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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

    रवींद्र दलित विमर्शः14

    रक्तकरबी(Red Oleanders)- राष्ट्रवाद वहीं है जो कुलीन सवर्ण सत्ता वर्ग का हित है।

    राष्ट्र मेहनतकश अवर्ण बहुजन बहुसंख्य जनगण की निगरानी,उनके,दमन,उत्पीड़न सफाये, नागरिकता नागरिक और मानवाधिकार हनन का सैन्य तंत्र है।


    इस हिंदू राष्ट्र के रामराज्य में किसी नंदिनी की आवाज की कोई गूंज नहीं है न लावारिश खून का कोई नामोनिशां है और न कातिल का कोई सुराग।


    मनुष्यता का वजूद आधार नंबर है और आधार नंबर नहीं है तो आपका कोई वजूद नहीं है।बुनियादी सेवाओं और जरुरतों,नागरिक और मानवाधिकार से आप वंचित है।

    इस अंधियारे के तिलिस्म में अभिव्यक्ति कैद है और नागरिकों की चौबीसों घंटे निगरानी है।निजता और गोपनीयता  के अधिकार की क्या कहिये, संवैधानिक अधिकार,मौलिक अधिकार,नागरिकता और नागरिक मानवाधिकार के हनन का अंध राष्ट्रवाद नरसंहारी सुनामी है,जिसके खिलाफ जन प्रतिरोध संगठित करने वाला यक्षपुरी का कोई अध्यापक कहीं नहीं है।

    नंदिनी का चरित्र जी रही तृप्ति मित्र के अवसान के बाद नंदिनी की आवाज की कोई गूंज बची नहीं है और  न बचा है शंभू मित्र का वह रंगकर्म।

    पलाश विश्वास

    मुझे नेट पर हिंदी में रक्तकरबी से संबंधित कोई समाग्री नहीं मिली है।अगर किसी के पास संबंधित सामग्री की जानकारी है तो कृपया शेयर करें।

    कोलकाता से नई दिल्ली पहुंचे फिल्मकार राजीव कुमार और उनकी पत्नी मीनाभाभी कई दिनों से कोलकाता में अपने पुराने घर में हैं और आज शाम फिर नई दिल्ली वापस हो जायेंगे।राजीव हमारे डीएसबी नैनीताल जमाने के मित्र हैं।कल का दिन उनके नाम रहा। सविता अपने साथ दवाएं और इंसुलिन लेकर नहीं गयीं तो इस बहना रात को साथ खाना खाने के बाद ही लौट सके।लौटकर फिर पीसी का सामना नहीं किया।हम दोनों शुगरिये हैं और जीने के लिए जूझ रहे हैं।

    इसलिए नोटबंदी संबंधी रिजर्व बैंक के आंकड़ों के बचाव में कारपोरेट वकील के अपने वित्तीय प्रबंधन के बचाव में नोटबंदी का मुख्य उद्देश्य डिजिटल लेन देन बताने पर कोई बात नहीं सकी।

    टीवी पर नोटबंदी पर बहस को लेकर हंसी आ रही थी क्योंकि मीडिया डिमोनीटाइजेशन को कल तक गेमचेंजर बता रहा था।

    कालाधन निकालने के लिए प्रधान स्वयंसेवक का हिज मास्टर्स वायस बना मीडिया अब भी नोटबंदी की उपलबधियां गिनाने के लिए डिजिटल स्मार्ट इंडिया को फोकस बनाये हुए है।

    अब भी रिजर्व बैंक को हुए नोट छापने के खर्च की वजह से हुए नुकसान की ही  चर्चा हो रही है।नोटबंदी के बाद से लेकर अब तक करीब तीस लाख लोगों के बेरोजगार होने की कोई चर्चा नहीं हो रही है।डिजिटल लेनदेन की वजह से कारोबार से बाहर हो गये छोटे और मंझौले कारोबारियों की हालत पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

    पचास दिन में ही शेयर बाजार में निवेशकों के साढ़े छह लाखो करोड़ रुपये डूब जाने और नोटबंदी के बाद अब तक शेयर बाजार  के सूचकांक उछालू खेल के जरिये छोटे और मंझौले निवेशकों के सत्यानाश और सत्ता वर्ग के चहेते उद्योगपतियों के देश भक्ति, विशुद्धता, धर्म,अस्मिता. राष्ट्रवाद और सुरक्षा संप्रभुता के नाम पर बाकी कारोबारियों और उद्यमियों और यहां तक कि प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों और लोकप्रिय ब्रांडों को हाशिये पर रखकर बाजार पर एकाधिकार कायम करने के डिजिटल तंत्र की चर्चा नहीं हो रही है।

    कालेधन को सफेद बनाने का राजनीतिक खेल,घोटालों पर पर्दा अभी हटा नहीं है।आधार नंबर के जरिये ईटेलिंग के जरिये खुदरा कारोबार के बंडाधार का कोई ब्योरा नहीं है और नहीं ही आर्थिक साइबर डिजिटल अपराधों की कोई चर्चा है।

    सरकार ने भी कालाधन निकालने की बात छोड़कर हकीकत छुपाने के लिए झट से असल गोलपोस्ट डिजिटल इंडिया का बेपर्दा कर दिया।

    हम इस सिलसिले में नोटबंदी के पहले दिन से कहते लिखते रहे हैं कि कालाधन निकालने के लिए नहीं,यह कालाधन सफेद करने का और आधार को वैधता देते हुए डिजिटल लेनदेन के जरिये अर्थव्यवस्था पर एकाधिकार कारपोरेट एकाधिकार कायम रखने का हिंदुत्व एजंडा है।

    हस्तक्षेप के तमाम लेखों को पढ़ लें।

    हम आधार परियोजना के प्रस्तावित होने के समय से इसे अर्थव्यवस्था से दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों,किसानों,मेहनतकशों और छोटे कारोबारियोे के बहिस्कार के तहत कारपोरेट एकाधिकार के सत्ता वर्चस्व के लिए नागरिकों की निगरानी का बंदोबस्त बताते लिखते रहे हैं।

    आधार पर हस्तक्षेप में प्रकाशित तमाम आलेखों को आप संदर्भ सामग्री मानकर दोबारा पढ़ सकते हैं।

    बाकी रिजर्व बैंक के आंकड़े हकीकत बयान करते हैं और सोशल मीडिया पर इस पर सारी सामग्री उपलब्ध है।इसलिए नोटबंदी पर हमें नया कुछ फिलहाल नहीं कहना है।मीडियावालों को यह भंग छाने की छूट रही।बाकी जनता अफीम के नशे में है।

    बहरहाल नोटबंदी का आधार निराधार डिजिटल इंडिया के कारपोरेट राष्ट्रवाद को समझना जरुरी है।इसी सिलसिले में रवींद्र नाथ के गीति नाट्य रक्तकरबी (Red Oleanders) में बेनकाब राष्ट्र और राष्ट्रवाद की चर्चा हम कर रहे हैं।

    रवींद्र नाथ के रक्तकरबी (Red Oleanders) में राष्ट्रवाद वहीं है जो कुलीन सवर्ण सत्ता वर्ग का हित है।

    आज के भारत का सच और औपनिवेशिक उपनिवेश अखंड भारत का सच हूबहू एक है।नील विद्रोह किसानों की बेदखली और उनको जबरन मजदूर बनाये जाने के खिलाफ आदिवासी  बहुजन किसानों का जन विद्रोह है।अब जनता लापता है।

    रक्तकरबी का राजा सोना निकालने के लिए किसानों को यक्षपुरी में कैद करके उनकी चौबीसों घंटे निगरानी करते हुए उन्हें नागरिक और मानवाधिकार से वंचित करता है और आज भारत की अर्थव्यवस्था निरंकुश सत्ता की वही यक्षपुरी है जहां कटकटेला अंधियारा के सिवाय कोई रोशनी नहीं है।

    इस हिंदू राष्ट्र के रामराज्य में किसी नंदिनी की आवाज की कोई गूंज नहीं है ना लावारिश खून का कोई नामोनिशां है और न कातिल का कोई सुराग है।

    मनुष्यता का वजूद आधार नंबर है और आधार नंबर नहीं है तो आपका कोई वजूद नहीं है।

    बुनियादी सेवाओं और जरुरतों,नागरिक और मानवाधिकार से आप वंचित है।

    इस अंधियारे के तिलिस्म में अभिव्यक्ति कैद है और नागरिकों की चौबीसों घंटे निगरानी है।निजता और गोपनीयता  के अधिकार की क्या कहिये, संवैधानिक अधिकार,मौलिक अधिकार,नागरिकता और नागरिक मानवाधिकार के हनन का अंध राष्ट्रवाद नरसंहारी सुनामी है,जिसके खिलाफ जन प्रतिरोध संगठित करने वाला यक्षपुरी का कोई अध्यापक कहीं नहीं है।

    नंदिनी का चरित्र जी रही तृप्ति मित्र के अवसान के बाद नंदिनी की आवाज की कोई गूंज बची नहीं है और  न बचा है शंभू मित्र का वह रंगकर्म।

    राष्ट्र मेहनतकश अवर्ण बहुजन बहुसंख्य जनगण की निगरानी, उनके, दमन, उत्पीड़न सफाये, नागरिकता नागरिक और मानवाधिकार हनन का सैन्य तंत्र है।

    इसी सिलसिले में  जार्ज आरवेल के उपन्यास 1984 और उससे संबंधित सामग्री और वीडियो,रवींद्र का गीत नाट्य रक्तकरबी(Red Oleanders) से संबंधित सामग्री और वीडियो के साथ चार्ली चैपलिन की फिल्म माडर्न टाइम्स के वीडियो पोस्ट किये।

    आधार से जरुरी सेवाओं को जोड़ने की मोहलत निजता के मौलिक अधिकार बन जाने के बावजूद दिसंबर तक बढ़ाकर कारपोरेट डिजिटल इंडिया के हिंदू राष्ट्र एजंडा को वैधता देने के सिलिसले में  निरंकुश अंध राष्ट्रवाद की आड़ में नागरिकों की निगरानी, नागरिक स्वतंत्रता और नागरिक मानवाधिकार हनन के अबाध पूंजी प्रवाह की जांच पड़ताल के मकसद से संदर्भ सामग्री पाठकों तक पहुंचाने के नजरिये से हमने ऐसा किया है।

    जार्ज आरवेल का उपन्यास 1949 में प्रकाशित हुआ।हमने याहू ग्रुप के जमाने से इस उपन्यास के कथानक के क्रम में नागरिक और मानव अधिकारों की लगातार चर्चा की है।उनके लिखे एनीमल फार्म पर भी इसी सिलसिले में खासकर सिंगुर नंदीग्राम भूमि आंदोलन में सत्ता वर्ग के कारपोरेट राज के सिलसिले में चर्चा  की है।

    चार्ली चैप्लिन का फासीवादी राष्ट्र के शिकंजे में फंसी नागरिकता पर और नागरिकों की निगरानी पर 1936 में बनी कामेडी फिल्म माडर्न टाइम्स भी हमने कई दफा शेयर किया है।

    गौरतलब है कि 1949 में लिखे जार्ज आरवेल के उपन्यास 1984 और 1936 में बनी चैपलिन की फिल्म माडर्न टाइम्स से काफी पहले 1917 में ही रवींद्रनाथ ने राष्ट्र के इस निरंकुश मनुष्यता और सभ्यता विरोधी चरित्र को अपने निबंध नेशनालिज्म (राष्ट्रवाद) में बेनकाब कर दिया था।

    रक्तकरबी(Red Oleanders) रवींद्रनाथ ने 1923 में लिखा।

    इसे भी पहले भारत के छोटे से राज्य त्रिपुरा के राजतंत्र पर लिखे ऐतिहासिक उपन्यास राजर्षि में रवींद्रनाथ ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद के मनुष्यता के दमन के चरित्र को बेनकाब किया है।इस उपन्यास पर हम बाद में अलग से चर्चा करेंगे।

    गौरतलब है कि फासीवाद नाजी राष्ट्र से बहुत पहले पश्चिमी राष्ट्र की अवधारणा के विरुद्ध रवींद्र भारतीय लोक गणराज्य की संस्कृति में विविधात बहुलता और संस्कृति के लोकतंत्र का विमर्श चला रहे थे।जिसका भारत  के हिंदुत्ववादियों के फासीवादी हिंदु राष्ट्र के एजंडे के साथ टकराव हिंदुत्ववादियों के फासीवाद और नाजी जर्मनी से संपर्क होते ही शुरु हो गया था।

    रक्तकरबी के विचार स्वप्न अभिव्यक्ति निजता नागरिकता और स्वतंत्रता नियंत्रण के राजकाज और सत्ता राजनीति के नस्ली वर्चस्व में निष्णात राष्ट्रवाद के खिलाफ मनुष्यता की पुकार की गूंज आरवेल के उपन्यास 1984 और चार्ली चैपलिन की फिल्म माडर्न टाइम्स में है तो रक्तकरबी का संदर्भ समझने के लिए सैन्य राष्ट्र में मनुष्यता और सभ्यता के संकट के गहराते जाने की प्रक्रिया भारत के आजाद होने तक समझने के लिए इन दोनों कृतियों को जानना जरुरी है।

    इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए रक्त करबी,1984 और माडर्न टाइम्स को एकसाथ रखकर देखें तो समझ में आता है कि पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में बदलने के बाद स्वतंत्र नागरिक किस तरह सैन्य राष्ट्र के नियंत्रित मनुष्यताहीन यंत्रमानव में तब्दील होता जा रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार माना है लेकिन आधार की तकनीकी निगरानी के तहत इस निजता की रक्षा के लिए अभी कोई फैसला नहीं हुआ है और सुप्राीम कोर्ट की राय बदलने के लिए सत्ता वर्ग के कब्जे में संसदीय प्रणाली में नागरिकों का खासकर अवर्णों, गैरनस्ली दीगर समुदायों,मेहनतकशों, किसानों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों का कारगर प्रतिनिधित्व न होने की वजह से नये कानून के तहत इस राय को उलट देने का खतरा बना हुआ है।

    आर्थिक सुधारों के हवाले कारपोरेट जनसंहारी कार्यक्रम के तहत संवैधानिक रक्षा कवच और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हुए तमाम कायदे कानून इसी तरह बदले जाते रहे हैं।कारपोरेट एकाधिकार के लिए तीन हजार के करीब कानून अभी भगवा रामराज के तीन साल में ही बदल दिये गये हैं।

    कारपोरेट खेल का कमाल यह है कि दुनियाभर में घूम घूमकर प्रधान स्वयंसेवक विदेशी कंपनियों के हवाले कर रहे  हैं भारत की अर्यव्यवस्था,कारोबार,उद्योग और जलजंगल जमीन और उनका बाबा बाबी संप्रदाय संस्थागत हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक स्वराज,विशुद्धता,धर्म,देशभक्ति का स्वांग रचते हुए अपना अपना कारोबार का कारपोरेट एकाधिकार वर्चस्व कायम कर रहे हैं।विदेशी पूंजी और स्वदेशी राष्ट्रवाद की दुधारी तलवार से आम जनता की गर्दन उतारी जा रही है।

    राज्यसभा में विपक्ष के बहुमत को बाईपास करते हुए अर्थ विधेयक बतौर लोकसभा में बहुमत के जरिये जिस तरह आधार कानून बनाया गया है उससे जनपदों के कब्रिस्थान और श्मशानघाट के नींव पर सत्ता सवर्ण वर्ग के डिजिटल यांत्रिक इंडिया का निरमाण का स्टार्ट अप शुरु हो गया है और स्मार्ठ फोन के ऐप के जरिये नागरिकों की जान माल का सफाया अभियान,बेदखली विस्थापन बहसि्कार और छंटनी की नई वर्मव्यवस्था का ब्राह्मणधर्म का पुनरूत्तान हो गया है और इसका पुरोहित तंत्र है समूचा कारपोरेटपंडेड राजनेता वर्ग तो लोकतंत्र और कानून के राज में आम नागरिक गुलाम में बदल गये हैं और किसान अपनी जमीन से बेदखल गुलाम कैद मजदूर हैं।

    यही रक्तरबी की यक्षपुरी का सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक यथार्थ है,जिसमें अभिव्यक्ति,निजता,सपनों,विचारों के नियंत्रण का माडर्न टाइम बदस्तूर  24 घंटा लाइव है और इसीमें 1984 की निरंतरता है और  नागरिक एनीमल फार्म में कैद जीव जंतुओं की तरह जनविद्रोह भी कर नहीं सकते क्योंकि आधार नंबर के सिवाय रक्त मांस का उनका कोई वजूद नहीं है।क्योंकि उनके विचार और सपने भी राष्ट्र नियंत्रित हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ही नहीं।सारे माध्यम,विधाएं और मातृभाषाएं तक जनपदों और जनता के खिलाफ सत्तावर्ग के नस्ली वर्म वर्चस्व के पक्ष में लामबंद है और सैन्यतंत्र लगातार मजबूत होता जा रहा है।

    आपातकाल के इस अंधियारे का कहीं कोई असर किसी नागरिक पर होने का अंदेशा भी नहीं है क्योंकि मनुष्य का कोई वजूद ही नहीं है और वह सिर्फ एक डिजिटल कार्यक्रम के अधीन यंत्रमानव है जिसके रोबोटिक प्रोग्राम में अंध राष्ट्रवाद के सिवाय कोई मानवीय संवेदना है ही नहीं।

    इसलिए किसी नंदिनी को रोशनी की तलाश नहीं है और समूचा अध्यापक वर्ग सिरे से लापता है जो कि आम नागरिकों की शिक्षा दीक्षा पूरी करके उन्हें मनुष्य बना दें।शिक्षा का ज्ञान से कोई मतलब नहीं है और न विमर्श की कोई इजाजत है।तमाम नागरिक और मानवाधिकार ऐप्पस और स्टर्ट अप से नत्थी है जो आधार लिकंड हैं।

    समूची युवापीढ़ी नीले शार्क के खेल में शामिल है और आत्महत्या उनकी अनिवार्य नियति है।समता,न्याय और अवसरों,रोजगार और आजीविका से बेदखल पीढ़ियों का कोई भविष्य है नहीं और हम एक अनंत ब्लैक होल में दाखिल यंत्रमानव हैं।

    भविष्यद्रष्टा रवींद्र लगातार यह चेतावनी जारी करते रहे हैं और चार्ली चैपलिन की कामेडी का विमर्स वहीं है जो 1984 का कथानक है।

    1923 में लिखे अपने नाटक रक्तकरबी(Red Oleanders) को रवींद्र भावीकाल के फासीवादी समय के सामाजिक यथार्त के रुप में पेश कर रहे थे।1924 के नवंबर दिसंबर के दौरान वे अर्जेंटीना की यात्रा पर थे उस यात्रा के दौरान एलमहर्स्ट से रवींद्र का लंबा संवाद चला जिसमें रक्तकरबी की चर्चा भी हुई।

    फासीवाद के खतरे के मद्देनजर भावीकाल के संकट से सचेत रवींद्र गैरबंगाली पाठकों तक इस नाटक को संप्रेषित करना चाहते थे।

    नील विद्रोह और उसमें शामिल आदिवासी बहुजन किसान,इस विद्रोह पर लिखे दीनबंधु मित्र के लिखे नाटक नील दर्पण और नवान्न से शुरु गणनाट्य आंदोलन,बंगाल की भुखमरी,तेभागा आंदोलन तक जारी किसान आदिवासी जनविद्रोंहों की निरंतरता की  वजह से अभूतपूर्व कृषि संकट के संदर्भ में बंगाल में रक्तकरबी की प्रासंगिकता और उसकी समझ को लेकर को कभी संशय नहीं रहा लेकिन पूंजीवादी साम्राज्यवादी उत्पादन प्रणाली और कारपोरेट राज में समूचे बारत में गहराते कृषि संकट,जल जंगल जमीन से किसानों की अनंत बेदखली के बावजूद अस्मिता राजनीति के हिंदुत्व एजंडे के अंध राष्ट्रवाद के सर्वव्यापी वर्चस्व की वजह से बाकी भारत में राष्ट्रवाद  के इस जनविरोधी वीभत्स चेहरे के सच का सामना हुआ ही नहीं है और प्रेमचंद के बाद किसानों और कृषि पर साहित्य के क्षेत्र में रचनाधर्मिता की अनुपस्थिति से हिंदुत्व के पुनरूत्थान की सुनामी में सैन्य राष्ट्र के निरंतर मजबूत होते जाने से आदिवासी भूगोल के अलावा धर्म जाति के नाम नरसंहारों की निरंतरता के बावजूद राष्ट्र और सत्ता की कारपोरेट राजनीति में रक्तकरबी  पर बाकी भारत में विमर्श का कोई स्पेस ही तैयार नहीं हो सका।

    भविष्यद्रष्टा रवींद्रनाथ को इस संकट का शायद आभास रहा होगा तो गैरबंगाली पाठकों के लिए उन्होंने इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी में खुद रेडआलियंडर्स शीर्षक से किया तो 1925 में ही इस नाटक की व्याख्या अंग्रेजी में कर दी।

    इस व्याख्या में रवींद्र नाथ ने मनुष्य की निजी सत्ता संप्रभुता का संगठित मनुष्यों के तंत्र द्वारा नियंत्रण को ही राष्ट्र तंत्र माना है।फासीवादी नाजीवादी सैन्य राष्ट्र के अभ्युदय से ही संस्थागत दमन उत्पीड़न का यह तंत्र बना है।रवींद्र ने इस व्याख्या और अपने निबंधों में इसकी विस्तार से चर्चा की है।

    Red Oleanders

    Tagore's preoccupation with life, death, and God in the first decade of the twentieth century gave way to a more overt analysis of political and social subjects during the 1920's. Red Oleanders epitomizes the best work of this phase. Set in an imaginary town called Yakshapuri (in Hindu mythology, the god of wealth rules over the city of this name), the play presents a society in which the hoarding of gold demands strict discipline and a stratified class structure based on the suppression of human rights. Tagore himself explained its several layers of meaning later to his English readers: He had condemned the principle of organization for utilitarian purposes, which subjugates the individuality of people and turns "a multitude of men . . . into a gigantic system"; the passion of greed among colonial powers, "stalking abroad in the name of European civilization," and humiliating subject races; and the impersonal attitude in modern humanity that transforms the spirit of science into the tyranny of the machine, preferring mechanization over humanitarianism. The playwright had become increasingly troubled by the evils of twentieth century civilization and seemed to offer an alternative solution in the person of Nandini, the heroine of this play. Nandini symbolizes spontaneity, love, altruism, and the spirit of humanity in communion with nature. The rebellion she instigates against the dehumanizing and exploitative order succeeds; the invisible King of Yakshapuri comes out and joins forces with her to destroy his own Frankenstein after he sees the havoc it has wrought. Red Oleanders has been variously interpreted as a call to Indians to take up arms against the British government and as a socialistic revolt against the agencies of capitalism. Such flag-waving restrictions of its theme only constrict its essential beauty, which exists in its universal qualities, applicable to all societies.

    https://www.enotes.com/topics/rabindranath-tagore/critical-essays



    रवींद्र का दलित विमर्श-15

    मैं अछूत हूं,मुझे मंत्र का अधिकार नहीं है

    मैं अछूत हूं,मेरी कोई जाति नहीं है!..

    सभ्यता का संकटःफर्जी तानाशाह  बहुजन नायक नायिकाओं का सृजन और विसर्जन मनुस्मृति  राजनीति का सोशल इंजीनियरिंग है।

    भारत विभाजन के बाद बहुजनों की आस्था,उनके धर्म और उनके राजनीतिक स्वायत्तता के इन आंदोलनों को बाबा बाबियों के तानाशाह रंगीला दूल्हा दुल्हनों के हवाले करने की कारपोरेट सत्ता के ब्राह्मणतांत्रिक सत्ता राजनीति का हाथ रहा है। जिससे इन आंदोलनों के मार्फत दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नियंत्रण में रखकर मनुस्मृति राज बहाल किया जाये और बहुजनों के सामुदायिक जीवन और साझा संस्कृति की विरासत और उनके मनुष्यता के धर्म का हिंदुत्वकरण कर दिया जाये।

    पलाश विश्वास

    बंगाल के नबाव के दरबारी दो पूर्वज गोमांस की गंध सूंघने का आरोप में मुसलमान बना दिये गये थे तो रवींद्र के पूर्वज अछूत पीराली ब्राह्मण बन गये थे।

    नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले सामाजिक बहिस्कार की वजह से अपने बचपन की अस्पृश्यता यंत्रणा पर उन्होंने कोई दलित आत्मकथा नहीं लिखी लेकिन उनकी स्मृतियों में इस अस्पृश्यता का दंश है।

    नोबेल पुरस्कार पाने के बावजूद हिंदुत्व के पवित्र धर्मस्थलों में उनका प्रवेशाधिकार निषिद्ध रहा है।

    ब्रहामसमाजी टैगोर परिवार  जमींदारी और कारोबार के तहत कोलकाता में प्रतिष्ठित थे लेकिन भद्रलोक समाज से बहिस्कृत थे।

    गीताजंलि में इसीलिए उनका अंतरतम लालन फकीर का मनेर मानुष और उनका प्राणेर मानुष है और दैवी शक्ति की आराधना के बजाय विश्वमानव के अंत-स्थल में वे अपने ईश्वर को खोज रहे थे।

    अस्पृश्यता  के इसी दंश के चलते कोलकाता का जोड़ासांको छोड़कर वीरभूम के आदिवासी गांवों में उन्होंने शांतिनिकेतन को अपनी कर्मभूमि बनाया उसीतरह जैसे नव जागरण के मसीहा ईश्वर चंद्र विद्यासागर कोलकाता,भद्रलोक समाज और अपने परिजनों को भी छोड़कर आदिवासी गांव में अपना अंतिम जीवन बिताया।

    आदिवासी के अनार्य द्रविड़ सामुदायिक जीवन के लोकतंत्र को दोनों ने जीवन का उत्सव मान लिया और उसीमें समाहित हो गये।

    भविष्यद्रष्टा रवींद्रनाथ टैगोर ने गीतांजलि में जो लिखा वहीं नियति के साथ भारत का साक्षात्कार है और ये पंक्तियां भारत में सभ्यता के संकट की निर्मम अभिव्यक्ति हैंः

    हे मोर दुर्भागा देश,जादेर कोरेछो अपमान

    अपमाने होते हबे ताहादेर सबार समान

    मानुषेर परशेरे प्रतिदिन ठेकाइया दूरे

    घृणा करियाछो तुमि मानुषेर प्राणेर ठाकुरे

    (ओ मेरे अभागा देश,जिनका तुमने किया है अपमान

    अपपमान में ही होना होगा उन्हीं के समान

    मनुष्य के स्पर्श को प्रतिदिन तुमने ठुकराया है

    तुमने घृणा की है मनुष्य के प्राण में बसे ईश्वर से)

    इसी तरह उन्होंने 1936 में पत्रपुट कवितासंग्रह के 15वीं कविता में लिखाः

    आमि व्रात्य,आमि मंत्रहीन,

    देवतार बंदीशालाय

    आमार नैवेद्य पौंचालो ना!..

    हे महान पुरुष,धन्य आमि,देखेछि तोमाके

    तामसेर परपार होते

             आमि व्रात्य,आमि जातिहारा

          (मैं अछूत हूं,मुझे मंत्र का अधिकार नहीं है

           देवता के बंदीगृह में

          मैरा नैवेद्य पहुंचा नहीं!..

    हे महान पुरुष,मैं धन्यहूं,मैंने तुम्हें देखा है

         अंधकार के दूसरे छोर से

         मैं अछूत हूं,मेरी कोई जाति नहीं है!..


    नस्ली राष्ट्रवाद के फासीवादी चरित्र रवींद्र समय की युद्ध विध्वस्त पृथ्वी का ही सच नहीं है,यह दरअसल भारत का ज्वलंत सामाजिक यथार्थ का निरंतर समयप्रवाह है। भारत में अस्पृश्यता की मनुस्मृति व्यवस्था रंगभेदी फासीवाद से अलग नहीं है और यही भारत की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है जो असमानता और अन्याय की निरंकुश नरसंहार संस्कृति भी है।यही फासिज्म का राजकाज,सभ्यता का संकट है।

    भारत में ब्रिटिश राजकाज के दौरान मनुस्मृति के तहत निषिद्ध अधिकारों से वंचित बहुजन समाज को लगता था कि अंग्रेजों के भारत छोड़ने पर भारत में फिर सत्ता ब्राह्मणतांत्रिक वर्ण वर्ग वर्चस्व की हो जायेगी तो रवींद्र नाथ अपनी मृत्यु से पहले अंग्रेजों के भारत छोड़ जाने के से पहले इस नस्ली राष्ट्रवाद के हिंदुत्व अभ्युत्थान की आशंका से बेहद चिंतित थे,जिसकी हम चर्चा कर चुके हैं।

    सभ्यता का संकट शीर्षक उनके मृत्युपूर्व आलेख में भारत में सत्ता हस्तांतरण के बाद मनुष्यता के संकट में भारत के विखंडन की उन्होंने विस्तार से चर्चा की है।

    भारत विभाजन की त्रासदी में अखंड भारत और विखंडित भारत में हिंसा और घृणा का सिलसिला अभी जारी है और यही  हिंसा और घृणा की संस्कृति ही भारत में सत्ता की राजनीति है,जिसके शिकार दलित,पिछड़े,मुसलमान और तमाम विधर्मी लोग, अनार्य द्रविड़ और दूसरे अनार्य जनसमुदाय, आदिवासी और मजबूत होती पितृसत्ता के शिकंजे में फंसी स्त्री,तमाम मेहनतकश लोग,किसान और मजदूर हैं।

    रवींद्र नाथ ने भारतीय जनता के सामाजिक जीवन को धार्मिक माना है और इस धर्म को उन्होंने मनुष्यता का धर्म माना है जो सत्ता वर्ग के रंगभेदी अस्मिता आधारित विशुद्धता का नस्ली धर्म नहीं है।

    वे अंत्यज अछूत और बहुजनों की आस्था और बहुजन समाज की बात ही कर रहे थे। वे आस्था की स्वतंत्रता और आस्था के लोकतंत्र की बात कर रहे थे।

    सत्ता हस्तांतरण के बाद सत्ता के वर्ग वर्ण वर्चस्व के लिए बहुजनों के राजनीतिक सामाजिक धार्मिक आर्थिक विघटन बिखराव विस्थापन दमन उत्पीड़न का सबसे भयंकर सच अगर शरणार्थी समस्या और आदिवासियों का सफाया अभियान है तो बहुजन राजनीति और धर्म आस्था में भी सत्ता नियंत्रित बाबा बाबियों के अभ्युत्थान मार्फत हिंदुत्व का यह पुनरुत्थान उत्सव है।

    बहुजन राजनीति भी बहुजनों के सामुदायिक जीवनयापन और साझा विरासत की संस्कृति के विरुद्ध यही बाबा बाबी संस्कृति में निष्णात है और इसी वजह से सत्ता का वर्ग वर्ण वर्चस्व निरंकुश ब्राह्मणतंत्र में निष्णात है,जिसकी आशंका बहुजन पुरखों मसलन महात्मा ज्योतिबा फूले और गुरुचांद ठाकुर के साथ साथ पीराली अछूत ब्राह्मण ब्रह्मसमाजी कवि रवींद्रनाथ को थी।

    गौरतलब है कि सत्ता वर्ग के तमाम संगठन और उनकी रंगभेदी नस्ली फासीवादी राजनीति संस्थागत है और वही संगठित राष्ट्र व्यवस्था का पर्याय है तो बहुजन समाज में संस्थागत संगठन के विघटन और बिखराव के तहत धार्मिक राजनीतिक बाबा बाबियों को खड़ा करके,उन्हें कठपुतलियां बनाकर बहुजन समाज को गुलाम बनाये रखने का खेल ही अस्मिता निर्भर धर्मांध अंध राष्ट्रवादी राजनीतिक वर्चस्व का समीकरण है।

    इन्हें स्थापित करने ,इनके महिमामंडन करने में यही राजनीति काम करती है और फिर रस्म अदायगी के बाद इन्हीं प्रतिमाओं का सार्वजनिक विसर्जन का रिवाज है।समूचा प्रचारतंत्र महिमामंडन,प्राण प्रतिष्ठा और विसर्जन उत्सव में लगा रहता है। विसर्जन के समयभी ढोल नगाड़े पीटने का सार्वजनिक विजयोत्सव का महिषासुर वध है।यही कुल मिलाकर भारत में समता,न्याय और कानून का राज है।

    धर्म और राजनीति में सत्ता समर्थित तमाम महानायकों महानायिकाओं और बाबा बाबियों के प्रकरण में यही वैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है।

    पवित्र धर्मस्थलों और संस्थागत धार्मिक संस्थानों में प्रवेशाधिकार वंचित जनसमुदाओं की आस्था और सामुदायिक जीवन के साथ साथ समान मताधिकार के लोकतंत्र में वंचित दलित बहुजन जनसमुदायों के लिए तमाम डेरे,मठ और ऐसे ही वैकल्पिक धार्मिक संगठन,पंथ उनकी राजनीतिक ताकत के आधार भी हैं,जिसका नियंत्रण आजादी से पहले उन्हीं के हाथों में हुआ करता था और यही उनकी राजनीतिक धार्मिक स्वायत्तता का आधार था।

    बंगाल का मतुआ और कर्नाटक का लिंगायत धर्म इसके उदाहरण हैं तो पंजाब में सिख समाज के सत्ता वर्गीय अकालियों के मुकाबले यही फिर डेरा संस्कृति है तो बाकी देश में तमाम मठ और बाबा बाबियों के अखाड़े इसीतरह के  वैकल्पिक परिसर हैं।

    बंगाल में मतुआ धर्म ब्राह्मण धर्म के खिलाफ बहुजनों का चंडाल आंदोलन रहा है तो कर्नाटक में लिंगायत आंदोलन बहुजनों का ब्राह्णधर्म के खिलाफ सामाजिक सशक्तीकरण आंदोलन रहा है।

    जैसे तमिलनाडु का ब्राह्मणधर्म संस्कृति विरोधी द्रविड़ आंदोलन।

    देशभर में बंगला के चैतन्य महाप्रभू और पंजाब के गुरुनानक के सुधार आंदोलनों के तहत सामंती दैवी सत्ता के विरुद्ध मनुष्यता के धर्म के तहत साधुओं, संतों, पीर, फकीरों, बाउलों और समाज सुधारकों के ये आंदोलन बहुजन पुरखों के नेतृत्व में बहुजनों के राजनीतिक धार्मिक स्वयायत्ता के आंदोलन रहे हैं।

    इनमें आदिवासी धर्म और राजनीति के स्वायत्तता आंदोलन और आदिवासी किसान जनविद्रोह की परंपरा भी है,जो सामंती और साम्राज्यवादी सत्ता के साथ साथ ब्राह्मणतंत्र के नस्ली वर्चस्व और मनुस्मृति विधान की असमानता और अन्याय के विरुद्ध थे।

    भारत विभाजन के बाद बहुजनों की आस्था,उनके धर्म और उनके राजनीतिक स्वायत्ता के इन आंदोलनों को बाबा बाबियों के तानाशाह रंगीला दूल्हा दुल्हनों के हवाले करने की कारपोरेट सत्ता के ब्राह्मणतांत्रिक सत्ता राजनीति का हाथ रहा है।

    जिससे इन आंदोलनों के मार्फत दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नियंत्रण में रखा जाये और बहुजनों के सामुदायिक जीवन और साझा संस्कृति की विरासत और उनके मनुष्यता के धर्म का हिंदुत्वकरण कर दिया जाये।

    इसी राजनीति के तहत अकाली अब पूरी तरह संघ परिवार के शाखा संगठन में तब्दील हैं तो महात्मा गौतम बुद्ध,महात्मा महावीर,गुरुनानक, महात्मा ज्योतिबा फूले,बाबासाहेब भीमारव अंबेडकर,नारायण स्वामी,हरिचांद गुरुचांद,अयंकाली,पेरियार से लेकर मान्यव कांशीराम के तमाम आंदोलनों का हिंदुत्वकरण उसीतरह हो गया जैसे कि तमाम मठों,जिनमें गोरखपुर का मठ भी शामिल है,तमाम डेरों,मतुआ,लिंगायत और द्रविड़ आंदोलनों का हिंदुत्वकरण हुआ है और इससे बीरसा मुंडा का आंदोलन भी अछूता नहीं है।

    फर्जी तानाशाह  बहुजन नायक नायिकाओं का सृजन और विसर्जन सत्ता राजनीति का सोशल इंजीनियरिंग है।

    हमारे बेहद प्रिय युवा मित्र अभिषेक श्रीवास्तव ने राम रहीम प्रकरण पर फेसबुक पर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी,जिस पर अलग से चर्चा करने की जरुरत थी।भारत की परिकल्पना ही दरअसल रवींद्र का दलित विमर्श है।

    लोक और जनपदों में रचे बसे भारत में बहुलता,विविधता,सहिष्णुता के लोकतंत्र में मनुष्यों की आस्था और धर्म,खासतौर पर सामंती वर्ण वर्ग वर्चस्वी सत्ता वर्ग के संरक्षित परिसर से बहिस्कृत और अछूत अंत्यज बहुजन समाज के सामाजिक यथार्थ के सिलसिले में आस्था और धर्म के अधिकार से वंचित समुदाओं का सच ही भारत में बहुजन आंदोलन के बिखराव और राजनीति में सवर्ण राजनीति के हित में प्रायोजित  दूल्हा दुल्हन बारात संस्कृति को समझने के लिए अभिषेक का यह मंतव्य गौरतलब है।

    अभिषेक ने लिखा हैः

    इन तमाम बाबाओं के अपने-अपने पंथ हैं। ये पंथ हिंदू धर्म में बहुलता का बायस रहे हैं। द्वैतवाद, अद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद, गोरख, कबीर, नानक, सूफ़ी, सांख्‍य, अघोर... गिनते जाइए। जितनी शाखाएं, उतने बाबा। ये रंग-बिरंगे पंथ हिंदू धर्म को मोनोलिथ यानी एकांगी नहीं बनने देते। जो जनता इन पंथों के बाबाओं की भक्‍त है, वह स्ट्रिक्‍टली वैष्‍णव या शैव नहीं है। उसकी धार्मिक आस्‍थाओं में राम-कृष्‍ण या अन्‍य अवतार उस तरह से नहीं आते जैसे एक सामान्‍य शहरी सवर्ण हिंदू के मानस में रचे-बसे होते हैं। इसीलिए इन पंथों के बाबा लोग भले पंथ के नाम पर राजनीति करते हों, लेकिन इनके सामान्‍य गंवई निम्‍नवर्गीय अवर्ण भक्‍त कर्मकांड के ऊपर व्‍यक्तिगत आचरण को जगह देते हैं। सौ में दस भले हिंसा करते हैं लेकिन बाकी नब्‍बे ऐसी घटनाओं के बाद टूट जाते हैं।

    मुझे लगता है कि हिंदू धर्म के एकांगी बनने की राह में जो आस्‍थाएं रोड़ा हैं, वे ही आरएसएस के निशाने पर हैं। निशाने का मतलब गलत न समझिएगा। पंथ-प्रधान का भ्रष्‍ट होना एक सामान्‍य बात है लेकिन उन्‍हीं पंथ-प्रधानों को कुकृत्‍यों की सज़ा मिलना बेशक एक स्‍कीम का हिस्‍सा हो सकता है जो आरएसएस की वैचारिकी में फिट नहीं बैठते। जो लोग दो दिन से डिमांड कर रहे हैं कि ऐसे तमाम बाबाओं की नकेल कसी जाए, वे शायद व्‍यापक तस्वीर को मिस कर रहे हैं। आप चेहरों को भूल जाइए, तो उनके पीछे के तमाम पंथ दरअसल आरएसएस का एंटीडोट हैं/थे/होने की क्षमता रखते हैं। मैं इसमें गोरक्षनाथ मठ की परंपरा को भी गिनता हूं। रामदेव और रविशंकर सरीखे तो सरेंडर किए हुए धार्मिक कारोबारी हैं, वे इस नैरेटिव में नहीं आते।



    रवींद्र का दलित विमर्श-16

    आंतरिक उपनिवेश में नस्ली नरसंहार के प्रतिरोध में आदिवासी अस्मिता के झरखंड आंदोलन के दस्तावेजों का अनिवार्य पाठ

    भारतमाता का दुर्गावतार नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद का प्रतीक है तो महिषासुर वध आदिवासी भूगोल का सच

    দুই ছিল মোর ভুঁই, আর সবই গেছে ঋণে। বাবু বলিলেন, 'বুঝেছ উপেন? এ জমি লইব কিনে।' কহিলাম আমি, 'তুমি ভূস্বামী, ভূমির অন্ত নাই - চেয়ে দেখো মোর আছে বড়জোর মরিবার মতো ঠাঁই। শুনি রাজা কহে, 'বাপু, জানো তো হে, করেছি বাগানখানা, পেলে দুই বিঘে প্রস্থে ও দিঘে সমান হইবে টানা - ওটা দিতে হবে।'

    पलाश विश्वास


    দুইছিল মোর ভুঁই, আর সবই গেছে ঋণে। বাবু বলিলেন, 'বুঝেছ উপেন? এ জমিলইব কিনে।' কহিলাম আমি, 'তুমি ভূস্বামী, ভূমির অন্ত নাই - চেয়ে দেখো মোর আছে বড়জোর মরিবার মতো ঠাঁই। শুনি রাজা কহে, 'বাপু, জানো তো হে, করেছি বাগানখানা, পেলে দুইবিঘে প্রস্থে ও দিঘে সমান হইবে টানা - ওটা দিতে হবে।'

      (दो बीघा जमीन ही बची है मेरी,बाकी सारी जमीन हुई कर्ज के हवाले।बाबू बोले,समझे उपेन?उसे मेरे हवाले करना होगा।यह जमीन मैं खरीद लुंगा।मैने कहा,तुम हो भूस्वामी,तुम्हारी भूमि का अंत नहीं।मुझे देखो,मेरी मौत के बाद शरण के लिए इतनी ही जमीन बची है।सुनकर राजा बोले-बापू,जानते हो ना,बागान तैयार किया है मैंने,तुम्हारी दो बिघा जमीन शामिल कर लूं तो लंबाई चौड़ाई में होगा बराबर,उसे देना होगा।)

    राष्ट्रीयताओं के दमन और आदिवासी भगोल में अनंत बेदखली अभियान और भारतीय किसानों की अपनी जमीन छिन जाने के बारे में रवींद्र नाथ की लिखी कविता दो बिघा जमीन आज भी मुक्तबाजारी कारपोरेट हिंदुतव की नरसंहारी संस्कृति का सच है।यही फासिज्म का राजकाज और राष्ट्रवाद दोनों है।

    हो सकें तो विमल राय की रवींद्र नाथ की कविता दो बीघा जमीन पर केंद्रित फिल्म को दोबारा देख लें।

    भारत में राष्ट्रीयता का मतलब हिंदुत्व का नस्ली फासीवादी राष्ट्रवाद और उसके कारपोरेट साम्राज्य के सैन्यतंत्र के अश्वमेधी का महिमामंडन है।

    अनार्य द्रविड़ दलित शूद्र आदिवासी स्त्री अस्मिताओं का विमर्श इस राष्ट्रवाद के विरुदध है तो रवींद्र के राष्ट्रवाद विरोध बौद्धमय भारत के मनुष्यता का धर्म है और दलित विमर्श के तहत अस्पृश्यता विरोधी चंडाल आंदोलन भी,जो अपने आप में आदिवासी किसान जनविद्रोह का परिणाम है।

    राष्ट्रवाद के विरोध का सिलसिला रवींद्र के त्रिपुरा पर लिखे 1885 में प्रकाशित  उपन्यास राजर्षि से लेकर मृत्युपूर्व उनके लिखे निबंध सभ्यता के संकट तक जारी रहा है।वे जब बहुलता,विविधताऔर सहिष्णुता के जनपदीयलोकगणराज्यों की परंपरा में मनुष्यता की विविध धाराओं के महामिलन तीर्थ भारततीर्थ बतौर नये भारत की परिकल्पना कर रहे थे, तब उनके लिए फासीवादी नाजी नस्ली राष्ट्रवाद के परिदृश्य में भारत में हिंदुत्व के नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद के सामंती साम्राज्यवादी हिंदुत्व पुनरूत्थान का सच सबसे भयंकर था।

    तब तक राष्ट्र के अंतर्गत राष्ट्रीयताओं के दमन के नजरिये से राष्ट्रीयताओं की समस्या पर कम से कम भारत में कोई चर्चा नहीं हुई है।

    रूस की चिट्ठी में,चीन और जापान के प्रसंग में उऩ्होंने अंध राष्ट्रवाद की चर्चा तो की है लेकिन राष्ट्र के अंतर्गत राष्ट्रीयता के दमन की नरसंहार संस्कृति  की चर्चा नहीं की है।बल्कि रूस में विविध राष्ट्रीयताओं के विलय के साम्यवाद की उन्होंने प्रशंसा की है।भारतीय किसानों और कृषि संकट के संदर्भ में दलितों की दशा का चित्रण भी उन्होंने शुरु से लेकर आखिर तक की है।

    वास्तव में रवींद्र नाथ भारतीय सभ्यता और संस्कृति के जिन विविध बहुल घटकों के विलय के कथानक को अपनी रचनाधर्मिता का केंद्रीय विषय बनाया है,वह राष्ट्रीयताओं की समस्या ही है और फर्क सिर्फ इतना है कि रवींद्र नाथ इन राष्ट्रीयताओं के समन्वय और सहअस्तित्व की बात कर रहे थे।

    लेनिन,स्टालिन और माओ त्से तुंग की तरह राष्ट्रीयताओं की समस्या मानकर सभ्यता और मनुष्यता की रवींद्रनाथ ने चर्चा नहीं की है।

    वास्तव में फासीवादी राष्ट्रवाद के उनके निरंतर विरोध राष्ट्रीयताओं की राष्ट्र के नस्ली वर्चस्व के अंतर्गत राष्ट्रीयताओे की इसी समस्या को ही रेखांकित करता है और इसीलिए फासिस्ट मनस्मृति राष्ट्रवादियों को उनके साहित्य से उसी तरह घृणा है जैसे भारत के अवर्ण अनार्य द्रविड़ अल्पसंख्यका  कृषि और प्रकृति से जुड़े जन समुदाओं और मेहनतकशों से।

    मुक्तबाजारी अर्थव्वस्था इन जन समुदायों की नरसंहारी संस्कृति पर आधारित है तो कारपोरे टहिंदुत्व का फासीवादी राष्ट्रवाद का आधार भी यही है।मनुस्मृति विधान का नस्ली वर्चस्व,आदिवासी भूगोल का दमन और अस्पृश्यता का सारा तंत्र यही है।

    भारत में राष्ट्रीयताओं की समस्या पर संवाद निषिद्ध है तो जल जंगल जमीन नागरिकता आजीविका समानता न्याय किसानों,दलितों.शूद्रों,पिछड़ों,मुसलमानों और विधर्मियों, हिमालयक्षेत्र की आदिवासी और गैर आदिवासी राष्ट्रीयताओं,कश्मीर और आदिवासी भूगोल के नागरिक मानवाधिकार के पक्ष में आवाज उठाने वाले तमाम लोगों अरुंधति राय, सोनी सोरी, नंदिता सुंदर, साईबाबा से लेकर हिमांशु कुमार तक राष्ट्रवादियों के अंध राष्ट्रवाद के तहत राष्ट्रद्रोही हैं और इसके विपरीत मनुष्यता के विरुद्ध तमाम युद्ध अपराधी राष्ट्रनायक महानायक हैं,जो बंकिम की राष्ट्रीयता के धारक वाहक  हिंदुत्व के मनुस्मृति विधान के भगवा झंडेवरदार हैं।

    इसलिए हमने कल नेट पर उपलब्ध राष्ट्रीयता की समस्या पर उपलब्ध सारी सामग्री शेयर की है और आदिवासियों के दमन उत्पीड़न और सफाया के दस्तावेज भी शेयर किये हैं।

    भारत में राष्ट्रीयता समस्या को लेकर रवींद्र के दलित विमर्श को समझने के लिए कामरेड एके राय के आंतरिक उपनिवेश के विमर्श को समझना जरुरी है और जयपाल सिंह मुंडा  का आदिवासी अस्मिता विमर्श भी।

    इस सिलसिले में सत्ता राजनीति से जुड़ने से पहले शिबू सोरेन,विनोद बिहारी महतो और ईएन होरो के झारखंड आंदोलन से संबंधित दस्तावेज भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। सत्ता में निष्णात होने से पहले आदिवासी आंदोलन के इतिहास को दोबारा पलटकर देखना भारत में राष्ट्रीयता की समस्या को समझने में मददगार हो सकता है।

    प्रतिरोध के सिनेमा के लिए बहुचर्चित युवा फिल्मकार संजय जोशी ने डाक से वीरभारत तलवार संपादित नवारुण पब्लिशर्स की तरफ से प्रकाशित पुस्तक झारखंड आंदोलन के दस्तावेज खंड 1 भेजी है।264 पेज की यह पुस्तक भारत में राष्ट्रीयता के राष्ट्रीय प्रश्न को समझने के लिए एक अनिवार्य पाठ है,लेकिन इसकी कीमत जन संस्करण 299 रुपये और पुस्तकालय संस्करण 549 रुपये हैं जो हिंदी पुस्तकों की कीमत के हिसाब से बराबर है लेकिन आम जनता तक इस पुस्तक को उपलब्ध कराने में यह कीमत कुछ ज्यादा है।

    हमने पत्रकारिता की शुरुआत 1980 में धनबाद से ही की और झारखंड आंदोलन के तहत राष्ट्रीयताओं की समस्या पर केंद्रित विमर्श में उस दौरान हमारी भी सक्रिय भागेदारी रही है।कामरेड एक राय,शिबू सोरेन और विनोद बिहारी महतो के साथ साथ इस पुस्तक में शामिल आदिवासियों के राष्ट्र की समस्या के लेखक सीताराम शास्त्री से हमारा निरंतर संवाद रहा है।

    हमारे दैनिक आवाज में शामिल होने से पहले कवि मदन कश्यप वहां संपादकीय में थे और तब हमने अंतर्गत का एक अंक राष्ट्रीयता की समस्या  और झारखंड आंदोलन पर निकाला था।

    हमारे धनबाद आने से पहले वीर भारत तलवार भी दैनिक आवाज में थे  और हमारे ज्वाइन करने से पहले वे आवाज छोड़ चुके थे लेकिन तब भी  वे धनबाद में थे और  शालपत्र निकाल रहे थे।वीरभारत तलवार की ज्यादा अंतरंगता उपन्यासकार (गगन घटा गहरानी) मनमोहन पाठक के साथ थी।

    वीर भारत तलवार लगातार झारखंड आंदोलन से जुड़े रहे हैं और झारखंडी विमर्श के वे निर्माता भी रहे हैं।इस पुस्तक में शामिल तमाम दस्तावेज या तो उन्होंने खुद अनूदित किये हैं या उन्हें शालपत्र में प्रकाशित किया है, इसलिए इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता के बारे में किसी तरह के संदेङ का कोई अवकाश नहीं है।

    सरायढेला.धनबाद के पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा केंद्रीय सम्मेलन में मैं भी मौजूद था।इसी सम्मेलन में झारखंड आंदोलन दो फाड़ हो गया था और एके राय से शिबू सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा अलग हो गया था।

    एके राय से अलगाव के बाद झारखंड आंदोलन का लगातार बिखराव और विचलन होता रहा है और अलग राज्य बनने के बाद झारखंड आंदोलन सिरे से लापता है।नये राज्य में एके राय के विचारों के लिए कोई जगह नहीं है।

    विनोद बिहारी महतो दिवंगत हैं और शिबू सोरेन सिरे से बदल गये हैंं।

    पुस्तक की भूमिका में वीर भारत तलवार ने सही लिखा हैः

    अगर आप झारखंड और आदिवासियों के नाप पर राजनीति करने वाले संगठनों और पार्टियों के उन पुराने दस्तावेजों को देखें ,जिन्हें इन पार्टियों ने झारखंड आंदोलन के दौरान स्वीकृत किया था ,तो आप हैरान हो जायेंगे।खासकर झारखंड मुक्तिमोर्चा और आजसू के उस समय के पार्टी कार्यक्रम और घोषणापत्र को देखकर किसी के भी  मन में यही सवाल उठेगा कि क्या यही झारखंड मुक्ति मोर्चा है? यही आजसू है?...झारखंड आंदोलन के दौरान इन पार्टियों ने जो कुछ कहा और झारखंड बन जाने के बाद ,सत्ता में रहते हुए इन्होंने जो कुछ किया,इन दोनों के बीच,इनकी कथनी और करनी के बीच,क्या कोई संबंध है?..

    इस पुस्तक में राज्य पुनर्गठन आयोग को 1954 में झारखंड पार्टी के जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में दिया गया मेमोरेंडम है तो 1973 में झारखंड पार्टी के एनई होरो के नेतृ्त्व में भारत के प्रधान मंत्री को दिया गया मेमोरंडम भी है।

    भारत में राष्ट्रीयताओं की समस्या को समझने के लिए बेहद जरुरी दस्तावेज सीताराम शास्त्री ने तलवार के सहयोग से तैयार बंगाल के कामरेडों को समझाने के लिए लिखा। यह दस्तावेज- भारत में राष्ट्रीय प्रश्न और आदिवासियों के राष्ट्र की समस्या इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।तो आदिवासी विमर्श और राष्ट्रीयता की समस्या पर वीरभारत का आलेख झारखंडः क्या,क्यों और कैसे? भी अनिवार्य पाठ है।बाकी सांगठनिक दस्तावेजो के अलावा कामरेड एके राय के तीन दस्तावेज इस पुस्तक में शामिल किये गये हैं।1.भारत में आंतरिक उपनिवेशवाद और झारखंड की समस्या 2.भारत में असमान विकास तथा उत्पीड़ित जातियों का शोषण 3.झारखंड आंदोलन की नई दिशा और झारखंडी चरित्र

    ऋषि बंकिमचंद्र बांग्ला सवर्ण राष्ट्रवाद के साहित्य सम्राट हैं तो हिंदुत्व के नस्ली फासीवादी राष्ट्रवाद की जड़ें उनके आनंदमठ, दुर्गेश नंदिनी जैसे आख्यान में हैं। इतिहास में हिंदुत्व के नस्ली वर्चस्व को महिमामंडित करने वाले बंकिम के वंदे मातरम साहित्य के खिलाफ दो बीघा जमीन पर खड़े हैं रवींद्रनाथ और उनका सामाजिक यथार्थ, उनका इतिहास बोध,,उऩका बौद्धमय भारत इस नस्ली राष्ट्रवाद के खिलाफ मुकम्मल दलित विमर्श है तो यह आदिवासी भूगोल के दमन और उत्पीड़न पर आधारित फासीवादी नस्ली सैन्य राष्ट्र और आंतरिक उपनिवेशवाद का सच भी है।

    आर्यावर्त के भूगोल से बाहर बाकी बचा भारत अनार्य,द्रविड़ और दूसरी राष्ट्रीयताओं का भूगोल है और महाभारत का इंद्रप्रस्थ उसके दमन का केंद्र है।

    रवींद्र के दलित विमर्श बहुलता ,विविधता और सहिष्णुता के जनपदीय लोक गणराज्यों से बने स्वदेश के हिंद स्वराज की कथा है,जहां गांधी का दर्शन और रवींद्र का दलित विमर्श पश्चिमी उस फासीवादी नस्ली राष्ट्रवाद के विरुद्ध एकाकार है जो नस्ली सत्ता वर्चस्व के लिए नरसंहारी संस्कृति के प्रतिरोध की दो बिघा जमीन भी है।

    सवर्ण विमर्श में राष्ट्र के सामंती साम्राज्यवादी चरित्र पर,राष्ट्रीयताओं की समस्या पर घनघोर संवाद होने के बावजूद सत्ता वर्ग के नस्ली वर्चस्व पर आधारित राष्ट्र और राष्ट्रवाद के संदर्भ और प्रसंग में सिरे से सन्नाटा है।

    दलित विमर्श इस नस्ली वर्चस्व के विरोध में है और चूंकि बहुजन कृषि और प्रकृति से जुड़े तमाम जनसमुदायों की जड़ें आ्रर्यों की वैदिकी सभ्यता से अलग अनार्य द्रविड़ और अन्य अनार्य नस्लों, सभ्यताओं और राष्ट्रीयताओं में है,जिनके उत्तराधिकारी आज के आदिवासी है तो रवींद्र के इस दलित विमर्श की समझ के लिए आदिवासी अस्मिता की समझ भी जरुरी है।

    इसलिए हमने इस चर्चा में इससे पहले रांची से प्रकाशित चार पुस्तकों की चर्चा की थी।इन चार पुस्तकों में आदिवासी अस्मिता पर भारत की संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा ने आवाज उठाने वाले जयपाल सिंह मुंडा के लेखों और भाषणों का संग्रह (अंग्रेजी में) अश्विनी कुमार पंकज संपादित आदिवासीडम भी है।

    गौरतलब है कि किसी एक राष्ट्रीयता के वर्चस्व पर आधारित पश्चिमी राष्ट्र दूसरी राष्ट्रीयताओं के दमन का तंत्र है और उसके इसी फासीवादी नाजी साम्राज्यवादी चरित्र के खिलाफ गांधी और रवींद्र राष्ट्रवाद के खिलाफ खड़े हो गये।

    जर्मनी,जापान और इटली के फासीवादी नाजी समय के बारे में सबको कमोबेश मालूम है।इस फासीवादी नाजी कालखंड से भी पहले ब्रिटिश,फ्रांसीसी,पुर्तगीज,स्पेनीश साम्राज्यवाद ने नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के तहत उपनिवेशों में नस्ली नरसंहार के जरिये राष्ट्रीयताओं का सफाया किया है।

    अमेरिका,लातिन अमेरिका के मूलनिवासियों का सफाया इस नस्ली नरसंहार का वीभत्स इतिहास है और नई दुनिया के खोज के तमाम महानायकों मसलन कोलंबस और वास्कोडिगामा के हाथ लाखों मूलनिवासियों के कत्लेआम के खून से लहूलुहाऩ हैं और नस्ली इतिहासकारों के आख्यान में वही महिमामंडित पाठ्यक्रम है।

    अमेरिका में लोकतंत्र के मूल्यों के खात्मे के सात उसी रंगभेदी नस्ली नरसंहार कार्यकर्म का पुनरूत्थान अमेरिका साम्राज्यवाद का मुक्तबाजारी बहुराष्ट्रीय पूंजी का चेहरा है।जिसके साथ हुंदुत्व के नस्ली राष्ट्रवादियों की सत्ता का युद्धक गठजोड़ है।

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की शुरुआत  1857 की क्रांति से होती है और उसमें 1757 के तुरंत बाद शुरु आदिवासी शूद्रों दलितों के चुआड़ विद्रोह की कथा नहीं है जिसकी कोख से अंग्रेजी हुकूमत को बनाये रखने के लिए स्थायी भूमि बंदोबस्त के तहत जमींदारियों का सृजन हुआ और ब्रिटिश हुकूमत के साथ जमींदारियों के सवर्ण वर्चस्व के विरोध में आदिवासी किसानों का सामंतवादविरोधी साम्राज्यवाद विरोधी महासंग्राम का सिलसिला भी इसीके साथ शुरु हुआ और शुरु हुआ  भारत में अनार्य द्रविड़ और दूसरी अनार्य राष्ट्रीयताओं के दमन के सैन्य राष्ट्रवाद का निर्माण बंकिम के आनंदमठ  के साथ।

    भारत के आदिवासी खुद को असुरों के वंशज कहते हैं और दुर्गा का मिथक रचा गढ़ा गया आनंदमठीय नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के तहत जो सत्ता वर्ग के खिलाफ राष्ट्रीयताओं के महासंग्राम में आदिवासी असुरों का वध कार्यक्रम है।

    हिंदुत्व के फासवीवादी पुनरूत्थान की जमीन आनंदमठ है और भारतामाता का दुर्गावतार भी यही आनंदमठीय राष्ट्रवाद का आंतरिक उपनिवेशवाद है।

    राष्ट्रीयताओं के दमन का इतिहास  इसलिए जर्मनी,इटली या जापान तक सीमाबद्ध नहीं है और न साम्राज्यवादी पश्चिमी राष्ट्रों के दनियाभर में फैले उपनिवेशी की ही यह व्यथा कथा है।

    साम्यवादी राष्ट्रों में भी राष्ट्रीयताओं के दमन का इतिहास है।

    सोवियत संघ और चीन में भी.सोवियत संघ का विघटन राष्ट्रीयताओं के गृहयुद्ध का परिणाम है तो चीन में राष्ट्रीयता के दमन को तिब्बत के सच के संदर्भ में समझा जा सकता है।जबकि लेनिन,स्टालिन और माओ त्से तुंग जैसे राष्ट्र नेताओं ने राष्ट्रीयता की समस्या के समाधान के लिए अपनी तरफ से लगातार कोशिशें की हैं और सच यह है कि साम्यवादी राष्ट्रों ने राष्ट्रीयता के यथार्थ को मानकर इस समस्या के समाधान की लगातार कोशिश की है लेकिन पश्चिमी राष्ट्रों में ऐसा कोई विमर्श नहीं चला।

    पश्चिम के माडल पर निर्मित भारतीय राष्ट्र में भी राष्ट्रीयताओं के राष्ट्रीय प्रश्न को संबोधित करने का प्रयास नहीं हुआ और गांधी और रवींद्रनाथ को पश्चिम के इसी राष्ट्रवाद से विरोध था।

    गौरतलब है कि झारखंड आंदोलन के साम्यवादी नेता कामरेड एक राय ने इसी नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद को आतंरिक उपनिवेशवाद कहा है और मैंने भी अपने उपन्यास अमेरिका से सावधान में साम्राज्यवादी मुक्तबाजार की चुनौती के संदर्भ में लगातार इस आंतरिक साम्राज्यवाद की चर्चा की है।

    राष्ट्रीयता के इस राष्ट्रीय प्रश्न को समझने के लिए हमने मुक्तबाजार के पहले  शहीद शंकर गुहा नियोगी के निर्माण और संघर्ष की राजनीति की चर्चा की है और झारखंड राज्य की परिकल्पना में झारखंड के आंदोलनकारियों की अर्थव्यवस्था,जल जंगल जमीन राष्ट्रीय संसाधन खनिज संपदा और औद्योगीकरण के बारे में आंदोलन की रणनीति भी कमोबेश उसी निर्माण और संघर्ष की राजनीति पर आधारित है।

    बंगाल में सार्वजनीन दुर्गोत्सव के वंदेमातरम राष्ट्रवाद के तहत ही महिषासुर वध के मिथक का भारतीय नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक दुर्गावतार बनाया गया है।

    ब्रिटिश हुकूमत,स्थाई भूमि बंदोबस्त के जरिये किसानों की जल जंगल जमीन आजीविका और रोजगार से बेदखली के 1757 से शुरु चुआड़ विद्रोह के दमन में ही दुर्गावतार के वंदेमातरम राष्ट्रवाद के हिंदुत्व पुनरुत्थान के बीज हैं तो सैन्य राष्ट्रवाद के विमर्श के मुकाबले रवींद्र के दलित विमर्श की अनार्य द्रविड़ जमीन बंगाल में सामंती व्यवस्था के संकट के दौरान जमींदारी तबके के जर्मनी से जुड़े जमींदारों के हित में किसानों के हक हकूक के खिलाफ मनुस्मृति विधान के पक्ष स्वेदशी आंदोलन और अनुशीलन समिति के सवर्ण राष्ट्रवाद के दौरान दुर्गा के महिषमर्दिनी मिथक को राष्ट्रवाद बना देने के हिंदुत्व उपक्रम को समझने के लिए चुआड़ विद्रोह के भूगोल इतिहास को समझना जरुरी है।

    गौरतलब है कि आदिवासी,शूद्र दलित शासकों के  चुआड़ विद्रोह भारतीय विमर्श और भारतीय इतिहास में किसी भी स्तर पर दर्ज नहीं है और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनार्य असुरों के आदिवासी किसान जनविद्रोहों को कभी शामिल ही नहीं किया गया है और इस इतिहास में वंदेमातरम के अखंड राष्ट्रवाद के सिवाय बाकी राष्ट्रीयताओं के वजूद को सिरे से खारिज कर दिया गया है,जबकि रवींद्र की भारत परिकल्पना में इन राष्ट्रीयताओं के लोक गणराज्यों के विलय का कथानक है।

    चुआड़ विद्रोह,संथाल विद्रोह और मुंडा विद्रोह से लेकर बंकिम के आनंदमठ में बहुचर्चित संन्यासी विद्रोह और नील विद्रोह के भूगोल में बिहार झारखंड ओड़ीशा छत्तीसगढ़ आंध्र मध्यप्रदेश और बंगाल के आदिवासी भूगोल नस्ली वर्चस्व के इस राष्ट्रवाद की सामंती संरचना और ब्रिटिश साम्रज्यवाद के खिलाफ भारतीय अनार्य द्रविड़ राष्ट्रीयताओं के महासंग्राम का इतिहास है जो भारत के मुक्ति संग्राम के सवर्ण नस्ली विमर्श में कहीं शामिल नहीं है।

    इसीलिए भारतमाता का दुर्गावतार नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद का प्रतीक है तो महिषासुर वध आदिवासी भूगोल का सच



    रवींद्र का दलित विमर्श-सत्रह

    नस्ली वर्चस्व का परमाणु राष्ट्रवाद अब हाइड्रोजन बम है

    महात्मा फूले की गुलामगिरि  और रवींद्र नाथ के जूता व्यवस्था का आंतरिक उपनिवेशवाद का सामाजिक यथार्थ एक है

    गोहत्या पर सजा और मनुष्य की हत्या पर बिना प्रायश्चित्त सामाजिक प्रतिष्ठा के हिंदुत्व पर रवींद्रनाथ का प्रहार

    राष्ट्रीयताओं की विविधता बहुलता के लोकतांत्रिक ढांचा में ही देश बचता है और निरंकुश वर्चस्व की सत्ता देश तोड़ती है

    पलाश विश्वास

    नस्ली वर्चस्व के फासीवादी नाजी निरंकुश राष्ट्रवाद पश्चिम से और खासतौर पर यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्रों से आयातित सबसे खतरनाक हाइड्रोजन बम है।

    फासीवादी अंध राष्ट्रवाद की कीमत  जापान को हिरोसिमा और नागासाकी के परमाणु विध्वंस से चुकानी पड़ी है।

    रवींद्र नाथ ने जापान यात्रा के दौरान इस अंध राष्ट्रवाद के खिलाफ जापानियों को चेतावनी दी थी।हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिरने से पहले 1941 में ही रवींद्रनाथ दिवंगत हो गये लेकिन उनकी वह चेतावनी अब हाइड्रोजन बम की शक्ल में विभाजित कोरिया के साथ साथ परमाणु साम्राज्यवाद के रचनाकार महाबलि अमेरिका के लिए अस्तित्व संकट बन गया है।

    इसी अंध राष्ट्रवाद के कारण दो दो विश्वयुद्ध हारने वाले जर्मनी का विभाजन हुआ लेकिन फासीवाद और नवनाजियों के प्रतिरोध में कामयाबी के बाद बर्लिन की दीवारे ढह गयीं और जर्मनी फिर अखंड जर्मनी है जो बार बार नवनाजियों का प्रतिरोध जनता की पूरी ताकत के साथ कर रहे हैं।

    कोरिया खुद जापानी साम्राज्यवाद का गुलाम रहा है और साम्राज्यवाद के हाथों खिलौना बनकर वह उत्तर और दक्षिण में ठीक उसी तरह विभाजित है जैसे अखंड भारत के तीन टुकड़े भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश।

    नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद और साम्राज्यवादियों के खेल की वजह से विभाजित भारतवर्ष के भविष्य को लेकर चिंतित थे रवींद्रनाथ।

    1890 में रवींद्रनाथ ने अपने समाज निबंधों की शृंखला में जूता व्यवस्था लिखकर औपनिवेशिक भारत में नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद की सामंती साम्राज्यवादपरस्ती की कड़ी आलोचना की थी और मृत्युपूर्व अंतिम निबंध सभ्यता के संकट तक सामंतवाद और साम्राज्यवाद के पिट्ठू आंतरिक उपनिवेशवाद के नस्ली वर्चस्ववाद पर उन्होंने लगातार प्रहार किये क्योंकि वे जानते थे कि पश्चिम के इस फासीवादी नाजी राष्ट्रवाद की अंतिम और निर्णा्यक नियति विभाजन की निरंतरता की त्रासदी है और अंतिम सांस तक रवींद्रनाथ ने नस्ली राष्ट्रीयताओं के सहअस्तित्व से बने अखंड दुर्भागा देश को इस भयंकर नियति के खिलाफ चेतावनी दी है।

    ब्राजील और अर्जेंटीना में श्वेत अश्वेत संघर्ष के बारे में कहीं चर्चा नहीं होती। लातिन अमेरिका में यह रंगभेद उस तरह नजर नहीं आता जैसे दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका में।

    रंगभेद की यह तीव्रता यूरोपीय देशों में अब बुहत ज्यादा नजर नहीं आती।बल्कि इस रंगभेद के प्रवर्तक इंग्लैंड में जीवन के हर क्षेत्र में अश्वेतों का ही वर्चस्व हो गया है।

    इसके विपरीत भारत में जाति व्यवस्था के तहत असमानता और अन्याय की व्यवस्था अमेरिका की तरह नस्ली वर्चस्व के रंगभेद में तब्दील है।

    अमेरिका का श्वेत आतंकवाद और ग्लोबल हिंदुत्व का नस्ली वर्चस्ववाद एकाकार है।फिरभी अमेरिका का विभाजन नहीं हुआ तो इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिकी राष्ट्र का संघीय ढांचा है,जिसमें अमेरिका की बहुलता और विवधता का लोकतंत्र बना हुआ है जो श्वेत आतंकवाद का लगातार प्रतिरोध कर रहा है।

    सोवियत संघ में जब तक संघीय ढांचा बना रहा और विविधताओं की बहुलता के खिलाफ राष्ट्रीयताओं का निर्मम दमन नहीं हुआ तब तक सोवियत संघ बना रहा और संघीय ढांचा टूटने के बाद ही सोवियत संघ का विभाजन हुआ।

    रवींद्र नाथ के विविधता के दलित विमर्श,गांधी के हिंद स्वराज और यहां तक कि नेताजी के आजाद हिंद फौज की संरचना में संघीय ढांचा के बीज हैं जहां केंद्र की निरंकुश नस्ली वर्चस्व की सत्ता के बजाय जनपदों के लोक गणराज्यों का लोकतंत्र है।

    स्वतंत्रता सेनानियों से बनी भारत की संविधान सभा ने दो राष्ट्र के सिद्धांत के आधार बने भारत के संविधान के लिए विविधता और बहुलता के लोकतंत्र की रक्षा के लिए समानता और न्याय के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संविधान की प्रस्तावना में महात्मा गौतम बुद्ध के धम्म के सिद्धांतों के तहत नागरिक और मनवाधिकार की आधारशिला रखते हुए स्वतंत्र सार्वभौम लोक गणराज्य भारत के लिए संघीय ढांचा का विकल्प चुना जो राष्ट्रीयताओं की समस्या के समाधान का रास्ता था।

    नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद ने उस संघीय ढांचा को तहस नहस करके दिल्ली केंद्रित निरंकुश फासीवादी सत्ता की स्थापना कर दी है,जिसके खिलाफ रवींद्रनाथ उन्नीसवीं सदी से अपने मृत्यु से पहले तक लगातार चेतावनी देते रहे हैं।

    रवींद्र रचनाधर्मिता की यही मुख्यधारा है जो भारत की साझा संस्कृति की विरासत है जो बौद्धमय भारत के समता और लक्ष्यों के अनुरुप हैं।

    बहुजन पुरखों और सामंतवादविरोधी मनुष्यता के धर्म के पक्षधर इस महान देश का धर्म और आध्यात्म भी सत्ता वर्ग के नस्ली वर्चस्व के विरुद्ध है लेकिन सवर्ण विद्वजतजनों की इसमें दिलचस्पी नहीं है तो पीड़ित शोषित अत्याचार के शिकार और नरसंहार संस्कृति के तहत वध्य बहुसंख्य जनगण इसे भारतीय इतिहास और संस्कृति,लोक और जनपद के नजरिये से समझने के लिए तैयार नहीं हैं।


    गौरतलब है कि महात्मा ज्योतिबा फूले ने  गुलामगिरी की प्रस्तावना में शुरुआती दो पैरा में इसी नस्ली वर्चस्व के विशुद्ध राष्ट्रवाद की चर्चा की हैः


    सैकड़ों साल से आज तक शूद्रादि-अतिशूद्र (अछूत) समाज, जब से इस देश में ब्राह्मणों की सत्ता कायम हुई तब से लगातार जुल्म और शोषण से शिकार हैं। ये लोग हर तरह की यातनाओं और कठिनाइयों में अपने दिन गुजार रहे हैं। इसलिए इन लोगों को इन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए और गंभीरता से सोचना चाहिए। ये लोग अपने आपको ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों की जुल्म-ज्यादतियों से कैसे मुक्त कर सकते हैं, यही आज हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं। यही इस ग्रंथ का उद्देश्य है। यह कहा जाता है कि इस देश में ब्राह्मण-पुरोहितों की सत्ता कायम हुए लगभग तीन हजार साल से भी ज्यादा समय बीत गया होगा। वे लोग परदेश से यहाँ आए। उन्होंने इस देश के मूल निवासियों पर बर्बर हमले करके इन लोगों को अपने घर-बार से, जमीन-जायदाद से वंचित करके अपना गुलाम (दास) बना लिया। उन्होंने इनके साथ बड़ी अमावनीयता का रवैया अपनाया था। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी इन लोगों में बीती घटनाओं की विस्मृतियाँ ताजी होती देख कर कि ब्राह्मणों ने यहाँ के मूल निवासियों को घर-बार, जमीन-जायदाद से बेदखल कर इन्हें अपना गुलाम बनाया है, इस बात के प्रमाणों को ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने तहस-नहस कर दिया। दफना कर नष्ट कर दिया।

    उन ब्राह्मणों ने अपना प्रभाव, अपना वर्चस्व इन लोगों के दिलो-दिमाग पर कायम रखने के लिए, ताकि उनकी स्वार्थपूर्ति होती रहे, कई तरह के हथकंडे अपनाए और वे भी इसमें कामयाब भी होते रहे। चूँकि उस समय ये लोग सत्ता की दृष्टि से पहले ही पराधीन हुए थे और बाद में ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने उन्हें ज्ञानहीन-बुद्धिहीन बना दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों के दाँव-पेंच, उनकी जालसाजी इनमें से किसी के भी ध्यान में नहीं आ सकी। ब्राह्मण-पुरोहितों ने इन पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए, इन्हें हमेशा-हमेशा लिए अपना गुलाम बना कर रखने के लिए, केवल अपने निजी हितों को ही मद्देनजर रख कर, एक से अधिक बनावटी ग्रंथो की रचना करके कामयाबी हासिल की। उन नकली ग्रंथो में उन्होंने यह दिखाने की पूरी कोशिश की कि, उन्हें जो विशेष अधिकार प्राप्त हैं, वे सब ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं। इस तरह का झूठा प्रचार उस समय के अनपढ़ लोगों में किया गया और उस समय के शूद्रादि-अतिशूद्रों में मानसिक गुलामी के बीज बोए गए। उन ग्रंथो में यह भी लिखा गया कि शूद्रों को (ब्रह्म द्वारा) पैदा करने का उद्देश्य बस इतना ही था कि शूद्रों को हमेशा-हमेशा के लिए ब्राह्मण-पुरोहितों की सेवा करने में ही लगे रहना चाहिए और ब्राह्मण-पुरोहितों की मर्जी के खिलाफ कुछ भी नहीं करना चाहिए। मतलब, तभी इन्हें ईश्वर प्राप्त होंगे और इनका जीवन सार्थक होगा।

    (साभारःहिंदी समय,महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा)

    रवींद्रनाथ ने यूरोपीय सभ्यता के अनुकरण के तहत बंगाली भद्रलोक सवर्ण नस्ली राष्ट्र वाद पर तीखा प्रहार करते हुए जूता व्यवस्था निबंध में वैदिकी धर्म संस्कृति के यूरोपीय सभ्यता के साथ सामंजस्य बैठकर ब्रिटिश हुकूमत की नौकरी कर रहे भद्रलोक बिरादरी के ओहदे के हिसाब से बूट से लेकर भांति भाति के जूतों से पीटे जाने की अनिवार्यता का स्वीकार करने के तर्कों का ब्यौरा पेश किया है।पहले पहल जूता खाने की यूरोपीय सभ्यता में नजीर न होने की वजह से विरोध करनेवाले प्रभुवर्ग वर्ण के लोगों ने लाट साहेब के उन्हीं के हितों का हवाला देने पर उसी जूता व्यवस्था का कैसे महिमामंडन किया है,उसका सिलिसलेवार ब्यौरा दिया है।

    गौरतलब है कि बंकिम के आनंदमठ में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी किसानों के जनविद्रोह को मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्व के जिहाद बताकर कंपनी राज को हिंदू राष्ट्र बनने से पहले तक हिंदुओं का हित बताने की दैवी वार्ता के साथ वंदेमातरम का उद्घोष हुआ और हिंदुत्व राष्ट्रवादियों ने स्वतंत्रतता संग्राम के दौरान जूता व्यवस्था को अपनी नियति मान ली।अंग्रेजी हुकूमंत की जूताखोरी का महिमामंडन वैदिकी संस्कृति के हवाले से भद्रलोक बिरादरी ने निःसंकोच किया और वे दूसरों के मुकाबले अपने ऊंचे ओहदों को लेकर खुश रहे।यह गुलामगिरी का बांग्ला राष्ट्रवाद है जो आनंदमठ के जरिये हिंदुत्व का फासीवादी राष्ट्रवाद है।

    সমাজলিখেছেন রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর

    জুতা-ব্যবস্থা

    লাটসাহেব রুখিয়া দরখাস্তের উত্তরে কহিলেন, 'তোমরা কিছু বোঝ না, আমরা যাহা করিয়াছি, তোমাদের ভালোর জন্যই করিয়াছি। আমাদের সিদ্ধান্ত ব্যবস্থা লইয়া বাগাড়ম্বর করাতে তোমাদের রাজ-ভক্তির অভাব প্রকাশ পাইতেছে। ইত্যাদি।'

    নিয়ম প্রচলিত হইল। প্রতি গবর্নমেন্ট-কার্যশালায় একজন করিয়া ইংরাজ জুতা-প্রহর্তা নিযুক্ত হইল। উচ্চপদের কর্মচারীদের এক শত ঘা করিয়া বরাদ্দ হইল। পদের উচ্চ-নীচতা অনুসারে জুতা- প্রহার-সংখ্যার ন্যূনাধিক্য হইল। বিশেষ সম্মান-সূচক পদের জন্য বুট জুতা ও নিম্ন-শ্রেণীস্থ পদের জন্য নাগরা জুতা নির্দিষ্ট হইল।

    যখন নিয়ম ভালোরূপে জারি হইল, তখন বাঙালি কর্মচারীরা কহিল, 'যাহার নিমক খাইতেছি, তাহার জুতা খাইব, ইহাতে আর দোষ কী? ইহা লইয়া এত রাগই বা কেন, এত হাঙ্গামাই বা কেন? আমাদের দেশে তো প্রাচীনকাল হইতেই প্রবচন চলিয়া আসিতেছে, পেটে খাইলে পিঠে সয়। আমাদের পিতামহ-প্রপিতামহদের যদি পেটে খাইলে পিঠে সইত তবে আমরা এমনই কী চতুর্ভুজ হইয়াছি, যে আজ আমাদের সহিবে না? স্বধর্মে নিধনং শ্রেয়ঃ পরধর্মোভয়াবহঃ। জুতা খাইতে খাইতে মরাও ভালো, সে আমাদের স্বজাতি-প্রচলিত ধর্ম।'যুক্তিগুলি এমনই প্রবল বলিয়া বোধ হইল যে, যে যাহার কাজে অবিচলিত হইয়া রহিল। আমরা এমনই যুক্তির বশ! (একটা কথা এইখানে মনে হইতেছে। শব্দ-শাস্ত্র অনুসারে যুক্তির অপভ্রংশে জুতি শব্দের উৎপত্তি কি অসম্ভব? বাঙালিদের পক্ষে জুতির অপেক্ষা যুক্তি অতি অল্পই আছে, অতএব বাংলা ভাষায় যুক্তি শব্দ জুতি শব্দে পরিণত হওয়া সম্ভবপর বোধ হইতেছে!) কিছু দিন যায়। দশ ঘা জুতা যে খায়, সে একশো ঘা-ওয়ালাকে দেখিলে জোড় হাত করে, বুটজুতা যে খায় নাগরা-সেবকের সহিত সে কথাই কহে না। কন্যাকর্তারা বরকে জিজ্ঞাসা করে, কয় ঘা করিয়া তাহার জুতা বরাদ্দ। এমন শুনা গিয়াছে, যে দশ ঘা খায় সে ভাঁড়াইয়া বিশ ঘা বলিয়াছে ও এইরূপ অন্যায় প্রতারণা অবলম্বন করিয়া বিবাহ করিয়াছে। ধিক্‌, ধিক্‌, মনুষ্যেরা স্বার্থে অন্ধ হইয়া অধর্মাচরণে কিছুমাত্র সংকুচিত হয় না। একজন অপদার্থ অনেক উমেদারি করিয়াও গবর্নমেন্টে কাজ পায় নাই। সে ব্যক্তি একজন চাকর রাখিয়া প্রত্যহ প্রাতে বিশ ঘা করিয়া জুতা খাইত। নরাধম তাহার পিঠের দাগ দেখাইয়া দশ জায়গা জাঁক করিয়া বেড়াইত, এবং এই উপায়ে তাহার নিরীহ শ্বশুরের চক্ষে ধুলা দিয়া একটি পরমাসুন্দরী স্ত্রীরত্ন লাভ করে। কিন্তু শুনিতেছি সে স্ত্রীরত্নটি তাহার পিঠের দাগ বাড়াইতেছে বৈ কমাইতেছে না। আজকাল ট্রেনে হউক, সভায় হউক, লোকের সহিত দেখা হইলেই জিজ্ঞাসা করে, 'মহাশয়ের নাম? মহাশয়ের নিবাস? মহাশয়ের কয় ঘা করিয়া জুতা বরাদ্দ?' আজকালকার বি-এ এম- এ'রা নাকি বিশ ঘা পঁচিশ ঘা জুতা খাইবার জন্য হিমসিম খাইয়া যাইতেছে, এইজন্য পূর্বোক্ত রূপ প্রশ্ন জিজ্ঞাসা করাকে তাঁহারা অসভ্যতা মনে করেন, তাঁহাদের মধ্যে অধিকাংশ লোকের ভাগ্যে তিন ঘায়ের অধিক বরাদ্দ নাই। একদিন আমারই সাক্ষাতে ট্রেনে আমার একজন এম-এ বন্ধুকে একজন প্রাচীন অসভ্য জিজ্ঞাসা করিয়াছিল, 'মহাশয়, বুট না নাগরা?' আমার বন্ধুটি চটিয়া লাল হইয়া সেখানেই তাহাকে বুট জুতার মহা সম্মান দিবার উপক্রম করিয়াছিল। আহা, আমার হতভাগ্য বন্ধু বেচারির ভাগ্যে বুটও ছিল না, নাগরাও ছিল না। এরূপ স্থলে উত্তর দিতে হইলে তাহাকে কী নতশির হইতেই হইত! আজকাল শহরে পাকড়াশী পরিবারদের অত্যন্ত সম্মান। তাঁহারা গর্ব করেন, তিন পুরুষ ধরিয়া তাঁহারা বুট জুতা খাইয়া আসিয়াছেন এবং তাঁহাদের পরিবারের কাহাকেও পঞ্চাশ ঘা'র কম জুতা খাইতে হয় নাই। এমন-কি, বাড়ির কর্তা দামোদর পাকড়াশী যত জুতা খাইয়াছেন, কোনো বাঙালি এত জুতা খাইতে পায় নাই। কিন্তু লাহিড়িরা লেপ্টেনেন্ট-গবর্নরের সহিত যেরূপ ভাব করিয়া লইয়াছে, দিবানিশি যেরূপ খোশামোদ আরম্ভ করিয়াছে, শীঘ্রই তাহারা পাকড়াশীদের ছাড়াইয়া উঠিবে বোধ হয়। বুড়া দামোদর জাঁক করিয়া বলে, 'এই পিঠে মন্টিথের বাড়ির তিরিশটা বুট ক্ষয়ে গেছে।' একবার ভজহরি লাহিড়ি দামোদরের ভাইঝির সহিত নিজের বংশধরের বিবাহ প্রস্তাব করিয়া পাঠাইয়াছিল, দামোদর নাক সিটকাইয়া বলিয়াছিল, 'তোরা তো ঠন্‌ঠোনে।' সেই অবধি উভয় পরিবারে অত্যন্ত বিবাদ চলিতেছে। সেদিন পূজার সময় লাহিড়িরা পাকড়াশীদের বাড়িতে সওগাতের সহিত তিন জোড়া নাগরা জুতা পাঠাইয়াছিল; পাকড়াশীদের এত অপমান বোধ ইহয়াছিল যে, তাহারা নালিশ করিবার উদ্যোগ করিয়াছিল; নালিশ করিলে কথাটা পাছে রাষ্ট্র হইয়া যায় এইজন্য থামিয়া গেল। আজকাল সাহেবদিগের সঙ্গে দেখা করিতে হইলে সম্ভ্রান্ত 'নেটিব'গণ কার্ডে নামের নীচে কয় ঘা জুতা খান, তাহা লিখিয়া দেন, সাহেবের কাছে গিয়া জোড়হস্তে বলেন, 'পুরুষানুক্রমে আমরা গবর্নমেন্টের জুতা খাইয়া আসিতেছি; আমাদের প্রতি গবর্নমেন্টের বড়োই অনুগ্রহ।' সাহেব তাঁহাদের রাজভক্তির প্রশংসা করেন। গবর্নমেন্টের কর্মচারীরা গবর্নমেন্টের বিরুদ্ধে কিছু বলিতে চান না; তাঁহারা বলেন, 'আমরা গবর্নমেন্টের জুতা খাই, আমরা কি জুতা-হারামি করিতে পারি!'


    अब गोरक्षकों के राष्ट्रवादी तांडव के संदर्भ में समाज निबंध शृंखला के तहत आचरण अत्याचार विषय पर रवींद्रनाथ के इस मंत्वय पर गौर करें जिसमें उन्होंने गोहत्या पर सजा और मनुष्य की हत्या पर बिना प्रायश्चित्त सामाजिक प्रतिष्ठा के हिंदुत्व पर प्रहार किया है।इस निबंध में जाति व्यवस्था के तहत अस्पृश्यता के वैदिकी धर्म में नीची जातियों,अस्पृश्यों के उत्पीड़न के सामाजिक यथार्थ,उनकी जल जंगल जमीन से बेदखली का भी ब्यौरा है

    একজন লোক গোরু মারিলে সমাজের নিকট নির্যাতন সহ্য করিবে এবং তাহার প্রায়শ্চিত্ত স্বীকার করিবে , কিন্তু মানুষ খুন করিয়া সমাজের মধ্যে বিনা প্রায়শ্চিত্তে স্থান পাইয়াছে এমন দৃষ্টান্তের অভাব নাই । পাছে হিন্দুর বিধাতার হিসাবে কড়াক্রান্তির গরমিল হয় , এইজন্য পিতা অষ্টমবর্ষের মধ্যেই কন্যার বিবাহ দেন এবং অধিক বয়সে বিবাহ দিলে জাতিচ্যুত হন ; বিধাতার হিসাব মিলাইবার জন্য সমাজের যদি এতই সূক্ষ্মদৃষ্টি থাকে তবে উক্ত পিতা নিজের উচ্ছৃঙ্খল চরিত্রের শত শত পরিচয় দিলেও কেন সমাজের মধ্যে আত্মগৌরব রক্ষা করিয়া চলিতে পারে । ইহাকে কি কাকদন্তির হিসাব বলে । আমি যদি অস্পৃশ্য নীচজাতিকে স্পর্শ করি , তবে সমাজ তৎক্ষণাৎ সেই দন্তিহিসাব সম্বন্ধে আমাকে সতর্ক করিয়া দেন , কিন্তু আমি যদি উৎপীড়ন করিয়া সেই নীচজাতির ভিটামাটি উচ্ছিন্ন করিয়া দিই , তবে সমাজ কি আমার নিকট হইতে সেই কাহনের হিসাব তলব করেন । প্রতিদিন রাগদ্বেষ লোভমোহ মিথ্যাচরণে ধর্মনীতির ভিত্তিমূল জীর্ণ করিতেছি , অথচ স্নান তপ বিধিব্যবস্থার তিলমাত্র ত্রুটি হইতেছে না । এমন কি দেখা যায় না ।

    সমাজ লিখেছেন রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর

    আচারের অত্যাচার


    आज सुबह हमारे एक पुराने मित्र,सरकारी अस्पताल के अधीक्षक पद से रिटायर शरणार्थी नेता ने फोन करके कहा कि आप हिंदुत्व के खिलाफ हैं और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के बारे में कुछ भी नहीं लिखते।

    उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आप लोग तो रोहिंगा मुसलमानों के बारे में लिखेंगे और असम बांग्लादेश और बंगाल के मिलाकर ग्रेटर इस्लामी बांग्लादेश के एजंडा पर आप खामोश रहेंगे।

    उन्होमने दावा किया की वे मरा लिखा सबकुछ पढ़ते हैं और मरे तमाम वीडियो भी देखते हैं।

    पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों,बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न,शरणार्थी समस्या पर मैं लगातार लिखता रहा हूं जिसे वे हिंदुत्व के खिलाफ राजनीति बता रहे हैं और बंगाल के नस्ली सवर्ण वर्चस्व के खिलाफ रवींद्र के दलित विमर्श को भी वे गैर प्रासंगिक मानते हैं।

    गौरतलब है कि बंगाल के ज्यादातर शरणार्थी नेताओं और आम शरणार्थियों की तरह वे भी हिंदुत्व के झंडवरदार और संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडे के समर्थक हैं और उन्हें समझाना मुश्किल हैं।

    वे सुनते नहीं हैं और न वे पढ़ते हैं बल्कि उन्हें हिंदुओं के खतरे में होने की फिक्र ज्यादा है और राष्ट्रवाद की वजह से हुए युद्ध गृहयुद्ध देश के विभाजन और विश्वव्यापी शरणार्थी समस्या और नस्ली वर्चस्व के फासीवाद नाजीवादके बारे में कुछ बी समझाना मुश्किल है।

    विभाजनपीड़ितों के भारत विभाजन और शरणार्थी समस्या के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराने की बात समझ में आती है लेकिन नस्ली वर्चस्व के फासीवादी विशुद्धता के हिंदुत्व एजंडे पर किसी संवाद के लिए सवर्ण विद्वतजन उसीतरह तैयार नहीं हैं जैसे वे बहुजनों के जीवन और आजीविका,उनकी नागरिकता,उनके नागरिक और मानवाधिकार और शरणार्थी समस्या पर कुछ भी कहने लिखने को तैयार नहीं हैं।

    जाहिर है कि हम उन विद्वतजनों के लिए रवींद्र विमर्श पर यह संवाद नहीं चला रहे हैं।हम उन्हीं को सीधे संबोधित कर रहे हैं जो नियति के साथ सवर्ण अभिसार के शिकार नरसंहारी संस्कृति के वध्य मानुष हैं।

    बहारहाल जो मेरा लिखा पढ़ते हैं और मेरा वीडियो देखते हैं,उन्हें मालूम होगा कि पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ितों के बारे में,बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न,सलाम आजाद और तसलिमा नसरीन के साथ इस मुद्दे पर लिखे हर किसी के साहित्य पर,शरणार्थी समस्या,नागरिकता कानून,शरणार्थि्यों के देश निकाला अभियान और आधार के बारे में कितना लिखा और कितना कहा है।

    पूर्वी बंगाल के विभाजन पीड़ितों के बारे में हमने जिलावार पूरे भारत के हर हिस्से में बसे शरणार्थियों की समस्या पर विस्तार से लगातार लिखा है।लेकिन मेरी चूंकि किताबें नहीं छपतीं और अखबारों,पत्रिकाओं में भी मैं नहीं छपता तो राष्ट्रवाद के प्रसंग में रवींद्र के दलित विमर्श  पर विभाजन पीड़ित हिंदुत्व सेना में तब्दील शरणार्थियों की इससे बेहतर प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की जा सकती।

    दो राष्ट्र के सिद्धांत के तहत देश के विभाजन के साथ ही राष्ट्रवाद के नस्ली वर्चस्व आधारित राष्ट्र में राष्ट्रीयता का संकट शुरु हो गया था।

    विभाजन  के वक्त ही मास्टर तारासिंह ने पूछा था,हिंदुओं को हिंदुस्तान मिला और मुसलमानों को पाकिस्तान,तो सिखों को क्या मिला।

    सिखों की राष्ट्रीयता के सवाल पर खालिस्तान आंदोलन और सिखों के नरसंहार के बारे में हम जानते हैं।

    आदिवासी राष्ट्रीयताएं आदिवासी भूगोल के अलावा हिमालय क्षेत्र में सबसे ज्यादा हैं लेकिन उनकी राष्ट्रीयता के राष्ट्रीय प्रश्न को संबोधित किये बिना छत्तीसगढ़ और झारखंड आदिवासी राज्य बनाकर आदिवासी भूगोल में गैरआदिवासियों के नस्ली वर्चस्व को बहाल रखकर आदिवासी राष्ट्रीयता के सवाल को और उलझा दिया गया है।इसी तरह उत्तराखंड और तेलंगना अलग राज्य बने और वहां भी आम जनता अपने संसाधनों से बेदखल किये जा रहे हैं।

    समस्याओं को बनाये रखकर नस्ली वर्चस्व बहाल करने की यह सत्ता राजनीति है तो निरंकुश कारपोरेट अर्थव्यवस्था का माफियातंत्र भी।

    अखंड भारत में हिंदू बहुसंख्यक थे तो भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान बनने के बाद इस्लामी राष्ट्रीयता वहां बड़ी राष्ट्रीयता बन गयी।ज

    नसंख्या स्थानांतरण का कार्यक्रम भारी खून खराबे के बावजूद सिरे से फेल हो जाने से भारत में मुसलमान और पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक हो गये।

    विभाजन के तुरंत बाद सीमाओं के आर पार अल्पसंख्यक उत्पीड़न शुरु हो गया।पाकिस्तानी इस्लामी राष्ट्रीयता बंगाली भाषायी राष्ट्रीयता के दमन पर आमादा हो गयी तो पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह हो गया और भारत के सैन्य हस्तक्षेप से बांग्लादेश बना।

    बांग्लादेश बनते ही फिर इस्लामी बांग्लादेशी राष्ट्रवाद के तहत बांग्ला राष्ट्रवाद के विरुद्ध अभियान और भारत में अल्पसंख्यक खिलाफ हिंदुत्व की दंगाई राजनीति बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न और तेज हो गया।

    विभाजन पीड़ित हिंदुत्व की पैदल सेना को इस्लामी राष्ट्रवाद का यथार्थ समझ में आता है लेकिन हिंदुत्व के अंध राष्ट्रवाद की सीमापार होने वाली भयंकर प्रतिक्रिया की कहानी समझ में नहीं आती।

    तसलिमा के उपन्यास लज्जा में हिंदुओं का उत्पीड़न और बांग्लादेश से उनका पलायन से हिंदुत्व की सुनामी बनती है लेकिन बांग्लादेश और दुनियाभर में राम के नाम बाबरी विध्वंस के राष्ट्रवाद की परिणति जो लज्जा की पृष्ठभूमि है,समझ में नहीं आती।दुनियाभर में अंध राष्ट्रवाद के नतीजतन युद्ध गृहयुद्ध और आधी दुनिया के शरणार्थी बन जाने और देश के बीतर जल जंगल जमीन नागरिकता आजीविका रोजगार नागरिक मानवाधिकार से अनंत बेदखली का नस्ली राष्ट्रवाद और मनुस्मति विधान की निरंकुश फासीवादी सत्ता के यथार्थ उन्हें और बाकी नागरिकों को समझ में नहीं आता।वे नरसंहारों के मूक दर्शक हैं और अपनी हत्या के इंतजाम के समर्थक भी।

    बंगाल और पंजाब और आदिवासी भूगोल की राष्ट्रीयताएं ही नहीं, बल्कि भारत और पाकिस्तान में कश्मीरियों की राष्ट्रीयता का संकट भी इस दास्तां का भयानक सच है।भारत में शामिल कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर सीमा के आर पार कश्मीरियत के भूगोल के दोनों हिस्सों में आजादी की मांग उठ रही है और भारत में यह मांग हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ है तो पाकिस्तान में इस्लामी राष्ट्रवाद के खिलाफ।

    भारत और पाकिस्तान में कश्मीरी राष्ट्रीयता की इस समस्या को सिरे से नजरअंदाज किये जाने के नतीजतन किसी को समझ में नहीं आता कि कश्मीर समस्या हिंदू मुस्लिम राष्ट्रीयताओं का सवाल नहीं है और यह कश्मीरी राष्ट्रीयता की समस्या है,जिसे सीमायुद्ध में तब्दील करने वाले नस्ली राष्ट्रवाद की सत्ता पाकिस्तान और भारत में सिरे से मानने से इंकार करता है और कश्मीर की समस्या का समाधान आज तक नहीं हो सका।यह निषिद्ध विषय है।

    मानवाधिकार के हनन का विरोध के खिलाफ आवाज उठाना हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद दोनों के लिए राष्ट्रद्रोह है उसीतरह जैसे बौद्ध अनुयायी नम्यांमार में बहुसंख्यक बौद्धों की ओर से रोहिंगा मुसलमानों के नरसंहार के खिलाफ खामोश हैं तो हिंदुत्ववादी इस मुद्दे पर चुप्पी के साथ बंगालादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न पर मुखर हैं।

    जनसंख्या की इस राजनीति पर हमने पहले चर्चा की है।आगे भी करेंगे।

    बंगाल में ही गोरखालैंड आंदोलन गोरखा राष्ट्रीयता बनाम बांग्ला राष्ट्रीयता अस्सी के दशक से चल रहा है।

    अस्सी के दशक में अलग गोरखालैंड राष्ट्र के आंदोलन में हजारों लोग मारे गये।दार्जिलिंग के पहाड़ों को राजनीतिक स्वायत्तता देकर इस समस्या का तदर्थ हल निकाला गया लेकिन नस्ली वर्चस्व की राजनीति के तहत दार्जिलिंग के पहाड़ फिर ज्वालामुखी है और फिर गोरखालैंड का आंदोलन जारी है जो सिर्फ दार्जिलिंग के पहाडो़ं तक सीमाबद्ध नहीं है।

    गोराखा राष्ट्रीयता के भूगोल  और इतिहास में समूचा नेपाल,उत्तराखंड के गोरखा शासित हिस्से.सिक्किम और भूटान भी शामिल है और महागोरखालैंड का एजंडा भी पुराना है।सत्ता के नस्ली वर्चस्व की राजनीति से यह आग बूझेगी नहीं।

    आदिवासी राष्ट्रीयताओं की समस्या को संबोधित किये बिना असम को कई टुकड़ों में विभाजित किया जाता रहा है।लेकिन पूर्वोत्तर की राष्ट्रीयताओं का आपसी विवाद थमा नहीं है।

    मणिपुर में नगा और मैती संघर्ष लगातार जारी है तो असम में ही बोरोलैंड को स्वशासी इलाका बनाने के बाद भी अल्फाई अहमिया राष्ट्रवाद,इस्लामी ग्रेटर बांग्लादेश और आदिवासी राष्ट्रीयताओं का गृहयुद्ध जारी है।

    इसी तरह त्रिपुरा में आदिवासी राष्ट्रीयता उग्रवाद में तब्दील है।

    सत्ता की राजनीति राष्ट्रीयता आंदोलन के उग्रवादी धड़ों का का शुरु से इ्स्तेमाल उसीतरह करती रही है जैसे मेघालय में हाल में भाजपाई राजकाज है और असम में अल्फाई राजकाज है तो त्रिपुरा में फिर वामसत्ता को उखाड़ फेंकने का हिंदुत्व एजंडा है।

    कश्मीर में सत्ता हड़पने की राजनीति का किस्सा बंगाल में भी दोहराने की तैयारी के तहत गोरखालैंड बनाम बांग्ला राष्ट्रीयता के गृहयुद्ध के पीछे भी नस्ली वर्चस्ववाद के हिंदुत्व एजंडे का हाथ है।यह हिंदुत्ववादियों को समझाना मुश्किल है तो सवर्ण धर्मनिरपेक्षता के झंडेवरदार बी राष्ट्रीयताओं की समस्या पर उसी नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद के तहत किसी भी संवाद से पिछले सात दशकों से इंकार करते रहे हैं,जिनमें वामपंथी भी शामिल है।

    ऐसा तब है जबकि लेनिन,स्टालिन और माओ ने भी राष्ट्रीयता की समस्या को संबोधित करने के गंभीर प्रयास किये हैं।




    रवींद्र दलित विमर्श-18

    गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं,इसीलिए उनका वध हुआ।

    गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे।

    संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है।

    भारत में बुद्धमय भारत के अवसान के बाद हिंदुत्व पुनरूत्थान की प्रक्रिया महिषासुर वध की निरंतरता है और नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक वही दुर्गावतार है,जिसकी ताजा शिकार गौरी लंकेश है।किसी मोमबत्ती जुलूस से इस व्यवस्था का अंत नहीं होने वाला है।

    पलाश विश्वास

    कल हमने रवींद्र के दलित विमर्श के तहत रवींद्र के दो निबंधों जूता व्यवस्था और आचरण अत्याचार की चर्चा की थी।आचरण अत्याचार में जाति व्यवस्था की अस्पृश्यता पर प्रहार करते हुए रवींद्र ने लिखा है कि गाय मारने पर प्रायश्चित्त का विधान है लेकिन मनुष्य को मारने पर सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है , उसी तरह अछूतों को छूने पर जाति चली जाती है लेकिन अछूतों पर अत्याचार,उत्पीड़न और उनकी बेदखली से जाति मजबूत हो जाती है।गोरक्षकों के तांडव में प्रायश्चित्त का विधान अब वध है।

    जिस सामाजिक यथार्थ की बात रवींद्र ने उन्नीसवीं सदी में कही थी,वह आजादी के सत्तर साल बाद नरसंहार संस्कृति का नस्ली राष्ट्रवाद है।गोरक्षकों के तांडव पर हिंदू गांधी के पोते की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला बताता है कि कानून का राज और संविधान कितना बेमायने है और कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए राष्ट्र की जिम्मेदारी और जबावदेही का क्या हाल है।

    गोरक्षकों से नागरिकों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और इसमें भी नागरिकों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि गोरक्षा तांडव अब नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद के हिंदुत्व का पर्याय है तो कारोपेरट फासिज्म के राजकाज की राजनीति और सत्ता इसी गोरक्षक सेना के समर्थन से हैं।

    हमारी विकास यात्रा हमें लगातार मध्यकालीन बर्बर अंधकार युग की तरफ ले जा रही है,जिसका विकास दर से कोई संबंध नहीं है।विशुद्धता का यह रंगभेदी नस्ली वर्चस्व सभ्यता का संकट है।

    ब्रिटिश हुकूमत का अंत हुआ और जैसा कि रवींद्र नाथ ने अपने मृत्युपूर्व लिखे निबंध में ब्रिटिश हुकूमत के स्थानांतरण के बाद भारत के भविष्य को लेकर चिंता जताते हुए चेतावनी जारी की थी,जैसे कि महात्मा ज्योति बा फूले और मतुआ चंडाल आंदोलन के नेता गुरुचांद ठाकुर समेत बहुजन पुरखों को आशंका थी,सत्ता ब्राह्मणवाद के नस्ली वर्चस्व को हस्तातंरित हो जाने के बाद हूबहू वही हो रहा है।

    ब्रिटिश हुकूमत में पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के तहत पेशा बदलने की छूट के तहत जाति व्यवस्था टूटने लगी थी और मनुस्मृति विधान के तहत ज्ञान,आस्था और उपासना,शस्त्र और संपत्ति के अधिकारों से वंचित बहुजनों को वे अधिकार मिलने लग गये थे,जो अब संवैधानिक रक्षाकवच के बावजूद छीने जा रहे हैं और भारतीय नस्ली वर्चस्व की मनुस्मृति संस्कृति फिर वही महिषासुर वध कथा है।

    गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे।गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं, इसीलिए उनका वध हुआ।

    यह मामला अभिव्यक्ति का संकट है या असहमति के विरुद्ध असहिष्णुता है,ऐसा राजनीतिक सरलीकरण सामाजिक यथार्थ के खिलाफ है। देशभर में ऐसे तमाम कांड लगातार होते जा रहे हैं और विरोध की रस्म अदायगी के बाद फिर अखंड मौन के मद्य़फिर फिर वध दृश्य की पुनरावृत्ति है।गांधी हत्या के बाद तो फिरभी एक लंबा अंतराल रहा है और दंगों और नरसंहारों में वैदिकी संस्कृति के वध उत्सव के मौन दर्शक बने नागरिक विद्वतजनों पर हो रहे ताजा हमलों में अपनी मौत की दस्तक सुनकर विचलित हो रहा है नागरिक समाज का पढ़ा लिखा तबका।

    विरोध जताने की राजनीति के अलावा सामाजिक सक्रियता का अगला कदम उठाने की वह सोच ही नहीं सकता क्योंकि इसी तंत्र के बने रहने में उसके हित हैं।उसका वर्ग वर्ण हितों के विरुद्ध सत्ता परिवर्तन की राजनीति उसके लिए सुविधाजनक विकल्प है और सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिरोध की संस्कृति उसके हितों के खिलाफ है।

    गोरक्षकों के तांडव के मानस से भी ज्यादा खतरनाक यह सुविधा का विमर्श।

    यही जूता व्यवस्था है ताकि जूता खाकर अपनी खाल बचायी जा सके।यही सवर्ण सत्ता वर्ग का मानस है।

    रवींद्र के दलित विमर्श पर संवाद इसी सामाजिक यथार्थ की जांच पड़ताल है।रवींद्र भारत की समस्या को सामाजिक मानतेे रहे हैं और यह सामाजिक समस्या जितनी गुलामगिरि की कथा है,उतनी ही रवींद्र के सामाजिक यथार्थ जूता व्यवस्था यानी नस्ली सत्ता वर्चस्व के अंतर्गत जूता खाते रहकर अपनी हैसियत बचाने की संस्कृति है,जो अब बहुजन संस्कृति है तो यह वैदिकी विशुद्धता की संस्कृति भी है।

    गुलामगिरि की जूता व्यवस्था में समाहित बहुजन समाज का यथार्थ यही है और यही बहुजनों का हिंदुत्वकरण है,जिसके दायरे से बाहर बने रहने के लिए इस देश में अनार्य द्रविड़ और दूसरी अनार्य नस्लों की जल जंगल जमीन की लड़ाई है,जिसके दमन के लिए नरसंहार संस्कृति का अंध नस्ली राष्ट्रवाद है।

    बुद्धमय भारत के अवसान के बाद नस्ली सत्ता वर्चस्व के मनुस्मृति बंदोबस्त की यह संस्कृति भारत में इस्लामी शासन के करीब सात सौ सालों और ब्रिटिश हुकूमत के दो सौ सालों के दरम्यान बनाये रखने के लिए सत्ता वर्ग ने उनकी गुलामी का महिमामंडन करते हुए उनकी सत्ता में भागेदारी के जरिये बहुजनों और खासतौर पर आदिवासियों का उत्पीड़न और दमन का सिलसिला जारी रखा है और इसीलिए हिंदुत्व एजंडे के तहत हिंदू राष्ट्र के वास्तुकार हिंदू महासभा और संघ परिवार ने भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया तो आज वे श्वेत आतंकवाद के अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजराइली जायनी आतंकवाद के साथ खड़े हैं।

    मनुस्मृति व्यवस्था के सत्ता वर्ण और वर्ग ने इसी तरह शक हुण पठान मुगल विदेशी हुकूमत का कभी विरोध नहीं किया और उनके खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम भी बहुजन और आदिवासी समुदायों के लोग, किसान और मेहनतकश तबके लड़ते रहे हैं।

    भारत में बुद्धमयभारत के अवसान के बाद हिंदुत्व पुनरूत्थान की प्रक्रिया महिषासुर वध की निरंतरता है और नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक वही दुर्गावतार है,जिसकी ताजा शिकार गौरी लंकेश है।किसी मोमबत्ती जुलूस से इस व्यवस्था का अंत नहीं होने वाला है।

    भारत की मौजूदा समस्याएं राजनीतिक नहीं हैं ,आज भी असमानता,अन्याय और उत्पीड़न,बेदखली और नरसंहार की ये तमाम समस्याएं सामाजिक समस्याएं हैं और उनका राजनीतिकरण करने से वे समस्याएं सुलझने वाली नहीं हैं। सामाजिक बदलाव के बिना सामाजिक यथार्थ बदलेगा नहीं।इसिए सामाजिक यथार्थ को समझना बेहद जरुरी है।

    कल हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी का फोन आया था और हमारी उनपर रवींद्र के दलित विमर्श पर लंबी बातचीत हुई।वे रवींद्र के भारतवर्षेर इतिहास की तर्ज हमें इतिहास पढ़ाते रहे हैं और हम इस पर हस्तक्षेप पर चर्चा पहले ही कर चुके हैं।रवींद्र की तरह ही वे मानते हैं कि इतिहास शासक वर्ग का नहीं होता,इतिहास जनता बनाती है और इतिहास जनता का इतिहास होता है।रवींद्र के दलित विमर्श में भारत की समूची दर्शन परंपरा की जनपदीय लोकसंस्कृति की साझा विरासत को सत्ता वर्ग के नस्ली राष्ट्रवाद का एकमात्र प्रतिरोध वे भी मानते हैं।उन्होंने इस संवाद को पुस्तक में समेटने का सुझाव भी दिया है।हमने उनसे यही निवेदन किया कि हम आलोचकों,संपादकों और प्रकाशकों की दुनिया के बाहर के जीव हैं और इसलिए हम पुस्तकें छापने के चक्कर में नहीं पड़ते जो अंततः पढ़े लिखे सवर्म विद्वतजनों तक सीमाबद्ध हो जाती हैं और आम जनता और बहुजनों के साथ संवाद की कोई स्थिति नहीं बनती। इसीलिए हम वैकल्पिक मीडिया की बात करते रहे हैं और इसी सिलसिले में सोशल मीडिया में मोबाइल क्रांति के जरिये जुड़े भारी संख्या में मौजूद बहुजनों और आदिवासियों को सीधे संबोधित करने का प्रयास करते हैं।

    इस संवाद की मुख्य समस्या सोशल मीडिया में स्पेस की कमी है।जिस वजह से कल रवींद्र विमर्श-सत्रह को दो भागो में बांटकर हस्तक्षेप में लगाना पड़ा।हमने कल सारा दिन बाउल साहित्य,बाउल गान,बाउल आंदोलन और बाउल रवीद्र के साथ लालन फकीर से संबंधित सामग्री सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

    हमने रवींद्र रचना धर्मिता में बुद्धमय भारत की चर्चा की है और वैदिकी संस्कृति के असर की मुख्यधारा में रवींद्र विमर्श के बारे में चर्चा फिलहाल नहीं कर रहे हैं।बाकी लोग ऐसा ही करते रहे हैं।रवींद्र संगीत के प्रेम पर्व और पूजा पर्व विभाजन से इसमें समाहित संत परंपरा और लोक संस्कृति की साझा विरासत का अता पता गायब है।भारत के भक्ति आंदोलन के नामकरण में भी वही विभ्रम है क्योकि दैवी सत्ता के विरोध में भक्ति की प्रासंगिकता नहीं है। इसीतरह रवींद्र संगीत में प्रेम मनुष्यता का धर्म है तो पूजा दैवी सत्ता का विरोध।रवींद्र संगीत और गीतांजली के गीत की भावभूमि सीधे तौर पर बाउल परंपरा से जुड़ती है और रवींद्र को इसलिए बंगाल का सबसे महान बाउल कहा जाता है।

    गीताजंलि की रचनाओं के बारे में कहा जाता है कि बाउल लालन फकीर के लोकसंस्कृति में रचे बसे लोक बोली में  अभिव्यक्त दर्शन को रवींद्र ने गीतांजलि में परोसा है।रवींद्र ने बार बार लालन फकीर के बारे में लिखा भी है।

    गीतांजलि और रवींद्र संगीत को समझने के लिए बाउल आंदोलन,बाउल पंरपरा और बाुल दर्शन पर विस्तार से चर्चा की जरुरत है।जो एकसाथ संभव नहीं है।जाहिर है कि यह चर्चा लंबी चलने वाली है।

    बांग्लादेश में बाउल आंदोलन और संस्कृति पर व्यापक पैमाने पर काम हुआ है और सारी सामग्री बांग्ला में है.वहां जनपदों की लोकसंस्कृति पर लगातार विमर्श और संवाद जारी रहता है और बांग्लादेशी साहित्य भी जनपदों की बोलियों में लिखा जाता है।

    हमारे यहां बोलियों की कोई संस्कृति नहीं बची है और मुक्त बाजार ने भारतीय कृषि,किसानों और मेहनतकश तबके, कारोबारियों के साथ साथ जनपदों का और जनपदों की लोक संस्कृति की साझा विरासत का सत्यानाश कर दिया है और इसी के नतीजतन सत्ता वर्चस्व की मुक्तबाजारी कारोपोरेट वध संस्कृति के नस्ली राष्ट्रवाद की यह नस्ली सुनामी है और जनपदों के लोकतंत्र की कृषि व्यवस्था के पांरपारिक उत्पादन संबंधों की साझा विरासत की बहाली के बिना हम मनुस्मृति राष्ट्रवाद के महिषासुर वध की निरंतरता को रोक नहीं सकते।यह बेहद कठिन कार्यभार है।

    गौरतलब है कि हम रवींद्र विमर्श से संबंधित संदर्भसामग्री लगातार सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं।मेरे फेसबुक पेज Palash Biswas Updates पर सारी संदर्भ सामग्री और हस्तक्षेप के तमाम लिंक हैं,आप उन्हें अलग से देखते पढ़ते रहे तो हम सोशल मीडिया पर इस विमर्श की सीमाओं को तोड़ सकते हैं।

    आज हम बाउल आंदोलन के बारे में थोडी च्रचा करना चाहते हैं।बाउल परंपरा में दैवी सत्ता का निषेध है।मनुष्य की देह ही उनकी आस्था का आधार है।रवींद्र पर बाउल देहतत्व का असर नहीं हुआ,लेकिन पुरोहित तंत्र और ब्राह्मण धर्म के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मनुष्यता के धर्म की बाउल परंपरा के शायद वे सबसे बड़े प्रवक्ता

    थे।रवींद्र के जिन गीतों के लिए नोबेल पुरस्कार मिला, वे सारे गीत बााउल मनुष्यता के धर्म के मुताबिक पुरोहित तंत्र और ब्राह्मण धर्म दोनों के खिलाफ हैं।

    रवींद्र के बाद हाल में दूसरी बार गीतों के लिए जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, वे बाब डिलान भी रवींद्र की तरह अपने को बाुल कहते रहे हैं।बाुल परंपरा से जुड़ने के लिए वे बंगाल के बाउलों के साथ बंगाल में रह चुके हैं।

    बाउल जाति धर्म से ऊपर हैं।जाति उनकी कुछ भी हो सकती है और धर्म भी उनका कुछ भी हो सकता है।बाउल शब्द की उत्पत्ति चैतन्यलीलामृत में परम वैष्णवों के लिए इस्तेमाल किये गये महाबाउल शब्द में बतायी जाती है।

    बाउल दर्शन पर वैष्णव और सूफी दोनों आंदोलनों का असर है और उनकी सहजिया जीवनपद्धति में धार्मिक कर्मकांड,संस्कारों का निषेध है।यह ब्राह्मण धर्म के खिलाफ एक और जनविद्रोह है।

    वैष्णव आंदोलन हिंदुत्व में समाहित हो गया लेकिन बाउल परंपरा का जाति धर्म अस्मिताओं से कुछ भी लेना देना नहीं है।उनके लिए मनुष्य की अंतरात्मा ही सार्वभौम है और वही अंतिम सत्ता है और इस अंतरात्मा के अलावा कोई दैवी सत्ता नहीं है।रवींद्र रचनासमग्र में भी दैवी सत्ता के स्थान पर यही अंतरात्मा का स्थान है।चूंकि आत्मा का आधार मनुष्यदेह  है इसलिए बाउलों के लिए देह पवित्रतम है।बाउल गान आत्मचेतना का गीत है।यह अंतरात्मा का आवाहन है।रवींद्र संगीत का पूजा पर्व भी अंतरात्मा का आवाहन है।

    सूफी मत का जैसे बौद्ध सहजिया पंथ में समायोजन हुआ तो बाउल आंदोलन बंगाल में बौद्ध,सूफी और वैष्णव धाराओं की मनुष्यता का धर्म और प्रेम और अहिंसा का दर्शन है।इसी बिंदू पर गांधी और रवींद्र के जीवन दर्शन एकाकार हैं,जहां मनुष्यता का उत्कर्ष ही सभ्यता का प्रतिमान है।

    लालन फकीर मुसलमान थे लेकिन संत कबीर की तरह उनके जन्म और धर्म को लेकर किंवदंतियां प्रचलित है।

    माना जाता है कि वे जन्मजात हिंदू थे और तीर्थयात्रा के दौरान चेचक निकलने पर मरणासण्ण हो जाने की वजह से उनके साथी उन्हें छोड़कर गांव वापस आकर उनके मरने की खबर फैला दी। बीमार हालत में एक मुसलमान परिवार ने उनकी सेवा की और वे बच गये लेकिन उनका धर्म चला गया और वे मुसलमान हो गये।परिवार ने भी उन्हें विधर्मी मानकर त्याग दिया।

    बाउल बनने के बाद उन्हीं लालन फकीर के अनुयायीू संत कबीर दास की तरह हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के हैं।

    रवींद्र पर वैदिकी साहित्य,बौद्ध साहित्य,बाउल गान के अलावा भारत के संत आंदोलन का गहरा असर रहा है।गुरु नानक,सूरदास और कबीर दास का उनपर गहरा असर रहा है,इस पर हम अलग से चर्चा करेंगे।

    बंगाल के बाउलों का बंकिम के आनंदमठ के तथाकथित सन्यासी विद्रोह यानी आदिवासी किसान विद्रोह में साधुओं और फकीरों के साथ बड़ी भूमिका रही है तो बांग्लादेश की लड़ाई में भी वे शामिल रहे हैं।

    संस्कृत काव्यधारा के अंतिम महाकवि जयदेव आदिबाउल माने जाते हैं।कवि जयदेव बंगाल में सेनवंश के अंतिम शासक राजा लक्ष्मणसेन के सभाकवि थे।उनके लिखे गीतगोविन्द में श्रीकृष्णकी गोपिकाओं के साथ रासलीला, राधाविषाद वर्णन, कृष्ण के लिए व्याकुलता, उपालम्भ वचन, कृष्ण की राधा के लिए उत्कंठा, राधा की सखी द्वारा राधा के विरह संताप का वर्णन है।

    संस्कृत काव्य धारा के विपरीत उन्होंने कृष्ण और राधा को हाड़ मांस के मनुष्य के रुप में चित्रित किया और छंद और अलंकार में संस्कृत का व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र को तोड़ते हुए देशज छंद और अलंकार का प्रयोग किया। डॉ॰ ए॰ बी॰ कीथ ने अपने 'संस्कृत साहित्य के इतिहास'में इसे 'अप्रतिम काव्य'माना है। सन् 1784 में विलियम जोन्सद्वारा लिखित (1799 में प्रकाशित) 'ऑन द म्यूजिकल मोड्स ऑफ द हिन्दूज' (एसियाटिक रिसर्चेज, खंड-3) पुस्तक में गीतगोविन्द को 'पास्टोरल ड्रामा' अर्थात् 'गोपनाट्य'के रूप में माना गया है। उसके बाद सन् 1837 में फ्रेंच विद्वान् एडविन आरनोल्ड तार्सन ने इसे 'लिरिकल ड्रामा'या 'गीतिनाट्य'कहा है। वान श्रोडर ने 'यात्रा प्रबन्ध'तथा पिशाल लेवी ने 'मेलो ड्रामा', इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटानिका (खण्ड-5) में गीतगोविन्द को 'धर्मनाटक'कहा गया है। इसी तरह अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से इसके सम्बन्ध में विचार व्यक्त किया है। जर्मन कवि गेटेमहोदय ने अभिज्ञानशाकुन्तलम्और मेघदूतम्के समान ही गीतगोविन्द की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।


    कवि जयदेव के राधा कृष्ण प्रेम में बंगाल के दो बड़े आंदोलनों की उत्पत्ति हुई और ये दोनों आंदोलन ब्राह्मण धर्म और पुरोहित तंत्र के खिलाफ हैं।बाउल आंदोलन और वैष्णव आंदोलन की मूल प्रेरणा कवि जयदेव और उनका गीत गोविंदम है जहां प्रेम ही मनुष्यता का दर्शन है।

    कवि जयदेव की स्मृति में ही बीरभूम के केंदुुली में सदियों से दुनियाभर के बाउल जयदेव मेले में जुटते हैं।केंदुलि शांतिनिकेतन से 42 किमी दूर है।

    বাউল মতবাদকে একটি মানস পুরাণ বলা হয়। দেহের আধারে যে চেতনা বিরাজ করছে, সে-ই আত্মা । এই আত্মার খোঁজ বা সন্ধানই হচ্ছে বাউল মতবাদের প্রধান লক্ষ । ধর্মীয় দৃষ্টিকোণ থেকে দেখলে একে পৃথক দর্শন বুঝায়। কিন্তু আসলে এ কোন পৃথক মতবাদ নয়।

    শান্তিনিকেতনের বাটিক প্রিন্টিং-এ বাউলের চিত্র।

    এটি ধর্মীয় দর্শন থেকে সৃষ্ট আত্ম চিন্তার রুপভেদ। যা মুলতঃ আত্মার অধ্যাত্ম চেতনার বহিপ্রকাশ। বাংলাদেশের লোক সাহিত্য ও লোকঐতিহ্য, লালন শাহ বিবেচনা-পূর্নবিবেচনা প্রভৃতি গ্রন্থে গবেষকগণ লিখেছেন; আরবের রাজ শক্তির প্রতিঘাতে জন্ম হয়েছে সুফি মতবাদের । এটিকে লালন-পালন করেছে পারস্য। বিকাশ ইরান ও মধ্য এশিয়ায়। পরবর্তিতে যতই পূর্ব দিকে অগ্রসর হতে থাকে এর মধ্যে ততই পূর্বদেশীয় ভাবধারার সম্মিলন ঘটতে থাকে। দহ্মিণ এশিয়ায় এসে অধ্যাত্ম সঙ্গীত চর্যাগীতিতেরুপান্তর হয়। অতপর তুর্কী বিজয়ের মধ্যদিয়ে মধ্যপ্রাচ্যের সূফী-দরবেশ গণের আগমনে বৌদ্ধ সিদ্ধাচর্যাগণের আদর্শ মানবতাবাদ, সুফীবাদে সম্মিলিত হয়ে ভাবসঙ্গীতে রুপান্তর হয় । ফলে সুফী দর্শন অতি সহজে বৌদ্ধের কাছের প্রশংসনীয় হয় । কাজেই একদিকে সূফীবাদ এবং অন্যদিকে বৌদ্ধ সাধনা এই সকলের সমম্বয়ে গড়ে উঠে মরমী ভাব-সাধনা [১][২][৩]। গবেষক সৈয়দ মোস্তফা কামাল, ডঃ আশরাফ সিদ্দিকী সহ অনেকে এ অভিমত পোষন করেন; মধ্যযুগের প্রারম্ভে বাংলার শ্যামল জমিনে অদৈত্ববাদের মধ্যদিয়ে ভারতে চৈতন্যবাদ বিকশিত হয় পঞ্চদশ শতাব্দিতে। তখন ভাগবতধর্ম, আদি রামধর্ম ও কৃষ্ণধর্মের মিলনে বৈঞ্চবধর্ম আত্মপ্রকাশ করে। এতে করে বৈঞ্চবী সাধন পদ্ধতির মধ্যে অনিবার্য রূপে শামিল হয় প্রাচীন মরমীবাদ । ফলে পূর্বরাগ, অনুরাগ, বংশী, বিরহ, দেহকাঁচা ও সোয়া-ময়না সম্মেলিত ইত্যাদি মরমী সাহিত্যের শব্দ, নামে উপনামে বৈঞ্চববাদে বা বৈঞ্চব সাহিত্যে সরাসরি ধার করা হয় । এ ভাবে মরমীবাদের হূদয়স্পর্সী শব্দমালায় রচিত সঙ্গীত বাউল সঙ্গীত নামে আত্মপ্রকাশ করে এক নতুন সম্প্রদায়ের জন্ম দেয়, যা আজকাল বাউলনামে অভিহিত [১]। 'বাহুল' বা 'ব্যাকুল' থেকে 'বাউল' নিষ্পন্ন হতে পারে বলে অনেকেই মনে করেন। আবার আরবি 'আউল' বা হিন্দি 'বাউর' থেকেও শব্দটি আসতে পারে। যেভাবে যে অর্থই আভিধানিক হোক না কেন, মূলত এর ভাব অর্থ হলো, স্রষ্টা প্রেমিক, স্বাধীন চিত্ত, জাতি সম্প্রদায়ের চিহ্নহীন এক দল সত্য সাধক, ভবঘুরে[২]। বাউলদের মনের ভাব প্রকাশের মাধ্যম হচ্ছে বাউল সঙ্গীত নামে পরিচিত আধ্যাত্মচেতনার গান । এ বিষয়ে দেওয়ান মোহাম্মদ আজরফ বলেছেন : ইদানিং বাউল শব্দের উৎপত্তি নিয়ে নানা বাক-বিতন্ডার সৃষ্টি হয়েছে। কেউ বা একে সংস্কৃত 'বতুল' (উন্মাদ, পাগল, ক্ষেপা, ছন্নছাড়া, উদাসী) শব্দের অপভ্রংশ বলে মনে করেন । তবে যা থেকেই বাউল শব্দের উৎপত্তি হোক না কেন, বর্তমানে বাউল মতবাদ একটি বিশেষ মতবাদে পরিণত হয়েছে। [১]

    বাউল মতবাদ

    https://bn.wikipedia.org/s/21xy


    The Kenduli Mela provides a unique opportunity to catch a glimpse of the wandering minstrels called Bauls, who believe in the simplicity of love of life and who propagate universal love that transcends religion. Thousands of people from all over the country and overseas flock to this three-day musical event which celebrates soulful music and is an opportunity to meet the Bauls in their saffron attire carrying a musical instrument called the Ektara.

    प्रेम के इसी दर्शन पर आधारित है चैत्नय महाप्रभू का वैष्णव आंदोलन जिसके तहत हरिमाम के जाप के तहत अछूतों को व्यापक पैमाने पर हिंदू मान लिया गया।बंगाल में अस्पृश्यता बाकी बारत की तुलना में उतना कठोर न होने का बड़ा कारण अनार्य द्रविड़ सभ्यता के साथ साथ बौद्धमय विरासत है तो दूसरा बड़ा कारण चैतन्य महाप्रभू का वैष्णव आंदोलन है,जो वैदिकी कर्म कांड के विपरीत पुरोहित तंत्र के विपरीत विशुद्ध मनुष्यता के धर्म पर आधारित प्रेम का दर्शन है और यही प्रेम का दर्शन बाउल पंरपरा है।

    गौरतलब है कि लालन फकीर पर भी हमले होते रहे और बाउलों के साथ साथ वैष्णवों के अखाड़ों पर भी कट्टरपंथियों के हमले होते रहे।बाउल धर्मनिरपेक्षता हमेशा निशाने पर रही है तो पुरी यात्रा के दौरान चैतन्य महाप्रभु की रहस्यमय मृत्यु हो गयी और उनकी देह का पता ही नहीं चला जैसे संत तुकाराम सशरीर वैकुंठ चले गये,उसी तरह कहा गया कि चैतन्य महाप्रभु भी भगवान जगन्नाथ के शरीर में समाहित हो गये।

    दरअसल पुरोहित तंत्र ने ही संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है।

    The word Baul comes from the Sanskrit "Batul," which means mad, or "afflicted by the wind disease." The Bauls are India's wandering minstrels of West Bengal, whose song and dance reflect the joy, love and longing for mystical union with the Divine. Bauls are free thinkers who openly declare themselves to be mad for the God who dwells within us all.

    The Bauls of Bengal have made no effort to record their practices, lives or beliefs, for they are reluctant to leave a trace behind. Therefore little concrete documentation is available when exploring the group's origin. Scholars have instead turned to the songs of the Bauls to piece together their potential history. Examining the style and language of the Bauls' music, links the sect to distinct groups that share their unique style of worship.

    The first traces of practices similar to those of the Bauls appear in the caryāpadas, the oldest texts recorded in Bengali tongue. These ancient documents – dating back nearly one thousand years – contain poems once sung by a religious sect of Bengal known as the Siddhācāryas. The caryāpadas reference the appropriate behaviors and restraints for an individual wishing to be find the "ultimate release." The Bauls share this early sect's philosophy of achieving personal freedom through practical means and worship, also known as Tantra. The poems of the Siddhācāryas also have a similar metaphoric nature to those of the Bauls vague and often enigmatic songs.

    The Siddhācāryas are thought to have been diverse in background, as the caryāpadas contain ideas and phrases of both Buddhist and Saivite Hindu origins. Their religious diversity and shared goal of personal liberation strongly link this Bengali group to the Bauls that had yet to exist as we know them today.

    However as India has progressed drastically over the course of history, the religious make-up of Bengal has shifted as well. Islam and Vaisnavism dominate where Buddhism and Saivite Hinduism once did. The dramatic shift in religious climate opened the door for individuals to combine the influence of the various forms of spirituality. A few of the Bauls recorded songs mention Nerā, a caste derived from the former Buddhist monks and nuns who, with the slow decline of Buddhism, abandoned celibacy for a tantric style of worship similar to the Bauls. The references to this caste in Baul music again supplies scholars a thread with which to connect this mysterious group to the past.

    Before, the Bauls roamed Bengal on foot; nomads spreading their music and dance. In each village there was a special house set aside for them to stay in, and they would stay as long as they pleased. When they would arrive, the villagers would supply them with food and the necessities of life for as long as their visit lasted. Subhendu "Bapi" Das says:

    "That was the responsibility of the village people. And the bauls' responsibility is to make them happy, give them happy, give them a clear message of life, so they can go on with their happy soul."

    He has also said that unfortunately modern India can no longer support their nomadic way of living, so therefore they have had to adapt. "Now it is totally different. Before, people have respect for many things, and now those things are gone because the time is changing. Now bauls have their own house and they stay in one place, not moving around. Baba (Purna Das Baul) has a house in Calcutta, and he is very famous for this type of music and this tradition and philosophy. People respect him and they are making lots of concerts to him, and that's how the life is going on," says Bapi Das.

    https://bauls.wordpress.com/history/



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    रवींद्र का दलित विमर्श-19

    लालन फकीर  का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष।

    ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया।।

    संत कबीर को समझे तो रवींद्र और लालन फकीर को भी समझ लेंगे।

    पलाश विश्वास

    बौद्धमय बंगाल का अवसान ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ।आठवीं सदी से लेकर ग्यारहवीं सदी तक बंगाल में बौद्ध पाल राजाओं का शासन रहा जिसका ग्यारहवीं सदी में सेन वंश के अभ्युत्थान के साथ अंत हुआ।सेन वंश के राजा बल्लाल सेन के शासनकाल में बंगाल में ब्राह्मण धर्म का प्रचलन हुआ लेकिन सेन वंश के शासन का अंत तेरहवीं सदी में हो गया।बंगाल में पठान सुल्तानों,हिंदू राजाओं और बारह भुइयां के साथ शूद्र और आदिवासी राजाओं का राजकाज अलग अलग क्षेत्र में चला।

    बंगाल प्राचीन काल में आर्यों के लिए निषिद्ध रहा है और इसे असुरों का देश माना गया है।

    From Wikipedia, the free encyclopedia

    The history of Bengal includes modern-day Bangladesh and West Bengal in the eastern part of the Indian subcontinent, at the apex of the Bay of Bengal and dominated by the fertileGanges delta. The advancement of civilization in Bengaldates back four millennia.[1] The region was known to the ancient Greeks and Romans as Gangaridai. The Ganges and the Brahmaputrarivers act as a geographic marker of the region, but also connect it to the broader Indian subcontinent.[2] Bengal, at times, has played an important role in the history of the Indian subcontinet.

    Etymology


    The exact origin of the word Bangla is unknown, though it is believed to be derived from the Dravidian-speaking tribe Bang/Banga that settled in the area around the year 1000 BCE.[12][13] Other accounts speculate that the name is derived from Venga (Bôngo), which came from the Austric word "Bonga" meaning the Sun-god. According to the Mahabharata, the Puranas and the Harivamsha, Vanga was one of the adopted sons of King Vali who founded the Vanga Kingdom. It was either under Magadh or under Kalinga Rules except few years under Pals.The Muslim accounts refer that "Bong", a son of Hind (son of Hām who was a son of Prophet Noah/Nooh) colonised the area for the first time.[14] The earliest reference to "Vangala" (Bôngal) has been traced in the Nesari plates (805 CE) of RashtrakutaGovinda III which speak of Dharmapala as the king of Vangala. The records of Rajendra Chola I of the Chola dynasty, who invaded Bengal in the 11th century, speak of Govindachandra as the ruler of Vangaladesa.[15][16][17] Shams-ud-din Ilyas Shah took the title "Shah-e-Bangla" and united the whole region under one government.

    Some references indicate that the primitive people in Bengal were different in ethnicity and culture from the Vedic people beyond the boundary of Aryavarta and who were classed as "Dasyus". The Bhagavata Purana classes them as sinful people while Dharmasutra of Baudhayana prescribes expiatory rites after a journey among the Pundras and Vangas. Mahabharataspeaks of Paundraka Vasudeva who was lord of the Pundras and who allied himself with Jarasandha against Krishna. The Mahabharata also speaks of Bengali kings called Chitrasena and Sanudrasena who were defeated by Bhima and Kalidasamentions Raghu defeating a coalition of Vanga kings.

    अनार्य असुरों के बंगाल में सेन वंश के राजकाज के दौरान  पहले शैब और शाक्तधर्म का प्रचलन रहा है,जो वैदिकी सभ्यता के दायरे से बाहर अनार्य संस्कृति हैं।सेन वंश के अंतिम राजा लक्ष्मण सेन के सभाकवि जयदेव के गीतगोविंदम् से बंगाल में बाउल और वैष्णव धर्म का प्रचलन हुआ जो ब्राह्मण धर्म और पुरोहित तंत्र के साथ साथ दैवी सत्ता के खिलाफ हैं।

    तेरहवीं सदी से इस्लामी राजकाज और सेन वंश के शासन के दौरान बड़े पैमाने पर बौद्धों और अनार्यों असुरों के हिंदुत्वकरण और हिंदुत्वकरण के तहत जाति व्यवस्था को अस्वीकार करने के कारण इस्लाम में धर्मांतरण की वजह से बंगाल में साझा संस्कृति का जन्म हो गया।यह साझा संस्कृति वैष्णव बाउल,बौद्ध और इस्लाम के सूफी पंथ के मुताबिक मनुष्यता का धर्म है,जो सामंती और दैवी सत्ताओं को सिरे से नामंजूर करता है।

    रवींद्र साहित्य और दर्शन में इसी साझा बाउल फकीर संस्कृति  का सबसे ज्यादा असर है,जिसके तहत आध्यात्म का अर्थ मनुष्य देह में बसी अंतरात्मा की खोज के तहत मनुष्यता के उत्कर्ष का अनुसंधान है.जो धर्म सत्ता और राजसत्ता दोनों के विरुद्ध है।प्राचीन काल से बंगाल में अनार्यों,असुरों के जनपद रहे हैं।

    फिर अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भी आदिवासी और शूद्र शासक निरंकुश सत्ता की राष्ट्रव्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे हैं।इसलिए राजसत्ता का विरोध इस आध्यात्म के अंतर्गत है।

    इस्लामी शासन के दौरान बाकी भारत में भी राजसत्ता और दैवी सत्ता दोनों के विरुद्ध हिंदू मुस्लिम एकता की साझा विरासत के तहत संतों और सूफी फकीरों का आंदोलन जारी रहा है।बंगाल में इन सूफी फकीरों का असर बहुजन संस्कृति पर सबसे ज्यादा रहा है,जिसमें बौद्ध,वैष्णव,बाउल और सूफी धर्म समाहित है।

    इस परंपरा के सबसे बड़े बाउल फकीर लालन फकीर रहे हैं।

    लालन फकीर लालन साँई के नाम से मशहूर हैं।इसे लेकर विवाद है कि रवींद्रनाथ की उनसे कभी मुलाकात हुई या नहीं हुई।पूर्वी बंगाल में टैगोर परिवार की जमींदारी सिलाईदह में थी,जहां युवा रवींद्रनाथ जमींदारी के कामकाज के सिलिसिले में जाया करते थे।रवींद्र की युवावस्था में ही लालन फकीर का निधन हो गया और तब उनकी आयु 116 साल के करीब बतायी जाती है।इसलिए संभावना यही है कि सिलाईदह से नजदीक लालन का अखाड़ा होने के बावजूद इन दोनों की शायद मुलाकात नहीं हुई होगी।लेकिन लालन के अनुयायियों के संपर्क में थे रवींद्र।लालन ने खुद अपने गीतों को लिपिबद्ध नहीं किया,उनके अनुयायियों ने उनके गीतों को संकलित किया और उन्हीं के मार्फत वे गीत रवींद्र तक पहुंचे।जिनके बारे में रवींद्र ने बार बार चर्चा की है।

    लालन फकीर मानवतावादी थे और जाति धर्म नहीं मानते थे।मनुष्यता का धर्म उनका धर्म था और वे अपने अतःस्थल में ही ईश्वर का अनुसंधान करते थे और यही अनुसंधान  उऩकी साधना थी।उनका गीत हैः

    'ডানে বেদ, বামে কোরান,

    মাঝখানে ফকিরের বয়ান,

    যার হবে সেই দিব্যজ্ঞান

    সেহি দেখতে পায় ।'

    (दाहिने वेद,बाँए कुरान,

    बीच में फकीर का बयान

    जिसको होगा वह दिव्यज्ञान

    वही देख सके हैं)

    यह भारत की सूफी और संत परंपरा की साझा विरासत है।

    रवींद्र रचना में इसी दिव्यज्ञान की झलक हैः

    'সীমার মাঝে, অসীম, তুমি

    বাঁজাও আপন সুর।

    আমার মধ্যে তোমার প্রকাশ

    তাই এত মধুর।

    কত বর্ণে কত গন্ধে

    কত গানে কত ছন্দে,

    অরূপ, তোমার রূপের লীলায়

    জাগে হৃদয়পুর।'

    (सीमा के मध्य,असीम,तुम्हीं

    बजाओ अपना सुर

    मेरे बीतर तुम्हारी अभिव्यक्ति

    इसीलिए इतना मधुर।

    कितने रंगों में,कितने गंध में

    कितने गीतों में कितने छंद में

    अरुप तुम्हारे रुप की लीला में

    जागे ह्रदयपुर)

    ब्रह्म समाज के निराकार ईश्वर हिंदू मुस्लिम संत सूफी परंपरा में फिर वही निराकार हैं,जिसे अपने अंतःस्थल में देखते हैं लालन फकीर और रवींद्रनाथ दोनों।लालन फकीर की कोई धार्मिक पहचान उसीतरह नहीं है,जैसे संत कबीर की नहीं थी।संत कबीर का ईश्वर भी निराकार था।

    कबीर का धर्म भी मनुष्यता का धर्म है।संत रविदास के लिए कठौती में ही गंगा है।सूफी संतों की वाणी में समानता और न्याय की गूंज अनुगूंज है और वे मनुष्य में ही ईश्वर को देखते हैं।

    रवींद्रनाथ सदाचार को भारत की सभ्यता मानते थे और सभ्यता केइतिहास में उन्होंने पश्चिमी सभ्यता के प्रतिमानों को खारिज करते हुए सदाचार की भारतीय संस्कृति को ही भारत की सभ्यता बताते हैं।भारत में संत और सूफी आंदोलन में सदाचार ही मनुष्यता की उत्कृष्टता की कसौटी है।लालन फकीर और संत कबीर दास सदाचार का आदर्श बताते हैं तो यही सदाचार फिर गांधी का दर्शन है।

    जाति धर्म के भेदभाव के खिलाफ लालन फकीर और संत कबीर दोनों तीखे प्रहार करते हैं तो अस्पृश्यता के नस्ली रंगभेद की विषमता को भारत की मुख्य समस्या मानने वाले रवींद्र नाथ जल को जीवन का आधार मानकर अस्पृश्यता के खिलाफ जलदान के अधिकार को लेकर चंडालिका लिखते हैं।

    बंगाल के बाउल धर्म की गूंज कबीर दास की रचना में हैः

    झीनी -झीनी बीनी चदरिया।

    काहे कै ताना,काहे कै भरनी,

    कौन तार से बीनी चदरिया।।

    इंगला पिंगला ताना भरनी,

    सुषमन-तार से बीनी चदरिया।।

    आठकंवल दल चरखा डोलै,

    पांच तत्त गुन तीनि चदरिया।।

    साँई को सियत मास दस लागे,

    ठोंक ठोंक के बीनी चदरिया।।

    सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी,

    ओढ़ि के मैली कीन्हीं चदरिया।।

    दास कबीर जतन सौं ओढ़ी,

    ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया।।

     रवींद्र नाथ पर संत कबीर का भी गहरा असर है,जिसका हम अलग से चर्चा करेंगे।सफी बाउल संतों की तरह कबीर पर बी बौद्ध दर्शन का असर है,इसकी भी आगे चर्चा करेंगे।

    रवींद्र लालन प्रसंग में कबीर दास के संदर्भ बाउल संत परंपरा की साझा विरासत को समझने में हिंदी पाठकों के लिए मददगार साबित हो सकती है।

    सूफी परंपरा के बारे में कमोबेश जानकारी और समझ होने के बावजूद हिंदी के आम पाठकों को बंगाल के बाउल फकीरों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

    लालन फकीर के देहत्तव,उनकी धर्मनिरपेक्षता,समता और न्याय की उनकी पक्षधरता और समंतवाद के किलाप उनके प्रतिरोध,जाति धर्म के आधार पर भेदभाव और पुरोहित मुल्ला तंत्र पर  कड़े प्रहार,मनुष्यता के धर्म कबीर और नानक के साहित्य और बाकी भारत की साझा विरासत के मुताबिक हैं।

    कबीर दास की रचनाओं से आम पाठक काफी हद तक परिचित हैं,इसलिए हम रवींद्र लालन प्रसंग में कबीर का उल्लेख कर रहे हैं।

    आप कबीर को समझते हैं तो लालन फकीर को समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।लालन फकीर के दर्शन को समाने लाने में रवींद्रनाथ ने ही पहल की थी।लालन फकीर का एकमात्र चित्र जो उपलब्ध है,वह ज्योतिंद्रनाथ टैगोर ने बनायी  है,जिसके आधार पर रवींद्र और लालन की मुलाकात की किंवदंती प्रचलित हो गयी।लालन फकीर के बीस गीतों का प्रकाशन रवींद्रनाथ ने 1905 में प्रवासी पत्रिका में कराया।इसे साहित्य की अमूल्य संपदा बतौर प्रकाशित किया गया।

    বিশ্বকবি রবীন্দ্রনাথের নিজের ভাষায় - 'আমার লেখা যারা পড়েছেন, তাঁরা জানেন বাউল পদাবলীর প্রতি আমার অনুরাগ আমি অনেক লেখায় প্রকাশ করেছি। শিলাইদহে যখন ছিলাম, বাউল দলের সঙ্গে আমার সর্বদাই দেখা সাক্ষাৎ ও আলাপ- আলোচনা হতো। আমার অনেক গানে আমি বহু সুর গ্রহন করেছি এবং অনেক গানে অন্য রাগরাগিনীর সাথে আমার জ্ঞাত বা অজ্ঞাতসারে বাউল সুরের মিল ঘটেছে। এর থেকে বোঝা যাবে, বাউলের সুর ও বানী কোন এক সময় আমার মনের মধ্যে সহজ হয়ে মিশে গেছে। আমার মনে আছে, তখন আমার নবীন বয়স- শিলাইদহ (কুস্টিয়া) অঞ্চলের এক বাউল একতারা হাতে বাজিয়ে গেয়েছিল -


    'কোথায় পাবো তাঁরে - আমার মনের মানুষ যেঁরে।

    হারায়ে সেই মানুষে- তাঁর উদ্দেশে

    দেশ বিদেশে বেড়াই ঘুরে ।'


    (এই গানটি গেয়েছিল-ফকির লালন শাহের ভাবশিষ্য গগন হরকরা। যার আসল নাম বাউল গগনচন্দ্র দাস।)

    रवींद्रनाथ ने लिखा हैः मेरा लिखा जिन्होंने पढ़ा है,वे जानते हैं कि बाउस पदावली से मुझे किस हद तक प्रेम है,जनिके बारे में मैंने अपने अनेक लेखों में लिखा है।मैं जब सिलाईदह में था,बाउलों के दल के साथ मेरी हमेशा मुलाकात बातचीत हुआ करती थी।मैंने अपने अनेक गीतों में उनके अनेक सुरों को अपनाया है और दूसरे अनेक गीतों में दूसरी राग रागिनियों के सात मेरे जाने अनजाने में बाउल सुर मिल गया है।इसीसे समझा जा सकता है कि बाउल सुर और वाणी मेरे मन में कितनी सहजता के साथ एकाकार हैं।मुझे याद है कि जब मेरी उम्र कम थी,सिलाईदह (कुष्टिया) इलाके में एक बाउल ने हाथों में इकतारा बजाते हुए गाया था-

    कहां मिलेगा वह-मेरे अंतःस्थल का मानुष जो

    उस मानुष को खोकर-उसीकी खोज में

    देश विदेश भटकूं मैं।

    लालन फकीर के इस गीत को गा रहे थे उन्ही के अनुयायी गगन हरकरा।

    लालन फकीर  का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष है।

    हम लालन फकीर और खास तौर पर गीतांजलि पर चर्चा जारी रखेंगे।फिलहाल रवींद्र संगीत पर आधिकारिक गीतवितान डाट काम से हम रवींद्र के उन गीतों की सूची दे रहे हैं,जिनमें बाउल प्रभाव है।गौरतलब है कि रवींद्र के सारे गीत गीतवितान शीर्षक से संकलित हैं।  

    Tagore songs composed in Baul style

    List of related Tagore songs

    The following Tagore songs which are correspond to Baul style. These songs contain ideas with double meaning and the style of the tune pertaining to a homeless minstrel. They are fit for singing with modest or even without accompaniment. Rabindranath had combined this style with other formats of Hindustani classical music in order to suit his compositions.

    Baul-Sur

    • Agune Holo Agunmoy

    • Akash Hote Khoslo Tara

    • Akashe Dui Hate Prem Bilay

    • Amader Bhoy Kahare

    • Amader Khepiye Beray

    • Amader Pakbe Na Chul

    • Amar Mon Bole Chai Chai

    • Amar Mon Jakhon Jagli Na Re

    • Amar Naiba Holo Pare

    • Amar Pothe Pothe Pathor

    • Amar Praner Manus Ache

    • Amar Sonar Bangla Ami

    • Amare Paray Paray

    • Ami Marer Sagor Pari

    • Amra Bosbo Tomar Sone

    • Amra Chas Kori Anande

    • Bachan Bachi Maren Mori

    • Bajre Tomar Baje Banshi

    • Bare Bare Peyechi

    • Bhenge Mor Ghorer Chabi

    • Bhule Jai Theke Theke

    • Bolo Bolo Bondhu Bolo

    • Byartho Praner Aborjona

    • Chi Chi Chokher

    • Choli Go Choli

    • Dao Hey Amar

    • Dukkha Jodi Na

    • E Din Aji Kon

    • Ebar Dukkho Amar

    • Ei Ekla Moder

    • Ei Shraboner Buker

    • Ei To Bhalo Legechilo

    • Gan Amar Jay Bhese

    • Ganer Bhelay Bela

    • Ghore Mukh Molin

    • Gram Chara Oi Rangamatir

    • Hay Hemantalaksmi

    • Hridoy Amar Oi Bujhi

    • Ja Chilo Kalo

    • Jakhon Porbe Na

    • Jakhon Tomay Aghat

    • Jani Jani Tomar

    • Jani Nai Go

    • Jatri Ami Ore

    • Je Ami Oi Bhese

    • Je Tomay Chare

    • Je Tore Pagol Bole

    • Jethay Tomar Lut

    • Jhnakra Chuler Meyer Kotha

    • Jodi Tor Bhabna

    • Jodi Tor Dak Shune

    • Khyapa Tui Achis

    • Kon Alote Praner Pradip

    • Kothin Loha Kothin

    • Ma Ki Tui Porer

    • Mati Toder Dak Diyeche

    • Matir Prodip Khani

    • Megher Kole Kole Jay

    • Moder Kichu Nai Re

    • Moner Modhye Nirobodhi

    • Na Re Na Re Hobe

    • Nirabe Thakis Sokhi

    • O Amar Mon Jakhan

    • O Bhai Kanai

    • O Dekha Diye Je Chole Gelo

    • O Jaler Rani

    • O Nithur Aro Ki Ban

    • Oder Kathay Dhnada Lage

    • Ogo Tomra Sabai Bhalo

    • Oi Asontaler Matir Pore

    • Or Maner E Bandh

    • Ore Agun Amar Bhai

    • Ore Jhor Neme Ay

    • Ore Tora Nei Ba Katha Bolli

    • Pagla Hawar Badoldine

    • Paye Pori Shono Bhai

    • Phagun Haway Haway

    • Phaguner Shuru Hotei

    • Phire Chal Matir Tane

    • Pothik Megher Dol Jote

    • Roilo Bole Rakhle Kare

    • Sabai Jare Sab Diteche

    • Se Ki Bhabe Gopon Robe

    • Sedine Apad Amar Jabe

    • Sharote Aj Kon Atithi

    • Sokhi Tora Dekhe Ja Ebar

    • Tar Anto Nai Go

    • Tomar Surer Dhara Jhare

    • Tor Apon Jone Charbe

    • Tor Shikol Amay Bikol

    • Tora Nei Ba Kotha Bolli

    • Tumi Bahir Theke Dile Bisam

    • Tumi Ebar Amay Laho

    • Tumi Je Surer Agun

    • Tumi Khushi Thako

    Bahar-Baul

    • Basante Ki Shudhu

    • Ore Ay Re Tabe Mat

    Behag-Baul

    • Akash Jure Shuninu Oi

    • Amay Dao Go Bole

    • Basanta Tor Shesh

    • Elem Natun Deshe

    • Jini Sakol Kajer

    • Mon Re Ore Mon

    • Or Bhab Dekhe Je Pay

    • Tora Je Ja Bolis Bhai

    Behag-Khambaj-Baul

    • O Amar Chander Alo

    • Shiter Hawar Laglo Nachon

    • Dujone Dekha Holo

    Bhairavi-Baul

    • Amay Bhulte Dite Naiko

    • Apnake Ei Jana Amar Phurabe

    • Ay Re Mora Phasal Kati

    • Biswajora Phad Petecho

    • Biswasathe Joge Jethay

    • Eto Alo Jaliyecho

    • Hey Nobina

    • Keno Re Ei Duwartuku

    • Lakshmi Jakhon Asbe

    • Oder Sathe Melao Jara

    • Pran Chay Chokshu Na Chay

    • Tomar Mohon Rupe Ke

    • Tui Phele Esechis

    Bibhas-Baul

    • Aj Dhaner Khete Roudro

    • Aji Bangladesher Hridoy

    • Aji Pronomi Tomare

    • Aji Sharototapone Probhat

    • Ami Bhoy Korbo Na Bhoy

    • Ami Kan Pete Roi

    • E Bela Dak Poreche

    • Ei Je Tomar Prem

    • Ei Kothata Dhore

    • Ei To Tomar Prem Ogo

    • Ek Hate Or Kripan

    • Megher Kole Rod Heseche

    • Nayan Mele Dekhi Amay

    • Nishidin Bharasa Rakhis

    • Ogo Bhagyodebi Pitamohi

    • Ore Grihobasi Khol Dar

    • Pous Toder Dak Diyeche

    • Shrabon Tumi Batase Kar

    Chhayanat-Baul

    • Amar Nayan Bhulano Ele

    Desh-Baul

    • Amay Bandhbe Jodi Kajer

    • Aro Aro Probhu

    • Oi Je Jhorero Megher Kole

    GourSarang-Baul

    • Badol Baul Bajay Re

    Hameer-Baul

    • Basante Phul Gathlo

    Iman-Baul

    • Akash Hote Akash Pothe

    • Ek Din Chine

    • Nityo Tomar Je Phul

    • Noy Noy E Modhur Khela

    • Sakal Snaje Dhay Je Ora

    Iman-Kalingara-Baul

    • Poth Ekhono Sesh Holo Na

    Jhijhit-Baul

    • Bajramanik Diye Gnatha

    • Sab Dibi Ke Sab Dibi Pay

    Jogia-Baul

    • Ore Jete Habe Ar Deri

    Kalingara-Baul

    • Amare Dak Dilo Ke

    • Ami Tarei Khuje Berai

    • Diner Pore Din

    • Kanna Hasir Dol

    • Sahaj Habi Sahaj Habi

    Khambaj-Baul

    • Amar Kontho Hote

    • Amar Shesh Paranir Kori

    • Ami Phirbo Na Re

    • Bhalo Manush Noi Re

    • Chokh Je Oder

    • Ganer Jhornatolai

    • Kon Khela Je Khelbo

    • Moder Jemon Khela Temni

    • Nayan Chere Gele Chole

    • O To Ar Phirbe Na

    • Ore Pothik Ore Premik

    • Phul Tulite Bhul Korechi

    • Tomari Nam Bolbo Nana Chole

    • Tumi Hothath Haway

    Mishra Behag-Baul

    • Jibon Jakhon Chilo

    Mishra Jhijhit-Baul

    • Ore Shikol Tomay Kole

    Pancham-Baul

    • Apon Hote Bahir Hoye

    Pilu-Baul

    • Ami Jabo Na Go Omni

    • Ami Tarei Jani

    • E Poth Geche Konkhane

    • Nahoy Tomar Ja Hoyeche

    • O Amar Desher Mati

    • Rangiye Diye Jao Jao Jao

    • Sab Kaje Hat Lagai

    • Se Je Moner Manush Keno

    Pilu-Bhimpalasi-Baul

    • Apni Amar Konkhane

    Pilu-Khambaj-Baul

    • Kon Bhiruke Bhoy

    Tilak-Kamod-Baul

    • Amar Kontho Tare Dake

    http://www.geetabitan.com/raag/light-classical-and-regional-forms/baul.html



    रवींद्र का दलित विमर्श-20

    क्या यह देश हत्यारों का है? हम किस देश के वासी हैं?

    भविष्य के प्रति जबावदेही के बदले घूसखोरी?

    गौरी लंकेश की हत्या के बाद 25 कन्नड़, द्रविड़ साहित्यकार निशाने पर!

    मौजूदा सत्ता वर्ग की रिश्वत खाकर भविष्य से दगा करने से इंकार करनेवाले लोग निशाने पर हैं,बाकी किसी को खतरा नहीं है।

    भारत के किसान हजारों साल से धर्मसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ लड़ते रहे हैं।जिसका कोई ब्यौरा हमारे इतिहास और साहित्य में नहीं है।अब हम फिर उसी धर्मसत्ता के शिकंजे में हैं और राजसत्ता निरंकुश है।किसान और कृषि विमर्श से बाहर हैं।

    पलाश विश्वास

    इंडियन एक्सप्रेस की खबर है।गौरी लंकेश की हत्या के बाद कन्नड़ के 25 साहित्यकारों को जान के खतरे के मद्देनर सुरक्षा दी जा रही है।

    जाहिर है कि दाभोलकर,पनासरे,कुलबर्गी,रोहित वेमुला,गौरी लंकेश के बाद वध का यह सिलसिला खत्म नहीं होने जा रहा है।

    हम किस देश के वासी हैं?

    अब यकीनन राजकपूर की तरह यह गाना मुश्किल हैःहम उस देश के वासी हैं,जहां गंगा बहती है।

    सत्तर के दशक में हमारे प्रिय कवि नवारुण भट्टाचार्य ने लिखा थाःयह मृत्यु उपत्यका मेरा देश नहीं है।

    अब वही मृत्यु उपत्यका मेरा देश बन चुका है।शायद अब यह कहना होगा कि मेरा देश हत्यारों का देश है।सत्य,अहिंसा और प्रेम का भारत तीर्थ अब हत्यारों का देश बन चुका है,जिसमें भारतवासी वही है जो हत्यारा है।बाकी कोई भारतवासी हैं ही नहीं।

    रवींद्रनाथ के लिखे भारतवर्षेर इतिहास की चर्चा हम कर चुके हैं।जिसमें उन्होंने साफ साफ लिखा है कि शासकों के इतिहास में लगता है कि भारतवर्ष हत्यारों को देश है और भारतवासी कहीं हैं ही नहीं।आज समय और समाज का यही यथार्थ है।

    रवींद्र नाथ की लिखी कविता दो बीघा जमीन की भी हम चर्चा कर चुके हैं।जल जंगल जमीन के हकहकूक के बारे में उन्होंने और भी बहुत कुछ लिखा है।क्योंकि वे जिस भारतवर्ष की बात करते रहे हैं,वह समाज का मतलब जनपदों का ग्रामीण समाज है।किसानों का समाज है।ईंट के ऊपर ईंट से बनी नयी सभ्यता के मुक्तबाजार में कीट बने मनुष्यों की कथा विस्तार से उन्होंने लिखी है।

    साहित्य के बारे में लिखते हुए उन्होंने सम्राट अशोक के शिला लेखों की चर्चा की है।उनके निबंध साहित्य पर हम आगे चर्चा करेंगे।

    रोम में कुलीन तंत्र में आदिविद्रोही स्पार्टकस के नेतृत्व में दासों के विद्रोह के बाद करीब दो हजार साल हो गये हैं,मनुष्यों को दास बनाने का वह कुलीन तंत्र खत्म हुआ नहीं है।

    जर्मनी और इंग्लैंड समेत यूरोप में राजसत्ता और धर्म सत्ता के विरुद्ध किसानों के विद्रोह के बाद सही मायने में स्वतंत्रता का विमर्श शुरु हुआ।इंग्लैंड में 1381 के किसान विद्रोह से एक सिलसिला शुरु हुआ किसानों के विद्रोह और आंदोलन का,जिसके तहत राजसत्ता और धर्मसत्ता के कुलीन तंत्र में दास मनुष्यों का मुक्ति संघर्ष शुरु हुआ।इंग्लैंड और जर्मनी के किसानों ने धर्मसत्ता को सिरे से उखाड़ फेंका।

    1381 के इंग्लैंड में किसानों का वह विद्रोह का एक बड़ा कारण प्लेग से हुई व्यापक पैमाने पर मृत्यु को बताया जाता है तो दूसरा कारण सौ साल के धर्मयुद्ध क्रुसेड के लिए किसानों पर लगा टैक्स है।यह पहला युद्ध विरोधी किसान विद्रोह भी है।यूरोप की रिनेशां भी इसी धर्मयुद्ध की परिणति है।

    धर्मसत्ता और राजसत्ता के कुलीन तंत्र के खिलाफ फ्रांसीसी क्रांति हुई और अमेरिकी क्रांति में लोकतंत्र  की स्थापना से धर्म सत्ता और राजसत्ता के विरुद्ध मनुष्यता और स्वतंत्रता के मूल्यों की जीत का सिलसिला शुरु हुआ।

    पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और औद्योगीकीकरण से पहले इतिहास बदलने में किसानों की निर्णायक भूमिका रही है।वह भूमिका अभी खत्म नहीं हुई है।

    विचारधारा की राजनीति करने वालों को शायद ऐसा नहीं लगता और वे अपना अपना लालकिला बनाकर भगवा आतंक के प्रतिरोध का जश्न मनाते हुए नजर आते हैं।

    यह सारा इतिहास विश्व इतिहास का हिस्सा है और कला साहित्य,माध्यमों और विधाओं का विषय भी है।

    इसके विपरीत पश्चिमी देशों की नगरकेंद्रित आधुनिक सभ्यता के मुकाबले डिजिटल मुक्तबाजार के बहुसंख्यक मनुष्य अब भी किसान हैं।

    शहरीकरण और औद्योगीकीकरण के नतीजतन पेशा बदलने की वजह से जो शहरी लोग अब किसान नहीं हैं,उऩकी जड़ें भी गांवों में हैं।

    भारत के किसान हजारों साल से धर्मसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ लड़ते रहे हैं।जिसका कोई ब्यौरा हमारे इतिहास और साहित्य में नहीं है।अब हम फिर उसी धर्मसत्ता के शिकंजे में हैं और राजसत्ता निरंकुश है।

    किसान और कृषि विमर्श से बाहर हैं।

    ब्रिटिश हुकूमत की शुरुआत से भारत के किसान औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लगातार विद्रोह करते रहे हैं,लेकिन यह इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में शामिल नहीं है।

    साहित्य से भी किसान बहिस्कृत हैं।ऐसा क्यों है?

    अभी वर्धा के छात्रों ने सारस पत्रिका के प्रवेशांक मे किसानों पर एक विमर्श की शुरुआत की है।इसकी निरंतरता बनाये रखने की जरुरत है।पत्रिका अभी हम तक पहुंची नहीं है।जब आयेगी तब इसपर अलग से चर्चा करेंगे।इस शुरुआत के लिए उन्हें बधाई।

    रवींद्रनाथ ने राष्ट्रवाद पर लिखते हुए भारत की समस्या को सामाजिक माना है और इस सामाजिक समस्या को उन्होंने  विषमता की समस्या कहा है। इस विषमता की वजह नस्ली वर्चस्व है और इसीलिए नस्ली वर्चस्व पर आधारित पश्चिम के फासीवादी राष्ट्रवाद का उन्होंने शुरु से लेकर अंत तक विरोध किया है।

    जाति वर्ण व्यवस्था के तहत भारत के किसान शूद्र, अछूत, आदिवासी या विधर्मी हैं।यही भारत का किसान समाज है।इसी वजह से इतिहास और साहित्य, कला, माध्यमों में किसान वर्ग वर्ण नस्ली वर्चस्व की वजह से अनुपस्थित हैं।

    बाकी दुनिया में और फासीवादी राष्ट्रवाद की जमीन पर भी किसानों को ऐसा बहिस्कार नहीं है।न अन्यत्र कहीं अन्नदाता किसान और मेहनतकश लोग शूद्र या अछूत हैं।विषमता का यह नस्ली वर्चस्ववाद श्वेत आतंकवाद से भी भयंकर है।

    बंगाल में भुखमरी के बाद गणनाट्य आंदोलन में किसानों को पहली बार विमर्श के केंद्र में रखा गया और फिर नक्सलबाड़ी आंदोलन में भारतीय कृषि पर फोकस हुआ।सत्तर के दशक के अंत के हिंदुत्व पुनरूत्थान और मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था के तहत मनुस्मृति की धर्मसत्ता और राजसत्ता के एकाकार हो जाने से बहुसंख्य बहुजन अवर्ण आदिवासी और विधर्मी गैरनस्ली अनार्य द्रविड़ किसान,उनके गांव, जनपद, जल, जंगल जमीन वैदिकी सभ्यता की अश्वमेधी नरसंहार संस्कृति के निशाने पर हैं और सत्ता वर्ग को उनसे कोई सहानुभूति नहीं है।किसान से पेशा बदलकर भद्रलोक बने शहरी मुक्तबाजारी सत्ता समर्थकों को भी किसानों से कोई सहानुभूति नहीं है।

    गौरतलब है कि भारतीय किसान समाज,उनकी लोकसंस्कृति और उनके आंदोलन  देशी विदेशी शासकों,जमींदारों,महाजनों और सूदखोरों के साथ साथ इस भद्रलोक बिरादरी के खिलाफ रहे हैं तो जाहिर है कि भद्रलोक बिरादरी के सत्ता वर्ग,उनकी राजनीति,उनके इतिहास और उनके साहित्य में बहुजन, अवर्ण, शूद्र, अछूत, आदिवासी,अनार्य,द्रविड़ किसानों की कोई जगह नहीं है।

    कल हमने  विश्वभऱ के किसान आंदोलनों के बारे में उपलब्ध समाग्री शेयर करने की कोशिश की तो ज्यादातर सामग्री अंग्रेजी या बांग्ला में मिली और हिंदी में कम से कम सूचना क्रांति में ओतप्रोत हिंदी समाज की तरफ से दर्ज किसान आंदोलनों का कोई दस्तावेज हमें नहीं मिला।

    शोध पुस्तकें हैं लेकिन वे खरीदने के लिए हैं और अंग्रेजी और बांग्ला की तरह ओपन सोर्स नहीं है।

    बांग्ला में भी ज्यादातर सामग्री बांग्लादेश से है.जहां सवर्ण वर्चस्व नहीं है।

    हिंदी में 1857 की क्रांति से पहले 1757 में पलाशी युद्ध के तत्काल बाद शुरु चुआड़ विद्रोह और पूर्वी बंगाल के पाबना और रंगपुर के किसान विद्रोहों के बारे में कुछ भी उपलब्ध नहीं है।शोध सामग्री हो सकता है कि हो,लेकिन आम जनता के लिए उपलब्ध जनविमर्श में ऐसे दस्तावेज नहीं है।

    कल हमने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ फकीर संन्यासी विद्रोह के दस्तावेज भी शेयर पेश किये है,जिसके बारे में हिंदी में आनंदमठ के संन्यासी विद्रोह और वंदेमातरम प्रसंग में चर्चा होती रही है।बंगाल में विद्रोह दमन के बावजूद यह विद्रोह नेपाल, बिहार, असम और पूर्वी बंगाल में जारी रहा है और इसके नेतृ्त्व में फकीर बाउल सन्यासी के अलावा आदिवासी और किसान भी थे।

    भारत में धर्मसत्ता का वर्चस्व कभी नहीं रहा है।वैदिकी सभ्यता के ब्राह्मण धर्म या बौद्धमय भारत के बौद्ध धर्म या पठान मुगलों के सात सौ साल के दौरान  इस्लाम धर्म शासकों का धर्म होने के बावजूद यूरोप में धर्म सत्ता और राजसत्ता के किसी दोहरे तंत्र को  भारत में आम जनता के किसान समाज ने स्वीकारा नहीं है।कुलीन सत्ता वर्ग के धर्म और राजनीति से अलग उनकी लोक संस्कृति की साझा विरासत गांव देहात जनपदों में मनुष्यता के धर्म के रुप में हमेशा जीवित रही है।

    यही भारत की सूफी संत गुरु परंपरा है,जो सत्ता वर्ग के दायरे से बाहर जल जंगल जमीन और जनपद का विमर्श रहा है।

    सात सौ साल के इस्लामी राजकाज के दौरान आम जनता का व्यापक जबरन धर्मांतरण हुआ होता तो भारत में बौद्धों की तरह हिंदुओं की जनसंख्या भी कुछ लाख तक सीमित हो जाती और अस्सी प्रतिशत से ज्यादा यह जनसंख्या उसी तरह नहीं होती जैसे बौद्ध शासकों के बाद भारत में बौद्धों की जनसंख्या का अंत हो गया।

    बंगाल में तेरहवीं सदी में जिस तरह बौद्धों का धर्मांतरण हुआ है,भारत के इतिहास में सात सौ साल के मुसलमान शासकों के राजकाज के दौरान उतना व्यापक धर्मंतरण हुआ नहीं है।होता तो जैसे भारत फिर बुद्धमय नहीं बना,उसीतरह हिंदू राष्ट्र का विमर्श चलाने वाले पुरोहित तंत्र और सत्ता वर्ग् के साथ हिंदू भी नहीं होते।

    इस्लामी शासन के दौरना भी हिंदुओं की दिनचर्या जीवन यापन मनुस्मृति विधान के कठोर अनुशासन में पुरोहित तंत्र के निंयत्रण में रहने का इतिहास है  और मुसलमान शासकों ने अंग्रेजों की तरह ब्राह्मणतंत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है।

    मनुस्मृति विधान ईस्ट इंडिया कंपनी के राजकाज के दौरान समाज सुधार के ब्राह्मणतंत्र विरोधी बहुजन आंदोलनों को तहत टूटना शुरु हुआ क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान उन्हें उनके वे हकहकूक मिलने शुरु हो गये जो मनुस्मृति विधान के तहत निषिद्ध थे।

    अब आजादी के बाद हिंदुत्व के पुनरुत्थान के फासीवादी नस्ली राजकाज और राष्ट्रवाद के तहत फिर मनुस्मृति विधान लागू है तो जाहिर है कि बहजनों, अवर्णों, आदिवासियों,द्रविड़ और अनार्य, किसान और मेहनतकश समुदायों का सफाया लाजिमी है।

    इसीलिए मुक्त बाजार में किसान समाज की हत्या हो रही है तो बोलियों का लोकतंत्र खत्म है और लोकसंस्कृति जनपदों के साथ साथ विलुप्तप्राय है।

    साहित्य,कला,इतिहास और संस्कृति का प्रस्थानबिंदू सिरे से खत्म है तो वर्तमान सामाजिक यथार्थ हत्यारों का आतंकराज है,जहां कबीर सूर नानक तुकाराम लालन फकीर या रवींद्र या गांधी या प्रेमचंद के लिए कोई स्पेस नहीं है।

    भारत में लोक संस्कृति का आध्यात्म,आस्था और धर्म प्रकृति और पर्यावरण, जल जंगल जमीन और सामुदायिक जीवन पर आधारित है जो उपभोक्तावाद और नस्ली फासीवादी राष्ट्रवाद दोनों, धर्म सत्ता और राजसत्ता दोनों के विरुद्ध है।

    रवींद्रनाथ ने पल्ली प्रकृति में लिखा हैः

    आम जनता में विशेष कालखंड में सामयिक तौर पर भावनाओं की सुनामी बनती है-सामाजिक,राष्ट्रवादी या धार्मिक संप्रदायिक। आम जनता की भावनाओं की इस सुनामी की ताकीद अगर ज्यादा हो गया तो भविष्य की यात्रापथ की दिशाएं बदल जाती हैं।कवियों में यह प्रवृत्ति होती है कि कई बार वे वर्तमान से रिश्वत लेकर भविष्य को वंचित कर देते हैं।कभी कभी ऐसा समय आता है,जब रिश्वत का यह बाजार बेहद लोभनीय बन जाता है।देशभक्ति,सांप्रदायिकता के खाते खुल जाते हैं।तब नकदी की लालच से बचना मुश्किल हो जाता है..(रवींद्र रचनावली,जन्मशतवार्षिकी संस्करण,पल्ली प्रकृति,पृष्ठ 570)

    मौजूदा सत्ता वर्ग की रिश्वत खाकर भविष्य से दगा करने से इंकार करनेवाले लोग निशाने पर हैं,बाकी किसी को खतरा नहीं है।

    जल जंगल जमीन और प्रकृति के विरुद्ध मनुष्य के सर्वग्रासी लोभ और आक्रमण के खिलाफ अरण्य देवता निबंध में उन्होंने लिखा है कि अपने लोभ के कारण मनुष्य अपनी मौत को दावत दे रहा है। इसी कृषि विरोधी जनपद विरोधी विकास को गांधा ने पागल दौड़ कहा और सत्ता वर्ग इसे आज आर्थिक सुधार कहता है।

    जंगलों के अंधाधुंध कटान के खिलाफ पर्यावरण बचाओ चिपको आंदोलन से बहुत पहले रवींद्र नाथ ने लिखा हैः

    রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর এসব বুঝেছিলেন বলে 'অরণ্য দেবতা'প্রবন্ধে বলেছেন- 'মানুষের সর্বগ্রাসী লোভের হাত থেকে অরণ্য সম্পদ রক্ষা করাই সর্বত্র সমস্যা হয়ে দাঁড়িয়েছে। বিধাতা পাঠিয়েছিলেন প্রাণকে, চারিদিকে তারই আয়োজন করে রেখেছিলেন। মানুষই নিজের লোভের দ্বারা মরণের উপকরণ জুগিয়েছে।… মানুষ অরণ্যকে ধ্বংস করে নিজেরই ক্ষতি ডেকে এনেছে। বায়ুকে নির্মল করার ভার যে গাছের উপর, যার পত্র ঝরে গিয়ে ভূমিকে উর্বরতা দেয়, তাকেই সে নির্মূল করেছে। বিধাতার যা কিছু কল্যাণের দান, আপনার কল্যাণ বিস্মৃত হয়ে মানুষ তাকেই ধ্বংস করেছে।'

    रवींद्र नाथ ने मनुष्य के लिए जो भी कुछ हितकर है,उसे प्रकृति पर निर्भर माना है।उनके मुताबिक प्रकृति से तादाम्य ही मनुष्यता का धर्म है। प्रकृति से व्याभिचार के लिए धर्म कर्म से विचलन के खिलाफ वे मुखर रहे हैंः

    আমরা লোভবশত প্রকৃতির প্রতি ব্যভিচার যেন না করি। আমাদের ধর্মে-কর্মে, ভাবে-ভঙ্গিতে প্রত্যহই তাহা করিতেছি, এই জন্য আমাদের সমস্যা উত্তরোত্তর জটিল হইয়া উঠিয়াছে- আমরা কেবলই অকৃতকার্য এবং ভারাক্রান্ত হইয়া পড়িতেছি। বস্তুত জটিলতা আমাদের দেশের ধর্ম নহে। উপকরণের বিরলতা, জীবনযাত্রার সরলতা আমাদের দেশের নিজস্ব- এখানেই আমাদের বল, আমাদের প্রাণ, আমাদের প্রতিজ্ঞা।'

    छिन पत्र और तपोवन में भी उन्होंने जल जंगल जमीन के हकहकूक की आवाज बुलंद की हैः

    বৃক্ষের প্রয়োজনীয়তা সম্পর্কে এ এক বিস্ময়কর অনুধ্যান নিঃসন্দেহে। ছিন্নপত্রের ৬৪ তথা ছিন্নপত্রাবলির ৭০ সংখ্যক পত্রে কবি বৃক্ষের সঙ্গে নিজের সম্পর্কের পরিচয় উন্মোচন করে বলেন-


    'এক সময়ে যখন আমি এই পৃথিবীর সঙ্গে এক হয়ে ছিলাম, যখন আমার উপর সবুজ ঘাস উঠত, শরতের আলো পড়ত, সূর্যকিরণে আমার সুদূর বিস্তৃত শ্যামল অঙ্গের প্রত্যেক রোমক‚প থেকে যৌবনের সুগন্ধ উত্তাপ উত্থিত হতে থাকত, আমি কত দূরদূরান্তর দেশদেশান্তরের জলস্থল ব্যাপ্ত করে উজ্জ্বল আকাশের নীচে নিস্তব্ধভাবে শুয়ে পড়ে থাকতাম, তখন শরৎসূর্যালোকে আমার বৃহৎ সর্বাঙ্গে যে-একটি আনন্দরস, যে-একটি জীবনীশক্তি অত্যন্ত অব্যক্ত অর্ধচেতন এবং অত্যন্ত প্রকাণ্ড বৃহৎভাবে সঞ্চারিত হতে থাকত, তাই যেন খানিকটা মনে পড়ল। আমার এই যে মনের ভাব, এ যেন এই প্রতিনিয়ত অঙ্কুরিত মুকুলিত পুলকিত সূর্যনাথ আদিম পৃথিবীর ভাব। যেন আমার এই চেতনার প্রবাহ পৃথিবীর ঘাসে এবং গাছের শিকড়ে শিকড়ে শিরায় শিরায় ধীরে ধীরে প্রবাহিত হচ্ছে, সমস্ত শস্যক্ষেত রোমাঞ্চিত হয়ে উঠেছে, এবং নারকেল গাছের প্রত্যেক পাতা জীবনের আবেগে থর থর করে কাঁপছে।'


    আবার 'তপোবন'এ তিনি বলেন-


    '…ভারতবর্ষের একটি আশ্চর্য ব্যাপার দেখা গেছে এখানকার সভ্যতার মূল প্রস্রবণ শহরে নয়, বনে। ভারতবর্ষের প্রথমত আশ্চর্য বিকাশ দেখিতে পাই সেখানে, মানুষের সঙ্গে মানুষের অত্যন্ত ঘেঁষাঘেঁষি একেবারে পিণ্ড পাকিয়ে ওঠেনি। সেখানে গাছপালা, নদী সরোবর মানুষের সঙ্গে মিলে থাকার যথেষ্ট অবকাশ পেয়েছিল।'

    जल जंगल जमीन और किसानों के समाज का यह विमर्श ही सूफी संत आंदोलन का धर्म कर्म और रचनाधर्मिता है तो यही रवींद्र का दलित विमर्श है।

    इसलिए कबीर,सूरदास,तुलसी, नानक,तुकाराम,नामदेव,गुरुनानक ,बसेश्वर, चैतन्य, जयदेव, लालन फकीर और रवींद्र को समझने के लिए भारतीय कृषि,किसान और कृषक समाज,आदिवासी और किसान आंदोलन में रची बसी जनपदों की लोक जमीन पर खड़ा होना जरुरी है।



    रवींद्र का दलित विमर्श-21

    बौद्ध,वैष्णव,बाउल फकीर सूफी आंदोलन की जमीन ही रवींद्र की रचनाधर्मिता और यही लालन फकीर का उन पर सबसे गहरा असर।

    গীতাঞ্জলির গীতধারায় লালনের দর্শনের বা লালন কালামের পরিশীলিত রচনার ধারাবাহিকতা।

    कादंबरी की आत्महत्या ने रवींद्र को स्त्री अस्मिता का सबसे बड़ा प्रवक्ता बनाया और क्रूर जमींदार सामंत के पुत्र रवींद्र किसानों, मेहनतकशों, शूद्रों, अछूतों, आदिवासियों, मुसलमानों  के हकहकूक के हक में खड़े हो गये।

    नरसंहार संस्कृति का धर्म और राष्ट्रवाद दोनों कृषि और किसानों के खिलाफ,बोलियों,भाषाओं और संस्कृतियों की साझा विरासत के खिलाफ है।

    बदनाम हिंदी पट्टी की तुलना में दूसरे गैरहिंदी प्रदेशों में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का तांडव,सामाजिक बदलाव की जमीन गायपट्टी में ही प्रतिरोध निरंकुश फासीवाद का प्रतिरोध संभव है।

    मुक्बाजार में धर्म भी एक अंतहीन पाखंड है जो जाति, वर्ण ,नस्ल के आधार पर वर्ग वर्ण वर्चस्व सुनिश्चित करता है और इसीलिए कारपोरेट एकाधिकार के मुक्तबाजार में धर्मोन्माद का यह नंगा कत्लेआम कार्निवाल है,जिसे राष्ट्रवाद कहा जा रहा है।

    यह आस्था का नहीं,राजनीति का मामला है,सत्ता समीकरण का मामला है।यही जनसंहार संस्कृति का जायनी तंत्र है तो मनुस्मृति विधान भी।

    दूध घी की नदियां इसीलिए अब खून की नदियों में तब्दील हैं।


    पलाश विश्वास

    पांच अक्तूबर को मैं नई दिल्ली रवाना हो रहा हूं और वहां से गांव बसंतीपुर पहुंचना है।आगे क्या होगा,कह नहीं सकते।कोलकाता में बने रहना मुश्किल हो गया है और कोलकाता छोड़ना उससे मुश्किल तो गांव लौटना शायद सबसे ज्यादा मुश्किल। मैंने जिंदगी से लिखने पढ़ने की आजादी के सिवाय कुछ नहीं मांगा और गांव के घर से अलग कहीं और घर बसाने की नहीं सोची।इसलिए आगे लिखना हो सकेगा कि नहीं,कह नहीं सकते।होगा तो भी एक बड़ा अंतराल चाहिए फिर दोबारा खड़े होने के लिए।किखने पढ़ने का नया ठिकाना जुगाड़ना सबसे जरुरी है।वैसे भी जनता के हकहकूक के हम में खड़े होकर लिखने पढ़ने की आजादी अब खतरे में हैं तो लिख पढ़कर गुजारा करने के मौके नहीं के बराबर है।बाजार से जुड़ना हमारी सेहत के मुताबिक नहीं है और बिना बाजार से जुड़े जिंदा रहने की भी आजादी नहीं है।

    इसलिए रवींद्र दलित विमर्श लगातार जारी रखने की मजबूरी है।

    हिंदी के पाठकों को कितना पहुंच पा रहा है यह विमर्श,हम नहीं जानते।लेकिन हिंदी वालों को खुशी होगी कि बांग्लादेश में हस्तक्षेप पर हिंदी में जारी यह रवींद्र मविमर्स बांग्लादेश में खूब पढ़ा और शेयर किया जा रहा है।

    कोई अंतराल की गुंजाइश नहीं है।जितना समेट सकते हैं,समेटने की कोशिश करेंगे।पाठकों को इस बमबारी से तकलीफ हो रही होगी,हम समझते हैं।लेकिन यह तय है कि कुछ समय की बात है और फिर हमारे मोर्चे पर लंबा सन्नाटा होना है।तब तक झेलते रहें।

    लालन फकीर और रवींद्र की चर्चा के मध्य हमने किसान आंदोलनों पर चर्चा की है क्योंकि साहित्य और संस्कृति का मूल आधार मनुष्य और प्रकृति के अंतर्संबंध हैं और यही धर्म कर्म का आधार भी है।

    सभ्यता और मनुष्यता का विकास दुनियाभर में कृषि से हुई।

    खानाबदोश कबाइली सभ्यता से पशुपालन और खेती के बाद सत्रहवीं सदी से औद्योगीकरण का सिलसिला शुरु हुआ।उत्पादन संबंधों की बुनियाद पर मनुष्य सामाजिक प्राणी बना तो कृषि आजीविकाओं और कृषि की वजह से।

    औद्योगीकरण ने उस कृषि व्यवस्था को तहस नहस कर दिया है और उत्पादन संबंधों का ताना बाना सिरे से उलझ गया है।

    पूंजी और मुनाफा की अर्थव्यवस्था में शहरीकरण के मार्फत जो नई सभ्यता का जन्म हुआ,उसकी जड़ें पश्चिम में हैं।

    भारत ही नहीं समूची एशिया और अफ्रीका की सभ्यता का इतिहास किसानों का इतिहास है।जिसे विद्वतजनों का कुलीन तबका सिरे से नजरअंदाज कर रहा है।

    विज्ञान और तकनीक से औद्योगीकरण तेज हुआ।

    बाजार का विस्तार हुआ और शहरीकरण हुआ।

    पूंजीवादी व्यवस्था साम्राज्यवादी व्यवस्था में बदल गयी है।

    कृषि व्यवस्था का देश और पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के राष्ट्र में बहुत अंतर है।देश जनपदों से बनता है और जनपद किसानों से बनता है।राष्ट्र जनपदों और किसानों के सफाये का तंत्र है।

    देशभक्ति अपनी जमीन से जुड़ी मनुष्यता की चेतना है तो राष्ट्रवाद अंध नस्ली वर्चस्व है जो पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के साथ साथ सामंती वर्ग वर्ण वर्चस्व को मजबूत करता है।यही सभ्यता का संकट है।

    अंधाधुध शहरीकरण और पूंजीवादी औद्योगीकीकरण अब आधार नंबर और आटोमेशन से लेकर रोबोटिक्स के दौर में है और इस उ्त्पादन प्रणाली में मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है।

    इस कारपोरेट मुक्तबाजार में मनुष्य कृषि व्यवस्था की तरह न उत्पादक है और न सामाजिक है।वह उपभोक्ता मात्र है और मनुष्यता के आदर्शों और मूल्यों का कोई मायने उसके लिए नहीं है।मनुष्यविरोधी प्रकृतिविरोधी नरसंहार संस्कृति है यह। नरसंहार संस्कृति का धर्म और राष्ट्रवाद दोनों कृषि और किसानों के खिलाफ,बोलियों,भाषाओं और संस्कृतियों की साझा विरासत के खिलाफ है।

    मुक्बाजार में धर्म भी एक अंतहीन पाखंड है जो जाति,वर्ण,नस्ल के आधार पर वर्ग वर्ण वर्चस्व सुनिश्चित करता है और इसीलिए कारपोरेट एकाधिकार के मुक्तबाजार में धर्मोन्माद का यह नंगा कत्लेआम कार्निवाल है,जिसे राष्ट्रवाद कहा जा रहा है।यह आस्था का नहीं,राजनीति का माला ,सत्ता समीकरण का मामला है।यही जनसंहार संस्कृति का जायनी तंत्र है  तो मनुस्मृति विधान भी।

    रवींद्र नाथ जमींदार थे।उनके पिता की विरासत की वजह से रवींद्रनाथ जमींदार बने।उनके पिता महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर ब्रहमसमाजी थे तो स्वभाव चरित्र से भद्रलोक बिरादरी से बाहर एक सामंती जमींदार भी थे।टैगोर की रचनाधर्मिता उनके बचपन से इस सामंती शिकंजे को तोड़ते हुए बनी।

    जोड़ासांकू के ठैगोर परिवार में बच्चों की कोई आजादी नहीं थी और स्त्रियों की भी कोई आजादी नहीं थी।

    ज्योतिंद्र नाथ टैगोर की पत्नी कादंबरी देवी ने आत्महत्या की तो इस मामले को रफा दफा करने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया गया।

    इस प्रकरण का पर्दाफाश रवींद्र ने ही किया और कादंबरी देवी की उस मृत्यु ने रवींद्रनाथ को स्त्री स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रवक्ता बना दिया।

    नष्टनीड़ उपन्यास और उस पर बनी सत्यजीत रे की फिल्म चारुलता कादंबरी देवी की कुचल दी गयी स्त्री अस्मिता को नये सिरे से रवींद्र ने रचा तो आंख की किरकिरी,चोखेर बाली की विनोदिनी सामंती समाज के खिलाफ स्त्री अस्मिता का महाविस्फोट है।

    महर्षि देवेंद्रनाथ क्रूर जमींदार थे।

    पूर्वी बंगाल के ग्रामीण पत्रकार कंगाल हरनाथ ने जमींदार देवेंद्र नाथ टैगोर के खिलाफ अपनी पत्रिका में लगातार लिखा तो उनका भयानक उत्पीड़न हुआ।

    प्रजाजनों पर अत्याचार करने के मामले में देवेंद्र नाथ टैगोर निरंकुश थे।यहीं नहीं,रवींद्र नाथ के दादा प्रिंस द्वारकानाथ टैगोर कोलकाता के फोर्ट विलियम के ठेके और शेयरबाजर से ही बड़े उद्योगपति नहीं बने,वे पश्चिमी देशों में काले गुलामों का निर्यात भी करते थे। असम के चायबागानों और पूर्वी बंगाल में आदिवासी मजदूरों को सप्लाई करना भी उनका धंधा था।

    इस जमींदारी पृष्ठभूमि के जमींदार रवींद्रनाथ के किसानों और मेहनतकश तबके के हक हकूक के हक में खुलकर खड़े होने की रचनाधर्मिता में बंगाल के बाउल फकीरों के किसान आंदोलन और बंगाल के किसान समाज से जुड़ी उनकी रचनाधर्मिता की निर्णायक भूमिका रही है।

    रवींद्र के मानस को सामंती जमींदारी पृष्ठभूमि से मुक्त करने में बौद्ध साहित्य,संत साहित्य और बाउलों का सबसे बड़ा योगदान है।

    इसीकी परिणति गीताजंलि है।

    कृषि आधारित उत्पादन संबंधों की साझा लोकसंस्कृति में विकसित उनकी रचनाधर्मिता का मुख्य स्वर सामाजिक न्याय और समानता है तो इसके लिए लालन फकीर और बंगाल की सूफी संत परंपरा और उनके आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है।किसान समाज पर सामंती शिकंजे की दैवी सत्ता और राजसत्ता और फासिस्ट नस्ली राष्ट्रवाद के विरुद्ध उनकी रचनाधर्मिता का आध्यात्म किसानों के सामुदायिक जीवन और उनकी जीवन यंत्रणा पर आधारित है,जिसे भारत में किसान आंदोलनों के इतिहास में साधू संतों पीरों फकीरों बाउलों की निर्णायक भूमिका को समझे बिना समझना मुश्किल है।

    रवींद्र का यह आध्यात्म चार्बाक दर्शन से लेकर शहीदे आजम भगतसिंह की नास्तिकता में एकाकार है।

    हिंदी पाठकों के सामने समूचा संत साहित्य है।यह समूचा साहित्य जनपदों की पृष्ठभूमि में भारत के किसान समाज को संबोधित बोलियों में लिखा गया साहित्य है जिसमें मीरा बाई का जीवन और साहित्य भारतीय स्त्री अस्मिता को लोक विमर्श है तो कबीरदास सूरदास रहीमदास रसखान तुकाराम नामदेव और गुरुनानक का सारा साहित्य उस सामंती दैवी सत्ता के खिलाफ जो जनपदों और किसान समाज के दमन उत्पीड़न पर बनी है और इस साहित्य में नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के विरुद्ध न्याय और समानता का वह लोकतंत्र है जो शहरीकरण औद्योगीकीरण के आधुनिक साहित्य में सिरे से अनुपस्थित है।

    संत कबीर का प्रतिरोध हो या सूफी संतों का प्रतिरोध,सत्ता की राजनीति सामाजिक शक्तियों के सामने टिक ही नहीं सकी।

    आज अगर प्रतिरोध का साहित्य रचा नहीं जाता तो इसका सबसे बड़ा कारण है कि साहित्य और संस्कृति की जड़ें जनपदों से कट चुकी हैं और सामाजिक शक्तियों के एकाधिकार नस्ली वर्चस्व के निरंकुश फासिस्ट सैन्यतंत्र में खत्म होते जाना है।

    किसान के साहित्य और संस्कृति से बाहर होना उत्पादन प्रणाली के कायाकल्प की कथा है और इस उत्पादन प्रणाली या राष्ट्र के विकास दर में कृषि और किसानों की कोई भूमिका न होना है।

    कबीरदास ने जिस दो टुकभाषा में मूर्ति पूजा,पंडित पुरोहित मौलवी मुल्ला,पोथी पुराण,धर्मस्थल,तीर्थ,कर्मकांड,मंदिर मस्जिद और धर्म जाति अस्मिताओं का विरोध किया है,आज आजाद भारत में दाभोलकर,पनसारे कुलबर्गी,रोहित वेमुला और गौरी लंकेश की हत्या की पृष्ठभूमि में उसकी कल्पना करना असंभव है।

    इनमें गौरी लंकेश लिंगायत थीं और कन्नड़ के जिन 25 साहित्यकारों के लिए सुरक्षा इंतजाम करना पड़ रहा है,वे सभी अनार्य द्रविड़ है तो उनमें भी अनेक लिंगायत आंदोलन से जुड़े हैं।

    कर्नाटक में ब्राह्मण तंत्र के खिलाफ लिंगायत आंदोलन का व्यापक असर रहा है और कर्नाटक में जीवन के सभी क्षेत्रों में लिंगायत वर्चस्व है।इसके बावजूद कर्नाटक में जो हो रहा है,वह उत्तर भारत की बदनाम गायपट्टी से भयंकर है।

    यहीं नहीं,जिन लेखकों पर हिंदुत्व के ब्राह्मणवादी पुनरूत्थान के खिलाफ लिखने के लिए हमले हुए,वे महाराष्ट्र और कर्नाटक के हैं तो रोहित वेमुला की हत्या तेलंगना राष्ट्रीयता और तेलंगना किसान आंदोलन की जमीन हैदराबाद में हुई।

    दाभोलकर और पानसारे उस महाराष्ट्र में मारे गये जहां शिवाजी महाराज ने दिल्ली की निरकुंश सत्ता को चुनौती देकर महाराष्ट्र में ब्राह्मण तंत्र के खिलाफ शूद्रों का राज कायम किया,जहां महात्मा ज्योतिबा फूले और सावित्रबाी फूले की कर्म भूमि है,जहां से बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने जाति उन्मूलन के एजंडे के साथ समानता, न्याय और संवैधानिक हकहकूक का मिशन शुरु किया,जहां आज भी लाखों अबेंडकरी संगठन सक्रिय हैं।

    कर्नाटक,महाराष्ट्र,पेरियार के तमिलनाडु और नारायण स्वामी,अयंकाली के केरल में जनपदों और किसान समाज का व्यापक हिंदुत्वकरण हुआ है वैसे ही जैसे बंगाल,बिहार और असम का।

    हिंदी पट्टी में संतों के आंदोलन और सूफी आंदोलन के पीछे जो किसान समाज है, वही बंगाल के फकीर बाउल आंदोलन का किसान समाज है।

    रवींद्र साहित्य का आध्यात्म और प्रेम मनुष्यता का धर्म और विश्व मानवता का दर्शन इसी जमीन की उपज है।

    इस जमीन के पकाने का काम किया है बाउल फकीर आंदोलन ने।

    इसी फकीर बाउल आदिवासी किसान आंदोलन के हिंदुत्वकरण से जन्मा फासिज्म का नस्ली राष्ट्रवाद,जिस कारण भारत का विभाजन हुआ और फिर फिर फिर विभाजन का खतरा देश और जनता को लहूलुहान कर रहा है।

    दूध घी की नदियां इसीलिए अब खून की नदियों में तब्दील हैं।

    गीतवितान में दो हजार से ज्यादा रवींद्र नाथ के गीत हैं जिनमें सैकड़ों बाउल गान से सीधे प्रभावित हैं,जिनकी एक आधिकारिक सूची भी हमने शेयर की है।

    गीतांजलि की चर्चा हमेशा भारतीय आध्यात्म और रहस्यवाद,आस्था और धर्म के संदर्भ और प्रसंग में होती है।लेकिन यह आध्यात्म वैदिकी सभ्यता और ब्राह्मण धर्म का आध्यात्म नहीं है।यह बौद्ध विरासत,वैष्णव बाउल और फकीर,सूफी आंदोलन की साझा विरासत की पूर्वी बंगाल के शूद्र अछूत मुसलमान किसानों की लोकसंस्कृति है,जिसके सबसे बड़े प्रतिनिधि लालन फकीर हैं।

    हिंदी के पाठक अगर गोस्वामी तुलसीदास के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को मनुस्मृति संविधान का रक्षक मानते हैं तो वे राम चरित मानस में मनुष्यता के धर्म को समझ नहीं सकते।कबीर दास,रसखान,सूरदास,रहीम दास,तुकाराम,नामदेव और गुरु नानक की साझा विरासत को अगर नहीं समझते तो समता न्याय का विमर्श रहा दूर,भारते के संविधान ,कानून के राज,लोकतंत्र और लोक गणराज्य को बी नहीं समझेंगे और जिस राजसत्ता और धर्मसत्ता के खिलाफ जनपदों और किसान समाज की आजादी के लिए संतों गुरुओं का आंदोलन है,उसी के शिकंजे में फंसते चले जायेेंगे और सामाजिक शक्तियों की जगह फासीवादी निरंकुश नस्ली सत्ता की नरसंहार संस्कृति के शिकार हो जायेंगे।

    दिल्ली की सत्ता के लिए हिंदी पट्टी बेकार बदनाम हो रही है।हिंदुत्व या इस्लामी राष्ट्रवाद,नस्ली और क्षेत्रीय राष्ट्रवाद का तांडव गैर हिंदी प्रदेशों में सबसे ज्यादा है।कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र,असम,बंगाल जैसे राज्यों में,जहां नस्ली वर्चस्व के खिलाफ,ब्राह्मणधर्म के खिलाफ सामंतवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ आदिवासियों किसानों के साथ साथ साधु संतों फकीरों बाउलों का आंदोलन चलता रहा है और समता न्याय के संघर्ष भी जहां तेज हुए हैं।

    इस लिहाज से उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में सामाजिक बदलाव बाकी भारत की तुलना में ज्यादा हुआ है और सत्ता में और जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी  दलितों, मुसलमानों, पिछडो़ं, आदिवासियों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिला है और स्त्री अस्मिता के स्वर भी इन्हीं क्षेत्रों में सबसे मुखर हैं तो इस निरंकुश नस्ली सत्ता के प्रतिरोध की जमीन भी गाय पट्टी में बनेगी।इसकी तैयारी में रवींद्र का दलित विमर्श और नस्ली राष्ट्रवाद के मुकाबले बाउल फकीरोें आदिवासियों किसानों के आंदोलन के इतिहास को समझना बेहद जरुरी है।

    बांग्लादेश के कबीर हुमायूं ने गीताजंलि में लालन फकीर के असर का सिलसिलेवार विश्लेषण किया है।उनके मुताबिक लालन की रचनाओं का परिष्कार गीतांजलि में रवींद्रनाथ ने किया है।उनके इस दावे की पुष्टि दूसरे तमाम अध्ययनों से होती रही है।फिलहाल उनके आलेख में रवींद्र और लालन के गीतों का यह  तुलनात्मक अध्ययन देखें और रचनाधर्मतिा में किसान समाज की प्रासंगरिकता को समझेंः

    রবীন্দ্রনাথের গীতাঞ্জলির গীতধারায় যদি আমরা আধ্যাত্মিকতার চেতনায় নিবিষ্টতায় রসাস্বাদন করি তা'হলে আমরা দেখবো যে লালনের দর্শনের বা লালন কালামের পরিশীলিত রচনার ধারাবাহিকতা।লালনের কালামে বিনয় ও মানবীয় আমিত্ব শূন্যতার এক কৌশল মাত্র। গুরুর চরণে নিজেকে অধম ও গুরুত্বহীনভাবে তুলে ধরে গুরুকে সর্বোত্তমরূপে প্রকাশ করার এক কৌশল সাঁইজী তুলে ধরেছেন তাঁর সুরে ও কালামে। পরম আত্মাকে কল্পনা করেছেন গুরুর ভনিতায়। সেই কথাই যেন আমরা শুনতে পাই কবিগুরু রবী ঠাকুরের কন্ঠে -


    'তুমি কেমন করে গান কর যে, গুণী,

    অবাক হয়ে শুনি কেবল শুনি।

    সুরের আলো ভূবন ফেলে ছেয়ে,

    সুরের হাওয়া চলে গগন বেয়ে,

    পাষান টুটে ব্যাকুল বেগে ধেয়ে

    বহিয়া যায় সুরের সুরধুনী।'




    রবীন্দ্রনাথ অরূপের (নিরাকার) অপরূপ রূপে অবগাহনের নিমিত্তে অতল রূপ সাগরে ডুব দিয়েছেন অরূপ রতন (অমূল্য রতন) আশা করি, তাঁর ভাষায়-


    'রূপসাগরে ডুব দিয়েছি

    অরূপ রতন আশা করি ;

    ঘাটে ঘাটে ঘুরব না আর

    ভাসিয়ে আমার জীর্ণ তরী ।

    সময় যেন হয় রে এবার

    ঢেউ-খাওয়া সব চুকিয়ে দেবার

    সুধায় এবার তলিয়ে গিয়ে

    অমর হয়ে রব মরি।'


    লালন তাঁর একতারার তারে সুরে ও ছন্দে গেয়ে গেছেন -


    'রূপের তুলনা রূপে।

    ফণি মণি সৌদামিনী

    কী আর তাঁর কাছে শোভে ।

    যে দেখেছে সেই অটল রূপ

    বাক্ নাহি তার, মেরেছে চুপ।

    পার হলো সে এ ভবকূপ

    রূপের মালা হৃদয়ে জপে ।'


    এই রূপের তুলনা মানবসত্ত্বায় নিহিত বস্তুমোহমুক্ত নিষ্কামী মহা মানবের স্বরূপ। যে মহা মানব সম্যক গুরুদেবের কাছে সম্পূর্ন আত্ম-সমর্পিত চিত্তে কঠিন ধ্যানব্রত অবস্থায় শিক্ষা গ্রহন করেন। যেখানে অরূপে( অস্থিত্বহীনতায়) খুঁজে ফেরে রূপের সন্ধান। যেখানে 'নিজেকে জানা'এর জন্য পরিপূর্ন আত্মদর্শনে ব্যাপৃত থাকে। তাই লালন ফকির দ্বিধাহীন চিত্তে প্রকাশ করেছেন -


    'যার আপন খবর আপনার হয় না।

    একবার আপনারে চিনতে পারলেরে

    যাবে অচেনারে চেনা ।

    আত্মরূপে কর্তা হরি,

    নিষ্ঠা হলে মিলবে তাঁরই ঠিকানা।

    ঘুরে বেড়াও দিল্লি লাহোর

    কোলের ঘোর তো যায় না ।'


    ধর্ম তত্ত্বে পরমাত্মা বা ঈশ্বরকে অনুসন্ধানের জন্য বৈরাগ্য সাধন প্রক্রিয়ায় বনে-জঙ্গলে, পাহার-পর্বতে, অথবা মক্কা-কাশীতে যাওয়ার তাগিদ অনুভব করেনি লালন শাহ; তেমনি তাঁর ভাবশিষ্য রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরও লালন দর্শনের মতোই ঈশ্বরের মহিমা খুঁজে ফিরেছেন মানুষের মাঝে। মানুষই ঈশ্বর, মানুষই দেবতা, মানুষের মাঝেই পরমাত্মার অস্থিত্ব লীন। তাই লালন শাহের কন্ঠে যেমন শুনি-


    'ভবে মানুষ গুরুনিষ্ঠা যার।

    সর্বসাধন সিদ্ধি হয় তার ।

    নিরাকারে জ্যোতির্ময় যে

    আকার সাকার হইল সে

    যে জন দিব্যজ্ঞানী হয়, সেহি জানতে পায়

    কলি যুগে হল মানুষ অবতার ।'


    অপরদিকে রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর লালন শাহের ভাব দর্শনের দ্যোতনাকে আরও উচ্চমার্গ্মে তুলে ধরেছেন। মনে হয় লালনের চিন্তা-চেতনাকে শালীন ও সুন্দরভাবে তুলে ধরেছেন স্বয়ং কবিগুরু। মার্জিত ভাষার পরিশীলিত সুরের মাধুর্য দিয়ে কবিগুরু একতারার সুরের স্থানে বীণার তারে ঝংকৃত করেছেন মানব ও মানবতার মাঝেই পরমাত্মার অস্তিত্ব। সেই পরমাত্মাকে পেতে হলে আমিত্বের অহংবোধকে লীন করে দিতে হবে মানুষ-গুরু সাধনে; মানবতার পরাকাষ্ঠা দেদীপ্যমান করে। কবিগুরুর ভাষায় তা হলো -


    'ভজন পূজন সাধন আরাধনা

    সমস্ত থাক পড়ে।

    রুদ্ধদ্বারে দেবালয়ের কোণে

    কেন আছিস ওরে।

    তিনি গেছেন যেথায় মাটি ভেঙে

    করছে চাষা চাষ -

    পাথর ভেঙে কাটছে যেথায় পথ,

    খাটছে বারো মাস।

    রৌদ্রে জলে আছেন সবার সাথে,

    ধূলা তাঁহার লেগেছে দুই হাতে -

    তাঁরই মতন শুচি বসন ছাড়ি

    আয় রে ধুলার 'পরে।'


    অপরদিকে, ফকির লালন শাহ মানবদেহে নিহিত আলোকিত সত্তার উন্মেষের ইচ্ছায় স্বীয় কন্ঠে উচ্চারন করেন -


    'মানুষ ভজলে সোনার মানুষ হবি।

    মানুষ ছাড়া ক্ষ্যাপারে তুই

    মূল হারাবি ।

    মানুষ ছাড়া মনরে আমার

    দেখিরে সব শূন্যকার

    লালন বলে মানুষ আকার

    ভজলে পাবি ।'


    লালন ফকির তাঁর পরমাত্মার সাথে মিলনের প্রচন্ড আকাঙ্খা তাঁকে উন্মাতাল করে রাখতো, তাই সে প্রভুর সাথে মিলনের আকাঙ্খায় বেদন সুরে গেয়ে বেড়ায়-


    'মিলন হবে কতোদিনে।

    আমার মনের মানুষের সনে ।

    ঐ রূপ যখন স্মরণ হয়

    থাকে না লোক লজ্জার ভয়

    লালন ফকির ভেবে বলে সদাই

    ও প্রেম যে করে সেই জানে ।'


    প্রভুর সাথে মিলনের ইচ্ছা লালনকে যেমন চাতক প্রায় জোছনালোকের প্রত্যাশায় দিন গুনতো , তেমনি প্রভুর সান্নিধ্য পাবার আশায় রবীন্দ্রনাথ ব্যাকুল হৃদয়ে গাইতেন -


    'যদি তোমার দেখা না পাই প্রভু,

    এবার এ জীবনে,

    তবে তোমায় আমি পাইনি যেন,

    সে কথা রয় মনে ।

    যেন ভুলে না যাই, বেদনা পাই

    শয়নে স্বপনে।'


    অথবা


    'আমার মিলন লাগি তুমি

    আসছ কবে থেকে।

    তোমার চন্দ্র সূর্য তোমায়

    রাখবে কোথায় ঢেকে।

    কত কালের সকাল-সাঁঝে

    তোমার চরণধ্বনি বাজে,

    গোপনে দূত হৃদয়-মাঝে

    গেছে আমায় ডেকে।'


    বাউল সম্রাট লালন ফকির এবং কবিগুরু রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর- এ দু'জন মহৎ-প্রাণ ও সাধুর কর্ম ও রচনার কিছু দিক নিয়ে আলোকপাত করেছি বটে। লালন শাহের প্রয়াণের সময়কালে রবীন্দ্রনাথের পূর্ণ যৌবনকাল। তখন তাঁর বয়স ২৮/২৯ বছর। যে 'গীতাঞ্জলি'রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরকে এবং বাংলা ভাষাকে এনে দিয়েছে সুনাম, সম্মৃদ্ধি ও বিশ্বজনীনতা। সেই গীতাঞ্জলির প্রতিটি 'গীত'ধীর-স্থীরতার সাথে পাঠ করলে নিজের অজান্তে মনে হবে - এ কথাগুলোতো তাঁর পূর্ব-পুরুষ বাউল কবি ফকির লালন শাহ আগেই বলে গেছেন। অর্থাৎ, গীতাঞ্জলির গানগুলো লেখার সময় কবিগুরু প্রচন্ডভাবে বাউল কবি লালনের রচনার দ্বারা প্রভাবিত হয়েছিলেন। কিন্তু বড়ই পরিতাপের বিষয় এশিয়ার প্রথম নোভেল বিজয়ী কবিগুরু রবীন্দ্রনাথকে নিয়ে যেভাবে দুই বাংলায় বাঙালীগণ উচ্ছ্বাসিত ও উদ্বেলিত হয়ে স্মরন করেন; সেইরূপ হয়না বাউল সম্রাট লালন শাহের ক্ষেত্রে।

    https://www.amarblog.com/kabirkabir/posts/154289



    रवींद्र का दलित विमर्श-22

    गोदान की धनिया,सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका भारतीय स्त्री अस्मिता का यथार्थ!

    देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है।सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है।नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है।

    महिमामंडन और चरित्रहनन के शिकार रवींद्रनाथ!

    नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने  रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला  ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद  का प्रतीक बना डाला।अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है।

    पलाश विश्वास

    सवर्ण भद्रलोक विद्वतजनों ने नोबेल पुरस्कार पाने के बाद से लेकर अबतक रवींद्र के महिमामंडन के बहाने रवींद्र का लगातार चरित्र हनन किया है।रवींद्र साहित्य पर चर्चा अब रवींद्र के प्रेमसंंबंधों तक सीमाबद्ध हो गया है जैसे उनके लिखे साहित्य को वैदिकी धर्म के आध्यात्म और सत्तावर्ग के प्रेम रोमांस के नजरिये से ही देखने समझने का चलन है।कादंबरी देवी,विक्टोरिया ओकैम्पो से लेकर लेडी रानू मुखर्जी तक के साथ प्रेमसंबंधों के किस्सों पर लगातार लिखा जा रहा है।

    दूसरी तरफ, बहुजनों, मुसलमानों, स्त्रियों, किसानों, मेहनतकशों और अछूतों के लिए उनकी रचनाधर्मिता में समानत और न्याय की गुहार या सत्ता वर्ग वर्ण के नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के खिलाफ उनके प्रतिरोध की चर्चा कहीं नहीं होती।

    इसके विपरीत,भारत में स्त्री अस्मिता का सच प्रेमचंद के उपन्यास गोदान की धनिया,उन्हींकी कहानी सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका के सामाजिक यथार्थ हैं।सामाजिक विषमता,नस्ली वर्चस्व, पितृसत्ता, अन्याय, असमानता, बहिस्कार, अत्याचार उत्पीड़न की सामंती महाजनी मनुस्मृति व्यवस्था में धार्मिक सांस्कृतिक पाखंड के हिसाब से सवर्ण स्त्री देवी है लेकिन पितृसत्ता की मनुस्मृति के विधान के तहत स्त्री आज भी शूद्र दासी है।

    धर्म कर्म समाज राष्ट्र राजनीति और अर्थव्यवस्था के हिसाब से स्त्री उपभोक्ता वस्तु है और उसकी मनुष्यता की कोई पहचान नहीं है।

    शूद्र,अछूत और आदिवासी स्त्री का मौजूदा सामाजिक यथार्थ तो गोदान,सद्गति और चंडालिका से भी भयंकर है।

    मुक्तबाजार में एक तरफ देवी की पूजा का उत्सव और बाजार है तो दूसरी तरफ घर और बाहर सर्वत्र देवी की देह का आखेट है और अछूत आदिवासी स्त्रियों पर अन्याय,अत्याचार और उत्पीड़न की बलात्कार सुनामी ही आज का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसपर कानून का कोई अंकुश नहीं है।

    चंडालिका इसी उत्पीड़ित स्त्री का विद्रोह है तो यही भारत में स्त्री अस्मिता का सच है लेकिन सवर्ण स्त्री विमर्श में चंडालिका,धनिया और झुरिया के लिए कोई जगह उसी तरह नहीं है जैसे साहित्य,संस्कृति और इतिहास में कृषि और किसानों,अछूतों और आदिवासियों के लिए कोई जगह नहीं है।

    देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है।तो दूसरी तरफ सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है।नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है।

    सत्ता वर्ण और वर्ग के लिए नोबेल पुरस्कार की वजह से रवींद्र नाथ को निगलना और उगलना हमेशा मुश्किल रहा है।

    आधुनिक बांग्ला साहित्य के महामंडलेश्वर सुनील गंगोपाध्याय का दावा है कि विश्वभर में इने गिने लोग रवींद्रनाथ का नाम जानते हैं और जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तब पूर्व के बारे में पश्चिम को कुछ भी मालूम नहीं था और इसीलिए तब रवींद्र की इतनी चर्चा हुई।कुल मिलाकर मान्यता यही है कि रवींद्र के सामाजिक यथार्थ के दलित विमर्श का कोई वजूद नहीं है और वैदिकी धर्म और आध्यात्म के बारे में पश्चिम की अज्ञानता के कारण ही रवींद्र को नोबेल मिला।राष्ट्रवादियों के मुताबिक ब्रिटिश हुकूमत की दलाल करने की वजह से रवींद्र को नोबेल पुरस्कार मिला।

    हाल में रवींद्र साहित्य के खिलाफ राष्ट्रवादियों के फतवे से बांग्ला राष्ट्रवाद को धक्का लगा है और बंगाल में इस फतवे के खिलाफ आवाजें भी उठने लगी है।जैसे एकबार खुशवंत के रवींद्र को पवित्र गाय कह देने पर बंगाली भावनाओं को भारी सदमा लगा था।लेकिन सच यह है कि नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने  रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला  ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद  का प्रतीक बना डाला।अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है।

    फासीवादी राष्ट्रवाद के निशाने पर रवींद्र नाथ शुरु से हैं और 1916 में ही उनपर अमेरिका और चीन में हमले हुए।1941 में उनके अवसान के बाद रवींद्र विरासत को खारिज करने के लिए उनपर हमलों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं हुआ।

    मई, 2014 से बहुत पहले 17 सितंबर,2003 में बंगाल की गौरवशाली देश पत्रिका में  एक पाठक सुजीत चौधरी,करीमगंज ने रवींद्र के चरित्रहनन के विरोध में लिखाःसांप्रतिक काल में देश पत्रिका में रवींद्रनाथ के संबंध में अनेक निबंध और पत्र प्रकाशित हुए हैं।जिन्हें पढ़कर आम पाठक की हैसियत से मुझे कुछ धारणाएं मिलीं,जो इसप्रकार हैंःएक-रवींद्रनाथ सांप्रदायिक थे।इसलिए अपने मुसलिम बहुल जमींदारी इलाके में नहीं,हिंदूबहुल वीरभूम में उन्होंने विश्वविद्यालय की स्थापना की।दो- वे कापुरुष थे और उनका देशप्रेम नकली था।तीन-उनकी कथनी और करनी में कोई सामजस्य नहीं था।कथनी में वे विधवा विवाह के समर्थक थे और असली वक्त पर खुद बाधा खड़ी कर देते थे।चार-वे जाति प्रथा के समर्थक थे।पांच-वे प्रणय संबंधों में निरंकुश थे।आठ साल के शिशु से लेकर अपनी भाभी तक किसी को उन्होंने नहीं बख्शा। छह-अपनी बालिकावधु पर उन्होंने प्रकांतर से अनेक अत्याचार किये।सात- कविता वविता कुछभी नहीं,कुछ गीतों के लिए वे जिंदा हैं।इसके विपरीत उम्मीद की बात यह है कि बांग्लाभाषी दूसरे सारे आलोचक,गवेषक,कवि,साहित्यकार,पत्रलेखक सभी आदर्सवादी,प्रगतिशील एवं निर्मल चरित्र के हैं।शुक्र है,वरना रवींद्र नाथ ने तो लगभग पूरे देश का ध्वंस कर दिया होता।(संदर्भःकी खाराप लोक छिलेन रवींद्रनाथ!देश,17 सितंबर,2003)

    पत्र लेखक ने जिन बिंदुओं पर रवींद्र के चरित्र हनन की बात की है,वे सारे भद्रलोक रवींद्र विमर्श के तत्व हैं।आज भी रवींद्र विमर्श रवींद्र के प्रेमसंबंधों पर शोध का अनंत सिलसिला है।कम से कम हिंदी में ऐसे चरित्रहनन की नजीर नहीं है।

    गौरतलब है कि देश के संपादक सागरमय घोष के निधन के बाद इस पत्रिका की भूमिका सुनील गंगोपाध्याय के नेतृत्व में बदल गयी जो रवींद्र को दौ कौड़ी का साहित्यकार नहीं मानते।उन्होंने इसी देश पत्रिका में समय को सूत्रधार मानकर तीन उपन्यासों की एक ट्रिलाजी प्रकाशित की,एई समय,पूर्व पश्चिम और भोरेर आलो और बांग्ला विद्वत समाज इसे नवजागरण,स्वतंत्रता संग्राम,भारत विभाजन,बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम,नक्सलबाड़ी आंदोलन,शरणार्थी समस्या और आधुनिक भारत का समग्र इतिहास बताते हैं।

    इस इतिहास में बंगाल के नमोशूद्र सुनील गंगोपाध्याय के मुताबिक हिंदू कभी नहीं थे,दो राष्ट्र सिद्धांत के तहत भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इन अछूतों को भी सवर्णों को हिंदू मान लेने की मजबूरी थी।

    इस इतिहास में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आदिवासी किसान जनविद्रोहों के लिए कोई स्थान नहीं है और मां काली को उन्होंने भोरेर आलो में लैंग्टा संथाल मागी याऩी नंगी संथाल औरत बताया है।

    इस इतिहास में विभाजन पीड़ित शरणार्थियों की दंडकारण्य कथा है लेकिन मरीचझांपी नरसंहार नहीं है और शरणार्थी जीवन यंत्रणा को आपराधिक गतिविधियों से जोड़ते हुए शरणार्थियों को बंगाल की सारी समस्याओं की जड़ बताया गया है।

    सुनील गंगोपाध्याय ने नवजागरण के राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे चरित्रों को अपने हिसाब से गढ़ा है तो रवींद्र कादंबरी प्रेम प्रसंग भी इस ट्रिलाजी का आख्यान है।

    गोदान औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत किसान का महाजनी व्यवस्था में चलने वाले निरंतर शोषण तथा उससे उत्पन्न संत्रास की कथा है। यह महाजनी सभ्यता अब मुक्तबाार के कारपोरेटएकाधिकार में बदल गया है और एक नहीं,लाखों होरियों की मर्यादा की लड़ाई का अंतिम विकल्प अब आत्महत्या है।

    आजादी से पहले किसान आदिवासी शूद्र अछूत मुसलमान समूचा बहुजन समाज जल जंगल जमीन के हकूक के लिए लगातार हजारोंहजार साल से लड़ता रहा है और आजादी के बाद में किसान आंदोलन सवर्ण सत्ता की राजनीतिक मनुस्मृति का शिकार है तो मुक्तबाजारी फासीवादी सैन्य राष्ट्रवाद में बेदखली की यह महाजनी सभ्यता निरंकुश नरसंहार संस्कृति है।

    गोदान का नायक होरी एक किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है। 'आजीवन दुर्धर्ष संघर्ष के बावजूद उसकी एक गाय की आकांक्षा पूर्ण नहीं हो पाती'। गोदान भारतीय कृषक जीवन के संत्रासमय संघर्ष की कहानी है।

    अब होरी सिरे से दो बीघा जमीन की तरह लापता है और कोई शोकसंदेश नहीं है।

    गोदान के नायक और नायिका होरी और धनिया के परिवार के रूप में हम भारत की एक विशेष जनपदीय लोक संस्कृति की साझा विरासत को सजीव और साकार पाते हैं, ऐसी संस्कृति जो अब समाप्त हो रही है या हो जाने को है, फिर भी जिसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुबास भरी है।कृषि और किसानों की बेदखली और उनके वध उत्सव के इस दुःसमय में गोदान की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है।

    गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन - उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता और भारतपरायणता के साथ स्वार्थपरता ओर बैठकबाजी, उसकी बेबसी और निरीहता- का जीता जागता चित्र उपस्थित किया गया है। उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसे सहलाता, क्लेश और वेदना को झुठलाता, 'मरजाद' की झूठी भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता, तिल तिल शूलों भरे पथ पर आगे बढ़ता, भारतीय समाज का मेरुदंड यह किसान कितना शिथिल और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है।

    गोदान के कथानक में नगरों के कोलाहलमय चकाचौंध ने गाँवों की विभूति को कैसे ढँक लिया है, जमींदार, मिल मालिक, पत्रसंपादक, अध्यापक, पेशेवर वकील और डाक्टर, राजनीतिक नेता और राजकर्मचारी जोंक बने कैसे गाँव के इस निरीह किसान का शोषण कर रहे हैं और कैसे गाँव के ही महाजन और पुरोहित उनकी सहायता कर रहे हैं, गोदान में ये सभी तत्व नखदर्पण के समान प्रत्यक्ष हो गए हैं।

    यही आज का सच है और नस्ली वर्चस्व के फासीवादी राष्ट्रवाद में बहुजनों की सद्गति का सिलसिला  जारी है।इस कहानी को दोबारा पढ़ें और हो सके तो इस कहानी पर बनी सत्यजीत रे की फिल्म को देखते हुए समकालीन डिजिटल इंडिया की नरसंहारी संस्कृति और समय के सच का सामना करें।


    सद्गति -प्रेमचंद

    दुखी चमार द्वार पर झाडू लगा रहा था और उसकी पत्नी झुरिया, घर को गोबर से लीप रही थी। दोनों अपने-अपने काम से फुर्सत पा चुके थे, तो चमारिन ने कहा, 'तो जाके पंडित बाबा से कह आओ न। ऐसा न हो कहीं चले जायँ।'

    दुखी –'हाँ जाता हूँ, लेकिन यह तो सोच, बैठेंगे किस चीज़ पर ?'

    झुरिया –'क़हीं से खटिया न मिल जायगी ? ठकुराने से माँग लाना।'

    दुखी –'तू तो कभी-कभी ऐसी बात कह देती है कि देह जल जाती है। ठकुरानेवाले मुझे खटिया देंगे ! आग तक तो घर से निकलती नहीं, खटिया देंगे ! कैथाने में जाकर एक लोटा पानी माँगूँ तो न मिले। भला खटिया कौन देगा ! हमारे उपले, सेंठे, भूसा, लकड़ी थोड़े ही हैं कि जो चाहे उठा ले जायँ। ले अपनी खटोली धोकर रख दे। गरमी के तो दिन हैं। उनके आते-आते सूख जायगी।'

    झुरिया –'वह हमारी खटोली पर बैठेंगे नहीं। देखते नहीं कितने नेम-धरम से रहते हैं।'

    दुखी ने जरा चिंतित होकर कहा, 'हाँ, यह बात तो है। महुए के पत्ते तोड़कर एक पत्तल बना लूँ तो ठीक हो जाय। पत्तल में बड़े-बड़े आदमी खाते हैं। वह पवित्तर है। ला तो डंडा, पत्ते तोड़ लूँ।'

    झुरिया –'पत्तल मैं बना लूँगी, तुम जाओ। लेकिन हाँ, उन्हें सीधा भी तो देना होगा। अपनी थाली में रख दूँ ?'

    दुखी –'क़हीं ऐसा गजब न करना, नहीं तो सीधा भी जाय और थाली भी फूटे ! बाबा थाली उठाकर पटक देंगे। उनको बड़ी जल्दी विरोध चढ़ आता है। किरोध में पंडिताइन तक को छोड़ते नहीं, लड़के को ऐसा पीटा कि आज

    तक टूटा हाथ लिये फिरता है। पत्तल में सीधा भी देना, हाँ। मुदा तू छूना मत।'

    झूरी –'गोंड़ की लड़की को लेकर साह की दूकान से सब चीज़ें ले आना। सीधा भरपूर हो। सेर भर आटा, आधा सेर चावल, पाव भर दाल, आधा पाव घी, नोन, हल्दी और पत्तल में एक किनारे चार आने पैसे रख देना। गोंड़

    की लड़की न मिले तो भुर्जिन के हाथ-पैर जोड़कर ले जाना। तू कुछ मत छूना, नहीं गजब हो जायगा।'

     

    इन बातों की ताकीद करके दुखी ने लकड़ी उठाई और घास का एक बड़ा-सा गट्ठा लेकर पंडितजी से अर्ज करने चला। ख़ाली हाथ बाबाजी की सेवा में कैसे जाता। नजराने के लिए उसके पास घास के सिवाय और क्या

    था। उसे ख़ाली देखकर तो बाबा दूर ही से दुत्कारते। पं. घासीराम ईश्वर के परम भक्त थे। नींद खुलते ही ईशोपासन में लग जाते। मुँह-हाथ धोते आठ बजते, तब असली पूजा शुरू होती, जिसका पहला भाग भंग की तैयारी थी। उसके बाद आधा घण्टे तक चन्दन रगड़ते, फिर आइने के सामने एक तिनके से माथे पर तिलक लगाते। चन्दन की दो रेखाओं के बीच में लाल रोरी की बिन्दी होती थी। फिर छाती पर, बाहों पर चन्दन की

    गोल-गोल मुद्रिकाएं बनाते। फिर ठाकुरजी की मूर्ति निकालकर उसे नहलाते, चन्दन लगाते, फूल चढ़ाते, आरती करते, घंटी बजाते। दस बजते-बजते वह पूजन से उठते और भंग छानकर बाहर आते। तब तक दो-चार जजमान द्वार पर आ जाते ! ईशोपासन का तत्काल फल मिल जाता। वही उनकी खेती थी। आज वह पूजन-गृह से निकले, तो देखा दुखी चमार घास का एक गट्ठा लिये बैठा है। दुखी उन्हें देखते ही उठ खड़ा हुआ और उन्हें साष्टांग दंडवत् करके हाथ बाँधकर खड़ा हो गया। यह तेजस्वी मूर्ति देखकर उसका हृदय

    श्रृद्धा से परिपूर्ण हो गया ! कितनी दिव्य मूर्ति थी। छोटा-सा गोल-मटोल आदमी, चिकना सिर, फूले गाल, ब्रह्मतेज से प्रदीप्त आँखें। रोरी और चंदन देवताओं की प्रतिभा प्रदान कर रही थी। दुखी को देखकर श्रीमुख से बोले – 'आज कैसे चला रे दुखिया ?'

    दुखी –'ने सिर झुकाकर कहा, बिटिया की सगाई कर रहा हूँ महाराज। कुछ साइत-सगुन विचारना है। कब मर्जी होगी ?'

    घासी –'आज मुझे छुट्टी नहीं। हाँ साँझ तक आ जाऊँगा।'

    दुखी –'नहीं महराज, जल्दी मर्जी हो जाय। सब सामान ठीक कर आया हूँ। यह घास कहाँ रख दूँ ?

    घासी –'इस गाय के सामने डाल दे और जरा झाडू लेकर द्वार तो साफ़ कर दे। यह बैठक भी कई दिन से लीपी नहीं गई। उसे भी गोबर से लीप दे। तब तक मैं भोजन कर लूँ। फिर जरा आराम करके चलूँगा। हाँ, यह लकड़ी भी चीर देना। खलिहान में चार खाँची भूसा पड़ा है। उसे भी उठा लाना और भुसौली में रख देना।'

    दुखी फौरन हुक्म की तामील करने लगा। द्वार पर झाडू लगाई, बैठक को गोबर से लीपा। तब बारह बज गये। पंडितजी भोजन करने चले गये। दुखी ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। उसे भी ज़ोर की भूख लगी; पर वहाँ

    खाने को क्या धारा था। घर यहाँ से मील भर था। वहाँ खाने चला जाय, तो पंडितजी बिगड़ जायँ। बेचारे ने भूख दबाई और लकड़ी फाड़ने लगा। लकड़ी की मोटी-सी गाँठ थी; जिस पर पहले कितने ही भक्तों ने अपना ज़ोर आजमा लिया था। वह उसी दम-खम के साथ लोहे से लोहा लेने के लिए तैयार थी। दुखी घास छीलकर बाज़ार ले जाता था। लकड़ी चीरने का उसे अभ्यास न था। घास उसके खुरपे के सामने सिर झुका देती थी। यहाँ कस-कसकर कुल्हाड़ी का भरपूर हाथ लगाता; पर उस गाँठ पर निशान तक न पड़ता था। कुल्हाड़ी उचट जाती। पसीने में तर था, हाँफता था, थककर बैठ जाता था, फिर उठता था। हाथ उठाये न उठते थे, पाँव काँप रहे थे, कमर न सीधी होती थी, आँखों तले अँधेरा हो रहा था, सिर में चक्कर आ रहे थे, तितलियाँ उड़ रही थीं, फिर भी अपना काम किये जाता था। अगर एक चिलम तम्बाकू पीने को मिल जाती, तो शायद कुछ ताकत आती।

    उसने सोचा, यहाँ चिलम और तम्बाकू कहाँ मिलेगी। बाह्मनों का पूरा है। बाह्मन लोग हम नीच जातों की तरह तम्बाकू थोड़े ही पीते हैं। सहसा उसे याद आया कि गाँव में एक गोंड़ भी रहता है। उसके यहाँ ज़रूर चिलम-तमाखू होगी। तुरत उसके घर दौड़ा। खैर मेहनत सुफल हुई। उसने तमाखू भी दी और चिलम भी दी; पर आग वहाँ न थी। दुखी ने कहा, आग की चिन्ता न करो भाई। मैं जाता हूँ, पंडितजी के घर से आग माँग लूँगा। वहाँ तो अभी रसोई बन रही थी। यह कहता हुआ वह दोनों चीज़ें लेकर चला आया और पंडितजी के घर में बरौठे के द्वार पर खड़ा होकर बोला, 'मालिक, रचिके आग मिल जाय, तो चिलम पी लें।'

    पंडितजी भोजन कर रहे थे। पंडिताइन ने पूछा, 'यह कौन आदमी आग माँग रहा है ?'

    पंडित –'अरे वही ससुरा दुखिया चमार है। कहा, है थोड़ी-सी लकड़ी चीर दे। आग तो है, दे दो।'

    पंडिताइन ने भॅवें चढ़ाकर कहा, 'तुम्हें तो जैसे पोथी-पत्रो के फेर में धरम-करम किसी बात की सुधि ही नहीं रही। चमार हो, धोबी हो, पासी हो, मुँह उठाये घर में चला आये। हिन्दू का घर न हुआ, कोई सराय हुई। कह दो दाढ़ीजार से चला जाय, नहीं तो इस लुआठे से मुँह झुलस दूँगी। आग माँगने चले हैं।'

    पंडितजी ने उन्हें समझाकर कहा, 'भीतर आ गया, तो क्या हुआ। तुम्हारी कोई चीज़ तो नहीं छुई। धरती पवित्र है। जरा-सी आग दे क्यों नहीं देती, काम तो हमारा ही कर रहा है। कोई लोनिया यही लकड़ी फाड़ता, तो

    कम-से-कम चार आने लेता।'

    पंडिताइन ने गरजकर कहा, 'वह घर में आया क्यों !'

    पंडित ने हारकर कहा, 'ससुरे का अभाग था और क्या !'

    पंडिताइन--'अच्छा, इस बखत तो आग दिये देती हूँ, लेकिन फिर जो इस तरह घर में आयेगा, तो उसका मुँह ही जला दूँगी।'

    दुखी के कानों में इन बातों की भनक पड़ रही थी। पछता रहा था, नाहक आया। सच तो कहती हैं। पंडित के घर में चमार कैसे चला आये। बड़े पवित्तर होते हैं यह लोग, तभी तो संसार पूजता है, तभी तो इतना मान

    है। भर-चमार थोड़े ही हैं। इसी गाँव में बूढ़ा हो गया; मगर मुझे इतनी अकल भी न आई। इसलिए जब पंडिताइन आग लेकर निकलीं, तो वह मानो स्वर्ग का वरदान पा गया। दोनों हाथ जोड़कर ज़मीन पर माथा टेकता हुआ बोला, 'पड़ाइन माता, मुझसे बड़ी भूल हुई कि घर में चला आया। चमार की अकल ही तो ठहरी। इतने मूरख न होते, तो लात क्यों खाते।'

    पंडिताइन चिमटे से पकड़कर आग लाई थीं। पाँच हाथ की दूरी से घूँघट की आड़ से दुखी की तरफ आग फेंकी। आग की बड़ी-सी चिनगारी दुखी के सिर पर पड़ गयी। जल्दी से पीछे हटकर सिर के झोटे देने लगा। उसने मन में कहा, यह एक पवित्तर बाह्मन के घर को अपवित्तर करने का फल है। भगवान ने कितनी जल्दी फल दे दिया। इसी से तो संसार पंडितों से डरता है। और सबके रुपये मारे जाते हैं बाह्मन के रुपये भला कोई मार तो ले ! घर भर का सत्यानाश हो जाय, पाँव गल-गलकर गिरने लगे। बाहर आकर उसने चिलम पी और फिर कुल्हाड़ी लेकर जुट गया। खट-खट की आवाजें आने लगीं। उस पर आग पड़ गई, तो पंडिताइन को उस पर कुछ दया आ गई। पंडितजी भोजन करके उठे, तो बोलीं –'इस चमरवा को भी कुछ खाने को दे दो, बेचारा कब से काम कर रहा है। भूखा होगा।'

    पंडितजी ने इस प्रस्ताव को व्यावहारिक क्षेत्र से दूर समझकर पूछा, 'रोटियाँ हैं ?'

    पंडिताइन –'दो-चार बच जायँगी।'

    पंडित –'दो-चार रोटियों में क्या होगा ? चमार है, कम से कम सेर भर चढ़ा जायगा।'

    पंडिताइन कानों पर हाथ रखकर बोलीं, 'अरे बाप रे ! सेर भर ! तो फिर रहने दो।'

    पंडितजी ने अब शेर बनकर कहा, 'क़ुछ भूसी-चोकर हो तो आटे में मिलाकर दो ठो लिट्टा ठोंक दो। साले का पेट भर जायगा। पतली रोटियों से इन नीचों का पेट नहीं भरता। इन्हें तो जुआर का लिट्टा चाहिए।'

    पंडिताइन ने कहा, 'अब जाने भी दो, धूप में कौन मरे।'

     

    दुखी ने चिलम पीकर फिर कुल्हाड़ी सँभाली। दम लेने से जरा हाथों में ताकत आ गई थी। कोई आधा घण्टे तक फिर कुल्हाड़ी चलाता रहा। फिर बेदम होकर वहीं सिर पकड़ के बैठ गया। इतने में वही गोंड़ आ गया। बोला, 'क्यों जान देते हो बूढ़े दादा, तुम्हारे फाड़े यह गाँठ न फटेगी। नाहक हलाकान होते हो।'

    दुखी ने माथे का पसीना पोंछकर कहा, 'अभी गाड़ी भर भूसा ढोना है भाई !'

    गोंड़ –'क़ुछ खाने को मिला कि काम ही कराना जानते हैं। जाके माँगते क्यों नहीं ?'

    दुखी –'क़ैसी बात करते हो चिखुरी, बाह्मन की रोटी हमको पचेगी !'

    गोंड़ –'पचने को पच जायगी, पहले मिले तो। मूँछों पर ताव देकर भोजन किया और आराम से सोये, तुम्हें लकड़ी फाड़ने का हुक्म लगा दिया। ज़मींदार भी कुछ खाने को देता है। हाकिम भी बेगार लेता है, तो थोड़ी बहुत मजूरी देता है। यह उनसे भी बढ़ गये, उस पर धर्मात्मा बनते हैं।'

    दुखी –'धीरे-धीरे बोलो भाई, कहीं सुन लें तो आफत आ जाय।'

    यह कहकर दुखी फिर सँभल पड़ा और कुल्हाड़ी की चोट मारने लगा। चिखुरी को उस पर दया आई। आकर कुल्हाड़ी उसके हाथ से छीन ली और कोई आधा घंटे खूब कस-कसकर कुल्हाड़ी चलाई; पर गाँठ में एक दरार भी न पड़ी। तब उसने कुल्हाड़ी फेंक दी और यह कहकर चला गया तुम्हारे फाड़े यह न फटेगी, जान भले निकल जाय।'

    दुखी सोचने लगा, बाबा ने यह गाँठ कहाँ रख छोड़ी थी कि फाड़े नहीं फटती। कहीं दरार तक तो नहीं पड़ती। मैं कब तक इसे चीरता रहूँगा। अभी घर पर सौ काम पड़े हैं। कार-परोजन का घर है, एक-न-एक चीज़ घटी ही रहती है; पर इन्हें इसकी क्या चिंता। चलूँ जब तक भूसा ही उठा लाऊँ। कह दूँगा, बाबा, आज तो लकड़ी नहीं फटी, कल आकर फाड़ दूँगा। उसने झौवा उठाया और भूसा ढोने लगा। खलिहान यहाँ से दो फरलांग से कम न था। अगर झौवा खूब भर-भर कर लाता तो काम जल्द खत्म हो जाता; फि र झौवे को उठाता कौन। अकेले भरा हुआ झौवा उससे न उठ सकता था। इसलिए थोड़ा-थोड़ा लाता था। चार बजे कहीं भूसा खत्म हुआ। पंडितजी की नींद भी खुली। मुँह-हाथ धोया, पान खाया और बाहर निकले। देखा, तो दुखी झौवा सिर पर रखे सो रहा है। ज़ोर से बोले –'अरे, दुखिया तू सो रहा है ? लकड़ी तो अभी ज्यों की त्यों पड़ी हुई है। इतनी देर तू करता क्या

    रहा ? मुट्ठी भर भूसा ढोने में संझा कर दी ! उस पर सो रहा है। उठा ले कुल्हाड़ी और लकड़ी फाड़ डाल। तुझसे जरा-सी लकड़ी नहीं फटती। फिर साइत भी वैसी ही निकलेगी, मुझे दोष मत देना ! इसी से कहा, है कि नीच के घर में खाने को हुआ और उसकी आँख बदली।'

    दुखी ने फिर कुल्हाड़ी उठाई। जो बातें पहले से सोच रखी थीं, वह सब भूल गईं। पेट पीठ में धॉसा जाता था, आज सबेरे जलपान तक न किया था। अवकाश ही न मिला। उठना ही पहाड़ मालूम होता था। जी डूबा जाता था, पर दिल को समझाकर उठा। पंडित हैं, कहीं साइत ठीक न विचारें, तो फिर सत्यानाश ही हो जाय। जभी तो संसार में इतना मान है। साइत ही का तो सब खेल है। जिसे चाहे बिगाड़ दें। पंडितजी गाँठ के पास आकर

    खड़े हो गये और बढ़ावा देने लगे हाँ, मार कसके, और मार क़सके मार अबे ज़ोर से मार तेरे हाथ में तो जैसे दम ही नहीं है लगा कसके, खड़ा सोचने क्या लगता है हाँ बस फटा ही चाहती है ! दे उसी दरार में ! दुखी अपने होश में न था। न-जाने कौन-सी गुप्तशक्ति उसके हाथों को चला रही थी। वह थकान, भूख, कमज़ोरी सब मानो भाग गई। उसे अपने बाहुबल पर स्वयं आश्चर्य हो रहा था। एक-एक चोट वज्र की तरह पड़ती थी। आधा घण्टे तक वह इसी उन्माद की दशा में हाथ चलाता रहा, यहाँ तक कि लकड़ी बीच से फट गई और दुखी के हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी। इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा। भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया।

    पंडितजी ने पुकारा, 'उठके दो-चार हाथ और लगा दे। पतली-पतली चैलियाँ हो जायँ। दुखी न उठा। पंडितजी ने अब उसे दिक करना उचित न समझा। भीतर जाकर बूटी छानी, शौच गये, स्नान किया और पंडिताई बाना पहनकर बाहर निकले ! दुखी अभी तक वहीं पड़ा हुआ था। ज़ोर से पुकारा –'अरे क्या पड़े ही रहोगे दुखी, चलो तुम्हारे ही घर चल रहा हूँ। सब सामान ठीक-ठीक है न ? दुखी फिर भी न उठा।'

    अब पंडितजी को कुछ शंका हुई। पास जाकर देखा, तो दुखी अकड़ा पड़ा हुआ था। बदहवास होकर भागे और पंडिताइन से बोले, 'दुखिया तो जैसे मर गया।'

    पंडिताइन हकबकाकर बोलीं—'वह तो अभी लकड़ी चीर रहा था न ?'

    पंडित –'हाँ लकड़ी चीरते-चीरते मर गया। अब क्या होगा ?'

    पंडिताइन ने शान्त होकर कहा, 'होगा क्या, चमरौने में कहला भेजो मुर्दा उठा ले जायँ।'

     

    एक क्षण में गाँव भर में खबर हो गई। पूरे में ब्राह्मनों की ही बस्ती थी। केवल एक घर गोंड़ का था। लोगों ने इधर का रास्ता छोड़ दिया। कुएं का रास्ता उधर ही से था, पानी कैसे भरा जाय ! चमार की लाश के पास से होकर पानी भरने कौन जाय। एक बुढ़िया ने पण्डितजी से कहा, अब मुर्दा फेंकवाते क्यों नहीं ? कोई गाँव में पानी पीयेगा या नहीं। इधर गोंड़ ने चमरौने में जाकर सबसे कह दिया ख़बरदार, मुर्दा उठाने मत जाना। अभी पुलिस की तहकीकात होगी। दिल्लगी है कि एक गरीब की जान ले ली। पंडितजी होंगे, तो अपने घर के होंगे। लाश उठाओगे तो तुम भी पकड़ जाओगे। इसके बाद ही पंडितजी पहुँचे; पर चमरौने का कोई आदमी लाश उठा लाने को तैयार न हुआ, हाँ दुखी की स्त्री और कन्या दोनों हाय-हाय करती वहाँ चलीं और पंडितजी के द्वार पर आकर सिर पीट-पीटकर रोने लगीं। उनके साथ दस-पाँच और चमारिनें थीं। कोई रोती थी, कोई समझाती थी, पर चमार एक भी न था। पण्डितजी ने चमारों को बहुत धामकाया, समझाया, मिन्नत की; पर चमारों के दिल पर पुलिस का रोब छाया हुआ था, एक भी न मिनका। आखिर निराश होकर लौट आये।

    आधी रात तक रोना-पीटना जारी रहा। देवताओं का सोना मुश्किल हो गया। पर लाश उठाने कोई चमार न आया और ब्राह्मन चमार की लाश कैसे उठाते ! भला ऐसा किसी शास्त्र-पुराण में लिखा है ? कहीं कोई दिखा दे। पंडिताइन ने झुँझलाकर कहा, 'इन डाइनों ने तो खोपड़ी चाट डाली। सभों का गला भी नहीं पकता। पंडित ने कहा, रोने दो चुड़ैलों को, कब तक रोयेंगी। जीता था, तो कोई बात न पूछता था। मर गया, तो कोलाहल मचाने के लिए सब की सब आ पहुँचीं।'

    पंडिताइन –'चमार का रोना मनहूस है।'

    पंडित –'हाँ, बहुत मनहूस।'

    पंडिताइन –'अभी से दुर्गन्ध उठने लगी।'

    पंडित –'चमार था ससुरा कि नहीं। साध-असाध किसी का विचार है इन सबों को।'

    पंडिताइन –'इन सबों को घिन भी नहीं लगती।'

    पंडित—'भ्रष्ट हैं सब।'

    रात तो किसी तरह कटी; मगर सबेरे भी कोई चमार न आया। चमारिनें भी रो-पीटकर चली गईं। दुर्गन्ध कुछ-कुछ फैलने लगी। पंडितजी ने एक रस्सी निकाली। उसका फन्दा बनाकर मुरदे के पैर में डाला और फन्दे को खींचकर कस दिया। अभी कुछ-कुछ धुँधलका था। पंडितजी ने रस्सी पकड़कर लाश को घसीटना शुरू किया और गाँव के बाहर घसीट ले गये। वहाँ से आकर तुरन्त स्नान किया, दुर्गापाठ पढ़ा और घर में गंगाजल छिड़का।

    उधर दुखी की लाश को खेत में गीदड़ और गिद्ध, कुत्ते और कौए नोच रहे थे। यही जीवन-पर्यन्त की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।



    रवींद्र का दलित विमर्श-23

    संविधान बदलकर मनुस्मृति बहाली के हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ आदिवासी किसानों के प्रतिरोध की विरासत में रवींद्र रचनाधर्मिता!

    रवींद्र उस भारतवर्ष के प्रतीक है कारपोरेट डिजिटल इंडिया का नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व जिसकी रोज हत्या कर रहा है।

    ब्रह्म समाज आंदोलन और औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से भी पहले पठान मुगल इस्लामी राजकाज के दौरान समाज सुधार आंदोलनों  नवजागरण की चर्चा खूब होती रही है लेकिन जाति तोड़ो अस्मिता तोड़ो के एकीकरण के बहुजन आंदोलन,आदिवासी किसान जनविद्रोहों के सिलिसिले में बाउल फकीर आंदोलन और लालन फकीर कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के रवींद्र संगीत के दलित विमर्श पर चर्चा कभी नहीं हुई है।

    बहुजनों के असल नवजागरण के हिंदुत्वकरण के इसी धतकरम से नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के नस्ली राष्ट्रवाद का जन्म औद्योगिक उत्पादन प्रणाली और ब्रिटिश राज में बहुजनों को मिले हकहकूक की वजह से टूटती जाति व्यवस्था आधारित मनुस्मृति प्रणाली की बहाली के लिए हुआ।इसे समझे बिना नरसंहारी कारपोरेट फासिज्म का प्रतिरोध मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।


    पलाश विश्वास


    कापीराइट मुक्त रवीद्रनाथ अब मुक्त बाजार के आइकन में तब्दील हैं।उनके वाणिज्यिक विपणन से उसी नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के राष्ट्रवाद को मजबूत किया जा रहा है जिसका रवींद्रनाथ आजीवन विरोध करते रहे हैं।

    चर्यापद के बाद आठवीें सदी से लेकर ग्यारवीं सदी के इतिहास में भारत भर में शूद्रों आदिवासियों दलितों के इतिहास पर जिस तरह कोई चर्चा नहीं हुई है,जिस तरह परातत्व अनुसंधान और इतिहास पर वर्ग वर्ण वर्चस्व की वजह से हड़प्पा सिंधु सभ्यता और अनार्य द्रविड़ सभ्यता की निरंतरता और उसे जुड़ी आम भारतीयों की रक्तधारा के विलय के इतिहास को लगातार दबाया जाता रहा है,जिस तरह शासक वर्ग के इतिहास और साहित्य से किसान,आदिवासी और दलित शूद्र बहुजन सिरे से गायब हैं,उसी तरह भारत में आदिवासी किसानों के इतिहास को मिटाने का कार्यक्रम फासिज्म के सैन्य राष्ट्रवाद का एजंडा है और इसी एजंडे के तहत रवींद्र का भगवाकरण है तो रवींद्र के साहित्य के किसान आदिवासी दलित शूद्र आंदोलन,मेहनतकशों के हक हकूक,जल जंगल जमीन के प्रतिरोध संघर्षों  की जमीन और रवींद्र के दलित विमर्श पर चर्चा निषिद्ध है।

    इसीलिए दलितों,शूद्रों,स्त्रियों,बहुजनों,अल्पसंख्यकों,मेहनतकशों,किसानों और उत्पीड़न अत्याचार के खिलाफ समानता और न्याय के लिए सामंतवाद, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद,ब्राह्मणवाद,मनुस्मृति व्यवस्था और नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के खिलाफ रवींद्र के आजीवन प्रतिबद्ध संघर्ष पर विमर्श का कोई स्पेस नहीं बना है।

    साहित्य,संस्कृति,माध्यमों में सत्ता वर्ग के एकाधिकार के लिए हमें रवींद्र के  दलित विमर्श पर संवाद की यह कोशिश इसीलिए सोशल मीडिया पर करनी पड़ रही है और तकनीक के जरिये इस वर्चस्ववाद के खिलाफ लड़ना पड़ रहा है।

    अब अंदाजा लगाइये कि सत्ता वर्ग के निरंकुश वर्चस्व के खिलाफ मनुस्मृति के तहत सारे हकहकूक से वंचित बहुसंख्य बहुजन जन गण के लिए एक मुस्त दैवी सत्ता और राजसत्ता का विरोध कितना कठिन रहा होगा।

    कंगाल हरिनाथ और लालन फकीर की युगलबंदी से नील विद्रोह के समय ब्रहमसमाज और नवजागरण आंदोलन के दौरान बंगाल में किसानों और आदिवासियों के बहुजन आंदोलन और जनविद्रोहों की जमीन पर जो सक्रिय रचनाधर्मिता थी,उसके पीछे कोई तकनीक नहीं थी,जिसके तहत अगर कोई अकेला व्यक्ति भी साहस विवेक और जीजिविषा के साथ फासिज्म की निरंकुश सत्ता के खिलाफ रीढ़ सीधी करके वैसा ही उपक्रम करें तो सत्ता के वर्म वर्ग वर्चस्व की चूलें हिल जाये।

    विडंबना यह है कि तकनीक का सत्ता वर्ग के हित में इस्तेमाल कर रहे हैं जूता व्यवस्था और गुलामगिरि की बहुजन सेनाएं और उनके मानस और विवेक का सिरे से भगवाकरण हो गया है जो आजादी से पहले कभी नहीं हुआ था।

    रवींद्र च्रचा में गुरुदेव रवींद्रनाथ,भारतीय तपवन, वैदिकी साहित्य, उपनिषद ऋषिक्लप रवींद्रनाथ की आड़ में रवींद्र साहित्य में महाकवि कीट्स के शब्दों में वर्णित इगोस्टिक सब्लाइम और नेगेटिव कैपेबिलिटि के विलयन की प्रक्रिया को सिरे से नजरअंदाज किया जाता है,जो रवींद्र का समूचा जीवन वृत्तांत है।

    अहम् और एकात्मता,व्यक्ति और समाज,व्यक्ति और परंपरा,व्यक्ति और समाज,समाज और इतिहास के सारे रंग और आयाम सत्ता वर्ग की व्याकरण विशुद्धता के कुलीन सौंदर्यबोध की वजह से साहित्य और संस्कृति के विमर्श से बाहर है और इसमें बोलियों,लोक और जनपदों के साथ साथ अस्पृश्यता के सिद्धांत के तहत आम जनता का पूरीतरह बहिस्कार है।

    इसी वजह से शुरु से आखिर तक देश दुनिया के परिदृश्य में रवींद्र नाथ व्यक्ति और कवि की हैसियत से जिसतरह राजनैतिक आर्थिक सामाजिक समता औलर न्याय के लिए,औपनिवेशिक शासन की पराधीनता से भारतीय जनगण की स्वतंत्रता के लिए रचनात्मक तौर पर निरंतर सक्रिय रहे,जिसतर साम्राज्यवाद विरोधी,फासीवाद विरोधी युद्धविरोधी वैश्विक महासंग्राम में महात्मा गौतम बुद्ध के पंचशील के तहत राष्ट्रनेताओं और विश्वनेताओं के साथ साथ दुनियाभर के चितकों,बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों के साथ मोर्चाबंद रहे हैं,यह लोकसंस्कृति और बाउल फकीर सूफी संत वैष्णव गुरु परंपरा में उनकी जड़ें होने की वजह से है।

    इन्हीं जड़ों को कोजने के सिलसिले में हम एक तरफ आदिवासी किसान आंदोलनों की विरासत की जांच पड़ताल कर रहे हैं,तो बहुजनों के नवजागरण की लोकसंस्कृति की साझा विरासत पर निरंतर फोकस बनाये हुए हैं और संदर्भ और प्रसंग की प्रासंगिकता के लिए समसामयिक मुद्दों और समस्याओं पर जनप्रतिरोध की जनपदीय लोकसंस्कृति की रोशनी में च्रचा भी कर रहे हैं।

    लालन फकीर के बाद इसी सिलसिले में आज हम कंगाल हरिनाथ की चर्चा कर रहे हैं।लालन फकीर की रचनाओं के साथ साथ रवींद्र की रचनाधर्मिता पर बाउल फकीर सूफी संत आंदोलन की बौद्धमय विरास का गहरा असर रहा है,इसकी हम चर्चा करते रहे है।

    इन्हीं लालन फकीर ने जाति तोड़ो आंदोलन बंगाल में शुरु किया था,जिसमें भारतीय ग्रामीण पत्रकारिता के भीष्म पितामह कंगाल हरिनाथ बाउल उनके अनुयायी और सहयोगी थे।जो नील की खेती कराने वाले किसानों के हक में अंग्रेजों से एकतरफ लोहा ले रहे थे तो दूसरी तरफ रवींद्र के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ की जमींदारी और बंगाल के जमींदारों,सामंतों के खिलाफ पत्रकारिता कर रहे थे और जाति तोड़ो आंदोलन के तहत बाउल गान बी रच रहे थे।

    जमींदार सामंत भद्रलोक कुलीन वर्चस्व के खिलाफ रवींद्र के दलित विमर्श की जमीन यही है।इसीलिए शुरु से रवींद्रनाथ मनुसमृति व्यवस्था के निशाने पर हैं।

    लालन फकीर जात पांत और धर्म की पहचान से इंकार कर रहे थे और उनके जाति तोड़ो आंदोलन से ब्रह्मसमाज में भी खलबली मची हुई थी।जाति तोड़ो आंदोलन बंगाल में तब वैष्णवों की गौर सभा भी चला रही थी और हरिचांद ठाकुर का मतुआ आंदोलन भी शुरु हो गया था।

    संत कबीर की तरह सभी जाति धर्म के लोग लालन फकीर से प्यार करते थे तो सबी जाति धर्मों के कट्टरपंथी लोग उनका विरोध करते थे।हिंदू उन्हें हिंदू मानते थे तो मुसलमान उन्हें मुसलमान मानते थे।वे निराकार ईश्वर के मानवधर्म की बात करते थे तो ब्रह्मसमाजी उन्हें ब्रमसमाज आंदोलन का हिस्सा मानते थे।जबकि वैष्णव उन्हें वैष्णव मानते थे।

    लालन का जवाब एक वाक्य का हैः'সব লোকে কয় লালন কী জাত সংসারে।'सभी पूछते हैं कि लालन इस संसार में किस जाति के हैं।

    रवींद्र नाथ लालन फकीर से नहीं मिले  और न वे कंगाल हरिनाथ से मिले।लेकिन लालन फकीर और उनके बाउल अनिवार्य से वे सिलाईदह में लगातार संवाद करते रहे हैं और लालन फकीर की रचनाओं को संकलित और प्रकाशित करने की पहल भी उन्होने ही की।

    लालनगीति डाट काम में इसी का ब्यौरा इस प्रकार दिया गया हैः

    রবীন্দ্রনাথ ও লালন সম্ভবত লালনের সঙ্গে রবীন্দ্রনাথের দেখা হয়নি। তবে সভ্য সমাজে লালনকে পরিচয় করিয়ে দিয়েছিলেন খোদ রবীন্দ্রনাথ। লালনের একটি গানে বেশ মোহিত হয়েছিলেন তিনি, 'খাঁচার ভেতর অচিন পাখি/কমনে আসে যায়।/ধরতে পারলে মনো-বেড়ি/দিতাম পাখির পায়।'দেহতত্ত্বের এ গানটিকে রবীন্দ্রনাথ ইংরেজি অনুবাদও করেছিলেন। তিনি চেয়েছিলেন গানের মর্মার্থ বোঝাতে। আর সে কারণেই বুঝি ১৯২৫ সালের ভারতীয় দর্শন মহাসভায় ইংরেজি বক্তৃতায় এই গানের উদ্ধৃতি দিয়েছিলেন। বলেছিলেন, অচিন পাখি দিয়ে সাধারণ মানুষের কাছে কত সহজে মরমি অনুভব পৌঁছে দিয়েছিলেন লালন। লালনের সঙ্গে দেখা না হলেও লালন-অনুসারীদের সঙ্গে দেখা হয়েছে রবিবাবুর। এক চিঠির মধ্যে পাওয়া যায় সেই কথা, 'তুমি তো দেখেছ শিলাইদহতে লালন শাহ ফকিরের শিষ্যদের সঙ্গে ঘণ্টার পর ঘণ্টা আমার কিরূপ আলাপ জমত। তারা গরিব। পোশাক-পরিচ্ছদ নাই। দেখলে বোঝার জো নাই তারা কত মহৎ। কিন্তু কত গভীর বিষয় সহজভাবে তারা বলতে পারত।'শুধু কি তাই! লালনের মৃত্যুর পর তাঁর গানের খাতাও সংগ্রহ করেছিলেন রবীন্দ্রনাথ। লালনগীতি সংগ্রাহক একজনকে লালনশিষ্য ভোলাই শা বলেছিলেন- 'দেখুন, রবিঠাকুর আমার গুরুর গান খুব ভালোবাসতেন, আমাদের খাতা তিনি নিয়ে গেছেন।'সেই খাতা গত শতকের শেষার্ধে পাওয়া যায় এবং প্রকাশিত হয়।

    हम आनंदमठ के वंदेमातरम राष्ट्रवाद के सच पर लगातार चर्चा करते रहे हैं और बंगाल के बाउल फकीर सूफी वैष्णव बौद्ध आंदोलनों पर भी लगातार चर्चा करते रहे हैं। कंगाल हरिनाथ और लालन फकीर से संबंधित उपलब्ध सामग्री भी हम लगातार शेयर कर रहे हैं। करते रहेंगे।

    बहुजनों को रवींद्र का दलित विमर्श समझ में आये तो उन्हें बहुजन आंदोलन की अल विरासत की समझ आयेगी और नस्ली वर्ण वर्चस्व का यह कारपोरेटफासिस्ट तिलिस्म भी टूटेगा।इस संवाद का मकसद यही है।


    बीबीसी की ताजा खबर हैः

    'संविधान पर पुनर्विचार आरएसएस का 'हिडेन एजेंडा' है'!

    राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारतीय संविधान में बदलाव कर उसे भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाना चाहिए.

    संघ प्रमुख भागवत ने हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि संविधान के बहुत सारे हिस्से विदेशी सोच पर आधारित हैं और ज़रूरत है कि आज़ादी के 70 साल के बाद इस पर ग़ौर किया जाए.

    आरक्षण पर फिर से विचार हो: मोहन भागवत

    'वेद और विज्ञान' पर मोहन भागवत के कमेंट को लेकर चर्चा

    आरक्षण पर फिर से विचार हो: मोहन भागवत

    आरएसएस का 'हिडेन एजेंडा'


    भारतीय लोक गणराज्य और भारतीय संविधान के साथ नरसंहार संस्कृति के वध्य भारतीय जनगण को बचाने के लिए समता और न्याय, मनुष्यता, सभ्यता और प्रकृति, नागरिकता, आजीविका, जल जंगल जमीन, नागरिक अधिकार और मानवाधिकार के लिए निरंकुश नस्ली वर्चस्व की कारपोरेट राजकाज, राष्ट्रवाद और राजनीति के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सामंतवाद विरोधी साम्राज्यवाद विरोधी एकताबद्ध जनप्रतिरोध की साझा विरासत से जुड़ने की सख्त जरुरत है।

    यह साझा विरासत सीधे तौर पर आदिवासी किसानों के जनविद्रोहों की निरंतरता, बाउल फकीर आंदोलन,नील विद्रोह और भारतीय सूफी संत बाउल फकीर गुरु परंपरा की जमीन है तो बहुजन आंदोलन की हजारों साल की विरासत, बौद्धमय भारत और विविधता बहुलता सहिष्णुता की अनेकता में एकता की साझा विरासत है।

    रवींद्र का दलित विमर्श का सार यही है।

    रवींद्र उस भारतवर्ष के प्रतीक है कारपोरेट डिजिटल इंडिया का नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व जिसकी रोज हत्या कर रहा है।

    नस्ली वर्चस्व की राष्ट्रवाद के प्रतिरोध के खिलाफ तथाकथित संन्यासी विद्रोह के आनंदमठ के झूठ के खिलाफ बाउल साधु फकीर आंदोलन का सच जानने की जरुरत है। संन्यासी फकीर आंदोलन और चुआड़ विद्रोह के तुरंत बाद शुरु संथाल मुंडा भील विद्रोह के साथ नील विद्रोह से भारत में महात्मा गौतम बुद्ध, वैष्णव बाउल,सन्यासी फकीर सूफी आंदोलन के साथ लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ का जाति तोड़ो आंदोलन एक तरफ तो दूसरी तरफ हरिचांद ठाकुर के मतुआ आंदोलन से गुरुचांद ठाकुर के चंडाल आंदोलन और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के जाति उन्मूलन एजंडा मिशन की शुरुआत महात्मा ज्योति बा फूले के शब्दों में बहुजनों की गुलामगिरि खत्म करने के लिए शुरु हो चुकी थी।

    बहुजन विमर्श,आदिवासी विमर्श,दलित विमर्श,स्त्री विमर्श और रवींद्र के दलित विमर्श का प्रस्थानबिंदू यही आदिवासी दलित बहुजन किसान असल नवजागरण है,जो इतिहास और साहित्य में नहीं है।

    ब्रह्म समाज आंदोलन और औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से भी पहले पठान मुगल इस्लामी राजकाज के दौरान समाज सुधार आंदोलनों  नवजागरण की चर्चा खूब होती रही है लेकिन जाति तोड़ो अस्मिता तोड़ो के एकीकरण के बहुजन आंदोलन,आदिवासी किसान जनविद्रोहों के सिलिसिले में बाउल फकीर आंदोलन और लालन फकीर कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के रवींद्र संगीत के दलित विमर्श पर चर्चा कभी नहीं हुई है।

    बंगाल के बाहर बाकी भारत में रवींद्र और बाब डिलान के नोबेल पुरस्कार के सौजन्य से लालन फकीर के बारे में पढ़े लिखों को थोड़ी बहुत सूचना हो सकती है लेकिन दक्षिण एशिया में ग्रामीण पत्रकारिता की शुरुआत नील विद्रोह, बाउल फकीर आंदोलन और जमींदारों के प्रजा उत्पीड़न के प्रतिरोध बतौर शुरु करने वाले लालन फकीर के नवजागरण ब्रहमसमाज के समकालीन,समानंतर  जाति धर्म पहचान तोड़ो आंदोलन में सहयोगी,अनुयायी पत्रकार बाउल कंगाल हरिनाथ की चर्चा अभी शुरु नही हुई है।

    बहुजनों के असल नवजागरण के हिंदुत्वकरण के इसी धतकरम से नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के नस्ली राष्ट्रवाद का जन्म औद्योगिक उत्पादन प्रणाली और ब्रिटिश राज में बहुजनों को मिले हकहकूक की वजह से टूटती जाति व्यवस्था आधारित मनुस्मृति प्रणाली की बहाली के लिए हुआ।इसे समझे बिना नरसंहारी कारपोरेट फासिज्म का प्रतिरोध मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

    कंगाल हरिनाथ देवेंद्र नाथ टैगोर की जमींदारी के प्रजाजनों के प्रतिरोध के नेता थे और लालन फकीर के अखाडा़ के बाउल पत्रकार भी थे।वे एक साथ नीलसामंत देशी विदेशी काले गोरे शासकों का प्रतिरोध कर रहे थे तो वर्म वर्ग वर्चस्व के साहित्य कला माध्यम के खिलाफ वैकल्पिक पत्रकारिता की जमीन भी रच रहे थे और मजे की बात यह है कि अपनी ही जमींदारी के खिलाफ प्रतिरोध की यही लालन कंगाल जमीन ही रवींद्र रचनाधर्मिता में तब्दील हो गयी है।

    जैसे बाउल फकीर आंदोलन का नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के हित में भगवाकरण हुआ,जैसे संतों सूफियों,फकीरों के सामंतविरोधी राजसत्ता और दैवीसत्तो के खिलाफ लोक जमीन के प्रतिरोध आंदोलन का भक्ति आंदोलन बतौर हिंदुत्वकरण हुआ,जैसे गौतम बुद्ध,महात्मा महावीर,गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह, शिवाजी महाराज,चंडाल मतुआ आंदोलन,लिंगायत आंदोलन,द्रविड़ आंदोलन,अयंकाली और लोखांडे के आंदोलन महात्मा ज्योतिबा फूले और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के मिशन का हिंदुत्वकरण हुआ ,उसीतरह लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ के जाति तोड़ो आंदोलन का हिंदुत्वकरण हुआ और इसी के तहत रवींद्रनाथ का महिमामंडन और चरित्रहनन का सिलसिला बारतीयजनगण और खासतौर पर भारतीयबहुजन समाज को साझा विरासत की जमीन से बेदखल करने के लिए जारी है।

    रवींद्र को विश्वकवि,ऋषि रवींद्र,कविगुरु बनाकर उन्हे लालन फकीर कंगाल हरिनाथ के दलित बहुजन विमर्श और आदिवासी किसान आंदोलन से अलग रखने का कार्यक्रम आनंद मठ का दूसरा पहलू है।

    आज इसी मुद्दे पर हम सिलसिलेवार चर्चा करेंगे। विस्तार से यह आलेख हस्तक्षेप पर पढ़ें। पूरा आलेख पढ़ने से पहले मेरे फेसबुक पेज पर संबंधित संदर्भ सामग्री बाउल फकीर आंदोलन,लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ के बारे में देख लें तो बेहतर।

    लालनफकीर और कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी का ब्यौरा इसप्रकार हैः

    কাঙাল হরিনাথের 'শখের বাউল'১৮৮০ সালের কথা। তখন গ্রীষ্মকাল। কাঙাল হরিনাথের জীবনে এক অভাবনীয় মুহূর্ত ছিল সেটা। তিনি লালনের গান শুনে মোহিত হয়ে পড়লেন। ভাবলেন নিজেও একটা বাউল গানের দল গড়বেন। তাঁর গ্রামবার্তা-প্রেসে কাজ করার সময় পাশে পেলেন অক্ষয় কুমার মৈত্রেয় ও জলধর সেনকে। ব্যস, জমে গেল সাঙ্গ। পাশে পণ্ডিত প্রসন্ন কুমার বললেন, 'নতুন করে গান তৈরি করতে হবে।'শুরু হলো কাজ। সে এক অপার্থিব দৃশ্য ছিল বটে। নকল বাউল গানের দল। গানের সঙ্গে ছিল নৃত্য। জলধর সেন সেই বর্ণনা দিয়েছিলেন চমৎকার করে, 'দেখিতেছি একদল ফকির; সকলেরই আলখাল্লা পরা, কাহারও মুখে কৃত্রিম দাড়ি, কাহারও মাথায় কৃত্রিম বাবরি চুল, সকলেরই নগ্ন পদ।'এই দল দেখেছিলেন প্রাণকৃষ্ণ অধিকারী। তাঁর বর্ণনা থেকে পাওয়া যায়, 'খেলকা, চুল, দাড়ি, টুপি ব্যবহার এবং কাহার কাহার পায়ে নূপুরও থাকিত। বাদ্যযন্ত্রের মধ্যে ডুগি, খোমকা, খুঞ্জুরি, একতারা প্রভৃতি ফকিরের সাজে তাহারা বাহির হইত। ফিকিরচাঁদ ফকিরের দল দেখিয়া শেষে গ্রামে গ্রামে অনেক দল সৃষ্টি হইল।'তবে এ কথা কিন্তু সত্যি লালন যা পারেননি, সেই কাজ করতে পেরেছিলেন তাঁরা। তাঁরা গানকে পৌঁছে দিয়েছিলেন বাংলার বিস্তৃত সীমানায়। লালনের গান চারদিকে যতটা ছড়িয়েছিল তার চেয়ে বেশি ছড়িয়েছিল নকল বাউলদের গান। অথচ লালনকে দেখে, তাঁর গান শুনে অনুপ্রাণিত হয়েই দল গড়েছিলেন কাঙাল হরিনাথ।(साभार लालनगीति डाट काम)

    जाति व्यवस्था पर लालन फकीर ने जाति धर्म की पहचान पर चोट के जरिये प्रहार किया है जो संत कबीर की भाषा के अनुरुप हैः

    'কেউ মালা কেউ তসবি গলায়/তাইতে যে জাত ভিন্ন বলায়- /যাওয়া কিংবা আসার বেলায়/জাতের চিহ্ন রয় কার রে।'

    किसी के हाथों में माला है तो तसवी किसी के गले में।इसी से अलग जाति (धर्म) की पहचान है तो जाते वक्त (मृत्यु के समय) किसकी जाति की क्या पहचान होती है।

    लालन फकीर की जीवनी लिखने वाले वसंत कुमार पाल ने उनकी धर्म जाति की किसी पहचतान को मानने से इंकार करते हुए लिखा हैः

    'সাঁইজি হিন্দু কি মুসলমান, এ কথা আমিও স্থির বলিতে অক্ষম।'

    कंगाल हरिनाथ ने जाति तोड़ो आंदोलन का ब्यौरा देते हुए लालन फकीर के जाति तोड़ो आंदोलन और वैष्णवों के गौरसभा आंदोलन की चर्चा अपने अखबार ग्रामवार्ता में इस तरह की हैः

    গ্রামবার্ত্তা প্রকাশিকা'র প্রবন্ধ-নিবন্ধ, সম্পাদকীয়, উপ-সম্পাদকীয় ও সংবাদ নিবন্ধকার হরিনাথ মজুমদার নিজেই লিখতেন। সেই সূত্রে 'জাতি' নামক নিবন্ধে 'গ্রামবার্ত্তার' নিবন্ধকার লিখেছেন :

    '...সকলেই ব্রাম্ম ও ধর্ম্মসভার নাম শুনিয়াছেন। গৌরসভা নামে নিম্নশ্রেণীর লোকেরা আর এক সভা স্থাপন করিয়াছেন। ইহার নির্দ্দিষ্ট স্থান নাই। গৌরবাদী বক্তা এক ২ পল্লীগ্রামে উপস্থিত হইয়া, সভা করিয়া গৌরাঙ্গের চরিত ও লীলা বর্ণনা করে, স্ত্রীপুরুষে ৩/৪ শত লোক এক ২ সভায় উপস্থিত থাকে। ইহারা স্বধম্র্মের মধ্যে, জাতিভেদ স্বীকার করেনা; কামার, কুমার, তেলি, জালিক, ছুতার প্রভৃতি সকলেই একসঙ্গে আহার করে। এই দলে মুসলমান আছে কিনা জানিতে পারা যায় নাই। লালনশাহ নামে এক কায়স্থ আর এক ধর্ম্ম আবিষ্কার করিয়াছে। হিন্দু-মুসলমান সকলেই এই সম্প্রদায়ভুক্ত। আমরা মাসিক পত্রিকায় ইহার বিশেষ বিবরণ প্রকাশ করিব। ৩/৪ বৎসরের মধ্যে এই সম্প্রদায় অতিশয় প্রবল হইয়াছে। ইহারা যে জাতিভেদ স্বীকার করে না সে কথা বলা বাহুল্য। এখন পাঠকগণ চিন্তা করিয়া দেখুন, এদিকে ব্রাহ্মধর্ম্ম জাতির পশ্চাতে খোঁচা মারিতেছে, ওদিকে গৌরবাদিরা তাহাকে আঘাত করিতেছে, আবার সে দিকে লালন সম্প্রদায়িরা, ইহার পরেও স্বেচ্ছাচারের তাড়না আছে। এখন জাতি তিষ্ঠিতে না পারিয়া, বাঘিনীর ন্যায় পলায়ন করিবার পথ দেখিতেছে।'

    कंगाल हरिनाथ और लालन फकीर की युगलबंदी के बारे इस ब्यौरे पर गौर करेंः

    এখানে প্রসঙ্গক্রমে উল্লেখ্য যে সুনীল গঙ্গোপাধ্যায়ের উপন্যাস অবলম্বনে গৌতম ঘোষ পরিচালিত চলচ্চিত্র 'মনের মানুষ'-এও সরাসরি উপস্থিতি দেখানো হয়েছে সাঁইজি লালনের সঙ্গে কাঙ্গাল হরিনাথ মজুমদার ও সাহিত্যিক মীর মশাররফ হোসেনকে (১৮৪৭-১৯১১)।

    অন্যদিকে, কাঙ্গাল হরিনাথশিষ্য জলধর সেন (১৮৬০-১৯৩৯) সাঁইজি লালন কাঙ্গাল কুটিরে এসে সঙ্গীত পরিবেশনের পর হরিনাথ-শিষ্যদের মনে যে ভাব উদয় হয়েছিল এর বিবরণ দিয়েছেন তার রচিত কাঙ্গাল জীবনীতে :

    'সে দিন প্রাতঃকালে লালন ফকির নামক একজন ফকির কাঙ্গালের সহিত সাক্ষাৎ করিতে আসিয়াছিলেন। লালন ফকির কুমারখালীর অদূরবর্তী কালীগঙ্গার তীরে বসবাস করিতেন। তাঁহার অনেক শিষ্য ছিল। তিনি কোন্ সম্প্রদায়ভুক্ত ছিলেন তাহা বলা বড় কঠিন, কারণ তিনি সকল সম্প্রদায়ের অতীত পেঁৗছিয়াছিলেন। তিনি বক্তৃতা করিতেন না, ধর্ম্মকথাও বলিতেন না। তাঁহার এক অমোঘ অস্ত্র ছিল তাহা বাউলের গান। তিনি সেই সকল গান করিয়া সকলকে মুগ্ধ করিতেন। ... সেই লালন ফকির কাঙালের কুটীরে, আমরা দিনের যে কথা বলিতেছি, সেই দিন আসিয়াছিলেন এবং কয়েকটি গান করিয়াছিলেন। সব কয়টী গান আমার মনে নাই; একটি গান মনে আছে। যথা_

    আমি একদিনও না দেখেছিলাম তারে;

    আমার ঘরের কাছে আরসী-নগর,

    তাতে এক পড়সী বসত করে।'

    অন্যদিকে, সাঁইজি লালনের গানের প্রেরণাতেই অক্ষয় কুমার মৈত্রের (১৮৬১-১৯৩০) মাথায় প্রথম বাউলের দল গঠনের চিন্তা আসে এবং পরে কাঙ্গাল হরিনাথের শিষ্যদল তা বাস্তবতায় রূপ দেয় 'ফিকির চাঁদ' নামে। সাঁইজি লালনের গানের সুরের প্রভাবে প্রভাবিত হয়ে কাঙ্গাল হরিনাথ প্রথম গান রচনা করেন :

    'আমি করব রাখালী কতকাল...।'

    এরপর হরিনাথ মজুমদার একের পর এক বাউল গান রচনা করতে থাকেন। কাঙ্গাল হরিনাথ ফিকির চাঁদের দল এবং বাউল গান রচনা প্রসঙ্গে তার দিনলিপিতে উল্লেখ করেছেন :

    "শ্রীমান অক্ষয় ও শ্রীমান প্রফুল্লের গানগুলির মধ্যে আমি যে মাধুর্য্য পাইলাম, তাহাতে স্পষ্টই বুঝিতে পাইলাম। এই ভাবে সত্য, জ্ঞান ও প্রেম-সাধনাতত্ত্ব প্রচার করিলে, পৃথিবীর কিঞ্চিৎ সেবা হইতে পারে। এতএব কতিপয় গান রচনার দ্বারা তাহার স্রোত সত্য, জ্ঞান ও প্রেম-সাধনের উপায়স্বরূপ পরমার্থ-পথে ফিরাইয়া আনিলাম এবং ফিকিরচাঁদের আগে 'কাঙ্গাল' নাম দিয়া দলের নাম 'কাঙ্গাল-ফিকিরচাঁদ' রাখিয়া তদনুসারেই গীতাবলীর নাম করিলাম। ... অল্পদিনের মধ্যেই কাঙ্গাল ফিকিরচাঁদের গান নিম্নশ্রেণী হইতে উচ্চশ্রেণীর লোকের আনন্দকর হইয়া উঠিল। মাঠের চাষা, ঘাটের নেয়ে, পথের মুটে, বাজারের দোকানদার এবং তাহার উপর শ্রেণীর সকলেই প্রার্থনাসহকারে ডাকিয়া কাঙ্গাল ফিকিরচাঁদের গান শুনিতে লাগিলেন।'

    সাঁইজি লালনের গান লালন-পালন ও সংগ্রহে যেমন গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করেছেন কাঙ্গাল হরিনাথ তেমনি কাঙ্গালের গানের পেছনে লালনের উৎসাহ-প্রেরণা ও লালন কর্তৃক প্রভাবিত হওয়ার প্রবণতারও উল্লেখযোগ্য প্রমাণ মেলে :

    ... কাঙ্গাল একদিন [লালন] ফকিরকে ডাকিয়া তাঁহার [কাঙ্গালের] রচিত কতগুলি গান শুনাইয়া জিজ্ঞাসা করিরেন, 'ভাই আমার এ কথাগুলি কেমন লাগিল?' ফকির হাসিয়া উত্তর দিলেন, 'তোমার এ ব্যঞ্জন বেশ হয়েছে, তবে নূনে কিছু কম আছে।'

    লালনের এই উৎসাহ-প্রেরণা ও সুরের প্রভাবে পরবর্তীতে কাঙ্গাল হরিনাথের গান উত্তরোত্তর সহজ-সরল, সুন্দর ও শ্রুতিমধুর ভাবগাম্ভীর্যময় হয়েছিল।

    আধ্যাত্মিক জীবনদর্শন ও বাউল গান রচনায় সাঁইজি লালন কর্তৃক যে কাঙ্গাল হরিনাথ প্রভাবিত হয়েছিলেন শুধু তা নয়, সাঁইজি লালন নিজেও কাঙ্গাল হরিনাথের উৎসাহ-প্রেরণায় প্রভাবিত হয়েছিলেন । যেমন কাঙ্গাল হরিনাথের এই গানটি_

    যারা সব জাতের ছেলে, জাত নিয়ে যাক্ যমের হাতে।

    বুঝেছি জাতের ধর্ম, কর্মভোগ কেবল জেতে

    একই আঙ্গিকে লালনের গান_

    সব লোকে কয় লালন কি জাত সংসারে।

    লালন বলে জাতের কি রূপ দেখলাম না এ নজরে

    অথবা কাঙ্গাল হরিনাথ রচিত_

    এখন, আমার মনের মানুষ কোথা পাই।

    যার তরে মনোখেদে প্রাণ কাঁদে সর্বদাই

    সাঁইজি লালন রচিত_

    মিলন হবে কত দিনে

    আমার মনের মানুষেরই সনে

    উপরের দুটি গানই ভাবের দিক থেকে একই সাদৃশ্যমূলক ও একে অন্যের সম্পূরক। সাময়িকপত্র সম্পাদনা, সংবাদ সংগ্রহ-প্রকাশ, সাহিত্যচর্চা ও প্রজানিপীড়নবৈরী কাঙ্গাল হরিনাথ মজুমদার লালনতীর্থে এসে সাঁইজির গানের সুরের স্পর্শে হয়ে ওঠেন আর এক নতুন বাউল সুরের সম্রাট। অন্যদিকে সাঁইজি লালন কাঙ্গাল স্পর্শে এবং মাঝেমধ্যে কুটিরে সমবেত হয়ে তার গান ও সুরের দ্যুতি ছড়িয়েছেন আধ্যাত্মিক জীবনদর্শন ও বাউল গানের মাধ্যমে। মানবপ্রেম, সমাজ সংস্কার ও জীবনের জয়গানের আলোর দ্যুতি ছড়ানোর দিক থেকে সাঁইজি লালন এবং কাঙ্গাল হরিনাথ ছিলেন একই চিন্তা, ধ্যান-ধারণার এক অভিন্ন সমীকরণের অধিকারী।

    http://www.jaijaidinbd.com/…


    कंगाल हरिनाथ फकीर की पत्रिका के बारे में बांग्ला पीडिया में लिखा हैः

    Grambarta Prakashika influential nineteenth-century journal, first published in April 1863 under the editorship of kangal harinath Majumdar. In June-July 1864 it became a fortnightly and a weekly in April-May 1871. Initially it was printed at Girish Vidyaratna Press, Kolkata. In 1864 Grambarta was shifted to Mathuranath Press at Kumarkhali. In 1873 the Kumarkhali press was donated to Harinath by its owner, Mathuranath Moitreya.

    Grambarta Prakaxika published articles on literature, philosophy, science etc. Reputed Bengali scholars used to write in the journal. rabindranath tagore's essays on literature, philosophy and science as well as poems were also published in it. The well-known Muslim writer mir mosharraf hossain began his literary activities through this paper for which he first worked as a mofussil correspondent. jaladhar sen, well-known as a writer of Himalayan travels and journalist, also began his literary career through this journal.

    Harinath edited Grambarta Prakasika for 18 years. During this period he led a relentless struggle to promote education in Bengal and create public opinion against exploitation. He published articles exposing social and political wrongs, and his pen was particularly uncompromising against the oppression of British indigo farmers and moneylenders. [Md Masud Parvez]

    http://en.banglapedia.org/index.php…



    रवींद्र का दलित विमर्श-24

    भारत के दलित विमर्श में रवींद्र नाथ नहीं है और आदिवासी किसानों मेहनतकशों के हकहकूक की विरासत की लोकसंस्कृति वह जमीन नहीं है,इसीलिए भारत में मनुस्मृति नस्ली वर्चस्व के खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं है।

    भानूसिंहेर पदावली सीधे तौर पर बंगाल के बाउल फकीर बहुजन किसान आदिवासी सामंतवाद विरोधी साम्रजाय्वाद विरोधी आंदोलन को बदनाम गायपट्टी के दैवी सत्ता राजसत्ता विरोधी मनुष्यता के धर्म संत सूफी आंदोलन से जोड़ती है और हम प्रतिरोध की इस जमीन पऱ खड़े होकर भी अपनी ही माटी की ताकत से अनजान खुदकशी का विकल्प चुन रहे हैं।

    पलाश विश्वास

    रवींद्र नाथ पर बचपन और किशोर वय में ही उत्तर भारत के कबीरदास और सूरदास के साहित्य का गहरा असर रहा है और संत सूफी साहित्यकारों के अनुकरण में ब्रजभाषा में उन्होंने भानुसिंह के छद्मनाम से बांग्ला लिपि में पदों की रचना की जो गीताजंलि से पहले की उनकी रचनाधर्मिता है  और ऐसा उन्होंने ब्रह्मसमाज और नवजागरण की विरासत के केंद्र बने जोड़ासांकू की ठाकुर बाड़ी में किया।उनकी यह पदावली 1884 में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुई है।गाय पट्टी की इस संत सूफी जमीन की खुशब को महसूस करने के लिए भानुसिंह की पदावली पठनीय है लेकिन नेट फर हमें इसका अनुवाद नहीं मिला है।

    हम रवींद्र की रचनाओं पर फिलहाल फोकस नहीं कर रहे हैं।ऐसा हम बाद में करेंगे।फिलहाल हम इस उपमहादेश की अखंड ऐतिहासिक सांस्कृतिक साहित्यिक विरासत में किसानों,मेहनतकशों के सामंतवाद साम्राज्यवाद और नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के प्रतिरोध की जमीन खोज रहे है जो रवींद्र की रचनाधर्मिता का आधार है तो भारतीय बहुजनों, किसानों और मेहनतकशों के हकहकूक जल जंगल जमीन आजीविका ,मनुष्यता, सभ्यता और पर्यावरण की सरहदों के आरपार निरंतर जारी लड़ाई भी है।

    यही लड़ाई रवींद्र का दलित विमर्श है।

    हस्तक्षेप पर पूरा आलेख के प्रकाशन से पहले हम इसका एक खास अंश इसीलिए नेट पर शेयर करके हैं ताकि पूरा आलेख पढ़ने से पहले लगातार शेयर की जा रही संदर्भ सामग्री आप पढ़ और देख लें।

    भानूसिंहेर पदावली के वीडियो हम शेयर कर रहे हैं तो रवींद्र साहित्य की ब्रजभाषा की जमीन की महक भी आप महसूस कर सकते हैं।

    भानूसिंहेर पदावली सीधे तौर पर बंगाल के बाुल फकीर बहुजन किसान आदिवासी सामंतवाद विरोधी साम्रजाय्वाद विरोधी आंदोलन को बदनाम गायपट्टी के दैवी सत्ता राजसत्ता विरोधी मनुष्यता के धर्म संत सूफी आंदोलन से जोड़ती है और हम प्रतिरोध की इस जमीन पऱ खड़े होकर भी अपनी ही माटी की ताकत से अनजान खुदकशी का विकल्प चुन रहे हैं।

    इस संवाद के दौरान हम अपने फेसबुक पेज और सोशल मीडिया पर संदर्भ सामग्री लगातार बांग्ला,हिंदी और अंग्रेजी में शेयर कर रहे हैं.जिनमें फिल्मों और लोकगीतों के वीडियो भी शामिल हैं।जो बांग्ला पढ़ सकते हैं,उनके लिए बांग्लादेश में किये गये शोध और अनुसंधान,बांग्लादेशी अखबारों में जारी संवाद मे साझेदार बनने का मौका है।जो बांग्ला पढ़ नहीं सकते तो वे गुगल बाबा की सेवा लेकर आनलाइन अनुवाद के माध्यम से बांग्ला और अंग्रेजी में उपलब्ध सारी सामग्री पढ़ समझ सकते हैं।सोशल मीडिया की सीमा के तहत पूरा आलेख,सारी संदर्भ सामग्री मूल या अनूदित साथ साथ दी नहीं जा सकती तो कृपया तकनीक का लाभ उठायें।

    रवींद्र नाथ के दो हजार से ज्यादा गीत प्रचलित हैं।

    नजरुल इस्लाम के गीत भी संख्या में बहुत ज्यादा हैं।

    इन गीतों में बाउल फकीर संत वैष्णव बौद्ध परंपराओं की लोकसंस्कृति है।

    बंगाल के जनपदों मे खेती और प्रकृति से जुड़े जन समुदायों के जीवनयापन और दिनचर्या के परत दर परत गीत हैं।

    नदियों की लहरों के साथ,ज्वार भाटा के साथ सूरज की पहली किरण से लेकर आखिरी किरण तक आम जनता का जीवनयापन इन्हीं लोकगीतों के साथ हैं और इन्हीं लोकगीतों मे लोक दलित विमर्श और संवाद की विविधता,बहुलता,द्वंद और एकात्मकता का लोकतंत्र है।

    इस महादेश ही नहीं,एशिया ही नहीं,दुनियाभर में किसानों और मेहनतकशों की बोलियों में यह लोकसंस्कृति रची बसी है जिससे उत्पादन संबंध और समाजिक संरचना के साथ साथ अर्थव्वस्था भी जुड़ी होती हैं।

    कारपोरेट मुक्त बाजार ने लोक संस्कृति और बोलियों को बाजार की भाषा और बाजार की उपभोक्ता संस्कृति में समाहित कर दिया है तो जाति धर्म की पहचान में निष्णात आत्मध्वंस की राजनीति का यह मृत्यु कार्निवाल है।

    बंगाल में लोकसंस्कृति की धारा रवींद्र संगीत और नजरुल संगीत के मार्फत पितृसत्ता के खिलाफ स्त्री अस्मिता की निरंतरता में तब्दील है जो दुर्गोत्सव की महिषासुर वध संस्कृति के विरुद्ध विविधता, बहुलता, सहिष्णुता और एकात्मता की साझा विरासत बांर्ला और भारतीय मनुस्मृति नस्ली वर्चस्व की पितृसत्ता के विरुद्ध है।

    पश्चिम बंगाल में रवींद्र संगीत और नजरुल संगीत के स्त्री संसार के बाहर पितृसत्ता की बलात्कार सुनामी है तो पूर्वी बंगाल में लोकसंस्कृति जीवन के हर क्षेत्र में साहित्य,कला,भाषा,माध्यम,पत्रकारिता की मुख्यधारा है।

    पश्चिम बंगाल में कंगाल हरिनाथ की चर्चा उस तरह नहीं होती जिस तरह बाकी भारत में चुआड़ विद्रोह,पाबना रंगपुर के किसान विद्रोह,नील विद्रोह और आदिवासी किसान आंदोलनों पर सन्नाटा है,लेकिन बांग्ला देश में फिकिरचांद बाउल घराने के प्रवर्तक लालन फकीर के सहयोगी कंगाल हरिनाथ के करीब एक हजार बाउल गीत प्रचलन में हैं और वहां रवींद्र और नजरुल के बराबर कंगाल हरिनाथ का स्थान है।

    कंगाल हरिनाथ के बारे में पश्चिम बंगाल में अज्ञानता का आलम है कि विश्वप्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे ने अपनी मशहूर क्लासिक फिल्म पथेर पांचाली में दुर्गी की बुआ के भजन के लिए कंगाल हरिनाथ के पूर्वी बंगाल में बेहद लोकप्रिय हरि पार करो आमारे का फिल्मांकन किया और उस वक्त उन्हें मालूम भी नहीं था कि यह बाउल गीत कंगाल हरिनाथ का है और मालूम पड़ने पर उन्होंने कंगाल हरिनाथ के वंशजों से माफी मांग ली।

    कंगाल हरिनाथ और उनकी पत्रिका ग्राम वार्ता का जमींदारों के खिलाफ किसान आदिवासी विद्रोहों,लील विद्रोह,पाबना और रंगपुर के किसानविद्रोहों में बड़ी भूमिका थी तो वे क्रूर महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर के अत्याचारों के खिलाफ भी प्रजाजनों के नेतृत्व का नेतृत्व कर रहे थे।जमींदारों की हिटलिस्ट में वे थे जबकि स्थानीय समस्याओं और विवादों के निपटारे के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने उनकी पत्रिका की सारी सामग्री का लगातार अनुवाद का सिलसिला बनाये रखा और कंगाल हरिनाथ के सुझावों के मुताबिक किसानों की समस्याएं सुलझाने की कार्रवाई वे करते रहे।लेकिन जमींदार उन्हें अपना शत्रु मानते थे।

    इसी सिलिसले में गौरतलब है कि पूर्वी बंगाल के कुष्टिया (अनिभाजित बंगाल के नदिया जिले के अंतर्गत) सिलाईदह में टैगोर जमींदारी के दायरे में कुमारखाली गांव में ग्राम वार्ता का प्रेस और उसके पास ही लालन फकीर का अखाडा़ और प्रजाजनों के हकहकूक की लड़ाई में लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के सारे परिदृ्श्य थे।इसी परिदृश्य में टैगोर जमींदारी के लठैतों ने कंगाल हरिनाथ पर हमला कर दिया तो लालन फकीर के अखाड़े के बाउलों और उनके समर्थकों ने उऩका बचाव किया।

    टैगोर जमीदारी के सामंती शिकंजे को तोड़कर ही रवींद्र लालन फकीर और कंगाल हरिनाथ की विरासत से जुड़े।

    इसी विरासत मे मतुआ और चंडाल आंदोलन है तो रवींद्र संगीत,नजरुल संगीत से लेकर शचिन देववर्मन सलिल चौधरी से लेकर भूपेन हजारिका तक भारत के सिनेमा और संगीत में लोकगीतों की मुख्यधारी की जड़ें भी यही है।

    इसी तरह चित्तप्रसाद और सोमनाथ होड़ की चित्रकला से लेकर ऋत्विक घटक की फिल्मों तक फैली है मिट्टी की वह सोंधी महक जिसकी सबसे सशक्त अभिव्यक्ति भारतीय गण नाट्य आंदोलन के नेतृत्व में भारतीय रंगकर्म में लगातार होती रही है।

    आज भी भारतीय रंग कर्म लोकसंस्कृति की इसी विरासत पर आधारित है और उसकी जनपक्षधरता की निरंतरता जारी है।

    बांग्ला में महाश्वेता देवी ,नवारुण भट्टाटार्य, सत्तर दसख के तमाम कवि कथाकार से लेकर शंखो घोष की कविता में भी लोकसंस्कृति की वह जमीन है।

    हिंदू शूद्र बाउल कंगाल हरिनाथ को लेकर बांग्लादेश मे कोई विवाद नहीं है। इस्लामी बांग्लादेशी राष्ट्रवाद के कट्टरपंथी तबका रवींद्र नाथ को इस्लामी राष्ट्रवाद के लिए सबसे बड़ा खतरा उसी तरह मानते हैं जैसे मनुसमृति नस्ली राष्ट्रवाद के कारपोरेट हिंदुत्ववादी भारत में।

    बांग्लादेश में भी रवींद्र के खिलाफ भयंकर घृणा अभियान है और लालन फकीर और बाउल आंदोलन को भी बांग्लादेश में इस्लाम के खिलाफ मानते हैं इ्सलामी राष्ट्रवादी।फिरभी हिंदू मुसलमान प्रजाजनों की अंग्रेजी हुकूमत और देशी जमींदारों के खिलाफ नील विद्रोह,पावना और रंगपुर किसान विद्रोह में खुलना जिले के कुमारखाली गांव से ब्रहमसमाज नवजागरण काल में ग्रामवार्ता पत्रिका निकालकर किसानों  और मेहनतकशों के हकहकूक के लिए आवाज उठाने वाले कंगाल हरिनाथ को लेकर कोई राष्ट्रीयतावादी सांप्रदायिक विवाद बांग्लादेश में नहीं है क्योंकि बांग्लादेश की भाषा,विधाओं,बांग्लादेश के साहित्य,उसकी संस्कृति,माध्यमों और पत्रकारिता में भी लोकसंस्कृति का बोलबाला है और इन पर बाजार और पूंजी का दखल नहीं है।भारतीय मीडिया में साहित्य का प्रवेशाधिकार निषिद्ध है,लेकिन बंगालादेश में साहित्य और कला ,लोकसंस्कृति पर सारा विमर्श वहां के दैनिक अखबारों में रोजाना जारी है।

    इसके विपरीत भारतीय साहित्य,विधाओं और माध्यमों में लोकसंस्कृति और बोलियों का वह ग्रामीण कृषि भारत सिरे से अनुपस्थित है।गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस अवधी में लिखा और वह समूचे भारत के लोगों का पवित्रतम ग्रंथ बन गया।सूरदास ने अपने पद ब्रजभाषा में लिखे तो ब्रजभाषा सामंतवाद विरोधी प्रतिरोध की भाषा बन गयी और रवींद्रनाथ ने भी ब्रजभाषा में भानुसिंहेर पदावली बाउल वैष्णव बौद्ध सूफी संत मनुष्यता के धर्म की अभिव्यक्ति के लिए लिख डाली।

    गुरु नानक, नामदेव, तुकाराम, विद्यापति, दादु, बशेश्वर,गाडगे महाराज, मीराबाई,रसखान,रहीम दास जैसे लोगों ने क्षेत्रीय लोकभाषा में लिखा और वह भारतीय साहित्य और संस्कृति की साझा विरासत में तब्दील है।

    बांग्लादेश की आम जनता भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में और बांग्लादेश बनने के बाद आजतक लगातार कट्टर इस्लामी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध लोकसंस्कृति के जिस बहुजन आंदोलन और किसान आदिवासी जल जंगल जमीन आजीविका और मनुष्यता के दलित विमर्श की शक्ति से लड़ते हुए उसे बार बार हरा रहा है,वह दलित विमर्श काजी नजरुल इस्लाम,कंगाल हरिनाथ,लालन फकीर और रवींद्रनाथ का दलित विमर्श है।

    भारत के दलित विमर्श में रवींद्र नाथ नहीं है और आदिवासी किसानों मेहनतकशों के हकहकूक की विरासत की लोकसंस्कृति वह जमीन नहीं है,इसीलिए भारत में मनुस्मृति नस्ली वर्चस्व के खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं है।

    ईबांग्ला लाइब्रेरी से भानुसिंहेर पदावली के कु छ पदों का मुखड़ा हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।चूंकि रवींद्रनाथ ने ब्रजभाषा में लिखने की कोशिशी की है तो पूरे पद का अनुवाद किये बिना हम सिर्फ शीर्षक को देवनागरी लिपि में भी दे रहे हैं ताकि वैष्णव बाउल धारा के इन पदों के बारे में पाठकों की धारणा बने।

    ভানুসিংহের পদাবলী

    আজু, সখি, মুহু মুহু

    आज सखी,मुहु मुहु


      আজু, সখি, মুহু মুহু গাহে পিক কুহু কুহু,    কুঞ্জবনে দুঁহু দুঁহু দোঁহারে পানে চায়।    যুবনমদবিলসিত পুলকে হিয়া উলসিত,    অবশ তনু অলসিত মুরছি জনু যায়।    আজু মধু চাঁদনী প্রাণ‐উনমাদনী,    শিথিল সব বাঁধনী, শিথিল ভৈ লাজ।    বচন মৃদু মরমর,...

    কো তুঁহু বোলবি মোয়

    को तुंहु बोलबि मोय

     

                কো তুঁহু বোলবি মোয়! হৃদয়‐মাহ মঝু জাগসি অনুখন,  আঁখ‐উপর তুঁহু রচলহি আসন            অরুণ নয়ন তব মরম‐সঙে মম   নিমিখ ন অন্তর হোয়।     কো তুঁহু বোলবি মোয়! হৃদয়কমল তব চরণে টলমল,   নয়নযুগল মম উছলে ছলছল            প্রেমপূর্ণ তনু পুলকে ঢলঢল...

    গহন কুসুমকুঞ্জ-মাঝে

    गहन कुसुमकुंज -माझे

     

    গহন কুসুমকুঞ্জ‐মাঝে   মৃদুল মধুর বংশি বাজে, বিসরি ত্রাস লোকলাজে   সজনি, আও আও লো॥ পিনহ চারু নীল বাস,   হৃদয়ে প্রণয়কুসুমরাশ, হরিণনেত্রে বিমল হাস,   কুঞ্জবনমে আও লো॥ ঢালে কুসুম সুরভভার,   ঢালে বিহগসুরবসার, ঢালে ইন্দু অমৃতধার   বিমল রজতভাতি রে। মন্দ মন্দ ভৃঙ্গ গুঞ্জে,  ...

    বঁধুয়া, হিয়া-পর আও রে

    बंधुआ,हिया-पर आओ रे

        বঁধুয়া, হিয়া‐পর আও রে! মিঠি মিঠি হাসয়ি, মৃদু মৃদু ভাষয়ি,   হমার মুখ‐'পর চাও রে! যুগ‐যুগ‐সম কত দিবস ভেল গত,   শ্যাম, তু আওলি না— চন্দ‐উজর মধু‐মধুর কুঞ্জ‐'পর   মুরলি বজাওলি না! লয়ি গলি সাথ বয়ানক হাস রে,   লয়ি গলি নয়ন‐আনন্দ! শূন্য কুঞ্জবন, শূন্য হৃদয মন,   কঁহি...

    বজাও রে মোহন বাঁশি

    बजाओ रे मोहन वंशी

     

      বজাও রে মোহন বাঁশি। সার দিবসক        বিরহদহনদুখ    মরমক তিয়াষ নাশি॥ রিঝ‐মন‐ভেদন       বাঁশরিবাদন    কঁহা শিখলি রে কান!— হানে থিরথির      মরম‐অবশকর    লহু লহু মধুময় বাণ। ধসধস করতহ      উরহ বিয়াকুলু,    ঢুলু ঢুলু অবশ নয়ান। কত শত...

    বসন্ত আওল রে

    वसंत आवल रे

     

               বসন্ত আওল রে! মধুকর গুন গুন, অমুয়ামঞ্জরীকানন ছাওল রে। শুন শুন সজনী, হৃদয় প্রাণ মমহরখে আকুল ভেল, জর জর রিঝসে দুঃখদহন সবদূর দূর চলি গেল। মরমে বহৈ বসন্তসমীরণ,মরমে ফুটই ফুল, মরমকুঞ্জ‐'পর বোলই কুহুকুহুঅহরহ কোকিলকুল। সখি রে, উচ্ছল...

    বাদরবরখন, নীরদগরজন

    बादरबरकऩ,नीरदगरजन

    বাদরবরখন, নীরদগরজন,   বিজুলিচমকন ঘোর, উপেখই কৈছে আও তু কুঞ্জে   নিতিনিতি মাধব মোর। ঘন ঘন চপলা চমকয় যব পহু,   বজরপাত যব হোয়, তুঁহুক বাত তব সমরযি প্রিয়তম,   ডর অতি লাগত মোয়। অঙ্গবসন তব ভীঁখত মাধব,   ঘন ঘন বরখত মেহ, ক্ষুদ্র বালি হম, হমকো লাগয়   কাহ উপেখবি দেহ॥ বইস বইস,...

    বার বার, সখি, বারণ করনু

    बार बार सखी,वारण करनु

     

    বার বার, সখি, বারণ করনু   ন যাও মথুরাধাম বিসরি প্রেমদুখ রাজভোগ যথি   করত হমারই শ্যাম। ধিক্ তুঁহু দাম্ভিক, ধিক্ রসনা ধিক্,   লইলি কাহারই নাম। বোল ত সজনি, মথুরা‐অধিপতি   সো কি হমারই শ্যাম। ধনকো শ্যাম সো, মথুরাপুরকো,   রাজ্যমানকো হোয়। নহ পীরিতিকো, ব্রজকামিনীকো,   নিচয়...

    মরণ রে, তুঁহুঁ মম শ্যামসমান

    मरण रे तुहुं मम श्यामसमान

        মরণ রে, তুঁহুঁ মম শ্যামসমান। মেঘবরণ তুঝ, মেঘজটাজূট, রক্তকমলকর, রক্ত‐অধরপুট, তাপবিমোচন করুণ কোর তব      মৃত্যু‐অমৃত করে দান॥           আকুল রাধা‐রিঝ অতি জরজর,           ঝরই নয়নদউ অনুখন ঝরঝর—           তুঁহুঁ মম মাধব, তুঁহুঁ মম দোসর,...

    মাধব না কহ আদরবাণী

    माधव ना कह आदरवाणी

    মাধব না কহ আদরবাণী,   না কর প্রেমক নাম। জানয়ি মুঝকো অবলা সরলা   ছলনা না কর শ্যাম। কপট, কাহ তুঁহু ঝূট বোলসি,   পীরিত করসি তু মোয়। ভালে ভালে হম অলপে চিহ্ণনু,   না পতিয়াব রে তোয়। ছিদল‐তরী‐সম কপট প্রেম‐'পর   ডরনু যব মনপ্রাণ ডুবনু ডুবনু রে ঘোর সায়রে,   অব কুত নাহিক ত্রাণ।...

    শুন লো শুন লো বালিকা

    सुन लो सुन लो बालिका

    শুন লো শুন লো বালিকা,          রাখ কুসুমমালিকা,    কুঞ্জ কুঞ্জ ফেরনু সখি, শ্যামচন্দ্র নাহি রে॥ দুলৈ কুসুমমুঞ্জরি,                 ভমর ফিরই গুঞ্জরি,    অলস যমুন বহয়ি যায় ললিত গীত গাহি রে॥ শশিসনাথ যামিনী,                  বিরহবিধুর কামিনী,       ...

    শুন, সখি, বাজই বাঁশি

    सुन, सखी, बाजई वंशी

       শুন, সখি, বাজই বাঁশি। শশিকরবিহ্বল নিখিল শূন্যতল   এক হরষরসরাশি। দক্ষিণপবনবিচঞ্চল তরুগণ,   চঞ্চল যমুনাবারি। কুসুমসুবাস উদাস ভৈল সখি   উদাস হৃদয় হমারি। বিগলিত মরম, চরণ খলিতগতি,   শরম ভরম গয়ি দূর। নয়ন বারিভর, গরগর অন্তর,   হৃদয় পুলকপরিপূর। কহ সখি, কহ সখি, মিনতি...

    শ্যাম রে, নিপট কঠিন মন তোর!

    श्याम रे, निपट कठिन मन तोर

          শ্যাম রে, নিপট কঠিন মন তোর! বিরহ সাথি করি দুঃখিনি রাধা   রজনী করত হি ভোর। একলি নিরল বিরল‐'পর বৈঠত,   নিরখত যমুনা‐পানে— বরখ্ত অশ্রু, বচন নহি নিকসত,   পরান থেহ ন মানে। গহনতিমির নিশি, ঝিল্লিমুখর দিশি'  শূন্য কদমতরুমূলে ভূমিশয়ন‐'পর আকুলকুন্তল   রোদৈ আপন ভূলে।...

    শ্যাম, মুখে তব মধুর অধরমে

    श्याम,मुखे तव मधुर अधरमे

    শ্যাম, মুখে তব মধুর অধরমে  হাস বিকাশত কায়, কোন স্বপন অব দেখত মাধব,  কহবে কোন হমায়! নীদ‐মেঘ‐'পর স্বপন‐বিজলি‐সম  রাধা বিলসত হাসি। শ্যাম, শ্যাম মম, কৈসে শোধব  তূঁহুক প্রেমঋণরাশি বিহঙ্গ, কাহ তু বোলন লাগলি,  শ্যাম ঘুমায় হমারা। রহ রহ চন্দ্রম, ঢাল ঢাল তব  শীতল জোছনধারা...

    সখি রে, পিরীত বুঝবে কে

    सखी रे,पिरीत बूझबे के

                   সখি রে, পিরীত বুঝবে কে!                   আঁধার হৃদয়ক দুঃখকাহিনী   বোলব, শুনবে কে।       রাধিকার অতি অন্তরবেদন   কে বুঝবে অযি সজনি।       কে বুঝবে, সখি, রোয়ত রাধা   কোন দুখে দিনরজনী।       কলঙ্ক রাটায়ব জনি, সখি, রটাও—   কলঙ্ক নাহিক...

    সখি লো, সখি লো,

    सखी लो, सखी लो,

    সখি লো, সখি লো, নিকরুণ মাধব   মথুরাপুর যব যায় করল বিষম পণ মানিনী রাধা   রোয়বে না সো, না দিবে বাধা,  কঠিন‐হিয়া সই হাসয়ি হাসয়ি   শ্যামক করব বিদায়। মৃদু মৃদু গমনে আওল মাধা,   বয়ন‐পান তছু চাহল রাধা, চাহয়ি রহল স চাহয়ি রহল—  দণ্ড দণ্ড, সখি, চাহয়ি রহল—  মন্দ...

    সজনি সজনি রাধিকা

    सजनी ,सजनी  राधिका

    সজনি সজনি রাধিকা লো,   দেখ অবহুঁ চাহিয়া মৃদুলগমন শ্যাম আওয়ে   মৃদুল গান গাহিয়া॥ পিনহ ঝটিত কুসুমহার,   পিনহ নীল আঙিয়া। সুন্দর সিন্দুর দেকে   সীঁথি করহ রাঙিয়া॥ সহচরি সব নাচ নাচ   মিলনগীত গাও রে, চঞ্চল মঞ্জরীরাব   কুঞ্জগগনে ছাও রে। সজনি, অব উজার'মঁদির   কনকদীপ জ্বালিয়া,...

    সতিমির রজনি, সচকিত সজনী

    सतिमिर रजनी,सचकित सजनी

    সতিমির রজনি, সচকিত সজনী, শূন্য নিকুঞ্জ‐অরণ্য। কলয়িত মলয়ে, সুবিজন নিলয়ে বালা বিরহবিষণ্ণ॥ নীল আকাশে তারক ভাসে, যমুনা গাওত গান। পাদপ‐মরমর, নির্ঝর‐ঝরঝর, কুসুমিত বল্লিবিতান। তৃষিত নয়ানে বনপথপানে নিরখে ব্যাকুল বালা— দেখ ন পাওয়ে, আঁখ ফিরাওয়ে, গাঁথে বনফুলমালা! সহসা রাধা চাহল...

    হম যব না রব, সজনী

    हम जब ना रब,सजनी


               হম যব না রব, সজনী, নিভৃত বসন্তনিকুঞ্জবিতানে   আসবে নির্মল রজনী— মিলনপিপাসিত আসবে যব, সখি,   শ্যাম হমারি আশে, ফুকারবে যব 'রাধা রাধা'  মুরলি ঊরধ শ্বাসে, যব সব গোপিনী আসবে ছুটই   যব হম আওব না, যব সব গোপিনী জাগবে চমকই   যব হম জাগব না, তব কি কুঞ্জপথ হমারি...

    হম, সখি, দারিদ নারী

    हम, सखी, दारिद नारी

            হম, সখি, দারিদ নারী। জনম অবধি হম পীরিতি করনু,   মোচনু লোচনবারি। রূপ নাহি মম, কছুই নাহি গুণ,   দুখিনী আহির জাতি— নাহি জানি কছু বিলাস‐ভঙ্গিম   যৌবনগরবে মাতি— অবলা রমণী, ক্ষুদ্র হৃদয় ভরি   পীরিত করনে জানি। এক নিমিখ পল নিরখি শ্যাম জনি,   সোই বহুত করি মানি।...



    रवींद्र का दलित विमर्श-25

    विषमता की अस्पृश्यता  के पुरोहित तंत्र के विरुद्ध समानता और न्याय की आवाज ही रवींद्र रचनाधर्मिता है।

    ."এ দুর্ভাগা দেশ হতে হে মঙ্গলময় /দূর করে দাও তুমি সর্ব তুচ্ছ ভয়-/ লোক ভয়, রাজভয়, মৃত্যু ভয় আর/দীনপ্রাণ দুর্বলের এ পাষাণভার।'——- :: রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর

    धार्मिक राष्ट्रवाद के आधार पर देश का विभाजन हो गया धार्मिक पहचान की दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत के तहत और आज फिर उसी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद से हम भारत को डिजिटल इंडिया बनाने की मुहिम में शामिल हैं।

    इसके विपरीत आस्था का  लोकतंत्र इस्लामी शासन से भी पहले बौद्ध,हिंदू और जैन भक्ति आंदोलन की साझा विरासत सातवीं आठवीं सदी से बनती रही है और 14 वीं सदी के बाद सूफी संत आंदोलन के साथ पूरे देश की लोक संस्कृति में बदल गया यह आस्था का लोकतंत्र और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम की जमीन भी यह है।यही हमारी साझा विरासत है।


    पलाश विश्वास

    विषमता की अस्पृश्यता  के पुरोहित तंत्र के विरुद्ध समानता और न्याय की आवाज ही रवींद्र रचनाधर्मिता है।इसीलिए उत्पीड़ित अपमानित मनुष्यता के लिए न्याय और समानता की उनकी मांग उनकी कविताओं,गीतों,उपन्यासों और कहानियों से लेकर गीताजंलि के सूफी बाउल आध्यात्म और रक्त करबी और चंडालिका जैसी नृत्य नाटिकाओं का मुख्य स्वर है।

    उनकी प्रार्थना अपने मोक्ष के लिए नहीं है यह जनगण की मुक्तिकामना हैः


    ए दुर्भागा देश होते हे मंगलमय

    दूर करे दाओ तुमि सब तुच्छ भय,-

    लोकभय,राजभय,मृत्युभय आर

    दीन प्राणेर दुर्बलेर ए पाषाणभार,

    एर चिरपेषण यंत्रणा धुलितले

    एई नित्य अवनति ,दण्डे पले पले

    एई आत्म अवमान,अंतरे बाहिरे

    एई दासत्वेर रज्जु,त्रस्त नतसिरे

    सहस्रेर पदप्रांत तले बारंबार

    मनुष्य मर्यादा पर्व चिर परिहार




    स्वदेश जिज्ञासा के संदर्भ में रवींद्रनाथ कहते थे कि वे राजनेता नहीं है।

    देश और समाज के बारे में रवींद्रनाथ की धारणाएं अपमानित मनुष्यता को देखने के बाद बनी है।वे कहते थे कि मानवीय संबंधों के सामग्रिक विकास का प्रयत्न ही उनके जीवन का चरम लक्ष्य है।

    विषमता की अस्पृश्यता  के पुरोहित तंत्र के विरुद्ध समानता और न्याय की आवाज ही रवींद्र रचनाधर्मिता है।

    इसीलिए देश और समाज की उनकी धारणाएं फासिज्म के राष्ट्रवाद तक सीमाबद्ध नहीं है।युद्ध के विरुद्ध विश्वशांति के लिए वे जिस फासीवादी नाजी अंध राष्ट्रवाद का विरोध कर रहे थे,दो दो विश्वयुद्धों के विध्वंस के बाद आज भी उसी फासिस्ट नाजी अंध राष्ट्रवाद की वजह से पूरी दुनिया युद्ध और गृहयुद्ध के शिकंजे में है और आधी दुनिया शरणार्थी है।

    समाज और देश की रवींद्रनाथ की धारणाएं हिंसा और घृणा के विरुद्ध देश काल की सीमायें तोड़कर सारे विश्व के परिप्रेक्ष्य में विकसित हुई और उनका मनुष्य राष्ट्रीयता की सरहदों की कैद तोड़कर गीतांजलि का विश्व मानव बन गया।

    रवींद्र नाथ ने लिखा हैः

    विश्वसाथे योगे जेथाय विहार

    सेईखाने योग तोमार साथे आमारो

    यही रवींद्र दर्शन का मूल तत्व है।

    प्रशांत चंद्र महलानबिश ने रवींद्र नाथ ओ विश्वमानवताबोध निबंध इसी दृष्टिकोण से लिखा है।

    प्रशांत चंद्र महलानबिश ने लिखा हैः भारत के ह्रदयगत इस भाव की अभिव्यक्ति के लिए रवींद्रनाथ ने बांग्लाभाषा में एक नया शब्द का प्रयोग किया-विश्वमानव..विश्वमानव मनुष्यों के सभी आदर्शों का आधार है।उनके मुताबिक रवींद्रनाथ के लिखे भारत वर्ष में रवींद्र की राष्ट्र और स्वदेशी समाज के स्वदेश की अवधारणाएं मिलती हैं।पाश्चात्य नेशन या राष्ट्र के विरुद्ध हैं रवींद्रनाथ क्योंकि पश्चिम का राष्ट्र निजी हितों को साधने का साधन है।

    रवींद्रनाथ के मुताबिक रिनेशां और एनलाइटेनमेंट के जरिये विज्ञान और तकनीक की मदद से पूंजीवाद का जितना व्यापक विस्तार होता गया,उसने राष्ट्र  व्यवस्था का निजी हितों को साधन के लिए उतना ही इस्तेमाल किया है।

    आज के कारपोरेट राष्ट्र और धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का सच भी यही है।

    इसीलिए पूंजीवाद के निजी हितों के लिए इस्तेमाल होने वाले राष्ट्र भारत को बनाने के सिरे से लगातार विरोध जीवन के अंत तक रवींद्रनाथ विषमता की व्यवस्था के प्रतिरोध बतौर करते रहे।

    नेशनल शब्द पर रवींद्रनाथ को तीखी आपत्ति थी।

    नवबंगेर आंदोलन शीर्षक निबंध में उन्होंने लिखाःएकदिन तड़के जागकर अचानक चारों तरफ देखा नेशनल पेपर,नेशनल मेला,नेशनल संग,नेशनल थिएटर-नेशनल की आंधी से ग्रसित दसों दिशाएं।औपनिवेशिक शासन के अधीन उधार की यह राष्ट्रीयता हमारी अपनी समाज व्यवस्था से मेल नहीं खाती।

    हमारी अपनी समाज व्यवस्था के बारे में उनकी समझ लोक संस्कृति के लोकतंत्र से बनी थी,जिसके तहत आस्था का लोकतंत्र धर्म आधारित राष्ट्रवाद को सिरे से खारिज करता है। इसी धार्मिक राष्ट्रवाद के आधार पर देश का विभाजन हो गया धार्मिक पहचान की दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत के तहत और आज फिर उसी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद से हम भारत को डिजिटल इंडिया बनाने की मुहिम में शामिल हैं।

    इसके विपरीत आस्था का  लोकतंत्र इस्लामी शासन से भी पहले बौद्ध,हिंदू और जैन भक्ति आंदोलन की साझा विरासत सातवीं आठवीं सदी से बनती रही है और 14 वीं सदी के बाद सूफी संत आंदोलन के साथ पूरे देश की लोक संस्कृति में बदल गया यह आस्था का लोकतंत्र और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम की जमीन भी यह है।यही हमारी साझा विरासत है।

    सोशल मीडिया पर रवींद्र विमर्श पर भी अंकुश लग रहा है और लिंक,संदर्भ सामग्री शेयर करने में तकनीकी दिक्कतें हो रही हैं।बंगाल में महिषासुर वध उत्सव का जलवा है और अखबार,मीडिया,घर परिवार सबकुछ बाजार में तब्दील है।

    आस्था का क्रयशक्ति से क्या संबंध है,यह समझ लें तो आस्था की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों समझी जा सकती है।

    दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन चोल और पल्लव राजाओं ने विशाल और भव्य मंदिर बनाकर दैवीसत्ता को राजसत्ता में निष्णात करने के लिए किया था। जबकि बौद्ध और जैन धर्म के असर में यह भक्ति आंदोलन मनुस्मृति के विरुद्ध और सामंती व्यवस्था के साथ साथ राजसत्ता और दैवीसत्ता के खिलाफ आंदोलन में तब्दील हो गया।

    आम जनता की आस्था में लोकतंत्र की संस्कृति की वजह से ही भारत में विविध बहुल  पस्परविरोधी संस्कृतियों का भी एकीकरण संभव हो सका है।इसीसे सामाजिक तानाबाना जनपदों की इसी लोकसंस्कृति से रचा है जिसे आस्था महोत्सव के विविध आयोजनों के मुक्तबाजार की उपभोक्ता संस्कृति ने सिरे से तहस नहस कर दिया है।

    इसी अनेकता में एकता की लोकसंस्कृति ने भारतीय जनता के मुक्तिसंग्राम को दिशा दिखायी है और इसीसे भौगोलिक एकता और अखंडता का विकास हुआ है।

    धर्मोन्माद में न आस्था है और न धर्म।

    यह नस्ली वर्चस्व का अश्लील नंगा कार्निवाल है जिसमें मनुष्य महज उपभोक्ता है,जिसका भक्ति और आस्था से कोई लेना देना नहीं है ।

    आस्था का महोत्सव मुक्त बाजार में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का नस्ली वर्चस्व है  तो यह राजनीति,सत्ता और राष्ट्र के संरक्षण में यह क्रयशक्ति के अश्लील प्रदर्शन की प्रतियोगिता और देशी विदेशी कंपनियों की अबाध मुनाफावसूली है।

    यह धर्म की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों है जो भारतीय दर्शन, आध्यात्म, इतिहास और परंपरा के खिलाफ है तो यह विज्ञान के भी खिलाफ है।

    तमिलनाडु,दक्कन और आंध्र तेलंगना में सातवीं आठवीं सदी से आस्था के राजकीय इस्तेमाल के विरुद्ध आंदोलन शुरु हुआ जो 14 वीं और 16 वीं सदी के दौरान पूरे भारत में समता और न्याय का आंदोलन बन गया।

    तमिल भाषा में पांच हजार साल का अखंड इतिहास है,जिसमें उत्तर भारत के अंधकार युग में भी दैवीसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ आस्था के लोकतंत्र की निरंतराता के ब्यौरे सिलसिलेवार हैं। मसलनः


    The collection and the canonisation of the Śaiva and the Vaiṣṇava bhakti poetry in the 10th century led to the spread of bhakti as a mass movement. Cuntarar's (between 780–830 CE) work, Ārūr Tiruttoṇṭattokai, originated the Śaiva canon. In his poem, Cuntarar mentioned 62 nāyaṉmārs (saints of Tamil Śaivism). He was added as the Cuntaramūrtttināyaṉar, and a total of 63 nāyaṉmārs decorated as the saints of Śaivism. Nampi Āṇṭār Nampi (1080–100 CE) arranged and anthologised the hymns of Campantar, Appar, and Cuntarar as the first seven holy books and added Māṇikkavācakar's Tirukkōvaiyār and Tiruvācakam as the eighth book. Tirumūlar's Tirumantiram, 40 hymns by two other poets, Tiruttoṇdar tiruvantāti and Nampi's hymns constitute the ninth to eleventh books of the Śaivite canon respectively. Cēkkiḷār's Periya Purāṇaṃ (1135 CE) became the twelfth Tirumuṛai and completed the Tamil Śaivite bhakti canonical literature. This body of works represents a huge corpus of heterogeneous literature covering nearly 600 years of religious, literary and philosophical developments. Kāraikkāl Ammaiyār's songs (500 CE) and the compositions of the Pallava King Aiyaṭikal Kāṭavar Kōn (670–700 CE) were the earliest in the Śaivite canon and Cēkkiḷār's Periyapurāṇam (early 12th century) would be the latest.

    Nātamuṉi (10th century), who is considered to be in the line of the very first Vaiṣṇavite ācāryas (teachers), compiled the Vaiṣṇavite bhakti poetry into a huge compendium called Nālāyirativyaprapantam, 'The Four Thousand Divine Works'. The earliest of Vaiṣṇavite poet-saints, Poykaiāḷvār, Pūtatāḷvār and Pēyāḷvār, belong to 650 to 700 CE. The Vaiṣṇavite canon consists of the works of 14 poets, out of which 12 are considered as āḷvārs.

    (संदर्भःhttps://www.sahapedia.org/the-dynamics-of-bhakti)

    उत्तर भारत की साधु संत सूफी बाउल पीर गुरु परंपरा से जुड़कर वैष्णव आंदोलन और भागवत पुराण में आस्था के लोकतंत्र के तहत ब्रह्म समाज आंदोलन और नवजागरण से पहले औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत में आस्था दैवी सत्ता और राजसत्ता के शिकंजे से निकल कर जनपदों की लोकसंस्कृति में तब्दील हो गयी थी,जो अब डिजिटल इंडिया में नस्ली नरसंहारी सत्ता वर्चस्व की विशुद्ध उपभोक्ता संस्कृति है।

    उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन के तहत साधु संतों सूफी फकीर बाउलों के क्रांतिकारी विचारों की वजह से पुरोहित तंत्र और सामंतों के वर्चस्ववाले धर्मस्थलों और उत्सवों से  निकलकर सगुण निर्गुण भक्ति के तहत आम जनता को जाति धर्म निर्विशेष आस्था की स्वतंत्रता मिली और तभी से मनुस्मृति व्यवस्था के खिलाफ शूद्रों, अछूतों, आदिवासियों, स्त्रियों का बहुजन आंदोलन शुरु हो गया।

    आस्था के इस लोकतंत्र में अपनी आस्था के विपरीत आस्था के विधर्मियों के धर्म और ईश्वर का सम्मान और मनुष्यमात्र से प्रेम की परंपरा का विकास हुआ। निराकार ईश्वर और सर्वेश्वर के सिद्धांत के तहत मनुष्य मात्र को नरनारायण और सेवाधर्म के मानवतावादी धर्म का विकास भी हुआ।

    इसके विपरीत धर्म अब कारपोरेट कारोबार है और रवींद्र,नजरुल,लालन फकीर,जयदेव, चैतन्य महाप्रभु,रामकृष्ण,कंगाल हरिनाथऔर स्वामी विवेकानंद के बंगाल में धर्म कर्म का कारपोरेट महोत्सव मनुस्मृति पुनरोत्थान के महोत्सव की राष्ट्रीय झांकी है।



    रवींद्र का दलित विमर्श-26

    राजसत्ता धर्म सत्ता में तब्दील

    यूरोप का मध्यकालीन बर्बर धर्मयुद्ध भारत के वर्तमान और भविष्य का सामाजिक यथार्थ।

    राजसत्ता,धर्मसत्ता,राष्ट्रवाद और शरणार्थी समस्या के संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमान और गुलामी की विरासत

    पलाश विश्वास

    कोलकाता में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में लाखों मुसलमानों ने रैली की और इस रैली के बाद बंगाल में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर नये सिरे से धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण तेज हुआ है।भारत में सिर्फ मुसलमान ही म्यांमार में नरसंहार और मानवाधिकार हनन के खिलाफ मुखर है,ऐसा नहीं है।

    पंजाब के गुरुद्वाराओं से सीमा पर जाकर सिख कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर इन शरणार्थियों के लिए लंगर चला रहे हैं तो भारत के गैर मुसलमान नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा भी रोहिंग्या नरसंहार के खिलाफ विश्वजनमत के साथ है।

    हिंदू मुसलमान दो राष्ट्र के सिद्धांत पर भारत विभाजन और जनसंंख्या स्थानांतरण भारत में शरणार्थी समस्या का मौलिक कारण है।धर्म आधारित राष्ट्रीयता की यह विरासत भारत की नहीं है।यूरोप के धर्म युद्ध की राष्ट्रीयता है और फिलीस्तीन विवाद को लेकर यूरोप का यह धर्म युद्ध अरब मुसलमान दुनिया के खिलाफ आज भी जारी है और इसी धर्म युद्ध के रक्तबीज बनकर तमाम आतंकवादी धर्म राष्ट्रीयता के संगठन रो दुनिया को लहूलुहान कर रहे हैं।

    धर्म आतंकवाद का पर्याय बन गया है।

    रोहिंगा मुसलमानों की समस्या भी राजसत्ता के धर्म सत्ता में बदल जाने की कथा है जिसके तहत एक धारिमिक राष्ट्रीयता दूसरी धार्मिक राष्ट्रीयता का सफाया करने में लगी है।अखंड भारत और म्यांमार दोनों ब्रिटिश हुकूमत के उपनिवेश रहे हैं तो यह धर्म युद्ध भी उसी औपनिवेशिक गुलामी की विरासत है,जो भारत के 1947 में और म्यांमार के 1948 में आजाद होने के बावजूद लगातार मजबूत होती जा रही है।

    म्यांमार में करीब 8 लाख रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं और वे इस देश में सदियों से रहते आए हैं, लेकिन बर्मा के लोग और वहां की सरकार इन लोगों को अपना नागरिक नहीं मानती है। बिना किसी देश के इन रोहिंग्या लोगों को म्यांमार में भीषण दमन का सामना करना पड़ता है। बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग बांग्लादेश और थाईलैंड की सीमा पर स्थित शरणार्थी शिविरों में अमानवीय स्थितियों में रहने को मजबूर हैं।ऐसे जो रोहिंगा शरणार्थी भारत में हैं,म्यांमार से भारत के संबंध सुधरते जाने के बाद उन्हें अब भारत में रहने की इजाजत नहीं है और उन्हें खदेड़ने की तैयारी है।जबकि रोहिंगा मुसलमानों की राष्ट्रीयता की लड़ाई म्यांमार की आजादी से पहले से जारी है।अचानक म्यांमार में यह गृहयुद्ध शुरु नहीं हुआ है।बदला है तो भरतीय राजनय का दृष्टिकोण बदला है जो सीधे तौर पर म्यांमार की सैन्य सत्ता के साथ है।

    फिलीस्तीन पर कब्जा का धर्म युद्ध भी इसके पीछे है क्योंकि रोहिंग्या मुसलमानों के सफाया कार्यक्रम में इजराइल का भी सक्रिय समर्थन है।

    अश्वेतों,लातिन मेक्सिकान मूल के लोगों और भारतीयों के साथ मुसलमानों के खिलाफ श्वेत आतंकवादी नस्ली अमेरिकी राष्ट्रवाद और इजराइल के जायनी आतंकवाद से नाभिनाल संबंध है भारत में धर्मसत्ता की और बतौर राष्ट्र भारत अमेरिका और इजराइल का समर्थक है तो रोहिंगाविरोधी धर्मोन्मादी धूर्वीकरण का रसायनशास्त्र समझना उतना मुश्किल भी नहीं है।

    गौरतलब है कि 1937 से पहले ब्रिटिश ने अंग्रेजों ने बर्मा को भारत का राज्य घोषित किया था लेकिन फिर अंगरेज सरकार ने बर्मा को भारत से अलग करके उसे ब्रिटिश क्राउन कालोनी (उपनिवेश) बना दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने बर्मा के जापानियों द्वारा प्रशिक्षित बर्मा आजाद फौज के साथ मिल कर हमला किया। बर्मा पर जापान का कब्जा हो गया। बर्मा में सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिन्द फौज की वहां मौजूदगी का प्रभाव पड़ा। 1945 में आंग सन की एंटीफासिस्ट पीपल्स फ्रीडम लीग की मदद से ब्रिटेन ने बर्मा को जापान के कब्जे से मुक्त किया लेकिन 1947 में आंग सन और उनके 6 सदस्यीय अंतरिम सरकार को राजनीतिक विरोधियों ने आजादी से 6 महीने पहले उन की हत्या कर दी। आज आंग सन म्यांमार के 'राष्ट्रपिता' कहलाते हैं। आंग सन की सहयोगी यू नू की अगुआई में 4 जनवरी, 1948 में बर्मा को ब्रिटिश राज से आजादी मिली ।

    जिस नस्ली राष्ट्रवाद के राष्ट्रीयता सिद्धांत के तहत भारत का विभाजन हुआ, उसी के तहत सत्ता समीकरण के मुताबिक रोहिंगा मुसलमानों के सवाल पर देश भर में मुसलमानों के खिलाफ नस्ली घृणा अभियान  की राजनीति और राजनय के तहत यह धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण है जो ब्रिटिश हुक्मरान की गुलामी की विरासत है।

    गुलामवंश के शासन का पुनरूत्थान है यह।

    भारत में राजसत्ता इसी नस्ली  वर्चस्व के राष्ट्रवाद के कारण धर्मसत्ता में तब्दील है और यूरोप का मध्यकालीन बर्बर धर्मयुद्ध भारत के वर्तमान और भविष्य का सामाजिक यथार्थ बनने लगा है,जिसकी आशंका रवींदरनाथ को थी।नेशन की इस नस्ली वर्चस्व की भावना पर प्राचीनता आरोपित करने का कार्यभार जर्मन रोमानी राष्ट्रवाद के हाथों पूरा हुआ।

    गौरतलब है कि मुसोलिनी का नाजी राष्ट्रवाद भी धर्मसत्ता को मजबूत करने के हक में था तो अमेरिकी लोकतंत्र में भी उसी नस्ली धर्म सत्ता का बोलबाला है और नवनिर्वाचित अमेरिका राष्ट्रपति को कार्यभार संभालने से पहले गिरजाघर जाकर अपनी निष्ठा समर्पित करनी पड़ती है।

    मजे की बात यह है कि ये रोहिंगा मुसलमान मूलतः अखंड बंगाल के चटगांव से भारत में ब्रिटिश हुकूमत के मातहत अंग्रेजों के प्रोत्साहन से ही म्यांमार के अराकान प्रदेश में बड़ी संख्या में उसी तरह जा बसे थे जैसे म्यांमार के रंगून और दूसरे प्रांतों के साथ सिंगापुर में भी बड़ी संख्या में भारत के दूसरे प्रांतों से लोग आजीविका और रोजगार के लिए जाकर बसे थे।अराकान में वैसे बंगाली मध्ययुग से बसते रहे हैं और वहां दुनिया के दूसरे हिस्सों से मुसलमान जाते रहे हैं लेकिन उनकी जनसंख्या में सबसे ज्यादा बंगाली मूल के लोग हैं।

    यह शरणार्थी समस्या द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों के अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ कर देने से लगातार चली आ रही है। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था।

    जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली। उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया।

    मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं।

    बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ गयी है। वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी है जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों में भारी विरोधाभास है। इसी वजह से उनसे नोबेल पुरस्कार वापस करने की मांग भी की जा रही है।

    बांग्लादेश के युद्ध के दौरान करीब नब्वे लाख शरणार्थी भारत आये थे और उनमें बड़ी संख्या में मुसलमान भी थे। सत्तर के दशक के उन शरणार्थियों के मुकाबले बांग्लादेश में सबसे ज्यादा करीब पांच लाख रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थी हैे तो भारतभर में इनकी संख्या तिब्बत से आये बौद्ध और श्रीलंका से आने वाले तमिल शरणार्थियों की तुलना में कम हैं।

    बांग्लादेश के लिए रोहिंग्या शरणार्थी उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी समस्या जरुर हैं लेकिन भारत विभाजन के बाद सीमापार से लगातार आ रहे शरणार्थियों की समस्या से जूझने वाले भारत के लिए रोहिंग्या शरणार्थी संख्या के हिसाब से उतनी बड़ी समस्या है नहीं।उनकी नस्ल की वजह से यह समस्या बड़ी समस्या जरुर बन गयी  है।

    क्योंकि रोहिंगा शरणार्थियों को उऩकी राष्ट्रीयता आंदोलन की वजह से आतंकवाद और भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा बता रही है भारत की हिंदुत्ववादी सरकार और इन शरणार्थियों को खदेड़ने का ऐलान किया जा चुका है।

    भारतीय राजनय भी इस मामले में म्यांमार में रोहिंगा मुसलमानों के नरसंहार और मानवाधिकार हनन के मुद्दे को सिरे से नजरअंदाज करते हुए म्यांमार की सैनिक  जुंटा सरकार का साथ देने की नीति पर चल रही है।

    जैसे भारत में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का हिंदू धर्म से कुछ लेना देना नहीं है उसी तरह रोहिंगा मुसलमानों के खिलाफ सैन्य जुंटा सरकार के धर्मोन्मादी राजकाज की इस नरसंहारी संस्कृति से बौद्धधर्म का कुछ लेना देना नहीं है और न ही यह बौद्ध और इस्लाम धर्म के अनुयायियों के बीच कोई फिलीस्तीन युद्ध है।

    फिलीस्तीन के धर्मयुद्ध के वारिशान जो बाकी दुनिया के खिलाफ धर्मयुद्ध जारी रखे हुए हैं ,यह उनका ही धर्मयुद्ध है।ऐसा समझ सकें तो रोहिंगा पहेली बूझ सकेंगे।

    भारत में ऐसे धर्मयुद्ध का कोई इतिहास नहीं है,इसे पहले समझना जरुरी है।

    क्योंकि भारत में धर्म मनुष्यता के लिए हमेशा मुक्तिमार्ग रहा है।धर्म को नस्ली वर्चस्व का माध्यम अब पश्चिम के अनुकरण में बनाया जा रहा है।

    क्योंकि भारत में यूरोप की तरह धर्म की सत्ता नहीं रही है।धर्म को लेकर सारे विवाद अब धर्म की सत्ता कायम करने के कारपोरेट एजंडे से हो रहे हैं।

    भारत में ब्राह्मण धर्म और वैदिकी सभ्यता की वर्ण व्यवस्था के खिलाफ खिलाफ समानता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना के लिए विश्व में पहली रक्तहीन क्रांति का नेतृत्व महात्मा गौतम बुद्ध ने किया तो प्रतिक्रांति के तहत पुष्यमित्र शुंग ने मनुस्मृति अनुशासन लागू करते हुए वर्ण व्यवस्था को पहले से मजबूत करने के लिए भारतीय समाज को जाति व्यवस्था के तहत हजारों टुकड़ों में बांट डाला।फिरभी बौद्धमय भारत की विरासत खत्म नहीं हुई और आर्यावर्त के भूगोल से बाहर बंगाल में ग्यारहवीं शताब्दी तक बौद्धकाल जारी रहा तो दक्षिण भारत में राजसत्ता और दैवीसत्ता को एकाकार करते हुए भव्य मंदिरों में केंद्रित चोल और पल्लव राजाओं के भक्ति आंदोलन को बौद्ध श्रमणों और जैन धर्म के अनुयायियों ने मनुस्मृति व्यवस्था के खिलाफ बहुजन आंदोलन में तब्दील कर दिया।

    बंगाल,बिहार और ओडीशा में भी बड़े पैमाने पर जैन धर्म का प्रभाव रहा है।

    इस्लामी शासन के अंतर्गत उत्तर भारत में सूफी संत आंदोलन ने मनुस्मृति विरोधी सामंतवाद विरोधी दैवीसत्ता विरोधी और राजसत्ता विरोधी बहुजन आंदोलन को समूचे भारत में धर्म जाति नस्ल की विविध बहुल विभिन्न संस्कृतियों के विलय की प्रक्रिया में बदल दिया जौ ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत के दौरान औद्योगीकरण और शहरीकरण के साथ जाति तोड़ो आंदोलन में तब्दील हो गयी।

    आजादी के बाद वह जाति तोड़ो आंदोलन जाति मजबूत करो आंदोलन में बदल गया तो बहुजन आंदोलन का भी पटाक्षेप हो गया और जाति आधारित मनुसमृति व्यवस्था की बहाली के लिए धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी है और यही सुनामी म्यांमार में शुरु से चल रही है।जिसके शिकार रोहिंगा मुसलमान हैं।

    इसके विपरीत भारतीय इतिहास की प्रवाहमान धारा आर्य अनार्य द्रविड़ शक हुण कुषाण सभ्यताओं के एकीकरण के हजारों साल की भारतीय सभ्यता और संस्कृति है, जिसमें पठान और मुगल शासन काल में इस्लाम के सिद्धांतों का समावेश भी होता रहा जिसके तहत भारतीय जनमानस पर सूफी संत फकीर बाउल आंदोलन का इतना घना असर रहा है।इस इतिहास को बदलने के लिए धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी है।

    रवींद्रनाथ शासकों के इतिहास के बदले भारतीय जन गण की इस सभ्यता और संस्कृति में देश और समाज को देखते थे।इसीलिए पश्चिम के पूंजीवादी साम्राज्यवादी और फासिस्ट नाजी राष्ट्रों के राष्ट्रवाद का विरोध करते थे और हम इसके बारे में मनुष्यता के धर्म और सभ्यता के संकट के संदर्भ में उऩके विचारों की चर्चा पहले ही कर चुके हैं।रवींद्रनाथ मानते थे कि पश्चिम का राष्ट्रवाद पूंजीवाद के निजी हितों को साधने का नस्ली राष्ट्रवाद है और भारत में विषमता की सामाजिक समस्या, असमानता, अन्याय और अस्पृश्यता की सामाजिक संरचना के लिए नस्ली वर्चस्व के इस राष्ट्रवाद का वे विरोध लगातार करते रहे।

    अपने अंतिम निबंध में सभ्यता के संंकट  में भारत के भविष्य को लेकर वे इसीलिए चिंतित थे कि ब्रिटिश हुकूमत नस्ली राष्ट्रवादियों की सांप्रदायिक राजनीति के तहत राष्ट्रीयता के सिद्धांत के तहत भारत के विभाजन पर आमादा थे और सत्ता हस्तातंरण के बाद यूरोपीय राष्ट्रवाद की नकल के तहत भारत में नस्ली वर्चस्व के फासीवादी राष्ट्रवाद के दुष्परिणामों से वे भारत के भविष्य को लेकर चिंतित थे।हम इस पर चर्चा कर चुके हैं।

    भारत में दैवीसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ भक्ति आंदोलन,सूफी संत आंदोलन,आदिवासी किसान विद्रोह और बाउल फकीर सन्यासी आंदोलन,चंडाल और बहुजन आंदोलनों की चर्चा हमने रवींद्र रचनाधर्मिता के तहत की है ताकि पश्चिमी राष्ट्रवाद के मुकाबले भारतीय इतिहास,सभ्यता और संस्कृति की साझा विरासत की जमीन पर रवींद्र के दलित विमर्श की प्रासंगिकता निरंकुश नस्ली वर्चस्व के फासीवादी राष्ट्रवाद की नरसंहारी संस्कृति के प्रतिरोध के सिलसिले में हम समझ सकें।

    पश्चिम के इस राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि में धर्मयुद्धों का इतिहास है तो संस्कृतियों के युद्धों की निरतंरता है।पश्चिम का यह राष्ट्रवाद नस्ली वर्चस्व का राष्ट्रवाद है जिसका विकास धर्मयुद्धों के दौरान धरमोन्मादी नस्ली वर्चस्व की दैवी सत्ता और राजसत्ता के पूंजीवादी तंत्र में बदलते जाने में हुआ जिसकी परिणति फासीवाद और साम्राज्यवाद में हुई।दक्षिण एशिया के भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास धर्मयुद्धों का इतिहास नहीं है और न यहां उस तरह के नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद का इतिहास कभी रहा है।

    राष्ट्रीयता के सिद्धांत के जरिये भारत विभाजन के साथ भारत में नस्ली वर्चस्व के लिए पश्चिम के पूंजीवादी राष्ट्रवाद का आयात हुआ।भारत में भी संविधान के संघीय ढांचा को तोड़ते हुए पूजीवादी कारपोरेटएजंडे के तहत  एक निरंकुश  सर्वसत्तावादी सैन्य राष्ट्र  का उदय हुआ जो सम्प्रभुता, केंद्रीकृत शासन और स्थिर भू-क्षेत्रीय सीमाओं के लक्षणों से सम्पन्न है। पश्चिम में धर्मयुद्धों के नतीजतन बने पश्चिमी राष्ट्रों की नकल के तहत दुनियाभर में आज के आधुनिक राज्य में भी यही ख़ूबियां हैं।इसीलिए पूरी दुनिया नस्ली  फासिज्म के शिकंजे में है और दुनियाभर की आधी मनुष्यता धर्मोन्मादी राष्ट्रवादी आतंकवाद,पूजीवाद और साम्राज्यवाद के युद्धों गृहयुद्धों के कारण शरणार्थी है।

    रोहिंग्या की पहचान को लेकर भी साफ समझ की कमी इतिहास के घालमेल की वजह से है।आखिर  रोहिंग्या शब्द कहां से निकला?

    इस बारे में रोहिंग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ीयां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाती है।

    इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिंग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका आशय वे पूर्वी बंगाल औऱ खास तौर पर चटगांव के  बंगाली मुसलमान हैं जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए।

    राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं।

    उनका यह दावा गलत है।रोहिंग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद है। बर्मा में अरब मुसलमानों के घुसने और रहने पर सभी सहमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं जबकि रोहिंग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है।

    कॉमन ईरा (सीई) के वर्ष 1400 के आसपास ये लोग ऐसे पहले मुसलमान  हैं जो कि बर्मा के अराकान प्रांत में आकर बस गए थे। इनमें से बहुत से लोग 1430 में अराकान पर शासन करने वाले बौद्ध राजा नारामीखला (बर्मीज में मिन सा मुन) के राज दरबार में नौकर थे। इस राजा ने मुस्लिम सलाहकारों और दरबारियों को अपनी राजधानी में प्रश्रय दिया था।

    अराकान म्यांमार की पश्चिमी सीमा पर है और यह आज के बांग्लादेश (जो कि पूर्व में बंगाल का एक हिस्सा था) की सीमा के पास है। इस समय के बाद अराकान के राजाओं ने खुद को मुगल शासकों की तरह समझना शुरू किया। ये लोग अपनी सेना में मुस्लिम पदवियों का उपयोग करते थे। इनके दरबार के अधिकारियों ने नाम भी मुस्लिम शासकों के दरबारों की तर्ज पर रखे गए।

    वर्ष 1785 में बर्मा के बौद्ध लोगों ने देश के दक्षिणी हिस्से अराकान पर कब्जा कर लिया। तब उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों को या तो इलाके से बाहर खदेड़ दिया या फिर उनकी हत्या कर दी। इस अवधि में अराकान के करीब 35 हजार लोग बंगाल भाग गए जो कि तब अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र में था। वर्ष 1824 से लेकर 1826 तक चले एंग्लो-बर्मीज युद्ध के बाद 1826 में अराकान अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया।

    तब अंग्रेजों ने बंगाल के स्थानीय बंगालियों को प्रोत्साहित किया कि वे अराकान ने जनसंख्या रहित क्षेत्र में जाकर बस जाएं। रोहिंग्या मूल के मुस्लिमों और बंगालियों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अराकान (राखिन) में बसें। ब्रिटिश भारत से बड़ी संख्या में इन प्रवासियों को लेकर स्थानीय बौद्ध राखिन लोगों में विद्वेष की भावना पनपी और तभी से जातीय तनाव पनपा जो कि अभी तक चल रहा है।

    बर्मा में ब्रिटिश शासन स्थापना की तीन अवस्थाएँ हैं। सन्‌ 1826 ई. में प्रथम बर्मायुद्ध में अँग्रेजों ने आराकान तथा टेनैसरिम पर अधिकार प्राप्त किया। सन्‌ 1852 ई. में दूसरे युद्ध के फलस्वरूप वर्मा का दक्षिणी भाग इनके अधीन हो गया तथा 1886 ई. में संपूर्ण बर्मा पर इनका अधिकार हो गया और इसे ब्रिटिश भारतीय शासनांतर्गत रखा गया।

    बहरहाल अराकान में बंगाली मुसलमानों के बसने के प्रथम प्रमाण पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के चौथे दशक से मिलते हैं।

    द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा पर जापान के क़ब्ज़े के बाद आराकान में बौद्धमत के अनुयाई रख़ाइन और रोहिंग्या मुसलमानों के मध्य रक्तरंजित झड़पें हुईं। रख़ाइन की जनता जापानियों की सहायता कर रही थी और रोहिंग्या अंग्रेज़ों के समर्थक थे इसीलिए जापान ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर जम कर अत्याचार किया।

    बर्मा 4 जनवरी 1948 को ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल से मुक्त हुआ और वहाँ 1962 तक लोकतान्त्रिक सरकारें निर्वाचित होती रहीं। 2 मार्च, 1962 को जनरल ने विन के नेतृत्व में सेना ने तख्तापलट करते हुए सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और यह कब्ज़ा तबसे आजतक चला आ रहा है। 1988 तक वहाँ एकदलीय प्रणाली थी और सैनिक अधिकारी बारी-बारी से सत्ता-प्रमुख बनते रहे। सेना-समर्थित दल बर्मा सोशलिस्ट प्रोग्राम पार्टी के वर्चस्व को धक्का 1988 में लगा जब एक सेना अधिकारी सॉ मॉंग ने बड़े पैमाने पर चल रहे जनांदोलन के दौरान सत्ता को हथियाते हुए एक नए सैन्य परिषद् का गठन कर दिया जिसके नेतृत्व में आन्दोलन को बेरहमी से कुचला गया। अगले वर्ष इस परिषद् ने बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया।

    ब्रिटिश शासन के दौरान बर्मा दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे धनी देशों में से था। विश्व का सबसे बड़ा चावल-निर्यातक होने के साथ शाल (टीक) सहित कई तरह की लकड़ियों का भी बड़ा उत्पादक था। वहाँ के खदानों से टिन, चांदी, टंगस्टन, सीसा, तेल आदि प्रचुर मात्रा में निकले जाते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध में खदानों को जापानियों के कब्ज़े में जाने से रोकने के लिए अंग्रेजों ने भारी मात्र में बमबारी कर उन्हें नष्ट कर दिया था। स्वतंत्रता के बाद दिशाहीन समाजवादी नीतियों ने जल्दी ही बर्मा की अर्थ-व्यवस्था को कमज़ोर कर दिया और सैनिक सत्ता के दमन और लूट ने बर्मा को आज दुनिया के सबसे गरीब देशों की कतार में ला खड़ा किया है।

    दूसरे द्वितीव विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण पूर्व एशिया में जापान के बढ़ते दबदबे से आतंकित अंग्रेजों ने अराकान छोड़ दिया और उनके हटते ही मुस्लिमों और बौद्ध लोगों में एक दूसरे का कत्ले आम करने की प्रतियोगिता शुरू हो गई। इस दौर में बहुत से रोहिंग्या मुस्लिमों को उम्मीद थी कि वे ‍अंग्रेजों से सुरक्षा और संरक्षण पा सकते हैं। इस कारण से इन लोगों ने एलाइड ताकतों के लिए जापानी सैनिकों की जासूसी की। जब जापानियों को यह बात पता लगी तो उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ यातनाएं देने, हत्याएं और बलात्कार करने का कार्यक्रम शुरू किया। इससे डर कर अराकान से लाखों रोहिंग्या मुस्लिम फिर एक बार बंगाल भाग गए।

    द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति और 1962 में जनरल नेविन के नेतृत्व में तख्तापलट की कार्रवाई के दौर में रोहिंग्या मुस्लिमों ने अराकान में एक अलग रोहिंग्या देश बनाने की मांग रखी, लेकिन तत्कालीन बर्मी सेना के शासन ने यांगून (पूर्व का रंगून) पर कब्जा करते ही अलगाववादी और गैर राजनीतिक दोनों ही प्रकार के रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। सैनिक शासन ने रोहिंग्या लोगों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया और इन्हें बिना देश वाला (स्टेट लैस) बंगाली घोषित कर दिया।

    तब से स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्टों में कहा गया है कि रोहिंग्या दुनिया के ऐसे अल्पसंख्यक लोग हैं, जिनका लगातार सबसे अधिक दमन किया गया है। बर्मा के सैनिक शासकों ने 1982 के नागरिकता कानून के आधार पर उनसे नागरिकों के सारे अधिकार छीन लिए हैं। ये लोग सुन्नी इस्लाम को मानते हैं और बर्मा में इन पर सरकारी प्रतिबंधों के कारण ये पढ़-लिख भी नहीं पाते हैं तथा केवल बुनियादी इस्लामी तालीम हासिल कर पाते हैं।

    बर्मा के शासकों और सैन्य सत्ता ने इनका कई बार नरसंहार किया, इनकी बस्तियों को जलाया गया, इनकी जमीन को हड़प लिया गया, मस्जिदों को बर्बाद कर दिया गया और इन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया गया। ऐसी स्थिति में ये बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, थाईलैंड की सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसते हैं या फिर सीमा पर ही शिविर लगाकर बने रहते हैं। 1991-92 में दमन के दौर में करीब ढाई लाख रोहिंग्या बांग्लादेश भाग गए थे। इससे पहले इनको सेना ने बंधुआ मजदूर बनाकर रखा, लोगों की हत्याएं भी की गईं, यातनाएं दी गईं और बड़ी संख्या में