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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    .......Moments with...My viewfinder..........The Anand Bhavan is a historic house museum in Allahabad, India focusing on the Nehru-Gandhi Family. It was constructed by Indian political leader Motilal Nehru in the 1930s to serve as the residence of the Nehru family when the original mansion Swaraj Bhavan (previously called Anand Bhavan) was transformed into the local headquarters of the Indian National Congress.



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  • 08/22/15--23:04: बस्तर के सोनी सोरी लिंगा कोडोपी और हिड्मे और अन्य आदिवासी साथी दिल्ली आये थे . सर्वोच्च न्यायालय में नहाडी फर्जी मुठभेड़ और हिड्मे की प्रतारणा के मामले दायर किये गए सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी ने बस्तर के हालात पर प्रेस वार्ता की मार्फत बस्तर के आदिवासियों के हालात से हम सब को अवगत करवाया सोनी सोरी लिंग कोड़ोपी दिल्ली में अनेकों मित्रों से मिले और उन्हें बस्तर आकर आदिवासियों की हालत देखने के लिए आमंत्रित किया सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी बस्तर लौट गए
  • बस्तर के सोनी सोरी लिंगा कोडोपी और हिड्मे और अन्य आदिवासी साथी दिल्ली आये थे .

    सर्वोच्च न्यायालय में नहाडी फर्जी मुठभेड़ और हिड्मे की प्रतारणा के मामले दायर किये गए

    सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी ने बस्तर के हालात पर प्रेस वार्ता की मार्फत बस्तर के आदिवासियों के हालात से हम सब को अवगत करवाया

    सोनी सोरी लिंग कोड़ोपी दिल्ली में अनेकों मित्रों से मिले और उन्हें बस्तर आकर 
    आदिवासियों की हालत देखने के लिए आमंत्रित किया


    सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी बस्तर लौट गए


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    कम दर्ज संख्या के आधार पर पूरे देश में 40000 सरकारी स्कूल बंद किये जा रहे हैं. इनमें छत्तीसगढ़ के लगभग 2000 स्कूल हैं. इसे 'युक्तियुक्तकरण' का नाम दिया जा रहा है.

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    मेक इन इंडियाÓ के अपने नारे के बारे में मोदी ने कुछ खास नहीं कहा क्योंकि इसके बारे में बताने के लिए उनके पास कुछ खास था भी नहीं। देश की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि उसका ढोल पीटा जाए।- प्रकाश कारात
    http://www.deshbandhu.co.in/article/5391/10/330#.Vdli1vaqqko
    ‪#‎NXTTakeOver‬
    ‪#‎RejectCBCS‬
    ‪#‎MakeSomeonesDayIn3Words‬...

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    प्रकाश करात : पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे बड़े सपने रखे थे और नारे पेश किए थे,...

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    अलगाववादियों से मिलने के लिए हमें भारत के आदेश की जरूरत नहींः पाक
    http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/249363/1/19
    ‪#‎बिहार_ठगबंधन‬
    Indo-Pak NSA-Level ‪#‎5SOSonGMA‬

    नई दिल्ली। पाकिस्तानी एनएसए सरताज अजीज के अलगाववादियों से ना मिलने की सलाह को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान ने कहा है कि वो हुर्रियत नेताओं से मुलाकात...
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    वन सम्पदा : धन संपदा

    Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna's photo.

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  • 08/22/15--23:17: हमारी दो महिला साथी जेलों मे पड़ी हुई हैं. पहली हैं रोमा बहन और दूसरी हैं चितरूपा जिन्हें हम सब सिल्वी बहन भी कहते हैं . दोनों महिलाओं ने अपना पूरा जीवन देश के गाँव के लोगों के ज़मीन पर खेती करने के अधिकार, जीवन यापन करने के अधिकार और इज्ज़त से रहने के अधकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया है . रोमा उत्तर प्रदेश मे सोनभद्र मे बनने वाले कन्हार बाँध विरोधी जन आन्दोलन मे लोगों का साथ दे रही थीं . रोमा को करीब दो महीने से जेल मे डाला हुआ है . सिल्वी बहन मध्य प्रदेश मे बड़े बाँध बना कर किसानों की ज़मीनें डुबाने के खिलाफ़ जल सत्याग्रह और अदालती लड़ाइयों मे जनता का साथ दे रही थीं इसलिए सरकार ने बीस अगस्त को मध्य प्रदेश मे सिल्वी बहन को भी गिरफ्तार कर के जेल मे डाल दिया है . इन गिरफ्तारियों पर देश भर मे खामोशी है. यह एक भयानक दौर है जब मुल्क की ज़मीन और लोगों की ज़िदगी बचाने की कोशिश करना जुर्म करार दे दिया गया है . लुटेरे अपराधी गद्दी पर बैठ गए हैं . इतिहास इस दौर को भारत का स्याह दौर के रूप मे बताएगा . हम इन गिरफ्तारियों का विरोध करते हैं और इनकी रिहाई के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं .
  • Himanshu Kumar added 2 new photos.

    हमारी दो महिला साथी जेलों मे पड़ी हुई हैं. पहली हैं रोमा बहन और दूसरी हैं चितरूपा जिन्हें हम सब सिल्वी बहन भी कहते हैं .

    दोनों महिलाओं ने अपना पूरा जीवन देश के गाँव के लोगों के ज़मीन पर खेती करने के अधिकार, जीवन यापन करने के अधिकार और इज्ज़त से रहने के अधकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया है .

    रोमा उत्तर प्रदेश मे सोनभद्र मे बनने वाले कन्हार बाँध विरोधी जन आन्दोलन मे लोगों का साथ दे रही थीं . रोमा को करीब दो महीने से जेल मे डाला हुआ है .

    सिल्वी बहन मध्य प्रदेश मे बड़े बाँध बना कर किसानों की ज़मीनें डुबाने के खिलाफ़ जल सत्याग्रह और अदालती लड़ाइयों मे जनता का साथ दे रही थीं इसलिए सरकार ने बीस अगस्त को मध्य प्रदेश मे सिल्वी बहन को भी गिरफ्तार कर के जेल मे डाल दिया है .

    इन गिरफ्तारियों पर देश भर मे खामोशी है.

    यह एक भयानक दौर है जब मुल्क की ज़मीन और लोगों की ज़िदगी बचाने की कोशिश करना जुर्म करार दे दिया गया है .

    लुटेरे अपराधी गद्दी पर बैठ गए हैं . इतिहास इस दौर को भारत का स्याह दौर के रूप मे बताएगा .

    हम इन गिरफ्तारियों का विरोध करते हैं और इनकी रिहाई के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं .



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    ........... ABVP का महादेवी काव्य-गोष्ठी....
    22 hrs · 
     
    कल समता भवन से गुजर रहा था, काव्य-गोष्ठी चल रही थी. सहृदय तो मैं हूँ नहीं पर कविता की धुन मुझे खींच ही लेती है. भरा पूरा प्रांगण,मंच पर सुसज्जित लोग विराजमान. वे कवि थे या नहीं, कह नहीं सकता पर थे बहुत सुसज्जित. किसी चीज की कमी थी तो बस एक शिवलिंग की. कितना अच्छा होता भोले बाबा पर एक लोटा गंगाजल चढ़ाकर काव्य-पाठ की शुरुआत होती. वगैर उनके सिर्फ हर-हर महादेव का नारा तो फीका लगेगा ही. ये अलग बात है कि कविताओं की पंक्तियाँ विचारों से लैश थी... एक दो पंक्ति ही सुन पाया.... ''रत्ती भर बीवी के लिए, माँ-बाप को बाहर कर कर दिया'' माँ-बाप के प्रति कवि की चिंता चरम पर है, हाँ बीवी को कवि रत्ती भर ही मानते हैं। खैर यह मुद्दा तो स्त्री-अध्ययन के छात्रों के लिए शोध का विषय हो सकता है..... कुल मिलाकर शिव-लिंग और शंख-नाद के अभाव को छोड़ दिया जाये तो कहा जा सकता है कि--- इस समाज में कविताओं की एक नयी परंपरा को स्थापित किया गया जिसका श्रेय abvp को जाता है.... एक गोष्ठी में ही रामचन्द्र शुक्ल जी की---'कविता क्या है' से लेकर निराला और मुक्तिबोध की परंपरा को ख़ारिज कर देने वाली इस संस्था ने वाकई जबर्दस्त कार्य किया है...... शायद यही कारण रहा होगा कि इसी विश्वविद्यालय के स्थापित कवियित्रियों ने ख़ुद को इस संगोष्ठी में भाग लेने के लायक नहीं समझा.....


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    मीडिया सत्ता के हक में लामबंद

    मीडिया जनता के हक हकूक के खिलाफ

    मीडिया बेदखली का पैरोकार

    मीडिया में मुक्त बाजार की जय जयकार

    हैरत भी नहीं कि मी़डिया बेदखल कैंपस में

    होक कलरव क खिलाफ लामबंद

    पलाश विश्वास

    মুখ্যমন্ত্রীর উপস্থিতিতে প্রেসিডেন্সি বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রছাত্রীদের ওপর বর্বরোচিত পুলিশী হামলার প্রতিবাদে শনিবার এস এফ আই-এর মিছিল...... Students LATHICHARGED in presence of the CM.Procession on Saturday in KOLKATA.

    ডিগবাজি খাওয়ায় বছরের সেরা বাঙালি কে ?? অভীকদা নাকি সুমন দা ??

    Vanish Ganatantra's photo.


    कौन अखबार किस भाषा में बात कर रहा है,पाठक से बेहतर जानता नहीं है कोई।


    कौन अखबार कब कब बदला है ऐन मौके पर,पाठक से बेहतर जानता नहीं है कोई।


    दर्शक की नजर में हम्माम मे सारे के सारे नंगे हैं।

    फिरभी शर्मोहया की दीवारें अपनी जगह थीं,जो अब ढह रही है।

    फासीवाद के रंग चाहे हो रंग बिरंगी चेहरे सारे एक हैं।

    जनता से बेहतर कोई न जाने है।


    जनता को मालूम है कि जो बी हो जिस भी पार्टी या विचारधारा का,उसके हक में कोई नहीं है और न उसके हकहकूक का हिसाब कहीं होना है और नउसकी सुनवाई कहीं है।


    जनता अब मजे के लिए अखबार पढ़ती है।

    मीडिया अब मनरंजन का सर्वोत्तम माध्यम है।

    हम जैसे गुलाम लोगों के लिए भी यह बेहद पीड़ा का कारण है।


    नौकरी के चंद महीने अभी बाकी हैं।

    हम ेक्सटेंसन के मोहताज भी नहीं हैं।

    जैसे हमारा प्रमोशन हुआ नहीं है,जाहिर है कि हमारा एक्सटेशन बी होने वाला नहीं है।


    सच कहने के लिए अगर एक्सप्रेस समूह मुझे नौकरी से निकाल फेंके अभी इसी वक्त तो भी मुझे परवाह नहीं है।


    कम वक्त नहीं बिताया हमने यहां।बसंतीपुर की गोबर माटी से सने नैनीझील के ठीक ऊपर डीएसबी कालेज में दाखिला लेने के साथ साथ मध्य झील पर उनियाल साहब के दैनिक पर्वतीय में हाईस्कूल पास करते ही 1973 से लगातार लगातार कागद कारे कर रहा हू।अविराम।नौकरियां करने लगा 1980 से।कोलकाता में एक्सप्रेस समूह की सेवा में हूं 1991 से।1980 में झारखंड घूमने के बहाने दैनिक आवाज में लैंड करने के बजाय मीडिया का मतलब हमारे लिए एकमात्र पक्ष जनपक्ष का रहा है।जीना भी यहीं ,मरना भी यहीं।इसके सिवाय जाना कहीं नही है।


    मीडिया में दिवंगत नरेंद्र मोहन से बदनाम कोई मालिक संपादक हुा कि नहीं,मुझे मालूम नहीं है।उन नरेंद्र मोहन ने मुझे बिना अपायंटमेंट लेटर मेरठ जागरण में खुदा बनाकर रखा और जिन्हें मैं मसीहा मानता रहा,उनने मुझे कुत्ता बनाकर रखा।


    जबतक मेरठ में मैं रहा।1984 से लेकर 1990 तक घर घर जाकर इंटर पास बच्चों को भी मैंने पत्रकार बनाया है।जो भी भर्ती हुई है,विज्ञापन मैंने निकाले।परीक्षा मैंने ली।कापियां मैंने जांची।भर्ती के बाद उन्हें ट्रेन और ग्रुम भी मैंने किया।यह नरेंद्र मोहनजी की मेहरबानी थी।उने कभी दखल नहीं दिया।चाहे हमारी सिफारिश पर किसी का पैसा न बढ़ाया हो लेकिन अखबार में क्या छारपें न छापें,यह फैसला उनने हम संपादकों पर छोड़ा है हमेशा।

    जब नैनीताल की तराई में महतोष मोड़ सामूहिक बलात्कार कांड हो गया शरणार्थियों की जमीन हथियाने के लिए,रोज मैं जागरण के सभी संस्करणों में पहले पन्ने पर छपता था।


    मुख्यमंत्री थे मेरे ही पिता के कास मित्र नारायणदत्त तिवारी जिनके खिलाफ पहाड़ और तराई एकजुट आंदोलन कर रहा था।सारे उत्तरप्रदेश में,हर जिले में और यूपी से भी बाहर तिवारी के इस्तीफे की मांग गूंज रही थी।उस दरम्यान कम से कम तीन बार उन्हीं लरेंद्र मोहन से तिवारी ने मुझे फौरन निकालने के लिए कहा थाय़यूं तो तिलवारी से नरेंद्र मोहन के मधुर संबंध थे और तिवारी से हमारे भी पारिवारिक रिश्ते थे।न मैंने रिस्तों की परवाह की और न नरंद्रमोहन ने।उनने साफ मना कर दिया तीनों बार।


    हमने आदरणीय प्रभाष जोशी और ओम थानवी के खिलाफ लागातार लिखा है।बदतमीजियां की हैं।लेकिन एक्सप्रेस में इतनी आजादी रही है कि किसी ने कभी मुझसे जवाबतलब नहीं किया कि क्यों लिखते हो या किसी ने कभी मना भी नहीं किया लिखने को।समयांतर में लगातार थानवी की आलोचना होती रही और समयांतर में मैं लगातार लिखता रहा।


    थानवी से मुंह देखादेखी बंद थी।लेकिन थानवी ने कभी न मुझे रोका न टोका।उनकी रीढ़ के बारे में तो मैं लिख ही रहा था।क्यों लिख रहा था,जिन्हें अब भी समझ में न आया, वे बाद में समझ लें।


    मीडिया वही है।हम भी वही है।

    मीडिया पर कोई पाबंदी है नहीं।

    आपाकाल ने साबित कर दिया कि चीखों को रोकने की ौकात हुकूमत की होती नहीं है हरगिज।

    बार बार साबित हो गया है कि आजाद लबों को हरकतों से रोक सके,ऐसी औकात न बाजार की है और न हुकूमत की है।भले सर कलम कर लें।



    मुक्त बाजार और विदेशी पूंजी के हक में वफादारी वजूद का सवाल भी हो सकता है।इतनी लागत है,इतना खर्च है और मुनाफा भी चाहिए तो बाजार के खिलाफ हो नहीं सकते।


    यह हम बखूब समझते हैं और जिंदगी में नौकरी से फुरसत मिलने पर इसीलिए कमसकम अखबार निकालने का इरादा नहीं है।


    मीडिया सत्ता की भाषा बोल रहा है है और जुबां पर कोई पहरा है नहीं दरअसल।न आपातकाल कहीं लगा है।सत्ता ने किसी को मजबूर किया हो,ऐसी खबर भी नहीं है।


    बाजार का हुआ मीडिया ने सत्ता को भी अपना लिया है।और मडिया अब बेदखल कैंपस में हमारे बच्चों के खिलाफ है।


    बेदखल कैंपस में बच्चों के कत्लेआम की तैयारी है।


    फिलहाल ताजा स्टेटस यह है कि इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता ने म से कम खबर जो है,तस्वीरे जो हैं,वही लगायी है।यह हमारे लिए राहत की बात है।बाकी मीडिया छात्रों को अपराधी बनाने लगा है।


    क्योंकि हमारे बच्चे हमारे हक हकूक के लिए लड़ रहे हैं और कैंपस बेदखल करने लगा है फासीवाद जिसतरह, प्रतिरोध उससे तेज है।दमन उससे भी कहीं तेज है और हमारे बच्चे सुरक्षित नहीं है।शर्म करो लोकतंत्र।

    मीडिया का फोकस हालांकि एफटीआईआई के कैंपस पर हैं लेकिन देशभर में विश्वविद्यालयों के कैंपस बेदखल हो रहे हैं और फासीवाद ने इन विश्वविद्यालयों की घेराबंदी कर दी है।छाकत्र बेहद बहादुरी से लड़ रहे हैं।जादवपुर विश्वविद्यालय के होक कलरव की गूंज दुनियाभर में हुई है।होक कलरव और शहबाग एकाकार है।खास तौर पर बंगाल और दक्षिण भारत के कैंपस में फासीवादी सत्ता और मुक्त बाजार के किलाफ प्रतिरोध बेहद तेज है और खबर कही नहीं है।मीडिया सत्ता के साथ मिलकर होक कलरव को अभव्य कलरव बनाने लगा है।


    जादवपुर विश्वविद्यालय में उपकुलपति ने पुलिस बुलवाकर छात्र छात्राओं को पिटवाया,गिरफ्तार करवाया ,जिसके खिलाफ होक कलरव की शुरुआत हुई।


    तो सत्ता ने फिर एफटीआईआई पुणे में महाभारत रच दिया और कुरुवंश की तरह छात्रों के किलाफ सफाया अभियान देश भर में चालू रिवाज बन गया है।


    ताजा मामला कोलकाता के विश्वप्रसिद्ध प्रेसीडेसी विश्वविद्यालय का है जहां मुख्यमंत्री की मौजूदगी में पार्टीबद्ध गुंडों और पुलिस ने छात्रों को धुन डाला और उपकुलपति मुस्कुराती रही।


    छात्रों के धरना प्रदर्सन से बेरवाह मुख्यमंत्री कैंपस दखल के लिए इफरात खैरात नकद डाल गयीं और आंदोलनकारी छात्रों की परवाह किये बिना,उन्हें शामिल किये बिना जबरन दीक्षांत समारोह भी  हो गया।


    चूंकि प्रेसीडेंसी में छात्रों ने मुख्यमंत्री क काले झंडे दिखाये तो इसके बदले में प्रेसीडेंसी में शामिल जादवपुर और बाकी बंगाल और बाकी देश के होक कलरव की नाकेबंदी पुलिस और पार्टीबद्ध गुंडों ने की है और पूरे बंगाल में,खासतौर पर कोलकाता में फासीवादी झंडे फहराने के लिए कैंपस की जबरदस्त नाकेबंदी है।आंदोलन जारी है।


    छात्र देश भर में एफटीआईआई महाभारत के विरोध में हैं।

    छात्र अंध राष्ट्रवादी केसरियाकरण के खिलाफ है।

    छात्र आर्थिक सुधारों के खिलाफ हैं।

    छात्र किसानों की खुदकशी के खिलाफ हैं।

    छात्र देश जोड़ने,दुनिया जोड़ने और दिलों को जोड़ने का बीड़ा उठा चुके हैं और अब उनकी खैर नहीं है।

    कैंपस में भी कत्लेआम की तैयारी है।

    मीडिया होक कलरव के खिलाफ है।

    आनंद बाजार समूह में फिर शामिल हो गयी हैं दीदी।


    यही नजारा दक्षिण भारत के कैंपस में है,ऐसा आनंद तेलतुंबड़े का कहना है लेकिन खबर या तो सिरे से नहीं है या फिर सारी खबरें सत्ता और सियासत के हक में हैं।

    हमारे बच्चे कतई सरक्षित नहीं हैं।


    मीडिया सत्ता के हक में लामबंद.

    मीडिया जनता के हक हकूक के खिलाफ

    मीडिया बेदखली का पैरोकार

    मीडिया में मुक्त बाजार की जय जयकार

    हैरत भी नहीं कि मी़डिया बेदखल कैंपस में

    होक कलरव क खिलाफ लामबंद


    INDIAN EXPRESS Reports:

    Students let 'unwell' Presidency University V-C leave campus

    The call to boycott given by a section of protesting students failed to cast shadow over the convocation ceremony.

    Kolkata | Published:August 23, 2015 12:13 am

    presidency college protests, mamata banerjee, presidency banerjee, presidency protests, presidency vc gherao, kolkata news, west bengal news, india news

    Students 'gherao' the V-C at her office, Saturday. (Source: Express Photo by Subham Dutta)

    Presidency University Saturday held its third convocation amid high drama and presence of heavy police force even as the 26-hour-long gherao of its Vice-Chancellor Anuradha Lohia ended after she was allowed by the protesting students to leave the campus over her deteriorating health.

    The students, however, insisted on her resignation. "We decided to let her leave the campus since she was unwell, but our protests will continue. We will continue to occupy the office until she resigns," Trisha Chanda, general secretary of the students union, said.

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    The call to boycott given by a section of protesting students failed to cast shadow over the convocation ceremony.

    The mood at the university campus was divided as many students shouted 'we want convocation' while others shouted slogans demanding the V-C's resignation over alleged police assault on students protesting during Chief Minister Mamata Banerjee's visit to campus Friday.

    During her convocation speech, Lohia said, "We were faced with rather unpleasant incidents in the past 24 hours. But I must say every challenge is an opportunity and my dear faculty and students stood by me and made sure that nothing marred the convocation…"

    http://indianexpress.com/article/cities/kolkata/students-let-unwell-presidency-university-v-c-leave-campus/

    অশালীন বিক্ষোভ উড়িয়ে সমাবর্তনে পড়ুয়ারা

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    উপাচার্যকে ঘেরাও করে রেখে সমাবর্তন অনুষ্ঠান নিয়ে অনিশ্চয়তা তৈরি করেছিলেন বিক্ষোভরত পড়ুয়ারা। শুক্রবার বিকেল থেকে শনিবার সন্ধে পর্যন্ত ছাত্রছাত্রীদের বিক্ষোভ, হই-হট্টগোলের বিরামও ছিল না। কিন্তু সে সব পাশ কাটিয়েই এ দিন বিকেলে প্রেসিডেন্সি বিশ্ববিদ্যালয়ের সমাবর্তন অনুষ্ঠান হয়েছে।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ২৩ অগস্ট, ২০১৫

    বিক্ষোভ সত্ত্বেও সমাবর্তন

    Presidency University Vice-Chancellor Anuradha Lohia's medical check-upছাত্র বিক্ষোভের মধ্যেই সুষ্ঠুভাবে হল প্রেসিডেন্সি বিশ্ববিদ্যালয়ের তৃতীয় সমাবর্তন। ডিরোজিও হলে সমাবর্তনের মূল অনুষ্ঠানে শুক্রবার বিকেল থেকে চলা ছাত্র বিক্ষোভের কোনও আঁচই লাগেনি। তবে ছাত্ররা তাঁদের দাবি, উপাচার্যের পদত্যাগের দাবিতে এখনও আন্দোলন চালিয়ে যাওয়ার সিদ্ধান্ত নিয়েছেন। ছাত্রদের এই অযৌক্তিক আন্দোলনকে কড়া ভাষায় সমালোচনা করেছেন বিশ্ববিদ্যালয়ের আচার্য তথা রাজ্যপাল কেশরীনাথ ত্রিপাঠী। এ ব্যাপারে তিনি উপাচার্য অনুরাধা লোহিয়ার নেওয়া সিদ্ধান্তকে সমর্থনও জানান। সমাবর্তনের পর ছাত্র বিক্ষোভ নিয়ে প্রশ্ন করলে আচার্য বলেন, যা হয়েছে তা ঠিক হয়নি। ছাত্রদের এই আচরণকে কোনও মতেই সমর্থন করি না। ছাত্ররা এখানে পড়তে আসে বিক্ষোভ দেখাতে নয়। সরাসরি প্রেসিডেন্সির ছাত্র বিক্ষোভের সমালোচনা না করলেও সমাবর্তনে আসা পদ্মভূষণ উপাধি পাওয়া বিশিষ্ট অধ্যাপক পি বলরাম শিক্ষাপ্রতিষ্ঠানে ছাত্র বিক্ষোভের নিন্দা করেন। বলেন, শিক্ষাঙ্গনে শিক্ষার চর্চা ছাত্রদের ফিরিয়ে আনতে হবে। উপাচার্য তাঁর বক্তবে‍্য শুক্রবার বিকেল পাঁচটা থেকে চলা ঘেরাও বিক্ষোভ প্রসঙ্গে বলেন, গত ২৪ ঘণ্টা ধরে বিশ্ববিদ্যালয়ে ঘটা অবাঞ্ছিত ঘটনা সত্ত্বেও সবাই সমাবর্তন অনুষ্ঠানে এসেছেন। এতে এটাই প্রমাণিত হয়, অধিকাংশ ছাত্রছাত্রী, শিক্ষক–শিক্ষিকারা আমার সঙ্গে আছেন। যারা আমার সঙ্গে আছে তাদের ধন্যবাদ জানাই। ছাত্রছাত্রী ও শিক্ষক–শিক্ষিকাদের সমর্থন না থাকলে সমাবর্তন সফল হতে পারত না।

    ছাত্র বিক্ষোভের জেরে শুক্রবার বেকার বিল্ডিং দিয়ে ট্যাক্সি করে বেরতে বাধ্য হন শিক্ষামন্ত্রী পার্থ চ্যাটার্জি। শনিবার অবশ্য তিনি সমাবর্তন অনুষ্ঠানে আসেন রাজ্যপালের গাড়িতে চেপে। শুক্রবার বিকেল থেকেই প্রেসিডেন্সিতে উপাচার্যকে ঘেরাও করে রেখে শুরু হয় পড়ুয়াদের আন্দোলন। যা রাতভর চলে। বিশ্ববিদ্যালয়ে তাঁর নিজের ঘরেই পড়ুয়াদের হাতে ঘেরাও হয়ে থাকেন উপাচার্য। ছিলেন রেজিস্ট্রার দেবজ্যোতি ঘোষ ও কয়েকজন শিক্ষক। পড়ুয়াদের অভিযোগ, মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি যখন ক্যাম্পাস ছেড়ে বেরিয়ে যাচ্ছেন তখন পু‍্লিস তাঁদের মেরেছে। বিশ্ববিদ্যালয় তাঁদের নিরাপত্তা দিতে ব্যর্থ হয়েছে তাই তাঁরা উপাচার্যের পদত্যাগ চান। যদিও তাঁদের অভিযোগ ও দাবির যৌক্তিকতা নিয়েই প্রশ্ন রয়েছে। আন্দোলন নিয়ে দ্বিধাবিভক্ত বিশ্ববিদ্যালয়ের পড়ুয়ারাও। একটা অংশের পড়ুয়ারা এই আন্দোলনের সঙ্গে নেই।

    শনিবার বিক্ষোভরত পড়ুয়াদের তরফে সমাবর্তন অনুষ্ঠান বয়কটের ডাক দেওয়া হয়। উপাচার্যের সামনে এসে সমাবর্তন বয়কট করার পোস্টারও ঝোলানো হয়। দফায় দফায় আন্দোলনের গতিপ্রকৃতি নিয়ে নিজেদের মধে‍্য আলোচনার পর উপাচার্যের সামনে এসে চিৎকার করে স্লোগান দিতে দেখা যায় পড়ুয়াদের। সেই সময় উপাচার্য বলেন, পুলিসের সঙ্গে পড়ুয়াদের ধস্তাধস্তিতেতে আমি কি করব? দায়িত্বজ্ঞানহীন আন্দোলন। এটা দুর্ভাগ‍্যজনক যে এই ছাত্রছাত্রীদের নামের আগে প্রেসিডেন্সি লেখা থাকবে। এই আন্দোলন এবার বাড়িতে পৌঁছে যাবে। বাড়ির লোকজন কি শেখাচ্ছে এদের? কিছু পড়ুয়ার জন্য সমাবর্তন বন্ধ হবে না। আমি ঘেরাও থাকলেও সমাবর্তন হবে। আমি কোনও ভুল করিনি। পদত্যাগ করব না। ছাত্রছাত্রীদের স্লোগান ও হই–হল্লার মাঝে এক শিক্ষকের সঙ্গে বিরক্ত উপাচার্যকে 'আকাশ ভরা সূর্য তারা'ও গাইতে দেখা যায়। এর পর দুপুর তিনটের কিছু পরে হঠাৎই একাংশ ছাত্র, শিক্ষক ও আধিকারিকরা ব্যারিকেড করে উপাচার্যকে তাঁর ঘর থেকে বার করে নিয়ে আসেন। শুক্রবারও উপাচার্যের সঙ্গে কথা কাটাকাটির সময় শালীনতার মাত্রা ছাড়িয়েছিলেন বিক্ষোভরত পড়ুয়াদের কেউ কেউ। এই সময়ও উপাচার্যের উদ্দেশে পড়ুয়াদের কুকথা বলতে শোনা যায়। ডিরোজিও হলে যাওয়ার সময় পোর্টিকোয় তাঁর গাড়ির সামনে বসে পড়েন পড়ুয়ারা। পরে অবশ্য তাঁরা উঠে যান। মূলত যে ছাত্ররা উপাচার্যের গাড়ির সামনে বসে পড়েছিলেন তাঁরা যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের ছাত্রছাত্রী।

    শুক্রবার রাত থেকেই তাঁরা প্রেসিডেন্সিতে জড়ো হয়েছিলেন। অনেকে সারারাত ছিলেন বলেও জানা গেছে। পাঁচটা নাগাদ সমাবর্তনে যোগ দিতে রাজ্যপাল যখন প্রেসিডেন্সিতে আসছেন তখনও পোর্টিকোতে বসেছিলেন আন্দোলনকারীরা। রাজ্যপালের গাড়িতেই আসেন শিক্ষামন্ত্রী। আন্দোলনরত ছাত্র–ছাত্রীদের দু'পাশে সরিয়ে দিয়েই রাজ্যপালের গাড়ি ঢোকার রাস্তা করে দেয় পুলিস। সমাবর্তনে বিশিষ্ট জ্যোতিপদার্থবিদ জয়ন্তবিষ্ণু নারলিকারকে ডি এসসি সম্মান জানায় বিশ্ববিদ্যালয়। তাঁর ভাষণে রাজ্য সরকারের পাশাপাশি প্রেসিডেন্সির উপাচার্য অনুরাধা লোহিয়ার নেতৃত্বদানের ভূয়সী প্রশংসা করেন রাজ্যপাল। মূল অনুষ্ঠানের পর নিজের ঘরে ফিরে আসেন উপাচার্য। যেখানে তখনও বসেছিলেন আন্দোলনরত পড়ুয়ারা। পরে সাড়ে সাতটা নাগাদ তিনি বিশ্ববিদ্যালয় ছেড়ে বেরিয়ে যান। ছাত্ররা জানিয়েছেন উপাচার্যের পদত্যাগের দাবিতে তাঁরা অনড়। এটা নিয়ে কনভেনশনের আয়োজন করা হবে। এবং যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের আদলে প্রেসিডেন্সির পড়ুয়াদের মতামত নেওয়া হবে যে তাঁরা এই উপাচার্যকে চান কি চান না। পাশাপাশি তাঁরা আরও জানিয়েছেন উপাচার্যকে বিশ্ববিদ্যালয়ে ঢুকতে তাঁরা বাধা দেবেন।

    http://aajkaal.in/kolkata/%E0%A6%AC%E0%A6%BF%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%B7%E0%A7%8B%E0%A6%AD-%E0%A6%B8%E0%A6%A4%E0%A7%8D%E0%A6%A4%E0%A7%8D%E0%A6%AC%E0%A7%87%E0%A6%93-%E0%A6%B8%E0%A6%AE%E0%A6%BE%E0%A6%AC%E0%A6%B0%E0%A7%8D%E0%A6%A4/


    প্রেসিডেন্সিতে এসে ছাত্রছাত্রীদের বিক্ষোভের মুখে পড়লেন মমতা

    www.anandabazar.com/.../প-র-স-ড-ন-স-ত-এস-ছ-ত-রছ-ত-র-দ-র-ব-ক-ষ-...

    এর মধ্যেই প্রেসিডেন্সির ছাত্রছাত্রীদের সঙ্গে এসে যোগ দেন যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের'হোক কলরব' আন্দোলনের অনেক সদস্যই। উপাচার্যের পাশে বসা রেজিস্ট্রারকে অকথ্য ভাষায় গালাগালি করতে দেখা যায় বিক্ষোভকারীদের। কেউ কেউ সিগারেট ধরিয়ে ধোঁয়া ছাড়তে থাকেন। আজ, শনিবার বিশ্ববিদ্যালয়ের তৃতীয় সমাবর্তনঅনুষ্ঠান। সে কারণেই কর্তৃপক্ষ ...


      

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    Rajiv Lochan Sah shared Narendra Singh Negi's video.

    अरे यहीं कहीं होगा। ढूँढो उसे। कहाँ जा सकता है वह हम सब को छोड़ कर ? उसने तो कहा ही था, ''उधिन हम न्हिं हू लेकिन, हम लै उधीन हूँलो।''तो कहाँ आये जैंता के अच्छे दिन ? और जब तक जैंता कराहती रहेगी, गिरदा हमारे आसपास बना रहेगा।
    इसीलिये तो आज नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून, पौड़ी, रुद्रपुर, दिनेशपुर, अगस्त्यमुनि और न जाने कहाँ-कहाँ उसकी उपस्थिति देखी जा रही है।

    ीब, न कोई मुस्लिम था , न हिन्दू न सिख न ईसाई, न कोई बच्चा था न कोई बूढ़ा न आदमी और औरत का कोई भेद था ..... किसी ने सही कहा था दुनिया से जब भी जाओ तो कुछ इस तरह की तुम हसो जग रोये.....
    उत्तराखंड का गौरव थे गिर्दा , उत्तराखंड के लोगों की आवाज थे, वो थे जो क्रांति की उम्मीद थी परिवर्तन की उम्मीद उत्तराखंड के अच्छे दिनों की उम्मीद थी.....
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    Big Picture: 1965, fifty years later

    As India and Pakistan face off over talks this week, a journey back in time to a war no one won by The Indian Express

    Updated: August 23, 2015 1:18 pm


    Indian Express hits the Bull`s Eye!

    India may be celebrating the fiftieth anniversary of the 1965 war this month but it will need a lot more than a "war carnival" at Rajpath to etch it in public memory. If 1965 is truly India's forgotten war, there are reasons for it.

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    Sandwiched between the humiliation suffered at the hands of the Chinese in 1962 and the exhilaration of a Pakistani surrender in 1971, the 1965 war resulted in a stalemate. There were no surrender ceremonies at Dhaka's Race Course Ground like in 1971 nor was there an emotional "Ae mere watan ke logon…" which brought Jawaharlal Nehru to tears like in 1962. 1965 didn't change the political geography of the sub-continent; no territories exchanged hands. Before the ink on the Tashkent Agreement had dried, then prime minister Lal Bahadur Shastri passed away, overshadowing everything that had happened earlier.

    1965-map

    The war was the product of a certain geopolitical and temporal context. The Indian Army had lost badly to the Chinese in 1962, which created a sense of false superiority in the Pakistan army. Hoping to squeeze India with Chinese support, Pakistan had ceded land in Pakistan Occupied Kashmir to China. As a member of various Western military alliances, Pakistan had also benefited from American aid and military equipment. Pakistan was politically stable and its economy was held up by top economists as an example for other developing countries.

    READ: Key Battles – Memorials, war stories keep Asal Uttar alive

    Ayub Khan's belief that "Hindu morale would not stand more than a couple of hard blows at the right time and place" was emboldened by his army's performance during the limited conflict in the Rann of Kutch in April 1965. The award of the international Kutch Tribunal had given 350 sq km territory to Pakistan and put Shastri under pressure.

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    Meanwhile, India was still in the process of strengthening and modernising its armed forces following the 1962 debacle and 1965 seemed like an opportune time for Pakistan to move in. Zulfikar Ali Bhutto, Ayub's young and ambitious foreign minister, had been speaking of an Algeria like uprising in Kashmir which would finish "the unfinished business of Partition". Bhutto was the brain behind Operation Gibraltar, where Pakistan aimed to stage an insurrection in J&K through massive infiltration, sabotage and subversion.

    Rudra Chaudhuri, senior lecturer at King's College, London, says, "This was Bhutto's war — an opportunity seized by a relatively young and ambitious actor working behind the scenes. The Kashmir cell, led by those drawn to this maverick, convinced Ayub Khan of the potential for rebellion in Kashmir."

    But, Chaudhuri adds, "Neither Bhutto nor Ayub imagined the outbreak of war. Hypnotised into believing that rebellion in Kashmir supported by the Pakistani army would lead to the overthrow of Indian rule, Ayub and his army chief, General Musa Khan, were dumbstruck when India opened a second front."

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    That second front was in Punjab. After the failure of Operation Gibraltar, Pakistan launched Operation Grand Slam to capture Jammu and isolate Srinagar from the rest of India. Shastri decided to escalate the war across the international border taking Pakistan by surprise. Worried about the Chinese threat, India did not target East Pakistan.

    The 1965 war ended in 22 days, when General J N Chaudhuri mistakenly assumed that the army was running out of ammunition and had suffered considerable tank losses. He advised Shastri to agree to a ceasefire even though the prime minister wanted to prolong the war by a few days if India could win a spectacular victory.

    For India, there were many high points of the war. Indians, despite their less sophisticated equipment, performed better than the Pakistanis. Pakistani tanks met with disaster in the battlefields of Asal Uttar and Phillora. India's offensive thrust in Kashmir led to the capture of the strategically important Haji Pir Pass and some tactically crucial heights in Kargil. In Punjab, the army reached close to the outskirts of Lahore but did not press on. India, however, suffered from poor military leadership, flawed intelligence assessment and a rather poor strategy of delivering a large number of inconsequential jabs instead of deep, powerful thrusts inside Pakistani territory.

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    The Indian Navy didn't participate in the war and the performance of the IAF was mixed. Pushpindar Singh, author of IAF's three-volume official history, Himalayan Eagles, says, "The first air war in the sub-continent was at best a draw. The smaller in size Pakistan Air Force certainly did better in the opening rounds but towards the end, the Indian Air Force gradually got its act together and was increasingly dominant at time of the ceasefire".

    According to then defence minister Y B Chavan's War Diary, published by his aide R D Pradhan, Chavan gave the Army and the IAF the go-ahead to launch attacks across the ceasefire line (now the LoC) without consulting the Emergency Committee of the Cabinet. This account is corroborated by the then defence secretary PVR Rao and army chief General Chaudhuri.

    The 1965 war also set the template for political control of the military during wars. As historian Srinath Raghavan says, "The principal lesson drawn by political and military leaders from the debacle of 1962 was to give the military a free hand in operational matters. Hence, in 1965, the politicians consciously refrained from enquiring too deeply into the actual conduct of war. This lack of adequate civilian oversight was one reason why India did not achieve a better outcome. The 'victory' in 1965 also cemented the notion that this was the best way to conduct civil-military relations, an assumption that prevails to date."

    Politically, it was a tough time for Shastri. He had sent a strong message by refusing to restrict the war to J&K. Before leaving for Tashkent, he had publicly announced that he would never return Haji Pir Pass. But, as former ambassador to Pakistan K S Bajpai, who was part of the Indian delegation at Tashkent, says, "I don't know how we convinced ourselves to sign on what we did when Shastriji remained opposed to giving Haji Pir back. The pressure of Soviets not using a veto at the Security Council on Kashmir may have done the trick."

    "In the end, Pakistan as a nation achieved little," says Chaudhuri. India did slightly better even though the military gains were lost at the diplomatic table.

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    War diary: Start to finish

    May 1964

    Trouble in Kanjarkot, Rann of Kutch, as Pakistani trespassing increases. More incidents by Jan-Feb 1965

    February-April 1965

    India's 31 Infantry Brigade instructed to capture Kanjarkot in Operation Kabaddi. Pakistan retaliates, launches Desert Hawk II. Raiding party of 6 Punjab (Pakistan) kills eight Indians.

    April-June

    Ceasefire negotiations begin. Both sides agree to restore status quo as of January 1, 1965. Ceasefire signed. Is to take effect from July 1.

    June

    Indian military authorities, prompted by ceasefire violations in J&K, decide not to remain passive any longer. Launch offensive.

    August 5

    Pakistan's 12 Infantry Division, led by Maj Gen Akhtar Hussain Malik, launches extensive infiltration. Under Operation Gibraltar, 30,000 men are pushed across the ceasefire line (now called LoC) into J&K.

    August

    Indian leadership decides Pakistan needs to be dealt with strongly. India's 68 Infantry Brigade is tasked to capture Haji Pir Pass in operation codenamed "Bakshi". Haji Pir sector is secured. India's XI Corps and I Corps plan offensive in Lahore and Sialkot. Offensive called off due to ceasefire on the night of September 23.

    September 1

    Pakistan makes a three-pronged attack. At 3 pm, Brigadier Manmohan Singh, commander of 191 Brigade Group, calls for IAF support when Pakistani tanks have reached 450 metres from Brigade HQ. IAF support arrives at 5 pm and bombs Pakistan army's gun posts causing damage to all artillery ammunition lorries, tank ammunition. Brigade HQ is moved to Jaurian and given responsibility of defence of Akhnoor.

    September 2

    Pakistan Sabre jets bomb Jaurian in Jammu but despite initial success and closing in on Akhnoor, Pakistan's Grand Slam loses momentum. Then, Pakistan carries out air raid on Amritsar.

    September 4

    UN Security Council adopts a resolution jointly sponsored by six non permanent members for immediate ceasefire in Kashmir. Indian PM Lal Bahadur Shastri blames Pakistan for situation in J&K.

    September 10

    Pakistan's famed Patton tanks launch a tank offensive on Manawan in Khemkaran sector. A recoilless gun mounted by Havaldar Abdul Hamid knocks out three Patton tanks. Hamid is posthumously awarded Param Vir Chakra.

    September 16

    Shastri makes a statement in Parliament, puts blame on Pakistan.

    September 22

    Bhutto makes an impassioned statement on Kashmir at UNSC emergency session. Reads out Ayub Khan's statement that Pakistan is unsatisfied with ceasefire… India's permanent representative to UN, G Parthasarathi, conveys that India has accepted ceasefire and asks for a new date to implement it. UNSC fixes it at 3.30 pm on September 23

    September 23

    Guns go silent.

    January 4, 1966

    Indian and Pakistani leaders meet in Tashkent, Soviet Union, for talks

    January 10

    Shastri and Ayub Khan reach a final agreement. Joint declaration is signed by 4.30 pm.

    January 11

    Shastri dies of heart attack at 1.30 am.

    (Compiled by Pranav Kulkarni)

    They were at the forefront

    Capt Amarinder Singh

    Sikh Regiment, former ADC to GOC-in-C Western Command Lt Gen Harbaksh Singh in 1965

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    "For me, it was a great opportunity as a youngster to be with Army Commander, Lt Gen Harbaksh Singh, who was commanding the entire Western Army which was at war. I saw the Commander at work and not once did I see him stressed. He didn't show any signs of panic in the worst of conditions, and this (confidence) spread (across the regiment) and that is why the Army did so well."

    ***

    K S Bajpai

    former ambassador to Pakistan (1976-80), who was posted in Karachi during the 1965 war

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    It is definitely a time to introspect. We may have been successful in stopping Pakistan's misadventure for the time being in 1965, but we have not managed to leave a lasting impact on them. Pakistan's determination to wrest Kashmir from us, by any means, fair or foul, still exists. So, measures to tackle such stance must be a part of our policy.

    ***

    Kuldeep Nayar

    veteran journalist who, in his book Beyond The Lines – An Autobiography, has chronicled the 1965 conflict

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    "The 1965 war at best was a draw or just a small edge over Pakistan. Lahore was important but we did have to bypass it. We are boasting too much. We could not avoid it…(Many years ago) I wanted to talk to Ayub Khan, Pakistan's president then. He said I should talk to (Zulfikar Ali) Bhutto as it was his war. When I met Bhutto, he said, 'I had really thought that if Pakistan could beat India, this is the time. I was wrong….'"

    ***

    Capt Reet MP Singh (Retd)

    8 Cavalry, awarded Vir Chakra for the 1965 war

    "I consider myself lucky that I participated in the entire war. It was providence that I was not injured in the beginning of the war and suffered injuries only at the fag end when my regiment was trying to re-capture the village of Mchhike in Khemkaran sector from the Pakistani Army."

    ***

    Lt Col Nagindar Singh (Retd)

    3 Cavalry, fought the 1965 battle

    "The bulk of my regiment was deployed in Khemkaran sector in the Battle of Asal Utar while one squadron was near Attari to prevent a flanking Pakistani attack. The morale was high. Troops under my command shot down a Patton tank as it came down the Lahore-Amritsar road and we never saw any Pattons again
    in that area".

    (Compiled by Pranav Kulkarni)

    - See more at: http://indianexpress.com/article/india/india-others/big-picture-1965-fifty-years-later/#sthash.ID13lOSi.dpuf

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    CC News Letter 22-23 August - July 2015 Was Warmest Month Ever Recorded For The Globe
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    In Solidarity
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    By Eric Zuesse

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    A New Economic System, A New Society
    By John Scales Avery

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    We need a new economic system, a new society, a new social contract, a new way of life. Here are the great tasks that history has given to our generation


    EU Backs Greece's Tsipras As Left Platform Splits From Syriza
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    Greek Prime Minister Alexis Tsipras' decision to call snap elections is a calculated maneuver aimed at establishing a new political framework for pushing through deeply unpopular austerity measures. In the hours after Tsipras announced that he was resigning and calling the new elections, statements from European officials make clear that the decision was carried out under the direction of Greece's European Union (EU) creditors. Tsipras' Syriza party is expecting to be able to win the elections held next month and to form a new government, perhaps with one or another pro-austerity coalition partner


    The West Spreads Intellectual Idiocy
    By Andre Vltchek

    http://www.countercurrents.org/vltchek220815.htm

    The war for survival of humanity is already being fought. It is "The Great Humanistic War" -the warover people's brains and hearts, not over the territory. It can be also called the "information war", a "detox" war, or a war to bring human beings back to life from their intellectual intoxication, from their slumber and servility, a war for much better world, a war that would put knowledge above diplomas and stamps, human warmth and kindness aboveviolence and aggression, and human beings above profits and money. The victory can only arrive accompanied with knowledge, with independent thought, with rational humanism, with compassion and solidarity, and human warmth


    An Open Letter To Hillary Clinton
    By Rosemarie Jackowski

    http://www.countercurrents.org/jackowski220815.htm

    If you are elected president, what action will you take to compensate for the destruction of Iraq and the deaths of the civilians? Do you support reparations for Iraq? Your answer, or the lack of an answer, will give voters a clue to your sense of justice


    Former IAEA Head of Verification: AP's Iran Doc A "Crude" Forgery
    By Robert Barsocchini

    http://www.countercurrents.org/barsocchini220815.htm

    Former head of verification and security policy coordination at the International Atomic Energy Agency, Tariq Rauf, told The Huffington Post that a document disseminated by AP, which purportedly says Iran will "self-inspect" the Parchin center, is "Likely a crude attempt to hinder [the negotiation process]… [The] origin of the document could be similar to that of the 'Niger Letter' re uranium purchases by Iraq." The "Niger Letter" was used as part of the effort to persuade the US public to support the US's illegal invasion of Iraq


    Two More Syrian Heroes Murdered While Protecting Our Shared Cultural Heritage
    By Franklin Lamb

    http://www.countercurrents.org/lamb220815.htm

    Curating antiquities or attending international conferences on archaeology have become capital offenses among some claimed "religious purists." Two more Syrian nationalists who served all of us by protecting and preserving our global cultural heritage in this cradle of civilization were murdered within the past two weeks just six days apart


    Wine And Water Watch (WWW) Challenges
    Northern California's Invasive Wine Empire
    By Shepherd Bliss

    http://www.countercurrents.org/bliss220815.htm

    Sonoma County, California: Activists objecting to the over-growth of the wine/hospitality industry in rural areas of four Northern California counties have met monthly for half a year. At their August 15 meeting in Healdsburg, Sonoma County, one of the wine industry's epicenters, they agreed to name themselves Wine and Water Watch (WWW)


    Anarchism, Marxism, And Victor Serge
    By Staughton Lynd

    http://www.countercurrents.org/lynd220815.htm

    A Review Essay of Anarchists Never Surrender: Essays, Polemics, and Correspondence on Anarchism, 1908-1938,ed. and translated by Mitchell Abidor

    21 August, 2015


    The Metastasizing US Military Drone Program
    By Judith Bello

    http://www.countercurrents.org/bello210815.htm

    It was never in doubt that the US has expanded its military drone program continuously, at least since 2001, and continues to do so. Not only have the numbers of active, armed Predators and Reapers increased, but continuing research and development have yielded larger, faster drones capable of carrying more armaments, better video feeds, and more security. Smaller drones that can go unnoticed with the capacity to obtain visual or audio information, or deliver a small weapon, say a poison dart are also under intensive development


    The Latest Science on Global Warming
    By Eric Zuesse

    http://www.countercurrents.org/zuesse210815.htm

    Because of the prejudiced coverage of the global warming issue that's common in much of the press, I have decided to present highlights from one of the most comprehensive articles that's now being considered by one of the world's top scientific journals on the topic: Atmospheric Chemistry and Physics. This is the latest scientific knowledge on the subject. The paper is titled: "Ice melt, sea level rise and superstorms: evidence from paleoclimate data, climate modeling, and modern observations that 2 ◦C global warming is highly dangerous," by J. Hansen et al


    Is Russia A Threat To America's National Security?
    By G. Asgar Mitha

    http://www.countercurrents.org/mitha210815.htm

    The past five years have seen a chorus of American neo-cons levelling charges that Russia poses a national security threat. But exactly how and why remains an enigma. Is the threat military, geo-political, economic (including energy) or social or a combination? It is certainly strange that Russia should be a threat when it has been America that has an undisputed record of being national security threats to just about every country on this planet
    --
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    উপসম্পাদকীয়
    অনন্য এক গ্রন্থ আত্মসমর্পণের দ্বন্দ্ব
    শাহ্ আব্দুল হান্নান
    ২৩ আগস্ট ২০১৫,রবিবার, ১৭:৪৫

    শাহ্ আব্দুল হান্নান
    শাহ্ আব্দুল হান্নান


    1
    ইসলাম গ্রহণকারী পাশ্চাত্য চিন্তাবিদের লেখা আমি মনোযোগ দিয়ে পড়ে থাকি। তাদের মধ্যে রয়েছেন- মুহাম্মদ আসাদ, মরিয়ম জামিলা প্রমুখ। এর মধ্যে সাবেক ক্যাথলিক খ্রিষ্টান রায়ে নাস্তিক, জেফরি ল্যাং-য়ের বই Struggling to Surrender-এর বাংলা অনুবাদ 'আত্মসমর্পণের দ্বন্দ্ব'পড়লাম। সার্বিক বিবেচনায় এটি এক অনন্য বই। বইটি প্রকাশ করেছে বাংলাদেশ ইনস্টিটিউট অব ইসলামিক থট (ইওওঞ)। বাড়ি নম্বর-৪, রোড নম্বর-২, সেক্টর-৯, উত্তরা, ঢাকা (টেলিফোন নম্বর : ৮৯১৭৫০৯)।
    জেফরি ল্যাং পুস্তকের প্রথম অধ্যায়ে তার ইসলাম গ্রহণের কথা তুলে ধরেছেন। তিনি স্কুলজীবনের শেষ দিকে নাস্তিক হয়ে গিয়েছিলেন। তবে তার জীবনে অল্প বয়সেই স্বপ্ন দেখতেন যে, তিনি নামাজ পড়ছেন। তিনি পিএইচডি শেষ করার পর বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষক হিসেবে যোগদান করেন। সেখানে একজন অত্যন্ত ব্যক্তিত্বশালী আরব মুসলিম মাহমুদ কানদিলের সাথে পরিচয় হয়। তার মাধ্যমেই তিনি ইসলাম সম্পর্কে অবহিত হন এবং শেষ পর্যন্ত ইসলাম গ্রহণ করেন।
    দ্বিতীয় অধ্যায়ে তিনি আল কুরআন পড়ার ফলে যে অনুভূতি হয়, তার আলোচনা করেছেন। তিনি মনে করেন, ইসলাম যুক্তির ওপর জোর দিয়েছে। কুরআনে ৫০ জায়গায় 'আকালা'র (যুক্তির) কথা এসেছে। তবে মুসলমানদের অবশ্যই শেষ পর্যন্ত ওহিলব্ধ জ্ঞান, অর্থাৎ কুরআনের নিকটই যেতে হবে।
    তিনি বিভিন্ন বিষয়ে বাইবেল ও কুরআনের তুলনামূলক আলোচনাও করেছেন। তিনি কুরআন ও বিজ্ঞান নিয়ে আলোচনা করে বলেছেন, কুরআনে বিজ্ঞানবিরোধী কোনো কিছু পাওয়া যায়নি। তবে কুরআন বিজ্ঞানের বই নয়, হেদায়েতের বই। এ অধ্যায়ে তিনি কুরআনে ব্যবহৃত রূপক, কুরআনের অনুপম বৈশিষ্ট্য এবং মানবজীবনের মূল লক্ষ্য সম্পর্কেও আলোচনা করেছেন।
    তৃতীয় অধ্যায়ে তিনি রাসূল সা: এবং হাদিস শাস্ত্র নিয়ে আলোচনা করেছেন। হাদিসের সব ধরনের সমালোচনার তিনি উত্তর দিয়েছেন। জাল হাদিস ও দুর্বল হাদিস চিহ্নিত করার জন্য মুসলিম পণ্ডিতদের অসাধারণ প্রচেষ্টার কথা তিনি উল্লেখ করেছেন। এ কাজ এখনো জারি আছে। এ প্রসঙ্গে আমরা ড. ইউসুফ আল কারজাবির 'সুন্নাহর সান্নিধ্যে'বইয়ের উল্লেখ করতে পারি; যেখানে তিনি সুন্নাহ যাচাই ও গ্রহণের ৯টি নীতিমালা উল্লেখ করেছেন। এর মধ্যে প্রধান হচ্ছে- কুরআনের আলোকে হাদিস বুঝতে হবে; কুরআন-বিরোধী কোনো হাদিস গ্রহণযোগ্য নয়।
    এ অধ্যায়ে লেখক উল্লেখ করেন, রাসূল সা:কে কুরআনের আলোকে চিনতে হবে এবং তার সম্পর্কে অপ্রামাণ্য কোনো কাহিনী গ্রহণ করা যাবে না। (পৃ. ১০৬-৮)।
    চতুর্থ অধ্যায়ে জেফরি ল্যাং মুসলিম উম্মাহ সম্পর্কে আলোচনা করেছেন। তিনি বলেছেন, ইসলাম ভৌগোলিক পরিচয় এবং গোত্রবাদকে প্রশ্রয় দেয়নি। এখানে কালো-সাদা পার্থক্য নেই। পরিবারকে ইসলাম সার্বিকভাবে শক্তিশালী করতে চেয়েছে।
    চতুর্থ অধ্যায়ে তিনি নারীদের প্রসঙ্গে ব্যাপক আলোচনা করেছেন। তিনি ব্যাখ্যা করেছেন, আল্লাহর খলিফা হিসেবে, মানুষ হিসেবে এবং মুসলিম হিসেবে নারী-পুরুষ সমান। মানুষের মর্যাদা নির্ধারিত হয় তাকওয়ার ভিত্তিতে, নারী-পুরুষ হিসেবে নয়। তিনি মনে করেন, মুসলিম সমাজে নারীর অবস্থা তত ভালো নয়; তাদের ওপর বিধিনিষেধ অনেক বেশি। কুরআনের আলোকে তাদের অবস্থা আরো উন্নত করতে হবে।
    এ অধ্যায়ে তিনি মুসলিম নারীর পোশাক, নারী নেতৃত্ব, নারীর সাক্ষ্য, নারীদের বিভিন্ন অভিযোগ সম্পর্কে আলোচনা করেছেন। তিনি এসব ব্যাপারে ড. জামাল বাদাবির মত সমর্থন করেছেন।
    তিনি এ অধ্যায়ে জিহাদ ও রিদ্দা (ধর্মত্যাগ) নিয়েও আলোচনা করেছেন। রিদ্দা বা ইসলাম ত্যাগের ব্যাপারে তিনি ওইসব মুসলিম পণ্ডিতের মত সমর্থন করেছেন, যারা বলেছেন যে, ইসলাম ত্যাগ করে যারা ইসলামের বিরুদ্ধে অস্ত্র ধরে না, তাদের কোনো শাস্তি হবে না।
    বিভিন্ন বিষয়ে চিন্তাবিদদের ভিন্নমত থাকা অস্বাভাবিক নয়। যা হোক, এ বইটি সবার পড়া উচিত বলেই মনে করি।
    লেখক : সাবেক সচিব, বাংলাদেশ সরকার

    __._,_.___

    -- Posted by: Shah Abdul Hannan <shah_abdul_hannan@yahoo.com>
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    Press Note & Fact finding Report of Rihai Manch on Zeenat's death in Mahmoodabad Kotwali Seetapur UP.

    -- RIHAI MANCH
    For Resistance Against Repression
    ---------------------------------------------------------------------------------
    रिहाई मंच ने जारी की महमूदाबाद कोतवाली में हुई जीनत मौत प्रकरण की जांच रिपोर्ट
    पुलिस को ठहराया कसूरवार, प्रशासन की भूमिका पर सवाल, सीबीआई जांच की मांग

    लखनऊ, 23 अगस्त 2015। रिहाई मंच ने 11 अगस्त 2015 को महमूदाबाद कोतवाली,
    सीतापुर में हुई 18 वर्षीय युवती जीनत की मौत प्रकरण पर अपनी जांच
    रिपोर्ट जारी करते हुए पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग की है।

    रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने जारी विज्ञप्ति में कहा है कि
    प्रथम दृष्टया की हत्या का मामला लगने वाली इस घटना में पुलिस की भूमिका
    संदिग्ध है जिस पर जांच रिर्पोट में आठ अहम सवालों के जरिए पुलिस की
    थ्योरी पर सवाल उठाए गए हैं जिसमें पुलिस ने दावा किया था कि युवती ने
    आत्महत्या किया था। जांच दल में मोहम्मद शुऐब, राजीव यादव, अनिल यादव,
    मसीहुदीन संजरी, शाहनवाज आलम, जियाउद्दीन, हरे राम मिश्र शामिल थे। जांच
    रिपोर्ट में मौका मुआयना, आस-पास के लोगों की बातचीत, परिजनों का पक्ष,
    पुलिस अधिकारियों के बयानों, परिस्थितिजन्य तथ्यों के विश्लेषण, आला
    प्रशासनिक अधिकारियों के पक्ष, मीडिया रिपोर्टस् के आधार पर निष्कर्ष
    निकाले गए हैं।

    जिसमें कहा गया है कि कोतवाली के टाॅयलेट में मिले जीनत के शव और उसके
    द्वारा 6 बजे से 6 बजकर 20 मिनट के बीच आत्महत्या करने के पुलिस के तथ्य
    को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से आए सीएमओ सीतापुर के बयान कि
    पोस्टमार्टम जो कि 8 बजे रात से शुरू हुआ था के 18 घंटे पहले उसकी मौत हो
    चुकी थी, खारिज कर देता है। तो वहीं जब पुलिस खुद कह रही है कि मृतका 5
    बजकर 55 मिनट पर कोतवाली पहंुच गई थी तो 6 बजे मृतका के पिता द्वारा अपनी
    लड़की के बारे में कोतवाली में पूछने पर उसे कुछ न बताना और 6 बजकर 20
    मिनट पर जब पुलिस ने लड़की की टाॅयलेट में मौत हो जाने की पुष्टि की उस
    वक्त भी मृतका के पिता जो फिर वहां आए और उसके बाद 7 बजे तीबारा आए तब भी
    उसके बारे में न बताना पुष्ट करता है कि पुलिस तथ्यों को मृतका के पिता
    से छुपा रही थी। तो वहीं पोस्टमार्टम के हवाले से मृतका की मौत जब लगभग
    दो से तीन बजे के बीच हो चुकी थी तो पुलिस की कहानी के पात्र चीनी मिल
    कर्मचारी अमर सिंह, वन विभाग चैकीदार यासीन, पुलिस सिपाही ब्रहृमदेव
    चैधरी, होमगार्ड रामइकबाल और कोतवाली में मौजूद चैकीदार शिवबालक और अपने
    को टाॅयलेट में मृतका द्वारा फांसी लगाए जाने के बाद उसे देखने वाले
    प्रत्यक्षदर्शी कोतवाल रघुबीर सिंह समेत अन्य पुलिस वालों की कहानी पर
    सवाल उठ जाता है कि आखिर क्यों रात दो-तीन बजे के बीच हुई मौत को वे सब
    सुबह 6 बजे के तकरीबन बता रहे हैं या फिर उसकी कहानी बना रहे हैं। वहीं
    जांच टीम को मालूम चली कही सुनी बातें कि लड़की रात दो-ढाई बजे के करीब
    थाने के गेट से बाहर नग्न अवस्था में भागने की कोशिश कर रही थी जिसको
    चार-पांच पुलिस वाले पकड़कर कोतवाली के अंदर ले गए की पुष्टि पोस्टमार्टम
    रिपोर्ट से मृतका की मौत का समय और उस टाॅयलेट में मृतका द्वारा लगाई गई
    फांसी की पुलिस की झूठी कहानी जिसमें फांसी लगाना कहीं से भी मुमकिन नहीं
    हो सकता जहां पुलिस की पूरी कहानी पर सवाल उठाता है वहीं इस बात पर भी
    सवाल उठाता है कि रात में हुई मौत को आखिर पुलिस क्यों सुबह हुई मौत बता
    रही है। जबकि परिस्थितिजन्य साक्ष्य जीनत के साथ हुए बलात्कार और हत्या
    की ओर इंगित करते हैं। ऐसे में कोतवाली की पुलिस इस घटना में संलिप्त है
    वहीं इस घटना के इतने दिनों बाद भी जिला व प्रदेश स्तर पर शासन व प्रशासन
    स्तर पर पुलिस की कहानी को ही जबरन सच साबित करने की कोशिश हो रही हो तो
    राज्य की किसी भी एजेंसी द्वारा इस घटना की निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती।
    निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है जिसको पाने का हक हर पीडि़त व
    इंसाफ मांगने वाले का हक है। उसी अधिकार के तहत हम मांग करते हैं कि इस
    घटना की सीबीआई जांच कराई जाए।

    द्वारा जारी-
    शाहनवाज आलम
    (प्रवक्ता, रिहाई मंच)
    09415254919
    ------------------------------------------------------------------------------
    Office - 110/46, Harinath Banerjee Street, Naya Gaaon Poorv, Laatoosh
    Road, Lucknow
    E-mail: rihaimanch@india.com
    https://www.facebook.com/rihaimanch

    महमूदाबाद (सीतापुर) कोतवाली में हुई ज़ीनत की मौत प्रकरण पर जांच रिपोर्ट

    घटना
    11 अगस्त 2015, दिन मंगलवार को कोतवाली महमूदाबाद, सीतापुर में जीनत नाम
    की 18 वर्षीय लड़की की थाने के टाॅयलेट में कथित तौर पर फांसी लगा लेने
    की बात सामने आई। जिसमें पुलिस की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए स्थानीय
    लोगों ने पुलिस पर हत्या का आरेप लगाते हुए प्रदर्शन किया जिसमें नदीम
    नाम के युवक की पुलिस की गोली से मौत हो गई।

    पुलिस का दावा
    पुलिस की लम्बी चैड़ी और कई पात्रों वाली कहानी के मुताबिक वह
    'विक्षिप्त'लड़की शारदा नहर के पास सुबह चार बजे अमर सिंह नामक चीनी मिल
    कर्मचारी को मिली थी जिसने उसे वन विभाग के चैकीदार यासीन तक पहंुचाया।
    जिसने उसे सिपाही ब्रम्हदेव और होमगार्ड रामइकबाल को सौंप दिया जो उस
    लड़की को सुबह 5 बजकर 55 मिनट पर टैम्पो से कोतवाली ले आया। जांच दल को
    कोतवाल रघुवीर सिंह ने बताया कि विक्षिप्त सी यह लड़की सम्भवतः आत्महत्या
    करने के मकसद से वहां गई थी। वहीं लड़की के पिता मकबूल के मुताबिक सुबह
    करीब चार बजे जब वे नमाज पढ़ने के लिए उठे तब घर से लड़की को लापता देख
    कर और आस-पास खोजबीन करने के बाद वह सुबह करीब 6 बजे पहली बार कोतवाली
    पहंुचे और पुलिस से अपनी बेटी के बारे में पूछा और कोई जवाब न मिलने पर
    उसके गायब होने की मौखिक सूचना दी। पिता के मुताबिक वह इसके बाद दूसरी
    बार 6 बजकर बीस मिनट और तीसरी बार 7 बजे भी थाने गए थे। लेकिन आखिरी बार
    यानी 7 बजे उन्होंने थाने पर काफी भीड़ देखी जहां काफी गाडि़यां खड़ी
    थीं, जिसके चलते वे वापस चले आए कि ऐसे में उनकी कोई सुनवाई नहीं होगी।
    सवाल उठता है कि जब लड़की 5 बजकर 55 मिनट पर थाने पहंुच गई थी और उनके
    पिता 6 बजे थाने पहंुच गए थे तब उनसे पुलिस ने यह बात क्यों छुपायी कि
    वहां उनकी बेटी नहीं है ? जबकि जांच दल को तथ्यों से अवगत करा रहे कोतवाल
    रघुबीर सिंह ने इस बात की पुष्टि की कि उस दिन सुबह चैकीदार शिवबालक जब
    लड़की को शौच के लिए ले गया और दरवाजा नहीं खुलने पर उसने अन्य पुलिस
    कर्मियों को बुलाया तो वह भी कोतवाली के पास स्थित अपने आवास से आए और
    लड़की के शव को देखा।

    इसी तरह, पुलिस के मुताबिक लड़की थाने में पहंुचने के लगभग 5 मिनट के
    अंदर ही शौच करने गई, जिसे चैकीदार शिवबालक ले गया। जहां, शिवबालक के
    मुताबिक लड़की ने हैंडपाईप से बाल्टी में पानी भरा और वह टाॅयलेट में चली
    गई। शिवबालक के मुताबिक वह टाॅयलेट के बाहर ही लगभग 5-7 फिट की दूरी पर
    खड़े रहे। लेकिन लगभग 15 मिनट बाद उन्होंने लड़की को आवाज दी जिस पर कोई
    प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर उन्होंने पुलिस कर्मियों को आवाज दी जिन्होंने
    दरवाजे, जिसमें अंदर से सिटकनी नहीं थी और जो बाहर की तरफ ही खुलता है,
    को खोला जिसमें लड़की टाॅयलेट के रोशनदान जो तकरीबन 6 फिट ऊंचाई पर है,
    की जाली से अपने दुपट्टे के सहारे लटकी मिली। शिवबालक के मुताबिक
    उन्होंने लड़की के अंदर जाने के बाद किसी तरह की कोई आवाज नहीं सुनी।

    यहां कुछ अहम सवाल उठते हैं-

    1- यह कैसे सम्भव है कि कोई व्यक्ति 5-7 फिट की दूरी पर खड़ा हो और
    आत्महत्या करने वाले की किसी हरकत या आहट की आवाज उसको सुनाई न दे?
    क्योंकि आत्महत्या चाहे जिनती भी दृढ़ निश्चय से की जा रही हो मरते वक्त
    इंसान अपने को बचाने की हर सम्भव कोशिश करता है। उसके मुंह से चीख निकलना
    स्वाभाविक है, उसका हाथ-पैर पटकना स्वाभाविक है जिससे लड़की के पैर के
    पास रखी बाल्टी से पैर टकराना लाजिमी होता, जिससे वह गिर जाता या टकराकर
    सरक जाता। इन दोनों परिस्थतियों में आवाज उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
    जिसकी आवाज 5-7 फिट दूरी पर खड़े चैकीदार की कानों तक नहीं पहुंचती, यह
    मुमकिन ही नहीं है?

    2- अगर पैर बाल्टी से नहीं टकराता तो जितना छोटा टाॅयलेट है उसमें बाल्टी
    के बगल में मौजूद टाॅयलेट के दरवाजे से पैर टकराना स्वाभाविक था जिससे
    दरवाजा जो सिटकिनी नहीं होने के कारण अंदर से बंद नहीं था, निश्चित तौर
    पर खुल जाता है। लेकिन पुलिस के मुताबिक आश्चर्यजनक रूप से ऐसा कुछ भी
    नहीं हुआ। जो पुलिस की कहानी पर सवाल उठाता है।

    3- लड़की की लम्बाई लगभग पांच फिट से कुछ ज्यादा है जबकि टाॅयलेट की छत
    की उंचाई तकरीबन 7 फिट है। जबकि रोशनदान का वह छेद जिसमें फंदा बंधा है
    छत से करीब एक फिट नीचे है। इसतरह गले में बंधे फंदे और रौशनदान के छेद
    में बंधे फंदे के दूसरे सिरे की बीच की दूरी यानी फंदे की लम्बाई तकरीबन
    ढ़ाई-तीन फिट है। इसतरह गले जिसमें फंदा बंधा है और फर्श जिस पर लड़की का
    घुटना टिका है की अधिकतम दूरी तीन-साढ़े तीन फिट से ज्यादा नहीं है। ऐसे
    में सवाल उठता है कि क्या एक पांच फिट लम्बाई वाली लड़की तीन फिट लम्बे
    फंदे से लटक कर मर सकती है, वह भी तब जब उसका घुटना पूरी तरह से फर्श पर
    हो? शव की स्थिति को देखते हुए प्रश्न उठता है कि यदि जीनत ने खड़े होकर
    जाली और गले में फंदा बांधा तो गले का फंदा साढ़े चार फिट के स्थान पर
    तीन-साढ़े तीन फिट की दूरी पर कैसे आ गया। उस तस्वीर से यह संभव है कि
    जीनत ने फांसी बैठकर लगाई हो लेकिन ऐसी स्थिति में गले पर जोर पड़ना संभव
    नहीं है। जिससे उसकी मृत्यु कारित हो।

    4- मृतका की संचार माध्यमों में आई तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि
    मृत लड़की की गरदन दीवार से सटी हुई है और बहुत हल्की सी लटकी हुई है।
    जांचदल को घटना स्थल का मुआयना कराने वाले कोतवाली के सिपाहियों का कहना
    है कि लड़की ने अपने दुपट्टे का फंदा बनाकर रोशनदान की जाली में बांधकर
    अपने शरीर के वजन का दबाव बनाकर अपने गले में लगे फंदे को टाईट कर दिया
    जिससे उसकी मौत हो गई। लड़की की तस्वीर और पुलिस के बयान दोनों एक ही
    दिशा में जाते हैं पर ऐसे फांसी लगाकर कोई आत्महत्या कर सकता है यह
    स्वाभाविक नहीं है। क्योंकि लड़की का शव घुटनों के सहारे टिका है? यह एक
    ही स्थिति में संभव है जब लड़की के गर्दन में फंदा बांधकर जाली के दूसरी
    ओर से खींचा जाए और कुछ लोग लड़की को पकड़कर नीचे की तरफ दबाव बनाए? इस
    तर्क का समर्थन मृतका की तस्वीर और पुलिस के बयान दोनों करते हैं। या फिर
    दूसरी स्थिति यह है कि वह लड़की पहले मर चुकी थी जिसके शव को वहां लाकर
    दीवार के सहारे खड़ाकर फांसी का फंदा बनाकर उसके आत्महत्या करने के प्लाट
    को बनाया गया। ऐसे में दोनों स्थितियों में यह पुलिस की कहानी के न सिर्फ
    विपरीत जाता है बल्कि पुलिस की आपराधिक भूमिका पर भी सवाल उठा देता है कि
    ऐसी कौन सी परिस्थितियों ने पुलिस को ऐसा करने पर मजबूर किया।

    5- मृत लड़की के पिता ने लड़की के शव के पैरों में चप्पल न होने के सवाल
    पर जांच दल को बताया कि सुबह उन्हें अपनी बेटी का एक चप्पल उनके घर के
    प्रांगण मंे मिला तो वहीं दूसरा सड़क पर पड़ा मिला। ऐसा किन परिस्थतियों
    में हुआ होगा यह कह पाना मुश्किल है। लेकिन ऐसा होने की एक वजह यह हो
    सकती है कि उसने घर से बाहर निकलने के बाद अपना एक चप्पल प्रांगण में
    छोड़ दिया हो और दूसरा सड़क पर छोड़ दिया हो। लेकिन ऐसा उसने क्यों किया
    होगा, यह नहीं कहा जा सकता। दूसरी वजह यह हो सकती है कि उसे किसी ने सड़क
    से जबरन उठाया हो और उसका चप्पल निकल गया हो, और इस कृत्य के साक्ष्य
    मिटाने के उद्येश्य से लड़की का एक चप्पल प्रांगण के अंदर फेंक दिया गया
    हो और जल्दबाजी और अफरातफरी में दूसरा चप्पल वहीं छूट गया हो।

    वहीं पुलिस का यह कहना कि लड़की को जिस शारदा नहर के पास से पाया गया
    वहां अक्सर लोग आत्महत्या करने के मकसद से जाते हैं और चूंकि लड़की
    विक्षिप्त और काफी डिप्रेसन में लग रही थी, अपना नाम और पता बार-बार गलत
    बता रही थी इसलिए यह मानकर कि लड़की आत्महत्या के इरादे से वहां गई हो
    उसे फौरन वहां से अमर सिंह नाम के एक चीनी मिल कर्मचारी ने हटा दिया और
    वन विभाग के गार्ड यासीन को सौंप दिया। पुलिस की इस कहानी के मुताबिक
    लड़की के पास एक पाॅलीथीन बैग था जिसमें एक जोड़ी सूट और सौ रूपए थे।
    यहां सवाल उठता है कि अगर लड़की सचमुच आत्महत्या के मकसद से नहर की तरफ
    गई थी तो उसने सड़क पर सिर्फ चप्पल क्यों छोड़ दिया उसने कपड़ों का
    पाॅलीथीन बैग भी क्यों नहीं फेंक दिया? जीवन से ऊब चुका कोई आत्महत्या
    करने पर आमादा व्यक्ति सिर्फ चप्पल छोड़ देगा और कपड़ा और सौ रूपए को
    जरूरी सामान समझकर क्यों अपने पास रख लेगा ? इस तथ्य की रोशनी में लड़की
    के नंगे पांव थाने पहंुचने की कहानी पर गम्भीर सवाल उठते हैं?

    6- घटनास्थल पर मौजूद होने के बावजूद लड़की के पिता से शव के पंचनामें पर
    क्यों नहीं हस्ताक्षर करवाया गया?

    7- कुछ अखबारों में यह बात छपी कि लड़की के पिता ने पुलिस को यह लिख कर
    दिया है कि उसने आत्महत्या की है। लेकिन जांच दल को मृतका के पिता ने
    बताया कि उसने पुलिस को ऐसा कुछ भी लिख कर नहीं दिया है। ऐसे में सवाल
    उठता है कि मृतका के पिता द्वार ऐसी तहरीर दिए जाने की बात किस आधार पर
    छपी? जब पिता ने ऐसी कोई तहरीर दी ही नहीं तो पुलिस ने अखबारों में छपी
    इस खबर का खंडन क्यों नहीं किया कि उसके पास ऐसी कोई तहरीर नहीं है? यहां
    इस बात की भी सम्भावना नहीं बचती कि पिता ने पहले तो पुलिस को यह लिख कर
    दे दिया हो लेकिन बाद में मुकर गया होे क्योंकि पुलिस की कहानी के ही
    मुताबिक लड़की के थाने में आत्महत्या कर लेने के करीब चार घंटे बाद उसके
    पिता को उसके घर से जबरन थाने उठा ले जाने के बाद थाने पर दी गई। यानी
    किसी भी परिस्थिति में पिता तो यह कह ही नहीं सकता कि उसकी बेटी ने
    आत्महत्या की क्योंकि वह वहां मौजूद ही नहीं था। ऐसे में यह मानने की कोई
    वजह नहीं हो सकती कि ऐसी खबर पुलिस ने ही प्लांट करवाई हो ताकि इसे प्रथम
    दृष्टया ही संदिग्ध लग जाने वाली 'मौत'में पुलिस पर सवाल न उठे।

    8- स्थानीय सीएमओ डाॅ हरगोविंद सिंह द्वारा पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट के
    हवाले से यह बताया जाना कि लड़की की हत्या पोस्टमार्टम होने से 18 घंटे
    पहले हो गई थी अपने आप में पुलिस की कहानी पर सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि
    पोस्टमार्टम रात को 8 बजे हुआ था इस लिहाज से मौत का वक्त रात को लगभग दो
    से तीन बजे के बीच आता है। जबकि पुलिस का कहना है कि लड़की की मौत सुबह 6
    बजे के करीब हुई।

    कुछ अन्य तथ्य और लोगों की प्रतिक्रियाएं जो पुलिस की भूमिका को संदिग्ध बनाती हैं।

    1- जिन लोगों ने कोतवाली के अंदर पुलिस की थ्योरी कि यह आत्महत्या का
    मामला है का विरोध किया और पुलिस पर लड़की के साथ बलात्कार कर हत्या कर
    देने का आरोप लगाया और थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों की भी भूमिका की
    जांच की मांग की उन्हें उनके घरों से रात को उठा ले जाना। जबकि वे घटना
    के सामने आने के बाद हुए प्रदर्शनों में शामिल भी नहीं थे क्योंकि अगर
    ऐसा होता तो गिरफ्तारी, जो उनके पकड़े जाने से काफी पहले ही शुरू हो चुका
    था, अपने घर में नहीं सो रहे होते।

    2- मृतका को टायॅलेट तक पहंुचाने और टायॅलेट से 5-7 फिट की दूरी पर खड़े
    होने के बावजूद चैकीदार शिवबालक द्वारा किसी तरह की कोई आवाज न सुनने की
    अस्वाभाविक लगने वाली बात पर जांच दल द्वारा पूछताछ करने पर शिवबालक का
    जवाब देने के बजाए यह गुहार लगाना कि उनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और उन्हें
    कुछ भी नहीं मालूम, भी पुलिसिया कहानी को संदिग्ध बना देता है। क्योंकि
    यदि शिवबालक सच बता रहे थे तो उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता
    करने और कुछ भी नहीं जानने की गुहार लगाना तार्किक नहीं है।

    3- जांच दल को अपना नाम न बताने की शर्त पर घटना स्थल के आस-पास व कस्बे
    के लोगों ने बताया कि लड़की को रात में दो-ढ़ाई बजे के करीब शोर मचाते
    हुए बिल्कुल नंगी अवस्था में थाने के गेट से निकलकर भागने की कोशिश करते
    हुए देखा गया जिसे चार से पांच पुलिस वाले वापस पकड़ कर अंदर लेकर चले
    गए। अपने आप में कही सुनी ऐसी बातों को जांच रिपोर्ट में तथ्यों के रुप
    में शामिल करने का निर्णय जांचदल ने तब लिया जब पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट के
    हवाले से सीतापुर सीएमओ का बयान मीडिया में आया कि लड़की की मौत
    पोस्टमाॅर्टम जो कि 8 बजे रात में हुआ उसके 18 घंटे पहले हो चुकी थी।

    4- जांच दल को तथ्यों से अवगत करा रहे कोतवाल रघुबीर सिंह और मजिस्ट्रेट
    अजय कुमार सिंह से मीडिया में आई खबर कि लड़की के पिता ने लिखकर दिया है
    कि उसने आत्महत्या की है के बारे में कोई भी जानकारी न होना बताना। वहीं
    जांचदल ने अन्य महिला अधिकार संगठनों के जांच दल से इस संबन्ध में बात की
    तो उन्होंने बताया कि पुलिस ने उनसे कहा कि लड़की के पिता ने ऐसा लिखा है
    जिसकी वजह से एफआईआर नहीं की गई वहीं जब उन लोगों ने मृतका के पिता
    द्वारा दिए गए पत्र को मांगा तो पुलिस ने काफी देर बाद मृतका की हत्या के
    बाद हुए प्रर्दशन के बाद दर्ज किए गए मुकदमें की काॅपी उन्हें दिखाई।
    जिसपर सवाल करने पर पुलिस टाल-मटोल करने लगी और अपराध का क्राइम नंबर तक
    नहीं बताया। यह स्थितियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि पुलिस अपनी
    कहानी के मुताबिक विवेचना और मजिस्टेरियल जांच करवाना चाहती है जिससे
    तथ्यों को वह अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ सके।

    पुलिस की गोलीबारी में नदीम की मृत्यु व प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज,
    गोलीबारी, घरों पर छापेमारी व फर्जी मुकदमें लादने के संदर्भ में-

    मृतका का शव कोतवाली के टाॅयलेट में मिलने के बाद लड़की के पिता द्वारा
    यह कहने कि मृतका के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी पुलिस वालों ने हत्या
    कर दी के बाद महमूदाबाद कस्बे की इंसाफ पसंद अवाम कोतवाली पर आकर यह मांग
    करने लगी कि दोषी पुलिस वालों पर मुकदमा दर्ज किया जाए। इस दौरान वहां
    आईजी ज़की अहमद, पुलिस अधीक्षक राजेश किशन समेत शासन-प्रशासन के आला
    अधिकारी मौजूद थे। पर मजबूत तथ्यों के बावजूद पुलिस के खिलाफ एफआईआर न
    दर्ज कर आला अधिकारियों के इशारे पर अपने मांगों के लिए संघर्षरत आम-अवाम
    पर लाठी चार्ज कर व गोलीबार कर इंसाफ की अवाज को हर स्तर पर कत्ल करने की
    कोशिश की गई। इन्हीं सिपाहियों की गोलीबारी में नदीम को भी गोली लगी
    जिसके बाद जब उसके साथियों ने उसे उठाकर वहां से अस्पताल ले जाने की
    कोशिश की तो न सिर्फ उन पर लाठी चार्ज की गई बल्कि घायल नदीम को वहां
    छोड़ जाने के लिए मजबूर करने के लिए फायर किए गए। जब उसके साथी वहां से
    हट गए तो जहां सिपाहियों को उसे अस्पताल ले जाना चाहिए था वहां उल्टे
    उन्होंने गोली लगने से तड़प रहे नदीम को लाठियों से तब तक पीटा जब तक कि
    वह मर नहीं गया। जांच दल को लोगों ने बताया कि सिपाहियों ने ऐसा इसलिए
    किया कि अगर नदीम बच जाता तो वह उनके खिलाफ गवाह हो सकता था।

    कोतवाली में जिन लोगों ने प्रमुखता से मृतका की मौत पर पुलिस के खिलाफ
    एफआईआर दर्ज करने की मांग की उनकी पुलिस ने फर्जी मुकदमें में गिरफ्तारी
    कर ऐसी इंसाफ पसंद आवाजों को दबाने की कोशिश की जो महमूदाबाद कोतवाली
    पुलिस के आपराधिक चरित्र के खिलाफ थी। तो वहीं पूरे कस्बे के नागरिकों को
    आतंकित करने व आवाज न उठाने देने के लिए 11 अगस्त से लेकर जब तक जांच दल
    महमूदाबाद 14 अगस्त को गया था, उस दिन तक पुलिस की छापेमारी का दौर चल
    रहा था।

    जांच दल ने इस बात को बहुत पास से देखा कि इंसाफ का कत्ल करने पर उतारू
    पुलिस उन पुलिस वालों जिनकी जीनत की हत्या में संलिप्तता है को बचाने के
    लिए आला अधिकारियों की सरपरस्ती में पूरे इलाके की इंसाफ पसंद अवाम पर
    कहर ढा रहे हैं।

    निष्कर्ष
    कोतवाली के टाॅयलेट में मिले जीनत के शव और उसके द्वारा 6 बजे से 6 बजकर
    20 मिनट के बीच आत्महत्या करने के पुलिस के तथ्य को पोस्टमार्टम रिपोर्ट
    के हवाले से आए सीएमओ सीतापुर के बयान कि पोस्टमार्टम जो कि 8 बजे रात से
    शुरू हुआ था के 18 घंटे पहले उसकी मौत हो चुकी थी खारिज कर देता है। तो
    वहीं जब पुलिस खुद कह रही है कि मृतका 5 बजकर 55 मिनट पर कोतवाली पहंुच
    गई थी तो 6 बजे मृतका के पिता द्वारा अपनी लड़की के बारे में कोतवाली में
    पूछने पर उसे कुछ न बताना और 6 बजकर 20 मिनट पर जब पुलिस ने लड़की की
    टाॅयलेट में मौत हो जाने की पुष्टि की उस वक्त भी मृतका के पिता जो फिर
    वहां आए और उसके बाद 7 बजे जब वह फिर आए फिर भी उसे मृतका जो कि उसकी
    लड़की थी के बारे में न बताना पुष्ट करता है कि पुलिस तथ्यों को मृतका के
    पिता से छुपा रही थी। तो वहीं पोस्टमार्टम के हवाले से मृतका की मौत जब
    लगभग दो से तीन बजे के बीच हो चुकी थी तो पुलिस की कहानी के पात्र चीनी
    मिल कर्मचारी अमर सिंह, वन विभाग चैकीदार यासीन, पुलिस सिपाही ब्रहृमदेव
    चैधरी, होमगार्ड रामइकबाल और कोतवाली में मौजूद चैकीदार शिवबालक और अपने
    को टाॅयलेट में मृतका द्वारा फांसी लगाए जाने के बाद उसे देखने वाले
    प्रत्यक्षदर्शी कोतवाल रघुबीर सिंह समेत अन्य पुलिस वालों की कहानी पर
    सवाल उठ जाता है कि आखिर क्यों रात दो-तीन बजे के बीच हुई मौत को वे सब
    सुबह 6 बजे के तकरीबन बता रहे हैं या फिर उसकी कहानी बना रहे हैं। वहीं
    जांच टीम को मालूम चली कही सुनी बातें कि लड़की रात दो-ढाई बजे के करीब
    थाने के गेट से बाहर नग्न अवस्था में भागने की कोशिश कर रही थी जिसको
    चार-पांच पुलिस वाले पकड़कर कोतवाली के अंदर ले गए की पुष्टि पोस्टमार्टम
    रिपोर्ट से मृतका की मौत का समय और उस टाॅयलेट में मृतका द्वारा लगाई गई
    फांसी की पुलिस की झूठी कहानी जिसमें फांसी लगाना कहीं से भी मुमकिन नहीं
    हो सकता जहां पुलिस की पूरी कहानी पर सवाल उठाता है वहीं इस बात पर भी
    सवाल उठाता है कि रात में हुई मौत को आखिर पुलिस क्यों सुबह हुई मौत बता
    रही है। जबकि परिस्थितिजन्य साक्ष्य जीनत के साथ हुए बलात्कार और हत्या
    की ओर इंगित करते हैं। ऐसे में कोतवाली की पुलिस इस घटना में संलिप्त है
    वहीं इस घटना के इतने दिनों बाद भी जिला व प्रदेश स्तर पर शासन व प्रशासन
    स्तर पर पुलिस की कहानी को ही जबरन सच साबित करने की कोशिश हो रही हो तो
    राज्य की किसी भी एजेंसी द्वारा इस घटना की निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती।
    निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है जिसको पाने का हक हर पीडि़त व
    इंसाफ मांगने वाले का हक है। उसी अधिकार के तहत हम मांग करते हैं कि इस
    घटना की सीबीआई जांच कराई जाए।

    जांच दल के सदस्य
    मुहम्मद शुऐब , मसीहुद्दीन संजरी, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, हरेराम
    मिश्र, जियाउद्दीन, अनिल यादव
    9415012666, 9415254919, 9452800752, 7379393876, 9454292339
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    Pathapally: Mahad of the 21st Century

    Anand Teltumbde

    The Pathapally Dalit Baditha Nyaya Porata Samiti (PDBNPS), a united front of 11 organizations, created to spearhead the struggle of the Dalits of Pathapally village, decided to observe 25th anniversary of the Tsundur Massacre on  August 6, and take a long march from Pebber to Pathapally to stress their demands which the administration chose to ignore despite a series of protests it carried out over more  than two months, including a relay fast from 8 July at the Ambedkar statue, not very far from the Pebber Mandal Office. On the previous day, the administration declared that it would impose section 144, right from the Pebber exit on the Hyderabad-Bengaluru highway and ban the entry to Pathapally village on August 6. But in an exemplary display of defiance nearly seven thousand Dalits from surrounding villages gathered in solidarity with the Pathapally Dalits and compelled the administration to accept their demands with a definite commitment for implementation. Pathapally struggle is by far the first Dalit struggle after the formation of the Telangana state and first to expose that even Telangana which had surfeit of legacy of radical movements right from the pre-independence period was not immune to caste atrocities. The importance of this struggle is not however confined to Telangana, it could well be considered Mahad of the 21st century that could herald the advent of new genre of the Dalit movement for the coming times.

    The Trigger

    Pathapally, a small village in Pebber Mandal in Mehboobnagar district of the youngest state of Telangana that came into being out of popular movement that devoured more than 600 youth, is less than 15 km away from the Hyderabad-Bengaluru express way, connecting India's two most presentable global cities, epitomes of her high-end modernity. But it takes you away to at least 100 years back when Dalits were not allowed to enter temples, use common water sources and were compelled to meekly obey the dictates of dominated castes. Those who wonder why Dalits had endured their oppression and not rebelled against it for over two millennia might find their answer in Pathapally. The Dalits of Pathapally suffered all these years the brute force of domination of the upper caste Boyas. As such the struggle they waged against this oppression since  May 1 signifies new awakening and gets it closer to Mahad, where nearly nine decades ago Dalits had waged their epic struggle for the very similar purpose. The trigger for Mahad was passing of the Bole resolution in the Legislative Council of Bombay and subsequent adoption by the Mahad municipality which opened all public water tanks for Dalits. Pathapally Dalits did not have to wait for any such resolution; the constitution of the country having granted them these rights way back in 1950 and in addition brought in stringent laws against the upper castes discriminating against or perpetrating atrocities on them.

    The trigger for Pathapally came on the May Day when a Madiga (Dalit) boy Raghuram, a bus conductor in the Telangana Road Transport Corporation, one of the three lucky Dalits from 40 odd families to have some regular employment, expressed an innocuous desire to do puja in the village temple after his marriage, to a local Congress MLA, G Chinna Reddy, who was among the guests. The MLA assured him to follow him but when he along with other Dalits reached the temple the MLA was not to be found. Thinking that they had blessings of the MLA, Madigas went ahead entering the temple and doing puja. Next day, when Raghuram's mother went to distribute beetle leaves to the Boyas as per the custom, they threatened her that they would kill Raghuram for daring to take Madigas into the temple. Incidentally, Boyas, who are the dominant caste in Pathapally, themselves rank the lowest among the BCs and have been seeking scheduled tribe status for themselves since 2012. The temple priest Krishnamachari performed the yagna for purification and reprimanded Boyas for letting Madigas pollute the gods. In the night Boyas had a meeting and decided social boycott against the Madigas. The saga of atrocities on Pathapally Madigas began from there. The Madigas had to walk through a kilometer long road passing through the Boya part of the village to reach their colony at the lower end. They were teased, abused in caste names, thrown stones at, assaulted with minor pretext, and variously harassed.

    On May 4, some Madiga youth went to Pebberu and informed the Tehsildar in Prajawani (a forum for voicing people's grievances) about this harassment. In response, Tehsildar Pandu Nayak along with Prakash Yadav, sub-inspector of police (SI) and some policemen visited the Madiga hamlet, established a police picket and opened the doors of temple to let Madigas in. However, as the Tehsildar left the village, a mob of 300-400 Boya youth rushed in and attacked the Madigas in front of the SI and drove them to Dalit colony. From thereon, the harassment and assaults intensified. In order to avoid these daily ordeals, Madigas decided on June 1, to leave their homes and shift to the housing plots near the Pebberu-Kollapur road which were allotted to them by the then AP government in 2008. They erected their hutments, brought building materials and began living there. However, the priest and the village revenue officer (VRO) incited the Boyas that if Madigas lived at the upper part of the village, they would pollute the entire village and bring bad omen. In order to push them back to their old colony, on June 3, the Boyas came in hundreds and buried one, Chinna Sayanna, who died the previous night, right in the midst of Madiga hutments. Madigas approached police. The police headed by DSP, Vanaparthi accompanied by a circle inspector, SI and 60 odd policemen came to the village the next day (June 4) but could not stop the Boyas burying another dead, Godanna, in the midst of the Madiga hutments right in front of the police. Madigas resorted to rasta roko on Pebberu-Kollapur road in protest. Police who helplessly watched the Boyas bury their dead amidst Madiga hutments, resorted to severe lathi charge on the protesting Madigas. Jitendra Reddy, SI, Pebberu took 20 Dalits including Raghuram into custody and beat them black and blue. Even women were not spared by male policemen. Many of them were still taking private treatment for injuries when I met them on 19 July.   

    Skeletons Tumble Out

    The episode that began with an innocuous desire of a Dalit to enter temple, after 65 years of the constitutional guarantee to do so, exposed the years of injustice and terror the Dalits meekly endured. Just close to the newly allotted housing plots, one Narayana Madiga was allotted a patta of 1 acre and 13 gunthas agriculture land. With all formalities completed, he began cultivating it from 2001 but the dominant Boyas could not stomach the idea. They started burying their dead on his land and putting up memorial structures. While their traditional burial ground lay just across the village road and had only 3-4 such structures over several generations, the new burial ground already had over a dozen of them. Narayana was harassed into eventually giving up cultivation in 2007. As we travelled into the Madiga colony, many more things came to lime light. The village had a water tank but it supplied to only Boya houses. For Dalits, there were separate bore wells, from which underground pipe carried salty water to Dalit colony. It opened into four pits with an opening each where from Dalits drew water. The sight was so appalling that I had to ask a Madiga lady for demonstration to believe it. Beyond the Dalit village was a huge tank, which was said to have swallowed Dalit lands. Total of 54 acres of lands belonging to them was submerged rendering them landless labourers. Such is the terror of Boyas that Madigas could not utter a word of dissent. The tank standing on their lands reportedly fetches over Rs 12 lakhs annually from the auction for fishing, and irrigates Boya lands. What Madigas got in return is inundation of their houses during rainy season that brought along serpents and other reptiles for their company. While the Boyas evicted Madigas from their own lands, they have usurped the village common lands with impunity and put up semi-permanent cow sheds and warehouses.   

    Interestingly, the sarpanch of Pathapally is one Madiga woman, Subhadra, who was previously a cook in the village school under the mid-day meal scheme. Boyas had objected to her being a cook but accepted her as the sarpanch of the gram panchayat. In the current caste polarization between Boyas and Madigas, her family is on the side of the Boyas and against agitating Madigas. In contrast, one Boya, Pedda Vusanna, who had been allotted a housing plot along with Madigas is on the Madiga side. Interestingly, Subhadra also gets water from the Madiga bore wells but would not speak a word against the dominant Boyas and Pedda Vusanna is punished by his own caste men by demolishing his hut and severely beating his wife, son and daughter.

    Tsundur day and the Long March

    The lathi charge on June 4, catapulted Pathapally to the pages of district newspapers. The Kula Nirmulan Porata Samiti (Committee for the Struggle for Annihilation of Castes) (KNPS) picked up the issue and formed a united front styled as Pathapally Dalitha Badhitha Nyaya Porata Samiti on June 10, to spearhead the struggle. It comprised KNPS, Telangana Praja Front (TPF), Praja Kala Mandali (PKM), Chaitanya Mahila Sangham (CMS), Civil Liberties Committee (CLC), Palamuru Adhyayana Vedhika, Telangana Vidyarthi Vedhika (TVV), Ambedkar Yuvajana Sangham, Democratic Teachers Federation (DTF), Madiga Students Front (MSF), and Jalavanarula Samrakshana Samithi. This new outfit organized a dharna in front of the collector office in Mehboobnagar on June 23, but no one paid any heed to it. Dejected with the continuing neglect of the administration, it decided to do indefinite sit-in at the Ambedkar statue near the Pebber Mandal Office with relay fast from July 8. Even then none in the administration felt the need to speak to them. The KNPS requested me to come and intervene in the struggle which I could do on July 19. I met the relay-fasters at Pebber and thereafter, accompanied by some KNPS and PDBNPS activists, went to Pathapally. I carried out my own investigations and addressed an impromptu press meet in the Madiga colony. The next day, Pathapally got prominently flashed for the first time in the Hyderabad papers and through the Hindu report became national news. On July 20, we again had a formal press conference at Hyderabad which further added to its exposure. It stirred up the establishment but negatively. That very day (July 20) some goons feigning as MRPS (Madiga Reservation Porata Samiti) activists came and broke the pandal and had a scuffle with the agitating inmates threatening them to stop the agitation. They had to beat retreat before the resolve of the agitating people. The administration however remained unmoved.

    In order to create pressure on the government, the PDBNPS in consultation with me decided to observe 25th anniversary of the Tsundur massacre on August 6 and take an eight kilometer long march to Pathapally after the meeting at Pebber. The district administration had taken a serious note of it and declared that they would not allow it to happen. It clamped section 144 right from the entry to the Pebber town up to Pathapally. In the morning the entire area was cordoned off by the police. Before starting off from the Hyderabad airport to Pebber, I called up the SP and the (special) collector to understand their plans and informed them my desire to discuss the matters. As we reached Pebber, people began gathering and soon the crowd swell to four to five thousand. The Additional Police Superintendent (ASP) DV Srinivas Rao who headed the police there spoke with me and got my assurance that everything would be peaceful. After the speeches of the prominent activists in observance of the Tsundur Day, I addressed the gathering and gave a formal call for the long march to Pathapally. It opened up the floodgates of peoples' enthusiasm and before we could manage to come out, they began marching towards Pathapally. Many people poured in on the way to stretch the rally for nearly two km, packed with slogan shouting people. The procession reached Pathapally by 3 pm. The sloganeering reached high pitch as it entered the village. People strolled into the temple, the entry to which had triggered off the entire episode. After taking round of the Madiga colony, the procession converted itself into a public meeting on the land belonging to Narayana Madiga. The two big pandals put up for the purpose could barely accommodate a fraction of the crowd.  

    As the speeches began, it started raining heavily but people remained unmoved. Around 5 pm, I along with Prof Lakshminarayana of the University of Hyderabad, M Raghavachary, B Abhinava, and K Jayaraj of the PDBNPS went to the Special Collector and Additional SP, who were waiting for us, for discussion. The discussion went on for three hours at the Scheduled Caste Welfare Hostel in the nearby village of Srirangapuram in Peppirair Mandal. The administration represented by the Special Collector Vanaja Devi and ASP Srinivas Rao extended exemplary understanding and displayed dignified appreciation of the struggle and gracefully accepted all our demands, except for the charging Jitendra Reddy under the SC/ST Atrocity Act and the suspension of the RDO and the DSP under whose supervision the huts of Dalits were demolished. About the first matter, Srinivas Rao wanted to discuss with the SP before making a commitment and about the second Vanaja Devi assured us that the action would be taken as per the CCA rules. We accepted it in good spirit. The accepted demands included: (1) Fencing off the graveyard created by the Boyas on Madiga lands and disallowing any more burials there, (2) The heirs of Narayana Madiga to be given 23 gunthas land which they lost in the burials of Boyas within three months; (3) 45 house pattas to be given to the Dalits within a week and construction of two-bedroom houses  to start on top priority under the government scheme; (4) 18 huts and one shutter that were demolished by RDO/DSP to be made good within a week; (5) Madigas who lost about 54 acres of land in the village tank to be compensated with equivalent land under the government's land purchase scheme within three months if they had proof of patta or cultivation; (6) the fake cases filed against Madigas vide FIR 65 and 67 of 2015 and another case under section 107 against 23 Madigas to be investigated and withdrawn within 10 days; (7) Jannaiah, Erranna and others from Boya community to be charged under IPC 307 as per the complaint; (8) Boya Mallesh and Anjanelu to be arrested under the SC/ST Atrocity Act according to the FIR 55 of 2015; (9)  the temple priest Krishnamachari to be tried under the SC/ST Atrocity act; (10) the cases to be filed against the persons named in the last 11 incidents in the village; and (11) cases to be filed against the five families who buried their dead on the Madiga lands. The special Collector in addition assured that she would put in special efforts to normalize relations between the Boyas and Madigas to establish peace. The Additional SP also assured us to maintain police vigil and protect Dalits from any reprisal from the Boyas.

    Reminiscing Mahad

    Comparison of Pathapally with the iconic Mahad struggle under the leadership of Babasaheb Ambedkar might sound audacious but in many ways it is reminiscent of the former. After the attack on the Dalits on 20 March 1927 in retaliation for their 'polluting' the Chavadar tank, Ambedkar had consciously planned the Satyagraha conference on 25 December. It envisaged a team of satyagrahis offering a daily satyagraha at the Chavadar tank by drinking its water. However, some orthodox Hindus had fraudulently managed to obtain a court injunction just a few days before the conference, claiming that the Chavadar tank was actually a Chaudhary tank, a private property and hence it did not come under the purview of the Bole resolution. The entire conference debated whether to go ahead with saytyagraha or not. The overwhelming majority of the 10,000 delegates that came for the satyagraha were determined to go ahead defying the injunction and to court arrest. But eventually at the behest of Ambedkar, they relented and agreed to return without performing satyagraha. Similar situation was created on 6 August for us by the administration by clamping section 144. But sensing the resolve of the several thousand Dalits that began gathering there, it took a sensible stand and averted unseemly consequences. In Mahad, the situation was certainly far more congenial than at Pathapally to exhibit the Dalit resolve to secure their human rights but unfortunately the historical opportunity was lost in giving up the satyagraha as it also happened in the decision to not retaliate the attack during the previous conference.

    Pathapally, perhaps reflected the learning from Mahad that the mode of struggle depends upon the adversary and that the state is not necessarily a friend of Dalits or even a neutral arbiter in social conflicts. The Mahad struggle had got strangled into court battles which when won after 10 years proved to be a Pyrrhic victory. The Pathapally was surely more complex than Mahad. While Mahad was focused on a symbolic assertion of civil rights of Dalits, which were already granted them, Pathapally involved actual civil and criminal issues against the dominant community. Mahad had largely pitched itself against the orthodox Hindu society whereas Pathapally was clear that it was confronting both, the dominant community as well as the state. Mahad had a largely non-partisan colonial state to induce a notion of neutrality, but Pathapally had to knowingly deal with the neoliberal state, which characteristically tended to ignore the weak and shelter the strong. It could only bend under the pragmatic exigencies of public pressure. Pathapally reflected clarity, learning from its predecessors with which it could strategize and secure victory in one go, which Mahad could not. While such advancement in strategy, execution and consequent aftermath in Pathapally over Mahad is a natural learning consequence, it does not rob it of its similarities with Mahad. Indeed, Pathapally could be seen as Mahad of the 21st century!

    While it is shameful for India to need Mahads, it may be necessary for Dalits to herald a new genre of Dalit movement.


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    Sun, Aug 23, 2015 | 05:07 PM IST

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    Tamil nation must ensure TNA holds true to elected mandate - JS Tissainayagam
    J. S. Tissainayagam Tamil Guardian 21 August 2015

    It is up to the Tamil public, civil society and diaspora to ensure that the Tamil National Alliance remains true to the mandate given by the voters, said exiled Tamil journalist J.S. Tissainayagam on Friday.

    Writing in the Asian Correspondent Mr Tissainayagam noted Tamil discontent at ambiguous aspects of the Tamil National Alliance's manifesto, and called on,

    "Tamil voters, Tamil civil society – especially organisations such as the Tamil Civil Society Forum – and the Tamil diaspora to keep the TNA accountable and not deviate from its policy statements declared before elections." 

    Highlighting ongoing accounts of torture and stressing the importance of an international justice mechanism to deal with Sir Lanka's mass atrocities, Mr Tissainayagam added,

    "The Tamil public has to also hold the TNA to the promise of pursuing international justice for mass atrocities. There are persuasive arguments that have been put forward that models other than an international investigation will be more expedient to establish. However, in the face of mounting criticism from its electorate the TNA pledged before the election to support an international mechanism and going back on it would be a horrendous betrayal."

    Mr Tissainayagam concluded,

    "What the Tamils expected from the TNA after May 2009 was unique. While legally it had to function as a political party within the Sri Lankan system, the Tamils expected the TNA to also negotiate with the Sri Lanka government as an elected representative of a people – of a nation if you may. Up to now the TNA has not played that role well. But with the TNA's remarkable electoral victory emasculating other Tamil political parties, it is now left to the Tamil public, civil society and diaspora to be check on the TNA to compel it to stay on the straight and narrow."

    See full opinion piece below.

    Sri Lanka election: Tamil voters must keep TNA on straight and narrow

    The Tamil National Alliance (TNA) performed exceptionally well in Sri Lanka's parliamentary election on August 17. But as it prepares to negotiate with the new government on behalf of its Tamil electorate on a political settlement, accountability and demilitarisation, it is up to the Tamil public, civil society and the Tamil diaspora to keep tabs to ensure the TNA remains true to the mandate given by the voters.

    Elections to parliament followed a presidential election on January 8, which saw the shock defeat of the corrupt and violent presidency of Mahinda Rajapakse. The new president, Maithripala Sirisena, who came at the head of a coalition which the TNA helped place in power, pledged to work towards restoring democracy and good governance through a 100-day programme.Last week's parliamentary election was a referendum on the 100-day reform programme.

    However, the focus of parties contesting Tamil-dominated northern and eastern Sri Lanka was in stark contrast to party interest in the Sinhala-dominated parts of the country. In the Northern and Eastern provinces, the main campaign debate was between the TNA and the Tamil National Peoples' Front (TNPF). It concentrated on a federal constitution based on the right to self-determination for a political settlement, and for accountability for mass atrocities against Tamil civilians during the civil war that ended in May 2009.

    The contest in the Sinhala south was mainly between Rajapakse's United Peoples' Freedom Alliance (UPFA) and the United National Front for Good Governance (UNFGG), led by Ranil Wickremesinghe. While both the UNFGG and UPFA had many differences, they categorically rejected the TNA and TNPF's demands for both a federal constitution and international accountability.

    Thus it was a deeply divided Sri Lankan polity with entrenched prejudices that went to the polls. Of the 225 parliamentary seats up for grabs, the UNFGG secured 106 (just short of a simple majority, but expected to form the government), the UPFA 95 and the TNA was third with 16, with other parties taking the residue.

    While Tamils demonstrated their support to the TNA at the election, its failure to deliver on many needs of the Tamil electorate during the seven months of the Sirisena government has left its electorate worried. This is visible in at least three important areas of Tamil life.

    First are the families of the disappeared. Disappearances of Tamil civilians had been taking place even before large-scale armed combat war began in the 1980s: some were abducted by unknown people, while others were arrested by the police and military. None of them were seen by their families again.

    But disappearances following arrest crossed a threshold in May 2009. As hostilities wound down in the country's civil war, around 300,000 people crossed from LTTE-controlled areas into government territory. Some of them were LTTE cadres others were civilians. They had to all register with the Sri Lanka military after crossing. In the weeks and months that followed an unknown number – said to be in the thousands – disappeared. They were taken by the military ostensibly for questioning. When they did not return, their families believed they were being held incommunicado in Sri Lankan prisons. In the following months these families began a mostly futile search for their loved ones.

    Families searching for their missing loved ones hoped that the Sirisena government that was placed in office by Tamil votes mobilised by the TNA would help bring their children back. But they were sorely disappointed. The indifference of the government to the disappeared is summed up in the words of Wickremesinghe, who told a New York Times interviewer, "'there are people who are missing whose names are not found anywhere,' which, he said, means they either "are not among the living, or they left the country. That's all.'"

    Some families of the disappeared at least have got the message that the Sirisena-Wickremesinghe government does not care. But unable to avenge themselves on the government, they expressed their outrage at the Tamil parties, including the TNA. On the eve of the election at a protest, they said, "[t]hat they would not vote for anyone in this election or in any election until their missing loved ones were returned to them or they received news about them, the protesters condemned both the previous government and the present government."

    The second group of Tamils who have been disappointed with the TNA are those who believed that despite the TNA helping Sirisena to become president, it had failed to protect them from continuing human rights abuses. Their expectation of this from a political party and not the police is understandable because in the past the police have been a force of oppression of the Tamils, rather than an agency to enforce law and order.

    The International Truth and Justice Project (ITJP), headed the South African jurist Yasmin Sooka, details many harrowing cases in its July 2015 report . The report said, "organised abductions, torture and sexual violence by the security forces have continued long after the change of government and as recently as July 2015."

    The third group that entertains disappointment with the TNA is those who demand an international investigation for what the United Nations terms war crimes and crimes against humanity. The demand for an international investigation and trial before an international tribunal seemed possible when the UN Human Rights Council adopted a resolution in May 2014 for a report one year later. While the presentation of the report has been now postponed to September, media organisations highlighted a leaked document where the UN's Office in New York pre-empts action in September and outlines plans to set up a purely domestic inquiry into human rights violations.

    Tamils – especially the victims – have consistently rejected anything other than a full-fledged international mechanism for the investigation and trial of the perpetrators. A survey by the British NGO Sri Lanka Campaign for Truth and Justice of the survivors that had outlined the merits/demerits of different models for seeking justice for war crimes concluded that there was"clear support for an international and clear understanding that this mechanism had to be established by the United Nations."

    In the face of this, the TNA manifesto's ambivalence on supporting an international mechanism to deliver justice for the victims provoked much irritation within the Tamil polity. The manifesto asked for "[a]scertainment of the truth … Truth, justice, reparation and the guarantee of non-recurrence … being comprehensively addressed so as to ensure permanent and genuine reconciliation between the different peoples on the basis of justice and equality."

    The uproar this statement provoked had the TNA scrambling to reassure the voters that it stood unreservedly for an international investigation.

    In the light of these developments, it is now up to the Tamil voters, Tamil civil society – especially organisations such as the Tamil Civil Society Forum – and the Tamil diaspora to keep the TNA accountable and not deviate from its policy statements declared before elections. There are at least two areas where they should be vigilant.

    The TNA has had a tendency to act in the past as a gatekeeper between the Tamil people and the world outside – be it with Sri Lanka's central government institutions or the international community. As such, it sees its role as keeping the northern and eastern Sri Lanka stable and quiet, while procuring for the Tamil public its needs.

    For instance, it is only a few TNA parliamentarians and provincial councillors who have been personally involved in grassroots-level organisation around issues such as returning private land occupied by the military in northern Sri Lanka while other leaders (unless canvassing for votes) remain aloof.


    When it comes to protests on disappearances, the TNA generally leaves civil society organisations to support the families of missing persons. A well-documented example of this was British Prime Minister David Cameron's visit to Jaffna during the November 2013 Commonwealth Summit. Rather than take Cameron to the place where families of the disappeared were gathered, thereby giving the survivors an opportunity to air their grievances to a powerful actor who could take their message to the international community, the TNA leadership chose to escort him away – a move that was later criticised by commentators.

    The Tamil public and civil society have to temper the TNA's tendency to have a patron-client relationship with its voters and keep reminding the party that it derives its power and legitimacy only from the people it represents.

    The Tamil public has to also hold the TNA to the promise of pursuing international justice for mass atrocities. There are persuasive arguments that have been put forward that models other than an international investigation will be more expedient to establish. However, in the face of mounting criticism from its electorate the TNA pledged before the election to support an international mechanism and going back on it would be a horrendous betrayal.

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      अभिमत    आलेख

    लालकिले से खोखला भाषण

    प्रकाश करात : पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे बड़े सपने रखे थे और नारे पेश किए थे, उनकी तुलना में इस साल 15 अगस्त का उनका भाषण रक्षात्मक था। बेशक, मोदी के रक्षात्मक होने के

    भारत-पाक : अब लीक से थोड़ा हटने की जरूरत

    डॉ. रहीस सिंह : पाकिस्तान की तरफ से युद्ध विराम उल्लंघन सम्बंधी घटनाओं, भारतीय सीमाओं में पाकिस्तानी आतंकवादियों को लगातार प्रवेश दिलाने की पाकिस्तानी सेना की कोशिशों और पाकिस्तान की सरकार द्वारा लगातार भारतीय तर्कों के नकार क

    'समान पद समान पेंशन' का मामला

    कल्याणी शंकर : पूर्व सैनिकों के 'समान पद समान पेंशनÓ का मसला हल होने का नाम नहीं ले रहा है और सरकार लगातार कह रही है कि वह इसके पक्ष में है। पर अगर वह इसके पक्ष में है, तो देर क्यों हो रही है? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मसले पर ग

    शिक्षा का धंधा

    गिरीश मिश्र : कहा जाता है कि भारत में दो कारोबार में कभी मंदी नहीं आती है। इनमें से पहला है शिक्षा का धंधा और दूसरा है स्वास्थ्य सेवाओं का कारोबार। इन दोनों के विषय में आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने वर्ष 1776 में प्रकाशित अपन�

    चुनाव पूर्व बिहार को सवा लाख करोड़ की सहायता

    शीतला सिंह : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव आयोग द्वारा बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले सवा लाख करोड़ की केन्द्रीय सहायता की घोषणा के साथ ही यह भी जोड़ा है कि अभी चालीस हजार करोड़ और देने जा रहे हैं जिससे बिहार की बी

    मंगलौर, कारकल, मुड़बिदरी

    ललित सुरजन : 31जुलाई की दोपहर मंगलौर विमानतल पर उतरते साथ जिस अव्यवस्था के दर्शन हुए उससे मन सशंकित हुआ कि क्या आगे की यात्रा में भी यही सब झेलना होगा। हवाई अड्डे पर बेहद भीड़ और गहमागहमी थी। अपना सामान उठाने के लिए यात्री एक-दूसरे प

    हेल्दी फास्ट फूड बढ़ाइये

    डॉ. भरत झुनझुनवाला : दोमाह पूर्व मैगी नूडल में लेड की मात्रा मानदण्ड से अधिक पाये जाने के कारण सरकार ने प्रतिबन्ध लगाया। हाल में सरकार ने नेशनल कंज्यूमर रिड्रेसल में मैगी बनाने वाली नेस्ले कम्पनी के विरूद्ध 640 करोड़ का दावा उपभोक्

    भारत-पाक बंटवारे की एक सच्ची कहानी

    कुलदीप नैय्यर : यह एक सिख लड़की की कहानी है जिसे सीमा के दोनों तरफ की सैकड़ों औरतों की तरह बंटवारे की चोट सहनी पड़ी। औरतों को सबसे ज्यादा सहना पड़ा और उन्हें हर तरह के अत्याचार सहने पड़े। बंटवारे के पहले भी रावलपिंडी एक मुस्लिम बहु

    अगस्त के वो तीन दिन, जिन्होंने दुनिया का नक्शा बदल दिया

    विनय शुक्ला : चौबीस साल पहले की बात है तब मैं मास्को में यूएनआई का संवाददाता था, सोमवार 19 अगस्त, 1991 को सवेरे 4 बजे मेरे सिरहाने रखे फोन की घंटी बजी, चोंगे में कोई अनजानी आवाज सिर्फ इतना बोली: 'तास का टेलीप्रिंटर देख लो...Ó और फोन कट गया। उस

    वन रैक वन पेंशन की मांग में बाढ़ आने की संभावना

    डॉ. हनुमन्त यादव : पिछले दो महीने से जंतर मंतर पर धरना दे रहे सेवानिवृत्त सैनिक ही नहीं, भारत के हर हिस्से में बसे जो सेवानिवृत्त सैनिक आस लगाए बैठे थे कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री अपने उद्बोधन में वन रैंक वन पेंशन लागू किए जाने की घोष

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