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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    अब पूरा देश उन्हीं नाथूराम गोडसे के राममंदिर में तब्दील है जहां हम अपनी अपनी पहचान और आस्था के मुताबिक नतमस्तक हैं।यही आज का सबसे भयंकर सच है।

    ममता के सर पर ग्यारह लाख का इनाम वाला वीडियो वाइरल तो मकसद पूरे भारत में दंगा भड़काने का है!

    चूंकि किसी मुख्यमंत्री  के सर पर यह इनाम घोषित हुआ है तो माननीय सांसदगण मुखर हैं।किसी पानसारे, दाभोलकर, कलबुर्गी या रोहित वेमुला की हत्या पर संसद में सन्नाटा ही पसरा रहा है। इनकी और देश भर में गोरक्षा के नाम तमाम बेगुनाहों की निंरतर हो रही हत्याओं के अलावा शहीद की बेटी गुरमेहर कौर  और बांग्ला की युवा कवियित्री मंदाक्रांता से लेकर देशभर में स्त्री के खिलाफ बलात्कार, सामूहिक बलात्कार की धमकियों और ज्यादातर मामलों में वारदातों के खिलाफ संविधान,संसद और कानून की खामोशी का कुल नतीजा यह है।


    पलाश विश्वास


    भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री के सर पर ग्यारह लाख के इनाम की घोषणा से संसदीय बहस की गर्मागर्मी से हालात कितने संगीन हैं, इसका अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है। चूंकि किसी मुख्यमंत्री  के सर पर यह इनाम घोषित हुआ है तो माननीय सांसदगण मुखर हैं। किसी पानसारे, दाभोलकर, कलबुर्गी या रोहित वेमुला की हत्या पर संसद में सन्नाटा ही पसरा रहा है। इनकी और देश भर में गोरक्षा के नाम तमाम बेगुनाहों की निंरतर हो रही हत्याओं के अलावा शहीद की बेटी गुरमेहर कौर और बांग्ला की युवा कवियित्री मंदाक्रांता से लेकर देशभर में स्त्री के खिलाफ बलात्कार,सामूहिक बलात्कार की धमकियों और ज्यादातर मामलों में वारदातों के खिलाफ संविधान,संसद और कानून की खामोशी का कुल नतीजा यह है।

    जाहिर है कि ममता के खिलाफ इस धमकी की प्रतिक्रिया भी उस बंगाल में घनघोर होने वाली है,जो बंगाल कवियत्री  मंदाक्रांता सेन  के खिलाफ सामूहिक बलात्कार की धमकी के खिलाफ खामोश रहा है,वह अब मुखर नजर आ रहा है।विडंबना  तो यह है कि मंदाक्रांता और श्रीजात के मामले में सरकरा ने कुछ भी नहीं किया और सत्तादल ने रामनवमी के जवाब में हनुमान पूजा का प्रचलन किया।विडंबना यह है कि बंगाल में स्त्री उत्पीड़न बाकी भारत से ज्यादा है और जो मुख्यमंत्री इन तमाम मामलों में कोई कार्रवाई नहीं करने के  लिए मशहूर हैं,वे आज इस तरह के धर्मांध फतवे के निशाने पर हैं।धर्मोन्मादी राजनीति के लिए खुल्ला मैदान छोड़ने और बाकी विपक्ष के सफाये के आत्मध्वंस का यह बेहद खतरनाक उदाहरण है तो इस अग्निगर्भ परिस्थितियों से बंगाल और बाकी देश को निकालने के लिए ममता बनर्जी इस घटनाक्रम से क्या सबक लेकर फासिज्म के राजकाज के खिलाफ कैसे मोर्चा संभालती है,यह देखना दिलचस्प होगा।हालांकि शुरु आती प्रतिक्रिया में उन्होंने ऐलान कर दिया है कि दंगाइयों को बंगाल में दंगा भड़काने का कोई मौका वे नहीं देंगी।फिरभी बंगाल के हर जिले में धार्मिक ध्रूवीकरण की वजह से इतना घना तनाव है,जो भारत विभाजन के वक्त भी कभी नहीं था।

    टीवी चैनल पर जो सुशील भद्र चेहरों का मुखर हुजूम अब सहिष्णुता, विविधता और बहुलता की बात कर रहा है। वे ही  लोग बंगाल और बाकी देश में अब तक ऐसे तमाम मामलों में भारतीय संसद और न्यायपालिका की तरह खामोश रहे हैं।

    जो संस्थागत फासिज्म की विचारधारा और संगठन है,राजकाज जिसका निरंकुश है,उसके हजार चेहरे हैं जो परस्परविरोधी बातें कहकर लोकतंत्र और स्वतंत्रता का विभ्रम फैलाकर देश को गैस चैंबर बनाकर अपने नरसंहार और अनचाही जनसंख्या के निरंकुश सफाये के एजंडे को वैश्विक जायनी दुश्चक्र के तहत मीडिया के मार्फत अंजाम दे रहे हैं,यह सबकुछ उनके सुनियोजित योजनाबद्ध चरणबद्ध कार्यक्रम के तहत हो रहा है।

    सारी क्रिया प्रतिक्रिया का कुल नतीजा फिर फिर भारत का धर्मोन्मादी विभाजन, विखंडन और अखंड मनुस्मृति शासन है।एकाधिकार कारपोरेट राज है।

    प्रतिक्रिया से वे लगातार मजबूत हो रहे हैं जबकि प्रतिरोध सिरे से असंभव होता जा रहा है।धर्मांध ध्रूवीकरण लगातार तेज करते रहना उनका मकसद है और इसे तेज करने में उनके विरोधी उनका बखूब साथ दे रहे हैं।

    मसलन अब हत्या की सुपारी का वीडियो वाइरल है।

    मीडिया बाकायदा सर कलम करने की धमकी देने वाले का अभूतपूर्व महिमामंडन कर रहा है।

    इस अकेले संस्थागत विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध प्रशिक्षित बलिप्रदत्त कार्यकर्ता के इस उद्गार का भारतीय खंडित मानस और धर्मांध दिग्भर्मित युवा मानस पर क्या क्रिया प्रतिक्रिया होगी,इसके बारे में कोई चिंता किसी की नजर नहीं आ रही है।

    जाहिर है कि शहादत की एक श्रंखला तैयार करने की यह एक रणनीति है,जो हमें बंगाल बिहार और बाकी देश में अब लगातार मुकम्मल हिंदू राष्ट्र के गठन होने और उसके बाद लगातार देखना होगा।

    हम इस कयामती फिजां से बच नहीं सकते।

    गौरतलब है कि भारत में आजादी के तुरंत बाद 30 जनवरी,1948 को जिस विचारधारा के तहत नाथूराम गोडसे ने जिस राजनीतिक फासिस्ट नस्ली संगठन के समर्थनसे प्रार्थना सभा में राम के नाम हे राम कहकर प्राण त्यागने वाले गांधी की हत्या कर दी, ममता बनर्जी का सिर काटने पर इनाम घोषित करनेवाले वैचारिक महासंग्राम के पीछे वे ही लोग हैं। वही संस्थागत नस्ली नरसंहारी संगठन है।विचारधारा वही है।

    उस वक्त भी हमने हत्या के पीछे किसी पागल धर्मांध नाथूराम गोडसे की शख्सियत की पड़ताल कर रहे थे और फासिज्म के उस विषवृक्ष को फूलते फलते रोकने की हमने कभी कोशिश नहीं की।

    अब पूरा देश उन्हीं नाथूराम गोडसे के राममंदिर में तब्दील है जहां हम अपनी अपनी पहचान और आस्था के मुताबिक नतमस्तक हैं।यही आज का सबसे भयंकर सच है।

    आज भी संसदीय बहस के निशाने पर उन्हीं नाथूराम गोडसे का अवतार किसी अनजानायुवा मोर्चा का शायद टीनएजर कार्यक्रता है, जो एक झटके से हिंदू जनमानस के लिए शहादत का श्रेष्ठ उदाहरण स्वरुप प्रस्तुत है।

    जाहिर है कि गांधी के हत्यारे के लिए धर्मांध बहुसंख्य हिंदू जनमानस में रामंदिर का निर्माण हो चुका है और उस राममंदिर में बाल्मीकि रामायण, कृत्तिवासी कंबन रामायण या रामचरित मानस के मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं, फिर उन्हीं नाथूराम गोडसे की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी है।

    हत्यारों का, नस्ली नरसंहार संस्कृति का यह अभूतपूर्व बजरिया मेइन स्ट्रीम मीडिया महिमामंडन भारतीय लोक गणराज्य के विध्वंस का बाबरी विध्वंस बतर्ज नरसंहारी राजसूय महायज्ञ है,जिसके लिए अब बंगाल का कुरुक्षेत्र तैयार है।

    जो भारत में हिंदुत्व की राजनीति के सबसे बड़े समर्थक थे और अछूतों के बाबासाहेब से लेकर सशस्त्र संग्राम के जरिये भरत को स्वतंत्र कराने वाले क्रांतिकारियों और नेताजी तक तमाम विविध विचारधाराओं के मुकाबले हिंदुत्व की ही राजनीति कर रहे थे, उन गांधी की हत्या के बाद वे लगातार भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, भाषा, साहित्य, लोक, कला माध्यमों में गहरे पैठ चुके हैं,राजनीति ने इसे रोकने के लिए अभी तक कोई पहल की नहीं है।

    बल्कि इस हिंदुत्व का लाभ उठाने के लिए तरह तरह के वोटबैंक समीकरण और सोशल इंजीनियरिंग कवायद का सहारा लेकर लगातार  इसे मजबूत किया है।

    दरअसल यह नस्ली रंगभेद और असमानता और अन्याय की विचारधारा सत्ता वर्ग की साझा मनुस्मृति संस्कृति है और भारतीय राजनीति के सारे कारपोरेट फंडिग वाले दल इसी संस्कृति के घटक हैं और इसी ग्लोबल एजंडे को कार्यान्वित करने के लिए डिजिटल इंडिया के आर्थिक सुधारों के एकाधिकारवादी मुनाफे और हितों में साझेदार हैं।

    इसलिए इस नरसंहारी अश्वमेध को रोकने का उनका कोई इरादा है ही नहीं।

    न कभी था।जैसे मुस्लिम लीग की साझा राजनीति ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भारतीय जनता की आजादी,समता और न्याय के खिलाफ थी,केंद्र और राज्यों की सत्ता में भागेदारी के लिए यह साझेदारी गांधी की ह्ताय के बाद से लगातार जारी है और इस गठबंधन में वामपंथी, समाजावादी,अंबेडकरी से लेकर गांधी विमर्श के झंडेवरदार तक शामिल है और कुल मिलाकर भारत में राजनीति हिंदुत्व की राजनीति है।

    जाहिर है कि इस हिंदुत्व की राजनीति में उसकी संस्थागत विचारधारा और उसके संस्थागत संगठन के मुकाबले गुपचुप हिंदुत्व की राजनीति तरह तरहे के रंगबिरंगे झंडे और बैनर के साथ कर रहे राजनीतिक वर्ग बेहद कमजोर हो गया है,क्योंकि मीडिया,बाजार ,कारपोरेट और ग्लोबल आर्डर और साम्राज्यवाद के अखंड समर्थन और अखंड धार्मिक ध्रूवीकरण से फासिज्म का निरंकुश राजकाज का प्रतिरोध सिरे से असंभव हो गया है।

    कृपया गौर करें कि हम शुरु से लिख और बोल रहे हैं कि फासीवादी नस्ली नरसंहार कार्यक्रम का यूपी,गुजरात,असम चरण के बाद निर्णायक महाभारत बंगाल का कुरुक्षेत्र है।जहां संस्थागत फासिज्म के राजनीतिक और स्वयंसेवी तमाम सिपाहसालार अपना अपना मोर्चे पर चाकचौबंद इंतजाम के साथ लामबंद हैं।

    कृपया गौर करें कि कोलकाता और बंगाल पर य़ह पेशवा हमला भास्कर पंडित की बर्गी सेना की तरह यूपी,मध्य भारत और बिहार को रौंदने के बाद हो रहा है।अबकी दफा में बोनस में असम और समूचा पूर्वोत्तर है।

    बाकी भारत उनके अधीनस्थ है।दक्षिण भारत की अनार्य पेरियार भूमि भी।

    विडंबना है कि हमारे पढ़े लिखे लोग,खासकर प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्षतावादी जमात के हवा हवाई लोग सच का सामना करने को अब भी तैयार नहीं है।

    सारी कवायद ईवीएम के बदले बैलेट पेपर को वापस लेने जैसे बेमतलब के मुद्दों को लेकर हो रही है,जिनसे हालात बदलने वाले नहीं है।

    सत्ता का रंगभेदी निर्मम बर्बर मनुष्यताविरोधी,प्रकृतिविरोधी,सभ्यता विरोधी चेहरा बेनकाब है और हम एक ही रंग की बात कर रहे हैं।

    बाकी रंग बिरंगे सत्ता अश्वमेधी नरसंहार संस्कृति की हमें कोई परवाह नहीं है।

    अब तमाम धमकियों और वारदातों का प्रतिरोध न होने की निरंतरता के मध्य हुआ सिर्फ इतना है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के युवा नेता योगेश वार्ष्णेय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को 11 लाख रुपए इनाम में देने की बात कही है।

    गौरतलब है कि उत्तर भारत मेंमुस्लिम शिक्षाकेंद्र अलीगढ़ से यह वीडियो जारी हुआ है तो यह बेमतलब या संजोगवश नहीं है।अलीगढ़ को जानबूझकर धर्मोन्माद भूकंप का एपिसेंटर बना दिया गया है।अब तक इतना ही पता चला है कि  योगेश अलीगढ़ में बीजेपी यूथ विंग से जुड़े हुए हैं। जो दी गयी भूमिका का उन्होंने बखूब निर्वाह किया है,उसके मुताबिक उनका एक वीडियो भी सामने आया है। इस मीडिया लायक  सनसनीखेज वीडियो में योगेश कहते हैं, 'बंगाल में लाठीचार्ज का वीडियो देखकर कुछ और विचार नहीं आया बस जो कोई ममता बनर्जी का सिर काटकर यहां रख देगा मैं उसे 11 लाख रुपए दूंगा। ममता बनर्जी का सिर काटकर ले आओ 11 लाख रुपए मैं उसे दिलवाउंगा। मैं दूंगा उसे 11 लाख रुपए।'

    हम बार बार लगातार  बांग्ला,हिंदी और अंग्रेजी में लिख बोल रहे थे कि मंदाक्रामता के बाद अब किसकी बारी है।

    बंगाल की अति मुखर स्वयंभू प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष सिविल सोसाइटी का महिमांडित बाबू कल्चर,जमींदारी विरासत के भद्र समाज ने इसका कोई नोटिस नहीं लिया।असहिष्णुता के किलाप इन्ही लोगों ने पुरस्कार लोटाने वालों की आलोचनी की थी और बंगाल से साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने वाली मंदारक्रांता का बहिस्कार भी इन्हीं लोगों ने कर रखा था।

    बंगाल में बेहद बेशर्मी के साथ,बेहद निर्ममता के साथ भारत विभाजन के बाद जनसंख्या का समायोजन पूर्वी बंगाल के अछूत हिंदुओं को देश भर में छितराने और बंगाल में उनके तमाम हकहकूक और जीवन में हर क्षत्र में उन्हें वंचित करने की जनसंख्या राजीति के तहत हुआ है।

    सत्तावर्ग ने मुस्लिम वोट बैंक के सहारे दलितों और आदिवासियों का सफाया करके सत्ता पर काबिज रहने की प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष राजनीति की है।जिसमें मुसलमानों का न विकास हुआ है और न उनका कोई भला हुआ है।सच्चर कमिटी की रपट ने सारा खुलासा कर दिया है।जिस वजह से वामपंथियों से मुसलमानों का मोहभंग हो गया।बल्कि वंचित तबकों के लिए मुसलमान इसी वोटबैंक राजलीति की वजह से ही घृणा और वैमनस्य के निशाने पर हैं।यह तबका अब शासिज्म की पैदल सेना है।

    संस्थागत फासिज्म की नस्लवादी राजनीति इसी घृणा और वैमनस्य की पूंजी से चल रही है।जाहिर है कि धर्मोन्मादी हिंदुत्व के पक्ष में भीतर ही भीतर एक बड़ा जनाधार बनता रहा है,जिसका मुकाबला भी हिंदुत्व की राजनीति या मुस्लिम वोटबैंक के समीकरण से करने की आत्मघाती राजनीति से किया जाता रहा है।

    कुछ दिनों पहले रामनवमी के मौके पर राम के नाम सशस्त्र शक्ति परीक्षण बंगाल के चप्पे चप्पे पर हुआ तो उसी के साथ सत्तादल ने भारी पैमाने पर हनुमान जयंती मनायी ,जिसे मनाने की बंगाल में कोई परंपरा रही नहीं है।इसके बाद हनुमान जयंती जब हिंदुत्ववादियों ने मनायी तो उसको नियंत्रित करने के लिए सरकार और प्रशासन ने कार्रवाई की है।

    बहुचर्चित वीडियो इसी सरकारी कार्वाई के खिलाफ राज्य की मुख्यमंत्री को ही निशाना बनाकर जारी कर दिया गया है।इसका मकसद सीधे तौर पर बंगाल में धार्मिक ध्रूवीकरण और संक्रामक और तेज बनाने का है।

    जितनी तीव्र प्रतिक्रिया होगी,उतना ही तेझ और भयंकर धार्मिक ध्रूवीकरण होगा,यह सुनियोजित है।

    इस पर गौरक करें कि न्यूज एजेंसी ANI में लगी खबर के मुताबिक, योगेश वार्ष्णेय नाम के नेता ने ऐलान किया है कि जो भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का सिर काटकर लाएगा उसे 11 लाख रुपये का इनाम दिया जाएगा।

    एएनआई के मुताबिक, हनुमान जयंती के मौके पर बीरभूम जिले में लोगों की भीड़ ने 'जय श्री राम' के नारे लगाए.भीड़ को तितर-बितर करने के लिए प्रशासन ने लाठीचार्ज के आदेश दिए थे।

    गौर करें कि इसी के बाद यह विवादित वीडियो बयान सामने आया। भारतीय जनता पार्टी की युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा के एक कार्यकर्ता ने एलान किया है कि जो कोई पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का सिर काट कर लायेगा, उसे वह 11 लाख रुपये का इनाम देंगे। योगेश ने कहा है कि पश्चिम बंगाल के बीरभूम में हनुमान जयंती पर हनुमान भक्तों की पिटाई का वीडियो देखकर उनकी आंखें फटी रह गयीं। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी में इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं है।

    कानूनी कार्रवाई जाहिर है कि होगी।कानून अपने तरीके से काम करेगा। संस्थागत फासिज्म ने गाधी हत्या में अपना हाथ होने के बावजूद दूसरे उग्रवादी आतंकवादी संस्थाओं की तरह उसकी जिम्मेदीरी आज भी स्वीकार नहीं की है लेकिन हत्यारों क महिमांडन उनकी राजनीति का वैचारिक प्रशिक्षण है।

    बदस्तूर योगेश से इस संगठन और उसके राजनीतिक घटक ने पल्ला झाड़ लिया। लेकिर संस्थागत नस्ली फासिज्म के वैचारिक प्रशिक्षण में यह वाइरल वीडियो भारतीय. हिंदू मानस और युवा मानस को किस हद तक संक्रमित करेगा,यह समझने वाली बात है और इस संक्रमण का कोई रोकथाम किसी के पास है या नहीं,कम से कम हमें मालूम नही है।

    प्रशिक्षित बलिप्रदत्त कार्कर्ता योगेश वार्ष्णेय के इस शहादती बयान पर खास तौर पर गौर करें कि ममता बनर्जी का जो भी सिर काटकर लाएगा, मैं उसे 11 लाख का इनाम दूंगा। उन्होंने सीधे आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी न सरस्वती पूजा होने देती हैं और न ही रामनवमी के मौके पर मेला लगाने देती हैं।यह आम शिकायत बंगाल में बेहद लोकप्रिय हिंदुत्व की बहार बागों में है।

    जो आरोप योगेश ने लगाया है ,उसका असर धारिमिक ध्रूवीकरण के लिहाज से रामवाण की तरह होना है।योगेश के मुताबिक  हनुमान जयंती के मौके पर लोगों पर लाठीचार्ज हुआ और उन्हें बुरी तरह पिटवाया गया वह मुसलमानों को खुश करने के लिए इफ्तार पार्टी देती हैं।हमेशा मुसलमानों का सपोर्ट करती हैं। इस नेता ने कहा कि वह इस मामले में पीएम, सीएम योगी और संघ को लेटर भेजेंगे।इससे इस वीडियो के असर का अंदाजा लगा लीजिये।

    गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के बीरभूम में हनुमान जयंती के मौके पर निकाले गए जुलूस पर लाठीचार्ज करने पर योगेश का यह बयान सामने आया है।जहां हनुमान  जयंती के मौके पर हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। पुलिस ने कार्यकर्ताओं को जुलूस की इजाजत नहीं दी थी बल्कि धारा-144 लागू कर दी थी। इसके बावजूद सैकड़ों कार्यकर्ता 'जय श्री राम' के नारों के साथ सड़कों पर उतर आए। इसपर सिउड़ी  के बस स्टैंड पर पुलिसकर्मियों ने जुलूस को जब रोका तो गहमागहमी मच गई। पुलिस ने कार्यकर्ताओं को काबू करने के लिए लाठीचार्ज किया और इलाके में रेपिड एक्शन फोर्स को तैनात किया गया। इस दौरान लगभग 10 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।

    इससे पहले यानी योगेश का वीडियो सामने आने से पहले, भाजपा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर इस मामले में तानाशाही रवैये का आरोप लगाया था।

    गौर करें इससे पहले यानी योगेश का वीडियो सामने आने से पहले बंगाल के भगवाकरण राज्य के दौरे पर आए किरन रिजिजू ने आरोप लगाया था कि ममता बनर्जी सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग विपक्षी पार्टियों पर निशाना साधने के लिए कर रही हैं।

    तो समझ लीजिये कि कौन सा तार कहां से जुड़ा है और करंट का ट्रांसमीटर कहां लगा है।झटका मारने वाली बिजली कहां से आ रही है।

    बहरहाल  बीरभूम जिले के मुख्यालय सिउड़ी में  पुलिस ने रविवार को ही बीर हनुमान जयंती के आयोजकों से कह दिया था कि वे उन्हें मंगलवार को किसी रैली और मीटिंग की इजाजत नहीं देंगे। इसके बाद आयोजकों ने पुलिस को भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि जुलूस में कोई भी हथियार लेकर नहीं आएगा, लेकिन पुलिस फैसले को बदलने को तैयार नहीं हुई। पुलिस की इजाजत के बिना ही भीड़ रैली निकालने पहुंची।

    इस मामले पर मध्य प्रदेश के बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने एएनआई से कहा- मैं इससे सहमत नहीं हूं। ममता जी की तुष्टिकरण की नीति को लेकर नाराजगी हो सकती है, लेकिन हिंसा का समर्थन नहीं कर सकते।

    दूसरी ओर, इसी बीच रांची में दो गुटों में झड़प के बाद माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गयी। घटना मंगलवार दिन के करीब 1.30 बजे की है। मेन रोड में दोनों गुट के बीच मारपीट, हंगामा और पथराव के बाद पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा, आंसू गैस के गोले भी छोड़े। डेली मार्केट और इकरा मसजिद के पास पुलिस ने हंगामा कर रहे लोगों को कई बार खदेड़ा। इकरा मसजिद चौक के पास गली में पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। उपद्रवियों ने कई वाहनों में तोड़फोड़ की. होटल कैपिटल हिल के सामने खड़े चार वाहनों के शीशे तोड़ डाले। पुलिस पर भी पथराव किय। घटना में कई पुलिसकर्मियों को चोटें आयी।पुलिस के लाठीचार्ज में भी कई उपद्रवी घायल हो गये। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मेन रोड में भगदड़ की स्थिति बनी रही। अलबर्ट एक्का चौक से लेकर ओवरब्रिज तक सारी दुकानें बंद हो गयीं। पुलिस ने आम लोगों को मेन रोड में प्रवेश करने से रोक दिया। सूचना मिलने के बाद डोरंडा, बहुबाजार रोड, ओल्ड हजारीबाग रोड और कडरू की भी सारी दुकानें बंद हो गयीं। स्थिति को सामान्य बनाने में पुलिस को करीब ढाई घंटे लगे। शाम के करीब चार बजे के बाद स्थिति सामान्य हुई. इसके बाद मेन रोड में ट्रैफिक खोला गया।

    जाहिर है कि बंगाल  में तलवार पर राजनीति गरमा गयी है।हिंदुित्व के नाम पर आम लोग हथियारबंद जत्थों में तब्दील हो रहे है।हालत यह है कि  आसनसोल के मेयर व पांडेश्वर से तृणमूल विधायक जीतेंद्र तिवारी के खिलाफ रामनवमी के दिन तलवार के साथ शोभायात्रा निकालने को लेकर पांडेश्वर थाने में एफआइआर दर्ज की गयी है। पुलिस ने उनके खिलाफ जांच शुरू कर दी है।

    रांची की ताजा वारदात से साफ जाहिर है कि अब किसी एक सूबा,किसी यूपी,गुजरात ,असम या बंगाल में मजहबी सियासत की आग भड़काने तक सीमित नहीं है यह नस्ली जनसंख्या शपाया अभियान का धर्मोन्मादी एजंडा,निशाने पर झारखंड बिहार,समूचा पूर्वोत्तर और बाकी देश है।

    गौरतलब है कि योगेश का यह वीडियो वाइरल होने से पहले अदालत के बाहर समाधान की संभावना से इनकार करते हुए विहिप के अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन ने मंगलवार को कहा कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए संसद में एक कानून पारित किया जाना चाहिए। जैन ने कोलकाता में  प्रेस क्लब में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा : सरकार पर हमें पूरा भरोसा है और हमें लगता है अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए जल्द ही एक कानून पारित किया जायेगा। अयोध्या में राम मंदिर बनाने के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का वादा हमारे निश्चय से कहीं कम नहीं है।

    विहिप नेता का दावा है कि चूंकि योगी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद राम मंदिर निर्माण का वादा किया है। इसलिए मोदी और योगी की जोड़ी निश्चित रूप से अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करवायेगी।  शीर्ष न्यायालय द्वारा दिये गये कोर्ट के बाहर समाधान करने के सुझाव की संभावना से इनकार करते हुए श्री जैन ने कहा : मुसलिम समुदाय से अन्य पक्ष चर्चा में  और विमर्श में रुचि नहीं ले रहे हैं। इसलिए किसके साथ हम इस विषय पर चर्चा करें और समाधान करें, इस मुद्दे का समाधान निकालने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है, एक कानून पारित करना और अयोध्या में राम मंदिर बनाना।

    गौरतलब है कि यूपी में योगी को आनंदमठ के संतान दल के सन्यासी का अवतार बताया जा रहा है।आनंदमठ को बंगाल में बंकिम चंद्र ने लिखा और हिंदुत्व की राजनीति भी बंगाल से शुरु हुआ है।इसलिए साफ जाहिर है कि कोलकाता में इस घोषणा का मकसद सुनियोजित किसी परिकल्पना को अंजाम देने का ही है और बाकी पूरा घटनाक्रम उसी क्रम में है।गौर करें,यह पूछे जाने पर कि राज्यसभा में बहुमत नहीं होने पर भाजपा नीत राजग सरकार कानून किस तरह पारित करा पायेगी, जैन ने कहा : ऐसे कई उदाहरण हैं, जब संसद में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के जरिये विधेयक पारित हुए हैं। राम मंदिर के बाबत एक विधेयक भी संयुक्त बैठक के जरिये पारित कराया जा सकता है।   जैन से जब पूछा गया कि क्या विहिप को केंद्र से इस विषय पर कोई आश्वासन मिला है, तो उन्होंने कहा : हम सब जानते हैं कि मोदीजी को आश्चर्यचकित करने में महारत हासिल है।इस मामले में भी आप एक आश्चर्य देख सकते हैं।



    Video:https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/1681994808495588/?l=1835399672213656272
    Shramik krishak Maitrui Swsthaya kendra,Chengaile
    2014 के बाद भारत सरकार ने स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में कटौती कर दी।(I could not complete the talk as the link disrupted and the talk ended abruptly.But you may get the point in dscription.I had to focus on the Shramik krishak Maitrui Swsthaya kendra,Chengaile to inform the rest of the nation about this excellent experiment.
    आवाज उठायें कि स्वास्थ्य कोई भीख नहीं है, स्वास्थ्य हमारा अधिकार है।सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसंगत चिकित्सा की जिम्मेदारी सरकार लें।

    `सबके लिए स्वास्थ्य'संभव है।

    सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसम्मत चिकित्सा संभव है
    सिर्फ विकसित देशों में नहीं,हमारे जैसे गरीब देशों में भी।
    "সবার জন্যে স্বাস্থ্য"সম্ভব।

    भारत सरकार की गठित एक उच्चस्तरीय स्वास्थ्य कमिटी ने ऐसा ही कहा है। कांग्रेस के सत्ताकाल में 2010 में गठित इस कमिटी के सभापिति डा. श्रीनाथ रेड्डी थे। रेड्डी कमिटी ने कहा था, अभ्यंतरीन उत्पादन के 1.4 से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य के मद में सरकार अगर खर्च करें तो हमारे देश में भी सबके लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम की व्यवस्था लागू की जी सकती है। यानी यह आपका या मेरा आकाश कुसुम सपना नहीं है, सरकार की सलाहकार विशेषज्ञ समिति ही ऐसा कह रही है। बहरहाल, भारत की बात छोड़ दें, इस दुनिया के कम से कम 41 देशों की सरकारों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है। जर्मनी और इंग्लैंड की तरह धनी देशों से लेकर पेरु या श्रीलंका की तरह तथाकथित गरीब देशों में भी यह व्यवस्था चालू हो गयी है।उन्होंने ऐसा कैसे संभव कर दिखाया? हमारे अपने देश में यह क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?

    क्या होना चाहिए था ?
    विश्व स्वास्थ्य संस्था या WHO (World Health Organization) ने 1978 में एक सनद जारी किया, जिसमें कहा गया कि सन् 2000 के अंदर सबके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करनी होगी। इस सनद पर दस्तखत करने वाले तमाम देशों में भारतवर्ष अन्यतम रहा है। आज 2017 में भी भारत ने यह स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू नहीं किया है। आज भी जेब से पैसे खर्च करके स्वास्थ्य (या सरल भाषा में इलाज) खरीदना होता है। इसके बावजूद उपयुक्त, सही, विज्ञानसम्मत चिकित्सा मिलेगी ,इसकी कोई गारंटी नहीं है।ऐसा क्यों है, बताइये।

    इन मांगों को लेकर हम पिछले चार साल से आंदोलन कर रहे हैं। अगस्त ,2015 में 33 संगठनों को लेकर बंगालभर में सबके लिए स्वास्थ्य प्रचार समिति का गठन करके सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। बंगालभर में यह प्रचार अभियान चल रहा है। 24 जनवरी,2016 को स्वास्थ्य की मांग लेकर कोलकाता यूनिवर्सिटी इंस्टीच्युट में एक जन कांवेंशन हो गया। जिसमें डा. श्रीनाथ रेड्डी, डा.विनायक सेन और दूसरों ने अपने वक्तव्य पेश किये। पिछले साल 7 अप्रैल को, हमने `विश्व स्वास्थ्य दिवस ' `सबके लिए स्वास्थ्य दिवस'के रुप में मनाया। हमने इस मौके पर डा. श्रीनाथ रेड्डी कमिटी की सिफारिशों के मुताबिक ये मांगें रखी थींः

    केंद्र या राज्य की सरकारी संस्था के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा दी जायें।
    सभी स्वास्थ्य सेवाएं निःशुल्क हों।
    सारी अत्यावश्यक दवाइयां निःशुल्क दी जायें।
    सभी नागरिकों को आधार कार्ड की तर्ज पर HEALTH ENTITLEMENT CARD दिया जाये। जिस कार्ड के जरिये भारतवर्ष में कहीं भी उन्हें स्वास्थ्य सेवाें निःशुल्क मिलें। 
    स्वास्थ्य बीमा भ्रष्टाचार का स्रोत है,इस व्यवस्था को तुरंत खत्म कर दिया जाये।

    लेकिन हुआ क्या ?

    कांगेसी सरकार ने तो रेड्डी समिति की किसी भी सिफारिश को नहीं माना.इस पर तुर्रा यह कि भाजपा ने सत्ता में आकर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में 9.4 प्रतिशत कटौती कर दी।सरकार की भूमिका मैनेजर की हो गयी और स्वास्थ्य क्षेत्र में गैरसरकारी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में तृणमूल सरकार के जमाने में कई उल्लेखनीय परिवर्तन हो गये हैं।पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रकाशित Health on the March,14 -15 के मुताबिकः

    फरवरी, 2012में डाक्टरों से जेनेरिक दवाएं नूस्खे पर लिखने के लिए कहा गया।

    2.सरकारी अस्पतालों में अस्वस्थ नवजात शिशुओं की चिकित्सा के लिए सिक निओनेटाल केअर यूनिट(एसएलसीयू) और सिक निओनेटाल स्टेबेलाइजिंग यूनिट की संख्या बढ़ा दी गयी।

    3.विभिन्न सरकारी अस्पतालों में उचित मूल्य पर दवाओं की दुकानें चालू हो गयी हैं,जहां से 142 अत्यावश्यक दवाइयां 48 से 67.25 प्रतिशत कम कीमत पर खरीदी जा सकती है।इसके अलावा इन दुकानों में एंजिओप्लास्टि में इस्तेमाल किये जाने वाले स्टेंट, पेसमेकर, अस्थि चिकित्सा के लिए इम्प्लांट इत्यादि भी रियायती दरों पर खरीदे जा सकते हैं।

    4,मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़कर 17 हो गयीं,जहां 2200 सीटें हैं।

    4.पिछड़ा क्षेत्र विकास खाते से देहात में तेरह मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना का कमा चल रहा है।

    6.जिला अस्पतालों और मेडिकल कालेज अस्पतालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है।

    7. 9 फरवरी,2014 को जारी एक सरकारी निर्देश में कहा गया है कि सरकारी अस्पतालों में आउटडोर और इनडोर फ्री बेड पर निःशुल्क अत्यावश्यक दवाओं की आपूर्ति की जाये।

    8. 3 मार्च,2014 को जारी एक आदेश में कहा गया है कि अब से सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की लिखी दवाइयों का पूरा कोर्स मरीजों को दिया जायेगा।

    9. विभिन्न सरकारी अस्पतालों में सिटी स्कैन, एमआरआई, एक्सरे और किसी किसी मामले में विभिन्न तरह की खून की जांच के लिए सरकार ने पीपीपी माडल के तहत गैरसरकारी संस्थाओं के साथ समझौता किया है,जिसके तहत मरीज बाजार की तुलना में कुछ कम कीमत पर ये जांच पड़ताल करा सकते हैं।

    इसके अलावा अक्तूबर,2015 से पश्चिम बंगाल के सारे सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में चिकित्सा पर सारा खर्च निःशुल्क कर दिया गया है (हालांकि पीपीपी माडल की सारी सेवाओं पर यह लागू नहीं है।
    वास्तव में हुआ क्या है?
    सारी चिकित्सा निःशुल्क है,ऐसा सुनने पर लगता है कि `यह तो जैसे सबके लिए स्वास्थ्य का हमारा सपना सच हो गया'। किंतु मित्रों.असल में ऐसी कोई तस्वीर बनती नहीं है। सबकुछ मुफ्त मिलेगा,ऐसा सरकारी ऐलान हो जाने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। सभी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। आपरेशन, रेडियोथेरापी, केमोथेपरापी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।पेस मेकर, स्टेंट, प्रस्थेसिस काफी मात्रा में न मिलने से मरीजों को खाली हाथ लौटाकर बार बार बुलाया जा रहा है। ढांचा, डाक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाये बिना सबकुछ मुफ्त है,ऐलान कर देने से चिकित्सा का स्तर लगातार गिर रहा है।कहीं वार्मर में बच्चा झुलस रहा है तो कहीं तीमारदार डाक्टर नर्स को पीट रहे हैं।असलियत की तस्वीर यह है।

    हाल में हमारी मुख्यमंत्री ने कोलकाता के बड़े बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के प्रबंधकों को बुलाकर उन्हें थोड़ा बहुत डांटा फटकारा है। जिनपर आरोप है कि वे मुनाफाखोरी के लिए मरीजों की परवाह नहीं करते।किंतु समझने वाली बात तो यह है कि जो लोग कारोबार चला रहे हैं ,वे डांट फटकार की वजह से मरीजों के हित में सोचना शुरु कर देंगे,ऐसा समझना गलत है। स्वास्थ्य के साथ जहां रुपयों का लेन देन का मामला जुड़ा हुआ है,ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था में किसी भी स्थिति में मुनाफा को हाशिये पर रखकर पहले मरीज के सर्वोत्तम हित के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इसके अलावा सवाल तो यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कराने के बदले गैरसरकारी अस्पतालों में सेहत खरीदने के लिए लोग आखिर क्यों चले जाते हैं। जा इसलिए रहे हैं कि मुफ्त में जो मिलने का ऐलान है,हकीकत में उसका कोई वजूद ही नहीं है।अगर जेब में पैसे हों तो लोग सरकारी अस्पताल के दरवज्जे पर झांकने भी नहीं जाते। बड़ी संख्या में सुपरस्पेशलिटी अस्पताल हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं, नर्स नहीं है, दवाएं और उपकरण नहीं हैं। बेड मिलता नहीं है और मरणासन्न रोगी को इस अस्पताल से उस अस्पताल को रिफर करते रहने की मजह से परिजन उसे लेकर भटकते ही रहते हैं। अंत में कोई उपाय न होने की वजह से ही वे गैरसरकारी अस्पतालों में चले जाते हैं।जिनके पास पैसे हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ है तो जिनके पास पैसे नहीं हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ और है।दोनों ही व्यवस्था साथ सात चलते रहने की स्थिति में विज्ञानसंगत चिकित्सा किसीकी नहीं होती। किसी को जरुरत के हिसाब से काफी ज्यादा मिल जाता है तो दूसरों को थोड़ा बहुत फ्री माल मिल जाता है। इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि देश में सभी के लिए एक ही व्यवस्था बनायी जाये, जिससे पैसे पर यह कतई निर्भर न हो कि किसे किस तरह का इलाज मिलता है। ऐसी व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार लें, कोई मुनाफाखोर स्वास्थ्यविक्रेता नहीं। यह सोचने पर अचरज होता है कि सारा जोर `सबके लिए आधार कार्ड'की मांग पर है लेकिन `सबके लिए स्वास्थ्य'को लेकर तनिक परवाह किसी को नहीं है।

    इसलिए इस साल भी हम विश्व स्वास्थ्य दिवस सबके लिए स्वास्थ की मांग दिवस के रुप में मनाने जा रहे हैं।आप भी आइये। आइये कि हम आवाज उठायें कि स्वास्थ्य कोई भीख नहीं है, स्वास्थ्य हमारा अधिकार है।सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसंगत चिकित्सा की जिम्मेदारी सरकार लें।

    श्रमजीवी स्वास्थ्य पहल 

    2014 के बाद भारत सरकार ने स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में कटौती कर दी।

    `सबके लिए स्वास्थ्य'संभव है।

    सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसम्मत चिकित्सा संभव है
    सिर्फ विकसित देशों में नहीं,हमारे जैसे गरीब देशों में भी।
    "সবার জন্যে স্বাস্থ্য"সম্ভব।

    भारत सरकार की गठित एक उच्चस्तरीय स्वास्थ्य कमिटी ने ऐसा ही कहा है। कांग्रेस के सत्ताकाल में 2010 में गठित इस कमिटी के सभापिति डा. श्रीनाथ रेड्डी थे। रेड्डी कमिटी ने कहा था, अभ्यंतरीन उत्पादन के 1.4 से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य के मद में सरकार अगर खर्च करें तो हमारे देश में भी सबके लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम की व्यवस्था लागू की जी सकती है। यानी यह आपका या मेरा आकाश कुसुम सपना नहीं है, सरकार की सलाहकार विशेषज्ञ समिति ही ऐसा कह रही है। बहरहाल, भारत की बात छोड़ दें, इस दुनिया के कम से कम 41 देशों की सरकारों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है। जर्मनी और इंग्लैंड की तरह धनी देशों से लेकर पेरु या श्रीलंका की तरह तथाकथित गरीब देशों में भी यह व्यवस्था चालू हो गयी है।उन्होंने ऐसा कैसे संभव कर दिखाया? हमारे अपने देश में यह क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?

    क्या होना चाहिए था ?
    विश्व स्वास्थ्य संस्था या WHO (World Health Organization) ने 1978 में एक सनद जारी किया, जिसमें कहा गया कि सन् 2000 के अंदर सबके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करनी होगी। इस सनद पर दस्तखत करने वाले तमाम देशों में भारतवर्ष अन्यतम रहा है। आज 2017 में भी भारत ने यह स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू नहीं किया है। आज भी जेब से पैसे खर्च करके स्वास्थ्य (या सरल भाषा में इलाज) खरीदना होता है। इसके बावजूद उपयुक्त, सही, विज्ञानसम्मत चिकित्सा मिलेगी ,इसकी कोई गारंटी नहीं है।ऐसा क्यों है, बताइये।

    इन मांगों को लेकर हम पिछले चार साल से आंदोलन कर रहे हैं। अगस्त ,2015 में 33 संगठनों को लेकर बंगालभर में सबके लिए स्वास्थ्य प्रचार समिति का गठन करके सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। बंगालभर में यह प्रचार अभियान चल रहा है। 24 जनवरी,2016 को स्वास्थ्य की मांग लेकर कोलकाता यूनिवर्सिटी इंस्टीच्युट में एक जन कांवेंशन हो गया। जिसमें डा. श्रीनाथ रेड्डी, डा.विनायक सेन और दूसरों ने अपने वक्तव्य पेश किये। पिछले साल 7 अप्रैल को, हमने `विश्व स्वास्थ्य दिवस ' `सबके लिए स्वास्थ्य दिवस'के रुप में मनाया। हमने इस मौके पर डा. श्रीनाथ रेड्डी कमिटी की सिफारिशों के मुताबिक ये मांगें रखी थींः

    केंद्र या राज्य की सरकारी संस्था के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा दी जायें।
    सभी स्वास्थ्य सेवाएं निःशुल्क हों।
    सारी अत्यावश्यक दवाइयां निःशुल्क दी जायें।
    सभी नागरिकों को आधार कार्ड की तर्ज पर HEALTH ENTITLEMENT CARD दिया जाये। जिस कार्ड के जरिये भारतवर्ष में कहीं भी उन्हें स्वास्थ्य सेवाें निःशुल्क मिलें। 
    स्वास्थ्य बीमा भ्रष्टाचार का स्रोत है,इस व्यवस्था को तुरंत खत्म कर दिया जाये।

    लेकिन हुआ क्या ?

    कांगेसी सरकार ने तो रेड्डी समिति की किसी भी सिफारिश को नहीं माना.इस पर तुर्रा यह कि भाजपा ने सत्ता में आकर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में 9.4 प्रतिशत कटौती कर दी।सरकार की भूमिका मैनेजर की हो गयी और स्वास्थ्य क्षेत्र में गैरसरकारी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में तृणमूल सरकार के जमाने में कई उल्लेखनीय परिवर्तन हो गये हैं।पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रकाशित Health on the March,14 -15 के मुताबिकः

    फरवरी, 2012में डाक्टरों से जेनेरिक दवाएं नूस्खे पर लिखने के लिए कहा गया।

    2.सरकारी अस्पतालों में अस्वस्थ नवजात शिशुओं की चिकित्सा के लिए सिक निओनेटाल केअर यूनिट(एसएलसीयू) और सिक निओनेटाल स्टेबेलाइजिंग यूनिट की संख्या बढ़ा दी गयी।

    3.विभिन्न सरकारी अस्पतालों में उचित मूल्य पर दवाओं की दुकानें चालू हो गयी हैं,जहां से 142 अत्यावश्यक दवाइयां 48 से 67.25 प्रतिशत कम कीमत पर खरीदी जा सकती है।इसके अलावा इन दुकानों में एंजिओप्लास्टि में इस्तेमाल किये जाने वाले स्टेंट, पेसमेकर, अस्थि चिकित्सा के लिए इम्प्लांट इत्यादि भी रियायती दरों पर खरीदे जा सकते हैं।

    4,मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़कर 17 हो गयीं,जहां 2200 सीटें हैं।

    4.पिछड़ा क्षेत्र विकास खाते से देहात में तेरह मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना का कमा चल रहा है।

    6.जिला अस्पतालों और मेडिकल कालेज अस्पतालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है।

    7. 9 फरवरी,2014 को जारी एक सरकारी निर्देश में कहा गया है कि सरकारी अस्पतालों में आउटडोर और इनडोर फ्री बेड पर निःशुल्क अत्यावश्यक दवाओं की आपूर्ति की जाये।

    8. 3 मार्च,2014 को जारी एक आदेश में कहा गया है कि अब से सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की लिखी दवाइयों का पूरा कोर्स मरीजों को दिया जायेगा।

    9. विभिन्न सरकारी अस्पतालों में सिटी स्कैन, एमआरआई, एक्सरे और किसी किसी मामले में विभिन्न तरह की खून की जांच के लिए सरकार ने पीपीपी माडल के तहत गैरसरकारी संस्थाओं के साथ समझौता किया है,जिसके तहत मरीज बाजार की तुलना में कुछ कम कीमत पर ये जांच पड़ताल करा सकते हैं।

    इसके अलावा अक्तूबर,2015 से पश्चिम बंगाल के सारे सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में चिकित्सा पर सारा खर्च निःशुल्क कर दिया गया है (हालांकि पीपीपी माडल की सारी सेवाओं पर यह लागू नहीं है।
    वास्तव में हुआ क्या है?
    सारी चिकित्सा निःशुल्क है,ऐसा सुनने पर लगता है कि `यह तो जैसे सबके लिए स्वास्थ्य का हमारा सपना सच हो गया'। किंतु मित्रों.असल में ऐसी कोई तस्वीर बनती नहीं है। सबकुछ मुफ्त मिलेगा,ऐसा सरकारी ऐलान हो जाने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। सभी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। आपरेशन, रेडियोथेरापी, केमोथेपरापी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।पेस मेकर, स्टेंट, प्रस्थेसिस काफी मात्रा में न मिलने से मरीजों को खाली हाथ लौटाकर बार बार बुलाया जा रहा है। ढांचा, डाक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाये बिना सबकुछ मुफ्त है,ऐलान कर देने से चिकित्सा का स्तर लगातार गिर रहा है।कहीं वार्मर में बच्चा झुलस रहा है तो कहीं तीमारदार डाक्टर नर्स को पीट रहे हैं।असलियत की तस्वीर यह है।

    हाल में हमारी मुख्यमंत्री ने कोलकाता के बड़े बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के प्रबंधकों को बुलाकर उन्हें थोड़ा बहुत डांटा फटकारा है। जिनपर आरोप है कि वे मुनाफाखोरी के लिए मरीजों की परवाह नहीं करते।किंतु समझने वाली बात तो यह है कि जो लोग कारोबार चला रहे हैं ,वे डांट फटकार की वजह से मरीजों के हित में सोचना शुरु कर देंगे,ऐसा समझना गलत है। स्वास्थ्य के साथ जहां रुपयों का लेन देन का मामला जुड़ा हुआ है,ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था में किसी भी स्थिति में मुनाफा को हाशिये पर रखकर पहले मरीज के सर्वोत्तम हित के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इसके अलावा सवाल तो यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कराने के बदले गैरसरकारी अस्पतालों में सेहत खरीदने के लिए लोग आखिर क्यों चले जाते हैं। जा इसलिए रहे हैं कि मुफ्त में जो मिलने का ऐलान है,हकीकत में उसका कोई वजूद ही नहीं है।अगर जेब में पैसे हों तो लोग सरकारी अस्पताल के दरवज्जे पर झांकने भी नहीं जाते। बड़ी संख्या में सुपरस्पेशलिटी अस्पताल हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं, नर्स नहीं है, दवाएं और उपकरण नहीं हैं। बेड मिलता नहीं है और मरणासन्न रोगी को इस अस्पताल से उस अस्पताल को रिफर करते रहने की मजह से परिजन उसे लेकर भटकते ही रहते हैं। अंत में कोई उपाय न होने की वजह से ही वे गैरसरकारी अस्पतालों में चले जाते हैं।जिनके पास पैसे हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ है तो जिनके पास पैसे नहीं हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ और है।दोनों ही व्यवस्था साथ सात चलते रहने की स्थिति में विज्ञानसंगत चिकित्सा किसीकी नहीं होती। किसी को जरुरत के हिसाब से काफी ज्यादा मिल जाता है तो दूसरों को थोड़ा बहुत फ्री माल मिल जाता है। इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि देश में सभी के लिए एक ही व्यवस्था बनायी जाये, जिससे पैसे पर यह कतई निर्भर न हो कि किसे किस तरह का इलाज मिलता है। ऐसी व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार लें, कोई मुनाफाखोर स्वास्थ्यविक्रेता नहीं। यह सोचने पर अचरज होता है कि सारा जोर `सबके लिए आधार कार्ड'की मांग पर है लेकिन `सबके लिए स्वास्थ्य'को लेकर तनिक परवाह किसी को नहीं है।

    इसलिए इस साल भी हम विश्व स्वास्थ्य दिवस सबके लिए स्वास्थ की मांग दिवस के रुप में मनाने जा रहे हैं।आप भी आइये। आइये कि हम आवाज उठायें कि स्वास्थ्य कोई भीख नहीं है, स्वास्थ्य हमारा अधिकार है।सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसंगत चिकित्सा की जिम्मेदारी सरकार लें।

    श्रमजीवी स्वास्थ्य पहल 

    2014 के बाद भारत सरकार ने स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में कटौती कर दी।

    `सबके लिए स्वास्थ्य'संभव है।

    सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसम्मत चिकित्सा संभव है
    सिर्फ विकसित देशों में नहीं,हमारे जैसे गरीब देशों में भी।
    "সবার জন্যে স্বাস্থ্য"সম্ভব।

    भारत सरकार की गठित एक उच्चस्तरीय स्वास्थ्य कमिटी ने ऐसा ही कहा है। कांग्रेस के सत्ताकाल में 2010 में गठित इस कमिटी के सभापिति डा. श्रीनाथ रेड्डी थे। रेड्डी कमिटी ने कहा था, अभ्यंतरीन उत्पादन के 1.4 से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य के मद में सरकार अगर खर्च करें तो हमारे देश में भी सबके लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम की व्यवस्था लागू की जी सकती है। यानी यह आपका या मेरा आकाश कुसुम सपना नहीं है, सरकार की सलाहकार विशेषज्ञ समिति ही ऐसा कह रही है। बहरहाल, भारत की बात छोड़ दें, इस दुनिया के कम से कम 41 देशों की सरकारों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है। जर्मनी और इंग्लैंड की तरह धनी देशों से लेकर पेरु या श्रीलंका की तरह तथाकथित गरीब देशों में भी यह व्यवस्था चालू हो गयी है।उन्होंने ऐसा कैसे संभव कर दिखाया? हमारे अपने देश में यह क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?

    क्या होना चाहिए था ?
    विश्व स्वास्थ्य संस्था या WHO (World Health Organization) ने 1978 में एक सनद जारी किया, जिसमें कहा गया कि सन् 2000 के अंदर सबके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करनी होगी। इस सनद पर दस्तखत करने वाले तमाम देशों में भारतवर्ष अन्यतम रहा है। आज 2017 में भी भारत ने यह स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू नहीं किया है। आज भी जेब से पैसे खर्च करके स्वास्थ्य (या सरल भाषा में इलाज) खरीदना होता है। इसके बावजूद उपयुक्त, सही, विज्ञानसम्मत चिकित्सा मिलेगी ,इसकी कोई गारंटी नहीं है।ऐसा क्यों है, बताइये।

    इन मांगों को लेकर हम पिछले चार साल से आंदोलन कर रहे हैं। अगस्त ,2015 में 33 संगठनों को लेकर बंगालभर में सबके लिए स्वास्थ्य प्रचार समिति का गठन करके सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। बंगालभर में यह प्रचार अभियान चल रहा है। 24 जनवरी,2016 को स्वास्थ्य की मांग लेकर कोलकाता यूनिवर्सिटी इंस्टीच्युट में एक जन कांवेंशन हो गया। जिसमें डा. श्रीनाथ रेड्डी, डा.विनायक सेन और दूसरों ने अपने वक्तव्य पेश किये। पिछले साल 7 अप्रैल को, हमने `विश्व स्वास्थ्य दिवस ' `सबके लिए स्वास्थ्य दिवस'के रुप में मनाया। हमने इस मौके पर डा. श्रीनाथ रेड्डी कमिटी की सिफारिशों के मुताबिक ये मांगें रखी थींः

    केंद्र या राज्य की सरकारी संस्था के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा दी जायें।
    सभी स्वास्थ्य सेवाएं निःशुल्क हों।
    सारी अत्यावश्यक दवाइयां निःशुल्क दी जायें।
    सभी नागरिकों को आधार कार्ड की तर्ज पर HEALTH ENTITLEMENT CARD दिया जाये। जिस कार्ड के जरिये भारतवर्ष में कहीं भी उन्हें स्वास्थ्य सेवाें निःशुल्क मिलें। 
    स्वास्थ्य बीमा भ्रष्टाचार का स्रोत है,इस व्यवस्था को तुरंत खत्म कर दिया जाये।

    लेकिन हुआ क्या ?

    कांगेसी सरकार ने तो रेड्डी समिति की किसी भी सिफारिश को नहीं माना.इस पर तुर्रा यह कि भाजपा ने सत्ता में आकर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में 9.4 प्रतिशत कटौती कर दी।सरकार की भूमिका मैनेजर की हो गयी और स्वास्थ्य क्षेत्र में गैरसरकारी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में तृणमूल सरकार के जमाने में कई उल्लेखनीय परिवर्तन हो गये हैं।पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रकाशित Health on the March,14 -15 के मुताबिकः

    फरवरी, 2012में डाक्टरों से जेनेरिक दवाएं नूस्खे पर लिखने के लिए कहा गया।

    2.सरकारी अस्पतालों में अस्वस्थ नवजात शिशुओं की चिकित्सा के लिए सिक निओनेटाल केअर यूनिट(एसएलसीयू) और सिक निओनेटाल स्टेबेलाइजिंग यूनिट की संख्या बढ़ा दी गयी।

    3.विभिन्न सरकारी अस्पतालों में उचित मूल्य पर दवाओं की दुकानें चालू हो गयी हैं,जहां से 142 अत्यावश्यक दवाइयां 48 से 67.25 प्रतिशत कम कीमत पर खरीदी जा सकती है।इसके अलावा इन दुकानों में एंजिओप्लास्टि में इस्तेमाल किये जाने वाले स्टेंट, पेसमेकर, अस्थि चिकित्सा के लिए इम्प्लांट इत्यादि भी रियायती दरों पर खरीदे जा सकते हैं।

    4,मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़कर 17 हो गयीं,जहां 2200 सीटें हैं।

    4.पिछड़ा क्षेत्र विकास खाते से देहात में तेरह मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना का कमा चल रहा है।

    6.जिला अस्पतालों और मेडिकल कालेज अस्पतालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है।

    7. 9 फरवरी,2014 को जारी एक सरकारी निर्देश में कहा गया है कि सरकारी अस्पतालों में आउटडोर और इनडोर फ्री बेड पर निःशुल्क अत्यावश्यक दवाओं की आपूर्ति की जाये।

    8. 3 मार्च,2014 को जारी एक आदेश में कहा गया है कि अब से सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की लिखी दवाइयों का पूरा कोर्स मरीजों को दिया जायेगा।

    9. विभिन्न सरकारी अस्पतालों में सिटी स्कैन, एमआरआई, एक्सरे और किसी किसी मामले में विभिन्न तरह की खून की जांच के लिए सरकार ने पीपीपी माडल के तहत गैरसरकारी संस्थाओं के साथ समझौता किया है,जिसके तहत मरीज बाजार की तुलना में कुछ कम कीमत पर ये जांच पड़ताल करा सकते हैं।

    इसके अलावा अक्तूबर,2015 से पश्चिम बंगाल के सारे सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में चिकित्सा पर सारा खर्च निःशुल्क कर दिया गया है (हालांकि पीपीपी माडल की सारी सेवाओं पर यह लागू नहीं है।
    वास्तव में हुआ क्या है?
    सारी चिकित्सा निःशुल्क है,ऐसा सुनने पर लगता है कि `यह तो जैसे सबके लिए स्वास्थ्य का हमारा सपना सच हो गया'। किंतु मित्रों.असल में ऐसी कोई तस्वीर बनती नहीं है। सबकुछ मुफ्त मिलेगा,ऐसा सरकारी ऐलान हो जाने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। सभी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। आपरेशन, रेडियोथेरापी, केमोथेपरापी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।पेस मेकर, स्टेंट, प्रस्थेसिस काफी मात्रा में न मिलने से मरीजों को खाली हाथ लौटाकर बार बार बुलाया जा रहा है। ढांचा, डाक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाये बिना सबकुछ मुफ्त है,ऐलान कर देने से चिकित्सा का स्तर लगातार गिर रहा है।कहीं वार्मर में बच्चा झुलस रहा है तो कहीं तीमारदार डाक्टर नर्स को पीट रहे हैं।असलियत की तस्वीर यह है।

    हाल में हमारी मुख्यमंत्री ने कोलकाता के बड़े बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के प्रबंधकों को बुलाकर उन्हें थोड़ा बहुत डांटा फटकारा है। जिनपर आरोप है कि वे मुनाफाखोरी के लिए मरीजों की परवाह नहीं करते।किंतु समझने वाली बात तो यह है कि जो लोग कारोबार चला रहे हैं ,वे डांट फटकार की वजह से मरीजों के हित में सोचना शुरु कर देंगे,ऐसा समझना गलत है। स्वास्थ्य के साथ जहां रुपयों का लेन देन का मामला जुड़ा हुआ है,ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था में किसी भी स्थिति में मुनाफा को हाशिये पर रखकर पहले मरीज के सर्वोत्तम हित के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इसके अलावा सवाल तो यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कराने के बदले गैरसरकारी अस्पतालों में सेहत खरीदने के लिए लोग आखिर क्यों चले जाते हैं। जा इसलिए रहे हैं कि मुफ्त में जो मिलने का ऐलान है,हकीकत में उसका कोई वजूद ही नहीं है।अगर जेब में पैसे हों तो लोग सरकारी अस्पताल के दरवज्जे पर झांकने भी नहीं जाते। बड़ी संख्या में सुपरस्पेशलिटी अस्पताल हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं, नर्स नहीं है, दवाएं और उपकरण नहीं हैं। बेड मिलता नहीं है और मरणासन्न रोगी को इस अस्पताल से उस अस्पताल को रिफर करते रहने की मजह से परिजन उसे लेकर भटकते ही रहते हैं। अंत में कोई उपाय न होने की वजह से ही वे गैरसरकारी अस्पतालों में चले जाते हैं।जिनके पास पैसे हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ है तो जिनके पास पैसे नहीं हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ और है।दोनों ही व्यवस्था साथ सात चलते रहने की स्थिति में विज्ञानसंगत चिकित्सा किसीकी नहीं होती। किसी को जरुरत के हिसाब से काफी ज्यादा मिल जाता है तो दूसरों को थोड़ा बहुत फ्री माल मिल जाता है। इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि देश में सभी के लिए एक ही व्यवस्था बनायी जाये, जिससे पैसे पर यह कतई निर्भर न हो कि किसे किस तरह का इलाज मिलता है। ऐसी व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार लें, कोई मुनाफाखोर स्वास्थ्यविक्रेता नहीं। यह सोचने पर अचरज होता है कि सारा जोर `सबके लिए आधार कार्ड'की मांग पर है लेकिन `सबके लिए स्वास्थ्य'को लेकर तनिक परवाह किसी को नहीं है।

    इसलिए इस साल भी हम विश्व स्वास्थ्य दिवस सबके लिए स्वास्थ की मांग दिवस के रुप में मनाने जा रहे हैं।आप भी आइये। आइये कि हम आवाज उठायें कि स्वास्थ्य कोई भीख नहीं है, स्वास्थ्य हमारा अधिकार है।सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसंगत चिकित्सा की जिम्मेदारी सरकार लें।

    श्रमजीवी स्वास्थ्य पहल
     

    सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसम्मत चिकित्सा संभव है
    सिर्फ विकसित देशों में नहीं,हमारे जैसे गरीब देशों में भी।
    "সবার জন্যে স্বাস্থ্য"সম্ভব।

    भारत सरकार की गठित एक उच्चस्तरीय स्वास्थ्य कमिटी ने ऐसा ही कहा है। कांग्रेस के सत्ताकाल में 2010 में गठित इस कमिटी के सभापिति डा. श्रीनाथ रेड्डी थे। रेड्डी कमिटी ने कहा था, अभ्यंतरीन उत्पादन के 1.4 से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य के मद में सरकार अगर खर्च करें तो हमारे देश में भी सबके लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम की व्यवस्था लागू की जी सकती है। यानी यह आपका या मेरा आकाश कुसुम सपना नहीं है, सरकार की सलाहकार विशेषज्ञ समिति ही ऐसा कह रही है। बहरहाल, भारत की बात छोड़ दें, इस दुनिया के कम से कम 41 देशों की सरकारों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है। जर्मनी और इंग्लैंड की तरह धनी देशों से लेकर पेरु या श्रीलंका की तरह तथाकथित गरीब देशों में भी यह व्यवस्था चालू हो गयी है।उन्होंने ऐसा कैसे संभव कर दिखाया? हमारे अपने देश में यह क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?

    क्या होना चाहिए था ?
    विश्व स्वास्थ्य संस्था या WHO (World Health Organization) ने 1978 में एक सनद जारी किया, जिसमें कहा गया कि सन् 2000 के अंदर सबके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करनी होगी। इस सनद पर दस्तखत करने वाले तमाम देशों में भारतवर्ष अन्यतम रहा है। आज 2017 में भी भारत ने यह स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू नहीं किया है। आज भी जेब से पैसे खर्च करके स्वास्थ्य (या सरल भाषा में इलाज) खरीदना होता है। इसके बावजूद उपयुक्त, सही, विज्ञानसम्मत चिकित्सा मिलेगी ,इसकी कोई गारंटी नहीं है।ऐसा क्यों है, बताइये।

    इन मांगों को लेकर हम पिछले चार साल से आंदोलन कर रहे हैं। अगस्त ,2015 में 33 संगठनों को लेकर बंगालभर में सबके लिए स्वास्थ्य प्रचार समिति का गठन करके सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। बंगालभर में यह प्रचार अभियान चल रहा है। 24 जनवरी,2016 को स्वास्थ्य की मांग लेकर कोलकाता यूनिवर्सिटी इंस्टीच्युट में एक जन कांवेंशन हो गया। जिसमें डा. श्रीनाथ रेड्डी, डा.विनायक सेन और दूसरों ने अपने वक्तव्य पेश किये। पिछले साल 7 अप्रैल को, हमने `विश्व स्वास्थ्य दिवस ' `सबके लिए स्वास्थ्य दिवस'के रुप में मनाया। हमने इस मौके पर डा. श्रीनाथ रेड्डी कमिटी की सिफारिशों के मुताबिक ये मांगें रखी थींः

    केंद्र या राज्य की सरकारी संस्था के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा दी जायें।
    सभी स्वास्थ्य सेवाएं निःशुल्क हों।
    सारी अत्यावश्यक दवाइयां निःशुल्क दी जायें।
    सभी नागरिकों को आधार कार्ड की तर्ज पर HEALTH ENTITLEMENT CARD दिया जाये। जिस कार्ड के जरिये भारतवर्ष में कहीं भी उन्हें स्वास्थ्य सेवाें निःशुल्क मिलें। 
    स्वास्थ्य बीमा भ्रष्टाचार का स्रोत है,इस व्यवस्था को तुरंत खत्म कर दिया जाये।

    लेकिन हुआ क्या ?

    कांगेसी सरकार ने तो रेड्डी समिति की किसी भी सिफारिश को नहीं माना.इस पर तुर्रा यह कि भाजपा ने सत्ता में आकर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में 9.4 प्रतिशत कटौती कर दी।सरकार की भूमिका मैनेजर की हो गयी और स्वास्थ्य क्षेत्र में गैरसरकारी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में तृणमूल सरकार के जमाने में कई उल्लेखनीय परिवर्तन हो गये हैं।पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रकाशित Health on the March,14 -15 के मुताबिकः

    फरवरी, 2012में डाक्टरों से जेनेरिक दवाएं नूस्खे पर लिखने के लिए कहा गया।

    2.सरकारी अस्पतालों में अस्वस्थ नवजात शिशुओं की चिकित्सा के लिए सिक निओनेटाल केअर यूनिट(एसएलसीयू) और सिक निओनेटाल स्टेबेलाइजिंग यूनिट की संख्या बढ़ा दी गयी।

    3.विभिन्न सरकारी अस्पतालों में उचित मूल्य पर दवाओं की दुकानें चालू हो गयी हैं,जहां से 142 अत्यावश्यक दवाइयां 48 से 67.25 प्रतिशत कम कीमत पर खरीदी जा सकती है।इसके अलावा इन दुकानों में एंजिओप्लास्टि में इस्तेमाल किये जाने वाले स्टेंट, पेसमेकर, अस्थि चिकित्सा के लिए इम्प्लांट इत्यादि भी रियायती दरों पर खरीदे जा सकते हैं।

    4,मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़कर 17 हो गयीं,जहां 2200 सीटें हैं।

    4.पिछड़ा क्षेत्र विकास खाते से देहात में तेरह मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना का कमा चल रहा है।

    6.जिला अस्पतालों और मेडिकल कालेज अस्पतालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है।

    7. 9 फरवरी,2014 को जारी एक सरकारी निर्देश में कहा गया है कि सरकारी अस्पतालों में आउटडोर और इनडोर फ्री बेड पर निःशुल्क अत्यावश्यक दवाओं की आपूर्ति की जाये।

    8. 3 मार्च,2014 को जारी एक आदेश में कहा गया है कि अब से सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की लिखी दवाइयों का पूरा कोर्स मरीजों को दिया जायेगा।

    9. विभिन्न सरकारी अस्पतालों में सिटी स्कैन, एमआरआई, एक्सरे और किसी किसी मामले में विभिन्न तरह की खून की जांच के लिए सरकार ने पीपीपी माडल के तहत गैरसरकारी संस्थाओं के साथ समझौता किया है,जिसके तहत मरीज बाजार की तुलना में कुछ कम कीमत पर ये जांच पड़ताल करा सकते हैं।

    इसके अलावा अक्तूबर,2015 से पश्चिम बंगाल के सारे सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में चिकित्सा पर सारा खर्च निःशुल्क कर दिया गया है (हालांकि पीपीपी माडल की सारी सेवाओं पर यह लागू नहीं है।
    वास्तव में हुआ क्या है?
    सारी चिकित्सा निःशुल्क है,ऐसा सुनने पर लगता है कि `यह तो जैसे सबके लिए स्वास्थ्य का हमारा सपना सच हो गया'। किंतु मित्रों.असल में ऐसी कोई तस्वीर बनती नहीं है। सबकुछ मुफ्त मिलेगा,ऐसा सरकारी ऐलान हो जाने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। सभी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। आपरेशन, रेडियोथेरापी, केमोथेपरापी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।पेस मेकर, स्टेंट, प्रस्थेसिस काफी मात्रा में न मिलने से मरीजों को खाली हाथ लौटाकर बार बार बुलाया जा रहा है। ढांचा, डाक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाये बिना सबकुछ मुफ्त है,ऐलान कर देने से चिकित्सा का स्तर लगातार गिर रहा है।कहीं वार्मर में बच्चा झुलस रहा है तो कहीं तीमारदार डाक्टर नर्स को पीट रहे हैं।असलियत की तस्वीर यह है।

    हाल में हमारी मुख्यमंत्री ने कोलकाता के बड़े बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के प्रबंधकों को बुलाकर उन्हें थोड़ा बहुत डांटा फटकारा है। जिनपर आरोप है कि वे मुनाफाखोरी के लिए मरीजों की परवाह नहीं करते।किंतु समझने वाली बात तो यह है कि जो लोग कारोबार चला रहे हैं ,वे डांट फटकार की वजह से मरीजों के हित में सोचना शुरु कर देंगे,ऐसा समझना गलत है। स्वास्थ्य के साथ जहां रुपयों का लेन देन का मामला जुड़ा हुआ है,ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था में किसी भी स्थिति में मुनाफा को हाशिये पर रखकर पहले मरीज के सर्वोत्तम हित के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इसके अलावा सवाल तो यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कराने के बदले गैरसरकारी अस्पतालों में सेहत खरीदने के लिए लोग आखिर क्यों चले जाते हैं। जा इसलिए रहे हैं कि मुफ्त में जो मिलने का ऐलान है,हकीकत में उसका कोई वजूद ही नहीं है।अगर जेब में पैसे हों तो लोग सरकारी अस्पताल के दरवज्जे पर झांकने भी नहीं जाते। बड़ी संख्या में सुपरस्पेशलिटी अस्पताल हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं, नर्स नहीं है, दवाएं और उपकरण नहीं हैं। बेड मिलता नहीं है और मरणासन्न रोगी को इस अस्पताल से उस अस्पताल को रिफर करते रहने की मजह से परिजन उसे लेकर भटकते ही रहते हैं। अंत में कोई उपाय न होने की वजह से ही वे गैरसरकारी अस्पतालों में चले जाते हैं।जिनके पास पैसे हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ है तो जिनके पास पैसे नहीं हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ और है।दोनों ही व्यवस्था साथ सात चलते रहने की स्थिति में विज्ञानसंगत चिकित्सा किसीकी नहीं होती। किसी को जरुरत के हिसाब से काफी ज्यादा मिल जाता है तो दूसरों को थोड़ा बहुत फ्री माल मिल जाता है। इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि देश में सभी के लिए एक ही व्यवस्था बनायी जाये, जिससे पैसे पर यह कतई निर्भर न हो कि किसे किस तरह का इलाज मिलता है। ऐसी व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार लें, कोई मुनाफाखोर स्वास्थ्यविक्रेता नहीं। यह सोचने पर अचरज होता है कि सारा जोर `सबके लिए आधार कार्ड'की मांग पर है लेकिन `सबके लिए स्वास्थ्य'को लेकर तनिक परवाह किसी को नहीं है।

    इसलिए इस साल भी हम विश्व स्वास्थ्य दिवस सबके लिए स्वास्थ की मांग दिवस के रुप में मनाने जा रहे हैं।आप भी आइये। आइये कि हम आवाज उठायें कि स्वास्थ्य कोई भीख नहीं है, स्वास्थ्य हमारा अधिकार है।सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसंगत चिकित्सा की जिम्मेदारी सरकार लें।

    श्रमजीवी स्वास्थ्य पहल 

    2014 के बाद भारत सरकार ने स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में कटौती कर दी।

    `सबके लिए स्वास्थ्य'संभव है।

    सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसम्मत चिकित्सा संभव है
    सिर्फ विकसित देशों में नहीं,हमारे जैसे गरीब देशों में भी।
    "সবার জন্যে স্বাস্থ্য"সম্ভব।

    भारत सरकार की गठित एक उच्चस्तरीय स्वास्थ्य कमिटी ने ऐसा ही कहा है। कांग्रेस के सत्ताकाल में 2010 में गठित इस कमिटी के सभापिति डा. श्रीनाथ रेड्डी थे। रेड्डी कमिटी ने कहा था, अभ्यंतरीन उत्पादन के 1.4 से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य के मद में सरकार अगर खर्च करें तो हमारे देश में भी सबके लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम की व्यवस्था लागू की जी सकती है। यानी यह आपका या मेरा आकाश कुसुम सपना नहीं है, सरकार की सलाहकार विशेषज्ञ समिति ही ऐसा कह रही है। बहरहाल, भारत की बात छोड़ दें, इस दुनिया के कम से कम 41 देशों की सरकारों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है। जर्मनी और इंग्लैंड की तरह धनी देशों से लेकर पेरु या श्रीलंका की तरह तथाकथित गरीब देशों में भी यह व्यवस्था चालू हो गयी है।उन्होंने ऐसा कैसे संभव कर दिखाया? हमारे अपने देश में यह क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?

    क्या होना चाहिए था ?
    विश्व स्वास्थ्य संस्था या WHO (World Health Organization) ने 1978 में एक सनद जारी किया, जिसमें कहा गया कि सन् 2000 के अंदर सबके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करनी होगी। इस सनद पर दस्तखत करने वाले तमाम देशों में भारतवर्ष अन्यतम रहा है। आज 2017 में भी भारत ने यह स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू नहीं किया है। आज भी जेब से पैसे खर्च करके स्वास्थ्य (या सरल भाषा में इलाज) खरीदना होता है। इसके बावजूद उपयुक्त, सही, विज्ञानसम्मत चिकित्सा मिलेगी ,इसकी कोई गारंटी नहीं है।ऐसा क्यों है, बताइये।

    इन मांगों को लेकर हम पिछले चार साल से आंदोलन कर रहे हैं। अगस्त ,2015 में 33 संगठनों को लेकर बंगालभर में सबके लिए स्वास्थ्य प्रचार समिति का गठन करके सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। बंगालभर में यह प्रचार अभियान चल रहा है। 24 जनवरी,2016 को स्वास्थ्य की मांग लेकर कोलकाता यूनिवर्सिटी इंस्टीच्युट में एक जन कांवेंशन हो गया। जिसमें डा. श्रीनाथ रेड्डी, डा.विनायक सेन और दूसरों ने अपने वक्तव्य पेश किये। पिछले साल 7 अप्रैल को, हमने `विश्व स्वास्थ्य दिवस ' `सबके लिए स्वास्थ्य दिवस'के रुप में मनाया। हमने इस मौके पर डा. श्रीनाथ रेड्डी कमिटी की सिफारिशों के मुताबिक ये मांगें रखी थींः

    केंद्र या राज्य की सरकारी संस्था के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा दी जायें।
    सभी स्वास्थ्य सेवाएं निःशुल्क हों।
    सारी अत्यावश्यक दवाइयां निःशुल्क दी जायें।
    सभी नागरिकों को आधार कार्ड की तर्ज पर HEALTH ENTITLEMENT CARD दिया जाये। जिस कार्ड के जरिये भारतवर्ष में कहीं भी उन्हें स्वास्थ्य सेवाें निःशुल्क मिलें। 
    स्वास्थ्य बीमा भ्रष्टाचार का स्रोत है,इस व्यवस्था को तुरंत खत्म कर दिया जाये।

    लेकिन हुआ क्या ?

    कांगेसी सरकार ने तो रेड्डी समिति की किसी भी सिफारिश को नहीं माना.इस पर तुर्रा यह कि भाजपा ने सत्ता में आकर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में 9.4 प्रतिशत कटौती कर दी।सरकार की भूमिका मैनेजर की हो गयी और स्वास्थ्य क्षेत्र में गैरसरकारी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में तृणमूल सरकार के जमाने में कई उल्लेखनीय परिवर्तन हो गये हैं।पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रकाशित Health on the March,14 -15 के मुताबिकः

    फरवरी, 2012में डाक्टरों से जेनेरिक दवाएं नूस्खे पर लिखने के लिए कहा गया।

    2.सरकारी अस्पतालों में अस्वस्थ नवजात शिशुओं की चिकित्सा के लिए सिक निओनेटाल केअर यूनिट(एसएलसीयू) और सिक निओनेटाल स्टेबेलाइजिंग यूनिट की संख्या बढ़ा दी गयी।

    3.विभिन्न सरकारी अस्पतालों में उचित मूल्य पर दवाओं की दुकानें चालू हो गयी हैं,जहां से 142 अत्यावश्यक दवाइयां 48 से 67.25 प्रतिशत कम कीमत पर खरीदी जा सकती है।इसके अलावा इन दुकानों में एंजिओप्लास्टि में इस्तेमाल किये जाने वाले स्टेंट, पेसमेकर, अस्थि चिकित्सा के लिए इम्प्लांट इत्यादि भी रियायती दरों पर खरीदे जा सकते हैं।

    4,मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़कर 17 हो गयीं,जहां 2200 सीटें हैं।

    4.पिछड़ा क्षेत्र विकास खाते से देहात में तेरह मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना का कमा चल रहा है।

    6.जिला अस्पतालों और मेडिकल कालेज अस्पतालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है।

    7. 9 फरवरी,2014 को जारी एक सरकारी निर्देश में कहा गया है कि सरकारी अस्पतालों में आउटडोर और इनडोर फ्री बेड पर निःशुल्क अत्यावश्यक दवाओं की आपूर्ति की जाये।

    8. 3 मार्च,2014 को जारी एक आदेश में कहा गया है कि अब से सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की लिखी दवाइयों का पूरा कोर्स मरीजों को दिया जायेगा।

    9. विभिन्न सरकारी अस्पतालों में सिटी स्कैन, एमआरआई, एक्सरे और किसी किसी मामले में विभिन्न तरह की खून की जांच के लिए सरकार ने पीपीपी माडल के तहत गैरसरकारी संस्थाओं के साथ समझौता किया है,जिसके तहत मरीज बाजार की तुलना में कुछ कम कीमत पर ये जांच पड़ताल करा सकते हैं।

    इसके अलावा अक्तूबर,2015 से पश्चिम बंगाल के सारे सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में चिकित्सा पर सारा खर्च निःशुल्क कर दिया गया है (हालांकि पीपीपी माडल की सारी सेवाओं पर यह लागू नहीं है।
    वास्तव में हुआ क्या है?
    सारी चिकित्सा निःशुल्क है,ऐसा सुनने पर लगता है कि `यह तो जैसे सबके लिए स्वास्थ्य का हमारा सपना सच हो गया'। किंतु मित्रों.असल में ऐसी कोई तस्वीर बनती नहीं है। सबकुछ मुफ्त मिलेगा,ऐसा सरकारी ऐलान हो जाने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। सभी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। आपरेशन, रेडियोथेरापी, केमोथेपरापी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।पेस मेकर, स्टेंट, प्रस्थेसिस काफी मात्रा में न मिलने से मरीजों को खाली हाथ लौटाकर बार बार बुलाया जा रहा है। ढांचा, डाक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाये बिना सबकुछ मुफ्त है,ऐलान कर देने से चिकित्सा का स्तर लगातार गिर रहा है।कहीं वार्मर में बच्चा झुलस रहा है तो कहीं तीमारदार डाक्टर नर्स को पीट रहे हैं।असलियत की तस्वीर यह है।

    हाल में हमारी मुख्यमंत्री ने कोलकाता के बड़े बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के प्रबंधकों को बुलाकर उन्हें थोड़ा बहुत डांटा फटकारा है। जिनपर आरोप है कि वे मुनाफाखोरी के लिए मरीजों की परवाह नहीं करते।किंतु समझने वाली बात तो यह है कि जो लोग कारोबार चला रहे हैं ,वे डांट फटकार की वजह से मरीजों के हित में सोचना शुरु कर देंगे,ऐसा समझना गलत है। स्वास्थ्य के साथ जहां रुपयों का लेन देन का मामला जुड़ा हुआ है,ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था में किसी भी स्थिति में मुनाफा को हाशिये पर रखकर पहले मरीज के सर्वोत्तम हित के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इसके अलावा सवाल तो यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कराने के बदले गैरसरकारी अस्पतालों में सेहत खरीदने के लिए लोग आखिर क्यों चले जाते हैं। जा इसलिए रहे हैं कि मुफ्त में जो मिलने का ऐलान है,हकीकत में उसका कोई वजूद ही नहीं है।अगर जेब में पैसे हों तो लोग सरकारी अस्पताल के दरवज्जे पर झांकने भी नहीं जाते। बड़ी संख्या में सुपरस्पेशलिटी अस्पताल हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं, नर्स नहीं है, दवाएं और उपकरण नहीं हैं। बेड मिलता नहीं है और मरणासन्न रोगी को इस अस्पताल से उस अस्पताल को रिफर करते रहने की मजह से परिजन उसे लेकर भटकते ही रहते हैं। अंत में कोई उपाय न होने की वजह से ही वे गैरसरकारी अस्पतालों में चले जाते हैं।जिनके पास पैसे हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ है तो जिनके पास पैसे नहीं हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ और है।दोनों ही व्यवस्था साथ सात चलते रहने की स्थिति में विज्ञानसंगत चिकित्सा किसीकी नहीं होती। किसी को जरुरत के हिसाब से काफी ज्यादा मिल जाता है तो दूसरों को थोड़ा बहुत फ्री माल मिल जाता है। इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि देश में सभी के लिए एक ही व्यवस्था बनायी जाये, जिससे पैसे पर यह कतई निर्भर न हो कि किसे किस तरह का इलाज मिलता है। ऐसी व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार लें, कोई मुनाफाखोर स्वास्थ्यविक्रेता नहीं। यह सोचने पर अचरज होता है कि सारा जोर `सबके लिए आधार कार्ड'की मांग पर है लेकिन `सबके लिए स्वास्थ्य'को लेकर तनिक परवाह किसी को नहीं है।

    इसलिए इस साल भी हम विश्व स्वास्थ्य दिवस सबके लिए स्वास्थ की मांग दिवस के रुप में मनाने जा रहे हैं।आप भी आइये। आइये कि हम आवाज उठायें कि स्वास्थ्य कोई भीख नहीं है, स्वास्थ्य हमारा अधिकार है।सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसंगत चिकित्सा की जिम्मेदारी सरकार लें।

    श्रमजीवी स्वास्थ्य पहल 

    2014 के बाद भारत सरकार ने स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में कटौती कर दी।

    `सबके लिए स्वास्थ्य'संभव है।

    सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसम्मत चिकित्सा संभव है
    सिर्फ विकसित देशों में नहीं,हमारे जैसे गरीब देशों में भी।
    "সবার জন্যে স্বাস্থ্য"সম্ভব।

    भारत सरकार की गठित एक उच्चस्तरीय स्वास्थ्य कमिटी ने ऐसा ही कहा है। कांग्रेस के सत्ताकाल में 2010 में गठित इस कमिटी के सभापिति डा. श्रीनाथ रेड्डी थे। रेड्डी कमिटी ने कहा था, अभ्यंतरीन उत्पादन के 1.4 से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य के मद में सरकार अगर खर्च करें तो हमारे देश में भी सबके लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम की व्यवस्था लागू की जी सकती है। यानी यह आपका या मेरा आकाश कुसुम सपना नहीं है, सरकार की सलाहकार विशेषज्ञ समिति ही ऐसा कह रही है। बहरहाल, भारत की बात छोड़ दें, इस दुनिया के कम से कम 41 देशों की सरकारों ने यह व्यवस्था लागू कर दी है। जर्मनी और इंग्लैंड की तरह धनी देशों से लेकर पेरु या श्रीलंका की तरह तथाकथित गरीब देशों में भी यह व्यवस्था चालू हो गयी है।उन्होंने ऐसा कैसे संभव कर दिखाया? हमारे अपने देश में यह क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?

    क्या होना चाहिए था ?
    विश्व स्वास्थ्य संस्था या WHO (World Health Organization) ने 1978 में एक सनद जारी किया, जिसमें कहा गया कि सन् 2000 के अंदर सबके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करनी होगी। इस सनद पर दस्तखत करने वाले तमाम देशों में भारतवर्ष अन्यतम रहा है। आज 2017 में भी भारत ने यह स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू नहीं किया है। आज भी जेब से पैसे खर्च करके स्वास्थ्य (या सरल भाषा में इलाज) खरीदना होता है। इसके बावजूद उपयुक्त, सही, विज्ञानसम्मत चिकित्सा मिलेगी ,इसकी कोई गारंटी नहीं है।ऐसा क्यों है, बताइये।

    इन मांगों को लेकर हम पिछले चार साल से आंदोलन कर रहे हैं। अगस्त ,2015 में 33 संगठनों को लेकर बंगालभर में सबके लिए स्वास्थ्य प्रचार समिति का गठन करके सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। बंगालभर में यह प्रचार अभियान चल रहा है। 24 जनवरी,2016 को स्वास्थ्य की मांग लेकर कोलकाता यूनिवर्सिटी इंस्टीच्युट में एक जन कांवेंशन हो गया। जिसमें डा. श्रीनाथ रेड्डी, डा.विनायक सेन और दूसरों ने अपने वक्तव्य पेश किये। पिछले साल 7 अप्रैल को, हमने `विश्व स्वास्थ्य दिवस ' `सबके लिए स्वास्थ्य दिवस'के रुप में मनाया। हमने इस मौके पर डा. श्रीनाथ रेड्डी कमिटी की सिफारिशों के मुताबिक ये मांगें रखी थींः

    केंद्र या राज्य की सरकारी संस्था के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा दी जायें।
    सभी स्वास्थ्य सेवाएं निःशुल्क हों।
    सारी अत्यावश्यक दवाइयां निःशुल्क दी जायें।
    सभी नागरिकों को आधार कार्ड की तर्ज पर HEALTH ENTITLEMENT CARD दिया जाये। जिस कार्ड के जरिये भारतवर्ष में कहीं भी उन्हें स्वास्थ्य सेवाें निःशुल्क मिलें। 
    स्वास्थ्य बीमा भ्रष्टाचार का स्रोत है,इस व्यवस्था को तुरंत खत्म कर दिया जाये।

    लेकिन हुआ क्या ?

    कांगेसी सरकार ने तो रेड्डी समिति की किसी भी सिफारिश को नहीं माना.इस पर तुर्रा यह कि भाजपा ने सत्ता में आकर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में 9.4 प्रतिशत कटौती कर दी।सरकार की भूमिका मैनेजर की हो गयी और स्वास्थ्य क्षेत्र में गैरसरकारी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में तृणमूल सरकार के जमाने में कई उल्लेखनीय परिवर्तन हो गये हैं।पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रकाशित Health on the March,14 -15 के मुताबिकः

    फरवरी, 2012में डाक्टरों से जेनेरिक दवाएं नूस्खे पर लिखने के लिए कहा गया।

    2.सरकारी अस्पतालों में अस्वस्थ नवजात शिशुओं की चिकित्सा के लिए सिक निओनेटाल केअर यूनिट(एसएलसीयू) और सिक निओनेटाल स्टेबेलाइजिंग यूनिट की संख्या बढ़ा दी गयी।

    3.विभिन्न सरकारी अस्पतालों में उचित मूल्य पर दवाओं की दुकानें चालू हो गयी हैं,जहां से 142 अत्यावश्यक दवाइयां 48 से 67.25 प्रतिशत कम कीमत पर खरीदी जा सकती है।इसके अलावा इन दुकानों में एंजिओप्लास्टि में इस्तेमाल किये जाने वाले स्टेंट, पेसमेकर, अस्थि चिकित्सा के लिए इम्प्लांट इत्यादि भी रियायती दरों पर खरीदे जा सकते हैं।

    4,मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़कर 17 हो गयीं,जहां 2200 सीटें हैं।

    4.पिछड़ा क्षेत्र विकास खाते से देहात में तेरह मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना का कमा चल रहा है।

    6.जिला अस्पतालों और मेडिकल कालेज अस्पतालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है।

    7. 9 फरवरी,2014 को जारी एक सरकारी निर्देश में कहा गया है कि सरकारी अस्पतालों में आउटडोर और इनडोर फ्री बेड पर निःशुल्क अत्यावश्यक दवाओं की आपूर्ति की जाये।

    8. 3 मार्च,2014 को जारी एक आदेश में कहा गया है कि अब से सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की लिखी दवाइयों का पूरा कोर्स मरीजों को दिया जायेगा।

    9. विभिन्न सरकारी अस्पतालों में सिटी स्कैन, एमआरआई, एक्सरे और किसी किसी मामले में विभिन्न तरह की खून की जांच के लिए सरकार ने पीपीपी माडल के तहत गैरसरकारी संस्थाओं के साथ समझौता किया है,जिसके तहत मरीज बाजार की तुलना में कुछ कम कीमत पर ये जांच पड़ताल करा सकते हैं।

    इसके अलावा अक्तूबर,2015 से पश्चिम बंगाल के सारे सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में चिकित्सा पर सारा खर्च निःशुल्क कर दिया गया है (हालांकि पीपीपी माडल की सारी सेवाओं पर यह लागू नहीं है।
    वास्तव में हुआ क्या है?
    सारी चिकित्सा निःशुल्क है,ऐसा सुनने पर लगता है कि `यह तो जैसे सबके लिए स्वास्थ्य का हमारा सपना सच हो गया'। किंतु मित्रों.असल में ऐसी कोई तस्वीर बनती नहीं है। सबकुछ मुफ्त मिलेगा,ऐसा सरकारी ऐलान हो जाने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। सभी दवाइयां नहीं मिल रही हैं। आपरेशन, रेडियोथेरापी, केमोथेपरापी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।पेस मेकर, स्टेंट, प्रस्थेसिस काफी मात्रा में न मिलने से मरीजों को खाली हाथ लौटाकर बार बार बुलाया जा रहा है। ढांचा, डाक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाये बिना सबकुछ मुफ्त है,ऐलान कर देने से चिकित्सा का स्तर लगातार गिर रहा है।कहीं वार्मर में बच्चा झुलस रहा है तो कहीं तीमारदार डाक्टर नर्स को पीट रहे हैं।असलियत की तस्वीर यह है।

    हाल में हमारी मुख्यमंत्री ने कोलकाता के बड़े बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के प्रबंधकों को बुलाकर उन्हें थोड़ा बहुत डांटा फटकारा है। जिनपर आरोप है कि वे मुनाफाखोरी के लिए मरीजों की परवाह नहीं करते।किंतु समझने वाली बात तो यह है कि जो लोग कारोबार चला रहे हैं ,वे डांट फटकार की वजह से मरीजों के हित में सोचना शुरु कर देंगे,ऐसा समझना गलत है। स्वास्थ्य के साथ जहां रुपयों का लेन देन का मामला जुड़ा हुआ है,ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था में किसी भी स्थिति में मुनाफा को हाशिये पर रखकर पहले मरीज के सर्वोत्तम हित के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इसके अलावा सवाल तो यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कराने के बदले गैरसरकारी अस्पतालों में सेहत खरीदने के लिए लोग आखिर क्यों चले जाते हैं। जा इसलिए रहे हैं कि मुफ्त में जो मिलने का ऐलान है,हकीकत में उसका कोई वजूद ही नहीं है।अगर जेब में पैसे हों तो लोग सरकारी अस्पताल के दरवज्जे पर झांकने भी नहीं जाते। बड़ी संख्या में सुपरस्पेशलिटी अस्पताल हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं, नर्स नहीं है, दवाएं और उपकरण नहीं हैं। बेड मिलता नहीं है और मरणासन्न रोगी को इस अस्पताल से उस अस्पताल को रिफर करते रहने की मजह से परिजन उसे लेकर भटकते ही रहते हैं। अंत में कोई उपाय न होने की वजह से ही वे गैरसरकारी अस्पतालों में चले जाते हैं।जिनके पास पैसे हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ है तो जिनके पास पैसे नहीं हैं,उनके लिए इंतजाम कुछ और है।दोनों ही व्यवस्था साथ सात चलते रहने की स्थिति में विज्ञानसंगत चिकित्सा किसीकी नहीं होती। किसी को जरुरत के हिसाब से काफी ज्यादा मिल जाता है तो दूसरों को थोड़ा बहुत फ्री माल मिल जाता है। इस समस्या का एकमात्र समाधान यही है कि देश में सभी के लिए एक ही व्यवस्था बनायी जाये, जिससे पैसे पर यह कतई निर्भर न हो कि किसे किस तरह का इलाज मिलता है। ऐसी व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार लें, कोई मुनाफाखोर स्वास्थ्यविक्रेता नहीं। यह सोचने पर अचरज होता है कि सारा जोर `सबके लिए आधार कार्ड'की मांग पर है लेकिन `सबके लिए स्वास्थ्य'को लेकर तनिक परवाह किसी को नहीं है।

    इसलिए इस साल भी हम विश्व स्वास्थ्य दिवस सबके लिए स्वास्थ की मांग दिवस के रुप में मनाने जा रहे हैं।आप भी आइये। आइये कि हम आवाज उठायें कि स्वास्थ्य कोई भीख नहीं है, स्वास्थ्य हमारा अधिकार है।सबके लिए निःशुल्क विज्ञानसंगत चिकित्सा की जिम्मेदारी सरकार लें।

    श्रमजीवी स्वास्थ्य पहल
     
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    महत्वपूर्ण खबरें और आलेख यह इस दौर की सबसे बड़ी अफवाह है कि #राजनीति 'विकास'के लिए की जाती है


    #सपा #बसपा की हर गलती का लाभ संघ उठाता चल रहा था।

    अब पूरा देश #गोडसे के राममंदिर में तब्दील हैयही आज का सबसे भयंकर सच है

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    महिला समूहों ने लगाई योगी से गुहारएंटी रोमिओ स्क्वॉड पर लगे लगाम

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/uttar-pradesh-saffron-terror-government-failure-womens-group-yogi-adityanath-13849 #Yogiraj

    सुरंग तो खुल गई पर किस्मत नहीं

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    दरोगाजी ने नाम पूछाफिर बोले साले #मुसलमान हैं, #कटुआ हैंसाले #गाय काटते हैंमारो सालों को

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    #यूपी में क्यों #बिहार दोहराना मुश्किल हैजानिए 10 वजहें

    #मुलायम का #लालू नहीं हो पाना मुसलमानों को ऐसे किसी भी गठजोड़ को विश्वास भरे नजर से देखने से रोकता है।

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    #भाजपा के #आंबेडकर प्रेम का सच

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/truth-of-bjps-ambedkar-love--13844

    हिंदुओं के भारी पैमाने पर #इस्लाम कबूलने के बारे में स्वामी विवेकानन्द के दो टूक विचार

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    जब #अमेरिका डरता है तो शुरू होती है विचारों पर निगरानी

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/usa-terror-13841

    #पीडीपी- #भाजपा 7 प्रतिशत के अपने इस परीक्षाफल से कुछ भी नहीं सीखेंगे?

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    ये #गौरक्षक #नॉर्थ_ईस्ट में क्यों नहीं होते ?

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    यह इस दौर की सबसे बड़ी अफवाह है कि #राजनीति 'विकासके लिए की जाती है

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/politics-of-development-politics-of-sp-bsp-social-justice-13855 # politics_of_development

    लाखों करोड़ों रूपया #कारपोरेट को #सब्सिडी देने वाली केन्द्र सरकार किसानों की कर्ज माफी पर ईमानदार नहीं

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/corporate-subsidy-bjp-government-farmers-suicides-wto-modi-government-13854

    #अम्बेडकरवाद का भक्तिकाल : #दलित गुलामी के नए दौर का प्रारम्भ  !

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/anti-ambedkar-programs-ambedkarism-bhaktikal-dalit-slavery-13851

    #यूपी में जघन्य अपराधों की बाढ़, #योगीजी का 'सुपर एक्टिविस्म' #मीडिया में सुर्खियां बटोरने तक सीमित: #भाकपा

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/bjps-fascist-policy-communist-party-of-india-secular-democratic-leftist-forc-13853

    Hijab-wearing #Muslim beaten 'like an animal' in Milwaukee (USA)

    http://www.hastakshep.com/englishnews/india-hijab-wearing-muslim-beaten-like-an-animal-in-milwaukee-usa-13852

    By-poll and Lesson for #AAP

    Was AAP different than other bourgeois parties?

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/debate-by-poll-lesson-for-aap-13858


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    अम्बेडकरवाद का भक्तिकाल :
    दलित गुलामी के नए दौर का प्रारम्भ !

    जयपुर में आज 13 अप्रैल 2017 को अम्बेडकर के नाम पर "भक्ति संध्या" होगी। दो केंद्रीय मंत्री इस अम्बेडकर विरोधी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे। अम्बेडकर जैसा तर्कवादी और भक्तिभाव जैसी मूर्खता ! इससे ज्यादा बेहूदा क्या बात होगी ?

    भीलवाड़ा में बाबा साहब की जीवन भर विरोधी रही कांग्रेस पार्टी का एस.सी. डिपार्टमेंट दूसरी मूर्खता करेगा। 126 किलो दूध से बाबा साहब की प्रतिमा का अभिषेक किया जायेगा। अभिषेक होगा तो पंडित भी आएंगे ,मंत्रोच्चार होगा,गाय के गोबर ,दूध ,दही ,मूत्र आदि का पंचामृत भी अभिषेक में काम में लिया ही जायेगा । अछूत अम्बेडकर कल भीलवाड़ा में पवित्र हो जायेंगे!

    तीसरी वाहियात हरकत रायपुर में होगी 5100 कलश की यात्रा निकाली जाएगी। जिस औरत को अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहब ने मंत्री पद खोया ,उस औरत के सर पर कलश,घर घर से एक एक नारियल लाया जाएगा। कलश का पानी और नारियल आंबेडकर की प्रतिमा पर चढ़ाये जायेंगे। हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जायेंगे। जिस अम्बेडकर के समाज को आज भी नरेगा ,आंगनवाड़ी और मिड डे मील का मटका छूने की आज़ादी नहीं है ,उनके नाम पर कलश यात्रा ! बेहद दुखद ! निंदनीय !

    एक और जगह से बाबा साहब की जयंती की पूर्व संध्या पर भजन सत्संग किये जाने की खबर आयी है। एक शहर में लड्डुओं का भोग भगवान आंबेडकर को लगाया जायेगा।

    बाबा साहब के अनुयायी जातियों के महाकुम्भ कर रहे है ,सामुहिक भोज कर रहे है,जिनके कार्डों पर गणेशाय नमः और जय भीम साथ साथ शोभायमान है।भक्तिकालीन अम्बेडकरवादियों के ललाट पर उन्नत किस्म के तिलक आप हरेक जगह देख सकते है। जय भीम के साथ जय श्री राम बोलने वाले मौसमी मेढकों की तो बहार ही आयी हुयी है।

    बड़े बड़े अम्बेडकरवादी हाथों में तरह तरह की अंगूठियां फसाये हुए है,गले में पितर भैरू देवत भोमियाजी लटके पड़े है और हाथ कलवों के जलवों से गुलज़ार है,फिर भी ये सब अम्बेडकरवादी है।

    राजस्थान में बाबा साहब की मूर्तियां दलित विरोधी बाबा रामदेव से चंदा ले के कर डोनेट की जा रही है।इन मूर्तियों को देख़ कर ही उबकाई आती है। कहीं डॉ आंबेडकर को किसी मारवाड़ी लाला की शक्ल दे दी गयी है ,कहीं हाथ नीचे लटका हुआ है तो कहीं अंगुली "सबका मालिक एक है " की भाव भंगिमा लिए हुए है।

    ये बाबा साहब है या साई बाबा ? मत लगाओ मूर्ति अगर पैसा नहीं है या समझ नही है तो।

    कहीं कहीं तो जमीन हड़पने के लिए सबसे गन्दी जगह पर बाबा साहब की घटिया सी मूर्ति रातों रात लगा दी जा रही है।

    बाबा साहब की मूर्तियां बन रही है ,लग रही है ,जल्दी ही मंदिर बन जायेंगे ,पूजा होगी ,घंटे घड़ियाल बजेंगे,भक्तिभाव से अम्बेडकर के भजन गाये जायेंगे। भीम चालीसा रच दी गयी है,जपते रहियेगा।

    गुलामी का नया दौर शुरू हो चुका है। जिन जिन चीजों के बाबा साहब सख्त खिलाफ थे ,वो सारे पाखण्ड किये जा रहे। बाबा साहब को अवतार कहा जा रहा है। भगवान बताया जा रहा है। यहाँ तक कि उन्हें ब्रह्मा विष्णु महेश कहा जा रहा है।

    हम सब जानते है कि डॉ अम्बेडकर गौरी ,गणपति ,राम कृष्ण ,ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश ,भय ,भाग्य ,भगवान् तथा आत्मा व परमात्मा जैसी चीजों के सख्त खिलाफ थे।
    वे व्यक्ति पूजा और भक्ति भाव के विरोधी थे। उन्होने इन कथित महात्माओं का भी विरोध किया ,उन्होंने कहा इन महात्माओं ने अछूतों की धूल ही उड़ाई है।

    पर आज हम क्या कर रहे है बाबा साहब के नाम पर ? जो कर रहे है वह बेहद शर्मनाक है ,इससे डॉ अम्बेडकर और हमारे महापुरुषों एवम महस्त्रियों का कारवां हजार साल पीछे चला जायेगा। इसे रोकिये।

    बाबा साहब का केवल गुणगान और मूर्तिपूजा मत कीजिये। उनके विचारों को दरकिनार करके उन्हें भगवान मत बनाइये । बाबा साहब की हत्या मत कीजिये।

    आप गुलाम रहना चाहते है ,बेशक रहिये ,भारत का संविधान आपको यह आज़ादी देता है ,पर डॉ अम्बेडकर को प्रदूषित मत कीजिये।

    आपका रास्ता लोकतंत्र और संविधान को खा जायेगा। फिर भेदभाव हो ,जूते पड़े,आपकी महिलाएं बेइज्जत की जाये और आरक्षण खत्म हो जाये तो किसी को दोष मत दीजिये।

    इन बेहूदा मूर्तियों और अपने वाहियात अम्बेडकरवाद के समक्ष सर फोड़ते रहिये।रोते रहिये और हज़ारो साल की गुलामी के रास्ते पर जाने के लिए अपनी नस्लों को धकेल दीजिये।गुलामों से इसके अलावा कोई और अपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है।

    जो बाबा साहब के सच्चे मिशनरी साथी है और इस साजिश और संभावित खतरे को समझते है ,वो बाबा साहब के दैवीकरण और ब्राह्मणीकरण का पुरजोर विरोध करे।मनुवाद के इस स्वरुप का खुल कर विरोध करे।

    अम्बेडकरवाद में भक्तिभाव के लिए कोई जगह नहीं है ।

    - भंवर मेघवंशी 
    ( स्वतंत्र पत्रकार एवम सामाजिक कार्यकर्ता )

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    अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं!

    पलाश विश्वास

    Video:https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/1685033008191768/?l=3021243169750074783

    Video:https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/1685039704857765/?l=8291158912020329557

    आजीविका के बतौर पेशेवर पत्रकार से पत्रकारिता से पिछले साल 16 मई को रिटायर हो गया हूं।इस बीच जो लोग बिना पारिश्रामिक मुझे छाप रहे थे,इस केसरिया दुःसमय में वे भी मुझ जैसे दुर्मुख को छापना सही नहीं मान रहे हैं।बाजार में होने की उनकी सीमाएं हैं।फिरभी कभीकभार वे मुझे छाप ही देते हैं,पैसे भले न दें।

    माननीय प्रभाष जोशी की कृपा से उनके धर्मनिरपेक्ष,प्रगतिवादी,गांधीवादी चित्र में कोटे का चेहरा बन जाने के बावजूद,वेतन बोर्ड के मुताबिक समाचार संपादक का स्केल तक पहुंच जाने के बावजूद उप संपादक पद से रिटायर हुआ हूं और मेरा प्रोफाइल या सीवी किसी के काम का नहीं है।

    विविध विषयों को पढ़ा सकता हूं,विभिनिन भाषाओं में लिख पढ़ सकता हूं,लेकिन बाजार में हमारे विचार और सपने प्रतिबंधित हैं।

    ऐसे हालात में चूंकि सामंती मनोवृत्ति का नहीं हूं।जैसे हमारे पुरखे पूर्वी बंगाल के जमींदारों सामंती मूल्यों के आधार पर बाकी लोगों पर खुद हावी हो जाते थे,वैसा हमने इतने सालों से कोशिश करके न करने का अभ्यास करते हुए अपना डीएनए बदल डालने की निरंतर कोशिश की है।

    हम ऐसा फैसला कुछ नहीं कर सकते,जिसपर मेरे परिवार के लोगों को ऐतराज हो।इसलिए फिलहाल घर वापसी के रास्ते बंद हैं तो महानगर में बिना किसी स्थाई छत के जिंदा रहना हमारी बची खुची क्रयशक्ति के हिसाब से नामुमकिन है।

    इसलिए पत्रकारिता से भी रिटायर होने का वक्त हो आया है।साहित्य से रिटायर होते वक्त भी कलेजा लहूलुहान था।

    1980 से लगातार सारे ज्वलंत मुद्दों को बिना देरी संबोधित करने की बुरी लत रही है।1991 से आर्थिक मुद्दों और नीति निर्धारण की वैश्विक व्यवस्था पर मेरा लगातार फोकस रहा है।

    अब मेरे पास वैकल्पिक माध्यम कोई नहीं है।

    यह सोशल मीडिया भी मुक्तबाजार का एकाधिकार क्षेत्र है,जहां विचारों और सपनों पर सख्त पहरा है।

    हम जिंदगी भर कोशिश करेक जमीन पर कोई स्वतंत्र स्वनिर्भर वैकल्पिक मीडिया गढ़ नहीं सके हैं।यह हमारी सबसे बड़ी अयोग्यता है।

    जन्मजात मेधावी नहीं रहा हूं।हमेशा हमने सीखने समझने की कोशिश की है और उसी बूते लगातार संवाद जारी रखने की कोशिश की है।

    अब मौजूदा हालात में जब मेरे पास लिखने की कोई फुरसत निकलना क्रमशः मुश्किल होता जा रहा है,हम भविष्य में ऐसे किसी विषय पर नहीं लिखेंगे,जो घटनाक्रम की प्रतिक्रिया में लिखा जाये।

    क्योंकि इन प्रतिक्रियाओं से जनविरोधी नरसंहारी संस्कृति के लिए धार्मिक ध्रूवीकरण और तेज होता है।

    किसी भी राजनीतिक गतिविधि,समीकरण पर मेरी अब कोई टिप्पणी नहीं होगी क्योंकि पूरा राजनीतिक वर्ग आम जनता के खिलाफ लामबंद है और इस वर्ग से हमारा किसी तरह का कोई संबंध नहीं है और जनसरोकार से बिल्कुल अलहदा यह सत्ता की मौकापरस्त राजनीति आम जनता के किसी कामकाज की नहीं है।

    जिन मुद्दों पर जानकारी मीडिया या अन्य माध्यमों तक आपको मिल रही है, उनपर अपना विचार व्यक्त करने की जरुरत नहीं है।

    इसलिए मीडिया की सुर्खियों पर अपना पक्ष अब नहीं रखेंगे।

    जरुरी हुआ तो कभी कभार आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों या नीति निर्धारण प्रक्रिया पर लिखेंगे।

    राजनीतिक कवायद नहीं,अब हम जमीन पर जो भी रचनात्मक हलचल है या जो प्रासंगिक द्सतावेज मिलते रहेंगे, उन पर कभी कभार मंतव्य करेंगे।यह पत्रकारिता नहीं होगी और न प्रतिक्रिया होगी।सीधे हस्तक्षेप होगा।

    अब तक जो लोग मुझे झेलते रहे हैं,उनका आभारी हूं।

    खासकर उन मित्रों का आभार जो लगातार पांच दशकों से मेरा समर्थन करते रहे हैं और जिनके बना मेरा मेरा कोई वजूद है ही नहीं।

    कविता छोड़कर पत्रकारिता अपनाने की जो गलती की है,वह सुधारी नहीं जा सकती,लेकिन अब रोजमर्रे की पत्रकारिता से मेरा अवसान।धन्यवाद।


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    महत्वपूर्ण खबरें और आलेख जी हाँ, चुनाव आयोग जानता है ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है !



    जी हाँचुनाव आयोग जानता है ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है !

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/evm-disorder-burn-process-13892

     

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    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/mugalsarai-assembly-constituency-constituency-mla-sadhna-singh--13888

     

    क्वांटिटी से ज्यादा क़्वालिटी और खुद पर एक्सपेरिमेंट करना सबसे ज्यादा जरूरी

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/global-fashion-and-design-week-13891

     

    ब्लास्टिंग अफवाह - सचिन पायटल पर हाथ मारना चाहती है भाजपा?

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/sachin-pilot-blasting-rumor-bjp-rajasthan-congress-politics--13894

     

    विशेष आदिम जनजाति पुलिस पलटन : झारखंड का सलवा जुड़ूम तो नहीं बनेगा !!!

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/special-primitive-tribe-police-platoon-13893

     

    कांग्रेस और क्षेत्रीय विपक्षी दलों का आचरण पिछड़ा वर्ग विरोधी- भाजपा

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/narendra-modi-in-concluding-session-of-bjp-national-executive-meeting--13890

     

    नरेंद्र मोदी आजादी के बाद के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता - भाजपा

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/reception-of-bjp-national-president-amit-shah-on-his-arrival-at-bhubaneswar-13887

     

    वसुंधरा का जादू कायम है.... नरेन्द्र मोदी के लिए अब वसुंधरा को हटाना आसान नहीं होगा...

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/vasundhara-raje-dhaulpur-assembly-by-election-vasundharas-magic-narendra-modi-13876

     

    विशेष आदिम जनजाति पुलिस पलटन : झारखंड का सलवा जुड़ूम तो नहीं बनेगा !!!

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/special-primitive-tribe-police-platoon-13893

     

    क्या मीडिया तीन तलाक के मामले को आवश्यकता से अधिक महत्व दे रहा है?

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/media-tripple-talaq-divorce-13889

     

    पूरा राजनीतिक वर्ग आम जनता के खिलाफ लामबंद है...

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/goodbye-journalism-13885

     

    हिन्दुस्तान हो या पाकिस्तानसरकारें और अदालतें भी चुप हैं...राष्ट्रवाद की बाढ़ जो आई हुई है

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/kulbhushan-jadav-nationalist-politics-13884

     

    अफगानिस्तान पर अमरीका ने हमला आईएस को तबाह करने नहीं अमरीकी जनता को ठगने के लिए किया

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/us-invasion-of-afghanistan-is-american-public-protests-isis-obama-hillary--13883

     

    पुलिस के जवानों का 'दर्दभी समझिए

    काम के बढ़ते बोझ ने पुलिस वालों में 'इंसानहोने के भाव को ही खो दिया है।

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/uttar-pradesh-law-and-order-vacancies-in-police-yogi-sarkar-rule-of-law-13882

     

    सलाम मशालमशालें बुझा नहीं करतीं। अँधेरे के खिलाफ जंग जारी रहेगी। इंसान की मजबूरी है कि उसे रौशनी बेहद पंसद है।

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/mashal-khan-wali-khan-university-mardan-lynching-13881

     

    CPI-M Condemns Arrest of Abul Hossain ! Demands His Immediate Release!

    http://www.hastakshep.com/englishnews/india-cpi-m-condemns-arrest-of-abul-hossain-demands-his-immediate-release-13880

     

    Tripura : EVMs with Voter-Verified Paper Audit Trail (VVPAT) must be used- CPIM

    http://www.hastakshep.com/englishnews/india-tripura-evms--with-voter-verified-paper-audit-trail-vvpat-must-be-used--cpim-13879

     

    NPP Supremo calls on Security Council to sensor US President for violating International Law

    http://www.hastakshep.com/englishnews/india-sensor-us-president-for-violating-international-law-13874

     

    Kashmir needs a healing touch today. Can any democracy of 7% vote would legitimise?

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/debate-kashmir-needs-a-healing-touch-today-13886

     

    Our democracy under threat

    RSS was against the movement for India's independence

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/debate-democracy-under-threat-13878

     

    By-poll and Lesson for AAP

    Was AAP different than other bourgeois parties?

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/debate-by-poll-lesson-for-aap-13858


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    `सन् 2000 के अंदर मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से ज्यादा हो जायेगी!'
    प्रबीर गंगोपाध्याय

    पुस्तक अंशः

    जनसंख्या की राजनीति
    फिलहाल तथ्य और कुछ सवाल
    प्रबीर गंगोपाध्याय
    अनुवादःपलाश विश्वास


    सारणी- 8 में हम देख रहे हैं कि हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में मुसलमानों की वृद्धि दर असीम है। वास्तव में,1961 में वहां मुसलमानों की कोई आबादी ही नहीं थी। 1971 में वहां 28 मुसलमान रहने लगे तो वृद्धि दर अनंत हो गयी। सीमाहीन। असीम।17 जिलों में वृद्धि दर 100 से ज्यादा है।लेकिन उन जिलों में मुसलमानों की जनसंख्या बेहद कम है। कहीं भी कुल जनसंख्या का 3.3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। सिर्फ दमन अपवाद है, जहां मुसलमान 11.24 प्रतिशत हैं। जिन जिलों में वृद्धि दर 50 से लेकर 99.9 प्रतिशत है, उन जिलों में भी मुसलमानों की जनसंख्या कुल जनसंख्या के दस फीसद से ज्यादा नहीं है।जो औसत प्रतिशत 11.2 से कम है। अपवाद देवरिया (उत्तर प्रदेश), मुंबई और पश्चिम कन्नड़ हैं। इन जिलों में मुसलमान 11.2 प्रतिशत से ज्यादा हैं।
    दूसरी तरफ, जिन जिलों में मुसलमानों की संख्या काफी है, कहीं कहीं वे बहुसंख्य भी हैं, उन सभी जिलों में मुसलमानों की वृद्धि दर औसत वृद्ध दर से कम है। कुछ जिलों में तो कुल जनसंख्या के अनुपात में मुस्लिम जनसंख्या घट भी गयी है। सारणी -9 में हम कुछ उदाहरणों पर गौर करेंगे।

    सारणी-9(11)
    -------------------------------------------------------------------------------------------------
    जिला   जिले की जनसंख्या में          जनसंख्या में कमी वृद्धि         वृद्धि दर
               मुस्लिम प्रतिशत                                                             1961-71
                       1961             1971                                                     (प्रतिशत)
    -------------------------------------------------------------------------------------------------
    बरमुला          97.30            95.90                   -1.4                             27.16
    अनंतनाग      95.20            94.80                   -0.4                             27.42
    लक्षद्वीप       98.69           94.37                 - 4.32                            26.19

    श्रीनगर          90.60           91.40                  +0.8                            28.44
    पूंछ                  *               88.90                     *                                 8.52
    मल्लापुरम        *               63.93                     *                               47.98
    डोडा             65.00           63.60                 -1.14                             28.21
    रजौरी          79.40           61.00                  -18.4                            11.16
    मुर्शिदाबाद    55.80          56.30                 +0.54                             29.48
    लद्दाख          45.50          46.66                +1.16                              21.99
    रामपुर          45.50         46.66                +0.76                              30.59
    मालदा         46.10          43.13                 -2.97                              23.24
    ग्वालपाड़ा     43.30          42.25                -1.05                               40.57
    कछाड़          39.10         39.89                +0.79                               26.78
    पूर्णिया         37.25         38.15                +2.02                               34.18
    नौगांव         41.20         39.39                 -1.81                               32.62  
    मुरादाबाद     37.25         38.15                +0.90                               26.00
    बिजनौर       36.40         36.66                +0.16                               25.51
    प.दिनाजपुर  39.40         35.89                 -3.51                               27.94
    उधमपुर       33.80         32.92                 -0.88                               25.96
    सहारनपुर    31.00          31.11                +0.11                               27.31
    कोझीकोड    47.20         30.62                -12.08                              33.06
    बरेली          29.80         29.20                  -0.60                              17.68
    बीरभूम       27.60         29.19                 +1.59                               29.75
    कामरुप      29.30         28.93                   -0.37                              36.06
    मुजफ्फरपुर 27.90        28.83                   +0.93                             28.64
    बहराइच     25.55         26.99                  +1.44                              21.53
    हैदराबाद    27.10         26.45                    -0.55                             37.14
    माहे             *              24.44                        *                                22.80
    जैसलमेर   26.40          24.40                   -2.00                                9.88
    कन्नानौर  23.50          24.34                   +0.84                             37.44
    24 परगना 23.41         23.68                   +0.27                             36.19
    नदीया       24.37         23.34                    -1.03                             24.96
    गोंडा         20.90         22.57                   +1.67                              19.99
    मेरठ         20.90         22.14                    +1.24                             31.06
    पीलीभीत   20.00         21.62                    +0.62                             25.24
    पालघाट     28.00         21.27                   -6.73                              17.76

    कूचबिहार   23.70         21.25                   -2.45                              23.98
    बस्ती        18.60          20.30                  +170                               23.57
    -------------------------------------------------------------------------------------------------

    सारणी -9 में हम देखते हैं कि 1971 की जनगणना के मुताबिक देशभर में कुल  9 जिलों में मुसलमान बहुसंख्य हैं। 1961 में वे कुल 7 जिलों में बहुसंख्य थे। इसकी वजह यह है कि पूंछ (जम्मू व कश्मीर) और मल्लापुरम, दोनों जिलों का गठन 1961 के बाद हो गया। बाकी सात जिलों में श्रीनगर को छोड़कर सभी जिलों में मुसलमानों की जनसंख्या घटी है। इन जिलों में वृद्धि की दर औसत वृद्धि दर से कम है। ग्वालपाड़ा जिले में वृद्धि दर 40.57 होने के बावजूद कुल जनसंख्या के अनुपात में मुस्लिम जनसंख्या 191 से 1971 तक  1.05 प्रतिशत घट गयी। रजौरी जिले में सबसे ज्यादा घटी है मुस्लिम जनसंख्या।
    जिन 15 जिलों में मुसलमानों की आबादी घट गयी है, उनके बारे में आंकड़े सारणी -10 में दिये गये हैं।
    सारिणी -10 में हम देखते हैं कि लाहौल स्पीति (हिमाचल प्रदेश) में मुसलमान करीब करीब गायब हो गये हैं।1961 में वहां मुसलमान कुल जनसंख्या के 5.96 प्रतिशत थे,1971 में यह अनुपात घटकर 0.12 हो गया है। मणिपुर में मुस्लिम जनसंख्या करीब दो तिहाई घट गयी है। त्रिपुरा के तीन जिलों में मुसलमान करीब 10-15 प्रतिशत घट गये हैं।

    सारणी 10 (12)
    -------------------------------------------------------------------------------------------------
    जिला                 जिले में जनसंख्या में                       जनसंख्या में           वृद्धि दर
                          मुसलमानों का प्रतिशत                      कमी वृद्धि            1961-71
                           1961              1971                                            (प्रतिशत में)
    -------------------------------------------------------------------------------------------------
    लाहौल स्पीति      5.96               0.12                       -5.84                - 97.77
    दक्षिण त्रिपुरा     20.10              4.34                      -15.76                - 76.68
    मणिपुर दक्षिण    6.20              0.19                        -5.01                - 66.43
    कुलु                     *                  0.21                           *                   - 61.20
    पश्चिम त्रिपुरा   20.10              6.47                      -13.63                 -54.82
    रोपड़                  *                   0.55                          *                      -47.51
    जिंद                  *                   1.20                          *                       -31.27

    खासी जयंतिया
    पहाड़              1.10                0.73                       -0.47                   -24.56
    उत्तर त्रिपुरा   20.10               9.38                      -10.72                  -20.72
    टिहरी गढ़वाल  0.58               0.48                        -0.10                   -10.79
    पुरुलिया         6.00                4.64                        -1.36                    - 8.72       
    लुधियाना       0.41                0.40                        -0.01                    -7.69
    होशियारपुर    0.50                0.33                        -0.17                     -7.02
    चमोली          0.38                0.32                        -0.06                     -1.96
    महासु           0.80                0.67                        -0.13                     -1.05
    -------------------------------------------------------------------------------------------------
    इस तरह के बदलाव से यह समझने की कोई वजह नहीं है कि यह कुदरत के किसी गैरमामूली कानून के तहत हो रहा है।यानी कि मृत्यु दर जन्म दर के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ गयी होगी।असल में यह सबकुछ जिले से बाहर चले जाने  या जिले में नई आबादी की बसावट की वजह से हुआ है। त्रिपुरा के सेंसस कमिश्नर ने कहा हैः `हम अच्छी तरह जानते हैं कि 1961 से पहले पूर्वी पाकिस्तान ( अब बांग्लादेश) से गैरकानूनी तरीके से कुछ घुसपैठियों के आ जाने से त्रिपुरा में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ गयी थी। इन लोगों की वापसी का नतीजा त्रिपुरा की मुस्लिम जनसंख्या में देखा जा रहा है।’
    जिलावार इन आंकड़ों से हमारे लिए जो मसला साफ हो जाता है, वह यह है कि सिर्फ वृद्धि दर से मुस्लिम जनसंख्या के हिसाब किताब से बनी हमारी धारणा हमें एक बड़ी गलती की तरफ खींच ले जायेगी। सिर्फ इन जिलावार आंकड़ों से हम अंदाज लगा सकते हैं कि मुसलमानों की संख्या दरअसल कितनी बढ़ी है। इसके साथ ही हम हकीकत की जमीन पर खड़े होकर यह समझ सकते हैं कि किसी सूरत में मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि की वजह से मुसलामान हिंदुओं के बहसंख्य संख्या को पार नहीं कर सकते।
    पिछले तेरह सौ सालों के तथ्यों की पड़ताल करने के बाद यह मालूम पड़ता है कि अखंड भारत में मुसलमानों की आबादी 1941 में सबसे ज्यादा हो गयी थी। तब जेएम दत्त के अनुसार कुल जनसंख्या के 23.81 प्रतिशत या किंग्सले डेविस के मुताबिक 24.28 फीसद मुसलमान थे। हालांकि बहुत लोगों का यह मानना है कि पाकिस्तान की मांग का औचित्य साबित करने के मकसद से 1941 की जनगणना में मुस्लिम जनसंख्या को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया गया था।
    फिर अखंड देश के  विभाजन के बाद भारत में मुस्लिम जनसंख्या 9-11 प्रतिशत बना रहा है। दूसरी तरफ,शुरु से हिंदू अस्सी फीसद से ज्यादा बने हुए हैं। आज भी स्थिति वही है। तेरह सौ सालों से अगर जन समुदायों में तरह तरह के बदलाव के बावजूद तस्वीर एक सी बनी हुई है तो अगले तेरह सौ साल में भी इस तस्वीर को पलट देना क्या संभव है? इसका फैसला चिंतनशील पाठकों पर छोड़ दिया जा रहा है।
    विश्व हिंदू परिषद का दावा और एक हिसाब

    अब हम विश्व हिंदू परिषद के दिये तथ्यों की पड़ताल करेंगे।हमने पहले ही साफ कर दिया है कि उनके आंकड़े सरकारी आंकड़ों से मिलते नहीं हैं। वे मुसलमानों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर बता रहे हैं। तब भी हम देखते हैं कि दिये गये तथ्यों (सारणी-2)के मुताबिक मुस्लिम जनसंख्या 1951 के 3.5 करोड़ से बढ़कर 1981 में 8.5 करोड़ हो गयी है। यानी की मुसलमानों की संख्या  इन तीस सालों में 5 करोड़ बढ़ गयी है। इस हिसाब से हर दस साल में उनकी औसत वृद्धि दर 1.66 करोड़ बनती है। 1981 -2001 तक या बीस साल में अगर इसी दर से वृद्धि होती रही तो मुसलमानों की संख्या बढ़कर 11.82 हो जाती है। दलील बतौर अगर हम मान लें कि मुस्लिम जनसंख्या उन तीस साल की अवधि के मुकाबले दो गुणा भी बढ़ जाये तो भी उनकी संख्या 2001 में 15 करोड़ बनती है। अब हम यह भी मान लें कि इस दौरान हिंदुओं की जनसंख्या में कोई  बढ़ोतरी नहीं हो रही है। तो भी किस गणित से 1971 के 55 करोड़ हिंदुओं के मुकाबले 15 करोड़ मुसलमान बहुसंख्य हो जायेंगे? ऐसा कौन गणित विशारद है, जिनके उपजाऊ दिमाग में इसतरह का अजब गजब गणित बन रहा है!
    अब थोड़ा हिसाब जोड़ लिया जाये। 1981 के आंकड़ो में देखा जा रहा है कि भारत में हिंदुओं की जनसंख्या 55 करोड़ है और मुसलमान 7.5 करोड़ हैं। यानी हिंदुओं के मुकाबले में ज्यादा होने के लिए और 48 करोड़ मुसलमान होने चाहिए। जो 7.5 करोड़ मुसलमान भारत में हैं, वे सबके सब बच्चे पैदा नहीं कर सकते। उनमें बच्चे हैं और बूढ़े बूढिया भी हैं। मुसलमानों के बहुत ज्यादा बच्चे होते हैं। मान लीजिये कि इनमें 4.5 करोड़ ब्च्चे और बूढ़े हैं।(14) बाकी 3 करोड़ मर्द और औरतें बच्चे पैदा करने में सक्षम हैं। इस हिसाब से 1.5 मुस्लिम मर्द औरत जोड़ियों को 45 करोड़ बच्चे पैदा करने होंगे। हर जोड़े के लिए यह संख्या 32 होगी। उनकी औसत संतानों की संख्या कुछ कम यानी तीन ही मान लें तो अगर हर  मुस्लिम जोड़ी 35 बच्चे पैदा कर सकें तभी विश्व हिंदू परिषद की चेतावनी सच में बदल सकती है।( यह भी मान लेना होगा कि इस अवधि में हिंदू बच्चे पैदा नहीं करेंगे।)

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    Please save the universities!
    Palash Biswas
    Video embedded:
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    I am very worried with the unexpected gender conflict situation in University campus countrywide.As the girl students were leading the student movement with the male students and even some of them kissed each other publicly to protest intolerance,hate campaign and racist attacks by the fascist forces misusing identities,this sitaution seems rather inserted within every campus to stop the newly empowered girls to participate or lead the student movement.
    We have sen such incidents recently in JNU and Jadavpur campus which scrapped the HOKKOLOROB.
    I am shocked with the latest development in Wardha Hindi University where a research scholar has been ousted while the investigation in a molestation case lodged by a girl student.The research scholar has been very active in the campus and molestation is yet to be proved.
    I appeal everyone to understand the unprecedented critical juncture after the Rhit Vemula and Najib and Hok Kolorob movements as every university campus has been targeted and inflicted.

    Sanjiv Chandan has wrote:
    और अंततः यौन उत्पीड़न के आरोपी विद्यार्थी को हिन्दी विश्वविद्यालय ने अपने प्राशासकीय संरक्षण से मुक्त कर दिया और उसके निष्कासन का निर्णय अपने विश्वविद्यालय के वेबसाईट पर जारी कर दिया. पत्र नीचे है. यह आरोपकर्ता लडकी और उसके साथियों की बड़ी जीत है.
    लेकिन ज़रा गौर करिये निष्कासन की भाषा और निर्णय पर. अभी तो आरोपी छात्र की पीएचडी पर अस्थाई रोक लगाने से वे नकार रहे थे और अभी ही बिना जांच पूरी हुए उसे निष्कासित भी कर दिया. यह विश्वविद्यालय है या कोई घनचक्कर ! सच में इस विश्वविद्यालय को या तो बंद कर देना चाहिए या मर्ज कर देना चाहिए. वैसे भी इसे सरकार ने नन परफार्मिंग यूनिवर्सिटी घोषित कर रखा है, शायद ऐसे ही अधिकारियों और शिक्षकों के कारण.
    On the other hand वे खेलते हैं विद्यार्थियों के भविष्य से और विद्यार्थी भूख हड़ताल को विवश ....
    तस्वीर में केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार के विद्यार्थी हैं , इनका बीए-बीएड कोर्स 15 दिनों में पूरा होने वाला है , लेकिन कोर्स को मान्यता ही नहीं है. विश्वव
    विद्यालय अपना हाथ झाड रहा है, यूजीसी, एमएचआरडी सबके -सब पल्ला झाड रहे हैं.
    देश भर में ऐसे कई केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिनके बीए-बीएड कोर्स को मानयता नहीं है
    आखिर इन विद्यार्थियों का क्या दोष है. ये तीन दिन से भूख हड़ताल पर हैं.
    पूरी खबर पढ़ें:
    http://thewirehindi.com/…/students-on-hunger-strike-in-cen…/


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    सस्ती दरों पर मछली उपलब्ध कराएगी भाजपा सरकार

    गोवा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार मछली खरीद पर अनुदान देगी। इस आशय की घोषणा गोवा के कैबिनेट मंत्री विनोद पालिएंकर ने की...

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/fish-crisis-goa-cabinet-minister-vinod-palyekar-fish-at-cheap-rates-13936

    छात्र विरोधी यूजीसी गजट के खिलाफ आंदोलन : बहुजन छात्रों को प्रताड़ित कर रहा कुलपति

    जेएनयू के छात्र पूरे देश के विश्वविद्यालयों में घूमकर छात्र-नौजवानों को एकजुट कर रहे हैं। बिहार में इस मुहिम का पहले चरण की शुरूआत हो रही है।...

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/jnu-student-ledear-prashant-nihal-mulayam-singh-birendra-kumar-13935

    जब गृह मंत्री को कहना पड़ा कश्मीरी भी भारत के ही नागरिक हैं

    देश में कश्मीरियों को लेकर जिस तरह ही नफरत सामने आ रही है उसको लेकर गृह मंत्रालय भी सतर्क हो गया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सभी राज्यों को एडवायजरी जारी की है।...

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/mewar-university-of-rajasthan-assault-with-kashmiri-students-13934

    अडवाणीजी 6 दिसंबर को शौर्य दिवस मनाएंगे कि नहीं

    बाबरी मस्जिद : इस की पीड़ा कितनी गहरी होगीये तो आडवाणी ही जानते हैं। मरने के बाद पीछे क्या होता हैकिसी ने नहीं देखा, ...

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/guestwriter-advaniji-december-6-shaurya-divas-babri-masjid-bjps-top-man-13933

    Please save the universities

    understand the unprecedented critical juncture after the Rohit Vemula and Najib and Hok Kolorob movements as every university campus has been targeted and inflicted....

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/please-save-the-universities-wardha-hindi-university-13938

    Modi Government Approaches S.C. for Permission to Kill Innocent Citizens with Impunity

    government is asking the apex court to recall its order with the aim of giving a free hand to the police and security forces to kill innocent citizens in the name of national security. ...

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/modi-government-approaches-sc-for-permission-to-kill-innocent-citizens-13932

    BJP's Double Speak on Beef

    Despite the loud voice duet on cow slaughtering Bhagva Brigade is completely getting unmasked in northeast Indian states. After making a manipulated entry into the Northeast ...

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/bjp-double-speak-on-beef-13928


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    Government of India reduced to a security agency working in foreign interest.Rare kind of racist fascist patriotism!
    Economic reform unprecedented at the cpst of security and integrity of India.The policy making and governance in anti national mode in the times of bigotry inflicted blind nationalism!
    Palash Biswas 
    Economic reform unprecedented at the cpst of security and integrity of India.The policy making and governance in anti national mode in the times of bigotry inflicted blind nationalism!
    They have the mandate to sell off India like any PSU!
    India encouraging global defence companies to set up units: Arun Jaitley says.Thus the security,sovereignty and unity have been handed over to global private companies and foreign interests.Rare performance of racist fascist patriotism which reduces the government of India into a security agency working for foreign interests.

    Thus,the Union Finance Minister was given additional charge of Defence Ministry after Manohar Parrikar was made the Chief Minister of Goa.

    India is formulating policy to help major global defence companies set up manufacturing units in the country in collaboration with Indian firms, Finance Minister Arun Jaitley said today. 

    "Under our changed policy, we are in the future going to concentrate not merely in buying from the rest of the world, but encouraging global defence majors in collaboration with Indian companies to set up manufacturing units in India," Jaitley said at a reception hosted by India's Ambassador to the US Navtej Sarna.

    Jaitley, who holds the additional charge of the Defence Ministry, said the Union Government has made the initial policy changes while some more are being planned. 

    "Hopefully in the years to come, the impact of this change as far as defence manufacturing policy is concerned would be visible in India. It is receiving a good response from major manufacturers," Jaitley said without giving any details. 

    Jaitley was given the additional charge of the Defence Ministry apart from the Ministry of Corporate Affairs after his predecessor Manohar Parrikar was made the Chief Minister of Goa.

    Using cricket lingo, he described himself as the "night watchman" for these two ministries. "One of my principal responsibilities is to look after the finances of the government. There are some additional responsibilities that keep coming," he said. 

    "In the US you do not have much of cricket. In India it is our favourite game. In the game of cricket, we call it night watchman," he said, referring to his dual role.

    "The Prime Minister has asked me to fill in that role in some other departments. But my principal requirement is in finance," Jaitley said. 

    Jaitley, leading an Indian delegation, arrived here on April 20, to attend the annual Spring meetings of the International Monetary Fund and the World Bank. 

    In addition to his meetings and presentations at the annual Spring meetings of the IMF and the World Bank, Jaitley is also scheduled to attend meetings of other multilateral forums including that of the G-20 finance ministers.

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    Humanity ashamed,not the people of India!

    Palash Biswas

    Video:https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/1692450647450004/?l=4428451761847766847


    Not very long ago,India remained an agrarian society with agrarian economy.Socialism meant Green Revolution. Irrespective of caste, religion, race, language, region, celebration of life meant a common culture deeply rooted in rural India which was defined as Swraj!But we sacrificed the Agrarian India on the altar of free market economy only 25 years ago and agrarian growth rate reduced to near zero. nWe wanted a consumer market and a service oriented economy in which the state and the government elected by the people should be managers of the global corporate companies.The task had to accomplished with religious ritual of vedic racist sacrifice tradition of the caste,calss race hegemony ruling India.

    Hence,the cashless digital India means ethnic cleansing of the agrarian communities ie SC,ST,OBC and minorities the majority rooted in rural India and mass nuclear destruction of rural India to make in an oversmart India with readjustment of demography with pure blood.

    It is happening and the it is systematic strategic selling off the natural resources owned and defended by agrarian communities.

    Thus,the ruling class and its policy making governance bodies never care to address the agrarian crisis created by themselves.

    The agrarian crisis rather has become a magical wand with inherent inequality and injustice to sustain the hegemony rule.

    We have seen prime ministers belonging to agrarian communities time and again,majority ministers in center and states,CMs and politicians speaking aloud about the wellness of peasantry who have been blasting the peasantry with their political might.

    Earth day celebrated as the Nation has no sympathy with the peasantry!They represent the Earth under monopolistic racist fascist aggression unabated!Those naked peasants on Jantar Mantar and shameless political class and the intelligentsia speaking on earth and environment have not the courage to stand with those naked humanity who feed us with the growth of the soil.Democracy and justice witness ding urine by the helpless producers as the consumers captured everything with their purchasing capacity and the peasantry is subjected to ethnic cleansing!

    It seems rather  like a magic show to attract the audience as the peasantry has no space to raise their voice.The Jantar Mantar show evented for the media representes the helplessness of the majoority Indian citizens belonging to Indian peasantry.

    Earth might not sustain itself if the peasantry is killed by the Global oreder of ethnic cleansing!


    From Wikipedia, the free encyclopedia:

    In 2014, the National Crime Records Bureau of India reported 5,650 farmer suicides.[1] The highest number of farmer suicides were recorded in 2004 when 18,241 farmers committed suicide.[2] The farmers suicide rate in India has ranged between 1.4 and 1.8 per 100,000 total population, over a 10-year period through 2005.[3]

    India is an agrarian country with around 70% of its people depending directly or indirectly upon agriculture. Farmer suicides account for 11.2% of all suicides in India.[1] Activists and scholars have offered a number of conflicting reasons for farmer suicides, such as monsoon failure, high debt burdens, government policies, publicmental health, personal issues and family problems.[4][5][6] There are also accusation of states manipulating the data on farmer suicides.[7]


    पेशे से पत्रकार आशुतोष मिश्रा ने किसानों के मूत्रपान करने की ख़बर शेयर करते हुए पूछा है, 'हिंदुओं के साथ इतना अन्याय! कहां गए धर्म के रक्षक जो गरीब हिंदू किसानों के लिए आगे नहीं आ रहे?'


    जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने किसानों के मूत्र पीने की ख़बर को शेयर करते हुए ट्वीट किया, 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वे कहां हैं…

    Raavenraj Sayam Koitoor जंतर मंतर पर किसानो ने मूत्र पिया।

    आरक्षण और मेहनत से अफसर बने किसान पुत्र और किसान के दम भरने वाले नेताओं को सांप सूंघ गया।

    आक्रोश की चिंगारी उठने लगी है

    संभल जाओ वरना कुछ नहीं बचेगा।

    तुम्हारे महल राख हो जाएगें।

    धरती पुत्र है धरती जैसा दिल है किसानो का सब सहते है।भूकंप आया ना तो तुम्हारी ऊंची ऊँची हवेलियां मिट्टी में मिल जाएगी।



    पिछले एक महीने से देश के राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे तमिलनाडु के किसानों ने शनिवार को मांगें नहीं माने जाने पर नाराजगी जाहिर करते हुए मूत्र पिया। सूखे की मार झेल रहे तमिलनाडु के किसान केंद्र सरकार से कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं। किसान 38 दिनों से केंद्र से कर्जमाफी और वित्तीय सहायता की मांग के साथ धरने पर हैं। सरकार और प्रशासन का ध्यान अपनी बदहाली की ओर खींचने के लिए गले में खोपड़ी पहनने से लेकर सड़क पर सांभर-चावल और मरे हुए सांप-चूहे खाने तक, इन किसानों ने कई सांकेतिक तरीकों का सहारा लिया। हालांकि सरकार ने किसानों के इस प्रदर्शन को लेकर आंख-कान बंद कर रखे हैं। सरकार की ओर से अभी उन्हें किसी तरह की मदद का आश्वासन नहीं दिया गया है।

    शनिवार को किसानों द्वारा प्रदर्शन के दौरान मूत्र पीने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोग इनके समर्थन में खड़े हो गए हैं। वहीं, कई यूजर्स ने किसानों की मदद न करने पर राज्य सरकार और केंद्र सरकार को फटकारा है तो कुछ लोगों ने पीएम मोदी से इनकी मदद करने की अपील की है। कुछ यूजर्स ने सरकार और पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए शर्म करने को कहा है।

    आंदोलन की अगुआई कर रही नेशनल साउथ-इंडियन रिवर्स लिंकिंग फार्मर्स असोसिएशन के स्टेट प्रेजिडेंट पी.अयाकन्नू ने कहा था कि हमें पीने के लिए तमिलनाडु में पानी नहीं मिल रहा है और पीएम नरेंद्र मोदी इसकी अनदेखी कर रहे हैं, तो हमें अब अपने मूत्र से ही प्यास बुझानी पड़ेगी। प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है, 'हम लोगों को नजरअंदाज करके मोदी ने बता दिया कि वह हम लोगों को दिल्ली से भगाना चाहते हैं, कभी-कभी तो हमें लगता है कि इससे अच्छा तो हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाए।'इसके साथ ही किसानों ने शनिवार को मूत्र पीने के साथ ही कहा कि सरकार ने हमारी मांग पर ध्यान नहीं दिया तो रविवार को अपना मल खाएंगे।

    इस सिलसिले में स्त्री काल के संपादक संजीव चंदन का मंतव्य गौरतलब हैः

    अब किसानों को न्याय मिल जायेगा क्योंकि अब साहित्यकर भी 41वें दिन संवेदित हो गये हैं।

    आखिरकार स्कूल की लड़ाई लड़ते, हिंदी के साहित्यकारों के प्रिय पत्रकार , श्री रवीश कुमार ने किसानों के संघर्ष पर प्राइम टाइम कर दिया । बस साहित्यकार भी संवेदित हो गए। उसके पहले रवीश जी जब स्कूलों को ठीक करने में लगे थे, तो बीच-बीच में दूसरे चैनलों पर कटाक्ष भी करते जा रहे थे कि वे गाय, हिन्दू-मुसलमान या मंदिर-मस्जिद कर रहे होंगे।

    वैसे तमिलनाडु वाले किसान, पाठ्यपुस्तकों वाले निरीह किसान नहीं हैं। कभी भाजपा के तमिलनाडु में कार्यकर्ता रहे इन किसानों के नेतृत्व को यह पता है कि मीडिया तमाशा पसन्द है, तमाशा के बाद ही वे कवरेज देते हैं। योगी-मोदी में लगे मीडिया को अपने जरूरी मुद्दों के प्रति आकर्षित करने के लिए उन्हें 40 दिन से तरह-तरह के इवेंट करने पड़ रहे हैं। क्योंकि सरकार मीडिया में हंगामे के बाद ही सुनती है। इंडियन एयरलाइंस में हंगामा करने वाले शिवसैनिक सांसद को सरकार ने सबक सिखवा दिया और सहारनपुर में बड़े पुलिस अधिकारी के घर तोड़-फोड़ करने वाले भाजपा सांसद पर चुप्पी साध ली।

    दिल्ली में अजीबोगरीब इवेंट के साथ आंदोलन करते किसान मीडिया को कमोवेश अपनी ओर खींच ही ले रहे-अब जब किसान कपड़े उतार देगा रायसीना पर, अपना ही पेशाब पीने लगेगा जंतर-मंतर पर तो झक मारकर कवरेज करियेगा ही, हजारो किसान की मौत संवेदित न करती हो तो भी। इस तरह के इवेंटमय आंदोलन किसान विदर्भ में कई बार करते रहे हैं।

    कुछ साल पहले उन किसानों के घर और उन गांवों में जाना हुआ था , जहां क्रमशः सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह के जाने के बाद बड़ा मीडिया इवेंट बना था। जहां सोनिया गईं, जिस किसान विधवा को एक लाख का चेक दिया था, उसकी समस्या ज्यों की त्यों थी, उसके खेत गांव के नाले में डूबते थे, फसल नष्ट होता था, यथावत रहा सबकुछ । राहुल की पोस्टर वुमन विधवा किसान कलावती के एक और किसान दामाद ने आत्महत्या कर ली थी। और मनमोहन सिंह के जाने के पहले तक , जिस वायफड़ गाँव मे एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की थी , वहां दो-दो किसानों ने आत्महत्या कर ली ।

    तो हे संवेदित मित्रों , जब तक कृषि मजदूरों को स्कीलड श्रमिक का दर्जा नहीं मिलेगा, जब तक उनके फसल का उचित दाम नहीं मिलेगा, जिसके लिए कुछ आपको भी योगदान करने होंगे, यानी खाद्य पदार्थों के लिए अधिक भुगतान करना होगा, जबतक समग्र नीति नहीं बनेगी, तबतक आपको किसान बेचारे अपने इवेंट से संवेदित करते रहेंगे, क्योंकि उनके मरने से वैसी संवेदना कहां जाग पाती है!

    Peasants committing suicides are cowards and criminals — said BJP minister

    हाल में नई दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की रैली में भी एक किसान की खुदकशी पर हंगामा बरपा था।फ्लैश बैक में इसे भी सोशल मीडिया के सौजन्य से देख सकते हैंः

    Gajendra Singh, a farmer from Rajasthan, his crops ruined by rains, hanged himself from a tree at an AAP rally here on 22 April just before Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal addressed thousands against the controversial land ordinance. The unfortunate event was captured live by the electronic media. It took place at Jantar Mantar in the heart of the city where thousands from Delhi and other states had turned up to denounce the land bill at a mass meeting called by the AAP. A suicide note in Hindi found at the spot said the man was taking his life because untimely rains had destroyed his crops and ruined him. Immediately after the incident, political blame game ensued with the leaders of various ruling parties slinging mud at each other for the heart-rending incident.

    But the most 'startling" comment came from O P Dhankar, BJP agriculture minister of Haryana. He described the peasants who commit suicide as cowards and criminals not worthy of help from the government. Playing a second fiddle to such politicians devoid of conscience are the self-styled economists in the pay roll of the ruling monopolists. Swaminathan A Aiyer wrote in his column in the Times of India dated 10 May 2015 that "Everybody loves farm suicides" because "Many states now compensate suicide-hit families, delighting moneylenders who had lent to these families and can now use muscle to claw back their dues from the compensation money." He further added that "presenting farm suicides as a single mass tragedy can win awards for journalists, TRPs for TV anchors, donations for NGOs opposing commercial crops and globalization, slogans for leftists attributing everything to class war, and votes for opposition parties." So the media, according to him, is highlighting farm suicides. This "erudite" person has then made a comment that would make even a donkey laugh. "The overwhelming cause of suicide is mental stress, not financial stress. Many suicides (notably in Andhra Pradesh) were of farmers who borrowed heavily to drill tubewells that quickly ran dry. Free electricity in many states (including AP) has greatly lowered water tables, ruining tubewells. Thus ''free electricity causes suicide", observes this 'celebrated economist-columnist'. The government might think of awarding a higher "Padma" award to him for such path-breaking discoveries.

    On the other hand, Dhankar who earlier headed the BJP's Kisan Cell, and is on record to have condemned the previous UPA government for not doing enough for farmers, denied that any farmer had committed suicide due to crop damage. But the fact is that after scores of debt-ridden farmers saw their winter crops damaged by unseasonal hailstorms and rains in states such as Rajasthan, Uttar Pradesh, Haryana and Punjab, there were reports of a string of suicides. The governments irrespective of hues whose brazenly anti-peasant policies have pushed the poverty-stricken hapless peasants to take recourse to such extreme steps are unfazed. On top of it, politicians like Dhankar who have ridden to power with the backing of the exploitative monopolists and are committed to serve their sinister class interest as their faithful subservient and in exchange are allowed to enjoy pelf and power do not feel even a fig ashamed for making such most atrocious remarks.

    As per the latest report, one peasant commits suicide in every 38 minutes, 47 in a day. The overall number of peasants' suicide has crossed 3 lakhs. And power-greedy anti-people bourgeois politicians like Dhankar have gone to the extent of even shunning the typical hoodwinking practice of the hypocrites to shed crocodile tears for public consumption and instead have been showing audacity to pass such derogatory remarks against the wretched impoverished pauperized peasants who being unable to secure any help or assistance from the power that be are ending their lives en masse. Time has come when the destitute peasants must understand that committing suicide would allow these heartless spineless politicians to thrive and prosper at their cost. They must close their ranks and unleash a massive organized movement to force the autocratic government yield to their righteous demand to live and dislodge persons like Dhankar from the public offices




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    महत्वपूर्ण खबरें और आलेख गिद्ध की नजर हमेशा मरघट पर गढ़ी रहती है - अच्छे दिनों के वादे से बड़ा झूठ मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि


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    Sukma Killings:Until you address agrarian crisis,the mourning continues,I am afraid!

    Palash Biswas

    Video:https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/1692450647450004/?l=4428451761847766847

    I am shocked by the killing of CRPF jawans who themselves belong to Indian Peasantry.I have been pointing out that military and paramilitary forces have been deployed in Tribal belt to accomplish the task of Salwa Judum to protect the corporate infrastructure to exploit natural resources.It is ironical as the Salwa judum is in itself that the tribals ase armed to kill the tribals themselves.The military and paramilitary forces are misused to protect private interests.

    The Maoist problem might not be dealt with Notebandi as it had been claimed as the arms used show that Maoists have no dearth of weapons as it had been claimed. Militraization of state might not solve the agrarian crisis and the infinite displacement drive against indigenous communities to eject them out of their forests,home and land with create more extreme format of Maoism as it had been originally known as the thunder of the spring.

    It is not an emotional case of patriotism at all.It means agarian communities have been subjected to monopolistic attack by desi videshi private companies.Simply Indian military and para military forces should not be used to protect corporate interest.
    Without addressing the Agrarian crisis and hearing the voices of the masses under repression,persecution we tend to create many more Kashmir within the border where our forces have to fight against the people of India who have opted for armed struggle against Military state governed by corporate hegemony.

    At he same time,the Maoist or Naxals should learn that they might have some ideological cause for this assault but in return they are killing innocent young men in military paramilitary dress who in fact mean to defend the nation and they are not the enemies of the people.


    Recently we have witnessed the AGHORI type media attracting naked urine drinking demonstration at Jantar Mantra by the peasants from Tmailnadu with skulls.Those peasants are not Aryans like UP or Maharashtra peasants and they have racially a different look.

    I am afraid that the media and intelligentsia have a racist antipathy against them and treated their grievances as political gimmick.

    Adivasis from Dantevara or Bastar are also racially different and they have not the NGO or political support to stage similar demonstration in the heart of Indian capital nor they mean tostage such political drama as they have been closely associated with the nature and never compromised with deshi or videshi ruler.Hence,we have hardly any idea about the tribal psyche which is no less explosive than mines and it is physically exploding time and again.

    Our friends expressed pleasure that the magic show ended at Jantar Mantar so that some gentle Aryand politician with their Aryand gentle and civilized supporter might show their strength with their hypocrite ideology.

    The centre managed the crisis convincing the Tamilnadu peasants to go back home but the stage is just transferred from new Delhi to Chennai and DMK,the opposition in Taminadu has called a Bandh simly because the problem is not addressed at all.

    If the political parties speaking and invoking identity emotions resultant hate and violence in so called mainstream politics, how the Maoists might be restrained with military might as the problem is never addressed and the government,politics or society or intelligentsia never care for the tribal people who are ultimate victims!

    It is the tragedy of Indian peasantry that they must be killed or whenever they opt for resistance led by some political force or say Maoists they have to kill the sons of the same soil fighting to defend the Nation inflicted by civil war.

    I have raised these questions in this video and the mourning continues and I am afraid that we have to continue to lose our dearest ones in this man made calamity infinite as the Cashless Digital Urban India has not sympathy whatsoever for the Indian peasantry!

    Our friend Rajiv Narayan Bhuguna has rightly pointed out on his FB wall:Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
    3 hrs ·
    पूंजीपतियों के हित साधन के लिए सरकारें आदिवासियों की जमीनें छीनती हैं , और फिर उन आदिवासियों के बीच पैठ बना कर नक्सली सुरक्षा सैनिकों को मारते हैं । इसी तरह अपने वोटों की फसल उगाने को राजनितिक पार्टियां कश्मीर में उलटे सीधे समझौते करती हैं , जिससे हालात बिगड़ते हैं । नतीजतन वहां भी सैनिकों को हताहत , आहत और अपमानित होना पड़ता है । छत्तीस गढ़ के नक्सली और कश्मीर के पत्थर बाज़ खूब समझ लें , कि जिन सैनिकों को वह निशाना बना रहे हैं , वे अपनी सेवा शर्तों तथा अनुशासन से बंधे हैं । वे वहां आदिवासियों की भूमि हड़पने को नहीं , अपितु अपनी नौकरी की वजह से तैनात हैं , और किसी सामान्य अथवा निर्धन मज़दूर , किसान , श्रमिक परिवार के बेटे हैं । उन पर चाँद मारी कर आप कोई क्रांतिकारी नहीं , अपितु कायराना और आत्म घाती हरकत कर रहे हो । धन पशुओं और राज नेताओं के गठ जोड़ से लड़ने के लिए संगठित होकर लोकतांत्रिक पद्धति ही अपनानी होगी ।

    -- 

    Indian Express reports:

    Worst in Chhattisgarh in seven years: 25 CRPF men killed by Maoists in Sukma

    Senior police officers said the ambush took place after personnel from the 74th battalion of CRPF had emerged from their camp to secure an under-construction road in a Maoist stronghold in south Sukma.

    Written by Deeptiman Tiwary , Dipankar Ghose , Rahul Tripathi | Raipur | Updated: April 25, 2017 11:21 am
    crpf attack, sukma, maoist attack crpf, chhattisgarh crpf attack, burkapal sukma, moaists attack army, sukma killings death toll, sukma crpf attack latest news, chhattisgarh news, indian expressIn 2010, 76 CRPF personnel were killed in Sukma in a Maoist attack. (Source: Express photo)

    IN THE biggest Maoist attack on CRPF personnel in Chhattisgarh in the last seven years, 25 jawans were killed and six injured in an ambush in the Burkapal area of Sukma on Monday afternoon, officials said.

    Senior police officers said the ambush took place after personnel from the 74th Battalion of CRPF had emerged from their camp to secure an under-construction road in a Maoist stronghold in south Sukma.

    The attack took place more than a month after 13 CRPF jawans were killed in a similar ambush on a road-opening party on the Injeram-Bhejji stretch, around 60 km from Monday's ambush spot. In 2010, 76 CRPF personnel were killed in Sukma in a Maoist attack.

    Sukma Attack: Mortal Remains Of Fallen Soldiers Brought To Caf Camp
     

    Chhattisgarh Police and CRPF sources said that two companies — around 150 personnel — of the battalion were ambushed by around 300-400 Maoists at around 12.30 pm on the Dornapal-Jagargunda stretch, one kilometre from the Burkapal CRPF camp. A company commander and six others were reported to be missing, said officials.

    crpf attack, sukma, maoist attack crpf, chhattisgarh crpf attack, burkapal sukma, moaists attack army, sukma killings death toll, sukma crpf attack latest news, chhattisgarh news, indian expressA piece of the explosives used in the attack.

    "The exchange of fire lasted for over two hours. Given the heavy gunfire, we could not ascertain the location of the entire CRPF party immediately," said a police officer.

    President Pranab Mukherjee and Prime Minister Narendra Modi condemned the attack.

    In a post on his official Twitter account, the President said: "Strongly condemn attack on CRPF personnel in Chhattisgarh; condolences to families of deceased and prayers for injured."

    In 2010, 76 CRPF personnel were killed in Sukma in a Maoist attack.

    Prime Minister Narendra Modi described the attack as "cowardly and deplorable". In a post on his Twitter account, he wrote: "We are monitoring the situation closely. We are proud of the valour of our (CRPF) personnel. The sacrifice of the martyrs will not go in vain. Condolences to their families."

    Union Home Minister Rajnath Singh said he has spoken to his deputy Hansraj Ahir, who is expected to visit Chhatishgarh and review the security situation along with the DG of CRPF. "Extremely pained to know about the killing of CRPF personnel in Sukma. My tributes to the martyrs and condolences to their families," Singh posted on Twitter.

    In 2010, 76 CRPF personnel were killed in Sukma in a Maoist attack.Injured CRPF jawans being brought in a chopper for treatment

    Officials said that Singh has briefed Modi on the attack and is also likely to visit Chattishgarh on Tuesday.

    Chief Minister Raman Singh, who was scheduled to return from Delhi on Tuesday, reached Raipur on Monday night to attend emergency meetings. Union Home Secretary Rajiv Mehrishi also held security reviews with senior officials and the CRPF.

    According to officials, the Home Ministry has conveyed its unhappiness over the ground situation and that "no lessons were learnt" after the March 11 attack in Bhejji.

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    Officials said the ministry has also called for a review of Standard Operating Procedures (SOPs) since road-opening parties had been targeted earlier, too.

    In preliminary reports submitted to the ministry, CRPF said that seven of its personnel were initially injured in exchange of fire with Maoists. By the time rescue teams reached the spot, they found the bodies of the personnel, with their weapons and wireless system missing.

    "In a fierce gunbattle with Maoists, 25 brave soldiers of CRPF laid down their lives for the motherland. Two companies of 74 Bn CRPF were deployed to provide security for road construction in the area connecting Burkapal to Chintagufa in Sukma… The party was ambushed by a group of about 300-400 Maoist cadres at 1230 hrs at Kalapattar near Burkapal," a CRPF statement said.

    In 2010, 76 CRPF personnel were killed in Sukma in a Maoist attack.

    Sources said the CRPF men suffered heavy casualties as they were located at a disadvantageous position.

    "The CRPF troops replied in a befitting manner but taking geographical position to their advantage, Maoists succeeded in inflicting losses on CRPF. Twenty-four brave soldiers (were) martyred at the battleground and one succumbed to his injuries while being evacuated to a hospital in Raipur," the statement said.

    Those killed at the spot were Inspector Raghubir Singh, sub-inspector KK Das, three assistant sub-inspectors, five head constables and fourteen constables. CRPF said that their bodies had been airlifted to Raipur and the injured admitted in Ramkrishna Hospital.

    The force also claimed that it had inflicted casualties on Maoists. "A considerable number of Maoists are believed to have been eliminated as tell-tale signs indicate from the ground," the statement said.

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    Senior CRPF officers, including the director general and inspector general (operations), have reached Raipur and will visit the encounter spot on Tuesday, sources said.

    The road being built is a crucial 56-km stretch from Dornapal on NH 30 to Jagargunda, considered one of the most sensitive zones in the country. While an 8-km stretch from Dornapal to Gorgunda has been completed, the remaining 46-km stretch, being built by the Police Housing Corporation, is still under construction.

    Over the last three years, road-building activity in this area has seen 11 exchanges of fire, 18 IED blasts, three civilian deaths in explosions, and the recovery of 16 IEDs.

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    Before this attack, seven security personnel were killed and 25 injured on this road over the last three years — there are five police stations and 15 CRPF camps at 11 places along the stretch.
    In the aftermath of the Bhejji attack, police officers had said that the Maoists were desperate to halt road construction here, and were targeting them through IEDs and attacks.

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    सार्वजनिक बयान

    "मंदबुद्धि लोगों का देश", नागरिकों को निराधार करती बायोमेट्रिक
    युआईडी/आधार अनूठा पहचान परियोजना का सच और बारह अंकों का रहस्य

    वित्त कानून 2017 और कंपनी राज की स्थापना की घोषणा

    कल 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट कि न्यायामूर्ति अर्जन कुमार सिकरी की
    अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ बायोमेट्रिक अनूठा पहचान/आधार संख्या से
    मौलिक अधिकार के उल्लंघन के मामले की सुनवाई कर फैसला देंगे. यह संयुक्त
    मुक़दमा मेजर जनरल (भूतपूर्व) सुधीर वोम्बात्केरे, सफाई कर्मचारी आन्दोलन
    के नेता बेज्वाडा विल्सन और केरल के पूर्व मंत्री बिनोय विस्वम द्वारा
    अलग-अलग दायर किया गया है. 21 अप्रैल को न्यायामूर्ति सिकरी ने अटॉर्नी
    जनरल से पुछा था कि आप अदालत के आदेश के बावजूद अनूठा पहचान/आधार संख्या
    को अनिवार्य क्यों कर रहे है. अटॉर्नी जनरल ने जवाब दिया कि क्योंकि आधार
    कानून, 2016 लागु हो गया है अदालत के आदेश का अब कोई महत्व नहीं रह गया
    है.

    मौजूदा कानून के सम्बन्ध में 10 अप्रैल को कानून मंत्री ने संसद को और 21
    अप्रैल को अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करते हुए यह कहा कि
    आधार कानून, 2016 के 12 सितम्बर, 2016 से लागु हो जाने के कारण संविधान
    पीठ का आदेश अब कानून नहीं रहा. दोनों ने बड़ी ही बेशर्मी से सुप्रीम
    कोर्ट के सितम्बर 14, 2016 के फैसले के बारे में अनभिज्ञ रहने का स्वांग
    रचा. ये बात संसद में भी सरकार को बताई गयी है और जल्द ही कोर्ट भी भी यह
    निर्णय सुनाएगा कि सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ का आखिरी फैसला ही देश
    का कानून है और वह सर्वोपरी है क्योंकि वह आधार कानून के लागु होने के
    बाद आया है.

    तथ्य यह है कि सितम्बर 14, 2016 के न्यायमूर्ति वि. गोपाला गौड़ा और
    आदर्श कुमार गोयल की खंडपीठ ने 5 जजों के संविधान पीठ के 15 अक्टूबर 2015
    के आदेश को सातवी बार यह कहते हुए दोहराया कि युआईडी/आधार संख्या किसी भी
    कार्य के लिए जरूरी नहीं बनाया जा सकता है. इस मामले की सुनवाई को
    सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टी .एस ठाकुर, न्यायाधीश ए. एम.
    खानविलकर और न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के पीठ ने 9 सितम्बर को तय
    किया था. यह फैसला पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक विद्यार्थी कौंसिल द्वारा दी
    गयी चनौती के सन्दर्भ में आया है. इससे पहले पश्चिम बंगाल विधान सभा ने
    आधार के खिलाफ सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया है.

    अच्छा हुआ कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त कानून 2017 अब सबकी निगाह
    नए मुख्य न्यायाधीश पर टिकी है क्योकि डिजिटल उपनिवेशवाद को निमंत्रण
    देता डिजिटल इंडिया और बायोमेट्रिक युआईडी/आधार संख्या का भविष्य उन्हें
    ही तय करना है. के जरिये संशोधन के सम्बन्ध में वह कर दिया जो वित्त
    मंत्री रहते प्रणब मुख़र्जी ने संसद में बायोमेट्रिक "ऑनलाइन डेटाबेस"
    अनूठा पहचान अंक (यू.आई.डी./आधार) परियोजना की घोषणा करते वक्त अपने
    2009-10 बजट भाषण में नहीं किया था. अंततः भारत सरकार ने कंपनी कानून,
    2013 और आधार कानून, 2016 का जिक्र साथ-साथ कर ही दिया. इस कानून ने
    कानून के राज की समाप्ति करके कंपनी राज की पुनः स्थपाना की विधिवत घोषणा
    कर दिया है. इसने देश के राजनीतिक भूगोल में को ही फिर से लिख डाला है
    जिसे शायद एक नयी आज़ादी के संग्राम से ही भविष्य में कभी सुधारा जा सके.
    इसके कारण बायोमेट्रिक युआईडी/आधार अनूठा पहचान परियोजना और कंपनियों के
    इरादे के बीच अब तक छुपे रिश्ते जगजाहिर हो गए है. मगर सियासी दलों और
    नागरिकों के लिए वित्त कानून 2017 का अर्थ अभी ठीक से खुला ही नहीं है.

    भारत में एक अजीब रिवाज चल पड़ा है। वह यह कि दुनिया के विकसित देश जिस
    योजना को खारिज कर देते हैं, हमारी सरकार उसे सफ़लता की कुंजी समझ बैठती
    है। अनूठा पहचान (युआईडी)/आधार संख्या परियोजना इसकी ताजा मिसाल है। मोटे
    तौर पर 'आधार'तो बारह अंकों वाला एक अनूठा पहचान संख्या है,  जिसे
    देशवासियों को सूचीबद्ध कर उपलब्ध कराया जा रहा है। लेकिन यही पूरा सच
    नहीं है। असल में यह 16 अंकों वाला है मगर 4 अंक छुपे रहते है. सरकार के
    इस परियोजना के कई रहस्य अभी भी उजागार नहीं हुए है।
    सरकारी व कंपनियों के विचारकों के अनुसार भारत "मंदबुद्धि लोगों का देश"
    है. शायद इसीलिए वो मानते जानते है कि लोग खामोश ही रहेंगे. ऐसा भारतीय
    गृह मंत्रालय के तहत नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नैटग्रिड) विभाग के मुखिया
    रहे कैप्टन रघुरमन का मानना है.

    कैप्टन रघुरमन पहले महिंद्रा स्पेशल सर्विसेस ग्रुप के मुखिया थे और
    बॉम्बे चैम्बर्स ऑफ़ इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स की सेफ्टी एंड सेक्यूरिटी
    कमिटि के चेयरमैन थे। इनकी मंशा का पता इनके द्वारा ही लिखित एक दस्तावेज
    से चलता है, जिसका शीर्षक "ए नेशन ऑफ़ नम्ब पीपल"अर्थात् असंवेदनशील
    मंदबुद्धि लोगों का देश है। इसमें इन्होंने लिखा है कि भारत सरकार देश को
    आंतरिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं कर सकती। इसलिए कंपनियों को अपनी सुरक्षा के
    लिए निजी सेना का गठन करना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि 'कॉर्पोरेटस'
    सुरक्षा के क्षेत्र में कदम बढ़ाएं। इनका निष्कर्ष यह है कि 'यदि वाणिज्य
    सम्राट अपने साम्राज्य को नहीं बचाते हैं तो उनके अधिपत्य पर आघात हो
    सकता है।''  कैप्टन रघुरमन बाद में नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड के मुखिया
    बने. इस ग्रिड के बारे में 3 लाख कंपनियों की नुमाइंदगी करने वाली
    एसोसिएट चैम्बर्स एंड कॉमर्स (एसोचेम) और स्विस कंसलटेंसी के एक दस्तावेज
    में यह खुलासा हुआ है कि विशिष्ट पहचान/आधार संख्या इससे जुड़ा हुआ है।
    आजादी से पहले गठित अघोषित और अलोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी "फिक्की"
    (फेडरेशन ऑफ़ इंडियन कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) द्वारा 2009 में तैयार
    राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर टास्कफोर्स (कार्यबल) की 121 पृष्ठ कि
    रिपोर्ट में सभी जिला मुख्यालयों और पुलिस स्टेशनों को ई-नेटवर्क के
    माध्यम से नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नैटग्रिड) में जोड़ने की बात सामने
    आती है. यह रिपोर्ट कहती है कि निलेकणी के नेतृत्व में जैसे ही भारतीय
    विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) तैयार हो जाएगा, उसमें शामिल
    आंकड़ों को नेशनल ग्रिड का हिस्सा बनाया जा सकता है जिससे आतंकवाद निरोधक
    कार्रवाइयों में मदद मिल सके।''ऐसा पहली बार नहीं है कि नैटग्रिड और
    यूआईडीएआई के रिश्तों पर बात की गई है। कंपनियों के हितों के लिए काम
    करने वाली संस्था व अघोषित और अलोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी "एसोचैम"और
    स्विस परामर्शदाता फर्म केपीएमजी की एक संयुक्त रिपोर्ट 'होमलैंड
    सिक्योरिटी इन इंडिया 2010'में भी यह बात सामने आई है। इसके अलावा जून
    2011 में एसोचैम और डेकन क्रॉनिकल समूह के प्रवर्तकों की पहल एवियोटेक की
    एक संयुक्त रिपोर्ट 'होमलैंड सिक्योरिटी एसेसमेंट इन इंडिया: एक्सपैंशन
    एंड ग्रोथ'में कहा गया है कि 'राष्ट्रीय जनगणना के तहत आने वाले
    कार्यक्रमों के लिए बायोमीट्रिक्स की जरूरत अहम हो जाएगी।'इस रिपोर्ट से
    पता चलता है कि यूआईडी से जुड़े राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर कार्यक्रम का
    लक्ष्य क्या है। रिपोर्ट अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल की तरह आतंकवाद
    निरोधक प्रणाली अपनाने की सिफारिश करती है तथा कंपनियों के लिए सुरक्षित
    शहर (स्मार्ट सिटी) योजना की मंजूरी का आवाहन करती है।

    वैसे तो अमेरिका में बायोमेट्रिक यूआईडी के बारे में क्रियान्वयन की
    चर्चा 1995 में ही हो चुकी थी मगर हाल के समय में धरातल पर इसे अमेरिकी
    रक्षा विभाग में यूआईडी और रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी)
    की प्रक्रिया माइकल वीन के रहते उतारा गया. वीन 2003 से 2005 के बीच
    एक्विजिशन,  टेक्नोलॉजी एंड लॉजिस्टिक्स (एटी ऐंड एल) में अंडर सेक्रेटरी
    डिफेंस हुआ करते थे। एटी ऐंड एल ने ही यूआईडी और आरएफआईडी कारोबार को
    जन्म दिया। अंतरराष्ट्रीय फौजी गठबंधन "नाटो"के भीतर दो ऐसे दस्तावेज
    हैं जो चीजों की पहचान से जुड़े हैं। पहला मानकीकरण संधि है जिसे 2010
    में स्वीकार किया गया था। दूसरा एक दिशा निर्देशिका है जो नाटो के
    सदस्यों के लिए है जो यूआईडी के कारोबार में प्रवेश करना चाहते हैं। ऐसा
    लगता है कि भारत का नाटो से कोई रिश्ता बन गया है. यहां हो रही घटनाएं
    इसी बात का आभास दे रही हैं।

    इसी के आलोक में देखें तो चुनाव आयोग और यूआईडीएआई द्वारा गृह मंत्रलय को
    भेजी गयी सिफारिश कि मतदाता पहचान पत्र को यूआईडी के साथ मिला दिया जाय,
    चुनावी पर्यावरण को बदलने की एक कवायद है जो एक बार फिर इस बात को
    रेखांकित करती है कि बायोमीट्रिक प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग
    मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल उतना निर्दोष और राजनीतिक रूप से तटस्थ चीज
    नहीं जैसा कि हमें दिखाया जाता है। ध्यान देने वाली बात ये है कि चुनाव
    आयोग के वेबसाइट के मुताबिक हर ईवीएम में यूआईडी होता है। मायावती,
    अरविन्द केजरीवाल सहित 16 सियासी दलों ने ईवीएम के विरोध में तो देरी कर
    ही दी अब वे बायोमेट्रिक यूआईडी/आधार के विरोध में भी देरी कर रहे है.
    यही नहीं राज्यों में जहा इन विरोधी दलों कि सरकार है वह वे अनूठा पहचान
    यूआईडी/आधार परियोजना का बड़ी तत्परता से लागू कर रहे है.

    यह ऐसा ही है जैसे अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जब पहली बार
    शपथ ले रहे थे तो उन्हें यह पता ही नहीं चला कि जिस कालीन पर खड़े थे वह
    उनके परम विरोधी पूंजीपति डेविड कोच की कम्पनी इन्विस्ता द्वारा बनायीं
    गई थी. डेविड कोच ने ही अपने संगठनो के जरिये पहले उन्हें उनके कार्यकाल
    के दौरान गैर चुनावी शिकस्त दी और फिर बाद में चुनावी शिकस्त भी दी. भारत
    में भी विरोधी दल जिस बायोमेट्रिक यूआईडी/आधार और यूआईडी युक्त ईवीएम की
    कालीन पर खड़े है वह कभी भी उनके पैरो के नीचे से खिंची जा सकती है.
    लोकतंत्र में विरोधी दल को अगर आधारहीन कर दिया जाता है तो इसका
    दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता है क्योंकि ऐसी स्थिति में उनके
    लोकतान्त्रिक अधिकार छीन जाते है.

    ईवीएम के अलावा जमीन के पट्टे संबंधी विधेयक में जमीन के पट्टों को अनूठा
    यूआईडी/आधार से जोड़ने की बात शामिल है। यह सब हमारे संवैधानिक अधिकारों
    का अतिक्रमण होगा और प्रौद्योगिकी आधारित सत्ता प्रणाली की छाया लोकतंत्र
    के मायने ही बदल रहा है जहां प्रौद्योगिकी और प्रौद्योगिकी कंपनियां
    नियामक नियंत्रण से बाहर है क्योंकि वे सरकारों, विधायिकाओं और विरोधी
    दलों से हर मायने में कहीं ज्यादा विशाल और विराट हैं।

    यूआईडी/आधार और नैटग्रिड एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू हैं। एक ही रस्सी
    के दो सिरे हैं। विशिष्ट पहचान/आधार संख्या सम्मिलित रूप से राजसत्ता और
    कंपनिया विभिन्न कारणों से नागरिकों पर नजर रखने का उपकरण हैं। यह
    परियोजना न तो अपनी संरचना में और न ही अमल में निर्दोष हैं। हैरत कि बात
    यह भी है कि एक तरफ गाँधी जी के चंपारण सत्याग्रह के सौ साल होने पर
    सरकारी कार्यक्रम हो रहे है वही वे गाँधी जी के द्वारा एशिया के लोगो का
    बायोमेट्रिक निशानदेही आधारित पंजीकरण के खिलाफ उनके पहले सत्याग्रह और
    आजादी के आन्दोलन के सबक को भूल गए. उन्होंने उंगलियों के निशानदेही
    द्वारा पंजीकरण कानून को कला कानून कहा था और सबंधित दस्तावेज को
    सार्वजनिक तौर पर जला दिया था. चीनी निवासी भी उस विरोध में शामिल थे.
    ऐसा लगता है जैसे चीन को यह सियासी सबक याद रहा मगर भारत भूल गया. चीन ने
    बायोमेट्रिक निशानदेही आधारित पहचान अनूठा परियोजना को रद्द कर दिया है.

    गौर तलब है कि कैदी पहचान कानून, 1920 के तहत किसी भी कैदी के उंगलियों
    के निशान को सिर्फ मजिसट्रेट की अनुमति से लिया जाता है और उनकी रिहाई पर
    उंगलियों के निशान के रिकॉर्ड को नष्ट करना होता है.  कैदियों के ऊपर
    होनेवाले जुल्म की अनदेखी की यह सजा की अब हर देशवासी को  उंगलियों के
    निशान देने होंगे और कैदियों के मामले में तो उनके रिहाई के वक्त नष्ट
    करने का प्रावधान रहा है, देशवासियों के पूरे  शारीरिक हस्ताक्षर को
    रिकॉर्ड में रखा जा रहा है. बावजूद इसके जानकारी के अभाव में देशवासियों
    की सरकार के प्रति आस्था  धार्मिक आस्था से भी ज्यादा गहरी प्रतीत होती
    है. सरकार जो की जनता की नौकर है अपारदर्शी और जनता को अपारदर्शी बना रही
    है.

    10 अप्रैल को रवि शंकर प्रसाद ने राज्यसभा में आधार पर चर्चा के दौरान
    बताया कि सरकार नैटग्रिड और बायोमेट्रिक आधार को नहीं जोड़ेगी. ऐसी सरकार
    जिसने आधार को गैरजरूरी बता कर देशवासियों से पंजीकरण करवाया और बाद में
    उसे जरुरी कर दिया उसके किसी भी ऐसे आश्वासन पर कैसे भरोसा किया जा सकता
    है. जनता इतनी तो समझदार है ही वह यह तय कर सके कि कंपनियों के समूह
    फिक्की और असोचैम के रिपोर्टों और मंत्री की बातों में से किसे ज्यादा
    विश्वसनीय माना जाय. इन्ही कंपनियों के समूहों में वे गुमनाम चंदादाता भी
    शामिल है जो ज्यादा भरोसेमंद है क्योंकि उन्ही के भरोसे सत्तारूढ़ सियासी
    दलों का कारोबार चलता है. फिक्की और असोचैम के रिपोर्टों से स्पष्ट है कि
    नैटग्रिड और बायोमेट्रिक आधार संरचनात्मक तौर पर जुड़े हुए है. वैसे भी
    ऐसी सरकार जो "स्वैछिक"कह कर लोगो को पंजीकृत करती है और धोखे से उसे
    "अनिवार्य"कर देती है उसके आश्वासन पर कौन भरोसा कर्र सकता है.

    इस हैरतंगेज सवाल का जवाब कि देशवासियों की पहचान के लिए यूआईडी/संख्या
    संख्या की जरूरत को कब और कैसे स्थापित कर दिया गया, किसी के पास नहीं।
    पहचान के संबंध में यह 16 वां प्रयास है। चुनाव आयोग प्रत्येक चुनाव से
    पहले यह घोषणा करता है कि यदि किसी के पास मतदाता पहचान पत्र नहीं है तो
    वे अन्य 14 दस्तावेजों में से किसी का प्रयोग कर सकते हैं। ये वे पहचान
    के दस्तावेज हैं जिससे देश में प्रजातंत्र एवं संसद को मान्यता मिलती है।
    ऐसे में इस 16वें पहचान की कवायद का कोई ऐसा कारण नजर नहीं आता जिसे
    लोकशाही में स्वीकार किया जाए। संसद को पेश किये गए अपने रिपोर्ट में
    वित्त की संसदीय समिति ने खुलासा किया है कि सरकार ने इस 16वें पहचान के
    अनुमानित खर्च का पहले हुए पहचान पत्र के प्रयासों से कोई तुलना नहीं
    किया है. देशवासियों को अंधकार में रखकर बायोमेट्रिक-डिजिटल पहलों से
    जुड़े हुए उद्देश्य को अंजाम दिया जा रह हैं। ज्ञात हो कि इस समिति ने
    सरकार के जवाब के आधार पर यह अनुमान लगाया है की एक आधार संख्या जारी
    करने में औसतन 130 रुपये का खर्चा आता है जो देश के प्रत्येक 130 करोड़
    लोगों को भुगतान करना पड़ेगा.

    बायोमेट्रिक यू.आई.डी. नीति को नागरिक जीवन (सिविल लाइफ) के लिए समीचीन
    बताकर 14 विकासशील देशो में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की कंपनियों और
    विश्व बैंक के जरिये लागु किया जा रहा है. दक्षिण एशिया में यह पाकिस्तान
    में लागु हो चुका है और नेपाल और बांग्लादेश में भी लागु किया जा रहा है.

    भारत में इस बात पर कम ध्यान दिया गया है कि कैसे विराट स्तर पर सूचनाओं
    को संगठित करने की धारणा चुपचाप सामाजिक नियंत्रण, युद्ध के उपकरण और
    जातीय समूहों को निशाना बनाने और प्रताड़ित करने के हथियार के रूप में
    विकसित हुई है। विशिष्ट पहचान प्राधिकरण, 2009 के औपचारिक निर्माण से
    अस्तित्व में आई यू.आई.डी./आधार परियोजना जनवरी 1933 (जब हिटलर सत्तारूढ़
    हुआ) से लेकर दूसरे विश्वयुद्ध और उसके बाद के दौर की याद ताजा कर देती
    है। जिस तरह इंटरनेशनल बिजनेस मशीन्स (आई.बी.एम.) नाम की दुनिया की सबसे
    बड़ी टेक्नॉलाजी कम्पनी ने नाजियों के साथ मिलकर यहूदियों की संपत्तियों
    को हथियाने, उन्हें नारकीय बस्तियों में महदूद कर देने, उन्हें देश से
    भगाने और आखिरकार उनके सफाए के लिए पंच-कार्ड  (कम्प्यूटर का पूर्व रूप)
    और इन कार्डो के माध्यम से जनसंख्या के वर्गीकरण की प्रणाली के जरिए
    यहूदियों की निशानदेही की, उसने मानवीय विनाश के मशीनीकरण को सम्भव
    बनाया। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है।

    खासतौर पर जर्मनी और आमतौर पर यूरोप के अनुभवों को नजरअंदाज करके,
    निशानदेही के तर्क को आगे बढ़ाते हुए तत्कालीन वित्तमंत्री ने 2010-2011
    का बजट संसद में पेश करते हुए फर्माया कि यू.आई.डी. परियोजना वित्तीय
    योजनाओं को समावेशी बनाने और सरकारी सहायता (सब्सिडी) जरूरतमंदों तक ही
    पहुंचाने के लिए उनकी निशानदेही करने का मजबूत मंच प्रदान करेगी। जबकि यह
    बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि निशानदेही के यही औजार बदले की भावना
    से किन्हीं खास धर्मो, जातियों, क्षेत्रों, जातीयताओं या आर्थिक रूप से
    असंतुष्ट तबकों के खिलाफ  भी इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं। आश्चर्य है
    कि आधार परियोजना के प्रमुख यानी वित्त मंत्री ने वित्तीय समावेशन की तो
    बात की, लेकिन गरीबों के आर्थिक समावेशन की नहीं। भारत में राजनीतिक
    कारणों से समाज के कुछ तबकों का अपवर्जन लक्ष्य करके उन तबकों के जनसंहार
    का कारण बना- 1947 में, 1984 में और सन् 2002 में। अगर एक समग्र अन्तः
    आनुशासनिक अध्ययन कराया  जाए तो उससे साफ हो जाएगा कि किस तरह निजी
    जानकारियां और आंकड़े जिन्हें सुरक्षित रखा जाना चाहिए था, वे हमारे देश
    में दंगाइयों और जनसंहार रचाने वालों को आसानी से उपलब्ध थे।

    भारत सरकार भविष्य की कोई गारंटी नहीं दे सकती। अगर नाजियों जैसा कोई दल
    सत्तारूढ़ होता है तो क्या गारंटी है कि यू.आई.डी. के आंकड़े उसे प्राप्त
    नहीं होंगे और वह बदले की भावना से उनका इस्तेमाल नागरिकों के किसी खास
    तबके के खिलाफ नहीं करेगा? दरअसल यही जनवरी 1933, जनवरी 2009 से अप्रैल
    2017 तक के निशानदेही के प्रयासों का सफरनामा है। यू.आई.डी. वही सब कुछ
    दोहराने का मंच है जो जर्मनी, रूमानिया, यूरोप और अन्य जगहों पर हुआ जहां
    वह जनगणना से लेकर नाजियों को यहूदियों की सूची प्रदान करने का माध्यम
    बना। यू.आई.डी. का नागरिकता से कोई संबंध नहीं है, वह महज निशानदेही का
    साधन है। इस पृष्ठभूमि में, ब्रिटेन द्वारा विवादास्पद राष्ट्रीय
    पहचानपत्र योजना को समाप्त करने का निर्णय स्वागत योग्य हैं क्योंकि यह
    फैसला नागरिकों की निजी जिंदगियों में हस्तक्षेप से उनकी सुरक्षा करता
    है। पहचानपत्र कानून 2006 और स्कूलों में बच्चों की उंगलियों के निशान
    लिए जाने की प्रथा का खात्मा करने के साथ-साथ ब्रिटेन सरकार अपना
    राष्ट्रीय पहचानपत्र रजिस्टर बंद कर दिया है।

    इसकी आशंका प्रबल है कि आधार जो कि यू.आई.डी. (विशिष्ट पहचान संख्या) का
    ब्रांड नाम है वही करने जा रही है जो कि हिटलर के सत्तारूढ़ होने से पहले
    के जर्मन सत्ताधारियों ने किया, अन्यथा यह कैसे सम्भव था कि यहूदी नामों
    की सूची नाजियों के आने से पहले भी जर्मन सरकार के पास रहा करती थी?
    नाजियों ने यह सूची आई.बी.एम. कम्पनी से प्राप्त की जो कि जनगणना के
    व्यवसाय में पहले से थी। यह जनगणना नस्लों के आधार पर भी की गई थी जिसके
    चलते न केवल यहूदियों की गिनती, बल्कि उनकी निशानदेही सुनिश्चित हो सकी,
    वाशिंगटन डी.सी. स्थित अमेरिका के होलोकास्ट म्युजियम (विभीषिका
    संग्रहालय) में आई.बी.एम. की होलोरिथ डी-11 कार्ड सार्टिग मशीन आज भी
    प्रदर्शित है जिसके जरिए 1933 की जनगणना में यहूदियों की पहले-पहल
    निशानदेही की गई थी।

    भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने एक जैवमापन मानक समिति (बायोमेट्रिक्स
    स्टैंडर्डस कमिटि) का गठन किया. समिति खुलासा करती है कि जैवमापन सेवाओं
    के निष्पादन के समय सरकारी विभागों और वाणिज्यिक संस्थाओं द्वारा
    प्रामाणिकता स्थापित करने के लिए किया जाएगा। यहां वाणिज्यिक संस्थाओं को
    परिभाषित नहीं किया गया है। जैवमापन मानक समिति ने यह संस्तुति की है कि
    जैवमापक आंकड़े राष्ट्रीय निधि हैं और उन्हें उनके मौलिक रूप में
    संरक्षित किया जाना चाहिए। समिति नागरिकों के आंकड़ाकोष को राष्ट्रीय
    निधि अर्थात 'धन'बताती है। यह निधि कब कंपनियों की निधि बन जाएगी कहा
    नहीं जा सकता.
    ऐसे समय में जब बायोमेट्रिक आधार और कंपनी कानून मामले में कांग्रेस और
    भारतीय जनता पार्टी के बीच खिचड़ी पकती सी दिख रही है, आधार आधारित
    केंद्रीकृत ऑनलाइन डेटाबेस से देश के संघीय ढांचे को खतरा पैदा हो गया
    है। आधार आधारित व्यवस्था के दुरुपयोग की जबर्दस्त संभावनाएं हैं और यह
    आपातकालीन स्थिति तक पैदा कर सकने में सक्षम है। ये देश के संघीय ढांचे
    का अतिक्रमण करती हैं और राज्यों के अधिकारों को और मौलिक व लोकतान्त्रिक
    अधिकारों को कम करती हैं।

    देश के 28 राज्यों एवं 7 केंद्र शासित प्रदेशों में से अधिकतर ने
    यूआईडीएआई के साथ समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। राज्यों में वामपंथी
    पार्टियों की सरकारों ने इस मामले में दोमुहा रवैया अख्तियार कर लिया है.
    अपने राज्य में वे इसे लागु कर रहे है मगर केंद्र में आधार परियोजना में
    अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग की संग्लिप्तता के कारण विरोध कर रहे है. क्या
    उनके हाथ भी ठेके के बंटवारे के कारण बांध गए है? कानून के जानकार बताते
    हैं कि इस समझौते को नहीं मानने से भी राज्य सरकारों को कोई फ़र्क नहीं
    पड़ता, क्योंकि कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। पूर्व न्यायाधीश, कानूनविद
    और शिक्षाविद यह सलाह दे रहे हैं कि यूआईडी योजना से देश के संघीय ढांचे
    को एवं संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया
    है। राज्य सरकारों, केंद्र के कई विभागों और अन्य संस्थाओं को चाहिए कि
    यूआईडीएआई के साथ हुए एमओयू की समग्रता में समीक्षा करे और अनजाने में
    अधिनायकवाद की स्थिति का समर्थन करने से बचें। एक ओर जहां राज्य और उनके
    नागरिक अपने अधिकारों को लेकर चिंतित हैं और केंद्रीकृत ताकत का विरोध
    करने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिगामी कनवर्जेंस इकनॉमी पर आधारित
    डेटाबेस और अनियमित सर्वेलेंस, बायोमीट्रिक व चुनावी तकनीकों पर मोटे तौर
    पर किसी की नजर नहीं जा रही और उनके खिलाफ आवाज अभी-अभी उठना शुरू हुआ
    है।

    ठेका-राज से निजात पाने के लिए विशिष्ट पहचान/आधार संख्या जैसे उपकरणों
    द्वारा नागरिकों पर सतत नजर रखने और उनके जैवमापक रिकार्ड तैयार करने पर
    आधारित तकनीकी शासन की पुरजोर मुखालफत करने वाले व्यक्तियों, जनसंगठनों,
    जन आंदोलनों, संस्थाओं के अभियान का समर्थन करना एक तार्किक मजबूरी है.
    फिलहाल देशवासियों के पास अपनी संप्रभुता को बचाने के लिए आधार परियोजना
    का बहिष्कार ही एक मात्र रास्ता है. अगले चुनाव से पहले एक ऐसे भरोसेमंद
    विपक्ष की जरुरत है जो यह लिखित वायदा करे कि सत्ता में आने पर ब्रिटेन,
    अमेरिका और अन्य देशों कि तरह भारत भी अपने वर्तमान और भविष्य के
    देशवासियों को बायोमेट्रिक आधार आधारित देशी व विदेशी खुफिया निगरानी से
    आज़ाद करेगी.

    संपर्क सूत्र: डॉ गोपाल कृष्ण, सदस्य, सिटीजन्स फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज
    व  www.toxicswatch.org के संपादक है जो आधार विधेयक, 2010 के आकलन के
    लिए वित्त संबंधी संसद की स्थायी समिति के समक्ष विशेषज्ञ के रूप में
    उपस्थित हुए थे.
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    Caste discourse in Bengal always remained uncomfortable!

    Vidya Bhushan Rawat

    Caste discourse in Bengal always remained uncomfortable for many since the beginning but under the left government's 35 years rule it was too difficult but now Mamta has learnt a lot from them. This is the irony in India that opponents learn from each other and follow the same dictates. After staying in Kolkata for a couple of days, I was invited by a group of dynamic young creative activists to Nalikul, a small town, a few kilometers away from famously known 'Singur'. I was supposed to speak on caste and its influence in our minds and what may be way out. These friends had booked a hall for the talk. I arrived at Nalikul on 24th evening around 530 pm since I was given time frame that the talk would start at 6 pm. When we reach to our friends place, we were informed that the booking that they made was cancelled just a few hours earlier. The hall owner was under tremendous pressure not to allow. It is not that we were organising a huge meeting but a small interaction on the issue. The owner of the hall, I was told, was close associate of a Trinamul Congress leader.

    But we were not deterred. We got a place which was semi constructed where this group of young boys and girls set and I can tell you candidly that it was a very satisfactory session. It started nearly 730 and went on till late 1230 pm with each participant deeply engrossed in the discussion. It was not a preaching but a conversation despite i thoroughly enjoyed and perhaps so did the participants.

    Bengal is sitting on a volcano of communal hatred which might erupt any time if not taken on head on administratively as well as politically. Already, we are witnessing saffron upsurge at many places. The threat is real and signs are visible.

    Bengal constitute nearly 25-30% Muslim population and 20% Dalit population. Together they can change the destiny of the state which has a history of working together which the Bangla nationalism brought. Will Bengal rise up and defeat the fanatics ? It will not be possible unless there is a strong Dalit Muslim OBC alliance in the state. So far the brahmanical leadership of all the political parties have desisted speaking on it because it means the 'sacred' domain of the power will have to be debrahmanised but the time has come now to talk about castes in Bengal. Most of the Bengali Muslims are actually Dalit-Pasmanda Muslims and therefore their alliance with Dalits will be natural yet there is no discourse. The Bengali intellectual class would not like to cede their privileged positions to Dalits and they realise that it will be the Hindutva which can keep their interest safe and hence the love for saffron among this elite is growing. Saffron politics is long term based. They would like to polarise Bengal therefore it is time to talk strongly on the Alliance building between various unrepresented marginalised sections which has been been marginalised by the brahmanical elite of Bengal.

    Vidya Bhushan Rawat
    April 25th, 2017




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    महत्वपूर्ण खबरें और आलेख माओवाद की जड़ है धूर्त ब्राह्मण, उद्दंड क्षत्रिय और व्यापार बुद्धि वाला वैश्य - ई.एन.राममोहन, पूर्व महानिदेशक बीएसएफ

    #भारतसरकार ने बताया था इसे आदिवासियों की जमीन हड़पने की कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी कार्रवाई

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/sukma-biggest-action-after-columbus-to-grab-tribals-land-13969

    डा. अम्बेडकर का #संघीकरण!

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/rss-dr-ambedkar-13985

    ये कैसा #योगीराजरमेश लोधी की पुलिस हिरासत में मौत के सदमे से उनके चाचा की भी मौतयोगी से लगा चुके थे गुहार

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/police-custody-death-police-custody-ramesh-lodhi-yogi-adityanath-13983

    #माओवाद की जड़ है धूर्त ब्राह्मणउद्दंड क्षत्रिय और व्यापार बुद्धि वाला वैश्य - ई.एन.राममोहनपूर्व महानिदेशक बीएसएफ

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/en-rammohan-former-director-general-of-the-bsf-fighting-naxals-13986

    #माओवाद-अगर सरकार के पास थोड़ी भी बुद्धि होगी तो वह इसे ठीक करेगी। वरना उसे विध्वंस का सामना करना पड़ेगा।

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/en-rammohan-former-director-general-of-the-bsf-fighting-naxals-13986

    सिर्फ #भाजपा विरोध से तो न होगी विपक्षी एकताजनता का कार्यक्रम कहां है

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/bjp-opposition-opposition-unity-public-program-bjp-13979

    6 दिसंबर 1992 : #बाबरी_मस्जिद के साथ उस दिन अनेक संवैधानिक संस्थाएं भी धराशायी हो गईं थीं

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/december-6-1992-babri-masjid-constitutional-institutions-judiciary--13974

    आधार आधारित केंद्रीकृत ऑनलाइन डेटाबेस : #कांग्रेस- #भाजपा के बीच गठबंधन से देश के संघीय ढांचे को खतरा

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/aadhar-based-centralized-online-database-coalition-of-congress-bjp-13973

    #भगत_सिंह और सावरकर एक साथ : #फासीवादी गन्दी चाल!

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/bhagat-singh-and-savarkar-together-fascist-messy-move-13971

    #शिवपाल के नाम से अखिलेश को इतना गुस्सा क्यों आता है ?

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/states-why-does-akhilesh-get-so-angry-with-shivpal-13976

    #अखिलेश को चाहिए भगवान श्रीकृष्‍ण का ई मेल एड्रेस पूछेंगे #सुदामा को डिजिटल पेमेंट किया था क्‍या?

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/states-akhilesh-wants-lord-krishnas-e-mail-to-ask-for-a-digital-payment-to-sudama-13975

    #Sukma_Killings : Until you address agrarian crisis, the mourning continues!

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/columnsinenglish-sukma-killings-until-you-address-agrarian-crisis-the-mourning-continues-13978 #SukmaAttack

    "मंदबुद्धि लोगों का देश", नागरिकों को निराधार करती बायोमेट्रिक #यूआईडी/आधार अनूठा पहचान परियोजना का सच और बारह अंकों का रहस्य...

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/aadhar-based-centralized-online-database-coalition-of-congress-bjp-13973 #congress #bjp

    #शारदा-नारदा से बचाव का रास्ता भी विपक्षी एकता !!!

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/bjp-opposition-opposition-unity-public-program-bjp-13979

    #लोकतंत्र में विरोधी दल को अगर आधारहीन कर दिया जाता है तो इसका दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता है,

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/aadhar-based-centralized-online-database-coalition-of-congress-bjp-13973

    #भगत_सिंह एक विचारक थेजिनका आधार #मार्क्सवाद था. लेनिन की क्रांति को सही मानते थे,

    http://www.hastakshep.com/opinion-debate-hindi/bhagat-singh-and-savarkar-together-fascist-messy-move-13971  #Bhagat_Singh

    #पत्रकार के सवाल पर भड़के #अखिलेशकहा तुम भगवा रंग के कपड़े पहनकर आए हो

    http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/states-why-does-akhilesh-get-so-angry-with-shivpal-13976#Yadavakhilesh

    #Militarization of state might not solve the agrarian crisis

    http://www.hastakshep.com/englishopinion/columnsinenglish-sukma-killings-until-you-address-agrarian-crisis-the-mourning-continues-13978


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    दस दिगंत भूस्खलन जारी

    पलाश विश्वास

    कामयाबी इंसान को सिरे से बदल देता है।इसलिए मैं हमेशा कामयाबी से डरता रहा हूं कि मैं सिरे से बदल न जाऊं। मुझ पर मेरे पिता का जरुरत से ज्यादा असर रहा है,जिन्हें बटोरने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। वे अपना काम करते करते मर गये,जोड़ा कुछ भी नहीं है।

    मुझे इसलिए अपनी नाकामयाबियों पर कोई अफसोस नहीं है।

    तकलीफों से जन्मजात वास्ता रहा है।इसलिए उससे भी ज्यादा परेशानी नहीं है।

    अब भी डर वही है कि सिरे स न बदल जाऊं।क्योंकि जमाने में लोगों के सिरे से बदल जाने का दस्तूर है जो कामयाबी की और शायद अमन चैन की सबसे बड़ी शर्त है।

    जिंदगी बड़ी होनी चाहिए।लंबी चौड़ी नहीं।हम नहीं जानते कितनी लंबी दौड़ अभी बाकी है।इस दौड़ में कहां कहां पांव फिसलने के खतरे हैं।

    जिंदगी जी लेने के बाद नई जिंदगी की शुरुआत मौत के बाद होती है और मौत के बाद कितनी लंबी जिंदगी किसी को मिलती है,मेरे ख्याल से कामयाबी की असल कसौटी यही है।हमारे लिए इस कसौटी की भी कोई गुंजाइश नहीं है।

    बहरहाल,1979 में पहली बार जब मैंने पहाड़ छोड़कर मैदानों के लिए नैनीताल से कूच किया था,उसदिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। मुझे बरेली से सहारनपुर पैसेंजर पकड़कर इलाहाबाद जाना था।मेरा इरादा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डा. मानस मुकुल दास के गाइडडेंस में अंग्रेजी साहित्य में शोध करना था।

    चील चक्कर पीछे छोड़ वाल्दिया खान से नीचे उतरते ही सड़क के दोनों तरफ भारी भूस्खलन होने की वजह से घंटों मूसलाधार बारिश में फंसा रहा था।

    उस वक्त नैनीताल से मैं अपनी किताबें और होल्डआल में बिस्तर और झोले में पहनने के कपड़े लेकर निकला था।घर में खबर भी नहीं की थी कि मैं नैनीताल छोड़कर इलाहाबाद निकल रहा हूं।

    तब मालूम न था कि नैनीताल की झील से और हिमालय की वादियों से हमेशा के लिए नाता तोड़कर निकलना हुआ है और हिमालय की गोद से नकली नदियों की तरह उल्टे पांव लौटना फिर कभी संभव नहीं होगा।यह भी सोचा नहीं था कि अपना गांव हमेशा के लिए पीछे छूट गया है और हमेशा के लिए अपने खेत खलिहान से बेदखली का विकल्प मैंने चुना है।

    विश्वविद्यालय परिसर में बने रहने का ख्वाब धनबाद के कोयलांचल में ही जलकर राख हो गये।भूमिगत आग की तरह कुछ करने का जुनून जो मुझे इन चार दशकों तक देश भर में दौड़ाता रहा है,वह भी अब शायद मर गया है।

    सर पर छत न होने का जो अंजाम होता है,उसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि हम अब अपनी प्यारी किताबें सहेजकर रख नहीं सकते।

    जिन किताबों को लेकर नैनीताल से चला था,वे भी मेरे साथ दौड़ती रहीं है।अब उनकी भी दौड़ खत्म है।अपने लिखे से मोहभंग दो दशक पहले ही हो गया था।उनसे काफी हद तक पीछा छुड़ा लिया है।अब बाकी बची हुई किताबों की बारी है।

    डीएसबी की उन किताबों का साथ भी छूट रहा है।

    किताबों से बिछुड़ना प्रिय मित्रों साथियों की मौत से भी भयानक सदमा होता है।

    दरअसल नैनीताल छोड़ते वक्त मेरे दस दिगंत में जो भूस्खलन हो रहे थे,उसका सिलसिला कभी खत्म हुआ ही नहीं है।



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    जब मजदूर आंदोलन हैं ही नहीं,जब मेहनतकशों के हकहकूक भी खत्म है तो मई दिवस की रस्म अदायगी का क्या मतलब?

    हरियाणा में अब मजदूर दिवस विश्वकर्मा दिवस पर मनाया जाएगा!

    पलाश विश्वास

    पहली मई को शिकागो में मजदूरों ने अपनी शहादत देकर काम के आठ घंटे का हक हासिल किया था।उन्हीं के लहू के रंग से रंगा है मजदूरों का लाल झंडा।आज जब हम भारत और बाकी दुनिया में पहली मई मानने की रस्म अदायगी कर रहे हैं, तो संगठित और असंगठित मजूरों की दुनिया में मेहनतकशों के सारे हक हकूक सिरे से लापता है। मुक्तबाजार की कारपोरेट दुनिया डिजिटल हो गयी है। कल कारखानों और उत्पादन इकाइयों में आटोमेशन हो गया है।उत्पादन में मशीनों के बाद कंप्यूटर और कंप्यूटर के बाद रोबोट का इ्स्तेमाल होने लगा है।

    कारपोरेट दुनिया में सारे कामगार,सारे कर्मचारी और सारे अफसरान भी अब ठेके पर हैं।जिनके काम के घंटे तय नहीं है।कहने को भारत में 16154 कामगार संगठन हैं, जिनके करीब 92 लाख सदस्य हैं। भारत में कुल 50 करोड़ कर्मचारी व मजदूर हैं जिनमें करीब 94 फीसदी असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं।

    भारत में मेहनतकशों के तमाम कानूनी हक हकूक सिरे से खत्म हो गये हैं।श्रम कानून सारे सारे खत्म हैं। वैसे भी मुक्तबाजार की अर्थव्यवस्था में उत्पादन प्रणाली तहस नहस है और सारा जोर सर्विस और मार्केंटिंग पर है,जहां उत्पादन होता नहीं है। जहां श्रम का कोई मूल्य नहीं है और न उसकी कोई भूमिका है।

    संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में नौकरी अब ठेके पर होते हैं और ठेके में काम के घंटे तय नहीं होते।

    डिजिटल कैसलैस इंडिया का मतलब भी जमीनी स्तर तक आटोमेशन है। आटोमेशन माने व्यापक पैमाने पर छंटनी। क्योंकि सरकार अब मैनेजर की भूमिका में है और मेहनतकशों,कामगारों और कर्मचारियों के हकहकूक की कोई जिम्मेदारी उसकी नहीं है।उसे देशी विदेशी पूंजी के हित में सारी चीजें मैनेज करना होता है।

    ऐसे हालात में क्या मई दिवस और क्या मेहनतकशों के हकहकूक?

    बहरहाल,पहली मई को दुनिया के कई देशों में श्रमिक दिवस मनाया जाता है और इस दिन देश की लगभग सभी सरकारी गैरसरकारी उत्पादन इकाइयों और कंपनियों में छुट्टी रहती है। भारत ही नहीं, दुनिया के करीब 80 देशों में इस दिन राष्‍ट्रीय छुट्टी होती है।  हालांकि इस साल हरियाणा सरकार ने लेबर डे नहीं मनाने का फैसला किया है।जहां उसी विचारधारा की सरकरा है,जिसकी सत्ता केंद्र में है।जैसे श्रमिक कानून खत्म करने की शुरआत राजस्थान से हुई,वैसे ही क्श्रमिक दिवस कत्म करने की शुरुआत हरियाणा से हो गयी है।

    हरियाणा सरकार ने इस साल मजदूर दिवस नहीं मनाने का फैसला किया है। प्रदेश के श्रम राज्य मंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हमने फैसला लिया है कि 1 मई को मजदूर दिवस नहीं मनाएंगे। मजदूर दिवस विश्वकर्मा दिवस पर मनाया जाएगा, जो दीपावली के अगले दिन होता है। हालांकि मजदूर संगठनों ने इसका विरोध किया और उनका कहना है कि सरकार की मंशा ठीक नहीं है।

    बहुत जल्द मई दिवस मनाने की रस्म अदायगी भी खत्म होने जे रही है।1991 से उदारीकरण,निजीकरण ,ग्लोबीकरण के तहत हमने जिस डिजिटल अर्थव्यवस्था को अपनाया है, उसमें तेजी से मेहनतकशों का दमन और सफाया का अभियान बिना रोक टोक चल रहा है और मेहनतकशों के वोटों से चुनी हुई सरकार और आम जनता के चुने हुए नुमाइंदों की संसदीय सहमति से आर्थिक सुधार के नाम मेहनतकशों के हक हकूक खत्म करने के लिए तमाम कानून खत्म कर दिये गये हैं या बदल दिये गये हैं।इसके साथ ही ट्रेड यूनियन आंदोलन खत्म हो गया है।

    नए श्रम कानून में प्रस्तावित बदलाव के तहत अब कर्मचारियों को नौकरी से निकालना आसान होगा वहीं कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा ट्रेड यूनियन बनाने के लिए न्यूनतम 10 फीसदी या 100 कर्मचारियों की जरूरत होगी। फिलहाल 7 कर्मचारी मिलकर ट्रेड यूनियन बना सकते हैं। नए कानून में तीन पुराने कानूनों को मिलाया जाएगा। नौकरी से निकाले जाने पर ज्यादा मुआवजे पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही 1 साल से पुराने कर्मचारी को छंटनी के पहले 3 महीने का नोटिस देना जरूरी होगा। नया श्रम कानून इंडस्ट्रियल डिस्प्युट्स एक्ट 1947, ट्रेड यूनियंस एक्ट 1926 और इंडस्ट्रियल एंप्लॉयमेंट (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) एक्ट 1946 की जगह लेगा।

    ट्रेड यूनियनें अब मैनेजमेंट का हिस्सा है,जिनका इस्तेमाल मजदूर आंदोलन को सिरे से खत्म करना है।

    जब मजदूर आंदोलन हैं ही नहीं,जब मेहनतकशों के हकहकूक भी खत्म है तो मई दिवस की रस्म अदायगी का क्या मतलब?

    1800 के दौर में (19वीं शताब्दी में) यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में मजदूरों से 14 घंटे तक काम कराया जाता था। न कोई मेडिकल लिव होती थी और न ही किसी त्योहार पर छुट्टी होती थी।इन सभी यातनाओं के खिलाफ 1 मई 1984 में अमेरिका में करीब तीन लाख मजदूर सड़कों पर उतर पड़े। इन मजदूरों की मांग थी कि अधिकतम 8 घंटे काम कराया जाए और सोने के लिए भी आठ घंटे दिए जाएं।

    इसी दौरान यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भी कई मजदूर आंदोलन हुए जिसके परिणाम स्वरूप काम के घंटे 8 तय किए।

    गौरतलब है कि अंतराष्‍ट्रीय तौर पर मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत 1 मई 1886 को हुई थी। अमेरिका के मजदूर संघों ने मिलकर निश्‍चय किया कि वे 8 घंटे से ज्‍यादा काम नहीं करेंगे। जिसके लिए संगठनों ने हड़ताल किया। इस हड़ताल के दौरान शिकागो की हेमार्केट में बम ब्लास्ट हुआ। जिससे निपटने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोली चला दी, जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्‍यादा लोग घायल हो गए। इसके बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में ऐलान किया गया कि हेमार्केट नरसंहार में मारे गये निर्दोष लोगों की याद में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा।

    तब से मजदूर आंदोलनकी निरंतरता और मजदूरों के हकहकूक की लड़ाई के बतौर मजदूर दिवास मनाया जाता रहा है।अब मजदूर जिवस तो हम मना रहे हैं लेकिन मेहनतकशों की लड़ाई सिरे से खत्म है और मजदूरों के सारे हकहकूक खत्म हैं और अब उनके रोजगार या नौकरी की भी कोई गारंटी नहीं है।जो अभी काम पर हैं,उनके काम के घंटे भी तय नहीं हैं।

    मई दिवस पर अपने फेसबुक वाल पर मशहूर गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार के इस मंतव्य में अंधाधुंध सहरीकरण और उपभोक्ता संस्कृति के मुक्तबाजार में उत्पादन प्रणाली से बाहर इस कारपोरेट दुनिया में सर्वव्यापी असंगठित क्षेत्र में मेहनतकशों के मौजूदा हालात बयां हैः


    कभी सड़क पर कपड़े की पोटली में बच्चा लटकाए सड़क बनाते मजदूर पति पत्नी से पूछियेगा कि वो पहले क्या करते थे ?

    इनमें से बहुत सारे मजदूर पहले किसान थे जिन्हें हम शहरियों के विकास के लिए बाँध बनाने, हाई वे बनाने , हवाई अड्डा बनाने या अमीरों के कारखाने बनाने के लिए उजाड दिया गया .

    हमने किसान को पहले मजदूर बना दिया

    फिर जब ये मजदूर पूरी मजदूरी मांगता है तो हमारी ही पुलिस इन मजदूरों पर लाठी चलाती है इन्हें गोली से उड़ा देती है

    आज तक कभी पुलिस को किसी अमीर को पीटते हुए देखा है कि तुम अपने मजदूरों को कानून के मुताबिक मजदूरी क्यों नहीं देते ?

    आज तक श्रम विभाग के किसी अधिकारी को इस बात पर सज़ा नहीं हुई कि तुमने एक भी फैक्ट्री में मजदूरों को पूरी मजदूरी दिलाने के लिए कार्यवाही क्यों नहीं करी ?

    सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि अगर कोई भी मजदूर कम मजदूरी पर काम करता है उसे बंधुआ मजदूर माना जायेगा ၊

    अब ज़रा राष्ट्र की राजधानी में ही सीक्योर्टी गार्ड की नौकरी करने वाले से पूछियेगा कि उसकी ड्यूटी आठ घंटे की है या बारह घंटे की ?

    आठ घंटे के काम के लिए मजदूरों नें लंबा संघर्ष किया था ၊

    दिल्ली की हर फैक्ट्री में मजदूरों से बारह बारह घंटे काम करवाया जा रहा है , खुद जाकर देख लीजिए ၊

    लेकिन यह सब देखना सरकार की प्राथमिकता ही नहीं है ၊

    सभी पार्टियां इस मामले में एक जैसी साबित हुई हैं ၊

    आप मानते हैं कि देश में सब ठीक ठाक चल रहा है ၊

    हमें इसी बात की चिंता है कि इतना अन्याय होते हुए भी सब कुछ ठीक ठाक क्यों चल रहा है ?

    हमारी चिंता अशांती नहीं है ၊

    हमारी चिंता शांती है ၊

    अन्याय के रहते शांती बेमानी और नाकाबिले बर्दाश्त है ၊


    संतोष खरे ने समयांतर में प्रस्तावित श्रम कानून सुधारों के बारे में जो लिखा है,गौरतलब हैः

    केंद्र सरकार ने कुछ श्रम कानूनों में संशोधन के प्रस्ताव को वेबसाइट पर डालकर उसके संबंध में 30 दिनों के अंदर लोगों की राय आमंत्रित की है। सरकार ने यह संशोधन 'श्रम सुधार'के नाम से करने का दावा किया है, पर इसके अवलोकन से कोई भी सामान्य बुद्धि-विवेक वाला व्यक्ति समझ सकता है कि सरकार 'श्रम सुधार'के नाम पर वास्तव में कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाना चाहती है।

    सरकार ने जिन श्रम कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव किया है वे ऐसे कानून हैं जिनके अंर्तगत् श्रमिक पिछले 6 दशकों से भी अधिक समय से अपने नियोजन से संबंधित सुविधाएं और लाभ प्राप्त करते चले आ रहे हैं। पर वर्तमान भाजपा सरकार (सॉरी- नरेंद्र मोदी सरकार) की केंद्र में सत्ता स्थापित होते ही उनका श्रम मंत्रालय श्रमिक विरोधी कानून लागू करने के लिए प्रयासरत है। कारखाना अधिनियम, 1948 के प्रस्तावित संशोधनों को देखें तो वर्तमान कानून के अनुसार सामान्यतया किसी भी व्यस्क श्रमिक से एक दिन में 9 घंटों से अधिक अवधि तक काम नहीं कराया जा सकता तथा इस अवधि में भी 5 घंटों के बाद आधे घंटे का विश्राम दिया जाना आवश्यक है। यदि वह 9 घंटों से अधिक की अवधि तक कार्य करता है तो वह ऐसी बढ़ी हुई अवधि हेतु सामान्य वेतन की दर का दोगुना वेतन पाने का अधिकारी होगा। किंतु उसके कार्य की अवधि जिसमें ओवर टाइम भी सम्मलित है एक सप्ताह में 60 घंटों से अधिक नहीं होगी तथापि आवश्यक कारणों से यह अवधि मुख्य कारखाना निरीक्षक की अनुमति से ओवर टाइम की अवधि एक तिमाही में 75 घंटों तक बढ़ाई जा सकेगी। पर सरकार इस अधिनियम की धारा 64 में संशोधन कर इस अवधि को बढ़ाना चाहती है। तर्क किया जा सकता है कि ओवर टाइम की अवधि बढ़ने से श्रमिकों को अधिक आर्थिक लाभ होगा और संभव है तब श्रमिक आर्थिक लाभ के लिए अधिक समय तक ओवर टाइम करना चाहे पर क्या इस तरह अधिक ओवर टाइम करने से उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा? 1948 के कानून में कानून निर्माताओं ने इन्हीं तथ्यों पर विचार कर सीमित ओवर टाइम के प्रावधान किए थे, पर अब 2014 में मजदूरों के स्वास्थ्य की कीमत पर इस तरह के कथित श्रम सुधार करना कतई उचित नहीं कहा जा सकता। सोचने की बात है कि कहां वर्तमान में एक तिमाही में ओवर टाइम की अधिकतम अवधि 50 घंटे है जिसे सरकार 100 घंटे करना चाहती है। इसका एक परिणाम यह भी होगा कि कम से कम श्रमिकों से अधिक से अधिक कार्य कराया जा सके।

    एक और संशोधन यह प्रस्तावित है कि सरकार एक दिन में कार्य के घंटों की अवधि राजपत्र में अधिसूचना जारी कर 12 घंटों तक बढ़ा सकती है। बड़े उद्योग घरानों के लिए यह कठिन नहीं होगा कि वे सरकार से दुरभि संधि कर ऐसी अधिसूचना जारी न करवा लेंगे।

    अभी तक कारखानों में महिला श्रमिकों एवं किशोर को जोखिम भरे काम पर नहीं लगाया जा सकता पर अब संशोधन के द्वारा यह प्रावधान करने का प्रस्ताव किया गया है कि केवल किसी गर्भवती महिला अथवा विकलांग व्यक्ति को जोखिम भरे काम पर नहीं लगाया जाए। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार का इरादा महिलाओं एवं किशोर श्रमिकों को भी जोखिम भरे कार्यों में लगाने का है। इसी तरह का प्रस्ताव ट्रांसमिशन मशीनरी या मुख्य मूवर को साफ करने, तेल डालने या उसे एडजस्ट करने जैसे कार्यों के लिए भी है।

    केंद्र सरकार के द्वारा न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के प्रावधानों में भी संशोधन किए जाने का प्रस्ताव किया गया है। अभी तक इस अधिनियम के अनुसार सरकार अनुसूचित उद्योगों में शासकीय राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित कर श्रमिकों के न्यूनतम वेतन का निर्धारण करती है और आवश्यकतानुसार समय-समय पर जो सामान्यतया प्रत्येक पांच वर्ष के अंदर का समय होता है उसका पुनरीक्षण किया जाता है। इसके अलावा प्राइस इंडेक्स में होने वाली वृद्धि के अनुसार भी हर छमाही पर महंगाई भत्ते की दरों का पुनरीक्षण किया जाता है। किंतु बड़े औद्योगिक घराने सरकार के द्वारा निर्धारित की जाने वाली न्यूनतम वेतन की दरों से संभवत: कठिनाई का अनुभव करते हैं और वे इस कानून में ऐसा संशोधन चाहते हैं जिसमें न्यूनतम वेतन दिए जाने की मजबूरी न हो बल्कि वे स्वयं यह निर्णय करें कि उनके संस्थान में वेतन की दरे क्या होगी? यदि इस तरह का कोई संशोधन किया जाता है तो अनुसूचित उद्योगों के बड़ी संख्या के श्रमिकों के वेतन की दरों में कमी हो जाएगी। इस प्रकार यह संशोधन श्रमिकों का सीधा शोषण होगा।

    इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004 में गुजरात में औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्रावधानों में लचीलापन किया गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि वहां के नियोजकों को यह छूट प्राप्त हो गई कि वे सरकार से बिना अनुमति लिए किसी भी श्रमिक को एक माह का नोटिस देकर काम से निकाल सकते हैं। अभी हाल में राजस्थान मंत्रिमंडल ने भी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, कारखाना अधिनियम, 1948 तथा संविदा श्रमिक (विनियमन एवं उन्मूलन)  अधिनियम, 1970 में ऐसे संशोधन किए हैं जो श्रमिकों के हितो के विपरीत हैं। इस राज्य सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम के अध्याय-5 में संशोधन किया है। अभी तक यह व्यवस्था थी कि जिन संस्थानों में 100 या 100 से अधिक श्रमिक कार्यरत हैं ऐसे संस्थान को बंद करने के लिए सरकार से अनुमति लेना आवश्यक होता था। अब राजस्थान सरकार ने श्रमिकों की संख्या सौ से बढ़ाकर तीन सौ कर दी है और इस प्रकार बड़ी संख्या के संस्थान जहां तीन सौ से कम कर्मचारी काम करते हैं वहां उन्हें काम से हटाना आसान हो गया है। इसके साथ ऐसे संस्थानों के नियोजकों को छंटनी, ले-ऑफ तथा क्लोजर घोषित करने में भी आसानी हो जाएगी क्योंकि अब उन्हें सरकार से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। इसके अलावा राजस्थान सरकार ने औद्योगिक विवाद उठाने के लिए तीन वर्ष की अवधि की समय सीमा निश्चित कर दी है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2010 में ऐसे औद्योगिक विवादों के लिए जो शासन के द्वारा संदर्भित न किए गए हों 3 वर्ष की अवधि निर्धारित की थी जबकि अभी तक ऐसी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं थी। राजस्थान सरकार ने ट्रेड यूनियन एक्ट के अंर्तगत प्रतिनिधि यूनियन के रजिस्ट्रेशन के लिए श्रमिकों के प्रतिशत को 15 से बढ़ाकर 35 कर दिया है। इसी प्रकार ठेका श्रमिकों का अधिनियम जो ऐसे संस्थानों पर लागू होता था जहां कम से कम 20 मजदूर कार्य करते हैं जिसे राजस्थान सरकार ने उनकी संख्या बढ़ाकर 50 कर दी है। इसी तरह इस सरकार ने कारखाना अधिनियम में इसे लागू होने की श्रमिकों की संख्या की सीमा को बढ़ा दिया है जिसका परिणाम यह होगा कि बड़ी संख्या में श्रमिक इस अधिनियम के अंर्तगत प्राप्त होने वाली सुरक्षा की सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे। यह लिखने की आवश्यकता नहीं है कि राजस्थान सरकार ने उपरोक्त संशोधन केंद्र सरकार के इशारे पर ही किया होगा।

    केंद्र सरकार का इरादा वेबसाइट पर डाले गए प्रस्तावित संशोधनों में साफ झलकता है कि वह इन संशोधनों के माध्यम से पूंजीपति वर्ग को लाभ देना चाहती है ताकि विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने संस्थान स्थापित कर मनमाने ढ़ंग से चला सकें और इस देश के अब तक के श्रमिक कानूनों में जो सुविधाएं और लाभ श्रमिकों को प्राप्त होते थे उन्हें वंचित किया जा सके। संभवत: इसीलिए संस्थानों के नियमित कार्यों को ठेका श्रमिकों से कराने, ट्रेड यूनियनों को कमजोर करने, श्रमिकों को सेवा से पृथक करने और छंटनी, ले-ऑफ, क्लोजर जैसी प्रक्रियाओं को आसान बनाने जैसे संशोधन करने का प्रयास किया जा रहा है। बिडंबना यह है कि इन श्रमिक विरोधी संशोधनों को श्रम सुधारों के नाम पर किया जा रहा है। विभिन्न श्रम संगठनों और मीडिया में प्रस्तावित सुधारों का जमकर विरोध और आपत्तियां की गई हैं।(साभार समयांतर)



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    #চুয়াড় বিদ্রোহ@Chuar Rebellion: Midnapur Bankura legacy of freedom and Resistance! 

    Palash Biswas

    Video:https://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/1702587569769645/?l=8439862445005580068
    Millions of farmers in Latin America, Africa and south Asia are, at present, direct victims of the wondrous regime set up by the WTO and world order sustained by governments worldwide led by ruling hegemony of ruling dynasties in desguise of democracy and their agencies all on name of growth,development and humanitarian cause and projected mass movement .


     With the gradual dismantling of quantitative restrictions and tariff barriers, the peasantry in the poorer countries is facing rack and ruin.


     A whole range of farm commodities can be offered for trading by the technologically advanced Western countries at prices that would not cover farmers' costs in the poor continents. One reason is the neo-colonial edict: some are more equal than others; subsidies are out for farmers in India, Pakistan or Bangladesh, but not for those in the US, or in France.


    But agrarian Midnapur and Jangal Mahal in Bengal have a different legacy of resistance to reject the Global Order,indiscriminate industrializaion,urbanisation and infrastructure.


    I am just drawing your attention to this humanscape of continuous resistance inherent.


    Midnapur is quite different from rest of Bengal,rest of India.So the tribal India,which it makes with Jharkhand,dandakarnya,Orrissa,MP,Maharashtra and Andhra are quite different in culture,psyche,linguistics and history.


    We have brute apathy against them!We may include tribal Gujarat and rajasthan along with UP and Bihar in this list.Then entire North East.


    For Example as Warren Hastings failed to quell the Chuar uprisings. The district administrator to Bankura wrote in his diary in 1787 that the Chuar revolt was so widespread and fierce that temporarily, the Company's rule had vanished from the district of Bankura.


     Finally in 1799 the Governor General, Wellesley crushed these uprisings by a pincer attack. An area near Salboni in Midnapore district, in whose mango grove many rebels were hung from trees by the British, is still known by local villagers as "the heath of the hanging upland", Phansi Dangar Math.

     

    Some years later under the leadership of Jagabandhu the paymaster or Bakshi (of the infantry of the Puri Raja), there was the well-known widespread Paik or retainer uprising in Orissa. In 1793 the Governor General Cornwallis initiated in the entire Presidency of Bengal a new form of Permanent Settlement of revenue to loyal landlords. 

    This led to misfortunes for the toiling peasantry: in time they would protest against this as well.
    First Chuar Rebellion (1767.)


    But the world owes much to rebels who would dare to argue in the face of the pontiff and insist that he is not infallible.


    -Babasaheb Ambedkar


    In the fight for Swaraj you fight with the whole nation on your side...[but to annihilate the caste], you have to fight against the whole nation—and that too, your own. But it is more important than Swaraj. There is no use having Swaraj, if you cannot defend it. More important than the question of defending Swaraj is the question of defending the Hindus under the Swaraj. In my opinion, it is only when Hindu Society becomes a casteless society that it can hope to have strength enough to defend itself. Without such internal strength, Swaraj for Hindus may turn out to be only a step towards slavery. Good-bye, and good wishes for your success.
    -B.R. Ambedkar


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