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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    अगर हिंदुत्व संस्कृति है तो इस महादेश का सारा जनसमूह हिंदू है तो उनके कत्लेआम का एजंडा हिंदुत्व का एजंडा कैसे हो सकता है?
    पलाश विश्वास

    पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ साथ भारत के मुसलामान भी बुद्ध धर्म अनुयायी थे,जिनने मनुस्मृति की बजाय इस्लाम अपनाया,हम यह बार बार लिखते रहे हैं।


    अब पाकिस्तानी विदुषी और समामाजिक कायर्कर्ता फौजिया सईद भी यही कह रही हैं।

    मुसलमान कोई विदेशी नहीं हैं,वे भी हमारे ही पुरखों की संतान है और यह दंगा फसाद और ग्लोबल आर्डर पर कब्जे का धर्मोन्मादी मुक्तबाजारी एजंड दरअसल हमारा ही खून बहाने का जुध महाजुध है।

    अद्यतन जीनेटिक्स के सबूत भी टैगोर के भारत तीर्थ की अवधारणा की पुष्टि करते हैं।

    अगर हिंदुत्व संस्कृति है तो इस महादेश का सारा जनसमूह हिंदू है तो उनके कत्लेआम का एजंडा हिंदुत्व का एजंडा कैसे हो सकता है?

    जीनेटिक्स के सबूत मुताबिक बुद्धमय भारत के अवसान से पहले ही सारा भारत वर्ष,अखंड भारत वर्ष विभिन्न नस्लों की रक्तधाराओं के अविराम मिश्रण से एकात्म एकच रक्त हो चुका था।आर्य अनार्य द्विड़ शक हुण के वंशज ही हम हिंदू मुसलमान!

    सिख और ईसाई,बौद्ध और जैन तो अस्मिता के नाम मुहब्बत के कत्लेआम के इस मजहबी सियासत सियासती मजहब के त्रिशुल से क्यों इतना खून बह रहा है अनार्य शिव और हड़प्पा मोहंजोदोड़ो की विरासत से?
    हमारे दिलो दिमाग से?
    क्यों यह कयामत का मंजर है?

    क्योंकि भावी पीढ़ियों को न जल मिलने वाला है और न अन्न। यह महादेश मरुस्थल में तब्दील होने वाला है। जल के सारे स्रोत स्रोत सूख रहे हैं।आगे जलयुद्ध है।

     क्योंकि भावी पीढ़ियों को न जल मिलने वाला है और न अन्न।
    यह महादेश मरुस्थल में तब्दील होने वाला है।

    जल के सारे स्रोत स्रोत सूख रहे हैं।आगे जलयुद्ध है।
    https://youtu.be/YkgDFsVMp-0

    जिंदाबान..दीवारें जिंदाबान!
    दीवारें जो गिरायें,वो उल्लू दा पट्ठा!
    इसीलिए इतिहास लहूलुहान,पन्ना दर पन्ना खून का सैलाब!
    लहुलुहान फिजां है
    लहुलुहान स्वतंत्रता
    लहुलुहान संप्रभुता
    लहूलुहान इनडिविजुअल
    लहुलूहान ट्राडिशन
    लहूलुहान यह कायनात
    और यह कयामत का मंजर

    फासीवाद की कुंडली भी बांच लीजिये!
    गांधी की प्रार्थना सभा में हत्या!Murder in the Cathedral! Rising Fascism and the Burnt Norton!

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    किसी इंसान को कुत्ता कहकर इंसानियत की तौहीन न करें प्लीज!

    पलाश विश्वास
    आज सवेरे उठते ही सविता बाबू ने बांग्ला दैनिक एई समय का पन्ना खोलकर दिखाते हुए कहा कि कुत्ते भी इंसान हैं लेकिन इंसान कुत्ता भी नहीं है।मां बाप ने अपने जिस जिगर के टुकड़े ,नन्हीं सी जान को ट्रेन में लावारिस छोड़ दिया और वह ट्रेन कारशेड में चली गयी।रातभर इंसानियत की शर्म जैसे इस कृत्य का प्रायश्चित्त करता रहा एक कुत्ता।कोलकाता के नजदीक डायबंड हारबार का यह वाकया है।

    डायमंड हारबार एक पर्यटक स्थल भी है और गंगासागर की तीर्थयात्रा जिस लाट थ्री से शुरु होती है,वह डायमंड हारबर के पास ही है।थोड़ा आगे निकलिये तो काकद्वीप होकर नामखाना और फिर वकखालि का समुद्रतट है।यह मैनग्रोव फारेस्ट बद्वीप का इलाका है।जहां फ्रेजरगंज और वक खाली में समुंदर की खाड़ी के उसपार सुंदरवन का कोरइलाका है।यही नहीं,काकद्वीेप के पास कालनागिनी नदी किनारे नया पर्यटन स्थल न्यू वकखालि भी है।

    पर्यटकों का हुजूम रोज उमड़ता है और कोई निगरानी होती नहीं है उनकी।स्थानीय लोगों के लिए वे अतिथि देवोभवः.. हमारे उत्तराखंंड में भी पर्यटकों के लिए कुछभी करने की पूरी मनमानी की छूट है।पर्यटन की आड़ में मनुष्यता का विसर्जन यह हो गया।

    कल तड़के जब वह ट्रेन सुबह की पहली गाड़ी बनकर कारशेड पर चली आयी तो कोलकाता में मछलियां और सब्जियां ले जाने वाले,कामवाली मौसियों का हुजूम और नौकरीपेशा नित्ययात्री के साथ कोलकातामें पढ़ाई के लिए जाने वाले छात्र छात्राओं का काफिला ट्रेन में किसीतरह जगह बनाने के रोजनामचे में दाकिल हो गये।
    बच्चा मां बाप से बिछुड़कर आईलान की लाश की तरह रो रोकर थक हारकर ट्रेन की सीट पर सो गया।शुक्र है कि आठ नौ महीने के बेहद प्यारे उस बच्चे की जिस्म पर तब भी गर्म कपड़े थे।उसके बगल में दूध का बोतल और दवाइयां भी सही सलामत।

    मां बाप को बच्चे को छोड़ना ही थी,तो वह मरे नहीं,इसकी परवाह क्यों करनी थी।कोलकाता और खाातौर पर शाम होते हीइन दिनों सर्दी होने लगी है।वीराने में खड़ी ट्रेन के अंदर कितनी ठंड होगी सोचिये।
    पहरेदार कुत्ते को बच्चे की सुरक्षा का इतनाख्याल कि उसने किसी को ट्रेन के उस आखिरी डब्बे में तब तक दाखिल होने नहीं दिया,जबतक न कि जीआरपी के कुछजवानों ने बिस्कुटवगैरह से ललचाकर उसे बच्चे से अलहादा नहीं कर दिया।
    मां बाप लापता है और जरुरी नहीं कि उनने ही बच्चे को छोड़ा हो यह किसी हैवान की कारस्तानी भी हो सकती है।

    बच्चा बीमार हो गया है और उसकी एक आंख में तकलीफ है।उसे अस्पताल और चाइल्ड केयर के हवाले किया गया है।

    मुझे तो मं बाप की चिंता हो रही है क्योंकि अपराध का बोलबाला ऐसा है कि वे सही सलामत हो,ऐसा भी जरुरी नहीं है।

    इंसानियत का तकाजा है कि हम उम्मीदबी करें कि यह अपकर्म किसी मां बाप का हरगिज नहीं हो सकता।

    जिनने भी इस मासूम बच्चे की यह गत कर दी,वह मनुष्यता का दुश्मन जरुर है औरमनुष्यता को उस कुत्ते का आभारमानना चाहिए।

    किसी इंसान को कुत्ता कहकर इंसानियत की तौहीन न करें प्लीज!

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  • 11/29/15--10:29: यही है कयामत का मंजर और हमारे स्वर्गवास का इंतजाम कयामत का मंजर यहींच अरुंधति जो कह रही हैं वह सच है और इस अपकर्म में संसदीय पक्ष विपक्ष,रंगबिरंगी तमाम विचारदाराएं शामिल है जो दरअसल वंश वर्चस्व का अंग्रेजी हुकूमत का तोहफा है और इसीको हम लोकतंत्र समझ रहे हैं और धर्म और जातिकी अस्मिताओं को इसी खुशफहमी में मजबूत कर रहे हैं। सध्याच्या परिस्थितीसाठी असहिष्णू हा शब्दही अपुरा – अरूंधती रॉय महात्मा फुले यांच्या पुण्यतिथीच्या निमित्ताने अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषदेतर्फे देण्यात येणारा यंदाचा
  • यही है कयामत का मंजर और हमारे स्वर्गवास का इंतजाम

    कयामत का मंजर यहींच

    अरुंधति जो कह रही हैं वह सच है और इस अपकर्म में संसदीय पक्ष विपक्ष,रंगबिरंगी तमाम विचारदाराएं शामिल है जो दरअसल वंश वर्चस्व  का अंग्रेजी हुकूमत का तोहफा है और इसीको हम लोकतंत्र समझ रहे हैं और धर्म और जातिकी अस्मिताओं को इसी खुशफहमी में मजबूत कर रहे हैं।

    सध्याच्या परिस्थितीसाठी असहिष्णू हा शब्दही अपुरा – अरूंधती रॉय

    महात्मा फुले यांच्या पुण्यतिथीच्या निमित्ताने अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषदेतर्फे देण्यात येणारा यंदाचा

    यावेळी रॉय म्हणाल्या, 'संपूर्ण उपखंडात रसातळाला जाण्याची स्पर्धाच सुरू झाली आहे आणि त्यात भारताचा उत्स्फूर्त सहभाग आहे. सगळ्या शिक्षणसंस्था, महत्त्वाच्या संस्थांमध्ये सरकारच्या मर्जीतील माणसे भरली जात आहेत. देशाचा इतिहासच बदलण्याचे प्रयत्न केले जात आहेत. धर्मातून बाहेर गेलेल्यांना आरक्षणाची लालूच दाखवून चालणारा 'घर वापसी'चा प्रकार क्रूर आहे. डॉ. आंबेडकरांच्या तत्त्वांचा त्यांच्याच विरोधात वापर करण्यात येत आहे. बाजीराव-मस्तानी चित्रपटावरून मोठा वाद होतो. मात्र पेशव्यांच्या काळात दलितांवर झालेल्या अन्यायाची चर्चाही होत नाही.' -

    पलाश विश्वास

    Starving Sudanese child being stalked by a vulture. Image courtesy: Kevin carter


    महात्मा फूले के 125वें पुण्य स्मरण पर अरुंधतिरॉय को समता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ... रॉय ने मोदी सरकार पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि एनडीए सरकार हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही है। ... इस समारोह में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने अरूंधति रायका विरोध करते हुए जमकर हंगामा किया।


    अरुंधति राय के ताजा बयान को मीडिया विवादास्पद बता रहा है।असहिष्णुता के खिलाफ राष्ट्रीय पुरस्कार पहले ही लौटा चुकी अरुंधति ने सीधे कहा है कि राजग सरकार सीधे ब्राह्मणवाद लागू करने पर उतारु है और मौजूदा हालात बयां करने के लिए असहिष्णुता काफी नहीं है।जलाने मारने काटने के इस क्तेआम को असहिष्णुता कहना काफी नहीं है।


    हमने राजस्थान के बीकानेर जिले में प्रेम करने के अपराध में एक दलित युवक की निर्मम हत्या पर भंवर मेघवंशी की रपट लगायी और उसके साथ की जो तस्वीरें नत्थी की है,उनसे हमारी आत्मा भी लहूलुहान हो गयी।वीभत्सता की मनुष्यता और प्रकृति विरोधी इस वारदात की तस्वीरें साझा करना बहुत कष्टकर रहा है।लेकिन सच चाहे जैसा हो सामाजिक यथार्थ है।जब मनुष्यअब सामाजिक प्राणी नहीं ही रहा है,तो उसकी संवेदनाएं भी मर गयी हैं।सच कहने पर उसकी प्रतिक्रिया प्रतिक्रियावादी होती है।लेकिन सच कहना मनुष्य होने के नाते हमारा कार्यभार है।

    अरुंधति ने सच कहा है जैसे हम लगातार कहते रहे हैं कि यह सोचना ही होगा कि अगर हम हिंदू समाज हैं,अगर हिंदुत्व हमारी साझा विरासत और संस्कृति है तो एकच रक्त के विज्ञान को खारिज करते हुए जाति वर्ण वर्चस्व के तहत लाखों अस्मिताओं के तहत बंटा क्यों है यह हिंदू समाज।

    जाति व्यवस्था को बनाये रखना ही ब्राह्मणवाद है,मनुस्मृति शासन और मुक्तबाजार की अर्थव्यवस्था है।


    हम इसे लगातार कह रहे हैं।अगर हम जाति को संबोधित करते हैं और जातियों को गाली दिये बिना हमारा अमृत वचन बेजुबान है तो इसका मतलब फिर वही है कि हम हरहालत में जाति को बनाये रखना चाहते हैं और इसीलिए हम जाति को मजबूत कर रहे हैं।


    यह बहुत बड़ी त्रासदी है कि किन्हीं मजबूत जातियों का महागठबंधन सनातन हिंदू धर्म के झंडेवरदारों को हरा देता है।इसका सीधा मतलब है कि जनता की आस्था और उनकी समस्याओं,रोजमर्रे की जरुरतों,उनके वजूद से इस धर्म का कोई नाता नहीं है।


    असल हिंदू हो जो वह जरुर अरुंधति के कहे का मतलब बूझ लें कि धर्म का राजकाज से कोई मतलब नहीं है।


    भक्ति आंदोलन के मनीषियों ने मध्यकाल में ही इस दैवी सत्ता को खारिज करके रोशनी फैलायी है और कटकटेला अंधियारे के कारोबार ने उस रोशनी को धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद में ओ3म स्वाहा कर दिया है और उत्तरआधुनिक हिंदू धर्म को जाति और अस्मिताओं के शिकंजे में दबाकर रखा है।


    संसद का अधिवेशन अंबेडकर स्मृति पारायण की वैदिकी रस्मअदायगी में तब्दील है तो राजकीय संविधान दिवस और संविधान संकल्प भी जाति उन्मूलन के एजंडे से दूर है जबकि हिंदुत्व के पुनरूत्थान के लिए उन्नीसवीं सदी का वह नवजागरण चाहिए जिसने सतीप्रथा,बहुविवाह,बाल विवाह का निषेध करते हुए स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह जैसे क्रांतिकारी कार्यक्म को अंजाम दिया।


    उधर महात्मा ज्योतिबा फूले,सावित्री बाई फूले और हरिचांद ठाकुर गुरुचांद ठाकुरसमेत तमाम अछूत पिछड़े मनीषियों ने इसी कार्यक्रम को भारतीय यथार्थ बना दिया।


    इस लिहाज से नवजागरण के साथ सात किसान आदिवासी आंदोलन का वह सिलसिला दरअसल भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल है और वर्तमान परिदृश्य अंधकार युग।


    हमने अपने वीडियो टाक में पिछले दिनों विश्व साहित्य के मार्फत यह बताया है कि यह सिलिसिला 1170 में कैंटरबुरी के आर्कविशप की हत्या के साथ शुरु हुआ।


    असहिष्णुता और शुद्धता संशोधन आंदोलन का खुलासा मर्डर इन द कैथेड्रल में और शेक्सपीअर के नाटकों में खूब हुआ है।


    विडंबना यह है कि हम आजाद भारत में इसीको,इस औपनिवेसिक विरासत को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद  बता रहे हैं क्योंकि रियासतें और जमींदारियां खत्म हुई नहीं है और न भारत में भूमि सुधार लागू हुआ है।


    इसके उलट जलजंगल जमीन और नागरिकता से बेदखली का एफोडीआई यह मुक्तबाजार उन्माद है जिसके तार पूंजी बाजार से जुड़े हैं और गाय,गोबर, माटी से इसका कोई संबंध नहीं है।


    इसीलिए हम एकच रक्त के भारत तीर्थ पर खून की नदियां बहाने वाले त्त्वों के हाथों खिलौना बने हुए हैं और राष्ट्र का विवेक जब भी बोलता है,उसके खिलाफ अविराम घृणा अभियान चला रहे हैं।


    अरुंधति जो कह रही हैं वह सच है और इस अपकर्म में संसदीय पक्ष विपक्ष,रंगबिरंगी तमाम विचारधाराएं शामिल है जो दरअसल वंश वर्चस्व  का अंग्रेजी हुकूमत का तोहफा है और इसीको हम लोकतंत्र समझ रहे हैं और धर्म और जाति की अस्मिताओं को इसी खुशफहमी में मजबूत कर रहे हैं।


    हिंदुत्व जीने और मरने वाले लोग इस देश में बहुसंख्य है जबतक वे इस हकीकत का सामना ना करें कयामत का यह मंजर बदलने वाला नहीं है।

    'सध्याच्या परिस्थितीचे वर्णन करण्यासाठी असहिष्णू हा शब्दही अपुरा ठरावा. सर्व प्रशासकीय व्यवस्थांमध्ये हिंदुत्वाचे भाट असून दलित, आदिवासी, मुस्लिम यांना दहशतीखाली ठेवण्यात येत आहे,'असा आरोप प्रसिद्ध लेखिका अरूंधती रॉय यांनी शनिवारी केला.
    महात्मा फुले यांच्या पुण्यतिथीच्या निमित्ताने अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषदेतर्फे देण्यात येणारा यंदाचा महात्मा फुले समता पुरस्कार रॉय यांना देण्यात आला. यावेळी समता परिषदेचे संस्थापक अध्यक्ष छगन भुजबळ, महापौर दत्तात्रय धनकवडे, आमदार पंकज भुजबळ, जयदेव गायकवाड, दीप्ती चवधरी, विचारवंत हरी नरके, माजी महापौर चंचला कोद्रे, समीर भुजबळ, कृष्णकांत कुदळे, राजू घाटोळे आदी उपस्थित होते. पुरस्काराची एक लाख रुपयांची रक्कम आणि पुस्तकांच्या मानधनातून मिळालेले दोन लाख रुपये असा तीन लाख रुपयांचा निधी रमाबाई मिशनला देण्याचे रॉय यांनी जाहीर केले.

    बढ़ावा दे रही मोदी सरकार : अरुंधति राय

    Webdunia Hindi - ‎Nov 28, 2015‎

    पुणे। जानी-मानी लेखिका अरूंधति रॉय ने शनिवार को आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार 'हिन्दू राष्ट्रवाद' के नाम पर 'ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही' है और 'असहिष्णुता' जैसा शब्द उस 'डर' को बताने के लिए नाकाफी है जिसमें अभी अल्पसंख्यक समुदाय जी रहा है। रॉय के इस बयान पर दंक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन कर उन्हें 'राष्ट्र विरोधी' करार दिया । यहां एक कार्यक्रम में रॉय की मौजूदगी से नाराज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने हंगामेदार प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम में रॉय को समाज सुधारक ...

    अरुंधतिने कहा, ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही मोदी सरकार, फिर से लिख रही है इतिहास

    एनडीटीवी खबर - ‎20 hours ago‎

    पुणे: दुनिया भर में मशहूर भारतीय लेखिका अरुंधतिरॉय ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार 'हिंदू राष्ट्रवाद' के नाम पर 'ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही' है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 'असहिष्णुता' जैसा शब्द उस 'डर' को बताने के लिए नाकाफी है जिसमें अभी अल्पसंख्यक समुदाय जी रहा है। रॉय के इस बयान पर दंक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन कर उन्हें 'राष्ट्र विरोधी' करार दिया। रॉय के खिलाफ एबीवीपी ने किया प्रदर्शन पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में रॉय की मौजूदगी से नाराज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ...

    लेखिका अरुंधतिरॉय का बड़ा आरोप, हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही है मोदी सरकार

    Rajasthan Patrika - ‎13 hours ago‎

    पुणे। पुणे। प्रसिद्ध लेखिका और असहिष्णुता के विरोध में राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने वाली अरुंधती रॉय ने मोदी सरकार पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपानीत एनडीए सरकार हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही है। रॉय ने कहा कि जिस 'डर' के साए में अल्पसंख्यक जी रहे हैं उसे बताने के लिए 'असहिष्णुताÓ शब्द नाकाफी है।अरुंधतिने कहा कि लोगों की हत्या, उन्हें जिंदा जलाना और ऐसी ही बातों के लिए असहिष्णुता पर्याप्त शब्द नहीं है। ...rai 1. गौरतलब है कि अरुंधतिरॉय उन लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने हाल ही में देश में 'बढ़ती असहिष्णुताÓ के खिलाफ पुरस्कार लौटाया है।

    हिन्‍दू राष्‍ट्रवाद के नाम पर देश में ब्राह्मणवादफैला रहा केंद्र: अरुंधति‍रॉय

    Nai Dunia - ‎9 hours ago‎

    देश में असहिष्‍णुता पर चल रही बहस के बीच लेखक अरुंधतिरॉय ने इसे एक नया मोड़ दे दिया है। एक विवादित बयान देते हुए उन्‍होंने कहा कि जिस डर में भारत में अल्‍पसंख्‍यक जी रहे ... उन्‍होंने इसके साथ ही केंद्र सरकार पर देश में हिन्‍दू राष्‍ट्रवाद के अंतर्गत ब्राह्मणवादफैलाने का आरोप भी लगाया। उन्‍होंने यह भी कहा कि भारत के सामाजिक सुधारों को महान हिन्‍दू विचार के ... देश में दलित, पिछड़ों, मु‍स्लिमों और ईसा‍इयों को बांटने की कोशिश कर रही है। 55 वर्षीय बुकर प्राइज विजेता अरुंधतिरॉय यहां पर महत्‍मा फुले समता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में महत्‍मा ज्‍योतिबा फुले अवॉर्ड लेने पहुंची थी।

    ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही मोदी सरकार: अरूंधति रॉय

    ABP News - ‎13 hours ago‎

    ... एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने उन्हें ''राष्ट्रविरोधी, पाकिस्तान समर्थक और भारतीय सेना विरोधी'' करार दिया . बाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया . एबीवीपी ने आयोजकों को एक ज्ञापन सौंपकर कहा कि रॉय ने अपने ''राष्ट्र विरोधी'' रवैये से सभी भारतीयों की संवेदनाएं आहत की हैं . इस मौके पर एनसीपी नेता और महाराष्ट्र सरकार के पूर्व मंत्री छगन भुजबल ने कहा कि भाजपा को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से सबक लेना चाहिए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने ऐसे नेताओं को काबू में लाना चाहिए जो ''असहिष्णु बातें'' करते हैं. Tags : modi govt narendra modi Intolerance arundhati roy.

    हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही एनडीए सरकार

    दैनिक जागरण - ‎10 hours ago‎

    पुणे। प्रसिद्ध लेखिका और असहिष्णुता के विरोध में राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने वाली अरुंधती रॉय ने मोदी सरकार पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपानीत एनडीए सरकार हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही है। उन्होंने कहा कि जिस 'डर' के साए में अल्पसंख्यक जी रहे हैं उसे बताने के लिए 'असहिष्णुता' शब्द नाकाफी है। अरुंधतिने कहा कि लोगों की हत्या, उन्हें जिंदा जलाना और ऐसी ही बातों के लिए असहिष्णुता पर्याप्त शब्द नहीं है। हमें इन सबको बताने के लिए एक नया शब्द गढऩा पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा देश के समाज सुधारकों का महिमामंडन महान हिंदुओं के तौर ...

    हिंदू राष्ट्र के नाम पर ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही है मोदी सरकार: अरुंधती रॉय

    नवभारत टाइम्स - ‎18 hours ago‎

    अरुंधतिरॉय (फाइल फोटो). फोटो शेयर करें. पुणे जानी-मानी लेखिका अरुंधती रॉय का मानना है कि मोदी 'हिंदू राष्ट्रवाद' के नाम पर 'ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही' है। रॉय ने कहा कि 'असहिष्णुता' जैसा शब्द उस 'डर' को बताने के लिए नाकाफी है जिसमें अभी अल्पसंख्यक समुदाय जी रहा है। रॉय के इस बयान पर दंक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया और उन्हें 'राष्ट्र विरोधी' बताया। अरुंधती ने यह आरोप भी लगाया कि बीजेपी देश के समाज सुधारकों का महिमामंडन 'महान हिंदुओं' के तौर पर करने की कोशिश कर रही है और डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी हिंदू करार दे रही है, जबकि उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ ...

    हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही मोदी सरकार: अरूंधति रॉय

    आईबीएन-7 - ‎15 hours ago‎

    पुणे। जानीमानी लेखिका अरूंधति रॉय ने आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार हिंदू राष्ट्रवाद के नाम परब्राह्मणवादको बढ़ावा दे रही है और असहिष्णुता जैसा शब्द उस डर को बताने के लिए नाकाफी है जिसमें अभी अल्पसंख्यक समुदाय जी रहा है। रॉय के इस बयान पर दंक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन कर उन्हें राष्ट्र विरोधी करार दिया है। एक कार्यक्रम में रॉय की मौजूदगी से नाराज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने हंगामेदार प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम में रॉय को समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा ...

    मोदी राज में ब्राह्मणवादलाने, इतिहास पुनर्लेखन के प्रयास:अरूंधति

    खास खबर - ‎55 minutes ago‎

    मोदी राज में ब्राह्मणवादलाने, इतिहास पुनर्लेखन के प्रयास:अरूंधति. Published : 29-11-2015. arundhati royaccuse modi govt of bringing brahminism,rewritting of history -. पुणे। बुकर पुरस्कार से सम्मानित भारतीय लेखिका अरूंधति रॉय ने पुणे में आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार हिंदू राष्ट्रवाद के नाम परब्राह्मणवादको बढावा दे रही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि असहिष्णुता जैसा शब्द उस डर को बताने के लिए नाकाफी है जिसमें अभी अल्पसंख्यक समुदाय जी रहा है। रॉय के इस बयान पर दंक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन कर उन्हें राष्ट्र विरोधी करार दिया। पुणे में आयोजित एक ...

    ''हिंदू राष्ट्रवाद की आड़ में ब्राह्मणवादफैला रही मोदी सरकार''

    Nai Dunia - ‎Nov 28, 2015‎

    पुणे। अब मशहूर लेखिका अरुंधती रायने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। उनका आरोप है कि हिंदू राष्ट्रवाद की आड़ में मोदी सरकार ब्राह्मणवादको बढ़ावा देने में जुटी है। बकौल अरुंधती, "मौजूदा समय में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग जिस तरह के भय के माहौल में जी रहे हैं, उसको परिभाषित करने के लिए "असहिष्णुता" जैसे शब्द पर्याप्त नहीं हैं। समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले पुरस्कार से सम्मानित होने के मौके पर शनिवार को अरुंधती रायने उपरोक्त टिप्पणी की। अपने संबोधन में उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि सत्ताधारी पार्टी समाज सुधारकों को महान हिंदू के रूप में महिमा ...



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  • 11/30/15--02:44: https://youtu.be/E1qXD7NKMHU Viagra in Tea Spoon!चाय की कप में वियाग्रा! सत्यं शिवम् सुदरम्! सत्यमेव जयते! तमसोमाज्योतिर्गमय! देश में बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर खान, शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय कलाकारों के बयानों पर उठे विवाद के बीच अभिनेत्री नंदिता दास ने भी देश के हालात पर चिंता जताई है। दुनिया रोज बदलती है और जिंदगी तकनीक! अतीत सुहाना है,हर मोड़ पर भटकाव भी वहीं! जिनने मेरा प्रार्थनासभा में गाधी की हत्या वीडियो देख लिया, उन्होंने जरुर गौर किया होगा कि नाथुराम गोडसे के उद्गार, हत्या की दलील की क्लीपिंग और गांधी हत्या के दृश्यों के मध्य बैकग्राउंड में मर्डर इन द कैथेड्रल का अविराम मंचन है।रेश्मा की आवाज है। गौर करें कि आर्कविशप की हत्या से पहले उसे देश छोड़ने का फतवा है और उसकी हत्या के औचित्य की उद्घोषणा है।यह दृश्य अब इंडिया लाइव का अतीत में गोता,ब्लैक होल गर्भ में महाप्रस्थान। मनुस्मृति शासन की जान का कहे,वहींच मनुस्मृति है। जाति खत्म कर दो, मनुस्मृति खत्म! ई जौन फ्री मार्केटवा ह,उ भी खत्म,चाय कप में वियाग्रा छोडो़ तनिको! फिर आपेआप बौद्धमय भारत। सनातन एकच रक्त अखंड भारत वर्ष

  • Viagra in Tea Spoon!चाय की कप में वियाग्रा! सत्यं शिवम् सुदरम्! सत्यमेव जयते! तमसोमाज्योतिर्गमय!

    देश में बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर खान, शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय कलाकारों के बयानों पर उठे विवाद के बीच अभिनेत्री नंदिता दास ने भी देश के हालात पर चिंता जताई है।

    दुनिया रोज बदलती है और जिंदगी तकनीक!

    अतीत सुहाना है,हर मोड़ पर भटकाव भी वहीं!


    जिनने मेरा प्रार्थनासभा में गाधी की हत्या वीडियो देख लिया, उन्होंने जरुर गौर किया होगा कि नाथुराम गोडसे के उद्गार, हत्या की दलील की क्लीपिंग और गांधी हत्या के दृश्यों के मध्य बैकग्राउंड में मर्डर इन द कैथेड्रल का अविराम मंचन है।रेश्मा की आवाज है।


    गौर करें कि आर्कविशप की हत्या से पहले उसे देश छोड़ने का फतवा है और उसकी हत्या के औचित्य की उद्घोषणा है।यह दृश्य अब इंडिया लाइव का अतीत में गोता,ब्लैक होल गर्भ में महाप्रस्थान।


    मनुस्मृति शासन की जान का कहे,वहींच मनुस्मृति है।

    जाति खत्म कर दो, मनुस्मृति खत्म!

    ई जौन फ्री मार्केटवा ह,उ भी खत्म,चाय कप में वियाग्रा छोडो़ तनिको!


    फिर आपेआप बौद्धमय भारत।


    सनातन एकच रक्त अखंड भारत वर्ष और सनातन उसका धर्म हिंदूधर्म।पहिले मुक्ताबाजार का यह वियाग्रा छोड़िके बलात्कार सुनामी को थाम तो लें!

    सध्याच्या परिस्थितीसाठी असहिष्णू हा शब्दही अपुरा – अरूंधती रॉय

    महात्मा फुले यांच्या पुण्यतिथीच्या निमित्ताने अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषदेतर्फे देण्यात येणारा यंदाचा

    यावेळी रॉय म्हणाल्या, 'संपूर्ण उपखंडात रसातळाला जाण्याची स्पर्धाच सुरू झाली आहे आणि त्यात भारताचा उत्स्फूर्त सहभाग आहे. सगळ्या शिक्षणसंस्था, महत्त्वाच्या संस्थांमध्ये सरकारच्या मर्जीतील माणसे भरली जात आहेत. देशाचा इतिहासच बदलण्याचे प्रयत्न केले जात आहेत. धर्मातून बाहेर गेलेल्यांना आरक्षणाची लालूच दाखवून चालणारा 'घर वापसी'चा प्रकार क्रूर आहे. डॉ. आंबेडकरांच्या तत्त्वांचा त्यांच्याच विरोधात वापर करण्यात येत आहे. बाजीराव-मस्तानी चित्रपटावरून मोठा वाद होतो. मात्र पेशव्यांच्या काळात दलितांवर झालेल्या अन्यायाची चर्चाही होत नाही.' -


    पलाश विश्वास

    सच कहा है अरुंधति ने, जाति व्यवस्था को बनाये रखना ही ब्राह्मणवाद है

    यह ‪#‎दंगा‬फसाद और ग्लोबल आर्डर पर कब्जे का ‪#‎धर्मोन्मादी‬‪#‎मुक्तबाजारी‬एजेंडा दरअसल हमारा ही खून बहाने का जुध महाजुध है

    लहुलूहान ट्राडिशन लहूलुहान यह कायनात और यह कयामत का मंजर फासीवाद की कुंडली भी बांच लीजिये! गांधी की प्रार्थना सभा में हत्या!



    कयामत का मंजर यहींच अरुंधति जो कह रही हैं वह सच है और इस अपकर्म में संसदीय पक्ष विपक्ष, रंगबिरंगी तमाम विचारदाराएं शामिल है जो दरअसल वंश वर्चस्व का अंग्रेजी हुकूमत का तोहफा…

    बवाल मचाने के मास्टर उदय प्रकाश का ताजा उपहारः

    तुझ पे दिल क़ुर्बान।

    यह हिंदुस्तान का राष्ट्रगीत ' जन गण मन अधिनायक जय हे ' लिखने वाले, साहित्य के लिए एकमात्र भारतीय " नोबेल पुरस्कार' से सम्मानित कवि रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी ' काबुली वाला' पर आधारित फ़िल्म का गाना है। बलराज साहनी इसमें काबुलीवाला पठान थे। मैं जब कॉलेज भी नहीं पहुँच सका था, तब यह फ़िल्म देखी थी और आज तक इसका असर गहरा है।

    मार्मिक।

    दोस्तो। सुनें । पसंद न आये, तो भी कोई बात नहीं।

    smile emoticon

    Movie : Kabuliwala Music Director: Salil Chowdhary Singers: Manna Dey Director: Hemen Gupta. Enjoy…

    Kabuliwala Songs - Balraj Sahni - Usha Kiran - YouTube

    Oct 7, 2013 - Uploaded by Filmi Gaane

    Movie : Kabuliwala Music DirectorSalil Chowdhary Singers:Manna Dey DirectorHemen GuptaEnjoy ...



    जीएसटी की राह

    जीएसटी विधेयक को लेकर चले आ रहे गतिरोध के दूर होने की संभावना से उद्योग-व्यापार जगत ने राहत की सांस ली होगी।

    Authorजनसत्ताNovember 29, 2015 22:45 pm

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    जीएसटी विधेयक को लेकर चले आ रहे गतिरोध के दूर होने की संभावना से उद्योग-व्यापार जगत ने राहत की सांस ली होगी। यह अप्रत्यक्ष करों की प्रणाली में अब तक के सबसे बड़े बदलाव की कवायद है। आर्थिक सुधार का यह एक बहुत महत्त्वाकांक्षी प्रस्ताव है। इसे लेकर कॉरपोरेट जगत के उत्साह की झलक एक बार फिर दिखी, जब सरकार और विपक्ष के बीच रजामंदी के आसार दिखने पर बीते शुक्रवार को सेंसेक्स चढ़ गया।

    अपने अब तक के डेढ़ साल के कार्यकाल में शायद पहला मौका था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी मसले पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सीधी चर्चा के लिए आमंत्रित किया। दरअसल, सरकार ने अगले साल एक अप्रैल से जीएसटी को लागू करने का लक्ष्य घोषित कर रखा है। यह तभी संभव है जब जीएसटी से संबंधित विधेयक पर इसी सत्र में संसद की मुहर लगे। लोकसभा में यह विधेयक पारित हो चुका है, पर राज्यसभा में अटका हुआ है। राज्यसभा में राजग का बहुमत नहीं है।

    फिर, यह संविधान संशोधन विधेयक है और सरकार जानती है कि विपक्ष के सहयोग के बगैर न यह पारित हो पाएगा न इसे क्रियान्वित किया जा सकेगा। मानसून सत्र के अनुभव से भी यह सबक मिला होगा। पिछले सत्र का काफी समय ललित मोदी प्रकरण और व्यापमं घोटाले पर विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया था। बहरहाल, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से बातचीत करके जीएसटी पर कांग्रेस से तल्खी दूर करने की प्रधानमंत्री की पहल सराहनीय है। अभी तक भाजपा इस तरह पेश आ रही थी जैसे जीएसटी की फिक्र केवल उसे है। जबकि इसकी पहल यूपीए सरकार ने की थी।

    बरसों की कवायद के बाद भी जीएसटी को कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सका, क्योंकि राज्यों के कई एतराज थे। भाजपा-शासित गुजरात ने भी कई दफा अपनी आपत्तियां जाहिर कीं, उस वक्त भी जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे। इसलिए विवाद केंद्र और संसदीय विपक्ष के बीच उतना नहीं, जितना केंद्र और राज्यों के बीच रहा है। जीएसटी के तहत राजस्व का नुकसान होने की राज्यों की आशंका दूर करने के लिए विधेयक में शुरू में उसकी भरपाई की व्यवस्था की गई। फिर भी तमाम राज्य राजी नहीं हुए तो भरपाई की अवधि बढ़ाई गई।

    उनकी जिद पर कई वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर करना पड़ा। प्रस्तावित कर-प्रणाली के तहत निर्णय प्रक्रिया में राज्यों को भी शामिल करने का केंद्र ने भरोसा दिलाया और इसके लिए विधेयक में जीएसटी परिषद के गठन का प्रावधान किया। लेकिन अब भी कई मसले अनसुलझे हैं, जैसा कि कांग्रेस की शिकायत से जाहिर है। कांग्रेस चाहती है कि जीएसटी की दर अठारह फीसद से अधिक न की जाए, एक फीसद अतिरिक्त कर का प्रावधान समाप्त कर दिया जाए और विवाद निपटारा प्राधिकरण स्थापित किया जाए।

    इन मांगों को राजनीतिक वितंडा कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। इन पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। कॉरपोरेट जगत को उम्मीद है कि जीएसटी से कोराबार में सहूलियत होगी। यह दावा भी किया जाता रहा है कि जीडीपी की दर बढ़ाने में जीएसटी मददगार साबित होगा। मगर महंगाई और राज्यों के राजस्व के कोण से भी इस पर विचार करना जरूरी है।


    सहिष्णुता असहिष्णुता वाद विवाद की आड़ में भूमंडलीकरण की आंधी है।जीएसटी पर आम सहमति है।जीएसटी पर जेटली की दलीलें और राजनीतिक गोलबंदी हमने लाइव शेयर की है।लेकिन अरुंधति के वीडियो और पार्लियामेंट लाइव के वीडियो शेयर नहीं हो पाया तकनीकी अड़चन की वजह से।जैसा हमने वायदा किया है।इसका खेद हैं।सारे वीडियो,और हमारे वीडियो भी आनलाइन हैं।गुगल करके देख लें।


    बहरहाल स्मार्टसिटी और पैकेज की लूट है!

    बहरहाल विकास दर की छलांग है!

    बेदखली की छूट है!बहरहाल

    नंगी तलवारें चमकै खूबै!बहरहाल

    फतवा बहार सहिष्णुता बहार!बहरहाल


    बहरहाल रेटिंग एजंसियों के भी फतवे हैं!

    बहरहाल वैश्विक इशारे भी फतवे  हैं!


    झोंकके एफोडीआई!बहरहाल

    ठोंकके विनिवेश!बहरहाल

    पूंजीप्रवाह जलप्रलय!बहरहाल


    बहरहाल कयामत का मंजर

    संपूर्ण निजीकरण!बहरहाल

    संपूर्ण ग्लोबीकरण!बहरहाल


    कटे हुए हाथ हैं!

    कटे हुए पांव हैं!

    कटा हुआ दिल है!


    कटा हुआ दिमाग!

    फटा हुआ पैबंद चेहरा!

    वजूद कबंध है!

    नरमुंड नारियल है!

    आत्मध्वंस का महोत्सव!


    अंदरो शरणार्थी सैलाब ह!

    बाहरो शरणार्थी सैलाब ह!


    सैन्यराष्ट्र आईसिस!

    आंतक के खिलाफो जुध!

    आ बैल मुझे मार!

    यहींच ग्लोबल आर्डर!

    यहींच ओकुपाई द ग्लोबल आर्डर।

    यहींच हिंदुत्व का एजंडा।


    हर नन्ही सी जान आइलान!

    प्रेम किया नहीं तो भुगत लो!

    बीकानेरी अंजाम!बहरहाल

    आज का वीडियो टाक मेै अपनी पुरानी भूमंडलीकरण कविताओं  के पाठ से शुरु कर रहा हूं और कोशिश रहेगी कि अरुंधति राय ने जो असल एजंडा ब्राह्मणवाद का बताया है,उसका आशय ब्राह्मणों को गाली नहीं है,हम यग जरुर साफ करें।अव्वल तो अरुंधती खुदै ब्राह्मण हैं और जाति उन्मूलन का नया पाठ जारी करते हुए उनकी प्रस्तावना बहुजनों को इसीलिए नागवर गुजरी है।सम्राट चंद्रगुप्त के गुरु ब्राह्मण हैं।हमारे गुरुजी भी ब्राह्मण हैं।


    हम बंगाल में चंडाल आंदोलन के वंशज हैं और अछूत हैं ,इसीलिए शरणार्थी तो हैं ही,सीनियर मोस्ट,रेटिंग में टाप पर होने के बावजूद सबएडीटर रियार कर रहे हैं।हम लोग जो हमारा सत्यानाश कर रहे हैं,उनका विरोध करने में कोताही नहीं करते।लेकिन ब्राह्मणों को गरियाकर जाति व्यवस्था को वैधता और मजबूती देने का कोई मौका नहीं छोड़ते।


    आप अमलेंदु को कोई मदद नहीं करते और यह भी नहीं समझते कि हम किन मुद्दों को संबोधित कर रहे हैं।हस्तक्षेप की सलीब पर रोज मैं टंगा होता हूं और मेरी जिस्म पर जख्मों के सैलाब,मेरे बहते खून की आपको परवाह नहीं है।


    हस्तक्षेप की मदद मेरी मदद है,समझ लें।इसीतरह अरुंधती को नहीं पढ़ेंग या उनकी नहीं सुनेंगे,तो मुक्त बाजार का यह फंडा,कत्लेआम का नजारा समझ न पायेंगे।हम भले ही वीडियो टाक में आगे पीछे अरुंधती का कहा लिखा शामिल कर लें,जबतक न आप उन्हें बहुजनों के हित में न समझें,देखेंगे नहीं।


    यह भी जातिवाद है।बहुजनों का यह आत्मघाती जातिवाद ही मनुस्मृति शासन को बहाल रखे हुए हैं।थोड़ा विज्ञान,थोड़ा इतिहास की समझ से चीजों को देखने की तहजीब सीख लें तो चीजें बहुत साफ हो जायेंगी और समझ में आ जाई कि दरअसल कौन दोस्त बा,कौनो दुश्मनो ह।बाकी सबकुछ ठीकठीक मुक्तबाजार।


    उन्होंने मैसी साहेब में  अभिनेत्री बतौर कैरियर शुरु कर किया था  लेकिन उनका चेहरा कोई विश्वविजेता नहीं है और अंबेडकर की जुबान बोलकर बदलाव के ख्वाबों को वे जो जल जंगल जमीन से जोड़ने लगी हैं,इसलिए वे न आइकन है और न स्टार।

    Noted author Arundhati Roy on Saturday alleged that the Narendra Modi-led government was "promoting Brahmanism" in the name of "Hindu Rashtravad",…


    Going by respondents' admissions, untouchability is the most widespread among Brahmins, followed by OBCs.


    अरुंधती राय दरअसल मुक्तबाजार के सौंदर्यबोध और व्याकरण तबाह कर रही हैं।सो, वह हमें इतनी प्रिय भी हैं।


    कल ही हमने इस पर हस्तक्षेप पर त्वरित टिप्पणी की है जो शायद काफी नहीं है।फिर यह खुलासा।


    हमारी अरुंधति के कहे का आशय कुलो इतना है कि यह जो जातिवाद है,वहीच ब्राह्मणवाद का तोता है।


    मनुस्मृति शासन की जान का का कहे,वहींच मनुस्मृति है।

    जाति खत्म कर दो,मनुस्मृति खत्म।


    फिर आपेआप बौद्धमय भारत।


    सनातन एकच रक्त अखंड भारत वर्ष और सनातन उसका धर्म हिंदूधर्म।पहिले मुक्ताबाजार का यह वियाग्रा छोड़िके बलात्कार सुनामी को थाम तो लें।


    रचनाकर्म के लिए फूल मस्ती मोड जरुरी है ताकि दिलो दिमाग के सारे ऐप्पस खुद ब खुद खुलता चला जाये।रचनाकर्म से मजा न आये जिंदगी का,तो वह रचनाकर्म दो कौड़ी का नहीं है।


    चार्ली चैपलिन हंसोड़ न होता तो न दार्शनिक होता और कलाकार।

    रचनाकर्म में डिकेंस और लैंब की तरह पैथोस और ह्यूमर दोनों न हो,या फिर मंटो जैसा तीखापन और परसाई जैसा डंक न हो तो लिखना भी क्या और पढ़ना भी क्या।


    पाठक,श्रोता की जुबान कुछ भी हो,भाषा की दीवारें लांघकर उसके दिलोदिमाग तक पहुंचने की कुव्वत न हो तो पिछवाड़ा दागकर महान जितनो बनो आप,हमारे हिसाब से आपकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं।


    दिलो दिमाग के सारे तार झनझना देना ही रचनाकर्म है और वहां वर्चस्व सिर्फ मुहब्बत का है।

    घृणा निषिद्ध है।

    फिर वहींच सत्यं शिवम् सुदरम्!

    सत्यमेव जयते!

    तमसोमाज्योतिर्गमय!


    आज सुबोसुबो सविता बाबू यादों में फिर नई नवेली धनबाद के कोयलांचल चली गयी और हुक्म हुओ कि जलेबी सिंघाड़ा ले आओ और फिर होगा धनबाद का नाश्ता।


    इस नेकी के लिए गर से निकला तो आठवीं की परीक्षा से फारिग एक दोस्त मिला जो दांतों में ब्रश फंसाये सड़क पर आदमरफ्त का जायका ले रहा था और हमउ टाइम मशीन में धड़ाक से अपने बचपन में।


    हमारी भी आदत यही रही है कि सुबह का जायका खूब लिया जाये और उसी रोशनी,उसी ऊर्जा में बाकी दिन खपाया जाये।हाजतरफा के लिए सीधे नदीकिनारे।खेत से गन्ना उखाड़े दतौन।मटर की फलियां या खेत मा जो भी उगै हो,बिना मुंह हाध गोड़ वगैरह धोये उसीसे नाश्ता आउर फेर सगरे गांव में टहल के सबकुछ ठीकै बा।


    इस हक की खातिर हमने बचपन में न जाने कितने गृहयुद्ध, चक्रव्यूह, युद्ध महायुद्ध फतह किये हैं रोशनी की खातिर।


    मैंने पूछा कि अभी अभी उठे हो किया।

    उनने जबाव में कहा,परीक्षा हो गयी है।नींदभर सोना है।


    दुनियाभर के बच्चे मेरे दोस्त हैं क्योंकि वे दुश्मनी की तकनीक जानते ही नहीं हैं।


    समझ लो कि दिलोदिमाग के सारे तार उन्हीं की मुट्ठी में।

    सारे समुंदर उन्हींकी मुट्ठी में।

    मुट्ठी में फलक।

    हिमालय के उत्तुंग शिखर, नदियां, घाटियां, झरने यूं कि सारा कायनात।


    फिर मेरे उस दोस्त ने कहा,मामा के घर जाना है।

    कहां?

    नैहाटी में।

    नैहाटी में कहां?

    पूरब तरफ।


    पूरब तरफ कहां?बंकिम के घर के पास?कांठाल पाड़ा में?


    कांठाल पाड़ा के उत्तर में।काठपुल के पार।जेखाने 29 हाथ कालीपूजा हय।सेखाने।उनने साहेब पाड़ा का भूगोल बताया।


    फिर उनने बिना पूछे, औचक कह दिया,सैर सपाटे के लिए नहीं। साहेब पाड़ा में एक ठोंगे की दुकान है उसके वहीं इसी साल की पुरानी किताबें हैं नौवीं दसवीं की।वे खरीदनी हैं।


    फिर क्या?नैहाटी का कांठाल पाड़ा और साहेबपाड़ा का पूरा भूगोल बसंतीपुर में तब्दील।जहां मैं परीक्षा में बैठने से पहले नई कक्षा की किताबें दबाकर पूरी पढ़ लिया करता था।


    दूसरी में पढ़ता तो चौथी पांचवीं की किताबें मेरे खजाने में होतीं।पिताजी और चाचाजी के खजाने की चाबी भी मेरी मुट्ठी में।


    मैंने अपना गरीब बचपन कोलकाता महानगर के हिस्से के बचपन के साथ शेयर किया और उनसे कहा कि कैसे दसवीं पास होने के बाद ही फूल पैंट पिन्हे।कैसे दसवीं पास होने के बाद ही जूते और घढ़ी के दर्शन हुए।


    मैंने अपना गरीब बचपन कोलकाता महानगर के हिस्से के बचपन के साथ शेयर किया कि कैसे हम नदियां पार करके कीचड़ में लथपथ स्कूल पहुंचते थे और हमारे गांव के लोग कैसे अपढ़ थे कि हमें अपने बैलों भैंसो के साथ अंग्रेजी का अभ्यास करना होता था।


    मैगी पित्जा बूस्टर से सजे इस बचपन को फटेहाल कंगाल उस बचपन के किस्से में मजा आया।


    तो उनने कहा कि गाइड मैं नहीं पढ़ता।पहले टेक्स्ट पढ़ता हूं और फिर क्वेश्चन बैंक से सवालों के जवाब तलाशता हूं।


    हमारे जमाने में भी कुंजी और गाइड होते थे और जिनके भरोसे हम कभी नहीं होते थे।


    हमारी तकनीक बहुत सीधी थी,नौवीं दसवीं की परीक्षा इंटर की किताबों के ब्यौरेवार टेक्स्ट आत्मसात करके दो तो किला फतह! फिर ट्यूटर,टीचर का क्या काम?जो हमारे थे ही नहीं।


    फिर  मेरे दोस्त ने बिना पूछे कहा कि टेक्स्ट दो बार पढ़ लेता हूं।फिर बंद करके सवालों के जवाब खोजते हुए लिखता हूं।लिखकर फिर देखता हूं कि गलती कहां हो गयी।गलती सुधारते न सुधारते किताबें नदी होकर बहने लगती हैं दिलोदिमाग में।


    जैसे मैं खुद ही अपना साक्षात्कार कर रहा था!


    किस्से हमेशा मजेदार होते हैं और अतीत बेहद सुहावना होता है।लेकिन अतीत को ही जीना बेहद खतरनाक होता है।


    हम देख रहे हैं कि हम अतीतोन्मुखी देश में तब्दील हैं।


    वह छोटा सा बच्चा परंपरा अर्जित करने की कवायद में है और अतीत से उसे कोई मोह नहीं है।


    अतीत के मोह में वर्तमान बहुत तेजी से अतीत में तब्दील होता जा रहा है और भविष्य अंधकार में।


    पुनरूत्थान के संदर्भ और प्रसंग ये ही हैं।


    हमने नोबेल विजेता टीएस इलियट के इनडिविजुअल एंड ट्रेडिशन की मर्डर इन द कैथेड्रल और इसीके समांतर प्रार्थना सभा में गांधी की हत्या के संदर्भ और प्रसंग में अपने वीडियो टाक में सिलसिलेवार चर्चा की है।


    जिनने वीडियो देख ली,उन्होंने गौर किया होगा कि नाथुराम गोडसे की हत्या की दलील की क्लीपिंग और गांधी हत्या के दृश्यों के मध्य बैकग्राउंड में मर्डर इन द कैथेड्रल का मंचन है।


    गौर करें कि आर्कविशप की हत्या से पहले उसे देश छोड़ने का फतवा है और उसकी हत्या के औचित्य की उद्घोषणा है।यह दृश्य अब इंडिया लाइव का अतीत में गोता,ब्लैक होल गर्भ में महाप्रस्थान।


    पंरपरा उत्तराधिकार नहीं है।मेधा विमर्श में जाति वर्ण आधिपात्य के कुतर्क का यह एक वैज्ञानिक जवाब है कि पंरपरा रेडीमेड नहीं होती और न परंपरा वैदिकी या मिथकीय है।इसीतरह इतिहास के भी संदर्भ और प्रसंग बदलते रहते हैं।


    कालातीत होने के बाद मारे जाने वाली हर शख्सियत परंपरा में तब्दील हो जाती है और उसी परंपरा में निष्णात होकर ही परंपरा अर्जित की जाती है।परंपारा न उत्तराधिकार है और न वंश विरासत या वंश वर्चस्व और न अतीत का अनुचित महिमामंडन है परंपरा।


    दुनिया रोज बनती बदलती है और इतिहास के संदर्भ और प्रसंग उसीतरह बदलते हैं जैसे हमारी मुट्ठी से वर्मान फिसलकर अतीत के ब्लैकहोल में समा जाता है और इंद्रधनुषी उस अतीत के पुनरूत्थान की कोई भी कोशिश हमें सीधे ब्लैकहोल में फेंक देती है।


    जिंदगी तकनीक है और सच पूछिये कि तकनीक उतनी बुरी भी नहीं है।तकनीक तो आपकी इंद्रियों की तरह हैं।यह आपके विवेक पर निर्भर है कि आप अपनी इंद्रियों का इस्तेमाल कैसे और क्यों करते हैं। अब बिना तकनीक हम एक कदम चल नहीं सकते जैसे विज्ञान का विरोध विकास का पर्याय नहीं है और न विप्लव का।


    चूंकि विप्लव अंतरात्मा की आवाज है तो वैज्ञानिक दर्शन के साथ ही सामाजिक यथार्थ का महाविस्फोट भी है।


    कल मुझे खूब हंसने को जी हुआ।साहिबे किताब बनने की न मेरी औकात है और न मेरी मंजिल।जब तक मुझे छापा जाता रहा है,मुझे भी खुशफहमी रही है कि मेरी किताबें भी निकल सकती हैं।


    छपना बंद हो गया अमेरिका से सावधान अधूरा छोड़ते न छोड़ते।उसे पूरा इसलिए नहीं किया और न करने का इरादा है क्योंकि हम सावधान किसे करें ,क्यों करें,क्योंकि देश नई ग्लोबल स्थाई बंदोबस्त के तहत वही अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील हैं और गुलाम आपकी हर्गिज नहीं सुनेंगे।


    मंकी बातें वे भक्तिभाव से सुनते देखते हैं,हमारी काम की बातें उन्हें पसंद हैं नहीं।अंध भक्तिबाव आत्मध्वंस का सबसे अच्छा तरीका।


    कल हंसी इसी बात पर आयी अपने साहित्यकारों की हत्या पर खामोश साहित्य अकादमी ने रवींद्र समग्र प्रकाशित किया है जो बांग्ला में सत्ता वर्ग की ओर से जमींदारियों रियासतों के वंश वर्चस्व के औचित्य के मुताबिक रंवींद्र विमर्श है।


    करीब दस साल पहले हमने अपने महा आदरणीय कामरेड कवि से आखिरीबार पूछा था कि चूंकि हम दिल्ली प्रेस क्लब में आराम से पांडुिपि पर चर्चा कर लेने की फुरसत और तहजीब में नहीं है तो कृपया बतायें रवींद्र के दलित विमर्श का हुआ क्या आखिर।


    उन्हींके तगादे पर लिखी थी वह किताब जो मैंने उन्हीं के हवाले कर दी थी।तब उनने कहा था कि पांडुलिपि के संपादन उन्होंने एक रवींद्र विशेषज्ञ के हवाले किया है।जल्दी ही किताब छप जायेगी और प्रकाशक चेक भेज देंगे।


    न चेक आया,न किताब छपी और ने वह पांडुलिपि लौटी।


    हैरत की बात मेरे लिए यह है कि जिन बिंदुओं पर मेरा रवींद्र का दलित विमर्श है,अकादमी कि किताब में उन्हें छुआ तक नहीं गया है।इन्ही रवींद्र विशेषज्ञ को पांडुलिपि जांचने को दिया गया था और रवींद्र समग्र के संदर्भ में कहना होगा कि इसमें नया जैसा कुछ भी नहीं है वैसे भी शायद चोरी का भी कुछ नहीं है।


    शुक्र है,संकलन मौलिक है।जो माल समाज और समय के लिए खतरनाक हो,उसे उठा लेना और भी खतरनाक है।


    वे उठा लेते तो हमें बेहद खुशी होती।हमें मुद्दों से मतलब है और नाम जितना है,उसीसे कम गालियं नहीं पड़ती हैं।आगे नाम और हुआ तो क्या पता,आखेरे अंजाम क्या हो।


    जो मेरा लिखा छापते नहीं,बल्कि दबाते हैं वे इस मायने में हमारे शुभाकांक्षी हैं कि वे मुझे बेमतलब के खतरों से बचा रहे हैं।


    बहरहाल साहित्य अकादमी के इस रवींद्र समग्र और रवींद्र विशेषज्ञता पर मैं निहाल हूं और फुरसत मिले तो गपशप के लिए कामरेड कवि के साथ दिल्ली प्रेस क्लब में शाम को बैठ भी सकता हूं।18 मई के बाद मेरे लिए फुरसत ही फुरसत है।


    वैसे मैं उनका आभारी भी हूं कि पांडुलिपि के जो अंश मेरे पास उपलब्ध हैं,उन्हें पढ़कर मुझे कुछ ठीक भी नहीं लग रहा है।यह मामला इतने सस्ते में निपटाने का सौदा था ही नहीं।


    जाहिर है कि करीब बारह तेरह साल की अवधि में मैं रुका भी नहीं हूं और परंपरा में मेरी डुबकी का सिलसिला थमा भी नहीं है।


    मुद्दा यह है कि रवींद्र विमर्श बेहद अनिवार्य है क्योंकि वह धर्मोन्मादी अतीतमुखी भारत के बचाव का एटम बम भी है।

    उसका इस्तेमाल हड़बड़ी में तो होना ही नहीं चाहिए।


    थैंक्यू,कामरेड कवि,आपने मुझे हड़बड़ी में एटम बम दागने से बचा लिया।यकीन भी कर लीजिये कि अब मेरी कोई किताब छपेगी नहीं और न हमें इसका कोई अफसोस भी होगा।


    दरअसल हम तो किस्सागो हैं।किस्सा बांच दिया,बस।किस्सा कहां पहुंचा,नहीं पहुंचा,इसका कोई सरोकार मुझसे नहीं है।


    किस्सागोई बहुत बुरी आदत है।देखिये न मैं कैसे कपास ओटने लग जाता हूं।मुझे बातें बेहद जरुरी करनी थीं लेकिन लग गया किस्सा बांचने।गंभीर बातें करने का मौका भी नहीं है।

    देश में बढ़ती कथित असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर खान, शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय कलाकारों के बयानों पर उठे विवाद के बीच अभिनेत्री नंदिता दास ने भी देश के हालात पर चिंता जताई है।





    Wednesday, December 9 at 3:00am






      


      






    सेमीनार: असहिष्णुता की चुनौती और सोशल मीडिया hastakshep.comके पांच साल पूरे होने व मानवाधिकार दिवस की पूर्व संघ्या पर शाम 3 बजे बुद्धवार, 9 दिसंबर 2015 यूपी प्रेस क्लब लखनऊ, उत्तर प्रदेश नागरिक प...


    EPFO wants to invest more in govt securities

    Surya Sarathi Ray23 hours ago

    Recent attempts to revamp the Employees' Provident Fund Organisation's (EPFO) investment pattern with a gradual shift to riskier, higher-yielding instruments have run into hurdles. While whatever measly sum the EPFO has invested in the stock market since August has yielded an annualised return of just 1.5%, causing the trade unions to say ?I told you so?, the retirement body has now said it would fall way short of the newly-prescribed limit of mandatory exposure to corporate credits due to a dearth of such instruments that yield returns higher than even state government securities.

    FE has learnt that the EPFO has sought the finance ministry?s permission to tweak the new investment pattern for the current fiscal to allow up to 100% exposure in favour of state development loans (SDLs) or government securities from the current limit of 45-50%.

    As per the formula notified by the labour ministry on April 23 this year, EPFO will invest a minimum of 35% and a maximum of 45% of fresh accretion, estimated at R1,15,000 crore, in corporate credits.

    However, in the first five months of the current fiscal, the EPFO has so far been able to invest only R7,600 crore in corporate credits ? both public sector as well as private ? including investment in bank-term deposits. This leaves another R32,650-44,150 crore additional investment to be made in the remaining seven months to comply with the prescribed norm.

    ?During the financial year, there has been a serious mismatch in the demand and supply of corporate credits. The attainment of the (prescribed) percentage of investment appears to be very difficult, rather, the same may not be possible without compromising on the rate of return on the investments made by EPFO,? reads the agenda note of the EPFO trustees? recent meeting. ?It is against common sense of investment to make investment in corporate credits having lower security and lower rate of interest as against SDLs having both higher interest and higher security in the prevailing market conditions,? it added.Analysts, however, said the contingency of initial exchange-traded funds returns being low?these investments are meant to be long-term?or a transient demand-supply mismatch in the corporate debt securities market should not be a reason for changing the new investment formula and returning to the conventional pattern.

    ?We hope that the ministry of finance will agree to higher percentage of investment in government securities or SDLs for this financial year,? said a senior EPFO official. However, he added that higher allocation to G-Secs/SDLs would be made particularly if the rate of AAA corporate credit of PSUs remain below the SDL rates.

    As per the latest norms, besides investing 35-45% in corporate credits, the EPFO will invest 45-50% of its incremental deposits in government securities and related investment and another up to 5% into money market instruments. Prior to the change, the EPFO was required to investment up to 40% in corporate debt securities and term deposit of banks.

    © image

    The rate of interest on the corporate credits has gone down considerably. In fact, for the last one month, SDLs issued by various state governments that are secured through the mechanism of automatic debt by the Reserve Bank of India have been fetching a higher rate of return compared with corporate credits.

    The EPFO?s idea of pruning exposure to corporate credits first came up in the August 21 meeting with the portfolio managers where it was decided that for the current fiscal, investments in SDLs may be permitted beyond the maximum percentage prescribed in the pattern of investment. The proposal was discussed threadbare in the meeting of the central board of trustees on August 26 where it was decided that a proposal should be made to the department of financial services, ministry of finance, to allow investment in government securities and SDLs up to 100%.

    Meanwhile, the Finance, Investment and Audit Committee of the EPFO in its meeting held in April last year had allowed investment in private corporate credits having a minimum of dual AA+ rating.

    The issue has been referred to an expert committee headed by Arun Kaul, which is yet to submit its report. However, as the final report is pending, the EPFO has proposed to invest in bonds and term deposits of dual AA+ private schedule commercial banks with certain conditions.


    We had to dramatise our protest for visible impact, said Vajpeyi.


    नई दिल्ली। सुपर स्टार आमिर खान की पत्नी किरण राव द्वारा देश छोड़कर जाने की इच्छा जताने के बीच यह जानना रोचक होगा कि अमीर तेजी से देश छोड़कर विदेश में बसते जा रहे हैं। एक…


    Parliament LIVE: Lok Sabha to debate 'rising intolerance' today

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    महमूद मदनी का ब्लॉग: प्रधानमंत्री जी, सूफी ही नहीं, इस्लाम के हर पंथ का है शांति में यकीन

    28 Nov 2015 13:34 pm | महमूद ए मदनी



    जिंदाबान..दीवारें जिंदाबान!

    दीवारें जो गिरायें,वो उल्लू दा पट्ठा!

    इसीलिए इतिहास लहूलुहान,पन्ना दर पन्ना खून का सैलाब!

    लहुलुहान फिजां है

    लहुलुहान स्वतंत्रता

    लहुलुहान संप्रभुता

    लहूलुहान इनडिविजुअल

    लहुलूहान ट्राडिशन

    लहूलुहान यह कायनात

    और यह कयामत का मंजर


    फासीवाद की कुंडली भी बांच लीजिये!

    गांधी की प्रार्थना सभा में हत्या!Murder in the Cathedral! Rising Fascism and the Burnt Norton!


    कैंटरबुरी कैथेड्राल में आर्कविशप की जो हत्या हुई और फासीवाद के शिशुकाल में जो इलियट ने इसे गीति नाट्य बना दिया,उसे समझने के लिए प्रार्थना सभा में राम नाम जाप रहे असल हिंदू धर्म के सबसे बड़े धार्मिक नेता की हत्या और आज भी हत्यारे के भव्य राममंदिर की कथा समझने के लिए कैथेड्राल में आर्कविशप की हत्या की इस क्लासिक कथा पर चर्चा बेहद  जरुरी है।

    थीम सांगःसूफी संगीत और बाउल गीत


    हमने टुवेल्फ्थ नाइट के जरिये लोक धर्म पर्व टुवेल्फ्थ नाइट की प्रासंगिकता पर चर्चा की दो कारणों से।पहला तो यह कि अमेरिका की भावभूमि में जो नई दुनिया बनी और बन रही है,महारानी एलिजाबेथ के स्वर्णकाल के आगे पीछे सबकुछ सुधारो अभियान के तहत चले प्यूरिटन उसकी वास्तविक कोख है।इसीकी अगली कड़ी मर्डर इन द कैथेड्रल है और हमारे अत्यंत प्रिय कवि टीएस इलियट ने अपना गीति नाट्य 1170 में कैंटरबरी कैथेड्राल में हुई आर्क विशप थामस बैकेट की कथा पर लिखी तो असहिष्णुता के तूफान से वे भी नहीं बचे।



    Twelfth Night


    Hay O Rabba Nai Laghda Dil Mera - Reshma - Dailymotion

    www.dailymotion.com/.../xw4crj_hay-o-rabba-nai-laghda-dil-mera-resh..

    अकादमिक चर्चा जो शायद छात्रों के लिए बेहद काम की चीज हो और इसके साथ ही इस हत्या के समांतर गांधी हत्या का आंखों देखा हाल और नाटक का मंचन भी मूल टेक्स्ट के साथ शामिल करेंगे।


    सुनते रहे हमारे प्रवचन मोक्ष के लिए और मुक्ति मार्ग पर कदम मजबूती के साथ बिना इधर उधर भटके,तेज तेज चलें इसके लिए पढ़ते रहें हस्तक्षेप।


    इस प्रस्तावना के साथ मूल चर्चा विजुअल ही होगी।

    संदर्भ मूल अंग्रेजी में इस आलेख के साथ नत्थी होंगे।



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    भोला की चिट्ठठी

    TaraChandra Tripathi shared Dinesh Karnatak's photo.

    चिठ्ठी आदरणीय मास्टर जी, 
    मैं भोला हूँ, आपका पुराना छात्र. शायद आपको मेरा नाम भी याद ना हो, कोई बात नहीं, हम जैसों को कोई क्या याद रखेगा. मुझे आज आपसे कुछ कहना है सो ये चिट्ठी डाक बाबु से लिखवा रहा हूँ.

    मास्टर जी मैं ६ साल का था जब मेरे पिताजी ने आपके स्कूल में मेरा दाखिला कराया था. उनका कहना था कि सरकारी स्कूल जाऊँगा तो पढना-लिखना सीख जाऊँगा और बड़ा होकर मुझे उनकी तरह मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी, दो वक़्त की रोटी के लिए तपते शरीर में भी दिन-रात काम नहीं करना पड़ेगा… अगर मैं पढ़-लिख जाऊँगा तो इतना कमा पाऊंगा कि मेरे बच्चे कभी भूखे पेट नहीं सोयेंगे!

    पिताजी ने कुछ ज्यादा तो नहीं सोचा था मास्टर जी…कोई गाडी-बंगले का सपना तो नहीं देखा था वो तो बस इतना चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ लिख कर बस इतना कमा ले कि अपना और अपने परिवार का पेट भर सके और उसे उस दरिद्रता का सामना ना करना पड़े जो उन्होंने आजीवन देखी…!

    पर पता है मास्टर जी मैंने उनका सपना तोड़ दिया, आज मैं भी उनकी तरह मजदूरी करता हूँ, मेरे भी बच्चे कई-कई दिन बिना खाए सो जाते हैं… मैं भी गरीब हूँ….अपने पिता से भी ज्यादा !


    शायद आप सोच रहे हों कि मैं ये सब आपको क्यों बता रहा हूँ ?

    क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूँ उसके लिए आप जिम्मेदार हैं !

    मैं स्कूल आता था, वहां आना मुझे अच्छा लगता था, सोचता था खूब मन लगा कर पढूंगा,क्योंकि कहीं न कहीं ये बात मेरे मन में बैठ गयी थी कि पढ़ लिख लिया तो जीवन संवर जाएगा…इसलिए मैं पढना चाहता था…लेकिन जब मैं स्कूल जाता तो वहां पढाई ही नहीं होती.

    आप और अन्य अध्यापक कई-कई दिन तो आते ही नहीं…आते भी तो बस अपनी हाजिरी लगा कर गायब हो जाते…या यूँही बैठ कर समय बिताते…..कभी-कभी हम हिम्मत करके पूछ ही लेते कि क्या हुआ मास्टर जी आप इतने दिन से क्यों नहीं आये तो आप कहते कुछ ज़रूरी काम था!!!

    आज मैं आपसे पूछता हूँ, क्या आपका वो काम हम गरीब बच्चों की शिक्षा से भी ज़रूरी था?

    आपने हमे क्यों नहीं पढाया मास्टर जी…क्यों आपसे पढने वाला मजदूर का बेटा एक मजदूर ही रह गया?

    क्यों आप पढ़े-लिखे लोगों ने मुझ अनपढ़ को अनपढ़ ही बनाए रखा ?

    क्या आज आप मुझे वो शिक्षा दे सकते हैं जिसका मैं अधिकारी था?

    क्या आज आप मेरा वो बचपन…वो समय लौटा सकते हैं ?

    नहीं लौटा सकते न ! तो छीना क्यों ?

    कहीं सुना था कि गुरु का स्थान माता-पिता से भी ऊँचा होता है, क्योंकि माता-पिता तो बस जन्म देते हैं पर गुरु तो जीना सिखाता है!

    आपसे हाथ जोड़ कर निवेदन है, बच्चों को जीना सिखाइए…उनके पास आपके अलावा और कोई उम्मीद नहीं है …उस उम्मीद को मत तोड़िये…आपके हाथ में सैकड़ों बच्चों का भविष्य है उसे अन्धकार में मत डूबोइए…पढ़ाइये…रोज पढ़ाइये… बस इतना ही कहना चाहता हूँ!

    क्षमा कीजियेगा !

    भोला

    ———————–

    [10:41pm, 29/11/2015] Rajiv Joshi:

    भोला को उसके मास्टर का उत्तर
    प्यारे भोला!
    तुम्हारा पत्र मिला। तुमने लिखा कि तुम सबसे निर्धन तबके के हो।तुम्हारे वर्ग के लोग बड़े मेहनती होते हैं। यदि बढ़िया शिक्षा मिले तो यह हाड़ तोड़ पसीना बहाने वाले लोग शाशक वर्ग के नाजुक और मेहनत से भागने वाले बच्चों से आगे न बढ़ जाएंगे? इसलिए शाशक वर्ग तुम्हें सिर्फ साक्षर करना चाहता है शिक्षित नहीं। इसलिए स्कुल में मास्टर गरीब के बच्चों को कहीं वास्तव में शिक्षित न कर बैठे, मुझे खूब काम सौंप दिए जाते हैं। मगर फालतू की सूचनाएं देने, दाल भात पकाने, स्कुल के निर्माण कार्य करवाने, आदि काम के बाद भी में पढाने का समय निकाल ही लेता हूँ। पर इन्होंने blo,जनगणना, पल्स पोलियो, पशु गणना, चुनाव और भी कई ड्यूटी लगाकर मुझे स्कुल से बाहर कर दिया।तुम समझते हो मै गायब रहता हूँ।
    मै एक शिक्षक हूँ।शाशक वर्ग की इस नापाक और जन विरोधी चाल को समझता हूँ। इसलिए अकेले भी ' सारा जहां दुश्मन सही आओ मुकाबला करें की तर्ज पर डटा हूँ। मैं इन परिस्थितियों में शिक्षित सबको नहीं कर पाता पर साक्षर तो तब भी कर ही पाता हूँ।मुझे अफ़सोस है कि तुमने लिखा तुमने पत्र डाक बाबू से लिखवाया। इसलिए कह सकता हूँ कि तुम मेरे शिष्य हो ही नहीं। तुम झूठे हो।तुम जो भी हो बड़े ही भोले हो और सचमुच पप्पू हो। मगर तुमने निम्न वर्ग का बनकर एक ऐसे शिक्षक की अस्मिता पर सवाल खड़ा कर दिया है जो इसी वर्ग की शिक्षा यानि जन शिक्षा यानि सम्यक शिक्षक के लिए भी संघर्षरत है। 
    भोला! हमारे देश में शिक्षा का बाज़ार 350 लाख करोड़ रूपये से भी बड़ा है। ओटो मोबाइल,कम्युटर आदि सबसे बड़े चार सेक्टर से भी बड़ा सेक्टर शिक्षा का है। इस बाजार की यह तारीफ़ है कि जब पूरे बाजार में आर्थिक मंदी होती है तब शिक्षा के सेक्टर में बूम आता है। तब अन्य सेक्टर में छटनी होती है। नोकरिया नहीं मिलती। बेरोजगारी बढती है। लोग और और और डिग्रियां लेने दौड़ते हैं। फलस्वरूप शिक्षा के व्यवसाय में बूम आता है।
    प्यारे भोला! पूंजीवादी वैस्वीकरण के दौर में गरीब दिन पर दिन गरीब और अमीर रोज अमीर होता जा रहा है। गरीब की क्रय शक्ति ख़त्म हो गयी है। बाजार में अमीरों ने अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए माल पाट तो दिया है। मगर खरीदे कौन? कैसे? किससे? इसलिए विश्व के कई देशों की अर्थ व्यस्था लड़खड़ा रही हैं। स्वीडन का उदहारण हाल में तुमने देखा। पूरा यूरोप और अमेरिका भी इस मंदी का शिकार है।हमारा देश भी इस आर्थिक मंदी की जकड में आता जा रहा है। 
    इसलिए सभी कारपोरेट घराने शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी लगाना चाहते हैं। ये कार्पोरेट्स इतने शक्तिशाली है कि हमारी और तुम्हारी सरकार्रे इनके सामने नत मस्तक हैं। ये समझो कि यही सरकार हैं। 
    खैर, तुम यह खेल समझो। सरकारी स्कूल बढ़िया चलेंगे तो निजी स्कुल कैसे खुलेंगे? इसलिए सरकारी मास्टर को और सरकारी स्कूलों या पूरी सरकारी शिक्षा को पहले बदहाल करो। फिर बदनाम करो। अंत में हड़प लो की नीति चल रही है। ये जो मीडिया सरकारी शिक्षक को शिक्षा की पूरी बदहाली का दोषी करार देता है न! वह यह सब जानबूझकर करता है। मीडिया पूंजीपतियों का तो है।वही शिक्षक को लक्ष्य बनाता है ताकि जनता का उस पर से यकीन ही उठ जाए।
    भोला बेटे! तुम भी मुझे इसी वर्ग की काल्पनिक रचना लगते हो। तुमने एक शिक्षक को छेड़ा है। इसलिए एक सवाल तुमसे।
    बताओ हम सरकार क्यों चुनते हैं। तुम्हारे जवाब हो सकते हैं। हमारी पार्टी की बने तो सरकार हमारे कारपोरेट सेक्टर को वेल आउट पैकेज दे। हम पूंजीपतियों को अनुदान दे सके। हमारी फैक्टरियों के लिए मुफ़्त जमीन बिजली पानी सड़क वाले सेज बनाकर दे। आदि आदि।
    मगर जनता की ओर से जवाब होगा कि किसी लोक कल्याणकारी राज्य की सरकार को अपनी जनता की रोटी कपडा मकान पढाई दवाई और सुरक्षा इन छः चीजों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हम शिक्षा की बात करते हैं।
    हमारे संविधान में पैदा होने से बारहवीं तक की शिक्षा को सरकार की जिम्मेदारी माना है। शिक्षा अधिकार अधिनियम लाकर सरकार ने इसे मात्र 6 से 14 साल तक की घटिया शिक्षा के अधिकार में बदल दिया है। 1 अप्रैल 2010 को यह लागू हो गया था। छः साल होने को हैं। शिक्षा में कोई बदलाव आया?
    भोला! ये गरीबों की शिक्षा का घटिया प्रबंध है। अमीर के बच्चे कहीं और उम्दा शिक्षा ले रहे हैं। वे ही हम पर हमेशा राज करेंगे। इसलिए हम शिक्षक निम्न वर्ग के लिए हमेशा चिंतित हैं।
    सामान शिक्षा प्रणाली की मांग करते हैं। हम चाहते हैं कि अमीर-गरीब, हिन्दू मुसलमान, किसान सुल्तान, रानी- मेहतरानी, शिक्षक मजदुर नेता अभिनेता सबके बच्चे एक साथ एक छत के नीचे मुफ़्त में सरकारी स्कुल में ही पढ़ें। हम एक ऐसा शिक्षा का ढांचा लेकर रहेंगे।
    भोला! तुम मुझे इस पत्र का भी जवाब देना और पुरे भारत में एक ऐसा सरकारी प्राथमिक स्कुल बताना जहां हर कक्षा के लिए एक टीचर हो। एक ऐसा प्राइवेट स्कुल भी बताना जहां हर कक्षा के लिए कम से कम एक टीचर प्रिंसपल क्लर्क आया न हो।
    एक पत्र अपने प्रधानमंत्री के लिए भी लिखना भोला! और कहना कि हमारे देश में सामान शिक्षा प्रणाली लागू करो। भारत जैसा संसाधन सम्पन्न देश ऐसा कर सकता है। अपने हक़ के लिये लड़ो भोला। हम मास्टर इस लड़ाई में सबसे आगे होंगे।
    एक अंतिम वात और। कभी फिर चिठ्ठी लिखो तो अपने शिक्षक का नाम जरूर बताना। मैं जनता हूँ। ऐसे शिक्षक नहीं होते। शिक्षक आज भी मेहनत करते हैं। तुम झूठे हो भोला! तुम शिक्षा विरोधी और जन विरोधी जमात की काल्पनिक उपज हो।
    तुम्हारी पूरी जमात को मेरी श्रीधांजलि।
    तुम्हारा राजीव मास्टर।


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    असहिष्णुता से असहमति


    Author:  

    Edition : .Samayantar

    छ घटनाएं सारी सीमाओं के बावजूद ऐसी चिंगारी का काम कर डालती हैं जो लपटों में बदल अंतत: सारे संदर्भ को नया ही आयाम दे देती हैं। केंद्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या पर अकादेमी द्वारा चुप्पी लगा देने की प्रतिक्रिया स्वरूप शुरू हुए सामान्य से विरोध ने जिस तरह से साहित्य अकादेमी पुरस्कारों को लौटाने के सिलसिले में बदला, वह सामान्य घटना नहीं है। समयांतर के पिछले अंक में इसकी शुरुआत करने वाले पर गंभीर आशंका जताई गई थी। अपनी जगह वह यथावत है। वैसे उस टिप्पणी ('सार्वजनिक विरोध का निजी चेहरा', दिल्ली मेल) में यह भी कहा गया था कि "हम जिस माहौल में रह रहे हैं वह ऐसे संकट का दौर है जिसका विरोध निश्चित तौर पर और समय रहते किया जाना चाहिए क्योंकि यह हमारे समाज के मूल आधार सहिष्णुता और विविधता को ही खत्म करने पर उतारू नहीं है बल्कि यह हमें हर तरह की तार्किकता और वैज्ञानिक समझ से वंचित कर देने का प्रयास भी है। इसलिए यह चिंता किसी 'अकेले लेखक'या कलाकार की न तो हो सकती है और न ही होनी चाहिए। पर यह विरोध समझ-बूझकर किया जाना चाहिए। बेहतर तो यह है कि यह सामूहिक हो क्योंकि आज व्यवस्था जिस तरह की है और वह जिस हद तक असंवेदनशील नजर आ रही है, उसमें इक्की-दुक्की आवाजों की परवाह करने वाला कोई नहीं है।"

    प्रसन्नता की बात है कि पुरस्कार लौटाने का यह कदम मात्र किसी एक व्यक्ति, भाषा या क्षेत्र तक सीमित न रह कर राष्ट्रव्यापी रूप ले चुका है। अब तो चित्रकार, फिल्मकार, वैज्ञानिक और इतिहासकार भी इस विरोध का हिस्सा हो चुके हैं। आशा करनी चाहिए, अगर सरकार ने समय रहते उचित कदम नहीं उठाए तो, अन्य बौद्धिक वर्ग भी देश की प्रगति, वैज्ञानिक विकास, तार्किक चिंतन, सांस्कृतिक समरसता, सहिष्णुता और विविधता को बचाने की इस मुहिम में शामिल होने में देर नहीं लगाएंगे।
    हर लेखक या उस तरह से कोई भी बुद्धिजीवी अंतत: एक समाज की ही देन होता है। वह उसी के दायरे में विकसित होता है और स्वयं को अभिव्यक्त करता है। दूसरे शब्दों में उसका विकास समाज के विकास से गहरे जुड़ा होता है। ऐसे दौर में जब देश के शासक वर्ग का एक हिस्सा निहित स्वार्थों के लिए आंखमूंद कर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से सांप्रदायिकता को और अतार्किक स्तर पर हमारे विगत को महिमा मंडित करने पर तुला हो, वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता की मजाक उड़ाता नजर आ रहा हो, ऐसे में समाज के भविष्य को लेकर देश के रचनाकारों, चिंतकों और बुद्धिजीवी वर्ग में अगर चिंता न हो तो यह जीवंत समाज का लक्षण नहीं माना जा सकता।

    प्रतिक्रियावादी विचारों का बढ़ता खतरा
    देखा जाए तो ये चिंताएं, जो अंतत: दुनिया को देखने-समझने और उसे बदलने की आधारभूत मानवीय प्रवृत्ति से जुड़ी हैं, किस व्यापक खतरे का सामने कर रही हैं इसका उदाहरण पिछले सिर्फ डेढ़ साल के वक्फे में पनपे प्रतिक्रियावादी विचारों और अभिव्यक्तियों में देखा जा सकता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब सत्ता के संरक्षण में हो रहा है। देश को दुनिया के सबसे विकासशील देश में बदलने का सपना दिखलाने वाला प्रधानमंत्री एक आधुनिक चिकित्सालय का उद्घाटन करते हुए, यह कहते नहीं झिझकता कि हमारे यहां प्राचीन काल में चिकित्सा का स्तर यह था कि जानवर के सर को आदमी के सर पर ट्रांसप्लांट किया जाता था। बिना सहवास के, जैसा कि कर्ण के संदर्भ में हुआ था, संतान उत्पन्न की जा सकती थी। उनके अनुसार हमारे यहां जेनेटिक साइंस व प्लास्टिक सर्जरी अनादिकाल से विकसित थे। गुजरात में स्कूली पाठ्यक्रमों में एक ऐसे व्यक्ति की किताब को पढ़ाया जा रहा है जो कहता है कि महाभारत काल में आईवीएफ की तकनीक उपलब्ध थी।

    एक और महाशय विज्ञान कांग्रेस में देश के चुनींदा वैज्ञानिकों के सामने दावा करने से जरा नहीं झिझकते कि हमारे पुष्पक विमान ग्रहों के बीच उड़ान भरते थे।
    ऐसा प्रतीत होने लगा था मानो नया निजाम और उसके समर्थक अब तक के इतिहास और विज्ञान के अध्ययनों और उनकी उपलब्धियों को जड़-मूल से उखाडऩे पर उतारू हैं। बहुमत के नशे में चूर सत्ताधारी दल ने ज्ञान-विज्ञान की विश्वस्तरीय संस्थाओं को तहस-नहस करने का जैसे बीड़ा ही उठा लिया है। इस विवेकहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण आईआईटी, दिल्ली जैसी संस्था पर एक स्वामी का थोपा जाना है। शिक्षण और शोध संस्थानों पर जिस तरह से और जिस तरह के अयोग्य और कुंद व्यक्तियों को सरकार लादने पर लगी हुई है वह आतंककारी है। सरकार का अहंकार किस स्तर का है इसका उदाहरण पुणे का फिल्म व टेलीविजन संस्थान है जिस पर एक दोयम दर्जे के अभिनेता को थोप दिया गया है। सरकार ने लगभग पांच महीने चले छात्रों के आंदोलन की अनसुनी करके जिस तरह की निर्ममता का परिचय दिया है वह बतलाता है कि इस सरकार का किसी भी तरह के लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास नहीं है। वह लोकतंत्र का इस्तेमाल कर इस देश को एक बर्बर मध्यकालीन धार्मिक राज्य में को बदल देना चाहती है।

    एफटीआईआई का संदेश
    पर देखने की बात यह है कि एफटीआईआई के छात्रों को मजबूर करने का जो संदेश देश के बुद्धिजीवियों और विचारवान तबके तक गया है उसने सरकार की अडिय़ल और दमनकारी छवि को मजबूत करने और दूसरी ओर उसका विरोध करने की लहर के जन्म में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिन फिल्मकारों ने अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने की बात की है उनका तो सीधा संबंध ही एफटीआईआई के घटनाचक्र से है।

    इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं रही है कि आज की तारीख तक सात सौ से ज्यादा देश के शीर्ष से लेकर युवातर वैज्ञानिकों ने इस अवैज्ञानिक, अतार्किक और सांप्रदायिक माहौल के विरोध में जारी बयान पर हस्ताक्षर किए हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 87 वर्षीय पीएम भार्गव जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक का तो स्पष्ट ही कहना है कि "तार्किकता और रेशनलिज्म, जो कि विज्ञान की आधारशिला होते हैं, खतरे में हैं। इस सरकार के मन में विज्ञान के प्रति कोई सम्मान नहीं है।ÓÓ और इसमें दो राय नहीं हो सकती। पर संभवत: इसीलिए आश्चर्य यह है कि ये वैज्ञानिक तब क्यों नहीं बोले जब इस आक्रमण की शुरुआत हो रही थी। विज्ञान कांग्रेस को प्रमादियों द्वारा कब्जा लिए जाने पर भारतीय वैज्ञानिकों की तब की चुप्पी पर दुनिया भर में सवाल उठाए जा रहे थे और उनकी खिल्ली उड़ाई जा रही थी।

    यह स्थिति इसलिए आई कि भारत को तीसरी दुनिया में प्रगतिशील, उदार, ज्ञान-विज्ञान के लिए समर्पित और एक महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश के रूप में जाना जाता था। एक ऐसा देश और समाज जहां समानता और सर्वधर्म समभाव का आदर्श प्राप्त करने का प्रयत्न अपनी सारी सीमाओं के बावजूद सतत जारी था। इसमें कई खामियां थीं पर ऐसा कभी नहीं था कि विगत सात दशकों में सत्ता पर आई किसी सरकार ने कट्टरपंथी, सांप्रदायिक और अलोकतांत्रिक तत्वों को इस तरह से खुलेआम बढ़ावा दिया हो। सांप्रदायिकता और हत्याओं के आरोपियों को केंद्र में जगह दी हो।

    वैज्ञानिकों की वह प्रारंभिक चुप्पी के दो संभावित कारण समझ में आते हैं। पहला, पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई सरकार और उसके नेतृत्व की दमनकारी छवि का आतंक। और दूसरा, यह कि वैज्ञानिक समुदाय नई सरकार और इसके नेतृत्व को कुछ समय देना चाहता हो।

    व्यक्ति नहीं समाज के अस्तित्व का सवाल
    असल में लेखकों के विरोध ने देश के शेष चेतना संपन्न और विवेकवान बौद्धिक तबके को झिंझोड़ कर रख दिया है। समाज का यह प्रभावशाली और चेतना संपन्न वर्ग, जो पिछले डेढ़ वर्ष से लगभग स्तब्ध था, अपनी तंद्रा से जाग गया है। उसे समझते देर नहीं लगी है कि पानी सर से गुजर गया है। यह संकट मात्र उसी के अस्तित्व से नहीं जुड़ा है बल्कि उस समाज के अस्तित्व का सवाल भी इसी में निहित है जिसका वह अविभाज्य अंग है। वह तभी बच सकता है जब यह समाज बचेगा। उसके सामने बहुत दूर के नहीं आसपास के ही उदाहरण हैं कि किस तरह से एक नहीं अनेकों समाज और देश सत्ताधारियों और सत्ताकामियों की महत्त्वाकांक्षाओं और तिकड़मों के चलते तबाही और अराजकता के शिकार हुए हैं। यहां भी जिस तरह से पुराणपंथ को स्थापित किया जा रहा है वह मूलत: एक वर्ग विशेष की सत्ता को स्थायी बनाए रखने से ही जुड़ा है। बहुसंख्यकवाद मूलत: लोकतंत्र के माध्यम से सत्ता पर काबिज होने का सबसे आजमाया हुआ पर विनाशकारी तरीका है। यह तरीका नए समाज के निर्माण के किसी भी स्वप्न से रहित एक परंपरावादी सत्ताधारी वर्ग के हितों का ही पोषण करता है। इसके उदाहरण एशिया और अफ्रीका के कई क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं। प्रश्न है क्या हम भी उन्हीं देशों की तरह धार्मिक और रूढि़वादी होने की राह पर नहीं हैं? अब और तटस्थ रहने का समय नहीं है। यह विरोध सत्ता प्राप्त करने का नहीं है बल्कि ज्ञान को अपनी स्वाभाविक दशा में बढऩे देने का रास्ता सुनिश्चित करने का है। यह विरोध एक लोकतांत्रिक व्यवस्था व धर्मनिरेपक्ष समाज को बचाने का है। क्योंकि इस असहिष्णुता सफल होना भारतीय गणतंत्र की आधारभूत अवधारणा का ही अंत होना नहीं है बल्कि इस पूरे महादेश को असंतोष और अराजकता में धकेल देना है। यह निश्चय है कि देश की जनता इतनी आसानी से यह सब होने नहीं देगी। इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com


    Viagra in Tea Spoon!चाय की कप में वियाग्रा! सत्यं शिवम् सुदरम्! सत्यमेव जयते! तमसोमाज्योतिर्गमय!

    देश में बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर खान, शाहरुख खान जैसे लोकप्रिय कलाकारों के बयानों पर उठे विवाद के बीच अभिनेत्री नंदिता दास ने भी देश के हालात पर चिंता जताई है।

    दुनिया रोज बदलती है और जिंदगी तकनीक!

    अतीत सुहाना है,हर मोड़ पर भटकाव भी वहीं!


    जिनने मेरा प्रार्थनासभा में गाधी की हत्या वीडियो देख लिया, उन्होंने जरुर गौर किया होगा कि नाथुराम गोडसे के उद्गार, हत्या की दलील की क्लीपिंग और गांधी हत्या के दृश्यों के मध्य बैकग्राउंड में मर्डर इन द कैथेड्रल का अविराम मंचन है।रेश्मा की आवाज है।


    गौर करें कि आर्कविशप की हत्या से पहले उसे देश छोड़ने का फतवा है और उसकी हत्या के औचित्य की उद्घोषणा है।यह दृश्य अब इंडिया लाइव का अतीत में गोता,ब्लैक होल गर्भ में महाप्रस्थान।


    मनुस्मृति शासन की जान का कहे,वहींच मनुस्मृति है।

    जाति खत्म कर दो, मनुस्मृति खत्म!

    ई जौन फ्री मार्केटवा ह,उ भी खत्म,चाय कप में वियाग्रा छोडो़ तनिको!


    फिर आपेआप बौद्धमय भारत।


    सनातन एकच रक्त अखंड भारत वर्ष और सनातन उसका धर्म हिंदूधर्म।पहिले मुक्ताबाजार का यह वियाग्रा छोड़िके बलात्कार सुनामी को थाम तो लें!

    सध्याच्या परिस्थितीसाठी असहिष्णू हा शब्दही अपुरा – अरूंधती रॉय

    महात्मा फुले यांच्या पुण्यतिथीच्या निमित्ताने अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषदेतर्फे देण्यात येणारा यंदाचा

    यावेळी रॉय म्हणाल्या, 'संपूर्ण उपखंडात रसातळाला जाण्याची स्पर्धाच सुरू झाली आहे आणि त्यात भारताचा उत्स्फूर्त सहभाग आहे. सगळ्या शिक्षणसंस्था, महत्त्वाच्या संस्थांमध्ये सरकारच्या मर्जीतील माणसे भरली जात आहेत. देशाचा इतिहासच बदलण्याचे प्रयत्न केले जात आहेत. धर्मातून बाहेर गेलेल्यांना आरक्षणाची लालूच दाखवून चालणारा 'घर वापसी'चा प्रकार क्रूर आहे. डॉ. आंबेडकरांच्या तत्त्वांचा त्यांच्याच विरोधात वापर करण्यात येत आहे. बाजीराव-मस्तानी चित्रपटावरून मोठा वाद होतो. मात्र पेशव्यांच्या काळात दलितांवर झालेल्या अन्यायाची चर्चाही होत नाही.' -


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    सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज


    आमिर खान के बयान के बाद छिड़े विवाद पर विद्या भूषण रावत की टिप्पणी।

    आमिर खान की पत्नी के 'विदेश में बसने की खबर' से हर 'भारतीय' सदमे में हैं और उनको शाहरुख़ खान के साथ पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे है। आमिर के पुतले जलाए जा रहे हैं और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किए गए हैं जिनमें देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं. वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं कि आमिर ने गद्दारी की है और उनको इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात कि हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशों में रहकर पूरे अधिकार के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं, मंदिर बनाना चाहते हैं, मोदी की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूरी दबंगई दिखाना चाहते हैं। अगर यही बात अमिताभ करते तो क्या उन्हें कहीं भेजने की बात होती?

    हम फ़िल्मी कलाकारों को भगवान बनाकर न देखें। व्यक्तिगत तौर पर मैं आमिर खान को ढकोसलेबाज़ मानता हूँ क्योंकि उनकी सत्य की जीत 'रिलायंस' के चंदे से होती है और भारत में अगर हम भ्रष्टाचार को लेकर लालू को इतना गरियाते हैं तो अम्बानी तो उस बीमारी के जनक थे। क्या अर्नब गोस्वामी जैसे भारत में 'ईमानदारी' का राग अलापने वाले मसीहा लोग अम्बानी और अडानी के बारे में बात करेंगे? जब करप्शन की बात हो तो राजनेताओं का ही हिसाब किताब क्यों हो, उद्योगपतियों का क्यों नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा उनकी ही दुकानों से निकलती है। इसलिए आमिर ने जो कहा वो बहुत सोच-विचार, रिहर्सल के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए। उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली देकर हिंदुत्व के लठैत आमिर की ही बात को सही साबित कर रहे हैं।

    हालांकि, मैं आमिर की बातों से कत्तई इतेफाक नहीं रखता। सबसे पहले तो आमिर की यह बात गलत है कि भारत में असिहष्णुता अचानक बढ़ गई। हमारा देश असल में असभ्य और क्रूर है, जहाँ दहेज़ के लिए लड़कियां रोज जलती हैं, जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चों की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते, जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है। जहाँ सती का आज भी महिममंडन होता हो और विधवा होने पर औरतों की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो, जहाँ किसी के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता हो, जहाँ स्कूलों से बच्चे इसलिए निकल कर चले जाते हो कि खाना किसी दलित महिला ने बनाया है, उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहें, जहां एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गई हो, जिसके छूने भर से लोग अछूत हो जाएं! लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालों का ध्यान इधर कभी नहीं गया। ऐसा नहीं कि इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं की गई हो।

    असहिषुणता का इतिहास लिखें तो शर्म आएगी, तब आमिर खान से क्यों इतनी नाराज़गी है? मतलब साफ़ है। भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े 'ब्रांड' एम्बेसडर हैं। और जो व्यक्ति 'अतुलनीय भारत' की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा! आमिर खान और अन्य कलाकारों ने भारत के 'सहिष्णु' होने के सबूत दिए और साथ ही दलितों या पसमांदा मुसलमानों की हालतों पर चुप रहकर उन्होंने हमेशा ही 'सहिष्णु' परम्परा का 'सम्मान' किया है। शायद रईसी परंपरा में केवल बड़े बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें सेकुलरिज्म होती हैं लेकिन हलालखोर, कॅलण्डर, नट या हेला भी कोई कौम है, इसका शायद इन्हें पता भी नहीं होगा। हमें पता है कि अभी तक मैला ढोने की प्रथा के विरुद्ध आमिर ने कभी निर्णायक बात नहीं की, वो केवल टीवी शो में आंसू बहाने तक सीमित थी।

    तो फिर क्या बदला? लोग कहते हैं कि कांग्रेस के ज़माने में भी सेंसरशिप लगी और फिल्में प्रतिबंधित हुईं। बिलकुल सही बात है। हम इमरजेंसी के विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ दल का मुख्य आदर्श संजय गांधी और चीखने चिल्लाने वाले मुल्ले हैं जो किसी भी उदार विचार को या उनसे विपरीत विचार को डंडे और धमका डरा के रुकवाना चाहते हैं। फ़िल्मी लोगों को उतनी ही तवज्जो मिलनी चाहिए जिसके वे हक़दार हैं। पिछले कुछ वर्षों में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने में सबसे प्रमुख रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव भी जितवाया है लेकिन उनमें कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके। अमिताभ हालाँकि गुजरात या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं, इसलिए चुप रहते हैं। हालाँकि देर सवेर उन्हें मुंह खोलना पड़ेगा। आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की आक्रामक मार्केटिंग चल रही है इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णों की 'सहनशीलता' के 'प्रतीक' हैं इसलिए उनसे ये 'उम्मीद' ये की जाती है कि वे डॉ. ए. पी. जे. कलाम की तरह अपने 'भारतीय' होने का सबूत दें। कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो 'देशद्रोही' है। जिन लोगों को सुनकर हम बड़े हुए उन साहिर, दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी, बेगम अख्तर को धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी एक राय रखते हैं। कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाड़ी लोग वो बात कह देते हैं जो उनके कई प्रशंसकों को नहीं जंचती। उसमें कोई बुरी बात नहीं है। हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते, अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं कि वो साफ सुथरी फिल्म बनाते हैं। क्या हम रवीना टंडन, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान लें? हाँ फिल्मो में बहुत से लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयों पर बोला है और उनकी समझ समझ है। बाकी हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है। अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मों का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं कि उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि फिर आपको मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।

    आमिर खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है। अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है? उसको गालियों से लतियाएं या भरोसा दिलाएं? आमिर ने बस एक ही बात गलत कही कि असहिष्णुता बढ़ रही है, क्योंकि वो पहले से ही है। इस देश के लोगों ने उनको प्यार दिया है। जो लोग इस वक़्त दबंगई कर रहे हैं वो हमें आपातकाल के संजय गांधी के गुंडों की याद दिला रहे हैं। आमिर को कहना चाहिए कि कौन लोग ऐसा तमाशा कर रहे हैं। ये पूरे देश के लोग नहीं हैं, ये एक पार्टी विशेष और जमात विशेष के लोग हैं जिन्होंने उन सभी को गरियाने और धमकाने का लाइसेंस लिया हुआ है जो इनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते। इसलिए आमिर साहेब सबको न गरियाएं। साफ़ बोलिए वो कौन हैं जो असहिष्णुता फ़ैला रहे हैं। इमर्जेन्सी का विरोध करने वालों का सबसे बड़ा मॉडल इमरजेंसी का दौर ही है और वही व्यक्तिवादी राजनीति आज हावी है। केवल फर्क इतना है कि उस दौर में दूरदर्शन और रेडियो पर समाचार सरकार सेंसर करती थी और आज सरकार और सरकारी पार्टी के दरबारी पत्रकार पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं। आज अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी का दौर है जिसमें सरकार से मतभेद रखने वालों की खबरें सेंसर ही नहीं होंगी बल्कि उनको अच्छे से गरियाया जाएगा। आखिर 9 बजे के प्राइम टाइम शोज का यही उद्देश्य है। हकीकत यह है कि हम वाकई में एक भयानक दौर से गुजर रहे हैं जिसमें तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारों की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संवैधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ों को दबा दिया जा रहा है। पूंजीवादी ब्राह्मणवादी लोकतंत्र से आखिर आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? वो तो सन्देश वाहक को ही मारना चाहता है ताकि खबर ही न रहे और खबरें बनाने और बिगाड़ने के वर्तमान युग में मीडिया निपुण होता जा रहा है, जो बहुत ही शर्मनाक है।


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    हमारे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों साल पहले खोज लिया था सारी समस्‍याओं का समाधान : कैलाश सत्‍यार्थी

    शांति के लिए नोबल पुरस्‍कार मिलने के बाद कैलाश सत्‍यार्थी की सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया बेहद कम देखने में आई है। इधर बीच उन्‍होंने हालांकि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्‍य को एक लंबा साक्षात्‍कार दिया है जो 9 नवंबर को वहां प्रकाशित हुआ है। उससे दो दिन पहले बंगलुरु प्रेस क्‍लब में उन्‍होंने समाचार एजेंसी पीटीआइ से बातचीत में कहा था कि देश में फैली असहिष्‍णुता से निपटने का एक तरीका यह है कि यहां की शिक्षा प्रणाली का ''भारतीयकरण'' कर दिया जाए। उन्‍होंने भगवत गीता को स्‍कूलों में पढ़ाए जाने की भी हिमायत की, जिसकी मांग पहले केंद्रीय मंत्री सुषमा स्‍वराज भी उठा चुकी हैं। शिक्षा के आसन्‍न भगवाकरण और देश में फैले साम्‍प्रदायिक माहौल के बीच नोबल पुरस्‍कार विजेता सत्‍यार्थी के पांचजन्‍य में छपे इस अहम साक्षात्‍कार के कुछ अंश हम यहां साभार पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं। -मॉडरेटर 



    कैलाश सत्‍यार्थी 



    नोबल पुरस्कार ग्रहण करते समय आपने अपने भाषण की शुरुआत वेद मंत्रों से की थी। इसके पीछे क्या प्रेरणा थी?
    शांति के नोबल पुरस्कार की घोषणा के बाद जब मुझे पता चला कि भारत की मिट्टी में जन्मे किसी भी पहले व्यक्ति को अब तक यह पुरस्कार नहीं मिल पाया है तो मैं बहुत गौरवान्वित हुआ। अपने देश और महापुरुषों के प्रति नतमस्तक भी। मैंने सोचा कि दुनिया के लोगों को शांति और सहिष्णुता का संदेश देने वाली भारतीय संस्कृति और उसके दर्शन से परिचित करवाने का यह उपयुक्त मंच हो सकता है। मैंने अपना भाषण वेद मंत्र और हिंदी से शुरू किया। बाद में मैंने उसे अंग्रेजी में लोगों को समझाया। मैंने
    संगच्छध्वम् संवदध्वम् संवो मनांसि जानताम्
    देवा भागम् यथापूर्वे संजानानाम् उपासते!!
    का पाठ करते हुए लोगों को बताया कि इस एक मंत्र में ऐसी प्रार्थना, कामना और संकल्प निहित है जो पूरे विश्व को मनुष्य निर्मित त्रासदियों से मुक्ति दिलाने का सामर्थ्य रखती है। मैंने इस मंत्र के माध्यम से पूरी दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि संसार की आज की समस्याओं का समाधान हमारे ऋषि मुनियों ने हजारों साल पहले खोज लिया था। बहुत कम लोग जानते होंगे कि मैंने विदेशों में भारतीय संस्कृति और अध्यात्म पर अनेक व्याख्यान भी दिए हैं। मेरे घर में नित्य यज्ञ होता है। पत्नी सुमेधा जी ने भी गुरुकुल में ही पढ़ाई की हुई है।

    विदिशा से नोबल पुरस्कार मंच तक की यात्रा में आप ने अलग-अलग सीढि़यां चढ़ीं, इस सीढ़ी में संस्कृत भाषा को आप कहां देखते हैं?
    मुझे आध्यात्मिक गहराई तक ले जाने में संस्कृत का बहुत बड़ा योगदान है। बचपन से ही मुझे धार्मिक अनुष्ठानों में गहरी रुचि थी। बहुत कम लोग विश्वास कर पाते हैं कि 12-13 वर्ष की उम्र में ही मुझे रामचरितमानस कंठस्थ हो गई थी। मैं एक ही बैठकी में इसका पाठ कर लेता था। लोग मुझे इसके पाठ के लिए अपने घर बुलाते... उसके बाद मैंने उपनिषदों को पढ़ना शुरू किया। बाद में मैं आर्य समाज से जुड़ गया तो अध्यात्म में और दिलचस्पी बढ़ गई। इसके लिए मेरा संस्कृत सीखना जरूरी था। जिस भाषा में मूल रचनाएं होती हैं और जो गहरा भाव उनमें होता है, अनुवाद की भाषा में वह भाव उतनी गहराई से नहीं आ पाता। मैं तो किशोरावस्था में ही अध्यात्म में इतने गहरे उतर गया था कि 15-16 साल की उम्र में संन्यास लेना चाह रहा था।

    तो फिर संन्यासी क्यों नहीं बने?
    बचपन में मैं स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित था। उनको न केवल खूब पढ़ा बल्कि उनके जैसे बनने का सोचने भी लगा। मैंने पढ़ा कि उन्हें ईश्वर के दर्शन हुए थे। बस इसी से मेरे मन में संन्यास की भावना पैदा हुई। मैं संन्यास की तरफ अग्रसर हो रहा था कि इसी दौरान मेरा संपर्क आर्य समाज से हुआ। यह घटना तब की है जब मैं बीई के प्रथम वर्ष में था। आर्य समाज के द्वारा आयोजित एक भाषण प्रतियोगिता के दौरान मैंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा। इससे इतना प्रभावित हुआ कि इंजीनियरिंग की किताबों के साथ-साथ मैंने आर्य समाज के साहित्य को पढ़ना शुरू कर दिया। बाद में मैंने सत्यार्थ प्रकाश की हिंदी में संक्षिप्त टीका भी की। स्वामी दयानंद के जीवन ने मुझे बहुत प्रभावित किया। स्वामी दयानंद ने बताया कि समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्ति की सेवा में ही ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। मैंने संन्यास और मोक्ष का विचार छोड़ दिया और अपने को समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों की सेवा में लगा दिया। 

    आपके आदर्श कौन रहे हैं या कहें कि आप को किस से ऊर्जा मिलती है?
    बचपन में तो स्वामी विवेकानंद ही थे। बाद में किशोरावस्था में मुझे लगा कि महर्षि दयानंद जी को हमारे वेदों और उपनिषदों की गहरी समझ थी। उन्होंने जिस तरह से वेदों की वैज्ञानिक व्याख्या की है, उसने मुझे बहुत प्रभावित किया। आजादी के नायकों और क्रांतिकारियों की जीवनियों ने ही मुझे सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित किया। 

    तो क्या आपने अपना उपनाम सत्यार्थी आर्य समाज यानी स्वामी दयानंद से प्रभावित होकर ही रखा है?
    यह समाज में व्याप्त छुआछूत के खिलाफ मेरे विद्रोह की परिणति हैं। मैं बचपन से ही जाति व्यवस्था और छुआछूत का विरोधी था। किसी दोस्त ने कहा कि तुम हमेशा सामाजिक बुराइयों के खिलाफ विद्रोह करते रहते हो इसलिए उपनाम में विद्रोही जोड़ लो, तो किसी ने कहा कि हमेशा सच बोलते हो और सच के लिए लड़ते हो, इसलिए सत्यार्थी जोड़ लो। किसी ने कहा संस्कृत में कोविद हो, इसलिए कोविद लगा लो। मैं भी सत्यार्थ प्रकाश से बहुत प्रभावित था इसलिए उपनाम में सत्यार्थी ही जोड़ लिया। इस तरह से मैं कैलाश नारायण शर्मा से कैलाश सत्यार्थी बन गया।

    आपने कहा कि आप आध्यात्मिक हैं और मानने में कम और जानने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। एनजीओ क्षेत्र को लेकर सवाल उठते रहते हैं। यह बताइए कि इस काम में दूध कितना है और पानी कितना? और आपने इसे कैसे जाना है?
    देखिए, सत्तर और अस्सी के दशक में बाल श्रम और बच्चों के अधिकारों को लेकर कोई भी संस्था या सरकार कुछ सोचती तक नहीं थी। साल 1989 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बाल अधिकार घोषणापत्र जारी करने से पहले बच्चों के अधिकारों और सवालों को लेकर कोई आवाज तक नहीं थी। जब बाल अधिकार घोषणापत्र जारी हुआ और कई देशों ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसमें भारत भी शामिल था, उसके बाद तो बच्चों के लिए काम करने वालों की बाढ़ ही आ गई। नब्बे के दशक में बाल श्रम और बाल मजदूरी के खिलाफ मोर्चा संभालने के लिए कई संस्थाएं खड़ी हो गईं। हालांकि इनमें से ज्यादातर संस्थाएं पहले ग्रामीण विकास, महिला सशक्तीकरण और स्वास्थ्य आदि पर काम करती थीं। इनमें कई गांधीवादी संस्थाए भी थीं। लेकिन, जब संस्थाओं को विदेशी धन और सरकारी पैसा मिलने लगा तो लोग संस्था बनाकर लाभ कमाने लगे। सरकारी अधिकारियों और नेताओं की पत्नियों व बच्चों ने भी संस्थाएं बना लीं। अब 'सोशलाइट' और 'फैशनेबल' सिविल सोसायटी भी तैयार हो गई हैं। मैंने अपने 40 साल के सार्वजनिक जीवन में सब तरह के उतार-चढ़ाव देखे हैं। इसमें समाज में जनचेतना का ज्वार भी देखा है तो आंदोलनों में क्रांतिकारी विचारों से ओत-प्रोत युवा शक्ति का जोश भी। वैचारिक प्रदूषण फैला रहे और बुद्धि विलासिता कर रहे उन एनजीओ को भी देखा है जिन्होंने सामाजिक बदलाव और समाज कल्याण को कारोबार बना दिया है। फाइव स्टार होटलों में मीटिंग और पार्टियां करने वाले और शराब, पैसे व ताकत के नशे में चूर इन लोगों को भूख और गरीबी का न तो संज्ञान है और न ही सरोकार। इनमें से अधिकांश लोग समाज के हाशिए पर खड़े जिस व्यक्ति के नाम पर करोड़ों रुपये का चंदा ले रहे हैं और बढि़या रपट बना रहे हैं, उस गांव के गरीब को तो उन्होंने देखा तक नहीं है। पिछले करीब दो दशकों में एनजीओ का एक वर्ग सामाजिक बदलाव का नहीं बल्कि करियर बनाने का जरिया बन गया है।

    लोग एनजीओ को करियर, दुकानदारी और मुनाफे का माध्यम समझते हैं। मैं देखता हूं कि जो दानदात्री संस्थाए हैं उनका अपना भी एक एजेंडा है। मेरा इन संस्थाओं से हमेशा से झगड़ा रहा है। दुनिया में हर जगह भले लोग हैं और वह भले लोग चाहते हैं कि समाज का कुछ भला हो। उनके पास पैसा भी है और वे दान भी देते हैं। वह लोग जिन संस्थाओं को पैसा देते हैं उनसे कुछ उम्मीद भी नहीं करते, सिवाय इसके कि पैसा ईमानदारी से उस उद्देश्य के लिए खर्च हो जिसके लिए दिया जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ कई बड़ी संस्थाए हैं जिनके अपने एजेंडे हैं जिनकी पहचान कर पाना अब मुश्किल नहीं है, जो पहले इंटरनेट के न होने से मुश्किल था। हमारे संगठन का पूरे साल का उतना खर्च नहीं होता, जितना ऐसी किसी दानदात्री संस्था के सीईओ की सैलरी होती है। जबकि हम सैकडों बच्चों को छुड़वा रहे हैं। उन्हें पुनर्वासित करके शिक्षा दिलवा रहे हैं।

    अभी आप ने जैसा बताया कि दानदात्री संस्थाओं का अपना एक एजेंडा होता है। भारत के संदर्भ में वह एजेंडा क्या हो सकता है?
    देखिए, कई तरह के लोग हैं। कॉरपोरेट जगत और राजनीति के लोग भी अब अपने मकसद के लिए एनजीओ बना रहे हैं। धर्म परिवर्तन के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। एनजीओ गरीबी के नाम पर पैसा बनाने की मशीन बन रहे हैं। ऐसे में सबका अपना अलग-अलग एजेंडा है। कई संस्थाएं नक्सलवाद से प्रभावित हैं जो कहीं न कहीं हिंसा को बढ़ावा देती हैं। यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है। इनको पैसा उन संस्थाओं से मिलता है जो कहने को तो समाजिक विकास के लिए कार्य कर रही हैं, लेकिन असल में उनका चरित्र ऐसा है नहीं। मेरा यह निजी अनुभव है कि मोटे अनुदान, सुविधाओं और विदेशी यात्राओं का लालच देकर अंतर्राष्ट्रीय संगठन भारत के एनजीओ समुदाय को तोड़ते और एक दूसरे से लड़वाते भी है।

    क्या मानवाधिकार भी ऐसा ही मुद्दा है?
    नहीं। समाज कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण रक्षा के लिए उठाए गए कदम से वास्तव में मानवाधिकारों की रक्षा होती है, लेकिन मानवाधिकार की आड़ में छद्म एजेंडा बढ़ाना गलत है। 

    कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाए हैं जो एजेंडे के साथ दानदात्री संस्थाओं को चला रही हैं। इसके पीछे आपको क्या ताकत नजर आती है? क्या ये अपने आप में संगठित तौर पर बहुत मजबूत हैं या पीछे से कोई और समर्थन भी मिलता है?
    अब पर्दे के पीछे क्या चल रहा है, यह तो मुझे भी नहीं पता, लेकिन जहां तक हमारे संगठन का सवाल है, उसकी दिशा और काम को लेकर हम बिल्कुल स्पष्ट हैं। हमारा साफ मानना है कि किसी भी उद्योग को नुकसान पहुंचाने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। हमारी दुश्मनी उद्योग से नहीं बल्कि उस बुराई से है, जो उस उद्योग में नहीं होनी चाहिए। इनको दूर करने के लिए संविधान, कानून और अंतरराष्ट्रीय मापदंड हैं।

     यह देश 'सेकुलर' है और जय राम जी करके आप इतने आगे आ गए?

    (हंसते हुए) जी, हमने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।  मैं शुद्घ शाकाहारी हूं और शराब व मांसाहार का घोर विरोधी हूं। कभी किसी दानदात्री संस्था के व्यक्ति के लिए हमारी संस्था ने शराब और मांस की व्यवस्था नहीं की जबकि लोग कहते हैं यह तो छोटी सी बात है। आप छोटी-छोटी बातों पर क्यों अड़े रहते हैं। संस्थाएं मुद्दे उठाती रहती हैं। कई ऐसे मुद्दे भारत में भी हमारे साथी संगठनों ने उठाए लेकिन बाद में हमें पता लगा वह यह मुद्दे इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि जिनसे उन्हें पैसा मिल रहा है, वह लोग यह सब उनसे करवा रहे हैं। यानी पैसा देने वाला इस शर्त पर पैसा दे रहा है कि तुम यह सवाल उठाओगे।जब समाज की समस्याओं और उसका समाधान जनता से पूछे बगैर पैसा देने वाला निर्धारित करेगा तो फिर बदलाव कैसे आएगा? हमने कभी भी सत्य, करुणा, धर्म और कर्म का मार्ग नहीं छोड़ा मैंने  न तो कभी भारतीयता, राष्ट्रीय गौरव और अपनी महान संस्कृति के साथ समझौता किया है और न ही कभी करूंगा।

    गुजरात दंगों में गैर-सरकारी संगठनों की बहुत किरकरी हुई थी। एक संगठन पर तो वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप भी लगे। जांच में पता चला कि उस संगठन को दान में जो पैसा मिला था उसमें से एक बड़ी रकम से सजने-संवरने का सामान खरीदा गया था। ऐसे कामों को आप किस तरह से देखते हैं?
    देखिए, जिन मुद्दों के लिए और जिन कामों के लिए हमें लोगों से पैसा मिलता है, हमारी नैतिक जवाबदेही उन्हीं के लिए सबसे ज्यादा होनी चाहिए। जहां तक गुजरात दंगों के संबंध में कुछ गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका की बात है तो इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन अखबारों से पता चला है कि इस मामले की अभी न्यायिक जांच चल रही है। मैं देखता हूं कि आज गैर-सरकारी संगठनों में नैतिक जवाबदेही का बहुत अभाव है बल्कि नैतिकता की कमी दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। अगर आप किसी सामाजिक मुद्दे के साथ चल रहे हैं तो आपकी नैतिक जवाबदेही तो बनती ही है। अगर आपको बेहतर भारत और बेहतर समाज बनाना है तो यह जवाबदेही अनिवार्य है।

    आपने जो बातें बताईं, वह नक्सलवाद और कन्वर्जन पर साफ दिखाई देती हैं। आपको कहीं लगता है कि सेकुलरवाद का लबादा ओढ़कर कोई एक लॉबी है जो काम कर रही है?
    देखिए, हमारा जो दर्शन है वह सर्वधर्म समभाव का दर्शन है। यह दुनिया का महानतम दर्शन है। इस दर्शन में दुनिया की सभी समस्याओं का हल और सभी प्रश्नों का उत्तर है लेकिन यह दु:ख की बात है कि लोगों ने जाति, पाखंड और कर्मकांड के नाम पर उसका सत्यानाश कर दिया है। हमारा जो मूल दर्शन है वह सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुम्बकम् के आधार पर है।
    अयं निज: परोवेति, गणनां लघु चेतसाम्।
    उदार चरितानाम् तु, वसुधैव कुटुम्बकम्।

    हमारा वेद तो वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है। हमारी संस्कृति हमारा देश इन्हीं मूल्यों पर तो खड़ा है। इन मूल्यों में किसी भी तरह की हिंसा और धोखाधड़ी का स्थान नहीं है। मैं अंहिसा में विश्वास रखता हूं। मैं चाहता हूं कि दुनिया में हर समस्या का समाधान अहिंसा से ही हो। हम जिन बातों में उलझे हुए हैं, वे बहुत ही सतही और उथली बातें हैं। हम शांति की बात करते हैं। पूरे ब्रह्मांड की शांति की बात करते हैं। हम दुनिया में शांति के लिए शांति पाठ करते हैं। ॐ द्यौ: शांति: अंतरिक्ष शांति: पृथ्वी: शांति़: आप: शांति़: - यह जो पूरा का पूरा शांति पाठ है यह दुनिया को शांति का संदेश देता है।

    पूरी दुनिया में हिंसा फैली हुई है। ऐसे में विश्व शांति में आप भारत की क्या भूमिका देखते हैं।
    हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने समाज में ही नहीं, जल-वायु, पेड़-पौधे, वनस्पति और औषधि तक में शांति स्थापना की बात की है। आज इतने सालों बाद समुद्र को शांत और सुरक्षित रखने की बात को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने स्वीकार किया है। भारत में एक तरफ जहां आर्थिक रूप से संपन्न राष्ट्र बनने की संभावना है, हमारे आध्यात्मिक दर्शन की जो गहराई है, उस गहराई में से वर्तमान समस्याओं का समाधान निकालकर हम दुनिया के सामने रखें। मैं दुनिया में जगह-जगह वेद मंत्रों को कई बार बोलता हूं। लोग सुनते हैं, समझते हैं और आत्मसात करने की बात करते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि हमारी जो आध्यात्मिक बुनियाद है और वह जिन मूल्यों पर खड़ी है, उन मूल्यों की सही ढंग से व्याख्या, पालन और लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रचार का काम नगण्य हुआ है। कई देशों में नौजवानों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत भी उनमें से एक है। हमारे पास जो आध्यात्मिक ज्ञान है उस पर ज्यादा गर्व होना चाहिए, क्योंकि यह ज्ञान दुनिया में सिर्फ हमारे पास है। मैं संप्रदायों, मतों और पंथों को धर्म नहीं मानता। धर्म एक ही है संसार में। मनुस्मृति में कहा गया है धार्यते इति धर्म:। यानि मनुष्य के लिए धारण करने वाले जो गुण होते हैं वही धर्म हैं। मनुस्मृति में ही इसकी व्याख्या है-
    धृति: क्षमा दमोस्तेयं, शौचमिन्द्रिय निग्रह।
    धीर्विद्या सत्यमक्रोध:, दशैकं धर्म लक्षणं।
    क्षमा, सत्य, अक्रोध, करुणा, आत्म नियंत्रण आदि दस मानवीय गुणों का जो पालन करता है वही धार्मिक है। इसके अलावा कोई धर्म नहीं है।

    आपने कहा कि बच्चों के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के बाद बहुत सारी गांधीवादी संस्थाएं चोला बदलकर बच्चों के काम में लग गईं। आपको लगता है कि गांधी जी के मूल विचार और उनके नाम पर जो देश में चल रहा है, उसमें बहुत बडा फर्क है?
    लोहियाजी कहते थे कि तीन तरह के गांधीवादी होते हैं। एक सरकारी गांधीवादी जो सत्ता में बैठ गए हैं। दूसरे मठी गांधीवादी जो इस तरह की संस्थाएं चला रहे हैं और तीसरे कुजात गांधीवादी। लोहियाजी खुद की तुलना करते हुए कहते थे कि वे गांधीवादी तो हैं लेकिन कुजात गांधीवादी। मुझे लोहिया जी की इन बातों ने बहुत प्रभावित किया। लोगों का मानना है कि कैलाशजी पर गांधीवाद का प्रभाव है। मैं यह मानता हूं कि गांधी जी ने एक महान काम किया जो कोई भी नहीं कर पाया। मेरा मानना है कि दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी हैं वह सब राष्ट्र की सेवा के अपने जुनून की वजह से क्रांतिकारी बने, लेकिन गांधी जी मेरी नजर में एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भारतीय आध्यात्मिक मूल्यों को जन-आंदोलन में परिवर्तित किया। सत्य और अहिंसा की बात हम लोग मंदिरों में ही समझते थे, लेकिन जो सत्य है वह ईश्वर का ही एक प्रतिबिंब है। जिन बातों को हम मंदिर, मस्जिद और चर्च में पढ़ा और सुना करते थे, गांधी जी ने उन्हीं बातों को आधार बनाकर शांति, अहिंसा और सत्य के माध्यम से कई जन-आंदोलन खड़े किए। वह सब हमारे आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ी हुई बातें थीं तो जनता भी उनसे जुड़ने लगी। हम भारतीयों के खून में ही शांति है। 

    यह मौका भुनाने से ज्यादा भाव जगाने वाले हैं या मौका भुनाने के लिए लोग खड़े हो जाते हैं?
    हमारे आंदोलन के शुरू में जो लोग जुड़े थे वे आज की पीढ़ी से बहुत अलग थे। अब तो इनमें से कई लोगों का स्वर्गवास भी हो चुका है। जो नई पीढ़ी के लोग आते हैं अगर उन्हें कहीं थोड़ा ज्यादा पैसा मिलता है तो वह वहां दौड़े चले जाते हैं। मेरे शुरुआती साथियों और वरिष्ठ सहयोगियों ने सामाजिक कार्य में बेहतर नौकरी और पैसे का लालच कभी नहीं किया। हिंदुस्तान समाचार के संस्थापक और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के प्रचारक बालेश्वर अग्रवाल जी हमारे पिता समान थे। मेरी पत्नी उनकी दत्तक पुत्री समान थीं। वह हमारी सगाई करवाने विदिशा भी आए थे। मेरे उनके संबंध बहुत अच्छे थे। वह मुझे दामाद मानते थे। एक बार शादी के बाद दिल्ली में हमारे घर आए। तब हम लोगों के पास बिस्तर नहीं थे, अखबार के बंडल के ऊपर दरी बिछाकर हम सोते थे। घर की हालत देखकर उन्होंने मुझे नौकरी का ऑफर दिया, लेकिन मैंने मनाकर दिया। एक बार मेरे कॉलेज के प्राचार्य, जो मुझसे बड़ा स्नेह करते थे, मेरे घर आए। उन्होंने भी मेरी हालत देखी तो दिल्ली के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में मेरे लिए अध्यापन की व्यवस्था कर दी। मैंने उसे भी ठुकरा दिया। मैंने कहा जिसका संकल्प लिया है वही करूंगा। एक तरफ हमारे बेटे के लिए दूध और फल जरूरी था तो दूसरी तरफ गुलाम बच्चों को आजाद करना था। मैंने दूसरा विकल्प चुना। हम तब एनजीओ जानते भी नहीं थे। मित्रों की आर्थिक मदद से ही सामाजिक बदलाव में जुटे हुए थे।

    (साभार: पांचजन्‍य) 
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    मेरे लेखकों! किसका इंतज़ार है और कब तक?

    पाणिनि आनंद 
    करीब सात हफ्ते पहले हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक उदय प्रकाश ने जब अपना साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया था तब उनसे सबसे पहला विस्‍तृत साक्षात्‍कारकैच न्‍यूज़ के वरिष्‍ठ सहायक संपादक पाणिनि आनंदने  लिया था। यह साक्षात्‍कार 6 सितंबर को प्रकाशित हुआ था लेकिन कई तथ्‍य इसमें संपादित कर दिए गए थे। उस वक्‍त तक न तो यह अंदाज़ा था कि पुरस्‍कार वापसी की यह इकलौती कार्रवाई एक चिंगारी का काम करेगी, न ही यह इलहाम था कि साहित्‍य अकादमी को अपने कदम पीछे खींचने पड़ेंगे और लेखकों की हत्‍याओं की औपचारिक निंदा करने को मजबूर होना पड़ेगा। आज जब करीब चार दर्जन लेखकों की पुरस्‍कार वापसी के बाद सरकार की इस ''स्‍वायत्‍त'' संस्‍था को झुकना पड़ा है और आंदोलन अपने पहले चरण को तकरीबन पूरा कर चुका है, तो लेखकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब आगे क्‍या होगा? सरकार विचलित है तो लेखक भी चिंतित हैं। इस समूचे अध्‍याय पर पाणिनि आनंद ने इस बार ख़बर से आगे बढ़कर एक प्रेरणादायी और आवाहनकारी लेख लिख डाला है जो उदय प्रकाश के साक्षात्‍कार के छूट गए अंशों को मिलाकर काफी तथ्‍यात्‍मक और प्रेरणादायी बन पड़ा है। यह लेख बीते डेढ़ महीनों में घटी घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए भविष्‍य की भी पड़ताल करता है। (मॉडरेटर)  



    ग्राफिक्‍स: साभार कैच न्‍यूज़ 




    इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के लेखकों और कवियों ने साहित्‍य अकादमी से मिले पुरस्‍कार (और एक मामले में पद्मश्री) लौटा कर इतिहास बनाया है।

    यह इसलिए और ज्‍यादा अहम है क्‍योंकि पुरस्‍कार लौटाने वाले लेखक किसी एक पंथ या विचारधारा के वाहक नहीं हैं, वे किसी एक भाषा में नहीं लिखते और किसी जाति अथवा धर्म विशेष से नहीं आते। इनका खानपान भी एक जैसा नहीं है। कोई सांभरप्रेमी है, कोई गोबरपट्टी का वासी है तो कोई द्रविड़ है।

    ये सभी अलग-अलग पृष्‍ठभूमि से आते हैं। इनकी संवेदनाएं भिन्‍न हैं और इनकी आर्थिक पृष्‍ठभूमि भी भिन्‍न है। बावजूद इसके, ये सभी एक सूत्र से परस्‍पर बंधे हुए हैं। यह सूत्र वो संदेश है जो ये लेखक सामूहिक रूप से संप्रेषित करना चाहते हैं, ''मोदीजी, हम आपसे अहमत हैं, हम आपकी नाक के नीचे आपकी विचारधारा वाले लोगों द्वारा अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर किए जा रहे हमलों से आहत हैं।''

    कैसे सुलगी चिंगारी

    इस ऐतिहासिक अध्‍याय की शुरुआत कन्‍नड़ के तर्कवादी लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्‍या से हुई थी।    

    इस घटना के सिलसिले में हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक उदय प्रकाश के साथ पत्रकार और प्रगतिशील कवि अभिषेक श्रीवास्‍तव की बातचीत हो रही थी। कलबुर्गी और उससे पहले नरेंद्र दाभोलकर व गोविंद पानसारे की सिलसिलेवार हत्‍या पर दोनों एक-दूसरे से अपनी चिंताएं साझा कर रहे थे। नफ़रत और गुंडागर्दी की इन घटनाओं के खिलाफ़ दोनों एक भीषण प्रतिरोध खड़ा करने पर विचार कर रहे थे।

    उदय प्रकाश इस बात से गहरे आहत थे कि साहित्‍य अकादमी ने कलबुर्गी की हत्‍या पर शोक में एक शब्‍द तक नहीं कहा। उनके लिए एक शोक सभा तक नहीं रखी गई। प्रकाश कहते हैं, ''आखिर अकादमी किसी ऐसे शख्‍स को पूरी तरह कैसे अलग-थलग छोड़ सकती है जिसे उसने कभी अपने सबसे प्रतिष्ठित पुरस्‍कार से नवाज़ा थायह तो बेहद दर्दनाक और हताशाजनक है।''

    फिर उन्‍होंने विरोध का आगाज़ करते हुए पुरस्‍कार लौटाने का फैसला लिया और अगले ही दिन इसकी घोषणा भी कर दी। इस घोषणा के बाद दिए अपने पहले साक्षात्‍कार में उदय ने कैच को (''नो वन हु स्‍पीक्‍स अप इज़ सेफ टुडे'', 6 सितंबर 2015) इसके कारणों के बारे में बताया था और यह भी कहा था कि दूसरे लेखकों को भी यही तरीका अपनाना चाहिए।

    विरोध का विरोध

    अब तक कई अन्‍य लेखक और कवि अपने पुरस्‍कार लौटा चुके हैं। बीते 20 अक्‍टूबर को दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में आयोजित लेखकों व कवियों की एक प्रतिरोध सभा ने अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर हमले की कठोर निंदा की।

    फिर 23 अक्‍टूबर को कई प्रतिष्ठित लेखकों, कवियों, पत्रकारों और फिल्‍मकारों की अगुवाई में एक मौन जुलूस साहित्‍य अकादमी तक निकाला गया और उसे एक ज्ञापन सौंपा गया।

    इनका स्‍वागत करने के लिए वहां पहले से ही मुट्ठी भर दक्षिणपंथी लेखक, प्रकाशक और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता जमा थे जो ''पुरस्‍कार वापसी तथा राजनीतिक एजेंडा वाले कुछ लेखकों द्वारा अकादमी के अपमान'' का विरोध कर रहे थे।

    साहित्‍य अकादमी के परिसर के भीतर जिस वक्‍त ये दोनों प्रदर्शन जारी थे, मौजूदा हालात पर चर्चा करने के लिए अकादमी की एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक भी चल रही थी।

    बैठक के बाद अकादमी ने एक संकल्‍प पारित किया जिसमें कहा गया है: ''जिन लेखकों ने पुरस्‍कार लौटाए हैं या खुद को अकादमी से असम्‍बद्ध कर लिया है, हम उनसे उनके निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हैं।''

    और सत्‍ता हिल गई

    जिस देश में क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक और कवि इन पुरस्‍कारों से मिली राशि के सहारे थोड़े दिन भी गुज़र नहीं कर पाते, वहां ''ब्‍याज समेत पैसे लौटाओ'' जैसी प्रतिक्रियाओं का आना बेहद शर्मनाक हैं।

    राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और उसकी अनुषंगी संस्‍थाओं के सदस्‍यों और नेताओं की ओर से जिस किस्‍म के भड़काने वाले बयान इस मसले पर आए हैं, उसने यह साबित कर दिया है कि लेखक सरकार का ध्‍यान इस ओर खींचने के प्रयास में असरदार रहे हैं।

    और हां, जेटलीजी, जब आप कहते हैं कि यह प्रतिरोध नकली है, तो समझिए कि आप गलत लीक पर हैं। लेखक दरअसल इससे कम और कर भी क्‍या सकता है। सत्‍ता प्रतिष्‍ठान के संरक्षण में जिस किस्‍म की बर्बरताएं की जा रही हैं, हर रोज़ जिस तरह एक न एक घटना को अंजाम दिया जा रहा है और देश का माहौल बिगाड़ा जा रहा है, यह एक अदद विरोध के लिए पर्याप्‍त कारण मुहैया कराता है।

    अब आगे क्‍या?

    लेखकों व कवियों के सामने फिलहाल जो सबसे अहम सवाल है, वो है कि अब आगे क्‍या?

    यह लड़ाई सभी के लिए बराबर सम्‍मान बरतने वाले और बहुलता, विविधता व लोकतंत्र के मूल्‍यों में आस्‍था रखने वाले इस देश के नागरिकों तथा कट्टरपंथी गुंडों के गिरोह व उन्‍हें संरक्षण देने वाले सत्‍ता प्रतिष्‍ठान के बीच है।

    इस प्रदर्शन ने स्‍पष्‍ट तौर पर दिखा दिया है कि लेखक बिरादरी इनसे कतई उन्‍नीस नहीं है, लेकिन अभी लेखकों के लिए ज्‍यादा अहम यह है कि वे व्‍यापक जनता के बीच अपनी आवाज़ को कैसे बुलंद करें। ऐसा महज पुरस्‍कार लौटाने से नहीं होने वाला है। यह तो फेसबुक पर 'लाइक' करने जैसी एक हरकत है जिससे कुछ ठोस हासिल नहीं होता।

    एकाध छिटपुट उदाहरणों को छोड़ दें, तो बीते कुछ दशकों के दौरान साहित्‍य में कोई भी मज़बूत राजनीतिक आंदोलन देखने में नहीं आया है। कवि और लेखकों को सड़कों पर उतरे हुए और जनता का नेतृत्‍व किए हुए बरसों हो गए।

    मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछली बार कब इस देश के लेखकों ने किसानों की खुदकशी, दलितों के उत्‍पीड़न, सांप्रदायिक हिंसा और लोकतांत्रिक मूल्‍यों व नागरिक स्‍वतंत्रता पर हमलों के खिलाफ कोई आंदोलन किया था। वे बेशक ऐसे कई विरोध प्रदर्शनों का हिस्‍सा रहे हैं, लेकिन नेतृत्‍वकारी भूमिका उनके हाथों में कभी नहीं रही। न ही पिछले कुछ वर्षों में कोई ऐसा महान साहित्‍य ही रचा गया है जिसने किसी सामाजिक सरोकार को मदद की हो।

    पिछलग्‍गू न बनें, नेतृत्‍व करें

    एक लेखक आखिर है कौनवह शख्‍स, जो समाज के बेहतर और बदतर तत्‍वों की शिनाख्‍त करता है और उसे स्‍वर देता है।

    एक कवि होने का मतलब क्‍या हैवह शख्‍स, जो ऐसे अहसास, भावनाओं और अभिव्‍यक्तियों को इस तरह ज़ाहिर कर सके कि जिसकी अनुगूंज वृहत्‍तर मानवता में हो।

    मेरे प्रिय लेखक, आप ही हमारी आवाज़ हैं, हमारी कलम भी, हमारा काग़ज़ और हमारी अभिव्‍यक्ति भी। वक्‍त आ गया है कि आप आगे बढ़कर चीज़ों को अपने हाथ में लें।

    अब आपको जनता के बीच निकलना होगा और उसे संबोधित करना ही होगा, फिर चाहे वह कहीं भी हो- स्‍कूलों और विश्‍वविद्यालयों में, सार्वजनिक स्‍थलों पर, बाज़ार के बीच, नुक्‍कड़ की चाय की दुकान पर, राजनीतिक हलकों में, समाज के विभिन्‍न तबकों के बीच और अलग-अलग सांस्‍कृतिक कोनों में। 

    और बेशक उन मोर्चों पर भी जहां जनता अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है- दिल्‍ली की झुग्गियों से लेकर कुडनकुलम तक और जैतापुर से लेकर उन सुदूर गांवों तक, जहां ज़मीन की मुसलसल लूट जारी है।

    आपको उन ग्रामीण इलाकों में जाना होगा जहां बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां संसाधनों को लूट रही हैं: उन राजधानियों व महानगरों में जाइए, जहां कॉरपोरेट ताकतों ने कानूनों और नीतियों को अपना बंधक बना रखा है और करोड़ों लोगों की आजीविका से खिलवाड़ कर रही हैंकश्‍मीर और उत्‍तर-पूर्व को मत भूलिएगा जहां जम्‍हूरियत संगीन की नोक पर है। इस देश के लोगों को आपकी ज़रूरत है।

    सबसे कमज़ोर कड़ी

    इन लोगों के संघर्षों को महज़ अपनी कहानियों और कविताओं में जगह देने से बात नहीं बनने वाली, न ही आपका पुरस्‍कार लौटाना जनता की अभिव्‍यक्ति की आज़ादी को बहाल कर पाएगा। अगर आप ऐसा वाकई चाहते हैं, तो आपको इसे जीवन-मरण का सवाल बनाना पड़ेगा। आपको नवजागरण का स्‍वर बनना पड़ेगा।

    ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी है क्‍योंकि सरकार अब इस सिलसिले की सबसे कमज़ोर कडि़यों को निशाना बनाने की कोशिश में जुट गई है। उर्दू के शायर मुनव्‍वर राणा, जिन्‍होंने टीवी पर एक बहस के दौरान नाटकीय ढंग से अपना साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटा दिया था, कह रहे हैं कि उन्‍हें प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया था और अगले कुछ दिनों में उन्‍हें मोदी से मिलने के लिए बुलाया गया है।

    राणा एक ऐसे लोकप्रिय शायर हैं जिन्‍होंने सियासी मौकापरस्‍ती की फसल काटने में अकसर कोई चूक नहीं की है। उनके जैसी कमज़ोर कड़ी का इस्‍तेमाल कर के सरकार लेखकों की सामूहिक कार्रवाई को ध्‍वस्‍त कर सकती है।

    ऐसा न होने पाए, इसका इकलौता तरीका यही है कि जनता का समर्थन हासिल किया जाए। लेखक और कवि आज यदि जनता के बीच नहीं गया, तो टीवी की बहसें और उनमें नुमाया लिजलिजे चेहरे एजेंडे पर कब्‍ज़ा जमा लेंगे।

    जनता का समर्थन हासिल करने, अपना सिर ऊंचा उठाए रखने, इस लड़ाई को आगे ले जाने और पुरस्‍कार वापसी की कार्रवाई को सार्थकता प्रदान करने के लिए हरकत में आने का सही वक्‍त यही है। मेरे लेखकों और कवियों, बात बस इतनी सी है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। किसका इंतज़ार है और कब तकजनता को तुम्‍हारी ज़रूरत है!


    (साभार: कैच न्‍यूज़, अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव) 



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    हरीश रावत के जिंदल प्रेम में एक्‍सपोज़ हुई भाजपा, पीसी तिवारी व अन्‍य हिरासत में


    पुष्‍कर सिंह बिष्‍ट । अल्मोड़ा


    रानीखेत के नैनीसार में जिंदल समूह को कौड़ियों के भाव ग्रामीणों की जमीन देने के विरोध में आए उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के पीसी तिवारी व उनके आठ सहयोगियों सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणों खासकर महिलाओं को पुलिस दमन का शिकार होना पड़ा। इलाके को पुलिस छावनी बनाकर मुख्यमंत्री ने इस कथित अंतरराष्‍ट्रीय स्कूल का उद्घाटन आखिरकार कर ही डाला। गुरुवार की सुबह जब परिवर्तन पार्टी के सदस्‍यों का दल कार्यक्रम स्थल की ओर रवाना हुआ तो कटारमल के पास पुलिस ने पीसी तिवारी, जीवन चंद्र, प्रेम आर्या, अनूप तिवारी, राजू गिरी आदि को हिरासत में ले लिया। देर शाम तक इन लोगों को नहीं छोड़ा गया था। 




    इधर ग्रामीणों का एक बड़ा समूह जिसमें महिलाएं भी थीं, उन्‍हें पुलिस ने झड़प के बाद मजखाली के आसपास जंगल में रोक लिया और उनकी विरोध सामग्री, तख्ती, झण्डे आदि भी जला दिए। भाजपा नेता व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन राम को भी हिरासत में लेने का समाचार है। 

    उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने इसके विरोध में अल्मोड़ा में मुख्यमंत्री का पुतला फूंका। इस मुद्दे पर कई दिनों से मीडिया में हो हल्ला करने वाले भाजपा नेता अजय भट्ट कार्यक्रम स्थल पर तो नहीं गए अलबत्ता भाजपा नेता इस मामले में कन्नी काटते रहे। भाजपा सांसद मनोज तिवारी के मौके पर आने से पूरी भाजपा को मानो सांप सूंघ गया। कई भाजपा नेताओं ने यहां तक कहा कि मामला उनकी समझ में अभी नहीं आया है। सुबह से ही जिंदल समूह के इस कार्यक्रम की तैयारी के अखबारों में जो विज्ञापन दिखे उसमें भाजपा सांसद अजय टम्टा व अनेक स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बधाई संदेश थे जिससे पूरी भाजपा बैक फुट पर दिखी। ज्ञात हो कि अल्मोड़ा जिला में डीडा (द्वारसों) के तोक नौनीसार की 353 नाली (7.061 हेक्टेयर) भूमि प्रदेश सरकार दिल्ली की हिमांशु एजुकेशन सोसायटी को आवंटित करने की प्रक्रिया से सन्देह के घेरे में आ गयी है। स्थानीय ग्रामीण इसके विरोध में सड़क पर उतर आये हैं। 

    अल्मोड़ा-रानीखेत के बीच द्वारसों क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बहुत सुन्दर है। द्वारसों से काकड़ीघाट के लिये कई दशक से बन रहे मोटर मार्ग में मात्र 3 कि.मी. पर सड़क के किनारे नानीसार नामक तोक है जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार बहुत गुपचुप तरीके से जिन्दल समूह की इस संस्था को कथित इन्टरनेशनल स्कूल के लिये कौडि़यों के भाव आवंटित कर रही है किन्तु आवंटन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दबंग संस्था ने जमीन पर कब्जा कर लिया है। 

    कुमाऊँ में सार का मतलब खेती की जमीन से होता है। नानीसार का मतलब ही छोटी खेती की जमीन से है। प्रदेश सरकार के निर्देश पर प्रशासन ने इस जमीन के आवंटन की प्रक्रिया को इतने गोपनीय ढंग से अंजाम दिया कि डीडा के ग्रामीणों को 25 सितम्बर को इसका पता तब चला जब हिमांशु एजुकेशनल सोसायटी दिल्ली 260 जी.एल.एफ. तथा शिवाजी मार्ग नई दिल्ली के दर्जनों मजदूर व जे.सी.बी. मशीनों ने उनकी जमीन पर सड़क निर्माण, पेड़ों का विध्वंस व घेरबार शुरू कर दी। ग्रामीणों द्वारा हाथ पांव मारने के बावजूद जमीन पर कब्जा कर रहे लोगों एवं प्रशासन ने उन्हें कोई जानकारी नहीं दी। इस घटना के विरोध में 2 अक्टूबर को ग्रामीणों ने नैनीसार में धरना दिया, तब रानीखेत तहसील से पटवारी व पुलिस ने आकर उन्हें कार्य में व्यवधान न डालने की चेतावनी दी। ग्रामीणों ने एस.डी.एम. रानीखेत को ज्ञापन भी दिया। 8 अक्टूबर को दर्जनों ग्रामीण जिला मुख्यालय पर आये व वहां मौजूद ए.डी.एम. इला गिरी को इस दबंगई के खिलाफ ज्ञापन दिया। इसी दिन ग्रामीणों का यह दल उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी से मिला व अपनी जमीन बचाने में मदद की गुहार की।  

    उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने 9 अक्टूबर को जिला अधिकारी विनोद कुमार सुमन से मिल कर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देकर ग्रामीणों की भूमि पर अतिक्रमण रोकने, पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच व इस मामले से जुड़े सभी तथ्यों से सार्वजनिक करने की मांग की। 

    11 अक्टूबर को डीडा-द्वारसों के ग्रामीणों के आमंत्रण पर उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के एक दल ने ग्रामीणों के साथ घटनास्थल का दौरा किया। घटनास्थल पर जिन्दल का स्कूल खोलने का बोर्ड लगा है व रोड़ से लगी भूमि पर खुदान सड़क निर्माण हो चुका है। बांज, काफल, चीड़ के पेड़ जमींदोज किये जा चुके हैं। मौके पर विद्युत विभाग का ट्रांसफार्मर लगा था, संस्था व पट्टी पटवारी के पास जमीन के कागजात नहीं थे और संस्था द्वारा वहां किये जा रहे विनाश को लेकर एस.डी.एम. रानीखेत, ए.पी.बाजपेयी को मौके पर जानकारी दी। मौके पर क्षेत्रीय पटवारी आया पर निर्माण कर रही संस्था व पटवारी के पास जमीन का कब्जा लेने का कोई आदेश नहीं था। 

    इस बीच सूचना अधिकार अधिनियम से प्राप्त जानकारी से साफ हो गया है कि राजस्व अभिलेखों में श्रेणी 9(3)5 कृषि योग्य बंजर भूमि में दर्ज 7.061 हे. भूमि अभी तक भी नैनीसार डीडा द्वारसों की जमीन का जिन्दल ग्रुप के पक्ष में हस्तान्तरण नहीं हुआ। 

    इस मामले में नियमानुसार ग्राम सभा की आम बैठक नहीं हुई और न ही आम ग्रामवासियों से अनापत्ति ली गयी। इस गांव के ग्राम प्रधान गोकुल सिंह राणा का एक अनापत्ति प्रमाण पत्र जिस पर 23 जुलाई 2015 की तिथि है, इसमें अनापत्ति प्रमाण पत्र देेते हुए लिखा है कि जमीन सार्वजनिक उपयोग व धार्मिक प्रयोजन की नहीं है जबकि जिला अधिकारी कार्यालय के पत्र पत्रांक 6444/सत्ताईस-19-15-15, दिनांक 29 जुलाई, 2013 में तीन बिन्दुओं के साथ ग्राम सभा की खुली बैठक में ग्राम की जनता ग्राम प्रधान प्राप्त अनापत्ति प्रस्ताव की सत्यापित प्रति मांगी गयी है। ग्रामीणों ने 15 अक्टूबर को उपजिलाअधिकारी रानीखेत के यहां हुए विरोध प्रदर्शन में ज्ञापन देकर कहा है कि ग्रामवासियों की खुली बैठक में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं किया गया। यदि ऐसा फर्जी दस्तावेज तैयार किया गया है तो ऐसा करने वालों पर कार्यवाही की जाय। ग्रामीणों ने अतिक्रमणकारियों द्वारा लोभ-लालच देने, जबरन उठवा देने व जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी लगाया है। 

    इस भूमि का मूल्य रू. 4,16,59,900/- (चार करोड़ सोलह लाख उनसठ हजार नौ सौ रूपया) लगाया गया है। वार्षिक किराया मात्र 1996.80 पैसा लिखा गया है। इसी आधार पर उत्तराखण्ड सरकार ने 22 सितम्बर, 2015 को सचिव, उत्तराखण्ड शासन डी.एस.गब्र्याल की ओर से जारी शासनादेश में गवर्नमेन्‍ट ग्रान्ट एक्ट के अधीन पहले 30 वर्ष के लिये 2 लाख रूपये वार्षिक दर व 1196.80 किराये पर पट्टा निर्गत करने हेतु नियमानुसार अग्रिम कार्यवाही करने के आदेश दिये। इसका 7 अक्टूबर को उपजिलाअधिकारी ने पट्टे पर सशुल्क आवंटन करने हेतु अपनी आख्या दी। स्वयं तत्कालीन जिलाधिकारी विनोद कुमार सुमन ने सचिव डी.एस.गब्र्याल द्वारा जारी शासनादेश के बिन्दु 9 जिसमें सर्वोच्च न्यायालय जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य एवं झारखण्ड राज्य व अन्य बनाम पाकुर जागरण मंच व अन्य में न्यायालय के निर्देश का पालन सुनिश्चित करने को कहा है, जिस पर उपजिलाअधिकारी रानीखेत की आख्या अभी तक प्राप्त नहीं है। लेकिन अल्मोड़ा के जिला प्रशासन ने 25 सितम्बर को ही मिलीभगत कर उक्त भूमि पर जबरन संस्था को कब्जा करा दिया। 

    ग्रामीणों का आरोप है कि उक्त भूमि उनकी नाप भूमि थी, जिसे बन्दोबस्त में गलत दर्ज किया गया। वहां वन पंचायत बनी है, चीड़ के पेड़ों पर लीसा लगा है, गांव का एक छोटा मन्दिर (थान) है लेकिन इन सभी की सरकार के इशारे पर अनदेखी की गयी है। जिन्दल समूह की इस कथित सोसायटी के दलाल अब ग्रामीणों को धमकाने, लालच देने व धन के जोर पर दुष्चक्र व गिरोहबन्दी में लग गये हैं। सरकार के इशारे पर कांग्रेस पार्टी से जुड़े लोगों को आगे कर ग्रामीणों के विरोध को दबाने की नाकाम कोशिश हो रही है। दिलचस्‍प बात यह है कि हिमांशु एजुकेशनल सोसायटी द्वारा जो प्रस्ताव प्रदेश के मुख्यमंत्री को दिया गया है उसमें उत्तराखण्ड के किसानों, मजदूरों के बच्चों की पढ़ाई इस कथित इण्टरनेशनल स्कूल में करने की कोई व्यवस्था नहीं है। शासनादेश में भी केवल अधिकारियों/कर्मचारियों के बच्चों को शिक्षा देने का जिक्र किया गया है। 

    इस सोसायटी के दस्तावेजों में साफ है कि इस कथित अंतरराष्‍ट्रीय स्कूल में विदेशी छात्र पढ़ेंगे और 30 प्रतिशत कोटे पर उत्तराखण्ड के अधिकारियों व नेताओं के बच्चों को सीट दी जाएगी। फिलहाल हरीश रावत जिसे उत्तराखण्ड का जमीनी नेता कहा जाता है, उनकी इस घटना से खूब किरकिरी हुई है। माना जा रहा है कि यह मामला दिल्ली में सोनिया दरबार तक जा सकता है। इस घटना में कन्नी काटने पर यूकेडी, भाजपा जैसे अन्य दलों की भी पोल खुली है जो उत्तराखण्ड के नाम पर लोगों से भावनात्मक खिलवाड़ करते हैं। 
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    वीरेन डंगवाल के संग एकालाप


    मृत्‍युंजय 


    मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं

                 साभारःअभिषेक श्रीवास्तव का जनपथ


    (क)



    "क्या करूँ
    कि रात न हो
    टी.वी. का बटन दबाता जाऊँ
    देखूँ खून-खराबे या नाच-गाने के रंगीन दृश्य
    कि रोऊँ धीमे-धीमे खामोश
    जैसे दिन में रोता हूँ
    कि सोता रहूँ
    जैसे दिन-दिन भर सोता हूँ
    कि झगड़ूँ अपने आप से
    अपना कान किसी तरह काट लूँ
    अपने दाँत से
    कि टेलीफोन बजाऊँ
    मगर आयँ-बायँ-शायँ कोई बात न हो"

    तब मेरा क्या होगा वीरेन दा -

    दिन कहीं बचा है क्या वीरेन दा?
    कि पूरा दिन एक विशाल चमकीली काली पट्टियों वाला विज्ञापन है
    जिसमें रंगों की अँधेरी सुबहें परवाज करती हैं
    कि पूरी रात एक रिमोट है
    जिसके बटन दिन के हाथों में हैं।
    कि पूरी कायनात एक स्क्रीन में बदल गई है
    सब कुछ आभासी हो गया है।
    कि प्रेम करने को आतुर कमीने नंगे बदन खुले रास्ते में खड़े हैं
    रास्ता छेंक कर
    कि रक्त की शरण्य भी आखेटकों की सैरगाह है
    कि पटक देने का जी चाहता है सर
    कहीं भी

    कहीं कुछ भी नष्ट नहीं होता
    अविनाशी हो गया है सब कुछ
    कोई ऐसी जगह बची ही नहीं जहाँ कोई न हो
    दुनिया के सारे दर और दीवारजिन्हें घर कहते है
    खाक हो गए हैं
    आइए एक पहाड़ उलटकर अपनी रीढ़ पर रख लें
    और दब जाएँ इस अविनाशी नश्वरता के नीचे
    दम घुटने से

    मैं तो... मन करता है अपनी टाँगे धीरे धीरे रेत दूँकाट लूँ
    गर्दन खींच दूँ रबर की तरह
    मुट्ठियों में भींच लूँ सारी हड्डियाँ
    बाकी लोथ पटक दूँ
    सारे कमरे में फैल जाए आदिम रक्त गंध

    कहीं तो कुछ हो
    मत बदलेबचा रहे
    मत बचेयाद रहे
    याद न रहेसपने रहें

    सपने जो हरदम हकीकत के अदृश्य हाथों की अवश कठपुतलियाँ हैं
    और हकीकत तो वही है न वीरेन दा!

    ये हम कहाँ आ गए वीरेन दा -

    कि आपके गर्म हाथों में छुपाकर अपना मुँह
    रोने का मन कर रहा है
    पर आँसू नश्तर की तरह चुभ रहे हैं
    रोती हुई आँखे दर्द से सूख गई हैं
    दिमाग की नस तक फैल गया है चिपचिपा मांस
    मेरी अपनी ही पलकें चुभ रही हैं खुले घाव में
    आपकी हथेली को भेद हजार कीड़े भिनक रहे हैं
    रक्त गंध के हर जर्रे में उनकी नुकीली सूँड़ गड़ गई है
    उसी भयानक स्क्रीन पर लाइव चल रहा है यह दृश्य
    पीछे से एक आकार में अँगुलियाँ उठाये एक हिंस्र पशु नगाड़ों के शोर में अपनी बारीक दाढ़ी में नफीस तराना पढ़ रहा है!

    आप सुन रहे हैं न !
    देखा आपने,
    आपने देखा !
    देख रहे हैं न।

    चलिए उठिए वीरेन दा,
    आप इतने घायल तो कभी नहीं हुए
    हलक तक तक पसरे लहू में छप छप करते हम स्क्रीन पर दिख रहे हैं
    देखिए नाटक नहीं है ये
    टी वी चल रहा है
    भागिए वीरेन दा
    जल्दी करिए
    कुचल नहीं सकते तो रेंग कर छुपने की कोशिश करिए प्लीज
    हजार मेगा पिक्सल की रेंज में हैं हम !
    लोग हँस रहे हैं
    पापकार्न के ठोंगे और नया सिमअभी अभी खरीदे गए हैं।
    एक नौकरी चहिए वीरेन दामैं तंग आ गया हूँ इस हरामपंथी से
    चुपचाप पडा रहूँ कोई आए न जाए कुछ सुनूँ नहीं कुछ भी देख न सकूँ महसूस करना बंद कर दूँ बउरा जाऊँ
    सुख में नहीं दुख में नहीं चेतना से भाग जाऊँ

    एक नौकरी चहिए वीरेन दा
    अपने कमीनेपन की बाड़ लगाकर रोक लेना चाहता हूँ सब
    क्यों वीरेन दा
    इस हरमजदगी के बाद भी वह मुझे प्रेम करती है
    आप भी तो करते हैं
    बर्दाश्त नहीं होता अब कुछ भी असली
    मुझे छोड़ दीजिए
    मत छुइए मुझे
    हट जाइए
    हटिए

    मुझे एक नौकरी चाहिए वीरेन दा
    वहीं उस स्क्रीन के भीतर
    मेरे गले तक उल्टिओं का स्वाद भर आया है
    उसे पी लूँगा
    मैं कमजोर नहीं हूँ वीरेन दा
    आपने क्या समझ रक्खा है
    मैं जानता हूँ ये सब नकली है
    मैं अभी फोड़ डालूँगा पूरा प्रोजेक्टर
    एक नौकरी दिलाइए न वीरेन दा
    नहीं दिलवा सकते फिर भी दिलवाइए तो...

    शाम को मर जाता है वक्त
    वक्त की लाश पर दिन और रात के गिद्ध खरोंचते है जटिल आकृतियाँ
    सुबह गीला लाल रंग पसर जाएगा सब ओर
    24 -7 का धंधा है यह
    इतनी कठपुतलियाँ इतने वेग से इतनी तरफ घूम रही हैं
    इतने धागों से बँधी हुई बड़े से देग में
    यह रणनीति बनाने का वक्त है
    वहीं चलिए वीरेन दा
    उठिएलहू सने होठों में खैनी दबाइए
    अपनी कैरिअर वाली साइकिल निकालिए
    चलिए चलते हैं कानपुर के रास्ते
    जहाँ आपके दोस्त और मेरे गुरु हैं
    लाल इमली की भुतही मिल की सीढ़ियाँ उतरिए
    जहाँ लोग हैं
    इस स्क्रीन से बाहर निकालिए भाई
    कोई प्यारा व्यारा नहीं है यहाँ
    चलिए!

    अपने सलवटों भरे चेहरे को सँभालिए
    जी कड़ा करिए
    हैंडिल थाम लीजिए कस कर
    बाप रे! सँभालिए
    इतनी तेजी इस उम्र में
    मैं छूट जाऊँगा
    गिर जाऊँगा मैं
    सहस्रों फुट नीचे यहीं खो जाऊँगा मैं
    इन प्रिज्मों की आभासी दुनिया में
    जरा धीरे चलिए
    हजारहाँ रपट चले घुटनों पर तो तरस खाइए
    ये कोई फैसले का वक्त नहीं है
    अभी तो रात बाकी है बात बाकी है
    बाकीमीर अब नहीं हैं
    कोई पीर भी नहीं है
    हिंस्र पशुओं से भरा ये अँधेरा काफी डरावना है
    अपने डर से डरिए वीरेन दा धीरे चलिए

    मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं
    मुझसे डर बुड्ढे
    धीरे चल
    चाल बदल कर नहीं बच सकता तू !

    माफ करिएगा वीरेन दा
    अनाप-शनाप बक गया गुस्से में
    पर जा कहाँ रहे हैं
    चला तो आप ऐसे रहे हैं जैसे जल्दी ही कहीं पहुँचना है हमें
    पर इसी स्क्रीन के भीतर कहाँ तक जाएँगे आप
    ऐसा न करिए कि मुझे गिरा दीजिए कहीं
    यह रास्ता इतिहास की तरफ तो जाता नहीं है
    भविष्य की तरफ तो जाता नहीं है
    वर्तमान में तो आप भाग ही रहे हैं
    फिर जा कहाँ रहे हैं हम

    अद्भुत है यह तो अविश्वसनीय असंभव
    हम कहीं पहुँच गए
    ये क्या जगह है दोस्तों
    ये क्या हो रहा है
    मुझे मितली आ रही है
    फिर से दिन उग आया है वीरेन दा
    चिड़ियों की चोंचे नर्म शबनमी रक्त में लिथड़ी हैं
    पेड़ अट्टहास कर रहे हैं
    बाजरे की कलगी के रोएँ चुभ रहे हैं भालों की तरह हवा की अँतड़ियों में
    हरियाली के थक्कों के बीच आप मुझे कहाँ ले आए हैं
    सरपट की नुकीली पत्तियाँ खुखरियों की तरह काट रही हैं मुझे
    इतनी रेत इतनी रेत
    मेरा दम घुट रहा है
    वक्त बीत रहा है वीर... ए...


    (ख)


    एक दर्द है जो अब होता ही नहीं
    एक मन है जो चलता ही नहीं
    एक जिस्म भी है जिस पर मेरा छोड़ हर किसी का नियंत्रण है
    एक दुख है जो अब देश काल के शर से बिंधकर दुख ही नही रह गया है
    आजकल तो इतने मुल्कों से इतनी लाशें उठती रहती हैं इतनी चीजों की कि
    दुनिया एक कब्रगाह जैसी हो गई है
    यहाँ आपसे धीमे धीमे बतियाते हुए भी मुझे डर है कि
    हम एक बड़ी कब्र में तो नहीं बैठे हैं वीरेन दा?

    नहीं...
    अब पहले जैसी हालत नहीं है।
    पक्का !
    अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा हूँ।
    कितना परेशान किया आपको
    मैं भी कैसा अभागा हूँ कि यह भी नहीं कर सका कि
    कम से कम आपके जख्मों पर पट्टी ही बदल पाऊँ
    ऐसे हालात में आप न होते तो
    मेरा क्या होता वीरेन दा?
    चुप रहने से क्या होगा ?
    कहा न मेरी तबियत ठीक है !
    बेहतर हूँ भाई,

    अब सुनिए-
    की-बोर्डों की ठक-ठक के नीचे
    विराट कंप्यूटर के पीछे से
    वहाँउस स्क्रीन के धागों में मैं जब झाँक रहा था
    मैंने धब्बे देखे थे
    लाल खून से भरे और चमकते हुए...
    आप जानते हैं कुछ तो बताइए
    उस विशाल स्क्रीन को
    शार्ट सर्किट करने का कोई तो रास्ता होगा न

    ओ होये बात,
    अरे वीरेन दामुझे न बनाइए
    मैं तब से जानता हूँ आपको जब आप
    कंधे पर लटकाए घूमते थे मुझे
    मेरी बेसिक रीडर को सँभालते बचाते
    और तीनरंगे झंडे को उदास हसरत से देखते हुए


    (ग)


    यहाँ कुछ हरा-हरा सा दिख रहा है
    क्या यही वह जगह है जहाँ से
    पलटकर
    कुछ छीन लातेमार खातेमार देते लोग
    आत्महत्या की घिरी चौपाल में
    हत्या के मंसूबे बनाकर।

    'मरनाकहने से अपने घावों की
    याद ताजा हो जाती है
    और मारने से अपनी चोट भूल जाती है
    हमारे अपने ही हैं ये दोस्त
    सपने की व्यथा जैसे
    कथा जैसी कई युग से कही जाती सुनी जाती आ रही है

    गहरे पर्वतों के गर्भ में से
    जंगलों की काष्ठव्यापी हरी कच्ची गंध से
    पतली चपल और वेगवंती आ-वेग धारा से
    बुलावा आ रहा है
    चलेंगे वीरेन दा?


    (30 नवंबर, 2010)
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    A SECULARIST RESPONDS TO MINISTER RAJNATH SINGH ….

    RAM PUNIYANI. Sunday, November 29, 2015

     

    NEW DELHI: The celebration of Constitution day ( November 26 2015) marked the revival of the debate, rather questioning of the concept of secularism, yet again. Rajnath Singh, the home minister repeated the arguments which the RSS parivar has been raising time and over again. He said that the perverse use of the term secularism is causing social tensions. As per Singh, secularism is the most misused term in the country and it is this misuse of the term which is causing social tensions. He repeated that this term has Western roots and stands for separation between religion and state. In India since its religion itself is secular such a concept is not needed here. He repeated the earlier arguments of RSS ideologues that there is no need to have the word Secularism the Preamble of Indian Constitution. 

    Most of these arguments which keep coming from Sangh parivar have a deeper purpose. They are uncomfortable with the very concept of a secular state so they bring forward this debate in different guises. One recalls that on the eve of Republic Day January 26 2015, the Government issued an advertisement in which the words secular and socialist were missing. The argument put forward after a strong protest was that these words were inserted into the Preamble during the Emergency were not there originally. The point however is that the Indian Constitution has all the provisions for secular values in different clauses of our Constitution, still in the face of rising communal politics this addition to the Preamble made in 1975 merely reinforces the goals of our Constitution. 

    Is secularism a Western concept? It is true that this value originated in the Western World but the context of the word is not mere geographical it has all to do with the process of modernization, the rise of industrialization and modern education accompanying the process of abolition of kingdoms, feudal values. It runs parallel to coming of the society with equality of all human beings. This process comes in the wake of a change in societal dynamics whereby the hold of organized religion, the clergy, on social affairs starts diminishing or is abolished altogether. This process of secularization heralds the beginning of the modern society where religion, the organized institution in contrast to other facets of religion, is relegated to the margins of society. 

    The argument that India is different as here there was no organized Church, this concept is not needed in India. As far as the scattered clergy of Hinduism is concerned, it played the same role, allying with the feudal powers to sanctify the divine power of kings or landlords, is no different. For that matter whatever be the religion, the clergy does play the same role in every pre-industrial society. It is a bane of South Asian countries that clergy or 'politics in the name of religion' keeps dominating the and acts as an obstacle to the strengthening of democratic values and relationship of equality. 

    The assertion that the Indian religion, Hinduism is secular, defies all sociological understanding of India, Hinduism and society here. Hinduism, of course is not a Prophet based religion, but is dominated by the Brahminical clergy, which was part of the ruling social powers. Hindu clergy, namely the Brahmins had the same role in giving sanctity to the feudal lord-king as any other clergy had, although in one sense the most visible of this is the organized Catholic Church and so that becomes the most cited example. 

    In the BJP scheme of things the religions of Indian origin, Buddhism, Jainism, Sikhism are all the sects of Hinduism. This is a political elaboration; not a theological one as all these religions are full-fledged religions as far as scriptures, rituals and values are concerned. This is deliberately done to create 'the other' in the followers of Islam and Christianity. So to say that the religions of Indian origin are the only Indian religions is faulty again. Religions don't have nationality, they are universal. 

    The origin of religion in that sense is incidental. Look at the spread of Buddhism. Look at the followers of these religions trotting all over the globe. The very formulation of Indian versus foreign religion is a political construct. Hinduism does have different sects like any other religion having many sects. India has many religions thriving here. What are Indian religions is well answered by Gandhi. Gandhi states that in India "Apart from Christianity and Judaism, Hinduism and its offshoots, Islam and Zoroastrianism are living faiths." (Gandhi's collected works, Volume XLVI p. 27-28). This is very contrary to the RSS-BJP formulation of Islam and Christianity being foreign religions. 

    It is true that the practice of secularism has been tardy in India due to the weakness of the political leadership and due to the absence of effective land reforms. In tune with that, the RSS parivar has been coining different terms to criticize secularism as such and to hide its total opposition to religious pluralism and secularism. 

    First it began with the term appeasement for the affirmative policies of the Congress, and then went on to coin the term pseudo secular and lately sickular as a derogatory term for those trying to uphold the Constitutional values of secularism. The BJP slogan of 'Justice for all and appeasement of none' in a way underlines the way Hindu nationalism will operate, with no concern for the weaker religion minorities. Its agenda has been structured around identity issues related to a section of Hindus. Earlier the major issue used on the ground was the Ram temple, and today and the 'Cow as mother' is the reigning identity issue. 

    'India First' the highly emotive phrase coined by Prime Minister Narendra Modi as a substitute for secularism is a clever maneuver to bypass the word secular, which is a big obstacle to the agenda of Hindu nationalism of the RSS-BJP. While the freedom movement was totally diverse, plural and secular to the core the ideological foundations of today's BJP lay in the Hindu nationalism as brought up by Savarkar and later by RSS. This begins with the formulation of India as a Hindu nation from times immemorial, in contrast to the self understanding of Indian national movement that 'we are a nation in the making'. 

    Although the BJP currently has no choice but to uphold the Indian constitution it is trying to subvert the spirit of secular values by various means. And that's what the RSS pracharak Rajnath Singh is doing as a minister in the Indian Government! Such distortions of the spirit of Indian Constitution need to be combated at the ideological, social and political level.

     

    #secularism, # pseudosecular, #sickular #Ram Puniyani # Hindu nationalism, # Indian Nationalism #Indian Constitution # India First #plural# Freedom movement

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    Friends,

    Since last couple of months after the announcement of a new constitution, Nepal is facing a serious crisis due to the undeclared economic blockade imposed by India. The Indian government has denied any such sanction rather it blames this on Madhesi protestors of terai region who have hindered the entry points on Indo-Nepal border and blocked all supplies. There is no doubt that Madhesi people are dissatisfied with the new constitution and hence they are protesting against it since last three months. They feel that it has failed to address their demands and an injustice has been done to the community. But the Indian Government, that was already unhappy with the Nepali leadership has now played up on this rage and has tried to teach a lesson by first imposing the blockade directly and then indirectly on the pretext of Madhesi sentiment.

    This impasse has created an unprecedented crisis for the Nepali people. People from plains and hilly areas both are affected from this. There is serious dearth of petrol, cooking gas, medicines in Nepal and the ordinary life is in shackles. People feel as if they are citizens of a war-ridden nation. The contradictions between both the countries as well as that of hill and terai are getting sharper day by day. This contradiction is making inroads into the common masses too.

    This is a grave situation. In solidarity with the people of Nepal including the agitating people of  Tarai-Madhesh, we hope to resolve this situation through dialogue as soon as possible. The government of India must not treat this crisis as a prestige issue rather it should immediately call for an end to this 'unofficial blockade'.

    To deliberate upon the situation we have called a meeting with some of our Nepalese comrades. We expect your presence and participation. 

    Nepal's Present Crisis and India
    Date & Time : 4 December 2015, 3.00 pm
    Venue : Seminar Hall, N. D. Tewari Bhavan 
    (next to Gandhi Peace Foundation), 
    Deendayal Upadhyay Marg, New Delhi

    Anand Swaroop Verma
    On behalf of Samkaleen Teesari Dunia
    Phone: 9810720714

    मित्रो,

                             

    पिछले लगभग दो माह सेजब से नए संविधान की घोषणा हुईभारत द्वारा लागू की गयी आर्थिक नाकाबंदी के कारण पड़ोसी देश नेपाल जबरदस्त संकट के दौर से गुजर रहा है. भारत सरकार का कहना है कि उसने किसी तरह की नाकाबंदी नहीं की है और तराई क्षेत्र में मधेसी आंदोलकारियों ने सीमा से नेपाल के प्रवेश मार्गों पर अवरोध पैदा किये हैं जिससे भारत से कोई आपूर्ति संभव नहीं हो पा रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि मधेस की जनता नए संविधान से असंतुष्ट है और वह पिछले तीन महीनों से आन्दोलन कर रही हैउसे लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है और उसकी मागों को संविधान में संबोधित नहीं किया गया है. नेपाल के मौजूदा नेतृत्व से नाराज भारत सरकार ने मधेसी जनता के आन्दोलन की आड़ ले कर नेपाल को सबक सिखाने के मकसद से पहले तो प्रत्यक्ष तौर पर और फिर अप्रत्यक्ष तौर पर नाकाबंदी की है.


    इस स्थिति ने नेपाल की जनता के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया हैइस संकट की चपेट में पहाड़ और तराई दोनों क्षेत्र की आबादी है. आज देश के अंदर न तो पेट्रोल है और न खाना बनाने की गैसअस्पतालों में दवाएं बिलकुल ख़त्म हैं और उनकी पूरी ज़िन्दगी तहस-नहस हो गयी है. उनकी हालत किसी युद्ध-पीड़ित देश के नागरिक जैसी हो गयी है. पहाड़ और तराई के बीच तथा समग्र नेपाल और भारत के बीच अन्तर्विरोध खतरनाक रूप लेते जा रहे हैं. यह अन्तर्विरोध महज सरकारों के बीच नहीं बल्कि जनता के बीच भी विकसित होने लगा है.


    यह स्थिति बहुत चिंताजनक है. मधेस क्षेत्र और तराई सहित नेपाल की जनता के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए हम चाहते हैं कि बातचीत के जरिये समस्या का जल्द से जल्द समाधान हो. भारत सरकार इसे झूठे सम्मान का विषय न बना कर इस 'अनऑफीसियल ब्लाकेडको फ़ौरन ख़त्म करे.


    इस समूचे मामले पर विचार करने के लिए हमने नेपाल के अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर एक बैठक बुलाई है. हम चाहते हैं कि आप इसमें शामिल हों और अपनी राय रखें.


    विषय : नेपाल का मौजूदा संकट और भारत

    तिथि : 4 दिसम्बर 2015, दिन के 3 बजे.

       स्थान : सेमिनार हॉल, एन. डी. तिवारी भवन,

                              (गाँधी शांति प्रतिष्ठान के बगल में), दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नयी दिल्ली

     

    आनंद स्वरूप वर्मा

    'समकालीन तीसरी दुनिया'की ओर से.

    Phone: 9810720714


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    साजिशों की दास्तान "आपरेशन अक्षरधाम"

    समीक्षा - अवनीश कुमार

    c-2, Peepal wala Mohalla,
    Badli Ext. Delhi-42
    (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

    "आपरेशन अक्षरधाम"हमारे राज्यतंत्र और समाज के भीतर जो कुछ गहरे सड़ गल
    चुका है, जो भयंकर अन्यापूर्ण और उत्पीड़क है, का बेहतरीन आलोचनात्मक
    विश्लेषण और उस तस्वीर का एक छोटा सा हिस्सा है।

    24 सितंबर 2002 को  हुए गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हमले को अब करीब 13
    साल बीत चुके हैं। गांधीनगर के सबसे पॉश इलाके में स्थित इस मंदिर में
    शाम को हुए एक 'आतंकी'हमले में कुल 33 निर्दोष लोग मारे गए थे। दिल्ली
    से आई एनएसजी की टीम ने वज्रशक्ति नाम से आपरेशन चलाकर दो फिदाईनो को
    मारने का दावा किया था। मारे गए लोगों से उर्दू में लिखे दो पत्र भी
    बरामद होने का दावा किया गया जिसमें गुजरात में 2002 में राज्य प्रायोजित
    दंगों में मुसलमानों की जान-माल की हानि का बदला लेने की बात की गई थी।
    बताया गया कि दोनो पत्रों पर तहरीक-ए-किसास नाम के संगठन का नाम लिखा था।

    इसके बाद राजनीतिक परिस्थितियों में जो बदलाव आए और जिन लोगों को उसका
    फायदा मिला यह सबके सामने है और एक अलग बहस का विषय हो सकता है। इस मामले
    में जांच एजेंसियों ने 6 लोगों को आतंकियों के सहयोगी के रूप में
    गिरफ्तार किया था जो अंततः सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पूरी तरह
    निर्दोष छूट गए। यह किताब मुख्य रूप से जिन बिंदुओं पर चर्चा करती है
    उनमें पुलिस, सरकारी जांच एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों तथा निचली
    अदालतों और उच्च न्यायालय तक की कार्यप्रणालियों और सांप्रदायिक चरित्र
    का पता चलता है। यह भी दिखता है कि कैसे राज्य इन सभी प्रणालियों को
    हाइजैक कर सकता है और किसी एक के इशारे पर नचा सकता है।

    आपरेशन अक्षरधाम'मुख्य रूप से उन सारी घटनाओं का दस्तावेजीकरण और
    विश्लेषण है जो एक सामान्य पाठक के सामने उन घटनाओं से जुड़ी कड़ियों को
    खोलकर रख देता है। यह किताब इस मामले के हर एक गवाह, सबूत और आरोप को
    रेशा-रेशा करती है। मसलन इस 'आतंकी'हमले के अगले दिन केंद्रीय
    गृहमंत्रालय ने दावा किया कि मारे गए दोन फिदाईन का नाम और पता मुहम्मद
    अमजद भाई, लाहौर, पाकिस्तान और हाफिज यासिर, अटक पाकिस्तान है। जबकि
    गुजरात पुलिस के डीजीपी के चक्रवर्ती ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के दावे
    से अपनी अनभिज्ञता जाहिर की और कहा कि उनके पास इस बारे में कोई जानकारी
    नहीं है।

    इसी तरह पुलिस के बाकी दावों जैसे फिदाईन मंदिर में कहां से घुसे, वे किस
    गाड़ी से आए और उन्होने क्या पहना था, के बारे में भी अंतर्विरोध बना
    रहा। पुलिस का दावा और चश्मदीद गवाहों के बयान विरोधाभाषी रहे पर
    आश्चर्यजनक रूप से पोटा अदालत ने इन सारी गवाहियों की तरफ से आंखें मूंदे
    रखी।

    चूंकि यह एक आतंकी हमला था इसलिए इसकी जांच ऐसे मामलों की जांच के लिए
    विशेष तौर पर गठित आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) को सौंपी गई। लेकिन
    इसमें तब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई जब तक कि एक मामूली चेन स्नेचर समीर
    खान पठान को पुलिस कस्टडी से निकालकर उस्मानपुर गार्डेन में एक फर्जी
    मुठभेड़ में मार नहीं दिया गया। अब इस मामले में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी
    जेल में हैं। इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट में लिखा गया – "कि पठान
    मोदी और अन्य भाजपा नेताओं को मारना चाहता था। उसे पाकिस्तान में आतंकवाद
    फैलाने का प्रशिक्षण देने के बाद भारत भेजा गया था। यह ठीक उसके बाद हुआ
    जब पेशावर में प्रशिक्षित दो पाकिस्तानी आतंकवादी अक्षरधाम मंदिर पर हमला
    कर चुके थे।"मजे की बात ये थी इसके पहले अक्षरधाम हमले के सिलसिले में
    25 सितंबर 2002 को जी एल सिंघल द्वारा लिखवाई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट में
    मारे गए दोनो फिदाईन के निवास और राष्ट्रीयता का कहीं कोई जिक्र नहीं था!

    28 अगस्त 2003 की शाम को साढ़े 6 बजे एसीपी क्राइम ब्रांच  अहमदाबाद के
    दफ्तर पर  डीजीपी कार्यालय से फैक्स  आया जिसमें निर्देशित  किया गया था
    कि अक्षरधाम  मामले की जांच क्राइम  ब्रांच को तत्काल प्रभाव  से एटीएस
    से अपने हाथ  में लेनी है। इस फैक्स के मिलने के बाद एसीपी जीएल सिंघल
    तुरंत एटीएस आफिस चले गए जहां से उन्होने रात आठ बजे तक इस मामले से
    जुड़ी कुल 14 फाइलें लीं। इसके बाद शिकायतकर्ता से खुद ब खुद वे
    जांचकर्ता भी बन गए और अगले कुछ ही घंटों में उन्होने अक्षरधाम मामले को
    हल कर लेने और पांच आरोपियों को पकड़ लेने का चमत्कार कर दिखाया। इस
    संबंध में जीएल सिंघल का पोटा अदालत में दिए बयान के मुताबिक – "एटीएस की
    जांच से उन्हें कोई खास सुराग नहीं मिला था और उन्होने पूरी जांच खुद नए
    सिरे से 28 अगस्त 2003 से शुरू की थी।"और इस तरह अगले ही दिन यानी 29
    अगस्त को उन्होने पांचों आरोपियों को पकड़ भी लिया। पोटा अदालत को इस बात
    भी कोई हैरानी नहीं हुई।

    परिस्थितियों को देखने के बाद ये साफ था कि पूरा मामला पहले से तय कहानी
    के आधार पर चल रहा था। जिन लोगों को 29 अगस्त को गिरफ्तार दिखाया गया
    उन्हें महीनों पहले से क्राइम ब्रांच ने अवैध हिरासत में रखा था, जिसके
    बारे में स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन भी किया था। जिन लोगों को "गायकवाड़
    हवेली"में रखा गया था वे अब भी उसकी याद करके दहशत से घिर जाते हैं।
    उनको अमानवीय यातनाएं दी गईं, जलील किया गया और झूठे हलफनामें लिखवाए गए।
    उन झूठे हलफनामों के आधार पर ही उन्हें मामले में आरोपी बनाया गया और
    मामले को हल कर लेने का दावा किया गया।

    किताब में इस बात की विस्तार से चर्चा है कि जिन इकबालिया बयानों के आधार
    पर 6 लोगों को आरोपी बना कर गिरफ्तार किया गया था, पोटा अदालत में बचाव
    पक्ष की दलीलों के सामनें वे कहीं नहीं टिक रहे थे। लेकिन फिर भी अगर
    पोटा अदालत की जज सोनिया गोकाणी ने बचाव पक्ष की दलीलों को अनसुना कर
    दिया तो उसकी वजह समझने के लिए सिर्फ एक वाकए को जान लेना काफी होगा।
    --"मुफ्ती अब्दुल कय्यूम को लगभग डेढ़ महीने के ना काबिल-ए-बर्दाश्त
    शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के बाद रिमांड खत्म होने के एक दिन पहले 25
    सितंबर को पुरानी हाईकोर्ट नवरंगपुरा में पेश किया गया जहां पेशी से पहले
    इंस्पेक्टर वनार ने उन्हें अपनी आफिस में बुलाया और कहा कि वह जानते हैं
    कि वह बेकसूर हैं लेकिन उन्हें परेशान नहीं होना चाहिए, वे उन्हें बचा
    लेंगे। वनार ने उनसे कहा कि उन्हें किसी अफसर के सामने पेश किया जाएगा जो
    उनसे कुछ कागजात पर हस्ताक्षर करने को कहेंगे जिस पर उन्हें खामोशी से
    अमल करना होगा। अगर उन्होने ऐसा करने से इंकार किया या हिचकिचाए तो
    उन्हें उससे कोई नहीं बचा पाएगा क्योंकि पुलिस वकील जज सरकार अदालत सभी
    उसके हैं।"

    दरअसल सच तो ये था कि बाकी सभी लोगों के साथ ऐसे ही अमानवीय पिटाई और
    अत्याचार के बाद कबूलनामें लिखवाए गए थे और उनको धमकियां दी गईं कि अगर
    उन्होने मुंह खोला तो उनका कत्ल कर दिया जाएगा। लेकिन क्राइम ब्रांच की
    तरफ से पोटा अदालत में इन इकबालिया बयानों के आधार पर जो मामला तैयार
    किया गया था, अगर अदालत उसपर थोड़ा भी गौर करती या बचाव पक्ष की दलीलों
    को महत्व देती तो इन इकबालिया बयानों के विरोधाभाषों के कारण ही मामला
    साफ हो जाता, पर शायद मामला सुनने से पहले ही फैसला तय किया जा चुका था।
    किताब में इन इकबालिया बयानों और उनके बीच विरोधाभाषों का सिलसिलेवार
    जिक्र किया गया है।

    इस मामले में हाइकोर्ट का फैसला भी कल्पनाओं से परे था। चांद खान, जिसकी
    गिरफ्तारी जम्मू एवं कश्मीर पुलिस ने अक्षरधाम मामले में की थी, के सामने
    आने के बाद गुजरात पुलिस के दावे को गहरा धक्का लगा था। जम्मू एवं कश्मीर
    पुलिस के अनुसार अक्षरधाम पर हमले का षडयंत्र जम्मू एवं कश्मीर में रचा
    गया था जो कि गुजरात पुलिस की पूरी थ्योरी से कहीं मेल नहीं खाता था।
    लेकिन फिर भी पोटा अदालत ने चांद खान को उसके इकबालिया बयान के आधार पर
    ही फांसी की सजा सुनाई थी।

    लेकिन इस मामले में हाइकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा – "वे अहमदाबाद,
    कश्मीर से बरेली होते हुए आए। उन्हें राइफलें, हथगोले, बारूद और दूसरे
    हथियार दिए गए। आरोपियों ने उनके रुकने, शहर में घुमाने और हमले के स्थान
    चिन्हित करने में मदद की।"जबकि अदालत ने आरोपियों का जिक्र नहीं किया।
    शायद इसलिए कि आरोपियों के इकबालियाय बयानों में भी इस कहानी का कोई
    जिक्र नहीं था। जबकि पोटा अदालत में इस मामले के जांचकर्ता जीएल सिंघल
    बयान दे चुके थे कि उनकी जांच के दौरान उन्हें चांद खान की कहीं कोई
    भूमिका नहीं मिली थी। लेकिन फिर भी हाइकोर्ट ने असंभव सी लगने वाली इन
    दोनो कहानियों को जोड़ दिया था और इस आधार पर फैसला भी सुना दिया।

    इसी तरह हाइकोर्ट के फैसले में पूर्वाग्रह और तथ्य की अनदेखी साफ नजर आती
    है जब कोर्ट ये लिखती है कि "27 फरवरी 2002 को गोधरा में ट्रेन को जलाने
    की घटना के बाद, जिसमें कुछ मुसलमानों ने हिंदू कारसेवकों को जिंदा जला
    दिया था, गुजरात के हिंदुओं में दहशत फैलाने और गुजरात राज्य के खिलाफ
    युद्ध छेड़ने की आपराधिक साजिश रची गई।"जबकि गोधरा कांड के मास्टरमाइंड
    बताकर पकड़े गए मौलाना उमर दोषमुक्त होकर छूट चुके हैं और जस्टिस यूसी
    बनर्जी कमीशन, जिसे ट्रेन में आग लगने के कारणों की तफ्तीश करनी थी, ने
    अपनी जांच में पाया था कि आग ट्रेन के अंदर से लगी थी। इसी तरह हाइकोर्ट
    ने बहुत सी ऐसी बातें अपने फैसले में अपनी तरफ से जोड़ दीं, जो न तो
    आरोपियों के इकबालिया बयानों का हिस्सा थी और न ही जांचकर्ताओं ने पाईं।
    और इस तरह पोटा अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए मुफ्ती अब्दुल कय्यूम,
    आदम अजमेरी, और चांद खान को फांसी, सलीम को उम्र कैद, मौलवी अब्दुल्लाह
    को दस साल और अल्ताफ हुसैन को पांच की सजा सुनाई।

    इसी तरह हाइकोर्ट ने इन आरोपों को कि ये षडयंत्र सउदी अरब में रचा गया और
    आरोपियों ने गुजरात दंगों की सीडी देखी थी और आरोपियों ने इससे संबंधित
    पर्चे और सीडी बांटीं जिसमें दंगों के फुटेज थे, को जिहादी साहित्य माना।
    सवाल ये उठता है कि अगर कोई ऐसी सीडी या पर्चा बांटा भी गया जिसमें
    गुजरात दंगों के बारे में कुछ था तो उसे जिहादी साहित्य कैसे माना जा
    सकता है। हालांकि अदालतें अपने फैसलों में अपराध की परिभाषा भी देती हैं
    उसके आधार पर किसी कृत्य को आपराधिक घोषित करती हैं पर इस फैसले में सउदी
    अरब में रह रहे आरोपियों को जिहादी साहित्य बांटने का आरोपी तो बताया गया
    है पर जिहादी साहित्य क्या है इसके बारे में कोई परिभाषा नहीं दी गई है।

    आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने क्रमवार 9 बिंदुओं पर अपना विचार रखते हुए
    सभी आरोपियों को बरी किया। सर्वोच्च न्यायलय ने माना कि इस मामले में
    जांच के लिए अनुमोदन पोटा के अनुच्छेद 50 के अनुरूप नहीं था। सर्वोच्च
    न्यायलय ने यह भी कहा कि आरोपियों द्वारा लिए गए इकबालिया बयानों को दर्ज
    करने में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय नियमों की अनदेखी की गई। जिन दो
    उर्दू में लिखे पत्रों को क्राइम ब्रांच ने अहम सबूत के तौर पर पेश किया
    था उन्हें भी सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। फिदाईन की पोस्टमार्टम
    रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत ने कहा – "जब फिदाईन के सारे कपड़े खून
    और मिट्टी से लथपथ हैं और कपड़ों में बुलेट से हुए अनगिनत छेद हैं तब
    पत्रों का बिना सिकुड़न के धूल-मिट्टी और खून के धब्बों से मुक्त होना
    अस्वाभाविक और असंभ्व है।"इस तरह सिर्फ इकबालिया बयानों के आधार पर किसी
    को आरोपी मानने और सिर्फ एक आरोपी को छोड़कर सभी के अपने बयान से मुकर
    जाने के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने सारे आरोपियों
    को बरी कर दिया।

    हालांकि ये सवाल अब भी बाकी है कि अक्षरधाम मंदिर पर हमले का जिम्मेदार
    कौन है। इसलिए लेखकद्वय ने इन संभावनाओं पर भी चर्चा की है और खुफिया
    विभाग के आला अधिकारियों के हवाले से वे ये संभावना जताते हैं कि इस हमले
    की राज्य सरकार को पहले से जानकारी थी। फिदाईन हमलों के जानकार लोगों के
    अनुभवों का हवाला देते हुए लेखकों ने यह शंका भी जाहिर की है क्या मारे
    गए दोनो शख्स सचमुच फिदाईन थे? इसके साथ ही इस हमले से मिलने वाले
    राजनीतिक फायदे और समीकरण की चर्चा भी की गई है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि किताब में कहीं भी कोरी कल्पनाओं का सहारा
    नहीं लिया गया है। इस पूरे मुकदमें से जुड़े एक-एक तथ्य को बटोरने में
    लेखकों को लंबा समय लगा है। मौके पर जा कर की गई पड़तालों, मुकदमें में
    पेश सबूतों, गवाहियों, रिपोर्टों और बयानों की बारीकी से पड़ताल की गई है
    और इन सारी चीजों को कानून सम्मत दृष्टिकोण से विवेचना की गई है। यह
    किताब, राज्य सरकार की मशीनरी और खुफिया एजेंसियों, अदालतों तथा राजनीतिक
    महत्वाकांक्षा की साजिशों की एक परत-दर-परत अंतहीन दास्तान है।

    "आपरेशन अक्षरधाम"
    (उर्दू हिंदी  में एक साथ प्रकाशित)
    लेखक – राजीव यादव, शाहनवाज आलम
    प्रकाशक – फरोश मीडिया
    डी-84, अबुल फजल इन्क्लेव
    जामिया नगर, नई दिल्ली-110025

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  • 11/30/15--06:55: Bajrangi Linguistics

  •  
    Priyanshu Bhatt commented on your photo.
     
       
    Priyanshu Bhatt
    November 30 at 7:16pm
     
    abe chu.........be........... abe sabse pahle ye bata do yaha per RSS ne kiya kya hai??? tumhare baap ka khoon kiya ya tumare bachho ko bumb se uda diya??? kabhi dekha bumb bisphot se mrne walo ko??? nahi dekha kyuki wo tumhare nahi the......... kisne mara mullo ne mara....... unke sathi kon the india ke muslim...... abe ab dekho gaddar kon nikla india ka gaddar muslim jise tum jaise gaddro ne BSF me bharti krwaya tha..wahi kom gaddar nikli...... jis din tera ya tumhar beta aatnki hamle me mara jayega us din tum jaise mullo ko samajh me aayega.........ki dard kya hota hai tumhe to usi dard se roti senkni hai ki kab tum ya tumhari party ko vote mile tumhe note mile............... bina reason ke bhadwa post mt dala kro
     
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    I am so glad because Ashk ji used to interct on this novel with me while I used to discuss with him in on America se savdhan.


    Ashkji treated this novel as any master would treat his masterpiece.

    I am grateful to Neelabhji that he shares this information and it soothes my heart in the deepest level as I know that Ashkji had been so much worried about the completion of this novel.

    But he completed with his brand remained intact.

    I have more causes to celebrate because my heart has been always full of inspiration while ,whenever I did read the Gang of Four. 

    Ashkji,Manto,Krishnachander and rajinder Singh Bedi. 

    Congrats.

    However I could not pay respect to his wish that he wanted me to complete America se savdhan and it has never to be published !

    I am sure Girti Deeren would be a grand Success!



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    ১৭টি বন্ধ চা বাগানের ১৪০০ শ্রমিক (আনুমানিক) মারা গেছেন অনাহার আর অপুষ্টিতে!

    1400 hundred starving workers of Bengal tea Gardens succumbed!

    ২০০০ থেকে ২০১৫ – ১৭টি বন্ধ চা বাগানের ১৪০০ শ্রমিক (আনুমানিক) মারা গেছেন অনাহার আর অপুষ্টিতে। আমাদের সহ নাগরিকেরা খেতে না পেয়ে মারা যাচ্ছেন; আরও কত আগুনিত চা-শ্রমিক অর্ধাহারে-অনাহারে দিন কাটাচ্ছেন আর একটু একটু করে এগিয়ে চলেছে্ন এক বেদনাদায়ক নিশ্চিত মৃত্যুর দিকে, আমরা জানি না। কিন্ত আমরা কি শুধুই দেখবো আর চায়ের পেয়ালায় তুফান ছুটিয়ে আলোচনায় মগ্ন থাকবো? নাকি এদের এই ভয়ঙ্কর বিপদের দিনে তাদের পাশে দাঁড়াবো? বন্ধুরা – আমাদের পথ দেখান। আপনাদের নির্দিষ্ট মতামত জানান। আপনাদের দেওয়া উপদেশগুলিকে একত্রিত করেই আমরা আমাদের ভবিষ্যৎ কার্যক্রম ঠিক করবো। আপনাদের উপদেশের অপেক্ষায় "মানুষের সাথে মানুষের পাশে"-র এডমিন টিম।

    বিঃদ্রঃ সবাকার কাছে অনুরধ, দয়া করে আপনাদের অভিমত/উপদেশগুলি কমেন্ট করুন। শুধু লাইক করবেন না।


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  • 12/01/15--08:13: पाकिस्तान की इस बच्ची ने जो कहा है उसे एक बार जरूर सुनें!#Extension Oil War #Reforms#IMF#World Bank #Mandal VS #Kamandal#Manusmriti हम उनसे अलग कहां हैं हिंदू राष्ट्र बनकर भी हम क्यों बन गये पाकिस्तान,अमेरिका का उपनिवेश? वेदमंत्र में हर मुश्किल आसान,हिंदुत्व एजंडा फिर क्यों मुक्त बाजार और सुधार पर खामोशी क्यों समता और समामाजिक न्याय और हमारे नुमाइंदे क्यों खामोश? बंगाल में 35 साल के राजकाज गवाँने के बाद कामरेडों को यद आया कि रिजर्वेशन कोटा लागू नहीं और धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण के मुकाबला फिर बहुजन समाज की याद बंगाल में भी मंडल बनाम कमंडल? উগ্র হিন্দুত্ববাদের বিরুদ্ধে লড়াই করার শপথ নিতে । জাতপাত নিয়ে লড়াই করা দাঙ্গাবাজ বিজেপিকে পরাস্ত করা এবং তৃণমুল নামক জঙ্গি সংগঠন কে স্বমুলে নির্মুল করার শপথ নিতে আগামি ২৭শে ডিসেম্বর২০১৫ । বামফ্রন্টের ডাকে ব্রিগেড সমাবেশে দলে দলে যোগ দিন । आज का मनुष्यता और मेहनतकशों की दुनिया को मेरा यह संबोधन कोई एक्टिविज्म या सहिष्णुता असहिष्णुता बहस नहीं है। हम अस्सी के दशक और नब्वे के दशक से शुरु आर्थिक सुधार,राजनीतिक अस्थिरता, हत्याओं, कत्लेआम, त्रासदियों, निजीकरण

  • https://youtu.be/tkefnIAXJds


    पाकिस्तान की इस बच्ची ने जो कहा है उसे एक बार जरूर सुनें!#Extension Oil War #Reforms#IMF#World Bank #Mandal VS #Kamandal#Manusmriti

    हम उनसे अलग कहां हैं हिंदू राष्ट्र बनकर भी हम क्यों बन गये पाकिस्तान,अमेरिका का उपनिवेश?

    वेदमंत्र में हर मुश्किल आसान,हिंदुत्व एजंडा फिर क्यों मुक्त बाजार और सुधार पर  खामोशी क्यों समता और समामाजिक न्याय और हमारे नुमाइंदे क्यों खामोश?

    बंगाल में 35 साल के राजकाज गवाँने के बाद कामरेडों को यद आया कि रिजर्वेशन कोटा लागू नहीं और धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण के  मुकाबला फिर बहुजन समाज  की याद बंगाल में भी मंडल बनाम कमंडल?

    উগ্র হিন্দুত্ববাদের বিরুদ্ধে লড়াই করার শপথ নিতে ।

    জাতপাত নিয়ে লড়াই করা দাঙ্গাবাজ বিজেপিকে পরাস্ত করা এবং তৃণমুল নামক জঙ্গি সংগঠন কে স্বমুলে নির্মুল করার শপথ নিতে আগামি ২৭শে ডিসেম্বর২০১৫ ।

    বামফ্রন্টের ডাকে ব্রিগেড সমাবেশে দলে দলে যোগ দিন ।

    आज का मनुष्यता और मेहनतकशों की दुनिया को मेरा यह संबोधन कोई एक्टिविज्म या सहिष्णुता असहिष्णुता बहस नहीं है।

    हम अस्सी के दशक और नब्वे के दशक से शुरु आर्थिक सुधार,राजनीतिक  अस्थिरता, हत्याओं, कत्लेआम, त्रासदियों, निजीकरण,उदारीकरण ग्लोबीकरण,इस्लामोफोबिया,तेल युद्ध,संसदीयआम सहमति और सियासत के तमाशे की हरिकथा अनंत बांच रहे हैं आज अकादमिक और आफिसियल वर्सन के साथोसाथ नई पीढ़ियों के लिए खासकर।पढ़ते रहें हस्तक्षेप।छात्रों के लिए बहुत काम की चीज है।सुनते रहे हमारे प्रवचन मुक्ति और मोक्ष के लिए।

    पलाश विश्वास

    Sanjit Kumar Mondal's photo.


    गौर करें कि 1991 के फर्स्ट स्ट्राइक और मरुआंधी से पहले 1988 में सलमान रश्दी के सैटेनिक वर्सेज बजरिये इस्लामोफोबिया।उससे पहले याद करें अफगानिस्तान में सोवियत संघ का आत्मघाती हस्तक्षेप और तालिबान का सृजन,लहुलूहान पंजाब और असम और त्रिपुरा और इसी प्रसंग में चंद्रशेखर के शासनकाल में भुगतान संतुलन संकट और विश्वबैंक,मुद्राकोष के तमाम आंकड़े और शर्ते ,जिसके मुताबिक तब से लेकर अब तक वैश्विक वित्तीयसंस्तानों के हवाले भारत की राजनीति,अर्थव्यवस्था,आस्था और धर्म।

    गौर करें 1971 का बांग्लादेश युद्ध,समाजवादी माडल और निर्गुट आंदोलन,सोवियत बारत मैत्री और सत्तर का दशक।


    फिर याद करें,आपरेशन ब्लू स्टार,इंदिरा गांधी की हत्या और सिखों का नरसंहार,राममंदिर आंदोलन का शंखनाद,राजीव का राज्याभिषेक,श्रीलंका में हस्तक्षेप,फिर राजीव की निर्मम हत्या और अमेरिकी परस्त ताकतों का उत्थान हिंदुत्व का पुनरूत्थान।


    याद करें हरितक्रांति,भोपाल गैस त्रासदी,बाबरी विध्वंस,आरक्षण विरोधी आत्मदाह आंदोलन और राजनीतिक अस्थिरता,अल्पमत सरकारों का संसदीय सहमति से पूंजी बाजार के हित में आर्थिक सुधार कार्यक्रम का पूरा टाइमलाइन 1991 से जो तेलयुद्ध का विस्तार है और भारत जिस वजह से अनंत युद्धस्थल है और हिंदुत्व की वैदिकी संस्कृति के नाम धर्म के नाम अधर्म की जनिविरोधी बेदखली नरसंहार संस्कृति का बेलगाम अस्वमेध और राजसूय।


    आज का मनुष्यता और मेहनतकशों की दुनिया को मेरा यह संबोधन कोई एक्टिविज्म या सहिष्णुता असहिष्णुता बहस नहीं है।

    हम अस्सी के दशक और नब्वे के दशक से शुरु आर्थिक सुधार,राजनीतिक  अस्थिरता, हत्याओं, कत्लेआम, त्रासदियों, निजीकरण,उदारीकरण ग्लोबीकरण,इस्लामोफोबिया,तेल युद्ध,संसदीयआम सहमति और सियासत के तमाशे की हरिकथा अनंत बांच रहे हैं आज अकादमिक और आफिसियल वर्सन के साथोसाथ नई पीढ़ियों के लिए खासकर।


    पढ़ते रहें हस्तक्षेप।

    छात्रों के लिए बहुत काम की चीज है।

    सुनते रहे हमारे प्रवचन मुक्ति और मोक्ष के लिए।


    यह विशुद्ध प्रोपेशनल जर्नलिज्म है हालांकि मैं एक मामूली सबएडीटर हूं लेकिन इंडियन एक्सप्रेस समूह के संपादकीय डेस्क से मैंने यह दुनिया पल पल बदलते बिगड़ते देखा है तो दैनिक जागरण और दैनिक अमर उजाला में बाकायदा डेस्क प्रभारी बतौर कमसकम आठ साल और,कुल 35 साल यानी सत्तर और अस्सी के दशक का खजाना मेरे पास है।


    आपको कोई खुल जा सिम सिम कहना नहीं है।


    1980 में हमने जब पत्रकारिता शुरु की,तब जो बच्चा पैदा हुआ,मेरे रिटायर करते वक्त वे 36 साल के हो जाेंगे।जो तब 12 साल का था टीन एजर भी न था,उसकी उम्र 48 साल होगी।


    इन तमाम लोगों और लुगाइयों को दिमाग में रखकर मैंने आज आर्थिक सुधार,विश्वबैंक और आईएमएफ के नौकरशाहों के हवाले भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था,बाबासाहेब के संविधान की ऐसी की तैसी ,कानून की राज की ऐसी की तैसी,भारतीयगणतंत्र और लोकगणराज्य की ऐसी की तैसी,समता और सामाजिक न्याय की ऐसी की तैसी का फूल नजारा राज्यसभा टीवी के सौजन्य से ताजा ग्लोबल देसी अपडेट के साथ साथ,रिजर्व बैंक के गवर्नर और भारत के वित्त मंत्री के उच्चविचार के साथ साथ फूल अकादमिक डिस्कासन Economic reforms in India,IMF,world bank,1991 के साथ साथ संसद शीत सत्र लाइव के साथ मध्यपूर्व से लेकर दुनिया के हर कोने पर नजर,नेपाल में भारत के हस्तक्षेप,आर्थिक नाकेबंदी,मौसम की चिंता,मानसरोवर में गंगा के उद्गम और भारत से बेदखल हिमालयके रिसते जख्मों,सूखते मरुस्थल में तब्दील होते ग्लेशियरों के साथ जस का तस कमंडल बनाम मंडल गृहयुद्ध और तेल युद्ध के विस्तार भारत युद्धस्थल का विजुअल पोस्टमार्टम पेश किया है।


    कल बहुत जटिल लिखा था।अमलेंदु तक को बहुतै तकलीफ हुई और आज शाम को कल दिन में लिखा वह साझा कर सका।उसका धन्यवाद और अभिषेकवा का भी धन्यवाद की सुबोसुबो गू का छिड़काव हम कर रहे हैं विशुद्धता के तंत्र मंत्र यंत्र तिलिस्म  पर।


    बुरा मत मानिये हम फिर वहीं नबारुणदा हर्बर्ट हैं या फैताड़ु बोंहबाजाक हैं,जिसके बारे में हमने खुलासा किया है।हमारा लिखा रवींद्र का दलित विमर्श भी नहीं है न दलितआत्मकथा गीतांजलि है।

    आज जियादा पादै को नहीं है।


    पाकिस्तान की बिटिया ने जो करारा प्रहार पाकिस्तान की इकोनामी और राजनीति,अमेरिकापरस्ती पर किये हैं,उसके आगे उस बिटिया को सलाम कहने के अलावा कोई चारा नहीं है।आप हमारा वीडियो भले न देखें,पाकिस्तान की उस बिटिया जिंदाबाद जिंदाबन को जरुर सुन लेना और वीडियो से बाहिर निकल आना,यही निवेदन है।


    पांचजन्‍यमें नोबेल लारिटवा का इंटरव्यू बांचि  लेब तो रमाचरित मानस का कहि वेद उद सब भूलि जाई।सबसे पहिले हमारे मेले में बिछुड़वला बानी सगा भाई अभिषेक ने इसे ससुरे जनपथ पर हग दिहिस तो हमउ छितरा दिहल का,समझ जाइयो।पूरा इंटर ब्यू हम दे नाही सकत।नौबेल लारिटवा के उद्गार में चूं चूंकर जो सहिष्णुता ह ,वही इस देश का सामजिक यथार्थ है और विद्वतजनों का ससोने में मढ़ा गढ़ा चरित्रउ।विस्तार से हमउ लिखल रहल बानी,देखत रह हस्तक्षेप आउर हमार तमामो ब्लाग।


    शांति के लिए नोबल पुरस्‍कार मिलने के बाद कैलाश सत्‍यार्थी की सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया बेहद कम देखने में आई है। इधर बीच उन्‍होंने हालांकि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्‍यको एक लंबा साक्षात्‍कार दिया है जो 9 नवंबर को वहां प्रकाशित हुआ है। उससे दो दिन पहले बंगलुरु प्रेस क्‍लब में उन्‍होंने समाचार एजेंसी पीटीआइ से बातचीतमें कहा था कि देश में फैली असहिष्‍णुता से निपटने का एक तरीका यह है कि यहां की शिक्षा प्रणाली का ''भारतीयकरण'' कर दिया जाए। उन्‍होंने भगवत गीता को स्‍कूलों में पढ़ाए जाने की भी हिमायत की, जिसकी मांग पहले केंद्रीय मंत्री सुषमा स्‍वराज भी उठा चुकी हैं।

    पांचजन्‍यका पहिला सवालः

    नोबल पुरस्कार ग्रहण करते समय आपने अपने भाषण की शुरुआत वेद मंत्रों से की थी। इसके पीछे क्या प्रेरणा थी?

    जवाब में नोबेल लारिटवा का यह उद्गारः

    शांति के नोबल पुरस्कार की घोषणा के बाद जब मुझे पता चला कि भारत की मिट्टी में जन्मे किसी भी पहले व्यक्ति को अब तक यह पुरस्कार नहीं मिल पाया है तो मैं बहुत गौरवान्वित हुआ। अपने देश और महापुरुषों के प्रति नतमस्तक भी। मैंने सोचा कि दुनिया के लोगों को शांति और सहिष्णुता का संदेश देने वाली भारतीय संस्कृति और उसके दर्शन से परिचित करवाने का यह उपयुक्त मंच हो सकता है। मैंने अपना भाषण वेद मंत्र और हिंदी से शुरू किया। बाद में मैंने उसे अंग्रेजी में लोगों को समझाया। मैंने

    संगच्छध्वम् संवदध्वम् संवो मनांसि जानताम्

    देवा भागम् यथापूर्वे संजानानाम् उपासते!!

    का पाठ करते हुए लोगों को बताया कि इस एक मंत्र में ऐसी प्रार्थना, कामना और संकल्प निहित है जो पूरे विश्व को मनुष्य निर्मित त्रासदियों से मुक्ति दिलाने का सामर्थ्य रखती है। मैंने इस मंत्र के माध्यम से पूरी दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि संसार की आज की समस्याओं का समाधान हमारे ऋषि मुनियों ने हजारों साल पहले खोज लिया था। बहुत कम लोग जानते होंगे कि मैंने विदेशों में भारतीय संस्कृति और अध्यात्म पर अनेक व्याख्यान भी दिए हैं। मेरे घर में नित्य यज्ञ होता है। पत्नी सुमेधा जी ने भी गुरुकुल में ही पढ़ाई की हुई है।


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    We claim to be digital India! We boast for campus  recruitment maounting millions of dollar to make us techno Super Power!


    Chennai submerged because we fail to learn the ABCD of disaster management because we tend to create all bloody calamities and opt for self destruction.We ,the Indians!


    Here you are!


    My Tamilnadu! 


    My Dravidnadu submerged into water.


    Water logged Chennai!


    Water logged Dravid Nadu where Dravid Self Respect had been immersed in special Cinema Effects!


    The Tamilnadu which has nothing to do for the cause of suffering Dravid,Tamil Humanity and the Tamil Refugees and those who are stranded in Srilanka for biometric ethnic cleansing as we,the Indians are also habitual for biometric ethnic cleansing and infinite genocide culture.


    https://youtu.be/tkefnIAXJds


    पाकिस्तान की इस बच्ची ने जो कहा है उसे एक बार जरूर सुनें!#Extension Oil War #Reforms#IMF#World Bank #Mandal VS #Kamandal#Manusmriti

    हम उनसे अलग कहां हैं हिंदू राष्ट्र बनकर भी हम क्यों बन गये पाकिस्तान,अमेरिका का उपनिवेश?

    वेदमंत्र में हर मुश्किल आसान,हिंदुत्व एजंडा फिर क्यों मुक्त बाजार और सुधार पर  खामोशी क्यों समता और समामाजिक न्याय और हमारे नुमाइंदे क्यों खामोश?

    बंगाल में 35 साल के राजकाज गवाँने के बाद कामरेडों को यद आया कि रिजर्वेशन कोटा लागू नहीं और धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण के  मुकाबला फिर बहुजन समाज  की याद बंगाल में भी मंडल बनाम कमंडल?

    উগ্র হিন্দুত্ববাদের বিরুদ্ধে লড়াই করার শপথ নিতে ।

    জাতপাত নিয়ে লড়াই করা দাঙ্গাবাজ বিজেপিকে পরাস্ত করা এবং তৃণমুল নামক জঙ্গি সংগঠন কে স্বমুলে নির্মুল করার শপথ নিতে আগামি ২৭শে ডিসেম্বর২০১৫ ।

    বামফ্রন্টের ডাকে ব্রিগেড সমাবেশে দলে দলে যোগ দিন ।

    आज का मनुष्यता और मेहनतकशों की दुनिया को मेरा यह संबोधन कोई एक्टिविज्म या सहिष्णुता असहिष्णुता बहस नहीं है।

    हम अस्सी के दशक और नब्वे के दशक से शुरु आर्थिक सुधार,राजनीतिक  अस्थिरता, हत्याओं, कत्लेआम, त्रासदियों, निजीकरण,उदारीकरण ग्लोबीकरण,इस्लामोफोबिया,तेल युद्ध,संसदीयआम सहमति और सियासत के तमाशे की हरिकथा अनंत बांच रहे हैं आज अकादमिक और आफिसियल वर्सन के साथोसाथ नई पीढ़ियों के लिए खासकर।पढ़ते रहें हस्तक्षेप।छात्रों के लिए बहुत काम की चीज है।सुनते रहे हमारे प्रवचन मुक्ति और मोक्ष के लिए।

    Palash Biswas

    Indian Express Reports:


    Chennai under water, again

    Chennai under water, again

    The rains in Chennai have virtually broken a 100-year record with one day's rainfall covering a month's average. Tamil Nadu has announced holiday for schools and colleges while most of the factories and offices too closed. Residents of southern suburbs were the worst affected. When thousands of people who went to the city for work on Tuesday were stranded at different points en route after bus and train services stopped. Showers also lashed northern districts and Puducherry, disrupting flight movement and leaving several areas inundated. The meteorological office said the trough of low pressure was now over the southwest bay adjoining Sri Lanka off Tamil Nadu, and would bring more rain.


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  • 12/02/15--00:40: हमउ देखब सूरजवा की औकात कि काहे ना होब भोर! कायनात ह तो कबहुं ना टूटब इंसानियत का डोर! हमउ देखब कौन लाला ललिया घर फूंकन आवै हमार साथ! हमउ देखब कौन लाला ललिया पकड़े हमार हाथ! हमारे हुक्मरान ने जलयुद्ध में भारत को हरा दिया। हमारे हुक्मरान हिमालय हार गये। जुए में हार गये देश हमारे हुक्मरान! हमारी भावी पीढ़ियों के लिए न अन्न है और न जल। अफगानिस्ताम में सोवियत हस्तक्षेप याद है? वहींच ओरिजिनल सिन!पिद्दी समझकर महाबलि सोवियत संघ ने जो अफगानिस्तान में हस्तक्षेप कर दिया तो उसकी कोख से कैसे कैसे जिन्न निकले,बोल जमूरे! पलाश विश्वास
  • हमउ देखब सूरजवा की औकात कि काहे ना होब भोर!

    कायनात ह तो कबहुं ना टूटब इंसानियत का डोर!


    हमउ देखब कौन लाला ललिया घर फूंकन आवै हमार साथ!


    हमउ देखब कौन लाला ललिया पकड़े हमार हाथ!


    हमारे हुक्मरान ने जलयुद्ध में भारत को हरा दिया।

    हमारे हुक्मरान हिमालय हार गये।

    जुए में हार गये देश हमारे हुक्मरान!


    हमारी भावी पीढ़ियों के लिए न अन्न है और न जल।

    अफगानिस्ताम में सोवियत हस्तक्षेप याद है?


    वहींच ओरिजिनल सिन!पिद्दी समझकर महाबलि सोवियत संघ ने जो अफगानिस्तान में हस्तक्षेप कर दिया तो उसकी कोख से कैसे कैसे जिन्न निकले,बोल जमूरे!


    पलाश विश्वास

    सेमीनार: असहिष्णुता की चुनौती और सोशल मीडिया hastakshep.comके पांच साल पूरे होने व मानवाधिकार दिवस की पूर्व संघ्या पर


      



      

      


    Amalendu Upadhyaya invited you to Insaaf Abhiyan Uttar Pradesh's event



    सेमीनार: असहिष्णुता की चुनौती और सोशल मीडिया hastakshep.com के पांच साल पूरे होने व मानवाधिकार दिवस की पूर्व संघ्या पर


    Wednesday, December 9 at 3:00am








      



      








    सेमीनार: असहिष्णुता की चुनौती और सोशल मीडिया hastakshep.comके पांच साल पूरे होने व मानवाधिकार दिवस की पूर्व संघ्या पर शाम 3 बजे बुद्धवार, 9 दिसंबर 2015 यूपी प्रेस क्लब लखनऊ, उत्तर प्रदेश नागरिक प...






    अफगानिस्ताम में सोवियत हस्तक्षेप याद है?


    वहींच ओरिजिनल सिन!पिद्दी समझकर महाबलि सोवियत संघ ने जो अफगानिस्तान में हस्तक्षेप कर दिया तो उसकी कोख से कैसे कैसे जिन्न निकले,बोल जमूरे!




    अमेरिका को मौका चाहिए था।शीतयुद्ध तेल युद्ध में तब्दील हो गया कि जादू मंतर हो गया और जैसे टूटी सद्दाम की मूर्ति लाइव,वैसे ही टूटि गयो सोवियत संघ।


    तालिबान!

    अलकायादा!

    आइसिस!

    हमारे गांव जुआर में कहावत है,पाप ना छोड़े बाप!

    तालिबान,अलकायदा और आइसिस का नियोग अमेरिका से जो करवा रहे,उ सोवियत संग है।कर्मफल भी सध गया।


    पण जो नर्क रचि दीन्है,दुनिया उसी नर्क में धक धक जल रिया तेलकुंआ है।रूस चीन मिलकर भी भस्मासुर मार ना सकै।उ भस्मासुर इजराइल है।जिसके वध के लिए विष्णु भगवान का चक्र काम ना आई।उ चक्र ससुरा इजराइल भस्मासुर का रक्षाकवच ह।

    अमेरिका इजराइल का साझा उपक्रम अरब वसंत अब भारत में वसंत बहार है।हमार कुलो मतलब यहींच।


    कल हमने अपने प्रवचन में आर्थिक सुधार के कुलो किस्सा बांचि रहिस।देख लीज्यो।आज इसीलिए मोहलत है।आज प्रवचन नइखै।


    1991 में खाड़ी युद्ध में इराक पर जो बमवर्षा हुई रही,वह बमवर्षा इस महादेश के चप्पे चप्पे में हो रही।पाकिस्तानी बिटिया के भखन से हमने पाकिस्तान पेश कर दिया और हिंदुस्तान हमउ वानी।


    का मिलल बंटवारे से?

    पाकिस्तान में तबाही तो हिंदुस्तान में भी तबाही!

    सरहदों के आर पार तबाही और कयामत का मंजर!


    सरहदों के आर पार मुहब्बत का कत्लेआम!

    सरहदों के आर पार नफरत का अरब वसंत!


    सरहदों के आर पार अमेरिकी हितों की बम वर्षा।

    सरहदों के आर पार आतंक विरोधी जुध गृहजुध!


    सरहदों के आर पार भस्मासुर महाजिन्न जलवा!

    सरहदों के आर पार मनुस्मृति शासन घनघोर!


    सरहदों के आर पार रंगभेदी वंश वर्चस्व मूसलाधार।

    सरहदों के आरपार धर्म के नाम अधर्म अंधकार!



    अमेरिका और यूरोप के पाप का घड़ा भर गया है।


    आइलान की लाश नहीं थी वह।


    वह दरअसल अमन चैन की लाश है।


    जो दरअसल लाखोंलाख बह रही हैं समुंदर में ही नहीं,हर मुल्क की सरजमीं पर बह रही हैं लाखोंलाख आइलान की लाशें!


    खतरे में है इंसानियत और खतरे में कायनात!


    गोर्बाचेव याद हैं!

    पेरोस्त्रोइका याद है!


    सोवियत संघ की वह हरित क्रांति जिसने वहां कृषि की हत्या कर दी!क्योंकि गोर्बाचेव ने सोवियत संघ को मुक्तबाजार के हवाले कर दिया।अफगानिस्तान में हस्तक्षेप से सोवियत उतना नहीं टूटा जितना ग्लासनोस्त और पेरोस्त्राइका से टूटा।


    भारत में फिर वहीं ग्लासनोस्त!

    भारत में फिर वहीं पेरोस्त्राइका!

    इस पर तुर्रा अरब वसंत हाहाकार।


    वीडियो जरुर देख लें।

    सबूत विजुअल उसीमें दागे रहे।ग्राफिक ब्यौरे और आंकड़ें,दस्तावेज वहीं हैं क्योंकि आलेख में यह समेटना मुश्किल है।


    सबसे खतरनाक यह है कि हम नेपाल को अफगानिस्तान बनाने पर आमादा है क्योंकि सवियत हश्र से हमने कुछ सीखा नहीं है।सच से हमारा वास्ता नहीं है और हमारा धर्म मिथक है तो इतिहास भी हमने मिथकीय बना दिया है,जहां ज्ञान विज्ञान सच का निषेध है।


    हमने नेपाल चीन के हवाले कर दिया है और तबतक बहुतै देर हो जायेगी जब हमें पता चलेगाकि पूरा महादेश रेगिस्तान है और हमारी भावी पीढ़ियों के लिए न अन्न है और न जल।

    हमारे हुक्मरान ने जलयुद्ध में भारत को हरा दिया।

    हमारे हुक्मरान हिमालय हार गये।

    जुए में हार गये देश हमारे हुक्मरान!


    हमारी भावी पीढ़ियों के लिए न अन्न है और न जल।



    टिकट ना कटवाया ह ,तो कटवा लो प्लीज!पहुंच जाव लखनऊ!कुरुक्षेत्र वहींच बनेला ह!महाभारत के खिलाफो हो जौन,जौन हो धर्मोन्मादी कत्लेआम,आत्मघात के विरुध,जौन ह जाति स्थाई बंदोबस्त के मुक्तबाजारी रंगभेदी वंशवर्चस्व के जाति धरम आउर मजहबी सियासत,सियासती मजहब केे विरुध,टिकटवा मिलल कि ना मिलल,पहुंचे जाओ लखनऊ।


    सेना हमार भी कम नाही।इत उत भागतड़ा।चरनवाहा कोई नइखे कि मारे डंडा पिछवाड़े कि एइसन पांत में हो जाइ लामबंद फटाक से।तिलिसमवा भी टूटे फिर।अय्यार जो सगरे तलवार भांजे,मू से गू की बरसात करे जौ ससुर,ससुरी,वे तमाम लुंगी उठाइके भागे पिर देखो मदारी का खेल कि जमूरे वाह!


    एक सिपाहसालार को आजहुं शुबोशुबो धर लिहिस गरदनवा पकडिके।स्त कलंदर उ आपण यशवंतवा बेधड़क बदमाश!भड़ास पादै रहै जौन खूब।अब जित दखो तित मस्ती खूब कर रिया ह।


    गन्ना चूसत ह खेत मा सुसर! हमार करेजा तो धक धक धड़क गियो रे!बाप!का खेल दिखावै हो बाप!हमार बचपन मा दाखिल हुई रहा हमें बतावै बगैर!बदतमीज।ठोंक दिहिस खूब।शुबो सवेरे!

    ओ ससुर जो हगैके मूतेकै तमीज भी नइखे,उ सब पाद पादकै गंधा दियो माहौल सगरा आउर हमार अल्टरनेटिव मडिया जहां के तहां!


    एफोडीआई का उखाड़ लिहिस!छ महीने जरा वेइट करिके देखो,हमउ उतरैब मैदान मा!फिन देखब तमाशा तो तमासा दिखाइब खूब कि


    हमउ देखब सूरजवा की औकात कि काहे ना होब भोर!

    कायनात ह तो कबहुं ना टूटब इंसानियत का डोर!

    हमउ देखब कौन लाला ललिया घर फूंकन आवै हामर साथ!

    हमउ देखब कौन लाला ललिया पकड़े हमार हाथ!


    यशवंता वचन दिहिस रहै कि लखनभ पहंचे रहल वानी।सगरे सिपाहसालार पहुंचे रहल वानी।उ कहत रहे,हमउ लड़ब।जान लड़ाये देब।लामबंदी का काफिला ह तइयार।जो ससुरे इत उत भाग रहल वानी गरदन पकिड़ै के हमउ खींचिकै मोरचे पर तान दिब।


    हमउ कच्चा खिलाड़ी नाही कहल रहल वानी हमउ के ई चुदुर बुदुर से बदलबे ना कुछो।हमउ तुहार कातिर जो बम एटम बाम बारुद जमा किये रहल वानी,उ फेंके के चाहि ठिकाने पर के हमार भारत,भारत मा हमारे सगरे सगा सगा जो बिरादर तमामो नागरिक ह आम लोग आउर लुगाई जौन,उन तक खबर हो जाई कि जुध ह।

    हमउ जो सुर साधल रहल वानी,जो रेयाज तानेरहल वानी,जो गंगा हियां हमार दिल मा बहतड़,दिमाग मा बहतड़ एइसन कि गोमुख होकै गंगासागर तलक गंगास्नान जरुरत ना पड़ी कबहुं।


    कह गये संत रैदास कि मन चंगा तो कठौती मा गंगा।उ गंगा हमार दिल मा दिमाग मा।उ कठौती हमउ वानी।उ ससुरी गांगा खतरे मा बा।हिमालय खतरे मा।हम कहत बाड़न कि सुसर पहुंचों लखनऊ के बाद देहरादून।फिन सुंदरलाल बहुगुणा की अंकियन मां झांकेके चाहि।एकच अनंनत इंचरव्यू उनर चिपको आउर हिमालय पर चाहि।हमउ उसका टास्क सार्वनिक कर रहल बाड़न।के हमार दाज्यू राजीव नयन बहुगुणा कुछो कम मस्त कलंदर नइखै।सुर ताल साधेके उ भी संतन कम नइखै।ई कहो कि औघड़ बाबा साक्षात। हमार यशवंत कम नइखे,जानत हो।दुई मिलेकै दक्ष यज्ञ भंग करिकै चाहि आउर बतावेक चाहि के कइसन हिमालय की हत्या रोकेक चाहि ताकि गंगा बहे हमार दिलमा,गंगा बहे हमार दिमागो मा।


    हमउ देखब सूरजवा की औकात कि काहे ना होब भोर!

    कायनात ह तो कबहुं ना टूटब इंसानियत का डोर!

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    वेदमंत्र में हर मुश्किल आसान,हिंदुत्व एजंडा फिर क्यों मुक्त बाजार और सुधार पर  खामोशी क्यों समता और समामाजिक न्याय और हमारे नुमाइंदे क्यों खामोश?

    बंगाल में 35 साल के राजकाज गवाँने के बाद कामरेडों को यद आया कि रिजर्वेशन कोटा लागू नहीं और धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण के  मुकाबला फिर बहुजन समाज  की याद बंगाल में भी मंडल बनाम कमंडल?

    উগ্র হিন্দুত্ববাদের বিরুদ্ধে লড়াই করার শপথ নিতে ।

    জাতপাত নিয়ে লড়াই করা দাঙ্গাবাজ বিজেপিকে পরাস্ত করা এবং তৃণমুল নামক জঙ্গি সংগঠন কে স্বমুলে নির্মুল করার শপথ নিতে আগামি ২৭শে ডিসেম্বর২০১৫ ।

    বামফ্রন্টের ডাকে ব্রিগেড সমাবেশে দলে দলে যোগ দিন ।

    आज का मनुष्यता और मेहनतकशों की दुनिया को मेरा यह संबोधन कोई एक्टिविज्म या सहिष्णुता असहिष्णुता बहस नहीं है।

    हम अस्सी के दशक और नब्वे के दशक से शुरु आर्थिक सुधार,राजनीतिक  अस्थिरता, हत्याओं, कत्लेआम, त्रासदियों, निजीकरण,उदारीकरण ग्लोबीकरण,इस्लामोफोबिया,तेल युद्ध,संसदीयआम सहमति और सियासत के तमाशे की हरिकथा अनंत बांच रहे हैं आज अकादमिक और आफिसियल वर्सन के साथोसाथ नई पीढ़ियों के लिए खासकर।पढ़ते रहें हस्तक्षेप।छात्रों के लिए बहुत काम की चीज है।सुनते रहे हमारे प्रवचन मुक्ति और मोक्ष के लिए।


    हमार दोस्त,हमार भाई कमल जोशी परगत भयो दीवाल पर आउर जमकश इक फोटो भोर के दागि रहिस,सो देख लिज्यो!

    लिहिस कमल जोशीः

    सुबह और तुम....!

    कोटद्वार लौटा तो एक सुहाने आसमान ने बाहें फैलाई...!

    कमल जोशी का प्रवचनः

    साथियो,

    बच्चों से बात करते हुए अभी कल ही ध्यान आया की उनकी सृजनशीलता को कैसे प्रस्फुटित किया जा सकता है...! वे एनर्जी से लबरेज़ हैं. अंग्रेजी स्कूल तो बच्चों को इसका मौक़ा दे देवते हैं, समर्थ परिवारों के बच्चों के अभिभावक उनकी होबी के खर्चे को अफ्फोर्ड कर सकते हैं...पर वो बच्चे जो अपनेआर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग से होते है क्या हम उनके लिए कुछ कर सकते हैं..चाहे कितना ही छोटा करें..पर हम क्या कर सकते है.?

    ये जिक्र मैंने अपने बच्चो के साथ काम करने वाले साथियों से किया और उन्हे बताया की इस को मैं कैसे करना चाहता हूँ, तो न केवल वो सहमत हुए बल्कि एक ने तुरंत फेस बुक के लिए अपील/ पोस्ट तक तैयार कर मुझे भेज दी. . उसे बाँट रहा हूँ...! और आप राय दें की क्या ये संभव है...

    "..फेसबुक एक ऐसा माध्यम है जिसकी सहायता से हम ना सिर्फ सामजिक रूप से जुड़ते है बल्कि सामाजिक सरोकारों में खासकर जिन्हें हमारी सहायता की जरूरत है उनकी मदद भी कर सकते है | बच्चे जो की किसी भी तबके के हो हमारा भविष्य है और हम बड़े अगर उनके जीवन में कुछ नया , आकर्षक और सीखने लायक चीजों से परिचय करा सके तो उन्हें नयी बातो का ज्ञान होगा और ना जाने कौन सी बात किसी को आगे बढ़ने की दिशा ही दिखा दे ? हम बच्चो के साथ , बच्चो के लिए कुछ काम करना चाहते है,

    लेकिन रिसोर्सेस ना के बराबर है. लेकिन हमारा मानना है की कुछ करने के लिए पैसे से ज्यादा जज्बे की जरूरत होती है और मेरे ही जैसे मेरे कई मित्र होंगे जो ऐसा सोचते होंगे सो क्यों ना ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में बच्चो के साथ रहा जाये....कुछ वो हमसे सीखेंगे तो कुछ हम उनसे और बात बन जाएगी... बच्चो की रुचियों को ध्यान में रख आप में से जो भी मित्र कम से कम एक दिन का समय दे पाने के इच्छुक हो तो कृपया बताये की आप क्या सिखा सकते है लेकिन ये ध्यान रखे की हमारे पास सीखने आने वाले बच्चे नगर पालिका स्कूल के भी हो सकते है और मध्यमवर्गीय भी सो, best out of waste पर काम करना चाहेंगे.... खाने और रहने की व्यवस्था मिल जुल कर होगी. यदि आप कोटद्वार में आकर बच्चों के साथ अपनी आर्ट को बांटना चाहते हैं तो कृपया अपने बारे में और अपनी रूचि, जो की आप बच्चो को सिखाना चाहेंगे, सूचित करें.. ताकि अन्य मित्र भी जाने की कितने लोग ऐसे काम में रूचि रखते है लेकिन फोन नंबर इनबॉक्स देने की कृपा करे ताकि आपसे संपर्क और जानकारी ली या दी जा सके..... बच्चे हम जैसों के ज़ेहन में हमेशा से खिलखिलाते आये है सो सोचा क्यों ना इन्ही के साथ, अपना भी मन बहलाया जाये.....


    गुजरो जो बाग़ से तो दुआ मांगते चलो ,

    जिसमे खिले है फूल , वो डाली हरी रहे |"


    मित्र का धन्यवाद की इतने सुन्दर शब्दों में मेरे दिल की बात लिख दी...मित्र इन्हें ही तो कह्ते हैं..