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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    Four degrees in hand, he still cleans Mumbai's sewers

     that, much likeBabasaheb Ambedkar's pursuit of an education, he, too, would have to study further to better his lot.

    But a decade on, with four degrees under his belt, Yadav, who pursued an MA in globalization and labour at the Tata Institute of Social Sciences (TISS), continues to work as a conservancy worker with theBrihanmumbai Municipal Corporation (BMC). While Yadav, now 36, is currently working on an MPhil at TISS, he spends his nights cleaning Mumbai's garbage.

    Yadav, who grew up in the slums around Arthur Road in the 1980s, during the heyday of Mumbai's underworld, says he felt the full force of social inequality when he joined the BMC. After his MA degree, when he applied for better positions in the civic body — for which he was well qualified — he was rejected even though there were vacancies, he says.

    "I could not afford to quit work and study because I have a family to support," he says. He hopes that, someday, his degrees will get him a less degrading job.

    Yadav, whose family has been involved in conservancy work for three generations, recalls his father coming home drunk after a day's work and routinely beating up his mother.

    "My mother believed in Ambedkar and wanted all of us to study hard," says Yadav, who studied till Class X in a municipal school, but failed his SSC exams. He went to work as a delivery boy at a share firm, carting 300kg of shares across the country in the pre-Internet era. He also worked as a security guard and an office boy. It was only when his father suffered a stroke that Yadav took over his job. "Even to get that job, I had to pay Rs 2,000 as bribe to push the file," he says.

    When he got time off from cleaning the city's garbage, Yadav would pore over newspapers. He came across an advertisement issued by the Yashwantrao Chavan Maharashtra Open University (YCMOU) offering those who failed the Class X exam the opportunity to pursue a degree if they cracked the university's entrance test. Yadav credits his general knowledge for the ease with which he breezed through the exam.

    He went on to do a BCom and a BA in journalism from YCMOU, a diploma in social work from Nirmala Niketan, and a master's degree in social work from Tilak Maharashtra University before he joined TISS and bagged another MA.

    Now, Yadav lives in a pint-sized room in a Chembur chawl with his wife and two daughters. He says his wife has been very supportive of his studies.

    He is still bitter about being denied study leave when he was pursuing an MA at TISS. "The BMC's rules and regulations allow for 24 months of paid study leave. Very few people know about it. Usually only bureaucrats in the department avail of it. But when I applied for it, the civic authorities said they could not give it to someone like me," says Yadav.

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    His colleagues and professors at TISS did their utmost to support him in his quest for study leave. Yadav did not get the two-year break, only three months of leave when, in the course of his MA, he was selected to travel to Johannesburg by a Swiss development agency.

    Yadav still wants to fight inequities with his education, like Ambedkar. He does not want to give up his job, but aims to challenge the system from within.

    Read this story in Hindi: चार डिग्रीएमफिल स्टूडेंटपर करता है गटर की सफाई


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    आस्‍था नहीं, अन्‍वेषण पर आधारित होना चाहिए इतिहास


    भारतीय इतिहास लेखन के विकास, असहमति की परंपरा तथा बौद्धिक अभिव्‍यक्तियों को बाधित करने के मौजूदा प्रयासों पर  रोमिला थापर की  कुलदीप कुमार से बातचीत


    (अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव)

    आपकी पुस्‍तक दि पास्‍ट बिफोर अस आरंभिक उत्‍तर भारत की ऐतिहासिक परंपराओं पर विस्‍तार से बात करती है। जानकर अचरज होता है कि आखिर क्‍यों और कैसे इस विचार की स्‍वीकार्यता बन सकी कि भारतीयों में ऐतिहासिक चेतना का अभाव है।

    ये जो मेरी पुस्‍तक छह माह पहले प्रकाशित हुई है, आरंभिक उत्‍तर भारत की ऐतिहासिक परंपराओं पर केंद्रित है। जिसे मैं आरंभिक उत्‍तर भारत कहती हूं, उसका आशय ईसा पूर्व 1000 से लेकर 1300 ईसवीं तक है। यह पुस्‍तक अनिवार्यत: इतिहासलेखन का एक अध्‍ययन है और इतिहास के लेखन का यह ऐसा क्षेत्र है जिस पर हमने भारत में, खासकर प्राक्-आधुनिक भारत के संदर्भ में बहुत ध्‍यान नहीं दिया है। आधुनिक भारतीय इतिहास के साथ तो इसका खासा महत्‍व पहचाना जाना शुरू हो चुका है लेकिन प्राक्-आधुनिक इतिहास के संदर्भ में ऐसा कम है। यह इसलिए अहम है क्‍योंकि यह उस दौर के इतिहासकारों और विचारधाराओं का अध्‍ययन है, जो इतिहास के लेखन की ज़मीन तैयार करते हैं। इस लिहाज़ से यह इतिहास दरअसल इतिहासलेखन पर एक टिप्‍पणी है।

    हर कोई यह कहता पाया जाता था कि भारतीय सभ्‍यता में इतिहासबोध का अभाव है। मुझे आश्‍चर्य होता कि आखिर ऐसा क्‍यों कहा जाता है। मैंने इसी सवाल से अपनी शुरुआत की। मैं समझ नहीं पा रही थी कि इतनी जटिल सभ्‍यता आखिर क्‍यों अपने अतीत के प्रति एक बोध विकसित क्‍यों नहीं कर सकी और विशिष्‍ट तरीकों से अतीत से क्‍यों नहीं जुड़ सकी। आखिर को हर समाज की अपने अतीत के प्रति एक समझ रही है और अपने लेखन के विभिन्‍न माध्‍यमों में समाजों ने अपने अतीत को उकेरा है।

    फिर, यह क्‍यों कहा गया कि भारतीय सभ्‍यता में इतिहासबोध का अभाव था? मुझे लगता है कि भारतीय इतिहास के औपनिवेशिक लेखन से इसका लेना-देना होना चाहिए।


    आपका आशय प्राच्‍यवादियों से है?

    मेरा आशय आंशिक तौर पर प्राच्‍यवादियों से और बाकी प्रशासक इतिहासकारों से है, जैसा कि उन्‍हें अकसर कहा जाता है। वे अंग्रेज प्रशासक थे जिन्‍होंने इतिहास भी लिखा, जिसका एक अहम उदाहरण विन्‍सेन्‍ट स्मिथ हैं। लेकिन इससे पहले भी 19वीं सदी में प्राचीन भारतीय इतिहास को एक ऐसे इतिहास के रूप में देखा जाता था जो एक स्थिर समाज से ताल्‍लुक रखता था, जिसमें कुछ भी बदला नहीं था। इससे एक तर्क यह निकलता था कि यदि कोई समाज बदलता नहीं है, तो जाहिर तौर पर इतिहास का उसके लिए कोई उपयोग नहीं है क्‍योंकि इतिहास तो बदलावों का दस्‍तावेजीकरण होता है, बदलावों की व्‍याख्‍या होता है। तो यदि आप किसी समाज को स्थिर कह देते हैं, तो उसमें इतिहासबोध के नहीं होने की बात कह कर आप एक हद तक सही जा रहे होते हैं।


    स्थिर की बात किस अर्थ में है?

    स्थिर का मतलब ये कि कोई सामाजिक परिवर्तन हुआ ही नहीं और समाज की संरचना जैसी थी वैसी ही बनी रही। फिर उन्‍होंने काल की अवधारणा के साथ इस तर्क को नत्‍थी कर डाला और कहा कि काल की प्राचीन भारतीय अवधारणा चक्रीय थी। यानी निरंतर एक ही चक्र खुद को दुहराता रहा, जो कि तकनीकी तौर पर सही नहीं है क्‍योंकि आप काल की चक्रीय अवधारणा का अध्‍ययन करें तो साफ़ तौर पर पाएंगे कि चक्र का आकार बदलता रहता है और प्रत्‍येक चक्र में धर्म की मौजूद मात्रा भी परिवर्तनीय होती है।


    बल्कि, वास्‍तव में घटती ही है…

    हां, घटती है। इसीलिए यह आवश्‍यक है कि कोई न कोई सामाजिक बदलाव ज़रूर हुआ हो जिसने यह परिवर्तन पैदा किया हो। लेकिन ऐसा नहीं माना गया। हालांकि इसके पीछे सबसे अहम कारक यह तथ्‍य था कि एक औपनिवेशिक संरचना, एक औपनिवेशिक प्रशासन उस समाज के लोगों के ऊपर उपनिवेश या उपनिवेशित समाज की अपनी समझ को थोपना चाहता है। इसलिए, ऐसा करने का एक बढि़या तरीका यह कह देना है कि: "आपके लिए आपके इतिहास का अन्‍वेषण हम करेंगे और आपको बताएंगे कि वह कैसा था।"और ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने बिल्‍कुल यही काम मोटे तौर पर किया जिसके लिए उसने प्राक्-आधुनिक भारतीय इतिहास के सार के रूप में दो धार्मिक समुदायों की उपस्थिति को समझा।


    यानी हिंदू और मुसलमान?

    हां,,. और इसका सिरा जेम्‍स मिल के कालावधीकरण (हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल) तक और इन दो धार्मिक समुदायों के संदर्भ में भारतीय समाज को देखने की एक विशुद्ध सनक तक खिंचा चला जाता है।


    महाभारत को पारंपरिक तौर पर इतिहास की श्रेणी में रखा गया था। अतीत को देखने का भारतीय तरीका क्‍या बिल्‍कुल ही भिन्‍न था?

    आरंभिक भारत के ग्रंथों को अगर हम देखें तो पाएंगे कि कुछ ऐसे पाठ संभव हैं जो इतिहास के कुछ आयामों को प्रतिबिंबित करते हों। ब्रिटिश उपनिवेशवाद की दलील थी कि इ‍कलौता ग्रंथ जो इतिहास को प्रतिबिंबित करता था वह 12वीं सदी में कश्‍मीर के कल्‍हण का लिखा राजतरंगिणी था। उनका कहना था कि यह एक अपवाद था। हालांकि करीब से देखने पर कुछ दिलचस्‍प आयाम खुलते नज़र आते हैं। मसलन, कुछ ग्रंथों को इतिहास के रूप में वर्णित किया गया है। इस शब्‍द का अर्थ वह नहीं था जो आज की तारी में हम 'इतिहास'से समझते हैं। इसका ससीधा सा अर्थ था कि 'अतीत में ऐसा हुआ रहा।'आप 'इतिहास पुराण'शब्‍द को अगर लें, तो इसका मतलब यह हुआ कि हमारे खयाल से अतीत में ऐसा ही हुआ रहा होगा। लेकिन इसके बारे में महत्‍वपूर्ण यह है कि एक चेतना है जो इतिहास सदृश है, भले ही वह ऐतिहासिक रूप से सटीक ना हो। मेरी दिलचस्‍पी इसी में है।

    मैंने अपनी पुस्‍तक में यही तर्क दिया है कि इस प्रश्‍न के तीन पहलू हैं जिनकी पड़ताल की जानी है। पहला, ऐसे कौन से ग्रंथ हैं जो ऐतिहासिक चेतना को दर्शाते हैं, जिन्‍हें हमें ऐतिहासिक रूप से सटीक लेने की ज़रूरत नहीं है लेकिन ये उन लोगों का अंदाजा दे पाते हैं जो इस दिशा में कुछ हद तक सोच रहे थे। फिर उस ऐतिहासिक परंपरा की बात आती है जिसका मैंने जि़क्र किया है, जहां अतीत के संबंध में यथासंभव उपलब्‍ध तथ्‍य, आख्‍यान और सामग्री को सायास जुटाकर समूची सामग्री को एक शक्‍ल देने का प्रयास है। अपने तर्क के लिए मैंने विष्‍णु पुराण को लिया है जहां यह सब उपलब्‍ध है, जो अतीत को आख्‍यान के तौर पर वर्णित करता है- जिसकी शुरुआत मिथकीय मनु से होती है, फिर उसके वंशज समूहों, वंशावलियों, मध्‍यकाल में उपजे कुटुम्‍बों और अंतत: राजवंशों और उनके शासकों का वर्णन है। आधुनिक इतिहासकार के लिए जो बात अहम है, वह अनिवार्यत: ऐतिहासिकता का प्रश्‍न नहीं है- कि कौन से पात्र और घटनाएं वास्‍तविक हैं- बल्कि यह कि प्रस्‍तुत आख्‍यान दो भिन्‍न किस्‍म के समाज-रूपों और ऐतिहासिक बदलाव को दिखाता है या नहीं।


    आपका आशय इश्‍वाकु से है?

    हां, कुछ इश्‍वाकु के वंशज और कुछ इला के। दरअसल, यह राजवंशों से अलहदा एक कौटुम्बिक समाज का रूप है।

    इसके बाद, यानी गुप्‍तकाल के बाद, इसके रूप बदलते हैं और आख्‍यानों का लेखन सचेतन ढंग से और स्‍पष्‍टता के साथ किया जाता है जिनमें दावा है कि ये वास्‍तविक रूप से घटी घटनाओं के आख्‍यान हैं। दिलचस्‍प है कि इसमें बौद्ध और जैन आख्‍यान सम्मिलित हैं। बौद्ध और जैन परंपराओं में इतिहासबोध बहुत तीक्ष्‍ण था तो संभवत: इसलिए कि इनके विचार और शिक्षाएं ऐसे ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित थे जो वास्‍तव में हुए थे। इतिहास में बड़ी स्‍पष्‍टता से उनकी निशानदेही की जा सकती है। दूसरी ओर, उत्‍तर-पौराणिक ब्राह्मणवादी परंपरा तीन किस्‍म के लेखन का गवाह रही है जो वर्तमान और अतीत का दस्‍तावेज हैं और इसीलिए इतिहास लेखन में सहायक है। पहली श्रेणी राजाओं की जीवनकथा है, जिसे 'चरित'साहित्‍य कहते हैं- हर्षचरित और रामचरित और ऐसे ही ग्रंथ। दूसरी श्रेणी उन शिलालेखों की है जो तकरीबन हर राजा ने बनवाए। कुछ शिलालेख बहुत ही लम्‍बे हैं। उनमें राजवंशों के इतिहास और राजाओं की गतिविधियों का संक्षिप्‍त उल्‍लेख मिलता है। यदि कालानुक्रम से किसी एक राजवंश के सभी शिलालेखों को एक साथ रखकर आदि से अंत तक पढ़ा जाए, तो परिणाम के तौर पर हमें राजवंश का इतिहास मिल जाएगा। गुप्‍तकाल के बाद के दौर में क्‍या हुआ था- कम से कम कालानुक्रम और राजवंशों के संदर्भ में- उस पर हमारा आज का अधिकतर मौजूद अध्‍ययन मोटे तौर पर इन्‍हीं शिलालेखों पर आधारित है। हाल ही में इन शिलालेखों से हमें भू-संबंध, श्रम और सत्‍ताक्रम के राजनीतिक अर्थशास्‍त्र में आए बदलावों के प्रमाण भी प्राप्‍त हुए हैं।


    यहां तक कि अशोक की राजाज्ञाओं में भी एक इतिहासबोध दिखता है, जो उन्‍होंने अपनी प्रजा को निर्देश पर तत्‍काल अमल करने के लिए जारी किए थे हालांकि उसके दिमाग में अपनी भावी पीढ़ी का भी ध्‍यान तो रहा ही होगा।

    हां, बेशक ऐसा ही है। कुछ में तो वह यहां तक कहता है कि उसे आशा है कि उसके पुत्र और पौत्र हिंसा को त्‍याग देंगे और यदि वे ऐसा नहीं कर सके तो भी दंड सुनाते समय दया बरतेंगे। यानी, भावी पीढि़यों के लिए दस्‍तावेज का एक बोध तो था ही और मुझे लगता है कि शिलालेखों में यह विशेष तौर से ज़ाहिर है। आखिर किसी पत्‍थर पर या ताम्‍बे की प्‍लेट पर या फिर विशेष तौर से निर्मित किसी शिला अथवा मंदिर की दीवार पर खुदवाने का इतना कष्‍ट उन्‍होंने क्‍यों उठाया? इसलिए क्‍योंकि वे चाहते थे कि उनके बाद की कई पीढि़यां भी उसे पढ़ती रहें।

    तीसरे किस्‍म का लेखन ज़ाहिर तौर से कालक्रमानुसार लिखे गए अभिलेख थे। राजतरंगिणी कश्‍मीर का एक इतिवृत्‍त है जो कि उच्‍च कोटि का साहित्‍य है। कुछ बहुत छोटे-छोटे इतिवृत्‍त भी हैं जिन्‍हें संजो कर रखा गया, हालांकि वे कल्‍हण जैसे उत्‍कृष्‍ट नहीं हैं।

    मध्‍यकाल में राजदरबारों में कालक्रमानुसार अभिलेखों का लिखा जाना जारी रहा और रामायण व महाभारत जैसे महाग्रंथों के नए संस्‍करण आए तथा बाद में नई भाषाओं में भी इन्‍हें लिखा गया।


    आप दोनों महाग्रंथों रामायण और महाभारत को कैसे देखती हैं हिंदू सामान्‍य तौर पर सोचते हैं कि इनमें जो कुछ लिखा है, बिल्‍कुल वैसे ही सब कुछ घटा था। हस्तिनापुर और अयोध्‍या में तो इन महाग्रंथों की ऐतिहासिकता को जांचने के लिए खुदाई भी हुई थी।

    भारतीय महाग्रंथों को लेकर एक इतिहासकार के समक्ष दो समस्‍याएं होती हैं। कुछ मायनों में तो ये भारत के संदर्भ में विशिष्‍ट हैं क्‍योंकि और कहीं भी ऐसा नहीं हुआ है कि वहां के महाग्रंथ अनिवार्यत: धर्मग्रंथ बन गए हों। वहां वे प्राचीन नायकों का वर्णन करने वाले काव्‍य हैं जबकि यहां वे पवित्र ग्रंथ बन गए हैं। इसलिए हमारे सामने दो समस्‍याएं हैं। एक तो बेहद बुनियादी समस्‍या जो रह-रह कर अकसर उभर आती है और अब वह पहले से कहीं ज्‍यादा मज़बूती से हमारे सामने उपस्थित होगी। ये वह फ़र्क है, जो हमें आस्‍था और इतिहास के बीच बरतना होता है। यदि एक इतिहासकार के तौर पर आप महाभारत को पढ़ रहे हैं, तो यह मान लेने की प्रवृत्ति देखी जाती है कि आप ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्‍योंकि आप इसे पवित्र साहित्‍य मान रहे हैं, जबकि ऐसा कतई नहीं है। एक इतिहासकार के तौर पर आप समाज के संदर्भ में उसके पाठ को बरत रहे हैं तथा सेकुलर और तर्कवादी तरीके से बस उसका विश्‍लेषण कर रहे हैं।

    इससे दिक्‍कत पैदा होती है क्‍योंकि एक आस्‍थावान व्‍यक्ति के लिए ये वास्‍तविक घटनाएं हैं और यही वे लोग हैं जो वास्‍तव में पढ़ाते रहे हैं, जबकि एक इतिहासकार के लिए मुख्‍य सरोकार की चीज़ यह नहीं है कि ग्रंथ में वर्णित व्‍यक्ति और घटनाएं ऐतिहासिक हैं या नहीं। सरोकार इस बात से है कि ये ग्रंथ जो वर्णन कर रहे हैं, उसका व्‍यापक ऐतिहासिक संदर्भ क्‍या है और व्‍यापक समाज के साहित्‍य के तौर पर इनकी भूमिका क्‍या है। हमारे पास कोई वास्‍तविक साक्ष्‍य नहीं है कि ये लोग थे। जब तक हमें साक्ष्‍य नहीं मिल जाते, इस पर हम कोई फैसला नहीं दे सकते। ये दो बिल्‍कुल अलहदा क्षेत्र हैं लेकिन आज हो ये रहा है कि आस्‍था के छोर से बोल रहे लोगों- सब नहीं, एक छोटा सा हिस्‍सा- में एक प्रवृत्ति यह देखी जा रही है कि वे मांग कर रहे हैं कि इतिहासकार उसे ही इतिहास मान ले जिसे आस्‍थावान लोग इतिहास मानते हैं। एक इतिहासकार ऐसा नहीं कर सकता। आज इतिहास को आस्‍था पर नहीं, आलोचनात्‍मक अन्‍वेषण पर आधारित होना होगा।


    यही वजह है कि इतिहास की पाठ्यपुस्‍तकों में बदलाव की मांग की जा रही है।

    हां, बेशक। इसमें सबसे ज्‍यादा दिलचस्‍प यह है कि एनसीआरटी की जिन पाठ्यपुस्‍तकों पर यह बहस चल रही है- जिन्‍हें हमने प्राचीन, मध्‍यकालीन और आधुनिक भारत तक सब खंगाल कर लिखा था- उनकी आलोचना और उनमें बदलाव की मांग धार्मिक संस्‍थानों और ससंगठनों की ओर से आ रही है। दूसरे इतिहासकार ऐसी मांग नहीं कर रहे। यह इस बात का एक अहम संकेत है कि कैसे आस्‍था, एक मायने में, इतिहास के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कर रही है।

    दूसरे, हमें एक सवाल पूछना होगा: क्‍या यह सिर्फ आस्‍था है या फिर जिसे आस्‍था बताया जा रहा है उसमें कोई राजनीतिक तत्‍व भी है?  क्‍योंकि जो संगठन ऐसी मांग उठाते हैं, उनके राजनीतिक संपर्क ज़रूर हैं। चाहे जो भी हो, व्‍यापक अर्थों में 'राजनीतिक'शब्‍द का प्रयोग करें तो समाज में वर्चस्‍वशाली स्‍वर वाला कोई भी संगठन राजनीतिक प्रवृत्ति से युक्‍त होगा ही। इसलिए, इतिहास में आस्‍था का अतिक्रमण सिर्फ धर्म और इतिहास की टकराहट नहीं है। यह एक खास तरह की राजनीति के साथ भी टकराना है।


    इन दिनों ऐसा लगता है कि हर किसी की धार्मिक भावनाएं इतनी नाज़ुक हैं कि तुरंत आहत हो जाती हैं। क्‍या हमारे यहां असहमति की परंपरा रही है?

    बेशक हमारे यहां असहमति की परंपरा रही है। जब कभी पुराने लोगों ने, खासकर बाहरी लोगों ने भारत में धर्म के बारे में लिखा, उन्‍होंने अकसर यहां के दो अहम धर्म समूहों का हवाला दिया- ब्राह्मण और श्रमण। चाहे वह ईसा पूर्व चौथी सदी में मेगस्‍थनीज़ रहे हों या 12वीं ईसवीं में अल-बरूनी, ये सभी ब्राह्मण और श्रमण की बात करते हैं, जैसा कि सम्राट अशोक ने पंथों का जि़क्र करते हुए अपने शिलालेखों में भी इन पर बात की है।


    तो क्‍या यह वैदिक और गैर-वैदिक का फ़र्क है?

    इससे कहीं ज्‍यादा, क्‍योंकि अल-बरूनी तक पहुंचने के क्रम में आप ऐसे ब्राह्मणों को पाएंगे जो उस वक्‍त वेद और पुराण दोनों की शिक्षा दे रहे थे। पुराणों पर आधारित हिंदू धर्म कहीं ज्‍यादा लोकप्रिय था, जैसा कि चित्रकला, शिल्‍पकला और कुछ साहित्‍य श्रेणियों में दिखाई देता है। श्रमण में बौद्ध और जैन आते थे, जिन्‍हें ब्राह्मण नास्तिक कहते थे। यह संभव है कि इस श्रेणी के भीतर ऐसे पंथ भी रहे हों जो वेदों पर आस्‍था नहीं रखते थे, मसलन भक्तिमार्गी शिक्षक। इस द्विभाजन के बारे में दिलचस्‍प बात यह है कि पतंजलि ने अपने संस्‍कृत व्‍याकरण में दोनों को परस्‍पर विरोधी बताया है और इनकी तुलना सांप व नेवले से की है। इसका मतलब यह हुआ कि ब्राह्मणवादी परंपरा से पर्याप्‍त और खासी असहमतियां मौजूद थीं।


    तो क्‍या यह किसी संघर्ष का रूप ले सकी?

    हां, कुछ मामलों में ऐसा हुआ। राजतरंगिणी में कल्‍हण बताते हैं कि किसी कालखंड में- पहली सदी के मध्‍य के आसपास- बौद्ध भिक्षुओं पर हमले हुए और उनके विहारों को नष्‍ट किया गया था। फिर, तमिल स्रोतों से पता चलता है कि जैनियों को सूली पर चढ़ाया गया। शिलालेखों में शैव और जैनियों तथा शैव और बौद्धों के बीच अंतर का जि़क्र है। भले ही असहिष्‍णुता से जुड़ी घटनाओं का जि़क्र यहां मिलता है लेकिन कोई जिहाद या धर्मयुद्ध जैसी स्थिति नहीं बनी थी।

    इसकी वजह बेशक यह हो सकती है कि प्राक्-आधुनिक भारतीय सभ्‍यता में भेदभाव का स्‍वरूप उतना धार्मिक प्रकृति का नहीं था बल्कि यह था कि जाति संरचना का हिस्‍सा रहे लोगों ने जाति संरचना से बाहर रहे लोगों के साथ अमानवीय व्‍यवहार किया होगा। यह भारत में हर धर्म के साथ देखा जा सकता है, चाहे वह यहां का रहा हो या बाहर से आया रहा हो।

    असहमति इस अर्थ में एक दिलचस्‍प स्‍वरूप धारण कर लेती है कि ब्राह्मणवादी और श्रमणवादी दोनों ही परंपराओं के भीतर भी असहमत लोग थे। विमर्श और विवाद की तयशुदा प्रक्रियाओं में इसे स्‍पष्‍ट रूप में देखा जा सकता है। पहले, विरोधी विचार को संपूर्ण और तटस्‍थ तरीके से सामने रखा जाता है, फिर वादी विस्‍तार से उसके अंतर्विरोधों को उजागर करता है, आखिर में या तो सहमति होती है अथवा असहमति।

    यहां ध्‍यान देने वाली बात यह है कि असहमति को मान्‍यता दी जाती है और उस पर बहस की जाती है। तमाम ऐसे उदाहरण हैं जहां विभिन्‍न शासकों के दरबार में हुई किसी बहस में किसी व्‍यक्ति के जीतने या हारने का संदर्भ आता है।


    और क्‍या पूर्वपक्ष यानी प्रतिवादी का विचार ईमानदारी से सामने रखा जाता था?

    हां, क्‍योंकि यह वाद-विवाद एक सार्वजनिक आयोजन होता था।


    क्‍या लेखन में भी ऐसा ही था?

    हां, लेखन में भी यही स्थिति थी। जैसा कि हर अच्‍छा अध्‍येता करता है, यदि आप किसी चीज़ की निंदा करना चाहते हों तो सबसे पहले आपको उसे गहराई से समझना होगा अन्‍यथा आपकी निंदा सतही करार दी जाएगी। विद्वता का सार यही है और ऐसा उस वक्‍त होता था। असहमति से निपटने का एक अन्‍य तरीका, जिसे प्रभावकारी माना जाता था, वो यह था कि ब्राह्मणवादी परंपरा असहमत व्‍यक्ति की सहज उपेक्षा कर देती थी। ब्राह्मणों और बौद्ध व जैन के बीच के तनाव बड़े दिलचस्‍प तरीके से विष्‍णु पुराण में उकेरे गए हैं जिसमें बौद्धों और जैनियों को "महामोह"की संज्ञा दी गई है- यानी बहकाने वाले लोग। कहानी यह थी कि इन लोगों ने ब्रह्माण्‍ड के बारे में समझाने के लिए एक सिद्धांत गढ़ा था जो कि दरअसल बहकावा था जो लोगों को गलत रास्‍ते पर ले जाता था। इसलिए, बहकावेबाज़ होने के लिए इनकी निंदा की गई है। असहमति से निपटने का यह एक अन्‍य तरीका था।

    सामान्‍यत: यह कहा जाता है कि शंकराचार्य ने हिंदू धर्म की रक्षा की थी। मैं इस दलील को नहीं मान पाती क्‍योंकि उन्‍होंने बौद्धों के कुछ विचारों को भी हथिया लिया था और इससे कहीं ज्‍यादा, बौद्ध धर्म के पतन के कई और कारण हैं। यह जानना दिलचस्‍प है कि मठ स्‍थापित करने का चलन, जो कि इस रूप में पहले नहीं मौजूद था, बौद्ध और जैन विहारों की संरचना के समरूप जान पड़ता है। इनका असर यह हुआ कि किसी शिक्षण को बड़े पैमाने पर आयोजित और प्रसारित करने के लिए उसके पीछे एक संस्‍थान का होना अनिवार्य है।


    चाहे जो हो, शंकराचार्य को तो प्रच्‍छन्‍न बौद्ध कहा ही जाता रहा।

    हां, वे थे भी, लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि उन्‍होंने श्रमणवादी परंपरा से कुछ कारक आंदोलन को संगठित करने के लिए उधार लिए और यह एक ऐसी बात है जिसे हम नहीं मानते हैं। विचारधारा का अन्‍वेषण करते वक्‍त यह जानना दिलचस्‍प होगा कि विरोधी परंपरा से क्‍या कुछ उधार लेकर हथियाया जा रहा है।


    एकाधिक रामकथाओं पर आपका क्‍या विचार है? बौद्ध और जैन परंपराओं में तो इनके कई संस्‍करण हैं।

    इन कहानियों के अपने कई संस्‍करण लोगों के पास थे। रामकथा पहले भी एक लोकप्रिय कथा थी और आज भी है। बौद्ध जातक कथाओं में आपको कहीं-कहीं इनके तत्‍व बिखरे हुए मिल जाएंगे। जिसे दशरथ जा‍तक कहा जाता है, वह रामकथा का ही एक हिस्‍सा है। इसमें राम और सीता दोनों वनवास पर जाते हैं, वहां से लौटते हैं और मिलकर 16,000 साल तक राज करते हैं। बौद्ध संस्‍करण में एक अहम फ़र्क यह है कि यहां राम और सीता भाई-बहन हैं। इसका जैन संस्‍करण पउम चरिय (पद्म चरित) संपूर्णत: जैन लोकाचार से परिपूर्ण है। इसमें दशरथ, राम, सीता और अन्‍य सभी पात्र जैन हैं। साफ़ तौर पर यह एक बड़े नायक के चरित का सीधे-सीधे अपनी परंपरा में उठा लिया जाना है।


    इस संस्‍करण में तो दशरथ जीवन के अंत में संन्‍यास ले लेता है…

    हां, दशरथ संन्‍यास ले लेता है और सीता आश्रम में चली जाती है। उसका अंत नहीं होता, न ही उसे धरती निगल जाती है। दिलचस्‍प है कि पउम चरिय ऐतिहासिकता का दावा करता है और कहता है कि ये घटनाएं वास्‍तव में हुई थीं और वह बताता है कि बाकी सारे संस्‍करण गलत हैं और वही वास्‍तव में बता सकता है कि घटनाएं कैसे घटित हुई थीं। यानी यह दूसरे संस्‍करणों को चुनौती दे रहा है। यह एक ऐसा पाठ है जिसमें रावण और अन्‍य राक्षसों को मेघवाहन वंशावाली का सदस्‍य बताया गया है जिसका संबंध चेदियों से है, जिसका एक दिलचस्‍प समानांतर ऐतिहासिक संदर्भ हमें कलिंग के खरावेला के शिलालेखों में मिलता है जो खुद को मेघवाहन बताता है और चेदि का जि़क्र करता है। पउम चरिय का सबसे अहम तर्क यह है कि इन राक्षसों का कथा के दूसरे संस्‍करणों में दानवीकरण किया गया है। इसमें रावण के दस सिर नहीं हैं। वह दरअसल नौ विशाल रत्‍नों का एक हार पहनता है जिनमें प्रत्‍येक में उसका सिर दिखाई देता है। इसका प्रयास यह है कि वाल्‍मीकि रामायण और अन्‍य संस्‍करणों में मौजूद फंतासी के तत्‍वों की एक तार्किक व्‍याख्‍या की जाए।

    इतने ढेर सारे रामायण क्‍यों मौजूद हैं? इसका लेना-देना दरअसल हिंदू धर्म की प्रकृति से है और एक इतिहासकार के तौर पर हिंदू धर्म के बारे में यही बात मुझे सबसे ज्‍यादा आकृष्‍ट करती है। यह किसी एक ऐतिहासिक शिक्षक, एक पावन ग्रंथ, सामुदायिक पूजा, संप्रदाय और एक समान आस्‍था प्रणाली पर आधारित नहीं है, जैसा कि हम यहूदी-ईसाई परंपरा में पाते हैं। यह वास्‍तव में पंथों का एक जुटान है। आप अपनी पसंद की किसी भी चीज़ में आस्‍था रख सकते हैं, जब तक कि आप उसके कर्मकांडों को अपना रह हों। और ये कर्मकांड अकसर जाति आधारित होते हैं। आप किसी कर्मकांड को होता देखकर उसमें प्रयोग की जाने वाली वस्‍तुओं, चढ़ावे और प्रार्थना के आधार पर मोटे तौर से यह जान सकते हैं कि यह ब्राह्मणवादी है या गैर-ब्राह्मणवादी। इसलिए मेरे खयाल से संप्रदाय के संदर्भ में जाति बहुत अहम पहलू है और यदि कोई धर्म अनिवार्यत: कई संप्रदायों के सह-अस्तित्‍व व संसर्ग पर आधारित हो, तो ज़ाहिर तौर पर आस्‍था और कर्मकांडों के संस्‍करणों में भिन्‍नता तो होगी ही।

    इसीलिए, कहानियां एकाधिक होंगी। और इसका उस सामाजिक संस्‍तर से पर्याप्‍त लेना-देना होगा जहां से उसका लेखक आ रहा है। मसलन, भारतीय प्रायद्वीप की कुछ लोक कथाओं में सीता युद्ध में नेतृत्‍वकारी भूमिका का निर्वाह करती है, जो कि इस बात का लक्षण है कि इस कहानी का महिलाओं का लिखा संस्‍करण उनका अपना है।

    यह बात कहीं भी अैर किसी भी कहानी के साथ सही हो सकती है। आप देखिए कि लातिन अमेरिका में ईसाइयत का क्‍या हश्र हुआ, कि वहां जिस-जिस क्षेत्र में वह गया, लोगों ने अपनी परंपराओं के हिसाब से उस कहानी को बदल डाला। यह वास्‍तव में किसी कथा की महान संवेदनात्‍मकता का द्योतक है कि कैसे वह लोगों की कल्‍पनाओं को अपने कब्‍ज़े में ले लेती है और लोग उसे अपने तरीके से ढाल लेते हैं।


    आजकल बहुलतावाद और विविधता को लोग सहिष्‍णुता से नहीं लेते हैं। आपके विचार में एक जनतांत्रिक समाज के तौर पर भारत के विकास के साथ ऐसा क्‍या गड़बड़ हो गया कि हम इस मोड़ तक आ गए?

    यहां एक बार फिर ऐसा लगेगा कि मैं उपनिवेशवादियों को आड़े हाथों ले रही हूं लेकिन इसका ज्‍यादातर लेना-देना 19वीं सदी के विचारों से है। औपनिवेशिक विद्वान और प्रशासक हिंदू धर्म को समझ नहीं पाए क्‍योंकि वह यहूदी या ईसाई धर्म के उनके अपने अनुभवों के सांचे में बैठ नहीं सका। इसलिए उन्‍होंने तमाम संप्रदायों को एकरैखिक परंपरा में बांधकर और इन्‍हें मिलाकर एक धर्म का आविष्‍कार कर डाला जिसे उन्‍होंने हिंदूइज्‍़म कहा। आस्‍थाओं और कर्मकांडों का अपना एक इतिहास था लेकिन एकल ढांचे में इनकी समरूपता बैठाने का विचार नया था। इनमें से कुछ घटक तो बहुत पहले से विद्यमान थे। मसलन, शक्‍त-शक्ति की परंपरा यानी तांत्रिक परंपरा सातवीं और आठवीं सदी के स्रोतों में ज्‍यादा मज़बूती से उभर कर आई थी। फिर भी, हो सकता है कि कुछ लोगों के बीच इसका विचार और कर्मकांड काफी पहले से मौजूद रहा हो। सामान्‍यत: लोग मानते हैं कि यह शायद अवैदिक लोगों और निचली जातियों व ऐसे ही लोगों का धर्म था।


    शिल्‍पकला इत्‍यादि में इनकी अभिव्‍यक्ति खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों की दीवारों तक कैसे पहुंच गई?

    जिस तरह समाज और उसका इतिहास बदलता है, वैसे ही अभिजात वर्ग के घटकों में भी बदलाव आता है। हम सभी इस विचर को सुनते-समझते बड़े हुए हैं कि जाति एक जमी हुई निरपेक्ष चीज़ है। अब हालांकि हम देख पा रहे हैं कि राजनीतिक दायरे कहीं ज्‍यादा खुले हुए थे। सही परिस्थितियां हासिल होने पर जातियों के भीतर के समूह उच्‍च पायदान तक खुद को पहुंचाने के दांव भी खेलते थे।


    और इसी के लिए वे वंशावलियां बनवाते थे…

    हां, ठीक बात है। एक व्‍यक्ति या एक परिवार सत्‍ता और वर्चस्‍व की स्थिति तक पहुंच कर भी उन देवताओं की पूजा कर सकता है जो पुराणों का हिस्‍सा नहीं हैं, जैसे कि कुछ देवियां। लेकिन, चूंकि अब उन्‍हें न अभिजात तबके ने अपना बना लिया है इसलिए उन देवताओं को उस देवसमूह में डाला जा सकता है और वह पौराणिक हिंदू धर्म का हिस्‍सा बन जाता है। यही बात है कि पुराणों का अध्‍ययन जितना रोमांचकारी है उतना ही ज्‍यादा जटिल भी है क्‍योंकि आप नहीं जानते कि कौन सी चीज़ कहां से आ रही है। ऐतिहासिक नज़रिये से देखें, तो ये तमाम तत्‍व कहां फल-फूल रहे थे और कब व कैसे वे मुख्‍यधारा के धर्म का हिस्‍सा बना दिए गए, इसका पता लगाना बड़ा दिलचस्‍प काम हो सकता है।

    जब मैंने 19वीं सदी के उपनिवेशवादियों का जिक्र किया तो मेरी कोशिश उस एकल धर्म यानी हिंदू धर्म के निर्माण की तरफ ध्‍यान आकृष्‍ट करने की थी जिसके कुछ विशिष्‍ट और परिभाषित कारक हैं। राजनीति जब धर्म के स्‍वरूप और उसकी अंतर्वस्‍तु को तय करने लग जाती है, तो वहां साम्‍प्रदायिकता की परिघटना का प्रवेश हो जाता है। मुस्लिम साम्‍प्रदायिकता के साथ ऐसा करना आसान है क्‍योंकि इस धर्म का बाकायदे एक इतिहास है जिसमें उसका एक संस्‍थापक है और उसकी शिक्षाएं इत्‍यादि हैं। इसी के साथ हिंदू साम्‍प्रदायिकता समानांतर आकार ले लेती है। दोनों प्रतिरूप हैं। इसमें हिंदू धर्म को इस तरीके से दोबारा सूत्रीकृत किया जाना है जिससे लोगों को राजनीतिक रूप से संगठित करने में धर्म का इस्‍तेमाल संभव हो सके। यही वजह है कि ऐतिहासिकता का सवाल बहुत महत्‍वपूर्ण हो उठता है। यदि आपने तय कर दिया कि वह राम है जिसने धर्म की संस्‍थापना की थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्‍मद की तरह ही ऐतिहासिक रूप से अस्तित्‍व में था। इन तीनों के बारे में तो कोई विवाद नहीं है। अशोक ने लुम्बिनी में एक लाट लगवाई थी जिस पर लिखा था कि यहां बुद्ध जन्‍मे थे। रोमन इतिहासकारों ने ईसा के बारे में और अरब के इतिहासकारों से मोहम्‍मद के बारे में लिखा ही है।

    यानी, एक ऐतिहासिक संस्‍थापक और एक पवित्र ग्रंथ तो होना ही है। बंगाल में जब पहली बार अदालतें अस्तित्‍व में आईं, तो न्‍यायाधीशों पे पंडितों से पूछा कि वे किस पुस्‍तक की वे कसम खाएंगे। उनकी बाइबिल या कुरान कौन सी किताब है? कुछ ने रामायण का नाम लिया, कुछ लोगों ने उपनिषद और कुछ अन्‍य ने गीता का नाम लिया। यह विवाद अब भी बना हुआ है। गांधीजी ने गीता को बड़ा महत्‍व दिया था, तो बहुत से लोगों को लगने लगा कि यही पवित्र ग्रंथ है। इसकी जरूरत ही नहीं है। वह कई पवित्र किताबों में एक थी। इसी तरह अगर आप राम को भगवान मानते हैं, तो वह तमाम भगवानों में एक भगवान, तमाम अवतारों में एक अवतार था।

    अब सवाल आता है कि एक संगठन तो होना ही चाहिए। यदि धर्म कई सम्‍प्रदायों से मिलकर बना है, तो इन्‍हें साथ कैसे लाया जाए? एक तरह से देखें तो ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज और ऐसे ही संगठन धर्म को संगठित करने का एक आरंभिक प्रयास थे ताकि समूचे समुदाय की ओर से उक्‍त संगठन बोल सके। ऐसा हो नहीं सका। 1920 और 1930 के दशक में इन प्रयासों के विफल हो जाने के बाद हिंदू धर्म की औपनिवेशिक समझ के आधार पर हिंदुत्‍व का उभार हुआ और हिंदू धर्म के भीतर से ही एक ऐसे धर्म को निर्मित करने की कोशिश की गई जिसका राजनीतिक तौर पर इस्‍तेमाल किया जा सके। अब, इसके लिए क्‍या ज़रूरी था? इसके लिए हिंदू को ही यहां का मूलनिवासी परिभाषित करने की ज़रूरत थी क्‍योंकि उसका धर्म की ब्रिटिश भारत की चौहद्दी के भीतर पनपा था। यानी बाकी सब बाहरी हुए। यानी धर्म अब नागरिकता का अधिकार या बाहरी की परिभाषा को तय कर रहा था। यह बात राजनीतिक रूप से बेहद अहम है। यह एक बड़ा संक्रमण है जो कि पूरी तरह 19वीं सदी के विचार पर आधारित है- औपनिवेशिक और उसकी प्रतिक्रिया में भारतीय, दोनों ही विचार।


    यानी कि वेंडी डोनिगर "दि हिंदूज़: ऐन आल्‍टरनेटिव हिस्‍ट्री"जैसी पुस्‍तकों पर प्रतिबंध लगाने या वापस लेने की मांग राजनीतिक है।

    पेंग्विन से प्रकाशित यह पुस्‍तक उन बहुलताओं पर चर्चा करती है जिनसे मिलकर हिंदू धर्म बना है। यह विभिन्‍न सामाजिक सम्‍प्रदायों और धर्म के उनके स्‍वरूप के बारे में है जो उन्‍होंने हिंदू विचार और प्रार्थना पद्धति के मूल से लिया था और हिंदू धर्म के निर्माण में इस आधार पर जो योगदान दिया था। एक ऐसी पुस्‍तक जो वैकल्पिक पंथों और बहुलतावाद पर चर्चा करती हो, उसे प्रसारित किए जाने को मंजूरी नहीं दी जा सकती क्‍योंकि वह विकल्‍पों और बहुलताओं के बीच फल-फूल नहीं सकती है। उन्‍होंने इस मसले को खुले तौर पर नहीं उठाया क्‍योंकि राजनीतिक रूप से यह दुरुस्‍त कदम नहीं होता। इसीलिए उन्‍होंने ऐसे मुद्दे उठाए, मसलन कि डोनिगर कैसे कह सकती हैं कि राम ऐतिहासिक पात्र नहीं थे। विद्वानों में अधिकांश का मत है कि अगर यह गलत नहीं है तो यह सुनिश्चित भी नहीं है।

    फिर उनके ऊपर शिव की व्‍याख्‍या में फ्रायडीय विश्‍लेषण प्रयोग करने का आरोप लगा और उनके लिखे कुछ वाक्‍यों पर आपत्ति जताई गई। हर किसी को आपत्ति करने का अधिकार है, लेकिन उसके लिए आपको बताना होगा कि वह क्‍यों गलत है और उसकी वजहें गिनवानी होंगी। आप यह नहीं कह सकते कि मेरी भावनाएं आहत हो रही हैं, इसलिए मैं चाहता हूं कि पुस्‍तक पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। यह पुस्‍तक एक प्रस्‍थापना को सामने रखती है। आपको इसका प्रतिवाद पेश करना होगा। प्रस्‍थापना का प्रतिवाद प्रस्‍तुत करना ही प्राचीन भारतीय दार्शनिक परंपरा के अनुकूल होगा। लेकिन दुर्भाग्‍यवश, "आहत भावनाओं"के आधार पर किताबों को प्रतिबंधित करने की मांग करने वाले अधिकतर लोग वे हैं जिनके पास प्रतिवाद करने की क्षमता नहीं है।


    एक भावना यह भी है कि तमाम लोग इतिहास पर ऐसी लोकप्रिय पुस्‍तकें लिख रहे हैं जो तथ्‍यात्‍मक रूप से बहुत सही नहीं हो सकती हैं। मसलन, चार्ल्‍स एलेन की 'अशोक'।

    देखिए, इतिहस हमेशा से दो बीमारियों से ग्रस्‍त रहा है। एक तो, जैसा कि एरिक हॉब्‍सबॉम ने बहुत सटीक सुझाया था, कि इतिहास राष्‍ट्रवाद के लिए अफ़ीम जैसा है। अतीत  और भविष्‍य की सारी भव्‍य निर्मितियां इतिहास पर खड़ी होती हैं। इसलिए, इतिहास ने राष्‍ट्रवाद में, और इसी वजह से राजनीति में, बहुत अहम योगदान दिया है। आप उससे बच नहीं सकते।

    दूसरे, चूंकि किन्‍हीं तरीकों से इतिहास को महज एक आख्‍यान माना गया है- जो कि समाजशास्‍त्र, अर्थशास्‍त्र, नृशास्‍त्र और अन्‍य विधाओं के साथ नहीं है, जिनकी अपनी एक प्रविधि है। लोग मानकर चलते हैं कि कोई भी शख्‍स जिसने इतिहास पर छह किताबें पढ़ ली हैं वह  सातवीं किताब लिखने के योग्‍य है। लेकिन हम ललोग जो कि इतिहास के क्षेत्र में ही काम करते हैं, लगातार कहते रहे हैं कि इतिहास में विश्‍लेषण की अपनी एक प्रविधि होती है। इसके स्रोतों के साथ तमाम किस्‍म के तकनीकी पहलू जुड़े होते हैं। यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। यह दूसरी बीमारी है जिससे इतिहास ग्रस्‍त है और ग्रस्‍त रहेगा।

    हम कह सकते हैं कि इतिहासकारों के बीच भी एक विभाजन है। एक तरफ पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित इतिहासकार हैं जो ऐतिहासिक विश्‍लेषण की प्रविधियों से परिचित हैं। दूसरी तरफ वे नौसिखिये हैं जो छह किताबें पढ़कर सातवीं लिख देते हैं।


    एक अनुशीलन के तौर पर आज की तारीख में इतिहास, 50 साल पहले की तुलना में कहां खड़ा है?

    पिछले पचास साल में इतिहास भारी बदलावों से गुज़रा है जिसका अंदाज़ा औसत और सामान्‍य पाठकों को शायद बिल्‍कुल नहीं है। उनकी इतिहास की अवधारणा बीसवीं सदी से पहले की बनी हुई है। विभिन्‍न प्रवासी समूहों के साथ यही दिक्‍कत है कि वे इतिहास को उन धारणाओं के संदर्भ में प्रस्‍तुत करते हैं जिनसे वे 50 साल पीछे से परिचित रहे हैं। वे लगातार अगली पीढि़यों तक इसे दुहराते रहते हैं जबकि हम उन धारणाओं से काफी दूर चले आए हैं। यही वजह है कि हमारे बीच इतना कम संवाद है।

    मैंने जब दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में साठ के दशक की शुरुआत में पढ़ाना शुरू किया था, तो हमारे बीच इस बात को लेकर काफी बहसें, बैठकें, परिचर्चाएं होती थीं कि इतिहास के पाठ्यक्रम को राजनीतिक और राजवंशीय इतिहास से विस्‍तारित कर सामाजिक और आर्थिक इतिहास तक ले जाने की ज़रूरत है। बहसें काफी गरम भी हो जाती थीं और लोग पूछते थे कि यह सामाजिक और आर्थिक इतिहास नाम की नई चिडि़या कौन सी है। आज कोई यह सवाल नहीं पूछता। इसमें कुछ भी नया नहीं है। इसके बाद हम तमाम दूसरी दिशाओं में दूसरी चीज़ों की ओर बढ़े। एक लंबा दौर इतिहास के मार्क्‍सवादी लेखन का रहा। फिर, जिसे "लिटरेरी टर्न"कहा गया, उसमें लोगों की काफी दिलचस्‍पी रही, यानी एक सांस्‍कृतिक मोड़ से युक्‍त उत्‍तर-औपनिवेशिकतावाद। तब इतिहासकारों ने पाठ की ओर रुख किया और उनका दोबारा अन्‍वेषण शुरू किया।


    उत्‍तर-आधुनिकतावाद का क्‍या हुआ?

    उत्‍तर-आधुनिकतावाद भी आया है। यह एक बिल्‍कुल नए किस्‍म का दायरा है जिसमें हम जैसे कुछ लोग बहुत सशक्‍त पक्ष रखते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आपको उन बौद्धिक बदलावों को लेकर सचेत रहना होगा जो इधर बीच आए हैं। मैं नहीं चाहती कि मुझे दंभी समझा जाय, लेकिन यह बात मैं ज़रूर कहना चाहूंगी कि आज ऐसी स्थिति आ चुकी है जहां जो लोग भी समाज विज्ञान में लेखन का काम कर रहे हैं, वे ऐसा एक ठस बौद्धिक पक्ष लेकर कर रहे हैं। उनका काफी अध्‍ययन रहा है, उन्‍होंने सैद्धांतिकी गढ़ी है, उन्‍होंने अतीत को समझने की कोशिश की है, लेकिन उनके सामने जो अड़चन है वह बेहद बुनियादी पक्ष से आती है। इसीलिए, कोई बहस करना ही बहुत मुश्किल जान पड़ता है क्‍योंकि आज अच्‍छे इतिहासकार जिस आधारभूमि पर सैद्धांतिकी गढ़ रहे हैं, उसे एक औसत पाठक शायद ही समझ पाता है और जो नहीं पढ़ते उनकी तो यह बेहद कम समझ में आता है। और जो लोग किताबें प्रतिबंधित करने या वापस लेने जैसी मांग उठाते हैं, वे तो उन किताबों को पढ़ते ही नहीं हैं।


    (समयांतर के जून अंक में प्रकाश्‍य) 


    (साभार: गवरनेंस नाउ, 6 मई 2014)

    (Translated by Janpath)



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    ऐसा नहीं है कि कभी लोगों ने अपना समस्याएं प्रशासन को नहीं बताई हो. लोग परेशान भी होते रहे और खूब चिल्लाते भी रहे मगर कभी किसी मामले में सुनवाई तब जाकर हुई जब सत्ता से संबद्ध पार्टी की कमेटी या वजनदार कार्यकर्ता की ओर पहल हुई. मगर मैं दमदम नगरपालिका के नए चेयरमैंन व प्रशासन की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकता कि पहली बारिश में ही तालाब बन गए गोराबाजार की न सिर्फ चिंता की बल्कि समस्या के समाधान की पहल भी कर दी. यह बात मुझे प्रभातखबर में छपी खबर से पता चली. मैंने भी उस बारिश के बाद अपने वार्ड नंबर १८ के जलजमाव पर फेसबुक में लिखकर दमदम नगरपालिका से इस ओर ध्यान देने की गुजारिश की थी. मैं व्यक्तिगत तौरपर कुछ कहने नहीं गया था मगर समस्या पर उन्होने स्वतः संज्ञान लिया. इसके मैं व्यक्तिगत तौर उनकी प्रशासनिक सतर्कता का कायल हो गया हूं. तृणमूल के ऐसे सिपाही ही लोगों में अपनी पैठ बनाए रखने में कामयाब रहेंगे. जनता को धोखा देने वालों से जनता दूर ही होती चली जाती है. जब मुखिया इतना मुस्तैद हो बाकी प्रशासन उसके नक्शेकदम पर ही चलेगा. विकास का यह कारवां अपनी हर मंजिल फतह कर लेगा, ऐसा कम से कम मुझे पूरा भरोसा है.
    इस टिप्पणी के साथ प्रभातखबर में छपी उस खबर को भी दे रहा हूं जिसके कारण मैं दमदम नगरपालिका के चेयरमैन हरेंद्र सिंह को उनके प्रयास के लिए साधुवाद भी दे रहा हूं. खबर में उनके प्रयासों का विवरण आप भी देखिए.

    DrMandhata Singh's photo.
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    Afghan security situation in a flux

    Asif Haroon Raja


    The US led western forces invaded Afghanistan on October 7, 2001 and caused massive destruction to the country. Ruling Taliban considered it prudent to withdraw and fight the occupation another day. After regrouping in FATA the Taliban fighters started guerrilla war. While Haqqani Network (HN) under Siraj Haqqani concentrated upon Eastern Afghanistan, Quetta Shura under Mullah Omar focused on Southern Afghanistan from late 2002 onwards and by 2008 they were able to gain ascendency over these two regions. Thereon, they started attacking targets in all parts of Afghanistan in spite of the two US troop surges in 2009. Mounting casualties forced Obama to announce drawdown of troops in December 2010 despite strong reservations of ISAF, Pentagon and CIA. Process of withdrawal set into motion from July 2011 onwards which got completed in end December 2014. The US-NATO forces abandoned Afghanistan in disgrace, leaving behind an unstable, impoverished and ethnically polarized Afghanistan heading towards another round of internecine war. They have desecrated the status and reputation of mighty US military and NATO, caused post stress disorder diseases to the tens of thousands, compelled many homesick soldiers left with no heart to fight the unwinnable war to commit suicides, debased the image of the sole super power and plummeted US economy.

    So much so that the US was forced to quit without defeating its opponent and achieving any of its objectives. Pakistan has been politically and economically enfeebled but the schemers have failed to disable its nuclear program, demobilize Army, detach Balochistan and Khyber Pakhtunkhwa/FATA and make Pakistan a submissive State. Their creations – TTP, BLA, BRA, and BLF - conducting proxy war all these years have been pushed against the wall by Pak security forces. MQM linked with RAW and MI-6 has been cornered. Al-Qaeda has been badly mauled in this region but it has emerged as a strong force in Arabian Peninsula and in North Africa.             

    Afghan-US Barter Security Agreement (BSA) was signed by the elected unity government of President Ashraf Ghani and CEO Dr Abdullah. It allowed the ISAF to retain nine military bases and a token residual force of 12,000 troops, which include 8400 US soldiers, till December 2016 to help the new regime to achieve stability. BSA is also designed to enable the US to create conditions for talks with Taliban leading to negotiated political settlement and to prevent the Taliban from capturing power. Presence of foreign troops in Afghanistan has kept the resistance movement alive and is also allowing CIA to keep an eye on Pakistan and China.

    It will be exceedingly difficult for the meager residual force to accomplish the said objectives when over 155,000 ground troops backed by a huge array of airpower, technology and intelligence assets of six agencies couldn't do it under best of circumstances. Economy was vibrant and military power of US armed forces and NATO was at its zenith. Situation has changed drastically after 13 years of fighting so-called war on terror. Occurring green-over blue attacks from inside would keep the residual force frightened. The residual force will remain bunkered in fortified nine military bases. They are eagerly waiting for the completion of hazardous and torturous two-year period devoid of fun and frolic so that they could return to their homes safe and sound.   

    Besides rendering technical advice, the trainers will continue imparting training and providing equipment to ANSF from within the promised $4.1 billion annual military aid. This force will also provide back up support by way of drones, airstrikes and gunship helicopters attacks. Drone attacks in eastern Afghanistan have picked up momentum. Daesh leaders and fighters have also been targeted in Helmand and Nangarhar. 

    The Afghan National Army (ANA), comprising mostly Tajik and Uzbek soldiers, trained and equipped by the US-UK military for over a decade has still not acquired sufficient prowess to fight the Taliban at its own. ISAF has always considered ANA a liability since it failed to live up to its expectations despite spending colossal amount on its refurbishment. The ANA plagued by indiscipline and desertion cases took over forward line security duties from ISAF on December 28, 2014 and has been involved in battles with Taliban all over the country but has so far not been able to contain their surge. The Taliban are striking targets in all parts of the country including Kabul. Their rate of attacks intensified after they launched their spring offensive. The Haqqani Network after being pushed out from North Waziristan by Pak security forces accelerated their attacks against Northern Afghanistan in collusion with IMU and gained ascendency over large number of districts. The only possibility of survival of ANSF is continuation of unity government of Ashraf Ghani and Dr Abdullah and their skillful handling of the explosive situation to promote political stability and harmony between warring tribes/groups.

    Abdullah has not overcome the grief of losing presidential election since he is convinced that his mandate was fraudulently stolen. He enjoys broad support among non-Pashtuns and also has some support among the Pashtuns. He is in best books of India because of his highly pro-India stance but he is not good enough for USA. Ashraf Ghani on the other hand is unassuming, lacks charisma and doesn't enjoy much respect even among his fellow Pashtuns. His allies like Rashid Dostum in the north do not enjoy good reputation. Crutches provided by Washington may not help him in steadying the rocking ship. Unlike Hamid Karzai who managed to stay in power for 13 years, Ashraf Ghani has tough times ahead. He will have to remain watchful of Abdullah who may pull the rug from under his feet whenever opportunity comes his way. Surging power of Taliban under Mullah Omar is his biggest test. Warlords may resurface to challenge the central authority.

    These challenges are impeding his constructive initiatives to improve governance, minimize corruption, and bring improvement in law and order, and uplift the condition of marginalized sections of the society. It is encouraging noting that he has not pursued his predecessor's policy of rancor and vitriol and keeping its eastern border hot to antagonize Pakistan and please India. He started off well by acting more prudently and maturely and took several initiatives to remove the climate of mistrust and hostility between Pak-Afghan relations. However, since he has no political roots and he has been installed by USA and the country is entirely dependent upon foreign aid, Ghani is likely to follow US dictated policies rather than pursuing independent foreign policy in the best interest of Afghans and the country.   

    Somehow the two power sharing leaders do not have the political sagacity, magnetism and maturity to gel the divided nation and pull the country out of the woods. India which has penetrated in every department of Afghanistan including Army and intelligence agencies is continuing with its dirty work of keeping Pak-Afghan relations tense in pursuit of its regional ambitions. Relations which had begun to improve rapidly once again nose-dived after massive pressure was put on Ghani by Hamid Karzai, Northern alliance heavy Parliament and pro-India elements within ANSF and NDS. Pakistan was blamed for attack on Afghan Parliament last month and resurgence in Taliban attacks. Ghani reverted to the tone and tenor of Karzai by saying that Pakistan is 'waging an undeclared war against Afghanistan'. Mercifully the downward slide has been stemmed as a result of Murree meeting between Afghan regime representatives and Taliban and also attended by reps of USA and China. China's One-Belt-One-Road connectivity and huge investment in Afghanistan will also help in inducing Afghan regime to gravitate towards immediate neighbors rather than far off neighbors like India.  

    Reclusive Mullah Omar has put his weight behind the talks saying these are legitimate. He has given this policy statement despite strong opposition within Taliban ranks who maintain that no talks are possible as long as foreign troops are present on Afghan soil. This change has occured most probably because of emergence of threat of Daesh in Afghanistan and defection of segment of Taliban to Daesh and several TTP leaders pledging allegiance to Abu Bakar Baghdadi. RAW-CIA has played a role in bringing Daesh and TTP closer and creating space for Daesh in Afghanistan. Kunar-Nuristan will in all probability become a common base of operation for Daesh and TTP to bolster Khurasan movement and also to step up terrorism in tribal belt of Pakistan to recapture the lost space. In case Taliban are downed though collective efforts of ISAF, ANA and Pak Army, it will accelerate Khurasan movement, which will become uncontrollable and will engulf Afghanistan, Central Asia, Caucasian region as well as Pakistan. The only force that can effectively counter threat of Deash in this region is Pak Army in Pakistan and Taliban in Afghanistan. Pakistan should therefore play its cards sensibly and shouldn't befriend tottering Afghan regime at the cost of annoying ascending Taliban.       

    The writer is a defence analyst/columnist/researcher, Member Executive Council PESS, Director Measac Research 


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    CC News Letter 20 July - Biosphere Collapse: The Biggest Economic Bubble Ever

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    In Solidarity
    Binu Mathew

    Biosphere Collapse: The Biggest Economic Bubble Ever
    By Dr. Glen Barry

    Newspapers are full of disastrous warnings if economic growth does not return to Greece, or if it drops a couple points in China. Rarely in human history have so many been so fundamentally wrong about a matter of such importance as the desirability, and even the possibility, of perpetual economic growth. The real threat to human well-being is not that there is too little economic growth. Rather, it is that there is too much, and that we have overshot how much growth can occur without collapsing our shared environment

    "Decline Of Earth's Plant Life Threatens Human Life As We Know It"
    By Thomas Riggins

    A recent scientific study comparing the role of plants in the sustainability of life on Earth and the current rapid destruction of such life has convinced many scientists that human civilization and well-being will be placed in jeopardy. Rain forests and grass lands around the world are being destroyed at an alarming rate to make room for palm oil plantations, commercial crops of no intrinsic value (tobacco), and the practices of illegal logging for the furniture and lumber trades, and industrialized agriculture

    Straight Talk On The Pope And Climate Change
    By Raymond Lotta

    Many within the environmental movement, including some of its most prominent leading figures, have jumped on the encyclical as a "game-changer." People are making the argument that one of the world's most powerful religious-moral voices is now sounding the climate alarm, that he is opening Church discourse to the science of global warming, and that the pope is uniquely capable of inspiring and moving public policy in the right direction. And this document, the argument goes, may be part of our best hope to stop the destruction of the planet before it is too late: to appeal to and pressure the world's leaders to take decisive action. So we should welcome the pope's encyclical on climate change. To which our reply is... WRONG, WRONG, WRONG.

    The Real Reasons For The Iran Agreement
    By Paul Craig Roberts

    If you can free yourself from the brainwashing from the presstitute media, three BIG reasons jump out at you. One is that the neoconservatives' perception of the threat has shifted from "Muslim terrorists" to Russia and China. Unlike Muslim terrorists, both Russia and China are constraints on Washington's unilateralism. Since the collapse of the Soviet Union, Washington has grown accustomed to being the Uni-Power, able to exercise its will unchallenged in the world. The rise of Russian strength under Putin and Chinese strength under the new policy has destroyed Washington's Uni-Power privilege. Washington wants the privilege back

    Review: "Go Set A Watchman" By Harper Lee -
    Zero Tolerance For Racism Or Constructive Engagement?
    By Dr Gideon Polya

    Harper Lee has followed her "To Kill A Mockingbird" (1960) with a sequel "Go Set A Watchman" (2015), actually written before the first novel but set 20 years after the events of the first novel. This novel raises the key issue of how decent people should respond to racism - with zero tolerance or constructive engagement from within. Continuing African-American and Palestinian disenfranchisement, inequality and segregation in the 21st century demand zero tolerance for racism

    Agency To Enslave Greeks Is Established
    By Eric Zuesse

    Late on Thursday, July 16th, German Economic News headlined "Greece: Debt Restructuring Through the Back Door," and reported that, "The majority of Greece's national debt is to be moved in the next three years gradually to the euro bailout fund ESM [European Stability Mechanism], so that the IMF will continue to remain as a lender. The euro zone countries will thereby provide Athens a longer grace period [a temporary postponement of payments, while the 18% annual interest-rate soars Greece's debt even higher], and longer repayment periods." The super-secretive European Stability Mechanism was set up in 2012, in order to handle Greece's anticipated virtual receivership, which it now will do

    Did Muslim Murder 4 Marines In Payback For Iraq Libya Syria Somalia Afghanistan?
    By Jay Janson

    Another killing of GIs by a Muslim American. Most Americans will confine their judgement and emotions to this one specific quadruple murder, and this will be helpful to those, who have invested in profitable genocides from Korea onward in their continuing to stay under the radar. Insidious US media will make sure the deaths of the four Marines and Abdulazeez play out well for its ISIS hoax and Christian-Israeli hate Islam campaign

    Concentrated Wealth + Widespread Stupidity = End Of Democracy
    By Eric Zuesse

    The American Revolution overthrew Britain's aristocracy here. But now, the American people need to overthrow America's own aristocracy, or else simply accept fascism (rule by an aristocracy). If America, under that condition, will be peaceful, then it can only be the peace of the graveyard — democracy's graveyard

    Global One Percent Celebrate At The Bohemian Grove
    By Peter Phillips

    On the surface, the Bohemian Grove is a private place where global and regional elites meet for fun and enjoyment. Behind the scene, however, the Bohemian Grove is an American version of building insider ties, consensual understandings, and lasting connections in the service of class solidarity. Ties reinforced at the Grove manifest themselves in global trade meetings, party politics, campaign financing, and top-down corporatism

    Every. Four. Years. (But What About Bernie?)
    By Mickey Z.

    Are you making the big connections? How are you working to challenge deeply entrenched privilege and hierarchy to create new coalitions? Are you willing to do the work it'll take to end male supremacy, white supremacy, and class supremacy? What are you doing -- each and every day -- to help bring down this global system of oppression and exploitation before there's nothing left? How much time do you believe we have? Reminder: If you think Bernie Sanders is the answer, you're asking the wrong questions…

    RSS & Politics: Marriage Of Convenience
    By Shamsul Islam

    It needs no corroboration that Narendra Bhai Modi was chosen as PM on the behest of RSS and BJP (and the Bhartiya Jana Sangh earlier) is run by RSS cadres loaned to the BJP. It enjoys the fame when credited for BJP's victory. RSS loves power as any other theocratic organization but also wants to be looked as sagely while faced with controversial decisions of its creation; the BJP. In good times the RSS is BJP but in rough times in order to save itself from embarrassment resulting from certain actions of the BJP government, the RSS declares itself to be apolitical

    Dear Sisters, Please Help Us To Protect Athirapally River And Forest
    By Geetha and friends

    This urgency has arisen because the Ministry Of Environment and Forests is convening the Expert Appraisal Committee for River valley and Hydroelectric Projects on July 20th and 21st to reconsider giving Environmental Clearance to the Athirapally Project which has been denied clearance thrice! I request you to write to the Chairman asking him to restrain from giving clearance to a project that has been proven by accredited agencies to be unviable economically, energy-wise, ecologically and socially too

    Ambedkar's Vision Of Secular Socialist India
    By Vidya Bhushan Rawat

    In the business of politics people diametrically opposed to Ambedkar's vision of a 'prabudhha bharat' or 'enlightened India' which we cannot accomplish without an inclusive vision with participation of religious and linguistic minorities and socially and economically marginalized communities including their women, are trying to appropriate Ambedkar for their own purposes

    Stop Attacking Human Rights Defenders
    By Bangalore Citizens' Initiative

    Bangalore Citizens Statement against State Sponsored Intimidation of Human Rights Activists and Civil Society Organizations

    India: Government Dumps The Court's Order In A Sewer- AHRC
    By Asian Human Rights Commission

    A total of 180,657 rural households continue to engage in manual scavenging in India, despite the inhuman practice being repeatedly outlawed by the Parliament and Judiciary. This is the state a year after the launch of Swachh Bharat Abhiyan (Clean India Mission), a flagship scheme of the incumbent government, covering 4,041 statutory towns, aiming to clean the streets, roads, and infrastructure of the country. It remains a reality, two and a half years after the Supreme Court last outlawed the practice, fixing command responsibility with the chief executive officer (or equivalent authority) of civic bodies for continuation of the practice

    Who Killed Kishenji ?
    By Nisha Biswas

    The statement of Abhishek Banerjee is important not only in the case of killing of Kishenji or Azad but raises question on all the encounter killings that has happened and are happening in Junglemahal as well as in other parts of the country, be it Karnataka, Telangana, Andhra Pradesh, Tamil Nadu or any other state. It is high time that impartial inquiries should be undertaken and state must be stopped from murdering its own people

    California's North Coast Wine Industry: How "Sustainable" Is It?
    By Shepherd Bliss

    Sonoma County Winegrowers bought an expensive, full-page, color ad, using tax dollars, in the July 12 daily Santa Rosa Press Democrat and in various weeklies, such as the North Bay Bohemian and Sonoma West. The ad ignited a firestorm of protest with angry letters to editors and online comments from the community storming local publications that ran the ad. As someone who practices, writes about, and teaches college students at Sonoma State and Dominican Universities about what "sustainable" really means, the ad offends me. It is blatant propaganda of false advertising to hoodwink readers

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    This mosque is India's first, Prophet's contemporary

    By Arvind Padmanabh
    Kodungallur (Kerala) : One will find nothing unusual about this place of worship for Muslims as one drives past this town in central Kerala, just 30 km north of Kochi. But it's when you go in and chat up with the volunteers and office-bearers that the enormity of its legacy actually hits you.

    Cheraman Juma Masjid, as it stands now (Photo Courtesy: TCN).
    For Cheraman Jum'ah Masjid in this town, also known by its anglicised name Cranganore, is not just the oldest in India and the subcontinent but one built during the lifetime of Prophet Mohammad in 629 AD by an Arab propagator of Islam, Malik Ibn Dinar.
    It is also testimony to two facts. One, Islam came to India long before the Mughals came in from the northwest. Two, the entry of Islam was smooth and Muslims enjoyed the full patronage of the locals irrespective of their religions - a facet that is still visible and cherished here.
    This mosque stands proud with two other landmarks of Kodungallur, also known as Muziris. The first is the Saint Thomas Church, also said to be among the first in India built by the Apostle himself around 52 AD. He had arrived here in India and the church has some holy relics from the olden days. The second is the Bhagavathy Temple of Cheran ruler Chenguttavan, also known as Vel Kelu Kuttuvan, around 150 AD.
    In fact, in a manifestation of India's cultural syncretism, many non-Muslims are its devotees and hold "Vidhyarambham", or the commencement of education ceremony for their children at this mosque. During Ramadan, iftaar offerings are often made by the non-Muslim communities in the area.
    There are several legends surrounding the Cheraman Jum'ah mosque. As one goes: It was built under the patronage of the last Chera king, Cheraman Perumal, who is also believed to have abdicated his throne and embraced Islam upon meeting the Prophet at Mecca.
    But before he died at Dhufar in Oman due to some illness on the way back to India, he wrote some letters asking the local rulers, to whom he had handed over his empire, to extend all help they could to some Arab merchants who were planning to visit India.
    One such merchant, Malik Ibn Dinar, was given permission by local chieftains to build Islamic places of worship around the area. The mosque accordingly is called the Cheraman Mosque in recognition of the help extended by the last Chera ruler.
    This apart, Malik Ibn Dinar, who was also a "sahaba" or a companion of the Prophet, was the mosque's first Ghazi, succeeded by his nephew Habib Bin Malik. Both Habib Bin Malik and his wife are entombed at the Cheraman Juma Masjid.
    The original mosque itself has undergone several renovations. The oral traditions have it that the first such refurbishment took place in the 11th century and again some 300 years later. In the modern era a revamp was done in 1974, after which a reconstruction happened in 2001.
    But all along, the sanctum sanctorum has been preserved. Minarets and a dome are also modern-day additions. Yet, despite the renovations, a striking amalgam of different cultures and religions is in full play at the grand old mosque.
    From some angles, it can even pass off as a temple.
    At the centre of this striking blend of several architectural styles and practices is a traditional Kerala-style lamp hanging from the ceiling. This lamp also has inscriptions in old Malayalam script Vattezhuthu.
    In true style of temples in the south, the mosque also has a pond. Then the minber, or the pulpit from where the Imam delivers sermons, has some intricate carvings and lacquer work, which is again unique to southern India.
    The mosque also has a small museum. At the centre, inside a glass casing, is a miniature replica of the mosque as it stood around 350 years ago. There are also some other artefacts from the times gone by, such as the redstones that were used to as building material in sizes uncommon today, and an ancient sewage channel.

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    Cheraman Juma Masjid: The first Masjid of India

    Local traditions have it that Cheraman Juma Masjid in Kerala was established in the year 629CE. An inscription in Arabi-Malayalam language on the gate of the masjid gives the date as 5 Hijri. This makes Cheraman Juma Masjid in Kodungallur in the Thrissur district of Kerala, the first mosque of India and one of the oldest in the whole world.
    Legend has it that the king of Kodungallur, Cheraman Perumal accepted Islam and traveled to Madina to meet the Prophet Mohammad (salallahu alaihi wasallam). He died on his way back and is now buried in Salalah, Oman. Before dying, he instructed his travel companions to spread the message of Islam in his homeland.

    A group of Muslim travelers led by a companion of the Prophet, Malik Bin Dinar (not to be confused with the famous scholar of the same name) came to Kerala and according to the wishes of Cheraman Perumal, established this and other mosques in Kerala and also instructed people in Islamic practices. These mosques survived and continue to be functional mosques where regular prayers and educational functions are conducted even to this day.

    Inscription in Arabi-Malayalam dates the mosque to 5th year of Hijri
    Located on National Highway-17, Cheruman Juma Masjid is an important Kerala landmark. The place is called Cheraman Malik Nagar in the honor of King Cheraman Perumal and Malik Bin Dinar. The masjid has seen some renovations over the years but the original hall and internal structure have been preserved. Four minarets have been added in one of the later renovations but attempts have been made to give the look and feel of the old structure in the exterior of the building.

    Cheraman Juma Masjid, as it stands now.
    Ignore the minarets, and the small dome and you can imagine how this building would have looked like hundreds or a thousand years ago. The museum on site has pictures and a model of the old structure to help you imagine. Located on the side of the main street (now NH-17), the masjid is surrounded by shops and homes. It is a community institution situated well within the community.
    The original structure did not look like anything foreign, the architecture and design both inside and outside resembles local influence. It was a double storied structure with a sloping tiled roof. Unlike the mosques of North India, there are no minarets or Arabic calligraphy or complex geometrical patterns on the outside the building. The simple entrance must have been inviting and not intimidating, a reflection on how Islam came to Kerala and got well entrenched in the land.
    The main room, which is the part of the original structure, is small. It probably can host only about four rows of 15 people for prayers. There is an old wooden mimbar with an intricate design. Along with fans hanging from the ceiling, there is a big brass lamp, not unlike what can be found in a Hindu temple. But my enquiries did not reveal anything special about this lamp.

    A model of the older building exist in the museum.
    Just left of this main prayer hall are the grave of Malik Bin Dinar's son and wife. Malik Bin Dinar himself is buried in Kasargod, about 350 kms from here. The right side of the masjid is a big graveyard; since many graves have been reused, it is difficult to tell how old the oldest grave is. Behind the mosque is an artificial pond that was used for making ablution.
    The Masjid is run by a committee and they are doing their utmost to preserve the history and traditions of this important landmark of Islam in India. One of the living history is the Muezzin of the mosque. He upholds his family tradition of several generations by being the current Muezzin. The Imam and Muezzin live in quarters that are located behind the masjid.

    Syed Muhammad is giving azan for the last 77 years
    There is a museum on the premises which is in desperate need of more historical artifacts of the glorious past of Malabar Muslims.


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    जी नहीं, सिर्फ आईआईटी और आईआईएम ही नहीं, आज ज्ञान-विज्ञान औए विचार का हर केंद्र राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल है...स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी सब...आधे से ज्यादा को तो आप नाथ कर अपने रंग में रंग ही चुके हैं. बाकियों को भी जल्दी से नाथ कर अपने रंग में रंग लीजिये. नहीं तो, आपका सब किया धरा बेकार हो जायेगा...
    पर एक बात बताइए. आप हरेक के दिमाग को कैसे नाथियेगा? इंसानी सोच को, उसके सोचने-समझने-जांचने-परखने की शक्ति को, उसके विवेक को, उसकी तर्क शक्ति को, उसकी नैसर्गिक जिज्ञासा को? और फिर ये कोई एक-दो-हज़ार-लाख तो हैं नहीं. सवा सौ करोड़ हैं. और वह भी अलग-अलग जाति, धर्म, रूप, रंग, भाषा और बोली के...और फिर ग्लोबलईजेशन के इस दौर में, जब बाहर की मुद्राओं के साथ वहां के विचारों की बयार भी उड़ कर आयेगी, तो फिर आप क्या करेंगे?...
    हाँ एक काम आप कर सकते हैं. आप की शरण में तो दुनिया का सारा ज्ञान बहुत पहले से ही लोटपोट होकर लहलहा रहा है...अरे वही पुरातन ज्ञान का असीम भण्डार, जिसके बलबूते हम जल्दी ही विश्व गुरू बनने वाले हैं...क्यों नहीं आप उसी ज्ञान का इस्तेमाल करके हरेक इंसान के दिमाग में एक ऐसा चिप इंस्टाल करवा देते कि वह आसानी से आपके हांथों की कठपुतली बन जाये. फिर वह वही देखेगा, वही सोचेगा, वही बोलेगा, वही पढ़ेगा, वही लिखेगा, वही करेगा, जो आप चाहते हैं...सारा झंझट ही ख़त्म...

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    Arrange some medical care of all those sacred men and women speaking hatred please!
    Palash Biswas
    Palash are you mentally sick, if you need any medical help, please send me message, i can arranger for your better treatment.
    some Atul Gupta wrote this on my message box.
    I am very glad to know that some fellows are so much so concerned for my health.
    I am quite well and no one should be worried of my health and as the governance of fascism continues,i would not stop writing.Those feel sick of my writing might seek medical care to operate on the cancer of blind fascist nationalism!
    However,I am grateful that Mr Atul Gupta​ politely trying to prove all those speaking love.
    It is good that the cadres of fscism seem to have stopped abuses as their god has issued a ban on abusive language on social media for damage control.
    It would be better to arrange some medical help for all those sacred men and women who vomit fire against everyone whoever speak democracy,rule of law,equality,justice and secularism.

    Hindustan Times wrote better:

    Is it just a cultural outfit or does it have a role in guiding the political destiny of India? The RSS really needs to make up its mind.

    After saying that it had no role in running the government, the RSS has missed no opportunity to make its views heard on a number of issues which are not in its purview as a non-political cultural outfit.

    And many of these pronouncements have harmed the image of the BJP government, in whose name it often claims to speak. The latest salvo is against some of the IITs and IIMs by the RSS mouthpiece, the Organiser. It says that these institutions are promoting an anti-Indian and anti-Hindu sentiment.

    It singled out eminent nuclear scientist Anil Kakodkar for criticising the HRD ministry on certain issues. It then bizarrely asks why Mr Kakodkar did not criticise the Kiss of Love movement by IIT Mumbai students even as he accused Union HRD minister Smriti Irani of recruiting directors to the IITs casually.

    The other pieces of evidence of anti-national and anti-Hindu activity consist of the introduction of non-vegetarian food in IIT Roorkee's canteen and the apparent low morals of the faculties in IITs, which were misguiding students.

    The IITs and IIMs are by all accounts India's calling cards in educational excellence. Scientists and other top academics have every right to question the actions of the ministry, but this in no way amounts to any attempt to undermine these institutions.

    It beggars belief that an institution of learning should have to prove its Hindu credentials. The government should step in and tell the RSS to stay out of these institutions and stop damaging the morale of the faculty and students.

    The mouthpiece has also meddled in the FTII imbroglio, dubbing those protesting against the appointment of Gajendra Chauhan as chairman as anti-Hindu. The RSS is clearly way out of line with these remarks.

    It is not the custodian of Hinduism and being pro-Hindu cannot be a qualification for any institution. By interfering like this, it is devaluing the brand of these places where the best and brightest of our students study. If the RSS contention that the Left and Congress sought to undermine these institutions by introducing an ideological tilt to them, then it is doing the same by its remarks.

    The RSS can well be a guide for the BJP, but it has to leave the running of institutions to elected representatives. In recent times, it has sought to communalise many issues to the detriment of our social fabric.

    It must confine itself to its avowed claim that it is a cultural organisation and refrain from intruding into areas where it has no expertise or knowledge.

    This might be something it could ponder at its meeting in Nainital which begins this week.

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    The Hindu

    DHRM chairman is dead




    Chairman of the Dalit Human Rights Movement (DHRM)

     Anilkumar N.S., is no more. He was 48.


    Mr. Anilkumar, popularly known as Thathu Annan, passed away around 6 p.m. on Saturday, after he was admitted to Thiruvananthapuram Medical College Hospital. The body was kept for public viewing at the Ayyankali Smriti Mandapam at Venganoor from 10 a.m. on Monday, after which it was taken to the DHRM South Zone office near Thonnakkal. The funeral was held as per Buddhist traditions at 5 p.m.


    Born on April 30, 1968 to Sukumaran and Thulasi in Nandancode, Anilkumar completed his education in the Nandancode Lower Primary School, the Salvation Army School, Vengannoor Boys High School, and Government Arts College here. He was then involved with the activities of the Dalit Cultural Force (DCF), the Ambedkar Cultural Centre, and the BSP among others. He was an active presence during the recent Adivasi struggle in front of the Secretariat.


    Mr. Anilkumar, who had contested the 2014 Parliament elections on a DHRM-BSP ticket from Attingal, took over as the chairman of the movement earlier this year. Known as a painter, writer, poet and also for his research into folk arts, Mr. Anilkumar was behind 'Uyirunarvu', an audio album based on the life of Ayyankali, which was released by Kanshi Ram in Thiruvananthapuram. He had also launched a home school project for imparting English education to Dalit children in 2012, apart from setting up the Native Buddhist Trust in 2014. He was the 15{+t}{+h}accused in the Varkala murder case of September 2009 as well, along with several other DHRM leaders. — Special Correspondent


     You were not an 'intellectual',

     hence you will not have a farewell by the intelligentsia

    by Vijayan M J



    You were not an 'intellectual', hence you will not have a farewell by the intelligentsia; 


    You were no 'artist', so none will mourn your death by poetry or paintings;


    You were not an 'activist' for movements or a leader for political parties, hence none expressed shock nor did anyone flood the social media with news of your eternal journey, your demise; 


    You were neither a super star nor a celebrity, so not even page3 will see a mention;


    But at a time when being an 'ordinary man' is fashion, your extra ordinary life will keep you away from front pages!


    What were you, who were you?


    A criminal, a dacoit, an anti-social? 


    Didn't the police, prosecutor, political leaders and media call you that? 


    Interesting as your life, with the news of your death spreading, as life goes on as usual for many others, some of us are beginning to feel a vogue, a vacuum, a silence, a shooting pain in our hearts... A pain that's mixed with the fun of not having 'known' you, which way to pronounce your name, a pain that is going to take a long time to subside; probably a space that can be filled only with the rise of the dream that you initiated, the movement of the unspoken! Let your voice, thoughts and actions inspire the uncounted multitudes to rise up and rejoice in resistance...

    Good bye and never rest in peace, Thathu; thats not what you are known for... 


    Make the heavens and hells restless Thathu...


    As the world lives on, let your world wake up; to life!


    (Thathu was among the founding initiators of an interesting and inspiring Dalit movement in Kerala, the Dalit Human Rights Movement, if you have not heard about this in the past, don't confuse this with any NGO, it's one of the iconic movements Kerala has seen in recent times, from the prism of intellectual mobilisation of critical mass!)


    .Arun Khote
    On behalf of
    Dalits Media Watch Team
    (An initiative of "Peoples Media Advocacy & Resource Centre-PMARC")

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    Dalits Media Watch

    News Updates 21.07.15


    Dalit woman gang-raped, body torn to pieces, burnt - The Times Of India

    14-yr-old Dalit girl gang-raped - The Times Of India

    Here's proof that poor get gallows, rich mostly escape - The Times Of India

    Athawale for smooth passage of atrocities bill in Parl session - Business Standard

    Now, displacement is just months away - The Hindu


    Activists groups plan protest rally on July 27 - The Hindu

    Dalits stage demonstration over land issue - The Hindu



    Please Watch:

    Seminar On " Dalits & Media : Concerns and Lacuna



    The Times Of India


    Dalit woman gang-raped, body torn to pieces, burnt


    Ishita Mishra,TNN | Jul 20, 2015, 10.49 PM IST

    AGRA: In one of the most horrific cases of sexual assault and murder in recent times, a Dalit woman was gang-raped and murdered by local hoodlums allegedly associated with the family of a village headman in Malpura, Agra. The site of the crime was just 200 metres from the police post. A fact-finding team set up by DIG Agra Lakshmi Singh found parts of the woman's body, partially burnt. A number of condoms were also recovered from the spot. 

    The crime occurred in Kakua village on the Gwalior Highway. Police have still to estimate when the crime occurred. Local people said the police team arrived while it was raining heavily on Sunday and found partially burnt parts of the woman's body. Witnesses said the body was burnt along with strips of leather. Kerosene appeared to have been poured on the body. 

    The victim is identified as Hema, a woman in her 40s, originally from Jhansi district. She had been living in the village, in an under-construction colony, 'Om Garden'. Her husband Hemraj and 12-year-old daughter lived with her. The family had been engaged as guards at the site by the owners of the colony, Vikram Singh and Rajendra Singh, four years back. The victim, her husband and daughter had gone to Jhansi, local people said, adding that the woman also had a son who lived with her husband's parents there. 

    The woman had returned alone some days ago. Her husband and daughter returned on Saturday to find the door locked from outside. 

    Villagers said Hemraj had climbed the roof of the house, to find his wife's mutilated boy on the cot there. The rain had spoiled the body. Villagers told the DIG that Hemraj, in shock and run out to tell the others about the death. As news spread, the village headman and others attempted to prevent the guard from taking the matter to police. The men gathered up the body parts and set it afire, and forced the man and his daughter to return to Jhansi, villagers said. Lakshmi Singh DIG Agra range told TOI that she had visited the site of the crime and signs of the brutality could be seen. "Blood stains were seen far from spot of the crime, indicating that the woman had struggled. Condoms were recovered, so there is reason to suspect she was raped before being killed. Villagers told us the woman was a Dalit. Forensic reports and post-mortem examinations will throw light on how long ago the murder occurred," the DIG said. 

    An FIR was lodged by police in the absence of a complainant in this case. 

    Ten people were named in the FIR, including the owners of the colony, Vikram Singh and Rajendra Singh and village headman Sukhpal, for murder and hiding evidence. 


    The Times Of India

    14-yr-old Dalit girl gang-raped


    TNN | Jul 20, 2015, 09.37 PM IST


    BAREILLY: A 14-year-old Dalit girl was allegedly abducted and gang-rapedon Saturday night in Nurpur village, Badaun district. A case was lodged by police against three men. One of the accused, Omendra Pal, is the son of Tekchand Pal, Badaun district president of Samajwadi Party Pichra Varg Prakosht.BAREILLY 

    It was reported that the girl was attacked as she had gone to answer nature's call in the fields on Saturday evening. The three men, who arrived on a motorbike, took her to a nearby mango orchard and allegedly raped her there. The men then fled the scene, leaving the girl alone in the orchard. The girl managed to drag herself to the nearby Ramzanpur village, where she narrated her experience to her aunt. The aunt in turn informed the girl's brother, who took the matter to police on Sunday

    Police have lodged a complaint against Omendra Pal, Surendra Pal and Narendra Pal under Section 376 (rape) of Indian Penal Code (IPC) and relevant sections of Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act and SC/ST Act. 

    The girl is under treatment at the district hospital. 

    SP (Badaun city) Anil Yadav said, "We arrested Surendra Pal today. A search is on to nab the other accused. A report of the girl's medical examination is awaited." 

    In another incident, a 32-year-old woman was allegedly raped in a village falling under the jurisdiction of Faizganj Behta police station in Badaun district. She too was attacked while was had stepped out of her house to relieve herself in the fields on Saturday night. Police said the woman had named Chaman, a resident of the same village, as her attacker. 

    Narendra Singh, station officer, Faizganj Behta police station, said, "The woman's husband was out of station and she did not approach police until today. An FIR has now been filed and we are investigating." 

    A case was lodged by police against three men. One of the accused, Omendra Pal, is the son of Tekchand 


    The Times Of India

    Here's proof that poor get gallows, rich mostly escape


    Himanshi Dhawan & Pradeep Thakur,TNN | Jul 21, 2015, 01.44 AM IST

    NEW DELHI: The fact that our legal system is skewed against the poor and marginalized is well-known. And to that extent, it's only expected that they get harsher punishment than the rich. But here are figures that tell the full story.

    A first of its kind study, which has analyzed data from interviews with 373 death row convicts over a 15-year period, has found three-fourths of those given the death penalty belonged to backward classes, religious minorities and 75% were from economically weaker sections.

    The reason why the poor, Dalits and those from the backward castes get a rougher treatment from our courts is more often than not their inability to find a competent lawyer to contest their conviction. As many as 93.5% of those sentenced to death for terror offences are Dalits or religious minorities.

    The findings are part of a study conducted by the National Law University students with the help of the Law Commission that is currently engaged in a wider consultation with different stakeholders on the issue of death penalty and whether it should be abolished.

    Law panel chairman Justice A P Shah, himself a strong proponent of abolition of death penalty, is to submit a final report to the Supreme Court by next month.

    Senior advocate Prashant Bhushan said: "It is true that there is a class bias, otherwise why would we have so many people languishing in jail because they cannot afford a lawyer to get bail?" He said only 1% of the people can afford a competent lawyer. Afzal Guru hardly had any legal representation at the trial court stage, he added.

    Founder of Human Rights Law Network and senior advocate Colin Gonsalves holds similar views. "I think the finding that 75% of the death row convicts are poor is the absolute minimum. The rich mostly get away while the very poor, especially Dalits and tribals, get the short shrift."

    The NLU students have interviewed all the death sentence convicts and have documented their socio-economic background. The psychological torture these prisoners face before they are hanged are some of the observations in the study. Prisoners on death row are not allowed to attend court proceedings most of the time. In many cases, those interviewed revealed they were unable to understand proceedings even when they got an opportunity to be in the court as there was not much interaction with their lawyers.

    "Gallows are only for the marginalized. The first thing when a person is arrested is his access to a lawyer. The poor don't get that access while the well-off do and that completely changes their case," said Suhas Chakma of Asian Centre for Human Rights. For the economically weak, legal aid or advice comes at the trial stage by which time it is too late, he added.

    Within the prison, death row convicts are put in separate barracks and kept in solitary confinement. They are not allowed to work unlike other prisoners or mingle with anyone else, leading to many psychological disorders. The result is startling. Many prisoners interviewed said they wanted to die and should be hanged without delay. A few mentally strong ones said if represented well they could escape the gallows.

    Between 2000 and 2015, 1,617 were sentenced to death by the trial courts - 42% of them from UP and Bihar. The conviction rate, however, at the stage of high courts and the SC was much lower at 17.5% and 4.9% respectively. Most death sentences were commuted to life imprisonment or acquitted.


    Business Standard

    Athawale for smooth passage of atrocities bill in Parl session


    Press Trust of India  |  New Delhi  

    July 20, 2015 Last Updated at 19:57 IST

    Claiming atrocities on Dalits have increased in the recent past, RPI (A), a NDA constituent, today asked the Centre to ensure smooth passage of Prevention of Atrocities Amendment Bill, 2014 during the Monsoon Session of Parliament beginning tomorrow

    "Atrocities against Dalits have increased. A draft (Prevention of Atrocities Amendment bill) was prepared to amend Prevention of Atrocities Act, 1989 in 2014. 

    "It has to be passed on priority basis when it is tabled during the upcoming session. I made a demand for its smooth passage during the all-party meeting today," RPI (A) chief Ramdas Athawale said. 

    On the issue of offering reservation for the financially weaker section among the upper castes, Athawale said, his party was not opposed to the idea until quota given to SC, ST and OBC community members is "untouched". 

    The Rajya Sabha member sought framing 'Reservation Act' to see interests of SC, ST and OBC communities are protected. 

    "I have demanded framing Reservation Act to protect reservations given to SC, ST and OBCs community members. Also, the reservation should be put in the Ninth Schedule of Constitution so that if anyone doesn't implement the provision, action can be taken against him/her," he said. 

    Athawale insisted the government to hold a four-day special session of Parliament to discuss issues relating to backward class members on the occasion of the 125th birth anniversary of Constitution's architect B R Ambedkar. 

    The Parliamentarian further informed to have received a letter from Maharashtra Finance Minister Sudhir Mungantiwar that the state government has approved Rs 125 crore for celebrating Ambedkar's birth anniversary in a big way. 

    "Plus, the letter mentions the government has approved Rs 40 crore for purchasing Ambedkar's London home," he added. 

    On Land Acquisition bill, Athawale said his party wants the legislation be cleared by Parliament with consensus. 

    "The Prime Minister too has appealed so during the all-party meeting," he added. 

    Athawale added that work of constructing Ambedkar's memorial on Mumbai's Indu Mill plot is expected to begin in the presence of Modi towards the end of this year.


    The Hindu

    Now, displacement is just months away





    An uncertain future awaits most of the landowners in the tiny hamlet of Uddandarayunipalem , which will be one of the villages that will soon be engulfed in the seed capital of Amaravati. People in the riverfront village, which hosts some of the most fertile lands in the capital region, had once fiercely resisted moves to acquire their lands but later fell in line.


    Now with the Amaravati project's Singapore consultants choosing to locate the seed capital bang in their midst, displacement is no longer a long-term possibility for these villagers, mostly belonging to Scheduled Caste communities, but just months away on the event horizon.


    The lack of clarity on ownership of lanka lands is adding to their worries. "We have about 400 acres of lanka lands on which close to 250 families depend," Puli Lazar, the village welfare cooperative society president told The Hindu on Monday. "We have been cultivating banana and yam on these riverbed lands for the last 50 years, even securing agricultural loans from bank on the basis of pattadar passbooks. But since the Land Pooling Scheme began, the government has refused to heed to our pleas to notify our lands and accept our consent letters.''

    Mr. Lazar said a meeting of villagers would be held in a day or two to decide the future course of action. ``We have many issues. A lot of people have built their own houses here. There are family issues as well, daughters to get married, study loans to repay. The future looks hazy and uncertain,'' Mr. Lazar said.


    The village harbours a chunk of 300 acres of assigned land and the government has refused to agree to giving them ownership of lands since they are not registered.


    The future looks hazy and uncertain.Puli Lazar -Villager of Uddandaruynipalem


    The Hindu

    Activists groups plan protest rally on July 27




    Condemn delay in implementing A.J. Sadashiva panel report


    Members of various Scheduled Caste (SC) organisations in the State, under the leadership of Basavamurthy Madar Chennaiah Swami, Chitradurga, and Shadakshari Swami of Adi Jambava Peetha, Hiriyur, would be staging a 'semi-nude' procession in Bengaluru on July 27 to protest against the inordinate delay on the part of the State government in implementing the Justice A.J. Sadashiva Commission report on providing internal reservation among SCs.


    Addressing a joint press conference here on Monday, L. Marenna, senior leader, H. Thippeswamy, president of Dr. Ambedkar Sangha, Ballari, Girimallappa, Mundargi Nagaraj, T. Pompapati, Venkatesh Murthy, and J. Jagannath, among other leaders, criticised the State government for not initiating any steps to implement the Commission's report that would benefit the oppressed communities.


    They said Chief Minister Siddaramaiah, who as the Opposition leader had announced that the report would be implemented if Congress came to power, was not initiating any steps in this regard. "It is unfortunate that five years have passed after the Commission submitted its report and the State government was dilly-dallying over taking a decision on adopting a resolution accepting the report and forward it to the Union government recommending its implementation", the leaders regretted.


    The semi-nude protest would be part of the 'Bengaluru chalo' programme, in which dalits from all the districts would participate, they said adding that all the dalit leaders and organisations had forged unity to pressure the government to implement the Commission report.


    "If the Siddaramaiah government failed to take a decision during the ongoing session of the legislature, we will have to construe that his government's concern was only 'fake' and the dalit communities will be forced to intensify the agitation", Mr. Marenna said.


    The Hindu

    Dalits stage demonstration over land issue





    Dalit people staged a day-long demonstration here on Monday asking the State Government to take back around 1,000 acres in the district given during the British regime to them which were allegedly in possession of other communities.


    Tamilvendhan, district secretary of Viduthalai Chirutahigal Katchi, who coordinated the agitation, told reporters that the lands were given during the pre-Independence era to Dalits since 1920 with the sole purpose of encouraging them to take up agricultural activities and thereby, help them improve their livelihood.

    "Over the years, the lands were either sold or been encroached upon. According to the rules, the sale of land even if done by a few Dalits under economically crunch situations are not valid.


    "Hence, the State Government should take back all lands either sold or encroached upon and issue free house site pattas to presently landless Dalit people residing in the district on the recovered plots," he said.


    Mr. Tamilvendhan blamed the revenue administration for not taking any steps till now to initiate the proceedings of recovering the lands despite repeated pleas made by the Dalit community on the issue.


    News monitored by Girish Pant & AJEET


    .Arun Khote
    On behalf of
    Dalits Media Watch Team
    (An initiative of "Peoples Media Advocacy & Resource Centre-PMARC")
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    Rien Achterberg
    Rien Achterberg 4:16pm Jul 21
    Do we humans have really ever evolved out of the stone-age? Reading the news & seeing the graphic pictures on the tv or in (& here) makes me wonder what the f... we're doing to each other....:( No surprise we're working ourself into extinction at a very rapid rate.... Karma....
    Original Post
    Palash Biswas
    Palash Biswas 1:23pm Jul 21
    Palash Scape,the Real India: नगाड़े लेकिन खामोश हैं।फिर भी नौटंकी का वही सिलसिला! किस्से बहुत...
    कैसे नहीं दोगे जमीन,देखते नहीं कि सड़कों पर उतरने लगे हैं युद्धक विमान कि झीलों और समुंदरों की गहराइ...
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    Mamata Banerjee added 6 new photos.Bengal is now No.1 in development. We are committed to surge ahead further with the 5Ds – Discipline, Dedication, Devotion, Determination, Development.
    ममता ने अव्वल बंगाल का दावा ठोंका तो महाश्वेता दी ने ठोंकी दीदी की पीठ

    हमें सिर्फ अफसोस है कि दीदी ने महाश्वेता दी को क्यों तकलीफ दी!

    पलाश विश्वास
    दीदी ने 21 जुलाई के शहीद दिवस पर मीडिया के भरोसे न रहकर रैली की तस्वीरें खुद फेसबुक पर दर्ज करायी है।फेसबुक पर ही उनका दावा है कि बंगाल 5Ds – Discipline, Dedication, Devotion, Determination, Development के करिश्मे से बाकी तमाम राज्यों के मुकाबले तरक्की में अव्वल नंबर है।तो उनके भतीजे ने कामरेड ज्योति बसु की खिंचाई करने में भी कोताही नहीं बरती और कहा कि परिवर्तन अगर उनके जीते जी हो गया होता तो वे देख लेते कि बिन गोली चलाये मां माटी मानुष की सरकार कितने शानदार तरीके से राजकाज चलाती है।

    अमूमन हमारी दिलचस्पी बंगाल या किसी सूबे के या देश के रोज बनते बिगड़ते या बदलते राजनीतिक समीकरण में कतई होती नहीं है क्योंकि इस राजनीति का कोई जनसरोकार या जन प्रतिबद्धता नहीं होती।न संसद और विधानसभाओं की रियेलिटी शो को हम कोई हकीकत का आइना मानते हैं।

    हमने दीदी का भाषण सिलसिलेवार सुना भी नहीं है।भीड़ तो हर रैली में हो जाती है क्योंकि भीड़ का बंदोबस्त चाकचौबंद होता है।

    दीदी के फेसबुक मंतव्य और उनके लगाये पोस्ट ही हमारे ब्लागों के लिए काफी थे।

    हमने खासतौर पर इस रैली का नोटिस इस लिए लिया कि अपने सबसे प्रिय लेखक कवि नवारुणदा के निधन के बाद उनकी मां, हम सबकी महाश्वेता दी खासतौर पर मंच पर थीं.

    मैं बहुत अरसे से महाश्वेता दी से नहीं मिला।आखिरी बार मैं और सविता नवारुणदा के गोल्फग्रीन वाले घर में उनसे मिले थे।वे नब्वेपार हैं और करीब पचास साल से मधुमेह की वजह से इंशुलिन पर हैं और अब भी लिखना उनने नहीं छोड़ा है।

    मां माटी मानुष सरकार बनने के बाद वे जैसे सत्ता में निष्णात हुई हैं,वैसा हमने 1980 से लगातार लगातार उनके साथ गहराये संबंधों की जमीन पर कभी बुरे से बुरे ख्वाबों में भी नहीं सोचा था।

    हम चूंकि सत्ता की राजनीति से कोई वास्ता रखते नहीं हैं चाहे सत्ता का रंग जो भी हो,हम तो हाशिये पर जो जनता है,उसके हमसफर हैं।इस मोर्चे पर महाश्वेता दी देशभर के लड़ाकों की निर्विवाद सिपाहसालार रही हैं।

    हमें पता ही न था कि नवारुण दा से भी उनके रिश्ते के तार इसी वजह से टूट गये और महास्वेता दी कैंसर से जूझते अपने बेटे को देखने भी नहीं गयी।उस परिवार से सारे रिश्ते तोड़ लेने की वजह से हमें भी नहीं मालूम पड़ा कि कब हमारे नवारुणदा कैंसर के शिकार होकर चल दिये हम सबसे रूठकर।

    आज उन्हीं महाश्वेता दी को उठाकर मंच पर लाया गया राजनीतिक मकसद से।

    वे खड़े होकर बोल नहीं सकती थी और हम जानते हैं कि उन्हें वहां बैठने में कितनी तकलीफ होगी।

    उनके हाथों में माइक थमा दिया गया और वे एक ही वाक्यबोलीं कि चार साल से मां माटी मानुष की सरकार ने इतने काम किये हैं जो किसी बी राज्य ने नहीं किये हैं।

    सियासत के इस नजारे से दिल तार तार हो गया।

    महाश्वेतादी की राजनीति अब भले बदल गयी हो लेकिन जनप्रतिबद्ध साहित्य का पाठहमारी पीढ़ी को पढ़ाने वाली भी वे रही हैं और इस देश के मेहनतकशों के तमाम आंदोलनों के दस्तावेज बी उन्होंनेही साहित्य में तब्दील किये हैं।

    ममता दीदी से उन्हें बेपनाह प्यार इसलिए है सिर्फ कि उनने बेदखल किसानों के आंदोलन की अगुवाई की है।

    हमें सियासत से कोई मतलब नहीं है।दीदी के दावे और बाकी लोगों की रायउनकी सियासत के बारे में क्या है,इसकी भी हमें खास परवाह नहीं है।

    हम जानते हैं कि जैसे दीदी ने 1916 में चुनाव जीतकर फिर ब्रिगेड में विजय रैली मनाने का ऐलान किया है,वैसा ही कुछ होने वाला है क्योंकि बंगाल में दीदी के मुकाबले कोई फिलहाल नहीं है।

    हमें सिर्फ अफसोस है कि दीदी ने महाश्वेता दी को क्यों तकलीफ दी!

    Mamata Banerjee added 6 new photos.

    Today is 21st July – historic Maa Mati Manush Dibas.

    We fondly remember the martyrs who gave their lives to restore democracy in Bengal.

    Lakhs and lakhs of people from all corners of the state participated in today's event to salute the martyrs and express solidarity with our agenda of development, harmony and peace.

    Lakhs of people could not reach the venue due to the huge turnout.

    We are proud of our people. They are our asset, our future.

    Bengal is now No.1 in development. We are committed to surge ahead further with the 5Ds – Discipline, Dedication, Devotion, Determination, Development.

    My heartiest greetings and best wishes to everyone.


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    Nagade Khamosh hain is  a play written in folk format and played by our Girda in Nainital during Emergency.

    Nagade Khamosh hain is  a play written in folk format and played by our Girda in Nanital during Emergency.
    It is about the ignorance of real issues of Humanity and environment and nature in so called democratic setup which does not echo the voices of either Man or Nature.Written in reference to Monsoon Session of the Indian parliament. Nagare are the drums without which no Nautanki,the folk drama might be played at al.The situation is all the drums are silent while the nautanki is continued !
    Nagade Khamosh hain is  a play written in folk format and played by our Girda in Nanital during Emergency.
    -- Palash Biswas

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    Stephen Hawking: Intelligent Aliens Could Destroy Humanity, But Let's Search Anyway

    Stephen Hawking (shown here in 2008) has been vocal about fears that an advanced alien civilization might wipe out humanity.© NASA/Paul Alers Stephen Hawking (shown here in 2008) has been vocal about fears that an advanced alien civilization might wipe out humanity.

    This week, famed physicist Stephen Hawking helped launch a major new effort to search for signs of intelligent alien life in the cosmos, even though he thinks it's likely that such creatures would try to destroy humanity. 

    Since at least 2010, Hawking has spoken publicly about his fears that an advanced alien civilization would have no problem wiping out the human race the way a human might wipe out a colony of ants. At the media event announcing the new project, he noted that human beings have a terrible history of mistreating, and even massacring, other human cultures that are less technologically advanced — why would an alien civilization be any different? 

    And yet, it seems Hawking's desire to know if there is intelligent life elsewhere in the universe trumps his fears. Today (July 20), he was part of a public announcement for a new initiative called Breakthrough Listen, which organizers said will be the most powerful search ever initiated for signs of intelligent life elsewhere in the universe. [13 Ways to Hunt Intelligent Alien Life]

    "I am here today because I believe the Breakthrough initiatives are incredibly important," Hawking said during a media event at the Royal Society in London. "It's time […] to search for life beyond Earth. The Breakthrough initiatives are making that commitment. We are alive. We are intelligent. We must know."

    The new Breakthrough Listen initiative would only search for signs of intelligent life, not broadcast signals from Earth, and scientists other than Hawking have expressed concerns about hailing the attention of alien civilizations. However, a second initiative, Breakthrough Message, will host a competition open to anyone in the world, to make suggestions for the content of messages to be sent from humans to other intelligent beings.

    Scientists currently have no idea what alien life-forms might look like, or how they might respond to contact from human civilization. 

    "Such advanced aliens would perhaps become nomads, looking to conquer and colonize whatever planets they could reach," Hawking said in 2010 on an episode of "Into the Universe with Stephen Hawking," a TV show that aired on the Discovery Channel. "If so, it makes sense for them to exploit each new planet for material to build more spaceships so they could move on. Who knows what the limits would be?"

    Hawking voiced his fears at the Breakthrough event, saying, "We don't know much about aliens, but we know about humans. If you look at history, contact between humans and less intelligent organisms have often been disastrous from their point of view, and encounters between civilizations with advanced versus primitive technologies have gone badly for the less advanced. A civilization reading one of our messages could be billions of years ahead of us. If so, they will be vastly more powerful, and may not see us as any more valuable than we see bacteria."

    Astrophysicist Martin Rees countered Hawking's fears, noting that an advanced civilization "may know we're here already."

    Ann Druyan, co-founder and CEO of Cosmos Studios, who was part of the announcement panel and will work on the Breakthrough Message initiative, seemed much more hopeful about the nature of an advanced alien civilization and the future of humanity.

    "We may get to a period in our future where we outgrow our evolutionary baggage and evolve to become less violent and shortsighted," Druyan said at the media event. "My hope is that extraterrestrial civilizations are not only more technologically proficient than we are but more aware of the rarity and preciousness of life in the cosmos."

    Jill Tarter, former director of the Center for SETI (Search for Extraterrestrial Intelligence) also has expressed opinions about alien civilizations that are in stark contrast to Hawking's. 

    "While Sir Stephen Hawking warned that alien life might try to conquer or colonize Earth, I respectfully disagree," Tarter said in a statement in 2012. "If aliens were to come here, it would be simply to explore. Considering the age of the universe, we probably wouldn't be their first extraterrestrial encounter, either.

    "If aliens were able to visit Earth, that would mean they would have technological capabilities sophisticated enough not to need slaves, food or other planets," she added.

    The new Breakthrough Listen initiative is scheduled to operate for 10 years and will search for signs of non-naturally occurring communications in both radio frequencies and laser transmissions. The initiative will scan the 1 million stars closest to Earth in the Milky Way, as well as the 100 closest galaxies. 

    Follow Calla Cofield @callacofield. Follow us @SpacedotcomFacebook andGoogle+. Original article on

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  • 07/22/15--01:39: परेशां परेशां कि अलादीन अनेक और उनके विश भी अनेक और सारे के सारे एलियंस,जो तबाही पर आमादा हैं इस सूअरबाड़े में लेकिन असली सूअर भी कोई नहीं है। जरा उनका भी इलाज कराने की सोचिये जो नफरत से फिजां को बदमजा कर रहे हैं और उनकी इस हरमजदगी का भी कुछ इलाज सोचिये। स्टीफन हॉकिंग को मालूम नहीं है कि एलियंस ने हमें किस बेरहमी से कायनात की सारी बरकतों और रहमतों से बेदखल कर दिया है और कयामत के रक्तबीज वे कहां कहं बो रहे हैं कि उनको केसरिया रंग की कोई दुनिया मुकम्मल बनाना है और इंद्रदनुष से केसरिया के सिवाय सारे रंग उड़ाने हैं।एलियंस की खोज बाहर काहे करै हैं,हमारे मिलियनर बिलियनर तबका लेकिन वही एलियंस है,जिसको न इंसानियत की परवाह है और न कायनात की खैरियत की उनकी कोई मंशा है। उनका मजहब तबाही है। उका ईमान तबाही है। उनकी हरकत तबाही है। उनकी इबादत तबाही है। उनकी बोली तबाही है। उनका रब तबाही है। वे एलियंस हैं। नगाड़े लेकिन खामोश हैं।फिर भी नौटंकी का वही सिलसिला! किस्से बहुत हैं,मसले भी बहुत हैं,किस्सागो कोई जिंदा बचा नहीं है।

  • परेशां परेशां कि अलादीन अनेक और उनके विश भी अनेक

    और सारे के सारे एलियंस,जो तबाही पर आमादा हैं

    इस सूअरबाड़े में लेकिन असली सूअर भी कोई नहीं है।

    जरा उनका भी इलाज कराने की सोचिये जो नफरत से फिजां को बदमजा कर रहे हैं और उनकी इस हरमजदगी का भी कुछ इलाज सोचिये।

    स्टीफन हॉकिंग को मालूम नहीं है कि एलियंस ने हमें किस बेरहमी से कायनात की सारी बरकतों और रहमतों से बेदखल कर दिया है और कयामत के रक्तबीज वे कहां कहं बो रहे हैं कि उनको केसरिया रंग की कोई दुनिया मुकम्मल बनाना है और इंद्रदनुष से केसरिया के सिवाय सारे रंग उड़ाने हैं।एलियंस की खोज बाहर काहे करै हैं,हमारे मिलियनर बिलियनर तबका लेकिन वही एलियंस है,जिसको न इंसानियत की परवाह है और न कायनात की खैरियत की उनकी कोई मंशा है।

    उनका मजहब तबाही है।

    उका ईमान तबाही है।

    उनकी हरकत तबाही है।

    उनकी इबादत तबाही है।

    उनकी बोली तबाही है।

    उनका रब तबाही है।

    वे एलियंस हैं।

    नगाड़े लेकिन खामोश हैं।फिर भी नौटंकी का वही सिलसिला!

    किस्से बहुत हैं,मसले भी बहुत हैं,किस्सागो कोई जिंदा बचा नहीं है।

    पलाश विश्वास

    और तब पिताजी के  नानाजी बोले,तुम जैसे किसानों,तुम जैसे मेहनतकशों के मुकाबले ये बनैले सूअर भी बेहतर।

    इस सूअरबाड़े में लेकिन असली सूअर भी कोई नहीं है।

    एलियंस की कोज में निकले हैं स्टीफन हॉकिंग,जिनसे बेहतर कोई नहीं जानता कि वे हमें तबाह कर देगे,ठीक उसीतरह जैसे हम हालीवू़ड के टरमिनेटर जैसी दर्जनों फिल्मों में देख चुके हैं।

    खैर,हालीवूड में एक फिल्म ऐसी भी बनी है कि एलियंस ने कहीं हमारी दुनिया पर धावा न बोलकर किसी और दुनिया में अवतार बनकर हमला कर दिया बाकी उन अवतारों के प्रतिरोध की कहानी है फिल्म अवतार में।

    बजरंगी भाईजान पर कुर्बान जमाने में अवतार तो लोग बूल गये लेकिन स्टीफन हॉकिंग को भूलना मुस्किल है क्योंकि वे एलियंस की खोज में निकल पड़े हैं।

    स्टीफन हॉकिंग महाशय को नहीं मालूम कि अवतारों के महादेश इस अखंड हिंदू राष्ट्र में एलियंस का ही राजकाज है कि

    परेशां परेशां कि अलादीन अनेक और उनके विश भी अनेक

    और सारे के सारे एलियंस,जो तबाही पर आमादा हैं

    और नजारा यह है कि नगाड़े लेकिन खामोश हैं।फिर भी नौटंकी का वही सिलसिला! किस्से बहुत हैं,मसले भी बहुत हैं,किस्सागो कोई जिंदा बचा नहीं है।

    नगाड़े खामोश है,शायद नैनीताल का युगमंच बी भूल गया है जैसे पूरा हिमालय भूल गया है गिरदा को।

    हमारे कलेजे के उस टुकड़े ने लिखा था नगाड़े खामोश हैं इमरजंसी के खिलाफ और मालरोड,त्ल्ली मल्ली जोड़कर उसका मचान भी किया था गिरदा के युगमंच ने।

    मजा यह है इमरजेंसी के खिलाफ वह नाटक इमरजेंसी में खेला गया लेकिन फिर कभी किसी ने उसका मचन किया हो या नहीं,हमें मालूम नहीं हैं।

    उस नाटक की स्क्रिप्ट शायद हमारी हीरा भाभी के पास भी न हो,जिसे आखिरी बार हमने नैनीताल समाचार में देखा था।

    ठेठ कुंमायूनी लोक शैली में लोक मुहावरों के साथ वह नाटक हुआ करै है।हमारी दुनिया फिर वही लोक,मुहावरों और किस्सों का देहात।

    चार पांच दशक पहले जब इस महादेश में नौटंकी की धूम रही है तब जो जीते रहे हैं,उन्हे शायद याद भी हों कि नगाड़े क्या चीज हैं।

    नगाड़ों की वह  गूंज सिर्फ अब सलवाजुड़ुम भूगोल के आदिवासी इलाकों में सुनी जा सकती है,जहां कोई नौटंकी लेकिन होती नही हैं।

    बाकी देश में नगाड़े साठ के दशक से खामोश हैं।

    नगाड़ों के बिना नौटंकी होती है नहीं,मगर मजा देखिये कि नगाड़े सारे के सारे खामोश हैं और नौटंकी की धूम मची है।

    घर से लेकर सड़क और संसद तक वही नौटंकी का मजा है।

    नारे,पोस्टर, वाकआउट,स्थगन,शोर शराबा सबकुछ जारी हैं जस का तस लेकिन न जन सुनवाई है,न जमनता के मसले हैं,न जनसरोकार कहीं है।खालिस मनोरंजन है।

    देख लीजिये,जिनसे हुकूमत परेशां हैं,उनसे पीछा छुड़ाने की जुगतमें हैं,वे इस बहाने कैसे नप जायेंगे और वाहवाही में तालियों का शोर खत्म न होते होते कैसे सारे बिल विल विश फिश पूरे नजर आयेंगे।

    मछली बाजार हैं तो हिलसा भी होंगे।

    माफ कीजियेगा जो हमें दिमाग के मरीज समझते हैं और हमारा इलाज कराने पर तुले हैं।मुहब्बत करने वाल हर शख्स आखिर कोई दीवाना होता है और नफरत का सौदागर हर कोई सयाना होता है।

    जरा उनका भी इलाज कराने की सोचिये जो नफरत से फिजां को बदमजा कर रहे हैं और उनकी इस हरमजदगी का भी कुछ इलाज सोचिये।

    स्टीफन हॉकिंग को मालूम नहीं है कि एलियंस ने हमें किस बेरहमी से कायनात की सारी बरकतों और रहमतों से बेदखल कर दिया है और कयामत के रक्तबीज वे कहां कहं बो रहे हैं कि उनको केसरिया रंग की कोई दुनिया मुकम्मल बनाना है और इंद्रदनुष से केसरिया के सिवाय सारे रंग उड़ाने हैं।

    एलियंस की खोज बाहर काहे करै हैं,हमारे मिलियनर बिलियनर तबका लेकिन वही एलियंस है,जिसको न इंसानियत की परवाह है और न कायनात की खैरियत की उनकी कोई मंशा है।

    उनका मजहब तबाही है।

    उका ईमान तबाही है।

    उनकी हरकत तबाही है।

    उनकी इबादत तबाही है।

    उनकी बोली तबाही है।

    उनका रब तबाही है।

    वे एलियंस हैं।

    परेशां परेशां कि अलादीन अनेक और उनके विश भी अनेक

    और सारे के सारे एलियंस,जो तबाही पर आमादा हैं

    स्टीफन हॉकिंग हमारे पसंदीदा साइंटिस्ट हैं।हालांक न विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टि से इस धर्मोन्मादी मुक्तबाजार के नागरिकों और नागरिकाओं का कोई वास्ता है।

    यूनिवर्सिटी ऑफ केम्ब्रिज में गणित और सैद्धांतिक भौतिकी के प्रोफेसर रहे स्टीफ़न हॉकिंग की गिनती आइस्टीन के बाद सबसे बढ़े भौतकशास्त्रियों में होती है।

    हमने तो जिंदगी उलटपुलट जी ली वरना हम भी काम के ,मुहब्बत ने हमें नाकाम कर दिया है।

    विज्ञान सिलसिलेवार पढ़ना न हुआ तो क्या स्टीफन हॉकिंग तो हैं जो विज्ञान को समझने के लिए हमारे खास मददगार हैं और उन्हें पढ़ते हुए सृष्टि के जन्म रहस्य से लेकर क्वांटम थ्योरी और बदलते हुए गति के नियम समझना उतना मुश्किल भी नहीं है।

    यही स्टीफन हॉकिंग महाशय का करिश्मा है कि समीकरण बनाना बिगाड़ना भूल गये तो क्या विज्ञान की दुनिया में सेंध मारते रहने का शौक बहाल है।

    स्टीफन हॉकिंग का कहना है कि शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़ते हु्ए यह साबित किया कि अगर इच्छा शक्ति हो तो व्यक्ति कुछ भी कर सकता है।

    हमेशा व्हील चेयर पर रहने वाले हॉकिंग किसी भी आम इंसान से अलग दिखते हैं, कम्प्यूटर और विभिन्न उपकरणों के जरिए अपने शब्दों को व्यक्त कर उन्होंने भौतिकी के बहुत से सफल प्रयोग भी किए हैं।

    बिन कंप्यूटर कैंसर से रीढ़ खोने वाले मेरे पिता पुलिनबाबू की रीढ़ जैसी मजबूत रीढ़ किसी की देखी नहीं है।

    सृष्टि के नियम से वे मेरे पिता थे लेकिन हमारी भैंसोलाजी की दुनिया मे वे भी किसी स्टीफन हॉकिंग से कतई कमतर न थे जो इंसानियत की कोई सरहद नहीं मानते थे और न स्टीफन हॉकिंग मानते हैं।

    स्टीफन हॉकिंग की तरह जेहन तो खैर किसी को मुनासिब होगा,खासतौर पर जो दाने दाने को मोहताज हुआ करें हैं,लेकिन मेरे पिता तो शारीरिक और मानसिक पाबंदियों को तोडने का जुनून जी रहे थे और उनका बेटा होकर उनकी विरासत को ढो न सका तो लानत है ऐसी दो कौड़ी की जिंदगी पर भइये।

    #दुनिया भर में दूसरे ग्रहों के लोगों को खोजने के लिए कई प्रयास चलते रहे हैं और इस पर कई फिल्में भी बनी हैं।

    अब ब्रिटिश कॉस्मोलॉजिस्ट स्टीफन हॉकिंग ने ब्रह्मांड में दूसरी दुनिया के लोगों को खोजने के लिए सबसे बड़े अभियान चलाया है. यह अभियान के लिए द ब्रेकथ्रू लिसेन प्रॉजेक्ट चलाया जाएगा और करीब 10 साल तक चलने वाले इस प्रोजेक्ट में दस करोड़ डॉलर के खर्च होंगे।

    सिलिकन वैली के रूसी कारोबारी यूरी मिलनर का द ब्रेकथ्रू लिसेन प्रॉजेक्ट को समर्थन हासिल है। माना जा रहा है कि ब्रह्मांड के दूसरी दुनिया में इंसानों जैसी समझदारी भरी जिंदगी के निशान तलाशने के लिए इंटेसिव साइंटिफिक रिसर्च किया जाएगा।

    लंदन की रॉयल सोसायटी साइंस अकैडमी में इस प्रॉजेक्ट की लॉन्च के मौके पर हॉकिंग ने कहा कि इस असीमित ब्रह्मांड में कहीं न कहीं तो जीवन जरूर होगा उन्होंने कहा कि यही समय है जब हम इस सवाल का हम धरती के बाहर की दुनिया में खोजें।  अभियान शुरू करने वाले स्टीफन हॉकिंग एक खास बीमारी के चलते बातचीत नहीं कर पाते हैं और वह अपने गाल की मांसपेशी के जरिए अपने चश्मे पर लगे सेंसर को कंप्यूटर से जोड़कर ही बातचीत कर पाते हैं।

    दस करोड़ डॉलर खर्च करके ढूंढे जाएंगे एलियंस

    गिरदा माफ करना।रंगकर्मी हम हो नहीं सके मुकम्मल तेरी तरह।न तेरा वह जुनून है।न तेरा दिलोदिमाग पाया हमने।

    इमरजेंसी खत्म नहीं हुआ अब भी।नैनीझील पर मलबों की बारिश होने लगी है,जैसा तुझे डर लगा रहता था हरवक्त।मालरोड पर मलबा है इनदिनों और पहाड़ों में मूसलाधार तबाही है।

    तू नहीं है।तेरा हुड़का नहीं है।तेरा झोला नहीं है।नगाड़े खामोश है उसी तरह जैस इमरजेंसी में हुआ करै हैं।

    नगाड़े खामोश हैं,हम फिर माल रोड पर दोहरा नहीं सके हैं।

    न हमारे गांव के लोग कहीं मशाले लेकर चल रहे हैं।

    गिरदा,तू हमारी हरामजदगी के लिए हमें माफ करना।

    फिर भी नौटंकी का वही सिलसिला!

    किस्से बहुत हैं,मसले भी बहुत हैं,किस्सागो कोई जिंदा बचा नहीं है।

    अमृतलाल नागर सिर्फ हिंदी के नहीं,इस दुनिया के सबसे बड़े किस्सागो रहे हैं।

    ताराशंकर बंद्योपाध्याय,विक्चर ह्यूगो, दास्तावस्की और तालस्ताय को सिरे से आखिर तक पढ़ने के बाद राय यह बनी थी।

    फिरभी हिमातक हमारी कि किस्सागो बनने का पक्का इरादा था।मंटो को पढ़ते रहे थे।फिर भी किस्सा अफसाना लिखने की ठानी थी।पचास से ज्यादा कहानियां छप गयीं।

    कहानियों की दो किताबें पंद्रह साल पहले आ गयीं।पचासों कहानियों को फेंक दिया न जाने कहां कहां।

    किस्सा गोई का मजा तब है,जव जमाना सुन रहा हो किस्सा।जमाना सो गया है,यारों।गिरदा तू ही बता,तू भी रहता आसपास कहीं तो सुना देता तुझे सारा का सारा किस्सा।

    विष्णु प्रभाकर,अमृत लाल नागर और उपेंद्रनाथ अश्क से खतोकितवत होती रही है क्योंकि उन्हें परवाह थी नई पौध की।वे चले गये तो उनके खतूत भी सारे फेंक दिये।टंटा से बेहद मुश्किल से जान छुड़ाया।अब न कविताहै न कहानी है।

    फिरभी किस्से खत्म हुए नहीं हैं।जाहिर सी बात है कि मसले भी खत्म हुए नहीं हैं।नगाड़े भले खत्म हो गये हैं।नौटंकी खत्म है।लेकिन नौटंकी बदस्तूर चालू आहे जैसे भूस्खलन या भूकंप।

    यकीन कर लें हम पर,हमारे गांव देहात में अमृतलाल नागर से बढ़कर किस्सागो रहे हैं और शायद अब भी होंगे।

    काला आखर भैंस बराबर उनकी दुनिया है।लिख नहीं सकते।बलते भी कहां हैं वे लोग कभी।लेकिन अपने मसलों पर जब बोले हैं,किस्सों की पोटलियां खोले हैं।

    दादी नानी के किस्सों से कौन अनजान हैं।वे औरतें जो हाशिये पर बेहद खुश जीती थीं और किस्से की पोटलियां खुल्ला छोड़ घोड़ा बेचकर सो जाती थीं।

    जमाने में गम और भी है मुहब्बत के सिवाय।लेकिन मुहब्बत के सिवाय इस दुनिया में क्या रक्खा है जो जिया भी करें हम!

    हमें कोई फिक्र नहीं होती।कोई गम नहीं है हमें।न किसी बात की खुशी है और न कोई खुशफहमी है।

    इकोनामिक्स उतना ही पढ़ता हूं जो जनता के मतलब का है।

    बाकी हिसाब किताब मैंने कभी किया नहीं है क्योंकि मुनाफावसूल नहमारी तमन्ना है,न नीयत है।

    मैं कभी देखता नहीं कि पगार असल में कितनी मिलती है।दखता नहीं कि किस मद में कितनी कटौती हुई।बजट कभी बनाता नहीं। गणित जोड़े नहीं तबसे जबसे हाईस्कूल का दहलीज लांघा हूं।खर्च का हिसाब जोड़ता नहीं हूं।

    शादी जबसे हुई है,तबसे हर चंद कोशिश रहती है कि सविता की ख्वाहिशों और ख्वाबों पर कोई पाबंदी न हो,चाहे हमारी औकात और हैसियत कुछ भी हो।

    बदले में मुझे उसने शहादत की इजाजत दी हुई है सो सर कलम होने से बस डरता नहीं।

    सिर्फ सरदर्द का सबब इकलौता है कि कहीं कोई जाग नहीं है और जागने का भी कोई सबब नहीं है।

    बिन मकसद अंधाधुंध अंधी दौड़ है और इस रोबोटिक जहां के कबंधों को कोई फुरसत नहीं है।

    नगाड़े खामोश भी न होते तो कोई फर्क पड़ता या नहीं ,कहना बेहद मुश्किल है।जागते हुए सोये लोगों को जगाना मुश्किल है।

    फिक्र सिर्फ एक है कि जो सबसे अजीज है,कलेजा का टुकड़ा वह अब भी कमीना है कि उसके ख्वाब बदलाव के बागी हैं अब भी और मां बाप के बुढ़ापे का ख्याल उसे हो न हो,अपनी जवानी का ख्याल नहीं है।बाप पर है,कहती है सविता हरदम।हालांकि सच तो यह है कि कोई कमीना कम नहीं रहे हैं हम।

    कमीनों का कमीना रहे हैं हम।हमने भी कब किसकी परवाह की है।ख्वाबों में उड़ते रहे हैं हम।बल्कि अब भी ख्वाबों में उड़ रहे हैं हम।

    कि बदलाव का ख्वाब अभी मरा नहीं है यकीनन।

    हो चाहे हालात ये कि बदलाव की गुंजाइश कोई नहीं है और फिजां में मुहब्बत कहीं नहीं है।

    दुनिया बाजार है।

    जो आगरा बाजार नहीं है।

    नहीं है।नहीं, नहीं है आगरा बाजार यकीनन।

    नगाड़े भले खामोश हों और झूठी नौटंकिया भले चालू रहे अबाध महाजनी पूंजी और राजकाज के फासिज्म की मार्केंटिंग के धर्मोन्माद की तरह जैसे फतवे हैं मूसलाधार,मसले चूंकि खत्म नहीं हैं,न पहेलियां सारी बूझ ली गयी है।

    खेत खलिहान श्मशान हैं।

    घाटियां डूब हैं।

    नहीं है कोई नदी अनबंधी।

    जल जंगल जमीन नागरिकता और सारे हकहकूक,जिंदा रहने की तमाम बुनियादी शर्तें सिरे से खत्म हैं यकीनन।

    शर्म से बड़ा समुंदर नहीं है।

    खौफ से बढ़कर आसमान नहीं है।

    काजल की कोठरियां भी छोटी पड़ गयी है,इतनी कालिख पुती हुई हैं दसों दिशाओं में।

    किसान बेशुमार खुदकशी कर रहे हैं थोक भाव से।

    मेहनतकशों के हाथ पांव कटे हुए हैं ।

    युवाजन बेरोजगार है।

    छात्रों का भविष्य अंधकार है।

    बलात्कार की शिकार हैं स्त्रियां रोज रोज।

    बचपन भी बंधुआ है।

    दिन रात बंधुआ है।

    तारीख भी बंधुआ है।

    बंधुआ है भूगोल।

    किराये पर है मजहब इनदिनों।

    किराये की इबादत है।

    किराये पर है रब इनदिनों तो

    किराये पर है मुहब्बत इन दिनों।

    डालर बोल रहे हैं खूब इनदिनों

    नगाड़े खामोश हैं इनदिनों

    खुशफहमी में न रहे दोस्तों,

    नौटंकियां चालू हुआ करे भले ही

    नौटकियों का सिलसिला हो भले ही

    रंगों के इंद्रधनुष से कोई गिला न करें।

    न किसी किराये के टट्टू से करें मुहब्बत

    क्योंकि मुहब्बत फिरभी मुहब्बत है

    नगाड़े बोले या नहीं बोले नगाड़े

    लैला की मुहब्बत फिरभी मुहब्बत है

    मजनूं की मुहब्बत फिरभी मुहब्बत है

    किसी किराये के रब से भी न करें मुहब्बत

    कि मजहब भी बेच दिया यारों

    उनने जिनने देश बेच दिया है।

    वालिद की मेहरबानी थी कि उनने हमें अपना सबसे बड़ा दोस्त समझा हमेशा।

    वालिद की मेहरबानी थी कि उनने हर सलाह मशविरा और फैसलों के काबिल समझा हमें,जबसे हम होश में रहे।

    दिवंगत पिता के वारिश हैं हम।

    उनके किस्सों के वारिश भी हुए हम।

    तराई में दिनेशपुर के बगाली उपनिवेश में नमोशुद्रों के गांव भी अनेक थे।हमारे गांव में हमारे परिवार को जोड़कर सिर्फ पांच परिवार नमोशूद्र थे।

    बाकी जात भी अलग अलग।

    लेकिन हमारी कोई जाति अस्मिता न थी।

    बसंतीपुर में बोलियां भी अलग अलग।

    किसी से किसी का कोई खून का रिश्ता न था।

    हर रिश्ता लेकिन खून के रिश्ते से बढ़कर था।

    साझा चूल्हे का इकलौता परिवार था।

    जिसमें हम पले बढ़े।

    अब उसी साझे चूल्हे की बाते हीं करता हूं जो अब कहीं नहीं है।

    सिर्फ एक ख्वाब है।उस बंजर ख्वाबगाह में तन्ही हूं एकदम।

    सर से पांवतक लहूलुहान हूं।

    यही मेरा कसूर है।

    बसंतीपुर हो दिनेशपुर का कोई दूसरा गांव,या तराई के किसी भी गांव में मेरा बचपन इतना रचा बसा है अब भी कि नगरों महानगरों की हमवाें भी मुझे छुती नहीं है।

    अनेक देस का वाशिंदा हूं।एक देश का वारिश हूं।

    मेरा देश वही बसंतीपुर है जो मुकम्मल हिमालय है या यह सारा महादेश।मेरी मां भी लगभग अनपढ़ थीं।

    इत्तफाकन उसकी राय भी यही थी।मां से बढ़कर जमीर नहीं होता।मेरी मां मेरा जमीर हैं।

    उस गांव के लोग जब अपने मसले पर बोलते थे,किस्सों की पोटलियां खोलते थे।

    पहेलियां बूझते थे।

    मुहावरों की भाषा थी।

    किस्सों के जरिये हकीकत का वजन वे तौलते थे।राय भी किस्से के मार्फत खुलती थी और पैसला भी बजरिये किस्सागोई।

    एक किस्सा खत्म होते न होते दूसरा किस्सा एकदम शुरु से।

    सुनने और सुनाने का रिवाज था।

    समझने और समझाने का दस्तूर था।

    ऐसा था सारा का सारा देहात मेरा देश।

    वह देश मर गया है और हम भी मर गये हैं।

    सारे के सारे नगाड़े खामोश हैं।

    अब रणसिंघे बजाने का जमाना है।

    हर कहीं महाभारत

    और हर कहीं मुक्त बाजार।

    इस मुक्त बाजार में हम मरे हुए लोग हैं

    जो जिंदों की तरह चल फिर रहे हैं।

    हमारी माने तो कोई जिंदा नहीं है यकीनन।

    यकीनन कोई जिंदा नहीं है।

    सारे नगाड़े खामोश हैं

    फिरबी नौटंकी चालू है।

    मेरे गांव में लोग कैसे बोलते थे ,कैसे राज खोलते थे और कैसे शर्मिंदगी से निजात पाते थे,वह मेरा सौंदर्यबोध है।व्याकरण है।

    मसलन गांव की इजाजत लिये बिना,गांव को यकीन में शामिल किये बिना बूढ़े बाप के बेटे ने शादी कर ली तो फिर उस बाप ने अपने कमीने की मुहब्बत पर मुहर लगवाने की गरज से पंचायत बुलाई,जिसमें कि हम भी शामिल थे।

    बाप ने मसला यूं रखाः

    घनघोर बियावां में तन्हा भटक रहा था।

    फिर उस बियाबां का किस्सा।

    उससे जुड़े बाकी लोगों के किस्से।

    बाप ने फिर कहा कि आंधी आ रही थी।पनाह कहीं नहीं थी।

    किसी मजबूत दरख्त के नीचे बैठ गया वह।

    फिर वैसे ही किस्से सिलसिलेवार।

    आंधी पानी हो गया ठैरा तो उसने सर उठाकर देखा तो उस दरख्त पर मधुमक्खी का एक छत्ता चमत्कार।

    पिर शहद की चर्चा छिड़ गयी।

    उसकी मिठास की चर्चा चलती रही।

    आखिर में बूढ़े बाप ने बयां किया कि जिसमें हिम्मत थी,मधुमक्खी के दंश झेलने की वह नामुराद वह छत्ता तोड़ लाया।

    शहद की मिठास से गांव के लोगों को उसने खुश कर दिया तो फिर असली दावत की बारी थी।

    मेरे पिता भी किस्सागो कम न थे।

    लेकिन वे किस्से मधुमती में धान काटने और मछलियों के शिकार के किस्सों से लेकर देश काल दुनिया के किस्से होते थे।

    उनके हर किस्से के मोड़ पर कहीं न कहीं अंबेडकर और लिंकन होते थे।गांधी और मार्क्स लेनिन भी होते थे।किसान विद्रोह के सिलिसिलों के बारे में वे तमाम किस्से सिर्फ मेरे लिए होते थे।

    उनके किस्सों में आजादी की एक कभी न खत्म होने वाली जंग का मजा था और बदलाव के ख्वाब का जायका बेमिसाल था,जिसके दीवाने वे खुद थे,जाने अनजाने वे मुझे भी दीवाना बना गये।

    उनके किस्सों में उनके नानाजी घूम फिरकर आते थे और वे मुझसे खास मुहब्बत इसलिए करते थे कि मेरे जनमते ही मेरी दादी ने ऐलान कर दिया था कि उका बाप लौट आये हैं।

    पिता तो मेरी शक्ल में अपने उस करिश्माई नानाजी का दीदार करते थे जो आने वाली आफत के खिलाफ हमेशा मोर्चाबंद होते थे और उनकी रणनीति हालात के मुताबिक हमेशा बदलती थी और हर आफत को शह देते थे और अपनी कौम को हर मुसीबत से बचाते थे।

    मेरे पिता को शायद मुझसे नानाजी का किस्सा दोहराने की उम्मीद रही है,कौन जाने कि पिता के दिल में क्या होता है आखिर किसी कमीने औलाद के लिए।

    बहरहाल नानाजी के एक खास किस्से के साथ इस किस्से को अंजाम देना है।

    जाहिर है कि इलाके में पिता के नानाजी का रुतबा बहुत था।जिनको हर बात पर नानी याद आती हो,वे अपने नाना को भी याद कर लिया करें,तो इस किस्से का भी कोई मतलब बने।

    पिता ने बताया कि पूर्वी बंगाल में तब दुष्काल का समां था और भुखमरी के हालात थे।खेत बंजर पड़े थे सारे के सारे।

    बरसात हुई तो उनने गांववालों और तमाम रिश्तेदारों से खेत जोतने की गुजारिश की।उनसे उनके हल भी माेग मदद के लिए।

    बारिश मूसलाधार थी।

    किसी केघर अनाज न था।

    हर कोई भूखा था।

    किसी को अपने खेत जोत लेने की हिम्मत न थी।

    सारे के सारे लोग सोते रहे।

    न कोई जागा और न कोई जगने का सबब था।

    दमघोंटू माहौल था और फिंजा जहरीली हो रही थी।

    नफरत के बीज तब भी बो रहे थे रब और मजहब के दुश्मन तमाम रब और मजहब के नाम,इबाबत के बहाने।

    नाना जी आखिरकार किसी किसान को केत जोतने के लिए उठा नहीं सकें।

    तो उसी रात पास के जंगल से बनैले सूअरों ने खेतों पर हमला बोल दिये और अपने पंजों से सारे के सारे खेत जोत दिये।

    सुबह तड़के जागते न जागते जुते हुए खेत की तस्वीर थीं फिजां।

    नाना जी तब गा रहे थे वह गीत जो यकीनन तब तक लिखा न था और भुखमरी के खिलाफ सोये हुए लोगों के लिए शायद वे यही गीत गा सकते थेःबहारों फूल बरसाऔ।

    वह भुखमरी के खिलाफ उनकी जीत थी जो जंग उनने अपने साथियों की मदद से नहीं जीती और तब बनैले सूअर उनके काम आये।वे ताउम्र बनैले के सूअरों के उस चमत्कार को याद करते रहे।

    सबने अपने अपने खेतों में धान छिड़क दिये।

    और तब पिताजी के  नानाजी बोले,तुम जैसे किसानों,तुम जैसे मेहनतकशों के मुकाबले ये बनैले सूअर भी बेहतर।

    इस सूअरबाड़े में लेकिन असली सूअर भी कोई नहीं है।

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    ''तो मेरा अपराध ऐसा है जिसका इल्जाम विद्वान लोग अक्सर एक दूसरे पर लगाते रहते हैं: संदर्भ से काट कर, चुनिंदा तौर पर उद्धृत करना. जाने कैसे मुझे याद नहीं आता कि राजमोहन गांधी को दुनिया में मौजूद गांधी की तारीफ के सचमुच के अंबारों में से एक से भी ऐसी कोई समस्या रही हो – मिसाल के लिए रिचर्ड ऑटेनबरो की ऑस्कर विजेता फिल्म गांधी (जो तथ्यों के बजाए काल्पनिक रचना ज्यादा है), जिसमें गांधी के सबसे मुखर और अहम आलोचक आंबेडकर को एक मेहमान करदार के रूप में भी पर्याप्त जगह नहीं दी गई है, या फिर रामचंद्र गुहा की जीवनी गांधी बिफोर इंडिया, जो उन सभी समस्याजनक मुद्दों को पूरी तरह दरकिनार कर देती है, जो गांधी की चमक-दमक को धूमिल कर सकते हैं. क्या राजमोहन गांधी ने उन्हें 'ऐतिहासिक बहसों के उसूलों'पर व्याख्यान दिया था? इसकी संभावना तो नहीं है.''

    निबंध की पहली किस्त

    पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है: अरुंधति रॉय

    Posted by Reyaz-ul-haque on 7/22/2015 04:07:00 PM

    पिछले साल अरुंधति रॉय द्वारा डॉ. बी. आर. आंबेडकर की मशहूर किताब एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट की प्रस्तावना 'द डॉक्टर एंड द सेंट' (2014) लिखने के बाद से बहसों का एक सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें अब तक अनेक वैचारिक नजरियों, राजनीतिक हलकों और सामाजिक तबकों के लोगों ने भाग लिया है. सतही प्रशंसा और उत्साही निंदा से अलग हट कर जाति उन्मूलन की इस बहस को पूरी जटिलता और एक मजबूत प्रतिबद्धता के साथ पेश करनेवाली अरुंधति रॉय की प्रस्तावना कितनी चुनौतीपूर्ण है, यह बात इससे जाहिर होती है कि इसकी आलोचना करने वालों में से ज्यादातर परस्पर विरोधी विचारधाराओं और नजरियों से जुड़े हुए हैं: आंबेडकराइट कार्यकर्ताओं-विचारकों से लेकर गांधीवादियों तक. आलोचना के इस सिलसिले की हालिया कड़ी में, राजमोहन गांधी ने (जो रिसर्च प्रोफेसर, पूर्व राज्यसभा सांसद और अनेक किताबों के लेखक होने के साथ साथ एम.के. गांधी के पोते भी हैं) इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) के 11 अप्रैल 2015 अंक में एक लंबा निबंध लिखा: 'इंडिपेंडेंस एंड सोशल जस्टिस: द आंबेडकर-गांधी डिबेट'। अरुंधति रॉय ने थोड़ी देर से इसका जवाब लिखा, जो इसी पत्रिका के 20 जून 2015 अंक में प्रकाशित हुआ है. रॉय के इस निबंध का हिंदी अनुवाद हाशिया पर पेश किया जा रहा है. पढ़ने की आसानी के लिए इस लंबे निबंध को किस्तों में पोस्ट किया जाएगा, जिसकी पहली किस्त नीचे है. अनुवाद: रेयाज उल हक.

    मेरे ´द डॉक्टर ऐंड द सेंट' [1] पर राजमोहन गांधी द्वारा लिखी गई लंबी आलोचना [2] पर जवाब देने में मुझे वक्त लगा. पहले मैंने सोचा कि मेरे निबंध को नजदीकी से पढ़ने पर उन सवालों के जवाब मिल जाएंगे, जो उन्होंने उठाए हैं. मैं कुछ ऐसा लिखने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थी, जो एक लंबा जवाब होने वाला था और जिसमें ज्यादातर मुझे खुद के लिखे हुए से ही उद्धरण देना था - यह सबसे शर्मिंदगी की बात थी. सच कहूं तो, राजमोहन गांधी ने यह सब लिखा तो मुझे खुशी ही हुई थी क्योंकि इसने मेरे इस नजरिए की तस्दीक की है कि बी.आर. आंबेडकर ने अपने वक्त में जो जटिल बौद्धिक और राजनीतिक लड़ाई छेड़ी थी उसका एक मुनासिब ब्योरा देने और आज के भारत में जातीय राजनीति को समझने के लिए हमें एम.के. गांधी द्वारा इसमें निभाई गई भूमिका को सावधानी से देखने की जरूरत है. गांधी के रुतबे को देखते हुए यह ऐसा काम नहीं है, जिसे हल्के-फुल्के तरीके से किया जाए. 

    मेरे सामने रास्ता ये था कि या तो गांधी को पूरी तरह से छोड़ दिया जाए या फिर इस मुद्दे से उस सख्ती के साथ पेश आया जाए, जिसकी यह मांग करता है. इसका नतीजा यह हुआ कि हालांकि 'द डॉक्टर एंड द सेंट'आंबेडकर की प्रतिष्ठित रचना एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट की प्रस्तावना था, लेकिन उसमें गांधी ने गैरमामूली जगह घेर ली. इसके लिए मेरी तीखी – और कई मायनों में समझ में आने लायक – आलोचना की गई है. अगर मैंने इससे गांधी को बाहर रखा होता, तो मेरा अंदाजा है कि उन्हीं में से कुछ आलोचकों ने मुझ पर बेरहमी से इल्जाम लगाए होते और यह वाजिब ही होता. 

    हालांकि राजमोहन गांधी ने इन सारी बातों को सिर के बल खड़ा कर दिया है जब वे दावा करते हैं कि 'द डॉक्टर एंट दे सेंट'लिखने में मेरा 'मकसद'गांधी को बदनाम करने के लिए आंबेडकर का इस्तेमाल करना था (दीगर कुछ लोगों ने मेरी इस बात पर फटकार लगाई है कि पश्चिमी आधुनिकता के अपरिहार्य और तबाही लाने वाले नतीजों पर गांधी का नजरिया 'भविष्यद्रष्टा'का था). चूंकि राजमोहन गांधी के सिर पर उस खानदान के नाम की पगड़ी है, तो कुछ लोग जिनमें से कई अच्छा और अहम काम कर रहे हैं, शायद उनके परचम के नीचे आ खड़े हुए हैं. ऐसा लगता है कि उनमें से किसी ने इस पर गौर नहीं किया है कि उनके अनेक विचार और दावे सचमुच बेचैन कर देने वाले हैं – और मैं उनके द्वारा मेरे बारे में कही गई बातों की तरफ इशारा नहीं कर रही हूं. यही वजह है कि मैंने इस पर जवाब देना जरूरी समझा. हालांकि यह बात अफसोसनाक ही होगी, अगर जल्दबाजी में और खोखले तरीके से पढ़ने के इस दौर में, कुछ मुद्दों पर केंद्रित इस जवाब को 'द डॉक्टर एंड द सेंट'की जगह उसके एवज में रख दिया जाए. 

    राजमोहन गांधी की आलोचना का शीर्षक 'इंडिपेंडेंस ऐंड सोशल जस्टिस'बड़ी सफाई से पूरे मामले को उसी पुरानी चाल में ढाल देता है: गांधी आजादी के लिए लड़ रहे थे और आंबेडकर सामाजिक न्याय के लिए. (यह बात कही नहीं गई है लेकिन यह इसमें छुपा हुआ है कि गांधी प्रधान थे.) अमूमन, एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट का एक शुरुआती पाठ भी इस मामले को खारिज कर देता है. जहां तक 'द डॉक्टर एंड द सेंट'की बात है, राजमोहन गांधी ने या तो इसे जरा भी गौर से नहीं पढ़ा है या फिर उन्होंने अपनी दलीलों के लिए जानबूझ कर इसे धुंधला बना दिया है. उन्होंने निबंध की सभी बातों की अनदेखी की है, सिवाय उन हिस्सों को छोड़ कर, जो उनके दादा से ताल्लुक रखते हैं (जो मेरा अंदाजा है कि यह एक किस्म की राजनीति भी है). उन्होंने इस निबंध को ऐसे लिया है मानो यह गांधी की एक दोषपूर्ण, आधी-अधूरी जीवनी है और वे इसी आधार पर अपनी आलोचना को आगे बढ़ाते हैं. मुझ पर लगाई गई उनकी तोहमतें तो जानलेवा हैं. वो मुझ पर एक 'झूठा, आसानी से मजाक उड़ाने लायक, मनगढ़ंत गांधी'की रचना करने का आरोप लगाते हैं. वे कहते हैं कि मैं बेईमान, 'रचनात्मक'रही हूं और 'मैं उस बात को छुपा गई हूं, जिसके बारे में जानती हूं कि वो सच्ची है'. वे मुझ पर अनदेखी करने, अतार्किकता, सस्ती विद्वत्ता और 'थोड़े समय के लिए भी गांधी का विद्वान नहीं होने'के आरोप लगाते हैं. वे 'जबानी मोर्चेबंदी की जिंदगी पसंद करने'के लिए मेरा मजाक उड़ाते हैं (मैं अभी तक इसे समझने की कोशिश कर रही हूं कि यह बुरी बात कैसे है. मैं सोचती हूं कि जबानी मोर्चाबंदी एक ऐसी जगह है कि जहां हम अपने बारे में और जिस दुनिया में हम रहते हैं उसके बारे में खुल कर सोचते हैं – और हम ऐसा हमेशा नरमी से ही नहीं करते). वे कहते हैं कि उनका इरादा आंबेडकर या गांधी से मुकाबला करने का नहीं है (हालांकि वे बड़ी कारीगरी से इसके इशारे करते हैं कि आंबेडकर एक औपनिवेशिक सरकार में सार्वजनिक पद पर थे, जबकि गांधी जेल की यात्राएं कर रहे थे). लेकिन फिर वे मुझसे 'मुकाबला'करने की एक चाहत कबूल करते हैं – 'इसे गुस्ताखी कहिए'. यह थोड़ी साहस की कमी है. जो भी हो, ये बड़ी बहसें हैं, जो कुछ के लिए नई हैं और कुछ के लिए नई नहीं है, लेकिन यकीनन वे मेरे बारे में नहीं हैं. (वह सब अब इतिहास का हिस्सा हैं). उनसे नजर चुराने का अब कोई विकल्प नहीं है. पिटारा खुल चुका है. इतिहास हमेशा की तरह मोर्चे पर है. नई किताबें इस दुनिया के सफर पर रवाना हो चुकी हैं: महाड सत्याग्रह पर आनंद तेलतुंबड़े की किताब, अश्विन देसाई और गुलाम वाहेद की द साउथ अफ्रीकन गांधी: स्ट्रेचर-बियरर ऑफ एंपायर और ब्रज रंजन मणि की डि-ब्राह्मनाइजिंग हिस्ट्री का व्यापक तौर पर संशोधित संस्करण. बहरहाल, जहां तक मेरी बात है, मुझे भरसक बेहतरीन तरीके से उन आरोपों को परखने और उन पर जवाब देने दीजिए, जो उन्होंने मुझ पर लगाए हैं. (हालांकि कुछ आरोप ऐसे हैं जो मुझे अवाक कर देते हैं जैसे, 'रॉय ने आजादी के आंदोलन का जिक्र तक नहीं किया है...' (आरजी.कॉम, पेज 19).)

    'ऐतिहासिक बहस के उसूल'

    ''द डॉक्टर एंड द सेंट'में बातों को शामिल नहीं किया जाना इस रचना की सबसे गंभीर कमी है,'राजमोहन गांधी कहते हैं. 'मैं यह भी दिखाना चाहूंगा कि रॉय का हमला ऐतिहासिक बहस के उसूलों का उल्लंघन करता है. ये उसूल मांग करते हैं, कि सबसे पहले तो किसी बयान पर किया जानेवाला हमला उस संदर्भ को मुहैया कराए, जिसमें किसी अलां, या फलां या फिर महात्मा तक ने 50 या 100 साल पहले बयान दिया होगा. दूसरे, कायदा यह मांग करता है कि वह खास सूचना काट कर बाहर न की जाए.' 

    तो मेरा अपराध ऐसा है जिसका इल्जाम विद्वान लोग अक्सर एक दूसरे पर लगाते रहते हैं: संदर्भ से काट कर, चुनिंदा तौर पर उद्धृत करना. जाने कैसे मुझे याद नहीं आता कि राजमोहन गांधी को दुनिया में मौजूद गांधी की तारीफ के सचमुच के अंबारों में से एक से भी ऐसी कोई समस्या रही हो – मिसाल के लिए रिचर्ड ऑटेनबरो की ऑस्कर विजेता फिल्म गांधी (जो तथ्यों के बजाए काल्पनिक रचना ज्यादा है), जिसमें गांधी के सबसे मुखर और अहम आलोचक आंबेडकर को एक मेहमान करदार के रूप में भी पर्याप्त जगह नहीं दी गई है, या फिर रामचंद्र गुहा की जीवनी गांधी बिफोर इंडिया, जो उन सभी समस्याजनक मुद्दों को पूरी तरह दरकिनार कर देती है, जो गांधी की चमक-दमक को धूमिल कर सकते हैं. क्या राजमोहन गांधी ने उन्हें 'ऐतिहासिक बहसों के उसूलों'पर व्याख्यान दिया था? इसकी संभावना तो नहीं है.

    मैं उनके इल्जामों के नुक्तों की ओर जाऊं, उसके पहले मुझे चुनिंदा तौर पर उद्धृत करने की बात पर थोड़ी बात कर लेने दीजिए. हरेक इंसान को जब किसी के लेखन से उद्धृत करना हो तो उसे चुनना ही पड़ता है – शिक्षक हों या गुणगान करने वाले, निंदक हों या खानदान की थाती के पहरेदार. वे जो चुनते हैं और जो छोड़ते हैं, यह बात उनकी अपनी राजनीति के बारे में भी काफी कुछ उजागर करती है. मैं कबूल करती हूं कि मैंने गांधी को चुनिंदा तरीके से उद्धृत किया. मेरा चयन गांधी द्वारा जाति पर जाहिर की गई राय को तलाश करने की कोशिशों पर आधारित था. यह सिलसिला मुझे नस्ल (रेस) के बारे में उनकी राय तक लेकर गया. मेरा चयन गांधी को बदनाम करने के लिए नहीं किया गया था या, जैसा कि कुछ लोगों ने इशारा किया है, गांधी और आंबेडकर की 'तुलना'करने के लिए नहीं किया गया था. बल्कि गांधी ने आंबेडकर के संघर्ष में जो अहम और चिंताजनक भूमिका अदा की, ये उस कहानी को कहने का जरिया था. ऐसा करने के लिए उन बातों को प्रमुखता से पेश करना जरूरी बन गया, जिनको प्रभुत्वशाली ऐतिहासिक कहानी ने गैरमुनासिब तरीके से छुपा रखा है. मैं कबूल करती हूं कि मैंने काले अफ्रीकियों के बारे में, मजदूरों, 'अछूतों'और औरतों के बारे में गांधी की कही और लिखी गई सबसे विचलित कर देने वाली बातों में से कुछ को चुनिंदा तौर पर उद्धृत किया. मैं यह पूरी तरह जानती थी कि यह कुछ हलकों में भारी हैरानी पैदा करेगा (मुझे कबूल करने दीजिए कि इसने मुझे भी निराश किया था), मैंने उन्हें लंबाई में उद्धृत करने की सावधानी बरती. 'ओह वे बदल गए थे'का सामना करने के लिए मैंने उनके राजनीतिक जीवन के पूरे दौर (1893-1946) से बातों को उद्धृत किया. 'वे अपने वक्त के इंसान थे'जैसी दलीलों का सामना करने के लिए मैंने उनके समकालीनों और उनसे पहले के लोगों की राय को उद्धृत किया था. मैंने अपने हवालों को बड़ी सावधानी के साथ पेश किया था. मैंने हरेक उद्धरण को उसके अपने ऐतिहासिक संदर्भ में पेश किया. 'द डॉक्टर एंट द सेंट'की अनेक जाने-माने इतिहासकारों द्वारा औपचारिक रूप से समीक्षा की गई है, जिनके बारे में मुझे यकीन है कि वे ऐतिहासिक बहस के उसूलों को समझते हैं. राजमोहन गांधी के पास इस बेहद चिंताजनक सामग्री के बारे में कहने के लिए कुछ भी ठोस बात नहीं है. उनकी मुख्य शिकायत यह है कि मैंने साथ ही साथ गांधी की कुछ ऐसी अच्छी-भली बातें क्यों उद्धृत नहीं की है, जिन्हें उन्होंने चीजों को हल्का करने या 'संतुलित करने'की खातिर विभिन्न मौकों पर कहा होगा. (असल में मैंने ऐसा किया भी, हालांकि इसकी अलग वजहें हैं). फिर यह बात भी मायने रखती है कि हम सबमें गांधी की कही और की गई सभी अच्छी और महान बातें बातें कूट कूट कर भरी गई हैं, नहीं क्या? यह हमारी इतिहास की किताबों में है, हमारे राजनेताओं के भाषणों में है, यहां तक कि उस हवा तक में है जिसमें हम सांस लेते हैं. दिमाग में भर दी गई इन बातों के खिलाफ या उससे हट कर कुछ लिखने के लिए यह जरूरी है कि पहाड़ को थोड़ा खिसकाया जाए.

    चलिए, इसे एक खयाली रूप में देखते हैं.

    दलील के लिए मान लीजिए कि एक जानी-मानी शख्सियत अलां ने अपने राजनीतिक जीवन के अनेक दशकों में ऐसी गंभीर और खूबसूरत बातें कही हैं जो सार्वजनिक रेकॉर्ड में हैं. ऐसी बातें मसलन:

    सभी इंसान पैदाइशी तौर पर बराबर हैं
    गरीब ही धरती के वारिस हैं
    गरीबी हिंसा की सबसे बदतरीन शक्ल है

    और मान लीजिए कि उसी शख्सियत अलां ने समांतर (लेकिन सार्वजनिक रेकॉर्ड से कमोबेश छिपे हुए) ट्रेक में ऐसी बातें भी कही हों:

    जाति हिंदू सभ्यता का कौशल है
    काफिर कायदे से ही असभ्य होते हैं
    ज्यादातर मजदूरों की नैतिक क्षमताएं नष्ट हो गई हैं
    कुछ अछूत अपनी बुद्धि में गायों से भी बदतर हैं
    मेहतरों (स्वीपर्स) को हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं है

    राजमोहन गांधी के मुताबिक, इनमें से एक ट्रेक को सहेज कर रखना और दूसरे को मिटा देना ऐतिहासिक बहस के उसूलों का पालन करना है. लेकिन इससे उल्टी बात उसका उल्लंघन है. यह चालाकी भरा नुक्ता अपनी जगह, क्या पहले ट्रेक में कही गई अच्छी अच्छी बातें, दूसरे ट्रेक के पक्षपात और उसकी संकीर्ण समझदारी को हल्का करती है? या यह पूरे मामले को ही और भी परेशान कर देने वाली बात नहीं बना देती? मेरा जवाब, यही दूसरी संभावना है. 



    1. अरुंधति रॉय, 'द डॉक्टर एंड द सेंट', (प्रस्तावना), बी.आर. आंबेडकर, एनाइहिलेशन ऑफ कास्टमें, (नवयाना 2014).
    2. इस निबंध के दो संस्करण हैं, एक छोटा संस्करण ईपीडब्ल्यू के 11 अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित हुआ जिसका हवाला मैं आरजी (ईपीडब्ल्यू) के रूप में दूंगी. दूसरा, लंबा ऑनलाइन संस्करण ( है जिसका हवाला मैं आरजी.कॉम के रूप में दूंगी.
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    एक मिनट का मौन
    एम्मानुएल ओर्तीज । अनुवाद: असद जैदी

    इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
    मेरी गुज़ारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
    ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
    और फिर एक मिनट का मौन उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोध में
    सताया गया, क़ैद किया गया
    जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
    जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
    अफ़गानिस्तान के मज़लूमों और अमरीकी मज़लूमों के लिए

    और अगर आप इज़ाजत दें तो

    एक पूरे दिन का मौन
    हज़ारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज़
    इस्त्राइली फ़ौजों ने अमरीकी सरपरस्ती में मार डाला
    छह महीने का मौन उन पन्द्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
    जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लम्बी घेराबन्दी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

    इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ

    दो महीने का मौन दक्षिण अफ़्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
    अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया। नौ महीने का मौन
    हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहाँ मौत बरसी
    चमड़ी, ज़मीन, फ़ौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
    जहाँ बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
    एक साल का मौन विएतनाम के लाखों मुर्दों के लिए...
    कि विएतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है...
    एक साल का मौन कम्बोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
    एक गुप्त युद्ध का शिकार थे... और ज़रा धीरे बोलिए,
    हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं। दो महीने का मौन
    कोलम्बिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
    उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
    फिर गुम हो गए और ज़बान से उतर गए।

    इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ।

    एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
    एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
    दो दिन का मौन ग्वातेमालावासिओं के लिए
    जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
    45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
    और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
    जिनकी क़ब्रें समुन्दर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुम्बी इमारत भी न होगी।
    उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकॉर्ड नहीं खोले जाएंगे।
    उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
    दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम

    एक सदी का मौन

    यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिन्दों के लिए
    जिनकी ज़मीनें और ज़िन्दगियाँ उनसे छीन ली गईं
    पिक्चर पोस्ट्कार्ड से मनोरम खित्तों में...
    जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फ़ालन टिम्बर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
    अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुम्बकीय काव्य-पंक्तियाँ भर हैं।

    तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा ?
    जबकि हम बेआवाज़ हैं
    हमारे मुँहों से खींच ली गई हैं ज़बानें
    हमारी आखें सी दी गई हैं
    खामोशी का एक लम्हा
    जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
    मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

    इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ
    आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
    आपको ग़म है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रही रह जाएगी
    इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज़ न रहे।
    कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।

    क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
    यह 9/10 के बारे में है
    यह 9/9 के बारे में है
    9/8 और 9/7 के बारे में है
    यह कविता 1492 के बारे में है।

    यह कविता उन चीज़ों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं।
    और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर :
    यह सितम्बर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
    यह सितम्बर 12, 1977 दक्षिण अफ़्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
    यह 13 सितम्बर 1971 और एटिका जेल, न्यू यॉर्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।

    यह कविता सोमालिया, सितम्बर 14, 1992 के बारे में है।

    यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुँछ रही है कर मिट जाया करती है।
    यह कविता उन 110 कहानियो के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं, 110 कहानियाँ
    इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई ज़िक्र नहीं पाया जाता,
    जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यू यॉर्क टाइम्स और न्यूज़वीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
    यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

    आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?
    हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :
    बिना निशान की क़ब्रें
    हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
    जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
    अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
    इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं
    या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ
    फिर भी आप चाहेंगे कि
    हमारी ओर से कुछ और मौन।

    अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
    तो रोक दो तेल के पम्प
    बन्द कर दो इंजन और टेलिविज़न
    डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज़
    फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
    बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
    डिलीट कर दो सरे इंस्टेंट मैसेज
    उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

    अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर ईंट मारो,
    और वहां के मज़दूरोंका खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
    सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्लेबॉय।

    अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
    तो रहो मौन ''सुपर बॉल'' इतवार के दिन
    फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई के रोज़
    डेटन की विराट 13-घंटे वाली सेल के दिन
    या अगली दफ़े जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों
    और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।

    अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
    तो अभी है वह लम्हा
    इस कविता के शुरू होने से पहले।

    ( 11 सितम्बर, 2002 ) 

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