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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    #NoteBandiNasBandiEmergency

    #NoMoreRohith

    नोटबंदी के पचास दिन पूरे होते न होते जेएनयू के बारह बहुजन छात्रों पर कुठाराघात

    पलाश विश्वास

    30 दिसंबर तक की मोहलत खत्म होने से पहले जेएनयू पर हमला नोटबंदी के सर्जिकल स्ट्राइक से,कैशलैस डिजिटल इंडिया से,दिवालिया बैंकिंग,लाटरी अर्थव्यवस्था से ध्यान हटाने का मास्टर स्ट्रोक तो नहीं है?रोहित वेमुला को भूलने की तरह फिर छात्र युवा देश भर में कत्लेआम के स्थाई बंदोबस्त को तो नहीं भूल रहे हैं?क्या संघ परिवार के पाले में बैठे बहुजन बुद्धिजीवियों के लिए नोटबंदी के जवाब में फिर अस्मिता राजनीति के समरसता उफान का यह मौका नहीं है?हम नहीं जानते हैं।आप?

    इस पर तुर्रा यह कि फासिज्म के राजकाज राजकरण के समय में विपक्ष का चेहरा फिर वही ममता बनर्जी या फिर अरविंद केजरीवाल है।भूमिगत अन्ना ब्रिगेड परदे के पीछे सक्रिय है।यह अजब गजब स्वदेशी जागरण है।

    दीदी के कैबिनेट में सिरे से बहुजनों का कोई रोल नहीं है और बंगाल में जीवन के किसी भी क्षेत्र में बहुजनों का कोई चेहरा नहीं है।दीदी के फेसबुक स्टेटस पर हिंदुत्व का महोत्सव है।केजरीवाल अन्ना ब्रिगेड की पूंजी फिर आरक्षण विरोध है।संघ परिवार के अगले प्रधानमंत्रित्व का दावेदार फिर वही केजरीवाल है।

    दीदी ने लोकसभा विधानसभा चुनाव में वामपक्ष के साथ कांग्रेस को ठिकाने लगाने के लिए बंगाल का मुकम्मल केसरियाकरण कर दिया।कांग्रेस बंगाल में साइन बोर्ड है।नादानी की क्या कहें कि उन्हीं मोदी दीदी गठबंधन के मुकाबले कांग्रेस की फिर सत्ता में वापसी की तमन्ना है।

    दीदी के सिपाहियों ने ही संसद में,संसद के बाहर  सबसे जियादा हंगामा बरपाया है और नोटबंदी पर संसद में कोई बहस नहीं हुई है।चंडूखाने में लोग इतने बेखबर भी नहीं होते।जितने वामपंथी और बहुजन सितारे हैं।दीदी के आगे पीछे घूमे हैं।बिना पड़ताल किये कि दीदी केजरीवाल के आगे पीछे कौन हैं।

    बंगाल में लोग यही पूछ रहे हैं कि दीदी मोदी युगलबंदी की पहेली का क्या हुआ।सीबीआई ईडी क्यों मेहरबान हैं।

    बंगाल में लोग यही पूछ रहे हैं कि दीदी मोदी युगलबंदी के आलम में दिल्ली की तृणमूल क्रांति और चिटफंड के खजाने के बीच दूरी कितनी है।

    बंगाल में लोग यही पूछ रहे हैं कि देशभर में छापे में तमिलनाडु के मुख्यसचिव से लेकर मायावती के भाई के यहां रेड हुआ तो दक्षिण कोलकाता की सारी प्राइम प्रापर्टी पानी के मोल खरीदने वालों के खिलाप कोई रेड क्यों नहीं पड़ा।क्यों नहीं,नोटिस थमाने के बजाय बंगाल में शारद नारदा के सिपाहसालारों के यहां छापे पड़े।

    हम बचपन से वामपंथियों को सियासती घोड़े जान रहे थे,रेस में घोडो़ं के बजाय अब गदहों को दौड़ते देख हैरानी हो रही है।

    मायावती पर निशाना बंधते देखते ही नोटबंदी की सियासती जमात में भगदड़ मच गयी है और आप नोटबंदी से राहत मांग रहे हैं।

    देश के इस सबसे मुश्किल वक्त पर यादवपुर विश्वविद्यालय का होक कलरव मौन है।कोलकाता में प्रेसीडेंसी,सेंटस्टीपेंस,कलकत्ता विश्वविद्यालय में सन्नाटा है।

    देश के इस सबसे मुश्किल वक्त पर हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला के साथी नोटबंदी पर खामोश हैं।ज्वाइंट फोरम के स्टेटस में नोटबंदी का जिक्र भी नहीं है।तमाम बहुजन बुद्धिजीवी या पेटीएम के साथ हैं या  अंबेडकर मिशनरियों की तरह मौन हैं या अपने अपने खजाने को बचाने की कवायद में मशगुल हैं।बामसेफ का राष्ट्रीय आंदोलन सिरे से गायब है।मूलनिवासी मौन हैं।क्यों?हम नहीं जानते हैं।आप?

    देश के इस सबसे मुश्किल वक्त पर अार्थिक अराजकता,नोटबंदी नसबंदी,नकदी संकट,भुखमरी,बेरोजगारी,मंदी के घनघोर संकट के वक्त छात्र युवा खामोश हैं। देश में छात्रों युवाजनों का समकालीन परिदृश्य से यह गुमशुदगी हैरतअंगेज है।

    फिर मायावती के खिलाफ भगवा राम मोर्चाबंद हैं।यूपी जीतने को दलित बुद्धिजीवी की संघी मोर्चाबंदी भयानक है।नोटबंदी के साथ बहुजनों की केसरिया मोर्चाबंदी क्यों?हम नहीं जानते हैं।आप?

    अंबेडकर भवन विध्वंस के बाद अंबेडकर मसीहा और उनका परिवार बहुजनों का दुश्मन ? और उसी अंबेडकर मलबे पर  केसरिया अंबेडकर मिशन की सत्रह मंजिल इमारत के भव्य राममंदिरमार्का समरसता परियोजना के साथ उना रैली के बाद जयभीम कामरेड गायब है।

    पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव,पंजाब में भी शिकस्त की आशंका, पांचों राज्यों में खासतौर पर यूपी में बहुजनों की केसरिया मोर्चाबंदी,समरसता अभियान, परिवर्तन यात्रा और फिर जेएनयू की हैरतअंगेज मोर्चाबंदी। यूपी में नोटों की वर्षा नोटबंदी नसबंदी के मध्य? क्यों?हम नहीं जानते हैं।आप?

    हमने कैरम कभी कायदे से खेला नहीं है।कुश्ती कबड्डी बचपन में खूब खेला है।थोड़ा बहुत फुटबाल,हाकी और क्रिकेट भी।सब आउटडोर है।इनडोर सत्ता गलियारों का संसदीय खेल अनजाना है।डाइरेक्ट इनडायरेक्ट स्ट्राइक,सरजिकल स्ट्राइक के कलाकौशल हम जानते नहीं हैं।हम शतरंज के खिलाड़ी भी नहीं हैं।शह मात प्रेमचंद जी से साभार जान रहे थे,पियादों की घुड़चाल समझ नहीं पा रहे हैं।आप?

    मौकापरस्त मलाईदार पढ़े लिक्खे बहुजन केसरिया बजरंगी  बिरादरी प्याज की परतों की तरह खिलने लगी है।

    ऐसे तिलस्मी मुकाम पर मनुस्मृति विदाई के बाद एक बार फिर जेएनयू पर फोकस बनाने के लिए संघ परिवार का प्लान आखिर क्या है?आत्महत्या की कोशिश है? या सारे विश्वविद्यालय बंद कराने की युद्धघोषणा है?या 30 दिसंबर का बेनामी मास्टरस्ट्रोक यही है।यहींच।पियादों की घुड़चाल समझ नहीं पा रहे हैं।आप?

    मनुस्मृति संविधान के रामराज्य में रोहित वेमुला अकेले नहीं है।नोटबंदी के बाद बेनामी संपत्ति का क्या होगा कह नहीं सकते,लेकिन रामराज्य में मनुस्मृति बहाल रखने खातिर हर शंबूक की हत्या का अब अनिवार्य सुधार कार्यक्रम है।इसीलिए नोटबंदी के पचास दिन पूरे होते न होते जेएनयू के बारह बहुजन छात्रों पर कुठाराघात हो गया।महाभारत का कुरुक्षेत्र अब फिर जेएनयू है।पार्वती अब मोहनजोदोड़ो की डांसिग गर्ल है,तो वैज्ञानिक सोच की भ्रूण हत्या भी अनिवार्य है।

    शुक्रवार को जेएनयूमें हुई एकेडमिक काउंसिल की मीटिंग में टेस्ट की फीस बढ़ाने को लेकर भी फैसला लिया गया.आईआईटी खड़गपुर में फीस बढ़ाने के खिलाफ आंदोलन की खबर बासी हो गयी है।फीस बढ़ाने के बावजूद बहुजनों की एंट्री रोकने का ऐहतियाती इंतजाम जबर्दस्त है।गौरतलब हे कि जेएनयू में छात्राें देश का बेकी विश्वविद्यालयों के मुकाबले ज्यादा हैं तो बहुजन छात्र भी वहां ज्यादा है।जेएनयू बागी लड़ाकू छात्राओं और बेशुमार बहुजन छात्रों की वजह से मनुस्मृति की आंखों में किरकिरी है।

    गौरतलब है कि दो बार नामंजूर करने के बाद आखिरकार जेएनयूने 'योग दर्शन' और 'वैदिक संस्कृति' पर शॉर्ट टर्म कोर्स के प्रपोजल को मंजूर कर लिया है। अकैडमिक काउंसिल की मीटिंग में दोनों सर्टिफिकेट कोर्स को पास कर दिया गया है।

    गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के लापता छात्र नजीब अहमद की तलाश की जंग दिल्ली पुलिस के लिये दिनोदिन भारी पड़ती जा रही है। बड़े-बड़े मामलों को सुलझाने वाली दिल्ली पुलिस के हाथ नजीब अहमद के मामले में अब तक खाली हैं।

    गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन ने धरना-प्रदर्शन न करने के लिए नोटिस बोर्ड लगा दिया है।

    अब मुलाहिजा फरमायें।

    शकील अंजुम।

    सामाजिक न्याय की बुलंद आवाज़। अब JNU से निलंबित। वाइस चांसलर के आदेश पर SC, ST और OBC छात्रों के साथ इनका सामाजिक बहिष्कार।

    गौरतलब है कि  जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सोमवार को हुई विद्वत परिषद की बैठक में जबरदस्ती घुसकर अनुशासनहीनता करने वाले आठ छात्रों के खिलाफ जेएनयूप्रशासन ने कड़ा रूख अख्तियार किया है। प्रशासन ने उनको विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधि से ही नहीं बल्कि हॉस्टल से भी निलंबित कर दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच समिति भी बैठा दी है। जांच समिति की रिपोर्ट आने तक यह छात्र निलंबित रहेंगे। जेएनयूप्रशासन ने कहा है कि जो भी इन छात्रों को कैंपस में बुलाएगा उस पर कार्रवाई होगी।

    गौरतलब है कि  जेएनयूके शिक्षक काउंसिल बैठक में बाहरी छात्रों को एंट्री करवाने वाले करीब 20 शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की जा रही है। शिक्षकों का कहना है कि काउंसिल बैठक में बाहरी छात्र भी पहुंच रहे हैं, इसकी जांच होनी चाहिए। बाहरी छात्रों की बैठक में एंट्री करवाने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई भी जरूरी है। उधर, विश्वविद्यालय की इस कार्रवाई पर छात्रसंघ ने आपत्ति दर्ज करवाई है।

    अब दिलीप मंडल के इस फेसबुकिया मंतव्य पर गौर करेंः

    JNU में अफ़ज़ल गुरु मामले में भी कार्रवाई से पहले जाँच कमेटी बैठी थी। उस मामले में सभी छात्र अंदर आ गए।

    वहीं,

    SC-ST-OBC-माइनॉरिटी छात्रों को 24 घंटे के अंदर निकाल दिया। कोटा लागू करने और इंटरव्यू का नंबर घटाने की माँग से इतना ख़ौफ़।

    निकालने के नोटिस पर लिखा है कि आगे जाँच भी होगी।

    हद है।

    दिलीप इस मामले को अफजल गुरु मामले में रिहा छात्रों से जोड़ क्यों रहे हैं,हमारी समझ से परे है।

    आगे दिलीप ने लिखा हैः

    देश भर में कहीं भी JNU मामले पर आंदोलन हो तो कृपया मुझे टैग कर दें। अब हम किसी भी और को, रोहित वेमुला की तरह, सांस्थानिक हत्या का शिकार बनने नहीं दे सकते।

    उनको मिला जबाव भी लाजवाब हैः

    स्नेहलभाई पटेलनोटबंदी कैशबंदी की #नाकामियोंको छिपाने और देश की जनता का ध्यान दूसरी ओर भटकाने का षड्यंत्र jnu के दलित आदिवासी अल्पसंख्यक एवं ओबीसी के 12 छात्रों का निलंबन, दमनात्मक कार्रवाई और बहिष्कार की घटना है।

    Gagan Rajanaikमंडल सर!पंडों के प्राण धर्म में बसते हैं।एक बार 60% ओबीसी भाई इनके धर्म को कसकर लात मार दें जैसा कि मराठी ओबीसी भाइयों ने किया।फिर देखिए थोड़े क्षण के लिए जलजला या सुनामी से कम तहलका नहीं होगा। हिंदुत्व को त्यागने की बात पूरे विश्वमीडिया में आग की तरह फैलेगी।फिर देखिए पंडों के प्राण कैसे सूखते हैं।बापबाप करेंगे।

    अब फिर दिलीप का स्टेटसः

    2016 की शुरुआत रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या से हुई। साल के आख़िर में संघियों, द्रोणाचार्यों की नज़र राहुल सोनपिंपले और JNU के OBC, SC और माइनॉरिटी के साथियों पर है।

    आज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संघी कुलपति ने मुलायम सिंह यादव, विश्वम्भर नाथ प्रजापति, दिलीप यादव, भूपाली, प्रशांत, मृत्युंजय, शकील आदि को तत्काल प्रभाव से निलम्बित कर दिया।

    #NoMoreRohith

    एक आधुनिक लोककथा।

    मोदी जी- पंडित जी, किसको निकाला? किस बात का हल्ला है?

    JNU वाइस चांसलर - अहीर, कुर्मी, कोयरी, कुम्हार, मुसलमान, आदिवासी, दलितों को निकाल दिया है श्रीमान।

    मोदी जी - बहुत अच्छा। क्या माँग कर रहे थे? किस बात का आंदोलन है?

    वाइस चांसलर - यह देखिए इनका कितना खतरनाक पर्चा है श्रीमान। माँग कर रहे हैं कि शिक्षक पदों पर संविधान में दिया गया कोटा लागू करो। इंटरव्यू को वेटेज घटाओ। यह हो गया तो हम उन्हें कम नंबर देकर फ़ेल कैसे करेंगे। ये नामुराद जाने कैसे रिटेन एक्ज़ाम में अच्छा नंबर ले आते हैं।

    मोदी जी - बहुत खूब पंडित जी।

    इस संवाद से प्रसन्न होकर नागपुर के देवताओं ने मोदी जी पर फूल बरसाए।

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    विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम के डीएनए का नस्ली सफाया अब नोटबंदी का अगला चरण है।

    देश के इस घनघोर संक्रमणकाल में रोहित वेमुला के साथी कहां सो रहे थे,छात्र युवा कहां मनुस्मृति दहन कर रहे थे,पता ही नहीं चला।

    अब उन्हें कोंचकर जगाने का वक्त है।नया साल छात्रों का कारसेवक कायाकल्प का मनुस्मृति समय है।जो बहुजन जहां तहां घुस गये है,उनेहं कोड़े मारकर निकाल बाहर करने का सही वक्त है।

    मनुस्मृति कोई व्यक्ति नहीं,बाकायदा वैदिकी संहिता है,याद दिलाने के लिए संघ परिवार को धन्यवाद।

    पेटीएमपीएम ने 30 दिसंबर तक सुनहले दिनों के लिए मोहलत मांगी थी पचास दिनों की।गिनती में घपला वहीं से शुरु हुआ।इसी मुताबिक सारा देश नोटबंदी के पचास दिन पूरे होने के लिए 30 दिन का इंतजार कर रहा है।

    8 नवंबर को नोटबंदी के लिए राष्ट्र के नाम पेटीएम संदेश जारी हो गया तो पेटीएम राजकाज के पचास दिन 28 दिसंबर को पूरे होते हैं।गणित में भारत के लोग इतिहास में इतने कच्चे नहीं थे।महाजनी व्यवस्था में सूदखोर की गिनती हमारा गणित हो गया है।आदरणीय सुरेंद्र ग्रोवर जी ने 28 को ही पचास दिन पूरे हो जाने की सूचना देकरहमारा भी गणित दुरुस्त कर दिया।हाईस्कूल पास करने के बाद हमने कभी हिसाब जोड़ा नहीं है और बेहिसाब जिंदगी गुजरती चली गयी।ग्रोवर साहेब का आभार।

    अयोध्या में राममंदिर न बनने से राम की सौगंध खाने वाले बजरंगी बहुत परेशान होवै थे।वे फिर कारसेवक बनकर पता नहीं कहां कहां धमाल मचाने का मंसूबा बना रहे थे।यूपी फिर कब्जाैने की राह देख रहे थे।नोटबंदी की आड़ में जहां नोटों की बरसात जो हुई सो हुई,मोटर साईकिल और ट्रक तक बरसने लगे।मायावती को घेरकर  दो चार चापे मारकर विपक्षे के खेमे में हलचल मचा दी।राजनीतिक मोर्चाबंदी राहुल ममता मोर्चाबंदी तक सिमट गया,फिरभी यूपी अभी दूर है।इसका इंतजाम भी हो गया।रामराज्य मुकम्मल है।इस बीच मुंबई में डिजिटल इंडिया का राममंदिर बन गया।अरब सागर में भगवा झंडों की सुनामी में शिवाजी महाराज का भसान भी हो गया।

    उत्तराखंड के माफियावृंद के साथ एक ही फ्रेम में शोभित कल्कि महाराज ने पूरे देस के लिए बारह मास चारधामों की यात्रा के लिए चार धाम राजमार्ग का शिलान्यास सुनहले दिनों के तोक आयात से एक दिन पहले कर दिया।यह चाकचौबंद इंतजाम है।आगे भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी की मार है।हिंदू राष्ट्र में कितने करोड़ हिंदू जियेंगे,कितने करोड़ हिंदू मरेंगे,अतापता नहीं।लोक का सत्यानाश तो हो गया,परलोक में स्वर्गवास का स्थाई बंदोबस्त है।वैसे चार धामों के उत्तराखंडवासी तो पहले से स्वर्गवासी है।खासकर तब जब मुसलमानों के आतंकवाद की वजह से धरती का स्वर्ग इस वक्त बाकी देश के लिए केसरिया राजकाज में नर्क बना हुआ है।

    इसके बावजूद हिंदुत्व के केसरिया कार्यक्रम और राजकाज,हिंदू राष्ट्र के मनुस्मृति संविधान के बारे में शक की कोई गुंजाइश रह गयी तो कल जेएनयू में एकमुश्त बारह बहुजन छात्रों पर कुठाराघात से वह दूर हो जानी चाहिए।मनुस्मृति विदाई और मनुस्मृति दहन के मध्य जयभीम कामरेड सुनामी का अता पता लापता हो गया था।अब फिर महाभारत का कुरुक्षेत्र जेएनयू में स्थानांतरित है।

    इस पर फेसबुक में दिलीप मंडल के ताजा स्टेटस पर किन्हीं Jitendra Visariyaका मंतव्य प्रासंगिक हैः

    ठीक है आंदोलन भी करिए कि रोहित बेमुला कांड फिर से न दोहराया जाये!....यह मोदी पार्टी की एक चाल भी हो सकती है कि आप अपना भींगा जूता छोड़, जेएनयू की ओर दौड़ पड़ो । मैं कहता हूँ कि उन्हें तो हर बार की तरह अपना फैसला बदलना ही पड़ेगा, पर आप अपना जूता हाथ में तैयार रखो! वो भी पूरा भींगा हुआ! क्योंकि 50 दिन पूरे होने वाले हैं!!!

    चूं चूं के मुरब्बे का ताजा अपडेट यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को आगामी बजट से पहले नीति आयोगद्वारा आयोजित अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक में हिस्सा लिया। बैठक में अर्थशास्त्रियों ने कई आर्थिक बिंदुओं मसलन कृषि, कौशल विकास और रोजगार सृजन, टैक्स और शुल्क संबंधी मामले, शिक्षा, डिजिटल प्रौद्योगिकी, आवास, पर्यटन, बैंकिंग आदि पर अपनी राय दी। बैठक में 2022 तक कृषि आय को दोगुना करने पर सुझाव दिए गए। बैठक के बाद नीति आयोगके वाइस चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने बताया कि विशेषज्ञों ने पीएम मोदी को बताया कि भारत को टूरिज्म में अधिक निवेश करने की जरूरत है।

    गौरतलब है कि  नीति आयोगमें आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में अर्थशास्त्रियों ने आयकर दरों में कटौती करने तथा सीमा शुल्क दरों का वैश्विक स्तर पर प्रचलित दरों के साथ तालमेल बिठाने की वकालत की ताकि आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सके। नीति आयोगके तत्वावधान में यह बैठक फरवरी में पेश होने वाले आम बजट से पहले हुई है।बैठक में नोटबंदी के अर्थव्यवस्था पर प्रभाव की चर्चा नहीं हुई जबकि अर्थव्यवस्था को कम नकदी वाली बनाने के लिए डिजिटलीकरण के मुद्दे पर विचार विमर्श हुआ।

    इसी बीच पुराने नोट पर अध्यादेश को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब 31 मार्च 2017 के बाद एक समय में 10 से ज्यादा नोट रखने पर पाबंदी रहेगी, फिर चाहे ये नोट 500 के हों या 1000 के, या दोनों। रिसर्च के लिए अधिक से अधिक 25 नोट रख सकते हैं। नोट जमा करते वक्त गलत जानकारी देने पर 5,000 रुपये जुर्माना या जमा रकम का 5 गुना जुर्माना देना पड़ेगा। 31 मार्च, 2017 के बाद तय सीमा से ज्यादा नोट रखने पर 10,000 रुपये जुर्माना या जब्त रकम का 5 गुना जुर्माना देना पड़ेगा।

    यही नहीं 30 दिसंबर के बाद 500 और 1000 के पुराने नोट जमा करने के लिए कठोर शर्तों को पूरा करना होगा। 30 दिसंबर के बाद पुराने नोट जमा करने से पहले ये बताना होगा कि आखिर अब तक नोट क्यों नहीं जमा किया। साथ ही खुद अगर रिजर्व बैंक नहीं पहुंच सकते तो डाक के जरिये पुराने नोट और साथ में घोषणापत्र भेज सकते हैं। घोषणापत्र में ये बताना होगा कि खुद क्यों नहीं आए, और अब तक नोट क्यों नहीं जमा किए। रिजर्व बैंक आपकी दलीलों से सहमत नहीं हुआ तो पुराने नोट को नकार भी सकता है।

    गौरतलब है कि इसी बैठक के ऐन पहले सोना उछला और शेयर बादजार चढ़ गया।

    मनी कंट्रोल का खुलासा यह हैः

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल बड़े इकोनॉमिस्ट और सरकारी अफसरों से बैठक की। इस बैठक में देश के विकास के रोडमैप पर चर्चा की गई। नीति आयोग की इस बैठक में टैक्स ढांचे को सरल बनाने, डायरेक्ट टैक्स में कटौती और कस्टम ड्यूटी में सुधार पर चर्चा हुई। बैठक में पीएम मोदी को कई सुझाव दिए गए और टैक्स ढांचे को आसान बनाने पर चर्चा हुई। इस बैठक में अलग-अलग सेक्टर के 13 विशेषज्ञ थे।


    इस बैठक के बाद नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगढ़िया ने कहा कि इस बैठक में कस्टम ड्यूटी में सुधार, इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर में बदलाव, इनपुट और आउटपुट पर समान ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी में बदलाव और रेवेन्यू न्यूट्रल रखने की सिफारिश की गई। इस बैठक में पीएम ने इस बात पर भी जोर दिया कि लोग टैक्स चोरी नहीं करना चाहते। बशर्ते उन्हें ये भरोसा दिया जाए कि उनके टैक्स का सही इस्तेमाल हो रहा है।


    वहीं नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने सीएनबीसी-आवाज़ से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि बजट से पहले प्रधानमंत्री के साथ की गई बैठक सकरात्मक रही। अमिताभ कांत ने वित्त मंत्री जेटली की बात दोहराई और इस बजट में बड़े टैक्स रिफॉर्म के संकेत दिए।


    जानकारों का मानना है कि आने वाले बजट में इन एक्सपर्ट्स की सिफारिशों के आधार पर बजट में बदलाव मुमकिन है। जिसके तहत इनकम टैक्स छूट की सीमा बढ़ाई जा सकती है। अभी इनकम टैक्स छूट की मौजूदा सीमा 2.5 लाख रुपये है। इसके अलावा इनकम टैक्स के सभी स्लैब बढ़ाए जा सकते हैं। कॉरपोरेट टैक्स की दरें भी कम हो सकती हैं। इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर में भी बदलाव मुमकिन है। इस बजट में इंपोर्ट ड्यूटी की विसंगतियां दूर की जाएंगी। इंपोर्ट ड्यूटी कच्चे माल पर कम, तैयार माल पर ज्यादा की जाएगी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने की तैयारी की जाएगी।


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    तुगलकी राजकाज और राजकरण!

    नोटबंदी का पर्यावरण और बहुजनों का हिंदुत्व खतरनाक हैं दोनों!

    पलाश विश्वास

    हम शुरु से जल जंगल जमीन के हक हकूक को पर्यावरण के मुद्दे मानते रहे हैं।हम यह भी मानते रहे हैं कि मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था से प्रकृति,मनुष्यता,संस्कृति और सभ्यता के अलावा धर्म कर्म को खतरा है।

    सभ्यता के विकास में मनुष्य और प्रकृति के संबंध हमेशा निर्णायक रहे हैं तो सभ्यता के विकास में पर्याववरण चेतना आधार रहा है।यही हमारे उत्पादन संबंधों का इतिहास हैं और इन्हीं उत्पादक संबंधों से भारतीय अर्थव्यवस्था बनी है,जिसका आधार कृषि है।धर्म कर्म और आध्यात्म का आधार भी वहीं पर्यावरण चेतना है।

    ईश्वर कही हैं तो प्रकृति में ही उसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है।आस्था का आधार भी यही है।

    मुक्तबाजारी हिंदुत्व को इसीलिए हम धर्म मानने से इंकार करते रहे हैं।यह विशुद कारपोरेट राजनीति है,अधर्म है।अंधकार का कारोबार है।नस्ली नरसंहार है।

    भारत में पर्यावरण का पहरुआ हिमालय है तो सारे तीर्थस्थान वहीं हैं और वहां के सारे लोग आस्तिक है।यह आस्था दरअसल उनकी पर्यावरण चेतना है।पर्यावरण चेतना के बिना धर्म जैसा कुछ होता ही नहीं है,ऐसा हम मानते हैं।

    नोटबंदी के डिजिटल कैशलैस मुक्तबाजारी नस्ली नरसंहार अभियान के निशाने पर प्रकृति,मनुष्यता,संस्कृति,सभ्यता के अलावा मनुष्य की आस्था,परंपरा,इतिहास के साथ साथ धर्म कर्म भी है।

    नोटबंदी के पचास दिन पूरे होते न होते डिजिटल कैशलैस इंडिया की हवा निकल गयी है।सामने नकदी संकट भयावह है।

    देश के चार टकसालों में शालबनी में कर्मचारियों ने ओवर टाइम काम करने से मना कर दिया है,जहं रात दिन नोटों की छपाई के बाद कैशलैस लेनदेन तीन चार सौ गुणा बढ़ने के बावजूद बैंक अपने ग्राहकों को नकदी देने असमर्थ हैं।

    बाकी तीन टकसालों में भी देर सवेर शालबनी की स्थिति बन गयी तो इंटरनेट औरमोबाइल से बाहर भारत के अधिकरांश जनगण का क्या होगा,यह पीएमएटीएम और एफएम कारपोरेट के तुगलकी राजकाज और राजकरण पर निर्भर है।

    यूपी में चुनाव है तो वहां नोट,मोटर साईकिलें और ट्रक भी आसमान से बरस रहे हैं।बंगाल बिहार ओड़ीशा और बाकी देश में जहां चुनाव नहीं है,आम जनता की सुधि लेने वाला कोई नहीं है।राष्ट्र के नाम संदेश शोक संदेश से हालात नहीं बदलने वाले हैं।

    नोटबंदी सिरे से फेल हो जाने के बाद नोटबंदी का पर्यावरण बेहद खतरनाक हो गया है।

    इस देश की जनसंख्या में सवर्ण हिंदू बमुश्किल आठ फीसद हैं।

    बाकी बानब्वे फीसद बहुजन हैं।

    ब्राह्मणों और सवर्णों को अपनी दुर्गति के लिए गरियाने वाले ये बानब्वे फीसद बहुजन ही देश के असल भाग्यविधाता हैं।

    पढ़े लिखे सवर्णों में ज्यादातर नास्तिक हैं।

    पढ़े लिखे ब्राह्मण भी अब जनेऊ धारण नहीं करते।

    इसके विपरीत पढे लिखे बहुजन कहीं ज्यादा हिंदू हो गये हैं और कर्मकांड में बहुजन  सवर्णों से मीलों आगे हैं।मंत्र तंत्र यंत्र के शिकंजे में भी ओनली बहुजन हैं।हिंदुत्व सुनामी में जो साधू संत साध्वी ब्रिगेड हैं,उनमें भी बहुजन कहीं ज्यादा हैं।बहुजनों के धर्मोन्माद से ही हिंदुत्व का यह विजय रथ अपराजेय है और यही मुक्तबाजार का सबसे बड़ा तिलिस्म है।कारपोरेट हिंदुत्व का सबसे बड़ा प्रायोजक है।अब तो रतन टाटा भी हिंदुत्व की शरण में नागपुर में शरणागत हैं।

    जाहिर है कि नोटबंदी का पर्यावरण और बहुजनों का हिंदुत्व खतरनाक हैं दोनों।बेहद खतरनाक हैं और यही डिजिटल कैशलैस सैन्यतंत्र सैन्यराष्ट्र का चरित्र है।

    नोटबंदी के पचास दिन पूरे होने से पहले मुंबई से लेकर उत्तराखंड तक जो हिंदुत्व का एजंडा लागू हो रहा है,उसपर गौर करना बेहद जरुरी है।

    गढ़वाल में भूंकप क्षेत्र भागीरथी और अलकनंदा घाटियों के आस पास चारधामों तक राजमार्ग पर्यटन विकास के लिए नहीं है।उत्तराखंड में चुनाव जीतने का रणकौशल भी यह नहीं है।हिमाचल और उत्तराखंड का केसरियाकरण बहुत पहले हो गया है।अब बाकी देश के केसरियाकरण के सिलसिले में यह राममंदिर आंदोलन रिलांच है जैसे केजरीवाल अन्ना ब्रिगेड का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सिरे से आरक्षणविरोधी है,वैसे ही हिंदुत्व का यह एजंडा विशुध कारपोरेट एजंडा है।

    हिंदुत्व के इस कारपोरेट एजंडा ने तो शिवसेना को भी अनाथ करके शिवाजी महाराज की विरासत पर कब्जा करने के लिए अरब सागर में शिवाजी भसान कर दिया है और मुंबई में राममंदिर का निर्माण भी हो गया है।संघ परिवार बाबासाहेब अंबेडकर के अंबेडकर भवन ढहाकर, कब्जा करके उसी जमीन पर बहुजनों का नया राममंदिर बाबासाहेब के नाम बना रहा है।

    हम जहां हैं,उस कोलकाता के जलमग्न हो जाने का खतरा गहरा रहा है।हुगली नदी के दोनों किनारे कोलकाता और हावड़ा हुगली में भी टूट रहे हैं जैसे मुर्शिदाबाद और मालदह में टूट रहे हैं।तो सुंदर वन के सारे द्वीप डूबने वाले हैं।

    पर्यावरण महासंकट में नोटबंदी का पाप धोने के लिए समुद्रतट से लेकर हिमालय तक मुक्तबाजारी कारपोरेट हमला तेज है।

    सुंदरवन और पहाड़ों में रोजगार की तलाश में पलायन का परिदृश्य एक जैसा है।अभी सुंदर वन के गोसाबा में मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता तुषार कांजिलाल की टैगोर सोसाइटी फार रूरल डेवलपमेंट ने चार गांवों आनंदपुर,लाहिड़ीपुर,हैमिल्टनबाद और लाटबागान में घर घर जाकर समीक्षा की है।इन गांवों के पांच हजार तीन सौ एक सक्षम पुरुषों में दो हजार पांच सौ छसठ पुरुषों ने रोजगार की तलाश में गांव छोड़ दिया है। 618 महिलाओं ने भी गांव छोड़ दिया है।यह एक नमूना है।सुंदरवन ही नहीं उत्तराखंड के पहाड़ों के गांवों की तस्वीर यही है।

    पर्यटन विकास की ही बात करें तो उत्तराखंड को बहुत कम निवेश पर मौजूदा रेलवे नेटवर्क के जरिये पूरे देश से जोड़ा जा सकता है जबकि नैनीताल जैसे पर्यटन स्थल तक पहुंचने के लिए अब सिर्फ कोलकाता और नई दिल्ली से सीधी ट्रेनें हैं।मुंबई,चेन्नै,बेंगलुरु,जयपुर,अबहमदाबाद,नागपुर,भोपाल,रायपुर,भुवनेश्वर से अगर नैनीताल के लिए सीधी ट्रेन सेवा हो तो कुमायूं में पर्यटन विकास बहुत बढ़ सकता है।देहरादून हरिद्वार देशभर से जुड़ा है,वहां से रेलवे नोटवर्क को पूरे उत्तराखंड हिमाचल तक ले जाना फौरी जरुरत है।

    सरकार ऐसा कुछ न करके गढवाल के केदार जलसुनामी इलाकों में बारहमहीने धर्म पर्यटन का बंदोबस्त कर रही है,तो इसका असल मकसद समझना जरुरी है।

    हिमालय के बारे में चेतावनियां सत्तर के दशक से जारी होती रही है।अब वर्ल्डवाइल्ड लाइफ फंड की 2011 की रपट के मुताबिक सुंदरवन इलाके के लिए डूब के खतरे की चेतावनी भी बासी हो चुकी है जबकि भारत के सारे समुद्रतट को परमाणु भट्टी में तब्दील करने का अश्वमेध अभियान जारी है।

    शिवसेना ने मुंबई के सीने पर जैतापुर में पांच पांच परमाणु संयंत्र लगाने का अभी तक विरोध नहीं किया है जबकि शिवाजी की विरासत छिनने पर मराठी मानुष के जीवन मरण के दावेदार बौखला रहे हैं।

    चेतावनी है कि अगले तीस सालों में सुंदरवन के पंद्रह लाख लोग बेघर होंगे और सुंदरवन के तमाम द्वीप डूब में शामिल होंगे।

    हम अपने लिखे कहे में लगातार मुक्तबाजार के खिलाफ पर्यावरण आंदोलन तेज करने की बात करते रहे हैं।

    हम बहुजन आंदोलन को भी पर्यावरण आंदोलन में बदलने के पक्षधर हैं।क्योंकि बहुजनों के हकहकूक के तमाम मामले जल जंगल जमीन आजीविका और रोजगार से जुड़े हैं और पार्कृति संसाधन उन्ही से छीने जा रहे हैं।क्योंकि कृषि भारत में पर्यावरण,जलवायु,जीवन चक्र और मौसम केसंतुलन का आधार है और भारत में कृषिजीवी आम जनता बहुजन हैं।हमारी किसी ने नहीं सुनी है।

    अब हमारे लिए यह बहुत बड़ा संकट है कि कमसकम पहाड़ों में लगभग सारे राजनेता चिपको आंदोलन से जुड़े होने के बाद उनमें से ज्यादातर लोग अब कारपोरेट दल्ला बन गये हैं और हिमालय के हत्यारों में वे शामिल हैं।जाहिर है कि सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण कार्यकर्ता का चरित्र भी राजनीतिक संक्रमण से पूरी तरह बदल जाता है।आम जनता के बजाय उन्हें बिल्डरों,माफिया,प्रोमोटरों,कारपोरेट बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ज्यादा चिंता लगी रहती है।

    यह बेहद खतरनाक स्थिति है।

    बहुजनों के केसरियाकरण और बहुजनों के हिंदुत्व से ही सारा का सारा राजनीतिक वर्ग इस देश में बहुजनों के नस्ली नरसंहार के हिंदुत्व एजंडा को अंजाम दे रहा है।इसका प्रतिरोध न हुआ तो आगे सत्यानाश है।

    डीएसबी जमाने के हमारे प्राचीन मित्र राजा बहुगुणा का ताजा स्टेटस हैः

    हरीश रावत ने केदारधाम तो मोदी ने चारधाम से सिक्का जमाया ? उत्तराखंड की कौन कहे ?

    राजा बहुगुणा आपातकाल के बाद नैनीताल जिला युवा जनता दल के अध्यक्ष थे।वनों की नीलामी के खिलाफ आंदोलन में वे जनतादल छोड़कर उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ता बने।28 नवंबर,1977 को नैनीताल में छात्रों पर लाठीचार्ज,पुलिस फायरिंग,नैनीताल क्लब अग्निकांड  के मध्य वनों की नीलामी के खिलाफ शेखर दाज्यू, गिरदा, राजीव लोचन शाह और दूसरे लोगों के साथ जेल जाने वालों में उत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत भी शामिल थे।हरीश रावत जेल से निकलकर सीधे राजनीति में चले गये।

    गौरतलब है कि इसीलिए हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने पर वाहिनी के चिपकोकालीन अध्यक्ष शमशेर सिंह बिष्ट ने एक आंदोलनकारी के हाथों में सत्ता की बागडोर होने की बात कहकर हलचल मचा दी थी।

    तब डीएसबी के छात्र आज के सांसद प्रदीप टमटा भी वाहिनी के बेहद सक्रिय कार्यकर्ता थे।वह लंघम हास्टल में रहता था,जहां पहले राजा रहते थे।लंघम में रहते हुए ही राजा के साथ महेंद्र सिंह पाल की भारी भिड़ंत हो गयी थी।नैनीताल के सबसे धांसू छात्र नेता महेंद्र सिंह पाल भी हम लोगों के ही साथ थे।हम लोग ब्रुकहिल्स में रहनेवाले काशी सिंह ऐरी के साथ थे तो प्रदीप लंघम के ही शेर सिंह नौलिया के साथ।चिपको ने हम सभी को एकसाथ कर दिया।चिपको के दौरान प्रदीप के डेरे थे बंगाल होटल में मेरा कमरा,गिर्दा का लिहाफ और नैनीताल समाचार का दफ्तर।तो काशी सिंह ऐरी भी चिपकों के दौरान डीडी पंत और विपिन त्रिपाठी के साथ उत्तराखंडआंदोलन का हिस्सा बनने से पहले हमारे साथ थे।मतलब यह खास बात है कि उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय तमाम लोग चिपको आंदोलन से जुड़े थे।

    अब सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी से राजनेता,मुख्यमंत्री से लेकर सांसद तक बनने वाले प्राचीन साथियों की पर्यावरण चेतना पर हमें शक है।हमारे साथी , हमें माफ करें।मैं जन्मजात तराई का मैदानी हूं।मातृभाषा भी बांग्ला है।ऊपर से शरणार्थी किसान परिवार से हूं।खांटी उत्तराखंडी होने का दावा कर नहीं सकता। हमें जितनी फिक्र उत्तराखंड की कोलकाता में 25 साल गुजारने के बावजूद हो रही है,उतनी फिक्र भी हमारे साथियों को उत्तराखंड की नहीं है,यह हमारे लिए गहरा सदमा है।वैसे उत्तराखंड की राजनीति और विधानसभा में भी हमारे पुराने साथी कम नहीं हैं।लेकिन महिला आंदोलनकारियों की बेमिसाल शहादतों और उत्तराखंड वासियों की आकांक्षा और संघर्षों से बने नये राज्य में वे क्या कर रहे हैं,समझ से परे हैं।

    बारह महीने चार धाम यात्रा के हिंदुत्व प्रोजेक्ट पर राजा के सिवाय किसी का पोस्ट नहीं मिला है।

    आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा फेसबुक या सोशल मीडिया पर नहीं हैं।चार धाम हिंदुत्व के सिलसिले में उनकी प्रतिक्रिया या कोई उनका मंतव्य हमारे सामने नहीं है। पत्रकारों को तुरंत उनसे देहरादून में साक्षात्कार करना चाहिए।

    सुंदरलाल बहुगुणा  हमारी तरह नास्तिक नहीं हैं।विशुद्ध गांधीवादी हैं।वे धार्मिक हैं।पर्यावरण और जल जंगल जमीन के मसलों को वे सीधे आध्यात्म से जोड़कर देखते हैं।उनके विरोध का हथियार भी उपवास है। पर्यावरण संकट के मद्देनजर बरसों से वे पहाड़ों पर चढ़ नहीं रहे हैं और गोमुख पर रेगिस्तान बनते देख भविष्य में जल संकट के मद्देनजर उन्होंने बरसों से अन्नजल छोड़ दिया है।गंगा की अविराम जलधारा को बनाये रखने का नारा उन्होंने ही सबसे पहले दिया था।

    आदरणीय सुंदर लाल बहुगुणा हमें कोई दिशा दें तो बेहतर।मुख्यमंत्री हरीश रावत या फिर केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री को भी वे सलाह देने की हालत में हैं।

    अभी हिमालय में तमाम ग्लेशियर पिघलने लगे हैं और एक एक इंच जमीन भूमाफिया ने दखल कर लिया है।बारह मास धर्म पर्यटन में पहाड़ियों का क्या हिस्सा होगा,मौजूदा पर्यटन वाणिज्य में पहाड़ियों की हिस्सेदारी के मद्देनजर इसे समझा जा सकता है।पर्यावरण,मौसम और जलवायु के परिदृश्य में माउंट एवरेस्ट पर्वतारोहण पर्यटन का नजारा सामने हैं।

    इसी सिलसिले में पहाड़ से ही इंद्रेश मैखुरी का यह स्टेटस भी उत्तराखंड में हिंदुत्व के जलवे को समझने के लिए मददगार हैः

    हरीश रावत जी ने बुजुर्गों के मुफ्त तीर्थ घूमने की योजना निकाली,भूत-मसाण पूजने वालों को पेंशन की घोषणा की,छठ,करवाचौथ की छुट्टी कर डाली और अब जुमे की नमाज के लिए सरकारी कर्मचारियों को 90 मिनट की छुट्टी दे रहे हैं.हरीश रावत जी बुजुर्ग हैं,तीर्थ करने की उनकी उम्र है,छूट्टी की जरुरत है,उनको.तो क्यूँ न उनकी ही छुट्टी करके तीर्थ यात्रा पर रवाना कर दिया जाए.नहीं तो वे राज्य को ही मसाण बना कर उसकी पुजई करते रहेंगे !


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    राम के नाम सौगंध भीम के नाम!

    मनुस्मृति का जेएनयू मिशन पूरा, जय भीम के साथ नत्थी कामरेड को अलविदा है।सहमति से तलाक है।

    बहुजनों को वानरवाहिनी बनाने वाला रामायण पवित्र धर्मग्रंथ है,जिसकी बुनियाद पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रामराज्य में मनुस्मृति अनुशासन है।सीता का वनवास,शंबूक हत्या है।

    अब संघ परिवार ने बाबासाहेब अंबेडकर को भी ऐप बना दिया है।

    डिजिटल लेन देन के लिए बनाया भीम ऐप, किया लॉन्च।

    न नेट, न फोन आने वाले समय में सिर्फ आपका अंगूठा काफी है।

    आगे आधार निराधार मार्फत दस दिगंत सत्यानाश है।


    पलाश विश्वास

    नोटबंदी के बावनवें दिन नोटबंदी के पचास दिन की डेडलाइन पर अभी बेपटरी है भारत की अर्थव्यवस्था।नकदी  के बिना सारा जोर अब डिजिटल कैशलैस वित्तीय प्रबंधन पर है।राजकाज और राजकरण भी नस्ली सफाये का समग्र एजंडा है।एफएम कारपोरेट का दावा है कि हालात अब सामान्य हैं।परदे पर सपनों का सौदागर हैं।

    बहुजनों को वानरवाहिनी बनाने वाला रामायण पवित्र धर्मग्रंथ है,जिसकी बुनियाद पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का रामराज्य में मनुस्मृति अनुशासन है।

    अब संघ परिवार ने बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को भी ऐप बना दिया है।

    डिजिटल लेन देन के लिए बनाया भीम ऐप, किया लॉन्च।

    न नेट, न फोन आने वाले समय में सिर्फ आपका अंगूठा काफी है।

    आगे आधार निराधार मार्फत दस दिगंत सत्यानाश है।

    भीम ऐप हैं और निराधार आधार कैसलैस डिजिटल आधार। नागरिकता, गोपनीयता, निजता, संप्रभुता का बंटाधार।

    भारत तीसरे विश्वयुद्ध में बाकी विश्व के खिलाफ अमेरिका और इजराइल का पार्टनर और ग्लोबल सिपाहसालार ट्रंप,पुतिन साझेदार।

    नाटो का प्लान बायोमेट्रीक यूरोप में खारिज,भारत में डिजिटल कैशलैस आधार। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दागी अपराधी की तरह हर कैशलैस लेनदेन पर नागरिक या बहुजन बहुजन अपना फिंगर प्रिंट भीम ऐप से अपराधी माफिया गरोहों और कारपोरेट कंपनियों को,साइबर अपराधियों को हस्तांतरित करते रहें।

    भीम ऐप डिजिटल क्रांति है।बहुजन राजनीति केसरिया है।

    राजनीति के तमाम खरबपति अरबपति करोड़पति शिकारी खामोश हैं।सर्वदलीय संसदीय सहमति है।बहुजन भक्तिभाव से गदगद हैं,समरस हिंदुत्व है और पवित्र मंदिरों में प्रवेश महिलाओं का भी अबाध है।समता है।न्याय भी है।संविधान है। कानून का राज भी है।लोकतंत्र के सैन्यतंत्र में सिर्फ नागरिक कबंध दस डिजिट नंबर हैं।कारपोरेट इंडिया नागपुर में शरणागत है।सुनहले दिन आयो रे।छप्पर फाड़ दियो रे।

    अब आपका ही अंगूठा आपकी पहचान और आपका बैंक होगा वही आपका अंगूठा। भीम ऐप के लिए आपका अंगूठा ही काफी है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आधार को बुनियादी सेवा लेनदेन के लिए अनिवार्य बनाने की इस अवमानना के लिए जयभीम ऐप लांच किया है पेटीेमप्रधानमंत्री ने।बहुजन समाज का नारा चुराकर संघ परिवार का नारा हैः


    बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय...जयभीम ऐप गरीबों का खजाना है।

    खजाना मिला है तो सभी अलीबाबा चालीस चोर हैं।

    साथ में खूबसूरत गाजर भी कि अब लोग गूगल पर भीम की जानकारी तलाशेंगे। बहुजन अपने बाबासाहेब की जानकारी गुगल से मांगेंगे,जहां सारी जानकारी पर,समूचे सूचना तंत्र पर,मीडिया पर,साहित्य संस्कृति पर,इतिहास भूगोल,मातृभाषा पर  सरकारी संघी नियंत्रण है।बहुजन गुगल में फेसबुक,सोशल नेटवर्क के अलावा कहां हैं?वहां भी दस दिगंत सेसंरशिप है।हर प्रासंगिक पोस्ट ब्लाक या डिलीट या स्पैम है।

    जाहिर है कि बहुजनों के मसीहा से बाबासाहेब को विष्णु भगवान बनाने की तैयारी है।गौरतलब है कि पेटीएमपीएम कल राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं। राष्ट्र को संदेश देने से पहले बहुजनों को संदेश दे डाला पेटीएमपीएम ने,वही जो संघ परिवार का असल और फौरी मकसद दोनों है।

    जाहिर है कि बहुजनों की खातिर ही डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए पेटीएमपीएम ने नया मोबाइल ऐप भीम लॉन्च किया है जो बिना इंटरनेट चलेगा। पेटीएमपीएम ने कहा कि सरकार ऐसी टेक्नोलॉजी ला रही है जिसके जरिए बिना इंटरनेट के भी आपका पेमेंट हो सकेगा। गरीब का अंगूठा जो कभी अनपढ़ होने की निशानी था वह डिजिटल पेमेंट की ताकत बन जाएगा।

    पेटीएमपीएम ने  डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने वालों को सम्मानित किया। लकी ग्राहक योजना और डिजि-धन व्यापार योजना के तहत 7,229 विजेता भी लकी ड्रॉ के जरिए चुने गए।

    पेटीएमपीएम ने  कहा कि टेक्नोलॉजी को लेकर काफी भ्रामक समझ है। वो  टेक्नोलॉजी का नहीं बल्कि गरिबों का खजाना है।

    पिछली बार 8 नवंबर को जब पेटीएमपीएम ने राष्ट्र को संबोधित किया था तो नोटबंदी का बड़ा फैसला लिया। लिहाजा लोगों को इस बार पेटीएमपीएम से बड़ी उम्मीदें हैं। लोगों को कितना ब्लैकमनी जमा हुआ इसका हिसाब चाहिए। आम आदमी को उम्मीद है कि अपने कल के संबोधन में पीएम विथड्राल लिमिट बढ़ाने कि घोषणा करेंगे। आयकर विभाग ने जिन लोगों पर कार्यवाही की उन पर सरकार कितने दिनो में कार्यवाही करेगी सरकार इसका रोड मैप देगी। इसके साथ ही डिजिटल पेमेंट का रोड मैप भी रखा जाएगा।

    केसरिया राजकाज का दावा है कि  भीम ऐप 2017 का देशवासियों के लिए उत्तम से उत्तम नजराना है।

    पहले से साफ ही था कि चिड़िया की आंख पर ही निशाना है।

    नोटबंदी के मध्य़ यूपी में नोटों के साथ केसरिया मोटरसाईकिलों और बजरंगी ट्रकों की बरसात के मध्य मायावती की बसपा के खजाने पर छापा।बहुजन समाज को तितर बितर करके यूपी दखल करने का मास्टर प्लान बखूब है।

    समाजवादियों के मूसलपर्व में भी किसका हाथ है,यह गउमाता की समझ से परे भी नहीं है।राष्ट्र के नाम संदेश शोक संदेश में चाहे जो हो,नोटबंदी का औचित्य साबित करना मकसद कतई नहीं है।नकितना कालाधन निकला,कितनी नकदी चलन में है,कब बैंकों से एटीएम से पैसा मिलेगा,कोई हिसाब नहीं मिलने वाला है जुमलों के सिवाय।

    सारा जोर कैशलैस डिजिटल हंगामे पर है।जिसका फौरी लक्ष्य यूपी दखल है।

    यह कैशलैस डिजिटल हंगामा विशुध माइंड कंट्रोल तमाशा है।ब्रेनवाश है बहुजनों का,जो कत्लेआम के जश्न के लिए अनिवार्य है।वही फासिज्म का निरंकुश राजकाज है।राजकरण भी वही और वित्तीय प्रबंधन भी वही।अबाध नस्ली सफाया।

    ।नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष की मोर्चाबंदी के खिलाफ छापेमारी अभियान तेज हो रहा है। अन्नाद्रमुक और बसपा के बाद अब दीदी की तृणमूल कांग्रेस निशाने पर है।

    डिजिमेला जयभीम करतब से पहले कोलकाता में सीबीआई ने टीएमसी  सांसद तापस पाल को गिरफ्तार कर लिया है।

    गौरतलब है कि माकपा ने 2011 के विधानसभा चुनाव से पहले रोजवैली के गिरफ्तार सर्वेसर्वा गौतम कुंडु के साथ कलिंपोंग और कोलकाता में दीदी,मुकुल राय और उनके सिपाहसालारों की बैठकें होने का आरोप लगाया था।

    2011 के बाद 2016 के अंत में सीबीआई एक्शन जबरदस्त है।दीदी का कालाधन भी निकलने वाला है।संदेश राष्ट्र के नाम बदस्तूर यही है।

    विपक्ष को तितर बितर करने का दशकों से आजमाया रामवाण सीबीआई छापा है।भगदड तो जारी है।राजनीतिक विपक्ष खत्म है।

    बहुजन भी शिकंजे में फंसे हैं।भीम के नाम सौगंध है।

    बाकी देश गैस चैंबर या फिर मृत्यु उपत्यका है।

    तापस पाल की गिरफ्तारी के बाद बिना नाम बताये पत्रकारों से कहा गया है कि गौतम कुंडु के साथ प्रभावशाली कमसकम पंद्रह लोगों की बैठकें होती रही हैं और लाखों की लेनदेन भी बारंबार होती रही हैं।वाम दावे के मुताबिक जीत के वे नोटों से भरे सूटकेसों का अभी अता पता नहीं है।

    सीबीआई के मुताबिक उन हाई प्राोफाइल बैठकों में तापस पाल भी मौजूद थे और बाकी लोगों के बारे में वे जानते हैं।इसलिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है क्योंकि वे सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं दे रहे हैं।

    संसद में तृणमूल सचेतक सुदीप बंदोपाध्याय को भी सीबीआई ने तलब किया है।सोम मंगल को वे सीबीआई के मुखातिब होंगे।आगे लंबी कतार है।

    जाहिर है वक्त सनसनी का है।सनसनी में नोटबंदी का किस्सा उसीतरह रफा दफा है जैसे मनुस्मृति का किस्सा, सर्जिकल स्ट्राइक हो गया। सनसनी और धमाकों की रणनीति से नोटबंदी का किस्सा रफा दफा करने की तैयारी है।मगर यूपी जीतने का टार्गेट निशाना बराबर हैं।इसीलिए बाबासाहेब अब संघ परिवार का ऐप हैं।

    जेएनयू पर हमला भी इसी रणनीति का हिस्सा है।बहुजन छात्रों को अलगाव में डालने का यह जबर्दस्त दिलफरेब खेल है जो कामयाब होता नजर आ रहा है।बहुजन छात्र और कामरेड क्रांतिकारी दोनों एक दूसरे से निजात पाने को बौरा गये लगते हैं और जाहिर है कि तरणहार इकलौता संघ परिवार है।जावड़ेकर धन्य हैं।

    धन्य है बहुजन छात्रों के निलंबन पर कामरेडों की क्रांतिकारी खामोशी भी।

    कामरेड इसीतरह बहुजनों को केसरिया कांग्रेस खेमे में हांकते रहे हैं दशकों से।

    क्रांति से बहुजनों का यह तलाक सहमति से है।

    जाहिर है कि संघ परिवार की बाड़ाबंदी में दाखिले के बाद बहुजनों का जो होना था वही हो रहा है।भूखे शेरों की मांद में चारा बनने के लिए बेताब बहुजनों का यही कर्मफल है।कारपोरेट इंडिया के तंत्र मंत्र यंत्र हिंदुत्व तो पहले से था ही,अब वह तेजी से अंबेडकर मिशन में तब्दील हैं।मिशन के दुकानदार भले वे ही पुराने चेहरे हैं।

    जाहिर है कि भाजपा और संघ परिवार के साथ साथ कारपोरेट इंडिया के नस्ली सफाये के एजंडा का असली मास्टरकार्ड बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ही हैं और अब उनका बीज मंत्र भी जयभीम है,फिर अब भीम ऐप है। क्योंकि यूपी और गायपट्टी ही नहीं,बाकी देश की आंखें भी यूपी के नतीजों पर टिकी है।

    बहुजनों की आबादी बानब्वे फीसद है।

    पचास फीसदी आबादी ओबीसी की और ओबीसी सत्ता में है तो बाकी आम जनता को हांकने के लिए जयभीम जयभीम समां है मुक्तबाजारी कार्निवाल का।

    यूपी की जीत बहुजन एकता तोड़कर ही मिल सकती है और संघ परिवार इसके लिए कुछ भी करेगा।राम से बने हनुमान पहले से मोर्चाबंद हैं और अब मलाईदार पढ़े लिखे बहुजनों की सेवा व्यापक पैमाने पर समरसता मिशन में ली जा रही है।

    सोदपुर हाट में एक बुजुर्ग बीएसपी नेता की किराने की दुकान है।आज हाट में गया तो उनने कहा कि यूपी में बहनजी जीत रही हैं।वे जीतती हैं तो बाकी देश में फिर जयभीम जयभीम है।इसपर हमने कहा कि यूपी में नोटों की वर्षा हो रही है और समाजवादी दंगल का फायदा भी संघ परिवार को होना है।

    उनने बहुत यकीन के साथ कहा कि मुसलमान संघ परिवार को वोट नहीं देंगे और वे इस बार बहनजी के साथ हैं।बहुजनों को यही खुशफहमी है।वे बंटे रहेंगे और उम्मीद करेंगे कि मुसलमान उनके लिए सबकुछ नीला नीला कर दें।मौका पड़ा तो बहुजन मुसलमानों का साथ भी न देंगे।

    हमने उनसे ऐसा नहीं कहा बल्कि हमने निवेदन किया कि बंगाल में मतुआ और शरणार्थी सारे बहुजन हैं और वे ही सारे के सारे बजरंगी हैं तो आप बंगाल में बैठकर यूपी के बहुजनों के बारे में इतने यकीन के साथ दावा कैसे कर सकते हैं।

    पहली बार हमने किसी बंगाली सज्जन से सुना,बंगाल के बहुजन बुड़बक हैं और बिहार के बहुजन भी बराबर बुड़बक हैं लेकिन यूपी के बहुजन उतने बुड़बक भी नहीं हैं।

    फिर मैंने निवेदन किया कि बहन जी तो कई दफा मुख्यमंत्री बन गयीं तो सामाजिक न्याय और समता का क्या हुआ,बाबासाहेब का मिशन का क्या हुआ।

    उनने जबाव में कहा,कुछ नहीं हुआ लेकिन आरएसएस को हराना अंबेडकर मिशन को बचाने के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है।

    उनने जबाव में कहा,भाजपा ने अगर यूपी जीत ली तो न अंबेडकर मिशन बचेगा और न देश बचेगा।

    हाट में खड़े यह संवाद सुनते हुए एक अजनबी बुजुर्ग ने कह दिया,दो करोड़ वेतनभोगी पेंशनभोगी हैं तो सिर्फ दो हजार नेता नेत्री हैं।नोटबंदी के बाद जिस तेजी से आम जनता तबाह है,इन दो हजार नेता नेत्रियों के पैरों तले कुचले जाने से पहले जनता अब किसी भी दिन बगावत कर देगी।

    हम कुछ जवाब दे पाते,इससे पहले वे निकल गये।

    गौरतलब है कि प्रधानमंत्री पेटीएम ने नोटबंदी के 50 दिन पूरे होने के बाद दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में डिजिधन मेला का उद्घाटन किया। इस मेले का उद्घाटन देश में डिजिटल पेमेंट और कैशलेस इंडिया को बढ़ावा देने के लिए किया गया। इस मेले में प्रधानमंत्री  पेटीएम ने भीम ऐप की की घोषणा की।

    इस भीम ऐप से कमसकम उत्तर भारत में सामाजिक न्याय की बहुजन राजनीति का काम तमाम करना स्वंवर का लक्ष्य है।

    गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना बाबासाहेब की वजह से हुआ,जो सर्वविदित सच है।इस सच को आधार बनाकर भारतीय रिजर्वबैंक की हत्या को जायज बता रहे हैं पेटीएमप्रधानमंत्री और बहुजन गदगद है।

    बहुजनों के लिए मंकी बातें आज लता मंगेशकर के गाये सुपरहिट फिल्मी गानों से भी ज्यादा सुरीली है क्योंकि सारे बोल जयभीम जयभीम है।यानी कि हिंदुतव का ग्लोबल एजंडा अब राम के नाम नहीं,बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के नाम से अंजाम तक पहुंचाने का चाक चौबंद इंतजाम है।

    गौरतलब है कि भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहलीबार इस तरह राजकाज और वित्तीय प्रबंधन अंबेडकर मिशन और अंबेडकर विचारधारा के मुताबिक चलाने का दावा किया है।पहले ही कहा जा रहा था कि नोटबंदी के लिए बाबासाहेब ने कहा था।

    इस पर आदरणीय आनंद तेलतुंबड़े ने लिखा हैः

    कहने की जरूरत नहीं है कि दलितों और आदिवासियों जैसे निचले तबकों के लोगों को इससे सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है और वे भाजपा को इसके लिए कभी माफ नहीं करेंगे. भाजपा ने अपने हनुमानों (अपने दलित नेताओं) के जरिए यह बात फैलाने की कोशिश की है कि नोटबंदी का फैसला असल में बाबासाहेब आंबेडकर की सलाह के मुताबिक लिया गया था. यह एक सफेद झूठ है. लेकिन अगर आंबेडकर ने किसी संदर्भ में ऐसी बात कही भी थी, तो क्या इससे जनता की वास्तविक मुश्किलें खत्म हो सकती हैं या क्या इससे हकीकत बदल जाएगी? बल्कि बेहतर होता कि भाजपा ने आंबेडकर की इस अहम सलाह पर गौर किया होता कि राजनीति में अपने कद से बड़े बना दिए गए नेता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं.

    राम के नाम  सौगंध अब भीम के नाम।

    जेएनयू मिशन पूरा हो गया,जयभीम के साथ नत्थी कामरेड को अलविदा है।

    रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के बाद देशभर के छात्रयुवा जैसे जाति धर्म की दीवारें तोड़कर जाति उन्मूलन के मिशन के साथ मनुस्मृति दहन कर रहे थे,उसका मूल मंत्र जयभीम कामरेड है।

    मीडिया ने नोटबंदी के पचास दिन पूरे होते न होते जेएनयू के बारह बहुजन छात्रों के निलंबन की खबर को ब्लैकआउट करके संघ परिवार के मिशन को कामयाब बनाने में भारी योगदान किया है।

    पिछली दफा भी कन्हैया के भूमिहार होने के सवाल पर बवाल खूब मचा था।

    इस बार बहुजन छात्रों के निलंबन के खिलाफ सवर्ण कामरेडों की खामोशी का नतीजा यह है कि छात्रों युवाओं के मध्य भी अब जाति धर्म की असंख्य दीवारें इस एक कार्रवाई के तहत बना दी गयी है।

    गौर करें कि कैशलैस डिजिटल इंडिया के वृंदगान के साथ संघ परिवार की तरफ से  नया साल अब जयभीम जयभीम  है।गोलवलकर सावरकर मुखर्जी का कहीं नाम नहीं है।यह सीधी सी बात बहुजनों की समझ से परे हैं और चाहते हैं नीली क्रांति।

    पेटीएम के बाद अब रुपै की महिमा अपरंपार है।गौरतलब है कि बाबासाहेब के नाम कैशलैस डिजिटल लेनदेल का इनामी ड्रा के लिए अनिवार्य शर्त अब रुपै है।

    नोटबंदी से पहले भारी पैमाने पर रुपै कार्ड का पिन चुराया गया था।

    इस फर्जीवाड़ा का अभीतक कोई सुराग मिला नहीं है।

    अब इनाम के लिए रुपै कार्ड की अनिवार्यता साइबर फ्राड का जोखिम उठाने का खुला न्यौता है।

    पहले डिजिटल लेन देन पर छूट के ऐलान के बाद एफएमकारपोरेट ने साफ किया कि छूट डेबिट कार्ड पर मिलेगा,क्रेडिट कार्ड पर नहीं।

    अब कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 'लकी ग्राहक योजना'और 'डिजि धन व्यापार योजना'लॉन्च की हैं। केंद्र की पुरस्कार योजनाएं 25 दिसंबर से शुरू हैं। ये 14 अप्रैल तक चलेंगी। हर हफ्ते सात हजार ग्राहक और कारोबारियों को पुरस्कार मिलेगा।

    गौरतलब है कि  50 से 3000 रुपए तक की पेमेंट ही लकी ड्रॉ में शामिल होंगी। 3 हजार से ज्यादा के भुगतान इससे बाहर हैं।

    गौरतलब है कि  प्राइवेट कार्ड या वॉलेट के भुगतान भी बाहर हैं।

    अब साफ किया गया है कि रुपै अनिवार्य है और  सिर्फ यूपीआई, यूएसएसडी, आधार बेस्ड पेमेंट व रुपै कार्ड से होने वाला भुगतान ही लकी ड्रॉ में शामिल होगा।

    मोबाइल लेनदेन के जिन तरीकों पर सबसे ज्यादा जोर है,वे इस प्रकार हैंः यूपीआई : यूपीआई एनईएफटी या आईएमपीएस ट्रांसफर से अलग है। इसके जरिए किसी भी बैंक खाते से किसी अन्य बैंक खाते में मोबाइल से तुरंत पैसे भेजे जा सकते हैं।

    यूएसएसडी : साधारण मोबाइल से बैंकिंग के लिए सरकार ने यूएसएसडी बैंकिंग नाम से एक नई सुविधा शुरू की है। यह बैंकिंग सुविधा मोबाइल फ़ोन में *99# डायल करके प्रयोग की जाती है। अंग्रेजी के अलावा हिंदी समेत 10 क्षेत्रीय भाषाओं में बैंकिंग कर सकते हैं।

    आधार बेस्ड पेमेंट : आपका आधार कार्ड आपके लिए एटीएम की तरह काम करेगा। इसके लिए आधार माइक्रो एटीएम लगाए जाएंगे। इस आधार माइक्रो एटीएम से आप पैसे निकाल सकते हैं। इसके लिए आपके पास बस आधार कार्ड होना चाहिए और कार्ड का नंबर आपके बैंक खाते के साथ जुड़ा होना चाहिए। अब आपको पैसे निकालने या ट्रांसफर करने के लिए पास के किसी आधार माइक्रो एटीएम पर जाना होगा।

    डिजि-धन मेला में पहुंचे पीएम अपने विरोधियों पर भी खूब बरसे। प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा है कि 2 साल पहले सिर्फ गए की बात होती थी लेकिन अब आने की बात होती है। पहले खबरें होती थीं कितना गया लेकिन अब खबरें है कितना आया।

    लोगों की पीएम से उम्मीद है कि बेनामी संपत्ति वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए, इतनी तकलीफ के बाद अब आने वाले दिनों में क्या टैक्स बेनिफिट मिलेगा पीएम इस पर बताएं। हायर एजुकेशन पर टैक्स बहुत ज्यादा है उसे कम किया जाए।  मोदीजी करंट अकाउंट पर 50 हजार की लिमिट को बढ़ाये। महंगाई पर नियंत्रम किया जाए। सर्विस टैक्स कम हो जीएसटी को जल्दी लागू हो। इनकम टैक्स की लिमिट 2.5 लाख से बढ़ाकर 5 लाख की जाए।

    उधर नोटबंदी के 50 दिन पूरे होने पर आज कांग्रेस ने सरकार पर हमला बोला। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरमने कहा कि नोटबंदी पूरी तरह नाकाम रही है और सरकार ने बिना कुछ सोचे समझे इस फैसले को लिया। उन्होंने ये भी कहा कि सिर्फ वक्त ही बताएगा कि जनता सरकार के इस कदम से कितना खुश है।






    डिजिटल हो जाओ।गुलामी दांव पर है तो गुलामगिरि का का होय?

    ओकर तो बावन इंच मोट सीना है।कांधा मोठा मजबूतै होय।अब बटाटा सस्ता हो कि महंगा हो कांदा,उस कांधे पर देश का बोझ है।जनता गउ ह।अर्थव्यवस्था कोल्ही का बैल।सांसद का है ,आप ही बोलो।उसकी लाठी,उसका माडिया।चूंचा किये बिना गुलामगिरि की सोच भइये।

    जनता बागी हो जाई तो गलामगिरि को बड़का खतरा।

    आधार का विरोध कोय ना करै जो डिजिटल आधार का फर्जीवाड़ा होवै।सूअरबाड़ा जिंदाबान।गुलामगिरि जिंदाबान।हिंदू राष्ट्र मा हिंदुत्व से आजादी कौन मांगे?

    पलाश विश्वास

    विरासत में गुलामी मिली है हजारोंहजार बरस की।यही गुलामी आखेर पूंजी है भारत के कैशलैस डिजिटल आम नागरिकों की।हालात लेकिन तेजी से बदलने लगे हैं।मालिकान ने खुदै गुलामी की पूंजी में पलीता लगा दिया है।पण होइहें वहींच जो राम रचि राखा।गुलामी बदस्तूर जारी है।जातपांत मजहब का कारोबार और आम जनता के बीच बंटवारा की सरहदें बदस्तूर सही सलामत है।गुलामगिरि सही सलामत है। इस गुलामी से छुटाकार किसे चाहिए,आजादी से आम जनता को भारी खौफ है।कहीं सचमुचै आजाद हो गयो तो गुलामगिरि का होगा?मनुस्मृति विधान के तहत गुलामी की सीढ़ी पकड़कर रोये हैं कि नया साल लाखो बरीस आवै,चाहे जावै जान भली, गुलामगिरि कबहुं ना जाये।कुलो किस्सा यहींंच है।मजहब यही है।सियासत भी यहींच।

    बहुजनों में सबसे भारी ओबीसी।देश की आधी आबादी ओबीसी।देश की,सूबों की  सत्ता में ओबीसी।ढोर डंगरों की गिनती हुई रहै हैं,ओबीसी की गिनती कबहुं न होई।

    मलाईदारों को चुन चुनकर राबड़ी बांटि रहे।आम ओबीसी किस्मत को रोवै हैं।कहत रहे बवाल धमाल मचाइके पुरजोर।कोटाभी फिक्स कर दियो।बलि।मंडल लागू कर दियो।मंडल ना मिलल।घंटा मिलल।मंडल समरस भयो।ओबीसी बजरंगी भाईजान। महात्मा फूले माता साबित्रीबाई का नाम जाप।अंबेडकर नाम जाप।धर्मदीक्षा भी हुई रहै नमो नमो बुद्धाय।गुलामगिरि की आदत ना छूटै।चादर दागी बा।फिर मिलल उ बंपर लाटरी का करोड़पति ख्वाब।वानरसेना को मिलल भीम ऐप।गुलामगिरि सलामत है।

    यूपी जीतने को नोटबंदी फेल।पण ओबीसी कुनबे में मूसल पर्व जारी है।कभी महाभारत है तो रामायण कभी,कभी कैकयी का किस्सा।टीवी का फोकस वहींच।

    जेएनयू के बारह छात्र निलंबित,खबर नइखे।नजीब कहां गइलन,खबर नइखै।जयभीम कामरेड गायब।रोहित वेमुला के तस्वीरो गायब।पलछिन पलछिन नयका नयका तमाशा।जूतम पैजार हुई रहा,पण थप्पड़वा अभी मारिहें कि तबहुं मारिहें।मारिबे जरुर।कबहुं तो मारबो।टीआरपी आसमान चूमै।फोकस वहींच।

    नोटबंदी पर चर्चा उर्चा अब मंकी बातें।ओकर खूंटूी मा बंधा गउमाता रिजर्वबैंकवा।घर की मुर्गी भारतमाता वंदेमातरम।जब चाहे सर्जिकल स्ट्राइक।माइका लाल होवै जो सिडिशन मुठभेड़ छापे जांच के मुकाबले अंगद बन जाई।जब चाहै तब नियम कायदा कानून बदले देवै।गवर्नर ववर्नर एफएमवा कौन खेती की मूली?कारसेवा जारी बा।राम की सौगंध मंदिर वहींच बनावेक चाहि।जयभीम।गुलामगिरि सलामत।

    बेशर्म गुलाम लोग का उखाड़ लीन्हे?

    कबंधों का चेहरा नइखै,जान कौन फूकैं?

    संसद को बायपास करके सुधार लागू होई रहा।

    आधार भी लागू होई गयो सुप्रीम कोर्ट की ऐसी तैसी करके।

    सियासत को ऐतराज नाही,जिसको ठेके पर देश है।काहे को सरदर्द?

    हम अमेरिका बनै चाहै।ट्रंप ग्लबोल हिंदुत्व का भाग्य विधाता।

    वहींच ट्रंपवा आज कहि रहे कंप्यूटर पर कोई भरोसा नइखे।सब हैक होवै रहे।कोई कंप्यूटर सेफ नाही।वे कहि रहे के कूरियर से चिठी भेजेक चाहि।ईमेलवा भी डेंजरस हो गइल।डिजिटल अमेरिका अनसेफ हो गइल।डिजिटल इंडिया शाइनिंग शाइनिंग।रुपै कार्ड से सबसे जियादा फर्जीवाड़े।अबहुं तीन करोड़ किसान के मत्थे रुपै।डिजिटल हो जाओ फिन चाहे थोक खुदकशी कर लो।बाबासाहेब ऐप है।डिजिटल हो जाओ।

    सियासतबाज तमाम संसद मा खामोश वेतन भत्ता विदेश यात्राम में मशगुल।भौत खूब रहा कि उ संसद को गोली मारकर हिंदू ह्रदय सम्राट रेल बजट के जइसन बजट का भी काम तमामो कर दियो।पढ़े लिखे टैक्स छूट के अलावा बजट न समझें।टैक्स छूट नाही।पण बाकी बजट दिसंबर मा एडवांस होई गयो।

    शर्म अगर सांसदों को होती तो संसद संविधान की रोज रोज हत्या के बाद इस्तीफा दे रहे होते।शिकन तक ना।फ्री मार्केटवा मा सांसद सभै मस्त मस्त।

    ओकर तो बावन इंच मोट सीना है।कांधा मोठा मजबूतै होय।अब बटाटा सस्ता हो कि महंगा हो कांदा,उस कांधे पर देश का बोझ है।जनता गउ ह।अर्थव्यवस्था कोल्ही का बैल।सांसद का है ,आप ही बोलो।उसकी लाठी,उसका माडिया।चूंचा किये बिना गुलामगिरि की सोच भइये।जनता बागी हो जाई तो गलामगिरि को बड़का खतरा।

    आधार का विरोध कोय ना करै जो डिजिटल आधार का फर्जीवाड़ा होवै।सूअरबाड़ा जिंदाबान।गुलामगिरि जिंदाबान।हिंदू राष्ट्र मा हिंदुतव से आजादी कौन मांगे?

    युवराज नयका साल का जश्न मानवै रहै।बाकीर क्षत्रप सिपाहसालार सूबों की जंग मा बिजी होवै।बेशी तो रंगबिरंगे छापों से हैरान परेशान खामोश।

    लखनऊ का दंगल नोटबंदी से सबसे बड़का राहत बा।बाकी देश मा अमंगल,यूपी लखनऊ मा मंगल ही मंगल।अमंगल मंगल।कैश भले  ना मिलल इंडिया डिजिटल बा।अंगूठा छाप दियो तो छप्पर फाड़कै सुनहले दिन बरसै।गुलामगिरि सही सलामत बा।फिर गमछा पहिनो के लुंगी पीन्दे,कि नंगा नाचै बीच बाजार,गुलामी सलामत बा।

    टीवी शो फिर सास बहू संग्राम है।रियेलिटी शो जब्बर।बिग बास फेल है तो नोटबंदी फेलके जवाब ह ई रियलिटी शो।सबसे बड़ा शो।हजारोंहजार ऐंकर चीखै रहे ब्रेंकिंग न्यूज।बहुजन समाज ब्रेकिंग हो।ओबीसी आपसै मा सर फुटाव्वल मा बिजी।

    दशरथ और राम वनवास तो फिर दशरथै को ही वनवास। का ट्विस्ट है स्टोरी मा धकाधक।उ निकार दियो।फिन रातोंरात वापल बुला भी लिया।खुदै निकल गये तो फिर निकार दियो। शकुनी मामा विदेश मा।सौतेली मां कैकई।बहुओं के बीच बाल नोचेंकै दंगल।टीपू और औरंगजेब को बख्शे नहीं ससुरे।गुलामी सलामत बा।

    बाबासाबहेब अब भीम ऐप हैं जयभीम माइनस कामरेड।

    सत्ता में साझेदारी खातिर,समता नियाय खातिर दलित मुसलमान वोटों पर दांव लगाये बैठे हैं।समरस नजारा है।फिन घड़ी घड़ी नोटों की वर्षा।केसरिया हुईू गयो सारी मोटर साईकिलें  साइकिलें।ट्रको भयो बजरंगी।बुरबकई की हद है।गुलामगिरि।

    रामायण महाभारत या मुगलई किस्सा जो भी हो,बहुजनों में जोर मारकाट मची है और यूपी जीतने का रास्ता बजरंगी ब्रिगेड के लिए साफ करने की अंधी बजरंगी वानर दौड़ है कि कहीं यूपी में ससुरा हिंदुत्व का विजय रथ विकास यात्रा  थम गयो तो हिंदुत्व के नर्क से जिनगी को निजात मिलने की कोई सूरत बन गयी तो प्यारी प्यारी गुलामगिरि दांव पर।फिर अंधेरे के कारोबार का होई।सही सलामत रहे गुलामगिरि।

    जाहिर है कि बहुजनों को आजादी न भावै।फिलहालओबासी दंगल भौते भावै।उससे ज्यादा भावै गुलामगिरि कि आजादी से बड़ा डर लागे।रोशनी से भी डरै हो।

    नयका साल का जश्न बड़जोर रहा।पुरनका बोतलवा मा नयकी शराब परोस दियो वहींच मिनि बजट।वहींच सोशल स्कीम खातिर सरकारी खर्च की संजीवनी।

    क्योंकि अर्थव्यवस्था को चूना लगा दियो है।नकदी बिना बाजर ठप बा।विकास दर घटि चली जाये।रुपया धड़ाम।रुपया गायब।छूमंतर।फिर भी बेस्टइवर कारपोरेय वकीलवा दहाड़ रहि हैं कि इंफ्लेशनवा कंट्रोल में है।खेती मानसून की किरपा पर बशर्ते कुछ बोया भी हो।बिजनेस भगवान भरोसे।उद्योगों का बंटाधार।उत्पादन गिरता जाये।बरेली के बाजार मा झूमका गिरल हो डिजिटल हो जाओ।सबको मिल जाई।डाके की सोचो मत।बचा का है जो लूट लिबो।बची गुलामगिरि है।जाको राखे साइयां,खत्म ना होवै।कसर बाकी न रहे,महाजनी सभ्यता में अब डिजिटल अंगूठा छाप हो जाओ।

    मेहनकशों के हाथ काट दिये।बजरंगी बनियों की थाली में कर्ज परोस दियो।

    बलि सूद घटि गयो रे।कारोबार काम धंधा चौपट।रोजगार कामधंधे चौपट। नौकरियों की छंटनी।जिनगी चटनी।भुखमरी की नौबत इधर तो उधर मंदी है।इनकम हैइइच नको।जमा पूंजी छिन लियो।बाजार से बेदखली के बाद अबहिं करज बढ़ाने और सूद घटाने का ख्वाबे बेचे बेशर्म सौदागर।गुलामगिरि सलामत चाहे कमामत आ जाये।

    सौदागर भी दस दफा सोचे हैं।पुरनका माल नयका कहिकर गाहक फंसाने से पहले दस बार सोचे हैं।ई सौदागर अवतार ह।कल्कि अवतार ह।छप्पन इंच सीना।

    सीनियर सिटिजनवा को ब्याज दर पहले सो जो था,वहींच है,मियां बीवी का खाता अलगे करके चूरण बांट दियो।

    खाद्य के अधिकार में महिलाओं को पहिले से छह हजार मिलत रहे और शहरी ग्रामीण विकास परियोजनाओं में घर बनाने के लिए छूट पहिले से जारी है।

    बैंकवा से ब्याज दरों में कटौती दिवालिया बैंकों के बच निकलने की जुगत है।डिजिटल विजिटल मा टैक्स भी लागू। कैश लिमिट वही 24 हजार।एटीएम खलास।

    इस पर तुर्रा सब्सिडी की गैस का दाम भी बढ़ा दियो है।

    पेट्रोल डीजल बिजली भाड़ा किराया फीस सब लगातार बढ़ोतरी पर।

    अनाज दाल तेल से लेकर मांस मछली दूध शिक्षा चिकित्सा में जो भुगतान करना पड़ै,उस खातिर ना नोट मिलल,ना पचास दिनों की तपस्या के बाद कालाधन कहीं ससुरा निकलता दीख रहा है।

    सजा भुगतने का संकल्प पानी में है।बार बार वायदा से मुकरना कहानी है।

    ख्वाबों की फूलझड़ी पुरानी योजनाओं के परवचन में खिलखिलाये दियो।

    सियासतबाज बल्लियों उछले हैं।सोना उछला,बाजार उछले हैं।

    आम लोग उन सबसे कहीं जियादो उछलो है।केसरिया केसरिया बोलो।

    सबसे जियादा ओबीसी बहुजन उछले हैं कि गुलामगिरि सौ टका सही सलामत।

    सुनहले दिन आये गरयो रे।नया साल मुबारक हो।बदल दो वंदेमातरम,हिंदुत्व का नया नारा हैःडिजिटल होजाओ।गुलामी दांव पर है तो गुलामगिरि का का होय?



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    নৈরাজ্যের পরিকল্পনা ও শিখণ্ডী মোদিঃSaradendu Uddipan writes on his FB wall
     বিজেপি এবং তার মাতৃ সংগঠন আরএসএস এর প্রত্যক্ষ মদতে এমএম কালবুর্গী হত্যা, অসহিষ্ণুতার কারণে শিল্পী সাহিত্যিকদের রাষ্ট্রীয় সম্মান ফেরত, রোহিত ভেমুলা হত্যা, রামজাদা-হারামজাদা ইস্যু, ইউনিভার্সিটিগুলির মধ্যে ভাগুয়া সন্ত্রাস, দুর্গা-মহিষাসুর দ্বৈরথ, গোমাতা, গোমূত্র, গোমাংস রাজনীতির কারণে একলাখ হত্যা এর প্রত্যেকটি ষড়যন্ত্রই রচিত হয়েছিল রাষ্ট্রকে চরম নৈরাজ্যের পথে ঠেলে দেবার জন্য। ব্রাহ্মন্যবাদ এই নৈরাজ্যের আবহাওয়াতেই ভাগুয়া সন্ত্রাসের উত্থান চাইছিল। আশার কথা যে এই ষড়যন্ত্রের প্রত্যেকটি ক্ষেত্রেই অসভ্য, বর্বর এই ভাগুয়া সন্ত্রাসীরা পর্যুদস্ত হয়েছে। ভারতের জাগ্রত জনগণের সংগঠিত প্রতিবাদে বিষদাঁত ভেঙ্গে গেছে এই দেশদ্রোহীদের। ভারতবর্ষের মধ্যে নৈরাজ্য এবং বিশৃঙ্খল পরিবেশ তৈরি করার কোন ত্রুটি রাখেনি এই বর্বর শক্তি। শিল্পী, সাহিত্যিক, সংখ্যালঘু, নারী, শিশু কাউকে রেয়াত করেনি এই নরপিশাচের দল। সন্ত্রাস সৃষ্টি করার জন্য ব্যবহার করেছে ধর্মাধর্ম, জাতপাত, দেশপ্রেমী-দেশদ্রোহী, ধর্ষণ, খুন, দাঙ্গা প্রভৃতি কৌশল। এই ভাবে একটু একটু করে ভারতবর্ষের মানুষকে বিভাজিত করে আক্রমণ নামিয়ে এনেছে দলিত-বহুজন মানুষের উপর। ফেক এনকাউন্টারে গুলি করে মারা হয়েছে আদিবাসী মহিলা ও শিশুদের। সিধু-কানুর মূর্তি ভেঙ্গে ফেলা হয়েছে। ভেঙ্গে ফেলা হয়েছে বাবা সাহেব বি আর আম্বেদকরের দাদারের ঐতিহাসিক বাড়ি। আর এই ক্ষেত্রেও লক্ষ লক্ষ মানুষ দলমত নির্বিশেষে, ধর্মাধর্মের বিভেদ ভুলে প্রতিবাদে সামিল হয়ে গুড়িয়ে দিয়েছে ব্রাহ্মন্যবাদীদের সমস্ত অপকৌশল। 
    ব্রাহ্মন্যবাদীদের ষড়যন্ত্রের নক্কার জনক অধ্যায় ছিল গুজরাটের উনা। দেশজুড়ে চলছিল গোমাতার সন্তানদের সন্ত্রাস। যে ভাবে নিরীহ চর্মকারদের উপর প্রকাশ্যে পুলিশের মদতে নির্যাতন চালানো হয়েছিল তা হিটলারের নাৎসি বাহিনীকেও লজ্জা দিতে পারে। হ্যা ভারতের সচেতন মানুষ এ ক্ষেত্রেও গর্জে উঠেছিল দীপ্ত প্রতিবাদে। দলিত-বহুজনের সম্মিলিত প্রতিবাদে পদত্যাগ করতে বাধ্য হয়েছিল গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রী। আর এইখানেই অশনি সংকেত দেখতে পেয়েছিল ব্রাহ্মন্যবাদী বর্বর রেজিমেন্ট। ওরা বুঝতে পেরেছিল বঙ্গোপসাগর থেকে আরবসাগর জুড়ে শুরু হয়েছে এক প্রবল নীল ঘূর্ণি ঝড়। তার আবহ সংবাদ ছড়িয়ে পড়ছে দিকে দিকে। দলিত-বহুজন সমাজকে এক সংহতির মঞ্চে এনে আগামী নির্বাচনগুলিতে এই ঘূর্ণি ঝড় গোটা ভারতবর্ষে আছড়ে পড়বে। চুরমার করে দেবে ব্রাহ্মন্যবাদী বিষবৃক্ষ। তাই দেরি না করে দেশের মানুষকে অর্থনৈতিক ভাবে পঙ্গু করে দেবার মরণ কামড় দিল ব্রাহ্মন্যবাদ।

    মোদির এই নোটবন্দী এবং ভারতীয় খাজানা লুট সন্ত্রাস এবং নৈরাজ্য সৃষ্টির শেষ এপিসোড। তিনি আদানী, আম্বানী, বিজয় মাল্য, লোলিত মোদি, রামদেব, আশারাম, রবিশঙ্করদের মত ডিফল্টার এবং বড় চোরদের টাকা মুকুব করার জন্য জনগণের টাকা লুট করে রিজার্ভ ব্যাঙ্কে জমা করার ফন্দী আটলেন। অর্থনৈতিক অবরোধ করে দিলেন মানুষে উপর। তিনি চেয়েছিলেন মানুষ এই অবরোধের ফলে উশৃঙ্খল হয়ে উঠুক। দাঙ্গা, হাগামা, সন্ত্রাসের মধ্যে জড়িয়ে পড়ুক। বাজার লুট হোক, ব্যাঙ্ক লুট হোক, আগুন জ্বলুক। সেই অজুহাতে দেশে নেমে আসুক পরিকল্পিত নৈরাজ্য। আর এই নৈরাজ্যের মধ্যে উঠে আসুক মিলিটারী অভ্যুত্থান। মিলিটারী শাসন। সেই মত তিনি ভারতীয় সেনাদের প্রস্তুতও রেখেছিলেন। তিনজন পদাধিকারীকে ডিঙ্গিয়ে তার পছন্দের মানুষকে তুলে এনেছিলেন সেনা প্রধান হিসেবে।

    আমরা অত্যন্ত গর্বিত যে, দেশের জাগ্রত বিবেক সম্পন্ন মানুষ মোদির ও তার দলের এই প্ররোচনায় পা না দিয়ে অসীম ধৈর্যের পরিচয় সাথে বর্বর ব্রাহ্মন্যবাদীদের রাষ্ট্রীয় সন্ত্রাসের পরিকল্পনাকে একেবারে নস্যাৎ করে দিয়েছেন। নিজেদের জীবনের মূল্যে তুলে ধরেছেন ভারতবর্ষের ত্যাগ, তিতিক্ষা ও সহনশীলতার বানী।

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    Recently I have traslated BUXA DUARER Bagh in Hindi.The book deal with Aborigin humanity and their day to day struggle for survival.Excellent experience.He was honoured in Behala Book Fair on new year eve in Dada`s mohalla but I could not join him because Sabita Bau was performing in Loksanskriti Bhava with Jagarani students and teacher Lipi Di.Rabindra Sangeet specialistDr.Kumar Chattopadhayay and Vishwanth Sur,the classical master were present at the occasion.Sabita publicly perfomed solo firs time.
    It was a superb evening to see more than twenty children and Young girls performing so well.Thanks Lipidi.
    Col.Lahiri with Pushpraj landed home at New Year morning.We spent nice day together.If publishers support,I would like to translate all good works in Hindi,Bengali and English.Other prominent works by COL.Lahiri are Excellent study on Netaji,Short story collection one and two,Military o anyano galpo,Duto Hasir Natak,a novel on army life,Agnipurush.I would like to introduce Col.Lahiri to Hindi dunia.
    Dhulagarh is dragged in Communal riot for politics.My office Express Bhavan is situated there.I added a snap on Shabe Barat celebration on Dulahargh Majar.It isshocking for me that the peace hub has been boiled by politics.
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    मजहबी सियासत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट,फिरभी यूपी में हिंदुत्व का पुनरूत्थान?

    सुप्रीम कोर्ट हिंदुत्व को धर्म नहीं मानता,संघ परिवार के खुल्ला खेल फर्रूखाबादी जारी रखने से कौन रोकेगा?

    सीधा मतलब है कि देश राष्ट्रद्रोही है क्योंकि देश को राष्ट्र कुचल रौंद रहा है।

    https://www.youtube.com/watch?v=CPFq3qiteig


    पलाश विश्वास

    अब शायद मान लेना होगा कि यूपी में चौदह साल का वनवास खत्म करके रामराज्य की स्थापना के मकसद से नोटबंदी का सर्जिकल स्ट्राइक कामयाब है।

    यदुवंश के मूसलपर्व ने इस असंभव को संभव करने का समां बांधा है और अब यूपी में हिंदुत्व के पुनरूत्थान का दावा खुल्लमखुल्ला है।नोटबंदी का कार्यक्रम से लेकर डिजिटल कैशलैस कारपोरेट अश्वमेध अभियान का मकसद यूपी में रामराज्य है,यही नोटबंदी का सीक्रेट है।इसलिए रामवाण का लक्ष्य निशाने पर लगा है,यह मान लेने में हकीकत का सामना करना आसान होगा।बाकी देश में नकदी संकट और यूपी में नोटों की बरसात से यह साफ हो गया था कि कालाधन निकालना मकसद नहीं है,निशाने पर यूपी है।जब कालाधन निकालना मकसद नहीं है तो किसीसे क्यों उसके रिजल्ट का ब्यौरा मांग रहे हैं।नतीजा देखना है तो यूपी को देखिये।

    हालांकि लखनऊ रैली के दिन ही सुप्रीम कोर्ट ने मजहबी सियासत को गलत बताया है।सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक पीठ ने एक अहम फैसले में आज कहा कि प्रत्याशी या उसके समर्थकों के धर्म, जाति, समुदाय, भाषा के नाम पर वोट मांगना गैरकानूनी है। चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है। इस आधार पर वोट मांगना संविधान की भावना के खिलाफ है। जन प्रतिनिधियों को भी अपने कामकाज धर्मनिरपेक्ष आधार पर ही करने चाहिए। आने वाले पांच राज्‍यों में इसका असर होने की संभावना है।

    क्या असर होना है?

    क्या सुप्रीम कोर्ट धर्म की राजनीति पर रोक लगा सकता है?

    क्या सुप्रीम कोर्ट संघ परिवार और भाजपा पर रोक लगा सकता है?

    इसका सीधा जवाब नहीं है क्योंकि हिंदुत्व को धर्म मानने से सुप्रीम कोर्ट ने साफ इंकार कर दिया है,इसलिए हिंदुत्व के ग्लोबल एजंडे पर रोक लगने की कोई आशंका नहीं है।सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने एक बार फिर साफ किया कि वह हिंदुत्व के मामले में दिए गए 1995 के फैसले को दोबारा एग्जामिन नहीं करने जा रहे। 1995 के दिसंबर में जस्टिस जेएस वर्मा की बेंच ने फैसला दिया था कि हिंदुत्व शब्द भारतीय लोगों की जीवन शैली की ओर इंगित करता है। हिंदुत्व शब्द को सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता।इसका सीधा मतलब यह है जब हिंदुत्व धर्म नहीं है,तो उसपर रोक लग नहीं सकती और संघ परिवार का खुल्ला खेल फर्रूखाबादी जारी रहने वाला है।

    यह नोटबंदी का सर्जिकल स्ट्राइक भी  संघ परिवार का खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है। उसका स्वदेश और उसका धर्म दोनों फर्जी हैं जैसे उसका राष्ट्रवाद देशद्रोही है।

    इस बीच नोटबंदी के बारे में आरटीआई सवाल के जवाब में रिजर्व बैंक ने नोटबंदी से पहले वित्तमंत्री या भारत सरकार के मुख्य सलाहकारों से विचार विमर्श हुआ है कि नहीं,राष्ट्रहित के मद्देनजर गोपनीय जानकारी बताते हुए जवाब देने से इंकार कर दिया है।वित्त मंत्री या मुख्य आर्थिक सलाहकार से विचार विमर्श वित्तीय प्रबंधन और नोटबंदी के मामले में करने का खुलासा राष्ट्रहित के खिलाफ क्यों है,यह सवाल बेमतलब है।कुल मतलब यह है कि वित्तमंत्री और मुख्य आर्थिक सलाहकार को अंधेरे में रखकर ही राष्ट्रहित में यह सर्जिकल स्ट्राइक है।यह संघ परिवार का हितों का हिंदुत्व राष्ट्रवाद है।मकसद यूपी जीतकर मनुस्मृति शासन और नस्ली नरसंहार है।गौरतलब है कि रिजर्व बैंक ने किन लोगों के परामर्श से नोटबंदी के फैसले को अंजाम दिया गया है,इसका भी जवाब देने से  राष्ट्रहित के मद्देनजर साफ इंकार कर दिया है।

    सीधा मतलब है कि देश राष्ट्रद्रोही है क्योंकि देश को राष्ट्र कुचल रौंद रहा है।


    'मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ, वे कहते हैं इंदिरा हटाओ'—इंदिरा गांधी, 1971

    नतीजा आपातकाल।

    'मोदी कहता है काला धन हटाओ, वे कहते हैं मोदी हटाओ'—नरेंद्र मोदी 2017 लखनऊ

    नतीजा? इतिहास की पुनरावृत्ति कारपोरेट हिंदुत्व का नस्ली नरसंहार।

    नागरिक जब नहीं होते तो सिर्फ राष्ट्र होता है और राष्ट्र का अंध राष्ट्रवाद होता है,उसका सैन्यतंत्र होता है और नतीजा वही निरंकुश फासिज्म।

    देश का मतलब हवा माटी कायनात में रची बसी मनुष्यता है और राष्ट्र का मतलब संगठित सत्ता वर्ग का संगठित सैन्य तंत्र जिसे सचेत नागरिक लोकतंत्र बनाये रखते हैं।नागरिक न हुए तो राष्ट्र का चरित्र निरंकुश सैन्यतंत्र है और नतीजा नस्ली नरसंहार।नागरिकों की संप्रभुता के बिना यह कारपोरेट राष्ट्र नरसंहार गिलोटिन है।

    देश और राष्ट्र एक नहीं है।

    देश मतलब स्वदेश है,जो जनपदों का समूह है और राष्ट्र का मायने अबाध पूंजी प्रवाह है।कंपनीराज है।जिसमें नागरिक शहरी और महानगरीय है,जनपद हाशिये पर।जल जंगल जमीन हवा पानी माटी की जड़ों से कटे हुए नागरिक समाज का कैशलैस डिजिटल राष्ट्र है यह,जिसकी प्लास्टिक क्रयक्षमता अंतहीन है और क्रय शक्तिहीन,जल जंगल जमीन खेत खलिहान से बेदखल गांव देहात,पहाड़ और समुंदर,द्वीप और मरुस्तल और रण, अपढ़ अधपढ़ जनपदों की इस उपभोक्ता बाजार में तब्दील राष्ट्र को कोई परवाह नहीं है।

    गांवों जनपदों के रोने हंसने चीखने पर निषेधाज्ञा है।उसके लोक पर कर्फ्यू है।उसके हकहकूक के खात्मे के लिए निरंकुश अशवमेध सैन्य अभियान राष्ट्र का युद्धतंत्र है,जिसका महिमामंडन अध राष्ट्रवाद की असहिष्णुता की नरसंहार संस्कृति है,नस्ली सफाया अभियान है और उसका सियासती मजहब भी है।

    यही हिंदुत्व का कारपोरेट पुनरूत्थान है।कारपोरेट निजीकरण विनिवेश उदारीकरण ग्लीबकरण का ग्लोबल मनुस्मृति विधान है।

    हिंदुत्व का यह कारपोरेट पुनरूत्थान भारत अमेरिका इजराइल का त्रिभुज है।जो ग्लोबल हिंदुत्व का त्रिशुल कारपोरेट है और बाकी दुनिया के साथ महाभारत है तो घर के भीतर घर घर महाभारत है,जिसे हम रामायण साबित कर रहे हैं।

    यह परमाणु विध्वंस का हिरोशिमा नागासाकी राष्ट्र है,यह जनपदों का देश नहीं,स्मार्ट महानगरों,उपनगरों का शापिंग माल पूंजी उपनिवेश है।राष्ट्र नहीं,अनंत पूंजी बाजार है,पूंजी बाजार का निरंकुश सैन्यतंत्र है।जहां कोई चौपाल,पंचायत या घर है ही नहीं।परिवार नहीं है,समाज भी नहीं है। न परिवार है,न दांपत्य है,न रिश्ते नाते हैं और न लोक गीतों की कोई सुगंध है।सिर्फ प्रजाजनों के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक है।

    देश का मतलब उसका इतिहास,उसका लोक है,उसकी बोली उसकी मातृभाषा है और राष्ट्र का मतलब अकूत प्राकृतिक संसाधनों के लूटखसोट का भूगोल है।विज्ञापनों का जिंगल है।पूंजी महोत्सव का विकास है।अब वह राष्ट्र अर्थव्यवस्था की तरह शेयर बाजार है,जो खूंखार भालुओं और छुट्टा सांढों के हवाले है।

    बाजार का धर्मोन्माद अंधियारा का कारोबार,राष्ट्र का सैन्य तंत्र और निरंकुश राजकाज है।अंधियारे का कारोबार भाषा और संस्कृति है,विधा और माध्यम हैं। तो सत्यमेव जयते अब मिथ्यामेवजयते है।मिथ्या फासिज्म का रंगरेज चरित्र है जो कायनात को धोकर अपने रंग से रंग देता है।

    यही अब यूपी का समां है।कयामती फिजां है।सामाजिक बदलाव अब निरंकुश मनुस्मृति समरसता है और सामाजिक बदलाव का रंग भी केसरिया है।इसीका चरमोत्कर्ष यदुवंश का रामायण और महाभारत दोनों हैं।मुगलिया किस्सा भी वहींच।

    यूपी में जैसा कि दावा है,अब चौदह साल के बाद यदुवंश के मूसल पर्व के परिदृश्य में फिर शायद हिंदुत्व का पुनरूत्थान है।त्रेता के अवसान के बाद रिवर्सगियर में फिर सतजुग है।रघुवंश का राजकाज बहाल है।बहुजनों का कलजुग काम तमाम है।

    समाजवादियों और बहुजनों के आत्मघाती स्वजनवध महोत्सव की यह अनिवार्य परिणति है।सत्ता में साझेदारी में समता न्याय की मंजिल कहीं खो गयी है और नोटों की बरसात शुरु हो गयी है।नतीजा वही हिंदुत्व का पुनरूत्थान।

    राष्ट्र की नींव पूंजी है और देश का ताना बाना उत्पादन संबंधों की विरासत है।कृषि समाज के अवसान और पूंजीवाद के उत्थान के साथ राष्ट्र का जन्म पूंजी के हितों के मुताबिक हुआ औद्योगिक क्रांति के साथ।अंग्रेजों ने देश का बंटाधार करके हमें राष्ट्र का उपनिवेश सौंप दिया और वही हमारा हिंदू राष्ट्र है तो गुलामी विरासत है।

    भारत कभी राष्ट्र नहीं रहा है।भारत हमेशा देश रहा है।लोक में रचा बसा म्हारा देश।जहां की विरासत लोकतंत्र की रही है।सामंती उत्पादन प्रणाली में वह देश मरा नहीं और न वह लोक मरा कभी।जिसे महान हिंदुत्व का लोकतंत्र कहते अघाते नहीं लोग,वह दरअसल लोक में रचे बसे जनपदों का लोकतंत्र है।राष्ट्र ने जनपदों की हत्या कर दी तो लोकतंत्र का भी अवसान हो गया और अब सिर्फ निरंकुश हिंदू सैन्य राष्ट्र है।इसीलिए कालाधन निकालने नाम आम जनता पर आसमान से अग्निवर्षा पवित्र है।

    सामंती उत्पादन और शासन प्रणाली में भी हवा पानी माटी में रचा बसा रहा है देश और जब तक भारत कृषि प्रधान रहा है तब तक जिंदा रहा है यह देश।

    कृषि की हत्या के साथ देश की हत्या हो गयी।

    जल जंगल जमीन की हत्या हो गयी।

    हवा पानी माटी की हत्या हो गयी।

    अब हम निरंकुश राष्ट्र के प्रजाजन हैं।संगठित कारपोरेट सत्ता वर्ग का मुक्त आखेटगाह है यह आम प्रजाजनों के लिए पवित्र वधस्थल जो अब हिंदुत्व का कारपोरेट पुनरूत्थान है।निरंकुश मनुस्मृति शासन है। अवध की सरजमीं पर अब उसका जयगान है।यह धर्म भी नहीं है।धर्म का कारपोरेट इस्तेमाल है।यही मजहबी सियासत है।

    फासिज्म के राजकाज में भी राष्ट्र का एकाधिकारी नेतृत्व ईश्वर होता है।

    उस ईश्वर की मर्जी संविधान है।उसे किसी से सलाह लेने की जरुरत नहीं होती और न उसे कायदे कानून संविधान संसद की परवाह होती है।आम जनता की तो कतई नहीं।उसे अपने खास दरबार के खास लोगों के कारोबार का राष्ट्र बनाना होता है।

    ईश्वर के राष्ट्र में नागरिक नहीं होते,सिर्फ भक्तजन।स्वर्गवासी भक्तजन।

    ईश्वर को समर्पित कीड़े मकोड़े किसी राष्ट्र के नागरिक नहीं हो सकते।

    अंध राष्ट्रवादी भक्तजन।आत्ममुग्ध नरसिस के आत्मघाती भक्तजन।

    मित्रों,चार्ली चैपलिन की फिल्म द डिक्टेटर फिर एक बार देख लें।

    लिंक यह हैः

    Charlie Chaplin The Great Dictator 1940 Full Movie - YouTube

    the dictator charlie chaplin full movie के लिए वीडियो▶ 2:39:00

    https://www.youtube.com/watch?v=A7BvszFbHVs

    19/09/2016 - Nicholas Mitchell द्वारा अपलोड किया गया

    Charlie Chaplin The Great Dictator 1940 Full Movie ... O Grande Ditador [The Great Dictator ...

    साल के अंत में पुरानी शराब नये बोतल में पेश करने के बाद सुनहले दिनों का यह नजारा।साल के पहले ही दिन सरकार ने देश के लोगों को झटका दिया है। सरकार ने पेट्रोल के दामों में 1.29 रुपये और डीजल के दामों में 97 पैसे की बढ़ोत्तरी कर दी है। सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडर के दाम भी दो रुपये बढ़ाए गए हैं। यह सात महीने में एलपीजी कीमतों में आठवीं वृद्धि है। इसके अलावा विमान ईंधन (एटीएफ) के दामों में भी 8.6 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी की गई है।

    अंतरराष्ट्रीय पेट्रोलियम बाजार में तेजी के मद्देनजर घरेलू सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दाम में वृद्धि की घोषणा की। पेट्रोल की कीमत में पिछले एक महीने में यह तीसरी और डीजल में एक पखवाड़े में यह दूसरी वृद्धि है। खुदरा बिक्री मूल्यों में यह बढ़ोत्तरी आज मध्यरात्रि से लागू होगी।

    दिल्ली में वैट कर सहित पेट्रोल के खुदरा मूल्य में 1.66 रुपये और डीजल के मूल्य में 1.14 रुपये की वृद्धि होगी। दिल्ली में अब पेट्रोल की दर 70.60 रुपये और डीजल की 57.82 रुपये प्रति लीटर हो जाएगी। इससे पहले 17 दिसंबर को पेट्रोल की कीमत 2.21 रुपये और डीजल की कीमत 1.79 रुपये प्रति लीटर बढ़ायी गई थी। तब दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 68.94 रपये और डीजल की कीमत 56.68 रुपये प्रति लीटर हो गई थी।

    सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों के अनुसार इसी तरह सब्सिडी वाले 14.2 किलोग्राम के रसोई गैस सिलेंडर का दाम दो रुपये बढ़ाकर 432.71 से 434.71 रुपये किया गया है। यह जुलाई से रसोई गैस सिलेंडर कीमतों में आठवीं वृद्धि है। उस समय सरकर ने सब्सिडी को समाप्त करने के लिए सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम में हर महीने दो रुपये की बढ़ोतरी का फैसला किया था।




    राजनीतिक नोटबंदी का राजनीतिक आशय आर्थिक तबाही का नरसंहार!

    दीदी के अपराजेय किले पर सीबीआई हमला जारी तो त्रिपुरा के इकलौता वामकिले में भी भूकंप के झटके!

    मुलायम अखिलेश में सुलह की कोशिशें नाकाम!पानी पर वार,पानी दुधार!

    यूपी में हिंदुत्व पुनरूत्थान के बाद अब बंगाल का हिंदुत्वकरण नोटबंदी की ताजा फसल है।फासिज्म के राजकाज का राजनीतिक मोर्चा यूपी के यदुवंशी मूसलपर्व के बाद अब बंगाल,पूर्वी भारत का चिटफंड है।राहत कहां है?

    46 लाख करोड़ का टैक्स छूट कारपोरेट कंपनियों को देने वाले कंपनी राज ने सरकारी बैंकों का इस्तेमाल देशी विदेशी कंपनियों को अरबों खरबों की कर्ज देने और माफ करने में किया है।अर्थशास्त्री सुगत मार्जित ने आज आनंद बाजार पत्रिका के संपादकीय में दो टुक शब्दों में लिख दिया है कि अब बैंक हमारे खातों से हमारा सफेद धन बड़े कारोबारियों के कर्ज में देगा कम सूद पर,जिसे वे कभी नहीं लौटायेंगे।

    हाथी के दांत दिखाने के और ,खाने के और!

    पलाश विश्वास

    देश में अब स्त्रीकाल का कोई विकल्प नहीं है।माता सावित्री बाई फूले के जन्मदिन पर इस विकल्प पर खुले दिमाग से विचार करने की जरुरत है।स्त्री नेतृत्व के मौजूदा चेहरे अपनी साख खो रहे हैं,यह पितृसत्ता की मुक्तबाजारी जश्न है।बड़े पैमाने पर नये स्त्री नेतृत्व की सबसे ज्यादा जरुरत है और हम इस मुहिम में दिलोजान से जुड़े तो माता सावित्री बाई को यह सच्ची श्रद्धांजिल होगी पितृसत्ता तोड़कर।

    कैशलैस इंडिया के डिजिटल लेनदेन की ताजा चेतावनी यहै हि मशहूर फिल्म स्टार करीना कपूर का आईटी एकाउंट हैक  हो गया है।

    बंगाल में दीदी के अपराजेय किले पर सीबीआई हमला जारी तो त्रिपुरा के इकलौता वामकिले में भी भूकंप के झटके हैं।दो सांसदों की गिरप्तारी के बाद दीदी ने जवाबी गिरफ्तारी की धमकी दी है।फासिज्म के राजकाज का राजनीतिक मोर्चा यूपी के यदुवंशी मूसलपर्व के बाद अब बंगाल,पूर्वी भारत का चिटफंड है।राहत कहां है?

    इसी बीच राजनीतिक मोर्चे में सनसनी निरंकुश है।बलि समाजवादी पार्टी में सुलह की कोशिशें नाकाम हो गयी हैं!बाप बेटे मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच बैठक रही बेनतीजा रही है।पानी पर लाठी का वार कुछ ऐसा हुआ है कि पानी अलग तो धार अलग ,सभी बीच मंझधार। रामगोपाल यादव ने भी खूब  कहा है कि अब ना कोई सुलह, ना कोई समझौता होगा। फिलहाल मुलायम सिंह और शिवपाल यादव के बीच बैठक जारी है।

    राजनीतिक विकल्प फासिज्म के राजकाज का शून्य बटा दो है।यह सभसे भयंकर कयामती फिजां है।लोकंत्र का बेड़ा गर्क है।हर नागरिक कुंभकर्ण है।

    यदुवंश का रामायण महाभारत मुगलाई किस्सा थमने के आसार नहीं हैं।इस बीच समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल को लेकर दावेदारी भी जारी है। आज अखिलेश गुट की तरफ से रामगोपाल यादव ने साइकिल पर दावेदारी जताई। उन्होंने चुनाव आयोग से मुलाकात कर पार्टी का बहुमत साथ होने की बात कही। रामगोपाल यादव ने कहा कि असल समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव की है।

    इससे पहले कल मुलायम सिंह और शिवपाल यादव चुनाव आयोग गए थे और दावा किया था कि साइकिल चुनाव चिन्ह उनका है। हालांकि  अभी तक औपचारिक तौर पर समाजवादी पार्टी के बंटवारे का एलान नहीं हुआ है। हकीकत फिरभी यही है कि  अखिलेशवादी और मुलायमवादी दो साफ खेमे पार्टी में बन चुके हैं।

    भारत के रिजर्व बैंक,भारत के वित्तमंत्री और भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार को अंधेरे में रखकर संघ परिवार के बगुला छाप विशेषज्ञों की देखरेख में नोटबंदी का कसद कोई अर्थतंत्र में क्रांति का नहीं रही है,चक्रवर्ती महाराज की अधीनता से बाहर सूबों पर कब्जा करने का यह मास्टर प्लान है।

    नोटबंदी से कालाधन नहीं निकला या पचास दिनों के बावजूद नकदी संकट से मौतों का सिलसिला जारी है या लोगों को पूरा वेतन पूरा पेंशन अभी भी नहीं मिल रहा है या अर्थव्यवस्था को भारी धक्का लगा है या देश मंदी,भुखमरी और बेरोजगारी की आपदाओं से घिरा है,इन सबका न मोदी और न संघ परिवार से कोई लेना देना नहीं है।

    यूपी में हिंदुत्व पुनरूत्थान के बाद अब बंगाल का हिंदुत्वकरण नोटबंदी की ताजा फसल है।

    मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं।फिरभी रोज इस देश की अर्थव्यवस्था की धड़कनों को समझने की कोशिश में लगा रहता हूं क्योंकि इसी अर्थव्यवस्था में भारतीय जनता के जीवन मरण के बुनियादी सवालों के जबाव मिलते हैं और हम रोजाना उन्हीं सवालों के मुखातिब होते हैं।

    मसलन मीडिया में बैंकों के कर्ज पर ब्याज दरें घटाने को नोटबंदी की उपलब्धि बतौर पेश किया जा रहा है।दावा है कि इससे आम उपभोक्ताओं को ईएमआई में बड़ी राहत मिलने वाली है।कारपोरेट लोन में  अरबों खरबों ब्याज के मद में छूट की कोई खबर कहीं नहीं है।गौरतलब है कि पीएम नरेंद्र मोदी की नव वर्ष की पूर्व संध्या पर दिए गए भाषण के बाद बैंकों द्वारा लैंडिग रेट्स यानी कर्ज पर ब्याज दरें घटा दी हैं। देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने बेंचमार्क लैंङ्क्षडग रेट (एमसीएलआर) में 0.90 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की जो कि पहले 8.9 प्रतिशत थी। इसके बाद कई अन्य बैंकों ने अपने एमसीएलआर में कटौती का एलान किया।

    मसलन रेलवे के निजीकरण की मुहिम तेज है।रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने आज कहा है कि रेलवे की बेहतरी के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बड़े कैपिटल इंफ्यूजन का भरोसा दिलाया है। इसी पर बात करते हुए रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन विवेक सहाय ने कहा कि रेलवे में इंफ्रास्ट्रक्टर बढ़ाने के लिए निवेश की जरुरत है और उसमें काफी कदम उठाएं जा चुके है। लेकिन समस्या ये है कि फ्रेट ट्रैफिक(माल ढुलाई) में ग्रोथ नहीं आ रही है। बल्कि लक्ष्य से भी 45 मिलियन टन फ्रेट ट्रैफिक पिछे चल रहा है, तो इसको देखते हुए लगता है कि अर्निंग भी बजट से तो बहुत कम हो रही है। फ्रेट अर्निंग का ना बढ़ना सबसे ज्यादा चिंता का विषय है।

    मसलन आरबीआई ने ई-वॉलेट पेटीएम को पेमेंट बैंक बनाने की औपचारिक मंजूरी दे दी है। पेटीएम ने पिछले साल ही पेमेंट बैंक शुरू करने का एलान किया था। पेटीएम पेमेंट बैंक में ग्राहक का अकाउंट उसके पेटीएम वॉलेट से जुड़ा रहेगा जिसमें 14.5 फीसदी का इंटरेस्ट मिलेगा। पेटीएम ने कहा है कि कंपनी का मकसद हर भारतीय को बैंक की सहूलियत देना और टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के दम पर बैंकिंग की दुनिया में अपनी पैठ बनाना है। पेटीएम पेमेंट बैंक में विजय शेखर शर्मा का 51 फीसदी हिस्सा होगा।

    कैशलैस डिजिटल इंडिया में सर्विस टैक्स बैंक कमीशन वगैरह माफ करने की जो बात कही जा रही थी ,उसकी मियाद भी अब पूरी हो गयी है। नकदी की हदबंदी की वजह से बार बार एटीएम से पैसे निकालने में भी फीस भरनी होगी और लाटरी में जो करोड़पति बनेंगे,उनके अलावा बाकी लोगों को हर डिजिटल लेनदेन की कीमतभी चुकानी होगी।

    आधार पहचान से लेनदेन के जोखिम शेयर और म्युच्यल फंड जैसे होंगे।रिटर्न कुछ मिले या नही भी मिले,जोखिम विशुध उपभोक्तावादी है।यानी धोखाधड़ी इत्यादि से बचने के लिए सुरक्षा इंतजाम की कोई गारंटी मोबाइलनेटव्रक,नेट या आधार प्राधिकरण की तरफ से ,रिजर्वबैंक की तरफ से या भारत सरकार की तरफ से बैंको में लेनदेन की तरह नहीं है।

    बराक ओबामा तो गये और दुनिया टंर्प के हवाले हैं।विप्रो और इंपोसिस ने आने वाली सुनामी से आगाह करते हुए कर्मचारियों को भावुक होने से मना किया है।आउटसोर्सिंग में फ्रक पड़ा तो बच्चों को कंप्यूटर की लाखोंकरोडो़ं रपये कीकमाई के लिए अंधे कुएं में धकेलने और उच्च शिक्षा,शोध और विशेषज्ञता से चीन से हजारों मील पिछड़ने का नतीजा समाने जो होगा ,सो होगा,उत्पादन प्रणाली,कृषि और सराकारी क्षेत्र में रोजगार सृजन न होने का नतीजा अर्थव्यवस्था और आम जनता की सेहत के लिए भयानक होगा।

    जाहिर है कि 46 लाख करोड़ का टैक्स छूट कारपोरेट कंपनियों को देने वाले कंपनी राज ने सरकारी बैंकों का इस्तेमाल देशी विदेशी कंपनियों को अरबों खरबों की कर्ज देने और माफ करने में किया है।अर्थशास्त्री सुगत मार्जित ने आज आनंद बाजार पत्रिका के संपादकीय में दो टुक शब्दों में लिख दिया है कि अब बैंक हमारे खातों से हमारा सफेद धन बड़े कारोबारियों के कर्ज में देगा कम सूद पर,जिसे वे कभी नहीं लौटायेंगे।

    जाहिर है अर्थशास्त्री की बात निराधार हो नहीं सकती ।इसका सीधा मतलब यही है कि आने वाले बजट का सार संक्षेप भी यही होने वाला है और नोटबंदी इसी की तैयारी है।गौरतलब है कि उद्योग जगत ने एसबीआई, पीएनबी, यूनियन बैंक आफ इंडिया (यूबीआई) तथा आईडीबीआई द्वारा ब्याज दर में कटौती के बीच आज कहा कि इस कदम से अर्थव्यवस्था को बड़ा बल मिलेगा और खपत को प्रोत्साहन मिलेगा क्योंकि कर्ज मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। ब्याज दर में कटौती अच्छा कदम उद्योग मंडल सी.आई.आई. ने कहा कि ब्याज दर में कटौती मध्यम अवधि में आर्थिक मजबूती की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    इस पर भी गौर करेंः

    `मैं बुनियादी ब्याज दर में 0.9 फीसदी की कमी लाने के एसबीआई के फैसले का भी स्वागत करता हूं'। भाजपा अध्यक्ष ने कहा, 'मुझे यकीन है कि नोटबंदी के बाद हमारे बैंकों के पास मौजूद संसाधनों से गरीबों के कल्याण के मोदी के अभियान में तेजी आएगी और देश एक व्यापक आधार के साथ तेजी से एक ठोस अर्थव्यवस्था की दिशा में बढ़ेगा'। शाह ने कहा कि कम दरों से आवास और वाहन के लिए मिलने वाला कर्ज ज्यादा किफायती हो जाएगा। छोटे शहरों और गांवों में आवासीय गतिविधियों से अकुशल कार्य बल के रोजगार में बढ़ोत्तरी होगी।

    हाथी के दांत दिखाने के और,खाने के और।

    इस बार बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा। बजट सत्र 31 जनवरी से शुरू होगा और सत्र का पहला हिस्सा 9 फरवरी तक चलेगा। आज हुई कैबिनेट कमेटी ऑन पार्लियामेंट्री अफेयर्स की बैठक में ये फैसला लिया गया। नोटबंदी कारपोरेट बजट की चाकचौबंद तैयारी है।इस पर कवायद जारी है।संसद के बाहर 26 जनवरी के परेड की तैयारियां चल रही हैं तो संसद के भीतर बजट सत्र की।सरकार ने रेल बजट को आम बजट के साथ मिलाकर पेश करने का फैसला लिया है। दूसरी तरफ जीएसटी की तैयारियां भी जोर शोर से चल रही हैं।चूंकि सरकार कारोबारी साल 2017-18 में जीएसटी लागू करना चाहती है। ऐसे में एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स जैसे इनडायरेक्ट टैक्स में बड़े फेरबदल की संभावना कम है, जिसकी पहले बड़ी अहमियत रहती थी। इतना ही नहीं इस बार बजट में खर्चे का हिसाब किताब भी अलग तरीके से पेश किया जाएगा। क्योंकि सरकार ने प्लान और नॉन प्लान एक्सपेंडिचर के बीच के अंतर को खत्म करने का फैसला लिया है। इसकी जगह कैपिटल एक्सपेंडिचर और रेवेन्यू एक्सपेंडिचर पेश किया जाएगा।

    गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों से कहा है कि वो बजट का प्रस्ताव तैयार करते वक्त 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव का ख्याल रखें।

    सोशल स्कीमों में बड़ी बड़ी घोषणाएं फर्जी निकली है और रेल किराया से लेकर पेट्रोल डीजल तक महंगा है।औद्योगिक उत्पादन और कृषि उत्पादन का बंटाधार है।ताजा आंकड़ों ने साबित कर दिया है।फिरभी मीडिया शेयर बाजार की उछाल में अर्थव्यवस्था की सेहत दिखा रहा है।अर्थशास्त्री भी सत्ता के मुताबिक आदा सचआधा फसाना कह रहे हैं।हम जैसे् अपढ़ अधपढ़ लोगों के लिए खुदै माजरा समझने की कोशिश इसीलिए अनिवार्य है।

    वरना मैं साहित्य का मामूली छात्र हूं।किताबें मेरी पूंजी है।ज्ञान की खोज मेरी जिंदगी है।इतिहासबोध मेरा आधार हैै और वैज्ञानिक दृष्टि बंद दरवाजे और बंद खिड़किया खोलने की मेरी चाबी है।मेरी जिंदगी इतनी सी है।इससे ज्यादा मैंने कुछ कभी चाहा नहीं है।नैनीताल में गिरदा के सान्निध्य में भयानकअराजक ही था मैं जीवन यापन के मामले में।धनबाद में कोयलाखानों और आदिवासी कामगारों के बीच पत्रकारिता के दौरान भी मैं कमोबेश वही था।विवाह के बाद परिवार की जरुरतों के मुताबिक जितना बदलाव होने थे,वही हुए।बाकी मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही है।

    यह नितांत निजी बातें हैं।फिरभी आपसे शेयर इसलिए कर रहा हूं क्योंकि भारत की आम जनता के मुकाबले विश्वविद्यालय में पढ़ाई लिखाई और पेशेवर पत्रकारिता के अलावा हमारे कोई सुर्खाव के पर नहीं है।

    हमारे कहे लिखे पर जाहिर है कि आपका ध्यान खींचने में असमर्थ हूं।नोटबंदी वित्तीय प्रबंधन का मामला है।हम शुरु से उसे संबोधित कर रहे हैं।यह मेरा दुस्साहस ही कहा जाना चाहिए क्योंकि आर्थिक मुद्दों पर राजनीतिक मजहबी माहौल में समझने की कोई संभावना नहीं है।

    आज कोलकाता और सारे बंगाल में हंगामा बरपा है।संसद में तृणमूल कांग्रेस के नेता सुदीप बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी के बाद बारुद के ढेर में पलीता लगा है।इससे पहले सांसद तापस पाल गिरफ्तार हो गये हैं।ये दोनों गिरफ्तारियां रोजवैली की देशभर में संपत्ति जब्त करने के बाद हुई हैं।

    अनेक बड़े लोग अभी रोजवैली कांड में भी गिरफ्तार किये जाने

    शारदा फर्जीवाड़े मामले में मंत्री सांसद गिरफ्तार होकर छूट गये हैं और फिलहाल शारदा मामला ठंडा है।

    सीबीआई की नजर वाम और कांग्रेस के नेताओं पर भी है।त्रिपुरा भी निशाने पर।

    सीधे तौर पर बंगाल की राजनीति में भूचाल आया हुआ है।मुख्यमंत्री ममता बंद्योपाध्याय और उनके परिजन शुरु से कटघरे में हैं।

    विधानसभा चुनावों में मोदी दीदी गठबंधन बनने के बाद दीदी आरोपों से सिरे से बरी हो गयी थीं।लोकसभा चुनावों के दौरान शारदा का मामला कहीं उठा ही नहीं बल्कि नारदा रिश्वतखोरी मामले में दीदी के तमाम सिपाहसालारों के फुटेज सार्वजनिक हो गये।तब भी किसी भी स्तर पर कार्रवाई मोदी दीदी गठबंधन ने नहीं की।

    इस बीच 2011 के विधानसभा चुनावों से लेकर नोटबंदी के पचास दिनों तक बंगाल का सबसे तेज केसरियाकरण हो गया है।शरणार्थी और मतुआ समुदायों का हिंदुत्वकरण पूरा हो गया है।

    यह इसलिए हुआ क्योंकि दीदी मोदी गठबंधन ने वामपक्ष और कांग्रेस का सफाया करने खातिर संघ परिवार के हिंदुत्वकरण मुहिम का किसी भी स्तर पर प्रतिरोध नहीं किया।दूसरी तरफ जनाधार टूटने के साथ साथ वामपक्ष का संगठन भी तितर बितर हो गया और कांग्रेस बंगाल में साइन बोर्ड है।

    विपक्ष की जगह भाजपा ने ले ली है और बंगाल में भाजपाइयों की नेतृत्व दिलीप घोष जैसे संघी कर रहे हैं।

    पहले ही संघ परिवार ने असम जीत लिया है और असम में बसे बंगाली शरणारिथियों ने वहां अल्फा से बचने के लिए संघ परिवार के अल्फाई राजकाज बहाल करने में निर्णायक भूमिका अपनायी है।

    बंगाल की मुख्यमंत्री को कभी इस सच का अहसास शायद ही हो कि वामपक्ष के सफाये की उनकी जंग का अंजाम बंगाल का हिंदुत्वकरण है।जिन मामलों में फंसने से बचने के लिए मोदी के साथ गठबंधन उनने किया ,उन्हीं मामलों में अब वे बुरीतरह फंस गयी हैं।

    सुदीप बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी के तुरंत बाद कोलकाता में भाजपा कार्यालय में सत्तादल के समर्थकों ने हमला बोल दिया तो दीदी ने सीधे मोदी और अमित शाह को गिरफ्तार करने की मांग कर दी है।इससे पहले इन गिरफ्तारियों की भनक लगते ही दीदी ने चुनौती दी थी कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाये।वाम पक्ष और कांग्रेस दोनों के सफाये के बाद दीदी की साख तहस नहस हो जाने से बंगाल सीधे तौर पर बिना किसी चुनाव के संघ परिवार के कब्जे में है।

    गैरतलब है कि रोजवैली चिटफंड घोटाले में टीएमसी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी के बाद आज कोलकाता में हिंसा भड़क गई है। कोलकाता में बीजेपी मुख्यालय पर हमला किया गया है। हमला का आरोप टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लगा है। खबरों के मुताबिक 12 बीजेपी कार्यकर्ता घायल हुए हैं और 2 की हालत काफी गंभीर है। बीजेपी ने आरोप लगाए हैं कि पुलिस की मौजूदगी में हमले किए गए लेकिन पुलिस ने दंगाईयों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

    आज ही रोजवैली चिटफंड केस में टीएमसी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय को गिरफ्तार किया गया है। कल टीएमसी के सभी सांसद और विधायक दिल्ली में मिल रहे हैं और इसके बाद गिरफ्तारी के खिलाफ आंदोलन के लिए आगे की रणनीति बनाएंगे। इस गिरफ्तारी के बाद ममता बनर्जी ने भी प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली।

    ममतादीदी ने कहा है कि केंद्र सरकार विरोधियों की आवाज दबाने के लिए कानून का गलत इस्तेमाल कर रही है। टीएमसी का कहना है कि सरकार बदला लेने की सियासत कर रही है और इस आपातकाल के खिलाफ वो लड़ेंगे।

    मोदी ने नोटबंदी की तकलीफें दूर करने के लिए पचास दिनों की जो मोहलत 30 दिसंबर की डेड लाइन  के साथ मांगी थी और कालाधन के खिलाफ जिहाद छेड़ने की चेतावनी दी थी,उसका कुल आशय यही था।

    राजनीतिक नोटबंदी का राजनीतिक आशय।

    फिर भी मजा यह है कि आंकडो़ं का खेल बदस्तूर जारी है क्योंकि आंकड़ों की पड़ताल  कभी नहीं होती।आम जनता के सामने हवाई आंकड़े दिखा दो आम जनता उन आंकड़ों का सच जानने की कभी कोशिस करने का दुस्साहस नहीं करेंगी क्योंकि गमित ,विज्ञान और अर्थशास्त्र से परीक्षा पास करने के अलावा पढ़े लिखे भी टकराने का दुस्साहस नहीं करते।यही हमारी सबसे कमजोर नस है।

    नोट बंदी का माह यानी नबंवर का महीना औद्योगिक उत्पादन के मामले में अच्छा नहीं रहा। इसका कारण नोट बंदी के बाजार में आई दिक्कतें माना जा रहा है।

    सरकार के हाल के नोटबंदी के कदम का प्रमुख उद्योगों पर असर नजर आने लगा है। देश के 8 प्रमुख उद्योगों की विकास दर नवंबर में बढ़कर 4.9 फीसदी रही। पिछले महीने की तुलना में इसमें गिरावट देखी गई। अक्टूबर में इसकी विकास दर 6.6 फीसदी थी।

    आठ प्रमुख उद्योग में गिरावट

    आठ प्रमुख उद्योगों की विकास दर नवंबर में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में बढ़कर 4.9 फीसदी रही। हालांकि कोयला, स्टील और बिजली के उत्पादन में बढ़ोतरी रही लेकिन यह भी गिरावट का प्रतिशत नहीं घटा सकी। प्रमुख उद्योगों से जु़ड़े इन आंकड़ों को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने जारी किया है।

    औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) के आंकड़ों में 8 प्रमुख उद्योगों (ईसीआई) का 38 फीसदी योगदान है। इनमें कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, उर्वरक, स्टील (आयल और नॉन आयल), सीमेंट और बिजली शामिल हैं। ईसीआई के अंतर्गत स्टील, रिफाइनरी उत्पादों और सीमेंट में अच्छी वृद्धि देखी गई, जबकि कच्चा तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट देखी गई।

    खूब जली बिजली

    बिजली उत्पादन जिसका आईआईपी में सबसे ज्यादा 10.32 फीसदी योगदान है। इसमें नवंबर में पिछले साल के समान अवधि की तुलना में 10.2 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई। स्टील उत्पादन का आईआईपी में 6.68 फीसदी योगदान है, इसमें समीक्षाधीन माह में 5.6 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई। इसके बाद रिफाइनरी उत्पाद में अक्टूबर में 2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    वाहनों का उत्पादन भी गिरा

    दिसम्बर माह में देश की बड़ी वाहन निर्माता कंपनियों को बिक्री में दबाव देखा गया है। जानकारों का मानना है कि यह 500 रुपये और 1,000 रुपये की नोटबंदी के कारण हुआ है।

    घटी बिक्री पर महिन्द्रा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (वाहन) प्रवीन शाह ने कहा कि वाहन उद्योग लगातार चुनौतियों से जूझ रहा है, साथ ही इसे नोटबंदी का भी अल्पकालिक नुकसान झेलना पड़ा, जिसके कारण खरीदारों ने अपने निर्णय को टाल दिया। शाह आगे कहते हैं कि हमें उम्मीद है कि सरकार द्वारा जीएसटी (वस्तु एवं सेवाकर) को लागू करने तथा 1 फरवरी को प्रस्तुत किए जाने वाले बजट में उद्योग के हित में कुछ सही  पहल करने से वाहन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।

    इसीलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था को कोई नुकसान नहीं हुआ है। वित्त मंत्री ने आंकड़े पेश किए जिसके हिसाब से नोटबंदी के बाद राजस्व बढ़ा है। वित्त मंत्री ने ये भी कहा है कि कई क्षेत्रों में कारोबार भी बढ़ा है और खेती को भी कोई नुकसान नहीं हुआ है।जेटली ने कहा, "नए नोट जारी करने का काम काफी आगे बढ़ चुका है, कहीं से अशांति की कोई खबर नहीं है। रिजर्व बैंक के पास बहुत अधिक मात्रा में नोट उपलब्ध हैं मुद्रा का बड़ा हिस्सा बदला जा चुका है और 500 रुपये के और नये नोट जारी किए जा रहे हैं।वित्त मंत्री ने कहा, "बैंकों की कर्ज देने की क्षमता बढ़ी है। 19 दिसंबर तक प्रत्यक्ष कर संग्रह में 14.4 प्रतिशत, अप्रत्यक्ष कर संग्रहण में 26.2 प्रतिशत की वृद्धि। केंद्रीय उत्पाद शुल्क की वसूली की वृद्धि 43.3 प्रतिशत तथा सीमा शुल्क वसूली की वृद्धि 6 प्रतिशत हो गई।नोटबंदी से किसानों को हुए फायदे की बात करते हुए वित्मंत्री ने कहा, "रबी की बुवाई पिछले साल से 6.3 प्रतिशत अधिक हुई है। जीवन बीमा क्षेत्र का कारोबार बढ़ा है पेट्रोलियम उपभोग में वृद्धि हुई है। इसी तरह पर्यटन उद्योग और म्युचुअल फंड योजनाओं में निवेश में भी वृद्धि हुई है।उन्होंने कहा, "नये नोट जारी करने का सबसे अहम दौर पूरा हो गया है, अब स्थिति में काफी सुधार हो रहा है। आरबीआई के पास पर्याप्त करेंसी है। आने वाले कुछ सप्ताहों में स्थिति में सुधार होगा।वित्त मंत्री ने कहा, "नोटबंदी पर आलोचक गलत साबित हुए नोटबंदी का एकाध तिमाही में आर्थिक वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था हालात इतने बुरे नहीं जितना कि कहा जा रहा था।



    महज दो चार घंटे की तैयारी में नोटबंदी, जबकि इसी नोटबंदी के बाद सोवियत संघ टूट गया था।तो क्या नोटबंदी के जरिये हिंदुत्व पुनरूत्थान के लिए भारत को तोड़ने का कोई मास्टर प्लान है हिंदुत्व के एजंडे का?

    बजट भी नोटबंदी के बाद यूपी जीतने का हिंदुत्व कार्यक्रम?

    यूपी में दंगल और बंगाल में सिविल वार के हालात फेल नोटबंदी को भुलाने के लिए काफी हैं?भुखमरी,मंदी और बेरोजगारी का क्या जबाव है?

    फेल नोटबंदी कैसे नजर घूमाने की सीबीआई कवायद से राजनीतिक रंग में बंटा बंगाल धू धू जल रहा है,हिंदुत्व का एजंडा वहां राष्ट्रपति शासन।

    नोटबंदी के बाद कतारों में जो लोग मारे गये,उनके खून से तानाशाह के हाथ रंगे हैं।करोडो़ं जो लोग बेरोजगार होकर कबंध हैं,उनका सारा खून भी उन्हीं को हाथों में है।जो भुखमरी और मंदी के शिकार होंगे ,उनकी लाशों का बोझ भी उनके कांधे पर है।

    कितना चौड़ा सीना है?

    कितने मजबूत कंधे हैं?

    पलाश विश्वास

    पांच राज्यों के लिए चुनाव आचार संहिता लागू हो गयी है।चार फरवरी से मतदान है।यूपी में ग्यारह फरवरी से सात दफा में वोट गेरने हैं।गणना 11 मार्च को वोटों की गिनती  है।चुनाव प्रक्रिया के मध्य पहली फरवरी को वक्त से पहले रेल और आम बजट मिलाकर डिजिटल कैशलैस इंडिया का बजट पेश होना है।

    सीधा फायदा संघ परिवार को है।

    विपक्ष के विरोध और चुनाव आयोग की विवेचना  के बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपना फैसला सुना दिया हैं कि बजट पेश करने की तारीख में कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने ये भी कहा बैंक से रकम निकालने की सीमा हटाने का फैसला हालात को देखने के बाद ही लिया जाएगा।वित्त मंत्री का कहना है कि बजट एक संवैधानिक आवश्यकता है और लोकसभा चुनाव से पहले भी बजट पेश होता है। साथ ही वित्त मंत्री ने ये भी कहा कि कैश निकालने की लिमिट पर आरबीआई फैसला लेगा और जैसे पाबंदी किश्तों में आई, उसी तरह रियायतें भी किश्तों में आएंगी।

    चुनाव आयोग पारदर्शिता के नाम पर जो कर रहा है,उसका स्वागत है।लेकिन सत्ता घराने को एकतरफा बढ़त देने के इस इंतजाम को अगर रोक नहीं सका चुनाव आयोग तो चुनाव की निष्पक्षता का सवाल बेतमलब है।

    उठते सवालों के बीच वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि बजटको लेकर विपक्ष का विरोध सही नहीं है।भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है कि चुनाव आयोग जल्द ही चुनाव के दौरान बजटपेश करने के मामले पर अपनी राय देगा। इस साल परंपरा तोड़ते हुए केंद्रीय बजटपेश किए जाने से एक दिन पहले 31 जनवरी से संसद का बजटसत्र शुरू होने वाला है और अलग से रेल बजटपेश नहीं किया जाएगा।

    साफ जाहिर है कि  अब नोटबंदी के बाद देश का बजट भी यूपी के हिंदुत्व पुनरूत्थान के नाम।सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया को धर्मनिरपेक्ष बनाये रखने का आदेश दिया है और साथ ही हिंदुत्व को धर्म मानने से इंकार करके संघ परिवार के हिंदुत्व के ग्लोबल एजंडे को हरी झंडी दे दी है।

    चुनाव प्रक्रिया के मध्य बजट का मतलब भी सत्ता वर्चस्व के आगे स्वायत्त लोकतांत्रिक संस्थानों के अवसान है।गौरतलब है कि परंपरागत रूप से आम बजट 28-29 फरवरी को पेश किया जाता रहा है। बजटमें सरकार कई योजनाओं की घोषणा करती है और जनता को कई किस्म की छूट भी दी जाती है। वैसे भी नववर्ष की पूर्व संध्या पर कई फर्जी योजनाओं की घोषणा डिजी मेले में कर दी गयी है।बजट के जरिेये फिर बाजीगरी के आसार हैं।कांग्रेस समेत 16 विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रपति और चुनाव आयोग को पत्र लिख कहा है कि अगर बजटतय वक्त से पहले पेश हुआ तो बीजेपी इसे आगामी विधानसभा चुनावों में भुनाने का प्रयास करेगी। इस सप्ताह की शुरूआत में भेजे गए इस पत्र में विपक्ष ने एनडीए सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार बजटके दौरान वोटरों को रिझाने के लिए लोक-लुभावन वादे कर सकते है।

    इसी बीच बरसों पहले होने वाली गिरफ्तारियां टालकर नोटबंदी फेल होने की अभूतपूर्व उपलब्धि से नजर घूमाने के लिए जो सनसनी पैदा की जा रही है,उससे पूरा बंगाल जलने लगा है और वहां हालात तेजी से राष्ट्रपति शासन के बन रहे हैं।कोलकाता की सड़कों पर जो हुआ वह आने वाले वक्त की झांकी भर है।

    अभी बंगाल की नंबर वन हिरोइन जो अभी भी परदे पर उतनी ही लोकप्रिय हैं,का नाम हवाला गिरोह से जुडा़ है जिसके मार्फत हवाला के जरिये रोजवैली के तीन सौ करोड़ रुपये विदेश में भेजने का जिम्मा उन्हें था,त्रेसठ करोड़ वे भेज भी चुकी हैं।इस हिरोइन ने कमसकम तीन बार रोजवैली के सर्वेसर्वा गौतम कुंडु के साथ विदेश यात्रा की थी और तापस पाल के साथ वे भी रोजवैली का फिल्म ट्रेड देखती थीं।नाम का खुलासा अभी नहीं हुआ है।वे बालीवूड फिल्मों के लिए भी मशहूर है।रुपा गांगुली कभी नंबर वन नहीं रही हैं।न ही शताब्दी राय।शताब्दी ने बालीवूड में कोई काम नहीं किया है।

    रुपा और शताब्दी पहले से विवादों में है।लेकिन रहस्यमयी हिरोईन से चिटपंड और राजनीति के हवाला कारोबार के खुलासा होने के आसार है।

    गौरतलब है कि इस हिरोइन के खासमखास रिश्तेदार सिंगापुर से हवाला रैकेट चलाते हैं।सुदीप बंदोपाध्याय को अब शारदा मामले से भी नत्थी कर दिया गया है।शारदा समूह के मीडिया कारोबार को भी लपेटे में लिया जा रहा है।रफा दफा शारदा फर्जीवाड़ा मामले के फाइलें फिर खुल गयी हैं।सुदीप्त देवयानी फिर चर्चा में हैं।

    इसी बीच ममता ने आशंका जताई है कि मोदी के कहे मुताबिक उनके भतीजे अभिषेक बंदोपाध्याय समेत उनके परिजनों,बाबी हकीम और शुभेंदु अधिकारी जैसे मंत्रियों और कोलकाता के मेयर शोभनदेव को सीबीआई गिरफ्तार करने वाली हैं।इसके बाद ही वे सीधे केंद्र सरकार और संघ परिवार से सीधे मुकाबले के मोड में हैं और उनकी इस जिहाद को बंगाल भर में नोटबंदी के विरोध की शक्ल में हिंसक आंदोलन में पहले ही दिन बदल देने में उनके समर्थकों  और कार्यकर्ताओं ने भारी कामयाबी पायी है।

    विजयवर्गीज औस सिर्द्धार्थ नाथ सिंह बंगाल भाजपा के संघी अध्यक्ष दिलीप घोष की अगुवाई में बंगाल भर में भाजपा के प्रतिरोध का नेतृत्व कर रहे हैं।

    भाजपाइयों ने राज्यपाल से मिलकर बंगाल में राष्ट्रपति शासन की भी मांग कर दी है।अब हालात तेजी से राष्ट्रपति शासन के बन भी रहे हैं।

    यूपी में दंगल और बंगाल में सिविल वार के हालात फेल नोटबंदी को भुलाने के लिए काफी हैं?

    भुखमरी,मंदी और बेरोजगारी का क्या जबाव है?

    रोज वैली चिटफंड घोटाले के सिलसिले में सीबीआई द्वारा तृणमूल कांग्रेस के सांसद संदीप बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी के बाद कोलकाता और बंगाल के हर जिले में आज प्रधानमंत्री का पुतला जला है।सड़क रेल परिवहन ठप है।सुंदरवन से लेकर पहाड़ों तक में बंगाल में जनता तृणमूल और भाजपा के झंडे के साथ आपस में मारामारी कर रहे हैं।बमबाजी ,आगजनी और हिंसा का महोत्सव है।

    बंगालकी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर जमकर हमला किया। यहां तक कि 2002 के गुजरात दंगों के लिए उनकी गिरफ्तारी की भी मांग की।उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है और कहा है कि हिम्मत है तो उन्हें गिरफ्तार करें। बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी के बाद टीएमसी के सैंकडों कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के खिलाफ नारे लगाए और बीजेपी के प्रदेश मुख्यालय पर पथराव किया।

    फिर पूरे बंगाल में प्रधानमंत्री का पुतला दहन और उनका वैदिकी रीति रिवाज से श्राद्धकर्म हो रहा है।

    ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी पर यह आरोप लगाया कि राजनीतिक बदले की भावना के तहत वे टीएमसी के सांसदों को गिरफ्तार करवा रहे हैं। ममता बनर्जी ने इस गिरफ्तारी के विरोध में अपने कार्यकर्ताओं से देशभर में विरोध-प्रदर्शन करने की अपील की थी। इस अपील के बाद मंगलवार को कोलकाता में बीजेपी के दफ्तर पर तथाकथित टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ की। आज कोलकाता सहित पूरे बंगालमें टीएमसी कार्यकर्ताओं का विरोध-प्रदर्शन जारी रहा।

    बंगालके हुगली में स्थित भारतीय जनता पार्टी के आॅफिस में बुधवार को टीएमसी कार्यकर्ताओं ने आग लगा दी। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, बीते दो दिनों में टीएमसी कार्यकर्ताओं ने दूसरी बार बीजेपी आॅफिस को निशाने पर लिया है। मंगलवार को भी टीएमसी स्टूडेंट्स विंग के कार्यकर्ताओं ने कोलकाता स्थित बीजेपी के राज्य मुख्यालय पर हमला बोला था। इसमें कई बीजेपी कार्यकर्ता घायल भी हुए थे। विरोध करने वाले सभी लोग टीएमसी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय की रोज वैली चिटफंड घोटाले में गिरफ्तारी का विरोध कर रहे हैं।

    केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें उन्होंने कहा कि तृणमूल पार्टी के कार्यकर्ता उनके घर में जबर्दस्ती घुसने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने लिखा, 'तृणमूल कांग्रेस के गुंडे मेरे कैलाश बोस स्ट्रीट के अपार्टमेंट में जबर्दस्ती घुसने का प्रयासस कर रहे हैं। वहां मेरे मां-बाप रहते हैं। कितना शर्मनाक है ये।'

    नोटबंदी से पहले 2014 के चुनाव के बाद सीबीआई के छापे पड़ चुके होते और गिरफ्तारियां हो गयी होतीं तो ऐसा नजारा नहीं होता।सीबीआई केंद्र की सत्ता की कठपुतली है और नोटबंदी के खिलाफ खड़े लोगों को खामोश करने लगी है,आम जनता में यह धारणा बनी है।ममतादीदी को प्रबल जनसमर्थन के मद्देनजर बंगाल में हालात आपातकाल तो क्या तेजी से गृहयुद्ध में तब्दील होते जा रहे हैं।

    संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडे के लिए दसों उंगलियां घी में और सर कड़ाही में।कल रात से ही यूपी में भाजपा की बढ़तवाले सर्वे शुरु हो गये हैं।

    रिजर्व बैंक और उसके रिलायंस रिटर्न मोदी नजदीकी गवर्नर सीबीआई गिरफ्त में नहीं हैं और न सारे दस्तावेज,गवाह और सबूत उनके सामने रखकर कोई पूछाताछ हो रही है।आरटीआई के सवालों के जबाव में वित्त मंत्री से सलाह ली गयी है या नहीं, नोटबंदी कि सलाह किन विशेषज्ञों से ली गयी है,ऐसे शाकाहारी सवाल भी टाले जा रहे हैं।इसी माहौल में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत ताजा खुलासा हुआ है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के केंद्रीय बोर्ड की गत आठ नवंबर को हुई बैठक में 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को वापस लेने की सिफारिश की गयी थी। प्रधानमंत्री ने इसी दिन देर शाम राष्ट्र के नाम अपने टेलीविजन संदेश में घोषणा की थी कि मध्यरात्रि से ये नोट वैध मुद्रा नहीं रह जायेंगे।

    यानी कि प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन रिकार्ड होने के बाद रिजर्व बैंक से आरबीआई कानून से बचने के लिए यह सिफारिश जबरन वसूली गयी थी और वित्तमंत्री ही नहीं रिजर्व बैंक के गवर्नर भी नोटबंदी के मामले में अधेरे में थे।मोदी ने रिकार्डेड भाषण दिया था ,यह पहले ही साबित हो चुका है।

    सीधे तौर पर इससे साबित होता है कि नोटबंदी के बाद कतारों में जो लोग मारे गये,उनके खून से तानाशाह के हाथ रंगे हैं।करोडो़ं जो लोग बेरोजगार होकर कबंध हैं,उनका सारा खून भी उन्हीं को हाथों में है।जो भुखमरी और मंदी के शिकार होंगे ,उनकी लाशों का बोझ भी उनके कांधे पर है।

    कितना चौड़ा सीना है?

    कितने मजबूत कंधे हैं?

    सारा जोर कैसलैस डिजिटल लेनदेन पर है।आदार पहचान अनिवार्य है।लेकिन डिजिटल लेनदेन की रियायतें खत्म हैं।जोकिम अलग से भयंकर हैं क्योंकि सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।डिजिटल लेनदेने के लिए ई-वॉलेट सबसे सरल और आसान उपाय बनकर उभरे हैं लेकिन इसके साथ जोखिम भी कम नहीं। डाटा चोरी का डर है तो मोबाइल गुम हो जाने पर बैलेंस ट्रांसफर का खतरा और पेटीएम जैसी ईवॉलेट दिग्गज कंपनियां भी सुरक्षित नहीं हैं। मोबाइल गुम होना आम बात है।अब मोबाइल गुम होते ही आपकी जान भी चली जायेगी।जमा पूंजी निजी जानकारियां,गोपनीयता सब कुछ आधार नंबर के साथ बेदखल होगा।

    गौरतलब है कि सुरक्षा का हवाला देकर ही एसबीआई ने आज ई-वॉलेट में पेमेंट ट्रांसफर पर रोक लगा दी है। लेकिन बड़ा सवाल है जब कैशलेस होने की तरफ हम आगे बढ़ रहे हैं तो ई-वॉलेट सहूलियत का सबसे बड़ा उपाय था लेकिन अगर इसमें इतने खतरे हैं तो क्या करें और कैसे फ्रॉड से बचेंय़इसका कोई जबवा रिजर्व बैंक दें तो बेहतर।

    कितना चौड़ा सीना है?

    कितने मजबूत कंधे हैं?

    सात समुंदर के पानी से गुजरात नरसंहार के खून धुले नहीं हैं,बल्कि व्हाइट हाउस के रेड कार्पेट से वे खूनी हाथ चांप दिये गये हैं,जो अब फिर इंसानियत और जम्हूरियता का कत्ल करने लगे हैं।

    रिजर्व बैंक की सिफारिश जिस दिन मिली ,उसी दिन राष्ट्र के नाम संबोधन,तो किन विसेषज्ञों से कब किस बैठक में नोटबंदी के बाद की स्थितियों से निबटने के बारे में सलाह मशविरा हुआ था,यह जानकारी जाहिर है ,आरटीआई सवाल से नहीं मिलेगा।

    महज दो चार घंटे की तैयारी में नोटबंदी,जबकि इसी नोटबंदी के बाद सोवियत संघ टूट गया था।

    कितना चौड़ा सीना है?

    कितने मजबूत कंधे हैं?

    वर्ष 1991, सोवियत संघ (यूएसएसआर - यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स) में नोटबंदी और सोवियत संघ का विघटनः

    मिखाइल गोर्बाचेव के नेतृत्व वाले सोवियत संघ ने अपने 'अंतिम साल' की शुरुआत में 'काली अर्थव्यवस्था' पर नियंत्रण के लिए 50 और 100 रूबल को वापस ले लिया था, लेकिन यह कदम न सिर्फ महंगाई पर काबू पाने में नाकाम रहा, बल्कि सरकार के प्रति लोगों को विश्वास भी काफी घट गया... उसी साल अगस्त में उनके तख्तापलट की कोशिश हुई, जिससे उनका वर्चस्व ढहता दिखाई दिया, और आखिरकार अगले साल सोवियत संघ के विघटन का कारण बना... इस कदम के नतीजे से सबक लेते हुए वर्ष 1998 में रूस ने विमुद्रीकरण के स्थान पर बड़े नोटों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उनमें से बाद के तीन शून्य हटा देने की घोषणा की, यानी नोटों को पूरी तरह बंद करने के स्थान पर उनकी कीमत को एक हज़ार गुना कम कर दिया... सरकार का यह कदम तुलनात्मक रूप से काफी आराम से निपट गया...

    तो क्या नोटबंदी के जरिये हिंदुत्व पुनरूत्थान के लिए भारत को तोड़ने का कोई मास्टर प्लान है हिंदुत्व के एजंडे का?

    मध्य प्रदेश के नीमच निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने बताया कि उनकी RTI अर्जी के जवाब में उन्हें बताया गया कि रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने गत आठ नवंबर को नयी दिल्ली में आयोजित बैठक में ही इसकी सिफारिश की थी कि उस वक्त वैध मुद्रा के रूप में चल रहे 500 और 1,000 रुपये के नोट चलन से वापस ले लिये जाने चाहिए.

    गौड़ ने हालांकि, बताया कि आरबीआई के एक अधिकारी ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा आठ (1) (ए) का हवाला देते हुए उन्हें नोटबंदी के विषय पर आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की संबंधित बैठकों के मिनटों की जानकारी नहीं दी। इसी धारा का उल्लेख करते हुए उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि आरबीआई ने नोटबंदी पर अंतिम निर्णय अपनी किस बोर्ड बैठक में लिया था।

    सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा आठ (1) (ए) के मुताबिक उस सूचना को जाहिर करने से छूट दी गयी है, जिसे प्रकट करने से भारत की प्रभुता और अखंडता, राष्ट्र की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों और दूसरे देशों से संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो या किसी अपराध को उकसावा मिलता हो।

    कितना चौड़ा सीना है?

    कितने मजबूत कंधे हैं?

    भारत में कृषि उत्पादन दर हरित क्रांति के दो चरण पूरे होने से लेकर मनसेंटो क्रांति,जीएम सीड और ठेके पर खेती के बावजूद शून्य से ऊपर उठ नहीं रहा है। बुनियादी तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था कृषि अर्थव्यवस्था है और मुक्त बाजार में भी सत्तर फीसद से ज्यादा लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है।

    अंधाधुंध शहरीकरण, अंधाधुंध बेदखली विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले खेत खलिहान पहाड़ जंगल रण मरुस्थल और समुंदर हो जाने से खेती का रकबा लगातार घटता जा रहा है।

    मुनाफावसूली की खेती में जीने के लिए,बाकी देशवासियों के लिए अनाज, दाल, तिलहन की उपज लगातार घटती जा रही है और हरित क्रांति के बाद खाद बीज सिंचाई मशीनों और मजदूरी के आसमान चूमते भावों की वजह से कैश फसल पर किसानों का जोर हैं लेकिन लागत का पैसा भी फसल से वापस नहीं आ रहा है।इस कृषि संकट को संबोधित न करने की वजह से लाखों किसान खुदकशी कर चुके हैं।

    नोटबंदी के बाद अब करोडो़ं किसान कंगाल हैं।खरीफ की फसल बिकी नहीं है और रबी की बुवाई हुई नहीं है।अब पुरानी योजनाओं के कायाकल्प या चुनावी बजट के झुनझुना से नये सिरे से खेती हो नहीं सकती।

    अनाज की भारी किल्लत और भुखमरी आगे हैं।इसी सिलसिले में हाल ही में 2010 में उत्तर कोरिया में नोटबंदी के अनुभव के मद्देनजर बगुला छाप विशेषज्ञों ने क्या एहतियाती इंतजामात किये हैं,इसका खुलासा आहिस्ते आहिस्ते होना है।

    बहरहाल उत्तर कोरिया में वर्ष 2010 में तत्कालीन तानाशाह किम जोंग-इल ने अर्थव्यवस्था पर काबू पाने और काला बाज़ारी पर नकेल डालने के लिए पुरानी करेंसी की कीमत में से दो शून्य हटा दिए, जिससे 100 का नोट 1 का रह गया... उन सालों में देश की कृषि भी भारी संकट से गुज़र रही थी, सो, परिणामस्वरूप देश को भारी खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ा... चावल की बढ़ती कीमतों जनता में गुस्सा इतना बढ़ गया कि आश्चर्यजनक रूप से किम को क्षमा याचना करनी पड़ी तथा उन दिनों मिली ख़बरों के मुताबिक इसी वजह से तत्कालीन वित्त प्रमुख को फांसी दे दी गई थी…

    कितना चौड़ा सीना है?

    कितने मजबूत कंधे हैं?

    लोग इस खुशफहमी में आज भी डिजिटल पेमेंट कर रहे हैं कि केंद्र सरकार की ओर से इसपर रियायत है। लेकिन 30 दिसंबर तक दी गई छूट को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया है। इसलिए अब आपसे बैंकों ने पैसा वसूलना शुरू कर दिया है।

    लोग इस उम्मीद में बैठे थे कि सरकार एटीएम और डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर रियायतें 30 दिसंबर के बाद भी जारी रखेगी। या फिर 2000 रुपये से कम डिजिटल भूगतान करने पर सर्विस टैक्स छूट बरकरार रखेगी। लोग गलतफहमी में हैं। क्योंकि बैंको ने एक्स्ट्रा चार्जेस लगाने की प्रक्रिया फिर से शुरू कर दी है। जिसका सीधा असर अब आपके डिजिटल बटवे पर हो रहा है।

    नोटबंदी के पचास दिन पुरे होने के बाद एटीएम से कैश निकालने पर ट्रांजैक्शन मुफ्त था उस वापस पांच ट्रांजेक्शन की पाबंदी लग चुकी है। इतना ही नहीं 2000 से कम डिजिटल भूगतान पर मिल रही रियायत की अवधि समाप्त हो गई है और बौंको ने मर्चेंट को इससे जुडे इंस्ट्रक्शन देना भी शुरू कर दिया है।

    दरअसल, नोटबंदी लागू थी तब भी रेलवे टिकट या हवाई टिकट में डिजिटल भुगतान पर 1.8 फीसदी के आसपास चार्जेस लग रहे थे। अब ई-वॉलेट कंपनिया भी वॉलेट से बैंक में पैसे ट्रांसफर करने पर फिर से फीस वसूलना करना शुरू कर सकती हैं।

    हम यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि कोई सपेरा या बाजीगर या सौदागर आम जनता से अपनी गलती की वजह से होने वाली तबाही के लिए माफी मांगेंगे।

    मीडिया में सोवियत संघ और उत्तर कोरिया के अनुभवों के अलावा हाल में हुए तमाम देशों में नोटबंदी के असर का खुलासा पहले ही हो गया है।मसलनः

    घाना, वर्ष 1982...

    विश्व के आधुनिक इतिहास में नोटबेदी का कदम सबसे पहले अफ्रीकी देश घाना में उठाया गया था, जब वर्ष 1982 में टैक्स चोरी व भ्रष्टाचार रोकने के उद्देश्य से वहां 50 सेडी के नोटों को बंद कर दिया गया था. इस कदम से घाना के नागरिकों को अपनी ही मुद्रा में विश्वास कम हो गया, और उन्होंने विदेशी मुद्रा और ज़मीन-जायदाद का रुख कर लिया, जिससे न सिर्फ देश के बैंकिग सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा, बल्कि विदेशी मुद्रा पर काला बाज़ारी बेतहाशा बढ़ गई... ग्रामीणों को मीलों चलकर नोट बदलवाने के लिए बैंक जाना पड़ता था, और डेडलाइन खत्म होने के बाद बहुत ज़्यादा नोट बेकार हो जाने की ख़बरें थीं...


    नाइजीरिया, वर्ष 1984...

    नाइजीरिया में वर्ष 1984 में मुहम्मदू बुहारी के नेतृत्व वाली सैन्य सरकार ने भ्रष्टाचार से लड़ने के उद्देश्य से बैंक नोटों को अलग रंग में जारी किया था, और पुराने नोटों को नए नोटों से बदलने के लिए सीमित समय दिया था... नाइजीरिया सरकार द्वारा उठाए गए कई कदमों में से एक यह कदम पूरी तरह नाकाम साबित हुआ था, और कर्ज़ में डूबी व महंगाई तले दबी अर्थव्यवस्था को कतई राहत नहीं मिल पाई थी, और अगले ही साल बुहारी को तख्तापलट के कारण सत्ता से बेदखल होना पड़ा था...


    म्यांमार, वर्ष 1987...

    नोटबंदी का भारत से मिलता-जुलता कदम वर्ष 1987 में पड़ोसी देश म्यांमार में भी उठाया गया था, जब वहां सत्तासीन सैन्य सरकार ने काला बाज़ार को काबू करने के उद्देश्य देश में प्रचलित 80 फीसदी मुद्रा को अमान्य घोषित कर दिया... इस कदम के प्रति गुस्सा काफी रहा, और छात्र इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए तथा भारी विरोध प्रदर्शन किया... देशभर में प्रदर्शनों का दौर काफी लंबे अरसे तक जारी रहा, और आखिरकार अगले साल सरकार को हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस और सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी...


    '90 के दशक की शुरुआत में, ज़ायरे...

    बैंक नोटों में सुधार के नाम पर '90 के दशक की शुरुआत में कई कदम उठाने वाले ज़ायरे के तानाशाह मोबुतु सेसे सेको को उस दौरान भारी आर्थिक उठापटक का सामना करना पड़ा... वर्ष 1993 में अप्रचलित मुद्रा को सिस्टम से पूरी तरह वापस निकाल लेने की योजना के चलते महंगाई बेतहाशा बढ़ गई, और अमेरिकी डॉलर की तुलना में स्थानीय मुद्रा में भारी गिरावट दर्ज की गई... इसके बाद गृहयुद्ध हुआ, और वर्ष 1997 में मोबुतु सेसे सेको को सत्ता से बेदखल कर दिया गया..



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    नोटबंदी से गरीबों की परेशानियां बढ़ी हैं!

    सारे रद्द नोट वापस,विकास दर में तीन प्रतिशत गिरावट

    हमारी नाकेबंदी,अब महामहिम राष्ट्रपति पर भी रोक लागाइये जो खुलेआम मंदी का ऐलान कर रहे हैं!

    आधार निराधार गाय भैंसों की सरकार,मनुष्यों की क्या दरकार?

    सिखों के दसवें गुरु, हम सबके गुरु गोविंद की 350वीं जयंती  के मौके पर प्रणाम।

    इस पर्व पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 8 नवंबर 2016 को लागू किए गए नोटबंदी के फैसले और इससे अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ने वाले असर को लेकर अब राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी आशंका जाहिर की है।राष्ट्रपति ने दो टुक शबदों मे कहा है कि नोटबंदी की मार से गरीबों का हाल बेहाल है।महामहिम ने कहा है, 'नोटबंदी से जहां कालेधन और भष्ट्राचार के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, वहीं इससे अर्थव्यवस्था में अस्थायी रूप से कुछ नरमी आ सकती है। गरीबों की तकलीफों को दूर करने के मामले में हमें ज्यादा सजग रहना होगा, कहीं ऐसा न हो कि दीर्घकालिक प्रगति की उम्मीद में उनकी यह तकलीफ बर्दास्त से बाहर हो जाए।'

    हम शुरु से ,पहले दिन से नोटबंदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताजपोशी की युगल बंदी के तहत ग्लोबल हिंदुतव के त्रिशुल हिंदू राष्ट्र भारत,कु क्लाक्स क्लैन का रंगभेदी अमेरिका और मुसलमानों के खिलाफ जिहादी इजराइल की तरफ से ग्लाोबल हिंदुत्व का यह वैश्विक विध्वंस कार्यक्रम मान रहे हैं।

    जैसे कि कभी गोर्बाचेव ने अमेरिकी योजना के तहत सोवियत संघ की अर्तव्यवस्था को तहस नहस करने के लिए नोटबंदी कर दी थी और नतीजतन सोवियत संघ हजार टुकड़ो में निबट गया था।नोटबंदी का यह कार्यक्रम भारत के बहुजनों के नस्ली सफाया का कार्यक्रम है,हमने लगातार लिखा है।

    बंगाल की भुखमरी की तस्वीर पेश करते हुए हम लगातार कह रहे हैं कि इस नोटबंदी से व्यापक पैमाने में बेरोजगारी होने वाली है और करोड़ों लोगों का रोजगार आजीविका अर्थव्वस्था और उत्पादन प्रणाली के साथ खत्म है।आगे मंदी और भुखमरी है।प्रिंट में हमें कहीं नहीं हैं,सोशल मीडिया पर हमारी नाकेबंदी है।

    हमारी नाकेबंदी,अब महामहिम राष्ट्रपति पर भी रोक लगाइये जो खुलेआम मंदी का ऐलान कर रहे हैं।गौरतलब है कि नोटबंदी को लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पहली बार कोई बयान दिया है।महामहिम राष्ट्रपति का कहना है कि नोटबंदी की वजह से गरीबों की परेशानियां बढ़ी हैं।

    गौरतलब है कि महामहिम राष्ट्रपति ने देश भर के राज्यपालों और उपराज्यपालों को संबोधित करते हुए नोटबंदी का जिक्र किया। राष्ट्रपति ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये दिए गए अपने संदेश में कहा कि नोटबंदी से निश्चित ही गरीबों की परेशानियां बढ़ी हैं।

    गौरतलब है कि महामहिम राष्ट्रपति ने कहा कि नोटबंदी से कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में ताकत मिलेगी, लेकिन इससे फिलहाल अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर भी प्रभाव पड़ेगा। इससे अस्थायी आर्थि‍क मंदी संभव है।

    इसी बीच ग्‍लोबल फाइनेंशियल सर्विस एचएसबीसी ने कहा कि नोटबंदी की वजह से जीडीपी ग्रोथ में भारी कमी आने का अनुमान है। उसके मुताबिक अक्‍टूबर से दिसंबर के बीच ग्रोथ रेट 5 फीसदी रहेगी। एचएसबीसी ने कहा है कि आने वाले क्‍वार्टर (जनवरी-मार्च) में भी जीडीपी ग्रोथ पर नोटबंदी का असर बना रह सकता है और ग्रोथ पूर्व के 8 फीसदी के अनुमान से घटकर 6 फीसदी तक गिर सकती है। जनवरी-मार्च के बीच 6 फीसदी ग्रोथ का अनुमान,जो आगे और गिरने के आसार हो सकते हैं। एचएसबीसी की तरफ से जारी रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि नोटबंदी का असर मैन्‍युफैक्‍चरिंग, इन्‍वेस्‍टमेंट और सर्विस सेक्‍टर पर सबसे ज्‍यादा पड़ा है।

    विकास दर में तीन फीसद गिरावट का मतलब है अर्थव्यवस्था,आम जनता और खासकर गरीबों के लिए तबाही जिसकी चेतावनी राष्ट्रपति ने संवैधानिक दायरे में दो टुक शब्दों में दे दी है।अक्टूबर से दिसंबर तक विकास दर आठ फीसद से गिरकर पांच फीसद हो गयी है।यह नोटबंदी का असर है।पहले अर्थशास्त्री एक फीसद की गिरावट होने की आशंका जता रहे थे।नोटबंदी बुरीतरह  फ्लाप हो जाने से गिरावट कहां तक जायेगी,अब अर्थशास्त्री ही हिसाब जोड़कर बतायें।बगुला छाप विशेषज्ञ बेहतर जानते हैं।जिनकी सलाह से रिजर्व बैंक और वित्तमंत्री को अंधेरे में रखकर राजनीतिक मकसद से यूपी जीतने की खातिर भारत की आम जनता और अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया नरसिस महान तानाशाह आत्ममुग्ध ने और लाउडस्पीकर बन गया मीडिया भी।

    इस पर तुर्रा यह कि बीस जनवरी को डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका से आईटी सेक्टर में भारत के कारोबार और रोजगार दोनों को जोर का झटका लग सकता है जबकि आईटी पर फोकस राजीव गांधी के जमाने से 1984 से लगातार जारी है और आईटी के तहत ही भारत में निजीकरण, उदारीकरण और ग्लोबीकरण की धूम है।खेती और उत्पादन पर फुल स्टाप है।उच्चशिक्षा और शोध खत्म है।ज्ञान की खोज सिरे से बंद है।तकनीक और ऐप के मुक्तबाजार की जान आईटी है और उसकी जान अमेरिका में है।

    अब ताजा खबर यह है कि भारतीय आईटी कंपनियों की मुश्किल बढ़ सकती हैं। अमेरिका एच-1बी  वीजा के नियम और सख्त करने वाला है जिससे कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में नौकरी देना मुश्किल हो जाएगा। खबरों के मुताबिक यूएस कांग्रेस में एच-1बी वीजा बिल दोबारा पेश किया गया है। इस  बिल में कई बदलाव बड़े बदलाव किए गए हैं।नए प्रस्तावों के तहत एच-1बी वीजा के लिए न्यूनतम सैलरी 1 लाख डॉलर प्रति साल होनी चाहिए। हालांकि नए बिल में मास्टर डिग्री की छूट कर दी है।

    नोटबंदी बुरीतरह फ्लाप हो गया।विश्वविद्यालयों को बंद कराने का अभियान अभी चालू है और जेएनयू में बहुजन छात्रों को अलगाव में डालने की मुहिम अभी जारी है,लेकिन इन छात्रों के हक में अब फिर जयभीम कामरेड की आवाजें गूंजने लगी हैं। बंगाल में चार हिरोइनों की प्रेमकथा की चाश्नी मिली रोजवैली क्रांति के हिंदुत्व अश्वमेधी अभियान सर्जिकल स्ट्राइक की तरह बुमरैंग हैं।नोटबंदी के खिलाफ बंगाल में आज दूसरे दिन भी ट्रेन सड़क यातायात हिंसक प्रदर्शन की वजह से बाधित होती रही दिनभर और पूरे बंगाल में मोदी का पुतला दहन मनुस्मृति दहन में तब्दील है।हांलाकि श्राद्धकर्म वैदिकी  है।

    झूठ के काले कारोबार,फासिज्म के राजकाज का नया शगूफा मोदी का अनूठा मास्टर स्ट्रोक दाउद की संपत्ति जब्त कराने का दावा है।भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि मोदी सरकार को नोटबंदी के कालाधन निकालो अभियान के तहत एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मिली है। पार्टी का कहना है कि मोदी सरकार की कोशिशों से भारत के मोस्ट वांटेड क्रिमिनल दाऊद इब्राहिम की यूनाइटेड अरब अमीरात स्थित 15,000 करोड़ की संपत्ति को ज़ब्त कर लिया गया है। हालांकि, दुबई में भारतीय वाणिज्य दूतावास की एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि उनके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है। जबकि बीजेपी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने बुधवार को एक ट्वीट कर इसे प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति का मास्टर स्ट्रोक क़रार दिया गया।

    कैशलैस डिजिटल इंडिया के झूठे क्वाब को वित्तमंत्री शुरु से लेसकैश कह रहे हैं।झूठ का यह महातिलिस्म भी बेपरदा हो गया है। ई वैलेट के जरिये कैशलैस इंडिया में डिजिटल लेनदेन पर देश के सबसे बड़े बैंक स्टेटबैंक आफ इंडिया ने नेट असुरक्षा के चलते रोक लगा दी है।

    गुगल के सीईओ ने खड़गपुर आईआईटी में छात्रों से संवाद के दौरान माना है कि भारत में कैशलैस लेनदेन का इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है।हालांकि उन्होंने कहा हैः

    Google CEO Sundar Pichai in an exclusive interview to NDTV said that the company is now using India as a lab for world innovations. Giving away Google's next steps in India, Mr Pichai said the notes ban or demonetisation is a bold move and would accelerate digital change and his company may bring services on top of the UPI based system which will make digital payments easier.

    जिस यूपीआई  के की नींव पर डिजिटल इंडिया की जमीन बननी है, गुगल के सीईओ के मुताबिक उसे अभी आकार लेने में वक्त लगेगा और बहुआयामी कोशिश करनी होगी।जब संरचना है ही नहीं,नेट से बाहर है अधिकांश जनता,निराधार आधार के जोखिम और असुरक्षा के आधार पर नोटबंदी का यह करतब सीधे मास डेस्ट्राक्शन है।

    गौरतलब है कि गुगल सीईओ ने डिजिटल इंडिया के बारे में एनडी टीवी से कहा हैः

    On digital payments

    • When you drive these platform shifts, take some time for effects to play out, it's a multiplier effect.

    • I think it is a courageous move and it is a platform shift for the unplanned economy, trying to digitise how cash moves around and you know we are excited by it.

    • I think you know understanding what UPI is and the power of the stack, which is being built here, I think it is truly unique to India.

    • We are working on it hard. Anything we can do to make payments easier for users in India.

    • So we are trying to understand UPI stack, to bring some services, which which will make things better for Indian users in terms of digital payments.

    जिस भीम ऐप को लांच करके यूपी जीतने का ख्वाब संजो रहे हैं तानाशाह,उससे भले वे चुनाव जीत जाये,लेनदेन के लिए यह ऐप मुसीबत का सबब साबित हो रहा है।बाबासाहेब की खुली बेइज्जती पर बहुजन समाज खामोश है।भीम फर्जीवाड़ा है।

    पीएम नरेंद्र मोदी ने डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए BHIM (Bharat Interface for Money) मोबाइल एप लॉन्च किया है। BHIM मोबाइल एप सरकार के पुराने यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस) और यूएसएसडी (अस्ट्रक्चर्ड सप्लीमेंट्री सर्विस डाटा) का अपडेटेड वर्जन है जिसके जरिए डिजिटल पेमेंट लिया और भेजा जा सकता है। हालांकि इसके लॉन्च होने के कुछ दिनों के भीतर ही इस नाम के करीब 40 फेक एप Google play store पर अपनी जगह बना चुके हैं।

    इन नकली एप से बचकर रहें।

    बता दें कि फिलहाल भीम एप सिर्फ गूगल प्ले स्टोर पर ही मौजूद है और जल्द ही इसे iOS प्लेटफॉर्म पर भी लॉन्च किया जाएगा। इस डिजिटल पेमेंट एप को एंड्राइड यूजर प्ले स्टोर पर जाके डाउनलोड कर सकता है। आप जैसे ही प्ले स्टोर पर पहुंचकर भीम एप सर्च करते हैं तो सबसे ऊपर जो एप दिखाई देता है वही असली एप है लेकिन उसके नीचे *99#BHIM UPI, modi BHIM, BHIM payment जैसे नामों वाले करीब 40 नकली भीम एप भी आपको दिखाई देंगे।

    डफरशंख की घोषाणाओं के मुताबिक नोट वापस करने की अंतिम तिथि 31 मार्च से घटाकर 31 दिसंबर कर दिये जाने के बावजूद करीब 15 लाख करोड़ रद्द पांच सौ और हजार के नोट बैंकों में वापस चले आये हैं।बैंकों के चेस्ट में नत्थी आइकन से पाी पाई लेनदेन रियल टाइम में दर्ज हो रहा है।फिरभी न वित्तमंत्री और न रिजर्व बैंक के गवर्नर कितना कालाधन निकला,इसका कोई आंकड़ा देने को तैयार है।

    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया को धर्मनिरपेक्ष बताया है लेकिन हिंदुत्व को धर्म मानने से इंकार कर दिया है।ग्लोबल हिंदुत्व के एजंडे पर कोई अंकुश लगा नहीं है।नतीजतन गोपट्टी का महाभारत जीतने खातिर संघ परिवार फिर राममंदिर निर्माण किये बिना रामजी से दगा करते हुए साठ के दशक की गोमाता की शरण में है।

    गौरतलब है कि मोदी सरकार अब गाय- भैंसों को भी आधार कार्ड देने जा रही है। देश में पशुओं की गणना तथा दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए पशुपालन मंत्रालय ने यह तरीका खोजा है। लगभग एक लाख लोग पूरे देश के कोने-कोने में घूमकर पशुओं पर टैग लगाएंगे।

    आधार निराधार गाय भैंसों की सरकार,मनुष्यों की क्या दरकार?

    इसी सिलसिले में निवेदन है कि हम पहले से कह रहे हैं,लिख रहे हैं कि नस्ली नरसंहार का सफाया अभियान का आधार निराधार आधार है।नागरिकों की बायोमैट्रिक पहचान किसी सभ्य विकसित देश को मंजूर नहीं है।लेकिन नागरिकों की स्वतंत्रता,संप्रभुता,नागरिक और मानवाधिकार,उनकी संपत्ति,जमा पूंजी बचत इत्यादि के साथ उनकी निजता और गोपनीयता की धज्जियां उड़ाकर आंखों की पुतलियों और उंगलियों की छाप के गैरकानूनी असंवैधानिक कारोबार के जरिये देश नीलाम करने का काला धंधा सर्वदलीय सहमति से चल रहा है।आधार पहचान के जरिये कैशलैस लेनदेल शतप्रतिशत बिना किसी सुरक्षा गारंटी के कर लेने का कारपोरेटएकाधिकार हमला यह नोटबंदी है।कालाधन नहीं निकला है।इसलिए इसका हिसाब कोई दे नहीं रहा है।

    फाइनेंसियल एक्सेप्रेस के मुताबिक हकीकत यह हैः

    Indians have deposited nearly all the currency bills outlawed at the end of the deadline last year, according to people with knowledge of the matter, dealing a blow to Prime Minister Narendra Modi's drive to unearth unaccounted wealth and fight corruption, reports Bloomberg.

    Banks have received R14.97 lakh crore as of December 30, the deadline for handing in the old bank notes, the people said, asking not to be identified citing rules for speaking with the media. The government had initially estimated about R5 lakh crore of the R15.4 lakh crore rendered worthless by the sudden move on November 8 to remain undeclared as it may have escaped the tax net illegally.

    खबरों के मुताबिक नोटबंदी के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को 15 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट मिलने का अनुमान है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी के बाद बैन किए गए नोट बैंकों में जमा करने की समय सीमा खत्म होने यानी 30 दिसंबर 2016 तक 97 फीसदी ओल्ड करंसी बैंकों में वापस आ चुका है।हालांकि सरकार व आरबीआई ने इस बारे में आधिकारिक आंकड़ा अभी तक जारी नहीं किया है। आधिकारिक आंकड़े दस दिसंबर तक हैं, जिनमें आरबीआई ने कहा कि 12.44 लाख करोड़ रुपये राशि के पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट वापस आ गए।

    गौरतलब है कि नोटबंदी के ऐलान के समय अर्थव्यवस्था में 500 और 1000 रुपये के नोटों की शक्ल में करीब 15.4 लाख करोड़ रुपये की रकम थी। सूत्रों के अनुसार, 30 दिसंबर 2016 तक इसमें से 14.97 लाख करोड़ रुपये बैंकों में वापस आ चुकी थी।

    केंद्र सरकार ने शुरुआत में अनुमान लगाया था कि नोटबंदी के फैसले के बाद टैक्स चोरी कर जाम किए गए 5 लाख करोड़ रुपये (कालाधन) वापस ही नहीं आएंगे। नोटबंदी के फैसले से ये बेकार हो जाएंगे।अगर वर्तमान हालात की बात करें तो 97 फीसदी 500 और 1000 के पुराने नोट बैकों में वापस आ चुके हैं। यह आंकड़ा लगभग 100 फीसदी तक भी जा सकता है क्योंकि 31 मार्च तक एनआरआई और नोटबंदी के समय विदेश गए भारतीय आरबीआई में पुराने नोटों को जमा करा सकते हैं।

    आधार निराधार गाय भैंसों की सरकार,मनुष्यों की क्या दरकार?

    यूपी जीतने के लिए देश की आम जनता पर सर्जिकल स्ट्राइक का नतीजा यह है कि चुनाव सर्वे में अभी से संघ परिवार का परचम लहराने लगा है।चुनाव से ऐन पहले परंपरा तोड़कर बजटपेश करने के फैसले के बाद अब गायपट्टी में लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया दोनों के हिंदुत्वकरण का चाकचौबंद इंतजाम है।नोटों की बरसात अलग से जारी है।इंसानों से नागरिकता छीन रही है।इंसानों से हकहकूक छीने जा रहे हैं।नागरिकऔर मानवाधिकारों की हत्या हो रही है।गाय भैंसों की नागरिकता के लिए लिए उन लोगों को 50 हजार टैबलेट भी सौंप दिए गए हैं। सरकार का प्लान है कि इस साल लगभग 88 मिलियन गाय और भैंसों के कान में यूआईडी नंबर सेट कर दिया जाएगा। इससे सभी दुधारु पशुओं की अपनी अलग पहचान होगी और उनकी सेहत का ख्याल रखने के लिए आईडी नंबर का सहारा लिया जाएगा।

    टैग की मदद से पशुओं पर नजर रखने में आसानी होगी। जिससे उनकी दवाएं, टीकाकरण समय-समय पर किया जा सकेगा। माना जा रहा है कि इससे 2022 तक डेयरी किसानों की आय लगभग दोगुनी हो जाएगी। प्रत्येग टैग सरकार को आठ रुपए का पड़ेगा।उस टैग को ऐसे मेटेरियल से बनाया जा रहा है जिससे पशु को कोई नुकसान नहीं होगा। टैग लगाने गया शख्स उसे लगाकर टैग के नंबर को अपने टैबलेट के ऑनलाइन डाटाबेस में ऐड कर लेगा। इसके साथ ही पशु के मालिक को उससे जुड़ा एक हेल्थ कार्ड दिया जाएगा।

    नोटबंदी के बाद जारी हुए नए नोटों को लेकर कई शिकायतें सामने आ चुकी हैं, लेकिन इस बार बैंक ने किसान को ऐसे नोट थमा दिए जिसमें गांधी जी गायब थे। मध्य प्रदेश में एक बैंक द्वारा किसानों को बिना महात्मा गांधी की तस्वीर वाले 2000 रुपए के नोट दिए जाने का मामला सामने आया है। किसानों को एसबीआई ब्रांच की ओर से दिए गए नोटों में गांधी जी।

    मामला मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले की बड़ोदा तहसील का है। फर्जी नोट समझकर किसान हैरान हो गए। हालांकि बाद में बैंक कर्मचारियों ने बताया कि ये नोट असली हैं, लेकिन इनकी प्रिंटिंग सही से नहीं हुई है।

    लक्ष्मण मीणा और गुरमीत सिंह नाम के दोनों किसानों ने बैंक से आठ-आठ हजार रुपए निकाले थे। दोनों किसानों को बैंक की ओर से दो-दो हजार रुपए के चार-चार नोट दिए गए। बिना नोटों को जांचे परखे इन्होंने अपने पास रख लिए। बैंक से बाहर आकर जब इन्होंने नोट देखे तो दंग रह गए। पास में मौजूद लोगों ने जब यह देखा तो वे भी हैरान थे कि बिना गांधी जी की तस्वीर के नोट कैसे छप सकता है।

    हालांकि जब यह लोग वापस बैंक में गए तो बैंक अधिकारियों ने पूछताछ के बाद नोट वापस ले लिए। भारतीय स्टेट बैंक के एक अधिकारी आर के जैन का कहना है कि, "यह जाली नोट नहीं हैं। इनमें मिसप्रिंट हुई है, नोटों को जांच के लिए भेज दिया गया है।"

    ई-वॉलेट में सुरक्षा का हवाला देकर कल एसबीआई ने नेटबैंकिंग के जरिए वॉलेट रीचार्ज करने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद सीएनबीसी-आवाज़, अलग-अलग शहरों में केस स्टडी के जरिए ये जानने की कोशिश कर रहा है कि क्या वाकई ई-वॉलेट सुरक्षित हैं? क्या ई-वॉलेट में पैसा रखना सही है? कहीं कंपनियां अधूरी तैयारी के साथ तो काम नहीं कर रहीं। इसकी पड़ताल करते हुए हमें मिले दिल्ली के सीए राजीव सूद। राजीव सूद पेटीएम का इस्तेमाल करते हैं और कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपने पेटीएम वॉलेट में 1000 रुपये क्रेडिट कार्ड से ट्रांसफर किए। लेकिन ये पैसे कहां चले गए, इसका अब तक हिसाब नहीं हैं।

    सीएनबीसी-आवाज़ की पड़ताल के इसी क्रम में हमें दूसरा उदाहरण मिला नागपुर में। यहां भी पेटीएम वॉलेट को लेकर ही दिक्कत थी। दरअसल, रिषभ इंफोटेक के मालिक राजेश जवर ने करीब 15 दिन पहले अपने बैंक अकाउंट से 4,000 रुपये पेटीएम वॉलेट में ट्रांसफर किए। लेकिन राजेश न कोई ट्रांजैक्शन कर पा रहे हैं और न इन्हें पैसा रिफंड मिल रहा है।

    इस पड़ताल में सीएनबीसी-आवाज़ ने मुंबई के ऐसे दुकानदारों से भी बात की, जो पेटीएम इस्तेमाल करते हैं। इनको भी ट्रांजैक्शन के बाद मैसेज न मिलने और वॉलेट का पैसा वापस अकाउंट में न ट्रांसफर हो पाने की शिकायत थी। रेस्टोरेंट संचालक, शंकर का कहना है कि वॉलेट का पैसा पेटीएम में ट्रांसफर नहीं होता और फोन करने के लिए सीधे कोई कस्टमर केयर नंबर नहीं है।




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    Standard of Education in Primary, Secondary and Higher Secondary Schools in the State of West Bengal

                                                                                                                    Col. Bhupal Lahiri (Retd.)

    What makes a country great?  Is it the number of educated people or quality of education? How is it, in this fast progressing world, seventy long years after independence,  except for producing more children, we have lagged behind in almost all the fields including good standard of education?

    I often pondered over such questions but found no convincing answer. My search for simple and straight forward answers led me to piles of complex mathematical figures rolled out by statisticians or labyrinth of arguments woven by the Pundits. The more I tried to dig, I sank deeper into the quick sand of confusion. This is the state, I suppose, the Pundits finally attain in life, a condition described by our ancient saints as Moksha.

    My query about the standard of education let me to certain startling facts and I was in for a shock when I read the reports published by some reputed international organisations. One such organisation commented, it will take at least 50 years for India to attain the minimum standard. A survey recently conducted by an English  News Television Channel about the standard of education in primary schools in our villages shows that students fared very badly in mock tests conducted by them. You have to be a four star astrologer to predict the exact year by which we shall be able to reach the base camp of education while trying to climb the peak of excellence. And taking into account the present state of affairs and the visible theatrics as well as high decibel noises generated by the politicians in power, it does not demand the skills of a rocket scientist engaged in calculating the time required for journey to Mars, to be able to safely assume that it will take very many years before we achieve a minimum standard.

    Here arises the question, what has led to this dismal state? Couldn't we have done better? How will the problems related to the low standard presently being faced by the schools will ever get resolved?

    The problems plaguing the issue of standard of education are very many; the primary ones are deficiency of teachers, quality of teachers and their irregular attendance,  poor infrastructure etc. etc.

    The infrastructure which we inherited at the time of independence when the British left, was not too bad, definitely much better than British Colonies in Africa and South Asia.  It was not very difficult to build up on it gradually if a sincere effort was made by successive governments from day one and by this time, we could have easily reached the desired standard. But this was not done, why?

    The main reason put forth by the Pundits is that we are a poor nation and do not have sufficient  resources. This argument is nothing but a trash which may not deserve any place other than a trash can. How could the Third World Countries like Bosnia, Nigeria, Uganda or Kenya attain better standards after their independence? Are they very rich?

    The real reason is that, successive governments did not consider education as a priority in their development programmes . And you know why.

    For all political parties, without any exception, which captured the seat of power during the last 70 years, allocation of priorities in roll over five year plans as well as earmarking of resources for implementation of development works, depended only on a single factor, political gain.  Though the architects of our constitution visualised our country as a welfare state, gain for the poor  people, in real terms, has never been the priority for any government.

    From day one after independence, it was crystal clear to the politicians that giving priority to education and allocation of more funds will not fetch them proportional dividends in terms of increase in number of votes. Conversely, they preferred that a vast population of the country should remain uneducated. They framed the education policy in such a manner that the students who perform poorly in school examinations, are debarred from entry into colleges. A little analysis will reveal that this axe was primarily designed for the students studying in village schools with low standards. In this manner, they conjured, demand for jobs for educated and highly skilled will be less and they will have enough uneducated unemployed people , particularly in the villages, to participate in their election rallies and full up the Maidans like Brigade Parade Ground with million heads.

    It is political calculation and not scientific study or evaluation which acts as overriding factor in the matter of determination of national priority. While allocating funds, politicians take into consideration the aspects of visible and invisible gains, as perceived by voters. They are somehow convinced, visible and immediate gains like better roads, street lighting or piped water supply are appreciated more by voters compared to long term or invisible gains. For example, providing cheap ration is considered more beneficial compared to filling up the deficiency of teachers in schools, the effect of which is not visible to the public immediately. I am yet to see an election manifesto where any political party or a candidate promises to improve the standard of education in schools.     

    Thus successive governments made great announcements like Sarva Shiksha Avijan amidst lot of fanfare and drum beating just to impress the world, but did little to improve the standard of education in schools, particularly those located in suburban areas and far flung villages. In stead, they encouraged businessmen and party members with tons of black money to enter into the lucrative business of education and set up sophisticated private schools in cities and towns with high capitation fees to cater for the children of urban elite. The standard of education in most of these schools is undoubtedly high compared to Govt. schools in villages, but well beyond the reach of common people.

    A divide has thus been created by the government, of course by design, where children of the rich and privileged will have first class education in premiere private schools in cities and towns, but children of the poor mostly residing in villages will have access to only third class education in government schools. Therefore it is natural, students passing out of schools with low standard will find it extremely difficult to compete with students of elite schools, in various competitive examinations.

     Out of the three main factors affecting the standard of education such as deficiency of teachers, quality of teachers and poor infrastructure, let's take the first one i.e. deficiency of teachers.  There is a huge deficiency of teachers, on the average about forty to fifty percent and in some schools it is as high as eighty percent.  I will give few examples.  Nfarganj Baidyanath Bidyapith, a high school in Basanti Block with two thousand four hundred students, shortage of teachers is twenty seven, out of seventy two authorised. In Nafarganj No.4 Secondary School, there is not a single teacher for classes five to seven.

    During the last several years, West Bengal Govt. have not recruited a single teacher with some pretext or other, though several new schools have been opened.  And during this time, they have entangled themselves in various problems including a number of court cases. Even the ace Astrologers and Tantriks are unable to predict as to when such cases will be closed. As per the statement of Chief Minister of the State, there are two villains in the piece simultaneously shoving spokes in their wheel of progress. The first one is the government at the centre and second one is the opposition party in the state. A news item appearing in 'The Telegraph' on 27 August 2016 is relevant and I quote:

    Calcutta, Aug. 26: Chief minister Mamata Banerjee today said "unnecessary cases" filed by "a handful of politicians" had caused the delay in the recruitment of primary school teachers.

    The comments came on a day Calcutta High Court said there must not be further delay in the recruitment of teachers and that the verdict on the case filed by some trained candidates who are yet to secure jobs would be delivered on August 31.

    Speaking at the foundation day programme of the Trinamul student wing on Mayo Road, Mamata said: "A handful of politicians have filed cases against the recruitment (process) because they want nothing good to happen. The same people are now demanding answers on why teachers are not getting jobs.... Ask them, why did you file the 'political interest litigations'?"




    "If I try to build a road, they move court. If I try to create jobs, they move court. If I try to do anything for development that would benefit people, they move court. This has to stop," she added.

    The last Teacher Eligibility Test (TET) at the primary level was held in October 2015 with the aim of filling up 30,000 vacancies. Around 20 lakh candidates had taken the exam. However, recruitments could not be made because of court cases alleging irregularities and a question paper leak. The last time recruitments were made was on March 31, 2013.

    Later today, the case filed by three candidates who had obtained certificates from Primary Teachers Training Institutions, a recruitment pre-condition laid down by the Centre, came up for hearing before the court of Justice C.S. Karnan

    Justice Karnan said: "There should be no further delay in dissolving the matter. Because of the delay in appointments, students are suffering. So, I want to end the case by this month. I will deliver my verdict on August 31."

    Lawyers representing the state filed an affidavit today, stating the government would give priority to those candidates who have passed the TET and have either a Primary Teachers Training Institution certificate or a DLed degree.

    "If any posts are vacant after that, then only will the untrained TET-qualified candidates be recruited," the affidavit said.

    Soumen Dutta, the lawyer representing the petitioners, sought the court's permission to file an affidavit to counter the proposal. The judge agreed to the request.

    CPM MLA Sujan Chakraborty alleged the government was not recruiting teachers because it would have to pay them salaries.

    "The government is not sincere about recruiting teachers as it would have to pay them salaries.... Instead of paying salaries, the government is interested in spending on fairs," Chakraborty said, adding that his party did not file any case.

    Unquote.

    It is not a rare experience, political parties declare popular policies just before elections to garner more votes but are never serious to implement them. Afterwards when nothing happens, they fabricate reasons to convince the public that they are indeed trying their best to fulfill their promises, but there are extraneous reasons beyond their control which are preventing them to do so. These extraneous reasons are so skillfully crafted and fabricated by highly intelligent brains hired by the powerful politicians that a common man on the street will never suspect the good intention of the political party making such announcements. At the worst, an innocent public may brand the party in power as inefficient or a bunch of incompetent fools never realising that they have been tricked by highly competent brains, specialised in the field deceiving innocent and unsuspecting  public.   

    We have also seen that the political parties in power, have gradually destroyed the other pillars of democracy as defined in our constitution and have appropriated all the powers unto themselves.  And it will be a rather day dream, if we imagine that they are going to give up the power on their own which they have so painstakingly acquired and concentrated in their hands! Is there anyone who can put pressure and force them to change their ways?

    Let us turn our eyes to the essence of our democracy, as spelt out in our constitution. It is for the people and by the people. But, except for casting their votes once in five years, most people in our country have not been exercising their democratic rights. In practice, over the years, they have been eventually converted into robotic voting machines. Simply put, by not exercising their rights for long seventy long years, ultimately the people of this largest democracy in the world  have become totally powerless and thus have lost the ability to bring about any pressure on the political parties in power, forcing them to change or set the wrong things right. In spite of all the pains of suffering and deprivation, they are stuck to their age old belief that the sufferings they are presently undergoing is because of their destiny etched on their forehead at the time of their birth or due to Karma in their previous birth.  They sincerely believe, it is either the Sarkar (Govt.) or God (Lord Krishna of Bhagabat Gita or Allah) who can alleviate their sufferings and they have no role, whatsoever, to play in resolving the problems, as they are powerless.  In the extreme, few of them even believe that wearing pendants given by astrologers, stuffed with holy ash will help their children to obtain excellent results in examinations, even if there are no teachers in the school and no classes are held throughout the academic year.

    So much about the role and power of our citizens and their ability to bring about pressure on the government thus forcing them to improve the educational standard. Let us now turn our eyes to other three agencies, who we believe, can play a positive role in the matter.  The first one, out of these is the Judiciary, one of the principal Pillars of our Democracy.

    When it comes to safeguarding the interest of common citizens of our country, the role of Judiciary has been clearly defined in our constitution. Since standard of education has a direct bearing in shaping the future citizens of our country and the elected political parties have undoubtedly failed to discharge their responsibility in the matter of achieving the required standard in schools and not recruited a single teacher during last so many years, Judiciary ought to have taken suo moto cognizance of the grave situation and done something concrete to mitigate the problem.  A pro-active stance on the part of Judiciary was expected because the matter is of national importance with far reaching consequences.  Judiciary could have termed the delay and vacillation by the political parties as criminal negligence, and could have acted strongly and promptly rather than reprimanding the government and asking them to submit affidavits during endless hearing sessions and thus allowing the matter to drag on indefinitely. It appears that Judiciary have played safe and have avoided any confrontation with the political class in power. Obviously, this is a direct fall out of the political establishment becoming too dominant and consequently weakening of the Judiciary which in turn has greatly contributed to disturbing the equilibrium of our monolithic democratic structure.  Considering the present situation and in light of our experience in the recent past, we may not expect any intervention by the Judiciary in near future, lest they are blamed by the polity for alleged over-activism.

    The other agency, which could have put some pressure are the teachers serving in our primary, secondary and higher secondary schools. Acute shortage of teachers is undoubtedly subjecting them to tremendous amount of strain, which is ultimately affecting the standard of education. They should have fought for it, not only for their own sake, but for the future of students and the country. Except for few protests here and there, they didn't put up a strong fight. But why?

    The straight forward answer is, they are scared. We must realise, in the present democratic set up, the atmosphere has been vitiated by political parties to such an extent, any person raising a voice of protest, is immediately branded as enemy of the state. In spite of great suffering the teachers undergo every day, you don't expect them to act as emotional fools and sacrifice their career or even their life.

    Thus in the present situation, unless some miracle happens, I do not foresee any possibility of filling up the vacancies of teachers immediately and I am not prepared to hazard any guess as to how long it is going to take.

    So far as infrastructure in suburban and village schools is concerned, the picture is dismal with insufficient class rooms, very few furniture, no electricity, no fan etc. I can give thousand and one examples of schools bringing out the present state of affairs, but will restrict myself to only one or two. In the whole of Basanti Block in South 24 Parganas, out of a total of TWENTY TWO High Schools, Science Subjects are taught only in TWO schools in Classes X to XII, because there are no qualified teachers as well as properly equipped laboratories. Isn't it shocking? Located in the same Block, Nafarganj Baidyanath Bidyapith with two thousand four hundred students, there is no infrastructure for teaching Science Subjects. As per my calculations, approximately ninety five percent students studying in different schools in Basanti Block are being deprived of an opportunity to study science subjects. We must realise that these students, so deprived, will never be able to appear in Joint Entrance Examinations and become doctors, engineers or scientists in future. Above all, they will never develop a scientific temperament in their life. I am certain, situation in other Blocks as well as other Districts of the State is not very different. In this age of tremendous progress in science and technology, isn't it a matter of shame?

    How a teacher in such schools will ever have the courage in asking his/her student as to what is his/her ambition in life? How will he/she be able to face a student when he/she replies, I want to be a rocket scientist like Abdul Kalam or a scientist like Jagadish Chandra Bose or a doctor like Bidhan Chandra Roy? Though it will be nothing but a day dream to imagine that each one of these students will become a world famous scientist, shouldn't we at least expect them to develop a scientific temperament, which is so very important for in shaping the future citizens of our nation.    

    Bluff and deceit perpetuated and practiced by those who are at the helm of affairs and a total control all our thoughts and activities day in and day out, have permeated so deep into our bone marrow and have rendered us so insensitive that we no longer feel insulted and hang our heads in shame when a student in a village school stands up and asks, sir, what is my fault that I will never get a chance to become a doctor or an engineer? And while fabricating a deceitful answer interwoven with vague philosophical complexity, we would often lull ourselves into believing that we have been able to impress the student so much, henceforth he is going to respect us like a God, and chant the holy mantra while prostrating at our feet, Guru Brahma, Guru Bishnu, Guru hi Parameshwara ......

    In this scenario, reason for occasional outburst of anger and violence by students, to the extent of manhandling of teachers which we witness these days, is not difficult to explain. A teacher can never teach anything unless students respect him from the core of their heart, and that respect can only be gained by being truthful and transparent, and certainly not through deceit or bluff.    

    It is not only poor infrastructure or inadequate number of teachers, but also quality of the teachers which is also affecting the standard of education. But  what is the reason for this poor quality of teachers? Couldn't we get better teachers in this vast country with a population of 125 crores? Certainly we could have, if we tried. But why didn't we try?

    The answer is not very difficult to find. It is because we left the future of our students as well as the serious business of nation building entirely at the hands of incompetent and selfish politicians, totally engrossed in a singular mission of acquiring more power and more money for themselves.

    Let's see how they made a hash of the primary and secondary education system. In their domain of scanty knowledge they believe, it is only the pilots flying their air planes must have the required aptitude to safely take off or land the air plane or their marks man NSG to hit the bull at the practice firing range.

    It is beyond their ability to comprehend that someone with very good academic record and excellent communication skills may not have the aptitude for teaching, particularly, at primary and secondary school levels. A close look at the existing examination system for recruitment of teachers will prove the point.

    And after recruitment, teachers are neither put through any orientation course or upgradation programme and straightway sent to schools to teach. How can we expect them to deliver quality education without training or acquiring the required teaching skill? I must add here with humility that there are exceptions. But can we count on few exceptions for a whole system to run efficiently?

    Acquiring  knowledge and skill is a continuous process and like any other profession, this is equally applicable to teachers. Particularly in this fast changing world of science and technology, where new methods of learning are being innovated and introduced every day, if the teachers are unable to keep themselves abreast with the latest changes and innovations, they are bound to become outdated and ineffective in no time.

    Apart from teaching skill, the question of dedication and motivation are extremely important, particularly now, when anything and everything other than material gain, such as ideals, ethics or morality have lost their importance in our daily life. Thus if the teachers today do not follow the examples of their predecessors in sacrifice everything for the sake of  their students, they cannot be blamed. I strongly feel, until and unless the overall environment of the society, including the character of  all- pervasive dirty politics is changed and high moral values restored among all sections of the society, expecting teachers alone to behave selflessly like Dronacharya, is nothing but asking for the moon.

    When we get the news that countries like Kenya are taking long strides in improving the standard of education by adopting innovating techniques like e-learning, we certainly feel sad. Though the present picture is rather depressing with no solution to the problem in sight, we shouldn't simply sit idle waiting for mercy to be showered from the heavens or from the Sarkar. We should keep on trying small little things, with whatever limited resource each one of us have.

    Authorities in the Govt. Education department haven't paid adequate attention while devising the syllabi so that the integration between primary to secondary as well as secondary to higher secondary is seamless and there are no gaps in the standards. At present, there being wide gaps, students find it extremely difficult to cope up with the syllabus during their transition from primary to secondary or secondary to higher secondary.

    I have seen students struggling with English syllabus and unable to cope up with the English lessons which they find too difficult when promoted from Class Two to Class Three. This is because English is not taught in Classes One and Two and students start learning English only in Class 3. What is the problem of including English in the syllabus of Classes One and Two so that they acquire adequate knowledge in the subject when promoted to Class Three from Class Two? Though these are very minor issues which can be resolved very easily by the concerned authorities of Education Department and does not call for much additional resource, their lack of interest is clearly demonstrated by their inaction, in spite of prodding and nudging.

    The other problem affecting the standard of education is the present method of evaluation of  performance by the students. There is no set standard, and it is now being done in an ad hoc and arbitrary manner. As I just said, not much effort or resource is required on the part of Education Department in bringing about the changes in the syllabus and set the anomalies in evaluation system right and the corresponding benefit will be huge. But who can wake you up when you sleep with eyes wide open!

    I shall bring to fore another small issue with a big impact. Unless the school children, particularly in primary classes are provided with sufficient nutrition, they will suffer ill health and will not be able to absorb education with due attention, however high standard the education imparted may be. Nutritional value of free mid day meal now being provided in schools is so low, that it is a sure method of producing millions of poor children studying in village schools with under-developed brains and weak bodies. And the Govt. surely knows, a vast section of rural population with under developed brain and body shall never be able to acquire higher skills or higher education, and thus never be qualified to demand jobs requiring higher skills or education. They are also aware that their slogan of Skill India is meant only for the urban rich who can afford food with adequate nutrition for their school going children and not depend on midday meals unlike a vast population living in far flung villages.


    Sources (Enclosed for ready reference in 16 pages )

    1. Pratham's Annual Status of Education:2013 Report

    2. India to take 126 years to reach global education standards: A Report by Assocham

    3. Sharp decline in education standard across country: Pratham's Annual Status of Education Report (Rural) 2012.

    4. India will be late by 50 years in achieving education goals: UNESCO

    5. Shortage of teachers in primary and secondary schools: Govt. of India, Ministry of HRD  

          

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    एकदम अकेली हो गयी शबाना।

    ओमपुरी का अवसान सांस्कृतिक आंदोलन के कोरे कैनवास को बेपरदा कर गया।

    पलाश विश्वास

    शबाना आजमी की तरह हमारा ओम पुरी के साथ लंबा कोई सफर नहीं है। ओमपुरी के निधन के बाद शबाना स्तब्ध सी हैं और मीडिया को कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है।तडके सुबह ये खबर आई कि बॉलीवुड अभिनेता ओमपुरी को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी है।

     परिवार से जुड़े सूत्रों ने कहा, आज सुबह दिल का तेज दौरा पड़ने से उनका उपनगरीय अंधेरी स्थित अपने घर पर निधन हो गया।66 साल के ओमपुरी के निधन की खबर से पूरा बॉलीवुड,रंगकर्मी दुनिया अब सन्न हैं।

    ओमपुरी का पूरा नाम ओम राजेश पुरी है। वह 66 वर्ष के थे। ओम पुरी का जन्म १८ अक्टूबर 1950 में हरियाणा के अम्बाला शहर में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने ननिहाल पंजाब के पटियाला से पूरी की। 1976 में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ओमपुरी ने लगभग डेढ़ वर्ष तक एक स्टूडियो में अभिनय की शिक्षा दी। बाद में ओमपुरी ने अपने निजी थिएटर ग्रुप "मजमा" की स्थापना की। ओम पुरी ने नये सिनेमा के दौर में सुर्ख़ियों में आए थे।

    हाशिमपुरा मलियाना नरसंहार के बाद नई दिल्ली से पैदल चलकर आजमगढ़ की बेटी शबाना आजमी ने राजा बहुगुणा,शमशेर सिंह बिष्ट,शंकरगुहा नियोगी जैसे प्रिय जनों के साथ मेरठ पहुंचकर जनसभा को संबोधित किया था।

    तब मंच पर शबाना आजमी से संक्षिप्त सी मुलाकात हुई थी।लेकिन ओम पुरी या नसीर,या गिरीश कर्नाड,श्याम बेनेगल,गोविंद निलहानी,स्मिता पाटिल,दीप्ति नवल,अमरीश पुरी,नाना पाटेकर जैसे समांतर फिल्मों के कलाकारों से हमारी कोई मुलाकात नहीं हुई।

    बाबा कारंथ ने युगमंच के साथ काम किया है।कोलकाता में गौतम घोष से भी मिले हैं।रुद्र प्रसाद सेनगुप्त से भी अंतरंगता रही है।संजना कपूर और नंदिता दास से भी संवाद की स्थिति बनी है।

    फिरभी बिना मुलाकात हम इन लोगों से किसी न किसी तरह जुड़े हैं।वे गिरदा की तरह किसी न किसी रुप में हमारे वजूद में शामिल हैं।

    मृणाल सेन और ऋत्विक घटक की फिल्मों के साथ सत्तर के दशक में लघु पत्रिका आंदोलन और समांतर सिनेमा के साथ रंगकर्म से हमारा गहरा ताल्लुकात ही हमारी दिशा तय करता रहा है।

    टैगोर,नजरुल,माणिक,शारत,भारतेंदु,प्रेमचंद,मुक्तिबोध के साथ साथ कालिदास,शूद्रक,सोफोक्लीज और शेक्सपीअर के नाटकों से हमारा सौंदर्यबोध बना है।

    नेशनल स्कूल आफ ड्रामा में हमारे नैनीताल के रंगकर्मियों की मौजूदगी इतनी प्रबल रही है कि कभी उसे नैनीताल स्कूल आफ ड्रामा कहा जाता है।

    हमारे पसंदीदा हालिया कलाकार इरफान खान,हमारे अजीज दोस्त इदरीस मलिक की तरह ओम पुरी भी एनएसडी से जुड़े हैं।एन एस डी के बृजमोहन शाह,आलोकनाथ और नीना गुप्ता युगमंच के साथ काम करते रहे हैं।

    अस्सी के दशक में जब समांतर सिनेमा की यादें एकदम ताजा थीं,शबाना और स्मिता परदे पर थीं,अचानक स्मिता पाटिल के निधन पर गहरा झटका लगा था।उसी के आसपास श्रीदेवी और कमल हसन की बेहतरीन फिल्म सदमा देखने को मिली थी।

    श्रीदेवी,माधुरी या तब्बू या प्रियंका या दीपिका के लिए शबाना और स्मिता की तरह श्याम बेनेगल जैसा निर्देशक नहीं था।कोई ऋशिकेश मुखर्जी,बासु भट्टाचार्यऔर गुलजार भी नहीं। फिरभी वह तमस का समय रहा है।जो रामायण महाभारत के साथ राममंदिर आंदोलन में समांतर सिनेमा के साथ साथ लघु पत्रिका आंदोलन और भारतीय कला साहित्य सांस्कृतिक परिदृश्य का भी अवक्षय है।केसरियाकरण है।

    बांग्ला फिल्मों की महानायिका सुचित्रा सेन हो या चाहे बालीवूड की बेहतरीन अभिनेत्रियां काजोल, कंगना,  तब्बू इनके लिए समांतर सिनेमा का कोई निर्देशक नहीं रहा है।फर्क क्या है,ऋत्विक घटक की फिल्मों मेघे ढाका तारा और कोमल गांधार की सुप्रिया चौधरी को देख लीजिये और बाकी उनकी सैकड़ों फिल्मों को देख लीजिये। सत्यजीत राय की माधवी मुखर्जी को देख लीजिये।सिर्फ शबाना अपवाद हैं,जो हर फिल्म में हर किरदार के रंग में रंग जाती हैं।अब भी मशाल उन्हीं हाथों में है।

    काजोल जैसी अभिनेत्री की एक भी क्लासिक फिल्म उस तरह नहीं है जैसे नर्गिस की मदर इंडिया।समांतर फिल्मों के अवसान का यह नतीजा है मुकतबाजारी वाणिज्य में हमारी बेहतरीन मेधा का क्षय है।

    अमरीश पुरी के निधन से झटका तो लगा लेकिन वे इस हद तक कामर्शियल फिल्मों के लिए टाइप्ड हो गये थे कि सदमा की हालत नहीं बनी।

    समांतर फिल्मों के अवसान,श्याम बेनेगल के अवकाश और स्मिता के निधन के बाद भी शबाना आजमी,ओम पुरी,नंदिता दास के अभिनय और बीच बीच में बन रही नान कामर्सियल फिल्मों,गौतम घोष की फिल्मों के जरिये हम सत्तर के दशक को जी रहे थे।इधर बंगाल में  नवारुण भट्टाचार्य के कंगाल मालसाट और फैताड़ु का फिल्मांकन भी कामयाब रहा है।

    इसके अलावा हमारे मित्र जोशी जोसेफ और आनंद पटवर्धन ने वृत्त चित्रों को ही समांतर फिल्मों की तरह प्रासंगिक बनाया है।

    इस बीच प्रतिरोध का सिनेमा भी आंदोलन बतौर तेजी से फैल रहा है।

    ओम पुरी हमसे कोई बहुत बड़े नहीं थे उम्र में।सत्तर के दशक से कला फिल्मों से लेकर वाणिज्य फिल्मों,हालीबूड ब्रिटिश फिल्मों में लगातार हम उनके साथ जिंदगी गुजर बसर कर रहे थे और अचानक जिंदगी में उनकी मौत से सन्नाटा पसर गया है।

    शबाना आजमी या श्याम बेनेगल या गिरीश कर्नाड नाना पाटेकर को कैसा लग रहा होगा,हम समझ रहे हैं।गौतम घोष और रुद्र प्रसाद सेनगुप्त भी उनके मित्र थे।

    करीब तीन सौ फिल्मों में काम किया है ओमपुरी ने।इनमें बीस फिल्में हालीवूड की भी हैं।फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से सिनेमा का प्रशिक्षण लेने वाले ओमपुरी ने दर्जनों हिट फिल्मों में काम किया। अर्धसत्य (1982), मिर्च मसाला (1986) समेत कई फिल्मों में उनके अभिनय को बेहद सराहा गया।

    हरियाणा के अंबाला में जन्मे ओमपुरी ने बॉलीवुड के साथ-साथ मराठी और पंजाबी फिल्मों में भी अभिनय किया। वह पाकिस्तानी, ब्रिटिश और हॉलीवुड फिल्मों में भी पर्दे पर नजर आए। सिनेमा में उत्कृष्ठ योगदान के लिए उन्हें पदमश्री से भी सम्मानित किया गया।

    फिल्म अर्धसत्य के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी नवाजा गया।

    इप्टा आंदोलन,सोमनाथ होड़,चित्तोप्रसाद के भुखमरी परिदृश्य से बारतीय रंगकर्म और भारतीय सिनेमा का घना संबंध रहा है।

    इप्टा अब भी है।वह असर नहीं है।

    नोटबंदी के परिदृश्य में फिर बंगाल की भुखमरी की वह काली छाया गहराने लगी है।इप्टा की वह भूमिका दीख नहीं रही है।न मीडिया,न प्रिंट,न माध्यम,न विधा,न साहित्य और न संस्कृति में और न ही राजनीति में इस कयामती सच और यथार्थ का कोई दर्पण कही दीख रहा है।मनुष्यता के संकट में सभ्यता का अवसान है।

    दूसरे विश्वयुद्ध की वजह से भारी मंदी और कृषि संकट की वजह से बंगाल में भुखमरी हुई थी।आज भारत में कृषि और कृषि से जुड़े समुदायों के कालाप कारपोरेट हमला सबसे भयंकर है।नोटबंदी के बाद जनपद और देहात कब्रिस्तान हैं तो किसानों के साथ साथ व्यवसायी भी कंगाल हैं।नौकरीपेशा मर मरकर जी रहे हैं।

    हमारे पास अखबार नहीं हैं।

    हमारे पास पत्रिकाएं नहीं हैं।

    हमारे पास नाटक और रंगकर्म नहीं हैं।

    हमारे पास टीवी नहीं है।

    हमारे पास सिनेमा नहीं है।

    साहित्य नहीं है।

    राजनीति हमारी नहीं है और न हमारी राजनीति कोई है।

    निरंकुश सत्ता के हम प्रजाजन गायभैंसो से भी बदतर हैं।

    गायभैंसो की तरह हम सिर्फ आधार नंबर हैं।

    फर्क यही है कि ढोर डंगरों के वोट नहीं होते और हमारे सिंग नहीं होते।

    हमारी कोई संस्कृति नहीं है।

    हमारा कोई इतिहास नहीं है।

    हमारी विरासत से हम बेदखल हैं।

    हम कायनात से भी बेदखल हैं।

    कयामत के वारिशान हैं हम।

    मोहनजोदोड़ो और हड़पप्पा की तरह हमारा नाश है।सर्वनाश है।

    साम्राज्यवादी औपनिवेशिक शासन की वजह से देशज आजीविका,रोजगार और उत्पादन प्रणाली तहस नहस हो जाने की वजह से भारत और चीन की भुखमरी थी।

    विडंबना है कि इस महादेश के दोनों नोबेल विजयी अर्थशास्त्री डां.अमर्त्य सेन और मोहम्मद युनूस को मुक्त बाजार विश्व व्यवस्था की वकालत करते हुए साम्राज्यवादी हाथ नहीं दिखे।

    इप्टा ने भारतीय जनता का सभी माध्यमों में और विधाओं में जिस तरह प्रतिनिधित्व किया,उसी परंपरा में लघु पत्रिका आंदोलन,वैकल्पिक मीडिया और समांतर सिनेमा की विकास यात्रा है।

    हमने शरणार्थी कालोनी के अपने बचपन में भारत की आजादी के जश्न से ज्यादा भारत विभाजन का शोक अपने लोगों के लहूलुहान दिमाग में सिखों, पंजाबियों,वर्मा के शरणार्थियों और बंगाली शरणार्थियों के नैनीताल की तराई में एक बड़े कैनवास में देखा है,जिसे जीते हुए तमस का वह टीवी सीरियल है,जिसमें भारत विभाजन की पूरी साजिश ओम पुरी ने अपने किरदार में जिया है।

    मेरठ में मलियाना और हाशिमपुरा नरसंहार,सिखों के नरसंहार के परिदृश्य में श्वेत श्याम टीवी पर तमस की वह आग टीवी के परदे के अलावा हमने मेरठ की जमीन और आसमान में महीनों महीनों लगातार देखा है।

    धुंआ धुआं आसमान देखा है।

    इंसानी गोश्त की महक देखी है।

    अल्लाहो अकबर और हर हर महादेव जयश्रीराम का उन्माद देखा है।

    भोपाल त्रासदी के बाद बाबरी विध्वंस और गुजरात का नरसंहार देखा है।

    तमस का सिलसिला जारी है।फिरभी इप्टा और समांतर सिनेमा और लघुपत्रिका आंदोलन हमारे साथ हमारी दृष्टि और दिशा बनाने के लिए मौजूद नहीं थे।

    शेक्सपीअर, कालिदास,शूद्रक और सोफोक्लीज के नाटकों के पाठ के बाद सीधे रंगमंच की पृष्ठभूमि में समांतर सिनेमा हमारे लिए बदलाव का सबसे बड़ा ख्वाब रहा है,जबकि आजादी के बाद साठ के दशक में छात्रों युवाओं का मोहभंग हो चुका था।

    मृणाल सेन की कोलकाता 71 और इंटरव्यू के साथ सत्यजीत रे की फिल्म प्रतिद्वंद्वी,ऋत्विक की तमाम फिल्मों के बाद अंकुुर,निशांत,आक्रोश,अर्द्धसत्य और मंथन जैसी फिल्में हमें बदलाव का ख्वाब जीने को मजबूर कर रही थीं।

    इन सारी फिल्मों का देखना हमारे लिए साझा अनुभव रहा है,जिसमें गिरदा, कपिलेश भोज,हरुआ दाढ़ी,जहूर आलम,शेखर पाठक जैसे लोग साझेदार रहे हैं।

    हिमपाती रातों में नैनीझील के साथ साथ मालरोड पर उन फिल्मों को हमने रात रातभर गर्मागर्म बहस में जिया है और उसकी ऊर्जा को हमने नैनीताल के रंगकर्म में स्थानांतरित करने की भरसक कोशिश की है।उन फिल्मों के सारे किरदार हमारे वजूद में शामिल होते चले गये और वे हमारे साथ ही रोज जी मर रहे हैं।ओम पुरी पहलीबार मरा नहीं है।स्मिता मरकर भी जिंदा हैं।

    ओम पुरी से बड़े थे गिरदा और वीरेनदा।ओमपुरी से बड़े हैं आनंदस्वरुप वर्मा और पंकज बिष्ट।अभी पहली जनवरी को हमारे सोदपुर डेरे में 78 साल के कर्नल भूपाल चंद्र लाहिड़ी आये थे।वे देश की सरहदों पर लड़ते रहे हैं और 83-84 में नैनीताल कैंट के केलाखान में उनका डेरा भी रहा है।वे रंगकर्मी हैं।कैमरे के पीछे भी वे हैं।लिखते अलग हैं।इसपर तुर्रा सुंदरवन के बच्चों के लिए उनकी जान कुर्बान है।

    अभी हमने उनके आदिवासी भूगोल पर लिखा बेहतरीन उपन्यास बक्सा दुआरेर बाघ का हिंदी में अनुवाद किया है।जो जल्दी ही आपके हातों में होगा,उम्मीद है।

    कर्नल भूपाल चंद्र लाहिड़ी ने सैन्य जीवन पर उपन्यास अग्निपुरुष भी लिखा है।कहानियां और नाटक अलग से हैं।वे अकेले दम सुंदरवन के बच्चों तक पौष्टिक आहार पहुंचा रहे हैं।

    हफ्ते में चार दिन डायलिसिस कराने के बावजूद कोलकाता से सुंदरवन के गांवों का सफर उनका रोजनामचा है।पत्नी का निधन हो चुका है और बच्चे अमेरिका में हैं।

    उन्होंने घर में स्टुडियो बनाकर ओवी वैन के जरिये सुंदर वन के बच्चों को वैज्ञानिक तरीके से शिक्षित करने का काम कर रहे हैं।उन्हें विज्ञान पढ़ा रहे हैं।क्योंकि सुंदरवन के स्कूलों में विज्ञान जीव विज्ञान पढ़ा नहीं जाता।

    यह काम एक डाक्टर की मौत वाले टेस्ट ट्यूब बेबी वाले डां.सुभाष मुखर्जी को समर्पित है और सारा खर्च वे अपनी जमा पूंजी से उठा रहे हैं।

    हमने कर्नल लाहिड़ी से बांग्ला और हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन के अवसान पर चर्चा की तो समकालीन तीसरी दुनिया,समयांतर और हस्तक्षेप पर भी चर्चा हुई।

    इप्टा जमाने से त्रासदी यही है कि हम अपनी विरासत सहेजने में सिरे से नाकाम हैं।हम अगली पीढ़ी को बैटन थमाने में सिरे से नाकाम हैं।तमाम विधाओं और माध्यमों की बेदखली की असल वजह यही है कि समय रहते हुए हम अपने मिशन को जारी रखने का कोई स्थाई बंदोबस्त नहीं कर पाते।

    फिल्मों में एकमात्र नजीर ऋत्विक घटक का है,जिनके साथ तमाम कलाकारों, टेक्नीशियनों को स्वतंत्र तौर पर काम करने के लिए उन्होंने तैयार किया है।

    ऋत्विक की फिल्मों में अक्सर संगीत उन्होंने खुद तैयार किया है,लेकिन उन्होंने इसका श्रेय साथियों को दिया है।

    समांतर सिनेमा की पृष्ठभूमि में इप्टी की गौरवशाली विरासत,भारतीय रंगकर्म की विभिन्न धाराएं,मृणाल सेन और ऋत्विक घटक की फिल्में रही हैं।सारा आकाश और भुवन सोम से यह सिलसिला शुरु हुआ था।भारतीय सिनेमा की यथार्थवादी धारा अछूत कन्या से लेकर दो बीघा जमीन,मदर इंडिया और सुजाता, दो आंखें बारह हाथ,जागते रहो,आवारा जैसी  की निरंतरता भी समांतर सिनेमा की निरंतरता है।त्रासदी यह है कि समांतर सिनेमा की निरंतरता अनुपस्थित है।

    समकालीन तीसरी दुनिया का आखिरी अंक लेकर हम बैठे थे और दिन भर यह सोच रहे थे कि सुंदरवन इलाके के बच्चों के लिए पौष्टिक आहार और शिक्षा का जो कार्यक्रम शुरु हुआ है,कर्नल लाहिड़ी के अवसान के बाद उसके जारी रहने की कोई सूरत नहीं है।

    हम चिंतित थे कि आगे चलकर हम कैसे समकालीन तीसरी दुनिया,समयांतर या हस्तक्षेप जारी रख पायेंगे।नैनीताल में अकेले जहूर आलम ने युगमंच को जिंदा रखा है।लेकिन सत्तर दशक की तरह डीएसबी कालेज के छात्र अब थोक भाव में रंगकर्म में शामिल नहीं हैं।नैनीताल समाचार भी संकट में है।पहाड़ फिर भी जारी है।

    शयाम बेनेगल के स्थगित होने के बाद न कोई भारत की खोज है और न समांतर सिनेमा का भोगा हुआ यथार्थ कहीं है।

    शबाना के टक्कर की कोई दूसरी अभिनेत्री स्मिता के बाद पैदा नहीं हुई।

    इप्टा आंदोलन के तितर बितर हो जाने से तमाम कला माध्यमों और विधाओं में जनप्रतिबद्धता का मिशन सिरे से खत्म है।

    अमरीश पुरी और ओम पुरी के बाद अब शबाना एकदम अकेली रह गयी हैं। बंगाल में गौतम घोष के साथ जो नये फिल्मकार सामने आये थे,वे न जाने कहां हैं।

    ओमपुरी का अवसान सांस्कृतिक आंदोलन के कोरे कैनवास को बेपरदा कर गया।अपने एक इंटरव्‍यू में ओमपुरी खुद यह दुख जताया था। ओमपुरी ने बताया कि उन्‍हें किसी फिल्‍म के लिए एक करोड़ रुपए कभी नहीं मिले। बल्कि 40 से 50 लाख या 10 से 15 लाख रुपए तक ही मेहनताना मिलता है। वो स्‍टार हैं मैं नहीं. ओमपुरी ने कहा कि इस उम्र में अब हमारे जैसे उम्रदराज कलाकारों को ध्‍यान में रखकर रोल नहीं लिखता। ऐसे रोल लिखे भी जाते हैं, तो इसमें स्‍टार लिए जाते हैं।

    ओमपुरी ने अपने सिने करियर की शुरूआत वर्ष 1976 में रिलीज फिल्म "घासीराम कोतवाल" से की।विजय तेंदुलकर के मराठी नाटक पर बनी इस फिल्म में ओमपुरी ने घासीराम का किरदार निभाया था। वर्ष 1980 में रिलीज फिल्म"आक्रोश"ओम पुरी के सिने करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई।

    गोविन्द निहलानी निर्देशित इस फिल्म में ओम पुरी ने एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जिस पर पत्नी की हत्या का आरोप लगाया जाता है। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए ओमपुरी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। फिल्म "अर्धसत्य"ओमपुरी के सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है।

    उनकी जीवनी 'अनलाइकली हीरो:ओमपुरी' के अनुसार 1950 में पंजाब के अम्बाला में जन्मे इस महान कलाकार का शुरुआती जीवन अत्यंत गरीबी में बीता और उनके पिता को दो जून की रोटी कमाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। ओम पुरी के पूर्व पत्नी नंदिता सी पुरी द्वारा लिखी गई इस किताब में कहा गया है कि टेकचंद (ओमपुरी के पिता) बहुत ही तुनकमिजाज और गुस्सैल स्वभाव के थे और लगभग हर छह महीने में उनकी नौकरी चली जाती थी। उन्हें नई नौकरी ढूंढ़ने में दो महीने लगते थे और फिर छह महीने बाद वह नौकरी भी चली जाती। वे गरीबी के दिन थे जब परिवार को अस्तित्व बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती।

    आनंद पटवर्द्धन ने मैसेज किया था,फोन पर बात करेंगे,उनके फोन के इंतजार में हूं।


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    Supreme Court's takes cognizance of incest of private companies & UIDAI for collection of biometric data

     

    Claims about biometric data deeply unscientific, illegitimate promotes genetic determinism and digital casteism

    Now that Supreme Court's bench of Chief Justice J S Khehar, Justice N V Ramana and D Y Chandrachud have admitted on January 5, 2017 that "biometric data collection by private agencies is not a great idea", it is time to examine the idea of biometric data based 12-digit unique identification (UID)/Aadhaar number project which is linked to proposed imminent DNA profiling of Indian residents. The Human DNA Profiling Bill, 2015 aimed at regulating the use of Deoxyribose Nucleic Acid (DNA) analysis of human body substances profiles and to establish the DNA Profiling Board for laying down the standards for laboratories, collection of human body substances, custody trail from collection to reporting and also to establish a National DNA Data Bank and for matters connected therewith or incidental thereto. The Bill provides for procurement of "Intimate body sample" which means a sample of blood, semen or any other tissue, fluid, urine, or pubic hair, a dental impression; or a swab taken from a person's body orifice other than mouth obtained through "Intimate forensic procedure".  The intimate forensic procedure means the following forensic procedures, namely:-(a)  an external examination of the genital or anal area, the buttocks and also breasts in the case of a female breast; (b) the taking of a sample of blood; (c) the taking of a sample of pubic hair; (d) the taking of a sample by swab or washing from the external genital or anal area, the buttocks and also breasts in the case of a female; (e)  the taking of a sample by vacuum suction, by scraping or by lifting by tape from the external genital or anal area, the buttocks and also breasts in the case of a female; (f) the taking of a dental impression and (g) the taking of a photograph or video recording of, or an impression or cast of a wound from, the genital or anal area, the buttocks and also breasts in the case of a female.

    As per Section 2 (g) of Aadhaar (Targeted Delivery of Financial and Other Subsidies, Benefits and Services) Act, 2016, "'biometric  information'  means  photograph,  finger  print,  Iris  scan,  or such other biological attributes of an individual as may be specified by regulations." The reference to "such other biological attributes" makes it clear that voice sample and DNA profiling is included under its ambit. This Act seems to make the proposed Human DNA Profiling Bill redundant.

    When one looks at the definition of the "Biometrics" which "means the technologies that measure and analyse human body characteristics, such as 'fingerprints', 'eye retinas and irises', 'voice patterns', "facial patterns', 'hand measurements' and 'DNA' for authentication purposes" as per Information Technology (Reasonable security practices and procedures and sensitive personal data or information) Rules, 2011 under section 87 read with section 43A of Information Technology Act, 2000, it becomes clear that the plan of data collection does not end with collection of finger prints and iris scan, it goes quite beyond it.

    The fact remains biometric data like finger print, voice print, iris scan and DNA do not reveal citizenship. While use of biometric technology, an advanced technique for the identification of humans, based on their characteristics or traits is unfolding there is agency within India too. These traits can be face, fingerprint, iris, voice, signature, palm, vein, and DNA. DNA recognition and vein recognition are the latest and most advanced types of biometric authentication. Biometric technology is being deployed in the application areas like government, travel and immigration, banking and finance, and defense. Government applications cover voting, personal ID, license, building access, etc; whereas travel and immigration use biometric authentication for border access control, immigration, detection of explosives at the airports, etc. Banking and finance sector use biometric authentication for account access, ATM security, etc.

    Such profiling is aimed at examination of human biological material that is coded with "the past history and thus dictate the future of an individual's racial and genealogical makeup, and influence an individual's medical and psychological makeup." The proponents of the biometric profiling such tools can make all citizens 'safe' forever. "Biometrics are turning the human body into the universal ID card of the future". Unmindful of dangerous ramifications of such applications, biometric ID's are all set to be made as common as e-mail addresses. Biometric information includes DNA profiling wherein biological traits are taken from a person because by their very nature are unique to the individual and positively identifies that person within an ever larger population as the technology improves.

    Supreme Court's observation must be looked at in the light of a decision of the European Court of Human Rights (ECHR). The case was heard publicly on February 27, 2008, and the unanimous decision of 17 judges was delivered on December 4, 2008. The court found that the "blanket and indiscriminate nature" of the power of retention of the fingerprints, cellular samples, and DNA profiles of persons suspected but not convicted of offenses, failed to strike a fair balance between competing public and private interests and ruled that the United Kingdom had "overstepped any acceptable margin of appreciation" in this regard. The decision is nonappealable. The Court cannot ignore this decision because the Aadhaar Act extends to DNA through the definition of biometric information in Section 2 (g)

    The Court's observation must be seen in the context of what happened in 1998 at National Biometric Test Center, San Jose State University set up by the Biometric Consortium, which is the US government interest group on biometric authentication. The centre was asked to testify to the USA's House Committee on Banking and Financial Services hearing on "Biometrics and the Future of Money". This testimony of May 20, 1998 was reprinted under the title, "Biometric Identification and the Financial Services Industry. This centre emerged from a meeting of Biometric Consortium held in 1995 at the Federal Bureau of Investigation (FBI) training facility. This Test Center has defined biometric authentication as "the automatic identification or identity verification of an individual based on physiological and behavioral characteristics". Agencies like US Department of Defence, North Atlantic Treaty Organisation, World Bank Group, USAID and Interpol has been promoting such automatic identification in at least 14 developing countries including Pakistan, Bangladesh and Nepal without any democratic mandate as part of a convergence project to ensure merger of private sector, public sector and citizens sector. The E-identity and biometric UID/Aadhaar related projects are part of World Bank's e-Transform Initiative formally launched on April 23, 2010 for convergence. 

    The Court's observation faintly and partly echoes the Public Statement by 21 concerned citizens of August 2015 and the Statement of Concern against UID/Aadhaar by 17 eminent citizens issued in September 2010 demanding that the project based on biometric profiling "should be halted before it goes any further". The signatories to the statements included Justice VR Krishna Iyer, Supreme Court of India, Prof. Romila Thapar, Prof. Upendra Baxi, Justice A.P.Shah, Prof. Anil Sadgopal, Prof. Kalpana Kannabiran and others. The Court made these observations in the cases filed by Justice K.S.Puttaswamy (Retd), Major General S.G. Vombatkere, former Additional Director General Discipline & Vigilance in Indian Army, Col. Mathew Thomas, a defence scientist and several eminent persons which include several transfer petitions from Tamil Nadu, Maharashtra and other states subsequent to the order of Supreme Court Bench of five judge headed by Chief Justice of India which reads:  "Since there is some urgency in the matter, we request the learned Chief Justice of India to constitute a Bench for final hearing of these matters at the earliest" in its order dated October 15, 2015 in the Writ Petition (Civil) No. 494 of 2012. This case pertains to supreme national interest filed by stalwarts of impeccable and unquestionable integrity. This is a test case for how the Court deals with genuine public interest litigation filed in pursuance of citizens' fundamental duties taking in to account.

    Neither the Court nor the concerned lawyers been able to read both the biometric UID/Aadhaar Number Act and Identification of Prisoners Act (which is force) together to in order to fathom the disturbing ramifications of the former.  The Identification of Prisoners Act, 1920 reads: "The object of this bill is to provide legal authority for taking measurements, finger impressions, footprints and photographs of persons convicted of, or arrested in connection with, certain offences." According to the Identification of Prisoners Act at the time of the acquittal of the prisoner, his biometric data is required to be destroyed. Since 1857, fingerprint identification methods have been used by police agencies in India and around the world to identify suspected rebels, political dissidents and criminals. The first systematic capture of hand images for identification purposes initiated by William Herschel, a civil servant in colonial India in 1858. It is noteworthy that in 1898, Edward Henry, Inspector General of the Bengal Police established the first British fingerprint files in London. The biometric UID/Aadhaar Number project goes further by storing the biometric data forever. The UID/Aadhaar Number project and related s schemes is unfolding to undertake indiscriminate profiling citizens and residents of India. It is like fixing a dehumanizing genetic caste identity on a person.

    The promoters of biometric UID/Aadhaar Number are promoting digital caste system and digital racism. Jacob Appelbaum, computer security researcher, hacker, activist, and a spokesperson for WikiLeaks has warned, biometric Aadhaar/"UID will create a digital caste system because going by the way it is now being implemented, if you choose not to be part of the system, you will be the modern-day equivalent of an outcast. In theory, you are supposed to have the freedom to choose but in reality, the choice will only be whether to be left out and left behind".

    If biometric identification under Aadhaar (Targeted Delivery of Financial and Other Subsidies, Benefits and Services) Act, 2016 is deemed legitimate then there is a logical compulsion for the Court to declare The Identification of Prisoners Act, 1920 as redundant because the latter provides for a government limited by law and the former provided for a government made unlimited by law as far as indiscriminate human profiling is concerned.      

    It is apparent that there is a need for the Supreme Court, High Courts and legislatures to examine whether or not biometrics provides an established way of fixing identity of Indians. Has it been proven? A report "Biometric Recognition: Challenges and Opportunities" of the National Research Council, USA published on 24 September 2010 concluded that the current state of biometrics is 'inherently fallible'. That is also one of the findings of a five-year study. This study was jointly commissioned by the CIA, the US Department of Homeland Security and the Defence Advanced Research Projects Agency. Notably, West Bengal legislature has passed unanimous resolution against biometric UID/Aadhaar number.  It is high time other State legislatures ponder to ponder over it as well.

    Another study titled "Experimental Evidence of a Template Aging Effect in Iris Biometrics" supported by the Central Intelligence Agency (CIA), the Biometrics Task Force and the Technical Support Working Group through Army contract has demolished the widely accepted fact that iris biometric systems are not subject to a template aging effect. The study provides evidence of a template aging effect. A "template aging effect" is defined as an increase in the false reject rate with increased elapsed time between the enrollment image and the verification image. The study infers, "We find that a template aging effect does exist. We also consider controlling for factors such as difference in pupil dilation between compared images and the presence of contact lenses, and how these affect template aging, and we use two different algorithms to test our data." 

    Neither the Court nor the concerned lawyers have been able to recognize that citizens' opposition to biometric UID/Aadhaar has a historical context. It is linked to more than a century old world famous 'Satyagraha' of Mahatma Gandhi in order to oppose the identification scheme of the government in South Africa. On 22nd August, 1906, the South African government published a draft Asiatic Law Amendment Ordinance. The Ordinance required all Indians in the Transvaal region of South Africa, eight years and above, to report to the Registrar of Asiatics and obtain, upon the submission of a complete set of fingerprints, a certificate which would then have to be produced upon demand. The move proposed stiff penalties, including deportation, for Indians who failed to comply with the terms of the Ordinance. Knowing the impact of the Ordinance and effective criminalisation of the entire community, Mahatma Gandhi then decided to challenge it. Calling the Ordinance a 'Black Act' he mobilised around 3,000 Indians in Johannesburg who took an oath not to submit to a degrading and discriminatory piece of legislation. Biometric aadhaar case demonstrates how 'Those who forget history are condemned to repeat it'.

    Biometric profiling is inherently dangerous because it tracks individuals based on their religious, behavioural and/or biological traits. History is replete with examples wherein such profiling has been used for genocide, holocaust and violence against all kinds of minorities.

    The reference to "Aadhaar card" by the Court's repeated orders unequivocally illustrates that it has not applied its judicial mind to the core concern relating to 'UID number', 'Aadhaar number' or 'Aadhaar' and the Adhar Trust. Unless arguments in the Court and Court's orders make rigorous distinction between them, they cannot do justice to their role.        

    An application filed on July 16, 2015 in the Supreme Court intending to formally make biometric UID/Aadhaar applicable to other government schemes such as obtaining passports, PAN cards, immigration, railways, telecommunications and prison management systems shows that that unmindful of Court's orders biometric UID/Aadhaar number is a tool for exclusion, not for claimed inclusion. In fact such profiling with biometric data is fraught with dangers of unprecedented communal crisis at the local, regional and national level in the country.

    The promoters of world's biggest biometic database project based on the unscientific and questionable assumption that there are parts of human body likes fingerprint, iris, voice etc that does not age, wither and decay with the passage of time. Unique Identification Authority of India (UIDAI) is acting on a manifestly unscientific basis. Those who support UID/Aadhaar number and related initiatives display unscientific temper by implication.

    The reason for the vehement opposition to (UID)/Aadhaar number project is that it is contrary to the basic structure of the Constitution of India, which provides for a limited government and not an unlimited government. The project is aimed at creating an unlimited government. It is incorrect, bad and illegitimate.  

    For a 21 month period between 25 June 1975 to 21 March 1977, the country was put under internal Emergency under Article 352 of the Constitution of India, effectively bestowing on Indira Gandhi, the then Prime Minister, the power to rule by decree, suspending elections and civil liberties. This was made legal and it remained so as long as it lasted. The powers given to her virtually had no limits. The human body came under assault as a result of forced vasectomy of thousands of men under the infamous family planning initiative of Sanjay Gandhi.  UID/Aadhaar number project constitutes a bigger assault on human body because it links "biometric information" to "demographic information" which includes "information relating to the name, date of birth, address and other relevant information of an individual, as may be specified by regulations for the purpose of issuing an Aadhaar number, but shall not include race, religion, caste, tribe, ethnicity, language, records of entitlement, income or medical history" as per Section 2 (k) of Aadhaar (Targeted Delivery of Financial and Other Subsidies, Benefits and Services) Act, 2016.

    Given the fact that judicial orders from the High Courts and Supreme Court have so far dealt with the limited issue of how UID/Aadhaar cannot be made mandatory, first thing anyone should understand with regard to gathering momentum against biometric unique identification (UID)/Aadhaar number is that the very first document that residents of India encounter in this regard is UID/'Aadhaar Enrolment Form'. At the very outset the enrolment form makes a declaration is that "Aadhaar Enrolment is free and voluntary." This is a declaration of Government of India. This is a promise of Union of India. As a consequence, all the agencies state governments, the Government of India and the "agencies engaged in delivery of welfare services" are under legal and moral obligation to ensure that the UID/Aadhaar cannot be made mandatory. As such the Supreme Court has simply stated what the Union of India itself has promised. In its interim order what the Court has done is to simply reiterate the significance of the promise made by Government of India. If programs, projects and schemes are launched in breach of Governments' promise, it will set a very bad and unhealthy precedent and no one ever in future trust the promise made by Union of India.  The column number 8 in the UID/Aadhaar Enrolment Form on the first page refers to "agencies engaged in delivery of welfare services" but does not define who these agencies are. It appears that its definition has deliberately been kept vague. Which are the agencies that are involved in delivery of welfare services? Aren't security agencies and commercial agencies with ulterior motives included in it?  

    On page number 2 of the UID/Aadhaar Enrolment Form provides, "Instructions to follow while filling up the enrolment form" which states that column numbered 8 is about seeking consent from an Indian "Resident (who) may specifically express willingness / unwillingness by selecting the relevant box" by ticking "yes" or "no" options. The column number 8 reads: "I have no objection to the UIDAI sharing information provided by me to the UIDAI with agencies engaged in delivery of welfare services." Now, the issue is that if residents are promised that enrolment is "voluntary" they may give their consent unaware of its ramifications but if they know that it is made "mandatory" they may refuse to give their consent. 

    Are the agencies with whom Unique Identification Authority of India (UIDAI) on behalf of President of India has signed contract agreements with foreign surveillance technology companies like Accenture Services Pvt Ltd, US, Ernst & Young, US, L1 Identity Solutions Operating Company, now France (as part of Safran group), Satyam Computer Services Ltd (Mahindra Satyam), as part of a "Morpho led consortium" (Safran group), France and Sagem Morpho Security Pvt Ltd (Safran group), France "engaged in delivery of welfare services"? Admittedly, these agencies have access to personal information of the Purchaser and/or a third party or any resident of India for at least seven years as per Retention Policy of Government of India or any other policy that UIDAI may adopt in future. The purchaser is President of India through UIDAI. 

    The contract agreement is applicable to both Centralised Identities Data Repository (CIDR) of digit biometric unique identification (UID)/Aadhaar number which is 'voluntary' and the 'mandatory' National Population Register (NPR) of Ministry of Home Affairs which is also generating Aadhaar number. Notably, column number 2 in the Aadhaar Enrolment Form on page number 1 and 2 refers to "NPR Number" and "NPR Receipt/TIN Number" and at states "Resident may bring his/her National Population Register Survey slip (if available) and fill up the column" number 2. 

    The databases of both the numbers namely, UID/Aadhaar number and NPR number are being converged as per approved strategy.  Does it not make both the databases of biometric identification numbers one and mandatory in the end? Is the promise by the Prime Minister about Aadhaar Enrolment being "free and voluntary" truthful? It is not "free" for sure because it costs citizens' their democratic rights. As to it being "voluntary" it is not so by design. It is evident that the Prime Minister has been miser with truth.       

    Initially, it seemed surprising as to why L1, a high value company that worked with the US' intelligence was sold to French conglomerate Safran group which has a 40 year partnership with China. It also seemed puzzling as to why the contract amount given to Sagem Morpho of Safran Group is not being disclosed. There is no confusion as to why such agencies of US, France and China are eagerly collecting the biometric database of Indians at the rate of Rs 2.75 per enrolment and de-duplication. It is reveals the lack of business of Indian decision makers. These foreign entities are getting possession of national assets of Indians along with payment for doing the favour of collecting it! "Biometrics Design Standards for UID Applications" prepared by UIDAI's Committee on Biometrics states in its recommendations that "Biometrics data are national assets and must be preserved in their original quality." Isn't such preservation being undertaken by these foreign agencies in their supreme national interest of their own governments?

    UIDAI's paper titled 'Role of Biometric Technology in Aadhaar Authentication' based on studies carried out by UIDAI from January 2011 to January 2012 on UID/Aadhaar biometric authentication reveals that the studies "focused on fingerprint biometric and its impact on authentication accuracy in the Indian context. Further, improvements to UID/Aadhaar Authentication accuracy by using Iris as an alternative biometric mode and other factors such as demographic, One Time Pin (OTP) based authentication have not been considered in these studies."  

    This paper explains, "Authentication answers the question 'are you who you say you are'". This is done using different factors like: What you know– user ID/password, PIN, mother's maiden name etc, What you have – a card, a device such as a dongle, mobile phone etc and What you are – a person's biometric markers such as fingerprint, iris, voice etc. The 'what you are' biometric modes captured during UID/Aadhaar enrolment are fingerprint, iris and face. It is noteworthy that this paper also refers to biometric markers like 'fingerprint, iris, voice etc' revealing that after fingerprint and iris, 'voice' print is also on the radar and its reference to "etc" includes DNA prints as well.    

    Notably, ESL Narasimhan, governor of Andhra Pradesh said, "We are spending thousands of crores on identification cards every other day and then saying it is useless card. It happened in case of citizenship card, PAN card, voter identity card and now they are coming to Aadhaar card. He was speaking at the inaugural session of fifth international conference on 'emerging trends in applied biology, biomedicines and bio-forensics'. This was reported by Business Standard on 30 November 2013. Narasimhan is a former head of the Intelligence Bureau (IB). DNA analysis has become so cheap that within a few years instead of an Aadhaar, one can have whole DNA sequence with unique marker because "with a few thousand rupees, everybody's entire DNA sequence can be put on a card", argued Ramakrishna Ramaswamy, vice chancellor, University of Hyderabad, speaking at the same conference. It is noteworthy that these efforts are going in a direction wherein very soon employers are likely to ask for biometric data CD or card instead of asking for conventional bio-data for giving jobs etc. It is likely to lead to discrimination and exclusion. 

    A report "Biometrics: The Difference Engine: Dubious security" published by The Economist in its October 1, 2010 issue observed "Biometric identification can even invite violence. A motorist in Germany had a finger chopped off by thieves seeking to steal his exotic car, which used a fingerprint reader instead of a conventional door lock." So far the Court has not been able to appreciate such concerns. 

    In villages, they say when you give a hammer to a blacksmith he/she will only think in terms of nailing something. The only difference is that here it is the human body which is being nailed. If you only have a hammer, you tend to see every problem as a nail. If biometric technologies are at hand, some people under the influence of technology tend to see every problem as an identification problem. 

    The UIDAI paper states, "Of the 3 modes, fingerprint biometric happens to be the most mature biometric technology in terms of usage, extraction/matching algorithms, standardisation as well as availability of various types of fingerprint capture devices. Iris authentication is a fast emerging technology which can further improve Aadhaar Authentication accuracy and be more inclusive."  

    Such absolute faith in biometric technology is based on a misplaced assumption that are parts of human body that does not age, wither and decay with the passage of time. Basic research on whether or not unique biological characteristics of human beings is reliable under all circumstances of life is largely conspicuous by its absence in India and even elsewhere. 

    Notwithstanding similar unforeseen consequences Prime Minister's faith in biometric remains unshaken. It seems that considerations other than truth have given birth to this faith. Is there a biological material in the human body that constitutes biometric data which is immortal, ageless and permanent?  Besides working conditions, humidity, temperature and lighting conditions also impact the quality of biological material used for generating biometric data. UID/Aadhaar number is based on the unscientific and questionable assumption that there are parts of human body likes fingerprint, iris, voice etc" that does not age, wither and decay with the passage of time.

    It is apparent that like Indira Gandhi and Dr Manmohan Singh, Prime Minister Narendra Modi too has become instrumental in the installation in establishment of authoritarian architecture through biometric identification of Indians. This is likely to get the similar response from voters as they had given in the aftermath of proclamation of emergency. The human body is again under attack through indiscriminate biometric profiling with patronage of the ruling parties at the centre and in the states.

    Unmindful of such glaring evidence that creates a logic compulsion for stoppage of UID/Aadhaar number projects, all the political organisations and institutions of government which supported imposition of emergency are likely to support biometric identification project as it helps build a permanent emergency architecture which was conceived during the imposition of internal emergency. The institutions which supported suspension of right to life and personal liberty and provided exemplary justice to victims of Bhopal disaster seem to be suffering from the curse of Albatross. 

    The observations based on many inferred past "facts" can be deceptive. This does not mean that there are no methods at all for exposing a hypothesis concerning "facts" about emergence of a surveillance transnational state to critical objective evaluation. At a time when computing cloud beyond India's jurisdiction is unthinkingly being embraced by the National e-Governance Programme amidst apprehensions about technological and legal challenges associated with the concept of 'shared platform' without ascertaining the risks associated with its usage of such emerging technologies, the specter of Investor-state dispute settlement (ISDS) or investment Court system (ICS) that is making national judiciary subservient is looming on the horizon.

    Referring to the British victory over Indians in 1857, William Howard Russell of 'London Times' wrote: "Our siege of Delhi would have been impossible, if the Rajas of Patiala and Jhind (Jind) had not been our friends". The seize of the "national assets" of database of personal sensitive biometric information of all the present and future Indians would have been impossible but for the help of 'commercial czars' and the witting or unwitting complicity of civil servants, legislators, ministers, editors and other legal entities. The International Biometric Industry Association has listed potential applications for including voter registration, access to healthcare records, banking transactions, national identification systems and parental control.

    Indeed it has right been said, "Judge not, that ye be not judged. For with what judgment ye judge, ye shall be judged: and with what measure ye mete, it shall be measured to you again." It appears that the Court is on trial (to paraphrase "Courts on Trial" by Judge Jerome Frank). Amidst the observations by the three-judge bench, the Supreme Court's website continues to refer to the case as a "Five Judges Bench Matter" since October 2015 as per a written order of a five judge Constitution Bench headed by Chief Justice of India which underlined that "there is some urgency in the matter". It is apparent that the advertising and public relations blitzkrieg unleashed by identification and surveillance technology vendors have clouded the minds of legal fraternity. The dangers of trusting such technological advances for determining social policies will consequent in a situation where "[A] warrant requirement will not make much difference to a society that, under the sway of a naive and discredited theory of genetic determinism, is willing to lock people away on the basis of their genes" among other adverse effects.

    For Details: Gopal Krishna, Citizens Forum for Civil Liberties (CFCL), Mb: 9818089660, 8227816731. CFCL has been campaigning against surveillance technologies since 2010. CFCL had appeared before the Parliamentary Standing on Finance that examined the Aadhaar Bill, 2010. 


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    यूपी वालों, चाहो तो देश बचा लो!

    पलाश विश्वास

    नोटबंदी के खिलाफ राजनीतिक मोर्चाबंदी का चेहरा ममता बनर्जी का रहा है।नोटबंदी के खिलाफ शुरु से उनके जिहादी तेवर हैं।हम शुरु से चिटफंड परिदृश्य में दीदी मोदी युगलबंदी के तहत 2011 से बंगाल में तेजी से वाम कांग्रेस के सफाये के साथ आम जनता के हिंदुत्वकरण के परिप्रेक्ष्य में चेताते रहे हैं कि संघ परिवार के दोनों हाथों में लड्डू है।हिंदुत्व के कारपोरेट एजंडा के लिए सत्ता पक्ष का नेतृ्तव संघी है तो विपक्ष का चेहरा भी नख से शिख तक केसरिया है।केसरिया देशभक्ति ,भ्रष्टाचार विरोधी नोटबंदी के जरिये डिजिटल कैसलैस इंडिया में कंपनी कारपोरेट राज का सफाया है तो नोटबंदी के खिलाफ यह फर्जी जिहाद भी संगीन की नसबंदी है।दीदी ने आखिरकार साबित कर दिया कि उन्हें तकलीफ सिर्फ संघ परिवार की सरकार के मौजूदा मुखिया से है,संघपरिवार या उसके हिंदुत्व एजंडे का लवे किसी भी स्तर पर विरोध नहीं करती।उनने कारपोरेट वकील अरुण जेटली या संघ के संगठन सिपाहसालार राजनाथ सिंह या राममंदिर आंदोलन के महाप्रभु लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमत्री बनाने की पेशकश की है।अमित शाह को शिकायत हो सकती है कि दीदी ने उनका नाम क्यों नहीं लिया।

    इसीतरह अरविंद केजरीवाल भी मोदी के बजाय खुद प्रधानमंत्री या अमित शाह के बजाय खुद संघ परिवार की राजनीति का चेहरा बन जायें तो हिंदुत्व के एजंडे से उऩके आरक्षण विरोधी मुक्तबाजारी राजनीति को कोई परहेज नहीं है।

    नीतीश कुमार,बीजू पटनायक या चंद्रबाबू नायडु के मौसम चक्र का जलवायु समझना बहुत मुश्किल है और वे अपनी अपनी राजनीतिक मजबूरियों के बावजूद संघ परिवार से नत्थी हैं।सिर्फ लालू प्रसाद यादव का संग परिवार से कभी कोई तालमेल नहीं है।

    मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने संघ परिवार के हर फैसले को यूपी में संघ परिवार के सूबों की सरकारों से ज्यादा मुश्तैदी से लागू किया है।समाजवादी और बहुजन पार्टी की सर्वोच्च प्राथमिकता यूपी की सत्ता पर काबिज होना है।चुनाव से पहले गठबंधन हुआ नहीं है,लेकिन जरुरत पड़ी तो उन्हें संघ परिवार की मदद से सरकार बनाने में कोई हिचक नहीं होगी।

    हम बार बार लिख रहे हैं कि राजनीति आम जनता के खिलाफ लामबंद है और राजनीति में आम जनता के हकहकूक की लड़ाई की कोई गुंजाइश नहीं है।न आम जनता की निरंकुश सत्ता और फासिज्म के राजकाज के किलाफ अपनी कोई राजनीतिक मोर्चाबंदी है।सर्वदलीय सहयोग और सहमति से नरसंहार संस्कृति का यह वैश्विक मुक्तबाजार है।इस पर तुर्रा यह कि बहुजन पढ़े लिखे लोगों को इस कारपोरेट हिंदुत्व के नरसंहार कार्यक्रम से कोई ऐतराज नहीं है।वे जैसे मुक्तबाजार के खिलाफ खामोश रहे हैंं, वैसे ही वे नोटंबदी के खिलाफ भी खामोश हैं।

    गौरतलब है कि यूपी के किसानों ने भारत के महामहिम राष्ट्रपति से मौत की भीख मांगी है।किसानों को अब इस देश में मौत ही मिलने वाली है।तो कारोबारियों को भी मौत के अलावा कुछ सुनहला नहीं मिलने वाला है।

    हमने पहले ही लिखा हैः

    नोटबंदी का नतीजा अगर डिजिटल कैसलैस इंडिया है तो समझ लीजिये अब काले अछूतों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का अब कोई देश नहीं है।वे आजीविका,उत्पादन प्रणाली और बाजार से सीधे बेदखल है और यह कैसलैस या लेस कैश इंडिया नस्ली गोरों का देश है यानी ऐसा हिंदू राष्ट्र है जहां सारे के सारे बहुजन अर्थव्यवस्था से बाहर सीधे गैस चैंबर में धकेल दिये गये है।

    इधर यूपी के विभिन्न हिस्सों से रोजाना पाठकों के फोन आने लगे हैं।समाजवादी महाभारत के बावजूद पिछले दिनों हमें यूपी के मित्रों ने आश्वस्त किया है कि पहले जो हुआ सो हुआ,अब यूपी की जमीन पर हिंदुत्व का एजंडा कामयाब होने वाला नहीं है।उनके मुताबिक मीडिया के सर्वेक्षण में भले ही निरंकुश सत्ता की बढ़त दीख रही हो,दरअसल जमीन के चप्पे चप्पे पर तानाशाह को हराने की पूरी तैयारी है और आम जनता यूपी की सरजमीं पर नोटबंदी नरसंहार का मुंहतोड़ जवाब देगी।

    गोरखपुर के एके पांडे ने कल बाकायदा चुनौती दी कि अगर छप्पन इंच का सीना है तो यूपी का चुनाव नोटबंदी के मुद्दे पर लड़कर देख लें तो डिजिटल इंडिया का हाल मालूम हो जायेगा।

    इतना बड़ा कलेजा है तो एक लाख स्वयंसेवकों को उतारकर गाय भैंसों को आधार नंबर काहे बांट रहे हैं,यूपी वाले सवाल कर रहे हैं।

    फर्क बस यही है कि ढोर डंगरों के वोट नहीं होते और मनुष्यों के सींग नहीं होते।गायभैंसों के आधार नंबर से हिंदुत्व के वोट नहीं बड़ने वाले हैं और गनीमत है कि सींग नहीं हैं तो आम जनता के धारदार सींग से राजनेताओं के लहूलुहान हो जाने की भी आशंका नहीं है।

    यूपी से मिले फोन पर आसंका यही जताई जा रही है कि अगले चुनाव में बहुमत किसी को नहीं मिलने वाला है।ऐसे में समाजवादी और बहुजन पार्टी में जिसे भी सीटें ज्यादा मिलेंगी,उसे समर्थन देकर यूपी पर इनडायरेक्ट राज करेगा संघ परिवार।

    हम सबसे यही कह रहे हैंः

    यूपी वालों चाहो तो देश बचा लो!

    कांग्रेस और भाजपा के सत्ता से बाहर हो जाने से यूपी में राममंदिर और हिंदुत्व की राजनीति की हवा निकल गयी है।दंगा कराने में सियासत को कामयाबी नहीं मिल रही है।

    हम यूपी वालों से कह रहे हैंः

    दंगाबाजों को सत्ता से बाहर धकेलो।

    मैं उत्तराखंडवासी हूं लेकिन जनमजात मैं भी यूपी वाला हूं।यूपी बोर्ड से हमने हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाएं पास की हैं।हमारे कोलकाता चले आने के बाद उत्तराखंड अलग बना है।यूपी की राजनीतिक ताकत सबसे बड़ी है।यूपी का दिल भी सबसे बड़ा है।

    हम अपने अनुभव से ऐसा कह रहे हैं।यह कोई हवा हवाई बात नहीं है।नैनीताल और पीलीभीत,रामपुर बरेली,बहराइच,लखीमपुर खीरी,बिजनौर,मेरठ,बदायूं,कानपुर जैसे यूपी के जिलों में दंडकारण्य के बाद सबसे ज्यादा विभाजनपीड़ित बंगालियों कहीं भी यूपी में को बसाया गया है।कहीं भी यूपी में बंगाली शरणार्थियों से भेदभाव की शिकायत नहीं मिली है।बल्कि उत्तराखंड बनने के बाद वहां पहली बार सत्ता में आते ही भाजपा की सरकार ने बंगाली शरणार्थियों को बारत का नागरिक मानने से इंकार कर दिया था।वहां भी उत्तराखंड की जनता ने शरणार्थियों का कदम कदम पर साथ दिया है।

    यूपी में ही सामाजिक बदलाव की दिशा बनी है।यूपी ने ही बदलाव के लिए बाकी देश का नेतृत्व किया है तो अब यूपी के हवाले है देश।देश का दस दिगंत सर्वनाश करने के लिए सिर्प यूपी जीतने की गरज से अर्थव्यवस्था के साथ साध करोड़ों लोगों को बेमौत मारने का जो चाकचौबंद इंतजाम किया है संघ परिवार ने,उसके हिंदुत्व एजंडे का प्रतिरोध यूपी से ही होना चाहिेए।यूपी वालों के पास ऐतिहासिक मौका है प्रतिरोध का।

    यूपी वालों,देश आपके हवाले हैं।




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    গোপাল ভাঁড়ের ফর্মুলা !!

    Saradindu Uddipan Exposes Mamata RSS alliance on his FB wall!
    এক চালাক পণ্ডিতকে নিয়ে ভীষণ ধন্দে পড়েছিলেন সভাসদগণ। কিছুতেই বোঝা যাচ্ছিলনা তার মাতৃভাষা কি ! গোপাল ভাঁড়ের রাম ধাক্কা ফর্মুলায় পণ্ডিতের সহজাত স্বভাবে বেরিয়ে এসেছিল তার মাতৃভাষার গালি "শড়া অন্ধা"। এর পরেই সভসদগণ বুঝতে পেরেছিলেন এই ধড়িবাজ পণ্ডিতের মাতৃভাষা উড়িয়া।

    মোদির নোটবন্দী মমতা ব্যানার্জীর কাছে এক রাম ধাক্কা। একেবারে গল্পের সেই গোপাল ভাঁড়ের ফর্মুলা। ধাক্কার গুতোয় তিনি বেসামাল। একেবারে কালীঘাটের ভাষায় তিনি মোদিকে গাল পেড়েছেন "কালিদাস" বলে। এর আগে বলেছিলেন "শা ... হরিদাস......পিছনে বাম্বু...ইত্যাদি ইত্যাদি...।।

    আপনারা নিশ্চয়ই লক্ষ করেছেন যে, এই সাময়িক রাগারাগির মধ্যে দিয়েই কিন্তু বেরিয়ে পড়েছে মমতা ব্যানার্জীর আসল পরিচয়। তিনি বিজেপির পক্ষে। তিনি এই ভেবে শঙ্কিত যে মোদিজী কালিদাসের মত বিজেপির ডালে চড়ে বিজেপিকেই কাটতে শুরু করেছেন !! তাতে তিনি যারপরনাই বিচলিত!!

    আর আপনারা এটাও নিশ্চয়ই বুঝে ফেলেছেন যে "কালিদাস"এর বিরোধীতা করতে গিয়ে তিনি সমর্থন করলেন বিজেপির সেই নেতাদের যারা কট্টর আরএসএস পন্থী। তার মুখে প্রথমেই যে নামটি এল, তিনি হলেন আদবানীজী যিনি বাবরী মসজিদ ভেঙ্গে ফেলার প্রধান পুরোহিত !! পরে অবশ্য ঢোক গিলে তিনি আরো দুটি নাম উচ্চারণ করলেন তারাও আরএসএস এর ঘনিষ্ঠ কেডার।

    আপনারা কেউ কেউ হয়ত বুঝতে পারছেন যে এই মকফাইট আসলে চোর-ডাকাতদের আভ্যন্তরীণ বখরা নিয়ে বিবাদ। পর্দার আড়ালে এর মীমাংসাও হয়ে যাবে একদিন।

    মোদির এই ভারতীয় খাজানা লুটের ফর্মুলাতে ব্রাহ্মণ লাইন যদি বেসামাল হয়, যদি ৫টি রাজ্যে আসন্ন নির্বাচনে ফলাফল খারাপ হয় তবে জাতীয় রাজনীতিতে মোদির পরিবর্তে আর এক কট্টর ব্রাহ্মণবাদীকে প্রয়োজন হবে। আর সে ক্ষেত্রে মমতা মোদির থেকে অনেক বেশি ধ্বংসাত্মক। আর এই নির্বাচনে বিজেপির আশাতীত ফলাফল হলে ২০২১ সালের মধ্যেই মোদির নেতৃত্বে শুরু হবে মহাপ্রলয়।

    আমরা যদি এই গোপাল ভাঁড়ের ফর্মুলা থেকে এই চোর-ডাকাতদের আসল পরিচয় বুঝে নিতে পারি সেটাই হবে বড় লাভ। 
    নতুবা ??
    হে দলিত-বহুজন মানুষ !!!
    আসন্ন মহাপ্রলয়ের জন্য প্রস্তুত হও !!!

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    India's Marie Antoinette Moment

    Anand Teltumbde


    Amid the tales of mass misery and deaths due to cash crunch caused by his decision of demonetization, Narendra Modi asked people to go for digital transactions and in one stroke overtook Marie Antoinette, who is reported to have asked people suffering due to widespread bread shortages, to eat cake. Historians are not sure about the queen having ever said it, but the entire nation has been witnessing Modi's high pitched exhortations to have cashless transactions through digital media. Marie, with her royal lineage said it in feudal France three centuries ago, Modi claiming to come from a humble family of chaiwala with his mother working as a maid servant in others' houses says it in a democratic republic of India in 2016!

    The drama of war against black money, terrorism and counterfeit currency through demonetizing the 500 and 1000 rupee notes has completely exposed the political unscrupulousness of the BJP and narcissist haughtiness of Modi. Leave apart catching black money, demonetization opened new avenues of making black money. The anger over the untold sufferings it unleashed on already distressed rural population haven't flowed onto streets as even the Supreme Court apprehended but may have its date in coming elections. The new ploy of promoting digital transactions is nothing short of rubbing salt on the wounds of millions of the working class. BJP is blissfully complacent with its victory in civic polls in five states that took place after demonetization was announced. It took it as the approval of demonetization by the people and thankfully appears out to repeat such blunders to its own peril.

    Cashless Fantasy

    Modi has mesmerized people with his theatrical skills and gift of the gab, giving them many slogans like "digital India", "make in India", "Startup India", "swachh Bharat", "sabka saath, sabka vikas", etc. but halfway through his tenure, could not deliver on any of them. The cashless economy is most fantastic of these slogans that he has come out with just to distract public attention from catastrophic demonetization. When he announced his decision on 8 November, he had mentioned "black money" 18 times in his speech and did not talk even once about cashless or digital economy. After 20 days when his bravado could not contain the disastrous consequences to people and mounting criticism of this inept act, he swiftly changed the goalpost and began talking about"cashless" and/or "digital" economy. This term occurred 24 times in his Mann ki Baat on 27 November, when he first mentioned it whereas black money occurred only nine times. The queues in front of banks and ATMs had not yet ended but the discourse was successfully diverted towards cashless transactions. In the face of horrific empirical reality even the sarkari intellectuals felt embarrassed to speak with conviction for demonetization, but most of them began comfortably speaking in favour of cashless economy. The spurt in use of digital wallets post demonetization emboldened them to project India was already ready for the 'cultural revolution' as BJP's Venkaiah Naidu claimed.

    Can really India be a cashless or even as Modi corrected himself later, less cash economy in near future? As of now there is no definition of any of these terms and they only connote relative standing of economy in terms of the usage of physical cash. For instance, the Mastercard report on Measuring progress toward a cashless society (2013) categorized countries into four classes: inception (where cash accounts for 90% or more of all consumer transactions), transitioning (where cash transactions account for between 80–90% of consumer payments), tipping point (where cash transactions account for 55-71% of consumer payments) and advanced (where nearly everyone has at least a debit card and merchant acceptance is nearly ubiquitous). According to this report, India is placed in inception category at only 2% of consumer payment transaction done using non-cash methods as compared to the advanced category cases of Singapore (61%), Netherlands (60%), France and Sweden (59%). The report presented trajectory score (growth during the previous five years) of cashless transactions for the subject countries. As against Singapore (39%), Netherlands (20%), France (14%), Canada (16%), India's score was 11%, far behind some of the members in its category such as UAE (65%), South Africa (53%), Kenya (51%), and even Nigeria (12%). The report listed pre-requisites for going cashless and estimated readiness score for various countries. Sweden scored top at 89, Singapore 80, Netherlands 88, France 74 and India just 29, behind even the countries like Kenya at 30, Thailand at 48, and Malaysia at 56. It should be clear that India is not ready to go anywhere near cashlessness at least during Modi's tenure.

    Daydreaming Digital

    Digital money may be desirable but its proliferation presupposes financial inclusion of all people, macro-economic and cultural factors; merchant scale and competition; and technology infrastructure. Towards financial inclusion, the government has made some progress by opening 256 million bank accounts for the poor. Many of them under the Prime Minister's celebrated Jan Dhan Yojana, however, are the second accounts, a quarter of them being zero- balance non-operative accounts, and therefore a burden on the banking system. With regard to accessibility of financial services, there are about 2 lakh bank branches for total of 6.5 lakh villages; 2 lakh ATMs, mostly in cities, 85% of which are still running on outdated Windows XP. Thus, a large population of the country still does not have access to financial services. Even if the financial services reach out to all people, a vast majority will still be excluded simply because they do not have money. The NCAER-University of Maryland's income based survey (2011-12) established that for the lowest percentile of population, consumption is about twice the income, and everybody up to 33rd percentile consumed more than their income. Are these people expected to transact digitally?   


    The spread of mobile telephony is flaunted as the platform to leapfrog into digital space. The latest figures from the Indian telecom regulator TRAI show that, as of 31st July 2016 , India had a teledensity of 83%. This may, however, need correction because it is based on number of connections and not users. Many people using multiple SIM cards, this number may be scaled down significantly. There are about 350 million Internet connections of which about half are on broadband (3G + 4G + wireline broadband). For the top four telecom operators, the number of mobile connections (smart phones) that are data enabled is just about 30%. There are total 6 crores debit cards and 2.5 crores of credit cards, which are barely accepted in cities. This is not the infrastructure for 1.3 billion people to go cashless. The security infrastructure required for digital transaction is still not up to the mark which does not induce confidence even in educated people to transact online. Today, 95% of all transactions take place in cash and only 4% people do online shopping, most of which with cash on delivery.  With 90% of India's workforce in informal sector that run on cash, Modi-speak makes a pure daydream.


    Aata or Data


    There are apparent advantages of digital money over paper currency but to assume that everything is green with it will be grossly erroneous. Paper currency costs to produce and runs a risk of being counterfeited but then digital money is not free; taking current commissions being charged by the payment platforms, the cost of digital transactions could run into thousands of crores of rupees. A currency notes incurs cost of production and logistic for its circulation but it copes with on an average 100,000 transactions. If its cost is spread over these transactions, the per-transaction cost is almost zero. Contrast it with the cost of digital transaction either by credit/debit cards or e-wallets. They charge anywhere between 1 to 4% transaction value. As the user base widens these unit costs are expected to come down but not completely vanish because their issuers' business model is premised on that revenue stream. The digital money, moreover, suffers from various security risks. In course of time, like costs, risk associated with digital money also may come down but they can never be zero. Eventually, these risk and cost shall be borne only by common people.

    Basically, digital or physical, it is a question of money which majority of people simply does not have. Digital money may suit Modi to score political mileage, hyping it as development but it should be understood that there is no essential difference between the physical and digital money, insofar as they both constitute liability of the issuer and operates as a transferable claim in transaction mode. Digital currency tends to increase velocity of money and become virtual. Virtual money is just a digital representation of value, which is issued and usually controlled by its developers. If digital money is transacted between person to person (P2P) and used in the real world for physical goods and services, it remains digital but if it is used only for virtual world purchases in closed loop systems, then it turns virtual. The intrinsic tendency of digital money to become virtual is hugely speculative.

    Then why is Modi after cashless economy? Cashless economy makes it difficult for many in informal economy to escape the tax net and significantly add to the indirect taxes when GST is implemented. Already, indirect tax contributes two-third of tax revenue; its increase would enable dampening of direct taxes on wealthy. Politically, it lends complete control over people because they can now be profiled with their transaction data and targeted for effective surveillance. It directly benefits digital wallet companies like PayTM, which is said to be making Rs 120 crores per day since demonetization was announced and surged in its valuation by 4.7%. The space has already attracted many players but in long run the winners would be those platform-gateway companies which also sell data. Reliance can surely be named because its Jio strategy catapults it to be the lord of the digital world. The vast majority however will be forced to buy data over aata (ration).

    Marie Antoinette's impudence led to the French Revolution, to the overthrow of the monarchy and to her being guillotined. Can we not hope for a small change in India!       


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    1976 में बंगाल में आरक्षण लागू करवाने वाले डा.गुणधर वर्मन को कोलकाता ने याद किया।

    किसी गुरिल्ला युद्ध से हालात बदले नहीं जा सकते!

    जन आंदोलनों को अब और रचनात्मक बनाना जरुरी है!

    देशभर में जनप्रतिबद्ध लोगों की मोर्चाबंदी फौरी जरुरत!

    पलाश विश्वास

    ओमपुरी के अवसान पर समांतर फिल्मों और लघुपत्रिका आंदोलन पर चर्चा के साथ हमने जो इप्टाांदोलन के तितर बितर हो जाने की बात लिखी है,विभिन्न राज्य में सक्रिय इप्टा के रंगकर्मियों को लगता है उस पर ऐतराज है।हमें उनकी सक्रियता के बारे में कोई शक नहीं है।हम जानते हैं कि बिहार छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में इप्टा आंदोलन अब भी जारी है।रंगकर्म और इप्टा दोनों हमारे वजूद में हैं।

    हम सिर्फ यह कह रहे हैं ,बिहार के तनवीर भाई और छत्तीसगढ़ के निसार अली और तमाम साथी इस पर गौर करें कि हम मुद्दा इप्टा के गौरवशाली भूमिका की उठा रहे हैं।बंगाल की भुखमरी से लेकर साठ सत्तर के दशक में भी भारतीय माध्यमों में,विधाओं में,कला क्षेत्र में इप्टा की मौजूदगी सर्वव्यापी रही है।समांतर सिनेमा का आधार रंगकर्म है और अब भी हमारे बेहतरीन तमाम कलाकार स्टार थिएटर से हैं।भारतीय फिल्मों के तमाम कलाकारों,संगीतकारों,गायकों से लेकर अनेक चित्रकारों और लेखक कवियों की पृष्ठभूमि इप्टा से जुड़ी है।सारे माध्यमों और विधाओं से रंगकर्म जुड़ा है।

    उस आलेख में भी हमने इसी पर फोकस किया है लेकिन कुछ मित्रों ने आधा अधूरा आलेख छापा है या पोर्टल में लगाया है,जिससे यह संदेश गया है कि हम मौजूदा परिप्रेक्ष्य में इप्टा को अनुपस्थित मान रहे हैं।पूरा आलेख हस्तक्षेप पर लगा है।कृपया उसे भी देख लें।मूलतः उस आलेख का फोकस समांतर फिल्मों पर है।हमने लघु पत्रिका आंदोलन की भी कायदे से चीरफाड़ अभी नहींं की है।

    हम इप्टा को भी बेहद प्रासंगिक मानते हैं।रंगकर्म हमारे लिए जन आंदोलन की बुनियाद है।हमने रंग चौपाल के मार्फत देशभर के रंगकर्मियों को एक साथ मोर्चाबंद करने की पहल भी इसीलिए की है,जिसमें निसार अली और कुमार गौरव जैसे लोग हमारे साथ हैं।सिर्फ इप्टा के लोगों को भी हम एक साथ जोड़कर रंगकर्म को आजादी के आंदोलन की बुनियाद बनायें,तो तेजी से हम व्यापक जन मोर्चाबंदी में कामयाब हो सकते है।

    हमारे मित्र शमशुल इस्लाम भी बुनियादी तौर पर रंगकर्मी हैं।हम उनसे भी लगातार संवाद कर रहे हैं।हमें फिर उत्पल दत्त,सफदर हाशमी और शिवराम जैसे रंगकर्मियों की बेहद सख्त जरुरत है।फिलहाल इतना ही,इप्टा पर बहुत कुछ कहना लिखना बाकी है।

    हमारे आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़े अब खड़गपुर में नहीं हैं।रोजाना उनसे घंटों जरुरी मुद्दों पर बातें होती रहती थीं।एक अंतहीन का सिलसिला महीनों से थमा हुआ है।आनंद हमेशा कहा करते हैं कि सत्ता जब निरंकुश हो तो प्रतिरोध बेहद रचनात्मक बनाने की जरुरत होती है।हालात खराब इसलिए भी हैं कि रचनात्मकता के सारे माध्यमों और विधाओं से बेदखली के बाद रचनात्मक प्रतिरोध की जमीन पांव तले से खिसक सी गयी है।संस्कृतिकर्मियों का रचनात्मक प्रतिरोध कहीं अभिव्यक्त हो नहीं रहा है।या भारत में अभिव्यक्ति का वह स्पेस बोलियों और लोक के खात्मे से खत्म है।

    कल रात भागलपुर से लघु पत्रिका आंदोलन के जमाने से डा.अरविंद कुमार का फोन आ गया अचानक।उनने कहा कि कोलकाता से आशुतोष जी ने नंबर दिया है।कोलकाता में संस्कृति जगत की दुनियाभर में धूम है।लेकिन नवारुण भट्टाचार्य से निधन के बाद वहां किसी से मेरा किसी किस्म का संवाद हुआ नहीं है।

    कभी देशभर के लेखकों और कवियों से हमारा निरंतर संवाद जारी रहा था।खासकर अमेरिका से सावधान लिखते हुए हर छोटे बड़े कवि से हमारी बातें होती रहती थी।रोजाना सैकड़ों पत्र आते थे।यूपी बिहार मध्यप्रदेश राजस्थान के तमाम संस्कृतिकर्मियों से लगातार विचार विमर्श होता रहा है।आज वे तमाम नाम और चेहरे सिर्फ स्मृतियों में दर्ज हैं।यथार्थ की जमीन पर संस्कृतिकर्मी कौन कहां है,फेसबुक में उनकी अविराम सक्रियता के बावजूद मुझे ठीक ठीक मालूम नहीं है।

    परसों अरसे के इंतजार के बाद आनंद पटवर्धन से लंबी बातचीत संभव हो सकी।हम मौजूदा चुनौतियों से निबटने के तौर तरीकों पर बात कर रहे थे और कोशिश कर रहे थे कि हम अपनी भूमिकाओं की चीड़फाड़ करें और माध्यमों और विधाओं में नये सिरे से जनपक्षधरता का मोर्चा मजबूत करने की पहल करें।आनंद पटवर्धन से बात हो रही थी तो जाहिर है कि बातचीत में वृत्तचित्रों और फिल्मों का भी जिक्र हो रहा था और अभिव्यक्ति की रचनात्मकता की बात भी हो रही थी।

    कल रात फिर कर्नल भूपाल चंद्र लाहिड़ी से फोन पर लंबी बातचीत हुई और उन्होंने जोर खासकर इस बात पर दिया कि कोई जरुरी नहीं है कि हम फिल्मों के पोस्ट प्रोडक्शन या डबिंग ,व्यायस ओवर के लिए तकनीकी उत्कर्ष की ज्यादा परवाह करें।अत्याधुनिक स्टुडियो की भी हमें जरुरत नहीं है।आपबीती सुनाते हुए उन्होेंने कहा कि उनकी फिल्म एई समय को कोलकाता के नंदन में सेंसर से पास होने के बाद प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं मिली।कोलकाता में कहीं वह फिल्म तब तक प्रदर्शित नहीं हो सकी जबतक न वह टोरंटो फिल्म समारोह में प्रंशंसित हुई।कोलकाता में हमने आनंद पटवर्धन,जोशी जोसेफ और नवारुण भट्टाचार्य के उपन्यास कंगाल मालसाट पर बनी फिल्मों पर रोक लगते देखा है।

    कोलकाता के सांस्कृतिक जगत में भी कर्नल लाहिड़ी अकेले रहे।अकेले हैं। लेकिन एक जेनुइन योध्दा की तरह उन्होंने मरते दम तक मोर्चा पर बने रहने का करतब कर दिखाया है। उनका मानना है कि संगठन हो या नहीं,पूरी रचनात्मकता के साथ जनप्रतिबद्ध लोगों को देश भर में साथ साथ काम करने के रास्ते मोर्चाबंद होना चाहिए क्योंकि राजनीति कारपोरेट हो गयी है।यही फौरी जरुरत है।

    गौरतलब है कि कर्नल लाहिड़ी डायलिसिस कराने के बाद सात नवंबर को नंदीग्राम गये थे और वहां उन सबसे मुलाकात किया,जिन्होंने नंदीग्राम में आंदोलन किया था।

    उनके साथ नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज भी थे।

    इसी दिन वहां बरसों पहले निहत्था किसानों और स्त्रियों पर पुलिस ने गोली चलायी थी। बंगाल मरीचझांपी नरसंहार की तरह   नंदीग्राम गोलीकांड को भी सत्ता के चिटपंड कार्निवाल में,सर्वव्यापी केसरियाकरण के निर्विरोध महोत्सव में भूल गया है और बाकी देश को भी नंदीग्राम का प्रतिरोध याद नहीं है।

    चूंकि विरोध प्रतिरोध से गुलामी खत्म होने का सबसे बड़ा खतरा है।गुलामगिरि खोने का डर है।गैंडे की खाल में खरोंच पड़ने का डर है।कालनिद्रा में खलल पड़ने का डर है।सर में रातोंरात सींग उग जाने से गदहा जनम खत्म होने का नर्क से विदाई का खतरा है।मुक्तबाजारी क्रयशक्ति से बेदखल होने का डर है।

    कर्नल लाहिड़ी ने कार्यकर्ताओं के साथ उस जनांदोलन में बलात्कार और दमन की शिकार महिलाओं से भी मुलाकात की है।

    वे भी शुरु से उस आंदोलन के साथ थे और इसी सिलसिले में पुष्पराज से उनकी मुलाकात हुई।उस आंदोलन का फिल्मांकन जोशी जोसेफ ने किया था।

    जनांदोलनों के पीछे रह जाने और मीडिया मार्फत राजनीति और सत्ता के वर्चस्व के खेल से लेखक फिल्मकार रंगकर्मी कर्नल भूपाल चंद्र लाहिडी दुःखी हैं।वे सुंदर वन के बच्चों को पौष्टिक आहार और शिक्षा देने का काम भी अकेले दम कर रहे हैं।

    इसलिए कर्नल लाहिड़ी भी इस बात पर जोर दे रहे थे कि जनांदोलनों को सिरे से रचनात्मक बनाने की जरुरत है।

    अब संगठनों पर भरोसा आहिस्ते आहिस्ते कम होता जा रहा है।

    उनका कहना है कि संगठन या तो बन नहीं रहे हैं या फिर संगठन बनकर भी बिखर रहे हैं या उनका चरित्र वाणिज्यिक या राजनीतिक होता जा रहा है,जो सिरे से जनविरोधी है।इसलिए ज्यादा से ज्यादा जनप्रतिबद्ध लोगों को लेकर विचारधाराओं के आर पार निरंकुश सत्ता के खिलाफ आम जनता के हकहकूक के लिए आवाज उठानी चाहिेए।

    नंदी ग्राम की ताजा रपट कर्नल लाहिड़ी और पुष्पराज से जल्द ही मिलने की संभावना है।मिलती है तो हम उन्हें भी साझा करेंगे।

    फिल्मकार आनंद पटवर्द्धन  का भी यही मानना है जो हम बार बार कहते रहे हैं कि सत्ता जब निरंकुश है और सत्तावर्ग का जब वैश्विक तंत्र मंत्र यंत्र है तो अकेले किसी के दम पर जनांदोलन तो दूर अभिव्यक्ति का कोई रास्ता भी खुला नहीं है।

    फिल्मकार आनंद पटवर्द्धन  का तो यह मानना है कि जो प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भूमिगत हैं,उन्हें अपने दड़बों से बाहर निकलकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हो जाना चाहिए क्योंकि किसी गुरिल्ला युद्ध से हालात बदले नहीं जा सकते और न ही सिर्फ विश्वविद्यालयों के छात्रों और युवाओं के आंदोलन से आम जनता के हकहकूक बहाल हो सकते हैं।

    पहाड़ों में चिपको चिपको आंदोलन महिलाओं ने शुरु किया,तो उत्तराखंड आंदोलन में भी माहिलाओं की निर्णायक भूमिका रही।मणिपुर में सश्स्त्र सैन्य बल विशेषाधिकार कानून के खिलाफ आंदोलन इंफाल के इमा (मां) बाजार से महिलाओं ने शुरु किया जिसका चेहरा इरोम शर्मिला रही हैं।पितृसत्ता के खिलाफ यह स्त्री का खुल्ला प्रतिरोध है।

    स्त्रियों के नेतृत्व में देशव्यापी आंदोलन निरंकुश सत्ता और फासिज्म के खिलाफ सबसे सशक्त प्रतिरोध की जमीन तैयार कर सकता है।

    इस सिलसिले में स्त्रीकाल की ओर से देशभर में महिला नेतृत्व की खोज एक सकारात्मक पहल है। मनुस्मृति और पितृसत्ता के खिलाफ खड़े हुए बिना,स्त्री को उसके हक हकूक दिये बिना यह सामाजिक क्रांति असंभव है।चंदन से हमने यही कहा है।

    पहाड़ों में स्त्री अर्थव्यवस्था और रोजमर्रे की जिंदगी की जिंदगी की धुरी है। उत्तराखंड में स्त्री शिक्षा साठ सत्तर के दशक से बाकी देश से बेहतर है।इसी वजह से आज तक उत्तराखंड के तमाम आंदोलनों में स्त्री का नेतृत्व है।

    बंगाल में किसी घर में ईश्वर चंद्र विद्यासागर या राजा राममोहन राय की तस्वीर नहीं है।बाकी भारत में भी स्त्री मुक्ति के इन सिपाहसालारों को याद करने वाले नहीं है।

    क्योंकि हम पितृसत्ता के मनुस्मृति राज के गुलाम हैं।हमारे डीएनए में, नस नस में मनुस्मृति पितृसत्ता है।सवर्णों की तुलना में बहुजनों में स्त्री अत्याचार किसी भी स्तर पर कम नहीं है।इसके उलट स्त्री का कोई सम्मान बहुजन समाज में नहीं है।घरेलू हिंसा से बहुजन समाज रिहा नहीं है।मेहनतकश स्त्री सबसे ज्यादा इसी समाज में हैं,जिनकी अपने घर में कोई इज्जत नहीं है।जिसकी वजह से उनका नर्क खत्म नहीं होता।

    स्त्री के नेतृत्व को स्वीकार करने में सबसे बड़ी बाधा बहुजनों का हिंदुत्वकरण है।अवतारवाद है।जहां से शोषण उत्पीड़न के दस दिगंत खुलते हैं।मुक्तबाजार का तड़का अलग है।इसी वजह से हिसाब बराबर करने का सबसे सरल तरीका बलात्कार है।स्त्री के खिलाफ हिंसा में वृद्धि स्त्री के हर क्षेत्र में नेतृत्व के खिलाफ पितृसत्ता का कुठाराघात है।

    धर्म जाति हैसियत से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ा है।जिसके मुताबिक स्त्री शूद्र,हर महाभारत लंकाकांड की असल वजह,देहदासी देवदासी का नर्क का द्वार है।समाजवादी मूसलपर्व के पीचे भी कैकयी है।पिता पुत्र बाकी सिपाहसालार पाक साफ हैं,दोषी सिर्फ सास और बहुएं हैं।सारे धर्म,धर्म ग्रंथ स्त्री के विरुद्ध हैं।शरतचंद्र और रवींद्रवनाथ के  अलावा साहित्य में किसी मर्द को स्त्री की देह के पार स्त्रीमन की कोई परवाह नहीं रही है।

    स्त्री मुक्ति आंदोलन में बहुत बड़ी भूमिका निभाने वाले बंगाल के हरिचांद ठाकुर और महाराष्ट्र के महात्मा ज्योतिबा फूले और और माता सावित्री बाई फूले को भारतीय हिंदुत्व वर्चस्व के गुलाम समाज में मान्यता अभी भी नहीं मिली है।

    मशहूर फोटोकार कमल जोशी ने नैनीताल समाचार में स्त्रियों के द्वाराहाट सम्मेलन की रपट लिखी है।इससे पहले कारपोरेट शिकंजे में फंसी जमीन का रिहा कराने के लिए अल्मोड़ा में भी स्त्रियों ने निर्णायक भूमिका निभाई है।

    कमल जोशी फ्रेम दर फ्रेम पहाड़ की मेहनतकश स्त्री को फोकस करते हैं।

    भारत में पर्यावरण चेतना के भीष्म पितामह सुंदरलाल नब्वे साल के हो गये।

    उन्हें प्रणाम।

    पर्यावरण आंदोलन को अभी जल जंगल जमीन की लड़ाई का हथियार बनाना बाकी है।इस बारे में हमने लगातार लिखा है।

    कल बंगाल के बुद्ध की उपाधि से मशहूर वैज्ञानिक तार्किक आंदोलन के सूत्रधार और बंगाल में बहुजन आंदोलन के निर्विवाद नेता डा.गुणधर वर्मन को कोलकाता ने याद किया।

    भारत का संविधान 26 जनवरी ,1950 में लागू हुआ लेकिन सरकारी नौकरियों में बंगाल में आरक्षण संविधान लागू होने के 26 साल बाद 1976 में लागू हो सका।इसके लिए पेशे से चाइल्ड स्पेशलिस्ट चिकित्सक डा.गुणधर वर्मन ने बंगाल में जबर्दस्त आंदोलन किया और आरक्षण के सहारे मलाईदार जिंदगी जीने वाले लोग डा.गुणधर वर्मन को नहीं जानते।बंगाल में मनुस्मृति शासन तो भारत विभाजन के बाद से लगातार लागू है।

    बहरहाल बंगाल में 1976 में आरक्षण लागू होने से मनुस्मृति शासन में कोई व्यवधान आया नहीं है।फर्क सिर्फ इतना हुआ है कि पहले हिंदू महासभा को बंगाल की जमीन से भारत विभाजन करने, बंगाल में ब्राह्मणवादी व्यवस्था बहाल करने के लिए भारत विभाजन में कामयाबी मिली तो सत्ता में संघ परिवार को काबिज होने का मौका दूसरे राज्यों की तरह अब भी नहीं मिला है।

    अब बिना सत्ता के बंगाल पूरी तरह केसरिया है।संघियों का शिकंजा है और मुख्यमंत्री भी संघ परिवार के विपक्ष का चेहरा चिटफंड है।बहुजनों का सफाया है।

    1976 से अबतक जिन लोगों को आरक्षण मिला वे तमाम लोग सत्ता के साथ नत्थी मलाईदार लोग हो गये हैं और बंगाल में हिंदुत्व के वे ही धारक वाहक है।

    1976 में आरक्षण लागू होने के बाद 1977 से 2011 तक बंगाल में वामपक्ष का शासन रहा और वाम आंदोलन में बहुजनों के चेहरे नेतृत्व में जैसे गायब रहे,वैसे ही आरक्षण की रस्म अदायगी सांकेतिक तौर पर होती रही।

    बंगाल में भारत के दूसरे राज्यों के मुकाबले आरक्षित पदों पर रिक्तियों के लिए योग्य उम्मीदवार कभी नहीं मिलते।ओबीसी बंगाल में नहीं है,वाम दावा था जबकि आधी आबादी ओबीसी है।अभी भी ओबीसी आरक्षण बंगाल में लागू नहीं है।बंगाल के ओबीसी खुद को सवर्ण मानते रहे हैं।मनुस्मृति शान उन्हीं की वजह से है।पूरे देश का किस्सा वही।

    स्कूल कालेजों में शिक्षक नहीं हैं,विश्वविद्यालयों में फैकल्टी नहीं है। स्कूल सर्विस कमीशन से लेकर विश्वविद्यालयों तक की नियुक्ति परीक्षाएं पास करने वाले लाखों अनुसूचितों को रोजगार नहीं मिला।सुंदरवन इलाके में कहीं विज्ञान की पढ़ाई नहीं है प्रगतिशील बंगाल में।जाति प्रमाणपत्र भी नहीं मिलते।हर क्षेत्र में,हर विभाग में ज्यादातर आरक्षित पद बरसों से खाली रहने के बाद योग्य उम्मीदवार न मिलने की वजह से सामान्य बना दिये गये।नौकरी,रोजगार के लिए पार्टीबद्ध होने की अनिवार्यता है।जीने के लिए ,सांस सांस के लिए पार्टीबद्ध होना जरुरी है।चाहे राजकिसी का भी हो।

    सामाजिक कार्यकर्ता मृन्मय मंडल और अतुल हावलादार ने पढ़े लिखे लोगों की बेवफाई को बहुजनों के दुःख का सबसे बड़ा कारण बताया है क्योंकि आरक्षण हासिल करने के बाद बाबासाहेब की इन संतानों ने अपने समाज के लिए कुछ किया नहीं है।

    इस मौके पर बंगाल भर से सामाजिक कार्यकर्ता मध्य कोलकाता के धर्मांकुर बौद्ध मंदिर में एकत्रित हुए जिनकी स्मृतियों में डा.गुणधर वर्मन एक भिक्षु रहे हैं।जिन्होंने संगठन और आंदोलनों में खुद को मिटा दिया है।इन तमाम लोगों ने मौजूदा हालात से निपटने के लिए गहन विचार विमर्श किया।

    सबसे ज्यादा चिंता इन्हें यूपी को लेकर है।

    बंगाल के सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक अगर नोटबंदी के जरिये संघ परिवार ने यूपी दखल कर लिया तो पूरे भारत की आम जनता, किसानों, मजदूरों, व्यापारियों , नौकरीपेशा लोगों के लिए कयामत है।

    सबसे ज्यादा चिंता इन्हें यूपी को लेकर है कि यूपी जीतने के बाद राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के बाद फासिज्म की सत्ता और नरसंहारी हो जायेगी और भारतीय संविधान की जगह मनुस्मृति अक्षरशः लागू हो जायेगी।

    कार्यकर्ताओं ने एक स्वर से नोटबंदी को यूपी दखल करके बहुजनों के नरसंहार का हिंदुत्व कारपोरेट कार्यक्रम बताया और यूपी की जनता से अपील की कि देश बचाने के लिए हर हाल में संघ परिवार को कड़ी शिकस्त दें।

    माफ करें,हालात से निबटने के लिए रणनीति पर जो सिलसिलेवार  चर्चा हुई,उसे हम साझा नहीं कर रहे हैं।

    कृपया इन दस्तावेजों को गौर से पढ़ेंः

    Reservation of Vacancies in Services and Posts

    Govt of West Bengal passed "West Bengal Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Reservation of Vacancies in Services and Posts) Act, 1976" and framed Rules under the Act. This extends to the whole of West Bengal i.e. it is to be followed not only by the Public Service Commission direct recruitment for Govt. of West Bengal but also Non-PSC direct recruitment vacancies arising in State Govt. Establishments, State Govt. Undertakings, Quasi Govt. Establishments and Local Bodies. The vacancies to be filled up by direct recruitment and for promotion in the whole of West Bengal come under the purview of this reservation act except any employment in the West Bengal Higher Judicial Service, private sector, domestic service and single post cadre. There shall be reservation of 22% for members of Scheduled Caste, 6% for members of Scheduled Tribe. There is no reservation for Backward Class candidate for promotion. A separate 50 / 100 point roster shall be maintained by every establishment. 100 point roster is maintained for direct recruitment and 50 point roster is maintained for promotion. At present, there are 100 communities identified by Govt. of West Bengal as SC/ST; among which 60 communities are SC and 40 communities are ST. Here is a list of the same:-

    1. List of Scheduled Caste

    2. List of Scheduled Tribes

    3. West Bengal SC ST (Reservation of vacancies in Services and Posts) Act,1976

    4. West Bengal SC ST (Reservation of vacancies in Services and Posts) Rules, 1976

    https://wbxpress.com/reservation-of-vacancies-in-services-and-posts/


    WB SC & ST(Reservation of vacancies in the services and post)Act ...

    ssccw.wbpar.gov.in/.../WB%20SC%20...


    05/05/1976 - West Bengal Act XXVII of 1976. The West Bengal Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Reservation of vacancies in. Services and Posts) ...

    [PDF]The West Bengal Scheduled Castes and ... - Search State Laws

    www.lawsofindia.org/downloadfile.php...

    इस पृष्ठ का अनुवाद करें

    Act, 1976. mcnl. (2) 11 extends to the whole of West Bengal. (3) I! shall come inlo .... -'Provided fuflher that thc nurnbcr of any Scheduled Caste ..... 2 1 st vacancy.

    [PDF]RESERVATION ACT

    oldwww.iiests.ac.in/.../975-state-act-on-...

    05/05/1976 - West Bengal Act XXVII of 1976. The West ... Services and Posts) Act,1976 ..... st vacancy. Scheduled Caste. 2 nd vacancy. Unreserved. 3 rd.



    नोटबंदी के फैसले की समीक्षा के लिए संसद की लोक लेखा समिति ने वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों समेत रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर उर्जित पटेल को 28 जनवरी को अपने समक्ष पेश होने के लिए तलब किया था. कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता केवी थॉमस अध्यक्षता वाली इस समिति ने आरबीआई गर्वनर से 10 सवाल पूछे हैं. इन सवालों में नोटबंदी पर आरबीआई की भूमिका और उसके प्रभाव के बारे में पूछा गया है.

    'इंडियन एक्सप्रेस'की खबर के मुताबिक ये सवाल 30 दिसंबर को भेजे गए. 10 सवाल ये हैं…

    1. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने सदन में कहा है कि नोटबंदी का फैसला आरबीआई और इसके बोर्ड ने लिया. सरकार ने इस सलाह पर निर्णय लिया. क्‍या आप सहमत हैं?

    2. आरबीआई ने कब तय किया कि नोटबंदी भारत के हित में हैं?

    3. रातों-रात 500 और 1000 के नोट बंद करने के पीछे आरबीआई ने क्‍या तर्क पाए?

    4. आरबीआई के अनुसार भारत में सिर्फ 500 करोड़ रुपये की जाली करेंसी है. जीडीपी के मुकाबले भारत में नकद 12 फीसदी था, जो कि जापान (18%) और स्विट्जरलैंड (13%) से कम है. भारत में मौजूद नकदी में उच्‍च मूल्‍य के नोटों का हिस्‍सा 86% था, लेकिन चीन में 90% और अमेरिका में 81% है. ऐसी क्‍या चिंताजनक स्थिति थी कि नोटबंदी का फैसला लिया गया?

    5. 8 नवंबर को होने वाली आपातकालीन बैठक के लिए आरबीआई बोर्ड सदस्‍यों को कब नोटिस भेजा गया था? उनमें से कौन इस बैठक में आया? कितनी देर यह बैठक चली?

    6. नोटबंदी की सिफारिश करते हुए क्‍या आरबीआई ने स्पष्ट किया था कि 86 प्रतिशत नकदी अवैध होगी? कितने समय में व्यवस्था पटरी पर लौट सकेगी?

    7. फैसले के बाद बैंकों से 10000 रुपये प्रतिदिन और 20000 रुपये प्रति सप्‍ताह निकासी की सीमा तय की गई. एटीएम से 2000 रुपये प्रतिदिन की सीमा तय की गई. किस कानून और शक्तियों के तहत लोगों पर अपनी ही नकदी निकालने की सीमा तय की गई? करेंसी नोटों की सीमा तय करने की ताकत आरबीआई को किसने दी? क्‍यों न आप पर मुकदमा चलाया जाए और शक्‍त‍ियों का दुरुपयोग करने के लिए पद से हटा दिया जाए?

    8. इस दौरान आरबीआई के नियमों में बार-बार बदलाव क्‍यों हुए? उस आरबीआई अधिकारी का नाम बताएं जिसने निकासी के लिए लोगों पर स्‍याही लगाने का विचार दिया? शादी से जुड़ी निकासी वाली अधिसूचना किसने तैयार की? अगर यह सरकार ने किया था तो क्‍या अब आरबीआई वित्‍त मंत्रालय का एक विभाग है?

    9. कितने नोट बंद किए गए और कितनी पुरानी करेंसी जमा हुई?

    10. आरबीआई आरटीआई के तहत मांगी जाने वाली जानकारी क्‍यों नहीं दे रहा?



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    UID/Aadhaar Enabled Bio-metric Attendance System (AEBAS) violates Supreme Court's orders


    Seeding of UID/Aadhaar not permitted by both the Court's order and the Aadhaar Act 2016


    It is in breach of promise made in the UID/Aadhaar Number Enrolment Form  


    Some 639 organizations registered over 1.88 lakh employees, over 5000 active devices in contempt of Supreme Court's Constitution Bench order on the subject of 12-digit biometric Unique Identification (UID)/Aadhaar Number. This has been revealed by a government document titled "Aadhaar: Dynamics of Digital Identity". The Court reiterated its order on September 14, 2016 after the passage of The Aadhaar (Targeted Delivery of Financial and Other Subsidies, Benefits and Services) Act, 2016 underlining the fact that the order is the fact that the last order of the Supreme Court is the law of the land.


    The Court's three judge bench expressed concern about collection of biometric data by private and foreign agencies on January 5, 2017. In case any Indian resident or agency is facing problems due to any order which are making biometric Unique Identification (UID)/Aadhaar Number compulsory, one can use the order to save oneself from illegitimate, illegal and unconstitutional instructions or circulars. 


    The UID/Aadhaar Enrolment continues to make a promise to Indian residents that "Aadhaar Enrolment is free and voluntary." It is available at https://uidai.gov.in/images/uid_download/enrolment_form.pdf. Besides Supreme Court, Punjab and Haryana High Court's observation in a written order compelled central government to withdraw its circular making UID/Aadhaar mandatory.


    In a blatant disregard of Court's directions, Ministry of Finance, Government of India has communicated a Common Strategy to be adopted by Banks to achieve the targets under Aadhaar Seeding in mission mode. Department  of  Financial  Services  (DFS),  Ministry  of  Finance,  Government  of  India vide letter  F.No.  21(23)/2014-FI (MISSION) dated 13.07.2016 has fixed the timelines for achieving 100% Aadhaar seeding of all the accounts and common strategies to be adopted by all the banks have also been communicated. Government  of  India  has  informed  that  Aadhaar  will  be  used  as  identifier  for  all  centrally funded  scholarship  schemes  and  the  amount  will  be  directly  transferred  to  aadhaar  linked bank  account.  Hence, schools  have  also been directed  to  collect  aadhaar mandate  and send the  same  to  concerned  bank  branches. All the banks are requested seed the aadhaar received from schools on priority basis. Such violation of Court's order is recorded in the minutes of State Level Bankers' Committee, Puducherry convened by Indian Bank, a Public Sector, Government of India Undertaking. The minutes are available at http://www.indianbank.in/slbc/SLBC19082016agenda.pdf

    The existing legal provisions as per Court's order and the Aadhaar Act 2016 do not provide for seeding of UID/Aadhaar with any scheme or project.


    It is instructive to observe that Election Commission of India is the only agency that has complied with the Supreme Court's orders in letter and spirit. There is a compelling logic for the Court to consider passing an order to follow the order of the Election Commission as a template should. The Commission revised its order dated February 27, 2015 on August 13, 2015. Its revised order reads: "All further activities relating to collection/feeding/seeding of Aadhaar Number being undertaken currently under NERPAP shall be suspended with immediate effect till further directions from the Commission. In other words, henceforth no more collection of Aadhaar Numbers from electors or feeding/seeding of collected Aadhaar data shall be done by any election authority or officials connected with the NERPAP."  NERPAP stands for National Electoral Rolls Purification & Authentication Programme. The revised order is available at http://eci.nic.in/eci_main1/Current/NERPAP-AADHAAR_14082015.pdf

    The list of notifications and circulars issued by the UIDAI (https://www.uidai.gov.in/beta/legal-framework/acts/notifications.html and https://www.uidai.gov.in/beta/legal-framework/acts/circulars.html) indicate that there were no steps taken to strictly follow all the earlier orders passed by this Court commencing from September 23, 2013.


    The application programming interfaces (API) Aadhaar authentication usage from (https://uidai.gov.in/images/FrontPageUpdates/aadhaar_authentication_api_1_6.pdf), copy of the web page http://jeemain.nic.in/webinfo/Public/Home.aspx and the UIDAI press release of 29.11.2016 indicates they have directed regional centres to enrol Joint Entrance Examination aspirants on priority. This is discriminatory and vindicates the apprehensions expressed by National Human Rights Commission (NHRC) in its submission before the Parliamentary Standing Committee on Finance that had examined and trashed the Aadhaar Bill 2010.


    The Aadhaar authentication description (https://uidai.gov.in/images/authentication/d2_authentication_framework_v1.pdf page 4) ignores modification of its authentication framework and consequently the forms/circulars/likes/API so as to not compulsorily require the Aadhaar number. A copy of the UIDAI events webpagehttps://www.uidai.gov.in/beta/media-center/aadhaar-in-news/events-workshops.html that indicates that the UIDAI is running Sensitization Workshop on Aadhaar Seeding and Authentication Services every fortnight. A circular K-11022/188/2015-UIDAI(Auth-II) that also indicates that the UIDAI has not restricted its activities to those permitted by the Court.


    The UIDAI webpage for its advertisements (https://www.uidai.gov.in/beta/media-center/media/advertisement.html) that clearly ignores indicates that it has ignored the requirement to give wide publicity in the electronic and print media including radio and television networks that it is not mandatory for a citizen to obtain an UID/Aadhaar Number.


    The Aadhaar authentication description (https://uidai.gov.in/images/authentication/d2_authentication_framework_v1.pdf page 4) that has ignored modification of its authentication processes and APIs so that Aadhaar identification cannot be insisted upon by the various authorities. The URL at https://www.uidai.gov.in/beta/authentication/aadhaar-financial-inclusion/aadhaar-seeding.html shows UIDAI has undertaken multiple activities to ensure Aadhaar seeding in facilitated in various scheme databases.


    The Introduction to Aadhaar Authentication from its Authentication API (https://uidai.gov.in/images/FrontPageUpdates/aadhaar_authentication_api_1_6.pdf page 3) show that ignores any modification of its authentication API or KYC frameworks so that the production of an UID/Aadhaar Number will not be condition for obtaining any benefits otherwise due to a citizen.

    The operation model overview for the Aadhaar authentication (https://www.uidai.gov.in/beta/authentication/authentication/operation-model.html) that continues to ignore altering its authentication and KYC services to ensure that the Aadhaar card Scheme remains purely voluntary and it cannot be made mandatory.


    The API Aadhaar authentication usage from  (https://uidai.gov.in/images/FrontPageUpdates/aadhaar_authentication_api_1_6.pdf) that have not been modified to restrict the access of the authentication and KYC services. A copy of the list of live Authenticated User Agencies (AUA), Authentication Service Agencies (ASA), e-KYC User Agencies (KUA) indicates that hundreds of private parties have been allowed by the UIDAI to access the Aadhaar number and associated data thus not restricting the use of the Aadhaar number. UIDAI web page https://www.uidai.gov.in/beta/authentication/aadhaar-financial-inclusion/aadhaar-as-financial-address.html shows that UID/Aadhaar Number is being promoted as a financial address. The UIDAI web pagehttps://www.uidai.gov.in/beta/authentication/aadhaar-financial-inclusion/aadhaar-authentication-for-financial-transactions.html promotes Aadhaar authentication for financial transactions to promote electronic payments.


    A Press Note titled 10 crore Aadhaars linked to Bank Accounts issued by the UIDAI indicates that they have not restricted the use of the UID/Aadhaar Number. One spreadsheet on the National Payments Corporation of India (NPCI)'s website highlights that the UIDAI has been providing authentication and KYC services to the National Payments Corporation of India, a non government company for various banking services including:

    i.                    APBS Credit (Disbursement based on UIDAI No.) including ACH Debit, ACH  Credit, NACH Credit and NACH Debit.

    ii.                  CTS Cheque Clearing

    iii.                IMPS 

    iv.                RuPay Card usage at (POS)

    v.                  RuPay Card usage at (eCom)

    vi.                AEPS (Inter Bank) Txn over Micro ATM (e.g. Cash withdrawal/ Cash Deposit)