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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    जनकवि भोला की कुछ रचनाएँ


    भोजपुरी रचनाएं और उनका हिंदी अनुवाद 

    1-तोहरा नियर दुनिया में केहू ना हमार बा

    तोहरा नियर दुनिया में केहू ना हमार बा
    देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
    मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
    जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
    तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
    देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
    हेने आव नाया एगो दुनिया बसाईं जा
    जिनिगी के बाग आव फिर से खिलाईं जा
    देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
    देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
    दहशत में पड़ल बिया दुनिया ई सउंसे
    लह-लह लहकत बिया दुनिया ई सउंसे
    छोड़िं जा दुनिया आव लागत ई आसार बा

    (आप सब के जैसा दुनिया में कोई और हमारा नहीं है
    आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
    मन को आशा और विश्वास आप ही से मिला है
    जिंदगी को खास जान आप ही से मिला है
    आप ही से मेरी जिंदगी का तार जुड़ा है
    आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
    इधर आइए एक नई दुनिया बसाई जाए
    जिंदगी के बाग को फिर से खिलाया जाए
    आपको देखके ही मुझे आधार मिला है
    आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
    यह सारी दुनिया दहशत में पड़ी हुई है
    यह दुनिया लह-लह लहक रही है 
    इस दुनिया को छोड़के आइए, यही आसार लग रहा है)

    2-जान जाई त जाई

    जान जाई त जाई, ना छूटी कभी
    बा लड़ाई ई लामा, ना टूटी कभी
    रात-दिन ई करम हम त करबे करब
    आई त आई, ना रुकी कभी
    बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
    दुख आई त आई, ना झूठी कभी
    साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल
    नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी

    5सितंबर, 87 समकालीन जनमत में प्रकाशित

    (जान जानी है तो जाए, पर नहीं छूटेगी कभी
    यह लड़ाई तो तो लंबी है, नहीं टूटेगी कभी
    रात-दिन यह कर्म तो हम करेंगे ही करेंगे
    आना होगा तो आएगा ही, नहीं रुकेगा कभी
    यह दर्द है राग-रागिनी का, जिसे गाऊंगा ही
    साथी का यह साथ मुझे जबसे मिला है
    स्नेह की यह लता तो कभी सूखेगी नहीं) 

    3-आज पूछता गरीबवा

    कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
    बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
    बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
    जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
    करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
    बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
    जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
    साथी करम के करनवा बतवनी
    ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
    बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
    माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
    दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
    इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
    बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।

    ( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
    कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
    बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
    जाड़ों की रातें कलप के बिताए
    करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
    कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
    जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
    साथी कर्म के कारणों को बताए
    न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
    कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
    मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
    उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
    आंसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
    कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)

    4. जन-संगीत
    हम चहनी, चाहींला, चाहत बानी
    कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी
    तोहरे पिरितिया के याद में जिनिगिया
    निंदवा में अइतू सुनइती हम गीतिया
    कहां चल जालू निंदवा में खोजत बानी
    कबहूं....
    दिन रात के बाड़ू हो तू ही दरपनवा
    जवरे पिरितिया के गाइला हो गनवा
    काहे जनबू ना जान जनावत बानी
    कबहूं....
    ना देखती कउनो हम कबो सपनवा
    शहीदन के हउवे ई प्यारा जहनवा
    अब कउनो ना डर बा जानत बानी
    कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी
    (हमने चाहा, चाहता हूं, चाह रहा हूं
    हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं
    तुम्हारी प्रीत की याद में है जिंदगी
    नींद में आती तो गीत सुनाता
    साथ में प्रीत के गाने गाता
    क्यों नहीं जानोगी जान, बता रहा हूं
    हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं
    नहीं देखता कभी सिर्फ कोई स्वप्न
    शहीदों का है यह प्यारा जहान
    अब कोेई डर नहीं यह जानता हूं
    हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं)


    5. जनवाद के आवाज
    आवऽता दहाड़ते 
    जनवाद के आवाज
    ना चलल बा ना चली
    सामंती ई राज
    जन-जन के त्याग शक्ति
    ना करी अब कउनो भक्ति
    घर गांव जवार के नारा बा
    जाति ना साथिये दुलारा बा
    ना रही कनहूं हत्यारा
    जन जीवने बा प्यारा
    बस इहे बा नारा, इहे बा नारा
    सभे बा प्यारा, प्यारा, प्यारा।


    (आ रही है दहाड़
    जनवाद की आवाज की 
    नहीं चला है न चलेगा 
    यह  राज सामंती
    जन जन की त्याग शक्ति 
    नहीं करेगी अब कोई भक्ति
    घर जवार गांव का नारा है
    जाति नहीं साथी ही दुलारा है
    नहीं रहूंगा कहीं हत्यारा
    जन जीवन है प्यारा
    बस यही है नारा, यही है नारा
    हर कोई है प्यारा, प्यारा, प्यारा )


    हिंदी कवितायेँ  

    लहू किसका
    सोचता था,
    मुझे फिर से सोचना पड़ रहा है
    कारण,
    मेरे समक्ष मौत जो खड़ी है,
    दिन रात सदा भूख के रूप में
    जिसे चाहता हूं खत्म करना
    हर राह चुनी नाकामयाब रहा
    मिली है आजादी संघर्ष कर रहा हूं
    एक सोच है यही 
    कविता कर रहा हूं
    बह रहा है आज लहू किसका
    यही प्रश्न कर रहा हूं

    आओ, बात करें
    बात ज्ञान और विज्ञान की करें
    बात जमीं और आसमान की करें
    बात मजदूर किसान की करें
    और की नहीं बात मात्र इंसान की करें
    न हिंदू न इसाई मुसलमान की करें
    जाति-धर्म नहीं बात इंसान की करें
    बात रोटी और बेटी के अरमान की करें
    बात साथी सम्मान की करें
    आओ बात ज्ञान विज्ञान की करें

    आदमी 
    मैं आदमी हूं
    भर दिन मेहनत करता हूं
    देखने मेें जिंदा लाश हूं 
    लेकिन.....
    मैं लाश नहीं हूं
    मैं हूं दुनिया का भाग्य विधाता
    जिसके कंधों पर टिकी हैं
    दैत्याकार मशीन
    खदान, खेत, खलिहान
    जी हां, मैं वहीं आदमी हूं
    जिसके बूते चलती है
    ये सारी दुनिया
    जिसे बूते बैठे हैं
    ऊंची कुर्सी पर 
    कुछ लोग
    जो पहचानते नहीं
    इस आदमी को
    समझते नहीं
    इस आदमी को
    नहीं, नहीं,
    ऐसा हरगिज नहीं 
    मैं होने दूंगा
    अपनी पहचान मिटने नहीं दूंगा
    क्योंकि 
    मैं आदमी हूं
    हां, हां,
    मैं वही आदमी हूं।

    आखिर कौन है दोषी?
    जब से होश हुआ तब से लड़ रहा हूं
    कारण सबसे कह रहा हूं
    यह सारी मुफलिसी बेबसी की देन है।
    सुनो समझो तुम्हारे अरमानों को अपने साथ देख रहा हूं
    साफ है दिल जिसका, उसी के पीछे लगा हत्यारा देख रहा हूं
    आॅफिसरों और नेताओं में लूटखसोट का रोजगार देख रहा हूं
    जनवितरण प्रणाली से जल रहा बाजार देख रहा हूं
    गंदगी में गंदगी से रोग बढ़ते हाल देख रहा हूं
    कुछ घर में रोगियों को दवा के बिना मरते बेबस लाचार देख रहा हूं
    कुछ ही शिक्षा के रहते, बेशुमार बेरोजगार देख रहा हूं
    कर्ज पर कर्ज से दबी जिंदगी सरेआम देख रहा हूं
    चलचित्र के द्वारा सेक्स का प्रचार देख रहा हूं
    पास पड़ोस में बढ़ते लुच्चे-लफंगों की कतार देख रहा हूं
    तिलक दहेज की ज्वाला में 
    बहनों को जिंदा जलाते-मारते घर से निकालते अखबार देख रहा हूं
    बिजली के पोल तार अधिकारी और कर्मचारी के रहते
    घर गांव शहर में अंधकार देख रहा हूं
    कब कौन मरेगा उनके इशारे पर 
    लाश को छिपाते अखबार देख रहा हूं
    कान में तेल डालकर बैठी राज्य और केंद्र सरकार देख रहा हूं
    कब तक साधेगी खामोशी जनता, उनके बीच मचा हाहाकार देख रहा हूं
    अब नहीं बचेगी जान भ्रष्ट नेताओं और आॅफिसरों की 
    जनता के हाथ में न्याय की तलवार देख रहा हूं
    अभी नजर नहीं आ रहा है, लेकिन बम और बारूद के धुएं को तैयार देख रहा हूँ

    हम लड़ रहे हैं
    हम लड़ रहे हैं
    हम किनसे लड़ रहे हैं?
    हम लड़ रहे हैं
    सामंती समाज से
    रूढि़वादी समाज से
    पूंजीवादी समाज से
    अंधविश्वासी समाज से
    आखिर क्यों ल़ड़ रहे हैं इनसे?
    समता लाने के लिए
    समाजवादी व्यवस्था लाने के लिए
    पूंजीवाद के सत्यानाश के लिए
    सांप्रदायिकता को समूल नष्ट करने के लिए
    ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकने के लिए
    अंधविश्वास को दूर भगाने के लिए
    क्योंकि-
    इसी से गरीबी मिटेगी,
    गरीबों को मान-सम्मान मिलेगा,
    अब तक ये जो सिर झुका कर चलते थे
    सिर उठाकर चलेंगे
    इसी क्रांति से 
    अमन, चैन, शांति मिलेगी
    सापेक्ष चेतना जगेगी
    इसी चेतना के जगने से होगी क्रांति। 
    क्रांति का मतलब गुणात्मक, मात्रात्मक नहीं।
    मात्रात्मक यानी पानी का भाप, भाप का पानी, 
    अर्थात पूंजीवादी सरकार का आना-जाना
    फिर फिर वापस आना
    गुणात्मक-
    जैसे दूध का दही बनना
    फिर कोई उपाय नहीं 
    दही का फिर से दूध बनना
    अर्थात् पूंजीवादी सामंतवादी आतंकवादी सरकार का जाना 
    समाजवादी सरकार का आना।
    अब तक के आंदोलन से 
    ऊपरी परिवर्तन होते रहे
    अंतर्वस्तु नहीं बदली
    अब गुणात्मक क्रांति होगी
    अंतर्वस्तु भी बदलेगी
    परिणाम
    अब धरती पर पूंजीपति नहीं रहेगा
    न जंगल में शेर रहेगा
    न शेर वाला कोई विचार रहेगा
    गरीबों की सरकार रहेगी
    हम रहेंगे, हमारी जय-जयकार रहेगी
    हमारा अब यही नारा रहेगा 
    न कोई हत्यारा रहेगा
    न सामंती पाड़ा रहेगा
    क्योंकि,
    हम बढ़ रहे हैं, बढ़ रहे हैं...



    यह तस्वीर है वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस की उस सभा की जहां किरण बेदी वक्ता होकर गई थीं , वहाँ हिन्दू स्त्रियों पर खतरे के भयावह तस्वीरें पेश की जा रही थी , पहली तस्वीर उसी भयावहता को बता रही है और दूसरी तस्वीर किरण बेदी के भाषण की , भाषण की कला का कोई मुकाबला नहीं , जंतर -मंतर तो याद ही होगा न ! आइये दिल्ली में मुख्यमंत्री बनने को ख्वाहिशमंद किरण जी हिन्दू महिलाओं को भयमुक्त करेंगी , हालांकि वे स्वयं भयभीत जरूर होंगी , भाजपा प्रधानसेवक जी ऐन वक्त पर कठपुतली की डोर न खींच लें !

    Sanjeev Chandan's photo.
    Sanjeev Chandan's photo.


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    Is Congress trying to become B team of the Sangh Parivar ? Despite the known fact that upper castes particularly the brahmins have ditched the Congress and will not come back to it in near future as they enjoy the feast of Sangh Parivar, the party still have not been able to leave its love for them. Dr Ambedkar said,' Congress as the original brahmanical party of India. Is it destined to represent just upper castes. Will BJP and Congress be just convertible currencies without any particular difference between the leadership.. ideologies are to befool people.. netas enjoy their power whether it is BJP or Congress. Most of the BJP has a majority of former congressmen and a number of them are waiting for their turn to be minister again.. who are they befooling.. poor devotees..

    Indian National Congress leader launches 'secular' Hindu outfit to challenge growth of Sangh parivar outfits | http://wp.me/p3DY9j-9vBl

    Indian National Congress leader launches 'secular' Hindu outfit to challenge growth of Sangh parivar outfits | http://wp.me/p3DY9j-9vBl


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    ज़्यादा पुरानी बात नहीं है - 
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    आज से पचास साल पहिले किसी भी प्रथा या परंपरा को वेद सम्मत बता कर उसके पालन के लिए प्रेरित किया जाता था l हिन्दुओ की सभी परंपराओ को शास्त्रोक्त (शास्त्र अनुसार ) माना जाता था l अब विज्ञान के युग मे हर बात और चलन को वैज्ञानिक बताने का दौर चल रहा है l यज्ञ,हवन ,यज्ञोपवीत से लेकर ग्रहण पर स्नान, दुग्ध अभिषेक जैसी हर बात को वैज्ञानिक सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक पैदा हो गए है l बाबा रामदेव के सहयोगी वैद्य बालकृष्ण दवाईयो की मार्केटिंग के साथ अपनी इस तरह की दुर्लभ खोजो से जनता को अवगत कराते रहते है l हिन्दू परिवार मे जन्म लेकर हम भी कई परम्पराओ का अनुसरण करते आ रहे है ,... हमे उसके वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक होने से कोई फर्क नहीं पड़ता l मज़ेदार स्थिति यह है कि ऐसी बाते किसी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध संस्थान द्वारा आज तक प्रमाणित नहीं की गई l

    Gopal Rathi's photo.
    Gopal Rathi's photo.


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    एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
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    एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है

    आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है

    ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए

    यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है

    एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—

    इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

    मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम

    तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है

    इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके

    जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है

    कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए

    मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

    मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ

    हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

    -दुष्यंत कुमारसौजन्य से प्रिय कवि भाई नित्यानंद गायेन


    गरीबों के हाथों में न्याय की तलवार हो, भोला जी यह चाहते थे: रवींद्रनाथ राय

    जनकवि भोला जी स्मृति आयोजन संपन्न


    शंकर बिगहा जनसंहार के अभियुक्तों की रिहाई पर क्षोभ और विरोध जाहिर किया गया,
    न्याय के संहार पर साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने गहरा शोक जाहिर किया
    तमिल उपन्यासकार पेरुमल मुरुगन की हिंदूवादी संगठनों द्वारा किये जा रहे विरोध और किताब जलाये जाने की निंदा


    15 जनवरी को जनकवि भोला जी का स्मृति दिवस था। हमने आरा शहर के नवादा थाने के सामने उसी जगह पर उनकी स्मृति में आयोजन किया, जहां हर साल गोरख पांडेय की स्मृति में काव्य गोष्ठी आयोजित होती रही है और जिसके आयोजन में भोला जी की प्रमुख भूमिका रहती थी। भोला जी को चाहने वाले रचनाकार, कलाकार, संस्कृतिकर्मी और उनके राजनीतिक साथी बड़ी संख्या में इस आयोजन में शामिल हुए। यह आयोजन जन संस्कृति मंच और भाकपा-माले की नवादा ब्रांच कमेटी ने किया था। भोला जी नवादा मुहल्ले में रहते थे और भाकपा-माले और जन संस्कृति मंच दोनों के सदस्य थे। सबसे पहले नवादा ब्रांच के सचिव का. प्रमोद रजक ने बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और पत्रकारों का स्वागत किया और कहा कि भोला जी ने अपनी कविता के जरिए गरीबों और दलितों को जगाने का काम किया। 

    आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन, वरिष्ठ कवि-आलोचक रामनिहाल गुंजन, आलोचक प्रो. रवींद्रनाथ राय और जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने की। पहले उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया। आयोजन की शुरुआत जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने उनके मशहूर गीत 'कवन हउवे देवी देवता, कवन ह मलिकवा, बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा'सुनाकर की। उन्होंने उस गीत की रचना प्रक्रिया के बारे में बताया कि उनकी बहन ने अपने बेटे के लिए मन्नत मांगी थी, जिसे पूरा करने जाते वक्त वे हमें भी जबरन ले गए थे। भोला जी पूरे रास्ते देवी-देवताओं को गरियाते रहे। संयोगवश भांजे को चोट आ गई तो बहन ने डांटा की, इनकी वजह से ही ऐसा हुआ। इस पर भोला जी ने जवाब दिया कि नहीं, कोई बड़ी दुघर्टना होने वाली होगी, मेरे द्वारा देवी-देवता को गरियाने की वजह से ही यह हुआ, कि कम चोट ही आई। निर्मोही ने बताया कि जिस मरछही कुंड में वे लोग गए थे, उसमें योजना बनाकर वे कूदे कि पता चलें कि अंदर पानी में क्या है। 

    कवि बनवारी राम ने भी भोला जी की नास्तिकता के बारे में जिक्र किया कि जब उन्हें उनकी बेटी का शादी का कार्ड मिला तो देखा कि उस पर गणेश जी की तस्वीर को लाल रंग से पोत दिया गया था। जाहिर है गणेश जी वाला कार्ड ही बाजार में मिलता है, वही छपकर आया होगा। उसके बाद भोला जी को वह तस्वीर नागवार गुजरी होगी।

    आयोजन जनकवि की स्मृति का था, तो जनविरोधी राजनीति पर निशाना सधना ही था। कवि सुनील चौधरी ने मोदी के शासनकाल में सांप्रदायिक उन्माद को बढ़ावा दिए जाने की राजनीति के पीछे मौजूद असली मंशा की ओर लोगों का ध्यान खींचा और कहा कि चाय बेचने की बात करने वाला आज देश को बेच रहा है। आज देशी-विदेशी कंपनियों को देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट की खुली छूट दे दी गई है। इस देश का न्यायतंत्र बिका हुआ है। आजादी और लोकतंत्र दोनों खतरे में है। भोला जी आज होते तो आज इसके खिलाफ लिख रहे होते। 

    आयोजन में शंकरबिगहा जनसंहार समेत बिहार में अन्य जनसंहारों के मामलों में अभियुक्तों की रिहाई पर विरोध और क्षोभ जताते हुए साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने एक मिनट का मौन रखकर न्याय के संहार पर गहरा शोक जाहिर किया। इसके साथ ही हिंदूवादी जातिवादी संगठनों द्वारा अपने उपन्यास 'माथोरुभगन' को जलाये जाने और उनके विरोध प्रदर्शनों के कारण तमिल उपन्यासकार पेरुमल मुरुगन द्वारा अपनी सारी किताबों को वापस ले लेने को विवश हो जाने को लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए घातक बताया गया तथा इसकी निंदा की गई। ज्ञात हो कि जिस उपन्यास को जलाया गया है वह चार वर्ष पहले तमिल में प्रकाशित हुआ था, लेकिन पिछले साल जब इसका अंगरेजी अनुवाद आया तब इसका विरोध शुरू हो गया।

    कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि कई मायने में भोला जी पढ़े-लिखे लोगों से ज्यादा अपने समय और समाज को समझते थे। उनकी कविता को किसी काव्यशास्त्रीय कसौटी के जरिए नहीं, बल्कि जनता की वेदना से समझा जा सकता है। सुमन कुमार सिंह ने कवि बलभद्र द्वारा भेजे गए भोला जी से संबंधित संस्मरण का भी पाठ किया। 
    कवयित्री किरण कुमारी ने कहा कि भोला जी ने समाज की विद्रूपताओं पर प्रहार किया। वे सूत्रों में संदेश देते थे और वे संदेश बड़े होते थे। डाॅ. रणविजय ने कहा कि भोला जी कबीर की तरह थे। चित्रकार राकेश दिवाकर जिन्होंने कभी भोला जी का एक बेहतरीन पोट्रेट बनाया था, उन्होंने आशुकविता की उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी आशुकविता सुनाई, जो शंकरबिगहा जनसंहार के अभियुक्तों की रिहाई से आहत होकर लिखी गई थी। राकेश दिवाकर की कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह थीं- औरतें थीं, अबोध थे/ बूढ़े थे, निहत्थे थे/ सोए थे/ वे मार दिए गए/ निःशस्त्र थे, बेवश थे, लाचार थे/ वे मार दिए गए/ हत्यारे बरी हो गए/ क्योंकि सरकारें उनकी थीं....

    भोला जी के पुत्र पेंटर मंगल माही ने कहा कि अपने पिता पर उन्हें गर्व है। वे समाज की बुराइयों के खिलाफ लिखते थे। कठिनाइयों में रहते हुए उन्होंने कविताएं लिखीं। गीतकार राजाराम प्रियदर्शी ने भोला जी का गीत 'तोहरा नियर दुनिया मेें केहू ना हमार बा'को गाकर सुनाया। रामदास राही ने भोला जी की कविताओं का संकलन प्रकाशित करने का सुझाव दिया। 
    आशुतोष कुमार पांडेय ने कहा कि कविता भोला जी की जुबान पर रहती थी। वे सतही कवि नहीं थे, बल्कि उनकी कविताएं देश-समाज की गंभीर चिंताओं से जुड़ी हुई हैं।
     भाकपा-माले के आरा नगर सचिव का. दिलराज प्रीतम ने कहा कि आज देश के सामने गंभीर संकट है, मोदी शासन में अब तक 8 जनविरोधी अध्यादेश पारित हो चुके हैं। देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। भोला जी की स्मृति हमें यह संकल्प लेने को प्रेरित करती है कि हम इस तानाशाही का प्रतिरोध करें, इसके खिलाफ रचनाएं लिखें। इस मौके पर युवानीति के अमित मेहता और सूर्य प्रकाश ने रमता जी के गीत 'हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा'का गाकर सुनाया। 

    प्रो. अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने बताया कि जब प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान भोला जी की दूकान हटाने का फरमान आया था, उन्हीं दिनों उनसे पहली मुलाकात हुई थी और वे उसका विरोध करने की योजना बना रहे थे। उन्होंने जनता को अपनी कविताओं के जरिए बताया कि ये जो वर्दीधारी हैं, जो सफेदपोश हैं, इनसे बचने की जरूरत है। प्रो. उपाध्याय ने कहा कि विपन्नावस्था में उनकी जिंदगी गुजरी पर उनके चेहरे पर हंसी हमेशा बनी रही। वे बहुत बड़े थे। वे हमारी स्मृतियों में हमेशा रहेंगे।

    कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि इस आयोजन में लोगों की उपस्थिति ही उनकी लोकप्रियता का पता देती है। वे उनमें से नहीं थे जो अपने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ धन बटोरते रहते हैं, जो न्याय के नाम पर अन्याय करते हैं, जो सत्ता के बगैर नहीं रह सकते। मेहनतकश अवाम के प्रति उनमें सच्ची संवेदना थी। अपने आदर्शों को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने बताया कि वे और सुमन कुमार सिंह उनकी बीमारी के दौरान आरा सदर अस्पताल में भी मौजूद थे, जहां उन लोगों ने अस्पताल की कुव्यवस्था का विरोध भी किया था। लेकिन अंततः भोला जी को बचाया नहीं जा सका। जितेंद्र कुमार ने कहा कि कविता को व्यापक जनता से जोड़ना ही भोला जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

    वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन जी ने कहा कि अरबों लोग उन्हीं स्थितियों में रहते हैं, जिनमें भोला जी थे, लेकिन उनसे वे इसी मायने में अलग थे कि वे बदहाली के कारणों के बारे में सोचते थे और उस सोच को अपनी कविताओं के जरिए जनता तक पहुंचाते थे। भोला जी क्रांतिकारी जनकवि थे। वे दूजा कबीर थे। 

    वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन ने कहा कि जब वे भोला जी के पान दूकान के करीब मौजूद एक हाई स्कूल में शिक्षक थे, तो रोजाना उनकी मुलाकात उनसे होती थी। उन दिनों उन्होंने उनकी चालीस-पैंतालीस कविताएं देखी थीं। उन्होंने कहा कि भोला जी कविता की शास्त्रीयता पर ध्यान नहीं देते थे। सीधे-साधे लहजे में अपनी बात कहते थे। उन्होंने उन पर लिखी गई अपनी कविता का भी पाठ किया। 

    आलोचक रवींद्रनाथ राय ने कहा कि भोला जी में निरर्थक संस्कारों को तोड़ देने का हौसला था। जनता का सवाल ही भोला जी की कविता का सवाल है। उनकी कविताओं में प्रश्नाकुलता है। वे सामाजिक-राजनीति संघर्षों के कवि थे। न्याय की तलवार जनता के हाथ में हो, यह भोला जी चाहते थे। 

    अध्यक्षमंडल के वक्तव्य के दौरान ही भोला जी के अजीज दोस्त गीतकार सुरेंद्र शर्मा विशाल भी आयोजन में पहुंच गए। उन्होंने उन्हें एक अक्खड़ कवि के बतौर याद किया और कहा कि उनका जीवन अपने लिए नहीं था, बल्कि लोगों के लिए था। वे जिस राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए थे, जीवन भर उसके आंदोलनों के साथ रहे। सुरेंद्र शर्मा विशाल ने हिंदूवादी संगठनों के 'घरवापसी'अभियान की आलोचना करते हुए यह सवाल उठाया कि घर वापसी के बाद किस श्रेणी में जगह मिलेगी? रखा तो शूद्रों की श्रेणी में ही जाएगा! उन्होंने वर्गीय विषमता से ग्रस्त शिक्षा पद्धति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने एक गीत भी सुनाया- का जाने कहिया ले चली इ चलाना/ धर्म के नावे प आदमी लड़ाना।

    संचालन करते हुए मैंने भोला जी की कविता, कवि व्यक्तित्व और विचारधारा पर केंद्रित अपने लेख के जरिए कहा कि जनांदोलन और उसके नेताओं के प्रति भोला जी के गीतों पर जबर्दस्त अनुराग दिखाई पड़ता है। जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार हैं उनकी कविताएं। 


    इस मौके पर भोला जी की जनवाद के आवाज, जनसंगीत, जान जाई त जाई, फरमान, लहू किसका, आओ बात करें, आदमी, आखिर कौन है दोषी?, हम लड़ रहे हैं, आज पूछता गरीबवा आदि कविताओं का पाठ भी किया गया। इस आयोजन में यह भी तय किया गया कि भविष्य में भोला जी की स्मृति में होने वाले आयोजनों में आशुकविताओं का भी पाठ होगा, जिसके लिए विषय उसी वक्त निश्चित किया जाएगा। 

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    यदि तुम्हें,
    धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाय
    पानी तक न लेने दिया जाय कुएं से
    दुत्कारा फटकारा जाय चिल-चिलाती दोपहर में
    कहा जाय तोड़ने को पत्थर
    काम के बदले
    दिया जाय खाने को जूठन
    तब तुम क्या करोगे?


    यदि तुम्हें,
    मरे जानवर को खींचकर
    ले जाने के लिए कहा जाय
    और
    कहा जाय ढोने को
    पूरे परिवार का मैला
    पहनने को दी जाय उतरन
    तब तुम क्या करोगे ?


    यदि तुम्हें,
    पुस्तकों से दूर रखा जाय
    जाने नहीं दिया जाय
    विद्या मंदिर की चौखट तक
    ढिबरी की मंद रोशनी में
    काली पुती दीवारों पर
    ईसा की तरह टांग दिया जाय
    तब तुम क्या करोगे?


    यदि तुम्हें,
    रहने को दिया जाय
    फूस का कच्चा घर
    वक्त-बे-वक्त फूंक कर जिसे
    स्वाहा कर दिया जाय
    बर्षा की रातों में
    घुटने-घुटने पानी में
    सोने को कहा जाय
    तब तुम क्या करोगे?

    यदि तुम्हें,
    नदी के तेज बहाव में
    उल्टा बहना पड़े
    दर्द का दरवाजा खोलकर
    भूख से जूझना पड़े
    भेजना पड़े नई नवेली दुल्हन को
    पहली रात ठाकुर की हवेली
    तब तुम क्या करोगे?


    यदि तुम्हें,
    अपने ही देश में नकार दिया जाय
    मानकर बंधुआ
    छीन लिए जायं अधिकार सभी
    जला दी जाय समूची सभ्यता तुम्हारी
    नोच-नोच कर
    फेंक दिए जाएं
    गौरव में इतिहास के पृष्ठ तुम्हारे
    तब तुम क्या करोगे?


    यदि तुम्हें,
    वोट डालने से रोका जाय
    कर दिया जाय लहू-लुहान
    पीट-पीट कर लोकतंत्र के नाम पर
    याद दिलाया जाय जाति का ओछापन
    दुर्गन्ध भरा हो जीवन
    हाथ में पड़ गये हों छाले
    फिर भी कहा जाय
    खोदो नदी नाले
    तब तुम क्या करोगे?


    यदि तुम्हें ,
    सरे आम बेइज्जत किया जाय
    छीन ली जाय संपत्ति तुम्हारी
    धर्म के नाम पर
    कहा जाय बनने को देवदासी
    तुम्हारी स्त्रियों को
    कराई जाय उनसे वेश्यावृत्ति
    तब तुम क्या करोगे?


    साफ सुथरा रंग तुम्हारा
    झुलस कर सांवला पड़ जायेगा
    खो जायेगा आंखों का सलोनापन
    तब तुम कागज पर
    नहीं लिख पाओगे
    सत्यम, शिवम, सुन्दरम!
    देवी-देवताओं के वंशज तुम
    हो जाओगे लूले लंगड़े और अपाहिज
    जो जीना पड़ जाय युगों-युगों तक
    मेरी तरह?
    तब तुम क्या करोगे?

    --ओमप्रकाश वाल्मीकि



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    Thus, most logical conclusion that Matua Family betrayed the movement.

    P.R. Thakur was also oriented with Sangha Paribar.

    Palash Biswas

    সৌজন্য প্রশান্ত চক্রবর্তী! @ Runumi Sarma

    সৌজন্য প্রশান্ত চক্রবর্তী! @  Runumi Sarma

    I am ashamed to see Matua Maata,Bina Pani Devi aged over nineties being prompted to disown her own younger son and declaring her support to Mamata Bala Thakur,the TMC candidate from Bangao and she said that she had to stand with Mamata bala.I am ashamed for the helpless mother and the legacy of Harichand Thakur and Guruchand Thakur completely degenerated and disintegrated which resisted East India Company,united Bahujan Samaj in united Bengal and initiated real renaissance right in early eighteenth century.


    The grand lady happen to be related to my dearest aunt,Jethima who brought me up and named me with a blooming forest fire.Bina Pani Devi along with her son Kapil Krishna Thakur visited our home in Naintal Tarai at Basantipur in sixties while I was a child and late Kapil Krishna Thakur remembered this as his father PR Thakur also did respect his cousin`s relation.The community earlier voted for the CPM but later shifted its allegiance to the TMC after Mamata paid several visits to the community's 95-year-old head, Binapani Debi, who is known as "Boroma".


    The head of the Thakur clan and the Matua community Boroma Binapani Devi declared that she would support her daughter-in-law Mamata Bala Thakur, the Trinamool Congress candidate of upcoming Bangaon Loksabha by-poll. On Friday, before the media she also said she has no connection with Manjul Krishna Thakur who left Trinamool Congress ministry to join BJP on Thursday. Manjul Krishna Thakur's son Subrata Thakur has also joined BJP.

    Matua community holds a major vote share in Bengal politics.  Manjul Krishna Thakur's switching from Trinamool Congress to BJP is expected to create a split in the Matua community. Against this backdrop Boroma' support to TMC candidate will give some air of relief to the party. Before the thousands of supporters Baroma said her blessings are with Mamata Bala Thakur.


    I am ashamed that the Matua Family has betrayed the movement which saw Baba Saheb DR BR Ambedkar in the constitution draft committee and for which we utter the words like equality and social justice.The family which demanded land reform and have been also involved in the Left Rule in Bengal has been disintegrated and divided for the brutal betrayal just for nothing.For nothing!

    Just see,Manjul Krishna Thakur&Subroto Thakur joing B.J.P Party 2right after Thakur family's head Baroma Binapani Devi's declaration of support to TMC candidate Mamata Bala Thakur, new BJP inductee of Thakur family Manjul Krishna claimed Baroma was forced to make such comment. Manjul Krishna who switched to BJP on Thursday and resigned from TMC ministry, also alleged that Trinamool Congress is playing the divisive politics.

    Earlier on Friday morning Baroma Binapani Devi said she does not have any relation with Manjul Krishna Thakur. Before the media persons and the hordes of her disciples she blessed her daughter-in law, the candidate of Trinamool Congress of Bagoan Lok Sabha by-poll.


    As Manjul Krishna exploded the bomb to expose the self styled Matua Chief minister`s Matua Vote Bank equation,she made them ministers with insignificant ministries but never allowed them to work in the interest of the Bahujan Samaj.However,the fact is that Manjul as the state minister of refugee affairs in Mamata Maa Maati Manush government never dared to utter a word to empower either Matua communities across political border and identities.

    Not only this,Ex CBI joint director Upen Biswas who is remembered to send OBC icon Lalu Prasad to jail happened to be the state minister of SC welfare affairs and we could not contact him since he took the oath.We have not seen him in public.Now,the ex joint CBI director is pitted against CBI to defend all ministers,MPs and Political leaders and icons alleged to be involved in Sardha scam and some of them have been in Jail,some are waiting to go behind the bars.


    What about the refugees?What about the citizenship of Partition victim Hindu Refugees ,the potential Vote bank?

    I have no to comment.The refugee leaders are posting their photos with all kinds of politician ,national and local.Then,it the refugee movement at last.


    Mind you,with the community's godmother Binapani Devi - revered as Boroma by her followers - blessing Mamata since 2008, Trinamul has reaped dividends in successive elections in the two 24-Parganas, Nadia and parts of north Bengal. Earlier, the community had sided with the Left. Against this backdrop, today's development ... Thakurnagar in North 24-Parganas became the headquarters of the Namasudra refugees from Bangladesh. The Namasudras were also settled in Dandakaranya in Chhattisgarh and the Andaman,all over central India,resettled under Dandakaranya project,Uttarakhand and UP,MP and Maharashtra,Tamilnadu and Karnataka,Bihar and Assam,Rajsthan and Andhra.


    Leader of Bangladesh minority forum,an eminent Matua across the border,Utpal Biswas wrote:

    What is difference between TMC and BJP for the Bengali refugee? In addition to this we should remember that P.R. Thakur was also oriented with Sangha Paribar, so that Manjul Thakur has not do anything something new. Actually after Guruchand, Thakur family has been serving for traditional politics.

    I replied:

    Fully agree with you,Utpal Babu.It is a most logical conclusion that Matua Family betrayed the movement.I Want a detailed article from you.Pl send immediately to:palashbiswaskl@gmail.com


    I expect you to speak out as I know you being a genuine.

    Utpal just answered:


    We Minority Rights Forum,Bangladesh have been working for minorities in Bangladesh, so for the time being I am not able to write briefly, hope, I can after March 2015.

    I requested:

    We urgently need it as our people stranded confused.

    Utpal Babu replied:

    I have completed a serious work what can be published by Kapil Krishna Thakur, and now am also engaged another serious work by the Forum. You know very well I am a follower of You, Kapilda, Nitishda, Samar Baidya and I am not so expert to write on anything extrempro, I always consume many days to write and on this issue I must consume more days.Please and excuse me.

    Again I wrote:

    I know your potentials and believe you may write instantly if you try.You sound so much so logical!


    Utpal Babu is an eminent Matua and he responded to my older article very late which is relevant in latest context:

    বাংলা শুধুই বাংলা: উদ্বাস্তু ও অনুপ্রবেশকারি,হিন্দু ও মুসলিম বিভাজনসত্বেও মোদীকে ধন্যবাদ

    shudhubangla.blogspot.in

    I wrote,thanks Modi to expose the hegemony and the coopted following!


    The degeneration is complete as Alleging that Trinamool Congress MP and his elder brother Kapil Krishna Thakur's death was the result of a conspiracy, Manjul Krishna Thakur - who resigned the West Bengal cabinet to join the BJP - has demanded a CBI probe into his death.


    'I think my elder brother did not die a natural death. There was some conspiracy. I demand a CBI (Central Bureau of Investigation) inquiry to ascertain the exact cause of death,' Manjul Krishna said here Thursday.


    Manjul Krishna Thakur, who held the refugee, relief and rehabilitation portfolio in Chief Minister Mamata Banerjee's cabinet, announced his resignation from the ministry and the Trinamool Congress and joined the Bharatiya Janata Party (BJP) alongside his son Subrata Thakur.


    Kapil Krishna Thakur's wife, however, questioned the timing of the demand.


    'If he (Manjul Krishna Thakur) felt so, then a CBI inquiry should have been held soon after my husband died. Just because he has left the party, is that the reason he is saying all these,' asked Kapil Krishna Thakur's widow Mamata Bala Thakur, who has been named the Trinamool candidate for the coming Bongao Lok Sabha by-polls Feb 13.


    Kapil Krishna Thakur, the eldest son of the influential Matua community leader Binapani Debi Thakurani (Baroma) and the 'sanghadhipati' of Matua Mahasangha, died at a private hospital her Oct 13 last year.


    Nevertheless,the Trinamool Congress on Thursday ruled out any adverse impact on the party because of the exit of its minister Manjul Krishna Thakur, who joined the BJPalleging that the TMC was functioning in a "whimsical" way.

    "Trinamool's organisation will not be affected in any way by their exit," TMC secretary-general and education ministerPartha Chatterjee told a press conference. Thakur's son Subrata Thakur too joined the saffron party, which has hinted that many Trinamool Congressleaders were ready to switch over. "If Manjul Krishna Thakur is so concerned about ideology and morality, why did he not resign as an MLA? Chatterjee said.

    "We will take action against Manjul Krishna Thakur and Subrata Thakur as per procedure," Chatterjee said. Earlier, Manjul told reporters, "I have decided to join the BJP today along with my son as I feel that the TMC is no longer a party for honest and good politicians. The TMC government has not allowed me to work for the benefit of my Matua community." The development came ahead of a crucial by-election to Bongaon parliamentary constituency in West Bengal on February 13.

    TMC minister Upen Biswas, who was also present at the press conference, announced that Mamata Bala Thakur would be the TMC's candidate for Lok Sabha By-poll in Bongaon parliamentary constituency. Mamata Bala Thakur is the sister-in-law of Manjul and wife of Kapil Krishna Thakur, a sitting TMC MP, whose demise had necessitated the by-election.


    ঠাকুর পরিবারে ভাঙন, বিজেপিতে যোগদানের জন্য ছেলে মঞ্জুলকৃষ্ণের সঙ্গে সম্পর্ক ছিন্ন বড় মার


    ব্যুরো: পরিবারে ভাঙন ধরেছিল আগেই। রাজনীতির লড়াইয়ে এ বার ভেঙে চুরমার হয়ে গেল রক্তের সম্পর্ক। বিজেপিতে যাওয়ায় ছোট ছেলে মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুরের সঙ্গে সম্পর্ক ছিন্ন করার কথা জানালেন মতুয়াদের বড় মা বীণাপানি দেবী। বড় ছেলে কপিলকৃষ্ণের স্ত্রী মমতাবালার পাশে দাঁড়িয়েছেন তিনি। তেরোই ফেব্রুয়ারি বনগাঁ লোকসভায় উপ-নির্বাচন। মতুয়া মহাসঙ্ঘের প্রয়াত সঙ্ঘাধিপতি কপিলকৃষ্ণ ঠাকুরের মৃত্যুতে অকাল ভোট। বনগাঁর ভোটে বরাবরই মতুয়ারা বড় ফ্যাক্টর। তাই, যুযুধান তৃণমূল-বিজেপি দু-দলই ঠাকুরবাড়ির প্রধান বীণাপানি দেবীর দিকে তাকিয়ে।

    ঠাকুরবাড়ির অন্দরের খবর, গত লোকসভা নির্বাচনেই ছেলে সুব্রতর টিকিটের জন্য মুখ্যমন্ত্রীর কাছে তদ্বির করেছিলেন মঞ্জুল। কিন্তু, তৃণমূলের হয়ে ভোটে দাঁড়িয়ে জিতে যান দাদা কপিলকৃষ্ণ।

    উপ-নির্বাচনেও যে ছেলের ভাগ্যে তৃণমূলের টিকিট মিলছে না তা মন্ত্রী মঞ্জুলকৃষ্ণ আগেই আঁচ করেছিলেন। ছেলে সুব্রতকে নিয়ে তিনি ঘাসফুল ছেড়ে পদ্মফুলে যাওয়ায় রুষ্ট বড় মা বীণাপানি দেবী।

    বনগাঁর ভোটে তৃণমূল ঘোষণা করে দিয়েছে কপিলকৃষ্ণ ঠাকুরের স্ত্রী মমতাবালাই তাদের প্রার্থী। মঞ্জুলকৃষ্ণের ছেলে সুব্রত ঠাকুরকে টিকিট দিতে পারে বিজেপি। ফলে, উপ-নির্বাচন পরিণত হতে চলেছে ঠাকুরবাড়ির ঘরের লড়াইয়ে।

    তবে, বড় মা বীণাপানি দেবী মমতাবালার পাশে দাঁড়ানোয় বনগাঁ কেন্দ্রে তাদেরই অ্যাডভান্টেজ বলে আশা করছে তৃণমূল।

    http://zeenews.india.com/bengali/zila/binapani-devi-breaks-her-relation-with-son_124196.html


    নিরুপম সাহা: বনগাঁ, ১৫ জানুয়ারি– সারা ভারত মতুয়া মহাসঙেঘর (মঞ্জুলপম্হী) পদাধিকারীদের রাজনৈতিক পরিচয় নিয়ে রাজ্য জুড়ে আলোড়ন তৈরি হওয়ায় তার আঁচ পড়ল সঙেঘর অন্দরেও৷‌ বৃহস্পতিবার সঙেঘর একটি পক্ষের সঙঘাধিপতি মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর তৃণমূলের মন্ত্রী থাকাকালীন বি জে পি-তে যোগ দেওয়ায় বিতর্ক আরও বেশি হয়েছে৷‌ মঞ্জুলপম্হী মতুয়া মহাসঙেঘর কার্যকরী সভাপতি পৃথ্বীশ দাশগুপ্ত বৃহস্পতিবার বলেছেন, মতুয়া মহাসঙঘ একটি অরাজনৈতিক ধর্মীয় সংগঠন৷‌ সেখানে সংগঠনের সঙঘাধিপতি মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর এবং সাধারণ সম্পাদক সুব্রত ঠাকুর ব্যক্তিগত সিদ্ধাম্তে বেশি করে রাজনীতিতে জড়িয়ে পড়েছেন৷‌ তাঁদের দল বদল নিয়ে মতুয়া ভক্তদের মধ্যে বিরূপ প্রতিক্রিয়ায় সঙেঘর ওপর প্রভাব পড়বে৷‌ এই পরিস্হিতিতে তাঁরা দু'জন সংগঠনের পদ থেকে পদত্যাগ না করলে তিনি তাঁর পদ থেকে পদত্যাগ করবেন৷‌ অন্যদিকে, কপিলপম্হী মতুয়া মহাসঙেঘর সঙঘাধিপতি মমতাবালা ঠাকুর (কপিল ঠাকুরের স্ত্রী) জানান, মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুরের বি জে পি-তে যোগদান তাঁর ব্যক্তিগত ব্যাপার৷‌ সাধারণ ভক্তরা এর বিচার করবে৷‌ তিনি আরও অভিযোগ করেন, মন্ত্রী হওয়া সত্ত্বেও মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর দেড়-দু'মাস ধরে অসুস্হ হয়ে পড়ে থাকা সত্ত্বেও নিজের দাদা কপিলকৃষ্ণকে একবারের জন্য দেখতে যাননি৷‌ এদিকে, মঞ্জুলকৃষ্ণের বি জে পি-তে যোগদান এবং তাঁর ছেলেকে বনগাঁ লোকসভা কেন্দ্রের উপনির্বাচনে দলের প্রার্থী করার সিদ্ধাম্তের বিরুদ্ধে এদিন বিকেলে ঠাকুরনগর স্টেশন এবং সংলগ্ন এলাকায় অবরোধ, বিক্ষোভ মিছিল করলেন বিক্ষুব্ধ বি জে পি কর্মীরা৷‌ তাঁদের অভিযোগ, এই আসনটি তৃণমূলের কাছে বিক্রি করে দেওয়া হয়েছে৷‌ এ ব্যাপারে প্রদেশ কংগ্রেস সম্পাদক সম্রাট তপাদারের অভিযোগ, আর্থিক লেনদেনের মাধ্যমে ব্যক্তিস্বার্থে মঞ্জুল দলত্যাগ করেছেন৷‌ তাঁর যদি ধর্মনিরপেক্ষ দল হিসেবে অন্য কোথাও যোগদানের ইচ্ছে থাকত, তাহলে বি জে পি-র মতো সাম্প্রদায়িক দলের বদলে কংগ্রেসে যোগ দিতে পারতেন৷‌ এদিন সন্ধেয় মঞ্জুলকৃষ্ণের বাড়ির সামনে বিক্ষোভ দেখায় তৃণমূলের বাইক বাহিনী৷‌ 'মঞ্জুলকৃষ্ণ গো ব্যাক, সুব্রত গো ব্যাক'ধ্বনিও তোলেন৷‌ বিক্ষোভকারী তৃণমূল সমর্থকদের বক্তব্য, মঞ্জুলবাবুর জন্য ভোটে খেটেছিলাম৷‌ তাঁকে জিতিয়ে মন্ত্রী করিয়েছিলাম৷‌ দল ছাড়ার ব্যাপারে আমাদের সঙ্গে কথা বলা উচিত ছিল৷‌ তীব্র প্রতিবাদ করছি৷‌ ভোট রাজনীতিকে কেন্দ্র করে ঠাকুরবাড়িতে আগেই ভাঙন ধরেছে৷‌ মঞ্জুলের দলত্যাগে সেই প্রভাব মতুয়া মহাসঙেঘর ওপর পড়ল বলে মনে করা হচ্ছে৷‌ ঠাকুরবাড়ির সদস্যদের এহেন আচরণে ক্ষুব্ধ সাধারণ মতুয়া ভক্তরা৷‌ বনগাঁ লোকসভা-সহ রাজ্যের অনেকগুলি বিধানসভা এবং লোকসভা আসনে মতুয়াদের ভোট একটা ফ্যা'র কাজ করে৷‌ আর সেই কারণে তৃণমূল প্রথমে ঠাকুরবাড়ির ছোট ছেলে মঞ্জুলকৃষ্ণকে গাইঘাটা বিধানসভা কেন্দ্রে টিকিট দিয়ে মন্ত্রীও করে৷‌ ঠাকুরবাড়ির উন্নয়নে বিভিন্ন প্রকল্পে অর্থ দান করেন তৃণমূলের বিধায়ক, সাংসদ এমনকি খোদ মুখ্যমন্ত্রীও৷‌ পরবর্তীতে বনগাঁ লোকসভা আসনে ঠাকুরবাড়ির বড় ছেলে কপিলকৃষ্ণ ঠাকুরকে প্রার্থী করেও মতুয়াদের অন্য অংশের মন কেড়ে নেয় তৃণমূল৷‌ আর তারই বিরূপ প্রতিক্রিয়া দেখা দিল কপিলকৃষ্ণের মৃত্যুর পর৷‌ এই কেন্দ্রের প্রার্থী হিসেবে লোকসভা নির্বাচনের আগে তৃণমূলের সর্বোচ্চ নেত্রীর দ্বারস্হ হয়েছিলেন মঞ্জুল-পুত্র সুব্রত ঠাকুর৷‌ কিন্তু শেষ পর্যম্ত সুব্রতর বদলে কপিলকৃষ্ণকে প্রার্থী করা হয়৷‌ তাঁর অকাল প্রয়াণে এই আসনে ফের নির্বাচন হওয়ার কারণে ফের প্রার্থী হওয়ার জন্য তৃণমূলের কাছে বার্তা পাঠান সুব্রত৷‌ যদিও দল সেই বার্তায় সাড়া না দিয়ে কপিলকৃষ্ণের স্ত্রী মমতাবালার দিকে ঝোঁকায় সুব্রত বি জে পি-র দিকে ঝুঁকে পড়েন৷‌ বি জে পি-ও এই সুযোগ হাতছাড়া করতে চায়নি৷‌ সুব্রতর সঙ্গে সঙ্গে তাঁর বাবা, রাজ্যের মন্ত্রী মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুরকেও দলে টেনে নিয়ে বনগাঁ কেন্দ্রের উপনির্বাচনে এই আসনটি মতুয়া ভোটের ওপর নির্ভর করে নিজেদের দখলে রাখতে চাইছে বি জে পি৷‌ যদিও মঞ্জুলের এই দলত্যাগ মতুয়াদের ভোট-বাক্সে কী প্রভাব ফেলে, তা নির্বাচনের পর বোঝা যাবে৷‌ তবে এদিনের ঘটনা যে মতুয়া মহাসঙেঘর অন্দরে ধাক্কা মেরেছে, তা নিশ্চিত করে বলা যায়৷‌ ১৮ জানুয়ারি মঞ্জুলপম্হী মতুয়া সঙেঘর কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠক এ ব্যাপারে সরগরম থাকবে বলে মনে করছেন কেন্দ্রীয় কমিটির সদস্যরা৷‌

    http://www.aajkaal.net/16-01-2015/news/236643/

    আজকালের প্রতিবেদন: আমি তো মুখ্যমন্ত্রীকে কবেই সতর্ক করেছি, ঘর সামলান৷‌ তবে তৃণমূল থেকে বি জে পি-তে যাওয়া বা বি জে পি থেকে তৃণমূলে যাওয়া, ফের তৃণমূল থেকে বি জে পি-তে যাওয়া হতেই পারে৷‌ কোনও পার্থক্য তো নেই৷‌ তৃণমূল কংগ্রেসের মন্ত্রী মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুরের বি জে পি-তে যোগ দেওয়া প্রসঙ্গে এই মম্তব্য করেছেন বিরোধী দলনেতা ডাঃ সূর্যকাম্ত মিশ্র৷‌ প্রায় একই সুরে বামফ্রন্ট চেয়ারম্যান বিমান বসু বলেছেন, তৃণমূল কংগ্রেসকে আমি কোনও ধর্মনিরপেক্ষ দল বলে মনে করি না৷‌ সাম্প্রদায়িক বি জে পি-র মতো ওরাও ধর্মকে ব্যবহার করেই রাজনীতি করে৷‌ ফলে কে কোন দল ছেড়ে কোন দলে গেলেন, তা মানুষ বিচার করবে৷‌ তৃণমূল কংগ্রেস প্রসঙ্গে তিনি বলেন, এ তো সবে শুরু৷‌ আরও অনেক কিছু ঘটবে৷‌ তবে আমি নিশ্চিত, আজ হোক কাল হোক, তৃণমূল কংগ্রেসের বি জে পি-র সঙ্গে যাওয়া ছাড়া কোনও পথ নেই৷‌ বৃহস্পতিবার সি পি এমের কলকাতা জেলা সম্মেলনের উদ্বোধন করতে এসে সূর্যকাম্ত মিশ্র সাংবাদিকদের প্রশ্নের উত্তরে বলেছেন, বি জে পি যেমন পার্টি, তৃণমূলও তেমন পার্টি৷‌ ফলে তৃণমূল থেকে বি জে পি-তে রূপাম্তর আর এমন কী! এদিন মুকুল রায়ের সি বি আই দপ্তরে না-যাওয়া নিয়ে সূর্যকাম্ত মিশ্র বলেন, বি জে পি নেতারা তো দাবি করছেন মুকুল রায় নাকি দেখা করতে চাইছেন! এ রাজ্যে বি জে পি-কে মুখ্যমন্ত্রীই ডেকে এনেছিলেন৷‌ বিমান বসু এ প্রসঙ্গে বলেছেন, অনেক আগে থেকেই বি জে পি-র সঙ্গে মুকুল রায়ের কথা হচ্ছে বলে মনে হয়৷‌ হয়ত একটা লাইন 'ওপেন'করতে চাইছেন৷‌ বি জে পি-র সঙ্গে যাওয়া ছাড়া তৃণমূলের আর পথ নেই বোধহয়৷‌ তিনি বলেন, তৃণমূলের সর্বভারতীয় সাধারণ সম্পাদক নাকি অনৈতিক বেআইনি কাজ করেন না! দিল্লিতে নিজেই বলেছেন, শুনলাম৷‌ তাহলে সি বি আইয়ের সঙ্গে দেখা করবেন বলেও কেন এলেন না? এটা কি নৈতিক কাজ হল? বিমান বসু বলেন, মুকুল রায়ের হাতে ৬টি আংটি ছিল৷‌ সি বি আই ডাকার পর নাকি আরও ২টো যোগ হয়েছে৷‌ মঞ্জুলকৃষ্ণ প্রসঙ্গে এদিন বিমান বসু বলেছেন, যাঁরা একদিন সততার প্রতীক ছাপ্পা দেখে গিয়েছিলেন, তাঁরা আজ দেখতে পাচ্ছেন গোটা রাজ্যে সেই হোর্ডিংটা আর নেই৷‌ যাঁরা একদিন দেওয়ালে দেওয়ালে ড. মমতা ব্যানার্জি লেখা দেখতেন তাঁরা দেখলেন 'ড.'উধাও৷‌ তাই এখন ভুল ভেঙে অন্য দলে যাচ্ছেন৷‌ সূর্যকাম্ত মিশ্রের কাছে জানতে চাওয়া হয়েছিল, যাঁরা তৃণমূল ছেড়ে সাম্প্রদায়িক বি জে পি-তে যাচ্ছেন তাঁদের কি বামপম্হীদের কাছে আসতে বলবেন? সূর্যকাম্ত বলেন, যাঁরা বুকে 'আমরা সবাই চোর'লিখে মিছিল করেছেন, তাঁদের ডাকার প্রশ্ন নেই৷‌ কিন্তু তৃণমূল কংগ্রেসেও তো অনেকে আছেন, যাঁরা চোর নন, নয়া উদারনীতির বিপদ, সাম্রাজ্যবাদের বিপদ বুঝতে পারছেন৷‌ তাঁদের সোচ্চার হওয়ার আবেদন জানাচ্ছি৷‌ বেরিয়ে আসার আবেদন জানাচ্ছি৷‌ আমাদের দলে এভাবে যখন তখন কাউকে সদস্য করে নেওয়া যায় না৷‌ গঠনতন্ত্র মেনে চলতে হয় আমাদের৷‌ তবে সম্মিলিত লড়াইয়ের পথ তো খোলা আছে৷‌ মুকুল রায় আজ কথা দিয়েও সি বি আই দপ্তরে যাননি৷‌ এর পেছনে কী কারণ আছে বলে মনে হয়? এ প্রশ্নে সূর্যকাম্ত বলেন, দিল্লিতে বসে বলেছিলেন, যাবেন৷‌ কিন্তু এখানে এসে তো দলনেত্রীর সঙ্গে দেখা করে ধমক খেয়েছেন৷‌ ওঁর সঙ্গে যা সম্পর্ক তাতে মাঝেমধ্যে ধমকটমক খেতে হয়৷‌ কিন্তু রেলের সঙ্গে সারদা ট্যুরস অ্যান্ড ট্রাভেলসের চুক্তি প্রসঙ্গে তো মুকুল বলেছিলেন, আমার সময় হয়নি৷‌ কার সময় হয়েছে তা সবাই বুঝতে পেরেছেন৷‌ আর এবারে তো সাফ বলে দিয়েছেন ডেলো বাংলোয় বৈঠকের কথা৷‌ এতদিন আমরা বলছিলাম৷‌ দেরিতে হলেও কথাটা মুকুল বলে দিয়েছেন৷‌ দলনেত্রীর মাথাব্যথা তো আগেই করে দিয়েছেন!

    আজকালের প্রতিবেদন: রাজ্যের মন্ত্রী মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর তৃণমূল মন্ত্রিসভা থেকে পদত্যাগ করে বি জে পি-তে যোগ দিলেন৷‌ যোগ দিলেন তাঁর পুত্র সুব্রত ঠাকুর৷‌ বি জে পি রাজ্য সভাপতি রাহুল সিন‍্হা এ খবর জানিয়ে বৃহস্পতিবার বলেছেন, 'পুত্র-সহ মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুরের এই যোগদানে তৃণমূলের বিদায় ঘণ্টা বেজে গেল৷‌ ৩ দিনের নোটিসে আমরা তৃণমূল মন্ত্রীদের (কয়েক জনকে) বি জে পি-তে যোগদান করাতে চাই৷‌'এদিকে মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর পদত্যাগ করার পর বি জে পি অফিসে বসে বলেন, 'তৃণমূলে কোনও ভাল লোক থাকতে পারছে না৷‌ যাঁদের বিবেক বা মনুষ্যত্ব আছে, তাঁরা তৃণমূলে থাকতে পারেন না৷‌ আমি আমার দপ্তরের (উদ্বাস্তু) কোনও কাজ গত সাড়ে তিন বছরে করতে পারিনি৷‌ মতুয়াদের স্বার্থ দেখতে পারিনি৷‌ এ কথা মুখ্যমন্ত্রীকে জানিয়ে কোনও ফল হয়নি৷‌ তাই বি জে পি-তে যোগ দিলাম৷‌'এই প্রথম রাজ্যে শাসক দলের কোনও মন্ত্রী পদত্যাগ করে বিরোধী দলে যোগ দিলেন৷‌ এমন ঘটনার গুরুত্ব রাজ্য রাজনীতিতে অপরিসীম৷‌ একে তৃণমূল সারদা কেলেঙ্কারি নিয়ে বিপর্যস্ত, তার ওপর তাদের এক মন্ত্রী বিরোধী দলে যোগ দেওয়ায় দল আরও বেসামাল হয়ে পড়ল৷‌ মতুয়ার ঠাকুর পরিবারের ভাঙন সেখানকার রাজনীতিতেও প্রভাব ফেলবে, সে প্রভাব তৃণমূলের পক্ষে যাওয়া অসম্ভব৷‌ বুধবার থেকেই সাংবাদিক মহলে খবর চলছিল যে, বি জে পি-তে একজন বড়সড় কেউ তৃণমূল থেকে যোগদান করবেন৷‌ বৃহস্পতিবার সকালে জানা যায়, একজন মন্ত্রী পদত্যাগ করছেন৷‌ বিকেলে রাহুল সিন‍্হা সাংবাদিক সম্মেলনে বলেন, 'এই যোগদানের ফলে মতুয়াদের সঙ্গে বি জে পি-র যোগাযোগ নিবিড় হল৷‌ তৃণমূল থেকে আরও অনেকে বি জে পি-তে যোগ দেওয়ার জন্য পা বাড়িয়ে আছেন৷‌ মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর তৃণমূলের বিদায় যাত্রার প্রথম ফিতেটা কাটলেন৷‌ প্রথম মন্ত্রী হিসেবে তিনি ক্ষমতা ছেড়ে সাধারণ মানুষের জন্য লড়াইয়ের অঙ্গীকার করলেন৷‌ দল ছেড়ে যাওয়া এক জিনিস, মন্ত্রিত্ব ছাড়া আর এক জিনিস৷‌ এই মাসে তৃণমূল থেকে আরও অনেকেই বি জে পি-তে যোগদান করবেন৷‌'প্রসঙ্গত উল্লেখযোগ্য, রাহুল সিন‍্হা এর আগেও এ কথা জানিয়েছিলেন এবং বলেছিলেন, বি জে পি-র জয়যাত্রা দ্রুততর হবে৷‌ রাহুল সিন‍্হা জানান, 'আমরা নন-সারদা তৃণমূলিদের দলে নেব৷‌ যাদের বিরুদ্ধে অর্থ তছরুপের অভিযোগ আছে, তাদের আমরা দূরে রাখব৷‌ মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর এবং তাঁর পুত্র– দু'জনেই স্বচ্ছ মানুষ৷‌ সুব্রত চটপটে, ছটফটে ছেলে৷‌ ওকে দিয়ে অনেক কাজ হবে৷‌ এঁদের পরিবার মতুয়াদের জন্য কাজ করেছে৷‌ বি জে পি এবার মতুয়াদের মধ্যে শক্তিশালী হবে৷‌ এর ইতিবাচক প্রভাব পড়বে মতুয়া সমাজের ওপর৷‌'এর আগে মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর পদত্যাগপত্র লিখে একটি পাঠান মুখ্যমন্ত্রীকে, একটি বিধানসভার অধ্যক্ষকে এবং অপরটি দলের সভাপতিকে৷‌ অর্থাৎ, তিনি মন্ত্রিত্ব থেকে পদত্যাগ করার সঙ্গে সঙ্গেই স্বাভাবিক নিয়মে বিধায়ক পদ এবং দলের প্রাথমিক সদস্য পদ থেকে পদত্যাগ করলেন৷‌ পদত্যাগপত্রে তিনি লিখেছেন, রাজ্যের সামাজিক এবং রাজনৈতিক পরিবেশের এখন প্রচণ্ড অবনতি হয়েছে৷‌ তিনি সকাল ৯টা নাগাদ তাঁর একাম্ত সচিব পি এস মুখোপাধ্যায়কে ফোন করে বলেন, 'আজ আমি অফিসে যাচ্ছি না৷‌ গাইঘাটা চলে যাচ্ছি৷‌'বিকেলে তিনি কলকাতায় বি জে পি অফিসে ছিলেন৷‌ ছিলেন তাঁর ছেলে সুব্রত ঠাকুর৷‌ সুব্রত গাইঘাটার পঞ্চায়েত সমিতি থেকে পদত্যাগ করেছেন৷‌ তিনি বি ডি ও-কে পদত্যাগপত্র দিয়েছেন৷‌ এদিকে বি জে পি অফিসে রাহুল সিন‍্হার পাশে বসে মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর জানান, আমার ছেলে নির্বাচনে দাঁড়াবে কি না, তা ঠিক করবে দল৷‌ বি জে পি ঐতিহ্যবাহী দল, অনেক মনীষী এই দল করে গেছেন৷‌ আমি সাড়ে তিন বছরে কোনও কাজ করতে পারিনি৷‌ আমার বাবাও বিধান রায়ের আমলে উদ্বাস্তু দপ্তরের মন্ত্রী ছিলেন৷‌ তিনিও ভিন্ন কারণে পদত্যাগ করেন৷‌ তৃণমূলের যা অবস্হা হয়েছে, তাতে কোনও ভাল লোক থাকতে পারে না৷‌ আমার বড়দা কপিলকৃষ্ণ ঠাকুরের মৃত্যু স্বাভাবিক ছিল না৷‌ আমি এই মৃত্যুর সি বি আই তদম্ত চাই৷‌ তিনি বাড়িতে মারা যাননি৷‌ আমার বৌদি মমতা ঠাকুর তৃণমূলের প্রার্থী হয়েছেন৷‌ তিনি ক্লাস থ্রি পাস৷‌'


    তাঁকে জিজ্ঞেস করা হয়, পদত্যাগের পর মুখ্যমন্ত্রী কি আপনাকে কিছু বলেছেন?


    তাঁর জবাব, ওঁর দম্ভ আছে৷‌ উনি কিছু বলেন না৷‌


    ল্আপনি কি কথা বলার চেষ্টা করেছেন?


    মঞ্জুলকৃষ্ণ: আমি কী কথা বলব? উনি খেয়ালি মানুষ৷‌ জানিয়েছিলাম, মতুয়াদের জন্য কাজ করতে পারছি না৷‌ কিন্তু উনি কিছুই করেননি৷‌ ল্কেন পারছিলেন না?


    মঞ্জুলকৃষ্ণ: গোষ্ঠীদ্বন্দ্ব ছিল৷‌ সে কথা নেতৃত্ব জানত৷‌ তাতেও যদি নেতৃত্ব কিছু না করে তো আমি কী করতে পারি?


    সুব্রত ঠাকুর বলেন, মতুয়াদের জন্য যেভাবে কাজ করা উচিত ছিল, তার ধারেকাছেও আমরা যেতে পারিনি৷‌ দলে কোনও গণতন্ত্র নেই৷‌ মুষ্টিমেয় কয়েকজনের কথায় কাজ চলে৷‌ কিছু মানুষ ষড়যন্ত্র করে ঠাকুরবাড়ির বদনাম করতে চাইছে৷‌ তাতে কোনও লাভ হবে না৷‌





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  • 01/17/15--04:25: हिन्दी नाटक और रंगमंच की अधिकारी विदुषी डाॅ गिरीश रस्तोगी का अचानक इलाहाबाद में निधन हो गया है!उन्हें हड्डियों का कैंसर था ! हिन्दी नाट्यालोचन के सैद्धांतिक क्षेत्र में यह एक अपूरणीय क्षति है।समूचा साहित्य जगत इस दुःख की घड़ी में उनके परिवार के साथ है! हम सब उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते है! फोटो साभार-अनिल जनविजय! हिन्दी नाटक और रंगमंच की अधिकारी विदुषी डाॅ गिरीश रस्तोगी का अचानक इलाहाबाद में निधन हो गया है!उन्हें हड्डियों का कैंसर था ! हिन्दी नाट्यालोचन के सैद्धांतिक क्षेत्र में यह एक अपूरणीय क्षति है।समूचा साहित्य जगत इस दुःख की घड़ी में उनके परिवार के साथ है! हम सब उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते है! फोटो साभार-अनिल जनविजय!
  • हिन्दी नाटक और रंगमंच की अधिकारी विदुषी डाॅ गिरीश रस्तोगी का अचानक इलाहाबाद में निधन हो गया है!उन्हें हड्डियों का कैंसर था ! हिन्दी नाट्यालोचन के सैद्धांतिक क्षेत्र में यह एक अपूरणीय क्षति है।समूचा साहित्य जगत इस दुःख की घड़ी में उनके परिवार के साथ है!
    हम सब उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते है!
    फोटो साभार-अनिल जनविजय!

    हिन्दी नाटक और रंगमंच की अधिकारी विदुषी डाॅ गिरीश रस्तोगी का अचानक इलाहाबाद में निधन हो गया है!उन्हें हड्डियों का कैंसर था ! हिन्दी नाट्यालोचन के सैद्धांतिक क्षेत्र में यह एक अपूरणीय क्षति है।समूचा साहित्य जगत इस दुःख की घड़ी में उनके परिवार के साथ है!  हम सब  उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते है!  फोटो साभार-अनिल जनविजय!

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    जब हम जवाँ होने वाले थे- 
    १- नैनीताल के साधारण रेस्तराओं में ३५ रु. महीने पर पेट भर भोजन उपलब्ध था.
    २. तल्लीताल से मल्लीताल तक रिक्शे का भाड़ा २५ पैसा था. 
    ३. महिलाओं की एक सामान्य साड़ी का मूल्य १५रु. और विवाह के अवसर पर पहने जाने वाला मदीने का घाघरा- पिछौड़ा सौ रुपये से कम पर भी उपलब्ध था. (घाघरे के कपड़े को मदीना कहा जाता था).
    लेकिन 
    ३. सामान्य परिवारों की महिलाओं के पास केवल एक या दो धोतियाँ हुआ करती थीं
    ४. ग्रामीण महिलाएँ मारकीन की सादी धोतियों को रंग कर उपयोग में लाती थीं. सधवाएँ अपनी साड़ियों को गुलाबी रंग से रंगती थीं और विधवाएँ काया रंग (काई का सा रंग) से.
    ५. अल्मोड़ा की लाला बाजार में लोहे के शेर के पास मिलने वाला गुलाबी रंग पक्का माना जाता था और उसे गुलेनार कहा जाता था.
    ६. भोजन बनाते समय केवल धुली धोती पहनना अनिवार्य था. धोती का साफ होना आवश्यक नहीं था. मैल से चीकट धोती भी स्वीकार्य थी, बशर्ते उसे एक बार जल स्पर्श करा लिया गया हो.
    ७. अक्सर गरीब ब्राह्मण स्त्रियाँ, भोजन करने के लिए धुली धोती की अपरिहार्यता के कारंण, पुरुषों के भोजन कर लेने के उपरान्त दरवाजा बन्द कर निर्वस्त्र भोजन करती थीं. क्यों कि उनके पास दूसरी धोती नहीं होती थी. प्राय: उनकी अकेली धोती पर भी पैबन्द लगे होते थे.
    टिप्पणी मित्रो कुछ आप भी याद करें तो

    ८.चप्पल भी एक विलासिता थी. और महिलाएँ नंगे पाँव सारे काम- खेती, जंगल से घास और लकड़ी लाना आदि, करती थीं. 
    ९. आँख आना (आँखों का लाल हो जाना और दुखना) एक आम बीमारी थी जो ठीक होने में कम से कम एक सप्ताह का समय लेती थी. उसके लिए किल्मोड़े की जड़ को घिस कर लगाया जाता था. नौसादर का भी प्रयोग होता था. 
    १० बच्चों को प्राय: श्वास फूलने की बीमारी हो जाती थी, जिसे हब्बा-डब्बा कहा जाता था. उसकी सर्वाधिक कारगर दवा किड़्कोथई ( रेशम के कीट की तरह बाँबी) से निकलने वाला बुरादा माना जाता था. हमारे गाँव की एक बूढ़ी महिला, जो प्राय: रामनगर के पास ढिकुली में रहती थी, लाया करती थी.
    ११. छोटे बच्चों की पैंट शौच की सुविधा के लिए दोनों और खुली होती थी, जिसे सल्तराज कहा जाता था. 
    ११ शराब उपलब्ध नहीं थी. चरस और गाँजा आम था. लोग शाम को अलाव के पास गोल घेरे में बैठ तंबाकू पिया करते थे. विजातीय व्यक्ति को केवल चिलम दी जाती थी. गुड़गुड़ी केवल स्वजातियों के लिए होती थी. चिलम सुलगाने का काम बच्चों का था, और जो मौका मिलने पर एक दो कश भी लगा लिया करते थे. 
    १२. हमारे गाँव में दीपावली के पर्व पर, सरपंच जी की बैठक में भारी जुवा होता था. जुवे में बड़े जुआरी कौड़ियों से और रिवाज मनाने के लिए खेलने वाले पाँसे का उपयोग किया करते थे. ताश का भी प्रयोग होने लगा था.
    १३. हर तीसरे दाँव पर एक दाँव (नाल-फड़) व्यवस्था के नाम होता था, (नाल कर और फड़ या बैठक-व्यवस्था) 
    १४. हारे जुआरी, अक्सर अपनी पत्नी के जेवर भी दाँव पर लगा दिया करते थे.
    १४ दीवाली के बाद पहली पूर्णिमा को अपील का भी पर्व होता था जिसमें जुआरी फिर एकत्र होते थे
    १०. कक्षा ९ तक फेल न होना, प्रतिभाशाली होने का प्रमाण माना जाता था.


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    मैं चुपके से कहता अपना प्यार: जॉन बर्जर

    Posted by Reyaz-ul-haque on 1/17/2015 07:45:00 PM


    फ्रांस के दक्षिणी इलाके के एक गांव में रहने वाले ब्रिटेन के चर्चित लेखक जॉन बर्जर का यह लेख सिर्फ नाजिम हिकमत की याद को ही ताजा नहीं करता, एक नाउम्मीदी भरे वक्त में उम्मीद की पड़ताल भी करता है. प्रतिलिपि-9 में प्रकाशित यह अनुवाद भारत भूषण तिवारी का है और यह निबंध बर्जर के निबंधों की किताब होल्ड एवरीथिंग डियर में संकलित है. बर्जर अपनी किताब वेज ऑफ सीइंग के लिए जाने जाते हैं, जो मूलत: बीबीसी पर प्रसारित एक डॉक्युमेंटरी है. 

    (जनवरी 2002)

    शुक्रवार.

    नाजिम, मैं मातम मना रहा हूँ और इसे तुमसे साझा करना चाहता हूँ, जिस तरह तुमने बहुत सी उम्मीदें और बहुत से ग़म हमसे साझा किये थे.

    रात में तार मिला
    सिर्फ तीन लफ्ज़:
    'वह नहीं रहा.'[1]

    मैं मातम मना रहा हूँ अपने दोस्त ह्वान मून्योस के लिए. वह नक्काशियाँ और इन्स्टलेशन बनाने वाला एक अद्भुत कलाकार था.कल अड़तालीस की उम्र में स्पेन के किसी समुद्र-तट पर मर गया.

    एक बात जो मुझे हैरान करती है वह मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ. किसी चीज़ का शिकार हो जाने, मार दिए जाने या  भूख से मर जाने से अलहदा एक कुदरती मौत के बाद पहले तो एक झटका लगता है. और अगर मरने वाला लम्बे समय तक बीमार न रहा हो, तो फिर भयावह किस्म का हानि-बोध होता है खासकर जब मरनेवाला जवान हो-

    दिन निकल रहा है
    पर मेरा कमरा
    एक लम्बी रात से बना है.[2]

    - और उसके बाद आता है दर्द जो अपने बारे में कहता है कि वह कभी ख़त्म न होगा.फिर दर्द के साथ चोरी-छुपे कुछ और आता है जो लगता तो मज़ाक है मगर है नहीं (ह्वान बहुत मजाकिया था). कुछ ऐसा जो छलावा पैदा करे, करतब दिखाने के बाद के किसी जादूगर के रूमाल जैसा कुछ, एक किस्म का हल्कापन जो सर्वथा विपरीत है उसके जो आप महसूस कर रहे होते हैं. तुम समझ रहे हो न कि मैं क्या कह रहा हूँ? यह हल्कापन एक ओछापन है या कोई नई हिदायत?

    तुमसे यह पूछने के पाँच मिनट बाद ही मेरे बेटे इव का फैक्स आया जिसमें कुछ पंक्तियाँ हैं जो उसने ह्वान के लिए अभी-अभी लिखी हैं.

    तुम हमेशा एक हँसी
    एक नई तरकीब के साथ
    नमूदार हुए.

    तुम हमेशा गायब हुए
    अपने हाथ
    हमारी मेज़ पर छोड़ कर.
    तुम गायब हुए
    अपने ताश के पत्ते
    हमारे हाथों में छोड़कर.

    तुम फिर दिखाई दोगे
    एक नई हँसी के साथ
    जो होगी एक तरकीब.

    शनिवार

    मुझे पक्का यकीन नहीं है कि मैं नाजिम हिक्मत से कभी मिला हूँ. मैं सौगंध उठा लूँगा कि मिल चुका हूँ पर ब्यौरेवार सबूत नहीं दे सकता. मुझे लगता है मैं उनसे लन्दन में 1994 में मिला था. उनके जेल से रिहा होने के चार सालों बाद, उनकी मृत्यु से 9 साल पहले. रेड लायन स्क्वेयर में हुई एक राजनीतिक बैठक में वे बोल रहे थे. पहले उन्होंने कुछ शब्द कहे और फिर चंद कविताएँ पढीं. कुछ अंग्रेजी में, और कुछ तुर्की में. उनकी आवाज़ दमदार, शांत, अत्यंत आत्मीय और बेहद सुरीली थी. मगर ऐसा नहीं लग रहा था कि आवाज़ उनके गले से आ रही है- या उस क्षण तो आवाज़ उनके गले से आती नहीं लग रही थी. लगता था जैसे उनके सीने में कोई रेडियो रखा है जो वे अपने चौड़े, हल्के काँपते हाथों से शुरू और बंद कर रहे थे. मैं इसे ठीक तरह बयान नहीं कर रहा हूँ क्योंकि उनकी उपस्थिति और निश्छलता एकदम ज़ाहिर थी. अपनी एक लम्बी कविता में वे छह लोगों का वर्णन करते हैं जो तुर्की में चालीस के दशक के किसी शुरूआती साल में रेडियो पर शोस्ताकोविच की एक सिम्फ़नी सुन रहे हैं. उन छह में से तीन व्यक्ति (उन्हीं की तरह) जेल में है. सीधा प्रसारण हो रहा है, उसी वक़्त हजारों किलोमीटर दूर मास्को में वह सिम्फ़नी बजाई जा रही है. रेड लायन स्क्वेयर में उन्हें अपनी कविताएँ पढ़ते हुए सुनकर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके शब्द दुनिया के दूसरे हिस्से से भी आ रहे हैं. इसलिए नहीं कि उन्हें समझना मुश्किल था (ऐसा बिल्कुल नहीं था), इसलिए भी नहीं कि वे अस्पष्ट और सुस्त थे (वे धैर्य की क्षमता से भरपूर थे), बल्कि इसलिए क्योंकि वे शब्द कहे जा रहे थे किसी भी तरह दूरियों पर फतह पाने के लिए और बेअंत हिज्रों पर मात करने के लिए. उनकी सभी कविताओं का यहीं और कहीं है.

    एक टमटम प्राग में-
    एक ही घोड़े वाली गाड़ी
    पुराने यहूदी कब्रगाह के आगे से गुज़रती है.
    टमटम भरी है किसी दूसरे शहर की हसरतों से

    गाड़ीवान मैं हूँ.[3]

    बोलने के लिए खड़े होने से पहले जब वे चबूतरे पर बैठे हुए थे, तब भी यह देखा जा सकता था कि वे असामान्य तौर से लम्बे-चौड़े आदमी हैं. 'नीली आँखों वाला दरख्त'यह नाम उन्हें यूं ही नहीं दिया गया था. जब वे खड़े हुए, तो ऐसा महसूस होता था कि वे बहुत हल्के भी हैं, इतने हल्के कि उनके हवा में उड़ जाने का खतरा है.

    शायद मैंने उन्हें कभी नहीं देखा. क्योंकि यह मुमकिन नहीं कि लन्दन में इंटरनेशनल पीस मूवमेंट द्वारा आयोजित बैठक में हिक्मत को कई जहाज़ी तारों की मदद से चबूतरे से बाँध कर रखा गया हो जिससे कि वे ज़मीन पर बने रहें. फिर भी यह मेरी स्पष्ट स्मृति है. उनके शब्द बोले जाने के बाद आसमान में ऊपर उठ जाते थे – वह बैठक बाहर खुले में हो रही थी- और उनका शरीर मानो उनके लिखे शब्दों के पीछे पीछे जाने के लिए ही बना था, जैसे वह शब्द उठाते जाते थे स्क्वेयर के ऊपर और थियोबाल्ड्स रोड की उन पूर्ववर्ती ट्रामों की चिंगारियों से ऊपर जो तीन-चार साल पहले चलनी बंद हो गई थीं.

    तुम अनातोलिया के
    एक पहाड़ी गाँव हो,
    तुम मेरे शहर हो,
    बेहद खूबसूरत और अत्यधिक दुखी
    तुम हो मदद की एक गुहार- यानी तुम मेरे देश हो;
    तुम्हारी और दौड़ते कदम मेरे हैं.[4]

    सोमवार की सुबह

    मेरे लम्बे जीवन में मेरे लिए महत्त्वपूर्ण रहे लगभग सभी समकालीन कवियों को मैंने अनुवाद में और कदाचित ही उनकी मूल भाषा में पढ़ा है. मैं सोचता हूँ कि बीसवीं सदी से पहले किसी के लिए ऐसा कहना असंभव होता. कविता के अनुवादयोग्य होने या न होने पर बहस सदियों तक चली – पर वे सब चेम्बर आर्ग्युमेंट्स थे – चेम्बर म्यूज़िक की तरह. बीसवीं सदी के दौरान बहुत सारे चेम्बर्स धराशायी हो गए. संचार के नए माध्यम, वैश्विक राजनीति, साम्राज्यवाद, विश्व बाज़ार वगैरह ने अंधाधुंध और अप्रत्याशित तरीके से लाखों लोगों को साथ ला दिया और लाखों लोगों को दूर कर दिया. नतीजतन कविता की अपेक्षाएँ बदलीं; श्रेष्ट कविता ने और भी ज्यादा उन पाठकों पर भरोसा किया जो दूर-बहुत दूर थे.

    हमारी कवितायें
    मील के पत्थरों की तरह
    रास्ते के किनारे खड़ी रहे.[5]

    बीसवीं सदी के दौरान, कविता की कई विवस्त्र पंक्तियाँ अलग-अलग महाद्वीपों के बीच, परित्यक्त गाँवों और दूरस्थ राजधानियों के बीच टाँगी गई थीं. तुम जानते हो यह बात, तुम सभी; हिक्मत, ब्रेष्ट, वायेखो, अतिल्ला योज़ेफ़, अदोनिस, ह्वान गेलमन…

    सोमवार की दोपहर

    जब मैंने पहली बार हिकमत की कुछ कविताएँ पढ़ीं तब मैं किशोरावस्था के आखिरी दौर में था. ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के तत्त्वावधान में छपने वाली एक गुमनाम सी अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका में वे कविताएँ प्रकाशित हुई थीं. कविता के बारे में पार्टी की नीति बकवास थी, पर प्रकाशित होने वाली कविताएँ और कहानियां अक्सर प्रेरक होती थीं.

    उस समय तक मायरहोल्ड को मास्को में मौत की सजा दे दी गई थी. अब मैं खासकर मायरहोल्ड के बारे में सोचता हूँ तो इसलिए कि हिक्मत उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते थे, और 1920 के दशक के शुरूआती सालों में जब वे पहली बार मास्को गए थे तब वे मायरहोल्ड से खासे प्रभावित भी थे.

    'मायरहोल्ड के थिएटर का मैं बहुत ऋणी हूँ. 1925 में जब मैं तुर्की वापिस लौटा तो मैंने इस्तंबुल के एक औद्योगिक जनपद में पहले श्रमिक रंगमंच का गठन किया. इस थिएटर के साथ निर्देशक और लेखक के तौर पर काम करने पर मुझे महसूस हुआ कि दर्शकों के लिए और उनके साथ काम करने की नई संभावनाएं हमारे लिए मायरहोल्ड ने खोलीं.'

    1937 के बाद, उन नई संभावनाओं की कीमत मायरहोल्ड को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, पर उस पत्रिका के लन्दन स्थित पाठकों को यह बात मालूम नहीं हुई थी.

    जब मैंने पहले-पहल हिक्मत की कविताएँ पढ़ीं तो जिस चीज़ ने मुझे आकृष्ट किया वह थी उनकी स्पेस; तब तक मेरी पढ़ी हुई अन्य कविताओं में मुकाबले उनमें सबसे ज़्यादा स्पेस मौजूद  थी. उनकी कविताएँ स्पेस को बयान नहीं करती थीं बल्कि उस स्पेस से होकर आती थीं, वे पहाड़ों को लाँघती थीं. वे एक्शन के बारे में भी थीं. वे संदेहों, तन्हाई, वियोग, उदासी को जोड़ती थीं. ये भावनाएँ कर्त्तव्य का एवज नहीं थीं, बल्कि कर्त्तव्य उन भावनाओं का अनुगमन करता था. स्पेस और एक्शन साथ साथ चलते हैं. जेल उनकी प्रतिपक्षता है, और तुर्की की जेलों में ही राजनीतिक कैदी के तौर पर हिक्मत ने अपना आधा साहित्य रचा.

    बुधवार

    नाजिम, मैं जिस मेज़ पर लिख रहा हूँ उसका वर्णन मैं तुम्हें सुनाना चाहता हूँ.  यह बगीचे  में रखी जाने वाली सफ़ेद धातु की बनी हुई टेबिल है, ठीक वैसी जैसी बोस्फोरसi पर बनी किसी यालीii के मैदान में नज़र आती है. यह टेबिल तो पेरिस के दक्षिण-पूर्वी उपनगर के छोटे से घर के ऊपर से ढँके बरामदे में रखी हुई है. यह घर 1938 में बना था, यहाँ उस समय दस्तकारों, कारीगरों, कुशल श्रमिकों के लिए बनाये गए अनेक घरों में एक घर. 1938 में तुम जेल में थे. तुम्हारे बिस्तर के ऊपर दीवार पर एक घड़ी कील के सहारे लटक रही थी. तुम्हारे ऊपर वाले वार्ड में ज़ंजीरों में बँधे तीन कैदी मौत की सजा का इंतज़ार कर रहे थे.

    इस टेबिल हर समय बहुत सारे कागज़ पड़े होते हैं. हर सुबह सबसे पहले मैं कॉफ़ी की चुस्कियां लेते हुए इन कागज़ों को तरतीब से रखने की कोशिश करता हूँ.  मेरी दाहिनी तरफ गमले में एक पौधा है, जो मुझे यकीन है तुम्हें पसंद आएगा. इसकी पत्तियाँ बेहद गहरे रंग की हैं.  नीचे की तरफ पत्तियों का रंग डैम्सन जैसा है, ऊपर की तरफ रौशनी ने रंग को थोडा मटमैला कर दिया है. पत्तियां तीन-तीन के समूह में हैं, जैसे कि वे रात को मंडराने वाली तितलियाँ हों- उनका आकार तितलियों जितना ही है- जो उस फूल से अपना खुराक हासिल करती हैं.  इस पौधे के फूल छोटे-छोटे, गुलाबी रंग के और गाना सीखते प्राइमरी स्कूल के बच्चों कि आवाज़ों की तरह मासूम हैं. यह एक बड़े से तिपतिया घास की तरह है. खासकर यह पोलैंड से मँगाया गया है जहाँ इस पौधे को कोनिकज़िना कहा जाता है. यह मुझे एक मित्र की माँ ने दिया था जिन्होंने यूक्रेन की सरहद के पास स्थित अपने बगीचे में इसे उगाया था. उनकी नीली आकर्षक आँखें हैं और वे बगीचे में टहलते हुए और घर में चहलकदमी करते हुए पौधों को वैसे ही छूती रहती हैं जैसे कुछ दादियाँ अपने नन्हे नाती-पोतों के माथों को छुआ करती हैं.

    मेरे  महबूब, मेरे  गुलाब
    पोलैंड  के मैदानों  से  होकर गुजरने वाले मेरे सफ़र का  हो चुका आग़ाज़:
    मैं हूँ एक छोटा सा बच्चा  खुश और हैरतज़दा
    लोगों
    जानवरों
    चीज़ों, पौधों
    वाली  अपनी पहली तस्वीरों की किताब को देखता हुआ
    एक छोटा सा बच्चा.[6]

    दास्तानगोई में सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या पहले आएगा और क्या बाद में. वास्तविक क्रम तो शायद ही ज़ाहिर हो पाता है. ट्रायल एंड एरर. कई कई बार.  और इसलिए कैंची और स्कॉच टेप की एक रील भी टेबिल पर है. टेप की  रील उस चीज़ में नहीं फिट की गई है जिससे टेप की पट्टी को काट कर अलग करना आसान हो जाता है. मुझे टेप पट्टी कैंची से काटनी पड़ती है. मुश्किल काम है टेप का सिरा खोजना और फिर उसे खींचना.

    मैं बेसब्री से, खीजते हुए अपने नाखूनों से खुरचकर ढूँढता हूँ. नतीजतन जब मुझे सिरा मिल जाता है तो उसे टेबिल के सिरे से चिपका देता हूँ और रील को तब तक खुलने देता हूँ जब तक वह फर्श को न छूने लगे. और फिर उसे वैसे ही लटकता छोड़ देता हूँ.

    कभी कभी मैं इस बरामदे से उठकर बगल वाले कमरे में चला जाता हूँ जहाँ मैं बतियाता हूँ, खाता हूँ या अखबार पढता हूँ.  कुछ दिनों पहले इसे कमरे में जब मैं बैठा तो एक हिलती सी चीज़ की और मेरा ध्यान गया.  टेबिल के सामने रखी मेरी खाली कुर्सी के पैरों के पास बरामदे की फर्श पर टपक रहा था झिलमिलाते पानी का बेहद छोटा सा सोता, हिलोरे लेता हुआ. आल्प्स  से निकलने वाली नदियों का उद्गम भी इस टपकन से ज़्यादा कुछ नहीं होता.

    खिड़की से अन्दर आते हवा के झोंके से झकझोरी जाने वाली टेप की रील भी कभी कभी पहाड़ों को हिला देने के लिए काफी होती है.

    गुरुवार की शाम

    दस साल पहले इस्तंबुल में हैदर-पाशा स्टेशन के पास वाली एक इमारत के सामने मैं खड़ा था जहाँ संशयितों से पुलिस पूछ-ताछ कर रही थी. इमारत की सबसे ऊपर वाली मंजिल पर राजनीतिक कैदियों को रखा जाता था और उनसे सवाल पूछे जाते थे, कभी कभी हफ़्तों तक. 1938 में वहाँ हिक्मत से भी पूछ-ताछ की गई थी.

    उस इमारत का ढाँचा किसी कैदखाने की तरह नहीं बल्कि एक विशाल प्रशासकीय दुर्ग की तरह बनाया गया था. यह  इमारत अविनाशी प्रतीत होती है और ईंटों और ख़ामोशी से बनी है. वैसे तो कैदखानों की मनहूस मगर अक्सर मायूस कामचलाऊ सी फिजा भी होती है. मसलन, बुर्सा के जिस कैदखाने में हिक्मत ने दस साल बिताये उसे अपनी अजीब सी बनावट के कारण 'पत्थर के हवाई जहाज़'के नाम से जाना जाता था. इसके विपरीत इस्तंबुल में स्टेशन  के पास वाले  जिस अचल दुर्ग को मैं देख रहा था उसमें  मौन के स्मारक  की तरह एक निश्चय और प्रशांति थी.

    यह इमारत संयत स्वरों में घोषणा करती है कि जो भी इसके  अन्दर है या इसके भीतर जो कुछ  भी होता है, वह भुला दिया जाएगा, रिकार्ड से हटा लिया जायेगा, योरप और एशिया के बीच की दरार में दफन कर दिया जाएगा.

    और उस वक़्त मैंने उनकी कविता की अनोखी और अनिवार ऊर्जा को समझा; उसे लगातार अपने कारावास से पार पाना होता था. दुनिया भर के कैदियों ने हमेशा ग्रेट एस्केप के ख्वाब देखे हैं, मगर हिक्मत की कविता ने कभी नहीं.

    उनकी कविता ने, शुरू होने से पहले ही, कैदखाने को दुनिया के नक़्शे पर एक बिंदु की तरह रख दिया.

    सबसे खूबसूरत समंदर
    अब तक पार नहीं किया गया.
    सबसे खूबसूरत बच्चा
    अब तक बड़ा नहीं हुआ.
    सबसे खूबसूरत दिन हमारे
    हमने अब तक देखे ही नहीं.
    और सबसे खूबसूरत लफ्ज़ जो मैं तुमसे कहना चाहता था
    वो मैंने अब तक कहे ही नहीं.

    उन्होंने हमें कैद कर लिया है,
    बंद कर दिया है:
    मुझे दीवारों के अन्दर
    और तुम्हें बाहर.

    मगर यह कुछ भी नहीं है.
    सबसे बुरा तब होता है
    जब लोग- जाने अनजाने
    अपने अन्दर कैदखाने लिए चलते हैं
    बहुतेरे लोगों को ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया है.

    ईमानदार, मेहनतकश, भले लोग
    जिन्हें प्यार किया जाना चाहिए
    उतना ही जितना कि मैं तुमसे करता हूँ.[7]

    उनकी कविता ज्यामितीय कम्पास की तरह वृत्त बनाती थी, कभी नज़दीकी तो कभी चौड़े और वैश्विक, जिसका सिर्फ नुकीला बिंदु जेल की कोठरी में गड़ा होता था.

    शुक्रवार की सुबह

    एक बार मैं मद्रीद के एक होटल में ह्वान मून्योस का इंतज़ार कर रहा था. वह लेट हो गया था क्योंकि जैसा मैंने बताया रात में मेहनत करते वक़्त वह कार सुधारते मैकेनिक की तरह होता, और समय का हिसाब नहीं रखता.

    आख़िरकार जब वह आया, मैंने उसे कारों के नीचे पीठ के बल लेटने की बात कहकर छेड़ा. और बाद में उसने मुझे एक चुटकुला फैक्स किया जो मैं तुम्हें सुनाना चाहता हूँ, नाजिम. पता नहीं क्यों. क्यों यह जानना शायद मेरा काम नहीं. मैं तो सिर्फ दो मृत व्यक्तियों के बीच के एक डाकिये का काम कर रहा हूँ.

    'आपको मैं अपना परिचय देना चाहूँगा – मैं एक स्पैनिश मैकेनिक हूँ (सिर्फ कारें, मोटर-साइकिलें नहीं) जो अपना ज़्यादातर समय इंजिन के नीचे पीठ के बल लेटे हुए उसे देखने में गुजारता है. मगर, और यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, मैं कभी कभी कलाकृतियाँ भी बना लेता हूँ. ऐसा नहीं कि मैं कोई कलाकार हूँ. ना. मगर मैं चीकट कारों के अन्दर और नीचे रेंगने का बकवास काम छोड़ना चाहता हूँ और कला की दुनिया का कीथ रिचर्ड बनना चाहता हूँ. और अगर यह संभव न हो तो मैं पादरियों की तरह काम करना चाहूँगा, केवल आधे घंटे के लिए, और वह भी वाइन के साथ.

    यह ख़त मैं तुम्हें इसलिए लिख रहा हूँ क्यों कि मेरे दो दोस्त (एक पोर्टो में और एक रोतेर्दम में) तुम्हें और मुझे पुराने शहर पोर्टो के बॉयमंस कार म्यूजियम और दीगर बेसमेंट्स ( उम्मीद है जो अधिक मदिर होंगे) में आमंत्रित करना चाहते हैं.

    उन्होंने लैंडस्केप  के बारे में भी कुछ कहा था जो मेरी समझ में नहीं आया. लैंडस्केप. मुझे लगता है शायद वह गाड़ी में घूमने और यहाँ वहाँ भटकने के बारे में था, या गाड़ी चलाते हुए इधर उधर निहारने के बारे में…

    सॉरी सर! अभी अभी कोई दूसरा ग्राहक आया है. वाह! ट्रायम्फ स्पिटफ़ायरiii.

    मुझे ह्वान की हँसी सुनाई देती है, उस स्टूडियो में गूँजती हुई जहाँ वह अपनी निशब्द आकृतियों के साथ तनहा है.

    शुक्रवार की शाम

    कभी कभी मुझे लगता है कि बीसवीं सदी की महानतम कविताएँ – चाहे वे पुरुष द्वारा लिखी गई हों या स्त्री द्वारा- शायद सर्वाधिक भ्रातृत्व वाली भी हैं. अगर ऐसा है तो इसका राजनीतिक नारों से कोई लेना-देना नहीं है.  यह बात लागू होती है रिल्के के लिए जो अराजनीतिक थे, बोर्हेस के लिए जो प्रतिक्रियावादी थे और हिक्मत के लिए जो ताउम्र कम्युनिस्ट रहे.  हमारी सदी अभूतपूर्व नरसंहारों वाली रही, फिर भी जिस भविष्य की इसने कल्पना की (और कभी कभी उसके लिए संघर्ष भी किया) उसमें भाईचारे का प्रस्ताव था. पहले की बहुत कम सदियों ने ऐसा प्रस्ताव रखा.

    यह लोग, दीनो
    जो रोशनी के तार-तार चीथड़े उठाये हैं
    इस अँधेरे में
    वे कहाँ जा रहे हैं, दीनो?
    तुम, मैं भी:
    हम उनके साथ हैं, दीनो.
    नीले आसमान की झलक
    हमने भी देखी है दीनो.[8]

    शनिवार

    नाजिम, शायद इस बार भी मैं तुमसे मिल नहीं रहा हूँ.  फिर भी सौगंध खा लूँगा कि मिल रहा हूँ. बरामदे में तुम मेरी मेज़ की दूसरी तरफ बैठे हो. कभी गौर किया है कि अक्सर सिर की बनावट उसके अन्दर आदतन चल रही विचार पद्धति की ओर इशारा करती है. कुछ सिर हैं जो लगातार गणनाओं की गति दर्शाते हैं. कुछ हैं जो खुलासा करते हैं पुरातन विचारों के दृढ़ अनुसरण का. इन दिनों कई सारे तो अनवरत हानि की अबोध्यता को धोखा देते हैं. तुम्हारा सिर- इसका आकार और तुम्हारी त्रस्त सी नीली आँखें- मुझे दिखाती हैं अलग अलग आसमानों वाली कई सारी दुनियाओं का सह-अस्तित्व, एक के भीतर दूसरा, अन्दर; डरावना नहीं शांत, मगर भीड़-भड़क्के का आदी.

    मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ इस दौर के बारे में जिस में हम जी रहे हैं. जो कुछ भी तुम मानते थे कि इतिहास में हो रहा है, या समझते थे कि होना चाहिए, वह भ्रामक साबित हुआ. तुम्हारी कल्पना का समाजवाद कहीं नहीं बनाया जा रहा. कार्पोरेट पूँजीवाद बेरोक आगे बढ़ रहा है- यद्यपि उत्तरोत्तर प्रतिरोध के साथ – और वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर के टावर उड़ा दिए गए हैं. अत्यधिक भीड़ से भरी दुनिया दिन पर दिन गरीब होती जाती है. अब कहाँ है वह नीला आसमान जो तुमने दीनो के साथ देखा था?

    तुम जवाब देते हो, हाँ, वे उम्मीदें तार-तार हैं, फिर भी वास्तव में इससे फ़र्क क्या पड़ता है? न्याय अब भी एक शब्द वाली प्रार्थना है, जैसा कि आज के तुम्हारे समय में ज़िगी मारली गाता है. सारा इतिहास ही उम्मीदों के बचे रहने,खो जाने और फिर नए होने का है. और नई उम्मीदों के साथ आते हैं नए विचार.

    मगर भारी भीड़ के लिए, उनके लिए जिनके पास बहुत थोड़ा है या कभी-कभी साहस और प्यार के सिवाय कुछ भी नहीं है, उनके लिए उम्मीद अलग तरह से काम करती है. फिर उम्मीद दाँतों के बीच रखकर चबाने की चीज़ हो जाती है. यह बात मत भूलो. यथार्थवादी बनो. दाँतों के बीच में उम्मीद रखे हुए ताक़त आती है उस वक़्त आगे बढ़ने की  जब थकन उठने नहीं देती. ताक़त आती है ज़रुरत पड़ने पर असमय न चीख पड़ने की. और सबसे बढ़कर ताक़त मिलती है किसी पर न गुर्राने की. ऐसा व्यक्ति जो अपने दाँतों के बीच उम्मीद रखे है, उस भाई या बहन की  सभी इज्ज़त करते हैं. वास्तविक दुनिया में बिना उम्मीद वाले लोग अकेले होने के लिए अभिशप्त हैं. वे ज्यादा से ज्यादा दया दिखा सकते हैं. और जब रातें काटने और एक नए दिन के तसव्वुर की बात आती है तो क्या फर्क पड़ता है कि दाँतों के बीच रखी उम्मीदें ताज़ा हैं यार तार-तार. तुम्हारे पास थोड़ी कॉफ़ी होगी?
    मैं बनाता हूँ.

    मैं बरामदे से निकलता हूँ. जब तक मैं दो कप लिए रसोईघर से लौटता हूँ- और कॉफ़ी तुर्की है- तुम जा चुके हो. मेज़ पर, जहाँ स्कॉच टेप चिपका है उसके एकदम पास, एक किताब है जिसमें उघरी है एक कविता जो तुमने 1962 में लिखी थी.

    गर मैं होता गूलर का पेड़ तो उसकी छांह में दम लेता
    गर मैं किताब होता
    बिन ऊबे पढ़ता उन रातों में जब आँखों में नींद न होती
    गर होता कलम तो खुद की उँगलियों के बीच भी नहीं चाहता फँसना
    गर दरवाज़ा होता
    तो खुलता भलों के लिए और बुरों के लिए बंद हो जाता
    गर मैं होता खिड़की, बिना पर्दों वाली खुली चौड़ी खिड़की
    अपने कमरे में सारे शहर को ले आता
    गर मैं लफ्ज़ होता
    तो पुकारता खूबसूरत को सच्चे को खरे को
    गर मैं लफ्ज़ होता
    मैं चुपके से कहता अपना प्यार.[9]

    मूल नोट्स

    1.नाजिम हिक्मत, दि मास्को सिम्फ़नी, अनुवाद, तनेर बायबार्स, रैप एंड व्हिटिंग लि. 1970.
    2.वही.
    3.हिक्मत, प्राग डॉन, अनुवाद, रैंडी ब्लासिंग और मुतेन कोनुक, पेर्सिया बुक्स, 1994.
    4.हिक्मत, यू, अनुवाद, ब्लासिंग और कोनुक, वही.
    5.अनुवाद, जॉन बर्जर.
    6.हिक्मत, लेटर फ्रॉम पोलैंड, अनुवाद जॉन बर्जर.
    7.हिक्मत, 9-10पीएम. पोएम्स. अनुवाद ब्लासिंग और कोनुक.
    8.हिक्मत, ऑन अ पेंटिंग बाइ अबिदीन, एंटाइटल्ड दि लॉन्ग मार्च. अनुवाद जॉन बर्जर.
    9.हिक्मत, अंडर दि रेन. अनुवाद ओज़ेन ओज़ुनर और जॉन बर्जर.

    अनुवादक के नोट्स

    i.तुर्की के यूरोपीय हिस्से और एशियाई हिस्से को जोड़ने वाला जलडमरू मध्य जिसे इस्तंबुल स्ट्रेट भी कहा जाता है.
    ii.इस्तंबुल की समुद्र तट से सटी विशाल कोठियाँ.
    iii.एक ब्रिटिश स्पोर्ट्स कार का मॉडल



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    Image"In a marked contrast to his pre-election diatribe against other political parties, monarchy and the 'imperialist forces of India and America', Prachanda gave a very reserved and conciliatory speech in his election victory rally, emphatically pleading everybody, especially the international community, to not doubt his party's commitment to multi-party democracy. This evolution of Maoists into a more or less liberal democratic party with an anomalistic name now appears ever clearer."

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    Islamist Militancy in Bangladesh: What's to be Done?
    By Ali Riaz   

    Image"Developments over the past year demonstrate that militant Islamists have regrouped and seem to be steadily gaining strength. The government has always been one step behind in dealing with them. To my knowledge no investigations, either public or administrative, has been conducted to identify the individuals concerned and the reasons behind the leniency displayed toward militants. Patrons of the militants - individuals and organizations, domestic and foreign – have escaped justice altogether."

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    http://www.progressivebangladesh.org/


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    Revenge of the East

    Vol - L No. 3, January 17, 2015 

    The best tribute to the dead of Charlie Hebdo is the debate on freedom of speech that has now opened up.

    Inflation Targeting as Policy Option for India

    Vol - L No. 3, January 17, 2015 Renu Kohli 

    Inflation targeting may have its benefits but the timing of India's ongoing transition to IT – an adverse domestic and global macroeconomic context – poses signifi cant risks to a successful implementation. Moreover, the evidence of IT having a positive impact comes from the pre-financial crisis era; more recent studies of the emerging market economies over a longer period show the non-IT countries growing faster than those which have adopted IT.

    Commentary

    In a peculiar re-enactment of the fascist past, sections of the Indian intellectual community are displaying a horrifying moral ambiguity in their slow drift into a system that typifi es a dangerous and opportunist liaison between the forces of...

    Special Articles

    The processes of liberalisation, globalisation, and privatisation were expected to weaken the bargaining power of workers vis-à-vis employers and lead to a reduction in the number and frequency of industrial conflicts. However, the reform...

    Editorials

    The courts must decide whether free expression is a constitutional right.

    Editorials

    A mandate from across ethnic and social groups in Sri Lanka has felled the mighty Rajapaksa regime.

    Special Articles

    Born in a poor Nai (barber) family, Karpoori Thakur, a committed socialist, played an important role in politics of Bihar for more than four decades between the 1950s and 1980s. He introduced controversial policies of reservation (the "Karpoori...

    Commentary

    I was 12 when I first heard of Krishna Iyer. It was a steamy Madras morning in July 1987. That day's Indian Expressannounced that the retired judge would be the Opposition's presidential candidate. He was to face R...

    Commentary

    An appropriate response is not to curtail legitimate civil liberties or democratic freedoms, for this could have even more dangerous political and social consequences in areas of civil liberties and democratic rights, but rather to work towards...

    Notes

    An examination of age-wise voting and preferences in the 2014 elections reveals that the Bharatiya Janata Party benefi ted from youth and first-time voters showing a high preference for the party relative to other age groups.

    Commentary

    The safety guidelines for schools in Karnataka that mandate cultures of surveillance and control are inadequate to prevent the systematic abuse of children in schools. Systems that place child welfare at the heart of schooling and school...

    Commentary

    Assessing the progress made in reducing under-nutrition among children who are less than two years old in Maharashtra between 2005-06 and 2012, this article points out that child under-nutrition, especially stunting, declined signifi cantly in...

    Special Articles

    The public distribution system remains the bedrock of India's food security system and the Food Security Act (2013) has only increased its importance. At the same time, the PDS administration has been subject to reform, change and experimentation...

    Perspectives

    This article examines the nature of two varied forms of assessments like the continuous comprehensive evaluation and end-of-the-year exams, studies the variations in the principles underlying them and presents a case for an assessment that is...

    Reports From the States / Web Exclusives

    Union Carbide Corporation managed to wrangle out of the Bhopal gas tragedy by exploiting a loophole in the Foreign Exchange Regulation Act. If governments are not vigilant, other companies, ushered for "Make in India", would do the...

    Discussion

    Two responses to "Has Microfinance Lost Its Moral Compass?" (David Hulme and Mathilde Maitrot, EPW, 29 November 2014). The first argues that microfinance institutions in Bangladesh remain client-focused and mission-oriented. The second...

    Discussion

    David Hulme and Mathilde Maitrot's article on amorality of money in EPW ("Has Microfinance Lost Its Moral Compass?", 29 November 2014) is timely and well-researched to illustrate one of the successes in development turning into...

    Book Reviews

    Beyond Inclusion: The Practice of Equal Access in Indian Higher Education edited by Satish Deshpande and Usha Zacharias (New Delhi: Routledge), 2013; pp 356, Rs 415 (hardback).

    Book Reviews

    Chandernagore: From Bondage to Freedom, 1900-1955 by Sailendra Nath Sen (Delhi: Primus Books), 2012; pp xv + 376, Rs 1,150.

    Book Reviews

    Left of Centre: Kamal Morarka in Parliament edited by Lina Mathias (New Delhi: Rupa Publications), 2013; pp xviii + 267, Rs 495.

    Web Exclusives

    Charlie Hebdo's critics have got one thing wrong – the real target of such terrorist attacks  is not the "Islamophobic" Western establishment, it is the Muslim heretic who wants to defy the cleric and...

    Web Exclusives

    While the election victory for President Maithripala Sirisena was due to a unique political moment that united minorities and many in the Sinhala electorate to vote out an authoritarian regime, expectations of major change in economic policy need...


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    Recent Changes in Labour Laws and their implications for the Working Class

    January 13, 2015


    http://sanhati.com/excerpted/12592/

    anamitralabourlaws

    By Anamitra Roychowdhury. The author teaches at St. Stephen's College, University of Delhi.

    Introduction

    Sweeping changes in labour laws are taking place in India. While launching the "Shramyev Jayate" (i.e. only hard work will win) programme, the Prime Minister urged us to take a compassionate view on "Shram Yogi" (worker) and use them as a source of "Rastra Nirmaata" (nation builder). It would therefore appear from this, that the current government is championing the cause of labour. Curiously, according to the media reports on the event, the industry lobby (CII, FICCI, ASSOCHAM etc.) unanimously applauded the proposed changes in labour laws, while the central trade unions (including Bharatiya Mazdoor Sangh, the trade union affiliated with the Bharatiya Janata Party [BJP]) complained about not being consulted at all and threatened to launch a nationwide protest on December 5, 2014 (see 17 October 2014, The Hindu). Therefore, clearly there is some confusion over the realcontent of the labour reforms. Thus, it becomes imperative to analyze the class character of the reforms and identify their possible impact on different sections of society. This is precisely what the present article seeks to do, in order to clear some confusion that currently prevails.

    Self certification by Manufacturing firms and their Inspection

    Mr. Modi's emphasis on building a robust manufacturing sector in India is well-known from his "Make in India" campaign. Towards that end he launched a couple of policy measures aimed at increasing the ease of doing business in India: "Ease of business is the first and foremost requirement if Make in India has to be made successful" (see17 October 2014, The Indian Express). India's rank in the "Ease of Doing Business" index actually slipped from 140 to 142 in 2014-15 (out of 189 countries) and Modi's measures are primarily aimed at improving India's ranking next year.

    A significant move in that direction is the unveiling of Shram Suvidha Portal, which would allow employers to submit a self-certified single compliance report for 16 Central labour laws. This reform is expected to simplify business by putting the onus of compliance with the firms through self-certification. The Prime Minster described this reform as follows: "These facilities are what I call minimum government, maximum governance". He justified these in the following terms: "Let's start with trust" (ibid.). However, self-certification suffers from a basic drawback of non-revelation of truthful information, if there are incentives for doing so (like saving on a range of compliance cost in this case) [For a different critique see the article by Jesim Pais in 06 November 2014, The Hindu].

    One might argue that the problem of non-revelation of truthful information may be largely curbed if there is a rigorous inspection mechanism in place. It is precisely here that Mr. Modi announced another radical change. In the name of ending the 'Inspector Raj' from now on labour inspectors would not be allowed to decide on their own, the establishments to be inspected. Instead, they would be sent to randomly selected establishments (administered centrally through computerized draw of lot; similar to those done during random scrutiny of income tax returns) and have to upload their reports within 72 hours, without future scope of modifying them. However, since labour inspectors generally have better ground level information about establishments and their functioning, centralized selection of enterprises for inspection even if randomly chosen, is certainly going to compromise on the effectiveness of inspection.

    In fact trade unions are apprehensive that even if there are complaints of violation of safety norms by workers, even then labour inspectors might not inspect the offending factories – since now inspection of factories can only be done through random draw of lots. In any case, centralized controlling of inspections violates the International Labour Organization's (ILO) labour inspection convention 81 (1947) – to which India is a signatory. This is because according to Article 12 of the labour inspection convention 81, labour inspectors are empowered inter alia, "to enter by day any premises which they may have reasonable cause to believe to be liable to inspection; and to carry out any examination, test or enquiry which they may consider necessary in order to satisfy themselves that the legal provisions are being strictly observed" (emphasis mine). The new stipulation, by regulatinginspectors' visit to establishments curbs the freedom of inspectors to visit any enterprise, thus violating the provisions of ILO convention.

    Moreover, the above move is expected to bring down annual labour inspections (currently 3 lakhs; see, 17 October 2014, The Indian Express) very sharply. But cutting down on labour inspections will adversely impact industrial safety, in a country where the culture of adhering to industry safety standards is already abysmal. It does not need mentioning that the workers will be at the receiving end of such deteriorating industrial safety norms. Moreover, this is introduced at a time when there is clear evidence to show that inspection standards in establishments relating to labour and industrial regulations have declined drastically. In the last two decades especially there has been serious under reporting of accidents – only fatal accidents are reported, since they are difficult to conceal, whereas non-fatal accidents go unreported (06 November 2014, The Hindu). This is reflected in the secular rise in share of fatal injuries in total injuries (Figure: 1).

    anamitrafig1

    Figure: 1
    Source: Indian Labour Yearbook, various issues

    It is easy to see that these policy changes are detrimental to labour rights. The rest of the article is devoted to evaluating the possible implications of the recently changed labour laws in Rajasthan. We chose Rajasthan for discussion since this is the first state to change the labour laws and so far is the only case in point.

    Recent labour law changes in Rajasthan

    The subject of labour being in the concurrent list, the BJP government in Rajasthan led by Ms. Vasundhara Raje recently proposed amendments to three key labour legislations namely, the Contract Labour (Regulation and Abolition) Act (CLRA), 1970; the Factories Act, 1948 and the Industrial Disputes Act (IDA), 1947. Her cabinet approved these amendment bills. The proposals then went for Centre's approval and faced no hurdle – as the BJP in its election manifesto promised to amend the labour laws. Finally, it went to the President seeking his approval and acquired so – thereby turning them into law (see 8 November 2014, Business Standard). These changes are supposed to set off a domino effect as other states are likely to follow suit [According to the media reports the states of Haryana and Madhya Pradesh are already moving along these lines]. This would in effect decentralize the Indian labour market, with 29 states each vying to offer the most lucrative labour regime to attract industries.

    The concrete change in case of Contract Labour Act, 1970 is that it would now be applicable only in case of establishments employing 50 or more workers instead of the earlier threshold of 20 workers. Before amendment the Factories Act, 1948 covered those factories employing 10 or more workers (using power) or 20 or more workers (without using power). The recent amendment increased this threshold to 20 workers (using power) and 40 workers (without using power). Finally, according to Chapter VB of the Industrial Disputes Act (IDA), 1947 previously it was necessary to obtain prior government permission to retrench, layoff workers and closedown factories in an establishment employing 100 or more permanent workers1. The recent amendment raised the employment threshold to 300 workers. In this article we shall comment on each of these labour law changes seriatim.

    With regard to the Contract Labour Act our observation would be limited to the following implication: making Contract Labour Act (restricting the use of contract workers) applicable to establishments employing 50 or more workers instead of 20 workers would mean that all regular jobs in establishments below 50 workers (but above 20 workers) would be abolished. According to 2010-11 data, around one-third of 2.15 lakh regular workers in the manufacturing sector of Rajasthan were located in establishments employing less than 50 workers. This move would bring in insecurity in the lives of these workers. Moreover, this employer-friendly move would also implicitly encourage the use of contract workers more liberally in establishments employing more than 50 workers.

    Let us now discuss the implications of the amendment to the Factories Act, 1948. Any firm engaged in manufacturing activity and registered under the Factories Act comes under the organized segment of manufacturing. Therefore, by increasing the workers' threshold in establishments that is required to register under the Factories Act, some of the factories erstwhile registered under the Factories Act (namely, factories employing 10-19 workers using power and 20-39 workers not using power) would no longer be required to do so. Thus, at the stroke of a pen, these manufacturing establishments would now be categorized under the unorganized sector. Consequently, workers in these establishments now being placed in the unorganized segment of manufacturing would stand to lose on various rights like social security benefits, old age benefits and other benefits (Chandru, 2014).

    Additionally, this would deteriorate the quality of manufacturing sector data. This is because Annual Survey of Industries (ASI) conducts survey every year only for the organized manufacturing sector i.e. only those manufacturing establishments registered under the Factories Act, 1948. Because survey is carried out every year therefore data on organized manufacturing is considered to be reliable/firm. However, the same cannot be said for the unorganized manufacturing sector data – since survey in this segment is conducted in five years interval – and for non-survey years estimates are obtained by updating the survey year's figures by the Index of Industrial Production (IIP) (see Roychowdhury, 2005 for details). With the recent amendment, since some of the erstwhile organized manufacturing firms would be pushed into the unorganized segment therefore, as things stand, they would not be surveyed every year by ASI – leading to deterioration of data quality. Next we turn to the most contentious move of amending the IDA, 1947 and try to examine its rationale.

    It is normally argued in the literature that Chapter VB of IDA creates unnecessary obstacle in adjusting the workforce of an establishment (and its closure) and consequently hinders employment creation in the manufacturing sector (Kapoor, 2014). Also notice that this particular legislation gives some bargaining power to the working class vis-à-vis employers, by conferring security of livelihood even in midst of a vast pool of unemployed workers.

    The reason typically put forward as to why supposedly rigid labour regulations result in stymied employment growth, is succinctly captured by the following observation: "In face of adverse shocks employers have to reduce the workers' strength; but they are not able to do so owing to the existence of stringent job security provisions. On the other hand, when the going is good and the economic circumstances are favourable, the firms may want to hire new workers. But they would hire only when they would be able to dispense with workers as and when they need to. Thus, separation benefits accruing to workers become potential hiring costs for the employers. This affects the ability and the willingness of firms to create jobs" (Shyam Sundar, 2005). This piece of legislation is also identified to be the main reason for India's inability to build a proper manufacturing base.

    However, there is neither proper theoretical backing nor any empirical evidence to suggest that the slow employment growth in Indian manufacturing is primarily due to the labour laws. The two most quoted empirical studies in favour of undertaking labour reforms are Fallon and Lucas (1993) and Besley and Burgess (2004). The first study has been criticized thoroughly on grounds that the results are not statistically sound (Bhalotra, 1998). With regards to the second study Bhattacharjea (2006 and 2009) noted that the labour regulation index constructed by Besley and Burgess suffers from a number of shortcomings. Besley and Burgess classified the states of India (pro-worker, pro-employer and neutral) according to their constructed regulatory index and it is precisely here that the shortcoming of their index comes out most starkly. Among various shortcomings in the construction of the index, one important aspect is to neglect the implementation of law. For example, according to their index Kerala is designated as a pro-employer state whereas Gujarat and Maharashtra are demarcated as pro-worker states. This is so even though a World Bank (2003) study [quoted in Anant et. al. (2006) p.256] reports that small and medium enterprises in Kerala receive twice as many factory inspections per year as in Gujarat and Maharashtra.

    Such anomalies arise because Besley and Burgess, by putting excessive emphasis on legal statutes, missed out on important counts like implementation of the law and larger macroeconomic issues during their sample period (1958-92). For example, Anant et. al. (2006) noted that reading off directly from state amendments to measure rigidities could be exceedingly misleading because the effect of laws could only be fully realised into labour market outcomes through proper implementation. Implementation in turn depends upon a range of intermediate factors like enforcement environment, culture of governance and compliance, among others. Limited consideration of these aspects can very easily deflect or nullify the presumed effect of the statutes – and hence impair accurate construction of the regulatory index. Now, Bhattacharjea pointed out that since the study profusely used this evidently flawed regulatory index in deriving its results, the outcome of the study is open to question. In fact, there is no study at the all India level conclusively showing manufacturing employment to be adversely affected by restrictions on hiring and firing (the content of Chapter VB).

    Alternatively, many micro-level studies document large scale employment adjustments in face of adverse demand shocks. For example, Breman (2004) provides evidence on thousands of workers having lost their jobs in the collapse of Ahmedabad's textile factories in 1980s and 1990s; specifically, restrictions on retrenchment did not stand in the way of adjusting the workforce when about 36000 workers lost their jobs due to closure of several mills in Ahmedabad during 1983 and 1984 (see Papola 1994). Similarly, Sharma and Sasikumar (1996) studying 233 manufacturing firms in the Ghaziabad and Noida industrial belt found that neither employment growth nor fixed capital investments of firms were constrained by labour laws. In fact, at the all India level Nagaraj (2004) noted that, "Between 1995-96 and 2001-02, 1.3 million employees (13 per cent of workforce) lost their jobs". Now, if restrictions on hire and fire really operated as a constraint, how is it that the firms could retrench such large sections of the workforce in such short period of time?

    On the other hand, there is evidence on systematic downsizing of the workforce through innovative means like the voluntary retirement schemes (VRS). Indian government constituted a dedicated fund to that end namely, National Renewal Fund (NRF) as part of its 1991 reform process "to provide funds [among others] …. for compensation of employees affected by restructuring or closure of industrial units both in the public and private sector" (Zagha, 1999). It is estimated that until July 1995 the dedicated fund enabled firms to retrench 78,000 labourers from the public sector and further aimed to reduce 2 million workers (ibid).

    On top of this there is evidence on firms already introducing reform in the labour market through the back door or, to use Nagaraj's term "reform by stealth". This is through the route of creating informal employment within the formal sector. Commentators have pointed out that employers enjoy enough de facto flexibility through the employment of contract workers in the organized manufacturing sector (Guha, 2009). This is easy to understand; Chapter VB of the IDA applies to only permanent workers of an establishment and not to workers employed through contractors (contractual workers). Thus, there is no prior permission needed to retrench contractual workers of an establishment. Let us see in figure2 what happened to this contractual workforce in the organized manufacturing sector.

    anamitrafig2

    Figure: 2

    Source: Annual Survey of Industries, various years

    It is clear that the contractual, contingent workers sharply increased in the last two decades, precisely coinciding with the period when India went ahead with liberalization policy. Thus, according to the 2010-11 data, one-third of the organized manufacturing sector workforce is out of the ambit of IDA requiring no prior permission for retrenchment. However, the share of contract workers in total workers is an underestimate of the proportion of workers not covered by Chapter VB – this is because even the regular workers employed in establishments employing less than 100 workers are out of the ambit of law. Thus, if we add the number of regular workers below the employment threshold to the contractual workforce then in 2010-11 the proportion of workers for whom no prior permission from the government was necessary for carrying out separation stood at almost 60 percent of the total workforce (Roychowdhury, 2014). Therefore, with such large proportion of workforce not covered by IDA it is difficult to argue that the organized manufacturing sector is crippled by stringent restrictions on hiring and firing.

    Conclusion

    The foregoing discussion shows that the recent labour law changes, while strengthening the hands of capital, would bring in its bogie uncertainty and insecurity in the lives of millions of workers. Also, they are not based on sound economic logic but are rather gifts to the corporate sector, which has reportedly spent huge sums of money on BJP's election campaign. It is payback time to the corporate sector and the BJP, it seems, is keeping its promise well.

    References
    Anant, T. C. A, R. Mohapatra, R. Nagaraj and S. K. Sasikumar (2006), 'Labour Markets in India: Issues and Perspectives', in J. Felipe and R. Hasan (eds), Labour Markets in Asia: Issues and Perspectives' (Basingstoke: Palgrave Macmillan).

    Besley, Timothy and Robin Burgess (2004), 'Can Labour Regulation Hinder Economic Performance? Evidence from India', The Quarterly Journal of Economics, Vol. 119, No 1, February: 91-134.

    Bhalotra, Sonia (1998), 'The Puzzle of Jobless Growth in Indian Manufacturing', Oxford Bulletin of Economics and Statistics, Vol. 60, No. 1: 5-32.

    Bhattacharjea, A. (2006), 'Labour Market Regulation and Industrial Performance in India: A Critical Review of the Empirical Evidence', The Indian Journal of Labour Economics, Vol. 42 No. 2: 211-232.

    – Bhattacharjea (2009), 'The Effects of Employment protection Legislation on Indian Manufacturing', Economic and Political Weekly, May 30: 55-62.

    Breman, J. (2004), The Making and Unmaking of an Industrial Working Class (New Delhi: Oxford University Press).

    Chandru, K (2014), 'Ad-hocism in the Decisions to Modify Labour Laws' Economic and Political Weekly, July26:15-18.

    Fallon, Peter R. and Robert E.B. Lucas (1993), 'Job Security Regulations and the Dynamic demand for Labor in India and Zimbabwe', Journal of Development Economics, Vol. 40: 241-275.

    Guha Atulan (2009), 'Labour Market Flexibility: An Empirical Inquiry into Neoliberal Propositions', Economic and Political Weekly, May 9: 45-52.

    Kapoor, Radhika (2014), 'Creating 'Good Jobs' : Assessing the Labour Market Regulation Debate', Economic and Political Weekly, November 15: 16-18.

    Nagaraj, R (2004), 'Fall in Organised Manufacturing Employment: A Brief Note', Economic and Political Weekly, July 24: 3387-3390.

    Papola, T. S. (1994), 'Structural Adjustment, Labour Market, Flexibility and Employment', Indian Journal of Labour Economics, Vol. 37, No.1: 3-16.

    Roychowdhury, Anamitra (2005), "On Some Problems in the Estimation of Growth Rate of Output in India: An Analysis with reference to the period 1980-81 to 2002-03", M. Phil thesis, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.
    – Roychowdhury (2014): "Recent Changes in Labour laws: An Exploratory Note", <>emEconomic &Political Weekly, October 2014.

    Sharma, Alakh N. and S. K. Sasikumar (1996), 'Structural Adjustment and Labour', V.V. Giri National Labour Institute, NOIDA (mimeo).

    Sundar, K. R. Shyam (2005), 'Labour Flexibility Debate in India: A Comprehensive Review and Some Suggestions', Economic and Political Weekly, May 28: 2274-2285.

    Zagha, Roberto (1999), 'Labour and India's Economic Reforms' in J D Sachs et.al. (eds), India in the Era of Economic Reforms (New Delhi: Oxford University Press).

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    यह जंग हैइस जंग में ताक़त लगाइए
    बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

    हाल की दो बड़ी घटनाएँ खासी बहस में रही हैं। आमिर खान की फिल्म पी के पर हर किसी को कुछ कहना है। हिंदी के एक वरिष्ठ कवि से लेकर सत्तासीन दल के साथ जुड़े संघ परिवार के उग्रवादी संगठनों के सदस्यों तक हर किसी ने कुछ कहना है। दूसरी घटना मुंबई में भारतीय विज्ञान महासभा के सम्मेलन में किसी कैप्टेन बोदास का अतीत में भारत में विमानों के उड़ने को लेकर परचा पढ़ा जाना थी। ये दो घटनाएँ अलग लगती हैंपर दोनों के साथ वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य का संबंध है और गहराई से सोचने पर दोनों इकट्ठी चरचा की माँग रखती हैं।

    पी के को लेकर बजरंग दल आदि कुछ संगठनों के शोर मचाने के बावजूद आम लोगों ने इसे खूब देखा। इसके राजनैतिक महत्व को समझते हुए बिहार और यू पी की सरकारों ने इस करमुक्त घोषित कर दिया। फिल्म के प्रति लोगों की भावनाएँ क्या हैंयह बॉक्स आफिस में हिट होना ही दिखला देता है। आज के जमाने में जब लाखों लोग मुफ्त में चुराई हुई फिल्म देखते हैंएक फिल्म का करोड़ों कमा लेना यह दिखलाता है कि लोगों को फिल्म की कहानी पसंद आई है। इससे यह जाहिर होता है कि लोग कर्मकांडों का जीवन जीते हैंपर कोई ज़रूरी नहीं कि रस्मों में उन्हें कोई गहरा विश्वास हो। रामायण,महाभारत और उपनिषदों की कहानियों में या बाइबिलहदीस के किस्सों में क्या सच है और क्या नहींइससे भी लोगों को कोई खास मतलब नहीं है। लोगों को ईश्वर सेवह कैसा भी होमतलब हैऔर उन्हें यह भी मालूम है कि ईश्वर की नज़र में हर कोई समान है। कथाएँ हैं और जीवंत हैं क्योंकि ईश्वर है।

    कैप्टन बोदास कौन हैं और अतीत में भारत में हवा में उड़ने वाले यंत्र थे या नहींइससे ज्यादातर आम लोगों को कुछ लेना देना नहीं है। ईश्वर की कल्पना के साथ विमान की कल्पना जुड़ी हैइसलिए बोदास की बात के सही ग़लत होने से लोगों को वैसे ही कोई फर्क नहीं पड़ता। ईश्वर की धारणा वैज्ञानिक है या नहींइससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। मामला पेंचीदा इसलिए हुआ कि बोदास ने आस्था के साथ जुड़ी इस बात को कि अतीत में विमान थेएक परचे के रूप में विज्ञान महासभा के सम्मेलन में पढ़ा। यह एक अद्भुत विड़ंबना है। पिछली सदी में और खास तौर पर हाल के दशकों में यह धारणा मजबूत होती गई है किसी भी बात के सही होने के लिए उसका वैज्ञानिक आधार होना ज़रूरी है। आस्था के प्रसंग में इसमें एक विरोधाभास हैपर आम लोग इस विरोधाभास को सहज ढंग से जीते हैं।

    आज़ादी के बाद देश में बड़े पैमाने पर आधुनिक तालीम फैलने लगी तो पुरानी व्यस्थाओं के साथ टक्कर लेते नए खयाल भी फैले। एक ओर तो समूची दुनिया में विज्ञान और आस्था के बीच लकीर साफ होती जा रही थीवहीं हमारे यहाँ आस्था के नाम पर बाज़ार और राजनीति का खेल बढ़ता जा रहा था। ऐसे में देश के संविधान में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार का जिक्र होना और तरक्कीपसंद सोच के साथ उसे जोड़ना उन निहित-स्वार्थों के खिलाफ जाता हैजो आस्था के बाज़ार और राजनीति का फायदा उठाते हैं। ऐसी स्थिति में उभरती जटिल सामाजिक परिस्थितियों को समझाने के लिए अस्सी-नब्बे के दशकों में कुछेक उत्तरआधुनिक चिंतकों ने आस्था के सवाल को अकादमिक रूप से उठाया। बहस यह थी कि आधुनिक दृष्टि से आस्था के सवाल को समझा नहीं जा सकता। यह भी कि तर्कशील नज़रिया आस्था को समझने में पूरी तरह नाकाबिल है। भारत की जनता तो आस्था में जीती हैइसलिए हमें तर्क से अलग हटकर अपने समाज को समझने की ज़रूरत है। वह नई समझ कैसी होगी यह तो साफ नहीं हो रहा थापर विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना की सीमाओं को बखानते हुए इन चिंतकों ने तर्कशीलता की जम कर पिटाई की। दूसरी ओर ऐसी कोशिशें भी चल रही थीं कि आस्था पर आधारित रस्मों का वैज्ञानिक आधार है। आम लोग इस विरोधाभास को कैसे लेते हैंपीके फिल्म यह बात साफ दिखलाती है। लोगों में यह समझ भरपूर है कि आस्था का बाज़ार उनको लूटता जा रहा है। जो लोग आस्था के नाम पर राजनीति करते हैंउनसे मुठभेड़ करने में कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए।

    आखिर विज्ञान क्या हैसंक्षेप में कहा जाए तो यह हमें ऐसी मान्यताओं तक ले जाता हैजिन्हें तर्क और प्रयोगों के आधार पर सत्यापित किया जा सके। इस तरह विज्ञान ज्ञान पाने के दूसरे सभी तरीकों से अलग और अनोखा तरीका है। आखिर इसमें ऐसी क्या विशेषताएँ हैं कि इसे अनोखा माना जाएविज्ञान के हर पक्ष का कोई सरलीकृत विवरण नहीं दिया जा सकता। हम जानते हैं कि विज्ञान की नींव प्रत्यक्ष प्रमाणों पर आधारित है। प्रयोग दुहराने पर बार-बार एक जैसे अवलोकनों को प्रत्यक्ष देख पाने की,मापने में राशियों पर नियंत्रण यानी कौन सी राशि नियत हो और कौन सी घट-बढ़ रही होइसको नियंत्रण करने कीऔर सैद्धांतिक प्रस्तावनाओं को ग़लत साबित कर पाने की स्थितियों की कल्पना की माँग विज्ञान में ज़रूरी होती है। कुल मिला कर विज्ञान ज्ञान और सत्य के निकट तक पहुँचने का तक पहुँचने का सर्वांगीण तरीका है,जिसके लिए शुरूआती चरणों में सरल तरीके अपनाए जाते हैंपर सरलीकरण की साफ समझ होना ज़रूरी है। अवलोकन और मापन में अनिश्चितताओं को अधिकतम निश्चितता के साथ दर्ज़ करने की जैसी माँग विज्ञान में हैऐसी और कहीं नहीं है।

    अक्सर विज्ञान और तक्नोलोजी का विकास समांतर में हुआ हैहालाँकि यह कतई ज़रूरी नहीं कि ऐसा समांतर विकास हो और न ही हमेशा ऐसा होता है। उन्नीसवीं सदी तक यूरोप और भारत में तक्नोलोजी में विकास का ऐसा बड़ा अंतर हो चुका था कि नई तक्नोलोजी के साथ आ रहे विज्ञान की उपमहाद्वीप में कोई जड़ें पहले से मौजूद नहीं थीं। यूरोप में उच्च शिक्षा संस्थाओं में बड़ी प्रयोगशालाएँ आम हो गई थीं। उपमहाद्वीप में ऐसा कुछ भी नहीं था। आधुनिक विज्ञान में सिद्धातों और प्रयोगों को साथ-साथ देखा जाना जाता हैयह यूरोप में हो चुका था। भारत में ये दो अलग बातें थीं। हाथों से काम करना निचली जातियों के लिए था। यहाँ तक कि चिकित्सा-शास्त्रों में ऊँचाइयों तक पहुँचने के बावजूद उस पर आध्यात्मिकता का लबादा ओढ़ा गया और शरीरखास तौर पर मृतकों पर काम करने वाले शोधकों को अस्पृश्य माना गया। इसलिए आज के विज्ञान के नज़रिए से जो तरक्की हमारे यहाँ हुई थीवह खंडितऔर अक्सर वाचिक परंपरा में सीमित रही। अगर बाहरी प्रभाव न होता तो उपनिवेश काल में भारत में विज्ञान का जैसा विकास हुआउससे बेहतर कुछ होने की संभावना नहीं थी। मीमांसा के आधुनिक तरीकों के साथ समझौता करते और उसे अपनाते हुए जो विकास पिछली दो सदियों में हुआवह सीखने का ऐसा ढाँचा थाजिसमें अधिकतर लोगों को मौका नहीं दिया गया। अतीत में समाज में जो मान्यताएँ प्रचलित थींउन पर अधकचरी समझ ज्यादातर लोगों में बनी रही। पर वह वैज्ञानिक समझ नहीं कहला सकती।

    बोदास ने जो बातें अपने परचे में कहींउनका खंडन चालीस साल पहले किया जा चुका था। वह कोई हवाई खंडन नहीं थाबाकायदा गहन अध्ययन के बाद एरोस्पेस(उड्डयनइंजीनियरिंग के वैज्ञानिक प्रोमुकुंद और उनके चार सहयोगियों ने प्रतिष्ठित पत्रिका में परचा लिख कर यह साबित किया था कि जिन सूत्रों का हवाला बोदास ने दिया हैवह कपोल कल्पना हैं। तो बोदास ने कैसे यह परचा पढ़ाक्या विज्ञान महासभा किसी को भी कुछ पढ़ने की अनुमति दे सकती हैयह सामाजिक हिंसा के समांतर चलती बौद्धिक गुंडागर्दी है। बौद्धिक दुनिया में धौंस जमाए बिना बाज़ार और राजनीति कमज़ोर पड़ जाती है। इसलिए समाज को अंधकूप में डालकर फायदा उठाने वाले बौद्धिक गुंडागर्दी करते हैं। चिंता की बात यह है कि आम बुद्धिजीवी इतना असहाय हो गया है कि या तो वह इस गुंडागर्दी को चुपचाप सह रहा है या इसका साथ देते हुए अपना फायदा निकालने के फेर में पड़ा है। ऐसा बुद्धिजीवी जितना भी विज्ञान पढ़ा हो,महज समझौतापरस्त ही नहींरुढ़िवादी ही कहलाएगा। बदकिस्मती से हमारे देश के अधिकतर वैज्ञानिक इसी श्रेणी में आते हैं। समाज के बारे में औसत वैज्ञानिक की जागरुकता कितनी हैवह इसी बात से जाहिर हो जाती है कि अधिकतर तो अपनी भाषाओं में विज्ञान पर बात ही नहीं कर सकते। वैसे इसका कारण यह भी है कि तमाम परचेबाजी के बावजूद उनमें विज्ञान की समझ कमज़ोर है।

    स्टीवेन पिंकर ने कहा है कि पिछली सदियों के मुकाबले में समाज में हिंसा आम तौर पर कम हुई है। जिस तरह हर रोज हिंसा की खबरें आती हैंऐसा लगता है कि पिंकर की यह धारणा सहीं नहीं होगी। पर सचमुच अगर इंसान ने कोई तरक्की की है तो वह हिंसा को नकारने की प्रवृत्ति का बढ़ना ही है। इंसान की जैविक बनावट ऐसी है कि हिंसा और प्रेम दोनों भावनाएँ उसमें प्रबल हो सकती हैं। असहायता और असुरक्षा से हिंसा पनपती है। राजनैतिक ताकतें इस बात का फायदा उठाती हैं कभी यह आज़ादी या बराबरी के लिए संघर्ष में तो कभी सांप्रदायिक हिंसा में दिखता है। हमारे यहाँ पिछली सदी में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा का माहौल घटता-बढ़ता रहा है। अस्सी के दशक से लगातार सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काकरलोगों में असुरक्षा का अहसास पैदा करएक हिंसक गुंडा समाज बनाने की कोशिशें चलती रही हैं। आज उत्तर भारत में यह गुंडागर्दी की प्रवृत्ति व्यापक है। जिन चिंतकों ने आस्था का सवाल उठाते हुए इस बढ़ते ध्रुवीकरण को समझने-समझाने की कोशिश की थीपीके फिल्म और इसके प्रति आम लोगों का खिंचाव उन्हें खारिज करते हैं। यह अकारण नहीं है कि इससे सांप्रदायिक ताकतों और आस्था का बाज़ार चलाने वालों को काफी परेशानी हुई है और उन्होंने इस फिल्म को बैन करने की माँग उठाई है।

    तर्कशील होना किसी की आस्था का अपमान नहीं है। जब तक कोई किसी को अपनी हरकतों से चोट नहीं पहुँचा रहा होवह अपनी मर्ज़ी से तर्कशील या आस्थावान हो सकता है। यह बात उनको मालूम हैजिन्होंने आस्था का सवाल उठाकर आधुनिकता के उस केंद्र को भी खारिज कर दिया थाजिसने हमें न केवल कुदरत के बारे में बेहतर समझ दी हैबल्कि इंसान की सही ग़लत कारवाइयों पर सवाल खड़ा करने की ताकत भी दी है।

    आस्था के सवाल का हौव्वा खड़ा करने वाले सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ मुखर रहेआज भी हैंपर वे समय-समय पर डाँवाडोल सी बातें करते रहते हैं। विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पर ऊल-जलूल हमला करने वाले खुद किसी निरपेक्ष धरातल से नहीं आतेवे सभी भयंकर गैरबराबरी पर आधारित हमारे समाज के सुविधा-संपन्न वर्गों से आते हैं। इसलिए आस्था के सवाल के उनके शोर को निःशंक होकर नहीं लिया जा सकता। पीके हमें यही बात बतलाती है। चालीस साल पहले प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों द्वारा खारिज किए जा चुके बकवास पर विज्ञान महासभा में बोदास का परचा पढ़ सकना हमें बतलाता है कि आम लोगों को बेवकूफ बनाकर हिंसक गुंडा समाज बनाने की प्रक्रियाएँ उरूज पर हैं। ऐसे में प्रसिद्ध लोकप्रिय संगीत मंडली 'इंडियन ओशनके गीत की यह पंक्ति ही दुहरा सकते हैं कि 'बस कीजिए आस्मान में नारे उछालनायह जंग है इस जंग में ताक़त लगाइए।'

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    • कॉरपोरेट एजेंडा के खिलाफ जो बोले वो हिंदू राष्ट्र का घनघोर राष्ट्रद्रोही!!!

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 18:06:45 +0000
      बीस ट्रिलियन डालर के हाई बुलेटस्पीड ख्वाब और थकान….! दुकान मिली, केतली मिली, पर चाय नहीं….! चुल्हा ठंडा और चूल्हे वाली गयी घास लेने बल…..ग्राउंड जीरो से अर्थव्यवस्था का हाल हकीकत...

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    • जब हम जवाँ होने वाले थे-

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 17:47:35 +0000
      जब हम जवाँ होने वाले थे- 1- नैनीताल के साधारण रेस्तराओं में 3५ रु। महीने पर पेट भर भोजन उपलब्ध था। 2. तल्लीताल से मल्लीताल तक रिक्शे का भाड़ा 2५ पैसा था। 3. महिलाओं की एक सामान्य साड़ी का मूल्य 1५रु।...

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    • पेरिस, पेशावर और बोको हरम, धर्म, राजनीति और हिंसा

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 16:53:52 +0000
      क्या हम इस्लाम-मुसलमानों और आतंकी घटनाओं के बीच संबंध को कम करके बताना चाहते हैं? क्या हम मुसलमानों द्वारा की जा रही हिंसा को नकारना चाहते हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि कुरान की शिक्षाओं के बावजूद,...

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    • सेंसर बोर्ड विवाद के पीछे भाजपा- सिख ग्रुप का आरोप

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 16:13:39 +0000
      डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की फिल्म 'मैसेंजर ऑफ गॉड'को सेंसर सर्टिफिकेट मिलने के विवाद में सिख समूह दल खालसा ने आरोप लगाया है कि सेंसर बोर्ड विवाद की असफलता के पीछे भाजपा...

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    • केजरीवाल पर माकन का वार- अपने झूठे वादों से लोगों को गुमराह करते हैं केजरीवाल

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 15:56:42 +0000
      जिस की राजनीति झूठ और झूठे वादों पर टिकी है वह भ्रष्टाचार से कैसे लड़ सकता है-माकन नई दिल्ली। कांग्रेस महासचिव और दिल्ली में कांग्रेस का नया चेहरा अजय माकन ने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल...

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    • खामख्वाह बगावत कर रहे सेंसर बोर्ड सदस्य- अरुण जेटली

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 15:07:19 +0000
      नई दिल्ली। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की फिल्म 'मैसेंजर ऑफ गॉड'को सेंसर सर्टिफिकेट मिलने के विवाद में इस्तीफों की झड़ी पर मोदी सरकार और सेंसर बोर्ड के बीच विवाद और गहरा गया...

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    • सेंसरबोर्ड का संकट और मोदी सरकार

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 14:14:06 +0000
        सेंसरबोर्ड के नौ सदस्यों ने कल सूचना और प्रसारण मंत्रालय के पास अपना इस्तीफ़ा भेज दिया, इसके पहले सेंसरबोर्ड की अध्यक्षा लीला सेम्सन इस्तीफ़ा दे चुकी हैं। मीडिया और भाजपा ने तुरंत ही इन इस्तीफ़ों...

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    • 'धर्मान्तरण की राजनीति'

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 13:46:15 +0000
      नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच द्वारा आयोजित व्याख्यान 'धर्मान्तरण की राजनीति'मुख्य वक्ता: प्रसिद्ध राजनीतिक चिन्तक विलास सोनवने अध्यक्षता: प्रो. आनंद प्रकाश आप सादर आमंत्रित हैं. 18 जनवरी...

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    • ओबामा ने यूरोप को मुस्लिम समुदाय को जोड़ने की बताई जरूरत (देखें वीडियो)

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 09:57:35 +0000
      अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यूरोप को अमेरिका से प्रेरणा लेकर समाज की मुख्यधारा में बेहतर तरीके से मुस्लिम समुदाय को जोड़ने पर ध्यान केंद्रित करने पर जोर दिया है क्योंकि समुदाय के ज्यादातर लोग...

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    • Sham of Lowering Petrol & Diesel Prices

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 09:39:04 +0000
      New Delhi. The Communist Party of India (Marxist)-  CPI(M) has strongly condemned the excise duty hikes on petrol and diesel. Party demanded that the full benefit of the fall in global crude price be...

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    • एक मीडिया हाउस क साथ मिलकर TMC को बदनाम कर रही भाजपा- ममता का आरोप

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 09:10:52 +0000
      पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी का नाम लिए बिना आरोप  लगाया है कि एक राष्ट्रीय दल बंगाल के एक मीडिया हाउस के साथ मिलकर राज्य की राजनीतिक...

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    • शाजिया इल्मी को नेक सलाह-बेशर्मी का लबादा ओड़े रखो, कहीं भी बाल बाँका नहीं होगा।

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 08:50:22 +0000
      शाजिया इल्मी को दो नेक सलाहें. """"""""""""""""""""'ना शाजिया ..ना ! ना...

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    • कथित रूप से ISIS में शामिल होने जा रहा इंजीनियर गिरफ्तार

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 07:37:06 +0000
      हैदराबाद पुलिस ने अमेरिका से लौटे एक इंजीनियरिंग स्नातक को आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) में शामिल होने के लिए दुबई जाते वक्त गिरफ्तार करने का दावा किया है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले बेंगलुरु में...

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    • राजनीतिक उद्देश्यों के लिए आस्था का इस्तेमाल "आग के साथ खेल"

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 07:13:23 +0000
      एक शीर्ष अमेरिकी राजनयिक ने म्यांमार में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता पर चेताते हुए कहा है कि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए एक चुनावी साल में आस्था का इस्तेमाल "आग के साथ खेल"है। A top American...

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    • Obama: Europe needs to better integrate Muslim communities

      Posted:Sat, 17 Jan 2015 06:29:38 +0000
      US President Barack Obama says the threat of violent extremism has 'metastasized', but insists he does 'not consider it an existential threat'.  (Afp News)

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    • पहली नैतिक जीत तो आप ने दर्ज करा ही दी!

      Posted:Fri, 16 Jan 2015 21:23:40 +0000
      नई दिल्ली। आखिरकार पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी की सियासी दौड़ खत्म हो ही गई, उन्हें अपनी मंजिल मिल गई है। हालांकि उनके आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल होने पर एक बार फिर इन चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया...

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    अच्छे दिन रिलायंस के

    डीजल विनियंत्रित और सब्सिडी रफूचक्कर तो खुल रहे हैं बंद पंप

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


    जैसे अडानी ने मोदी के चुनाव अभियान के पुष्पक रथ का इंतजाम करके भारत के सारे बंदरहगाह अपने नाम लिखा लिये हैं और बेदखली की बारी है।वैसे ही अच्छे दिन बहुरे हैं रिलायंस के जिननके मालिक मुकेस अंबानी और उनके बाई ने सबसे पहले वायब्रेंट गुजरात के मौके से अमेरिका के खारिज करने से पहले मनमोहन को खारिज करके नरेंद्र भाई मोदी की ताजपोशी की शुरुआत की थी।रिलायंस नें गुजरात के अबकी दफा वायब्रेंट महफिल में डेढ़ करोड़ के निवेस का एलान किया है।डालरों की बरसात होने लगी है।तो भागवत भारत सरकार को इजराइल की राह चलने का सबक पढ़ा रहे हैं।शत प्रतिशत हिंदुत्व के एजंडे का अनुमोदन करते हुए शाही राजकाज की शपथ लेकर भ्रष्टाचार विरोधी किरण बेदी दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं।

    कैश सब्सिडी से जो बांसो उछल रहे हैं कि खाते में आ गयी रे नकदी,उनकी जानकारी के लिए सब्सिडी की वजह से जो रिलायंस समूहे के पेट्टोल पंप देश भर में बंद पड़े पड़े जंग खाने लगे थे वे वैश्विक बाजारों में तल की कीमतें घटने के बहना अपने सारे पंप खोल रहे हैं।बीस फीसद खुल भी गये हैं।डीजल कीमतों को नियंत्रणमुक्त किए जाने से उत्साहित रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने बंद पेट्रोल पंपों को फिर खोलना शुरू कर दिया है। कंपनी ने अपने 1,400 बंद पेट्रोल पंपों में से 20 प्रतिशत शुरू कर दिए है, शेष को भी वह एक साल के भीतर चालू करेगी। इसी के मध्य उच्चतम न्यायालय ने मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की अंतिम रिपोर्ट पर जवाब देने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है। कैग ने कृष्णा गोदावरी बेसिन में डी 6 कुओं की खुदाई के लिए कॉन्ट्रैक्टरों को किए गए भुगतान में अनियमितताएं पाई हैं। शीर्ष अदालत ने इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख 20 मार्च तय की है। इस दौरान न्यायालय कैग की रिपोर्ट पर रिलायंस के जवाब की समीक्षा करेगा। कैग ने अपनी रिपोर्ट में रिलायंस इंडस्ट्रीज को कुओं की खुदाई व केजी-डी 6 में कॉन्ट्रैक्टरों को किए गए भुगतान के 35.71 करोड़ डॉलर यानी लगभग 2,179 करोड़ रुपये के अनियमितताें पायी हैं।

    पेट्रोल पंप नये सिरे से रिलायंस तब खोल रहा है जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) का संचयी शुद्घ मुनाफा चालू वित्त वर्ष की दिसंबर तिमाही में 4.5 फीसदी घटकर 5256 करोड़ रुपये रहा। पिछली तिमाही में कंपनी को 5,502 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था। एकल आधार पर कंपनी का शुद्घ मुनाफा 7.72 फीसदी घटकर 5085 करोड़ रुपये रहा। कंपनी के मुनाफे में तिमाही और सालाना दोनों आधार पर गिरावट आई है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुख्य वित्त अधिकारी आलोक अग्रवाल ने कहा, 'यह कठिन तिमाही रही। जिंस कारोबार में इस तरह का उतार-चढ़ाव काफी चुनौतीपूर्ण होता है और मार्जिन पर दबाव बनता है। बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है लेकिन हमारा रुख सतर्कता के साथ आशावादी है।' तेल कीमतों में सालाना आधार पर 40 फीसदी की गिरावट से कंपनी की आय पर व्यापक असर पड़ा है।

    मोदी के एकल चुनाव प्रचार में सात सौ करोड़ खपाने की खबर आयी है,तो खर्च जाहिर है कई गुणा ज्यादा है क्योंकि मोदी निरंतर प्रचार अभियान पर है और पूरा भारत जीते बिना उनका प्रचार खत्म नहीं होने जा रहा है।जूत लेंगे तो हिंदुत्व का राजकाज कायम रखने के लिए फिर होगा लगातार प्रचार।

    कारपोरेट वकील जेटली ने कह ही दिया है निवेशकों से कि सारे फैसले बजट में गहो कोी जरुरी नहीं है।धूम धड़ाके से रेलवे में सुधार की बात हो रही है।बैंकों को होल्डिंग कंपनियां बनाने की बात हो रही है।कोल इंडिया के विभाजन और विनिवेश की तैयारी है और दावा भी किया जा रहा है कि निजीकरण नहीं होगा। रेलवे का निर्माण में शत प्रतिशत एफडीआई है।

    इंपास्ट्राक्चर में रिलायंस इंफ्रा का हिस्सा कितना होगा क्योकि अर्थव्यवस्था फिर बीस ट्रिलियन डालर की होनी है और डालरों के बेताज बादशाह बिना शक दरअसल मुकेश अंबानी हैं जो कल्कि अइवतारके राजसूययज्ञ में मुख्य पुरोहित हैं।गौरतलब है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने आगामी एक से डेढ़ साल में अपने विभिन्न प्रकार के कारोबार में एक लाख करोड़ रुपये के नए निवेश की रविवार को घोषणा की। उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया में सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। रिलायंस अपने इस निवेश से पेट्रोरसायन कारोबार की उत्पादन क्षमता का विस्तार करने के साथ-साथ चिर प्रतीक्षित 4-जी ब्राडबैंड नेटवर्क सेवा शुरू करेगा और सरकार के 'मेक इन इडिया' और 'डिजिटल इंडिया पहल' में योगदान करेगा।


    गौरतलब है कि डीजल कीमतों को नियंत्रणमुक्त किए जाने से उत्साहित रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने बंद पेट्रोल पंपों को फिर खोलना शुरू कर दिया है। कंपनी ने अपने 1,400  बंद पेट्रोल पंपों में से 20  प्रतिशत शुरू कर दिए है,  शेष को भी वह एक साल के भीतर चालू करेगी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा भारी सब्सिडी वाला ईंधन बेचे जाने की वजह से निजी क्षेत्र की कंपनी को अपने ईंधन स्टेशनों को बंद करना पड़ा था।


    देश में निजी क्षेत्र की रिफाइनरी कंपनियों में रिलायंस इंडस्ट्रीज के अलावा एस्सार आयल लि शामिल है। 2006  तक इन कंपनियों ने डीजल के 17  प्रतिशत व पेट्रोल के 10 प्रतिशत घरेलू खुदरा बाजार पर कब्जा कर लिया था। लेकिन इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा भारी सब्सिडी वाला ईंधन बेचे जाने की वजह से निजी क्षेत्र की कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।


    रिलायंस इंडस्ट्रीज ने तीसरी तिमाही के नतीजों के बाद निवेशक प्रस्तुतीकरण में कहा,  230  पेट्रोल पंप पहले ही खोले जा चुके हैं। हमारी योजना एक साल में पूरे नेटवर्क को चालू करने की है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने मार्च,  2008  के आसपास भारी नुकसान की वजह से अपने 1,432  पेट्रोल पंप बंद कर दिए थे। सरकार ने जून,  2010  में पेट्रोल कीमतों को नियंत्रणमुक्त किया था। उसके बाद एस्सार खुदरा क्षेत्र में फिर उतर गई थी। वह अपने 1,400  आउटलेट्स से मुख्य रूप से पेट्रोल की बिक्री कर रही है। देश में सबसे ज्यादा खपत वाले ईंधन डीजल को पिछले साल नियंत्रणमुक्त किया गया था। उसके बाद से निजी क्षेत्र की कंपनियां एक बार फिर खुदरा बाजार में उतरने लगी हैं।



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    सैफई का समाजवाद

    सुनील कुमार

    सैफई महोत्सव की शुरूआत 1997 में स्व. रणवीर सिंह यादव ने किया था। 2002 में उनकी मृत्यु के पश्चात् उनको याद करते हुए हर वर्ष 26 दिसम्बर से 8 जनवरी तक सैफई महोत्सव का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन पिछले साल सुर्खियों में रहा जब उ.प्र. में दंगे प्रभावित लोग ठंड में मर रहे थे और सैफई का आयोजन चल रहा था। इस साल यह राष्ट्रीय मीडिया में मुख्य खबर नहीं बन पाई। यह महोत्सव सरकारी आयोजन नहीं माना जाता है लेकिन इस आयोजन में जिस तरह से 14 दिन पूरा शासन-प्रशासन लगा रहता है उससे तो यही लगता है कि यह सरकारी आयोजन ही है।2013-14 के आयोजन में मीडिया में 300 करोड़ रू. खर्च होने की बात बताई गई थी जबकि मुख्यमंत्री ने 1 करोड़ रु. खर्च होने की बात कही थी। सैफई में उ.प्र. के मुख्यमंत्री सहित दर्जनों मंत्री डेरा जमाये रहते हैं। प्रदेश में ठंड से सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं। इटावा जनपद में जिस दिन सैफई आयोजन की शुरूआत हुई उसी दिन इसी जनपद के महेन्द्र कुमार की ठंड लगने से मौत हो गई। महेन्द्र खेत में पानी लगाने गए थे जहां पर वह ठंड की चपेट में आ गये। अपने को मजदूर-किसानों की हितैषी कहने वाली सपा सरकारजिनकी पार्टी का नाम समाजवाद पार्टी है और लाल-हरा रंग के झंडा उठाई हुई सत्ता में काबिज हैंउनको इस मौत से कुछ लेना देना नहीं रहा। सैफई महोत्सव को सफल बनाने के लिए जया बच्चन व आजम खां बालीवुड के कलाकारों को सैफई भेजने में दिन-रात लगे हुए थे।

    सैफई महोत्सव के उद्घाटन में मुलायम सिंह यादव ने कहा: ''आयोजन से ग्रामीण क्षेत्रों की सभ्यतासंस्कृति बढ़ती है। लोक कला व संस्कृति के प्रोत्साहन के लिये ही सैफई महोत्सव किया जाता है। बड़े कलाकार मुंबई व लखनऊ के लोगों को ही देखने को मिलते हैं। सैफई महोत्सव में किसान-मजदूर व ग्रामीण छात्र-छात्राओं को भी बड़े कलाकारों को देखने का मौका मिलता है। सैफई के नाच-गाने की आलोचना की जाती है। क्या ग्रामीण क्षेत्रों के किसान-मजदूर नाच-गाना नहीं देख सकते हैंमहोत्सव में लोक गीतों के माध्यम से लोगों में मेल-मिलाप बढ़ेगा।'' मुलायम सिंह ने उपस्थित छात्रों से अपील की कि वे ''शिक्षा पर ध्यान दें और आगे चलकर जया बच्चन जैसा अपना नाम देश में रोशन करें।''

    मुलायम सिंह जीयह बात सही है कि मनोरंजन करने का अधिकार ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का उतना ही है जितना शहरी क्षेत्र के लोगों का। लोक गीतों की जगह बालीवुड,हालीवुड के गानों का बोल बाला है। सैफई महोत्सव में मोनिका बेदीमल्लिका सेरावत से लेकर चारू लता तक के शो होते हैं। इसमें 'मुन्नी बदनाम हुईसे लेकर 'तेरी चिकनी कमर पर मेरा दिल फिसल गयाजैसे गाने गाये जाते हैं। यह किस लोकगीत के अन्दर आता हैइससे आप युवाओं में किस तरह की संस्कृति को पैदा कर रहे हैंआप के महोत्सव में अन्तिम दिन बालीवुड नाइट मानाया जाता है जिसमें मुम्बई से दर्जनों अभिनेताअभिनेत्री बुलाये जाते हैं। इनको देखने के लिए भीड़ इतना बेकाबू हो जाती है कि पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ता है। सैफई में चार्टड प्लेनों का तांता लगा रहता है। इन 14 दिनों में लगता है कि उ.प्र. सरकार सैफई से ही चल रही है। जिस जया बच्चन का उदाहरण आप छात्रों के सामने दे रहे हैं वैसे ही लोग बालीवुड को बढ़वा दे रहे हैं । इससे लोकगीतों या लोककला को प्रोत्साहन कैसे मिलेगाक्या आपके पास भगत सिंहचन्द्रशेख आजादरामप्रसाद विस्मिल के उदहारण नहीं मिलेआप जयप्रकश,लोहिया के विचारधारा को मानने वाले हैं! क्या उनका उदाहरण आप छात्रों को नहीं दे सकते थेआप जया बच्चन का उदाहरण इसलिए दिये ताकि आप उसी बालीवुड की पश्चिमी संस्कृति को अपना चुके हैं। यही कारण है कि आप अपने जन्म दिन पर ब्रिटेन से मंगाई हुई बग्घी पर बैठेते हैं, 75 फीट और 400 किलो वजन का केक काटते हैं। क्या यही विचारधारा जयप्रकाश और लोहिया की थीउ.प्र. में सबसे योग्य आपका ही परिवार है जिससे 5 सांसदमुख्यमंत्री और मंत्री हैंयह तो अधिकार प्रदेश की जनता को भी है लेकिन उ.प्र. की राजनीति पर तो अपके परिवार का पैतृक अधिकार बन गया है जिसके कारण भाईभतीजाबहुनाती-पोते ही लोकसभाविधानसभा में आ रहे हैं।

    डी एमएस पी सहित तामम अधिकारी व हजारों संख्या में पुलिस बल की तैनाती सैफई में रहती है और प्रदेश की सुरक्षा....! इटावा सैफई का जिला हेडक्वार्टर है। वहां पर दो रिपोर्टरजो कि सैफई महोत्सव कवरेज करने गये थेउनको चाणक्य होटल के पास मारपीट कर लूट लिया जाता है तो बाकी जगहों की बात ही छोड़ दीजिये। सैफई में पुलिस हथियारों की प्रदर्शनी लगाई गई थीजिसको देख मुख्यमंत्री ने सराहना की और निर्देशित किया कि इस तरह की प्रदर्शनी भविष्य में और जगहों पर लगाया जाये। मुख्यमंत्री ने पुलिस को आधुनिक बनाने के लिए किसी भी संसाधन की कमी नहीं आने का आश्वासन भी दिया। मुख्यमंत्री जीपुलिस को आधुनिक बनाना अच्छी बात है। लेकिन यह आधुनिकीकरण किसके लिये किया जायेगाक्या पुलिस आधुनिक होकर और तेजी के साथ अपराधियों का साथ देगी और महिलाओं के साथ बलात्कार करेगीअच्छा होता कि आप हथियार प्रर्दशनी की जगह पुलिस को मानवीय दृष्टकोण से काम करने के लिए कैम्प लगाते जिसमें वे अपने कर्तव्य का पालन करना सीखते। 

    जैकलीन को मिनट के परफार्मेंस देने के लिए 75 लाख रु. देने के बजाय सड़कों पर अलाव जलातेरैन बसेरा बनाते तो कुछ लोगों की जिन्दगी ठंड से बचायी जा सकती थी। पुलिसअधिकारीमंत्री जिस तेजी से ड्युटी बजा रहे थे अगर वे इतनी तत्परता अपने कामों में दिखलाते तो लोगों की समस्याएं कुछ कम होतीअपराध कम होते। लेकिन आप का उ.प्र. बालिवुड का प्रदेश और आपका समाजवाद आपके वंशवाद के लिए मौजवाद बन चुका है।

     

    सुनील कुमार

    सैफई महोत्सव की शुरूआत 1997 में स्व. रणवीर सिंह यादव ने किया था। 2002 में उनकी मृत्यु के पश्चात् उनको याद करते हुए हर वर्ष 26 दिसम्बर से 8 जनवरी तक सैफई महोत्सव का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन पिछले साल सुर्खियों में रहा जब उ.प्र. में दंगे प्रभावित लोग ठंड में मर रहे थे और सैफई का आयोजन चल रहा था। इस साल यह राष्ट्रीय मीडिया में मुख्य खबर नहीं बन पाई। यह महोत्सव सरकारी आयोजन नहीं माना जाता है लेकिन इस आयोजन में जिस तरह से 14 दिन पूरा शासन-प्रशासन लगा रहता है उससे तो यही लगता है कि यह सरकारी आयोजन ही है।2013-14 के आयोजन में मीडिया में 300 करोड़ रू. खर्च होने की बात बताई गई थी जबकि मुख्यमंत्री ने 1 करोड़ रु. खर्च होने की बात कही थी। सैफई में उ.प्र. के मुख्यमंत्री सहित दर्जनों मंत्री डेरा जमाये रहते हैं। प्रदेश में ठंड से सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं। इटावा जनपद में जिस दिन सैफई आयोजन की शुरूआत हुई उसी दिन इसी जनपद के महेन्द्र कुमार की ठंड लगने से मौत हो गई। महेन्द्र खेत में पानी लगाने गए थे जहां पर वह ठंड की चपेट में आ गये। अपने को मजदूर-किसानों की हितैषी कहने वाली सपा सरकारजिनकी पार्टी का नाम समाजवाद पार्टी है और लाल-हरा रंग के झंडा उठाई हुई सत्ता में काबिज हैंउनको इस मौत से कुछ लेना देना नहीं रहा। सैफई महोत्सव को सफल बनाने के लिए जया बच्चन व आजम खां बालीवुड के कलाकारों को सैफई भेजने में दिन-रात लगे हुए थे।

    सैफई महोत्सव के उद्घाटन में मुलायम सिंह यादव ने कहा: ''आयोजन से ग्रामीण क्षेत्रों की सभ्यतासंस्कृति बढ़ती है। लोक कला व संस्कृति के प्रोत्साहन के लिये ही सैफई महोत्सव किया जाता है। बड़े कलाकार मुंबई व लखनऊ के लोगों को ही देखने को मिलते हैं। सैफई महोत्सव में किसान-मजदूर व ग्रामीण छात्र-छात्राओं को भी बड़े कलाकारों को देखने का मौका मिलता है। सैफई के नाच-गाने की आलोचना की जाती है। क्या ग्रामीण क्षेत्रों के किसान-मजदूर नाच-गाना नहीं देख सकते हैंमहोत्सव में लोक गीतों के माध्यम से लोगों में मेल-मिलाप बढ़ेगा।'' मुलायम सिंह ने उपस्थित छात्रों से अपील की कि वे ''शिक्षा पर ध्यान दें और आगे चलकर जया बच्चन जैसा अपना नाम देश में रोशन करें।''

    मुलायम सिंह जीयह बात सही है कि मनोरंजन करने का अधिकार ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का उतना ही है जितना शहरी क्षेत्र के लोगों का। लोक गीतों की जगह बालीवुड,हालीवुड के गानों का बोल बाला है। सैफई महोत्सव में मोनिका बेदीमल्लिका सेरावत से लेकर चारू लता तक के शो होते हैं। इसमें 'मुन्नी बदनाम हुईसे लेकर 'तेरी चिकनी कमर पर मेरा दिल फिसल गयाजैसे गाने गाये जाते हैं। यह किस लोकगीत के अन्दर आता हैइससे आप युवाओं में किस तरह की संस्कृति को पैदा कर रहे हैंआप के महोत्सव में अन्तिम दिन बालीवुड नाइट मानाया जाता है जिसमें मुम्बई से दर्जनों अभिनेताअभिनेत्री बुलाये जाते हैं। इनको देखने के लिए भीड़ इतना बेकाबू हो जाती है कि पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ता है। सैफई में चार्टड प्लेनों का तांता लगा रहता है। इन 14 दिनों में लगता है कि उ.प्र. सरकार सैफई से ही चल रही है। जिस जया बच्चन का उदाहरण आप छात्रों के सामने दे रहे हैं वैसे ही लोग बालीवुड को बढ़वा दे रहे हैं । इससे लोकगीतों या लोककला को प्रोत्साहन कैसे मिलेगाक्या आपके पास भगत सिंहचन्द्रशेख आजादरामप्रसाद विस्मिल के उदहारण नहीं मिलेआप जयप्रकश,लोहिया के विचारधारा को मानने वाले हैं! क्या उनका उदाहरण आप छात्रों को नहीं दे सकते थेआप जया बच्चन का उदाहरण इसलिए दिये ताकि आप उसी बालीवुड की पश्चिमी संस्कृति को अपना चुके हैं। यही कारण है कि आप अपने जन्म दिन पर ब्रिटेन से मंगाई हुई बग्घी पर बैठेते हैं, 75 फीट और 400 किलो वजन का केक काटते हैं। क्या यही विचारधारा जयप्रकाश और लोहिया की थीउ.प्र. में सबसे योग्य आपका ही परिवार है जिससे 5 सांसदमुख्यमंत्री और मंत्री हैंयह तो अधिकार प्रदेश की जनता को भी है लेकिन उ.प्र. की राजनीति पर तो अपके परिवार का पैतृक अधिकार बन गया है जिसके कारण भाईभतीजाबहुनाती-पोते ही लोकसभाविधानसभा में आ रहे हैं।

    डी एमएस पी सहित तामम अधिकारी व हजारों संख्या में पुलिस बल की तैनाती सैफई में रहती है और प्रदेश की सुरक्षा....! इटावा सैफई का जिला हेडक्वार्टर है। वहां पर दो रिपोर्टरजो कि सैफई महोत्सव कवरेज करने गये थेउनको चाणक्य होटल के पास मारपीट कर लूट लिया जाता है तो बाकी जगहों की बात ही छोड़ दीजिये। सैफई में पुलिस हथियारों की प्रदर्शनी लगाई गई थीजिसको देख मुख्यमंत्री ने सराहना की और निर्देशित किया कि इस तरह की प्रदर्शनी भविष्य में और जगहों पर लगाया जाये। मुख्यमंत्री ने पुलिस को आधुनिक बनाने के लिए किसी भी संसाधन की कमी नहीं आने का आश्वासन भी दिया। मुख्यमंत्री जीपुलिस को आधुनिक बनाना अच्छी बात है। लेकिन यह आधुनिकीकरण किसके लिये किया जायेगाक्या पुलिस आधुनिक होकर और तेजी के साथ अपराधियों का साथ देगी और महिलाओं के साथ बलात्कार करेगीअच्छा होता कि आप हथियार प्रर्दशनी की जगह पुलिस को मानवीय दृष्टकोण से काम करने के लिए कैम्प लगाते जिसमें वे अपने कर्तव्य का पालन करना सीखते। 

    जैकलीन को मिनट के परफार्मेंस देने के लिए 75 लाख रु. देने के बजाय सड़कों पर अलाव जलातेरैन बसेरा बनाते तो कुछ लोगों की जिन्दगी ठंड से बचायी जा सकती थी। पुलिसअधिकारीमंत्री जिस तेजी से ड्युटी बजा रहे थे अगर वे इतनी तत्परता अपने कामों में दिखलाते तो लोगों की समस्याएं कुछ कम होतीअपराध कम होते। लेकिन आप का उ.प्र. बालिवुड का प्रदेश और आपका समाजवाद आपके वंशवाद के लिए मौजवाद बन चुका है।


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    Dear Siddhi Bhaju,

    Thank you so much for your very well explained supplement to encourage us against every injustice that we find in our past and present. 

    No wonder, this explanation could be downright rejected by बर्मूबादि and बर्मूच्य:ज. It is easy to understand why बर्मूबादि has to reject it. They are just defending their interest. The बर्मूच्य: reject it because of their ignorance and misguided knowledge. If they are capable to understand what their masters are doing to them in the end, they would stop roosting for their master's interest. But, they won't do. So, as the rooster does in nature, I find this rooster character so accurate in your subject of explanations too. See, the Gwonga bhaju was prosecuted by his master बर्मू Koirala, and he is unable to understand that he was on the dinner table for them to eat because he is a Gwonga. Instead, he thinks it would be a different story if he had a different master (a politician who is less corrupt than the one who victimized him). Now, show us, who (बर्मू politicians) did not similar job? Just find out how may Gwongas had been victimized during Koirala, Deuba, Chand, Thapa, Nepal, Dahal, Khana, etc. etc. If they did not benefit from the injustice, would they continue to keep the same system in those long decades? They are busy just to finger-point each other, play a blame game and somehow manage to stick with the same system.  

    This is the hard fact of Nepal. It has not changed and will not change whether I use soft flowery words or the harsh bitter words. The बर्मूच्य:ज are all victimized here and there and they will continuously get victimized until they keep roosting for their ill-minded master बर्मूज. 

    Dear Bihari Krishna Gwonga Bhaju, 

    You may have got time to go through the links I provided. All reasonings that you expected from me are there. 

    Love and Smile,
    Jwajalapaa


     

    On Sat, Jan 17, 2015 at 12:21 PM, Bihari Krishna Shrestha<biharishrestha@gmail.com> wrote:

    Dear Siddhijee,

    Thank you for your compliments for my work in the government back then when I was one of its officials. However, while I agree with you that I had been meted out injustice by a bunch of corrupt politicians who had no qualms carrying out what I think was the behest of their mentors, a certain foreign power in our region, I have difficulty linking it with and blaming it on Prithvi Narayan Shah just because the former happened to share the same ethnicity, the Hindu high caste category, with the latter.

     

    Regarding this "Jwajalapaa" fellow, I assume that he is also a Newar like me. As a fellow Newar, I would have very much liked to see him take on me on my reasoning in a more dignified manner than what he has done. I have difficulty responding to such communications that fails to maintain a certain decorum that, I think, should go with any inter-personal exchanges, particularly in a public forum like this.

     

    Bihari Krishna Shrestha


    On Sat, Jan 17, 2015 at 9:02 PM, Siddhi Ranjitkar <siddhiranjit@gmail.com>wrote:

     

    To Whom It May Concern: Today's Monsters of Injustice

     

    Prithvi Narayan Shah had been only the symbol of injustice. He had been dead for more than two-and-a-half centuries ago but his injustice had lived on. It was not surprising that some people defended him, as knowingly or unknowingly they wanted to continue the injustice prevailed in the Nepalese politics, society and economy. They did not have sense of justice even in the 21st century. It was disgraceful to them and we need to fight against injustice until the last drop of blood would flow in our veins.

     

    Kamal Thapa wanted to impose Hindu religion on the entire Nepalese doing injustice to the millions of non-Hindu Nepalese. Do you guys believe that doing injustice to the people would bind all Nepalese to a single Nepal? The answer is certainly, 'no'. In fact, Mr. Thapa had been sowing the seed of disintegration of the country. If Mr. Thapa were to be successful to introduce his religion on the non-Hindus, it would surely provoke the non-Hindus and they would rise to fight against injustice done to them. Do you think that then he would be able to put Nepal in one piece?

     

    The most unfortunate thing happened to the people fighting for justice had been Prime Minster Sushil Koirala attended the tea party held by Mr. Thapa in honoring the injustice done to the Nepalese people for more than two-and-a-half centuries. Mr. Koirala himself had been the victim of injustice. His mentor BP Koirala had suffered the whole life from the injustice done to him and his party. Sushil himself had suffered, too but unfortunately he forgot that injustice done to him and his party. He forgot that the NC leaders and cadres had repeatedly shed their precious blood to fight against the injustice. Attending the tea party, Mr. Koirala had disgraced the brave people that had died for justice, and that had recently suffered from injustice for the thirty years of the Panchayat regime.

     

    Unfortunately, Mr Koirala wanted to revive the injustice joining hands with the Panchayat leaders that had demanded the capital punishment to BP Koirala and Ganeshman Singh. That would not be tolerable to the Nepalese and disgraceful to Mr Koirala himself, too. Nepalese had done justice to Mr. Sushil Koirala giving him a chance to run the administration justly and sincerely. He needed to explain to the people why he attended the tea party held for honoring the injustice otherwise he would be abusing the people's mandate.

     

    Subhas Nemwang had been the victim of injustice, too. He had been the Chairman of the constituent assembly or the Speaker of the parliament as a favor done by his CPN-UML bosses otherwise he would not have betray his fellow people attending the tea party held for reviving the injustice. What Nemwang had done justice to the constituent assembly not dong his duty as the chairman but following the orders of his CPN-UML bosses? Nemwang would learn his mistake of doing injustice to the fellow citizens.

     

    Now, KP Oli did not want to do justice to the people that had been repressed for more than 240 years of the rule of injustice. He wanted to use his power of the two-thirds majority again to impose the rule of injustice. Poor Oli did not realize that the time was not of the 240 years ago but of the 21st century. The people had developed different mindset and they would not tolerate any injustice anymore. Imposing injustice would break the country into pieces if Oli were to do so with the power not only of the two-thirds majority but also of bullets and ammunition. He would certainly kill some brave people but he would not be able to kill all the fighters for justice.

     

    Bihari Krishnajee: I had a great respect for you as you did a great job for the people suffered from injustice when you were a joint secretary to the Ministry of Local Development. After the NC party came to power in 1990, do you remember you had once complained bitterly about the injustice done to you by the Girija administration firing you from the job of additional secretary? How painful to be the victim of injustice, you certainly know. I am talking nothing but about injustice done even to the top bureaucrat like you. So, why don't we fight for justice rather than defending the injustice?

     

    Living in UK or USA or any other countries and shouting at me in the emails for fighting against injustice, those guys would be brought to justice if they were to continue to have such mindsets in the respective country, as those countries have the rule of law and rule of justice.

     

    Sincerely yours

     

    Siddhi B Ranjitkar

     

    January 16, 2015


    On Fri, Jan 16, 2015 at 9:57 PM, Jwajalapaa Sakasita<jwajalapaa@gmail.com> wrote:
    Dear बर्मूच्य: Bihari Krishna Kukhuraa ko Bhale Gwonga Shrestha,

    First of all, congratulation for having the knowledge that you are a Gwonga Kukhuraa ko Bhale. Many newars are not fortunate enough like you to know what they are, a rooster or a duck. You educated us that the nomenclature mainly derives from agriculture or livestock products (Bajimaya, Pamyae, Maeken, Nyachhyon, Gwonga) and  I will go a little more into it than the nomenclature.

    You know very well that a rooster is useful to shout Kukhuri Kaaan, produce fertilized eggs, be sometime a guard to perceived danger to themselves and their masters and ultimately become food in their masters' plate. Like this natural duties of rooster, your jobs match perfectly as is seen in your couple of write up in defense of mono-ethnic Nepal, against aadivasi janjati community who wants to see multi-ethnic existence, against people demanding equal right and recognition, and touting like a parrot of khas-bahunbadi media. Your dearest job is to shout Kukhuri Kaan for your बर्मू masters, produce fertilized ground to flourish more बर्मू च्य: in Nepal, be sometime a guard to perceived danger to your kind and your mono-ethnic master and ultimately get eaten up by your masters. What a great coincidences of being a Gwonga and your character?  

    You now may be thinking why this man is calling me बर्मू च्य:, right? For all other readers, let me explain in brief, बर्मू च्य: means a slave of bahun. Among newar community, those people who likes to serve खस-बाहुन and the the system protected, maintained, ruled by खस-बाहुन without considering any harm done to themselves, their own community members are known as बर्मू च्य: । These people usually live on donations, (salary, jobs, government and non-government positions, awards, recognitions etc.) provided by their barmu masters and have no sense of self-dignity at all. From outside, you may see them highly successful, recognized, popular, rich, award-winning personality, but from inside, they are hollow-minded, empty, chakadibaaj opportunists. Without these properties, they can do nothing. They don't own industry, they don't own anything that they can command. They can only be a good servant.

    Coming to the point, for all of you who are so much into praising the barbaric Prithvi Narayan Shah as if an incarnation of GOD to your kind of people, you must read following contents and do a serious soul search. 


    पृथ्वीनारायणलाई राष्ट्रनिर्माता मान्नु पाखण्डीपन --- गोपाल शिवाकोटी  


    पृथ्वी नारायण शाहबारे उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणहरुले के भन्छन ? - लक्ष्मी तामाङ


    पृथ्वीनारायणले नेपाल बनाएका होइनन, नेपाल खोसेर बर्बाद बनाएका हुन ।  


    पृथ्वीनारायण शाहको लुकाइएको इतिहास - पुष्प मुनकःमि 


    लुकाइएको नेपाली इतिहास 


    These are only a few examples, there are plenty of other scholarly authors who don't consider PN Shah a unifier anymore. Those pieces may not be of your taste, but you have to have a sound logic to counter their opinions. Repeating the middle-school level text-book contents written by some chakaribaj story teller is not enough. Invading East India company to northward toward Nepal is nothing more than a hoax and built up story without any proof so far. The 'garden' story is argued to be written later during Bhimsen Thapa's rule. The name dibyopadesh was created by Naraharinath. Yes, PN Sah was a conqueror, and there is no problem in recognizing him as a conqueror, who expanded the Gorkha territory and adopted the name "Nepal". That is it.

    Thanks.    

    Jwajalapaa


    Dear all,

    Sri Siddhi Ranjitkar normally writes well-argued papers, although one
    does not agree with him all the time. The point is that he deals with
    a subject generally quite exhaustively. But this one on Prithvi
    Narayan Shah is vastly different, just pouring venom not only on the
    late ruler belonging to an era of some two and half centuries ago,
    branding him "monster of injustice" without going into why he thought
    it was so. Mr. Ranjitkar was also furious with every single politician
    who attended the tea party organized by Kamal Thapa. As a media person
    who writes for a larger readership, the writings must read as an
    objective account of a given subject or situation, discernibly free
    from personal emotive excesses. While historical figures are always
    viewed from many different angles, both positive and negative--and
    Prithvi Narayan Shah should be no exception--it is still necessary
    that such assessments be based on the interpretation of facts. In this
    case, Mr. Ranjitkar has failed to honour the norms of a public writer,
    and by doing so, he has only managed to climb down several notches in
    the esteem and popularity he otherwise enjoyed among his audience. The
    bottom line of norms for any public writing should be that it remains
    dignified in its mode of expression and choice of words. While one may
    disagree with a certain point of view, one has to do that without
    being disagreeable himself, and this demand is particularly germane in
    an email forum like this where there are no "editors".

    While I, as a Newar, belong to a tribe that King Prithvi Narayan Shah
    vanquished, I hold that ruler in great esteem and consider him to be a
    great statesman of his time in South Asia. When he said, he would like
    to make Nepal "asali Hindustan", in my view, as a devout Hindu, he
    meant it in every sense of the term. While the undivided India then
    was more popular as "Mughlaan" with Islam steadily spreading in the
    subcontinent at the hands of the Persian and Muslim rulers,
    Christianity was spreading its wings particularly in the eastern
    region at the hands of the invading Westerners. And given Nepal's
    geographical location as the bridge to Tibet for trans-Himalayan
    trade, Prithivi Narayan Shah must have thought that it was only a
    matter of time that these little kingdoms in the Himalayan range would
    fall to invading East India Company sooner than later, thus putting
    Hinduism at great risk. So, as the ambitious ruler that he was, it was
    little wonder that he would set out to conquer and put together a
    larger kingdom that could possibly resist the northward push of the
    alien rulers. That is what ambitious rulers did the world over in
    those days anyway.

    But Prithivi Narayan Shah's greatness manifests itself after he had
    put together his larger kingdom. Unlike the Sen rulers of Palpa before
    him, he did not want to partition his new kingdom to his descendants.
    He not only wanted the new enlarged state to remain intact (and
    expanding), he, unlike most other victorious rulers in other parts of
    the world, bequeathed his new kingdom to the people of all caste
    ethnic groups living therein by envisioning it as a "garden" to be
    owned by them all. Of his many acquisitions, Kathmandu valley was by
    far the richest and most attractive of all. While we have known
    through history books such victors engaging in the loot and plunder of
    the vanquished, Prithvi Narayan Shah just made himself a part of the
    Newari culture by letting the Kumari chariot procession to proceed
    normally. The Kathmandu Newars themselves seem to have acquiesced
    without much resistance, one possible reason being that in those days,
    like in Europe, there was a special category of people who became
    kings. History tells us that Newars had "Thaku juju" or Thakuri kings
    even before Prithvi Narayan Shah descended on Kathmandu. The last
    Newar king was a Malla, a Thakuri clan and not one of those many Newar
    caste categories whose nomenclature mainly derives from agriculture or
    livestock products such as pamyae (a bean) who now call themselves
    "Pradhan",  or MaeKen (black bean, or kalo dal) now calling themselves
    Maskey to make it sound more respectable. Most clan names have
    remained unchanged too. Bajimaya is "I don't like Chyura", or
    Nyachhyon is the head of a fish. I myself am a Gonga (a rooster) and
    in my younger days, chose to go for a more generic Shrestha. In any
    case, Newars of Kathmandu owe a special debt of gratitude to Prithvi
    Narayan Shah. It is because of him Kathamndu is now Nepal's capital,
    with its land price steadily skyrocketing and making them the richest
    community in the country.

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    Dr Firoz Mahboob Kamal
     
    The hate campaign
    The killings at Charlie Hebdo had sent powerful shock waves all over the West. Now the security threats and fear run very high everywhere. It seems that not only the hateful Islamophobic cartoonists of Charlie Hebdo, but also the politicians and the security officers of the West have turned pathologically paranoid. Even an unattended bag in a railway or underground station is enough to paralyse the traffic system in London, Paris, Berlin, Brussels, Rome and other cities of the West for hours. Now the governments are planning to check every internet mail of every individual. Hence nothing is private for any man or woman. The western imperialists used to take their wars of occupation and plunder to foreign lands; hence their homes were safe. But now the war has arrived to their doorsteps. They have withdrawn troops from Algeria, Afghanistan, Iraq, Mali and other third world countries, but the war is not leaving them. Now they are taking full war preparation to save their own streets. The French President François Hollande has announced that he will deploy 10,500 soldiers all over France to fight the Islamists. Former French President Sarkozi declared "war of civilisation" in response to attack on freedom. Thus, the whole western world is quickly turning into a huge and hot war zone.
     
    War never starts all on a sudden. Like a disease, it has its own ongoing moral, ideological and social pathology. War needs ideological ignition in people's psyche. Such a job is done by the ideological warriors. In the past, the war mongering crusaders did that job massively against the Muslims. Hence so-called the holy war (the crusade) could sustain for more than hundred years. Nurturing such hatred has been a classic political art and part of the genocidal warfare in Europe. So in comparison to other people in other continents, the Europeans made distinctive history of cruelty in ethnic cleansing worldwide. Hence Jews in Europe and Muslims in Spain are not the only victims of European. The Red Indians and Incas in America, the Aborigines in Australia and the Maoris in New Zealand met the same fate. In modern times, Hitler and his cronies, the colonialists and the imperialists did the same crime but the scientific skill. The killings of more than 75 million in two World Wars indeed draw the pathological roots from the past. Now the same old disease shows signs of violent remission. The job has now been taken over by the Islamophobic columnists, cartoonist, writers, warlords, the defence industry and the politicians. The West has now great number of such venomous people in their midst. And now the target is Islam and its prophet. Hence the crusade that was started by George W Bush in 2001 now gets enough fuel for its robust sustenance.
    Malicious hatred against the target people is indeed the requisite precursor for a brutal war. The German politician, writer and the press nurtured such hatred against the Jews before the World War II. Hitler was not a lone performer; he had a huge army of collaborators in that crime. Hence killing of 6 million Jews on an industrial scale became morally acceptable to the German. Now the tide is running against the Muslims. And the now shows the same readiness to endorse the most heinous crime against Muslims. Wit moral death does, people can't see crime as crime. The symptoms of such moral death of the West are now quite manifest. For example, Gaza and Kobani are bombed to rubbles by Israel and the US. More than 2000 innocent children, women and men are slaughtered in Gaza. Bombs were dropped even on the UN run schools. But the US and her European partners are not ready to consider such Israeli brutalities as war crimes. The US didn't allow the UN Security Council to pass a resolution condemning such crime. With the same moral death, the US could drop 2 atom bombs in cities of Hiroshima and Nagasaki; and now financing and patronising Israeli barbarity with its all brutal dimension. They do not like that such crimes should go to the International Criminal Courts for the prosecution.
     
    The double standard
    In the west, all are not equal to enjoy the same liberty. They have given full liberty to magazines like Charlie Hebdo to cross all limits to spread pornographic slander against Islam's great prophet Muhammad (peace be upon him). The Western leaders also announce their full solidarity with those slanderers by chanting "je suis Charlie" (I am Charlie). But they don't allow others to chant "je suis Palestinian" (I am Palestinian). Hence the British MP Mr David Ward from East Bradford got wide condemnation for expressing his strong anger at the arrival of Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu at Paris march on 11/01/15 and sending a twitter message "je suis Palestinian" (I am Palestinian). He was condemned not only by the Israeli Ambassador at London and but also by the Islamophobic British media and the British politicians. He is the only exceptional member of the British Parliament who could announce, "If I was in Gaza, I would have fired rocket to Israel." For such moral stance at the time of Israel's Gaza bombing, he was rebuked by the British Prime Minister and other political leaders of both Tory and Labour parties. He was forced by his party's parliamentary whip to withdraw the original statement. Such hypocrisy in the British politics is not hidden, rather broadly practised to support its own illegal creation of Israel!
     
    The Western leaders have given the full impunity to the Israeli warlords to commit whatever crimes they wish against the Palestinians. The US, the UK, France and other Western countries exercised the same unfettered liberty in killing Muslims in million in Algeria, Vietnam, Iraq, Afghanistan and other occupied countries. Millions of Palestinians are driven out of their homes and forced to live in refugee camps for more than 60 years. Does it need to be saint to condemn such crimes? But the West's moral conscience stands fully insensitive to such horrific crimes; hence they never condemned these as war crimes. Rather they punish those who condemn and protest against such brutalities. They label them as Islamic extremists. The French black comedian Diendonne didn't take any weapon in hand to kill anyone. He only exercised freedom of speech to protest against the Israeli brutalities in the occupied Palestine. For that, he has been put in prisons. Whereas the newspapers and magazines like Charlie Hebdo of Paris, London's Daily Mail and Daily Sun and many others of Europe enjoy full liberty to inject more venom to the western psyche.
     
    The state-sponsored slander
    Charlie Hebdo recently published its post-attack first edition with another slanderous cartoon against the prophet Muhammad (peace upon him) on the cover page. It is indeed a state-sponsored million-copy edition to rub more salt on the wounded psyche of the Muslims. Printing satirical cartoon is not the only staple of Charlie Hebdo. It is not neutral either –as it claims. It is conducting an ugly and continuous propaganda war against Islam's core teachings like sharia, jihad and khilafa. Its toxic slander against Islam's greatest prophet Muhammad (peace be upon him) knows no moral or ethical limit. Publishing most pornographic vulgar cartoon against this great man of the human history is in fact the main passion of the cartoonists. 
    Those who chanted "je suis Charlie" (I am Charlie), they too, made their massage louder. They announced unequivocally that like the dead cartoonists, they too rejoice such pornographic ridicule against Islam's prophet. Toxic cartoons are being used as weapon of ideological war against Islam and its iconic characters. Can a man with little respect for this great prophet spread such venomous filth? By publishing such pornographic slanders, these cartoonists didn't exercise freedom of expression. In fact, they exercised freedom of abuse. How a Muslim can support Charlie Hebdo? A Muslim must be an obedient follower of Muhammad (peace be upon him) in all aspects of his life. He must love him more than his own life. It is a Divine requirement. Hence ridiculing the prophet Muhammad (peace be upon him) is indeed ridiculing every Muslim. Hence, such vulgar bigotry and poisonous slander can only draw a country to an unending blood-letting war. France with its 6.5 million strong Muslims is indeed moving fast to such a war. How a country can deserve any peace or tranquillity with such slanderous posture against 6.5 Muslims? It shows signs that the war will not remain confined within the French boundary. In neighbouring Belgium, two Muslims are killed on 16/1/15, and many more are arrested. France government too has proven to be  very prompt to add more fuel to the fire. The French parliament voted by 488 votes to one to launch military campaign against Islamic State. The French aircraft carrier has already moved nearer to the Syrian shore of the Mediterranean to facilitate the US air strikes against Islamic State. It is reported that about 3 thousand European Muslims have already joined the Islamic State to fight the ongoing war in Syria and Iraq. Many more thousands of these jihadists are prevented from joining the Islamic State by imposing strict travel restriction in the border outposts and the airports. Now France has opened new frontiers for these enthusiastic Islamist warriors on its own soil.
     
    Solidarity with the hate campaign
    Charlie Hebdo is not alone in its ugly hate campaign against Islam and its prophet (peace be upon him). The western leaders displayed their full solidarity with it. More than 40 heads of states marched in the streets of Paris on 11/01/15 to show such solidarity. The western leaders talk about fighting war for protecting western values and culture. But what is western value and culture? Do the Muslims need any lecture to learn the western values and culture? Didn't they display those values and culture during the last several centuries all over the world? Is it not the values and culture of military aggression, occupation, colonisation, imperialism, ethnic cleansing, slave-trading, genocide, World Wars, gas chambers, dropping of atom bombs, waterboarding, Guantanamo Bay, Abu Gharib, Sabra, Satilla and Gaza? They killed 75 million people only in two World Wars! Who else can match their brutality? Their war machines are still not withdrawn from their army bases in the Muslim lands.
    The western leaders talk about fighting terrorism. Do the Muslims need any lecture to understand terrorism too? The Muslims are the worst victims of terrorism since the advent of Western colonialism in their countries. Most of the Muslim lands were occupied and millions lost lives by the hand of these terrorists. Only in Palestine, more than 4 million people are made homeless by these terrorists –fully sponsored by the West's money, weapons and diplomacy. Terrorising people with lethal weapons for political and military gains is no more a crime of a few thugs. It is the sophisticated war tactics of the super powers. These state terrorists of the West are the real threat against the world peace. They are charged with deep hatred against Islam, Islam's prophet and the common Muslims. Hence they could easily show their solidarity with the hate mongering cartoonists of Charlie Hebdo.
    The military occupation of Muslim lands, the plunder of its resources and de-Islamisation of its people are the main objectives of the anti-Muslim state terrorists. Such imperialist objectives are so much integrated in the imperialists' culture and values that even most barbaric manifestation of the state terrorism like war for occupation, destruction of cities, cleansing of native population received not only the popular support, but also get voluntary participation of the people for its prolonged continuation. This is why the quick occupation of Iraq and Afghanistan gave a huge boost to President George W Bush's popularity in the USA. Only his utter failure to enforce the US grip in those occupied lands and numerous body bags of the US soldiers brought his disgrace –and not the occupation itself. The US people didn't expect such disgrace of their citizens in any foreign land. Due to the same western mind-set, Israel –one of the most barbaric countries in human history and the West's ugly colonial legacy, enjoy so much support in the West. For the same reason, 4 million people marched in the street of Paris to support Charlie Hebdo's hate campaign against the prophet of Islam (peace be umpon him) and the Islamists. Indeed, here lies the main problem of the west. The anti-Islamic hatred is indeed embedded in their mind-set. Hence for any peace, they do not need more wars, rather needs a 180 degree paradigm shift in their mind-set. They need more home works to change their understanding about Islam and Muslims. The current state of poisonous hatred against Islam and Muslims could only generate more Charlie Hebdo cartoonists, more Abu Gharib, more Guantanamo Bay, more water boarding and more torture cells. In such milieu of abuse, the jihadists will enjoy fertile breeding grounds. The US and its ally have spent several trillion of dollars in wars and war industries. They fought war for 13 years in Afghanistan and for 8 years in Iraq. At the end, they couldn't win any war, rather returned back with humiliation. The month-long bombing by the US, the UK, the French, the Australian and the Jordanian bombers couldn't bring any victory for the coalition forces even in a small town of Kobani. If they think that few thousands Kurd secularist mercenaries or Shia militias will do their war against the Islamists, they are indeed living in fools' paradise!
     
    Fake humanity
    The leaders of the Western countries talk a lot about humanity and higher moral values. But there exist monumental evidences to prove such claim fake. Creation of Israel on an illegally occupied land by the colonial West and their continual support for its land grabbing genocidal war are enough to prove that. What a disgrace, the original resident of the Palestine are driven out of their ancestral homes to make space for houses for the European and American Jews! The Palestinian refugees are denied access to their own land. There exists no international institution where they can seek justice. The UN Security Council itself is under the occupation of the usurper imperialists. It has given recognition to creation of such illegal state on illegally occupied land. What an irony, any effort to reclaim the occupied land is labelled as terrorism! The leaders of these countries showed silence in remembrance of the dead cartoonist of Charlie Hebdo. The Western imperialists have killed more than a million people in Iraq and Afghanistan in their recent wars of occupation. But, did they observe a single moment of silence in memory of those dead souls? France herself killed 1.5 million Algerians in its war of occupation in the sixties. Did they pay any homage to those innocent people who were brutally killed there? The crime of these innocent Algerians was nothing else but the genuine demand for freedom from the colonial rule. Recently the Christians killed thousands of Muslims in Central African Republic. Where is the solidarity of the Western leaders with those innocent victims of the genocide? Since the victims are Muslims, didn't they deserve any respect and sympathy?  They chanted chorus "Je suis Charlie" (I am Charlie). What does that mean? Do they say that like the abusive Charlie Hebdo, I am also an equal abuser and hater of the prophet of Islam (peace be upon him).  They are not ready to retreat an inch from that abusive path. They showed full solidarity not only with Charlie Hebdo, but also continue to show full solidarity with the brutal Israeli killers. Hence the butcher of Gaza -the Israeli PM was cordially welcomed in their midst. Only due to such crippling moral disease, they could sponsor the illegal creation of Israel in occupied land of the Palestinian
    Mr Gerald Biard, the chief editor of Charlie Hebda who was on holiday when the attacks occurred wrote, "Charlie is an atheist paper, is accomplishing more miracles than all saints and prophets." (The Guardian 14/01/15). What is that miracle that the editor claims for? Of course, they made a history. About 4 million Europeans chanted the chorus "je suis Charlie" (I am Charlie) only in Paris; many more millions did the same in other parts of Europe. But it is not a miracle. It is the disease of Europe. It is the ugliest solidarity with the virulent hate campaigners. It is indeed the recipe of further holocaust. The West could commit so many ugly crimes in the past only because of such moral ill health. They could kill more than 75 million only in two World Wars. They could also kill many more million in post-World Wars regional wars as occurred in Korea, Vietnam Afghanistan and Iraq.  About 2 hundred thousand were slaughtered in their own backyard in Bosnia. But how many Europeans came out to the street to condemn those crimes? How many Europeans marched in the street chanting "je suis Bosnian" (I am Bosnian)? How many said "je suis Palestine (I am Palestine). The Whole Muslim population were ethnically cleansed from Spain. The European people never came to street to show solidarity with those ill-fated victims of the wars of ethnic cleansing. Such ethnic or religious cleansing never happened against the non-Muslims even in Islam's heart lands like Egypt, Syria, Iraq, Lebanon and Palestine; more than 10-15% of the population in these heart lands remain non-Muslim even during last 1400 years' Muslim rule. In Lebanon it is more than 30-35%. But the ethnic annihilation in Europe during so-called Holy Roman Empire was complete that the percentage of non-Christian in Europe was not even 00.001%. The same happened after the Christian victory against the Muslims in Spain. In the name of religion, such crime never happened in a Muslim country. The Muslims never had any phobia against non-Muslims, and neither had the non-Muslims against Muslims in those Muslim lands. But now, along with the Muslims, the Christians too, are leaving these Muslim countries. The US invasion and its massive bombing campaign have made the Muslim countries most unsafe for everybody. The bombs do not see the faith, only see the targets. 


    The abuse of freedom
    Some of the cartoonists claimed that they are not against Islam; they are only against the extremist ideologies of Islam. They argue that they make satire only of prophet (peace be upon him)'s character, not of Islam. It is a sheer lie and ridicule. The prophet Muhammad (peace be upon him) is the embodiment of Islam's core belief and ideologies. He showed his followers how to practise full package of Islam. Can anyone separate the prophet Muhammad (peace be upon him)'s character from the ideology of Islam? Establishing Islamic state, continuing dawa (propagation), practising full sharia, launching jihad, encouraging people to embrace martyrdom, implementing shura (counselling),hadud (sharia judgments) and levying jijiya on non-Muslims were the parts of his life. These are his ideologies. Hence ridiculing the prophet's character is nothing else than ridiculing the ideologies of Islam. Did any newspaper in any Muslim country ever showed such abusive attitude against the great prophet like Jesus Christ (Allah's blessing be on him) or Moses (Allah's blessing be on him too)? 

    The Western leaders claim that they are fighting terrorism. But the truth is otherwise. The Muslims are the worst victims of state terrorism. About 3 thousand people were killed in 9/11. But the US has killed more than million as a result of the war.  Very recently on 16/01/15, the US bombers killed more than 50 civilians in Iraq. (RT TV). What can be more terrorism than this? Both in the past and in the present, the Muslims became the worst victims of state terrorism in Algeria, Iraq, Afghanistan, Bosnia, India, Egypt, Syria, Myanmar, Central Africa and Sri Lanka? Terrorism is no more a crime of a few thugs. It is now the full-scale warfare of the arrogant military powers to control the world politics in their own hand. The US war in Iraq and Afghanistan and Israeli war in Gaza, Egyptian Army's manslaughter in Cairo, Alexandra and other cities are indeed the worst terrorist acts that one can perceive. Non-state terrorist can't think of terrorism of such magnitude.

     
    The only option
    Wolves can't enjoy safe haven even in caves. They too need protection to escape the imminent extinction. The same is true with the imperialists. They have done enough crimes all over the world. They have taken genocidal wars to the distant corners of the world. They have dropped atom bombs, napalm bombs, cluster bombs, chemical bombs, missiles and drones on the head of the weak. Now the war stands at their front doors. After spending a trillions of dollar, the US and its ally didn't expect such a fate. Hence they are filled with extreme anger and frustration. Anger of the innocent victims has all reached to the explosion level. Further killing or torturing those who are already ready to embrace martyrdom is not going to solve the problem. Even an average European understands this new reality. The march of about 4 million Europeans in Paris is indeed the demonstration of such fear. It has little to do with the little known vulgar Charlie Hebdo. It is not to show the solidarity with the 12 people who are killed in the attacks. While 6 million Jews were incinerated in gas chambers, no one marched in the street of a European city to show solidarity with the victims. In fact, the Europeans didn't face any war at their doorsteps from the Jews at that time. But now the situation is different. They sense war looming in their midst.
    Now in the West, there exists only one option to have a peaceful co-existence of Muslims and the non-Muslims. It is not possible to do the same ethnic cleansing again on the European soil –as was done in Spain in 15th century. Now more than 20 million Muslims live in Europe; 6.5 million only in France.  May be, some xenophobic far-rightists may still prefer that genocidal route. But the only feasible option stands otherwise. Instead of abusing 1.5 billion Muslims for their fundamental beliefs, they must reconcile with them.Sharia, khilafa, jijiya and hadud are not issues in the West. But those basics must be allowed to be practised in Muslim majority countries - as were practised in all Muslim countries till the West's colonial occupation. The West must not create blockade against the resurrection of Islam's most crucial political institution like khilafa. Such blockade will make the war inevitable.
    Like the deformed Christian or the Jews, the Muslims do not enjoy such option to be deformed or reformed. Such deformation or reformation is nothing else than deviation from the siratul mustaqeem  -hence direct route to hellfire. Since the prophet of the Islam (peace be upon him) was the fundamentalist believer and practitioner of the Qur'anic Islam, every Muslim must try to be the Islamic fundamentalist of the same degree. It is not a choice, but an obligation. The West must reconcile with the Muslims' such core belief. Otherwise the clash of civilisation is unavoidable. But it appears that the West has deliberately taken the route of hostility with the prophet's Islam. They have already declared their solidarity with the hate campaigner against Islam's great prophet (peace be upon him). "Je suis Charlie" is indeed the war cry of such hostility.
    In Islam, practising sharia is a binding obligation. Whoever ignores this obligation is severely condemned with three derogatory labels from Allah Suhhana Wa Ta'ala: he is a kafir, zalem and fasik. The Holy Qur'an reveals: "Whoever does not make judicial judgement according to the revealed laws (sharia) is a kafir (disbeliever) … a zalem (oppressor) ..and a fasik (sinner). (Sura Maida: verse 44, 45 and 47). Hence, there is no room for the secular laws and judiciary in a Muslim country.  The presence of Christians, Jews, Buddhist, Hindus, atheist, polytheists and the followers of other beliefs is not new under the Muslim rule. It has a history of more than 14 hundred years. In those days, the believers of other faiths could understand the Muslims' religious obligation; hence these non-Muslim compatriots never put any hindrance against the implementation of sharia, khilafa, shura, hadud and other Islamic fundamentals. Even in countries where the Muslims were in minority like India and Spain, they didn't protest against the practice of sharia either. Instead of any interference in the Muslims' religious affairs, they opted for peaceful co-existence.
     
    The arrogance
    But such wisdom of the past does not exist in contemporary Western leaders. Their economic, military and technological might made them arrogant as well as incompatible with the Muslims' beliefs and practice. The Western powers are putting obstacles against implementation of sharia even in countries where more than 90% people are Muslims. As if the sharia is their own domestic issue! After the occupation of Afghanistan, the German Foreign Minister declared in Public that sharia will not be allowed to return back to Afghanistan. Is it not a blatant interference in Muslims' internal affairs? Where is freedom of the Afghan people to decide their own law? The US president Obama labelled sharia as medieval barbarity. What a sheer arrogance? Can a Muslim surrender to such anti-Islamic arrogance?  
    The West's stubborn hostility against Islam's fundamental belief is indeed the cause of current impasse. They have already launched a civilizational war against the Muslims to stop them practising prophet's Islam. They want Muslims to be fully de-Islamised and deformed from the Qur'anic Islam. They find it the only option to peacefully co-exist with the Muslims. Hence demand for Islam's reformation cum deformation is very high in the Western camp. The tyrant rulers and the secularist intellectuals of the Muslim countries have already taken that enemy route. Hence they are equally inimical against sharia and khilafa like the non-Muslims. Many of them like Iraqi and Syrian Kurds, Iraqi and Irani Shia, the Egyptian military, Bangladeshi secularists, the Pakistani Army have already joined their rank to kill the Islamists. The Western leaders must understand that the original Islam has nothing to reconcile with the corrupt beliefs of the Egyptian, Saudi, Qatari, Bahraini, Pakistani, Bangladeshi or other secularist tyrants of the Muslim world. By making coalition with these de-Islamised despots, the West is not going to gain anything in their war against Islam. Rather, such alliance would only re-inforce their image as the enemies of Islam. Such an approach will only add more fuel to the ongoing war. 18/01/15
     


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