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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    The attack in the southern city of Suruç targeted a gathering of 300 Socialist Youth Associations Federation (SGDF) members from Istanbul.

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    कैसी अफवाह फैली कि लोग सिल-बट्टों की पूजा करने लगे, फोटो पर क्लिक करके जानें...

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    দুই শিশুকে দড়ি দিয়ে বেঁধে নির্যাতন
    www.prothom-alo.com/bangladesh/article/582736

    সরকারি রাস্তায় খেজুরের কাঁটা দিয়ে তৈরি বেড়া ভেঙে ফেলায় দুই শিশুকে দড়ি ও শিকল দিয়ে বেঁধে রেখে নির্যাতন করা হয়েছে। সাতক্ষীরার শ্যামনগর উপজেলার কাশিমাড়ি ইউনিয়নের জয়নগর গ্রামে এ ঘটনা ঘটেছে ১৬ জুলাই বৃহস্পতিবার। এ ঘটনার সঙ্গে জড়িত থাকার অভিযোগে পুলিশ গোলাম মোস্তফা...
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    আমাদের ছায়াপথেই আরেক পৃথিবীর সন্ধান?
    www.prothom-alo.com/technology/article/582940

    আজ যুক্তরাষ্ট্রের মহাকাশ গবেষণা প্রতিষ্ঠান নাসার গবেষকেরা একটি সুসংবাদ দিতে পারেন। আমাদের এই মিল্কিওয়ে ছায়াপথের কোনায় পৃথিবী সদৃশ আরেকটি গ্রহের আবিষ্কারের ঘোষণা দিতে পারেন তাঁরা।আজ বৃহস্পতিবার নতুন আবিষ্কার সম্পর্কে জানানোর জন্য একটি সংবাদ সম্মেলন ডেকেছে নাসা। মিল্কিওয়ে...
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    वीटो खत्म,राजन साहेब,आप तो गये काम से!

    क्यों भइये,बाबासाहब के नाम रोना क्यों,जबकि हमने उनके संविधान खत्म होने दिया और अब रिजर्व बैक का काम भी तमाम!

    पलाश विश्वास

    राजन साहब,मरी आवाज आप तक पहुंच रही है तो गुजारिश है कि अब पहेलियां बूझने की तकलीफ हरगिज न करें कि फासिज्म के राजकाज में अब रिजर्व बैंक की कोई भूमिका है नहीं,हो भी तो रिजर्व बैंक के गवर्नर नाम के मैनेजर की सेवाओं की भारतीय महाजनी औपनिवेशिक सामंती सैन्य अर्थव्यवस्था को कोई जरुरत हैं नहीं।


    शुक्र मनाइये कि फासिज्म के राजकाज से आपको बार बार रेट में कटौती के आदेश अब फिर नहीं मिलेंगे।बाजार को जैसी और जितनी कटौती पुरकश मुनाफावसूली के लिए जरुरी होगी,वैसा बाजार के लोग खुद ही कर लेंगे और इसके लिए बगुला विशेषज्ञों की समिति बनने वाली है जिसमें जाहिर है कि सरकारी आदमी कोई रहेगा नहीं और आप होंगे तो बी आपकी चलेगी नहीं।


    योजना आयोग का खात्मा जैसे हो गया वैसे ही हूबहू भारतीय रिजर्व बैंक का अवसान है।इमारत चाहे बनी रहे,बंक भी शायद वही हो,लेकिन मौद्रिक बंदोबस्त और भारतीय बैंकिंग से भारतीयरिजर्व बैंक का नाता हमेशा हमेशा के लिए खत्म होने वाला है।वह भी आपही के कार्यकाल में।


    जैसे बैंकिंग अधिनियम में संशोधन के जरिये सरकारी क्षेत्र के बैंकों में शेयर रखने की हदबंदी खत्म करके उन्हें आजाद कर दिया गया है और हर सरकारी बैंक का प्रबंधन निजी हाथों में है वैसे ही रिजर्व बैंक के सारे सत्ताइस महकमे निजी क्षेत्र के सेवकों के हवाले हैं और आपके उच्च विचारों से हम अबतक अनजान हैं।


    मीडिया की खबर यह है कि सरकार ने नीतिगत दर के निर्धारण में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के निर्णय पर केंद्रीय बैंक प्रमुख के 'वीटो' के अधिकार को वापस लेने का प्रस्ताव किया है। इस प्रस्ताव से रिजर्व बैंक प्रमुख की शक्तियां कम हो सकती हैं।


    वित्त मंत्रालय ने भारतीय वित्तीय संहिता (आईएफसी) के संशोधित मसौदे को जारी किया है। इसमें यह प्रस्ताव किया गया है कि शक्तिशाली समिति में सरकार के चार प्रतिनिधि होंगे और दूसरी तरफ केंद्रीय बैंक के 'चेयरपर्सन' समेत केवल तीन लोग होंगे।


    संहिता के मसौदे में 'रिजर्व बैंक के चेयरपर्सन' का उल्लेख है, न कि गवर्नर का। फिलहाल रिजर्व बैंक के प्रमुख गवर्नर हैं। वित्तीय क्षेत्र में बड़े सुधार के इरादे से लाए जा रहे आईएफसी में मौद्रिक नीति समिति का प्रस्ताव किया गया है, जिसके पास प्रमुख नीतिगत दर के बारे में निर्णय का अधिकार होगा और खुदरा मुद्रास्फीति पर उसकी निगाह होगी तथा खुदरा मुद्रास्फीति वार्षिक लक्ष्य सरकार हर तीन साल में केंद्रीय बैंक के परामर्श से तय करेगी।


    मसौदे में कहा गया है, प्रत्येक वित्त वर्ष के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के संदर्भ में वार्षिक मुद्रास्फीति लक्ष्य का निर्धारण केंद्र सरकार रिजर्व बैंक के परामर्श से तीन-तीन साल में करेगी। इस मसौदे पर लोगों से 8 अगस्त तक टिप्पणी मांगी गई है।


    गले गले तक विदेशी कर्ज,व्याज,मुनाफावसूली और टैक्स होलीडे के एफडीआई बजट और सरकारी चुनाव खर्च के अलावा वित्तीय नीति तो कोई होती नहीं कारपोरेट वकीलों के प्रबंधन में,मौद्रिक कवायद जो मुनाफावसूली और बुलरन के लिए होती है,वह रेटिंग अब राजन साहेब का वीटो नहीं है।


    वद दिन भी दूर नहीं,जब बारत मुकम्मल अमेरिका होगा,रिजर्व बैंक नहीं,कोई और नोट छाप रहा होगा और बैंकिंग पूरी की पूरी विदेशी होगा।रिजर्व बैंक का जैसे काम तमाम हुआ,बैंकिग अधिनियम में पास बेहिसाब शेयरों के दम बाकी बैंक भी उसी तरह झटके से विदेशी हो जायेंगे।


    दिवालिया होगी तो आम जनता,बाकी रईस तो देनदारी और करज से नजात पाने के लिए शौकिया दिवालिया हो जाते हैं और चियारिनों का जलवा फरेब निकाह कर लेते हैं।


    यह बहुत बड़ा मसला है हमारे लिए क्योंकि इस तिलिस्म का सारा कारोबार,सारी आर्थिक गतिविधियों के तार और समावेशी विकास से लेकर समता और सामाजिक न्याय के सारेमसले भारतीय रिजर्व बैंक से जुड़े हैं,जिसकी कुल अवधारणा लोकल्याणकारी राज्य की रुह है।


    जो हो रहा है वह दरअसल संपूर्ण निजीकरण,संपूर्ण विनिवेश,संपूर्ण विनियंत्र और संपूर्ण विनियमन के जरिये हमारा सबकुछ बाजार के हवाले करने का पुख्ता इंतजाम है और इस मुद्दे पर नगाड़े सारे रंग बेरंग खामोश है और बाकी नौटंकी चालू आहे।


    सुबह सुबह इकोनामिक टाइ्म्स में वह खबर पढ़ ली,जिसकी चेतावनी सरकारी बैंकों के श्रमिक कर्मचारी नेताओं,अफसरों और आम कर्मचारियों से पिछले कमसकम दस साल से हम देते रहे हैं।

    इकोनामिक टाइम्स ने लिखा हैः

    BIGGER ROLE FOR GOVT IN FIN ARCHITECTURE - RBI Governor may Lose Veto Power On Rates

    As per revised IFC draft, govt to name majority members of powerful monetary policy panel

    The central bank governor will not have a veto over interest rates and the government will have the power to appoint a majority of the members of the monetary policy committee, according to a revised draft of the proposed Indian Financial Code (IFC) that will replace multiple laws governing the financial sector.

    These proposals, particularly the move to dilute the absolute powers the Reserve Bank governor currently enjoys in setting benchmark rates, may set the stage for another round of friction between the finance ministry and the central bank.

    The revised draft also lays down a framework for inflation-targetting under which the central bank and government will together set the target.

    The revised draft is based on the recommendations of the Financial Sector Legislative Reforms Council (FSLRC), headed by former Supreme Court judge BN Srikrishna.

    As per the latest version, the government will have the right to appoint four of the seven members of the monetary policy committee (MPC).


    

    


    http://epaperbeta.timesofindia.com/index.aspx?eid=31817&dt=20150724


    होता मैं अगर हातिम मियां तो बूत में जान डाल देता और फिर बाबासाहेब से पूछते कि किन नाचीजों के लिए आपने अपनी जिंदगी लगा दी जिन्हें अपने वजूद से भी दगा करने की आदत है।


    बहरहाल हातिम ताई महज एक कहानी यमन के राजकुमार हातिम की है, जिसमें वे सात सवालों के जवाब खोजने एक सफर में निकल जाते हैं। अंतिम सवाल के जवाब मिलने के बाद एक युद्ध होता है जिसमें हातिम जीत जाता है और कहानी खत्म हो जाती है।


    हमारी तो किसी एक सवाल के मुखातिब होने की औकात नहीं है।जंग क्या खाक लड़ेंगे हम।


    हम जो कर सकते हैं वही करते रहेंगे और कर भी रहे हैं वहीं कि बाबासाहेब के नाम रोयेंगे और बाबा साहेब का किया धरा सबकुछ तबाह होते देख भी लेंगे।


    बहरहाल जाति उन्मूलन की एडजंडे की बात हम नहीं कर रहे हैं और न बाबासाहेब के समता और सामाजिक न्याय पर कुछ अर्ज कर रहे हैं।भारतीय रिजर्व बैंक बना ही नहीं होता अगर बाबासाहेब प्राब्लम आफ रुपी न लिखते और उस पर जांच आयोग बैठाकर ब्रिटिश हुकूमत ने रिजर्व बैंक की नींव न डाली होती।यह रिजर्व बैंक भी मानता है और हमारे लोगों को मालूम नहीं है।


    हम न जाने कितनी पुश्तें और अछूत पिछड़े बने रहने को बेताब हैं और हकीकत से मुंह चुराते रहेंगे सिर्फ जूठन खाते रहकर मलाई में डुबकी लगाने की ख्वाहिशें पालकर।


    इतिहास और भूगोल के बदलते नजारें देखने की आंखें कब होंगी हमारे पास न जाने।


    फिर हम वही गधों की बिरादरी हैं,बाबासाहेब की मेहरबानी से तनिको कुर्सी पर जमने की आदत हुई है और पुरखों तरह फचेहाल नहीं हैं,सूट बूटचाई के शौकीन हैं और देसी बोल नहीं सुहाते चुंकि जुबान अंग्रेजी टर्राती है।


    बाकी हम वही गधों की बिरादरी हैं जो मलमलकर केसरिया मेंहदी चाहे जहां जहां लगा लें केसरिया अश्वमेध के घोड़े हर्गिज न होंगे क्योंकि विशुद्ध आर्यरक्त से देश के बहुजनों का कोई रिश्ता कभी नहीं रहा है और राजकाज मुकम्मल मनुस्मृति शासन है हिंदू राष्ट्र में।


    हमें माफ करें कि बिन अर्थशास्त्री हुए हम आर्थिक मसलों पर लगातार अपने लोगों को आगाह करते रहे है क्योंकि राजकाज, राजनय और राजनीति का कुल मसला आर्थिक है और मनुस्मृति भी कोई धर्मशास्त्र नहीं है,मुकम्मल अर्थशास्त्र है।


    ग्लोबीकरण,उदारीकरण और निजीकरण का कुल मतलब भी बहुजनों, जो हमारे लिए समूचा उत्पादक वर्ग है,जिसे बाबासाहेब वंचित कहा करते थे और उन्हीं के हक हकूक तय करने में बाबासाहेब ने जिंदगी खपा दी,उन्हीं बहुजनों का सिरे से सफाया है।जो फिर हिंदू राष्ट्र पैदल सेना है।


    गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक (अंग्रेज़ी: Reserve Bank of India) भारतका केन्द्रीय बैंकहै। यह भारतके सभी बैंकों का संचालक है। रिजर्व बैक भारत की अर्थव्यवस्था को नियन्त्रित करता है।

    इसकी स्थापना १ अप्रैल सन १९३५ को रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया ऐक्ट १९३४के अनुसार हुई। प्रारम्भ में इसका केन्द्रीय कार्यालय कोलकातामें था जो सन १९३७ मेंमुम्बईआ गया। पहले यह एक निजी बैंक था किन्तु सन १९४९ से यह भारत सरकार का उपक्रम बन गया है। डा॰ रघुराम राजनभारतीय रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर हैं, जिन्होंने ४ सितम्बर २०१३ को पदभार ग्रहण किया।

    पूरे भारत में रिज़र्व बैंक के कुल 22 क्षेत्रीय कार्यालय हैं जिनमें से अधिकांश राज्यों की राजधानियों में स्थित हैं।

    भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 1934 के प्रावधानों के अनुसार 1 अप्रैल 1935 को हुई थी।

    रिज़र्व बैंक का केन्द्रीय कार्यालय प्रारम्भ में कलकत्तामें स्थापित किया गया था जिसे 1937 में स्थायी रूप से बम्बईमें स्थानान्तरित कर दिया गया। केन्द्रीय कार्यालय वह कार्यालय है जहाँ गवर्नर बैठते हैं और नीतियाँ निर्धारित की जाती हैं।

    यद्यपि ब्रिटिश राजके दौरान प्रारम्भ में यह निजी स्वामित्व वाला बैंक हुआ करता था परन्तु स्वतन्त्र भारतमें सन् 1949 में इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। उसके बाद से इस पर भारत सरकार का पूर्ण स्वामित्व है।

    भारतीय रिज़र्व बैंक की प्रस्तावना में बैंकके मूल कार्य इस प्रकार वर्णित किये गये हैं :

    "बैंक नोटों के निर्गम को नियन्त्रित करना, भारत में मौद्रिक स्थायित्व प्राप्त करने की दृष्टि से प्रारक्षित निधि रखना और सामान्यत: देश के हित में मुद्रा व ऋण प्रणाली परिचालित करना।"

    • मौद्रिक नीति तैयार करना, उसका कार्यान्वयन और निगरानी करना।

    • वित्तीय प्रणाली का विनियमन और पर्यवेक्षण करना।

    • विदेशी मुद्रा का प्रबन्धन करना।

    • मुद्रा जारी करना, उसका विनिमय करना और परिचालन योग्य न रहने पर उन्हें नष्ट करना।

    • सरकार का बैंकर और बैंकों का बैंकर के रूप में काम करना।

    • साख नियन्त्रित करना।

    • मुद्रा के लेन देन को नियंत्रित करना

    समिति में ताकतवर होगी सरकार

    वित्तीय संहिता को फिर से तैयार कर रहे पैनल ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के बारे में अपने सुझावों में बदलाव किया है। इसके ढांचे में बदलाव से अब केंद्र सरकार का पलड़ा भारी हो गया है। नए प्रस्ताव के मुताबिक एमपीसी में 7 सदस्य होंगे, जिनमें से 4 की नियुक्ति सरकार करेगी।  अब रिजर्व बैंक के गवर्नर के हाथ से वीटो अधिकार ले लिया गया है। समिति बहुमत के आधार पर फैसले करेगी और वह गवर्नर को मानना पड़ेगा। इस समिति को महंगाई दर के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए नीतिगत दरों के बारे में फैसला करना है।


    बहरहाल गुरुवार को वित्त मंत्रालय की ओर से भारतीय वित्तीय संहिता (आईएफसी) के पुनरीक्षित मसौदे में दिए गए सुझाव के मुताबिक समिति की अध्यक्षता रिजर्व बैंक के गवर्नर करेंगे। वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) की ओर से दिए गए सुझाव के मुताबिक सरकार की ओर से चुने गए 4 सदस्य रिजर्व बैंक और सरकार के बीच खींचतान पैदा कर सकते हैं। यह सुझाव ऊर्जित पटेल समिति की सिफारिशों से भी मेल नहीं खाता, जो चाहती थी कि एमपीसी में 5 सदस्य हों, जिनमें से 3 केंद्रीय बैंक से लिए जाएं।


    पुनरीक्षित मसौदे में सलाह दी गई है, 'रिजर्व बैंक को निश्चित रूप से एक मौद्रिक नीति समिति बनानी चाहिए, जो महंगाई दर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नीतिगत दरें दय करे।'

    रिजर्व बैंक के गवर्नर के चेयरमैन होने और 4 सदस्य सरकार की ओर से नियुक्त किए जाने के अलावा समिति में एक सदस्य रिजर्व बैंक बोर्ड से, एक रिजर्व बैंक का कर्मचारी होगा। बोर्ड के कार्यकारी सदस्य की नियुक्ति रिजर्व बैंक बोर्ड की ओर से की जाएगी, जबकि कर्मचारी का चयन रिजर्व बैंक का गवर्नर करेगा।


    पटेल समिति के सुझाव रिजर्व बैंक के पक्ष में थे। उसके सुझावों के मुताबिक रिजर्व बैंक का गवर्नर समिति का चेयरमैन होगा। जबकि एमपीसी का उप चेयरमैन मौद्रिक नीति का प्रभारी डिप्टी गवर्नर होगा। इसके अलावा मौद्रिक नीति का प्रभारी कार्यकारी निदेशक इसका सदस्य होगा। इसमें दो सदस्य बाहर से रखे जाने का सुझाव था, जिसके बारे में विशेषज्ञता, मौद्रिक अर्थव्यवस्था में अनुभव, व्यापक अर्थव्यवस्था, केंद्रीय बैंकिंग, वित्तीय बाजार, सार्वजनिक वित्त और संबंधित क्षेत्रों के अनुभव को देखते हुए चेयरमैन और उप चेयरमैन को फैसला करना था। पुनरीक्षित मसौदे के मुताबिक एमपीसी की बैठक में फैसले बहुमत के आधार पर होंगे।


    इस मामले में भी पहले के मसौदे में बदलाव किया गया है, जिसमें कहा गया था कि रिजर्व बैंक का गवर्नर को एमपीसी के किसी भी फैसले के ऊपर फैसला करने की शक्ति होगी। पुनरीक्षित मसौदे के मुताबिक अगर किसी मामले में बराबर मत पड़ते हैं, तब रिजर्व बैंक के गवर्नर को दूसरा मत देने का अधिकार होगा। मौद्रिक समिति के  फैसले रिजर्व बैंक के गवर्नर के लिए बाध्यकारी होंगे। हर सदस्य को एक बयान लिखना होगा, जिसमें प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में मतदान करने की वजह होगी। इसके पहले रिजर्व बैंंक और वित्त मंत्रालय के बी सहमति बनी थी कि एक मौद्रिक नीति ढांचा तैयार किया जाएगा, जिसमें उतार चढ़ाव वाले महंगाई दर को लक्षित किया जाएगा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर लक्ष्य जनवरी 2016 तक 6 प्रतिशत से नीचे और 2016-17 में 4 प्रतिशत से नीचे रखा गया है।

    http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=105940


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    अंबेडकर स्टूडेंट्स फोरम
    'विश्व आदिवासी दिवस'- 09 अगस्त को वर्धा में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित हो रहा है। उलगुलान साहित्य व सांस्कृतिक मंच, गोंडवाना युवा जंगोम दल और गोंडवाना महिला जंगोम दल संयुक्त रूप से यह कार्यक्रम कर रहे हैं। दलित-आदिवासी वैचारिकी के ओजस्वी प्रवक्ता और गोंडवाना के युवा बौद्धिक कार्यकर्ता डॉ. सुनील कुमार 'सुमन' सर इस आयोजन में मुख्य वक्ता के तौर पर उपास्थित रहेंगे। हिन्दी विश्वविद्यालय से छात्र-छात्राओं की टीम भी इस प्रोग्राम में उत्साह के साथ भाग लेगी। जय सेवा ! जोहार ! जय गोंडवाना ! जय भीम !

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    लोकशाहीर
    आन्नाभाऊ साठे जयंती 
    निमित्त
    "जाहीर अभिवादन सभा"
    1 ऑगस्ट 2015, सायं. 5:00 वा.
    राजर्षी शाहू स्मारक भवन, कोल्हापूर
    आपण सहपरिवार यावे ही विनंती.
    - अनिल म्हमाने



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  • 07/25/15--01:32: जो नपुंसक है,वह मजनूं कैसे हुआ करै हैं,कोई महाजिन्न से पूछकर बतावै! जिन्हें किसानों की खुदकशी से मुनाफावसूली का बिजनेस राजकाज चलाना हो,वे क्या किसानों की परवाह करें।औरत की देह जिनके लिए मांस का दरिया हो वे क्या किसी की अस्मत के आगे सर नवाये क्योंकि उनका मजहब भी झूठा,ईमान भी फरेब,इबादत सरासर बेईमानी और रब भी उनका किराये का,नपुंसक है या नहीं वह रब भी वे तय करें कि इस देश के किसान किसी लिहाज से रब से कम नहीं। बादल फटने लगे हैं कारवां की जिद में हम डूब में हैं और पता नहीं है हमें सहर होगी या नहीं फिर कभी अंधियारे के राजकाज में जाहिर यह भी सिरे से नामालूम हिंदू राष्ट्र में खून किसी का खौलता नहीं कि किसी खुदा का फतवा है कि इस देश के किसान या मजनूं है या फिर नपुंसक सिरे से,जाहिर कि खुदकशी कर रहे किसान वे हरगिज नपुंसक नहीं यारो जो बीवी से मुंह चुराते हैं जो बोल रहा है बेखौफ वह लेकिन सैन्य राष्ट्र के फासिज्म के लिए बेहद खतरनाक देशद्रोही हर शख्स लेकिन न मणिपुर है और न छत्तीसगढ़,शुक्रिया पलाश विश्वास

  • जो नपुंसक है,वह मजनूं कैसे हुआ करै हैं,कोई महाजिन्न से पूछकर बतावै!

    जिन्हें किसानों की खुदकशी से मुनाफावसूली का बिजनेस राजकाज चलाना हो,वे क्या किसानों की परवाह करें।औरत की देह जिनके लिए मांस का दरिया हो वे क्या किसी की अस्मत के आगे सर नवाये क्योंकि उनका मजहब भी झूठा,ईमान भी फरेब,इबादत सरासर बेईमानी और रब भी उनका किराये का,नपुंसक है या नहीं वह रब भी वे तय करें कि इस देश के किसान किसी लिहाज से रब से कम नहीं।


    बादल फटने लगे हैं कारवां की जिद में

    हम डूब में हैं और पता नहीं है हमें

    सहर होगी या नहीं फिर कभी

    अंधियारे के राजकाज में जाहिर

    यह भी सिरे से नामालूम

    हिंदू राष्ट्र में खून किसी का खौलता नहीं

    कि किसी खुदा का फतवा है कि

    इस देश के किसान या मजनूं है

    या फिर नपुंसक सिरे से,जाहिर

    कि खुदकशी कर रहे किसान

    वे हरगिज नपुंसक नहीं यारो

    जो बीवी से मुंह चुराते हैं

    जो बोल रहा है बेखौफ वह लेकिन

    सैन्य राष्ट्र के फासिज्म के लिए

    बेहद खतरनाक देशद्रोही

    हर शख्स लेकिन न मणिपुर है

    और न छत्तीसगढ़,शुक्रिया

    पलाश विश्वास

    तुर्की की इस तस्वीर में फिलहाल हम नहीं है,लेकिन हो सकते हैं शामिल कभीभी।

    Turkey: 30 young socialists massacred in Suruç suicide bombing » peoplesworld The attack in the southern city of Suruç targeted a gathering of 300 Socialist Youth Associations Federation (SGDF) members from Istanbul.


    इन सभी को सलाम कि वे इंसानियत के कातिर कुर्बान हो गये।


    कारंवां कहीं नजर ही नहीं आ रहा है दोस्तों।बादलों की जिद की क्या औकात।वली जो कहलाये इन दिनों वह दरअसल मवाली है,वली तो हरगिज नहीं।मानसून पूरा का पूरा फट जाया करें ,लेकिन हमारी नींद में खलल यकीनन होगी नहीं।चीखें चाहे जितनी तेज हों खिड़कियों पर दीवारें बसा लेंगे हम और सुनामी और भूकंप के सिलसिले में मलाई रेगिस्तान में शुतुरमुर्ग की औलाद बने रहेंगे हम।


    वरना यह क्या कि इस देश का कौन शख्स है ऐसा शंहशाह आलम जहांपनाह कि उसका खेती और देहात से कोई रिश्ता नाता न रहा हो कभी।जिसकी कोई पीढ़ी कभी काश्तकारी या शेतकरी से नत्थी हुई न कभी।फिर भी खुदा का फरमान है कि किसान जो खुदकशी करै हैं वे या तो मजनू हैं या पिर नपुंसक है।


    हकीकत चाहे जो हो,लेकिन समझ में न आने वाली बात तो यह है कि जो नपुंसक है,वह मजनूं कैसे हुआ करै हैं,कोई महाजिन्न से पूछकर बतावै!


    बाल की खाल निकालें तो बात निकलेंगी और हजारों हजार साल की दूरियां तय करके बाबुलंद सवालिया निशान बन जायेगी कि जो असल में वली है,या रब,वही दरअसल नपुंसक है और नपुंसक कोई और जो हो,सो हो,वली या मजनूं हरगिज हो नहीं सकता।रंगा सियार जैसे शेर नहीं हो सकता।


    मोहतरमा कोई अजीज पढ़ रही हों तो तोबा,हमारी गुस्ताखी माफ करें कि हम दुनियाभर की औरतों की तौहीन करने वाले नहीं हैं ,इस पर भी यकीन करें।औरतखोर मर्दों के फासिज्म के हालाते बयां पर हम महज तकनीकी खामी बता रहे हैं।


    वरना औरतों के खिलाफ यह उतनी ही बड़ी बदतमीजी है जितनी इस देश के लोगों के मुंह और पेट तक अन्न पहुंचाने वालों की।


    जिन्हें किसानों की खुदकशी से मुनाफावसूली का बिजनेस राजकाज चलाना हो,वे क्या किसानों की परवाह करें।औरत की देह जिनके लिए मांस का दरिया हो वे क्या किसी की अस्मत के आगे सर नवाये क्योंकि उनका मजहब भी झूठा,ईमान भी फरेब,इबादत सरासर बेईमानी और रब भी उनका किराये का,नपुंसक है या नहीं वह रब भी वे तय करें कि इस देश के किसान किसी लिहाज से रब से कम नहीं।


    मुहब्बत की तमीज जिन्हें है नहीं हरगिज,वेही हैं फासिज्म के राजकाज के सिपाहसालार और नफरत ही उनका कारोबार।


    महब्बत का किस्सा अजब गजब है।

    मुहब्बत का जलवा अजब गजब है।

    मसलन जिस महाश्वेता दी को व्हील चेयर पर बिठाकर 21 जुलाई की रैली में अपनी ढहती हुई साख पर परदा डालने के लिए ले आयीं दीदी हमारी और बेहद अस्वस्थ जिनसे उनने कहलवाया कि बंगाल अव्वल ठैरा और बाकी राज्यों में राजकाज फिसड्डी, मुहब्बत का कारनामा यह कि वही महाश्वेतादी बादल फटते नजारों के बीच डूबते हुए कोलकाता में भीगी भीगी बहारों की फिजां में घर से ऐसे निकली जैसे हानीमून पर हों और सीद्धे पहुंच गयी नवान्न।


    गलत न समझें ,वे ममता  नाम की किसी मुख्यमंत्री के दरवज्जे मत्था ठेकने नहीं गयीं जो खुद उन्हें आंदोलन की जननी कहकर हजार बार सलाम करती हैं और उनके बुलावे पर कहीं भी जा सकती हैं।


    बंगाल में तृणमूली क्या खाक समझेंगे किसी महाश्वे देवी को।वामपंथी तो खैर कभी न समझे हैं उन्हें।इन दिनों कोलकाता में महाश्वेता दी को ममता के अलावा कोई पूछता भी नहीं है।हम भले इत्तफाक करें या न करें ममता के कामाज राजकाज से उनकी शुक्रिया कि वे कमसकम हमारी महाश्वेता दी को पलक पांवड़े पर बिठाये रखा हैं जबकि हमने उन्हें तन्हा तन्हा छोड़ दिया है।


    किसान का बेटा हूं।फिर देश के किसानों की तरह अधनंगे,कैंसर से रीढ़गले लेकिन सीधी रीढ़ के पुलिनबाबू का बेटा हूं और बसंतीपुर का वारिश हूं,रब से भी खौफ नहीं करने की विरासत है हमारी कि हमारी हजारों पुश्तें जल जंगल जमीनकी हिफाजत के वास्ते कुर्बान हैं,इसलिए महाश्वेता दी के लिखे हमारे इतिहास के पन्नों को भूल नहीं सकता चाहें वे तन्हा हालत में किसी से भी नत्थी हों।


    बादल क्यों फटते हैं,हमें मालूम है।

    हिमालय क्यों ज्वालामुखी में तब्दील है,हमें मालूम है यकीनन।

    हमें मालूम है कि क्यों छत्तीसगढ़,मणिपुर या कश्मीर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे के लाल निशान हैं।


    हमें मालूम है कि सोने का भाव अचानक क्यों गिर रहा है और सेनसेक्स का सेक्स क्या है।

    हमें मालूम है कि डूब का सिलसिला कहां से शुरु है।


    हमें मालूम है कि समुंदर क्यों जल रहा है और दसों दिशाओं में कमल क्यों खिलखिलाकर खिल रहा है।

    यही हमारा अपराध है चाहे तो तीस्ता बना दो या साईबाबा।


    जिस मुल्क में फासिज्म का राजकाज हो,सिर्फ नपुंसकों को बोलने लिखने की इजाजत हो और बाकी लोग खामोश हैं,सोच और ख्वाबों पर जहां पाबंदी हो और परिंदे या तितलियों के डैनों पर जहां जंजीरे हों और हर घर पिंजड़ें में तब्दील हो,खेत खलिहान जल रहे हों,किसान खुदकशी कर रहे हो,सबकुछ लुट रहा हो,डाकुओं और रहजनों के इस मुकाम पर सच जानना और सच कहना भी किसी कत्ल के मुकदमे में चश्मदीद गवाह होना है और मारे जाना है।


    महब्बत का किस्सा अजब गजब है।

    मुहब्बत का जलवा अजब गजब है।


    बहरहाल महाश्वेता देवी को हमने अकेले में नवान्न के सारे गीत सिलसिलेवार गाते हुुए सुना है।जो नवान्न उनके पति और नवारुण दा के पिता बिजन भट्टाचार्य ने लिखा था और मामूली तकरार से जिस पति से उनका तलाक हो गया था और दूसरी शादी भी कर ली थी महाश्वेता देवी ने।अपने इकलौते बेटे से तजिंदगी अलग रहीं जो और कैंसर से घुट घुटकर मरते इकलौते बेटे के सिर पर हाथ फेरने जो कभी नहीं गयीं,बरसात के इस मौसम में वे भयंकर अस्वस्थता के हाल में उसी नवान्न को छूने चली गयीं किसी की खातिर।


    मुहब्बत का किस्सा अजब गजब है।

    मुहब्बत का जलवा अजब गजब है।


    फासिज्म का कारिंदा क्या जाने की मुहब्बत क्या है।

    सुहागरात से पहले पत्नी का परित्याग करने वालों की जमात क्या जानें कि मजनूं की क्या औकात है।



    कोई नपुंसक ही यह हिमाकत कर सकै है कि कहैं कि नुंसक हैं ,इसीलिए खुदकशी कर रहे हैं किसान।


    क्यों भइये,बाबासाहब के नाम रोना क्यों,जबकि हमने उनके संविधान खत्म होने दिया और अब रिजर्व बैक का काम भी तमाम!


    राजन साहब,मरी आवाज आप तक पहुंच रही है तो गुजारिश है कि अब पहेलियां बूझने की तकलीफ हरगिज न करें कि फासिज्म के राजकाज में अब रिजर्व बैंक की कोई भूमिका है नहीं,हो भी तो रिजर्व बैंक के गवर्नर नाम के मैनेजर की सेवाओं की भारतीय महाजनी औपनिवेशिक सामंती सैन्य अर्थव्यवस्था को कोई जरुरत हैं नहीं।


    शुक्र मनाइये कि फासिज्म के राजकाज से आपको बार बार रेट में कटौती के आदेश अब फिर नहीं मिलेंगे।बाजार को जैसी और जितनी कटौती पुरकश मुनाफावसूली के लिए जरुरी होगी,वैसा बाजार के लोग खुद ही कर लेंगे और इसके लिए बगुला विशेषज्ञों की समिति बनने वाली है जिसमें जाहिर है कि सरकारी आदमी कोई रहेगा नहीं और आप होंगे तो बी आपकी चलेगी नहीं।


    योजना आयोग का खात्मा जैसे हो गया वैसे ही हूबहू भारतीय रिजर्व बैंक का अवसान है।इमारत चाहे बनी रहे,बंक भी शायद वही हो,लेकिन मौद्रिक बंदोबस्त और भारतीय बैंकिंग से भारतीयरिजर्व बैंक का नाता हमेशा हमेशा के लिए खत्म होने वाला है।वह भी आपही के कार्यकाल में।


    जैसे बैंकिंग अधिनियम में संशोधन के जरिये सरकारी क्षेत्र के बैंकों में शेयर रखने की हदबंदी खत्म करके उन्हें आजाद कर दिया गया है और हर सरकारी बैंक का प्रबंधन निजी हाथों में है वैसे ही रिजर्व बैंक के सारे सत्ताइस महकमे निजी क्षेत्र के सेवकों के हवाले हैं और आपके उच्च विचारों से हम अबतक अनजान हैं।


    मीडिया की खबर यह है कि सरकार ने नीतिगत दर के निर्धारण में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के निर्णय पर केंद्रीय बैंक प्रमुख के 'वीटो' के अधिकार को वापस लेने का प्रस्ताव किया है। इस प्रस्ताव से रिजर्व बैंक प्रमुख की शक्तियां कम हो सकती हैं।


    वित्त मंत्रालय ने भारतीय वित्तीय संहिता (आईएफसी) के संशोधित मसौदे को जारी किया है। इसमें यह प्रस्ताव किया गया है कि शक्तिशाली समिति में सरकार के चार प्रतिनिधि होंगे और दूसरी तरफ केंद्रीय बैंक के 'चेयरपर्सन' समेत केवल तीन लोग होंगे।


    संहिता के मसौदे में 'रिजर्व बैंक के चेयरपर्सन' का उल्लेख है, न कि गवर्नर का। फिलहाल रिजर्व बैंक के प्रमुख गवर्नर हैं। वित्तीय क्षेत्र में बड़े सुधार के इरादे से लाए जा रहे आईएफसी में मौद्रिक नीति समिति का प्रस्ताव किया गया है, जिसके पास प्रमुख नीतिगत दर के बारे में निर्णय का अधिकार होगा और खुदरा मुद्रास्फीति पर उसकी निगाह होगी तथा खुदरा मुद्रास्फीति वार्षिक लक्ष्य सरकार हर तीन साल में केंद्रीय बैंक के परामर्श से तय करेगी।


    मसौदे में कहा गया है, प्रत्येक वित्त वर्ष के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के संदर्भ में वार्षिक मुद्रास्फीति लक्ष्य का निर्धारण केंद्र सरकार रिजर्व बैंक के परामर्श से तीन-तीन साल में करेगी। इस मसौदे पर लोगों से 8 अगस्त तक टिप्पणी मांगी गई है।


    गले गले तक विदेशी कर्ज,व्याज,मुनाफावसूली और टैक्स होलीडे के एफडीआई बजट और सरकारी चुनाव खर्च के अलावा वित्तीय नीति तो कोई होती नहीं कारपोरेट वकीलों के प्रबंधन में,मौद्रिक कवायद जो मुनाफावसूली और बुलरन के लिए होती है,वह रेटिंग अब राजन साहेब का वीटो नहीं है।


    वद दिन भी दूर नहीं,जब बारत मुकम्मल अमेरिका होगा,रिजर्व बैंक नहीं,कोई और नोट छाप रहा होगा और बैंकिंग पूरी की पूरी विदेशी होगा।रिजर्व बैंक का जैसे काम तमाम हुआ,बैंकिग अधिनियम में पास बेहिसाब शेयरों के दम बाकी बैंक भी उसी तरह झटके से विदेशी हो जायेंगे।


    दिवालिया होगी तो आम जनता,बाकी रईस तो देनदारी और करज से नजात पाने के लिए शौकिया दिवालिया हो जाते हैं और चियारिनों का जलवा फरेब निकाह कर लेते हैं।


    यह बहुत बड़ा मसला है हमारे लिए क्योंकि इस तिलिस्म का सारा कारोबार,सारी आर्थिक गतिविधियों के तार और समावेशी विकास से लेकर समता और सामाजिक न्याय के सारेमसले भारतीय रिजर्व बैंक से जुड़े हैं,जिसकी कुल अवधारणा लोकल्याणकारी राज्य की रुह है।


    जो हो रहा है वह दरअसल संपूर्ण निजीकरण,संपूर्ण विनिवेश,संपूर्ण विनियंत्र और संपूर्ण विनियमन के जरिये हमारा सबकुछ बाजार के हवाले करने का पुख्ता इंतजाम है और इस मुद्दे पर नगाड़े सारे रंग बेरंग खामोश है और बाकी नौटंकी चालू आहे।


    सुबह सुबह इकोनामिक टाइ्म्स में वह खबर पढ़ ली,जिसकी चेतावनी सरकारी बैंकों के श्रमिक कर्मचारी नेताओं,अफसरों और आम कर्मचारियों से पिछले कमसकम दस साल से हम देते रहे हैं।

    होता मैं अगर हातिम मियां तो बूत में जान डाल देता और फिर बाबासाहेब से पूछते कि किन नाचीजों के लिए आपने अपनी जिंदगी लगा दी जिन्हें अपने वजूद से भी दगा करने की आदत है।


    बहरहाल हातिम ताई महज एक कहानी यमन के राजकुमार हातिम की है, जिसमें वे सात सवालों के जवाब खोजने एक सफर में निकल जाते हैं। अंतिम सवाल के जवाब मिलने के बाद एक युद्ध होता है जिसमें हातिम जीत जाता है और कहानी खत्म हो जाती है।


    हमारी तो किसी एक सवाल के मुखातिब होने की औकात नहीं है।जंग क्या खाक लड़ेंगे हम।


    हम जो कर सकते हैं वही करते रहेंगे और कर भी रहे हैं वहीं कि बाबासाहेब के नाम रोयेंगे और बाबा साहेब का किया धरा सबकुछ तबाह होते देख भी लेंगे।


    बहरहाल जाति उन्मूलन की एडजंडे की बात हम नहीं कर रहे हैं और न बाबासाहेब के समता और सामाजिक न्याय पर कुछ अर्ज कर रहे हैं।भारतीय रिजर्व बैंक बना ही नहीं होता अगर बाबासाहेब प्राब्लम आफ रुपी न लिखते और उस पर जांच आयोग बैठाकर ब्रिटिश हुकूमत ने रिजर्व बैंक की नींव न डाली होती।यह रिजर्व बैंक भी मानता है और हमारे लोगों को मालूम नहीं है।


    हम न जाने कितनी पुश्तें और अछूत पिछड़े बने रहने को बेताब हैं और हकीकत से मुंह चुराते रहेंगे सिर्फ जूठन खाते रहकर मलाई में डुबकी लगाने की ख्वाहिशें पालकर।


    इतिहास और भूगोल के बदलते नजारें देखने की आंखें कब होंगी हमारे पास न जाने।


    फिर हम वही गधों की बिरादरी हैं,बाबासाहेब की मेहरबानी से तनिको कुर्सी पर जमने की आदत हुई है और पुरखों तरह फचेहाल नहीं हैं,सूट बूटचाई के शौकीन हैं और देसी बोल नहीं सुहाते चुंकि जुबान अंग्रेजी टर्राती है।


    बाकी हम वही गधों की बिरादरी हैं जो मलमलकर केसरिया मेंहदी चाहे जहां जहां लगा लें केसरिया अश्वमेध के घोड़े हर्गिज न होंगे क्योंकि विशुद्ध आर्यरक्त से देश के बहुजनों का कोई रिश्ता कभी नहीं रहा है और राजकाज मुकम्मल मनुस्मृति शासन है हिंदू राष्ट्र में।


    हमें माफ करें कि बिन अर्थशास्त्री हुए हम आर्थिक मसलों पर लगातार अपने लोगों को आगाह करते रहे है क्योंकि राजकाज, राजनय और राजनीति का कुल मसला आर्थिक है और मनुस्मृति भी कोई धर्मशास्त्र नहीं है,मुकम्मल अर्थशास्त्र है।


    ग्लोबीकरण,उदारीकरण और निजीकरण का कुल मतलब भी बहुजनों, जो हमारे लिए समूचा उत्पादक वर्ग है,जिसे बाबासाहेब वंचित कहा करते थे और उन्हीं के हक हकूक तय करने में बाबासाहेब ने जिंदगी खपा दी,उन्हीं बहुजनों का सिरे से सफाया है।जो फिर हिंदू राष्ट्र पैदल सेना है।


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    ऐसी राजनीति पर थूःथूःथूः

    कि सबसे बड़ा मसला यह कि कौन कंडोम नकली है और कौन असली

    उस रसगुल्ला क्रांति के बाद वामपक्ष को भी जनता के मुद्दों की पहचान नहीं है

    पलाश विश्वास

    बसंतीपुर में हमारे घर में दो चीजों पर सबसे धमाल हुआ करता था।पहला तो रसगुल्ला और दूसरी मिर्चें।चूंकि नदियों से हम बेदखल हो गये थे देश के विभाजन के साथ,इसलिए हिलसा मछलियां तीं नहीं और हिलसा थी नहीं तो मछलियों के लिए कोई हंगामा कभी बरपा नहीं।


    मैं खासतौर पर रसगुल्ले का दीवाना रहा।इतना दीवाना कि पूरा बचपन और कैशोर्य रसगुल्ले के हवाले था।


    मेरे चाचा के मुंह से रसगुल्ला निकालकर खाया है मैंने।


    साझा परिवार था।भाई बहनें बहुत।मैं अपना हिस्सा खत्म करके दूसरों के रसगुल्ले हड़पने के लिए घात लगाकर बैठता था।


    खालिस जैशोर फरीदपुर की आखिरी विरासत मिर्ची थी।बिन मिर्ची खाना जूठन जैसा लगता था हमें।हमारे घर में खालिस प्रतियोगिता होती थी हर रोज कि सबसे झाल मिर्च कौन कितने गिन गिनकर खा सकता है।


    हमारे ताउजी तो दावत में भी जेबों में मिर्चे भर भरकर ले जाते थे कि काने में मिर्च कम हुआ तो जेब से निकाल लें जो अक्सर होता था।


    बंगाल में एक क्रांति रसगुल्ला क्रांति भी हुई थी 1965 में ऐसी क्रांति जो दुनियाबर में शायद कहीं नहीं हुई।यूं कहें कि बंगाल में आधे अधूरे लागू हुए भूमि सुदार की वजह भी वही रसगुल्ला क्रांति हे ,तो शायद गलत न होगा।


    यूं तो तब भी तेभागा जारी था और भीतर ही भीतर कृषि विद्रोह की आग सुलग रही थी और समां खाद्य आंदोलन का था,असल गलती गांधीवादी तब के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्रे सेन ने यह कर दी कि बंगाल में खाद्य संकट से निबटने के लिए उनने आव देखा न ताव,फौरन छेने की मिठाइयों पर रोक लगा दी,जिसमें सबसे खास रसगुल्ला हुआ करै है।फिर तो बंगाल में ऐसा भूचाल आया कि हाशिये पर खड़े वाम पंथी सत्ता में ऐेसे आये कि करीब 35 साल तक उनका शासन रहा बंगाल में।


    भारतभर में इतने अधिक अलोकप्रिय मुख्यमंत्री कोई दूसरा हो।उनके साथ उतने ही अलोकप्रिय रहे हैं अतुल्य घोष।इसमें भी खास बात यह है कि इन दोनों से ईमानदार राजनेता बंगाल में शायद कोई तीसरा हों।


    दोनों पक्के गांधीवादी रहे हैं।सादगी से जीने वाले।न उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप था और न अपने अपने को रेवड़ियां बांटने का कोई सवाल था और न वे तानाशाह थे।


    फिरभी हालात उनके खिलाफ थे और बंगाल तब दाने दाने को मोहताज था।


    इससे भी बड़ी बात यह कि बंगाल के कामरेडों ने सही मुद्दों और सही मसलो को उठाने और जनता के साथ खड़े होने,जनता के बीच लगातार लगातार सक्रिय रहकर जनता को सत्ता के खिलाफ लामबंद करने में कोई कोताही न की।


    नेता भी कैसे थे कामरेड ज्योति बसु,कामरेड मुजफ्फर अहमद,कामरेड सोमनाथ चटर्जी,कामरेड हरिकृष्ण कोनार,कामरेड प्रमोद दासगुप्त,कामरेड विनय चौधरी,कामरेड शैलेन दासगुप्त,कामरेड जतीन चक्रवर्ती,कामरेड गीता,कामरेड अशोक घोष वगैरह वगैरह।जाहिर है कि नेतृत्व का कोई संकट भी नहीं था।


    वरना आज के मुकाबले तब वामपंथ के लिए कांग्रेस को बेदखल करके सत्ता में आना बहुत मुश्किल था।


    बंगाली सबसे ज्यादा मछलियों,मिष्टि दही,रसगुल्ला समेत तमाम रसदार छेने की मिठाई के दीवाने रहे हैं हमेशा से।बंगाल में किसी भी शहरी इलाके के किसी भी मोहल्ले में और किसी भी गांव में मिठाई की दुकान में चले जाये जो इफरात हैं हर कहीं और कमसकम मिठाई की दुकान से घाटा हो जाने का अंदेशा कभी हो ही नहीं सकता।


    अब जबकि मधुमेह की महामारी है जो साठ के दशक में रही नहीं है।


    फिरभी शाम को कभी फुरसत मिलती है तो अपने मोहल्ले के किसी भी मिठाई की दुकान में बड़े बड़े गमलों में रसगुल्ले,गुलाब जामुन,चमचम छेने की जलेबियां और छेने की दूसरी मिठाइयां बनते देखकर हमेशा हैरत में होता हूं कि इतनी मिठाइयां,इतनी दुकानें और मधुमेह के इतने मरीज और दस रुपये से कम नहीं कोई अच्छी मिठाई,तो खाता कौन होगा।


    शाम चार बजे से रात के दस बजे तक मिठाइयां बनती है।बासी मिठाइयां अनबिकी बहुत बेदर्दी के साथ रात को दुकान बंद होते न होते कचरे में फेंक दी जाती है।सवाल किया कोई इस सिलसिले में,बेवकूफ माने जायेंगे।


    रसगुल्ला और मिछाइयों कि ऐसी महिमा अपरंपार जिसपर लगे प्रतिबंध की वजह से प्रफुल्ल चंद्र सेन और अतुल्य घोष जैसे लोग भी बेहद अलोकप्रिय हो गये।


    जबकि हकीकत यह है कि खासतौर पर प्रफुल्ल चंद्र सेन  को इस बात की ज्यादा फिक्र थी कि छेने की मिठाइयों की वजह से दूध की किल्लत हो रही थी और वे मिठाइयों पर पाबंदी लगाकर दूध बच्चों और उनकी माताओं के लिए बचाने की जुगत में थे।


    अब उनकी क्या कहें जो जनता के खान पान पर पाबंदी लगाकर धर्म की राजनीति के जरिये धर्मोन्माद फैला रहे हैं।


    उससे बी बड़ा मसला है कि मौजूदा राजनीति की जड़ें जनता के बीच कहीं नहीं हैं और जनता के मुद्दों से राजनीति का कोई सरोकार नहीं है।


    संसद का मानसून सत्र जारी है और हर मिनट ढाई लाख का खर्च है।

    जनता के किसी मुद्दे की गूंज लेकिन कहीं नहीं है।


    राजनीति अब सत्ता समीकरण के सिवाय कुछ भी नहीं है।

    नगाड़े खामोश हैं और नौटंकियां चालू है कुल किस्सा यही है।


    वामपक्ष को भी उस रसगुल्ला क्रांति के बाद मुद्दों की कोई पहचान नहीं है।


    हाल में धर्मस्थलों पर कंडोम की किल्लत सुर्खी बनकर अखबारों और टीवी पर छा गयी थी और अब सबसे बड़ा मसला यह है कि हम कैसे कंडोम का इस्तेमाल करें और कैसे कंडोम का इस्तेमाल न करें।



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    IPL स्पॉट फिक्सिंग: क्रिकेटरों सहित दाऊद और छोटा शकील भी बरी, फैसला सुनकर रो पड़े खिलाड़ी



    नई दिल्लीः दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल)-2013 से जुड़े स्पॉट फिक्सिंग मामले में क्रिकेट खिलाड़ी शांताकुमारन श्रीसंत, अजीत चंदीला और अंकित चव्हाण पर लगे सभी आरोपों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने तीनों क्रिकेटरों और अन्य के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा लगाए गए सभी आरोप हटा दिए। पूरे मामले में सबूतों के अभाव में कोर्ट ने सभी 36 आरोपियों को बरी कर दिया।

    राजस्थान रॉयल्स टीम से जुड़े तीन खिलाडि़यों को दिल्ली पुलिस ने स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया था। बीसीसीआई द्वारा आजीवन प्रतिबंध की सजा झेल रहे चव्हाण और श्रीसंत जमानत पर रिहा हो गए थे लेकिन चंदीला को जमानत नहीं मिली थी।


    अदालत का यह फैसला दिल्ली पुलिस के लिए एक झटका है, जिसने पूरे मामले की जांच की थी। पुलिस ने अदालत के सामने 6000 पन्ने का चार्जशीट दाखिल किया था, जिसमें 42 लोगों को आरोपी बनाया गया था।

    आरोपियों में अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम कासकर और उसका सहयोगी छोटा शकील भी शामिल थे। खिलाडि़यों को तो अदालत ने जमानत दे दी थी लेकिन दाऊद और शकील के खिलाफ अदालत ने गैरजमानती वारंट जारी किया था।

    आईपीएल के छठे संस्करण के दौरान सामने आई इस हिला देने वाली घटना के तहत दिल्ली पुलिस ने 16 मई 2013 को भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेल चुके श्रीसंत सहित कई सटोरियों को गिरफ्तार किया था।

    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नीना बंसल कृष्णा ने फैसला सुनाते हुए कहा, ''सबको (मामले से) बरी किया जाता है।'' 36 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने के संबंध में फैसले के लिए मामले को आज रखा गया था। फैसला सुनने के बाद 32 वर्षीय श्रीसंत की आंखें छलक आईं। अदालत कक्ष में मौजूद खिलाड़ियों ने एक दूसरे को गले लगाकर बधाई दी।

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    फैसले के बाद क्या कहा श्रीसंत ने 
    फ़ैसला आने के बाद श्रीसंत कोर्ट में रो पड़े। श्रीसंत ने कहा कि वो फ़ैसले से ख़ुश हैं और उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। श्रीसंत ने भरोसा जताया कि कोर्ट से राहत मिलने के बाद उन्हें बीसीसीआई से भी राहत मिलेगी। उन्होंने कहा, ''ईश्वर ने चाहा तो मैं क्रिकेट में वापसी करूंगा। मुझे कोई शिकायत, कोई मलाल नहीं है।''

    फैसले पर अजित चंडीला का बयान
    वहीं केस में क़रीब 3 महीने से ज़्यादा समय जेस में बितावने वाले अजित चंडीला ने फ़ैसले पर कहा कि ये उनकी ज़िंदगी का सबसे ख़राब पल था जो अब गुजर गया है।

    दिल्ली पुलिस की मांग और बयान
    आज सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने पटियाला कोर्ट में कहा कि हमारी जांच जारी है और हमें जांच करने के लिए और वक्त चाहिए। जिसके बाद कोर्ट ने सभी आरोपियों को केस से मुक्त कर दिया।  फैसले के बाद दिल्ली पुलिस की ओर से कहा गया है कि उन्हें निचली अदालत के इस फैसले से धक्का लगा है। पुलिस का कहना है कि सबूतों और रिपोर्ट के आधार पर जस्टिस मुद्गल समिति और लोढ़ा समिति ने अपना फैसला सुनाया था। कोर्ट के विस्तृत फैसले का दिल्ली पुलिस अभी अध्ययन करेगी और फिर अगली कार्रवाई तय करेगी।

    मई 2013 में इन खिलाड़ियों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार किया था, लेकिन जुलाई 2013 में सबूत के अभाव के चलते इन्हें ज़मानत मिल गई। बीसीसीआई ने इनपर अपनी जांच करके आजीवन प्रतिबंध लगा दिया है।

    राजस्थान की टीम को मिला एक और मौका
    पटियाला हाउस कोर्ट के फैसले ने कई नए सवालों को खड़ा कर दिया है। स्पॉट फिक्सिंग मामले में तीनों खिलाड़ियों के आरोपमुक्त होने से आईपीएल टीम राजस्थान रॉयल्स को फिर से सुप्रीम कोर्ट जाने का आधार मिल गया है। इसका कारण यह है कि सुप्रीम कोर्ट की मुद्गल समिति का हालिया फैसला भी इसी दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट पर आधारित था। इस समिति की रिपोर्ट को आधार बनाकर लोढ़ा समिति ने कार्रवाई के आदेश दिए थे।

    लोढ़ा समिति ने आरआर पर दो साल का बैन लगाया है। इस दौरान समिति ने कहा कि आरआर के तीन खिलाड़ियों को फिक्सिंग के लिए गिरफ्तार भी किया गया था। अब जब कोर्ट ने बरी कर दिया है कि तो राजस्थान की टीम अब मुद्गल समिति की रिपोर्ट पर सवाल उठा सकती है।

    पुलिस ने अदालत को बताया था कि दाऊद की मुंबई के डोंगरी में और शकील की वहां नागपाड़ा में संपत्तियां हैं। अदालत ने पहले दाऊद, शकील, पाकिस्तान स्थित जावेद चुटानी, सलमान उर्फ मास्टर और एहतेश्याम के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किए थे। चुटानी, सलमान और एहतेश्याम दाउद के करीबी समझे जाते हैं।


    (ऊपर तस्वीर में श्रीसंत के माता-पिता फैसले पर खुशी जताते हुए)

    पुलिस ने इस मामले में आरोपियों के खिलाफ 6000 पेजों का एक आरोपपत्र दायर किया था। उसने बाद में पूरक आरोपपत्र भी दायर किया था। अदालत ने पहले श्रीसंत, चव्हाण और कई अन्य आरोपियों के विरुद्ध मकोका के प्रावधानों के तहत सबूत नहीं होने पर उन्हें जमानत दे दी थी। चंदीला समेत अन्य आरोपियों को भी बाद में अदालत से जमानत मिल गई थी।

    पुलिस ने अपने आरोपपत्र में दावा किया था कि दाऊद और शकील भारत में क्रिक्रेट में फिक्सिंग और सट्टेबाजी को नियंत्रित करते रहे और वे ही आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग के पीछे थे।


    क्या था मामला -

    आईपीएल-6 में राजस्थान रॉयल्स के श्रीसंथ और बाकी खिलाड़ियों पर स्पॉट फिक्सिंग के आरोप लगे थे. दिल्ली पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने कहा था कि 9 मई, 2013 को हुए पंजाब और राजस्थान के बीच मैच में राजस्थान के खिलाड़ी श्रीसंथ पर पूर्व नियोजित तरीके से एक ओवर में 14 रन दिए थे.

     

    उन्होंने खुलासा किया था कि कैसे सट्टेबाजों ने पकड़े गए खिलाड़ियों को विशेष 'कोड'दिए जिनका उन्होंने मैचों के दौरान चुने हुए ओवरों में इस्तेमाल किया था. कुमार ने कहा, 'कुछ ओवरों में उन्हें (खिलाड़ियों) कुछ निश्चित रन ही देने थे. सट्टेबाजों ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि उन्हें संकेत देना होगा कि वे इतने रन देंगे.'

     

    सट्टेबाजों के निर्देशों पर अपनी सहमति दिखाने के लिए खिलाड़ियों ने कुछ कोड भी इस्तेमाल किए थे.

     

    'निर्देश थे कि 'अपनी पैंट में तौलिया डालो या फील्ड सजाने में समय लो या पहनी हुई शर्ट या बनियान बाहर निकालो'. कुमार ने राजस्थान रॉयल्स के तीन मुकाबलों 5, 9 और 15 मई को क्रमश: पुणे वारियर्स, किंग्स इलेवन पंजाब और मुंबई इंडियंस के खिलाफ हुए मैचों के सबूत दिए, जिसमें स्पॉट फिक्सिंग की गई थी.

    चंदीला का 14 रन -

     

    फिक्सिंग में पहला मामला जिस पर शक हुआ, वह 5 मई को राजस्थान रॉयल्स बनाम पुणे वारियर्स मैच के दौरान का था. इस मैच में जैसे कि सहमति बनी थी, चंदीला ने अपने स्पैल के दूसरे ओवर में 14 रन दिए लेकिन वह पूर्व निर्धारित संकेत देना भूल गया, जिसके कारण सट्टेबाज इस मैच में सट्टा नहीं लगा सके.'

    जिसके कारण बहस हो गई और पैसा वापस करने की मांग की गई.

    श्रीसंथ का 'तौलिया'

    पुलिस ने जिस अगले मैच की बात की, वह 9 मई को मोहाली में हुआ था. इस मैच में श्रीसंथ को दूसरा ओवर फेंकने से पहले अपनी पैंट में तौलिया रखना था और सट्टेबाजों को भारी सट्टा लगाने के लिए काफी समय देना था.'

    http://www.rtinews.net/judiciary/lower-courts/ipl-spot-fixing-court-dismiss-allegation/8826.html?utm_campaign=shareaholic&utm_medium=linkedin&utm_source=socialnetwork



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    India – UID Dilemma isn't about those who enrol in Aadhaar, but those who don't

    India's Unique Identity

    Will the Supreme Court restrain the government from coercing everyone into getting Aadhaar numbers by parting with their biometrics information?
    India's Unique Identity Dilemma isn't about those who enrol in Aadhaar, but those who don't
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    Over the next two weeks, the Supreme Court will hear a clutch of public interest writ petitions challenging Aadhaar, India's biometrics-based unique identification project.

    The project has fired the imagination of policy-makers who believe biometrics can help the state identify and verify beneficiaries of social welfare schemes, allow portability of benefits across states, and enable administrators to link and track multiple databases at a finger-click.

    Those opposed to Aadhaar point out that reforms in ration and jobs schemes have already been achieved through simpler technology such as SMS alerts, computerisation of lists and community supervision. In the absence of a comprehensive law on privacy and data protection, they say, the information being collected under Aadhaar and the scale of the programme have serious implications for misuse of personal information and tracking and surveillance by the state.

    The scheme, run under an executive order since 2009, is not covered by any law. Since the beginning, Nandan Nilekani, who led the UID authority, maintained that the scheme is voluntary. But to expand enrolment under the scheme, the Centre has pushed state governments to ask residents to produce Aadhaar for any interaction with the state: to get employment in government schemes, to access provident fund, to open bank accounts, to vote, to register a marriage, and most recently, to adopt a child.

    Over the last two years, the Supreme Court has passed three orders saying the State cannot make having an Aadhaar number a pre-condition for accessing public services. It is now set to give its final order on this.

    Here's an update on where the project stands, what are its stated benefits, and what are the concerns around it.

    What is Aadhaar and how is it generated?

    Aadhaar is the brand name of the Unique Identification project which aims to assign a unique number to every resident of India. To get this 12-digit number, residents are required to submit biometrics and demographic information to private enrolling agencies hired by the state governments.

    Biometrics include the scan of all fingerprints, face, and the iris of both eyes. The demographic information includes name, date of birth, gender, residential address. A resident who does not possess any documentary proof of identity or proof of address can still enrol and get an Aadhaar number by being introduced by a designated "introducer".

    The data thus collected is encrypted and a digital signature is applied to the data file. It is then sent to the Unique Identity Authority of India's Central Information Data Repository at Bengaluru where it is compared against every other person who has previously enrolled. This is called "de-duplication". Only after a confirmation that there is no other person with the same details, does the CIDR send a letter containing the Aadhaar number by post.
    The process aims to ensure that every person has just one Aadhaar number.

    Is Aadhaar legal?

    The previous government introduced the National Identification Authority of India Bill in December, 2010. This bill was referred to a parliamentary committee on finance under Bharatiya Janata Party MP Yashwant Sinha. The committee rejected the bill in its report in December 2011. It said the "collection of biometric information and its linkage with personal information of individuals" without amending the Citizenship Act "appears to be beyond the scope of subordinate legislation, which needs to be examined in detail by Parliament".

    The bill was sent back but since it was not reframed, the UID project or Aadhaar continues to function without a legal framework and parliamentary oversight.

    Constitutional experts and critics of the project have pointed to UID's potential to become a powerful tool for social control and surveillance by the state, and the implications of this for dissent in a democracy. Legal scholar Usha Ramanathan describes the UID as an inverse of sunshine laws like the Right to Information. While the RTI makes the state transparent to the citizen, the UID does the inverse: it makes the citizen transparent to the state, she says.

    The parliament committee too had recognised these risks. It had pointed to lessons from the United Kingdom, which had abandoned its Identity Project of 2006 and dismantled the collected biometrics database, citing it as a potential danger to public interest and to the legal rights of individuals.

    Despite the concerns, two successive Prime Ministers – Manmohan Singh and Narendra Modi – have pushed ahead with Aadhaar, arguing it would help improve the delivery of social welfare schemes.

    How does Aadhaar improve things?

    The government says biometric authentication is meant to prevent identity fraud – for example, someone collecting wages in someone else's name. In 2012, when Aadhaar-based pilot projects were introduced, one of the biggest benefits described was doorstep delivery of welfare services to the poor.

    For example, under the employment scheme MNREGA, bank accounts "mapped" with 12-digit Aadhaar numbers were to be opened for workers at the time of their enrolment in Aadhaar. Banks would hire agents called banking correspondents who would travel to villages with hand-held devices and cash. Workers' fingerprints would serve as their PIN. Once their biometrics matched with the data in UIDAI's database using real time-internet connectivity, they would get their wage payments on the spot from the agent.

    Using Aadhaar for 'authentication', this benefit distribution drive ran into problems on the ground – poor internet connectivity, bank technology upgradation, lack of security, doubts over the integrity of banking corespondents.

    How can Aadhaar eliminate leakages?

    After the Aadhaar-based 'authentication' model failed, the government abandoned the focus on last-mile delivery. It limited its efforts to using Aadhaar for 'de-duplication', or eliminating fake and ghost beneficiaries.

    Essentially, the government wants to match its welfare databases against the Aadhaar database. This could have been done most easily by getting people to record details of their ration cards while enrolling for Aadhaar. But given the lack of legal framework and subsequent Supreme Court orders, the government could not do this. Instead, through state governments, orders have been issued to local authorities asking them to get beneficiaries to mandatorily submit their Aadhaar numbers to access welfare services like food rations under the public distribution system, NREGA wages, pensions, among others.

    In the first step, local authorities collect the numbers and upload them to the UID database. In the second step, a verifier based anywhere in the country compares the demographic details in two databases – the names and residences in the ration list and the demographic information collected by UID to check if the two match or not. In the third step, random checks are done on a few people in the system. After that, the Aadhaar data is "seeded" in the PDS database.

    The discrepancies that become apparent during the process have been described as "ghosts" or "fake claimants", essentially people who do not exist or who have duplicate cards. The government claims to have removed lakhs of fake and ghost beneficiaries through this process in various schemes.

    A few academics and legal experts, however, have questioned whether some of the "ghosts" are those who missed enrolment, or those who did not know about the "seeding" requirements, or those simply not interested in enrolling for a Unique Identity card. District officials admit that while rushing through the process, in some instances names of beneficiaries were simply struck offwhen they could not be located immediately.

    How many have enrolled so far?

    Till July 2015, 87 crore, or 72% of India's population of 120 crore, had been provided a Unique Identity number at a cost of Rs 5,980 crore. According to UIDAI Deputy Director General Sreeranjan, this covers over 94% of adult population in 18 states, with mostly children and adolescents below 18 years age still left out. (Those below 18 will have to enrol twice for their biometrics to be fixed in the database.)

    However, the extent of "seeding", or linking Aadhaar to welfare schemes, is quite low. For the public distribution scheme, it is as low as 11% of the beneficiaries, said a Finance Ministry official.

    Concerned about this, the government is putting pressure on central ministries and state governments to speed up the process. For instance, despite its stated position in the Supreme Court that Aadhaar enrolment is voluntary, from April 1, the central government made UID mandatory for MNREGA payments in 300 districts. Workers who did not have an Aadhaar card were to be "escorted" to the enrolment centres. Last month, it required all those drawing social pensions be enrolled in Aadhaar, even setting aside funds for their transport and refreshments.

    What explains the government's haste? Maintaining two lists of beneficiaries, one with Aadhaar and others without will be a hassle, the government says. Further, officials explain that Aadhaar will work best when everyone opts for it. Every time a new person enrols their biometrics and demographics are matched against every other person who has previously enrolled, in what is called "de-duplication". Only when everyone is on the system can this de-duplication be done most reliably. In effect, Aadhaar will not work until everyone is on it.

    "The system would work best if everyone is enrolled, with their details seeded at the time of enrolment, even if this took a few years," explained an advisor to government who worked on implementing Aadhaar. "In the future, if more and more people without Aadhaar started appearing in the database, it will make it harder to authenticate who they are."

    This is how the UIDAI describes it:

    "Since de-duplication in the UIDAI system ensures that residents have only one chance to be in the database, individuals are made to provide accurate data. This incentive will become especially powerful as benefits and entitlements are linked to Aadhaar."

    So far the government has maintained that Aadhaar is not mandatory for welfare benefits. But in the course of the final hearing in the Supreme Court last week, the government filed an affidavit asking the court to lift its stay orders and allow it to make Aadhaar mandatory. Further, it has said that it plans to link Aadhaar to more and more public services: to providing passports, PAN cards, railway bookings, to telecommunications (mobile, internet, data), and prison management systems.

    This would create a situation where a citizen has no choice but to get on to the government's Aadhaar database.

    The petitioners say this would be disastrous since India does not have a law on privacy and data protection.

    On Wednesday, countering the petitioners' case that Aadhaar imperilled privacy, Attorney General Mukul Rohatgi argued that there is no fundamental right to privacy under the Indian constitution. He asked that the petitions be referred to a larger constitutional bench. This will delay a decision on the project's fate for now and allow the government to continue enrolling residents under the scheme.


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    'Cotton's Forgotten Children': Almost half a million Indian children produce cottonseed

    Shiva Shankar

    -- Almost half a million Indian children are working to produce the cottonseed that is the basis for our garments and all the other textile products that we use. ... Children below 14 – of which two-thirds are girls - are employed in the seed fields on a long-term contract basis through loans extended to their parents by local seed producers, who have agreements with the large national and multinational seed companies. Children are made to work 8 to 12 hours a day and are exposed to poisonous pesticides used in high quantities in cottonseed cultivation. Most of the children working in cottonseed farms belong to poor Dalit ('outcaste'), Adivasi (tribal) or Backward Castes families. ...


    'Cotton's Forgotten Children': Almost half a million Indian children produce cottonseed - Utrecht, The Hague, 23 July 2015

    Almost half a million Indian children are working to produce the cottonseed that is the basis for our garments and all the other textile products that we use. Around 200,000 of them are below 14 years of age. This is one of the shocking results of the new study 'Cotton's Forgotten Children' by India's long-term expert on the issue, Dr. Davuluri Venkateswarlu.

    It is equally shocking that the number of children working in the cotton seed fields has increased with almost 100,000 since the last all-India study on this issue in 2010. Children's below 14 constitute around 25% of the workforce on the fields of the farmers that supply their seeds to both Indian and multinational companies. Another 35% of the workforce are children between 14 and 18 years of age.

    The report criticises the Indian state governments, especially those of Gujarat and Rajasthan, for 'not paying serious attention to tackle the issue' and 'being in the denying mood'. On the role of the seed companies it states: 'The response of the seed industry as a whole to address the problem of child labour is minimal'.

    Long working days – Exposed to pesticides

    Children below 14 – of which two-thirds are girls - are employed in the seed fields on a long-term contract basis through loans extended to their parents by local seed producers, who have agreements with the large national and multinational seed companies. Children are made to work 8 to 12 hours a day and are exposed to poisonous pesticides used in high quantities in cottonseed cultivation. Most of the children working in cottonseed farms belong to poor Dalit ('outcaste'), Adivasi (tribal) or Backward Castes families. Around 70% of the children are hired or even trafficked from other states while 30% is 'family labour'. Most are school-dropouts.

    Hopeful signs

    There are also some hopeful signs. The number of children below 14 working on seed farms – in proportion to the total workforce - has dropped in all states. In Andhra Pradesh and Tamil Nadu there was a significant decline of 42% and 69% respectively of young children working in the seed fields.

    The report also recognizes a number of initiatives undertaken by multinational companies like Bayer, Monsanto and DuPont, some local companies, government agencies, Unicef, NGOs like MV Foundation in Andhra Pradesh and a union like DRMU in Gujarat which helped to reduce the number of young working children.

    However due to the very substantial increase of production area, especially in Gujarat and Rajasthan, the total number of working children has nevertheless increased substantially. The number of adolescents doing this work has increased since 2010 with 70,000 and the number of young children with almost 30,000.

    Below minimum wages for women

    The other main issue in the new report is the payment of wages below the official minimum wage, especially to women. For specific tasks mainly allocated to women and children – especially the labour-intensive cross-pollination – wages are paid that are substantially below the official state or zonal minimum wages. This happens in all the states.  Despite this and earlier reports on the issue (e.g. Wages of Inequality, December 2012) this issue has not yet been tackled effectively by government and companies and has hardly been taken up by civil society.

    Recommendations

    The 47-page report contains 11 recommendations for both companies, the National Seed Association of India and the (state) governments to tackle child labour, below official minimum or living wages and other labour rights violations.

    A few of these recommendations are:

    1. Seed companies need to do a proper review of their procurement policies to ensure that growers have enough margins to tackle child labour and pay at least the official minimum wage to workers.

    2. Government and independent agencies have to do research if the present minimum wages are actually living wages that allow adult cottonseed workers a decent life. Cottonseed workers should also be covered under social security benefits like the Provident Fund.

    3. In view of the magnitude and seriousness of the child rights violations  and other violations in cottonseed production, a special taskforce of state governments to ensure labour rights in this sector is recommended. Such a taskforce should work in close co-operation with local groups, village panchayats, local (child) rights groups, NGOs and unions.

    4. Every Indian or multinational seed company, as well as the NSAI, should have an effective grievance mechanism where both farmers and agricultural labourers can safely file grievances on violations of labour rights at the farm level and resolve those issues. In cases of systemic violations, programmes to tackle these violations have to be developed.

    5. The National Seed Association of India (NSAI) should play a more proactive role in urging their members to combat child labour and respect labour rights, including by setting up joint programmes and requiring from members to report on progress.



    Websites: http://www.indianet.nl/
              http://www.dalits.nl
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    Kira Lerner, Ryan Lenz
    July 24, 2015
     
    When mass shootings fit into Gov. Bobby Jindal's view of "radical Islamic terrorists" he is quick to condemn the violence as terrorism. But when the incidents are results of lax gun control laws and radical right-wing shooters he simply calls the situation tragic and is quick to move on. The evidence already indicates that the shooter in the Lafayette Theater was a fan of David Duke, neo-Nazis, and antigovernment conspiracies.
     
     

    Louisiana Gov. Bobby Jindal speaks with the media following a deadly shooting at the Grand Theatre in Lafayette, La., Thursday, July 23, 2015., AP PHOTO/DENNY CULBERT,
     
     
    After a shooter opened fire in a Louisiana movie theater Thursdaynight, killing two and taking his own life, Gov. Bobby Jindal (R) arrived at the scene and called for prayers after the "senseless act of violence."
    "This should never happen anywhere, but you certainly never imagine, you never imagine it would happen in Louisiana, never imagine it would happen in Lafayette," the governor and presidential candidate said at a news conference late Thursdaynight.
    Since he spoke, a clearer picture of the shooter, who held a number of right-wing beliefs and acted as a "lone wolf," has emerged. But Jindal has yet to speak out about the individual and the threat of the radicalized right.
    When mass shootings fit into Jindal's view of "radical Islamic terrorists" posing the gravest threat to our country, he is quick to condemn the violence as acts of terrorism. But when the incidents are results of lax gun control laws and radical right-wing shooters — which more frequently lead to terrorism in the U.S. — he simply calls the situation tragic and is quick to move on.
    After a shooter killed nine people in Charleston, South Carolina last month, Jindal called President Barack Obama's calls for stricter gun control "completely shameful," and like he did Thursday, offered only prayers. But when a naturalized U.S. citizen from Kuwait opened fire at two military facilities in Chattanooga, Tennessee earlier this month, Jindal released a statement saying the incident "certainly looks like an act of terrorism" and "underscores the grave reality of the threat posed to us by radical Islamic terrorism every single day." He went on to say, "the truth is that radical Islam is at war with us, and we must start by being honest about that."
    To the Louisiana governor and many Republican lawmakers, when white men open fire in public places it is "tragic" and "awful," but when the shooter has a connection to "Islamic extremism," the act becomes terrorism.
    Jindal also refuses to discuss policies that lead people to open fire and commit mass executions across the country — and in Louisiana, many of those policies were his creation.
    The governor, who is rated an A+ by the National Rifle Association, has opposed every sensible piece of gun control legislation in Louisiana and has signed a series of bills making it easier for people to have and carry firearms in public. Last year, he signed two bills to expand gun rights for state residents, including one to allow people with concealed handgun permits to carry their weapons into restaurants that serve alcohol — previously, state law did not allow people to carry guns into any establishments where they can drink alcohol. The other bill expanded Louisiana's "stand your ground" law.
    The year before, he signed another series of bills expanding rights for gun owners including one to enforce penalties for the intentional publication of the personal information of people with concealed handgun permits.
    At the NRA's annual meeting this year, Jindal compared the fight for gun rights to efforts in his state and others for so-called religious freedom measures. "If these large forces can conspire to crush the First Amendment, it won't be long before they come after the Second Amendment," Jindal said.
    Louisiana has some of the laxest gun control laws in the country, and as a result, the worst rate of gun violence.
    Kira Lerner is a Political Reporter for ThinkProgress. She previously worked as a reporter covering litigation and policy for the legal newswire Law360. She has also worked as an investigative journalist with the Chicago Innocence Project where she helped develop evidence that led to the exoneration of a wrongfully convicted man from Illinois prison. A native of the Washington, D.C. area, Kira earned her bachelor's degree at Northwestern University's Medill School of Journalism.
    One day after John Russell Houser killed two people and wounded nine in a movie theater in Lafayette, La., a picture is emerging online of a man caught up with a number of far-right ideas and fascinated about "the power of the lone wolf."

    Photo of suspect John Russell Houser via his LinkedIn page
    "Do not mistake yourselves for one minute, the enemy sees all posted on this website. I do not want to discourage the last hope for the best, but you must realize the power of the lone wolf, is the power that come forth in ALL situations," Houser wrote on a forum dedicated to the New York chapter of Golden Dawn, Greece's far-right neo-Nazi political party. "Look within yourselves."
    That comment was one of dozens of messages that Houser, 59, left on several Internet message boards, all of which provide a picture of a politically disaffected, angry man who viewed the United States as a "financially failing filth farm," expressed interest in white power groups, anti-Semitic ideas, the anti-gay Westboro Baptist Church, as well as a number of conspiracy theories often espoused by the antigovernment right.
    But his extremism appears to have gone deeper. In 2005, he registered to attend David Duke's European-American Unity and Rights Organization (EURO) Conference in New Orleans, according to a spreadsheet of conference registrations obtained by Hatewatch. He lauded Duke, one of the most recognizable figures of the American radical right, a neo-Nazi, longtime Ku Klux Klan leader and now an international spokesman for Holocaust denial. On a PoliticalForum.com, Houser wrote in 2013, "David Duke has been unseen or hear of in years, but at one time appeared exactly what US needed."
    Elsewhere online, Houser described his interests as "hustling" and said that his political involvement was minimal, though he belonged to a forum associated with Tea Party Nation. He sang the praise of Adolf Hitler many times, saying "Hitler is loved for the results of his pragmatism," last January on the websitestateofmind13.com.
    Aside from his affinity for Hitler and Golden Dawn, he expressed racist extremism elsewhere. He promoted the disproven racist theory that a connection exists between race and IQ, and promoted The Bell Curve, a book written by Charles Murray. As for voting, he said, "don't vote, waste of time."
    The shooting comes five weeks after Dylann Roof walked into a historic black church in Charleston, S.C., and killed nine people, adding to an ever growing list of attackers who, motivated by right-wing ideologies, have a left a growing body count of innocent victims.
    Ryan Lenz is senior writer for the Southern Poverty Law Center's Intelligence Project

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    CC News Letter 23 July - What, Really, Is Netanyahu's Game Plan For America?


    Dear Friend,

    If you think the content of this news letter is critical for the dignified living and survival of humanity and other species on earth, please forward it to your friends and spread the word. It's time for humanity to come together as one family! You can subscribe to our news letter here http://www.countercurrents.org/subscribe.htm. You can also follow us on twitter, http://twitter.com/countercurrents and on Facebook, http://www.facebook.com/countercurrents

    In Solidarity
    Binu Mathew
    Editor
    www.countercurrents.org


    Greek Parliament Rubber-Stamps New EU Austerity Plan
    By Christoph Dreier & Alex Lantier

    http://www.countercurrents.org/lantier230715.htm

    After discussion and debate dragged on into the early morning hours, the Greek parliament overwhelmingly adopted a vast new set of cost-cutting measures and legal "reforms" dictated by the European Union


    Representative Democracy Is A Waste Of Time
    By Fritz Tucker

    http://www.countercurrents.org/tucker230715.htm

    The logical countermovement to expansive representational democracy was one that advocated a return to local, participatory governance. In the twenty-first century participatory democracy is not just desirable, but feasible. Digital, electronic communication is essentially instantaneous, recorded in abundance, and easily searchable


    What, Really, Is Netanyahu's Game Plan For America?
    By Alan Hart

    http://www.countercurrents.org/hart230715.htm

    He could order a false flag operation – an attack on American interests somewhere which with manufactured/false evidence he would blame on Iran. That could, probably would, give American neo-cons the pretext they would like for war on Iran


    Reviewing Trashy Hasbara Against BDS
    By Vacy Vlazna

    http://www.countercurrents.org/vlazna230715.htm

    Boycotting Israel is Wrong: The progressive path to peace between Palestinians and Israelis by Philip Mendes, Nick Dyrenfurth is a slipshod diatribe against the principled efforts of the Boycott Divestment and Sanctions (BDS) movement. It beggars belief that this silly book, riddled with hasbara and anti-arabsemitism, is written by academics with research skills: Monash University's Philip Mendes and Nick Dyrenfurth who, once wrote that Australia's exPrime Minister John Howard "speaks fluent spin"- Dyrenfurth should know!


    Ukrainian News Service Says Standard Of Living Is Plummeting
    By Eric Zuesse

    http://www.countercurrents.org/zuesse230715.htm

    The plunging economy of Ukraine has evidently become so bad that Ukrainians now can even feel safe to call publicly for stopping the war against the separatist Donbass region of the country, and for reallocationg those military expenditures so that Ukrainians in the non-rebelling part of the country won't starve to death


    How China And Russia Are Running Rings Around Washington
    By Pepe Escobar

    http://www.countercurrents.org/escobar230715.htm

    Let's start with the geopolitical Big Bang you know nothing about, the one that occurred just two weeks ago. Here are its results: from now on, any possible future attack on Iran threatened by the Pentagon (in conjunction with NATO) would essentially be an assault on the planning of an interlocking set of organizations -- the BRICS nations (Brazil, Russia, India, China, and South Africa), the SCO (Shanghai Cooperation Organization), the EEU (Eurasian Economic Union), the AIIB (the new Chinese-founded Asian Infrastructure Investment Bank), and the NDB (the BRICS' New Development Bank) -- whose acronyms you're unlikely to recognize either. Still, they represent an emerging new order in Eurasia


    The Saudi Proxy In The 21st Century
    By Judith Bello

    http://www.countercurrents.org/bello230715.htm

    The United States relationship with Saudi Arabia is, on the surface, a mystery. Saudi Arabia has been a U.S. proxy and a protectorate for nearly 100 years, yet it remains a very foreign entity, which consistently engages in activities uncomfortable for US public sensibilities. Wahabism, the state religion of Saudi Arabia, deeply meshed with the government, is the narrowest and most radical fundamentalism in the Muslim world. Strict social limitations on women and a particularly harsh form of Sharia law are maintained by the Saudi regime


    Yakub Memon's Blood Is On Us Too
    By Samar

    http://www.countercurrents.org/samar230715.htm

    Those who planted the bombs have got their death sentences commuted to life, while Yakub, who did not plant a single one, is being sent to the gallows. And, this is where the death sentence starts looking like the revenge of a system frustrated with its failure to catch and punish the real culprits that is killing Yakub on the flimsiest of grounds


    Civil Society Comes Out In Support Of Teesta Setalvad And Javed Anand
    By Concerned Citizens

    http://www.countercurrents.org/cc230715.htm

    Romila Thapar, Admiral Ramdas, Naseeruddin Shah, Mahesh Bhatt, Nandita Das, Githa Hariharan, Aruna Roy, Jayati Ghosh, Rajmohan Gandhi, Tushar Gandhi, Vivan Dundaram, Nilima and GM Shaikh, Henri Tiphange and hundreds of other prominent artists, intellectuals and activists protest against witch hunting of Teesta and Javed


    Adv P A Sebastian, The Doyen Of Civil Rights Movement Passes Away
    By Anand Teltumbde

    http://www.countercurrents.org/tetumbde230715.htm

    Our friend and comrade P A Sebastian, who was the face of Committee for Protection of Democratic Rights (CPDR) for decades, has passed away this morning around 10 am. Sebastian, Sabby for his friends, was an integral part of the radical movement in Maharashtra


    Splitting Jammu & Kashmir
    By Mohammad Ashraf

    http://www.countercurrents.org/ashraf230715.htm

    Attempts on both sides of the border to take away certain areas of the erstwhile state of Jammy & Kashmir may result in the restoration of the ancient Kingdom of Kashmir!


    Early Diagnosis Of Drug Resistance Is Crucial To Ending TB
    By Shobha Shukla

    http://www.countercurrents.org/shukla230715.htm

    Despite being treatable, TB remains a major global public health problem. As Dr Mario Raviglione, Director Global Tuberculosis Programme of WHO, informed, in 2013, 9 million people fell ill with TB in; 1.5 million men, women and children died from it; 480,000 people developed multi drug resistant TB (MDR-TB), with 210,000 associated deaths. Also, 60% of all MDR-TB cases can be attributed to India, China, Russia, Pakistan and Ukraine
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    पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है-2: अरुंधति रॉय

    Posted by Reyaz-ul-haque on 7/25/2015 12:52:00 AM


    यहां पेश है आंबेडकर-गांधी बहस के संदर्भ में राजमोहन गांधी को अरुंधति रॉय के जवाब 'ऑल द वर्ल्ड'ज अ हाफ-बिल्ट डैम'के हिंदी अनुवाद की दूसरी किस्त. पहली किस्त यहां पढ़ें. इस अनुवाद में गांधी की रचनाओं या भाषणों के उद्धरणों के हिंदी अनुवाद के लिए भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा हिंदी में प्रकाशित गांधी के अधिकृत समग्र लेखन संपूर्ण गांधी वांग्मय से मदद नहीं ली जा रही है क्योंकि उसमें हिंदी में दिए गए पाठ और उसके अंग्रेजी संस्करण (सीडब्ल्यूएमजी) के पाठ में काफी फर्क है, जिसका हवाला इस बहस में बार बार दिया जा रहा है. इसलिए बहस को उसकी सही शक्ल में पेश करने के लिए इस अनुवाद में उद्धृत अंशों का भी अनुवाद किया जा रहा है. अनुवाद: रेयाज उल हक

     

    अब मुझे राजमोहन गांधी के कुछ खास और बड़े आरोपों पर गौर करने दीजिए:

    'द आइडियल भंगी'

    वे कहते हैं,
    यहां (अनगिनत संभावित छूटों में से) एक और चीज छोड़ी गई है. वे गांधी की एक रचना 'द आइडियल भंगी'के काफी मजे लेती हैं (पृ.132-33) और सफाई को लेकर गांधी की चिंता का मजाक उड़ाती हैं और इसमें से कई वाक्य पेश करती हैं. लेकिन वे बड़ी सावधानी से उस वाक्य को छोड़ देती हैं जो भंगियों के साथ तब/अब होने वाले व्यवहार पर गांधी के गुस्से को जाहिर करता है. यह 28 नवंबर 1936 को हरिजन में प्रकाशित हुआ था: 'लेकिन मैं इतना जानता हूं कि भंगी को तुच्छ मान कर हम – हिंदू, मुसलमान, ईसाई और सभी – पूरी दुनिया की नफरत के लायक हो गए हैं.' (सीडब्ल्यू 64:86) हां, गांधी जातीय नाइंसाफियों से और भारत की गंदगी से और बहुत कुछ से परेशान थे (आरजी.कॉम).

    नीचे मैं 'द आइडियल भंगी'से वह हिस्सा पेश कर रही हूं, जिसे मैंने 'द डॉक्टर एंड द सेंट'में अपनी टिप्पणी के साथ उद्धृत किया है (रॉय 2014: 132-33). पढ़नेवाले खुद ही फैसला कर सकते हैं कि जिस वाक्य को मैंने बड़े 'शरारती तरीके से'छोड़ दिया था, क्या उसकी गैरमौजूदगी से निबंध के मतलब या उसकी आत्मा पर कोई फर्क पड़ रहा है:

    1936 में उन्होंने [आंबेडकर ने] आग लगा देने वाली (और महंगी, जैसा कि गांधी ने सरपरस्ती वाले लहजे में टिप्पणी की थी) रचना एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट प्रकाशित की […] उसी साल गांधीजी ने भी साहित्य में यादगार योगदान दिया. वे अब तक अड़सठ साल के हो चुके थे. उन्होंने 'द आइडियल भंगी'नाम से एक प्रतिष्ठित निबंध लिखा: ब्राह्मण का धर्म जैसे आत्मा को साफ रखना है, उसी तरह भंगी का धर्म समाज के शरीर को साफ रखना है...ऐसा होते हुए भी अभागा भारतीय समाज भंगी को सामाजिक अछूत बताता है, उसे पायदान की सबसे निचली सीढ़ी पर रखा जाता है, उसे गाली और लात खाने लायक माना जाता है, वह एक ऐसा जीव है जो जाति के लोगों की जूठन पर पलता है और कूड़े के ढेर पर रहता है. 

    अगर हमने सिर्फ भंगी की हैसियत को ब्राह्मण के बराबर मान लिया होता, हमारे गांव और उनके निवासी साफ-सफाई और व्यवस्था की तस्वीर बन गए होते. इसलिए मैं बिना किसी हिचक या संदेह के यह कहने का साहस करता हूं कि जब तक ब्राह्मण और भंगी के बीच अपमानजनक फर्क को मिटा नहीं दिया जाता, तब तक हमारा समाज सेहत, समृद्धि और शांति का सुख नहीं उठा सकेगा और खुशहाल नहीं हो पाएगा.

    फिर [गांधी ने] उन शैक्षणिक जरूरतों, व्यावहारिक कौशल और हुनर का एक खाका दिया जो एक आदर्श भंगी में होनी चाहिए:

    'तब समाज के ऐसे एक सम्मानित सेवक के व्यक्तित्व में किन गुणों की झलक होनी चाहिए? मेरी राय में एक आदर्श भंगी को सफाई के उसूलों का पूरा ज्ञान होना चाहिए. उसे पता होना चाहिए कि एक सही शौचालय कैसे बनता है और उसे साफ करने का सही तरीका क्या है. उसे पता होना चाहिए कि पेशाब-पाखाने की बदबू से कैसे पार पाएं और उसे खत्म कैसे करें. इसको नुकसान रहित बनाने के लिए विभिन्न असंक्रामकों के बारे में भी उसे पता होना चाहिए. इसी तरह उसे पेशाब और पाखाने को खाद में बदलने के तरीके के बारे में पता होना चाहिए. लेकिन इतना ही काफी नहीं है. मेरे आदर्श भंगी को पाखाने और पेशाब की गुणवत्ता के बारे में पता होगा. वह उन पर नजदीकी से नजर रखेगा और संबद्ध व्यक्ति को सही वक्त पर चेतावनी देगा...'

    मनुस्मृति कहती है कि काबिलियत होने के बावजूद शूद्र को धन जमा नहीं करना चाहिए, क्योंकि धन जमा करने वाला शूद्र ब्राह्मण को खटकता है. गांधी एक बनिया थे, जिसके लिए मनुस्मृति सूदखोरी को ईश्वरीय धंधा करार देती है, यही गांधी कहते हैं:

    'ऐसा आदर्श भंगी अपने पेशे से अपनी रोजी हासिल करते हुए, इसे सिर्फ एक पवित्र धर्म मानेगा. दूसरे शब्दों में, वह धनी बनने के सपने नहीं देखेगा.'

    इसे ध्यान में रखें कि गांधी नहीं चाहते थे कि 'भंगी' (पाखाना साफ करने वालों को वे यही कहना पसंद करते थे) कथित तौर पर ईश्वर द्वारा तय किए गए, दूसरे लोगों के पाखाने को साफ करने के अपने इस पेशेवर धंधे से भी धन जमा नहीं करें, जबकि दूसरी ओर उन्होंने ट्रस्टीशिप का अपना मशहूर उसूल विकसित किया था: 'अमीर लोगों की दौलत उनकी मिल्कियत में रहने दी जानी चाहिए...' (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी यानी सीडब्ल्यूएमजी 79:133-34, रॉय 2014: 90 पर उद्धृत). तब की तरह अब भी बनिया लोग ही अमीर हैं. यकीनन गांधी जातीय नाइंसाफियों से परेशान थे, लेकिन खुद जाति से उन्हें कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने एक बार भी साफ साफ और निश्चित शब्दों में इसको खारिज नहीं किया. अपने बाद के जीवन में कुछ मौकों पर जब उन्होंने नरमी के साथ इसकी आलोचना भी की तो उन्होंने सुझाव दिया कि इसकी जगह वर्ण व्यवस्था को लाया जाना चाहिए – जिसको आंबेडकर ने जाति व्यवस्था का 
    'जनक' बताया था. गांधी ने वंशानुगत पेशों की परंपरा में अपने यकीन को लगातार दोहराया. और चूंकि राजमोहन गांधी हमें ऐसी तारीफ के साथ 'द आइडियल भंगी'पेश करते हैं तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि वे अपने दादा के नजरिए से सहमत हैंॽ

    इत्तेफाक से, ऐसा एक और इंसान भी है जो इस नजरिए से सहमत है: अपनी किताब कर्मयोगी में (जिसको बाल्मीकि समुदाय के विरोध के बाद उन्होंने वापस ले लिया), नरेंद्र मोदी ने लिखा है:

    मैं नहीं मानता कि वो यह काम केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए करते रहे हैं. अगर ऐसा होता तो उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे काम को जारी नहीं रखा होता...किसी समय किसी व्यक्ति को यह ज्ञान प्राप्त हुआ होगा कि समग्र समाज और देवताओं की खुशी के लिए काम करना उनका (बाल्मीकियों का) धर्म है; कि देवताओं द्वारा उन्हें सौंपा गया यह काम करना होगा; और यह काम सदियों से आंतरिक आध्यात्मिक गतिविधि की तरह जारी रहना चाहिए. (शाह 2012 से उद्धृत, रॉय 2014: 133).

    महाड सत्याग्रह

    राजमोहन गांधी ने मुझ पर इल्जाम लगाया है कि मैंने मार्च 1927 में महाड सत्याग्रह पर गांधी की टिप्पणियों को जानबूझ कर और बेईमानी से महज यह कहते हुए दबा दिया है कि गांधी ने 'हमले के सामने अछूतों के सब्र बारे में सहमति जताते हुए'लिखा. उनका कहना है कि मुझे यह जोड़ना चाहिए था कि सत्याग्रह के एक महीने के बाद 28 अप्रैल 1927 में यंग इंडिया में गांधी ने लिखा था कि 'डॉ. आंबेडकर द्वारा कथित अछूतों को तालाब पर जाकर अपनी प्यास बुझाने की सलाह देते हुए बंबई लेजिस्लेटिव काउंसिल और महाड म्युनिसिपैलिटी के प्रस्ताव को परखना न्यायोचित था.'यह भी कि महात्मा ने 'छुआछूत का विरोध करनेवाले हरेक हिंदू'से कहा कि वे महाड के अछूतों का सार्वजनिक बचाव करें 'भले ही उनका अपना सिर फूट जाने का जोखिम हो' (सीडब्ल्यू 33: 268). यह सच है कि मैंने इन उद्धरणों को शामिल नहीं किया था. (हालांकि इसे बेईमानी से दबाया जाना कहना, मेरे ख्याल से, थोड़ा ज्यादा ही है.)

    'द डॉक्टर एंड द सेंट'में तथ्यों को इस तरह पेश किया गया है. गांधी पहले महाड सत्याग्रह में मौजूद नहीं थे. आंबेडकर और उनके साथियों ने मंच पर उनकी एक तस्वीर लगाई क्योंकि तब वे उनकी प्रेरणा के स्रोत थे. राजमोहन गांधी ने जिस बात का जिक्र छोड़ दिया है वो यह है कि उस साल बाद में एक दूसरा महाड सत्याग्रह भी हुआ था (दिसंबर 1927) जिसमें पहले के मुकाबले ज्यादा तादाद में लोग जमा हुए थे. उसी महीने में गांधी, लाहौर में ऑल इंडिया सप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस में बोले थे, जहां उन्होंने अछूतों से कहा था कि वे अपने अधिकारों की खातिर लड़ने के लिए 'मीठी मीठी बातों से समझाने-बुझाने से काम लें, न कि सत्याग्रह से क्योंकि जब लोगों के भीतर गहराई तक जड़ें जमाए बैठे पूर्वाग्रहों को झटका पहुंचाने के मकसद से इसका [सत्याग्रह का] उपयोग किया जाता है तो यह दुराग्रह बन जाता है.''दुराग्रह'को उन्होंने 'शैतानी शक्ति'बताया, जो सत्याग्रह यानी 'आत्मिक शक्ति'के ठीक उल्टा है (प्रशाद 1996: 2015 में उद्धृत, सीडब्ल्यूएमजी 16: 126-28 भी देखें – रॉय 2014: 106-07 में उद्धृत).

    महाड सत्याग्रह पर गांधी की प्रतिक्रिया पर व्हाट कांग्रेस एंड महात्मा हैव डन टू द अनटचेबल्स(पहली बार 1945 में प्रकाशित) में लिखते हुए आंबेडकर ने कहा था:

    अछूत मि. गांधी का नैतिक समर्थन पाने को लेकर नाउम्मीद नहीं थे. असल में उन्हें इसको पाने की बहुत अच्छी वजह भी थी. क्योंकि सत्याग्रह का हथियार – जिसकी बुनियादी बात यह है कि अपनी तकलीफों से अपने विरोधी के दिल को पिघला दिया जाए – वह हथियार था जिसको मि. गांधी ने बनाया था और जिन्होंने स्वराज हासिल करने के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कांग्रेस से इसका अमल कराया था. स्वाभाविक बात थी कि अछूतों ने हिंदुओं के खिलाफ अपने सत्याग्रह में मि. गांधी से पूरी हिमायत की उम्मीद की थी, जिसका मकसद सार्वजनिक कुओं से पानी लेने और हिंदू मंदिरों में दाखिल होने के अधिकार को कायम करना था. हालांकि मि. गांधी ने सत्याग्रह को समर्थन नहीं दिया. सिर्फ इतना ही नहीं कि उन्होंने समर्थन नहीं दिया, बल्कि उन्होंने कड़े शब्दों में इसकी निंदा की (बाबासाहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेज या बीएडब्ल्यूएस 9: 247, रॉय 2014: 109-10 में उद्धृत).

    क्या राजमोहन गांधी की दलील यह हो सकती है कि आंबेडकर सच्चाई को 'दबा'रहे थेॽ

    (जारी)
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    The Need For A New Economic System


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     The Need For A New Economic System
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    The wisdom of our ancestors, their respect for nature and their hospitable traditions of sharing, can help us to create a new economic system founded on social and environmental ethics


    Five Myths About Economic Growth
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    It seems like all the talk of economic growth was overblown, more the result of Wall Street excitement and political rhetoric than sober thought. Maybe what we really want is economic slenderizing


    Netanyahu: Unserious Leader Of A Fearful Nation
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    Israel's Prime Minister Benjamin Netanyahu cannot be taken seriously when he talks about Iran. While Netanyahu is a master at exploiting fear in a particularly fearful society, the following points demonstrate that thinking people can ignore his claims dealing with Iran


    Hiroshima: 70 Years Of Lies And Propaganda
    By Mickey Z.

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    "Why did we drop (the bomb)?" pondered Studs Terkel, two decades ago. "So little Harry could show Molotov and Stalin we've got the cards," he explained. "That was the phrase Truman used. We showed the goddamned Russians we've got something and they'd better behave themselves in Europe. That's why it was dropped. The evidence is overwhelming. And yet you tell that to 99 percent of Americans and they'll spit in your eye." Let the spitting begin


    Hindutva In Hurry
    By Shamsul Islam

    http://www.countercurrents.org/islam250715.htm

    Political arm of the RSS, BJP could secure only 31% of the total votes polled in the 2014 parliamentary elections. This clearly showed that 69% of the Indians; 80% of whom were Hindus did not vote for BJP. However, overlooking this reality the masters of BJP; the RSS top brass boasted that BJP's victory put "an end to 800 years of slavery" and by 2020 "entire country will be Hindu". The VHP patron Ashok Singhal went to the extent of declaring that by "2030 the entire world will be Hindu". With this frame of mind RSS is getting more myopic and accelerated its game of turning a democratic-secular India into a Hindu theocratic polity. After getting political power they seem to be in hurry and resorting to all kinds of tricks to capture national institutions specially belonging to the realms of art, culture and academia. This clique knows that time is running out fast and they need to bulldoze


    Unanimous Rejection Of Land Acquisition Bill 2015,
    Joint Forum To Intensify Opposition
    By Bhumi Adhikar Andolan

    http://www.countercurrents.org/baa250715.htm

    Representatives of people's movements, peasant unions and farmers' organisations from across country reject the bill as anti-farmer and undemocratic at public hearing. Strong message to JPC to oppose anti-constitutional Land Bill

    Observe Kandhamal Day On August 25

    http://www.countercurrents.org/cc240715.htm
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  • 07/25/15--10:36: ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲ਼ਾ ਵਿਖੇ ਭਗਵਾਨ ਪਰਸ਼ੂਰਾਮ ਚੇਅਰ ਸਥਾਪਿਤ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲੇ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰੋ! ਸਿੱਖਿਆ ਦਾ ਭਗਵਾਂਕਰਨ ਬੰਦ ਕਰੋ! ਧਰਮ ਨੂੰ ਸਿੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸਰਕਾਰ ਨਾਲ਼ੋਂ ਵੱਖ ਕਰੋ! ਦੋਸਤੋ, ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲ਼ਾ ਵੱਲੋਂ ਯੂਨਵਰਸਿਟੀ ਵਿੱਚ 26 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਦੇ ਮਿਥਹਾਸਕ ਪਾਤਰ ਭਗਵਾਨ ਪਰਸ਼ੂਰਾਮ ਦੀ ਚੇਅਰ ਸਥਾਪਤ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ, ਜਿਸਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਲਈ ਸੂਬੇ ਦੇਮ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸਿੰਘ ਬਾਦਲ ਉਚੇਚੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਪਹੁੰਚ ਰਹੇ ਹਨ। ਜਿਕਰਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਨਾਲ਼ ਹੁਣ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਮਿਥਿਆਹਸਕ ਤੇ ਗੈਰ-ਵਿਗਿਆਨਕ ਖੋਜਾਂ ਨੂੰ ਹੱਲਾਸ਼ੇਰੀ ਦੇਵੇਗੀ। ਪਰਸ਼ੂਰਾਮ ਦੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਧਾਰਮਿਕ ਸਮਾਗਮਾਂ ਨੂੰ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਕੈਂਪਸ ਵਿੱਚ ਤਾਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ। 'ਡੈਮੋਕ੍ਰੈਟਿਕ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਯੂਨੀਅਨ'ਅਤੇ 'ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਸਟ ਯੂਨੀਅਨ (ਲਲਕਾਰ)'ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਇਸ ਭਗਵੇਂਕਰਨ ਦੀ ਸਖਤ ਨਿਖੇਧੀ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ ਤੇ ਇਸਨੂੰ ਰੋਕਣ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ। ਕੇਂਦਰ ਵਿੱਚ ਮੋਦੀ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਬਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਭਗਵੇਂਕਰਨ ਦੇ ਯਤਨਾਂ ਵਿੱਚ ਜੋ ਤੇਜੀ ਆਈ ਹੈ, ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦਾ ਇਹ ਕਦਮ ਉਸੇ ਦਾ ਹੀ ਹਿੱਸਾ ਹੈ। ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਸਿੱਖਿਆ ਤੇ ਇਤਿਹਾਸ ਦੀਆਂ ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਉੱਤੇ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸਵੈਸੇਵਕ ਸੰਘ ਨਾਲ਼ ਜੁੜੇ ਵਿਦਵਾਨ ਸਥਾਪਤ ਹੋ ਚੁੱਕੇ ਹਨ ਤੇ ਸਿਲੇਬਸਾਂ ਤੇ ਇਤਿਹਾਸ ਨੂੰ ਸੋਧ ਕੇ ਭਗਵੀਂ ਸਿਆਹੀ ਨਾਲ਼ ਲਿਖਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਝੂਠੀ ਪੁਰਾਤਨ ਹਿੰਦੂ ਵਿਰ
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    ਦੋਸਤੋ, ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲ਼ਾ ਵੱਲੋਂ ਯੂਨਵਰਸਿਟੀ ਵਿੱਚ 26 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਦੇ ਮਿਥਹਾਸਕ ਪਾਤਰ ਭਗਵਾਨ ਪਰਸ਼ੂਰਾਮ ਦੀ ਚੇਅਰ ਸਥਾਪਤ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ, ਜਿਸਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਲਈ ਸੂਬੇ ਦੇਮ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸਿੰਘ ਬਾਦਲ ਉਚੇਚੇ ਤੌਰ 'ਤੇ ਪਹੁੰਚ ਰਹੇ ਹਨ। ਜਿਕਰਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਨਾਲ਼ ਹੁਣ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਮਿਥਿਆਹਸਕ ਤੇ ਗੈਰ-ਵਿਗਿਆਨਕ ਖੋਜਾਂ ਨੂੰ ਹੱਲਾਸ਼ੇਰੀ ਦੇਵੇਗੀ। ਪਰਸ਼ੂਰਾਮ ਦੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਧਾਰਮਿਕ ਸਮਾਗਮਾਂ ਨੂੰ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਕੈਂਪਸ ਵਿੱਚ ਤਾਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ। 'ਡੈਮੋਕ੍ਰੈਟਿਕ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਯੂਨੀਅਨ' ਅਤੇ 'ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਸਟ ਯੂਨੀਅਨ (ਲਲਕਾਰ)' ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਇਸ ਭਗਵੇਂਕਰਨ ਦੀ ਸਖਤ ਨਿਖੇਧੀ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ ਤੇ ਇਸਨੂੰ ਰੋਕਣ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ। 

    ਕੇਂਦਰ ਵਿੱਚ ਮੋਦੀ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਬਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਭਗਵੇਂਕਰਨ ਦੇ ਯਤਨਾਂ ਵਿੱਚ ਜੋ ਤੇਜੀ ਆਈ ਹੈ, ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦਾ ਇਹ ਕਦਮ ਉਸੇ ਦਾ ਹੀ ਹਿੱਸਾ ਹੈ। ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਸਿੱਖਿਆ ਤੇ ਇਤਿਹਾਸ ਦੀਆਂ ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਉੱਤੇ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸਵੈਸੇਵਕ ਸੰਘ ਨਾਲ਼ ਜੁੜੇ ਵਿਦਵਾਨ ਸਥਾਪਤ ਹੋ ਚੁੱਕੇ ਹਨ ਤੇ ਸਿਲੇਬਸਾਂ ਤੇ ਇਤਿਹਾਸ ਨੂੰ ਸੋਧ ਕੇ ਭਗਵੀਂ ਸਿਆਹੀ ਨਾਲ਼ ਲਿਖਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਝੂਠੀ ਪੁਰਾਤਨ ਹਿੰਦੂ ਵਿਰਾਸਤ, ਅੰਨ੍ਹੇ ਕੌਮਵਾਦ ਤੇ ਇਸਲਾਮ ਵਿਰੋਧੀ ਨਫਰਲ ਫੈਲਾਉਂਦੇ ਝੂਠਾਂ ਤੇ ਹਿੰਦੂ ਮਿੱਥਿਹਾਸਕ ਗਾਥਾਵਾਂ ਆਦਿ ਨੂੰ ਸਿਲੇਬਸਾਂ ਵਿੱਚ ਲਿਆਂਦਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਪੁਰਾਤਨ ਵੈਦਿਕ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਹਵਾਈ ਜਹਾਜ਼ ਜਿਹੀਆਂ "ਵਿਗਿਆਨਕ ਖੋਜਾਂ" ਤੇ ਮੱਧਕਾਲ ਵਿੱਚ ਮੁਸਲਮਾਨ ਧਾੜਵੀਆਂ ਦੁਆਰਾ ਮਹਾਨ ਹਿੰਦੂ ਸੱਭਿਅਤਾ ਨੂੰ ਤਬਾਹ ਕਰਨ ਤੇ ਭਾਰਤ ਨੂੰ ਗੁਲਾਮ ਬਣਾਉਣ ਜਿਹੇ ਝੂਠੇ ਦਾਅਵੇ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਵੱਡੇ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਪ੍ਰਚਾਰੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਜ਼ੋਤਿਸ਼ ਜਿਹੀਆਂ ਗੈਰ-ਵਿਗਿਆਨ ਚੀਜ਼ਾਂ ਤੇ ਇਤਿਹਾਸ ਦੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਅਨੇਕਾਂ ਭਗਵੇਂ ਝੂਠ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਸਿਲੇਸਬਾਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ। ਇਸ ਨਾਲ਼ ਜਿੱਥੇ ਇੱਕ ਪਾਸੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਮਿਹਨਤ, ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਤੇ ਕੁਰਬਾਨੀਆਂ ਦੀ ਸੱਚੀ ਵਿਰਾਸਤ ਨਾਲ਼ੋਂ ਤੋੜਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਉੱਥੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਅੰਨ੍ਹੇ ਕੌਮਵਾਦ, ਧਰਮ ਦੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਆਪਸੀ ਭਰਾਮਾਰ ਜੰਗ ਲਈ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਅਜਿਹੀ ਸਿੱਖਿਆ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੇ ਦਿਮਾਗ਼ਾਂ ਨੂੰ ਖੁੰਢਿਆਂ ਕਰਕੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਲ਼ੇ-ਦੁਆਲ਼ੇ ਦੇ ਦੀ ਸਹੀ ਸਮਝ ਬਣਾਉਣ ਤੇ ਬਿਹਤਰ ਸਮਾਜ ਸਿਰਜਣ ਦੇ ਰਾਹ ਪੈਣ ਤੋਂ ਰੋਕੇਗੀ। 

    ਇਸ ਲਈ ਅਜਿਹੀਆਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰਨਾ ਸਭ ਅਗਾਂਹਵਧੂ, ਵਿਗਿਆਨਕ ਤੇ ਇਨਸਾਫਪਸੰਦ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਤੇ ਨਾਗਰਿਕਾਂ ਦਾ ਫਰਜ਼ ਬਣਦਾ ਹੈ। ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸ਼ਨ ਖੁਦ ਆਪਣੇ ਇਹਨਾਂ ਫਿਰਕੂ ਕਦਮਾਂ ਦੀ ਸੱਚਾਈ ਤੋਂ ਵਾਕਫ਼ ਹੈ ਤੇ ਇਸ ਖਿਲਾਫ਼ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੇ ਰੋਹ ਤੋਂ ਡਰਦਾ ਹੈ, ਇਸੇ ਲਈ ਇਸ ਕੰਮ ਨੂੰ ਚੁੱਪ-ਚੁਪੀਤੇ ਐਤਵਾਰ ਨੂੰ ਅਤੇ ਨਵਾਂ ਵਿੱਦਿਅਕ ਸ਼ੈਸ਼ਨ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੀ ਗੈਰ-ਮੌਜੂਦਗੀ ਵਿੱਚ ਨੇਪਰ੍ਹੇ ਚਾੜ ਰਹੀ ਹੈ। ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਵੱਲੋਂ ਇਸਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕਰਨ ਦਾ ਮਤਲਬ ਸਾਫ਼ ਹੈ ਕਿ ਸਰਕਾਰ ਖੁਦ ਅਜਿਹਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਹੈ ਤੇ ਇਹਨਾਂ ਕਦਮਾਂ ਨੂੰ ਸ਼ਹਿ ਦੇ ਰਹੀ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਇਹਨਾਂ ਫਿਰਕੂ ਕਦਮਾਂ ਨੂੰ ਰੋਕਣ ਲਈ ਸਗੋਂ ਜੁਝਾਰੂ ਤੇ ਬਹਾਦਰ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਆਉਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਅਜਿਹੇ ਕਦਮਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਡਟਣਾ ਅੱਜ ਵਿਗਿਆਨ, ਸੱਚਾਈ ਤੇ ਇਨਸਾਫ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਡੇ ਨਿਸ਼ਚੇ ਦਾ ਸਵਾਲ ਹੈ। ਭਵਿੱਖ ਵਿੱਚ ਹਾਕਮਾਂ ਦੀਆਂ ਇਹ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਹੋਰ ਤੇਜ਼ ਹੋਣੀਆਂ ਹਨ। ਅਸੀਂ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਇਸ ਫਿਰਕੂ ਕਦਮ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰਕੇ ਹੋਏ ਇਸਨੂੰ ਰੋਕਣ ਅਤੇ ਸਮੁੱਚੀ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਭਗਵੇਂਕਰਨ ਵਿਰੁੱਧ ਸੰਘਰਸ਼ ਵਿੱਚ ਡਟਣ ਲਈ ਤੁਹਾਨੂੰ ਸੱਦਾ ਦਿੰਦੇ ਹਾਂ। 

    ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਏਕਤਾ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ 
    ਸਿੱਖਿਆ ਦਾ ਭਗਵਾਂਕਰਨ ਕਰਨ ਵਾਲ਼ੀਆਂ ਫਿਰਕੂ ਤਾਕਤਾਂ ਮੁਰਦਾਬਾਦ 

    ਵੱਲੋਂ : 
    ਡੈਮੋਕ੍ਰੈਟਿਕ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਯੂਨੀਅਨ (DSO) 
    ਪੰਜਾਬ ਸਟੂਡੈਂਟਸ ਯੂਨੀਅਨ (ਲਲਕਾਰ)
    Timeline Photos
    ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲ਼ਾ ਵਿਖੇ ਭਗਵਾਨ ਪਰਸ਼ੂਰਾਮ ਚੇਅਰ ਸਥਾਪਿਤ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲੇ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰੋ! ਸਿੱਖਿਆ ਦਾ ਭਗਵਾਂਕ...

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