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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    Sushma Swaraj urges Centre to declare Bhagwad Gita as national holy book

    http://media2.intoday.in/indiatoday/images/stories//2014December/sushma_650_120714034847.jpg


    External Affairs Minister Sushma Swaraj on Sunday urged the Centre to declare Bhagwad Gita as national holy book.  Swaraj was attending the celebrations marking 5,151 years of the Bhagwad Gita in Delhi. Haryana Chief Minister Manohar Lal Khattar and several others were also present during the celebrations.

    Sushma also said that PM Narendra Modi had gifted Bhagwad Gita to Obama during his US visit and indicated the Bhagwad Gita as a national holy book.

    Read more at: http://indiatoday.intoday.in/story/sushma-swaraj-urges-centre-to-declare-bhagwad-gita-as-national-holy-book-bhagwad-gita-national-holy-book/1/405663.html

     


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    कभी खंजर बदले, कभी कातिल, हालात नहीं बदलते
    -------------------------------------------------------
    उत्तर प्रदेश में सत्ता के रथ पर सवार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आधी
    यात्रा पूरी कर चुके हैं, उनके द्वारा अब तक किये कार्यों की अब समीक्षा
    की जा सकती है। अब उनके निर्णयों और नीतियों की तुलना बसपा सरकार की
    पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के निर्णयों और नीतियों से की जा सकती है।
    शराब कारोबार को लेकर अखिलेश यादव और मायावती की नीतियों की तुलना करें,
    तो लगता है कि खंजर और कातिल ही बदले हैं, हालात नहीं।
    उत्तर प्रदेश की जमीन शराब का कारोबार करने के लिए बेहद उपजाऊ मानी जाती
    रही है। 1990 के दशक में तो शराब कारोबारी उत्तर प्रदेश में पूरी तरह
    हावी हो गये थे। हालात इतने बदतर हो गये थे कि शराब माफियाओं ने
    शासन-प्रशासन से अलग अपना एक तंत्र स्थापित कर लिया था, जिसे अघोषित रूप
    से सब कुछ करने की आज़ादी थी। माफियाओं के सशस्त्र गुर्गे आम आदमी के घरों
    में घुस कर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों से बदतमीजी ही नहीं करते थे,
    बल्कि किसी को भी हिरासत में लेकर पुलिस को सौंप देते थे और पुलिस
    अधीनस्थ की तरह उनके आदेश का पालन करते हुए मुकदमा लिख कर किसी को भी जेल
    भेज देती थी।
    माफिया राज में आर्थिक हानि के साथ जनहानि भी होती ही रहती थी, पर
    माफियाओं से कोई सवाल करने वाला तक नहीं था। उस वक्त लगता ही नहीं था कि
    उत्तर प्रदेश कभी शराब माफियाओं के चंगुल से मुक्त भी हो सकेगा, ऐसे
    माहौल में 28 अक्टूबर 2000 को उत्तर प्रदेश के राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री
    बने, तो उन्होंने अपने मात्र 1 वर्ष, 131 दिन के अल्प कार्यकाल में ही
    शराब माफियाओं की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। सिंडिकेट को पूरी तरह तबाह कर
    दिया और कड़े नियमों के साथ एक नई शराब नीति बनाई, जिससे सरकार को भी अधिक
    आर्थिक लाभ होने लगा।
    राजनाथ सिंह की बनाई नीति के तहत लॉटरी पद्धति चलती रही, उनके बाद 8
    मार्च 2002 से 3 मई 2002 तक राष्ट्रपति शासन रहा, इसके बाद 3 मई 2002 से
    29 अगस्त 2003 तक मायावती मुख्यमंत्री रहीं और फिर बसपा को तोड़ने के बाद
    29 अगस्त 2003 को मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गये, जो 13 मई 2007 तक
    रहे, इस बीच माफियाओं के मनोबल में उतार-चढ़ाव तो आते रहे, लेकिन शराब
    नीति न बदलने के कारण माफिया पुनः हावी नहीं हो सके, लेकिन 13 मई 2007 को
    मायावती पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में लौटीं, तो फिर
    उन्होंने माफियाओं को छूट देनी शुरू कर दी। मायावती ने राजनाथ सिंह
    द्वारा बनाई गई शराब नीति पूरी तरह पलट दी और माफियाओं के दबाव में कई
    बार शराब नीति बदली। मायावती के खुले आशीर्वाद के कारण गुरप्रीत सिंह
    चड्ढा उर्फ पोंटी चड्ढा सबसे बड़े शराब माफिया के रूप में उभर कर सामने
    आया और समूचे उत्तर प्रदेश में कुछ ही समय में छा गया।
    मायावती के शासन काल में हजारों करोड़ के गोलमाल का खुलासा भी हुआ। जनहित
    याचिका के रूप में प्रकरण सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, लेकिन मायावती के
    खुले संरक्षण और पोंटी चड्ढा के शातिर दिमाग के चलते वित्तीय वर्ष समाप्त
    होने के कारण याचिका स्वतः निरर्थक हो गई।
    मेसर्स ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड का 5 जून, 2007 को मात्र
    10 लाख रुपए की लागत से पंजीकरण कराया गया था। पंजीकरण प्रमाण पत्र
    रजिस्ट्रार मनमोहन जुनेजा ने जारी किया था, जिसमें कंपनी का मुख्यालय
    जालंधर स्थित मकान संख्या- 15, मॉडर्न कालोनी में दर्शाया गया था।
    स्थापना के मात्र एक माह बाद 7 जुलाई, 2007 से मेसर्स ब्लू वॉटर
    इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड आबकारी कर वसूलने का काम करने लगी। धांधली
    का क्रम और भी आगे बढ़ा। ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के
    विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका पड़ने के बाद रायल ब्रेवरिजेज लिमिटेड
    नाम की एक और संस्था सामने आई। इस कंपनी का पंजीकरण कंपनी 5 जून 2007 को
    कंपनीज एक्ट 1956 के तहत जालंधर और लुधियाना के पते पर हुआ था।
    ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज को उत्तर प्रदेश में आबकारी कर वसूलने का ठेका 7
    जुलाई, 2007 को मिला और 10 जुलाई, 2007 को ही कंपनी बोर्ड ने विशेष
    प्रस्ताव पारित कर के कंपनी का पंजीकृत कार्यालय मकान नं. 15, मॉडर्न
    कालोनी, जालंधर, पंजाब से बदलकर मकान नंबर- 972 फेस- 3 बी- 2 मोहाली,
    पंजाब कर दिया। जनवरी, 2009 को कंपनी बोर्ड ने विशेष प्रस्ताव पारित कर
    के कंपनी का नाम ब्लू वॉटर प्राइवेट लिमिटेड से बदलकर रायल बेवरिजेज
    प्राइवेट लिमिटेड कर दिया। इसके बाद पुन: इसके पंजीकृत कार्यालय का पता
    बदलकर 62- 1, भाई रणधीर सिंह नगर, लुधियाना, पंजाब कर दिया गया। यह सब
    सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका से बचने के लिए किया गया, ताकि कोर्ट
    वादी ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड का पता ही खोजता रहे और पूरा
    प्रकरण जहाँ का तहां दब जाये और हुआ भी वैसा ही।
    जनहित याचिका में पहले ही वित्त वर्ष में 4000 करोड़ रुपए के आबकारी
    राजस्व घोटाले का आरोप लगाया गया था। उस वक्त मेरठ व बरेली जोन का थोक व
    फुटकर व्यवसाय पोंटी चड्ढा की कंपनियों के पास था। प्रदेश भर के देसी और
    विदेशी शराब के थोक व्यापार पर भी पोंटी चड्ढा ग्रुप का ही कब्जा था।
    मायावती शासन में 30 जून, 2007 को नई नीति घोषित की गई, जिसके चलते बिना
    किसी टेंडर के प्रदेश के चार हजार करोड़ रुपए के सरकारी राजस्व की वसूली
    का ठेका भी ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड को दे दिया, जबकि इस
    कंपनी का रजिस्ट्रेशन जालंधर, पंजाब में 5 जून, 2007 को ही पंजाब, हिमाचल
    प्रदेश एवं चंडीगढ़ के कंपनी रजिस्ट्रार के समक्ष हुआ। मायावती सरकार का
    अनुभवहीन कंपनी को ठेका देने का आशय मेसर्स ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज
    प्राइवेट लिमिटेड को लाभ पहुंचाने का ही था।
    बसपा सरकार ने 11 फरवरी, 2009 को नई आबकारी नीति बनाते हुए पूरे प्रदेश
    को दो भागों में बांट दिया था। आगरा, वाराणसी व लखनऊ जोन में देसी शराब,
    विदेशी शराब व बीयर की फुटकर दुकानों व मॉडल शॉप का व्यवस्थापन लॉटरी
    पद्धति से बरकरार रखा, जबकि बरेली सहित मेरठ जोन को विशिष्ट जोन घोषित
    करते हुए इसके व्यवस्थापन का दायित्व एक बार फिर उत्तर प्रदेश सहकारी
    चीनी मिल संघ लखनऊ को सौंप दिया। सरकार ने 12 फरवरी 2009 को मेरठ जोन को
    विशिष्ट जोन बना दिया, जिसमें मेरठ प्रभार, सहारनपुर प्रभार, मुरादाबाद
    प्रभार व बरेली प्रभार के तहत कुल 17 जिलों को सम्मिलित किया गया। नई
    आबकारी नीति लागू होने के बाद उप्र सहकारी चीनी मिल संघ ने शराब माफिया
    पोंटी चड्ढा की नामी-बेनामी कंपनियों को हैंडलिंग एजेंट बनाकर विदेशी और
    देसी मदिरा का थोक व्यापार सौंप दिया।
    मायावती शराब कारोबारी गुरप्रीत सिंह चड्ढा उर्फ पोंटी चड्ढा पर पूरी तरह
    मेहरबान थीं, जिससे यूपी में शराब के कारोबार पर पोंटी चड्ढा का एकछत्र
    राज्य स्थापित हो गया था, उसके इशारे पर नीति बदल जाती थी। पोंटी ने
    राजनाथ की बनाई लॉटरी नीति ही नहीं बदलवाई, बल्कि नवीनीकरण की परंपरा भी
    शुरू करायी। वर्ष 2012 में विधानसभा चुनाव से पहले ही पोंटी को बसपा की
    सत्ता में वापसी न होने का अहसास हो गया, तो उसने एक साल के शराब लाइसेंस
    के नवीनीकरण की अवधि बढ़वा कर दो साल करा ली थी।
    मायावती के संरक्षण के चलते पोंटी की बिना मर्जी के शराब का कोई भी
    ब्रांड यूपी में मार्केटिंग नहीं कर सकता था। यूपी में उन्हीं शराब
    कंपनियों का ब्रांड बिका, जिसने अपने ब्रांड की मार्जिन मनी के साथ कमीशन
    भी पोंटी को दी, जिन कंपनियों ने मार्जिन मनी के साथ कमीशन देने से मना
    किया, वो बंदी की कगार पर चली गई, अथवा बिक गई। जो ब्रांड सब से अधिक
    बिकते थे, वे बाजार से गायब ही हो गये। पोंटी के कहर के चलते कई लोगों ने
    अपनी फैक्ट्री युनाइटेड ब्रेवरीज के मालिक विजय माल्या को बेच दी, लेकिन
    शुरू में पोंटी और विजय माल्या की बात नहीं बनी, तो पोंटी ने विजय माल्या
    की कंपनियों की शराब की सप्लाई बंद करने का सिग्नल दे दिया, जिससे डरे
    विजय माल्या को भी पोंटी चड्ढा के साथ समझौता करना पड़ा। सिगराम के
    ब्रांड उत्तर प्रदेश में बिकते रहे, क्योंकि इस कंपनी ने शुरुआत में ही
    पोंटी के सामने हथियार डाल दिए थे। अपनी झोली भरने को पोंटी ने हर तरह का
    दबाव बनाया। नियम-कानून बदलवाये भी और खुल कर तोड़े भी।
    अखिलेश यादव 15 मार्च 2012 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो
    अधिकांश लोगों को यही आशा थी कि मायावती शासन की शराब नीति को बदल कर
    अखिलेश यादव पोंटी चड्ढा ग्रुप का आधिपत्य समाप्त कर देंगे, लेकिन पोंटी
    चड्ढा ग्रुप ने जिस तरह माया राज के समय प्रदेश की आबकारी नीति को अपनी
    सोच के अनुसार लागू कराया, उसे ही अब अखिलेश सरकार आगे बढ़ा रही है।
    हालांकि 17 नबंवर 2012 को पैसे की भूख ने ही पोंटी चड्ढा को मिटा दिया,
    लेकिन मौत के बाद भी शराब कारोबार पर पोंटी चड्ढा का राज कायम है। उसकी
    कंपनियों का उत्तर प्रदेश के शराब कारोबार पर कब्जा ही नहीं है, बल्कि
    उसकी बनाई नीतियों के आधार पर ही सब कुछ चल रहा है। हालांकि पोंटी की
    हत्या के बाद शराब सिंडिकेट ने एक बार फिर सिर उठाने का प्रयास किया था,
    लेकिन ऐसी सभी आशंकाओं को अखिलेश सरकार ने खारिज कर दिया। अखिलेश सरकार
    को भी पोंटी ग्रुप पर पूरा भरोसा है। एक-दूसरे का साथ पाकर सरकार और
    पोंटी ग्रुप दोनों खुश नजर आ रहे हैं।
    ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ पोंटी ग्रुप को ही लाभ हुआ हो। प्रदेश के शराब
    व्यवसाय पर पोंटी ग्रुप के कब्जे से पहले तक आबकारी से सरकार को लगभग
    3500 करोड़ रुपयों राजस्व मिलता था, लेकिन पोंटी के शराब व्यवसाय में आते
    ही आबकारी राजस्व 20000 करोड़ रुपये से ऊपर तक पहुँच गया। पहले आबकारी
    नीति में एकमुश्त लाइसेंस फीस देने की भी शर्त लागू नहीं थी। दस फीसदी
    लाईसेंस शुल्क जमा करने के बाद प्रत्येक तीसरे महीने शुल्क की अदायगी
    होती थी। इस नियम को पोंटी ने बदलवाया और आबकारी नीतियों में बड़ा बदलाव
    कराने के बाद केंद्रीय कृत करा लिया, इस नीति के चलते ही उसका एकछत्र राज
    स्थापित हुआ। पोंटी चड्ढा के शातिर दिमाग का ही कमाल कहा जायेगा कि तमाम
    शराब माफियाओं को किनारे कर वह अकेला माफिया बन गया।
    अखिलेश सरकार ने पहली बार इसी वर्ष 2014 में आबकारी नीति की समीक्षा की।
    उन्होंने कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया और मायावती द्वारा लागू नियमों को
    ही आगे बढ़ा दिया। दो सालों के लिए शराब के दामों में बढ़ोतरी करते हुए
    अपनी नई नीति को लागू कर दिया। फिलहाल प्रदेश के शराब व्यवसाय पर मृतक
    पोंटी की कंपनियों का ही राज चल रहा है। दुकानें मनमाने तरीके से खोली
    हुई हैं। धार्मिक स्थल, गंगा किनारे, अस्पताल के पास, स्कूल के पास, घनी
    बस्ती में और राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे दुकान नहीं खोली जा सकती है,
    पर इसमें से एक भी नियम का पालन नहीं किया जा रहा है। दुकान खुलने और बंद
    होने के समय का पालन तो कभी नहीं किया जाता, जिसे शासन-प्रशासन गलती भी
    नहीं मानता। शराब खुलेआम ओवर रेट बिक रही है। बिना होलो ग्राम के बिक रही
    है। सरकार की अनुमति के बिना बाहरी राज्यों की शराब भी सरकारी दुकानों से
    बेची जा रही है और सब से महत्वपूर्ण बात यह कि पोंटी ग्रुप की कंपनियों
    के गुर्गे उत्तर प्रदेश में एक बार फिर पुलिस व आबकारी विभाग की टीम की
    तरह छापा मारने लगे हैं, जो समूचे सिस्टम पर हावी होने का सटीक प्रमाण
    है।
    खैर, बात भ्रष्टाचार और आरोप-प्रत्यारोपों की नहीं, बल्कि नैतिकता की है।
    पोंटी को आगे बढ़ाने वाली पूर्व मुख्यमंत्री मायावती अगर, गलत कही जा सकती
    हैं, तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी जवाब देने ही होंगे। मुख्यमंत्री
    अखिलेश यादव प्रदेश के विकास में पोंटी ग्रुप के साथ को जरूरी मानते हैं,
    तो इस एक तर्क से मायावती पर लगे सभी आरोप स्वतः निरस्त हो जाने चाहिए।


    बी.पी. गौतम
    स्वतंत्र पत्रकार
    8979019871

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    ---------- Forwarded message ----------
    From: Hastakshep समाचार पोर्टल<news.hastakshep@gmail.com>
    Date: 2014-12-07 0:26 GMT+05:30
    Subject: (हस्तक्षेप.कॉम) Secular Bangladesh wants Taslima Nasrin back Home!
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    Dear Friends,
    The forest people in the forest region of Kaimur, Robertsganj, sonbhadra, UP are observing 10th Decemeber the International Human Rights Day protesting against the thousands false cases implicated on the tribal, dalit and poor people in the forest area by Forest department and the police in two acts thus criminalizing the whole society who are also deprived sections. This is happening when our August Parliament has enacted historical Act " Forest Rights Act" in 2006 to protect the rights of the forest people and end the historical injustice. But when we demanded for implementation in district Sonbhdar alone more than 10 thousand cases are filed on the activists and the tribal, dalits and poor people. We are protesting on 10 december for withdrawal of these cases and otherwise the forest people will give mass arrest. On this day we are pledging to our selves that we will not take bail for false cases and force the administration and the government to withdraw these cases unconditionally. To continue this spirit we all will also gather in New Delhi on 15th december to challenge the governments for effective implementation of the Forest Rights Act at Jantar Mantar, Demands in english given below.  pl read the link below. 
    Muslims, dalits and tribals make up 53% of all prisoners in India


    स्वास्थ और शिक्षा का अधिकार मानवाधिकार है                                                                                   आजीविका का अधिकार मानवाधिकार है


                  ''मुन्सिफ का सच सुनहरी सियाही में छिप गया                                                                         

                                                                                         वैसे वो जानता है ख़तावार कौन है''


    10 दिसम्बर 2014 मानवाधिकार दिवस को रार्बटसगंज चलो                          
    15 दिसम्बर 2014 को जंतर मंतर दिल्ली चलो 




     वनाधिकार कानून 2006 लागू करो, संविधान की व संसद की गरिमा की सुरक्षा करो, ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करो व सम्मानजनक जीने के अधिकार को सुनिश्चित करो 
    फर्जी मुकदमें लगाना बंद करो !! वनाश्रित समुदायो के ऊपर लगे 10000 से अधिक फर्जी मुकदमे वापिस करो!!फर्जी मुकदमों के खिलाफ जिला एवं पुलिस प्रशासन पर हल्ला बोल एवं जेल भरो आंदोलन !!!जनसंगठन का ऐलान सरकार फर्जी मुकदमों को बिना किसी शर्त बिना किसी जमानत के वापस ले
    हिंडालको अस्पताल द्वारा मिथिलेश गोण के हत्यारे डाक्टरों पर मुकदमा दर्ज करो!!  बलात्कारी कलवंत अग्रवाल को जेल भेजो !! ओबरा खनन हादसे के आरोपियों को गिरफ्तार करो!! मनरेगा घोटाले के दोषी अधिकारी पनधारी यादव को गिरफतार करो!! जे0पी कम्पनी द्वारा हज़ारों एकड़ वनभूमि की हेराफेरी के लिए अपराधिक मुकदमें कर जेल भेजो!! कुमार मंगलम बिड़ला पर देश के संसाधनों की लूट, जालसाज़ी व 420सी के मुकदमें कायम होने के बावजूद भी आखिर गिरफतारी क्यों नहीं?? वनविभाग द्वारा लाखों है0 भूमि पर जापान की कम्पनी जाईका से लिए गए लोन में घोटाले के तहत मुकदमा आखिर क्यों नहीं? 
     साथीयो! मानवाधिकार दिवस हमारे देश के संविधान में प्रदत्त सम्मानजनक जीने के अधिकारों को सुनिश्चित करता है, इसलिए हमारे ऊपर हो रहे अन्यायों के खिलाफ हमनें अपने आंदोलन का दिन भी 10 दिसम्बर को ही चुना है। गौरतलब है कि सरकार, न्यायालय, प्रशासन ने कैमूर क्षेत्र में हज़ारों वर्षो से रह रहे आदिवासी, दलित एवं अन्य ग़रीब वर्ग को ही इस जनपद में सबसे बड़े अपराधिक प्रवृति के तत्व करार दिया है। अगर आंकड़े इकट्ठे किए जाएं तो सबसे ज्यादा मुकदमें जिनकी संख्या दस हज़ार से भी ऊपर है, वह वनों में रहने वाले आदिवासी एवं दलितों पर हैं। जिनपर वनविभाग एवं पुलिस विभाग ने दो-दो कानूनों के तहत एक साथ गैरकानूनी तरीके से फर्जी मुकदमे किए हैं। अगर आदिवासी, दलित, ग़रीब वर्ग की महिलाऐं व मेहनकश ही देश के लिए खतरा हैं, जिनके वोट से ही सरकारें बनती हैं तो फिर आखिर यह सरकार किस के लिए काम कर रही है? इसे स्पष्ट किया जाए। 
    देश की संसद ने 2006 में वनाधिकार कानून लागू ही इसलिए किया था ताकि वनों में रहने वाले लोगों के साथ ब्रिटिश काल से जो ऐतिहासिक अन्याय किया गया है, उसे खत्म किया जा सके। यह अन्याय मुख्य रूप से वनविभाग, पुलिस विभाग सांमती तत्वों व पूंजीवादी ताकतों द्वारा किया गया है। इस कानून के आने के बाद यह सारे फर्जी मुकदमे वापिस हो जाने चाहिएं थे। लेकिन उल्टे 2006 के बाद तो इन फर्जी मुकदमों को लगाने की बाढ़ सी आ गई। दुद्धी, राबर्टसगंज एवं घोरावल तहसील में ऐसी अनगिनत फाईलें हैं, जिसमें एक ही फाईल में 200/ 400/ 600 की संख्या तक लोग केवल आदिवासी और दलित शामिल हंै व जिसमें 80 प्रतिशत से ऊपर महिलाओं के नाम शामिल कर उनका आपराधिक इतिहास बनाया जा रहा है। यही नहीं हमारे यूनियन द्वारा 28 सितम्बर 2013 को रेणूकूट में हिंडालको कम्पनी के हत्यारे डाक्टरों के खिलाफ शांतिपूवर्क जुलूस में प्रशासन द्वारा संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारीयों व  200 लोगों पर लोकसेवक पर हमला करने का झूठा केस दर्ज किया गया व कई धाराऐं लगाई गई हैं। साथीयों इस मुददे पर यूनियन के 100 सदस्यीय प्रतिनिधि मंड़ल हमारे यूनियन के कार्यकारी अध्यक्ष श्री संजय गर्ग की अध्यक्षता में 10 अप्रैल 2014 को मा0 मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव से वार्ता कर इन फर्जी मुकदमों की सूची खासतौर पर पिपरी फर्जी मुकदमों के बारे में भी अलग से ज्ञापन सौंपा था। इस पर मुख्यमंत्री द्वारा गृहमंत्रालय को आदेश ज़ारी कर कई मुकदमों की वापसी भी हो गई है लेकिन सोनभद्र पुलिस इस मामले को दबा कर सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों पर फिर से नोटिस चिपका रही है व अनायास ही परेशान कर रही है। पूर्व पुलिस अधीक्षक रामबहादुर यादव द्वारा हमारे यूनियन के पदाधिकारीयों को यह बताया गया था कि यूनियन के सदस्यों के कई मुकदमें वापिस किए गए है इन मामलों पर हमारी मांग है कि सोनभद्र पुलिस पूरा खुलासा करें व मुकदमों की वापिसी को सार्वजनिक करे। मानवाधिकार दिवस के उपलक्ष्य में हम यह मांग करते हैं कि -
    1.सभी फर्जी मुकदमों को बिना किसी शर्त वापिस किया जाए। 
    2.वनाधिकार कानून-2006 को इसकी सही मंशा के अनुरूप लागू किया जाए। सामुदायिक अधिकारों को राजस्व रिकार्डो में दर्ज वनक्षेत्र को ही मान्यता दे समुदाय को उनके अधिकार सौंप दिए जाने चाहिए। इस कानून की नोडल एजेंसी समाज कल्याण विभाग नहीं बल्कि राजस्व विभाग को बनाया जाए। 
    3.प्रशासन द्वारा पूर्व में बनाई गई कई सही ग्राम वनाधिकार समितियों को भंग कर सांमती तत्वों को ग्राम वनाधिकार समिति में शामिल किया गया है। जहां-जहां यह त्रुटियां हुई हैं, उन्हें ठीक किया जाए। जैसे ग्राम बसौली, बहुआर रार्बट्सगंज की पुरानी समितियों को बरकरार रखा जाए। 
    4.प्रशासन द्वारा वनाधिकार कानून-2006 को केवल अनुसूचित जनजातियों के लिए लागू करने का भ्रम फैलाया जा रहा है, जिससे कि इस वनक्षेत्र में आदिवासियों एवं अन्य परम्परागत वनसमुदायों में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है। जबकि जनपद में अभी भी कई आदिवासी समुदाय जनजाति में घोषित ही नहीं है व यह कानून केवल अनुसूचित जनजाति के लिए नहीं बल्कि अन्य परम्परागत वनसमुदायों के लिए भी है, जोकि एक बड़ी संख्या में यहां निवास करते हैं। सभी आदिवासी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का  दर्जा दिया जाए। 
    5.जनपद में वनसमुदायों एवं अन्य नागरिकों की स्वास्थ सुविधाओं के लिए किसी भी प्रकार का पर्याप्त ढांचा नहीं है। हिंडालको, जे0पी एवं अन्य औद्योगिक घरानों द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल आदिवासियों की भूमि को हथिया कर उनके स्वास्थ से ही खेला जा रहा है व कम्पनियां केवल ग़रीब समुदायों एवं आदिवासियों का शोषण ही कर रही हैं। वनाधिकार कानून-2006 के अनुसार सभी स्वास्थ एवं शिक्षा की सुविधाओं को सुचारू रूप से चलाया जाए अन्यथा इन कम्पनियों द्वारा लूटी गई भूमियों को वापिस लेने का आंदोलन चलाया जाएगा। 
    6.जनपद में मलेरिया, टी0बी से निपटने के लिए व्यापक इंतजाम किए जाए, प्रत्येक घर में मच्छरदानियों को बांटा जाए, प्रदुषण को कम किया जाए। जिले में आधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पताल खोला जाए। कम्पनियों के निजी अस्पतालों को सरकारी अस्पतालों में बदला जाए व आदिवासी  एवं ग़रीब वर्ग के लिए मुफत सुविधाए उपलब्ध कराई जाए। प्राथमिक स्वास्थ केन्दों को पंचायत स्तर पर खोला जाए। 
    7.हमारे संगठन को कम से कम 25 हज़ार मच्छरदानियां उपलब्ध कराई जाए ताकि इनका वितरण किया जा सके। 
    8.इस जनपद में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक अच्छे स्कूलों कालेजो व, तकनीकी विद्यालयों का निर्माण किया जाए। 
    9.मुकदमें उन पर दर्ज किए जाए जो अपराधी, हत्यारे, बलात्कारी व प्राकृतिक संसाधनों को लूटने वाले भ्रष्टाचारी औद्योगिक घराने हैं। इन अपराधियों व भ्रष्टाचारीयों को बजाय राजनैतिक संरक्षण के जेल भेजा जाए। 
    साथीयों अपनी इन्हीं सब संवैधानिक हकों की बहाली व राष्ट्रीय स्तर पर वनाधिकार कानून को प्रभावी ढंग से न लागू करने के लिए 15 दिसम्बर 2014 को देश के सभी जनसंगठनों एकत्रित हो कर केन्द्र एवं राज्य सरकारों को खुली चुनौती देने के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में दिल्ली में जंतर मंतर पहुंचे। 

    अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन AIUFWP न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव NTUI
    मानवाधिकार कानूनी सलाह केन्द्र, कैमूर क्षेत्र महिला मज़दूर किसान संघर्ष समिति, कैमूर मुक्ति मोर्चा, 
    महिला वनाधिकार एक्शन कमेटी
    संपर्क पताः टैगोर नगर, राबटर््सगंज, सोनभद्र एवं 222 विधायक आवास, ऐश बाग रोड, लखनऊ, उ0प्र0

    Establish Constitutional Rights of Forest Dwelling Working People !
                      Long Live the Victory of Historic Struggles of Forest People 

    On the occasion of 8th year of Forest Rights Act,2006 passed in our Parliament 

    Thousands of struggling forest people, in asserting their rights are coming together to challenge the Govt for effective implementation of the Act and to safeguard all Constitutional rights of the forest people
                                 on 15th December 2014
                                   at Jantar mantar, 11am to 4pm 

           Many people's organizations participating in this mass protest.

     Please join in large numbers.

     Demands
    • Implement the Forest Rights Act 2006 effectively with political will across the country. The forest rights and the developmental rights of the forest people should be addressed immediately.
    • The community rights of the forest people should be granted immediately according to the Forest right Act 
    • The rights on Non Timber Forest Produce (NTFP) to be given to the forest people and formation of the cooperatives of the forest people should start immediately as per the September 2012 amendment of the Rules of the FRA. The control of Forest Department and Forest Corporation on the NTFP worth of millions of rupees should be abolished completely to bring out forest people from abject poverty. 
    • The Provision of 75 years for other forest dwellers is Unconstitutional and should  be amended. 
    •  The Forest Department and Forest Corporation  responsible for the historical injustice against the forest people since colonial days should be ousted from the forest region. 
    • The Indian Forest Act ( 1927) should be abolished, it is in contradiction with FRA and Indian Constitution Art. 39b. IFA 1927 was framed by British to colonize our forest to exploit the vast resources for establishing colonial  Eminent Domain. It is also in contravention with Art no. 13 of Part I of fundamental rights section of Indian Constitution that says that "All laws in force in the territory of India immediately before the commencement of this Constitution, in so far as they are inconsistent with the provisions of this Part, shall, to the extent of such inconsistency, be void". IFA 1927 also violates Art no 39 B of the Indian Constitution. 
     
    • Programmes should be initiated to empower forest women, their role, control and participation in all forest protection, conservation, management,procurement, development and livelihood needs to be enhanced. As women are more close to nature and for them nature is source of heritage and livelihood and not revenue earning source. 
     
    • All false criminal cases and forest cases filed by forest department and police on forest people especially adivasi/dalit/poor section/women should be immediately withdrawn to end their criminal history falsely built by the state. 
     
    • All the forest village/taungiya villages,as per the provision of Sec 3(h) in F.R.A should be converted into revenue village. The only state that has converted the forest village into revenue village is UP, village Surma, Golbojhi, Dudwa National Park, Distt Lakhimpur Khiri and various other villages. This example should be replicated in other states too. 
     
    • The multinational & Indian companies and especially mining and power companies violating the FRA should be booked under criminal Act and stringent punishment should be imparted for irreparable destruction to our environment. 
     
    • The Big dams, super power projects to corporates such as Jaypee, Birla, Reliance, Lanco, Adani, Mittal, Tata, Essar and others needs be scrutinized and the projects that are not environmentally viable should be cancelled and heavy penalties to be imposed on these companies and groups of companies.  
     
    • The PTG, nomadic tribes and other vulnerable groups in the forest area should be given special protection under FRA and their rights should be recognized cross districts and states. The process of recognition of their rights has not started till now that is a shame on the part of the government. 
     
    • Ensure labour rights and labor standards in the forest areas; ensure social security, Guarantee a Living Wage for All,Make non-payment of the Minimum Wage a Cognisable Offence,Ensure Equal Wage for Equal Work,Ensure Universal Health care and an Indexed Pension for All,Protect Livelihood Rights for all, Regularise All Contract Workers - Regularise All Honorarium Workers,Guarantee an allowance equaling half the minimum wage to all unemployed working people

       

     
    • The Indian Govt. should stop functioning as agent of corporate and should focus on the implementing the rights of the forest people as guaranteed by Indian Constitution, U.N. Human Right Charter and I.L.O Convention no.169 to safeguard the environment and democracy .
                     Long live the unity of forest people and all working people!
     
    ALL INDIA UNION OF FOREST WORKING PEOPLE
    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com






    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com






    -- 
    Ms. Roma ( Adv)
    Dy. Gen Sec, All India Union of Forest Working People(AIUFWP) /
    Secretary, New Trade Union Initiative (NTUI)
    Coordinator, Human Rights Law Center
    c/o Sh. Vinod Kesari, Near Sarita Printing Press,
    Tagore Nagar
    Robertsganj, 
    District Sonbhadra 231216
    Uttar Pradesh
    Tel : 91-9415233583, 
    Email : romasnb@gmail.com
    http://jansangarsh.blogspot.com

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     Join the war against manual scavenging.
                     ---------------------------------------

    Dear Friends,
             I am writing to you (as 'vice president' of Ambedkar Scholarships) to request your participation in the struggle to end the evil practice of manual scavenging in India.
             I have had the good fortune to be associated with Ambedkar Scholarships and Benjamin Kaila since the beginning. For the last eight years the scholarship programme has been enlarged to include a special category to help children whose parents are forced to scavenge for a living.
             I would be grateful if you can consider supporting this programme, and also if you will forward this appeal to others who are concerned.
             Please contact me (sshankar@cmi.ac.in) or Benjamin Kaila (benjamin_kaila@yahoo.com) if you have any questions.
             Many thanks.
             Yours sincerely,
             Shiva Shankar.

                             -------------------

    'All you have shall someday be given, therefore give now that the season of giving may be yours and not your inheritors' - Kahlil Gibran


             Introducing a special category in Ambedkar Scholarships

    Encouraged by the response to the Ambedkar Scholarships Programme that we launched just 12 years ago, we initiated a special category to help our most deprived and discriminated children - those whose parents have to scavenge for a living.

    There are over 1.4 million Dalit people who are forced to earn a nightmarish living by cleaning dry latrines. Though outlawed in 1993, this hateful practice still continues everywhere in India. After all, wherever there is a railway station, there are people cleaning human excreta with primitive equipment.

    Andhra Pradesh is one of the states which has a very large number of people engaged in scavenging. Andhra Pradesh is also one of the states that is at the forefront of the war to end this shameful blot on humanity. Under the leadership of Mr.Bezwada Wilson, the Safai Karamchari Andolan (SKA) is making great progress in this war - please read Gita Ramaswamy's "India Stinking" (published by Navayana) for details.

    In Tamil Nadu, Ambedkar Scholarships has formed partnerships with Janodayam, a group dedicated to the elimination of scavenging headed by Mr.G.Israel, as well as with organisations such as READ (headed by Mr.Karuppusamy), Premalaya (headed by Mr.A.Isaiah), Scavengers Dignity Forum (headed by Mr.G.Sakthivel) and others. In Ghazipur disctrict, UP, we have formed a partnership with Mr.Vidya Rawat's SDF that is working for the rights of people who have to scavenge for a living.

    Ambedkar Scholarship is proud to associate itself with these organisations in starting a special category to help children of people who have to scavenge go to school and college.

    To support a child please contribute Rs.6,000/ or US$150/. This scholarship will support the recipient for one year.

    www.friendsforeducation.org [www.friendsforeducation.org]

    USD donations:

      In favor of: Friends for Education International
      Please post your cheques to:
      Benjamin P Kaila, 999 W Hamilton Ave #24, Campbell, CA 91214

    India rupee donations:

      In favor of: Friends for Education International (India)
      Please post your cheques to:
      Shiva Shankar,
      CA4, Seabrook Apartments,
      4th Seaward Road, Valmiki Nagar,
      Chennai - 600041.

    Please visit [www.friendsforeducation.org] for more information about these programmes.

             Yours sincerely,
             Shiva Shankar,
             Chennai Mathematical Institute.


                        "Educate, Agitate, Organise"
                            -------------------


    Underground Realities - Preeti Mehra http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-features/tp-sundaymagazine/underground-realities/article5741424.ece

    On January 26, 1950, we are going to enter into a life of contradictions. In politics, we will have equality and, in social and economic life, we will have inequality. - Dr. B.R. Ambedkar


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    ---------- Forwarded message ----------
    From: Hastakshep समाचार पोर्टल<news.hastakshep@gmail.com>
    Date: 2014-12-08 0:55 GMT+05:30
    Subject: (हस्तक्षेप.कॉम) अकाल की कला और भूख की राजनीति
    To: hastakshep@googlegroups.com


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    Recurring Shame of Maharashtra

     

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    From: Navin Narayan <navinjnu@gmail.com>
    Date: Fri, Dec 5, 2014 at 4:00 PM
    Subject: Amendment in PDF eligibility of UGC
    To: udsf-jnu@googlegroups.com


    Dear Friends, 

    Greetings !!

    This is to bring in your notice that UGC has amend its SC/ST PDF eligibility criteria without any notice on 22/7/2014. if I remember correctly earlier it was open to all those who posses doctoral degree. Now in addition of that one must be secure 50% marks in UG and 55% in PG. This is in contrast of NET eligibility which is 50% in PG. what is the rational behind this is out of one's imagination. I think its an attack on marginalized communities chances of acquiring higher education. its first in the series more to come, therefore we have to be vigilant  and also expose this and the bad intention of this regime.

    Hope to listen from you on this !

    Jai Bheem !!

    Navin N.


    लालकिले पर गीता महोत्सव का आशय फिर वही मुक्तबाजारी नस्ली वर्चस्व।

    योजना आयोग खत्म इसलिए क्योंकि वह सुधार अश्वमेध के माफिक नहीं।

    कुल मिलाकर यह देश फिर वही महाभारत है और धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे हर कोई वध्य है जो निमित्त नियतिबद्ध हैं और सता के नस्ली वर्चस्व के लिए विधर्मी विदेशी हैं,भारतीय नागरिक हरगिज नहीं।

    पलाश विश्वास



    संगीतबद्ध हो गयी आज की सुबह।


    फोन पर अशोक जयसिंघानी में बच्चों की आवाज में गीत सुनाया और कहा कि इसे जेल में गा सकते हैं और अब जेलयात्रा कभी भी संभव है।


    पूरा देश जेलखानै  है,ऐसा हम जयसिंघानी जी को बता नहीं सकते।


    मनचाहा राजकाज निबट जाने के बाद राजनीति का साध्वी जिहाद का अंजाम यह कि साध्वी निरंजन ज्योति की विवादास्पद टिप्पणियों के मुद्दे पर राज्यसभा में पिछले एक सप्ताह से चला आ रहा गतिरोध आज सभापति द्वारा एक प्रस्ताव पढ़ने के बाद समाप्त हो गया।


    इसी बीच विपक्ष की गैरहाजिरी में कारपोरेटकेसरिया हित में एक झटके से 1382 कानून अप्रासंगिक बताकर राजकाज तेज करने केलिए खत्म कर दिये गये हैं,हमने इस पर लिखा भी है।लेकिन हमें अभी नहीं मालूम कि उन खत्म किे कानून कौन कानून हैं और राजकाज उनसे कैसे बाधित हो रहा था।उनके खत्म हने का सीधा फायदा किन्हें है।


    संसद और संसद के बाहर कोई पूछने वाला भी नहीं है।बहरहाल साध्वी चुनाव प्रचार करेंगी दिल्ली में और संसद भी बहाल है।


    गौरतलब है कि प्रस्ताव में संसद के सभी सदस्यों, मंत्रियों और सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से सार्वजनिक बयानों में हर कीमत पर शिष्टता बरतने की बात कही गई है। इस तरह के बयान को लेकर विपक्ष की मांग पर आज अंतत: सहमति बन गई और उच्च सदन में तीन बार के स्थगन के बाद प्रश्नकाल के दौरान सभापति द्वारा यह बयान पढ़े जाने के पश्चात सदन में सामान्य ढंग से कामकाज चलने लगा।


    इसी बीच राष्ट्रीय राजधानी में कुछ गिरजाघरों  को कथित रूप से क्षतिग्रस्त किए जाने की घटनाओं की पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने आज कहा कि देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखना सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है और वह इस प्रकार के मामलों की एसआईटी से जांच कराएगी।


    लोकसभा में शून्यकाल के दौरान कांग्रेस के एंटो एंटनी ने इस विषय को उठाते हुए कहा कि दिल्ली समेत विभिन्न क्षेत्रों में चर्चो पर लगातार हमले हो रहे हैं। ऐसे हमलों पर कार्रवाई नहीं होने से ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। सरकार को इस दिशा में पहल करनी चाहिए।


    इसी बीच चेन्नै से खबर है कि  छह महीने पहले भाजपा के साथ गठबंधन करने वाली एमडीएमके ने अपना नाता तोड़ लिया है। पार्टी की बैठक में एनडीए से अपना नाता तोड़ने का प्रस्ताव पारित किया है।


    एमडीएमके ने दावा किया है कि गठबंधन में शामिल होने के दौरान पीएम मोदी सहित सभी भाजपा नेताओं ने स्वीकार किया था कि वे श्रीलंका का समर्थन नहीं करें गे, लेकिन वे लोग दोबारा वापिस अपने ट्रैक पर आ गए। भाजपा तमिलों के खिलाफ काम करती रही है। मोदी ने राजपक्षे को चुनाव के लिए बधाई दी है।


    अगर यह सच है ते पहेली यह है कि बाकी तामिल राजनीति क्यों केसरिया है।


    इन्हीं परिस्थितियों के बीच आज सुबह ही पुणे से अशोक जयसिंघानी का फोन आया और कहा उन्होंने हम लोग जो लिख बोल रहे हैं,वह तो खुल्ला खेल है।तमाशा पुराना है।


    उन्होंने कहा कि सारे समझदार लोग जानते हैं।


    सही कहा है उन्होंने हमने तो एफडीआई को डालर छापने के मोदी उपक्रम बतौर चिन्हित भी किया है और औपनिवेशिक ब्रिटिश राजकाज का हवाला देकर औपनिवेशिक जमाने में नोट छापकर लूटने के खिलाफ बाबासाहेब के शोध का हवाला भी दिया है।जाहिर है कि हम नया कुछ भी नहीं कह रहे हैं।प्राब्लम आफ रुपी न पढ़ा हो तो पढ़ लीजिये तुरंत।


    हम इसका क्या इलाज निकालें कि इस देश के सबसे बड़े अर्थशास्त्री के नजदीकी रिश्तेदार इल्युमिनेटी और जायनी घराने से हैं और वे हिंदुत्व का शास्त्रीय राग अलाप रहे हैं।


    समझने वाली बात यह भी है कि नोबेल पुरस्कार जिस नोबेल महासय के नाम है,वे डायनामाइट के आविस्कारक हैं और हथियारों का उनका कारोबार है।


    हथियारों के कारोबार का शांति और प्रगति से क्या नाता है ,इसका खुलासा वियतनाम के कसाई हेनरी कीसिंजर और बाराक ओबामा को मिले नोबेल शांति पुरस्कारों की दास्तां है।


    हम क्या करें कि इस देश में आम नागरिकों की सुनवाी होती ही नहीं और न भीड़ में किसी चेहरे की कोई पहचान होती है।


    आलोकित मंच से सुभाषित सूक्तियों से हम देश और समय की नब्ज बूझने की कवायद करते हुए तजिंदगी गुलामी ही जीते हैं।


    आपस में हम संवादहीनता के रिश्ते निभाते हुए आग के दरिया से हजारों कोस दूर रहते हैं जबकि उस आग के दरिया को पार किये बिना मुहब्बत होगी नहीं।

    लालकिले पर गीता महोत्सव का आशय फिर वही मुक्तबाजारी नस्ली वर्चस्व।

    योजना आयोग खत्म इसलिए क्योंकि वह सुधार अश्वमेध के माफिक नहीं।


    कुल मिलाकर यह देश फिर वही महाभारत है और धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे हर कोई वध्य है जो निमित्त नियतिबद्ध हैं और सता के नस्ली वर्चस्व के लिए विधर्मी विदेशी हैं,भारतीय नागरिक हरगिज नहीं।


    इस हिंदुत्व के आलम का नतीजा यह कि मुसलमानों में केसरियाकरण इतना तेज हुआ है कि त्रेपन साल से बाबरी मस्जिद की लड़ाई लड़ने वाले हाशिम साहब अब मोदी महाराज की कदमबोशी के लिए बेताब है।


    मुक्तबाजारी नस्ली रंगभेदी हिंदुत्व के एजंडे में अल्पसंख्यकों का यह हाल है तो दलितों,आदिवासियों के सारे राम और बीरसा हनुमान हुए जा रहे हैं।


    आनंद तेलतुंबड़े के मुताबिक दलितों पर अत्याचार बढ़ गये हैं और अल्पसंख्यकों  का जीना हराम हो गया है।


    हस्तक्षेप में पटना में प्रतिरोध के  सिनेमा की रपटे सिलसिलेवार जो हस्तक्षेप में छपी हैं,उन्हें जरुर पढ़लें,क्योंकि उन्हें पढ़े बिना हमारे लिखे का संदर्भ प्रसंग समझ में नहीं आयेगा।जिसके बिना यह कयामत तो जारी ही रहनी है और हो हल्ला मचाने की नौटंकी से मजमा लगेगा जरुर,पैसे भी होंगे वसूल जरूर,लेकिन हालात नहीं बदलेंगे।


    गौर तलब है कि  बाबरी मस्जिद के मुख्‍य मुद्दई हाशिम अंसारी ने गुरुवार को मामले के हल के लिए पीएम मोदी से मिलने की बात कही है। इससे पहले उन्होंने इस मुकदमे की पैरवी नहीं करने और रामलला को आजाद करने की बात कही थी। साथ ही, उन्होंने इस मामले के समाधान के लिए हनुमानगढ़ी के महंत और अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष ज्ञानदास के अलावा अयोध्या के अच्छे और ईमानदार हिंदुओं का साथ भी मिलने की बात कही है।  


    बिल्कुल सही कहा है कि आर्य वंशज हिंदुत्व की शरण में जाये बिना धर्मोन्मादी हिंदुत्व को अपनाये बिना इस देश में पिलव्कत किसी के वजूद का कोई मतलब ही नहीं ठैरा।


    हाशिम साहेब के कहे का मतलब अक्षरशः तब तक नहीं समझ में आयेगा जबतक कि न अंधेरा चीरकर हम रोशनियों के जलवे से इस कयामत का रेशां रेशां बेनकाब कर पायें।

    हम नहीं मानते कि हाशमी साहेब रातोंरात बदल गये होंगे।बदले वे हालात हैं,जिनमें उन्हें मोदी की शरण में जाने के अलावा कोई राह नहीं सूझ रही है।यह बहुसंख्य जनगण की हालत है जो बदलते हालात में असहाय और लाचार हो गये हैं।


    हमें और बारीकी से पढ़ने की जरुरत है कि उन्होंने क्यों कहा, "जो लोग मेरी मुखालफत करते हैं, वह चाहते हैं कि रामलला जेल में रहें और वह एमपी, एमएलए बनते रहें।" यही नहीं, हाशि‍म ने नरेंद्र मोदीकी शान में कसीदे भी पढ़ डाले। उन्‍होंने कहा, "मोदी अच्छे आदमी हैं। उनकी 'हि‍साब दो'वाली नीति‍ काफी अच्‍छी है, क्‍योंकि‍ राजनीति‍ करने वाले हुकूमत का पैसा लेकर फायदा उठाते हैं। मोदी ठीक कहते हैं कि‍ पहले जो पैसा दि‍या है, उसका हि‍साब दो। कम से कम जो एमपी और एमएलए पैसा लेकर आते हैं और खर्च नहीं करते उनसे हिसाब तो मांग रहे हैं।"


    गीता महोत्सव,संस्कृत का अनिवार्य पाठ और इंडिया टीम का समवेत स्वर साध रहे हैं हाशिम साहेब और तम दूसरे लोग,जिनके साथ हम खभी खड़े ही नहीं थे।हम उनसे बेवफाई की शिकायत करने के तो कतई हकदार ही नहीं हैं।


    हमने शुरु से लिखा है कि लालकिले पर गीता महोत्सव का आशय यह है कि दावे अब सिर्फ अयोध्या,मथुरा और काशी पर नहीं है,दावे दिल्ली की तमाम ऐतिहासिक निर्माण पर है तो सारी पुरातात्विक विरासतें भी दांव पर हैं।इतिहास भूगोल दांव पर है।दांव पर है सभ्यता,संस्कृति,मनुश्यता,प्रकृति और पर्यावरण भी।


    मुझे हिचक नहीं कि हाशिम साहेब इस आशय को बेशक  समझ गये हैं और रालला की शरण में जाकर मुसलमानों के लिए अमन चैन मांगने की यह तरकीब निकाली है उन्होंने। मौजूदा हालात में जिसे गलत भी नहीं ठहराया जा सकता है ।


    और समाचार एजंसी  भाषा की ओर से प्रसारित इस खबर पर भी गौर करें कि

    यूपी बीजेपी अध्यक्ष का दावा, प्राचीन तेजो महालय मंदिर का हिस्सा है ताजमहल

    Taj Mahal Part of Ancient Temple, Claims Uttar Pradesh BJP Chief

    बहराइच: दुनिया के सात अजूबों में से एक ताजमहल को वक्फ बोर्ड के हवाले किए जाने की मांग के बीच उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने आज यह कहकर विवाद को नया मोड दे दिया कि विश्व ऐतिहासिक विरासत ताजमहल प्रचीन तेजो महालय मंदिर का हिस्सा है।


    बाजपेयी ने यहां संवाददाताओं से कहा कि मुगल शासक शाहजहां ने मंदिर की कुछ जमीन को राजा जय सिंह से खरीदा था। बाजपेयी का दावा है कि इससे संबंधित दस्तावेज अभी भी मौजूद हैं।


    एक सवाल के जवाब में उन्होंने आरोप लगाया कि वक्फ की संपत्तियों पर कब्जा जमाये बैठे उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री आजम खां की नजर अब विश्व विरासत इमारत ताजमहल पर है।


    उन्होंने कहा कि ताजमहल में पांच वक्त की नमाज पढ़ने का आजम का सपना कभी नहीं पूरा हो पाएगा।


    वक्फ मंत्री आजम ने मुतवल्लियों के 13 नवंबर को हुए सम्मेलन में कहा था कि वह राज्य सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड से कहेंगे कि वह ताजमहल को बोर्ड की संपत्ति बनाए और उन्हें (आजम को) उसका मुतवल्ली नियुक्त कर दें।


    इस बयान पर जब संवाददाताओं ने आजम से सवाल किए तो वह पलट गए और कहा कि आप लोग मजाक को गंभीरता से क्यों ले लेते हो।


    इसके बाद आगरा के एक संगठन इमाम-ए-रजा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मांग की कि वे ताजमहल को वक्फ की संपत्ति घोषित करें और मोहर्रम के दौरान वहां मातम की इजाजत दें।


    शियाओं के प्रमुख धर्मगुरुओं ने हालांकि ताज को शिया वक्फ बोर्ड की संपत्ति माने जाने की मांग को खारिज करते हुए कहा कि विश्व विरासत इमारतों को ऐसे विवादों से दूर रखना चाहिए।


    ऑल इंडिया शिया पर्सनल ला बोर्ड के प्रवक्ता यासूब अब्बास ने बताया कि जहां तक मुमताज महल का सवाल है, वह शिया थीं लेकिन ताजमहल देश की विरासत है और इसे सुन्नी या शिया वक्फ बोर्डों में से किसी को भी नहीं सौंपा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड अपनी मस्जिदों और मदरसों का रखरखाव तो कर नहीं पा रहे हैं, ताजमहल कैसे संभालेंगे। अगर ताजमहल वक्फ बोर्ड को सौंपने का मुद्दा उठा तो शिया और सुन्नी टकराव की मुद्रा में आ जाएंगे, इसलिए ताजमहल को झगड़े से दूर रखना चाहिए।


    मोदी महाराज का राजकाज


    दरअसल हमारे सामने चुनौती यह भी है कि न सिर्फ अस्मिताओं के आर पार,बल्कि भाषाओं और बोलियों, साहित्य और संस्कृति के माध्यमों और विधाओं की दीवारे तहस नहस करके भारत जोड़ने का कार्यभार है हम पर।


    मोदी महाराज जो भी जो कह रहे हैं, जो उनका राजकाज है और विकास की जो उनकी परिकल्पना है और उनका जो हीरक चतुर्भुज है,उसका आशय लाल किले पर गीता महोत्सव से खुलता है।


    उसका नाता सीधे संस्कृत के अनिवार्य पाठ के लेकर स्मृति ईरानी की अति सक्रियता है और सोवियत माडल योजना आयोग को खारिज करते हुए नई टीम इंडिया की पेशकश करते हुए मोदी का खुल्लमखुल्ला ऐलाने जंग है कि योजना आयोग सुधारोन्मुख विकास के माफिक नहीं है।


    गौरतलब है कि योजना आयोग का गठन 1950 में पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने किया था। आयोग को आजाद भारत के आर्थिक विकास की योजना बनाने का जिम्मा सौंपा गया था। योजना आयोग पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए देश के औद्योगिक और कृषि विकास में अपना योगदान देता है।


    गौरतलब है कि स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए भाषण में मोदी ने कहा था कि योजना आयोग अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। नई संस्था की जरूरत है। तब से ही सरकार योजना आयोग के विकल्पों पर काम कर रही है।


    गौरतलब है कि बैठक में उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत, ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक, गुजरात की सीएम आनंदीबेन पटेल, छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए। हालांकि, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जीऔर जम्मू-कश्मीरके सीएम उमर अब्दुल्ला नहीं आए। ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस इस प्रस्ताव के खिलाफ हैं।


    गौरतलब है कि  प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि योजना आयोग में बदलाव का वक्त आ चुका है। देश को एक नई व्वयस्था की जरूरत है।


    उन्होंने कहा, "योजना आयोग की जगह एक उपयुक्त निकाय होना चाहिए ताकि देश की ताकत का मजबूती के साथ उपयोग किया जा सके।"


    वहीं, कांग्रेस ने मोदी सरकार के फैसले को अलोकतांत्रिक करार दिया है। कांग्रेस का कहना है कि इससे केंद्र और राज्य दोनों के बीच संबंध प्रभावित होंगे।


    इससे भी दिमाग की बत्ती नहीं जली तो विदेश मंत्री का विश्व हिंदू परिषद,दुर्गा वाहिनी,बजरंगी दल समेत संघ परिवार के नेत-ृत्व पर खुल्ला दावा है जो अब न विदेश मंत्री बतौर सक्रिय है और न देशहित में उनकी राजनयिक कोई भूमिका है और धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का पताका उठाते हुए भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करनेका ऐलान कर रही हैं वे।


    सुषमा स्वराज ने रविवार को लाल किला मैदान में गीता की '5151वीं वर्षगांठ' पर कहा था कि इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की बस औपचारिकता मात्र बाक़ी है।


    विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के  इस बयान पर विवाद धर्म बनाम धर्मनिरपेक्षता का फर्जी महाभारत छिड़ गया है और विपक्षी पार्टियों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।


    संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडे में फर्जी जिहाद के तमाम सिपाहसालारों की अपनी अपनी रंग बिरंगी दुरंगी भूमिका है और इसका खुलासा हम बार बार करते रहे हैं।


    कुल मिलाकर यह देश फिर वही महाभारत है और धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे हर कोई वध्य है जो निमित्त नियतिबद्ध हैं और सता के नस्ली वर्चस्व के लिए विधर्मी विदेशी हैं,भारतीय नागरिक हरगिज नहीं।


    इसी के बीच जो अमेरिका हम बनने को बेताब है ,उस जन्नत की हकीकत भी वहीं सनातन नस्लवागद है और अमेरिका में पुलिस के हाथों कई अश्वेत लागों की हत्या के विरोध में प्रदर्शन जारी है और न्यूयॉर्क में शनिवार को एक बड़े विरोध प्रदर्शन के लिए तैयारी चल रही है।


    समाचार एजेंसी एफे के अनुसार, अश्वेत लोगों की हत्या को लेकर पिछले बुधवार को शुरू हुआ प्रदर्शन लगातार पांचवे दिन रविवार को भी जारी रहा।


    ग्रैंड ज्यूरी द्वारा अफ्रीकी अमेरिकी एरिक गार्नर की हत्या के आरोपी पुलिस अधिकारी पर आरोप तय नहीं करने के फैसले के विरोध में शुरू हुआ प्रदर्शन दिनों-दिन व्यापक रूप लेता जा रहा है।

    काश्मीर आख्यान


    श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 1983 के बाद पहली बार किसी ने इस स्टेडियम में रैली करने की हिम्मत की है। मोदी ने कहा कि पहाड़ का पानी और जवानी देश के काम आना चाहिए। भाजपा ने इस रैली में एक लाख लोगों के जुटने का दावा किया है। मोदी ने कहा कि सरकार बनने के बाद मैं हर महीने जम्मू-कश्मीर आया हूं। पीएम ने कहा कि कश्मीर के लोगों के प्यार को मैं विकास के साथ वापस लौटाऊंगा। मोदी ने कहा कि कश्मीर में पानी से बिजली पैदा होगी, तो मुसीबत दूर होगी। मोदी ने कहा कि कश्मीर में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं ..


    बहराहाल,चुनाव नतीजे चाहे कुछ हो,हकीकत यह है कि काश्मीर में अभी उम्मीदें बाकी हैं जिसे आर्थिक सुधारों के अजबकि राष्ट्रीयझंडा लेकर संविधान मनाने वाले अश्वमेध से रौंदता जा रहा है नस्ली धर्मोन्मादी सत्तावर्ग।


    काश्मीर में राष्ट्रीय झंडे के साथ संविधान दिवस मनाने का तात्पर्य जिनके समझ में नहीं आया वे गौर करें कि जम्मू कश्मीर में प्रथम चरण के चुनाव में हुए रिकार्ड मतदान को दोहराते हुए दूसरे चरण में भी 71 फीसदी मतदान हुआ है।


    वहीं, अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार के आह्वान को 18 सीटों पर मतदाताओं ने फिर से नजरअंदाज कर दिया।


    इसके विपरीत,काश्मीर के सांबा में बोले नरेंद्र मोदी, नौजवान अब एके 47 नहीं, एंड्रायड वन चाहता है।वहीं, श्रीनगर में सोमवार को मोदी की रैली को देखते हुए अधिकारियों ने रैली स्थल पर 4,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया है।



    प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदीसोमवार को जम्मू-कश्मीरमें हैं। मोदी सांबा के विजयपुर में अपनी रैली को संबोधित कर चुके हैं। श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीरस्टेडियम में एक बड़ी रैली को भी संबोधित किया। बीजेपी नेताओं के मुताबिक इस रैली में 1लाख लोगों के पहुंचने की उम्मीद है।


     मोदी की रैली के दौरान शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम के आसपास सेना ने सुरक्षा बेहद कड़ी कर दी है और श्रीनगर शहर को किले में तब्दील कर दिया गया है।  खुद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर हर घंटे सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा कर रहे हैं


    यह बात कुछ समझने वाली नहीं है।


    बायोमेट्रिक डिजिटल देश में आंतरिक सुरक्षा का आलम यह और प्रधानमंत्री काश्मीर की बुनियादी समस्याओं को बिना छुए मुक्ताबाजारी हिंदुत्व राग अलपते हुए कहते हैंः सरकार में इरादा है, तो वह बदलाव ला सकती है, लेकिन जम्मू कश्मीर की सरकारों ने कभी जनता की परवाह नहीं की।


    सिर पर पगड़ी पहने हुए मोदी ने कहा कि मैं अभिभूत हूं कि मुझे प्रेमनाथ डोगरा की पगड़ी पहनाई गई। मोदी ने कहा कि भाजपा का मंत्री है सबका साथ, सबका विकास। मोदी ने कहा कि विस्थापितों का गुनाह क्या था, कि वो देश के लिए मर मिटने वाले लोग थे।

    कालाधन बाबा,कालाधन राजनीति


    मजा इस बात का भी लीजिये कि विदेशों से कालाधन वापस लाने के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए योगगुरु बाबा रामदेव ने अब मोदी सरकार को चेतावनी दी है। बाबा रामदेव ने कहा कि कालाधन वापस लाने के लिए जनता ने मोदी सरकार को मौका दिया है। एक वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक अगर सरकार कालाधन वापस लाने में किसी तरह की सुस्ती दिखाती है तो वह एक बार फिर रामलीला मैदान में उतरेंगे और पूरे देश में आंदोलन करेंगे। हालांकि रामदेव ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वादे पर पूरा भरोसा है।


    ये वे बाबा हैं जो बुरका पहनकर रामलीला मैदान से भागे थे और भ्रष्टाचर विरोधी कालाधन वापस लाओ ब्रिगेड के अन्यतम सिपाहसालार हैं।


    इस ब्रिगेड का आधा अब सत्तादखल के लिए संघ परिवार से साझा के लिए शिवसेना मोड में है।आधा हकीकत आधा फसाना अजब गजब अफसाना है।


    मोदी की आराधना है तो भाजपा के खिलाफ गाना बजाना है और सत्ता में शामिल हो जाना है।


    आधा ब्रिगेड अन्ना और क्रेन बेदी हैं जो भाजपी न्त्थी है।


    अब कालाधन का किस्सा भी यह कि स्विटजरलैंड सबूत मांग रहा है और मारीशस हांगकांग के रास्ते कालाधन सफेद होकर विदेशी निवेशको की आस्था के साथ साथ ग्लोबल हिंदुत्व है और वही नहीं,अमेरिका इजराइल की अगुवाई में हिटलर मुसोलिनी के अधूरे काम यानी अनार्यों के सफाया का एजंडा है।


    बहरहाल,स्विट्जरलैंड ने भारत से साफ कहा है कि वह काले धन पर सबूत के साथ आएं। विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए भारत के लगातार बढ़ रही तथाकथित कोशिशों के बीच स्विट्जरलैंड ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले में किसी तरह के 'टटोलने के अभियान' में सहयोग नहीं करगा। स्विट्जरलैंड का कहना है कि भारत के अधिकारी अपनी स्वतंत्र जांच किए बिना स्विस बैंकों में सभी भारतीय खाताधारकों के नाम की जानकारी नहीं मांग सकते है।


    तो बाबा फिर देश परिक्रमा के तेवर पर हैं और चूंकि वे अपनी कंपनियों के सीईओ है तो देश के सीईओ के खिलाफ उनकी इस ब्रांड बूस्टिंग सफारी का पाठ मौजूदा सत्ता विमर्श और समीकरण व्याकरण को समझने में मददगार होगा जरुर।


    मत चूको चौहान।


    सोलह दिसंबर का जश्न

    द्रोपदी न होती तो महाभारत न होता।


    दरअसल असली कुरुक्षेत्र तो द्रोपदी की देह पर ही लड़ा गया।


    उसी द्रोपदी देहे किंतु कुरुक्षेत्रे धर्मक्षेत्रे जन्म जन्मातर कर्मफल नियतिबद्ध निमित्तमात्र कोवद्य़बना देने का गीता प्रवचन है जो भगवान के बोल हैं,वे दरअसल नवनाजीवादी विमर्श हैछगैरजरुरी विजातीय जनसंख्या का सफाया।


    स्त्री देह आखेट ही महाभारत का प्रस्थानबिंदू है तो मनुस्मृति का स्त्री को शूद्र बताने का विधान ही हिंदुत्व है तो हिंदू साम्राज्यवाद की नींव भी वही भागवत गीता है जिसे एक दूसरी कलिकालीन स्त्री राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की प्रस्तावना कर रही हैं।


    सारे कांड लंकाकांड से लेकर अयोध्या कांड राजधानी के गर्भनाल से जुड़े हैं,जहां बांग्ला बोलने वाले तमाम लोग बांग्लादेशी है तो नेपाली गुरखे हैं और बाकी हिमालय के लोग रंगरुटों और बर्तन मांजो जमात है और स्त्री देह आखेट है।


    सोलह दिसंबर का जश्न अब भी जारी है।


    बलात्काकांड की वजह से मृतात्माओं के महानगर,जहां आधा महानगर समाधियों,मकबरों और तन्हा तन्हा आलीशान महलों का है,राजधानी नई दिल्ली में नये साल का जश्न फिर सोलह दिसंबर बतर्ज मनाया जा रहा है।


    हमने कल ही बंगालभर में स्त्री उत्पीड़न की घटनाओं को ब्लागों में डाला और आज फिर वहीं खेल दिल्ली में खुल्लमखुल्ला।


    राजधानियों में तो बलात्कार सत्ता का महोत्सव है और राजधानियों से बहुत दूर यह रोजमर्रे की हकीकत है।


    अगर स्त्री उत्पीड़न की सारी वारदातें दर्ज हों तो देशभर के सारे अखबारों के पन्ने कम पड़ जायेंगे।सारे अखबारों में तब रवींद्र सरोवर नजर आयेगा।


    रोज पूर्वोत्तर के बच्चों के बच्चों पर हमले होते हैं तो रोज बलात्कार भी होते हैं और रोज रोज मोमबत्ती जुलूस भी निकलते हैं और जंतर मंतर में किसी न किसी का धरना प्रदर्श होता है।जनपथ से लेकर संसद और संसद से लाइव टीवी परदे पर रात दिन चौबीसों घंटे सातों दिन विचित्र किस्म के नुक्कड़ नाटक होते हैं।


    सत्ता विमर्श में तस्वीर का यह दूसरा रुख है जो बेपर्दा होता नहीं है।


    दरअसल हम इस नस्ली पुरुषतांत्रिक समाज में स्त्री देह के आखेट को ही सफलता का चरमोत्कर्ष मानते हैं और रूपहले माध्यमों का कथासार भी यही है,जहां जिंदगी की आहटें बमश्किल दर्ज हो पाती हैं।


    समूचा साहित्य अब अनंत देहगाथा है।सारी विधायें अब नंगी स्त्रीदेह है।कला का चरमोत्कर्ष भी फिर वही वस्त्रहरण।


    स्त्रीविरुद्धे भोग की अनंत रात है,जिसी तपिश से हम जी रहे हैं और मर भी रहे हैं,जो दरअसल घर घर की कहानी भी है।


    क्योंकि सेक्सस्लेव औरतें ही सती सावित्रियां हैं और इसी सतीत्व प्रतिमान के तहत स्त्री का अस्तित्व ही पल छिन पल छिन दांव पर लगा है।इसीलिए जिंदगी उसके लिए पल पल मरण है।


    पुरुषतांत्रिक समाज,नस्लभेदी ,रंगभेदी,जातिवादी समाज व्यवस्था में स्त्री को अपनी देह से मुक्ति तो मिलेगी नहीं,उसको अपनी देह बेचने की आजादी जरुर मिल सकती है और यह मर्दों के भोग के खातिर मुक्तबाजारी उत्तरआधुनिक विमर्श और सौंदर्यबोध दोनों हैं।


    हालात बदलते नहीं हैं और जैसे कि हमारे युवा साथी बीपी गौतम लिखते हैं कि कातिल बदल जाते हैं,खंजर बदल जाते हैं,हालात बदलते नहीं हैं।


    साहेब कयामत का मंजर यही है।


    जब तक न जागे खेत खलिहान,जब तक न जागे देश के नौजवान और जब तक इस पुरुषतांत्रिक मनुस्मृति के खिलाफ सेक्स दासी बना दी गयीं औरतें चहारदीवारियां लांघ कर मर्द सांढ़ संस्कृति के खिलाफ चित्रांगदा बनकर तमाम धनुर्धरों के खिलाफ हानीमून के लिए नहीं,बल्कि इस राज्यतंत्र को बदलने के लिए युद्ध शुरु नहीं करतीं तब तक हालात वहीं रहेंगे कि कातिल बदल जाते हैं,खंजर बदल जाते हैं,हालात बदलते नहीं हैं।


    ज़ी मीडिया ब्यूरो की इस खबर पर गौर करेंः

    नई दिल्ली: उबर टैक्सी रेप मामले में सरकार ने कड़ी कार्रवाई करते हुए उबर टैक्सी सर्विस सेवा बंद कर दी है। दिल्ली सरकार ने इस टैक्सी सेवा को फिलहाल बंद कर दिया है जिसपर तत्काल प्रभाव से रोक लग गई है। उबर टैक्सी में ही शुक्रवार को एक महिला से ड्राइवर ने रेप किया था। एक टैक्सी सेवा में रजिस्टर्ड ड्राइवर के दिल्ली में पैसेंजर से रेप करने के आरोप के बाद दूसरे कैब ऑपरेटर्स पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब यह सवाल खड़े हो रहे हैं कि दूसरी कैब सर्विस कितनी सुरक्षित है?

    शुक्रवार रात दिल्ली में एक महिला के साथ कथित तौर पर बलात्कार करने वाला 32 वर्षीय कैब चालक एक बार पहले भी बलात्कार के मामले में जेल जा चुका है। गौर हो कि रविवार को अपने गृहनगर मथुरा से गिरफ्तार किया गया शिवकुमार यादव पहले भी अपराधी रह चुका है। टैक्सी सेवा मुहैया कराने वाली अमेरिकी कंपनी उबेर इंडिया को दिल्ली पुलिस ने मामले की जांच में शामिल होने का निर्देश दिया। पुलिस ने उबेर इंडिया के अधिकारियों से पूछताछ भी की।

    दिल्‍ली पुलिस ने आज उबेर कैब सर्विस के अधिकारियों से पूछताछ की। रिपोर्ट के अनुसार, उबेर ने इस घटना के मद्देनजर अपने गुड़गांव ऑफिस को बंद कर दिया है।

    गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि घटना समाज पर एक धब्बा है और इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि मेरा मानना है कि इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक घटना नहीं हो सकती। हम इन घटनाओं से काफी दुखी हैं। कड़े कदम उठाने की जरूरत है। मंत्री ने कहा कि मौजूदा कानूनों को और असरदार तरीके से लागू किए जाने की जरूरत है तथा समाज में धारणा में बदलाव होना चाहिए। सोलह दिसंबर की सामूहिक बलात्कार घटना के दो साल पूरे होने से कुछ दिन पहले हुई इस घटना के कारण केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली दिल्ली पुलिस की आलोचना हो रही है।

    http://zeenews.india.com/hindi/india/delhi-cab-rape-govt-bans-uber-from-operating-in-the-city-with-immediate-effect/240994

    फिर जी कारोबार की ये खबरें बी देख लेंः


    देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई बैंक ने अगले साल एक जनवरी से बचत खाता धारकों के लिए अपने एटीएम शुल्क में बढ़ोतरी की घोषणा की है। नयी नियम के तहत बैंक के एटीएम का महीने में पांच बार मुफ्त उपयोग किया जा सकता है जबकि अन्य बैंकों के एटीएम का तीन बार मुफ्त उपयोग किया जा सकेगा।

    पॉस्को को लौह अयस्क का लाइसेंस देने के प्रस्ताव पर विचार

    केंद्र सरकार दक्षिण कोरिया की इस्पात कंपनी पॉस्को की ओड़िशा में 52,000 करोड़ रुपये की इस्पात परियोजना के लिए लौह अयस्क ढूंढने का लाइसेंस प्रदान करने के प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है। यह परियोजना करीब एक दशक से अटकी हुई है।

    'म्युनि बांड'के लिए जल्द ही नियम पेश करेगा सेबी'म्युनि बांड'के लिए जल्द ही नियम पेश करेगा सेबी

    घरेलू बचत को सही जगह निवेश करने में मदद एवं नए निवेश का एक माध्यम उपलब्ध कराने के लिए बाजार नियामक सेबी म्युनिसिपल बांडों को जारी करने एवं उन्हें बाजार में सूचीबद्ध कराने के लिए जल्द ही नियमों का एक मसौदा जारी करेगा।

    शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 77 अंक कमजोर

    एशियाई बाजार में तेजी के रख के बीच कारोबारियों द्वारा उच्चस्तर पर मुनाफावसूली किये जाने से बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स आज के शुरुआती कारोबार में 77 अंक कमजोर हो गया।

    योजना आयोग की जगह नए निकाय में राज्यों की बड़ी भूमिका होनी चाहिए: मोदीयोजना आयोग की जगह नए निकाय में राज्यों की बड़ी भूमिका होनी चाहिए: मोदी

    सहयोगपूर्ण संघीय व्यवस्था को मजबूत करने पर बल देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि योजना आयोग की जगह गठित किये जाने वाले नये निकाय में राज्यों की निश्चित रूप से बड़ी भूमिका होनी चाहिए।

    कनाट प्लेस में वाईफाई प्रयोग सफल: टाटा डोकोमोकनाट प्लेस में वाईफाई प्रयोग सफल: टाटा डोकोमो

    राष्ट्रीय राजधानी के प्रमुख कारोबारी स्थल कनाट प्लेस में वाई फाई सेवा को लोगों ने हाथों हाथ लिया है। टाटा डोकोमो ने यह दावा करते हुए कहा है कि वाई फाई सेवाओं के प्रति लोगों के उत्साह को देखते हुए वह कई अन्य स्थानों पर भी इस तरह की सेवा शुरू करने की योजना बना रही है।

    &#039;GDP वृद्धि दर: भारत ने इस साल चौंकाया, अगले साल भी करेगा बेहतर!&#039;'GDP वृद्धि दर: भारत ने इस साल चौंकाया, अगले साल भी करेगा बेहतर!'

    वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी सिटीग्रुप का कहना है कि आर्थिक मोर्चे पर भारत ने 2014 में 'वास्तव में चौंका'दिया और वह 2015 में भी ऐसा कर सकता है। इसके साथ ही फर्म ने का अनुमान है कि भारत की भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर मौजूदा वित्त वर्ष के 5.6 प्रतिशत से बढकर 2016-17 में सात प्रतिशत पर पहुंच जाएगी।

    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के 31 प्रस्तावों पर 16 दिसंबर को विचारप्रत्यक्ष विदेशी निवेश के 31 प्रस्तावों पर 16 दिसंबर को विचार

    सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के 31 प्रस्तावों पर 16 दिसंबर को विचार करेगी। इनमें रत्नाकर बैंक, नोवार्टिस हेल्थकेयर व एचडीएफसी बैंक के प्रस्ताव शामिल हैं।

    सबसे ज्यादा कालाधन जमीन जायदाद के कारोबार में: ICAIसबसे ज्यादा कालाधन जमीन जायदाद के कारोबार में: ICAI

    इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) ने कालेधन के खिलाफ तुरंत कदम उठाए जाने का आग्रह करते हुए कहा है कि कालेधन में भू-संपत्ति कारोबार सबसे अधिक योगदान है।

    एलआईसी ने सभी पॉलिसी रिकॉर्ड का किया डिजिटलीकरण

    भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) अपने सभी पॉलिसी रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण कर लिया है। कंपनी ने उसके द्वारा जारी सभी पालिसियों को इलेक्ट्रानिक या डीमैट रूप में डाल दिया है।

    मोदी इफैक्ट! शेयर बाजारों में विदेशी निवेश एक लाख करोड़ रुपए के पारमोदी इफैक्ट! शेयर बाजारों में विदेशी निवेश एक लाख करोड़ रुपए के पार

    नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद भारतीय शेयर बाजार सेंसेक्स और निफ्टी दिन-प्रतिदिन रिकॉर्ड तोड़ते हुए नई ऊंचाई को छू रहा है। मोदी सरकार के सकारात्मक कदमों के चलते विदेशी निवेशकों ने मौजूदा कैलेंडर वर्ष में अब तक देश के शेयर बाजारों में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया है।

    'उपभोक्ताओं को मिलेगा बिजली वितरण कंपनी चुनने का विकल्प'

    उपभोक्ताओं को जल्द ही अपनी बिजली आपूर्ति कंपनी चुनने का अधिकार मिल सकता है। सरकार बिजली अधिनियम में इस संबंध में आवश्यक संशोधन कर रही है। इन संशोधनों का मकसद वितरण क्षेत्र में ज्यादा प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना है।

    सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने के लिए और कदम उठाएंगे जेटलीसब्सिडी को तर्कसंगत बनाने के लिए और कदम उठाएंगे जेटली

    आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की प्रतिबद्धता के प्रति भारतीय उद्योग जगत को आश्वस्त करते हुए वित्त मंत्री अरण जेटली ने आज कहा कि सरकार सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने के लिए और कदम उठायेगी।

    सीडीएमए बैंड को 3,646 करोड़ प्रति मेगाहर्ट्ज मूल्य की सिफारिश

    दूरसंचार विभाग की एक समिति ने सीडीएमए स्पेक्ट्रम की नीलामी के लिये आधार मूल्य 3,646 करोड़ रुपये प्रति मेगाहर्ट्ज रखने का सुझाव दिया है। यह दूरसंचार नियामक ट्राई की सिफारिश से 17 प्रतिशत अधिक है।

    सोना और गिरा, आज की कीमत 26,675 रुपए प्रति 10 ग्रामसोना और गिरा, आज की कीमत 26,675 रुपए प्रति 10 ग्राम

    विदेशों में नरमी के रुख के बीच राष्ट्रीय राजधानी के सर्राफा बाजार में आज सोने के भाव 195 रुपये की गिरावट के साथ 26,675 रुपये प्रति 10 ग्राम रह गये। मौजूदा स्तर पर आभूषण और फुटकर विक्रेताओं की सुस्त मांग के कारण भी बहुमूल्य धातुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ गया।

    विदेशी मुद्रा भंडार 1.432 अरब डॉलर बढ़कर हुआ 316.311 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार 1.432 अरब डॉलर बढ़कर हुआ 316.311 अरब डॉलर

    देश का विदेशी मुद्रा भंडार 28 नवंबर को समाप्त सप्ताह में 1.432 अरब डॉलर बढ़कर 316.311 अरब डॉलर हो गया। इस वृद्धि का कारण विदेशी मुद्रा आस्तियों में वृद्धि होना था।

    बीएसएनएल का 1411 करोड़ रुपए का सरकारी ऋण माफ

    भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के वित्तीय संकट को दूर करने और उसके पुनरुद्धार के लिए उसके 1411 करोड़ रूपये के सरकारी ऋण को माफ कर दिया गया है।

    वैश्विक संकेतों के बीच सोना, चांदी की कीमतों में गिरावटवैश्विक संकेतों के बीच सोना, चांदी की कीमतों में गिरावट

    कमजोर वैश्विक रूख के बीच मांग कमजोर पड़ने से दिल्ली सर्राफा बाजार में आज सोने के भाव 30 रुपए की गिरावट के साथ 26,870 रुपए प्रति दस ग्राम रह गये। आभूषण निर्माताओं की घरेलू हाजिर बाजार में मांग घटने से बहुमूल्य धातुओं पर दबाव रहा।

    भारत ने विनिर्माण, सेवा क्षेत्र में चीन को पछाड़ा : HSBC

    भारत ने नवंबर में विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर में चीन को पीछे छोड़ दिया। हालांकि, उभरते बाजार के उत्पादन में लगातार दूसरे महीने गिरावट आई और यह छह माह के निचले स्तर पर आ गया। यह बात आज एचएसबीसी के सर्वेक्षण में कही गई।

    अमेरिकी कंपनी से 25 लाख टन गैस खरीदेगा गेल इंडिया

    देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक गैस वितरक गेल इंडिया लिमिटेड ने अमेरिकी कंपनी डब्ल्यूजीएल से 25 लाख टन गैस खरीद का अनुबंध किया है। यह अनुबंध 20 साल तक गैस खरीद के लिये किया गया है।

    सेंसेक्स 105 अंक टूटा, सात सप्ताह में पहली बार सप्ताहिक गिरावटसेंसेक्स 105 अंक टूटा, सात सप्ताह में पहली बार सप्ताहिक गिरावट

    आईटी, तेल एवं गैस तथा स्वास्थ्य कंपनियों के शेयरों में मुनाफावसूली से बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स आज करीब 105 अंक की गिरावट के साथ 28,458.10 अंक पर बंद हुआ। पिछले सात सप्ताह में यह पहली सप्ताहिक गिरावट है।

    http://zeenews.india.com/hindi/business







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  • 12/08/14--14:13: প্রিয় বন্ধু, অন্ত্যজ জীবনের রূপকার বরেণ্য কথাশিল্পী অনিল ঘড়াই আর নেই। জাত কেউটের মতই জাত লেখক ছিলেন অনিল ঘড়াই। জাতে কিন্তু ছিলেন হাড়ি। অন্ত্যজ, ব্রাত্য, দলিত। অতি দলিত। কিন্তু দলিত জীবনের কোনো হীনমণ্যতা তাঁকে কোথাও স্পর্শ করতে পারেনি। অন্ত্যজ জীবনের সমাজবাস্তবকে তুলে ধরতে তিনি আমার মতে অনেক বড় বড় বাংলা লেখকের তুলনায় অনেক বেশি ক্ষমতার পরিচয় দিয়েছেন তাঁর প্রতিটি লেখায় বিশেষকরে ছোটগল্পে।পরিযান প্রমাণ।
  • প্রিয় বন্ধু,অন্ত্যজ জীবনের রূপকার বরেণ্য কথাশিল্পী অনিল ঘড়াই আর নেই।

    জাত কেউটের মতই জাত লেখক ছিলেন অনিল ঘড়াই। জাতে কিন্তু ছিলেন হাড়ি। অন্ত্যজ, ব্রাত্য, দলিত। অতি দলিত। কিন্তু দলিত জীবনের কোনো হীনমণ্যতা তাঁকে কোথাও স্পর্শ করতে পারেনি। অন্ত্যজ জীবনের সমাজবাস্তবকে তুলে ধরতে তিনি আমার মতে অনেক বড় বড় বাংলা লেখকের তুলনায় অনেক বেশি ক্ষমতার পরিচয় দিয়েছেন তাঁর প্রতিটি লেখায় বিশেষকরে ছোটগল্পে।পরিযান প্রমাণ।

    পলাশ বিশ্বাস


    যা ছিলেন

    যা হয়েছিলেন

    জাত কেউটের মতই জাত লেখক ছিলেন অনিল ঘড়াই


    জাতে কিন্তু ছিলেন হাড়ি। অন্ত্যজ,ব্রাত্য,দলিত। অতি দলিত। কিন্তু দলিত জীবনের কোনো হীনমণ্যতা তাঁকে কোথাও স্পর্শ করতে পারেনি। অন্ত্যজ জীবনের সমাজবাস্তবকে তুলে ধরতে তিনি আমার মতে অনেক বড় বড় বাংলা লেখকের তুলনায় অনেক বেশি ক্ষমতার পরিচয় দিয়েছেন তাঁর প্রতিটি লেখায় বিশেষকরে ছোটগল্পে।


    সাতের দশকের যে শক্তিমান লেখকদের কথা বাজারি লেখায় ছয়লাপ বাংলা সাহিত্যভুলে যেতে চলেছে,অভিজিত সেনগুপ্ত,শৈবাল মিত্র,অমর মিত্র,ভগীরথ মিশ্রদের সেই প্রজন্মের লেখদের সমকক্ষ ছিলেন অনিল ঘড়াই।


    অতি আফসোসের সঙ্গ লিখতে হচ্ছে যে বাংলা তাঁকে তাঁর প্রাপ্য সম্মানটুকু থেকে বন্চিত করল। টুকরো খবরে এবং কলকাতার কচড়ায় নামমাত্র উল্লেখ করে ষাটটির বেশি বইয়ের লেখকে সম্মান জানানো হল।


    অন্ত্যজ জীবনের রূপকার বরেণ্য কথাশিল্পী অনিল ঘড়াইআর নেই। বিগত 23 শে নভেম্বরে কলকাতার এক নার্সিংহোমে তিনি শেষ নিঃশ্বাস ত্যাগ করেন। তাঁর বয়স হয়েছিল ৫৭ বছর।


    নদিয়ার কালীগঞ্জের আদি বাড়িতে তাঁর শেষকৃত্য সম্পন্ন হয়েছে।


    তারপর কোনো লেখা তাঁকে নিয়ে আমার চোখে পড়েনি।


    আশা করব অন্ততঃ বাংলা লিটিল ম্যাগ তাঁকে স্মরণ করবে এবং বইমেলায় হয়ত আমরা কিছু লেখায় অনিল ঘড়াই ও তাঁর সমকালকে আবার ফিরে দেখতে পারব।


    অনিলের মত আমি ক্ষমতাবান বাংলা লেখক নই।উদ্বাস্তুর ছেলে।পড়াশুনা হিন্দিতে বা ইংরাজিতে।হিন্দি কাগজে কাজ করি। লেখালেখি ইংরেজিতে করার অভ্যাস আছে।


    লেখা আমার পিতৃদায়,যেহেতু তিনি সারা ভারতে অন্তযজ উদ্বাস্তুদের নিয়ে সারা জীবন লড়াই চালিয়ে গিয়েছেন এবং বাংলার বাইরের বাঙালিদের নিয়ে বাঙালির আদৌ কোনো মাথাব্যথা নেই।তাই আমায় মাঝে মাঝে বাংলা লেখার চেষ্টা করতে হয়।


    বাংলায় লেখা অনিলের বরং জলভাত ছিল।ব্যাপক ছিল তাঁর পাঠক সমাজ এবং যত্ন করেই তাঁর বই প্রকাশকরা ছাপতেন।বাংলায় কোনো ভাষাতেই আমার লেখা ছাপা হয় না।কোনো দিনও হবে না।


    তবু অনিল ঘড়াইকে নিয়ে একটি অতি দীর্গ লেখা বহুকাল আগে লিখেছিলাম।সুস্নাত জানা সমাপাদিত বইয়ের জন্য।অনিল ঘড়াই বিশেষ করে আমায় লিখতে বলেছিলেন।জানি না,আদৌ সে লেখা ছাপা হল কিনা।লেখার পর আমি আগামী লেখায় চলে যাই।আগের লেখা ছাপা হল কিনা খোঁজ করিনা।


    ঔ লেখায় তাঁর পরিযান বইখানির সব গল্প নিয়ে লিখেছিলাম।

    আমি তারাশন্করের বিখ্যাত সব বই পড়েছি,পড়েছি মাণিক বন্দোপাধ্যায়ও, যাদের লেখায় অন্ত্যজ জীবনের ইতিকথা লেখা আছে বলে দাবি করা হয়।সেখানে অন্ত্যজ জীবনের যৌণতার বিবরণ অনেক মিললেও তাঁদের জীবন জীবিকার খুঁটিনাটি অনুপস্থিত বলেই আমার মনে হয়েছে।সচেতন প্রচেষ্টা সত্বেও প্রামাণিকতার অভাব মনে হয়েছে ছত্রে ছত্রে।


    অনিল ঘাড়াইয়ের লেখায় কিন্তু সেই সমাজবাস্তব ছিল যা আমি বাংলাদেশি লেখকদের লেখায় দেখতে পাই।


    কিন্তু নবারুণদা অন্ত্যনা হয়েও,পা থেকে মাথাপর্যন্ত আগাগোড়া আরবন হয়েও অন্ত্যজ ও ব্রাত্যজীবনের যে সংগ্রামকে ভাষা দিতে পেরেছেন.সেটা অনিলের লেখাতেও পাইনি।আসলে সেই লড়াইয়ে অনিল ছিলেনই না কোথাও,তাঁর সমাজবাস্তবের দৃষ্টিপাত তাই আমাকে তাঁর কাছ থেকে দুরে সরিয়ে রেখেছে।


    ১৯৯৪ সালে দলিত সাহিত্যের জন্য রাষ্ট্রপতির হাত থেকে পেয়েছিলেন সংস্কৃতি পুরস্কার।বাংলা দলিত সাহিত্য আন্দোলনও তাঁকে পুরস্কৃত করেছিল,বোধহয় 2002 সালেকাঁথিতে সেই বাংলা দলিত সাহিত্য সম্মেলনে আমি প্রথম ও শেষবার গিয়েছিলামতারপর বইমেলা ছাড়াও কোলকাতায় অনেক অনুষ্ঠানে দেখা হয়েছে।কিন্তু সেই শেষ।


    দলিত সাহিত্য সম্মেলনে রাজনৈতিক দলাদলি দেখে আমার আর ওদের সঙ্গে ওঠা বসা হয়নি এবং কোনো কালই দলিত সাহিত্যকি হিসাবে চিন্হিত হতে চাননি অনিল ঘড়াইও।


    আমার এখনো আশ্চর্যা হয় যে কোন যে তাঁকে সেবার পুরস্কার দেওয়া হল এবং কানই বা তিনি নিতে গেলেন।তিনি ত মেইন স্ট্রিমের লিখক হতে সাদ্যমত চেষ্টা করেছিলেন এবং তাঁ বড় লেখক হয়ে ওঠার যথেষ্টই সম্ভাবনা ছিল।


    আমি নাগরিকত্ব সংশোধণী আইন পাশ হওয়ার পর থেকে কোলকাতায় সেই 2003 সাল থেকে কোথাও বইমেলা বা অন্য কোনো অনুষ্ঠানে যাইনা।মাঝে ভাষাবন্ধনে যুক্ত থাকার জন্য হয়ত একাধবার গিয়েছি।


    তাই অনিল ঘড়াইয়ের কোনো সংবাদ আমি জানতাম না।কয়েক মাসের বন্ধুত্বের জন্য তাঁকে প্রিয় বন্ধু লিখলাম,জানিনা সে অধিকার আমার আছে কিনা।


    তাঁর প্রয়াত হওয়ার খবরও ঔ টুকরো খবর থেকে জানা।আমাকে কেউ জানাননি।কত লোক জনতে পেরেছেন,তাঁর পাঠকদের সবাই জানেন কিনা ধন্দে আছি।


    তাই অন্ততঃ বাংলার বািরের পাঠকদের জন্য এই লেখার প্রয়োজন মনে হয়েছে।বাংলায় অনিলের অনেক বন্ধু আছেন, যারা আশা করি ভালোভাবে সময়মত অনিলকে স্মরণ করবেন এবং অবশ্যই তিনি তাঁর প্রাপ্যসম্মান থেকে বন্চিত হবেন না৷‌


    অনিল ঘড়াইয়ের জন্ম ১৯৫৭ সালে মেদিনীপুর জেলার এগরা থানার অম্তর্গত রুশিতাংশণীপুর গ্রামে৷‌ তাঁর শৈশব, কৈশোর ও যৌবনের অনেকটা সময় কেটেছে নদীয়া জেলার কালীগঞ্জে৷‌


    পিতা অভিমন্যু ঘড়াই ও মাতা তিলোত্তমা ঘড়াই।

    মৃত্যুকালে বয়স হয়েছিল ৫৭ বছর৷‌


    রেখে গেছেন দুই মেয়ে ও স্ত্রীকে৷‌

    নদিয়ার কালীগঞ্জের আদি বাড়িতে তাঁর শেষকৃত্য সম্পন্ন হয়েছে।


    গত ৮ মাস ধরে কিডনি জনিত সমস্যায় ভুগছিলেন এই সাহিত্যিক। তাঁর ঘনিষ্ঠ বন্ধু আর এক সাহিত্যিক নন্দদুলাল রায়চৌধুরী বলেন, "সাহিত্য-সংস্কৃতির বড় ক্ষতি হয়ে গেল।"




    ২৭ বছর বয়সে চক্রধরপুরে রেলের ইঞ্জিনিয়ার পদে যোগ দেন তিনি। ১৯৮৫ সালে খড়্গপুর রেল বিভাগে বদলি হন। ১৯৯০ সালে তাঁর প্রথম ছোটগল্প প্রকাশ হয় 'দেশ'পত্রিকায়। নদিয়ার রাজোয়াড় বিদ্রোহ নিয়ে লেখা উপন্যাস 'অনন্ত দ্রাঘিমা'২০১০ সালে বঙ্কিম স্মৃতি পুরস্কার পায়। ১৯৯৪ সালে দলিত সাহিত্যের জন্য রাষ্ট্রপতির হাত থেকে পেয়েছিলেন সংস্কৃতি পুরস্কার।


    তাঁর নুনবাড়ি, আকাশ মাটির খেলা, কাক, পরিযান-সহ বহু লেখা সাহিত্যপ্রেমী মনে রেখেছেন। রেলশহরের কবি-সাহিত্যিকদের নিয়ে তিনি গড়েছিলেন 'ঘরোয়া সাহিত্য বাসর'।


    কৃষ্ণনগর কলেজ থেকে ইলেকট্রিক্যাল ইঞ্জিনিয়ারিংয়ে ডিপ্লোমা করেন। দক্ষিণ-পূর্ব রেলওয়েতে আধিকারিক হিসেবে চাকরি করতেন। চাকরিসূত্রে চক্রধরপুর ও পরে খড়্‌গপুরে বসবাস করতেন।


    তাঁর প্রথম গল্পগ্রন্থ কাক এবং প্রথম উপন্যাস নুনবাড়্থি। তার গল্প, উপন্যাস ও কবিতা মিলিয়ে গ্রন্থের সংখ্যা পঞ্চাশেরও বেশি। অনিল ঘড়াইয়ের সাহিত্যের মূল সম্পদ দলিত, নিম্নবিত্ত ও শ্রমজীবী মানুষের জীবনচর্যা। নদীয়া ও মেদিনীপুরের গ্রামীণ মানুষ ও তাদের কথ্যভাষা যেমন উঠে এসেছে তাঁর রচনায়, তেমনি চক্রধরপুরে বসবাস করার সুবাদে সিংভূম অঞ্চলের কথ্যভাষাসহ সেখানকার মানুষের জীবনের ছবি পাওয়া যায় তাঁর সাহিত্যে।


    হিন্দী ও ইংরেজি ভাষাতেও প্রকাশিত হয়েছে তাঁর কয়েকটি গ্রন্থ।


    দীর্ঘদিন থেকে কিডনির অসুখে ভুগছিলেন তিনি। কিন্তু অসুস্থ অবস্থাতেও সমানে চালিয়ে গেছেন তাঁর সাহিত্যকর্ম, 'তূর্য'পত্রিকার সম্পাদনা ও অন্যান্য কাজ। মানুষের প্রতি আন্তরিক ব্যবহার ছিল তাঁর চরিত্রের একটি উজ্জ্বল দিক।


    প্রথম প্রকাশিত উপন্যাস 'নুনবাড়ি'এবং গল্প-সঙ্কলন 'কাক'থেকেই তাঁর স্বাতন্ত্র্যচিহ্নিত সাহিত্য-পথের যাত্রাশুরু৷‌ যে যাত্রাপথে জীবনের বিস্তৃত পরিসর, মানসিক টানাপোড়েন, খুঁটিনাটি উঠে এসেছে বারবার৷‌ ষাটেরও বেশি বইয়ের রচয়িতা এই সাহিত্যিক তাঁর 'অনম্ত দ্রাঘিমা'-র জন্য পেয়েছেন বঙ্কিম পুরস্কার৷‌ ঔপন্যাসিক ও গল্পকার পরিচয়ের আড়ালে প্রয়াত সাহিত্যিকের ছিল এক কবি-মন৷‌ কবিতা ছিল তাঁর প্রথম প্রেম৷‌ কবিতার জন্য পেয়েছেন 'আকাশ সাহিত্য পুরস্কার'এবং 'কবি নিত্যানন্দ পুরস্কার'৷‌ কথাসাহিত্যে বিশেষ অবদানের জন্য পেয়েছেন সোমেন চন্দ পুরস্কার, তারাশঙ্কর পুরস্কার, মাইকেল মধুসূদন পুরস্কার, তিস্তা-তোর্সা সম্মান-সহ একাধিক পুরস্কার ও সম্মান৷‌ তাঁর পরিচিত গল্প-উপন্যাসের মধ্যে রয়েছে 'পরীযান ও অন্যান্য গল্প', 'ভারতবর্ষ', 'কামকুঠিয়া', 'ফুলপরী', 'জন্মদাগ', 'নীল দুঃখের ছবি', 'সামনে সাগর', 'দৌড়বোগাড়ার উপাখ্যান', 'বনবাসী', 'জার্মানের মা', 'লোধগ্রামে সূর্যোদয়'প্রভৃতি৷‌

    তাঁর কিছু বইঃ

    • Kak

    • The Stories of the Downtrodden

    • Poradhin

    • Agun

    • Gyanbrikkher phol

    • Germaner ma

    • Bharatbarsha

    • Garba dao

    • Noon Bari

    • Parijaan O Annanyo Galpo

    • Bababashi

    • Ekkanota Golpo

    • Koler Putul

    • Migh Jiboner Trishna

    • Ananta Draghima

    • Swapner Khorapakhi

    • Shreshto Golpo

    • Bokrorekha

    • Nil Dukkher Chobi

    • Khela Ghor

    • Antaja Premer Golpo

    • Swet Poddo

    • Nuna Samader Golpo

    • 25Ti Nirbachito Golpo

    • Biparit Juddhyer Mohora

    • Chaitrophul



    মাটির সেতু

    অনিল ঘড়াই এর লেখার জীবন্ত নমুনা তাঁর এই ছোটগল্পটি

    কানের কাছে একটা মশা উড়লে আজকাল ভয় পায় রিতা। ভয়টা যে কোথা থেকে আসে সে নিজেও জানে না। এই ভয়ের কথা সে কারও কাছে মুখ ফুটে বলতে পারে না। কতবার ভেবেছে, বলবে। পারেনি। গুটিয়ে যাওয়া কেন্নোর মতো তার তখন শরীর। কুলকুল করে ঘামে। গলা শুকোয়। ফ্রিজের জল খেলেও হৃদপিণ্ডের গতি স্বাভাবিক হয় না। তন্ময়কে জাগিয়ে দিয়ে সে তখন উদ্‌ভ্রান্ত স্বরে বলে ওঠে, অ্যায়, শুনছ ?

    তন্ময়ের ঘুম ভাঙলে ভাল, নইলে আবার একা হয়ে যায় রিতা। ভয়টা মাকড়সার জাল বোনে তার মনে। বিষাক্ত লালায়, ভাবনায় ভরে ওঠে তার মন। এই প্রথম নয়, অনেক দিন থেকেই এমন অনুভূতি তাকে কুরে কুরে খায়। হিম করে দেয় রক্ত।

    তুয়া এখন ঘুমোচ্ছে অঘোরে। দেওয়াল ঘড়িতে একটা বাজার সংকেত দেয়। থানায় ঘণ্টা বাজিয়ে দেয় নাইট-গার্ড। তুয়ার শরীর ছুঁয়ে এক দৃষ্টিতে তাকিয়ে থাকে রিতা। এখনও এক বছর বয়স হয়নি মেয়েটার। সাত মাসে অন্নপ্রাশন হল। সেই আনন্দের দিনে ঠিক এমনই একটা ভয় পিচ্ছিল হিম সাপের মতো পেঁচিয়ে ধরেছিল রিতার শরীর। সেদিনও পাশে তন্ময় ছিল। তার ঘেমো মুখের দিকে তাকিয়ে তন্ময় প্রথমে কিছু আন্দাজ করতে পারেনি। কিছু পরে ঠেলা মেরে সে বলেছিল, অ্যায় রিতা, তোমার কি শরীর খারাপ ?

    — না, মানে...

    কী হয়েছ বলবে তো ?

    — কী বলবে রিতা। শুধু ফ্যালফ্যাল করে তাকাল। বাড়ি ভর্তি লোকের মাঝখানে 'ভয়'শব্দটার কোনও স্থান নেই। মুখ ফসকে কিছু বলে ফেললেই সবাই সন্দেহের চোখে তাকাবে। ভাববে— পাগল। সবার সামনে সে ছোট হতে পারবে না। এতে তন্ময়ের মান-সম্মান জড়িয়ে আছে। সেদিনও কেমন চুপচাপ হয়ে গিয়েছিল রিতা। কাঁটা গেলার চেয়ে অস্বস্তিকর অনুভূতি নিয়ে সে কোনও মতে সামাল দিয়েছিল পরিস্থিতি। অথচ ছোটবেলা থেকে সে নাকি অনেক সাহসী। বাথরুমে পড়ে গিয়ে তার মা'র যখন ষ্ট্রোক হল— তখন সেই বিপদের সময় রিতাই ডায়াল ঘুরিয়ে ডেকে এনেছিল ডাক্তার। রমা তবু বাঁচেনি। মরার আগে সে নাকি রিতার হাত ধরেছিল শক্ত করে। পরে যখন হাত ছাড়াতে যায়— তখন কী করুণ অবস্থা। সবাই ভয় পেলেও রিতা সেদিন ভয় পায়নি। রীতিমতো গায়ের জোরে সে হাতটা ছাড়িয়ে নিয়েছিল মায়ের মুঠি থেকে। এ ঘটনা বেশি দিনের নয়। মাত্র চার বছর আগের। কেমিষ্ট্রি-অনার্স পাশ করার পর তার বিয়ে হয়ে গেল তন্ময়ের সঙ্গে। তন্ময়ের বদলির চাকরি। রিতা তার সঙ্গে সঙ্গে ঘোরে। এই তো বছর খানেক আগে তারা ধানবাদে ছিল। শাশুড়ি চিঠি লিখতেন, সাবধানে থাকবে। তন্ময়ের শরীরের প্রতি নজর রেখো। সব ঠিক ছিল তবু কোথায় যেন একটা ফাঁক। আর সেই ফাঁক দিয়ে হিমেল রাতের সিঁধেল চোরের মতো ঢুকে এসেছে ভয়। আজকাল রিতা বড় মনমরা। সে একা থাকতে ভালবাসে। কখনও-সখনও রমার মৃত্যু দৃশ্য তার চোখে ভাসে। একটা ঠাণ্ডা হাত শক্ত করে ধরে আছে রিতার হাত। ছাড়বে না কিছুতেই। সঙ্গে নিয়ে যাবে। রিতা যাবে না, তবু জোর করে নিয়ে যাবে। রিতা ভাবে মৃত্যুর আগে বা পরে সবাই কি অমন স্বার্থপর হয়ে ওঠে ?  যে মা তাকে এত ভালবাসত— সে কেন অমন ভাবে তার হাত দুটো আঁকড়ে ধরল ?  স্বপ্নে কতবার যে রিতা ছটফট করেছে। সে কিছুতেই মায়ের সঙ্গে পারছে না। তাকে হারিয়ে দিচ্ছে মা। একটা খাদের কিনারায় এসে দাঁড়িয়েছে সে। কেউ ফুঃ দিলে সে বুঝি তলিয়ে যাবে। 'আঃ!'এই অস্ফূট আর্তনাদ রিতার বুকে কান পাতলে তন্ময় বুঝি শুনতে পাবে। তবু কেন নির্বিকার তন্ময় ?  তা হলে সব শুনেও সে কি চুপ করে আছে।

    মশারি উঠিয়ে জানলার কাছে এসে দাঁড়াল রিতা। বাইরে বেশ ফুরফুরে হাওয়া। বসন্তের এই হাওয়া গায়ের ঘাম চেটে খায়। রিতার আরামবোধ হয়। তার দু'চোখ থেকে ক্রমশ সরে যাচ্ছে ভয়। হাওয়ায় প্রজাপতির ডানা ঝাপটানোর মতো নড়ছে সিন্থেটিক পর্দা। সে নিজে পছন্দ করে কিনেছে। ঘর সাজাতে ভালবাসে বলেই ঘরের প্রতি তার এত নজর। তন্ময়েরও এতে সায় আছে। রিতা এ সব ব্যাপারে সুখী। তন্ময়ের মা তার কোনও কাজে দখলদারি দেয় না। বরং উৎসাহ দেয়। শ্বশুর তো মাটির মানুষ। ভগবান তুল্য। যা সে রেঁধে দেবে ভোগের প্রসাদ ভেবে খেয়ে নেবে তৃপ্তিতে। অথচ রিতা জানে— তার রান্না মোটেও আহামরি নয়। রান্নার বই পড়ে রান্না শেখা— সে তো এক ধরনের পুতুলখেলা। এত খেলা-খেলা সুখ তবু কেন ভয়ের অসুখ ?  তন্ময়কে সে কতদিন বলেছে, জানো, এখানে থাকতে আমার একদম ভাল লাগে না। তোমাদের বাড়িতে এলে আমার মুখের হাসি কে যেন চুরি করে নিয়ে যায়।

    — সে কী, এ তো বড় ডেঞ্জারাস রোগ! তন্ময়ের চোখে-মুখে রসিকতা, শ্বশুরবাড়ি কোন মেয়েরই বা ভাল লাগে! আমার মায়েরও ভাল লাগেনি; তোমারও ভাল লাগবে না এ তো জানা কথা!

    — তুমি হালকা ভাবে নিও না, প্লিজ। আমি আর পারছি না।

    — কেন, কী হয়েছ ?

    — এখানে এলে আমার দম বন্ধ হয়ে আসে। রিতা হাঁপায়।

    — সাউথ ফেস রুম। তাতেও তোমার দম বন্ধ হয়ে যাচ্ছে ?

    রিতা আলতো ভাবে নিজের চুলের গোড়া চেপে ধরে, তোমার ছুটি শেষ হতে আর ক'দিন বাকি ?

    — পাঁচদিন পরেই চলে যাব।

    — পাঁচদিন নয়, আজই চলো।

    — এত তাড়াহুড়োর কী আছে! ছুটিই পাই না। বহু কষ্টে ম্যানেজ করতে হয়েছে, বুঝলে!

    রিতা মুখ ঝুঁকিয়ে চলে যায় পাশের ঘরে, তন্ময় তার এই ব্যাকুলতার কোনও অর্থ আবিষ্কার করতে পারে না। যত দিন যায়, ততই যেন শুকিয়ে যায় রিতা। তার ঠোঁটের হাসি ভয় এসে চুরি করে নিয়ে গেছে।এ কথা সে কাকে বলবে ?  সে ভেবেছিল— তুয়া আসলে সব ঠিক হয়ে যাবে। তা-ও হল না। এখন ভয়টা তুয়ার জন্যও। অতটুকুন মেয়ে, সবে দু'একটা কথা শিখছে। হা করে শুনতে চায় আশেপাশের শব্দ। সব শব্দ কি তুয়ার শ্রবণযোগ্য। এই যে বাতাসের শিস ভূতের মতো খেলে যাচ্ছে সারা ঘরে, ভাগ্যিস তুয়া ঘুমিয়ে আছে— না হলে নির্ঘাৎ সে শুনতে পেত। রিতা চায় না তুয়াও একই অসুখে ভুগুক। ভয়টা ভাইরাস। একবার আক্রান্ত হলে ছড়িয়ে পড়বে। বাইরে মৃদু জ্যোৎস্না আছে। চারদিক বেশ নিঝুম। সামান্য হিমেল আমেজ। শীত যেন গিয়েও যাচ্ছে না। কেন যে শীত আসে, বিশ্রী! রিতা খসে পড়া আঁচলটা বুকের উপর টেনে আনে। এখানে এসে সে নাইটি পরে না। শাশুড়ির শান্ত চোখ দুটো কেমন ড্যাবা-ড্যাবা হয়ে যায়। মন দিয়ে সিঁদুর পরে, না হলে সেই একই দৃশ্য! ক'দিনের তো মামলা। মানিয়ে নিতে হয়। জোর করে হাসতে হয়। না হলে অশান্তি। যাকে বলে 'গুড গার্ল'রিতা তাই হয়ে থাকতে চায় সবার কাছে। তার মা বলতেন, কাউকে আঘাত দিবি না, আঘাত দিলে তা ফিরে আসে। এখন, এই নিঝুম রাতে কোথায় যেন একটা কুকুর ডেকে ওঠে। বড় অদ্ভুত সেই ডাক। গায়ের লোমগুলো যেন খাড়া হয়ে ওঠে। রোজ রাতে কি এই কুকুরটা এমন তারস্বরে কাঁদে ?  রিতা আবার কেমন কুঁকড়ে যায়। সাদা হয়ে ওঠে চোখের জমি। তন্ময়ের ঘুমের কপাল ভাল। না জাগালে রোদ মুখে না পড়লে তার ঘুম ভাঙে না। নাইট-ল্যাম্পের আলোয় পুরো ঘর এখন নীল সমুদ্র। রিতা শুধু ঢেউ গুনছে। আর হাঁপিয়ে উঠছে। তার বয়সও হচ্ছে। কেউ তার কথাকে কোনও গুরুত্ব দিচ্ছে না। সবাই নিজের কথাটাই বেশি করে ভাবছে। এই দোতলা বাড়িটায় কেউ বুঝি নিঃশব্দে ঘোরাফেরা করে! রিতা নাক টেনে গন্ধ শোঁকার আপ্রাণ চেষ্টা করে। দেওয়াল ঘড়িটার টিক-টিক শব্দ তার বুকে ভয়ের হাতুড়ি ঠুকে দেয়। রিতার চোয়াল শক্ত হয়ে ওঠে। তার যত রাগ তন্ময়ের উপর গিয়ে পড়ে।

    — তুমি আমার কথা শুনবে কি না বলো ?  তোমাকে শুনতেই হবে। রিতা হাঁপায়।

    — বলো, কী বলতে চাও ?

    — এখানে আমি আর থাকব না। আমার ভীষণ ভয় করে।

    — ভয়! কীসের ভয় ?

    — ও আমি তোমাকে বোঝাতে পারব না। রিতার বিপর্যস্ত গলা, বাবাকে বলো বাড়িটা উনি বিক্রি করে দিক।

    — তা হয় না। জানো, কত কষ্ট করে বাড়িটা উনি করেছেন। রিটায়ারমেন্টের সব টাকা এই বাড়ি করতে চলে গিয়েছে।

    — তোমার কাছে বাড়ি বড় না আমি বড় ?  বলো, তোমাকে বলতেই হবে। রিতা ফুঁপিয়ে ওঠে; এই বাড়ির কিছু দূরেই শ্মশান। রোজ একটা না একটা মড়া এই রাস্তা দিয়ে যায়। ওরা কী রকম বীভৎস চিৎকার করে: বলো হরি হরি বোল! তুমি তো ঘরে থাকো না। আমাকে সব দেখতে হয়, শুনতে হয়। যারা যায় তাদের কিছু যায় আসে না। কিন্তু আমি যে তিলে তিলে শেষ হয়ে যাচ্ছি। ওই কথাগুলো আমি যে কিছুতেই মন থেকে মুছে ফেলতে পারছি না।

    — এখানে আরও একশ'টা বাড়ি আছে, প্রতিটা বাড়িতে বউ আছে— কই তাদের তো এমন ভাবে রিয়্যাক্ট করে না।

    — তাদের করে না বলেই যে আমার কিছু হবে না এমন তো নয়। সবার নার্ভ সমান নয়। এ রকম বেশি দিন হলে আমি পাগল হয়ে যাব। রিতা এবার সশব্দে কেঁদে ওঠে। তার কান্নার শব্দে ঘুম ভেঙে যায় তন্ময়ের। আলো জ্বেলে সে রিতার পাশে গিয়ে দাঁড়ায়। ঘাড়ে হাত রেখে চমকে ওঠে তন্ময়। অদ্ভুত ঠাণ্ডা রিতার পুরো শরীর জুড়ে উঠে আসছে। রিতা যেন রক্তমাংসের মেয়ে নয়, একটা বরফের চাঁই। অনেকক্ষণ পরে তন্ময় শুধোল, তুমি ঘুমোওনি ?  আঁচলে চোখ মুছে নিয়ে রিতা বলল, না, ঘুম আসছে না। জানো, আবার একটা ডেড বডি গেল! আমার ভীষণ ভয় করছিল। আমার গলা শুকিয়ে আসছিল। মনে হচ্ছিল, এই বুঝি আমার দম আটকে যাবে। মায়ের মতো আমি বুঝি তুয়ার হাতটা আঁকড়ে ধরব। তাই ভয়ে বিছানা ছেড়ে উঠে এসেছি। এখানে দাঁড়াতেই হুড়মুড়িয়ে কান্না এল। কেন যে কান্না আসে, তা আমি তোমাকে কোনও দিনও বোঝাতে পারব না।

    সমস্যার গভীরে ঢোকার চেষ্টা করল তন্ময়। কিন্তু ব্যর্থ হল সে। নিস্তেজ হয়ে বলল, কিছু মনে না করলে কাল আমি তোমাকে ডাক্তারের কাছে নিয়ে যাব।

    — আমার ব্লাড প্রেসার, ব্লাড সুগার সব নরম্যাল।

    — মেডিসিনের ডক্টরের কাছে নয়, আমি তোমাকে—

    কথা শেষ হতে দিল না রিতা, ক্রুদ্ধ-আক্রোশে সে ঝাঁপিয়ে পড়ল তন্ময়ের বুকের উপর, তুমি আমাকে পাগল ভেবেছ, তাই না ?  সাইক্রিয়াটিস্টের কাছে নিয়ে যেতে চাও, তাই না ?  আমি জানি, তুমি আমার মরা মুখ দেখতে চাও। ভালই তো— আমি মরে গেলে তুমি তোমার অফিসের সুন্দরী স্টেনোকে বিয়ে করে নিতে পারবে।

    — কী যা তা বলছ ?

    — যা তা নয়, ইউনিভার্সাল ট্রুথ। রিতা থামল কিছু সময়। তারপর দম ছেড়ে বলল, তুমি যা চাও তা আমি কিছুতেই হতে দেব না। তুয়ার কিছু ক্ষতি হলে আমি তোমাকে শান্তিতে বাঁচতে দেব না।

    দেওয়ালে পিঠ ঠেকে যাওয়ার মতো তন্ময়ের অসহায় অবস্থা। সে যে কী করবে কিছু বুঝে উঠতে পারে না। তার আগেই রিতা তার হাত ধরে, চলো, বিছানায় চলো। মেয়েটা একা আছে। ওর পাশে আমাদের থাকা দরকার। ওর যাতে আমার অসুখটা না হয়, সেটা তো তোমাকে দেখতে হবে।

    রিতার অস্বাভাবিক গলা। তন্ময় বাধ্য ছেলের মতো বিছানায় গিয়ে বসল। এখন ভালবাসার ইশারা করা পাপ। তবু সে রিতার হাতটা ধরল। রিতা সঙ্গে সঙ্গে বলল, জানো, আমার মা মরার আগে আমার হাতটা ঠিক এমনি করে ধরেছিল।

    তন্ময় কোনও উত্তর দিল না।


    জার্মানের মা / অনিল ঘড়াই / Nilkhet.Co - সবার জন্য বই

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    DK Number: DKBEN-4844. ISBN: 8189834681. Title: Caitraphula / চৈত্রফুল /. Author: Anila Gharai. অনিল ঘড়াই. Imprint: Kalakata : Ganacila, কলকাতা : গাঙচিল,. Physical Desc.: 221 p. ; 22 cm. Year: 2009. Price: USD 12.70. Nature Of Scope: Novel. Language: In Bengali. Summary: Novel on social themes. Subject Strings ...

    অনন্ত দ্রাঘিমা / অনিল ঘড়াই. Ananta draghima /

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    DK Number: DKBEN-4634. ISBN: 9788129509130. Title: Ananta draghima / অনন্ত দ্রাঘিমা /. Author: Anila Gharai. অনিল ঘড়াই. Imprint: Kalakata : De'ja Pabalisim, কলকাতা : দে'জ পাবলিশিং,. Physical Desc.: 456 p. ; 25 cm. Year: 2009. Price: USD 19.75. Nature Of Scope: Novel. Language: In Bengali. Summary: Novel, based on ...

    সামনে সাগর / অনিল ঘড়াই. Samane sagara / - D. K. Agencies

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    DK Number: DKBEN-1519. ISBN: 8129500825. Title: Samane sagara / সামনে সাগর /. Author: Anila Gharai. অনিল ঘড়াই. Imprint: Kalakata : De'ja Pabalisim, কলকাতা : দে'জ পাবলিশিং,. Physical Desc.: 224 p. ; 22 cm. Year: 2003. Price: USD 7.25. Nature Of Scope: A novel. Language: In Bengali. Summary: Novel, based on social ...



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    Press Release: Punjabi University cancels Pak qawaals program #Censorship


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    Famine continues.Continues the saga of poverty!

    Palash Biswas

    Humanscape of poverty and famine has not changed a little bit despite claimed inclusion and trickling development and indices loaded FII oriented growth story of the millionaire billionaire ruling class fed by FDI dollar hegemony across political borders all over the geopolitics inflicted by continuous holocaust, continuous genocide culture and continuous racial ethnic cleansing.

    We share the history of famine and poverty with China which opened up the prohibited great walls for global free market with whom we are engaged in arms race,water war,growth rate battle sharing open border trade killing indigenous agrarian humanity,nature and environment as well as small business and every kind of livelihood and job in organised and non organised sectors.

    Every law is subjected to be broken in accordance with the interest of multinational capital and the neo Nazi Zionist regime rules humanity and nature with singular agenda of mass destruction and man made calamities infinite.It is global order and we are divided though ,happen to be united to suffer the same destiny of extinction just because of our biometric digital robotic citizenship and identities under surveillance.

    We are ignorant enough to overlook the sustenance toxicity and radioactivity in our soul just because of the FDI Raj.We have to be targeted by drones,fake encounters,riots,genocides ,civil war and war because the ultimate killing is the culture of the Rambo turned guillotine state power.

    We overlook Bhopal gas tragedy.We sell of national resources  for foreign printed notes valued zero and chemical nuclear disaster envelop our day to day life.
    We are habitual to be ruled by genocide masters and no justice may be expected in the geopolitics wheresoever.

    Thus,victims of Bhopal Gas Tragedy,Sikh Genocide,Gujarat genocide,Babri mosque demolition,genocides in Srilanka, Nepal, Pakistan, Afganisthan,Bangladesh,Bhutan,China and so on,the victims of development,man made calamities,naked violation of civic and human rights divided though,stand united in our plight predestined, preplanned all over the undeveloped,underdeveloped world.

    Here you are.I introduce you to the past we shared and which continues at present and would continue in future,the mass destruction in the agrarian world.The Famine continues.
    Bangladeshi media publishes and update and I share the experience:
    Palash Biswas

    ৪০ বছর পরও বাসন্তীরা বাসন্তীই রয়ে গেছে

    ১৯৭৪ সালের কথা। দেশজুড়ে তখন করাল দুর্ভিক্ষ। দৈনিক ইত্তেফাকে প্রকাশিত একটি ছবি বিশ্বময় ঝড় তুলেছিলো। সেসময়ের ক্ষমতাসীন সরকারের তখতে তাউস নাড়িয়ে দিয়েছিলো। ছবির নায়িকা কুড়িগ্রামের চিলমারীর বাসন্তী। ১৯৭৪ সালে দুর্ভিক্ষের সংবাদ সংগ্রহ করতে দৈনিক ইত্তেফাকের রিপোর্টার শফিকুল কবির আর আলোকচিত্রী আফতাব আহমেদ গিয়েছিলেন কুড়িগ্রামে। এমনিতেই এঅঞ্চলের মানুষ মঙ্গাপিড়ীত থাকে বছরের বেশ খানিকটা সময়। তার উপরে '৭৪-এর ভয়াবহ মনান্তর। ক্ষুধার জ্বালায় দিশেহারা মানুষ খড়-কুটা থেকে শুরু করে যা পেয়েছে তাই খেয়ে ক্ষুন্নবিৃত্তি করেছে।

    মাছধরার জাল পড়া সেই বাসন্তী পাশে তার বোন দূর্গতী

    সাংবাদিক শফিকুল কবীর আর আফতাব আহমেদ দুর্ভিক্ষে অসহায় মানুষের সংবাদ সংগ্রহ করতে করতে পৌঁছান চিলমারী বাজারের অদূরে মাঝিপাড়ায় বাসন্তীদের বাড়ীতে। দূর্ভিক্ষের পাশাপাশি ভয়াল বন্যায় বাসন্তিদের তখন চরম দুর্বিসহ দিন কাটছে। এখানেই বাসন্তী আর তার চাচাতো বোন দুর্গতি'র ছবি তোলেন আফতাব আহমেদ। এই ছবিতে দেখা যায় খাবারের জন্য বাসন্তি আর দুর্গতি কলাগাছের পাতার গোড়ার অংশ সংগ্রহ করছে। পরনের ছেঁড়া শাড়ীর সাথে ছেঁড়া জাল গায়ে জড়িয়ে তারা সম্ভ্রম রক্ষার চেষ্টা করছে।

    ছবিটি দৈনিক ইত্তেফাকের প্রথম পৃষ্ঠায় গুরুত্ব দিয়ে ছাপা হয়। এই ছবি ছাপা হবার পর হৈ-চৈ পড়ে যায়। তৎকালীন আওয়ামী সরকারের ভাবমূর্তি প্রশ্নবিদ্ধ হয়ে পড়ে বিশ্বময়। বাসন্তী'র সেই ছবি হয়ে ওঠে চুয়াত্তরে বাংলাদেশের দুর্ভিক্ষের 'ব্রান্ড এ্যাম্বাসেডর'।

    এই ছবি প্রকাশের অন্তত: একযুগ পরে এই ছবির সত্যাসত্য নিয়ে প্রশ্ন তোলেন কেউ কেউ। বলা হয়- অপুষ্ট, বুদ্ধি এবং বাক প্রতিবন্ধী কিশোরী বাসন্তীর 'ফটোসেশন'করতে তাকে নগদ পঞ্চাশ টাকা দেয়া হলে বাসন্তী ছবি তুলতে রাজী হয়। সাংবাদিক শফিকুল কবীর আর আফতাব আহমেদকে সংবাদ সংগ্রহে সহায়তাকারী সেসময়ের চিলমারীর অস্থায়ী চেয়ারম্যান আনছার আলী একটি ছেঁড়া জাল পরিয়ে বাসন্তী এবং দুর্গতিকে কলাগাছের পাতা কাটতে বললে তারা তা করতে থাকে। আর তাদের সেই কাজের ছবি তোলেন আফতাব আহমেদ। এই ছবির তীব্র সমালোচনা করে অনেক বুদ্ধিজীবী একে তৎকালীন সরকারকে অস্থিতিশীল করা এবং শেখ মুজিব হত্যা ষড়যন্ত্রের সাথে ধারাবাহিক যোগসূত্রের কথাও বলেন।

    ৪০ বছর পর

    আমরা গিয়েছিলাম চিলমারীতে। ভাওয়াইয়া গানের সম্রাট শিল্পী আব্বাসউদ্দীনের অমর গান- 'ওকি গাড়িয়াল ভাই--- হাঁকাও গাড়ী তুমি চিলমারী বন্দরে--'ক্ষ্যাত চিলমারী বন্দরের বর্তমান অবস্থা জানতে। একমসয় এই চিলমারী খুবই জমজমাট এবং প্রসিদ্ধ বন্দর ছিলো। এখানে বড় বড় জাহাজ-কার্গো ভিড়তো। এসব নৌযান মানুষ ও পণ্য পরিবহন করে ঢাকা, নারায়ণগঞ্জ, চট্টগ্রাম এমনকি দিল্লী কিংবা কোলকাতায়ও যেত। এখন সেসব দিন সুদূর পরাহত। দেশ বিভক্তির পর আস্তে আস্তে তা বন্ধ হয়ে গেছে। সাধারণ এবং বয়েসী মানুষ আমাদেরকে সেসব কথাই বলছিলেন।

    কথায় কথায় উঠে আসে বাসন্তীর নাম। আমাদের আগ্রহ বেড়ে ওঠে বাসন্তীকে দেখার। চিলমারী বাজার থেকে দু-তিন'মিনিটের পথ বাসন্তীদের মাঝিপাড়া। কেউ কেউ একে বাসন্তীগ্রামও বলে। আমি ভেবেছিলাম বাসন্তীর সেই ছবি'র ব্যাপারে তার কাছ থেকেই সত্যাসত্য জেনে নেব। কারণ আমি আসলে জানতামই না বাসন্তী বুদ্ধি এবং বাক প্রতিবন্ধী। উৎসাহী মানুষরা যখন আমাদেরকে বাসন্তীর ঘরের সামনে নিয়ে এলো আমরা খুব হতাশ হলাম। বাসন্তী অস্ফুট স্বরে কি যেনো বললো ঠিক বোঝা গেল না। বার বার তার তার শীর্ণ পা দেখিয়ে আমাদেরকে যা বোঝাতে চাইলো, তাতে আমরা বুঝলাম তার পায়ে ব্যথার ব্যাপারটি। তার কাছে যা-ই জিজ্ঞেস করি ফ্যাল ফ্যাল করে তাকিয়ে থাকা কিংবা অষ্ফূট আর্তনাদের মতো কিছু শব্দ ছাড়া তার কাছ থেকে পরিস্কার কিছু পাওয়া গেলো না। স্বজনদের মধ্যে তার এক ভাই আছে সে-ও ঢাকা গেছে। ভাইয়ের স্ত্রীও ভালো কোনো তথ্য দিতে পারলো না। শেষমেষ প্রতিবেশীদের কয়েকজনকে জিজ্ঞেস করে মিশ্র একটা ধারণা পেলাম আমরা।

    বাসন্তীরা ক'দিন আগেও যমুনার ভাঙ্গনে নদী-শিকস্তি হয়ে নদীর পাড়ের একটি বাঁধের পাশে ছাপড়া তুলে আশ্রয় নিয়েছে। মাঝিপাড়ার প্রায় শ'খানেক পরিবার আছে সেখানে। বাসন্তী এখনো অনাহারে অর্ধাহারে কাটায়। সবাই তাকে বাসন্তী পাগলী বলে।

    বাসন্তী'র ছবি প্রকাশের পর কেটে গেছে দীর্ঘ ৪০ বছর। প্রমত্ত যমুনায় বয়ে গেছে কোটি কোটি কিউসেক পানি। অসংখ্য চর যেমন জেগেছে- পানির তোড়ে বিলীন হয়েও গেছে অনেক জনপদ। একসময়ের জমজমাট চিলমারী বন্দর বয়সে ভারাক্রান্ত বাসন্তীর মতো যবুথবু হয়ে গেছে। দেশে সরকার প্রধান বদল হয়েছে অনেক। রাজনৈতিক উত্থান-পতনের মাঝে নিত্য উন্নয়নের গালগল্প শুনতে শুনতে আমরা পুলকিত, উজ্জীবিত অথবা হতাশ হয়েছি অনেকবার। কিন্তু বাসন্তীদের ভাগ্যে পরিবর্তন আসেনি। বাসন্তীরা বাসন্তীই রয়ে গেছে।

    http://www.bdmonitor.net/newsdetail/detail/49/102088

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    নিউইয়র্কে সেমিনারে টবি ক্যাডম্যান
    যুদ্ধাপরাধ বিচারের ক্ষেত্রে বাংলাদেশের ফৌজদারি আইন ও সাক্ষ্য আইনকে গ্রহণ করা হয়নি আন্তর্জাতিক আইনের ধারে কাছেও যায়নি
    * বিচার ব্যবস্থার মাধ্যমে হত্যাকান্ড নিয়ে আমেরিকা, বৃট্রেন, জাতিসংঘ, ইউরোপীয় ইউনিয়ন উদ্বিগ্ন
    নিউইর্য়ক থেকে সংবাদদাতা : আন্তর্জাতিক খ্যাতিসম্পন্ন যুদ্ধাপরাধ বিশেজ্ঞ মানবাধিকার আইনজীবী টবি ক্যাডম্যান বলেছেন, বাংলাদেশের মানুষ যুদ্ধাপরাধ ইস্যু নিয়ে ব্যাপকভাবে বিভক্ত। যাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধাপরাধের অভিযোগ উঠবে, তাদের সবাইকে অবশ্যই দোষী সাব্যস্ত করতে হবে এবং ফাঁসি দিতে হবে। এর চেয়ে কম কিছুই যথেষ্ট বিবেচিত হবে না। এমনকি বিচারবুদ্ধিসম্পন্ন ব্যক্তিরাও যুদ্ধাপরাধের প্রশ্নে কা-জ্ঞান হারিয়ে ফেলেন। জামায়াত নেতা কাদের মোল্লা ইতিমধ্যে বিচার ব্যবস্থার মাধ্যমে হত্যাকান্ডের শিকার হয়েছেন। এই বিচার ব্যবস্থার মাধ্যমে হত্যাকান্ড নিয়ে আমেরিকা, বৃটেন, জাতিসংঘ, ইউরোপীয় ইউনিয়ন উদ্বিগ্ন। 
    বাংলাদেশে বিচারবিভাগীয় এবং বিচার বহির্ভূত হত্যাকান্ড নিয়ে হিউম্যান রাইটস এন্ড ডেভেলপমেন্ট ফর বাংলাদেশ আয়োজিত এক সেমিনারে মূল বক্তা হিসেবে টবি ক্যাডম্যান এসব কথা বলেন। গত ৬ ডিসেম্বর শনিবার নিউইয়র্কের ইয়র্ক কলেজ অডিটোরিয়ামে এ সেমিনারের আয়োজন করা হয়। এইচআরডিবির প্রেসিডেন্ট মাহতাব উদ্দিনের সভাপতিত্বে এবং জাহিদ জামির ও বশুরা লিমার পরিচালনায় সেমিনারে প্যানেল আলোচক ছিলেন মন্ট্রিয়েলের ডউসন কলেজের অধ্যাপক ড. আবিদ বাহার, নর্থ ক্যারোলিনা ইউনিভার্সিটির অধ্যাপক ড. নকিবুর রহমান, মজলিসে সুরার প্রেসিডেন্ট ড. শেখ আহমেদ ও সাধারণ সম্পাদক ড. আব্দুল হাফেদ জামেল। সেমিনারে অন্যান্যের মধ্যে বক্তব্য রাখেন যুক্তরাষ্ট্র বিএনপির সাবেক সাধারণ সম্পাদক জিল্লুর রহমান জিল্লু, মীর মাসুম আলী, সিটি কলেজের সহকারী প্রফেসর ড. নিজাম উদ্দিন, এটর্নী এম আজিজ, সাহানা মাসুম, ডা. জুন্নুন চৌধুরী, প্রফেসর নূরুল ইসলাম, ওমামা মাসুম ও তালহা সাবাজ প্রমুখ।
    টবি ক্যাডম্যান বলেন, আমাকে আইনজীবী হিসাবে জামায়াতে ইসলামি ২০১১ সালে নিয়োগ দেয়। আইনজীবী হিসাবে আমার কাজ হলো বাংলাদেশে আন্তর্জাতিক ট্রাইব্যুনাল নাম দিয়ে যে বিচারিক হত্যাকান্ড হচ্ছে তা বিশ্বকে জানানো। আমি তা জানিয়েছি। এই বিষয়ে সকলেই উদ্বেগ প্রকাশ করেছেন। তারাও কাজ করছে, তবে ধীর গতিতে। তিনি বলেন, যুদ্ধাপরাধীদের বিচার করা উচিত। তবে আন্তর্জাতিক আইন অনুযায়ীই তা করা উচিত। 
    আন্তর্জাতিক খ্যাতিসম্পন্ন যুদ্ধাপরাধ বিশেষজ্ঞ টবি ক্যাডম্যান বাংলাদেশে যুদ্ধাপরাধের বিচারপ্রক্রিয়া এবং এ নিয়ে সৃষ্টি সার্বিক পরিস্থিতির প্রেক্ষাপটে তুলে ধরে বলেন, ২০১০ সালের অক্টোবরে তিনি যখন প্রথমবারের মতো বাংলাদেশে আসেন, তখন ঢাকার শাহজালাল আন্তর্জাতিক বিমানবন্দরে তাকে ভিআইপি লালগালিচা সংবর্ধনা দেয়া হয়েছিল। বিমানবন্দর থেকে তিনি হোটেল সোনারগাঁও ছুটে গিয়েছিলেন বাংলাদেশ সুপ্রিম কোর্ট আয়োজিত যুদ্ধাপরাধের নিরপেক্ষ বিচারবিষয়ক এক সভায় বক্তৃতা করতে। কিন্তু এই সম্মান খুবই স্বল্পস্থায়ী হয়েছিল। এরপরপরই বাংলাদেশ সরকারের তীব্র বিরোধিতার মুখে পড়েন তিনি। 
    বৃটিশ এ আইনজীবি বলেন, ট্রাইব্যুনাল-১ এর চেয়ারম্যান নিজামুল হক ও জিয়াউদ্দিনের মধ্যে যে আলাপ হয়েছে তাতে এটি স্পষ্ট যে শুরু থেকেই ট্রাইব্যুনাল স্বাধীন ছিল না। সরকার যতই দাবি করুক না কেন, ট্রাইব্যুনালের গঠন প্রক্রিয়া ও সংশ্লিষ্ট বিধিতে ত্রুটি রয়েছে। ট্রাইব্যুনালের ক্ষেত্রে বাংলাদেশের ফৌজদারি আইন ও সাক্ষ্য আইনকে গ্রহণ করা হয়নি এবং আন্তর্জাতিক আইনের ধারে কাছেও যায়নি। ফলে ট্রাইব্যুনালের বিচারে আন্তর্জাতিক মান বজায় রাখার যে দাবি সরকার করে আসছে তা রাখা তো দূরের কথা, জাতীয় মানও বজায় রাখা সম্ভব হবে না।
    তিনি বসনিয়ায় যুদ্ধাপরাধ ট্রাইব্যুনালে প্রসিকিউটর হিসেবে তার আট বছরের অভিজ্ঞতার আলোকে বলেন, বসনিয়ার ট্রাইব্যুনাল আন্তর্জাতিক ট্রাইব্যুনাল ছিল না, সেটি তাদের ন্যাশনাল ট্রাইব্যুনাল ছিল। কিন্তু বসনিয়া সরকার বিচার পরিচালনায় আন্তর্জাতিক আইনের সহযোগিতা নিয়েছে। সেখানে আন্তর্জাতিক বিচারক, আন্তর্জাতিক প্রসিকিউটর ও আন্তর্জাতিক তদন্তকারীরা ছিল বলে বিচার প্রক্রিয়া নিয়ে কোন প্রশ্ন উঠেনি। কিন্তু বাংলাদেশ সরকার 'সমগ্র বিশ্বের জন্য দৃষ্টান্ত'সৃষ্টি করতে সকল আন্তর্জাতিক আইন অগ্রাহ্য করেছে। 
    টবি ক্যাডম্যান বলেন, আমরা চাই যুদ্ধারাধীদের বিচার আন্তর্জাতিক আদালতে এবং বাংলাদেশের বাইরে করা হোক। সেই বিচারালয়ের বিচারক নিয়োগ করা হোক আন্তর্জাতিক বিচারক। আমরা চাই না রাজনীতির হাতিয়ার বানিয়ে কাউকে দন্ড দেয়া হোক।
    যুদ্ধাপরাধ মামলায় দন্ডপ্রাপ্ত মাওলানা মতিউর রহমান নিজামীর ছেলে ড. নকিবুর রহমান বলেন, কাশিম উদ্দিনের ছেলে শিবলি আমাকে বলেছে, ২০০১ সালের আগে আমি বা আমার পরিবার কোন দিন মাওলানা মতিউর রহমান নিজামীর নাম শুনিনি। তাকে মন্ত্রী করার পর আমরা চিনেছি। তিনি বলেন, আওয়ামী লীগের এক নেতাকে আমার বাবার বিরুদ্ধে মিথ্যা স্বাক্ষী দিতে বাধ্য করা হয়েছে। দ্বিতীয় স্বাক্ষী নান্নুকেও বাধ্য করা হয়েছে মিথ্যা স্বাক্ষী দিতে। তাকে তুলে আনা হয় এবং প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা এবং তৎকালীন স্বরাষ্ট্র প্রতিমন্ত্রী টুকুর নির্দেশে সে মিথ্যা স্বাক্ষী দেয়। নেয় মোটা অংকের অর্থ। সেই সাথে হুমকি দেয়া হয় ছেলের চাকরি খাওয়া হবে। তিনি বলেন, এই অবিচারের বিরুদ্ধে আমাদের রুখে দাঁড়াতে হবে।
    যে মাওলানা কাশিম উদ্দিনকে হত্যা করার জন্য মাওলানা মতিউর রহমান নিজামীর (আমার বাবা) বিরুদ্ধে রায় দেয়া হয়েছে আমি তাদের পরিবারের সদস্যদের সাথে কথা বলেছি। কাশিম উদ্দিনের ছেলে শিবলি আমাকে জানিয়েছে তারা ১৫ বছর আগে আমেরিকায় আসে এবং তারা বর্তমানে ডালাসে বসবাস করছে। আসার পর তারা আজ পর্যন্ত বাংলাদেশে যায়নি। তাদের পরিবারের সবাই এখন ডালাসে রয়েছে। 
    ড. আবিদ বাহার বলেন, বর্তমান শেখ হাসিনার সরকার হচ্ছে অবৈধ সরকার। শেখ মুজিব বাংলাদেশের গণতন্ত্রকে, মানুষের বাক স্বাধীনতা, মানুষ হত্যা এবং সংবাদপত্রে স্বাধীনতা কেড়ে নিয়ে বাংলাদেশে বাকশাল কায়েম করেছিলেন। এখন তার মেয়ে শেখ হাসিনা বাংলাদেশে বাকশাল টু কায়েম করছেন। তিনি বলেন, গোলাম আজমের অপরাধ তিনি ভুট্টোর সঙ্গে বৈঠক করেছিলেন। ভুট্টুর সঙ্গেতো শেখ মুজিবও দেখা করেছিলেন। তার পরিবারকে রক্ষার জন্য অনুরোধ করেছিলেন। ১৯৫ জন চিহ্নিত যুদ্ধুাপরাধীদের মুক্ত করে দিয়েছিলেন। বাংলাদেশে কেউ যদি রাজাকার থাকে তাহলে তিনি হচ্ছেন শেখ মুজিব। তিনিই বাংলাদেশের সবচেয়ে বড় রাজাকার। কারণ তিনি যুদ্ধাপরাধীদের মুক্তি দিয়েছিলেন। আর এখন শেখ হাসিনা যুদ্ধাপরাধী হিসাবে যাদের বিচার করছেন, তাদের কেউই মুজিবের লিস্টে ছিলেন না।

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    Press Release – 9 workers on hunger strike for 14 days, ACT TO SAVE THEIR LIFE


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    Are all Indians Sons of Ram?

     

     

    Ram Puniyani

     

     

     

    During the anti colonial movement, Mahatma Gandhi emerged as the tallest of leaders and was called, 'Father of the nation' Rashtrapita. This term was first used by Subhash Chandra Bose in a Radio address in 1944 and later approved, accepted and upheld by majority of Indians. Of course he was not accepted as Father of the Nation by Muslim and Hindu communalists. For Muslim communalists, Muslim Nation began from eight century with the rule of Mohammad bin Kasim in Sindh. For Hindu Communalists this has been a Hindu nation form times immemorial. Gandhi was accepted as Father of the nation by majority of Indians and all those who were with freedom movement led by him for his role in bringing together all the people of India. The nation was seen as 'Nation in the making' not as a readymade nation as presented by religious nationalists.  Gandhi's marathon effort was to bring in fraternity amongst all the Indians and so Hindu-Muslim unity was central to his enterprise. This was the logical central point of his effort as these were two main religious communities. He anchored himself to morality of all the religions and could bring the bonding of different religious communities under the overarching identity of 'Indian'. He faced the strong resistance to his efforts from the propaganda and deeds of the communal forces, that's also what led to his murder in 1948.

     

     

    Despite his murder; the communalists and their Hate propaganda and divisive thinking continued and kept changing its language in different guises. While majority Muslim communalists went over to Pakistan, the leftover of this communalism did produce the likes of Akbaruddudin Owaisi and his clones indulging in Hate speech against Hindus. On a much larger and bigger scale the head of Hindu communal organization, kept harping on creating social common sense picked from the British introduced communal historiography, where Muslim kings were demonized, labeled as aliens etc. around which stereotypes and myths were constructed. This demonization reached its peak in the sloganBabar ki Aulad jao Kabristan ya Pakistan (sons of Babar go to Pakistan or graveyard) The latest in the line is that all those who do not identify with Lord Ram are Haramjade (Illegitimates) and the country belongs to Ramjade's (Sons of Ram) only, others are to be treated like aliens.

     

    This formulation is the culmination of RSS Chief Mohan Bhagwat's recent statement that all of us are Hindus, this is Hindustan. By inference Lord Ram is the symbol of India that is Hindustan and so Sadhvi Niranjan Jyoti the BJP minister in central cabinet stated "Modi has given a mantra that we will neither take bribe nor let others take bribe. Now you have to decide whom to choose. Will you choose the sons of Ram or those who are illegitimate)," Just a small recap; Indian Constitution calls it as "India that is Bharat'.   

     

    Now while the collective opposition is demanding the suspension of the Sadhvi from Minister ship and initiating the legal proceedings against her, the BJP is hiding her under the pretext that she has already apologized and that she is new to the ministry. Also that she is coming from a poor dalit background. The opposition argument is that she has taken oath under the Indian Constitution, while her statement is not only an attempt to create a divide between religious communities, it's a blatant hate speech and such a person is already guilty of violating the Indian Constitution. The criminal action demanded by opposition ranks against the minister Sadhvi Niranjan Jyoti relates to the hate speech provision, Section 153A of the Indian Penal Code, which prescribes a maximum sentence of three years of imprisonment. 

    One can be charged under this section only with the government's sanction. Hate speech is widely understood to be an exception to the freedom of speech, Section 153A also holds to account anybody who is "promoting enmity between different groups on grounds of religion ... and doing acts prejudicial to maintenance of harmony". There are many in this gallery, prominent amongst them being Akbaruddin Owaisi, Raj Thackeray, Praveen Togadia, and Varun Gandhi, to name the few who came out with scathing statements against the 'other community'. Hiding behind the fact that Sadhiv Jyoti is a dalit holds no water as she is fully indoctrinated in the ideology of Sangh Parivar. Also the argument that even Sonia Gandhi used the word 'Maut ke Saudagar' (Merchants of Death) is not relevant here, as Sonia was talking about a political tendency of communalism, not against any particular religious community. 

     

    Overtly BJP leadership is not much supporting this statement, but this is the logical outcome of the politics of their Parivar, which brought them to power and whose agenda of Hindu nationalism they are pursuing. How do we deal with such divisive agenda and Hate speech? One recalls Akbaruddin Owaisi was taken to task for his Hate speech. If one recalls right Dr. Pravin Togadia was also the guest of the prison for Hate speech once. Dr. Togadia has probably set the bench marks more than once in clever use of divisive language. His video of how to get rid of Muslim neighbors by throwing tomatoes on them was also seen but most of the time he has escaped the punishment. A similar comment, like the one now of Sadhvi Jyoti was also made by another BJP leader in Uttar Pradesh by Ram Pratap Chauhan in Vijay Shankhnaad Rally in Agra on 21st November 2013 as well. That one got unnoticed. IT only goes on to show, Sadhvi's statement is a part of the thinking in the wider Parivar circle. 

     

     

    BJP leadership faces the dilemma. In Parliament and for the global consumption it has to keep the face of 'Development', while to keep its political power it has to go with the divisive agenda of its parent organization as unfolded by its associates and many elements within the party. So a clever balancing act is always in order, to hide under the apology of A Sadhvi and to turn a blind eye towards such tendencies. For them the same divisive agenda has to be operationalized with some variations in places where elections are to be held.

     


    Then the question comes, as Indian nation who is our Father; Gandhi or Ram? Ram is a mythological reality with whom large section of Hindus identify. He was King of Ayodhya. The criticism of the prevalent version of Ram Story by Dr. Ambedkar seems to have been ignored in the din of communal hysteria. In 'Riddles of Hinduism', Ambedkar takes up the issue of Ram upholding caste and gender hierarchy amongst others. Rams' murder of Shambuk, as Shambuk was a Shudra who was doing penance has come under heavy criticism from Ambedkar. Similarly banishing his pregnant wife Sita is a serious issue. One more point Ambedkar raises is also about Ram's killing of Bali Raja, that too from behind. Bali was a popular king revered by dalit bahujans. Similarly Periyar Ramasami Naicker also took many of these issues about the Lord.

     

    While there are claims that we are a Hindu nation from times immemorial, as a matter of fact India became a nation state through the anti colonial struggle led by Gandhi. So the very formulation that all Indians are sons of Ram has no grounding. Surely many Hindus identify with Ram but as Indians, it is Gandhi who is the 'father of the nation'. Ram is symbol of Hindu nationalism while Gandhi is symbol of Indian nationalism.

     

     

    After Modi came to power in 2014, the assertion of RSS agenda is going on uninhibited and intimidating those who uphold the Indian Constitution and values of freedom struggle. Assertions like Ramjade as synonymous with Indian-ness are revival of the forces which killed and went on to celebrate this dastardly act, which was the first attack on values of our freedom movement. 

     

    --
    response only to ram.puniyani@gmail.com

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    Tarun Kanti Thakur 10:14am Dec 9
    "একেই কি বলে ব্রাহ্মণ্যবাদ ???"
    তরুণকান্তি ঠাকুর
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    বিচ্ বাজার মে খাড়ে হোকর চিল্লা-চিল্লাকে বেঁচো তো মিট্টি ভি বিক জাতা হ্যায়, ওরনা সোনা ভি নহি বিকতা ।
    কারন প্রচারের গুনে অচল মালও বিক্রি হয়ে যায়, আর অ-প্রচারে ভালো জিনিসও বিক্রি হয় না ।
    বর্তমান প্রচারের যুগ, প্রচারের জোরে চোর, গুণ্ডা, বদমাইশ, বলাৎকারী, খুনি ভগবান হয়ে বশে থাকে আর অ-প্রচারে সজ্জন, বিদ্বান ,জ্ঞানীগুনী ব্যাক্তিও তাঁর যোগ্য সম্মান থেকে বঞ্চিত হন।আর এর জলন্ত উদাহরণ বর্তমান ভারতের সামাজিক, রাজনৈতিক ও ধর্মীয় বাতাবরণ।যেমন, আশারাম বাপু, স্বামী নিত্যানন্দ, ভিমানন্দ ,রামপাল ,স্বামী সদাচারী, শংকরাচার্য জৈনেন্দ্র সরস্বতী, চন্দ্রস্বমী ,সাঁই বাবা ইত্যাদি ভগবানে পরিণত হয়, অপর দিকে গুরুচাঁদ ঠাকুর, যোগেন্দ্রনাথ মন্ডল, রাষ্ট্রপিতা জ্যোতিরাও ফুলের, সাবিত্রীবাঈ ফুলে, সন্ত তুকারাম ,সন্ত রবিদাস , শাহু মহারাজ, , বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকর এর মত অসংখ্য মুলনিবাসী মনিষী, মহামানব অ-প্রচারে ও কুপ্রচারে তাঁদের যোগ্য সম্মান পান না । তাঁদের প্রাপ্য সম্মান থেকে বঞ্চিত হচ্ছেন।

    ব্রাহ্মণ্যবাদী সমাজ ও প্রচার মাধ্যম চিরকাল মুলনিবাসী তথাকথিত শূদ্র মনিষী ও মহাপুরুষদের প্রচারের আলো থেকে দুরে সরিয়ে রেখেছে।চিরকাল অন্ধকারে রেখেছে, রাখার চেষ্টা করে চলছে ।কারন তাঁরা ব্রাহ্মণ্যদের বিরোধীতা করেছেন, সমাজকে বৈশম্যময় ব্রাহ্মণ্যবাদ থেকে মুক্ত করে সমানতা, বন্ধুতা ও ন্যায়ের সমাজ গঠনের আন্দোলন করেছেন।আমরা একটু গভীর ভাবে চিন্তা করলে দেখতে পাব বাংলা তথা সমগ্র ভারতবর্ষে ব্রাহ্মণ ঘোষিত যত গুলি মনিষী ও সমাজসংস্কারকের নাম জানি এবং ইতিহাসের পাঠ্য ক্রমের মধ্যে দিয়ে নুতন নুতন প্রজন্মকে জানানো এবং শেখানো হয় তাঁরা সবাই হয় ব্রাহ্মণ সন্তান নতুবা ব্রাহ্মণ্যবাদের পৃষ্ঠপোষক , প্রচারক ও সমর্থক।

    বাংলায় এমন একজনও ব্রাহ্মণ এবং তৎসম জাতির মনিষী বা সমাজ সংস্কারকের নাম মনে পড়ে না, যিনি ব্রাহ্মণ্যবাদের উর্ধে উঠে ব্রাহ্মণ্যবাদের বিরোধিতা করেছেন এবং সমাজের সকল স্তরের মানুষের উন্নতি ও মঙ্গল সাধনের কথা ভেবে কাজ করেছেন।ব্রাহ্মণ্যবাদী প্রচার মাধ্যম কিভাবে মিথ্যা গল্প ফেঁদে একজন মানুষকে মহান তৈরী করতে পারে তা আজ এখানে দেখার চেষ্টা কোরব।এই লেখার মধ্যে দিয়ে আমি কাউকে হেঁয় বা ছোট করতে চাইনা।আমার উদ্দেশ্য তা নয়।আমি ব্রাহ্মণ্যবাদ কি ভাবে কাজ করে সেটা দেখানোর চেষ্টা করছি। কিন্তু যেটা সত্য তাকে অস্বীকারও করতে পারছিনা।যদি এই লেখা পড়ে কারো মনে ব্যথা লাগে তার কাছে আমি ক্ষমা চাইছি।

    আজ এখানে আমরা ব্রাহ্মণ প্রদত্ত উপাধি "বিদ্যাসাগর " শ্রী ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় এবং গুরুচাঁদ ঠাকুর এর তুলনা মূলক সমাজ সংস্কারক ও শিক্ষা প্রসারের আলোচনা করব।

    গুরুচাঁদ ঠাকুর :-1846 সালের 13 ই মার্চ অখন্ড বাংলার ফরিদপুর জেলার ওড়াকান্দী গ্রামে জন্মগ্রহণ করেন।এখানকার ভৌগোলিক পরিবেশ বলতে বৎরের 6/7 মাস জলের তলায় ডুবে থাকে, ডোবা ও জল কাঁদায় পরিপূর্ণ থাকে।সম্পূর্ণ বাংলায় কোথাও নিম্নবর্ণের শূদ্র পতিতদের জন্য কোন স্কুল বা পাঠশালা ছিল না । তাই গুরুচাঁদ ঠাকুর কে প্রথমে দশরথ বিশ্বাসের বাড়িতে, তার পর মল্লকাঁদী গ্রামে গোলক কীর্তনীয়ার বাড়িতে থেকে বাংলা ভাষায় পড়াশুনা করেন এবং পরে বর্ণহিন্দুদের স্কুলে স্থান না হওয়ায় মুসলমানের মক্তবে ফার্সি ভাষায় পড়াশুনা করেন।
    এই রকম জল কাঁদায় ঢুবে থাকা এলাকার অশিক্ষিত, বর্বর, পতিত মানুষের জন্য সর্বপ্রথম গুরুচাঁদ ঠাকুর অনুভব করেছিলেন যে, এ জাতির মুক্তির এক মাত্র পথ শিক্ষা।শিক্ষা বিনা এদেশের বৃহত্তর শূদ্র অতিশূদ্র ও মুসলমানদের জীবনে আন্ধকার রাতের শেষ হবে না।তাই তিনি 1880 সালে নিজ গৃহ ওড়াকান্দীতে সর্ব প্রথম সমাজের সকল স্তরের মানুষের জন্য বিদ্যালয় স্থাপন করলেন।শুরু হল শিক্ষার আন্দোলন।পরের বৎসর খুলনা জেলার দত্তডাঙ্গায় নমঃশূদ্র সম্মেলনে শিক্ষার আন্দোলনের ডাক দিলেন।

    "দত্তডাঙ্গা সভা মধ্যে গুরুচাঁদ কয়।
    শিক্ষা বিনা এ জাতির নাহিক উপায়।।
    সেই বানী সবে মানি নিল দেশে দেশে।
    পাঠশালা করে সবে পরম উল্লাসে।"

    গুরুচাঁদ ঠাকুর 1880 সাল থেকে 1937 সাল পর্যন্ত নিজ হাতে 1812 টি প্রাথমিক ও মাধ্যমিক বিদ্যালয় স্থাপন করেন।তিনি বাংলার সকল অশিক্ষিত, বর্বর পতিত জাতির উদ্দেশ্যে বার বার বলতেন--

    "বাঁচি কিবা মরি তাতে দুঃখ নাই।
    গ্রামে গ্রামে পাঠশালা গড়ে যেতে চাই ।

    খাও বা না খাও তাতে দুঃখ নাই ৷
    ছেলে মেয়ে শিক্ষা দাও এই আমি চাই ।"

    তিনি আরো বলতেন --

    "বিদ্যাধর্ম ,বিদ্যাকর্ম ,বিদ্যা সর্বসার ।
    বিদ্যা বিনা এ জাতির নাহিক উদ্ধার।"

    "ছেলে মেয়ে দিতে শিক্ষা।
    প্রয়োজনে কর ভিক্ষা।।"

    "শিক্ষাহীন হলে জাতি কোন আশা নাই, 
    ঘরে ঘরে স্কুল কর মিলিয়া সবাই।
    ছেলে মেয়ে উভয়েরে দিতে হবে শিক্ষা।
    শক্তি না থাকিলে কর দশদ্বারে ভিক্ষা।"

    সমগ্র বাংলার নমঃজাতি তথা অন্যান্য নিম্নবর্ণের( শূদ্র অতিশূদ্র) মানুষদের অজ্ঞান ও অশিক্ষার অন্ধকার কুপ থেকে মুক্তি দেবার জন্য সমগ্র বাংলায় একমাত্র পতিত পাবন গুরুচাঁদ ঠাকুর মুক্তির বারিধি হয়ে এগিয়ে এসেছিলেন।তাঁর আগে বর্ণ বৈশম্যময় হিন্দু ধর্মের কোন মহান ব্যক্তি, সমাজ দরদী, সমাজ সংস্করক তথা তেত্রিশ কোটি দেবী দেবতা ও দুই ডজন অবতার তথাকথিত নিম্নবর্ণের মানুষদের অজ্ঞানতার অন্ধকার থেকে মুক্তির কথা বলেন নাই, ভাবেন নাই।পৃথিবীর ইতিহাসে এমন কোন মহান ব্যক্তি আমি খুঁজে পাই না যিনি সারাজীবন ধরে সমস্ত শ্রেনীর মানুষের কল্যাণে 100 (একশত) স্কুলও প্রতিষ্ঠা করেছেন।কিন্তু পতিত পাবন গুরুচাঁদ ঠাকুর নিজ হাতে 1812 (আঠারো শত বার ) টি প্রাথমিক ও মাধ্যমিক বিদ্যালয় স্থাপন করেছেন।
    ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় যদি শুধু মাত্র উচ্চ বর্ণের ছেলে মেয়েদের জন্য শহর কেন্দ্রীক 39 (ঊনচল্লিশ) টি ,মতান্তরে 29 টি বিদ্যালয় স্থাপন করে বিদ্যাসাগর উপাধিতে ভূষিত হতে পারেন তাহলে জিনি 1812 টি বিদ্যালয় স্থাপন করেছেন সেই পতিত পাবন গুরুচাঁদ ঠাকুর এর নামের সঙ্গে বিদ্যার মহাসাগর উপাধিও অতি তুচ্ছ মনে হবে।সূর্যকে মোমবাতি দেখানোর মত বিষয় হবে।
    1858 সালে ব্রিটিশ সরকার দলিত পতিতদের জন্য শিক্ষার কথা বললে এ প্রসঙ্গে দয়ার সাগর বিদ্যাসাগর 1859 সালে বাংলার লেফটেনান্ট গভর্নর কে এক আবেদন জানিয়ে বলেছিলেন' - - "আমার সাধারণ বুদ্ধিতে মনে হয় শিক্ষা বিস্তারের সবচেয়ে ভাল ব্যবস্থা হল - - - কেবল মাত্র উচ্চ বর্ণের ভিতর ব্যপক ভাবে শিক্ষার প্রসার ঘটানো।" ( পঞ্চরত্ন ক্যুইজ সমগ্র,হরি গুরুচাঁদ প্রকাশনী)
    কিন্তু আমাদের তথা মুলনিবাসী ভারতবাসীর দুর্ভাগ্য ব্রাহ্মণ্যবাদী সমাজ ও প্রচার মাধ্যমের হীনমন্যতা ও সতেলাপনার কারনে সহস্রাব্দের শ্রেষ্ঠ সমাজ দরদী, সমাজ সংস্কারক শিক্ষার আন্দোলনের জলন্ত সূর্য পতিত পাবন গুরুচাঁদ ঠাকুর তাঁর প্রাপ্য সম্মান পেলেন না।কারন তিনি নমঃজাতির ঘরে জন্ম গ্রহন করেছেন।

    শ্রী ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় :- 26 সেপ্টেম্বর 1820 সালে বীরভূম জেলার বীরসিংহ গ্রামের এক ব্রাহ্মণ পরিবারে জন্মগ্রহণ করেন।ছোট বেলা থেকেই খুব মেধাবী ছিলেন।ব্রাহ্মণ সন্তান বলে বিদ্যা শিক্ষার জন্য কখনো কোন পাঠশালা বা বিদ্যালয়ে প্রবেশ পেতে বাঁধার সম্মুখীন হতে হয় নি।দারিদ্রতা শিক্ষা লাভের পথে বাঁধা সৃষ্টি করলেও সেটা বিরাট কোন বিষয় বলে মনে করি না।ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় এর সমাজ সংস্কারমূলক কাজ গুলো নিঃসন্দেহে প্রশংসনীয়, এতে কোন দ্বিমত থাকতে পারে না । তিনি অবশ্যই বাঙালী তথা ভারতবাসীর কাছে প্রনম্য ।কিন্তু ব্রাহ্মণ্যবাদী সমাজ ও প্রচার মাধ্যম একজন মানুষকে কি ভাবে মহান থেকে মহানতর করে তুলতে পারে তার প্রমাণ শ্রী ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় ( বিদ্যাসাগর )।আমরা সকলেই স্কুল জীবনে বিদ্যাসাগর সম্পর্কে অনেক গল্প কাহিনী পড়েছি ।পড়ে একজন বাঙালী হিসেবে গর্বে বুক ভরে গেছে।কিন্তু সেগুলো কতটা সত্য বা মিথ্যা তা আজ বুঝতে পারছি।
    দু-তিন টি কাহিনী এখানে উল্লেখ করব পাঠকগন বিচার করবেন ব্রাহ্মণ্যবাদ কাকে বলে ?

    প্রথমে বলি,
    "মাতৃ ভক্ত বিদ্যাসাগর "

    একবার বিদ্যাসাগরের মাতৃদেবী ছেলে (বিদ্যাসাগর) কে দেখতে চান তাই কলিকাতায় খবর পাঠালেন।খবর পেয়ে বিদ্যাসাগর মহাশয় মায়ের ইচ্ছা পুরন করতে কলিকাতা থেকে গ্রামের উদ্দেশ্য রওনা দিলেন।পথে যেতে যেতে রাত হয়ে যায় এবং গ্রীষ্মকাল হওয়াতে বিকেল বেলা ঝড় বৃষ্টি শুরু হয়।তবু তিনি থামলেন না, মায়ের আদেশ পালন করতে ঝড় বৃষ্টি উপেক্ষা করে এগিয়ে চললেন।পথে আবার এক বাঁধা দেখা দিল, খরস্রোতা দামোদর নদ।তার উপরে ঝড় ও বৃষ্টির কারণে আরো ভয়ংকর রূপ ধারণ করেছে।এতেও তিনি ভয় পেয়ে থামলেন না।সেই উত্তাল দামোদর তিনি সাঁতরে পার হয়ে গেলেন এবং সেই রাতেই মায়ের সঙ্গে দেখা করলেন।এ পর্যন্ত আমরা দেখলাম যে বিদ্যাসাগরের মাতৃ ভক্তির তুলনা হয় না।
    কিন্তু সমস্যা হয়েছে অন্য যায়গায়, 
    " আনন্দবাজার পত্রিকায় একবার ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায়ের ভ্রাতা শম্ভুচরন বন্দোপাধ্যায়ের লেখার একটি উদৃতি দেখেছিলাম ,সেখানে তিনি লিখেছেন যে, তাঁহার দাদা ঈশ্বরচন্দ্র সাঁতারই জানিতেন না, সুতরাং তাঁহার পক্ষে উত্তাল দামোদর সাঁতরাইয়া পর হইবার প্রশ্নই ওঠে না।"
    (সংগ্রহ; -গুরুচাঁদের প্রত্যক্ষ শিক্ষা ।---মনীন্দ্রনাথ বিশ্বাস । পৃষ্ঠা নং 6 )।।

    দ্বিতীয় কাহিনীতে শেখানো হয় যে, ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় কলিকাতায় থাকিয়া এতই অভাব অনটনের মধ্যে লেখাপড়া শিখেছেন যে রাতে প্রদীপ জ্বালিয়ে পড়ার জন্য প্রদীপের তেল বা কেরোসিন কিনবার মত পয়সা ছিল না, তাই তিনি রাতে কলিকাতার রাস্তার গ্যাসের আলোর নিচে দাঁড়িয়ে পড়াশুনা করতেন।এখানে পড়াশুনার প্রতি ঈশ্বরচন্দ্রের অদম্য ইচ্ছা শক্তির পরিচয় সমাজ ও নুতন নুতন প্রজন্মের সামনে তুলে ধরতে চেষ্টা করেছে ব্রাহ্মণ্যবাদী প্রচার মাধ্যম।
    কিন্তু সমস্যা সৃষ্টি করেছে কলিকাতা মিউনিসিপাল্টির তৎকালীন রেকর্ড।তৎকালীন মিউনিসিপাল্টির রেকর্ড পরিক্ষা করে দেখা গেছে যে শ্রী ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় যখন পড়াশুনা করতেন তখন কলিকাতার রাস্তায় ল্যাম্পপোষ্ট বা গ্যাসের আলো লাগানোই হয়নি।

    আর একটা বিষয় বলে লেখাটা শেষ করব, বিষয়টি হল, বিদ্যাসাগরের আত্মসম্মান বোধ বা আমরা বলতে পারি অপমানের বদলা।যেমন কুকুর তেমন মুগুর।
    অনেক লোকে প্রায়ই বলে থাকেন, "অশি অপেক্ষা মসির ধার অনেক বেশি তীক্ষ্ণ এবং ধাঁরাল ।"
    অর্থাৎ কলমের জোরে একটা বিষয়কে ভালো থেক মন্দ, আবার মন্দ থেকে ভালো তৈরী করা যায়।কাউকে মহান তৈরী করতে তাঁর তুচ্ছ কাজকেও মহান কাজে পরিণত করা যায়।
    ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় এর বেলাতেও তাই হয়েছে বলে আমি মনে করি।ঈশ্বরচন্দ্রের এই ঘটনাটা পড়লে বিষয়টা আপনাদের সামনে পরিষ্কার হবে।

    কোন এক দরকারে একবার ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় জনৈক ইংরেজ অফিসারের সঙ্গে দেখা করতে তার অফিসে যান।গিয়ে দেখলেন সেই ইংরেজ অফিসার জুতা পায়ে টেবিলের উপরে পা তুলে বসে আছেন।ইংরেজ অফিসার ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় কে দেখে পা দুটো টেবিলের উপর থেকে নামালেন না, এমনকি ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় মহাশয়ের অনুরোধ করা সত্ত্বেও তিনি তা করলেন না।সুতরাং ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় মহাশয় অত্যন্ত আপমানিত হলেন।শুধু তিনি কেন? যে কোন সাধারণ মানুষও অপমানিত হবেন ,হবারও কথা।
    জনৈক ইংরেজ টেবিলের উপর থেকে পা দুটো না নামিয়ে অত্যন্ত জঘন্য কাজ করেছেন।তার জন্য তাকে বারংবার ধিক্কার জানাই।
    কিন্তু ঘটনা ক্রমে কোন একদিন সেই ইংরেজ অফিসার ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় মহাশয়ের সঙ্গে দেখা করতে এলে শ্রী বন্দোপাধ্যায় সেই ইংরেজ অফিসারের মত করে অপমানের প্রতিশোধ নিলেন।
    অর্থাৎ ইংরেজ অফিসারকে ভিতরে ঢুকতে দেখে ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় মহাশয় নিজের চটি জুতা পায়ে দিয়ে ইংরেজের সামনেই টেবিলের উপর পাঁদুটো তুলে দিলেন।ফল স্বরূপ সেই ইংরেজ অফিসার ভিষন আপমানিত হলেন, বিদ্যাসাগর মহাশয় অপমানের বদলা নিতে পেরে অসীম শান্তি পেলেন।
    কিন্তু আপনারাই বলুন, এটা কি কোন পন্ডিত ব্যাক্তির ভদ্রলোকের মত কাজ হয়েছে ?

    সেদিন যদি ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় মহাশয় জনৈক ইংরেজ অফিসারকে নিজের অফিসে ঢুকতে দেখে চটি জুতা পায়ে দিয়ে টেবিলের উপরে তুলে না দিয়ে নিজে উঠে গিয়ে ইংরেজের জন্য একটা চেয়ার এগিয়ে দিয়ে বসতে বলতেন, তাহলে আমার দৃঢ় বিশ্বাস সেদিন সেই ইংরেজ অফিসার তার কৃতকর্মের জন্য আরো বেশী অপমানিত হতেন, লজ্জা পেতেন এবং ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায়ের কাছে হাত জোড় করে ক্ষমা চাইতেন।
    বিদ্যাসাগর মহাশয় যদি এই কাজটি করতেন তাহলে সেদিন এক বিদেশীর কাছে ভারতীয় সংস্কৃতির মাথা উচু হত।ভারতীয় সভ্যতার পরিচয় আরো একবার বিদেশী ইংরেজ দেখতে পারত।
    কিন্তু ঈশ্বরচন্দ্র বন্দোপাধ্যায় মহাশয় তা না করে ইটের বদলে পাটকেল, খুনের বদলা খুন, আর অপমানের বদলে অপমান করে ভারতীয় সভ্যতা ও সংস্কৃতির মাথা হেট করলেন।

    এখানে সত্যেনদ্রনাথ দত্তের কবিতা মনে পড়ে গেল, 
    " উত্তম ও অধম"

    কুকুর আসিয়া এমন কামড়
    দিল পথিকের পায়,
    কাপড়ের চোটে বিষদাঁত ফুটে
    বিষ লেগে গেল তায়।

    ঘরে ফিরে এসে রাত্রে বেচারা
    বিষম ব্যথায় জাগে
    মেয়েটি তাহার তারি সাথে হায়
    জাগে শিয়রের আগে।
    বাপেরে বলে ভৎসনা ছলে
    কপালে রাখিয়া হাত, 
    "তুমি কেন বাবা ছেড়ে দিলে তারে
    তোমার কি নাই দাঁত !"
    কষ্টে হাসিয়া আর্ত কহিল
    "তুইরে হাঁসালি মোরে।
    দাঁত আছে বলে কুকুরের পায়
    দংশিব কেমন করে !
    কুকুরের কাজ কুকুর করেছে
    কামড় দিয়েছে পায়, 
    তাই ব'লে কুকুরে কামড়ানো কি'রে
    মানুষের শোভা পায় ?"

    tarunkantithakur@gmail.com, 08855805900.

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    ১৯৭১ সালে পশ্চিম পাকিস্তানের হানাদার বাহিনীর বিরুদ্ধে ন'মাস যুদ্ধ করে জিতেছিল পূর্ব পাকিস্তানের মানুষ। ভারত সাহায্য করেছিল যুদ্ধে জিততে। ওই সাহায্যটা না করলে বাংলাদেশের পক্ষে যুদ্ধে জেতা সম্ভব হত বলে আমার মনে হয় না। বাংলাদেশের জন্ম আমাদের বুঝিয়েছিল, ভারত ভাগ যাঁরা করেছিলেন, দূরদৃষ্টির তাঁদের খুব অভাব ছিল। তাঁরা ভেবেছিলেন 'মুসলমান মুসলমান ভাই ভাই, হোক না তারা বাস করছে হাজার মাইল দূরে, হোক না তাদের ভাষা আর সংস্কৃতি আলাদা, যেহেতু ধর্মটা এক, বিরোধটা হবে না।'ভুল ভাবনা। ভারত ভাগ হওয়ার পর পরই বিরোধ শুরু হয়ে গেল। পশ্চিম পাকিস্তানি শাসকগোষ্ঠী শোষণ করতে শুরু করলো পূর্ব পাকিস্তানের মুসলমানদের । নিজেদের ভাষাও চাপিয়ে দিতে চাইলো। আরবের ধনী মুসলমানরা যেমন এশিয়া বা আফ্রিকার গরীব মুসলমানদের তুচ্ছতাচ্ছিল্য করে, মানুষ বলে মনে করে না, পশ্চিম পাকিস্তানী শাসকরা ঠিক তেমন করতো, বাঙালিদের মানুষ বলে মনে করতো না। পূর্ব পাকিস্তান ফসল ফলাতো, খেতো পশ্চিম পাকিস্তান। পুবের ব্যবসাটা বাণিজ্যটা ফলটা সুফলটা পশ্চিমের পেটে। এ ক'দিন আর সয়! মুসলমানে মুসলমানে যুদ্ধ হল। শেষে, বাঙালি একটা দেশ পেলো। ভীষণ আবেগে দেশটাকে একেবারে ধর্মনিরপেক্ষ, সমাজতান্ত্রিক, গণতান্ত্রিক ইত্যাদি চমৎকার শব্দে ভূষিত করলো। ক'জন মানুষ ওই শব্দগুলোর মানে বুঝতো তখন? এখনই বা কতজন বোঝে? বোঝেনি বলেই তো চল্লিশ বছরের মধ্যেই দেশটা একটা ছোটখাটো পাকিস্তান হয়ে বসে আছে। ইসলামে থিকথিক করছে দেশ। টুপিতে দাড়িতে, হিজাবে বোরখায়, মসজিদে মাজারে চারদিক ছেয়ে গেছে। মানুষ সামনে এগোয়, বাংলাদেশ পিছোলো। চল্লিশ বছরে যা পার্থক্য ছিল বাংলাদেশে আর পাকিস্তানে, তার প্রায় সবই ঘুচিয়ে দেওয়া হয়েছে। সমান তালে মৌলবাদের চাষ হচ্ছে দু'দেশের মাটিতে। বাংলাদেশ মরিয়া হয়ে উঠেছে প্রমাণ করতে, যে, 'মুসলমান মুসলমান ভাই ভাই। দ্বিজাতিতত্ত্বের ব্যাপারটা ভুল ছিল না, ঠিকই ছিল'।

    দেশের সংবিধান বদলে গেছে। পাকিস্তানি সেনাদের আদেশে উপদেশে যে বাঙালিরা বাঙালির গলা কাটতো একাত্তরে, পাকিস্তান থেকে আলাদা হতে চায়নি, দেশ স্বাধীন হওয়ার পর খুব বেশি বছর যায়নি, দেশের তারা মন্ত্রী হয়েছে, দেশ চালিয়েছে। আমার মতো গণতন্ত্রে সমাজতন্ত্রে সমতায় সততায় বিশ্বাসী একজন লেখককে দেশ থেকে দিব্যি তাড়িয়ে দেওয়া হয়েছে কিছু ধর্মীয় মৌলবাদীকে খুশি করার জন্য। যারা তাড়ালো, যারা আজও দেশে ঢুকতে দিচ্ছে না আমাকে, সেই রাষ্ট্রনায়িকারা ওপরে যা-ই বলুক, ভেতরে ভেতরে নিজেরাও কিন্তু মৌলবাদী কম নয়।

    বিজয় উৎসব করার বাংলাদেশের কোনও প্রয়োজন আছে কি? আমার কিন্তু মনে হয় না। আসলে ঠিক কিসের বিরুদ্ধে বিজয়? পাকিস্তান আর বাংলাদেশের নীতি আর আদর্শ তো এক! সত্যিকার বিরোধ বলে কি কিছু আছে আর? পাকিস্তানের ওপর নয়, বরং বাংলাদেশের বেশিরভাগ মানুষের রাগ একাত্তরের মিত্রশক্তি ভারতের ওপর। বিজয় দিবস করে খামোকাই নিজের সঙ্গে প্রতারণা না করলেই কি নয়! ১৬ ডিসেম্বরে নয়, বাংলাদেশ বরং ১৪ই আগস্টে 
    উৎসব করুক। পাকিস্তানের জন্মোৎসব করুক ঘটা করে। পাকিস্তানের সঙ্গে মিলে মিশে রীতিমত জাঁকালো উৎসব। মুসলমানের উৎসব। বিধর্মীদের থেকে মুসলমানদের আলাদা করার ঐতিহাসিক উৎসব। বিজয় উৎসব।


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    (c) to own and acquire movable and immovable property; and
    (d) to administer such property in accordance with law.
    28. Freedom as to attendance at religious instruction or religious worship in certain educational institutions.—(1) No religious instruction shall be provided in any educational institution wholly maintained out of State funds.
    (2) Nothing in clause (1) shall apply to an educational institution which is administered by the State but has been established under any endowment or trust which requires that religious instruction shall be imparted in such institution.
    (3) No person attending any educational institution recognised by the State or receiving aid out of State funds shall be required to take part in any religious instruction that may be imparted in such institution or to attend any religious worship that may be conducted in such institution or in any premises attached thereto unless such person or, if such person is a minor, his guardian has given his consent thereto.
    Cultural and Educational Rights
    29. Protection of interests of minorities.—(1) Any section of the citizens residing in the territory of India or any part thereof having a distinct language, script or culture of its own shall have the right to conserve the same.
    (2) No citizen shall be denied admission into any educational institution maintained by the State or receiving aid out of State funds on grounds only of religion, race, caste, language or any of them.
    30. Right of minorities to establish and administer educational institutions. — (1) All minorities, whether based on religion or language, shall have the right to establish and administer educational institutions of their choice.
    (1A) In making any law providing for the compulsory acquisition of any property of an educational institution established and administered by a minority, referred to in clause (1), the State shall ensure that the amount fixed by or determined under such law for the acquisition of such property is such as would not restrict or abrogate the right guaranteed under that clause.
    (2) The State shall not, in granting aid to educational institutions, discriminate against any educational institution on the ground that it is under the management of a minority, whether based on religion or language.
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    Why people (Bhaktas) wants to close Madrassa before EDIT Indian constitution ?

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    India already has a National Book – Constitution, says John Dayal

    09 Dec 2014 05:12 PM, IST


    India already has a National Book – Constitution, says John Dayal
    John Dayal

    By IndiaTomorrow.net,

    New Delhi, 09 Dec 2014: BJP leader and foreign affairs minister Sushma Swaraj's call for declaring Hindu holy book Bhagavad Gita as the national scripture of the country has generated a hot debate among intellectuals and community leaders of different religions.

     

    Eminent human rights activist and Christian leader John Dayal says India already has a National Book in the form of Constitution.  

     

    "There should be respect given to all books of faith…But our Constitution is our national book because I believe that it distils all the good the various books of faith contain in themselves – the sacredness and dignity of the human person from the womb to the end, the equality of all people, fundamental freedoms," says Dr John Dayal adding that erosion of the Constitution, which gives the country Rule of Law, has started.

     

    "I fear that the erosion of our Constitution is taking place right before our eyes. In the past one month, government ministers and non-state actors have articulated their vision of an India of the future, and subtle but perceptible changes have already been brought about towards goal of a mono-cultural India which remains at odds with its vivid variety. This is a testing of waters for a more direct assault in the future. It could be a matter of time," says he in a post on his facebook page.

     

    Speaking at 'Gita Prerna Mahotsav' event at the Red Fort in New Delhi on 7th Dec, Swaraj had asked the Centre to declare Bhagavad Gita as a 'Rashtriya Granth' (national scripture).

     

    Dr Dayal, who has read holy books of several religions, says all should be respected, though personally, being a Christian, the Bible is the book of his faith.

     

    "I have read the Bhagavad Gita many times in its English translation by the philosopher and second President of India, Dr. Sarvepalli Radhakrishnan, and hold it in high regard as I do the Holy Quran, the Zen Avesta, the Guru Granth Sahib and others, which I have read in parts over the years, also in their English translations. I wish I could have read in the wonderful languages they were written it. I studied Hebrew for a couple of years, but that was not enough to be proficient enough to read the Talmudic texts in the original. Knowing Urdu is absolutely no help in reading the Quran in its resonating Arabic. As a Christian, the Bible is the book of my faith, and holy for me. There should be respect given to all books of faith," says Dr. Dayal, former member of National Integration Council.


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    This is an important document about the background of Bangladesh war on the Pak election results in 1970 which projected two leaders against each other Mujib in the East and Bhutto on the West.

    .It was published in British newspaper the Times on 9 th December 1970 just before Bhutto waged the brutal war against the people of Bangladesh.Thanks Prajanmo Bangladesh to share the document.

    Palash Biswas

    ইতিহাস কথা কওঃঅবাধ নির্বাচনের মাধ্যমে সাবেক পররাষ্ট্রমন্ত্রী জুলফিকার আলি ভুট্টো পশ্চিমের একক নেতা হিসেবে আবির্ভূত হয়েছেন এবং বাঙালি জাতীয়তাবাদী শেখ মুজিবুর রহমান পূর্ব পাকিস্তানের মুকুটহীন সম্রাটে পরিণত হয়েছেন

    দি টাইমস, ৯ ডিসেম্বর, ১৯৭০

    একটি বিস্ময়কর সংখ্যাগরিষ্ঠ বিজয়ের মাধ্যমে পকিস্তানের প্রথম অবাধ নির্বাচনের মাধ্যমে সাবেক পররাষ্ট্রমন্ত্রী জুলফিকার আলি ভুট্টো পশ্চিমের একক নেতা হিসেবে আবির্ভূত হয়েছেন এবং বাঙালি জাতীয়তাবাদী শেখ মুজিবুর রহমান পূর্ব পাকিস্তানের মুকুটহীন সম্রাটে পরিণত হয়েছেন। পশ্চিমাংশে নতুন সংসদের ৩০০ আসনের মধ্যে যেখানে ধরা হয়েছিল মি. ভুট্টোর সোশ্যালিস্ট পিপলস পার্টি ৩০টি আসন পাবে, সেখানে তারা পশ্চিমের ১৩৮টি আসনের মধ্যে ৮১টি আসন লাভ করেছে। মি. ভুট্টো ১১৯টি আসনে তার প্রার্থী দাঁড় করিয়েছিলেন এবং তার দল আশা করছে সবগুলো আসনের ফলাফল প্রকাশ হলে আরো ২০টি আসন লাভ করে শীর্ষে অবস্থান করবে।

    পূর্ব প্রদেশে জাতীয়তাবাদী দল আওয়ামী লীগ, যেমন আশা করা হয়েছিল, বাংলার জন্য নির্ধারিত ১৬২টি আসনের মধ্যে ইতোমধ্যেই ১৪৫ আসন লাভ করেছে। এভাবে আওয়ামী লীগ পাকিস্তানের একক বৃহত্তম দল হিসেবে আবির্ভূত হচ্ছে, যদিও পশ্চিমের কোনো সমর্থনই তারা পাবে না। একইভাবে ভুট্টোর অনুসারীরা পশ্চিম পাকিস্তানেই সীমাবদ্ধ, পূর্বে সমর্থনের কোনো আশা বা চেষ্টা তারা করেনি।

    এই দু'জন আঞ্চলিক নেতা পকিস্তানের সব ইস্যুতে সম্পূর্ণ বিপরীত অবস্থান গ্রহণ করে থাকেন এবং নির্বাচনের এই ফলাফল পকিস্তানকে সম্পূর্ণ দু'টি পৃথক রাজ্যে বিভক্ত করে ফেলবে বলে মনে হচ্ছে। মি. ভুট্টো 'ইসলামী সমাজতন্ত্র'র ব্যানারে তার নির্বাচনী প্রচারাভিযান চালিয়েছেন, ভারতের সঙ্গে এক হাজার বছরের যুদ্ধ করার প্রতিজ্ঞা করেছেন এবং পাঞ্জাব ও সিন্ধু প্রদেশে বেশিরভাগ আসন পেয়েছেন। উত্তর-পশ্চিম সীমান্ত প্রদেশেও তিনি সমর্থন অর্জন করতে পেরেছেন।

    প্রত্যন্ত অঞ্চল থেকে চূড়ান্ত ফলাফল আসছে এবং এটা পরিস্কার যে ভুট্টো পাঞ্জাবের ৮২টি আসনের মধ্যে অন্তঃত ৬২টি আসন পাবেন এবং নিজ প্রদেশ সিন্ধুতে ২৭টি আসনের মধ্যে ১৯টি আসন পাবেন। এছাড়া তিনি নিজে যে-ছয়টি আসনে দাঁড়িয়েছিলেন তার পাঁচটিতেই তিনি জিতছেন। যে কাউন্সিল মুসলিম লীগকে ভাবা হয়েছিল পশ্চিম পাকিস্তানের সর্ববৃহৎ দল হিসেবে আত্মপ্রকাশ করবে, মিয়া মুমতাজ দৌলতানার সেই দলটির ভরাডুবি হয়েছে। যে ৫০টি আসনে তারা প্রতিযোগিতা করেছিল তার মধ্যে তারা মাত্র ৭টি আসন পাচ্ছে। বিস্ময়করভাবে ডানপন্থী কট্টর দল জামাত-ই-ইসলামী খুবই খারাপ ফলাফল করেছে এবং বাম ধারার ধার্মিকের দল হাজারভি জামাত উলামা ইতোমধ্যেই পাঁচটি আসন লাভ করেছে।

    নির্বাচনে অংশ নেয়া অন্যান্য ২৩টি দলের প্রার্থীরা শোচনীয়ভাবে পরাজিত হয়েছে। কিছু বিখ্যাত নেতা তাদের নিজস্ব নেতৃইমেজের কারণে নিজ নিজ এলাকায় জয়লাভ করেছেন। এদের মধ্যে আছেন পাকিস্তান গণতন্ত্রী দলের বিখ্যাত নেতা নূরুল আমিন, উত্তর-পশ্চিম সীমান্ত প্রদেশের মিয়া মুমতাজ দৌলতানা ও আব্দুল ওয়ালি খান। তবে বিমানবাহিনীর সাবেক প্রধান এয়ার ভাইস মার্শাল আসগর খান, যিনি আইয়ুব খানের বিরুদ্ধে সংঘটিত গণআন্দোলনে নেতৃত্ব দিয়েছিলেন, পিপলস পার্টির প্রার্থী হিসেবে রাওয়ালাপিন্ডিতে পরাজিত হন।

    এবিষয়ে কোনো সন্দেহ নেই যে ক্ষমতাবান আওয়ামী লীগ বাঙালি জাতীয়তাবাদের ওপর ভিত্তি করে তাদের ক্ষমতা প্রদর্শন করেছে। দলটির জনপ্রিয়তা দাঁড়িয়ে আছে প্রধানত তার পশ্চিম পাকিস্তান বিরোধী অবস্থান এবং পূর্ব পাকিস্তানের জন্য স্বায়ত্তশাসনের প্রতিজ্ঞা থেকে। তবে এখানে একটি ব্যাপার ছিল যে, আওয়ামী লীগের প্রধান প্রতিদ্বন্দ্বী পিকিংপন্থী ন্যাশনাল আওয়ামী পার্টি শেষ মুহূর্তে নির্বাচন বয়কটের সিদ্ধান্ত নেয় এবং এভাবে শেখ মুজিবের মাঠ ফাঁকা হয়ে যায়। দলটি এখন গত সপ্তাহে বাতিল হয়ে যাওয়া ঘুর্ণিঝড়-দূর্গত বাকি নয়টি আসনে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করবে।

    রাওয়ালাপিন্ডি, করাচি, পেশওয়ার ও পাঞ্জাবের গ্রামাঞ্চলে কিছু বিচ্ছিন্ন সংঘাতের ঘটনা ছাড়া নির্বাচন সহিংসতা ছাড়াই অনুষ্ঠিত হয়েছে। নির্বাচন এক অর্থে পাকিস্তানে উত্তেজনা কমিয়ে দিয়েছে কিন্তু অন্য অর্থে দেশটিতে জটিল রাজনৈতিক পরিস্থিতির সৃষ্টি করেছে।

    পাকিস্তানের নতুন রাজনৈতিক প্রতিনিধিবর্গকে জাতীয় পরিষদে প্রথম দিন বসার পর থেকে ১২০ দিন সময় দেয়া হবে একটি নতুন সংবিধান প্রণয়ন করার জন্য। কিন্তু নির্বাচনের ফলাফল ও সাংবিধানিক সংসদের চেহারা যা দাঁড়াচ্ছে তা থেকে মনে হচ্ছে সে-প্রক্রিয়া থেমে যাবে। পূর্ব পাকিস্তানের ১৬২ জন প্রতিনিধি এরকম একটি সংবিধানের জন্য লড়াই করবেন যা প্রদেশগুলোর সর্বোচ্চ স্বায়ত্তশাসন দেবে। শেখ মুজিব যদি সংসদে তার দাবি প্রতিষ্ঠিত করতে পারেন তবে কেন্দ্রীয় সরকারকে তার প্রতিরা ও পররাষ্ট্র ছাড়া সব ক্ষমতা ছেড়ে দিতে হবে।

    তিনি এরকম একটি সংবিধান চাচ্ছেন যা বাঙালিদের তাদের অর্থনৈতিক কর্মকাণ্ড ও বৈদেশিক বাণিজ্যের জন্য নিজস্ব পছন্দকে যাচাই করার সুযোগ নিশ্চিত করবে। এর ফলে পূর্ব বাংলা পাকিস্তানের শত্রুভাবাপন্ন রাষ্ট্র ভারতের সঙ্গে বাণিজ্য করতে পারবে। অন্যদিকে ভুট্টো ক্ষমতাধর কেন্দ্রীয় সরকার সমর্থন করেন এবং তিনি পূর্ব পাকিস্তানের বেশিরভাগ দাবিরই বিরোধিতা করবেন। তাই দুই নেতা সমঝোতায় আসতে পারবেন কিনা সেব্যাপারে সন্দেহ থেকে যাচ্ছে।

    অনুবাদ: ফাহমিদুল হক



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