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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    उमेश डोभाल स्मृति रजत जयंती समारोह 

    पौड़ी गढ़वाल/25 मार्च, 2015 

    'बदलते परिवेश में जन प्रतिरोध्विषय पर

    'समकालीन तीसरी दुनिया' के सम्पादक 

    आनंद स्वरूप वर्मा के भाषण का संक्षिप्त रूप 

     

    ...उमेश डोभाल की याद में आयोजित इस समारोह में आने का अवसर पा कर मैं काफी गर्व का अनुभव कर रहा हूं। बहुत दिनों से पौड़ी आने की इच्छा थी। 1980 में जब मैंने समकालीन तीसरी दुनिया का प्रकाशन शुरू किया था उस समय से ही यहां राजेन्द्र रावत राजू से मेरी मित्रता शुरू हुई जो काफी समय तक बनी रही। उनके निधन के बाद यह जगह मेरे लिए अपरिचित सी हो गयी और फिर धीरे-धीरे यहां से संबंध् कमजोर पड़ता चला गया। आज उमेश डोभाल की कर्मभूमि में आने का जो अवसर प्राप्त हुआ उसका लाभ उठाते हुए मैं कुछ बातें आपके साथ साझा करना चाहता हूं। 

     

    उमेश डोभाल की हत्या के बाद कई महीनों तक यह मामला राष्ट्रीय चर्चा का विषय नहीं बन सका था। फिर जून 1988 में एक दिन मेरे पत्रकार मित्र राजेश जोशी ने जो उन दिनों जनसत्ता में थे इस घटना के बारे में जानकारी दी और बताया कि किस तरह 25 मार्च से ही उमेश लापता हैं और संदेह है कि शराब माफिया ने उनकी हत्या कर दी लेकिन प्रशासन बिल्कुल इस घटना से बेपरवाह है। फिर हम लोगों ने जून 1988 को तीसरी दुनिया अध्ययन केन्द्र की ओर से एक अपील जारी की जिसकी एक प्रति यहां मेरे पास है और फिर एक कमेटी बनाकर उमेश डोभाल की हत्या के सवाल को उजागर किया गया। धीरे-धीरे यह आंदोलन का रूप लेता गया और बाद में तो आपको पता है कि यह कितना बड़ा आंदोलन हो गया जिसने न केवल तत्कालीन उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र में बल्कि पूरे देश में एक हलचल मचा दी। यहां यह भी मैं बताना चाहूंगा कि उमेश डोभाल की हत्या के पीछे मनमोहन सिंह नेगी उर्फ मन्नू नामक कुख्यात शराब माफिया का इतना आतंक था कि दिल्ली तक में उत्तराखंड का कोई पत्रकार इस मामले में पहल लेने के लिए तैयार नहीं था। नतीजतन जो समिति बनी उसका संयोजक मुझे बनाया गया। धरनाप्रदर्शनोंजुलूसों आदि का सिलसिला शुरू हुआ जो तेज होता गया और पत्रकारों के अलावा विभिन्न तबकों के बीच इस प्रसंग पर चर्चा होने लगी। बहरहाल इस अवसर पर 27 वर्ष पूर्व की सारी घटनाएं मुझे याद आ गयीं जिसे मैंने आपसे शेयर किया।

     

    अब आज के विषय पर चर्चा की जाय। आज का विषय है 'बदलते परिवेश में जनप्रतिरोध्'। हमें जानना है कि परिवेश में किस तरह का बदलाव आया है और जनप्रतिरोध् ने कौन से रूप अख्तियार किए हैं। पिछले सत्र में उमेश डोभाल के बड़े भाई साहब ने एक बात कही थी कि जिन परिस्थितियों में उमेश डोभाल जनता के पक्ष में पत्रकारिता कर रहे थे वे परिस्थितियां आज और भी ज्यादा तीव्र और खतरनाक हो गयी हैं इसलिए आज पत्रकारों को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा शिद्दत के साथ काम करने की जरूरत है। मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूं और इसी संदर्भ में बदली हुई परिस्थितियों पर बहुत संक्षेप में कुछ कहना चाहूंगा। 1990 के बाद से वैश्वीकरण का जो दौर शुरू हुआ उसकी वजह से हमारा समूचा शासनतंत्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के कब्जे में आ गया। सत्ता पर उनका नियंत्रण मजबूत होता चला गया। यह सिलसिला नरसिंह राव की सरकार से शुरू हुआ और अटल बिहारी वाजपेयीमनमोहन सिंह की सरकार से लेकर नरेन्द्र मोदी की सरकार आते-आते काफी खतरनाक रूप ले चुका है। इसी संदर्भ में मैं विश्व बैंक द्वारा जारी उस दस्तावेज का जिक्र करना चाहूंगा जिसका शीर्षक था 'रीडिफाइनिंग दि रोल ऑफ स्टेटअर्थात राज्य की भूमिका को पुनर्परिभाषित करना। इस दस्तावेज को नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ स्तिगलीज ने तैयार किया था जो उन दिनों विश्व बैंक के उपाध्यक्ष थे और वैश्वीकरण के प्रबल समर्थक थे। बाद में स्तिगलीज वैश्वीकरण के जबर्दस्त विरोधी हो गए और उन्होंने वैश्वीकरण की खामियों को लेकर कुछ बहुत अच्छी चर्चित पुस्तकें लिखीं। इस दस्तावेज को सारी दुनिया के पूंजीवादपरस्तों ने और खास तौर पर तीसरी दुनिया अर्थात एशिया,फ्रीका और लातिन अमेरिका के देशों के शासकों ने बाइबिल की तरह अपना लिया। इस दस्तावेज में इन देशों की सरकारों को सलाह दी गयी थी कि वे कल्याणकारी कार्यों से अपना हाथ खींच लें और इन सारे कामों को निजी कंपनियों को सौंप दें। इसमें यह भी कहा गया था कि यह जिम्मेदारी सौंपने के बाद सरकार एक 'फेसिलिटेटरअर्थात सहजकर्ता की भूमिका निभाए। इसका अर्थ यह हुआ कि शिक्षास्वास्थ्यपेयजलपरिवहन आदि की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंप दी जाए। अब इसके निहितार्थ पर गौर करें। 1947 के बाद से हम एक कल्याणकारी राज्य की कल्पना कर रहे थे और हमें उम्मीद थी कि क्रमशः हम उस दिशा में बढ़ते जाएंगे। अगर जन कल्याणकारी कामों की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंप दी जाती है तो ये कंपनियां इन कामों को फायदे और नुकसान के तराजू पर तौलकर ही आगे बढ़ेंगी जबकि इन क्षेत्रों में नुकसान और फायदे के अर्थ में नहीं सोचा जाना चाहिए। इस नीति पर काम करते हुए 1998 में प्रधनमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 'पी.एम. कौंसिल ऑन ट्रेड ऐंड इंडस्ट्रीजका गठन किया और देश के प्रमुख उद्योगपतियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी। मसलन शिक्षा की जिम्मेदारी मुकेश अंबानी कोस्वास्थ्य की जिम्मेदारी राहुल बजाज को और इसी तरह विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी अलग-अलग उद्योगपतियों को सौंप दी गयी। अब इसके निहितार्थों पर गौर करें। अगर ऐसा हो जाता है तो जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की न तो कोई जरूरत रहेगी और न इन प्रतिनिधियों की संस्थाओं अर्थात विधानमंडलों और संसद की कोई प्रासंगिकता रह जाएगी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने सभी मंत्रालयों को यह निर्देश भेजा कि पी.एम. कौंसिल ऑन ट्रेड ऐंड इंडस्ट्रीज को एपेक्स बॉडी माना जाए और इन पंूजीपतियों को मंत्रालय की वे सभी फाइलें उपलब्ध् करायी जाएं जो वे चाहते हैं। मजे की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना को किसी अखबार ने अपने यहां प्रकाशित करने की जरूरत नहीं महसूस की। केवल 'हिन्दूनामक अंग्रेजी अखबार में एक छोटी सी खबर प्रकाशित हुई थी। बाद में कुछ उत्साही पत्रकारों ने अपनी पहल से इसे प्रचारित किया और जब यह खबर काफी चर्चा में आ गयी तो इस योजना को बैक बर्नर पर डाल दिया गया। मेरा मानना है कि यह सारा काम छुपे तौर पर होने लगा जो आज पूरी तरह उजागर हो चुका है। आपने खुद महसूस किया होगा कि छत्तीसगढ़ हो या झारखंड या उड़ीसा-इन सारे क्षेत्रों में किस तरह बड़े कार्पोरेट घराने जलजंगल और जमीन की लूट में लगे हुए हैं। किस तरह वेदांता ने उड़ीसा में नियामगिरि की पहाड़ियों को बॉक्साइट के लिए खोद डाला और पर्यावरण का सत्यानाश कर दिया। किस तरह छत्तीसगढ़ में जनता के शांतिपूर्ण प्रतिरोध् का दमन करते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कच्चे लोहे की तलाश में गांव के गांव उजाड़ दिए और लोगों को तबाही के कगार में झोकने के साथ ही समूचे इलाके को हिंसा की चपेट में डाल दिया। 

    मैं जोर देकर यह कहना चाहता हूं कि अगर जनतांत्रिक आंदोलनों का दायरा सिकुड़ता जाएगा तो इससे हिंसा का रास्ता तैयार होगा। यह बात देश-विदेश के सभी समाज वैज्ञानिक कहते रहे हैं। अगर आप प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक हेराल्ड लॉस्की के प्रसिद्ध ग्रंथ 'ग्रामर ऑफ पॉलिटिक्सको पढें तो पता चलता है कि क्यों उन्होंने सरकारों को सलाह दी थी कि कभी भी न तो खुले संगठनों पर पाबंदी लगाओ और न कल्याणकारी कार्यों को राज्य के दायरे से बाहर रखो। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा किया तो पूरा समाज हिंसा और विद्रोह की चपेट में आ जाएगा और तुम कुछ नहीं कर सकोगे। जिन इलाकों का मैंने जिक्र किया है वे आज हिंसा की चपेट में हैं और यह स्थिति सरकार की कॉरपोरेटपरस्त नीतियों की वजह से तैयार हुई है। यह बात केवल मैं नहीं कह रहा हूं-सरकारी दस्तावेज मेरे इस कथन की पुष्टि करते हैं। यहा मैं 2008 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी उस रिपोर्ट का जिक्र करना चाहूंगा जिसका शीर्षक है 'कमेटी ऑन स्टेट एग्रेरियन रिलेशंस ऐंड अनफिनिश्ड टॉस्क ऑफ लैंड रिफार्म्स'। इसकी अध्यक्षता केन्द्रीय ग्राम विकास मंत्री ने की।  15 सदस्यों वाली इस समिति में अनेक राज्यों के सचिव और विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान तथा कुछ अवकाशप्राप्त प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर कितने बड़े पैमाने पर उपजाऊ जमीन और वन क्षेत्र को उद्योगपतियों को दिया गया। 

    मैं इस रिपोर्ट के एक अंश को पढ़कर सुनाना चाहूंगा-'आदिवासियों की जमीन हड़पने की कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी कार्रवाईउपशीर्षक के अंतर्गत भारत सरकार की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि- 

    ''छत्तीसगढ़ के तीन दक्षिणी जिलों बस्तरदांतेवाड़ा और बीजापुर में गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। यहां एक तरफ तो आदिवासी पुरुषों और महिलाओं के हथियारबंद दस्ते हैं जो पहले पीपुल्स वॉर ग्रुप में थे और अब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के साथ जुड़े हैं तथा दूसरी तरफ सरकार द्वारा प्रोत्साहित सलवा जुडुम के हथियारबंद आदिवासी लड़ाकू हैं जिनको आधुनिक हथियारों और केंद्रीय पुलिस बल के तमाम संगठनों का समर्थन प्राप्त है। यहां जमीन हड़पने की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई चल रही है और जो पटकथा तैयार की गयी है वह अगर इसी तरह आगे बढ़ती रही तो यह युद्ध लंबे समय तक जारी रहेगा। इस पटकथा को तैयार किया है टाटा स्टील और एस्सार स्टील ने जो सात गांवों पर और आसपास के इलाकों पर कब्जा करना चाहते थे ताकि भारत के समृद्धतम लौह भंडार का खनन कर सकें। 

    ''शुरू में जमीन अधिग्रहण और विस्थापन का आदिवासियों ने प्रतिरोध् किया। प्रतिरोध् इतना तीव्र था कि राज्य को अपनी योजना से हाथ खींचना पड़ा... सलवा जुडुम के साथ नये सिरे से काम शुरू हुआ। अजीब विडंबना है कि कांग्रेसी विधायक और सदन में विपक्ष के नेता महेंद्र कर्मा ने इसकी शुरुआत की लेकिन भाजपा शासित सरकार से इसे भरपूर समर्थन मिला... इस अभियान के पीछे व्यापारीठेकेदार और खानों की खुदाई के कारोबार में लगे लेाग हैं जो अपनी इस रणनीति के सफल नतीजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सलवा जुडुम शुरू करने के लिए पैसे मुहैया करने का काम टाटा और एस्सार ग्रुप ने किया क्योंकि वे 'शांतिकी तलाश में थे। सलवा जुडुम का पहला प्रहार मुड़िया लेागों पर हुआ जो अभी भी भाकपा (माओवादीद्) के प्रति निष्ठावान हैं। यह भाई भाई के बीच खुला युद्ध बन गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 640 गांव खाली करा दिये गयेइन गांवों के मकानों को ढाह दिया गया और बंदूक की नोक पर तथा राज्य के अशीर्वाद से लोगों को इलाके से बेदखल कर दिया गया। साढ़े तीन लाख आदिवासीजो दांतेवाड़ा जिले की आधी आबादी के बराबर हैंविस्थापित हुएउनकी औरतें बलात्कार की शिकार हुईंउनकी बेटियां मारी गयीं और उनके युवकों को विकलांग बना दिया गया। जो भागकर जंगल तक नहीं जा पाये उन्हें झुंड के झुंड में विस्थापितों के लिए बने शिविरों में डाल दिया गया जिसका संचालन सलवा जुडुम द्वारा किया जाता है। जो बच रहे वे छुपते छुपाते जंगलों में भाग गये या उन्होंने पड़ोस के महाराष्ट्रआंध्र प्रदेश और उड़ीसा में जाकर शरण ली। 

    ''640 गांव खाली हो चुके हैं। हजारों लाखों टन लोहे के ऊपर बैठे इन गांवों से लोगों को भगा दिया गया है और अब ये गांव सबसे ऊँची बोली बोलने वाले के लिए तैयार बैठे हैं। ताजा जानकारी के अुनसार टाटा स्टील और एस्सार स्टील दोनों इस इलाके पर कब्जा करना चाहते हैं ताकि वहां की खानें इनके पास आ जायं।'' (पृ. 160-161) 

    यह रिपोर्ट अभी भी इंटरनेट पर उपलब्ध् है जिसे आप देख सकते हैं।

     

    सरकारें अपने स्वार्थ के लिए किस तरह जनतांत्रिक आंदोलनों के दायरे को खत्म करती जा रही हैं इसका उदाहरण देते हुए मैं आपके सामने कुछ तथ्य रखना चाहूंगा। मैं आपको 1998 की याद दिलाऊंगा जब गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी थे। उस वर्ष हैदराबाद में आडवाणी ने नक्सलवाद प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और पुलिस महानिरीक्षकों की अलग-अलग बैठकें बुलाईं। इन बैठकों में चार राज्य-आंध्र प्रदेशमध्य प्रदेशउड़ीसा और महाराष्ट्र शामिल थे। सितंबर 2005 में इसी विषय पर तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने एक बैठक बुलायी जिसमें 13 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित किया गया था। फिर जनवरी 2006 में पाटिल ने एक और बैठक बुलायी और इस बार 15 राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल थे। अखबारों में छपी खबरों के अनुसार बैठक के दौरान लंच के समय तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने बाहर कुछ पत्रकारों से कहा कि उनके राज्य में नक्सलवाद या माओवाद बिल्कुल नहीं है फिर भी उन्हें बुला लिया गया। अब जरा आंकड़ों पर विचार करें।

    1998 में नक्सलवाद प्रभावित राज्यों की संख्या सरकारी आंकड़े के अनुसार चार थी जो 2006 आते-आते 15 हो गयी थी। देश के अंदर कुल 28-29 राज्य हैं। अब इनमें अगर 15 को नक्सलवाद प्रभावित मान लिया जाए तो क्या स्थिति दिखायी देती है। उत्तर पूर्व के सात राज्य पहले से ही अशांत घोषित हैं जहां 1958 से ही आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर्स ऐक्ट लगाकर शासन किया जा रहा है। कश्मीर स्थायी तौर पर अशांत रहता है तो ऐसी स्थिति में क्या यह माना जाय कि 28 में से 23 राज्य ऐसे हैं जहां शासन करना सरकार के लिए मुश्किल है?

    ऐसा है नहीं। दरअसल यह सारा कुछ माओवाद का हौवा खड़ा करना था जिसका मकसद यह था कि जब इन इलाकों में बाजार की ताकतें प्रवेश करेंगी और इनके खिलाफ प्रतिरोध् शुरू होगा तो उसका दमन करने के लिए पहले से ही एक वातावरण तैयार किया जाए। अपने दमन को न्यायोचित ठहराने और बाजार की ताकतों को मदद पहुंचाने के लिए सरकार ने यह माहौल तैयार किया। वह झूठे आंकड़े प्रचारित करती रही। 

    ऊपर जिन बैठकों की चर्चा की गयी है उसी में गृहमंत्री ने केन्द्र सरकार की इस नीति का खुलासा किया कि जिन राज्यों में नक्सलवाद या माओवाद विकसित हो रहा है उन्हें केन्द्र से इस बात के लिए विशेष पैकेज दिया जाएगा ताकि वे अपने यहां उग्रवाद का मुकाबला कर सकंे। 21 दिसंबर 2007 को विभिन्न अखबारों के नैनीताल संस्करण में एक खबर प्रकाशित हुई कि उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी ने केन्द्र सरकार से राज्य की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को उन्नत करने के लिए 208 करोड़ की मांग की है। खंडूरी का कहना था कि राज्य में माओवाद का खतरा बढ़ गया है क्योंकि पड़ोस में नेपाल है और वहां से माओवादी इनके इलाके में घुसपैठ करते हैं। उसी दिन के अमर उजाला के नैनीताल संस्करण में यह खबर छपी कि हंसपुर खत्ता और चौखुटिया के जंगलों में कुछ सशस्त्र लोग घूमते हुए दिखायी दिए जिनके माओवादी होने का संदेह है। फिर 24 दिसंबर को इन्हीं अखबारों ने प्रकाशित किया कि प्रशांत राही नामक जोनल कमांडर को हंसपुर खत्ता के जंगलों से उस समय गिरफ्रतार किया गया जब वह अपने पांच साथियों के साथ मीटिंग कर रहे थे। इसके बाद उत्तराखंड में एक के बाद सात आठ लोगों की गिरफ्रतारी हुई और उन्हें माओवादी बताकर जेल में डाल दिया गया। यह अलग बात है कि बाद में अदालत ने उन सभी को सबूत के अभाव में रिहा कर दिया लेकिन तब तक वे लोग सात वर्ष जेल में बिता चुके थे। आज इतने वर्षों बाद भी अभी तक ऐसी कोई खबर नहीं मिली है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि उत्तराखंड में माओवादी हिंसा का कोई प्रभाव दिखाई देता है। दरअसल सभी गिरफ्तार युवक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता थे जो निश्चित तौर पर कम्युनिस्ट विचारों से प्रेरित थे लेकिन जिनका संघर्ष संवैधानिक दायरे के अंदर ही था। 

    उन्हीं दिनों हमलोग एक फैक्ट फाइडिंग टीम लेकर उत्तराखंड आए थे। उस टीम में मेरे अलावा गौतम नवलखापंकज बिष्टराजेन्द्र धस्मानाभूपेन आदि कुछ साथी थे और हमने उस समय यहां के एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुलिस अधिकारी से जिनका उपनाम गणपति था भेंट की और जानना चाहा कि किस आधार पर इन सारे लोगों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया है। उस अधिकारी ने हमें बताया कि खुफिया सूत्रों से सरकार को जानकारी मिली थी कि राज्य में माओवादी गतिविधियां शुरू हो रही हैं। हमने जब उनसे कहा कि हमें तो कहीं भी इस तरह की गतिविधियाँ नहीं दिखायी दी तो उनका जवाब था कि 'आपको इसलिए नहीं दिखायी दीं क्योंकि हमने उन्हें पहले ही पकड़ लिया 'ऐंड वी निप्पड इट इन दि बडमतलब यह कि बिना किसी प्रमाण के इस आशंका के आधार पर कि राजनीतिक तौर पर जनता के पक्ष में सक्रिय ये लोग आने वाले दिनों में माओवादी हो सकते हैंउन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में डाल दिया गया। 

    तो ऐसी स्थिति है। मीडिया भी दुर्भाग्यवश पुलिस विभाग का स्टेनो बन गया है। विभाग जो बयान देता है या जो सर्कुलर जारी करता है उसके आधार पर वे अपनी रिपोर्ट तैयार करते हैं और किसी तरह की खोजबीन की जहमत नहीं उठाते। उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि प्रशांत राही देहरादून में अपने घर के सामने गिरफ्तार किए गए या हंसपुर खत्ता के जंगल में जैसा कि पुलिस बता रही है। बहरहाल ये कुछ ऐसी बातें हैं जिनपर हमें बड़ी संजीदगी से विचार करना है और इनका ताल्लुक सीधे-सीधे जनतंत्र से है। मैं एक कम्युनिस्ट हूं लेकिन अपने कम्युनिस्ट मित्रों से कहता हूं कि देश के मौजूदा हालात को देखते हुए वे अभी क्रांति और कम्युनिज्म के एजेंडा को कुछ समय के लिए दरकिनार करते हुए जनतंत्र को बचाने के एजेंडा पर सक्रिय हो जाएं। ऐसा मैं इसलिए कहता हूं कि हमारे देश में आज जनतंत्र पर ही खतरा मंडरा रहा है जो मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद और भी ज्यादा खतरनाक रूप ले चुका है। हमें इस पर बहुत गंभीरता से सोचने की जरूरत है क्योंकि अगर जनतंत्र ही नहीं रहेगा तो समाजवाद या साम्यवाद की भी कल्पना नहीं की जा सकती। 

    अब मैं थोड़ा बौद्धिक कर्म और बुद्धिजीवियों की भूमिका की चर्चा करना चाहूंगा। यह एक अजीब सी बात है कि हमारी पूरी सोच यूरो सेंट्रिक या अमेरिका सेंट्रिक है। आप खुद देखिए कि अखबारों से आपको यूरोप और अमेरिका के बारे में तो काफी कुछ जानकारी मिल जाती है लेकिन भूटानमालदीव,बांग्लादेश या अगल-बगल के देशों की घटनाओं की कोई जानकारी नहीं मिलती। वैसे भी मीडिया का लगातार ह्रास होता गया है। अब से 30 साल पहले कम पन्नों के अखबार निकलते थेएक या दो संस्करण निकलते थे लेकिन किसी न किसी रूप में पूरे देश या कम से कम पूरे प्रदेश की जानकारी मिल जाती थी। लेकिन आज 30-30 पेज के अखबार निकलते हैंउनके बीसियों संस्करण निकलते हैं लेकिन पौड़ी की खबर श्रीनगर को नहीं या देहरादून की खबर मसूरी के लोगों को नहीं मिलती जबकि ये इलाके एक-दूसरे से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर हैं। अब खबरें स्थानीय पृष्ठों तक सिमट कर रह गयी हैं। मैं इसे मीडिया का विकास कैसे कहूं जब सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में लोग लगातार एक-दूसरे से कटते जा रहे हों। दरअसल हमने प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के विकास को मीडिया का विकास समझने की भूल की। मीडिया आज मिस-इन्फॉरमेशन और डिस-इन्फॉरमेशन फैलाने में लगा है। सत्ता ने सूचना को या कहें कि खबरों को एक हथियार बना लिया है-जनता को गलत सूचनाएं देना। इस हथियार का मुकाबला हमें इसी हथियार से करना होगा अर्थात जनता को ज्यादा से ज्यादा सही सूचनाएं पहुंचाना। मैंने तीसरी दुनिया के माध्यम से इसी काम को लगातार आगे बढ़ाया है। हमें नए-नए तरीके विकसित करने होंगे ताकि जनता को सही जानकारियों से लैस कर सकें। अगर हम लोगों को जागरूक बना सकें तो सामाजिक बदलाव में लगी शक्तियां खुद-ब-खुद उनका सही इस्तेमाल कर लेंगी। 

    मैं बौद्धिक कर्म की बात कर रहा था। दुनिया के कुछ देशों में ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं जहां बुद्धिजीवियों ने पहल की और उनके सांस्कृतिक संगठनों ने आगे चलकर एक ऐसे राजनीतिक संगठन का रूप लिया जिसने सशस्त्र संघर्ष के जरिए अपने देश से विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंका। मैं यहां अफ्रीका के तीन देशों का जिक्र करना चाहूंगा जो पुर्तगाली उपनिवेश थे और जहां संस्कृतिकर्मियों ने मुक्ति आंदोलनों की शुरुआत की। ये देश हैं-अंगोला,मोजाम्बीक और गिनी बिसाऊ। अंगोला में युवा कवि अगोस्तिनो नेतोमोजाम्बीक में एडुवार्डों मोण्डालेन और गिनी बिसाऊ में अमिल्कर कबराल नामक बुद्धिजीवियों ने पुर्तगाल की राजधनी लिज्बन में छात्र रहते हुए एक सांस्कृतिक संगठन की स्थापना की जिसका नाम अगर अंग्रेजी में कहें तो 'लेट अस डिस्कवर अफ़्रीकाथा। यही संगठन आगे चलकर अंगोला में एमपीएलए (पीपुल्स मूवमेंट फॉर दि लिबरेशन ऑफ अंगोला)मोजाम्बीक में फ्रेलिमो (फ्रंटफॉर दि लिबरेशन ऑफ मोजाम्बीकद्) और गिनी बिसाऊ में 'पीएआईजीसी (फ्रीकन पार्टी फॉर दि इंडिपेंडेंस ऑफ गिनी ऐंड केपवर्डे) के नाम से सक्रिय हुआ और सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत करते हुए 1975 में इसने पुर्तगाली उपनिवेश से अपने-अपने देशों को आजाद कराया। अगोस्तीनो नेतो की कविताएं और अमिल्कर कबराल के संस्कृति से संबंधित लेख हिन्दी सहित दुनिया की सभी भाषाओं में चर्चित और उपलब्ध् हैं। 

    दूसरी घटना का संबंध् भी पश्चिम अफ्रीकी देश नाइजीरिया से है... मैं यहां जानबूझ कर इन देशों का उदाहरण दे रहा हूं क्योंकि तीसरी दुनिया के देशों की सामाजिकराजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों और हमारे देश की परिस्थितियों में काफी समानता दिखायी देती है। पहली बात तो यह है कि यहां अधिकांश देश ब्रिटेन के गुलाम रहेइनकी समाज व्यवस्थाएं काफी हद तक पिछड़ी रहीं और इनमें से अधिकांश देश चूंकि भारत की तरह कृषि प्रधान थे इसलिए इनके मुहावरे भी हमारे मुहावरों से काफी मिलते-जुलते हैं। विडंबना यह है कि हम इन देशों के बारे में कम बल्कि बहुत कम जानते हैं... तो मैं नाइजीरिया की बात कर रहा था। 1965 में नाइजीरिया में सैनिक तानाशाहों ने फर्जी चुनाव कराए और अपने पक्ष में नतीजे घोषित कराने लगे। वहां के एक कवि हैं वोले सोयिंका जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। उन दिनों वह युवा थे और कवि के रूप में उनकी एक पहचान बनी हुई थी। उन्होंने जब देखा कि रेडियो लगातार झूठी खबरें प्रसारित कर रहा है तो आवेश में आकर उन्होंने एक बंदूक उठायी और सीधे रेडियो स्टेशन में घुस गएसमाचारवाचक के सामने से माइक अपने सामने किया और ऐलान किया कि सारी झूठी खबरें प्रसारित हो रही हैं और चुनाव में जबर्दस्त धांधली हुई है। जाहिर सी बात है कि इसके बाद उन्हें गिरफ्तार होना ही था। वह जेल गए और जेल में ही उन्होंने एक बड़ी शानदार किताब लिखी।1996 में वोले सोयिंका ने सैनिक तानाशाह सानी अबाचा के खिलाफ गुप्त रूप से एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया और जनता को सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिए प्रेरित करते रहे। अब आप खुद देखें कि 1965 में जिस जज्बे के साथ उन्होंने रेडियो स्टेशन पर कब्जा किया था वह जज्बा नोबेल पुरस्कार पाने के बावजूद 30 साल बाद भी उनके अंदर कायम था। सोयिंका कम्युनिस्ट नहीं हैं-बल्कि उन्हें कम्युनिस्ट विरोधी भी कहा जा सकता है लेकिन वह जनतंत्र और जनतांत्रिक मूल्यों के प्रबल समर्थक हैं और जब भी कहीं जनतंत्र पर हमला देखते हैं तो पूरे साहस के साथ उसकी रक्षा के लिए खड़े हो जाते हैं। एक बुद्धिजीवी की यही सही भूमिका है। 2004 में मैं कुछ महीनों के लिए नाइजीरिया गया था और उन्हीं दिनों सोयिंका की एक पुस्तक'क्लाइमेट ऑफ फीयरप्रकाशित हुई थी जो नाइजीरिया में रिलीज होने जा रही थी। उस अवसर पर शहर में लगे बड़े-बड़े पोस्टरों और सोयिंका के प्रति आम जनता के सम्मान को देखकर मैं हैरान रह गया। तो यह होती है एक जनपक्षीय बुद्धिजीवी की भूमिका। हमें इन चीजों से सबक लेना चाहिए। 

    अपना वक्तव्य समाप्त करने से पूर्व मैं बुद्धिजीवियों की भूमिका के ही संदर्भ में कुछ ऐसी बातें कहने जा रहा हूं जो शायद कुछ लोगों को पसंद ना आए। हमारी यह खुशकिस्मती है कि मुख्यमंत्री आज इस समारोह का उद्घाटन करने नहीं आए। मैं आयोजकों से जानना चाहूंगा कि ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसकी वजह से किसी बौद्धिक कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए मुख्यमंत्री को बुलाने की जरूरत पड़ती है। उमेश डोभाल की स्मृति के कार्यक्रम का सरोकार पत्रकारिता और संस्कृति से है। उमेश डोभाल की जब हत्या हुई तब उत्तराखंड राज्य नहीं बना था और उस समय उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और इस सरकार के दिग्गज नेता मनमोहन सिंह नेगी नामक माफिया के हिमायती माने जाते थे। मुख्य मंत्री हरीश रावत आज उसी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वह कितने भी अच्छे आदमी क्यों न हों लेकिन वह राज्य के मुख्यमंत्री हैं और उसी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिसके शासनकाल में उमेश डोभाल की हत्या हुई थी। कम से कम इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही आयोजकों को उन्हें बुलाने से बचना चाहिए था। मेरे सामने बैठे मेरे मित्र शेखर पाठक या राजीव लोचन शाह भी अगर मुख्यमंत्री होते तो मैं यही बात कहता।

    दूसरेपिछले सत्र में शेखर पाठक जी ने यह जो कहा कि अगर मुख्यमंत्री यहां आए होते तो हम उनको रू-ब-रू होकर बताते कि उनकी वजह से राज्य की जनता किन संकटों का सामना कर रही है। मैं उनकी इस बात से सहमत नहीं हूं। यह बताने के लिए मुख्यमंत्री को उद्घाटन के लिए बुलाने की जरूरत नहीं है। वह आएंश्रोताओं के बीच बैठें या एक नागरिक के रूप में वक्तव्य दें इससे मुझे कोई ऐतराज नहीं है लेकिन उन्हें सम्मानजनक स्थिति देना उमेश डोभाल का अपमान है। इसके अलावा एक बात और मैं कहना चाहूंगा कि आप लोग इस तरह के आयोजनों के लिए सरकार से क्यों पैसा लेते हैंआपका जनता पर भरोसा क्यों नहीं हैक्या आपको पता नहीं कि यह पैसा आपकी आंखों को पीलियाग्रस्त कर देता हैअभी हाशिमपुरा के जनसंहार के दोषियों की रिहाई की खबर आयी है। मैं आपको बताऊँ कि उस घटना की रिपोर्टिंग पत्रकार वीरेन्द्र सेंगर ने की थी और चौथी दुनिया नामक अखबार में बैनर न्यूज के रूप में इस शीर्षक से छपा था-'लाइन में खड़ा कियागोली मारी और नहर में फेंक दिया'। यह ब्रेकिंग न्यूज थी। लेकिन दिल्ली के किसी भी अखबार ने इसे 'लिफ्टनहीं किया। दरअसल अखबारों के मालिकसंपादक और प्रमुख पत्रकार तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के इतने कृपापात्र थे कि उन्हें यह खबर ऐसी लगी ही नहीं जिसे छापा जाए। इसे रोकने के लिए वीर बहादुर सिंह ने लोगों को फोन किया हो-ऐसा भी नहीं था। होता यह है कि जब आप सत्ता से लाभ लेने लगते हैं तो आंखों पर एक ऐसा पर्दा चढ़ जाता है कि सत्ता की गड़बड़ियां आपको नजर ही नहीं आती। इसलिए कृपया ऐसे कार्यक्रमों के लिए सत्ता से दूरी बनाएं रखें और मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को बुलाने की परंपरा बंद करें। मैंने यह भी गौर किया है कि उत्तराखंड में लगभग हर महीने कोई न कोई लेखक अपनी पुस्तक का लोकार्पण किसी न किसी मंत्री से कराता है और खुद को गौरवान्वित महसूस करता है। यह अत्यंत शर्म की बात है। मैं समझता हूं कि मेरा यह कथन मुमकिन है अभी आपको कटु लगे लेकिन इस पर जरूर विचार करिएगा। 

    अंत में मैं जॉर्ज ऑरवेल के इस कथन से अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा कि 'ऐट दि टाइम ऑफ यूनीवर्सल डिसीटटेलिंग द ट्रुथ इज ए रिवोल्यूशनरी ऐक्टअर्थात जब चारो तरफ धेखाधड़ी का साम्राज्य हो तब सच बोलना ही क्रांतिकारी कर्म है। धन्यवाद। 

     


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    मुकुल को सीबीआई क्लीन चिट का मामला चिटफंड जांच सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    अच्छे दिनों की सुनामी आयी है और दिन इतने अच्छे निकल रहे हैं कि सेहत के लिए बेहद खतरनाक हो रहे हैं।जिनके अच्छे दिन हैं,उनकी दसों उंगलियां घी में और सर भी कड़ाही में।बाकी आम जनता की हालत पतली है।


    जीडीपी का एक फीसद जो आम जनता पर भारत में विकसित देशों के औसत दस फीसद के मुकाबले खर्च होता रहा है,उसमें भी कटौती है और बीमा में एफडीआई की वजह से दोगुणी तिगुणी प्रीमियम पर सेहत बीमा भरोसे हैं।


    अच्छे दिन भारतीय जनगण के लिए भेहद भारी साबित होने लगे हैं।


    ईमानदारी और शुचिता का फहराता झंडा अब शोकमुद्रा में है और देश में ही कालाधन सफेद करने के दुबई ,हांगकांग और मारीशस बनकर तैयार है।


    भारतीय रिजर्व बैंक हाशिये पर है और अर्थव्यवस्था सेबी के हवाले हैं।


    गौर कीजिये कि चिटफंड घोटालों में देश भर की जनता को लूटने वाली हजारोंहजार फर्जी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सेबी के हाथ खींच तान कर लंबे हुए बहुत अरसा बीता।


    सीबीआई को पोंजी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिसिया हक हकूक मिले शारदा फर्जीवाड़े की जांच सीबीआई के हवाले हो जाने से काफी पहले।


    इस अवधि में सीबीआई की सक्रियता की तो सुर्खियां मुख्यमंत्रियों,मंत्रियों,सासदों,आदि आदि अति महत्वपूर्ण लोगों को जब तब कटघरे में खड़ा करती रही हैं,लेकिन सेबी ने अब तक कहां क्या उखाडा़ और कहां कहां कोंदो बोया,इसकी कोई खबर नहीं हुई।


    बहरहाल बंग विजय अभियान और संसदीय सहमति की रणनीति साधने में क्षत्रपों को नकेल डालने की रणनीति बेहद कामयाब रही है।


    हाथ कंगन को आरसी क्या,पढ़े लिखे को फारसी क्या।


    बजट सत्र में क्षत्रपों की कथनी और करनी हमारे कहे लिखे मुताबिक ही मोदी और संघ परिवार के संकट टालने के निमित्त सीमाबद्ध हो गयी।


    इसी दरम्यान सीबीआई ने जिन हस्तियों को गिरप्तार किया था,वे एक एक करके पर्याप्त सबूत के बिना जेल से छूटते चले जा रहे हैं।


    देवयानी और सुदीप्तो के अलावा जेल में अब भी जो वसंत बहार किये हुए हैं,उनमें खास सांसद कुणाल घोष और मंत्री मदन मित्र के अलावा कोई नहीं है।


    दीदी मोदी धार्मिक ध्रूवीकरण का ताजा स्टेटस यह है कि कोलकाता नगरनिगम और दूसरी पालिकाओं के चुनाव में वाम वापसी का अंदेशा दूर दूर तक नहीं है और दसों दिशाओं में खिलखिला रहे कमल के बावजूद दीदी अपराजेय हैं।


    संघ परिवार ने दीदी को अपराजेय जो बनाया सो बनाया,बंगाल का केसरिया कायाकल्प कर दिया।यह बंग विजय से कम बड़ी उपलब्धि नहीं है संघ परिवार के लिए कि वह बंगाल में निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन गयी है,जबकि वह वाम जमाने में कहीं शाखा लगाने की हालत में नही रहा है।


    हम पहले ही लिख चुके हैं कि सीबीआई शारदा फर्जीवाड़े मामले में अब एकदम निष्क्रिय है और संघ परिवार ने जो शारदा फर्जीवाड़े के मामले में लगातार पल छिनपलछिन दीदी और उनके परिजनों को कटघरे में खड़ा कर रहा था,वहां शारदा फर्जीवाड़े मामले में सन्नाटा का रामलीला ग्राउंड बन गया है और पुरुषोत्तम राम मुस्करा रहे हैं और खुल्ला छुट्टे बजरंगियों का खेल तमाशा देखने में मगन हैं।


    इसी बीच,ईडी जो शारदा मामले में कुछ उकाड़ न सकी,अचानक अपने रंग में है। बंगाल में फिल्मों,खेलों और दुर्गोत्सव तक में बेशुमार निवेश करनेवाली चिटपंड कंपनी रोजजवैली  के विदेशी कारों के काफिला के मालिक गौतम कुंडु को गिरफ्तार कर लिया गया।


    ईडी कह रहा है औरसीबीआई जो तमाम चिटफंड कंपनियों की जांच की जिम्मेदार है और सेबी जिसे इन कंपनियों के खिलाफ पुलिस की तरह कार्रवाई करने के अधिकार मिले हुए हैं,दोनों खामोश हैं।


    ईडी के मुताबिक,रोजवैली ने शारदा से तिनगुणा ज्यादा पैसा जनता की जेब से निकाला है।


    खास बात यह है कि इस बार कटघरे में देश के सबसे ईमानदार और सबसे गरीब मुख्यमंत्री त्रिपुरा के माणिक सरकार हैं जबकि इस बीच मोदी से मुलाकात के बाद दीदी अचानक बरी हो गयी है।


    खास बात यह है कि शारदा मामले में सीबीआई के दोनों चार्ज सीट में इस मामले में अबतक गिरफ्तार तमाम लोगों के साक्ष्य मुताबिक जो मुख्य अभियुक्त हैं,पूर्व रेलमंत्री मुकुल राय,उन्हें सीधे क्लीनचिट दे दिया गया है और उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं है।


    उलट इसके एक चार्ज शीट के मुताबिक तो पूर्व रेल मंत्री मुकुल राय गवाह बनाये गये हैं।


    जाहिर सी बात है कि मुकुल को सीबीआई क्लीन चिट का मामला चिटफंड जांच सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा है।


    जाहिर सी बात है कि संघ परिवार ने बखूबी चिटफंड प्रकरण  को संसदीय सहमति का अचूक हथियार बना लिया है।


    जाहिर सी बात है कि मुकुल को सीबीआई क्लीन चिट का मतलब है चिटपंड के तमाम मामलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और जबभी संसदीय सहमति के लिए उनके इस्तेमाल से क्षत्रपों को नकेल डालने की जरुरत होगी,उन मामलों को ठंडे बस्ते से फिर निकाला जायेगा।




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    Does ActionAid International support caste discrimination?
    Written by Karthik Navayan
     
    Published on 25 March 2015
     

     

    Karthik Navayan

    In India there is no escape from the Brahmanical caste structure, it is a story that needs no retelling. It has been the case since ages, and, quite distressingly, it will be so for at least few generations to come. My 18-month tenure in ActionAid Hyderabad Regional Office and my subsequent year-long fight with ActionAid India and ActionAid International not only affirmed my conviction, but it enlightened me about another phenomena, too; that an international aid agency's "International Office", which committed themselves to the poor and unprivileged, can also become as casteist and discriminatory as Indian casteists. To put it more bluntly, individuals from India's dominant castes and the ones who believe in Brahmanical ideology rule those agencies.

    Please read my earlier article, for more background: Caste Discrimination in Modern Workspaces: The Case of ActionAid India  

    1. Indian caste system is becoming a world problem

    Caste system and Chaturvarnya1 principles of hierarchy is spreading across countries of the world; the caste Hindus carry their caste along with them wherever they go. As observed by Dr. B. R. Ambedkar, "As long as caste in India does exist, Hindus will hardly intermarry or have any social intercourse with outsiders; and if Hindus migrate to other regions on earth, Indian caste would become a world problem."2 What Dr Ambedkar foretold in 1917, has become the truth today.

    The people who migrated from India to different countries have formed their caste organisations in places like the United Kingdom, United States of America, Canada, South Africa and UAE. The table below lists a few of the websites of caste-based organisations across the world:

    http://www.bbsl.org.uk/ - Bardai Brahmin Samaj London,

     http://www.elebs.org/ - East London & Essex Brahm Samaj,

     http://www.bbsl.org.uk/ - Bardai Brahmin Samaj London

    http://brahminsamajcanada.com/ - Brahmin Samaj Canada

     http://www.brahminsamajontario.org/ Brahmin Samaj (society) of Ontario

     http://palwadatoronto.com/ Shri Palwada Audichya Brahmin Samaj, Toronto

     http://www.vsna.org/ Veerashaiva Samaja of North America (VSNA)

     http://www.bsgc-il.org/ - Brahma Samaj of Greater Chicago

     http://rajputdhobiusa.weebly.com/ - Rajput Dhobi Samaj -USA

     http://www.bardaionline.com/ - Sri Bardai Brahmin Samaj (Leicester) UK

     http://www.bardai.net/ Sri Baradi Brahmin Samaj Northamptionshire

     http://hinducouncil.com.au/ - The Hindu Council of Australia

     http://www.mycasteishindu.org/ - Alliance of Hindu Organisations

     https://www.ataworld.org America Telugu Association (ATA) Dominated by Kammas

    http://www.nataus.org/ - North American Telugu Association- Dominated by Reddys

     https://iynaus.org - The Iyengar Yoga National Association of the United States

     jaydevjani@hotmail.com - Brahmin Samaj of Georgia Inc

     http://mybsfl.com/ - Brahmin Samaj of Florida

     www.bsoga.org/- Brahmin Samaj of Georgia

     www.nhsf.org.uk – National Hindu Students Forum (UK)

    Transvaal Hindu Seva Samaj- Johannesburg, Gauteng

     http://www.hindusamajsheffield.org.uk/ - Hindu Samaj Sheffield – UK

     http://hinducouncil.com.au/ - The Hindu Council of Australia

     https://groups.yahoo.com/neo/groups/uae_brahmins/info- Brahmin Samaj UAE

     http://www.agrawalsamajusa.org/ Agarwal Samaj USA

     http://agrawalamerica.com/links.htm Agarwal Association of America

    http://iskcon.org/ - The International Society for Krishna Consciousness

     The above list of organisations can also be found here:3  http://karthiknavayan.wordpress.com/2014/12/04/caste-based-organisations-across-the-globe/

    The atrocities towards Dalits, namely, untouchability, humiliation, denial of equal opportunities and violation of human rights are similar in Indian organizations as well as in international organizations with notable Indian presence. Also, the caste practice of honour killings has migrated to the United States, United Kingdom and Canada along with Caste Hindus. In 2008, a so-called upper caste man called Subhash Chander, who lived in Oak Forest, suburb, south of Chicago in USA set fire to his pregnant daughter, his son-in-law and his 3-year-old grandson, and killed them all because he didn't approve of his daughter's marriage, as his son–in-law was a lower-caste man from India4.

    As caste and its evil social practises spread across countries, the Dalit groups have started fighting back. Because of prolonged battle carried out by several anti-caste organisations, the Government of the UK brought a law, The Equality Act 2010, which treats caste as an aspect of race5. Equality Act 2010 was aimed at ensuring equality to diverse ethnic migrant groups in the UK. In 2013, when the UK government wanted to bring an Anti-Caste legislation, which is a special legal measure against caste discrimination in the UK among the Indians, some Hindu fundamentalist groups in the UK opposed it.

    Then the government ordered a study on the presence of caste discrimination in UK. Dr Meena Dhanda, Reader in Philosophy and Cultural Politics, University of Wolverhampton headed a team of academics to conduct the study on behalf of the Equality and Human Rights Commission. The research was a part of the commission's Caste in Britain project, undertaken at the request of the Government, to help inform the introduction of a new statutory law. This followed the Enterprise and Regulatory Reform Act 2013 requirement that the government introduce a statutory prohibition of caste discrimination in British equality law6.

    Noting the severity of the problem of caste discrimination, the European Parliament (EP) recognised caste-based discrimination as a human rights violation and adopted a resolution condemning it and urging European Union institutions to address it, in October 2013. The EP consists of 28 member-countries of the EU. Acknowledging that caste-affected communities are still subjected to 'untouchability practices' in India, Nepal, Pakistan, Bangladesh and Sri Lanka, the October 10 resolution stressed the need to combat discrimination based on work and descent, which occurs also in Yemen, Mauritania, Nigeria, Senegal and Somalia7.

    Though caste is still haunting across the globe, the colonial misunderstanding of caste often repeats the same mistake. For instance, International Aid agencies like ActionAid International (AA International), which claim to be working for the Dalits and Adivasis in India, are primarily run by dominant caste individuals who do not have a proper understanding of the caste system and its socio-economic and cultural dimensions. This results in caste based discrimination on Dalits in their own institutional spaces!

    As Ambedkar clearly pointed out on a different historical situation, the negligence of foreigners, including radicals, about the social fabric of India which by default bestows privileges, prestige, and confidence on the Brahmins in accordance with the Manusmriti, thus making the Brahmins the 'governing class' who deliberately excluded all the means for the 'servile class' to achieve self-respect and development.

    Ambedkar observes, "Starting with the Brahmins who form a strong and powerful element in the governing class in India it is no exaggeration to say that they have been the most inveterate enemies of the servile classes, the Shudras (the old name for the non-Brahmins) and the Untouchables who together constitute about 80 or 90 percent of the total Hindu population of India. If the common man belonging to the servile classes in India is to-day so fallen, so degraded, so devoid of self-respect, hope or ambition, and so lifeless, it is entirely due to the Brahmins and their philosophy. The cardinal principles of this philosophy of the Brahmins were six—to use a correct expression, techniques of suppression—(1) graded inequality between the different classes; (2) complete disarmament of the Shudras and the Untouchables; (3) complete ban on the education of the Shudras and the Untouchables; (4) total exclusion of the Shudras and the Untouchables from places of power and authority; (5) complete prohibition against the Shudras and the Untouchables acquiring property, and (6) complete subjugation and suppression of women. Inequality is the official doctrine of Brahmanism and the suppression of the lower classes aspiring to equality has been looked upon by them and carried out by them, without remorse, as their bounded duty."8

    Without recognising the genealogy of the cultural, social, moral authority in the Indian social fabric, foreigners are taking these unmarked Indian Brahmanical class as representative of India. "These reasons cannot be beyond the ken of these radicals. Correspondents or no correspondents, is it not the duty of radicals to keep in touch with their kindred in other parts of the world to encourage them, to help them and to see that true democracy lives everywhere. It is a most unfortunate thing that the Radicals of England and America should have forgotten the class to whom they owe a duty to help and have become the publicity agents of Indian Tories who are just misusing the slogan of liberty to be fool and befog the world9."

    He again asks foreigners regarding their total faith in the Brahminical class, "Do they not realise that for the reasons for which the Sultan could not abolish Islam or the Pope could not repudiate Catholicism, the governing class in India will not decree the destruction of Brahmanism and that so long as the governing class remains what it is, Brahmanism, which preaches the supremacy of Brahmins and the allied castes and which recognises the suppression and degradation of the Shudras and the Untouchables as the sacred duty of the State, will continue to be the philosophy of the State even if India became free? Do they not know that this governing class in India is not a part of the Indian people, is not only completely isolated from them, but believes in isolating itself, lest it should be contaminated by them, has implanted in its mind by reason of the Brahmanic philosophy, motives and interests which are hostile to those who are outside its fold and therefore does not sympathise with the living forces operating in the servile masses whom it has trodden down, is not charged with their wants, their pains, their cravings, their desires, is inimical to their aspirations, does not favour any advance in their education, promotion to high office and disfavours every movement calculated to raise their dignity and their self-respect ? Do they not know that in the Swaraj of India is involved the fate of 60 millions of Untouchables?"10

    Now it is crystal clear that without a serious introspection into the policies, interventions and staff diversity of ActionAid International and other Aid Agencies, neither can poverty and injustice be fought nor can democracy be established. The tall claim that the Aid Agencies in India are engaged in a so-called fight against poverty and injustice holds no water. Whose poverty are you going to end and to whom do you plan to bring justice without addressing the caste system which itself is the primary contributor to poverty and injustice? If anyone raises such a question, he will find abundant proof that the Aid Agencies, far from planning to end poverty and injustice, are actually giving artificial respiration to the ancient form of Hindu polity of a 'hereditary governing class ruling a hereditary servile class'.

    2. The Aid Agencies and their perception on caste

    ActionAid International and other charity organisations which also speak of human rights, equality and justice, are filled with Brahmins and other dominant caste individuals. No aid agency is an exception. This rule even applies to the Indian units of the United Nations. A critical look at the historical formation of these caste interest groups will help us understand the root of this problem.

    The European understanding of caste and tradition in India is influenced by a Brahmin-centric worldview. Colonial knowledge production about India and its past were accessed from Brahmanical sources which were taken for granted as authentic. As Debjani Ganguly observes, "The predominance of Brahmins as informants, no doubt, led the British, to write accounts of ancient India in terms of Brahmanical sociology of knowledge"11.

    Caste thus understood and institutionalized by colonial forces was derived from the understanding of Brahmanical forces. Now, even annihilation of caste is also sought to be delineated by people from dominant castes who have access to the knowledge of their colonial masters. However, their representation often silences and shuts the voices of lifelong victims of caste oppression. Moreover, by using different international platforms they have been continuing their caste hegemony and diverting the radical idea of caste annihilation into caste reform. Once native informants now act as authentic reformers!

    In the European context, social exclusion and marginalisation is understood as the problem of individuals that can be solved through liberal individual rights, but in the Indian context, exclusion and marginalisation take place and are maintained through community dynamics. Even a liberal individual cannot simply take back his community inheritance in modern spaces. Without considering this complex social process aid agencies are appointing "unmarked" liberal individual bodies as experts for the development of marginalised but these unmarked bodies often their liberal credentials as camouflage to brutally suppress or invisibilise the marginalised bodies in their spaces. As a result, the disease of 'casteism' will definitely affect any international organisation that sets up its chapter in India. Likewise, the casteist Indian who holds some power in any international organisation can also be deadly.

    These aid agencies reflect a caste understanding which is historically rooted in colonial knowledge production in India which was aided by Brahmanical collaborators, and which subscribes to the hegemonic idea of Chaturvarnya and hierarchical social relations. They see it as normal and natural Indian social order, according to their understanding; it cannot be destroyed but may be reformed.

    British colonial rule in the Indian subcontinent has strengthened the Brahmin-imagined Chaturvarnya caste system, which demarcated the Brahmin as the highest ranking of the four varnas. In Hindu India, through the British colonial rule, Brahmins and other dominant castes have strengthened their position by occupying all available positions of power. When the defensive castes, the so-called lower castes, demanded the same treatment from the British rulers, the dominant castes have strengthened the Indian national movement.

    Aloysius observes here, "with the establishment of Pax Britannica the vanquishing of the rajas and maharajas on the one hand and the switchover from other sword wielding to pen pushing as the new method of ruling other- the British discovered the religio-culturally but scattered dominant, the Brahmanical (the people of different castes who by birth first, but more importantly conscious – moral adoption believe in practise and stand to gain by Varnashrama in social relations) particularly of the surplus producing river valley as the eminently suited and valued collaborator for the delivery of their colonial objective. This discovery and the mutual beneficial partnership that ensured between what was even flaunted as the reunification of the too long last brothers of the same stock12.

    In other words, Hadwa Dom clearly states, "The Brahmins of India actively collaborated with the English colonialists in their conquest of India. As a result, the English rewarded them by inventing the designated 'Leaders of Hinduism' for their loyal servants, their Aryan Brahmin cousins13.

    Hadwa Dom further observes: "During British control of colonial India, many missionaries and humanitarians from Britain and other western countries decried the Hindu caste system as unfair. At the same time, the British government in India had often been perfectly happy to align itself with the Brahmins in order to preserve stability and introduce at least a facade of local control in the colonial regime"14.

    The Brahmins were in alliance with the British scholars who studied the caste system. They portrayed themselves to be untouchable friendly and untouchability as a cultural heritage of this country. The very idea of caste system that the Britishers and other Europeans had was from Brahmins and other aggressive caste oppressors, not from the victims of the caste system. The colonial powers influenced by the manipulated knowledge given by the Brahmanical forces enabled dominance of the caste hierarchy and it is still holds sway in all walks of India's life, be it in the judiciary, civil service, politics and what not.

    3. Caste to be challenged at its conscious level

    The British-born sociologist and eminent feminist scholar Ruth Frankenberg argues in the context of white racism "the physical distance between white and black settlements in the west is the mark of social distance between them, the material boundaries were also the symbolic boundaries." She says that "the production and reproduction of dominance rather than subordination, normativity rather than marginality, and privilege rather than disadvantage"15.

    This definition identifies whiteness as something that places white people in dominant positions and grants white people unfair privileges, while rendering these positions and privileges invisible to white people16. That means whiteness here acts as a privilege. In India, caste acts as a privilege rather than a mere social organising principle and a tool of discrimination. Caste privileges provide innumerable opportunities and access to people from dominant castes while the people who have no caste privileges are compelled to obey and work according to the norms of the former.

    In intellectual and academic discourse, the Brahmin and other dominant castes are privileged to interpret and introduce the Indian caste system to the world through a systematic organisation of institutions. This is possible not only because of their advantaged positions in the academics but also due to their social privilege as upper castes, which endows them with a social legitimacy to speak.

    As Gopal Guru pointed out in his famous essay titled How egalitarian are the social sciences in India, "There are historical reasons that gave a structural advantage to the top of the twice born (TTB) in consolidating its privileged position in doing theory. Historically accumulated cultural inequalities seem to have reinforced dalit epistemological closure. This in effect left the realm of reflectivity entirely free from the TTB. Such closures have its sanction in Manu's thinking"17.

    The Indian academia produced caste hierarchy in academics in the name of anti-caste literature. In a hierarchical caste structure, the people from dominant castes will preach about virtues, good, evil, bad and what to do and what not to do etc by relegating the marginalised to the position of mere listeners and actors. In the same way, academia also reproduces the same caste hierarchical structure by placing marginal people at the receiving end always.

    In contradiction to the popular perception, radical thinkers like Ambedkar, Phule, and Periyar identified caste system as part of a larger construction of hegemonic forces of the time to enslave the larger masses. So for them caste as a system was not a natural order but an exploitative system supported by economic, cultural and social reasoning. Dr Ambedkar clearly identified the gravity of the caste system as deeply rooted in the cultural psyche of Indian society. Even victims and preceptors of the system deeply affected in the system so they cannot even achieve a development in their life world. Dr. Ambedkar says "Turn in any direction you like, caste is the monster that crosses your path. You cannot have political reform; you cannot have economic reforms unless you kill this monster" He also says, "caste is a notion, it is a state of the mind. The destruction of caste does not therefore mean the destruction of a physical barrier. It means a notional change.19"

    This definition of caste by Ambedkar was not taken seriously by the academia or by activists and this resulted in the continuous reproduction of caste and its cultural values in the postcolonial democratic institutions. The international Aid Agencies who claimed to build an equal society free from 'discrimination' and 'injustice' have fallen into the same trap of practicing discrimination through the reproduction of the caste notion. They are not even ready to look at the ideal of annihilation of caste, which will require them to critically reflect upon caste privileges, symbolic boundaries on which caste is working in modern times and caste capital invested in their own institutional system. For them caste is a system that has to be humanised through their reformatory agendas as Hindu liberal nationalist have always tried to do.

    4. Caste Discrimination in ActionAid Hyderabad Regional Office
    March 2012 – October 2013

    ActionAid India (AA India) and ActionAid International (AA International) have turned out to be casteist Brahmanical organisations not only because dominant caste individuals run them, but also because of their approaches and the procedures adopted to justify covert caste practises, such as in the case of two dominant caste employees in the Hyderabad regional office. AA India AA International managements took sides with the perpetrators of caste discrimination just because the AA India and AA International managements share the same social location and caste ideology as the perpetrators, the Programme Manager Indira Rani and the Regional Manager Raghu Pilla of its Hyderabad region. Both have practised discrimination against me because of my caste status as a Dalit.

    I complained to India – Country Director and senior management team on 26th January 2013 explaining the discrimination that I was facing in the ActionAid Hyderabad region. I raised 5 specific issues to be addressed by the ActionAid India Management including the issue of downgrading my position to field officer after I was interviewed (in ActionAid Hyderabad Regional Office) for the post of Programme Officer and was appointed as a Field Officer with the same job description as that of the former but with an inferior salary.

    The Country Director responded immediately, in a very technical and legalistic way and asked the HR to look into the matter. However, the HR did nothing apart from speaking to me for a couple of times over phone. No inquiry was conducted until the end of my contract period, i.e. 15th May 2013

    Again, I complained to the Country Director and approached all staff on 26th June 2013. After this mail, 30 colleagues from different regional offices had supported me and wrote to the Country Director demanding an inquiry into the issues I raised

    The enquiry was conducted only after 7 months had passed after my first complaint. It happened on 12th September 2014.The report was shared with me on 29th October along with another email informing me that they are closing my contract with ActionAid India. Therefore, the whole motive of this inquiry was to justify all the discriminatory decisions taken by Raghu and ActionAid management. Kumkum Kumar, another member on the committee did not participate in the inquiry and did not sign on the report.

    I stayed with the organization from May 15th, to 31st October 2013 for a period of 5 months 15 days without the extension of the contract and without signing any agreement, but my salary was paid; leaves and travel allowances approved. How could this happen in an organisation whose HR policies are so strict? In addition, I felt like I was living in a claustrophobic environment throughout this period as the sword of uncertainty hung over my head. Every day I was worrying about whether I would be able to draw my salary since my contract was neither renewed nor extended. Often, I thought that was a strategy adopted to 'punish' me or to 'push' me to leave the organisation.

    I wrote a mail to my line manager Raghu and HR manager Vijay Naugain requesting them to extend my contract for appropriate time. On 17th August 2013 , I copied this mail to Country Director and Programme Director, but there was no reply for 16 days. Therefore, I wrote another mail on 2nd September 2013 requesting them to approve my working from home, as I was not comfortable working in the office without a proper contract. My request to work from home was approved by Sehjo Singh, Programme Director 10th September 2013. She also informed me that my line management was changed on request from Raghu, and she asked me to report to her. Why was I asked to report to someone who does not sit in the same office? As per their decision at the time of my appointment, I was only a field officer, but now I was made to report to a senior/supervisor who sits in the country office. Was this to encourage me or to frustrate me further?

    On 29th October 2013, Sandeep, Country Director, was in Hyderabad for a workshop. On the same evening Raghu planned a staff meeting, so that Sandeep could also participate. A day before, Raghu called me over the phone and asked me to participate in the meeting. The meeting started at 7 pm., and Sandeep announced that there was no specific agenda for the meeting and if anybody wanted to share anything, they were welcome. Some colleagues shared their experiences. After some time, Sandeep praised Raghu saying that, "Raghu is the only capable leader in whole of ActionAid India," before adding further, "I love challenges, if anybody wants to challenge me, they are welcome". Raghu also asked me saying, "Karthik, if you want to ask anything from Sandeep, you can ask". I kept quiet, as I was not aware of why they were asking so. However, when I came home and checked my email at 9 pm, I found an email from HR saying that they have ended my contract with ActionAid India.

    ActionAid India Management conducted an inquiry 7 months after my complaint and they involve an outsider, Martin Macwan, as a committee Chairman. They avoided ActionAid employee; another inquiry committee member, Kumkum Kumar, knew all the facts of the case. Is it part of internal procedure to include an outsider in the inquiry committee and exclude the internal member who knows all the facts of the case?

    Moreover, they had not asked me to exercise my option to choose a member from my side. They constituted a kangaroo inquiry committee. They did involve Martin Macwan, the outsider, only because he was a Dalit! Samarendra Behera, second member was also a Dalit and staff of ActionAid India. Why did the inquiry committee not discuss its findings with Kumkum Kumar, the third member? She is the Programme Manager of ActionAid Kolkata regional office and had initiated a dialogue with the management demanding inquiry into my grievances. Therefore the ActionAid management proposed her name as a member of inquiry committee, as a tokenistic gesture, and did not discuss anything with her about the case. They planned the dates for inquiry in such a way that Kumkum Kumar could not participate in it, and they didn't share the inquiry committee report for her approval. It was a clever strategy on the part of ActionAid India to include two Dalits in the committee. They were being used to justify ActionAid India's own version of the story with the purpose of humiliating me and throwing me out of the job.

    The national and international managements of ActionAid were ready to take the blame by taking sides with both those dominant caste individuals Raghu and Indira, instead of adopting democratic practices. The argument that ActionAid is working with or is sympathetic towards Dalits will not excuse the occurrences of caste discrimination by people employed in the organisation.

    When Constitution of India under article 17, abolished caste based discrimination and untouchability, it does not mean that it is abolished in practice. It means that it aimed to do so, that is why Indian parliament has adopted several other protective legislations for the purpose of ensuring that the practice was stopped or prevented. Take the specific example of section 4 of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act -1989 which says, "Whoever, being a public servant, wilfully neglects his duties required to be performed by him under this Act, shall be punishable with imprisonment".

    ActionAid India did not have a grievance redressal mechanism to deal with the specific issue of caste-based discrimination, which is the reason why they ended up justifying caste discrimination by adopting different methods and different language, and with the systematic usage of bureaucratic and administrative rules, regulations and procedures.

    Caste acts as a mobiliser, as a thread running inside a garland, among the people who believe in caste hierarchy. It acts as a base of social formation and social discrimination in Indian public life. Moreover, it gives certain privileges to certain sections and imposes prohibitions on others. In my case, the caste bond among the people in ActionAid adversely affected me. On my first oral complaint to Raghu (Regional manager of AA Hyderabad) against casteist attitude and discriminatory behaviour of Indira Rani, (Programme Manager AA Hyderabad) he didn't initiate any discussion with me, but stood with Indira Rani.

    When I complained two times to Sandeep Chachra (Country Director –AA India), he took a legalistic and technical stand only for the protection of Raghu, and when I complained to AA International, against the AA India Management, the Indian dominant caste individuals heading different departments in AA International stood with AA India management and did not conduct the investigation.

    This situation is the result of our liberal public space which usually takes the caste privileges of certain sections as normal and caste assertion of the marginalized as abnormal. This impossibility of highlighting the caste privileges and caste bonds is never taken up as an issue in mainstream discourse on caste hegemony. By dismissing all this kind of nuances of caste, international agencies merely look it as a problem of poverty. And this results in lack of thorough understanding of caste manifestations at the consciousness level, cultural level, social level and the symbolic boundaries that caste create.

    In India, caste shapes and controls the psyche, material production, culture and social positions too. Therefore, without understanding these dynamics of caste, nobody can challenge and change the caste landscape of India and its anti-democratic and inhuman practises of discrimination and untouchability.

    In every advertisement, the ActionAid India proclaims that candidates from SC (Scheduled Castes), ST (Scheduled Tribes), BC (Backward Classes) and religious minorities are encouraged to apply. However, did this claim ever matter when it came to selecting or appointing the staff? There were very few persons from these SC ST communities in the organization. ActionAid India has a staff diversity policy on paper. However, there was no program which encouraged the members from these SC ST communities.

    ActionAid India asks the caste of the candidates, who apply for jobs, in its standard application format. In a caste based society like India, if the affirmative policy is only to identify candidates' caste and do nothing beyond that, it will potentially be counterproductive, no matter how inclusive the policy maybe. Moreover, it will affect the candidate; the staff members, who are not aware of the intention of such policy will covertly express a kind of prejudice towards the candidate and victimise him on the grounds of being 'less efficient'. That actually happened in my case. Therefore, the policy should clearly stipulate the rights and duties for both parties. Interestingly in my case, the fact that the inquiry committee consisted of two Dalits has only served the hegemonic and the caste aggressive persons in ActionAid India to get away with their behaviour by mentioning their diversity policy.

    I must say that the inquiry committee did not study the case either objectively or from victim's point of view. They just played the role of a lawyer in defence of ActionAid India management. The basic human rights principle of justice says that it is the perception of the discriminated that has to be considered by the inquiry committee rather than the 'perpetrators' version. ActionAid India was hiding behind the clever use of flowery words where it should have been accepting the lacunae in its HR and social diversity policies, and attempted to correct its caste-blindness and its half-hearted commitment to the marginalized communities.

    Here, other human rights organizations can take a lesson or two from ActionAid India on how not to conduct an inquiry on allegations of caste, race or gender discrimination. In my case, six fundamental principles were violated:

    • In cases of caste, race or gender discrimination, it is the feeling of the victim/who is discriminated against that should be given more importance than the view of the perpetrator.
    • Technicalities should not take priority over the merits of the case. Personal beliefs and prejudices determine appreciation of evidence, determination of guilt and award of judgment. These beliefs have the unmistakable imprint of social biases, relating to both caste and gender.
    • Victim should be given the latest information by respecting his/her human personality. It is very essential for both sides to be informed of the process of investigation time to time.
    • Discrimination is usually a process, not an event. Therefore, it is very difficult to provide a convincing answer for bits and pieces of questions.
    • In cases of caste, gender and racial discriminations, the guilty should prove that he is not guilty. This understanding should have been very important for a human rights organization such as ActionAid.

    5. Social Diversity of ActionAid India

    The table shows, the staff diversity in ActionAid India. Jayanta Bora, the head of HR, ActionAid International, sent this, when asked by Eugene Culas, the Director of VODI.

    ~

    The Actual Social Diversity in ActionAid India

    According to 2011 census, Scheduled Castes and Scheduled Tribes constitute 25% of total population in India . They were underrepresented in ActionAid India as SCs were only 9% and STs 4%, - total 13%. All those SC STs might be employed in menial jobs, peons, drivers, and other subordinate positions. In the year 2013, there was only 1 member from Scheduled Castes in the Senior Management Team, before that there was no member in of SCs or STs in ActionAid management.

    Though the Mandal Commission report of 1980 estimated the OBC population in the country to be 52%, while the National Sample Survey Organisation (NSSO) survey of 2006 quoted the figure of 41% , the OBCs are underrepresented in ActionAid India at 15%.

    Muslim population in India according to 2011 census is 14.2% of the country's population, but they are only 10% in ActionAid India . Persons with disabilities and LGBT, Transgender, PLHA - who together constitute over 2% of total population in India - are represented at 2% and 5% respectively in ActionAid India.

    Therefore, SC, ST, OBC, Muslim, PWD, LGBT, Transgender and PLWHA, who all together constitute 82% of total population of India, have only 45% representation in ActionAid India. While the other dominant castes, which make up 18% of total Indian population, are overrepresented in ActionAid India at 55%! Their own statistics tell us what kind of diversity policy ActionAid India has.

    6. The Inexplicability of ActionAid International's attitude

     January 2014 to November 2014

    As the things remained where they were, I requested ActionAid International to intervene. I sent my submission to the Chairperson of ActionAid International, Ovonji Odida on 7th January 201424 and next day she ordered for an inquiry by an internal team via an email dated 8th January 201425. She wrote that the case should be investigated by adopting appropriate procedures.

    Natasha Barker from ActionAid International acknowledged the same and asked me if I have any further information to submit26. I submitted another additional note with details on 20th January 201427. After a month passed, I wrote to Natasha Barker and others requesting them to update me on the progress they had made on the case, on 23rd February 201428. On 28th February 2014, I received a mail from Larne Amao29, confirming that the investigation was going on.

    I am surprised to note that even after many reminders the ActionAid international office kept its silence. This is an unacceptable behaviour from an international office of an organisation which is known for upholding the human rights of millions of voiceless people in the world. This state of affairs is because the ActionAid International is peopled by Indian Brahmins and other members of dominant castes. To list a few decision-making people in ActionAid International: the HR Head, Director of Programmes, and Head of Emergencies etc. are individuals from dominant castes in India.

     Within AA India and AA International, the caste system is perceived through the prism of mainstream discourse of Indian academia and their Brahmanical interpretations. That discourse in India and abroad always has been dismissive of the Dalit aspirations: that's the essence of "Indian sociology". The same is reflected in Indian and international development sectors too. It is a consequence of Gandhian idea of reformed caste practice without untouchability

     Another reason: there is no Dalit in AA International; there is no Dalit in the decision-making bodies of AA India. Ditto with all other international development agencies. We find Dalits only in menial jobs. Without proper Dalit representation in such organisations, they can never understand the Dalits' aspirations and their point of view. That is the reason why they keep on justifying their caste superiority as neutral and normal. If ActionAid International undertakes an honest attempt at looking into the matters of ActionAid India they will realise that the latter's claim is just propaganda.

    On 18th September 2014, Eugene Culas, the Director of London- based VODI (Voice of Dalits International) wrote to Judith Davey30, Director of People, Performance and Accountability, AA UK, to reinstate me. Judith Davey Replied on 19th September 201431, repeating ActionAid India management's version. Eugene Culas wrote back on 23rd September 201432 saying, "After speaking again to Mr Karthik Navayan, we are still concerned about his issue. Because the case is about downgrading a Programme Officer position for which he was interviewed, to Field Officer, for which he was appointed, without following any prescribed norms within AA's HR policy."

    Judith Davey Replied to Eugene Culas on 23rd September 201433 saying that "ActionAid India is an independent member of the ActionAid Federation therefore email copied to Sandeep Chachra, the Country Director as he is best placed to respond." On 24th September 2014 Sandeep replied to Eugene34 saying he is "requesting our OE Director (Organisational Effectiveness) to respond to concerns raised in email". Eugene replied on the same day35 saying, "It looks that the information that Judith is seeking is readily available. In that case could you send the information by this Friday so that we will share it with our international network. Look forward to hear from you/ OE Director"

    On 26th September 2014, Dipali Sharma, OE Director, replied to Eugene Culas36 repeating the earlier lies that the Programme Officer position was not downgraded but I was offered a Field Officer's job. From where this Field Officer's position sprang from she did not write. On 30th September 2014, Eugene Culas again wrote to Judith Davey37saying that "You said you have copied my email to Mr. Sandeep Chachra, who is the India Country Director of Action Aid to respond to me. Further, you mentioned that AA India is an independent member of the AA Federation. Mr. Sandeep Chachra passed that responsibility to the OE Director, Ms. Dipali Sharma, to respond to my concerns. Unfortunately there was nothing in her response connected to my concerns. Instead I found it to be the typical, stereotyped, legalistic style of a caste perpetrator attempting to tackle issues of Caste discrimination faced by Dalits. They also flout the assurance of a reply given to Mr. Karthik Navayan by AA International Chair, Johannesburg, under the pretext of some old immature enquiry done by AA India themselves and some interested parties. Mr. Karthik is still waiting for the results of the further enquiry from Johannesburg as was promised to him".

    1st October 2014 Judith replied to Eugene Culas38 saying, "I am not able to advise on this, as it is Sandeep's area of responsibility. Jayanta will be able to advise on whether there have been inquiries where the outcome has not been shared with Karthik Navayan" Since there was no reply from Jayanta Bora for 10 days, Eugene Culas wrote a reminder mail to him39 "I have been advised by Mr. Karthik that he has been waiting for more than the last 8 months for a response from your side. Hence, I brought it to the attention of Ms. Judith Davey of ActionAid UK, who also holds the view that a response from you is pending on the matter".

     On 12th October 2014, Jayanta Bora replied to Eugene Culas40 saying that, I learnt of the case only after receiving Judith's mail and have been in touch with AA India's ED and OE Director. I am afraid I will not be in a position to give a response to the case, as this is an AA India matter." How can he write that it is ActionAid India matter, when the International Board Chair issued directions for an inquiry? Moreover, when it comes to discrimination, nothing is internal. If ActionAid International says that caste discrimination is ActionAid India's internal matter, how can it raise the issue of women's rights when a woman is beaten up by her husband? The husband may counter saying that it is their family matter.

    Eugene Culas replied to Jayanta Bora on 12th October 201441 quoting all my communications with ActionAid International regarding my case. When there was no getaway for Jayanta Bora, he replied to Eugene Culas on 15th October 201442 saying, "We are in the process of reviewing all relevant information and related documentation with regards to the complaint. Our endeavour will be to provide the diversity data for AA India along with the third party investigation report on the complaint. We anticipate the overall process to be completed by around three weeks."

    After several rounds of emails, Jayanta Bora replied on 5th November 2014 he is the Head of Human Resources (HR) of ActionAid International, based in Johannesburg. There is nothing new in his mail except for the repetition of ActionAid India management's lies. Jayanta Bora first point was that an "inquiry was conducted consisting of a committee with well-respected Dalit leader Martin Macwan." However, this committee had just played the role of a defence lawyer for ActionAid India. I had explained the contradictions and illegitimacy of the inquiry committee report in my submission43.

    His second point as he wrote: "Karthik had made the complaint immediately prior to his fixed term contract end date." This is the biggest lie. How can people sitting in such big international positions so easily write such stuff? I complained to Sandeep Chachra (India – Country Director)44 and senior management team on 26th January 2013 explaining about the discrimination that I was facing in the ActionAid Hyderabad region45 ActionAid India did not conduct any inquiry, that is the reason why, for the second time, I complained to the Country Director and approached all staff on 26th June 201346.

    The third point he wrote was, "the inquiry committee observed that there was no caste based discrimination as alleged by Mr. Karthik". Here I challenge the very methodology that ActionAid India chose. By including two Dalits on the committee, they were just trying to justify the caste discrimination. Kumkum Kumar, the third member did not find the report worthy enough to ratify.

    Fourth point as he writes, "that ActionAid India's Governing Board, which consists of eminent national personalities including some leading Dalit movement leaders in India were well informed of the case and the process undertaken by the organisation. After reviewing the details of the inquiry and having satisfied themselves with the process, ActionAid India Board had shared its conclusions with AA International Board and AA International management. They have endorsed the third party independent investigation report findings."

     How can the ActionAid India Governing Board review a case which is in the consideration of International ActionAid? In addition, why was this information not communicated to the aggrieved party? Are these the principles of natural justice followed by ActionAid?

    In his fifth point he wrote that the "ActionAid India is an autonomous member of the ActionAid Federation and there is no further need for a re-investigation into this case by ActionAid International." ActionAid India was recently registered as a society in India but all its funds come from abroad. When an organisation is 100% dependent on foreign donors, in what way is it autonomous? On the one hand, they are benefitted in the name of Dalits and Adivasis while on the other they delegitimize the valid claims of Dalits and Adivasis in their institutional space. Shall we assume that ActionAid international is supportive of ActionAid India in latter's caste-discriminatory practices?

    Bora further writes, "Mr Karthik has written defamatory articles /mails in public and social network sites even after a fair and transparent enquiry process was conducted into his complaints and the report shared with him. There has been a continued attempt to defame ActionAid and inciting people against ActionAid. We strongly object to such conduct aimed at damaging the reputation of ActionAid."

    I have repeatedly said that while the inquiry itself was an atrocity, ActionAid International's seal of approval of it was rubbing more salt into the wounds. They say the articles I wrote were defamatory. If I was writing lies and hurling abuses at them, why did they not write rejoinders? Bereft of any other means in their institutional space to defend myself, I was fighting with all the available resources. From the beginning of this issue, I have the following questions to ask:

     1. Why and how was the programme officer position downgraded to field officer? And according to which rules of HR policy?

     2. Why was I assigned the job description of a programme officer even after being appointed field officer and paid less salary?

     3. Why was there no inquiry conducted during the period of January 2014 to September, for a period of 8 months, on my complaint?

     4. Why did ActionAid choose Martin Macwan, an outsider, as a member of the inquiry committee? Is it according to the prescribed grievance redressal mechanism of AA India or was he chosen only because he is a Dalit?

     5. Why did the report of inquiry committee not shared with Kumkum Kumar, the third member of inquiry committee?

     6. If the inquiry committee's report was shared with Kumkum Kumar - the third member of the Inquiry Committee, who knows all the facts of the case- why wasn't it ratified by her?

     7. The post, which I filled as Field Officer, was based on an advertisement that called for Programme Officer for 6 months. At the same time, another advertisement for Programme Officer did not carry any duration and was 'duly' filled by a person from a dominant caste and he was regularised too. What was the HR's role in this entire episode? Shall we assume that there are no uniform HR rules in ActionAid India? Or, can they change the rules depending on the caste of the candidates?

     8. Why did ActionAid India not communicate about the review of the case in the Governing Board to the complainant? Was this an appropriate procedure for an organisation which preaches the virtue of transparency to the world?

     9. Why did AA India and AA International not communicate the closure of the case to me, without conducting an investigation as directed by Ovonji Odida, until the intervention of VODI?

     10. Why do ActionAid India and ActionAid International not disclose their social diversity policies, if at all they do have any such policies?

    ~

    Notes

    [1]. The general proposition that the social organization of the Indo-Aryans was based on the theory of Chaturvarnya and that Chaturvarnya means division of society into four classes—Brahmins (priests), Kshatriya (soldiers),Vaishyas (traders) and Shudra (menials)

    [2]. B. R. Ambedkar Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development, by, Paper presented at an Anthropology Seminar, taught by Dr. A. A. Goldenweizer Columbia University. 9th May 1916, Text first printed in: Indian Antiquary Vol. XLI (May 1917)

    [3]. http://karthiknavayan.wordpress.com/2014/12/04/caste-based-organisations-across-the-globe/

     [4]. Monica Davey, The New York times, Published: January 3, 2008, viewed on 17th June 2014 athttp://www.nytimes.com/2008/01/03/us/03chicago.html?_r=0

     [5]. Caste discrimination and harassment in Great Britain, Government Equalities office, Research Finding Paper No 2010/08

    [6]. http://www.wlv.ac.uk/default.aspx?page=39321

     [7]. Divya Trivedi, Hindu News Paper Dated 15th December 2013, viewed on 24th July athttp://www.thehindu.com/news/national/caste-discrimination-a-global-evil-says-european-parliament/article5234387.ece

     [8].http://www.ambedkar.org/ambcd/43.%20A%20Plea%20to%20the%20Foreigner.htm

    [9].http://www.ambedkar.org/ambcd/43.%20A%20Plea%20to%20the%20Foreigner.htm

     [10].http://www.ambedkar.org/ambcd/43.%20A%20Plea%20to%20the%20Foreigner.htm

    [11]. Debjani Ganguly, Caste, Colonialism and counter modernity notes on a post colonial hermeneutics of caste, p.43, Routledge, 2009

    [12]. Aloysius, Brahmanical inscribed in Body-politic, p.8, Critical Quest, New Delhi, 2010

    [13]. Myth of One Hindu Religion PT 2, By Hadwa Dom - http://www.raceandhistory.com/historicalviews/NoDefinitionofHinduism2.ht

     [14]. http://asianhistory.about.com/od/india/ss/Photo-Essay-Colonial-India_11.htm

     [15]. Frankenberg, R. White women, race matters: The social construction of whiteness, Minneapolis, MN: University of Minnesota Press, 1993.p 236

     [16]. Meredith J. Green, Christopher C. Sonn, Jabulane Matsebula, Reviewing whiteness: Theory, research, and possibilities, South African Journal of Psychology, 37(3), 2007, pp. 389–419

     [17]. Gopal Guru, Economic and Political Weekly, Vol. 37, No. 50 (Dec. 14-20, 2002), pp. 5003-5009. Published by: Economic and Political Weekly, Article Stable URL: http://www.jstor.org/stable/4412959

     [18]. Ambedkar B R, Annihilation of Caste, available at http://ccnmtl.columbia.edu/projects/mmt/ambedkar/web/section_3.html, viewed on 12th July 2014

     [19]. Ambedkar, Annihilation of Caste, Critical Quest., 2007, Delhi, p. 37.

     [20]. Email communication from Jayanta, the HR Head of ActionAid International addressed to Eugene Culas, the Director of VODI (Voice of Dalits International) 

     [21]. Available - http://archive.indianexpress.com/news/scs-sts-form-25--of-population-says-census-2011-data/1109988/

     [22]. Available at- http://timesofindia.indiatimes.com/india/OBc-count-52-or-41/articleshow/263918.cms?referral=PM

     [23]. http://en.wikipedia.org/wiki/Islam_in_India#cite_note-censusIndia2011-6

     [24]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/04/submitted-to-honourable-irene-ovonji-odida-on-7th-january-2014-caste-discrimination-in-modern-workspaces_-the-case-of-actionaid-india.pdf

     [25]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/04/gmail-caste-discrimination-in-modern-workspaces_-the-case-of-actionaid-india-reply-from-irene-ovonji-odida-on-8th-january-2014.pdf

    [26]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/04/natasha-barker-gmail-acknowledgement-of-your-email-on-9th-january-2014.pdf

     [27]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/04/my-submission-to-actionaid-international-20th-january-20141.pdf

     [28]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/04/my-submission-to-actionaid-international-20th-january-20141.pdf

     [29]. https://karthiknavayan.files.wordpress.com/2015/03/gmail-regarding-my-complaint.pdf

     [30]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/18th-september-2014-eugene-wrote-to-judith-davey-about-caste-discrimination-in-actionaid-india.pdf

     [31]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/19th-september-2014-judith-replied-to-eugene-and-eugene-wrote-back-on-23rd-september-2014.pdf

     [32]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/23rd-september-2014-judith-to-eugene.pdf

     [33]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/23rd-september-2014-judith-to-sandeep.pdf

     [34]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/24th-september-2014-sandeep-to-eugene.pdf

     [35]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/24th-september-eugene-to-sandeep.pdf

     [36]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/26th-september-2014-dipali-to-eugene.pdf

     [37]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/30th-september-2014-eugene-to-judith.pdf

     [38]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/1st-october-2014-judith-to-eugene.pdf

     [39]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/11th-october-2014-eugene-to-jayanta.pdf

     [40]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/12th-october-2014-jayanta-reply-to-eugene.pdf

     [41]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/12th-october-2014-eugene-reply-to-jayanta-with-evidance-of-actionaid-international-directions-to-conduct-investigation-on-my-case.pdf

     [42]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/10/15th-october-2014-jayanta-reply-to-eugene-for-asking-3-weeks-time-to-conduct-scrutiny-of-case-documents.pdf

     [43]. http://roundtableindia.co.in/index.php?option=com_content&view=article&id=7144%3Acaste-discrimination-in-modern-workspaces-a-case-study-of-actionaid-india&catid=119&Itemid=132

     [44]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/11/gmail-some-issues-to-your-notice.pdf

     [45]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2013/06/1-1-first-letter-to-sandeep-and-senior-management-team1.pdf

     [46]. http://karthiknavayan.files.wordpress.com/2014/11/gmail-violation-of-equal-opportunities-in-actionaid-mockery-of-mission-statement.pdf

    ~~~

     

    Karthik Navayan is a human rights activist.

    Cartoon by Unnamati Syama Sundar.

    -- 
    B.Karthik Navayan,
    http://karthiknavayan.wordpress.com/


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    Attacking the Cross: Rise in Anti Christian Violence
     
    Ram Puniyani
     
     
    Julio Ribeiro is one of the best known police officers in India. Recently (March 16, 2015) he wrote in his article that he is feeling like a stranger in this country. 'I feel threatened, not wanted, reduced to a stranger in my own country'. This pain and anguish of a distinguished citizen, an outstanding police officer has to be seen against the backdrop of the rising attacks on Churches and rape of the 71 year old nun in Kolkata. All over the country the rage amongst the Christian community is there to be seen in the form of silent marches, candle light vigils and peaceful protests. 

    As such during the last several months in particular the instances of attacks, and intimidation of the minority community has become more frightening. There is also a noticeable change in the pattern of violence against them. Earlier these attacks were more in the remote Adivasi areas, now one can see this taking place in urban areas also. The change in frequency of these attacks after the new Government took over is a striking phenomenon. 

    As such Christians are one of the very old communities in India. Right from the first century when St. Thomas visited Malabar Coast in Kerala and set up a Church there the Christian community has been here, part of the society, contributing to various aspects of social life. The missionaries, the nuns and priests, have also spent ages in the rural hinterlands setting up educational and health facilities and have also founded the most reputed educational institutions in most of the major cities of the country. Christians today are a tiny minority (2.3% as per 2001 census). It has been a community which like any other has its own internal diversity with various Christian denominations. 

    In this context the rise of anti Christian violence during last few decades in Adivasi areas, Dangs (Gujarat) Jhabua (MP) Kandhamal (Orissa) has been an unnerving experience for the community as a whole and for those believing in pluralism and diversity of the country in particular. The violence which picked up from mid nineties peaked in the burning alive of Pastor Graham Stains (23rd Jan 1999) and later Kandhamal violence in 2007 and 2008. After this there was a sort of low intensity scattered violence in remote areas, till the attack on Churches in Delhi from last several months. The Churches which were attacked were scattered in five corners of Delhi, Dilshad Garden (East), Jasola (South West), Rohini (Outer Delhi), Vikaspuri (West) and Vasant kunj (South), as if by design the whole terrain of Delhi was to be covered for polarization. It was claimed by police and state that the main cause of these has been theft etc.; in the face of the fact at most of the places the donation boxes remained intact. BJP spokesperson are vociferously giving the data that during this period so many temples have also been attacked, which is a mere putting the wool in the eye, as the targeted nature of anti Christian violence is very glaring. 

    In the meanwhile the RSS Sarsanghachalak, the boss of the Hindu right, to which BJP owes its allegiance, states that Mother Teresa was doing the charity work with intent to conversion. Post the statement two major incidents have come to light. One is in Hisar in Harayana, where a church has been attacked, it's Cross replaced by the idol of Lord Hanuman and the Chief Minister of Haryana, who again has RSS background, stated that the Pastor of the Church has been alleged to be part of the conversion activities. At the same time RSS progeny Vishwa Hindu Parishad stated that more such acts of attack on churches will take place if conversions are not stopped. This incident reminds one of the placing of the idols of Ram Lalla (Baby Ram) in Babri Mosque in 1949 and then claiming that it was a birth place of Lord Ram. In addition the statement of the Chief Minister gives a clear indication as to how the investigation of the incident will take place and whether the real culprits will ever be nabbed. Incidentally there are no police complaints about Pastors' conversion activities if any, in the police records. This 'they are doing conversions' is a standard ploy which is propagated for anti Christian violence, which one has witnessed so far. 

    After Bhagwat's comments on Mother Teresa the anti Christian violence seems to be intensifying by the day and the incidence of Haryana and Kolkata are symbols of that and VHP is openly talking of more attacks. When Prime Minister Modi broke his deliberate silence on the issues of violence against minorities, he did say that religious freedom will be respected. But one also knows that what he says and what he means are mostly not the same. Also that now the silence of last several months has given a clear message to his associates in RSS combines that they can carry on their disruptive and polarizing activities at will. A large section within the Christian community feel that Modi was voted on the agenda of development and this type of violence was not anticipated! That is a sheer naivety, Modi is a RSS trained Pracharak, for whom the divisive agenda remains at the core, to be implemented by a clever 'division of labor' implemented through different organizations, which are part of RSS combine popularly known as Sangh Parivar. 

    As such India has been the cradle of many religions, which celebrated and lived together, a far cry from the present atmosphere which is intimidating the minorities. Christian's plight in recent times is something to which the concerned democratic rights individuals need to wake up to. This seems to be unfolding of the script, Pehle Kasai Phir Isai, (First Muslim, then Christians). It is not just a violation of their rights; it's also a violation of very basic norm of democracy. As they say, a democracy has to be judged by the litmus test of level of security and equity its minorities enjoy!

    --
    Response only to ram.puniyani@gmail.com

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    आमंत्रण

    भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ और भूमि अधिकार के लिए आन्दोलन की रणनीति बैठ - 10:30 से 3:30 बजे

     

    राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक - 4 से 6 बजे

     

    2 अप्रैल, डिप्टी स्पीकर हॉलकंस्टीट्यूशन क्लबदिल्ली

     

    साथियों,


    वर्ष 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करके मोदी की अगुवाई वाली वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया जो अब लोक सभा में पास होकर भूमि अधिग्रहण बिल का रूप ले चूका है. अध्यादेश के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक देश की जनता इसके विरोध में आन्दोलन कर रही है. यह बिल सरकार को देश के किसानों से बिना उनके अनुमति के ज़मीनें छीनकर कम्पनियों को देने की ताकत प्रदान करता है. केवल ज़मीन ही नही बल्कि सरकार देश का पानीदेश की बिजलीदेश के खनिज संपदा और देश की जनता का श्रम सबकुछ कंपनियों को सस्ते में उपलब्ध कराने की जुगत में है ताकि उनके (कंपनियों) के लिए कम लागत विनिर्माण (Low Cost Manufacturing) की गारंटी हो सके तथा वे इस देश में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सकें. इसे ही देश की वर्तमान सरकार तेज गति से विकास बता रही है और प्रधान मंत्री मेक इन इंडिया का नाम दे रहे हैजिस मेक इन इंडिया की दुनिया में श्रम कानून लागू नही होंगे और मजदूरों पर कंपनियों का पूर्ण नियंत्रण होगा. दुसरे शब्दों में भारत में संविधान का राज नही होगा बल्कि कंपनीयों का राज होगाजो देश की जनता के लिए गुलामी के एक नए दौर की शुरुआत होगी.  

     

    देश की जनता शाशकों के जन विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त मंशा को पहचानने लगीयही कारण है कि अध्यादेश के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक भारत की जनता भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ देश के सभी हिस्सों में लगातार सड़कों पर प्रतिरोध आन्दोलन कर रही है. इस मुद्दे पर जनता के जुझारू प्रतिवाद ने संसद के विपक्षी पार्टियों को भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करने के लिए बाध्य कर दिया हैऔर बीते 17 मार्च को संसद में विपक्ष के सांसदों में ने साथ मिलकर के भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च भी किया है. विपक्षी पार्टियों द्वारा किये जा रहे विरोध के कारण ही सरकार इस बिल को राज्य सभा में लाने का सहस नही दिखा पा रही है.

     

    इस अध्यादेश ने भूमि के प्रश्न को एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है. देश की जनता भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने की मांग के साथ-साथ भूमिहीनों के लिए भू अधिकार की मांग को भी प्रमुखता से उठा रही है. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द करने की मांग पर देश भर के जनांदोलनों और ट्रेड यूनियनों ने मिल कर अध्यादेश के विरोध में 24 फ़रवरी को संसद मार्ग पर विशाल रैली आयोजित की थी जिसकी धमक संसद में भी सुनाई पड़ी और सरकार को अध्यादेश में कुछ बदलाव का ड्रामा भी करना पड़ा था.

     

    वर्तमान में भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने और भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार सुनिश्चित करने के लिए पुरे देश में जन प्रतिरोध खड़ा हो रहा है और जगह-जगह से जुझारू प्रतिवादों और आन्दोलन की ख़बरें आ रही हैं. पुरे भारत में जन संगठन और ट्रेड यूनियन अपने-अपने इलाकों में आन्दोलन को और अधिक तीखा करने के लिए लोगों के सामने बिल के जन विरोधी चरित्र को रखते हुए हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैंतथा पुरे देश में जगह-जगह शहीदी दिवस (23 मार्च) को भू-अधिकार दिवस के रूप में मनाया गया है. भूमि अधिग्रहण बिल रद्द हो यह आन्दोलनों की फौरी मांग है लेकिन भू-अधिकार और विशेष तौर पर भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार के मुद्दे को भूमि अधिग्रहण बिल विरोधी आन्दोलन के केंद्र में रखा गया हैऔर यह आन्दोलन अध्यादेश रद्द हो जाने के बाद भी भू-अधिकार के प्रश्न पर आगे भी जारी रहेगा. आने वाले दिनों में भूमि अधिकार और श्रम अधिकारों के सवाल पर'भूमि अधिग्रहण नहीभू-अधिकार चाहिएनारे के साथ जन संगठनों और ट्रेड यूनियनों के संयुक्त नेतृत्व में जन अभियान चलेगा.   

     

    भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करवाने और सबके लिए और खास कर भूमिहीनों के लिए भू-अधिकार की लड़ाई को आगे बढ़ाने हेतु व्यापक और दूरगामी रणनीति तैयार करने के हेतु विचार विमर्श करने के लिए 2 अप्रैल 2015 को एक सम्मलेन आयोजित किया गाया है और उसी दिन सायं 4-6 बजे तक राजनितिक पार्टी के प्रतिनिधियों/सांसदों के साथ भी इस मुद्दे पर मीटिंग आयोजित होगी. जिसमे भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में संघर्ष करने वाले सभी संगठनों के प्रतिनिधि सादर आमंत्रित हैं. मीटिंग में मेधा पाटकर, अशोक चौधरी, हन्नान मौला, अतुल अंजान, डॉ सुनीलम, राकेश रफीक, भूपेन्द्र सिंह रावत एवं अन्य साथी शामिल होंगे.

     

    रोमा, संजीव, मधुरेश, श्वेता, कृष्णा प्रसाद, वीजू कृष्णन, प्रताप, सत्यम, मीरा, रागीव

     समन्वय समिति की ओर से  (For Coordinating Committee)

     

    Contact : 9818905316, 9958797409, 9911528696

     













    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com

    Delhi off - C/o NTUI, B-137, Dayanand Colony, Lajpat Nr. Phase 4, NewDelhi - 110024, Ph - 011-26214538




    -- 

    All India Union of Forest Working People AIUFWP
    11 Mangal Nagar,
    Saharanpur, U.P.247001
    Mobile> 09410418901,09868857723




    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com

    Delhi off - C/o NTUI, B-137, Dayanand Colony, Lajpat Nr. Phase 4, NewDelhi - 110024, Ph - 011-26214538

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    Hem Mishra brutally beaten on Nagpur Central Prison premises by Nagpur Police.

    Hem Mishra, Maroti Kurvatkar, and G Naga Saibaba demand strict action against guilty police personnel.
    (Below is the English Translation of a Press Note issued in Marathi by Hem Mishra, Maroti Kurvatkar and G.N. Saibaba)
    PRESS NOTE
    POLICE BEAT UP PRISONER ON PRISON PREMISES
    THE CASE OF POLITICAL PRISONER, JNU STUDENT, HEM MISHRA
    The Nagpur police abused and beat up Hem Keshavdutt Mishra, student ofDelhi's Jawaharlal Nehru University and  presently lodged in Nagpur Central Prison over the issue of applying handcuffs. They attacked him cruelly and injured him.
    This illegal and inhuman act of the police occurred just outside the prison gate within the prison premises on 20-03-2015 at around 10-00 a.m. when Hem Mishra was being taken for medical treatment to the Government Medical Hospital.
    The Supreme Court has long ago ordered that handcuffs should not be applied and ropes should not be tied to prisoners being taken from prison to court or hospital. This provision has also been incorporated in the Criminal Manual and theJail Manual. Besides, the Assistant Inspector General of Police (Law and Order), Office of the Director General of Police has also issued a circular in this regard.
    As per this, the police have been given clear orders not to apply handcuffs or tie ropes to prisoners being taken from the prison to the court or hospital. In case, in an exceptional circumstance, there is a need to apply handcuffs or tie ropes then it is necessary to take the permission of the concerned court. But the Maharashtra police are openly violating the orders of the Supreme Court.
    On 20-03-2015, when undertrial prisoner Hem Mishra was being taken to the Government Medical Hospital for medical treatment he informed the police of these orders of the Supreme Court. But the police without bothering tried to forcibly apply handcuffs. When he again tried to explain to them, the police abused him and beat him up. Further, they cruelly attacked him and injured him. They tore his clothes and also threatened to "see" him.
    These acts of the police are unconstitutional and illegal. They are also a violation of the orders of the Supreme Court. The victim has therefore sent a complaint to the Dhantoli Police Station through the Prison Superintendent calling for registration of an offence against the concerned guilty persons in this case and for their arrest. A complaint regarding this incident has also been made to the concerned court, the Principal Judge, Gadchiroli Sessions Court.
    Hem Mishra, G.N. Saibaba, Maroti Kurvatkar, have vide Press Release demanded that strict action should be taken against the guilty in this case.

    Yours faithfully,
    1) Hem Mishra -sd-
    2) Maroti Kurvatkar -sd-


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    Press Statement



    The Polit Bureau of the Communist Party of India (Marxist) has issued the
    following statement:



    Pursue Appeal in Babri Masjid Case





    The appeal against the Allahabad High Court verdict acquitting top BJP and
    VHP leaders of criminal conspiracy in the demolition of the Babri Masjid is
    pending before the Supreme Court.  The CBI had made the appeal nine months
    after the High Court verdict of May 2010.  The CBI has been lax in pursuing
    the matter in the Supreme Court.



    The Polit Bureau of the CPI(M) demands that the CBI pursue the appeal
    vigorously in the Supreme Court and not be influenced by extraneous
    considerations given the fact that top leaders of the ruling party are
    involved in the case.





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    Dear Harpal,
       This is blog link, where English translation of the same is posted.





    Dear Friends,
    This is my blog-bhagatsinghstudy post being shared as a group mail. I apologize in advance to those friends, who may not like to receive such group mails and I request them to pl. drop a line of their unwillingness to receive such mails, so that I can take their name/names out of group list. Your responses are as much welcome.
    Regards
    Chaman Lal

    भगत सिंह को पीली पगड़ी किसने पहनाई?
    चमन लालरिटायर्ड प्रोफ़ेसरजेएनयूदिल्ली
    ·         29 मार्च 2015
    मेरे पास भगत सिंह से जुड़ी 200 से ज़्यादा तस्वीरें हैं. इनमें उनकी प्रतिमाओं के अलावा किताबों और पत्रिकाओं में छपी और दफ़्तर वगैरह में लगी तस्वीरें शामिल हैं. ये तस्वीरें भारत के अलग अलग कोनों के अलावा मारिशसफिजी,अमरीका और कनाडा जैसे देशों से ली गई हैं.
    इनमें से ज़्यादा तस्वीरें भगत सिंह की इंग्लिश हैट वाली चर्चित तस्वीर हैजिसे फ़ोटोग्राफ़र शाम लाल ने दिल्ली के कश्मीरी गेट पर तीन अप्रैल, 1929 को खींची थी. इस बारे में शाम लाल का बयान लाहौर षडयंत्र मामले की अदालती कार्यवाही में दर्ज है.
    लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मीडियाखासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भगत सिंह की वास्तविक तस्वीरों को बिगाड़ने की मानो होड़ सी मच गई है. मीडिया में बार-बार भगत सिंह को किस अनजान चित्रकार की बनाई पीली पगड़ी वाली तस्वीर में दिखाया जा रहा है.
    पढ़ें लेख विस्तार से
    भगत सिंह (बाएँ से दाएँ)11 साल, 16 साल, 20 साल और क़रीब 22 साल की उम्र की तस्वीरें. (सभी तस्वीरें चमन लाल ने उपलब्ध कराई हैं.)
    भगत सिंह की अब तक ज्ञात चार वास्तविक तस्वीरें ही उपलब्ध हैं.
    पहली तस्वीर 11 साल की उम्र में घर पर सफ़ेद कपड़ों में खिंचाई गई थी.
    दूसरी तस्वीर तब की है जब भगत सिंह क़रीब 16 साल के थे. इस तस्वीर में लाहौर के नेशनल कॉलेज के ड्रामा ग्रुप के सदस्य के रूप में भगत सिंह सफ़ेद पगड़ी और कुर्ता-पायजामा पहने हुए दिख रहे हैं.
    तीसरी तस्वीर 1927 की हैजब भगत सिंह की उम्र क़रीब 20 साल थी. तस्वीर में भगत सिंह बिना पगड़ी के खुले बालों के साथ चारपाई पर बैठे हुए हैं और सादा कपड़ों में एक पुलिस अधिकारी उनसे पूछताछ कर रहा है.
    चौथी और आखिरी इंग्लिश हैट वाली तस्वीर दिल्ली में ली गई है तब भगत सिंह की उम्र 22 साल से थोड़ी ही कम थी.
    इनके अलावा भगत सिंह के परिवारकोर्टजेल या सरकारी दस्तावेज़ों से उनकी कोई अन्य तस्वीर नहीं मिली है.
    आखिर क्यों?
    वाईबी चव्हाणभगत सिंह की प्रतिमा का शिलान्यास करते हुए. (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है.)
    आख़िरकारभगत सिंह की काल्पनिक और बिगाड़ी हुई तस्वीर इलेक्ट्रानिक मीडिया में वायरल कैसे हो गई?
    1970 के दशक तक देश हो या विदेशभगत सिंह की हैट वाली तस्वीर ही सबसे अधिक लोकप्रिय थी. सत्तर के दशक में भगत सिंह की तस्वीरों को बदलने सिलसिला शुरू हुआ.
    भगत सिंह जैसे धर्मनिरपेक्ष शख्स के असली चेहरे को इस तरह प्रदर्शित करने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार पंजाब सरकार और पंजाब के कुछ गुट हैं.
    23 मार्च, 1965 को भारत के तत्कालीन गृहमंत्री वाईबी चव्हाण ने पंजाब के फ़िरोजपुर के पास हुसैनीवाला में भगत सिंहसुखदेव और राजगुरु के स्मारक की बुनियाद रखी. अब यह स्मारक ज़्यादातर राजनेताओं और पार्टियों के सालाना रस्मी दौरों का केंद्र बन गई है.
    विचारों से दूरी
    दरअसल भारत की सत्ताधारी पार्टियाँ भगत सिंह की बदली हुई तस्वीरों के साथ उन्हें एक प्रतिमा में बदलकर उसके नीचे उनके क्रांतिकारी विचारों को दबा देना चाहती हैंताकि देश के युवा और आम लोगों से उनसे दूर रखा जा सके.
    ब्रिटेन में रहने वाले पंजाबी कवि अमरजीत चंदन ने वो तस्वीर शाया की है,जिसमें 1973 में खटकर कलाँ में पंजाब के उस समय के मुख्यमंत्री और बाद में भारत के राष्ट्रपति बने ज्ञानी जैल सिंह भगत सिंह की हैट वाली प्रतिमा पर माला डाल रहे हैं. भगत सिंह के छोटे भाई कुलतार सिंह भी उस तस्वीर में हैं.
    भारत के केंद्रीय मंत्री रहे एमएस गिल बड़े ही गर्व के साथ कहते सुने गए हैं कि उन्होंने ही प्रतिमा में पगड़ी और कड़ा जोड़ा था. यह समाजवादी क्रांतिकारी नास्तिक भगत सिंह को 'सिख नायकके रूप में पेश करने की कोशिश थी.
    क्रांतिकारी छवि
    भगत सिंह के क्रांतिकारी लेख 1924 से ही विभिन्न अख़बारोंपत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं. इस समय उनके लेख किताबोंपुस्तिकाओंपर्चों वगैरह के रूप में छप रहे हैंजिनसे इस नायक की क्रांतिकारी छवि उभर कर सामने आती है.
    अस्सी के दशक तक भगत सिंह का लेखन हिंदीपंजाबी और अंग्रेजी में छप चुका थाजिसकी भूमिका बिपिन चंद्रा जैसे प्रसिद्ध इतिहासकार ने लिखी थी.
    उनके लेखन से यह प्रमाणित हो गया कि वो एक समाजवादी और मार्क्सवादी विचारक थे. इससे भारत के कट्टरपंथी दक्षिणपंथी धार्मिक समूहों के कान खड़े हो गए.
    मीडिया की साज़िश?
    भगत सिंह को बहादुर और देशभक्त बताने के लिए उन्हें पीली पगड़ी में दिखाना ज्यादा आसान समझा गया.
    यह उग्र मीडिया प्रचार के जरिए भगत सिंह की बदली गई छवि के ज़रिए एक अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी विचारक के मुक्तिकामी विचारों को दबाने की साज़िश है.
    (चमन लाल जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालयदिल्ली के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेजों का संपादन किया है. वो हिन्दीपंजाबी और अंग्रेजी में भगत सिंह पर किताबें लिख चुके हैं जिनका उर्दूमराठी और बांग्ला इत्यादि में अनुवाद हो चुका है.)
     


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  • 03/31/15--08:04: शत प्रतिशत हिंदुत्व का ताजा फार्मूला घर वापसी के जरिये हिंदुत्व और अपनी जाति में लौटे बिना गैरहिंदुओं को आरक्षण नहीं मिलें,इसका चाकचौबंद इंतजाम हो रहा है। सच का सामना करें अब भी कि बहुजन ही जाति उन्मूलन के सबसे ज्यादा खिलाफ हैं और बहुजन जिसदिन जाति की जंजीरें तोड़ देंगे न जाति रहेगी और न हिंदू साम्राज्यवाद का नामोनिशान रहेगा। हिंदुत्वकरण का यह धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद हिंदुत्व का पुनरूत्थान नहीं है यह बाकायदा मनुस्मृति के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था से प्रजाजनों का सिसिलेवार बहिस्कार और नरसंहार का कार्निवाल है। पलाश विश्वास
  • शत प्रतिशत हिंदुत्व का ताजा फार्मूला

    घर वापसी के जरियेहिंदुत्व और अपनी जाति में लौटे बिना गैरहिंदुओं को आरक्षण नहीं मिलें,इसका चाकचौबंद इंतजामहो रहा  है।


    सच का सामना करें अब भी कि

    बहुजन ही जाति उन्मूलन के सबसे ज्यादा  खिलाफ हैं

    और बहुजन जिसदिन जाति की जंजीरें तोड़ देंगे न जाति रहेगी और न हिंदू साम्राज्यवाद का नामोनिशान रहेगा।

    हिंदुत्वकरण का यह धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद हिंदुत्व का पुनरूत्थान नहीं है यह बाकायदा मनुस्मृति के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था से प्रजाजनों का सिसिलेवार बहिस्कार और नरसंहार का कार्निवाल है।

    पलाश विश्वास

    सबसे पहले साफ यह कर दूं कि कि कोई होगा ईश्वर किन्हीं समुदाय केलिए,कोई रब भी होगा,कोई खुदा होगा तो कोई मसीहा ,फरिश्ता और अवतार।उनकी आस्था और उनके अरदास पर हमें कुछ भी कहना नहीं है जिनपर नियामतों और रहमतों की बरसात हुई हैं।हमें उनकी आस्था और भक्ति से तकलीफ भी नहीं है और न हमारी हैसियत शिकायत लायक है।


    हम सिरे से आस्था से बेदखल हैं।किसी ईश्वर,किसी मसीहा और किसी अवतार ने हमें कभी मुड़कर भी नहीं देखा।इसलिए नाम कीर्तन की उम्मीद कमसकम हमसे ना कीजिये।बेवफा भी नहीं हम।लेकिन हमसे किसी ने वफा भी नहीं किया।


    हमने न किसी धर्मस्थल में घुटने टेके हैंं और न किसी पुरोहित का यजमान रहा हूं और न किसी पवित्र नदी या सरोवर में अपने पाप धोये हैं।न मेरा कोई गाडफादर या गाड मादर है।हम किसी गाड मदर या गाडफादर के नाम रोने से तो रहे।


    ताजा खबर यह है कि जाति के आधार पर जो अहिंदू बहुजन दूसरे धर्मों के अनुयायी होकर भी आरक्षण का लाभ लेना चाहते हैं,उनके लिए घर वापसी के अलावा आरक्षण के सारे दरवाजे गोहत्या निषेध की तरह बंद करने की तैयारी है।


    मोदी सरकार और संघपरिवार का साफ साफ मानना है कि जातिव्यवस्था सिर्फ हिंदुओं में है और इसके आधार पर आरक्षण का लाभ सिर्फ हिंदुओं को मिलना चाहिए।


    धर्मांतरित जिन बहुजनों ने दूसरे किसी धर्म को अपनाया है और वहां जाति व्यवस्था नहीं है,भविष्य में उन्हें उस धर्म के अनुयायी रहते हुए हिदुओं की जाति व्यवस्था के मुताबिक आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।


    घर वापसी के जरिये हिंदुत्व और अपनी जाति में लौटे बिना गैरहिंदुओं को आरक्षण न मिलें,इसका चाकचौबंद इंतजाम हो रहा  है।


    भारत को 2021 तक ईसाइयों और मुसलमानों से मुक्त करने के लिए शत प्रतिशत हिंदुत्व का यह अचूक रामवाण अब आजमाया ही जाने वाला है।फिर देखेंगे कि कैसे गैर हिंदू होकर रोजी रोटी कमायेंगे।कैसे गैरहिंदू होकर भी आरक्षण का मलाई बटोरते हुए अपनी अपनी जाति से चिपके रहेंगे और हिंदू न बनने का साहस रखेंगे।


    हमारे लिए खबर यह कतई नहीं कि लौहपुरुष रामरथी लालकृष्ण आडवाणी फिर कटघरे में हैं बाबरी विध्वंस के मामले में।


    हम उनको कटघरे में खड़ा करने की टाइमिंग देख रहे हैं कि बाबरी मामला रफा दफा होने के बाद प्रवीण तोगड़या जैसों के उदात्त उद्घोष राम की सौगंध खाते हैं, भव्य राममंदिर फिर वहीं बनायेंगे के महाकलरव मध्ये रफा दफा राममंदिर बाबरी  प्रकरण को फिर नये सिरे से दावानल की शक्ल देने से धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के खिलखिलाते कमल से कितनी कयामतें और बरसने वाली हैं।


    शत प्रतिशत हिंदुत्व के एजंडे और 2021 तक भारत को ईसाइयों और मुसलमानों से मुक्त कराने के लिए  आहूत राजसूय यज्ञ में तो फिर क्या संघ परिवार अपने सबसे मजबूत,सबसे तेज और सबसे आक्रामक दिग्विजयी अश्व को बलिप्रदत्त दिखाकर सारे भारत में नये महाभारत की बिसात तो नहीं बिछा रहा है,हमारे दिलोदिमाग में ताजा खलबली यही है।


    गौर कीजिये,अदालती सक्रियताओं के बावजूद मुक्त बाजारी अर्थव्यवस्था के तमाम अहम मामलों में मसलन भोपाल गैस त्रासदी,आपरेशन ब्लू स्टार और सिखों के नरसंहार,बाबरी विध्वंस के आगे पीछे देश विदेश दंगों के कार्निवाल और गुजरात नरसंहार के मामलों में दशकों की अदालती कार्रवाई के बावजूद न्याय किसी को नहीं मिला है।न फिर कभी मिलने के आसार हैं।राजनीति की बासी कढ़ी उबाल पर है।


    सच यह है कि न्याय की लड़ाई को ही धर्मोन्मादी महाभारत में अबतक तब्दील किया जाता रहा है और न्याय पीड़ितों से हमेशा मुंह चुराता जा रहा  है।


    गौरतलब है कि इन तमाम माइलस्टोन घटनाओं के मध्य अभूतपूर्व धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण और बहुसंख्य बहुजन जनता के व्यापक पैमाने पर हिंदुत्वकरण की नींव पर खड़ा है आज का मुक्त बाजार।


    यह हम पहली बार नहीं लिख रहे हैं और शुरु से हम लिखते रहे हैं ,बोलते रहे हैं कि मनुस्मृति कोई धर्म गर्ंथ नहीं है ,वह मुकम्मल अर्थशास्त्र है और वह सिर्फ शासक वर्ग का अर्थशास्त्र है जो प्रजाजनों को सारे संसाधऩों,सारे अधिकारों और उनके नैसर्गिक अस्तित्व और पहचान को जाति में सीमाबद्ध करके उन्हें नागरिक और मानवाधिकारों से वंचित करके सबकुछ लूट लेने का एकाधिकारवादी वर्चस्ववादी रंगभेदी नस्ली अर्थतंत्र और समाजव्यवस्था की बुनियाद है।मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था और ग्लोबल हिंदू साम्राज्यवाद का फासीवादी मुक्तबाजारी बिजनेस फ्रेंडली विकासोन्मुख राजकाज भी वही मनुस्मृति अनुशासन की अर्थव्यवस्था की निरंकुश जनसंहार संस्कृति की बहाली है।


    अर्थशास्त्री बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर इस सत्य का समाना कर चुके थे और उन्हें मालूम था कि एकाधिकारवादी वर्णवर्चस्वी नस्ली इस शोषणतंत्र की मुकम्मल अर्थव्यवस्था की बुनियाद जाति है,हिंदू साम्राज्यवाद का एकमेव आधार जाति है,और इसीलिए उन्होंने जाति उन्मूलन का एजंडा दिया और वंचितों को जाति के आधार पर नहीं,वर्गीय नजरिये से देखा।जाति उन्मूलन के लिए वे जिये तो जाति उन्मीलन के लिएवे मरे भी।


    वक्त है अब भी सच का सामना करें अब भी कि

    बहुजन ही जाति उन्मूलन के सबसे ज्यादा खिलाफ हो गये हैं

    और बहुजन जिस दिन जाति की जंजीरें तोड़ देंगे

    न जाति रहेगी और

    न हिंदू साम्राज्यवाद का नामोनिशान रहेगा।


    हिंदुत्वकरण का यह धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद हिंदुत्व का पुनरूत्थान नहीं है यह बाकायदा मनुस्मृति के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था से प्रजाजनों का सिसिलेवार बहिस्कार और नरसंहार का कार्निवाल है।


    हमारे परम आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़े से पढ़े लिखे बहुजनों को बहुत एलर्जी है कि वे पालिटिकैली करेक्टनेस की परवाह किये बिना सच को सच कहने को अभ्यस्त हैं।बहुजनों को वे सुहाते नहीं है जबकि वे प्रकांड विद्वान होने के सात साथ बाबासाहेब के निकट परिजन भी हैं जो बाबासाहेब के नाम पर कोई राजनीति नहीं करते हैं दूसरे परिजनों और अनुयायियों की तरह।


    जिन मुद्दों पर मैं रोजाना अपने रोजनामचे में पढ़े लिखे बहुजनों की नींद में खलल डालने की जोर कोशिश कर रहा हूं और जिन मुद्दों पर उनके यहां सिरे से खामोशी हैं,उन मुद्दों पर हमारी आनंदजी से लगातार लगातार लंबी बातें होती रही हैं।सूचनाओं से भी हमारे लोगों को कुछ लेना देना नहीं है।इसलिए वह सिलसिला बंद करना पड़ रहा है।


    बाबासाहेब जाति उन्मूलन एजंडे  में ही न सिर्फ भारतीय जनगण और न सिर्फ अछूतों, आदिवासियों, पिछडो़ं और स्त्रियों,किसानों और मजदूरों की मुक्ति का रास्ता देखते थे,बल्कि मानते रहे होंगे कि यह एकाधिकार प्रभुत्व से भारतीय अर्थव्यवस्था में आम जनता के हक हकूक बहाले करने का एकमात्र रास्ता है,जिसके लिए साम्राज्यवाद और सामंतवाद दोनों ही मोर्चे पर मुक्तिकामी जनता का जनयुद्ध अनिवार्य है इस राज्यतंत्र को सिरे से बदलकर समता और सामाजिक न्याय आधारित वर्गविहीन जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए।


    भारत के वाम ने इस कार्यभार को कितना समझा ,कितना नहीं समझा,इस पर यह संवाद फिलहाल नहीं है।बाबासाहेब को कभी दरअसल वाम ने सीरियसली समझने की कोशिश की है और अछूत वोटबैंक के मसीहा से ज्यादा उन्हें कोई तरजीह दी है,वाम आंदोलन में सिरे से अनुपस्थित अंबेडकर का किस्सा यही है।अलग से इसे साबित करने की जरुरत नहीं है।वाम मित्र और विशेषज्ञ इसपर कृपया गौर करें तो शायद बात कोई बने।


    सच यह है कि इस कार्यभार को स्वीकार करने में कोई बहुजन पढ़ा लिखा किसी भी स्तर पर तैयार नहीं है और बाबासाहेब के अनुयायी होने का एक मात्र सबूत उसका यह है कि या तो जयभीम कहो,या फिर जय मूलनिवासी कहो या फिर नमो बुद्धाय कहो और हर हाल में अपनी अपनी जाति को मजबूत करते रहो।


    सत्ता में भागीदारी के लिए बहुजन एकता और सत्ता में आने के बाद बाकी दलित पीड़ित अन्य जातियों के सत्यानाश की कीमत पर सवर्णों से,प्रभूवर्ग से राजनीतिक समीकरण साधकर सभी संसाधनों और मौकों को सिर्फ अपनी जाति के लिए सुरक्षित कर लेना बहुजन राजनीति है।यह समाजवाद भी है।


    बदलाव,समता और सामाजिक न्याय का कुल मिलाकर यही एजंडा है जिसका मनुस्मृति शासन ,मनुस्मृति अर्थव्यवस्था,नस्ली भेदभाव,वर्ण वर्चस्व के विरुद्ध युद्ध से कोई लेना  देना नहीं है और न बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के एजंडे से।


    उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र,यूपी बिहार में सामाजिक बदलाव का पूरा इतिहास जातियुद्ध के सिवाय,जाति वर्चस्व के सिवाय,हिंदुत्व की समरसता के सिवाय़ क्या है,पता लगे तो हमें भी समझा दीजिये।



    अपनी अपनी जाति की गोलबंदी के लिए बाबासाहेब के जन्मदिन,बाबासाहेब के तिरोधान दिवस और बाबासाहेब के दीक्षा दिवस का इस्तेमाल करते हुए हम क्रमशः ब्राह्मणों से अधिक ब्राह्मण ,ब्राह्मणों से अधिक कर्मकांडी और ब्राह्मणों से सौ गुणा ज्यादा जातिवादी मनुस्मृति के पहरुए,मनुस्मृति के झंडेवरदार बजरंगी बनते चले जा रहे हैं और नीले रंग पर भी अपना दावा नहीं छोड़ रहे हैं।बहुजनों में अंतरजातीय विवाह का चलन नहीं है जबकि ब्राह्मणों और सवर्णों से रिश्ते बनाने का कोई मौका बहुजन पढ़े लिखे छोड़ते नहीं है और अपने कुलीनत्व में बहुजनों से हरसंभव दूरी बनाये रखने में कोई कोताही बरतते नहीं है।


    अपनी जाति के लिए ज्यादा से ज्यादा आरक्षण की लड़ाई एक नया महाभारत है।इससे दबंग जातियां कोई किसी से पीछे नहीं है।जिन्हें आरक्षण मिला नहीं है,वे आरक्षण की मृगतृष्णा में दूसरे बहुजनों के खून की नदियां पार करने की तैयारी करने से हिचक नहीं रहे हैं।


    ऐसा हमने रोजगार संकट के विनिवेश निजीकरण कारपोरेट राजकाज समय में विभिन्न राज्य में खूब देखा है।आप भी याद करें।नाम उन जातियों का बताना उचित न होगा।इसलिए जानबूझकर उदाहरण दे नहीं रहा हूं।


    यह बहुजन सामज है दरअसल।इस सच का सामना किये बिना हम मुक्तबाजार के वधस्थल पर भेडो़ं की जमात के अलावा कुछ नहीं हैं और हमारा अंतिमशरण स्थल फिर वही संघपरिवार का समरस हिंदुत्व है।


    अपने आनंद तेलतुंबड़े सच का समाना करने में हमसे ज्यादा बहादुर हैं और सच सच कहने से नहीं हिचकते कि आरक्षण की व्यवस्था से जाति व्यवस्था को संवैधानिक वैधता मिली है और जाति व्यवस्था दीर्घायु हो गयी है।


    आरक्षण के लाभ जो तबका जाति के नाम पर उठा चुका है,उनका सारा कृतित्व व्यक्तित्व और वजूद जाति अस्मिता पर निर्भर हैं और अपनी संतानों को कुलीनत्व और नवधनाढ्य तबके में शामिल करने की अंधी दौड़ में वह तबका जाति को ही मजबूत कर रहा है।


    वंचित बहुजन जिनके सामने जीने का कोई सहारा नहीं है,जो निरंतर बेदखली का शिकार है,जो नागरिक और मानवाधिकारों से वंचित हैं,जो या तो मारे जा रहे हैं या थोकभाव से आत्महत्या के शिकार हो रहे हैं,उन बहुजनों से पढ़े लिखे बहुजनों का कोई ताल्लुकात नहीं है।


    जिस जाति व्यवस्था की वजह से बहुसंख्यबहुजन मारे जा रहे हैं,पढ़े लिखे मलाईदार बहुजन संघ परिवार के एजंडे के मुताबिक उसी जाति व्यवस्था को मजबूत करने का हर संभव करतब कर रहे हैं और जाति उन्मूलन पर बात करते ही हायतोबा मचाकर किसी को भी ब्राह्मणवादी करार देकर सिरे से बहस चलने नहीं देते हैं।


    बाबासाहेब ने सच ही कहा था कि सिर्फ उन्हें नहीं,बल्कि बहुसंख्य बहुजनों को लगातार धोखा दे रहे हैं पढ़े लिख मलाईदार बहुजन,जिनका जीवन मरण जाति का गणित है और जाति के गणित के अलावा उनके दिलोदिमाग को कुछ भी स्पर्श नहीं करता ।


    स्वजनों की खून की नदियां उन्हें कहीं दीखती नहीं हैं।दीखती हैं तो उन्हें पवित्र गंगा मानकर उसमे स्नान करके खून से लथपथ होने में भी उन्हें न शर्म आती है और न हिचक होती है।


    विनिवेश और संपूर्ण निजीकरण के जमाने में आरक्षण से अब रोजगार और नौकरियां मिलने के अवसर नहीं के बराबर हैं क्योंकि स्थाई नियुक्तियां हो नहीं रही हैं और सरारी नियुक्तियां हो न हो,सरकारी क्षेत्र का दायरा अब शून्य होता जा रहा है।यह आरक्षण सिर्फ और सिर्फ राजनीति आरक्षण है जिसेसबहुजनों का अब कोई भला नहीं हो रहा है,बहुजनों का सत्यानाश करनेवाले अरबपति करोड़पति नवब्राह्मण तबका जरुर पैदा हो रहा है जो बहुजनों को भेड़ बकरियों की तरह हांक रहा है और उनका गला भी बेहद प्यार से सहलाते हुए रेंत रहा है।


    बहुजन पढ़े लिखे मलाईदार तबके ने इसे रोकने के लिए बामसेफ जैसे जबरदस्त संगठन होने के बावजूद पिछले तेइस साल तक कोई पहल उसी तरह नहीं की ,जैसे ट्रेड यूनियनों ने मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था के नरसंहारी अश्वमेध का विरोध न करके बचे खुचे कर्मचारियों के बेहतर वेतनमान बेहतर भत्तों और सहूलियतों की लडाई में ही सारी ऊर्जा लगा दी।


    मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के बजाय नवधनाढ्य सत्ता वर्ग में शामिल कर्मचारी इस व्यवस्था की सारी मलाई खुद दखल करने की लड़ाई लड़ते रहे हैं और जाति इस दखलदारी की सबसे अचूक औजार  है।



    हमारी मानें तो संघ परिवार का कोई विशेष योगदान नहीं है  हिंदुत्व के इस पुनरूत्थान में।


    नरेंद्र मोदी ब्राह्मण नहीं हैं।

    आडवाणी भी ब्राह्मण नहीं हैं।

    बाबरी विध्वंस से लेकर कारसेवकों और उनके अगुवा समुदायों के अलग अलग चेहरे देखें,तो वे ब्राह्मण राजपूत कम ही होंगे,जिन्हें कोसे गरियाये बिना बहुजन राजनीति का काम नहीं चलता।संघ परिवार में ब्राह्मणों की जो जगह थी,वह अब बहुजनों के कब्जे में है।

    अपने ही नरसंहार का सामान जुटाने में लगे हैं बहुजन।


    धर्मोन्मादी बहुजन कारसेवक बहुजन हीं हैं और संघ परिवार के हिंदुत्व की कामयाबी का रसायन लेकिन यही है।


    संघ परिवार ने इसे ठीक से समझा है और इस रसायन के सर्वव्यापी असर के लिए जो कुछ भी करना चाहिए,सबकुछ किया है और उनका सबसे बड़ा दांव निःसंदेह नरेंद्रभाई मोदी ओबीसी है,जो जाति पहचान और समीकरण के हिसाब से कमसकम बयालीस से लेकर बावन फीसद तक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं।


    वामदलों ने किसी भी स्तर पर कभी बहुजनों को नेतृत्व देने की कोशिश नहीं की न बहुजनों की वहां कोई सुनवाई हुई है और देशभर में हाशिये पर हो जाने के बावजूद वाम सच का सामना करने को अभ भी तैयार नहीं है,तो बहुजनों के सार्वभौम हिंदुत्वकरण में कामयाब संघ परिवार के मुकाबले हवा हवाई युद्ध घोषणाओं के सिवाय हमारे लिए फिलहाल करने को कुछ नहीं है।


    लौहपुरुष को कटघरे में खड़े हो जाने से जो हर्षोल्लास है,उसका दरअसल मतलब कुछ और है।


    भोपाल गैस त्रासदी,आपरेशन ब्लू स्टार और सिखों के नरसंहार,बाबरी विध्वंस और गुजरात नरसंहार के मामलों में हमने अंधे कानून का दसदिगंत व्यापी जलवा देखा है तो मध्यबिहार के तमाम नरसंहार के मामलों में यही होता रहा है।


    कानून के राज का करिश्मा यह है कि दलित और स्त्री उत्पीड़न के तमाम मामलों में यही सच बारंबार बारंबार दोहराया जाता रहा है।


    कानून के राज का करिश्मा यह है कि फर्जी मुठभेड़ों और फर्जी आतंकी हमलों के तमाम मामले लेकिन कभी खुले ही नहीं है।


    कानून के राज का करिश्मा यह है कि नक्सली और माओवादी जिन्हें करार दिया जाता है,जो राष्ट्रद्रोही करार दिये जाते हैं,उन्हें भी न्याय नहीं मिलता है।

    कानून के राज और मिथ्या संप्रभू लोकतंत्र का करिश्मा यह है कि इरोम शर्मिला चौदह साल से अनशन पर हैं न सरकार उनकी सुवनवाई कर रही है और न देश उनके साथ है।


    कानून के राज का करिश्मा यह है कि जल जंगल जमीन नागरिकता रोजगार से बेदखल जनता काभो न्याय लेकिन मिला नहीं है।


    कानून के राज का करिश्मा यह है कि अभी अभी हाशिमपुरा नरसंहार कांड जिसमें सिर्फ पीएसी नहीं,सेना कीभी भारी भूमिका है, टाय टाय फिस्स है।


    कानून के राज का करिश्मा यह है कि अभी अभी चिटफंड घोटालों और भर्ष्टाचार के तमाम मामलों ,कालाधन किस्सो की क्षत्रपसाधो संसदीय सहमति की राजनीति भी हम देख रहे हैं।


    इसलिए निवेदन है कि ज्यादा खुश होने की जरुरत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट का नोटिस मिलने से ही लौह पुरुष के खिलाफ तमाम आरोप साबित हो जायेंगे और इस प्रकरण के तमाम लोग धर लिये जायेंगे,कृपया ऐसी उम्मीद न करें।


    फासीवाद रोकना है तो बहुजनों को संबोधित करें और जाति उन्मूलन के एजंडे पर तुरंत बहस चालू करें,जो सबसे जरुरी है।



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    Janhastakshep: A campaign against Fascist Designsd

    Delhi

     

    INVITES YOU

    To

    A public meeting

    On

    STATE AND COMMUNALISMTravesty of Justice in Hashimpura massacre, 1987

     

    Venue: GANDHI PEACE FOUNDATION, Deen Dayal Marg (Near ITO)

     

    Date: 9th April 2015

     

                                                     Time: 5.30 PM   

     

    ·        Justice (Retd.)  Rajinder achchar, member of the PUCL fact-finding team  into the genocide.

    ·        Rebeca John, Lawyer representing the ccase.

    ·        Saeed Naqvi, senior journalist

    And others

     

     

    Friends,

    Playing communal card and communal killings for electoral gains are not the monopoly of communal organizations only but even so-called secular parties also play communal cards leading to the increasing trend of communalization of the state apparatuses including judiciary. Most glaring example of connivance of state and its judicial apparatus is the judgment in the Hashimpura massacre in 1987 in which 42 men were cold-bloodedly killed by the UP PAC and 5 managed to survive by pretending to be dead to narrate the ordeal. After 28 years of the proceedings, the court acquitted all the accused of one of the most gruesome state organized massacres. No one killed them. In 1987 the then Rajiv Gandhi government, having come to power with unprecedented parliamentary majority after the anti-Sikh pogrom of Delhi in 1984, opened the lock of the now no-more Babari Masjid at Ayodhya,  to counter the ongoing Mandir campaign of BJP under the leadership of L K Adwani. The decision to open the lock was protested at many places by different sections of the society. Muslims, being the community directly aggrieved, came out in large numbers to protest this communal  move by the Congress governments at Centre as well as in UP. As has been the experience over the years, whenever the Muslims come out in large numbers to protest it  is termed as riot. The then state Home Minister, P Chidambaram has been reported to have instructed the state government to 'crush the Muslims.' Following the tip the 41 battalion of the communally trained PAC (Provincial Armed Constabulary of UP), in the night of 22-23 May 1987, raided the Hashimpura village in the name of a search operation. Many Muslim men were arbitrarily picked up quefrom outside the mosque and huddled in a truck. They were taken to a lonely spot on the bank of Ganga canal and many of them shot dead with the service rifles by the uniformed policemen and their bodies thrown into the canal. Rest was taken to the banks of the Hinden River, shot and their bodies were left there.

     

    The entire incident would have simply been buried without any consequences to the perpetrators but for a timely report filed by Vibhuti  Narayan Rai, the then SP of Gaziabad and later supported by the testimonies of 5 survivors of the massacre.

     

    After 28 years of legal proceedings in the case, the court set aside the testimonies of the survivors to acquit the culprit policemen giving them the benefit of doubt. Apparently, no one killed the victims.

     

    This judgment conforms to the emerging pattern in which the courts in different parts of the country have acquitted the perpetrators of heinous crimes may they be against the dalits or the minorities. The acquittal of Ranvir Sena killers in the Laxampur Bathe and Bathani Tola massacres in Bihar for similar reasons are other cases in point.

     

    However, there is a pattern in the madness. Such crimes cannot but be committed with active connivance or direct participation of the state machinery. In any such instance the government and the police ensure that every shred of evidence is destroyed to save the culprits. It ought to be ensured in the interest of justice that the suspected government agencies are kept out of investigation in such cases.

     

    What is particularly noteworthy is that the ruling class parties have done little more than pay lip service to the cause of the victims in such instances of gross miscarriage of justice. Mere statements of protest and symbolism have come to replace the need for a sustained campaign towards the ends of justice.

     

    Janhastakshep seeks a broader discussion on the issue of communalization of .the security forces and the judiciary.  Please joins us in the discourse. 

     

    -sd-

     

    Ish Mishra

    Convener


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    Excuse Me MR.PM,Passengers to starve in Non VVIP trains as my Wife does in Amritsar Express for your Bullet PPP Dream!

    Palash Biswas

    My wife Sabita Biswas,aged 56 is travelling by 13049 Amitsar Express. Coach B-one,Berth number 48.She is in mourning as her elder brother died and she has to join her family in Bijnore.


    I saw her leaving Howrah on 13:50 by the train.Since,I could not go,we opted for 3A ticket and it was only available as all trains remain full until May 2nd.


    We could not manage a return ticket as she has to look for Tatkal on her  return.


    Amritasar Express has no Pantry Car and travellers have to starve as they are not getting even drinking water as hawkers are not allowed and IRTC has to do nothing with serving food to Amritsar Express.They could not manage even drinking water.


    On stations you may not get anaything thanks to catering privatisation.It is being proved to be horrible expreince to feel good about your Bullet PPP model for general pubic.


    My home State Uttarakhand is no more a part of the most powerful Uttarpradesh and is neglected by Indian government.


    Potentially,the most beautiful Hill stations and most holy pilgrimage,Uttarakhand destinations have very selected connectivity in every means.Power equations have not to change just because of Uttarakhand in New delhi and hence,Uttrakhand people have not to get the Railway Booty which other states have.We have no direct train for Nainital from Mumbai while have only one weekly Lalkuan Express and a Horrible long distance slowest train Bagh Express from Howrah.


    The trains going through Uttarakhand have nothing to offer.


    Every train is super slow and almost none of them have any facility for travellers and those have to travel in Uttarakhand have to feel  the Hell losing.

    Even the Punjab bound trains have nothing,we could realise this time only.


    Others may share their experience and we may publish them on Hatsakshep.



    Railway Budget has been claimed to be focused on traveller`s security and better food and facilities.Yes,while you travel by Rajdhani or Durnta and some other VVIP trains bound to super Smart Metro cities, you have on to complain.


    If a train bound to the holy city,Amritsar where the Golden Temple is situated,means hell losing,your claim to make religious journey seems to be business friendly Five Crore endorsement for Celebs as Aamir Khan paid,only which means just starving for general taxpayers.


    I am just sharing this to highlight the resultant dreams exposed naked which have everything for Desi Videshi Capital inflow for Complete Privatization of Railway at the cost of Taxpayer Indian citizens.


    I know,the PM ,the Railway Minister,Railway Board and Railway officials have nothing to do with public grievances.


    I am sharing this horror for those who have to travel by Indian Railway to become Bullet literally as it means.



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    अपने भाई और युवा हमारे समय के बेहतरीन कवि नित्यानंद गायेन के सौजन्य से।आज वरिष्ठ कवि -लेखक विष्णुचन्द्र शर्मा जी का जन्मदिन है ! उन्हें ढेरों शुभकामनाएं .
    आज उनकी एक कविता

    अंतरंग यात्रा 
    ------------------
    मेरी पृथ्वी 
    एक अंतरंग यात्रा है ,
    जहाँ हर आदमी 
    एक लहर -दर -लहर 
    नृत्यरत है !

    मेरी पृथ्वी की कोई 
    सरहद नहीं है !
    कोई पारपत्र नहीं चाहिए 
    सिर्फ़ स्वर शब्दों को 
    ध्वनि ब्रह्मांड को उदात्त बनती और 
    धीरे -धीरे खोलती 
    और खोलती चली जाती है 
    और लय में बाँध देती है 
    हमें तुम्हें !

    -विष्णुचंद्र शर्मा

    'आज वरिष्ठ कवि -लेखक विष्णुचन्द्र शर्मा जी का जन्मदिन है !  उन्हें ढेरों शुभकामनाएं .  आज उनकी एक कविता     अंतरंग यात्रा   ------------------  मेरी पृथ्वी   एक अंतरंग यात्रा है ,  जहाँ हर आदमी   एक लहर -दर -लहर   नृत्यरत है !    मेरी पृथ्वी की कोई   सरहद नहीं है !  कोई पारपत्र नहीं चाहिए   सिर्फ़ स्वर शब्दों को   ध्वनि ब्रह्मांड को उदात्त बनती और   धीरे -धीरे खोलती   और खोलती चली जाती है   और लय में बाँध देती है   हमें तुम्हें !    -विष्णुचंद्र शर्मा'

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    PF Pension dumped in Dalal Street!
    Palash Biswas

    Dear friends,just remember how many times I have been warning you for your PF,Pension,Gratuity and deposit going into Dalal Street.The great Indian Parliamentary consensus has ensured Insurance Open Market for DIN DAHARE Dacoity.We have lost the sovereignty to have our money.Right to property is being violated by the Manusmriti Foreign Capital Kesria Hindutva Corporate Hegemony.
    Here you are!

    To facilitate flow of EPFO funds into equity markets, Labour Ministry is proposing to start with investment of 1 per cent of its corpus into equity and related schemes and take it gradually to 5 per cent. 

    The investment pattern for the retirement fund body in this regard is likely to be notified soon by the Labour Ministry, a senior government official said today. 

    Finance Minister Arun Jaitley in the budget proposed a new investment pattern under which the EPFO would invest a minimum of 5 per cent of its investable funds into equity and equity related schemes. 

    "We will notify the investment pattern soon. Over a period of time, it makes sense to invest in equity. Investment in a basket of portfolio is safe. All over the world, experience is that equity investment has given the highest returns, the Labour Ministry official said. 

    "What we are thinking is that we will start with 1 per cent and will go up to 5 per cent. We will review and gradually increase the investment limit," the official said. 

    The official was talking to reporters on the sidelines of a meeting of Central Board Of Trustees (CBT), Employees' Provident Fund Organisation (EPFO) and Tripartite Consultation on Comprehensive Amendments to the Employees' Provident Funds & Miscellaneous Provisions Act, 1952. 

    Trade unions have opposed any move to invest EPFO fund in capital market, CITU president A K Padmanabhan said. 

    As per the mandate given by Finance Ministry, investment in equity and related instruments could be up to 15 per cent of total funds. 

    Labour Minister Bandaru Dattatreya said based on today's views and apprehensions, the ministry will discuss with appropriate authorities to dispel the apprehensions expressed by stakeholders. 

    During the meeting, EPFO Central Provident Fund Commissioner K K Jalan said the central government can decide the pattern of investment of fund. 

    "Central government is 100 per cent competent as regards the investment guidelines of any provident fund in the country. The pattern of investment is to be determined by the government. We are not putting 100 per cent of the money in equity. 

    "At the first, 1 per cent and then review, then 2 per cent and review and try to reach 5 per cent. We are going very-very gradually. The feeling is that the economy will go better. So we can consider our investment in ETF (exchange traded funds) or economy," Jalan said.

    Just read the economic times.
    Govt to soon mandate a pension funds body to invest 5% of incremental corpus in ETFs
    The government is determined to push ahead with mandating the Employees' Provident Fund Organisation (EPFO) to invest up to 5% of its incremental corpus in exchange-traded funds. The move, opposed by labour unions, could see as much as `. 7,500 crore flowing into the stock market.

    "We will shortly notify the new investment pattern for EPFO," Labour Secretary Shankar Agarwal said on Tuesday . This will mean EPFO having to invest up to 5% of its estimated incremental income . 1.5 lakh crore in of ` exchange-traded funds, seen as an indirect and passive investment in equity .The decision comes after EPFO's Finance Investment & Audit Committee clarified that the government has the right to set the investment pattern.

    Trade union leaders say this puts workers' money at risk owing to the volatility in the stock market.

    The finance ministry had on March 2 notified the new investment pattern for non-government provident funds, superannuation funds and gratuity funds, allowing them to park 5-15% of their investible funds in equity and equity-related instruments. This is in line with the recommendations of the GN Bajpai-led committee on pensions and is expected to provide long-term resources to productive sectors, besides giving greater flexibility to subscribers to maximise returns. The new investment pattern takes effect from April 1.

    Palash Biswas

    Full story as follows.


    Apr 01 2015 : The Economic Times (Kolkata)
    Gates Opened for EPFO Funds to Flood Dalal Street
    New Delhi
    Our Bureau
    
    
    Govt to soon mandate a pension funds body to invest 5% of incremental corpus in ETFs
    The government is determined to push ahead with mandating the Employees' Provident Fund Organisation (EPFO) to invest up to 5% of its incremental corpus in exchange-traded funds. The move, opposed by labour unions, could see as much as `. 7,500 crore flowing into the stock market.

    "We will shortly notify the new investment pattern for EPFO," Labour Secretary Shankar Agarwal said on Tuesday . This will mean EPFO having to invest up to 5% of its estimated incremental income . 1.5 lakh crore in of ` exchange-traded funds, seen as an indirect and passive investment in equity .The decision comes after EPFO's Finance Investment & Audit Committee clarified that the government has the right to set the investment pattern.

    Trade union leaders say this puts workers' money at risk owing to the volatility in the stock market.

    The finance ministry had on March 2 notified the new investment pattern for non-government provident funds, superannuation funds and gratuity funds, allowing them to park 5-15% of their investible funds in equity and equity-related instruments. This is in line with the recommendations of the GN Bajpai-led committee on pensions and is expected to provide long-term resources to productive sectors, besides giving greater flexibility to subscribers to maximise returns. The new investment pattern takes effect from April 1.

    The labour ministry has in the past notified its own investment pattern for EPFO, taking into account the views of its Central Board of Trustees (CBT) but not necessarily those of the finance ministry. For instance, the finance ministry had first proposed investment in equity ranging from 0-15% of the incremental income in 2008. However, CBT did not approve of this. Hence, the 2013 investment pattern that's being followed doesn't provide for any investment in equity .

    However, following the recent notification by the finance ministry , Labour Minister Bandaru Dattatreya had referred the proposed investment pattern to the Finance Investment & Audit Committee, which at its meeting on March 26 concluded that "the government was competent to notify the pattern of investment and that pattern of investment was binding on EPFO".

    At the 207th CBT meet on Tuesday , Central Provident Fund Commissioner KK Jalan told trustees that the Finance Investment & Audit Committee was of the view that EPFO may consider investing an initial 1% in exchange-traded funds, which replicate the index and aren't as volatile as individual stocks. "This may gradually be increased to 5% by the end of the year," he said, adding that the government was the competent authority to finalise the investment pattern as it gives several concessions to pension funds, including exemption from income tax.

    The decision has been opposed by trade unions which are surprised by what they describe as an about-turn by the labour ministry and EPFO. "Investing employees' money in equities is not in the interest of workers and the country but only in the interest of markets. Hence, we are against the proposal," said AK Padmanabhan of the Centre of Indian Trade Unions.




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    PUCL कानपुर इकाई हाशिमपुरा नरसंहार कांड के पीड़ितों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए राज्य सरकार से न्याय की मांग करती है | 

    हाशिमपुरा में जो हुआ उसकीं जितनी निंदा की जाए कम है यह सिर्फ मानवी जिस्मों की हत्या नहीं है वरन उस मानवीय संवेदना और विशवास की हत्या है जो अपने समाज और अपनी हुकूमत से संरक्षण और न्याय की उम्मीद करती है | बिना किसी जाँच और सबूत के बेकसूर लोगों की सिर्फ इसलिए हत्या कर देना कि वे किसी दूसरे धर्म से आते है हमारे समाज की संकुचित सोच को दर्शाता है और साथ ही धार्मिक उन्माद को उकसाने में घी डालने का काम करता है | एक तरफ सरकारें कहती हैं कि वे धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना चाहती हैं और वही दूसरी ओर उन्हीं निर्देशों पर हाशिमपुरा जैसे कांड होते है | बेहद विरोधाभाषी चीजें हैं जिससे साफ जाहिर है कि साम्प्रदायिक और जातीय राजनीति ही हमारी सरकारों का मुख्य मकसद हैं जनता के सरोकार उनके लिए कोई खाश मायने नहीं रखते | 

    इतने संवेदनशील और अमानवीय मामले में 28 साल तक न्यायिक प्रक्रिया का चलना और उसके बाद आये निर्णय में दोषियों का बिना किसी सजा के बच जाना, हमारे देश की लचर न्यायिक व्यवस्था को प्रदर्शित करता है और यह साबित करता है कि भारत देश तो आज़ाद हो गया है लेकिन भारत की जनता आज भी गुलाम है हाथों में हथकड़ियाँ भले न हो पर इन्साफ आज भी कैद में है | 

    PUCL कानपुर एक नागरिक समाज के नाते उत्तर प्रदेश राज्य सरकार से पूरे मामले में फिर से अपील करने और दोषियों के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही की मांग करती है | यदि इस ओर जल्द ध्यान न दिया गया तो हम आम जन मानस को सरकारी कार्य प्रणाली के खिलाफ जन आन्दोलन के लिए प्रेरित करेंगे | 

    धन्यवाद 

    सौजन्य से   
    के एम् भाई 
    PUCL कानपुर 
    8756011826, 9415045873,

    Blog  - puclup.blogspot.in 

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    Rihai Manch Press Note-रिहाई मंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत, बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपीयों को बचाने का सीबीआई पर लगाया आरोप

    RIHAI MANCH
    For Resistance Against Repression
    -----------------------------------------------------------------------------------
    रिहाई मंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत, बाबरी मस्जिद
    विध्वंस के आरोपीयों को बचाने का सीबीआई पर लगाया आरोप
    सरकार की किसान विरोधी नीति के चलते प्रदेश में आत्महत्या कर रहे हैं किसान
    बरेली के किसान शिशुपाल की आत्महत्या के जिम्मेदार जिला ग्रामोद्योग
    अधिकारी को बर्खास्त किया जाए
    लखनऊ, 01 अपै्रल 2015। रिहाई मंच ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद
    ढहाने के आरोपी लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, उमा भारती, मुरली मनोहर
    जोशी, अशोक सिंहल समेत बीस लोगों को नोटिस जारी करने का स्वागत करते हुए
    पूर्व में हुई सीबीआई जांच में आरोपियों को क्लीन चिट दिए जाने पर सवाल
    उठाया है।

    रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा
    नोटिस जारी होने के बाद, यह सवाल एक बार फिर से पैदा होता है कि आखिर
    किसके इशारे पर सीबीआई द्वारा बाबरी मस्जिद विध्वंस के इन गुनहगारों को
    क्लीन चिट दी गई थी। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से पिछले दिनों
    सीबीसीआईडी ने हाशिमुपुरा जनसंहार मामले में गलत विवेचना कर दोषियों को
    बचाया ठीक उसी भूमिका में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई है। ऐसे
    में देश में न्याय व्यवस्था के समक्ष जांच एजेंसियां ही चुनौती बन गई हैं
    जों इंसाफ के खिलाफ और नाइंसाफी के पक्ष में सिर्फ विवेचना ही नहीं करती
    बल्कि सबूतों को मिटाने का भी काम करती हैं।

    रिहाई मंच के नेता राजीव यादव ने मोदी सरकार द्वारा बाबरी मस्जिद विध्वंस
    के वक्त देश के प्रधानमंत्री रहे नरसिम्हा राव का स्मारक बनाने की कड़ी
    आलोचना करते हुए कहा है कि एक ऐसा व्यक्ति, जो बाबरी मस्जिद विध्वंस को
    गिराने के आपराधिक षड़यंत्र में सीधे संलिप्त रहा हो, उसका स्मारक बनाने
    का सीधा मतलब देश के सेक्यूलर ढांचे पर एक हमला होगा। उन्होंने कहा कि यह
    साबित करता है कि संघ सत्ता में आने के बाद, बाबरी विध्वंस के मामले में
    राव द्वारा संघ के प्रति दिखाई गई वफादारी को पुरस्कृत करने के लिए मोदी
    सरकार द्वारा स्मारक बनाया जा रहा है।

    रिहाई मंच के नेता अनिल यादव ने कहा है कि प्रदेश में कई चरणों में हो
    रही बेमौसम बारिश के बावजूद प्रदेश सरकार द्वारा किसानों को राहत के लिए
    मुआबजा वितरण में आपराधिक हीला हवाली की जा रही है। इस हीलाहवाली के कारण
    किसानों की आत्महत्या का सिलसिला लगातार जारी है। उन्होंने कहा कि बरेली
    के भमोरा क्षेत्र के मिवक मझारा गांव के किसान शिशुपाल सिंह ने 15 साल
    पहले खादी ग्रामोद्योग से 33 हजार रुपया लोन लिया था। इस अवधि में उसने
    74 हजार रुपया ब्याज के तौर पर चुकाया, लेकिन मूलधन खत्म नहीं हो सका।
    मामला प्रमुख सचिव तक पहंुचा लेकिन शिशुपाल को कोई राहत नहीं मिली। इस
    बीच बारिश होने पर शिशुपाल ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या के
    पहले मृत किसान ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी भी लिखी थी जिसमें जिला
    ग्रामोद्योग अधिकारी को जिम्मेदार ठहराया गया था। अनिल यादव ने किसान की
    आत्महत्या प्रकरण में मृत किसान के परिजनों को 20 लाख रुपए मुआवजा की
    मांग करते हुए, बरेली के जिला ग्रामोद्योग अधिकारी को बर्खास्त करते हुए
    सख्त कार्रवाई की मांग की है।

    द्वारा जारी
    शाहनवाज आलम
    प्रवक्ता, रिहाई मंच
    09415254919
    ------------------------------------------------------------------------------
    Office - 110/46, Harinath Banerjee Street, Naya Gaaon Poorv, Laatoosh
    Road, Lucknow
    E-mail: rihaimanch@india.com
    https://www.facebook.com/rihaimanch

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    বাংলাদেশিদের গরুর মাংস খাওয়া বন্ধ করতে হবে: রাজনাথ



    ভারতের কেন্দ্রীয় স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী এবং হিন্দু মৌলবাদী দল বিজেপির নেতা রাজনাথ সিং বলেছেন, ভারত থেকে বাংলাদেশে গরু রপ্তানি পুরোপুরি বন্ধ করে দিতে হবে যাতে বাংলাদেশের মানুষ গরুর মাংস খাওয়া বন্ধ করে দিতে বাধ্য হয়।মঙ্গলবার তিনবিঘা করিডোর পরিদর্শন শেষে বিএসএফ জওয়ানদের উদ্দেশ্যে বক্তব্যে তিনি এ কথা বলেন বলে জানিয়েছে ভারতের রাষ্ট্রীয় বার্তা সংস্থা পিটিআই।

    এর দুদিন আগেই রাজনাথ সিং বলেছিলেন, মহারাষ্ট্র ও হরিয়ানায় গরু জবাই নিষিদ্ধের পথ ধরে পুরো ভারতেই গরু জবাই নিষিদ্ধ করার চেষ্টা করছে ক্ষমতাসীন হিন্দু মৌলবাদী বিজেপি সরকার।

    বাংলাদেশ-ভারত সীমান্তের প্রহরারত বিএসএফ জওয়ানদের উদ্দেশ্যে রাজনাথ বলেন, 'আমাকে বলা হয়েছে যে বিএসএফের কড়া নজরদারিতে গরু পাচার বন্ধ হয়ে যাওয়ার পর বাংলাদেশে সম্প্রতি গরুর মাংসের দাম ৩০ ভাগ বেড়ে গেছে।''আপনারা নজরদারি আরো বাড়িয়ে দিন যাতে গরু পাচার পুরোপুরি বন্ধ হয়ে যায় এবং বাংলাদেশে গরুর মাংসের দাম আরো ৭০-৮০ শতাংশ বেড়ে যায় যাতে বাংলাদেশের মানুষ গরুর মাংস খাওয়া ছেড়ে দেয়,'যোগ করেন রাজনাথ।ভারতের সরকারি হিসেবে ২০১৪ সালে ভারত থেকে বাংলাদেশে ১৭ লাখ গরু এসেছে।

    রবিবার রাজনাথ সিং বলেছিলেন যে পুরো ভারতে গরু জবাই নিষিদ্ধ করার জন্য ক্ষমতাসীন এনডিএ জোট 'যথাসাধ্য চেষ্টা'চালিয়ে যাচ্ছে।'এদেশে গরু জবাই গ্রহণ করা যায় না। আমরা গরু জবাই নিষিদ্ধ করার জন্য সর্বাত্মক প্রচেষ্টা চালাব এবং এজন্য ঐকমত্য প্রতিষ্ঠায় কঠোর চেষ্টা করে যাব,'বলেছিলেন রাজনাথ।২০০৩ সালে ভারতের কৃষিমন্ত্রী থাকার সময়ও তিনি একবার গরু জবাই নিষিদ্ধ করার জন্য পার্লামেন্টে বিল এনেছিলেন। কিন্তু সেবার তার সে প্রচেষ্টা সফল হয়নি।

    ১২০ কোটি জনসংখ্যা অধ্যুষিত ভারতে প্রায় ১৮ কোটি মুসলমান বাস করেন। এদের বেশিরভাগই দরিদ্র এবং সস্তা গরুর মাংস তাদের আমিষের একটি অন্যতম উৎস।তবে তথাকথিত সেক্যুলার ভারতের বেশিরভাগ রাজ্যে গরু জবাইয়ের ওপর আইনি নিষেধাজ্ঞা না থাকলেও মুসলমানদের গরু জবাইয়ের ওপর কড়াকড়ি করা হয়। ভারতের অনেক রাজ্যেই গরুর মাংস বিক্রির ওপর নিষেধাজ্ঞা রয়েছে।

    সম্প্রতি মহারাষ্ট্র ও হরিয়ানায় গরু জবাই নিষিদ্ধ করে নতুন যে আইন পাস হয়েছে তাতে আইন লংঘন করলে মৃত্যুদণ্ড পর্যন্ত হতে পারে।তবে মুসলমানদের পাশাপাশি খ্রিস্টান এবং নিম্নবর্ণের হিন্দুরাও গরুর মাংস খেয়ে থাকে।ঐতিহাসিকরা বলছেন, ভারতে গরুর মাংস নিষিদ্ধ করার দাবিটি আধুনিককালের। অনেক সংস্কৃত গ্রন্থেও বলা হয়েছে, প্রাচীন হিন্দুদের মধ্যে গরুর জবাই নিষিদ্ধের কোনো প্রচলন ছিল না।

    http://www.rtnn.net/bangla//newsdetail/detail/1/3/105515#.VRv3W45c2OA



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    Govind Krishnan
    Govind Krishnan 4:39pm Apr 1
    The daily BGKT-DEE Express is another slow train without any pantry or food available en route, and passengers were advised to take packed food to last a daytime journey of 622 km in 12 hrs 20 min. (0955 to 2210) through the barren Rajasthan landscape. There are other trains like this on IR.

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    पेड़ बचला तो आदिम बचला ( बाल नाटक )

         पेड़ बचला तो आदिम बचला ( बाल नाटक )


                                       बाल  प्रहसन नाटिका संकलन ::: भीष्म कुकरेती 



     [अन्ध्यर , इन लगणु च क्वी कै तै जबरदस्त धक्का दीणु च। बार बार धक्का की आवाज। उज्यळ हूंद त एक बल्द पेड़ पर जोरका धक्का दीणु च।   उळकाणु भयभीत च ]
                               उळकाणु
    ये क्या करणु छै ?
                                बल्द 
    मी डाळ भीम गिराणु  छौं।  
                              उळकाणु
    बंद कर। 
                                बल्द 
    क्या ?
                              उळकाणु
    बंद कर।  यु म्यार घर च। अर तू म्यार कूड़ उजाड़नु छै। 
                                बल्द [घंघतोळ मा ]
    त्यार ड्यार ? 
                              उळकाणु
    हाँ मि इख रौंद। 
                                बल्द 
    सच्ची ?
                               उळकाणु
    अबै हमर क्वी जीजा स्याळो रिस्ता च जु मि मजाक करणु हों। 
                                बल्द 
    मतलब तू इख ?
                              उळकाणु
    हाँ तो उळकाण डाळ मा नि रै सकदन।   
                                बल्द 
    हुक्कां !  हुक्कां ! अलग हू।  मीन पेड़ गिराण। 
                              उळकाणु
    त्वे कुण हाथ जुड़्यां छन।  एक घड़ी सूण त सै। 
                                बल्द 
    अच्छा चल बोल। 
                              उळकाणु
    पेड़ म्यार बसेरा च। मि इक रौंद।  यु नि राल तो मि नष्ट ह्वे जौल। 
                                बल्द 
    मि कुछ नि कर सकुद।  पेड़ गिराण मेरी लाचारी च। 
                           उळकाणु
    पर किलै ?
                                बल्द 
    बिरळन काम दियुं च।  
                              उळकाणु
    बिरळ तैं पेड़ गिरैक क्या फैदा।? 
                                बल्द 
    पता नी च।  वु मि तैं पेड़ गिराणो पैसा दींदु अर मि प्रश्न नि करदु। 
                              उळकाणु
    अरे बिरळक ठसक का वास्ता   मीन अपण ड्यार नि उजाड़न दीण।  
                                बल्द 
    वु पेड़ गिराणो बदल म्यार परिवारो वास्ता घास दींद , दाणा दींदु। पेड़ नि गिरौलु त म्यार परिवार भूक मरि जाल।  
                              उळकाणु
    कुछ बि ह्वे जाव मीन पेड़ नि गिराण दीण।  सैकड़ों साल से हम लोगुं अर हौर जानवरूं परिवार साख्युं से रौंदन इक।  तू क्या चांदि कि  हम बेघर ह्वे जौंवां ? 
                                बल्द 
    मीन अपर परिवार पळण।  
                               उळकाणु
    अरे पर दुसर तरीकों से बि त परिवार पळे सक्यांद कि ना ?
                                बल्द 
    पता नई च।  मि तैं त पेड़ इ गिराण आंद।  मीन जनम भर ई काम कार। 
                              उळकाणु
    क्वी त विकल्प होलु ? जै काम मा त्वै तै मजा बि आंद हो। 
                                बल्द 
    हाँ हाँ ! मि तै हौळ खैंचणम मजा आंद।  धरती पर चीरा लगाणम आनंद आंद। 
                              उळकाणु
    देख न विकल्प मिल गे ना ? तो तू हौळ खैंच ना ! 
                                बल्द 
    पर पेड़ गिराणम ज्यादा पैसा मिल्दन।  
                              उळकाणु
    यीं दुन्या मा पैसों से बि अधिक महत्वपूर्ण बत्था छन। 
                                बल्द
    जन कि /
                           उळकाणु
    जन कि प्रकृति तैं उनि रखण जन कि रखण चयेंद। 
                                बल्द 
    हम थूका प्रकृति तै  बदल्दा।  
                              उळकाणु
    पता च बगलक जंगळ पेड़ गिरैक कन खतम ह्वे ?
                                बल्द 
    हाँ मीनि त सब पेड़ गिरै छौ। अर बिरळ कथगा खुश ह्वे छौ। 
                              उळकाणु
    हाँ ! पर बिचारा जानवरूं तै कथगा तकलीफ ह्वे।  कतगौंकि तो साखी मतलब जनरेसन ही खतम ह्वे गे।  जानवरूं तैं सुरक्षित जगा ढुँढणो बान कख कख नी डबखण पोड आ कथगा तो नया घर तै अनुकूलन याने एडजस्ट नि कर सकिन अर खजे गेन। 
                                बल्द 
    देख ना फिर बि वु जगा खुजे इ लीन्दन कि ना ?
                              उळकाणु
    जरा सुचदि यदि सब पेड़ इनि गिराये जाल तो क्या ह्वाल ?
                                बल्द 
    इन नि ह्वे सकद। 
                               उळकाणु
    किलै नि ह्वे सकद ?
                                बल्द 
    यदि सब पेड़ गिराये जावन तो क्या ह्वे जाल ?
                              उळकाणु
    हम सब जानवर नया घर की ढूंढ मा इना -उना फुळे जौंला अर तू अर बिरळ हम तै कबि मिलल फिर। क्या तू चांदी कि हम फिर कबि नि मिलां ? 
                                बल्द 
    ना ना ! मेर समज से  ना। 
                              उळकाणु
    तीतै कुछ करण चयेंद। निथर सब पेड़ खतम ह्वे जाल अर हम सब्युं कुण कुछ नि बचल। 
                                बल्द 
    क्या मतबल मीम बि कुछ नि बचल ?
                              उळकाणु
    अरे यदि सब पेड़ गिर गे त तीम फिर काम कख रालु।  है ना ? पेड़बिहीन संसार मा काम रालु क्या ?
                                बल्द
    हैं मीन इन स्वाच  इ नी च।
                           उळकाणु
    सोच , सोच अर विचार कर।  
                                बल्द 
    रुक रुक ! रुक , अबि त इथगा पेड़ छन कि म्यार ज्यूंद रौण तक त पेड़ राला ही। 
                              उळकाणु
    अर त्यार बच्चा ?
                                बल्द 
    म्यार बच्चौंक क्या ?
                              उळकाणु
    जै हिसाब से पेड़ गिराये जाणा छन तै हिसाब से तो ऊंकुण पेड़ इ नि बचला। 
                                बल्द 
    हाँ पर हम पेड़ लगै द्योलां। 
                              उळकाणु
    पेड़ लगाणो बाद सालों लग जांदन एक पेड़ तै युवा हूण मा। इथगा सालुं मा तो हम जानवरूं दसियों साखी जनरेसन जनम लीन्दन अर खतम ह्वे जांदन। 
                                बल्द 
    हाँ या बात त गंभीर च ना ?
                               उळकाणु
    हाँ। 
                                बल्द 
     हम तै अधिक से अधिक पेड़ लगाण चयेंद। 
                              उळकाणु
    इथगा काफी नी। च 
                                बल्द 
    यार कुछ तो खराबी च।  तू भौत अधिक विचार करदि। 
                              उळकाणु
    अर तू भौत कम विचार करदि। 
                                बल्द 
    तेरी बथुं पर विश्वास नि हूंद। 
                              उळकाणु
    देख अबि बि हरेक जानवरकुण घर नी च।  अर पेड़ गिरण से अधिकतर जानवर बेघर ह्वे जाला। पेड़ गिरण से जनवरूं कुण भोजन की कमी ह्वे जाली। 
                                बल्द
    हाँ कमी तो ह्वेलि इ। 
                             उळकाणु
    फिर पडूँ से स्वछ हवा बि मिल्दी। 
                                बल्द 
    अच्छा ? स्वच्छ हवा मिल्दी ?
                               उळकाणु
    हाँ। 
                                बल्द 
    कनकैक ?
                              उळकाणु
    जैं हवा तै हम भैर फिंकदा पेड़ वीं हवा से सांस लींद अर हमर लैक हवा भैर फिंकद।    
                                बल्द 
    सच्ची ?
                              उळकाणु
    शहरूं मा धुंवा दिखदि। उख पेड़ नामात्रौ छन तो। 
                                बल्द 
    हाँ भौत बुरी हालात च। 
                              उळकाणु
    यदि पेड़ नि राला तो धुंवा इ धुंवा ह्वे जाल अर फिर कुछ नि बचल। 
                                बल्द 
    इन सच्ची होलु ?
                           उळकाणु
    यदि तू इनि पेड़ गिराणि रैली तो वु दिन दूर नी च कि दुन्या पेड़ विहीन -
                                बल्द 
    पर मि तै बि त परिवार पळण।  हाँ पेड़क कुछ हिस्सा  चल सकद ?  
                              उळकाणु
    नै नै।  अर तीतै पता च तापमान कथगा बढ़ गे। 
                                बल्द 
    ना पूछो।  बुरा हाल छन। हर साल गरमी बढ़नी च। 
                              उळकाणु
    किलैकि पेड़ कम हूणा छन। 
                                बल्द 
    क्या मतलब ?
                              उळकाणु
    अरे जब हम सांस फिंकदा या कारखानो से धुंवा या कार से धुंवा उठद त गरमी बड़द।  पर पेड़ हूण से गरम हवा ठंडी ह्वे जांदी।  
                                बल्द 
    त्यार दिमाग भौत चलद हाँ।  बात त सै च। 
                               उळकाणु
    फिर यांसे र अति गरमी , अतिठंड अर अति वर्षा शुरू ह्वे जांद। हर चीज अति। 
                                बल्द 
    मतलब पेड़ बचण चयेंदन। 

                              उळकाणु
    हाँ जंगळ बचण चयेंदन। 
                                बल्द 
    ठीक च। मि ये पेड़ तैं नि गिरांदु।  चलो एक सौदा ह्वे जावो। 
                              उळकाणु
    प्रकृति से सौदा नि हूंद।  अच्छा मि चलणु छौं।  चलो बच्चो जरा खाण पीणो इंतजाम करे जाव। बल्द जी फिर मिलला हाँ। 
    [उल्लू जांद ]
                                बल्द 
       जंगळ सुंदर त छन।  नी ? पेड़ नि ह्वाल तो फिर जंगळ बी बदसूरत ह्वे जाल।  उल्लू की बात मा दम च कि पेड़ बचाये जावन। 

            
      
                  :-======== स्वच्छ भारत  , स्वच्छ भारत , बुद्धिमान भारत! ========:
    2/4/15  , Bhishma Kukreti , Mumbai India 




    Thanking You . 
    Jaspur Ka Kukreti 

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    सोने की चिड़िया का पेट चीरने लगी है संसदीय राजनीति और सारे हीरे जवाहिरात देशी विदेशी पूंजी के हवाले

    पलाश विश्वास

    Ankur (film) - Wikipedia, the free encyclopedia

    en.wikipedia.org/wiki/Ankur_(film)

    Ankur (Hindi: अंकुर, Urdu: اَنکُر, translation: The Seedling) is an Indian colour film of 1974. It was the first feature film directed by Shyam Benegal and the debut ...

    Plot - ‎Characters - ‎Motif of the seedling - ‎Social issues

    Ankur Hindi Chalchitra - YouTube

    Video for ankur▶ 125:11

    www.youtube.com/watch?v=o3R6gmRzXAA

    Oct 31, 2011 - Uploaded by kamyogi

    Laxmi lives a poor lifestyle in a small village in India along with her husband, Kishtaya, who is a deaf-mute ...


    सोने की चिड़िया का पेट चीरने लगी है संसदीय राजनीति और सारे हीरे जवाहिरात देशी विदेशी पूंजी के हवाले।फिर दोहरा रहा हूं क्योंकि सोने की चिड़िया के मिथक पर लिखे रोजनामचे को अमलेंदु ने हस्तक्षेप पर लगाया नहीं है।


    भारत सोने की चिड़िया अब भी है और उस सोने की चिडि़या से मालामाल होने वाले लोग हमें उल्लू बनाते रहे हैं यह कहते हुए कि अंग्रेज सोने की चिड़िया को लूटकर ले गये हैं।



    संसदीय राजनीति का ताजा स्टेटस सोनिया के खिलाफ रंगभेदी टिप्पणी नहीं है।


    भारतीय मनुस्मृति सत्ता का हिंदू साम्राज्यवादी चरित्र ही रंगभेदी है।


    मीडिया में हम लोग खुदै उसी रंगभेद का शिकार हैं।पदोन्नति का वेतनमान मिल रहा है लेकिन पदोन्नति का पत्र नहीं मिल रहा है।जो पदोन्नति नहीं कर सकते वे बाकी सबकुछ कर रहे हैं क्यांकि पदोन्नति हमारी लंबित है।


    सुप्रीम कोर्ट कहते हैं कि नजर रख रहा है मजीठिया लागू करने पर।ग्रेडिंग मनमुताबिक और पदोन्नति का वेतनमान देने के बावजूद पदोन्नति नहीं।


    सुप्रीम कोर्ट की खुली अवमानना है और हम अदालत में चले भी जायें तो न्याय हमें मिलना नहीं है।सच सामने है और भारत के सुप्रीम कोर्ट का सच से कितना वास्ता है,हम कहेंगे तो अवमानना हो जायेगी।


    सोनिया पर रंगभेदी टिप्पणी पर ऐतराज से  पहले भारतीय समाज और जीवन के हर क्षेत्र में,हर शाख पर काबिज उल्लूओं के व्यवहारिक रंगभेद का पहले विरोध तो करें।


    रंगभेद से जिनका वर्चस्व बना हुआ है,बोलने लिखने और छपने की आजादी भी उन्हींकी है।महिमा उन्ही की है दसों दिशाओं में।


    हम तो घुसफैठिये हैं।पत्रकारिता में चालीस साल बिता देने के बावजूद हम पत्रकारिता में न नागरिक हैं और नागरिक अधिकार हमें हैं।हम लोग शुरु से शंटिंग में हैं।साहित्य में किसी ने घास नहीं डाला और पत्रकारिता में फिर वहीं अश्वेत अछूत हैं।


    जब पवित्रतम गाय की यह कथा है तो बाकी देश के बहुजनों की कथा व्यथा का क्या कहने।


    सोनिया पर टिप्पणी से जिन्हें तकलीफ हैं,वे हमारे साथ बरते जा रहे रंगभेदी भेदभाव के खिलाफ जाहिर है कि कभी न बोलेंगे।बोलेंग तो बात दूर तलक जायेंगी।


    बहुजनों को मनुष्य भी जो समझने की भूल न करें ,उन्हें सोनिया जी की चिंता ही सता सकती है।जात कुजात गासियां खाने के जनमजात अब्यसत हमें मत सिखाइये कृपया कि रंगभेद क्या बला है।हमारा वास्ता रंगभेद के शिकार पहाडों से भी है।पिघलते ग्लेशियर में दफन होकर भी हमारी हस्ती मिटती नहीं है,इसकी तकलीफ जिन्हें हैं,वे रंगभेद पर पादते हैं।


    यह संसदीय राजनीति का दस्तूर भी है कि फर्जी मुद्दों पर ध्यान भटका दो,फिर जिसे छह इंच छोटा करना है उसे अठारह इंच का बना दो।


    मसलन  भूमि अधिग्रहण विधेयक पर विपक्ष की ओर से कड़े विरोध का सामना कर रही केंद्र सरकार ने कहा है कि इस मामले में उनको मनाने का प्रयास जारी है। संसदीय कार्य मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने बुधवार को पत्रकारों को बताया कि विधेयक में हम विपक्ष के सुझावों को भी शामिल करेंगे। उम्मीद है कि इस मुद्दे पर सभी पक्षों के बीच सहमति बन जाएगी। सभी वरिष्ठ मंत्री विपक्ष के नेताओं को मनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नए अध्यादेश में नौ आधिकारिक संशोधन किए गए हैं। विपक्षी दलों का समर्थन हासिल करने के लिए सरकार और संशोधन को तैयार है।


    जाहिर है बिल यह भी पास होकर रहेगा।यूंभी कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि भूमि अधिग्रहण बिल में वो सरकार के साथ चर्चा करने के लिए तैयार हैं। आवाज़ संपादक संजय पुगलिया के साथ खास मुलाकात में दिग्विजय सिंह ने कहा कि सरकार बिल में किए गए बदलाव को लेकर सामने आये तो बात जरूर होगी। उन्होंने कहा कि भूमि बिल का श्रेय बीजेपी लेना चाहती है, भूमि बिल पर सबके साथ बात होनी चाहिए। मोदी जी को अपना रवैया छोड़ना होगा। बिल से पहले सरकार को सभी पक्षों से बात करनी चाहिए थी।


    पास हो या नहीं फर्क नहीं पड़ता।जो ममता बनर्जी भूमि अधिग्रहण के सख्त खिलाफ हैं,सत्ता में भी वे इस जिहाद की वजह से हैंं और असलियत यह है कि उनके राज्य में गांव के गांव फर्जी दस्तावेजों के आदार पर बेदखल हो रहे हैं।मुआवजा या जमीन की कीमत दूसरे लोगों की जेब में।यह महामारी है।हम जानते नहीं हैं कि बाकी राज्यों का फंडा क्या है।


    सुंदरवन में डकैती की खबरें तो मीडिया में छपती है लेकिव वहां और बाकी बंगाल में जो प्रामोमोटर बिल्डर सिंडिकेट राज में लोग अपनी जमीन जायदाद से रोज बेदखल हो रहे हैं,उसके लिए कानून का सहारा कुछ नहीं चाहिए।


    इस कानून का तकाजा तो विरोध और प्रतिरोध के दायरे में लंबित कारपोरेट योजनाओं को चाली करने से है।कारपोरेट के अलावा जो महाजनी सभ्यता जारी है,उसे न कानून की परवाह है और न व्यवस्था की।


    कृपया गूगल मैप पर इंडिया मिनर्ल्स का नक्शा देख ले और फिर समझ लें कि देश की अकूत प्राकृतिक संपदा को पूंजी के हवाले करने की संसदीय राजनीति के बिलियनर मिलियनर रंग बिरंगे लोग आर्थिक सुधारों के लिए क्यों और कैसे कैसे क्या क्या नाटक रच रहे हैं।नरमेध राजसूय के पुरोहितों का समझ लें।


    शेयर बाजार को मोदी जमाने में ग्रोथ पच्चीस फीसदी से ज्यादा हो गया है जो हर हाल में बढ़ता जायेगा।सांढ़ों और घोड़ों की बेलगाम दौड़ का खुल्ला मैदान यह देश है।


    रिजर्व बैंक का निजीकरण हो गया और मजा देख लीजिये कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआइ) आज 80 साल का हो गया। 80वें स्थापना दिवस पर आरबीआइ की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुंबई पहुंचे। उनके साथ वित्त मंत्री अरुण जेटली व महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस भी मौजूद थे। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने आरबीआइ गर्वनर रघुराम राजन व उनकी टीम को बधाई दी। आरबीआइ के काम को सराहते हुए उन्होंने कहा कि मैं यहां गरीबों के लिए कुछ मांगने आया हूं। अगले 20 साल में बैंक उनके घर तक पहुंचे। उनकी ताकत की वजह से ही जीरो बैलेंस वाले खाते में भी 14हजार करोड़ रुपये जमा हो गए।


    इस समावेशी विकास के नतीजे कितने प्रलंयकर हैं,जो मारे जा रहे हैं,उनको नहीं मालूम,बाजार के चकाचौंध में खड़े धर्मांध लोग इसका मतलब कैसे बूझ लेंगे,हमरा सरद्रद लेकिन यही है।


    नए वित्त वर्ष का बाजार ने शानदार स्वागत किया है और पहले ही दिन बाजार में 300 अंकों से ज्यादा की तेजी देखी गई है। सेंसेक्स निफ्टी करीब 1.25 फीसदी की तेजी के साथ बंद हुए हैं। मिडकैप शेयरों में 1.5 फीसदी और स्मॉलकैप शेयरों में 2.35 फीसदी के उछाल के साथ बंद मिला है।


    मनीकंट्रोल के मुताबिक नए वित्त वर्ष की शुरुआत हो गई है। नए वित्त वर्ष में सरकार के सामने इकोनॉमी की रफ्तार बढ़ाने की बड़ी चुनौती है। क्योंकि इंडस्ट्री की ग्रोथ अभी बहुत भरोसा जताने वाली नहीं नजर आ रही है। नजरें रिजर्व बैंक की ओर भी हैं। क्या वो 7 अप्रैल की पॉलिसी में ब्याज दरों में कटौती करेगा। सवाल ये है कि पॉलिसी के जो बड़े एलान किए गए हैं उन्हें लागू करने के लिए एक्शन भी हो रहा है। यहां इन्ही मुद्दों पर की जा रही है खास चर्चा।


    अभी तक मोदी सरकार ने कुछ बड़े कदम उठाए हैं, जिनमें बीमा बिल पास कराना, रक्षा, रेलवे में एफडीआई की सीमा बढ़ाना, डीजल का डीरेगुलेशन, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया पर जोर, जन धन योजना के तहत 12 करोड़ से ज्यादा नए बैंक खाते खोलना, नई गैस पॉलिसी को मंजूरी और प्रोजेक्ट्स की मंजूरी के नियम आसान करना आदि जैसे कदम शामिल हैं।


    लेकिन अब सरकार के पास रिफार्म को और आगे बढ़ाने और एक्शन के लिए ज्यादा वक्त नहीं है। नए वित्त वर्ष में सरकार के समाने कई चुनौतियां हैं। सरकार के लिए ग्रोथ बढ़ाना एक बड़ी चुनौती हैं। आईआईपी ग्रोथ में सुस्ती देखने को मिल रही है। इसके साथ ही कोर सेक्टर के आंकड़े भी कमजोर रहे हैं। भूमि बिल भी सरकार के लिए बड़ी मुश्किल बना हुआ है। जीएसटी लागू करने पर सबकी नजरें लगी हुई हैं। बेमौसम बारिश से महंगाई बढ़ने की आशंका भी उत्पन्न हो गई है।


    कोर सेक्टर ग्रोथ फिसलती नजर आ रही है अक्टूबर 2014 में ये 6.3 फीसदी थी, जबकि जनवरी 2015 में ये 1.4 फीसदी पर आ गई। वहीं महंगाई और चालू खाते का घाटा काबू में नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आरबीआई ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती करेगा? क्या रिफार्म को लेकर सरकार बोल्ड है? क्या वित्त वर्ष 2016 एक्शन का साल होगा?


    http://hindi.moneycontrol.com/mccode/news/article.php?id=116968


    मिथकों की माया निराली है।मिथक की व्याख्या कोई भी कुछ भी बता सकता है।हमारे धर्म अधर्म कर्म अकर्म उन मिथकों के दायरे में सीमाबद्ध है और देश की आम जनता इन्हीं मिथकों के तिलिस्म में कैद हैं और हम हकीकत का समाना कर नहीं रहे हैं।


    मैंने अमलेंदु से बार बार कहा है कि इस सोने की चिड़िया के मिथक का सच खोलना जरुरी है।लेकिन न अमलेंदु और न वे तमाम लोग जो कृपा पूर्वक मुझे सुनते या पढ़ते हैं,मेरे इस वक्तव्य का आशय समझ पा रहे हैं।


    इस देश में झारखंड नहीं होता और न कोयला खानें होतीं तो मेरे पत्रकार बनने का कोई इरादा कभी न था।झारखंड  और भारत की औद्योगिक उत्पादन प्रणाली को समझने के लिए सीधे जेएनयू से मैं अपरिचित मदनकश्यप के भरोसे अपने मित्र उर्मिलेश के कहने पर कुछ दिन झारखंड में  बिताने के लिए कड़कती हुई उमस के मध्य तूफान एक्सप्रेस से मुगलसरायउतरकर पैसेंजर गाड़ी से धनबाद पहुंच गया था और कवि मदन कश्यप ने मुझे गुरुजी दिवंगत ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के दरबार में पेश कर दिया था और गुरुजी ने ही हाथ पकड़कर मुझे पत्रकारिता का अ आ क ख ग सिखाया।


    तब पत्रकारिता में अपने होने का सबूत देने में इतना उलझ गया कोयला खदानों में कि फिर भद्रसमाज में होने का अहसास न हुआ और न आगे पढ़ाई जारी रखने की कभी इच्छा हुई।


    1980 से हम कोयला को काला हीरा मानते रहे हैं  और अचानक  हमारे  जादूगर प्रधानमंत्री  ने राउरकेला में पहुंचकर ऐलान कर दिया कि उनने कोयला को हीरा बना दिया है।प्रधानमंत्री बनने के बाद बुधवार काे पहली बार ओडिशा पहुंचे नरेंद्र मोदी ने कहा कि मैं हिसाब देने आया हूं।


    प्रधानमंत्री ने कोयला घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि हमने कोयले को हीरा बना दिया। 204 कोयला खदानों से देश को एक रुपया भी नहीं मिला था। अब केवल 20 खदानों के आवंटन से ही 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक मिल चुके हैं।


    इस पर फुरसत मिली तो फिर चर्चा करेंगे।


    सविता बाबू भूखी प्यासी अमृतसर एक्सप्रेस से पहली अप्रैल की रात साढ़े बारह बजे नजीबाबाद जंक्शन सही सलामत पहुंच गयीं और वाहां से मायके की गाड़ी में मायके।उनका फोन बंद है।


    इसी बीच विवेक देबराय  पैनल ने अपनी सिफारिश में कहा है कि निजी कंपनियों को यात्री गाड़ी और मालगाड़ी चलाने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसके लिए निजी कंपनियों को इंजन, वैगन, कोच और लोकमोटिव निर्माण का काम सौंप देना चाहिए। देबराय पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रेलवे को कल्‍यानार्थ कामकाजों और आरपीएू प्रबंधन से दूर रहना चाहिए। रेलवे अभी हॉस्‍पीटल और स्‍कूलों का संचालन कर रही  है. जिससे रेलवे को अलग रहने की बात कही गयी है।

    कमिटी ने सभी मौजूदा प्रोडक्‍शन यूनिटों के स्‍थान पर रेलवे मैनुफैक्‍चरिंग कंपनी  बनाने का सुझाव भी दिया है। इसके अलावा इस कमिटी में रेलवे स्‍टेशनों की जिम्मेदारी अलग कंपनी के हाथों में देने की भी बात कही गयी है।  रेलवे बोर्ड में टिकट दलालों पर अंकुश लगाने की भी बातकही गयी है। इसके लिए पीआरएस सिस्टम में जरूरी फेरबदल किया जा रहा है।



    इसी बीच न्यूनतम पांच रुपये किराये के देश में प्लेटफार्म टिकट दस रुपये का हो गया है।सर्विस टैक्स बढ़ने से रेल किराया बढ़ गया है और रिलायंस के कंधे पर सवार इफारमेशन टेक्नालाजी मार्फत इजरायली पूंजी की महक भारत में तेज हो गयी है।


    इसी बीच उत्तराखंड और समूचे हिमालय क्षेत्र की लाइफलाइन सेवा डेढ़ सौ साल से भी चली आ रही पुरानी सेवा मनी ऑर्डर से बंद हो रही है।


    पोस्ट ऑफिस ने अपनी सुविधाओं को तेज बनाने के लिए मनी आर्डर की जगह ई मनी आर्डर सेना शुरू की है, आज से ये लागू हो गया है, पिछले लंबे समय से मनी आर्डर सेवा चल रही थी, जिन्होंने भी इसका इस्तेमाल किया होगा उन्हें याद होगा कि कैसे दो चार पंक्तियों के संदेश के साथ भेजे गए पैसे २-३ या ज्यादा दिनों में अपनी मंजिल तक पहुंचते थे। १०० साल पुरानी मैनुएल मनिऑर्डर सेवा आज से इतिहास बन जाएगी।


    इसी बीच लंबे इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने नई विदेश व्‍यापार नीति (एफटीपी 2015-20) का ऐलान किया है। अगले पांच साल के लिए जारी इस नीति के तहत निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 'मेक इन इंडिया' और 'ईज ऑफ डू‍इंग बिजनेस' पर जोर दिया गया है। निर्यात से जुड़ी कई योजनाओं की जगह सर्विस एक्सपोर्ट इंडिया स्कीम (SEIS) और मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट इंडिया स्कीम (MEIS) नाम की दो नई स्कीम शुरू की गई हैं। पुरानी स्‍कीमों के फायदों को इन्‍हीं में समाहित कर दिया गया है। नई नीति के जरिए सरकार 2020 तक वस्‍तुओं व सेवाओं के निर्यात को 900 अरब डॉलर तक पहुंचाना चाहती है।


    इसी बीच अमेरिका की शह पर संयुक्त अरब सेना शिया संप्रदाय से लड़ने लगी है और ममता बनर्जी और मुकुल राय में सुलह हो गयी है तो विहिप नेता प्रवीण तोगाड़िया पर बंगाल में निषेधाज्ञा लागू हो गयी है।


    इसी बीच भारत के गृहमंत्री ने बंगाल की सरजमीं से ऐलान किया है कि वे बांग्लादेशियों को गोमांस खाना बंद कर देंगे।


    फिर धर्मोन्मादी तूफान जोरों पर है और देश भर में किसान असमय बरसात से माथे पर हाथ धरे सोच रहे हैं कि आत्महत्या करें या न करें।


    कल मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय से शिकायत की थी कि उत्तराखंड जाने वाली या उत्तराखंड से गुजरने वाली ट्रेनों में खाने पीने का कोई बंदोबस्त नहीं है।


    अमृतसर एक्सप्रेस तो स्वर्णमंदिर के दरवाजे तक पहुंचता है तो पर्यटन और धार्मिक पर्यटन के लिए अति महत्वपूर्ण मंजिल तक पहुंचने की कवायद जब नरकयंत्रणा है तो बाकी देश में गैर मेट्रो ठिकानों पर जाने वाली ट्रेनों की कुछ तो सुधि लें निजीकरण के मार्फत यात्री सहूलियतें और सुरक्षा का रेल बजट पीपीपी पेश करने वाली सरकार।


    देश डिजिटल है और तुरंत पीएमओ रिपोटिंग से आनलाइन कंप्लेन का फार्म भेज दिया गया जिसे मैंने भर दिया और रेलवे शिकायत विभाग ने उसे पाने की सूचना भी देदी है।नागरिकों को ऐसी पावती से सुशासन का आभास हो जाता है लेकिन हालात कितने बदलते हैं,देखना अभी बाकी है।


    बहरहाल मैं मजे में हूं।पड़ोसियों कीमहिमा है कि मुझे अभी रसोई में जाना नहीं पड़ रहा है।चायपानी से लेकर खाना पीना और दफ्तर का टिफिन भी वे बारी बारी ठीक से पहुंचा रहे है।अभी अभी काना खा लेने का दसियों बरा तकादा हो चुका है।


    सविताबाबू लेकिन मायके में ज्यादा दिनों तक ठहरने वाली नहीं हैं और पखवाड़े भर में आ धमकेंगी।इस बीच देर रात और सुबह सुबह कुछ पुरानी फिल्में देख सकता हूं।

    इसी सिलसिले में आज सुबह अंकुर देखी तो कल देर रात लीडर।


    अंकुर हमने अशोक टाकीज या फिर कैपिटल हाल में देखी थी,ठीक से याद नहीं है।यह दीवार देखने से पहले का वाकया है।गिरदा और मोहन साथ थे।गिरदा को फिल्म का आखिरी दृश्य बहुत भाया।

    मीडिया में हमारी हालत अंकुर की लक्ष्मी से कोई बेहतर लेकिन नहीं है।


    जमींदार पुत्र सूर्या (अनंत नाग) अपनी रखैल गर्भवती लक्ष्मी (शबाना) के गूंगे बहरे पति कृश्नैय्या (साधू मेहेर)की वापसी पर समझ लेता है कि वह उसे पीटने चला आ रहा है।


    वह जिस बच्चे के थामे डोर के भरोसे पंतंग उड़ा रहा था,पंतग उसे थमाये अपने आदमियों से कृश्नैय्या क पकड़वाकर भीतर से कोड़े लाकर बेरही से उसे धुन देता है तो शबाना आकर अपने पति से लिपट कर सूर्या को शाप देने लगती है निरंतर विलाप के मध्य।


    सूर्या की नई नवेली पत्नी(प्रिया तेंदुलकर),जिसने आते ही लक्ष्मी को घर बाहर किया भीतर से थरथराये पति के मुकातिब होती है तो जिनने पकड़ा कृश्नैय्या को,उन्हीं लोगों ने सहारा देकर उसे उठाया और लक्ष्मी अपने पति को लेकर लड़खड़ाती हुई अपने डेरे की तरफ निकल पड़ी और दूसरे लोग भी तितर बितर हो गये।


    तभी पंतग की डोर थामने वाले बच्चे ने एक पत्थर उठाया और दे मारा सूर्या की खिड़की पर।


    गिरदा आजीवन उस बच्चे की तलाश में रहे और मैं बी उस बच्चे की तलाश में हूं।शबाना कितनी बड़ी अभिनेत्री है एकदम शुरुआत से और कितनी जटिल भूमिका को निभा सकती है,उससे बड़ी बात यह है कि इस फिल्म में जमीन की मिल्कियत,सामंती शोषण,कृषि अर्थव्यवस्था और उत्पादन संबंधों का जटिल ताना बाना पेश है,जो समांतर फिल्मों का कथ्य भी रहा है।


    समांतर फिल्मों से पहले भी पचास और साठ के दशकों की फिल्मों और यहां तक कि व्ही शांताराम की फिल्मों में सामाजिक यथार्थ से टकराने का सिलसिला जारी रहा है।वैजयंती माला से बड़ी कयामत भारतीयसिनेमा में कोई दूसरी नहीं हुई।


    आम्रपाली ,ज्वेलथीफ,संगम,नया दौर, लीडर, मधुमति जैसी फिल्मों में उनकी नृत्यकला और उनके अभिनय के जादू का तोड़ अब भी नहीं निकला। तो राजकपूर की आवारा का वह स्वप्नदृश्य यथार्थ के समांतर लाजवाब है।


    दो बीघा जमीन और मदर इंडिया जैसी फिल्मों से आज भी भारतीय कृषि अर्थव्यवस्ता की विसंगतियां साफ साफ नजर आती हैं।


    भरतीय फिल्मों,साहित्य,कला माध्यमों में और भारतीय पत्रकारिता में सत्तर के दशक तक जो यथार्थ से टकराने की ,मिथकों को और फंतासी को तोड़ने की लगातार लगाातार कोशिशें होती रही हैं,उसके उलटअब सारे माध्यम और सारी विधायें ऊसर प्रदेश हैं,जहां कोई वनस्पति उगता नहीं है और सीमेंट के जंगल में दस दिगंत व्यापी मृगमरीचिका मुक्तबाजार है।


    फंतासी लाजवाब है और मिथ्या मिथकों में हम जी भी रहे हैं और मर भी रहे हैं।


    शोषक अत्याचारी सामंत की खिड़की पर पत्थर उठाकर मारने वाला बच्चा कहीं नहीं है और कहीं भी नहीं है।आज का सबसे बड़ा सामाजिक यथार्थ लेकिन यही है।


    धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के खिलाफ संसदीय राजनीति का पर्दाफाश बंगाल के बेहतर कहीं नहीं हुआ है।शारदा फर्जीवाड़ा की सीबीआई जांच का फंडा तो पूर्व रेलमंत्री मुकुल राय को क्लीन चिट मिलने से हो ही गया।क्षत्रप साधो का रसायन डाउ कैमिकल्स है।


    मोदी दीदी के मिले जुले धर्मोन्माद से वाम हाशिये पर है।वाम वापसी असंभव हो गयी है।


    अब रोजवैली के खिलाफ ईडी की सक्रियाता से एकमात्र वाम आधार त्रिपुरा की जोर नाकाबंदी हो रही है।माणिक सरकार कटघरे में हैं और दीदी सिरे से बरी हैं।


    तो दीदी ने मुकुल राय को सलाह दी है कि वे संयम से रहें तो तृणमूल में उन्हें उनकी पुरानी हैसियत वापस मिल जायेगी।


    लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी बांग्लादेशी घुसपैठियों के किलाफ आग उगल रहे थे तो दीदी अलपसंख्यकों का तरणहार बनते हुए मोदी को जेल भेजने का ऐलान करते हुए केंद्र में दंगाबाज सरकार न बनने देने का दावा कर रही थीं।


    तब से लेकर अबतक अमित शाह,मोहन भागवत और प्रवीण तोगाड़िया बंगाल में अपने लश्कर के साथ बेरोकटोक शत प्रतिशत हिंदुत्व  का अभियान चला रहे हैं।दीदी ने किसी को रोका नहीं।


    राज्यसभा में जमीन अधिग्रहण बिल लटक जाने के बावजूद बाकी सारे जरूरी बिल ममता बनर्जी की अगुवाई में धर्मनिरपेक्ष क्षत्रपों के समर्थन से पारित हो गये।


    जमीन अधिग्रहण के लिए अध्यादेश फिर लागू होने जा रहा है और लौह पुरुष को सुप्रीम कोर्ट के नोटिस और बाबरी विध्वंस के मूक महानायक नरसिंह राव के महिमामंडन के मध्य सोनिया गांधी के खिलाफ रंगभेदी टिप्पणी से नये सिरे से रामंदिर भव्य बनाने के लिए बच्चा बच्चा राम का माहौल बनाया जा रहा है।


    अब कोलकाता नगरनिगम के चुनाव प्रचार के लिए मोदी कोलकाता अपनी पूर्व घोषणा के मुताबिक नहीं आ रहे हैं लेकिन हिंदुत्व के आतंक के मारे सारे के सारे मुसलमान दीदी को वोट डाले ,ऐसा इंतजाम मोदी और उनके सिपाहसालारों ने कर दिया है।


    तोगड़िया बाकी देश में भले एटम बम हो,बंगाल के लिए वे पटाखा भी नहीं हैं।दीदी ने उनको एटम बम बना दिया है।


    हमें कभी यह साबित करने का मौका नहीं मिला और न मिलने वाला है कि अखबार कैसे चलाया जा सकता है।


    जिस मसीहा के महिमामंडन के लिए कहा जा रहा है कि आज के मुकाबले हिंदुत्व की चुनौती कभी और कहीं ज्यादा थीं,उनकी विद्वता और हैसियत के मुकाबले मेरी दो कौड़ी की औकात नहीं है।


    हमारे हिसाब से हिंदुत्व की सुनामी तो राममंदिर आंदोलन की शुरुआत कायदे से होने से पहले,राजीव गांधी के राममंदिर के ताला तुड़वाने से बहुत पहले आपरेशन ब्लू स्टार और सिखों के नरसंहार के जरिये पैदा हो गयी थी,जब समूचा सत्ता वर्ग और सारा मीडिया सिखों के सफाये पर तुला हिंदुत्वका आवाहन कर रहा था।


    उन दिनों के अखबारों में तमाम मसीहावृंद के सुभाषित पढ़ लें तो जाहिर हो जायेगा कि वे हिंदुत्व का कैसे मुकाबला कर रहे थे।


    हमारे आदरणीय मित्र आनंद स्वरुप वर्मा ने अस्सी के दशक के मीडिया के उस युंगातकारी भूमिका पर सिलसिलेवार लिखा है।


    हमने दिल्ली में उनसे मिलकर और अभी हाल में फोन पर उनसे अनुरोध किया है कि भारतीय मीडिया के कायाकल्प के उस दशक के सच को किताब के रुप में जरुर सामने लाये थो तमाम दावेदारों के दावों का निपटारा हो जाये।हमने वे तमाम आलेख अपने ब्लागों के लिए और हस्तक्षेप के लिए आनंद जी से मांगे हैं।मिलते ही हम साझा करेंगे।


    हमारी समझ से ग्लोबल हिंदुत्व के मुक्तबाजारी हिंदू साम्राज्यवाद का यह निरंकुश दौर पूंजी वर्चस्व समय में अमेरिका और इजराइल के दोहरे उपनिवेश भारत में भारतीय कृषि,भारतीय कारोबार और भारतीय उद्योग और समूची अर्थव्यवस्था के साथ सारी कायनात को मिटाने वाला अप्रतिरोध्य मनुस्मृति शासन है।


    इसीलिए बहुजनों के हिंदुत्व और शत प्रतिशत हिंदुत्व के एजंडे को हम बाबरी विध्वंस और गुजरात नरसंहार तो क्या सिखों के नरसंहार से भी ज्यादा खतरनाक मानते हैं।


    सारे माध्यम अब केसरिया है और कारपोरेट भी।


    सारी विधायें अब कारपोरेट हैं और केसरिया भी और हर जुबान पर देशी विदेशी पूंजी का ताला है और तमाम उजले चेहरे करोड़ों के रोजाना भाव बिक रहे हैं।


    हमारे हिसाब से इससे पहले सारे विधर्मियों के सफाया का इतना खुल्ला एजंडा डंके की चोट पर लागू करने वाला हिंदू साम्राज्यवाद का कोई राजकाज नहीं रहा है जो केसरिया है और कारपोरेट भी।

    जो वाशिंगटन और तेलअबीब के सहयोग से आम भारतीय जनगण का पूरा सफाया करने पर तुला है।



    भारतीय इतिहास में इससे बड़ा कोई दुस्समय आया है कि नहीं,हम नहीं जानते।


    हमारी औकात चाहे जो हो,हमारी हैसियत चाहे जो हो,हम इस दुस्समय को यूं गजरते हुए कयामत बरपाने से पहले कम से कम दम भर चीखेंगे जरुर आखिरी सांस तक।


    अपने अपने हित में कीर्तनिया संप्रदाय भले ही इस सामाजिक यथार्थ के दस दिगंत को झुठलाने का प्रयास करें,हमारा कोई दांव चूंकि कहीं नहीं है और हम आदतन अंकुर के उस बच्चे की तरह खिड़कियों पर पत्थर उठाकर मारनेवाले हैं,चाहे अंजाम कुछ भी हो।


    गौरतलब है कि कोयला को हीरा बनाते वक्त प्रधानमंत्री भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड (सेल) के राउरकेला स्थित इस्पात संयंत्र में आधुनिकीकरण एवं विस्तार क्षमता को राष्ट्र को समर्पित करने यहां पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि इस्पात उत्पादन में हम अमेरिका को पीछे छोड़ चुके हैं और अगला लक्ष्य चीन को पछाड़ना होना चाहिये।


    सरकार का 'मेक इन इंडिया'कार्यक्रम इसमें बहुत मददगार होगा। मोदी ने कहा कि जिस देश की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की हो उसे कोई भी लक्ष्य हासिल करने में मुश्किल नहीं होनी चाहये। विस्तारीकरण के बाद राउरकेला इस्पात संयंत्र की क्षमता 20 लाख टन सालाना से बढ़कर 45 लाख टन वार्षिक हो गयी है।


    प्रधानमंत्री ने राउरकेला के योगदान को सराहा। कहा कि राउरकेला इस्पात संयंत्र में उत्पादित लोहा देश की सैन्य शक्ति बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत सामरिक शक्ति बनने का सपना देख रहा है और इसमें राउरकेला इस्पात संयंत्र का बहुत बड़ा योगदान रहेगा।


    उन्होंने राउरकेला को 'लघु भारत'बताते हुए कहा कि राजनीति का स्वभाव पुरानी बातों को भुला देना होता है, लेकिन मैं राजनेता नहीं आपका सेवादार हूूं।


    प्रधानमंत्री ने कहा कि सिर्फ कच्चा माल बेचने से देश आगे नहीं बढ़ेगा। खनिज सम्पदा का इस्तेमाल देश के औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए होना चाहिये। देश में मौजूद कच्चे माल पर आधारित उद्योग लगाकर नयी औद्योगिक क्रांति के प्रयास किये जाने चाहिये।


    नई विदेश व्‍यापार नीति (एफटीपी 2015-20) का ऐलान


    इसी बीच मीडिया खबरों के मुताबिक लंबे इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने नई विदेश व्‍यापार नीति (एफटीपी 2015-20) का ऐलान किया है। अगले पांच साल के लिए जारी इस नीति के तहत निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 'मेक इन इंडिया' और 'ईज ऑफ डू‍इंग बिजनेस' पर जोर दिया गया है। निर्यात से जुड़ी कई योजनाओं की जगह सर्विस एक्सपोर्ट इंडिया स्कीम (SEIS) और मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट इंडिया स्कीम (MEIS) नाम की दो नई स्कीम शुरू की गई हैं। पुरानी स्‍कीमों के फायदों को इन्‍हीं में समाहित कर दिया गया है। नई नीति के जरिए सरकार 2020 तक वस्‍तुओं व सेवाओं के निर्यात को 900 अरब डॉलर तक पहुंचाना चाहती है। इसके लिए वैल्यू एडीशन, घरेलू उत्पादन और नए बाजारों की तलाश पर जोर दिया गया है। लेकिन सस्ते कर्ज की उम्मीद लगाये निर्यातकों को ब्याज सब्सिडी नहीं मिलने से निराशा हुई है।

    बुधवार को नई विदेश व्‍यापार नीति जारी करते हुए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि नई पॉलिसी से मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि उन्होंने माना कि इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की अड़चनों को दूर करना बड़ी चुनौती है। साथ ही विश्‍व बाजार में हम कमजोर मांग का सामना कर रहे हैं। नई नीति में मोदी सरकार ब्‍याज छूट और सब्सिडी की बजाय कारोबारी की प्रक्रिया को सरल बनाने और इनसेंटिव के जरिए प्रोत्साहन का रास्ता चुना है।

    2020 तक 900 अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्‍य

    वाणिज्य सचिव राजीव खेर ने कहा कि सरकार का मकसद वर्ष 2020 तक देश के निर्यात को 900 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। इससे विश्व निर्यात में भारत की हिस्सेदारी मौजूदा दो फीसदी से बढ़कर 3.5 फीसदी तक पहुंच सकती है।

    निर्यात प्रक्रिया होगी आसान

    वाणिज्‍य मंत्री ने कहा कि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही पुरानी योजनाओं को इन दोनों स्‍कीम के तहत लाया जाएगा। उन्‍होंने कहा कि ट्रांजेक्‍शन कॉस्‍ट को कम करने के लिए 21 विभागों को नामित किया गया है, जो निर्यात संबंधी प्रक्रिया को सरल बनाएंगे। इसके अलावा राज्‍यों को निर्यात की रणनीति बनाने में केंद्र की मदद दी जाएगी।

    डिफेंस, फार्मा पर फोकस, जीरो डिफेक्‍ट उत्‍पाद बनाने पर जोर

    नई विदेश व्‍यापार नीति में भी सरकार ने जीरो डिफेक्‍ट उत्‍पाद बनाने पर जोर दिया है। वाणिज्‍य मंत्री ने कहा कि नई पॉलिसी का फोकस हाई वैल्‍यू ऐडेड उत्‍पादों के निर्यात पर फोकस किया गया है। इसमें पर्यावरण के अनुकूल उत्‍पाद बनाने की बात भी कही गई है। सीतारमण ने कहा कि नई नीति लेबर को प्रोत्‍साहित करने वाले उत्‍पादों के निर्यात को बढ़ावा देगी। भारतीय उत्‍पादों को नई पहचान दिलाने के लिए सरकार एक ब्रांडिंग कैंपेन भी शुरू करेगी।

    सेज को उबारने की कवायद

    नई नीति में लगभग नाकाम को चुके स्पेशल इकोनामिक जोन (SEZ) को उबारने की कवायद के तहत MEIS और SEIS में मिलने वाली सुविधाओं का फायदा सेज इकाइयों को मिलेगा। इसके साथ ही चैप्टर-3 का फायदा भी सेज इकाइयों को मिलेगा।

    ई-कॉमर्स को बढ़ावा देगी नई नीति

    नई विदेश व्‍यापार नीति ई-कॉमर्स कंपनियों को भी निर्यात के लिए प्रोत्‍साहित किया जाएगा। ये रियायतें खासतौर पर नौकरियां पैदा करने वाले सेक्‍टरों से निर्यात पर मिलेंगी। कूरियर या फॉरेन पोस्‍ट ऑफिस के जरिए ई-कॉमर्स प्‍लेटफार्म का इस्‍तेमाल कर निर्यात करने वाली कंपनियों को MEIS का लाभ मिलेगा। हालांकि, यह फायदा सिर्फ 25 हजार रुपये तक के कंसाइनमेंट पर ही मिलेगा।

    नई विदेश व्‍यापार नीति की खास बातें-

    • नई नीति को जोर निर्यात को बढावा देने, नौकरियां पैदा करने और वैल्‍यू एडिशन पर है।

    • वस्‍तुओं के साथ-साथ सर्विस एक्‍सपोर्ट को बढ़ावा देने पर ध्‍यान दिया गया है। इसके लिए सरकार सब्सिडी के बजाय इंसेंटिव देने का रास्‍ता चुना है।

    • बुनियादी ढांचा सुधारने और कारोबार में आसानी

    • एक्‍सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए ब्रांडिंग कैंपेन शुरू होगा।

    • नए उद्यमियों को ट्रेनिंग दी जाएगी

    • श्रम आधारित उद्योगों से निर्यात को बढ़ाया दिया जाएगा। वैल्यू एडिड, कृषि उत्‍पाद, कमोडिटी, हाई-टेक प्रोडक्‍ट, इको फ्रेंडली और ग्रीन प्रोडक्‍ट पर जोर देने के साथ जीरो डिफेक्ट प्रोडक्ट के निर्यात पर जोर होगा।

    • निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कई पुरानी योजनाओं की बजाय दो बड़ी योजनाएं- 'मर्चेंडाइज एक्‍सपोर्ट फ्राम इंडिया' (एमईआईएस) और 'सर्विस एक्‍सपोर्ट फ्राम इंडिया' (एसईआईएस) नाम की दो नई योजनाएं शुरू।

    • ड्यूटी ड्राबैक के फायदे इन नई योजनाओं के तहत दिए जाएंगे।

    • ईपीसीजी स्‍कीम के तहत निर्यात आब्लीगेशन को पच्चीस फीसदी किया जाएगा। घरेलू खरीद को बढ़ावा दिया जाएगा।

    • नई योजनाओं के फायदे विशेष आर्थिक क्षेत्रों यानी सेज को भी मिलेंगे। चैप्‍टर तीन के तहत अब सेज को भी मिल सकेगी। लंबे समय से इसकी मांग की जा रही थी। इससे सेज को बढ़ावा मिलेगा।

    • टैरिफ रेशनलाइजेशन के तहत 850 टैरिफ लाइन कवर होंगी।

    • राज्‍यों से निर्यात बढ़ाने के लिए केंद्र के साथ तालमेल बनाने को बढ़ावा दिया जाएगा। केंद्र सरकार राज्‍यों को उनकी निर्यात रणनीति बनाने में मदद करेगी। इसके अलावा एक काउंसिल फॉर ट्रेड प्रमोशन एंड डेवलपमेंट बनाई जाएगी, जिसमें राज्‍यों की भागीदारी रहेगी।

    • ट्रांजेक्‍शन कॉस्‍ट को कम करने के लिए 21 विभागों को नॉमिनेट किया गया है, जो निर्यात संबंधी प्रक्रिया काे सरल बनाएंगे।

    • अब हर एक्‍सपोर्ट अप्रैजल तिमाही आधार पर होगा।

    • नई नीति में नए बाजारों की तलाश को महत्‍व दिया गया है।

    • कृषि उत्‍पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए ज्‍यादा इनसेंटिव दिए जाएंगे।

    • EPCG स्‍कीम के तहत एक्‍सपोर्ट आब्‍लिगेशन में 25 फीसदी की रियायत दी गई है। इससे घरेलू उत्‍पादन को प्रोत्‍साहन मिलेगा।

    • विदेश व्‍यापार नीति की सालाना समीक्षा के बजाय अब ढाई साल में समीक्षा की जाएगी।

    • विनिर्माण क्षेत्र और रोजगार सृजन में छोटे और मध्यम पैमाने के उद्यमों के महत्व को देखते हुए 'सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के 108 समूहों की पहचान की गई है।

    के आर चोकसी सिक्योरिटीज के देवेन चोकसी और ट्रेडस्विफ्ट ब्रोकिंगके संदीप जैन बता रहे हैं कि चौथी तिमाही में कंपनियों के लिए क्या क्या राहत की खबरें रही और किन खबरों के चलते कंपनियों के नतीजों पर खराब असर हो सकता है।


    बैकिंग-फाइनेंस नतीजे कैसे रहेंगे


    यूबीएस का अनुमान


    यूबीएस के मुताबिक चौथी तिमाही में बैंकिंग और फाइनेंस में एसेट क्वॉलिटी कमजोर ही रहेगी। हालांकि गैस प्राइस पूलिंग, कोल नीलामी के चलते एनपीए की दिक्कत कम होगी। बैंकों की रीस्ट्रक्चरिंग में बढ़ोतरी का अनुमान है। चौथी तिमाही में एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक की लोन ग्रोथ 20 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है और इंडसइंड बैंक, यस बैंक की लोन ग्रोथ 23-27 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है। इस दौरान बैंकों के मार्जिन स्थिर रहेंगे। वहीं दूसरी ओर हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों के नतीजे काफी मजबूत होंगे। कर्ज की कमजोर मांग, मार्जिन पर दबाव, ज्यादा प्रोविजनिंग से आईडीएफसीपर दबाव बना रहेगा।


    यूबीएस के मुताबिक एसबीआई, एचडीएफसी बैंक में एक्सिस बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदाऔर एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस में निवेश किया जा सकता है। यूबीएस के मुताबिक एमएंडएम फाइनेंशियलसे निवेशकों को दूर रहना चाहिए।


    आईटी सेक्टर

    आईटी सेक्टर में क्रॉस करेंसी की चिंताएं बनी हुई हैं। डॉलर के मुकाबले बड़ी करेंसीज 4-10 फीसदी कमजोर हो सकती हैं और नए प्रोजेक्ट शुरू होने में देरी हो सकती है। नॉर्थ अमेरिका में मौसम के अनियमित हालात के चलते वहां से ऑर्डर में कमी देखने को मिल सकती है। हालांकि टॉप 5 कंपनियों की डॉलर आय ग्रोथ तिमाही दर तिमाही 2-2.5 फीसदी गिरने का अनुमान है। ज्यादातर कंपनियों की डॉलर आय ऑर्गेनिक ग्रोथ +1 फीसदी या -1 फीसदी रहने का अनुमान है। ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन 1 फीसदी से -1 फीसदी के दायरे में रहने का अनुमान है। टेक महिंद्राका ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन 2 फीसदी गिरने का अनुमान है और मैनेजमेंट का कमेंट सतर्क का रह सकता है।


    ऑटो सेक्टर

    ऑटो सेक्टर पर बेमौसम बारिश का असर नतीजों पर दिखेगा और वित्त वर्ष 2015 की चौथी तिमाही में बिक्री कमजोर रहने के कारण कंपनियों की ज्यादा डिस्काउंट देने की गुंजाइश कम है। हालांकि ऑटो सेक्टर के लिए राहत की खबर है कि नए लॉन्च से बिक्री को सपोर्ट मिलेगा। मीडियम और हैवी कमर्शियल व्हीकल प्लेयर्स से अच्छे नतीजों की उम्मीद है वहीं टू-व्हीलर बिक्री स्थिर रह सकती है।


    कैपिटल गुड्स सेक्टर

    इस बार पावर में ऑर्डर काफी कम रहे हैं और कैपिटल गुड्स सेक्टर में रिकवरी काफी धीमी रही हैं। कंपनियों पर मार्जिन बनाए रखने, वर्किंग कैपिटल बढ़ाने पर फोकस रखने का दबाव है। वित्त वर्ष 2016 की दूसरी छमाही में ही रिकवरी की उम्मीद है।


    रियल एस्टेट सेक्टर

    चौथी तिमाही में रियल एस्टेट में नए लॉन्च ज्यादा नहीं हुए हैं जबकि एनसीआर मार्केट में दबाव लगातार जारी है। कंपनियों का सेल्स वॉल्यूम बढ़ने पर फोकस होगा। रियल एस्टेट के लिए कुछ राहत की खबरें ये हैं कि मुंबई में कुछ प्रोजेक्ट्स की बिक्री बढ़ रही है। बंगलुरू, पुणे का मार्केट अब भी मजबूत बना हुआ है।


    फार्मा सेक्टर

    फार्मा सेक्टर पर यूएसएफडीए की सख्ती का असर चौथी तिमाही में देखा जा सकता है और जबकि इस दौरान रुपये में कमजोरी से आय बढ़ेगी और घरेलू कारोबार मजबूत रहने की उम्मीद है।


    एफएमसीजी सेक्टर

    चौथ तिमाही में एफएमसीजी का डिमांड आउटलुक कमजोर रहा है और सिगरेट मार्जिन को बनाए रखना आईटीसीके लिए चुनौती है। बेमौसम बारिश की वजह से ग्रामीण बिक्री पर असर देखा जा सकता है। हालांकि एग्री सेक्टर से कच्चा माल इस्तेमाल करने वाली कंपनियों की लागत घटेगी और शहरों में ऑपरेट करने वाली कंपनियों में रिकवरी की उम्मीद है।


    मेटल सेक्टर

    आयरन ओर की किल्लत होने से इंपोर्ट बढ़ रहा है और कोयला ब्लॉक की नीलामी पर भी खर्च हुआ है जिससे कंपनियों की बैलेंसशीट पर दबाव है। डिमांड घटने से कंपनियां बड़े केपैक्स से बच रही हैं। हालांकि मेटल सेक्टर में कच्चा माल सस्ता होने से स्टील कंपनियों को फायदा भी हो रहा है।


    टेलीकॉम सेक्टर

    चौथी तिमाही में टेलीकॉम कंपनियों के वॉल्यूम पर दबाव देखा गया है और स्पेक्ट्रम नीलामी पर बड़ा खर्च हुआ है।भारती एयरटेल का अफ्रीकी कारोबार दबाव में आया है और इसका असर नतीजों पर देखने को मिलेगा।

    http://hindi.moneycontrol.com/mccode/news/article.php?id=116966




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