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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    Indian People lost the Waterloo in  the Indian capital irrespective of election result!

    It is now shafron time and shafron science in Bihar all the way as Amit Shah and all his horses have to win East and North East Non Aryan!The Finance Minister and the Prime minister should have some time now to finalise Budget skipping policy paralysis in default,inherited from UPA Second and US President`s diplomacy should bloom all over India,if not the lotus in Indian Capital.

    Palash Biswas

    Indian People lost the Waterloo in  the Indian capital irrespective of election result

    It is now shafron time and shafron science in Bihar all the way as Amit Shah and all his horses have to win East and North East Non Aryan!The Finance Minister and the Prime minister should have some time now to finalise Budget skipping policy paralysis in default,inherited from UPA Second and US President`s diplomacy should bloom all over India,if not the lotus in Indian Capital.


    Now the voting is over in New delhi and we still do not know whose Waterloo it is going to turn into.But it is sure Indian people have lost the waterloo irrespective of political conclusion whatsoever.Political equation have to do nothing with the economics of the emerging market as the Multinational capital is all set for the final kill and those selected for the racial ethnic cleansing might not be aware.


    Bjp accomplished the task to divide the people on religious line with a vital dose right from Washington as Obama preached freedom of religion and the politics in Delhi pitted Muslim voters against  Hindu Imperialism as the rest of identities happen to be divided in absence of a people`s resistance forum against Sell OFF Kill Masses Billionaire Millionaire multi national brigade.


    It is the exact location of the Waterloo we have lost politically, socially, culturally and economically as it had been the first ever digital biometric election in the most betted on emerging market for radioactive polonium growth trickling trickling as twinkling twinkling iconic stars with weapons of mass destruction.Because the Poisa finally has to manufacture the mandate so much so hyped.


    Irrespective of Delhi results,the monopolistics foreign capital boosted would run through the country and Bihar is going to be next target.RSS would have a most wanting bearer in Kashmir Valley,the PDP. Bengal is almost  shafron and all stakes remain status quo subjective to Didi` survival.


    During the first class election for the super first class citizens of Delhi,no national issue had been addressed at all and the basic problems of Indian Masses and those of the economy had not been projected anywhere amidst the digital blitz.


    Rather the racial Apartheid expressed it into a political document branding the North East people as immigrants.In fact anyone from anywhere living in Delhi does not deserve a better status provided he or she has not have any setting in the ruling hegemony whatsoever.


    It was a Super Hit blockbuster Friday show of Indian Cinema known for selling of multidimensional dreams all round and the Have Not audience happens to be target countrywide and beyond the borders!


    Thus, the latest scene of the political Nautanki with an item dance of the company wali Bai of Teesri Kasam fame unfolds in Bihar as Budget is the focal point of national international business which has to do nothing with Indian masses,the disunited,degenerated,identity struck emotional ninety percent masses!


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    प्रेस विज्ञिप्त 8 फरवरी 2015
    दलित महिला शोभा के घर पर हमला व उल्टे घायल महिलाओं को ही सोनभद्र पुलिस प्रशासन द्वारा गिरफतार कर जेल भेजने के मामले में हज़ारों दलित आदिवासीयों द्वारा थाना चोपन पर बेमियादी धरना


    जनपद सोनभद्र उ0प्र0 के ग्राम बाड़ी चोपन थाना तहसील राबर्टसगंज में वैष्णो देवी मंदिर के पीछे दलित महिला शोभा के घर पर 6 फरवरी 2015 को ग्राम बाड़ी के सरहंग दबंग लोगों ने सैकड़ों की संख्या में हमला बोला जिससे शोभा का घर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है व इस हमले में कम से कम 20 महिलाए गंभीर रूप से घायल हुई है। इन महिलाओं को न्याय देने के बजाय उल्टे सोनभद्र पुलिस ने सभी घायल महिलाओं को रात में मिर्जापुर जेल में भेज दिया और जिन्होंने हमला किया उनके झूठे फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनवाने का काम खुद उपर पुलिस अधीक्षक शंभू शरण यादव ने किया। घायल महिलाओं में कई ऐसी महिलाए हैं जिनके छोटे छोटे दुध मुंहा बच्चे हैं जो कि उनके बिना बिलबिला रहे हैं। शोभा व सभी महिलाए स्थानीय संगठन कैमूर क्षेत्र मज़दूर किसान महिला संघर्ष समिति एवं अखिल भारतीय वनजन श्रमजीवी यूनियन की सदस्या हैं। इन्हें बिना शर्त रिहा करने के लिए हज़ारों की तादात में दलित आदिवासी महिलाओं ने तीर कमान से लैस होकर चोपन थाने को घेराव कर लिया है व यह ऐलान कर दिया है कि सभी महिलाओं को जब तक बिना शर्त नहीं रिहा किया जाएगा व पीडि़त महिलाओं को जब तक न्याय नहीं दिया जाएगा तब तक आंदोलनकारी थाने पर अपना कब्ज़ा नहीं छोड़ेगें। आंदोलनकारी और अराजक तत्व जिनके पीछे प्रशासन, खनन माफिया, जेपी कम्पनी व वनविभाग है वे आमने सामने हैं। यह संघर्ष भूअधिकारों और महिला उत्पीड़न के खिलाफ का संघर्ष है जिसके लिए आंदोलनकारी डटे हुए है व उन्होंने फैसला लिया है अगर महिलाओं के साथ उत्पीड़न ज़ारी रहेगा तो वे सोनभद्र जिले में चल रहे तमाम जनआंदोलनों और देश भर के जनसंगठनों को एक़ित्रत कर एक व्यापक जनआंदोलन छेड़ेगें। 

    शोभा के घर पर इस घटना को अंजाम देने में स्थानीय दबंग जिसका नेतृत्व शोभा के ही बलात्कारी कलवंत अग्रवाल व अन्य डा0 मिश्रा, बीडीसी जसौदा, वनविभाग व डाला चैकी प्रभारी द्वारा किया गया। सोनभद्र की प्रेस के अनुसार हमला यह कह कर किया गया कि शोभा वनभूमि पर काबिज़ है जिसको वहां रहने का कोई हक नहीं है। जबकि उपर पुलिस अधीक्षक द्वारा यह बयान दिया गया है कि शोभा द्वारा बीडीसी जसौदा को मारा गया इसलिए उस के घर पर हमला किया गया। इन दोनों बातों से यह साफ होता है कि यह हमला पुलिस और दबंगों द्वारा मिलकर करवाया गया ताकि शोभा को जानसे मार कर वहां से भगाया जाए। दरअसल शोभा द्वारा पिछले दस वर्षो से अपने भूअधिकार का संघर्ष किया जा रहा है। एक दलित महिला होने के नाते वह अपनी मज़दूरी कर के चोपन के क्रशर बेल्ट में पेट भरती थी और वहीं पर वह अपनी झोपड़ी डाल कर रह रही थी। उसे वहां से हटाने के लिए खनन माफिया कलवंत अग्रवाल द्वारा 2008 में उसी के पति को चोरी के आरोप में जेल भिजवाया गया व उसी के घर में घुस कर शोभा का बलात्कार किया गया। यह बलात्कारी पुलिस के साथ मिलकर कोर्ट की आंखों में धूल झांेक कर 376 व एससीएसटी एक्ट में कोर्ट से स्टे आर्डर ले आया और बेखौफ घूमता रहा। बार बार शोभा और उसकी लड़कीयों को धमकीयां देता रहा कि मेरा कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता और तुम्हारी लड़कीयों के साथ भी अब यहीं होगा। इसके खिलाफ शोभा का संघर्ष ज़ारी रहा। इस बलात्कारी को गिरफतार करने के लिए संगठन ने एकजुट हो कर जून 2014 में चोपन थाने का घेराव किया और उसके फर्जी स्टे आर्डर को कोर्ट में चुनौती दी व गिरफतार करवाया। लेकिन कुछ ही दिन में वह छूट गया क्यों कि इस मामले में अभी तक सोनभद्र पुलिस ने बलात्कारी के खिलाफ चार्ज शीट दाखि़ल नहीं की है। 

    इसके अलावा जिस भूमि पर शोभा का घर स्थित है उस भूमि पर वनाधिकार कानून 2006 के तहत शोभा द्वारा दावा भी दायर किया गया है जो कि अभी तक लम्बित है। उ0प्र0 में सपा सरकार के सत्तासीन होने के बाद इस कानून को लागू करने की प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं की गई है। वनाधिकार कानून लागू करने का संघर्ष एक वृहद संघर्ष है जो कि जनपद सोनभद्र में दलित आदिवासीयों द्वारा लड़ा जा रहा है। यह संघर्ष दरअसल कम्पनियों, माफियाओं, पंूजीपतियों, सांमतों, ठेकेदारों, भूमाफियाओं व दबंगों के खिलाफ है। जो कि एकजुट हुए व व्यापक राजनैतिक चेतना के नहीं लड़ा जा सकता। शोभा द्वारा एक व्यापक मोर्चा बनाया गया व अपने क्षेत्र में उसने महिलाओं को बड़े पैमाने में संगठित कर सांमतों, पूंजीपतियों, बलात्कारीयों, अपराधीयों व हत्यारों को चुनौती दी। उसे यह आभास था कि किसी भी दिन उसपर जान लेवा हमला हो सकता है लेकिन वह निर्भिक हो कर अपने हकों के लिए सरकार से लड़ती चली आ रही है। बाड़ी क्षेत्र की मज़दूर ग़रीब महिलाओं द्वारा संगठित हो कर वनविभाग द्वारा लूटी गई भूमि पर उन्होंने अपना दख़ल काय़म किया व कारपोरेट लूट को भी चुनौती दी। 

    महिलाओं की इस संगठित ताकत के आगे सारे निहित स्वार्थ बौखलाने लगे व डाला चैकी इंचार्ज की मदद से महिलाओं को सबक सिखाने के लिए साजिश रची गई तथा शोभा को उसी के घर से बेदख़ल करने की साजिश बनाई। जबकि वनाधिकार कानून 2006 की धारा 4 उपधारा 5 में यह स्पष्ट वर्णित है कि जब कोई भी दावेदार इस कानून के तहत अपना दावा करता है तो उसे उसकी भूमि से तब तक बेदख़ल नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका दावा निस्तारित नहीं हो जाता। दलित महिला के घर पर हुए इस हमले का जवाब जिलाधिकारी को देना होगा जो कि जिला स्तरीय वनाधिकार समिति के अध्यक्ष है। संसद के इस कानून की अवमानना करने के लिए इस कानून में अधिकारीयों के उपर भी सख्त कार्यवाही करने के र्निदेश है चूंकि यह कानून वनाश्रित समुदाय के प्रति हुए ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने के लिए ही लाया गया है। लेकिन कानून के पालन के बजाय अभी तक यह ऐतिहासिक अन्याया जनपद सोनभद्र में ज़ारी है जहां पर खनन माफियाओं, कोयला चोरों, कम्पनियों की शय पर जिला प्रशासन इन अन्यायों को ज़ारी रखे हुए है।  

    आज सुबह से इस मामले को लेकर पूरे क्षेत्र मे आदिवासीयों में काफी गुस्सा है व वे हज़ारों की संख्या में एकत्रित हो कर चोपन थाना का घेराव करके बैठ गए है। इस मामले में अगर सुनवाई नहंी होती तो सोनभद्र के अलावा अन्य जनपदों एवं राज्यों से भी इस आंदोलन को मदद करने के लिए हज़ारों की संख्या में वनाश्रित समुदाय एकत्रित होगा। उनकी मांगे हैं -

    1.डाला चैकी प्रभारी विजय यादव एवं उपर पुलिस अधीक्षक शंभू शरण यादव को दलित महिला के घर पर हमले का पूरा जिम्मेदार ठहराते हुए व अराजक तत्वों को सुरक्षा देने के आरोप में तत्काल संस्पेड़ किया जाए। 
    2.दलित महिला के घर पर हुए हमले के उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
    3.सभी गिरफतार 18 महिलाओं को बिना शर्त व बाईज्जत रिहा किया जाए, अगर वे रिहा नहीं होती है तो थाना चोपर पर महिलाओं का घेराव ज़ारी रहेगा व इस मामले को मुख्यमंत्री स्तर तक लेजाया जाएगा। 
    4.दलित महिला के बलात्कारी कलवंत अग्रवाल को तत्काल गिरफतार करके जेल भेजा जाए। अगर गिरफतारी नहीं होती तो महिलाए एक वृहद जनांदोलन छेड़ेगी। 
    5.वनाधिकार कानून 2006 के तहत दलित महिला के दावे को निस्तारित कर उसका मालिकाना हक़ दिया जाए व तमाम अन्य वनाधिकार एवं लघुवनोपज पर मालिकाना हक़ दिया जाए। 
    6.महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न को तत्काल बंद किया जाए व महिलाओं को सम्मान दिया जाए। 
    7.दलित महिला के घर के हुए नुकसान का 25 लाख का मुवाअज़ा दिया जाए व उसके सम्मान को उसे लौटाया जाए। 
    8.इस पूरे क्षेत्र में दलित आदिवासीयों के भू एवं वनाधिकारों को सुनिश्चित किया जाए। 
       
    शोभा के घर पर हमले के बाद                        3 फरवरी को दलित आदिवासी महिलाओं द्वारा दख़ल की गई भूमि पर 
    रिपोर्ट रोमा

    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com

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    Let us not celebrate.

    Cry my country,cry!


    Change this damned Politics!

    No Politics represents the people anywhere!


    The Political hegemony treats the citizen as its enslaved subject.


    Ruling politics as well as the opposition is responsible for our suffering!

    Palash Biswas

    My countrymen,please do not celebrate the win of any political party or do not lose your heart in defeat.


    Change this damned Politics!

    No Politics represents the people anywhere!


    The Political hegemony treats the citizen as its enslaved subject.

    Ruling politics as well as the opposition is responsible for our suffering!


    We have to go back into the history from the days of freedom struggle and the aspiration of the movement and the people and see the results translated in an emerging market ruled by shafron corporate builder promoter mafia Raj.


    Ideologies misused by politics duped us for full seven decades,we have to understand and have to read the role of our national leaders afresh from prepartition united India to this date.


    We have to look in seventies while the people came out on streets and we got it back fired as and in the resurrection of Hindu Imperialism pro America pro Zionism.


    We have seen the socialist model.We have already seen the Gujarat PPP model along with the infamous genocide springing is every corner of the  geopolitics beyond borders again.

    We have seen latest attempt of the people in Ramliala ground in delhi thanks to Anna Brigade which spilled in the political power game and ground.Then we saw two comrades compete for the key to power in delhi and we would soon know whose waterloo it had been.


    We had been spellbound Tsunami very recently and paid back with a Desh Becho Muhim,sell off kill kill kill.Complete


    privatisation.Complete FDI.It is making in.It is innovation and it is the grand saga of the trickling growth which digested the welfare state as well as the forces who had been crying for equality,justice and poverty eradication all these decades!


    We have already seen the naked politics exposing its multidimensional skin.We would see it in Kashmir and in the IMIGRANT AFSPA Northeast very soon.


    We are enjoying the latest item song as Bihar Hilela and Patna hilela with Progressive Leftist Liberal Bengal Jhulela in dilemma whether the MAA MAATI Manush government inflicted with ponzi politics survives or not.


    I have nothing to do with political equations whatsoever and I have not to care who becomes the next PM or the next CM anywhere.


    Because it does not matter.


    The Billionaire Millionaire hegemony does not represent us and we have reduced to a status of robotic biometric digital clones in a Super Market carnival devoid of civilization,culture,mother tongue, economy,livelihood, job,natural resources like Hawa Pani and Anaaj along with humanity.


    Let us not celebrate.

    Cry my country,cry!


    I attended a condolence meeting in Dharmankur hall in central Kolkata today in memory of DR.Gunodhar Burman who passed MBBS and DCH in 1953 and died penniless though he continued to see patients until his demise.He was a son of a fisherman and never accepted fees from the depressed classes and always did look on their health.He organised first ever trade union for the fisherman flock and led the deprived communities till he breathed last.


    He was a close associate of Mahapran Jogendra Nath Mandal and later,Manyavar Kanshiram,He was behind Bangla Dalit Sahitya movement.


    Moreover, he was the man who obliged Bengal and Central government to activate the constitutional reservation for job for Scheduled Caste and scheduled tribe who were deprived in Benagl until 1972.


    Our people complain that they have no civic and human right as resettled partition victims anywhere in the country.


    Then see,Dr Burman led from the front in association of the first Dalit Speaker of Bengal assembly to pass the bill in guillotin procedure strategically as none of the eighty two members elected for Bengal Assembly supported the bill.Even he had to break in the survey team which surveyed for reservation for SC and ST communities.



    It is the most shocking information which I never knew and came to know this only today.


    Now, the Bengali Depressed classes and those refugees resettled outside Bengal should understand that It is not Delhi,even not those state capital in Indian states are responsible for the plight of Hindu partition victim SC ,ST and OBC agrarian communities,the ball rolled from Kolkata as it rolled again while citizenship amendment bill was presented in the Parliament by then Home Minister LK Adwani and Pranab Mukherjee refused public hearing and bengal political parties got it passed aligned with BJP and RSS which divided Bengal as well as India to deprive the depressed classes all over the geopolitics beyond border.


    Thus,the violence continues.

    Thus,the Holocaust continues.

    Thus,the ethnic cleansing continues.

    Thus,it is a regime of racial Apartheid!


    Thus,the refugee influx from outside as well as inside continues.Would not stop.



    I would write on this again and again when I get the documents,It should be treated as first FIR.


    Bangladeshi writer Monsur Haider writes that the ruling hegemony as well as the opposition happen to be responsible for extreme exploitation and persecution of the people in a democracy because the politics treats the masses as its enslaved subject to be destined for such treatment in a democracy.


    He operates the original Parliamentary phenomenon in Britain and then specifically focus on the recent incidents of political clash on going in Bangladesh.


    The article describes and explains the political hegemony across the border highly relevant in India,too as no politics represents the people,mind you.


    I am posting the article he sent to me original in Bengali.If possible,it should be translated and circulated.Those who may read Bengali,please read the original attached with this write up.



    উভয়ের দ্বারাই জনগণ চরমভাবে শোষিত ও নির্যাতিত


    Monsur Haider <haidermonsur1382@gmail.com>

    Sun, Feb 8, 2015 at 11:11 AM

    To: Monsur Haider <haidermonsur@gmail.com>, Monsur Haider <haidermonsur1382@gmail.com>

    Bcc: palashbiswaskl@gmail.com


    উভয়ের দ্বারাই জনগণ চরমভাবে শোষিত ও নির্যাতিত

    প্রচলিত গণতন্ত্রে বিরোধী দলও শাসন ক্ষমতারই অংশবিরোধীদলীয় নেতাও প্রটোকল পেয়ে থাকেকমপক্ষে পূর্ণ মন্ত্রীর মর্যাদা পেয়ে থাকেইংল্যান্ডে বিরোধী দল ছায়াসরকারও গঠন করেছায়া সরকারের বিভিন্ন মন্ত্রী গঠিত হয়তারা সরকারের মন্ত্রীর সমান্তরালে বিভিন্ন দিক নির্দেশনা বা সমালোচনাও করে থাকেবিএনপি বর্তমানসাংবিধানিকভাবে বিরোধী দলের মর্যাদা লাভ করতে না পারলেও কার্যত তারাই দেশের প্রধান বিরোধীদলের ভূমিকা পালন করে যাচ্ছেএবং প্রকৃত অর্থে তারাই প্রধান বিরোধীদলের ক্ষমতা রাখেসুতরাং কার্যতঃ গণতন্ত্রে বিরোধী দল যে শাসনক্ষমতার সমান্তরাল অংশীদার বা নিয়ন্তা হয় বিএনপি'র ক্ষেত্রে বর্তমানে তাই প্রযোজ্য হয়এবং এ কারণেইবিএনপি নির্বিচারে এত হরতাল-অবরোধের মতো ধ্বংসাত্মক কর্মসূচি দিতে পারছেএবং সরকারও তাকে বেআইনী বলছে নাবা গণতন্ত্রের নিয়মানুযায়ী বলতে পারছে না(নাঊযুবিল্লাহ!) অর্থাৎ দেশ চালনা বা শাসনকার্য পরিচালনায় বেগম খালেদা জিয়ার ভূমিকা ও দায়ভার গুরুত্ববহ

    উল্লেখ্য, গত ৫ ফেব্রুয়ারি-২০১৫ বিএনপি নেতৃত্বাধীন ২০ দলীয় জোটের ডাকা অবরোধের এক মাস পূর্ণ হয়েছেএই সময়ের মধ্যে চোরাগোপ্তা পেট্রোলবোমা হামলা, সহিংসতা-নাশকতার শিকার হয়ে প্রাণ হারিয়েছে যারা, তাদের বেশির ভাগই সাধারণ নিরীহ মানুষজীবিকার তাগিদে ঘর থেকে বের হয়ে সুস্থভাবে আবার ঘরে ফেরা নিয়ে চরম আতঙ্কেথাকতে হচ্ছে নিরীহ জনসাধারণদেরকেননা পেট্রোলবোমায় প্রায় প্রতিদিনই ঝলসে যাচ্ছে নিরপরাধ কারো না কারো শরীরদিনের পর দিন আয়-রোজগার না থাকায় ওষ্ঠাগততাদের প্রাণঅবরোধে দেশের অর্থনীতি, পরিবহন, ব্যবসা, পর্যটন, শিক্ষা, চিকিৎসাসহ সব কিছুরই ক্ষতি হচ্ছে সীমাহীন

    অবরোধ শুরুর পর থেকে প্রতিদিনই কোথাও না কোথাও গাড়ি পোড়ানো বা পেট্রোলবোমা হামলা বা হাতবোমা হামলার ঘটনা ঘটছেগত ৩০ দিনের মধ্যে ২৩ দিনই মৃত্যুবরণকরেছে কেউ না কেউএই সময়ের মধ্যে প্রাণ গেছে ৫৫ জনেরএর মধ্যে অন্তত ৪৪ জনই সাধারণ নিরীহ মানুষ, যার মধ্যে নারী ও শিশুও রয়েছে; এরা কেউ কোনোরাজনৈতিক দলের কর্মী ছিল নাএকই সময়ে পেটের দায়ে রাস্তায় গাড়ি চালাতে গিয়ে ১৭ জন পরিবহন শ্রমিককে আগুনে পুড়ে মরতে হয়েছে; তারাও রাজনীতির ধারেকাছে ছিলনাসাধারণ যাত্রীদেরও মরতে হচ্ছে বাসে চলাচল করতে গিয়েগত ২ ফেব্রুয়ারি-২০১৫ সোমবার গভীর রাতে কুমিল্লার চৌদ্দগ্রামে, এর আগে রংপুরের মিঠাপুকুরে, এমনকিরাজধানীর যাত্রাবাড়ীতেও যাত্রীবাহী বাসে পেট্রোলবোমা হামলায় প্রাণ দিতে হয়েছে নিরীহ যাত্রীদেরএই তিন স্থানে আগুনে পুড়ে মরতে হয়েছে ১৫ জন নিরীহ যাত্রীকেজরুরীপ্রয়োজনে রাস্তায় বেরিয়ে প্রাণ দিতে হয়েছে তাদেরদগ্ধ অনেকেই যন্ত্রণায় কাতরাচ্ছে হাসপাতালের বার্ন ইউনিটে

    অনুসন্ধানে জানা গেছে, গত এক মাসে দেশের বিভিন্ন স্থানে আগুন দেয়া হয়েছে ৯০০ গাড়িতেভাঙচুরের শিকার হয়েছে ৩,৩০০ গাড়িসম্পূর্ণ পুড়ে গেছে ৯০টি গাড়িআগুনের শিকার যানবাহনের বেশির ভাগই বাস-ট্রাকএসব সম্পদও সাধারণ মানুষের, রাজনৈতিক নেতাদের নয়একই সময়ে রেলের পূর্ব ও পশ্চিমাঞ্চলে ৭০টি নাশকতারঘটনা ঘটেছেনৌপথে হামলা হয়েছে চার দফাএসব নাশকতায় ক্ষতি হয়েছে নিরীহ যাত্রীদের

    লেখাবাহুল্য, বিএনপি-জামাত অস্বীকার করলেও এসব বর্বর ঘটনা মূলত বিএনপি-জামাতের হরতাল-অবরোধেরই কুফলঅর্থাৎ শাসন ক্ষমতায় বিএনপি-জামাতেরঅংশীদারিত্বের ব্যর্থতা, অজ্ঞতা, একগুয়েমী, জেদাজেদি, ক্ষমতার মোহে অন্ধ থাকার প্রক্রিয়া, জনগণকে ক্ষমতার ঘুটি হিসেবে প্রয়োগ করা, ইত্যাদি সব সীমাহীন অপতৎপরতাসর্বপোরি গণতান্ত্রিক কুশাসনেরই কুতৎপরতা

    অপরদিকে অপশাসন, অদূরদর্শিতা, অজ্ঞতা, অপরিণামদর্শিতার ক্ষেত্রে ক্ষমতাসীন সরকারও গভীর আপত্তিকর পারঙ্গমতা প্রদর্শন করছেগণপ্রজাতন্ত্রী বাংলাদেশের সংবিধানের১৪১ক (১) ধারা অনুযায়ী অভ্যন্তরীণ গোলযোগের দ্বারা বাংলাদেশ বা উহার যে কোনো সংঘের নিরাপত্তা বা অর্থনৈতিক জীবন বিপদের সম্মুখীন হলেই জরুরী অবস্থা জারিরকথা বলা হয়েছে

    কিন্তু বর্ণিত প্রাণহানী, নিরাপত্তাহীনতা, অর্থনৈতিক ধসের পরও ক্ষমতাসীন প্রধানমন্ত্রী গত ৪ ফেব্রুয়ারি-২০১৫ ইয়াওমুল আরবিয়া (বুধবার) জাতীয় সংসদে বলেছে, জরুরীঅবস্থা জারির মতো অবস্থা এখনও তৈরি হয়নি

    অথচ দেশবাসী সবাই মর্মে মর্মে উপলব্ধি করছে এক মাসেরও বেশি সময় ধরে লাগাতার অবরোধ এবং সে সাথে হরতাল; যা¬ দেশে এর আগে হয়নিএভাবে প্রাণহানি,অর্থনৈতিক ক্ষতিও হয়নিতাহলে প্রধানমন্ত্রীর দর্শন অনুযায়ী পরিস্থিতি আরো কত খারাপ হলে জরুরী অবস্থার মতো পরিবেশ তৈরি হবে? মূলত, প্রধানমন্ত্রীর এ বক্তব্য হচ্ছেজনস্বার্থ চরমভাবে উপেক্ষা করার শামিলজনজীবন দলিত-মথিত করার শামিল

    প্রতিভাত হচ্ছে- জনস্বার্থ চরমভাবে উপেক্ষা এবং ব্যক্তি স্বার্থ তথা ক্ষমতায় নির্মমভাবে আরোহন বা ক্ষমতায় বেসামালভাবে টিকে থাকার ক্ষেত্রে সরকারি বা বিরোধী দল বাবেসরকারি দল উভয়ের মনোবৃত্তি, অবস্থান এবং কর্মসূচি হুবহু একমুদ্রার এপিঠ আর ওপিঠঅর্থাৎ উভয়ের দ্বারাই জনগণ চরমভাবে শোষিত ও নির্যাতিতউভয়েরবিরুদ্ধেই অভিযোগের তীর বিশেষভাবে নিবদ্ধ হয়কিন্তু জনগণও কী অভিযোগের বাইরে?

    পবিত্র কুরআন শরীফ উনার মধ্যে ইরশাদ মুবারক হয়েছে, "মহান আল্লাহ পাক তিনি ওই জাতির জন্য পরিবর্তন করেন না, যতক্ষণ পর্যন্ত ওই জাতি নিজেরাই নিজেদের অবস্থারপরিবর্তন না করে" (পবিত্র সূরা আনফাল শরীফ : পবিত্র আয়াত শরীফ ৫৩)

    আর পবিত্র হাদীছ শরীফ উনার মধ্যে ইরশাদ মুবারক হয়েছে, "যে জাতি যেমন আমল করে, মহান আল্লাহ পাক তিনি ওই জাতির উপর ওই রকম শাসক চাপিয়ে দেন"

    কাজেই 'আমরা রাজনীতি করি না, আমরা আগুনে পুড়বো কেন? আমরা মড়বো কেন? আমরা না খেয়ে থাকবো কেন?'- এসব প্রশ্ন করার অধিকার মূলত সাধারণ মানুষেরওনেইকারণ রাজনীতি না করলেও, দল না করলেও ভোট দেয় না- এরকম সাধারণ মানুষ নেই বললেই চলেঅথচ গণতন্ত্র সমর্থন করা, ভোট দেয়া, নির্বাচন করা, পদপ্রার্থীহওয়া ইত্যাদি পবিত্র দ্বীন ইসলাম উনার দৃষ্টিতে হারামপবিত্র হাদীছ শরীফ উনার মধ্যে স্পষ্টভাবে ইরশাদ মুবারক হয়েছে, "যে ক্ষমতা চায় তার প্রতি লা'নত" (বুখারী শরীফ)

    লেখাবাহুল্য 'ভোট চাওয়া এবং ভোট দেয়া'সে ক্ষমতা চাওয়া বা লা'নতী প্রক্রিয়ারই কর্মসূচিনাউযুবিল্লাহ!

    কাজেই আজকে দেশে যে দুরবস্থা চলছে তা শুধু বিএনপি'র হরতাল-অবরোধই নয়, ক্ষমতাসীনের অপশাসনই নয়, জনগণেরও ধারাবাহিক লা'নতী কর্মকা-েরই পরিণতি

    পবিত্র কুরআন শরীফ উনার মধ্যে ইরশাদ মুবারক হয়েছে, "যমীনে এবং পানিতে যত ফিতনা-ফাসাদ সব মানুষের হাতের কামাই" (পবিত্র সূরা রূম শরীফ : পবিত্র আয়াতশরীফ ৪১)

    কাজেই বর্তমান ফিতনা ও দুরবস্থা দূর করতে হলে ক্ষমতাসীন দল, বিরোধী দল, ২০দলীয় জোট ও খোদ জনগণ সবাইকে একযোগে খালিছ তওবা করতে হবেক্ষমতাররাজনীতি, ভোটের রাজনীতি, গণতান্ত্রিক রাজনীতি পরিত্যাগ করে খিলাফত আলা মিনহাজিন নুবুওওয়াহ উনার দিকে ঝুঁকতে হবে

    শুধু ক্ষমতাসীন দলই নয়; গণতন্ত্র অনুযায়ী বিরোধী দলসহ সব প্রভাবশালী দলও কার্যত শাসন ক্ষমতারই অংশীদারজনগণ তাদের নিজেদের আমলের কারণেই জনবান্ধবহীনক্ষমতাসীন দল ও বিরোধীদল পায়সমস্ত ফিতনা থেকে উত্তরণের জন্য তওবা করতে হবে সবাইকে





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    Taslima warns Refugee Influx from Bangladesh on fire,Hindutva government sleeping



    Bangladesh media published the latest comment by Taslima Nasrin which is about minority Hindu persecution in Bangladesh once again on Lajja line.Taslima blasts Hasina Government for refugee influx from Bangladesh and complains thet Hindus have to leave Bangladesh even in secular democratic Hasina Regime!Bangladesh is facing a volatile time of communalized political violence as Maitri Express attack unveils the riot torn Bangladesh.A coup is under pipeline and understandablly as it happened earlier that any political rivalary results in further refugee influx.It is happening again and the Government of Hindutva seems sleeping.

    Just read Taslima Comment.
    Palash Biswas

    হিন্দুরা আওয়ামী আমলেও দেশত্যাগ করছে :তসলিমা নাসরিন :

    সেদিন আলোচনা হচ্ছিল কিছু ইউরোপীয় রাষ্ট্রদূতের সঙ্গে। প্রসঙ্গ বাংলাদেশ। আজকাল বাংলাদেশের কথা ওঠা মানে পেট্রোল বোমার কথা ওঠা। পেট্রোল বোমায় এ পর্যন্ত প্রচুর লোক নিহত, প্রচুর আহত। তুমি বাড়ি থেকে বের হলে, কিন্তু তুমি জানো না তুমি বাড়ি ফিরতে পারবে কি না। তুমি যখন বাইরে, বাসে চড়ছো, গাড়িতে চড়ছো, রাস্তায় হাঁটছো, আচমকা কোনও এক পেট্রোল বোমা উড়ে এসে তোমার গায়ে পড়তে পারে এবং তোমাকে পুড়িয়ে ছাই করে দিতে পারে। তুমি নিশ্চিত নও পেট্রোল বোমা তোমার গায়ে পড়বে না বা তুমি পুড়বে না বা তুমি মরবে না।
    বাড়ি থেকে বোরোনো মানে যদি যে কোনও সময় মরে যাওয়া হয়, তবে বাড়ি থেকে বেরোনোই হয়তো উচিত নয়। সবাইকে সিঁটিয়ে থাকতে হবে ভয়ে, জীবন স্থবির করে দিয়ে ঘরবন্দি বসে থাকতে হবে অনির্দিষ্টকাল। কিন্তু ঘরবন্দি হলে চাকরি খোয়াতে হয়, ব্যবসা লাটে ওঠে, কারো কারো জন্য তো দু'বেলা অন্নের সংস্থানই হয় না! এ অনেকটা দুটো মৃত্যুর মধ্যে একটিকে বেছে নিতে বলা। যে বাসের কনডাক্টরটা সেদিন পুড়ে মরলো, তার কি ঘরবার না হলে চলতো?
    কানাডা থেকে দেশে ফিরেছেন এক বয়স্ক ভদ্রলোক, আমার অনুরাগী পাঠক, দিল্লিতে এসে আমার সঙ্গে দেখা করার খুব ইচ্ছে পোষণ করেছিলেন, পারলেন না। একদিন আমাকে খুব দুঃখিত কণ্ঠে জানিয়ে দিলেন, বাসে উঠতে ভয় পাচ্ছেন তিনি। দেশটায় নাকি আগুন জ্বলছে।
    খালেদা জানেন সব। জানেন মানুষ জীবনের ঝুঁকি নিয়েও বাইরে বেরোবে। হয়তো মরবো না এই বিশ্বাস নিয়ে লোকে বেরোবে। কারণ ঘরে বসে থাকলে মানুষের চলবে না। দেশজুড়ে বিষম এক আতঙ্ক তৈরি করতে চাইছেন খালেদা। ছেলেমেয়েদের মাধ্যমিক পরীক্ষা দিতে দেবেন না। হরতাল ডেকে বসলেন পরীক্ষার দিন। নিজের ক্ষমতা ছাড়া আর কাউকে বা আর কিছুকে তিনি কি কখনও মূল্য দিয়েছেন? আমার জানা মতে, দেননি।
    তুমি বাসে চড়ছো, বাজারে যাচ্ছো, ভাগ্য ভালো হলে বেঁচে যাবে, তা না হলে আজই আগুনে জ্বলে পুড়ে তোমাকে মরতে হবে। এত নিরাপত্তাহীনতা স্বদেশে থাকে না, থাকে শত্রুর দেশে, অথবা যুদ্ধ চলছে এমন দেশে।
    তুমি বাসে চড়ছো, বাজারে যাচ্ছো, ভাগ্য ভালো হলে বেঁচে যাবে, তা না হলে আজই আগুনে জ্বলে পুড়ে তোমাকে মরতে হবে। এত নিরাপত্তাহীনতা স্বদেশে থাকে না, থাকে শত্রুর দেশে, অথবা যুদ্ধ চলছে এমন দেশে। ফিনল্যাণ্ডের লোকেরা তিরিশের দশকের শেষদিকে পেট্রোল বোমা বানিয়েছিল রাশিয়ার লোকদের মারার জন্য। পেট্রোল বোমাকে ওরা বলতো, 'মলোটভ ককটেল'। একে 'গরিবের গ্রেনেড'ও বলা হয়। এই পেট্রোল বোমা ফিনল্যাণ্ডের যু্দ্েধ আর স্প্যানিশ গৃহযুদ্ধে ব্যবহার হয়েছিল। আর এতকাল পর উক্রেইনে গতবছর এর সামান্য ব্যবহার দেখা যায়। যুদ্ধ ছাড়া এই বোমা কেউ ব্যবহার করেনি। যুদ্ধ নেই, অথচ বাংলাদেশে এই বোমা ব্যবহৃত হচ্ছে। যুদ্ধ নেই, অথচ শুরু হয়েছে যুদ্ধ যুদ্ধ খেলা। এ থেকেই শুরু হয়ে যেতে পারে বিচ্ছিরি গৃহযুদ্ধ। গৃহযুদ্ধ শুরু হোক বা না হোক, ধর্মনিরপেক্ষতা আর ধর্মান্ধতার মধ্যে চিরকালের যে লড়াই, সেটি তো রয়েই যাবে। ধর্মান্ধরা এখন আগুন হাতে নিয়েছে। এ আগুন জেহাদের আগুন। নরকের আগুনের চেয়েও এর বীভৎসতা বেশি।
    আপনার লক্ষ লক্ষ কর্মী মাঠে নামুক, মিছিল করুক, সভা করুক, অবরোধ করুক, কিন্তু খালি হাতে করুক, হাতে কোনও বোমা, কোনও বন্দুক না নিয়ে করুক। না, খালেদা রাজি নন।
    রাষ্ট্রদূতেরা পেট্রোল বোমা বন্ধ করা নিয়ে কথা বলেছেন দুই নেত্রীর সঙ্গে। বিরোধীদলের নেত্রীকে অনুরোধ জানানো হয়েছে, ঘণ্টার পর ঘন্টা তাঁকে বোঝানো হয়েছে ভায়োলেন্সবিহীন আন্দোলনে যাওয়ার জন্য। বলা হয়েছে, আপনার লক্ষ লক্ষ কর্মী মাঠে নামুক, মিছিল করুক, সভা করুক, অবরোধ করুক, কিন্তু খালি হাতে করুক, হাতে কোনও বোমা, কোনও বন্দুক না নিয়ে করুক। না, খালেদা রাজি নন। তিনি কোনো ভায়োলেন্সবিহীন অবরোধে রাজি নন। তিনি ভায়োলেন্স দেখতে চান, মৃত্যু দেখতে চান, রাজপথ রক্তে ভেজাতে চান। রক্ত ছাড়া তাঁর কাংখিত গন্তব্যে তিনি নাকি পৌঁছোতে পারবেন না। অগত্যা ইউরোপীয় রাষ্ট্রদূতদের হতাশ হয়ে ফিরে যেতে হয়েছে। কারও কথাই তিনি শুনবেন না। মানুষ আগুনে পুড়ে মরছে –এতে তাঁর কিছু যায় আসে না। ইরাক-সিরিয়ার সন্ত্রাসী দল আইসিসও তো সেদিন জ্যান্ত পোড়ালো জর্দানের পাইলটকে। জেনে শুনে খালেদাও পোড়াচ্ছেন। কী পার্থক্য দুই দলে?
    যাত্রীবাহী বাসে ট্রাকে লঞ্চে পেট্রোল বোমা ছোড়া হচ্ছে, বা নিরপরাধ মানুষকে গুলি করে মারা হচ্ছে, এসব খবর যখন কানে আসে, আমি প্রশ্ন করি, যদি সরকারের ওপর এত রাগ বিরোধী দলের, বিরোধী দলের সঙ্গী ধর্মীয় দল জামাতে ইসলামী আর ছাত্র শিবিরের, তবে তারা অরাজনৈতিক দরিদ্র নিরীহ নিরপরাধ লোকদের মেরে ফেলছে কেন, কেন সরকারের কোনও মন্ত্রী বা কোনও রাজনীতিকের বাড়িতে, বা অফিসে বা গাড়িতে বোমা ছুড়ছে না? সরকারের পতন চাও, তবে পেট্রোল বোমা সরকারের দিকে তাক করো, সাধারণ মানুষের দিকে তাক করছো কেন? সাধারণ মানুষকে মারা সোজা, জানি। কিন্তু কঠিন কাজটাই তো কঠিন সময়ে করতে হয়, অন্তত চেষ্টা তো করো। সরকারকে না মারলে সরকারের পতন কী করে হবে? সত্যি বলতে কী, গরিব মরলে কারও কিছু যায় আসে। না সরকারের, না বিরোধী দলের, না জনগণের।
    এই সরকারকে সংখ্যালঘুদের পক্ষের সরকার ভাবা হয়। কিন্তু বাস্তবে দেখতে পাচ্ছি মন্দির আক্রমণ হচ্ছে, সরস্বতীর একশ মূর্তি ভেঙে ফেলা হলো সেদিন, হিন্দুরা আওয়ামী আমলেও দেশত্যাগ করছে। আমি তো আশার কিছু দেখি না কোথাও। কেবল হতাশায় বসতি।
    কিছুদিন পর ইউরোপীয় সংসদ থেকে মানবাধিকার নিয়ে কথা বলতে বিশেষজ্ঞরা আসবেন। তাঁরা মানবাধিকার লঙ্ঘন নিয়ে দেশের প্রধানমন্ত্রী এবং বিরোধীদলের নেত্রীর সঙ্গে কথা বলবেন। নিরীহ নিরপরাধ মানুষকে পুড়িয়ে কেবল বিরোধীদলের নেত্রী জনগণের মানবাধিকার লঙ্ঘন করছেন তা নয়, প্রধানমন্ত্রীও লঙ্ঘন করছেন মানবাধিকার। মত প্রকাশের অধিকার অন্যতম মানবাধিকার। আর সেটিই নিয়ত পদদলিত হচ্ছে। বাক স্বাধীনতার বিরোধী আইসিটি অ্যাক্টের ৫৭ ধারাটি বহাল তবিয়তে এখনও বিরাজ করছে। ইন্টারনেটে এমন কোনও কথা কেউ যদি লেখে, যা সরকারের পছন্দ নয়, তবেই হাতকড়া পরিয়ে জেলে নিয়ে যাবে পুলিশ। তাছাড়া মুক্তচিন্তকদের নির্যাতন করার জন্য বাংলাদেশ ফৌজদারি আইনের ২৯৫ ধারা তো আছেই। এইসব দুষ্ট আইন বাতিল করা তো হচ্ছেই না বরং নির্বিচারে ব্যবহার করা হচ্ছে, তার মানে এই আইনগুলো রক্ষা করা হচ্ছে দুষ্ট কাজ করার জন্য। বাংলাদেশের সব সরকারই দুষ্ট কাজে ভীষণই পারদর্শী। এই সরকারকে সংখ্যালঘুদের পক্ষের সরকার ভাবা হয়। কিন্তু বাস্তবে দেখতে পাচ্ছি মন্দির আক্রমণ হচ্ছে, সরস্বতীর একশ মূর্তি ভেঙে ফেলা হলো সেদিন, হিন্দুরা আওয়ামী আমলেও দেশত্যাগ করছে। আমি তো আশার কিছু দেখি না কোথাও। কেবল হতাশায় বসতি।
    মানুষ কতটা অসহায় হলে জীবনের ঝুঁকি নিয়ে বাংলাদেশে বাস করে! কতটা অসহায় হলে বাসে পেট্রোলবোমা পড়তে পারে জেনেও বাসে চড়ে। কতটা অসহায় হলে রাজনীতিকদের সব অনাচার অত্যাচার সহ্য করেও, অবর্ননীয় দুর্ভোগের দিন কাটাতে কাটাতেও স্বপ্ন দেখে দিন বদলের!
    বিদেশি রাষ্ট্রদূতদের সঙ্গে কথা বলে এইটুকু টের পেয়েছি, বাংলাদেশকে তাঁরা গণতান্ত্রিক দেশ বলে মনে করেন না। জানি না, বাংলাদেশের গণতন্ত্রকে ঠিক কী তন্ত্র বলে তাঁরা মনে করেন। তবে আমার কথা বলি, যে দেশে জনগণের নিরাপত্তা নেই, সে দেশকে দেশ বলতে আমার বাধে, গণতন্ত্র বলতে তো আরও বাধে। গণতন্ত্র মানে কিন্তু শুধু ভোটাভুটি নয়, গণতন্ত্র মানে সবার কথা বলার অধিকার, সবার সমান অধিকার, সবার নিরাপত্তার অধিকার।
    http://primenews.com.bd/bn/2015/02/08/%E0%A6%B9%E0%A6%BF%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%A6%E0%A7%81%E0%A6%B0%E0%A6%BE-%E0%A6%86%E0%A6%93%E0%A7%9F%E0%A6%BE%E0%A6%AE%E0%A7%80-%E0%A6%86%E0%A6%AE%E0%A6%B2%E0%A7%87%E0%A6%93-%E0%A6%A6%E0%A7%87/

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    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे

    #पलाश विश्वास

    Swiss Leaks

    EXCLUSIVE: HSBC Indian list just doubled to 1195 names. Balance: Rs 25420 crore

    • EXCLUSIVE: HSBC Indian list just doubled to 1195 names. Balance: Rs 25420 crore

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    New Delhi | Mon, Feb 9, 2015

    Global 'leak' reveals names of businessmen, politicians; set to widen scope of SIT black money probe.

    Who's Who & How Much

    The List: Who's Who & How Much

    Full List: Top 100 HSBC account holders with Indian addresses

    Impact: Reactions galore after HSBC revelation

    Explained: What's new, why it's important

    Swiss Leaks: HSBC sheltered murky cash linked to dictators, arms dealers

    Swiss Leaks: New law, new loophole, new business for giant global bank

    Govt reacts: Any additional names will be brought under probe, says Jaitley

    - See more at: http://indianexpress.com/#sthash.hVogEB4e.dpuf


    Feb 09 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    PM on Course to Make India Ideal Destination



    

    

    Reliance Group Chairman Anil Ambani says Prime Minister Narendra Modi's focus on governance, taxation and transparency will make India the ideal business destination.



    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे

    द्रोपदी महानायिका है भारतीय महाकाव्य महाभारत की,जो हिंदुत्व के सिद्धांतों की आधारभूमि है और इसीकी कोख से जन्मी है गीता,जिसे भारत का राष्ट्रीयग्रंथ बनाने की तैयारी है।


    हिंदू राष्ट्र के लिए गीता महोत्सव जिस धर्म अधर्म जातिव्यवस्था कर्मसिद्धांत पर आधारित है वह गीता है और श्रीकृष्णमुखे गीतोपदेश कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया गया,जिसे आधुनिक भारत के महाभारत में पल दर प्रतिपल दोहरा रहे हैं तमाम बजरंगी,साधु संत से लेकर हिंदुत्व अश्वमेध के घोड़ों पर सवार सिपाहसालार तमाम।


    कुरुवंश के ध्वंस के निमित्त राजा द्रुपद के यज्ञ की अग्नि से आभिर्भूत द्रोपदी पांडवं और कौरवों के आत्मध्वंस की वजह बना दी गयी इस कथा में।


    द्रोपदी अत्यंत सुंदर है और उसकी सुंदरता की तुलना एकमात्र ग्रीक ट्रेजेडी कीनायिकाओं के सौंदर्य से की जा सकती है और वह हेलेन की तरह ग्रीक महाकाव्यइलियड की महानायिका है।


    हेलेन भी ट्राय के युद्ध की वजह बतायी जाती है।



    हेलेन से अलग लेकिन द्रोपदी रसोई की महारानी है।हर तरह की रेसिपि में मास्टरब्लास्टर जो नारी होने  की अनिवार्य शर्त है।


    द्रोपदी में बाकी हिंदू शास्त्रों के मुताबिक आदर्श नारी के सारे गुण हैं।


    वह कुशाग्र बुद्धि की अधिकारिणी और मनुस्मृति अनुशासन के अनुपालन में सतत प्रतिबद्ध है।


    स्वयंवर सभा में ब्राह्मण वेष में उपस्थित अर्जुन को पहचानने में और स्वयंवर से पहले मन ही मन उसका अभिषेक करने में उसे कोई भूल नहीं हुई और वह यह भी जानती थीं कि चिड़िया की आंख पर निशाना कर्ण भी साध सकते थे।


    इसीलिए अपने वाक्यवाण से उसने कर्ण के साथ साथ दुर्योधन को भी स्वयंवर सभा से लहूलुहान करके भगा दिया।


    जब कौरवों और पांडवों में राज्य के बंटवारे पर सुलह हो गया और इंद्रप्रस्थ का महातिलिस्म बनकर तैयार हो गया तब किंकर्तव्यविमूढ़ दुर्योधन की खिल्ली उड़ाती उसकी हंसी महाभारत में कुरुक्षेत्र की बिसात में तब्दील हो गयी जो द्रोपदी के प्रतिशोध की आग से सजाया गया।


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे


    वहीं द्रोपदी जब माता कुंती के आदेशानुसार पांच पतियों को पूर्वजन्म के फल मुताबिक स्वीकार करने को मजबूर होती है या चीरहरण के वक्त पांच धुरंधर  पतियों के उपस्थित होने के बावजूद धर्म की बार बारी दुहाई देने वाले अतिआदरणीय भीष्मपितामह,विदुर इत्यादि की उपस्थिति में एकदम एकाकी और असहाय होकर भगवान श्रीकृष्ण से मदद की गुहार लगाती है तो पूरे भारतीय महादेश तो क्या मानव सभ्यता में पुरुषतांत्रिक समाज में स्त्री सत्ता की प्रतीक बन जाती है द्रोपदी और उत्तरआधुनिक स्त्री विमर्श कीनियति भी वही द्रोपदी दुर्गति है।


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे



    अब फिर हिंदू साम्राज्यवाद के पुनरूत्थान गीता महोत्सवे वही द्रोपदी दुर्गति है।


    धर्मांतरण की पूरी लड़ाई लेकिन स्त्री देह की जमीन पर लड़ी जा रही है,लव जिहाद से लेकर वैदिकी वैलेंटाइन महापर्व तक।


    सत्ता की फिर वह लड़ाई द्रोपदी की देह पर देहमुक्ति के बाजार में।


    प्रेम से उदात्त और नैसर्गिक भाव मानव सभ्यता मे कुछ और नहीं है।

    वह प्रेम लेकिन हर धर्म में हर समाज में विशुद्ध पुरुष वर्चस्व का मामला है।


    ट्राय का युद्ध इसलिए हुआ कि हेलेन नाम्नी अत्यंत सुंदरी कन्या ग्रीक सभ्यता के अनुशासन भंग करने के अपराध में शाश्वत खलनायिका बन गयी।


    युद्ध हुआ ही इसीलिए कि उसने अपना प्रेम चुना जो वास्तविक अर्थो में आज भी पुरुष का एकाधिकारवादी वर्चस्व है।


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे



    द्रोपदी ने प्रेम किया तो अर्जुन से ही था लेकिन शास्त्रीय विधि और कथा सौन्दर्यबोध और गीता वक्तव्य के मुताबिक जब उसने अपने पूर्व जन्म फल के मुताबिक पांच पांच पतियों का वरण कर लिया,तो भी अर्जुन के प्रति उसके विशेष प्रेम की वजह से सशरीर स्वर्ग अभियान में पहला पतन लेकिन द्रोपदी का हुआ।


    यहां तक कि महाभारत युद्ध का चरमोत्कर्ष लेकिन न भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु है ना कौरव वीरों के शोक में विलाप करती औरते हैं और न मृत विध्वस्त वैदिकी सभ्यता के महाश्मशान में मंडराते गिद्ध और चील का उन्मुक्त उल्लास है।


    वह चरमोत्कर्ष लेकिन आततायी अश्वत्थामा के घात लगाकर माता द्रोपदी की संतानों का वध है।


    हिंदुत्व कुल मिलाकर वहीं वध संस्कृति है और द्रोपदी की देह मन और उसका मातृत्व और प्रेम अनंत उत्पीड़न का शिकार उसी तरह आज भी।


    मुक्त बाजार में भोगी समाज और पुरुषवर्चस्व के राजकाज ,धर्म अधर्म में देहमुक्ति आंदोलन और स्त्री सशक्तीकरण का यही प्रस्थानबिंदू है।


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे


    मैं तो परमाणु उत्तरदायित्व कानून पर अमेरिकी सरकार के लिए देशप्रेमियों के देश बेचो बयान को आज रोजनामचे का विषय बनाना चाहता था कि अमेरिकी प्रेसीडेंट बाराक ओबामा के उदात्त उद्गार धर्म स्वतंत्रता की कुल डिप्लोमेसी वहींच है।


    हमने बाराक ओबामा से पूछा था  कि गुजरात नरसंहार के मामले में उनका क्या स्टैंड है।

    जाहिर है कि जब हमारी राजडनीति और सत्ता हम प्रजाजनों को कोई जवाब नहीं देती तो व्हाइटहाउस को भारत के किसी गुलाम प्रजाजन का क्या जवाब होता।


    जवाब भारत से मिला।

    जवाब संघ परिवार से मिला।

    जवाब केसरिया सहनागरिकों से मिला।


    एक प्रति प्रश्न हमारे पुरातन मित्र नव दलित आंदोलन के पुरोधा और मानवाधिकार जलसुनवाई के तहत मानवाधिकार कर्मी डा. लेनिन रघुवंशी का आयाः

    गुजरात जनसंहार पर भारतीय जनता का स्टैंड क्या है।


    मुंबई में फिलीस्तीनियों के हक हकूक के लिए सालिडेरेटी के नेता और मनवाधिकार कर्मी फिरोज मीठीबोरवाला ने टिप्पणी की कि वाजिब सवाल है।


    निःसंदेह।


    दोनों हमारे प्रिय मित्र हैं।उनकी निरंतर सक्रियता का मैं हर हाल में समर्थन करता हूं।


    लेकिन उनके इस प्रतिप्रश्न से मेरा ओबामा को किये प्रश्न का प्रसंग सिरे से बदल गया है और मुझे यह कहते हुए झिझक नहीं है कि इस प्रतिप्रश्न से बाराक ओबामा वैसे ही जवाब के उत्तरदायित्व से मुक्त है जैसे मोदी सरकार के मेमोरेंडम से जैसे अमेरिकी कंपनियां भारत में भविष्य में होने वाली परमाणु और औद्योगिक दुर्घटनाओं की जिम्मेवारी से एकमुश्त बरी हो गयी हैं।


    हम लगातार इस बारे में अपडेट देते रहे हैं।

    हमारे मतामत और सारे संदर्भ प्रसंग तथ्य हमारे ब्लागों के अलावा हस्तक्षेपमें भी रोजाना छपते रहे हैं।जिसके गुगल प्लसे के फालोअर ही पचास हजार पार हैं।


    अखबारों में हर भाषा में भारत अमेरिकी राजनय का कच्चा चिट्ठा खुला है और इसके अलावा हमारे अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने विदेशी बैंकों के भारतीय खाताधारकों का पर्दाफाश किया है।


    नये सिरे से उन तथ्यों को शायद अब दोहराने की जरुरत नहीं है।

    रक्षा में विदेशी पूंजी और मेकिंग इन का किस्सा धारावाहिक है।

    बजट तैयारियों की कारपोरेट लाबिइंग भी बेपर्दा है।


    Aaj Tak shared Newsflicks Hindi's photo.

    #SwissLeaks से सामने आई #HSBC की लिस्ट में नेताओं की दिलचस्पी क्यों नहीं --- http://newsflicks.com/story.php?story_id=2830

    Newsflicks Hindi

    ‪#‎SwissLeaks‬से सामने आई ‪#‎HSBC‬की लिस्ट में नेताओं की दिलचस्पी क्यों नहीं ---http://newsflicks.com/story.php?story_id=2830



    इस आलेख के साथ ताजा तथ्य भी नत्थी होगें।


    हिंदुत्व के गीतामहोत्सव की असल कोख को पहचाने बिना भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों के इस दस दिगंत सर्वनाश का मामला खुलता नहीं है।


    इसीलिए आज का रोजनामचा यह


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे


    कल रात घर वापसी के वक्त जब हमारे ड्राइवर केशरिया रंगे दिल्ली के संभावित चुनाव परिणाम में केसरिया फीका हो जाने के अंदेशे से  बेहद उदास थे तो हमने हल्के से टिप्पणी कर दी कि कोई जरुरी नहीं कि दसों दिशाओं में कमल ही कमल खिले।


    हमने कहा कि वैसे दुर्गा पूजा के लिए कमल जितना जरुरी है वैसे ही बाकी देवदेवियों के लिए दूसरे फूल भी जरुरी हैं।


    दूसरे फूल नहीं खिले तो देवमंडल में महामारी हो जायेगी जो मारामारी होगी वह अलग।

    मसलन बंगाली तो दुर्गा पूजा अब कुछ सौ साल से पहले से करते रहे हैं लेकिन यहां शिव के उपासक अनार्य थे और काली कीउपासना अनंत काल से चली आ रही है।


    जाहिर है कि धतुरा और लाल जबा न खिले तो केसरिया भी नहीं खिलेगा।

    दिल्ली में ही जब कमल खिलता दीख नहीं रहा है, तो बंगाल में कमल खिलने की उम्मीद लेकर हताश होने की जरुरत तो है नहीं।


    हमने कहा कि घास फूल के मुकाबले में तो अब लाल जबा फूल की वसंत बहार होने के आसार ही ज्यादा लग रहे हैं।


    हमने यह भी कहा कि बिहारो में लालू नीतीश एकजुट है तो सूखी नदी में पतवाक खेते हुए कैसे कमल बो सकते हैं मांझी मसीहा।


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे




    फिर विशुदा की अतिप्रिय द्रोपदी कथा शुरु हो गयी कि दीदी के मुकाबले कमलदल का असली चेहरा फिर वही द्रोपदी है।


    पिर द्रोपदी की देह पर खिलते कमल की चर्चा जोरों से चली।


    वैलेंटाइन डे कोलकाता में सरस्वती पूजा बतौर मनाया जाता रहा है और वैलेंटाइन डे धर्मांतरण महोत्सव है।


    इसी प्रसंग में सहयात्री सहकर्मी चित्रकार सुमित गुहा ने कहा कि बच्चे बपैदा करने से तय होना है धर्म अधर्म।हिंदुओं की आबादी बढ़ाने खातिर बहुविवाह की हिंदुत्व पेशकश भी है।


    हिंदुत्व के शंखनाद के साथ संत समागम में खुलकर इस्लाम मुताबिक चार शादियों की इजाजत है तो धर्म शास्त्र सम्मत द्रोपदी के चार पतियों की व्यवस्था लागू करने में हर्ज क्या है।


    अगर पुरुष को बहुविवाह करने की इजाजत है तो स्त्री को क्यों नहीं।


    फिरोज मीठीबोरवाला की तर्ज पर हमें कहना पड़ा कि वाजिब सवाल है।


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे



    इसी सिलसिले में हम यह द्रोपदी कथा को बांच रहे हैं,जो दरअसल गीता महोत्सव के तहत स्त्री आखेट का मोहत्सव अर्थात मनुस्मृति अनुशासन है।


    द्रोपदी के तो पांच मान्य पति रहे हैं।

    वैदिकी कथानुसार कौन देव,कौन देवी,कौन अवतार वर्णशंकर नहीं है,यह भी कहना मुश्किल है क्योंकि पुत्र का वर देने वाले महापुरुष या देव स्त्री का पति हो यह भी जरुरी नहीं है।


    नियोग की सनातन व्यवस्था है और उसके लिए स्त्री के मतामत अनिवार्य है नहीं।


    अंबिका और अंबालिका और विदुर को कोख में जनने वाली माता की इच्छा अनिच्छा का सम्मान भी नहीं किया गया है और इसी नियोग से शास्त्र सम्मत धृतराष्ट्र जन्म है तो पांडु का पांडुवर्ण भी इसी अनिच्छाकृत नियोग से है।वह धर्म है विशुद्ध वैदिकी।


    महाभारत को लिखने वाले ऋषिवर स्वयं माता सत्यवती के कुहासा अभिसार का परिणाम हैं तो माता कुंती एक पति के बावजूद छह छह देवों के संतानों की माता हैं।


    बाकी कथा बेहद संवेदनशील है कि ईश्वरों की जन्मकथा में भी भारी घालमेल है और उसकी चर्चा तनिक संवेदनशील हो सकती है।


    पुराण और पौराणिक,वैदिकी साहित्य के पाठक खुदै समझ लें बाकी किंवदंतियों और लोक में तो यह खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है।


    कुल मिलाकर कथा वहीं


    # द्रोपदी दुर्गति

    #गीता महोत्सवे


    एक द्रोपदी कथा यह भी हैः



    If winter's here, can theatre be far behind?

    FOR 10 DAYS, THE ACADEMY OF FINE ARTS IN CALCUTTA BECAME A SORT OF MULTIPLEX FOR INDIAN THEATRE, AS GROUPS FROM ALL OVER THE COUNTRY CAME TO PARTICIPATE IN NANDIKAR'S 30TH NATIONAL THEATRE FESTIVAL.BUT TWO PLAYS FROM THE NORTHEAST GENERATED THE BIGGEST BUZZ — HEISNAM KANHAILAL'S DRAUPADI AND ANUP HAZARIKA'S CHARANDAS CHOR. DEBOJYOTI CHAKRABORTY CAUGHT UP WITH THE TWO DIRECTORS FOR A TETE-A-TETE

    ABOUT DRAUPADI

    Draupadi is a story about marginalised people who are continually oppressed by the powers that be. The protagonist, Draupadi (played by Heisnam Sabitri), an indigenous woman, fights against the atrocities being committed against her tribe. Ultimately, her husband Dulna is arrested and killed by the police. Draupadi, too, falls in their clutches. So what inspired Heisnam Kanhailal to stage Draupadi? "Torture and gang rape by security forces are regularly reported in Manipur. And this has been going on for a long time. We were trying to figure out how to register a powerful protest against this through the medium of theatre. Then, I was given this story of Mahasweta Devi by a friend in November 1999. Immediately, I began working on it and finished adapting it into a play in January 2000." The play was censored and hasn't been staged in Imphal since that year, although it has won accolades all over the country. This March, after 14 years, Draupadi will return to the stage in Manipur's capital.

    As he walked into the Academy of Fine Arts, Heisnam Kanhailal (seated left) could easily remind you of one of those Kung Fu masters you see in Chinese films. Wise, calm, poised — a man who commanded obvious respect. But that solemn expression soon changed as he spotted Nandikar's patriarch Rudraprasad Sengupta (standing behind). "How old is that jacket you're wearing? 50 years?" Kanhailal asked Sengupta, embracing him like an old friend. Asked to pose for a picture, the duo called out to Kanhailal's wife Heisnam Sabitri (seated right). And, like true, old-school gentlemen, they pulled out a chair for her. Picture by Bibhash Lodh

    Heisnam Kanhailal is the grand old man of Northeast theatre. He was awarded the Padma Shri in 2004 and is the founder-director of Kalakshetra Manipur. He was awarded the Sangeet Natak Akademi Award in direction in 1985 and in December, 2011, he was awarded the Sangeet Natak Akademi Ratna Award (the highest-ranked and most valued Akademi award).

    Draupadi has got a tremendous response here. The first show was sold out in no time and you have been requested to stage a second show. Did you expect to generate such huge interest?

    I think it's because of the love for this kind of theatre in Calcutta.

    The story ends with a magnificent final scene in which Draupadi faces her abusers, naked and bloody, but fiercely strong. Your wife, Heisnam Sabitri, plays the role of Draupadi in the play. Did you have any apprehensions when recreating the scene on stage?

    In the first show in Imphal, we did not go all the way. It was more of a suggestion. But we realized that wouldn't work. The scene had to really disturb the audience, hound the audience.

    We were invited to New Delhi for a festival organised by the National School of Drama in 2000. I consulted a few of my women friends and they asked me to go ahead with it.

    So, we played out the nude scene at our next show at the Shri Ram Centre auditorium. We got an incredible response. Highly respected and educated artistes like Sonal Mansingh rushed to the green room. They touched Sabitri's feet.

    Next, we came back to Imphal and did two shows. Trouble started from the third show. A group of educated, articulate women, decried the play; they started treating Savitri as a notorious woman. Another group, surprisingly comprising mostly men, said it should be done. These two groups began to fight each other in the daily newspapers.

    But in 2004, life imitated art when a group of Manipuri women walked through Imphal to the Assam Rifles headquarters and disrobed to protest the killing and alleged rape of Thangjam Manorama (who was picked up from her home by the 17th Assam Rifles. The next morning, her bullet-riddled corpse was found in a field. An autopsy revealed semen marks on her skirt suggesting possible rape.)

    On the morning after this incident, local newspapers began to write: "Draupadi was played out in life". They began calling me chingu (which in Manipuri means a wise man who can predict the future).

    Ordinary people tend to stay away from theatre these days. There's a feeling that theatre is a pastime for intellectuals. Very few theatre groups keep the audiences in mind or take risks.

    That's very true. Conventional theatre in India has borrowed heavily from Europe. It's intellectual, academic. Why should we do erudite theatre? We have to stop preaching to the audience; the audience is more intelligent than you think. My goal is to convey my sensibilities to the audience, to alert the audience, to move the audience.

    That is why I founded Kalakshetra and began to experiment. We believe in the notion of a workshop that is a laboratory or research theatre rather than a production company.

    We try to transform our ancestral traditions and give them contemporary cultural expressions. Of course, this has its risks and challenges. There are imperfections at times but it is worth doing.

    You have such a large body of work. Among your own plays, which is your favourite?

    There are four actually. Pebet, which was first produced in 1975 and is still continuing. Then Memoirs of Africa that was first produced in 1985. Draupadi and finally Rabindranath Tagore's Dakghar, which we produced in 2006.

    What do you seek in an actor?

    Stage presence and clarity of thought.

    Finally, what is one lesson of life that theatre has taught you?

    Theatre makes you more social, takes away inhibitions and teaches humility.

    About Charandas Chor Originally a Rajasthani folk tale, Charandas Chor was adapted for a play in Chattisgarhi by Habib Tanvir. The play is about a thief who promises his guru that he will never tell a lie. The guru asks him to give up his bad habits if he wants to become his disciple. He attempts to show his sincerity by offering never to do four things — eat off golden plates, ride an elephant at the head of a procession, marry a queen, and accept the throne of a country. The guru then tells him that he should also give up speaking lies. The thief consents and things take a queer turn…

    ABOUT CHARANDAS CHOR

    Anup Hazarika is at the forefront of theatre in Assam. The National School of Drama graduate has done mobile theatre for over five years, acted in 20 films and dabbled in television and short films before turning to serious theatre.

    You and your wife, Pakija Begum (who plays a central role in Charandas Chor), are in the same profession. Is it an advantage or a disadvantage for your spouse to be in the same trade?

    I would say it is an advantage because we never run out of topics to talk about. We enjoy discussing theatre all day.

    No ego clashes?

    Of course, there are arguments. If there are no disagreements, we can't improve. We are each other's biggest critics. But we complement each other really well because my wife is basically an actor and I am primarily a director. So, we get to hear different perspectives. I enjoy where she takes a role after I conceive it.

    What do you think of Menaka, which your wife has directed?

    Menaka was Pakija's first directorial venture. The character of Menaka is fantastic and Pakija suits it very well. I think the play will have great longevity.

    Mobile theatre is huge in Assam. What prompted you to leave mobile theatre and start

    serious theatre?

    Mobile theatre is a different kind of experience. There you perform in front of thousands of people. Also, I think there are around 14 mobile theatre troupes in Assam and each troupe supports around 100 families. I wanted to concentrate on the quality of my work and do good work. I am thankful to mobile theatre because I earned some money there and invested it in amateur theatre.

    Anup Hazarika (in picture by Bibhash Lodh above) sipped tea from an earthen cup, patiently acknowledging compliments from random strangers who walked up to him to say how much they had liked Charandas Chor. His play had received a standing ovation moments earlier. After the curtain call, an animated Rudraprasad Sengupta told the audience: "Throughout the past week, I have been urging you to see Charandas Chor. Judging from your reaction, I can see I was right in recommending it to you."

    If a youngster wants to take up theatre professionally, is it a viable career option?

    Like any other profession, they need to dedicate themselves to theatre. They need to hone their craft, they need to grow and doors will open automatically. But the road isn't easy. People's mentalities also need to change. Like in Guwahati, there is this attitude that people only come to the theatre if somebody invites them. Buying a ticket and going out to watch a play seems a little alien to them.

    Some much respected film actors, like for example Denzel Washington, when they shifted to theatre, critics panned them. Why do you think that happens?

    In theatre, the audience essentially views a long shot or wide shot, so you need larger movements, larger gestures. The stage has its own requirements and techniques, which you need to master.

    What do you need to be a good actor?

    You need to understand yourself first, then you must have the ability to put yourself in someone else's shoes and finally you need to let go of your inhibitions.

    http://www.telegraphindia.com/1140108/jsp/northeast/story_17764176.jsp#.VNiLp-aUdJk



    बहराहल ताजा हालात ये हैंः

    1. किसी महिला से पूछ लें कि वो 10 कर लेंगी पैदा ...

    2. https://plus.google.com/.../posts/HvQGtiCTzBa

  • Amalendu Upadhyaya

  • 20/01/2015 - किसी महिला से पूछ लें कि वो 10 कर लेंगी पैदा कि नहीं, उनकी मशीन कैसी है- आजम मोदी सरकार की रक्षार्थ हिन्दू महिलाओ को 10 बच्चे पैदा करनेके बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्‍वती के फरमान पर समाजवादी पार्टी के महासचिव और उत्तर ...

  • guru ji ka ashirwad: गर्भ में लड़के या लड़की का ...

  • ekbaba.blogspot.com/p/blog-page.html

  • बच्चा पैदा होने से पहले गर्भ के अन्दर लड़का है या लड़की इसका पता करना वो भी बहुत मुश्किल प्रक्रिया के द्वारा कराने के बाद भी मानव का मन शान्त नहीं होता इसलिए मनचाहा बच्चा पैदा करनेके बारें मे वैज्ञानिक खोज रहें है। स्त्री के गर्भ मे ...

  • 'थ्री इडियट्स'के अंदाज में बच्चा पैदा करने ...

  • www.amarujala.com › Lifestyle › Health And Fitness › Health Bulletin

  • फिल्म 'थ्री इडियट्स'का वह सीन याद है जिसमें हीरो और कॉलेज के लड़के हीरोइन की बहन की डिलिवरी वैक्यूम पंप से करते हैं? फिल्म में दिखाई गई यह'जुगाड़'तकनीक अब हकीकत में भी प्रजनन कराने में मददगार हो सकती है। बच्चेको देर तक गोद में लेने का ...

  • बच्चा पैदा करते हुए खिंचवाई फोटो! - patrika

  • www.patrika.com › duniya ajab gajab

  • 01/12/2013 - शायद ही कोई ऎसी महिला हो जो बच्चा पैदाकरते समय अपने पल-पल की फोटो खिंचवाए, वो भी बिल्कुल उसी हालत में जब उसने अपने शरीर के नीचले हिस्से पर कुछ भी नहीं पहन ... पत्रिका एंड्राइड और आई फ़ोन एप डाउनलोड करनेके लिए यहाँ क्लिक करें।

  • भारत में बच्चा पैदा करने का कारख़ाना खुला ...

  • hindi.ruvr.ru/2013_10_03/245214669/

  • 03/10/2013 - भारत के गुजरात राज्य के एक छोटे से नगर आनन्द में दूसरों के लिए बच्चा पैदा करनेका एक कारख़ाना खोला गया है। इस कारख़ाने में सैकड़ों महिलाएँ दूसरे देशों के बिना बच्चों वाले परिवारों के लिए बच्चे पैदा करके धन कमाने का काम ...

  • How to get pregnant in Hindi ? गर्भधारण करने का सही ...

    www.achhikhabar.com/2011/06/25/how-to-get-pregnant-in-hindi/

    25/06/2011 - Gynecologists का मानना है कि बच्चा पैदा करनेके लिए इस्त्री के eggs ovary से निकलने के 24 घंटे के अन्दर ही fertilize होने चाहियें. आदमी के sperms औरत के reproductive tract (प्रजनन पथ) में 48 से 72 घंटे तक ही जीवित रह सकते हैं. चूँकि बच्चा पैदा करने ...

    पराये पुरुष से बच्चे पैदा करना नियोग या संभोग

    searchoftruth-rajeev.blogspot.com/2011/01/blog-post_14.html

    14/01/2011 - पराये पुरुष से बच्चे पैदा करनानियोग या संभोग ? वाह भाई वाह । मि. राजीव । आपने तो कमाल कर दिया । धोती को फ़ाङकर रूमाल कर दिया । सर जी मैं भी आपके ब्लाग का एक रीडर हूँ । मुझे मेरे किसी फ़्रेंड जयकिशोर ने आपके ब्लाग के बारे में ...

    बोलीं साध्वी , मैंने चार बच्चे पैदा करने की ...

    www.prabhatkhabar.com/news/up/nothing-wrong.../302289.html

    6 दिन पहले - Prabhatkhabar: बदायूं : विश्व हिंदू परिषद नेता साध्वी प्राची ने ''लव जिहाद''के मुद्दे पर भड़काऊ टिप्पणी करके एक नए विवाद को जन्म दे दिया है और साथ ही हिंदू महिलाओं को चार बच्चे पैदा करनेकी सलाह देने वाले अपने बयान को सही ठहराया.

    गोली लगना 'बच्चा पैदा करने जैसा है' - BBC Hindi

    www.bbc.co.uk/hindi/.../07/140701_britain_police_women_killing_fma

    02/07/2014 - ब्रिटेन में एक महिला को गोली मारने के बाद पुलिस ने कहा कि वह मरेंगी नहीं, ये सिर्फ़ 'बच्चे पैदा करनेजैसा'है. बाद में महिला की मौत हो गई.

    Royal Patrika - ज्यादा बच्चे पैदा करना है तो ...

    https://www.facebook.com/royalpatrika/posts/688669884583818:0

    ज्यादा बच्चे पैदा करनाहै तो हिन्दू संगठनों को हिन्दुओं को पढऩे से रोकना और गरीब बनाना पड़ेगा -हिन्दू संगठनों को मिलेगा मुस्लिम विरोध का एक और हथियार...

    फेसबुक मीडिया - 'हिन्दुओं को चार बच्चे पैदा ...

    https://hi-in.facebook.com/FacebukMedia3/posts/868459469856452

    'हिन्दुओं को चार बच्चे पैदा करनाहोगा'साक्षी महाराज और VHP के इस बयान पर भांड मीडिया और सेक्युलर दोगले मिल कर कुत्ते की तरह मुंह उठा कर विधवाविलाप तो कर...


    4 बच्चोंके विवाद में कूदे VHP के अशोक सिंघल, कहा- 4 बच्चेपालने की दिक्कत जरूर दूर करेंगे भगवान

    ABP News - ‎Jan 18, 2015‎

    नई दिल्ली: साक्षी महाराज और साध्वी प्राची के बाद अब विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने भी की 4 बच्चे पैदा करनेकी वकालत की है. वीएचपी के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल ने कहा है कि, ''4 बच्चे पैदा करनेपर उन्हें पालने में कोई दिक्कत नहीं आएगी, क्योंकि भगवान सारी समस्याओँ को खुद ही दूर कर देते हैं.''इसके अलावा अशोक सिंघल ने कहा कि परिवार नियोजन पर अमल करने से हिंदुओं की आबादी लगातार घटती ही जा रही है. इससे पहले बीजेपी सांसद और साध्वी प्राची समेत वीएचपी नेता प्रवीण तोगड़िया ने भी चार बच्चे पैदा करनेकी वकालत की थी. क्या कहा था साध्वी प्राची ने? साध्वी ने प्राची ने कहा, ...

    VHP का अगला टारगेट कॉमन सिविल कोड

    नवभारत टाइम्स - ‎Jan 16, 2015‎

    तभी साक्षी महाराज का यह बयान आया था कि हर हिंदू महिला को कम से कम 4 बच्चे पैदा करनेचाहिए। जिसके बाद वीएचपी ने इसे सपोर्ट किया। वीएचपी के एक नेता ने कहा कि बीजेपी भी कॉमन सिविल कोड की बात करती है, लेकिन जब तक दबाव नहीं बनाया जाएगा तब तक वह इसे लागू नहीं करेगी। साथ ही इसके पक्ष में माहौल बनाना होगा ताकि विपक्षी पार्टियां इसका विरोध ना कर सकें। उन्होंने कहा कि मीटिंग में यह भी चर्चा की गई कि हम लोगों को यह बताएंगे कि अगर मुस्लिम आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो ऐसा वक्त आएगा जब हिंदू धर्म से दूसरे धर्म में जबरन धर्मांतरण का खतरा बढ़ जाएगा। इसके लिए पूरी प्लानिंग से काम ...


    एक अलगाववादी नेता ने जम्मू कश्मीर के मुस्लिम बहुसंख्यक चरित्र को कायम रखने के लिए मुसलमानों से एक से अधिक शादियां करने और यथासंभव बच्चे पैदा करने का आह्वान किया है। हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे मोहम्मद कासिम ने शनिवार को अपनी पार्टी मुस्लिम दीनिमहाज द्वारा जारी एक बयान में कहा, "हम संपन्न मुसलमानों से एक से अधिक शादियां करने और यथासंभव बच्चे पैदा करने की अपील करते हैं।"


    दुख्तरान-ए-मिल्लत की प्रमुख आसिया अंद्रा�बी के पति कासिम ने कहा, "जम्मू कश्मीर में शरणार्थियों को बसाया जाना इस राज्य के मुस्लिम बहुल दर्जे को बदलने की चाल है।"उन्होंने कहा कि कश्मीरी मुसलमान अपने विनाश में खुद ही भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा, "लडकियों देर से ब्याही जा रही हैं जिसका मतलब कम बच्चे पैदा करने की क्षमता है। देर से शादी करने के पीछे जो बहाना दिया जाता है वह यह है कि युवतियां (दुल्हनें) आर्थिक रूप से स्थिर (स्वावलंबी) होनी चाहिए।"


    कासिम ने कहा, "फिर शादी के बाद, जन्म नियंत्रण नारे जैसे "हम दो हमारे दो"और "पहला अभी नहीं, दूसरा कभी नहीं"लगातार इन दंपतियों पर थोपे जा रहे हैं।"उन्होंने कहा कि आर्थिक समस्या के डर से कम बच्चे पैदा करना कुछ नहीं बल्कि अज्ञानता है। उन्होंने कहा कि यह आpर्यजनक है कि देश में 80 फीसदी हिंदू जनसंख्या होने के बाद भी हिंदू नेता महिलाओं से पांच बच्चों को जन्म देने का आह्वान कर रहे हैं।



    बोलीं साध्वी , मैंने चार बच्चे पैदा करनेकी वकालत की थी, 40 नहीं

    प्रभात खबर - ‎Feb 2, 2015‎

    मालूम हो कि भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने हाल में सभी हिन्दुओं से चार-चार बच्चे पैदा करनेकी अपील की थी. विश्व हिन्दू परिषद नेता प्रवीण तोगडिया ने भी उनके सुर में सुर मिलाये थे. हालांकि खबरों के मुताबिक पार्टी नेतृत्व ने साक्षी महाराज को उनके बयान के लिये फटकार लगायी थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके विकास के एजेंडे पर असर डाल रहे ऐसे बयानों और विवादों को रोकने के लिये पार्टी नेताओं को हिदायत दी थी. विपक्षी दलों द्वारा इन विवादों को मोदी सरकार के हिन्दूवादी एजेंडा के तौर पर पेश किये जाने के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने ऐसे बयानों को रोकने पर खास जोर दिया था ...

    4 बच्चे पैदा करनेको कहा, 40 पिल्ले तो नहीं: साध्वी प्राची

    Sahara Samay - ‎Feb 1, 2015‎

    भाजपा नेता साध्वी प्राची उत्तर प्रदेश के विश्व हिंदू परिषद के सम्मेलन में विवादित बयान देकर फंस गयी हैं. उन्होंने अपने संबोधन में कहा, 'मैंने चार बच्चेही पैदा करनेको कहा था तो भूकंप आ गया, 35-40 पिल्ले पैदा करनेको तो नहीं कहा था.'प्राची ने एक समुदाय विशेष पर टिप्पणी की, 'ये लोग जो 35-40 पिल्ले पैदाकरते हैं और फिर लव जिहाद फैलाते हैं उस पर कोई बात नहीं करता. मेरे बयान पर मीडिया वालों ने मुझसे पूछा कि आपने क्या कह दिया, इससे तो विकास रुक जाएगा. मैंने उनसे भी कहा कि मैंने बिल्कुल ठीक कहा है.'प्राची ने मंच से समाजवादी पार्टी के नेताओं पर भी निशाना साधा. उन्होंने अपने ...

    'हिंदुस्तान को दारुल इस्लाम बनाना चाहते हैं 35-40... पैदा करनेवाले'

    Jansatta - ‎Feb 2, 2015‎

    विश्व हिंदू परिषद नेता साध्वी प्राची ने ''लव जिहाद''के मुद्दे पर भड़काऊ टिप्पणी करके एक नए विवाद को जन्म दे दिया है और साथ ही हिंदू महिलाओं को चार बच्चे पैदा करनेकी सलाह देने वाले अपने बयान को सही ठहराया है। प्राची ने कल यहां आयोजित 'विराट हिन्दू सम्मेलन'में कहा ''वे हमारी बेटियों को लव जिहाद के माध्यम से फंसा रहे हैं ये जो 35-40… पैदा करते हैं वे लव जिहाद फैला रहे हैं….ये लोग हिन्दुस्तान को दारुल इस्लाम बनाना चाहते हैं।''उन्होंने कहा ''जब मैंने टिप्पणी की तो ऐसा बवाल मचा मानो देश में भूकंप आ गया हो। मीडिया ने कहा कि तुमने चार बच्चों का बयान देकर हंगामा खड़ा कर दिया ...

    भगवाधारी भगोड़ों की सीख और हिंदू धर्म

    Legend News - ‎Feb 3, 2015‎

    हिन्दुओं की आबादी बढ़ाने के नाम पर कभी अति उत्साह में तो कभी व्यक्तिगत कुंठा का शिकार होकर सीमाएं लांघने का जो काम कुछ अतिवादी संत और साध्वी कर रहे हैं, वह दरअसल देश की फिजा में ज़हर घोल रहे हैं । सच तो यह है क‍ि ऐसी सोच उनकी अपनी- अपनी राजनैतिक, सामाजिक व शारीरिक कुठाओं से उपजी है जिन्हें वे पिछले काफी समय से हिंदुओं पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं। थोक मेंबच्चे पैदा करनेकी नसीहत वाला ये आंकड़ा दोनों ही धर्म के लोगों के लिए खासी परेशानी खड़ी कर सकता है । ये नसीहतें कुछ यूं परोसी जा रही हैं जैसे हिन्दू धर्मावलंबी इनके जड़ खरीद गुलाम हों और इन्हें उनके निजी जीवन ...

    साध्वी प्राची के बयानों से भाजपा ने किया किनारा

    Nai Dunia - ‎Feb 2, 2015‎

    बदायूं। हर हिंदू के चार बच्चे पैदा करनेवाले बयान पर कायम विश्व हिंदू परिषद की नेत्री साध्वी प्राची ने अब लव जिहाद पर आग उगली है। हालांकि भाजपा ने उनके बयानों से किनारा करते हुए कहा कि सरकार का पूरा ध्यान सिर्फ विकास और अच्छे प्रशासन पर है। ऐसे बयानों से पार्टी का कोई लेना देना नहीं है। इससे पहले साध्वी ने रविवार को विहिप के एक कार्यक्रम में चार से अधिक बच्चे पैदा करनेवाले कुछ हिंदुओं को सम्मानित किया था, जिसमें 11 बच्चों के पिता एक बुजुर्ग भी शामिल थे। सोमवार को साध्वी ने लव जिहाद पर मोर्चा खोलते हुए कहा कि 35-40 बच्चे पैदा करनेवाले लोग हमारी बेटियों को फंसाने ...

    खुद को हिंदू महासभा का कद्दावर नेता बताने वाले स्वामी ओमजी क्यों कर रहे हैं अरविंद केजरीवाल को गोली मारने की बात, क्लिक करके पढ़िए...

    केजरीवाल को नहीं समझ आएगा, तो उसको भी गोली मारेंगे: स्वामी ओमजी

    खुद को हिंदू महासभा कद्दावर नेता बताने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार स्वामी...

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    तानाजी कांबले युवा बहुजन एक्टिविस्ट है और उनका यह मंतव्य गौरतलब हैः

    कौन डर रहा है, किसने डरना चाहिए, कौन डर रहा है, कौन डरा रहा है, किसने १० - १० बच्चे पैदा करना चाहिए

    कौन बेवकूफ बन रहा है, कौन बेवकूफ बना रहा है, निशाना (लक्ष्य) कौन है, निशाने की बन्दुक किसके कंधे के ऊपर रखी है, बन्दुक (निशाना) किसने पकड़ी है, अस्सल में मांजरा (षडयंत्र) क्या है

    ओबीसी बेवकूफ बन रहा है, ओबीसी को ब्राह्मण मुर्ख (बेवकूफ) बना रहा है, निशाना (लक्ष्य) ओबीसी है, निशाने की बन्दुक मुसल्मान की तरफ है, ओबीसी को मारना चाहते है, लेकिन धमकाया जा रहा है मुसलमान को, देश में ब्राह्मण की सत्ता है, फिर भी ब्राह्मण डर रहा है, ब्राह्मण डर के मारे मुस्लमान को डरा रहा है, लेकिन ब्राह्मण ओबीसी को मारना चाहता है मुसलमान को नहीं

    देश में ओबीसी जनसंख्या करीबन ६२% है, देश आझाद होने के पहले १९३४ की जनगणना के अनुसार ओबीसी ५२% था, मुस्लिम लोग पाकिस्तान चले गए, पाकिस्तान के ओबीसी भारत में आ गए मतलब देश आझाद (१९४७) होने के बाद ओबीसी की संख्या बढ़ गई ओ आजतक ओबीसी की जातवार जनगणना नहीं हुई, ६२% ओबीसी अगर सही आझाद हुवा तो, जिसकी जीतनी संख्या भारी, उसकी उतनी देश के हर क्षेत्र पर सत्ता की भागीदारी (हिस्सेदारी)

    भारत की जनसंख्या १२४ करोड़ है, उनमे से ब्राह्मण बनिया सिर्फ ६% है, मुस्लिम १४ % ओबीसी ६२% है. हजारों सालों से ब्राह्मण बनिया इस देश पर राज कर रहे है, ब्राह्मण बनिया भारत के हर क्षेत्र की सत्ता छोड़ना नहीं चाहते, इसलिए बेगुनाह मुस्लमान (५५,००० सलाखों के पीछे है) के सीने पर बन्दुक तानकर ओबीसी को गुलाम रखने के लिए हर ब्राह्मण चिल्ला रहा है हिन्दू मतलब ओबीसी के हर घर में गुलाम पैदा हो, चार चार बच्चे पैदा किये तो उनकी परवरिश में माता पिता भिखारी बने और ओबीसी गुलाम का गुलाम रहे ओ ओबीसी किसी भी सत्ता का हिस्सेदारी नहीं बने

    इस देश में कभी भी ओबीसी खतरे में नहीं था और नहीं रहेगा, मुस्लमान भी कभी खतरे में नहीं था और नहीं रहेगा

    हजारों सालों से ब्राह्मण खतरे में था और आगे भी खतरे में रहेगा, जब जब ब्राह्मण को ज्यादा खतरा महसूस होता है, तब तब ब्राह्मण चिल्ला था नहीं की बचाव बचाव नहीं या, भागो भागो नहीं, बल्कि धर्म संकट में है, हिन्दू धर्म संकट में, धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा

    हिन्दू का मतलब : हीन + दू = घाणेरडा गलिच्छ रहनेवाला दूसरा = काला चोर = काफिर = हिनकस = शूद्र = राक्षस, दानव, दास, दस्यु, असुर

    लेकिन आज का हिन्दू धर्म मतलब = वर्णाश्रम धर्म = वैदिक धर्म = ब्राह्मणी धर्म

    हिन्दू धर्म की रक्षा करना मतलब धर्म की रक्षा नहीं बल्कि ब्राह्मणों की रक्षा करना ताकि ब्राह्मण ओबीसी के ऊपर राज करे

    हिन्दू धर्म की रक्षा करना मतलब आ बैल मुझे मार (ओबीसी को), आवो आवो ब्राह्मण हमारे ऊपर राज करो, आवो आवो ब्राह्मण हमारी सब धन सम्पति लेलो, हमारी माँ, बेटी, बहन, पत्नी सब तुम्हारी हो गई, इसलिए ब्राह्मण ओबीसी की शादी में ओबीसी से कहलवाता है "मम भार्या समर्पयानी"मतलब मेरी पत्नी तुम्हे (ब्राह्मण) को दान कर रहा हूँ, इसलिए ब्राह्मण पहले ओबीसी की पत्नी के साथ पहली रात (हनीमून) मनाता है और बाद में ओबीसी को, ओ लड़की देता है, इसलिए ब्राह्मण लड़की का पहला हात पकड़ता है और बाद में उस ओबीसी के हात में लड़की ओ सपूर्त करता है, लेकिन कहता है ये पहली मेरी पत्नी है बाद में तुम्हारी पत्नी, मै जब चाहूँ तब उसका उपभोग ले सकता हूँ इसलिए तो धर्म बनाया है, शूद्रों को सिर्फ कर्मण्य वादिके रास्ते मा फलेसु कदाचन की तरह सेवा करना है, इसलिए ओबीसी भाइयो जागो उठो सही तरह से भाई, मित्र, और शत्रु को पहचानों

    चार या चालीस बच्चे किसके लिए और क्यों पैदा करना है, कुत्ते की तरह चालीस बच्चे पैदा करने के बजाय एक या दो बच्चे शेर की तरह पैदा करों और अपने समाज को जागृत बनाके देश पर राज करो अपना अपना हिस्सा, वाटा, हक्क अधिकार छीन के लेलो, जिसने हमारा हक्क अधिकार छीना उसका जीना हराम करो.


    Feb 09 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    D-St Likely to be Rattled by Man Who will Control Delhi


    Mumbai:

    Our Bureau

    

    

    Weak Q3 results, strong US jobs data & deepening Eurozone crisis may also hurt sentiment

    Stock investors may have to brace for turbulence this week amid indications that a victory for Aam Aadmi Party in the Delhi elections, strong US jobs data and a deepening crisis in the Eurozone may spark a selloff. Although an AAP victory would do little to change national political equations, Dalal Street may view such an outcome as a setback for the Narendra Modi-led Bharatiya Janata Party.

    The stock markets will most likely open weak on Monday, after most exit polls on Saturday predicted an AAP win. An average of five exit polls gave AAP 41 seats, BJP 27 and Congress 2 in the 70-member Delhi assembly. On Friday, the BSE's mid-cap index fell 1.1%, the small-cap index declined 1.8% while the benchmark Sensex dropped 0.5%.

    "There might be a small correction because the markets have factored in a result in line with exit polls, though the mar gin for AAP in exit polls is con siderably high er," said Nirmal Jain, chairman of India Infoline.

    Some brokers believe selling by traders scurry ing to liquidate bets built on borrowed money may precipitate the market's slide, especially in midand small-cap stocks. Disappointing December quarter earnings of Indian companies are also weighing on sentiment.




    कौन डर रहा है, किसने डरना चाहिए, कौन डर रहा है, कौन डरा रहा है, किसने १० - १० बच्चे पैदा करना चाहिए कौन बेवकूफ बन रहा है, कौन बेवकूफ बना रहा है, निशाना (लक्ष्य) कौन है, निशाने की बन्दुक किसके कंधे के ऊपर रखी है, बन्दुक (निशाना) किसने पकड़ी है, अस्सल में मांजरा (षडयंत्र) क्या है ओबीसी बेवकूफ बन रहा है, ओबीसी को ब्राह्मण मुर्ख (बेवकूफ) बना रहा है, निशाना (लक्ष्य) ओबीसी है, निशाने की बन्दुक मुसल्मान की तरफ है, ओबीसी को मारना चाहते है, लेकिन धमकाया जा रहा है मुसलमान को, देश में ब्राह्मण की सत्ता है, फिर भी ब्राह्मण डर रहा है, ब्राह्मण डर के मारे मुस्लमान को डरा रहा है, लेकिन ब्राह्मण ओबीसी को मारना चाहता है मुसलमान को नहीं देश में ओबीसी जनसंख्या करीबन ६२% है, देश आझाद होने के पहले १९३४ की जनगणना के अनुसार ओबीसी ५२% था, मुस्लिम लोग पाकिस्तान चले गए, पाकिस्तान के ओबीसी भारत में आ गए मतलब देश आझाद (१९४७) होने के बाद ओबीसी की संख्या बढ़ गई ओ आजतक ओबीसी की जातवार जनगणना नहीं हुई, ६२% ओबीसी अगर सही आझाद हुवा तो, जिसकी जीतनी संख्या भारी, उसकी उतनी देश के हर क्षेत्र पर सत्ता की भागीदारी (हिस्सेदारी) भारत की जनसंख्या १२४ करोड़ है, उनमे से ब्राह्मण बनिया सिर्फ ६% है, मुस्लिम १४ % ओबीसी ६२% है. हजारों सालों से ब्राह्मण बनिया इस देश पर राज कर रहे है, ब्राह्मण बनिया भारत के हर क्षेत्र की सत्ता छोड़ना नहीं चाहते, इसलिए बेगुनाह मुस्लमान (५५,००० सलाखों के पीछे है) के सीने पर बन्दुक तानकर ओबीसी को गुलाम रखने के लिए हर ब्राह्मण चिल्ला रहा है हिन्दू मतलब ओबीसी के हर घर में गुलाम पैदा हो, चार चार बच्चे पैदा किये तो उनकी परवरिश में माता पिता भिखारी बने और ओबीसी गुलाम का गुलाम रहे ओ ओबीसी किसी भी सत्ता का हिस्सेदारी नहीं बने इस देश में कभी भी ओबीसी खतरे में नहीं था और नहीं रहेगा, मुस्लमान भी कभी खतरे में नहीं था और नहीं रहेगा हजारों सालों से ब्राह्मण खतरे में था और आगे भी खतरे में रहेगा, जब जब ब्राह्मण को ज्यादा खतरा महसूस होता है, तब तब ब्राह्मण चिल्ला था नहीं की बचाव बचाव नहीं या, भागो भागो नहीं, बल्कि धर्म संकट में है, हिन्दू धर्म संकट में, धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा हिन्दू का मतलब : हीन + दू = घाणेरडा गलिच्छ रहनेवाला दूसरा = काला चोर = काफिर = हिनकस = शूद्र = राक्षस, दानव, दास, दस्यु, असुर लेकिन आज का हिन्दू धर्म मतलब = वर्णाश्रम धर्म = वैदिक धर्म = ब्राह्मणी धर्म हिन्दू धर्म की रक्षा करना मतलब धर्म की रक्षा नहीं बल्कि ब्राह्मणों की रक्षा करना ताकि ब्राह्मण ओबीसी के ऊपर राज करे हिन्दू धर्म की रक्षा करना मतलब आ बैल मुझे मार (ओबीसी को), आवो आवो ब्राह्मण हमारे ऊपर राज करो, आवो आवो ब्राह्मण हमारी सब धन सम्पति लेलो, हमारी माँ, बेटी, बहन, पत्नी सब तुम्हारी हो गई, इसलिए ब्राह्मण ओबीसी की शादी में ओबीसी से कहलवाता है "मम भार्या समर्पयानी" मतलब मेरी पत्नी तुम्हे (ब्राह्मण) को दान कर रहा हूँ, इसलिए ब्राह्मण पहले ओबीसी की पत्नी के साथ पहली रात (हनीमून) मनाता है और बाद में ओबीसी को, ओ लड़की देता है, इसलिए ब्राह्मण लड़की का पहला हात पकड़ता है और बाद में उस ओबीसी के हात में लड़की ओ सपूर्त करता है, लेकिन कहता है ये पहली मेरी पत्नी है बाद में तुम्हारी पत्नी, मै जब चाहूँ तब उसका उपभोग ले सकता हूँ इसलिए तो धर्म बनाया है, शूद्रों को सिर्फ कर्मण्य वादिके रास्ते मा फलेसु कदाचन की तरह सेवा करना है, इसलिए ओबीसी भाइयो जागो उठो सही तरह से भाई, मित्र, और शत्रु को पहचानों चार या चालीस बच्चे किसके लिए और क्यों पैदा करना है, कुत्ते की तरह चालीस बच्चे पैदा करने के बजाय एक या दो बच्चे शेर की तरह पैदा करों और अपने समाज को जागृत बनाके देश पर राज करो अपना अपना हिस्सा, वाटा, हक्क अधिकार छीन के लेलो, जिसने हमारा हक्क अधिकार छीना उसका जीना हराम करो.


    Feb 09 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    Modi Forms 3 Sub-groups of CMs under NITI Aayog


    New Delhi:

    Our Bureau

    

    

    FUTURE CHANGES Move could cut number of schemes & even end the not-so-popular ones

    Heeding the longpending demand of states, Prime Minister Narendra Modi on Sunday formed a sub-group of chief ministers under NITI Aayog to suggest further rationalisation of 66 centrally funded schemes. This could prune the number of programmes, transfer some of them to the states and even end the not-sopopular ones.

    The BJP-led National Democratic Alliance government also set up sub-groups on skill development and Swachh Bharat Abhiyan. "The NITI Aayog would constitute three sub-groups of chief ministers to study the 66 centrally sponsored schemes, recommend how NITI Aayog can promote skill development and creation of skilled manpower within states and decide on institutional mechanisms to be evolved and technological inputs for ensuring that commitment to Swachh Bharat becomes a part of our life in perpetuity ," an official statement said.

    "The first sub-group will look into which amongst the 66 centrally sponsored schemes are required to continue and which can be cut down or transferred to states," Finance Minister Arun Jaitley said, adding that the sub-group will submit its views within a month and a half.The 14th Finance Commission headed by former Reserve Bank of India Governor YV Reddy had proposed a significant increase in the quantum of funds that the Centre gives to the states as their share of central tax revenue as well as a major jump in the amount that they mount that they can spend on their own with out being ac countable to the Centre.

    The Centre's assistance to states for the 66 schemes was . 3.38 lakh crore ` in 2014-15, more than double the amount of ` . 1.36 lakh crore in 2013-14.

    Flagship central schemes include Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee scheme, Bharat Nirman, Sarva Shiksha Abhiyan and Pradhan Mantri Grameen Sadak Yojana.In the 11th Plan period (2007-12), the provision for central schemes stood at over . 6.6 lakh crore.` At one point, there were as many as 360 such schemes and their number has come down to 66 last year from 147.

    At present, states are allocated money under central schemes for development work such as roads, sanitation, education and social welfare programmes.States have to spend the money allocated as per guidelines.

    The recently constituted National Institution for Transforming India (NITI Aayog) has replaced the over six-decade old Planning Commission as a think-tank for the Centre and state governments and to suggest policy directions.

    The Prime Minister is the chairperson of the body that comprises a governing council of chief ministers and lieutenant governors of all states and Union territories, a vice chairman, two full-time members, part-time members and ex-officio members, besides a secretary-level officer designated as CEO of the institution.

    Addressing the first meeting of the governing council of NITI Aayog, the Prime Minister identified "alleviation of poverty" as the biggest challenge.

    "Prime Minister also asked all states to create two task forces under the aegis of the NITI Aayog -one task force would focus on poverty alleviation and the other would focus on future development of agriculture in the state, and how the Centre can assist the state in this regard," the statement said.

    Modi asked the chief ministers to personally monitor factors that slow down projects.

    Feb 09 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    FOR CONNECTION TO HINTERLAND - Govt Eyes $2B in Foreign Funds for Ports' Expansion

    Ruchika Chitravanshi

    New Delhi

    

    

    The government is planning to raise nearly $2 billion (about `. 12,400 crore) in overseas funding for expansion of major ports in the country as well as to execute rail and road projects to connect them to the hinterland.

    The shipping ministry is likely to soon finalise the proposal for a dozen major ports that have a combined US dollar denominated income of about $400 million a year, officials said, adding that the plan will require the nod of the finance ministry and the Reserve Bank of India. "Ports are not hard pressed for money but we want access to cheaper funds. We can use our dollar denominated earnings as a security to raise more finance and it will be hedging for our funds as well," a senior government official said. Most of the ` . 2.96 lakh crore investments envisaged in major and non-major ports by 2020 has to come from the private sector.

    However, public funds will be required for activities such as deepening of port channels, and expansion of rail and road connectivity from ports to the hinterland.India allows foreign direct investment up to 100% under automatic route for construction and maintenance of ports.

    For road connectivity projects alone, about ` . 27,000 crore is required. Some of the funds can also be used for financing the Rail Corporation, which is being set up with participation of all the 12 major ports, exclusively for building port connectivity rail projects.

    The shipping ministry is still in the process of deciding the mechanism of fundraising, the official cited earlier said.

    "Getting access to cheaper overseas funds is a good idea since connectivity is a key issue for ports.Corporatisation of major ports at this point is important as it will make raising money much easier," said Manish Agarwal, leader-capital projects and infrastructure at PwC India.

    The shipping ministry is in talks with some foreign banks for extra commercial bor rowing, officials said, adding that the ministry is al so exploring the option of access ing long-term fi nance through pension funds.

    During 2013-14, the ministry had awarded 16 pro jects amounting to an estimated . 18,640.83 crore under public-pri` vate partnership mode for capacity addition of 159.65 MT in the major ports.

    The ports sector has the potential to absorb huge investments given India's 7,500 km long coastline and plans to develop it as preferred route to transfer cargo to hinterland, a shift that will ease pressure on the road and rail resources.



    

    





    Feb 09 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    DestiNation India

    Anil D Ambani


    

    

    PM's focus on governance, taxation and transparency will help us enter the business-friendly club

    If Prime Minister Narendra Modi has one ambition, it is to improve India's dismal ranki ng in the ease of doing busine ss index -currently languishing at 142, just above the West Bank and Gaza -as part of a comprehensive strategy to attract investors, rejuvenate the economy , create a global manufacturing hub and generate millions of jobs for young Indians.

    In the immediate analysis, he would want to see India rapidly climb up the ranks, to count at least among the top 50. I am ever confident that this will happen sooner than anyone imagines. For, I know that if there's any one teaching of the Mahatma the PM has closest to his heart, it is that about being the (force of) change that one would like to see.

    His government has already announced a series of far-reaching reforms, with more lined up in the forthcoming Budget and beyond. My interactions with investors, regulators, law enforcement agencies and other government bodies tell me that there are a number of further areas that require immediate attention. Critical to improving the ranking will be putting in place a host of legislative changes while making sure that those in charge of enforcement clearly understand that the thrust is to empower and encourage, not just to police and punish.

    The PM is keen that India establishes global benchmarks in areas such as governance, taxation and transparency . For this to happen, investors need to be reassured that India's legislative regime is predictable, stable, transparent, time-bound and in line with global best practices. These principles should also apply broadly to litigation policy , bankruptcy law and arbitration.

    Wrongs Hurt the Right

    It is common knowledge that tax authorities are used to challenging every order passed against them. This needs to be change because it denies law-abiding taxpayers their rightful dues in a timely manner. For corporates, these may include tariff orders by an electricity regulator, a telecom tribunal or some other forum, with every decision now being appealed right up to the Supreme Court.

    What's more, the prevailing practice of confiscation of security deposits and encashment of bank guarantees amounts to forms of extreme punitive action that lead to inevitable, but totally avoidable, litigation.

    With regard to the bankruptcy law, an efficient and effective insolvency system builds confidence among credit providers, resulting in reduced borrowing costs. It also fosters confidence among international investors. The T K Viswanathan Committee has made recommendations in this regard that need to be implemented at the earliest. Also needed is a credible, sustainable basis for settling employee claims and separation of workmen to allow clean closures of unviable businesses.

    In such cases, the administrator needs to be given the power to waive or reduce penalties and interest payments. An agency should supervise bankruptcies as the National Company Law Tribunal's operation has been stayed by the Supreme Court.

    Let me also suggest that the arbitration law should ensure that the process follows a strict `terms of reference' approach to set out all issues clearly . Time limits are needed for each stage, ensuring that the exercise is completed in six months. The government and state-run units should be precluded from appointing ex officio or retired bureaucrats as arbitrators. And judicial interventi on subsequent to awards being passed should be minimal.

    A well-defined and structured exit policy for businesses is essential, thus hastening the winding-up proc l ess. We have to find a way out to minii mise judicial delays and ensure timebound closure to commercial disputes. The Contract and the Specific Relief Acts need to be reviewed to z sanctify such accords and to ensure speedy compliance. Stay orders on projects should be granted only in ex l treme cases.

    India should also sign treaties with more countries with which it i does business regularly , so that the enforcement of foreign judgments can be streamlined. f The government has been talking about improving infrastructure. In order to achieve that, steps should be s taken to ensure clarity of title through digitisation of land records, sing le-window registration and mutation processes, and a streamlined system for land-use conversion. Similarly, labour law reforms should speed up the process of shutting units with adequate compensation to workers.Self-certification of various labour laws should be implemented to end `inspector raj'.

    We should also aim for convergence and e-enablement of all licensing and registration processes to provide for a unified, comprehensive, time-bound and process-based review that leads to the grant of speedy approvals. A combined digital application form instead of different paper-based ones for various departments will simplify the process.

    In the area of environmental clearances, let me suggest that these should be made through a single window and be time-bound. Environment compliance assistance centres shou ld be set up in the states to facilitate information exchange between regulators and industry .

    Tax reforms is another important area where arbitrary powers of seizure, search, arrest and inspection need to be curtailed. Assessment reopening needs to be curbed as this leads to huge liabilities and penalties being imposed. Assessments should be transparent and not be reopened in the wake of retrospective amendments. Tax refunds should be automatic and faster. There needs to be uniform interpretation of tax laws.

    We all understand that at times, amendments are necessary , but these should involve a consultation paper with a reasonable time for suggestions from all stakeholders. An emerging issues task force should consider issues raised by business chambers and provide clarifications in 60-90 days. The government needs to set up infrastructure to ensure that advance rulings are made in six months. The domestic threshold for RS 25 crore this should be lowered to ` from RS 100 crore.

    Make Taxes Certain

    On transfer pricing, a distinction ne eds to be made between the role of In dian multinationals as shareholders of foreign subsidiaries and as lend ers and guarantors. A specific com bined mechanism is needed to deal with transfer pricing and advance pricing arrangements (APAs) forcustoms and income tax, doing away with the special valuation branch for customs valuation. This will assume greater significance as `Make in In dia' gathers pace.

    There is a strong view that the gen eral anti-avoidance rule (Gaar) shou ld not be introduced. Instead, a speci fic anti-avoidance rule (Saar) should be put in place after consultations. A change is also needed in the approa ch of the Central Board of Direct Ta xes and the Central Board of Excise and Customs, with regard to the ac countability of officers, complaints of harassment and excessive assess ments. Revenue targets should not be overly aggressive and apparently harsh orders should be avoided.

    In line with international norms, group companies should be allowed to file consolidated returns to set off losses of each other. This will avoid the current anomaly of one group unit paying huge taxes while anoth er carries forward huge losses.

    Building social and physical infra structure and skill development sho uld be incentivised. Standardisation of public-private partnership (PPP) contracts will go a long way toward transparency and consistency . With regard to vicarious liability , prosecu tion against directors and senior ma nagers should be launched only after sanction by a senior-level official givANIRBAN BORA ing reasons and justifying the action.

    The three Ds -democracy , demo graphics and demand -have been in India's favour. A very welcome four th D -decisiveness -has now been introduced in abundance by Prime Minister Modi and his able team of ministers, including finance minis ter Arun Jaitley and commerce and industry minister Nirmala Sithara man. This offers great hope that Ind ia will soon shake off its image of bei ng a risky and difficult place for busi nesses, and instead become a safe, predictable and profitable destinati on for investors.

    I have not the slightest doubt that this will happen very , very soon. For, if there's one life principle that PM Narendrabhai is inspired by , it is Swami Vivekananda's message abo ut Arjuna-like single-mindedness in the pursuit of one's goals, "Take up one idea. Make that one idea your life. Dream of it, think of it, and live on it... this is the way to success."

    For Prime Minister Narendra Mo di, changing the way India does busi ness is one such idea.

    The writer is chairman, Reliance Group





  • जश्न का नहीं,चीख का समय है यह।

    एक पुरजोर मुकम्मल  चीख नरसंहार के खिलाफ।


    जश्न नहीं,देश जोड़ने और राजनीति बदलने का मौका!

    मोदी के खिलाफ जनादेश लेकिन और तेज दौड़ेंग अश्वमेध के घोड़े!

    युवाशक्ति को,बदलाव की ताकतों को सलाम,लेकिन अस्मिताओं को तोड़ने के चमत्कार  से जबतक सबक न लें लोकतंत्र,तबतक जनसंहार की संस्कृति बेलगाम!

    तबाही के बीचोंबीच मलबे सेघिरे हुए हम किसे आवाज दें,आवाज कुचली जा रही है!

    पलाश विश्वास

    #DelhiDecides में #AAPSweep ने दो साल में बदला #Delhi का नक्‍शा!  #KiskiDilli #Congress #Modi

    Newsflicks Hindi

    ‪#‎DelhiDecides‬में ‪#‎AAPSweep‬ने दो साल में बदला ‪#‎Delhi‬का नक्‍शा!

    ‪#‎KiskiDilli‬‪#‎Congress‬‪#‎Modi‬


    जश्न नहीं,देश जोड़ने और राजनीति बदलने का मौका!


    मोदी के खिलाफ जनादेश लेकिन और तेज दौड़ेंग अश्वमेध के घोड़े!


    युवाशक्ति को,बदलाव की ताकतों को सलाम,लेकिन अस्मिताओं को तोड़ने के चमत्कार  से जबतक सबक न लें लोकतंत्र,तबतक जनसंहार की संस्कृति बेलगाम!


    तबाही के बीचोंबीच मलबे से घिरे हुए हम किसे आवाज दें,आवाज कुचली जा रही है!


    एक दम निःशस्त्र खड़ा हू भारत महाभारत कुरुक्षेत्र मध्ये।

    पहले से कोई छाप नहीं रहा है कि बाजार की अर्थव्यवस्था के खिलाफ हैं हम।


    हस्तक्षेप के जरिये,अपने ब्लागों के जरिए,कुछ मित्रों को ईमेल के जरिये हम अपनी आवाज आप तक पहुंचाने की कोशिश दिनरात करते रहे हैं।1991 से यही सिलसिला चला आ रहा है।


    अमेरिका से सावधान के बाद कोई साहित्य लिखने की कोशिश भी हमने नहीं की है।


    हम देश के कोने कोने में अपने स्वजन परिजन देश वासियों को आवाज लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कहीं से तो अस्मिताएं टूटें और देश की जनता देश बचाने के लिए मोर्चाबंद हो।


    इंडियन एक्सप्रेस समूह का धन्यवाद कि इसके प्रबंधन ने हमारे बोलने लिखने पर अबतक रोक नहीं लगाई है और पत्रकारिता में बाजार के शरणागत हुए बिना हमारी रोजी रोटी चल रही है।


    कल से मेरे सारे ईमेल आईडी डीएक्टिवेट हैं।

    न ब्लाग में पोस्ट कर पा रहे हैं और न फेसबुक में लागातार संवाद साध पा रहे हैं।

    अजब गजब ब्लाकिंग हैं।


    हमने दो दिन पहले हस्तक्षेप पर अंग्रेजी में निवेदन किया थाः

    Let us not celebrate. Cry my country, cry!

    इससे पहले निवेदन किया थाः

    Indian People lost the Waterloo in the Indian capital irrespective of election result!

    कल ही लिखाः

    द्रोपदी दुर्गति गीता महोत्सव

    संजोग ऐसा कि कल के लिखे के बाद मैं चारों तरफ से घिरा हुआ हूं।


    मुझे नहीं मालूम कि मैं कैसे यह रोजनामचा अमलेंदु तक पहुंचा सकुंगा और कमसकम हस्तक्षेप पर आपसे संवाद बना रहे।


    संजोग है कि कल यह आलेख पोस्ट होने के बाद हस्तक्षेप में एक के बाद एक स्त्री उत्पीड़न की ताजा वारदातें दर्ज करानी पड़ी।


    हस्तक्षेप का हाल भी अच्छा नहीं चल रहा है।


    हम सारी भाषाओं का प्लेटफार्म बनाना चाह रहे थे इसे और पंद्रह महीने बाद सड़क पर आ जाने के बाद हस्तक्षेप जरिये अपना संवाद जारी रखने का सपना संजो रहे थे।


    रोजाना अपील करने के बावजूद जनपक्षधर ताकतें हमारे साथ नहीं हैं और संसाधन छीजते जा रहे हैं,यानी कि हमारे रिटायर होने से पहले बंद हो सकता है हस्तक्षेप भी।किसी से मदद की उम्मीद भी नहीं है।


    दिल्ली की राजनीतिक बिसात पर एक करोड़ की जेगुआर गाड़ी और पंद्रह लाख की सूट न्यूयार्क टाइम्स के आकलन मुताबिक,को कड़ी शिकस्त दी है जनता ने।


    जनता दरअसल उतनी बुरबक होती नहीं है जैसा जनजीवन से,सामाजिक यथार्थ से कटे,जड़ों से उखड़े हवा हवाई हम लोग मानने की जुर्रत करते हैं।


    अब भी हमारे पांव चूंकि जमीन में धंसे हुए हैं और चूंकि अबभी हम अपने गांव बसंतीपुर में अपने लोगों के बीच पहुंचकर आखिरी सांस लेने की उम्मीद बांधे हुए हैं,इस हकीकत के उजागर होने से हमसे ज्यादा खुश किसी और  को नहीं होना चाहिए।क्योंकि हमारी देह में अब भी गोबर माटी पानी जंगल और पहाड़ की बदबू बाकी है और अब भी हम बाजार के मध्य नहीं हैं।


    हम तो बाजार के व्याकरण के खिलाफ समाज,देश जोड़कर तमाम विधाओं,तमाम भाषाओं,तमाम जनपदों,खेतों और खलिहानों,जल जंगल जमीन पहाड़ और समुंदर,आसमान और हवाओं, पानियों, ग्लेशियरों,मरुस्थल और रण के हक हकूक की लड़ाई जीतने का मंसूबा बांधे हुए हैं।


    दिल्ली के चुनावों में किसे कितनी सीटें मिल रही हैं और रवीश कुमार जिस दिल्ली की तस्वीर हमें दिखा रहे हैं,जो वायदा आतिश मार्लिन और उनसे भी युवातर युवाओं के दृढ़ निश्चय में आम आदमी की जिंदगी के साथ साथ पूरी राजनीति बदलने का दिख रहा है,जो राजनीतिक लफ्फाजियां है,दाव पेंच है,उसमें मारी दिलचस्पी उतनी नहीं है,माफ करें।


    हम भी चाहते हैं कि रोजमर्रे की जिंदगी के स्थानीय मुद्दे सुलझने चाहिए।लेकिन इस जनसंहारी संस्कृति के अश्वेमेधी घोड़ों की दौड़ और तेज हो जाने की बढ़ती आशंकाओं के मद्देनजर ही मैंने लिखा है,जश्न का नहीं,चीख का समय है यह।


    चाहिए अब तुरंत एक पुरजोर मुकम्मल  चीख नरसंहार के खिलाफ।


    सामने बजट है और आर्थिक नीतियों के बारे में,संपूर्ण निजीकरण,विनिवेश,अबाध विदेशी पूंजी,अल्पसंख्यकों और स्त्रियों के नरमेध,दमन उत्पीड़न,नस्ली भेदभाव और भौगोलिक भेदभाव के बारे में दिल्ली जीत चुकी युवाशक्ति देश भर में आम जनता को कैसे गोलबंद कर पायेगी,अरविंद केजरीवाल की ताजपोशी से इसकी कोई दिशा अभी तय नहीं हो सकी है।जो हमारे चिंताओं का सबब है।


    इमाम बुखारी के फतवे के जरिये मुसलमानों को वोटबैंक बनाने के सत्ता समीकरण को खारिज करने की हिम्मत लेकिन हमारे हिसाब से दिल्ली में आप की प्रलयंकर जीत से बड़ी कामयाबी है।

    इसीतरह बारी अब हर अस्मिता को धव्सेत करने की है।


    इसीतरह वक्त अब इस मुक्तबाजार के खिलाफ युद्धघोषणा का है।


    इसी तरह बराी अब देश जोड़ने की है।समाज जोड़ने की है।


    इसी तरह बारी अब पागल दौड़ परिदृश्य बदलने की है।


    इसीतरह बारी अब सेज,स्मार्ट,डिजिटल,बायोमैट्रिक, एफडीआई,प्रोमोटर बिल्डर माफिया केसरिया कापोरेट कुरुक्षेत्र में तब्दिल देश में अमन चाने बहाल करने की है।


    इसीतरह बारी अब नरमेधी अश्वमेध के घोड़ों के लगाम थामने की है।

    तब जीते तो जश्न मनाना खूब।


    प्रतिरोध महोत्सव में खिलेंगे हमारे मुहब्बत के फूल कि बाजुओं में जोर हो इतना की कयामत सुनामी की बांह हम मरोड़ दें।


    जश्न अगर मनाना ही है तो कृपया जश्न इस उम्मीद की मनाइये कि हम चाहें तो अस्मिता के कारोबार पर आधारित विचारधाराओं के घात के गीता महोत्सव,स्त्री आखेट पुरुष वर्चस्व समय में अस्मिता तोड़ने की पहल कहीं से न कहीं से कर सकते हैं।दिल्ली ने साबित कर दिया।


    युवाशक्ति की इस पहल पर उनका सादर अभिनंदन।


    अगर दिल्ली तक यह बदलाव ठहर गया, राजनीति वही कारपोरेट फंडिंग और अर्थव्यवस्था वही कारपोरेट लाबिइंग और सत्ता उसी बिवियनर मिलियनर प्रजाति के लोगों की बनी रही,अगर संसद और संविधान,लोक,लोकतंत्र और जनपदों को कुचलने का,बेदखली और सर्वनाश का ,फौजी हुकूमत का,धोखाधड़ी औऱ फर्जीवाड़े का पोंजी नेटवर्क यह राज्यतंत्र जारी रहा तो अकेले अरविंद केजरीवाल भी अगर ईमानदार निकलें तो सूरत बदलने वाली नहीं हैं।


    चमत्कार कोई हो जाये कि राज्यों के अगले चुनावों में आम आदमी हर राज्य में चमत्कार कर दें,तो भी शायद न देश जुड़ेगा और न देश बदलेगा और न कातिलों के शिकंजे में फंसी हमारी गरदन के सही सलामत रहने की हालत बनने वाली है।


    पूरे राज्यतंत्र को बदलने और अर्थव्वस्ता को अर्थशास्त्रियों और विदेशी एजंसियों, संस्थाओं के कब्जे से निकालकर गांधी के कहे मुताबिक इस पागल दौड़ को रोकने की कोई पहल अगर यह युवाशक्ति नहीं कर सकी तो यह जीत और यह जश्न बेमायने हैं।


    अगर अंबेडकर के जाति उन्मूलन एजंडे को हम लागू कर नहीं सकते,तो यह जीत बेमायने है।


    अगर मेहनतकश निनानब्वे फीसद आवाम जिंदा रहने की हाल में न हो तो यह जीत बेमायने है।


    अगर खेत खलिहान,कल कारखाने जागे नहीं तो यह जीत बेमायने है।


    अगर पुरुष तंत्र का वर्चस्व बहाल रहा,मनुस्मृति शासन  रहा और देहमुक्ति के बावजूद स्त्री उत्पीड़न और दमन और वध का सिलसिला जारी रहा तो यह जीत बेमायने है।

    अगर बच्चे हमारे बंधुआ मजदूर बनते रहे और आदिवासी विस्थापन के शिकार हों,अगर अल्पसंख्यकों पर हमले जारी रहें और किसानों मजदूरों का सफाया जारी रहें सुदारों के नाम,विकास के नाम और विचारधाराओं के बहाने हमारे पुरखों की विरासत को लूटखसोट का तंत्र मजबूत करने के काम में लगाया जाता रहे,तो यह जीत बेमायने है।


    अगर दलितों पर अत्याचार का सिलसिला जारी रहे और सैन्यतंत्र मजबूत होता रहे,सलवा जुड़ुम जारी रहे,सिख संहार,बाबरी विध्वंस,गुजरात नरसंहार और भोपाल गैस त्रसदी के अपराधी सत्ता में बने रहें,तो यह जीत बेमायने हैं।


    एक अकेले अरविंद केजरीवाल ,एक अकेली आम आदमी पार्टी से यह व्यवस्था बदलेगी,इस उम्मीद का बोझ बहरहाल हम इन नाजुक जवान कंधों पर न डालें।


    एक अकेले कंधे पर देश बदलने की जिम्मेदारी डालेंगे तो वह कल्कि अवतार का उससे बड़ा अवतार होगा।

    ईश्वर होगा वह।

    मसीहा होगा वह।

    लेकिन देश न जुड़ेगा और न बदलेगा देश।


    वे दिल्ली की बहुसंख्य जनता की नर्क हुई जिंदगी को स्मार्ट सिटी या वर्ल्ड सिटी के सपनों के तिलिस्म से निकालकर एक राहतभरी खुशनुमा जिंदगी दे सकें तो यह जरुर कोई पहल हो सकती है।   


    जैसे केंद्र की सत्ता की धौंस हर प्रतिक्रिया में मिल रही है,जैसा बेलगाम अल्पसंख्यक विरोधी,बहुजन विरोधी गैरन्सल विरोधी स्त्री विरोधी श्रम विरोधी कृषि विरोधी विकास के शोर में दिल्ली के जमनादेश को बेमतलब कर देने की जोर आजमाइश चल रही हैं और जैसे दिल्ली जैसे आधे राज्य का हिसाब बंगाल,बिहार,यूपी जीतकर निकलाने का कार्यक्रम है और उनपर जो केसरिया कारपोरेट रंग है,जो हिंदुत्व की सेनाओं का दिग्विजयी अभियान है,केंद्र का सहयोग नमो महाराज की बधाई और वायदे के बावजूद नहीं मिला तो अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मसीहा बनकर भी क्या कुछ कर पायेंगे,अगले पांच साल तक हम देखेंगे।


    युवाशक्ति ने एकजुट होकर दिल्ली का जनादेश यह निकाला है और मोदी की शाहसवारी को पहला बड़ा झटका दिया है तो उनके हजार सलाम.उनके साथ जो देशभर के हमारे निजी नये पुराने मित्र हैं,उनको बधाई।


    हमारी दिलचस्पी लेकिन यह कि ये युवा और खासतर पर स्त्री शक्ति मेहनतकश तबके के खिलाफ जारी साजिशों के खिलाफ  मध्यवर्गीय सहूलियतों के दायरे तोड़कर अस्मिताओं को तहसनहस करके कैसे देश और समाज जोड़कर देश और जनपदों को बचाने की राष्ट्रव्यापी मुहिम में तब्दील करने में कामयाब होंगे।


    हमने द्रोपदी दुर्दशा कोई मजे लेने के लिए नही लिखा है,यह आज का सामाजिक यथार्थ है।


    जो वैलेंटाइन डे धर्मांतरण महोत्सव के तहत अरविंद के शपथ लेने से एकदिन पहले मनाया जाना है,उसपर अरविंद का बाइट नहीं मिला है।


    आधार जरिये लोकल्याणकारी राज्य को डिजिटल बायोमेट्रिक क्लोन देश बनाने का जो तंत्र मंत्र यंत्र हैं,उसपर भी अरविंद चुप हैं।


    ऐसे हालात में देश की कारपोरेट राजनीति के प्रतिरोध में हमसे ईमानदार,हमसे कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध,हमसे कही सक्षम और दक्ष यह युवाशक्ति केसे कैसे गुल खिलायेगी,उस गुलबहार के इंतजार में हैं हम।

    मेहनतकश तबके के व्यापक गोलबंदी के बिना यह असंभव है।

    धर्मोन्माद के खिलाफ वर्गीय ध्रूवीकरण के बिना भी यह असंभव है।


    अंबेडकरी आंदोलन को जनता के बुनायादी मुद्दों पर हांके बिना यह असंभव है।समाजवाद के बेसिक आदर्शोॆ के बिना यह असंभव है।


    साम्यवादी इतिहासबोध और भौतिकवादी व्याख्याओं को जमीन से जोड़े बिना यह असंभव है।


    गांधी के दर्शन को समझे बिना यह असंभव है।


    परमाणु चूल्हों के बजाये जनपद जनपद साझा चूल्हों के बिना यह असंभव है।


    जाति उन्मूलन के बिना यह असंभव है।

    नस्ली भेदभाव खत्म किये बिना यह असंभव है।भौोगोलिक दूरियां खत्म किये बिना यह असंभव है।


    बच्चे जीवन में कर दिखाने से पहले बहुत सारी परीक्षाओं से गुजरते हैं।

    दिल्ली के चुनाव पहला अवरोध है,जहां उनने अस्मिताओं की दीवारों को तहस नहस कर दिया है।


    बाकी देश में भी यह करिश्मा कर दिखाना है।

    यह अकेले उनकी जिम्मेदारी है नहीं,यह समझते हुए हम उनसे कोई उम्मीद पालें तो बेहतर है।


    जश्न मनाने का समय यह नहीं है।


    अश्वमेध की कातिल फौजें अब बेरहम कुचलेंगी जनपदों को,जिन्हें रोकने के लिए देश के हर कोने से मुकम्मल चीख जरुरी है।



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  • 02/10/15--08:44: Mamata congratulates AAP
  • My heartiest congratulations to AAP for a sweeping victory in Delhi Election. All the best Arvind Kejriwal, the new CM.

    Delhi election is the turning point of present political situation. This shows political vendetta has no place in a democracy. Country needed this change.

    This is a victory for the people and a big defeat for the arrogant and those who are doing political vendetta & spreading hate among people.

    My congratulations to all the Delhi voters, AAP workers and leaders for this big victory.


    मुहब्बत नहीं है,नहीं,नहीं है किसीसे किसी से किसीकी!

    मुहब्बत के बहाने बलात्कार ,सामूहिक बलात्कार और निर्मम हत्या की तैयारी है!

    वैलेंटाइन डे को फूलों के साथ साथ कांटों का भी हिसाब रख लें कि गिनती शुरु कर दें कि धर्मगुरुओं ने वाजिब संख्या बच्चों या पिल्लों की अभी तय नहीं की है।वह आपका प्रेम है।

    आखेर में एक अदद आम आदमी की चेतावनी है,गौर कर कि कांठालेर आठा लागले परे छाड़े ना कि

    मुहब्बत का हर मसीहा दगाबाजहै!

    तू दगाबाजों पर मुहब्बत जाया न कर!



    पलाश विश्वास

    नहीं, किसी से किसी को मुहब्बत लेकिन इस मुक्त बाजार में नहीं है।


    मुहब्बत नहीं है।नहीं,नहीं है किसी से किसी की।


    मुहब्बत के ख्याल में मुहब्बत की मुहब्बत में दीवानगी और जुनून लेकिन हर किसी की जिंदगी की दास्तां हैं।लेकिन सीने में हाथ रखकर ईमानदारी के साथ शायद किसी के लिए भी यह कहना मुश्किल होगा कि अपने सिवाय किस किस के साथ उनकी मुहब्बत रही है।या कभी किसी से हुई मुहब्बत देहगंध के आर पार कीचड़,गोबर माटी में।


    हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि हम रसगुल्ले के दीवाने होंगे।


    हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि सारे के सारे इंद्रधनुष हमारे लिए है।

    हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि सारी की सारी हिमपाती शामें हमारी मुहब्बत के नाम दर्ज है।

    हम हर नीली आंखों की जोड़ी पर कुर्बान हो सकते हैं और परियों के पांख से चस्पां हो सकते हैं।

    कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि गुलमोहर की छांव में कहीं पल रही होगी हमारी मुहब्बत।

    हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि कनेर के फूल में छुपी है  हमारी मुहब्बत।

    हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि किसी की एक झलक,किसी खास खिडकी से नैनीझील में प्रतिबिंबित कोू कतरां रोशनी का हमारे नाम लिखा होगा।

    कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि सारी नदियां बहती हैं हमारी मुहब्बत के नाम।

    कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि घुटनों तक धंसकर धान की रोपाई में होगी कहीं न कहीं मुहब्बत।

    कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि गेंहू का गहाई में होगी कहीं न कहीं मुहब्बत।

    कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि खेतों की निराई के वक्त उलझे कांटों में होगी मुहब्बत।


    किकिकि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि आममान में उमड़ते बादलों में,गहराते मानसून में होगी बरसात मुहब्बत की कभी न कभी।


    कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि अंतरिक्ष में उपग्रह प्रक्षेपण से लेकर परमाणु धमाकों और हरित क्रांति में होगी मुहब्बत।


    कि हम भोपाल गैस त्रासदी,बाबरी विध्वंस,मुंबई और देश विदेश के दंगों में,तबाह इराक अफगानिस्तान में,फिलीस्तीन में हसीन चेहरों की इबारत पढ़ते रहे बेपनाह कयामत के मंजर में दस दिगंत गुजारात नरसंहार के मध्ये कि कि कि कि कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि मरु आंधी में होगी कोई कहकशां और कहेगी लफ्जों के फूलों में मुसकुराकर कि मुहब्बत है,मुहब्बत है।लेकिन किसी ने नहीं कहा।हर्गिज नहीं कहा।


    कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि कृष्णकन्हैया की बांसुरी में होगी मुहब्बत,तो वहां रासलीला के तुरंत बाद शंख निनाद और फिर वही गीता महोत्सव,मनुस्मृति विधान।


    हमने सोचा कि चौदह साल के वनवास के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम की देहगंध में होगी मुहब्बत लेकिन सीता तो क्या यशोदा का वनवास देखते रहे हम।


    हम सालोंसाल नैनीझील के मिजाज,बदलकते रंग और झीलकिनारे बहती लहलहाती बयार में मुहब्बत खोजते रहे हम और मंहगे होटलों में हानीमून देखते रहे हम।


    हमने हर फिल्मी चेहर से मुहब्बत की,हर गोरापन के विज्ञापन से मुहब्बत की ,हम हर आइकन के फैन बन गये हम,हर एंबेसैडर से लेकर बाराक ओबामा और नरेंद्र मोदी तक मुहब्बत के दरवज्जे पर दस्तक देते रहे हम और परमाणु विध्वंस की कगार पर खड़े हो गये हम और गांधी,अंबेडकर और लेनिन से लेकर तमाम पुरखों, कबीर, रहीम, लालन, दादू, गालिब,प्रेमचंद,मुक्तिबोध,गोर्की,मार्टिन लूथर किंग से लेकर नेल्सन मंडेला के कातिल बनकर रह गये हम।


    किकिकि मुहब्बत के घनचक्कर में हम पेजथ्री हो गये रहे।


    कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि लू में होगी महब्बत की भूस्खलन और भूकंप में होगी मुहब्बत कि सुनामी में होगी मुहब्बत और हम रंग गये नख से सिर तक केसरिया केसरिया।हमें डूब मिली,मिला जलप्रलय,मिली तबाही की सौगात बार बार।


    कि कि कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि सुंदरवन या समुदंर में होगी मुहब्बत तो सुंदरवन उजाड़ है और हमारे आदिवासी उखाड़ है और सारे के सारे समुंदर और बंदरगाह बेदखल हैं।


    हम सोच रहे थे कि कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि खेतों खलिहानों की हरियाली और फसलों की खुशबू में होगी मुहब्बत लेकिन देश भर में किसान खुदकशी करने लगे।


    कि हम सोच रहे थे कि कल कारखानों में होगी मुहब्बत कहीं  न कहीं,एक एक करके कल कारखाने बंद होते रहे और हम तमाशबीन भूख से बिलबिलाते चेहरों पर राजनीति करते रहे।


    स्कूलों,कालेजों में कहीं नहीं थी कभी नहीं थी मुहब्बत कि हम बाजारों में खोजते रहे मुहब्बत लेकिन सारा का सारा खुदरा एफडीआई हो गया,सारे बाजार बेदखल।सारा देश एफडीआई हो गया।बिका देश मेरा।बिक गया देश हमारा  हम मुहब्बत में इस कदर बेखबर हो गये।


    हमने सोचा कि कि कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि दफ्तरों में होगी मुहब्बत कि निजीकरण विनिवेश से सारे साथी बिछुड़ते रहे,मुहब्बत के ख्वाब बिखरते रहे और हम दिवास्वप्न में हनुमान चालीसा पढ़ते रहे अपनी बारी के इंतजार में।



    कि हमें खुशफहमी रही कभी कभार कि तमाम ग्लेशियरों पर मुहब्बत के तमाम गाने दर्ज होंगे और उत्तुंग हिमशिखरों के पार कहीं न कहीं होगा वह स्वर्ग,जहां मुहब्बत की कोई दास्तां मुकम्मल होगी।


    मुहब्बत के किस्सों पर हमारे अति प्रिय पंजाब के रंगकर्मी गुरशरण सिंह उंगलियों के आकार से  जो बिंदास तरीक से अपनी नुक्कड़ प्रस्तुतुयों में बताते रहे हैं या अपने अख्तरुज्जमान इलियस या नवारुण दा के किस्सों में जो मुहब्बत की चीड़ फाड़ सामाजिक यथार्थ है या जो तसलिमा नसरीन की आपबीती है,उसका कुल जमा हिसाब लेकिन फिर वही फसाना है कि किसी न किसी बहाने औरत को मुहब्बत के बहाने फंसाना है।


    बांग्लादेशी दूसरी आधुनिक  लेखिकाओं मसलन जहांनारा और सेलिना हुसैन ने इसकी आगे चीरफाड़ बेरहम कि है और बताया है कि कैसे घात लगाये मुहब्बत खड़ी है हर नुक्कड़ पर कि अंदरमहल की चहारदीवारी में कि पल छिल पल छिन स्त्री आखेट पुरुषत्व का,पुरुषतंत्रउत्सव गीतामहोत्सव का दिग्विजयी राजसूय है।


    निजी कारनामों और कारस्तानियों से जो महामहिम हुजूरान चिराग रोशन हैं हर कहीं दिलोदिमाग में उनकी मुहब्बत की दास्तां का किस्सा भी कुल जमा किस्सा यही है।


    हम नाम नहीं करना चाहते,जो अवतार लाखों करोड़ बाजार के मुहब्बती मीनार चारमीनार हैं,उनके पताकाओं को गौर से देखें तो वहां से बह नकिलेगी स्त्री योनि से निकलती असंख्य रक्तनदियां।जिस योनी को हमारा धर्म नरक का द्वार कहे हिचकता नहीं है,मुहब्बत की चाशनी से उसे सराबोर करते हुए उसी पर लिख दिया गया है सभ्यता की इतिहास और जो कार्निवाल है मुक्त बाजार का यह ,वह रंग बिरंगा कंडोम का कारोबार है।


    राजनीति उस कारोबार की सबसे बेहतरीन शापिंग माल है।विधाएं कोठे हैं।तो माध्यम भी कोठे बना दिये गये हैं।


    यही मुहब्बत निफ्टी है।यही मुहब्बत सेनस्क्स है।यही मुहब्बत हीरक विकास,विकास दर है।उत्तरआधुनिक पाठ है।विशुद्ध धर्म अधर्म है।


    कास्टिंग काउच कही भी हैं।दप्तरों और घरों में भी।


    हम सबूत बतौर किस्से उघाड़ने लगें तो न जाने किस किस की पाक साफ चादर बीच सड़क खून की नदियां उगल दें।रहने भी दें।


    वैलेंटाइन डे को फूलों के साथ साथ कांटों का भी हिसाब रख लें कि गिनती शुरु कर दें कि धर्मगुरुओं ने वाजिब संख्या बच्चों या पिल्लों की अभी तय नहीं की है।वह आपका प्रेम है।


    आपके हुजूर में,खास तौर पर हमारी अति प्रिय स्त्रियों को आगाह करने की गरज से कि जाल बिछ चुका है ऐ हसीन परिंदों,अपनी पांख का ख्याल रखना हर उड़ान से पहले।


    बच्चा पैदा करने की मशीन के अलावा सभ्यता में नारी की गरिमा कुछ भी नहीं है।


    किसी औरत से दरअसल किसी को कोई मुहब्बत नहीं है।


    जिन स्त्रियों के साथ उनके प्रिय  पुरुषों का जनम जनम साथ है आस्था औऱ धर्म के मुताबिक,दरअसल वह फतवे को तामील करने की रस्म है और इस रिश्ते में आजादी की कोई खुशबू कहीं नहीं है।हम लिव इन कर रहे हैं।किसी से किसी को मुहब्बत नहीं है।


    हमने इस सिलसिले में द्रोपदी दुर्गति लिखा है,उसे नये सिरे से बांच भी लेंः

    द्रोपदी दुर्गति गीता महोत्सव

    द्रोपदी दुर्गति गीता महोत्सव

    http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2015/02/09/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A5%8B



    दरअसल मुहब्बत के बहाने बलात्कार,सामूहिक बलात्कारऔर निर्मम हत्या की तैयारी है।


    वैलांटाइन धर्मांतरण उत्सव से पहले मुझे ऐसा आगाह करना पड़ रहा है क्योंकि धार्मिक आयोजनों,उत्सवों,त्योहारों,धर्मस्थलों में सबसे ज्यादा विश्वासघात का शिकार होना पड़ता है स्त्री को।


    दुर्गोत्सव और सरस्वती पूजा में पुरुषसंगे अबाध घूमने की जो आजादी मिलती रही है,उसके नतीजों से रंग जाती है अखबारी सुर्खियां और धर्म आस्था को चोट पहुंचाना चूंकि हमारा मकसद नहीं है,इसलिए प्रसंग विस्तार में नहीं जा रहे हैं।अपने अपने अनुभवों से जांच परख लें।


    यह समझने के लिए बागी तसलिमा नसरीन को पढ़ना जरुरी नहीं है।

    धर्मग्रंथों में ही बलात्कार संस्कृति के अनंत पाठ है।


    आदरणीया सुकुमारी भट्टाचार्य ने सिलसिलेवार तरीके से वैदिकी साहित्य में इस स्त्री आखेट महाभारते कुरुक्षेत्र के बारे में तसलिमा नसरीन से काफी पहले,उत्तर आधुनिक देहमुक्ति आंदोलन से भी पहले लिखा है।


    बेआवाज आशापूर्णा देवी और बेगम रोकेया और बाबुलंद आवाज अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती ने लिखा है तो स्त्री सत्ता के पक्ष में खड़े शरतचंद्र आवारा मसीहा बन गये।मंटो ने बिंदास तरीके से अंदर महल के मांस के दरिया को दिखाया है।


    मनुस्मृति अनुशासन से लेकर मुक्तबाजार कार्निवाल,सर्वत्र उदात्त अवधारणाओं और विचारधाराओं की आड़ में पुरुष वर्चस्व स्त्री अस्मिता के उत्पीड़न ,दमन और अनंत शोषण के लिए है।


    सबसे पहले गुगल महाशय का धन्यवाद के लगता है ,वर्षों पुराना रिश्ता निभाते हुए कल मेरा कमसकम एक मेल आईडी उनने खोल दिया है जो आप तक मेरा लिखा फिर पहुंचने लगा है।अब मेरे मेल का इंतजार न करें।न करते हों तो शुक्र मनायें कि अब हम मेल नहीं भेजेंगे।रोज रोज एक ही वाकये से परेशां हूं।मेल जब तब डीएक्टिवेट हो रहा है।फिर उन्हें वही निवेदन कि महाशय ःयह सूचना है,खबर है और हम आपके प्राचीन सेवक हैं,पुरातन पत्रकार है और फिर उनकी कृपा।


    इस झमेले में अंग्रेजी में लिखना नहीं हो सका।जबकि कल से फिर ब्लाग पोस्ट चालू आहे।


    कवि अंबेडकरी वामपंथी अनिल सरकार का अवसान,उन्हें लाल सलाम।नीला सलाम।


    इसी बीच नौ फरवरी को दिल्ली आयुर्वेदिक महासंस्थान में हमारे मित्र,नेता और प्रियकवि अनिल सरकार का अवसान हो गया।


    वे करीब एक दशक से बीमार चल रहे हैं।जब हमने उनके साथ असम और त्रिपुरा के दूर दूराज इलाकों में 2002 और 2003  में भटक रहे थे ,तब भी वे मधुमेह के प्रलंयकर मरीज  थे।


    अनिल सरकार छोटे से अछूत राज्य त्रिपुरा के वरिष्ठतम मंत्री थे।माणिक सरकार से भी सीनियर।नृपेन चक्रवर्ती उनके गुरु थे।वे वामपंथी थे और उससे कट्टर बहुजन समाज के नेता वे रहे हैं।उससे बड़े वे अंबेडकर के अनुयायी रहे हैं।


    2002 में जब मैं आगरतला में त्रिपुरा के लोकोत्सव में मुख्यअतिथि बनाकर कोलकाता से ले जाया गया तो उनने बाकायदा मुझे भविष्य में अंबेडकरी आंदोलन की बागडोर इस नये अंबेडकर के हाथों में है,ऐसा डंके की चोट पर कहा।


    आज भी मैं उनके इस बयान की शर्मिंदगी से उबर नहीं पाया हूं।


    एक मेरे पिता मुझपर यह बोझ लाद गये कि अपने लोगो के हक में हर हाल में खड़ा होना है कि क्षमता प्रतिभा नहीं कि प्रतिबद्धता जरुरी बा कि अपने लोगो की लड़ाई अकेले तुम्हीं को लड़ना है।उसी बोझ ने बौरा दिया है।गालियां खाकर भी आखिरी सांस तक रीढ़ में कैंसर ढोने वाले पिता की विरासत की लड़ाई लड़ रहा हूं।


    किसी गांधी या अंबेडकर का कार्यभार के लायक हम हरगिज नहीं हैं।


    अंबेडकर एकच मसीहा आहे।एकल मसीहा आहे।

    हम उनकी चरण धूल समान नहीं हैं और न हमें किसी नये अंबेडकर,नये गांधी या नये लेनिन की जरुरत है।


    मूलतः राजनेता अनिलदा कवि बहुत बड़े थे और इमोशन पैशन के कारोबाार के बड़े कारीगर थे।वे हमारी नींव पर कोई बड़ी इमारत तामीर करना चाहते थे,जिस लायक हूं नहीं मैं।


    असम में तमाम मुख्यमंत्रियों राज्यपालों के बीच ब्रह्मपुत्र बिच फेस्टिवेल में मुझे  अतिथियों के आसन पर उनने बिठाया और मेरे पिता और डाक्टर चाचा असम के जिन हिस्सों में साठ के दशक में दंगापीड़ितों के बीच काम करते रहे हैं,उनके बीच मुझे वे ही ले गये।पूर्वोत्तर और पूर्वोत्तर के लोगों से मुझे उनने जोड़ा।


    वे अनाज नहीं लेते थे।आलू का चोखा उनका भोजन रहा है।वे कहते थे कि चावल से आलस आता है।मुझे तब भी मधुमेह था और अनिलदा ने कहा था कि चावल छोड़ दो,आलू खाओ।हमराे डाक्टर शांतनु घोष भी हाल में ऐसा बोल चुके हैं।


    असम दौरे के दौरान वे दिल का आपरेशन करा चुके थे।पिछले पूरे दशक वे कोलकाता और नई दिल्ली के अस्पतालों में पेंडुलम की तरह झूलते रहे हैं लेकिन वे निष्क्रिय नहीं रहे हैं।वे हमेशा सक्रिय रहे हैं।बेपरवाह भी रहे हैं।


    हमें ताज्जुब है कि पार्टी के अंदर वे तजिंदगी बने कैसे रहे हैं।क्योंकि अपने रिश्ते वे खूब निभाते थे एकदम हमारे कामरेड सुभाष चक्रवर्ती की तरह,जिनसे उनकी खास दोस्ती रही है।वे पोलित ब्यूरो की परवाह करते नहीं थे।


    मसलन नंदीग्राम और सिंगुर प्रकरण के दौरान हम जब वामपंथी पूंजीवाद और वाम जनसंहार संस्कृति पर तेज से तेज प्रहार कर रहे थे,बारंबार मरीचझांपी प्रसंग में कामरेड ज्योति बसु को घेर रहे थे और नागरिकता कानून संशोधन विधेयक पास कराने में पूर्वीबंगाल के शरणार्थियों के साथ वाम विश्वास घात और वाम हेजेमनी की खुलकर निंदा कर रहे थे,तब आगरतला में मेरे साथ प्रेस कांफ्रेंस करने से वे हिचकते न थे।

    लोककवि विजय सरकार के बहाने पूरे पूर्वोत्तर को वे लोककवि विजय सरकार के गांव और महानगर कोलकाता ले आये थे।उन्हें बार बार चेतावनी दी गयी कि हमसे ताल्लुकात न रखें जबकि हम वामपक्ष से एकदम अलग होकर अंबेडकरी आंदोलन में देश भर में भटकने लगे थे।हर चेतावनी के बाद कभी भी देर रात या अलस्सुबह उनका फोन आता था,जिसे सविता बाबू उठाया करती थी और पहले उन्हें अपनी ताजा लंबी कविता सुनाने के बाद वे मेरे मुखातिब होकर बेफिक्र कहते थे,फिर चेतावनी मिली है और हमने कहा है कि वे मेरे पत्रकार मित्र हैं।कुछ भी लिख सकते हैं।


    दलित कवि अनिल सरकार ने मुझे ही नहीं,वैकल्पिक मीडिया के सिपाहसालार हमारे बड़े भाई समयांतर के संपादक,बेमिसाल हिंदी उपन्यासकार पंकज बिष्ट को भी त्रिपुरा बुलाकर सम्मानित किया था।


    उनने मायावती की प्रशंसा में कविताएं लिखीं तो फूलन देवी उनके लिए महानायिका रही हैं।


    उनने बंगाल की नरसंहार संस्कृति पर भी कविताएं लिखी है।


    उनकी लिखी हर पंक्ति में अंबेडकर की आवाज गूंजती रही है।वे अंबेडकरी वामपंथी रहे हैं।

    यकीनन वे हमारे वजूद में शामिल हैं।हम उन्हें भूल नहीं रहे हैं।


    इसके साथ ही प्रकाश कारत और सीताराम येचुरी और विमान बोस के साथ मिलकर वाम दलित एजंडा को भी वर्षों से आकार देते रहे हैं लेकिन अमल में नहीं ला सके ,पर इस कारण पार्टी उनने छोड़ी नहीं है।मतभेद और विचारधारा के नाम पर पार्टी से किनारा करने वाले कामरेडों से सख्त नफरत रही है दलित कवि अनिल सरकार को।हालांकि उनका हर बयान अंबेडकरी रहा है।

    लाल सलाम अनिल दा।

    नीला सलाम अनिल दा।


    वे लगातार मंत्री रहे हैं।वे मरते दम तक राज्ययोजना आयोग के सर्वेसर्वा थे और पिछली विधानसभा चुनावों के दौरान उनने फोन पर कहा कि वे वामपंथ पर अपनी चुनाव सभाओं में कुछ भी नहीं बोल रहे थे बल्कि सर्वत्र चैतन्य महाप्रभु के प्रेम लोक माध्यमों से वितरित कर थे।वह चुनाव भी उनने जीत लिया।


    वे वैष्णव आंदोलन को प्रेमदर्शन कहा करते थे।

    वे कहा करते थे बंगाल में कोई वैष्णव नहीं है।बाकी भारत में कोई वैष्णव नहीं है।शाकाहार से वैष्णव कोई होता वोता नहीं है।वैष्णव तो मणिपुर है।


    इतने वर्षों में देश के जिस भी कोने में गया हूं,अनिवार्य तौर पर उनका फोन कहीं भी,किसी भी वक्त पर आता रहा है।

    अब रात बिरात जहां तहां उनके फोन का इंतजार न होगा।


    कोलकाता के जिस उदयन छात्रावास में उनकी छात्र राजनीति का आगाज हुआ,वहीं आज उनकी याद में स्मृति सभा है।टाइमिंग शाम की है और तब मुझे दफ्तर में पहुंच जाना है।मेरा दिलोदिमाग मगर वहीं रहेगा।


    उन्हें हमारी श्रद्धांजलि।अंग्रेजी में पूर्वोत्तर के लिए उनके व्यक्तित्व कृतित्व पर फुरसत में फिर लिखुंगा ।अब फिलहाल उनके बारे में इतना ही।


    लाल सलाम अनिल दा।

    नीला सलाम अनिल दा।



    घर में राष्ट्रद्रोही


    सुबहोसुबह राष्ट्रद्रोही होने का तमगा मिल गया।

    अखबार पढ़ते हुए टीवी चैनल ब्राउज कर रहा था कि इंग्लैंड और पाकिस्तान का अभ्यास मैच पर ठहर गया।


    अहसान ने जब अपनी दूसरी ही गेंद पर विकेट उखाड़ दिया और शोएब अख्तर पंजाब में जनमे तेज गोलंदाजों के बारे में बताने लगे तब सविता बाबू चादर बदलने के फिराक में घात लगाये बैठी थी।


    मैंने बस इतना ही कहा कि भारत के लिए ऐसी पिच पर भारी चुनौती है और पहला मैच पाकिस्तान के खिलाफ ही है।


    सविता बाबू बोली,तुम राष्ट्रद्रोही हो।

    कुछ भी अच्छा सोच नहीं सकते देश के बारे में।


    मैंने कहा तुम्हारे सुर में मोदी का सुर मिला हुआ है।मोदी भी जिस किसी को राष्ट्रद्रोही बताने से पहले हिचकते नहीं है और जो उनकी सरकार है वह तो हर किसी को राष्ट्रद्रोही बना रही है।


    उनने कहा कि देश के विकास के लिए मोदी ठीकै है।तुम लोग क्या कर रहे हो आलोचना के सिवाय और बीच बहस में उनेन चादर बदल दी।हम आसन जमाकर फिर बइटल वानी कि ठुमककर अपने किले रसोई में दाखिल हो गयी।


    नेटवा मा वैसे फतवा हमारे खिलाफ जब तब जारी होता रहता है।अब घर में भी।

    लीक से हटकर


    कल हमने पहलीबार एनडीटीवी पर अपने संपादक ओम थानवी को गौर से सुना।आज पहलीबार अखबार बांचते हुए पहले पेज पर उनका विशेष संपादकीय पढ़ा।क्योंकि कल मेरा अवकाश रहा है और छपने से पहलेकोज की तरह मैंने अखबार देखा नहीं है।


    इस संपादकीय में जो खास बात मुझे नजर आयी वह कांग्रेस और संघपरिवार के तिलिस्म टूटने का मुद्दा है,जो धर्म राष्ट्रीयता के सबसे बड़े सौदागर है।लीक से हटकर,ओम थानवी का लिखा यह संपादकीय जरुर पढें जनसत्ता के पहले पेज पर।


    हमने जब लिखा कि हम प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक मानते हैं ओम थानवी को।लोगों को लगा होगा कि हम चमचई पर उतारु हैं।हमने प्रभाष जी के प्रधान संपादक होते हुए उनके ब्राह्मणत्व पर हंस में लिखा है।प्रभाष जी से इंडियन एक्सप्रेस समूह के हर व्यक्ति का निजी संबंध रहा है।वैसे संबंध शायद किसी और संपादक के हों।


    हम लोग जनसत्ता में आये तो उनके अत्यंत अंतरंग संवाद की वजह से ही।आगे पीछे कुछ नहीं देखा।वे हर किसी का ख्याल रखते थे।हालांकि वे आखिरी दिनों में मुझे मंडल जी मंडल जी कहते रहे हैं,तब दिलीप मंडल हमारे साथ न थे।


    यकीनन ओम थानवी के साथ हम लोगों का वैसा कोई संबंध नहीं रहा है।न वे जनसत्ता कोलकाता में प्रभाषजी की तरह जब तब आते रहे हैं।न वे हममें से किसी की खोज खबर रखते हैं और न वे हमारा लिखा कुछ भी पढ़ते हैं।


    थानवी लेकिन केसरिया सुनामी से जनसत्ता को बाकी अखबारों की तरह रंगे नहीं हैं।हम समझ सकते हैं कि कितना मुश्किल है यह करिश्मा।देश भर में बाहैसियत पत्रकार सिर हमारा ऊंचा रखने के लिए उनका आभार।


    थानवी ने लेकिन किसा आपरेशन ब्लू स्टार का समर्थन नहीं किया है।

    न सती प्रथा के समर्थन में या श्राद्ध के महत्व पर कोई संपादकीय आया है।


    कांग्रेस और संघ परिवार समान रुप से देश के दुश्मन हैं और दोनों शिविर धर्म कर्म के गढ़ हैं और दोनों को ध्वस्त करने की शुरुआत दिल्ली में युवाशक्ति का शंखनाद है।उनका संपादकीय पढ़कर मुझे ऐसा लगा है और इसलीए उनका आभार।


    हमने पहले भी लिखा है कि ओम थानवी से हमारी कोई खास मुहब्बत नहीं है।लेकिन लगता है कि थोड़ी थोड़ी मुहब्बत भी होने लगी है।इनने और क्यों खूब नहीं लिखा,प्रभाष जोशी की तरह इसका मुझे अफसोस रहेगा।


    मुझे अफसोस रहेगा अगर मेरे मित्र शैलेंद्र कोलताका में और हमारे न मित्र न दुश्मन,हमारे बास ओम थानवी अगर हमसे पहले ही शिड्यूल के मुताबिक रिटायर हो गये।इन्हें मैं खूब जानता हूं और इनके साथ काम करते हुए मुझे कमसकम लिखने पढ़ने और बोलने में कभी कोई अड़चन न हुई।ये हमसे पहले रिटायर हो गये तो पता नहीं किस किसके मातहत दो चार महाने और बिताने होंगे,फिक्र इसकी होती है।डर के बिना मुहब्बत दरअसल होती नहीं है।


    बाकी हमारा स्टेटस यह है कि हमें प्रभाष जी नें बैकडेटेड इंडियन एक्सप्रेस के सबएडीटर का नियुक्ति पत्र जारी किया था कोलकाता आने के छह महीने बाद,जब मेरे वापसी के सारे रास्ते बंद हो गये थे।मजीठिया की कृपा से हम जो तेइस साल से जनसत्ता में सेवा कर रहे हैं,उन सबको इंडियन एक्सप्रेस के मुख्य उपसंपादक ओहदे तक कमसकम दो दो प्रमोशन के प्रावधान के तहत मिल रहा है।लेकिन नये सिरे से न नियुक्ति पत्र मिला है और न परिचयपत्र बदला है और न बदलने के आसार हैं।


    वेतनमान चाहे जो हो,मजीठिया का फतवा चाहे जो हो, हम बाहैसियत उपसंपादक ही रिटायर करने वाले हैं।


    हमें इसकी शिकायत होती तो हम य़शवंत बाबू के कहे मुताबिक अब तक कबके सुप्रीम कोर्ट के दरवज्जे खटखटा दिये होते।हमारे प्रेरणा स्रोत तो बेचारे मुक्तिबोध हैं जो द्रोणवीर कोहली के संपादकत्व में प्रूफ रीडर काम करते रहे।


    हमने सरकारी नौकरी का रास्ता इसीलिए नहीं चुना कि हम अपनी आजादी पर गुलामी चस्पां नहीं करना चाहते थे।

    हम पत्रकार भी इसी वजह से बने हुए हैं।

    प्रभाष जोशी से लेकर ओम थानवी ने हमारे फैसले को उचित ठहराया है।


    सविता बाबू की ओपन हर्ट सर्जरी देवी शेट्टी ने 1995 में की थी जबकि उनके दिल के भीतर कैंसर का ट्यूमर बन गया था।वहीं एकमात्र आपरेशन कोलकाता में इस रोग का सफल रहा है।ऐसा हमारे तबके स्थानीय संपादक श्याम आचार्य की पहल पर प्रधान संपादक प्रभाष जोशी के सौजन्य से हुआ है।जिन अमित प्रकाश सिंह से हमारी कभी बनी नहीं,वे बाकायदा इस काम के मैनेजर से जैसे रहे।


    तब चूंकि एक्सप्रेस समूह के एक एक कर्मचारी ने पैसे जोड़कर वह खर्चीला आपरेशन कराया,सविता बाबू ने हमें जनसत्ता छोड़ने के बारे में सपने में भी सोचने की इजाजत नहीं दी है।जैसे अपने मोहल्ले के लोगों ने आंधी पानी में कोलकाता आधीरात के वक्त दौढ़कर देवी सेट्टी के तत्काल आपरेशन के लिए ताजा खून देने को दौड़े बिना किसी रिश्ते के,वे रिश्ते अब इतने मजबूत हो गये हैं पिछले तेइस साल में कि हमारे लिए यह बंधन तोड़कर निकलना बेहद मुश्किल हो रहा है।


    हमने बसंतीपिर वालों को कानोंकान खबर नहीं होने दी।पिताजी जब देशाटन के मध्य महीनों बाद अचनाक आ धमके तो हमारे घर वालों को पता चला कि क्या विपदा आन पड़ी थी।हम एक्सप्रेस समूह का यह कर्ज उतार नहीं सकते।


    जिन महिलाओं के साथ टीम बनाकर सविता काम कर रही हैं वे न केवल धमकी दे रही हैं कि सोदपुर छोड़ने की सोची तो मार देंगे,वे जोर शोर से जुट गयी हैं हमारे लिए सस्ता मकान की खोज में।हमें तो यह कहने की इजाजत भी नहीं है कि सस्ते से सस्ते मकान में बसने की भी हमारी हैसियत नहीं है।


    यह जो अनिश्चयता का तिलिस्म है,इसमें असुरक्षा बोध इतना प्रबल है कि तजिंदगी धर्म कर्म से अलहदा रही हमसे ज्यादा भौतिक वादी,हमसे ज्यादा धर्म निरपेक्ष सविता बाबू विशुद्ध हिंदुत्व की भाषा बोलने लगी है।

    बाकी जनता के हिंदुत्व का राज भी कुछ कुछ सविताबाबू तकाजैसा हाल है।


    मेरा निजी अनुभव है कि मुक्त बाजार अर्थ व्यवस्था से महान कोई हिंदुत्व या कोई और धर्म मत नहीं है।


    असुरक्षा और भय ही धर्म की सबसे बड़ी पूंजी है और उसी की नींव पर तमाम तंत्र मंत्र यंत्र कारोबार है।धर्म ससुरा भयऔर असुरक्षा से निपटने का हनुमान चालीसा है।


    इस मुक्तबाजारी कारपोरेट केसरिया अर्थव्यवस्था में पल छिन पल छिन भारतीय नागरिक हनुमान चालीसा का पाठ करने को मजबूर है।


    आखेर में एक अदद आम आदमी की चेतावनी है,गौर कर कि कांठालेर आठा लागले परे छाड़े ना कि

    मुहब्बत का हर मसीहा दगाबाज है!

    तू दगाबाजों पर मुहब्बत जाया न कर!




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    Towards the dictatorship of 'Aam Admi'

     

    By Vidya Bhushan Rawat

     

    Delhi has never made many of us proud as yesterday when the results of the local polls gave an entire country and its already frightened people a new hope in the strength of democracy whatsoever bad it might be, that at the end of the day it is people who matter and that the most fascist and dictatorial persons too should be afraid of people and keep their cool even at the time of such occasions. I am not to here to describe this victory of Arvind Kejriwal the eighth wonder of the world but definitely one ca not take away the credit of committed volunteers of AAP and their strategy which worked in Delhi. These elections have given hope to people that if their work on their strategy well people will vote for them. It has given Kejriwal and his team a message that he should work as any further nautanki on his part will create survival problem for the party in future. As far as 'national' perspective is concern, we must not come to any conclusion that fast about AAP as an 'alternative' to BJP or representing 'secular' forces. The results in Delhi only clarify that each state want a dominant leader and elections and democracy is not just 'power' to 'people', it has different meaning to different communities.

     

    Why is Delhi election so important when it has merely 70 seats? Why Congress got decimated in Delhi and how long will the party's failure continue? Will AAP replace Congress as a political force in India? These are futile questions for many armchair authors who are fascinated by tricolor wielding 'Aam Adami' in the Delhi streets for the past three year. Will Delhi see a new kind of government? Is Aap really an 'innovative' and new 'left' outfit which is 'inclusive? It is time for serious introspection of the situation.

     

    As I mentioned earlier, I am not fascinated by those who call it a 'revolution' and the fact is most of the 'political''changes' by street smart 'rebels' is nothing but pure dictatorial in nature and dominance of the powerful communities. Democracy may be a call for the people, of the people and by the people but it is in fact power of the powerful in India. It is oversimplification of dirty facts that with the 'advent' of AAP the 'caste' politics will be eliminated and a 'class' war has started. Absolutely farcical and out of touch 'experts' can attribute such thoughts. When and where was AAP 'left'? What is the aam admi of AAP? Can the interest of the cash rich marwaris-Banias of whose community Arvind Kejriwal 'proudly' belong to, be the same, as of the migrants Dalits from Bihar and Uttar Prades ? Will the Sangh inspired 'Aam Admi' leave his caste prejudices and become more inclusive? Is it not a fact that Aap was not 'fighting' with Modi but with 'corruption' as Kumar Vishwas, whose family lineage goes back to RSS, continued to harp after the victory of AAP? What is the profile of AAP leaders? They do not suffer from day to day survival stints as one of their spouses work or many of them have earn enough money to survive a decent life.

     

    We celebrate their victory because it crushed Modi and his loudspeakers. Most of India celebrated it that way only yet there are powerful message hidden behind this victory. Politics is learning process and perhaps Arvind Kejriwal became much more sober and sensible after becoming a politician. The people in the slums and resettlement colonies realized that he can 'deliver' them. These days elections are not just ideological driven but more as developing 'perception' and management. AAP's theatrics can match the RSS propaganda machinery. The reason is clear as most of the AAP volunteers have family background of RSS and BJP and hence they know how to counter the propaganda. Secondly, in the caste war, BJP lost the Bania votes once Harsh Vardhan was clean bowled by the party. Kejriwal has been highly supported by Delhi's traders and not just Delhi but Haryana, Punjab and even UP traders have found a new 'icon' in Kejriwal at the moment. So, the Banais who did not have much political clout aspired that and got it. For years, they have been the backbone of BJP, supporting it wholeheartedly but got nothing in return in terms of leadership. Kejriwal filled that vacuum and it was not without any reason that Kejriwal spoke about BJP 'insulting' his 'community'. But just because trading community supported Kejriwal could not have turned him into such a big victory in Delhi. The real force behind AAP Tsunami in Delhi is the open and unambiguous support of Dalits, Muslims and the poor of Delhi. The question is why should poor of Delhi vote for him ? It is a massive mandate as the party got more than 54% of total votes while the main opposition party BJP got 32%. Congress had nearly 25% vote share last time was totally decimated and became irrelevant with merely 10% votes this time. Congress's vote of Dalit-Muslims-Poor actually made AAP's victory important. Will AAP leadership realize it? Will they realize how much the people particularly the Dalit Muslims have trusted them? Why have the Dalit Muslims voted in such a large number to AAP. Is it just 'Bijali-sadak-pani' or their support is for the larger cause.

     

    I would like to give one small example of Sohrab, my friend and cab driver who takes me to most of the places when I go out. And from the very beginning he was talking of AAP. With the advent of aggressive Hindutva fanatics, Muslims felt scary and he would talk to me about AAP. Yesterday, he called me and said they are celebrating AAP victory in their locality. We did see BJP during Vajpayee regime but despite differences of opinion everybody knew he was a man anybody could meet and a man of great humor and wit. Today, the whole government seems to be working on a vengeance towards political opponents. Minorities are feeling scary and disturbed. The Dalits who voted to AAP actually were disturbed with regular threat to Constitution and obviously the persistent anti poor stand of the government such as ordinances land acquisition and attempt to throttle anti poverty programmes. The friendship of the current regime with some of the 'big' and 'notorious''capitalists' is wellknown to be described here.

     

    The regular attacks on Churches on the eve of elections and attempt to communalise Delhi through 'Trilokpuri''experiment' boomeranged on Amit Shah and company who felt that they can redo a 'Mujjaffarnagar' in Delhi and reap the rich harvest later during the elections.  The aggressive campaign, in which BJP spend huge sum violated all forms of decency and poll norms created a contrary impression. The Election Commission sadly remained mute and helpless on all these issues despite media attention. There was fear in the air and the Sangh Parivar and BJP felt that they would bully people further into their way. The regular threat to people was a challenge to the privacy of the individual which people responded in a fitting way. BJP would never have thought the response would have been like this but the fact is that people of Delhi have rejected their polarization bid.

     

    It does not mean that the upper castes have left their caste identities. It does not mean that likes of Kumar Vishwas have a change of heart. Neither it mean that Banais of Sadar would pay handsome salaries to all the migrant workers coming to Delhi. Nor does it means that Chhotoos and Chhottis working in the houses of these caste Hindus will get a fair deal. Will Arvind Kejriwal and his team make some stronger 'domestic wage' act for 'workers' mainly trafficked from Chhattishgarh and Jharkhand?  Yet, all of the slum dwellers and Jhuggi Jhopad wallahs, resettlement colonies have different issues related to their daily lives and they need to be addressed.

     

    AAP has promised moon. It has promised thousands of CCTV cameras as well as women force, commandos to 'handle' crime against women. It is where we see the hypocrisy of the party and its leaders. Can crime against women be reduced by such nonsensical ways? AAP has no economic alternative except that they got promoted in the same corrupt corporate system, which they are opposing. The media projected them as alternative and only when the Ambanis were challenged made the things difficult for them in the media. It is the same media who glorified them converted them into villain and now after their victory making them 'revolutionary'. It is an opportunist media and AAP is well aware of it that if it did not have an upper caste middle class character none would have ever cared for this party. So upper caste urbanized middle class is the USP of AAP hence it is really not an Aam Adami, which actually AAP represent, but Khas crorpatis. Of course, some of the Dalits and Muslims got tickets in it and have representation in the party. However, the challenge lies ahead in fulfilling the promises and addressing the greater concern of the Dalits, Muslims and other poor. The question of representation will be important in future. Secondly, every state is looking for a dominant and powerful chief minister. Thirdly, most of the Kejriwal's original supporters are same who talked 'ooper Modi, Neeche Kejriwal'. In longer term such stretagy will not work as neither the caste equations are same in all the regions nor we have one leaders everywhere. Hence like Mayawati, who could not create a BSP beyond UP because of dearth of leaders, Kejriwal will find it equally difficult to have the leaders elsewhere.

     

    AAP put its spokesperson on TV debate very strategically. In major debates we saw Muslim spokes person on TV screens who were well articulate in both Hindi and English language as well as looked absolutely traditional in their outlook. So they reached their target audience very well. It is clear that Muslims who could have got confused in voting this time was unambiguous from the very beginning. If we compare it with the results last time, it is Congress Party, which got its seats from Muslim majority localities. It clearly reflects how this election was taken as a big challenge for Muslims and they voted in large number and to AAP.

     

    Will AAP to justice to the great faith posed by Muslims and Dalits in it. The coming days will show it. AAP will have to reflect on major policy decisions. It will have to speak on representation, on the issue of reservation, common civil code, violence against Dalits, issues of farmers, OBCs and so on.

     

    The decimation of Congress is not the end of the party as many suggest. The fact is that elections are being fought on perceptions. Kejriwal build a perception against Congress along with Anna on corruption issues converting the entire organization totally corrupt. The entire anti corruption movement was communal with anti dalit anti Muslim tendencies though political formation might have changed Kejriwal a bit but his core constituency and support base comes from powerful upper castes who have got disgruntled with BJP for not being able to address their issues. The fact is that Kejriwal's Jan Lokpal is nothing but an invitation to chaos over political leadership. Hope Kejriwal will work and act on the issues which are not that easy to solve. Will he take a position against Khap Panchayats as he spoke against BJP for trying to intimidate women and spoke candidly that he want girls to enjoy their freedom. So, perception against Congress Party will change once Kejriwal fail to deliver and come back to his agitational politics. With Modi failing at central level and Kejriwal in Delhi will only give people option to revert back to Congress. In fact, Congress should not have fielded candidate in Delhi elections this time given the huge perceptional issues this time and this could have given them much greater respite than current situation where the party scored a zero.

     

    Rahul Gandhi should continue to focus on young energetic people from diverse communities and try to ensure that Congress does not have dilly dallying approach on important issues. Congress's Narsimharao approach of 'no governance is the best governance' on major policy issues actually was responsible for development of perception regarding the party in recent years. The party did not do anything to these perceptions. It did not fight offensively when Nehru was being maligned by the Sangh Parivar trolls on the web space and questions were being raised about Indira Gandhi. The party need to have a cohesive voice and must look honest in its approach. Even when Sonia Gandhi got Forest Rights Act, Right to Food and Land Bill, the perception did not change. The poor were not very happy. The farmers voted against it because P Chidambaram and Montek Singh Ahaluwalia were never considered as pro people. So the socialist approach of Sonia and Rahul was mocked and failed by those in power and the party actually is still paying a price for bad governance or no governance.

     

    Next one year will be important for the country. AAP's victory shows that the saffron chariot can be stopped and that people are fed up with it but at the same point of time AAP is not the answer as most of its class caste character except for a few actually come from the Sangh thought. Secondly, no single party can rule India and therefore parties will have to develop way to work in mutual interest with common understanding and political ideologies. If Kejriwal says he does not have any ideology then he is lying actually. Can any one say Modi government is not working from an ideological perspective ? It is and signs are clear. Therefore, the Delhi election is a signal that if parties have good management and counter Sangh Parivar on the same wicket with good, committed idealistic volunteers, the things will move. AAP had definitely the louder volunteers even when ideologically they are B copies of Sangh Parivar yet their commitment to their leaders brought the things to this level.

     

    Finally, the election results have thrown a big challenge to 'democracy' itself. Are we electing 'larger' than life leaders who have no faith in 'democracy' ? There was a time when political leaders understood the importance of opposition and it was mutual understanding not to field candidates against good leaders. Today, things are changed and we want to 'liquidate' the opponents then and there. It is sad that political discourse has turned to such a level. Is it not a threat when we don't have an opposition in Parliament and the assemblies? Should the opposition come from the 'street' now? Do the people want to see chaos in the street ? Role of opposition leaders are important in shaping our policies and hence it saddened me to say that Ajay Maken got defeated humiliatingly despite the known fact that he could have been a better chief minister than the other too. But it is the same Delhi and its 'elite' and 'educated' class which defeated Dr Man Mohan Singh and gave it to one nondescript Vijay Kumar Malhotra.

     

    Lawmakers will have to think how can a party with 54% of votes get 95% of seats? Is it not highly disproportionate of their vote percentage? BJP with 32% of votes could manage with 5% while Congress with 9% vote did not get anything.  India will pay a heavy price with this when elections are becoming joke and high 'personalised' and personality based and those who have capacity to pay will be able to manage otherwise ordinary activists and workers have no place in such a 'democracy'. We must shift to Proportionate Electorate System so that diverse groups have representation in our Parliament and Assemblies and we will be saved from such a situation when a 'democratic' mandate does not become threat to 'democracy' itself. Kejriwal's victory is no different than Modi which decimated the opposition and it is here that I am signing out this note with a red alert that India will ultimately go to dictators who have no respect for democracy if people continue to give mandate in such a way as if they don't want to see any opposition.  And how will 'Aam Admi' tackle those who will take to street for its 'failure' to address the situation ? Will it send their 'jathas' to 'deal' with their 'political''opponents' ? Delhi will have to patiently wait for the coming days which may bring torturous 'Aam Admi' dictatorship in the street. At the moment, we can only wish good to Arvind Kejriwal and his team for five year and hope they will be able to fulfil their promises. 


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    10 hrs · 
    First JNU administration cancelled the venue booking and tried to stop our tonight's Public Meeting - The Undying Spirit of Kashmir: The question of self-determination. Then ABVP goons tried to stop meeting to start. But despite of cancellation of venue and deployment of JNU security guards to stop the meeting, democratic-progressive students of JNU ensured the meeting to happen at the same venue and all three speakers Arif Ayaz Parrey, Uzma Falak and Sayed A R Geelani spoke at length about the oppression as well as struggle of Kashmiri people for their right to self-determination. It was many hundred progressive-democratic students who stand in solidarity and support in the public meeting and after more than 2 hour long meeting, they went for a long juloos, telling sanghi fascist goons and administration in loud and clear voice that we will fight for our democratic spaces and rights, we will raise voices against every kind of oppression and demand justice and freedom, no matter how much you try to suppress us.
    Reyazul Haque's photo.
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    Reyazul Haque's photo.
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    #आत्मध्वंसविरुद्धे

    #आत्महत्यानिषेधे

    #प्रतिरोधनिमित्ते

    #मसीहानिषेध

    #आवाहन मनुष्यता का


    आम जनता और हम जैसे लोग न गांधी है,न लेनिन और न अंबेडकर,गिन गिनकर मारोगे तो भी कितने मारोगे?

    बाजू भी बहुतै हैं और सर भी बहुतै हैं।रगों में खून भी बहुतै है।

    गोडसे कहां कहां से लाओगे?

    कितने मंदिर मोदी और गोडसे के बनाओगे?

    कितनी नदियां खून की बहाओगे?


    तैंतीस करोड़ देव देवियों की विधि विधान के इस मिथ्या जगत के बावजूद हम हक हकूक से बेदखल आवाम मर मर कर जिंदा हैं।


    पलाश विश्वास

    साभार NDTV

    ·


    In #Gujarat, a Temple Devoted to PM Narendra ModiIncludes His Idol http://goo.gl/uq7Eml

    #आत्मध्वंसविरुद्धे

    #आत्महत्यानिषेधे

    #प्रतिरोधनिमित्ते

    #मसीहानिषेध

    #आवाहन मनुष्यता का

    अब मेरे मेल डीएक्टिव हो रहे हैं।ब्लागिंग भी रुक रही है।जो हमारे साथ हैं इस मुक्त बाजार के खिलाफ,वे हमसे सहमत हैं तो इस हरसंभव तरीके से अधिकतम लोगों के साथ देश के कोने कोने में शायर करें।


    आम जनता और हम जैसे लोग न गांधी है,न लेनिन और न अंबेडकर,गिन गिनकर मारोगे तो भी कितने मारोगे?


    बाजू भी बहुतै हैं और सर भी बहुतै हैं।


    रगों में खून भी बहुतै है।



    गोडसे कहां कहां से लाओगे?

    कितने मंदिर मोदी और गोडसे के बनाओगे?


    तैंतीस करोड़ देव देवियों की विधि विधान के इस मिथ्या जगत के बावजूद हम हक हकूक से बेदखल आवाम मर मर कर जिंदा हैं।

    कितनी नदियां खून की बहाओगे?



    आत्म ध्वंसे के हजारो कायदे हैं मुक्त बाजार चौकाचौंध मध्ये।


    हमें इंतजार है कि हमारे बच्चे बालिग हों,समझदार हों और हमारे साथ खड़े हों,फिर हम जालिमों से ,उनके जुल्मोसितम से निपट लेंगे यकीनन।

    कोई तकनीक हमें हरा नहीं सकती के हमउ तकनीक के बाप रहै हैं।

    आत्मध्वंस के रास्ते चल रहे सारे युवाजन जाति धर्म अस्मिता लिंग निर्वेशेष जब सड़क पर उतरेंगे आवाम के हक हकूक के लिए,उस दिन का इंतजार है।

    जब सारी स्त्रियां गोलबंद होंगी पुरुषतंत्र और उनके स्त्री विरोधी औजार के खिलाफ कि हर ब्लेड की धार पर होगा पुरुष वर्चस्व चाक चाक,उस दिन हम मनुस्मृति अनुशासन का हश्र भी देखेंगे।


    कि हर कोई आपकी योजना मुताबिक रोके जाने पर आप न होगा बाप।

    आप भी होगा तो बाप को न भूलेगा हर कोई बाप।रोक सको तो रोक लो।

    #आत्मध्वंसविरुद्धे

    #आत्महत्यानिषेधे

    #प्रतिरोधनिमित्ते

    #मसीहानिषेध

    #आवाहन मनुष्यता का


    जो हमें जानते नहीं हैं,वे नहीं जानते कि हनुमान की पूंछ में आग में लगाने का नतीजा भी कुछ होता होगा।


    यकीनन,रोबोटिक तकनीक हममें से हर किसीके डिजिटल बायोमेट्रिक डैटा से समृद्ध है।यकीनन किसी भी दिन किसी प्रायोजित दुर्घटना में हमारा अंत तय है।पोलोनियम 210 अचूक रामवाण है।

    भोपाल गैस त्रासदियां है।

    सिख संहार है।

    देश विदेश दंगे हैं।

    राजनीतिक घृणा और बेलगाम हिंसा है।

    निरंकुश सैन्यतंत्र है।

    सलवा जुड़ुम हैं रंगबिरंगे।

    आफसा है जहां तहां।

    गुजरात नरसंहार का सबक है।

    बाबरी विध्वंस बारंबार है।

    आपरेशन हैं।

    सर्वोपरि माफिया राज है।

    कारपोरेट कालाधन केसरिया है।

    यकीनन हमारे नाम भी लिखा गया है कोई प्रायोजित बुलेट।


    आखेर बै चैतू,फिकर नाट।

    नको नको।


    खोल दो सारे दरवज्जे कि कयामत चालू आहे।

    खोल दो सारी खिड़कियां कि कयामत चालू आहे।


    इस कयामत के शबाबो हुश्न की हवा पानियों के खिलाफ खड़े हुए बिना साबूत न बचेगा कोई प्रिय सपना।


    कोई गुलाब की पंखुड़ी नहीं होगी सही सलामत कि खिलते कमल की वसंत बहार है।

    भूखे रायल बंगाल टाइगरों  के अभयारण्य में नहीं,अपने खेत खलिहान, कल कारखाने,कारोबार और घर दफ्तर में हम भूखे भेड़ियों का निवाला में तब्दील हैं।


    अबै चैतू,कथे कथे खनै हो ससुकरे।


    आदिगंत डोनरकथा अनंत है।

    एकच डीएनए की संतानें कमल कमल हैं।


    बाकी सारे फूल,बाकी सारी कायनात पतझड़ है।

    बाकी सारी कायनात सुनामी है,जलसुनामी है,डूब है,भूस्खलन है मूसलाधार,भूकंप है या फिर तमाम तमाम रंगबिरंगे आपदाओं का इंद्रधनुष है।


    जिंदगी कोई बियांबां नहीं कि जंगल का कानून चलेगा।

    जिंदगी कोई बियाबां नहीं कि हमारी दोस्ती भेडियों से होगी।


    जिंदगी कोई जंगलबुक नहीं कि हम भेड़ियों के आहार के लिए शिकार करते रहे।


    इसीलिए बै चैतू,सुन,अंधियारे के कारोबार के खिलाफ एक मुकम्मल चीख जरुरी है।

    इस चीख को हथियार बना बै चैतू।

    कोई तकनीक हमें चीखने से रोक नहीं सकती।


    बाबुलंद जश्न मध्ये मनुष्यता साठी एकच मस्त चीख अनिवार्य आहे।आहेत।आहे।आहे।आहे।


    हम उस चीख के लिए आजीवन इंतजार में बैठे हैं कि बूढ़ी रंडी की महफिल में फिर होगा मुजरा कभी न कभी।


    कि हमारे लोग हर अनाज का हिस्सा मांगेगे कभी न कभी।

    कि चौराहे में अंधियारा के खुल्ला खेल फर्रऊखाबादी  के मध्य तेजबत्तीवाला अंधियारा बाबा आखेर अकेले है।

    कि चैतू चांदी काटेकै चांदी बाटेके धंधा बंद करके चाहि।

    कि

    #आत्मध्वंसविरुद्धे

    #आत्महत्यानिषेधे

    #प्रतिरोधनिमित्ते

    #मसीहानिषेध

    #आवाहन मनुष्यता का


    मित्रों ,मेरी औकात बस फिर वही माटी गोबर में गूंथे दिलोदिमाग है और मेरी विरासत मेरी पिता की रीढ़ में बसे लाइलाज कैंसर है।


    मेरी जमीन फिर वही बसंतीपुर है।

    मेरे घर,खेत,खलिहान में जब तब जहरीले नाग का दर्शन होता रहता है और सर्पदंश से मरा नहीं हूं,बाकायदा महानगरीय जीवन में उंगलियों के मार्फत खेती कर रहा हूं।जनमजात किसान हूं।शरणार्थी भी हूं और अछूत भी।कोई अपमान,कोई उपेक्षा,कोई उत्पीड़न हमें हमारे इरादे से डिगा नहीं सकते।


    समझ लें बै चैतू,हम तकनीक के तिलिस्म में कैद न होने वाले हैं।


    मुझे कमसकम पचास साल हुए पर्चा निकालते हुए।

    मेरे पिता और मेरे गांव के तमाम लोग आंदोलनकारी रहे हैं।

    मैंने कविता कहानी आलेख लिखने से पहले अ आ क ख सीखने के साथ पर्चा निकाला है।


    तोपखाने हमारे पास नहीं हैं।


    हमारे पास प्रक्षेपास्त्र नहीं हैं।

    हमारे पास ड्रोन और सैटेलाइट नहीं हैं।


    पहाड़ों में पला बढ़ा हूं जंगलों में बचपन बीता है और हर गुरिल्ला तकरीब हमें मालूम है।सीधे अगर लड़ न सकें तो छापामार हल्ले तो कर ही सकते हैं।


    चैतू,फिक्र किस बात की है बै,हम पुरखौती से बेदखल हैं और पुरखौती केसरिया है और हमारे सैकड़ों,हज्जारों ,लाखों गांव बेदखल विस्थापित हैं और हम सीमेंट के तिलिस्म में कैद हैं तो का हुआ बै,हम गांव के लोग लोक में रचे बसै हैं।

    हम तो जनमजात रंगकर्मी हैं।

    हम कुछ न हुआ तो रंग चौपाल के मध्य जोड़ेंगे देश और इस तकनीकी शैतानों का जवाब देंगे यकीनन।


    जबसे दिल्ली में आप ने कांग्रेस और भाजपा को साफ कर दिया है,तकनीक के रोबोट हमारी उंगलियां कैद करने लगी है।


    दरवज्जा अभी खुला तो अभी बंद।

    खिड़कियां अधखुली तो फिर बंद।


    हम बादलों के कारिंदे न हैं और इंद्रधनुष के शहसवार अश्वमेध के घोड़े हैं हम।हमसे हमारे सपने बेदखल हो नहीं सकते।


    हम किसी ईश्वर या अवतार के बंदे नहीं हैं बै चैतू।

    हम मनुष्यों के गुलाम हैं।


    वे अपनी कब्र खोद रहे हैं जो भी विरोध में लिख बोल पढ़ रहे हैं,उनके पीछे रोबोट और क्लोन छोड़ रखे हैं कि हर कहीं उन्हें आप नजर आ रहा है।


    हम मानते हैं कि मुहब्बत का हर मसीहा आखेर सौदागर है।

    हम किसी मसीहा के गुलाम नहीं हैं।


    आम जनता जो है,जो बाकी लोग हैं,वे हमारी तरह बदतमीज और जिद्दी जरुर नहीं हैं।


    आप को रोकने को लिए उन सबको कदम कदम पर रोकेंगे और अभिव्यक्ति के पैरों में जंजीरें बांधेंगे,तो सारे चेहरे आप नजर आयेंगे।


    फिर कोलकाता कारपोरेशन का चुनाव प्रचार करने का दंभ बचा भी होगा दिल्ली दुर्गति के बाद तो भी हर कहीं नये वाटरलू की फसल होगी।


    हम मसीहाई में यकीन नहीं करते।

    हम जनमजात कार्यकर्ता है और मेरे रिटायर होने में सिर्फ चंद महीने हैं।

    सारा जहां हमारा घर है।

    सारी जमीन हमरी है।

    सारा आसमान हमारा है।

    हमारा है समुंदर, पहाड़, रण, रेगिस्तान और तमाम नदियां हमारी,तमाम जंगल हमारे।


    लिख भी न सकें तो क्या सड़क पर खड़े अपना घर फूंकने का तमाशा मस्त मलंग कबीरा कर ही सकते हैं अगर गांधी की तरह मार न दिये गये।


    वे केजरी को भी गोली से उड़ाने की धमकी दे रहे हैं।


    मसीहा मारे जाते हैं।गांधी की हत्या हो गयी।


    मोदी के मंदिर बनने लगे हैं।

    गोडसे का मंदिर भी रामंदिर की तर्ज पर बनकर रहेगा।

    हिंदू राष्ट्र पहले से बना हुआ है।


    हिंदी हिंदू हिदुस्तान की रघुकुल रीति हजज्जारों सालों से चली आ रही है।

    बड़ा मूरख बै तू चैतू कि हजज्जारों साल की गुलामी की जंजीरों को आजादी का गहना मानकर मटक मटक कर चलि रिया हो।


    धर्म अधर्म देश में धर्मनिरपेक्षता कुछ नहीं,फरेब है।

    हमारी लड़ाई भटकाने का फरेब।

    हमें वोट बैंक में तब्दील करके हमारी गर्दन पर तलवार के वार के लिए।

    हमारी कन्याओं को वे विष कन्या बना रहे हैं।

    द्रोपदी की फसल पैदा कर रहे हैं वे।


    हमारी स्त्रियां जो तमाम गुलामो हैं,शूद्र हैं,दासी हैं,हम उनकी अगुवाई में लड़ेंगे साथी।

    जो छात्र युवाजन लाखोंलाख वर्गविहीन जाति विहीन धर्म विहीन समाज और देश के लिए हर कुर्बानी को तैयार हैं,हम उन सबको एक एक कर गोलबंद करेंगे।

    गोलबंद करेंगे निनानब्वे फीसद आवाम को एख फीसद एफडीआई खोर कालाधन काला चोर मुनाफा करोड़ टकिया पोशाक में विकास प्रवचन ताने मसीहा संप्रदाय की जनसंहारी सत्ता के खिलाफ।

    #आत्मध्वंसविरुद्धे

    #आत्महत्यानिषेधे

    #प्रतिरोधनिमित्ते

    #मसीहानिषेध

    #आवाहन मनुष्यता का


    आम जनता और हम जैसे लोग न गांधी है,न लेनिन और न अंबेडकर,गिन गिनकर मारोगे तो भी कितने मारोगे?


    बाजू भी बहुतै हैं और सर भी बहुतै हैं।


    रगों में खून भी बहुतै है।



    गोडसे कहां कहां से लाओगे?

    कितने मंदिर मोदी और गोडसे के बनाओगे?


    तैंतीस करोड़ देव देवियों की विधि विधान के इस मिथ्या जगत के बावजूद हम हक हकूक से बेदखल आवाम मर मर कर जिंदा हैं।

    कितनी नदियां खून की बहाओगे?

    हमें इंतजार है कि हमारे बच्चे बालिग हों,समझदार हों और हमारे साथ खड़े हों,फिर हम जालिमों से ,उनके जुल्मोसितम से निपट लेंगे यकीनन।

    कोई तकनीक हमें हरा नहीं सकती के हमउ तकनीक के बाप रहै हैं।

    आत्मध्वंस के रास्ते चल रहे सारे युवाजन जाति धर्म अस्मिता लिंग निर्वेशेष जब सड़क पर उतरेंगे आवाम के हक हकूक के लिए,उस दिन का इंतजार है।

    जब सारी स्त्रियां गोलबंद होगी पुरुषतंत्र और उनके स्त्री विरोधी औजार के खिलाफ के हर ब्लेड की धार पर होगा पुरुष वर्चस्व चाक चाक,उस दिन हम मनुस्मृति अनुशासन का हश्र भी देखेंगे।

    कि हर कोई आपकी योजना मुताबिक रोके जाने पर आप न होगा बाप।आप भी होगा तो बाप को न भूलेगा हर कोई बाप।रोक सको तो रोक लो।

    #आत्मध्वंसविरुद्धे

    #आत्महत्यानिषेधे

    #प्रतिरोधनिमित्ते

    #मसीहानिषेध

    #आवाहन मनुष्यता का

    पुनश्चःअब मेरे मेल डीएक्टिव हो रहे हैं।ब्लागिंग भी रुक रही है।जो हमारे साथ हैं इस मुक्त बाजार के खिलाफ,वे हमसे सहमत हैं तो इस हरसंभव तरीके से अधिकतम लोगों के साथ देश के कोने कोने में शायर करें।



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    The Tsunami is over Mr.Prime Minister!


    Ram has NO Place in RSS Hindutva agenda,it is Modi Puja and Godse Temple all Over!

    Blocking writing on net would not help either as AAP replaces RSS! After Delhi RSS losing ground and committing suicide!

    Palash Biswas


    Ram has NO Place in RSS Hindutva agenda,it is Modi Puja and Godse Temple all Over!


    Blocking writing on net would not help either as AAP replaces RSS! After Delhi RSS losing ground and committing suicide!


    Since AAP sweeped Delhi,Govt. of India is doing the great job blocking writing against the ruling Billionaire Millionaire hegemony,Corporate Raj,legislation and policy making,economic ethnic cleansing,racial Apartheid,inherent inequality and injustice, environment  and ecology,rapes and gangrapes,brutal violation of human and civic rights,Hindutva,RSS and Hindu Imperialism!


    Professional journalists like us may not write single line relevant to the suffering of the masses,their plight,their problems,their struggles and the care is taken to block information about the truth of so called development,Achhe Din and minimum governance, disinvestment and complete privatization under complete FDI Raj.

    The government has no capacity to digest any criticism at all.


    Everything from blue culture,everything from ponzi networking and fraud,making dupes of the consumers and taxpayers,blue film hardcore clippings are flowing in media and social networking but we are not allowed to address the masses and the nation.


    Every door is shut down.


    Every window is closed.


    It is an unwritten Emergency unprecedented that I am being deactivated and blocked again and again as our fellow citizens who dare to speak up have been shut up this way.


    Mr Prime Minister,it would not help you just because the Tsunami Baloon is blasted right in Delhi and you would see how your Hindutva card installs Didi in Bengal once again as Bangaon votes tomorrow and despite breaking the Matua Movement RSS is going to lose.


    You could not hold on Delhi and have been exposed at every home with Fifteen Lac suits branded and changed so many times a day.


    People would soon know who paid for these suits as the people know very well who paid for your 3D campaign and flights to and for and who happen to be the best winner with your win.


    You boast to represent us,the people of India,the people deprived of basic necessities and services as you have linked everything to the free market economy and the nation as well as national resources happen to be on stake.


    Pardon,we do not address those people on internet who have no time to read or  write any information at all neither they understand the economics.


    You and your government simply blocking those words and sentences which may rather help you in your governance and politics whatsoever.


    The wind is changing.


    RSS  is deviated from God Rama and worshiping you having invoked Nathuram Godse.In fact ,you did never follow the path of Maryada Purushottam! Adharm has enveloped the Dharma all the way and the all round fraud exposed,mind you!


    You have sidelined every RSS and BJP activist who happen to be patritiotic and concerend to gang up for the expantion of the infamous Gujarat Model.


    You seem not to have learnt the lesson in Delhi where simply the BJP supporters crossed the fences to teach you.As the liliput made it a perfect Watreloo for the God incarnated by RSS and Global Capitalism.


    Lotus may not bloom in a desert,mind you.

    You are making entire nation a desert with your robotic,digital and biometric tools.


    The citizens have their hearts and minds.

    They are not machines or the dices in the Dalal Street.You may drive the bull run but you may not drive the people in the same way.


    CHEEL CHAKKAR ahead with swift and dangerous turn.The oil prices not adjusted with the inflation and price rise and the people in Delhi could understand this.


    Your claims of Good Days turned to be disastrous and the people see red altheway.


    Your diplomacy exposed.Your claims of achievement exposed and the budget you are going to present it would be exposed.


    You have not perhaps witnessed the social forces across identities wanting an alternative politics which should represent the people.

    You dismantled Anna Brigade.


    The Ghost is rising again.


    You wanted your forces to run through the nation and win every state for you.


    In Bengal,the people do understand.When you do come to campaign for the Corporate elections in Kolkata,you would better understand!


    In Kashmir,the issues of article 370 and AFSPA might be compromised by those who are in search of the key to power.But the Kashmir Valley would decide everything which has already rejected you and the mandate has gone against you.


    If cross identity Vote is the trend,it has to continue for the best whether we stand with AAP or not.But the people would judge the politics and opt without your knowledge as shutters are down.


    As your profile shows you a man from grassroots,I may have sympathy,only sympathy for you Mr.Prime Minister.


    You may block some IDs dictating  the service provides to dance at your will.You may not block the hearts and minds of the people!


    Mind you the nation is not in any mood to dance with your tune.

    The Tsunami is over Mr.Prime Minister!




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    #मुक्तबाजारपोंजी

    #श्री 420

    दिल्ली के तख्त पर एक मुगलेआजम ताजनशीं है जो मुहब्बत के खिलाफ है

    फिक्र नाही के तिब्बत से सोना निकालना चालू आहे और शेयरों पर दांव का खुल्ला बाजार हुकूमत है,kissing Love Day मुबारक

    #देश के कोने कोने में श्री 420 कारनामा,फिर वहीं शारदा फर्जीवाड़ा राजकरण देश विरुद्धे

    पलाश विश्वास

    #मुक्तबाजारपोंजी श्री 420


    1. Shree 420

    2. 1955 Film

    3. A man (Raj Kapoor) arrives in a city with big dreams but must choose between integrity and success.

    4. Initial release: September 6, 1955 (India)

    5. Director: Raj Kapoor

    6. Music composed by: Shankar Jaikishan

    7. Songs


    1. श्री 420 - यूट्यूब

    2. Video for श्री 420▶ 163:42

    3. www.youtube.com/watch?v=TPLr46wm5Jc

    4. Jun 23, 2014 - Uploaded by RK Films

    5. रणबीर राज या राजू खुद के लिए एक नाम बनाने के लिए और एक बनाने के लिए मुंबई के लिए आता हैवह अपनी सारी संपत्ति खो देता है के बाद भाग्य।, वह विद्या (नरगिस), एक सिखाने के साथ ...


    दिल्ली के तख्त पर एक मुगलेआजम ताजनशीं है जो मुहब्बत के खिलाफ है!


    फिक्र नाही के तिब्बत से सोना निकालना चालू आहे और शेयरों पर दांव का खुल्ला बाजार हुकूमत है।


    फिक्र नाही के इंफ्रास्ट्रक्चर बूम बूम मार्फत,रिएल स्टेट कारोबार मार्फत,ईटेलिंग मार्फत,बेदखली विस्थापन देस निकाला मार्फत,कार्निवाल मुक्तबाजारी मार्फत,डाउ कैमिकल्स और तमामो हजारोहज्जार ईस्ट इंडिया कंपनी मार्फत,हजारों हजार शारदा फर्जीवाड़ मार्फत,बेलगाम बुलरन की सांढ़ संस्कृति मार्फत,अरबपति खरबपति कारपोरेट राजकरण फटा पोस्टर वोट समीकरण देश तोड़ो समाज तोड़ो घर परिवार तोड़ो मुहिमो मार्फत,खेती के बाद बिजनेस इंडस्ट्री विदेशी पूंजी और एफडीआई हवाले करो संघ के हिंदुत्व एजंडा मार्फत,मीडिया की ब्लू संस्कृति मार्फत बेमिसाल कयामत और सुनामी मार्फत रीमिक्स आइटम सांग पंद्रह लखटकिया सूटो मार्फत अडानी के जेट मार्फत अंबानी के तेलवर्चस्व मार्फत आईपीएल और रक्षा सौदा कमीशन स्विस बैंक खाता मार्फत कारपोरेट चंदा और कारपोरेट लाबिंग मार्फत,सैन्यतंत्र,आफसा और सलवा जुडुम मार्फत,आपदाओं विपदाओं मार्फत विकास दर की गरीबी की बदलती परिभाषाओं के मार्पत,आरबीआई की मौद्रिक कवायदों और विदशी रेटिंग बजरिये छलांगा मारती विकास दर मार्फत,कंप्लीट प्राइवेटाइजेशन कंप्लीट प्राइवेटाइजेशन कंप्लीट जिसइंवेस्टमेंट मार्फत इस रोबोटिक बाओमैट्रिक डिजिटल देश में शंहशाह के दरबार में प्याकिया तो डरना किया महफिल है।कि तुमसे हमें खूबैखूब मुहब्बत है,कहेके चाहि बाबुलंद चाहे मुहब्बत हो कि न हो,चाहे तैयारी बलात्कार की हो या निर्मम हत्या की,मुहब्बत का धग्मांतरण कार्निवाल मध्ये गाड सेव दि किंग मध्ये जनगणमन है।


    धर्मांतरण उत्सव चालू आहे के लवडे खातिरे वैलेंटाइन कुर्बान मेरी जान है।


    तमाम परिंदों के डैने लोहे की बेड़ियों में बंधे हैं कि गानेवाली बुलबुल के कलेजे में धंसा हुआ हिंदुत्व है।


    एक अनुवर्तिता से नाराज संघ परिवार गुस्से में है और डाउ कैमिकल्स का ऐलान है दिल्ली के वाटरलू का हश्र चाहे जो है,सो है,दिल्ली मगर उनकी है।हाशिये पर गुजरात नरसंहार,सिख संहार,बाबरी विध्वंस,भोपाल गैस त्रासदी और हरित क्रांति के पीड़ित हैं।


    सविता बाबू को बेहद अफसोस है कि मैंने उससे कभी नहीं कहा,आई लव यू।


    मैंने सविता बाबू को कभी बंद लिफाफे में कोई गुलाब न भेजा है और न कभी हमने वैलेंटाइन डे मनाया है।


    मैंने पहला खत उन्हें पोस्टकार्ड पर लिखा था अपनी शादी में हर हालत में मौजूदगी का निवेदन करते हुए।बाकी वक्त तजिंदगी वह मेरा पीछा छोड़ती नहीं हैं और न वे खुद मुझे कोई लवलेटर लिखने की इजाजत देती है।


    इसका मायने यह नहीं है कि हमने कभी मुहब्बत की नहीं होगी या मुहब्बत खतों में बयां किया नहीं होगा।


    बचपन में ही अपने पढ़ाकू वैज्ञानिक चिंतन मनन से लैस चाचाजी  डा.सुधीर विश्वास के करीब रहा हूं।पिता हमारे लिए हमेशा मित्रवत रहे हैं।लेकिन मेरा बचपन मेरी दिवंगत ताई और दिंवगत चाचा के नाम रहा है।


    चाचा की मेहरबानी से प्राइमरी पास कर लेने से पहले फूल पैंट पहनने की आदत बनने से पहले, नाक की घी बंद होने से पहले शरतचंद्र बंकिम चंद्र प्रेमचंद की घुट्टी पी ली थी और गोर्की से लेकर आलेक्सांद्र डूमा,डिकेंस,विक्टर ह्यूगो से लेकर पर्ल बक तक न जाने किस किसको पढ़ लिया था।


    दिलोदिमाग में सामाजिक यथार्थ की सुनामी तब से रची बसी है और मुहब्बत के सारे जलवे के मुखातिब रहा हूं तब कि रोज सुबह शाम दसों दिशाओं और सारे शरणार्थी कालोनियों,बंगाली और सिख,पूरबिया और देसी गांवो के जमीन आसमान चीरकर में रवींद्र नजरुल आवृत्ति किया करता था।


    गोबर माटी लबालब समुंदर थीं उनदिनों और मुहब्बत सुनामी थी उन दिनों कि हमने रसगुल्ले,कनेर के फूल,अपने पगला गोरु,तेज धार भैंसों,कनेर और गेंदा समेत तमाम फूलों,मानसून के बादलों,हिमालय के उत्तुंग शिखरों,तब तक अनबंधी तमाम नदियों और झरनों,कौमार्यभंग जिस अरणयदेहगंध का तब तक न हुआ था,उसके नाम,खेतों में खिलते सरसों के फूल,दूब की घास,मटर की फली,गन्नारस कड़ाहे,पशुचारा, धान की रोपाई, गन्ना काटते हाथों,बोझ ढोते चेहरों,अपने तमाम इंद्रधनुषी ख्वाबों,बदलाव के इरादों और पूरी कायनात के लिए न जाने कितने लव लेटर बेइंतहा लिखे थे।


    अब फिर वैसी मुहब्बत के लिए वक्त नहीं है यह संगीन कि मैंने कविताएं लिखनी छोड़ दी है के सुकांत भट्टाचार्य के मुताबिक यह पृथ्वी गद्यमय है और कविता को उनने छुट्टी दे दी के मुक्तिबोध की तरह अंधेरे के बीचोंबीच खड़े हमने अपना पक्ष तय कर लिया के नवारुण दा के अक्षय अनंत गुरिल्ला युद्ध में शामिल होकर अपने देश के मृत्यु उपत्यका में तब्दील करने के लिए मोर्चाबंद हूं मैं।


    के दिल्ली में कोई मुगलेआजम का राज है बै,चैतू,जो नागरिकों के सांझे चूल्हे को परमाणु चूल्हे में तब्दील कर रहा है कि कोई डाउ कैमिकल्स कंपनी है जो आम जनता के लिए पोलोनियम 210 से ज्यादा मारक विष के प्रयोग आर्थिक सुधारों के बहाने कर रही है।


    मैं फिर वहीं मुहब्बत के फसाने में हूं और पृथ्वी थिएटर चालू आहे।

    इसी थिएटर का आभार जिसे अब थामते थामते हमारी सबसे बड़ी ख्वाहिश रही कहीं रंगकर्म में हमसफर संजना कपूर बूढ़ी हो चली है और विरासत अभी रंग चौपाल के जिम्मे है।


    पृथ्वी थिएटर की पेशकश नहीं रही है फिल्म श्री 420,लेकिन मुझे नये सिरे से शेयर बाजार में खड़े खड़े पोंजी लूटखसोट की भारतीय अर्थव्यवस्था में जनसंहारी स्थाई बंदोबस्त के तिलिस्म के बींचोबीच श्री 420 के प्रेम दर फ्रेम पृथ्वी थिएटर की रुह बोलती नजर आ रही है,जहां मदरिंडिया की हसरतों का कत्ल होते देख रहा हूं और किसी मुगलेआजम की दहाड़ के सिवाय हर आवाज पर लेकिन चाकचौबंद पहरा है।


    हिंदुत्व के लिए लव बेहद जरुरी है।

    शूद्र दासियों को विष कन्या बनाये जाने की कवायद है।

    हर स्त्री को द्रोपदी दुर्गति बनाने का योगाभ्यास और अनंत प्रवचन है और लव कार्निवाल है क्योंकि इस पूरे देश में विधर्मी म्लेच्छों और अनार्यों के सफाये काएजंडा है।

    कि धर्मांतरित हर स्त्री के लिए दस बच्चे या चालीस पिल्ले पैदा करने के फतवे जारी है।


    आम आदमी कोई शहजादा सलीम नहीं है और न हर आम आदमी के लिए कोई अनार कली है और ताजमहल बनाने के ईनाम बतौर कटे हुए हाथों पर कोई ताजमहल कभी सजता रहा है कि मुहब्बत इजहार करने की आजादी नहीं है हमारे इस अस्मिताओं में तितर बितर कायनात में।के मुहब्बत से पहले जाति और धर्म के हिसाब निपटाने होते हैं।


    न जाने कैसे होगी फिर वही मुहब्बत कि प्यार किया तो डरना क्या वाली जिगर के साथ बजरंगियों और दुर्गाओं के पहरेदारी में कि कहा नहीं कि मुहब्बत है,शादी करने की नौबत होगी संघ परिवार की किसी अंधेरी रोशन गुफा में हर कहीं।


    पता नहीं कि किस किससे शादी करनी होगी मुहब्बते के शेयर की खरीददारी के लिए और न जाने किस विदेशी वित्तीय संस्था की आस्था की जरुरत होगी,हमें मुहब्बत है कहने के लिए के इस मुहब्बत खातिर न जाने किस किसको बेचना होगा यह देश बार बार बार।


    गनीमत है कि किसी हीर, रांझा ,लैला मजनूं, शीरीं फरहाद ,सोहनी माहीवाल रोमियो जुलियट को मुहब्बत के लिए देश दांव पर लगाना नहीं पड़ा।


    लेकिन अब लविंग किसिंग डे के फैशन में लाखों डालर के शूट और करोड़ की कार,अरब की हवाई उड़ान  के तहत किस किस क्लियोपैट्रा,द्रोपदी और हेलेन  के लिए अपना यह ग्लोबल विलेज दांव पर लगाना होगा,जिसके लिए डाउ कैमिकल्स का जहर हर किसी के रगों में बह रहा है खून बनकर।


    कि पता नहीं कि कब तक सांसों को इजाजत है मुहब्बत कहने के लिए।

    #मुक्तबाजारपोंजी

    #श्री 420

    दिल्ली के तख्त पर एक मुगलेआजम ताजनशीं है जो मुहब्बत के खिलाफ है

    फिक्र नाही के तिब्बत से सोना निकालना चालू आहे और शेयरों पर दांव का खुल्ला बाजार हुकूमत है,kissing Love Day मुबारक

    #देश के कोने कोने में श्री 420 कारनामा,फिर वहीं शारदा फर्जीवाड़ा राजकरण देश विरुद्धे



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    Congrats! Kejri!Now we have to watch you as we look forward to you for public hearing hitherto missing in our democracy!

    I hope that AAP would force into the rest of the country.But we  do not want yet another RSS.

    Palash Biswas

    Exactly one year after he quit over the Jan Lokpal issue, AAP leader Arvind Kejriwal will take oath on Saturday at the historic Ramlila Ground as the eighth Chief Minister of Delhi, after leading AAP to a stupendous victory in the assembly polls trouncing BJP.


    While you get this write up on your PC,You would have taken the oath afresh with a mandate you wanted.


    Since your landslide victory,my voice is chained as I may not mail anyone,I may not share a facebook post.I may not blog.They want to stop the digital biometric nation to go AAP way as they think that stopping us on net they would stop public hearing.IDs are being blocked to ensure corporate,builder mafia RaJ.


    Congrats! Kejri!Now we have to watch you as we look forward to you for public hearing hitherto missing in our democracy!



    Last time,we expected you to stand with us in our protest to the surveillance of the citizens!But hitherto you have not uttered a single word against brutal violation of civic and human rights.


    Mr.Kejriwal,the Anna brigade was raising its voice against Black Money.RSS also had been crying against Black Money and you just seem to overlap RSS and its greatest ever brand Modi,the prime minister.


    It is corporate corruption Mr.Kejri and it is all about the Dollar hegemony,all about ethnic cleansing,all about racial Apartheid,all about FDI and free flow of foreign capital, all about ponzi networking all round,all about statics fraud,all about militarization of the state to sell of the nation and national resources,all about the identity inflicted politics.


    I must congratulate you to have taken an initiative to mobilise the youth and women,workers and social forces across identities.


    I must congratulate you to have broken identities to create a full fledged Waterloo for caste religion race based Politics and wiping out the two greatest ever brand of identity Politics Congress ZERO and BJP THREE.


    We look forward to you to address the agrarian crisis beyond this or that civic APP.


    Mr.Kejriwal!World class Super smart Delhi is not the Nation.


    I hope,you must understand the expectation and aspiration of the masses deprived,depressed who simply do not want yet another brand of RSS to rule India.


    They look forward to you for a changed politics and the billionaire millionaire hegemony politics have stripped them naked of civic and human rights for corporate monopolistic profit.It is the root of the corruption.


    Mr.Kejriwal,you may not make everyone honest with your preaching broom.The black money vicious cycle should be stopped.


    We want to stand for public hearing as the cry continues at every home and no one cares to listen.


    We expect you to stand against complete FDI.

    We expect you to stand against complete Privatization.

    We expect you to stand against complete Militarization.

    We expect you to stand against complete Surveillance and complete STOP of the freedom of Expression which has taken an alarming turnaround as RSS thinks that they should dominate the cyber space as they ousted and ejected out public hearing in Print as well as Electronic media.


    RSS is annoyed with your win and wants us to be sackled in our room so that we may not communicate our fellow citizens lest every citizen of India opts for AAP!


    Please raise your voice how the government of India is blocking information and criticism of business friendly minimum governance of ethnic cleansing and how DOW Chemicals is ruling India.


    Congrats that you intend to ensure Electricity and Water for New Delhi but mind you,every citizen is on sale.Every thing national is on sale.Every resource is on sale.Jal Jangal Jameen Himalaya Hind Mahasagar our rivers and water resources are one sale.


    Agrarian communities die countrywide.The retailers must die.The Industry is killed.They manipulate the growth story projecting the glittering emerging market free for all.They might commit any crime against humanity as well as the nation to ensure the Bull Run.


    Is this honesty?

    Is this religion?

    Is this moral?

    I hope that AAP would force into the rest of the country.But we  do not want yet another RSS.


    Please clarify your stand to protest inherent inequality and injustice.

    Please clarify your stand to protest brutal violation of civic and human right across the country.

    Please clarify your stand to protest the changed labour reforms to chop off hands,legs and mouths.

    Please clarify your stand to protest the default Green signal for a monopolistic corporate aggression against the people of India who must be ejected out of their home,job,livelihood and Jal Jangal Jameen.

    Please clarify your stand to protest the RSS Love JIhad against women.

    Please clarify your stand to common civil code,Article 370 and AFSPA.

    Please clarify your stand to on Cash Subsidy,Oil business delinked from global prices which is the root cause of inflation and price rise.

    Please clarify your stand on UID.

    Please clarify your stand land acquisition amendment bill.

    Please clarify your stand retail FDI and E tailing killing the retail.

    Please clarify your stand  on knowledge economy which links education to purchasing power.

    Please clarify your stand on blooming lotus infrastructure.

    Please clarify your stand on Oil monopoly.

    Please clarify your stand sell off the ships and the ports.

    Please clarify your stand defence deals,hundred percent FDI in defence and legal commission.

    Please clarify your stand on Militarisation of the state.

    Please clarify your stand on continuous Salwa Judum and dismantling of fifth and sixth schedule. PESA.

    Please clarify your stand conversion campaign!

    Please clarify your stand on Gujarat Genocide and Sikh genocide,Bhopal Gas Tragedy and Babri demolishment.

    Please clarify your stand on continuous refugee influx nonstop and the citizenship of the refugees.

    Please clarify your stand minority persecution and flaring up riots countrywide.

    Please clarify your stand on encounter fraud nationwide.

    Please clarify your stand on PONZI networking.

    Please clarify your stand  Hindutva,Hindi Hindu Hindustan and Hindu Imperialism.


    I hope that you should do this because you seem to be the emerging leadership the country expects and ready to incarnate.



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    केसरिया मुकाबले दीदी अब अपराजेय,वाम के साथ आवाम नहीं

    बंगाल में हर चौथा वोटर अब केसरिया, शत प्रतिशत हिंदुत्व फतवा मुकाबले ध्रूवीकरण जनता का,बाकी मुद्दे समीकरण बेमतलब

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    संकेत दिल्ली के चुनावों में मिल चुके थे।नई किस्म की राजनीति की जीत वहां जितनी हुई,उसका जो प्रचार हुआ,उसके मुकाबले सच यही था कि शत प्रतिशत हिंदुत्व के फतवे देश में ध्रूवीकरण अब तेज से तेज होता जा रहा है।


    अमित शाह के दिग्विजयी घोड़ों का कब तक कहां तक सीबीआई और केंद्रीय एजंसियां साथ दे पायेंगी,शक है।


    बंगाल में कंफर्म हो गया कि जो आम जनता इस धर्मोन्माद के खिलाफ है,वह भाजपा को हराने वालों का साथ देगी।कोई फतवा जरुरी नहीं है।


    दिल्ली में वह ताकत आप रही है और कांग्रेस का सूपड़ा इसीलिए साफ हुआ है।आत्मध्वंस के जिस पथ पर तेजी से बढ़ रहा है संघ परिवार के मोदी ब्रांड हिंदुत्व का अश्वमेध घोड़ा,उसके रास्ते में ऐसे ही मोर्चाबंदी अब होती रहेगी।


    मौका था वाम के लिए।

    बहुजनों के लिए भी मौका था।

    मौका था वाम बहुजन गोलबंदी का भी।

    ऐसा लेकिन होना असंभव ही है।

    अनिल सरकार और तुलसीराम जैसे लोग याद आते रहेंगे और तेलतुंबड़े की लोग सुनेंगे भी नहीं।


    साख से बेदखल वाम,जनांदोलनों से ,जनता के मुद्दों से बेदखल वाम के साथ आवाम नहीं है कहीं और न कहीं हकीकत की जमीन पर खड़ा है वाम।


    इसीतरह बहुजन समाज का अता पता ही नहीं चल रहा है।दिल्ली में कांग्रेस की तरह साफ है बहुजन तो बंगाल में तो वह मैदान छोड़कर भागा हुआ है अरसे से।


    बंगाल में भाजपा के मुकाबले फिलहाल ममता बनर्जी के अलावा भाजपा को हराने वाला कोई शूरवीर नहीं है।


    वनगांव उपचुनाव में शरणार्थी आंदोलन का चेहरा जो बेनकाब हुआ सो हुआ क्योंकि नागरिकता के सवाल को शरणार्थियों के वजूद को वोट बैंक समीकरण में तब्दील करने की कोशिश पर खड़ा था भाजपा की जीत का समीकरण और शरणार्थी दलित नेताओं का भगवाकरण तेज हो गया रेवड़िया खाने के लिए।


    वोटबैंक बजरिये ,नागरिकता आंदोलन बजरिए मतुआ वंशजों के केसरिया अभियान को मतुआ आंदोलन के वोटरों ने मुंहतोड़ जवाब दिया है।


    कपिल कृष्ण ठाकुर 140 हजार  वोटों से जीते थे और उनकी विधवा ममता वाला  ने  प्रबल केसरिया तूफान के मुकाबले दो लाख वोटों से वाम उम्मीदवार को हराया।


    हर हथकंडे अपनाकर वनगांव में तीसरे स्थान पर रही भाजपा।

    यही जीत दरअसल ममता बनर्जी या तृणमूल कांग्रेस की नहीं है।

    यह जीत केसरिया उन्माद के खिलाफ वोटरों की अभूतपूर्व गोलबंदी की जीत है।

    जैसे दिल्ली में अरविंद केजरीवाल कीईमानदारी का कोई पुरस्कार नहीं है दिल्ली का मसनद।

    होता तो लोकसभा चुनाव में दिल्ली उन्हें बेरहमी से खारिज यूं न करती।

    भाजपा के किसरिया शत प्रतिशत जनसंहारी नरमेध अभियान के खिलाफ भाजपा को हराने के लिए अरविंद की ताजपोशी की है दिल्ली ने।


    जनपक्षधर ताकतें,इस समीकरण को जितना जल्दी समझ लें उतना ही तेज होगा संघ परिवार के पतन का सिससिला,जो शुरु हो चुका है।


    इसके साथ ही साफ हो गया कि बंगाल की जनता बंगाल को केसरिया उपनिवेश बनाने को कतई तैयार नहीं है।


    कांग्रेस और वामसमर्थक आम मतदाताओं ने केसरिया धर्मोन्माद को हराने के लिए दीदी का साथ दिया है।


    दीदी का वोट फीसद घटने के बजाय मतदान कम होने के बावजूद 46 फीसद के करीब है तो वाम वोट 26 फीसद के करीब रह गया है।


    लेकिन वनगांव संसदीय उपचुनाव और कृष्णगंज विधानसभा उपचुनाव में  भाजपा को पच्चीस फीसद वोट पड़े हैं।लोकसभा में भाजपा को बंगाल में सोलह फीसद वोट पड़े थे।


    यानी कि बंगाल में अब जब हर चौथा वोटर केसरिया है और केसरिया के मुकाबले वाम कहीं भी नहीं है तो आवाम के पास आप और ममता बनर्जी जैसे ही विकल्प होंगे।


    जैसे इसी वजह से बंगाल से सीबीआई महिमा से ममता की गिरफ्तारी होने की स्थिति में भी, मुकुल और दूसरे तृणमूलियों के फेंस इधर उधर होने के बावजूद धर्मोन्मादी नरमेध दिग्विजय अभियान से बचने का रास्ता खोजने के लिए बंगालियों के पास ममता बनर्जी के अलावा कोई दूसरा विकल्प है नहीं और तय हो गया कि अब ममता अपराजेय है।वाम वापसी असंभव है।


    यूपी ,बिहार और अन्य्तर जहां चुनाव होेंगे,कश्मीर में जनादेश के खिलाफ भाजपा की सरकार बन जाने के बाद वामपंथ और बहुजन के मुकाबले क्षत्रपों के अंब्रेला के नीचे आने के अलावा आम जनता  का शत प्रतिशत हिंदुत्व हिंसा से बचने का कोई रास्ता निकलने के आसार नहीं है।


    जाहिर है कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि के तहत आत्मध्वंस का,शत प्रतिशत हिंदुत्व एफडीआई का रास्ता चुन लिया है संघ परिवार ने।


    मुकुल राय ने अपने चेलों के जरिये वनगांव में भाजपा को हराने की हरसंभव कोशिश की है और पार्टी पर भी उनकी दावेदारी है।


    वनगांव के उपचुनाव में साफ हो गया कि दमदम से भाजपा के तपन सिकदर को जिताने के लिए सीपीएम के सुभाष चक्रवर्ती की जो ताकत रही है, वह ताकत उनकी नहीं रही  है और तृणमूल चाहे दो फाड़ हो या तीन फाड़,दीदी के मुकाबले बंगाल में अब कोई नहीं है।



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    A Poet, A City & A Footballer is a documentary on a film that never got made
    The Films Division production is the account of director Goutam Sen's futile effort to make a film on legendary footballer PK Banerjee.
    Nandini Ramnath
    Feb 15, 2015 · 07:45 am
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    Photo Credit: Films Division

    Joshy Joseph's new documentary has a triple-barrelled title and multiple layers folded into its 105-minute narrative. A Poet, A City & A Footballer is about the late Bengali poet and filmmaker Goutam Sen, the footballer PK Banerjee, an Eastern hemisphere romantic view of life, poetry and the ability of cinema to bring several ideas together into a coherent whole.

    A summary of the recently completed documentary's themes alone reveals its scope and ambition. The Films Division production explores Sen's unfulfilled quest to make a documentary on the legendary footballer PK Banerjee, which was cut short when Sen was diagnosed with cancer. As Sen wasted away, his film seemed doomed to die along with him, but another one took birth – Joseph's account of Sen's rage against the dying of the light. The film includes conversations with Sen, his former partner and family members, scenes from the shoot of the feature film Jongol Mohol that Sen was making in the middle of all the excitement, and excerpts from footage that would have gone into his Banerjee documentary, had he lived to complete it. Sen died in 2013.

    The convoluted journey started when Joseph, who is deputy director general in-charge of Films Division's Kolkata office, watched Sen pitch for funds for his Banerjee film. The filmmakers were good friends, and Joseph noticed how Sen, who had already been diagnosed with cancer, was struggling to breathe while building his case. When members of the Films Division commissioning body asked Sen if he would be able to finish his project, he replied. "Filmmaking is my medicine," Joseph recalls.

    VS Kundu, the Director General of Films Division, noticed that Sen's film was "getting blended with his own life story," Joseph adds. "Kundu asked Goutam to make an autobiographical film, but he wasn't sure if he could complete it." Joseph, meanwhile, could sense that a documentary about the abortive project was brewing, but he was held back by his concern for Sen.

    Two films better than one

    Kundu suggested combining the films, and a shoot of sorts got underway. A friend translated Sen's poems into English, but the filmmaker got conscious while reciting them on camera. "I could do nothing, I couldn't intervene, and meanwhile, his body was withering away," Joseph recalled. A few days later, they were waiting outside Sen's hospital room, watching him discuss his poems, his creative muses, and his PK Banerjee film. The camera kept rolling over the next hour and a half. "I made the film around those one and a half hours," Joseph said.

    Despite his condition, Sen did shoot a bit of footage with Banerjee, which have been included in Joseph's documentary. "While Goutam was in the hospital, he was trying to construct a film with PK Banerjee, but when he actually met him, the experience was different," Joseph said. "I found that the onslaught of stories [by Banerjee] was starting to make Goutam helpless. Since the PK Banerjee story wasn't part of my original material, it challenged me thoroughly." The structure he adopted helped give shape to the scattered footage. A Poet, A City & A Footballer is divided into non-linear chapters, somewhat like a novel. "The structure happened because of Goutam, this storyteller, challenging my structure," Joseph said.

    The chapters capture the essence of the city that has been Joseph's home for the past 17 years. Joseph met Sen at a national awards ceremony several years ago. "He was a representative of a Bohemian type, one in which sport and art overlapped" Joseph recalled. "I remember when I came here that there was hardly anybody who didn't have anything to do with poetry and football."


    The West Bengal that Joseph moved to was a Communist bastion at the time, and the filmmaker soon got a taste of its ability to control culture. His independently made documentary One Day From a Hangman's Life, a dramatised account of the hanging of convicted rapist Dhananjoy Chatterjee in 2004, was briefly banned by the Buddhadeb Bhattacharjee government. Joseph got involved with Bengali intellectuals who condemned the ban, among them the writer Mahasweta Devi. Joseph found strains of the intellectual life he had left behind in his native state of Kerala. "The Kerala of the seventies and the eighties is no more, it's now a consumerist place that believes in appearances," he said. "Calcutta is not bothered about appearances." It's still a city where it is possible to strike engrossing conversations with absolute strangers that go beyond politesse, he added.

    Kolkata calling

    Joseph's love for Kolkata comes through in the impressions of the city, which have been beautifully lensed by cinematographer Manesh Madhavan, and the conversations with its denizens, many of who speak with passion for the arts – and football. Banerjee turns out to be a consummate performer, narrating his journey into football and fame with camera-friendly bombast. As Banerjee prattles on, Sen watches from the sidelines, smiling to himself but also silenced by the verbiage.

    It might surprise some that A Poet, A City & A Footballer  is a Films Division production – its non-linear structure and quasi-experimental and meditative approach to narrative do not conform to the widely held perception of the government organisation as a propaganda churner that records the state's often imaginary achievements with doggedness and dullness. In recent years, the Films Division, especially under Kundu's dynamic leadership, has surprised many detractors. The organisation has been pushing the boundaries of the documentary form, commissioning films on a variety of subjects, regularly releasing its better regarded productions on DVD and on the internet, and creating a weekly screening space for independent documentaries.

    "It is bullshit that the Films Division doesn't prove the infrastructure for people who want to make documentaries," asserted Joseph, who has been on the organisation's rolls for as long as he been in Kolkata. "This place has a tendency to create a bubble. Anybody working here for two or three years can become a tehsildar. So some filmmakers die." Others flourish and manage to leave their personal stamp on their creations, as is the case with A Poet, A City & A Footballer, a documentary about many filmmaking passions melting into one engrossing and poignant whole.

    We welcome your comments at letters@scroll.in.

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    आप बना बाप,वाम हुआ राम और बहुजन हनुमान!
    सर कलम होने से पहले अब हम करें तो क्या?
    पलाश विश्वास
    आप बना बाप,वाम हुआ राम और बहुजन हनुमान!
    सर कलम होने से पहले अब हम करें तो क्या?

    सविता बाबू ने दसों दिशाओं में नाते रिश्ते जो जोड़ लिये हैं,वह अब सरदर्द का सबब हो गया है।वह कई जिलों में अपनी सांस्कृतिक मंडली प्रयास के साथ जुड़ी हैं,इससे मुझे उनसे उलझने का मौका कम मिलता है।इधर जब से तीन बजे घर लौटना होता है रात को और शाम पांच ही बजे दफ्तर रवानगी है।तो मेरे लिखन पढ़ने  का दायरा सिमट गया है।
    इसपर कटी हुई उंगलियों से रिसाव अलग है।
    निःशस्त्र महाभारत के बीचोंबीच खड़ा हूं और दसों दिशाओं में चक्रव्यूह तिलिस्म हैं।

    कल धुंआधार हो गया,बस तलाक नहीं हुआ।
    अब दिन में वे मुझे रंग बिरंगे आयोजनों में घसीटने लगी हैं और मैं  लिखन पढ़ने की आजादी का माहौल बनाये रखने की गरज से खामोशी से उनका हुक्म सर माथे करता रहा हूं।
    हमारा काम कमसकम चार दशक से यही रहा है कि सूचनाओं को रोके बिना आम जनता तक पहुंचा दें।

    सविता बाबू ने कह दिया,अब तक घुइया छीलते रहे हो।
    अब बूढ़े घोड़े हो,इतना भी मत दौड़ो कि धड़ाम से गिर पड़ो।
    इस देश की जनता पर कोई असर होने वाला नहीं है।
    जब सारे लोग खामोश मजे में जी रहे हैं तो तुम हमारी जिंदगी नरक क्यों किये जा रहे हो।
    सेहत का ख्याल रखो।

    कल भी दोपहर का भोज छह किमी दूर जाकर करना पड़ा तो तिलमिलाया था।
    जरुरी लिखना हो न सका।
    भीतर से गुस्सा उमड़ घुमड़ रहा था।
    उनने जब मेरी खांसी और सर्दी को मेरे पीसी के जिम्मे डाल दिया तो मेरी खामोशी टूट गयी।

    अमन चैन भंग हो गया।
    दफ्तर पहुंचकर रोज की तरह मैंने फिर उन्हें इत्तला नहीं किया कि बूढ़ा घोड़ा दौड़ते हांफते सहीसलामत पहुंच गया ठिकाने।
    घंटे भर में उनका फोन आ गया।
    मैंने कह दिया,फिक्र ना करो ,साते बजे पहुंच गया हूं।
    फिर अमन चैन बहाल है।

    अमन चैन का कुलो किस्सा यहीच है।
    आप खामोशी बुनने की कला में माहिर हों और मकड़ी की तरह जिंदगी भर खामोशी का जाल बुनते रहे,तो अमन चैन लक्ष्मी सरस्वती सबै कुछ है।
    बोले नहीं के  घरो में घिर जाओगे जनाब,बाहर तो जो होता है,वहीच होता है।

    भारत की जनता अमन चैन में इसी तरह जिंदड़ी गुजर बसर करते हैं और सविता को तकलीफ यह कि मैं रोजाना उनकी गहरायी नींद में खलल डालने की जुगाड़ में अब भी लगा हुआ हूं।उनका कहना है कि जन सूचनाओं से किसी को कुछ नहीं मालूम,उन्हें क्यों जनता के बीचोंबीच फेंकने की कसरत में लगा हूं।

    उनका कहना है कि जब अश्वमेध के घोड़े दसों दिशाओं को फतह कर रहे हैं,प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष बंगाल में भी वाम राम हुआ जा रहा है तो हिंदुत्व और हिंदू साम्राज्यवाद से तुम्हें क्यों इतना ऐतराज है।

    महाबलि तो हो नहीं हरक्यूलियस कि इस तिलिस्म की दीवारे ढहा दोगे कि तख्तोताज हवा में उछाल दोगे।मुफ्त में मारे जाओगे।

    बंगाल में हर चौथा वोटर अब केसरिया है।
    तृणमूल के वोट बढ़ गये हैं और संघ परिवार के वोट चार फीसद से पच्चीस तक छलांगा मार गया है।

    पच्चीस फीसद और इजाफा करने का हर इंतजाम हो रहा है।

    वाम साख गिरी है।
    मानते हैं हम।
    वाम जनाधार टूटा है ,मानते हैं हम।
    वाम सत्ता अब अतीत है,मानते हैं।
    फिर भी वाम राम हुआ जा रहा है,इस पहेली को बूझने में नाकाम हैं।

    बहुजन समाज भावनाओं का गुलाम है।
    बहुत बहुत भावुक है भारतीय जन गण मण।
    राजनीति दरअसल इन्हीं भावनाओं का इस्तेमाल करने की दक्षता और कला है।

    इसी में नींव है हिंदु्त्व और हिंदू साम्राज्यवाद का यह मुक्तबाजारी कार्निवाल।
    यहीच हरित क्रांति।
    यहीच दूसरका हरित क्रांति।
    यहीच विकास दर और अच्छे दिन।
    यहीच डाउकैमिक्लस की हुकूमत और यहीच मनसैंटो राजकाज मिनिमम कारपोरेट केसरिया।

    धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद इसी कला और दक्षता की पराकाष्ठा है।

    हम समझते हैं कि जयभीम,जय मूलनिवासी और नमो बुद्धाय से आगे न हमारा बहुजन गौतम बुद्ध के पथ पर एक कदम बढ़ने को तैयार है और न किसी को अंबेडकर के जाति उन्मूलन और उनके बहुजन हिताय अर्थशास्त्र की परवाह है।
    भावनाओं की राजनीति ही अंबेडकर एटीएम है।
    पुरखों की लड़ाई और विरासत एटीएम दुकान हैं।
    सारे राम हनुमान हैं।

    हमारे मित्र,विचारधारा के मोर्चे पर हमें खारिज करने में एक सेकंड देरी नहीं लगाते और उनका महाभियोग हमारे विरुद्ध यही है कि हमारा लिखा भाववादी है।

    उनके मुताबिक हम कुल मिलाकर एक अदद किस्सागो है जो जरुरी मुद्दो पर बात तो करता है लेकिन विचारधाराओं की हमारी कोई नींव हैइच नहीं।

    लंपट मठाधीशों के फतवे के मुताबिक लिखने पढ़ने और इतिहास में अमर हो जाने की कालजयी तपस्या हमने छोड़ दी है और मोक्ष में हमारी कोई आस्था नहीं है।

    जिंदगी अगर नर्क है तो हम स्वर्ग की सीढ़ियां बनाने वाले लोगों में नहीं हैं।

    गोबर माटी कीचड़ और जंगल की गंध में बसै मेरे वजूद का कुल मिलाकर किस्सा इसी नर्क के स्थाई बंदोबस्त के तिसिल्म को तोड़ने का है।

    मृत्यु उपत्यका अगर है देश यह,तो इस मृत्यु उपत्यका में मौत और तबाही के खूनी मंजर को बदल देने की हमारी जिद है।

    हमारे वस्तुवादी,भौतिकवादी वाम को क्या हुआ,पहेली यह है।
    पैंतीस साल के वाम राज में कैसा अजेय दुर्ग का निर्माण किया कि उसके चप्पे चप्पे में कामरेडों के दिलोदिमाग में कमल ही कमल हैं,पहेली यह है।
    पहेली यह है कि विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता यह कैसी है जो हवा बदलने से हवा के साथ हवा हो जाती है और मौकापरस्ती सर चढ़कर बोलती है।

    हम पहले लिख रहे थे कि बहुजनों के सारे राम हनुमान हो गये हैं।
    अब हमें लिखना पड़ रहा है,वाम अभी राम है।वाम अभी राम राम शा है।
    हम कह रहे थे,लाल में हो नीला।
    हम कह रहे थे,नीले में हो लाल।
    हम कह रहे थे कि देश के सर्वहारा मेहनतकशों की अस्मिता एकच आहे।
    हम कह रहे थे कि देश के सर्वाहारा मेहनतकश दरअसल मूलनिवासी आहेत।
    हम कह रहे थे कि हिंदुत्व और हिंदू साम्राज्यवाद का विकल्प कोई कारपोरेट राजनीति नहीं हो सकती।
    हम जनपक्षधर जनता के राष्ट्रीय मोर्चा की बात कर रहे थे और पागल दौड़ के खिलाफ गांधी के जनमोर्चे की बात कर रहे थे विचारधाराओं के आर पार।
    न लाल नीला हुआ है।
    न नीला लाल होने के मिजाज में है।
    लाल भी केसरिया हो रहा है
    और नीला भी केसरिया हो रहा है।
    कमल कायकल्प की यह कैसी विचारधारा है,यह अबूझ पहेली है।

    हमारे विचार विशेषज्ञ मित्रों को हमें खारिज करने का पूरा हक है और वे हमें इस काबिल भी नहीं मानते कि हमारे सवालों का जवाब दें।
    लेकिन हालत यह है हुजूर कि संघ परिवार का विकल्प उसका बाप है।
    लेकिन हालत यह है हुजूर कि
    आप बना बाप,वाम हुआ राम और बहुजन हनुमान!
    सर कलम होने से पहले अब हम करें तो क्या?


    0 0

    Diplomacy Counter Diplomacy

    Thanks Obama,PM assures to ensure freedom of faith!

    Mr.Prime Minister,You have reduced yourself to a common sales agenda for US interest across  political border.

    I do not know whether you consulted Tamilnadu before signing the nuclear deal with Sri Lanka.

    Nevertheless,I may not expect you to care about the Tamil demography across the waters.


    Palash Biswas

    First Post reports:His silence on the activities of Hindutva groups so far was open to many interpretations. Mostly unflattering, these neither helped his personal image nor that of his government.


    Modi diplomacy should be judged in the light of the burning fact that the NDA government has already lost some time in not pushing through the big reforms in its first six months of office – the so-called honeymoon period. After Delhi, the honeymoon is clearly over. But even now nothing is lost, if Modi can just focus on reforms ie ethnic cleansing,brutal apartheid.


    Obama just hinted the default policy paralysis and Modi answered with urgency.


    Because United States of America is worried,Even the limited reform measures Modi has introduced -- on land laws and increased foreign investment in the insurance sector -- have been blocked in the upper house of parliament, which the BJP does not control.

    It means the freedom of faith,my dear friends!

    Hindutva Super Icon Narendra Bhai Modi is not engaged in any agenda of Hindutva and his business friendly minimum governance if playing with the emotionally faith packed high voltage religious nationalism to make in India a full fledged emerging market devoid of whatsoever economy,devoid of whatsoever production system,devoid of natural resources,devoid of food ,water and Oxygen,devoid of business and industry,devoid of job and livelihood and yes,devoid of religion whatsoever.


    The Dow Chemicals governance is not only killing the agrarian geography and the green,the cemented jungles have to starve soon or later because it is service subject to purchase which Modi means with his version of economy and economics of making in.

    Only monsato is allowed for harvesting.No one else.Only Dow Chemicals is making the budget for the people of India.


    Modi made it clear that he is not in any mood to allow free water and cheap electricity for those who denied him without any mercy!


    Narendra Bhai Modi means business nothing else.

    He means Qayamat,nothing less.


    Narendra Bhai Modi means business and thus,the Hinduta jihad of cent percent Hindutva continues with a counter diplomacy against US diplomacy tagged with freedom of Faith.


    Asli Modi exposes himself when he speaks in PUNE: Ahead of the Budget, Prime MinisterNarendra Modi assured more reforms as he rolled out the red carpet to investors, especially the multinationals, inviting them to make use of the large pool of highly talented youth in the country.

    "In this age of competitive world, I assure corporates across the world that India is a land where they can find talents which can help them manufacture products that are very competitive," Modi told a select audience of corporates.

    The Prime Minister was inaugurating the multimodal manufacturing facility set up by the American engineering giant GE Corporation.

    Calling upon the investors to utilise the talent of large educated youth population, he said, "we have the highest demographic dividend, as 65 per cent of our population are below 35 years. Our talented youth have power to attract investments from across the world. Our skill power can also attract the investors."

    Modi also assured his administration will improve the ease of doing business.

    He said the number of clearances for setting up a hospitality venture will be brought down from a massive 110 to just about 20.

    "Our government has ensured predictability in our procedures, laws and policies. We have also taken many initiatives towards ease of doing business," Modi said.

    The NDA government will present the first full Budget on February 28 with some analysts wondering whether it would be a complete reform oriented budget following the defeat of BJP faced in the last week's Delhi elections.


    "I invite all those who want to participate in the economic development of the country to generate employment for our youth. Your (investors) growth is also linked to our growth," the Prime Minister said.



    Diplomacy Counter Diplomacy!

    Thanks Obama,PM assures to ensure freedom of faith!


    Mr.Prime Minister,You have reduced yourself to a common sales agenda for US interest across  political border.


    You can call it the Narendra Modi government's first big ticket achievement in the field of diplomacy: the nuclear agreement signed between India and Sri Lanka in New Delhi!


    I do not know whether you consulted Tamilnadu before signing the nuclear deal with Sri Lanka.


    Nevertheless,I may not expect you to care about the Tamil demography across the waters.


    The business friendly treated Obama`s freedom speech as US diplomacy.The diplomacy is paid back with the same coin.


    Hindutva Brigade is not tamed at all nor the Hindutva agenda is dismissed as yet but Indian Prime Minister is pragmatic enough to sell off age old brand equity of secular democratic India which nothing but yet another turnaround to be politically correct and diplomatically putting Global Hindutva immune under international pressure.


    Nevertheless,Barack Obama has not uttered a word against hindutva or Hindu Imperialism nor America has to do anything with the inherent inequality,injustice,racial apartheid and constant persecution of Indian masses as US economy has not recovered as yet and the great Indian Mahabharat on name of religious nationalism suits US interests more than anything.


    Mr.Prime Minister,you have not ensured freedom of faith at all nor you care about the very concept of freedom for this robotic biometric digital  cloned country ruled by Dow Chemicals, Monsanto,Ambani,Adani and so on.


    Mr.Prime Minister,in fact, you have ensured to sustain the faith of foreign investment institutions to sustain the Bull Run which is all about Indian Economy.


    Because Mr.Prime Minister,you are interested in no other freedom other than the freedom of free flow of multinational capital in the emerging market in making in mode.


    I am blocked on social media and I may not reach you breaking the barriers but let me ask one question, what national interest is served with the atomic deal with Sri Lanka?


    We are not getting nuclear energy from Sri Lanka.

    Are we going to supply anything nuclear to Sri Lanka?


    You would not answer,I know.


    The business friendly minimum governance is not responsible to the parliament nor to the people of India.


    What am I?


    You have blocked the free flow of information.


    You have blocked public hearing at any level in this digital des.

    We know the hidden agenda of US as well as global Hindutva interest as you ensure the freedom of faith,it is an appeasement of US interest as while you signed nuclear deal with Sri Lanka,it served US interest.


    Mr.Prime Minister,You have reduced yourself to a common sales agenda for US interest across  political border.


    I do not know whether you consulted Tamilnadu before signing the nuclear deal with Sri Lanka.


    Nevertheless,I may not expect you to care about the Tamil demography across the waters.


    However, India sealed a nuclear energy agreement with Sri Lanka on Monday, its first breakthrough with the new government of the tiny Indian Ocean island where China has been building ports and highways in a diplomatic push in recent years.

    Under the deal, India will help Sri Lanka build its nuclear energy infrastructure, including training of personnel, the Indian foreign ministry said.

    Later, India could also sell light small-scale nuclear reactors to Sri Lanka which wants to establish 600 MW of nuclear capacity by 2030, a Sri Lankan official and an Indian analyst said.

    The deal came as Sri Lankan President Maithripala Sirisena began a visit to India, his first trip abroad since he swept to power in January, which has provided New Delhi with an opening to repair ties that had become tense under his predecessor.

    "The bilateral agreement on civil nuclear cooperation is yet another demonstration of our mutual trust," Indian Prime Minister Narendra Modi said in a statement.

    India had grown increasingly wary of former president Mahinda Rajapaksa's pursuit of closer ties with China, which became a key supporter of the island's economy after its 26-year-civil war ended in 2009.

    China has built a seaport in the south of the country and signed a deal to develop a $1.5 billion port next to the commercial port in Colombo, raising fears Beijing is seeking influence in the island state with which New Delhi has had historical ties.

    Ties worsened further after the Rajapaksa government allowed Chinese submarines to dock last year.

    Modi said the two countries also agreed to expand defence cooperation, but gave no details. "This is my first visit and it has given very fruitful results," Sirisena said.

    Since coming to power last year, Modi has reached out to neighbours, offering to build power stations and ports, in a bid to push back against China.

    Next month he plans to travel to Sri Lanka and the Maldives where too Beijing is seen to be expanding its diplomacy as part of a strategy to build a network of ports in the Indian Ocean through which much of its trade and energy supplies transit.

    Sirisena has pledged to pursue a more global foreign policy.

    "It does introduce a kind of balance in Sri Lanka's external relationships," said Neelam Deo, director of Gateway House, an India-based think tank. "Nobody thinks that the relationship with China will diminish, but this is a better balance."

    China said last month it hoped for continued "cooperation" with Sri Lanka despite a pledge by the new government to review Chinese infrastructure projects awarded under the Rajapaksa administration.




    Will ensure complete freedom of faith: Full text of PM Modi's speech at Christian conference



    Minority Affairs Minister Dr. Najma Heptulla and Minister of Finance Arun Jaitley were also present.


    Here is the full text of Prime Minister Narendra Modi's address at the National Celebration of the Elevation to Sainthood of Kuriakose Elias Chavara and Mother Euphrasia:


    I am delighted to participate in this function to celebrate the elevation to sainthood of two great saints of Kerala - Saint Kuriakose Elias Chavara and Saint Euphresia. The whole country is proud of their recognition. Their elevation was preceded by that of Saint Alphonsa, who also hailed from Kerala.


    The life and deeds of Saint Chavara and Saint Euphresia are an inspiration not only to the Christian community, but to humanity as a whole. They are shining examples of dedication to God through selfless service for the betterment of mankind.


    Saint Chavara was a man of prayer and also a social reformer. In an era when access to education was limited, he stressed that every church should have a school. He thus opened the doors of education to people from all sections of society.


    Few outside Kerala know that he started a Sanskrit school, and also a printing press. His contribution towards women's empowerment was also noteworthy.


    Saint Euphrasia was a mystic who dedicated her life to prayer and devotion to God.


    Both these saints dedicated their life to God through service of fellow beings. The ancient Indian saying: "??????? ??????????? ??? ????????" - welfare of the world is the way to moksha (salvation) - explains their life.


    Friends,


    Spiritualism is rooted in India's heritage. Indian saints and Greek sages had intellectual and spiritual exchanges thousands of years back. India's openness to new ideas is manifest in the Rig Veda: ??? ?????? ?????? ????? ??????? Let noble thoughts come to us from all sides. This philosophy has guided our intellectual discourse since time immemorial. Mother India gave birth to many religious and spiritual streams. Some of them have even travelled beyond Indian borders.


    The tradition of welcoming, respecting and honouring all faiths is as old as India itself. As Swami Vivekananda said: We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true.


    What Swami Vivekananda had said a century ago holds good and will, for ever, not only for this nation but also for this government or for that matter any government in India, run by any political party. This principle of equal respect and treatment for all faiths has been a part of India's ethos for thousands of years. And that is how it became integral to the Constitution of India. Our Constitution did not evolve in a vacuum. It has roots in the ancient cultural traditions of India.


    Gurudev Rabindranath Tagore had inspired us to dream of a land where the mind is without fear and the head is held high. It is that heaven of freedom we are duty bound to create and preserve. We believe that there is truth in every religion. ??? ?? ????? ????? ??????


    Friends,


    Let me now come to the issue which is central and critical for peace and harmony in the contemporary world. The world is increasingly witnessing division and hostility on religious lines. This has become a matter of global concern. In this context the ancient Indian plea of mutual respect for all faiths is now beginning to manifest in global discourse.


    This long felt need and urge for mutually respectful relations led to the interfaith conference on 'Faith in Human Rights' at the Hague on tenth December, 2008. This was coincidentally also the 60th Anniversary of the Universal Declaration of Human Rights by the United Nations.


    Religious leaders representing every major world religion - Christianity, Hinduism, Judaism, Baha'i Faith, Buddhism, Islam, Taoism and indigenous religions met, discussed and pledged to uphold the Universal Declaration and of freedom of religion or belief.


    In their historic declaration, they defined what constitutes freedom of faith and how it is to be safeguarded.


    We consider the freedom to have, to retain, and to adopt, a religion or belief, is a personal choice of a citizen.


    The world is at cross roads which, if not crossed properly, can throw us back to the dark days of bigotry, fanaticism and bloodshed. This harmonious convergence among religions could not be achieved even when the world entered the third millennium. And now it has been. This shows that the rest of the world too is evolving along the lines of ancient India.


    Speaking for India, and for my government, I declare that my government stands by every word of the above declaration. My government will ensure that there is complete freedom of faith and that everyone has the undeniable right to retain or adopt the religion of his or her choice without coercion or undue influence. My government will not allow any religious group, belonging to the majority or the minority, to incite hatred against others, overtly or covertly. Mine will be a government that gives equal respect to all religions.


    India is the land of Buddha and Gandhi. Equal respect for all religions must be in the DNA of every Indian. We cannot accept violence against any religion on any pretext and I strongly condemn such violence. My government will act strongly in this regard.


    With this commitment, I appeal to all religious groups to act with restraint, mutual respect, and tolerance in the true spirit of this ancient nation which is manifest in our Constitution and is in line with the Hague Declaration.


    Friends,


    I have a vision of a Modern India. I have embarked on a huge mission to convert that vision into reality. My mantra is Development - ???? ???, ???? ?????.


    In simple terms it means food on every table, every child in school, a job for everybody and a house with toilet and electricity for every family. This will make India proud. We can achieve this through unity. Unity strengthens us. Division weakens us. I sincerely request all Indians, and all of you present here to support me in this huge task.


    Let the elevation to sainthood of Saint Chavara and Saint Euphrasia, and their noble deeds inspire us:


    -to maximize our inner strength

    -to use that strength for transforming society through selfless service

    -to fulfil our collective vision of a developed and modern India.


    THANK YOU.


    AAP humiliates BJP in Delhi: 5 points why Narendra Modi will rush economic reforms

    By: feonline | New Delhi | February 11, 2015 1:17 pm

    Aam Aadmi Party, Aam Aadmi Party Arvind Kejriwal, Arvind Kejriwal, Arvind Kejriwal economic reforms, Narendra Modi, Narendra Modi BJP, Narendra Modi economic reformsAam Aadmi Party (AAP) chief Arvind Kejriwal with Manish Sisodia and Union Urban Development Minister M Venkaiah Naidu in New Delhi. (PTI)

    The PM Narendra Modi-led Bharatiya Janata Party (BJP) may have suffered a humiliating loss to Arvind Kejriwal's Aam Aadmi Party (AAP) in the Delhi Assembly elections, but that is unlikely to deter him from going ahead with his economic reforms agenda, say investment banks.

    Fact: An upstart anti-establishment party crushed India's ruling BJP in a Delhi state election on Tuesday.

    Fallout: Delhi election defeat raised fears BJP might now renege on some fiscal reforms – Traders

    Here are the key points why:

    1. Prime Minister Narendra Modi-led BJP will stick to fiscal discipline despite Delhi election loss as that is what he promised and that is the lesson to be drawn from the Delhi Assembly rout of Kiran Bedi-led BJP by Arvind Kejriwal's AAP – Analysts

    2. Delhi elections could spur faster activity to ensure the reforms' impact is visible before the next election cycle – Edelweiss

    3. Upcoming state elections in Bihar, Tamil Nadu, West Bengal key for BJP – Analysts

    4. It's a wake-up call for government. The sharp fall in crude oil prices should be used in infrastructure to kick-start the economy – Macquarie

    5. Macquarie adds ongoing correction provides a good opportunity to buy before the budget on Feb. 28

    Stocks To Buy

    1. Macquarie says industrial stocks are under-owned and will be big beneficiaries of a government-led infrastructure build

    2. Adds buy Larsen & Toubro, Crompton Greaves , IRB Infrastructure and JSW Energy

    http://www.financialexpress.com/article/economy/aap-humiliates-bjp-in-delhi-5-points-why-narendra-modi-will-rush-economic-reforms/41569/


    Stratton and Sawhney: Is Narendra Modi right for India?

    Abby Stratton and Asha Sawhney

    February 9, 2015 •

    On May 26th, 2014, Narendra Modi was sworn in as India's 15th Prime Minister. Although Modi won by a landslide with the second-highest margin for an Indian election, he is a contentious figure throughout the nation. He promises to bring economic and legislative reform and has launched large-scale campaigns to promote female education. However, many people in India are wary of his political party, Bharatiya Janata Party (BJP), a group known for its Hindu nationalism. This, combined with his alleged connections to the 2002 Gujarat riots that killed at least a thousand Muslims, leaves notable figures such as Nobel Prize winner Amartya Sen hesitant to show their support, despite agreeing that Modi brings great hope to the Indian economy. So the question stands, is Modi destined to uplift or damage his country's increasing development?

    Abby Stratton:

    The BJP won India's most recent election by no small margin. The party nowoccupies 282 of the 543 seats in parliament for a 51.9% majority. The BJP's majority is particularly significant because the previous parliament was generally regarded as an institution of corruption with an inability to maintain control and cultivate a new generation of leaders for the country. Modi and the BJP drew large amounts of support from India's youth, with their votes contributing to Modi's 33% popular vote in the polls. Part of the reason the BJP is so popular with the youth is due to its support for the anti-corruption campaign, a hot-button topic in India. Choudhury Dilichand, a teacher from Dwarka, claims"the young people voted for Modi because he is honest, and there is hope that something can be done for jobs and development and so on. If Modi can keep clean people only in government, then something can be done. But if he can't, then there will be problems."

    The stagnation of India's legislative progress under the Congress party, Modi's opposing party, has India hoping for momentum under Modi's leadership. His party, the BJP, promises to fix this by moving toward significant economic and legislative reform. Given India's political structure, it is difficult to maintain a central or cohesive power which Modi hopes to work towards. A significant amount of power is delegated from the central government to the 29 individual states that constitute the republic. Maintaining central power or governance has, historically, proven to be difficult with more than 240 politicalparties vying for a piece of the action. According to reporter Jason Burke, India has recently experienced a "general sense of instability, insecurity, and drift." These feelings are part of the reason Modi rose to power, as he presents a dependable, almost father-like figure. His entire campaign centered around the promise that he would revitalize India'sslowing economic growth. Since he came to power, Modi has promised to make bank accounts for everyone, to build toilets in schools and announced his Make in Indiacampaign to turn the country into an international manufacturing focus.

    The widespread confidence in Modi's reforms is largely due to the success in his home state of Gujarat which, under his leadership, became an economic powerhouse. According to analyst Paranjoy Guha Thakurta, "Gujarat has not out-performed other states in terms of healthcare, education, and empowerment of women," but it does have a reputation for promoting industry and commerce. The economic progress of Gujarat built confidence in Modi during his campaign, but his personal life story also helped him connect to his voters, specifically the youth. Modi is an entirely self-made man in the political system without any politically powerful relatives to support his campaigns. He built himself up from "humble origins and modest means." His background offers him further separation from the perceptions of government being corrupt and fraught with nepotism.

    He also wants to change the way that India thinks about women. "When we hear about incidents of rape, our heads hang in shame," Modi said. "I want to ask every mother and father, you ask your daughters, 'Where are you going, who are you going with?' But do you ever ask your sons these questions? After all, those who rape are also someone's son." He continues to promote modernizing not only the economy and legislator, but social constructs and traditions in India.

    Judging by his previous track record of success in Gujarat and the incredible amount of support he has garnered through his campaigns, I believe Modi could implement the ambitious reforms of his campaign. His 33% popular vote proves that the people have confidence in Modi and, in many ways, he may represent the future of India. He champions the need for reform and, according to the polls, the youth are especially ready for Modi and his vision.

    Asha Sawhney:

    I must admit, when I speak about Narendra Modi, my personal bias shines through. It is by no means a bias I inherited from my Indian family members, who are almost all staunch supporters of the new prime minister. However, I come from a religious minority group in India and I do not believe that economic progress can fix a nation where tensions run high.

    The 2002 Gujarat riots are eerily similar to the 1984 anti-Sikh riots that killed thousands of my people in a mere three days. In both situations the police and government oversawslaughter and were accused of helping rioters identify religious minorities; in 1984 the targets were Sikh and in 2002 they were Muslim. However, "accused" is definitely an understatement. In both instances eyewitness accounts recall the government distributingvoting and property lists. Modi's connection to the riots was solid enough that the United States denied him a visa.

    While some argue that Modi's wrongdoings are in his past, Christian churches are continuously vandalized across the nation and religious leaders are sure it is at the hands of the BJP party. Worse still, Modi supporters have attempted to remove the word "secular" from the Indian constitution to make it a Hindu state. People argue that it is Modi's followers who incite religious violence, not him. But since Modi is a unilateral leader of his party, it is difficult to make such a distinction. In addition, it's unlikely that both Muslims and Christians, historically divided groups in India, would conspire to tarnish the name of the new prime minister. It is likely that, instead, these stories of government-supported religious violence corroborate each other.

    Some might say economic growth and development take precedent over religious conflict, which has been a reoccurring problem since India's inception. However, history shows that religious conflict is not a petty concern. In 1984 religious tension led to the creation of a Sikh extremist group that used the Golden Temple, the holiest shrine of Sikhism, as a human shield. Prime Minister Indira Gandhi did not let the presence of innocent civilians stop Operation Bluestar, an effort to take down said extremists. This back and forth conflict culminated with the assassination of Indira Gandhi by her Sikh bodyguards, leaving the nation in chaos, and thus causing street riots that killed thousands of innocent Sikhs. This narrative proves that if instances of religious conflict are treated as random and not addressed as a part of the system, they can develop into a national crisis.

    However, I agree wholeheartedly with Modi's women's rights campaigns against rape culture and educational inequality in India, but his personal actions towards women do not match his promises. It was discovered after the election that Modi is actually married, to a woman he has not seen in 43 years, after she left to pursue her education to become a teacher. This makes me wonder if the support for Indian girls and women will continue.

    Some also say Modi is not the hero that saved the Gujarati economy. The state was already well-developed thanks to historically sound infrastructure, and was on a trajectory for growth without Modi as their chief minister. Perhaps his praise as a hero is just a testament to his skills of creating a cult of personality that worships him. In the end, it's wise to wait and see how Modi's term plays out before jumping to immediate conclusions. However, I strongly believe it is the duty of the world's largest democracy to ensure safety and equality to all its citizens, and if a crisis comes to international light, it will probably be too late for many.

    Abby Stratton is a Weinberg freshman. She can be reached at abigailstratton2018@u.northwestern.edu. Asha Sawhney is a Weinberg freshman. She can be reached at ashasawhney2018@u.northwestern.edu. If you would like to respond publicly to this column, send a Letter to the Editor to opinion@dailynorthwestern.com.

    http://dailynorthwestern.com/2015/02/09/opinion/stratton-and-sawhney-is-narendra-modi-right-for-india/

    Modi's reforms enthuse Obama


    "My visit to India is one of great symbolism but it is also of tremendous substance," Mr. Obama said.

    He said that India and the U.S. were moving in the right direction and there was untapped potential to be realised. Bilateral trade between the two countries had increased 60 per cent in the past couple of years to a record $100 billion, but India's exports to the U.S. were still less than 2 per cent of all American imports, he said welcoming the Modi government's reforms agenda for making it easier to do business in India.

    "There is great interest on the part of U.S. companies to find consistency, clarity, greater simplicity in regulatory and tax environment in India … If that occurs, I think we are going to see lot more business in India … That is consistent with many of the reforms Prime Minister Modi has articulated," Mr. Obama said.

    He, however, said the "absence of an effective IP protection" in India was affecting business as U.S. companies tend to operate at the higher ends of the global value chain.

    Addressing apprehensions being raised about his "Make in India" initiative being protectionist or anti-trade, Mr. Modi said the plan was to improve the ease of doing business in India so as to enable the creation of jobs.

    Prime Minister Narendra Modi has successfully put his imprint on India-U.S. relations

    A Republic Day to remember

    In a first, woman officer leads Guard of Honour at Rashtrapathi Bhavan

    N-deal: No dilution of liability law

    OBAMA'S VISIT TO INDIA

    • DAY 1: JANUARY 25, 2015

    • Arrival in the morning and Rashtrapathi Bhavan Ceremonial

    • Rashtrapathi Bhavan Ceremonial

    • Homage to Mahatma Gandhi at Rajghat

    • Bilateral discussions with PM Narendra Modi, followed by a luncheon

    • Meeting with President Pranab Mukherjee

    • Banquet hosted by the President

    • DAY 2: JANUARY 26, 2015:

    • Republic Day function and Rashtrapathi Bhavan Ceremonial

    • 'At home' with Pranab Mukherjeeand a round table with CEOs

    • DAY 3: JANUARY 27, 2015:

    • To address a select gathering

    • Leaves for Saudi Arabia

    Obama India visit, Day 1: As it happened

    Obama at R-Day parade: As it happened

    Modi's reforms enthuse Obama

    Keywords: India-US Business summit, Obama in India, Obama India visit, Narendra Modi, India-US ties


    http://www.thehindu.com/news/national/modis-reforms-enthuse-obama/article6824216.ece

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    35. Ahead of Budget, PM Modi Promises More Reforms

    36. NDTV-14-Feb-2015

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