदा है क्योंकि इनके फायदे सामान्य फसल से अलग हैं। जिस तरह से जमीन कम होती जा रही है और जमीन की उर्वर्कता कम हो रही है उसके हिसाब से जीएम सीड्स काफी अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं।


    बीमा कानून में संशोधन हो जाने से जो 49 फीसद विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की इजाजत है,उसके तहत अमेरिका की तर्ज पर सारे नागरिक अब अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा की जद में जाएंगे।


    शून्य जमा बीमा इलाज से जो लूट खसोट का सिलसिला बना है,एकबार आप बीमा लिस्ट के मुताबिक अस्पताल में दाखिल हो जाये,त मामूली से मामूली उपचारके लिए लाखों का न्यारा वारा तय है।बीमा रकम से कई कई गुणा ज्यादा बिल का भुगतान के बाद आप कितने स्वस्थ रह पायेंगे,कहना मुश्किल है।यह डकैती और तेज,और मारक होने वाली है।


    बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने का प्रस्ताव है, जिससे इस क्षेत्र में निवेश से संबंधित जटिलताएं दूर होंगी और इससे बीमा क्षेत्र में एफडीआई के जरिये तत्काल 21,805 करोड़ रुपये की नई पूंजी आने का अनुमान है। हालांकि इस क्षेत्र को 44,805 करोड़ रुपये की पूंजी की जरूरत है।


    संशोधन के बाद भारत की बड़ी आबादी को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में लाने में मदद मिलेगी। बीमा में विदेशी निवेश की सीमा बढऩे का जश्न सरकार के साथ बीमा कंपनियां भी मना रही हैं, लेकिन ग्राहकों के लिए एक बुरी खबर इंतजार कर रही है। अगले महीने से शुरू हो रहे नए वित्त वर्ष में मोटर व स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम में भारी इजाफा होने के आसार हैं।


    जीवन रक्षक दवायों की कीमतें भी आसमान चूमने लगी हैं।डाक्टर अब दवा कंपनियों के एजेंट बन गये हैं।बंगाल में कानून जेनेरिक नाम से दवाएं प्रक्राइब करने का प्रावधान है ,जो अभी कहीं लागू नहीं है।


    ब्रांड नाम से मामूली सी मामूली मसलन आइरन,कैल्सियम और विटामिन प्रेसक्राइब किये जाते हैं। एंटीबायोटिक का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।कोई एंटीबायोटिक एमोक्सिसिलिन से कम नहीं होता।ऊपर से गैर जरुरी आपरेशन निजी अस्पतालों का सबसे बड़ा फंडा है।कोई नियंत्रण है नहीं।नालेज इकानोमी की तरह अस्पताल अब हेल्थ हब है।


    इस पर गौर करें कि बेयर के अध्ययन के अनुसार भारत में 7 दिन के इलाज के लिए (14  टेबलेट)  बेयर सिप्रोफ्लेक्सिन की कीमत 3.99 डॉलर है। जबकि इसके जैसी जेनेरिक दवाओं की यही कीमत 1.62 डॉलर है। अध्ययन के मुताबिक इसी दवा की इतनी टेबलेट के लिए बेयर कोलंबिया में 131.47 डॉलर वसूलती है।


    अपने डाक्टरसाहेब ठीक ही कह रहे हैं कि अब मेकिंग इन अमेरिका के अबाध पूंजी के केसरिया कारपोरेट राजकाज समय में किसी नागरिक को स्वस्थ रहने का अधिकार नहीं है।



    तेलतुंबड़े का कहना है, अस्मिता और भावना के आधार पर संगठन बनाना  आसान,लेकिन बाबासाहेब  इस आसान रास्ता के खिलाफ थे।


    कल  दिन में और रात में भी आनंद तेलतुंबड़े से फोन पर लंबी बाते हुईं।इधर कोलकाता में उनकी क्लास लग रही हैं।लेकिन हमारी उनसे मुलाकात हो नहीं पा रही है।वे खुद क्लास से निबटकर घर आना चाहते है लेकिन शाम होते न होते हमें दफ्तर के लिए निकलाना होता है।हम उनसे निवेदन कर चुके हैं कि कभी खड़गपुर वापसी के रास्त मुंबई रोड स्थित एक्सप्रेस भवन पधारेंतो हमारे सहकर्मियों से उन्हें मिला दूं,जो उनके पाठक और प्रशंसक दोनों हैं।


    कल हस्तक्षेप में छपे मेरे आलेख बहुजनों की सक्रिय हिस्सेदारी के बिना असंभव है मुक्तबाजारी कारपोरेट फासीवाद के खिलाफ लड़ाई(http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2015/03/16/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9F-%E0%A4%AB%E0%A4%BE%E0%A4%B8) मोबाइल पर पढ़ते  हुए खड़गपुर वापसी के रास्ते पहले उनने फोन किया और पहली प्रतिक्रिया सहमति दे दी।


    पहली प्रतिक्रिया के तहत चलते चलते तेलतुबड़े ने कहा कि मेहनतकश तबके की व्यापक एकता के बिना हम वैचारिक और बौद्धिक बहस से कुछ हासिल नहीं कर सकते।देश के बहुजन जबतक न जागें,तब तक वैचारिक बौद्धिक कवायद बेमतलब है क्योंकि यह बहुसंख्य बहजनों को किसी भी स्तर पर संबोधित नहीं करता।सही माने में यह सारी कवायद सत्ता वर्ग के हित में चली जाती है।


    आनंद का कहना है कि अभी हम मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था के फेनामेनन को समझ नहीं पा रहे हैं।यह बेहद जटिल है और इसका सरलीकरण नहीं किया जा सकता।उत्पादन प्रणाली और उत्पादन संबंधों के सिरे से निषेध की वजह से मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था इस तरह निरंकुश है क्योंकि वर्गीय ध्रूवीकरण उत्पादन प्रणाली के जिंदा रहने की हालत में सक्रियउत्पादन संबंधों के जरिये ही संभव है।


    आनंद के मुताबिक भारत में सत्ता वर्ग ने उत्रपादन प्राणाली और उत्पादन संबंधों की जो हत्या कर दी है,उससे अस्मिता के आधार पर या धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के आधार पर ही गोलबंदी और ध्रूवीकरण के हालात बने हैं।


    आनंद ने कहा कि हमें यह समझ लेना चाहिए कि सत्ता वर्ग और राज्यतंत्र ने वर्गीय ध्रूवीकरण के सारे रास्ते बंद कर दिये हैं,जिन्हें खोलने के लिए सबसे पहले बहुजनों को धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद और अस्मिता के मुक्ताबाजारी तिलिस्म से रिहा करना जरुरी है।हमारे प्रतिबद्ध जनपक्षधर लोग इसकी जरुरत जितनी तेजी से महसूस करेंगे और इसे वास्तव बनाने की दिशा में सक्रिय होंगे,उतना हम जनमोर्चा बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।विरोध और प्रतिरोध की हालत तो फिलहाल है ही नहीं।


    रात को आनंद ने खुलकर आराम से बात की।मैंने जो लिखा है कि बाबासाहेब संगठक नहीं थे,उसपर ऐतराज जताते हुए उन्होंने साफ तौर पर कहा कि बाबासाहेब चाहते तो राष्ट्रव्यापी संगठन वे बना सकते थे और सत्ता हासिल करना उनका मकसद होता तो वे उसके रास्ते भी निकाल सकते थे।


    बाबासाहेब की सर्वोच्च प्राथमिकता जाति उन्मूलन की रही है।


    आनंद के मुताबिक बाबासाहेब के विचार,बाबासाहेब के वक्तव्य और बाबासाहेब के कामकाज सबकुछ हम भूल जायें तो चलेगा लेकिन हमें उनके जाति उन्मूलन के एजंडे को भूलना नहीं चाहिए।उनकी जाति उन्मूलन की परिकल्पना रही है या नहीं रही है,इसका कोई मतलब नहीं है।क्योंकि जाति उन्मूलन के बिना भारत में वर्गीय ध्रूवीकरण के रास्ते खुलेंगे नहीं।


    वर्गीय ध्रूवीकरण न हुआ तो यह देश उपनिवेश ही बना रहेगा और वध संस्कृति जारी रहेगी।


    अर्थव्यवस्था के बाहर ही रहेंगे बहुसंख्य बहुजन।


    मुक्त बाजार का तिलिस्म और पूंजी का वर्चस्व जीवनयापन असंभव बना देगा।


    नागरिक कोई नहीं रहेगा।सिर्फ उपभोक्ता रहेंगे। उपभोक्ता न विरोध करते हैं और न प्रतिरोध। उपभोग भोग के लिए हर समझौता मंजूर है।देश बेचना भी राष्ट्रवादी उत्सव है।


    आनंद के इस वक्तव्य से हिंदू साम्राज्यवाद और अमेरिका इजराइल नीत साम्राज्यवादी पारमानविक रेडियोएक्टिव मुक्तबाजारी विश्वव्यवस्था के चोली दामन रिश्ते की चीरफाड़ जरुरी है।जिस उत्पादन प्रणाली और उत्पादन संबंधों के साथ साथ उत्पादक वर्ग के सफाये की नींव पर बनी है मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था,धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद एकदम उसीके माफिक है।फासीवाद उसका आधार है।


    गौर तलब है कि संघ परिवार का केसरिया कारपोरेट बिजनेस फ्रेंडली सरकार न सिर्फ मेड इन खारिज करके मेकिंग इन गुजरात और मेकिंग इन अमेरिका के पीपीपी माडल को गुजरात नरसंहार की तर्ज पर धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के दंगाई राजीनीति के तहत अमल में ला रही है,बल्कि पूरी हुकूमत अब मुकम्मल मनसैंटो और डाउ कैमिकल्स है।


    पूरा देश ड्रोन की निगरानी में है। नागरिकता अब सिर्फ आधार नंबर है।हालत यह है कि संघ परिवार के ही प्राचीन वकील राम जेठमलानी तक को देश के वित्तमंत्री अरुण जेटली को ट्रेटर कहना पड़ रहा है।


    हालत यह है कि तमाम सरकारी उपक्रमों की हत्या की तैयारी है गयी है।सरकार ने अगले वित्त वर्ष के लिए करीब 70,000 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य तय किया है। हालांकि विनिवेश विभाग को पूरा भरोसा है कि ये टारगेट हासिल कर लिया जाएगा। विभाग ने विनिवेश करने वाली कंपनियों को दो हिस्सों में बांटा है। इनमें 41,000 करोड़ रुपये पीएसयू में माइनॉरिटी हिस्सा बेचकर जुटाए जाएंगे, जबकि 28,500 करोड़ रुपये सरकारी कंपनियों में बड़ा हिस्सा बेचकर जुटाने की योजना है।


    माना जा रहा है कि नाल्को, एनएमडीसी, एनएचपीसी, भेल, नेवेली लिग्नाइट, इंडियन ऑयल, ड्रेजिंग कॉर्प, कंटेनर कॉरपोरेशन, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स, हिंदुस्तान कॉपर और ओएनजीसी वो कंपनियां हैं जिनमें विनिवेश किया जाएगा। दरअसल, ये वो कंपनियां हैं जिनमें सरकार की हिस्सेदारी 75 फीसदी से ज्यादा है और सेबी के नियम के मुताबिक सरकार को इसे 2017 तक कम करना है। हालांकि ओएनजीसी में हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया केंद्र और कंपनियों के बीच सब्सिडी-शेयरिंग मैकेनिज्म तय होने के बाद ही शुरू की जाएगी।




    बाबासाहेब का अंतिम लक्ष्य लेकिन समता और सामाजिक न्याय है,जिसके लिए बाबासाहेब ने राजनीति कामयाबी कुर्बान कर दी।


    सत्ता हासिल करना चूंकि उनका अंतिम लक्ष्य नहीं था,इसलिए संगठन बनाने में उनकी खास दिलचस्पी नहीं थी।


    समता और सामाजिक न्याय के लिए जो कमसकम वे कर सकते थे,उन्होंने सारा फोकस उसी पर केंद्रित किया।


    तेलतुंबड़े का कहना है, अस्मिता और भावना के आधार पर संगठन बनाना  आसान,लेकिन बाबासाहेब  इस आसान रास्ता के खिलाफ थे।


    उन्होंने कहा कि जाति पहचान और अस्मिता के आधार पर भाववादी मुद्दों पर केंद्रित जो बहुजन समाज का संगठन बनाया कांशीराम जी ने,जो बामसेफ और बाद में बहुजन समाजवादी पार्टी बनायी कंशीराम जी ने,बाबा साहेब चाहते तो वे भी बना सकते थे।


    क्योंकि जाति और पहचान,भावनाओं के आधार पर जनता को मोबिलाइज करना सबसे आसान होता है और यही सत्ता तक बहुंचने की चाबी है।जिस व्यक्ति का एजंडा जाति उन्मूलन का रहा हो,जिनने जति व्यवस्था तोड़ने के लिए भारत को फिर बौद्धमय बानाने का संकल्प लिया, वे जाति और पहचान के आदार पर भाववादी मुद्दों पर संगठन कैसे बना सकते थे,हमें इस पर जरुर गौर करना चाहिए।


    आनंद ने जो कहा,उसका आशय मुझे तो यह समझ आया कि बाबासाहेब के जीवन और उनके विचार,उनकी अखंड प्रतिबद्धता पर गौर करें तो वे सही मायने में राजनेता थे भी नहीं।उन्होंने बड़ी राजनीतिक कामयाबी हासिल करने की गरज से कुछ भी नहीं किया।


    बाबासाहेब राजनीति में वे जरुर थे,लेकिन उसका मकसद उनका भारत के वंचित वर्ग के लिए, सिर्फ वंचित जातियों या अछूत जातियों के लिए नहीं,अल्पसंख्यकों,आदिवासियों और महिलाओं, कामगारों और कर्मचारियों के हक हकूक सुनिश्चित करना था।


    इसमें उन्हें कितनी कामयबी मिली या उनकी परिकल्पनाओं में या उनके विचारों में क्या कमियां रहीं,इस पर हम समीक्षा और बहस कर सकते हैं और चाहे तो बाबासाहेब के व्यक्तित्व और कृतित्व का पुनर्मूल्यांकन कर सकते हैं,लेकिन उनकी प्रतिबद्धता में खोट नहीं निकाल सकते हैं।


    जो लोग बाबासाहेब को भारत में जात पांत की राजनीति का जनक मानते हैं, वे इस ऐतिहासिक सच को नजरअंदाज करते हैं कि जाति व्यवस्था का खात्मा ही बाबासाहेब की जिंदगी का मकसद था और यही उनकी कुल जमा राजनीति थी।


    ऐतिहासिक सच है कि बहुजनों को जाति के आधार पर संगठित करने की कोई कोशिश बाबासाहेब ने नहीं की और वे उन्हें वर्गीय नजरिेये से देखते रहे हैं।


    विडंबना यह है कि हर साल बाबासाहेब के जन्मदिन,उलके दीक्षादिवस और उनके निर्वाण दिवस और संविधान दिवस धूमधाम से मनाने वाले उनके करोड़ों अंध अनुयायियों को इस ऐतिहासिक सच से कोई लेना देना नहीं है कि बाबासाहेब बहुजनों को डीप्रेस्ड क्लास मानते थे,जाति अस्मिताओं का इंद्र धनुष नहीं।


    मान्यवर कांशीराम की कामयाबी बड़ी है,लेकिन वे बाबासाहेब की परंपरा का निर्वाह नही कर रहे थे और न उनका संगठन और न उनकी राजनीति बाबासाहेब के विचारों के मुताबिक है।


    मान्यवर कांशीराम ने उस जाति पहचान के आधार पर बहुजनों को संगठित किया,जिसे सिरे से मिटाने के लिए बाबासाहेब जिये और मरे।




    तेलतुंबड़े का कहना है, अस्मिता और भावना के आधार पर संगठन बनाना  आसान,लेकिन बाबासाहेब  इस आसान रास्ता के खिलाफ थे।


    इसके विपरीत संघपरिवार के संगठन का आधारःमस्जिद कोई धार्मिक स्थल नहीं, कभी भी तोड़ी जा सकती हैः स्वामी


    सुब्रमण्यन स्वामी ने एक बार फिर देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहरीले बोल बोले हैं। इस बार सारी हदें लांघ गए हैं स्वामी...

    पढ़ें स्टोरी...

    मस्जिद कोई धार्मिक स्थल नहीं, कभी भी तोड़ी जा सकती हैः स्वामी

    बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी के मुताबिक मस्जिद कोई धार्मिक स्थल नहीं है, इसलिए उसे कभी भी...

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    इसी बीच भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में कांग्रेस पार्टी दिल्ली के जंतर मंतर से संसद तक मार्च और विरोध प्रदर्शन कर रही है। संसद भवन तक मार्च करते इन कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और वॉटर कैनन का इस्तेमाल भी किया। इस मार्च के जरिए कांग्रेस मोदी सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है।


    इस विरोध मार्च में कांग्रेस के तमाम बड़े नेता शामिल हुए हैं, हालांकि बाहर होने की वजह से राहुल गांधी और तबियत खराब होने की वजह से सोनिया गांधी मार्च में शामिल नहीं थीं। पानी की बौछार और लाठीचार्ज में कई कांग्रेस कार्यकर्ता घायल भी हुए हैं। कांग्रेस के इस विरोध मार्च में सैकड़ों यूथ कांग्रेस कार्यकर्ता और किसान शामिल हुए हैं। कांग्रेस केंद्र सरकार के जमीन अधिग्रहण बिल को किसान विरोधी बताते हुए इसका विरोध कर रही है। इस भारी विरोध के बीच सरकार कल राज्यसभा में भूमि अधिग्रहण बिल पेश करने वाली है।


    इधर इंडस्ट्री को भी लग रहा है कि जमीन अधिग्रहण बिल को पास करवा पाना सरकार के लिए मुश्किल होगा।बजाज ग्रुप के चेयरमैन राहुल बजाज ने सीएनबीसी आवाज के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा है कि जमीन अधिग्रहण बिल को लेकर पूरा विपक्ष एक जुट है। ऐसे में राज्य सभा इस बिल के पास होने की संभवना नहीं है।


    दूसरी तरफ सीएनबीसी आवाज के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि सरकार को अब भी उम्मीद है कि जमीन अधिग्रहण बिल पर आम राय बना ली जाएगी।




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  • 03/17/15--08:27: धर्मनिरपेक्षता के रंग बिरंगे चेहरे बेनकाब केसरिया,कारपोरेट शत प्रतिशत हिंदुत्व में बाकी धर्म अनुयायियों के खात्मे का एजंडा है,हमले इसीलिए। अबाध पूंजी के हितों में अमेरिका अब भारत पर न आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है और न परमाणु प्रतिबंध।अभी अभी रक्षा बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए खुला है।अभी अभी बीमा बाजार खुला है।खुदरा कारोबार भी अलीबाबाओं के हवाले हैं। इसलिए हिंदुत्व के एजंडे को न अमेरिका का डर है और न वैटिकन का। अब यह भी देखिये कि अमेरिका और बाकी ईसाई दुनिया,जिनका इजराइल से जितना चोली दामन का साथ है,उतना ही मजबूत टांका है ग्लोबल हिंदुत्व के साथ। भारत में सिखों,मुसलमानों,बौद्धों,गैर नस्ली नगरिकों,बहुजनों,जिन्हें जबरन हिंदू बनाया जा रहा है,आदिवासियों और शरणार्थियों के मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के हनन पर अगर अमेरिका और वैटिकन खामोश हैं तो ईसाइयों पर हो रहे हमले से हिंदू साम्राज्यवाद को रोकने की कोई राह बचती नहीं है। पलाश विश्वास
  • धर्मनिरपेक्षता के रंग बिरंगे चेहरे बेनकाब

    केसरिया,कारपोरेट

    शत प्रतिशत हिंदुत्व में बाकी धर्म अनुयायियों के खात्मे का एजंडा है,हमले इसीलिए।

    अबाध पूंजी के हितों में अमेरिका अब भारत पर न आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है और न परमाणु प्रतिबंध।अभी अभी रक्षा बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए खुला है।अभी अभी बीमा बाजार खुला है।खुदरा कारोबार भी अलीबाबाओं के हवाले हैं।

    इसलिए हिंदुत्व के एजंडे को न अमेरिका का डर है और न वैटिकन का।

    अब यह भी देखिये कि अमेरिका और बाकी ईसाई दुनिया,जिनका इजराइल से जितना चोली दामन का साथ है,उतना ही मजबूत टांका है ग्लोबल हिंदुत्व के साथ।


    भारत में सिखों,मुसलमानों,बौद्धों,गैर नस्ली नगरिकों,बहुजनों,जिन्हें जबरन हिंदू बनाया जा रहा है,आदिवासियों और शरणार्थियों के मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के हनन पर अगर अमेरिका और वैटिकन खामोश हैं तो ईसाइयों पर हो रहे हमले से हिंदू साम्राज्यवाद को रोकने की कोई राह बचती नहीं है।



    पलाश विश्वास

    The Economic Times

    6 mins·

    In this interview with ET, Julio Ribeiro, retired IPS officer, says Prime Minister Narendra Modi needs to tell right wing fringe groups to shut up, and walk the talk of development for all.

    Your reactions? But first, read the full interview here!

    Attempts to make India saffron Pakistan won't work: Former IPS Julio Ribeiro - The Economic Times

    In an interview with ET, Julio Ribeiro says PM Modi needs to tell right wing fringe groups to shut up,...

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    खबर है कि देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराध का मुद्दा मंगलवार को लोकसभा में गूंजा। कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी पार्टियों ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश की। विपक्षी पार्टियों ने सदन में हरियाणा में एक गिरजाघर पर हमला और पश्चिम बंगाल में एक नन के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म का मुद्दा उठाया।


    खबर है कि नदिया में चार दिन पहले बुजुर्ग नन के साथ हुए गैंगरेप को लेकर आज संसद में हंगामा हुआ है. विरोधियों ने ममता और मोदी सरकार पर निशाना साधा है। अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

    एक और अहम खबर ये है कि वेटिकन सिटी से एक टीम रानाघाट कल आने वाली है। वेटिकन में पोप रहते हैं औऱ ईसाईयों का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र है।

    हिसार चर्च में तोड़फोड़ के मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी को गिरफ्तार किया है। एजंसी ने ये खबर दी है। पुलिस ने गांव के सरपंच सहित 5 लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया। हिसार में तो गिरफ्तारी हो गई लेकिन नदिया में चार दिन पहले बुजुर्ग नन के साथ हुए गैंगरेप के आरोपी अभी तक पक़ड में नहीं आए हैं।



    संसदीय कार्यवाही का आंखों देखा हाल चूंकि आप किसी न किसी माध्यम से जान रहे होंगे,इसलिए इस के विस्तार में नहीं जा रहा हूं।


    इस सिलसिले में हस्तक्षेप पर हमारा आलेख पढ़ लेंः

    संविधान से धर्मनिपेक्ष का पाखंड हटा ही दें अगर विधर्मी और अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं

    संविधान से धर्मनिपेक्ष का पाखंड हटा ही दें अगर विधर्मी और अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं



    शत प्रतिशत हिंदुत्व के एजंडे पर खामोशी।

    2021 तक भारत को इस्लाम मुक्त और ईसाई मुक्त करने की संघ परिवार की टाइम लाइन पर खामोशी।

    सभी भारतीय हिंदू है,वक्तव्य पर सन्नाटा।

    मस्जिद धर्मस्थल नहीं,उन्हें कभी भी तोड़ा जा सकता है,खुल्ला ऐलान पर राजधर्म का अता पता नहीं।

    सांसदों और मंत्रियों तक के धर्मोन्मदी बयानों पर कोई अंकुश नहीं।

    बजरंगियों को कहीं भी कुछ भी कर गुजरने का लाइसेंस।

    और अब जाकर कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में बुजुर्ग नन से सामूहिक बलात्कार और हरियाणा में एक चर्च तोड़े जाने की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की और इन पर तत्काल रिपोर्ट मांगी है।


    प्रधानमंत्री के राजधर्म के विपरीत विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा में हिसार के चर्च में तोड़फोड़ की घटना का समर्थन करते हुए पूछा है कि क्या ईसाई वेटिकन सिटी में हनुमान मंदिर के निर्माण की अनुमति देंगे।


    एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के अनुसार, विहिप के संयुक्त सचिव सुरेंद्र जैन ने स्वतंत्रता के लिए 1857 की लड़ाई को धर्म के लिए युद्ध बताया और कहा कि अगर ईसाइयों ने धर्मातरण नहीं रोका तो ऎसे युद्ध किए जाएंगे।


    उन्होंने दावा किया कि नदिया जिले में नन से गैंगरेप को सांप्रदायिक रंग देने के पीछे चर्च की साजिश है। उन्होंने कहा कि नन कायौन शोषण ईसाइयों की संस्कृति है, यह हिंदुओं की संस्कृति नहीं है।


    जैन ने कहा कि नन से रेप को लेकर पोप काफी चिंतित हैं इसलिए इसे रोकने के लिए वे समलैंगिक यौन संबंध को बढ़ावा दे रहे हैं।


    गौरतलब है कि हिसार के चर्च में तोड़फोड़ और नदिया जिले में नन से गैंगरेप के मामले में हिंदू समुहों के शामिल होेेने का आरोप लगा है। दोनों ही मामलों में विहिप ने किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया है।




    संसदीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की यह कारपोरेट केसरिया समरस अभिव्यक्ति है।


    धर्मनिरपेक्षता के प्रसंग में इस देश के गैरअनार्य आदिवासियों की गिनती भारतीय वोटबैंक की राजनीति में नहीं है,इसीलिए सलवा जुड़ुम या आफसा से धर्मनिरपेक्षता को कोई ऐतराज नहीं न जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता से बेदखली से धर्मनिरपेक्षता को कोई मतलब है।


    इसीलिए आदिवासियों की बेदखली वाले तमाम कानूनों को पास कराने में धर्मनिरपेक्षता और धर्मोन्माद एकाकार।


    हम पहले से लिखते रहे हैं कि बिलियनर मिलियनर सत्ता वर्ग के लिए जनसंहारी कारपोरेट मनुस्मृति जायनी राज्यतंत्र को बहाल रखने के लिए अनिवार्य संसदीय जनादेश हासिल करने के लिए धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक दखल बेदखल करने का अचूक रामवाण है,जिसका वोट राजनीति के दायरे से बाहर आचरण में कोई वजूद नहीं है।


    इसका क्या कहिये कि जिस राज्यसभा में सुधार संबंधी तमाम विधेयक बंधक हैं,बीमा बिल पास करा लेने के बाद बाकी बिलों के मामले में हिंदुत्व की सबसे बड़ी और मौलिक पार्टी कांग्रेस भी जिन्हें पास कराने के लिए राजी नहीं हैं,उन्हें पास कराने में मददगार हैं धर्मनिरपेक्षता के सूरमाओं की पार्टियांं तृणमूल कांग्रेस,जनतादल-यू और बीजू जनतादल।समाजवादी पार्टी कुछइधर है तो कुछ उधर भी।


    विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने विपक्ष से अपील की कि वह राज्यसभा में भूमि विधेयक पारित कराने के सरकार के प्रयासों का विरोध करे।तो व्यापक विपक्ष की एकता का संदेश देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित कम से कम 10 राजनीतिक दलों के नेता मंगलवार को संसद भवन से राष्ट्रपति भवन तक मार्च करते दीखे।


    भूमि अधिग्रहण बिल पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दल के तकरीबन 125 सांसद आज राष्ट्रपति से मिले। राष्ट्रपति को सांसदों ने ज्ञापन सौंपा। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में विपक्षी सांसदों का राष्ट्रपति भवन की ओर मार्च किया। सौ से ज्यादा सांसद इस मार्च में शामिल हुए। ये सांसद तख्तियां लिए हुए और भूमि बिल के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। पुलिस ने ये रास्ता आम लोगों की आवाजाही के लिए बंद कर दिया था।


    हम शुरु से लिखते रहे हैं कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें धर्मोन्मादी कारपोरेट राजकाज के सहायक हैं और सरकारों के स्थायित्व के लिए निर्णायक बनीं ये ताकतें 16 मई,1014 से पहले तक तमाम अल्पमत सरकारों को जनविरोधी कानून और नीतियों को अमली जामा देने में संसदीय सहमति और धर्मनिरपेक्ष वोट बैंक की राजनीति करती रही हैं।


    बंगाल में अभी हाल में हुए राणाघाट चर्च में 72 साल की नन के साथ जघन्य बलात्कार कांड के बाद मुख्यमंत्री के धर्मनिरपेक्ष चेहरे की कलई खुल गयी है जबकि यह वारदात ईसाइयों के लिए नहीं,बंगाल में वोटबैंक राजनीति में निर्णायक मुसलमानों को जान माल की सीधी चेतावनी है।ममता के परिवर्तन राज में स्त्री उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार की वारदातें राणाघाट से आगे भी जारी हैं।


    असली धर्मनिरपेक्षता का रंग ममता बनर्जी और उनकी पार्टी संसद में दिखा रही है।धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस ने तो सीधे भारतीय बीमा बाजार को अमेरिका के लिए खोलने के अपने एजंडे को संघ परिवार के कंधे पर बंदूक रखकर पास करवा लिया तो बीमा और खुदरा बाजार में एफडीआई का विरोध करने वाली तृणमूल कांग्रेस बीमा बिल पर वोट से पहले रज्यसभा से वाकआउट करके बिल पास हो जाने का रास्ता साफ कर दिया।


    यूपी में 2017 में इलेक्शन है और धुरंधर क्षत्रप मुलायम को दोनों हाथ में लड्डू रखने और खाने के गुर खूब मालूम हैं।समाजवादी पार्टी संघपरिवार के साथ सैफई से लेकर संसद तक में खड़ी है,लेकिन यूपी में चुनावी हितों के मद्देनजर इसका खुलासा होने नहीं देना चाहती।


    मुलायम के हाल में बने रिश्तेदार भयंकर धर्मनिरपेक्ष हैं और संसद में उनकी कोई ताकत नहीं हैं।वे एकदम सुरक्षित खेल रहे हैं।जबकि उन्हें हाशिये पर फेंकने वाली फिलहाल सत्ता समीकरण में उनके साथ नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनतादल यू,बंगाल की ममता बनर्जी और ओड़ीशा को कारपोरेट हवाले करने वाले नवीन पटनायक राज्यसभा में कोयला और खान अधिनियमों में संशोधन के अहम सुधारों को पास करने में धर्मोन्मादी संघ परिवार के हम साथ साथ हैं,परिवार।फिरभी पूछते रहेंगे,हम आपके हैं कौन।


    हम शुरु से लिख रहे हैं कि सरकार को भूमि अधिग्रहण संशोधन की जल्दबाजी नहीं है।

    अमेरिकी हितों के मद्देनजर टाप पर रहा है बीमा संशोधन बिल,वह स्मूदली पारित हो गया धर्मनिरपेक्ष कंधों पर सवार।


    देश के आदिवासी भूगोल को बेदखल करने से धर्मनिरपेक्ष वोटबैंक की राजनीति को कुछ आता जाता नहीं है।सिर्फ ओड़ीशा में झारखंड और छत्तीसगढ़ के बाद सबसे ज्यादा आदिवासी हैं ,जिनकी जमीनें नवीन पटनायक पहले ही कारपोरेट हवाले कर चुके हैं।


    बंगाल में तीस फीसद मुसलमान वोटर हैं तो नमाज पढ़ने या हिजाब ओढ़ने तक से परहेज नकरके धर्मनिरपेक्ष ममता मोदी को कमर में रस्सी बांधकर जेल भेजने का ऐलान करती हैं लेकिन बंगाल में आदिवासी वोट सिर्फ सात फीसद हैं।जंगल महल दखल करने का उनका एजंडा पूरा हो गया।वाम भी हाशिये पर हैं।


    इसलिए बेहिचक संसद में ममता संघपरिवार में शामिल और बाहर संघ परिवार के खिलाफ जिहाद, जिहाद,जिहाद।ताकि मुसलमान गलतफहमी में रहे।


    इसीतरह बिहार में भी आदिवासी वोटरों का प्रतिशत काफी कम है,जो चुनाव नतीजों के गणित के हिसाब से  बेमतलब है।


    अब समझ लीजिये कि कैसे धर्मनिरपेक्षता के क्षत्रपों की यह तिकड़ी कोयला और खान संशोधन विधेयकों को पास कराने के लिए कांग्रेस के विरोध के बावजूद राज्यसभा में संघ परिवार की जीत क्यों तय कर रहे हैं।उनकी धर्मनिरपेक्षता का आशय क्या है।


    सर्वभारतीय पार्टी होने के कारण आदिवासियों के हितों की कतई परवाह न करने वाली और आजादी के बाद से आदिवासियों को लगातार तबाह करते रहने वाली कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी के लिए आदिवासी हितों के रक्षक बतौर दीखने की गरज है,इसलिए भूमि,कोयला और खनन विधेयकों को उसका समर्थन निषिद्ध है।


    व्यापारी कांग्रेस के वोटबैंक नहीं है,इसलिए खुदरा कारोबार रसातल में जाये तो कांग्रेस को फर्क नहीं पड़ता और न देश के संसाधन बेचने के अपने अभियान संघ परिवार की ओर से और तेज किये जाने से उसके पेट मों कोई तितलियां हैं।देश बेचने का मौलिक सौदागर फिर वहींच कांग्रेस।विदेशी पूंजी की काजलकोठरी में सबके चेहरे कारे हैं।


    यही सबसे बड़ा कोयला घोटाला है,जिस पर कोई मुकदमा चलेगा नहीं।


    इसलिए हम तीसरा विकल्प धर्मनिरपेक्ष विकल्प नहीं मानते क्योंकि संसदीय सहमति की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता सबसे बड़ी धोखाधड़ी है।


    इसीलिए हम बार बार लाल नील एकता के तहत मेहनतकश के वर्गीय ध्रूवीकरण का एकमात्र रास्ता बता रहे हैं।अंध गलियों में भटकने के बजाये लाल और नील ताकतों को बहुजन सर्वहारा तबके के वर्गीय ध्रूवीकरण के लिए काम करना चाहिए।


    वाम को धर्मनिरपेक्ष सत्ता लोलुप क्षत्रपों के चंगुल से निकलकर मेहनकश जनता की गोलबंदी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।


    वहीं,नीले झंडे के अनुयायियों को समझ लेना चाहिए कि जिस बाबासाहेब को वे अपना ईश्वर बनाये हुए हैं,वे जातिव्यवस्था को खत्म करने के लिए जिये मरे और समता औक सामाजिक न्याय के लिए उऩका जो जाति उन्मूलन का एजंडा है,वह बहुजनों को वर्ग मानने की बुनियाद पर खड़ा है।वर्गीयध्रूवीकरण का मकसद जितना वाम है,उससे कमसकम भारतीय संदर्भ में वह अंबेडकरी कहीं ज्यादा है।


    इस सत्य को समझे बिना इस केसरिया कारपोरेट समय में न वाम का कोई भविष्य है और न बहुजन आंदोलन का।

    हस्तक्षेप में कल लिखे अपने आलेख,अस्मिता और भावना के आधार पर संगठन बनाना आसान, लेकिन बाबा साहेब इसके खिलाफ थे,

    (http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2015/03/17/%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AA),के संदर्भ में मैंने आज खुद आनंद तेलतुंबड़े को यह आलेख लिखने से पहले फोन कियाऔर उनसे निवेदन किया कि उनको उद्धृत करने में कहीं गलती हो गयी या उनके कहे का आशय निकालनेमें हमारे विश्लेषण अगर उनके विचारों के विपरीत है,तो तुरंत स्पष्टीकरण भेजेंताकि हम तथ्यों मे अगर कोई गलती हो तो तुरंत उसमें सुधार करेंक्योंकि अब हम यह बहस और तेज करने वाले हैं।

    आनंद ने साफ साफ कहा कि किसी स्पष्टीकरण की कोई जरुरत नहीं है।मुक्त बाजारी तिलिस्म की दीवारें तोड़ने की जितनी जरुरत है ,अस्मिताओं की आत्मघाती राजनीति से बहुजनों को निकालकर जनता के राष्ट्रीय मोर्चे की गोलबंदी उतनी ही जरुरी है।उन्होंने वायदा किया है कि वे इस सिलसिले में सिलसिलेवार लिखेंगे।



    अब इसे भी समझना गलतफहमियों को दूर करने के लिए बेहद जरुरी है कि फासीवाद का असली चेहरा सिर्फ केसरिया नहीं है।


    सबसे पहले इस खबर पर गौर कीजिये,योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण द्वारा अरविंद केजरीवाल से मिलने का समय मांगे जाने के एक दिन बाद आम आदमी पार्टी के संयोजक ने आज जबाव में 'जल्द मिलने' की बात कही है। दोनों नेताओं की तरफ से सोमवार सुबह केजरीवाल को एक एसएमएस भेजा गया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री के बंगलुरू से लौटने के कुछ घंटों के बाद, दोनों विरोधी गुटों के बीच सुलह के एक और प्रयास के तहत केजरीवाल गुट के वरिष्ठ नेताओं ने सोमवार देर रात यादव से मुलाकात की और कई विवादित मुद्दों पर बातचीत की. दोनों गुटों ने विचार-विमर्श को सकारात्मक बताया है।


    अर्थात सही मायने में जनमोर्चा बने या न बने,बहुजनों का वर्गीय ध्रूवीकरण हो या न हो,उससे निपटने की रणनीति में कोई कसर बाकी नहीं है।


    मतभेदों के जरिये आंतरिक लोकतंत्र के ईमानदार करतब के तहत संघ परिवार के विकल्प बतौर आप बिखर भी नहीं रहा है।


    यह ऐतिहासिक सच है कि करंट स्टेटस चाहे संघ परिवार की राजनीति को हिंदुत्व का वारिस बतौर पेश कर रही है।लेकिन तथाकथित हिंदुत्व के पुनरूत्थान से पहले आजादी से पहले और आजादी के बाद दुनियाभर में हिंदुओं के प्रतिनिधित्व का दावेदार कांग्रेस रही है।भारत विॆभाजन के दो राष्ट्र सिद्धांत के तहत जो सत्ता हस्तातंरण हुआ,उसकी बुनियाद हिंदुओं की पार्टी बतौर साम्राज्यवादियों की कांग्रेस को मान्ता है।संघ परिवार को नहीं।


    हिंदुत्व के उस पुनरूत्थान के लिए जो सिखों का नरसंहार हुआ,उसमें भी हाथ कांग्रेस के ही रंगे हुए हैं।


    जिस बाबरी विध्वंस के बाद संघ परिवार सत्ता की दावेदार बनकर उभरने लगा नवउदारवादी मुक्तबाजारी कारपोरेट राज के शुभारंभ से,उसके पीछे भी गौर से देखें तो फिर वहीं कांग्रेस का काला हाथ है।राम मंदिर का ताला खोलकार रामरथ का दिगिविजयी रास्ता तैयार किया कांग्रेस ने फासीवादी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के जरिए अबाध पूंजी के लिए।


    सिख जनसंहार के तुरंत बाद हुए 1984 के लोकसभा चुनावों में राजीव गांधी के सुपर तकनीक अवतार से डिजिटल देश बनाने का जो सिलसिला हुआ,दृश्य माध्यम के विस्तार के साथ,सूचना प्राद्योगिकी की पैत्रोदा भूमिका के तहत जो डिजिटल देश बनाने का मेकिंग इन अमेरिका आज फूल ब्लूम केसरिया कमल है,उस ऐतिहासिक संक्रमण काल में संघ परिवार ने सत्ता का विसर्जन करते हुए  राजीव गांधी की कांग्रेस का बिना शर्त समर्थन किया था।


    फिर हरित क्रांति की महारानी बतौर जिन इंदिरा गांधी ने कृषि के सफाये की परिकल्पना शुरु की और हिंदुत्व राष्ट्रवाद को बांग्लादेश विजयमाध्यमे हकीकत में बदला,उनके एकात्म हिंदुत्व में भी  तत्कालीन आरएसएस प्रधान बालासाहेब देवरस को पूर्ण समर्थन था।इमरजेंसी में संघ पर प्रतिबंध से जो रिश्ते खत्म हुए,समझा गया,राजीव जमाने में उसका नया नवउदारवादी कायाकल्प हो गया।


    यह भी ऐतिहासिक सच है कि बाबरी विध्वंस के वक्त यूपी में भाजपा के कल्याण सिंह की सरकार थी तो केंद्र में  कांग्रेस की नरसिंहराव की सरकार थीं।जिसे भारत में नवउदारवादी कायाकल्प और मुक्तबाजार की बुनियाद बनाने का श्रेय है और उस सरकार में वित्तमंत्री विश्वबैंक ने तय किये।


    तब केंद्र और राज्य सरकार ने,कांग्रेस और संघपरिवार ने मिलकर भारत को मुक्त बाजार में तब्दील करने के इस निर्णायक फासीवादी आपरेशन को अंजाम दिया,जिसकी परिणति आज की यह केसरिया कारपोरेट डाउकैमिक्लस मनसैंटोराज है।


    मनसैंटो राज की शुरुआत भी कांग्रेस ने किया है तो डाउ कैमिकल्स की आत्मा भोपाल गैस त्रासदी के वक्त भी केंद्र में कांग्रेसी हिंदुत्व का राजकाज चल रहा था।


    भोपाल गैस त्रासदी के गुनाहगारों को बचाने में भी कांग्रेस की सबसे बड़ी भूमिका रही है।


    आप थोड़ा सा इन तथ्यों की जांच परख कर लें और तथ्य इससे भिन्न हों तो इसकी जानकारी हमें देकर दुरुस्त जरुर करें।इस बीच कुछ जरुरी बातें कर ली जायें।


    कल रात बुखार नहीं आया और न कंपकंपी आयी।सविताबाबू की जिद पर दफ्तर जाने का जोखिम नहीं उठाया और रात के दो बजे तक अपने मोर्चे पर डटा रहा।सुबह सात बजे जाग भी गये कि डाक्टर के चैंबर से जांच पड़ताल के लिए खून लेनेवाला आ गया।


    छह किस्म की जांच के लिए सुबह सुबह सोलह सौ रुपये गिनने पड़े।आज मेरा आराम दिवस है और शाम तक जो जांच रपट आ जानी है,उसके तहत डाक्टर फिर से इलाज की दिशा तय करेंगे।


    स्वाइन फ्लू हुआ तो अस्पताल जाने की नौबत आ सकती है।


    सबकुछ ठीक रहा तो कल से फिर दफ्तर जाउंगा।


    खास बात यह है कि बिना बीमार पड़े हम जो मेडिकल चेकअप कराने के अभ्यस्त नहीं हैं,उस हिसाब से सविता बाबू के फिक्रमंद हो जाने से वह भी निबट गया।इलाज ठीक हुआ तो फिर पूरे दम के साथ आपकी नींद में खलल डालता रहूंगा।


    भुक्तभोगी का यथार्त बदल जाता है।स्वाइन फ्लू की महामारी के फंडे पर नये सिरे से गंभीरता से सोचना पड़ रहा है और इस सिलसिले में तमाम तथ्य हाथ आये हैं।अगर सेहत ठीक रही तो देर रात तक उन्हें साझा करने की कोशिश जरुर करुंगा।


    ताजा स्टेटस यह है कि तीसरे मोर्चे की राजनीति अब सिरे से बेनकाब हो गयी है।


    सामाजिक बदलाव और परिवर्तन के बहाने मुक्तिकामी बहुजन सर्वहारा जनता की ठगी के अपराध का खुलासा भी हो गया है।


    गौतम बुद्ध,बाबासाहेब और बहुजन पुरखों के हजारों साल के आंदोलन की समूची विरासत को मसीहाई और धनवसूली का एटीएम बना देने का खुलासा

    भी हो गया।

    अब भी न जागे बहुजन तो कब फिर जागेंगे बहुजन,कोई बता दें।


    सच यह भी है कि धर्मनिरपेक्षता भी अब कारपोरेट केसरिया गीता महोत्सव की समरसता है।


    धर्मनिरपेक्षता को गंगा में डालकर उसका धर्मांतरण  कर दिया है धर्मनिरपेक्षता के मसीहा संप्रदाय ने,जिनका  जनसंहारी राजकाज में वध्य जनता की नियतिबद्ध परिणति से कुछ लेना देना नहीं है।


    आपको याद होगा कि पंद्रह लाख टका के सूट और अमेरिकी धर्म स्वतंत्रता का क्या अजब गजब तमाशा हुआ भारत के गणतंत्र महोत्सव के दौरान और उसके तुरंत बाद कैसे मुक्त बाजारी घोड़ों और सांढ़ों का अश्वमेध अभियान का सिलिसला तेज होता गया और संसदीय सहमति की नौटंकी बजरिये कैसे कैसे एक के बाद एक सुधार कार्यक्रम लागू होने लगे।


    अब यह भी देखिये कि अमेरिका और बाकी ईसाई दुनिया,जिनका इजराइल से जितना चोली दामन का साथ है,उतना ही मजबूत टांका है ग्लोबल हिंदुत्व के साथ।

    इसलिए हिंदुत्व के एजंडे को न अमेरिका का डर है और न वैटिकन का।


    अमेरिका में तो सत्ता अमेरिकियों के बजाय या जायनी तत्वों की है या फिर ग्लोबल हिंदुत्व की।ग्लोबल हिंदुत्व की वही बरखा बहार भारत में डाउ कैमिकल्स और मनसैंटो की सत्ता है।


    गुजरात नरसंहार,सिख संहार और बाबरी विध्वंस के लिए रेड कारपेट बिछाते हुए सिरे से अबाध पूंजी और दुनिया की सबसे बड़ी इमर्जिंग मार्केट को अमरिकी उपनिवेश बनाने के लिए मानवता के विरुद्ध युद्ध अपराधों को क्लीन चिट देने वाली अमेरिका सहित समूची ईसाई दुनिया भारत में गिरजाघरों पर हो रहे हमलों के सिलसिले में धर्म की स्वतंत्रता का राग अब अलापने लगी है।


    हमारे ईसाई मित्रों,स्वजनों को हम साफ कर देना चाहते हैं कि हमारा मकसद कतई इन हमलों को न्यायोचित ठहराने का नहीं है,लेकिन इन हमलों के जिम्मेदार हिंदू साम्राज्यवाद के विजयरथ के सारथी जो लोग हैं,हम उनकी भूमिका की बात कर रहे हैं।


    हमारे पुराने सहकर्मी कवि अरविंद चतुर्वेद के पहले कवितासंग्रह का शीर्षक इस सिलसिले में बेहद मौजू हैःचेहरे खुली किताब।


    हम इन हमलों के खिलाफ सिर्फ ईसाइयों की नहीं,समूची भारतीय जनता की गोलबंदी के पक्षधर हैं।क्योंकि यह मामला जितना ईसाइयों के खिलाफ है,उससे कतई कम नहीं है भारतीय जनता के खिलाफ।


    भारत में सिखों का संहार हुआ।ईसाई दुनिया और और उसके सबसे बड़ी हुकूमत पवित्रतम वैटिकन में सन्नाटा छाया रहा।


    ईसाई सत्ता के सबसे बड़े दावेदार अमेरिका सिख संहार के वास्तविक अपराधियों का बचाव करता रहा।


    बाबरी विध्वंस हुआ भारत में तो इसे इजराइल की नजरिया से यरूशलम पर कब्जे का ड्रेस रिहर्सल बना दिया गया और भारतीय राजनीति और राजनय दोनों इस्लाम और इस्लामी दुनिया के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के आतंक के विरुद्ध युद्ध में पारमाणविक पार्टनर बन गये।


    गुजरात नरसंहार में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ और उस दौरान मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र भाई मोदी को प्रधानमंत्रित्व के सबसे बड़े दावेदार के रुप में उभरते न उभरते उन्हें सारे आरोपों से मुक्त कर दिया उऩका वीसा रोके रहे अमेरिका ने और अब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के निजी मित्र हैं,जिनसे ओबामा गाहे बगाहे मन की बातें करते रहते हैं और ओबामा उन्हीं के कर कमलों में भारत के मुक्तबाजारी कायाकल्प की बागडोर सौंपे हुए हैं।


    यह पृष्ठभूमि है ,भारत में ईसाइयों और गिरजाघरों पर हमलों की,कृपया इस पर गौर करें।


    इस बीच इजराइल और अमेरिका के इस्लाम और इस्लाम के विरुद्ध सत्तर दशक के अंत से अब तक जो लगातार  युद्ध ,गहयुद्ध और गणतंतर वसंत है,भारत में हिंदुत्व के  संपूर्ण पुनरूत्थान से पहले,बाबरी विध्वंस से पहले और संघ परिवार के केंद्र की सत्ता पर पहले दखल से पहले कांग्रेसी हिंदुत्व के भारत ने भरपूर सहयोग दिया।


    हमारा कहना यह है कि अमेरिका इस इमर्जिंग मार्केट को कब्जा करने की नीयत से हिंदू साम्राज्यवाद का साझेदार बनकर भारत को जो मुक्त बाजार बनाता रहा है खाड़ी युद्ध और सोवियत विघटन के डाबल धमाके से,वह बूमरैंग हो रहा है।


    यह ईसाई दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है कि उसने फिर एक हिटलर पैदा कर दिया है,जो उसे बख्शने वाला नहीं है।भारत में वह शुरुआत हो चुकी है।


    भारत में सिखों,मुसलमानों,बौद्धों,गैर नस्ली नगरिकों,बहुजनों,जिन्हें जबरन हिंदू बनाया जा रहा है,आदिवासियों और शरणार्थियों के मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के हनन पर अगर अमेरिका और वैटिकन खामोश हैं तो ईसाइयों पर हो रहे हमले से हिंदू साम्राज्यवाद को रोकने की कोई राह बचती नहीं है।


    फासीवाद से दुनिया में जो कहर बरपा ,उसका इतिहास भी देखना जरुरी है।


    जैसे तालिबान को लाल होती दुनिया के रंग बदलने के लिए पाला पोसा अमेरिका ने और ओसामा बिन लादेन जैसे भस्मासुर पैदा किया अमेरिका ने,कम्युनिस्ट विरोधी पश्चिम ने कम्युनिस्टों के सफाये के लिए तबतक हिटलर और मुसोलिनी को खुल्ला खेल खेलने दिया,यहूदियों का नरसंहार होने दिया,जबतक न जर्मनी का दावानल उनके घरों को जलाने लगा और हिटलर ने औचक स्टालिन से समझौता कर लिया।


    स्टालिन को भी इस समझौते की कीमत भारी चुकानी पडी,जब हिटलर की सेनाएं मास्को की ओर कूच करने लगीं।सोवियत शीत ने हिटलर का दम निकाल दिया,वरना क्राति को तो तभी बाट लगनी थी।


    फासीवाद के उभार में पूरब पश्चिम का समान योगदान है।

    अब भारत में भी हूबहू वही हो रहा है।

    एकच हिटलर बोल रहा है,जिसकी पीठ पर अमेरिका और इजराइल सवार है।

    मुक्तबाजारी हितों के लिए अमेरिका,इजराइल और उनके सहयोगी फासीवादी हिंदू साम्राज्यवाद को महाशक्ति बनाने लगी है।


    इजराइल को इसका अहसास नहीं होगा क्योंकि इस्लाम के खिलाफ हिंदुत्व की जिहाद में उसे अपनी ही जीत दीख रही है और भारत में इतने यहूदी और यहूदी धर्म स्थल भी नहीं है,जिनपर हिंदुत्व के विजयपताका लहराने की गुंजाइश है।


    भारतीय जनता के चौतरफा सर्वनाश के लिए चाकचौबंद इंतजाम बतौर फासीवाद के जिस महाबलि को जनमा है अमेरिकी कोख ने,संजोग से ईसाइयों और गिरजाघरों पर वही हमला कर रहा है।यह निर्मम कटु सत्य है।


    बयानों से कुछ नहीं होने वाला।


    अबाध पूंजी के हितों में अमेरिका अब भारत पर न आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है और न परमाणु प्रतिबंध।अभी अभी रक्षा बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए खुला है।अभी अभी बीमा बाजार खुला है।खुदरा कारोबार भी अलीबाबाओं के हवाले हैं।


    सबसे बड़ा कटु सत्य यह है कि अमेरिका कंपनियों के हितों के मुताबिक फासीवाद की यह बहार है और भारत में हिंदू साम्राज्यवादी फासीवादी अशवमेध अमेरिकी हितों के ही मुताबिक है।इसलिए अमेरिका उसपर अंकुश लगायेगा नहीं।


    जैसे हमले सिखों और मुसलमानों,बहुजनों और आदिवासियों,अनार्य नस्लों पर लगातार होते रहे हैं,संजोग वश शत प्रतिशत हिंदुत्व के एजंडे और 2021 तक भारत को ईसाईमुक्त इस्लाम मुक्त बनाने के संघ परिवार के महती एजंडे के तहत वैसे ही हमले अब ईसाइयों और गिरजाघरों पर हो रहे हैं।


    इससे भी कटु सत्य यह है कि भारत के ईसाइयों और गिरजाघरों की सुरक्षा के लिए बयान और राजनय की रस्म अदायगी के अलावा न अमेरिका कुछ करने जा रहा है और न वैटिकन।आखिरकार भारत के ईसाई काले हैं,जिनकी परवाह पश्चिम  को नहीं है।


    अमेरिका राष्ट्रपति बाराक ओबामा के धर्म स्वतंत्रता के माहन उद्गार और राणाघाट के जघन्य बलात्कार कांड पर महामान्य पोप के बयान से हिंदू साम्राज्यवाद के अश्वमेधी आक्रमण रुकेंगे नहीं।


    उन्हें यह समझना चाहिेए कि भारत में मुसलमान और सिख अगर हमलों के शिकार होंगे तो न ईसाई सुरक्षित होंगे और न गिरजाघर।शत प्रतिशत हिंदुत्व में बाकी धर्म अनुयायियों के खात्मा का एजंडा है,हमले इसीलिए।



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    आज  भोपाल में होने वाले आदिवासी मंत्रणा परिषद की बैठक के पूर्व एकता परिषद माननीय मुख्यमंत्री महोदय पत्र भेज कर अपना विरोद दर्ज किया। 


    16 मार्च 2015
    प्रति,
    माननीय मुख्यमंत्री महोदय
    मध्यप्रदेश शासन
    भोपाल, मध्यप्रदेश।

    विषय- आदिवासियों की जमीन खरीदने पर प्रतिबंध को जारी रखने के संदर्भ में।

    आदरणीय शिवराज सिंह जी

    इस पत्र के माध्यम से मैं आपका ध्यान 15 मार्च 2015 को पत्रिका समाचार पत्र में प्रकाषित खबर 'आदिवासियों की जमीन अब गैर आदिवासी खरीद सकेंगे की ओर आकर्षित करना चाहता हूं जिसमें उल्लेख है कि मध्यप्रदेष सरकार के द्वारा आदिवासी मंत्रणा परिषद में इस आषय का प्रस्ताव लाये जाने की तैयारी है जिसके अंतर्गत मध्यप्रदेष भूमि राजस्व संहिता की धारा 170 क, 170 ख, 170 ग एवं 170 घ में आदिवासियों को भूमि अधिकार संबध्ांी दिये गये सुरक्षा के प्रावधान को समाप्त किया जाना है।

    मध्यप्रदेश की कुल आबादी के 21.1 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। इस प्रकार के निर्णय से लगभग 1.5 करोड की आबादी का हित प्रभावित होगा। इस समुदाय के साथ सदियों से अन्याय और शोषण हो आ रहा है। आदिवासी अंचलों में लोगों ने इस उम्मीद के साथ सरकार को चुना कि पूर्व में उनकी छीनी गयी जमीनों को सरकार वापस दिलायेगी और भूमि अधिकार का पुर्नवितरण होगा। किंतु ठीक इसके उलट इस तरह की प्रक्रिया को प्रारंभ करने का मतलब है कि जो कुछ संसाधन आदिवासियों के पास है उसको छीनने की प्रक्रिया को वैधानिकता प्रदान करना है। मध्यप्रदेश शासन के द्वारा उठाया जाने वाला यह कदम प्रदेश की आदिवासी जनता के साथ अन्याय और उनको कमजोर करने की प्रक्रिया है। इसलिए एकता परिषद इस कदम को घोर विरोध करती है। 

    आदिवासी संस्कृति, परपंरा और प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकार को बनाये रखने के लिए ही पेसा कानून और राजस्व संहिता की धारा में अधिसूचित क्षेत्रों में गैर जनजातीय समुदाय के दखल रोकने के लिए प्रावधान किये गये थे। इसके अंतर्गत प्रावधान है कि कोर्इ भी गैर जनजातीय समुदाय अधिसूचित क्षेत्रों में जिला कलेक्टर की अनुमति के बिना न तो जमीन खरीद सकता है और न ही मकान बना सकता है, किंतु इन कानूनों और प्रावधानों के लागू न होने के कारण अधिसूचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गैर जनजातीय समुदाय का दखल और संसाधनों पर नियंत्रण बढा है। इससे स्थानीय स्वषासन की प्रक्रिया भी बाधित हुर्इ है।
    पूर्व में आदिवासी समुदाय को आबंटित की गयी भूमि अथवा उनके मालिकाना हक की भूमि का भौतिक सत्यापन न कराने और भौतिक कब्जा सुनिषिचत न कराने के कारण बड़े पैमाने पर आदिवासी समुदाय की जमीने गैर आदिवासी समुदाय के लोगों के द्वारा गैर कानूनी ढंग से कब्जा की गयी है। आदिवासी समुदाय की जमीन जो गैर कानूनी ढंग से गैर आदिवासी समुदाय को हस्तांतरित की गयी है, उनको वापस कराने की बजाय राजस्व संहिता में किये जाने वाले इस प्रकार के संषोधनों से प्रदेष की 21.1 प्रतिषत आदिवासी आबादी का हित प्रभावी होगा।

    मेरा आपसे विनम्र आग्रह है कि इस प्रकार की परिचर्चाओं और संभावित कार्यो पर पूर्णं विराम लगायें जिससे कि आदिवासी समाज कमजोर होता है।

    अत: आपसे आग्रह है कि मध्यप्रदेष भूमि राजस्व संहिता के अंतर्गत आदिवासियों की भूमि अधिकार की संरक्षा के लिए बनाये गये प्रावधान धारा 170 क, 170 ख, 170 ग, एवं 170 घ में किसी भी प्रकार के संषोधन न करे और तुरंत ही इस बात को सुनिशिचत करें कि पूर्व में आदिवासियों की जो जमीन गैर आदिवासियों को हस्तांतरित की गयी है उसकी जांच कराकर आदिवासियों को वापस करायी जाये।

    सादर सहित

    आपका

    (रनसिंह परमार)
    अध्यक्ष
    प्रतिलिपि-
    1माननीय आदिम जाति कल्याण मंत्री, मध्यप्रदेश शासन।
    2समस्त माननीय संसद सदस्य गण, लोक सभा क्षेत्र, मध्यप्रदेश।
    3समस्त माननीय विधायक गण, मध्यप्रदेश विधान सभा।

    -- 

    ANEESH THILLENKERY          

    National Convener                 
    Ekta Parishad,                      Ekta Parishad,
    Gandhi Bhavan,                    2/3A,2nd Floor,
    Shyamla Hills,Bhopal,         JangpuraAblock,
    Madhya Pradesh.                 New Delhi - 14
    Mob:9755988707                 Mo:9971964569
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    कालाधन ही अब इस देश की उत्पादन प्रणाली

    अमेरिकी अर्थव्यव्स्था से जुड़े मुक्तबाजार पर खतरे का अंदेशा

    पलाश विश्वास


    गौर करें कि देश के वित्तमंत्री अरुण जेटली  को राजनीति से शिकायत है कि वह देश के विकास के रास्ते पर अड़ंगे डाल रही है।


    संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयकों के अटके रहने के बीच सरकार ने आज विपक्ष से अपील की कि वह बाधाकारी भूमिका नहीं अपनाये क्योंकि देश को अपनी विकास दर को अगले वर्ष तक 8 प्रतिशत से अधिक ले जाकर चीन से आगे निकलने का ऐतिहासिक अवसर मिला है।


    गौरतलब है कि लोकसभा में मंगलवार को आम बजट का पहला चरण पूरा हो गया। बजट पर चर्चा के बाद वर्ष 2015-16 के लिए लेखानुदान की मांगों, वर्ष 2014-15 की अनुदान की अनुपूरक मांगों और उससे संबंधित विनियोग विधेयकों को मंजूरी दे दी गई।


    वित्त मंत्री अरुण जेटलीने कहा कि मोदी सरकार का लक्ष्य देश की विकासदर को 7 से 8 प्रतिशत तक ले जाना है। अपने संसाधनों को सक्षम बनाने, गरीबी हटाने और सामाजिक सुरक्षा के उपायों में तेजी लाने के लिए धन की जरूरत होगी। धन तभी मिलेगा, जब देश की विकासदर में तेजी आएगी। बाधा न बने विपक्ष : वित्त मंत्री ने कहा कि विकासदर के मामले में हम चीन से आगे निकल गए …


    जेटलीने कहा कि हमने अगले तीन वर्षों में राजकोषीय घाटे को 4.1 प्रतिशत से कम करके 3 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। कृषि क्षेत्र का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सिंचाई समेत विभिन्न कृषिगत क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया है ताकि कृषि क्षेत्र काविकासहो सके। अगर भारत को विकासकरना है तब कृषि क्षेत्र का विकासजरूरी है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के बारे में विपक्ष के आरोपों पर उन्होंने कहा कि पिछले 10 महीने में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 11 बार कम की गई। जबकि पूर्व में लागत से कम कीमत पर बेचने के कारण तेल विपणन कंपनियों को 30 हजार करोड़ रुपये नुकसान हुआ था।


    नवउदारवाद की संतानों ने इस देश के साथ जो गद्दारी की ,उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है।


    अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं ने कारपोरेट और वैशिविक पूंजी के हितों में देशज उत्पादन प्रणाली को सिरे से खत्म करके भारत को जो अमेरिकी उपनिवेश बना दिया ,वह लंबे संघर्षों के बाद हमारे पुरखों की हासिल आजादी और हमारी संप्रभूता का बेशर्म राष्ट्रद्रोही हस्तातंरण है ।


    हमारी अर्थव्यवस्था इतनी निराधार है कि हम अमेरिका ले आने वाले वैश्विक इशारों से अपनी वित्तीय और मौद्रिक नीतियां तय करते हैं वह भी कारपोरेट और वैश्विक पूंजी और देशज कालाधन के हित में।कालाधन ही अब इस देश की उत्पादन प्रणाली है।


    राष्ट्रद्रोही तत्वों ने मिथ्या राष्ट्रवाद की आड़ में बायोमैट्रिक डिजिटल रोबोटिक क्लोन नागरिकों को सही मायमे में आधार नंबर देकर निराधार बना दिया है।अब आधार लाकर भी होंगे।कहा जा रहा है कि इसमें तमाम तरह के निजी दस्तावेज स्कूली सर्टिफिकेट से लेकर पैन कार्ड,आधार कार्ड वगैरह वगैरह स्कैन कराकर अपलोड करा दें तो कहीं भी आटोमैटिकैली आपके कागजात का बिना उन्हें दिखाये सत्यापन हो जायेगा।यानी बायोमैट्रिक तथ्य के अलावा आप निदजी तमाम दस्तावेज वहां रखेंगे। डिजिटल देश बनाने की दिशा में यह अगला चरण है।


    अब सबसे बड़ी खतरे की घंटी है कि वैश्विक मंदी का अब तक ,2008 की महामंदी में भी भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय जनगण पर खास असर नहीं हुआ।सिर्फ अरसे तक शेयरों के भाव गिरते रहे।लेकिन अब वैश्विक इशारों का मतलब कयामत है।


    दुनियाभर में पराधीन अर्तव्यवस्थाओं का हश्र हम देखते रहे हैं।हम शुरु से लगातार लिख रहे हैं कि डालर वर्चस्व और युद्ध,गृहयुद्ध,आतंक और धर्मोन्माद की अमेरिकी अर्थव्वस्था से भारतीय अर्थव्यवस्था को जोड़ना बेहद आत्मघाती साबित हो सकता है कभी भी।दुनिया के इतिहास भूगोल में भूकंप और सुनामी कभी भी कहीं भी संभव है और अमेरिका में भी संभव है।


    दुनियाभर के देशों को तोड़ने वाला अमेरिका टूटेगा नहीं,इसकी कोई गारंटी दे नहीं सकता।डालर वर्चस्व टूटेगा नहीं,इसकी भी गारंटी दी नहीं जा सकती।


    तो जैसे रुबल और मार्क टूटने पर इन मुद्राओं और अर्थव्यवस्थाओं का हाल हुआ है,जैसे समूचा यूरोप विकसित हो दाने के बाद उत्पादन प्रणाली से बेदखल होकर आर्थिक झंझावत से गुजर रहा है,उससे सबक नहीं लेते तो डालर वर्चस्व टूटने से उससे नत्थी हमारी अर्थव्यवस्था का क्या हाल होना है,यह अभी कहा नहीं जा सकता।जिसकी न कोई उत्पादन प्रणाली है और न जिसका कोई आधार है।




    अब शेयर बाजार ही अर्थव्यवस्था है।इंफ्रा बूम बूम के इस दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों के जमाने में भारतीय अर्थव्यवस्था का कोई बुनियादी आधार ही नही है।


    भारतीय अर्थव्यवस्था  का मतलब फर्जी आंकड़े,फर्जी परिभाषा, सहूलियत के मुताबिक आधार वर्ष में बदलाव,कारपोरेट हितों में निरंतर टैक्स छूट और आम जनता का अर्थव्यवस्था से थोक निर्वासन,रोजगार,आजीविका,नागरिकता,जल जंगल जमीन और राष्ट्रीय संसाधनों से निरंकुश बेदखली,फर्जी बजट,फर्जी राजस्व और संसाधन प्रबंधन,अमेरिकी फेड बैंक का दबाव और अमेरिका नियंत्रित आर्थिक संस्थानों का रिमोट कंट्रोल,रेटिंग एजंसियों का निरंतर हस्तक्षेप,फर्जी विकास दर,फर्जी विकास,फर्जी इंक्लुजन और डाउ कैमिकल्स मनसैंटो हुकूमत है।


    जिसका प्रबंधन कारपोरेट वकील के हाथों में है और मीडिया जिसे रंगीन कंडोम की तरह जनता के सामने भोग के कार्निवाल बतौर पेश कर रहा है।


    उत्पादन के आंकड़े,मुद्रास्फीति दर और वित्तीय घाटा,व्यापार घाटा और भुगतान संतुलन के आंकडे भी कारपोरेट सुविधा के मुताबिक हैं।


    बिना फासीवादी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के उत्पादन प्रणाली और उत्पादक शक्तियों का सत्यानाश करके ,देशज कारोबार,कृषि और देशज उद्योग को बाट लगाकर अबाध पूंजी की यह अंधी दौड़ असंभव है और इसीलिए वैश्विक पूंजी ने भारत में एक हिटलर की ताजपोशी की है।


    जो सिलसिलेवार अपनी नरसंहार दक्षता और विशेषज्ञता के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था की बची हुई संजीवनी शक्ति को पारमाणविक रेडिएशन से खत्म करता जा रहा है।


    इसे समझने की जरुरत है कि जैसे हम कहते रहे हैं कि जाति व्यवस्था,रंगभेदी नस्लवाद और मनुस्मृति शासन मुकम्मल एकाधिकारवादी वर्तस्ववादी अर्थव्यवस्था है जो बहुसंख्य जनता के बहिस्कार और एथनिक क्लीजिंग पर आधारित है,उसी तरह शत प्रतिशत हिंदुत्व और सन 2021 तक भारत को इस्लाममुक्त और ईसाई मुक्त करने की युद्धघोषमा और दस दिगंत व्यापी धर्मोन्माद भी कुल मिलाकर हिंदू साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था है,जो बिल्कुल अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था के हितो में हैं।


    हम बिना समझें बतौर राष्ट्र वियतनाम बनते जा रहे हैं,लेकिन हम वियतनाम जैसा प्रतिरोध भी नहीं कर सकते।



    अकूत तेलभंडार से समृद्ध अरब दुनिया,मध्यपूर्व और इस्लामी विश्व को जैसे अमेरिका ने तबाही के कगार पर पहुंचा दिया है,वहीं हाल ग्लोबल हिंदुत्व के प्रायोजन से भारतीय उपमहाद्वीप का होने वाला है।भारत के पड़ोसी देश भी भारत के साथ साथ इस महाविनाश के शिकार होंगे।


    हालात कितने संगीन है,इसे ऐसे समझें कि  अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टीन लगार्ड ने भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि अगली बार जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा तो इन बाजारों से बड़ी मात्रा में पूंजी निकलेगी। मंगलवार को क्रिस्टीन ने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन से मुलाकात की। क्रिस्टीन ने राजन के विचारों का समर्थन करते हुए तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच अधिक समन्वय की अपील की। उनके अनुसार ब्याज दरों में बढ़ोतरी बाजारों को चौंका सकती है।


    सवाल यह है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर और भारत के वित्तमंत्री इतने लाचार क्यों हैं।

    इस पर तुर्रा कारपोरेट लाबिंग और कारपोरेट फंडिंग से इस देश की राजनीति को जनता के पक्ष से कोई मतलब नहीं है।संसदीय सहमति से सारे आत्मध्वंसी सुधार सिर्फ वोट बैंक के गणित साधने की कवायद के तहत लागू हो रहे हैं और मिलियनरों बिलियनरों की राजनीति को न देश की पर वाह है और जनता की।यह अभूतपूर्व संकट है।


    मसलन तृणमूल कांग्रेस ने संसद में वित्तमंत्री की ओर से बंगाल सरकार के विकास विरोधी रवैये की आलोचना के से तिलसमिलाकर साफ कर दिया कि भूमि अधिग्रहण को छोड़कर उसे किसी किस्म के सुधार से ऐतराज नहीं है।राज्यसभा में क्षत्रपों के क्षेत्रीयदल ही मोदी की नैया पार लगा रहे हैं।


    तृणमूल कांग्रेस किसी नीति या अर्थव्यवस्था की समझ से ऐसा कर रही है ,ऐसा भी नहीं है।धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण की नूरा कुश्ती जारी रखते हुए मोदी और दीदी साथ साथ हैं तो धर्मनिरपेक्षता और धर्मोन्माद भी उसीतरह सुधार एजंडा पर एकाकार है।


    दीदी भूमि आंदोलन के जरिये चूंकि सत्ता में आयी है तो इस फंडे को वे किसी तरह छोड़ना नहीं चाहती।बंगाल में निवेश हो नहीं रहा है और जमीन की वजह से तमाम परियोजनाएं अटकी हुई हैं।


    दीदी भूमि अधिग्रहण की इजाजत नहीं देंगी।लेकिन बीमा बिल,खुदरा बाजार से लेकर श्रम कानून संधोधन,नागरिकता कानून संशोधन और भूमि अधिग्रहण से कहीं ज्यादा खतरनाक खनन अधिनियम और कोयला अधिनियम, जिसका बंगाल की जनता और बंगाल की अर्थव्यवस्था से सीधा नाता है,ऐसे तमाम कानूनों के मामले में वह संघ परिवार के साथ मुश्तैद खड़ी हैं।


    बाकी राजनीति की हालत भी वही है।इसके विपरीत जनता की अपनी कोई राजनीति है ही नहीं।वाम और बहुजन आंदोलन सिरे से हाशिये पर है और धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण की वजह से,अस्मिता सीमाबद्ध राजनीति के सत्तालोलुप तिलिस्म में भारतीय नागरिक का कोई वजूद ही नहीं है जो राष्ट्रहित के पक्ष में कोई आवाज बुलंद कर सकें।


    किसी तरह की जनपक्षधर गोलबंदी नहीं है तो प्रतिरोध असंभव।


    जनांदोलनों से भी कारपोरेट,मीडिया और पूंजी ने जनता को बेदखल कर दिया है।फर्जी आंदोलन और फर्जी विक्लप के बंवर में हम नियतिबद्ध वध्य बहुसंख्य जनगण है।


    भारत में मोदी के गुजराती पीपीपी माडल मेकिंग इन स्मार्ट बुलेट विकास पर कारपोरेट दांव कितना ज्यादा है,इसे इस तरह समझें कि  हितों के टकराव के आरोपों को देखते हुए अन्तिम पलो में इस प्रोजेक्ट से जुड़ा एक बड़ा टेंडर रद्द कर दिया गया।


    यह टेंडरस्मार्ट सिटीप्रोजेक्ट के लिए कंसल्टेंट नियुक्त करने के मकसद से दिया गया था। नरेंद्र मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटीप्रोजेक्ट की रफ्तार बढऩे से पहले ही रोड ब्रेकर आ गया। इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि 7,000 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट का आधार तैयार कराने में इंटरनैशनल कंसल्टेंसी फर्म मैकिंजी गैर आधिकारिक तौर पर अर्बन डिवेलपमेंट मिनिस्ट्री की मदद कर रही है।


    दूसरी ओर,हिताची इंडिया लिमिटेड व सीमेंस लिमिटेड ने सीआईआई अर्थात काँन्फेडरशन आँफ इंडियन इंड्रस्ट्री के साथ सरकार के महत्कांक्षी परियोजना १०० स्मार्ट सिटीस्थापन करने की परियोजना से संबंधित एक एमओयू पर हस्ताक्षर किये। यह हस्ताक्षर भारतीय औद्योगिक नीति संवधर्न बोर्ड के सचिव श्री अमिताभ कांत की उपस्थिति मे हुए। इस अवसर पर हिताची के प्रबंध निदेशक ईचिरो लिनो, सीमेंस लिमिटेड की तरफ से श्री सुनील माथुर और काँन्फेडरशन आँफ इंडियन इंड्रस्ट्री के महानिदेशक श्री चंद्रजीत बनर्जी ने हस्ताक्षर किये।


    पूत के पांव तो अभी पालने में हैं।बुलेटट्रेन के लिए एक किमी रेलवे लाइन बनाने की लागत करीब सौ करोड़ डालर बतायी जा रही है।जीवन बीमा के डेढ़ लाख करोड़,जो बीमाधारकों के प्रीमियम से निकाले गये हैं,निजी इंफ्रा कंपनियों क मुनाफे के लिए रेलवे के पीपीपी विकास में जोंक दिये गये हैं।जबकि विनिवेश का सारा कार्यक्रम जीवन बीमा निगम और भारतीय स्टेट बैंक की खरीददार पर निर्भर है।


    अब समझ लीजियकि यह बुलेट ट्रेन किसके लिए होगी।आपकी मदद के लिए खबर यह है कि

    1 अप्रैल से रेलवे प्लेटफॉर्म टिकट महंगा हो जाएगा। रेलवे ने फैसला किया है कि नए वित्त वर्ष से प्लेटफॉर्म टिकट के दाम 5 रुपये से बढ़ाकर 10 रुपये किए जाएंगे।


    साथ ही डिवीजनल रेलवे मैनेजर्स यानी डीआरएम को ये अधिकार भी दिया गया है कि मेले या रैली जैसे मौकों पर इसके दाम 10 रुपये से भी ज्यादा किए जा सकते हैं।


    रेलवे के मुताबिक प्लेटफॉर्म पर गैर-जरूरी भीड़ कम करने और यात्रियों को असुविधा ना हो, इस मकसद से प्लेटफॉर्म टिकट के दाम बढ़ाए जा रहे हैं।


    सीएनबीसी आवाज़ को एक्सक्लूसिव जानकारी मिली है कि रेलवे के कायाकल्प की जिम्मेदारी रतन टाटा को दी जा सकती है। रेलवे के मेकओवर के लिए मंत्रालय इन्नोवेशन काउंसिल बनाएगा, और इस काउंसिल की बागडोर रतन टाटा के हाथ दी जा सकती है।


    रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने बजट में इस कायाकल्प काउंसिल का एलान किया था। रेलवे के 2 मुख्य फेडरेशन एआईआरएफ, एनएफआईआर भी इस काउंसिल के सदस्य होंगे। इस काउंसिल में अरुंधति भट्टाचार्य, के वी कामत शामिल होंगे।



    इसी बीच,भारत ने निवेश आकर्षित करने का रास्ता बना रखा है और और अमेरिकी कंपनियां वहां निवेश के लिए आगे बढ़ने को तैयार हैं। यह बात भारत में काम करने वाली अमेरिकी कंपनियों के मंच के प्रमुख ने कही।

    अमेरिका भारत व्यापार परिषद (यूएसआईबीसी) के प्रमुख मुकेश अघी ने भारत में कारोबार का वातारण बेहतर बनाने की दिशा में नरेंद्र मोदी सरकार की पहल की तरीफ करते हुए कहा कि भारत निवेश के लिए तैयार है और अमेरिका आगे बढ़ने के लिए उत्सुक है। इस महीने यूएसआईबीसी की कमान संभालने वाले अघी ने कहा कि अमेरिकी कंपनियां विशेष तौर पर बुनियादी ढांचा क्षेत्र में 1,500 अरब डालर के निवेश के मौकों के लिए तैयार हैं।

    उन्होंने कहा कि अपनी स्थापना के 40वें वर्ष में यूएसआईबीसी की सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि द्विपक्षीय व्यापार में 500 अरब डालर की वृद्धि हुई। उन्होंने कल कहा कि चुनौतियां हैं लेकिन मैं इसे अवसर की तरह देखता हूं। अघी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक यात्रा शुरू की है। उम्मीदें बहुत हैं। यदि बड़े जहाज को मोड़ना हो तो समय तो लगता है। माहौल बदलने की कोशिश करें तो इसमें समय लगता है। इसमें शायद ज्यादा लंबा समय लगे।



    सभी बीमार सराकारी उपक्रमों के विनिवेश के लिए नया बगुला पैनल बनकर तैयार है।जिन कंपनियों को बंद करना है,उनमें सबसे ऊपर एअर इंडिया का नाम है तो दूसरी तरफ विदेशों में सेवा शुरु करने के लिए निजी विमानन कंपनियों को अब पांच साल के बजाय सिर्फ एक साल इंतजार करना है।ऐसा एअर इंडिया की कीमत पर हो रहा है।


    गौरतलब है कि सरकार ने उन सार्वजनिक उपक्रमों की सूची तैयार की है जिनका अगले वित्त वर्ष में विनिवेश करना है और इसकी शुरूआत अप्रैल में भेल से हो सकती है ताकि 2015-16 के लिए तय 41,000 करोड़ रुपए के विनिवेश लक्ष्य को हासिल किया जा सके।

    आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि विनिवेश विभाग ने भेल के विनिवेश के संबंध में लंदन, सिंगापुर और हांगकांग में रोड शो की प्रक्रिया पूरी कर ली है। भेल के 260.75 रुपए प्रति शेयर के मौजूदा बाजार मूल्य के आधार पर 12.23 करोड़ शेयरों की बिक्री से सरकारी खजाने में 3,200 करोड़ रुपए आएंगे।

    इस कतार में जो अन्य कंपनियां हैं उनमें एनएमडीसी, नाल्को और आईओसी शामिल हैं जिनकी 10-10 प्रतिशत हिस्सेदारी की बिक्री का प्रस्ताव है। इसके अलावा ओएनजीसी, पीएफसी और आरईसी में पांच प्रतिशत हिस्सेदारी की बिक्री की भी तैयारी है। सूत्रों ने कहा कि विनिवेश विभाग का मानना है कि भेल के शेयरों में स्थिरता है और संभव है कि यह समय हिस्सेदारी बिक्री के लिए बिल्कुल सही हो।

    सरकार की भेल में 63.06 प्रतिशत हिस्सेदारी है। मार्च 2014 में सरकार ने एक थोक सौदे के जरिए भेल की 4.66 प्रतिशत हिस्सेदारी 1,800 करोड़ रुपए में जीवन बीमा निगम को बेची थी।

    सूत्रों के मुताबिक अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में भी विनिवेश की प्रक्रिया जारी है। विशेष तौर पर ओएनजीसी की पांच प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के संबंध में सरकार सब्सिडी योगदान कार्यक्रम पर काम कर रही है ताकि निवेशकों के सामने स्थिति स्पष्ट की जा सके। अप्रैल से शुरू हो रहे वित्त वर्ष 2015-16 के लिए सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश के जरिए 69,500 करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा है।

    इसमें नुकसान दर्ज करने वाली और मुनाफे में चल रही, दोनों तरह की कंपनियों की अल्पांश हिस्सेदारी बेचकर 41,000 करोड़ रुपए और रणनीतिक हिस्सेदारी बेचकर 28,500 करोड़ रुपए जुटाना शामिल है।

    काले धन पर कानून लागू होने से पहले मामला रफा-दफा करने की स्कीम ला सकती है सरकार

    By  एबीपी न्यूज

    नई दिल्ली: काले धन वालों को सरकार राहत देने के मूड में दिख रही है. प्रस्तावित नए काननू में 10 साल की सजा का प्रावधान है लेकिन सरकार उससे पहले ही जुर्माने की रकम  लेकर मामले को रफा-दफा कर सकती है.

    काले धन पर सरकार जल्द कानून लाने वाली है. लेकिन अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक सरकार इससे पहले ही मामला रफा-दफा करने की स्कीम ला सकती है.

    इसके तहत अगर किसी के पास काला धन है तो वह पेनल्टी देकर जेल जाने से बच सकता है. छिपाये गये काले धन और संपत्ति पर तीन सौ फीसदी जुर्माना वसूलने का प्रस्ताव है. इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि अगर किसी के पास 1 करोड़ रुपये है तो उसे नियम के मुताबिक 30 फीसदी टैक्स यानि 30 लाख रुपये देना होगा. अगर यही 1 करोड़ रुपये काला धन है तो स्कीम के तहत टैक्स का 300 फीसदी जुर्माना देना होगा. यानि 30 लाख रुपये टैक्स पर  300 फीसदी जुर्माने की रकम 90 लाख रुपये होगी. इसका मतलब ये हुआ कि 1 करोड़ के काले धन पर 30 लाख का टैक्स और 90 लाख का जुर्माना मिलाकर कुल 1 करोड़ 20 लाख रुपये देना होगा.

    सरकार जो कानून बनाने वाली है उसके तहत कालाधन छिपाने वालों को 10 साल की सजा हो सकती है. अगर रिटर्न में विदेशी संपत्ति का पूरा ब्योरा नहीं दिया या आधा-अधूरा दिया तो सात साल की सजा का भी प्रावधान है.

    काले धन पर रोक के लिए प्रस्तावित कानून के मुताबिक दोषी को सेटलमेंट कमीशन में अपील का भी अधिकार नहीं होगा. हो सकता है कि सरकार काले धन पर प्रस्तावित इसी कड़े कानून का डर दिखाकर उससे पहले ही मामला रफा-दफा करने का रास्ता खोज रही हो.

    काले धन पर बिल की बड़ी बातें

    • विदेश में काला धन छुपाने पर 300 प्रतिशत जुर्माना

    • 10 साल की सजा का भी प्रावधान होगा

    • ऐसे आरोपी को सेटलमेंट कमीशन में भी पनाह नहीं मिलेगी.

    • विदेशी संपत्ति के बारे में रिटर्न दाखिल न करने या अधूरा रिटर्न दाखिल करने पर सात साल की कैद होगी.

    • विदेशी संपत्ति के स्वामी या उससे लाभ लेने वाले व्यक्ति को आय न होने पर भी रिटर्न दाखिल करना होगा.

    • काला धन जमा करने के लिए उकसाने वाले बैंकों के खिलाफ कार्रवाई होगी.

    • आयकर रिटर्न में बताना होगा, किस तारीख में खुला विदेशी बैंक में खाता.

    http://abpnews.abplive.in/ind/2015/03/18/article530041.ece/black-money



    Mar 18 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    WORDS OF CAUTION - Jaitley Advises Politicians to Shun Obstructionism


    New Delhi:

    Our Bureau

    

    

    Rejects pro-corporate charge against his budget; tells the Lok Sabha members that lower corporate tax is needed to encourage investment; backs auction of spectrum and coal

    India is at a historic juncture to take off on the path of faster development and politicians must shun obstructionism to support the country, Finance Minister Arun Jaitley said in Lok Sabha on Tuesday, reminding members that investments were needed to create jobs, infrastructure and alleviate poverty as he rejected the pro-corporate charge against his budget.

    "This is a historic occasion for all politicians to choose the path that can lead to faster development of the country... We should rise above the politics of slogans," the minister said in his reply to the budget debate.

    Jaitley presented his second and the first full budget of the Narendra Modi government last month. "Are we in the business of distributing poverty or are we in the business of generating wealth and distributing wealth, so that it can reach the poor," Jaitley said, winding up the debate in Lok Sabha. The Appropriation Bill was later passed by a voice vote, completing the first phase of the budgetary exercise in the lower house.

    PLEA TO NOT STALL REFORMS

    Jaitley`s appeal was largely directed at the opposition, which has been stalling some of the key legislations on land acquisition, coal and mine auctions.

    He said that India is expected to grow by 7.4% this year and the next year it should be 8% plus, and added that other macroeconomic parameters such as the current account deficit are expected to come down to 1%.

    "You prevent economic decision making, you prevent reform, you prevent investments, you prevent jobs, you prevent infrastructure and you perpetuate India as a poor nation. That is not a course that we are going to follow. That is not a roadmap on which we are going to go," the finance minister said, indicating the government's intent to push reforms.

    In an indirect reference to development policies taking a back seat under the previous UPA government, he said: "You concen trated on distribution of existing resource. And the steps which were required for higher growth rate took a back seat. The result was, we were caught between two stools and we fell down. I don't want to commit the same mistake".

    `LOWER CORPORATE TAX NEEDED'

    The finance minister strongly rejected the charge that the government is pro-rich as it had proposed reduction of corporate tax to 25% from 30% over the next four years, saying the idea had been borrowed from the Direct Taxes Code (DTC) proposed by UPA's two finance ministers--P Chidambaram Pranab Mukherjee. He said the country needs investments and it is competing with other nations for not just overseas investments but also domestic investments as busi nesses will move where it is profitable to do business, pointing to their lower tax rates.

    The effective tax rate is around 23% globally, 21.9% in Asean nations and 19.66% in Europe, the finance minister pointed out."Who will invest in India if tax is 30%," he said, justifying the government's budget announcement to reduce corporate tax rate to 25%, while pointing out that this was suggested by the UPA in the DTC. "Investment will lead to jobs. Investment must also lead to profitability," he said, warning that if the country does not get investment, it will become a nation of traders. "I am requesting you with folded hands that let politics of obstructionism not be carried to a level that UPA now says, `I oppose every word of DTC'," he said in an emotional plea to the opposition. Referring to the issue of black money, Jaitley said the government would bring a new legislation in current session of Parliament, which would have provisions like 300% penalty and punishment up to 10 years for concealing overseas assets.

    BACKS AUCTIONS

    Talking about the coal sector, Jaitley said his government believes in auction. In this context, he said Manmohan Singh, as prime minister, also wanted auction of coal blocks in 2004 but could not implement the proposal till 2014. "We should learn the lessons" and "there should be no situation that a court summons a former PM", Jaitley said in an apparent reference to a legal notice sent to Singh by a Delhi court in connection with the coal block allocation scam.





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    Doms in Varanasi seek justice through honorable rehabilitation


    By Vidya Bhushan Rawat

     

    Hundreds of pilgrims seek to see the sunrise on the bank of Ganges in Varanasi and the boatmen go on live commentary of these ghats narrating the mythological details and the most poignant moment come when you see the Manikarnikaghat, Dashashwamegha Ghat and Harishchandraghat reminding you the stories of Raja Harishchandra's loyalty to his 'profession'. In an indirect reference, these are the same 'preaching' which ask you to do thy duty while 'result' is not thy concern. Secondly, Raja Harishchandra is 'applauded' because he remained defiant in 'asking' for 'money' amidst a great human tragedy in which a helpless woman does not have the money to 'pay' the charges for funeral which the Doms performs. It means that we should not show any human spirit and value to any one when situation warrants and just be 'committed' to our 'profession'. I think that is the most dangerous aspect of a philosophy which justified discrimination based on caste and gender.


    The references to Domraj often come in these mythologies and they continue to do the task of burning dead bodies at the Ghats and cleaning human excreta in the city. Most of the land meant for them is already occupied and big ghats have erupted on the bank. Nothing has changed for them. In fact, they reflect the criminal civilization which kept them subjugated for thousands of years and the independence that we got in 1947 has no meaning for them as the community remains untouchables among untouchables absolutely ostracized and thoroughly disenfranchised in the holy city.


    Officials in Varanasi claim that manual scavenging is absolutely abolished in the city and that there is not a single manual scavenger to be rehabilitated. It is strange and ironical. One would ask a simple question as where have the 'manual scavengers' gone? Is there any honorable rehabilitation done to them? Has untouchability finished from the 'holy city' and where does the 'holy shit' go if the city has become totally sanitized. These are some of the questions which need answer and introspection on part of the city which proudly claims to be the oldest city and a civilized one. Sorry, this is a city of Kabir, Ravidas and Buddha who revolted against brahmanical rituals and untouchability. So, attempt to show greatness of 'brahmanical rituals' in Varanasi need questioning.


    It was on March 10th that we had a gathering of Women Engaged in Manual Scavenging in Uttar Pradesh in Varanasi with the National Commission for Women. The local journalists had started coming in as one member of the Commission was visiting here. Some reporters had started coming before time and as usual show their 'hurriedness' to the organizers. Others started chatting with the women who had come from different parts of the state. One must realize that Women engaged in manual scavenging hail from Balmikis, Rawats, Helas, Bansfors, Halalkhors and Doms in Uttar Pradesh as well as Bihar. All these communities are the most marginalized and face the brunt of untouchability from within the Dalit communities too. Interestingly, so many of the civil society organisations, human rights groups sitting in Varanasi but none bothered about this issue. I was told by every one that manual scavenging is not prevalent in Varanasi. My only question to them is whether entire Varanasi is covered under the sewage system. If not then where does the entire filth go?


    The fact is Varanasi has all forms of manual scavenging and we will come to the 'original' form of manual scavenging by hand later but first demythise the fact that there does not exist any manual scavenging. Most of the municipal areas now have flushed toilets with septic tanks which need to be 'cleaned' in a month, six months or a year. Now, who clean them? And how do they clean them? Is there mechanical cleaning?  No none is available. These 'flushed' toilets are cleaned by hand manually and the human excreta is unloaded through buckets by these communities. There is bargain for the money and the behavior of the people is not just being rude but also humiliating. It seems they all think it is the job of these communities alone.


    It was interesting to see journalist speaking to these women and then turned to me in an attempt to dress me down. 'What are the organisations doing for them? You have called a meeting for 'manual scavenging' and 'these' people are asking for 'houses'. 'They earn a lot. They ask for Rs 500/- for cleaning one toilet. Can you imagine how big is it when people engaged in MNREGA do not get that much, he said. Do you have any figures of these people and then made a statement that these people just get everything and are not keen to do any other work.'


    I was listening to him patiently but my temper was running out of control. ' If I am coming from Delhi to tell you and the people in Varanasi that this heinous practice is still prevailing in this city then whose fault is it ? You people claim that there is no 'carrying night-soil overhead' and hence no 'manual scavenging' but the new act of 2013 define Sewage work, gutter, cleaning of septic tanks, work on railway platform apart from cleaning toilets is 'manual scavenging' and on that viewpoint itself the municipal authorities in Varanasi and elsewhere are on the wrong side and must be made accountable and answerable.


    Varanasi is being cleaned these days yet you can see filth and garbage everywhere. The roads are dusty and over-crowded with chaos and anarchy on the roads. Everywhere, it is those who have served the city for centuries they are facing the trouble. Their locations are under the threat of eviction. Doms and Hellas have no place to go. In the 'holy' city their only duty is to keep the city 'clean' but not to ask anything for them.

    Basanti Devi is from Manduwadih and along with 70 Dom families they are living on the one side of the railway track. An oral notice has been given to them to evict the land. 'We have been living here for over 40-50 years without any facilities. We have served people but we have no place to go? Where will our children go', she says. Others like Mehangi says that the community is in deep trouble as alcoholism is killing the community youths and hence they are unable to speak of their rights.


    "I am 20 years old but we have been staying here since my grand- parents' period. I have no children. I do clean toilets, wash it, pick up the latrine, clean septic tanks etc. I have to get into the septic tank and supply the 'maal' i.e. garbage of human excreta upward to throw it away. It's a kind of daily wage work which we do regularly though not really able to get it daily. We do all kind of work related to sanitation. If the latrine is choked then we have to do it manually by pushing through hands', says Sanjay.


    The work is tough, filthy, dangerous and not a single persons job. It takes 12 hours to clean a septic tank and threat perception is very high. The total number of people engaged could be as low as 5. When I asked them about how a reporter of a leading daily was mocking at them claiming that there charges were very high, Sanjay responded,' Sir, it is full day work and if there are five persons engaged in it and sometime more than that, then how much one earn in a day. Most of the time, we get between Rs 50-100 and they claim it is too much. It is more humiliation. People don't even want to pay money for the work we do', he emphasized.


    Initially, I thought that the work may be just of cleaning the septic tanks and of males alone but to my utter surprise and shock, Varanasi's Doms children and female wards too are engaged in the work. Sehjanti and other women go to nearby areas to clean the latrines and get Rs 50/- for their work for a month from one family. They too are engaged in cleaning of septic tanks and big pits which fills in regular intervals in a month period to a year's period but work is coming daily.


    Look like we are talking in the 16th century when laws of Manu were prevalent and there was no constitution. Can you imagine people not getting access to water and being threatened with Rs 2000 fine for getting access to water? The people who clean the city, pick our garbage, cremate our dead ones are treated as untouchables and do not have a space to live. Can we imagine people not having access to water for a fortnight? Can we imagine people not able to take bath for a month? It is easier for us to claim that Doms or Mushahars or Bansfors are 'dirty' but have we asked a simple question as why do they remain unclean? They clean your city, burn your dead ones but have no right to life. No right to live in dignity. Moreover, we do not feel offended to see their condition. We assume that if it is their 'fundamental' duty to do this work. Isn't it utterly disgraceful? When I asked Sanjay, a local youth as why they continue to do this work? 'What do we do'? 'Our parents did it, our grandparents did it. My mother did it. We never went to any school', he reply. 'We too want to see our children becoming officer but how do we do it? Unless government help it is difficult. At this moment, the untouchability and caste system is so powerful that none will give them any other 'job', Says Sanjay.


    'Who will give us job other than this? If we don't do this than what is the source of our survival? Even this money does not come with respect. There are so many questions with contempt. For small money people think they are doing a great favor to us' he says.


    Doms face untouchability at all level. Their children are not allowed to enter in the school. The other caste children keep a distance from them. Vikki inform me that he went to school for a few days and then when they came to know about his father, work and caste he was sent back. ' you don't need to study, he was told. A child who is not even 10 years of age, Vikky looks older than his age. He now help his family in the 'work'. He clean the latrine and also goes into cleaning the septic tank. It is so painful to see the children being taken for the 'work'.


    It is our combine failure. Whether it is Varanasi or Mumbai, Delhi or Hyderabad, Chennai or Banglore, Tirpuati or Madurai or Hawarh, manual scavenging is a shame, a blot on Indian nation. Unless, we are determined to abolish it from the root, it would not go away. It need strong and unambiguous national resolve as well as honorable rehabilitation of the communities engaged in manual scavenging, will ensure its complete elimination.


    It is not that the Doms don't want to come out of this filth but as a society we need to do make them feel that they are part of our society. We need a comprehensive package for them so that they are honorably rehabilitated and their children go to school.

    Varanasi Municipal Corporation has denied that manual scavenging does not exists there and that they do not need to rehabilitate it. According to the 2014 Act, the government was supposed to identify people engaged in manual scavenging and honorably rehabilitate them. Through this note, I am asking a few things and hope authorities will respond to it and act on it.

    1.     If manual scavenging is absolutely abolished in Varanasi then where are the people who were engaged in it ? How many of them have been rehabilitated by the government. Is there any record of related to their honorable rehabilitation?

    2.     Can the government inform us the exact number of Hellas, Rawats, Bansfors, Doms, Halalkhors are living in Varanasi. They are living in slums, in the outskirts and what is the status of their citizenship? Do they have right to vote and identity cards etc.

    3.     If Varanasi is Manual scavenging free then I want to ask how many areas are covered under the sewage system. If the entire city is not covered under the sewage system then what happens to the other areas outside the sewage areas. Can we get some data regarding the same?  Who clean the sewage lines in Varanasi? Does the municipality has any record of people being killed during cleaning process. If yes, how many and what was the compensation. Does the Corporation know that Sewage workers too come under the manual scavenging act after the definition was broadened?

    4.     There is a fact that most of Varanasi is not covered under Sewage system and hence people have made septic tanks and pit latrines which are cleaned by the people from these communities we have mentioned above. According to the Elimination of Manual Scavenging Act 2013, cleaning the septic tanks or pits etc too falls under the category of manual scavenging. Hence, we would like to know the exact number of persons engaged in this work and what action the municipal corporation plan to take in this regard? What will be your rehabilitation policy for these communities?

    5.     Doms are on the verge of eviction from Madudih and Sunderpur areas. There is a threat. They have not got any alternative place to live. None of them have identity cards and other facilities which government should have provided to them. We demand immediate action in this regard.

    6.     There is manual scavenging prevalent in Varanasi even according to old pattern of carrying nightsoil in buckets and baskets. When will government identity the exact number of people and rehabilitate them. Will it take action against people who are compelling people into it.

    7.     What is number of people employed by Varanasi Municiple Corporation ? How many of them hail from the manual scavenging communities? Are there any Hellas, Halalkhors and Doms in any of the Corporation's public work ? If not then why? Which communities are 'technically' recruited for 'sanitation work' in the corporation?

    These questions came in my mind when I glanced through government information that no manual scavenging exists in Varanasi. Social activists, organisations as well as media had no clue about it which is more than shameful. I was determined about it that it exists as the abovementioned questions were there in my mind. Being an old city, Varanasi could not have changed over night to become Scavenging free. Hence, I had send a team to investigate the matter and visit these busties who reported to me about septic tanks cleaning. None was clear about the manual scavenging act which includes all these practices into the definition of manual scavenging.  That apart, all these people I mentioned spoke to me and as well as in the Conference called by the National Commission for Women on March 10th in Varanasi. Later, I visited the Manduadih basti and have recorded the statements of the people. Right now, we hope that Uttar Pradesh government will take immediate action on it and not through denying the very existence of it but by the honorable rehabilitation of the people and fix accountability of the officials who have no clue about it.


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    Modi would Never support a Palestinan state and celebrates Netanyahu`s win!

    Indian PM Modi congratulates Netanyahu in Hebrew,while there was stony silence from the US


    Palash Biswas

    Prime Minister Modi congratulated Prime Minister Netanyahu in Hebrew following the Likud party's success in the elections.


    In a post from Modi's twitter account, he wrote in Hebrew "Mazel tov, my friend Bibi @Netanyahu. I remember our meeting in New York last September warmly," followed by a an English translation in a separate tweet.


    Around the world, Benjamin Netanyahu's re-election as Israeli leader was greeted with a mixed reaction.But Modi chose to clear the air and showcased his alignment wih Netanyahu..


    Is he behaving as the Prime Minister of India,this question has to be answered.Specifically while,there was stony silence from the US, where President Barack Obama has a difficult relationship with the Likud leader, and where American Jews may now need to readjust their thinking on Israeli policy.


    Historian Simon Schama was among those pondering the repercussions of the Israeli prime minister's statement this week that he would not grant a Palestinian state, and that he would continue to expand Jewish settlements.

    "There will now be immense soul-searching in [the] American Jewish community," said Schama, "not because Bibi won but because of what he said." The majority of American Jews did not want him to make his speech to the US Congress earlier this month, said Schama, and "his line on Palestine will deepen this rift".

    In European capitals those concerns echoed, with former Swedish prime minister Carl Bildt agreeing that Netanyahu's victory risked a "profound crisis on [the] Palestinian issue". He added that it was now "difficult to see any credible political path forward".

    In Ramallah, chief Palestinian negotiator Saeb Erekat said his re-election was due to "a campaign based on settlements, racism, apartheid and the denial of the fundamental rights of the Palestinian people".

    But further east, where Israel's diplomatic attention has now turned, Netanyahu's re-election was greeted "warmly" by Indian Prime Minister Narendra Modi, who embraced the result with the words: "Congratulations to my friend Bibi."



    Since Atal Times,India has been a close ally of Israel as much as Untied States of America.In accordance with Amirican interest Indian traditional pro Palestiinan diplomacy had turnaround long before with the demiose of Mrs Indira Gandhi.


    You may remember the tears of Yaser Arafat as he reached New Delhi after Indira`s assassination. Incidentally,Arafat was also assassinated.


    The mystery of the assassination of these leaders has not been solved as yet which changed the equation In South Asia as well as Middle East and suddenly India became the enemy of Palestine to support Israel and handed its internal security to Mossad.



    Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu said he will do everything in his power to ensure the "well-being and security" of all Israeli citizens.


    It literally means that he would do everything to destroy Palestine.


    Mind you,Netanyahu made his comments on Wednesday at the Western Wall in Jerusalem, a day after his conservative Likud party scored a resounding victory in Israel's parliamentary election.


    Netanyahu said earlier this week he would never support a Palestinian state, reversing the position he had held during his administration as the two sides conducted peace talks that eventually broke down.


    The election was viewed closely regarding its impact on U.S.-Israeli relations. Differences on key issues, including the Iranian nuclear negotiations and stalled peace talks, have led to increased tensions between the two governments.


    White House spokesman Josh Earnest said that  unprecedented security cooperation between the United States and Israel will continue, and he voiced support for a two-state solution with Israel and the Palestinians.It means that United States of America woul never support a Palestinian state.


    Meanwhile, Senior Palestinian Authority official Abdullah Abdullah expressed disappointment at the results.

    "Unfortunately it looks that the Likud will form the next government, and that means the old policy will continue," Abdullah said. "Netanyahu was very clear in his last days of the campaign that he will never allow a Palestinian state, he will not withdraw one centimeter from the occupied Palestinian territories, Jerusalem will stay united as the capital of Israel and that means it closes all the options for peace negotiations."

    The Palestinians are now likely to press ahead with their attempts to bring war crimes charges against Israel in the International Criminal Court.

    On the other hand,a U.N. spokesperson, speaking on behalf of Secretary-General Ban Ki-moon, said it will be incumbent on the new Israeli government to create the conditions leading to a final peace deal with the Palestinians. He said Israel should take steps including a cessation of illegal settlement building on occupied Palestinian land.

    In Brussels, EU foreign policy chief Federica Mogherini said the bloc is committed to working with the incoming Israeli government on a "mutually beneficial relationship" and on relaunching the Middle East peace process.

    In an interview with VOA, Middle East expert Aaron David Miller said the victory of Netanyahu's Likud party does not mean the end for Middle East peace talks.

    "The peace process will never die, it's like rock 'n' roll, it is essentially frozen," Miller said. "Whether or not the prime minister for campaign purposes or out of ideology walks back his commitment, I find much less consequential. Reportedly, he's made commitments privately which endorses this view. So which one is it, his public commitment, his private commitment?

    "I suspect that in the next 20-plus months, there will be an effort at least to prevent matters from deteriorating, and that could involve some sort of effort on the part of the [U.S. Secretary of State John Kerry]," he said.

    israelnationalnews.com reported:Prime Minister Binyamin Netanyahu and his main challenger, Labor chairman Yitzhak Herzog, engaged in last minute verbal jousting ahead of the ballot boxes closing at 10 p.m. on Tuesday night.


    Netanyahu clarified that if he is given the nod by President Reuven Rivlin to get first crack at forming a coalition government, he intends to create a right-wing government.


    "A leftist government will be dependent on the Arab list and will submit the whole way" in making concessions, warned Netanyahu. "A unity government will not be formed with Labor, there is no way to bridge the gaps between us."


    The prime minister's mention of the joint Arab list comes after Arab party head Ayman Odeh said "after the elections, we will listen to what Herzog has to say and then we will decide."


    The Arab list has been showing strongly in polls, garnering between 11 and 13 seats and coming in as the third largest party in numerous polls, meaning Herzog could indeed find himself dependent on a coalition with them to reach the needed 61 seat majority in forming a coalition.


    "The revolution is in our hands, go out and vote," urged Herzog during a visit to Modi'in. "This is a fateful battle on the future of the state."

    Turning his sights on Netanyahu, who warned earlier that massive Arab voter turnout threatened the future of a nationalist government, Herzog said "Netanyahu's panic is embarrassing."


    "Those who want a prime minister who cares about citizens and doesn't incite or discriminate needs to get up, go out and vote," said Herzog. "Let it not turn out tonight that we get a radical government of Netanyahu and (Baruch) Marzel who will break apart Israel. There is still time to get up and vote."


    Herzog's choice of words in saying the right will "break apart" Israel may be seen as ironic, given that in late 2013 he himself revealed his plan is to divide Jerusalem and give up massive swathes of Judea and Samaria in forming a Palestinian state.


    As for Marzel, the Yachad-Ha'am Itanu joint list with his Otzma Yehudit party has been appraised by many as being the key for a right-wing coalition, given that if it fails to pass the threshold percentage Likud may be unable to form a coalition.


    Walla! reported that the Yachad list is a few thousand votes short of passing the threshold with an hour left to go, although there are no official statistics until thevoting ends and the counting begins.



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  • 03/19/15--04:34: संपूर्ण निजीकरण के लिए बहुत बड़ा विनिवेश लक्ष्य सेबी ने नयी कंपनियों को जनता की जेब से पैसे निकालने की दे दी छूट आर्थिक प्रबंधन का कार्यभार तेजी से रिजर्व बैंक के हाथों से छीनकर सेबी को हस्तांतरित करने की तैयारी भारत के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के वाहक हिंदू साम्राज्यवाद और इजराइल का यह नायाब गठबंधन अब भारतीयमहादेश ही नहीं,पूरी दुनिया के लिए बेहद खतरनाक होने लगा है।अमेरिका भी डरने लगा है कि जो भस्मासुर उसने पैदा कर दिया है, कहीं वहीं अमेरिकी वर्चस्व का अंत न कर दें। पलाश विश्वास
  • संपूर्ण निजीकरण के लिए बहुत बड़ा विनिवेश लक्ष्य

    सेबी ने नयी कंपनियों को जनता की जेब से पैसे निकालने की दे दी छूट

    आर्थिक प्रबंधन का कार्यभार तेजी से रिजर्व बैंक के हाथों से छीनकर सेबी को हस्तांतरित करने की तैयारी

    भारत के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के वाहक हिंदू साम्राज्यवाद और इजराइल का यह नायाब गठबंधन अब भारतीयमहादेश ही नहीं,पूरी दुनिया के लिए बेहद खतरनाक होने लगा है।अमेरिका भी डरने लगा है कि जो भस्मासुर उसने पैदा कर दिया है, कहीं वहीं अमेरिकी वर्चस्व का अंत न कर दें।



    पलाश विश्वास


    संपूर्ण निजीकरण के एजंडे को अंजाम देने के लिए अगले वित्त वर्ष में बहुत बड़ा विनिवेश लक्ष्य तय किया गया है।


    एक तरफ सेबी ने नयी कंपनियों को जनता की जेब से पैसे निकालने की दे दी छूट और नयी कंपनियों को आम जनता से शेयरों के मार्फत पूंजी वसूलने के लिए शेयर बाजार में पंजीकरण के नियमों में ढील दे रही हैं तो दूसरी तरफ बाजार नियामक सेबी अपनी बढी जिम्मेदारियों के तहत और अधिक खुदरा निवेशकों को पूंजी बाजार में आकर्षित करने, गतिशील बांड बाजार विकसित करने तथा सभी व्युत्पन्न खंडों के लिए समान नियामकीय प्रणाली बनाने के लिए एक नये खाके पर काम कर रहा है।


    किस्सा यह है कि ई-कॉमर्स कंपनियां शेयर बाजार से पैसा जुटाने के लिए सेबी से आईपीओ के नियमों में ढ़ील देने की मांग कर रही हैं। कहा जा रहा है कि  सेबी अभी इन कंपनियों को आईपीओ में कोई ढील देने के लिए तैयार नहीं है। सेबी का कहना है कि वह निवेशकों के हितों के रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। कंपनियों को शेयर बाजार से पैसा जुटाने के लिए विस्तृत जानकारी देना जरूरी है साथ ही इसमें वही कंपनियां शामिल हो सकती हैं जिनकी वित्तीय स्थिति मजबूत है।दूसरी ओर,लिस्टिंग के नियमों में ढील भी दी जा रही है।


    बाजार नियामक का यह कदम इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार अगले वित्त वर्ष में घोषित लक्ष्य के मुकाबले बहुत ही ज्यादा करीब 10 अरब डालर का विनिवेश लक्ष्य तय किया है।कहने को  इसके तहत सार्वजनिक कंपनियों के शेयरों का और बडा हिस्सा आम निवेशकों को दिलवाने पर जोर होगा।दरअसल ये सरकारी उपक्रमों को औने पौने दाम पर देशी विदेशी निजी कंपनियों को बेचने की साजिश है और सत्ता में बैठे तमाम कारपोरेट दलाल इस एजंडे को अंजाम देने लगे हैं।


    नया रोडमैप सरकार तथा अन्य भागीदारों से विचार विमर्श से तैयार किया जा रहा है।नये बगुला पैनल का गठन विनिवेश के अधूरे एजंडे के तेजी से अमल के मकसद से किया गया है,जाहिर है।


    तिलिस्म इतना घना है


    मुक्तबाजारी तिलिस्म इतना घना है और सुचनाओं पर जंजीरें इतनी जकड़ी हुई है कि भारतीय जनगण को भारत बांग्लादेश मैच में रोहित शर्मा के मैच के अलावा आज कुछ दूसरा दीखेगा नहीं।सुबह अखबारों को पढ़ते हुए और टीवी चैनलों को देखते हुए क्रिकेट कार्निवाल की चकाचौंध रौशनी में भारत के भविष्य पर मंडराती काली छाया कहीं नजर नहीं आयी।इस पर तुर्रा यह कि रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा और करण जौहर की फिल्म 'बॉम्बे वेलवेट' का ट्रेलर सामने आ गया है। अनुराग कश्यप ने अपने ट्विटर अकाउंट पर इस फिल्म का ट्रेलर लॉन्च किया है। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने इस फिल्म को भारत-बांग्लादेश के वर्ल्ड कप मैच के दौरान लॉन्च किया है। फिल्म में रणबीर एक स्ट्रीट फाइटर जॉनी बलराज का रोल कर रहे हैं, जबकि अनुष्का एक जैज सिंगर बनी हैं जिसका नाम रोजी है।


    हेल्थ हब में लाचार हम


    मैं अब बेहतर हूं।न स्वाइन फ्लू है और न मलेरिया है औरजान को खतरा नहीं है।महीने भर सुस्त रहने के बाद,दस दिनों तक कड़ाएंटीबायोटिक लेने के बाद सोलह सौ रुपये के ब्लड टेस्ट से पता चला कि बीमारी की वजह लीवर में बैक्ट्रीयल इंफेक्शन है और इसी वजह से रक्तचाप गिरा है,बुखार हो रहा है और डीहाइड्रेशन हो रहा है।दस दिनों के इलाज में पांच छह हजार फूंक चुके है और सिलसिला जारी है।


    हमारा यह ब्यौरा भोगा हुआ यथार्थ है।


    अभी रिटायर होने में एक साल है और महंगा इलाज संभव है।अगले साल इसी वक्त बीमार रहूंगा तो इलाज कराने की औकात नहीं है।


    देश को हेल्थ हब बनाने के लिए पूंजी को खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी बना दने से आम जनता की बीमारियों के इलाज का कोई रास्ता बचा नहीं है।स्वास्थ बीमा के नाम पर डकैती का सिलिसिला बीमा बिल पास होने से और तेज जरुर हो गया है।


    स्वाइन फ्लू को लेकर हंगामा है।कोलकाता में माकपा के बड़े नेता गौतम देब के स्वाइन फ्लू से अस्पताल में भर्ती हो जाने पर मास्क 270 के भाव थोक बिक रहे हैं।देश भर में एक लाख लोग भी स्वाइन फ्लू से बीमार नहीं है।आंकड़ों में जितने लोग बीमार हैं उससे दस गुणा लोग इस बीमार की चपेट में आकर बिना इलाज के ठीक भी हो चुके हैं।

    हू की महामारी चेतावनी कुल मिलाकर मल्टीनेशनल दवा कंपनियों की मुनाफावसूली है।स्वाइन फ्लू ,हेपेटाइटस भी और एड्स के कहीं ज्यादा लोग पेट की तमाम बीमारियों से,मधुमेह से,टीबी से और कैंसर से मर रहे हैं।वैक्सीन का कारोबार फल फूल रहा है।ब्रांडेड दवाओं के कीमती वक्त में जीवन रक्षक दवाइयां नदारद हैं।


    दिशाएं पूरी तरह गायब

    इस लाचार समय में सामाजिक यथार्थ बीहड़ हैं और दिशाएं पूरी तरह गायब हैं।हम सारे लोग अंधेरे में चौराहे पर दिशाएं टटोल रहे हैं और दिशाएं कहीं मिल नहीं रही हैं।


    ऐसा पहली बार हो रहा है कि अस्मिताओं के ठेकेदार तमाम क्षत्रप आर्थिक सुधारों की नैय्या पार लगा रहे हैं और भारत की संसद कारपोरेट लाबिइंग और कारपोरेट फंडिंग के तहत कारपोरेट रणनीति के तहत कारपोरेट एजंडे के मुताबिक चल रही है।


    इस पर किस्सा यह है कि बजट सत्र के दौरान अहम बिलों पर चर्चा की वजह से देर शाम तक सदन की कार्यवाही चलती है। जिस वहज से संसद में मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है। इस बाबत जया बच्चन ने कल बजट सत्र के दौरान चर्चा के समय इस बात की शिकायत भी की।


    यानी इनके जीवन यापन में मच्छरों का हस्तक्षेप होताइच नहीं है और आम जनता की तकलीफों के बजाय इन मिलियनर बिलियनर सांसदों को संसद को मच्छर मुक्त करने की वैसी ही चिंता है,जितनी अपने वेतन,भत्तों,मुप्त विदेशयात्राओं और दूसरी सहूलियतों की।


    भारतीय राजनीति को बिजली पानी और शहरी जनता की सहूलियतों तक सीमाबद्द कर देने वाले नये ईमानदार राजनीतिक विकल्प की ईमानदारी का फंडा भी फूटने लगा है।


    चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी समेत छह अन्य दलों को मान्यता खत्म करने का नोटिस जारी किया है।आयोग ने सभी दलों को यह नोटिस पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान खर्च का ब्यौरा नहीं देने पर जारी‍ किया है। इन दलों को कड़ी चेतावनी जारी करते हुए आयोग ने इनके खिलाफ चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) नियम की धारा 16 (ए) लगाई है। गौरतलब है कि आयोग को नियमों का उल्लंघन करने वाले किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की मान्यता रद्द करने या समाप्त करने का अधिकार है।


    बहरहाल, आयोग ने इन दलों को आदेश का अनुपालन करने के लिए 20 दिनों का अंतिम समय दिया है।


    सबसे भयंकर राजनय के भगवे करण और विदेश नीति के हिंदुत्व पर खामोशी

    भारत की संसद विदेश नीति और राजनय पर खामोश है और राष्ट्रहित के खिलाफ विदेश नीति और राजनय  में हिंदुत्व कार्ड खेल रहे हैं मोदी।


    सार्क शिखर सम्मेलन से लेकर मारीशस यात्रा तक यह सिलसिला जारी है और भारत के महान जनप्रतिनिधियों ने भारत की विदेश नीति और राजनय के भगवेकरण पर चूं तक नहीं किया है और अब तो हद हो गयी है।


    सबसे भयंकर तो यह है कि स्वतंत्र फिलीस्तीन राष्ट्र कभी न बनने देने के वायद के साथ चौथी बार इजराइल के  प्रधानमंत्री बन रहे कट्टरपंथी नितान्याहु के समर्थन में मजबूती से खड़े हैं भारत के प्रधानमंत्री।जबकि इस जीत पर अमेरिका तक में सन्नाटा है और अमेरिका में बसे यहूदी भी नितान्याहु को अमेरिकी संसद को संबोधित करने की इजाजत देना नहीं चाहते।


    खास बात यह है कि नितान्याहु के लिए पलक पांवड़े बिछाये संघ परिवार और ग्लोबल हिंदुत्व के विपरीत उनके आका अमेरिका ने इजरायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की जीत के बाद चुनावी अभियान के दौरान अरब-इजरायल समुदाय के मतदाताओं के लिए दिए गए बयान की निंदा की है।


    समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव जोश अर्नेस्ट ने बुधवार को संवाददाताओं से कहा, ''अमेरिका उस टिप्पणी से चिंतित है, जिससे अरब-इजरायली नागरिकों को हाशिए पर रखने की बात परिलक्षित होती है।'' उन्होंने कहा, ''यह मूल्यों और लोकतांत्रिक आदर्शो की अवहेलना करता है, जो हमारे लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण रहा है और अमेरिका तथा इजरायल दोनों को जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण है।''


    नितान्याहू ने मंगलवार को मतदान के दिन अपने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था कि अरब मतदाता बड़ी संख्या में मतदान के लिए निकल रहे हैं। दक्षिणपंथी सत्ता को बचाने का एकमात्र रास्ता मतदान केंद्रों पर जाना और लिकुड पार्टी तथा जियोनिस्ट युनियन के बीच की खाई को कम करना है।


    जियोनिस्ट युनियन की सांसद शेली याचिमोविच ने नितन्याहू के बयान को नस्लीय करार देते हुए उनकी निंदा की। अर्नेस्ट एकबार फिर इजरायल-फिलिस्तीन मतभेद के द्वि-राष्ट्र समाधान पर अमेरिकी समर्थन को दोहराया। अर्नेस्ट ने कहा, ''अमेरिका की लंबे वक्त से यह नीति रही है और यह राष्ट्रपति का नजरिया रहा है कि द्वि-राष्ट्र समाधान जारी तनाव और अस्थायित्व को समाप्त करने का बेहतर तरीका है।''

    भारत के प्रधानमंत्री भारत को इजराइल का अमेरिका से बड़ा पार्टनर बनाने पर तुला हुआ है और इसका सीधा मतलब है कि भारत में आने वाले दिनों में गैरहिंदुओं,दलितों की ,स्त्रियों की शरणार्थियों की और आदिवासियों की शामत आने वाली है।


    असम में नागरिकता की समीक्षा हो रही है,जिससे मुसलमानों को साथ साथ हिंदू बंगालियों की नागरिकता खतरे में पड़ने वाली है तो दंगो के नया सिलिसला शुरु करने का इंतजाम अलग से हैं।


    भारत के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के वाहक हिंदू साम्राज्यवाद और इजराइल का यह नायाब गठबंधन अब भारतीयमहादेश ही नहीं,पूरी दुनिया के लिए बेहद खतरनाक होने लगा है।अमेरिका भी डरने लगा है कि जो भस्मासुर उसने पैदा कर दिया है, कहीं वहीं अमेरिकी वर्चस्व का अंत न कर दें।


    बुनियादी जरुरतें,खाद्य सामग्रियां, बुनियादी सेवाएं,बिजली पानी ईंधन से लेकर शिक्षा चिकत्सा सबकुछ महंगी

    दूसरी ओर,अर्थव्यवस्था का हाल यह है कि आंकड़ों में विकास दर बल्ल बल्ले।मुद्रास्फीति  शून्य है और उत्पादन के आंकड़े भी बेहतर हैं।


    मजा देखिये कि मुद्रास्फीति शून्य है और बुनियादी जरुरतें,खाद्य सामग्रियां,बुनियादी सेवाएं,बिजली पानी ईंधन से लेकर शिक्षा चिकत्सा सबकुछ महंगी है।


    मुक्तबाजार में दाने दाने को मोहताज है बहुसंख्य जनगण।


    आजीविका रोजगार खत्म है।


    शिक्षा, चिकित्सा, पेयजल, ईंधन,परिवहन जैसी बनियादी सेवाें दिनोंदिन बाजार के हवाले हैं।


    फिरभी आप चाहे तो मोदी से भी बेशकीमती सूट और परिधान किश्तों पर खरीद सकते है।उपभोक्ता बाजार बल्ले बल्ले।


    ईटेलिंग के अलावा अब ई फैशन भी उफान पर है तो रंगभेदी सौंदर्य उद्योग की क्या कहें।


    न किसी को बच्चों के कुपोषण की चिंता है और न असहाय लोगों की बेरोजगारी और भुखमरी की,न आपदाओं की,न चौपट होती खेती की,लेकिन शौचालय अभियान जारी है।


    स्त्री उत्पीड़न रोकने के बजाय स्त्री को बाजार में खड़ा करने का कारोबर जोरों पर है और शौचालय उनका सुरक्षा कवच बताया जा रहा है।


    कितनी आसानी से बहल जाते हैं हम।


    किसी भी पोपुलर हथकंडे से बुनियादी मुद्दों को भूल जाते हैं हम।


    टिकट पांच का,प्लेटफार्म टिकट लेकिन दस रुपये का

    अर्थव्यवस्था का प्रबंधन ऐसा है कि न्यूनतम रेलवे टिकट पांच रुपये का है और प्लेटफारम टिकट दस रुपये का।


    आम जनता खबरों को आत्मसात करने से पहले निजी दिनचर्या के अनुभवों को सच की कसौटी बना लें तो भी यह तिलिस्म टूट सकता है।लेकिन कार्निवाल संस्कृति के बीच सामाजिक यथार्थ सिरे से लापता है।


    पहली बार ऐसा हुआ है कि अमेरिकी फेड बैंक के ब्याज दरों में वृद्धि की आशंका से भारत की अर्थव्यवस्था थरथरा रही है और निवेशकों की आस्था डगमगा गयी।


    भारत की अर्थव्यवस्था अब कुल मिलाकर निवेशकों की आस्था है,जिसे बहाल रखने के लिए नरसंहाक की निरम्मता से भी बाज नहीं आ रहा है राष्ट्र।


    इसीलिए सैन्य राष्ट्र तेजी से रेडियोएक्टिव होता जा रहा है।


    बहरहाल अमेरिका की केंद्रीय बैंकिंग प्रणाली फेड रिजर्व ने ब्याज दरें बढ़ाने से इन्कार कर दिया है। फेड रिजर्व के बैठक में यह निर्णय लिया गया कि फिलहाल महंगाई का दबाव बना हुआ है, इसलिए ब्याज दरों को बढ़ाने का उचित वक्त नहीं है।


    गौरतलब है कि भारत में मौद्रिक नीति तय करने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की है, जिस पर ब्याज दरें घटाने का लगातार दबाव बना हुआ है। वहीं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी बड़ी सावधानी से फैसले ले रहा है।


    गौरतलब है कि  अमेरिकी इकोनॉमी की स्थिति हालांकि धीरे-धीरे सुधर रही है, मगर महंगाई का दबाव बना हुआ है। कच्चे तेल की कीमतों में कमी के कारण महंगाई नियंत्रण में है लेकिन ये स्थाई नहीं है।


    फेड के चेयरमैन जेनेट येलेन का कहना है कि महंगाई 2 फीसदी के लक्ष्य पर आने के बाद ही दरें बढ़ाई जाएंगी। यही नहीं, यूएस फेड ने अपने स्टेटमेंट से संयम शब्द को भी हटा दिया है।


    बहरहाल अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने जून में दरें नही बढ़ने के संकेत दिए हैं। इसके साथ ही फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें बढ़ाने के समय पर भी कोई फैसला नहीं लिया है। अगली कुछ एफओएमसी बैठकों में ब्याज दरें बढ़ने की संभावना नहीं है। आर्थिक आंकड़ों को देखकर दरें बढ़ाने पर फैसला लिया जाएगा।


    इसके बावजूद डालर वर्चस्व का आलम यह है कि  फेड रिजर्व के इस फैसले से भारत जैसे उभरती अर्थवयवस्था में तेजी तो आएगी,जैसा नयेसिरे से आज भारतीयशेयर बाजार में बुलरन फिर चालू हो जाने से साबित है, लेकिन यह तेजी मूलतः लिक्विडिटी पर आधारित होगी।


    क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था कुल मिलाकर अब निवेशकों की आस्था है।


    क्योंकि वहां के निवेशक एफआईआई के माध्यम से शेयर बाजार में निवेश करेंगे। क्योंकि  थोड़ी सी भी हानि की आशंका में वे भारतीय अर्थव्यवस्था को मंझधार में फंसाकर अपने पैसे को निकाल कर चलते बनेंगे।


    इससे शेयर मार्केट के तेजी से गिरने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसलिए अर्थव्यवस्था में सुधार के बिना ज्यादा निवेश आना अच्छा संकेत नहीं है।

    लेकिन अर्थव्यवस्था में बुनियादी सुधार या मृत उत्पादन प्रणाली में प्राण फूंकने का कोई प्रयास डाउ कैमिकल्स और मनसेंटो की बिजनेस फ्रेंडली सरकार करना नहीं चाहती,जिसका सारा जोर अबाध विदेशी पूंजी प्रवाह और एफडीआई राज पर है।


    लेकिन सारा जोर दूसरे चरण के आर्थिक सुधार लगाकर मेकिंग इन अमेरिका के पीपीपी माडल विकास पर है।


    वित्तीय नीति की जगह अब धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद ने ले ली है।

    उसी तरह विदेशनीति की जगह भी  धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद ने ले ली है।

    इसी के साथ साथ भारत में आर्थिक प्रबंधन का कार्यभार तेजी से रिजर्व बैंक के हाथों से छीनकर सेबी को हस्तांतरित करने की तैयारी है।मसलन सरकार आरबीआई की सरकारी बॉन्ड्स को रेग्युलेट करने की पावर उससे छीनकर सेबी को देने की तैयारी कर रही है।


    माना जा रहा है कि सरकार के इस कदम से आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन और सरकार के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। मुद्रा बाजार से संबंधित अन्य पावर्स आरबीआई के पास ही रहेंगी।


    सरकारी सूत्रों के मुताबिक अरूण जेटली रिटेल निवेशकों को आकर्षित कर बॉन्ड मार्केट को फैलाने और मौद्रिक नीति के हस्तांतरण में सुधार करना चाहते हैं। उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली में इस रविवार को होने जा रही पॉलिसी मीटिंग में इस बारे में कोई निर्णय लिया जाएगा।


    इस बीच विनिवेश के रोज नये तरीके निकाले जा रहे हैं।मसलन वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने आज कहा कि सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में चुनिंदा आधार पर पूंजी डालने की पहल स्वागत योग्य कदम है लेकिन इस प्रक्रिया में पीछे छूट जाने वाले छोटे बैंकों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स की वरिष्ठ निदेशक गीता चुघ ने एक कॉन्फ्रेंस कॉल में कहा 'हमारे विचार से दक्षता को प्रोत्साहन देना दीर्घकालिक स्तर पर अच्छी रणनीति है, लेकिन अल्पकाल में इससे सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों में पूंजी का दबाव बढ़ सकता है।'




    इसी के मध्य सेबी ने नयी कंपनियों को जनता की जेबों से पैसे निकालने की छूट देदी है।इस सिलसिले में इकोनामिक टाइम्स ने लिखा हैः

    Regulator may ease norm mandating cos to use IPO proceeds to build tangible assets

    Market regulator Sebi could ease rules that govern the public listing of shares by startups in India, a move that will remove one of the biggest hurdles cited by new-economy entrepreneurs who now look overseas while planning an initial public offer.

    The Securities & Exchange Board of India could scrap norms that require companies to use proceeds from a public listing to build tangible assets or buy plant and machinery, according to a Reuters report, and the regulator is preparing to unveil a consultation paper later this month on listing norms for micro, small and medium enterprises, sources in the department of micro, small and medium enterprises told ET.

    इकानामिक टाइम्स का यह बजट भी बेहद मौजूं है,जिसमें खुलासा किया गया है कि डाउ कैमिकल्स और मनसैंटो की हुकूमत में आखिर इस मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था से फायदा किसे हो रहा हैः


    Mar 19 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    Bull-ied By The Budget



    

    

    Investors betting on a post-Budget market surge have mostly made money . This year has been an exception with the Sensex falling 3.1% from the closing levels of February 28 even though the market broadly welcomed the Budget. Some analysts say the rate cut soon after the Budget dried up the supply of positive news or triggers, as another cut in the near future was ruled out. Indian markets had surged in the past year because of expectations that economic growth would pick up because of measures introduced by the Modi government. Expectations may have been ahead of reality and investors are now focussing on US Fed's interest rate policy and March quarter results, reports Rajesh Mascarenhas.






    किसानों के लिए अनंत वधस्थल यह मुक्त बाजार

    सोने की चिड़ियाअंग्रेज लेकर गये नहीं,हमने उसे चालीस लाख चोरों के हवाले कर दी है

    देशभर की प्राकृतिक संपदा,जो असली सोने की चिड़िया है,दरअसल उसके कारपोरेट लूट कास्थाई बंदोबस्त हो गया।क्षत्रपों को उनका हिस्सा समझा कर।


    पलाश विश्वास

    भारत सोने की चिड़िया अब भी है।


    जो इसे लूटकर अपना घर भरते रहे हैं,उन्होंने हमें यकीन दिलाया है कि अंग्रेज सोने की चिड़िया लेकर भाग गये हैं।


    इस पर आगे चर्चा करेंगे सिलसिलेवार।


    सिर्फ इतना समझ लीजिये कि दीवालिये देश में अरबपतियों की यह बहार नहीं होती और न स्विस बैंक में बशुमार खजाना भारतीयों के होते।

    हम शुरु से लिख रहे हैं कि भूमि अधिग्रहण से ज्यादा खतरनाक है खान एवं खनिज विधेयक। यह देशभर की प्राकृतिक संपदा,जो असली सोने की चिड़िया है,दरअसल उसके कारपोरेट लूट का

    स्थाई बंदोबस्त हो गया।


    फर्क इतना सा है कि राज्यों को इस लूटखसोट में भागीदार  बनाकर क्षत्रपों का समर्थन जीत लिया है मोदी के केसरिया कारपोरेट रण नीतिकारों ने।


    काफी विवादों और प्रक्रियात्मक तकरार के बाद खान एवं खनिजों के मामले में राज्यों को और अधिक अधिकार देने वाले चर्चित विधेयक को आज राज्यसभा की मंजूरी मिल गयी। कांग्रेस एवं वाम दलों को छोड़कर अधिकतर पार्टियों ने इसका समर्थन किया, जबकि जदयू ने यह कह कर वाकआउट किया कि वह इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहता है।


    बीमा बिल पास कराने में जैसे सहयोग किया दीदी ने,नीतीश कुमार ने वहीं तरीका अपनाया है।


    उच्च सदन ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक 2015 को 69 के मुकाबले 117 मतों से पारित किया।


    सदन ने इस विधेयक को फिर से प्रवर समिति के पास भेजने की कुछ दलों की मांग तथा इस विधेयक के विभिन्न उपबंधों पर वाम एवं कांग्रेस के सदस्यों द्वारा लाये गये संशोधनों को खारिज कर दिया।


    गौरतलब है कि इस विधेयक को लोकसभा पहले ही पारित कर चुकी है। उच्च सदन में इस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजा गया था। प्रवर समिति ने इसके बारे में 18 मार्च को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस विधेयक के जरिये 1957 के मूल अधिनियम में संशोधन किया गया है। सरकार इससे पहले इस संबंध में एक अध्यादेश जारी कर चुकी है। मौजूदा विधेयक संसद की मंजूरी के बाद उस अध्यादेश का स्थान लेगा।


    इसी के मध्य खबर है कि मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के बाद अब इसी से सटे दमोह जिले की हटा तहसील में भी हीरा अपनी चमक बिखेर सकता है। जिले के लगभग 400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में हीरे की खोज के लिए राज्य शासन के माध्यम से केन्द्र सरकार को हीरा खोज की अनुमति देने का प्रस्ताव भेजा गया है।


    इन हीरों की खोज,उनका खनन किसके लिए है,समझ भी लीजिये।

    बहरहाल राज्यसभा में शुक्रवार को माइनिंग बिल पास हो गया। खनन सचिव ने कहा कि अब लोकसभा में एमएमडीआर बिल पर चर्चा की जाएगी। माइनिंग से जुड़े कुछ नियमों पर राज्यों की राय ली जाएगी। अगले 2 हफ्तों में राज्यों के साथ बातचीत शुरू की जाएगी। खनन मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि नए एमएमडीआर बिल में डीएमएफ के नियमों में बदलाव किए गए हैं। एमएमडीआर बिल से खदानों का ई-ऑक्शन हो सकेगा। तोमर ने बताया कि सरकार ने जो संशोधित बिल पेश किया वो महत्वपूर्ण है। इसमें दो तरह के संशोधन बिल शामिल हैं।

    और दूसरी हरित क्रांति के साथ भोपाल गैस त्रासदी का भी जश्न मनाइये कि 2015-16 तक 33,000 करोड़ को छू जाएगा कीटनाशक बाजार

    कीटनाशकों का बाजार वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान 12-15 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 33,000 करोड़ रुपए पर पहुंच जाएगा हालांकि उद्योग सरकार की गलत नीतियों के कारण भारी नुकसान से जूझ रहा है। यह बात कीटनाशक उद्योग संगठन के शीर्ष अधिकारी ने कही।


    कीटनाशकों को पेय बनाने के लिए राहतें और चाहिए।

    केन्द्र सरकार के 55 सार्वजनिक उपक्रमों की समीक्षा की गई जिसमें से 46 इकाईयों के पुनर्गठन किया जाएगा जबकि शेष 9 को बंद करने की मंजूरी दी गई है।  



    सरकार ने भारी नुकसान में चल रहे एचएमटी वाचेज समेत सात खस्ताहाल उपक्रमों को बंद करने की मंजूरी दे दी है।  

    भारी उद्योग और लोक उपक्रम जी एम सिद्धेश्वरा ने आज राज्यसभा में बताया कि केन्द्र सरकार के 55 सार्वजनिक उपक्रमों की समीक्षा की गई जिसमें से 46 इकाईयों के पुनर्गठन किया जाएगा जबकि शेष 9 को बंद करने की मंजूरी दी गई है।  

    उन्होंने बताया कि भारत आप्थालमिक ग्लास और भारत यंत्र निगम को पहले ही बंद किया जा चुका है। जिन सात उपक्रमों को बंद करने की मंजूरी दी गई है उनका घाटा 3139 करोड़ रुपए पहुंच चुका है। बंद किए जाने वाले उपक्रमों में एचएमटी बियारिंग्स, तुंगभद्रा स्टील प्रोडेक्ट, एचएमटी वाचेज, एचएमटी चिनार वाचेज, हिन्दुस्तान केबल्स, हिन्दुस्तान फोटो फिल्मस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी और स्पाइस ट्रेडिंग कारर्पोरेशन लिमिटेड शामिल है।  

    एचएमटी वाचेज को 2012-13 में 242 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। सबसे अधिक नुकसान हिन्दुस्तान फोटो फिल्मस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी 2012-13 में 1561 करोड रुपए का नुकसान हुआ। हिन्दुस्तान केबल्स को 885 करोड़ रुपए और स्पाइस ट्रेडिंग कारर्पोरेशन लिमिटेड का नुकसान 2013-14 में 353 करोड़ रुपए का रहा है।



    भारतीय मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक नीतियों से भारतीय रिजर्व बैंक की बेदखली


    इस सोने की चिड़िया को बेचने की तरकीब के तहत ताजातरीन कवायद है भारतीय मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक नीतियों से भारतीय रिजर्व बैंक की बेदखली और देशी कारपोरेट कंपनियों को अब सिर्फ करों में छूट,टैक्स होलीडे और टैक्स फारगान की सौगात नहीं मिल रही है,उनके कर्ज को रफा दफा करने के लिए मौद्रिक नीति निर्धारण से लेकर पब्लिक डेब्ट मैनेजमेंट एजंसी रिजर्व बैंक के नियंत्रण  से निकाल कर निजी हाथों में सोंपी जा रही है।उसे सत्ताइसों विभागों में निजी कंपनियों का राज पहले से ही बहाल है।


    मौद्रिक कामकाज के  नियंत्रण के लिए कारपोरेट मांग मुताबिक ब्याज दर घटाने वाले रिजर्व बैंक के गवर्नर की डाउ कैमिकसल्स मनसैंटो हुकूमत  के साथ ठन गयी है।राजन ने ज्यादा जिद की तो उनकी विदाई देर सवेर हो जानी है।


    रघुराम राजन कमिटी की सिफारिशों  के मुताबिक देश कारपोरेटकंपनियों के कर्ज निपटारे के लिए रिजर्व बैंक के दायरे से बाहर जो मानीटरी पलिसी कमिटी और रेगुलेशन आफ गवर्नमेंट सिक्युरिटीज से संबंधित जो कमिटियां कारपोरेट कंपनियों की अगुवाई में बननी हैं,रिजर्व बैंक के गवर्नर उनमें आरबीआई की नुमाइंदगी के लिए अड़े हुए हैं।इसलिए मामला फिलहाल टला हुआ है।


    रिजर्व बैंक की औकात खत्म करने का फंडा यह है कि सरकार और रिजर्व बैंक (आरबीआइ) आने वाले दिनों में देश में विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने पर और ज्यादा ध्यान दे सकते हैं। देश का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार ही अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने के खतरे को कम करेगा। भारत का मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार 340 अरब डॉलर का है और पिछले छह महीने से इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने से उत्पन्न होने वाली स्थिति पर भावी रणनीति को लेकर वित्त मंत्रलय और आरबीआइ के बीच लगातार संपर्क बना हुआ है। जाहिर है कि इसल पर नियंत्रण भी रिजर्व बैंक के बदले कारपोरेट विशेषज्ञ कमिटी का ही होगा।


    बहराहाल इसकी पृष्ठभूमि तैयार करते हुए  रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने बुधवार को कहा कि केंद्रीय बैंक ब्याज दर पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत कदम से भारतीय बाजार में आने वाले उतार चढ़ावों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऐसी संभावना है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दर में वृद्धि का संकेत दे सकता है, क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार का संकेत दिख रहा है। इसके परिणामस्वरूप भारत समेत उभरते बाजारों से पूंजी निकल सकती है।


    दूसरी ओर,वित्त विधेयक के प्रावधान को लेकर रिजर्व बैंक के अधिकारों में कमी की आशंकाओं के बीच वित्त मंत्री अरुण जेतली ने कहा है कि एेसे किसी प्रावधान पर चर्चा संसद में ही होगी। एेसी आशंका है कि इस प्रावधान से ऋण बाजार के विनियमन की आर.बी.आई. की शक्ति कम हो सकती है।


    जेतली ने संवाददाताओं से कहा, ''मैं इसके (इस प्रावधान के) बारे में (संसद के) बाहर चर्चा नहीं करना चाहता। यदि वित्त विधेयक को लेकर कोई भ्रम है तो हम इस पर संसद में चर्चा करेंगे।''


    हम जानते हैं कि भारतीय रेलवे के निजीकरण से सिरे से इंकार करने वाली सरकार रेलवे प्रबंधन और रेलवे निर्माण और विकास,बुलेट स्पीड इत्यादि परियोजनाओं,रेलवे की तमाम सेवाओं को पीपीपी माडल के तहत कारपोरेट बना रही है।


    मेट्रो रेलवे पर रिलायंस इंफ्रा का वर्चस्व है तो बुलेट रेलेव ट्रैक और पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर रिलायंस के दांव सबसे घने हैं।


    इसी बीच रेलवे के इन्नोवेशन का कार्यभार रतन टाटा को सौंप दिया गया है।यह निजीकरण भी नहीं है।


    बजट में किए गए वादों को पूरा करते हुए रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने गुरुवार को 'कायाकल्प परिषद' का गठन कर दिया। देश के जाने माने उद्योगपति रतन टाटा को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। रेल मंत्रालय के मुताबिक, 'कायाकल्प परिषद' रेलवे में निवेश आकर्षित करने के लिए अहम बदलावों की रूपरेखा तैयार करेगी और सभी स्टेक होल्डर्स से और अन्य निवेश की इच्छुक पार्टियों से संपर्क साधेंगी।


    एअर इंडिया को बेचने की तैयारी है और निजी नयी कंपनियों को विमानन की छूट हैं।आकाश उन्हींका एकाधिकार बनने जा रहा है।


    भारत के तमाम बंदरगाह पहले ट्रस्ट हुआ करते थे जैसे कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट या बांबे पोर्ट ट्रस्ट।ट्स्ट की संपत्ति और ट्रस्ट की मिल्कियत कानूनन बेच नहीं सकते तो पहले ट्रस्ट को कारपोरेशन बना जिया गया और आहिस्ते आहिस्ते सारे बंदरगाहों का हस्तातंरण निजी कंपनियों को हो रहा है,जिसमें मोदी के खासमखास अडानी समूह को फायदा ही फायदा  है।


    अपने प्रिय प्रधानमंत्री की देश विदेश की केसरिया कारपोरेट यात्राओं की कीमत खूब वसूली जा रही है।


    हम लोग भूल गये हैं कि भारत में परंपरागत कपड़े उद्योग का अवसान धीरुभाई अंबानी की अगुवाई में इंदिरा गांधी के संरक्षण प्रोत्साहन से रिलायंस के उत्थान से हुआ।



    अब रिलायंस समूह जो कलतक कांग्रेस साथ था और तेल गैस,इंफ्रा,एनर्जी,टेलीकाम क्षेत्रों में जिसका बेलगाम विकास हो गया कांग्रेस के सौजन्य से।


    हम भूल रहे हैं कि सार्वजनिक उपक्रम ओएनजीसी के खोजे और विकसित तमाम तेलक्षेत्र तोहफे में दिये गये रिलायंस समूह को।


    अब मोदी की ताजपोशी में पहल करने वाले रिलायंस समूह के लिए और सौगातों की बहार तैयार है केसरिया समय में।


    कहा जा रहा है कि ईंधन के संकट से निबटने के लिए भारत में पांच विशालतम आयल रिजर्वयर बनाये जायेंगे और इनके निर्माण का ठेका पशिचम एशिया की किसी कंपनी को दिया जाने वाला है।


    ये रिजार्वेयर इसके हवाले होंगे,फिलहाल इसे राज रहने दें।



    सुबह ही बांग्लादेश विजय के कार्निवाल के मध्य बहुत बुरी खबर कोलकाता के विधान चंद्र राय शिशु अस्पताल से मिली ,जहां 24 घंटे में फिर पंद्रह नवजात शिशुओं ने दम तोड़ा है।


    कोलकाता और मालदह के अस्पतालों में थोक शिशु मृत्यु की फिर भी खबरें बनती रहती हैं।बाकी बंगाल और बाकी देश में प्रसूतियों और नवजात शिशुओं की मृत्यु के आंकड़ें नहीं मिलते।


    हमने लिखा था बहुत पहले कि बंगाल के जो हाल हैं,उससे कपड़ा और जूट मिलों,चायबागानों,तमाम बंद कल कारखानों के बाद अब बहुत जल्द खेतों खलिहानों और इस आसमुद्र हिमालयपर्यंत सीमेंट के जंगल से भी मृत्यु जुलस का अनंत सिलिसिला निकलेगा।


    इस पर चर्चा से पहले सबसे पहले इस पर गौर करें कि कांग्रेस को न किसानों की परवाह है और न भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन से क्योंकि भूमि अधिग्रहण से ही कांग्रेस इतनी फली फूली है।


    कांग्रेस सिर्फ भाजपाई बिल का विरोध कर रही है न कि किसानों के हितों के पक्ष में खड़ी हैं कांग्रेस। कांग्रेस अपने हिसाब से संशोधन चाहती है।इसका मतलब भी बूझ लें।


    भारत में पुरुष वर्चस्व का करिश्मा है कि स्त्री की मृत्यु पर शोक नहीं मनाया जाता।

    रस्म अदायगी के फौरन बाद स्त्री का सुलभ विकल्प नयी युवा स्त्री उपलब्ध है तो शोक काहे का।


    भारत में परिवार नियोजन हो जाने के बावजूद शिशुओं की मृत्यु हमें बेचैन नहीं करती।


    अस्पतालों से स्त्रियों और शिशुओं के निकलते रोज रोज के मृत्यु जुलूस के प्रति हम उतने ही तटस्थ हैं,जितने आजादी के बाद से रोजाना अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों से,सलवा जुड़ूम से ,आफसा से,सिखों के नरसंहार से,भोपाल गैस त्रासदी से,बाबरी विध्वंस और देश के कोने कोने में भड़काये जाने वाले दंगों से,गुजरात नरसंहार से,आदिवासियों की बेदखली से,दलितों पर निरंतर जारी अत्याचारों से,गैरनस्ली लोगों और अस्पृश्य भूगोल और अस्पृश्य समुदायों से निरंतर जारी रंगभेदी भेदभाव और अर्थव्यवस्था से उनके सामूहिक निष्कासन से लेकर किसानों की थोक आत्महत्या से हम बेखबर है।बेपरवाह हैं।


    दरअसल भारत की गौरवशाली सनातन सभ्यता के मिथ्या मिथकों के जरिये हम अत्याधुनिक ज्ञान,तकनीक,वैज्ञानिक आविस्कारों,सूचना प्राद्योगिकी बूम बूम के सीमेंट जंगलों में निहायत असामाजिक बर्बर पाशविक मर्दवादी आदिम युग का अंधकार जी रहे हैं चकाचौंध रोशनियों के महोत्सव में।

    भुखमरी से साफ इंकार


    बंगाल में चावल उत्पादकों की भुखमरी से इंकार किया जाता रहा है।


    बंगाल में बंद कलकारखानों में दम तोड़ती जिंदगी के सच से इंकार किया जाता रहा है।


    बंगाल में चाय बागानों से निकलते मृत्यु जुलूसों सको दशकों से नजरअंदाज किया जाता रहा है।


    सुंदरवन इलाके में विधवाओं की बस्तियों से,सीमा क्षेत्रों में औरतोें, विदेशी मुद्रा,सोना और नशा के फलते फूलते  कारोबार से इंकार किया जाता रहा है।


    इन तमाम परिस्थितियों में सारी राजनीति इन्हीं क्षेत्रों  में माफिया  राज के शिकंजे में है और आम जनता की कोई सुनवाई नहीं है।


    हिमघर पर्याप्त है नहीं,जितने हैं ,वहां भी राजनीति और माफिया का वर्चस्व है।


    नतीजतन बंपर आलू उत्पादन की कीमत बतौर जनपदों में मौतों की वर्षा हो रही है और सत्ता की राजनीति को विकास महोत्सव में इसकी कोई परवाह ही नहीं है।


    कामरेड ज्योति बसु के अवसान पर बंगाल के खेतों,गांवों और जनपदों को कोलकाता में समाहित करने के लिए जो विषवृक्ष रोपे जाते रहे हैं,उनके फल अब तैयार हैं।



    कुपोषण और भुखमरी और किसानों की थोक आत्महत्याओं के सही आंकड़े कभी नहीं मिलते हैं।


    तथ्यों को झुठलाकर बाल स्वास्थ्य के जिंगल से महमहाता हुआ यह देश हैं।


    भिन्न ग्रह का कोई प्राणी अगर भारतीय टीवी चैनलों के खुशबूदार विज्ञापनों और भारतीय फिल्मोंं को गलती से देखता रहे,तो उसे यही लगेगा कि इस धरती पर न कोई काली स्त्री है और न कोई अस्वस्थ स्त्री है।हर स्त्री की  कदकाठी  एकदम  नाप एक मुताबिक गढ़ी हुई हैं।हर स्त्री गोरी है।हर स्त्री सुखी संपन्न है और या सास या बहू बनकर दुनिया पर राज कर रही है,जिसके जीवन में जीवन साथी बदलने और नये पुराने संगी के साथ तालमेल बिठाने के अलावा और परिवार में अपना वर्चस्व बहाल रखने के अलावा रोजमर्रे की जिंदगी की कोई समस्या नहीं है।


    जैसे हमारी सारी स्त्रियां फैशन कांशस गोरी लंबी छरहरी कामकाजी हैं और हमारे खेतों,खलिहानों और खदानों में,रोजगार कीभट्ठियों में,गंदी बस्तियों में,बेरहम सड़कों पर कोई स्त्री है ही नहीं।


    जैसे यह सारा देश नई दिल्ली ,नये,कोलकाता, नवी मुंबई ,बंगलूर जैसे चमचामाता शहर है,जहां न धुआं है,न कोई मेहनतकश जिंदगी है,न उनके चेहरे पर पसीना कहीं है और उसकी खूबसूरती संगीतबद्ध काव्यधारा में गोबर माटी की कोई महक है।


    जैसे खूबसूरत विदेशी लोकेशन ही भारत का नैसर्गिक सौंदर्य है और फिल्मी नायिकाओं के गाल की तरह दमकते  राजमार्गों के आस पास न कोई खेत हैं,न कोई बस्ती है और न इंसानियत कहीं है।


    हमारे बगुला भगत अर्थशास्त्रियों, मिलियनर बिलियनर जनप्रतिनिधियों, एफडीआई खोर श्रमजीवी मीडियाकर्मी की कमरतोड़ मीडिया और डाउ कैमिकल्स मनसैंटो के नजरिये से असली भारत वही है,जो मोबाइल,पीसी और टीवी की खूबसरत मल्टी डाइमेंशनल हाई रेज्यूलेसन छवि है।


    वहां बेनागरिक ग्राम्य भारत की कहीं कोई तस्वीर है ही नहीं और विज्ञापनों में जैसे चमकदार सितारे जीवन के हर क्षेत्र के महमहाते बेदाग चेहरे हैं,वैसा ही खूबसूरत सामाजिक यथार्थ है।


    संजोगवश पुरस्कृतों,सम्मानितों और प्रतिष्ठितों के साहित्य कला,विधाओं और माध्यमों का समामाजिक यथार्थ भी यही है।


    इसी लिए भारत की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत,शहादतों के सिलसिले, किसानों, आदिवासियों और बहुजनों के हजारों साल के प्रतिरोध का हमारे लिए दो कौड़ी मोल नहीं है।


    इसीलिए अंबेडकर को हम ईश्वर बना देते हैं गौतम बुद्ध की तरह और दरअसल आचरण में हम रोज रोज उनकी हत्याएं कर रहे हैं.जैसे कि गांधी की हत्या हो रही है रोज रोज।


    यह व्यक्ति और विचारों का कत्लेआम नहीं है दोस्तों,न गौतम बुद्ध कोई व्यक्ति है और न अंबेडकर कोई व्यक्ति है और न गांधी कोई व्यक्ति है,वे हमारे जनपदों,हमारे लोक,हमारे इतिहास,हमारे सामाजिक यथार्थ के प्रतीक हैं।कत्लेआम भी हमारे जनपदों, हमारे लोक,हमारे इतिहास,हमारे सामाजिक यथार्थ का।


    मुक्तबाजारी उपभोक्ता दीवानगी में हम पाकिस्तानी विकेटों की तरह पूरे जोश खरोश के साथ अपने इन प्रतीकों को कत्म करके बचे खुचे जनपदों को महाश्मशान बना रहे हैं।



    कलिंग,कुरुक्षेत्र और वैशाली के विनाश का जो महाभारत है,उसे हम सामाजिक यथार्थ के नजरिये से नहीं,मिथ्या आस्था,प्रत्यारोपित धर्मोन्माद, अटूट अस्मिता और पहचाने के जरिए हासिल अपनी हैसियत  और मिथक तिलिस्म में कैद इतिहास दृष्टि से देख रहे हैं।


    इन्हीं मिथकों को इतिहास बनाने की कवायद कोई हिंदू राष्ट्र बनाने  का वास्तुशास्त्र नहीं है,यह सिरे से मुक्तबाजार का धर्मोन्मादी राजसूय अश्वमेध है।


    जिसे खूंखार भेड़ियों की जमात ने धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की शक्ल दे दिया है और हमारी गरदनें ऐसे चाक हो रही हैं कयामती गजब दक्षता के साथ कि फिरभी हम सारे कंबंध बजरंगी बने हुए हैं।


    सबसे बड़ा झूठ जो बतौर मिथक हम जनमजात जीते रहे हैं,वह यह है कि अतीत में भारत सोने की चिड़िया रहा है और आर्यों के उस सनातन भारत पर हमला करने वाले विदेशियों ने उसी सोने की चिड़िया को लूटा है।


    सबसे बड़ा झूठ जो बतौर मिथक हम जनमजात जीते रहे हैं,वह यह है कि आखिरकार वह सोने की चिड़िया अंग्रेज अपने साथ ले गये हैं।


    दोस्तों,हकीकत यह है कि सोने की चिड़िया इंग्लैंड में कही नहीं है और दूसरे विश्वयुद्ध जीतने के बाद से जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अवसान होना शुरु हुआ और निर्णायक तौर पर जिसे अश्वेत विश्व ने  हमेशा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों पर कैद कर दिया दक्षिण अफ्रीका में,जहां से गांधी का सफर शुरु हुआ था,उसके पास सोने की चिड़िया रही होती तो बघिमघम पैलेस का जलवा कुछ और होता।


    कृषि और उत्पादन प्रणाली को जलांजलि देकर समूची मेहनतकश विरासत को ब्रिटिश  संसद में ऊन की गद्दी में सीमाबद्ध करे देने वाले हमारे पुराने आकाओं के नक्शेकदम पर चल रहे हम भारतीयों को कभी अहसास ही नहीं हुआ कि हमारे पुरखे बेशकीमती आजादी के साथ सोने की वह चिड़िया भी हमें छोड़ गये और सत्ता वर्ग अब तक ,15 अगस्त  से लेकर अबतक उस चिड़िया के हीरे जवाहिरात मोती जड़े सोने के परों को नोंचते खरोंचते हुए अपना अपना घर भरते रहे और हमें बताते रहे कि सोने की चिड़िया तो कोई और ले गया।


    निर्मम सत्य यह है दोस्तों,अब वह सोने की चिड़िया चालीस लाख चोरों के हवाले है।

    निर्मम सत्य यह है दोस्तों,उस सोने की चिड़िया की नीलामी ही बेशर्म विकास गाथा है।


    अंग्रेज न हमारी उत्पादन प्रणाली ले गये और न हमारे उत्पादन संबंधों को तबाह किया अंगेजों ने और न जनपदों को जिबह किया।वे तो पवित्र गोमाता के संपूर्ण आहार बने पौष्टिक दूध से भारत माता की संतानों को वंचित करके अंग्रेजों की सेहत बनाता रहा।


    अंग्रेजों ने हमारे लिए यह मुक्त बाजार नहीं चुना है और इसे हमने चुना है।


    अंग्रजों ने हमारे संसद में प्रधानमंत्री बनकर नहीं कहा कि इस देश में इतने संसाधन हैं,जिन्हें विकास के रास्ते लगाया जाये,विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और अबाध पूंजी प्रवाह को जारी रहने दिये जाये,तमाम कायदे कानून संसदीयसहमति से बदल दिये जाये तो इतना इतना पैसा आयेगी कि कई राज्यों का खजाना छोटा पड़ जायेगा और राज्य सरकारें इस पीपीपी विकास से हासिल नोटों को गिन भी सकेंगी।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो प्रधानमंत्री ऐसा बयान जारी करने का मौका न मिला होता और न भूमि अधिग्रहण,कोयला,खनन,बीमा नागरिकता से संबंधित सारे कानून बदल कर बहुराष्ट्रीय पूंजी के हितों के मुताबिक सारे सुधार लागू करने की ऐसी हड़बड़ी होती।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो भारतीय राजनीति,भारतीय साहित्य कला माध्यमों,भारतीय सिनेमा,भारतीय खेलों,भारतीय मीडिया,भारतीयखुदरा बाजार, उपभोक्ता सौंदर्य बाजार, भारत में तमाम सेवाक्षेत्रों और भारत की सुरक्षा आंतरिक सुरक्षा पर डालरों की ऐसी बरसात मूसलाधार नहीं  होती।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो डाउ कैमिकल्स और मनसैंटो की हुकूमत,तमाम रंगबरंगे बगुला भगतों और तमाम कारपोरेट वकीलों की लाख कोशिशों के बावजूद भारत को सबसे बड़ा इमर्जिंग मार्केट का खिताब मिलता,न निवेशकों की आस्था सत्ता की आस्था होती और न इस देश में सांढ़ और घोड़े इतने बेलगाम होते।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो  पहली बार चुनाव जीतते न जीतते हमारे तमाम जनप्रतिनिधि ग्राम प्रधानों और कारपोरेशन के काउसिंलरो से लेकर सरकारी  समितियों के मनोनीत मेंबर,तमाम मशरूमी लाल बत्ती वालों,तमाम विधायकों,तमाम सांसदों और मंत्रियों,तमाम विचारधाराओं और तमाम अस्मिताओं के झंडेवरदारों,सपनों के सौदागरों का यह मिलियनर बिलियनर तबका होता और न उनमें यह महाभारत होता,जिसकी कि हम पैदल सेनाएं बजरंगी हैं।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो अमेरिका और इजराइल हमें अपना साझेदार हर्गिज नहीं मानता।अपनी गरज से तो नहीं।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो तमाम देशों के राष्ट्रप्रधान भारत के मुक्त बाजार में अपने हितों की तलाश में इतने बेसब्र होते।




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    Corporate tax relief,GAAR end followed by further Tax Forgone and Tax Holiday.
    Palash Biswas

    This business friendly government means business and business only.It is exactly a PPP model government which is of the corporate,by the corporate and for the corporate.Hidnutva is the preventive umbrella to protect corporate interest against resistance whatsoever.The opium is injected with surgical precision and the public vision seems to be in ventilation.
    Just now , expressindia.com breaks yet another breaking news about tax forgone.Indian Express reports:The Central Board of Direct Taxes (CBDT) will issue detailed guidelines to ensure that non-resident companies holding a board meeting or two in India do not get any tax demands on their global income on account of New Delhi's new wider definition of a resident company.
    Mind you, the budget ensured lacs of Crores relief in corporate tax an ensured the end of GAAR.Now RBI is being privatized in its literal sense to decide on monetary exercise to boost the SENSEX  and investor confidnece.
    The way insurance and mining bill have been passed with either Congress or Kshtrap support and walkout drama,it should be understood that Indian Politics as well as Governance mean corporate welfare,nothing else.
      | New Delhi |reprts for Financial Express:

    Sources said the new definition of tax residence introduced in Finance Bill 2015 was primarily aimed at preventing companies incorporated in India from escaping taxes on their worldwide income by holding one or two board meetings abroad and claim non-resident status.

    Such escape from tax domicile status was possible because the existing definition of a resident company required its control and management to be wholly in India 'throughout' the financial year.

    The Finance Bill brought within the definition of tax residence any company, the 'place of effective management' of which was in India at any time of the relevant financial year. Such place of effective management includes a place from where the key management and commercial decisions necessary for running the company are, in substance, made. This raised fears that non-resident multinational companies that wish to hold a board meeting here to showcase the country's business potential to its stakeholders might come under India's definition of a tax resident.

    If that happens, the global income of such company would become taxable here.

    Unlike countries like the US, India levies tax on the worldwide income of only resident companies. If non-resident companies have operations in India, they need to pay tax only on income from such local operations, not from their worldwide operations. If the Indian operations of a non-resident is organised in the form of a subsidiary company, the subsidiary is treated as a resident but not the parent.

    A person privy to discussions in the finance ministry said that the proposed clarification will make it clear to all field officers of the Income-Tax Department that the amendments to Section 6 of the Income Tax Act were not aimed at taxing the global income of non-resident companies for the sole reason that a few board meetings are held here.

    "The CBDT will issue detailed guidelines so that there is no arbitrary exercise of power and it becomes transparent as to what constitutes effective management. So far as a foreign company that has no business in India is concerned, it cannot be taxed in India just because a board meeting is held here," said the person, adding the new definition was internationally accepted.

    "The expected guidelines will provide the much-needed clarity, soothe the nerves of foreign investors and help avoid a narrow interpretation being used by the tax officers against the spirit of the lawmakers," said Amit Maheshwari, Partner, Ashok Maheshwary & Associates.


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    Conversion of Christians and Muslims in India


    Ulrich von Schwerin

    A heated controversy has been triggered in India over a Hindu nationalist campaign to bring Christians and Muslims "back into the Hindu fold". While the Hindu nationalist Prime Minister Narendra Modi remains silent over the issue, organisations allied to his party continue to pursue the campaign. By Ulrich von Schwerin

    The Hindu nationalists are calling it a "homecoming", but Muslims and Christians say it is forced conversion. Since a series of public ceremonies during which large groups of Christians and Muslims were converted to Hinduism, a heated controversy has been raging in India over the legitimacy and legality of these mass conversions, which are organised by Hindu nationalists. The debate has assumed a particularly explosive dimension because of the fact that the Hindu nationalist "Bharatiya Janata Party" (BJP) is India's governing party in New Delhi.

    The current debate was triggered by a ceremony in a slum in the northern Indian city of Agra. Most of the residents of this neighbourhood are Muslim migrants from Bengal in eastern India, who make a living collecting refuse. According to Indian media reports, they were invited to a meeting on 8 December to – so it was claimed – be registered for welfare benefits. As the crowd gathered, they were astonished to see statues of deities being put up and to hear the first notes of a religious song being played. At the end of the ritual they were told that from that moment on, they were Hindus.

    This was not just a one-off event. In recent weeks, there have been almost daily reports of further ceremonies where Christians and Muslims were converted to Hinduism. Although the Hindu nationalist "Vishva Hindu Parishad" (VHP) and the "Dharam Jagaran Samiti" (DJS), the main actors behind the campaign, stress that participation is voluntary, there are repeated claims that those involved are being put under pressure or that they have been promised money, land or other perks.

    While Prime Minister Narendra Modi remains true to his electoral promise to focus on economic development and is refraining from making any public comment on the conversions, critics are accusing him and his party of promoting the campaign. Even though the VHP and DJS are formally independent of the governing BJP, they are all members of the Hindu-nationalist family – what's known as the "Sangh Parivar" – which has at its centre the militant volunteer movement known as "Rashtriya Swayamsevak Sangh" (RSS).

    Muslims preparing for the Eid al-Adha prayer outside the Great Mosque (Jama Masjid) in New Delhi (photo: Reuters/Ahmad Masood)

    India's Muslims under pressure to convert: Hindu nationalists in India believe that the country's Muslims and Christians are in truth Hindus who relinquished their faith because they were either compelled to do so by Muslim conquerors or ensnared by Christian missionaries. The fact that this faith change often happened generations ago is overlooked by the Hindu nationalists, who view this not as a conversion, but as a return to the original faith

    Religious minorities in a future Hindu nation

    Founded in 1925, the RSS perceives itself as the seed and the spearhead of a future, reformed Hindu nation. Trained as paramilitaries, organised in a hierarchical fashion and indoctrinated over several years, RSS members in their uniform of black caps, white shirts and khaki coloured shorts form the backbone of the subsidiary organisations founded since the 1950s such as the VHP, the DJS or the BJP. They not only share the same ideology, a large portion of the cadres of these parties is also drawn from the ranks of the RSS – Prime Minister Modi included.

    For Hindu nationalists, when Christians or Muslims change their faith to Hinduism, it is not a conversion but a "homecoming" (ghar wapsi). As they see it, Muslims and Christians in India are in truth Hindus who relinquished their faith because they were compelled to do so by Muslim conquerors or ensnared by Christian missionaries. The fact that this faith change often happened generations ago is overlooked by the Hindu nationalists, who view this not as a conversion, but as a return to the original faith.

    In accordance with their own logic, it is only consistent that the BJP is currently and emphatically demanding a general ban on conversions. A regulation in the western Indian state of Gujarat, a state governed by Modi for years, could serve as a model for the planned law. In Gujarat, which experienced some of the bloodiest anti-Muslim pogroms of recent Indian history in early 2002 during Modi's period in office there, a regulation requiring all conversions to be officially approved by the authorities has been in place since 2003.

    Although India is over 80 per cent Hindu and Christians form a tiny majority of two per cent, the RSS has been warning since its foundation that the Hindus are slowly "dying out". In their eyes, India is the nation of Hindus. According to their concept of the nation, Christians and Muslims can never be completely Indian and are always suspected of having divided loyalties.

    The chief ideologist of the Hindu nationalists Vinayak Damodar Savarkar wrote in his influential 1921 book "Hindutva: Who is a Hindu?": "For though Hindusthan to them is Fatherland as to any other Hindu, yet it is not to them a Holyland too. Their holyland is far off in Arabia or Palestine. Their mythology and Godmen, ideas and heroes are not the children of this soil. Consequently their names and their outlook smack of foreign origin. Their love is divided."

    Indian villagers pray at an effigy of Narendra Modi, Kotharia, India (photo: AFP/Getty Images)

    Revered by some as a deity: Indian villagers assemble and pray by an effigy of Narendra Modi at a temple erected in his honour at Kotharia village near Rajkot. Since Modi and his Hindu nationalist Indian People's Party took office last May, there have been increasing reports of the forced conversion of religious minorities to Hinduism by radical Hindu organisations. These openly propagate the idea of a "Muslim and Christian-free India" on social networking sites

    Radical Hindu nationalist views and Modi's silence

    It was the view of the second RSS leader, Madhav Sadashiv Golwalkar, that there is no place in India for Christians and Muslims. In his view, the only options open to them are conversion or total subordination. Golwalkar wrote in his 1939 book "We, or our Nationhood defined", (in which he also described the disfranchisement of the Jews in Germany as a model for dealing with minorities):

    "The non-Hindu peoples in Hindusthan must either adopt the Hindu culture and language, must learn to respect and hold in reverence the Hindu religion (…), or they may stay in the country, wholly subordinated to the Hindu nation, claiming nothing, deserving no privileges, far less any preferential treatment – not even citizens' rights."

    Such radical views are not expressed by today's RSS leadership. But amid the controversy surrounding the conversions in Agra, the local DJS Chairman Rajeshwar Singh said in mid-December: "It is our goal to make India a Hindu nation by 2021. Christians and Muslims have no right to remain here. Either they are converted to Hinduism or forced to leave." Singh went on to promise that he would ensure that India was free of Muslims and Christians by the end of 2021.

    While the secular opposition is outraged, Modi remains silent. The PM barely issues any statements on central Hindu nationalist issues any more. Instead, he remains wholly focused on development and the economy, presenting himself as a liberal reformer. This is paying off – and not just at the polling booth. If Modi was regarded as a pariah in the West after 2002, these days he is even being courted by the likes of US President Barack Obama, who visited New Delhi in late January.

    But have Modi and the BJP really changed? The left-wing magazine "Frontline" doesn't think so, and claims that Modi is and remains an RSS activist: "He is himself a part of them, and thinks and talks in the same way as they do. He cannot tame the hard core, Modi is himself the hard core. (…) Narendra Modi shares the fanatical views of Sangh Parivar, which made him what he is. This explains his deliberate silence during the entire time, as the call to convert rings through the air. Inside he is rejoicing."

    http://en.qantara.de/content/conversion-of-christians-and-muslims-in-india-homecoming-or-forced-conversion


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    Hashimpura acquittal and the greater killings ahead!

    Palash Biswas

    1. Hashimpura massacre - Wikipedia, the free encyclopedia

      en.wikipedia.org/wiki/Hashimpura_massacre
      Wikipedia
      Hashimpura massacre took place on 22 May 1987, during the Hindu-Muslim riots in Meerut city in Uttar Pradesh state, India, when 19 personnel of the Provincial ...
      The incident - ‎Aftermath - ‎Court case - ‎See also


    It is conversion time all the way.It is a time for ceent percent Hindutva.It is global Hindutva which is selling off the Golden bird,the indigenous India of natural resources abundant and the agenda to accomplish the task of demographic readjustment for ethnic cleansing is the time line to make India Free of Non Hindusicluding hahujan Indian,the majority depressed classes and tribal India beside Islam and Christianity.All Party consensus shocasing false opposition of land Acquisition Bill which is slated to be passed as well,Mining and Mines Bills have been passed to destory and exploit naturally most rich tribal India,which is in fact the Golden Bird and the myth created that it was stolen by colonial rulres had been all the way a Myth to ensure to kill the resistance.


    I have been writing since 1991 that that the global Hindutva aligned  strategically with United states of America and the zionist Israel means to kill Indian Masses associated with natural resources and the nature itself.

    In this light we have to see the coincidence of setting free all the war criminals against humanity.We have seen it in the case of killings by private armies in Central Bihar.Which followed by release  of the accused in Gujarat Genocide.Whereas Bhopal Gas Tragedy Victims have been denied justice right from beginning,Nuclear agreement with USA has further denied the chances of justice or compensation in any case of nuclear and industrial disaster whereas India on the highway of second green revolution with radioactive nuclear energy option ensured the mass destruction.


    I have been in Meerut working as Chief Sub Editor in the Prominent UP daily,Dainik Jagaran which simply skipped the news of the massacre.It was a complete balck out while the Police and army personnel selected every male from the Muslim area of Hashimpura near Hapr Raod in Meerut and took the away to kill all of them in clod blood. Immediate provocation was the killing of a brother of a Army Officer by Gun with Telelence.


    It was the newly launched Dainik Amar Ujala which carried the story.Hashimpura Massacre was immediately followed up by Maliyana Killings and the Killed Muslim Bodies were dumped in Ganga Nahar.

    Then SSP Gaziabad,Bibhuti Narayan Roy did and excellent work who got all the dead bodies from the Gang Nahar and lodged FIR.


    Meanwhile,Overcoming stiff opposition in the Rajya Sabha, where the ruling party is in a minority, the government displayed deft political management to pass the Coal Mines Special Provisions Bill as well as the Mines& Minerals Development and Regulation (MMDR) ..Congress opposed but Ms Mamata Banerjee,Biju Patnaik and Nitish kumar,the most vocal Jihadies against hindutva baile out the government,It is celebration time for Sensex as all natural resources and mines have been handed over to Desi Videsi unabated free flow of capital and the black money.


    It is greater killing we have known hitherto.Hours before Parliament breaks for a month-long recess in the Budget session, the Mines and MineralsB ill and the Coal Mines Bill were passed by the Rajya Sabha, with the government managing to swing the support of some opposition parties.


    Economic times reports:Parliament has opened up coal mining to Indian and foreign private companies and allowed transparent auction of coal, bauxite and other minerals by passing two game-changing laws that could potentially free private enterprise from decades of socialist controls resulting in billions of dollars of investments by Indian and foreign miners.


    The new coal law gives the government the power to allow private companies to mine coal and sell it in the open market, ending four decades of state monopoly. So far private companies could mine coal only for use as fuel in their own factories. The government has assured workers of Coal India that the state-run giant's interests will be protected, and that it is not in a hurry to get private firms to start commercial mining operations, but the new law allows it to go ahead whenever it wants.



    Read more at:

    http://economictimes.indiatimes.com/articleshow/46641572.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst





    Now,media reports,a Delhi court on Saturday acquitted all the 16 accused in the Hashimpura massacre case of 1987.

    The court acquitted all the accused - members of the Provincial Armed Constabulary (PAC) of Uttar Pradesh saying, "I give them the benefit of doubt due to insufficient evidence, particularly on the identification of the accused."

    The court of Additional Sessions Judge Sanjay Jindal had on February 21 reserved the pronouncement of judgment in the 27-year-old case. The PAC personnel were facing charges of allegedly abducting and killing 42 persons of a particular community.

    3 of the accused dead

    Charge sheets were filed against the 19 accused before the Ghaziabad chief judicial magistrate. They did not appear in court though bailable warrants were issued 23 times between 1994 and 2000. Under public pressure, 16 of the accused surrendered before the Ghaziabad court and were subsequently released on bail.

    In September 2002, on the orders of the Supreme Court, the case was transferred to Delhi. Three of the 19 in the original list of accused including platoon commander Surender Pal Singh, under whose instructions the massacre was allegedly committed, are already dead.




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    मि अधिग्रहण नहीं                    धरती माता की जय                           भूमि अधिकार चाहिए

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव अमर रहें
     
    क़्त आने पे बता देगें तुझे ऐ आसमां
    हम अभी से क्या बताए क्या हमारे दिल में है......

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव शहीद दिवस
    के मौके पर भूमि, वनाधिकार एवं श्रमाधिकार रैली, अमवार, दुद्धी सोनभद्र, उ0प्र0
    23 मार्च 2015
    प्रिय साथियों,
    आज शहीद दिवस है, आज से 84 साल पहले तीन क्रांतिकारी नौजवानों भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव ने शहादत प्राप्त की थी। शहादत से पहले इन क्रांतिकारी साथीयों ने कहा था कि''अंग्रेज़ों की जड़े हिल चुकी है ये 15-20 साल में यहां से चले जाएगें, समझौता हो जाएगा, पर इससे जनता को कोई लाभ नहीं होगा, काफी साल अफरा तफरी में बीतेंगें इसके बाद लोगों को हमारी याद आएगी।''साथीयों आज सच में वह समय आ गया है जब हमें इन शहीदों की बाते याद आ रही है। उनकी शहादत कोई जज्बाती मामला नहीं था बल्कि उन्होंने आज़ादी का एक क्रांतिकारी राजनैतिक कार्यक्रम बनाया था जिसमें मुख्य बिन्दु था जमींदारी प्रथा को समाप्त करना और ब्रिटिश हुकुमत का प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार मउपदमदज कवउंपद को समाप्त करना जिसके तहत उन्होंने साम्राज्यवाद पर हमला बोला था। आज 84 साल बाद भी इस देश के मेहनतकश, काश्तकार, ग़रीब किसान, खेतीहर मज़दूर, भूमिहीन व जल-जंगल-जमींन पर निर्भरशील महिलाए साम्राज्यवाद का हमला वैश्विक पूंजीवाद के रूप में झेल रही है। हमारे राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री ने भूमि अध्यादेश को पारित कर हमें उपनिवेशिक काल की एक बार फिर से याद दिला दी है जिसमें भूमि और जंगल को कम्पनियों को लूटने का भरपूर मौका दिया जा रहा है।  24 फरवरी 2015 को संसद मार्ग नई दिल्ली में संसद भवन के सामने प्रस्तावित भूमि अधिकार संशोधित (बिल) कानून के विरोध में लगभग 350 आंदोलनकारी जनसंगठनों के हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। जिसकी संसद के दोनों सदनों में आवाज बुंलद होकर गूंजी और विपक्षी दलों ने वाक आउट किया। इस बिल के खिलाफ पूरे देश में अब  विरोध प्रदर्शन चल रहा हंै। जबकि संसद में इसके ऊपर इस सत्र में बहस भी जारी है। इस विरोध प्रदर्शन के आयोजक संगठनों के प्रतिनिधियों की एक विशेष बैठक 13 मार्च 2015 को नई दिल्ली में हुई, जिसमें सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अब यह आन्दोलन केवल भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ही नहीं बल्कि किसी भी परियोजना के अधिग्रहण के खिलाफ, भूमिहीन, बेघर, किसान, मजदूरों और शहर में झुग्गी-झोपडि़यों में रहने वाले करोडों गरीब व महिलाओं के भूमि पर  मालिकाना हक के लिए एक अभियान के रूप में जारी रहेगा व 23 मार्च का शहीद दिवस देश के कोने-कोने में भूमि, वनाधिकार एवं श्रम अधिकार दिवस के रूप में मनाया जायेगा और इस काले कानून के विरोध में संगठित प्रदर्शन और सम्मेलन किये जायंेगे। इसके साथ ही कई वामदलों एवं स्वतंत्र श्रमिक संगठनों के नवर्निमित अखिल भारतीय लोक मंच ।प्च्थ् ने 16 मार्च को जंतर मंतर पर भी यहीं निर्णय लिया है।  

    साथीयों कनहर नदी पर जो बांध गैरकानूनी ढंग से बांधा जा रहा है उसे हमें मजबूती से विरोध करना है। यह हमारे आस्तित्व की लड़ाई है हमारे भविष्य हमारी पीढ़ीयों की सुरक्षा है जिसे हम किसी भी सूरत में सौदा नहीं कर सकते। हमें ध्यान रखना होगा कि हम सरकार और इनके दलालों के बहकावे में न आए व केवल मुआवज़े के रूप में अपने संघर्ष को न देखें। यह संघर्ष केवल और केवल गांव, जमींन, जंगल व अपनी आगे आने पीढ़ीयों को बचाने का संघर्ष है इसलिए इस मुददे पर हमें अपनी समझ साफ करनी है व अपने आप को विस्थापित, डूब क्षेत्र में आने वाले एवं मुआवज़ा पाने वाले जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना है। पूर्व में अगर कोई मुवाअज़ा सरकार द्वारा दिया भी गया है तो वो अब मान्य नहीं है व उसकी बात हमें नहीं करनी है। हमें केवल अपनी धरती मां को बचाने की मुहिम को तेज़ कर छतीसगढ़ व झाड़खंड़ के सभी प्रभावित गांवों में संपर्क कर ज्यादा से ज्यादा महिला शक्ति को एकजुट कर इस गैरकानूनी बांध को बनने से रोकने का काम करना है। 

    साथीयों एक मिथक प्रचार चल रहा है कि ''कनहर बांध बनाओ और हरियाली लाओ''यह प्रचार सरकार, सपा पार्टी के विधायकों, सांमत यहां तक की मानवाधिकार पर काम करने वाली उ0प्र0 यूनिट के पी0यू0सी0एल तक यह प्रचार किया जा रहा है। जरा इनसे कोई ये पूछे कि क्या इन्हें मालूम है कि कैमूर क्षेत्र सबसे प्राचीनतम पर्वत श्रखंला का हिस्सा है व यहा पर अति दुलर्भ वनस्पति की प्रजातियां पाई जाती है जो कि प्रदेश के सबसे घने जंगल व सबसे बड़े वनसम्पदा के रूप में आंकड़ों में दिखाया जाता है। इसलिए ये लोग किस हरियाली की बात कर रहे हैं ये सवाल इनसे पूछा जाना चाहिए? गैरकानूनी कनहर बांध परियोजना एक बहुत बड़ा घोटाला है जिसकों बनाने के लिए सरकार के पास किसी भी प्रकार का फंड़ नहीं है। सरकार व इस क्षेत्र के विधायकों को यह बताना होगा कि यह ''हरियाली लाओ''का नारा है या ''कैमूर क्षेत्र को रेगिस्तान बनाओ''का नारा है। 10 मार्च 2015 को राष्ट्रीय महिला दिवस क्रांतिज्याति सावित्री बाई फूले के परिनिर्वाण दिवस पर हम लोग 2500 की संख्या में पैदल चल कर अमवार धरना स्थल से दु़द्धी नगर तक आए व सरकार को चेतावनी देने का काम किया कि वह काम रोके अन्यथा इस काम को स्वयं संघर्षशील जनता द्वारा रोका जाएगा। ज्ञापन मुख्यमंत्री के नाम सौंपा गया था व तुरंत इसके बाद 12 मार्च को रार्बटसगंज विधायक अविनाश कुशवाहा हमारे धरना स्तल पर पहुंचे। दो महीने में यह पहला अवसर था जब सरकार के एक विधायक आंदोलनकारीयों से बातचीत करने के लिए धरने पर पहुंचे। लेकिन इस समस्या का हल नहीं बल्कि उन्होंने आंदोलनकारीयों को धरना समाप्त करने की गुहार की व जनसंगठनों के बहकावे में न आने को कहा। यह भी कहा कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री से आंदोलनकारीयों की भेंट कराएगें। लेकिन आज तक वे अपने वादे पर खरे नहीं उतरे। वैसे भी इतने दिनों में सपा के विधायकों द्वारा जनता के पक्ष को जानने तक की कोशिश नहीं की गई व प्रशासन द्वारा 23 दिसम्बर 2014 को किए गए आक्रमण में आंदोलनकारीयों पर जो फर्जी मुकदमें लादे गए उसपर आज तक जांच तक नहीं बिठाई गई। बल्कि सरकार द्वारा प्रशासन का ही समर्थन किया जाता रहा व कनहर नदी के किनारे बसे तमाम गांवों को झूठा ठहरा दिया गया।

    साथीयों जिस साम्राज्यवाद से लड़ते हुए क्रांतिकारी नौजवानों ने आज से 84 साल पहले शहादत दी थी उसी अभियान को हमें ज़ारी रखना होगा। क्योंकि यह सरकारें फिर से साम्राज्यवादी ताकतों को हमारे उपर राज करने के लिए हम पर थोप रही है। वैसे भी इस क्षेत्र में रिहंद बांध से विस्थापित लोग कई बार विस्थपित किए जा चुके हैं ऐसे में विस्थापन की त्रासदी झेल चुके इस क्षेत्र में एक और गैरकानूनी बांध परियोजना का अखिर औचित्य क्या है? कनहर बांध परियोजना के गैरकानूनी कार्यो को भी रोकना होगा जो कि प्रदेश सरकार मनमाने ढंग से ग्राम पंचायतों की अनुमति के बिना भूअधिग्रहण करने पर आमादा है। यह परियोजना 1984 में त्याग दी गई थी इस परियोजना के लिए उस समय जो भी फंड आए थे उन्हें दिल्ली के एशियन खेल में स्थांनतरित कर दिया गया था। इस परियोजना के तहत जो भी भूमि अधिग्रहण उस समय हुआ वह संविधान व 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) के मंशा के विपरित है। जिसमें कहा गया है कि अगर भूअधिग्रहण परियोजना कार्यो के लिए उपयोग नहीं किया गया तो उस भूमि को उसके वास्तिविक काश्तकारों को लौटाना होगा। कनहर सिंचाई परियोजना सरासर गैरकानूनी व अवैध परियोजना है जो कि एक बहुत बड़ा घोटाला है व और कुछ नहीं। इस परियोजना को चालू करने की मियाद तक खत्म हो चुकी है, उ0प्र0 की अखिलेश यादव सरकार द्वारा इस परियोजना की शुरूआत करना कानून सम्मत नहीं है जबकि इस परियोजना को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अुनमति नहीं है व राष्ट्रीय ग्रीन टीब्यूनल ने भी इस पर रोक लगा रखी है व अभी भी यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है।  वहीं वनाधिकार कानून 2006 के तहत भी यह परियोजना अब बिना ग्राम सभा की सहमति के लागू नहीं हो सकती। इस के बारे में मुख्यमंत्री महोदय को हमारे बीच में आ कर हमसे सीधे बात करनी होगी। 

    इसलिए एक बार फिर हमें नई आज़ादी के लिए अपने संघर्षो को तेज़ करना है व सरकार के नापाक इरादों को अमर शहीदों को याद करते हुए नई क्रांति की शुरूआत करनी है। इसी मौके पर हमारे सभी साथी जो कनहर बांध से प्रभावित है या नहीं है सब 23 मार्च 2015 को सुबह 11 बजे अमवार बाज़ार में एकत्रित हो कर अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए सरकार से पूछेगें कि अभी तक हमसे बातचीत क्यों नहीं की गई। इस मौके पर हमें धरना स्थल से बाज़ार तक एक विशाल रैली भी निकालनी है इसलिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में शामिल हों। 
    इंकलाब जिन्दाबाद!
    शहीदों की   मज़ारों  पर   लगेंगेे हर बरस मेले
    वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा
    -शहीद रामप्रसाद बिस्मिल

    कनहर बांध विरोधी संघर्ष समिति, कैमूर क्षेत्र मज़दूर महिला किसान संघर्ष समिति, 
    अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन


    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com






    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com

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    বয়স লুকিয়ে বিদেশে পাড়ি জমাচ্ছে কিশোরীরা 


    বয়স কিভাবে বাড়ানো হলো- এমন প্রশ্নে রুমা জানায়, আমাদের কিছুই করতে হয়নি, দালালই সব ব্যবস্থা করেছে।দালালের নাম বলতে অস্বীকৃতি জানায় রুমা। তবে মোট ৬০ হাজার টাকার বিনিময়ে দালাল তাকে বিদেশ আসতে সহায়তা করেছে বলে জানায় সে। অথচ একজন নারীকর্মীর বিদেশে আসতে কোনো অর্থই খরচ হওয়ার কথা নয়। কারণ, যাতায়াতসহ সব খরচ বহন করে তার নিয়োগকর্তা।নিজেকে একটু বয়স্ক প্রমাণের জন্য বোরকা পরে রুমা। সঙ্গে বড়সড় একটি স্কার্ফ। এসবই করা হয়েছে দালালের পরামর্শে।

    শারজাহ বিমানবন্দরে অল্প বয়স্ক বাংলাদেশি মেয়েদের বিদেশ যাওয়ার হার চোখে পড়ার মতো। ট্রানজিট লাইন ক্রস করে জর্ডান, ওমান বা লেবানন যেতে বাংলাদেশি মেয়েদের লাইনে গিয়ে দেখা গেল, পাঁচ জনে এক জন করে কিশোরী দাঁড়িয়ে আছে। কিন্তু কারোরই পাসপোর্টে বয়স কম নয়। এদের সবারই গল্প এক। কোনো না কোনো দালালের হাত ধরে বয়স বাড়িয়ে অনেক আয়ের আশায় বিদেশে পাড়ি জমাচ্ছে তারা।

    http://insidebd.net/news/2015/03/21/details/22997


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    सोने की चिड़िया का आखेट और प्रधानमंत्री की मन की बातें

    इन जहरीली हवाओं और पानियों बीच मुखौटा लगाये कब तक जीते रहेंगे हम?

    पलाश विश्वास



    The Economic Times

    2 hrs·

    12 global companies in race to be part of PM Narendra Modi's pet Diamond Quadrilateral bullet train project http://ow.ly/KDz0L

    '12 global companies in race to be part of PM @[177526890164:274:Narendra Modi]'s pet Diamond Quadrilateral bullet train project http://ow.ly/KDz0L'


    कोलकाता में दफ्तरों और सड़कों पर लोग मंहगे मा्सक के साथ निकल रहे हैं।हम भी मुखौटा पहनेने को मजबूर हैं।


    स्वाइन फ्लू है या नहीं है,इसकी जांच की व्यवस्था बंगाल की छोड़िये,देश के किस किस अस्पताल में है,इसके बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं है।


    बंगाल में अभी मृतकों की गिनती भी शुरु नहीं हुई हैं कि अनुपलब्ध वैक्सीन के लिए मारामारी है।


    बंगाल के तमाम अस्पतालों के डाक्टर खुद तो मास्क पहन ही रहे हैं,वैक्सीन बाजार से औने पौने दामों पर खरीदकर खुद को सुरक्षित करने की फिराक में जनता के बीच पैनिक फैला रहे हैं।


    कोई बता नहीं पा रहा है कि फ्लू और स्वाइन फ्लू में फर्क क्या है।

    हर साल बंगाल में समुद्रतटीय आबोहवा में मौसम के उताचढ़ाव के साथ सर्दी खासी और फ्लू आम बीमारी है।जिससे किसी को कभी परेशान होते नहीं देखा है।


    लेकिन इस बार आतंक का माहौल इतना घना है हे कि जो हालात समझ रहे हैं ,उन्हें भी परिजनों को आश्वस्त करने के लिए अस्पताल या नर्सिंग होम दौड़ना पड़ रहा है।


    किसी के खांसते ही चारों तरफ लोगों को सांप सूंघने लग रहा है।


    हम लगातार महीनेभर से मेडिकल सुपरविजन पर हैं और अभी दस दिनों का एमोक्सोसिलिन कोर्स पूरा कर चुके हैं।


    डाक्टर ने हर तरह का परीक्षण करा लिया है और एंटीबायोटिक डिसकंटीन्यू करके जरुरत हुआ तो कफ सिरप लेने के लिए कहा है।


    डाक्टर के मुताबिक कोल्ड की दवा लेते रहने और एंटीबायोटिक कोर्स की वजह से खांसी पूर तरह खत्म होने में वक्त लगता है और यह चिंता की बात नहीं है।


    अब आलम यह है कि जो लोग गंभीर से गंभीर बीमारी का इलाज भी नहीं कराते, जो जिंदा परिजनों के लिए मातम मनाते हुए उन्हें मौत के घाटउतारे बिना चैन की नींद नहीं सोते और अपने खींसे से धेलेभर अपनी सेहत पर खर्च नहीं करते,मेरे खांसते ही उनमें सनसनी पैदा हो रही है और सविता को घेर कर उनका कहना है किकोई न कोई गंभीर बीमारी जरुर है और बिना इंतजार किये नर्सिंग होम में भर्ती हो जाना चाहिए।


    ऐसे शुभचिंतक हर गली मोहल्ले गांव में व्यापक पैमाने पर हे गये हैं और उनकी एकमात्र चिंता है कि किसी रोग का संक्रमण उन्हें कहीं स्पर्श न कर लें।


    हेल्थ माफिया इसका फायदा उठा रहा है।


    महामारियों का कुल जमा फंडा वैक्सीन कारोबार है।


    सवाल यह है कि इन जहरीली हवाओं और पानियों बीच मुखौटा लगाये कब तक जीते रहेंगे हम?


    हम लगातार कहते रहे हैं कि मौजूदा मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था के माईल स्टोन हैं हरित क्रांति के जरिए भारतीय कृषि का सत्यानाश,भोपाल गैस त्रासदी,आपरेशन ब्लू स्टार मार्फत हिंदुत्व का पुनरूत्थान और बाबारी विध्वंस,देश विदेश दंगे और गुजरात नरंसहार।हमरे हिसाब से ये अलग अलग घटनाएं उसीतरह नहीं है ,जैसे नरसंहार और दंगों के अरग अलग मामलों में अभियुक्तों की थोक रिहाई,जैसे सिखों और भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को दशकों से न्याय से इंकार,जैसे यूनियन कार्बाइड,डाउ कैमिकल्स और एंडरसन का बचाव और जैसे दंगाइयों की ताजपोशी के लिए कारपोरेट सक्रियता अबाध विदेशी पूंजी और अबाध बेदखली की तरह।


    सुधारों का,मुक्तबाजार का यह ताना बाना और तिलिस्म अस्मिता रंगा इतना घना है,कि इसे बेनकाब करना बेहद मुश्किल है।


    प्रधानमंत्री बन जाने के बड़े फायदे हैं।मीडिया और माध्यमों में प्रधानमंत्री की मन की बाते ही सुनने को मिलती हैं,और बाकी आवाजें सिरे से गायब हो जाती हैं।


    भूमि अधिग्रहण से किसानों को कितना फायद होने वाला है,देश भर के किसानों को प्रधानमंत्री ने सिलसिलेवार तरीके से समझाया है।


    सबसे पहले हस्तक्षेप पर हाशिमपुरा कांड का खुलासा करने वाले गाजियाबाद के तत्कालीन एसपी विभूति नारायण राय का भोगा हुआ यथार्थ शेयर करने के लिए अमलेंदु का आभार।


    मैंने सुबह सुबह जब फोन लगाकर कहा कि विभूति जी के अनुभव को शेयर कर लेना चाहिए,अमलेंदु ने कहा कि पांच मिनट पहले हस्तक्षेप पर उनका अनुभव लग चुका है।


    मलियाना और हाशिमपुरा दोनों कांडों में मेरठ कैंट के कुछ सैन्य अधिकारियों की बड़ी भूमिका थी। हापुड़ रोड के आरपार दंगाइयों ने हाशिमपुरा मुस्लिम बस्ती से टेलीलेंस लगाकर एक आर्मी अधिकारी के भाई को गोली से उड़ा दिया तो उस मोहल्ले के सारे मर्दों को ट्रकों  में भरकर ले जाने के आपरेशन में पीएसी के अलावा आर्मी के लोग भी थे।


    इसीतरह मेरठ कैंट इलाके में मलियाना को घेरकर जो नरसंहार हुआ ,उसे अंजाम देने में आर्मी का खुल्ला सहयोग रहा है।हम उन बस्तियों और उन लोगों को भी जानते रहे हैं,जिन्हें पैसे ,दारु और मांस देकर मेरठ में सिलसिलेवार दंगे भड़काये जाते रहे हैं।दंगाग्रस्त इलाकों का भौगोलिक ताना बाना और उसमें मेरठ के कुटीर उद्योगों का साझा कारोबार को तबाह करके एकाधिकार घरानों के न्यारा वारा के बारे में बी हम जानते रहे हैं।


    गौरतलब है कि अमृतसर स्वर्णमंदिर में आपरेशन ब्लू स्टार का ब्लू प्रिंट भी मेरठ कैंट में ही बना था।गायपट्टी के भगवेकरण में जाहिर है कि मेरठ की खास भूमिका रही है।


    विभूति नारायण के सौजन्य से हम मेरठ में पीएसी के कारनामे के बारे में अभी तक जान सके हैं और पूरा किस्सा अभी खुला ही नहीं है।


    पीएसी ने ऐसे ही कारनामाे मुरादाबाद और अलीगढ़ और यूपी के दूसरे शहरों  में करके मुसलमानों का हौसला पस्त करने में भारी भूमिका निभायी थी।


    अगर विभूति नारायण का कलेजा कमजोर होता तो इस कांड का भी खुलासा नहीं होता।मीडिया में खबरें भी विभूति नारायण की वजह से लगीं,वरना मीडिया ने तो पूरे मामले को रफा दफा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।मीडिया में होते हुए,सबकुछ जानते हुए हम लोग खबर नहीं बना सके थे।


    यूपी के हर शहर में बाबरी विध्वंस के पहले और बाद जो दंगे हुए उनमें देशज उत्पादन प्रणालियों का खात्मा मेरठ,बरेली से लेकर बनारस और फिरोजाबाद तक कामन फैक्टर हैं।


    नवउादवादी संतानों के राजकाज से पहले देशज उत्पादन प्रणाली को कैसे खत्म किया गया,मेरठ के दंगे इसकी दिलोदिमाग दहलादेने वाली केस स्टडी है।


    हरित क्रांति के अधूरे एजंडा को पूरा करने के लिए सत्तर और अस्सी तके दशकों में सुपरिल्पित तौर पर धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का आवाहन किया पक्ष विपक्ष की कारपोरेट राजनीति ने।


    जिसकी फसल है यह मनसैंटो डाउ कैमिकल्स की हुकूमत।


    दरअसल इन्हीं दंगाइयों ने जो हमारे राष्ट्र नेता भी हैं,दीर्घकालीन रणनीति बनाकर अब तक मिथकों में कैद सोने की चिडिया के आखेट का चाक चौबंद इंतजाम किया है।

    इससे पहले हमने इस सिलसिले में जो लिखा है उस पर भी गौर करेंः

    भारत सोने की चिड़िया अब भी है।


    जो इसे लूटकर अपना घर भरते रहे हैं,उन्होंने हमें यकीन दिलाया है कि अंग्रेज सोने की चिड़िया लेकर भाग गये हैं।


    इस पर आगे चर्चा करेंगे सिलसिलेवार।


    सिर्फ इतना समझ लीजिये कि दीवालिये देश में अरबपतियों की यह बहार नहीं होती और न स्विस बैंक में बशुमार खजाना भारतीयों के होते।

    हम शुरु से लिख रहे हैं कि भूमि अधिग्रहण से ज्यादा खतरनाक है खान एवं खनिज विधेयक। यह देशभर की प्राकृतिक संपदा,जो असली सोने की चिड़िया है,दरअसल उसके कारपोरेट लूट का स्थाई बंदोबस्त हो गया।


    भारतीय मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक नीतियों से भारतीय रिजर्व बैंक की बेदखली


    इस सोने की चिड़िया को बेचने की तरकीब के तहत ताजातरीन कवायद है भारतीय मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक नीतियों से भारतीय रिजर्व बैंक की बेदखली और देशी कारपोरेट कंपनियों को अब सिर्फ करों में छूट,टैक्स होलीडे और टैक्स फारगान की सौगात नहीं मिल रही है,उनके कर्ज को रफा दफा करने के लिए मौद्रिक नीति निर्धारण से लेकर पब्लिक डेब्ट मैनेजमेंट एजंसी रिजर्व बैंक के नियंत्रण  से निकाल कर निजी हाथों में सोंपी जा रही है।उसे सत्ताइसों विभागों में निजी कंपनियों का राज पहले से ही बहाल है।


    मौद्रिक कामकाज के  नियंत्रण के लिए कारपोरेट मांग मुताबिक ब्याज दर घटाने वाले रिजर्व बैंक के गवर्नर की डाउ कैमिकसल्स मनसैंटो हुकूमत  के साथ ठन गयी है।राजन ने ज्यादा जिद की तो उनकी विदाई देर सवेर हो जानी है।


    रघुराम राजन कमिटी की सिफारिशों  के मुताबिक देश कारपोरेटकंपनियों के कर्ज निपटारे के लिए रिजर्व बैंक के दायरे से बाहर जो मानीटरी पलिसी कमिटी और रेगुलेशन आफ गवर्नमेंट सिक्युरिटीज से संबंधित जो कमिटियां कारपोरेट कंपनियों की अगुवाई में बननी हैं,रिजर्व बैंक के गवर्नर उनमें आरबीआई की नुमाइंदगी के लिए अड़े हुए हैं।इसलिए मामला फिलहाल टला हुआ है।


    रिजर्व बैंक की औकात खत्म करने का फंडा यह है कि सरकार और रिजर्व बैंक (आरबीआइ) आने वाले दिनों में देश में विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने पर और ज्यादा ध्यान दे सकते हैं। देश का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार ही अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने के खतरे को कम करेगा। भारत का मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार 340 अरब डॉलर का है और पिछले छह महीने से इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने से उत्पन्न होने वाली स्थिति पर भावी रणनीति को लेकर वित्त मंत्रलय और आरबीआइ के बीच लगातार संपर्क बना हुआ है। जाहिर है कि इसल पर नियंत्रण भी रिजर्व बैंक के बदले कारपोरेट विशेषज्ञ कमिटी का ही होगा।


    बहराहाल इसकी पृष्ठभूमि तैयार करते हुए  रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने बुधवार को कहा कि केंद्रीय बैंक ब्याज दर पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत कदम से भारतीय बाजार में आने वाले उतार चढ़ावों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऐसी संभावना है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दर में वृद्धि का संकेत दे सकता है, क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार का संकेत दिख रहा है। इसके परिणामस्वरूप भारत समेत उभरते बाजारों से पूंजी निकल सकती है।


    दूसरी ओर,वित्त विधेयक के प्रावधान को लेकर रिजर्व बैंक के अधिकारों में कमी की आशंकाओं के बीच वित्त मंत्री अरुण जेतली ने कहा है कि एेसे किसी प्रावधान पर चर्चा संसद में ही होगी। एेसी आशंका है कि इस प्रावधान से ऋण बाजार के विनियमन की आर.बी.आई. की शक्ति कम हो सकती है।


    जेतली ने संवाददाताओं से कहा, ''मैं इसके (इस प्रावधान के) बारे में (संसद के) बाहर चर्चा नहीं करना चाहता। यदि वित्त विधेयक को लेकर कोई भ्रम है तो हम इस पर संसद में चर्चा करेंगे।''


    हम जानते हैं कि भारतीय रेलवे के निजीकरण से सिरे से इंकार करने वाली सरकार रेलवे प्रबंधन और रेलवे निर्माण और विकास,बुलेट स्पीड इत्यादि परियोजनाओं,रेलवे की तमाम सेवाओं को पीपीपी माडल के तहत कारपोरेट बना रही है।


    मेट्रो रेलवे पर रिलायंस इंफ्रा का वर्चस्व है तो बुलेट रेलेव ट्रैक और पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर रिलायंस के दांव सबसे घने हैं।


    इसी बीच रेलवे के इन्नोवेशन का कार्यभार रतन टाटा को सौंप दिया गया है।यह निजीकरण भी नहीं है।


    बजट में किए गए वादों को पूरा करते हुए रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने गुरुवार को 'कायाकल्प परिषद' का गठन कर दिया। देश के जाने माने उद्योगपति रतन टाटा को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। रेल मंत्रालय के मुताबिक, 'कायाकल्प परिषद' रेलवे में निवेश आकर्षित करने के लिए अहम बदलावों की रूपरेखा तैयार करेगी और सभी स्टेक होल्डर्स से और अन्य निवेश की इच्छुक पार्टियों से संपर्क साधेंगी।


    एअर इंडिया को बेचने की तैयारी है और निजी नयी कंपनियों को विमानन की छूट हैं।आकाश उन्हींका एकाधिकार बनने जा रहा है।


    भारत के तमाम बंदरगाह पहले ट्रस्ट हुआ करते थे जैसे कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट या बांबे पोर्ट ट्रस्ट।ट्स्ट की संपत्ति और ट्रस्ट की मिल्कियत कानूनन बेच नहीं सकते तो पहले ट्रस्ट को कारपोरेशन बना जिया गया और आहिस्ते आहिस्ते सारे बंदरगाहों का हस्तातंरण निजी कंपनियों को हो रहा है,जिसमें मोदी के खासमखास अडानी समूह को फायदा ही फायदा  है।


    अपने प्रिय प्रधानमंत्री की देश विदेश की केसरिया कारपोरेट यात्राओं की कीमत खूब वसूली जा रही है।


    हम लोग भूल गये हैं कि भारत में परंपरागत कपड़े उद्योग का अवसान धीरुभाई अंबानी की अगुवाई में इंदिरा गांधी के संरक्षण प्रोत्साहन से रिलायंस के उत्थान से हुआ।



    अब रिलायंस समूह जो कलतक कांग्रेस साथ था और तेल गैस,इंफ्रा,एनर्जी,टेलीकाम क्षेत्रों में जिसका बेलगाम विकास हो गया कांग्रेस के सौजन्य से।


    हम भूल रहे हैं कि सार्वजनिक उपक्रम ओएनजीसी के खोजे और विकसित तमाम तेलक्षेत्र तोहफे में दिये गये रिलायंस समूह को।


    अब मोदी की ताजपोशी में पहल करने वाले रिलायंस समूह के लिए और सौगातों की बहार तैयार है केसरिया समय में।


    कहा जा रहा है कि ईंधन के संकट से निबटने के लिए भारत में पांच विशालतम आयल रिजर्वयर बनाये जायेंगे और इनके निर्माण का ठेका पशिचम एशिया की किसी कंपनी को दिया जाने वाला है।


    ये रिजार्वेयर इसके हवाले होंगे,फिलहाल इसे राज रहने दें।

    हमारे बगुला भगत अर्थशास्त्रियों, मिलियनर बिलियनर जनप्रतिनिधियों, एफडीआई खोर श्रमजीवी मीडियाकर्मी की कमरतोड़ मीडिया और डाउ कैमिकल्स मनसैंटो के नजरिये से असली भारत वही है,जो मोबाइल,पीसी और टीवी की खूबसरत मल्टी डाइमेंशनल हाई रेज्यूलेसन छवि है।


    वहां बेनागरिक ग्राम्य भारत की कहीं कोई तस्वीर है ही नहीं और विज्ञापनों में जैसे चमकदार सितारे जीवन के हर क्षेत्र के महमहाते बेदाग चेहरे हैं,वैसा ही खूबसूरत सामाजिक यथार्थ है।


    संजोगवश पुरस्कृतों,सम्मानितों और प्रतिष्ठितों के साहित्य कला,विधाओं और माध्यमों का समामाजिक यथार्थ भी यही है।


    इसी लिए भारत की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत,शहादतों के सिलसिले, किसानों, आदिवासियों और बहुजनों के हजारों साल के प्रतिरोध का हमारे लिए दो कौड़ी मोल नहीं है।


    इसीलिए अंबेडकर को हम ईश्वर बना देते हैं गौतम बुद्ध की तरह और दरअसल आचरण में हम रोज रोज उनकी हत्याएं कर रहे हैं.जैसे कि गांधी की हत्या हो रही है रोज रोज।


    यह व्यक्ति और विचारों का कत्लेआम नहीं है दोस्तों,न गौतम बुद्ध कोई व्यक्ति है और न अंबेडकर कोई व्यक्ति है और न गांधी कोई व्यक्ति है,वे हमारे जनपदों,हमारे लोक,हमारे इतिहास,हमारे सामाजिक यथार्थ के प्रतीक हैं।कत्लेआम भी हमारे जनपदों, हमारे लोक,हमारे इतिहास,हमारे सामाजिक यथार्थ का।


    मुक्तबाजारी उपभोक्ता दीवानगी में हम पाकिस्तानी विकेटों की तरह पूरे जोश खरोश के साथ अपने इन प्रतीकों को कत्म करके बचे खुचे जनपदों को महाश्मशान बना रहे हैं।



    कलिंग,कुरुक्षेत्र और वैशाली के विनाश का जो महाभारत है,उसे हम सामाजिक यथार्थ के नजरिये से नहीं,मिथ्या आस्था,प्रत्यारोपित धर्मोन्माद, अटूट अस्मिता और पहचाने के जरिए हासिल अपनी हैसियत  और मिथक तिलिस्म में कैद इतिहास दृष्टि से देख रहे हैं।


    इन्हीं मिथकों को इतिहास बनाने की कवायद कोई हिंदू राष्ट्र बनाने  का वास्तुशास्त्र नहीं है,यह सिरे से मुक्तबाजार का धर्मोन्मादी राजसूय अश्वमेध है।


    जिसे खूंखार भेड़ियों की जमात ने धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की शक्ल दे दिया है और हमारी गरदनें ऐसे चाक हो रही हैं कयामती गजब दक्षता के साथ कि फिरभी हम सारे कंबंध बजरंगी बने हुए हैं।


    सबसे बड़ा झूठ जो बतौर मिथक हम जनमजात जीते रहे हैं,वह यह है कि अतीत में भारत सोने की चिड़िया रहा है और आर्यों के उस सनातन भारत पर हमला करने वाले विदेशियों ने उसी सोने की चिड़िया को लूटा है।


    सबसे बड़ा झूठ जो बतौर मिथक हम जनमजात जीते रहे हैं,वह यह है कि आखिरकार वह सोने की चिड़िया अंग्रेज अपने साथ ले गये हैं।


    दोस्तों,हकीकत यह है कि सोने की चिड़िया इंग्लैंड में कही नहीं है और दूसरे विश्वयुद्ध जीतने के बाद से जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अवसान होना शुरु हुआ और निर्णायक तौर पर जिसे अश्वेत विश्व ने  हमेशा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों पर कैद कर दिया दक्षिण अफ्रीका में,जहां से गांधी का सफर शुरु हुआ था,उसके पास सोने की चिड़िया रही होती तो बघिमघम पैलेस का जलवा कुछ और होता।


    कृषि और उत्पादन प्रणाली को जलांजलि देकर समूची मेहनतकश विरासत को ब्रिटिश  संसद में ऊन की गद्दी में सीमाबद्ध करे देने वाले हमारे पुराने आकाओं के नक्शेकदम पर चल रहे हम भारतीयों को कभी अहसास ही नहीं हुआ कि हमारे पुरखे बेशकीमती आजादी के साथ सोने की वह चिड़िया भी हमें छोड़ गये और सत्ता वर्ग अब तक ,15 अगस्त  से लेकर अबतक उस चिड़िया के हीरे जवाहिरात मोती जड़े सोने के परों को नोंचते खरोंचते हुए अपना अपना घर भरते रहे और हमें बताते रहे कि सोने की चिड़िया तो कोई और ले गया।


    निर्मम सत्य यह है दोस्तों,अब वह सोने की चिड़िया चालीस लाख चोरों के हवाले है।

    निर्मम सत्य यह है दोस्तों,उस सोने की चिड़िया की नीलामी ही बेशर्म विकास गाथा है।


    अंग्रेज न हमारी उत्पादन प्रणाली ले गये और न हमारे उत्पादन संबंधों को तबाह किया अंगेजों ने और न जनपदों को जिबह किया।वे तो पवित्र गोमाता के संपूर्ण आहार बने पौष्टिक दूध से भारत माता की संतानों को वंचित करके अंग्रेजों की सेहत बनाता रहा।


    अंग्रेजों ने हमारे लिए यह मुक्त बाजार नहीं चुना है और इसे हमने चुना है।


    अंग्रजों ने हमारे संसद में प्रधानमंत्री बनकर नहीं कहा कि इस देश में इतने संसाधन हैं,जिन्हें विकास के रास्ते लगाया जाये,विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और अबाध पूंजी प्रवाह को जारी रहने दिये जाये,तमाम कायदे कानून संसदीयसहमति से बदल दिये जाये तो इतना इतना पैसा आयेगी कि कई राज्यों का खजाना छोटा पड़ जायेगा और राज्य सरकारें इस पीपीपी विकास से हासिल नोटों को गिन भी सकेंगी।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो प्रधानमंत्री ऐसा बयान जारी करने का मौका न मिला होता और न भूमि अधिग्रहण,कोयला,खनन,बीमा नागरिकता से संबंधित सारे कानून बदल कर बहुराष्ट्रीय पूंजी के हितों के मुताबिक सारे सुधार लागू करने की ऐसी हड़बड़ी होती।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो भारतीय राजनीति,भारतीय साहित्य कला माध्यमों,भारतीय सिनेमा,भारतीय खेलों,भारतीय मीडिया,भारतीयखुदरा बाजार, उपभोक्ता सौंदर्य बाजार, भारत में तमाम सेवाक्षेत्रों और भारत की सुरक्षा आंतरिक सुरक्षा पर डालरों की ऐसी बरसात मूसलाधार नहीं  होती।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो डाउ कैमिकल्स और मनसैंटो की हुकूमत,तमाम रंगबरंगे बगुला भगतों और तमाम कारपोरेट वकीलों की लाख कोशिशों के बावजूद भारत को सबसे बड़ा इमर्जिंग मार्केट का खिताब मिलता,न निवेशकों की आस्था सत्ता की आस्था होती और न इस देश में सांढ़ और घोड़े इतने बेलगाम होते।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो  पहली बार चुनाव जीतते न जीतते हमारे तमाम जनप्रतिनिधि ग्राम प्रधानों और कारपोरेशन के काउसिंलरो से लेकर सरकारी  समितियों के मनोनीत मेंबर,तमाम मशरूमी लाल बत्ती वालों,तमाम विधायकों,तमाम सांसदों और मंत्रियों,तमाम विचारधाराओं और तमाम अस्मिताओं के झंडेवरदारों,सपनों के सौदागरों का यह मिलियनर बिलियनर तबका होता और न उनमें यह महाभारत होता,जिसकी कि हम पैदल सेनाएं बजरंगी हैं।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो अमेरिका और इजराइल हमें अपना साझेदार हर्गिज नहीं मानता।अपनी गरज से तो नहीं।


    भारत सोने की चिड़िया न रहा होता तो तमाम देशों के राष्ट्रप्रधान भारत के मुक्त बाजार में अपने हितों की तलाश में इतने बेसब्र होते।




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    Conversion into a fascist state is the next Phase of Economic Ethnic cleansing!


    RBI has to be dismantled as Planning Commision has been.Sebi for Pension Money in Markets as Jaitley Takes Stock!

    PM`s MAn ki Baat is in defence of his corporate Kesaria agenda!

    Palash Biswas

    What I have been warning for decades that everything the taxpayers have in their kitty.Pension,PF,Gratuity and even the Bank Deposit have to be diverted to the Market.


    For the accomplishment of this target Reserve Bank of India is being Dismantled and SEBI is taking over the monetary management.It is in the same line as Planning Commision is done with.


    It is Tax Holiday for foreign capital all the way as Finance Minister Arun Jaitley reportedly said that India needs to become globally competitive from infrastructure to taxation.


    Thus, the proposed public debt management agency should be independent of the central bank and the government, Reserve Bank of India governor Raghuram Rajan said on Sunday even as finance minister Arun Jaitley sought to downplay differences between the two policy makers.


    In a press conference after addressing RBI's board meeting, Jaitley reiterated that there is no disconnect between the central bank and the finance ministry. He was answering a question on differences between the RBI and government on issues such as the formation of the monetary policy committee, the creation of a public debt management agency (PDMA) and the government's decision to include a clause in the finance bill which will take out government bonds from the purview of the central bank.


    FM underlined the need for relaxing norms for entry of multinational corporations to promote growth, says report.

    "We have to make the entry point into India easier for large global corporations to grow," added FM.


    Meanwhile,to attract retail investors, mutual fund houses are tapping social media platforms like WhatsApp and a host of other calling and messaging apps to facilitate transactions in MF products.


    These new facilities will help investors in buying or selling mutual fund (MF) products in a simpler and faster manner, experts said.


    Mutual fund houses that have adopted digital modes such as Internet and mobiles for increasing distribution of MF products include Axis MF, Reliance MF, UTI MF, L&T MF, Quantum MF and ICICI Prudential MF.


    Meanwhile, to help lenders deal with defaulting corporate borrowers, SEBI today relaxed norms for them to convert their debt into equity in distressed listed companies —— a move that may lead to a sharp surge in restructuring of bank loans.

    The decision to tweak the pricing formula for conversion of debt into equity would also pave the way for bankers to have a larger say in activities of the distressed company by acquiring majority stake and taking over the management.

    The total non-performing assets of public sector banks alone stand at nearly Rs. 3 lakh crore, while top 30 defaulters are sitting on bad loans worth Rs. 95,122 crore as on December 2014. In the past, banks have converted bad debt into equity in a few cases like Kingfisher but the conversion has been mostly difficult including due to regulatory and legal issues.

    With the changed norms, pricing would be based on "fair value" with some safeguards and conversion into equity can only happen when the lenders have acquired at least 51 per cent stake in the concerned company.

    Describing the decision as "major", SEBI chairman U K Sinha said now exemptions have been given from certain regulations.



    Parliament passed the Insurance Bill raising the foreign investment limit.


    In Fact the PM has extended his pro corporate campaign to the agrarian communities and justified what Arun Jaitley means.His Man ki Baat is all about corporate lobbying and corporate funding and unabated corporate Kesaria Raj.He defended the Gujarati PPP Model of ethnic cleansing all the way.


    Just understand his urgency to press the push button for reforms.For Example, Reputed companies from six countries including France, Germany, Italy and China have entered the race to become part of Prime Minister Narendra Modi's pet Diamond Quadrilateral bullet train project.

    Twelve international companies are bidding for conducting the feasibility study for the three corridors of the Diamond Quadrilateral high-speed rail network project, said a senior Railway Ministry official.

    Feasibility study is being sought for high-speed rail corridors between Delhi and Mumbai, Mumbai and Chennai, and New Delhi and Kolkata, which are part of the Diamond Quadrilateral project.

    Four companies from China, including Siyuan, DB International from Germany, Systra from France, Sener from Spain and Italser from Italy, besides one from Belgium, have joined the global competitive bidding to bag the survey contract.

    However, the official said that one company will be allowed to do the survey for one corridor only in the Diamond Quadrilateral project.

    The bidding was opened this week and the winners will be decided within four months by July, said the official, adding that the feasibility study for the three routes is estimated to cost about Rs 30 crore.

    Currently, the superfast Rajdhani Express covers the distance between Delhi and Mumbai in about 16 hours. With the introduction of the high-speed train, the travel time is expected to be reduced by almost half.

    Similarly, the travel time between Delhi and the other metros will be reduced with the introduction of bullet trains.

    At present, China is undertaking feasibility study of the Delhi-Chennai route, also a part of the Diamond Quadrilateral project.

    The Rs 2 lakh-crore Diamond Quadrilateral project aims to drastically reduce the travelling time between the metros with the introduction of the high-speed trains, which will run at speeds of about 300-kmph.

    Besides, a feasibility study is in progress by the Japan International Cooperation Agency (JICA) for the 534-km-long Mumbai-Ahmedabad high speed corridor project, which is estimated to cost Rs 63,180 crore.



    Just see the impact!The All India Muslim Personal Law Board on Sunday launched a frontal attack on the Narendra Modi government and announced a nationwide campaign to counter right wing forces, accusing Hindu organisations like the RSS of hatching a "conspiracy" to convert the country into a "fascist state".


    Conversion into a fascist state is the next Phase of Economic Ethnic cleansing!


    Just see how innocently the  Prime Minister of India asked,Tell me is this amendment in the bill anti-farmer? That's why we had to bring the ordinance. If we had not brought this ordinance then farmers land would have gone and they. that is, farmers wouldn't have got any money."


    Coincidentally as the PM shared his Man ki Baaten to Indian farmers,a major fire broke out at the AC plant inside Parliament complex in Delhi on Sunday while welding work was underway gutting the unit and affecting air conditioning in the main building and it took ten fire engines to douse the flames in about 30 minutes.However,even after the attacks on Indian Parliament the security lapse is a red alert.We do not know how the Ruling Hegemony is going to streamline the security network and who would be targeted for this attack yet again.


    President Pranab Mukherjee expresses serious concern over the fire in Parliament Complex; asks for an urgent enquiry into the cause of the fire.


    Mind you,With opposition mounting campaign over Land Acquisition Bill, Prime Minister Narendra Modi today reached out to farmers, telling them that "lies" are being spread over the measure for "political reasons" to create confusion among the farming community.


    Speaking more on the Land Bill, Modi said this bill aims at avoiding exploitation of farmers. The amendments made to the 2013 Land Acquisition Act will even ensure that farmers will get the compensation that's four time the worth of the land.


    On the other hand,To deepen capital markets, the Securities and Exchange Board of India (Sebi) on Sunday pitched for allowing investment of pension money into various securities instruments and to create an enabling environment for REITs or Real Estate investment Trusts to flourish, as Finance Minister Arun Jaitley reviewed the state of capital markets in the country.


    In his first post-Budget meeting with Sebi's board, Mr Jaitley also discussed the capacity building and other infrastructure needs for merger of commodities regulator Forward Markets Commission (FMC) with Sebi to create a unified markets regulator.


    Mr Jaitley also discussed the recent trends related to investments by foreign portfolio investors and domestic institutional investors in the securities markets.


    After addressing Sebi's board members, Mr Jaitley said he also discussed various issues confronting the regulator, its functioning vis-a-vis new proposals in the Budget and the roadmap ahead.


    "They (Sebi) talked about capacity building at Sebi, both in terms of ability to acquaint with the subjects and other infrastructure requirements," the Finance Minister said about the discussions on FMC merger during his customary post-Budget address to the Sebi board.


    Mr Jaitley was accompanied by Minister of State for Finance Jayant Sinha during his interaction with Sebi's board and other senior officials of the markets regulator.


    Besides Sebi Chairman U K Sinha, its 8-member board includes three whole-time members (Prashant Saran, Rajeev Agarwal and S Raman), an independent director and nominees of Finance Ministry, Corporate Affairs Ministry and the Reserve Bank of India.


    Sebi later said in a statement that its Chairman apprised the Finance Minister of the recent developments in the Indian securities market and the initiatives taken by the regulator.


    "He also highlighted the announcements related to the securities market in the Union Budget for 2015-16 and consequent action being taken by Sebi," the regulator added.


    "Jaitley discussed the recent trends related to investments by foreign portfolio investors and domestic institutional investors in the securities market. Need for pension money to come to the Indian securities market was particularly emphasised."


    "Potential with respect to entry of REITs in the market was also discussed. The Finance Minister also took note of the roadmap of FMC's merger into Sebi," Sebi said.



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    Press Communiqué



    The Central Committee of the Communist Party of India (Marxist) met in New
    Delhi on March 21-22, 2015. It has issued the following statement:



    Damage to Crops



    The Central Committee expressed its deep concern at the wide-scale and heavy
    damage to crops in North India due to unseasonal rains. These rains have
    damaged the Rabi crop and aggravated the distress of farmers. This will lead
    to a further shortfall in food production. The Central Committee demanded
    that the Central Committee and the concerned state governments take
    immediate steps to provide sufficient compensation and relief to the
    affected farmers.



    Stop Land Ordinance



    The Central Committee extended its full support to the ongoing struggle
    against the land acquisition ordinance which is sought to be passed into law
    in parliament. This anti-farmer piece of legislation must be stopped. The
    CPI(M) will fully support and participate in the anti-land acquisition
    agitation being conducted by the Joint Forum.



    Denationalisation of Coal Industry



    The Central Committee sharply criticized the passage of the Coal Mines
    (Special Provisions) Bill, 2015 in parliament. The Modi Government was able
    to push through the Bill in the Rajya Sabha due to the support extended to
    it by the AIADMK, BJD, TMC, SP, BSP and some other parties. This Act opens
    the way for the entry of private sector in coal mining and denationalization
    of the industry. The Central Committee deplored the stand adopted by these
    regional parties who have compromised the interests of the people for some
    other considerations.



    The struggle to prevent the privatization of the coal industry should be
    carried on by the united working class movement.



    Hashimpura



    The acquittal by a Delhi Court of all the 16 accused in the Hashimpura
    (Meerut) massacre case in which 42 people were killed has angered those who
    had wanted to see that justice is done in this police atrocity. The
    acquittal due to insufficient evidence highlights the callous manner in
    which the prosecution of those guilty for communal killings are being
    conducted.



    The Central Committee demands that the verdict be appealed and the case
    strongly pursued in the higher court.



    Swine Flue Deaths



    The Central Committee expressed serious concern at the widespread outbreak
    of swine flue across the country. Nearly 2000 people have died due to the
    disease and thousands of others have fallen ill. The public health care
    system has failed miserably in dealing with the outbreak of the disease. The
    Central Government has not shown sufficient seriousness in coordinating the
    efforts to tackle the disease and extending support to the states.



    The Central Government has cut the health outlay in the Union Budget which
    will only worsen the public health system. The Central Committee demands
    adequate funds to be deployed for the public health care system and urgent
    steps to tackle swine flue on a war footing.



    Party Congress Preparations



    The Central Committee discussed and adopted the Political-Organisational
    Report to be presented to the 21st Congress of the party to be held in
    Vishakapatanam from April 14 to 19, 2015. The Political-Organisational
    Report deals with the three years work of the party since the last Party
    Congress.


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