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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    हमारे मुद्दे दूसरे हैं।


    हमारे मुद्दे युद्धक कारपोरेट मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में  कृषि,कारोबार और उत्पादन प्रणाली में जारी नरसंहार के हैं।


    हम किसी भी स्तर पर स्त्री के चरित्रहनन के खिलाफ हैं तो नरसंहार संस्कृति में स्त्री के इस्तेमाल उत्पीड़न के भी खिलाफ है हम!

    पलाश विश्वास

    संविधान बचाओ देश बचाओ देशभक्त नागरिकों!

    हमारे मुद्दे युद्धक कारपोरेट मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में  कृषि,कारोबार और उत्पादन प्रणाली में जारी नरसंहार के हैं।


    इसीलिए इसी सिलसिले में मित्रों,अमित्रों,आज कुछ बेतरतीब बातें करने की इजाजत हूं और शायद अगले पखवाड़े में यही सिलसिला जारी रहना है छिटपुट उपलब्ध कनेक्टिविटी के साथ क्योंकि पीसी तो सोदपुर छूटा जा रहा है और टैब और ऐप्स का अभ्यस्त नही हूं।घर में जो पीसी है,उसकी कनेक्टिविटी का अंदाज नहीं है।फिर दौड़ भाग भी खूब होनी है और मोबाइल पर मैं सोसल नेटवर्किंग कर नहीं सकता।


    सिलसिलेवार बातें कोलकाता लौटकर होनी है।फिलवक्त यात्रा पर जाते जाते बेहद जरुरी बातें करनी हैं।जिनपर आगे सिलसिलेवार चर्चा बी करेंगे ,अगर मौका हुआ और सकुशल सोदपुर लौटना हुआ।


    आगे किस किनारे बंधेगी अपनी नाव,कुछ भी पता नहीं है।


    हो सकता है कि इस बार आखिरी बार अपनी माटी को छूने का मौका है।


    आखिरीबार हिमालय को छूने का कार्यक्रम भी हो सकता है यह।


    दोस्तों से मुलाकातें भी आखिरी हो सकती हैं।


    हालात संगीन है और हम मुक्तबाजारी युद्ध गृहयुद्ध के कुरुक्षेत्रे धर्मक्षेत्रे अपनी नियतिबद्ध परिणति के इंताजार में हैं।


    दोस्त सारे महामहिम होते जा रहे हैं और आम लोगों के महामहिमों से संवाद के अवसर होते नहीं हैं।


    आगे सिर्फ पिछवाड़ा है।


    सामने कुछ भी नहीं है।


    हम अब अतीत में जी रहे हैं और वर्तमान हमें लील रहा है।


    फिर हो सकता है कि जिंदगी मौका दें न दें।जिंदगी जो अबूझ पहेली है कि गले मिलने का फिर मौका मिले न मिले, न गिले न शिकवे का फिर कोई मौका बने न बने।जिनके होने के लिए हम हैं,जो गुलमोहर की धूप छांव हैं,वे हो न हो।


    हो सकता है कि मित्रों में कुछ विश्वसुंदरी की तर्ज पर नोबेलिया हो जायें।जेएनयू के किसी कवि या कोलकाता के किसी कथाकार के नोबेल बन जाने की प्रबल संभावना है जैसे हमारे पुरातन सारे सहकर्मी और मित्र संपादक हो गये हैं और हम वही डफर के डफर रहे।


    प्रीमियम रेट पर रेलयात्रा की औकात हो यान हो और न जाने किस बंद गली में कैद रहे बाकी जिंदगी।अपनी माटी की खुशबू में समाहित हो आने का संजोग कोईबने  न बने।अनियंत्रित विनियमित बाजार के अबाध पूंजी प्रवाह और न्यूनतम राजकाज में हम जैसे लोगों का क्या हश्र होगा कौन जाने।


    देश की सबसे धनी महिला अब छनछनाते विकास बांटेंगी वंचितों को और देश को युद्धक अर्थव्यवस्था बनाने का जिम्मा जिस कंपनी का है ,उसका संविधान दशकों बाद बदल रहा है।कारोबारियों को ईटेलिंग में प्रतिस्पर्धा करने की सलाह दी जा रही है।हीरक चतुर्भुज में हम फिर कहा मिले या न मिले ,क्या ठिकाना है।


    हमारे मुद्दे दूसरे हैं।


    हमारे मुद्दे युद्धक कारपोरेट मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में  कृषि,कारोबार और उत्पादन प्रणाली में जारी नरसंहार के हैं।


    हमारे मुद्दे आम जनता के खिलाफ राष्ट्र के नस्ली युद्ध के हैं।हमारे मुद्दे भारतीय लोक गणराज्य का भविष्यसे जुड़े हैं।रहेंगे।क्योंकि हम सर्फ नागरिक हैं।महामहिम पार्टीबद्ध नहीं हैं और न होंगे।


    बाबासाहेब अंबेडकर का भी हो सकता है कि कोई जाति पूर्वग्रह रहा हो और जाति उन्मूलन के उनके एजंडे में खामियां भी रही हों,हो सकता है कि उनका अर्थशास्त्र मौलिक भी न हो।


    हो सकता है कि हिंदुत्व के मुद्दों पर उनके खुलासे में इतिहास बोध न हो और न उनके बनाये संविधान में कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो।



    बाबासाहेब के बचाव के लिए हम कुछ कहना नहीं चाहेंगे क्योंकि बाबासाहेब की ऊंचाई हालिल किये बिना हम मंतव्य करने की हालत में नहीं है।पद,प्रतिष्ठा और संपन्नता में जो हमसे बेहतर हैं,वे बोलें लिखें,उनकी अभिव्यक्ति का हम सम्मान करते हैं।


    वर्णवर्स्वी दुर्गा पूजा और महिषासुर वध के लिए स्त्री मिथक के पक्ष विपक्ष के मिथकों के हम खिलाफ हैं क्योंकि हम किसी भी स्तर पर स्त्री के चरित्रहनन के खिलाफ हैं तो नरसंहार संस्कृति में स्त्री के इस्तेमाल उत्पीड़न के भी खिलाफ है हम।


    हम जेएनयू कैंपसे अस्मिता अभियान के खिलाफ रहे हैं और हमारी कोशिश देश तोड़ने की नहीं जोड़ने की है।


    हम किसी खेमे में नहीं हैं और हिंदुत्व के एजंडे का विरोध करने के बावजूद देशभक्त निष्ठावान समर्पित संघ परिवार के कार्यकर्ताओं का हम सम्मान करते हैं और इसीलिए मोदी के राजकाज के उजले पक्ष पर हम कालिख नहीं पोत रहे हैं।


    हम इंदिरा और नेहरु की आलोचना कर रहे हैं और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वाम पाखंड का भी विरोध कर रहे हैं।


    नरसंहार संस्कृति वाम दक्षिण नहीं होती है,वह सत्ता वर्ग की वर्णवर्चस्वी और नस्ली संस्कृति है।


    हम महिषासुर प्रकरण में महिषासुर पूजा के उतने ही खिलाफ हैैं जितना आस्था के बहाने अश्लील वर्णवर्चस्व और नस्ली घृणा के दुर्गोत्सव का और इसे हम धार्मिक मामला नहीं मानते हैं और न जाति का मामला।


    लोकतंत्र का तकाजा है कि जैसे धार्मिक माने जानेवाली कुप्रथाओं का अब तक निषेध होता रहा है,उसीतरह भ्रूण हत्या,आनर किलिंग,दहेज समेत नरसंहार की स्त्रीविरोधी आदिवासी और दलित विरोधी प्रथाओं का भी अंत हो।


    हम यह भी मानते हैं कि भारतीय संविधान में अनेक गड़बड़ियां रह सकती हैं जैसे धर्मग्रंथों और मिथकों में भी होती हैं।


    मानवाधिकार और सभ्यता के लिहाज से उनमें संशोधन अवश्य होने चाहिए।लेकिन देशी विदेशी कंपनियों,वर्ण वर्चस्व और नस्लभेद के मनुस्मृति शासन को लागू करने के लिहाज से  इतिहास और संविधान संशोधन के हम विरुद्ध हैं।


    हम कानून के राज के पक्ष में हैं तो लोकतंत्र के पक्ष में भी।एकपक्षीय सांस्कृतिक वर्चस्व के किलाप अपर संस्कृति के वक्तव्य को बाकायदा पुलिसिया राष्ट्र के दमन तंत्र के तहत दबाना और बहुसंख्य का उसके पक्ष में खड़े हो जाने के विरुद्ध हम हैं।


    राष्ट्रतंत्रमें बुनियादी परिवर्तन के लिए हम भारतीय संविधान में भी परिवर्तन के पक्ष में हैं।वोट बैंक के गणित,मुक्त बाजार और युद्धक अर्थव्यवस्था के देशी विदेशी हितों के मद्देनजर विशुद्ध कारपोरेट लाबिइंग के तहत काननून और संविधान बदलने के देश बेचो अभियान का हम हर हल में विरोध करेंगे और इसीलिए हम संविधान बचाओ देश बचाओ अभियान भी चला रहे हैं।



    आप आस्था के नाम पर आदिवासियों की हत्या का जश्न मना सकते हो और उन पर अपना ध्रम और मिथक थोंप सकते हों तो उनका भी अधिकार बनता है,इतिहास को अपने नजरिये से गढ़ना और अपने मिथकों को सार्वजनिक करना।


    हो सकता है कि यह विशुद्ध राजनीति हो,लेकिन सत्तावर्ग को अपनी राजनीति में अपनी आस्था का इस्तेमाल जायज है तो आदिवासियों और वंचितों की राजनीति का हम हर स्तर पर विरोध करें तो यह लोकतंत्र के खिलाफ है।


    हम फारवर्ड प्रेस का समर्थन नहीं कर रहे हैं और न दुर्गा को गणिका बताते हुए महिषासुर मिथक का।


    हम मनावाधिकार के हक में खड़े हैं जिसके तहत नरहत्या गलत है,गैरकानूनी है और असुर भी मनुष्य हैं,आदिवासी हैं।ओबीसी भी हैं,उन शूद्र राजाओं के वंशज जो अठारवीं सदी तक इस देश के विबिन्न हिस्सों पर राज करते रहे हैं।


    हम सत्तापक्ष के अलावा विपक्ष की अभिव्यक्ति का भी सम्मान करते हैं और असहमत होने के बावजूद उसके खातिर लड़ सकते हैं।

    लेकिन जैसा कि हमने कहा कि हमारे मुद्दे मिथक नहीं,सामाजिक यथार्थ हैं।


    हमारा नजरिया भाववादी नही है,वस्तुवादी है और हम किसी भी तरह के अस्मिता आधारित ध्रूवीकरण के बजाय वर्गीय ध्रूवीकरण के पक्षधर हैं।



    अपने पुरातन और बेहद कामयाब सहकर्मी संपादक सुमंत भट्टाचार्य के हस्तक्षेप पर लगे फेसबुकिया मंतव्य पर दो बातें कहनीं हैं।


    उन्होंने बिल्कुल ठीक कहा है कि मिथकीय महिमांडन नहीं होना चाहिए।


    हम भी यही अर्ज कर रहे हैं कि दुर्गा की मूर्ति बनायी गयी है और उसीकी  पूजा होती है तो इसके विरोध में महिषासुर की मूर्ति बनाकर मिथकीय महिमांडन से भावावेग अंधड़ से हम सामाजिक यथार्थ को संबोधित नहीं कर सकते।


    हमारा दुर्गापूजा का विरोध लेकिन मिथकीय महिमामंडन नहीं है और न ही दुर्गा का चरित्र हनन है।किसी भी स्त्रीके ,चाहे वह स्त्री मिथक ही क्यों न हो,उसका चरित्रहनन पुरुषतांत्रिक है।


    दुर्गा का मिथक जो भी है और आस्था भी जो है,उसके बारे में हमें कुछ नहीं कहना है।


    महिषासुर विवाद का सच किंतु यही है कि देश भर में आदिवासी समाज की पहचान असुरसंस्कृति से जुड़ती है और बंगाल और झारखंड और शायद अन्यत्र भी असुर जातियां हैं।तो उनीकी हत्या का उत्सव क्यों मनाया जाना चाहिए,बुनियादी सवाल यही है।


    बुनियादी सवाल है कि अपनी ह्त्या के उत्सव का वे विरोध क्यों नहीं कर सकते।


    अगर नरबलि की प्रथा रुक सकती है तो असुर बिरादरी की भावनाओं का सम्मान करते हुुए बिना असुर वध के भी आस्था के उत्सव हो सकते हैं।


    बहुसंख्य समुदायों को अल्पसंख्यक समुदायों को मुख्यधारा मे जोड़ने की पहल करनी चाहिए।दूसरी बात यह कि बाकी जो सतीरुपेण देवियां हैं ,वे भी आदिवसी मूल की ही हैं और उनका कहीं कोई विरोध नहीं हो रहा है।


    दरअसल सतीपीठों का विमर्श और भैरवों को उनसे जोड़ने का मिथक दरअसल आर्य अनार्य संस्कृतियों का समायोजन रहा है।यह मिथक संस्कृतियों के एकीकरण का है।


    दूसरी बात यह है कि आर्य बाहरी है या भीतरी ,इस पर अलग अलग दावे हैं।संघ परिवार तो महाकाव्यों से लेकर वैदिकी साहित्य को भी इतिहास बनाने पर तुले हैं।


    इस पचड़े में हम पड़ना नहीं चाहते हैं लेकिन भारत वर्ष में अद्वैत संस्कृति कभी रही हो,ऐसा अभी साबित हुआ नहीं है।


    बहुल संस्कृति के देश में अलग अलग नस्लें है और जाति व्यवस्था में इस नस्ली आधिपात्य के भी ऐतिहासिक कारण हैं।जो उत्पादन संबंधों से जुड़े हैं।अर्थव्यवस्था में  जन्मजात आरक्षण का स्थाई बंदोबस्त है यह और व्यवस्था बदलने के लिए,राष्ट्रतंत्र में बुनियादी  परिवर्तन के लिए हम बाबासाहेब के जाति उन्मूलन एजंडा को प्रस्थानबिंदू मानते हैं।


    सांप्रतिक इतिहास में कश्मीर, मणिपुर, संपूर्ण हिमालय, दक्षिण भारत और मध्य भारत,समूचा पूर्वोत्तर और यहां तक कि पूरब के बंगाल,बिहार और ओड़ीशा जैसे राज्यों के प्रति सत्ता वर्चस्व वाले समुदायों का आचरण नस्लवादी है।


    हम इस नस्लवादी आचरण को समझे बिना कश्मीर को देश का अभेद्य अंग मानते हैं और हद से हद किसी हैैदर जैसी फिल्म बजरिये मुख्य़धारा के विमर्श के तहत हम अपने अपने स्तर पर कश्मीर का यथार्थ देखते परखते हैं,जबकि कश्मीरियों के नजरिये को हम सिरे से राष्ट्रद्रोही मानते हैं।


    मध्यभारत के आदिवासी भूगोल,हिमालय और पूर्वोत्तर के आफसा देश से भी हम जुड़ते नहीं हैं क्योंकि नस्ली वर्चस्व के कारण हम इस अस्पृश्य भूगोल के गैरनस्ली लोगों के नागरिक और मानवाधिकार हनन को राष्ट्रहित में मानते हैं।


    फिर भी गनीमत है कि इरोम शर्मिला लेकिन सोनी सोरी की तरह राष्ट्रद्रोही अभी करार नहीं दी गयीं।


    दुर्गा के मिथक पर असुरों की टिप्पणी से जो हमारी आस्था को आघात पहुंचता है,वह मिथक सर्वस्व है।


    दुर्गा न मूल मिथक में कोई सामाजिक यथार्थ है और न महिषासुर मिथक के आदिवासी विवरण में।


    हम दरअसल दो अलग अलग मिथकों के विवाद में है।


    इसके विपरीत,गुवाहाटी की सड़क पर नंगी भगायी जाती आदिवासी कन्या और निरंकुश सैन्य शासन के विरुद्ध मणिपुरी माताओं के नग्न प्रदर्शन या सोनी सोरी की आपबीती और ऐसे ही रोजाना देश कि किसी न किसी कोने में गैर नस्ली महिलाओं के उत्पीड़न पर हम विचलित नहीं होते।


    सलवा जुड़ुम हमें बतौर नागरिक लज्जित नहीं करता।

    न आफसा हमें शर्मिंदा करता है और न हम आधार निगरानी योजना के खिलाप खड़े हो पाते हैं और न निरंकुश बेदखली अभियान या अश्वमेधी राजकाज और सत्ता राजनीति के।


    संतान समेत दुर्गावतार की प्रतिमाएं है और वध्य जो असुर है अश्वेत,उसके नस्ली बिंब संयोजन के सौंदर्यबोध में नरसंहार संस्कृति का आक्रामक और अद्यतन सामाजिक यथार्थ है।


    हम पहले भी लिख चुके हैं कि दुर्गा बाकी चंडी रुपों की तरह कोई वैदिकी देवी नहीं हैं और दुर्गावतार मिथक वैदिकी है।


    यह बंगीय अवदान है.जिसका राष्ट्रीयकरण हुआ है।


    वैष्णोदेवी की पूरे देश में आराधना होती है और असुरों को मां के दरबार से कोई ऐतराज नहीं है।इसे समझा जाना चाहिए।


    असली दुर्गा पूजा तो बनेदी बाड़ी की पूजा है जो बंगाल के सामंतों की विरासत है,उसीतरह जैसे सतीप्रथा।सतीप्रथा कोई वंचितों और गैरनस्ली लोगों की परंपरा नहीं रही है।


    बौद्धमय बंगाल के पतन से पहले जयदेव ने गीत गोविंदम रचा और इस्लामी शासन के दौरान बंगाल में वैष्णव आंदोलन चैतन्य.महाप्रभु का चला।


    शैव और शाक्त संप्रदाय आदिकाल से रहे हैं जैसे राजा शशांक शैव रहे हैं।


    आधुनिक राजनीतिकों के सार्वजनीन दुर्गोत्सव से पहले बंगाल में कोई दुर्गा संप्रदाय नहीं रहा है।


    यह ब्राह्मणों की देवी रही है और दुर्गा का मिथक ब्राह्मणवादी है,यह भी इतिहास विरुद्ध है।


    ब्राह्मण को शिव ,काली और विष्णु के उपासक रहे हैं।


    दुर्गापूजा इस्लामी मनसबदार राजाओं और अंग्रेजी हुकूमत में जमींदारी की निहायत व्यक्तिगत पूजा रही है,जिसकी अनिवार्य रस्म नरबलि है।


    नरबलि तंत्र पद्धति और कापालिक कर्म है और बंगाल और अन्यत्र भी नरबलि और नरसंहार ब्राह्मण जाति का नहीं,बल्कि शासक वर्ग का साझा अश्वमेध राजसूय है।


    लेकिन इस नरसंहारी शक्ति में हिंदुत्व के पुरोहितों को शामिल किये बिना इस सर्वजन स्वीकृत बनाया जा नहीं सकता,इसलिए राक्षस रावण को भी ब्राह्मण बना दिया गया।


    पूजा समंतों की और पुरोहित ब्राह्मण।


    चूंकि प्रजाजनों की कोई भूमिका वध्य बन जाने के सिवाय थी नहीं,इसलिए इस पूजा के कर्मकांड में शामिल होने की योग्यता सिर्फ ब्राह्मणों और सिर्फ ब्राह्मणों को दे दिया गया।


    वही रघुकुल रीति चली आ रही है और दुर्गापूजा में भोग रांधने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को ही है।


    किसी और देव देवी की पूजा पद्धति में इतना कठोर अनुशासनबद्ध बहिस्कार नहीं है।


    आस्था की लोक परम्परा भी है और उसमें ब्राह्मण या पुरोहित की कोई भूमिका नहीं है।सूर्यउपासना वैदिकी और गैर वैदिकी दोनों है।


    यूपी बिहार की लोकभूमि में जो सूर्यउपासना का छठ है ,उसमें न जाति और न नस्ली भेदभाव है और न उगते और डूबते सूर्य को अर्घ देने की कोई विधि है।


    आस्था के इस सामाजिक न्याय को भी समझना जरुरी है।




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    JUMP CUT
    Who Is Going To Be Clean?
    We are still not ready to accept that cleanliness and sanitation are caste-based.

    Some straight questions. What are we going to clean, who is going to clean and what is our concept of clean­liness? Will this campaign address the most important, most basic and most neglected question of modernisation of our sanitation system? Whose India are we aiming at cleaning up? In India, cleanliness can't be just about Bollywood actor Aamir Khan preaching that we do not throw banana peels by the street or piss on walls nor about PMs, CMs, all manner of ministers and bureaucrats and politicians picking up brooms to clean streets and public toilets and public places that have already been thoroughly cleaned up for them to perform their sham.
    Lest we forget, India is divided into different classes and castes and communities. What is our target group? This campaign is not the first and won't be the last. From Gandhi's 'Clean India' to Modi's 'Swachh Bha­rat', the country has seen many a gimmick, but that has not prevented India from being the global capital of open defecation. And we never felt ashamed of it. Why?

     
     
    If India is unclean, it is because we will not let our cleaners live with dignity, equality.
     
     
    We are still not ready to accept that cleanliness and sanitation are caste-based. Because of our casteist mindsets, we are not willing to break this shackle. None of our earlier campaigns addressed the issue of cleaners. What an irony! India is not clean because we don't want cleaners to live with dignity and equality. We want the 'cleaners' to experience 'the spiritual experience' of cleaning shit!

    Even in the melodrama we are witnessing now, the focus is not on the localities which are full of garbage, with drains overflowing, septic tanks and sewers choked. This is because these places are home to the poor and the marginalised. These are the dwellings without toilets. The inhabitants may differ in caste and religion but their distinct class is both an identifier and equaliser. These places are devoid of basic infrastructure. Among those who live here are sanitation workers, whose working hours are spent in removing the garbage from the streets and dumps and landfills. Does this campaign address their well-being? No. Sanitation has been linked to caste and class.
    The need is to radically change that mindset. The present system is not ready to do that. As in Nirmal Bharat, the focus is on toilet construction and preaching cleanliness. This can give some people some spiritual solace of washing their guilt and enhance the business of building toilets. But the ground reality will remain. Whatever pomp and show accompanies prime minister Modi's campaign for a clean India, 'Swachh Bharat' appears headed towards the fate of all earlier attempts.

    The writer, a chief of bureau at Outlook Hindi, is author of Unseen: The Truth About India's Manual Scavengers. E-mail your columnist: bhasha [AT] outlookindia [DOT] om
    COVER STORY: CLEAN INDIA
    Cleaning India can't be a superficial thing. Can Modi choke off our industry of filth?
    UTTAM SENGUPTA, R.K. MISRA, MINU ITTYIPE
    COVER STORY: CLEAN INDIA
    'Swachh Bharat' is an extension of 'Nirmal Gujarat', but its cities are no stranger to filth
    R.K. MISRA
    COVER STORY: CLEAN INDIA
    Modi can try, but Benares just doesn't care
    AMRITA DASGUPTA
    COVER STORY: CLEAN INDIA
    Volunteers clear garbage from a colony streetside
    OPINION
    Build toilets. But more important, get communities to change ways.
    SANTOSH MEHROTRA


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    हिंदुत्व का कारोबार: आनंद तेलतुंबड़े


    Posted by Reyaz-ul-haque on 10/12/2014 08:09:00 PM

     
    हाशिए की आवाज स्तंभ के तहत समयांतर के अक्तूबर, 2014 अंक में प्रकाशित. अनुवाद:रेयाज उल हक

    आनंद तेलतुंबड़े
     

    नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिले की प्राचीर से लोगों से जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयतावाद को दस साल तक स्थगित रखने के लिए बड़ी जोशीली अपील की, लेकिन इसके बावजूद उनके कुनबे की सांप्रदायिक हरकतें कम नहीं हो रही हैं. अपील के उलट, हाल में नौ राज्यों में उपचुनावों के प्रचार अभियान दौरान ये हरकतें इस घटिया स्तर तक पहुंच गईं, कि लोगों को लगने लगा कि भाजपा ने दोमुंहेपन और बेईमानी का अपना पुराना खेल फिर से शुरू कर दिया है. इसने विवादास्पद सांसद योगी आदित्यनाथ को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र के साथ उत्तर प्रदेश में 11 विधानसभा सीटों और एक लोकसभा सीट के उपचुनाव की कमान सौंप दी. गोरखपुर से पांचवीं बार सांसद बने, भगवा कपड़े में लिपटे इस नौजवान योगी ने बड़े कम वक्त में इतनी बदनामी हासिल कर ली है कि वह भाजपा का हिंदुत्व का चेहरा बन गया है. मोदी के भाषण के महज दो दिन पहले, उसने संसद के भीतर सांप्रदायिक जहर उगलते हुए इस बात पर जोर दिया कि हिंदुओं को अल्पसंख्यकों के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है. गृह मंत्री राजनाथ सिंह इस पर सहमति में सिर हिला रहे थे. भाजपा के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के मुताबिक योगी को सोच-समझ कर उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के चेहरे के रूप में चुना गया था. यह बहुत साफ था कि भाजपा सांप्रदायिक रूप से लोगों को बांटना चाहती थी, मानो लोकसभा चुनावों के दौरान अमित शाह ने बड़ी महारत से जो किया था, वह कुछ कुछ उसे दोहराना चाहती थी.

    मैंने पिछले स्तंभ में यह चेतावनी दी थी कि अगर हिंदुत्व ब्रिगेड की घटिया बदमाशियों को समय रहते काबू में नहीं किया गया तो वे भाजपा के लिए आत्मघाती साबित होंगी. उपचुनावों के नतीजों ने इसे सचमुच दिखा भी दिया. जिन नौ राज्यों की 32 सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें से 26 सीटें भाजपा के पास थीं जिसे महज चार महीने पहले राष्ट्रीय चुनावों में शानदार जीत भी हासिल हुई थी. लेकिन उपचुनावों में वह महज 12 सीटें बचा पाई. सबसे तगड़ा झटका यूपी में लगा जहां अपने चुने हुए प्रचारक आदित्यनाथ के नेतृत्व में इसने 11 में 7 सीटें खो दीं. इसके बाद राजस्थान और गुजरात की बारी थी, जहां इसे लोकसभा चुनावों में पूरी तरह एकतरफा जीत हासिल हुई थी, वहीं उपचुनावों में दोनों राज्यों में 3-3 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा. इस हार ने संघी शिविर की बेबुनियाद उन्माद की हवा तो निकाली ही, इसने यह संकेत भी दिए कि भाजपा की भारी जीत के बावजूद इसका मुख्य जनाधार पहले के चुनावों की तरह अब भी करीब 22 फीसदी के आसपास ठहरा हुआ है. आम चुनावों में निर्णायक अंतर पहली बार वोट डाल रहे 4 करोड़ मतदाताओं की वजह से आया था, जो भाजपा की विकास संबंधी लफ्फाजी और रणनीतिक रूप से छिपा कर रखे हुए हिंदुत्व की वजह से उसकी तरफ आकर्षित हुए थे. उपचुनावों ने साफ तौर से यह जाहिर किया कि उन्होंने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति को नकारा है. अगर भाजपा इसे नजरअंदाज करेगी तो वह खुद अपनी कब्र खोदेगी, लेकिन जिस मुद्दे पर इसे जरूर ही आत्मविश्लेषण करना चाहिए, वह यह है कि इसका सांप्रदायिक मुद्दा भविष्य के लिए कितना व्यावहारिक है.

    हिंदुत्ववादी हेराफेरी

    दूसरे अनगिनत मुद्दों पर भाजपा के लफ्फाजी से भरे हुए दिखावे के बावजूद, अपने मातृ संगठन आरएसएस से विरासत में हासिल किया हुआ हिंदुत्व इसकी बुनियादी विचारधारा है. संघ परिवार इसके बारे में चाहे जितनी गोल-मोल बातें, हिंदुत्व और कुछ नहीं बल्कि ऊंची जाति के कुलीनों द्वारा अपने नस्ली प्रभुत्व को फिर से हासिल करने की योजना है. भारत अंतर्विरोधों की जमीन है, जहां सबसे जमीनी स्तर पर भाषा अपने अर्थ खो देती है, जहां आजादी का मतलब गुलामी हो सकता है, जहां साम्राज्यवाद का मतलब साम्राज्यवाद-विरोध हो सकता है, जहां स्वराज का मतलब बंधुआगिरी हो सकती है और राष्ट्रीय का मतलब राष्ट्र-विरोधी हो सकता है. इसमें और भी चीजें जुड़ सकती हैं, जो इस पर निर्भर करता है कि आप किस जातीय समूह से जुड़े हुए हैं. 1818 में पेशवाई के पतन ने पुणे के चितपावनों को भारी सदमा पहुंचाया, जिसने उनमें से अनेक को ब्रिटिशों के खिलाफ हथियार उठाने को प्रेरित किया. पारंपरिक रूप से इसे एक साम्राज्यवाद-विरोधी और क्रांतिकारी कदम माना जाता था, लेकिन असल में यह एक साम्राज्यवादी और प्रतिक्रियावादी कदम था, जिसे उन्होंने बुनियादी तौर पर अपना खोया हुआ राज हासिल करने के लिए उठाया था. क्योंकि अगर वे साम्राज्यवाद-विरोधी होते तो यकीनन उन्होंने अपनी दो तिहाई जनता के  हर कदम पर होने वाले जातीय उत्पीड़न पर गौर किया होता. 'हिंदुत्व'के जनक विनायक दामोदर सावरकर इन 'वीर क्रांतिकारियों'में आखिरी थे, जिन्होंने अपने लोगों को संगठित होने और उनके सपनों के लिए काम करने का विचारधारात्मक आधार मुहैया कराया. इसमें उनका 'अन्य'मुसलमानों और ईसाइयों को बनना था, जो मुख्यत: निचली जातियों से आते हैं. 1920 के दशक में महाराष्ट्र में दलितों के जो शुरुआती आंदोलन उभरे, उनसे पैदा हुए संभावित खतरे ने भी उनको संगठन के एक फासीवादी स्वरूप में संगठित होने की तरफ धकेला. इस तरह आरएसएस पैदा हुआ.

    यूरोप का फासीवाद और नाजीवाद उनकी प्रेरणा रहे हैं. गोलवलकर के विचार-रत्नों की एक झलक देखने भर से पता चलता है कि वे कितने खतरनाक और छल-कपट से भरे हैं. यह महसूस करते हुए कि वे व्यापक जनता का 'ब्राह्मणवादीकरण'किए बिना आगे नहीं बढ़ सकते, इसलिए उन्होंने अनेक ऐसे संगठनों का एक फंदा बनाया, जो ज्यादातर सामाजिक समूहों की जरूरतों को लगातार पूरा करता रह सकता था. इस तरह समय बीतने के साथ, वे आदिवासियों, दलितों और पिछड़ी जातियों के बड़े तबकों का ब्राह्मणवादीकरण करने में कामयाब रहे. एक तरफ जबकि दूसरी छोटी दलित जातियां आसानी से ही इस फंदे में आ गईं, अब तक ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक रहे आंबेडकर के अनुयायियों को सामाजिक समरसता मंच के जरिए इस जाल में फांसा गया. आज भाजपा की झोली में सबसे ज्यादा अनुसूचित जातियों/जनजातियों के सांसद और विधायक हैं. एक तरफ जबकि संघ परिवार को अपनी ऐसी चालबाजियों में कामयाबी इत्तेफाक से इसके लिए अनुकूल, नवउदारवादी दौर में हासिल हुई है, वहीं इसके भीतरी अंतर्विरोध भी इस तरह विकसित हुए हैं, कि वे उसके उभार और अस्तित्व को सीमित कर रहे हैं. इसे यह महसूस नहीं होता है कि ये अंतर्विरोध बुनियादी रूप से उसकी विचारधारात्मक उद्देश्य की अस्पष्टता से पैदा हुए हैं. हिंदू, हिंदूवाद, हिंदुत्व, हिंदुस्तान: इसकी यह पसंदीदा शब्दावली असली लग सकती है, लेकिन बुनियादी रूप में ये अवास्तविक और धुंधली है. उनका न तो इतिहास में कोई वजूद था और न ही कहीं और.

    हिंदू, हिंदुत्व, हिंदुस्तान

    संघ के मुखिया मोहन भागवत का तरीका दो अलग अलग चीजों को बेहद सरलीकृत तरीके से आपस में जोड़-तोड़ कर उनसे एक मनमाना नतीजा निकालने का है. इसके तहत वे कहते हैं कि भारत हिंदुस्तान था, हिंदुस्तान के लोग हिंदू हैं और इस तरह भारत हिंदू राष्ट्र है. उन्हें शायद ही यह बात समझ में आई हो कि उन्होंने न केवल एक बेवकूफी की बात कह दी है, बल्कि वे जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं. क्योंकि इसका सीधा मतलब यह है कि अगर भारत पहले से ही एक हिंदू राष्ट्र है, तो उनका अभियान तो पूरा हो चुका है और इसलिए अब उन्हें अपनी दुकान बंद कर देने की जरूरत है. कोई भी देख सकता है कि संघ परिवार के पूरे अभियान की जड़ें या तो अज्ञानता में धंसी हुई हैं या फिर झूठ-फरेब में. जिस पहचान पर वे इतराते फिरते हैं, वो अपने सबसे बेहतरीन रूप में विदेशियों द्वारा दिया हुआ नाम है और बदतरीन रूप में एक अपमानजनक संबोधन है. इनमें से पहली स्थिति के मुताबिक, हिंदू शब्द फारसी लोगों द्वारा स का गलत उच्चारण करते हुए उसे ह कहने से पैदा हुआ, जो सिंधु नदी के पार रहने वाले लोगों के बारे में बताना चाहते थे. हालांकि यह एक लोकप्रिय धारणा है, लेकिन इसमें आलोचनात्मक नजरिया नहीं है और इसकी पुष्टि मुमकिन नहीं, क्योंकि फारसी भाषा में अनगिनत ऐसे शब्द हैं जो स से शुरू होते हैं (मसलन शिया, सुन्नी, शरीअत, साहिर, सरदार) और उनको सही-सही बोला जाता है. फारसी और तुर्क लोगों ने जिन अर्थों में हिंदू शब्द का इस्तेमाल किया है, वे अर्थ उनके शब्दकोशों में मिलते हैं और वे भागवत और उनके संघ परिवार के लिए भारी शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं. उन शब्दकोशों में हिंदू का मतलब चोर, डकैत, रहजनी करने वाला, गुलाम, हुक्म मानने वाला नौकर और काली चमड़ी वाला भी होता है, जैसा कि हिंदू-ए-फलक का मतलब 'आसमान और शनि का कालापन'से जाहिर होता है. हिंदू शब्द के अपमानजनक होने का एक और पता 'हिंदू कुश'से चलता है, जो मध्य एशिया की सरहद पर स्थित पर्वतीय श्रृंखला है और जिसका मतलब हिंदुओं का हत्यारा है. इनमें से चाहे जो भी मामला हो, यह शब्द संस्कृत में या भारत की किसी भी स्थानीय बोली और भाषा में नहीं मिलता. 


    हिंदू का कभी भी कोई धार्मिक मतलब नहीं था. प्राचीन फारसी कीलाक्षर शिलालेख और जेंद आवेस्ता, हिंदू शब्द का हवाला किसी धार्मिक नाम के बजाए एक भौगोलिक नाम के रूप में देते हैं. जब फारस के राजा डेरियस प्रथम ने 517 ईसा पूर्व में भारतीय उपमहाद्वीप की सरहद तक अपनी सल्तनत का विस्तार किया, तो प्राचीन फारसी लोगों ने भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का जिक्र 'हिंदू'कह कर किया था. प्राचीन यूनानी और आर्मेनियाई लोगों ने भी यही उच्चारण अपनाया और इस तरह यह नाम चल पड़ा. जब बात हिंदूवाद की आई तो तिलक और राधाकृष्णन जैसे नायकों ने जो परिभाषा पेश की वह कोई परिभाषा ही नहीं थी. उसमें उन्होंने असल में हर चीज शामिल कर दी थी. आखिर में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के पास आया, जिसे फैसला करना था कि हिंदूवाद क्या है. उसने 1966 में और फिर 1955 में इस पर फैसला दिया भी. स्वामीनारायण (1780-1830) के अनुयायियों द्वारा दायर किए गए मामले में उन्होंने दावा किया था कि वे लोग हिंदू नहीं हैं. ऐसा उन्होंने 1948 बॉम्बे हरिजन (टेंपल एंट्री) एक्ट को चुनौती देने के लिए किया था, जो दलितों को सभी मंदिरों में दाखिल होने का अधिकार देता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राधाकृष्ण और कुछ यूरोपीय लोगों द्वारा दी गई परिभाषाओं का हवाला देते हुए, हिंदूवाद को इसकी सहिष्णुता और सबको मिला कर चलने के आधार पर परिभाषित किया. यह दिलचस्प बात है कि इसके पीछे असल में कुछ हिंदुओं द्वारा दूसरे हिंदुओं (दलितों) को अपने मंदिरों से बाहर रखने की इच्छा थी. संघ परिवार के दावों के उलट भारत में हरेक के हिंदू होने (या उसे हिंदू होना चाहिए) की बात कभी भी सच नहीं थी. वह सदियों पहले सिंधु घाटी और वेदों के दौर में सच नहीं थी, वह उत्तर भारत में शुरुआती आबादियों के बसने के बाद भी भारत के ज्यादातर हिस्सों के लिए सही नहीं थी, और यह बौद्ध धर्म के उदय के बाद तो यकीनन ही कभी सही नहीं रही.

    भारत का विचार

    यही मौका है जब संघ परिवार अपनी खामखयाली से बाहर आए और इतिहास के कुछ कठोर तथ्यों को समझे. वे जिस देश पर गर्व करने का नाटक करते हैं, उसे इंडिया या भारत कहा जाता है, हिंदुस्तान नहीं. यह उपनिवेशवादियों की देन है, यह अपनी इस शक्ल और आकार में इससे पहले कभी भी वजूद में नहीं था. जिन मुसलमानों से नफरत करना उन्हें पसंद है, वे तब से इस जमीन का हिस्सा हैं, जब आठवीं सदी में 17 बरस के मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर कब्जा किया और इस्लाम के विस्तार की राह खोल दी. ऐसा तलवार के दम पर नहीं हुआ, जैसा कि वे (संघ परिवार) यकीन करते हैं, बल्कि इसकी वजह यह थी कि उनके (संघ परिवार के) सनातन धर्म से सताई हुई निचली जातियों पर इस्लाम के बराबरी के पैगाम का असर हुआ था. बेहद समृद्ध इस विशाल उपमहाद्वीप में गुलामी का एक इतिहास रहा है, जिसके पीछे उनमें (संघ परिवार में) पाई जानेवाली श्रेष्ठतावादी सनक है और जिसका नतीजा आखिरकार भयानक तबाही वाले बंटवारे के रूप में सामने आया. इसके बाद भी, भारत में मुसलमानों की आबादी भारत को दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों में से एक बनाती है. संघ परिवार जिस भारतीय संस्कृति पर बेकार ही गर्व करता है, उसमें मुसलमानों का योगदान उनकी आबादी के लिहाज से कहीं ज्यादा व्यापक है. असल में भारत की ज्यादातर पुरातात्विक धरोहर मुसलमानों की ही बदौलत है. जिस 'मेहराब'के बारे में प्राचीन या यहां तक कि मध्यकालीन भारत तक में कुछ पता नहीं था, वह उन्हीं की देन है, जिसने इन धरोहरों को इस लायक बनाया कि भारत अब भी उन पर गर्व करता है. कला और संगीत में उनका योगदान भी कहीं ज्यादा है. फिर भारत को आधुनिकता और बुनियादी ढांचा उपनिवेशवादियों ने मुहैया कराया, हालांकि ऐसा करने के पीछे उनके अपने हित काम कर रहे थे. लेकिन उनकी जगह लेने वाले देशी हुक्मरान इसकी आखिरी बूंद तक निचोड़ लेने को बेताब हैं.


    अच्छा होगा, अगर संघ परिवार यह समझ ले कि उनका 'हिंदू'का धंधा कभी कारगर साबित नहीं होने वाला है. वे जितना इस प्रभुत्ववादी मंसूबे को आगे बढ़ाएंगे, उतना ही वे लोगों को अपने से दूर करते जाएंगे. यह बेहतर होगा कि वे बाबसाहेब आंबेडकर की इस सलाह को सुनें, जिनको वे 'प्रात:स्मरणीय'मानते हैं:

    'हिंदुओं में उस चेतना की निहायत ही कमी है, जिसे समाजशास्त्री 'कॉन्शसनेस ऑफ काइंड' (समग्र वर्ग की चेतना) कहते हैं. हिंदू वर्ग चेतना जैसी कोई चीज नहीं होती. हरेक हिंदू में जो चेतना पाई जाती है, वह उसकी अपनी जाति की चेतना होती है. यही वजह है कि हिंदूओं से एक समाज या राष्ट्र बनने को नहीं कहा जा सकता.'

    भारत का विचार इसकी जनता की बहुलता और विविधता का विचार है. सिर्फ इन्हीं शर्तों पर यह बहु-राष्ट्रीय देश वजूद में बना रह सकता है.

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    আমাদের মধ্যে আর নেই সংসদে হরিবোল করা মতুয়া সঙ্ঘাধিপতি কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর

    পলাশ বিশ্বাস


    আজ সকালের কাগজ পড়েই মাথায হাত

    জানতাম তিনি অসুস্থ,কিন্তু তাঁর কর্মক্ষমতার সঙ্গে খানিকটা পরিচিত,তাই বার্ধক্যের হানা এবং দীর্ঘ অসুস্থতা সত্বেও আশা করেছিলাম তিনি আবার সুস্থ হয়ে উঠবেন


    তিনি বনগাঁর সাংসদ কপিল কৃষ্ণ ঠাকুরমতুয়া মহাসংঘের বড়মা বীণাপাণি দেবীর বড় ছেলে তিনি। গত তিন মাস ধরে ভুগছিলেন জনডিসে। দিল্লির দুটি বেসরকারি হাসপাতালে চিকিত্‍সার পর আজ সকালে কলকাতার একটি বেসরকারি হাসপাতালে ভর্তি হন তিনি। দুপুর সাড়ে বারোটা নাগাদ তাঁর জীবনাবসান হয়। বয়স হয়েছিল আটাত্তর ।


    ভারতের পশ্চিমবঙ্গের  বনগাঁ কেন্দ্রের সাংসদ কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর প্রয়াত হলেন। কোলকাতার একটি বেসরকারি নার্সিং হোমে তিনি আজ (সোমবার) মারা যান।


    মৃত্যুর খবর পেয়েই  হাসপাতালে যান মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। হাসপাতালে যান মুকুল রায়, মদন মিত্র, জ্যোতিপ্রিয় মল্লিক সহ  তৃণমূলের নেতা কর্মীরা।  শেষ শ্রদ্ধা জানাতে মঙ্গল ও বুধবার ঠাকুরনগরে রাখা থাকবে তাঁর দেহ। বৃহস্পতিবার তাঁর অন্ত্যেষ্টি ।


    Mamata Banerjee

    21 hours ago

    I am deeply pained at the untimely passing away of Kapil Krishna Thakur, our MP from Bongaon and Head of Matua Mahasangha.


    We are with his family and my brothers and sisters of Matua Community at this moment of grief.


    May the departed soul rest in peace.



    মৃত্যুকালে তার বয়স হয়েছিল  আটাত্তর বছর। তিনি চলতি বছরের মে মাসে তৃণমূল কংগ্রেসের টিকিটে বনগাঁ (তপশিলি) সংরক্ষিত কেন্দ্রে এমপি নির্বাচিত হন।  



    তিনি সারা জীবন বামপন্থী ছিলেন এবং হঠাত লোকসভা ভোটের আগে তৃণমুলে গিযে বাবা প্রমথ রন্জন ঠাকুরের মতই সংসদে গিয়ে হরিবোল জযধ্বনে দিয়েছিলেন


    প্রচলিত সংবাদ মাধ্যমের মত,ভাটব্যান্কের অন্ক নিযে আমার মাথা ব্যথা নেই

    তিনি মতুয়া সঙ্ঘাধিপতি ছিলেন


    পূর্ব বাংলার পূর্ব পুরুষদের মতুয়া আন্দোলনের তিনিই শেষ  ধ্বজাবাহক, সেনাধিপতি মতুয়া বাহিনীর


    তিনি মতুয়া আন্দোলনকে কোথায় রেখে গেলেন,সেই চিন্তাটাই সবচেয়ে বড়

    শেষপর্যন্ত বাংলার জাতি ধর্ম নির্বিশেষ কৃষক আন্দোলনের মূল প্রতিনিধিত্ব ক্ষমতার রাজমনীতিতে হারিয়ে গেলেই সাঢ়ে সর্বনাশ,হরিচাঁদ গুরুচাঁদ মতাগদর্শের মানুষদের এ কথাটি মনে রাখতে হবে।  


    পিআর ঠাকুরের সঙ্গে ঠাকুরনগরে বাবার সঙ্গে গিয়ে একাবর মাত্র দেখা হয়েছিল সেই 1973 সালে,মানুষটি তখন সাংসদ ছিলেন না বোধ হয়,কিন্তু তাঁকে কাছ থেকে দেখার সুযোগ হয নি।  


    আমার জেঠিমার মা,আমার দিদিমা ঔ ঠাকুর বাড়িরই মেয়ে,কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর কথাটি মনে রেখেছিলেন,এবং সেই সূত্রে আমার মতামতকতে গুরুত্বও দিতেন,আমার সৌভাগ্য।  


    ষাটের দশকে বড়মাকে নিয়ে তিনি বাসন্তীপুরে আমাদের বাড়িতে গিয়েছিলেন এবং ঠাকুরনগরে যখন সবিতা আর আমি যাই শেশবার,সেকথা তিনি মনেও করেছিলেন।  


    তবূ সেবার তিনি বলেছিলেন আম্বেডকরকে নিয়ে কোনো আলোচনা করব না

    কিন্তু তারপর চন্দ্রপুরে যাই,ত তিনি মতুয়া কেন্দ্রের বাইরে অপেক্ষা করছিলেন

    বাহালি উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্বের আন্দোলনে তাঁ পুরোদম সমর্থন ছিল এবং এই প্রসঙ্গেই সেবার তাঁর সঙ্গে দীর্ঘ আলোচনা হয়েছিল।  


    তারপর তিনি ক্ষমতার অলিন্দে কোথায় ধরা ছোঁযার বাইরে চলে গেলেন,আর যোগাযোগ হইনি,তবু তাঁর স্বচ্ছ ভাবমুর্তি ও আন্তরিকতার ছবি এতটুকু ম্লান হয়নি কোনো দিন।  


    আজ তাঁকে হারানোর খবর বড়ই বেদনাদাযক।  


    সেই কবে ষাটের দশকে তিনি বাসন্তীপুর গিয়েছিলেন এবং ঘটনাচক্রে আজ আবার আমি বাসন্তীপুর যাচ্ছি দীর্ঘ সাত বছর পর,সেখানকার মাটিতে তাঁর পরশ পাইকি না দেখবো।  


    পারিবারিক সূত্রে জানা গেছে, কপিলকৃষ্ণ বাবু বার্ধক্যজনিত কারণে কিছুদিন ধরে অসুস্থ ছিলেন। তা ছাড়া তিনি জণ্ডিসেও ভুগছিলেন। তার মৃত্যুতে গভীর শোক প্রকাশ করে পরিবারের প্রতি সমবেদনা জানিয়েছেন বনগাঁর বিধায়ক বিশ্বজিৎ দাস। তিনি জানান, 'তার মৃত্যুতে  দলের অপূরণীয় ক্ষতি হল। তিনি হঠাৎ করে এভাবে চলে যাবেন আমরা বুঝতে পারিনি। এছাড়া কপিল বাবু মতুয়া মহাসংঘের  সংঘাধিপতি ছিলেন। সমস্ত মতুয়া ভক্তের প্রতি সমবেদনা জানাচ্ছি।'  

    গত মে মাসে লোকসভা নির্বাচনের সময় ঠাকুর নগরের ঠাকুর বাড়ি তথা মতুয়া সম্প্রদায়ের প্রতি সম্মান জানাতে বনগাঁ কেন্দ্রে কপিল কৃষ্ণ ঠাকুরকে তৃণমূল কংগ্রেসের প্রার্থী করেছিলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।


    বিশেষ করে কপিল বাবুর মা তথা সব মতুয়া ভক্তের শ্রদ্ধাভাজন বীণাপাণি ঠাকুরের (বড় মা) প্রতি  ভালবাসার নিদর্শন হিসাবে  মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় কপিলকৃষ্ণ ঠাকুরকে এমপি করবেন বলে মনস্থির করেন।  


    এমপি নির্বাচিত হওয়ার তিন মাসের মধ্যেই গত ১ সেপ্টেম্বর তিনি শ্রম বিভাগের স্ট্যান্ডিং কমিটির সদস্য হয়েছিলেন।

    কপিল কৃষ্ণ ঠাকুরের  ছোট ভাই মঞ্জুলকৃষ্ণ ঠাকুর  বর্তমানে  পশ্চিমবঙ্গ সরকারের উদ্বাস্তু পুনর্বাসন দফতরের মন্ত্রী।  

    কপিল কৃষ্ণ ঠাকুরের প্রয়াত বাবা প্রমথরঞ্জন ঠাকুর বা পিআর ঠাকুরও ১৯৬২ সালে বিধান চন্দ্র রায়ের মন্ত্রীসভায় উপজাতি কল্যাণ দফতরের রাষ্ট্রমন্ত্রী ছিলেন। দু'বার বিধায়কও হয়েছিলেন তিনি। ১৯৬৭  সালে তিনি নবদ্বীপ লোকসভা কেন্দ্র থেকে এমপি নির্বাচিত হন।  

    প্রয়াত এমপি কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর মতুয়া মহাসংঘের প্রধান ছিলেন। তার  মৃত্যুর খবর ছড়াতেই অসংখ্য ভক্ত অনুরাগী ভিড় জমিয়েছেন গাইঘাটার ঠাকুর নগরের ঠাকুর বাড়িতে। তাকে শেষ শ্রদ্ধা জানানোর জন্য বহু তৃণমূল নেতা কর্মীরা  ভিড় করে রয়েছেন তার বাসভবনে। সকলেই তার পার্থিব দেহ কোলকাতা থেকে আসার অপেক্ষায় রয়েছেন।#



    RIP Kapil Krishna Thakur - Trinamool MP and Matua scion

    October 13, 2014


    Trinamool Congress Lok Sabha MP Kapil Krishna Thakur (78) breathed his last today in a city hospital. He was one of the scions who had from a very early life fought for upliftment and social welfare of the Matua community. He is survived by his wife.

    He was the elder son of Binapani Debi Thakurani (Baroma), the leader of Matua community and great grandson of Shri Shri Guruchand Thakur. He had been the Sanghadhipati of Matua Mahasabha.

    Kapil Krishna Thakur had been elected from the Bongaon constituency in the 2014 Lok Sabha elections, defeating his nearest rival by almost one and a half lakh votes.

    After being elected as MP, he was a Member of the Standing Committee on Labour.

    A graduate of the Calcutta University, he had been a recipient of the prestigious Sri Sri Thakur Harichand-Guruchand prize for his sustained work among the Matuas to uplift them.

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    তৃণমূল লোকসভা সাংসদ শ্রী কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর আজ কলকাতায় শেষ নিঃশ্বাস ত্যাগ করেন।  বর্তমানে তাঁর স্ত্রী জীবিত। তিনি মতুয়া সঙ্ঘমাতা বীণাপাণি দেবী ঠাকুরের (বড়মা) বড় ছেলে এবং শ্রী শ্রী গুরুচরণ ঠাকুরের প্রপৌত্র।

    তিনি বনগাঁর মনিগ্রাম হাই স্কুল থেকে পাশ করার পরে কলিকাতা বিশ্ববিদ্যালয় থেকে স্নাতক হন। তিনি জীবনের প্রথম থেকেই বনগাঁর মতুয়া সম্প্রদায়ের সামাজিক উন্নয়নের সঙ্গে যুক্ত ছিলেন। তিনি বনগাঁয় বহু উন্নয়নমূলক কাজ করেছেন।

    কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর মতুয়া সঙ্ঘের একজন সক্রিয় কর্মী ছিলেন। মতুয়া গোষ্ঠীর উন্নয়নের জন্য তিনি শ্রী শ্রী ঠাকুর হরিচন্দ্র-গুরুচন্দ্র পুরস্কার পেয়েছিলেন।



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    মনুবাদীদের মূল নীতিঃ সাম-দাম-দন্ড-ভেদ : শরদিন্দু উদ্দীপন



    বিজেপি বা তার পৃষ্ঠপোষক মনুবাদী সংগঠনগুলির এজেন্ডাই হল সাম-দাম-দন্ড-ভেদ। ওর যখন যখন ক্ষমতাসীন হয়েছে বা সুযোগ পেয়েছে এই বিভাজন নীতিকেই বাস্তবায়িত করতে উঠে পড়ে লেগেছে। উদ্দেশ্য  একটাই এই বিভাজন নীতি বাস্তবায়িত হলে মনুবাদীদের সামাজিক স্থিতি মজবুত হয়। সুরক্ষিত হয় ও প্রবলতর হয়। শ্রমজীবী মানুষের পেটের উপরে পা দিয়ে আরাম সে বংশপরম্পরায় চালিয়ে যাওয়া যায় পরগাছা জীবন। মনুবাদীরা এখানেই সার্থক যে, এই নীতিকে বাস্তবায়িত করতে তারা সুকৌশলে ধর্ম নামক একটি টুলকে দক্ষতার সঙ্গে ব্যবহার করেছে এবং সমগ্র জাতিকে জাতপাতের বেড়াজালে আবদ্ধ করে মানুষের ব্যক্তি সত্তার মধ্যে ঘৃণার ঘুন ঢুকিয়ে দিতে সক্ষম হয়েছে।

    মনুবাদীদের রাজনৈতিক দল বিজেপি যখন যখন রাষ্ট্র ক্ষমতায় এসেছে এই  বিভাজনই হয়ে উঠেছে তাদের প্রধান খেলা। আর এই খেলা মূলত দেশের ৮৫% মানুষকে তাদের পায়ের তলায় পিষে মারার খেলা। দেশের জীব বৈচিত্র, সামাজিক বৈচিত্র ও ধর্মীয় বৈচিত্র নিয়ে বিভেদের খেলা। বিদ্যালয়গুলিতে সরস্বতীমন্ত্র চালু করা, গায়ত্রীমন্ত্র জপ করানো এবং জ্যোতিষশাস্ত্রকে বিজ্ঞান হিসেবে চালু করানো ছিল এই খেলার প্রায়োগিক কৌশল। বাবরি মসজিদ ধ্বংস করা, রামের মূর্তি ঢুকিয়ে দিয়ে স্থানটিকে রামের জন্মভূমি হিসেবে ঘোষণা করা, একটি প্রাকৃতিক সংযোগ সেতুকে রাম সেতু হিসেবে দেখানোর এই আবেগ আসলে মাইথোলোজিকাল রামকে ঐতিহাসিক রামে প্রতিষ্ঠিত করার উন্মত্ত খেলা। বিজেপি ক্ষমতায় এলেই সামাজিক, অর্থনৈতিক বা বৈচিত্রময় সামাজিক উন্নয়নের পরিবর্তে এই বিভাজনের খেলাতেই মত্ত হয়ে উঠেছে বেশী। মোদি এই খেলার বর্তমান কালাপাহাড়। ধ্বংস ও নির্মাণ যার অন্যতম শ্লোগান।

    মোদির গলায় আরএসএস এর গানঃ    
    "১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা- বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-পরে তাঁদেরবাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে"। মোদির এই বজ্র নিনাদ হঠাৎ তাল পড়ার মতো কোন বিষয় নয়। অথবা আবেগের বশে অতি প্রগলভতার বহিঃপ্রকাশও নয়। এটা রীতিমত গৃহানুশীলন ও দীর্ঘ প্রস্তুতির একটি আবশ্যিক রনভেরির যা আরএসএস এর পাঠশালায় প্রতিদিন বাজানো হয়। একই সুরে এই বিউগলই আমরা বাজাতে দেখেছিলাম শ্যামাপ্রসাদ মুখার্জিদের। সঙ্গে ছিলেন বিধান রায়, নলিনী সরকার এবং এন সি চ্যাটার্জিদের  মত হিন্দু মহাসভার বলিষ্ঠ নেতাগণ। এবং এই বিভাজনের কাজে এগিয়ে আসে  মাড়োয়ারি ব্যবসাদারবিড়লা,গোয়েঙ্কাঈশ্বর দাস জালান। তারা প্রচুর পরিমাণে অর্থ ঢালতে শুরু করে দেশ বিভাগের পক্ষে কারণ এই বিভাগে তারাই সবথকে বেশি লাভবান হবেন। তাদের পয়সা দিয়েই তখন শ্যামাপ্রসাদ মুখার্জিবিধান রায়নলিনী সরকার,এন সি চ্যাটার্জিদের আন্দোলন চলে। ৪ এপ্রিল ১৯৪৭ সালেতারকেশ্বরে হিন্দু মহাসভার একটি সম্মেলনে এন সি চ্যাটার্জি বলেন,"বিষয়টা আর দেশভাগের মধ্যে সীমাবদ্ধ নেইবাংলার হিন্দুরা আলাদা প্রদেশ গড়ে শক্তিশালী দিল্লী কেন্দ্রিক জাতীয় সরকারের অধীনে থকাবে। শ্যামাপ্রসাদ মুখার্জি একই সুরে বলেন যেদেশ ভাগই সাম্প্রদায়িক সমস্যার একমাত্র সমাধান"। কেননাProportional Representation নীতির জন্য দলিত-মুসলিমরা এক হয়ে আইন সভাতে সর্বাধিক প্রতিনিধি পাঠাতে শুরু করেছে। সংখ্যা বলে তারাই শাসন ক্ষমতার উপরে উঠে আসছে। বামুনেরা সংখ্যায় নগণ্য তাই তারা ক্ষমতার শীর্ষে আসতে পারছে না এবং সাধারণের উপর তাদের আধিপত্য বিস্তার করতে পারছেনা। স্বাধীনতার পরেও যদি এই মডেল কার্যকরী থাকে তবে লোটা কম্বল নিয়ে তাদের খাইবার – বোলান গিরিপথের ভিতর দিয়ে বহির্গমন করেতে হবে। সুতরাং বিভাজনই একমাত্র সমাধান। তাতে দেশ খণ্ডিত হলেও ব্রাহ্মন্যবাদী শাসকদের প্রভুত্ব অটুট থাকবে। মোদির গলায় তাই হিন্দু মহাসভা ও আর এস এস এর পুরাতনী গান।    

    সাম্প্রদায়িক বাটোয়ারার ও পুনর্বাসনঃ   
    খণ্ডিত দেশে ব্রাহ্মন্যবাদীদের একচ্ছত্র আধিপত্য প্রতিষ্ঠিত হলেও পুনর্বাসন ও নাগরিকত্ব নিয়ে থেকে যায় বিস্তর বিভেদ। ১৯৪৬ এর দাঙ্গা, সাম্প্রদায়িক হানাহানি ইতিমধ্যেই বাঙালী মনে বিভেদের প্রাচীর তৈরি করে ফেলেছে। উদ্বাস্তু সমস্যায় জর্জরিত হচ্ছে উভয় দেশ। সাম্প্রদায়িক বাটোয়ারার জন্য বিশাল সংখ্যক মানুষ পূর্বপুরুষের ভিটেমাটি ছেড়ে অন্যত্র চলে যেতে বাধ্য হচ্ছে। জলা-জঙ্গল-মরুভূমিতে চলছে পুনর্বাসনের কাজ। ঠিক এরকম সময় ১৯৫০ সালের ৮ই এপ্রিল  খণ্ডিত দুই রাষ্ট্রের প্রধানমন্ত্রীদের মধ্যে এই বিষয় নিয়েই প্রথম চুক্তি স্বাক্ষরিত হয়। এই  চুক্তি নেহেরু-লিয়াকত চুক্তি নামে খ্যাত।   
    "The two Prime Ministers met in Delhi on April 2, 1950, and discussed the matter in detail. The meeting lasted for six long days. On April 8, the two leaders signed an agreement, which was later entitled as Liaquat-Nehru Pact. This pact provided a 'bill of rights' for the minorities of India and Pakistan. Its aim was to address the following three issues:
    ·         To alleviate the fears of the religious minorities on both sides.
    ·         To elevate communal peace.
    ·         To create an atmosphere in which the two countries could resolve their other differences.
    According to the agreement, the governments of India and Pakistan solemnly agreed that each shall ensure, to the minorities throughout its territories, complete equality of citizenship, irrespective of religion; a full sense of security in respect of life, culture, property and personal honor.
    It also guaranteed fundamental human rights of the minorities, such as freedom of movement, speech, occupation and worship. The pact also provided for the minorities to participate in the public life of their country, to hold political or other offices and to serve in their country's civil and armed forces".


    এরপর চুক্তি স্বাক্ষরিত হয় ২রা এপ্রিল ১৯৭২ সালে। ইতিমধ্যে সংঘটিত হয়েছে বাংলাদেশের স্বাধীনতা সংগ্রাম। চুক্তি স্বাক্ষরিত হয় ভারতের প্রধানমন্ত্রী ইন্দিরা গান্ধী ও পাকিস্তানের রাষ্ট্রপতি জুলফিকার আলি ভুট্টার সাথে।
         
    ১৯৭৪ সালে স্বাক্ষরিত হয় ইন্দিরা-মুজিব প্যাক্ট। প্রত্যেক স্বাক্ষরিত চুক্তির মধ্যেই দুই দেশের সংখ্যালঘুদের পুনর্বাসনের উপরে বিশেষ গুরুত্ব দেওয়া হয়। এই চুক্তিগুলির ভিত্তি ছিল নেহেরু-লিয়াকত চুক্তি। অর্থাৎ সংখ্যালঘুরা স্বাধীন ভাবেই যে কোন দেশের নাগরিক হতে পারে এবং স্বাধীন ভাবে তাদের ধর্মীয় বা সাংস্কৃতিক পরম্পরা বহন করতে পারে।
    এটা অনস্বীকার্য যে এই চুক্তিগুলি ছিল আন্তর্জাতিক উদ্বাস্তু সমস্যা ও তাদের পুনর্বাসনের বিধি ব্যবস্থার পরিপূরক। এবং তার ফল হিসেবে ভারত, পাকিস্তান ও বাংলাদেশের মধ্যে সংঘটিত হয়েছে ব্যপক পুনর্বাসন। বাংলাদেশ বা পাকিস্তান থেকে বিতাড়িত উদ্বাস্তুরা ভারতের বিভিন্ন রাজ্যে বসতি স্থাপন করেছে। এবং ধীরে ধীরে মূল সংস্কৃতির সাথে সম্পৃক্ত হয়েছে। কিছু মানুষ নিপীড়ন সহ্য করেও থেকে গেছে পিতৃপুরুষের আজন্ম ভিটেয়। কিছু উৎপীড়িত হয়ে আজও উদ্বাস্তুতে পরিণত হচ্ছে। জনান্তিকে বলে রাখি, এই উদ্বাস্তুরা ভারতের আদিজন, ভারতীয় সংস্কৃতির ধারক, বাহক ও প্রতিপালক।               

    "তুমি মহারাজ সাধু হলে আজ...ঃ
    ব্রাহ্মন্যবাদীদের গাত্রদাহ এখানেই। এরা হিসেব করে দেখেছে যে এই দলিত, নিপীড়িত মানুষেরা নাগরিকত্বের অধিকার পেলে আবার এরা রাষ্ট্র ক্ষমতায় উঠে আসবে। সাংবিধানিক রক্ষাকবজ ব্যবহার করে রাষ্ট্রীয় সম্পদের নিজেদের ভাগ আদায় করে ছাড়বে এবং বিভাজনের আজন্ম খোঁয়াড় ভেঙ্গে ফেলে রাষ্ট্রকে গণতান্ত্রিক/সাম্যবাদী রাষ্ট্রতে পরিণত করবে। আর সেটা হলে ব্রাহ্মন্যবাদ, মনুবাদ অপাংক্তেয় হয়ে পড়বে। বর্ণবাদ ধ্বংস হয়ে যাবে। উৎপাদকদের পেটের উপর পা দিয়ে বংশপরম্পরায় চর্ব্য-চোষ্য-লেহ্য-পেয় গলধকরণ অসম্ভব হয়ে পড়েবে। তাই পূর্বপুরুষ মনুর বাণীকে আইনী গ্রাহ্যতা দিতে ২০০৩ সালে বিজেপি নাগরিক আইনের মধ্যে একটি সংশোধনী এনে পূর্ববর্তী আইন গুলিকে কার্যত ধুলিস্যাত করে দিল এবং একটি কালাকানুনকে বাস্তবায়িত করার জন্য রাষ্ট্র শক্তিকে ব্যবহার করতে শুরু করল। এই কালা কানুনের ফলেই কোটি কোটি মানুষ হয়ে পড়ল দেশহীন। এই কালাকানুনের ভাষায় তারা অনুপ্রবেশকারী, দেশদ্রোহী ও শ্ত্রু। সত্যি সেলুকস...!!!! প্রকৃতজনেরা আজ বেঘর অনুপ্রবেশকারী আর প্রকৃত অনুপ্রবেশকারীরা আদর্শ নাগরিক !!    

    জায়নবাদী কণ্ঠস্বরঃ
    আরএসএস এর লালিত ও প্রতিপালিত বিজেপি জানে যে তাদের কালাকানুন (http://www.indiankanoon.org/doc/693674/ ) আন্তর্জাতিক আইনের পরিপন্থী। মহামান্য সুপ্রিম কোর্টও এই ভাবে একটি বৃহত্তর জন সমূহকে নাগরিকত্ব থেকে বঞ্চিত করা যায়না বলে এই কানুন পরিবর্তনের জন্য তার প্রতিক্রিয়া ব্যক্ত করেছেন। এসব জেনেও নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি এরূপ প্রতিক্রিয়া দিলেন কেন? একটু খেয়াল করলেই ধরা পড়বে যে, নেহেরু, প্যাটেল, শ্যামাপ্রসাদ বা বিধান রায়দের যারা দেশ বিভাগের জন্য মদত দিচ্ছিলেন এযুগেও তাদের বংশধরেরা মোদিকে মদত দিয়ে চলেছে। এর কারণ হল ব্যবসা, মুনাফা এবং প্রভুত্ববাদ কায়েম করা। প্রভুত্ববাদ কায়েমের জন্য কাঁচামাল ও সস্তা শ্রমিকের উপর একচ্ছত্র দখলদারী। এই দখলদারী সার্বিক না হলে সুন্দরবন, জঙ্গলমহল, হিমালয় অঞ্চল অথবা জল-জঙ্গল-জমির উপর প্রভুদের রাজত্ব প্রতিষ্ঠিত হবে না। তাই এই কালাকানুনকে সামনে রেখে মোদি তার কর্পোরেট মডেলের বাস্তবায়ন শুরু করলেন। এই আইনের বলে যে কোন মানুষকে কনসেন্ট্রেশন ক্যাম্পে ঢুকিয়ে দেওয়া যাবে। তকেই প্রমান করতে হবে যে ১৯৪৭ সালের আগে তার পূর্বপুরুষেরা এদেশের নাগরিক ছিল। মোদি এটাও জানে যে নিরক্ষর সাধারণ মানুষের কাছে এমন কোন প্রামাণ্য দলিল নেই যে সে প্রভুদের জেরা থেকে মুক্তি পেতে পারে।


    খনিজ পদার্থের ঘটতি ইতিমধ্যেই প্রায় শেষের দিকে। পরমাণু জ্বালানী ও পেট্রোডলারের বাজার শেষ হয়ে যাবে কয়েক দিনের মধ্যে। এবার প্রাকৃতিক সম্পদ তাই ব্যবসার মূলধন, মূল পুঁজি, মূল কাঁচামাল। জায়নবাদী পুঁজিপতিরা তাই প্রাকৃতিক সম্পদের উপর দখলদারিতে সর্বশক্তি দিয়ে নেমে পড়েছে । অথচ এই প্রাকৃতিক সম্পদের অনেকটাই আগলে রেখেছে সাধারণ মানুষ। শ্রম এবং উৎপাদনের সাথে জড়িত মূলনিবাসী মানুষ। এদেশের আদিমজন। ভারতের সংবিধান যাদের রক্ষা কবজ। আদিবাসী ভূমি আইন, সেডুল্ড কাস্ট, সেডুল্ড ট্রাইব এট্রোসিটিস অ্যাক্ট এবং সংবিধানের বিভিন্ন ধারায় যারা ধীরে ধীরে বলিয়ান হয়ে উঠছে তাদের সোজা পথে বিতাড়িত করা দুরূহ কাজ। ব্যবসাদারদের মুনাফার জন্যই জায়নবাদী মোদি তাই এই কালা কানুনের আশ্রয় নিতে বদ্ধপরিকর। যে আইনের মধ্য দিয়ে প্রাকৃতিক সম্পদের উপর সার্বিক দখলদারি কায়েম করা যায়। ভয় প্রদর্শন, নিপীড়ন, গোলামী করন ও বিতাড়নের মাধ্যমে মানুষকে সর্বস্বান্ত করা যায়। মোদির জ্বলামুখ দিয়ে তাই উদ্গিরণ হয়ে পড়েছে সেই পুরাতনী মনুবাদীদের সাম-দাম-দন্ড-ভেদ  মূল নীতি।

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    শাসক প্রভুদের রাজনৈতিক গড়াপেটার বলি হচ্ছে বাংলার বহুজন ঃ শরদিন্দু উদ্দীপন।


    হয়কংগ্রেসেরসাথেথাকোনয়বামফ্রন্টঅথবাতৃণমূলনাহলেবিজেপিচোলাইয়েরমতগেলাতেগেলাতেএইআপ্তবাক্যটিপ্রায়অমৃতভাষণেপরিণতহয়েছেঅর্থাৎপবিত্রপ্রভূদেরছাড়াগতিনেইকলৌ নাস্তেবঃনাস্তেবঃগতিরন্যথা 

    একদাগরীবেরহাড়েদুব্বাগজানোরজমিদারপ্রভূদেরঅপত্যগর্ভেরসন্তানদেরনিয়েগঠিতকংগ্রেসদল৮০% উপরপুরোহিত প্রভুদেরনিয়েগড়াএইদলটিবহুজনমানুষেরকাছেঢাকঢোলপিটিয়েনিজেদেরমহিমাকীর্তনকরেছেক্ষমতাহস্তান্তরেরআগেথেকেক্ষমতাহস্তান্তরেরপরপ্রতিবছরস্বাধীনতারএকফালিছেড়াকাপড়উড়িয়েবিস্কুটলেবেঞ্চুসবিতরণকরেদায়িত্বশেষকরেছেখাদিবস্ত্রেমালকোঁচামেরেকাটিয়েদিয়েছে২৫বছরউদ্দেশ্যএকটাই,"আমরারক্তেরবিনিময়েতোমাদেরস্বাধীনতাদিয়েছি, তোমরাঘাম-রক্তদিয়েসেইকর্জশোধকরআমাদেরছানাপুনাগুলোকেনাদুসনুদুসকরেলালনপালনকরোকর্মেইতোমাদেরঅধিকারমাফলেসুকদাচন"২৫বছরধরেপেটে, মুখে, পশ্চাতেমাথায়পবিত্রপ্রভূদেরআশীর্বাদবহনকরছেবাংলারবহুজন

    বঞ্চনাঘনীভূতহলেএকসময়রায়তিরঅধিকারতেভাগাআন্দোলনপ্রবলতরহয়েওঠেএইআন্দোলনেভেজালমেশাতেকংগ্রেসেরইবাম্পন্থীঅংশকেলালপতাকাহাতেনামিয়েদেওয়াহয়ময়দানেএদেরএকটিঅংশপুলিসেরসাথেযোগসাজশকরেবহুজনেরঘরভেঙেছেজ্বালিয়েপুড়িয়েশেষকরেদিয়েছেভিটেমাটিঅন্যদলকেতৈরিরাখাহয়েছেত্রানশিবিরেরজন্যআরএকদলমঞ্চবেঁধেজুড়েদিয়েছেধোঁকাবাজিরগান, "কারাআমারঘরভেঙেছেস্মরণআছে"!

    সরল,নিরীহবহুজনেরকাছেএকমস্তধাঁধাঁনাগপাশেরভুলভুলাইয়ানিশ্চিতমৃত্যুরহাতথেকেআপাতবেঁচেথাকারনিরবস্বীকৃতিস্বরূপমাক্সবাদীদেরইতারাআপনকরেনিয়েছিলেনমনেকরেছিলেনমাক্সবাদইবহুজনেরআন্দোলনেরপ্রকৃতধারাশাসকপ্রভুরাসহাস্যে,শঙ্খবাদনে, পুস্পবর্ষণেশেষোক্তবিবর্তনটিআপনকরেনিয়েছিলেনপুরানোচৌখুপিরআদলঠিকরেখেকেবলসাইনবোর্ডেরপরিবর্তনকরাহয়েছিলসেদিনশুরুহয়েছিলমাক্সবাদীপতাকাহাতেমনুবাদেরপ্রয়োগমার্কটুইনেরসাথেগোয়েবলসেরমিক্সার

    মাক্সবাদীরাবুঝেছিলেনযে,সর্বহারারমতবাদটিকিয়েরাখতেহলে,সমাজেসর্বহারাচাইগুরুবচনেরমতোইতারাআউড়েযেতেথাকলেন, মেহনতিমানুষেরসরকারহবেখেটেখাওয়ামানুষেরাইরাষ্ট্রক্ষমতায়উঠেআসবেএকটিপ্রলোভনেরমুলোক্ষুধার্ত, বঞ্চিতমানুষেরসমানেখুড়োরকলেরমতোঝুলিয়েরেখেআরামেকাটিয়েদিলেন৩৪বছরসরলমেহনতিমানুষপ্রাণদিয়েআগলেরাখতেচাইলেনবর্ণচোরাবামপন্থীদেরসবকাজেরতারাইকাজিপ্রভুরাসুরক্ষিততাদেরকোনকাজনেইনাইকাজতোখইভাঁজবসেবসেফন্দীআঁটোবাঙালীমস্তিষ্কেরযতটুকুঘিলুআছেতারমধ্যেছাইপাঁশদিয়েঠেশেদাওযুবকদেরমেরুদণ্ডহীনকরেদাওওরাদালালীতেব্যস্তথাকুকপাক্কাদালালহয়েউঠুকসবঅথবামস্তানপাড়ায়পাড়ায়ক্লাবগুলিওদেরমাস্তানিআরগুলতানিমারারআখড়াহয়েউঠুকপঞ্চায়েতিরাজকায়েমহোকপ্রভুরাডিক্লাসডহয়েপঞ্চায়েতেরমাথায়বসেযাকবহুজনমানুষেরাআহাআহাকরেপ্রভুদেরসেবাকাজেব্যস্তথাকুকইত্যবসরেসমাজেরচিরায়তস্থিতিশীলআন্তগঠনটিভেঙেচুরেচুরমারকরেদেওয়াহোকযাতেবহুজনসমাজআরকোনদিনতারনিজেরঘরখুঁজেনাপায়তাদেরশ্রমএবংউপার্জনেরসবটাইযেনপ্রভুরাগণ্ডেপিন্ডেগিলতেপারেতারচিতায়তব্যবস্থাকরাহোক

    মাক্সবাদীরামুখে Inclusion'কথাবললেওআসলেপ্রয়োগকরলেনসাম-দাম-দন্ড-ভেদেরডিভাইননীতি discrimination theory বাবর্ণবাদ Declassification তত্ত্বেরবহুলপ্রয়োগেবামুনঘরেরছেলে/মেয়েরাজাতীয়স্তরথেকেএকেবারেআলু-পটলকারবারীদেরইউনিয়নেরনেতাহয়েউঠলেনবামপন্থীদলগুলোর৬৪% ভাগীদারীদখলকরেনিলেনমনুবাদীরামাক্সবাদীস্কুলে১০০বছরধরেওকোনশোষিতশ্রেণীরপ্রতিনিধিউঠেএলোনাঅথবাউঠতেদেওয়াহলনাআধুনিকরণ,কর্মসংস্থান,নগরায়ন,শিল্পায়নবিশ্বায়নহয়েউঠলউন্নয়নেরপরিভাষাবেছেবেছেএসসি/এসটি, ওবিসিমাইনরিটিঅধ্যুষিতএলাকায় sez ঘোষণাকরাহল,যাতে৮৫% বহুজনেরহাতেথাকামাত্র% জমিকেড়েনেওয়াযায়অর্থাৎভারতীয়মাক্সবাদহয়েদাঁড়ালোচিরাচরিতব্রাহ্মন্যবাদীবামনুবাদেরপ্রয়োগশালামহানপ্রভুদেরএকচ্ছত্রবাদহাসিলকরারআখড়া

    সিঙ্গুর,নন্দীগ্রামথেকেইরাজনৈতিকগড়াপেটারএইশয়তানীচক্রবহুজনসমাজেরগলায়ফাঁসহয়েএঁটেবসেলালগড়আন্দোলনেরশেষভাগেএসেহাড়েহাড়েঅনুভুতহয়শ্বাসরোধকারীযন্ত্রণাদিনেরআলোরমতপরিষ্কারহয়েযায়যেচিরায়তপ্রভুরাচাইছেননাসাধারণমানুষেরনেতৃত্বেজনগণতান্ত্রিকবিপ্লবকায়েমহোকসিধোসোরেন,ছত্রধরমাহাতোরারাজনৈতিকভাগিদারীআদায়করারজন্যউঠেআসুকজনগণকেবিপথচালিতকরারজন্যইতারামাওবাদীঘাতকদেরআমদানিকরেদালালীকরারজন্যবুদ্ধিজীবীদেরভাড়াকরাহয়এইসববুদ্ধিজীবীমাওবাদীরাআবারমঞ্চবেঁধেতোড়জোড়করেগাইতেশুরুকরেন,
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    তৃণমূলেরএইবছরেরশাসনকালআসলেজনগণেরবিরুদ্ধেসরাসরিযুদ্ধেরকালঅন্নদাতাবহুজনসমাজপ্রভূদেরজন্যকতটাআত্মবলিদানকরতেপারেতাদেখেনেবারকালসমীক্ষণেরকালমুল্যায়নেরকালএবংআগামীদিনেপ্রভূসমাজেরঅস্তিত্বসুনিশ্চিতকরারজন্যনির্দেশিকারচনাকরারকালসারদাকাণ্ডেজনগণেরবিরুদ্ধেশোষকপ্রভুদেরযুদ্ধেরকৌশলজনগণযদিবুঝতেপেরেযায়; অথবামা-মাটি-মানুষশ্লোগানেরভণ্ডামিরভেকযদিশেষপর্যন্তধরাপড়েযায়তবেপ্রবলভাবেকংগ্রেস, বিজেপিবাবামপন্থীদেরএগিয়েদেবেপ্রভুরাতাদেরমিডিয়াগুলোতে২৪ঘণ্টাপালাকীর্তনচলবেকোনএকটিধারাকেমহিমান্বিতকরেসর্বজনগ্রহণযোগ্যকরেতোলাহবেবহুজনসমাজকেপ্রতিশ্রুতিদিয়ে, প্রলোভনদেখিয়েপুরেদেওয়াহবেনির্দিষ্টখোঁয়াড়েশাসকপ্রভূদেরস্বার্থেইপরিকল্পিতভাবেবলিপ্রদত্তহবেবাংলারবহুজনসমাজ 


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    कहीं आसमान न निगल जाये हमारी सारी जमीन!

    अभी बचा हुआ है बसंतीपुर,कब तक बचा रहेगा बसंतीपुर?

    पलाश विश्वास

    पिछली दफा जब घर आया था,शहीरीकरण की लपलपाती जीभ को दावानल की तरह सारी तराई में खेतों और गांवों को निगलते जाने का अहसास लेकर वापस लौटा था।


    अबकी बार बरसों बाद घर लौटा हूं।


    घर इसीलिए नहीं आ रहा था कि बंटवारे के किस्से में शामिल होने का दर्द झेलने को तैयार न था।मेरे भीतर भी कोई टोबा टेकसिंह है।


    मैं जीते जी अपनी जमीन के टुकड़े करना नहीं चाहता और न अपने घर के।


    इसबार लौटा तो चारों तरफ से शहरीकरण के दावानल से घिरा हुआ महसूस कर रहा हूं।


    हमारे खेतों के बन रहे  कब्रिस्तान पर बेइंतहा सीमेंट का जंगल तामीर होते देख रहा हूं और लोग इसे विकास कह रहे हैं।


    आदतन सुबह सात बजे बाघ एक्सप्रेस से उतरकर घंटेभर में घर पहुंचकर गांव चक्कर लगाने निकल ही रहा था तो भाई पद्दो ने खबर दी कि कल ही कैशियर की पहली पत्नी का निधन हो गया।


    वहां पहुंचा तो उनकी दूसरी पतनी ने कहा,बहुत देर से आये हो कल दोपहर तक आते तो मुलाकात हो जाती।


    हरिमोहन दा का पोता साफ्टवेयर इंजीनियर है।


    वहां प्रेमनगर में राजमंगल पांडेय के घर के सामने के घर का एक लड़का मिला।प्रेमनगर के वे लोग भी नहीं बचे,जो मेरे बेहद अपने थे।ऐसे गांव तराई में या पहाड़ में कुल कितने होंगे,हिसाब दे नहीं सकता।


    हरिमोहन दा से पिछलीबार मिल गया था,वह शुगर की बीमारी से दो साल पहले गुजर गये।भाभी पहले ही जा चुकी थी वैसे ही हमसे हुई आखिरी किश्त की मुलाकात के बाद।


    गोपालमामा दरअसल गांव के रिश्ते से हमारे भांजे थे।चूंकि उम्र में बड़े थे,हम उन्हें मामा कहते थे।वे भी नहीं रहे।वे बाउल थे।


    प्रकाश झा ने गोविंद बल्लभ पंत पर जो फिल्म बनायी,उसकी शूटिंग बसंतीपुर में हुई थी और उस फिल्म में बाउल गाना गानेवाले गोपाल मामा थे।


    हजारी बुआ के वहां हर बार पान खाता था,हर किसी का मुस्कान के साथ स्वागत करने वाली हजारी बुआ भी नहीं रही।उनकी पोती ने पान खिलाय़ा।उनका पोता मैथेमेटिक्स पढ़ रहा है।लेकिन पोती ने स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी है।


    हमने उससे कहा कि रसोई घर में जिंदगी गुजारनी न हो तो फिर पढ़ाई शुरु कर दो।पढ़ी लिखी बहुओं और बेटियों से यही कहता रहा।


    गांव में कारें बहुत हैं।हर दो घर में से एक घर में कार खड़ी है।

    झोपड़ीवाला कोई मकान अब गांव में है नहीं।

    घर के बीतर घर,और घरों में चहारदीवारी है।

    अस्पताल और स्कूल पक्के हैं।

    चारों तरफ निकलने को पक्की सड़कें भी है।

    कंप्यूटर ङै और फेसबुक भी है।

    लोगों ने भव्य मंदिर भी बना लिय़े हैं।

    ज्यादातर गांववाले अब केसरिया हैं।

    उन घरों को कूदते फांदते छूना और उलमें बसी दिवंगत आत्माओं से संवाद में बीत गया पूरा दिन।हरिमाहन दा के नाती लालू और श्यामधारी भाई के बेटे गोवर्द्धन ने नेट से जोड़ने की कोशिश की ,संभव नहीं हुआ।


    अपने घर का भी कायाकल्प हो गया है।


    पद्दो ने दो मंजिला मकान बना लिया है।वहीं ठहरा हूं।


    दो भांजे शक्तिफार्म से राकेश और प्रसेनजीत इस घर में ठहर कर पढ़ रहे हैं।


    छोटा भाई पंचानन और उसकी पत्नी शिवानी नौकरी पर चले जाते हैं।भतीजा टुटुल कामकाज पर निकल जाता है तो पद्दो के पांव में भी सरसों हैं।घर में रहता बहुत कम है।पंचानन ने भी पक्का घर बना लिया है।


    दोमंजिले पर पद्दो ने हमारे लिए कमोड का इंतजाम किया है।


    घर की निशानी दोनों आम के पेड़ दिवंगत हैं।जामुन कटहल अमरुद आड़ू नीम बबुल वगैरह पेड़ कहीं नहीं है।कही नहीं है घर के पिछवाड़े का लंबा चौड़ा बगीचा।


    ताउजी के बसेरे पर पहरे के लिए एक अजनबी दंपत्ति अपने बच्चे के साथ है।अरुण ने अपना पक्का डेरा बांध रखा है।रहता वह दिल्ली में है।


    दशकों से ताई का घर माटी का जस का तस पड़ा है।सांप जितने थे जहां जहां,शीत निद्रा में हैं।अकेली मंझली बहू घर में रहती है।


    इस घर में मन रमाना मन साधना बहुत मुश्किल है। खेतों की तरफ गया तो वहां भी सीमेंट का जंगल पसर रहा है।लोगों ने दुकानें सजा ली है।


    फेसबुक पर मेरे गांव के बच्चे मुझे पढ़ भी लेते हैं।साइट पर भी चले आते हैं।कोईबेरोजगार नहीं है।कोई भूखा नहीं है।सभी लड़के लड़किया पढ़ाई कर रहे हैं या फिर नौकरी।


    लेकिन जैसे हर घर हमारा रहा है वैसे घर के भीतर भी कोई घर अभी बचा नहीं है।

    जैसे हर बात के लिए सलाह मशविरा संवाद आदान प्रदान की लोकरीति थी,उसकी कोई गुंजाइश नहीं है।


    गरीबी खोजे नहीं मिलेगी,संपन्न हो गया है बसंतीपुर और लोगों के खोत खलिहान भी बचे हुए हैं लेकिन साझा चूल्हा कहीं बचा नहीं है।


    मुझे नहीं मालूम कि मैं हसूं कि रोउं।


    मुझे नहीं मालूम कि इस गांव में मैं फिर कभी लौट सकता हूं या नहीं।


    जिसने पद्दो का घर बनाया,वह आकर बोला तीन लाख में आपके लिए ऐसा घर बन जायेगा और पांच लाख में हवेली बन जायेगी।मैंने कहा कि कोलकाता में तो दो कमरे के फ्लैट ही पचास लाख का है और एक कट्ठा जमीन दस से लेकर तीस लाख तक का उपनगलरों में तो महानगर में तो करोड़ों का खेल है।


    इस पर सविता बोली कि गांव आकर करोगे क्या,जायज बात है।लेकिन मन है कि मानता नहीं।


    दिनेशपुर के  36 बंगाल  गांवों में साठ के दशक में, संविद राज में भूमिधारी हक मिलने पर लोगों ने दो दो हजार रुपये में आठ आठ एकड़ जमीन बेच दिये।


    बसंतीपुर वालों ने जमीन बेची नहीं।जिसने बोची वह भी अपने ही लोगों को।जो लोग जैसे थे,बने रहे।


    पिछलीबार आय़ा था तो रुद्रपुर,गदर पुर होकर काशीपुर जसपुर और दूसरी तरफ किछा होकर शक्तिफार्म और सितारगंज तक तो रुंद्रपुर से हल्द्वानी तक शहरीकरण का उत्सव था।बड़ी सड़कों के किनारे काऱखाने,शापिंग माल,कालेज,आवासीय कालोनी महानगरीय बन रहे थे।


    अब बसंतीपुर के चारों तरफ शहरीकरण का उतसव है।


    साठ के दशक के भूमिधार हक मिलने के बाद से जो गांव और जो खेत बचे हुए थे, वे शहरों में खपते जा रहें हैं।दिनेशपुर के आस पास के सारे गांव दिनेशपुर में समाहित है।


    दिनेशपुर रुद्रपुर सडक के किनारे के तमाम गांवों के खेत अब सिडकुल के बाहर के कारखाने हैं,शापिंग माल है.शिक्षा दुकानें हैं,महंगे सुविधासंपन्न आवासीय परसिर है।


    आज सुबह भी जब कनेक्टिविटी के लिए गोवर्द्धने के साथ जूझ रहा था,बचपन के तमाम बचे हुए मित्र गोलक,टेक्का,विवेक आंगन में कुर्सी डाले इंतजार कर रहे थे।


    मेरे घर के पिछवाड़े एक नई बहू आयी है।वह चंडीपुर की है और उसने बताया कि उसके गांव से लेकर उदय नगर,कालीनगर,पंचाननपुर,नेताजी नगर ,दुर्गापुर तो क्या बसंतीपरु के उत्तर में चित्तरंजन तक की जमीने बिक गयी है और तमाम किसान अब मजदूर हो गये हैं लाखों खेत के बदले मिलने के बावजूद।


    गोलक को बताया तो बोला ,बसंतीपुर के रंजीत ने भी एक एकड़ जमीन बेच दी है।


    बसंतीपुर बनने से पहले बसंतीपुर के लोग विजयनगर के टेंट में जंगल के बीच रहते थे।वहां कमलादी,विशाखादी और रंजीत ने जन्म लिया था।


    कमलादी ने दुरारोग्य बीमारी से हताश होकर करीब छह साल पहले खुदकशी कर ली।विशाखादी को सांस की तकलीफ थी और दो तीन साल पहले उसने दम तोड़ दिया।उसका परिवार पीलीभीत से उजड़कर बसंतीपुर आ बसा था।उसके पति भी नहीं रहे।विशाखा दी विवेक की बड़ी बहन है।उनकी मां ने पुरा किस्सा सुनाया।


    बगल के घर में भाभी लिहाफ सिल रही थी।

    कहा,इतना काम क्यों करती हो भाभी।

    जवाब नहीं दिया,बोली बैठो।

    फिर मैंने पूछा,दादा कहां हैं।

    बोेले ,ऊपर।

    मैंने कहां,बुलाओ।

    बोले ,ऊपर आकर ही बुला सकती हूं।

    उनको भी मधुमेह की बीमारी थी।गांव के घर घर में अब संपन्नता के साथ मधुमेह महामारी है।

    रंजीत को भी मधुमेह है।गांव का जब चक्कर लगा रहा था तो वह दो तीन बार मिला।चश्मुद्दीन है।दुबला गया है।मैंने कहा कि बूढ़ा तो मैं भी रहा हूं,मरियल कयों हो इसतरह। बोला,शुगर है।


    मैंने इसपर कहा ,शुगर तो मुझे भी है।

    उसने कहा जोड़ों में दर्द बहुत है।


    अकेला भाई है।बंटवारे का  सववाल नहीं उठता।फिर भी उसने जमीन बेच दी।

    मुझसे कहा भी नहीं।


    कार्तिक काका और विधूदा पचहत्तर पार हैं।दोनों सक्रिय हैं।

    दोनो बसंतीपुर जात्रा पार्टी के कलाकार।कार्तिक काका तो इस बूढ़ापे में अब भी हीरो का पार्ट अदा करते हैं।बोले,आज का जमाना होता तो अवनी,हाजू और मैं बालीवूड में होते।कितने रास्ते खुले हैं।


    मैंने देखा कि कार्तिक काका के घुटनो तक कीचड़ से लथपथ।वही फसल की खुशबू महमहाती सी।अगली बार आउंगा तो क्या पता कार्तिक काका या विधूदा से मुलाकात हो पायेगी या नहीं।



    उनके पांव खेतों और खलिहानों पर हैं ,मजबूती से।राहत की बात यही है।

    बचे हुए लोग अब भी किसान होने का गर्व करते हैं,राहत की बात यह है।


    शायद पुरखों के बेमिसाल संघर्ष की बदौलत मिली जमीन की असली कीमत वे जान रहे होंगे,इसीलिए अब भी बचा हुआ है बसंतीपुर।


    कब तक बचा रहेगा बसंतीपुर।

    कब तक बची रहेगी तराई की हरियाली।

    कब तक बचे रहेंगे पहाड़।


    विकास सूत्र और मुक्त बाजार के चंगुल में फंसी छटफटा रही धरती पर माटी को कोई महक बची भी रहेगी या नहीं,नहीं,नहीं जानता।सीने में खून रीस रहा है लेकिन खून की नदियां दीख नहीं रही हैं किसी को भी।



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    ছাত্রদল এখনো রাস্তায়,যাদবপুরের শ্লোগান এখন

    জনতার সংগ্রাম চলবেই

    আমাদের সংগ্রাম চলবেই, চলবে…

    # অভিষেকেই যুব-রাজ

    মিলে গেল তৃণমূল যুবা ও তৃণমূল যুব

    দায়িত্বে অভিষেক বন্দ্যোপাধ্যায়


    পলাশ বিশ্বাস

    Photo: programme #hokkolorob :  1. Black badging  2. Postering  3. Mass convention  4. Torch rally  5. Token MASS hunger strike for 24 hours (from 6 pm)  6. Peaceful cultural demonstration  7. Screening of HOKKOLOROB videos  *All 'outsiders' are welcome.  Today completes one month for which the police atrocities  on the peaceful protesters of Jadavpur University went  unpunished.    Source : Subham Rath

    শাসকের রক্ত চক্ষুকে উপেক্ষা করে আবার রাস্তায় যাদবপুর।


    আবার রাস্তায় ছাত্রসমাজ।


    আমরা পাশে আছি যাদবপুর।


    জনতার সংগ্রাম চলবেই।


    আমাদের সংগ্রাম চলবেই, চলবে…


    ছাত্র সমাজের দাবি শুধু ছাত্রদের দাবি নয়।


    পচনধরা সমাজব্যবস্থার বিরুদ্ধে যুব সমাজের সরাসরি বিদ্রোহ ঘোষণা।

    এই বিপ্লবকে স্বাগত।


    আমাদের ঔ সব বিদ্রোহী ছেলেমেয়েরা দুধে ভাতে থাকার লড়াই লড়ছে না কিন্তু ,তাঁরা অন্ধকারের বিরুদ্ধে,তাঁরা নৈরাজ্যের বিরুদ্ধে ,তাঁরা এই মগের মুল্লুকের বিরুদ্ধে ,শাসকের রক্তচক্ষুর বিরুদ্ধে লড়াইয়ে নেমেছে,আমরা ক্লীবের মত চুপচাপ

    কেন?


    সময় লিখবে আমাদের অপরাধ!


    খবর হল,চরম অচলাবস্থার মধ্যেই নিরাপত্তারক্ষীদের সাহায্য নিয়ে অরবিন্দ ভবনে ঢুকলেন যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের উপাচার্য অভিজিত্‍ চক্রবর্তী। আজ সকালে বিশ্ববিদ্যালয় ক্যাম্পাসে ঢুকে পড়ুয়াদের প্রবল বিক্ষোভের মুখে পড়েন তিনি। বাধ্য হয়ে তাঁকে অরবিন্দ ভবনের বাইরেই অপেক্ষা করতে হয়। অবশেষে নিরাপত্তারক্ষী ও বিশ্ববিদ্যালয়ের কর্মীদের সাহায্য নিয়ে অরবিন্দ ভবনে ঢুকলেন উপাচার্য। মধ্যরাতে বিশ্ববিদ্যালয় ক্যাম্পাসে পুলিশি তাণ্ডবের প্রতিবাদে উপাচার্যের পদত্যাগের দাবিতে সরব পড়ুয়ারা। গতকালই ফের প্রতিবাদে গর্জে উঠে যাদবপুর। এই পরিস্থিতিতে পুজোর ছুটির পর তিনি এই প্রথম ক্যাম্পাসে পা দিতেই ফের অগ্নিগর্ভ হয়ে উঠেছে বিশ্ববিদ্যালয়-ক্যাম্পাস।


    ছাত্রছাত্রীদের ওপর পুলিসি নিগ্রহের এক মাস কেটে গেলেও উপাচার্যের পদত্যাগের দাবিতে সন্ধেয় ক্যাম্পাস থেকে ঢাকুরিয়া পর্যন্ত মশাল মিছিল করেন ছাত্রছাত্রীরা। ঢাকুরিয়া থেকে মিছিল ফিরে আসে বিশ্ববিদ্যালয় চত্ত্বরে। যাদবপুর থানার সামনে উপাচার্য অভিজিত চক্রবর্তীর কুশপুতুল পোড়ান ছাত্রছাত্রীরা। অভিজিত চক্রবর্তীর পদত্যাগের দাবিতে অনড় ছাত্রছাত্রী ও অধ্যাপকদের একাংশ। বৃহস্পতিবার কালো ব্যাজ পরে প্রতিবাদ জানান ছাত্রছাত্রীরা। গণ-কনভেনশনেও অংশ নেন তাঁরা। উপাচার্যের পদত্যাগের দাবিতে মহামিছিল করে অধ্যাপক সংগঠন জুটা।


    ছাত্রছাত্রীরা পড়াশোনা শুরু করলেও প্রথাগতভাবে ক্লাস বলতে যা বোঝায় যাদবপুরে তা এখনও বন্ধ। আর্টসের ছাত্রছাত্রীরা গাছতলায় ক্লাস করছেন। সায়েন্সের পড়ুয়ারা ক্লাস রুমে ক্লাস করলেও সাড়া দিচ্ছেন না রোল কলে। ইঞ্জিনিয়ারিং বিভাগে ল্যাবরেটরিতে কয়েকটি ক্লাস হলেও হচ্ছে না থিয়োরি ক্লাস।


    ইতিমধ্যে শাসকের  ছাত্র রাজনীতিতে বড় সড় পরিবর্তনে মুখ্য়মন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির রকম সকম দেখে মনে হয়,তিনি তার রাস্তাতেই চলবেন।

    আন্দোলনে মদ গাঁজা ভাঙ্গের গন্ধ শোঁকা দিদির সাংসদ ভাইপো এখন বাংলার ছাত্র রাজনীতিতে শাসকের মুখ।


    সংবাদে প্রকাশশ,# অভিষেকেই যুব-রাজ

    মিলে গেল তৃণমূল যুবা ও তৃণমূল যুব

    দায়িত্বে অভিষেক বন্দ্যোপাধ্যায়

    ঘোষণা করলেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়

    # মোদী সরকারের সমালোচনায় মমতা

    একাধিক প্রকল্প বাতিল ও বন্ধ

    ক্ষুব্ধ মুখ্যমন্ত্রী

    # নতুন সরকার যৌথ শাসন ব্যবস্থা ভেঙে  দিতে চাইছে

    ১০০ দিনের কাজের নিয়ম বদল

    "গরিবের ভাত মারছে কেন্দ্র'

    "টাকা মিলছে না ১০০ দিনের প্রকল্পের'

    "তিন মাস বন্ধ জে এন এন ইউ আর এমের কাজ'

    মোদী সরকারকে তোপ মুখ্যমন্ত্রীর


    ইতিমধ্য়ে নিজের দফতরে ঢুকতে গিয়ে বিক্ষোভের মুখে পড়লেন উপাচার্য। অরবিন্দ ভবনের সামনে বিক্ষোভরত ছাত্রছাত্রীদের দেখে তাঁদের মধ্যে দুজনের সঙ্গে কথা বলতে চান উপাচার্য। অরবিন্দভবনের বাইরে চেয়ারে বসে পড়েন তিনি। যদিও পদত্যাগের দাবিতে অনড় ছাত্রছাত্রীরা অভিজিত্‍ চক্রবর্তীর সঙ্গে কোনও কথা বলেননি। শেষ পর্যন্ত বিক্ষুব্ধ ছাত্রছাত্রীদের ব্যারিকেডের মধ্যে দিয়েই অরবিন্দভবনে ঢুকে যান উপাচার্য। সাংবাদিক সম্মেলনে দাবি করেন, ছাত্রছাত্রীরাই তাঁকে বিশ্ববিদ্যালয়ে নিরাপদে ঢোকার ব্যবস্থা করে দিয়েছে।


    অন্যদিকে উপাচার্য অভিজিত চক্রবর্তীকে বয়কটের সিদ্ধান্ত নিলেন যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের অধ্যাপকরা। যাদবপুরের অধ্যাপক সংগঠন জুটার তরফে এ কথা জানানো হয়েছে। উপাচার্যের তৈরি করা কোনও কমিটিতে থাকবেন না জুটার সদস্যরা। তবে, বিশ্ববিদ্যালয়ের স্বাভাবিক কাজকর্ম বজায় রাখতে ছাত্রছাত্রীরা ক্লাস করতে চাইলে তাঁরা ক্লাস নেবেন। গত ১৬ সেপ্টেম্বর রাতে উপাচার্যের তলব পেয়ে বিশ্ববিদ্যালয়ে ঢোকে পুলিস। ছাত্রছাত্রীদের মারধর করে ঘেরাও তুলে দেওয়া হয়।

    যাদবপুরের ছাত্রছাত্রী ও অধ্যাপকদের একাংশের প্রতিবাদ সত্ত্বেও অভিজিত চক্রবর্তীকে স্থায়ী উপাচার্য পদে নিয়োগ করেছে রাজ্য সরকার। সোমবার, তাঁর কাজে যোগ দেওয়ার কথা। ওইদিনই, রেজিস্ট্রারের কাছে প্রতিবাদপত্র জমা দেবে জুটা। জুটা মনে করছে, বিশ্ববিদ্যালয়ে হাইকোর্টের নির্দেশ কার্যকর করার ব্যাপারে কিছু সমস্যা রয়েছে। বিষয়টি আদালতকে জানানোর জন্য রেজিস্ট্রারের কাছে দাবি জানাবে তারা।


    যদিও কিছুটা হলেও নমনীয় হলেন যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের উপাচার্য অভিজিত চক্রবর্তী। স্থায়ী উপাচার্যের পদে যোগ দিয়ে আজ তিনি বলেন, আন্দোলনকারী ছাত্রছাত্রীরা তাঁর সন্তানের মত। তাঁদের কিছু অভিমান থাকতেই পারে। আলোচনার মধ্যে দিয়ে তার সমাধান করতে হবে। যদিও ১৬ সেপ্টেম্বর ক্যাম্পাসে পুলিসি তাণ্ডব নিয়ে এদিন কোনও মন্তব্য করেননি তিনি।


    দুপুর ১টা-কড়া পুলিসি পাহারায় কাজে যোগদান করলেন উপাচার্য। বিতর্ক সেফ প্যাসেজ নিয়ে। উপাচার্যের দাবি পড়ুয়ারাই সেফ প্যাসেজ দিয়েছেন।


    দুপুর ১২:৩০-সাংবাদিক সম্মেলন শেষ করলেন উপাচার্য।


    দুপুর ১২:১৫- সাংবাদিক সম্মেলন শুরু করলেন উপাচার্য।


    সকাল ১১:৩০-অরবিন্দ ভবনে ঢুকলেন উপাচার্য।


    সকাল ১১টা: যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয় ক্যাম্পাসে এলেন উপাচার্য। শুক্রবার কড়া পুলিসি প্রহরায় বিশ্ববিদ্যালয়ে ঢুকলেন তিনি। দুপুর ১২টায় সাংবাদিক সম্মেলন করার কথা রয়েছে তার।


    এদিকে বিশ্ববিদ্যালয়ে গতকাল ২৪ ঘণ্টার প্রতীকি অনশনে বসেন পড়ুয়ারা। উপাচার্যের পদত্যাগের দাবি তুলেছেন অনশনকারীরা।


    আজকালে লিখেছেন গৌতম চক্রবর্তী: উপাচার্যের পদত্যাগের দাবিতে অবশেষে অরবিন্দ ভবনের সামনে অনশনে বসলেন ছাত্রছাত্রীরা৷‌ একদিনের প্রতীকী অনশন৷‌ ছাত্রছাত্রীদের ওপর পুলিসি আক্রমণের এক মাস পূর্তির দিনে যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের ছাত্রছাত্রীরা তাঁদের আন্দোলন থেকে সরেননি৷‌ ছন্দে ফেরার একটা ইঙ্গিতের পাশাপাশি আন্দোলন হয়েছে৷‌ কোনও কোনও বিভাগে ক্লাস হয়েছে, পরীক্ষাও হয়েছে, ক্লাস বয়কটও চলেছে৷‌ ছাত্রছাত্রীদের ডাকা কনভেনশনে গান, বক্তৃতা, পথনাটিকা হয়েছে৷‌ সন্ধেয় মশাল মিছিল


    এবং সবশেষে গণঅনশনে বসেছেন ছাত্রছাত্রীরা৷‌ এদিন শিক্ষক সংগঠন জুটাও বিশ্ববিদ্যালয় চত্বরে গান গেয়ে মিছিল করে তাদের প্রতিবাদ জানিয়েছে৷‌ খবর ছিল এদিন বিশ্ববিদ্যালয়ে আসতে পারেন উপাচার্য অভিজিৎ চক্রবর্তী৷‌ কিন্তু শেষ পর্যম্ত তিনি আসেননি৷‌ বিশ্ববিদ্যালয়ের স্হায়ী উপাচার্য হওয়ার পর এখনও অভিজিৎবাবু একদিনও বিশ্ববিদ্যালয় চত্বরে পা রাখলেন না৷‌ স্বাভাবিক কারণেই প্রশ্ন উঠেছে, অচলাবস্হা কাটানোর ক্ষেত্রে তাঁর কি কোনও ভূমিকা নেই? সবটাই ছাত্রছাত্রী এবং শিক্ষক-শিক্ষিকাদের দায়িত্বঞ্জএদিকে, এদিন সকাল থেকেই যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রত্যেক গেটে ছাত্রছাত্রীরা দাঁড়িয়ে অন্য ছাত্রছাত্রীদের কালো ব্যাজ পরিয়েছেন৷‌ ছাত্রছাত্রীরা এদিন কালো ব্যাজ পরে বিশ্ববিদ্যালয় চত্বরে ঘোরাফেরা করেন৷‌ বেলা ১২টা থেকে কনভেনশন শুরু হয়৷‌ বিশ্ববিদ্যালয় চত্বরে ফেটসু-র কার্যালয়ের সামনে৷‌ যোগ দেন বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রাক্তনী শিক্ষাবিদ মীরাতুন নাহার-সহ বহু বিশিষ্টজন এবং আন্দোলনরত ছাত্রছাত্রীরা৷‌ মীরাতুন দেবী বলেন, অন্যায়ের বিরুদ্ধে প্রতিবাদ৷‌ তাই ছাত্রছাত্রীদের এই আন্দোলনে প্রথম থেকেই আছি৷‌ ছাত্রছাত্রীরা তারুণ্যের প্রতীক৷‌ তাই তাদের পাশে থাকতে চাই৷‌ এই উপাচার্য যা করেছেন, তা অন্যায়৷‌ ছাত্রছাত্রীরা প্রতিবাদ করছে৷‌ কিন্তু তিনি কী করছেন? ছাত্রছাত্রীরা তো বিশ্ববিদ্যালয়ে আসছেন৷‌ তিনি আসছেন না৷‌ তবে কি তিনি নিজেকে 'অপরাধী'মনে করছেন? কনভেনশন চলার মধ্যেই যাদবপুরের অধ্যাপক-অধ্যাপিকাদের সংগঠন 'জুটা'তাদের মিছিল বের করে৷‌ গান গেয়ে অধ্যাপক-অধ্যাপিকারা বিশ্ববিদ্যালয় চত্বরে ঘোরেন৷‌ জুটার সম্পাদক নীলাঞ্জনা গুপ্ত, অম্বিকেশ মহাপাত্র-সহ বহু অধ্যাপক-অধ্যাপিকা মিছিলে পা মেলান৷‌ মিছিল শেষে নীলাঞ্জনাদেবী বলেন, উপাচার্যের পদত্যাগ, ছাত্রছাত্রীদের ওপর পুলিসের নির্যাতন, ছাত্রীর শ্লীলতাহানি ও যৌন নিগ্রহের নিরপেক্ষ তদম্ত এবং বিভিন্ন সময় জারি করা নির্দেশিকার প্রত্যাহারের দাবি নিয়ে এই মিছিল হয়েছে৷‌ আমরা চাই বিশ্ববিদ্যালেয় স্বাভাবিক পরিবেশ ফিরে আসুক৷‌ ছাত্রছাত্রীরা ক্লাসে আসুক৷‌ ক্লাস করুক৷‌ আমরা ক্লাস নিতে রাজি৷‌ কিন্তু এই উপাচার্য থাকলে সেই পরিবেশ হবে বলে আমরা মেনে নিতে পারছি না৷‌ ক্লাস কম হচ্ছে হয়ত৷‌ কিন্তু যাদবপুরের ভবিষ্যতের কথা চিম্তা করে আন্দোলন করতেই হচ্ছে৷‌ এর আগেও আন্দোলন হয়েছে৷‌ তবে এমন আন্দোলন আগে কখনও হয়নি৷‌ এদিন জুটার প্রতিনিধিরা বিজ্ঞান বিভাগের 'ডিন'-এর সঙ্গে গিয়ে দেখা করেন৷‌ ওই বিভাগের ডিন-ই শিক্ষকদের প্রতিদিনের ক্লাস করার তালিকা তৈরি করার নির্দেশ দিয়েছেন৷‌ জুটার প্রতিনিধিরা ওই তালিকা না দেওয়ার সিদ্ধাম্ত নিয়েছেন বলে জানান৷‌ অন্য দিকে, এদিন সকাল থেকেই বিজ্ঞান বিভাগের সব ক্লাসই হয়েছে৷‌ ছাত্রছাত্রীরা হাজিরা না দিয়েই ক্লাস করেছেন৷‌ কলা বিভাগের ইংরেজি পরীক্ষাও হয়েছে৷‌ কলা বিভাগের ছাত্র নেতা সমন্বয় রাহা জানান, একটি প্রজেক্টের কাজ জমা দিয়েছেন ছাত্রছাত্রীরা৷‌ তবে ক্লাস, পরীক্ষার খাতা জমা দেওয়া হলেও ছাত্রছাত্রীরা আন্দোলনের পথ থেকে সরেননি বলে জানান এস এফ আইয়ের এই ছাত্র নেতা৷‌ বিকেল ৫টা নাগাদ ছাত্রছাত্রীরা মশাল মিছিল বের করেন৷‌ ফেটসু-র সম্পাদক চিরঞ্জিত ঘোষ বলেন, আন্দোলন চলছে৷‌ প্রতীকী অনশনেও বসছেন ছাত্রছাত্রীরা৷‌ প্রায় ৫০০ জন ছাত্রছাত্রী এতে অংশ নেবেন৷‌ উপাচার্য বিশ্ববিদ্যালয়ে আসবেন কি আসবেন না, সেটা তাঁর বিষয়৷‌ তবে ওই উপাচার্যকে আমরা মানছি না৷‌ তাঁর পদত্যাগ চাই৷‌ বিশ্ববিদ্যালয়ের স্বাভাবিক পরিস্হিতি ফিরিয়ে আনা ওই উপাচার্যের পক্ষে সম্ভব নয় বলেই আমরা মনে করি৷‌ শুক্রবার গ্রুপ বৈঠক হবে৷‌ তার পরই আমরা সিদ্ধাম্ত নেব৷‌ অন্যদিকে যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের পড়ুয়াদের আন্দোলনকে ন্যায়সঙ্গত বলে দাবি করল মজদুর ক্রাম্তি পরিষদ৷‌ বিশ্ববিদ্যালয়ের এক ছাত্রীর শ্লীলতাহানিকে কেন্দ্র করে কর্তৃপক্ষের উদাসীনতার নিন্দায় সরব হয়েছে এই পরিষদ৷‌ পরিষদের সাধারণ সম্পাদক আভাস মুন্সি জানান, যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয় নিয়ে নিরপেক্ষ বিচারবিভাগীয় তদম্ত এবং উপাচার্যের পদত্যাগ দাবি করা হয়েছে৷‌ বিশ্ববিদ্যালয়ে পড়াশোনার পাশাপাশি ছাত্র রাজনীতির পরিবেশ বজায় রাখার দাবিও জানানো হয়েছে৷‌ ছাত্র রাজনীতির অধিকার সকলের আছে৷‌ সেখানে কোনওরকম জোরজুলুম চলে না৷‌ এদিকে অল ইন্ডিয়া ডি এস ও-র পশ্চিমবঙ্গের রাজ্য কমিটির সম্পাদক অংশুমান রায় উপাচার্যকে স্হায়ী ঘোষণা করার সিদ্ধাম্তকে অত্যম্ত ন্যক্কারজনক বলে সমালোচনা করেন৷‌ তিনি বলেন, সমস্ত ভয়ভীতিকে উপেক্ষা করে যাদবপুরের ছাত্রছাত্রীরা যেভাবে আন্দোলন চালিয়ে যাচ্ছেন তা শিক্ষণীয়৷‌                   





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    বর্ধমানে বোমা বিস্ফোরণ ও বাংলাদেশের জামায়াত
    এবনে গোলাম সামাদ
    ১৮ অক্টোবর ২০১৪, শনিবার, ৯:৪৬

     
    আমি কখনো বর্ধমানে যাইনি। বর্ধমান শহর সম্পর্কে আমার কোনো ব্যক্তিগত ধারণা নেই। তবে ক'দিন ধরে আমাদের দেশের পত্রপত্রিকা পড়ে মনে হলো বর্ধমান শহরের লোক খুবই আতঙ্কিত হয়ে উঠেছেন। কেননা, সেখানে বাংলাদেশ থেকে কিছু জঙ্গি মুসলিম মৌলবাদী গিয়ে একটি দালানবাড়িতে বোমা বানাচ্ছিলেন। বোমা বানানোর সময় সেখানে বোমা বিস্ফোরণ ঘটে। ফলে মারা যান দু'জন বোমা নির্মাণকারী ও আহত হন আরো কয়েকজন। যে দালানবাড়িটিতে বোমা বানানো হচ্ছিল, এর ছবি প্রকাশিত হয়েছে আমাদের দেশের পত্রপত্রিকায়। পত্রিকার ছবি দেখে মনে হলো, বোমা বিস্ফোরণের ফলে বাড়িটির কোনো অংশ ভেঙে যায়নি। আমার মনে তাই প্রশ্ন জাগল, যে বোমা বিস্ফোরিত হয়েছে তা আসলেই বোমা ছিল না পটকা জাতীয় কিছু ছিল, তা নিয়ে। কারণ, প্রকৃত বোমা বিস্ফোরিত হলে দালানটির কিছু-না-কিছু অংশ তিগ্রস্ত হতো। কিন্তু তা হয়নি। তাই বর্ধমান শহরের লোকে ভয়ঙ্করভাবে আতঙ্কিত হওয়ার কিছু ঘটেছে বলে আমার মনে হলো না। যদিও পত্রপত্রিকায় বলা হচ্ছে, বর্ধমান শহরের মানুষ ভয়ঙ্করভাবে আতঙ্কিত হয়ে উঠেছেন। পশ্চিমবঙ্গে নকশালপন্থীরা অনেক শক্তিশালী প্রকৃত বোমা বানাতে জানেন। যার বিস্ফোরণে ভেঙে যেতে পারে দালানকোঠা। ভাঙতে পারে সাঁকো, উড়ে যেতে পারে রেললাইন। পশ্চিম বাংলার মানুষ নকশালদের তৈরি বোমা বানানোর সাথে পরিচিত। তাই এরা জঙ্গি মুসলিম মৌলবাদীদের তৈরি পটকা বিস্ফোরণে আতঙ্কিত হওয়ার কোনো কারণ আছে বলে আমার মনে হচ্ছে না। যদিও আমাদের দেশে পত্রপত্রিকায় বলা হচ্ছে, বর্ধমানে বিরাজ করছে আতঙ্ক। ভারতে ছত্তিশগড় রাজ্যে নকশালপন্থীরা স্থলমাইন ব্যবহার করছে, যা কেবল সেনাবাহিনীর লোকেরাই ব্যবহার করতে পারে। ভারতের নকশালপন্থীরা স্থলমাইন কী করে জোগাড় করতে পারছে, তা হয়ে আছে রহস্যাবৃত। কেউ কেউ এমন মন্তব্য করছেন যে, নকশালপন্থীরা প্রচুর অর্থ দিয়ে সেনাবাহিনীর কাছ থেকে কিনছে স্থলমাইন। কথাটা কতটা সত্য আমরা জানি না। তবে জনশ্র"তি এ বিষয়ে প্রবল। 
    আমাদের দেশে পত্রপত্রিকায় ও টেলিভিশনে বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামীকে জড়ানো হচ্ছে বর্ধমানে বোমা বিস্ফোরণের সাথে। কিন্তু বর্ধমান শহরে জামায়াত কর্মীরা কেন বোমা বানাতে যাবেন, সেটা আমার কাছে মোটেও বোধগম্য নয়। জামায়াত কর্মীরা যদি বোমা বানাতে চায়, তবে সেটা তার নিজ দেশে বসেই করতে পারে। পশ্চিমবঙ্গে বোমা বানিয়ে তা বাংলাদেশে নিয়ে আসা সহজসাধ্য নয়। এই বোকামি তারা কখনো করতে যেতে পারে না। বলা হচ্ছে, পশ্চিমবঙ্গের মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় তার তৃণমূল কংগ্রেস দল গড়ার জন্য প্রচুর অর্থ পেয়েছিলেন বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামীর কাছ থেকে। জামায়াতের সাথে তার রয়েছে একটা বিশেষ সম্পর্ক। আর তাই তিনি বাংলাদেশ থেকে যাওয়া বোমা বানানো লোকদের নিজ দেশে দিচ্ছেন প্রশ্রয়। কিন্তু যেখানে সামান্য একজন গরু বিক্রেতা পশ্চিম বাংলা থেকে বাংলাদেশে আসতে বিএসএফের গুলিতে প্রাণ হারাচ্ছেন, সেখানে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় পশ্চিমবঙ্গে জামায়াতে ইসলামীদের যাওয়া-আসার অবাধ সুযোগ করে দিতে পারেন, সেটা নিয়ে সহজেই প্রশ্ন উঠানো যেতে পারে। তাই মনে হচ্ছে, পত্রপত্রিকায় প্রচারিত খবর হলো খুবই দুরভিসন্ধিমূলক। বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামী দল একটা গোড়া ধর্মান্ধ মৌলবাদী ইসলামপন্থী দল নয়। এ দলের প্রতিষ্ঠাতা গোলাম আযমকে মনোবিদ্যার দৃষ্টিকোণ থেকে একজন কঠোর মনোভাবাপন্ন বা টাফ মাইন্ডেড ব্যক্তি বলা চলে না। বরং বলতে হয়, একজন নমনীয় মনোভাবের বা টেন্ডার মাইন্ডেড ব্যক্তি। তিনি কোনো দিনই চাননি জোর করে মতা দখল করতে। অগ্রসর হতে চেয়েছেন নিয়মতান্ত্রিক পথে। এখনো জামায়াত চাচ্ছে ভোটের মাধ্যমে মতায় যেতে। বোমাবাজি করে মতায় যাওয়া যাবে অথবা উচিত হবে সে কথা ভাবছে না এই দলটি। গোলাম আযমের রাজনৈতিক জীবন আরম্ভ হয় রাষ্ট্রভাষা আন্দোলনের মাধ্যমে। গোলাম আযম ছিলেন ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের ছাত্রসংসদের নির্বাচিত জিএস (জেনারেল সেক্রেটারি)। তিনি জিএস থাকার সময় পাকিস্তানের প্রধানমন্ত্রী লিয়াকত আলী খানকে দিয়েছিলেন উর্দুর সাথে বাংলাকে পাকিস্তানের অন্যতম রাষ্ট্রভাষা করার দাবি সংবলিত স্মারকলিপি। ১৯৪৮ সালে তদানীন্তন পাকিস্তানের প্রধানমন্ত্রী লিয়াকত আলী খান পূর্ব পাকিস্তান সফরে আসেন। সফরে এসে ২৭ নভেম্বর ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ে জিমন্যাসিয়াম মাঠে এক বিরাট ছাত্রসমাবেশে ভাষণ দেন। সেই ঐতিহাসিক ছাত্রসভায় ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের ছাত্রসমাজের প থেকে ঢাকসুর জিএস গোলাম আযম ছাত্রজনতার করতালির মধ্যে উর্দুর সাথে বাংলাকে অন্যতম রাষ্ট্রভাষার দাবি সংবলিত মেমোরেন্ডাম পাঠ করেন এবং তা দেন লিয়াকত আলী খানকে। তার সম্বন্ধে বিখ্যাত কমিউনিস্ট নেতা মোহাম্মদ তোয়াহা এক সাাৎকারে বলেছেন : 'গোলাম আযম সাহেব তখন ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের কেন্দ্রীয় ছাত্র সংসদের জিএস (জেনারেল সেক্রেটারি) ছিলেন। ছাত্র হিসেবে তিনি ছিলেন মেধাবী। স্বভাবগতভাবেই তিনি ছিলেন অমায়িক এবং ভদ্র। ভালো সার্কেলের ছাত্ররা যেমন পরস্পরের প্রতি আকৃষ্ট হয়ে থাকে, তেমনি আমরা সহজাতভাবে একত্রিত হয়ে ভাষা আন্দোলনে কাজ করেছি। আমাদের এ সার্কেলে আরো অনেক সহযোগী ছিলেন। এর পেছনে আর অন্য কোনো কারণ ছিল না।'..... (দ্রষ্টব্য : মহান একুশে সুবর্ণজয়ন্তী গ্রন্থ, পৃষ্ঠা-১৪৩৯। অ্যাডর্ন পাবলিকেশন, ঢাকা। ২০০৮।)
    গোলাম আযম ১৯৭১ সালে বলেছিলেন, শেখ মুজিবের হাতে মতা হস্তান্তর করা হোক। যদিও পরে তিনি করেছিলেন পাকবাহিনীর সাথে সহযোগিতা। কারণ তিনি চাননি, ভারতীয় বাহিনী এসে তদানীন্তন পূর্ব পাকিস্তান দখল করুক। তিনি ছিলেন ভারতীয় আধিপত্যবাদের বিরোধী। কিন্তু তিনি কখনোই চাননি পাকবাহিনী নিরস্ত্র জনগণকে হত্যা করুক। তিনি পাক সামরিক জান্তার বাড়াবাড়ির করেছেন সমালোচনা। এখন আমরা জানতে পারছি যে, শেখ মুজিবও চাননি যে সাবেক পাকিস্তান ভেঙে যাক। তিনি চেয়েছিলেন সাবেক পাকিস্তানের রাষ্ট্রিক কাঠামোর মধ্যেই পূর্ব পাকিস্তানের জন্য অধিক স্বায়ত্তশাসন। তিনি আওয়ামী লীগের অন্য নেতাদের মতো ভারতে যেতে চাননি। বন্দী হয়ে চলে গিয়েছিলেন তদানীন্তন পাকিস্তানের পশ্চিমাংশে। অর্থাৎ ১৯৭১ সালে শেখ মুজিবের সাথে গোলাম আযমের ঘোরতর মতভেদ ঘটেছিল, এ রকম সিদ্ধান্ত করা যায় না। গোলাম আযমের নাগরিকত্ব ফিরিয়ে দেয়া হয় উচ্চ আদালতের রায় অনুসারে। উচ্চ আদালতের বিচারকেরা বলেন যে, ১৯৭১-এ গোলাম আযম যা করেছেন, তার জন্য তার নাগরিকত্ব বাতিল করা যেতে পারে না। গোলাম আযম উচ্চ আদালতের রায় বলে হতে পারেন বাংলাদেশের নাগরিক। বাংলাদেশের সর্বোচ্চ আদালত তাকে দেশদ্রোহী ঘোষণা করেননি। জামায়াতে ইসলামী দল একটি চরমপন্থী দল নয়। মুসলিম মূল্যবোধে বিশ্বাসী একটি মধ্যপন্থী দল। এখনো জামায়াত বাংলাদেশে একটি নিষিদ্ধ সংগঠন হিসেবে ঘোষিত হয়নি। কিন্তু তার বিরুদ্ধে ষড়যন্ত্র চলেছে। আর এই ষড়যন্ত্রের অংশ হিসেবে ফলাও করে ছাপা হচ্ছে জামায়াতে ইসলামের সদস্যরা পশ্চিমবঙ্গের বর্ধমানে বোমা বানাচ্ছিল বলে। সম্প্রতি ইউরোপ ও আমেরিকার অনেক নেতা বাংলাদেশের জামায়াতে ইসলামীকে একটি মধ্যপন্থী ইসলামি দল হিসেবে বিবেচনা করছেন। বাংলাদেশের জামায়াত মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের রাজনীতিকদের কাছে পেতে শুরু করেছে বিশেষ বিবেচনা। তারা ভাবছেন, জামায়াত একটি মধ্যপন্থী ইসলামি দল। বাংলাদেশ হলো একটি মুসলিম অধ্যুষিত দেশ এবং ওআইসির সদস্য। বাংলাদেশে মধ্যপন্থী একটি ইসলামি দলের প্রভাব বেড়ে যাওয়া, ইউরোপ ও মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের জন্য হতে পারবে শুভ। কেননা, এর ফলে খ্রিষ্টান বিশ্বের প্রতি মুসলিম বিশ্বের বৈরী মনোভাব যাবে কমে। বাড়বে ইতিবাচক সহযোগিতার মনোভাব।
    বাংলাদেশে আওয়ামী লীগ এখন প্রমাণ করতে চাচ্ছে, জামায়াতে ইসলামী হলো একটি গোঁড়া ধর্মান্ধ ইসলামপন্থী দল। তাই আওয়ামী লীগ মতায় না থাকলে জামায়াত মতায় আসবে। আর এর ফলে তিগ্রস্ত হবে ইউরো-মার্কিন জোট। কিন্তু ইউরো-মার্কিন জোটের অনেক নেতাই হতে পারছেন না আওয়ামী লীগের দৃষ্টিভঙ্গির সাথে একমত। বিশেষ করে, মার্কিন যুক্তরাষ্ট্র বাংলাদেশের জামায়াত সম্পর্কে এখন অনেক ভিন্নভাবেই ভাবছে বলেই মনে হয়।
    একটি বিষয় বিশেষভাবে লণীয়, তা হলো সাবেক পাকিস্তান আমলে তদানীন্তন পূর্ব পাকিস্তানে দল হিসেবে জামায়াত মোটেও শক্তিশালী ছিল না। সে শক্তি সঞ্চয় করতে পেরেছে ১৯৭১ সালের পরে। তার ভারতীয় আধিপত্যবাদবিরোধী মনোভাবের কারণে। পশ্চিমবঙ্গের অনেক পত্রপত্রিকায় লেখা হচ্ছে, বাংলাদেশে জামায়াত সাহায্য ও সহযোগিতা পাচ্ছে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের কাছ থেকে। কিন্তু মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় যখন পশ্চিম বাংলার মুখ্যমন্ত্রী ছিলেন না, তখনই জামায়াত হয়ে ওঠে বাংলাদেশের রাজনীতিতে একটি গ্রহণযোগ্য শক্তি। বিএনপির সাথে জোট গঠন করে জামায়াত থেকে দু'জন হতে পারেন মন্ত্রী। এই দু'জন মন্ত্রী চেষ্টা করেননি বাংলাদেশে জঙ্গি ইসলামতন্ত্র প্রতিষ্ঠা করার। উদার গণতন্ত্র মেনেই পরিচালনা করতে চেয়েছেন দেশকে। বর্তমানে এই ইতিহাসটুকুকে টপকে যেতে চাচ্ছেন যেন এ দেশের অনেক সাংবাদিক। কেন তারা এটা করছেন, সেটা আমাদের বোধগম্য নয়। অনেক ভারতীয় পত্রপত্রিকার সাথে মিলছে তাদের সাংবাদিকতার ধারা।
    সম্প্রতি পশ্চিম বাংলার মুখ্যমন্ত্রী অভিযোগ তুলেছেন, ভারতের কেন্দ্রীয় সরকার পশ্চিমবঙ্গ সরকারের কাজে হস্তপে করছে। যাতে ফুটে উঠছে ভারতের কেন্দ্রীয় সরকারের স্বৈরাচারী মনোভাব। কিন্তু ভারতের সংবিধান এমন যে, এ রকম হস্তপে কেন্দ্রীয় সরকার করতেই পারে। কেননা, ভারতের সংবিধানে যদিও ভারতকে বলা হয়েছে একটি ইউনিয়ন। কিন্তু ভারত মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের মতো একটি ইউনিয়ন নয়। মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের কেন্দ্রীয় সরকার তার কোনো অঙ্গরাজ্যের ঘরোয়া রাজনীতিতে হস্তপে করতে পারে না। মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রে প্রত্যেকটি অঙ্গরাজ্য নির্বাচিত করে তাদের নিজস্ব গভর্নর। কিন্তু ভারতের বিভিন্ন প্রদেশের গভর্নর বা রাজ্যপাল নিযুক্তি পান কেন্দ্রীয় সরকারের কাছ থেকে। রাজ্যপাল কেন্দ্রীয় সরকারের নির্দেশে যেকোনো সময় প্রাদেশিক সরকারকে ভেঙে দিতে পারেন। এ ছাড়া কেন্দ্রীয় সরকার যেকোনো প্রদেশের সীমানার ঘটাতে পারে রদবদল। যেটা মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের কেন্দ্রীয় সরকার পারে না তার অঙ্গরাজ্যের েেত্র। ভারতকে যদি একটা প্রকৃত ফেডারেশন হতে হয়, তবে তার প্রত্যেকটি প্রদেশকে এক হয়ে করতে হবে আন্দোলন। একা পশ্চিমবঙ্গের পে ভারতকে একটা প্রকৃত ফেডারেশনে পরিণত করা কখনোই সম্ভবপর হতে পারে না। বাংলাদেশ এমন একটি রাষ্ট্র নয়, যে নাকি পারে পশ্চিমবঙ্গকে এ কাজে সহায়তা করতে। বিরাট রাষ্ট্র ভারত। সাবেক পাকিস্তানকে ভেঙে দেয়ার জন্য পূর্ব পাকিস্তানে পাঠিয়েছিল তার সৈন্য। কিন্তু অনুরূপ কিছু করতে পারে না বাংলাদেশ পশ্চিমবঙ্গের জন্য। যদিও পশ্চিমবঙ্গের বাংলা ভাষাভাষী মানুষের জন্য বাংলাদেশের মানুষ অনুভব করে সমমর্মিতা। কিন্তু তবুও ভারতের অনেক পত্রপত্রিকায় এমনভাবে খবর ছাপা হচ্ছে, যা পড়ে মনে হতে পারে বাংলাদেশ চাচ্ছে ভারত থেকে পশ্চিমবঙ্গের বিযুক্তি। জানি না, এ ধরনের প্রচারণার শেষ ফল কী দাঁড়াবে। ভারতের হিন্দুত্ববাদী সরকার পশ্চিমবঙ্গকে ভারতের সাথে যুক্ত রাখার অজুহাত তুলে বাংলাদেশের সাথে একটা সঙ্ঘাত বাধাবে কি না, সেটাও বলা যাচ্ছে না। আমরা গণতন্ত্রে আস্থাশীল। আস্থাশীল সংবাদপত্রের স্বাধীনতায়। কিন্তু দুঃখজনকভাবে আমরা ল করছি যে, আমাদের দেশের অনেক পত্রপত্রিকায় সংবাদ সরবরাহ করা হচ্ছে ভারতের হিন্দুত্ববাদী সরকারেরই অনুকূলে। এ ধরনের সাংবাদিকতা জাতীয় স্বার্থেই বর্জনীয়।
    লেখক : প্রবীণ শিক্ষাবিদ ও কলামিস্ট

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    নমো ঃ অশ্বমেধের ঘোড়া ঃ শরদিন্দু উদ্দীপন


    লিখছেনঃ 
    তিনি দিগ্বিজয়ের জন্য মনোনীত। যজ্ঞের জন্যউৎসর্গকৃত। ধর্ম যুদ্ধের জন্য নিবেদিত। তিনিঅশ্বমেধের ঘোড়া। তাই তাঁকে সাজানো হয়েছে সযত্নেচন্দন চর্চিত ললাট অগ্নিসম রক্ততিলক শিরে ভাগুয়াধ্বজ তুরিভেরি, দামামার  উন্মত্ত রণহুংকার তুলে তিনিছুটে চলেছেন। তারই হ্রেষারবে শিহরিত হচ্ছে দশদিক হ্যাতিনিই বর্তমান ভারতের মনুবাদী শিবিরের ছুটন্ত ঘোড়াতিনি নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি।

    এরকমই একটি ঘোড়ার সন্ধানে ছিল মনুবাদীরা যাকেদিগ্বিজয়ের কাজে ব্যবহার করা যেতে পারে এবংদিগ্বিজয়ের কাজ সমাপ্ত হলে বলি চড়ানো যেতে পারেবলিতেই মোহগ্রস্থ অশ্বের মুক্তি। হোমাগ্নীর পুত রসেভস্মীভূত হওয়াতেই তার  পরম শান্তি ওঁ শান্তিওঁ শান্তি মোদি সেই দাস সংস্কৃতি  পরম্পরার ধারক   বাহক যেদেবপ্রসাদ লাভ করে পরম শান্তি পেতে চায়  

    শূদ্র নিধনের প্রতীকী পরিভাষা 
    অশ্বমেধ যজ্ঞ ভূদেবতাদের ধর্মঅর্থকাম  মোক্ষ লাভেরসর্বোচ্চ পথ। মূলনিবাসীদের(শূদ্রবিরুদ্ধে কাঙ্ক্ষিত বিজয়লাভের জন্য এক সুনিশ্চিত বার্তা অশ্ব বা ঘোড়াকে দিয়ে এইকাজ পরিচালিত করা হয় এই কারণে যেভূদেবতীয় পরিভাষায়অশ্ব  শূদ্র সমগোত্রীয় ওদের ধর্মীয় ভাবনায় এটাইসম্পৃক্ত হয়ে আছে যেদেব সাম্রাজ্য বিস্তারের জন্য অশ্ব শূদ্রকে বলি প্রদত্ত হতে হয়।  কেননা ওদের বিধাতা জীব সৃষ্টিকালে পুরুষকে বলি দিয়েছিল এবং সেই বলি প্রদত্ত পুরুষেরপায়ের থেকে জন্ম নিয়েছিল শূদ্র  অশ্ব (পুরুষসূক্তঋক বেদ,৯০ শ্লোকঅর্থাৎ অশ্বমেধ হল শূদ্র বা দাস নিধনের প্রতীকীপরিভাষা নরেন্দ্র ভাই দামোদর দাস মোদি একদিকে শূদ্রঅন্যদিকে দাস সুলভ আনুগত্যের জন্য বিশ্বস্ত ঘোড়া। 

    রামরাজ্যের রণহুংকারঃ                 
    এই অশ্বমেধের ঘোড়া ছুটেছিল খৃষ্টপূর্ব ১৮৭ সাল আগেএকবার। প্রকাশ্যে দিবালোকে যখন পুস্যমিত্র শুঙ্গ সম্রাটঅশোকের প্রপৌত্র ব্রিহদ্রথকে নৃশংস ভাবে হত্যা করল পুস্যমিত্র শুঙ্গের এই অশ্বমেধ যজ্ঞ ছিল ঐতিহাসিক কালের সর্ববৃহৎ শূদ্র নিধন যজ্ঞ। অশ্বমেধের নামেধ্বংস করা হয়েছিল মূলনিবাসী সভ্যতার সমস্ত নিদর্শন। পুস্যমিত্র তার চরিত্রকে অবলম্বন করে লিপিবদ্ধকরেছিল রামায়ন কাহিনী শম্বুকের মতো জ্ঞান তাপসদের হত্যা করে তাদের ধড় থেকে মাথা নামিয়ে দিয়েব্রাহ্মনদের সন্তুষ্ট করেছিল রাজা রাম মোদির ভাষণেও উঠে আসছে  রামরাজ্যের সেই রণহুংকার   

    কূর্ম অবতারঃ 
    কচ্ছপ তার খোলসের মধ্য থেকে ক্রমশ শুঁড় বাড়তে শুরু করেছে। মৃতদেহ তার প্রধান খাদ্য। ব্রাহ্মণ ভোজনের জন্য শূদ্রের লাশ চাই। সস্তা বহুজনের লাশ। সুলতানি আমল থেকে ইংরেজ কাল পর্যন্ত ওরা মুখ খুলতে পারেনি। ইংরেজদের কাছ থেকে ক্ষমতা হস্তান্তরের পর থেকেই ওরা ক্রমশ দাঁত নখ বার করতে শুরু করেছে। শুরু হয়েছে সস্ত্রের ঝনঝনানি। সস্ত্র পূজা। কিন্তু একটি ঘোড়ার দকার ছিল ওদের। এযাবতকাল ওরা ব্যবহার করছিল ক্ষত্রিয় শক্তি। কিন্তু ক্ষত্রিয়রা ভূসম্পদের ৮০% দখল করে নিলে  ওরা বাণিয়া শক্তি ব্যবহার করে। তুলে আনা হয় মোহনদাস নামক এক বানিয়াকে। প্রয়োজন ফুরিয়ে গেলে মোহনদাস করমচাঁদ গান্ধীকেও তারা হত্যা করতে কুণ্ঠাবোধ করেনি। পাঞ্জাব এবং বাংলার শক্তিকে খর্ব করে তাদের খণ্ডিত করে বিপুল মানুষকে দেশহীন নাগরিকে পরিণত করতেও তারা দ্বিধা করেনি।   

    বিনাশায় চ দুষ্কৃতমঃ   
    ওদের মোক্ষ লাভের সবথেকে বড় অন্তরায় এখন ভারতীয় সংবিধান এবং তার প্রণেতা বাবাসাহেব ডঃ  বিআর আম্বেদকর। কারণ এই সংবিধান প্রণয়ন করে আম্বেদকর তাদের স্বপ্নের রাম রাজ্যকে আস্তাকুড়ে ফেলে দিয়েছেন। চতুর্বর্ণ ব্যবস্থাকে শুধু ধ্বংস নয় তাকে গর্হিত ও শাস্তি যোগ্য অপরাধ বলে প্রতিপাদিত করে দিয়েছেন। সংবিধানের মধ্যে ভাগিদারী ব্যবস্থা বলবত করে সমস্ত মানুষের সার্বিক উত্থান সম্ভব করে তুলেছেন। এই সংবিধানের কারণেই ক্রমশ রাষ্ট্র ক্ষমতায় উঠে আসছে বহুজন মানুষ। রাষ্ট্র হয়ে উঠছে for the people, by the people, of the people এর। শক্তিশালী বহুজন মানুষের শক্ত অভিঘাতেই উত্তর ভারতে দাঁত বসাতে পারছেনা ভুদেবতারা।   

    ধর্মসংস্থাপনার্থায়ঃ 
    সুতরাং পুনর্নির্মাণ চাই। সংবিধানকে ধ্বংস করে মনুর শাসন কায়েম করা চাই। জনগণকে পুনরায় বর্ণবাদ বা হিন্দুত্বের খোঁয়াড়ে পোরা চাই। বাবরি ধ্বংস চাই, গোধড়া চাই, সমঝোতা এক্সপ্রেস চাই, গুজরাট মডেল চাই, কাঁসির দখল চাই, বুদ্ধ গয়ার বিলুপ্তি চাই এবং এগুলো নির্দ্বিধায় প্রচার করার জন্য একজন নির্বোধ দাস চাই। একটা ঘোড়া চাই।   

    কল্যাণ সিংকে (দাস বংশের আর এক প্রতিনিধি) দিয়ে শুরু হয়েছিল এই রনভেরি। জাঠ রাজ সিং এ খেলার একেবারে অনুপযুক্ত। মুরলী মনোহর যোশির গায়ে এত শক্তি নেই। সুতরাং দাস চাই। ঘোড়া চাই। যে বলি প্রদত্ত হবে জেনেও রামরাজ্য বিস্তারের কাজ করতে পারে।   
    নরেন্দ্র দামোদর মোদি সেই দাস সেই অশ্বমেধের ঘোড়া যিনি অবলীলায় এগুলো প্রচার করেতে পারেন।  গুজরাট দাঙ্গায় শত শত মানুষের প্রান নিয়েও গাড়ির চাকায় কুকুর পিষে মরেছে বলে তামাশা করতে পারেন।  ১৯৪৭ সালেরপরে যাঁরা ভারতে এসেছেনতাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন১৬ মে- পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে বলতে পারেন।
     এই মোদির নেতৃত্বে দেশের সম্পদ পুঁজিপতিদের হাতে তুলে দেবার জান্য, নরহত্যার জন্য যদি টাকা লাগে দেবে কর্পোরেট গৌরী সেন। সুতরাং দেশকে মোদির যুগে ঠেলে দাও। গুজরাট মডেল সামনে লাও। সমস্ত মিডিয়াগুলিতে সারাক্ষণ প্রচারিত হোক মোদিবাবুর কীর্তন। আবাল বৃদ্ধ বনিতা নমো নমো গাইতে শুরু করুক। কেননা নমো হলেন একালের অশ্বমেধের ঘোড়া।

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    TALE OF UNHEARD VOICE An observation on MAL community in Saltora: By Saradindu Uddipan

     
     
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    TALE OF UNHEARD VOICE An observation on MAL community in Saltora: By Saradindu Uddipan

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    Saradindu Biswas

    Attachments4:59 AM (7 hours ago)


    to me, Amalendu



    I was appointed to study on the communities those are excluded from modern development and living as inferior in Bankura district, West Bengal, India during 2010. I was come to contact with some indigenous communities have been facing critical problems for survival such as Santhal, Munda, Mahali, Bagdi, Bauri and MAL. This study on "SOCIAL EXCLUSION" was patronized by UNICEF during 2010 and Udayani was the responsible organization appointed me to this challenging project. Basically the broken heart people got hart from the governing class and lost their lands, forests and water bodies. Even they have lost their human values to trust other. They kept them speechless and continued a traumatic a life. I am sharing here such an unheard voice of MAL community in a short form.  

    Location:

    Udaypur is a village with mixed communities near Biharinath hill at Saltora Block, Bankura, West Bengal, India. It is popularly known as Baddi Para though Mal is the major community living here for a long time. Others communities are Bagdi, Bauri and Bangal(Kayastha). Udaypur is a notified backward village by the West Bengal Government in Tiluri Gram Panchayat.

    Mal the most backward community among the Scheduled Caste don't have their cultivable land in this village. 42 households around 210 populations have acquired forest land and made their hamlets with mud and local materials. Most of the roofs of the huts are covered by rotten paddy straw. Some are by tarpaulin. A narrow passage is used as the outlet for both the animal and human.

    Livelihood: Mal community is basically agricultural laborers. During the monsoon they get sufficient agricultural work. But most of the months they don't have any work. It steer them towards seasonal migration to other districts. It is reported by the villagers that, they only get 10 days work in a month. Minor forest product is the other source of income for the Mal community. The broomstick, branch of neem tree, collecting of Sal leaves sometimes help the community to their existence of life.

    Mother and Child Care: Malnutrition among the children, adolescents and women is an acute hazardous in this village. No ICDS centre is running here by the Government to take care of. There is no Primary Health Center in this village. Pregnant women have no knowledge about National Maternity Benefit Scheme (NMBS) and institutional birth. The mortality rate of the new born baby is quite high.

    Child Education: Only one Primary School in the village is responsible for the education and MDM of the poor children. The rate of the dropout is high due to:

    a) Most of the boys are in social trauma.

     b) High School is 5 kilometer far from the village.

    c) Financial burden is one of the major problems.

    d) Cattle rearing and collecting of minor forest product is more important than education for them.

     

    Social Trauma: Mal community in Bankura district was untouchable. Even they were identified as criminals by the others. They are still unaccepted by the Kayastha, Baddi and Brahmans. The ignorance and isolation throw them into the social trauma.

    Exclusion of Identity and Dignity: But the history referred that, Bankura the part of ancient MALLABHUM governed by the Malla king. From ancient MAGADH to SAMATATA covering the modern states UP, Bihar, Jharkhand, Orissa and Bengal they built a huge nation. The Bagdi community also gets into their identity from Malla origin. Mhamati Gautam Buddha took his last meal in Malla kingdom and achieved MAHAPARINIBBANNA. Unfortunately the community has forgotten their identity and dignity keeping slavery into the four fold system for a long time.

     


    यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी


    स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है


    मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।


    पलाश विश्वास


    कल जो रोजनामचा लिखा,वह दरअसल अधूरा रह गया है।हमारे घर में दो छोटे बच्चे भी हैं।निन्नी और पावेल।छोटे बाई पंचानन की बेटी और बेटा।


    निन्नी चौथी में पढ़ती है और बेहद समझदार हो गयी है तो पावेल सातवीं में पढ़ते हुए भी बहुत हद तक वैसा ही है,जैसा कि मैं बचपन में हुआ करता था।


    मेरे इलाके में लोग मुझे बलदा यानी बड़े भाई और बुरबक एकसाथ एक ही शब्द में कहा करते थे।पावेल मेरी तरह ही साईकिल से अपने स्कूल छह सात किमी दूर जाता है रोज।वह सातवीं में पढ़ता है।


    वह मेरी तरह मुख्य सड़क छोड़कर खेतों की मेढ़़ों से रास्ता बनाकर स्कूल जाता है रोज।मैंने पूछा तो बताया कि मुख्य सड़क पर किसी फार्म हाउस के सात सात कुत्ते हैं,उनसे एक बार वह बच निकला है और उनसे बचने के लिए सुरक्षित खेतों के दरम्यान वह अपना रास्ता बनाता है।


    मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।

    फर्क यह हुआ कि पहले पूरी तराई एक बड़ा सा फार्म हाउस हुआ करता था और बाकी सारे गांव महनतकश बस्तियां।अब तराई और पहाड़ पूंजी का मुकम्मल सामंती उपनिवेश है।


    पिछलीबार जब घर आया था,दोनो बहुत छोटे थे और मेरे साथ चिपके रहते थे।खासतौर पर निन्नी।गांव में लोग उसे चिढ़ाते भी थे,ताउ तो चले जायेंगे,फिर क्या करोगी निन्नी।निन्नी जवाब में गुमसुम हो जाती थी।


    अबकी बार स्कूल से लौटने के बाद वे कोचिंग में चले जाते हैं।शाम को ही उनसे मुलाकात हो पाती है।पहले दिन तो उसके पिता ने हमारे आने की खुशी में उन्हें छुट्टी दे दी।अगले दिन सविता उन्हें लेकर बाजार चली गयीं।


    दोनो बच्चों ने अपनी ताई के साथ खरीददारी में अपनी पसंद के जो कपड़े खरीदे हैं,उन्हें देखकर मैं चकित रह गया।


    हमें इतनी तमीज भी नहीं थी।मुझे एक काला कोट मिला था ,उनकी उम्र में जो मेरी संपत्ति थी और मैं उसे हरवक्त चबाता रहता था।


    फिर भी पढ़ाई से जब उनकी छुट्टी होती है,उनसे रोज ढेरों बातें होती हैं और रह रहकर अपने बचपन में लौटना होता है।


    निन्नी ने वायदा किया है कि खूब पढेगी।


    मैंने उससे कहा कि अब इस घर में न कोई बेटी और न कोई बहू रसोई में कैद होगी फिर कभी।निन्नी से मैंने इस सिलसिले में जो भी कहा,बड़ो के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से उसने सुना और अपने सकारात्मक जवाब से मुझे हैरान करती रहीं।


    बहुत समझदार हो गयी है निन्नी।

    बहुत समझदार हो गयी है हमारी बेटिया।

    बिटिया जिंदाबाद।

    बसंतीपुर गांव से मेरी मां कभी अपने मायके ओड़ीशा वापस नहीं गयीं।न वह बाहर जाना पसंद करती थीं और इसी गांव की माटी में मिल गयीं।


    मेरी मां,मेरी ताई,मेरी चाची,मेरी बुआ,मेरी नानी और मेरी दादी के साथ साथ बसंतीपुर की सारी स्त्रियों को उनके कठिन संघर्ष के दिनों में बचपन से मैंने देखा है।


    रसोई में सिमटी उनकी रोजमर्रे की जिंदगी और उनके बेइंतहा प्यार के मुकाबले हम उन्हें वापस कुछ भी दे नहीं पाये।


    मेरी पत्नी सविता तो मेरी महात्वाकांक्षाओं की बलि हो गयीं।हम कोलकाता नहीं जाते तो उसे अपनी पक्की नौकरी छोड़कर हाउसवाइप भनकर जिंदगी न बितानी होती।हम कोलकाता में उसकी कोई मदद नहीं कर सकें।


    खुशी यह है कि निन्नी की मां नौकरी कर रही हैं।


    दरअसल मुद्दा यही है कि स्त्री के सशक्तीकरण के बिना न लोकतंत्र बच सकता है और न इस स्वतंत्रता का कोई मतलब है जबकि अपने अपने घरों में हम अपनी बेटियों बहुओं के लिए मुकम्मल कैदगाह रचते रहेंगे।


    हमारे घर में और गांव में खेतों,खलिहानों से लेकर घर की व्यवस्था में स्त्रियों की प्रबंधकीय दक्षता का मैं कायल रहा हूं।इस मामले में अधपढ़ हमारी ताई बाकायदा मिसाल है।फिर प्रोफेशनल लाइफ में कामकाजी महिलाओं को मैं दसों हाथों से घर बाहर संभालते हुए रोज जब देखता हूं।


    मुझे पक्का यकीन है कि समाज और देश के कायाकल्प के लिए स्त्री भूमिका ही निर्णायक होनी चाहिए।मैं चाहता हूं कि हमारी बहू बेटियां इस चुनौती को मंजूर करें और हम सारे पुरुष इसमें उनका सहयोग करें।


    मेरी दूसरी भतीजी,तहेरे भाई की बेटी कृष्णा नई दिल्ली में बीए फाइनल की छात्रा है।इंटर करने के बाद समुद्र विज्ञान की पढ़ाई के लिए वह कोलकाता गय़ी थी और उसके बाद उससे मुलाकात नहीं हुई है।लेकिन तभी मैंने उससे वायदा किया हुआ है कि वह कुछ बनकर दिखायें और जिंदगी में जो भी कुछ करना चाहती है,करें,पूरा परिवार उसके साथ होगा।


    हमने तभी साफ कर दिया कि हम उसके विवाह के लिए कोई जल्दबाजी नहीं करेंगे।जब वह पढ़ लिखकर काबिल हो जायेगी,तब जब चाहे तब, जिसे पसंद करेगी,उसके साथ विवाह करने के लिए स्वतंत्र होगी।जाति भाषा धर्म का कोई बंधन आड़े नहीं आयेगा।


    जाहिर है कि चौथी में पढ़ने वाली निन्नी से ये बातें मैं कर नहीं सकता।


    मुझे खुशी है कि बसंतीपुर की बेटियां ही नहीं,बहुएं भी पढ़ लिख रही हैं और नौकरी भी कर रही हैं और उनके जीवन में वे बाधाएं नहीं हैं,जो बसंतीपुर में मेरे बचपन के दौरान तमाम स्त्रियां पार नहीं कर सकीं।


    फिर भी जाति गोत्र का बंधन वैसा ही अटूट है।इसपर भी हमने अपने गांव वालों को साफ साफ बता दिया है कि हमारे परिवार के बच्चों को अपने अपने जीवन साथी चुनने का हम पूरा हक देंगे और इस सिलसिले में बच्चों की मर्जी ही फाइनल है।गांव में हमारे प्राण है और हम हर मामले में गांव के साथ हैं तो गांववालों को भी इस मामले में हमारा साथ देना चाहिए।


    मुझे खुशी है कि जाति उन्मूलन के जिस जाति अंबेडकरी एजंडा के तहत मेरे पिता तराई में सामाजिक एकीकरण की बात करते थे,नई पीढ़ी के बच्चे उसी के मुताबिक चल रहे हैं और उनके लिए जाति उतनी बड़ी बाधा नहीं रही,जिसकी वजह से हम अपनी संवेदनाओं को लगाम देने को मजबूर थे।


    ताराशंकर बंदोपाध्याय के महाकाव्यीयआख्यानों के मुकाबले उनका छोटा उपन्यास कवि मुझे बेहद प्रिय रहा है।एक डोम के कवित्व के चरमोत्कर्ष की वह संघर्ष गाथा है बंगाल के लोक में सराबोर।


    उसमें झुमुर गानेवाली बसंती की मौत निश्चित जानकर कविगानेर आसर पर जो गीत रचा उस डोम कवि ने ,उसका तात्पर्य अब समझ में आ रहा हैःजीवनडा एतो छोटो कैने।


    जिंदगी वाकई बेहद छोटी है।डिडिटल देश में डिजिटल सेना बनाने की बात हो रही है।बुलेट ट्रेन बस अब चलने वाली है।


    दिनेशपुर में भी पीटरइंग्लैंड,रिबोक,ली ब्रांडों खी धूम है।


    अत्याधुनिक जीवन और प्लास्टिक मनी की बहार के साथ साथ हम अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विकास के साथ सुपरसोनिक हैं बतौर उपभोक्ता।


    उपभोग और भोग के लिए हम अमेरिकियों से कम नहीं हैं।लेकिन अपनी ही बहू बेटियों के मामले में हम बर्बर आदिम पुरुषों से कम हैवान नहीं हैं।


    इस विरोधाभास के खिलाफ लड़ने खातिर अब हमारे पास कोई राममोहन राय,ईश्वरचंद्र विद्यासागर,ज्योतिबा फूले या हरिचांद गुरुचांद ठाकुर भी नहीं हैं।


    हम जितने आधुनिक होते जा रहे हैं,जितने ब्रांडेड होते जा रहे हैं,जितने पढ़ लिख रहे हैं,दहेज की मांग उतनी अश्लील वीभत्स होती जा रही है।


    दहेज खत्म कर दो तो बुनियादी जरुरतों के लिए इतने ज्यादा दुश्कर्म और इतने गहरे पैठे भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो और न कहीं भ्रूण हत्या की नौबत आयें।


    स्त्री की योग्यता और उसकी दक्षता का सही इस्तेमाल हो और पुरुष आधिपात्य से बाज आये समाज तो देश को अमेरिका बनाने की नौबत ही न आये और तब अमेरिका को भारत बनने की जरुरत आन पड़ेगी।


    विकास जितना तेज हो रहा है,मुक्त बाजार जैसे शिकंजे में ले रहा है कृषि, कारोबार, उत्पादन प्रणाली, आजीविका,प्राकृतिक मानव संसाधन,उतना ही बर्बर और आक्रामक हो रहा है सैन्य राष्ट्र अपनी ही जनता के विरुद्ध।


    सैन्य राष्ट्र के मुक्त बाजार में स्त्री उत्पीड़न की सांढ़ संस्कृति के तहत रोजाना बलात्कार, रोजाना उत्पीड़न,रोाजाना अत्याचार,रोजाना हत्या और रोजाना आत्महत्या स्त्री जीवन की कथा व्यथा है।


    पुरुषतंत्रक को उनसे तो चौबीस कैरेट की निष्ठा चाहिए लेकिनअपने लिए रासलीला का पूरा बंदोबस्त चहिए।


    उनके क्षणभंगुर सतीत्व के दो इंच पर ही टिकी है पृथ्वी बाकी सारे शिवलिंग हैं जिसका हर तरीके से अभिषेक होने ही चाहिए।


    इस ग्लोबीकरण से तो बेहतर है दो सौ साल पहले का नवजागरण,जब भारत में पहली बार स्त्रियों को आजाद करने का आंदोलन शुरु हुआ।


    स्वतंत्रता संग्राम शुरु हुआ तो स्त्री मु्क्ति आंदोलन ईश्वर चंद्र विद्यासागर राममोहन राय ज्योतिबा फूल और हिचांद गुरुचांद के तिरोधान की तरह खत्म हो गया।


    हमने आजादी हासिल कर ली है लेकिन हमारी स्त्रिया अभी घर बाहर गूुलाम है और हम उनकी देह को तो अपने भोग के लिए मुक्त करना चाहते हैं लेकिन उनकी अंतरात्मा की मुक्ति के हम विरुद्ध हैं।


    उनके सशक्तीकरण के हम विरुद्ध है।हम किस आजाद लोकतांत्रकिक देश में रह रहे हैं,यह सवाल हमें हर्गिज परेशान नहीं करता।


    नये सिरे से नवजागरण के लिए जिंदगी बहुत छोटी पड़ गयी है।शरतचंद्र ने स्त्री मन का जो पाठ दिया,हमने अपने साहित्य और संस्कृति में उसे मुकम्मल देहगाथा में तब्दील कर दिया है जो औपनिवेशिक हीनताबोध के मुताबिक है।


    चूंकि हम खुद गुलाम हैं तो हम यौनदासी के अलावा स्त्री का आजाद वजूद के बारे में सोच ही नहीं सकते।


    हम उन मित्रों को बेहद करीब से जानते हैं जो जाति गोत्र तंत्र में इतने फंसे हैं,कंडली ज्योतिष के अक्टोपस के शिकंजे में ऐसे हैं,कि जातगोत्र समीकरण से बाहर निकलने की इजाजत अपनी बेटियों को न देकर उनकी जिंदगी नर्क बना रहे हैं दरअसल और हमारी मजबूरी है कि हम उनकी कोई मदद  भी नहीं कर सकते।


    स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है।


    यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम अब तकनीकी तौर पर हर भाषा में लिखने को समर्थ हैं लेकिन भाषा से भाषांतर हो जाने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।


    यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम ग्लोबीकरण को अपना रहे हैं लेकिन देश से देशांतर तक हमारी दृष्टि कहीं पहुंचती है नहीं और अपने अपने घर के भीतर कैद हम अंध हैं,दृष्टि अंध।


    यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम चांद मंगल तक उपनिवेश गढ़ने को तत्पर हैं और हमारी दसों उंगलियों में ग्रहशाति के यंत्ररत्न हैं,ताबिज है,मंत्र तंत्र हैं।


    यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम बात तो करेंगे ज्ञान विज्ञान की लेकिन धर्मग्रंथों के पाठ के संस्कार,मिथकों के तमत्कार और टोटेम के अंधविश्वास को हरगिज हरगिज नही त्याजेंगे।


    यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र का।


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    बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।

    गिर्दा की पत्नी हीराभाभी के आंसुओं को लेकिन हम थाम नहीं सकते।

    पलाश विश्वास


    कई दिनों बाद आज फिर भाई देवप्रकाश और उनके भांजे पिंटू के सौजन्य से आमलाइन हूं।उधमसिंहनगर जिले के जिला मुख्यालय रुद्रपुर शहर के बगल में पूर्वी बंगाल से आये शरणार्थियों के लिए बसाये गये ट्रांजिड कैंप में बैठा हूं।जो अब सिडकुल के शिकंजे में हैं और यहां का हर शख्स अपनी जमीन खोकर करोड़पति है और शरणार्थी कालोनियां बेशकीमती उपभोक्ता बाजार में तब्दील है।


    घर बसंतीपुर से कैंप के बीच हिंदूजा का सबसे बड़ा कारखाना अशोक लेलैंड और सिंगुर प्रकरण के बाद पंतनगर स्थानांतरित टाटा मोटर्स का प्लांट यहां हैं।जहां नैनो लेकिन बनती नहीं है,नैनो मोदी के सानंद से बनती है लेकिन यहं छोटा हाथी निकलता है कारखाने से।


    सारी तराई शहरीकरण और औद्योगीकरण की सुनामी में है और जंगल तो खत्म हो ही गया हैं,गन्ने के खेत रास्ते में कहीं मिल नहीं रहे हैं।


    एक के बाद एक गांव के लोग लाखों करोड़ों में जमीन बेचकर रईस बनने के चक्कर में भिखारी बनते जा रहे हैं और संस्कृति पूरी तरह हिंग्लिश रैव पार्टी है।


    इसके बावजूद बिजली अब नियमित लोड शेडिंग हैं और उत्तराखंड में अविरत बिजली किंवदंती ध्वस्त है तो गांव गांव तक पहुंचने वाली सड़कें खंडहर हैं।


    बची खुची खेती में मिट्टी बालू की खदानें हैं।


    यही मेरा डिजिटल देश महान है।


    यह परिदृश्य तराई में सीमाबद्ध है.ऐसा भी नहीं है।


    कल ही नैनीताल होकर आया हूं।


    पहाड़ के चप्पे चप्पे में विकाससूत्र की धूम है।अब तो पेड़ों के टूंठ भी कहीं नजर नहीं आते। तराई से लेकर पहड़ा तक नालेज इकोनामी के तहत गांव गांव में कालेज,मेडिकल कालेज,बीएच कालेज,इंजीनियरिंग कालेज,ला कालेज खुल गये हैं।


    इंग्लिश कुलीन स्कूल कालेज तो मशरूम है।


    कोई नियंत्रण नहीं है।कोई नियमन नही है।

    बेलगाम पूंजी,मुनाफाखोरी और कमीशनखोरी का खुल्ला बाजार है।


    जो बच्चों का हुजूम बड़ी उम्मीदों के साथ इस शिक्षण संस्थानों से निकल रहा है,उनका आखिरकार होगा क्या,जो किसान बेदखल हो रहे हैं,उनका आखिर होगा क्या,इसका जवाब किसी के पास नहीं है।


    दिनेशपुर.ट्रांजिट कैंप से लेकर नैनीताल तक बाजारों में सारे के सारे चेहरे अजनबी हैं।जहां तहां शापिंग माल है।


    स्थानीय लोग पक्के मेहनतकश हो गये हैं और व्यापारियों के एक खास तबके को अपना सबकुछ हस्तांतरित करके ऐश कर रहे हैं मौत के इंतजार में।


    नैनीताल के लिए काठगोदाम से पहाड़ चढ़ते हुए पहाड़ के रिसते जख्मों से जो खून की धार निकलती रही,उसे अभी दिलोदिमाग से साफ नहीं कर पाया हूं।


    अपना नैनीताल भी तेजी से गांतोक नजर आने लगा है।


    तल्ली डाट सुनसान है तो कैंट बाजार का कायाकल्प हो गया है।मल्लीबाजार की दुकानें अजनबी हैं तो फ्लैट्स की घेराबंदी है।


    तल्ला डांडा और अय़ांर पाटा अब आलीशान हैं और सूखाताल,भीमताल,खुरपाताल तक विकास का कदमताल है और बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।


    कल सुबह गिरदा की पत्नी हीराभाभी से तल्ली डाट के बगल में हल्द्वानी रोड पर उनके नये कमरे में सविता और मेरी लंबी बातें होती रहीं।


    हीरा भाभी, बोली कम रोयी ज्यादा।उन आंसू की हिस्सेदारी लेकिन हमारी हैं नहीं।


    बटरोही से माउंट रोज में उनके घर जाकर हमने पूछा कि गिरदा की कितनी किताबें कोर्स में लगी हैं।बोले ,एक भी नहीं है।लगायेगा कौन,उन्होंने पूछा।


    हीराभाभी चाहती हैं कि गिरदा की स्मृति में कोई संग्रहालय बने।


    उत्तराखंड सरकार या कुमांयू विश्वविद्यालय चाहे तो यह संभव है।


    हीरा भाभी बोलीं कि गिरदा की किताबें और उनका सारा सामान अल्मोड़ें में उनके पुश्तैनी घर में बाथरूम के सामने गली में बक्से में बंद छोड़ आयी हैं क्योंकि केलाखान के पास गिरदा का घर उन्हें छोड़ना पड़ा।


    साढ़े बारह सौ का घर छोड़कर अशोक होटल के ठीक सामने जो साढ़े पांच हजार रुपये के किरोये पर उनका एक कमरे का घर है,जहां वे निपट अकेली हैं,उसमें कोई रसोई भी नहीं है तो किताबें वे कहां रखतीं।


    मेरे पिता पुलिन बाबू डायरियां लिखा करते थे रोजय़हर छोटी बड़ी जरुरी गैर जरुरी चीजों को लिखा करते थे।हमारा घर झोपड़ियों का झुरमुट था। कोई खाट तक नहीं थी हमारी और हम फर्श पर सोते थे।एक बड़े से लकड़ी के बक्से में सारे जरुरी कागजात ,जमीन का खसरा खतियान से लेकर ढिमरी ब्लाक आंदोलन के पोस्टर,पर्चे और उनकी डायरियां रखी हुई थीं।बाकी पूरे घर में अनाज और पत्र पत्रिकाओं का डेरा और बाकी सांपों का बसेरा था।छप्पर चूंती रहती थीं।


    पिताजी की मौत के बाद स्थिर हुआ तो हमें उस काठ के बक्से की सुधि आयी।पता चला कि पद्दो घर से बाहर था और तब दस बारह साल के भतीजे टुटुल ने बाक्स खोलकर दीमक लगे कागजात डायरियों और उसके भीतर की सड़न से घर को बचाने के लिए उस काठ के बक्से को ही फूंक दिया।


    पिताजी की इस तरह दो दो बार अंत्येष्टि हो गयी।


    हमारी औकात पिताजी के लिए संग्राहालय बनाने की थी नहीं।


    दिनेशपर कालेज के सामने जो मूर्ति बनी है,उसे हर साल नये सिरे से सहेजना पड़ता है क्योंकि रात के अंधेरे में हर साल उस मूर्ति को अनजान लोग तोड़ देते हैं।


    इस बार भतीजी निन्नी ने छूटते ही कहा कि दादाजी के हाथ में फ्रैक्चर है।


    सविता बोली उनकी पूरी देह ही फ्रैक्चर है।


    सविता ने फिर जिम्मेदार लोगों से निवेदन भी किया कि कैश कराने के लिए इस मूर्ति पूजा की जरुरत ही क्या है।


    सविता ने कहा कि हर मूर्ति गढ़ी जाती ही है विसर्जित होने के लिए।


    मुक्तबाजार हुई जा रही तराई में पुलिनबाबू की स्मृति का क्या मोल।


    बेहतर हो कि पुलिनबाबू को विसर्जित कर दिया जाये।

    उनको इस यातनागृह से मुक्त कर दिया जाये।


    हम जो गिरदा की मूरत गढ़ रहे हैं,बेदखल पहाड़ और बेदखल तराई की भावभूमि में उसकी कितनी प्रासंगिकता है,यह बात मेरी समझ में नहीं आती।


    राजीव लोचन साह ने कहा भी कि गिरदा ने जनता से लिया और जनता को लौटा दिया।पोथी रचने की उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी।


    वे बोले कि गिरदा तो चिरकुट पर लिखने वाला ठैरा।


    तो इस हुड़किया लोककवि की ब्रांडिंग करके किसे क्या फायदा होने वाला ठैरा।मुझे आशंका है कि जैसे हम अपने पिता की कोई स्मृति और उनके हिस्से का इतिहास बचा नहीं सकें,उसीतरह हमारे गिरदा को भी घुन और दीमक चाट जाने वाले होंगे।


    तुहीन और पिरिम अब दिल्ली में हैं और अनिमित नैकरियों में हैं और भाभी को कुल साढ़े सात हजार रुपये की पेंशन मिलती है।


    राजीव,दीपा कांडपाल,शेखर,उमा भाभी निजी तौर पर जितना कुछ कर सकते हैं,कर रहे हैं जो शायद काफी नहीं है।


    पवन राकेश का कहना है कि भाभी की आंखों से बहते आंसुओं को हम थाम ही नहीं सकते।


    कल दो बजे तक तुहीन को नैनीताल होना था।मुझे घर से पद्दो का जरुरी फोन मिलने की वजह से तुरत फुरत पहाड़ छोड़ आना पड़ा शेखर दा और उमा भाभी से मिले बिना ही।


    डीके ,विश्वास,कैप्टेन एल एम साह जैसे अनेक लोगों से बिना मिले।


    मैंने हीरा भाभी से कहा कि तुहीन लौटते ही फोन करें और तब हम पता लगायेंगे कि क्या वह किसी अखबार में काम करने को इच्छुक है।होगा तो हम लोग किसी संपादक मालिक मित्र से निवेदन करेंगे कि उसे अखबार का कामकाज सीखा दें।


    अभी तक तुहीन का फोन नहीं आया और मैं इंतजार में हूं।


    बटरोही और राजीवदाज्यू से संग्रहालय की बात हमने चलायी भी।राजीवदाज्यू ने कहा कि सरकारी नियंत्रण में संग्रहालय का हाल तो महादेवी वर्मा पीठ से मालूम पड़ गया ठैरा,जहां उसे रचने वाले बटरोही को ही खदेड़ दिया गया।


    उस दूध के जले बटरोही से भी हमारी माउंट रोज पर उनके मकान में लंबी बातें हुईं और उनसे भी कहा कि संग्रहालय बनाने की पहल आप ही कर सकते हैं।


    बटरोही जी कोई जवाब देने की हालत में नहीं थे।


    अबकी बार मल्लीताल के सबकुछ बदले माहौल में,इसे यूं समझें की नैनीताल के तीनों सिनेमाहाल विशाल,कैपिटल और अशोक बंद पड़े हैं और नैनीताल में कोई सिनेमाहाल इस वक्त है नहीं।


    तो मल्ली बाजार में अपने पुराने शर्मा वैष्णव भोजनालय में करगेती और सुदर्शन लाल शाह सत्तर के दशक के कुछ डीएसबी सूरमाओं से मुलाकात हो गयी और एक दम सत्तर के दशक में लौट गये।


    इससे पहले इदरीश मलिक की पत्नी कंवल सेमुलाकात हो गयी जो तराई के ही काशीपुर से हैं तो कोलकाता के भवानीपुर में भी उनकी जड़ें हैं।


    इदरीश की गैरहाजिरी में उनसे हुई मुलाकात में वे इतनी अंतरंग हुई कि लगी करने शिकायत कि हम उसके घर क्यों नहीं ठहरे।फिर नैनीताल में हर साल दिखायी जानेवाली राजीव कुमार की फिल्म वसीयत की चर्चा भी हुई जिसमें सारे के सारे नैनीतालवाल देशभर से इकट्ठे हुए थे और संजोग से उस फिल्म की पटकथा,संवाद,इत्यादि मैंने लिखी थी और दो चार शाट मुझपर भी फिल्माये गये थे।


    इदरीश अभी फिर मुंबई में है और उसकी दो फिल्में रिलीज होने को हैं,खुशी इस बात की है।


    नैनीताल इतना बदल गया है कि फिल्मोत्सव के लिए जगह नहीं मिल पा रही है तो युगमंच के रिहर्सल के लिए भी जगह नहीं है।


    फिर भी जहूर आलम की अगुवाई में सत्तर दशक की धारावाहिकता में युगमंच के नये पुराने रंगकर्मी हरिशंकर परसाई के मातादीन को मंच पर उतारने की जुगत में है।


    वे रिहर्सल की तैयारी में थे तो उनसे ज्यादा बात नहीं हो पायी।


    करीब रात के साढ़े बारह बजे हम मालरोड पर बंगाल होटल पहुंचे जहां मैं करीब पांच साल रुककर पढ़ता था डीएसबी में।एक सा गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी के घर में था।


    धड़कते हुए दिल के साथ गया कि पता नहीं कि किससे मुलाकात होगी और किससे नहीं।

    बंगाल होटल का कायाकल्प हो गया है।जिस कमरे में मैं रहता था,वह अब मौचाक रेस्तरां है।वहीं हम पूछताछ कर रहे थे तो सीढ़ियों पर दादा सदानंद गुहा मजुमदार आ खड़े हो गये।


    पहले उन्होंने ही हमें कस्टमर समझ लिया पर जब सविता ने कहा पलाश तो फौरन डांटते हुए बोले ,एखाने की कोरछिस ऊपरे जा।


    ऊपर जाते ही उनकी बेटी सुमा जो 1973 में साल भर की थी .हमें देखते ही चीख पड़ी,मां देखो के एसेछे,पलाश अंकल और फिर भाई को आवाज लगाने लगी -- ओ सभ्यो ओ सभ्यो


    दीदी अपने उसी कमरे में थीं।बड़ी बहू कोलकाता के बेलेघाटा से है।उसकी सास ने कहा कुछ नहीं, वह तुरंत किचन में घुस गयी।फिर दोनों के लिए माछ भात लेकर लौटीं।


    सविता बोली,इनसुलिन तो अशोक में छोड़ आयी लेकिन तुम्हारे हाथ का जरुर खाउंगी।


    छोटी बहू कुंमाय़ुनी और नैनीताल की है।पूछा तो बोली कि आस सेंट्स में टीचर है जैसे सुमा बिड़ला कालेज में है।


    मैंने कहा कि हमारी मैडम मिसेज अनिल बिष्ट भी कभी आल सेंट्स में पढ़ाती थी।



    इसपर उसके पति गुड्डु सुखमय ने कहा कि वह तो मैडम के साथ काम करता है।


    दस बजे गये ते ।फिर भी मैडम को एसएमएस करके उसने हमारे वहा होने की जानकारी दी।दो मिनट के भीतर मैडम फोन पर थीं और हम घंटा भर बातें करते रहे।


    करीब रात के साढ़े ग्यारह बजे अशोक में लौटे।सभ्यो गाड़ी से पहुंचा गया।


    हल्द्वानी में हरुआ दाढ़ी है तो आज सुबह अमर उजाला देखा तो हल्द्वानी में संपादक हमारे पुराने बरेली के सहकर्मी सुनील साह हैं।


    करगेती,भास्कर,कमलापंत और लोग हैं।लेकिन हल्द्वानी मैं रुक नहीं सका।

    भास्कर उप्रेती से नैनीताल पहुंचते ही मुलाकात हो गयी,गनीमत है।


    गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी इस वक्त मुरादाबाद में हैं।उन्हें प्रमाम करने की बड़ी इच्छा थी।


    राजीव लोजन साह ने गुरुजी से फोन पर मिलाया और फोन पर ही सविता और मैंने उन्हें प्रणाम कहकर नैनीताल से विदा ली।



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    দায়মুক্তি পাচ্ছেন ক্ষমতাসীনেরা :ছাড় পাচ্ছেন না বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা


    http://epaper.prothom-alo.com/contents/2014/2014_10_23/content_zoom/x2014_10_23_1_3_b.jpg.pagespeed.ic.cFUwW0qPsH.jpg

    দুর্নীতি দমন কমিশন (দুদক) যেন অনেকের জন্য দুর্নীতি থেকে দায়মুক্তির কমিশনে পরিণত হয়েছে। 'অভিযোগের আমলযোগ্য তথ্য-প্রমাণ না পাওয়ার কারণে'দুর্নীতির অভিযোগ থেকে একের পর এক দায়মুক্তি পাচ্ছেন সরকার-সমর্থিত রাজনীতিবিদ, প্রভাবশালী আমলা ও বিত্তশালী ব্যক্তিরা। দায়মুক্তির ঘটনাগুলো বিশ্লেষণ করলে দেখা যায়, অনেক ক্ষেত্রে দৃশ্যমান প্রমাণ থাকলেও দুদকের কর্মকর্তারা কোনো প্রমাণ পাননি। নির্বাচন কমিশনে নিজেদের দেওয়া হলফনামায় আর্থিক অনিয়মের প্রমাণ থাকলেও 'ভুল হয়েছে'অজুহাত গ্রহণ করে দেওয়া হয়েছে দায়মুক্তি। অবশ্য বিরোধী দলের রাজনীতিবিদেরা দায়মুক্তির কোনো সুযোগ পাননি।

    চলতি বছরের জানুয়ারি থেকে আগস্ট পর্যন্ত আট মাসে এক হাজার ৫৯৮ জনকে দুর্নীতির অভিযোগ থেকে দায়মুক্তি দিয়েছে দুদক। এ সময়ে ৯০৪টি দুর্নীতির অভিযোগের মধ্যে ৮৭০টিতে কোনো মামলাই হয়নি।

    http://www.prothom-alo.com/bangladesh/article/351838/%E0%A6%A6%E0%A6%BE%E0%A6%AF%E0%A6%BC%E0%A6%AE%E0%A7%81%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%A4%E0%A6%BF-%E0%A6%AA%E0%A6%BE%E0%A6%9A%E0%A7%8D%E0%A6%9B%E0%A7%87%E0%A6%A8-%E0%A6%95%E0%A7%8D%E0%A6%B7%E0%A6%AE%E0%A6%A4%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A7%80%E0%A6%A8%E0%A7%87%E0%A6%B0%E0%A6%BE

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    বিষয়ঃ সংবিধান দিবস সমারোহ

    প্রিয় সাথী,

    মানুষের জন্য, মানুষের দ্বারা মানুষের কল্যাণ সাধন করাই গণতন্ত্রের মূল বাণী। ভারতের সংবিধানের প্রস্তাবনায় এই মহান সংকল্প গ্রহণ করে সংবিধান প্রনেতাগণ ভারতের জনগণকেই গণতন্ত্রের মূলাধার এবং ভারত রাষ্ট্রের সার্বিক উন্নয়নের ভাগীদার হিসেবে মর্যাদা দিয়েছেন এবং দেশ রক্ষার সুমহান দায়িত্ব অর্পণ করেছেন।

     

    কিন্তু অত্যন্ত দুঃখের সাথে জানাচ্ছি যে বিগত ৬৫ বছর ধরে দেশে যেসব সরকার প্রতিষ্ঠিত হয়েছে তারা এই দায়িত্ব পালন করতে ব্যর্থ হয়েছে। উপরন্তু তারা অসদুপায়ে  জনাধারকে প্রভাবিত করে রাষ্ট্র ক্ষমতায় আসীন হওয়ার পর জনগণের উপরই খড়গহস্ত হয়ে উঠেছে বারবার। জনগণের পরিবর্তে পুঁজিপতিদের স্বার্থ রক্ষার  কাজেই তারা বেশী মনযোগী হয়ে উঠেছে। ভারতের সংবিধান  রাষ্ট্রের সম্পদগুলির উপর জনগণের যে ভাগীদারী সুনিশ্চিত করেছিল তা খর্ব করে দেশী বা বিদেশী পুঁজিপতিদের হাতে রাষ্ট্রকেই গচ্ছিত করে দিয়েছে এই সরকারগুলি। ফলে ক্ষুধা, দারিদ্রতা,  অনাহারে মৃত্যু, বেকারত্ব, বঞ্চনা প্রভৃতি অমানবিক অসুখগুলি রাষ্ট্রকে জর্জরিত করে তুলেছে। বেড়েছে অসন্তোষ, বিশৃঙ্খলতা, সাম্প্রদায়িক হানাহানি। দুর্বল করে তুলেছে সংবিধানের ভীত। বিপন্ন হয়ে পড়েছে গণতন্ত্র। রাষ্ট্র স্বৈরাচার,  নৈরাজ্যবাদ, ফ্যাসিবাদ ও সন্ত্রাসবাদের দিকে ক্রমান্বয়ে এগিয়ে চলেছে। যা মহান ভারতরাষ্ট্রের সামাজিক, সাংস্কৃতিক ও বৌদ্ধিক পরম্পরার সাথে এক গভীরতর ষড়যন্ত্র।

     

    আমাদের সংহতি ও সচেতন প্রয়াসই এই ষড়যন্ত্রের থেকে রাষ্ট্রকে মুক্ত করতে পারে। আসুন আগামী ২৬শে নভেম্বর ২০১৪, ভারতীয় সংবিধানের ৬৫ বছর পূর্তি উপলক্ষ্যে "সংবিধান দিবস সমারোহ"পালন করে আমরা ভারতরাষ্ট্রের সার্বভৌমত্ব ও গণতন্ত্র রক্ষার জন্য লাগাতার সংগ্রামের জন্য শপথ গ্রহণ করি।

    এই "সংবিধান দিবস সমারোহ"কে সার্বিক ভাবে সফল করে তোলার জন্য আগামী ৯ই নভেম্বর ২০১৪, সকাল ১০টা থেকে Buddha Dharmankur Sabaha(Bengal Buddhist Association), 1 Buddhist Temple Street. Kolkata- 700 o12  এর সভাকক্ষে একটি প্রস্তুতি সভার আয়োজন করা হয়েছে। একজন সচেতন দেশপ্রেমিক নাগরিক হিসেবে সবান্ধবে এই সভায় উপস্থিত থাকার জন্য আপনাকে সাদর আমন্ত্রণ জানাচ্ছি।

    সংগ্রামী অভিনন্দন সহ

    তপন মণ্ডল           ঃ ৯৪৩৪০৪০৭২৮

    অস্তিসু রূপোয়া ও     ঃ ৮৪২০৮৪৯৫৪২            

    শরদিন্দু উদ্দীপন      ঃ ৯৪৩৩৩৪২৪৮৮      


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    বাংলায় পুরুত প্রভুরা কি বেশি রকমের বাঙালি(অসুর) বিদ্বেষী? তারা কি অন্যান্য প্রদেশের ভূদবতাদের থেকে বেশী রক্ত পিপাসু? তা না হলে ধর্মের নামে বাঙালি নিধনের এমন ঢালাও পরিকল্পনা করলেন  কেন?  কেনইবা হিংসাবিদ্বেষসন্ত্রাস ও নরহত্যার এমন ঢালাও প্রদর্শন টিকিয়ে রাখার জন্য সর্বশক্তি প্রয়োগ করছেন পুরুত প্রভুরা! দুর্গা-কালি পূজার নামে ঢালাও মদের যোগান দেওয়ার ঘোষণা এবং সরকারের প্রধানদের  একে উৎসাহিত করার এমন উন্মত্ততা  কিসের ইঙ্গিত বহন করে ! একি কোন বিকারগ্রস্থতা না ব্যবসায়ী ফন্দি! না আসু কোন প্রলয়ের জন্য বলির পাঁঠার মতো অসুর বাঙালীকে প্রস্তুত রাখা!  যাতে সঠিক সময়ে অসুর বাঙালীর মুণ্ডু দিয়ে আবার ব্রাহ্মন্যবাদী কালীর অভিষেক হতে পারে ! এমন জিঘাংসা,  এমন উন্মত্তা ও ভেদ নীতির সগর্ব আয়োজন পৃথিবীর সভ্য দেশগুলিতে খুঁজে পাওয়া দুরূহ। ঘটনা হলবাংলায় এসব বহাল তবিয়তে চলছেএবং একে মহিমান্বিত করার জন্য সরকারের প্রধানরা পর্যন্ত প্যান্ডেলে  প্যান্ডেলে গিয়ে অসুর বাঙালী নিধনের জন্য শিরা ফুলিয়ে মন্ত্র উচ্চারণ করছেন! শপথ গ্রহণ করছেন, "আসছে বছর আবার হবে" 

    বাংলা এখন বর্বরতার আঁতুড়ঘর

    আদিম হিংস্রতাবর্বরতা ও পৈশাচিক প্রবৃত্তি নরতত্ব,সমাজতত্ব ও মনোবিজ্ঞানের একটি  বিরলতম অধ্যায়। মানুষের জিনোটাইপ ও ফিনোটাইপের আড়ালে এগুলি কি ভাবে প্রচ্ছন্ন হয়ে আছে তাও গবেষণাগারের সিরিয়াস পরীক্ষা নিরীক্ষার চ্যাপ্টার। পৃথিবীর বিবর্তনের কারণেই হোক বা গতিজাড্যের কারণেই হোক হোমোইরেক্টাস যুগের আদিম বর্বর মানব প্রজাতি বাংলায় কিন্তু কেন্দ্রীভূত হয়েছে এবং যোগ্যতম  প্রজাতি হিসেবে এই বিশেষ শ্রেণির মানুষেরা তাদের বিরলতম প্রতিভা এবং স্বভাবটি ধরে রেখেছে তাদের আচারবিচার ও ধর্মীয় আচরণের মাধ্যমে। নিঃসন্দেহে একটি প্রজাতির ক্ষেত্রে এটি একটি প্রবল গুন। লক্ষণীয় বিষয় এই যেহিংস্রতার এই প্রবল গুনটি তারা অন্য প্রজাতির মধ্যেও সঞ্চারিত করতে সক্ষম হয়েছে। ফলে প্রবৃত্তিটি মানব মজ্জায় ঢুকে গিয়ে একটি স্থায়ী স্বভাবে রূপান্তরিত হয়ে পড়েছে। বিস্তার লাভ করেছে এবং মূলাধারটি জৈব বৈচিত্রের (জাত ব্যবস্থা) আড়ালে সুরক্ষিত হয়ে আছে। এহেন দুর্লভবিরল ও আদিম হিংস্র বিষয়টির জন্যই সম্ভবত বাংলা একসময় গোটা পৃথিবীর গবেষণার কেন্দ্রবিন্দু হয়ে উঠতে চলেছে।     

    কালীপূজা এক বীভৎসতার প্রজেকশন 

    হাতে ঝুলছে কাঁটা নরমুণ্ড । খড়্গ থেকে ঝরে পড়ছে টাটকা রক্ত । নরমুণ্ডুগুলি থেকে ঝরে পড়া রক্ত পান করছে পিশাচ ও শৃগাল। ইতিউতি পড়ে আছে পুরুষের মুণ্ডহীন ধড়। তিনি "কালী করাল বদনীঅসি,পাশধারিণীবিচিত্র খট্বাঙ্গধারিণীনরমুণ্ড ভূষিতা। তিনি ব্যাঘ্র চর্ম পরিহিতাশুষ্ক মাংস ভৈরবীরূপিণী বিস্তৃত বদনালোল জিহ্বাভীষণা"। লকলকে জিভ দিয়ে চেটেপুটে পান করছেন সেই রক্ত! চোখ বন্ধ করে শুয়ে থাকা শিবের(ঈশ্বর) বুকের উরপ পা তুলে এই তাণ্ডব নর্তন বীভৎসতার প্রতীক নয়! অশুভ শক্তির বিরুদ্ধে শুভ শক্তির বিজয় উল্লাস!

    হ্যাএমনটাই মেনে নিতে হবে। নতুবা মান-সম্মান-মুণ্ডু সবটাই যাবে। এই  খট্বাঙ্গধারিণীনরমুণ্ড ভূষিতা, ভৈরবীরূপিণী বিস্তৃত বদনালোল জিহ্বা,  ভীষণা রূপের মাধুরী ও হুংকার ধ্বনি আকাশে বাতাসে উদ্গিরন করেই বাংলায় প্রভুদের বিজয় নর্তন শুরু হয়। রাজাকে বশীভূত করে, রাজ ক্ষমতা ব্যবহার করেই চলে তাণ্ডব নর্তনের রণ দামামা। রাজাকে নর্তকীদের নুপুর নিক্কন ও দেহবল্লরির ফাঁদে ফেলে রাজগুরু, রাজপুরোহিত, পণ্ডিত ও কবিরা মিলে রচিত করেন নরহত্যার বিজয় আলেখ্য। এই মহিমা কীর্তনগুলি লিপিবদ্ধ হয় পৌরাণিক কাহিনী রূপে। বিদ্যাপতির কালিকা পুরাণ এমনি এক আলেখ্য যেখানে দুর্গা বা কালীপুজা কি ভাবে কারা উচিৎ তার বর্ণনা দেওয়া হয়েছে।          

    বিদ্যাপতি শবরোৎসবের উদাহরণ দিয়ে বলেছিলেনঃ  'কুমারীবেশ্যানর্তকীদের নিয়ে শঙ্খতূর্য,মৃদঙ্গঢোল বাজিয়ে বহুবিধ ধ্বজা বস্ত্র সহ খৈফুল ছড়িয়েপরস্পরের প্রতি ধুলো কাঁদা ছিটিয়ে ক্রীড়া ও কৌতুক গান করতে করেতে যাত্রা করবে। ভগলিঙ্গযৌনউত্তেজক গান এবং তদৃশ্য বাক্যালাপ করে আনন্দ করবেএই সময় যে ব্যক্তি অশ্লীলতা ভালোবাসেনা বা নিজেও অপরের বিরুদ্ধে এরূপ শব্দ ব্যবহার করেনা ভগবতী ক্রুদ্ধ হয়ে তাকে শাপ দেবেন এবং বিনাশ করবেন'

    বৃহদ্ধর্ম পুরাণেও এই শবরোৎসবের বর্ণনা আছেঃ

    'ভগ লিঙ্গাভিধানৈশ্চ শৃঙ্গার বচনৈ স্তথা 

    গানং কার্যং ভোজয়চ্চ ব্রাহ্মনাৎ স্তোষয়েস্ত্রিয়া'

     বৃহদ্ধর্ম পুরাণ ২২ অধ্যায় ২০-৩০পৃ )

    ভূদেবতাদের কি অপূর্ব মহীমা! নাচ, গান, পান ভোজন এবং ভগলিঙ্গ সহ  মধুর ভাষণের মাধ্যমে স্ত্রীলোক দ্বারা তাদের তুষ্ট করার এই বিধানের মধ্যে দিয়ে তারা বুঝিয়ে দিলেন যে, "ভর্গো দেবস্য ধীমোহী, ধীয়োযোনা প্রচোদায়ৎ"।                

    দ্বিজ রামপ্রসাদ তার গানের মধ্যে কিন্তু প্রশ্ন করে বসেছিলেন, 'বসন পর মাবা 'শিব কেন তোর পদতলেমুণ্ডু মালা কেন গলে'। কি জানি হয়তো সমস্ত মাতৃ জাতীর প্রতি  এমন কদর্য ইঙ্গিত বা যৌনতার এমন ঢালাও ব্যবস্থা  তিনি  মেনে নিতে পারেননি। আজও কালী পূজার সময় পান্নালাল ভট্টাচার্যের গলায় তার এই আকুতি আমরা শুনতে পাই। কিন্তু পান ভোজন ও আদিমতার নেশায় মত্ত বাঙালির কাছ থেকে তার আকুতির কোন উত্তর পাওয়া যায়না। একেবারে রক্তের মধ্যে মিশে যাওয়া বা মজ্জাগত শ্বাপদ স্বভাবের তাই কোন পরিবর্তন লক্ষ্য করা যায়না।      

    কিন্তু এমন নগ্ন যৌনতা ও বীভৎস কালী মূর্তি কেন রচনা করলেন বাংলার  পণ্ডিত প্রবরেরা! কালচক্কযানি "তারা"যিনি গোতমা বুদ্ধের জীবিতাবস্থায় সমগ্র এশিয়া খন্ডে পূজনীয়া হয়েছিলেন। আজো যাকে প্রজ্ঞা ও পারমিতার সর্বোচ্চ সম্মান দেওয়া হয় তার প্রকৃত অর্থ তারা বুঝতে অসমর্থ হয়েছিলেন!  না চৌর্য বৃত্তিকালে "তারার"মহিমাকে বিকৃত করে একান্ত ভাবে তাদের আদিম বিকারগুলিকে ধর্মের মোড়কে বেঁধে দিলেন। মদ-গাঁজাসিদ্ধি-ভাং ও চুল্লু-তাড়ির নেশা ধরিয়ে জনগণকে বুদ করে রেখে নিজেদের বর্ণশ্রেষ্ঠ হিসেবে  সুরক্ষিত করলেন!

    ভাবীকালের গবেষকেরা নিশ্চিত এ নিয়ে বিস্তর পরীক্ষা নিরীক্ষা করবেন। ম্যান মিউজিয়ামের এমন উর্বর ক্ষেত্র হিসেবে বাংলা সেদিন হোমো- ইরেক্টাস জামানার আদিম হিংস্রতার জন্য বিশ্ব মানচিত্রে জায়গা করে নেবে। কিন্তু ততদিন তো চালিয়ে যাওয়া যেতে পারে কালিকা পুরাণের সাজেশন। তাইতো আবেগ মোহিত গলায় মুখ্যমন্ত্রীর গলায় চণ্ডী পাঠের ফোয়ারা ছোটে। কোল্লামখুল্লা প্রোমোদের জন্য মদগাঁজাচুল্লুর ঢালাও জোগানের ফরমান জারি হয়। বেঁচে থাক ব্রহ্মন্যবাদ। বেঁচে থাক আদিম হিংস্রতার পৈশাচিক প্রবৃত্তি।                                       

     


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    तस्‍लीमा नसरीन : कुछ विचार बिन्‍दु
    October 23, 2014 at 11:38am
    कात्‍यायनी


    तस्‍लीमा नसरीन धर्म के विरुद्ध और पुरुष वर्चस्‍ववाद के विरुद्ध लगातार प्रखरता से लिखती रहती हैं, लेकिन गाजा में जियनवादियों द्वारा नरसंहार की विभीषिका हो, या समूचे मध्‍यपूर्व में अमेरिकी साम्राज्‍यवाद की विनाशलीला हो, या फिर साम्राज्‍यवाद-पूँजीवाद के तमाम कुकर्मों और नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्‍वरूप पूरी दुनिया में बरपा हो रहा तबाहियों का कहर हो, तस्‍लीमा की आवाज कहीं भी सुनायी नहीं देती।

    जो व्‍यक्ति वास्‍तव में अन्‍याय और प्रतिगामिता का विरोधी होगा, वह जीवन के हर क्षेत्र में उनका विरोध करेगा, कुछ चुनिन्‍दा क्षेत्रों में नहीं। तस्‍लीमा में अंधी विद्रोह की आग है, पर सामाजिक विश्‍लेषण की कोई वैज्ञानिक-ऐतिहासिक दृष्टि नहीं है। पुरुष-वर्चस्‍वाद अपने आप में समाजिक संरचना से विच्छिन्‍न कोई स्‍वतंत्र सामाजिक-मनोवैज्ञानिक परिघटना नहीं है। यह वर्ग समाज के उद्भव के ठोस वस्‍तुगत समाजिक-आर्थिक कारणों से पैदा हुआ और अलग-अलग वर्ग समाजों में अपनी प्रकृति बदलता हुआ आज पूँजीवाद के युग में भी अपनी सर्वोन्‍नत सैद्धान्तिकी और नये-पुराने बर्बर और बारीक रूपों में मौजूद है। स्त्रियों की पराधीनता का मूल धर्म में नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक संरचना में मौजूद है। धर्म (अपने नये रूप में) और पूँजीवाद की पण्‍य संस्‍कृति उसे मजबूत और सर्वव्‍याप्‍त बनाने का काम करते हैं। तस्‍लीमा का अराजक विद्रोही नारीवाद स्‍त्री समुदाय की सामाजिक मुक्ति के मार्ग पर विचार करने के बजाय व्‍यक्तिगत रूढि़भंजक विद्रोह की सीमाओं में कैद रह जाता है और कहीं-कहीं यौन मुक्तिवाद के गड्ढे में भी जा गिरता है। स्‍त्री मुक्ति के प्रश्‍न को ऐतिहासिक वर्गीय परिप्रेक्ष्‍य में न देख पाने वाली हर अराजक वर्गीय दृष्टि अन्‍ततोगत्‍वा या तो लैगिक नियतत्‍ववाद का शिकार हो जाती है, या फिर भाषाशास्‍त्रीय नियतत्‍ववाद का, या फिर विशुद्ध व्‍यक्तिगत अराजकतावाद का।

    धर्म के प्रश्‍न पर भी यह समझ सबसे पहले जरूरी हो जाता है कि धर्म एक प्राक् पूँजीवादी अधिरचना के रूप में अस्तित्‍व में आने के बाद अपना स्‍वरूप-परिवर्तन करके पूँजीवाद के युग में भी क्‍यों और कैसे एक शक्तिशाली प्रतिगामी शक्ति के रूप में जीवित बचा हुआ है, सामंतवाद पर विजय के बाद पूँजीवाद ने क्‍यों और किसप्रकार चर्च (धर्म) के साथ ''पवित्र गठबंधन'' बना लिया था और आज धर्म किसप्रकार पूँजी की चाकरी बजा रहा है। जैसाकि मार्क्‍सवादी विश्‍लेषण बताता है, मात्र नास्तिकता और वैज्ञानिक दृष्टि के प्रचार से धर्म का उन्‍मूलन सम्‍भव नहीं। जबतक हमारा जीवन माल-उत्‍पादन की अदृश्‍य सत्‍ता के वशीभूत बना रहेगा, तबतक सामाजिक चेतना पर धर्म की दृश्‍य-अदृश्‍य जकड़बंदी भी बनी रहेगी। धर्म-विरोधी प्रचार पूँजीवाद के विनाश की पूरी परियोजना का एक दूरगामी कार्यभार ही हो सकता है।

    जो लोग केवल कुछ सामाजिक-सांस्‍कृतिक बुराइयों को या पूँजीवाद-साम्राज्‍यवाद के कुछ दुष्‍परिणामों को हमलों का निशाना बनाते हैं, लेकिन उनके मूल स्रोत या मूल कारण की शिनाख्‍त नहीं कर पाते उन्‍हें विश्‍व पूँजीवाद और देशी पूँजीवाद के 'थिंक टैंक' भी मसीहा और प्रतीक-पुरुष/स्‍त्री बना लेते हैं। ऐसे लोग जाने-अनजाने जनता को मिथ्‍या समाधान सुझाने और मिथ्‍या चेतना देने का ही काम करते हैं और पूँजीवाद की ही सेवा करते हैं। पूँजी की स्‍वतंत्र गति से और पूँजीवादी सत्‍ताओं के आचरण से जो अनियंत्रित असंतुलन,अतिरेकी प्रभाव और अराजकताऍं पैदा होती हैं, उन्‍हें पूँजीवादी व्‍यवस्‍था स्‍वयं नियंत्रित करना चाहती है। आई.एल.ओ. और तमाम अन्‍तरराष्‍ट्रीय राहत संस्‍थाऍं, तमाम एन.जी.ओ. और 'वर्ल्‍ड सोशल फोरम' जैसी संस्‍थाऍं, तमाम विखण्डित आन्‍दोलन, तमाम सुधारवादी लोग और तमाम बुर्जुआ सलाहकार-विचारक यही काम करते हैं। वे इसप्रकार भ्रम पैदा करने वाली धुँआ छोड़ने की मशीन, सेफ्टी वॉल्‍व, स्‍पीड ब्रेकर और जनाक्रोशों के प्रहारों को सोखने वाले कुशन का काम करते हैं। पूँजीवाद को पूँजीवादी आलोचना न सिर्फ स्‍वीकार्य होती है, बल्कि उसकी जरूरत होती है और वह उसका स्‍वागत करता है। डरता है वह साम्‍यवादी आलोचना से, और हर कीमत पर उसे दबा देना चाहता है। जो पूँजीवाद की वास्‍तविक, वैज्ञानिक समाजवादी आलोचना होती है, वह शब्‍दों से भी होती है और भौतिक बल के द्वारा भी।

    पूँजी अपनी स्‍वतंत्र आंतरिक गति से असमानता, भुखमरी, बाल श्रम, स्‍त्री दासता के बर्बर एवं बारीक रूपों और पर्यावरण विनाश को जन्‍म देती रहती है। ये चीजें अनियंत्रित होकर पूरे समाज को अराजकता के गर्त में न धकेल दे और स्‍वयं पूँजी-निर्माण की सतत् प्रक्रिया को ही खतरे में न डाल दे, इसके लिए कुछ पैबन्‍दसाजियों की, कुछ सुधार कार्रवाइयों की, कुछ सन्‍तुलनकारी कदमों की जरूरत होती है। एन.जी.ओ. राजनीति यही करती है और इसीलिए सालाना इस मद में दुनिया के पूँजीपति अरबों डालर खर्चते हैं। इसी मकसद से मैगासेसे पुरस्‍कार और नोवेल शान्ति पुरस्‍कार दिये जाते हैं और कैलाश सत्‍यार्थी जैसों को मसीहा बनाया जाता है। एक दूसरी श्रेणी उन अराजकतावादी उग्र विद्रोही और उत्‍तर-मार्क्‍सवादी, अस्मितावादी आदि-आदि टाइप के बुद्धिजीवियों की है, जो बुनियादी अन्‍तरविरोधों की शिनाख्‍त किये बिना सामाजिक-राजनीतिक प्रश्‍नों पर उग्र अकर्मक विमर्श करते हैं, खण्‍ड को समग्र के रूप में या प्रतीतिगत यथार्थ को सारभूत यथार्थ के रूप में प्रस्‍तुत करते हैं, रोग के लक्षणों को ही रोग बताते हैं, या फिर समाज के गैर बुनियादी अन्‍तरविरोधों को मुख्‍य मुद्दा बनाने का काम करते हैं। ये सभी लोग किसी न किसी रूप में मूल लक्ष्‍य को दृष्टिओझल कर देते हैं। विभ्रमग्रस्‍त और दिशाहीन लोग इन्‍हें अपना नायक मान लेते हैं और शासक वर्ग भी इन्‍हें समादृत-पुरस्‍कृत करता है।

    पि‍छड़े देशों में व्‍याप्‍त धार्मिक कट्टरपन और स्‍त्री-विराेधी बर्बरता की आलोचना करते हुए तस्‍लीमा नसरीन प्रकारान्‍तर से बुर्जुआ जनवाद का आदर्शीकरण करती हैं और खासकर पश्चिमी बुर्जुआ समाजों का भी आदर्शीकरण करती हैं। उनका तर्कणावाद कुलीन बुर्जुआ तर्कणावाद है और उनका नारीवाद अकर्मक विमर्शी, अराजकतावादी, व्‍यक्तिवादी, अग्निमुखी बुर्जुआ नारीवाद ही है, भले ही यहॉं-वहॉं वह समाजवाद की प्रशंसा करती या मार्क्‍सवाद को उद्धृत करती दीख जाती हों।

    উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি
    কি এখন শুধুই বাজার?
    আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার।
    সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই।
    সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন।
    পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই।
    উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি।
    কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো , জানিনা।

    পলাশ বিশ্বাস


    সাত বছর পর উত্তরাখন্ডে বাঙালি উদ্বাস্তু উপনিবেশ দিনেশপুরে ফিরে নিজেকে
    আউটসাইডার মনে হচ্ছে।

    বাসন্তীপুরে নেজির বাড়ির সামনে দাঁড়িয়ে আমি এবং সবিতা থ,নিজের বাড়িই
    চিনতে পারছি না।

    কাঁচা মাটির দেওয়ালে গাঁথা গাছ গাছালিতে ভরা বাড়ি আর নেই।
    ভাইপো টুটুল পাকাবাড়ি বানিয়েছে দোতলা।

    দিনেশপুরে আশেপাশের সব গ্রাম এখন দিনেশপুর শহরের মধ্য়ে।

    ছত্রিশ বাঙালি গ্রামের আশে পাশে প্রতিটি উদ্বাস্তু গ্রামের পাশে আরও অনেক
    বাঙালি গ্রাম।

    পুরাতন উদ্বাস্তু কলোনি এবং একাত্তরের পরে যারা এসেছেন ,তাঁরা সকলেই তরাই
    অন্চলে জম জায়গা খুইয়ে পরিবর্তে লাখোলাখ টাকা নিয়ে বাড়ি গাড়ি হাঁকিয়ে
    প্রতেকেই মহারাজা।

    তাঁরা এখন আমায় চিনতে ও পারছেন না।

    বাঙালি গ্রামগুলির বুকে এক এক গজিয়ে উঠছে কল কারখানা,নলেজ ইকোনামির নানা
    রং বেরং প্রতিষ্ঠান,শপিং মল,হাসপাতাল,আবাসিক কলোনি,বাজার আরো বাজার।

    কাল গিয়েছিলাম রুদ্রপুর ট্রান্জিট ক্য়াম্পে,যেখানে এক একড় জমি বিক্রি
    করে এক কোটি টাকা পেয়ে প্রত্যেকটি পরিবারই কোটিপতি।

    তাঁদের পুনর্বাসনের লড়াই লড়েছেন বাবা,সঙ্গে যতদিন পেরেছি থেকেছি আমি।

    সেই ছোটবেলা থেকে প্রতিটি পরিবারে আমার আনাগোনা।
    আমি ছিলাম তাঁদের নয়নের মণি।

    আজ তাঁরা আমায় চিনবেন না।

    আমি কোন ছার ,যে রবীন্দ্রনাথ, নেতাজি, বন্কিম, শরত,
    বিবেকানন্দ,নজরুল,ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগরের পরিচয়ে পাহাড়ে তরাইয়ে তাঁরা
    পরিচিত ছিলেন একদা,সেই তাঁদেরও ভুলেছেন তাঁরা।

    তাঁরা ভুলেছেন রবীন্দ্র সঙ্গীত,ভুলেচছেন নজরুল সঙ্গীত,অধিকাংশই বাংলায়
    কথা বলতে পারেন না।

    তাঁরা ভুলেছেন তাঁদের সংগ্রামের,জমির লড়াইয়ের ইতিহাস,ভুলেছেন পুলিনবাবুকে।

    যে মুর্তি তাঁরা পুলিনবাবুর গড়েছিলেন,সেই মুর্তির এখন হাত ভাঙ্গা।
    আমার ভাইঝি নিন্নি বলল,দাদুর হাতে ফ্রাক্চার।
    সব মুর্তিই গড়া হয় বিসর্জনের জন্য়।
    আমাদের আবেদন পুলিনবাবুর মুর্তিখানিও বিসর্জনে যাক।
    তাঁকে মুক্তি দিলেই হয়।
    এই বাঙালি উপনিবেশে পুলিনবাবূ মরেছেন তেরো বছর আগে,তাঁকে বাঁচিয়ে রাখার
    প্রয়োজন নেই যখন এই বাঙালি উপনিবেশে বাঙালিয়ানা বলতে দুর্গোত্সব আর
    কালিপুজো ছাড়া কিছুই বেঁচে নেই।
    বাঙালি গ্রাম একের পর এক কারখানা হয়ে যাচ্ছে।
    আমার গ্রাম এখনো বেঁচে আছে,আগামি বার ফিরব যখন,তখন হয়ত দেখতে পাব আমার
    গ্রাম বাসন্তীপুরও আস্ত একটি বাজার বা একটি কারখানা।
    এই বাজারে আমার নিঃশ্বাস বন্ধ হয়ে যায়।
    আমি চাইনা এই মুক্ত বাজার।
    সেই হিমালয় আর হিমালয় নেই।
    সেখানেও র্ক্তনদীর প্লাবন।
    পর্কৃতিতে অকসিজেন নেই।
    উত্তরাখন্ডের বাঙালিরা অনেকেই এখন কোটিপতি।
    কিন্তু তাঁরা কতটা বাঙালি আছেন এখনো ,জানিনা।
    একজন এমবিবিএস ডাক্তার হচ্ছেনা।
    একজন অফিসার হচ্ছে না।
    একজন প্রোফেসার হচ্ছে না।
    একজন শিল্পী হচ্চে না।
    একজন সাহিত্যিক হচ্ছে না।
    একজন সাংবাদিক হচ্ছে না।
    তবে টাকা হয়েছে প্রচুর।
    টাকার গরম হয়েছে প্রচুর।
    পরিবর্তে স্বজন হারিয়েছি আমরা।
    শহরে কারখানায় আমরা শ্রমজীবী বাঙালি হয়ে রয়েচি।
    উন্নয়ন সেকি শুধু টাকার খেলা,যেখানে সভ্যতা সংস্কৃতির আলো নিষিদ্ধ? বাড়ি
    কি এখন শুধুই বাজার?

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