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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    एक शोक मंतव्य अस्सी करोड़ में बिकी देशी ब्रांड एम्बेसडर के नाम

    फासिस्ट रेसिस्ट राजकाज के संरक्षण में बड़ी मछलियां चोटी मछलियों के खाने वाली हैं

    पलाश विश्वास

    बीबीसी की खबर है और दिलोदिमाग लहूलुहान हैः

    One of India's most iconic car brands has been sold by Hindustan Motors to the French manufacturer Peugeot for a nominal $12m (£9.6m), officials say. The Ambassador car used to be one of India's most prestigious vehicles beloved by government ministers.

    बीबीसी हिंदी की खबर में इसकी वजह का खुलासा भी हो गया हैः

    एक ज़माने में भारत में रुतबे और रसूख का पर्याय मानी जाने वाली एम्बेसडर कार का ब्रांड 80 करोड़ की मामूली कीमत पर बिक गया है. अधिकारियों ने बताया कि हिंदुस्तान मोटर्स ने फ्रांसीसी कंपनी पूजो के साथ ये सौदा किया है. एक वक्त था जब भारत में सरकारी लोगों की ये पसंदीदा कार हुआ करती थी, लेकिन 2014 के बाद से ही इसका उत्पादन बंद कर दिया गया.

    खबरों के मुताबिक  कभी नेताओं और नामी-गिरामी लोगों की शाही सवारी रही एंबेसडर कार के ब्रांड को हिंदुस्तान मोटर्सने बेच दिया है। यूरोप की दिग्गज ऑटो कंपनी प्यूजो ने इसे सिर्फ 80 करोड़ रुपये में खरीदा है। तीन साल पहले 2014 में एंबेसडर कार का प्रोडक्शन रोक दिया गया था। पिछले महीने पीसीए समूह ने भारतीय बाजार में प्रवेश करने के लिए सीके बिड़ला ग्रुप के साथ डील की थी, जिसके तहत शुरुआत में करीब 700 करोड़ रुपये का निवेश किया जाना है। इस रकम से तमिलनाडु में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाया जाएगा। इस प्लांट में हर साल 1 लाख वाहन बनाने की क्षमता होगी।

    गौर करें,खबर के मुताबिक 2014 से एम्बेसडर कार का उत्पादन बंद हो गया है।

    नोटबंदी के बाद यूपी चुनाव से बजट और राम के नाम, राम की सौगंध और राममंदिर के घटाटोप में अर्थव्यवस्था की सेहत समझने के लिए यह आर्थिक वारदात बेहद गौरतलब है।नोटबंदी की तिमाही में उत्पादन दर और विकास दर में गिरावट हुई है,जिससे झोला छाप बगुला भगत वित्तीय प्रबंधक और पालतू अर्थशास्त्री और मीडिया सिरे से इंकार करते हुए सुनहले दिनों के तिलिस्म में आम लोगों की जिंदगी को जलती हुई कब्रगाह में तब्दील करने का मुक्तबाजारी महोत्सव मना रहे हैं।

    गरीबों की गरीबी दूर करने के बहाने राम के नाम फासिज्म का कोरबार की तर्ज पर गरीबी उन्मूलन और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की भगवा वैदिकी पेशवाराज मार्का नैतिकता की सुनामी की आड़ में देश और आम जनता की मिल्कियत देश के संसाधन बेचने की पूरी प्रक्रिया एम्बेसडर ब्रांड विदेशी हवाले करने से जगजाहिर है और बीबीसी की खबर में देश की नीलामी की जो तस्वीर चस्पां है,उसे अंध राष्ट्रवादी हिंदुत्व के नजरिये से देश पाना उतना आसान भी नहीं है।

    बजट पेश करने के बाद सरकार ने जिस तरह से राशन कार्ड के साथ आधार कार्ड को नत्थी कर दिया है और जिसपर राजनीति फिर सिरे से खामोश है,जाहिर है कि पटरी से अर्थव्यवस्था उतर जाने और उत्पादन प्रणाली तहस नहस हो जाने से किसी की सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ा है तो आम जनता को एम्बेसडर जैसे ब्रांड के विदेशी हाथों में जाने से कोई तकलीफ होगी नहीं।

    गौरतलब है कि इस बीच सरकार ने सेबी के नए चेयरमैन का एलान कर दिया है। वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी अजय त्यागी को पांच साल के लिए सेबी का नया चेयरमैन बनाया है। अजय त्यागी 1 मार्च से मौजूदा सेबी चेयरमैन यू के सिन्हा की जगह लेंगे।सेबी जैसी नियामक संस्था के चेयरमैन पद की काबिलियत अगर संग की वफादारी है तो समझ लीजिये की देश की अर्थव्यवस्था नागपुर के हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक किन लोगों और किन चुनिंदा कंपनियों के हित में है और शेयर बाजार से नत्थी सारी बुनियादी सेवाओं को हासिल करने कैशलैस डिजिटल इंडिया में आम जनाता. कारोबार और इंडियािंकारपोरेशना का क्या हाल होना है।

    खबरों के मुताबिक अजय त्यागी हिमाचल प्रदेश कैडर के आईएएस अफसर हैं, जो वित्त मंत्रालय के इकोनॉमिक अफेयर्स डिपार्टमेंट में अतिरिक्त सचिव का कार्यभार संभाल रहे हैं। सेबी चीफ के पद की दौड़ में ऊर्जा सचिव पी के पुजारी और आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांता दास भी थे लेकिन त्यागी दोनों को पीछे छोड़कर चेयरमैन बनने में कामयाब रहे। इससे पहले यूके सिन्हा 18 फरवरी 2011 को सेबी के चेयरमैन बने थे, जिन्हें दो बार का सेवा विस्तार दिया गया था।

    इसी बीच वित्त मंत्री ने कहा है कि  प्रतिभूति बाजारों में बराबर बड़े घटनाक्रम देखने को मिलते रहते हैं और बाजार विनियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) अर्थव्यवस्थाकी जरूरत और और बाजार के हिसाब से एक पेशेवर संगठन के रूप में अपना विकास कर रहा है। वित्त मंत्री ने सेबी बोर्ड के सदस्यों और अधिकारियों के साथ बैठक में इस साल सल के बजट में बाजार संबंधी पहलों पर विचार विमर्श किया। हर साल बजट के ठीक बाद होने वाली इस परंपरागत बैठक में बजट प्रस्तावों के संदर्भ में पूंजी बाजार नियामक के भविष्य के एजेंडा पर विचार विमर्श किया गया।

    फिर मीडिया का यह शगूफाःनोटबंदी के बाद भले ही भारत की आर्थिक ग्रोथ की रफ्तार कुछ धीमी पड़ गई हो, लेकिन आने वाले अगले 5 साल में भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अमेरिका के एक शीर्ष खुफिया थिंक टैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान भारत की आर्थिक ताकत का मुकाबला करने में सक्षम नहीं है, इसलिए वह संतुलन के दिखावे की कोशिश में दूसरे तरीकों की तलाश करेगा।

    अंतरराष्ट्रीय कन्सल्टेंसी प्राइसवाटर हाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) ने भविष्यवाणी की है कि 2040 तक भारत अमेरिका को पछाड़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाबन जाएगा। इसकी कीमत हमें कितनी चुकानी है,अपनी जमा पूंजी कमाई पर टैक्स लगने के बावजूद यह सोचने की फुरसत किसी को नहीं है।

    दूसरी तरफ,नोटबंदी की कड़ी आलोचना करते हुए प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री स्टीव एच हांके ने आज कहा कि ऊंचे मूल्य के नोटों पर प्रतिबंध के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था नकदीरहित संकट में है। बाल्टीमोर, मैरीलैंड में जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री ने ट्वीट किया, 'नोटबंदी हारने वालों के लिए है। नकदी को छोडऩा इसका जवाब नहीं है। भारतीय नकदी अर्थव्यवस्था नकदीरहित संकट में है।' हांके ने इससे पहले कहा था कि शुरुआत से ही नोटबंदी में खामियां रहीं अैर यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यह नहीं जानते कि भारत किस दिशा में जा रहा है। हांके ने कहा था कि भारत के पास मोदी की नोटबंदी के अनुरूप ढलने के लिए जरूरी ढांचा नहीं है। उन्हें इस बात का पता होना चाहिए।

    पिछले 26 साल से देश बेचने का कारोबार इस अमेरिकी उपनिवेश में राजकाज है और आर्थिक सुधारों के नाम पर आम जनता का और खास तौर पर बहुजनों का कत्लेमाम है।आम जनता को अर्थशास्त्र नहीं आता और न अर्थव्यवस्था में उसकी दिलचस्पी है।

    कारपोरेट देशी कंपनियों के मालिकान,शेयर होल्डरों और वित्तीय प्रबंधकों को क्या हो गया है कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ चुनिंदा कंपनियों को दुनियाभर में अपना साम्राज्य बनाने के लिए राजकोष खुला है।बैंकों से लाखों करोड़ का कर्ज उनके डूबते कारोबार के लिए हैं और इसके अलावा सालाना लाखों का टैक्स माफ है।बाकी सबकी शामत है इस रामराज्य में।

    हाल ये हैं कि तेल,गैस और पेट्रोलियम,संचार,ऊर्जा और विमान, जहाज, बंदरगाह,सड़क परिवहन, रेल और मेट्रो रेल,बैंकिंग और बीमा,निर्माण और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में चुनिंदा कपनियों को लाखों करोड़ की रियायतें,विदेशों में उनके अरबों का निवेश और एम्बेसडर ब्राड का सौदा सिर्फ अस्सी करोड़ में।

    विनिवेश और निजीकरण के तहत सरकारी कंपनियां कौड़ियों के मोल बिकते देखने और रेलवे समेत सभी सेक्टरों में थोक पैमाने पर छंटनी का नजारा देखने और क्रांतिकारी ट्रेड यूनियनों के नेताओं की विदेश यात्राएं और पंचायत से लेकर संसद तक जन प्रतिनिधियों के करोड़पति और लखपति बनते देखने को अभ्यस्त आम जनता  को अब भी अपने बैंक खातों में नोटवर्षा की तर्ज पर सुनहले दिनों का बेसब्री से इंतजार है और यूपी चुनाव से पहले गरीबी उन्मूलन के नारे के साथ बेइंतहा सरकारी खर्च कागद पर दिखाने के करतब से अर्थव्यवस्था के जोड़ घटाव करने के मूड में आम जनता नहीं है,जाहिर है।

    दिवालियापन का आलम यह है कि  कारपोरेट कंपनियों को यह नजर नहीं आ रहा है कि एम्बेसडर जैसे बेशकीमती हिंदुस्तानी ब्रांड को खत्म करने का इंतजाम 2014 में बिजनेस फ्रेंडली हिंदुत्व की सरकार ने कर दिया है तो आगे उद्योग और कारोबार का हाल किसानों मजदूरों से भी बुरा होना है।

    नोटबंदी के बारे में हम पहले दिन से लिख रहे हैं,चाहे तो हस्तक्षेप पर नोटबंदी में लगे तमाम आलेख नये सिरे से पढ़कर देख लें कि नोटबंदी और डिजिटल कैशलैस इंडिया का मतलब नकदी पर चलने वाला खुदरा कारोबार और हाट बाजार खत्म है,किसानों की दस दिशा तबाही है,बेरोजगारी ,भुखमरी और मंदी है तो यह कारपोरेट एकाधिकार का चाकचौबंद इंतजाम है।

    बड़ी मछलियां छोटी मछलियां को निगलकर और बड़ी हो जायेंगी।वे और बड़ी हो गयी कंपनियां फासिज्म के राजकाज के सहारे  बड़ी कंपनियों को भी बख्शेंगी नहीं।

    कारपोरेट लाबिइंग से कारपोरेट कंपनियों को पिछले छब्बीस साल में जो चूना लगता रहा है,उसका हिसाब जोड़ लें।

    सरकारी संरक्षण में  तेल और गैस में ओएनजीसी जैसे नवरत्न कंपनी और तमाम सरकारी गैरसरकारी तेल कंपनियों का बंटाधार करके जैसे कारपोरेट एकाधिकार कायम हुआ है,वही किस्सा अब बाकी हिंदुस्तानी कारपोरेट कंपननियों का भोगा हुआ यथार्थ बनकर सामने आने वाला है।

    एम्बेसडर प्रकरण इस प्रक्रिया की शुरुआत है।वैसे भी कारपोरेट लाबिइंग की वजह से आटो सेक्टर में भारी संकट है।आगे आग दिवालिया बनते जाने की किसकी बारी है,यह सिर्फ नागपुर के मुख्यालय की मर्जी और मिजाज पर निर्भर है।

    एम्बेसडर को हम बचपन से जान रहे हैं।जब हम नैनीताल में पढ़ रहे थे।पहाड़ों में रेल तो क्या साईकिलें तक दिखती नहीं थी।पहाड़ों में और तराई में तब साठ और सत्तर के दशक में परिवहन का मतलब केएमओ और जीएमओ की बसों,टाटा के ट्रकों के अलावा चार पहिया वाहनों के मामले में एम्बेसडर कारें और जीप हुआ करती थी।जीप और जोंगा तो सिरे से लापता है,लेकिन एम्बेसडर चल रहा था।

    हिंदुस्तान मोटर्स का कोलकाता के नजदीक हिंद मोटर काऱखाना संकट में है और 2014 से एम्बेसडर का उत्पादन बंद है तो ब्रांड को विदेशी हाथों में महज अस्सी करोड़ के एवज में सौंपने से पहले बिजनेस फ्रेंडली सरकार के पास बहुत मौके थे एम्बेसडर बचाने के।

    किंगफिशर और विजय माल्या या विदेशों में अरबों डालर और पौंड नोटबंदी के आपातकाल में भी निवेश करने वाली कंपनियों के हितों का ख्याल जितना है इस फासिज्म के राजकाज को,उसका तनिको हिस्सा अगर एम्बेसडर के लिए खर्च होता।

    हम जब कुमायूं और गढवाल में पदयात्राें कर रहे थे तब कारों की सवारी का ख्वाब हम जाहिरा तौर पर नहीं देखते थे।लेकिन पेशेवर पत्रकारिता की वजह से 36 सालों में हमने कारों की सवारी खूब की है।मेरठ के दंगों के दौरान मारुति जिप्सी या झारखंड में ट्रेकर की सवारी भी खूब की है।लेकिन आधी रात के बाद दफ्तर से घर लौटना हो या कोयला कदानों में भूमिगत आग से घिरी धंसकती हुई जमीन पर दौड़ने की नौबत हो,एम्बेसडर कार हमारी पहली पसंद रही है जो जितने ड्राइवरों से हमारा ताल्लुकात हुआ है,उनके मुताबिक भारत की सड़कों पर सबसे बेहतरीन कार है।

    बहरहाल अर्थव्यवस्थी की तबाही,बेरोजगारी और छंटनी के शिकार लोगों के लिए सुनहले दिन हाजिर है क्योंकि सरकार एक तरफ लोगों को नौकरियां दिलवाना चाहती है, तो दूसरी ओर छंटनी के शिकार लोगों को बेहतर मुआवजा मिले, इसकी भी कोशिश कर रही है। इसके लिए सरकार छंटनी से जुड़े कानून में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। कानून का ये मसौदा अगर लागू होता है तो इससे करोड़ों कर्मचारियों को फायदा होगा।

    न रोजगार सृजन की कोई सोच है और न नौकरी की सुरक्षा की कोई गारंटी है।श्रम मंत्रालय छंटनी से जुड़े कानून में संशोधन करने की तैयारी कर रहा है। जानकारी के मुताबिक श्रम मंत्रालय छंटनी की सूरत में कर्मचारियों को मिलने वाले मुआवजे को बढ़ा कर 3 गुना करने का प्रस्ताव भेजेगा।यह इसलिए है कि उत्पादन प्रमाली तहस नहस होने और एकाधिकार कारपोरेट वर्चस्व की वजह से भारी पैमाने पर छंटनी होनी है।यह नजारा खुदरा कारोबार खतम करने वाली ईटेलिंग कंपनियों के रवैये से जाहिर है तो आईटी सेक्र का नाभिनाल तो ट्रंप के एक्जीक्यूटिव आदेशों से जुडा़ है।

    मसलन दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी स्नैपडील बड़ी छंटनी की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक कंपनी अपने 30 फीसदी कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है। धीमी ग्रोथ और नई फंडिंग ना मिलने के कारण कंपनी लागत घटाने को मजबूर है। जिसके चलते करीब 1000 कर्मचारियों को निकाला जा सकता है। इसके अलावा कंपनी की लॉजिस्टिक डिवीजन से करीब 3000 स्थायी और 5000 कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए कर्मचारियों को निकाला जा सकता है। कंपनी ने छंटनी की प्रक्रिया शुरू कर दी है, और इसके लिए दो कंसल्टेंट नियुक्त किए गए हैं।

    नोटबंदी के फर्जीवाड़े के हक में आंकडे़ भी सामने आ रहे हैं।मसलन नोटबंदी का उद्योगों पर कुछ असर दिसंबर में दिखा था और इसके बाद भी यह सरकार द्वारा आज जारी दो आंकड़ों में दिख रहा है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) की वृद्घि दर दिसंबर में 0.4 फीसदी रही जबकि नवंबर में इसमें 5.6 फीसदी की तेजी दर्ज की गई थी। इसी तरह कॉरपोरेट कर संग्रह अप्रैल से जनवरी के दौरान महज 2.9 फीसदी बढ़ा जबकि अप्रैल से दिसंबर तक इसमें 4.4 फीसदी की वृद्घि देखी गई थी।

    उत्पाद शुल्क संग्रह की वृद्घि भी जनवरी में घटकर 26.3 फीसदी रही जबकि दिसंबर में यह 31.6 फीसदी थी। नोटबंदी के कारण विवेकाधीन खर्चों में कटौती होने से सेवा कर संग्रह में जनवरी के दौरान 9.4 फीसदी की वृद्घि देखी गई जबकि दिसंबर में इसमें 12.4 फीसदी की वृद्घि दर्ज की गई थी। हालांकि यह चकित करने वाला रहा कि नवंबर में शानदार वृद्घि दर्ज करने वाला आईआईपी में जनवरी के दौरान इतनी कमी क्यों रही। आईआईपी में 75.5 फीसदी भारांश वाले विनिर्माण क्षेत्र की वृद्घि दिसंबर में 2 फीसदी रही जबकि जनवरी में यह 5.6 फीसदी बढ़ा था। हालांकि अप्रैल से अक्टूबर में भी आईपीपी में उतनी तेजी नहीं आई थी। ऐसे में केवल विमुद्रीकरण ही आईआईपी में नरमी की वजह नहीं मानी जा सकती। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जनवरी के दौरान कुल कर संग्रह 12.85 लाख करोड़ रुपये रही है जो इस वर्ष के बजट अनुमान का 76 फीसदी है।

    इस खबर पर भी गौर करें कर्मचारी कि सरकार सरकारी कंपनियों की सूचीबद्धता में तेजी लाने के लिए नई व्यवस्था की योजना बना रही है। इसका मकसद एक विभाग से दूसरे विभाग के बीच लाल फीताशाही को खत्म करना और कंपनियों को सूचीबद्धता के लिए चिह्नित करने और उन्हें शेयर बाजार में उतरने के बीच का वक्त कम करना है। इस व्यवस्था को अंतिम मंजूरी देने के लिए मंत्रियोंं की अधिकार प्राप्त समिति को सौंपा जा सकता है, जैसा कि रणनीतिक बिक्री के मामले में होता है।  

    वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 के अपने बजट भाषण में घोषणा की थी कि केंद्र सरकार सीपीएसई (केंद्र की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों) को शेयर बाजार मेंं समयबद्ध तरीके से सूचीबद्धता के लिए चिह्नित करने के लिए पुनरीक्षित व्यवस्था पेश करेगी। वरिष्ठ सरकारी सूत्रों ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था पर अभी काम किया जाना बाकी है। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया में जमीनी काम किए जाने के बाद मंत्रियोंं की अधिकार प्राप्त समिति प्रस्तावित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी की सूचीबद्धता पर अंतिम फैसला करेगी, जिसमेंं मर्चेंट बैंकर चुना जाना, रोड शो आदि शामिल है। इस तरह मंत्रियों की एक समिति सरकार के सामने एक वैकल्पिक व्यवस्था पेश करेगी, जो पहले से ही रणनीतिक बिक्री के लिए बनी हुई है।  

    कैबिनेट से पहली मंजूरी मिलने के बाद पीएसयू (ज्यादातर गैर सूचीबद्ध) का मूल्यांकन, दिलचस्पी लेने वाले खरीदारों की तलाश और कीमतें तक करने का काम किया जाएगा। उसके बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और जिस विभाग का पीएसयू है, उस विभाग के मंत्री मिलकर इस पर अंतिम फैसला करेंगे। यही समूह सूचीबद्धता के लिए पहले घोषित 5 सरकारी सामान्य बीमा कंपनियों, न्यू इंडिया एश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस, नैशनल इंश्योरेंस और जरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन आफ इंडिया की सूचीबद्धता को अंतिम मंजूरी देगा। वरिष्ठ सरकारी सूत्रों ने कहा कि या तो जेटली गडकरी की जोड़ी या कोई मंत्रियोंं के  नए अधिकार प्राप्त समूह को इस मामले की निगरानी व सरकारी कंपनियों की सूचीबद्धता की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

    अभी अगर एंप्लॉयर कर्मचारी को निकलता है तो उसे हर साल के लिए 15 दिन का वेतन मुआवजे के तौर पर देना होता है। मतलब यदि कंपनी में 4 साल काम किया है तो एम्प्लॉयर फिलहाल 2 महीने की तनख्वाह हर्जाने के तौर पर देता है। लेकिन नए प्रस्ताव के तहत यह मुआवजा 6 महीने का हो जाएगा। कैबिनेट की हरी झंडी मिलने के बाद इसे इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड के तहत संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में में पेश किया जा सकता है। संसद से पास होकर अगर यह ड्राफ्ट कानून की शक्ल अख्तियार करता है तो इससे तमाम इंडस्ट्रीज में काम कर रहे करोड़ों लोगों को फायदा पहुंचेगा।



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    रिलायंस देश में मीडिया भी रिलायंस हवाले,अब पत्रकारिता तेल,गैस,संचार,निर्माण विनिर्माण कारोबार की तर्ज पर!

    सत्ता संरक्षित कारपोरेट वर्चस्व के मुकाबले देशी स्थापित औद्योगिक घरानों के लिए मौत की घंटी!

    पलाश विश्वास

    ऐम्बेसैडर ब्रांड के अस्सी हजार में बिक जाने पर लिखते हुए हमने डिजिटल कैशलैस इंडिया में  कारपोरेट एकाधिकार की वजह से देशी कंपनियों के खत्म होने का अंदेशा जताया था।सत्ता संरक्षण और कारपोरेट लाबिइंग से छोटी बड़ी कंपनियों का क्या होना है,बिड़ला समूह के हालात उसका किस्सा बयान कर रहे हैं।टाटा समूह दुनिया पर राज करने चला था और साइरस मिस्त्री के फसाने से साफ हो गया कि उसके वहां भी सबकुछ ठीकठाक नहीं है।नैनो का अंजाम पहले ही देख लिया है।यह बहुत बड़े संकट के गगनघटा गहरानी परिदृश्य है।फासिज्म के राजकाज में आम जनता ,खेती बाड़ी, काम धंधे और खुदरा कारोबार में जो दस दिगंत सर्वनाश है,जो भुखमरी,मंदी और बेरोजगारी की कयामतें मुंह बाएं खड़ी है,इनकी तबाही से देशी पूंजी के लिए भी भारी खतरा पैदा हो गया है।बिड़ला और टाटा समूह का भारतीय उद्योग कारोबार में बहुत खास भूमिका रही है।बिड़ला समूह से किन्हीं मोहनदास कर्मचंद गांधी का भी घना रिश्ता रहा है। इस हकीकत का सामना करें तो हालात देशी तमाम औद्योगिर घरानों और दूसरी छोटी बड़ी कंपनियों के लिए बहुत खराब है।

    निजी तौर पर हम जैसे पत्रकारों के लिए हिंदुस्तान का रिलायंस में विलय भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता का अवसान है।वैसे भी मीडिया पर रिलायंस का वर्चस्व स्थापित है।यह वर्चस्व तेल,गैस,संचार,पेट्रोलियम,ऊर्जा से लेकर मीडिया तक अंक गणित के नियमों से विस्तृत हुआ है तो इसमें सत्ता समीकरण का हाथ भी बहुत बड़ा है।आजाद मीडिया अब भारत में नहीं है,यह अहसास हम जैसे सत्तर के दशक से पत्रकारिता में जुड़े लोगों के लिए सीधे तौर मौत की घंटी है। खबर है कि बिड़ला घराने की ऐम्बसैडर कार के बाद उसका अखबार हिंदुस्तान टाइम्स भी बिक गया है।खबरों के मुताबिक शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिंदुस्तान टाइम्स के बारे में चर्चा है कि हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतिया ने इस अखबार को पांच हजार करोड़ रुपये में देश के सबसे बड़े उद्योगपति रिलायंस के मुकेश अंबानी को बेच दिया है।यही नहीं चर्चा तो यहाँ तक  है कि प्रिंट मीडिया के इस सबसे बड़े डील के बाद शोभना भरतिया 31 मार्च को अपना मालिकाना हक रिलायंस को सौंप देंगी और एक अप्रैल 2017 से हिंदुस्तान टाइम्स रिलायंस का अखबार हो जाएगा।

    गौरतलब है कि 2014 में फासिज्म के राजकाज के बिजनेस फ्रेंडली माहोल में रिलायंस ने नेटवर्क 18 खरीदकर मीडिया में अपना दखल बढ़ाया है।नेटवर्क.18 कई प्रमुख डिजिटल इंटरनेट संपत्तियों की मालिक हैं, जिसमें इन डॉट कॉम, आईबीएनलाइव डॉट कॉम, मनीकंट्रोल डॉट कॉम, फर्स्टपोस्ट डॉट कॉम, क्रिकेटनेक्स्ट डॉट इन, होमशाप18 डाट काम, बुकमाईशो डॉट कॉम,बुकमाईशो डॉट कॉम, शामिल हैं। इनके अलावा यह कलर्स, सीएनएनआईबीएन, सीएनबीसी टीवी18, आईबीएन7, सीएनबीसी आवाज चैनल चलाती है।

    जाहिर है कि हिंदुस्तान समूह के सौदे से एकाधिकार  कारपोरेट वरचस्व का यह सिलसिला थमने वाला नहीं है।स्वतंत्र पत्रकारिता और अभिव्क्ति की आजादी का क्या होना है,इसकी कोई दिशा हमें नहीं दीख रही है।खबर तो यह भी है कि रिलायंस डीफेंस अब अमेरिका नौसेना के सतवें बेड़े की भी देखरेख करेगा।वहीं सातवा नौसैनिक बेड़ा जो हिंद महासागर में भारत पर हमले के लिए 1971 की बांग्लादेश लड़ाी के दौरान घुसा था।अब यह भी खबर है कि मुप्त में इंचरनेट की तर्ज पर मुफ्त में अखबार भी बांटेगा रिलायंस।जाहिर है कि भारतीय जनता को भी मुफ्तखोरी का चस्का लग चुका है। इसी बीच रिलायंसजियो की वीडियो ऑन डिमांड सेवा जियोसिनेमा, जिसे पहले जियोऑन डिमांड के नाम से जाना जाता था, में देखने लायक कई सिनेमा उपलब्ध हैं। अब इस ऐप में नया फ़ीचर जोड़ा गया है।

    इस भयावह जीजीजीजीजी संचार क्रांति से भारतीय मीडिया अब समाज के दर्पण, जनमत, जनसुनवाई, मिशन वगैरह से हटकर विशुध कारोबार है सत्ता और फासिज्म के राजकाज के पक्ष में,जिसे देश के रहे सहे ससंधन भी तेल और गैस की तरह रिलायंस के हो जायें।यह जहरीला रसायन आम जनता के हित में कितना है,पत्रकारिया के संकट के मुकबाले हमारे लिए फिक्र का मुद्दा यही है।

    भारत सरकार के बाद रिलायंस समूद देश में सबसे ताकतवर संस्था है।विकिपीडिया के मुताबिकः

    रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड {अंग्रेज़ी: Reliance Industries Limited) एक भारतीय संगुटिकानियंत्रक कंपनीहै, जिसका मुख्यालय मुंबई, महाराष्ट्रमें स्थित है। यह कंपनी पांच प्रमुख क्षेत्रों में कार्यरत है: पेट्रोलियम अन्वेषण और उत्पादन, पेट्रोलियम शोधन और विपणन, पेट्रोकेमिकल्स, खुदरा तथा दूरसंचार[2][3]

    आरआईएल बाजार पूंजीकरण के आधार पर भारत की दूसरी सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप कारोबार करने वाली कंपनी है एवं राजस्व के मामले में यह इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशनके बाद भारत की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है।[4] 2013 के रूप में, यह कंपनी फॉर्च्यून ग्लोबल 500सूची के अनुसार दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में 99वें स्थान पर है।[5]आरआईएल भारत के कुल निर्यातमें लगभग 14% का योगदान देती है।[6]


    हमने पत्रकारिता नौकरी के लिए नहीं की है।जीआईसी नैनीताल में जब हम ग्यारहवीं बारहवीं के छात्र थे,तभी हमारे तमाम सहपाठी आईएएस पीसीएस डाक्ट इंजीनियर वगैरह वगैरह होने की तैयारी कर रहे थे।बचपन से जीआईसी के दिनों तक हम साहित्य के अलावा जिंदगी में कुछ और की कल्पना नहीं करते थे।अब जनपक्षदर पत्रकारिता के लिए साहित्य और सृजनशील रचनाधर्मिता को भी तिलांजलि दिये दो दशक पूरे होने वाले हैं।पूरी जिंदगी पत्रकारिता में खपा देने वाले हम जैसे नाचीज लोगं के लिए यह बहुत बड़ा झटका है,काबिल कामयाब लोगों के लिए हो या न होजो नई विश्व व्यवस्था,फासिज्म के राजकाज की तरह रिलायंस समूह के साथ राजनैतिक रुप से सही कोई न कोईसमीकरण जरुर साध लेंगे।हम हमेशा इस समीकरणों के बाहर हैं।

    डीएसबी में तो कैरियरवादी तमाम छात्र कांवेंट स्कूलों से आकर हमारे साथ थे।जब हम युगमंच,पहाड़ और नैनीताल समाचार से जुड़े तब भी हमारे साथ बड़ी संख्या में कैरियर बनाने वाले लोग थे जिन्होंने अपना अपना कैरियर बना भी लिया।

    हममें फर्क यह पड़ा कि गिर्दा राजीव दाज्यू और शेखर पाठक जैसे लोगों की सोहबत में हम भी पत्रकार हो गये।तब भी हम यूनिवर्सिटी में साहित्य पढ़ाने के अलावा कोई और सपना भविष्य का देखते न थे।दुनियाभर का साहित्य पढ़ना हमारा रोजनामचा रहा है,लेकिन नवउदारवाद के दौर में हमने साहित्यपढ़ना भी छोड़ दिया है।

    लेकिन उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी और चिपको आंदोलन की वजह से पत्रकारिता हम पर हावी होती चली गयी।हम अखबारों में नियमित लिखने लगे थे।उन्ही दिनों से हिंदुतस्तान समूह से थोड़ा अपनापा होना शुरु हो गया।खास वजह  वहां मनोहर श्याम जोशी, हिमांशु जोशी और मृणाल पांडे की लगातार मौजूदगी रही है।

    हमने टाइम्स समूह के धर्मयुग और दिनमान में लिखा लेकिन हिंदुस्तान के लिए कभी नहीं लिखा।हमने 1979 में जब एमए पास किया,उसके तत्काल बाद 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हो गयी और पिताजी के मित्र नारायण दत्त तिवारी देश के वित्त मंत्री बन गये।तिवारी के सरकारी बंगले में पिताजी के रहने का स्थाई इंतजाम था।वित्त मंत्री बनते ही तिवारी ने पिताजी से कहा कि मुझे वे दिल्ली भेज दें।उन्होंने कहा था कि यूनिवर्सिटी में नौकरी लग जायेगी और मैं बदले में उनके लिखने पढ़ने के काम में मदद कर दूं।

    पहाड़ और तराई में हमने तिवारी का हमेशा विरोध किया है तो यह प्रस्ताव हमें बेहद आपत्तिजनक लगा और हमने इसे ठुकरा दिया और फिर उर्मिलेश के कहने पर मदन कश्यप के भरोसे धनबाद में कोयलाखान और भारत में औद्योगीकरण,राष्ट्रीयता की समस्या के अध्ययन के लिए पत्रकारिता के बहाने धनबाद जाकर दैनिक आवाज में उपसंपादक बन गये।फिर हम पत्रकारिता से निकल ही नहीं सके।

    उन दिनों हिंदुस्तान समूह में केसी पंत की चलती थी और केसी पंत भी चाहते थे कि मैं हिंदुस्तान में नौकरी ले लूं और दिल्ली में पत्रकारिता करुं।हमने वह भी नहीं किया।

    हालांकि झारखंड से निकलकर मेऱठ में दैनिक जागरण की नौकरी के दिनों दिल्ली आना जाना लगा रहता था।दिनमान में रघुवीर सहाय के जमाने से छात्र जीवन से आना जाना था और वहां बलराम और रमेश बतरा जैसे लोग हमारे मित्र थे।बाद में अरुण वर्द्धने भी वहां पहुंच गये।देहरादून से भी लोग दिनमान में थे।लेकिन मेरठ में पत्ररकारिता करने से पहले रघुवीर सहाय दिनमान से निकल चुके थे और दिनमान से तमाम लोग जनसत्ता में आ गये थे।जिनमें लखनऊ से अमृतप्रभात होकर मंगलेश डबराल भी शामिल थे।नभाटा में बलराम थे और बाद में राजकिशोर जी आ गये।

    नभाटा,जनसत्ता, कुछ दिनों के लिए रमेश बतरा ,उदय प्रकाश,पंकज प्रसून की वजह से संडे मेल और शुरुआत से आखिर तक पटियाला हाउस में आजकल और हिंदुस्तान के दफ्तर में मेरा आना जाना रहा है।आजकल में पंकजदा थे।हिंदुस्तान में जाने की एक और खास वजह वहां संपादक मनोहर श्याम जोशी को देखना भी था।

    हम मेरठ जागरण में ही थे कि कानपुर जागरण से निकलकर हरिनारायण निगम दैनिक हिंदुस्तान के संपादक बने।दिल्ली पहुंचते ही उनने हमें मेरठ में संदेश भिजवाया कि हम उनसे जाकर दिल्ली में मिले।

    हम जागरण छोड़ने के बाद 1990 में ही उनसे जाकर मिल सके।

    यह सारा किस्सा इसलिए कि यह समझ लिया जाये कि निजी तौर पर हिंदुस्तान समूह में मेरी कोई दिलचस्पी कभी नहीं रही है।

    1973 से हम नियमित अखबारों में लिखते रहे हैं।वैसे हमने 1970 में आठवीं कक्षा में ही तराई टाइम्स में छप चुके थे,जहां संपादकीय में तराई में पहले पत्रकार शहीद जगन्नाथ मिश्र और संघी सुभाष चतुर्वेदी के बाद पत्रकारिता शुरु करने वाले हमारे पारिवारिक मित्र दिनेशपुर के गोपाल विश्वास भी थे,जो बरेली से अमरउजाला छपने के शुरु आती दौर में उदित साहू जी के साथ भी थे।1970 से जोड़ें तो 47 साल और 1973 से जोड़ें तो 44 साल हम अखबारों से जुड़े रहे हैं।

    नई आर्थिक नीतियों के नवउदारवादी मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था के दिनों में पूरे पच्चीस साल हमने इंडियन एक्सप्रेस समूह जैसे कारपोरेट संस्थान में बिता दिये लेकिन इस पच्चीस साल में एक दिन भी शायद ऐसा बीता हो जब हमने अमेरिकी साम्राज्यवाद,मुक्त बाजार और कारपोरेट अर्थव्यवस्था के खिलाफ न लिखा हो या न बोला हो।हमें नियुक्ति देने वाले प्रभाष जोशी के अलावा हमारा एक्सप्रेस समूह के किसी संपादक प्रबंधक से कोई संवाद नहीं रहा है।

    यहां तक कि ओम थानवी को बेहतर संपादक मानने के बावजूद उनकी सीमाएं जानते हुए संपादकीय बैठकों में भी लगातार अनुपस्थित रहा हूं।

    कारपोरेट तंत्र का हिस्सा बने बिना पत्रकारिता में कोई तरक्की संभव नहीं है।लेकिन अपनी तरक्की मेरा मकसद कभी नहीं रहा है।

    हमने छात्र जीवन में टाइम्स समूह में लिखकर नैनीताल में पढ़ाई का खर्च जरुर निकाला लेकिन पेशेवर पत्रकारिता में लिखकर कभी नहीं कमाया है।रिटायर होने के बावजूद मेरा लेकन कामर्शियल नहीं है।आजीविका के लिए हम नियमित अनुवाद की मजदूरी कर रहे हैं ताकि हमारी जनपक्षधरता और राशन पानी दोनों चलता रहे।

    पहले पहल मैं जब मुख्य उपसंपादक होकर नये पत्रकारों की भर्ती कर रहा था तब जरुर भविष्य में संपादक बनने की महात्वाकांक्षा रही होगी।लेकिन नब्वे के दशक में हम अच्छी तरह समझ गये कि जनपक्षधरता और कारपोरेट पत्रकारिता परस्परविरोधी हैं।दोनों नावों पर लवारी नामुमकिन है।जनपक्षधरता के रास्ते में तरक्की नहीं है।हमने जनपक्षधरता का रास्ता अख्तियार किया।हम अपनी नाकामियों के खुद जिम्मेदार हैं।अपने फैसलों के लिए मुझे कोई अफसोस नहीं है।

    हिंदुस्तान समूह से कुछ भी लेना देना नहीं होने या टाटा बिड़ला से खास प्रेम मुहब्बत न होने की बावजूद देश के रिलायंस समूह में समाहित होने की यह प्रक्रिया हमें बेहद खतरनाक लग रही है।तेल गैस और पेट्रोलियम की तरह मीडिया का कारोबार होगा,एक्सप्रेस समूह में पच्चीस साल तक आजाद पत्रकारिता करने के बाद यह भयंकर सच हम हजम नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हम पत्रकारिता के सिपाहसालार, मसीहा, संपादक ,आइकन, साहिबे किताब,प्रोपेसर वगैरह कभी नहीं रहे हैं और न होंगे।

    छात्र जीवन में हमने जैसे समय को जनता के हक में संबोधित कर रहे थे और पेशेवर पत्रकारिता में आम लोगों की तकलीफों और पीड़ितों वंचितों की आवाज की गूंज बने रहने की कोशिश की है,उसके मद्देनजर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में कारपोरेट एकाधिकार के जरिये सत्ता के रंगभेदी फासिज्म के कारोबार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा,उसकी हमें बहुत फिक्र हो रही है।

    काबिल और कुशल लोग इस तंत्र में भी पत्रकारिता कर लेेंगे,लेकिन जो पैदल सेना है,उनकी पत्रकारिता और उनकी नौकरी दोनों शायद दांव पर है।

    बहरहाल खबरों के मुताबिक एक अप्रैल 2017 से रिलायंस प्रिंट मीडिया पर अपना कब्जा जमाने के लिए मुफ्त में ग्राहकों को हिंदुस्तान टाइम्स बांटेगा। ये मुफ्त की स्कीम कहा कहाँ चलेगी इस बात की पुष्टि तो नहीं हो पाई है और इस पांच हजार करोड़ की डील में कौन कौन से हिंदुस्तान टाइम्स के एडिशन है और क्या उसमे हिंदुस्तान भी शामिल है इस बात की पुष्टि नहीं हो पा रही है लेकिन ये हिंदुस्तान टाइम्स में चर्चा तेजी से उभरी है कि हिंदुस्तान टाइम्स को रिलायंस ने पांच हजार करोड़ रुपये में ख़रीदा है और हिंदुस्तान टाइम्स ने ये समझौता रिलायंस से कर्मचारियों के साथ किया है।

    अगर यह खबर सच होती है तो हिंदुस्तान टाइम्स के कर्मचारी 1 अप्रैल से रिलायंस के कर्मचारी हो जाएंगे। फिलहाल रिलायंस द्वारा प्रिंट मीडिया में उतरने और हिंदुस्तान टाइम्स को खरीदने तथा मुफ्त में अखबार बांटने की खबर से देश भर के अखबार मालिकों में हड़कंप का माहौल है।सबसे ज्यादा टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है।

    खबर है कि शोभना भरतिया और रिलायंस के बीच यह डील कोलकाता में कुछ बैकरों और अधिकारियों की मौजूदगी में हुई है।इसका आशय भी बेहद खतरनाक है।



    तमिलनाडु में सेंधमारी और बंगाल में राम की सौगंध, गायपट्टी में मुंह की खाने की हालत में ग्लोबल हिंदुत्व का पलटवार!

    पंजाब,कश्मीर और असम के बाद बंगाली और तमिल राष्ट्रीयताओं के साथ बेहद खतरनाक खेल हिंदुत्व के नाम!

    ध्रूवीकरण समीकरणःसंघियों ने अमर्त्य सेन समेत बंगाल के बुद्धिजीवियों पर निशाना साधा तो ममता दीदी ने पचानब्वे फीसद मुसलमानों को दे दिया आरक्षण।

    नोटबंदी के बावजूद यूपी हारने के बाद उत्तराखंड भी संघ परिवार के सरदर्द का सबब!

    हरिद्वार में बाबा रामदेव ने पलटी मारी और कहा,पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ जाएगा और भारी उथल-पुथल मचेगी!

    पलाश विश्वास

    आज यूपी में दूसरे चरण का मतदान है।उत्तराखंड में भी आज जनादेश की कवायद है।इससे एक दिन पहले तमिलनाडु में दिवंगत जयललिता को चार साल की कैद के अलावा सौ करोड़ के जुर्माने की सजा सुप्रीम कोर्ट ने सुना दी है तो बंगाल में कल ही लव जिहाद के खिलाफ हिंदुत्व का घनघोर अभियान गायपट्टी की तर्ज पर चला है।इसके अलावा दक्षिण 24 परगना के मुस्लिम बहुल इलाकों से होकर मध्य कोलकाता के धर्मतल्ला के रानी रासमणि रोड तक संघ परिवार के हिंदू संहति मंच का विशाल जुलूस जय श्रीराम के जयघोष के साथ निकला है।

    बजरंगियों के मत्थे पर भगवा पट्टी थी तो नेताओं के सुर में  मुसलमानों के खिलाफ खुला जिहाद।डोनाल्ड ट्रंप का दुनियाभर में पहला खुल्ला समर्थन।

    उधर आय से अधिक संपत्ति मामले में 4 साल की सजा सुनाए जाने के बाद सरेंडर के लिए कुछ मोहलत मांगने सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं शशिकला को करारा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने एआईएडीएमके की नेता को बेंगलुरु स्थित ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने के लिए और वक्त दिए जाने से इनकार कर दिया है।

    खबरों के मुताबिक वह सरेंडर करने के लिए जल्दी ही बेंगलुरु ट्रायल कोर्ट के लिए रवाना होंगी। वह बुधवार शाम तक बेंगलुरु ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर कर सकती हैं। इससे पहले शशिकला ने मरीना बीच जाकर पूर्व सीएम जयललिता को श्रद्धांजलि अर्पित की।

    मुसलमान बहुल इलाकों में इस जुलूस पर छिटपुट पथराव और जबाव में जुलूस में शामिल बजरंगियों के तांडव की भी खबर है।

    सबसे खास बात है कि कभी आमार नाम वियतनाम,तोमार नाम वियतनाम के नारे के साथ अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे मुखर रहे कोलकाता में संघियों ने व्यापक पैमाने पर मुसलमानों के खिलाफ जिहाद का ऐलान करने वाले डान डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीरों के साथ उनके इस्लामविरोधी जिहाद के समर्थन में दक्षिण 24 परगना और कोलकाता में व्यापक पोस्टरबाजी की है,प्रगतिशील,धर्मनिरपेक्ष और उदारता के झंडेवरदार बंगाल के लिए यह बेहद शर्मनाक हादसा है।

    वामपक्ष के सफाये पर उतारु दीदी ने मुसलमान वोट बैंक अटूट रखकर फासिज्म के राजकाज के साथ जो जहरीला रसायन तैयार किया है,उसके नतीजे बंगाल में सीमाओं के आर पार भयंकर तो होंगे ही,बाकी देश भी अछूता नहीं रहेगा।

    गौरतलब है कि वामशासन काल में 1980 के सिख संहार,असम और पूर्वोत्तर में खूनखराबे और बाबरी विध्वंस के वक्त भी कोई धार्मिक ध्रूवीकरण नहीं हुआ था।

    अब 2011 के परिवर्तन के बाद यह ध्रूवीकरण आहिस्ते आहिस्ते सुनामी में तब्दील है।धूलागढ़ को लेकर दंगा व्यापक बनाने की हिंदुत्व मुहिम जारी है तो जिलों में लगातार सांप्रदायिक संघर्ष उत्तर बंगाल,मध्य बंगाल और दक्षिण बंगाल का रोजनामचा बन गया है।

    दुर्गा पूजा,सरस्वती पूजा और मुहर्रम के मौके पर भी अब तनातनी आम है।

    2014 से बंगाल में हिंदुओं के ध्रूवीकरण में बांग्लादेश में बचे खुचे दो करोड़ हिंदुओं और गैर मुसलमानों पर लगातार तेज होते हमलों के साथ साथ असम में उल्फाई राजकाज के साथ जमीनी स्तर पर संघी कैडरों की ममता राज में बेलगाम सक्रियता बहुत तेजी आयी है।बंगाल जीतने के लिए शरणार्थी समस्या नागरिकता कानून बनाकर गहराने के बाद संघियों ने शरणार्थियों को भी अपनी गिरफ्त में दबोच लिया है,जिनका बाकी कोई तरनहार नहीं है।

    शारदा फर्जीवाड़ा के तुरुप का पत्ता खींसे में रखकर दो सांसदों को गिरफ्तार करते ही दीदी हिंदुत्व की पटरी पर फिर वापस हो गयी हैं।हालांकि चुनावी समीकरण के मुताबिक उन्होंने मुसलमान वोट बैक को अटूट रखने के लिए ओबीसी आरक्षण के तहत बंगाल के पचानब्वे फीसद मुसलमानों को दे दिया है।पश्चिम बंगालके कमिशन फॉर बैकवर्ड क्लासेज ने सोमवार को यह तय किया कि मुस्लिम समुदाय की 'खास' जाति को भी ओबीसी कैटिगरी के अंतर्गत लाया जाना चाहिए। अब तक मुस्लिम समाज के करीब 113 समुदायों को ओबीसी कैटिगरी में शामिल कर लिया गया है।

    इसके विपरीत ओबीसी हिंदुओं को आरक्षण के बारे में उन्हें कोई सरदर्द नहीं है।बंगाल में ओबीसी जनसंख्या पचास फीसद से ज्यादा है।दलितों और मतुआ और शरणार्थियों के साथ उनके केसरियाकरण से बंगाल में अब हिंदुत्व की सुनामी है।

    इस खतरे का अंदेशा भी दीदी को खूब है।लेकिन वे अपने ही बिछाये जाल में उलझ गयी है।

    बहरहाल केसरिया सुनामी पर  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है  कि किसी भी समुदाय द्वारा की जाने वाली हिंसा से उनकी सरकार सख्ती से निपटेगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में दंगा भड़काने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दीदी ने कहा, 'हम उन्हें नहीं बख्शेंगे जो दंगे की आग भड़काते हैं और दूसरों को उकसाते हैं। हम किसी भी समुदाय, चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो, सिख हो या फिर ईसाई, किसी की भी हिंसक गतिविधियों से सख्ती से निपटेंगे।'

    दूसरी तरफ,शशिकला की जेलयात्रा के साथ साथ तमिलनाडु और तमिल राजनीति पूरी तरह संघ परिवार के शिकंजे में है।अन्नाद्रमुक द्रमुक आंदोलन की तरह दो फाड़ है और द्रमुक भी इस जुगत में है कि या तो सत्ता उसे किसी समीकरण के साथ मिल जाये या फिर मध्यावधि चुनाव हो जाये।

    जाहिर है कि जो भी सरकार बनेगी ,वह केंद्र सरकार के रहमोकरम पर होगी।तमिल राष्ट्रीयता तीन धड़ों में बंट गयी है और सत्ता समीकरण जो भी हो, तमिलनाडु में संघ परिवार की सेंधमारी चाकचौबंद है।

    जो भी नई सरकार बनेगी,वह जाहिर है कि केंद्र सरकार से नत्थी हो जायेगी और उस धड़े के सांसद केसरिया अवतार में होंगे।जो भूमिका बंगाल के तृणमूल की संसद में रही है।

    भारत संविधान के मुताबिक लोक गणतंत्र है।

    संविधान के मुताबिक संसदीय लोकतंत्र है।

    विविधता और बहुलता में एकता के मकसद से राष्ट्र का ढांचा संसदीय है और भाषावार राज्यों का भूगोल बना है।

    अमेरिका में पचास राज्य है।वहां संघीय ढांचे में राज्यों को ज्यादा स्वतंत्रता और स्वायत्ता है।हर राज्य का अपना कानून है।संघीय कानून सर्वत्र लागू होता नहीं है।वहां भी राष्ट्रीयताओं को स्वयात्तता है।इसी तरह सोवियत संघ में स्टालिन ने सभी राष्ट्रीयताओं को को समाहित करने के बवाजूद उनकी स्वायत्ता को खत्म नहीं किया था।इसके विपरीत बारत में केंद्रीयकृत सत्ता है।

    तमाम राष्ट्रीयताएं और राज्य केंद्र की सत्ता के आधीन बंधुआ हैं,जिनकी अपनी कोई स्वायत्तता या स्वतंत्रता नहीं है।

    राष्ट्र की सैन्यशक्ति राष्ट्रीयताओं के दमन में लगी है।

    मध्यभारत का आदिवासी भूगोल हो या मणिपुर और समूचा पूर्वोत्तर या फिर कश्मीर सर्वत्र यही कहानी है।

    बाकी हिमालयी क्षेत्र में गोरखालैंड आंदोलन के जरिये गोरखा राष्ट्रीयता के उभार के अलावा बाकी जगह फिलहाल केंद्र सरकार और उनके सूबेदारों की तानाशाही के बावजूद,घनघोर अस्पृश्यता के बावजूद,पलायन और विस्थापन के बावजूद अमन चैन है।अमन चैन इसलिए है कि न हिमाचल और उत्तराखंड में कोई आंदोलन है।राष्ट्र के दमन के बीभत्स चेहरे से वे फिलहाल मुखातिब वैसे नहीं है,जैसे कश्मीर, मणिपुर, छत्तीसगढ़ ,झारखंड या पंजाब की राष्ट्रीयताओं की अभिज्ञता है।

    यह अमन चैन कैसा है,उदाहरण के लिए हिमाचल और उत्तराखंड हैं,जहां बारी बारी से कांग्रेस और भाजपा में सत्ता हस्तांतरण है और जन पक्षधर ताकतों का कोई प्रतिनिधित्व राजनीति और सत्ता में नहीं है।आम जनता के जनादेश से एक से बढ़कर एक भ्रष्ट  नेता केंद्र या राज्य में सत्ता के दम पर पूरा प्रदेश और उसके संसाधनों का खुल्ला दोहन कर रहे हैं।जनहित,जन सुनवाई हाशिये पर है।

    उत्तराखंड के साथ पहले झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य बनाकर इन राष्ट्रीयताओं के केसरियाकरण में संघ परिवारको नायाब कामयाबी मिल गयी है।बाद में तेलंगना अलग राज्य बनाकर तेलुगु राष्ट्रीयता दो फाड़ करके दोनों धड़ों का केसरियाकरण हुआ है।

    झारखंड और छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल हैं।गोंड भाषा का भूगोल किसी भी भाषा के मुकाबले कम नहीं है।ब्रिटिश हुकूमत के समय गोंडवाना नाम से परिचित आदिवासी भूगोल कई राज्यों में बांट दिया गया है।संथाल,हो,मुंडा,भील,गोंड,कुड़मी जैसे आदिवासी समुदायों का दमन का सिलसिला आबाध है।

    अब वहां अकूत खनिज संपदा,वन संपदा और जल संपदा के खुल्ला लूट का सलवा जुड़ुम है और सहहदों के बजायभारत के सैन्यबल और अर्द्ध सैन्यबल वहां केसिरया राजकाज के संरक्षण में निजी कारपोरेट पूंजी के हित में राष्ट्रीयताओं का दमन कर रहे हैं।आदिवासी भूगोल की रोजमर्रे की जिंदगी लहूलुहान है और बाकी देश की सेहत पर कोई असर नहीं है।

    इसके बावजूद अमेरिका या सोवियत संघ की तरह भारत में किसी नागरिक को राष्ट्रीयता पर बोलना निषेध है।संसदीय राजनीति में भी यह निषिद्ध विषय है।

    इसके विपरीत केंद्र सरकार,कारपोरेट कंपनियों और राजनीतिक दलों को इन राष्ट्रीयताओं के साथ खतरनाक खेल खेलने की खुली छूट है।

    इस खतरनाक खेल के दो ज्वलंत उदाहरण पंजाब और असम हैं।

    कश्मीर तो बाकायदा निषिद्ध विषय है और वहां की जनता के नागरिक और मानवाधिकारों पर सबकी जुबान बंद है।

    बाकी देश से अलग थलग होने के साथ सात भारत पाक  युद्ध का रणक्षेत्र बने रहने की वजह से कश्मीर से बाकी देश के संवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।

    कश्मीर और मणिपुर में दोनों जगह सशस्त्र सैन्यबल विशेषाधिकार कानून आफ्सा  लागू है।हम मणिपुर की जनता के हकहकूक को लेकर कमोबेश बोलते लिखते रहे हैं।कश्मीर के मामले में वह गुंजाइश भी नहीं है।

    नागरिकों का बोलना लिखना मना है,लेकिन वहां सत्ता की राजनीति चाहे तो कुछ भी कर सकती है।इसका कुल नतीजा इस महादेश में परमाणु हथियारों की दौड़ है।आजादी के बाद कश्मीर को लेकर युद्ध की आड़ में देशभक्ति और अंध राष्ट्रवाद के रक्षा कवच से लैस सत्तावर्ग ने रक्षा सौदों में अरबों अरबों कमाया है और विदेशों में जमा कालाधन का सबसे बड़ा हिस्सा कश्मीर संकट की वजह से हथियारों की होड़ में अंधाधुंध रक्षा व्यय है,जो वित्तीय घाटा और लगातार बढ़ते विदेशी कर्ज के सबसे बड़े कारण हैं,लेकिन वित्तीय प्रबंधकों और अर्थशास्त्रियों के लिए भी रक्षा व्यय शत प्रतिशत विनिवेश के बावजूद निषिद्ध विषय है।

    तमिल राष्ट्रीयता,सिख और पंजाबी राष्ट्रीयता,असमिया,मणिपुरी  और बंगाली राष्ट्रीयताएं आदिवासी भूगोल की राष्ट्रीयताओं और कश्मीरियत से कहीं कम संवेदनशील और विस्फोटक नहीं है,जहां भाषा,संस्कृति और मानसिकता केसरियाकरण और हिंदुत्वकरण की धूम के बावजूद वैदिकी संस्कृति से अलग है।

    तमिल शासकों ने दक्षिण पूर्व एशिया में फिलीपींस से लेकर कंबोडिया तक अपना साम्राज्य विस्तार किया है और तमिल इतिहास का आर्यवर्त के भूगोल और इतिहास से कोई लेना देना नहीं है।

    हिंदुत्व के सबसे भव्य और धनी हिंदू धर्मस्थल होने के बावजूद तमिलनाडु में द्रविड़ संस्कृति है।तमिल संस्कृत से भी प्राचीन भाषा है और तमिलनाडु के लोग तमिल के अलावा अंग्रेजी से भी कोई प्रेम नहीं करते।उनका इतिहास सात हजार साल तक निरंतर धाराप्रवाह है जहां कोई अंधायुग नहीं है।

    अस्सी के दशक में तमिल ईलम विद्रोह को दबाने के लिए भारतीय शांति सेना पंजाब और असम में राष्ट्र के  लहूलुहान हो जाने के बाद,बावजूद भेजी गयी थी।उसका अंजाम आपरेशन ब्लू स्टार जैसा भयंकर हुआ।

    इसका अलग ब्यौरा दोहराने की जरुरत नहीं है।

    बहरहाल पंजाब,असम और त्रिपुरा में राष्ट्रीयता के सवाल पर जो खतरनाक खेल खेला गया है,उसीकी पुनरावृत्ति अब बंगाल और तमिलनाडु में फिर हो रही है।

    सरकारें आती जाती हैं लेकिन कश्मीर और असम की समस्याएं अभी अनसुलझी हैं,पंजाब के मसले सुलझे नहीं है।गोरखालैंड बारुद के ढेर पर है।

    ऐसे में समूचे असम और पूर्वोत्तर से लेकर बंगाल तमिलनाडु तक हिंदुत्व की प्रयोगशाला में तब्दील है,इससे हिंदुत्व का पुनरुत्थान हो या न हो,इन राष्ट्रीयताओं के उग्रवादी से लेकर आतंकवादी विकल्प देश के भविष्य और वर्तमान के लिए भयंकर संकट में तब्दील हो जाने का अंदेशा है।

    असम में साठ के दशक से संघ परिवार उल्फाई राजनीति के हिंदुत्व एजंडा को अंजाम दे रहा है तो अब असम में उल्फाई राजकाज संघ परिवार का है और अब संघ परिवार के कारपोरेट हिंदुत्व के निशाने पर न सिर्फ बंगाल,समूचा पूर्वोत्तर से लेकर तमिलनाडु तक हैं।ये बेहद खतरनाक हालात हैं।

    बांग्लादेश की सरहद भी पाकिस्तान की सरहद से कम संवेदनशील नहीं है। बांग्लादेश में भारतविरोधी गतिविधियां पाकिस्तान से कम नहीं है और फर्क इतना है कि फिलहाल बांग्लादेश में भारत की मित्र सरकार है और बांग्लादेश फिलहाल शरणार्थी संकट खड़ा करते रहने के बावजूद भारत के लिए कोई फौजी हुकूमत नहीं है।

    फिरभी बंगाल में धार्मिक ध्रूवीकरण से राष्ट्रीयता का जो खतरनाक उग्रवादी तेवर है,उससे डरने की जरुरत है क्योंकि कश्मीर और पंजाब,तमिलनाडु की तरह यह उग्र राष्ट्रीयता सरहदों के आर पार है।

    बहरहाल,यूपी में जिन इलाकों में आज वोट गिरने हैं,वहां बाकी यूपी से मुसलमानों के वोट ज्यादा हैं।जो 26 फीसद के करीब बताया जाता है।

    पश्चिम यूपी में मुसलमानों के हिचक तोड़कर फिर दलित मुसलिम एकता के तहत भाजपा खेमे में आ जाने से संघियों के मंसूबे पर पानी फिर गया है।

    मायावती ने सौ मुसलमान प्रत्याशियों को टिकट दिये हैं तो समरसता के संघ परिवार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डान डोनोल्ड ट्रंप को यूपी जैसे राज्य में कोई टिकट नहीं दिया है,यह कल एच एल दुसाध ने डंके की चोट पर लिखा है।

    इसका असर हुआ तो दूसरे चरण में ही छप्पन इंच का सीना कितना चौड़ा और हो जाता है,यह नजारा देखना दिलचस्प होगा।

    जबकि हिंदू ह्रदय सम्राट और उनके गुजराती अश्वमेध विशेषज्ञ सिपाहसालार ने उत्तराखंड जैसे छोटे से राज्य को जीतने के लिए एढ़ी चोटी का जोर लगा दिया है और वहां भी इस चुनाव में मणिपुर की महिलाओं की तरह केंद्र की फासिस्ट सत्ता के खिलाफ महिलाएं मजबूती से लामबंद हो गयी है।

    उत्तराखंड राज्य आंदोलन की शहादतें मुखर होने लगी हैं और महिला आंदोलनकारियों के समर्थन से खड़े निर्दलीय उम्मीदवार कुमायूं और गढ़वाल में भाजपाइयों कांग्रेसियों के सत्ता समीकरण बिगड़ने में लगे हैं।

    अलग राज्य बनने के बाद पलायन और विस्थापन में तेजी के अलावा उत्तराखंड को कुछ हासिल नहीं हुआ है,यह शिकायत आम है।

    बाबा रामदेव की कपालभाति भी अब संघ परिवार के लिए सरदर्द का सबब है क्योंकि उन्होंने अबकी दफा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का भी खुले तौर पर समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह इस चुनाव में 'निष्पक्ष' हैं। रामदेव ने आगे कहा कि इस बार के विधानसभा चुनाव से उत्तराखंड में भूचाल आ सकता है।

    निष्पक्ष रहने की वजह पूछे जाने पर रामदेव ने कहा कि देश की जनता काफी विवेकशील है।

    मजे की बात है कि बाबा रामदेव ने कहा कि देश की जनता ही चायवाले को प्रधानमंत्री और पहलवान को मुख्यमंत्री बना देती है।

    गौरतलब है कि बाबा रामदेव ने लोकसभा चुनाव के वक्त खुले तौर पर भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी का समर्थन किया था।

    मौसमी बाबा राजनीति मौसम के विशेषज्ञ है और कारपोरेट मार्केटिंग और कारपोरेट लाबिइंग में वे कारपोरेट घरानों और कंपनियों के मुकाबले भारी हैं।

    ऐसे में बाबा का तेवर संघ परिवार के लिए खतरे की घंटी है।

    गौरतलब है कि दस साल तक वे मनमोहन के खास समर्थक थे।फिर हवा बदलते देखते ही संघ परिवार की शरण में चले गये।

    यूपी और उत्तराखंड में सबकुछ केसरिया होता तो बाबा का हिंदुत्व मिजाज ऐसे न बदला होता।यूपी उत्तराखंड में अगर भाजपा जीत रही होती तो धुरंधर कारोबारी बाबा रामदेव का कारपोरेट दिमाग कुछ अलग ही गुल खिलाये रहता।

    यही नहीं,बुधवार को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुई वोटिंग के दौरान कई दिग्गजों ने वोट डाला तो हरिद्वार के पोलिंग बूथ पर वोट डालने पहुंचे बाबा रामदेव ने कहा कि इस बार की वोटिंग में देश का विकास सबसे बड़ा मुद्दा है।

    योग गुरु का साफ साफ कहना है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ जाएगा और भारी उथल-पुथल मचेगी।

    ईमानदार को डाले वोट हरिद्वार में वोट डालने आए बाबा रामदेव से पत्रकारों ने जब पूछा कि क्या उथल-पुथल होगी, तो उन्होंने इसका कोई सीधा सा जवाब देने की बजाए यही कहा कि इस बार के चुनाव खासे महत्व के हैं.

    बहरहल हलात जो है,जीत भी जाये उत्तराखंड तो पंजाब और यूपी का घाटा पाटकर राज्यसभा में बहुमत पाना बेहद मुश्किल है।

    अब तय है कि जो भी हो,यूपी में संघ परिवार का वनवास खत्म नहीं होने जा रहा है।पंजाब में भी खास उम्मीद नहीं है।

    गोवा में फिलहाल कांग्रेस बढ़त पर नजर आ रही है।

    असम के बाद समूचा पूरब और पूर्वोत्तर को केसरिया बनाने की मुहिम तेज होने के मध्य उत्तराखंड में जीत हासिल करके साख बचाने की बची खुची उम्मीद के सहारे रामराज्य के कारपोरेट हिंदुत्व के ग्लोबल एजंडा पर अमल करने में भारी रुकावटें पैदा हो रही है।

    दूसरी तरफ बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना नजारा है।मीडिया रिलायंस हवाले है तो देश रिलायंस है और इसलिए सुप्रीम कोर्ट की निषेधाज्ञा के बावजूद निजी चैनलों में केसरिया सुनामी है और अखबारी कागज भी अब सिरे से केसरिया है।

    मालिकान के सत्ता समीकरण के मुताबिक एक श्रमजीवी पत्रकार संपादक ने चुनाव आयोग की निषेधाज्ञा के बावजूद  एक्जिट पोल छाप दिया तो उसे गिरफ्तार कर लिया,उससे उस अखबार के या बाकी रिलायंस मीडिया के केसरिया एजंडा में फर्क नहीं पड़ा है।मसलन बंगाल में एक बड़े अंग्रेजी अखबार के बांग्ला संस्करण में दावा किया गया है कि नोटबंदी से यूपी और उत्तराखंड में संघ परिवार के वोट दो फीसद बढ़ गये हैं और भाजपा को बढ़त है।

    इसी तरह तमाम रेटिंग एजंसियों,अर्थशास्त्रियों की भारतीय अर्थव्यवस्था की डगमगाती नैय्या पर खुली राय के विपरीत सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान मीडिया केसरिया रंगभेदी फासिस्ट हिंदुत्व के राजकाज में भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।इन्हीं झूठे ख्वाबों में गरीबी दूर करने और सुनहले दिनों का सच है।

    बंगल में हिंदूकरण अभियान के तहत प्रदेश भाजपा के संघी  अध्यक्ष व विधायक दिलीप घोष एकदम प्रवीण तोगड़िया के अवतार में हैं और उनकी भाषा डान डोनाल्ड की है।

    इन्हीं डान घोष ने हिंदुत्व के एजंडे को जायज ठहराने के लिए बंगाल के उदार,धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों पर निशाना साधा है।

    डान घोष  ने नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन पर खासतौर पर निशाना साधा है।घोष ने  एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, 'हमारे एक बंगाली साथी ने नोबल पुरस्कार जीता और हमें इस पर गर्व है लेकिन उन्होंने इस राज्य के लिए क्या किया? उन्होंने इस राष्ट्र को क्या दिया है?'

    उन्होंने कहा, 'नालंदा विश्वविद्यालय के चांसलर के पद से हटाए जाने से सेन अत्यधिक पीड़ित हैं। ऐसे लोग बिना रीढ़ के होते हैं और इन्हें खरीदा या बेचा जा सकता है और ये किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं।'

    घोष के मुताबिक  बंगाल के बुद्धिजीवी मेरुदंडविहीन है। बंगाल की शिक्षा व शिक्षा व्यवस्था की हालत बदतर होते जा रहे हैं, लेकिन बंगाल के बुद्धिजीवी चुप हैं। कोई आवाज नहीं उठा रहा है। कोई कुछ भी नहीं कह रहे हैं।अपनी सुविधा के लिए पहले वामपंथियों के पक्ष में लाल चोला पहन लिये थे और अब तृणमूल की शिविर में शामिल हो गये हैं।  

    आगे सरस्वती वंदना का अलाप है।घोष ने कहा है कि बंगाल के शिक्षण संस्थानों में मारपीट हो रही है। विद्यार्थी सरस्वती पूजा नहीं कर पा रहे हैं। सरस्वती पूजा करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। दुर्गापूजा विसर्जन के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। बंगाल से अब आइएएस व आइपीएस ऑफिसर नहीं बन रहे हैं।



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    বঙ্গযান - Bongozan
    July 9, 2015 ·

    মহাভারতের কথা অমৃতসমান কেন?

    - কলিম খান

    'নাস্তিক' বলে যে আদৌ কিছু হয় না, হওয়া সম্ভব নয়; একথা অনেকেই এখনো বুঝতে পারেন না। যে-মানুষ কোনওরকম প্রাতিষ্ঠানিক-ভগবানকে বিশ্বাস করে না, সে প্রাকৃতিক শক্তিতে বিশ্বাস করে। কোনও কিছুতেই বিশ্বাস নেই, এমন মানুষ এক মুহূর্ত্তও বেঁচে থাকতে পারে না। এখুনি যদি একটা ভূমিকম্প হয় আর ছাদটা যদি এখুনি ভেঙে পড়ে যায়, যেখানে পা ফেলব সেখানে যদি পা-টা ঢুকে যায়, যদি ওই গাছের তলা দিয়ে যাওয়ার সময় গাছটা মাথায় ভেঙে পড়ে! ইত্যাদি ইত্যাদি ইত্যাদি। এমনকি একটা গরু কিংবা কুকুরও প্রাকৃতিক নিয়মগুলির উপর বিশ্বাস করে তবে বেঁচে থাকতে পারে। অন্যথায় তার মৃত্যু অবশ্যম্ভাবী।

    কিংবা, আপনি ফুটপাথ ধরে হেঁটে চলেছেন, রাস্তার গাড়ীটা যে লাফ দিয়ে এসে আপনার ঘাড়ে পড়বে না, সামাজিক ও প্রযুক্তিগত এই নিয়মের উপর একটা বিশ্বাস তো আপনার আছেই। ওই বিশ্বাস না-থাকলে কোলকাতার ফুটপাথ দিয়ে লক্ষ লক্ষ মানুষ হাঁটতেই পারত না, আপনিও পারতেন না। কোনও একটা জীব ঘুরে ফিরে বেড়াচ্ছে, অথচ তার প্রাকৃতিক বা সামাজিক কোনওরকম বিশ্বাসের ক্ষেত্রই নাই, এটি একটি অবাস্তব কল্পনা। একটা জীব বেঁচে বর্ত্তে আছে, অথচ তার কোনও কিছুর উপর বিশ্বাস নেই এটা একেবারেই অসম্ভব। জগতের সবকিছু যে-যার নিয়মে চলছে, এই বিশ্বাস সকল জীবের মনের গভীরে অন্তঃসলিলা। আর ভালো মানুষেরা ওই বিশ্বাসকেই অনুবাদ করে নেন নিজের নিজের ঈশ্বর-প্রতীকে। এছাড়া আস্তিকতা আর কিছুই নয়। আমি প্রাতিষ্ঠানিক আস্তিকতা বা ধান্দাবাজি আস্তিকতার কথা বলছি না।

    যেহেতু প্রাতিষ্টানিক-ভগবানকে নিয়ে নানান ব্যবসা চলছে, আপনি কোনও প্রাতিষ্ঠানিক ভগবানে বিশ্বাস করলেন না। কিন্তু প্রাকৃতিক নিয়মগুলিতে বিশ্বাস করলেন। অর্থাৎ আপনার নাস্তিকতা কেবল তথাকথিত ঈশ্বর-অবিশ্বাসেই সীমাবদ্ধ। ভালো কথা। কিন্তু তাই বলে আপনার মৃত্যুচিন্তা হবে কেন? মৃত্যু বলতে, আমি বলছি - অফ্‌ হয়ে যাওয়া। বাতিটা জ্বলছিল, নিভে গেল তো মরে গেল, উবে গেল, এইরকম। তেমন কি মানুষের ক্ষেত্রে কখনও হয়, না হওয়া সম্ভব? না, সেভাবে মানুষ কখনো মরে না। মানুষ তো একটা দ্বৈত সত্তা, কেননা প্রত্যেক মানুষই তো আসলে একটা 'দৈহিক-মানুষ' আর একটা 'মানসিক-মানুষ'। দৈহিকভাবে তো মানুষ এই পৃথিবীতে থেকেই যায়, মানসিকভাবেও থেকে যায়। আর অমৃতপান করলে তো কোনও কথাই নেই। তার মৃত্যু হবার কোনও উপায়ই নেই তখন।

    দৈহিকভাবে মানুষ থেকে যায় কেমন করে? 'পুত্ররূপে জন্মে লোক ভার্য্যার উদরে। তেকারণে জায়া বলি বলয়ে ভার্য্যারে।'(১)। তো, দেখা যাচ্ছে, স্ত্রীর গর্ভে আপনি যে-সন্তান উত্‌পাদন করলেন, সে আসলে আপনিই। তাই তো সন্তান উত্‌পাদনকে 'রি-প্রোডাকশান' বলে। সেই কারণেই তো রাজা হেনরি-১-এর ছেলের নাম হয় হেনরি-২, তার ছেলে হেনরি-৩ ইত্যাদি। কিন্তু 'স্ত্রী' (যাহাতে গর্ভ সংহত হয়',) তো মানুষের একটি নয়, হতে পারে না। তাই তার 'গর্ভ সংহত হয়' আরও অনেক 'ক্ষেত্রে'ই। জমিতেও গর্ভ সংহত হয়, সেখানে আপনার লিঙ্গের কাজটা করে 'লাঙ্গল'। 'পুত্র'(২)-রূপে সেখানে 'উপজাত' হয় শষ্যফল। এমনকি যে-শিক্ষাপ্রতিষ্ঠানে আপনি পড়াচ্ছেন, সেখানেও 'গর্ভ সংহত হয়'। সেখানে আপনার লিঙ্গের কাজটা করে আপনার ডিগ্রির লেজ বা 'লাঙ্গুল', যেটা থাকে আপনার নামের পিছনে। আর সে ক্ষেত্র থেকে বহু এম.এ.পাশ বি.এ.পাশ উত্‌পাদিত হয়। 'পুত্র' উত্‌পাদনের জন্য মানুষের এ'রূপ অজস্র রকমের লিঙ্গ(৩) ও অজস্র রকমের যোনি (zon-e বা ক্ষেত্র) রয়েছে। তার মানে, একটা মানুষ সারাজীবন ধরে যত রকমের ক্ষেত্রের সংস্পর্শে এসে যত রকমের 'পুত্র' উত্‌পাদন করে, সেসব কিছুর মধ্যেই সে দৈহিকভাবে একটু একটু করে থেকে যায়। এর পরও যে-মানুষটা বাকী থাকে, তার শ্বাস প্রশ্বাস বন্ধ হয় গেলে আমরা তাকে গোর দিয়ে দেই। বাকী মানুষটা তখন গিয়ে জমা হয় আমাদের মাটির তলায় সংগৃহীত পেট্রলের রেকারিং ডিপজিটে আর বসুধার ফিক্সড্‌ ডিপজিটে। দৈহিকভাবে মানুষটার মরার কোনও উপায়ই নেই।

    আর 'মানসিক-মানুষ'টাও শ্বাস-প্রশ্বাস বন্ধ হলেই তত্‌ক্ষণাত্‌ মরে যায় না। সে জায়গা নেয় উত্তরসূরিদের মনের মাটিতে। সেখানে দুটো 'লোক' বা স্ফিয়ার রয়েছে। উত্তরসূরিদের মনের মাটির ওপরটা 'স্মৃতিলোক', আর তলাটা 'বিস্মৃতিলোক'। 'মানসিক-মানুষ'টা প্রথমে জায়গা নেয় স্মৃতিলোকে। সেখানে যতদিন সে থাকে ততদিন সে মরে না, ততদিন সে অমর হয়ে থাকে। তবে কতদিন সেখানে সে থাকতে পারবে, সেটা নির্ভর করে সে কী পরিমাণে 'পুণ্য' অর্জ্জন করেছে তার ওপর। 'পুণ্যক্ষয়' হয়ে গেলেই তাকে মনের মাটিতে গোর দিয়ে দেওয়া হয়; সে চলে যায় বিস্মৃতিলোকে। একমাত্র বিস্মৃতিলোকে চলে গেলেই 'মানসিক-মানুষ'টা মরে যায়। রবীন্দ্র-নাথের অর্জ্জিত সমস্ত 'পুণ্য' ক্ষয় হয়ে এখনও শেষ হয়ে যায়নি বলে বাঙলা সাহিত্য- পাঠকেরা তাঁকে তাঁদের মনের মাটিতে এখনও গোর দিয়ে দেননি, তাই তিনি আজও অমর। কিন্তু 'পুণ্য' ফুরিয়ে গেছে বলে, সৌরীন্দমোহন, শৈলজানন্দদেরকে বাঙলা সাহিত্যপাঠকেরা তাঁদের মনের মাটিতে গোর দিয়ে দিয়েছেন। তাই তাঁরা আজ মৃত। কারণ উত্তরসূরীর স্মৃতিলোকে বেঁচে থাকতে হলে 'পুণ্য' চাই। 'পুণ্য'ই এই 'লোক'-এর মাস্টার কার্ড, পাশপোর্ট ভিসা। হাতে 'পুণ্য' নাই তো স্মৃতিলোকে মানুষটার স্থান নাই। সে তখন বিস্মৃতিলোকে প্রেরিত এবং অতএব মৃত।

    অমৃত পান করতে পারলে মানুষ নাকি অমর হয়ে থাকে অর্থাত্‌ উত্তরসূরিদের স্মৃতিলোকে দিব্যি বেঁচে থাকতে পারে। কিন্তু 'অমৃত' জিনিসটা কোথায় পাওয়া যায়, সেটা এখনও কেউ জানে না। কোনও কর্পোরেট হাউস 'অমৃত' নামে কোনও প্রোডাক্ট এখনও মার্কেটে লঞ্চ্‌ করেনি। আদিকালে যে-অমৃত পাওয়া যেত বলে শোনা যায়, মহেঞ্জদড়ো বা হরপ্পা থেকে সেরকম কিছু আদৌ পাওয়া যায় নি। পাওয়ার কোনও সম্ভাবনা রয়েছে, পুরাতত্ত্ববিদ শ্রীব্রতীন্দ্রনাথ মুখোপাধ্যায় তেমন কোনও আশ্বাসবাক্যও আমাদের শোনাননি। তবে হ্যাঁ, অমৃত না-পাওয়া গেলেও 'অমৃতসমান' একটা জিনিস বহুকাল থেকে সর্বত্রই পাওয়া যায়। তার নাম 'মহাভারতের কথা'। এই কথা আগে লিখেছিলেন কৃষ্ণ দ্বৈপায়ন বেদব্যাস। পরে সেকথাই বাঙলায় লিখে গেছেন আমাদের কাশীরাম দাশ। তাঁর মতে ঃ-

    'মহাভারতের কথা অমৃতসমান।
    কাশীরাম দাশ কহে শুনে পুণ্যবান'।

    তাই বলে অমৃতসমান এ-জিনিসটা কিন্তু খেতে নেই, শুনতে হয় এবং শুনলে নাকি অনেক 'পুণ্য' হয়। আর,সেই 'পুণ্য'ফলের জোরে মানুষ উত্তরসুরিদের মানসলোকের মাটির উপর অনেকদিন টিকে থাকতে পারে। কারণ 'পুণ্য'ই স্মৃতিলোকের ভিসা-কাম-মাস্টার কার্ড। এই 'পুণ্যে'র কারণে উত্তরসূরিরা তাদের মনের মাটিতে 'পুণ্যবান' মানুষকে 'পুণ্যক্ষয়' হয়ে শেষ না-হওয়া পর্য্যন্ত গোর দিয়ে দেয় না। উপরেই থাকতে দেয়। যতদিন থাকতে দেয়, ততদিন মানুষটা বেঁচে থাকে, অমর হয়ে থাকে। অতএব, মরতে যদি না-চান, (কেই বা চায়?) আর অমৃত যখন সরাসরি পাওয়াই যাচ্ছে না, তখন ওই 'অমৃতসমান' জিনিসটাই আপনাকে জোগাড় করতে হবে, শুনতে হবে, 'পুণ্য' অর্জ্জন করতে হবে। নইলে মরতে হবে, অমর হওয়া যাবে না। কিন্তু প্রশ্ন হল ঃ মহাভারতের কথা 'অমৃতসমান' কেন? তা শুনলে মানুষ 'পুণ্যবান' হয় কেন? এবং তার ফলে অমর হয় কেন? কীভাবে হয়?

    সর্ব্বযুগের স্বর্ব্বমানবের যৌথরূপটি নিয়েই 'মহামানব' কনসেপ্টটি কল্পনা করেছিলেন রবীন্দ্রনাথ। কনসেপ্টটি কেমন? আজ আমরা পরমানূ চুলো জ্বালিয়ে অনেক কাজই চালাচ্ছি। কিন্তু এই চুলোতে পৌঁছতে আমাদেরকে অনেক চুলো পেরিয়ে আসতে হয়েছে। সেই আগুন আবিষ্কার থেকে শুরু করে পরমাণু চুল্লী পর্য্যন্ত একটা দীর্ঘ যাত্রার ইতিহাস ও স্মৃতি রয়েছে আজকের এই পরমাণু চুল্লীর পিছনে। তার মানে, আজ আমরা যেখানে আছি, সেখানে কেবল আজকের ছশো কোটি মানুষ নেই। মানুষের উদ্ভবের পর থেকে আজ পর্য্যন্ত যত মানুষ জন্মেছেন, তাঁদের সকলের শ্রম নিষ্ঠা ও অভিজ্ঞতার ফলের সমগ্র ভাণ্ডারটাই আজ আমরা ধারণ করে বয়ে নিয়ে চলেছি। অর্থাত্‌ বিগত যুগসমূহের সমস্ত মানুষেরাই তাঁদের সমস্ত অর্জ্জন ও উদ্ভাবনের মাধ্যমে আমাদের মধ্যে বিরাজ করছেন। বিরাজ করতেন না, যদি অতীতের সঙ্গে আমাদের 'আত্মবিচ্ছেদ' ঘটে যেত। ইতিহাসজ্ঞান আমাদের ওই অতীতটাকে বংশানুক্রমে নবায়ন করতে থাকে। এর ফলে, পূর্ব্বসূরী বেঁচে থেকে যায় উত্তরসূরিদের স্মৃতিলোকে। তাই ইতিহাসকথাই অমৃতসমান কথা। মহাভারতকথায় রয়েছে মানবসভ্যতার সেই অমৃতসমান কথাসমূহ।
    তবে রামায়ণ মহাভারত পুরাণাদিকে আমাদের তথাকথিত ঐতিহাসিকেরা ইতিহাস বলে মানতে চাননি। কেন, এবং এর ফলে কী বিপদ হয়েছে আমাদের, সেসব কথা অন্যত্র(৪) আমি কমবেশী লিখেছি। তবে রবীন্দ্রনাথের মতে, ওগুলিই আমাদের ইতিহাস। আর ইতিহাস বলেই সেগুলি অমৃতসমান। আজকের আলোচনায় মহাভারতে কী ইতিহাস বিধৃত রয়েছে, তার অতি সংক্ষিপ্ত কিছু নিদর্শন দেওয়ার চেষ্টা করব।

    মহাভারতকথা বুঝতে গেলে সর্বাগ্রে জানতে হয় কৃষ্ণ দ্বৈপায়ন বেদব্যাসকে। কে এই ভদ্রলোক? জেনে রাখা ভালো, ইনি একজন চিরজীবী। চিরজীবী তো, এখন তিনি কোথায় থাকেন? কেউ সেকথা জানে না, কেউ তাকে চেনে না। অথচ সবাই জানেন, আমাদের বেদপুরাণাদি গ্রন্থসমূহের রচনা তাঁরই মহান কীর্ত্তি। ভাষাবিশেষজ্ঞগণ সেইসব গ্রন্থের ভাষার স্বভাব বিশ্লেষণ করে রায় দিয়েছেন যে, ওই গ্রন্থগুলি কমপক্ষে এক হাজার বছর সমকালের বিভিন্ন সময়ে লেখা। তার মানে, ব্যাস মরে গিয়ে থাকলেও অন্তত এক হাজার বছর বেঁচে ছিলেন। ...যাই হোক, সমগ্র ব্যাসকাহিনী আজ এখানে ব্যাখ্যা করা যাবে না। কেবল আমার অনুসন্ধানলব্ধ ফলটুকু বলে দিয়ে আমরা মহাভারতের কথায় চলে যাব। ব্যাস কোনও একজন ব্যক্তি নয়, ব্রাহ্মণ নয়, ব্রাহ্মণ পণ্ডিতদের একটা সমিতি। সমিতির প্রত্যেক সদস্যকেই ব্যাস বলা হত, লায়ন্স ক্লাবের প্রত্যেক সদস্যকে যেমন লায়ন বলা হয়, সেইরকম। এই সমিতি ভারতবর্ষে কমপক্ষে একহাজার বছর সক্রিয় ছিল। প্রতি পাঁচ বছর অন্তর 'ব্যাস-পূর্ণিমা'য় এই সমিতির সাধারণ সম্মেলন (মেলা') অনুষ্টিত হত, আজকের ইতিহাস কংগ্রেসের মতো। এরাই ভারতের ইতিহাস নানা রূপে লিখে তা প্রচার করতেন। এই সমিতির সদস্যদের উত্তরসূরিরা এখনো তাঁদের নামের শেষে 'ব্যাস' পদবী ব্যবহার করে থাকেন। জেনে রাখা ভালো, 'ব্যাস' পদবীধারী বহু মানুষ এখনও রয়েছেন ভারতে।

    ভারতবর্ষের ইতিহাসে বৌদ্ধবিপ্লব সর্ব্বাপেক্ষা যুগান্তকারী ঘটনা। এই সময় ব্রাহ্মণের বিশেষাধিকার প্রায় বিলুপ্ত করে দেওয়া হয় ও ষোড়শ মহাজনপদ গঠন করে রামরাজত্ব প্রতিষ্ঠা করা হয়, ভারতবর্ষ বৈদিক যুগ পেরিয়ে বৌদ্ধযুগে প্রবেশ করে, আর সে কাহিনী লিখে রাখেন বিপ্লববাদী বাল্মীকিরা। ৭৫০ খ্রিস্টাব্দে হয় কাউণ্টার রেভলিউশান। ব্রাহ্মণের সুপ্রিমেসি পুনঃপ্রতিষ্ঠিত হয়, বিগত যুগের প্রতিবাদীদের ক্ষত্রিয়ত্ব কেড়ে নেওয়া হয় ও তাদেরকে শূদ্র ও অস্পৃশ্য বলে ঘোষণা করা হয়। ভারতবর্ষ এবার বৌদ্ধযুগ পেরিয়ে হিন্দুযুগে প্রবেশ করে। তাই রবীন্দ্রনাথ এই নতুন যুগটিকে বলেছেন 'প্রতিক্রিয়ার যুগ'। প্রতিশোধ স্বরূপ বাল্মীকিদেরকেও শূদ্র ও অস্পৃশ্য বলে ঘোষণা করে দেওয়া হয়। বর্ত্তমান ভারতে 'বাল্মীকি' পদবীধারী যে কয়েক লক্ষ মানুষ আজ রয়েছেন,তাঁরা সবাই সেকারণেই মেথর শ্রেণীর।...ব্যাসেরা এবার মহাভারত লেখেন। তাতে স্বভাবতই ব্রাহ্মণের জয়গান গাওয়া হয়। লেখা হয় 'দণ্ডীপর্ব্ব'। ব্রহ্মহত্যার ফল কত মন্দ হতে পারে, সেবিষয়ে সবাইকে সতর্ক করা হয়। তবে,নিজেদের উত্তরসূরিরা ইতিহাস ভুলে গিয়ে যাতে আত্ম-বিচ্ছেদে না-ভোগে, তাই, বলতে গেলে, সভ্যতার সূত্রপাত থেকে ৭৫০ খ্রিস্টাব্দ পর্য্যন্ত সমগ্র ইতিহাসটাই সংক্ষেপে লিখে রাখা হয় মহাভারতে; এমনভাবে যাতে আত্মজ 'উত্তম-অধিকারী'রা প্রকৃত অর্থটা বুঝতে পারে এবং অনাত্মীয় 'নিম্ন-অধিকারী'রা অন্য অর্থ বোঝে। এই সেই কারণ, যেজন্য বলা হয়, যা নেই মহাভারতে, তা নেই ভারতে। এখন প্রশ্ন হল ঃ কী আছে মহাভারতে?

    মহাভারতে বর্ণিত হয়েছে ভারতের প্রকৃত ইতিহাস। বৈদিকযুগের প্রাক্কাল থেকে ৭৫০ খ্রিস্টাব্দ পর্য্যন্ত সমকালের ঘটনাবলী এই ইতিহাসে সংক্ষেপে লিপিবদ্ধ করে রাখা হয়েছে। তবে এই ইতিহাস লেখা হয়েছে ক্রিয়াভিত্তিক শব্দার্থবিধি অনসুরণকারী ভাষায়(৫), যে শব্দার্থবিধি নানান কারণে পরবর্ত্তীকালে সবাই ক্রমশ বিস্মৃত হন। ব্রিটিশযুগে সেই বিস্মৃতি আরও বাড়ে। তাই ওই গ্রন্থের যথার্থ মানে আর বোঝা যায়নি। সম্প্রতি সেই বিধি এই লেখকের হস্তগত হওয়ার পর, সেই বিধির সাহায্যে মহাভারতের যথার্থ পাঠ সমাপন করা হয়, ও মহাভারতে বর্ণিত ভারতের প্রকৃত ইতিহাস জানতে পারা যায়।

    ভারতের ইতিহাস হল মূলত দেবাসুর সংগ্রামের ইতিহাস, অসুর বনাম সুরের, দানব বনাম দেবতার একটানা দ্বন্দ্বের বা সংগ্রামের ইতিহাস। ওই এক দ্বন্দই নানা যুগে নানা নামে বর্ণিত হয়েছে। কখনো তা বৈদিক বনাম তান্ত্রিক, দক্ষ বনাম শিব, আর্য্য বনাম অনার্য্য, বেদবাদী বনাম উপনিষদবাদী, জ্ঞানজীবী বনাম পণ্যজীবীর সংগ্রাম রূপে বর্ণিত; ক্খনো বা ব্রহ্মপুত্র বনাম সিন্ধু(৬), হিমালয় বনাম বিন্ধ্য, অশ্বথ্‌থ বনাম বট, সূর্য্যবংশী বনাম চন্দ্রবংশী, রাবণ বনাম রাম, বৈদিক বনাম অর্হত্‌(বৌদ্ধ), সদাচারী বনাম ম্লেচ্ছাচারীদের সংগ্রাম নামেও বর্ণিত এবং অবশেষে সেই একই দ্বন্দ্ব কৌরব বনাম পাণ্ডব্দের সংগ্রামের ইতিহাস নামে বর্ণিত হয়েছে। প্রকৃতপক্ষে এ হল সমাজতন্ত্রবাদী বনাম ধনতন্ত্রবাদীদের একটানা সংগ্রামের ইতিহাস(৭)। সেকালে সমাজতন্ত্রবাদীকে অসুর ও ধনতন্ত্রবাদীকে দেবতা বলা হত। অবশেষে দেবতারা পর্য্যুদস্ত হয় ও মহাপ্রস্থান করে, আর বিপরীতে সমুদ্রযাত্রা নিষিদ্ধ করে দিয়ে ভারতবর্ষে ধনতন্ত্রের ভবিষ্যত্‌ সিল করে দেওয়া হয়।

    মহাভারতের কাহিনী শুরু হচ্ছে উপরিচর (aperture) বসু থেকে। যেমন জলের 'উপরে চরে' যে বুদবুদ, একটু ছিদ্রযুক্ত বায়ু, তেমনি সামাজিক ছিদ্রে (মার্ক্স কথিত 'in the pores of the society'-তে) তখন মালিকানার বোধটুকু সবেমাত্র দেখা দিচ্ছে। তার বহু পরে মালিকানার গন্ধ এসে হাজির হচ্ছে মত্‌স্যগন্ধায়, ব্যক্তিমালিকানা কিন্তু তখনও দূর-অস্ত্‌। তখন এসেছে শুধু যৌথ সমাজের যৌথসম্পত্তির যৌথমালিকানার বোধ। গরু ছাগলের কিংবা বাঁদর-যূথের যেমন আহরিত বস্তুসমুহের প্রতি কোনওরকম মালিকানার বোধই জন্মায় না, তেমনি আদি মানবের কোনওরকম মালিকানার বোধই ছিল না। প্রথম জন্মায় (যৌথসম্পত্তি আর তাই তখন সবেমাত্র যৌথ-মালিকানার বোধ জন্মাচ্ছে। পণ্য উত্‌পাদিন, ব্যক্তিমালিকানা, এসব তখনো বহু দূরের কথা।...আর কাহিনী শেষ হচ্ছে গিয়ে জন্মেজয়ে। 'জন্মেজয়' শব্দের অর্থ 'বিদ্রোহ' (ও বিদ্রোহীগণ)। এটি ভারতে জ্ঞানজীবীদের (বেদজীবীদের) বিরুদ্ধে শেষ বিদ্রোহ। এই বিদ্রোহ কেবলমাত্র অঙ্গ বঙ্গ কলিঙ্গে বা বাঙলা বিহার উড়িষ্যায় কিছুকালের জন্য [হর্ষবর্দ্ধনের(৮) কালে] সফল হয়েছিল, তারপর পর্য্যুদস্ত হয়। 'দাঁতে কাঠি দিয়ে ঘোরানো হয়' বিদ্রোহীদের। আর কী কী করা হয়, তার বিস্তারিত বিবরণ রয়েছে মহাভারতের শেষ পর্ব্ব 'দণ্ডীপর্ব্বে'। বৈদিকযুগের সূচনাপর্ব্ব থেকে হিন্দুযুগের সূত্র-পাতের কাল পর্য্যন্ত ভারতে যা যা ঘটেছিল, তার প্রায় সব কথাই রয়েছে মহাভারতে। এখানে, এই ক্ষুদ্র নিবন্ধের পরিসরে, এখন আমরা মূল দু-চারটি ঘটনাকে বিশ্লেষণ করে দেখব।

    অতীতের কথা জানতে গিয়ে আমরা যখন পিছন দিকে তাকাই এবং আমাদের অতীত ইতিহাসটাকে বুঝে নেবার চেষ্টা করে, তখন সবচেয়ে বেশী ঝামেলা পাকায় আমাদের মস্তিষ্কের মধ্যে গেড়ে বসে থাকা বর্ত্তমান ধারণাগুলো। আমরা প্রথমেই খুঁজতে যাই ব্যক্তিকে। কে করল, কী করল, কার ওপর করল, তাদের নাম কী কী, তাদের বাবার বা মায়ের নাম কী কী, ইত্যাদি ইত্যাদি। আর সেজন্যেই অতীত ইতিহাসের পাতাগুলি পড়তে গিয়ে বিশীর ভাগ ওইতিহাসিকই ব্যর্থ হন, ব্যর্থ হয়েছেম্ন। কারণ একটু ভেবে দেখলেই বোঝা যায়, ওরকম ভাবনাটাই ভুল। সুদূর অতীতে, সমাজে যখন ব্যক্তিমালিকানা প্রতিষ্ঠিতই হয়নি, ব্যক্তিমানুষ আসবে কোথ্‌থেকে? আর ব্যক্তিমানুষ না-জন্মালে,ব্যক্তিনাম পাবেন কীভাবে? সেকারণেই, আমাদের ভারতীয় টিভিতে যখন বিআরফিল্মসের 'মহাভারত' প্রচার চলছিল, সেসময় কোলকাতার এক ইংলিশ মিডিয়াম শিশু স্বভাবতই তার মাকে প্রশ্ন করেছিল - 'মা, যুধিষ্ঠিরের টাইটেল কী?' আনন্দবাজারের কড়চা-লেখকেরও খটকা লাগে, তাই তিনি ওই শিশুটিকে তার কড়চায় স্থান করে দেন। তবে কেবল যুধিষ্ঠিরের কেন, বেদপুরাণাদিতে বর্ণিত সেকালের চরিত্রগুলির কারোরই তো টাইটেল নেই। কারণ, তারা কেউই তো ব্যক্তিমানুষ নয় যে তাদের ব্যক্তিনাম থাকবে, টাইটেল থাকবে আমাদের মতন। তখন তো ধারণা যৌথ, লোকে ব্যক্তিকে বা কারককে গুরুত্ব দেয় না, গুরুত্ব দেয় ক্রিয়াকে। সামাজিক সত্তা হচ্ছে কতক-গুলি অ্যাকসন, অ্যাকটর নয়। ভাষাও গড়ে ঊঠছে, অ্যাকটরকে ভিত্তি করে নয়, অ্যাকসনকে বা ক্রিয়াকে ভিত্তি করে। লোকে দেহকে গুরুত্ব দেয় না একালের মতো, গুরুত্ব দেয় প্রাণকে (আত্মাকে)। তাই ব্যক্তি সেখানে গুরুত্বহীন। যৌথসমাজের, যে-সমাজ পণ্যবাহী সমাজের দিকে পা ফেলবে ফেলবে করছে, সেই সমাজের এটাই স্বাভাবিক দৃষ্টিভঙ্গী। কেননা তখনো খণ্ডবাদিতার সূত্রপাত হয়নি, ডিটারমিনিজম আসেনি, আত্মাভিত্তিক দৃষ্টিভঙ্গী তখনো স্বভাবতই বজায় রয়েছে।

    অতএব, মহাভারতে আমরা যাদের কাহিনী পড়ছি, তারা কতকগুলি সামাজিক সত্তা বই অন্য কিছু নয়। কোন্‌ কোন্‌ ব্যক্তিমানুষ সেই সকল সত্তার ভূমিকায় অভিনয় করছে, সেটা মহা-ভারতের লেখকের কাছে আদৌ গুরুত্বপূর্ণ,নয়। তাছাড়া, লেখক নিজেও তো একটি সামাজিক সত্তা, একটা চেয়ার, একটা সমিতি, একটা ফাংশনারি চরিত্র। ব্যক্তিমানুষেরা সেই সত্তার ভুমিকায় অভিনয় করে যায় মাত্র। সেভাবেই মহাভারতের চরিত্রগুলিকে বুঝতে হয়,বুঝতে হবে। তা নইলে ইউরোপিয়ানদের মতো আপনারও মনে হবে - যত্তো সব মিথ্যা, মাই্থলজি, রূপকথা।

    তা সে যাই হোক, ঝামেলার সূত্রপাত মত্‌স্যগন্ধার আবির্ভাবের পর থেকেই, যে কিনা তার কানীন পুত্র ব্যাসের মা এবং ব্যাসপিতা পরাশরের বরে দুর্গন্ধবতী থেকে সুগন্ধবতীতে পরিণত হয়েছে। তার দাবী, তার সন্তানই পৈতৃক সম্পত্তির বা সিংহাসনের উত্তরাধিকারী হবে, গঙ্গাপুত্র নয়। অতএব সূত্রপাত হয়ে গেল দুই ধারার। সেই দুই ধারার নবায়ন হল, ধৃতরাষ্ট্র ও পাণ্ডুর আবির্ভাবে। দুটোরই উদ্ভবের পিছনে রয়েছে মত্‌স্যগন্ধার সেই কানীন পুত্রের হাত, বলা ভালো, কানীন পুত্ররূপে জাত এক ব্রাহ্মণের হাত, জ্ঞানজীবীর হাত, ব্যাসের হাত। সে কাহিনী অনুসারে ধৃতরাষ্ট্র জন্মদোষে জন্মান্ধ, আর পাণ্ডু জন্মদোষে পাণ্ডুবর্ণ। বাকী শারীরিক অবস্থা তার ভালো হলেও সন্তান উত্‌পাদনের ব্যাপারে সে অভিশপ্ত। ধৃতরাষ্ট্রের পত্নী গান্ধারী চোখ বেঁধে রাখেন, তাঁর দুর্যোধন দুঃশাসন প্রভৃতি শত পুত্র আর এক কন্যা দুঃশলা। আর পাণ্ডুর দুই রানী, কুন্তী ও মাদ্রী, পাণ্ডুর ঔরসে তাঁদের পুত্র হবার উপায় নেই, তাই ধর্ম্ম বায়ু ইন্দ্র ও অশ্বিনীকুমারদ্বয়ের ঔরসে তাঁদের গর্ভে পাঁচটি ক্ষেত্রজ পুত্র যুধিষ্ঠির ভীম অর্জ্জুন নকুল ও সহদেব জন্মে। আর সূর্য্যের ঔরসে কুন্তীর গর্ভে কানীন পুত্ররূপে জন্মায় কর্ণ। এখন প্রশ্ন দাঁড়াল, কারা সম্পত্তির উত্তরাধিকারী হবে, সিংহাসন পাবে, ক্ষমতায় বসবে অর্থাত্‌ কারা সমাজ চালাবে, কৌরবেরা না পাণ্ডবেরা?ঔরসজাত পুত্রেরা না ক্ষেত্রজ পুত্রেরা? অসুরের উত্তরসূরিরা না দেবতাদের উত্তরসুরিরা? সমাজতন্ত্রবাদিরা না ধনতন্ত্রবাদিরা? ফল হয় এই যে, উভয়েই উভয়কে মেরে প্রায় নিকেশ করে ফেলে। ধনতন্ত্রবাদিরা প্রায় নিঃশেষে নির্মূল হয়ে ভারতভাগ করে বা 'মহাপ্রস্থান' করে। ক্ষত্রিয়নিধন প্রায় সাঙ্গ হয়, অর্থাত্‌ স্টেট পাওয়ার একেবারে ক্ষীণদেহ হয়ে পড়ে। ব্যবসাবিরোধী মানসিকতার বিজয় ঘোষিত হয় ও সমুদ্রযাত্রা নিষিদ্ধ করা হয়, (৮০০ খ্রিস্টাব্দ) বেঁচে থাকা গুটিকয় ব্রাহ্মণ তাঁদের মন্দিরকেন্দ্রিক সভ্যতাকে কোন মতে টেনে চলতে থাকেন। এই হল ভারতের অতি সংক্ষিপ্ত ইতিহাস, যা মহাভারতে লেখা রয়েছে।

    তার পরের কথা সবাই কমবেশী জানেন। সমগ্র ভারতের সমস্ত জমির সকল সম্পদের মালিক হল মন্দির - এ বিধি (৮০০ খ্রিস্টাব্দে) পুনঃপ্রতিষ্ঠিত,অথচ তাকে রক্ষা করার জন্য বেঁচে নেই কোনও ক্ষত্রিয়। অতএব মন্দির হয়ে দাঁড়াল লুঠের একমাত্র লক্ষ্য, আর ক্ষত্র-শক্তিহীন অনন্যোপায় ব্রাহ্মণ সেই মন্দিরকে টেনে নিয়ে যেতে লাগল দুর্গম থেকে দুর্গমতর স্থানে, পাহাড়ের শীর্ষে এবং, বলা ভালো, বিদেশী লুঠেরাদের শিকার রূপে এভাবেই তার কেটে গেল প্রায় পাঁচশো বছর। অবশেষে একদিন হাজির হল মোগল মাস্তান। দশ বিশ জন অশ্বারোহী নিয়ে যারা অরক্ষিত ভারতের এলাকা দখল করতে লেগে গেল, যাকে বলে 'ওয়াক অভার'। তার পরের কথা সবাই জানেন।

    পরাশর ও মত্‌স্যগন্ধার কথা

    মত্‌স্যগন্ধা সেই ক্ষুদ্র জনগোষ্ঠীকে বোঝায়, যারা দুটি যৌথ সামাজিক গোষ্ঠীর মাঝে মাল লেন্দেন খটাতো, বা পারাপার করত। এদের চাল বয়ে নিয়ে গিয়ে দিত ওদেরকে, তো ওদের গরুছাগল এনে দিত এদেরকে। আর স্বভাবতই, পারানির কড়ি স্বরূপ রেখে দেওয়া হত কিছু চাল এবং কিছু গরুছাগল। এগুলি হতো ক্ষুদ্র জনগোষ্ঠীর নিজেদের সম্পদ। মালিকানার গন্ধের জন্ম এভাবেই এই বা, হল কি, সমাজে আরা বেদের বা জ্ঞান্দের সুপ্রিমেসি দাবী করে আসছিল, সমাজ যাদেরকে নিন্দা করছিল 'পরপরিশ্রমভোগী' (পরাশর) ব'লে, তারা এসে জুটল এই মত্‌স্যগন্ধার দলে। যৌথসমাজের কেউ যাতে বুঝতে না পারে, তাই তারা মিথ্যার কুয়াশা সৃষ্টি করে এই মত্‌স্যগন্ধাদের সঙ্গে মিলিত হল, তাদেরকে পরামর্শ দিল। এদের মিলনে, কিছুদিনের মধ্যেই জন্মাল এক নতুন বেদজীবী বা জ্ঞানজীবী গোষ্ঠী। নিষিদ্ধ সামাজিক আচরণকে চিরকালই কৃষ্ণ বা ব্ল্যাক (যেমন ব্ল্যাক-মানি) বলা হয়। জনসমুদ্রের ফাঁকে মিথ্যার কুয়াশা ঘেরা দ্বীপে (মার্ক্স কথিত ''in the pores of the society') সেই কৃষ্ণ দ্বৈপায়নের জন্ম হয়ে গেল। কেবল তাই নয়, এতকাল মত্‌স্যগন্ধা গোষ্ঠীটির সমাজে দুর্নাম ছিল যে তাদের মধ্যে মালিকানার গন্ধ দেখা যাচ্ছে আর এই জন্য যৌথসমাজের চোখে তারা ছিল নিন্দিত, ঘৃণিত। এবার পরাশর গোষ্ঠীর চেষ্টায় তারাই সমাজে সুনাম পেতে লাগল। একালে যেমন এখনও বলা হয় - 'লোকটার নজর তো কেবল টাকার দিকে। ছি ছি'। এটা মালিকানার দুর্গন্ধ। আবার মেয়ের বিয়ে দেওয়ার সময় - 'জান তো গিন্নি, ছেলেটার বাবা খুব হিসেবি মানুষ। অনেক খেটে আজ দুটো পয়সা করেছে, বিশাল ব্যবসা, একটা কারখানার মালিক, ঘরে দু-দুটো মারুতি, বিরাট চারতলা পাকাবাড়ী; কম কথা।' এটা মালিকানার সুগন্ধ। এভাব মত্‌স্যগন্ধা যৌথসমাজের মানুষের চোখেই ক্রমশ গন্ধবতী হয়ে উঠতে থাকে। ব্যক্তিগত সম্পত্তি থাকলে লোকে আর তার নিন্দা করে না, তার প্রশংসা করে। ...

    অবশ্য যৌথসম্পদের চরিত্র বা ধর্ম্ম বা ক্রিয়া প্রথমদিকে যা যা ছিল, সেই ক্রিয়া অনুসুরণ করে তখন তার নাম হয় পুষা, সবিতা ইত্যাদি। কিন্তু যখন তা রীতিমত রাষ্ট্রীয় পুঁজি, তখন তার নাম হয় সূর্য্য বা তপন ইত্যাদি। যখন যেমন ক্রিয়াকারী সেইরকম নাম। চন্দ্রের ক্ষেত্রেও তাই। যৌথপুঁজির আধারেরা তাই সূর্য্যবংশী এবং ব্যবসায়ী পুঁজির আধারেরা তাই চন্দ্রবংশী। তবে, যেহেতু সূর্য্য নিজের আলোতেই আলোকিত, তাই সূর্য্যবংশীরা সব ঔরসজাত আর চন্দ্রের ক্ষেত্র জাত বলে চন্দ্রবংশীরা সব ক্ষেত্রজ। তো, প্রধান প্রশ্ন হল ঃ সামাজিক ক্ষমতা পাবে কারা? সূর্য্যবংশীরা না চন্দ্রবংশীরা, সমাজতান্ত্রিকরা না ধনতান্ত্রিকরা? জ্ঞানজীবিরা না পণ্যজীবিরা? ঔরসজাত পুত্রেরা না ক্ষেত্রজ পুত্রেরা? মূল লড়াইটা এখানেই।

    ধৃতরাষ্ট্র ও পাণ্ডু

    দু-জনেই জন্মদোষে দুষ্ট। একজন জন্মান্ধ আর একজন পাণ্ডুবর্ণ। কেন? ভীষণদর্শন ব্যাস যখন অম্বালিকার সঙ্গে মিলিত হন, কখন সে ভয়ে চোখ বন্ধ করে নিয়েছিল। তাই তার পুত্র ধৃতরাষ্ট্র হয় জন্মান্ধ। আর আম্বিকার সঙ্গে যখন মিলিত হন, তখন সে ভয়ে সিঁটিয়ে পাণ্ডুবর্ণ হয়ে গিয়েছিল। তাই তার পুত্র হয় পাণ্ডুবর্ণ, অতএব পাণ্ডু। কী আছে এই কাহিনীতে?

    এই কাহিনীতে প্রাচীন ভারতে আদিম রাষ্ট্রহীন সাম্যবাদ কেমন করে প্রথমে রাষ্ট্রহীন সমাজতন্ত্রে ও রাষ্ট্রহীন ধনতন্ত্রে এবং পরে রাষ্ট্রযুক্ত সমাজতন্ত্রে ও রাষ্ট্রযুক্ত ধনতন্ত্রে উত্তীর্ণ হয়েছিল, অতি সংক্ষেপে সেই সমস্ত ঘটনার বিবরণ দেওয়া হয়েছে। একই কাহিনী পুরাণে বিস্তারিত-ভাবে বর্ণিত হয়েছে 'দক্ষোত্‌পত্তি' 'মারুতোত্‌পত্তি' ও 'পৃথু উপাখ্যান'-এ। সেই বর্ণনায় 'মহর্ষিগণের আক্রমণে' বেণীয়াবৃত্তি তার জন্মলগ্নেই কীভাবে পাণ্ডুবর্ণ হয়ে যায়, আর রাষ্ট্র কীভাবে উদ্ভুত হয় অন্ধ হয়ে, তার সমস্ত বিবরণই রয়েছে। 'পৃথিবী'তে ব্যবসা নিষিদ্ধ হয়ে যায়, ছাড় পায় কেবল 'বারাণসী'গুলি, যেগুলি কিনা 'পৃথিবীর বাইরে'।(১০)। 'পৃথিবীর বাইরে' মানে রাষ্ট্রের শাসনাধিকারের বাইরে বা 'পৃথু'র এলাকার বাইরে। আর রাষ্ট্রের দায়িত্ব হয় প্রজাদের নিকট থেকে, সামাজিক উত্‌পাদন কর্ম্মযজ্ঞ থেকে তাদের উত্‌পাদনে ভাগ বসিয়ে সেই উত্‌পাদিত সম্পদ এনে বেদজীবিদের ভরণপোষণ করা এবং ঠিক হয়, রাষ্ট্র এটা করবে অন্ধভাবে।(১১)।

    কিন্তু ব্যাপারটা এখানেই থেমে থাকেনি,থাকে না। বলতে গেলে একধরণের খর্ব জ্ঞানজীবিতা ও খর্ব্ব পণ্যজীবিতা যথাক্রমে এক ধরনের খর্ব্ব-'রাষ্ট্রযুক্ত সমাজতন্ত্র' ও এক ধরনের খর্ব্ব-'রাষ্ট্রযুক্ত ধনতন্ত্র' রূপে অর্থাত্‌ যথাক্রমে ধৃতরাষ্ট্র ও পাণ্ডুরূপে এবার মাঠে নামে। দুটো ধারাই রিনিউড্‌ হয়ে প্রবাহিত হতে থাকে। খর্ব্ব পণ্যজীবিতা বা পাণ্ডু রাষ্ট্র-ক্ষমতায় বসলেও, অর্থাত্‌ 'রাষ্ট্রযুক্ত ধনতন্ত্র' প্রচলিত হলেও, রাষ্ট্রীয় পুঁজি ব্যবহার করে ব্যাপক ব্যক্তিমালিকাধীন পণ্য সে উত্‌পাদন করতে পারবে না, এটাই ব্রাহ্মণের শাপ। তা করতে গেলেই তার মৃত্যু হবে। ক্ষমতায় সে থাকতে পারবে না। অতএব কারুজীবী ও ব্যবসাবৃত্তিধারী জনসাধারণের (বা কুন্তী ও মাদ্রীর) গর্ভে ধনতন্ত্রের পক্ষে রাষ্ট্রীয়-পুঁজি নিষেক করা সম্ভব হয় না, পণ্যজীবিদের নিজস্ব পুঁজি বা দেবতাদের ঔরস নিষিক্ত হয়। ফলত ধনতান্ত্রিক বিধি ও তার আধারেরা (বা যুধিষ্টির), ধনতান্ত্রিকে প্রচার ও তার আধারেরা (বা ভীম), ধনতান্ত্রিক পুঁজি ও তার আধারেরা (বা অর্জ্জুন) ইত্যাদি (১২) জন্মলাভ করে। কিন্তু একদিন সে লোভ সামলাতে পারে না, রাষ্ট্রীয় পুঁজিতে হাত দিয়ে বসে। হয়ে যায় 'ঘোটালা', চলে যায় ক্ষমতা। পাণ্ডুর মৃত্যু ঘটে।

    রাষ্ট্র সম্পর্কে আমাদের বর্ত্তমান জ্ঞানবৃদ্ধির অনেকটাই ইউরোপের দান। যদিও ভারতবর্ষই রাষ্ট্রসৃষ্টির ও ধর্ম্মসৃষ্টির বা আইনসৃষ্টির আদি দেশ, কিন্তু সে কেমন রাষ্ট্র ও কেমন ধর্ম্ম বা আইন সেসব বিষয়ে আমরা এখন প্রায় কিছুই জানিনা। তবে, সেই সমস্ত কথায় এখন আমি যাব না। এই মুহূর্ত্তে আমার প্রয়োজন কেবল ধৃতরাষ্ট্রকে বা খর্ব্ব সমাজতান্ত্রিক রাষ্ট্রকে।

    প্রাচীন ভারত রাষ্ট্র বলতে 'লিমিটেড টেরিটোরি, সভারেণ্টি...' এসব বুঝত না। বুঝত এক ধরণের 'রাষ্ট্র-করা' নিয়মাবলীকে বা প্রচারকে যা জনসাধারণ বিশ্বাস করত। আর সেই বিশ্বাসের উপরই দাঁড়িয়ে থাকত রাষ্ট্রব্যবস্থাটা। এই নিবন্ধের শুরুতে যে সামাজিক বিশ্বাসের কথা বলেছিলাম, এ সেই বিশ্বাস। এটা রয়েছে বলেই মানুষও যেমন সামাজিক নিয়ম কানুনের মধ্যে রয়েছে, তেমনি রাষ্টটাও টিকে রয়েছে। সামাজিক বা রাষ্ট্রিয় ওই সকল প্রাচারিত নিয়মা-বলীর উপর মানুষের বিশ্বাস যদি না-থাকত, রাষ্ট্রব্যবস্থাটি ভেঙে পড়তে কয়েক মুহূর্ত্ত সময় নিত না। এখন এই ব্যাপারটাকে বুঝতে অসুবিধা হয়, ব্যাপারটি অত্যন্ত বেশী প্রথাসম্মত হয়ে গেছে বলে। কিন্তু ২০০০ খ্রিস্ট পূর্ব্বাব্দের রাজা হামুরাবির ঘোষণা থেকে খুব সহজেই বোঝা যায়, রাষ্ট্র প্রতিষ্ঠার প্রত্যূষে ওই বিশ্বাস কত স্পষ্ট ছিল। এখনও বহু শীর্ষস্থানীয় রাষ্ট্রনেতা বা নেত্রী ব্যাপারটি অনুধাবন করে থাকেন। তাঁদের বক্তৃতায় কদাচিত্‌ ব্যাপারটা তাই উঁকিঝুঁকি দেয়।

    তা সে যাই হোক। জ্ঞানজীবী বা বেদজীবিদের ঔরসে সৃষ্ট সেই খর্ব্ব সমাজতান্ত্রিক রাষ্ট্রের বা ধৃতরাষ্ট্রের জন্ম হলে পর, তার থেকে স্বভাবতই জন্মায় কু-পরামর্শ ও কু-পরামর্শদাতারা (বা দুঃশলা), কু-শাসন ও তার আধারেরা (বা দুঃশাসন) এবং কু-বিচার ও তার আধারেরা (বা দুর্যোধন) প্রমুখেরা। দুটো ধারাই এবার মুখোমুখী দাঁড়ায়, কৌরব ও পাণ্ডব নামে। পাণ্ডবদেরকে বা পণ্যজীবিদেরকে ক্ষমতা থেকে দূরে রাখার জন্য নানা সদুপায় ও অসদুপায় অবলম্বন করা হয়। সেই বিশাল বিশাল সামাজিক ঘটনাগুলিকে জতুগৃহদাহ থেকে শুরু করে দ্রৌপদীর বস্ত্রহরণ পর্য্যন্ত বিভিন্ন কাহিনীর সাহায্যে বিবৃত করা হয়েছে মহাভারতে।

    অসুরের উত্তরসূরিরা ও দেবতাদের উভয়সূরিরা

    মানুষের ভাষার যে একটা গভীর সমস্যা আছে, সেটা ক্রিয়াভিত্তিক শব্দার্থবিধি আবিষ্কৃত হবার আগে আমাদের জানা ছিল না। সমস্যাটি হল, সমাজ যতদিন যৌথভাবে বা অখণ্ডস্বভাব-সম্পন্ন থাকে, ততদিন মানুষের ভাষা হয় আত্মাভিত্তিক, ক্রিয়াভিত্তিক, বহুরৈখিক। আর সমাজ যখন খণ্ডস্বভাবসম্পন্ন হয়ে পড়ে, তখন সেই সমস্ত সমাজের মানুষের মুখের ভাষাও হয়ে যায় দেহভিত্তিক, প্রতীকী, একরৈখিক। প্রকৃতির এ এক অমোঘ অনিবার্য নিয়ম।

    কিন্তু সমাজটা তো দুম করে তার অখণ্ডস্বভাব ত্যাগ করে খণ্ডস্বভাব সম্পন্ন হয়ে যায় না। তার একটা পর্য্যায়ক্রম আছে, পদ্ধতি আছে। ডিটারমিনিজম, রিডাকসনিজম ধীরে ধীরে সবল হতে হতে সমস্তটা গ্রাস করে। স্বভাবতই একটা সময় অবশ্যই দেখা দেয়, যেটাকে আমরা 'ট্রানজিশনাল পিরিয়ড' বলতে পারে। সেসময় একই সঙ্গে দুরকম ভাষারই প্রকোপ দেখতে পাওয়ার কথা, দেখাও যায়। ভারতে সেই অধ্যায় ছিল ৬০০ থেকে ৯০০ খ্রিস্টাব্দের সময়কালে, যখন গ্রন্থাদি রচিত হচ্ছে প্রধানত ক্রিয়াভিত্তিক ভাষায় এবং অপ্রধানত প্রতীকী ভাষায়, আর লোকসাধারণ কথাবার্তা বলছে প্রধানত প্রতীকী ভাষায় এবং অপ্রধানত ক্রিয়াভিত্তিক ভাষায়।

    ব্যাপারটা আর কারও নজরে না-পড়ুক, ভারতীয় ব্যাসেদের চোখে পড়ে যায়। তাঁরা দেখেন, লোকে ক্রিয়াভিত্তিক ভাষায় রচিত গ্রন্থগুলির অর্থ আর বুঝতে পারছে না। এমনকি উত্তম-অধিকারিরাও পারছে না। মহাভারত লিখে ইতিহাস জ্ঞানটাকে যে প্রবহমান রাখা যাবে ভাবা হয়েছিল, সেটা তো তাহলে থাকবে না। কারণ সমাজ ক্রমশ প্রতীকী ভাষায় অভ্যস্ত হয়ে যাচ্ছে এবং ক্রিয়াভিত্তিক ভাষা ভুলে যাচ্ছে। অতএব ব্যাসেরা যুক্তি করে লিখে ফেললেন হরিবংশ পুরাণ বা 'খিল হরিবংশ'। উদ্দেশ্য, খিল খুলে যেমন ঘরে ঢুকতে পারা যায়, এই গ্রন্থটির সাহায্যে তেমনি মহাভারতের খিল খুলে তার ভিতরে ঢুকে পড়া যাবে। অবশ্য তা সত্ত্বেও শেষরক্ষা করা যায়নি।

    সেই হরিবংশপুরাণে 'দেবগণের অংশাবতরণ' নামে একটি অধ্যায় রয়েছে। তাতে দেখানো হয়েছে, কৌরব পাণ্ডবেরা আসলে কারা?

    "...যথাসময়ে এবং যথানিয়মে সুরবৃন্দ নিজ নিজ অংশে অবতীর্ণ হইলেন। তন্মধ্যে যুধিষ্ঠির ধর্ম্মের, অর্জ্জুন ইন্দ্রের, ভীমসেন বায়ুর, নকুল ও সহদেব অশ্বিনীকুমার যুগলের, কর্ণ সূর্য্যের, দ্রোণাচার্য্য বৃহস্পতির, অষ্টমবসু-ভীষ্ম বসুগণের, বিদুর যমের, দুর্য্যোধন কলির, অভিমন্যু চন্দ্রমার, ভূরিশ্রবা শুক্রের, শ্রুতায়ুধ বরুণের, অশ্বথ্‌থামা মহাদেবের, কণিক মিত্রের, ধৃতরাষ্ট্র কুবেরের এবং দেবক, অশ্বসেন ও দুঃশাসন প্রভৃতি সকলে যক্ষ, গন্ধর্ব্ব ও উরগগণের অংশে অবতীর্ণ হইলেন। এই প্রকারে দেবতারা স্বীয় স্বীয় অংশে স্বর্গ হইতে মর্ত্যে অবতীর্ণ হইলে দেবর্ষি নারদ সুরগণকে লইয়া নারায়ণের সভায় উপস্থিত হইলেন।"

    অন্যত্র দেখানো হয়েছে ত্রেতার রাবণ, কালনেমি প্রমুখেরা দ্বাপরে কী কী রূপ পরিগ্রহ করেছিলেন ... ইত্যাদি ইত্যাদি।

    ছিন্নসূত্র জোড়া দিন

    ভারতের সমস্ত দুর্দ্দশার কারণ, মার্কস ও রবীন্দ্রনাথের মতে, 'অতীতের সঙ্গে ভারতের আত্মবিচ্ছেদ।' এই আত্মবিচ্ছেদ ঘটেছে, বেদপুরাণ রামায়ণ মহাভারতাদিতে বর্ণিত আমাদের ইতিহাসটা আমরা পড়তে ভুলে গিয়েছিলাম বলে। এখন 'ইতিহাসের সেই ছিন্নসূত্রগুলি জোড়া দেবার' সময় উপস্থিত। অতীতের অধ্যয়ন সাঙ্গ করে, তাকে 'আপডেটেড' করে নিয়ে বর্ত্তমানের সঙ্গে জুড়ে নিতে হবে। অতএব, নতুন উদ্যমে নতুনভাবে মহাভারতটা এবার পড়ে ফেলা দরকার। এটা করে ফেলতে পারলে, পূর্ব্বপুরুষ পুনরায় উত্তর-পুরুষের স্মৃতিলোকে দিব্যি বেঁচে থাকতে পারবেন। আর আমাদেরকে আত্মবিচ্ছেদে ভুগতে হবে না। অমৃতসমান কথা শোনা আমাদের সার্থক হবে।

    টীকা ও টুকিটাকি

    ১। হরিচরণ বন্দ্যোপাধ্যায়ের বঙ্গীয় শব্দকোষে 'জায়া' শব্দ দেখুন। এই নিবন্ধের মূল তথ্যভিত্তি ওই গ্রন্থ। পরে আর তা পৃথকভাবে উল্লেখ করা হচ্ছে না।
    ২। এই শব্দের ক্রিয়াভিত্তিক নর্থ 'পুং নামক নরক থেকে ত্রান করে যে'। এই অর্থ, আমাদের বিনিময়যোগ্য সমস্ত উত্‌পাদনই পুত্র-পদবাচ্য। এ-ভাষা যখন গড়ে উঠেছিল, তখন son-পুত্রও বিক্রয়যোগ্য ছিল; গাধিকে তার বাবা গলায় দড়ি বেঁধে গরুর মতো বেচতে এনেছিল। ইনিই চন্দ্রবংশীয় নৃপতি বিশ্বামিত্রের পিতা।
    ৩। লিঙ্গ ও যোনি কত প্রকারের হয়, তার বিস্তারিত বিবরণ পাবেন, এই লেখকের লেখা 'যোজঙ্গন্ধবিকার ঃ সিস্টেম ডিজাইনিং-এর একটি সমস্যা' নামক নিবন্ধে, যা পাওয়া যাবে লেখকের 'দিশা থেকে বিদিশায় ঃ নতুন সহস্রাব্দের প্রবেশবার্তা' গ্রন্থে।
    ৪। আমার চর্চ্চার মুখ্য বিষয় প্রাচীন ভারতের ইতিহাস। 
    ৫। বিস্তারিত বিবরণের জন্য উপরোক্ত 'পরমাভাষার সঙ্কেত ...' গ্রন্থটি দ্রষ্টব্য।
    ৬। এই বিষয়টিকে বিস্তারিত করা হয়েছে, মীজানুর রহমানের ত্রৈমাসিক পত্রিকার 'নদী' সঙ্খ্যায়। পত্রিকাটি ঢাকা থেকে প্রকাশিত হয়ে থাকে। এই গ্রন্থের দ্বিতীয় নিবন্ধরূপে সেটি
    সঙ্কলিত হয়েছে।
    ৭। বিষয়গুলি লেখকের 'মৌলবিবাদ থেকে নিখিলের দর্শনে' গ্রন্থে বিস্তারিতভাবে ব্যাখ্যতা করা হয়েছে।
    ৮। বিষয়টির বিস্তারিত ব্যাখ্যা পাবেন লেখকের তৃতীয় গ্রন্থে। উপরে ৪নং টীকা দেখুন। 
    ৯। ভূবিজ্ঞানী সঙ্কর্ষণ রায়ের 'পাথরচাপা ইতিহাস' থেকে।
    ১০। রামায়ণ-মহাভারতে এবং পুরাণাদিতে এসব কথা বহুবার লিখা রয়েছে।
    ১১। বিষয়টি বিস্তারিতি ব্যাখ্যা পাবেন লেখকের 'ফ্রম এনলাইটেনমেণ্ট ..." গ্রন্থে। উপরে ৪ নং টীকা দেখুন।
    ১২। বিষয়টির ব্যাখ্যা পাবেন লেখকের 'দ্রৌপদী থেকে শতরূপায়' শীর্ষক নিবন্ধে, যা ডলি দত্ত সম্পাদিত 'দধীচি' পত্রিকার দ্বিতীয় সঙ্খ্যায় প্রকাশিত হয়েছে।


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    इस बार आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे बिग डेटा की जुमलेबाजी के जरिए नोटबंदी से होने वाली तबाही और गैरकानूनी धन के ताने-बाने को ढंकने की कोशिश की जा रही है। अनुवाद: रेयाज उल हक

    "आंकड़ों को ठोक-पीट कर आप उनसे कुछ भी उगलवा सकते हैं"-रोनाल्ड कोज़

    यह बात पूरी तरह से शायद कभी भी उजागर न हो कि 86.4 फीसदी करेंसी को वापस लेने के इतिहास में अभूतपूर्व रूप से बेवकूफी भरे फैसले के पीछे का राज क्या था, लेकिन अब तक यह पर्याप्त रूप से साफ हो गया है कि यह फैसला और किसी ने नहीं बल्कि भारतीय राईख  के डेर फ्यूहरर  नरेंद्र मोदी ने लिया था. जब इस फैसले की बेवकूफी उजागर होने लगी तो अपनी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खास अंदाज में वे जब भी मुंह खोलते हैं, तब नोटबंदी का एक अलग ही मकसद बताने लगे हैं. जब लोगों तक नकदी पहुंचाने की बंदोबस्त चरमरा गई तो उन्होंने लोगों से डिजिटल हो जाने के लिए कहा; ताकि भारत को एक कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाया जाए, जिसे बाद में बदल कर लेस-कैश इकोनॉमी (कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था) कहा गया. जब 30 दिसंबर को आधार आधारित ई-लेनदेन की बायोमेट्रिक ऐप को 'भीम' (बीएचआईएम: भारत इंटरफेस मनी) का नाम दिया गया तो यह कहते हुए वे इससे भी राजनीतिक गोटी सेंकना नहीं भूले कि इसका नाम बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर रखा गया है. लेकिन फिर भी लोगों की नाराजगी इससे दूर न हो सकी, जिनमें से अनगिनत लोग भुखमरी की कगार पर धकेल दिए गए और कइयों की अब तक मौत हो चुकी है. 

    यह बेवकूफी भरी उम्मीद कि पुराने नोटों में जमा किए गए गैरकानूनी धन की भारी मात्रा कभी नहीं लौटेगी नाकाम हो गई है, जब 15 लाख करोड़ रुपए लौट आए हैं. यह रकम वापस लिए गए नोटों का 97 फीसदी है. मोदी ने फौरन अपना लक्ष्य बदलते हुए कहा कि अपराधियों को गिरफ्त में लेने के लिए नोटबंदी की प्रक्रिया में पैदा हुए डाटा का विश्लेषणात्मक उपकरणों के जरिए छानबीन की जाएगी. अपने नेता को सही साबित करने के लिए अनगिनत मोदीभक्त आनन-फानन में यह प्रवचन देने लगे कि कैसे बिग डाटा एनालिटिक्स (बीडीए) गैरकानूनी धन से छुटकारा दिलाने में मदद कर सकते हैं. उन्हें इसका अहसास नहीं था कि इस डाटा में एक बहुत अहम चीज की कमी थी.

    विश्लेषण का वितंडा
     

    बिग डाटा को आम तौर पर अंग्रेजी के वी अक्षर से शुरू होने वाले तीन शब्दों के जरिए परिभाषित किया जाता है: वॉल्युम (यानी आंकड़े का आकार), वेरायटी (यानी डाटा का बहुमुखी स्वरूप: ऑडियो, वीडियो, टेक्स्ट, सिग्नल),  और वेलॉसिटी (यानी डाटा के जमा होने की तेजी). एनालिटिक्स यानी विश्लेषण की व्यवस्था, सांख्यिकीय मॉडलिंग और मशीन लर्निंग को मिला कर बनती है. बिग डाटा के विश्लेषण के दौरान भारी मात्रा में जटिल डाटासमूहों की छानबीन की जाती है, ताकि ऊपर से नजर न आने वाली परिपाटी, अनजान अंदरूनी संबंध, रुझान और अनेक तरह के दूसरे उपयोगी सूचनाएं उजागर हों.

    लेकिन यह सब सच होने के बावजूद, यह कोई जादू की छड़ी नहीं है जो हवा में से नतीजे पैदा कर सकती है. सही है कि जाली नोटों की रोकथाम के लिए करेंसी नोटों में देश की पहचान करने के संकेत, उनका मूल्य, अनोखे सीरियल नंबर जैसी विशेषताएं तथा इसके अलाव एक पूरा तंत्र मौजूद है. इस डाटा तक नकदी गिनने वाली मशीनों के जरिए आसानी से और हाथोहाथ पहुंचा जा सकता है, बशर्ते उनसे होकर गुजरने वाले करेंसी नोटों के सीरियल नंबरों का पता लगाने और उन्हें स्टोर करने के लिए जरूरी सेंसर मशीनों में लगे हुए हों. इसके जरिए उन आखिरी व्यक्तियों या खाता धारकों तक का पता लगाया जा सकता है, जिनके पास से आखिरी बार ये नोट आए हों या जिन्होंने उनका आखिरी बार उपयोग किया हो. ऐसे अलगोरिद्म बनाए जा सकते हैं कि उन पर डाटा चलाने के बाद वे उन इलाकों का एक अनुमान लगा सकें, जिन इलाकों में रकम की जमाखोरी की गई थी. 

    लेकिन जहां तक नोटबंदी की प्रक्रिया के डाटा की बात है, यह तथ्य बरकरार है कि बैंकों में लगी हुई नोट गिनने की मशीनों में करेंसी नोटों के सीरियल नंबर जमा करने के लिए सेंसर नहीं लगे हैं. इस अहम डाटा की गैरमौजूदगी को देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचना नामुमकिन है कि जमा की गई रकम गैरकानूनी थी. किसी व्यक्ति का सुराग लगा पाना तो और भी मुश्किल है. पुराने करेंसी नोटों को नए करेंसी नोटों से बदलने के तरीके ये थे: (1) आम लोगों ने कतारों में लग कर अपनी पसीने की कमाई को बदला, (2) एजेंटों के जरिए नोट बदले गए जिसके लिए 20 से 40 फीसदी कमीशन अदा की गई और (3) 50 फीसदी का जुर्माना कर भर कर नोट जमा किए गए. इनमें से सिर्फ दूसरा तरीका ही गैरकानूनी है, क्योंकि इसके जरिए गैरकानूनी धन को कानूनी धन में तब्दील किया गया. ऐसा दो तरीकों से हुआ: एक, जिसमें बैंक अधिकारियों की मिलीभगत थी, और दो, जिसमें गरीब लोगों को 10 फीसदी के कमीशन पर पुराने नोट बदलने के काम पर लगाया गया. इन तरीकों से करोड़ों रुपए बदले गए. विश्लेषण की प्रक्रिया में इस डाटा से आखिर क्या मतलब निकाला जा सकेगा? उम्मीद के मुताबिक, बस बैंकों के पास जमा रकमों में भारी इजाफा होगा, लेकिन क्या इसे गैरकानूनी धन कहा जा सकता है? नोटबंदी ने सिर्फ एक ही काम किया है और वो यह है कि इसने अपराधियों के गैरकानूनी धन को कानूनी बना दिया है और इस तरह उन्हें फायदा पहुंचाया है.

    बेवकूफ बनी जनता
     

    जैसा कि मैंने अपने पहले के एक स्तंभ (समयांतर, दिसंबर 2016) में लिखा था कि कुल गैरकानूनी धन का सिर्फ 5 फीसदी ही नकदी में है (जिसमें जेवरात भी शामिल हैं). इसलिए अगर गैरकानूनी धन का सुराग लगाना ही मकसद था, तो नकदी के पीछे पड़ना फायदेमंद नहीं था. गैरकानूनी धन का मुहाना तो कॉरपोरेट दुनिया से निकलता है जिसकी पीठ पर राजनेताओं और नौकरशाहों का हाथ है. दिलचस्प यह है कि इस मुहाने को मोदी की निजी सुरक्षा हासिल है. उन्होंने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर, 20 हजार रुपए प्रति दानदाता तक करों में छूट दे रखी है. इस तरह राजनीतिक दल वो घाट बन गए हैं, जहां अपराधियों के गैरकानूनी धन को धो-पोंछ कर कानूनी बनाया जाता है. खुद मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने इन राजनीतिक दलों को, जिनकी संख्या आज 1900 से ज्यादा है, 'काले धन को ठिकाने लगाने वाला परनाला'कहा है. बेशक, इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिला है. करेंसी जमा करने के बिद डाटा की छानबीन करके संदिग्धों को पकड़ने का दिखावा करना ऐसा ही है जैसा जाल के बड़े छेद से तो मछलियों के झुंड को निकलने दिया जाए, और फिर मछली पकड़ने का दिखावा किया जाए. क्या मोदी, नोटबंदी का ऐलान करने से पहले जमा की गई भारी रकम की छानबीन करने वाले हैं? आखिरकार, मीडिया रिपोर्टों ने गोपनीयता के उनके दावे की पोल पहले ही खोल दी है कि पिछली तिमाहियों में भारी लेन-देन हुए हैं. यह जानने के लिए बहुत बुद्धि लगाने की भी जरूरत नहीं है कि वे सभी भाजपा के अंदरूनी हलके से जुड़े हुए थे.

    जब डाका डालने वालों के गिरोह खुलेआम घूम रहे हों तो जेबकतरों की पहचान करने के लिए क्या आपको सचमुच में बिग डाटा एनालिटिक्स उपकरणों की जरूरत है? और ये गिरोह ठीक-ठीक मोदी के अपने राजनीतिक वर्ग से ताल्लुक रखते हैं. असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक, 16वीं लोकसभा में दोबारा चुने गए 165 सासंदों की परिसंपत्तियों में 2009 से 2014 के दौरान 137 फीसदी का भारी इजाफा हुआ था (एफडीआर के मुताबिक कुल 168 सांसदों में से तीन के हलफनामे भारत के चुनाव आयोग की वेबसाइट पर साफ-साफ उपलब्ध नहीं हैं). मोदी की अपनी पार्टी परिसंपत्तियों और आपराधिक मुकदमों, दोनों ही मामलों में सबसे ऊपर है. उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा ने 80 में से 71 सीटें जीतीं, वरुण गांधी की परिसंपत्तियां 625 फीसदी की दर से बढ़ीं. 2009 में वरुण गांधी के हलफनामे के मुताबिक उनके पास कुल 4.93 करोड़ की परिसंपत्तियां थीं. 2014 में यह सीधे 30.81 करोड़ बढ़ते हुए, 35.73 करोड़ हो गईं. उनकी मां मेनका गांधी की परिसंपत्तियों में 105 फीसदी का इजाफा हुआ. अगर परिसंपत्तियों में इजाफे को भ्रष्टाचार के संकेत के रूप में लिया जाए, तो भाजपा साफ तौर पर कांग्रेस से आगे है. जहां भाजपा के दोबारा चुने गए सांसदों की परिसंपत्तियां तेजी से बढ़ते हुए 2014 में 5.11 करोड़ से 12.6 करोड़ हो गईं, जिसकी वृद्धि दर 146 फीसदी है, वहीं कांग्रेस में 104 फीसदी की वृद्धि दर देखी गई, जो 2009 के 5.66 करोड़ से बढ़ कर 2014 में 5.90 करोड़ हो गई. जनता के सेवक कहे जाने वाले ये राजनेता आखिर कैसे पैसे जुटाने की जादुई छड़ी में तब्दील हो गए हैं, इस सवाल का जवाब मोदी को देना होगा. कभी कॉलेज का मुंह तक न देखने वाले वरुण गांधी एमबीए किए हुए लोगों को मात दे सकते हैं. इसी तरह का जादू नौकरशाहों के मामलों में भी देखा जा सकता है, जिनके बगैर राजनेताओं की जादुई छड़ी कारगर नहीं हो सकती. यह एक आम जानकारी है कि नौकरशाह, खास कर प्रशासन, पुलिस का नियंत्रण करने वाले और नियामक पदों पर तैनात तमाम नौकरशाहों के पास भारी परिसंपत्तियां हैं जो उनकी आमदनी के स्रोत के अनुपात के बाहर हैं. उनमें से कितनों की कभी जांच-पड़ताल हुई है, और कितनों को कसूरवार साबित किया गया है? जो फूहड़ गैरबराबरी भारत को दुनिया के सबसे गैरबराबरी वाले देशों में खास तौर से बदनाम करती है, जिसके तहत 57 अरबपतियों के पास इसकी कुल संपत्ति[1] का 58 फीसदी है, वह आखिरकार ईमानदारी की कमाई नहीं है.

    विश्लेषण की मुश्किलें

    बीडीए के डाटा आधारित फैसलों के नए मॉडल के नतीजे बड़े हैं, जो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही हैं. दार्शनिक रूप से कहें तो यह 'सिद्धांतों का अंत'कर देता है.[2] बिग डाटा अंदरूनी संबंधों की तलाश करता है, यह वजहों की तलाश नहीं करता. इसकी दिलचस्पी 'क्यों'के बजाए 'क्या'में है. इस नए मॉडल पर मुग्ध लोगों के लिए व्हाइट हाउस की एक हालिया रिपोर्ट "बिग डाटा: अ रिपोर्ट ऑन अलगोरिद्मिक सिस्टम्स, अपॉर्च्युनिटी, एंड सिविल राइट्स"इसके खतरों से आगाह करने के काम आ सकती है. यह कहती है, "डाटा को सूचनाओं में बदलने वाला अलगोरिद्म अचूक नहीं है, वह अशुद्ध इनपुट, तर्क, संभाव्यता और अपने बनाने वाले लोगों पर निर्भर करता है."इसके पहले की एक व्हाइट हाउस रिपोर्ट ने भी स्वचालित और खुफिया फैसलों में एनकोडिंग भेदभाव की संभावनाओं के प्रति आगाह किया था, जो एनालिटिक्स के जटिल अलगोरिद्म का हिस्सा होते हैं. बिग डाटा के फायदे उतने नहीं हैं, जितना गंभीर चिंता निजता और डाटा सुरक्षा के बारे में है. डाटा पारिस्थितिकी के फायदे, सरकार, कारोबार और व्यक्तियों के बीच के शक्ति संबंधों को उलट देते हैं और नस्ली या दूसरी तरह की बदनाम करने वाली छवियों के निर्माण, भेदभाव, समुदायों या समूहों को गैरवाजिब तरीके से अपराधी बताने और आजादियों को सीमित करने की तरफ ले जा सकते हैं.

    जहां एक तरफ पूरी दुनिया इन मुद्दों को लेकर चिंतित है, भारत सरकार अपने डिजिटल रथ को आगे धकेल रही है और इसके नुकसान की ओर से आंखें मूंदे हुए है. यह आधार डाटा को लेकर बहुत उम्मीद पाले हुए है, जिसका इस्तेमाल करते हुए यह हरेक लेन-देन को डिजिटाइज करना चाहती है, जिसमें बायोमेट्रिक्स पहचान करने का आधार होगा. विशेषज्ञों द्वारा यह दिखाया गया है कि बायोमेट्रिक्स वित्तीय लेनदेन के लिए भरोसेमंद नहीं है, इसके बावजूद मोदी ने बीएचआईएम को "आपका अंगूठा आपका बैंक"के रूप में प्रचारित किया. एक अनोखी पहचान तैयार करने के अपने घोषित उद्देश्य के उलट, 2009 में अपनी शुरुआत के फौरन बाद आधार-ऑथेन्टिकेशन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) बनाया गया, जिसने इसको कारोबारों के लिए उपलब्ध करा दिया. जैसाकि इसके निर्माता नंदन निलेकणी ने हाल ही में दावा किया है कि महज एक "आधार-सक्षम बायोमेट्रिक स्मार्टफोन"से 600 अरब डॉलर के अवसर पैदा होने का अंदाजा है.
    [3] इसमें इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं है कि भारतीयों की निजता और उनके महत्वपूर्ण डाटा की सुरक्षा का क्या होगा. जब अगस्त 2015 में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में आया तो महाधिवक्ता ने यह कह कर इसे रफा-दफा कर दिया कि इस देश के लोगों को पास निजता का अधिकार नहीं है. दिलचस्प बात यह है कि लगभग ठीक उन्हीं दिनों मानहानि को अपराधों की सूची से हटाने के लिए सरकार ने ठीक इसकी उलटी बात कही कि उन्हें जनता के निजता के अधिकारों की सुरक्षा करनी है. सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही आधार कार्ड के उपयोग को सिर्फ छह क्षेत्रों तक सीमित कर दिया – सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राशन, एलपीजी, जन धन योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और पेंशन. और इसमें भी कार्ड का इस्तेमाल स्वैच्छिक है. लेकिन इसकी पूरी तरह अवमानना करते हुए, सरकार हर जगह इसको अनिवार्य बनाते हुए इसे जबरन लागू कर रही है. जाहिर है कि यह संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन करते हुए हम सबकी जिंदगियों पर पूरा नियंत्रण करना चाहती है और बिग डाटा एनालिटिक्स के इस्तेमाल के साथ हमें प्रयोगशालाओं के जानवर और फरमाबरदार मशीनों के रूप में ढाल देना चाहती है.

    अगर लोग नोटबंदी से होने वाली तबाहियों को चुपचाप बर्दाश्त कर सकते हैं, तो यह अपराध तो शायद एक जरा सी परेशानी ही मानी जाएगी!


    नोट्स

    [1] ऑक्सफेम स्टडी, देखें द हिंदू, 16 जनवरी, 2017.
    [2] सी एंडरसन, "द एंड ऑफ थ्योरी: द डाटा डेल्युज मेक्स द साइंटिफिक मेथड ऑब्सोलीट," वायर्ड, 23 जून 2008, ऑनलाइन उपलब्ध www.wired.com/2008/06/pb-theory.
    [3] https://www.credit-suisse.com/media/cc/docs/cn/india-digital-banking.pdf

     

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    अक्तूबर क्रांति की सौवीं सालगिरह के मौके पर क्रांतियों द्वारा विकसित किए जाने वाले नजरिए और क्रांति को देखने के नजरिए के बारे में सौम्यव्रत चौधरी और रेयाजुल हक का लेख. 
     

    1789 में फ्रांस की क्रांति की शुरुआत में ही दो बातें सामने आती हैं. पहली बात: हर क्रांतिकारी कदम और घटना मानो एक सामूहिक इच्छा को जन्म देती है, कि ऐसा हर कदम और घटना एक राष्ट्रीय स्मारक का विषय बने. स्मारक ही नहीं; हर क्रांतिकारी तारीख एक सामूहिक उत्सव के रूप में मनाई जाए. इस तरह फ्रांसीसी क्रांति, क्रांतिकारी भावनाओं के साथ-साथ, कुछ खास नाटकीय भावना भी पैदा करना चाहती है. ये वे भावनाएं हैं जिनसे एक दर्शक समूह किसी रंगमंच पर नाट्य प्रदर्शन के दौरान गुजरता है. या फिर एक समूह इन घटनाओं में इस तरह हिस्सा लेता है, जैसे किसी उत्सव में हिस्सा ले रहा हो. दोनों सूरतों में क्रांतिकारी दौर, मानो अपने आपको उस ऐतिहासिक पल की सच्चाई से आगे बढ़ कर एक कलात्मक और हमेशा कायम रहने वाली एक सच्चाई, एक शाश्वत सत्य का दर्जा देना चाहता है.
     

    दूसरी बात: 1789 से 1794 के बीच फ्रांसीसी क्रांति यह बात भी जाहिर करती है कि फ्रांस के क्रांतिकारी जो कर रहे थे, बोल रहे थे, जिन व्यापक गतिविधियों में हिस्सा ले रहे थे, वो सारी गतिविधियां मानो इतिहास के रंगमंच पर रचा जाने वाला प्रदर्शन यानी परफॉरमेंस हों. फर्क सिर्फ इतना था कि इतिहास के रंगमंच पर खेला गया नाटक किसी बाहरी दर्शक-समूह के लिए नहीं होता है. ऐसे रंगमंच में दर्शक खुद इतिहास के अभिनेता होते हैं, या कम से कम बन सकते हैं. इस संदर्भ में एमानुएल कांट द्वारा 1794 में कॉन्टेक्स्ट ऑफ फैकल्टी  में कही गई बात याद आती है कि अगर फ्रांसीसी क्रांति के विषय पर कोई ऐसा दर्शक सोचें या उसकी कल्पना करें जो इतिहास की परिधि से बाहर हो, जो खुद ही एक काल्पनिक दर्शक हो, तो ऐसे दर्शक में फ्रांस की क्रांति के संबंध में एक खास भावना पैदा होगी. इस भावना को कांट ने एंथुसियाज्म  यानी उत्साह का नाम दिया. इस भावना को हम नाट्यशास्त्र के नजरिए से एक 'राजनैतिक रस'कह सकते हैं. हालांकि याद रखना जरूरी है कि कांट की राय में फ्रांसीसी क्रांति में जो असली अभिनेता या दर्शक थे, जो उस हकीकत का हिस्सा थे, उनके नज़रिए से क्रांति की घटनाएं इतनी उलझी हुई थीं और भावनाएं भी उतनी ही उलझी हुई होंगी कि उनका बस चले तो उस क्रांति की पटकथा को, उसके मौलिक रूप में इतिहास के रंगमंच पर शायद दूसरी बार न खेलें. कांट के मुताबिक इसकी वजह यह थी कि यह क्रांति इतने खून-खराबे वाली थी, और क्रांति के भागीदारों की चाहतों और सामने आने वाली असलियत के बीच बड़ा अंतर और यहाँ तक कि विरोध भी था. इसलिए कांट सोचते हैं कि क्रांति में भागीदार बने लोग इतिहास के उसी बिंदु पर पहुंच कर उसे नहीं दोहराएंगे. हालांकि इस क्रांति में भाग लेने से उनकी कल्पना में, उनकी सोच में जो भावना पैदा हुई, उसको कांट ने उत्साह के रूप में पहचाना. यह उत्साह, एक आदर्श बना रहा – क्रांति का आदर्श. भले ही उसे एक ऐतिहासिक परिघटना के रूप में दोहराने लायक नहीं माना जाए, लेकिन वह आगे बढ़ने की एक निशानी जरूर थी, जो इंसानी सभ्यता का एक लक्षण है.
     

    इसके बावजूद, फ्रांस की क्रांति उसी उलझे इतिहास में क्रांतिकारी सोच – आज़ादी, बराबरी और मैत्री[1]  – को सामने लाती है, उसे अभिव्यक्त करती है. उसे साकार (परफॉर्म) करती है. यही फ्रांसीसी क्रांति की असली घटना (इवेन्ट) है.

    2
    1917 में रूसी क्रांति के बाद, 1920 में अक्तूबर के महीने में रंगमंच के प्रसिद्ध निर्देशक निकोलाई एवरेइनोव ने एक विशाल स्मारक-प्रदर्शन का निर्देशन किया. 1917 की घटनाओं को तीन साल बाद 1918 में सेंट पीटर्सबर्ग में जार के राजमहल की सीढ़ियों पर एक नाटक के रूप में लाखों दर्शकों के बीच खेला गया. दर्शक यह प्रदर्शन देख भी रहे थे, उसमें हिस्सा भी ले रहे थे, जैसे तीन साल पहले रूस की जनता ने क्रांति में हिस्सा लिया था. 


    फ्रांसीसी क्रांति से जुड़ी जो चाहत थी, वह रूस में भी नज़र आती है कि इतिहास की भौतिक असलियत को न छोड़ते हुए, इतिहास को एक नाटक की पटकथा, एक नाट्य-प्रदर्शन, एक नाट्य-उत्सव, एक नाट्य-रस की तरह आत्मसात किया जाए. लेकिन यह प्रयोग फ्रांसीसी क्रांति से इस मायने में अलग हो जाता है कि यहां जो हो चुका है और जो हो रहा है, उन दोनों को ही एक स्मारक के रूप में तब्दील कर देने की कोशिश हो रही थी. सोवियत संघ में असलियत से कल्पना तक का सफर तय किया जा रहा था, जहां चाहत और असलियत में फर्क तो था, लेकिन इस फर्क को स्मारकीय उत्सवों के जरिए महत्वहीन बनाने की कोशिश भी हो रही थी. 

    इस रूसी अनुभव के परिप्रेक्ष्य में कुछ सवाल पैदा होते हैं – (i) क्या कोई राज्य (स्टेट) इस सामूहिक चाहत को पूरी तरह आकार दे सकता है? राज्य की अपनी संरचना, समूह/समाज की चाहत और एक राष्ट्रीय समूह/समाज की कल्पना में किस तरह का तालमेल बैठ सकता है कि घटनाओं की असलियत एक हवाई सपने में तब्दील न हो जाए? (ii) और जब राज्य की संरचना किसी दल (पार्टी) या संघ की संरचना से जुड़ जाए, और जब दोनों, समूह की चाहत और राष्ट्र की कल्पना का एकमात्र माध्यम बन जाएं, तो क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता है कि राज्य-पार्टी/संघ की संरचना ने क्रांतिकारी सोच को एक राज्य/पार्टी की विचारधारा बना दिया है?
     

    रूस की बोल्शेविक पार्टी जिस वैचारिक दृष्टि को स्वीकार करती थी, उसके तहत राज्य यथास्थिति का एक उपकरण था, जो सिद्धांतत: परिवर्तन की सामूहिक चाहत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था. इस अर्थ में क्रांतिकारी सोवियत राज्य की अवधारणा अपने आप में एक विरोधाभास महसूस होगी. लेकिन क्रांति के फौरन बाद क्रांति से असहमत, उसके विरोधी और प्रतिक्रांतिकारी – हर तरह की ताकतों से जनता और क्रांतिकारी ताकतों की रक्षा करने की उम्मीद और समाज के विकास को गति देने की चाहत एक वाजिब चाहत थी और इसे नकारा नहीं जा सकता. इस तरह क्रांति के बाद के सोवियत समाज में राज्य एक जमीनी हकीकत का हिस्सा था.
     

    इस संदर्भ में यह बात साफ करना जरूरी है कि एक क्रांतिकारी पार्टी के रूप में बोल्शेविक पार्टी ने इतिहास की भौतिकता और असलियत, उसके द्वंद्व में हिस्सा लिया और उस उलझी हुई असलियत को एक क्रांतिकारी दिशा (orientation) देने की व्यावहारिक और सैद्धांतिक कोशिश की। यह क्रांतिकारी सोच को ही एक भौतिक (material) और आत्मिक (subjective) आयाम प्रदान करने की कोशिश थी. द्वंद्वात्मक स्थिति में दिशा (orientation) और विमर्श तलाशने की कोशिश, द्वंद्व को हवाई सपनों और शब्दों में तब्दील करना नहीं है–जैसा रूस की क्रांति के बाद राजकीय बोल्शेविक विचारधारा (बोल्शेविक स्टेट आइडयोलॉजी) ने एक समय में करना शुरू कर दिया था. 
     

    जैसा कि ऊपर रेखांकित किया गया है, यह भूलना भी गलत होगा कि राज्य एक ऐसी संचरना है, जिसका क्रांतिकारी जनता प्रतिक्रांति के खतरे का सामना करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती है. एकदलीय राज्य ने शुरू में जो वादा किया, जनता ने उसका भरोसा किया, क्योंकि क्रांतिकारी घटना द्वंद्व का अंत नहीं है, उसका एक नया पड़ाव है, जहां नई दिशा की जरूरत है. पर यह सच है कि दलगत-राज्य (पार्टी स्टेट) प्रतिक्रांतिकारी शक्ल भी अख्तियार करता है. इस दुविधा या उलझन का हल क्या है?

    3
    फ्रांस की इतिहासकार सोफी वाहनिक ने अपनी किताब इन डिफेन्स ऑफ द टेरर: लिबर्टी ऑर डेथ इन द फ्रेंच रिवॉल्यूशन  में यह दावा पेश किया है कि 1793-94 के क्रांतिकारी फ्रांसीसी दौर में राज्य ने अगर दहशत की नीति अपनाई तो इसका आधार यह था कि क्रांतिकारी जोश और प्रतिक्रांतिकारी खतरे का द्वंद्व, भावनाओं और हिंसा की एक पुनरावृत्ति में न फंसा रह जाए, वह 'विध्वंस के उन्माद'में फंसकर कत्लेआम में न लग जाए, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण की ओर बढ़े, जो प्रतिशोध की मांग कर रहे क्रांतिकारी जोश को शांत करने की भूमिका अदा करे. इस प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए वाहनिक यह पाती हैं कि 1793-94 की नाज़ुक परिस्थिति में फ्रांस के क्रांतिकारी राज्य ने, जो क्रांतिकारी होने के साथ-साथ कमज़ोर भी था, दहशत की नीति अपनाई तो इसके पीछे उसका यह विश्वास था कि इससे सामने आनेवाली असलियत ऐसी होगी, कि उसकी वजह से प्रतिक्रांतिकारी दहशत से कांपेंगे और क्रांतिकारी सोच का सैद्धांतिक जुनून और व्यावहारिक संस्थाएं, प्रतिक्रांति पर जीत हासिल करेंगी. भावनाओं और हिंसा की पुनरावृत्ति के बाद एक नई राजनैतिक भावना या रस पैदा होगा जो प्रकृति के नियम और चक्र से परे हो. जैसे इतिहास में एक नाट्य प्रदर्शन होता है, जिसके अभिनेता और दर्शक दोनों एक ऐसी अनुभूति से गुज़रते हैं जो नई सोच से पैदा हुई है न कि उस 'पुरातन प्रकृति'या 'आदिम गुणों'से, जिनको इंसान की प्रकृति का हिस्सा माना जाता है. इसके खिलाफ, एक नया समाज और नई सोच पैदा होती है जिससे एक नया राजनैतिक 'रस'जन्म लेता है. 


    यह दूसरी बात है कि फ्रांस और दुनिया के इतिहास में दहशतगर्द राज्य और क्रांतिकारी सोच इस नए रंगमंच और रस–यानी एक नए ऐतिहासिक बिंदु–पर कभी मिल नहीं पाए हैं. फ्रांस की क्रांति में जिस नीति को क्रांतिकारी दहशत कहा जाता था, वह रूस की क्रांति तक पहुंचते-पहुंचते, सीधे-सीधे राजकीय दहशत बन गई. इस राजकीय दहशत के दो पहलू हैं–विचारधारात्मक दहशत (आइडियोलॉजिकल स्टेट एपरेटस, राज्य के वैचारिक उपकरण) और सैनिक या पुलिसिया दहशत (कोएर्सिव स्टेट एपरेटस, राज्य के हिंसक उपकरण).
     

    लेकिन यह भी याद रखने वाली बात है कि जब सोवियत रूस इस राजकीय दहशत की स्थापना कर रहा था, जिसकी मूर्ति स्तालिन है, तभी रूसी रंचमंच में एक ऐसी लहर दौड़ रही थी, जो भविष्य के एक ऐसे रंगमंच की कल्पना कर रही थी, जिसमें एक उत्तर-क्रांतिकारी इंसान ही उसके लेखकों, अभिनेताओं, दर्शकों की रचना करेगा. जिसकी नाट्य भावनाएं एक क्रांतिकारी सोच से मंझे नए सामूहिक स्थान, आकार, समय और समाज में प्रवाहित होंगी.
     

    संभव है कि स्तालिन की विचारधारात्मतक (आइडियोलॉजिकल) दहशत, मेयरहोल्ड या मायकोव्स्की के उत्तर-क्रांतिकारी भविष्य की कल्पना से घबराते हुए हिंसा और भावना की पुनरावृत्ति पर उतर आए. संभव है क्रांतिकारी सोच, उस दौर में भी, राज्य की दहशत से जूझता, बचता, मरता हुआ, हर पुनरावृत्ति के आगे और परे एक नई कल्पना, नई सोच की निशानी पेश करता आया. हावी होने के बावजूद, राज्य की दहशत पूरी तरह उसे मिटा नहीं सकी. राजनीति में नया इंसान दहशत के साथ ही आया, उसे हिंसात्मक तरीके से थोपा गया, लेकिन आगे की राह उसने नई कल्पनाओं के जरिए बनाई. इसके लक्षण कला में जाहिर होते हैं, जहां हर पुनरावृत्ति से आगे और परे, एक अलग तरह का नया रस दिखता है. जहां एक नए तरह के समाज और भविष्य की कल्पना होती है, जिसकी सच्चाई इंसानों को प्रेरित करती है.

    4
    7 नवंबर 1918 को अक्तूबर क्रांति की पहली सालगिरह पर व्सेवोलोद मेयेरहोल्ड ने एक नाटक पेश किया: मिस्ट्री-बूफे. मायकोव्स्की के लिखे इस नाटक को मेयरहोल्ड ने पेशेवर कलाकारों और थिएटर समूहों के बहिष्कार के बावजूद बड़ी मशक्कत से तैयार किया था. क्रांति के बाद यह पहला सोवियत नाटक था, जिसमें अभिनय करने के लिए सार्वजनिक अपील करनी पड़ी थी और आखिरकार छात्रों की बड़ी भागीदारी से इस नाटक को 7 नवंबर 1918 को खेला गया. राजकीय आयोजन होने के बावजूद, इस नाटक से सोवियत सत्ता प्रतिष्ठान को परेशानी थी, क्योंकि इसमें भविष्यवादी रचनाधर्मिता का भरपूर उपयोग किया गया था, जो मायकोव्स्की की खासियत थी और जो मेयरहोल्ड के क्रांतिकारी नजरिए से भी मेल खाती थी. ऐसा इसलिए था कि मेयरहोल्ड महसूस करते थे कि रंगकर्म को वर्तमान की समस्याओं पर गौर करते हुए भविष्य के लिए नई कल्पना को प्रेरित करना चाहिए, जो अपने अंतिम मकसद के रूप में एक नए इंसान के निर्माण और जरूरतों को ध्यान में रखे.


    इसीलिए मेयरहोल्ड एक ऐसे रंगमंच को विकसित करने की प्रक्रिया में थे, जो स्मृतियों पर नहीं बल्कि सामाजिक मुद्राओं पर आधारित हो, जिसकी बनावट और बिंब विधान जाने-पहचाने अतीत का हवाला देने वाली पृष्ठभूमि बन कर न रह जाए, बल्कि उसमें ऐसे तत्व हों जो भविष्य की खातिर नई परिकल्पनाओं को उकसाएं. इसीलिए उन्होंने अपने रंगमंच में क्यूबिस्ट और फ्यूचरिस्ट कलाकारों को जगह दी. इस तरह वे कला की एक ऐसी भूमिका पर जोर दे रहे थे, जो ऐतिहासिक तो थी, लेकिन तो अतीत के किसी एक बिंदु पर ठहरी हुई नहीं थी. 
     

    नाटक को मिली प्रतिक्रियाएं बहुत कड़ी थीं और महज तीन प्रदर्शनों के बाद इसके प्रदर्शन को रोक दिया गया. यह मानो बाईस साल बाद मेयरहोल्ड की गिरफ्तारी, यातनाओं और जेल में मौत की सजा का एक तरह से पूर्वाभास देती हुई घटना थी. 
     

    अक्तूबर क्रांति बदलाव के एक ऐसे वादे के साथ हुई थी, जिसकी व्यापकता बहुत गहरी थी, जिसके दांव पर बहुत कुछ लगा था, लेकिन उसके पास इस वादे की कोई ठोस शक्ल नहीं थी, जिसको छू कर दिखाया जा सके कि क्रांति इसको हासिल करना चाहती है. ऐसे में, जब कुछ लेखक-कलाकारों ने उसे एक शक्ल देने की कोशिश की तो ऐसा क्यों हुआ कि उन्हें सत्ता के पूरे विरोध का सामना करना पड़ा?

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    पहले बोल्शेविक रंगकर्मी के रूप में मेयरहोल्ड द्वारा निर्देशित इस पहले सोवियत नाटक के प्रदर्शन से दो दिन पहले पेत्रोग्राद्साकाया प्राव्दा  में ए.वी. लुनाचार्स्की की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जो उन दिनों पीपुल्स कमिसार फॉर एजुकेशन थे. यह टिप्पणी मेयरहोल्ड द्वारा अपने नाटक में किए जा रहे प्रयोगों के संदर्भ में थी, जिसमें लुनाचार्स्की ने भविष्यवादी कलाकारों द्वारा की गई 'लाखों गलतियों'के प्रति अपनी आशंकाएं व्यक्त करते हुए कहा था, "अगर बच्चा विकृत हो, तब भी यह हमें प्यारा होगा, क्योंकि यह उसी क्रांति की पैदाइश है, जिसको हम अपनी महान मां के रूप में देखते हैं."
     

    बहुत कम टिप्पणियां इतने गहरे अर्थों वाली होती हैं. इस टिप्पणी में सोवियत संघ में आगे चल कर सामने आने वाले उस खौफनाक दौर की मानो एक भविष्यवाणी छिपी हुई थी, जिसमें असहमत नजरिए वाली कला को दबाया गया, पाबंदियां लगाई गईं, बहसों और तर्कों से परे जाकर, कलाकारों का यातनाएं दी गईं, वे गायब कर दिए गए, और उनकी हत्याएं तक हुईं. साथ ही, यह टिप्पणी जाहिर करती है कि क्रांति कला और संस्कृति के प्रति राज्य के संरक्षणवादी और सरपरस्ती भरे नजरिए को दूर नहीं कर पाई थी, जो अब तक के शासक वर्गों का नजरिया रहा था और जिसने कला को महज एक औजार, मतलब साधने की एक गतिविधि भर बना दिया था. 
    लेकिन यह सब तो महज उस बड़ी समस्या के लक्षण थे, जिसकी झलक बहुत साफ तौर पर लुनाचार्स्की की इस टिप्पणी में ही मिलती है. वह है खुद क्रांति के बारे में नजरिया. यहां क्रांति, भविष्य का एक वादा, एक रचनात्मक सपना नहीं रह गई है. बल्कि यह एक 'महान मां'है, जिसको सवालों और संदेहों से परे एक पूज्य मूर्ति के रूप में देखा जाना है. मां मानो एक स्मारक है, जो अपने 'बेटों'की जिंदगियों को अपने साए में लिए हुए है. एक ऐसी उपस्थिति है, जिसका होना भर ही वर्तमान को वैध या अवैध बना देने के लिए काफी है. 
     

    क्रांति को इस तरह देखना, यह एक ऐसी ऐतिहासिक सच्चाई का नकार थी, जिसमें क्रांति एक घटना, एक इवेन्ट होती है लेकिन यह नई प्रक्रिया को जन्म देती है, जो नजरिए, सोच, तौर-तरीकों और उम्मीदों को संभव बनाती है. यह घटना, उन नई प्रक्रियाओं के लिए एक संदर्भ की तरह मौजूद होती है, लेकिन ये प्रक्रियाएं सीधे-सीधे उसकी पाबंद नहीं होतीं और वे उससे आगे जाती हैं.
     

    गौर कीजिए कि किस तरह लुनाचार्स्की, क्रांति का जिक्र करते हुए मेयरहोल्ड और मायकोव्स्की के नाटक को एक ही झटके में अवैध, लेकिन बर्दाश्त किए जाने लायक घोषित कर देते हैं. मेयरहोल्ड और मायकोव्स्की जिस नजरिए का प्रतिनिधित्व करते थे, उसके लिए कला रचना, महज प्रचार का मशीनी औजार नहीं थी, हालांकि मेयरहोल्ड ने खुद थिएटर को प्रचार के एक तंत्र के रूप में विकसित करने में अहम भूमिका निभाई. पहले बोल्शेविक रंगकर्मी और निर्देशक के रूप में उन्होंने फौरी राजनीतिक जरूरतों की भरपाई करने वाले प्रयोग किए, उन्होंने रंगशाला में संदेशों वाली तख्तियां लटकाईं, अंतराल के दौरान दर्शकों पर पर्चों की बारिश की गई, नाटकों के बीच में गृह युद्ध के ताजा समाचार देने के लिए बाइक सवार मंच पर लाए जाते. लेकिन बुनियादी रूप से, मेयरहोल्ड के लिए नाटक एक ऐसा माध्यम थे, जो प्रचार की फौरी जरूरतों को पूरा करते हुए, उससे आगे जाकर एक नए इंसान के निर्माण की अवधारणा पेश करे.
     

    रूसी कलाकारों के संदर्भ में यह बात नई नहीं थी. जैसा कि जॉन बर्जर ने रेखांकित किया है, उनकी रचनाओं में अक्सर ही भविष्यवाणियां और आने वाले दिनों के पूर्वाभास हुआ करते थे. यह प्रक्रिया क्रांति के कुछ समय बाद तक जारी रही, लेकिन क्रांति के बाद अपनाई जाने वाली स्मारकीय दृष्टि और कला के क्षेत्र में अकादमिक नौकरशाही ने रूसी कलाकारों से उनकी यह खूबी भी छीन ली. क्रांति के बाद के समाज में जमीनी तौर पर जनता को रोटी, जमीन और शांति चाहिए थी, और सांस्कृतिक और वैचारिक गतिविधियों को मशीनी तौर पर इस मकसद को हासिल करने के लिए काम में लगा दिया गया. 
     

    मेयरहोल्ड की परिकल्पनाओं में यह देखा जा सकता था कि क्रांति से जो नया उत्साह पैदा हुआ था, उसको वे नए इंसान के निर्माण की दिशा में मोड़ना चाहते थे. उनकी असहमति जिस नजरिए से थी, वह क्रांति को ही नहीं, क्रांति के बाद की हकीकत को, जिंदगी को स्मारक बना देने के करीब ले गया. 
     

    6
    स्मारकीय सोच के अपने नुकसान होते हैं. फ्रांसीसी क्रांति ने बदलाव के स्मारकों को सामूहिक या राष्ट्रीय चाहत के साथ जोड़ा, लेकिन उसने स्मारकों की बुनियादी अवधारणा में कोई बदलाव नहीं किया कि मुख्यत: उनका ताल्लुक अतीत से होता है. वे वर्तमान में अतीत के उद्धरणों की तरह लिए जाएंगे. लेकिन सोवियत संघ ने इस अवधारणा के साथ एक गहरा प्रयोग किया. यहां स्मारकों को अतीत के एक निश्चित अवधि (घटना) और स्थान (संदर्भ) के उद्धरण से बढ़ा कर वर्तमान को परिभाषित करने वाली और उसकी पहचान को गढ़ने वाली जीवंत गतिविधि में तब्दील कर दिया गया. इसने स्मारकों को, खास कर राष्ट्रीय संदर्भ में, अतीत के दायरे से वर्तमान के दायरे में लाकर रख दिया. इसके बाद यह लगभग अनिवार्य बन गया, कि वर्तमान अपनी वैधता लगातार उस स्मारकीय संदर्भ से हासिल करे, जिसे यों तो अतीत में होना था, लेकिन जिसे वर्तमान की जिम्मेदार बना दिया गया है.


    1930 और 40 के दशक में चली उस बहस का पूरा सिरा इससे जुड़ता है, जिसमें कथ्य और स्वरूप को लेकर गंभीर बहस हुई और जिसमें अपने समय के कई बड़े चिंतकों, रचनाकारों और दार्शनिकों ने भाग लिया, जिसमें उस समय के ज्यादातर दिग्गज कलाकारों और चिंतकों की भागीदारी थी मसलन अर्न्स्ट ब्लॉख, थियोडोर अडोर्नो, बेर्तोल्त ब्रेख्त, वाल्टर बेंजामिन और जॉर्ज लुकाच. आइजेन्सटाइन, द्जीगा वेर्तोव. स्नानिस्लाव्स्की, मेयेरहोल्ड.  जैसा कि नामों की इस सीमित सूची से ही जाहिर है, यह बहस, सिर्फ साहित्य तक ही सीमित नहीं रही और कला, थिएटर और सिनेमा जैसी विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों तक इसका विस्तार हुआ. इन बहसों का स्वरूप हमेशा औपचारिक और परस्पर वाद-विवाद का नहीं था, लेकिन वे एक दूसरे की रचनाओं और विचारों के संदर्भ में आगे बढ़ रही थीं और उनके सरोकारों में सबसे ऊपर यही चिंता थी कि एक ऐसे भविष्य के बरअक्स बदलते हुए वर्तमान को कैसे देखा जाए, जिसका एक बाहरी खाका तो हमारे पास है लेकिन जिसकी अंदरूनी शक्ल मौजूद नहीं है.
     

    मोटे तौर पर दो भिन्न वैचारिक स्थितियों की पैरवी करने वाले दो समूहों ने – जो किसी भी लिहाज से अंदरूनी तौर पर आपस में सहमत लोगों से नहीं बने थे और उनमें आपस में काफी मतभेद थे – दो अलग अलग नजरियों की पैरवी की. एक का आग्रह अतीत से एक झटके से मुक्ति के साथ एक नए नजरिए की स्थापना थी, जिसमें एकदम नए तरह की रचना और चिंतन प्रक्रिया विकसित किए जाने की जरूरत थी.  दूसरे नजरिए में, परंपरागत कला रूपों में से कुछ को चुन कर वर्तमान और इसलिए एक सीमित भविष्य के लिए एक आदर्श के रूप में पेश किया गया.
     

    एवरेइनोव और मेयरहोल्ड के नाटकों के संदर्भ में कई समानताएं देखी जा सकती हैं: वे एक ही अक्तूबर क्रांति की अलग-अलग सालगिरहें मनाने के लिए खेले गए. दोनों ही राजकीय आयोजन थे. दोनों में ही जनता की भागीदारी की परिकल्पना थी. इसके बावजूद, क्रांति के प्रति दोनों का व्यवहार उनके नतीजों को इतना अलग-अलग कर देता है. जैसा कि ऊपर कहा गया है, एवरेइनोव के प्रदर्शन ने क्रांति के साथ साथ, क्रांति के बाद के जीवन को भी एक स्मारक में तब्दील कर दिया.
     

    एक स्मारक समय और स्थान, जैसा कि जॉन बर्जर इशारा करते हैं, दोनों के लिए एक चुनौती होता है. एक स्मारक एक द्वंद्व को, एक तनाव को ठहराव देता है, जिनका रिश्ता उन विशिष्ट स्थितियों से होता है, जिनमें उसे निर्मित किया गया होता है. तब एक ऐसे वर्तमान में स्मारकों को कैसे देखा जाए, जहां चीजें हर पल बदल रही हैं और हर विकल्प के अपने आयाम और द्वंद्व हैं? 
     

    7
    रूसी क्रांति से ठीक सौ साल पहले, भारत के पश्चिमी हिस्से में स्थित ताकतवर पेशवा राज की सेना को हराते हुए भारतीय ब्रिटिश फौज की एक टुकड़ी ने भारत में औपनिवेशिक शासन को निर्णायक रूप में स्थापित करने में मदद दी. ब्रिटिशों की ओर से लड़ते हुए जीतने वाली यह रेजिमेंट महार लोगों से बनी थी, जो महाराष्ट्र की सबसे उत्पीड़ित जातियों में से एक से ताल्लुक रखते थे और तब की बोली में 'अछूत'कहे जाते थे. भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखे जाने वाले महार सैनिकों ने इतिहास में बदनाम ब्राह्मणवादी पेशवा राज को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया. 1 जनवरी 1818 को हुई इस लड़ाई में मारे गए सैनिकों की याद में पुणे के पास कोरेगांव में एक स्मारक बनाया गया. 
     

    इसके बाद का इतिहास उपनिवेशवादी सत्ता की क्रूरता, बर्बरता और लूट की सदी थी. यह पूरे समाज के लिए अनेक तरह की तबाहियां लेकर आई, लेकिन साथ ही इसने सबसे उत्पीड़ित तबकों के लिए जातीय और सामुदायिक गिरफ्त को ढीला भी किया. इसने उनके लिए शिक्षा, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी के दरवाजे खोले. पिछड़ों और दलितों द्वारा अपनी मुक्ति के आधुनिक आंदोलनों की बुनियाद भी इसी के बाद पड़ी. 
     

    1927 की एक जनवरी को डॉ. बी.आर. आंबेडकर कोरेगांव स्मारक पर गए और इस जगह पर सालाना रैलियों का एक सिलसिला शुरू किया. किसी स्मारक के साथ आंबेडकर का यह शायद अकेला रिश्ता था. गेल ओमवेट लिखती हैं कि आंबेडकर इन रैलियों में कहा करते थे कि महारों ने ही भारत में ब्रिटिश सत्ता को स्थापित कराया था और महार ही इस सत्ता को यहां से उखाड़ सकते हैं.
     

    यह वो दौर था, जब पूरे उपमहाद्वीप में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष चल रहे थे और इसको लेकर कोई विवाद नहीं था कि जनता के व्यापक हिस्से में आजादी की उम्मीदें थीं. लेकिन विवाद इसको लेकर था कि यह आजादी कैसी होगी. कोरेगांव स्मारक पर आंबेडकर का ऐलान इसकी सबसे क्रांतिकारी अभिव्यक्तियों में से एक थी. इसमें यह उम्मीद और मांग थी कि आनेवाली आजादी को प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी विचारधारा और समाज की जातीय बनावट से मुक्त होना होगा. और इस मुक्ति को वो लोग हासिल करेंगे, जो इससे सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं. इस तरह आनेवाली सच्ची आजादी की कल्पना में ब्राह्मणवाद से मुक्ति की कल्पना भी शामिल थी. 
    इस तरह अपनी रैलियों के जरिए, आंबेडकर ब्रिटिश सत्ता की निर्णायक विजय के उस स्मारक को स्वीकार नहीं कर रहे थे, बल्कि उसे चुनौती दे रहे थे. उन्हें कोरेगांव स्मारक के ऐतिहासिक अर्थ को ही उलट दिया था, जिसमें स्वीकार और नकार की एक जटिल प्रक्रिया काम कर रही थी. वे पेशवाओं की पराजय को स्वीकारते थे, लेकिन इसके नतीजे में स्थापित औपनिवेशिक सत्ता को वे इस योग्य नहीं मानते थे कि वह मुल्क पर शासन करे. वे उस स्मारक में निहित उस ऐतिहासिक पल को संभव बनाने वाले मानवीय श्रम और कुरबानियों को सम्मान दे रहे थे, जिनका योगदान आजादी और नए समाज के निर्माण के लिए प्रेरणा देगा. 
     

    आंबेडकर जो कर रहे थे, वह सिर्फ एक स्मारक को चुनौती देने से कहीं अधिक था. यह स्मारकों की एक ऐसी अवधारणा को चुनौती थी, जिसके तहत उन्हें एक द्वंद्व रहित, सपाट संदेशों के रूप में देखा जाता है. यह ऐतिहासिक पलों को रूढ़ स्मृतियों में तब्दील करने का एक विरोध था. यह एक मांग थी कि इंसान की आजादी, बराबरी और तरक्की की उम्मीदों को अतीत की दुहाई देकर परे नहीं किया जा सकता. इस तरह आंबेडकर हमारी मदद करते हैं कि हम इतिहास के निर्माण में इंसानी कोशिशों की तरफ ध्यान दें, लेकिन साथ ही इसके अंतर्विरोधों और जटिलताओं को कभी अपनी नजरों से ओझल न होने दें. 
     

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    बाद के दिनों में सोवियत संघ द्वारा समर्थित सामाजिक यथार्थवाद की अवधारणा पर बहस करते हुए बेर्तोल्त ब्रेख्त की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि यह अवधारणा, अतीत के स्वरूपों को आज की सामग्री की अभिव्यक्ति के लिए एक आदर्श के रूप में पेश करती है. व्यापक राजनीतिक क्षेत्र में इस धारणा का विस्तार करके देखें तो इसका अर्थ यह भी हो सकता था कि समस्याओं के समाधान अपनी अभिव्यक्ति के लिए, अतीत के स्वरूपों को चुन सकते हैं.
     

    1917 और उसके बाद के समाज के लिए अतीत का मतलब दूसरी चीजों के साथ-साथ पूंजीवाद भी था.


    सौम्यव्रत चौधरी जेएनयू के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ऐस्थेटिक्स में असोसिएट प्रोफेसर हैं. रेयाजुल हक इसी स्कूल से शोध कर रहे हैं.


    समयांतर  के फरवरी 2017 अंक में प्रकाशित. 

    नोट्स

    [1] अक्सर 'फ्रेटर्निटी 'के लिए 'भाईचारा'शब्द का इस्तेमाल होता है, लेकिन यहां हम सोच-समझकर 'मैत्री'शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसका उपयोग डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने बुद्धा एंड हिज धम्म  में किया है. इस शब्द के इस्तेमाल की वजह यह है कि भाईचारा शब्द एक पारिवारिक रिश्ते का आभास देता है, जबकि मैत्री में दोस्ताना और बराबरी पर निहित होती है.  
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    जोहार! झारखंड में जल जंगल जमीन की लड़ाई आर या पार!

    टाटा देखाया, एचईसी देखाया / सीसीएल देखाया, ईसीएल देखाया

    बोकारो देखाया, रउरकेला देखाया / किसी ने देखा क्या 'बिकास'?

    ग्लोबल समिट का मदारी लोग भी ऐसा ही झूठ्ठा है.

    ओह रे रीझरंगिया, हाय रे झारखंडिया !

    आए गेलक लूटेक ले सरकार-फिरंगिया !!

    पलाश विश्वास

    रांची से ग्लाडसन डुंगडुंग ने लिखा हैः

    क्या केंद्र सरकार कोई निजी कंपनी है जो झारखण्ड में निवेश करेगी या झारखण्ड और भारत अलग-अलग देश है? केंद्र सरकार राज्यों को आर्थिक सहायता देती है पूंजीनिवेश नही करती है तथा एक देश ही दूसरे देश में पूंजी निवेश करती है। लेकिन अब क्या केंद्र सरकार को झारखण्ड से लाभ कमान है? क्या बात है! असल में कोई कंपनी राज्य में 5 हजार करोड़ से ज्यादा निवेश करने को तैयार ही नही है इसलिए फजीहत होने से बचने के लिए केंद्र सरकार ही कंपनी बन गयी और 50 हज़ार करोड़ निवेश करने की घोषणा की है। लेकिन सवाल यह है कि जब केंद्र सरकार ही सबसे बड़ा निवेशक है तो ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट आयोजित करने की क्या जरूरत थी? मुख्यमंत्री का फोटो छापकर दिखाने के लिए सरकारी खजाना खाली क्यों किया गया? कोई तो कुछ बताओ भाई क्या चल रहा है?

    एके पंकज ने लिखा हैः

    टाटा देखाया, एचईसी देखाया / सीसीएल देखाया, ईसीएल देखाया

    बोकारो देखाया, रउरकेला देखाया / किसी ने देखा क्या 'बिकास'?

    ओह रे रीझरंगिया, हाय रे झारखंडिया !

    आए गेलक लूटेक ले सरकार-फिरंगिया !!

    ग्लोबल समिट का मदारी लोग भी ऐसा ही झूठ्ठा है.

    आम सूचना ----------------------

    यह आम सूचना झारखंड का गोटा पबलिक लोग का तरफ से जारी किया जाता है कि 16 और 17 फरवरी को 'मोमेंटम झारखंड-ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट 2017'का नाम से हो रहा सरकारी लूट का खिलाफ आप सब अपना फेसबुक वॉल को ऐसा हरा कर दो. वरचुअल बिरोध भी हमारा लड़ाई का जंगल-मैदान है.

    दयामणि बारला का कहना हैः

    गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास जमीन सरकार का नहीं है, यह आदिवासी, मूलवासियों , किसानों और मेहनत कशों का है- जान देंगे-जमीन नहीं।

    कोल्हान के मनकी-मुङांओं ने कहा -किसी भी कीमत में हम अपना जंगल जमीन नदी पहाड़ से विस्थापित नहीं होना चाहते-

    इन दिनों में मेरे पांव थमे हुए हैं।उंगलियां अभी सही सलामत हैं।आंखों में भी  रोशनी बाकी है।मैंने झारखंड में जल जंगल जमीन की लड़ाई में शामिल होने की गरज से कभी 1980 में पत्रकारिता की तब शुरुआत की थी,जब छत्तीसगढ़,उत्तराखंड के साथ साथ झारखंड में जल जंगल जमीन की लड़ाई तेज थी।

    छत्तीसगढ़ में शंकरगुहा नियोगी संघर्ष और निर्माण राजनीति के तहत छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे तो उत्तराखंड में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी आंदोलन कर ही थी,जिस आंदोलन की बागडोर अस्सी के दशक से अब तक उत्तरा खंड की महिलाओं ने संभाल रखी है।

    उस वक्त आंदोलन की कमान शिबू सोरेन और विनोद बिहारी महतो के साथ साथ मजदूर आंदोलन के नेता कामरेड एके राय संभाल रहे थे।

    अब मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़,यूपी से टूटकर उत्तराखंड और बिहार के बंटवारे के बाद झारखंड अलग राज्य बन गये हैं और तीनों राज्यों में आंदोलनकारी अलग अलग खेमे में बxट गये तो जल जंगल जमीन की लड़ाई हाशिये पर आ गयी है।

    मुक्तबाजार में बाजार के कार्निवाल में उत्सव संस्कृति सुनामी की तरह देशभर में आम जनता की रोजमर्रे की जिंदगी को तहस नहस कर रही है और विकास के नाम पूंजी निवेश के बहाने जल जंगल जमन से बेदखली का अंतहीन सिलसिला शुरु हुआ है।

    इस बेदखली के खिलाफ देशभर में आदिवासी हजारों साल से लगातार लड़ रहे हैं और संसाधनों पर कब्जे के लिए उनका नरसंहार  ही भारत का सही इतिहास है जिसकी शुरुआत मोहनजोदोड़ों और हड़प्पा की सभ्याताओं के विनाश से हुई।सिंधु घाटी की नगरसभ्यता के वास्तुकारों,निवासियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी हार नहीं मानी है और वैदिकी सभ्यता के खिलाफ जल जगंल जमीन पर उनकी लड़ाई भारत का इतिहास है।

    1757 में पलाशी की लड़ाइ में सिराजुदौल्ला की हार के बाद बंगाल और बिहार समेत पूरे पूर्व और मध्य भारत में,पश्चिम भारत में भी देश के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए आदिवासी अंग्रेजी हुकूमत और देशी हुक्मरान के खिलाफ लड़ते रहे हैं।

    आजादी के बाद विकास के नाम पर इन्ही आदिवासियों की लगातार बेधखली होती रही।भारत विभाजन के बाद जितने शरणार्थी पाकिस्तान, बांग्लादेश, तिब्बत, म्यांमार और श्रीलंका से आये उनसे कहीं ज्यादा संख्या में इस देस में आदिवासी जबरन विस्थापित बनाये गये हैं।

    इसी लूटखसोट नीलामी के मकसद से भारतीय सेना और अर्द्ध सुरक्षा बल देशी विदेशी कंपनियों की सुरक्षा के लिए आदिवासी भूगोल के चप्पे चप्पे में तैनात हैं।अपने विस्थापन का विरोध और जल जंगल जमीन का हकहकूक की आवाज बुलंद करने पर तमाम आदिवासी नक्सली और मार्क्सवादी करार दिये जाते रहे हैं और उनके दमन के लिए सलवा जुड़ुम से लेकर सैन्य अभियान तक को बाकी देश जायज मानता रहा है।

    1991 के बाद अबाध पूंजी प्रवाह और निवेश विनिवेश आर्थिक सुधार के बहाने पूरे देश में आदिवासियों के खिलाफ फिर अश्वमेध जारी है।जिसके केंद्र में झारखंड और छत्तीसगढ़ खास तौर पर है,जहां छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और झारखंड आंदोलन का विखंडन हो गया है।

    खासतौर पर झारखंड आंदोलन की विरासत पर जिनका दावा है,झारखंड के वे आदिवासी नेता केंद्र और राज्य सरकारों में सत्ता में भागेदारी के तहत इस लूटपाट में शामिल हैं।

    खनिज संपदा,वन संपदा और जल संपदा से हरे भरे छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी फटेहाल हैं।जल जंगल जमीन की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले संथाल, मुंडा,भील,हो कुड़मी आदिवासियों के संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियों के तहत आरक्षित सुरक्षा कवच का भी कोई लाभ आजतक नहीं मिला है और न आजादी के बाद अबतक हुए तमाम विकास कार्यों में बेदखल आदिवासियों को कोई मुआवजा मिला है।

    मुक्तबाजार में पूरा आदिवासी भूगोल एक अंतहीन वधस्थल है।

    दूसरी ओर,जल जंगलजमीन की लड़ाई लड़ रहे उत्तराखंड में भी नया राज्य बनने के बाद माफिया राज है।

    झारखंड के आदिवासी लगातार जल जंगल जमीन के हकहकूक के लिए लड़ रहे हैं।लेकिन बाकी जनता उनके साथ नहीं है और न मीडिया उनके साथ हैं।

    छत्तीसगढ़ में सलवा जुड़ुम है तो झारखंड में वैज्ञानिक सलवा जुड़ुम है,जिसे मीडिया जायज बताने से अघाता नहीं है।

    पूंजी निवेश के नाम अब मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में आईपीएल की तर्ज पर राष्ट्र और राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों की खुली नीमामी हो रही है।

    देश में फासिज्म के राजकाज का अंदाजा लगाना आदिवासियों की रोजमर्रे की जिंदगी में सत्ता का बेलगाम आपराधिक वारदातों के बारे में जानकारी न होने की वजह से बेहद मुश्किल है।

    मसलन नोटबंदी का असर आदिवासी इलाकों में सबसे ज्यादा है जो वन उपज पर जीविका निर्वाह करते हैं या आदिवासी इलाकों में सस्ते मजदूर के बतौर  मामूली आय से जिंदगी गुजर बसर करते हैं और जहां बंगाल की भूखमरी अभी जारी है।

    आदिवासी कार्ड से लेनदेन नहीं करते हैं।जल जंगल जमीन से बेदखली के बाद वे रोजगार और आजीविका से भी बेदखल हैं।

    आदिवासी इलाकों में न संविधान लागू है और न कानून का राज है।

    वहां पीड़ितों की न सुनवाई होती है और न उनके खिलाफ आपराधिक वारदातों,दमन,उत्पीड़न का कोई एफआईआर दर्ज होता है।

    नकदी संकट ने उन पर सबसे ज्यादा कहर बरपाया है।

    इसके उलट संघ के खासमखास सिपाहसालार सीना ठोंककर विधानसभा चुनावों को नोटबंदी पर जनादेश बताने से परहेज नहीं कर रहे हैं क्योंकि गैरआदिवासी जनता कभी जल जंगल जमीन की लड़ाई में कहीं शामिल नहीं है और वहां मजहबी सियासत की वजह से अंध राष्ट्रवाद का असर इतना घना है कि किसी को काटों तो खून भी नहीं निकलेगा।

    नकदी संकट को जायज बताकर वोट डालने वाले यूपी,पंजाब और उत्तराखंड में वोटर कम नहीं हैं।

    हिंदुत्व का यह एजंडा कितनी वैदिकी रंगभेदी हिसा है और कितना राष्ट्रविरोधी कारपोरेट एजंडा,आदिवासियों की लड़ाई में शामिल हुए बिना इसका अहसास हो पाना भी असंभव है।

    गौरतलब है कि बाबासाहेब भीमराव आम तौर पर वंचित वर्ग की लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन वे खुले तौर पर दलितों के नेता थे,जिन्हें खुलकर संविधान सभा में सबसे पहले आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा ने समर्थन दिया था।

    सोशल इंजीनियरिंग और जाति धर्म समीकरण से सत्ता में भागेदारी में शरीक बहुजन समाज के नेताओं ने आदिवासियों के हक हकूक के लिए कोई आवाज अभी तक नहीं उठायी है और बहुजनों में हजारों साल से वैजिकी संस्कृति,पूंजी और साम्राज्यवाद के खिलाफ आजादी की लड़ाई में सबसे ज्यादा शहादतें देने वाले आदिवासियों के बिना बहुजन समाज का हर दावा खोखला है।

    बहरहाल झारखंड और छत्तीसगढ़ में बहुजन आदिवासियों का साथ दें तो किसी चुनावी जीत के मुकाबले कही ज्यादा कारगर प्रतिरोध मुक्ताबाजार के हिंदुत्व एजंडे का हो सकता है।

    इसी सिलसिले में रांची में ग्वलोबल इंवेस्टर्स समिट का विरोध कर रहे आदिवासियों का साथ देना बेहद जरुरी है।

    डुंगडुंगने जो लिखा है,वह पूरे देश में मुक्तबाजारी लूटपाट का किसा है,जिसमें सत्तावर्ग के साथ साथ समारा मीडिया और सारी राज्य सरकारें शामिल हैं।

    हम रांची जाने की हालत में नहीं हैं लेकिन हम रांची में आदिवासियों की इस लड़ाई के साथ हैं।

    रांची से साथियों के कुछ अपडेट्स पर गौर करेंः

    वंदना टेटे का कहना हैः

    आदिवासी बोलेंगे| जहां भी मंच मिलेगा| अपनी ही बात बोलेंगे|

    ग्लोबल समिट के जरिए हमारी आवाज नहीं दबायी जा सकती|

    डुंगडुंग ने लिखा हैः

    यह आॅकड़ा विकास बनाम विनाश को समझने के लिए है। विकास के नाम पर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सौदा करने का नतीजा क्या हो सकता है उसे समझना हमारे लिए बहुत जरूरी है। चीन की अर्थव्यवस्था 9.24 ट्रिलियन डाॅलर है और भारत का 1.877 ट्रिलियन डाॅलर। चीन के घरेलू सकल उत्पाद के मूल्य का विश्व अर्थव्यवस्था में हिस्सा 17.75 प्रतिशत है जबकि भारत का मात्र 3.38 प्रतिशत है। चीन में प्रति व्यक्ति आय 6,807.43 डाॅलर है वहीं भारत में प्रति व्यक्ति आय 1,498.87 डाॅलर। लेकिन चीन के 74 शहरों में से सिर्फ 3 शहर ही पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित हैं एवं बाकी 71 शहरों में आॅक्सीजन खरीदना पड़ रहा है। भारत की राजधानी दिल्ली पर्यावरण की दृष्टि से असुरक्षित हो चुकी है जहां कनाडा की कंपनी ने आॅक्सीजन बेचने का प्रस्ताव रखा है। एक बार सांस लेने के लिए 12.50 रूपये चुकाना होगा। लेकिन भारत चीन से प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है। इसलिए आज यह समझना बहुत जरूरी है कि हम आदिवासी लोग जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज यानी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं तो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि यह संघर्ष सम्पूर्ण मानव जीवन और प्रकृति को बचाने के लिए है। आज जंगल सिर्फ आदिवासी इलाकों में क्यों बचा हुआ है? क्या विकास का बड़ा-बड़ा सिद्धांत देने वालों के पास इसका जवाब है?

    बरखा लकडा ने लिखा हैः

    इतिहास आपकी ताकत है, तो युवा आपकी शक्ति 🍂

    🍂वीरता की ढाल पहनकर व जुनून का हथियार लेकर अमर नहीं शहीद होने का जज्बा रखो🍂

    अपने हजारों साल के लंबे और वैविध्यपूर्ण इतिहास में आदिवासी आज सबसे ज्यादा नाजुक दौर से गुजर रहा हैं। इस लम्बे इतिहास में हमारे पुरखों ने हर तरह के बाहरी आवरणों , आक्रमणों और भेदभाव को पूर्ण हस्तक्षेप कर सफलता पूर्वक संर्घष किया। हाथ में तीर-कमान , टंगियाॅ , दौवली लेकर दुश्मनों का कड़ा मुकाबला किया। अपनी संस्कृति, आज़ादी और अस्मिता की रक्षा के लिए खुद की बलि चढा दी। अंग्रेजों के हमलें के बाद आदिवासी इलाकों का इतिहास उनकी घुसपैठ को नाकाम करने के लिए प्रतिकारों और विद्रोहों की न टूटने वाली कड़ी रूप गाथाओं की अंतहीन किताब हैं। हमें अभिमान है कि गाथाओं में झारखंड में आदिवासी प्रतिकारों और विद्रोहों की गथाऐं अनूठी हैं। और सुनहरे अक्षरों में अंकित हैं। ये स्पष्ट है कि आदिवासी समाज ने कभी अंग्रेज़ी हूकुमत को स्वीकारा ही नहीं । उस समय दो ताकत 'आदिवासी बनाम अंग्रेज़ी हूकुमत' की लडाई हुई। इस लड़ाई में सारे आदिवासी युवा ही नेतृत्‍व किये।

    आदिवासियों का मानना था कि 'हमारे पुर्वजों ने जंगल- पहाड़ काटकर अपने हाथों से इस धरती को रहने लायक बनाया ये धरती हमारे पूर्वजों की हैं बीच में ये सरकार कहाॅ से आयी'।

    वर्त्तमान समय में भी सरकार छलपूर्ण कूटनीतिक चालों से विकास के नाम पर आदिवासियों की जमीन हडप लेना चाहती हैं। इस आक्रमण का खुला चुनौती सिर्फ और सिर्फ युवा ही दे सकते हैं। आज भी लडाई ' आदिवासी बनाम सरकार ' की हो गई हैं। जिसका सीधा मुकाबला युवा ही कर सकते हैं। इन युवाओ को भी अपने पुर्वजों के इतिहास को अपनी ताकत बनाकर सरकार की धूर्तापूर्ण कूटनीतिक और छलपूर्ण नीतियों का डटकर सामना करना होगा। फिर एक नयी 'हूल उलगुलान' का विगूल फूकना होगा वरना सरकार आपको विकास के नाम पर कब बलि चढा देगी ये खुद को भी पता नहीं चलेगा। अब वक्त है साथियों वीरता की ढाल पहनकर व जुनून का हथियार लेकर अमर नहीं शहीद होने का जज्बा रखो तभी आप अपना भूत, वर्त्तमान और भविष्य बचा पाओगे। और आपका आने वाला पीढी आपको नमन करेगा।

    अब तो लौट आओ बिरसा..

    अब तो लौट आओ बिरसा॥

    सूख गयी सारी नदियाँ बिरसा, कट गये सारे पेड़॥॥

    सूना हुआ पहाड़ बिरसा ,

    जंगल हुआ विरान॥

    कत्ल हो गये सारे सपने बिरसा,

    यतीम हुआ इतिहास ॥॥

    जल रही है धरती बिरसा ,

    लूट रहा आकाश॥॥

    पुकार रही है आंसू बिरसा, चीख रहा आवाज॥॥

    अब तो लौट आओ बिरसा

    अब तो लौट आओ...

    🍂बरखा लकडा 🍂


    डुंगडुंग ने लिखा हैः

    आदिवासियों को एक बात बहुत अच्छा से समझना होगा कि यदि वे ऐसे ही दूसरों के इसारे पर नाचते और उद्योगपतियों का स्वागत करते रहे तो आनेवाले समय में उनके पास नाचना क्या पैर रखने के लिए भी जमीन नही होगा। और जब जमीन ही नही होगा तो उनको कोई पूछने वाला भी नही होगा। आदिवासी लोग कीड़े-मकोड़े की तरह रौंद दिए जायेंगे। जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधन पर ही आदिवासी अस्तित्व टिक हुआ है। जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज ख़त्म मतलब आदिवासी ख़त्म।

    मोमेंटम झारखंड। आपका क्या है जो इतना इतना रहे हैं? जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज यानी सम्पूर्ण प्राकृतिक संम्पदा आदिवासियों का। उन्हीं के इलाकों में। आपके इलाके में क्या है? आप ने सबकुछ बेच खाया है। हां इन संसाधनों को आप लूट जरूर सकते हैं आदिवासियों से। आप हैं ही चोर, लूटेरा, बेईमान, हत्यारा और मुनाफाखोर। अब देखिये मोमेंटम झारखंड का लोगो उड़ता हाथी भी आपने गांेड़ आदिवासियों की कलाकृति से चोरी करके 40 लाख रूपये में बेचा है और आदिवासियों को क्रेडिट तक नहीं दिया। इतना बेईमान हैं आप लोग जो आज विकास के ठेकेदार बने हुए हैं और मीडिया तो आपके प्रचार का माध्यम है। पांच पेज का सरकारी विज्ञापन एक दिन में। वाह रे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ! सच्चाई छुपाने और जनता को भ्रमित करने का इनाम। अपना वजूद तक खोने को तैयार। जय हो लोकतंत्र ! चोर, लुटेरा, बेईमान, हत्यारा और मुनाफाखोरों का महाकुंभ है 'मोमेंटम झारखंड'और पानी की तरह पैसा बह रहा आम जनता का। और हां जब मैं हत्यारा कह रहा हॅंू तो याद रखिये टाटा ने ओड़िसा के कलिंगानगर में 19 आदिवासियों की हत्या करने के बाद अपना परियोजना स्थापित किया है और यही हत्यारा देश के विकास का मॉडल है तो आप समझ सकते हैं कि झारखंड किस दिशा में जा रहा है।

    छापिए-छापिए. अपनी वॉल पर. उसकी वॉल पर. दोस्त की वॉल पर. दुश्मन की

    वॉल पर. हर वॉल पर छापिए. कल तक सबकी वॉल पर छपा होना चाहिए -

    ''हेंदे रमड़ा केचे केचे, पुंडी रमड़ा केचे.''


    इसके उलट सरकारी दावा हैः

    संपन्न हुआ निवेशकों का महाकुंभ : हो जाये तैयार....आने वाला है छह लाख रोजगार :

    तैयार हो जाइये क्योंकि आने वाले दो सालो में झारखंड के छह लाख से ज्यादा लोगो को रोजगार मिलेगा. विभिन्न सेक्टर्स में छह लाख से अधिक लोगो के लिए रोजगार के द्वार खुलेंगे. जी हां, ये कोई सपना नहीं बल्कि हकीकत है. आज मोमेंटम झारखंड के दौरान 3 लाख करोड़ के निवेश पर हस्ताक्षर हुए. 209 कंपनियों के साथ सरकार का एमओयू हुआ. वहीं 6 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा. प्रत्यक्ष और परोक्ष मिला कर वास्तविक रोजगार की संभावनाएं इससे कई गुणा अधिक होगी. राज्य सरकार की ओर से कंपनियों के सीएसआर फंड पर नजर रखने के लिए भी एक संस्था का गठन किया गया है जिसकी जिम्मेदारी अब और ज्यादा बढ़ गई है.

    बढे़गा जीवन स्तर :

    मोमेंटम झारखंड से सूबे के लोगों के एसइएस यानि सोशियो इकोनोमिक स्टेटस में भी बेहतरी के अवसर खुलेंगे. नियमानुसार कंपनियों को अपने लाभ का दो प्रतिशत कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी पर खर्च करना होता है. जाहिर है सूबे के जिस इलाके में कंपनियां निवेश करेंगी, वहां स्कूल, पार्क, स्वास्थ्य व अन्य जन सुविधाओं में इजाफा होगा. कंपनियों ने भी आयोजन के दौरान इसमें अपनी रुचि दिखाई जिससे उम्मीद जाहिर हो रही है कि इलाके का जीवन स्तर सुधरेगा.

    क्या कहते हैं एक्सपर्ट :

    अथर्शास्त्री प्रो हरेश्वर दयाल कहते हैं कि मोमेंटम झारखंड से जीवनस्तर और जनसुविधाओं के बढ़ने की कई राह खुली हैं. एक तो यहां निवेश से रोजगार के अवसर खुलेंगे. दूसरा सीएसआर यानि कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी से भी इलाके की जनसुविधाएं बढ़ेंगी. वहीं दूसरी ओर रैपिड ट्रांसपेार्ट और स्मार्ट सिटी विकसित होने से लोगों को सीधा लाभ मिलेगा और उनके जीवनस्तर में सुधार होगा.

    दिखाया सामाजिक जिम्मेदारी के लिए उत्साह :

    कंपनियों ने अपने संबोधन में यहां की सामाजिक जिम्मेदारी में हिस्सेदारी की बात भी कही. जिंदल ग्रुप के नवीन जिंदल ने एलान किया कि सीएसआर के तहत कंपनी स्कूल और स्किल डेवलपमेंट में काम करेगी. सिंगापुर आम लोगों को सस्ते आवास मुहैया कराने में के प्रयास में राज्य सरकार का साझीदार बनेगा. मोमेंटम झारखंड के पहले दिन जॉन अब्राहम के नेतृत्व में सीएम से मिले प्रतिनिधिमंडल ने इस बाबत चर्च की. इसके अलावा सिंगापुर ने अस्पताल, कन्वेंशन सेंटर के निर्माण में भी रुचि दिखाई. आस्ट्रेलिया ने राज्य के बच्चों को स्कूली स्तर पर भी ट्रेनिंग देकर ओलंपिक के लिए तैयार करने की बात कही. किसानों को अधिक उपज के लिए ट्रेनिंग देने, सखी मंडल, युवा मंडल के कौशल विकास में भी आस्ट्रेलिया मदद करेगा.



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    जब प्रेतात्माओं से मीडिया का काम चल सकता है,तो मनुष्यों को मीडिया की कोई जरुरत नहीं है।

    मीडियाकर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी  भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी!

    पलाश विश्वास

    मीडियाकर्मी इसे अच्छीतरह समझ लें कि उनकी कार्यस्थितियों को नर्क बनाने से लेकर उनका सीआर खराब करने और उसीके आधार पर उन्हें काम से निकालने में मीडिया के मसीहा तबके की शैतानी भूमिका हमेशा निर्णायक होती है।कारपोरेट हितों के मुताबिक अपनी चमड़ी बचाने और जल्दी जल्दी सीढ़ियां छंलागने के लिए यह तबका किसी की भी बलि चढ़ाने से हिचकता नहीं है।

    1991 से मीडिया में गैरपत्रकारों की छंटनी का विरोध पत्रकारों ने कभी नहीं किया है और यूनियनों के नेतृत्व में रहे पत्रकारों ने सबसे पहले गैरपत्रकारों की कुर्बानी देकर आटोमेशन तेज किया है।

    यह भोगा हुआ यथार्थ है कि यूनियनें मालिकान की पहल पर चुनिंदा पत्रकारों की अगुवनाई में ही बनीं,जिसने पत्रकारों और गैरपत्रकारों की बलि चढ़ाकर अपनाकैरियर सवांरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।आज के हालात के लिये यह क्रांतिकारी मसीहा तबका मालिकानव से ज्यादा जिम्मेदार हैं।आगे मीडियाकर्मी ऐसी गलती न दुहरायें तो बेहतर।

    इसी आटोमेशन के खिलाफ आवाज उठाने में मेरा अपने सीनियर साथियों से दुश्मनी भी मोल लेनी पड़ी है।लेकिन हम अपने साथियों को बचाने में नाकाम रहे हैं।

    अब हम अनेक संपादकों और अपने पुराने सीनियर जूनियर साथियों के क्रांतिकारी तेवर से ज्यादा चकित हैं,जिन्होंने पेशेवर जिंदगी में हमेशा कारपोरेट हितों के मुताबिक बाजार के व्याकरण के मुताबिक पत्रकारिता की है और नौकरी में रहते हुए कारपोरेट लूट खसोट और जल जंगल जमीन के हकहकूक की आवाज उठाते जनपदों और जनसमूहों के उत्पीड़न सैन्य दमन से लेकर मेहनतकश तबकों के आंदोलन और बहुजनों पर सामंती अत्याचारों के खिलाफ बाकी मीडियाकर्मियों की तुलना में नीतिगत फैसलों की बेहतर स्थिति के बावजूद पिछले छब्बीस सालों में एक पंक्ति भी नहीं लिखी है और न अपने साथियों के हकहकूक के लिए कभी जुबान खोली है।

    मीडिया का यह पाकंडी मसीहा तबका,सत्तावर्ग ही बाकी मीडियाकर्मियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।क्योंकि वे बाकायदा मीडिया प्रबंधन के हिस्सा बने रहे हैं।इन लोगों से सावधान रहने की जरुरत है।कारपोरेट हितों के लिए वे हमेशा पेरोल पर हैं।

    हमने अपनी पेशेवर पत्रकारिता के 36 सालों में अपने साथियों को बचाने की हर संभव कोशिशें की हैं।जरुरत पड़ी तो किसी किसी पर हाथ भी उठाया है,लेकिन ऐन मौके पर उनकी गलतियों की जिम्मेदारी लेकर सजा भुगतने में और अपने कैरियर का बंटाधार करने में भी हिचकने की जरुरत महसूस नहीं की है।

    हमने किसी की शिकायत करने के बजाये हमेशा खुद हालात से निबटने की कोशिशें की हैं और जाहिर है कि मैनेजमेंट की आंखों में किरकिरी बने रहने में या उसे डराने में मुझे मजा आता रहा है।

    हस्तक्षेप पर अरविंद घोष की रपट से सदमा जरुर लगा है,लेकिन हमारे लिए यह कोई अचरज की बात नहीं है।मीडिया में पेशेवर नौकरी में रहते हुए हमें बहुत कुछ झेलना पड़ा है।

    एबीपी समूह शुरु से ही मुक्तबाजार व्यवस्था का सबसे मुखर प्रवक्ता रहा है और इस मायने में टाइम्स समूह उसका देश एकमात्र प्रतिद्वंद्वी है।

    दुनियाभर में ट्रंप समर्थक अमेरिकी फाक्स न्यूज के साथ उसकी तुलना की जा सकती है जो वर्चस्ववादी नस्ली रंगभेद के सत्तावर्ग की संस्कृति का प्रचार प्रसार करता है।

    टीवी 18 समूह और हिंदुस्तान समूह के रिलायंस के हवाले हो जाने के बाद मीडिया कर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी  भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी है।अरविंद ने लिखा हैः

    Strongly condemn the retrenchment on 7th February, 2017 with only 2 hours notice, of about 750 workers, journalists and reporters of Ananda Bazar Patrika group of  newspapers of Kolkata. Express solidarity with the retrenched workers and journalists and their affected families.

    यह हालत अचानक नहीं बनी है।

    मीडियाकर्मियों की जनपक्षधर चरित्र के लगातार हो रहे स्खलन और उनके आत्मघाती तरीके से मार्केटिंग और सत्ता की पैदल सेना बन जाने से समूचा मीडिया इस वक्त बारुदी सुंरगों से भरी मौत की घाटी में तब्दील है।

    गैरपत्रकार तबकों की छंटनी का कभी विरोध न करने वाले पत्रकार अब मीडिया में गैरपत्रकारों के सारे काम मसलन कंपोजिंग,प्रूफ रीडिंग,लेआउट,फोटोशाप,पेजमेकिंग से लेकर विज्ञापने लगाकर सीधे मशीन तक अखबार छापने के लिए तैयार करने का काम करते थे,जहां 1991 से पहले इन सारे कामों के लिए अलग अलग विभाग गैरपत्रकारों के थे।

    आटोमेशन मुहिम के चलते एक एक करके वे सारे विभाग बंद होते चले गये।अखबारों में अब दो ही सेक्शन हैं,संपादकीय और प्रिंटिंग मशीन।

    संपादकीय विभाग का काम भी मूल सेंटर के अलावा बाकी सैटेलाइट संस्करणों में इलेक्ट्रानिक इंजीनियर कर देते हैं।इसके खातिर पत्रकारों की संख्या बहुत तेजी से घटी है।प्रिंटिंग सेक्शन में भी बचे खुचे कर्मियों को अपने संस्थान के अखबारों के अलावा एक साध दर्जन भर से ज्यादा अखबारों का काम संस्था के जाब वर्क बतौर काम के घंटों के अंदर अपने वेतनमान के अलावा बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के करना होता है।

    मीडिया संस्थानों में स्थाई नौकरी वाले पत्रकार गैर पत्रकार विलुप्त प्राय हैं।जो हैं वे रिटायर करने वाले ही हैं।उन्हें आगे एक्सटेंशन मिलने की कोई संभावना नहीं है।

    अगले पांच सालों में मीडिया में सारे कर्मचारी ठेके की नौकरी पर होंगे।आटोमेशन के सौजन्य से किसीकी खास काबिलियत का कोई मूल्य नहीं है।इसलिए बाजार के मुताबिक छंटनी का यह सिलसिला चलने वाला है।

    वेज बोर्ड से बचने के लिए देशभर में असंख्य संस्करण आटोमेशन के जरिये छापते रहने की वजह से मीडिया में कोई पत्रकार या गैरपत्रकार,चाहे उनकी काबिलियत या हैसियत कुछ भी हो,अपरिहार्य नहीं हैं,जैसे हम लोग 1991 से पहले हुआ करते थे।सिर्फ अपने काम और अपनी दक्षता के लिए उन दिनों पत्रकारों के सात खून माफ थे।

    मीडिया ने मुझ जैसे बदतमीज पत्रकार को भी 36 साल तक झेल लिया और आजादी का सचस्का लग जाने से मैंने भी 36 साल तक मीडिया को झेला।अब हमारे जैसे लोगों के लिएमीडिया में कोई जगह नहीं बची है।

    इसलिए मीडिया में हर छोटे बड़े पत्रकार गैरपत्रकार के सर पर छंटनी की तलवार लटकी हुई है।आंखें बंद करके कारपोरेट या मार्केट के हित में कमा करते रहने की वफादारी से भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है,जब प्रेतात्माों से मीडिया का काम चल सकता है,तो मनुष्यों को मीडिया की कोई जरुरत नहीं है।

    हम जब दैनिक जागरण में मुख्य उपसंपादक बतौर काम कर रहे थे,1984 और 1989 के दौरान,तब माननीय नरेंद्र मोहन समूह के प्रधान संपादक थे।संपादकीय विभाग के कामकाज में वे हस्तक्षेप नहीं करते थे।

    संस्करण मैं ही निकालता था।ऐसा वक्त भी आया कि रातोंरात सारे पत्रकार बाग निकले और डेस्क के साामने सबएडीटर की कुर्सी पर सिर्फ नरेंद्रमोहन जी अकेले थे।उस वक्त नये पत्रकारों की भरती का विज्ञापन सबसे पहले तैयार करना होता था और आवेदन मिलते न मिलते उन्हें नियुक्ति देकर ट्रेनी पत्रकार बतौर उन्हें काम के लायक बनाना होता था।

    विज्ञापन छापने से लेकर भर्ती और प्रशिक्षण मेरठ में मेरी जिम्मेदारी थी तो कानपुर में आदरणीय बीके शर्मा की और समूह के समाचार संपादक तब हरिनारायण निगम थे।

    मुश्किल यह था कि छह सौ रुपल्ली से ज्यादा छात्रवृत्ति किसी को दी नहीं जाती थी।यह मरेठ की पगार थी।लखनऊ में तीन सौ रुपये की छात्रवृत्ति थी।खुराफात की वजह से जब उन्हीं तीनसौ रुपये की पगार पर उन्हें मेरठ स्तानांतरित कर दिया जाता था,हमारे लिए मानवीय संकट खड़ा हो जाता था।

    सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि नरेंद्र मोहन जी का आदेश था कि स्टिक बाई स्टिक मापकर पांच कालम का अनुवाद और पांच कालम के संपादन का काम सबसे लेना हो चाहे अखबार में कुल दस कालम की भी जगह न बची हो।

    हम लगातार प्रशिक्षुओं को स्थाई बनाने पर जोर देते रहते थे और अक्सर ऐसा नहीं हो पाता था।काम सीखते ही एक साथ भर्ती तमाम प्रशिक्षु झुडं बनाकर कहीं भी किसी भी अखबार में भाग निकलते थे क्योंकि तब जागरण ट्रेनिंग सेंटर से निकले पत्रकारों की बाजार में भारी मांग होती थी ।स्थाई पत्रकार भी वेतन सात सौ आठ सौ रुपये से ज्यादा न होने की हालत में अक्सर निकल भागते थे।

    फिर नये सिरे से भर्ती और प्रशिक्षण की कवायद।आदरणीय बीके शर्मा के बाद शायद मैने ही सबसे ज्यादा पत्रकारों को जागरण में नियुक्ति दी है और प्रशिक्षित किया है।इसलिए साथी पत्रकारों की नौकरी के आखिरी दिनों में भी मुझे बेहद परवाह होती थी।

    प्रभात खबर,जागरण और अमरउजाला में हम कंप्यूटर पर बैठते नहीं थे।कंपोजीटर,प्रूफरीटर,पेजमेकर अलग थे।कैमरा और प्रोसिंसग के विभाग अलग थे।कोलकाता में आये तो लेआउट आर्टिस्टभी दर्जनभर से ज्यादा थे।

    बीके पाल एवेन्यू में दोनों अखबारों में सौ से ज्यादा पत्रकार थे और लगभग सभी स्थाई थे।इनके अलावा जनसत्ता के करीब डेढ़ सौ स्ट्रींगर थे।दस साल पहले भी ग्रांट लेन के आफिस में इंडियन एक्सपेर्स की शुरुआत पर सौ से ज्याादा पत्रकार थे।फाइनेंशियल एक्सप्रेस का आटोमेशन सबसे पहले हुआ।फिर जनसत्ता का।

    आटोमेशन ने सारी भीड़ छांट दी।

    अब जनसत्ता कोलकाता में मेरे और शैलेंद्र के रिटायर होने के बाद स्थाई पत्रकार सिर्फ दो डा.मांधाता सिंह और जयनारायण प्रसाद रह गये तो एकमात्र स्टाफ रिपोर्टर प्रभाकरमणि तिवारी।बाकी दो अखबारों में एक भी स्थाई पत्रकार नहीं हैं।

    आफिस और मार्केटिंग में सारे के सारे.मैनेजर भी सारे के सारे ठेके पर हैं।

    दो आर्टिस्ट सुमितगुहा और विमान बचे हैं स्थाई।

    कंपोजिग के पुराने साथियों में प्रमोद कुमार और संपादकीय सहयोगी महेंद्र राय स्थाई हैं जो मार्केटंगकेलिए काम करते हैं।

    मशीन में पुराने कुछ लोगों के अलावा बाकी सारे ठेके पर हैं।

    यह किस्सा हकीकत की जमीन पर कयामती फिजां की तस्वीर है।

    एबीपी भाषाई अखबार समूह है ,जहां आटोमेशन शायद सबसे पहले शुरु हुआ।लेकिन बांग्ला में इंटरनेट से हिंदी और अंग्रेजी की तरह सारा कांटेट रेडीमेड लेने की स्थिति न होने और करीब पंद्रह करोड़ बांग्ला पाठकों की वजह से उन्हीं मौलिक कांटेंट की जरुरत पड़ती है।इसलिए आटोमेशन और ठेके की नौकरी के बावजूद वहां पत्रकारों गैरपत्रकारों की फौज बनी हुई थी।

    यानी बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं के  मीडिया में भी  हिंदी और अंग्रेजी की तरह प्रेतात्माओं से अब काम लिया जाना है।

    प्रेतात्माओं का वर्चस्व मनुष्यों के वजूद को खत्म करने वाला है।इंसानियत का जज्बा खतम है तो जाहिर है कि अब सिर्फ मसीने बोलेंगी।अभी रोबाट आया नहीं है और यह हाल है,आगे क्या होगा ,मीडियाकर्मी सोच समझ लें तो बेहतर।

    जाहिर है कि आटोमेशन,मशीनीकरण,आधुनिकीकरण ,उपभोक्ता वाद और मुकतबाजार का पत्रकारों ने जिस अंधेपन से समर्थन किया है,उससे सत्तावर्ग और मुक्तबाजारी राजनीति के नरसंहारी अश्वमेधी अभियान में चुनिंदा मौकापरस्त पत्रकारों के राजनीति,सत्ता और यहां तक कि पूंजीवादी तबक में एडजस्ट होने की कीमत अब मीडियाकर्मियों को हर हालत में चुकानी होगी।

    साथियों की निरंतर छंटनी का प्रतिरोध पत्रकार जमात ने  चूंकि कभी नहीं किया है और छंटनी का सिलसिला पत्रकारों के सहयोग से निर्विरोध जारी रहने की वजह से यूनियन बनाकर लड़ने की संख्या और ताकत भी उनके पास नहीं है।दूसरी तरफ श्रम कानून सिरे से खत्म हो जाने पर ऐसी लड़ाई से भी अब पायदा नहीं है।वेज बोर्ड का किस्सा काफी है प्रेस और मीडिया में कानून के राज का सच बताने के लिए।

    हाल में भड़ास के मजीठिया मंच से कानूनी लड़ाई का एकमोर्चा जरुर खुला है लेकिन मीडिया में इस वक्त संपूर्ण आटोमेशन होने की वजह से वेतनमान की लड़ाई भले आप लड़ लें,तेज होती छंटनी रोकने का आसार बेहद कम है।

    अब मीडियाकर्मियों को फर्जी मसीहा वर्ग की प्रेतात्माओं के शिकंजे से बाहर निकालकर अपनी जनमुखी भूमिका में वापस आने का सही वक्त है क्योंकि अब खोनेका कुछ भी नहीं है।हमने यह फैसला 1991 में ही कर लिया था।

    सिर्फ तरक्की और प्रोमोशन के मौके के अलावा मैंने कुछ नहीं खोया है।अब रिटायर होने के बाद भी बाकायदा जिंदा हूं और अपने मोर्चे पर अडिग हूं।

    जीवित मृत मसीहा संप्रदाय से मैरी स्थिति बेहतर है क्योंकि मैंने पाखंड जिया नहीं है और आम जनता के साथ सड़क पर खड़े होने में मुझे कोई शर्म नहीं है।मेरी नियति तो अपने पुरखों की तरह अपने गांव खेत खलिहान में किसी आपदा में मर जाने की थी।पढ़ लिखकर मैं अपने लोगों के साथ मजबूती के साथ खड़े होने की हिम्मत जुटा सका और पत्रकरिता को उनके हक हकूक की लड़ाई के हथियार बतौर इस्तेमाल करने की हमेशा कोशिश की, मरते वक्त कम स कम मुझे मामूली पत्रकार होने का अफसोस नहीं होगा।चाहे हासिल कुछ नहीं हुआ हो।

    मेरे पत्रकार मित्रों,पानी सर से ऊपर है और पांव तले जमीन भी खिसक रही है।बतौर पत्रकार जनता के साथ खड़े होने का इससे बेहतर मौका नहीं है।



    या कब्रिस्तान चुनें या फिर श्मशानघाट!

    संवैधानिक पद से जब कब्रिस्तान के बदले श्मशानघाट बनाकर गांवों के विकास का खुल्ला ऐलान चुनाव का मुद्दा हो जाये,जब बहस गधे के विज्ञापन पर हो,तब वोटर चाहे जो फैसला करें आगे बेड़ा गर्क है।

    नया यह हुआ है कि अमेरिकी मीडिया अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ हो गया है।

    फर्क भारत और अमेरिका में बस इतना ही है कि भारत का मीडिया जनता के खिलाफ हो गया है और उसका सच हुक्मरान का सच है।

    कमसकम इस बंटवारे के बाद यूपी के चुनाव नतीजों का इंतजार अब मत करें।

    पलाश विश्वास

    किसी गांव को कितने कब्रिस्तान या कितने श्मशानघाट चाहिए,अब यह सवाल फिजूल है।दोनों बराबर हैं।कब्रिस्तान बनना है तो श्मसानघाट बनाना जरुरी है और श्मशानघाट बनाने के लिए कब्रिस्तान जरुर बनना चाहिए।

    रामराज्य में समरसता की यह अजब गजब समता अब फासिज्म का राजकाज है।फसल जनादेश है।यही लोकतंत्र का अजब गजब सच भी है।

    मुक्तबाजारी विकास का व्याकरण भी यही है।सुनहले दिनों का यही चेहरा है।

    कहां तो छप्पन इंच का सीना तना हुआ था कि नोटबंदी पर जनादेश होगा और कहां बातें चलीं तो हम या तो श्मशानघाट में हैं या फिर कब्रिस्तान में।

    अंतिम संस्कार का फंडा़ भी यही है कि जिंदगी के इस लोक में जिसे कुछ न दिया हो,उसे परलोक में अमन चैन से बसने या उनकी उत्पीड़ित वंचित आत्मा की मुक्ति के लिए कर्म कांड के मार्फत अपनी अपनी आस्था के मुताबिक चाक चौबंद इंतजाम कर दिया जाये।समाज इसका इंतजाम खुद करता है।समुदाय की आस्था तय करती है कि अंतिम संस्कार की जगह कैसी हो।परिजन और पुरोहित कास्टिंग में होते हैं।

    जाहिर है कि श्मसानघाट या कब्रिस्तान बेहद जरुरी हैं लेकिन मुश्किल यह है कि बिना जरुरत इन्हें इफरात में जहां तहां बना देने का लोक रिवाज नहीं है।बल्कि मौत से जुड़े होने के कारण रिहायशी इलाकों में ऐसे स्थान घाट बनाने से लोग परहेज करते हैं।

    बनारस में घाट बहुत देखे हैं,श्मशानघाट कितने हैं,गिने नहीं हैं।

    अब श्मशानघाटों पर ही क्वेटो स्मार्ट शहर तामीर होना है,जाहिर है।

    बाकी तरक्की की आलीशान इमारतें,न जाने कितने ताजमहल इन्हीं कब्रिस्तानों में या श्मशान घाटों में तामीर होंगे और न जाने कितने करोड़ लोगों के हाथ काट दिये जायेंगे।ये ही हमारे सुपरमाल हैं,स्मार्ट शहर हैं और विकसित गांवों की तस्वीर भी यही।

    यह सिलसिला जारी रहना चाहिए,ताकि हम सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भुखमरी ,बेरोजगारी और मंदी के बावजूद,उत्पादन प्रणाली तहस नहस हो जाने के बावजूद बनसकें और देश कैसलैस डिजिटल नोटबंदी के बाद बनाया जा सके।

    जिन्हें जल जंगल जमीन की फिक्र जरुरत से ज्यादा है और जो बेइंतहा बेदखली के खिलाफ लामबंद हैं,वे भी समझ लें कि कहां कहां कैसे कैसे ऐसे श्मसानघाट और कब्रिस्तान बनाये जाने वाले हैं।हुक्मरान की मर्जी,मिजाज और इरादा समझ लें।

    यह न कविता है और न पहेली।कविता लिखना छोड़ दिया है और पहेली हम बनाते नहीं हैं।बहरहाल हालात कविता की तरह रोमांचक हैं तो पहेली की तरह अनगिनत भूलभूलैया का सैलाब।जी,हां यह मजहबी सियासत का तिलिस्म है जो कारपोरेट भी है और मुक्तबाजारी भी।व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र अबाध पूंजी के ।

    अब डंके की चोट पर बाबुलंद ऐलान हो गया कि हमारे तमाम गांवों में श्मशान घाट और कब्रिस्तान बराबर बनेंगे।स्कूल,कालेज,अस्पताल जैसी चीजों में बराबरी की बात चूंकि हो नहीं सकती, हक हकूक में बराबरी चूंकि हो नहीं सकती, मौकों में बराबरी चूंकि हो नहीं सकती,सर्वत्र नस्ली भेदभाव है तो जाति धर्म नस्ल में बंटे समाज के हिस्से में समता का यह नजारा कब्रिस्तान के मुकाबले श्मशानघाट बनता ही है।

    मजहबी सियासत से अब कब्रिस्तान या श्मशान घाट के अलावा कुछ नहीं मिलनेवाला है।सारे चुनावी समीकरण और जनादेश का कुल नतीजा यही है,जिसका पहले ही ईमानदार हुक्मरान ने सरेआम ऐलान कर दिया है।

    उन्हें धन्यवाद  या शुक्रिया अपने अपने मजहब से कह दीजिये और कमसकम इस बंटवारे के बाद यूपी के चुनाव नतीजों का इंतजार अब मत कीजिये।

    जाहिर सी बात है कि संवैधानिक पद से जब कब्रिस्तान के बदले श्मशानघाट बनाकर गांवों के विकास का खुल्ला ऐलान चुनाव का मुद्दा हो जाये,जब बहस गधे के विज्ञापन पर हो,तब वोटर चाहे जो फैसला करें आगे बेड़ा गर्क है।

    गधे फिरभी बेहतर हैं।

    उनकी आस्था हिंसा नहीं है।

    वे उत्पीड़ित वंचित शोषित हैं और आम जनता के मुकाबले उनका स्टेटस कुछ भी बेहतर नहीं है।लेकिन गधे का कोई मजहब नहीं होता और न गधे मजहब के नाम बंटे होते हैं।

    न गधों की संस्कृति वैदिकी हिंसा है और न गधों को अंतिम संस्कार के लिए किसी कब्रिस्तान या श्मशानघाट जाने की जरुरत है और न इस दुनिया में कहीं किसी कत्ल या कत्लेआम में गधों का कोई हाथ है ।

    जाहिर है कि गधे हमेशा प्रजाजन हैं,हुक्मरान नहीं जो पूरे मुल्क को या कब्रिस्तान या फिर श्मसानघाट बनाकर रख दें।

    कृपया गौर करें,हम पिछले 26 सालों से रोज इन्हीं कब्रिस्तानों और श्माशान घाटों के बारे में लिखते बोलते रहे हैं,किसीकी समझ में बात नहीं आयी।अब कमसकम वे कब्रिस्तान और श्मशान घाट के हकीकत पर बहस हो रही है।

    अब भी असलियत जो समझ न सकें ,वे चाहे जिसे वोट दें,या न दें,इससे देश में कुछ भी बदलने वाला नहीं है।उनका भी मालिक राम है।रामभरोसे पूरा देश है।

    जनगणमण बनाम वंदेमातरम् बहस फिजूल है।

    राष्ट्रगान गीत दोनों अब राम की सौगंध है।भव्य राम मंदिर वहीं बनायेंगे।

    बहरहल भारत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे 11 मार्च को आने वाले हैं।2014 में भी एक नतीजा आया था।नतीजों के असर पर बहस का कोई मतलब नहीं है।चुनावी समीकरण से सत्ता का फैसला आने वाला है,वह चाहे जो हो उन राज्यों का या देश का किस्मत बदलने वाला नहीं है।

    उम्मीदें बहुत हैं सुनहले दिन भगवा जमीन पर बरसने के और बिन मानसून बादल भी खूब उमड़ घुमड़ रहे हैं।

    बादल बरसे या न बरसे,हालात या कब्रिस्तान है या फिर श्मशानघाट।

    उत्पादन केंद्रों में, खेतों में, कल कारखानों में, दफ्तरों में खेतों खलिहानों से लेकर बाजारों में, गांवों,जनपदों से लेकर महानगरों तक हम दसों दिशाओं से कब्रिस्तान से घिरे हुए हैं और आगे और और कब्रिस्तान और श्मसानघाट  बनाने का वादा है।

    हुजुर, इस ऐलान से घबराने या भड़कने की कोई जरुरत नहीं है।

    हो सकें तो जमीन पर सीधे खड़े होकर हवाओं की खुशबू को पहचानें और जमीन के भीतर हो रही हलचलों को समझकर,मौसम,जलवायु और तापमान को परख कर  आने वाली आपदाओं के मुकाबले तैयार हो जायें।

    राजनीतिक रुप से सही होने पर हालात बेकाबू है और यही सच का सुनामी चेहरा है।अब पहले कौन मारे जायेंगे,अपनी अपनी मौत देर तक टालने की लड़ाई है और कुरुक्षेत्र में सत्ता विमर्श और युद्ध पारिस्थितकी यही है।हर किसी के लिए चक्रब्यूह है।

    क्योंकि अब हमारे पास विकल्प सिर्फ दो हैं या कब्रिस्तान या फिर श्मशानघाट।

    क्योंकि अब हमारे पास तीसरा कोई विकल्प नहीं बचा है।

    यह मुक्तबाजार का सच जितना है ,उसे बड़ा सच मजहबी सियासत का है।

    सबसे बड़ा सच हमारे लोकतंत्र और हमारी आजादी का है कि हुक्मरान हमें श्मसानघाट और कब्रिस्तान के अलावा कुछ भी देने वाले नहीं हैं।जो सुनहले दिन आने वाले हैं,वे दरअसल इन्ही श्मशानघाट या कब्रिस्तान के सुनहले दिन हैं।

    यूपी के कुरुक्षेत्र में तीसरे चरण के मतदान में कुल इकसठ फीसद वोट पड़े हैं।कहीं कहीं ज्यादा भी वोट गेरे गये हैं।जिनने वोट नहीं दिये ,कुल उससे बी कम वोट पाकर सरकारें खूब बन सकती हैं और चल दौड़ भी सकती हैं।फासिज्म के राजकाज का यही रसायन शास्त्र ,जैविकी और भौतिकी विज्ञान है।

    अमेरिका में तो महज 19.5  फीसद जनता के वोट से ग्लोबल हिंदुत्व के नये ईश्वर का अाविर्भाव हुआ है।जबकि उनके खिलाफ वोट 19.8 फीसद है।

    सारी विश्वव्यवस्था बदल गयी है।

    उपनिवेश में सत्ता बदल जाने से कयामत का यह मंजर बदलने वाला नहीं है।

    अब हालात यह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति स्वीडन में आतंकवादी हमला करा रहे हैं।यह अमेरिका का पहला झूठ भी नहीं है।

    खुल्ला सफेद झूठ कहने के लिए मीडिया से दुश्मनी तकनीकी तौर पर गलत है।सारे के सारे अमेरिकी राष्ट्रपति झूठ पर झूठ बोलते रहे हैं।

    दुनियाभर में युद्ध, गृहयुद्ध, विश्वयुद्ध में उन्हींके हित दुनिया के हित बताये जाते हैं।ईरान इराक अफगानिस्तान लीबिया मिस्र से लेकर सीरिया तक तमाम ताजे किस्से हैं।हम दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में अमेरिकी सैन्यशक्ति के शिकंजे में हैं और अमेरिकी हित भारत के सुनहले दिन बताये जा रहे हैं।साधु।साधु।

    नया यह हुआ है कि अमेरिकी मीडिया अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ हो गया है।

    फर्क भारत और अमेरिका में बस इतना ही है कि भारत का मीडिया जनता के खिलाफ हो गया है और उसका सच हुक्मरान का सच है।

    जम्हूरियत के जश्न में या तो हुक्मरान बोल रहे हैं या मीडिया बोल रहा है,आम जनता की कोई आवाज नहीं है।

    गूंगी बहरी जनता को बदलाव के ख्वाब देखने नहीं चाहिए और वह देख भी नहीं रही है।इसीलिए हत्यारों के सामने खुला आखेट है और चांदमारी जारी है।

    इसीलिए विकल्प या कब्रिस्तान है या फिर श्मसानघाट।

    अब आप ही तय करें कि आपका विकल्प क्या है।

    रांची से ग्लाडसन डुंगडुंग का अपडेट हैः

    झारखंड का गुमला जिला जहां आदिवासियों के जमीन लूट के खिलाफ 'जान देंगे, जमीन नहीं देंगे'जैसे नारा की उत्पत्ति हुई, आज इस जिले के आदिवासियों ने एक बार फिर से प्राकृतिक संसाधनों के कॉरपोरेट लूट के खिलाफ जंग छेड़ दिया है। अब वे नारा दे रहे हैं... आदिवासियों को धर्म के नामपर बांटना बंद करो... हम सब एक हैं... जल, जंगल, जमीन हमारा है...रघुवर दास छत्तीसगढ़ वापस जाओ... आदिवासी विधायक स्तीफा दो... 16-17 फरवरी 2017 को भारत सरकार, झारखंड सरकार और कॉरपोरेट जगत के लोग रांची में झारखंड की जमीन, खनिज, जंगल, पहाड़ और पानी का विकास के नाम पर सौदा कर रहे थे उसी समय गुमला में प्राकृतिक संसाधनों के इस कॉरपोरेट लूट के खिलाफ हजारों आदिवासी लोग आपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। एक बात तो तय है कि ये आग जो झारखण्ड में लगी है और झारखण्ड सरकार उसमें बार-बार घी डाल रही है, ये आग बुझेगी नही--

    हिमांशु कुमार ने लिखा हैः

    समाज के अन्याय के मामलों में कानून का बहाना बनाने वालों को ये भी स्वीकार कर लेना चाहिये कि जनरल डायर का गोली चलाना कानूनी था,

    भगत सिंह की फांसी भी कानूनी थी,

    सुक़रात को ज़हर पिलाना कानूनी था,

    जीसस की सूली की सज़ा कानूनी थी,

    गैलीलियो की सज़ा कानूनी थी,

    भारत का आपातकाल कानूनी था,

    गरीबों की झोपडियों पर बुलडोजर चलाना कानूनी है,

    पूरी मज़दूरी के लिये मज़दूरों की हड़ताल गैरकानूनी है,

    अंग्रेज़ी राज का विरोध गैरकानूनी था,

    सुकरात का सच बोलना गैरकानूनी था,

    यह बिल्कुल साफ है कि कानून और गैरकानूनी तो ताकत से निर्धारित होते हैं,

    आज आपके पास ताकत है इसलिये हमारा इन्साफ मांगना भी गैर कानूनी है,

    कल जब हमारे हाथ में ताकत होगी तब ये आदिवासियों की ज़मीनों की लूट, मुनाफाखोरी और अमीरी गैरकानूनी मानी जायेगी,





    कब्रिस्तान या श्मसान में तब्दील निजी अस्पतालों के शिकंजे से बचने के लिए मेहनतकशों के अपने अस्पताल जरुरी!

    ममता बनर्जी ने खोला अस्पतालों और नर्सिंग होम का कच्चा चिट्ठा,जनता के जख्मों पर मलहम भी लगाया,लेकिन वे भी यह गोरखधंधा को खत्म करने के मूड में नहीं!

    अब मुक्तबाजार के खिलाफ अनिवार्य है जन स्वास्थ्य आंदोलन!

    पलाश विश्वास

    अभी आलेख लिखने से पहले समाचारों पर नजर डालने पर पता चला कि महाराष्ट्र के पालिका चुनावों मे हाल में भाजपा से अलग होने के बाद शिवसेना मुंबई में बढ़त पर है,जहां भाजपा दूसरे नंबर पर है।बाकी महाराष्ट्र में भाजपा की जयजयकार है और कांग्रेस का सफाया है।बहुजन चेतना,बामसेफ,क्रांति मोर्चा,अंबेडकर मिशन, रिपबल्किन राजनीति के मामले में महाराष्ट्र बाकी देश से आगे है।इस नीले झंडे की सरजमीं पर शिवाजी महाराज की विरासत अब विशुध पेशवाराज है।भगवाकरण के तहत केसरिया सुनामी भी वहां सबसे तेज है।

    इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में फिर भगवा तांडव का नजारा है और यूपी में चरणबद्ध मतदान में अब कब्रिस्तान या श्मशानघाट चुनने की बारी है।

    उत्पादन प्रणाली तहस नहस है क्योंकि भारत का सत्तावर्ग को उत्पादन के बजाय मार्केटिंग में ज्यादा दिलचस्पी है।चूंकि उत्पादन श्रम के बिना नहीं हो सकता,जाहिर है कि उत्पादन के लिए मेहनतकशों के हकहकूक का ख्याल भी पूंजीवादी विकास के लिए रखना अनिवार्य है।

    दूसरी ओर,मार्केटिंग में मेहनतकशों के हकहकूक का कोई मसला नहीं है।हमारी मार्केंटिंग अर्थव्यवस्था में इस लिए सारे श्रम कानून खत्म हैं और रोजगारीकी कोई गारंटी अब कहीं नहीं है।उत्पादन में पूंजी और जोखिम के एवज में मुनाफा के बजाय फ्रैंचाइजी,शेयर और दलाली से बिना कर्मचारियों और मेहनतकशों की परवाह किये तकनीकी क्रांति के जरिये मुनाफा का मुक्त बाजार है यह रामराज्य।

    कारपोरेट पूंजी के हवाले देश के सारे संसाधन और अर्थव्यवस्था है।जाहिर है सर्वत्र छंटनी का नजारा है।मुक्तबाजार के समर्थक सबसे मुखर मीडिया में भी अब कारपोरेट पूंजी का वर्चस्व है और वहां भी मशीनीकरण से दस कदम आगे आटोमेशन और रोबोटीकरण के तहत छंटनी और बेरोजगारी संक्रामक महामारी लाइलाज है।फिरभी भोंपू,ढोल,नगाडे़ का चरित्र बदलने के आसार नहीं हैं।

    श्मशानघाट और कब्रिस्तान का नजारा खेतों खलिहानों और छोटे कारोबार में सर्वव्यापी हैं।भुखमरी,बेरोजगारी,मंदी,बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं के लिए क्रय क्षमता से महाबलि सत्ता वर्ग और उनका मौकापरस्त पढ़ा लिखा समझदार ज्ञानी संपन्न मलाईदार तबका जाहिर है मोहताज नहीं है।वित्तीय प्रबंधन और राजकाज के नीति निर्धारक तमाम बगुला भगत,झोला छाप विसेषज्ञ इसी तबके के हैं और भारतीय समाज में पढ़े लिखे ओहदेदार तबके का नेतृ्त्व जाति,धर्म,नस्ल क्षेत्र,पहचान में बंटी जनता का नया पुरोहिततंत्र है और बहुसंख्य बहुजन जनता इसी नये पुरोहित तंत्र के शिकंजे में फंसी है।

    नवधनाढ्य इस सत्तावर्ग को हिंदुत्व के कारपोरेट एजंडे और नरसंहारी मुक्तबाजार में अपनी संतान संतति का पीढ़ी दरपीढ़ी आरक्षित भविष्य नजर आता है।

    जाहिर है कि मुक्तबाजार के खिलाफ कोई आवाज राजनीति में नहीं है तो समाज में साहित्य में,संस्कृति,कला विधा माध्यमों में भी नहीं है।

    है तो माध्यमों पर बाजार और कारपोरेट पूंजी के कार्निवाल विज्ञापनी प्रायोजित पेइड वर्चस्व के कारण उसकी कही कोई गूंज नहीं है।

    जनपक्षधर ताकतों में अभूतपूर्व बिखराव और दिशाहीनता है।

    महाराष्ट्र का सच यूपी समेत बाकी देश का सच बन जाये तो हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सभी लोग कमोबेश मुक्तबाजार के बिछाये शतरंज के दस दिगंत कुरुक्षेत्र में भगवा कारपोरेट एजंडे के तहत जनता के अस्मिताबद्ध,जाति बद्ध,धर्म नस्ल क्षेत्र आधारित बंटवारे के इस खेल में जाने अनजाने शामिल हो गये हैं,जिसमें जीत या हार चाहे किसी की हो,आखिर में अर्थव्यवस्था,उत्पादन प्रणाली और आम जनता की मौत तय है।

    खेती,कारोबार,उद्योगों की हम पिछले 26 साल से सिलसिलेवार चर्चा करते रहे हैं।लेकिन जनता तक हमारी आवाज पहुंचने का कोई माध्यम या सूत्र बचा नहीं है।कोई मंच या संगठन या मोर्चा हमारे लिए बना या बचा नहीं है जहां हम उत्पीड़ित,वंचित,मारे जा रहे बेगुनाह इंसानों की चीखों की गूंज बन सकें।

    आम जनता को अर्थव्यवस्था समझ में नहीं आती और अपने भोगे हुए यथार्थ का विश्लेषण करने की फुरसत रोज रोजदम तोड़ रही उनकी रोजमर्रे की बिन दिहाड़ी बेरोजगार मेहनतकश भुखमरी की जिंदगी में नहीं है।

    गांधी की पागल दौड़ के विमर्श के बदले अब राममंदिर का स्वराज रामराज्य है और मुक्तबाजार स्वदेश है।डान डोनाल्ड ट्रंप की रंगभेदी प्रतिमा की हमारे धर्मस्थलों में देवमंडल के अवयव में प्राण प्रतिष्ठा हो गयी है।

    मार्क्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद, समाजवाद जैसे रंगबिरंगेवाद विवाद की आम जनता में कोई साख बची नहीं है।विचारधाराें चलन से बाहर है और सर्वव्यापी आस्था का अंध राष्ट्रवाद हिंदुत्व की कारपोरेट सुनामी है।जनता के हक में हर आवाज अब राष्ट्रद्रोह है और जनता का उत्पीड़न,शोषण औरदमन,नरसंहार देशभक्ति है।

    इस मुक्त बाजार में असल कब्रिस्तान और श्मशानघाट कारपोरेट पूंजी के हवाले स्वास्थ्य बाजार है।सार्वजनिक स्वास्थ्य से राष्ट्र का पल्ला झाड़ लेनेके बाद हम इसी कारपोरेट स्वास्थ्य बाजार के हवाले हैं।

    जनस्वास्थ्य के लिए सरकारें अब स्वास्थ्य हब बना रही है।

    गली गली गांव गांव मोहल्ला मोहल्ला नई संस्कृति का मकड़ जाल बुनते हुए बार रेस्तरां खोलने की तर्ज पर हेल्थ हब और हेल्थ टुरिज्म के बहाने हेल्थ सेक्टर में सरकार अधिगृहित जमीन मुफ्त में देकर या लीज पर,कर्ज पर देकर आम जनता को जिंदा जलाने या दफनाने के लिए इन्हीं कब्रिस्ताऩों और श्मसान घाटों के हवाले कर रही हैं जनता की चुनी हुई सरकारें।मौत का वर्चस्व कायम है जिंदगी पर।

    मुक्त बाजार से पहले तक अधिकांश जनता का सस्ता इलाज सरकारी अस्पतालों में बड़े पैमाने पर होता रहा है।साठ के दशक तक देहात के लोग इन अस्पतालों से भी दूर रहते थे।उस दौर का ब्यौरा हमारे साठ के दशक के साहित्य में दर्ज है।मसलन ताराशंकर बंद्योपाध्याय का आरोग्य निकेतन

    अभी 21 फरवरी को अमेरिका के कैलिफोर्निया के पालो आल्टा में विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री कैनेथ ऐरोका निधन हो गया,जिन्हें 1972 में नोबेल पुरस्कार मिला था।

    इन्हीं अर्थशास्त्री ऐरो ने 1963 मेंचेतावनी दी थी कि सारा समाज इस पर सहमत है कि स्वसाथ्य सेवा  को सिर्फ बाजार के हवाले करने पर विचार किया ही नहीं जा सकता।

    22 फरवरी को कोलकाता के टाउन हाल में निजी और कारपोरेट अस्पतालों के कर्णधारों को बुलाकर बंगाल की पोपुलिस्ट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन अस्पतालों के कामकाज की समीक्षा और जनसुनवाई कर दी।उन अस्पतालों को लेकर लगातार तेज हो रहे विस्फोटक जनरोष की रोकथाम के बतौर।जिसमें इन अत्याधुनिक कब्रिस्तानों और श्मशानघाटों की भयंकर तस्वीरें सामने आयी हैं,जो आज के तमाम तमाम अखबारों में छपा है।

    बहरहाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ शब्दों में यह एलान कर दिया है कि इलाज के नाम पर प्राइवेट अस्पतालों व नर्सिंग होम की लूट-खसोट नहीं चलेगी।

    जाहिर है कि मुख्यमंत्री लूटखसोट का यह तंत्र जारी रखते हुए उसमें जनता को बतौर उपभोक्ता खुश करने के लिए उसमें सेवा को शोषणविहीन बनाने पर जोर दिया है। वे वैकल्पिक जन स्वास्थ्य आंदोलन खड़ा करके पूंजी और बाजार के खिलाफ खड़ा होने के मूड में नहीं है जो सत्ता राजनीति और समीकरण के हिसाब से सही भी है।

    बुधवार को कोलकाता के ऐतिहासिक टाउनहॉल में महानगर और आसपास के इलाकों के  प्राइवेट अस्पतालों व नर्सिंग होम के प्रतिनिधियों को बैठक में पेशी करके मुख्यमंत्री ने साफ साफ  कहा कि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों के इलाज में लापरवाही व मनमानी की जाती है। मरीजों से अधिक बिल वसूला जाता है। यहां तक कि पैसे नहीं दिये जाने पर अस्पताल प्रबंधन परिजनों को शव तक ले जाने नहीं देता है।

    मुख्यमंत्री ने सभी अस्पतालों और नर्सिंग होम का कच्चा चिठ्ठा सिलसिलेवार उन अस्पतालों के प्रतिनिधियों के सामने खोलकर कड़ी चेतावनी भी जारी की।

    यह आम जनता की शिकायत की भाषा नहीं है।ममता बनर्जी बाहैसियत मुख्यमंत्री अपने संवैधानिक पद से ये शिकायत कर रही हैं तो सच का चेहरा कितना भयंकर होगा,इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

    दीदी ने तो फिरभी यह पहल की है,बाकी देश में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के गोरखधंधे के खिलाफ सरकारें,प्रशासन,कानून का राज और राजनीति अखबारी चीखती सुर्खियों में रोजाना दर्ज होते नंगे सच के मुकाबले सिरे से खामोश हैं।यही नहीं, इन सभी तत्वों की हेल्थ बिजनेस में बेशर्म हिस्सेदारी है।

    बंगाल में अभी निजी अस्पतालों से नवजात  शिशुओं की तस्करी का सिलसलेवार पर्दाफाश हो रहा है।अभी ताजा खुलासा से उत्तर बंगाल की एक बड़ी भाजपाई महिला नेता कटघरे में हैं तो बाकी राजनीति भी दूध से धुली नहीं है।

    बहरहाल मुख्यमंत्री ने कहा कि वह काफी दिनों से प्राइवेट अस्पतालों के साथ इन मुद्दों पर बैठक करना चाहती थीं। जाहि्र है कि  सीएमआरआइ में इलाज में लापरवाही से मरीज की मौत के बाद भारी हिंसा के बाद  की घटना के बाद यह बैठक जरूरी हो गयी थी।

    हाल के जनरोष और हिंसा की घटनाओं के सिलसिले में  दीदी ने कहा कि किसी की मौत पर परिजनों का दुखी होना स्वाभाविक है, पर कानून हाथ में लिये जाने का समर्थन नहीं किया जा सकता है।

    दीदी ने बाकायदा आंकडे पेश करते हुए कहा कि राज्य में 2,088 नर्सिंग होम हैं। केवल महानगर में नर्सिंग होम की संख्या 370 है। मां माटी मानुष की सरकार  ने 942 नर्सिंग होम में सर्वे करवाया था, जिसमें से 70 को कारण बताओं नोटिस जारी किया गया। वहीं, 33 का लाइसेंस रद्द कर दिया गया। नर्सिंग होम वालों की लूट-खसोट से परेशान होकर पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर ने भी एक सर्वे करवाया था, जिसमें भी प्राइवेट अस्पतालों की काफी गलतियां सामने आयीं।

    बैठक के ब्यौरे के मुताबिक मुख्यमंत्री ने कहा कि हद तो यह है कि स्वास्थ्य स्कीम के द्वारा जारी किये गये बीमा पर भी ये लोग मरीजों से पैसे वसूलते हैं। स्वच्छता व को-ऑर्डिनेशन का सख्त अभाव है। बिल बढ़ा कर लिया जाता है। यहां तक कि इलाज के बगैर भी बिल वसूलने की घटना नजर आती है। मरीजों पर महंगा टेस्ट करवाने के लिए दबाव डाला जाता है। बगैर जरूरत मरीज को वेंटिलेशन व ऑपरेशन थियेटर में डाल दिया जाता है। इससे बड़ा अनैतिक काम और नहीं हो सकता है। मरीजों को उनके मामले का विवरण नहीं दिया जाता है.।तय पैकेज पर एक्सट्रा पैकेज लेने का मामला भी सामने आया है।

    मुख्यमंत्री ने टाउन हॉल में मौजूद सभी बड़े नामी अस्पतालों के प्रतिनिधियों की एक एक करके क्लास लगायी।

    दीदी के जबाव तलब के जबाव भी बेहद दिलचस्प  हैं।

    मसलन दीदी ने अपोलो अस्पतालके प्रतिनिधि को संबोधित करते हुए कहा कि सबसे अधिक शिकायत आप लोगों के खिलाफ हैं। यहां गैरजरूरी टेस्ट आम है। मरीजों व उनके परिजनों को तरह-तरह से परेशान किया जाता है। उन पर महंगा टेस्ट करवाने के लिए दबाव बनाया जाता है। 35-40 लाख रुपये का बिल बना दिया जाता है। इतना बिल तो फाइव स्टार होटल में रहने पर भी नहीं बनता है। आखिर आम लोग लाखों रुपये बिल का भुगतान कैसे करेंगे?

    अपोलो अस्पताल के प्रतिनिधि ने मुख्यमंत्री के इस विस्फोटक बयान पर जबाव में सफाई दी  कि वे लोग साफ-सुथरा बिल बनाते हैं। चूंकि काफी महंगे यंत्र लगाये हैं और कुछ विशेष प्रोटोकॉल है, तो इसलिए खर्च कुछ ज्यादा होता है।

    ब्यौरे के मुताबिक मुख्यमंत्री बेलव्यू अस्पतालके प्रतिनिधि को लताड़ लगाते हुए कहा कि आपके यहां स्वास्थ्य परिसेवा का स्तर पहले के मुकाबले निम्न हो गया है।सीध दीदी ने कहां कि ऊपर से जिस प्रकार आप लोग मोटा बिल बना रहे हैं, उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं। इस पर बेलव्यू के प्रतिनिधि ने कहा कि हमारे यहां की नर्सें अक्सर दूसरे अस्पतालें में चली जाती हैं, जिससे हमारी स्वास्थ्य सेवा प्रभावित हुई हैं।

    सीएमआरआइअस्पताल की क्लास लेते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आपके यहां मरीजों से काफी ज्यादा बिल लिया जाता है। जिससे वहां जानेवाले रोगियों व उनके परिजनों को काफी परेशानी होती है। पिछले दिन सीएमआरआइ में जो घटना हुई, वह ठीक नहीं थी, पुलिस ने एक्शन लिया है, पर आप लोग भी सेवा पर अधिक ध्यान दो।गौरतलब है कि इसी हिंसा के मद्देनजर यह पेशी हुई है।

    रूबी अस्पतालको लताड़ लगाते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आपके यहां काफी चार्ज लिया जाता है, उसे ठीक करें। साथ ही आप के यहां मरीजों को उनके इलाज से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया जाता है, जो ठीक नहीं है।

    मुख्यमंत्री ने सबसे कड़ा प्रहार मेडिका अस्पतालपर किया, इस अस्पताल का प्रतिनिधि जब अपनी बात कहने के लिए खड़ा हुआ, तो मुख्यमंत्री ने उन्हें कहा कि आपके यहां किडनी रैकेट किस तरह चल रहा है?

    मुख्यमंत्री के इस बात हतप्रभ मेडिका के प्रतिनिधि ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है। हमारा किडनी रैकेट से कोई लेना-देना नहीं है। मुख्यमंत्री ने उनकी बात को काटते हुए कहा कि किडनी रैकेट में आप लोगों का नाम है।. दिल्ली से केंद्र सरकार की हमें रिपोर्ट मिली है। सीआइडी ने भी मामले की जांच की है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारा केवल यही कहना है कि हम लोग अपने राज्य में किसी भी हाल में किडनी व शिशु तस्करी रैकेट चलने नहीं देंगे।

    गौरतलब है कि शिशु तस्करी का जालकोलकाता से दिल्ली तक फैला हुआ है और प्रभावशाली तबके के साथ इसका नाभिनाल का संबंध है।

    भागीरथी नेवटिया वूमेन एंड चाइल्ड केयर सेंटर के प्रतिनिधियों को मुख्यमंत्री ने कहा कि आप के यहां से मरीजों के साथ लापरवाही की काफी रिपोर्ट हमारे पास आयी है। आपके यहां इलाज काफी महंगा है.।

    मुख्यमंत्री ने मौजूद सभी प्राइवेट अस्पतालों के  प्रबंधन से  कहा कि मलेरिया व डेंगू का प्रकोप आरंभ होने वाला है। यह नवंबर तक चलेगा। काफी मामले सामने आये हैं कि नर्सिंग होम वाले डेंगू का डर दिखा कर लाखों रुपया मरीजों से लूट लेते हैं। इलाज करें, पर लोगों को भयभीत न करें।

    फिर उन्होंने  हेल्थ हब और हलेथ टुरिज्म के मुक्तबाजारी बिजनेस के थीमसांग की तर्ज पर कहा कि हमारे यहां बांग्लादेश, नेपाल, बिहार, उत्तर पूर्व से काफी लोग इलाज के लिए आते हैं। नर्सिंग होम वालों को यह ध्यान में रखना होगा कि यह ईंट व लकड़ी का व्यवसाय नहीं, बल्कि जिंदगी बचाने का काम है। सेवा को कभी बेचा नहीं जाता। मरीजों को मानवीय दृष्टि से देखना चाहिए। 20 प्रतिशत की जगह अगर 100 प्रतिशत कमाई करेंगे, तो यह सेवा नहीं, संपूर्ण व्यवसाय बन जायेगा।

    यह अस्पतालों की तस्वीरें ही नहीं हैं,ये कुल मिलाकर मुक्त बाजार में हमारे समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, मीडिया, लोक, जनपद, मीडिया, उत्पादन प्रणाली, हाट बाजार, खेत खलिहान, कल कारखानों, दफ्तरों की आम तस्वीरे हैं जिन्हें सुनहले दिनों की तस्वीरें और अत्याधुनिक विकास की आयातित स्मार्ट बुलेट मिसाइल राकेट झांकियां मानकर कारपोरेट हिंदुत्व एजंडे के रामराज्य में मनुस्मृति बहाल करने मनुस्मृति शासन के फासिज्म के राजकाज के तहत हम नरसंहारी अश्वमेधी पैदलसेनाओं में शामिल हैं।जाहिर है कि कंबधों के वोट से कोई जनादेश नहीं है।

    हिंदू राष्ट्र के मुक्तबाजार के खिलाफ पहले शहीद कामरेड शंकर गुहा नियोगीने अपने संघर्ष और निर्माण राजनीति के तहत छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे के कार्यक्रम में जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी थी और बिना पूंजी या बाहरी मदद के अपने संसाधनों से मेहनकशों के अपने अत्याधुनिक शहीद अस्पताल में बाजार के व्याकरण और दबाव तोड़कर आम जनता को  नाम मात्र खर्च पर सही इलाज का माडल तैयार किया था।

    नियोगी  की शहादत के बाद छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का बिखराव हो जाने से छत्तीसगढ़ में यह स्वास्थ्य आंदोलन आगे शहीद अस्पताल के बने रहने के बावजूद नहीं चला लेकिन नियोगी के साथीडा. पुण्यव्रत गुण की अगुवाई में बंगाल के स्वास्थ्यकर्मी और डाक्टर बंगालभर में उत्तर और दक्षिण बंगाल में मेहनतकश तबके की अगुवाई में बिना सरकारी या बाहरी मदद यह आंदोलन जारी रखे हुए हैं।

    दल्ली राजहरा के शहीद अइस्पताल के माडल के मुताबिक कोलकाता,दक्षिण बंगाल और सुंदरवन इलाके में करीब दर्जनभर श्रमजीवी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र चल रहे हैं।जरुरत है कि बाकी देश में स्वास्यकर्मी,मेहनतकश तबका,डाक्टर और जनपक्षधर ताकतें मुक्तबाजार के खिलाफ यह जनपक्षधर जनस्वास्थ्य आंदोलन चलायें ताकि आम जनता को इस मुक्तबाजारी श्मशानघाटों या कब्रिस्तानों में जिंदा जलाने या जिंदा दफनाने की रस्म अदायगी का नर्क जीने से हम बचा सकें।

    डा.पुण्यव्रत गुणने शहीद अस्पताल के बारे में जो लिखा है,वह बेहद गौरतलब हैः

    दल्ली राजहरा जनस्वास्थ्य आंदोलन और शहीद अस्पताल


    छात्र जीवन से दल्ली राजहरा में मजदूरों के स्वास्थ्य आंदोलन के बारे में कहानियां सुन रखी थीं।शहीद अस्पताल की स्थापना से पहले 1981 में मजदूरों के स्थ्यास्थ्य आंदोलन में शरीक होने के लिए जो तीन डाक्टर गये थे,उनमें से डा.पवित्र गुह हमारे छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में एक थे।(बाकी दो डाक्टर थे डा. विनायक सेन और डा.सुशील कुंडु।)शहीद अस्पताल की प्रेरणा से जब बेलुड़ में इंदो जापान स्टील के श्रमिकों ने 1983 में श्रमजीवी स्वास्थ्य परियोजना का काम शुरु किया,तब उनके साथ हमारा समाजसेवी संगठन पीपुल्स हेल्थ सर्विस एसोसिएशन का सहयोग भी था।हाल में डाक्टर बना मैं भी उस स्वास्थ्य परियोजना के चिकित्सकों में था।

    मैं शहीद अस्पताल में 1986 से लेकर 1994 तक कुल आठ साल रहा हूं।1995 में पश्चिम बंगाल लौटकर भिलाई श्रमिक आंदोलन की प्रेरणा से कनोड़िया जूटमिल के श्रमिक आंदोलन के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल हो गया।चेंगाइल में श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र, 1999 में श्रमजीवी स्वास्त्य उपक्रम का गठन,1999 में बेलियातोड़ में मदन मुखर्जी जन स्वास्थ्य केंद्र,2000 में बाउड़िया श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र, 2007 में बाइनान शर्मिक कृषक मैत्री स्वास्थ्य,2006-7 में सिंगुर नंदीग्राम आंदोलन का साथ,2009 में सुंदरवन की जेसमपुर स्वास्थ्य सेवा,2014 में मेरा सुंदरवन श्रमजीवी अस्पताले के साथ जुड़ना,श्रमजीवी स्वास्थ्य उपक्रम का प्रशिक्षण कार्यक्रम,2000 में फाउंडेशन फार हेल्थ एक्शन के साथ असुक विसुख पत्रिका का प्रकाशन,2011 में स्व्स्थ्येर वृत्ते का  प्रकाशन --यह सबकुछ असल में उसी रास्ते पर चलने का सिलसिला है,जिस रास्ते पर चलना मैंने 1986 में शुरु किया और दल्ली राजहरा के शमिकों ने 1979 में।

    शुरु की शुरुआत

    एक लाख बीस की आबादी दल्ली राजहरा में कोई अस्पताल नहीं था,ऐसा नहीं है।भिलाई इस्पात कारखाना का अस्पताल,सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र,मिशनरी अस्पताल,प्राइवेट प्रैक्टिसनर,झोला छाप डाक्टर -मसलन की इलाज के तमाम बंदोबस्त पहले से थे।सिर्फ गरीबों का ऐसे इंतजामात में सही इलाज नहीं हो पाता था।

    खदान के ठेका मजदूरों और उनके परिजनों को भी ठेकेदार के सिफारिशी खत के बाबत बीएसपी अस्पताल में मुफ्त इलाज का वायदा था।लेकिन वहां वे दूसरे दर्जे  के नागरिक थे।डाक्टरों और नर्सों को उनकी लालमिट्टी से सराबोर देह को छूने में घिन हो जाती थी।

    इसी वजह से दिसंबर,1979 में छत्तीसगढ़ माइंस एसोसिएशन की उपाध्यक्ष कुसुम बाई का प्रसव के दौरान इलाज में लापरवाही से मौत हो गयी।उस दिन बीएसपी अस्पताल के सामने चिकित्सा अव्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में दस हजार मजदूर जमा हो गये थे।नहीं,उन्होंने अस्पताल में किसी तरह की कोई तोड़ फोड़ नहीं की और न ही किसी डाक्टर नर्स से कोई बदसलूकी उन्होंने की।बल्कि उन लोगों ने शपथ ली एक प्रसुति सदन के निर्माण के लिए ताकि किसी और मां बहन की जान कुसुम बाई की तरह बेमौत इसतरह चली न जाये।

    8 सितंबर,1980 को शहीद प्रसुति सदन का शिलान्यास हो गया।

    स्वतःस्फूर्तता से चेतना की विकास यात्रा

    1979 में छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के जो सत्रह विभाग शुरु किये गये,उनमें स्वास्थ्य विभाग भी शामिल हो गया।

    `स्वास्थ्य और ट्रेड यूनियन'शीर्षक निबंध में कामरेड शंकर गुहा नियोगी ने कहा है- `संभवतः भारत में ट्रेडयूनियनों ने मजदूरों की सेहत के सवाल को अपने समूचे कार्यक्रम के तहत स्वतंत्र मुद्दा बतौर पर कभी शामिल नहीं किया है।यदि कभी स्वास्थ्य के प्रश्न को शामिल भी किया है तो उसे पूंजीवादी विचारधारा के ढांचे के अंतर्गत ही रखा गया है।इस तरह ट्रेड यूनियनों ने चिकित्सा की पर्याप्त व्यवस्था, कार्यस्थल पर चोट या जख्म की वजह से विकलांगता के लिए मुआवजा और कमा करते हुए विकलांग हो जाने पर श्रमिकों को मानवता की खातिर वैकल्पिक रोजगार देने के मुद्दों तक ही खुद को सीमित रखा है।

    ---हमें यह सवाल उठाना होगा कि सही आवास, स्कूल, चिकित्सा, सफाई, जल, इत्यादि स्वस्थ जीवन के लिए जरुरी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी मालिकान लें।-- मजदूर वर्ग सामाजिक बदलाव का हीरावल दस्ता है,तो यह उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह अधिक प्रगतिशील वैकल्पिक सामाजिक प्रणालियों की खोज और उन्हें आजमाने के लिए विचार विमर्श करें और परीक्षण प्रयोग भी।इसके अंतर्गत वैकल्पिक स्वास्थ्य प्रणाली भी शामिल है।इसके साथ साथ यह भी जरुरी है कि श्रमिक वर्ग आज के उपलब्ध उपकरण और शक्ति पर निर्भर विकल्प नमूना भी स्थापित करने की कोशिस जरुर करें।'

    इस निबंध में नियोगी की जिस अवधारणा का परिचय मिला,बाद में वही `संघर्ष और निर्माण की विचारधारा'में तब्दील हो गयी। संघर्ष और निर्माण राजनीति का सबसे सुंदर प्रयोग हुआ शहीद अस्पताल के निर्माण में।(हम उसी अवधारणा का प्रयोग हमारे चिकित्सा प्रतिष्ठानों में अब कर रहे हैं।)

    `स्वास्थ्य के लिए संघर्ष करो'

    15 अगस्त,1981 को स्वास्थ्य के लिए संघर्ष करो कार्यक्रम की शुरुआत कर दी गयी।उस वक्त के पंफलेट में जिन मुद्दों को रखा गया था,जो मैंने देखा,वे इस प्रकार हैंः

    • टीबी की चिकित्सा का इंतजाम करना।

    • गर्भवती महिलाओं के नाम दर्ज करना,उनकी देखभाल इसतरह करना ताकि सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित हो जाये और बच्चे स्वस्थ हों।

    • बच्चों की देखभाल और उनके पालन पोषण का इंतजाम,सही वक्त पर उनका टीकाकरण।

    • एक स्वास्थ्यकेंद्र का संचालन ,खासतौर पर उन सभी के लिए जिन्हें बोकारो स्टील प्लांट अस्पताल में इलाज कराने की सुविधा नहीं मिलती।

    • एक अस्पताल का संचालन,जहां देहाती किसानों को जरुरी चिकित्सा सेवाएं मुहैय्या करायी जा सकें।

    • पर्यावरण को स्वस्थ रखना,खासतौर पर शुद्ध पेयजल की जरुरत के बारे में घर घर जानकारी पहुंचाना।इसी तरह हैजा और दूसरे रोगों की रोकथाम करना।

    • संगठन और आंदोलन में शरीक हर परिवार के संबंध में तमाम तथ्य संग्रह और उनका विश्लेषण।

    • संगठन के जो सदस्य स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के इच्छुक हों,उन्हें प्रशिक्षित करके `स्वास्थ्य संरक्षक'बनाना और उनके जरिये प्राथमिक चिकित्सा और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना।

    सफाई आंदोलन से…

    दल्ली राजहरा की मजदूर बस्तियों में सफाई का कोई इंतजाम नहीं था।फिर एक दिन मजदूर बस्तियों के तमाम मर्द औरतों,छात्र युवाओं और व्यवसायियों ने मिलकर मोहल्ले का सारा मैला एक जगह इकट्ठा कर लिया।इसके बाद खदानों से माल ढोने के लिए जाते हुए तेरह ट्रकों में भरकर वह सारा मैला माइंस मैनेजर के क्वार्टर के सामने ले जाया गया।मैनेजर को चेतावनी दे दी गयी कि -मजदूर बस्तियों को साफ सुथरा रखने का बंदोबस्त अगर नहीं न हुआ तो रोज सारा मैला माइंस मैनेजर के क्वार्टर के आगे लाकर फेंक दिया जायेगा।

    डाक्टर आ गये

    1981 में खदान मजदूरों के एक आंदोलन के सिलसिले में शंकर गुहा नियोगी तब  राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में कैद थे।दूसरी तरफ प्रशासन मजदूर आंदोलन को तोड़कर टुकड़ा टुकड़ा करने के मकसद से तरह तरह के दमनात्मक कार्वाई में लगा हुआ था।तभी पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज की एक जांच टीम के सदस्य बतौर डा. विनायक सेन दल्ली राजहरा आ गये।जेएनयू के सेंटर आफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ में 1976 से 1978 तक अध्यापन करने के बाद 1978 से फिर नये सिरे से जिंदगी का मायने खोजने के मकसद से वे होशंगाबाद जिले फ्रेंड्स रुरल सेंटर में टीबी मरीजों को लेकर काम करने लगे थे।उनके साथ आ गयी समाजविज्ञानी उनकी पत्नी डा.इलिना सेन।

    करीब करीब उसी वक्त डा.आशीष कुंडु भी आ गये।बंगाल में क्रांतिकारी मेडिकल छात्र आंदोलन के अन्यतम संगठक आशीष हाउसस्टाफशिप खत्म करके मेहनकश आवाम के संघर्षों में  अपनी पेशेवर जिंदगी  समाहित करने के लिए तब मजदूर आंदोलन के तमाम  केंद्रों में काम के मौके खोज रहे थे।

    छह महीने बाद डा. पवित्र गुह उनके साथ हो गये।निजी कुछ समस्याओं की वजह से वे इस दफा ज्यादा वक्त तक रह नहीं सके।वे फिर शहीद अस्पताल से नियोगी की शहादत के बाद 1992 में जुड़ गये। अब बी वे दल्ली राजहरा में हैं।

    स्वास्थ्य कमिटी

    पहले ही मैंने यूनियन के सत्रह विभागों में खास स्वास्थ्य विभाग की चर्चा की है।इस विभाग का काम था,बीएसपी अस्पताल में मरीज के दाखिले के बाद उनकी देखभाल करना।फिर सत्तर केदशक से अस्सी के दशक के अंत तक जो शराबबंदी आंदोलन (मद्यपान निषेध आंदोलन) चला,उसमें यूं तो समूची यूनियन शामिल थी,लेकिन उसमें भी स्वास्थ्य विभाग की भूमिका खास थी।81 के सफाई आंदोलन में कामयाबी की वजह से,चिकित्सकों के प्रचार अभियान के लिए प्रिशिक्षित होने के बाद जो सौ से ज्यादा मजदूर सामने आ गये,उन्हें और डाक्टरों को लेकर स्वास्थ्य कमिटी बना दी गयी।

    26 जवरी,1982 से यूनियन दफ्तरके बगल के गैराज में सुबह शाम दो दफा स्वास्थ्य सेवा का काम शहीद डिस्पेंसरी में  शुरु हो गया।स्वास्थ्य कमिटी के कुछ सदस्यों ने पालियों में डिस्पेंसरी चलाने में डाक्टरों की मदद करने लगे।डाक्टरों ने भी उन्हें स्वास्थकर्मी बतौर प्रशिक्षित करना शुरु कर दिया।अब स्वास्थ्य कमिटी के बाकी सदस्यों के जिम्मे था अस्पताल का निर्माण।

    26 जनवरी,1982 से 3 जून,1983 की अवधि में अस्पताल चालू होने से पहले करीब छह हजार लोगों की चिकित्सा शहीद डिस्पेंसरी में हुई।

    1977 के ग्यारह शहीद और शहीद अस्पताल

    छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के जन्म के बाद घर बनाने के लिए बांस बल्ली भत्ता की मांग लेकर आंदोलन कर रहे मजदूरों के आंदोलन को तोड़ने के लिए 2 जून, 1977 को यूनियन दफ्तर से पुलिस ने कामरेड नियोगी को अगवा कर लिया। अपने नेता की रिहाई की मांग लेकर मजदूरों ने पुलिस के दूसरे दल को घेरे लिया।उस घेराव को तोड़ने के लिए पुलिस न पहलीबार 2 जून की रात,फिर अगले दिन जिला शहर से भारी पुलिस वाहिनी के आने के बाद दूसरी बार मजदूरों पर गोली चला कर घेराव में कैद  पुलिसवालों को निकाला।

    2-3 जून के गोलीकांड में ग्यारह मजदूर शहीदहो गये-अनुसुइया बाई, जगदीश, सुदामा, टिभुराम, सोनउदास, रामदयाल, हेमनाथ, समरु, पुनउराम, डेहरलाल और जयलाल।इन  शहीदों की स्मृति में 1983 के शहीद दिवस पर शहीद अस्पताल का उद्बोधन हुआ। बाहैसियत मजदूर किसान मैत्री के प्रतीक खदान के सबसे वरिष्ठ मजदूर लहर सिंह और आसपास के गांवों में सबसे बुजुर्ग किसान हलाल खोर ने अस्पताल का द्वार उद्घाटन किया।उसदिन श्रमिक संघ के पंफलेट में नारा दिया गया-`तुमने मौत दी,हमने जिंदगी'-तुम शासकों ने मौत बाटी है,हम जिंदगी देंगे।

    मजदूरों के श्रम से ही कोई अस्पताल का निर्माण हो पाता है,किंतु छत्तीसगढ़ के लोहा खदानों के मजदूरों के स्वेच्छाश्रम से बने शहीद अस्पताल ही भारत का पहला ऐसा अस्पताल है,जिसका संचालन प्रत्यक्ष तौर पर मजदूर ही कर रहे थे।शहीद अस्पताल का सही मायने यह हुआ- `मेहनतकशों के लिए मेहनतकशों का अपना अस्पताल'- मेहनतकश आवाम के लिए मेहनतकशों का अपना कार्यक्रम।अस्पताल शुरु होने से पहले डिस्पेंसरी पर्व में डा.शैबाल जाना उससे जुड़ गये।अस्पताल शुरु हो जाने के बाद 1984 में डां.चंचला समाजदार भी पहुंच गयीं।

    शहीद अस्पताल एक नजर में

    जिला  सदर दुर्ग 84 किमी दूर, राजनांदगांव 62 किमी दूर, 66 किमी दूरी पर रायपुर जिले का धमतरी,दूसरी तरफ बस्तर जिले से सटा डो़न्डी- इनके मध्य एक विशाल आदिवासी बहुल इलाके के गरीबों के इलाज के लिए  मुख्य सहारा बन गया शहीद अस्पताल।(यह जो भौगोलिक स्थिति का ब्यौरा मैंने दिया है,वह छोटा अलग राज्य छत्तीसगढ़ बनने से पहले का है।अब दल्ली राजहरा बालाद जिले में है।)

    मंगलवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन सुबह 9.30 बजे से 12.30 तक और शाम को 4.30 से 7.30 तक आउटडोर खुला हुआ।इमरजेंसी के लिए अस्पताल हर रोज चौबीसों घंटे खुला।1983 में अस्पताल की शुरुआत के वक्त शय्या संख्या 15 थी,1989 में दोमंजिला बनने के बाद शय्या संख्या बढ़कर 45 हो गयी,हालांकि अतिरिक्त शय्या (मरीजों के घर से लायी गयी खटिया) मिलाकर कुल 72 मरीजों को भरती किया जा सकता था।अस्पताल में सुलभ दवाएं भी खरीदने को मिलती हैं।पैथोलाजी, एक्सरे, ईसीजी जैसे इंतजाम हैं।आपरेशन थिएटर और एंबुलेंस भी।

    चिकित्साकर्मियों में डाक्टरों के सिवाय एक नर्स को छोड़कर कोई संस्थागत तौर पर प्रशिक्षित नहीं था।मजदूर किसान परिवारों के बच्चे प्रशिक्षित होकर चिकित्साकर्मी का काम शहीद अस्पताल में कर रहे थे।अस्पताल के लिए बड़ी संपदा बतौर मजदूर स्वेच्छासेवकों की टीम थी।ये मजदूर स्वेच्छासेवक ही शहीद डिस्पेंसरी के समय से डाक्टरों के साथ काम कर रहे थे,जो आजीविका के लिए खदान में काम करते थे और शाम को और छुट्टी के दिन बिना पारिश्रामिक स्वास्थय कार्यक्रमके तहत काम करते थे।

    सिर्फ इलाज नहीं बल्कि ,जनता को स्वास्थ्य के प्रति सजग बनाना और स्वास्थ्य आंदोलन संगठित करना शहीद अस्पताल का काम था।

    किनके पैसे से बना अस्पताल?

    1983 15 बेड के एक मंजिला अस्पताल से 1998 में आधुनिक सुविधाओं से लैस विशाल अस्पताल का निर्माण हुआ।इतना पैसा कहां से आया?

     उस वक्त शहीद अस्पताल का निर्माण पूरीतरह मजदूरों के पैसे से हुआ। शुभेच्छुओं ने बार बार मदद की पेशकश भी की लेकिन मजदूरों ने विनम्रता पूर्वक मदद लेने से इंकार कर दिया।क्योंकि वे अपने सामर्थ्य को तौलना चाहते थे।शहीद अस्पताल के लोकप्रिय होने के बाद देशी विदेशी फंडिंग एजंसियों की तरफ से आर्थिक अनुदान के प्रचुर प्रस्ताव आते रहे,लेकिन उन तमाम प्रस्तावों को दृढ़ता के साथ खारिज कर दिया जाता रहा क्योंकि मजदूरों को अच्छी तरह मालूम था कि बाहर से आने वाला पैसे का सीधा मतलब बाहरी नियंत्रण होता है।

    `आइडल वेज'या `फाल बैक वेज'के बारे में हममें से ज्यादातर लोग जानते नहीं हैं।मजदूर काम पर चले गये लेकिन मालिक किसी वजह से कमा नहीं दे सके तो ऐसे हालात में न्यूनतम मजूरी का अस्सी फीसद फाल बैक वेज बतौर मजूरों को मिलना चाहिए।दल्ली राजहरा के मजदूरों ने ही सबसे पहले फाल बैक वेज वसूल किया।उसी पैसे से अस्पताल के निर्माण के लिए ईंट-पत्थर-लोहा-सीमेंट खरीदा गया।यह सारा माल ढोने के लिए छोटे ट्रकों के मालिकों के संगठन प्रगतिशील ट्रक ओनर्स एसोसिएशन ने मदद की।अस्पताल के तमाम अासबाब सहयोगी संस्था शहीद इंजीनियरिंग वर्कशापके साथियों ने बना दिये।

    अस्पताल की शुरुआत के दौरान यूनियन के हर सदस्य ने महीनेभर का माइंस एलाउंस और मकान किराया भत्ता चंदा बतौर दे दिये।इस पैसे का कुछ हिस्से से दवाइयां और तमाम यंत्र खरीद लिये गये।बाकी पैसे से एक पुराना ट्रक खरीद लिया गया,जिसे वाटर टैंकर में बदल दिया गया।खदान में पेयजल ले जाता था वह ट्रक और उस कमाई से डाक्टरों का भत्ता आता था।

    शुरुआत में पैसा इसी तरह आया।इसके बाद जितनी बार कोई विकास हुआ, निर्माण हुआ या बड़ा कोई यंत्र खरीदा गया,मजदूरों ने चंदा करके पैसे जुगाड़ लिये।

    अस्पताल चलाने के लिेकर्मचारियों के भत्ते वगैरह मद में जो पैसे चाहिए थे- उसके लिए मरीजों को थोड़ा खर्च करना पड़ा।आउटडोर में मरीजों के देखने के लिए पचास पैसे (जो बढ़कर बाद में एक रुपया हुआ) और दाखिले के बाद  बेड भाड़ा बाबत तीन रुपये रोज (जो बाद में बढ़कर पांच रुपये रोज हो गया) मरीजों के देने होते थे।लेकिन आंदोलनरत बेरोजगार मजदूरों और उनके परिजनों,संगठन के होलटाइमरों और बेहद गरीब मरीजों के सभी स्तर का इलाज मुफ्त था।

    इस तरह स्थानीय संसाधनों के दम पर आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ता चला गया शहीद अस्पताल।

    तर्कसंगत वैज्ञानिक चिकित्सा के लिए लड़ाई

    एक तरफ परंपरागत ओझा - बाइगा की झाड़फूंक तुकताक,दूसरी तरफ पास और बिना किसी पास के चिकित्सा कारोबारियों का गैर जरुरी नुकसानदेह दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल- इस दुधारी दुश्चक्र में फंसे हुए थे दल्ली राजहरा के लोग।वैज्ञानिक चिकित्सा की अवधारणा सिरे से अनुपस्थित थी।कुछ उदाहरणोें से आप बेहतर समझ सकते हैं-मसलन मेहनत के मारे थके हारे खदान मजदूरों को यकीन था कि लाल रंग के विटामिन इंजेक्शन और कैल्सियम इंजेक्शन से उनकी कमजोरी दूर हो जायेगी।बुखार उतारने के लिए अक्सर प्रतिबंधित एनालजिन इंजेक्शन इस्तेमाल में लाया जाता था- जिससे खून में श्वेत रक्त कोशिकाओं का क्षय हो जाता,लीवर किडनी नष्ट हो जाते। प्रसव जल्दी कराने के लिए पिटोसिन इंजेक्शन का इस्तेमाल होता था- जिससे गर्भाशय में तीव्र संकोचन की वजह से गर्भाशय फट जाने की वजह से मां की मौत का जोखिम बना रहता।..

    दल्ली राजहरा का मजदूरों के स्वास्थ्य आंदोलन ही समसामयिक भारत में दवाओं के तर्कसंगत इस्तेमाल का आंदोलन रहा है।मजदूरों को जिन डाक्टरों का साथ मिला,वे सभी इस आंदोलन के साथी हैं-जिनमें से कोई पश्चिम बंगाल ड्रग एक्शन फोरम के साथ जुड़ा था तो कोई आल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क से जुड़ा।दवाओं के तर्कसंगत प्रयोग की अवधारणा का बड़े पैमाने पर प्रयोगक्षेत्र बन गया शहीद अस्पताल।

    जहां घरेलू नूस्खे से इलाज संभव था,वहा दवाओं के इस्तेमाल का विरोध किया जाता था। मसलन-पेट की तकलीफों की वजह से नमक पानी की कमी को दुरुस्त करने के लिए पैकेट बंद ओआरएस के बदले नमक चीनी नींबू का शरबत बनकार पीने के लिए कहा जाता था।एनालजिन इंजेक्शन के बदले बुखार उतारने के लिए ठंडा पानी से शरीर को पोंछने के लिए कहा जाता था।खांसी के इलाज के लिए कफ सिराप के बदले गर्म पानी की भाप लेने की सलाह दी जाती थी।…

    दवा का इस्तेमाल जब किया जाता था,वह विश्व स्वास्थ्य संस्था की अत्यावश्यक दवाओं की सूची के मुताबिक किया जाता था। डाक्टर सिर्फ दवाओं के जेनरिक नाम लिखते थे। बहुत कम विज्ञानसंगत अपवादों को छोड़कर  एक से ज्यादा दवाओं का निर्दिष्ट मात्रा में मिश्रण का कतई इस्तेमाल नहीं किया जाता था।इस्तेमाल नहीं होता था- एनाल्जिन,फिनाइलबिउटाजोन,अक्जीफेनबिउटाजोन, इत्यादि तमाम नुकसानदेह दवाइयां।प्रेसक्रिप्शन पर लिखा नहीं जाता था- कफ सिराप,टानिक,हजमी एनजाइम,हिमाटेनिक,इत्यादि की तरह गैरजरुरी दवाएं।जहां मुंह से खाने की  दवा से काम चल जाता था,वहां इंजेक्शन का विरोध किया जाता था।..



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    आम जनता की सेहत के लिए डाक्टर भी हैं,हमारे उनके साथ खड़ा होने की जरुरत है।

    सत्ता, बाजार, सियासत और बिजनेस से हम इस मौत के मंजर को बदलने में कोई मदद मिलने वाली नहीं है।निजी तौर पर किसी के लिए भी दो चार मामलों में मदद करने की हालत नहीं बनती है।जनपक्षधर जन संगठन ही मौत का यह मंजर बदल सकते है,बशर्ते कि उनसे जुड़े लोग इसकी पहल करें।

    पलाश विश्वास

    Dr. Kotnis Ki Amar Kahani - YouTube

    dr.kotnis ki amar kahani के लिए वीडियो▶ 1:57:18

    https://www.youtube.com/watch?v=uLBdg63rPQE

    14/10/2011 - shemaroovintage द्वारा अपलोड किया गया

    Dr. Kotnis Ki Amar Kahani - Dr Kotnis ki Amar Kahani is based on the real life story of Dr Dwarkanath S .


    मौत सिरहाने इंतजार कर रही हो और मौत का यह मंजर सार्वजनिक हो,तो जिंदगी दर्द का सबब बन जाता है,जिससे रिहाई मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

    पूरे रामराज्य में सरकारी गैरसरकारी में यह मौत का मंजर बागों में बहार है और ख्वाबों के रंग बिरंगे सुनहले दिन हैं।

    ममता बनर्जी का निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के नुमाइंदों के साथ गुफ्तगूं उनकी स्टाइल में पालिटिकल मास्टर स्ट्रोक है क्योंकि यह टीवी पर लाइव रहा है।लोगों को अपने भोगे हुए यथार्थ के रिसते हुए जख्म पर मलहम लगा महसूस हो तो ताज्जुब की बात नहीं।लेकिन कब्रिस्तान हो या श्मशान घाट,सियासत के कारिंदे उसके नजारे बदल नहीं सकते।

    स्वास्थ्य जब बिजनेस है, हब है, टुरिज्म है और अरबों का निवेश का मामला है तो स्टेंट की कीमत पचासी फीसद कम होने के बावजूद दिल के मरीजों को इलाज में राहत नहीं है।जीवन रक्षक जेनरिक दवाइयां बेहद सस्ती होने के बावजूद नूस्खे पर महंगी आयातित दवाइयां लिखने वाले लोग बेहद धार्मिक हैं,कहना  ही होगा।

    ममता बनर्जी ने अपने लाइव शो में संवैधानिक पद पद से बोलते हुए तमाम आरोपों की पुष्टि भी कर दी है।जाहिर है कि अस्पतालों और नर्सिंग होमों में बिना जरुरी महंगी जांच पड़ताल,गैर जरुरी आपरेशन,मृत्यु के बाद भी आईसीयू और वेंटिलेशन का पांच सितारा बिल से लेकर अंग प्रत्यंग का कारोबार और नवजात शिशुओं की तस्करी जैसे तमाम गोरखधंधे में आम जनता की सेहत का कोई माई बाप नहीं है।

    मौत से रहम की भीख शायद मांगी भी जा सकती है,लेकिन लाचार दर्द से कोई रिहाई नहीं है।खासकर तब जब इलाज ही लाइलाज बनाने का बंदोस्त है चाकचौबंद।

    इस देश में आम जनता की सेहत की देखभाल का कोई इंतजाम नहीं है।

    मलाईदार नागरिकों का स्वास्थ्य बीमा जरुर होता है,लेकिन वे भी अपनी सेहत की जांच पड़ताल कराने की हालत में नहीं होते।

    नौकरी में रहते हुए कंपनी की तरफ से हमारा भी सालाना बीमा हुआ करता था।लेकिन बीमा का लाभ उठाने के लिए महंगे अस्पताल और नर्सिग होम ही सूचीबद्ध होने की वजह से सहकर्मियों और उनके परिजनों के बीमार पड़ने के बाद ऐसे चिकित्सा केंद्र में भरती होने की स्थिति में पहले ही दिन बीमा की रकम खत्म होने के बाद जो खर्च जेब से भरने पड़े,उस अनुभव के मद्देनजर हमने उसका लाभ उठाने की कोशिश कभी नहीं की ।हमारे और आम लोगों के इस अनुभाव के बारे में दीदी ने भी कहा है।

    बहरहाल हमेशा सस्ते और सरकारी अस्पतालों में जाकर इलाज कराने का विकल्प हमने चुना।

    स्वास्थ्य बीमा भी हेल्थ बिजनेस और हेल्थ हब की स्ट्रेटेजिक मार्केटिंग और रोजगार देने वाली कंपनियों की इस बिजनेस में हिस्सेदारी में हिस्सेदारी का किस्सा है।

    डा.कोटनीस की अमर कहानी हर भारतीय को मालूम होनी चाहिए।जिन्हें इस बारे में खास पता नहीं है,वे जिंदगी चैनल पर रात आठ बजे इन दिनों दिखाये जा रहे दक्षिण कोरियाई सीरियल डीसेंजेस आफ सन जरुर देखाना चाहिए।यह एक महिला डाक्टर और सैनिक अफसर की प्रेमकथा है।सेना में युद्ध पारिस्थितिकी के मुकाबले जाति धर्म नस्ल देश का भेदभाव किये बिना मनुष्य की जान बचाने के मिशन की कथा यह है।स्वदेश से दूर युद्धक्षेत्र में युद्ध,मादक कारोबार,अमेरिकी हस्तक्षेप, सीआईए के खेल,राजनीति,राजनय, आतंकवाद,भूकंप और महामारी के मध्य कदम कदम पर साथ साथ पीड़ितों,उत्पीड़ितों ,वंचितों को बचाने के मिशन में दोनों का प्रेम साकार है।

    किन मुश्किल परिस्थितियों में हर जोखिम और अविराम युद्ध परिस्थितियों में कोई डाक्टर मनुष्यता के मिशन के प्रति सबकुछ न्योच्छावर कर सकता है,कुल मिलाकर यह कथा है।

    हकीकत में समाज में ऐसे डाक्टरों की कमी नहीं है।

    बंगाल में जूनियर डाक्टरों का प्रगतिशील संगठन और चिकित्सकों का आंदोलन इसी दिशा में दशकों से काम कर रहे हैं।बाकी देश में सर्वत्र ऐसे डाक्टर होंगे।

    मेरे चाचा डा.सुधीर विश्वास एक मामूली आरएमपी डाक्टर थे,जो पचास और साठ के दशक में नैनीताल की पूरी तराई भाबर पट्टी में मेहनतकशों का इलाज करते थे।साठ के दशक में वे असम में दंगाग्रस्त इलाके में दंगापीड़ितों के इलाज के लिए असम भी गये थे।

    भोपाल गैस त्रासदी के बाद कोलकाता और मुंबई के अलावा देश भर के डाक्टर वर्षों तक वहां गैस पीड़ितों के इलाज में लगे रहे और आज भी उनके बीच कुछ डाक्टर काम कर रहे हैं।डां,गुणधर बर्मन भी जरुरतमंदों के इलाज में जिंदगी बिता दी।हर शहर,कस्बे और देहात में भी ऐसे अनेक डाक्टर हैं,जिनके साथ मिलकर महंगे और गैरवैज्ञानिक मुनाफाखोर इलाज से आम जनता को बचाया जा सकता है और नियमित सेहत की देखभाल से गंभीर बीमारियों और संक्रामक रोगों से रोकथाम भी हो सकती है।

    छत्तीसगढ़ का शहीद अस्पताल मेहनतकशों का बनाया हुआ अस्पताल है। छत्तीसगढ़ में डाक्टर विनायक सेन भी हैं।

    अभी मुझे तेज सरदर्द हो रहा है।जबरन लिख रहा हूं।

    इन दिनों जरुरी बातें लिखने में भी हमारी दिहाड़ी खराब होती है क्योंकि अनुवाद का काम रोक देना होता है,जिसकी वजह से मैं इन दिनों कहीं आता जाता नहीं हूं।

    सविता बाबू कई दिनों से बेचैन थीं कि उनकी रसोई में मदद करने वाली शंकरी का पति गंभीर रुप से बीमार है तो आज दिन में बैरकपुर में उनके घर हो आया।शंकरी की उम्र 36 साल है और उसके पति तारक की उम्र 46 साल।इकलौती बेटी टीनएजर है और बीए आनर्स प्रथम वर्ष की छात्रा है।

    2012 से पेशे से मछली बेचनेवाले तारक को हाई प्रेशर और मधुमेह की बीमारी है।हाल में पता चला है कि उसका एक गुर्दा सड़ गया है तो दूसरा गुर्दी भी करीब करीब खराब हो चुका है।वह डायलिलिस कराने की हालत में भी नहीं है।सरकारी अस्पतालों में भी डायलिसिस का खर्च मेहनतकशों के लिए बहुत महंगा है और वे अंग प्रत्यारोपण के बारे में सोच भी नहीं सकते।पिछले तीन दिनों में दो बार उसकी हालत बिगड़ी है और सरकारी अस्पताल में उसका इलाज हो नहीं सका है।

    तारक की भाभी का हाल में ब्रेन स्ट्रोक हुआ था और हम जब शंकरी के वहां थे तो खबर आयी कि उसकी बहन की पति के पैर पर स्लैब गिरा है और वह जख्मी हो गया है।वह इमारत बनाने के काम में मजदूर है और जाहिर है कि उसका कोई बीमा नहीं है।

    सविता ऐसे मामलों में सोदपुर में हर कहीं दौड़ती रहती है और निजी तौर पर मदद करती है।हमारी दिहाड़ी का ज्यादातर हिस्सा इसी मद में खर्च हो जाता है।इसके अलावा हम कुछ कर भी नहीं सकते हैं।मगर निजी मदद से यह मसला सुलझने वाला नहीं है जबकि व्यापक पैमाने पर जनता की देखभाल का इंतजाम जनता की ओर से करने का कोई काम हम अकेले अकेले नहीं करते हैं।

    सत्ता, बाजार, सियासत और बिजनेस से हम इस मौत के मंजर को बदलने में कोई मदद मिलने वाली नहीं है।निजी तौर पर किसी के लिए भी दो चार मामलों में मदद करने की हालत नहीं बनती है।

    जाहिर है कि सत्ता और राजनीति से अलग जनपक्षधर जन संगठन ही मौत का यह मंजर बदल सकते है,बशर्ते कि उनसे जुड़े लोग इसकी पहल करें।

    हाल में वनगांव इलाके में अपनी फुफेरी बहन के घर गया था।उनका बेटा छत्तीसगढ़ में ठेके पर निर्माण कार्य में लगी था और वहां बीमार पड़ जाने से उसकी मौत हो गयी।करीब 44 साल के उस बाजे की लाश देख आनेके बाद दूसरी मर्तबा वहीं गया तो गयी तो कुछ ही दूर नोहाटा में जोगेद्र नाथ मंडल के कार्यक्षेत्र में उस दीदी की बेटी के घर भी गया।उसके पति के भी गुर्दे खराब हो गये हैं और प्रत्यारोपण के लिए बीस लाख रुपये का पैकेज बताया जा रहा है।फिर बीस लाख रुपये खर्च करने के बावजूद बच जाने की गारंटी नहीं है।जाहिर है कि उनके पास वे पैसे कभी नहीं होने वाले हैं।

    घर बार जमीन जायदाद बेच देने के बावजूद अस्पतालों के गोरखधंधे में इलाज हो नहीं पाता।दीदी ने अस्पतालों और नर्सिंग होमों का किस्सा लाइव बताकर यह साबित कर दिया है कि यह कितनी भयंकर महामारी है।

    वक्त पर प्रेशर और शुगर का पता चले और इलाज हो तो इसतरह दिल और गुर्दे की बीमारियां मेहनतकश तबके में महामारी नहीं होती।

    इसके लिए बहुत अत्याधुनिक अस्पतालों की जरुरत भी नहीं है।सरकारी अस्पतालों में वैसे भी डाक्टर और नर्स कम हैं।

    इनमें से ज्यादातर निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में पाये जाते हैं तो बाकी बचे लोग भीड़ के इलाज के लिए नाकाफी हैं।ऐसे में जब वे गंभीर और आपातकालीन मरीजों का इलाज बी कर नहीं पा रहे हैं तो उनसे मेहनतकश लोगों की सेहत की देखभाल की उम्मीद नहीं की जा सकती।

    बुनियादी स्वास्थ्य सेवा और सेहत की जांच पड़ताल के लिए स्वास्थ्य केंद्र पर्याप्त होते हैं।साठ, सत्तर और अस्सी के दशक में भी यूपी,उत्तराखंड और बिहार के अस्पतालों में बिना किसी बुनियादी ढांचा के आम लोगों के व्यापक पैमाने पर इलाज और उनकी सेहत की देखभाल  के नजारे हमने देखे हैं।

    अब पिछले दिनों बसंतीपुर से फोन आया कि रुद्रपुर के मेडिकल कालेज अस्पताल में लेडी डाक्टर रात को नहीं होती,यह हमारे लिए हैरतअंगेज खबर है।

    उस अस्पताल में हमने बचपन से स्त्री रोग विभाग में बेहतरीन काम होते देखा है।इसके अलावा तराई के कस्बाई अस्पतालों में गदरपुर,बाजपुर जैसे देहात में जटिल से जटिल आपरेशन डाक्टरों को अत्यंत कुशलता के सात करते देखा है।लेडी डाक्टर वाली यह जानकारी हमारे लिए किसी सदमे से कम नहीं है।

    तकीनीकी तौर पर और संरचना के तौर पर उस मुकाबले हजार गुणा तरक्की के बावजूद बड़े महानगरों में भी मेहनतकशों को क्या गिनती,मलाईदार तबके के नागरिकों की भी सेहत की देखभाल तो क्या मामूली सी मामूली शिकायत के इलाज का कोई इंतजाम नहीं है।

    प्रतिबद्ध डाक्टरों का साथ हम दें और अपने अपने संगठन की तरफ से हम उनके साथ खड़े हों तो आम लोगों के लिए देशभर में स्थानीय सामान्य उपक्रम और बिना किसी पूंजी निवेश के वैज्ञानिक तरीके से तर्कसंगत इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र बड़े पैमाने पर खोले जा सकते हैं जहां मेहनतकशों की सेहत की देखबाल नियमित की जा सके।

    ऐसे प्रयोग हो भी रहे हैं और मिशन बतौर डाक्टरों की अच्छी खासी तादाद इसके लिए तैयार भी हैं।सरकारी और निजी जन स्वास्थ्य के विकल्प के बारे में सोचकर ही हम ये हालात बदल सकते हैं और यह एकदम असंभव भी नहीं है।बंगाल में ऐसे प्रयोग चल भी रहे हैं।मसलन डा.पुण्यव्रत गुण के अनुभव पर गौर करेंः

    शहीद अस्पताल की प्रेरणा से जब बेलुड़ में इंदो जापान स्टील के श्रमिकों ने 1983 में श्रमजीवी स्वास्थ्य परियोजना का काम शुरु किया,तब उनके साथ हमारा समाजसेवी संगठन पीपुल्स हेल्थ सर्विस एसोसिएशन का सहयोग भी था।हाल में डाक्टर बना मैं भी उस स्वास्थ्य परियोजना के चिकित्सकों में था।

    मैं शहीद अस्पताल में 1986 से लेकर 1994 तक कुल आठ साल रहा हूं।1995 में पश्चिम बंगाल लौटकर भिलाई श्रमिक आंदोलन की प्रेरणा से कनोड़िया जूटमिल के श्रमिक आंदोलन के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल हो गया।चेंगाइल में श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र, 1999 में श्रमजीवी स्वास्थ्य उपक्रम का गठन,1999 में बेलियातोड़ में मदन मुखर्जी जन स्वास्थ्य केंद्र,2000 में बाउड़िया श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र, 2007 में बाइनान शर्मिक कृषक मैत्री स्वास्थ्य,2006-7 में सिंगुर नंदीग्राम आंदोलन का साथ,2009 में सुंदरवन की जेसमपुर स्वास्थ्य सेवा,2014 में मेरा सुंदरवन श्रमजीवी अस्पताल के साथ जुड़ना,श्रमजीवी स्वास्थ्य उपक्रम का प्रशिक्षण कार्यक्रम,2000 में फाउंडेशन फार हेल्थ एक्शन के साथ असुख विसुख पत्रिका का प्रकाशन,2011 में स्व्स्थ्येर वृत्ते का  प्रकाशन --यह सबकुछ असल में उसी रास्ते पर चलने का सिलसिला है,जिस रास्ते पर चलना मैंने 1986 में शुरु किया और दल्ली राजहरा के श्रमिकों ने 1979 में।



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    INVITATION TO 7TH APRIL, 2017 NATIONAL CONFERENCE ON NATIONAL CAMPAIGN FOR UNIVERSAL HEALTH CARE

    In 1978, in its Alma Ata declaration the World Health Organization called for "Health for All by 2000 AD". INDIA was a signatory to that declaration.
    But from early the 1990s the Indian government started to drift away from its responsibilities to the service sectors, following the diktats of IMF-World Bank combined.
    In 2010 the Planning Commission constituted a High Level Expert Group (HLEG) on Universal Health Coverage. The group, headed by Dr. K Shrinath Reddy, recommended an increase in government spending on health care from 1.4% of GDP in 2010 to 2.5% by 2017 and to 3% by 2022, so that the government can meet the primary, secondary, and tertiary health care needs of all the citizens. The group envisaged government as the main provider of health care. It called for a Health Entitlement Card for every citizen.
    But the Planning Commission in its plan document of 2012 ignored HLEG's recommendations and from 2014 the MODI government has cut the Government health care spending by 20%. Now Government spends less than 1% of GDP in health care.
    From 2013, Shramajibi Swasthya Udyog, an organization of doctors and health workers committed to Universal Health Care, along with several other organizations, is taking the recommendations of HLEG on UHC to the people of West Bengal. In August 2015, 33 organizations formed the All Bengal Health for All Campaign Committee. Dr. K. Shrinath Reddy, Dr. Binayak Sen and several other health activists spoke for "Health for All" in a public convention in Kolkata on 24th January, 2016.
    The campaign in west Bengal is going on. Time has come to take this campaign to other states, so that people all over India move for Universal Health Care.
    This year on 7th April, Shramajibi Swasthyo Udyog will host a National Conference of delegates from different states to discuss and decide on the National Campaign.
    Venue: West Bengal Voluntary Health Association Tower, 1st floor. Near Manovikash Kendra/ Ruby Hospital/ Desun Hospital.
    Time: 12 Noon to 6 pm 
    We request you/your organization to take part in the conference. 
    The expenses for food and lodging will be taken care of by the organizers. 
    Please confirm your participation to shramajibiswasthya@gmail.com 15th of March, 2017. You may ring any one of the signatories for any query.
    Regards
    Yours Truly,

    Dr. Punyabrata Gun, Adviser, Shramajibi Swasthya Udyog, 
    Mob: 9830922194 
    Dr. Sujoy Kumar Bala, President, Shramajibi Swasthya Udyog 
    Mob: 9836475632 
    Dr. Mrinmoy Bera, Secretary, Shramajibi Swasthya Udyog



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    बाजार और कारपोरेट के खिलाफ जुबान खोलने में जिनकी औकात तक नहीं है,वे हारे या जीते तो उससे हमें क्या लेना देना?

    कोई अंक मिस किये बिना महिला पत्रिका   उत्तरा के सत्ताइस साल पूरे हो गये!महिला आंदोलन का सिलसिला भी उत्तराखंड में कभी  थमा नहीं है.निरंतर जारी है।

    बाकी देश में भी जितनी जल्दी हो सके, महिला नेतृ्त्व की खोज हम करें क्योंकि महिलाओं के आंदोलन और जन प्रतिरोध में उनके नेतृत्व से ही इस अनंत गैस चैंबर की खिड़कियां खुली हवा के लिए खुल सकती हैं।

    पलाश विश्वास

    इन दिनों राजीव दाज्यू लातिन अमेरिका में हैं।आज अरसे बाद शेखरदा (शेखर पाठक)से बात हो सकी।शेखरदा के मुताबिक राजीवदाज्यू अगले हफ्ते तक नैनीताल वापस आ जायेंगे।रिओ से राजीवदाज्यू ने फेसबुक पर कर्णप्रयाग में मतदान टल जाने से इंद्रेश मैखुरी को जिताने के लिए एक अपील जारी की है तो शेखर ने भी बताया कि यह विधानसभा में जनता की आवाज बुलंद करने का आखिरी मौका है।

    इस बारे में शेखरदा से मैंने पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि तमाम लोग कर्णप्रयाग जा रहे हैं।हमने जीत की संभावना के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि चुनाव जीतने की तैयारियां कुछ अलग किस्म की होती हैं,जिसमें बड़े दलों की ताकत का मुकाबला करके सही आदमी को जितना बेहद मुश्किल होता है। वे एकदम जमीन पर खड़े बिना भावुक हुए हकीकत बता रहे थे।

    शेखर दाज्यू सही बता रहे हैं।चुनाव जीतने के लिए,चुनाव जीतकर सत्ता हासिल करने के लिए बाजार और कारपोरेट पूंजी का सक्रिय समर्थन अनिवार्य हो गया है।सारे के सारे राजनीतिक दल कारपोरेट फंडिंग से चलते हैं।बाजार और कारपोरेट हितों के खिलाफ कोई इसीलिए बोलता नहीं है।

    अब तमाम बुनियादी सेवाएं और जरुरतें,आम जनता खास तौर पर मेहनतकशों के हक हकूक,भुखमरी,शिक्षा, चिकित्सा ,बिजली पानी जैसी अनिवार्य सेवाएं,जल जंगल जमीन और पर्यावरण के मुद्दे,भुखमरी,बेरोजगारी,मंदी वित्तीय प्रबंधन और अर्थव्यवस्था से जुड़े कारपोरेट हित और मुनाफाकोर बाजार की शक्तियों के हितों से टकराने वाले मुद्दे हैं।सुधार का मतलब है संसाधनों की खुली नीलामी ,निजीकरण और बेइंतहा बेदखली ,छंटनी और कत्लेआम।

    जाहिर है कि इनसे चूंकि टकरा नहीं सकते,परस्पर विरोधी आरोप प्रत्यारोप, किस्से,सनसनी,जुमले,फतवे से लेकर तमाम रंग बिरंगी पहचान,बंटवारे चुनावी मुद्दे हैं।

    बुनियादी मसलों पर बोलने वाले लोग चूंकि बाजार और कारपोरेट, प्रोमोटर, बिल्डर, माफिया और उनके हितों के प्रवक्ता मीडिया के खिलाफ खड़े हैं तो इन हालात में इंद्रेश जैसे किसी शख्स को जिताकर किसी विधानसभा या लोकसभा में जनता की चीखेों के बुलंद आवाज में गूंज बन जाने की कोई संभावना फिलहाल नहीं है।

    भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यही है कि संविधान निर्माताओं के सपनों के भारत के आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक नस्ली समानता,विविधता,बहुलता पर बात करना,मेहनतकशों के हकहकूक की आवाज बुलंद करना,बुनियादी मुद्दों पर बात करना,कानून के राज और भारतीय संविधान के प्रावधानों,नागरिक मानवाधिकारों की बात करना,संघीय ढांचे के मुताबिक  जनपदों और अस्पृस्य भूगोल की बात करना,जल जंगल जमीन पर्यावरण जलवायु मौसम के बारे में बात करना देशद्रोह है।

    भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यही है कि उत्पीड़न,दमन और अत्याचार के निरंकुश माफियाराज औन फासिज्म के नस्ली राजकाज के खिलाफ आवाज उठाना राष्ट्रद्रोह हैं।यही अंध राष्ट्रवाद है तो यही हिंदुत्व का कारपोरेट ग्लोबल एजंडा है,जिसके खिलाफ मेहनतकशों की मोर्चाबंदी अभी शुरु हुई नहीं है और हवा हवाई तलवार भांजते रहने से इस प्रलयंकर सुनामी के ठहर जाने के आसार नहीं है।

    ऐसे विषम पर्यावरण में चुनावी मौसम से कयामत की फिजां बदल जाने की संभावना के बारे में उम्मीद न ही करें तो बेहतर।

    अब यूपी के चुनाव के लिए पांचवें दौर का मतदान होना है और बाकी दो चरणों के मतदान भी जल्दी निबट जायेंगे।

    बंगाल में हर कहीं लोग यूपी में क्या होने वाला है,जानना चाहते हैं।मैं उन्हें यही बता रहा हूं कि जुमलों और पहचान की राजनीति में मतदाता किसी भी धारा में बह निकल सकते हैं और अब  2014 की सुनामी और उसके बाद के छिटपुट झटकों के अनुभवों के मद्देनजर कहा जा सकता है कि हालात खास बदलने वाले नहीं है क्योंकि आर्थिक मुद्दों पर बात करने के लिए भारतीय लोकतंत्र में कोई बात करने को तैयार नहीं है और बाजार और कारपोरेट के खिलाफ जुबान खोलने में जिनकी औकात तक नहीं है,वे हारे या जीते तो उससे हमें क्या लेना देना?

    सामंतवाद,साम्राज्यवाद,पूंजीवाद,विनिवेश,निजीकरण,बजट,रोजगार,रक्षा व्यय,संसाधनों की लटखसोट और नीलामी पर अब कोई विमर्श नहीं है।

    जाहिर है कि आम जनता के हितों की परवाह किसी को नहीं है ,सबको चुनावी समीकरण साध कर सत्ता हासिल करने की पड़ी है।विचारधारा गायब है।

    जाहिर है कि चाहे कोई भी जीते,जीतकर वे फासिज्म के राजकाज को मजबूत नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है।इतिहास गवाह है कि किसी सूबेदार की हुक्म उदुली की नजीरें बेहद कम है।चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान सूबेदारी का जलवा यूपी की जनता ने भी कम नहीं देखा है।चेहरा बदल जाने से हालात नहीं बदलेंगे।

    संघीय ढांचे की अब कारपोरेट राजनीतिक दलों को भी परवाह नहीं है।जाहिर है कि राष्ट्र में सत्ता के नई दिल्ली में लगातार केंद्रीयकरण और निरंतर तेज हो रहे आर्थिक सुधारों के बाद किसी राज्य में केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ राजकाज या कानून के राज की कोई संभावना नहीं है।

    यूपी जैसे,बिहार जैसे,महाराष्ट्र जैसे,बंगाल और तमिलनाडु,मध्यप्रदेश जैसे घनी आबादीवाले राज्यों के लिए भी विकास के बहाने केंद्रे सरकार के जनविरोधी कारपोरेट हिंदुत्व के एजंडे से नत्थी हो जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प सत्ता में बने रहने का नहीं है।छोटे राज्यों की तो बात ही छोड़ दें।इसीलिए केसरियाकरण इतना तेज है।

    जनता के हक में राजनीति खड़ी नहीं हो रही है तो जनता को हक है कि वे चाहे जिसे जिताये।इससे अब कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

    बंगाल में हम परिवर्तन का नजारा देख रहे हैं तो दक्षिण भारतीय राज्यों और पूर्वोत्र में खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है।

    बहरहाल नैनीताल जब भी जाता रहा हूं ,शेखरदा या उमा भाभी के बाहर ही रहने से मुलाकात हो नहीं सकी है।आज पहाड़ के ताजा अंक के बारे में पूछताछ के सिलसिले में दिल्ली में फिल्मवाले प्राचीन दोस्त राजीव कुमार से बात हुई तो उनने एसएमएस से शेखर दा का नंबर भेज दिया।फटाक से नंबर लगाया तो पता चला दा अभी अभी नैनीताल पधारे हैं।लंबी बातचीत हुई है।

    अभी अभी शंकरगुहा नियोगी पर डा.पुण्यव्रत गुण की किताब का अनुवाद किया है तो छत्तीसगढ़,उत्तराखंड और झारखंड के पुराने तमाम साथी खूब याद आते रहे।

    शेखर ने बताया कि उत्तरा के सत्ताइस साल पूरे हो गये।उत्तरा की शुरुआत से पहले उमा भाभी मेरठ में हमारे डेरे पर चर्चा के लिए आयी थीं।उस वक्त कमला पंत भी मेरठ में ही थीं।उमा भाभी रुपीन के साथ आयी थी।रुपीन टुसु से छोटी है।दोनों उस वक्त शिशु ही थे।शेखर दा ने बताया कि रुपीन भी नैनीताल आयी है और उसने पीएचडी की थीसिस जमा कर दी है।सौमित्र कैलिफोर्निया में है।

    उत्तरा के बिना किसी व्यवधान बिना कोई अंक मिस किये लगातार सत्ताइस साल तक निकलने की उपलब्धि वैकल्पिक मीडिया और लघु पत्रिका आंदोलन दोनों के लिए बेहद बुरे दिनों के दौर में उम्मीद की किरण है।

    उत्तराखंड की जनपक्षधर महिला आंदोलनकारियों की पूरी टीम अस्सी के दशक से सक्रिय हैं और उनकी सामाजिक बदलाव के लिए रचनात्मक सक्रियता का साझा मंच उत्तरा है।गीता गैरोला,शीला रजवार,बसंती पाठक,नीरजा टंडन,कमला पंत, डा.अनिल बिष्ट जैसी अत्यंत प्रतिभाशाली मेधाओं की टीम के नेतृ्त्व में उत्तराखंड के कोने कोने में  ने निरंतर सक्रियता जारी रखकर बुनियादी मुद्दों और मसलों को लेकर मेहनतकशों की हक हकूक की लड़ाई,जल जंगल जमीन की लड़ाई,शराबबंदी आंदोलन, पर्यावरण आंदोलन,पृथक राज्य आंदोलन,रोजगार आंदोलन,भूकंप,भूस्कलन,बाढ़ जैसे आपदाकाल में राहत और बचाव अभियान में उत्तराखंड का नेतृत्व किया है।

    मणिपुर और आदिवासी भूगोल के अलावा सामाजिक बदलाव के लिए निरंतर पितृसत्ता की चुनौतियों का बहादुरी से मुकाबला करके निरंतर सक्रियता और निरंतर आंदोलन से जुड़ी इन दीदियों और वैणियों से मेरे निजी पारिवारिक संबंध रहे हैं,इसलिए यह मेरे लिए बेहद खुश होने का मामला है।

    इसके साथ बोनस यह है कि पहाड़ के अंक भी लगातार निकल रहे हैं और तमाम आशंकाओं को धता बताकर नैनीताल समाचार का प्रकाशन अभी जारी है।

    बंगाल में ममता बनर्जी के लाइव शो के बाद रोज निजी अस्पतालों के लूट खसोट के बर्बर किस्से सामने आ रहे हैं।लेकिन इसके खिलाफ कोई जन आंदोलन असंभव है क्योंकि कारपोरेट पूंजी के खिलाफ  मैदान में डट जाने वाला कोई राजनीतिक दल अभी बचा नहीं है।बंगाल में मजदूर आंदोलन भी बंद कल कारखानों की तरह अब खत्म है।महिला,छात्र युवा आंदोलन भी तितर बितर है।

    अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप की ताजपोशी के दिन दुनियाभर में और अमेरिका के शहरों में महिलाओं ने जो अभूतपूर्व मार्च किया और अमेरिका में नस्ली राजकाज के खिलाफ जन प्रतिरोध का नेतृत्व जिस तरह महिलाएं कर रही हैं, मणिपुर और आदिवासी भूगोल की तरह उत्तराखंड में जन पक्षधर महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं की निरंतर सक्रियता और उनकी पत्रिका उत्तरा के लगातार सत्ताइस साल पूरे हो जाने से उम्मीद की किरण नजर आती है।

    बाकी देश में भी जितनी जल्दी हो सके,महिला नेतृ्त्व की खोज हम करें क्योंकि महिलाओं के आंदोलन और जन प्रतिरोध में उनके नेतृत्व से ही इस अनंत गैस चैंबर की खिड़कियां खुली हवा के लिए खुल सकती हैं।



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    Nothing to stop Racist RSS Agenda of Corporate Fascism!

    Palash Biswas

    What ever may come, the extraconstitutional rather anti constitution force RSS is determined to implement its agenda of ethnic cleansing injecting extrem racist venom of intolerance into the veins of the next generation to acomplish its agenda of zionist global corporate hindutva.

    RSS damn cares about the mandate.Mandate or no mandate it wants to kill every individual voicing dissent to kill diversity,tolerance and peace as it killed Gandhi and very recently Kalburgi,Pansare and davolkar not to mention Rohit Vemula nd najib very recently.Forget the genocide culture which created holocaust in Gujarat,Assam,Tripura and Punjab,riots countrywide and the soul of the nation is bleeding.

    RSS is afraid of the nonexisting resistance flaring up as the Washington March or Not My President demonstrations in United States of America has challnged the Racist Intplerant regime of newly elected President Don Donald Trump,Ku Klx Clan!

    The followers of some Nathuram Godse is afraid of democracy and thus they seem  to be adament to kill democracy lest Rohit Vemula phenomenon activated in Majority communities should dislodge themfrom the power and UP results might set the trends.

    Tahte is why amid incomplete UP elections,new wave of intolerance to capture university campus clearly heralds the darkness ahead.What patriotism?What nationalism?

    Example:Amidst the ongoing tussle between the Left-affiliated AISA and the RSS-backed ABVP, BJP MP Pratap Simha has stoked a controversy when he took to Twitter comparing Kargil martyr's daughter Gurmehar Kaur to fugitive underworld don Dawood Ibrahim. On Sunday evening, he posted a picture collage on Twitter with Kaur on one side and Ibrahim on the other side. Kaur is behind the 'Not Afraid of ABVP' campaign.

    Example:In his reply to a video by Gurmehar Kaur, the daughter of a slain Kargil war soldier, who recently started the campaign "Not Afraid of ABVP", Union Minister Kiren Rijiju on Monday said a strong army prevents war. Kaur, daughter of war Captain Mandeep Singh, last year made a a video asking India and Pakistan to amicably settle their disputes. She held a placard saying "Pakistan did not kill my dad, war killed him." Asking who is "polluting" her mind, Rijiju took to Twitter saying "India never attacked anyone but a weak India was always invaded".

    If every youth and every student cry freedom against the RSS regime and we the people stand united rock solid with the brave girl,the daughter of the kargil martyr,we might liberate the nation afresh from the clutches of death and destruction.

    Hours after Minister of State for Home Affairs Kiren Rijiju tweeted out asking who is "polluting" her mind, daughter of a slain Kargil marytr Gurmehar Kaur replied to his comment on Monday saying, "I have my own mind, nobody is polluting my mind. I am not anti-national." In a veiled reference, she also criticised former Indian cricketer Virendra Sehwag for trolling her on Twitter. "I am heartbroken, these are the people you yell for in matches and they troll you at the expense of your father's death," Kaur told news agency ANI. In a tweet, Sehwag held a placard that read: "I didn't score two triple centuries. My bat did." Meanwhile, two women constables of Delhi Police have been provided to Kaur for round the clock security following rape threats reportedly from ABVP.


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    सीनाजोरी का जलवा!

    इतिहास,भूगोल,विज्ञान के बाद अब अर्थशास्त्र पर भी फासिस्ट हमला!

    अर्थव्यवस्था से किसानों, जनपदों, गांवों, मेहनतकशों, खुदराबाजार, कारोबारियों,युवाओं और स्त्रियों,बहुसंख्य बहुजन जनता का एकमुश्त बहिस्कार!

    बेइंतहा बेदखली, दमन, उत्पीड़न, अत्याचार, नरसंहार के खिलाफ आवाज उठाना, विविधता बहुलता ,सहिष्णुता की बात करने पर अंजाम कलबुर्गी, पानेसर, दाभोलकर, रोहित वेमुला या नजीब का है या शहीद की इक्कीस साल की बेटी को रेप की धमकी है या राष्ट्रद्रोह का तमगा है।

    अब नोटबंदी के बाद जुबां पर तालाबंदी की तैयारी है।


    पलाश विश्वास

    इन दिनों राजनीति और राजकाज में सीनाजोरी का जलवा है।

    नोटबंदी के मारे किसानों ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में गन्ने को हथियार में तब्दील करके दंगाई राजनीति की तबीयत हरी कर दी है और यूपी में दो चरण का मतदान बाकी रहते रहते रिजर्व बैंक, अर्थशास्त्र और अर्थशास्त्रियों, रेटिंग एजंसियों के आकलन के खिलाफ विकास दर के झूठे आंकड़े पेश करके नोटबंदी से विकास तेज होने का जो दावा पेश किया गया है,वह तो हैरतअंगेज हैं ही,चुनाव प्रचार अभियान में जिस तरह सता पर काबिज  शीर्षस्थ राष्ट्र नेता अपने संवैधानिक पद से अर्थशास्त्र और अर्थशास्त्रियों की जो बेशर्म खिल्ली उड़ाई है, वह भारत ही नहीं,दुनिया के इतिहास में बेनजीर कारनामा है।

    सीनाजोरी का जलवा!

    इतिहास,भूगोल,विज्ञान के बाद अब अर्थशास्त्र पर भी फासिस्ट हमला!

    अर्थव्यवस्था से किसानों, जनपदों, गांवों, मेहनतकशों ,खुदराबाजार, कारोबारियों, युवाओं और स्त्रियों,बहुसंख्य बहुजन जनता  का बहिस्कार!

    हाल में इसी तर्ज पर अमेरिकी अलोकप्रिय राष्ट्रपति डान डोनाल्ड ने मीडिया को खारिज करने का अभियान छेड़ दिया है और इसी ट्रंप कार्ड के इस्तेमाल की भारत में तैयारी हो रही है।

    देश में फासिज्म के राजकाज में वित्तीय आपदायों के सृजनशील कलाकार और झोलाछाप विशेषज्ञों के सरताज भोपाल गैस त्रासदी के पीडितों के वंचित करने वाले यूनियन कार्बाइड के  मशहूर कारपोरेट वकील ने बाबुलंद आवाज में ऐलान कर दिया है कि अब अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस होनी चाहिेए।

    नागरिक और मनवाधिकार,मेहनतकशों के हकहकूक,जल जंगल जमीन पर्यावरण पहले से निषिद्ध विषय हैं।

    बेइंतहा बेदखली, दमन, उत्पीड़न, अत्याचार, नरसंहार के खिलाफ आवाज उठाना, विविधता, बहुलता,सहिष्णुता की बात करने पर अंजाम कलबुर्गी, पानेसर, दाभोलकर, रोहित वेमुला या नजीब का है या शहीद की इक्कीस साल की बेटी को रेप की धमकी है या राष्ट्रद्रोह का तमगा है।

    अब नोटबंदी के बाद जुबां पर तालाबंदी की तैयारी है।

    आला सिपाहसालार नोटबंदी पर यूपी का जनादेश जीतने का दावा कर रहे थे और उनकी जीत के लिए राम की सौगंध नाकाफी साबित होने लगी तो बाकायदा अर्थशास्त्र के खिलाफ युद्ध घोषणा कर दी गयी है।

    इतिहास के खिलाफ तो वे भारत में संस्थागत फासिज्म के जनमकाल से लड़ रहे हैं।सारा इतिहास दोबारा लिख रहे हैं। मिथकों और किंवदंतियों के अलावा अब सफेद झूठ को धर्म जाति नस्ल की रंगभेदी राजनीति के हिसाब से इतिहास बताया जा रहा है।

    भूगोल का बड़ा करना उनका सबसे प्रिय खेल है और इसमें उनकी मेधा बेमिसाल है।भारत विभाजन का किस्सा अभी आम जनता के लिए अबूझ पहेली है और भारत विभाजन से लेकर गांधी की हत्या और फिर फिर गांधी की हत्या के जरिये देश के बंटवारे से भूगोल के खिलाफ,राष्ट्रीय एकता और अखंडता के खिलाफ, संप्रभुता के खिलाफ उनका अविराम युद्ध धरअसल भारतीय जनता के दिलोदमिामाग में महाभारत के अश्वत्थामा का रिसता हुआ सदाबहार जख्म है,जिसका इलाज निषिद्ध है।

    इतिहासकारों को कूढ़े के ढेर में फेंकने के बाद अर्थशास्त्र बदलने और अर्थशास्त्रियों को भी खारिज कर देने का यह अभियान इतिहास के खिलाफ युद्ध की ही निरंतरता है और इसे हैरतअंगेज भी नहीं माना जा सकता।

    हैरतअंगेज इसलिए भी नहीं है कि भारतीयता और भारतीय संस्कृति के नाम राजनीति,राजकाज,राजधर्म  की विचारधारा सभ्यता,विज्ञान , आध्यात्म, धर्म, मनुष्यता और प्रकृति के विरुद्ध है,ईश्वर की अवधारणा और तमाम पवित्र धर्म ग्रंथों  में निहित बुनियादी मूल्यों,सामाजिकता,उत्पादन संबंधों,मनुष्यता,विवधता,बहुलता के विरुद्ध है।

    यह ध्यान देने की बात है कि वे विज्ञान,उच्च शिक्षा,शोध,विश्वविद्यालय के खिलाफ हैं लेकिन वे विध्वंसक परमाणु ऊर्जा के पक्ष में हैं।जनसंहार के तमाम उपकरणों और आयुधों के वे कारोबारी हैं।

    वे ऐप्पस,तकनीक और मशीनीकरण, रोबोटीकरण,तेज शहरीकरण, महानगरीकरण और औद्गोगीकीकरण के नाम बाजारीकरण के पक्षधर है,जो श्रम और उत्पादन संबंधों की बुनियादी सामाजिक आर्थिक शर्तों की मनुष्यता का खुल्ला उल्लंघन ही नहीं जनसंहार संस्कृति है।गैरजरुरी जनसंख्या का सफाया करके वे अपने धर्म कर्म एजंडे के हिसाब पसंदीदा जनता के अलावा बाकी सबको टरमिनेट कर देंगे।

    कारपोरेट एकाधिकार के लिए खेती और खुदरा कारोबार को खत्म करने के लिए नरसंहारी अश्वमेध के नस्ली एजंडा को लागू करने के लिए उनका संविधान मनुस्मृति है।नोटबंदी के जरिये मुक्तबाजार में आम जनता को नकदी से वंचित करके किसानों, कारोबारियों और मेहनतकशों के सफाया अभियान को जायज बताने के लिए इतिहास और विज्ञान के बाद अर्थशास्त्र पर यह अभूतपूर्व हमला है।

    मजे की बात तो यह है कि मनमर्जी आधार वर्ष, अवैज्ञानिक पद्धति,सुविधा के हिसाब से पैमाना और फर्जी आंकड़ों के इस खेल में सिर्फ औपचारिक और संगठित क्षेत्र और सच कहें तो शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के विकास को इस विकास दर का आधार बनाया गया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था का एक फीसद का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता है।

    भारतीय अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि आधारित है,यह संसाधनों के लिहाज से ही नहीं,प्राकृतिक और पर्यावरण के सच के हिसाब से भी नहीं,बल्कि हुस्ंक्य जनता के नैसर्गिक रोजगार और आजीविका होने की वजह से है।

    भारत आजाद होने के सत्तर साल में भोगोल का सच भी बदला नहीं है।कुछ महानगरों,उपनगरों और चुनिंदा शहरों में उपभोक्तावादी अंधाधुंध विकास के बावजूद, गांव गांव बिजली और उपभोक्ता बाजार पहुंचने के बावजूद,हर हाथ में मोबाइल, एटीएम पेटीएम,जीजीजीजजीजी संचार क्रांति के बावजूद डिजिटल कैशलैस इंडिया का  सच यही है कि हमारा यह स्वदेश जनपदों का देश है।

    जाहिर है कि गांवों, देहात ,किसानों और कृषि के विकास के बिना भारत के विकास का दावा झूठ के पुलिंदा के सिवाय कुछ नहीं है।

    औद्योगिक उत्पादन लगातार गिर रहा है क्योंकि तमाम देशी उद्योग,कल कराखाने बंद हो रहे हैं,उनका निजीकरण और विनिवेश बाजार में हुए अबाध विदेशी पूंजी के हितों के मुताबिक अंधाधुंध है।

    तमाम सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण हो जाने और यहां तक कि मीडिया पर कारपोरेट पूंजी का वर्चस्व कायम हो जाने की वजह से पढ़ी लिखी नई पीढी व्यापक पैमाने पर बेगोजगार है।

    जिस पैमाने पर स्त्री शिक्षा और स्त्री चेतना  का विकास हुआ है,उस अनुपात में स्त्री रोजगार और पितृसत्तात्मक समाज में घर बाहर और कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा की गारंटी एक फीसद भी नहीं है।

    नई आर्थिक नीतियों के नवउदारवादी मुक्तबाजार बन जाने के बाद कृषि विकास दर शून्य से नीचे पहुंच गयी है।

    कृषि संकट सुलझाये बिना आंकडो़ं की बाजीगरी से कृषि विकास दर में ढाई फीसद तक विकास की उपलब्धि पर छप्पन इंच का सीना न जाने कितने इंच का हो गया और सुनहले दिन के सपनों के तहत कृषि विकास दर चार से पांच फीसद बढ़ाने के दावे के बीच जल जंगल जमीन और पर्यायावरण, किसानों और मेहनतकशों, कारोबारियों और खुदरा बाजार, खेत खलिहानों और जनपदों के खिलाफ एकाधिकार कारपोरेट वर्चस्व का डिजिटल कैसलैस फर्जीवाड़ा नरमेध अभियान है।

    विकास दर में असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार कृषि को शामिल नहीं किया गया है।जाहिर है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने राष्ट्रीय आय का जो दूसरा अग्रिम अनुमान पेश किया, उतना इंतजार हाल में शायद ही किसी आंकड़े का किया गया हो। इसलिए कि इनसे न केवल पूरे वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्घि के अनुमान मिलते हैं बल्कि तीसरी तिमाही के जीडीपी अनुमान भी ये आंकड़े बताते हैं।  इन आंकड़ों में अहम बात यह है कि वृद्घि पर नोटबंदी के प्रभाव से काफी हद तक निपटा जा चुका है। विभिन्न क्षेत्रों पर इसका बेहद कम असर हुआ है। इस प्रक्रिया में सीएसओ ने सरकार से बाहर के हर व्यक्ति को चकित कर दिया है।

    यानी हिंदुत्व के एजंडे के तहत राम की सौगंध के साथ जिस अर्थव्यवस्था कि विकास दर पर संस्थागत फासिज्म का राजकाज और कारपोरेट वित्तीय प्रबंधन बल्ले बल्ले हैं,उससे कृषिजीवी भारतीय बहुसंख्य बहुजन जनता का सीधे बहिस्कार हो गया है। असंगठित क्षेत्र में जो मेहनतकश और नौकरीपेशा लोग हैं,वे भी हिंदुत्व के झोला छाप अर्थ शास्त्र के दायरे से बाहर हैं और बाहर हैं खुदरा बाजार और कारोबार में शामिल तमाम छोटे और मंझौले वर्ग के कारोबारी।बेरोजगार युवा और पढ़ी लिखी स्त्रियां भी इस अर्थव्यवस्था के बाहर है।उत्पादन प्रणाली में किसान और मजदूरों का सिरे से सफाया है।इसके बावजूद मीडिया और सर्वदली कारपोरट राजनीति जनविरोधी आर्थिक नीतियों की मनुस्मृति बहाल करने में लगी है।

    साठ के दशक से अमेरिका में अमेरिका मीडिया और राजनीति का समर्थ पुलसिसिया अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था के पक्ष में था जिसका नतीजा तेलयुद्ध से लेकर सीरिया का संकट है।य़ह अमेरिकी वसंत अब मध्यपूर्व और अरब अफ्रीकी देशों,पश्चिम यूरोप के बाद भारत का बदला हुआ मौसम है और तापमान तेलकुंओं की दहकती आंच है।भोपाल गैस त्रासदी के बाद परमाणु विध्वंस कर्मफल नियतिबद्ध है।

    अमेरिकी मीडिया को अपने धतकरम का अंजाम ट्रंप की ताजपोशी से समझ में खूब आ गया है।लेकिन 2014 के बाद भारतीय मीडिया अपने कारपोरेट अवतार में पूरीतरह फासिज्म के अंध राष्ट्रवाद के शिकंजे में है और इसीलिए अंधियारे का तेजबत्तीवाला कारोबार इतना निरंकुश है।

    मीडिया की सुर्खियां चीख रही हैंः वित्त मंत्री ने कहा है कि जीडीपी वृद्धि के तीसरी तिमाही के आंकड़ों पर नोटबंदी का बड़ा असर रहा। हालांकि, कृषि क्षेत्र में ग्रोथ का जिक्र करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि जीडीपी आंकड़ों ने उन लोगों के दावों को निराधार साबित कर दिया जो ग्रामीण क्षेत्रों को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर बातें कर रहे थे, कृषि क्षेत्र की वृद्धि रेकार्ड उच्चस्तर पर पहुंची। जेटली ने कहा कि बाजार में नोट डालने का काम काफी आगे पहुंच चुका है। इसके साथ साथ अर्थव्यवस्थाकी आंतरिक मजबूती से आर्थिक वृद्धि में तेजी लौटने के संकेत हैं।

    यही नहीं, दावा यह भी है कि भारत अब भी दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाबनी हुई है। नोटबंदी और उसके बाद लोगों को हुई परेशानी को देखते हुए यह काफी हैरान करने वाला है। हालांकि, भारत की विकास दर अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में सात प्रतिशत ही रही। यह पिछली तिमाही से कम है। पिछली तिमाही में यह विकास दर 7.4 रही थी। 2016-17 में जीडीपी की वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत पर रहने का अनुमान है जो इससे पिछले वित्त वर्ष में 7.9 प्रतिशत रही थी। वहीं भारत का पड़ोसी देश चीन दिंसबर वाली तिमाही में भारत से पीछे रहा। इस तिमाही में उसकी विकास दर 6.8 प्रतिशत रही।

    गौरतलब है कि येआंकड़े जारी होने से पहले तक ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि तीसरी तिमाही के मध्य में (8 नवंबर, 2016) के नोटबंदी के फैसले से अर्थव्यवस्थाके विभिन्न क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुये होंगे। भारतीय रिजर्व बैंक के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) तथा आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने इस दौरान भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को कम किया है।बहरहाल  इन संगठनों का मानना है कि नोटबंदी का भारतीय अर्थव्यवस्थापर अल्पावधि असर हुआ है। सीएसओ ने बयान में कहा कि वर्ष (2011-12) के स्थिर मूल्य पर वास्तविक जीडीपी 2016-17 में 121.65 लाख करोड़ रुपये पर कायम रहने का अनुमान है।

    जाहिर है कि जीडीपी विकास दर को लेकर आए बिल्कुल ताज़ा आंकड़े इशारा कर रहे हैं कि जीडीपी पर नोटबंदी का असर ज़्यादा नहीं पड़ा है। बेशक, अर्थव्यवस्थाकी रफ़्तार धीमी पड़ी है. फिर भी 2016-17 के लिए अनुमानित विकास दर 7.1% है। बीते साल ये दर 7.9% थी। देश की अर्थव्यवस्थापर नोटबंदी का मामूली प्रभाव देखने को मिला है और दिसंबर में समाप्त मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर घटकर सात फीसदी रही. मंगलवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दूसरी तिमाही में विकास दर 7.3 फीसदी थी।

    गौरतलब है कि ये आंकड़े केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी सीएसओ ने जारी किए हैं। देश की आर्थिक विकास दर के आंकड़े और पूर्वानुमान जारी करने वाली आधिकारिक संस्था सीएसओ ही है। इसके साथ ही सीएसओ ने पहली और दूसरी तिमाही में हुई जीडीपी वृद्धि के संशोधित आंकड़े भी जारी किये हैं। पहली तिमाही में संशोधित वृद्धि दर बढ़कर 7.2 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 7.4 प्रतिशत हो गई।

    अब दावा यह है कि 2025 तक भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍थाबन जाएगी। मोर्गन स्‍टेनली का अनुमान है कि वित्‍त वर्ष 2024-25 तक प्रति व्‍यक्ति आय 125 प्रतिशत बढ़कर 3,650 डॉलर हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की 40 करोड़ युवा जनसंख्‍या दुनिया में सबसे बड़ी जनसंख्‍या है और इनके पास तकरीबन 180 अरब डॉलर की खर्च शक्ति है। स्‍मार्टफोन के अत्‍यधिक इस्‍तेमाल और हर जगह मोबाइल ब्रॉडबैंड इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर मौजूद होने से अधिकांश कारोबार में विकास के लिए मददगार होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की ओवरऑल ग्रोथ में जनसंख्‍या का एक बहुत बड़ा महत्‍व है।

    इस लोकतंत्र में फासिज्म के राज में आम जनता कितनी असहाय है,यूपी जैसे निर्णायक चुनाव के मध्य रातोंरात रसोई गैस की कीमत में 86 रुपये की वृद्धि इसका सबूत है।यहीं नहीं,नोटबंदी को जायज ठहराते हुए भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी के चाकचौबंद इंतजाम के बीच कैशलैस डिजिटल इंडिया में बैंकों और एटीएम से नकदी की निकासी पर भारी सर्विस टैक्स ऐसे लगा दिया गया है कि उसमें बचत पर ब्याज खप जाये और आगे बैंकों में जमा पूंजी रखने की सजा बतौर अलग से जुर्माना लगाने का इंतजाम है।

    नागरिकों को अपनी कमाई,अपनी बचत और जमापूंजी बैक से निकालने  के लिए आयकर और दूसरे तमाम टैक्स चुकाने के बाद लेन देन टैक्स चुकाने होंगे।

    एक से बढ़कर एक जनविरोधी नीति रोज संसद और संविधान को हाशिये पर रखकर झोलाछाप बिरादरी की सिफारिश पर लागू हो रही है।जरुरत के मुताबिक जब चाहे तब पैमाने ,परिभाषा और आंकड़े गढ़कर मीडिया में पेइड न्यूज के तहत हर गलत नीति को विकास का गेमचेंजर बताया जा रहा है।

    यही नहीं, जेएनयू,जादवपुर,हैदराबाद समेत देशभर के विश्वविद्यालयों में मनुस्मृति राजकाज के तीव्र विरोध के बावजूद बजरंगी सेना ने ऐन यूपी चुनाव के बीच जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में उधम मचाकर धार्मिक ध्रूवीकरण का माहौल बनाया है, एक इक्कीस साल की शहीद की बेटी के खिलाफ बेशर्म बलात्कारी अभियान चलाकर जिसतरह महिलाओं और छात्र युवाओं पर हमले किये हैं तो इसके पीछे के राजनीतिक समीकऱण को समझना भी जरुरी है।

    यह सारा खेल बुनियादी मुद्दों और समस्य़ाओं को किनारे करके हिंदुत्ववादी सुनामी फिर 2014 की तर्ज पर पैदा करने की सुनियोजित साजिश है ताकि हारे हुए यूपी जीतकर सत्ता पर ढीली हुी पकड़ मजबूत की जा सके।

    सत्ता के लिए यह धतकरम जघन्य राष्ट्रद्रोह है।

    दूसरी ओर मीडिया के मुताबिक केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीसरी तिमाही के आंकड़ों पर नोटबंदी का कोई बड़ा असर नजर न आने से ब्रोकरेज और रिसर्च हाउसेज आश्चर्यचकित हैं। नोटबंदी के खासकर असंगठित क्षेत्र पर असर को लेकर आंकड़े को लेकर उन्हें संशय है। आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 7 प्रतिशत रही, जो दूसरी तिमाही में 7.4 प्रतिशत और एक साल पहले तीसरी तिमाही में 6.9 प्रतिशत थी।

    नोमुरा के मुताबिक, 'हमारे विचाार से जीडीपी के आधिकारिक आंकड़े नोटबंदी का वृद्धि दर पर असर कम करके आंक रहे हैं।' नोमुरा का कहना है कि संभव है कि सीएसओ के आंकड़े में असंगठित क्षेत्र में नोटबंदी के असर का प्रभावी आकलन नहीं हुआ और कंपनियों ने अपनी नकदी को बिक्री के रूप में दिखाया हो। वित्तीय ब्रोकरेज फर्म ने कहा है कि नोटबंदी के बाद वास्तविक गतिविधियों के आंकड़े से पता चलता है कि खपत एवं सेवा क्षेत्र ज्यादा प्रभावित हुआ है क्योंकि यहां नकदी से ज्यादा काम होता है।  

    बहरहाल आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि नोटबंदी ने आर्थिक गति पर बहुत कम असर डाला है। तीसरी तिमाही में निजी खपत, नियत निवेश और औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि बढ़ी है, जबकि सिर्फ सेवा क्षेत्र में मंदी आई है।

    ऐम्बिट कैपिटल का कहना है कि सीएसओ के आंकड़े का मामूली महत्त्व है, क्योंकि छोटे व मझोले कारोबारी समुदाय से बातचीत और बैंक के कर्ज देने की वृद्धि जैसे आंकड़ों से पता चलता है कि आर्थिक रफ्तार तीसरी तिमाही में धीमी पड़ी है। इसमें कहा गया है, 'हमारा विचार है कि जीडीपी वृद्धि दर चौथी तिमाही में रफ्तार पकड़ेगी। साथ ही वित्त वर्ष 18 में वृद्धि दर ज्यादा रहेगी।'  

    एडलवाइस रिसर्च का कहना है कि कुल जीडीपी में सरकार की भूमिका बढ़ रही है। भारत जैसे विकासशील देश में इसकी वजह से निजी निवेशकों की संख्या बढ़ सकती है। निजी खपत के आंकड़ोंं को भी देखें तो इस क्षेत्र में जोरदार तेजी आई है और इस पर नोटबंदी का सीमित असर ही दिख रहा है। इसमें कहा गया है, 'हालांकि आंकड़ों को लेकर संदेह किया जा सकता है, वित्त वर्ष 17 में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर को मूर्त रूप दिया जा सकता है। हमारा मानना है कि जीडीपी आंकड़े बाजार अनुमानों से अलग आएंगे और इससे मध्यावधि के हिसाब से लाभ होगा।'  



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    अंबेडकरी विचारक किरवले की हत्या और विजयन के सर पर एक करोड़ का इनाम!

    संघ सिपाहसालार ने हजारों मुसलमानों को कब्रिस्तान भेजने की बात कहकर गुजरात दोहराने की चेतावनी दे दी!

    पलाश विश्वास

    यूपी में आखिरी चरण के लिए मतदान बाकी है।दलित शोध छात्र रोहित वेमुला के बाद कोल्हापुर में प्रखर अंबेडकरी विचारक किरवले की हत्या हो गयी।इससे ज्यादा खतरनाक बात यह है कि उज्जैन में आरएसएस ने गुजरात में हजारों मुसलमानों के कत्लेआम का इकबालिया बयान जारी करते हुए केरल के मुख्यमंत्री के सर पर एक करोड़ के इनाम का ऐलान कर दिया है।

    कलबुर्गी,पानेसर,दाभोलकर के बाद रोहित वेमुला की हत्या और नजीब की गुमशुदगी के साथ किरवले की हत्या को जोड़कर देखें तो साफ तौर पर आरएसएस ने गुजरात नरसंहार दोहराने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है और बहुजनों को भी चचेतावनी दे दी है कि अब हिंदूराष्ट्र में अंबेडकर विमर्श के लिए कोई जगह नहीं है।

    जाहिर है कि केंद्र या राज्य में सत्ता हासिल करने या विशुध राजनीति या राजकाज से गांधी के हत्यारे कतई खुश नहीं हैं।वे राम राज्य से कम कुछ नहीं चाहते। रोहित के बाद किरवले की हत्या मनुस्मृति लागू करने के लिए भारतीय जनता के खिलाफ संघ परिवार की खुली युद्ध घोषणा है।

    चंद्रावत ने जिस तरह आम सभा में गुजरात में हजारों मुसलमानों को मौत के घाटउतारने का ऐलान किया है,यह गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के महिमामंडन का असल एजंडा है।

    चुनाव जीतने वाली स्थिर सरकार जिसे इशारे पर चल रही हो,वह अचानक इतना ज्यादा आक्रामक तेवर में आ जाये तो समझिये बहुत घनघोर संकट है।

    जिस तरह विद्यार्थी परिषद ने दिल्ली में उधम मचाया और उसके बाद कोलकाता में भी वह सड़क पर बवाल खड़ा करने के मूड में है,जिस तरह केरल के मुख्यमंत्री के सर पर इनाम एक करोड़ का ऐलान करते हुए आरएसएस के सिपाहसालार ने अमेरिका और भारतीय न्याय प्रणाली की क्लीन चिट को हाशिये पर रखकर सीना ठोंककर कह दिया कि संघ ने गुजरात में हजारों मुसलमानों को कब्रिस्तान में भेज दिया।

    इस ऐलान के बाद केरल के पलक्कड़ में तीन वाम कार्यकर्ताओं पर हमले भी हो गये।संघ परिवार इस इकबालिया बयान से पल्ला झाड़ने के लिए चंद्रावत को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया है,लेकिन अभी तक मध्यप्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है।

    इसी के मध्य कोल्हापुर से खबर आयी है कि कामरेड गोविन्द पानसरे के बाद अज्ञात हत्यारों ने आज सुबह कोल्हापुर वि वि में मराठी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ कृष्णा किरवले की उन्हीं के घर में घुस कर हत्या कर दी । डॉ किरवले अपने प्रखर अम्बेडकरवादी विचारों के लिए जाने जाते थे ।

    खबरों के मुताबिक इस नृशंस हत्या का पैटर्न वही है जो हत्यारों ने क्रमशः डॉ नरेंद्र दाभोलकर, कॉ गोविन्द पानसरे और प्रो एम एम कलबुर्गी की हत्या के समय अपनाया था ।

    गौरतलब है कि  इन तीनों प्रकरणों में हत्यारे अभी तक पकडे नही गये हैं और समाज के प्रगतिशील बौद्धिक नेतृत्व को हत्या जैसे हिंसक तरीकों से खामोश किये जाने की कोशिशें एक लंबे अरसे से जारी है।

    इंडियन एक्सप्रेस ने चंद्रावत के कारनामे का ब्यौरा देते हुए हैरत जताया कि उन्हें  अभीतक गिरफ्तार क्यों नहीं किया है।इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिकः

    Standing before a heaving crowd of Hindutva supporters in Ujjain on Wednesday, RSS leader Kundan Chandrawat made a frank admission: His "Hindu society" had sent thousands of Muslims to their deaths during the polarizing Gujarat riots. His admission, anchored in rhetoric, had macabre overtones.

    At an event organized by the local Janadhikar Samiti, Chandrawat had launched a scathing attack on the Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan, alleging that Vijayan was responsible for the deaths of the RSS activists in Kerala. Enraged and excited, Chandrawat asked for Vijayan's head: "I, Dr Kundan Chandrawat, declare from this dais – I have wealth that is why I say this… property worth more than Rs 1 crore. Cut off Vijayan's head, and bring it to me, I will transfer my house and assets in your name! Such traitors don't have the right to live in the country. Such traitors don't have the right to murder democracy!" Leaning intimidatingly over the podium, his voice roared. "Have you forgotten Godhra? You killed 56, we sent 2000 to the graveyard," referring to the colossal anti-Muslim pogrom that left Gujarat scarred in 2002. In response, Chandrawat received a resounding applause.



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