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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    यह बदइंतजामी और अराजकता बहुजनों के नरसंहार का चाकचौबंद इंतजाम है।

    करोड़ों लोगों को भूखों बेरोजगार मारने का पक्का इंतजाम करके उन्होंने संविधान दिवस मनाया और बहुजन बल्ले बल्ले हैं।

    पलाश विश्वास

    अमेरिकी साम्राज्यवाद से पूरे पचास साल लड़ते हुए कामरेड फिदेल कास्त्रो का निधन हो गया।दुनिया बदलने वाले तमाम लोग अब खत्म है और इस दुनिया को बदलने की लड़ाई में अब शायद ही हमारे पास कोई है।

    मनुष्यता और सभ्यता के लिए सबसे बड़ा संकट यही है कि अब कहीं कोई ऐसा इंसान पैदा नहीं हो रहा है,जिसे अपने सिवाय बाकी किसी की कोई परवाह हो या जो अपनी कौम,अपने वतन के खातिर सुपरपावर अमेरिका जैसी शक्ति से भी टक्कर ले सकें।

    अजीबोगरीब हालात हैं।मुक्तबाजार में फासिज्म के राजकाज के दौर में लोग इतने डरे हुए हैं कि हिटलर की पिद्दी के शोरबे के शोर में सिट्टी पिट्टी गुम है और तमाम ताकतवर मेधासंपन्न गुणीजन शुतुरमुर्ग में तब्दील हैं।ससुरे इतने डरे हुए हैं कि लिख पढ़ नहीं सकते,बोल नहीं सकते,दर्द हो तो चीख भी नहीं सकते।हग मूत पाद नहीं सकते।इस देश का ट नहीं हो सकता।

    आंखें खोल नहीं सकते कि सच देख लिया और कहीं जुबान फिसलकर सोच बोल दिया तो तानाशाह फांसी पर चढ़ा देगा।

    राजनेता अपना कालाधन बचाने की जुगत में है कि अरबपति जीवनचर्या में व्यवधान न आये।

    मीडिया आम जनता के हकहकूक के बारे में न बोलेगा और न लिखेगा,न देखेगा और न दिखायेगा क्योंकि कमाई बंद होने का डर है।

    कलाकार बुद्धिजीवी सहमे हैं कि कहीं सात रत्नों के कुनबे से बाहर न हो जाये।

    कारोबारी और उद्यमी चुप हैं कि कहीं कारोबार या उद्यम ही बंद न हो जाये।

    लोग कतारबद्ध होकर बलि चढ़ने के लिए तैयार हैं।

    कोढ़े खाकर भी जोर शोर से चीख रहे हैं,जय हो कल्कि महाराज।

    खेती का सत्यानाश हो गया और किसान गिड़गिड़ाते हुए रहम की भीख मांग रहे हैं।

    कामधंधा कारोबार रोजगार चौपट हैं तो भी करोड़ों लोग मोहलत और रहम की फिक्र में हैं।

    लोगों को अपनी अपनी खाल बचाने की ज्यादा चिंता है और गुलामी की जंजीरें तोड़ने का कोई जज्बा है ही नहीं क्योंकि गुलामों को गुलामी का अहसास उस तरह नहीं है जैसे अछूत अपनी दुर्गति की वजह पिछले जन्मों का पाप मानते हैं और जो मिल रहा है,उसे किसी ईश्वर न्याय मानता है।यही उनकी अटूट आस्था है।

    तंत्र मंत्र ताबीज से वे तमाम किस्मत बदलने के फेर में है और यही उसकी आस्था और धर्म कर्म है जो पिछडो़ं और अल्पसंख्यकों का भी हाल है।जादूगर के शिकंजे में है यह देश जो अपनी छड़ी घुमाकर सुनहले अच्छे दिन सबके खाते में जमा कर देगें और सारे लोग जमींदार पूंजीपति बन जायेेंगे।

    अब भी यह देश मदारी सांप और जादूगर का देश है।

    तकनीक अत्याधुनिक है और सभ्यता बर्बर मध्ययुगीन।

    इंसानियत है ही नहीं।इंसान भी नहीं हैं।शिवजी के बाराती तमाम भूतप्रेत हैं।

    आधी आबादी जो स्त्रियों की है,हजारों साल से उनके दिलो दिमाग में कर्फ्यू है और पढ़ लिखकर हैसियतें हासिल करने के बावजूद उन्हें कुछ चाहने,सोचने या फैसला करने की आजादी नहीं है और न पितृसत्ता के इस मनुस्मृति अनुशासन को तोड़ने की कोई इच्छा उनकी है।

    बल्कि पितृसत्ता की पहचान और अस्मिता के जरिये वे अपना महिमामंडन करती हैं और दासी होते हुए देवी बनने की खुशफहमी में हंसते हंसते खुदकशी कर लेती हैं,दम तोड़ देती हैं या मार दी जाती हैं।जीती है तो मोत जीती है और जिंदगी से बेदखल जीती हैं।

    जो औरतें ज्यादा खूबसूरत है और ज्यादा पढ़ी लिखी भी हैं,उसके साथ भी गोरी हैं,वे कभी सोच नहीं सकती कि उनकी नियति काली अछूत,पिछड़ी आदिवासी या विधर्मी औरतों से कुछ अलहदा नहीं है।

    बच्चों का मां बाप उसके पैदा होते ही बेहतरीन गुलामी का सबक घुट्टी में पिलाते रहते हैं ताकि वह बागी होकर इस तंत्र मंत्र यंत्र को बदलने के फिराक में मालिकान के गुस्से का शिकार न हो जाये।मां के पेट से निकलते ही अंधी दौड़ शुरु।

    ऐसे माहौल में लोग बाबासाहेब डा. बीआर अंबेडकर बोधिसत्व को याद कर रहे हैं जिनके जाति उन्मूलन के मिशन से किसी को कुछ लेना देना नहीं है।

    लोग अखबारों में छपे सत्ता के इश्तेहार से गदगद हैं कि देखो,तानाशाह बाबासाहेब को याद कर रहे हैं।

    बाबासाहेब की तस्वीर चक्रवर्ती महाराज की तस्वीर से छोटी है तो क्या?

    तानाशाह से बड़ी किसकी तस्वीर हो सकती है जिनका कद इतिहास भूगोल और सभ्यता से बड़ा है?

    अखबारी विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना जाहिर है कि नहीं है।समता और न्याय के संविधान निर्माताओं के सपने का जिक्र भी नहीं है और न उनमे से किसी का कहा लिखा कुछ है और न मूल संविधान के मसविदे से कोई उद्धरण है।

    संविधान दिवस के मौके पर जो विज्ञापन हर अखबार में आया है,उसमें नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का लेखा जोखा है जो श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल में मौलिक अधिकारों की काट बतौर बंधक संसद के संविधान संशोधन के तहत आपातकाल को जायज बताने के लिए जोड़ा था।

    कोलकाता के रेडरोड पर अंबेडकर मूर्ति के नीचे भी संविधान दिवस मनाया गया है।बंगाल में बसपा,रिपब्लिकन या बामसेफ जैसा कोई संगठन नहीं है लेकिन बाबासाहेब के नाम तीन लाख संगठन हैं जो अलग अलग हर साल बाबासाहेब की जयंती और उनका महानिर्वाण दिवस मनाते हैं और इस बहाने बाबासाहेब उनका एटीएम है।

    तीन लाख अंबेडकरी संगठनों के बंगाल में संविधान दिवस पर तीन सौ लोग बमुश्किल थे।जिनमें यादवपुर और कोलकाता विश्वविद्यालयों के कुछ बागी छात्र भी थे और थे कुछ मुसलमान।

    लालगढ़ शालबनी जैसे आदिवासी इलाकों से आदिवासी भी आये थे।धर्मतल्ला से जो जुलूस निकला उसका नेतृत्व संथाल महिलाएं पीली साड़ी में सर पर कलश रखे कर रही थीं।बाकी अछूत और पिछड़े गिनतीभर के नहीं थे क्योंकि किसी राजनीतिक नेतृत्व के संरक्षण के बिना वे हग मूत पाद भी नहीं सकते।

    ऐसा गुलामों का गुलाम है यह बहुजन समाज तो समझ लीजिये कि आगे करोडो़ं लोग मारे भी जायें तो लोग इसे अपना अपना भाग्य मान लेंगे।विकास बी मान सकते हैं।यही हमारी देशभक्ति है और यही हमारा राष्ट्रवाद है कि हम नरसंहार के खिलाफ कामोश ही रहें तो बेहतर।

    क्योंकि सामने से नेतृत्व करने के लिए हमारे पास कोई फिदेल कास्त्रो नहीं है।

    और बाबासाहेब को तो हमने हत्यारों की कठपुतली बना दी है।

    उस कठपुतली बाबासाहेब के हवाले से वे हमारा नरसंहार हमारे विकास के नाम करते रहेंगे,जायज साबित कर देंगे और हम यह मान लेगें कि बाबा साहेब की तस्वीर और मूर्ति के मालिकान कोई झूठ थोड़े ही बोल रहे हैं।

    बाबासाहेब तो कुछ भी कह सकते हैं।

    न हमने सुना है,न हमने देखा है और न हमने पढ़ा है।बाबासाहब की तस्वीर या मूर्ति है तो उनके हवाले से कहा सत्तापक्ष का बयान हमारा महानतम पवित्र धर्मग्रंथ है।

    इस मौके पर जंगलमहल के आदिवासियों ने जल जगल जमीन से उनकी बेदखली और बेलगाम सलवाजुड़ुम की आपबीती सुनायी।

    पुरखों की लड़ाई जारी रखने की कसम खायी और कहा कि वे हिंदू नहीं हैं।

    उनका सरना धर्म सत्यधर्म है और उनकी संस्कृति का इतिहास भारत का इतिहास है।

    उन्होंने कहा कि हमारे गीतों में सिंधु सभ्यता के ब्योरे हैं और हम पीढ़ी दर पीढ़ी उसी सभ्यता में जी रहे हैं और आर्य आज भी हमपर हमला जारी रखे हुए हैं और हमारे कत्लेआम और बेदखली का सिलसिला बंद नहीं हुआ है।

    उन्होंने कहा कि हजारों साल से हम आजाद हैं।

    आदिवासियों ने कहा,हम कभी गुलाम नहीं थे और न हम कभी गुलाम होंगे।

    आदिवासियों ने कहा,हमारे पुरखों ने आजादी के लड़ाई में हजारों सालों से शहादतें दी हैं और हम उनकी लड़ाई में हैं।

    बेहद शर्मिंदा मेरी बोलती बंद हो गयी।मितली सी आने लगी।सर चकराने लगा कि आखिर हम कौन लोग हैं और ये कौन लोग हैं।

    बिना लड़े हम हारे हुए लोग सुरक्षित मौत के इंतजार में हैं।

    और इस देश के आदिवासी आजादी के लिए मरने से भी नहीं डरते।

    वे किसी की सत्ता से नहीं डरते क्योंकि वे इस पृथ्वी,इस प्रकृति की संताने हैं और वे सभ्यता और इतिहास के वारिशान हैं और सबसे बड़ी बात वे हिंदू नहीं हैं।

    हम हिंदू हैं तो हमें अपनी जात अपनी जान से प्यारी है।

    हम हिंदू हैं तो कर्मफल मान लेना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और बाकी किसी अधिकार के हम हकदार नहीं है,ऐसा हम हजारों साल से मानते रहे हैं।

    आरक्षण के बहाने और बाबासाहेब की मेहरबानी से हम तनिको पढ़ लिखे शहरी गाड़ी बाड़ी वाले और अफसर मंत्री वंत्री वगैरह वगैरह डाक्टक वाक्तर,इंजीनियर वगैरह वगैरह हो गये हैं, लेकिन हम आदिवासी नहीं है न हमारा धर्म सरणा है,जो सत्य धर्म है।

    तमाम और वक्ता बोलते रहे।बाबासाहेब का गुणगान करते रहे और संविधान का महिमामंडन करते रहे।मैंने कुछ सुना नहीं है।

    मेरे बोलने की बारी आयी तो न चाहते हुए हमें बोलना पड़ा।

    क्या बोलता मैं?

    बाबासाहेब के बारे में क्या बोलता जिनका मिशन आधा अधूरा लावारिश है और बाबासाहेब जो खुद बंधुआ मजदूर में तब्दील हैं?

    उस संविधान के बारे में क्या बोलता जिसकी हत्या रोज हो रही है और हम खामोश दर्शक तमाशबीन है?

    उस लोकतंत्र के बारे में क्या कहता जो अब फासिज्म का राजकाज है?

    उस कानून के राज के बारे में क्या कहता जो जमीन पर कहीं नहीं है?

    बाबासाहेब की वजह से बने उस रिजर्व बैंक के बारे में क्या बोलता जिसके अंग प्रत्यंग पर कारपोरेट कब्जा है?

    तानाशाह के फरमान से जिसके नियम रोज बदल रहा है और जो सिरे से दिवालिया है?

    उस संसदीय प्रणाली पर क्या कहता जिसके डाल डाल पात पात कारपोरेट है और जहां हर शख्स अरबपति करोड़पति है और जिनमें ज्यादातर दागी अपराधी हैं?

    हम किस लोकतंत्र की चर्चा करें जिसमें हम तमाम पढ़े लिखे नागरिक दागी धनपशु अपराधियों के बंधुआ मजदूर हैं और अपनी खाल बचाने के लिए ख्वाबों में भी आजादी की सोच नहीं सकते?

    बल्कि हमने वह कहा जो हमने अभीतक लिखा नहीं है।

    कालाधन निकालने की कवायद से किसी को शिकायत नहीं है।

    शिकायत सबको बदइंतजामी से है और अराजकता से है।

    यह बदइंतजामी और अराजकता बहुजनों के नरसंहार का चाकचौबंद इंतजाम है।

    आरक्षण के बावजूद कितने फीसद दलित पिछड़े आदिवासी मुसलमान और दूसरे अनार्य लोग नौकरियों में हैं?

    योग्यता और मेधा होने के बावजूद बिना आरक्षण बहुजनों को किस किस सेक्टर में नीति निर्देशक बनाया गया है?कितने डीएम हैं और कितने कैबिनेट सेक्रेटरी हैं?कितने पत्रकार साहित्यकार सेलेब्रिटी है?

    फिर जोड़ लें कि कितने फीसद बहुजन खेती और कारोबार में हैं और उनमें भी कितने पूंजीपति है?सत्ता वर्ग के कितने लोग किसान हैं और कितने मजदूर?

    कितने फीसद बहुजनों के पास कालाधन है?

    जो शहरी लोग नेटबैंकिंग और मोबाइल तकनीक के जरिये कैशलैस जिंदगी के वातानुकूलित दड़बे में रहते हैं,उनमें बहुजन कितने फीसद हैं?

    यह संकट जानबूझकर सुनियोजित साजिश के तहत नरसंहारी अश्वमेध अभियान का ब्रह्मास्त्र है।

    राष्ट्र के नाम संबोधन रिकार्डेड था।

    सत्ता दल ने नोटबंदी से पहले सारा कालाधन अचल संपत्ति में तब्दील कर लिया।

    बाकायदा कानून बनाकर पहले ही सत्ता वर्ग के तीस लाख करोड रुपये विदेश में सुरक्षित पहुंचा दिये गये।

    सत्तापक्ष के तमाम पूंजीपतियों का बैकों से लिया गया लाखों करोड़ का कर्जा माफ कर दिया गया है।

    अब वे डंके की चोट पर कह रहे हैं कि कैशलैस सोसाइटी बनाना चाहते हैं चक्रवर्ती महाराज कल्किमहाराज।

    कैशलैस सोसाइटी के लिए बहुजनों को कौड़ी कौड़ी का मोहताज बना दिया गया।

    खेती का सत्यानाश हो गया।जो कारोबार काम धंधे में थे,असंगठित क्षेत्र के मजदूर थे,ऐसे करोड़ों लोग जिनें नब्वेफीसद बहुजन हैं,बेदखलकर दिये गये हैं और वे दाने दाने को ,सांस को मोहताज हैं और आगे देश व्यापी बंगाल की भुखमरी है।मंदी है।

    मुक्तबाजार के नियम तोड़कर इस कैशबंदी को कृपया बदइतजामी न कहें.यह बदइंतजामी मनुस्मृति अनुशासन का चाक चौबंद इंतजाम है।

    कोरोड़ों लोगों को भूखों बेरोजगार मारने का पक्का इंतजाम करके उन्होंने संविधान दिवस मनाया और बहुजन बल्ले बल्ले हैं।

    আম্বেদকরপন্থীদের সংবিধান বাঁচানোর ডাকে মিছিল

    November 26, 2016 0 Comment ambedkar, indian constitution

    নিজস্ব সংবাদদাতা, টিডিএন বাংলা, কলকাতা: আজ ঐতিহাসিক দিন।তবুও কেউ পথে নেই!কেবল পথে আম্বেদকরবাদীরা ও যাঁরা বাবা সাহেবকে ভালো বাসেন তাঁরা।আজ ভারতের সংবিধানের প্রতিলিপি ও জাতীয় পতাকা নিয়ে কলকাতায় মিছিল করলো একাধিক দলিত ও আদিবাসী সংগঠন।সকাল ১১টায় রানিরাসমণি থেকে এই পদযাত্রা শুরু হয়ে রেডরোড অবস্থিত বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকরের মূর্তির পাদদেশে শেষ হয়।

    ন্যাশনাল সোশাল মুভমেন্ট অব ইন্ডিয়ার ডাকে একাধিক এসসি, এসটি, ওবিসি, আদিবাসী সংগঠন মিছিলে অংশ নেয়। বহুজন সলিডারিটি মুভমেন্টসের রাজ্য সভাপতি শরদিন্দু উদ্দীপন বলেন,"বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকর আমাদের নেতা।তিনি সংবিধান রচনা করেছেন।তিনি না থাকলে আজ এই সংবিধান পেতামনা।আজ সেই সংবিধান ধ্বংসের চেষ্টা চলছে।আমরা তাই পথে নামছি।শাসকবর্গ অসমানতা এবং বর্বরতাপূর্ণ ব্যবস্থা কায়েম করার জন্য সংসদীয় গণতন্ত্র, ভারতীয় সংবিধান এবং জনগণের বিরুদ্ধে ভয়ঙ্কর ষড়যন্ত্রে লিপ্ত হয়েছে। এরা বিশ্বের সর্বশ্রেষ্ঠ গণতন্ত্রকে মনুবাদী বিচারধারা এবং ব্রাহ্মন্যবাদী একনায়কতন্ত্র এবং ফ্যাসিবাদের যূপকাষ্ঠে বলি চড়াতে চাইছে। এদের কাজকর্মে প্রমানিত হচ্ছে যে এই অমানবিক পুঁজিবাদ–ব্রাহ্মন্যবাদ দেশদ্রোহী গাটবন্ধন ভারতীয় সংবিধানকে নিজেদের কব্জায় নিয়ে ফেলেছে।

    এমন বিকট পরিস্থিতিতে ভারতের একজন গণতন্ত্র প্রেমী সচেতন নাগরিক হিসেবে সংবিধান তথা সংসদীয় গণতন্ত্র বাঁচানোর জন্য সর্বশক্তি নিয়ে এগিয়ে আসা প্রয়োজন।"

    আদিবাসীদের সাংস্কৃতিক আয়োজন সকলের প্রসংসা কুড়িয়েছে।উপস্থিত আম্বেদকরপন্থীরা সংবিধানের প্রস্তাবনা পড়েন এবং নতুন দেশ গঠনের প্রতিজ্ঞা করেন।তবে আদিবাসীদের অভিযোগ,"নিজেদের মৌলিক অধিকার নিয়ে আন্দোলন করলেই মাওবাদী বলা হচ্ছে।আমরা চরম সমস্যার মধ্যে আছি।"

    শরদিন্দু বাবুর আরও বলেন,"ভারতের সংবিধান গণতন্ত্রের ইতিহাসে সর্ববৃহৎ এবং সর্বশ্রেষ্ঠ সংবিধান।ভারতের সংবিধানের ভিত এমন ভাবে গড়ে তোলা হয়েছে যে যাতে প্রত্যেক নাগরিক নিজ নিজ ক্ষেত্রে অর্থনৈতিক, সামাজিক, ধর্মীয়, বৌদ্ধিক ও সাংস্কৃতিক স্বাধীনতা উপভোগ করতে পারে। এই সংবিধান দেশের প্রত্যেক নাগরিককে ধর্ম, জাতি, লিঙ্গ, ভাষা এবং আঞ্চলিকতার উর্দ্ধে এসে সদ্ভাবনার সাথে জীবন অতিবাহিত করার মৌলিক অধিকার প্রদান করেছে।

    কিন্তু অত্যন্ত বেদনার সাথে জানাচ্ছি যে, দেশে একটি ফ্যাসিবাদী শক্তি কায়েম হওয়ার পরে প্রতিনিয়ত এই সংবিধানের অবমাননা চলছে।"

    মিছিল শেষে বক্তব্য রাখেন কর্নেল সিদ্ধার্থ ভার্বে, সুরেশ রাম, শিরাজুল ইসলাম, সানাউল্লা খান, পলাশ বিশ্বাস, সিদ্ধানন্দ পুরকাইত, সুচেতা গোলদার, কৃষ্ণকান্ত মাহাত,প্রশান্ত বিশ্বাস প্রমুখ।

    মিছিলের আয়োজকদের দাবি,কলকাতায় আম্বেদকরের যে মূর্তি আছে তাতে বেশ কিছু 'ভুল'আছে।বাবা সাহেবের চোখে চশমা নেই।আরও কিছু ভুলের সংশোধন চেয়ে মুখ্যমন্ত্রী ও রাজ্যপালের সাথে দেখা করবেন তাঁরা।

    জাতীয় পতাকা হাতে সংবিধান দিবস পালন করলেন পশ্চিমবঙ্গের দলিত বহুজন মানুষঃ

    আজ সকাল ১১টার সময় থেকে ন্যাশনাল সোস্যাল মুভমেন্ট অব ইন্ডিয়ার আহ্বানে কোলকাতার রানিরাসমণি রোড থেকে শুরু হয় সংবিধান বাঁচাও শিরোনামে একটি পদযাত্রা। এই পদযাত্রায় অংশগ্রহণ করেন পশ্চিমবঙ্গের সর্ব ধর্মের মানুষ। মিছিল থেকে আওয়াজ ওঠে, "যদি আগামী শিশুদের ভবিষ্যৎ বাঁচাতে চাও, সংবিধান বাঁচাও"।

    সংবিধান দিবসে আগত সমস্ত মানুষ ফোর্টউইলিয়ামের পাশে অবস্থিত বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকরের মূর্তির পাদদেশে ভারতীয় সংবিধানের প্রস্তাবনা পাঠ করেন এবং শপথ গ্রহণ করেনে। অনুষ্ঠানের আকর্ষণ বাড়িয়ে তোলেন পশ্চিম মেদিনীপুর থেকে আগত আদীবাসী ভাইবোনেরা। তার সড়পা নৃত্যের মাধ্যমে মারাংবুরু এবং বাবা সাহেবকে বন্দনা করেন।



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    জালিয়াতি কারবারের আঁতুড়ঘর ব্রাহ্মন্যবাদঃ 

    Saradindu Uddipan

    আকারে একেবারে খর্বাকৃতি হলেও "বামন"রাজা মহাবলীকে হত্যা করতে পারে তার প্রতীকী কাহিনী আমরা ভগবত পুরাণে পেয়েছি। এই কাহিনীতে গর্বভরে দাবী করা হয়েছে যে বামন আকারে ক্ষুদ্র হলেও কূটকৌশল এবং বুদ্ধিতে অপ্রতিরোধ্য দুর্জেয়। এখানে বামন ভারতবর্ষের ৩.৫% ব্রাহ্মণের প্রতিনিধি এবং রাজা মহাবলী মূল ভারতের ৯৬.৫% জনগণের শাসক। এই বিশাল সংখ্যক মানুষকে যে বুদ্ধি এবং কৌশলে গোলামীর জঞ্জির পরিয়ে একেবারে প্রসাদান্নভোগী বা উচ্ছিষ্টভোগী পর্যায়ে নামিয়ে আনতে হয় তার নাম ব্রাহ্মন্যবাদ। 
    বেদ থেকে একেবারে খ্রিষ্টীয় বার শতক পর্যন্ত লেখা ব্রাহ্মন্যবাদি গ্রন্থগুলি সতর্ক ভাবে পাঠ করলেই আমরা বুঝতে পারব যে ব্রাহ্মন্যবাদ টিকে আছে সম্পূর্ণ আবেগ ও অন্ধবিশ্বাসের উপরে। আর এই অন্ধ বিশ্বাসকে টিকিয়ে রাখার জন্য ব্রাহ্মণেরা মানুষের শরীরে বেড়ি না পরিয়ে মস্তিষ্কতে ঠুলি বসিয়ে দিয়েছে এবং মানুষের আবেগকে ধর্মীয় রসায়নে জারিত করে ব্রাহ্মণের বানীকে অমৃত ভক্ষন এবং তাদের কাজগুলিকে দৈবশক্তির মহিমা হিসবে চিরস্থায়ী করে তুলেছে। তাই এখনো ভারতের মানুষ ব্রাহ্মণের জালিয়াতি, লাম্পট্য, মিথ্যাচার, শঠতা, ভেদনীতি, নরহত্যা, গুপ্তহত্যা এবং নৈরাজ্যকে অন্ধের মত অনুসরণ করে। দেব লীলা হিসেবে মেনে নেয়। 
    ভারতের আরএসএস এবং তার তৈরি বিজেপি এই ব্রাহ্মন্যবাদী ব্রিগেড। এদের প্রতিটি পদক্ষেপেই রয়েছে এই জালিয়াতির প্রকৌশল। নৈরাজ্য, অরাজকতা, খুন, সন্ত্রাস, ধর্ষণ, মহামারী, মন্বন্তর এবং মহাপ্রলয়কে এরা এদের ধর্ম প্রতিষ্ঠার উপযুক্ত সন্ধিক্ষণ বলে মনে করে। তাই সুযোগ পেলেই, ক্ষমতা পেলেই ব্রাহ্মণ্যশক্তি ধর্মপরায়ণ হয়ে ওঠে। 
    ভারতের বর্তমান প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি এই ব্রাহ্মন্যবাদীদের পুতবারি সিঞ্চিত এবং নরমেধ যজ্ঞের মনোনীত কান্ডারী। তার গোটা জীবনের প্রোফাইলটাই জালিয়াতী প্রামাণ্য দলিল। তার চা বিক্রেতা ভূমিকা থেকে গত নভেম্বরের ৮/১১/২০১৬ তারিখে নোট বন্ধ ঘোষণার সমস্তটাই জালি কারবার। 
    তিনি ভারতের দূরদর্শনের মাধ্যমে দেশের জনগণের প্রতি যে জরুরী ঘোষণা করেন যে আজ মধ্য রাত্রের পরে ভারতের ৫০০টাকা এবং ১০০০টাকার নোট আর বাজারে চলবে না। সেগুলি এখন ছেড়া কাগজের টুকরা। এই ঘোষণাকে দূরদর্শনে লাইভ টেলিকাস্ট হিসেবে দেখানো হয়। কিন্তু গবেষক এবং সাংবাদিক সত্যেন্দ্র মুরালীর করা RTI (PMOIN / R / 2016/53416) এবং DOEAF / R / 2016/80904 and MOIAB / R / 2016/80180 থেকে পরিষ্কার হয়ে যায় যে প্রধানমন্ত্রীর এই টেলিকাস্ট লাইভ ছিল না। ধরা পড়ে যাবার ভয়ে এখনো এই তথ্য জানানো হচ্ছেনা। ঘোরানো হচ্ছে এ দপ্তর থেকে সে দপ্তরে। প্রশ্ন উঠছে এর পরেও নৈতিক দায়িত্ব নিয়ে নরেন্দ্র মোদির দেশের এক মহান দপ্তরে পদ আঁকড়ে থাকা উচিৎ কি না?
    নোট বদলের আসল উদ্দেশ্য কি? 
    নোট বদলের পরের দিনই পরিস্থিতি মূল্যায়ন করে আমি দাবী করেছিলাম যে এটি মোদির নেতৃত্বে "ভারতের খাজানা লুট"এর সব থেকে বড় কেলেঙ্কারি। সেই দাবীর সমর্থন মিলেছে ভূতপূর্ব রিজার্ভ ব্যাঙ্কের গভর্নর এবং প্রাক্তন প্রধান মন্ত্রী মনোমোহন সিংহের কাছ থেকে। মোদিজীর এই প্রক্রিয়াকে 'Organised Loot, Legalised Plunder' হিসেবে আখ্যা দিয়েছেন। তিনি এও বলেছেন যে পৃথিবীতে এমন কোন দেশ নেই যেখানে মানুষ ব্যাংকে টাকা রাখবেন কিন্তু তুলতে পারবেন না। এটা জোর করে মানুষের অধিকার কেড়ে নেওয়া।

    আসল ঘটনাঃ 
    এই মহুর্তে দেশের ব্যাঙ্কে মোট অনাদায়ী লোন (Bad loan) এর পরিমান হলো ৬,০০,০০০ কোটি৷
    কয়েক সপ্তাহ আগে Credit Rating Agency মোদী সরকারকে রিপোর্ট দেয় যে এই মহুর্তে ভারতীয় ব্যাঙ্ককে ১.২৫ লক্ষ কোটি Capital Infusion দরকার৷
    জুলাই ২০১৬ তে ১৩টি ব্যাঙ্ককে ২৩,০০০ কোটি টাকা inject করা হয়৷
    ২০১৫ সালে অর্থমন্ত্রী অরুন জেঠলি বলেন যে আগামী ৪ বছরে (PSU) ব্যাঙ্ককে চাঙ্গা করতে আরো ৭০,০০০ কোটি দেওয়ার লক্ষ্যমাত্রা নিয়েছে কেন্দ্র৷

    এই পরিমাণে টাকা বাড়াতে পারলেই শিল্পপতিদের লোন মাফ করা যাবে এবং আবার তাদের নতুন লোন দেওয়া যাবে!
    ব্যাঙ্ককে টাকা বাড়ানো এবং প্রিয় শিল্পপতিদের ঋণ মকুব ক্রবার জন্য মোদী ২০০০টাকার নোট বাজারে এনে ৫০০টাকা এবং ১০০০টাকার নোট বাতিল বলে ঘোষণা করে দিলেন। ঘোষণা করলেন এই টাকা ব্যাঙ্কে রাখা যাবে কিন্তু যেমন খুশি টাকা তোলা যাবে না। সংসার চালানোর জন্য সামান্য টাকা তুলতে পারবেন।
    মোদী সরকার, মোদিপন্থী এবং তাদের পোষা মিডিয়াগুলি ঢাক পেটাতে শুরু করলেন যে এটি কালো টাকা উদ্ধার, জাল টাকা বন্ধ করা এবং সন্ত্রাসবাদীদের আটকানোর জন্য সঠিক পদক্ষেপ যা ৭০ বছর ধরে কোন সরকার করে নি। এই প্রক্রিয়ায় মোদিজী ভারতকে একেবারে ডিজিটাল দুনিয়ার সর্বোচ্চ দেশ হিসেবে টক্কর দেবেন। 
    RBI এর তথ্যানুযায়ী ১৪লক্ষ কোটি টাকার মধ্যে ৩৮% নোট ১০০০টাকার, আর ৪৯% নোট ৫০০ টাকার৷
    'Bussiness World' এর তথ্যানুযায়ী দেশে 'Fake note' 0.002% of Rs 1,000 notes, and 0.009% of Rs 500 notes. 
    কাদের দিয়ে খাজানা লুট করলেন মোদি ? 
    ১) ভারতের সেরা ১০০ জন Wilful ডিফল্টার দের মধ্যে State bank of India ৬৩ জনের ৭,০১৬ কোটি টাকা যার মধ্যে Kingfisher এর বিজয় মালিয়ার ১,২০১ কোটি টাকা মুকুব (Write off) করলো সরকার৷ 
    ২) রিলায়েন্স গ্রুপের মালিক অনিল আম্বানি মোদীর এবং বিজেপির খুব স্নেহভাজন৷তিনি দেশের সবচেয়ে বড়ো ডিফল্টার৷
    টাকার পরিমান মার্চ ২০১৫ তে ১.২৫ লক্ষ কোটি৷
    ৩)বেদান্ত গ্রুপের মালিক অনিল আগরওয়াল৷ ধাতু ও খনির ব্যাবসায়ী দ্বিতীয় বৃহত্তম ডিফল্টার যার পরিমান ১.০৩ লক্ষ্য কোটি৷
    ৪) ইএসএসআর গ্রুপের মালিক রুইয়া ব্রাদার্স (শশী রুইয়া ও রবি রুইয়া) ডিফল্টার, ঋনের পরিমান ১.০১ লক্ষ কোটি৷
    ৫) আদানী গ্রুপের মালিক গৌতম আদানি, মোদীর খাস লোক৷ডিফল্টার ৯৬,০৩১ কোটি টাকা৷
    ৬)জয়াপি গ্রুপের মালিক মনোজ গৌড় ৭৫,১৬৩ কোটি টাকার ডিফ্লটার।
    ৭) #JSW Group: মালিক সজ্জন জিন্ডাল৷ডিফল্টার রাশি ৫৮,১৭১ কোটি 
    ৮) #GMR Group: মালিক প্রোমোটার GM Rao. যিনি দিল্লী T3 International Airprt Terminal বানালেন৷ ডিফল্টার রাশি ৪৬,৯৭৬ কোটি টাকা৷
    ৯) #Lanco Group: যার মালিক মধূসুদন রাও৷ডিফল্টার রাশির পরিমান ৪৭,১০২কোটি টাকা৷
    ১০) #Videocon Group: মালিক বেণুগোপাল৷ডিফল্টার রাশি ৪৫,৪০৫ কোটি টাকা৷
    ১১) #GVK Group: মালিক GVK Reddy৷ডিফল্টার ৩৩,৯৩৩ কোটি টাকা৷
    ১২) #Usha Ispat: ডিফল্টার ১৬,৯৭১ কোটি টাকা৷কোম্পানিটির বর্তমানে কোনো হদিস নেই৷একটি সংবাদ সংস্থা তদন্ত করতে গিয়ে দেখে যে কোম্পানীটি বন্ধ এবং রহস্যময় ভাবে কোম্পানীর মালিকের অস্তিত্বই নেই৷
    ১৩) #Lloyeds Steel: ডিফল্টার ৯,৪৭৮ কোটি টাকা৷কোম্পানীটি বর্তমানে অন্য একটি কোম্পানী অধিকৃত৷
    ১৪) #Hindustan Cables Ltd.:ডিফল্টার ৪,৯১৭ কোটি টাকা৷বর্তমানে ব্যাবসা গুটিয়ে নিয়েছে৷
    ১৫) #Hindustan Petroliam Mfg.Co.: ডিফল্টার ৩,৯২৮ কোটি টাকা৷বর্তমানে কোম্পানীটি বন্ধ৷
    ১৬) #Zoom Developer: ডিফল্টার ৩,৮৪৩ কোটি টাকা৷কোম্পানীটির অস্তিত্ব মেলেনি৷
    ১৭) #Prakash Industry: ডিফল্টার ৩,৬৬৫ কোটি টাকা৷কোম্পানী চালু অাছে৷
    ১৮) #Crane Software International: ডিফল্টার ৩,৫৮০ কোটি টাকা৷কোং চালু অাছে৷
    ১৯) #Prag Bosimi International: ডিফল্টার ৩,৫৫৮ কোটি টাকা৷কোং চালু অাছে৷
    ২০) #Kingfisher Airlines: ডিফল্টার ৩,২৫৯ কোটি টাকা৷এখানে বলে রাখা প্রয়োজন এটা PNB অর্থাৎ পাঞ্জাব ন্যাশনাল ব্যাঙ্ক থেকে নেওয়া৷অার অাগে যেটা মাফ হয়েছে বললাম সেটা শুধু মাত্র SBI অর্থাৎ state bank of india র ৬৩ জনের তারমধ্যে Kingfisher এর বিজয় মালিয়া একজন৷kingfisher aviation ekhon বন্ধ৷
    ২১) #Malvika Steel: ডিফল্টার ৩,০৫৭ কোটি টাকা৷কোম্পানীটি বন্ধ৷ 
    (তথ্য সংগৃহীত)
    ইতি মধ্যে মাননীয় রঘুরাম রাজন হিসেব করে দেখিয়েছেন যে এ পর্যন্ত ৪০ হাজার কোটি টাকার রাজস্য, ১.৫ লক্ষ কোটি জিডিপি এবং ৩০ কোটি শ্রমদিবস নষ্ট হয়েছে। আরো ৫০ দিন এই ভাবে চললে যে পরিমাণে অর্থনৈতিক ক্ষতি হবে তা কালো টাকার কয়েক গুন বেশি। 
    প্রখ্যাত নোবেল জয়ী এবং অর্থনীতিবিদ মাননীয় অমর্ত্য সেন এই প্রক্রিয়াকে স্বৈরতান্ত্রিক হিসেবে আখ্যা দিয়েছেন। কোন অর্থনৈতিকই বিশেষজ্ঞ মোদির এই নোট কাণ্ডকে কালোটাকা ফিরিয়ে আনা বা নোটের জাল কারবার রোখার জন্য সঠিক পদক্ষেপ বলে স্বীকার করেন নি। বরং মানুষের উপর জোর করে চাপিয়ে দেওয়া এই অর্থনৈতিক অবরোধ দেশের চরম ক্ষতি এবং নৈরাজ্যের কারণ হিসেবে ব্যাখ্যা করেছেন। 
    আমরা দাবী করছি মোদি আসলে ব্রাহ্মন্যবাদী নৈরাজ্যের বাহক। ব্রাহ্মণ্য ধর্ম অনুসারেই মোদির এই জালিয়াতি দেশে মহামারী এবং মন্বন্তর ডেকে আনবে। এখনি সতর্ক হওয়া দরকার।

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    #SystematicEthnicCleansingbytheGovernanceofFascistAparhteid

    इतनी सारी कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों हैं भारत में?

    फिदेल कास्त्रो ने कामरेड ज्योति बसु से पूछा था

    उपभोक्ता जनता की कोई राजनीति नहीं है।

    उपभोक्ता जनता छप्पर फाड़ क्रयशक्ति के इंतजार में है और इस देश में ऐसी कोई राजनीति नहीं है जो उन्हें कायदे से समझा सकें कि छप्फर फाड़कर क्रयशक्ति नहीं,मौत बरसने वाली है।

    कमसकम भारते के कामरेडों की राजनीति ऐसी नहीं है।

    बाकी संघ परिवार और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है।

    पलाश विश्वास

    केरल और त्रिपुरा को छोड़कर भारत बंद का कहीं कोई असर नहीं हुआ है।केरल और त्रिपुरा में वामपंथी इस वक्त सत्ता में हैं,तो वहां बंद कामयाब रहा।बाकी देश में नोटबंदी के खिलाफ इस बंद का या आक्रोश दिवस का कोई असर नहीं हुआ है।भारतबंद का आयोजन वामपक्ष की ओर से था तो अब कहा जा रहा है कि किसी ने भारत बंद का आवाहन नहीं किया था।बंगाल के कामरेडों ने फेसबुक और ट्विटर से निकलकर देश भर में आम हड़ताल की अपील जरुर की थी,जिसाक मतलब भारत बंद है,ऐसा उन्होंने हालांकि नहीं कहा था।लेकिन इस आम हड़ताल में नोटबंदी के खिलाफ गोलबंद विपक्ष का नोटबंदी विरोध की मोर्चा तितर बितर हो गया।अचानक इस मोर्चे की महानायिका बनने के फिराक में सबसे आगे निकली बंगाल की मुख्यमंत्री ने नोटबंदी के विरोध के बजाय बंगाल से वाम का नामोनिशान मिटाने की अपनी राजनीति के तहत बंद को नाकाम बनाने के लिए अपनी पूरी सत्ता लगा दी और साबित कर दिया कि बंगाल में वाम के साथ आवाम नहीं है।बिहार में लालू और नीतीश के रास्ते अलग हो गये।नीतीश ने लालू से कन्नी काटकर मोदी की नोटबंदी का समर्थन घोषित कर दिया और जल्द ही उनके फिर केसरिया हो जाने की संभावना है।मायावती या मुलायम या अरविंद केजरीवाल किसी ने मोर्चाबंदी को कोई कोशिश नहीं की।

    साफ जाहिर है कि इस नोटबंदी का मतलब सुनियोजित नरसंहार है,जिसके तहत करोड़ों लोग उत्पादन प्रणाली, रोजगार, अर्थव्यवस्था और बाजार से बाहर कर दिये जायेंगे और आहिस्ते आहिस्ते भारतीय किसानों और मजदूरों की तरह वे आहिस्ते आहिस्ते बेमौत मारे जायेंगे।असंगठित क्षेत्र के और खुदरा बाजार के तमाम लोगों को मारने के लिए उनसे क्रयशक्ति छीन ली गयी है।

    अब अर्थशास्त्री और उद्योग कारोबार के लोग भी कल्कि महाराज के इस दांव के खतरनाक नतीजों से डरने लगे हैं।विकास दर पलटवार करने जा रही है और मंदी का अलग खतरा है तो भारतीय मुद्रा और भारतीय बैंकिंग की कोई साख नहीं बची है।कालाधन निकालने के बजाये रिजर्व बैंक के गवर्नर ने अचानक मुखर होकर डिजिटल बनने की सलाह दी है नागरिकों को तो कल्कि महाराज का मकसद डिजिटल इंडिया कैशलैस इंडिया है,संघ औरसरकार के लोग खुलकर ऐसा कहने लगे हैं।तो मंकी बातों में नोटबंदी का न्यूनतम लक्ष्य लेसकैश और अंतिम लक्ष्य कैशलैस इंडिया बताया गया है जो दरअसल मेकिंग इन हिंदू इंडिया है।

    #SystematicEthnicCleansingbytheGovernanceofFascistAparhteid

    भारत में इतनी कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों हैं?

    फिदेल कास्त्रो ने कामरेड ज्योति बसु से पूछा था।ज्योतिबसु ने फिदेल कास्त्रो को क्या जबाव दिया था,इसका ब्यौरा नहीं मिला है।

    अब चाहे तो हर कोई कामरेड कास्त्रो पिर हवाना सिगार के साथ इस देश की सरजमीं पर प्रगट हों तो जवाब दे सकता है।कामरेडवृंद यथास्थिति की संसदीय राजनीति में अपना अपना हिस्सा कादे से समझ बूझ लेना चाहते हैं और वे सबसे ज्यादा चाहते हैं कि भारत में सर्वहारा बहुजन का राज कभी न हो और रंगभेदी अन्याय और अराजकता का स्थाई मनुस्मृति बंदोबस्त बहाल रहे,इसलिए वे सर्वहारी बहुजन जनता की कोई पार्टी नहीं बनाना चाहते,बल्कि अना नस्ली वर्चस्व कायम रखने के लिए वामपंथ का रंग बिरंगा तमासा पेश करके आम जनता को वामविरोधी बनाये रखनेके लिए नूरा कुश्ती के लिए इतनी सारी कम्युलनिस्ट पार्टियां बना दी है कि आम जनता कभी अंदाजा ही नहीं लगा सकें कि कौन असल कम्युनिस्ट है और कौन फर्जी कम्युनिस्ट है।

    फिदेल ने अमेरिकी की नाक पर बैठकर एक दो नहीं,कुल ग्यारह अमेरिकी राष्ट्रपतियों के हमलों को नाकाम करके मुक्तबाजार के मुकाबले न सिर्फ क्यूबा को साम्यावादी बनाये रखा,बल्कि पूरे लातिन अमेरिका और अफ्रीका की मोर्चाबंदी में कामयाब रहे।सोवियत यूनियन,इंधिरा गांधी और लाल चीन के अवसान के बाद भी।फिदेल और चेग्वेरा ने मुट्ठीभर साथियों के दम पर क्यूबा में क्रांति कर दी जबकि क्यूबा में गन्ना के सिवाय कुछ नहीं होता और वहां कोई संगठित क्षेत्र ही नहीं है।जनता को राजनीति का पाठ पढ़ाये बिना फिदेल ने क्रांति कर दी और करीब साठ साल तक लगातार अमेरिकी हमलों के बावजूद न क्यूबा और न लातिन अमेरिका को अमेरिकी उपनिवेश बनने दिया।

    हमारे कामरेड करोडो़ं किसानों और करोड़ों मजदूरों,कर्मचारियों और छात्रों,लाखों प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के बावजूद भारत में मेहनतकशों के हकहकूक की आवाज भी बुलंद नहीं कर सके क्योंकि वे सत्ता में साजेदार थे या सत्ता के लिए राजनीति कर रहे थे और उनका लक्ष्य न सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व था और न संविधान निर्माताओं के लक्ष्य समता और न्याय से उन्हें कुछ लेना देना था।

    हम अब न सामाजिक प्राणी हैं और न हमारी कोई राजनीति है।समाज के बिना राजनीति असंभव है।

    हमारा कोई देश भी नहीं है।देशभक्ति मुंहजुबानी है।वतन के नाम कुर्बान हो जानेवाला शहीदेआजम भगतसिंह,खुदीराम बोस, मास्टर सूर्यसेन या अपने लोगों के हकहकूक के लिए शहीद हो जाने वाले बिरसा मुंडा,सिधो कान्हो जैसा कोई कहीं नहीं है।हमारे देश में किसी लेनिन या माओ से तुंग या फिदेल कास्त्रो के जनमने के आसार है क्योंकि बच्चे अब हगीज के साथ सीमेंट के दड़बों में जनमते हैं और जमीन पर कहीं गलती से उनके पांव न पड़े,माटी से कोई उनका नाता न हो,तमाम माता पिता की ख्वाहिश यही होती है।हालांकि हमने किसी बच्चे को सोना या चांदी का चम्मच के साथ पैदा होते नहीं देखा।हगीज के साथ पैदा हो रहे बच्चों का चक्रव्यूह रोज हम बनते देख रहे हैं।जिनमें मुक्ति कीआकांक्षा कभी हो ही नहीं सकती क्योंकि उन्हें उनकी सुरक्षा की शर्तें घुट्टी में पिलायी जा रही है।

    अब इस देश में कामयाब वहीं है जो विदेश जा बसता है।हमारी फिल्मों,टीवी सीरियल में भी स्वदेश कहीं नहीं है।जो कुछ है विदेश है और वहीं सशरीर स्वर्गवास का मोक्ष है।

    हमारे सारे मेधावी लोग आप्रवासी हैं और हमारे तमाम कर्णधार,जनप्रतिनिधि,अफसरान,राष्ट्रीय रंगबिरेंगे नेता, राजनेता, अपराधी भी मुफ्त में आप्रवासी हैं।

    इसकी वजह यह है कि हमारा राष्ट्रवाद चाहे जितना अंध हो,हमारा कोई राष्ट्र नहीं है।

    हमारा जो कुछ है,वह मुक्तबाजार है।

    हम नागरिक भी नहीं है।

    हम खालिस उपभोक्ता है।

    उपभोक्ता की कोई नागरिकता नहीं होती।

    न उपभोक्ता का कोई राष्ट्र होता है।

    उपभोक्ता का कोई परिवार भी नहीं होता।

    न समाज होता है।

    न मातृभाषा होती है और न संस्कृति होती है।

    उसका कोई माध्यम नहीं होता।

    न उसकी कोई विधा होती है।

    उसका न कोई सृजन होता है।न उसका कोई उत्पादन होता है।

    इसलिए मनुष्य अब सामाजिक प्राणी तो है ही नही,मनुष्य मनुष्य कितना बचा है,हमें वह भी नहीं मालूम है।

    इसलिए हमने जो उपभोक्ता समाज बनाया है,उसके सारे मूल्यबोध और आदर्श क्रयशक्ति आधारित है।

    जिनके पास क्रयशक्ति है,वे बल्ले हैं।

    जिनकी कोई क्रयशक्ति नहीं है,उनकी भी बलिहारी।

    वे भी उत्पादन और श्रम के पक्ष में नहीं है और न उनके बीच कोई उत्पादन संबंध है।

    वे टकटकी बांधे छप्परफाड़ क्रयशक्ति के इंतजार में हैं और उपभोक्ता वस्तु में तब्दील हर चीज,हर सेवा यहां तक कि हर मनुष्य को खरीदकर राज करने के ख्वाब में अंधियारा के कारोबार में शामिल हैं और उन्हें यकीन है कि आजादी का कोई मतलब नहीं है।

    गुलामी बड़ी काम की चीज है अगर भोग के सारे सामान खरीद लेने के लिए क्रयशक्ति हासिल हो जाये।

    वे मुक्तबाजार को समावेशी बनाने के फिराक में हैं।

    वे मुक्तबाजार में अपना हिस्सा चाहते हैं चाहे इसकी कोई भी कीमत अदा करनी पड़े।यही उनकी राजनीति है।

    मसलन तमिलनाडु,केरल और हिमाचल प्रदेश में इसी राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी नागरिक हर पांच साल में सत्ता बदल डालते हैं तो उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है कि शासक का चरित्र क्या है।तमिलनाडु में जो चाहिए राशनकार्ड पर उपलब्ध है तो हिमाचल में गरीबी कहीं नहीं है।किसी को कोई मतलब नहीं है कि उनका शासक कितना भ्रष्ट या गलत है।केरल के कामरेड भी हर पांच साल में दक्षिणपंथी हो जाते हैं।

    कल्कि महाराज का आम जनता विरोध नहीं कर रही है क्योंकि आमं जनता को अपने अनुभव से मालूम है कि विपक्ष की राजनीति का उनके हितों से,उनके हक हकूक और उनकी तकलीफों से कोई लेना देना नहीं है।वे सत्ता की लड़ाई लड़ रहे हैं।

    उपभोक्ता जनता को कोई सत्ता नहीं चाहिए।

    उपभोक्ता जनता की कोई राजनीति नहीं है।

    उपभोक्ता जनता छप्पर फाड़ क्रयशक्ति के इंतजार में है और इस देश में ऐसी कोई राजनीति नहीं है जो उन्हें कायदे से समझा सकें कि छप्फर फाड़कर क्रयशक्ति नहीं,मौत बरसने वाली है।

    कमसकम भारते के कामरेडों की राजनीति ऐसी नहीं है।

    बाकी संघ परिवार और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है।

    हमने अमेरिका से सावधाऩ अधूरा और अप्रकाशित छोड़कर कुछ कविताएं और कहानियां जरुर लिखी हैं,लेकिन उन्हें प्रकाशन के लिए नहीं भेजा है।न हमारी किताबें उसके बाद छपी हैं।हम अपने समय को संबोधित करते रहे हैं और करते रहेंगे।पिछले दिनों बसंतीपुर से भाई पद्दो ने कोलकाता आकर कहा कि उसकी योजना है कि हमारी किताबें छपवाने की उसकी योजना है।हमने उससे कह दिया कि किताबें छापना हमारा मकसद नहीं है और न छपना हमारा मकसद है।ऐसा मकसद होता तो दूसरों की तरह आर्डर सप्लाी करते हुए अपनी कड़की का इलाज कर लेता।दिनेशपुर में पिता के नाम अस्पताल बना है,मैंने देखा नहीं है।

    पद्दो ने कहा कि पिताजी की नई मूर्ति लगी है।वहां पार्क बना है और लाखों का खर्च हुआ है।मेरे पिता तो अपने लिए दो दस रुपये तक खर्च नहीं करते थे।इसलिए मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि मेरे पिताजी के नाम कौन इतना सारा खर्च उठा रहा है और क्यों ऐसा हो रहा है।

    हमने दरअसल किसी कद्दू में तीर नहीं मारा है।

    बंगाल में न बिजन भट्टाचार्य की जन्मशताब्दी मनायी न समर सेन की।बिजन भट्टचार्ये के नबान्न से भारत में इप्टा आंदोलन सुरु हुआ।समरसेन को खुद रवींद्रनाथ भविष्य का कवि मानते थे।रवींद्रनाथ के जीते जी वे प्रतिष्ठित कवि हो गये थे।

    फिर उन्होंने कविताएं नहीं लिखीं।कविता कहानी से ज्यादा जरुरी उन्हें अपने वक्त को संबोधित करना लगा और बाहैसियत पत्रकार जिंदा रहे और मरे।हाल में उनका बाबू वृत्तांत प्रकाशित हुआ जो उनका रचना समग्र है।जिसमें उनकी कविताएं भी शामिल हैं।

    हमने इस संकलन से समयांतर के लिए फ्रंटियर निकलने की कथा और आपातकाल में बुद्धिजीवियों की भूमिका का बाग्ला से हिंदी में अनुवाद किया है।

    समर सेन ने सिलसिलेवार दिखाया है कि वाम बुद्धिजीवी इंदिरा जमाने में आपातकाल में भी कैसे विदेश यात्राएं कर रहे थे और कैसे वे हर कीमत पर इंदिर गांधी के आपातकाल का समर्थन कर रहे थे।

    यह ब्यौरा पढ़ने के बाद बंगाली भद्र समाज और बुद्धिजीवियों का वाम अवसान बाद हुए कायाकल्प से कोई हैरानी नहीं होती।

    जबतक बंगाल,केरल और त्रिपुरा में सत्ता बनी रही वामदलों की वाम बुद्धिजीवियों की दसों उंगलियां घी की कड़ाही में थीं और सर भी।वे तमाम विश्वविद्यालयों,अकादमियों और संस्थानों में बने हुए थे।आजादी के बाद संघियों की सत्ता कायम होने से ठीक पहले तक विदेश यात्रा हो या सरकारी खर्च पर स्वदेश भ्रमण,वामपंथी इसमे केद्र के सत्ता दल से जुड़े बुद्धिजीवियों के मुकाबले सैकड़ों मील आगे थे।लेकिन उनकी इस अति सक्रियता से इस देश में सरवहारा बहुजनों को क्या मिला और उनके हकहकूक की लड़ाई में ये वाम बुद्धिजीवी कितने सक्रिय थे,यह शोध का विषय है।

    सारा शोर इन्हीं बुद्धिजीवियों का है,बाकी जनता खामोश है।अपना सत्यानाश होने के बावजूद जनता सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने को तैयार नहीं है क्योंकि कोई वैकल्पिक राजनीति की दिशा नहीं है।

    अब पिद्दी न पिद्दी का शोरबा तमाम कामरेड अखबारों के पन्ने भरते नजर आ रहे हैं क्यूबा की क्रांति,फिदेल कास्त्रो,अेरिकी साम्राज्यावाद के खिलाफ मोर्चा बंदी और क्यूबा यात्रा के संस्मरमों के साथ।इन तमा लोगों से पूछना चाहिए कि कुल उन्नीस लोगों को लेकर क्यूबा,लातिन अमेरिका और अफ्रीका की तस्वीर फिदले कास्त्रो ने बदल दी तो तमाम रंग बिरंगी कम्युनिस्ट पार्टियों,करोडो़ं की सदस्य संख्या वाले किसान सभाओं,मजदूर संगठनों,छात्र युवा संगठनों,महिला संगठनों आदि आदि के साथ वे अब तक किस किस कद्दू में तीर मारते रहे हैं।

    उन्हींका वह तीर अब कल्कि महाराज हैं।

    वह कद्दू अब खंड विखंड भारतवर्ष नामक मृत्यु उपत्यका है।



    कालाधन के लिए आम माफी
    #PowerPoliticswithoutcasuewhatsoever
    कालाधन हो गया सफेद,अब देश हुआ गोरों का!
    कामरेड केसरिया चले क्यूबा ,क्रांति वहीं करेंगे!
    लखनऊ मा दीदी दहाड़े,मोदी हटायेंगे!
    इस कवायद का अंजाम कैसलैस इंडिया है या लेस कैश इंडिया है तो इसे कालाधन निकालने के लिए कालाधन के खिलाफ जिहाद कैसे कह सकते हैं?
    नोटबंदी का नतीजा अगर डिजिटल कैसलैस इंडिया है तो समझ लीजिये अब काले अछूतों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का अब कोई देश नहीं है।वे आजीविका,उत्पादन प्रमाळी और बाजार से सीधे बेदखल है और यह कैसलैस या लेस कैश इंडिया नस्ली गोरों का देश है यानी ऐसा हिंदू राष्ट्र है जहां सारे के सारे बहुजन अर्थव्यवस्था से बाहर सीधे गैस चैंबर में धकेल दिये गये हैं।
    संसदीय राजनीति इस नस्ली नरसंहार कार्यक्रम पर खामोश क्यों है?

    पलाश विश्वास
    यूपी के किसानों ने भारत के महामहिम राष्ट्रपति से मौत की भीख मांगी है।किसानों को अब इस देश में मौत ही मिलने वाली है।तो कारोबारियों को भी मौत के अलावा कुछ सुनहला नहीं मिलने वाला है।
    पहले कानून बनाकर 30 लाख करोड़ रुपये सत्ता वर्ग के विदेशी ठिकानों पर सुरक्षित भेज दिये। उन्हें करों में राहत दी फिर नोटबंदी से पहले अपनी पार्टी के लिए देश भर में जमीनें खरीदीं और राष्ट्र के नाम रिकार्डेड भाषण दिया कि कालाधन निकालना है।लीक हुई नोटबंदी के तहत देश में खेती कारोबार इत्यादि को ठप करके मुक्तबाजार के नियमों और व्याकरण के खिलाफ उत्पादन और बाजार की गतिविधियां बंद करके चुनिंदा उद्योगपतियों को लाखों करोड़ का कर्ज माफ कर दिया।
    देश की आम जनता ने कतारबद्ध होकर अपना सारा सफेद धन बैंकों में जमाकर कौड़ी कोड़ी के लिए मोहताज है और अपनी रोजमर्रे की बुनियादी सेवाओं और जरुरतों के लिए उन्हें रोज इंतजार करना होता है कि तामनाशाह का नया फरमान क्या निकलता है।
    इस बीच कुल साढ़े आठ लाख की नकदी बैंकों में जमा हो गयी है,इसमें कितना कालाधन है,उसका कोई आंकड़ा नहीं है।बैंकों ने पैसे तो जनता से जमा कर लिया है लेकिन तानाशाह के फरमान के मुताबिक वे खुद दिवालिया हो गये हैं और जरुरत के मुताबिक कोई भुगतान करने की हालत में नहीं है।
    अब वे सीना ठोंककर कह रहे हैं कैशलैस इंडिया या फिर लेसकैश इंडिया।रिजर्व बैक के गवर्नर दिवालिया बैंकों के हक में कैशलैस लेनदेन की गुहार लगा रहे हैं।
    इस कवायद का अंजाम कैसलैस इंडिया है या लेस कैश इंडिया है तो इसे कालाधन निकालने के लिए कालाधन के खिलाफ जिहाद कैसे कह सकते हैं?
    अब फिर कालाधन के लिए आम माफी का ऐलान है।
    पचास फीसद टैक्स चुकाकर कालाधन सफेद कर सकते हैं।आम नौकरीपेशा लोगों को जब नाया वेतनमान मिलता है तो बकाया वेतन पिछली तारीख से लागू होने पर तीस फीसद तक का इनकम टैक्स भरना पड़ता है।जिनकी आय सबसे ज्यादा है,उन्हें साठ फीसद तक इनकाम टैक्स भरना पड़ता है तो उससे भी कम आधी रकम टैक्स में देकर बाकी रकम सफेद करने का बहुत बड़ा मौका है कालाधन के लिए।वैसे ज्यादातर कालधन तो पहले ही सफेद हो गया है।यह कर्जा माफी से बड़ा घोटाला है।
    अब कालाधन के खिलाफ मुहिम के तहत आम लोगों को उनकी बचत बैंकों में जमा कराने के लिए उनके खिलाफ छापेमारी का जिहाद है।
    फिर ऐसे माहौल में जब संसद में प्रधानमंत्री नोटबंदी पर बयान भी देने को तैयार नहीं है तो तनिक कल्पना करें कि कामरेड फिदेल कास्त्रो बातिस्ता सरकार के साथ सत्ता में साझेदारी करते हुए कभी विदेश यात्रा कर रहे हों।
    कल्पना करें कि वे अमेरिकी राष्ट्रपतियों के न्यौते पर व्हाइट हाउस में मौज मस्ती करने पहुंचे हों।
    कामरेड कास्त्रो के शोक संतप्त माकपा महासचिव सीताराम येचुरी वातानुकूलित राजधानी से संसद में सुनामी के मध्य़ केसरिया सिपाहसालर राजनाथ सिंह के साथ शोकयात्रा में शामिल होकर भारतीय जनता को उनका कर्मफल भोगने के लिए पीछे छोड़कर क्यूबा निकल रहे हैं।
    शायद भारत में क्रांति हो न हो वे ट्विटर क्राति की जमीन पर खड़े वहीं क्रांति करेंगे।उनके साथ कामरेड राजा भी सहयात्री है।बाकी दलों के सांसद भी होंगे और अफवाह है कि दीदी के जिहाद से नाराज क्यूबा की शोकयात्रा के नजराने से तृणमूली सांसदों को वंचित कर दिया गया है।
    तेभागा और खाद्य आंदोलन के बाद तीन राज्यों में सत्ता वर्चस्व हासिल करने से वाम राजनीति आम हड़ताल और बंद तक सीमाबद्ध हो गयी।सत्ता के दम पर हड़ताल और बंद की राजनीति।1991 से लेकर अबतक वाम राजनीति ने आर्तिक सुधार या मुक्तबाजार का अपनी राजनीतिक ताकत के मुताबिक कोई विरोध नहीं किया।
    राजनीतिक मजबूरी के तहत राजनीतिक सिद्धांत और विचारधारा के मुताबिक सही राजनीति की रणनीति के तहत सांकेतिक विरोध करना ही वाम चरित्र बन गया है,जिसका महत्व किसी ट्वीट,फेसबुक पोस्ट या प्रेस बयान से तनिक ज्यादा नहीं है।
    नोटबंदी के खिलाफ वाम विरोध भी सांकेतिक है।
    सत्ता की राजनीति के मुताबिक है।उनके विरोध और ममता बनर्जी के विरोध में कोई फर्क नहीं है और वाम पक्ष और ममता बनर्जी एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं।न जनता के हक में न मोदी के खिलाफ।
    बाकी विपक्ष का विरोध भी सांकेतिक है।
    ममता बनर्जी नोटबंदी के तेइस दिन बाद जब आम लोगों ने अपने सारे नोट जमा करवा दिये हैं,पुराने नोटफिर बहाल करने का रागअलापते हुए मोदी को राजनीति से बाहर करने की जिहाद का ऐलान कर रही है।आम जनता की इतनी तकलीफों के बाद पुराने नोटों को बहाल करने की मांग करके वे किसका हित साध रही हैं।अब तक बंगाल में वामपक्ष के सफाये के लिए बंगाल के केसरियाकरण का हरसंभव चाकचौबंदइंतजाम करने के बाद वे किस तरह संघ परिवार का क्यों विरोध कर ही हैं,शारदा नारदा संदर्भ और प्रसंग में इस पर शोध जरुरी है।वामपक्ष का दिवालिया हाल है कि नोटबंदी के खिलाफ ममता दहाड़ रही हैं मैदान पर और य़ेचुरी राजनाथ सिंह के साथ क्यूबा जा रहे हैं।यह है विचारधारा और जमीनी राजनीति के बीच का बुनियादी फर्क।
    1991 से लेकर अब तक आर्थिक सुधारों से लेकर आधार कार्ड तकका सर्वदलीय संसदीय सहमति की राजनीति के तहत सारे कायदे कानून बदले जाते रहे हैं और आज तो विपक्ष की मोर्चाबंदी के लिए कालाधन पर पचास फीसद टैक्स के साथ आम माफी का विधेयक भी लोकसभा में पारित हो गया है और राज्यसभा में अल्पमत होने के बावजूद विपक्ष के किसी न किसी खेमे के समर्थन से यह विधेयक कानून बन जायेगा।
    खेती चौपट हो जाने के बाद निजीकरण और विनिवेश के अबाध पूंजी प्रवाह से देश बेचने का जो खुल्ला खेल फर्रूखाबादी जारी है,संसदीय राजनीति ने उसका कब और कितना विरोध किया है,इस पर भी शोध जरुरी है।
    अपने अपने पक्ष की मौकापरस्त राजनीति के अलावा आम जनता की तकलीफों को वातानुकूलित अररबपति करोड़पति कारपोरेट कारिंदे राजनेताओं को कितनी परवाह है,इसपर बहस बेमतलब है।
    इसके मुताबिक हकीकत यह है कि अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने के बावदजूद संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडे के नल्सी नरसंहार कार्यक्रम का ओबीसी ट्रंप कार्ट चल गया है।
    महाराष्ट्र और गुजरात के निकायों के चुनावों में साफ हो गया है कि वोटों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं हुआ है।नोटबंदी के नतीजे समझाने की कोई कवायद विपक्ष ने बेमतलब हो हल्ला के अलावा वैसे ही नहीं किया है जैसे परमाणु संधि के नतीजों पर मनमोहनके दोबारा जीतने के बाद वामपक्ष ने भूलकर भी चर्चा नहीं की है।
    सिद्धांत या विचारधारा,राजनीति या अर्थशास्त्र के हिसाब से संसदीय राजनीति नहीं चलती।सत्ता के  दो ध्रूवों संघ परिवार या गांधी परिवार के साथ वक्त की नजाकत और वोटबंदी के गणित के हिसाब से बाजार और कारपोरेट के मौसम जलवायु तापमान के मुताबिक चलती है संसदीय राजनीति।
    नोटबंदी का नतीजा अगर डिजिटल कैसलैस इंडिया है तो समझ लीजिये अब काले अछूतों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का अब कोई देश नहीं है।
    सारे बहुजन आजीविका,उत्पादन प्रणाली और बाजार से सीधे बेदखल हैं और यह कैसलैस या लेस कैश इंडिया नस्ली गोरों का देश है यानी ऐसा हिंदू राष्ट्र है जहां सारे के सारे बहुजन अर्थ व्यवस्था से बाहर सीधे गैस चैंबर में धकेल दिये गये हैं।
    संसदीय राजनीति इस नस्ली नरसंहार कार्यक्रम पर खामोश क्यों है?
    आपको भारत अमेरिकी परमाणु संधि का किस्सा तो याद होगा।जिसके विरोध में वामपक्ष ने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लिया था।लेकिन सरकार गिराने में नाकामी के बाद अगले चुनाव में फिर मनमोहन की जीत के बाद वामपक्ष ने कब और कहां उस संधि का विरोध किया है,बतायें।
    क्या उन्होंने देश व्यापी जागरुकता अभियान चलाया?
    कुड़नकुलम जलसत्याग्रह में वाम भूमिका क्या है?
    उस संधि के बाद पूरे देश को परमाणु भट्टी में तब्दीलस कर दिया है,क्या इसके खिलाफ वामपक्ष ने कोई आंदोलन किया है,बतायें।
    अमेरिका के बाद हर देश के साथ जो परमाणु समझौते हुए हैं,क्या उसका वामपक्ष ने कोई विरोध किया है।सारी ट्रेड यूनियनें उनकी और फिरभी मेहनतकशों के रोजगार और आजीविकता छीन जाने खिलाफ ,सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के खिलाफ सांकेतिक विरोध के अलावा वामपक्ष ने सचमुच का कोई जनांदोलन खड़ा किया हो तो बतायें।
    जमीनी स्तर पर साम्यवादी तौर तरीके न अपनाने के कारण बंगाल,केरल और त्रिपुरा में बाकी देश की तुलना में सबसे तेज केसरियाकरण हुआ है और हाल यह है कि नोटबंदी आंदोलन की कमान भी वामपक्ष से ममता बनर्जी ने छीन ली है।
    सत्ता वर्चस्व के लिए साम्यवाद को तिलांजली देकर जो नस्ली बंगाली राष्ट्रवाद को लेकर दुर्गापूजा संस्कृति के साथ कैडरतंत्र के तहत राजकाज चलाता रहा वामपक्ष, ममता बनर्जी उसी को और बढ़िया तरीके से लागू कर रही हैं। वामपक्ष बेदखल हो गया बंगाल से। नोटबंदी के खिलाफ आम हड़ताल को जनसमर्थन नहीं मिला है,बाकायदा प्रोस सम्मेलन बुलाकर लेफ्ट फ्रंट चेयरमैन विमान बोस ने इसका बाबुलंद ऐलान खुद कर दिया है।
    भारत में रंगबिरंगे अनेक दल हैं।लेकिन सत्ता में भागीदारी के दो ध्रूव है संघ परिवार और गांधी परिवार।राज्यों में क्षत्रपों की अलग जमींदारी और रियासतें हैं।केंद्र में सत्ता में साझेदारी इन गदो परिवार में से किसी के साथ नत्थी होकर ही मिल सकती है।
    1977 तक गांधी परिवार का एकाधिकार वर्चस्व रहा है भारत की सत्ता राजनीति पर और संघ परिवार का हिंदुत्व एजंडा को कांग्रेस के माध्यम से ही लागू किया जाता रहा है।
    15 अगस्त 1947 से ही भारत हिंदू राष्ट्र है और भारत का संविधान के विपरीत समांतर शासन बहुजन जनता को जीवन के हर क्षेत्र में वंचित करने वाला मनुस्मृति अनुशासन का रहा है।
    1977 में आपातकाल के कारण सत्ता और लोकतंत्र में संघ परिवार की घुसपैठ शुरु हुई जो सिखों के नरसंहार और बाबरी विध्वंस के बाद समांतर सत्ता में तब्दील है।
    गांधी परिवार का नर्म हिंदुत्व अब संघ परिवार का गरम हिंदुत्व है।लेकिन दरअसल भारत में सत्ता का चरित्र कहीं बदला नही है।राजनीति या राष्ट्र का चरित्र बदला नहीं है।
    सोवियत संघ के अवसान और खाड़ी युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था लेकिन सिरे से बदल गयी है और इस बदलाव के महानायक डा.मनमोहन सिंह रहे हैं।
    16 मई 2014 के बाद अचानक भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बना है और न भारत मुक्तबाजार कल्कि महाराज के राज्याभिषेक से बना है।इसे पहले मन ले तो बहस हो सकती है।15 अगस्त,1947 से हिंदू राष्ट्र है।
    ये दोनों मुद्दे खास महत्वपूर्ण हैं।
    1977 से लेकर 2011 तक भारतीय राजनीति में वामपक्ष केंद्र की सरकारें बनाने की सत्ता साझेदारी खेल में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है।
    1977 में लोकसभा चुनाव में वाम सहयोग से ही बंगाल में जनतादल को सीटें मिली थी तो फिर विश्वनाथ सिंह की सरकार को वामपक्ष और संघ परिवार दोनों का समर्थन रहा है।
    सारी अल्पमत सरकारें और मनमोहन सिंह की पहली सरकार वाम समर्थन से चलती रही हैं।
    नरसिंह राव के जमाने में या अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में नहीं भारत को मुक्तबाजार बनाने का काम डा.मनमोहन सिंह के जमाने में शुरु हुआ है और इसे अब अंजाम तक पहुंचा रहे हैं ओबीसी कल्कि महाराज।
    संघ परिवार ने भारत की सत्ता हासिल करने के लिए अपने ब्राह्मण सिपाहसालारों को छोड़कर ओबीसी कार्ड अपनाया तो राममंदिर आंदोलन में भी बजरंगी इन्हीं ओबीसी समुदाय से सर्वाधिक हैं।
    जाति वर्चस्व की रंगभेदी नीति वाले संघपरिवार बहुजनों के सफाये के लिए ओबीसी को नेतृत्व देने को तैयार हो गया और जाति का तिल्सिम तोड़ने के लिए वर्गीय ध्रूवीकरण का विकल्प चुनने की कोई जहमत वामपक्ष ने नहीं उठायी।
    भारत के तमाम बुद्धिजीवियों में सबसे ज्यादा वाम बुद्धिजीवियों ने पुरस्कार पद सम्मान और विदेश यात्रा का लाभ उठाया है 16 मई 2014 तक।क्रांतिकारी विचारधारा के हो हल्ले के बाद वे कभी जनता के बीच नहीं गये तो किसानों और मजदूरों के संगठनों,छात्रों और महिलाओं के संगठनों में करोड़ों सदस्य होने के बावजूद जमीन पर किसी जनांदोलन का नेतृत्व संसदीय वाम ने नहीं की।
    बंगाल,केरल और त्रिपुरा की राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल और उस सत्ता के बचाव की राजनीति बंगाली और मलयाली राष्ट्रीयता के आवाहन के साथ किया है वामपक्ष ने जो कुल मिलाकर हिंदुत्व राजनीति का दूसरा खतरनाक रुप हैं।
    वामपक्ष ने जमींदारी हितों की हिफाजत में वाम पक्ष ने बंगाल,त्रिपुरा और केरल में जीवन के हर क्षेत्र में नस्ली वर्चस्व कायम रखा और बहुजनों को वाम राजनीतिक नेतृत्व देने से झिझकता ही नहीं रहा,बाकी भारत में वाम राजनीति को हाशिये पर रखने का काम भी इन्होंने खूब किया है और खास तौर पर हिंदी क्षेत्र को राजनीतिक नेतृत्व और प्रतिनिधित्व से इनने वंचित किया।
    1977 से पहले तेभागा और खाद्य आंदोलन में,तेलगंना और श्रीकाकुलम,ढिमरी ब्लाक जनविद्रोहों में जो वामपक्ष सर्वहारा वर्ग के साथ उनके नेतृत्व में सत्ता से टकरा रहा था,1969 में बंगाल में सत्ता का स्वाद चखते ही वह सत्ता राजनीति में तब्दील होता रहा और वाम नेतृत्व के इसी विश्वास घात के खिलाफ बंगाल में नक्सल विद्रोह हुआ चारु मजुमदार के नेतृत्व में।
    इस नक्सली आंदोलन का दमन भी माकपा ने कांग्रेस के साथ मिलजुलकर किया और तबसे लेकर अबतक वामपक्ष कांग्रेस से नत्थी रहा है।
    आपातकाल के खिलाफ माकपा जरुर थी लेकिन बंगाल में आपातकाल के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ।
    कमसकम उत्तरभारत के दक्षिणपंथी जैसे आपातकालका विरोध कर रहे थे,वैसा विरध वामपक्ष ने कतई नहीं किया और बहुसंख्य वामपंथी बुद्धिजीवी सीपीआई और रूस के बहाने आपातकाल से पहले,आपातकाल के दौरान और आपातकाल के बाद सत्ताा और नस्ली वर्चस्व का लाभ उठाते रहे और इन लोगों ने वाम नेतृत्व के साथ कदम से कदम बढ़ाकर भारत के बहुजनों को जीवन के हर क्षेत्र से वंचित करने का मनुस्मृति धर्म निभाया।
    इसीलिए संघ परिवार का ओबीसी ट्रंप कार्ड का कोई जवाब वामपंथियों के पास नहीं है।
    आरक्षणविरोधी आंदोलन के जरिये हर कीमत पर ओबीसी आरक्षण रोकने की कोशिश में भारतीय सत्ता की राजनीति के मंडल बनाम कमंडल ध्रूवीकरण करने वाले संघ परिवार ने राम की सौगंध खाते हुए वीपी सिंह का महिषासुर वध कर दिया और फिर भारत की सबसे बड़ी ओबीसी आबादी को अपनी पाली में कर लिया।
    इस सत्ता समीकरण में दमन और उत्पीड़न,रंगभेदी नरसंहार के शिकार दलितों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का साथ वामपक्ष ने भी नहीं दिया।
    इसीकी तार्किक परिणति यह सिलसिलेवार नरसंहार है।

    भारतभर में वाम राजनीति के हाशिये पर चले जाने की वजह से फासिज्म का यह रंगभेदी राजकाज निरंकुश है।

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    #CitizenshipsuspendedtoenhanceAbsolutePowerofRacistFascismMakinginMilitaryState

    गरीब कल्याण?

    लक्ष्य समता और न्याय का?

    अकेले घिरे तानाशाह के बचाव में राजनीति में ओबीसी मोर्चाबंदी की शुरुआत?


    पलाश विश्वास

    इंदिरा गांधी को यह देश शायद भूल गया है।देश अभी अमेरिका बनने को है और इस डिजिटल देश में शायद किसी इंदिरा गांधी की कोई प्रासंगिकता नहीं बची है।इंदिरा गांधी की चर्चा इस देश में अब आपातकाल के संदर्भ में ही ज्यादा होती है।

    इन्हीं इंदिरा गांधी ने पहलीबार गरीबी हटाओ का नारा देते हुए देश को समाजवादी बनाने का वायदा किया था।

    अब सत्ता में जो लोग हैं,उन्हें नेहरु इंदिरा की विरासत से कोई वास्ता नहीं है।लेकिन बिना टैक्स चुकाये कालाधन जमा करनेवाले जिन आर्थिक अपराधियों के खिलाफ जिहाद के नाम नोटबंदी में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और उनकी नागरिकता को निलंबित करके रंगभेदी नस्ली वर्चस्व और एकाधिकार के लिए यह डिजिटल नोटबंदी है,उन्हीं राष्ट्रविरोधी तत्वों को उनके कालाधन को सफेद करके साफ बरी कर देने की योजना को मौजूदा तानाशाही की सत्ता ने गरीबी हटाओ का मुलम्मा पहना दिया है।

    कालाधन आम माफी के लिए सिर्फ लोकसभा में वित्त विधेयक पास करके संसद और सांसदों को अंधेरे में रखकर राष्ट्रपति के मुहर से जो क्रांति की जा रही है,उसका नाम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना रखा गया है।

    गौरतलब है कि स्वेच्छा से बेहिसाब नकदी को सफेद बनाने की पिछली योजना 30 सितबर के खत्म हुई थी।जिससे चूंचूं का मुरब्बा निकला था और नोटबंदी का अंजाम भी वहीं चूं चूं का मुरब्बा है तो फिर नोटबंदी लागू करने के बीस दिनों के बाद फिर उसी चूं चूं के मुरब्बे को नये मुलम्मे के साथ गरीब कल्याण योजना में तब्दील कर देने के वित्तीय प्रबंधन के औचित्य पर किसी विमर्श की गुंजाइश भी नहीं है।इसके राजनीतिक आशय को समझना ज्यादा जरुरी है।

    इसीके साथ इस आर्थिक नस्ली नरसंहार को जायज ठहराने और मारे जाने वाले बहुजनों को झांसा देने के लिए इस योजना का लक्ष्य संविधान की प्रस्तावना के मुताबिक बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर और संविधान निर्माताओं के सपनों के भारत के अंतिम लक्ष्य न्याय और समता रखा गया है।

    समरसता अभियान की यह नई परिभाषा रोहित वेमुला और नजीब की संस्थागत हत्या परिदृश्य में बेहद हैरतअंगेज है लेकिन इसका न बाबासाहेब और बहुजनों से कोई रिश्ता है और न गरीबी हटाओ या इंदिरा गांधी से कोई रिश्ता है।

    सत्ता की सर्वोच्च प्राथमिकता जनगणमन गाते हुए देश और देश के संसाधनों को बेच डालने का है और इसीलिए नोटबंदी के बाद देश अब डिजिटल है।

    गौरतलब है कि देश में सिर्फ 54 फीसद लोगों के पास कोई बैंक खाता है,जनधन योजना के बावजूद।लोगों को सर छुपाने के लिए छत है नहीं और बेरोजगारी है तो शून्य बैलेंस के खाते का पासबुक और चेक उनके पास कितने हैं,यह आंकड़ा हमारे पास नहीं है।इसी बीच बाबासाहेब की वजह से बने रिजर्व बैंक के सभी अंगों प्रत्यंगों का निजीकरण हो गया है।

    भारतीय बैंकिग के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स खत्म करने के साथ इंदिरा गांधी ने संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की नीति अपनाते हुए समाजवादी विकास का जो माडल लागू किया था,इस गरीब कल्याण योजना के नाम पर उन्हीं सरकारी बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है और पूरी अर्थव्यवस्था को देशी विदेशी पूंजी के हवाले करके देश और देश के सारे संसाधनों को सत्ता वर्ग के नस्ली वर्चस्व के लिए बेच दिया जा रहा है।

    यह पूरा कार्यक्रम भारतीय संविधान के बदले मनुस्मृति अनुशासन के तहत बहुजनों को संपत्ति के अधिकार से वंचित करके उन्हें जीवन  के हर क्षेत्र में उनके तमाम हक हकूक,उनकी आजीविका,उनके रोजगार छीनने का है।

    यह नरसंहारी अश्वमेध अभियान का नया नामकरण है।

    इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीच्यूट के मुताबिक नकदी में देश में मौजूद कालाधन महज चार सौ करोड़ रुपये हैं जिन्हें निकालने के लिए की गयी नोटबंदी का खर्च बारह हजार करोड़ रुपये है।

    यह नोटबंदी की अर्थव्यवस्था है और जब बैंकों और एटीएम से बड़ी संख्या में लाशें निकलने लगी हैं तो कालाधन आम माफी योजना गरीब कल्याण योजना बतौर पेश कर दी गयी है।बीस दिन का नर्क जीने के बाद पंद्रह फीसद कालाधन भी नहीं निकला है।जबकि अब कालाधन को आम माफी भी दे दी गयी है।

    यह नोटबंदी योजना बुरी तरह फेल है।हालात नियंत्रित हो,ऐसा कोई वित्तीय प्रबंधन नहीं है।क्योंकि सरकार नकदी में लेन देन सिरे से बंद करना चाहती है और इसीलिए नोटबंदी के एलान के करीब तीन हफ्ते बाद भले ही बैंकों और एटीएम के बाहर कतारें थोड़ी कम हो गई हो, लेकिन अभी बैंकों में 500 रुपए के नए नोटों की किल्लत बरकरार है।

    रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने आश्वासन दिया है कि 500 रुपए के नोटों की कोई दिक्कत नहीं है। अब इस नोट की प्रिटिंग दोगुनी कर दी गई है। रोजाना छप रहे 500 रुपए के 80 लाख नोट। फिर भी क्यों है इसकी किल्लत?फिरभी क्यों बैंकों और एटीएम से सिर्फ दो हजार के नोट निकल रहे हैं?दो हजार का नोट खुल्ला करके कारोबार जो लोग चला नहीं सकते ,उनके बाजार से सफाये का यह इंतजाम है।

    बैंकों के दिवालिया हो जाने का नतीजा यह है कि सैलरी और पेंशन की टेंशन ने बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों में खौफ पैदा कर दिया है। इन्हें डर है कि कैश की कमी के चलते ग्राहक भड़केंगे और हंगामा करेंगे इसलिए बैंकों में पुलिस की तैनाती होनी चाहिए। इसके लिए ऑल इंडिया बैंक एम्पलॉय असोसिएशन और ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन ने इंडियन बैंक असोसिएशन से चिट्ठी लिखकर मदद मांगी है। नोटों की कमी के चलते ग्राहकों को संतुष्ट करना मुश्किल हो रहा है। अक्सर ग्राहक हंगामा करते हैं और गाली-गलौच पर उतर आते हैं। पेंशन और सैलरी का वक्त होने के चलते अगले दस दिन ज्यादा तनाव भरे होंगे।

    बहरहाल जनधन योजना से आम जनता को बैंकिंग के दायरे में लाने का बेहतरीन नतीजा अब सामने आ रहा है कि नोटबंदी के बाद देश में कायदा कानून मुताबिक 30 लाख करोड़ रुपये सुरक्षित बाहर भेज दिये जाने के बाद नकदी में बचा कालाधन ज्यादातर इन्हीं खातों में जमा कराया गया है जिन खातों से खाताधारक अब ज्यादातर मामलों में बेदखल हैं।

    खाता जिनके नाम हैं तो भी उन्हें इसका फायदा नहीं है।क्योंकि कल से बैंकों और एटीएम पर फिर कतारे लगी होंगी वेतन और पेंशन के लिए तो बैंकों के पास नकदी नहीं है बीस दिन नोटबंदी के बीत जाने के बावजूद और जनधन योजना खाता से भी निकासी की कोई उम्मीद नहीं है।गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खुले लगभग 26 करोड़ बैंक खातों से पैसा निकालने की सीमा तय कर दी है। इन खातों से अब अगली सूचना तक एक महीने में सिर्फ 10,000 रुपये की निकासी की जा सकती है। रिजर्व बैंक के मुताबिक जिन जनधन खातों की केवाईसी प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है उनसे एक महीने में 10,000 रुपये निकाले जा सकते हैं। वहीं जिन खातों की केवाईसी प्रक्रिया अभी लंबित है उनसे एक महीने में महज 5,000 रुपये ही निकाले जा सकते हैं। 26 करोड़ जनधन खाते हैं और देश में सभी को बैंकिंग से जोड़ने के लिए अगस्त 2014 में प्रधानमंत्री जनधन योजना की शुरुआत हुई थी।

    सवा अरब जनता में से नब्वे करोड़ लोग हर हाथ में रोजगार के बदले मोबाइल हो जाने के बावजूद इंटरनेट नेटवर्क से बाहर हैं।जो लोग फेसबुक,व्हाट्सअप का खूब इस्तेमाल कर लेते हैं वे ज्यादातर लाइक और शेयर और फोटो अलबम से बाहर न हार्ड वेयर न साफ्ट वेयर,न हैकिंग और न साइबर क्राइम के बारे में कुछ जानते हैं।ध्यान रहे कि साइबर संसार में कुछ एप और सॉफ्टवेयर ऐसे हैं जो कंप्यूटर पर टाइप होने वाले सभी बटन की जानकारी का डाटा तैयार करते हैं। इससे वह आपके कार्ड की जानकारी सेव कर सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए यूजर ऑन स्क्रीन कीबोर्ड और इकॉग्निटो टैब का प्रयोग कर सकते हैं।हाल में एटीएम का पिन चार महीनों से हैक होता रहा और मालूम होते हुए बैंकों ने इसकी कोई जानकारी ग्राहकों को नहीं दी और न ही कहीं एफआईआपर तक दर्ज करायी।बत्तीस लाख डेबिट कार्ट खारिज कर दिये।

    जाहिर है कि जबरन डिजिटल इंडिया बना दिये जाने के बावजूद भारत में शापिंग माल और ईटेलिंग,रेलवे टिकट बुकिंग के बाहर सारा कारोबार करीब 97 फीसद तक नकदी में होता है।

    मकान किराया का भुगतान नकदी में होता है।राशन पानी नकदी में चलता है।दिहाड़ी नकदी में मिलती है। सरकारी और संगठित क्षेत्र के दो चार करोड़ व्हाइट कालर लोगों को छोड़कर बाकी लोग दिहाड़ी में जीते हैं।कायदे कानून से बाहर जो असंगठित क्षेत्र हैं,वहा सारा लेन देन नकदी में होता है और ज्यादातर मामलों में न पे रोल होता है और न हिसाब किताब होता है और असंगठित क्षेत्र के ये तमाम मेहनतकश लोग अस्थाई मजदूर हैं जिन्हें नकदी की किल्लत की हालत में दिहाड़ी तो फिलहाल मिल ही नहीं रही है,उनकी नौकरी भी छंटनी में तब्दील हैं।

    अभी हाल में हम अपनी एक बेटी के घर में गये थे।जो ब्याह से पहले हमारे साथ रहती थी और घर के कामकाज में हमारा हाथ बंटाती थी।तमाम परिचित लोग उसे हमारी बेटी मानते रहे हैं।हम उसे खूुब कोशिश करके भी पढ़ा लिखा नहीं पाये और उसने कम उम्र में शादी कर ली।सोलह साल हो गये उसकी शादी के।उसने प्रेम विवाह किया पोस्टर और होर्डिंग बनाने वाले एक दिहाड़ी मजदूर से ।उनकी शादी को सोलह साल हो गये।उनका कोई बच्चा नहीं है और परिवार संयुक्त है।उसका जेठ अभी अविवाहित है और स्थानीय कल कारखानों को लोहे के कलपुर्जे सप्लाई करने के लिए उसने घर में कारखाना लगाया हुआ है।दिहाडी अब पहले की तरह मिल नहीं रही है।कारखाना का काम रुक रुककर चल रहा है।

    वे लोग मंकी बातें बड़ी ध्यान से सुनते हैं और उन्हें उम्मीद है कि कालाधन निकलेगा तो उनके जनधन खाते में जमा हो जायेगा और वे इससे अपना अधूरा मकान बना लेगें।वे नोटबंदी का समर्थन करते हैं।

    कुल मिलाकर मध्यम वर्ग और निम्न मध्यवर्ग से लेकर गरीब और तमाम पिछड़े लोग इसी उम्मीद में एटीएम और बैंकों से पैसे न मिलने के बावजूद नोटबंदी के जबरदस्त समर्थक हैं।

    अब वस्तुस्थिति यह है कि नोटबंदी से पहले तक सितंबर से पहले बैंकखातों में भारी पैमाने पर कालाधन चामत्कारिक तरीके से सफेद हो जाने की वजह से भारतीय बैंकों के पास करीब सौ लाख करोड़ रुपये जमा थे।जीवन बीमा,रेलवे जैसे सरकारी उपक्रमों में जो जमा है,उसका अलग हिसाब है।नोटबंदी के बाद अब तक सिर्फ साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये जमा हैं।कालाधन के लिए आधी रकम के टैक्स चुकाने के बाद आम माफी के इस नये फरमान के बाद शायद  दस बीस लाख हद से हद और बैकों में जमा हो सकते हैं जबकि इससे पहले की योजनाओं में ऐसा कोई चमत्कार हुआ हो,हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है।

    अब सवाल है कि बैंकों में सौ लाख करोड़,केंद्र और राज्य सरकार के खजाने और सरकारी उपक्रमों में जमा पूंजी के बावजूद पिछले दो साल के राजकाज में 14 मई 2014 के बाद अविराम स्वच्छता अभियान के तहत गरीबी उन्मूलन कितना हुआ है।

    अब अतिरिक्त बीस तीस लाख करोड़ रुपये के साथ गरीबी हटाओ का यह नारा कितना छलावा है और कितनी राजनीतिक इच्छा है,बहुत जल्द दूध का दूध,पानी का पानी हो जाना है।

    इस वक्त खेती का मौसम है।खरीफ फसल का बाजार ठप है और रबी फसल की तैयारी खटाई में है।आगे भुखमरी की नौबत है।करोडो़ं लोग बेरोजगार हो जायेंगे तो खुदरा कारोबार खत्म है।हाट बाजार किराना खत्म है।चाय बागानों में से लेकर कल कारखानों में मृत्यु जुलूस अलग निकलने वाला है।

    गौरतलब है कि उत्पादन प्रणाली का भट्ठा बैठाकर मुक्तबाजार में देश को तब्दील करने के लिए कृषि उत्पादन विकास दर शून्य हो जाने के बावजूद,सर्विस सेक्टर को औद्योगिक उत्पादन के मुकाबले तरजीह देने के बावजूद और निर्माण, विनर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर में विदेशी पूंजी और कालाधन के बावजूद,सारे के सारे सरकारी उपक्रमों के साथ साथ प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा तक में विनिवेश कर देने के बावजूद जनसंख्या के मुताबिक रोजगार का सृजन हुआ नहीं है और आजीविकाओं और रोजगार से जल जंगल जमीन और नागरिकता के साथ अंतहीन बेदखली जारी है।

    ऐसे में अब भी अमेरिका बनने चला डिजिटल देश में सत्तर फीसदी लोग खेती और कृषि पर निर्भर हैं।जलवायु,मौसम और मानसून पर निर्भर हैं।

    तो देश के बहुजन आरक्षण राजनीति और संवैधानिक रक्षा कवच के बावजूद अब भी करीब नब्वे फीसद खेती पर निर्भर हैं।

    इन्हीं बहुजनों के सफाये का अश्वमेध यज्ञ है।

    कुल मिलाकर देश में सवा अरब जनसंख्या के मध्य कमाऊ जनता की जनसंख्या 50 करोड़ भी नहीं है।

    करीब 75 करोड़ लोग जिनमें से ज्यादातर औरतें ,बच्चे और वृद्ध हैं,कमाउ परिजनों पर निर्भर हैं।

    उत्पादन प्रणाली में खेती को हाशिये पर रख दिये जाने की वजह से पूरा परिवार किसी आजीविका में खपने की अब कोई संभावना नहीं है। ऐसे कमाउ लोगों में बमुश्किल एक दो फीसद लोग ही संगठित या असंगठित क्षेत्र में नौकरीपेशा हैं।इनमे से भी सिर्फ संगठित,सरकारी और कारपोरेट सेक्टर के स्थाई कर्मचारियों और पे रोल पर संविदा कर्मचारियों को वेतन बैंक मार्फत मिलता है।

    नतीजतन कमाउ पचास करोड़ लोग हैं को समझ लीजिये कि करीब 47 करोड़ कमाउ लोगों में से 44 करोड़ लोग नकदी में लेन देन करते हैं।

    खेती में देश की आबादी की सत्तर फीसदी अब भी हैं तो सीधा मतलब है कि करीब अस्सी पचासी या नब्वे करोड़ लोगों का दस दिगंत सत्यानाश का पुख्ता इंतजाम है कालाधन सफेद करके कारोबार और लेनदेन में सत्ता वर्ग के नस्ली वर्चस्व के लिए यह डिजिटल नोटबंदी और बैंकिंग प्रणाली को दिवालिया कर देने का अभूतपूर्व कार्यक्रम। इससे गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का क्या वास्तव है,जब तक आम जनता समझ सकेगी,करोड़ों लोगों का काम तमाम है।

    खासकर यह हालत सबसे खतरनाक इसलिए है कि देश के तमाम जनप्रतिनिधि और राजनेता,बुद्धिजीवी और पढ़े लिखे लोगों को आम जनता की कोई परवाह नहीं है और उनमें से ज्यादातर इस खुली लूट में शामिल हैं और बहती गंगा में नहा धोकर शुद्ध पतंजलि बन जाने की जुगत में हैं।

    डा.अमर्त्य सेन से लेकर कौशिक बसु तक तमाम अर्थशास्त्री और तमाम रेटिंग एजंसियां नोटबंदी से अर्थव्यवस्था और विकास दर का बाजा बज जाने की आशंका जता रहे हैं।उद्योग और कारोबार जगत में भारी खलबली मची हुई है।

    तो ऐसे हालात में अब तक गरीबों का भला न कर पाने वाली सरकार कैसे अतिरिक्त महज बीस तीस लाख करोड़ रुपये से गरीबों की सारी समस्याएं सुलझा देंगी,इसका बाशौक इंतजार करते हुए मुलाहिजा फरमाये।

    मीडिया के मुताबिक इसी बीच नीतीश कुमार के बाद अब राजद नेता लालू प्रसाद यादव ने अब नोटबंदी का समर्थन कर दिया है। राहुल के नोटबंदी विरोधी खेमे का साथ छोड़ते हुए पटना में विधायकों से कहा कि वह सिर्फ इसे लागू करने के तरीके का विरोध कर रहे हैं, न कि इसके पीछे की वजहों का। इस तरह अपने इस कदम से लालू ने बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के सुर में सुर मिला दिया है। नीतीश कुमार शुरू से ही नोटबंदी पर केंद्र सरकार के निर्णय का समर्थन कर रहे हैं। बिहार में बने महागठबंधन में जेडी यू और आरजेडी के साथ कांग्रेस भी शामिल है।

    क्या यह भारतीय राजनीति में ओबीसी मोर्चाबंदी की शुरुआत है?

    नोटबंदी को लेकर भीतर ही भीतर संघ परिवार में जो घमासान मच रहा है,उसके मद्देनजर प्रधानमंत्री के अकेले घिर जाने की हालत में कहीं यह नया राजनीतिक समीकरण की शुरुआत तो नहीं है?

    आज नोटबंदी का 22 वां दिन है लेकिन बैंक और एटीएम के आगे कतार कम होने का नाम नहीं ले रही। आज पेंशन का दिन है और सुबह से ही बैंकों के सामने पेंशनधारकों की लंबी लाइन लगी हुई। यानी पेंशन का टेंशन बना हुआ है। इसके अलावा आज ज्यादातर कंपनियां अपने कर्मचारियों के अकाउंट में सैलरी डाल देंगी। बड़ा सवाल ये है बिना कैश के  पेंशन और सैलरी का टेंशन कैसे दूर होगा।

    सीएनबीसी-आवाज़के तमाम रिपोर्टरों ने देश के अगल अलग शहरों में पेंशनधारकों की हो रही परेशानी का जायजा लिया। नोएडा के पेंशनधारकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया रही। कुछ लोग एटीएम में कतार बहुत लंबी होने से परेशान है तो कुछ इस मुहिम में मोदी जी के साथ नजर आ रहे हैं।

    अब तो सीनियर सीटिजेंस भी पेटीएम और एटीएम का यूज कर रहें है। बैंक ने भी काफी मदद की है इनका मानना है तो पेंशन आने से परेशानी नहीं होगी और इनका मानना है की जल्द ही ये लाइंने खतम होंगी।

    इधर मुंबई के पेंशनधारक भी पेंशन के लिए सुबह से ही कतार में लगे है। घंटों इंतजार के बाद नंबर आ रहा है। पेंशन की ही नहीं सैलरी का भी संकट है। कल सैलरी आने वाली है और आज कुछ लोगों की सैलरी आ भी गई है। ऐसे में सैलरी निकालने के लिए एटीएम के सामने फिर से भीड़ जुटने लगी है।

    उधर सैलरी और पेंशन की टेंशन ने बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों में खौफ पैदा कर दिया है। इन्हें डर है कि कैश की कमी के चलते ग्राहक भड़केंगे और हंगामा करेंगे इसलिए बैंकों में पुलिस की तैनाती होनी चाहिए। इसके लिए ऑल इंडिया बैंक एम्पलॉय असोसिएशन और ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन ने इंडियन बैंक असोसिएशन से चिट्ठी लिखकर मदद मांगी है। नोटों की कमी के चलते ग्राहकों को संतुष्ट करना मुश्किल हो रहा है। अक्सर ग्राहक हंगामा करते हैं और गाली-गलौच पर उतर आते हैं। पेंशन और सैलरी का वक्त होने के चलते अगले दस दिन ज्यादा तनाव भरे होंगे।





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    गनीमत है कि देश अभी सेना के हवाले नहीं हुआ है।

    #DemonetizationBoltfromSaffronforSalaryandPension

    #CyberSecurityinDigitalIndia

    #CashlessIndiaAwardCyberHacking

    पलाश विश्वास

    आज पहली तारीख है।नोटबंदी के तुगलकी फरमान के बाद पहली पहली तारीख है।फिजां कुछ अलग है और बहारे भी कुछ अलग हैं।फूल बरसाओ बहारों कि अच्छे दिन उमड़ घुमड़कर सुनामी छप्पर फाड़ है।अभी अभी एक शख्स के खाते में निनानब्वे करोड़ जमा हो गये हैं तो इससे पहले किसी के खाते में हजारों करोड़ जमा हुआ ठैरा।आज सुबह सुबह एक कामवाली ने हुमस कर कहा कि उसके खाते में न जाने किस भले आदमी या औरत ने अस्सी हजार डाल दिये।पता चलते ही उसने जुगत लगाकर दस हजार उसमें से निकाल लिये हैं।गरीबी हटाने का यह निराला अंदाज है।ऐसे लोगं को जैसा छप्परफाड़ नकदी खाता में मिला,वैसे ही 130 करोड़ की किस्मत का कायाकल्प हो जाये तो सतजुग आ गया समझो।सिर्प मुश्किल है कि रामराज्य के लिए फिर त्रेता युग का इंतजार करना पड़ सकता है।राम मंदिर की सौगंध के लिए इतना इंतजार किया और थोड़ा और इंतजार बी नहीं कर सकते क्या?  

    अमेरिका बनते बनते मेरा देश यूनान बन गया।यूनान की जनसंख्या उतनी भी नहीं है,जितने लोग करीब दो करोड़ वेतन पेंशनभोगी बैंकों और एटीएम में कतारबद्ध हैं।

    यह दिलफरेब नजारा भी अभूतपूर्व है वरना अबतक तो किसी कोने में लावारिस हुआ करता था एटीएम।ये दो करोड़ लोग अपनी कीमती वक्त इस तरह बैंकों के कतार में झोंक रहे हैं।

    बाकी 128 करोड़ जनता को न वेतन मिलता है और न पेंशन और एक दो फीसद अरबपति करोड़पति वर्ग को छोड़कर बाकी तमाम लोग रंगबिरंगे कब्रिस्तान और श्मशानघाट के औघड़ वाशिंदे हैं कि रोज कुआं खोदकर वे पानी पीते हैं,घर फूंक तमाशा भी देखते हैं खामोश और रोज रोज मरते हुए उन्हें फिर जीने की आदत है और इनमें से ज्यादातर अपने पांवों के बल पर खड़े भी नहीं सकते और न उनकी तमाम इंद्रियां काम करती है।उनमें से कितनों के पास अपना दिमाग और दिल सही सलामत है,इसका भी कोई आंकड़ा नहीं है।फिलहाल देश बैंकों के दिवालिया हो जाने के बावजूद शांत है और सारा कारोबार कैशलैस है।

    पिछले 8 नवंबर के बाद के अनुभवों के मद्देनजर,पैसा मिलें या नहीं,घर वाले जरुर उनके सकुशल घर लौटने का इतंजार कर रहे हैं।बाकी तो कैशलैस इंडिया है।

    वैसे रिजर्व बैंक ने पर्याप्त कैश होने का दावा किया है और कहते हैं कि सेना कैश पहुंचाने में लगी है बैंकों और एटीएम तक।धीरज लोगों का टूटने लगा है।बवाल भी खूब मचने लगा है।बैंक कर्मी डरे हुए हैं कि कैश न मिलें तो पगलायी जनता न जाने क्या करे दें।सिनेमा हालों में तो देशभक्ति के लिए जनगणमन का इंतजाम हो गया जहां लोग लुगाइयों को सावधान मुद्रा में खड़ा कर दिया जायेगा।लेकिन बैंकों और एटीएम के सामने आम जनता जनगणमन गायन के साथ सावधान मुद्रा में खड़े होकर अभूतपूर्व मुद्रासंकट चामत्कारिक ढंग से सुलझ जाने का इंतजार करेंगे, फासिज्म के राजकाज ने फिलहाल ऐसा कोई फरमान जारी नहीं किया है।

    भारतीय सेना देश के सरहद पर दुश्मनों का मुकाबला करती है तो उन्हें कभी कभार आम जनता का भी मुकाबला करना पड़ता है।दंगाग्रस्त और अशांत इलाकों को सेना के हवाले कर दिये जाने की रघुकुल परंपरा है।तो आदिवासी भूगोल में सैन्य अभियान सलवा जुड़ुम है।कश्मीर और मणिपुर में यह स्थाई बंदोबस्त है।आपदाओं में भी सेना उतारी जाती है।दिवालिया बना दिये गये बैंकों की मदद में शायद किसी देश में पहली बार सेना उतारी जा रही है।शायद अब हम अपने बैंकों और एटीएम में देर सवेर सरहदों का नजारा देखने वाले हैं।हालात तेजी से ऐसे बनते जा रहे हैं।

    तनिक गौर फरमाये ये दो करोड़ वेतन और पेंशन भोगी लोग वे ही लोग हैं,जो फासिज्म के राजकाज के रंग बिरंगे कल पुर्जे हैं।जिनका बाकायदा बैंकों में खाता है और उन खातों में हर महीने पेंशन या वेतन जमा होता है।पहली तारीख के आगे पीछे वे महीने भर का खर्च नकदी में निकालते हैं।बाकी उन सबके पास एटीएम डेबिट क्रेडिट कार्ड हैं।

    ये खास किस्म के लोग देश की बाकी 128 करोड़ से अलग हैं और इनमें से ज्यादातर की नींद वातानुकूलित दड़बों मे काम के वक्त और घर में भी केसरिया केसरिया है और उनका पर्यावरण गायंत्रीमंत्र जाप है ।सरकार चाहें तो उन्हें राजद्रोह के मामले में कैद कर सकती है क्योंकि वे कार्ड होने के बावजूद बैंकों और एटीएम के सामने भीड़ जमाकर कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकते हैं।

    फासिज्म के राजकाज के लिए मुश्किल यह है कि बही खाते में देश अभी लोकतंत्र हैं और मुक्तबाजार भी है।लोकतांत्रिक संस्थानों का खात्मा हो गया है लेकिन ट्विटर वगैरह एकाउंट हैक हो जाने के बावजूद विपक्ष अभी जिंदा है।इस पर तुर्रा संसद भी भारी शोर शराबे के साथ चल रही है ताकि देश के लोकतंत्र बने रहने,संविधान लागू होने और कानून के राज के साथ जनता के हकहकूक और मौलिक अधिकारों के बारे में किसी को कोई शक नहीं है। जेलखानों की तरह देश में सबकुछ ठीकठाक है और गैस चैंबर की तरह किसी को किसी सुगंध या दुर्गंध का अहसास नहीं है और न नागरिकों को सर पर मंडराती मौत दिखायी दे रही है क्योंकि वे डिजिटल हैं और अपना सच अपने ख्वाबों के मुताबिक आधार कार्ड और अपनी अपनी जाति के मुताबिक चुनने को आजाद हैं।

    संसदीय सहमति असहमति की परवाह किये बिना बिना बहस कायदा कानून बदलने रोज रोज संविधान की हत्या करने की तर्ज पर  बिना किसी मसविदे या बहस के कालाधन निकालने के लिए पचास फीसद टैक्स जमा करके कालाधन सफेद करने का लोकतंत्र भी बहाल है,भले ही पेट्रोल पंपों और हवाई यात्राओं में पांच सौ का नोट अब नहीं चलने वाला है।

    हम अपने जानी दुश्मन पाकिस्तान की तरह कतई नहीं है हालांकि उनके इस्लामी राष्ट्र का जुड़वा हमारा यह हिंदू राष्ट्र है लेकिन फौजी हुकूमत नहीं है।

    चाहकर भी बैंकों और एटीएम पर बागी जनता को औकात में रखने के लिए सेना उतार नहीं सकते हैं।भले ही बैंककर्मियों की मदद के लिए कैश पहुंचाने की गरज से सेना की भी मदद ली जा रही है।हम सेना के परेड को देशभक्ति का पैमाना मानते हैं और हमारी देशभक्ति इसीमें हैं कि हम गली मोहल्लों और बाजारों में भी सेना का परेड देख लें।

    कैशलैस इंडिया के कार्डधारी पगलाये नागरिकों के धीरज का बांद टूटने का यह ऐहतियाती इंतजाम है तो बाकी 128 करोड़ जनता पगला गयी तो पुलिस और सेना के परेड का क्या नजारा होगा, उसका अंदाजा लगाकर भक्तजनों के पुलकित कीर्तन कमसकम  सोशल मीडिया में जरुर होना चाहिए।राजनीति और मीडिया में विशेषज्ञ कीर्तनिये कम नहीं है।बेचारे रवीश कुमार से परहेज हैं तो उन्हीं कीर्तनियों की मुफ्त सेवा ली जा सकती है।

    गनीमत है कि देश अभी सेना के हवाले नहीं हुआ है।

    हमारे पूर्व संपादक ओम थानवी के इस मंतव्य पर गौर करें

    मैंने पहले लिखा था कि काला धंधा रोकने की क़वायद ने वैधानिक कालाबाज़ारी का रास्ता खोल दिया है।

    सरकार की अपनी फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी नीति को एक बारगी छोड़ दें, सरकार ने यह जो क़ायदा बनाया है कि असीमित दवा पाँच सौ के पुराने नोट से ख़रीद सकते हैं। और सीमित मोबाइल रीचार्ज भी हो सकता है। पर ज़्यादातर दवा-विक्रेता डाक्टर के रुक्के के बावजूद पुराना नोट लेने से इनकार कर रहे हैं। रीचार्ज वाले रीचार्ज से मुँह फेर रहे हैं।

    पता चला है कि अपनी खाताबही में वे करोड़ों का काला धन सफ़ेद कर रहे हैं। वरना उन्हें अधिसूचना के मुताबिक़ पुराने नोट लेने से क्या गुरेज़? वे नोट उन्हें सरकार बदल कर देगी। ज़ाहिर है, वे आपके-हमारे नोट नहीं, अपने या ठेकेदारों के नोट बदलवाएँगे। उनके लिए इससे आसान काम क्या हो सकता है? सिर्फ़ काग़ज़ों में इंदराज चाहिए। उन्हें रुक्के की प्रति या ख़रीददार की आइडी रखने की हिदायत भी नहीं। किसी का नाम ही काफ़ी है!

    बंगाल के मशहूर चिंतक लेखक इनामुल हक ने लिखा हैः

    "অাপনাদের চোখ কপালে উঠে যাবে যদি জানেন যে মোদীজির নোট বদলের প্রকৃত উদ্যেশ্য কি?

    দেশ বাসীকে কাঁদিয়ে দেশের বৃহত্তম শিল্প পতিদের মুখে হাসি ফুটিয়ে দেশের বৃহত্তম ভণ্ডামির গুরু অাজ কুম্ভীরাশ্রু ঝরাচ্ছেন৷

    মোদীর প্রাণনাশের অাশঙ্কায় চিন্তিত 'রামদেব'৷

    ৫০০/১০০০ টাকার নোট বাতিলের পেছনে অাসল উদ্দেশ্যটি যদি বুঝতে চান তাহলে কিছুটা ফ্ল্যাশ ব্যাকে যেতে হবে—

    এই মুহূর্তে দেশের ব্যাঙ্কে মোট অনাদায়ী লোন (Bad loan) এর পরিমান হলো ৬,০০,০০০ কোটি৷

    কিছু সপ্তাহ অাগে Credit Rating Agency মোদী সরকারকে রিপোর্ট দেয় যে এই মুহূর্তে ভারতীয় ব্যাঙ্ককে অাশু ১.২৫ লক্ষ কোটি Capital Infusion দরকার৷

    জুলাই ২০১৬ তে ১৩টি ব্যাঙ্ককে ২৩,০০০ কোটি টাকা inject করা হয়৷

    ২০১৫ সালে অর্থমন্ত্রী অরুণ জেটলি বলেন যে অাগামী ৪ বছরে (PSU) ব্যাঙ্ককে চাঙ্গা করতে অারো ৭০,০০০ কোটি দেওয়ার লক্ষ্য মাত্রা নিয়েছে কেন্দ্র৷

    তার মানে ব্যাঙ্কে টাকা জমাটা বাড়াতে হবে,তবেই তো প্রিয় শিল্প পতিদের লোন মাফ করা যাবে অাবার তাদের নতুন লোন দেওয়া যাবে!

    তাহলে ব্যাঙ্ককে নতুন ভাবে চাঙ্গা করে লোন প্রদানের ক্ষমতা বাড়ানোর উদ্যেশ্যটার ফলস্বরুপ ৫০০/১০০ টাকার নোট বাতিলের Panic Button টা দাবানোই একমাত্র পথ কেন্দ্রের৷

    মোদী তাই করলেন৷

    ব্যাস গোটা দেশ ব্যাঙ্কের লাইনে দাঁড়িয়ে পড়লো৷

    ব্যাপক ভাবে টাকা জমা পড়ছে৷

    কিন্তু তুলতে পাবেন না৷

    শুধুমাত্র সংসার চালানোর টাকাটাই তুলতে পারবেন৷

    টাকা তুলে বা পাল্টে নিলে তো অাসল উদ্যেশ্যটাই বিফল হবে যে৷

    মোদী সরকার ও মোদী পন্থীরা ঢাক পিটিয়ে বললেন যে দেশীয় (Domestic) কালো টাকা উদ্ধারের জন্য এবং Terror Financing ও Fake Currency কে শেষ করার জন্য এই 'Demon'-etization.তাহলে কেনো ২০০০ টাকার নোট ছাপানো হলো?

    বিদেশে গচ্ছিত ভারতীয় টাকা, দেশে মজুত বিদেশী টাকা, ফোরেক্স, বেনামে বিদেশে সম্পত্তিতে নিবেশ, সম্পত্তি, সোনা, অলঙ্কার রূপে গচ্ছিত কালো টাকাগুলো কি শুধু ৫০০/১০০০টাকা বাতিল করে উদ্ধার করা যাবে?

    RBI এর তথ্যানুযায়ী ১৪লক্ষ কোটি টাকার মধ্যে ৩৮% নোট ১০০০টাকার, অার ৪৯% নোট ৫০০ টাকার৷

    'Bussiness World' এর তথ্যানুযায়ী দেশে 'Fake note' 0.002% of Rs 1,000 notes, and 0.009% of Rs 500 notes.

    তাহলে 'Fake Currency' যদি ISI ই ছাপায় তাহলে নতুন নোটের নকল করতে কতো দেরি লাগবে?





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    Mamata Banerjee had said that the the Army deployment was in "clear violation of the Constitution" and a bid to "create a civil war like situation in the country."

    Palash Biswas

    Today I visited almost a dozen ATMs in the neighbourhood and returned empty handed to read an alarming news that it would be biometric payment system in Cashless Digital India.Ruling TMC has launched a mass agitation against Demonetization all over Bengal as DIDI continued the Jihad and extended in Uttar Pradesh and Bihar.I saw TMC supporters demontrating before banks everywhere targeting the governance of fascism.Despite differenaces ,we have to salute the courage of the lady always ready to stree fight in the best interest of the masses.No political party has taken any intitiative similar. The CPIM GS Sitaram Yetury left to mourn in Cuba accomapning Saffron Commander Rajnath Singh and Bengla cpim still targeting Mamata and had done nothing against Demonitization.

    Government wants Aadhaar-enabled payment to replace debit, credit cards!

    The initiative can help the government deal with situations like recent demonetisation and curb black money menace while bringing in more financial transaction transparency.

    The Unique Identification Authority of India (UIDAI), in an attempt to encourage Aadhaar-enabled payments, has planned to increase biometric authentication capacity through Aadhaar from 10 crore to 40 crore a day to move to a cashless society.According to a new plan, these Aadhaar merchants, to be located in every rural village, will facilitate small payments such as grocery or medical bills or even open a bank account using biometric authentication.

    Mind you,Biometric payment is a point of sale (POS) technology that uses biometric authentication to identify the user and authorize the deduction of funds from a bank account. Fingerprint payment, based on fingerscanning, is the most common biometric payment method. Often, the system uses two-factor authentication, in which the finger scan takes the place of the card swipe and the user types in a PIN (personal ID number) as usual.It means with every trasaction you have to share yourpersonal data to anyone whom you never know and it would be almost impossible to guard yourself against the calamities imminent just because the biometric data might be misused at any point. 

    Mind you,I have talked to top Bank Officials after Card hacking and they admitted for biometric data sharing Bankning Security is never enough.Meanwhile,I have talked the HDFC headquarter which wanted my  feed back.I told them that I am rather worried for India bank System and sorry for Bank employers.I told them HDFC service has been excellent in Bengal area as they are trying their best that HDFC ATMs should not go dry.HDFC official are also helping the senior citizens and masses have no complaint at all.Bank employees in general are working round the clock under tremendous stress.But Iam afraid that the Government of India is admaent to fail Indian Banking and opening all doors of fraud and money laundering.

    Dr.Amartya Sen,Kaushik Basu and Abhirup Sarkar ,all eminent economists are worried for a breakdown of the economy as Banks have become virtually bankrupt.Banks fail tp pay wages and pension and it heralds rather Greek tragedy being enacted in India.Indian Banking system is handed over to non banking parties as PayTM,Big Bazar and Jio which would not ensure saftey against fraud,cyber crimes and moneylaundering.At the same time banks have to face heavy losses in transactions as transactions have been handed over to private parties.Now it would be UID for cashless transaction.It would be disastrous.

    In these circumsatnces,West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee opened another front in her battle with the centre on Thursday, objecting to the presence of Army soldiers at toll booths on national highways that run through her state, saying the state government's permission should have been sought.

    Is it Military Coup against agaisnt Mamata Bannerjee or an Arrest Attempt?Since Mamata is leading Anti Demonetization Resistance,the proactive CBI activism heralds some unexpected political development and it might be also a step forward to make Bengal Saffron!

    Is it an delayed attempt to arrest Mamata Bannerjee in Sarda a or Nrada Scame to make the reissistance against Demnetization politically silent which might finish TMC as well as the Left in the best interest of saffron agenda.If Bengal is captured after Assam,the coup is needed.

    We do not any similar exercise in any other state so far.Hence,the matter seems rather fishy!

    "Is this a military coup?" Mamata asked, adding, "even for a mock drill, the army has to take the state's permission, and they have not."

    The Trinamool Congress and other opposition parties raised the issue of the presence of Army personnel at toll plazas 'in various parts' of West Bengal in both Houses of Parliament on Friday. WB chief minister Mamata Banerjee had earlier told the Indian Express that the Army deployment was in "clear violation of the Constitution" and a bid to "create a civil war like situation in the country."

    However,the Army however clarified and called the incident a 'routine exercise.' Defence Minister Manohar Parrikar also spoke on the issue in Parliament and said that Trinamool's reaction to the incident was merely 'political frustration.' He said, "Its sad that a routine exercise has been made into a controversy now." Parrikar added that the exercise was scheduled to happen on December 28, 29 and 30, but were shifted to December 1, 2 on the request of Kolkata police.

    Defence minister Manohar Parrikar on Friday rubbished allegations by West Bengal chief minister Mamata Banerjee related to an "army coup", calling it political frustration.


    Banerjee is protesting against the presence of the army at toll plazas in several parts of the state, saying the permissions were not taken for the same.


    "I am very sad that such routine exercise by army is being used for controversy," Parrikar told Parliament, adding it was a standard practice. "It is only political frustration."

    The Chief Minister spent the night in her office at the secretariat Nabanna, refusing to go home till the Army left.


    "I am the custodian of common people... I will stay put here for the whole night and observe the situation," Ms Banerjee told reporters after midnight.


    Till 11 pm, just 500 metres away, there were soldiers at the Hooghly bridge toll booth conducting what the Army said was a routine exercise across eastern states to "gather statistical data about load carriers that could be made available to the Army in case of a contingency."


    A few hours later, the Army moved out of the toll booth. A temporary shed which had been set up was also removed.


    "These people may have gone. But they are there in 18 other districts," Ms Banerjee said.


    She said she had checked with other states which reported no such exercise and called it "political vendetta" and "an attack on the federal structure" by the centre, with which she has crossed swords over the currency ban. "Besides the financial emergency, the attack on democracy and the federal structure, is there an emergency?"


    Soldiers were first spotted at the toll plaza at Dankuni in Hooghly district, about 35 km from Kolkata, and at Palsit toll plaza about 90 km away.


    Even as Mamata Banerjee reacted angrily to that deployment, soldiers arrived at the Hooghly Bridge toll plaza. Hooghly Bridge or Vivekananda Setu connects Kolkata to Howrah district across the river. Nabanna is at the Howrah end of the bridge.


    The army's Eastern Command has said the state police had been informed. "Army conducting routine exercise with full knowledge & coord with WB Police. Speculation of army taking over toll plaza incorrect @adgpi," it tweeted.


    But the Kolkata Police responded, also on Twitter, "Army excercise at Toll Plaza was objected to in writing by Kolkata Police, citing security reasons & traffic inconvenience.@easterncomd"


    The Chief Minister said she has asked Chief Secretary Basudeb Banerjee, the state's top bureaucrat, to complain to the centre.      


    Before the Hooghly toll booth, soldiers in fatigues were spotted at toll plazas in Dankuni and Palsit and Derek O'Brien, a lawmaker of Ms Banerjee's Trinamool Congress had earlier on Thursday evening tweeted a video. Later in the night, Ms Banerjee alleged that there was "more army deployment" in other Bengal districts.


    The Army has said it conducts the data collection exercise at toll booths across the country bi-annually and assured that, "There is nothing alarming about this and it is carried out as per government orders." The exercise will end on Friday.


    "Routine exercise in all NE states. In Assam @ 18 places, Arunanchal@13, WB@19, Manipur@6, Nagaland@5, Meghalaya@5, Tripura & Mizoram@1@adgpi," the army tweeted.


    Mr O'Brien called it a "dangerous situation," and said his party would raise the issue in parliament on Friday.


    The Trinamool Congress is part of a united opposition attack on the centre in parliament over its ban on 500 and 1000-rupee notes aimed at curbing corruption and black or untaxed money. Mamata Banerjee is visiting different cities to protest; she accuses the government of punishing the poor with its notes ban which has led to a huge cash crunch.


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    नोटबंदी का यह कारपोरेट कार्यक्रम संघ परिवार का मृत्यु संगीत है।
    #CitizenshipsuspendedtoenhanceAbsolutePowerofRacistFascismMakinginMilitaryState
    खींच मेरा फोटो खींच!
    पेटीएम के बाद जिओ के विज्ञापनों में भी प्रधानमंत्री!
    पलाश विश्वास
    #CitizenshipsuspendedtoenhanceAbsolutePowerofRacistFascismMakinginMilitaryState
    खींच मेरा फोटो खींच!
    पेटीएम के बाद जिओ के विज्ञापनों में भी प्रधानमंत्री!अब बिना इजाजत जिओ के विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तस्वीर चस्पां करने के लिए मुकेश अंबानी को भारी घाटा उठाना पड़ेगा क्योंकि भारत सरकार इस गुनाह के लिए रिलायंस पर भारी जुर्माना सिर्फ पांच सौ(दोबारा पढ़ें,सिर्फ पांच सौ) का लगाने जा रही है।आयकर खत्म करके ट्रांजैक्शन टैक्स लगाकर अरबपतियों और करोड़पतियों को मेहनतकश जनता के बराबर खडा़ करनेवालों की समाजवादी क्रांति की समता,समरसता और सामाजिक न्याय का यह जलवा है तो आधार पहचान के जरिये लेन देन के तहत कारपोरेट एकाधिकार कायम करने के साथ बहुजनों का सफाया करने के लिए उनके कारपोरेट महोत्सव के अश्वमेध यज्ञ का हिंदुत्व एजंडा भी कैशलैस सोसाइटी है और नोटबंदी अभियान राममंदिर आंदोलन की निरंतरता है।
    जाहिर है कि कारपोरेट सुपरमाडल बने प्रधानमंत्री पर अब संघ परिवार का नियंत्रण भी नहीं है!
    ग्लोबल हिंदुत्व के महानायक डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अमेरिकी लोकतंत्र की परंपरा के मुताबिक अपने को ढालने की कोशिश हैरतअंगेज तरीके से कर रहे हैं।वैसे भी अमेरिका में राजकाज,कायदा कानून,राजनय,संधि समझौता से लेकर कानून व्यवस्था के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति के सर्वेसर्वा सर्वशकितमान स्टेटस के बावजूद तानाशाही तौर तरीके अपनाने की मनमानी नहीं है और राष्ट्रपति प्रणाली होने के बावजूद अमेरिकी सरकार को कदम दर कदम संसदीय अनुमति की जरुरत होती है।
    इसके विपरीत हमारे यहां संसदीय प्रणाली होने के बावजूद संसद की सहमति के बिना राजकाज,कायदा कानून,राजनय,संधि समझौता से लेकर कानून व्यवस्था के मामले में कैबिनेट की सांकेतिक अनुमति से ही जन प्रतिनिधियों को अंधेरे में रखकर बिना किसी संवैधानिक विशेषाधिकार के प्रधानमंत्री को फासिस्ट तौर तरीके अपनाने से रोकने की कोई लोकतांत्रिक तौर तरीका नहीं है।मनमोहन सिंह ने भारत अमेरिका परमाणु संधि पर दस्तखत कर दिया था बिना संसदीयअनुमति या सहमति के और वामपंथी अनास्था के बावजूद न सिर्फ उनकी सरकार गिरने से बची, अगला चुनाव जीतकर उनने वह समझौता बखूब लागू भी कर दिया जनमत,आम जनता या संसदीय अनुमति के बिना।जबकि इस संधि पर संसद की मुहर लगाकर बाकायदा समझौते को कानून बनाने में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की हालत पतली हो गयी थी।
    यही वजह है कि नस्ली दिलोदिमाग के होने के बावजूद अमेरिकी प्रेसीडेंट इलेकट को सिर्फ अमेरिकी का प्रेसीडेंट ही बने रहना है।डोनाल्ड ट्रंप अरबपति होने के बावजूद तमाम दूसरे पद और हैसियत छोड़ने को मजबूर हैं।
    दूसरी ओर,अपने प्रधानमंत्री पर कोई अंकुश किसी तरफ से नहीं है।गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर वे जो कुछ कर रहे थे,अब भी वही कर रहे हैं।देश का प्रधानमंत्री होने के बावजूद संसदीय अनुमति से नहीं संघ परिवार के एजंडा और दिशानिर्देश के तहत संघ मुख्यालय से वह फासिज्म का राजकाज चला रहे हैं।अब तो लगता है कि संघ परिवार का भी उनपर कोई अंकुश नहीं है।
    ओबीसी कार्ड खेलकर बहुसंख्य जनता का वोट हासिल करने के लिए जाति व्यवस्था और अस्मिता राजनीति के तहत भारत की सत्ता दखल करने में संघ परिवार को कामयाबी जरुर मिल गयी है,लेकिन संघी और भाजपाई भूल गये कि ब्राह्मण नेताओं जैसे अटल बिहारी वाजपेयी या मुरलीमनोहर जोशी और अटलबिहारी वाजपेयी को नियंत्रण करने में उन्हें जो कामयाबी मिलती रही है,उसकी सबसे बड़ी वजह ब्राह्मण भारत की जनसंख्या के हिसाब से तीन फीसद भी नहीं है।
    लालकृष्ण आडवाणी सिंधी हैं और सिंधियों की जनसंख्या ब्राह्मणों की जनसंख्या के बराबर भी नहीं है।
    इसके विपरीत ओबीसी की जनसंख्या पचास फीसद से ज्यादा है और संघ परिवार की पैदल सेना में ओबीसी सभी स्तरों पर काबिज हैं।सारे ओबीसी क्षत्रप राज्यों के मुख्यमंत्री हैं।
    अब मोदी ओबीसी कार्ड संघ परिवार के खिलाफ खेल रहे हैं।
    उनका ब्रह्मास्त्र उन्हींके खिलाफ दाग रहे हैं।
    लालू नीतीश नोटबंदी के हक में हैं।
    मुलायम अखिलेश लगभग खामोश हैं।
    यूपी बिहार सध गया तो नागपुर की परवाह क्यों करें।
    संघ परिवार के ताबूत पर कीलें अब ठुकने ही वाली हैं।
    हिंदुत्व का राममंदिर एजंडा पहले शौचालय में खप गया।
    राममंदिर के बदले शौचालय तो हिंदुत्व का एजंडा अब नोटबंदी है।
    मोदी इस ओबीसी समीकरण के तहत संघ परिवार की परवाह किये बिना निरंकुश राजकाज चला सकते हैं और हिंदुत्व का बैंड बाजा बजा सकते हैं तो ब्राह्मणों की खाट भी खड़ी कर सकते हैं।
    पहले भी डां.मनमोहन सिंह को बचाने में पंजाब के अकाली उनका साथ संघ परिवार से नाभि नाल के संबंध के बावजूद सक्रिय थे और अकालियों ने ही अनास्था प्रस्ताव से मनमोहन को बचाया।
    उन्हीं मनमोहन के कंधे पर सवार ओबीसी कारपोरेट अब मोदी राज में हर क्षेत्र में हिंदुत्व,शुद्धता और आयुर्वेद के ब्रांड के साथ तमाम कारपोरेट ब्रांड पर हावी है।
    उनका सारा कारोबार आयकर और नोटबंदी के दायरे से बाहर है और वे ही नोटबंदी के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं।
    जाति व्यवस्था बहाल रखने के लिए,मनुस्मृति अनुशासन लागू करने के लिए यह कारपोरेट राज हिंदुत्व का एजंडा है।
    इसीलिए ओबीसी कार्ड बेहिचक खेल दिया संघ परिवार ने तो इसी ओबीसी कार्ड की ताकत और कारपोरेट समर्थन से मोदी अब आम जनता के लिए जो सबसे खतरनाक है,सो है,संघ परिवार के लिए भस्मासुर हैं अभूतपूर्व जिन्हें संघ परिवार ने भगवान विष्णु की तरह सर्व शक्तिमान बना दिया और आखिरकार वे पेटीएम और जिओ के सुपरमाडल निकले।
    नोटबंदी का यह कारपोरेट कार्यक्रम संघ परिवार का मृत्यु संगीत है।
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    तो अब हम क्या करें?

    बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है।

    अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जाने से जो आर्थिक अराजकता की स्थिति बन रही है,वह कालेधन की अर्थव्यवस्था से ज्यादा खतरनाक है।

    पलाश विश्वास

    हमने व्यापक पैमाने पर समाज के विभिन्न तबकों के लोगों से बात की है तो पता चला है कि गांवों और शहरों में नोटबंदी के खिलाफ अभी कोई माहौल बना नहीं है तो कालाधन वापसी की किसीको कोई उम्मीद भी नहीं है।लोग रातोंरात कैशलैस अर्थव्यवस्था के पक्ष में हो गये हैंं और उन्हें उम्मीद है कि सुनहले दिन अब आने ही वाले हैं।मोदी ने अमीरों के खिलाफ गरीबों को भड़काने का काम बखूब कर दिया है और अपने संपन्न पड़ोसियों के मुकाबले बहुसंख्य जनता को नोटबंदी में खूब मजा आ रहा है और उन्हें आने वाले खतरों के बारे में कोई अंदाजा नहीं है।आगे वे मोदी के नये करतबों और आम बजट में राहत का इंतजार कर रहे हैं।कालाधन के अलावा उन्हें बेनामी संपत्ति भी जब्त हो जाने की उम्मीद है।उन्हें समझाने और अर्थतंत्र के शिकंजे में फंसी उनकी रोजमर्रे के हकीकत का खुलासा करने का हमारा कोई माध्यम नहीं है और न कोई राजनीति ऐसी है जो आम जनता के हक हकूक के बारे में सच उन्हें बताने की किसी योजना पर चल रहा है।

    हम यही बताने की कोशिश कर रहे है कि हिंदुओं के ध्रूवीकरण की राजनीति विपक्ष के अंध हिंदुत्व विरोध से जितना तेज हुआ है,उसी तरह अंध मोदी विरोध से भी कोई वैकल्पिक राजनीति तब तक नहीं बनती जब तक सच बताने और समजानेका हमारा कोई सुनियोजित कार्यक्रम और माध्यम न हो।हिंदुत्व के फर्जी एजंडा का पर्दाफाश करने की कोई जमीनी कवायद हम कर नहीं पाये हैं।तो संसदीय हंगामा से हम फासिज्म के राजकाज पर किसीभी तरह का अंकुश नहीं लगा सकते हैं। रोज नये नये सत्यानाशी फरमान जारी हो रहे हैं,जिनका असल मतलब और मकसद बताने और समझने का कोई नेटवर्क हमारे पास नहीं है।

    मसलन बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोदी के खिलाफ नोटबंदी के बाद पुराने नोट फिर बहाल करने की मांग लेकर जिहाद छेड़ दिया है और वे दिल्ली,लखनऊ और पटना घूमकर नया राजनीतिक समीकरण बनाने के फिराक में हैंं।प्रबल जनसर्तन होने के बावजूद उनकी इस मुहिम को आम जनता का समर्थन कतई नहीं है और वे मोदी के करिश्मे से अपने दिन फिरने का इंतजार कर रहे हैं और जो गरीब लोग हैं,वे छप्पर फाड़ सुनहले दिनों का इंतजार कर रहे हैं।वामपंथियों काकोईजनाधार बचा नहीं है तो दीदी का कोई जनाधार भी दिख नहीं रहा है।इसके विपरीत भूमिगत सारे संघी सतह पर आ गये हैं और मोदी की छवि सामने रखकर वे बंगाल का तेजी से केसरियाकरण कर रहे हैं।

    नोटबंदी क्रांति के बारे में हमें पहले दिन से ही खुशफहमी नहीं रही है।हमने शुरुआत में ही लिखा हैनई विश्वव्यवस्था  में नागपुर तेलअबीब और वाशिंगटन गठभंधन के आधार पर अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर ग्लोबल हिंदुत्व के उम्मीदवार घनघोर रंगभेदी डोनाल्ड ट्रंप के ताजपोशी से पहले भारत में आर्थिक आपातकाल लागू हो गया है।

    अब जो हालात बन रहे हैं,वे बेहद खतरनाक हैं।बेहद खतरनाक इसलिए हैं कि हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है।आज बाबासाहेब डा.भीमराव बोधिसत्व का परिनिर्वाण दिवस है।देशभर में परिनिर्वाण दिवस की धूम लगी रही।तो दूसरी ओर,तमिलनाडु में तीन दशकों से द्रमुक राजनीति की धुरी बनी हुई अम्मा का अवसान हो गया।वामपंथ के भारतीय परिप्रेक्ष्य में हाशिये पर चले जाने के बाद अंबेडकरी और द्रमुक आंदोलन के दिशाहीन हो जाने से वैकल्पिक राजनीति अब विश्वविद्यालयी छात्रो के जयभीम कामरेड तक सीमाबद्ध हो गयी है।

    हमने पिछले दिनों ओबीसी कार्ड के नये राजनीतिक समीकरण पर जो लिखा है,उससे देस में सबसे बड़ी आजादी के पढ़े लिखे लोग नाराज हो सकते हैंं।लेकिन सच यही है कि ओबीसी कार्ड के जरिये संघ परिवार ने पहले सत्ता दखल किया और हिंदुत्व के एजंडे के साथ राजकाज शुरु हुआ।अब वही हिंदुत्व कार्ड प्रधानमंत्री की अस्मिता राजनीति के तहत कारपोरेट एजंडा में तब्दील हुआ जा रहा है।इससे संघ परिवार का दूर दूर का कोई संबंध नहीं है।

    भले ही राममंदिर आंदोलन और हिंदुत्व का एजंडा हाशिये पर है लेकिन संघ परिवार का यह ओबीसी समर्थित कारपोरेट एजंडा असहिष्णुता की रंगभेदी राजनीति से कही ज्यादा खतरनाक है।देश की सबसे बड़ी आबादी को यह बात समझ में नहीं आ रही है तो देश में अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली के एकाधिकार देशी विदेशी के  कब्जे में चले जाने पर होने वाली नरसंहारी आपदाओं के बारे में हम किसे समझायें।

    आज अम्मा को द्रमुक राजनीति के ब्राह्मणवाद विरोध और नास्तिकता के दर्शन के मुताबिक दफनाया गया है।हम भारतीय राजनीति में मातृसत्ता का समर्थन करते हैं।हम महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व का ही नहीं,जीवन में हर क्षेत्र में उनके नेतृत्व के पक्ष में हैं।जाति के आधार पर आधी आबादी ओबीसी के कार्ड के जरिये केसरिया है तो लिंग के आधार पर आधी आबादी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के कब्जे में हैं।विकास का तंत्र जनपदों के सीमांत व्यक्ति तक पहुंचाने,आम जनता की बुनियादी जरुरतों और सेवाओं की सबसे ज्यादा परवाह करने और सीधे जनता से संवाद और जनसुनवाई के लिए अम्मा जयललिता की स्त्री अस्मिता निर्णायक रही है और उनकी राजनीति सीधे रसोई से शुरु होती है,इसमें भी हमें कोई शक नहीं है।

    ममता बनर्जी की राजनीति से सिरे से असहमत होने के बावजूद एक आजाद जनप्रतिबद्ध स्त्री के बतौर उनकी राजनीति का हम शुरु से समर्थन करते रहे हैं तो श्रीमती गांधी से लेकर सुषमा स्वराज और बहन मायावती की राजनीतिक भूमिका को हम सामाजिक बदलाव की दिशा में सकारात्मक मानते हैं और इसी सिलसिले में करीब पंद्रह साल से आमरण अनशन करने वाली मणिपुर की लौैहमानवी इरोम शर्मिला के संसदीय राजनीति में लड़ने के फैसले का हम विरोध नहीं करते।क्योंकि समता,न्याय औरसहिष्णुता के लिए पितृसत्ता का टूटना सबसे ज्यादा जरुरी है।

    जयललिता ने अयंगर ब्राह्मण होते हुए,जन्मजात कनन्ड़ भाषी होते हुए अपने सिनेमाई करिश्मा से तमिल अनार्य द्रविड़ आम जनता के साथ जो तादात्म्य कायम किया और जिस तरह वे द्रविड़ राजनीति का तीन दशकों से चेहरा बनी रही,वह हैरतअंगेज और अभूतपूर्व है और हम उनके निधन को तमिलनाडु में मातृसत्ता का अवसान मानते हैं।इसके बावजूद सच यह है कि अम्मा का अंतिम संस्कार वैदिकी रीति रिवाज के मुताबिक हुआ तो फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें चिताग्नि में समर्पित करने के बजाय दफनाया गया है।यह रामास्वामी पेरियार के आत्मसम्मान और अनास्था आंदोलन के विपररीत द्रविड़ आंदोलन का केसरियाकरण है।

    बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है।

    तो अब हम क्या करें?

    अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जाने से जो आर्थिक अराजकता की स्थिति बन रही है,वह कालेधन की अर्थव्यवस्था से ज्यादा खतरनाक है।



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    बाबाओं और बाबियों का देश

    सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था

    राजनीति में नागनाथ

    और आम जनता भेड़ धंसान

    लोकतंत्र दिवास्वप्न

    नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह

    विवेक धृतराष्ट्र

    पितृसत्ता गांधारी

    पलाश विश्वास

    सबसे पहले हम अपने पाठकों और इस देश की आम जनता से माफी चाहते हैं।मौजूदा आपातकालीन हालात में हालात अघोषित सेंसरशिप है और बाकायदा सोशल मडिया की नाकेबंदी है।जो लिंक हम शेयर कर रहे हैं,अव्वल तो वह आप तक पहुंच ही नहीं रहा है और पहुंच भी रहा है तो खुल नहीं रहा है।जिन प्लेटफार्म के जरिये हम आप तक पहुंचते हैं,वहां भी हमारे लिए सारे दरवाजे और खिड़कियां बंद हैं।

    नोटबंदी लागू होने के साथ साथ आम जनता ही नहीं,प्रतिबद्ध पढ़े लिखे एक बड़े तबके को भी यकबयक उम्मीद हो गयी कि देश में पहलीबार कालाधन निकालने का चाकचौबंद इंतजाम हो गया है।उनके पुराने स्टेटस इसके गवाह है।बहुत जल्दी उन्हें अपने अनुभवों से मालूम पड़ गया कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है।ऐसे तमाम पढ़े लिखे लोग तीर तरकश संभालकर मैदान में डट गये हैं और चांदमारी पर उतर आये हैं।उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि बाकी आम जनता उनकी तरह न पढ़े लिखे हैं और न काबिल और समझदार हैं।जो अब भी भक्तिमार्ग पर अडिग हैं।तो उनके ईश्वर के खिलाफ गोलाबारी का मोर्चा खुल गया है।ईश्वर के खिलाफ अनास्था आम आस्थावान जनता को सिरे से नापसंद हैं और वे किसी दलील पर गौर करने की मानसिकता में नहीं होते।ऐसे हालात में हकीकत की पूरी पड़ताल के बिना,लोगों से संवाद किये बिना हालात का मुकाबला असंभव है।

    प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मडिया में पक्ष विपक्ष के सत्तापक्ष के हितों के मुताबिक बहुत कुछ छप रहा है।कुल किस्सा आधा सच और आधा झूठ का फसाना है।आम जनता के लिए क्या सच है,कितना सच और कितना झूठ है,झूठ क्या है,यह सुर्खियों की चीखों से पता करना एकदम असंभव है।सोशल मीडिया पर संवाद का रास्ता खुल सकता था और वहां भी अघोषित सेंसरशिप है।

    हम सिरे से असहाय हैं।हमारा कहा लिखा कुछ भी आप तक नहीं पहुंच पा रहा है।करीब 45 साल से जिन अखबारों में हम लगातार लिखते रहे हैं,वहां सारे लोग बदल गये हैं और जो लोग अब वहां मौजूद हैं,उनमें अब भी ढेरों लोग हमारे पुराने दोस्त हैं।लेकिन उनमें से कोई हमें छापने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। क्योंकि पत्रकारिता अब मिशन नहीं है,बिजनेस है,जिसे सत्ता का संरक्षण और समर्थन की सबसे ज्यादा परवाह है।जनता का पक्ष उनकी कोई वरीयता है ही नहीं क्योंकि उन्हें सिर्फ अपने कारोबारी हितों की चिंता है और वे बेहद डरे हुए हैं।ऐसे हालात में पैनल चैनल पर हमें कहीं से बुलावा आना भी असंभव है।बाकी सोशल मीडिया पर हम रोजाना रोजनामचा वर्षों से लिख रहे हैं,जो आप तक पहुंच नहीं रहा है।हम शर्मिंदा हैं।

    हमारे इलाके में जबसे मैं नौकरी के सिलसिले में बंगाल में आया हूं,1991 से लेकर वाममोर्चा के सत्ता से बेदखल होने से पहले तक बुजुर्ग और जवान कामरेड घर घर आते जाते थे।इनमें सबसे बुजुर्ग दो कामरेड माणिक जोड़ के नाम से मशहूर थे।वाममोर्चा के सत्ता से बेदखल होने के बाद थोड़े समय के अंतराल में दोनों दिवंगत हो गये।

    कामरेड सुभाष चक्रवर्ती के जीवित रहने तक जिले भर में कैडरों का हुजूम जहां तहां दिखता रहता था।तमाम मुद्दों और समस्याओं पर आम जनता से निरंतर संवाद और इसके लिए तैयारी में उनकी दिनचर्या चलती थी।

    कामरेड ज्योति बसु के अवसान के बाद बंगाल में कोई कामरेड बचा है या नहीं,मालूम नहीं पड़ता।

    पूरे बंगाल में अब संघी सक्रिय हैं।अभी अभी बंगाल में नवजात बच्चों की अस्पतालों और नर्सिंग होम से व्यापक पैमाने पर तस्करी के मामले खुल रहे हैं,जिसमें प्रदेश भाजपा के संघी अध्यक्ष के खासमखास विधाननगर नगर निगम में भाजपाई उन्मीदवार एक चिकित्सक बतौर सरगना पकड़े गये हैं।

    नोटबंदी से एक दिन पहले बंगाल भाजपा के खाते में करोड रुपये जमा होने का किस्सा सामने आया तो आसनसोल इलाके में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार और आसनसोल के सांसद केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रिय के खासमखास कोलकाता के पास विधाननगर में कोयला मापिया के साथ 33 करोड़ के ताजा नोट के साथ पकड़े गये हैं।

    कालाधन नये नोट में तब्दील होकर फिर अर्थव्यवस्था में खुलकर आ रहा है और एक हजार के बदले दो हजार के नोट जारी करके कायदा कानून बदलकर इसका चाकचौबंद इंतजाम हो रहा है तो कैशलैस फंडा अलग है।

    दीदी ने मोदी के खिलाफ जिहाद का ऐलान कर दिया है और बंगाल में दीदी के सारे समर्थक केसरिया हो गये हैं।वे धुर दक्षिणपंथी हैं और कट्टर वामविरोधी हैं जो बंगाल में हाल में हुए चुनावों में दीदी मोदी गठबंधन को जिताने के लिए जमीन आसमान एक कर रहे थे।ये तमाम लोग अब भी मोदी और दीदी का समर्थन कर रहे हैं और दीदी के जिहाद को राजनीतिक नौटंकी मान रहे हैं।

    दीदी के समर्थक बहुत ज्यादा हैं,लेकिन उनमें से कोई कार्यकर्ता नहीं है और वे अपने अपने धंधे सिंडिकेट में मशगुल हैं।आम जनता के लिए उनके फरमान तो जारी होते हैं लेकिन आम जनता से किसी का कोई संवाद नहीं है।

    सारी राजनीति अखबारों और टीवी के सहारे चल रही है।

    वाम नेता भी वातानुकूलित हो गये हैं और उनके बयान सीधे अखबारों,टीवी और सोशल मीडिया से जारी होते रहते हैं।

    राजनीति पत्रकारिता में सीमाबद्ध हो गयी है और सारे पत्रकार राजनेता या कार्यकर्ता बन गये हैं।पत्रकारिता से अलग राजनीति का अता पता नहीं है और न ही राजनीति और सत्ता से अलग पत्रकारिता का कोई वजूद है।

    ऐसे माहौल में जिले के एक बड़े कामरेड से  आज धोबी की दुकान पर मुलाकात हो गयी,जिनसे नब्वे के दशक में और 2011 तक हमारी घंटों बातचीत होती रहती थी।वे ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी खासे सक्रिय हुआ करते थे।

    कामरेड सुभाष चक्रवर्ती के खेमे में उनकी साख बहुत थी।उनसे राह चलते दुआ नमस्कार एक मोहल्ले में रहने के कारण अक्सर हो जाती थी।लेकिन बड़े दिनों के बाद उनसे आमना सामना हुआ तो हम उम्मीद कर रहे थे कि वे बातचीत भी करेंगे।वे प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते थे और राजनीतिक सक्रियता में उनकी नौकरी कभी आड़े नहीं आयी।उनने पहले ही मौके पर वीआरएस ले लिया था।

    उनने कोई बात नहीं की तो मैंने पूछ लिया,क्या आप बैंक में थे।जाहिर है कि वे नाराज हुए और जवाब में कह दिया कि इतने दिनों से आपको यह भी नहीं मालूम।उनका सवाल था कि आप लिखते कैसे हैं।

    इस पर मैंने पूछ ही लिया,नोटबंदी के बारे में कुछ बताइये।

    वे बोले, मीडिया कुछ भी कह रहा है और आप लोगों को कुछ भी मालूम नहीं है।

    मैंने कहा,आप कुछ बताइये।

    जबाव में बुजुर्ग कामरेड ने कहा कि मुझे किसीसे कुछ लेना देना नहीं है।

    गांव हो या शहर,आम जनता और परिचितों से कामरेड इस तरह कन्नी काट रहे हैं,जिन्हें अर्थव्यवस्था के बारे में भी जानकारी होती है।

    यह सीधे तौर पर राजनीति का ही अवसान है,वामपंथ का तो नामोनिशां है नहीं।

    बिना राजनीतिक कार्यक्रम और संगठन के इस आर्थिक अराजकता का मुकाबला असंभव है जबकि आम जनता को सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के करतब से सावन ही सावन दिखा रहा है।

    बाबाओं और बाबियों का देश

    सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था

    राजनीति में नागनाथ

    और आम जनता भेड़ धंसान

    लोकतंत्र दिवास्वप्न

    नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह

    विवेक धृतराष्ट्र

    पितृसत्ता गांधारी


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    #सलामतरहेअपनाकालाधनकेसरिया

    #जनगणमनपेटीएमकैशलैसजिओबिगबाजारओलाबैंकिंगधोडाला

    #ThanksHDFCChiefParikhtostandforIndianBankingSystems

    पलाश विश्वास

    एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख ने नोटबंदी की तीखी आलोचना कर दी है तो भारतीय स्टेट बैंक की चेयरमैन ने बैंकिग के हक के खिलाफ मुद्रा प्रबंधन की रिजर्व बैंक की नीति के खिलाफ मुंह खोल दिया है।देश भर के बैंक कर्मचारी और अफसर नोटबंदी के महीनेभर बाद तक लगातार काम करते रहने,आम जनता की सेवा में लगे रहने के बाद,करीब पंद्रह लाख करोड़ पुराने नोट जमा करके बदले में सिर्फ तीन लाख करोड़ नये नोट के दम पर भारतीय बैंकिग को जिंदा रखने की हरसंभव कोशिश करके अब हारने और थकने लगे हैं और बहुत जल्द वे हड़ताल पर जाने वाले हैं।कैशलैस इंडिया में अब आम जनता को कुछ दिनों तक नकदी देने का काम करेंगी पीटीएम, जिओ,बिगबाजार और ओला जैसी नानबैंकिंग सेवाएं।अगर बैंक कर्मी सचमुच हड़ताल पर चले गये और वह हड़ताल हफ्तेभर तक चली,तो कैसलैस सावन के अंधों को दिन में तारे नजर आने लगेंगे।

    नोट बंदी के बाद इसी बीच टाटा समूह ने ब्रिटेन में एक अरब पौंड का निवेश कर दिया है तो अडानी समूह को आस्ट्रेलिया में करीब आठ अरब डालर का खदान खजाना मिल गया है और खुदरा बाजार समेत संचार और ऊर्जा,इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल्टी,रक्षा से लेकर बैंकिंग सेक्टर में रिलायंस समूह जिओ जिओ है।बाकी आम जनता दाने दाने को मोहताज है।नौकरीजीवी पेंशनभोगी दो करोड़ बैंकों की लाइन लगाकर पैसा घर चलाने के लिए लेने खातिर बैंकों और एटीएम पर दम तोड़ने लगे हैं।विशेषज्ञों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में नुकसान सत्तर फीसद से ज्यादा है और अनाज का भारी संकट आगे बंगाल की भुखमरी है।मंदी की छाया अलग गहराने लगी है।उत्पादन दर अभी से दो फीसद गिर गया है और विकास दर हवा हवाई है।शेयर बाजार में बड़े खिलाड़ियों की दिवाली और दिवालिया तमाम निवेशक।कल कारखाने ,कामधंधे , हाट बाजार,खेती बंद।

    सिर्फ काला धन अब केसरिया है।

    जनार्दन रेड्डी के उड़ाये  पांच सौ करोड़ में से ड्राइवर के सुइसाइड नोट में सौ करोड़ काला केसरियाधन सफेद है और बाकी कसिकिस के सुईसाइड नोट में सफेद हुआ है ,मालूम नहीं है।दो हजार के नये नोट ने केसरिया तंत्र कालाधन का खड़ा कर दिया है।नोटबंदी से ऐन पहले बंगाल भाजपा के खाते में तीन करोड़ और हर राज्य में जमीन खरीद,नोटबंदी से पहले नये नोट के साथ केसरिया सेल्फी सुनामी के बाद बंगाल में भाजपा के नेता के पास 33 करोड़ केसरिया नये नोट बरामद तो बंगलूर में 40 करोड़ के नये नोट हासिल।

    आम जनता के लिए नकदी वाले एटीएम तक फर्राटा दौड़ है और नकद पुरस्कार दो हजार का इकलौता नोट।

    केसरिया एकाधिकार कंपनियों का विदेशों में निवेश अरबों पौंड और डालर में।

    देश में निवेश दर शून्य से नीचे।

    उत्पादन दर में गिरावट।

    विकास दर में गिरावट।

    कृषि विकास दर शून्य से नीचे।

    सुनहले दिन केसरिया केसरिया।

    #सलामतरहेअपनाकालाधनकेसरिया

    #जनगणमनपेटीएमकैशलैसजिओबिगबाजारओलाबैंकिंगधोडाला

    तमिलनाडु में अम्मा के अवसान के बाद शोकसंतप्त कमसकम सत्तर लोगों के मरने की खबर है।

    हमारे हिंदू धर्म के मुताबिक तैतीस करोड़ देवदेवियों का संसार प्राचीन काल से है।

    उनके परिवार नियोजन का रहस्य हम जानते नहीं हैं।

    2016 में भी वे उतने ही हैं।

    लेकिन अवतारों की संख्या उनसे कहीं ज्यादा है,इसमें कोई शक शुबह की गुंजाइश नहीं है।बाबाबाबियों की संख्या उनसे हजार गुणा ज्यादा है।

    फिल्मस्टार और राजनेता भी ईश्वर न हो तो किसी देव देवी से कम नहीं है।

    अम्मा ने तो फिरभी बहुत कुछ किया है।

    आम जनता को दो रुपये किलो चावल,एक रुपये में भरपेट भोजन,राशनकार्ड पर टीवी,छात्र छात्राओं को मुफ्त लैपटाप, महिलाओं को साड़ी और विवाह पर कन्या को मंगल सूत्र।

    इन तमाम योजनाओं से लाभान्वित लोगों का शोक जायज है।अम्मा में उनकी अटल आस्था का भी वाजिब कारण है।

    इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे अपने पीछे चल अचल संपत्ति दो सौ करोड़ के करीब छोड़ गयी हैं या उनका राजनीतिक उत्तराधिकार और उनकी संपत्ति की मिल्कियत किसे मिलने वाली है।

    इसके विपरीत तैंतीस करोड़ देव देवी,इतने ही करोड़ अवतार,उनसे हजार गुणा बाबा बाबियों का यह हुजूम सिरे से मुफ्त खोर हैं और इनका सारा काला कारोबार आस्था का मामला है।

    धर्मस्थलों में देश की कुल संपत्ति से दस बीस गुणा संपत्ति है,जो सारा का सारा कालाधन केसरिया है।जिसका कोई हिसाब किताब नहीं है।वह सारा केसरिया कालाधन विशुद्ध आयुर्वेदिक है।जहां कानून का हाथ पहुंच जाये तो काट दिया जाये।जहां आयकर छापा नहीं पड़ सकता।उन्हीं धर्मस्थलों के महंत अब हमारे जनप्रतिनिधि हैं।जो अस्पृश्यता के धुरंधर प्रवक्ता हैं।यही उनका आध्यात्म है।

    आम जनता को कंगाल बनाये रखने की रघुकुल परंपरा मनुस्मृति है।यही रामराज्य और स्वराज दोनों हैं।अखंड जमींदारी और अखंड रियासत सही सलामत।केसरिया कालाधन सही सलामत।बाकी जनता का कत्लेआम अश्वमेध जारी रहे और बार बार देश का बंटवारा होता रहे।यही वैदिकी संस्कृति है।राम की सौगंध है।

    नोटबंदी से वही मनुस्मृति फिर बहाल हुई है और भारतीय संविधान और लोकतंत्र का रफा दफा हो गया है।

    रिजर्व बैंक के पास नोटों का कोई लेखा जोखा नहीं है और सारे नये नोटों का केसरिया कायाकल्प है।राजकाज बिजनेस में तब्दील है।राजनीति बेनामी संपत्ति है।रिजर्व बैंक को मालूम नहींं है किसे कितने नोट मिल रहे हैं और तमाम नये नोट केसरिया कैसे बनते जा रहे हैं और केसरिया हाथों में ही वे घूम क्यों रहे हैं।सत्ता नाभिनाल से जुड़ी तमाम गैर बैंकिंग संस्थाओं को आम जनता को गला काटने का हक और बैंकिंग दिवालिया।डिजिटल बहार।

    कालाधन का अता पता नहीं।कालाधन कहां है,कोई जवाब नहीं।स्विस बैंक खाताधारकों का क्या हुआ,कोई पता नहीं।माल्या के अलावा हजारों हजार करोड़ कर्ज माफी किन्हें मिली,नामालूम। कानून बनाकर किनके कालधन लाखों करोड़ विदेश भेज दिये गये,मालूम नहीं।लाखों करोड़ का टैक्स माफ किनके लिए।लाखों करोड़ का कमिशन किन्हें मिला मालूम नहीं।आम जनता को रातोंरात कंगाल बना दिया गया और उनके लोग अरबों पौंड,अरबों डालर का सौदा कारोबार कर रहे हैं।बाकी सारा कारोबार बंद है।

    अरबों पौंड,अरबों डालर का विदेश में निवेश पर नोटबंदी का कोई असर नहीं है।देश में निवेश शून्य से भी नीचे हैं।यह गजब की डिजिटल अर्थव्यवस्था है जिसकी सारी मलाई विदेशियों के लिए हैं या विदेशी कंपनियों के साझेदारों के लिए है।यह अजब गजब स्वराज का रामराज्य है।ग्लोबल हिंदुत्व सही मायने में यही है। उनका केसरिया कालाधन सात समुंदर पार।उनका सारा कर्ज माफ।किसानों की खेती चौपट कर दी।किसान लाखों की तादाद में खुदकशी कर रहे थे,मेहनतकश लाखों मारे जा रहे थे,दलित ,विधर्मी और आदिवासी लाखों मारे जा रहे थे और अब करोड़ों की तादाद में मारे जाएंगे।यही हिंदू राष्ट्र है।यही हिंदू ग्लोब है।

    किसी सभ्य देश में बैंक के पैसा देने से इंकार की वजह से सौ लोगों के मारे जाने का इतिहास नहीं है।न जाने कितने और मरेंगे तो हम शोक मनायेंगे।दो मिनट का मौन उन शहीदों के नाम रखेंगे।या फिर खुद शहादत में शामिल हो जायेंगे। न जाने कितने बच सकेंगे,जो आखिरकार चीख सकेंगे और न जाने किस किसकी खाल और रीढ़ बची रहेगी,किसका सर सही सलामत रहेगा कि फिर सर उठाकर रीढ़ सीधी करके इस अन्याय के अंध आस्था कारोबार के अंधा युग का इस महाभारत में विरोध करने की हालत में होंगे।

    यह महाजनी सभ्यता दऱअसल आस्था का कारोबार है।

    इसीलिए कारपोरेट नरसंहारी एजंडा भी हिंदुत्व का एजंडा है।

    आम जनता अब इसी आस्था की बलि हंस हंसकर हो रहे हैं।

    यही नहीं,एक दूसरे का गला काट रहे हैं।

    बनिया पार्टी ने बनिया समुदाय को कंगाल बना दिया है।

    सत्ता समीकरण ओबीसी है।

    सत्ता का चेहरा ओबीसी है।

    सत्ता के क्षत्रप और सिपाहसालार ओबीसी है।

    आधी आबादी ओबीसी है।

    जिनमें ज्यादातर किसान हैं।

    बाकी छोटे मोटे कामधंधे में लगे लोग।

    ओबीसी तमाम लोग कंगाल हैं।

    ओबीसी की गिनती अबतक नहीं हुई।

    ओबीसी के हकहकूक बहाल भी नहीं हुए।

    ओबीसी को आरक्षण देने के मंडल प्रावधान के खिलाफ मंडल के बदले कमंडल आया और हिंदुत्व के इस उन्माद की जमीन आरक्षण विरोध है।

    उसी हिंदुत्व एजंडा के सारे कारिंदे ओबीसी।

    जिस मनुस्मृति की वजह से दलितों पर हजारों साल से अत्याचार जारी है, उसी मनुस्मृति बहाल करने वाले दलितों के ईश्वर अवतार बाबा बाबी हैं।

    अर्थव्यवस्था सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले हैं।

    फिजां कयामत है।

    लोग अपनी अपनी आस्था के लिए खुदकशी करेंगे।

    लोग अपनी अपनी आस्था के लिए दंगा मारपीट कत्लेआम करेंगे,जान दे देंगे।लेकिन लोगों को संविधान या कानून की परवाह नहीं है।

    मनुस्मृति शासन बहाल ऱखने के लिए दलित ओबीसी बहुजन हिंदुत्व एजंडे के कारपोरेट सैन्यतंत्र  की पैदल फौजें हैं।

    इसीलिए निर्विरोध सलवाजुड़ुम।

    इसीलिए निर्विरोध बलात्कार सुनामी।

    इसीलिए निर्विरोध बच्चों की तस्करी।

    इसीलिए निर्विरोध दलितों पर अत्याचार।

    इसीलिए निर्विरोध स्त्री उत्पीड़न।

    इसीलिए निर्विरोध निजीकरण।

    इसीलिए निर्विरोध विनिवेश।

    इसीलिए निर्विरोध बेदखली।

    इसीलिए निर्विरोध बेरोजगार।

    इसीलिए निर्विरोध सैन्य तंत्र।सैन्य शासन।

    इसीलिए निर्विरोध फासिज्म कारोबार।राजकाज फासिज्म।

    इसीलिए सामूहिक नसबंदी डिजिटल बहार निर्विरोध।

    इसीलिए मैनफोर्स के हवाले देश का वर्तमान भविष्य और अतीत।

    इसीलिए बिना उत्पादन के सिर्फ कमीशन खोरी का काला केसरिया मुक्तबाजार है।

    इसीलिए इस देश का ट नहीं हो सकता।


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    ডিজিটালে কোন কোন কম্পানীর লাভ?

    ডিজিটালে সাধারণ মানুষ বাঁচবেন ত?

    ছ মাসেও পরিস্থিতির  উন্নতি না হলে,সারা দেশে বাংলার দুর্ভিক্ষ ফিরে আসবে।

    নোট বাতিল সিদ্ধান্ত কিন্ত বাংলার গৈরিকীকরণ অভিযানেরই অঙ্গ।বাংলার জননেত্রী মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির কোনো হিতৈষী সত্যি সত্যি আছে কিনা আমি জানি না।

    তিনিই আমাদের নেত্রী এবং রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রীঅন্ধ বামবিরোধী ভোটব্যান্কের রাজনীতিতে বামপন্থী আন্দোলনের ঐতিহ্য ধুয়ে মুছে ফেলার রাজনৈতিক ফসল তুলতে গিয়ে সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকেই তিনি যেভাবে বাংলা কে দক্ষিণপন্থী হিন্দুত্বকরণ ও আড়াআড়ি ধর্মীয় মেরুকরমের রণকৌশল সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকে গ্রহণ করেছেন,এই মুহুর্তে বাংলার অর্থব্যবস্থা ও সমাজ ব্যবস্থার পক্ষে তা আত্মঘাতী

    করপোরেট হিল্দুত্ব এজেন্ডার বিরুদ্ধে তাঁর মোদি হটাও জিহাদে মানুষের কতটা সমর্থন?


    পলাশ বিশ্বাস


    নোট বাতিল নিযে ভারতীয অর্থব্যবস্থার চুড়ান্ত নৈরাজ্য নিযে আমি নিযমিত হিন্দিতে লিখছি।কখনো কখনো ইংরেজিতে.আমি মোবাইলে লিখি না,তাই এফবি তে তত্ক্ষণাত্ কোনো মন্তব্য করা আমার পক্ষে সম্ভব নয়।বাংলা আমার মাতৃভাষা,যদিও বাংলায় আমি লেখক বা সাংবাদিক হিসেবে কোনো প্রতিষ্ঠিত মানুষ নইআমি আপনাদেরই মত একজন অতি সাধারণ নাগরিকমাত্রগত পয়তাল্লিশ বছর যাবত আমি ইংরেজি এবং হিন্দিতে জনগণের হয়ে কথা বলতে লিখতে অভ্যস্তকোনোদিন বাণিজ্যিক লেখা লিখতে পারিনি

    আজ জিরো ইনকাম স্টেটসেও আমার পক্ষে করপোরেট স্বার্থে লেখা সম্ভব নযতাই প্রিন্ট ও ইলেক্রোনিক মীডিয়ায অনুপস্থিত আমার মত নন সেলেব্রিটি মানুষের পক্ষে সাধারণ পাঠককে সম্বোধিত করা এক্কেবারেই অসম্ভবঅন্যদিকে আমার সর্বভারতীয় একটি পাঠকশ্রেণী এই পয়তাল্লিশ বছরে তৈরি হয়েছে.যাদের প্রতি আমি রিয়েল টাইমে যাবতীয় তথ্যও বিশ্লেষণ প্রস্তুত করতে দায়বদ্ধ

    আমি মাঝে মাঝে প্রাসঙ্গিক বিষয়ে বাংলায় অবশ্য লিখি,কিন্তু আমি এখন লিখতে পারছি না ,তাই আপনাদের কাছে করজোড়ে ক্ষমাপ্রার্থী

    নোট বাতিল সিদ্ধান্ত কিন্ত বাংলার গৈরিকীকরণ অভিযানেরই অঙ্গবাংলার জননেত্রী মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির কোনো হিতৈষী সত্যি সত্যি আছে কিনা আমি জানি না

    তিনিই আমাদের নেত্রী এবং রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রীঅন্ধ বামবিরোধী ভোটব্যান্কের রাজনীতিতে বামপন্থী আন্দোলনের ঐতিহ্য ধুয়ে মুছে ফেলার রাজনৈতিক ফসল তুলতে গিয়ে সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকেই তিনি যেবাবে বাংলা কে দক্ষিণপন্থী হিন্দুত্বকরণ ও আড়াআড়ি ধর্মীয় মেরুকরমের রণকৌশল সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকে গ্রহণ করেছেন,এই মুহুর্তে বাংলার অর্থব্যবস্থা ও সমাজব্যবস্থার পক্ষে তা আত্মঘাতী

    রাজনৈতিক ভাবেও বামপন্থীদের সরিয়ে ব্যাপক গৈরিকীকরণের হাইওয়ে ধরে কালো টাকার দক্ষিণপন্থী হিন্দুত্ব রাজনীতি তাঁর প্রবল গণ সমর্থনকেও বিপর্যস্ত করে তুলেছে,এবং তিনি ও তাঁর সমর্থকরা এটা একেবারেই বুঝতে পারছেন না,এটা বাঙালি ও বাংলার পক্ষে অশণিসংকেত,আমি মনে করি

    দিল্লী,পাটনা বা লাখনৌ হয়ত বা সারা দেশে মোদী হটাও জিহাদের পরিবর্তে বাংলার ধর্ম নিরপেক্ষ ও প্রগতিশীল গণতান্ত্রিক পরিবেশকে রক্ষা করার জন্য তৃণমূল স্তরে যে রাজনৈতিক সংগঠন এবং অর্থনৈতিক রাজনৈতিক অভিযানের প্রয়োজন,তেমন কোনো দিশা মাননীয়া মমতা ব্যানার্জির তৃণমূল কংগ্রেস বা বামপন্থী দলের কারও নেই

    সবচাইতে বেদনাদায়ক প্রসঙ্গ হল রাজনৈতিক শ্লোগান ছাড়া এই অইর্থনৈতিক বিপর্যয়ের সঠিক বিশ্লেষণ জনসমক্ষে আসছে না,খবরের কাগজ বা টিভি দেখে মানুষের যাবতীয় ধ্যান ধারণা চুড়ান্ত ভাবে রাজনৈতিক

    এই নোট বাতিলের সিদ্ধান্তের কোনো অর্থশাস্ত্রীয় ভিত্তি নেইমুক্ত বাজারের প্রবক্তা মাননীয় অমর্ত্য সেন থেকে অভিরুপ সরকার পর্যন্ত প্রতিষ্ঠিত সব অর্থবিদরাই খোলাখুলি বলছেনযত নোট বাতিল হয়েছিল তার সবগুলিই আবার ব্যান্কে ফেরত এসেছে

    কালো টাকার হদিশ কিন্ত এখনো মেলেনি এবং এখন সবাই ডিজিটাল ইন্ডিয়ার ধুয়ো তুলছেনকোন কোন কম্পানীর লাভ হবে এই ডিজিটালে,বুঝে নিতে হবে।কালো টাকার কথা প্রধানমন্ত্রী বেমালূম ভুলে গেছেন।

    এত কাল যাবত ছাপানো নোটের বদলে সমসংখ্যক বা অন্ততঃ কাজ চালানোর মত নোট ছাপানোর মত পরিকাঠামো রিজার্ভ ব্যান্কের নেইকালো টাকার হদিশ কিন্ত এখনো মেলেনি এবং এখন সবাই ডিজিটাল ইন্ডিয়ার ধুয়ো তুলছেনকোন কোন কম্পানীর লাভ হবে এই ডিজিটালে,বুঝে নিতে হবে।কালো টাকার কথা প্রধানমন্ত্রী বেমালূম ভুলে গেছেন।

    ছ মাস ছ বছরে ও বাজারে নগদের জোগান বাড়ার সম্ভাবনা শেষউপরন্তু ডিজিটাল ইন্ডিযার লক্ষ্যে অবিচল করপোরেট ফিস্ক্যাল পোলিটিক্যাল পরিকল্পনা অনুযায়ী নগদ টাকার কৃত্তিম অভাব তৈরি করা হল

    মোদ্দা কথা হল,সাধারণ মানুষকে ক্রয়ক্ষমতা থেকে বন্চিত করে তাঁর সবরকম আর্থিক সুযোগ সুবিধা,স্বাধীনতা,ক্ষমতা,উত্পাদন,জীবিকা,উদ্যম থেকে তাঁদের বন্চিত করা হলএটিএম বা ব্যান্কের লাইনে যারা মারা যাচ্ছেন আমরা সকলেই তাঁদের চর্ম চক্ষুতে দেখতে পারছি।কিন্তু সাধারণ কোটি কোটি মানুষের অকাল মৃত্যুর ভয়াল ভবিষ্যত আমরা প্রত্যক্ষ দেখতে পারছি না

    গতকালই ডিজিটাল ইন্ডিয়ার লক্ষ্যে যে এগারো দফা ইনসেন্টিভ ঘোষণা করা হল,তাঁর কোনো হিসেব আমাদের হাতে নেইআখেরে এই জডিজিটাল লেনদনের চার দেওয়ালে আমাদের হাতে শেষ পর্যন্ত কতটা ক্রয়ক্ষমতা থাকছে,এবং এই সোয়াইপ মেশিনগুলো কারা সাপ্লাই করবেন,তাঁদের কমিশন কত,ছাড় বাবদ কত পাব আর পরিসেবা বাবত কত দিতে হবে।

    ফেসবুক করা,এসএমএস করা আর ডিজিটাল লেনদেন এক কথা নয়আধার নাম্বার দিয়ে যে ডিজিটাল লেনদেনের ব্যবস্থা করা হচ্ছে,তাতে জান মালের নিরাপত্তার কোনো ব্যবস্থা ব্যান্কিংএর মত থাকছে না।

    প্রযুক্তিগত ত্রুটিতে কার্ড যেকোনো পয়েন্টে হ্যাক হতে পারে যেমনটা এটিএম বা ক্রেডিট কার্ডের ক্ষেতেরে হযেছিলব্যান্ক সেক্ষেত্রে ক্ষতিপূরণ দেবে কিন্তি নন ব্যান্কিং সংস্থা আদৌ কি ক্ষতিপূরণ দিতে দায়বদ্ধ,এমন কোনো প্রশ্ন করপোরেট সাংবাদিকরা করেন নি।

    কত কালো টাকা উদ্ধার হল?

    কত নোট ছাপা হল?

    আদানি টাটা রিলাযেন্স বিলিয় বিলিযন পৌন্ড বা ডলারে বিজনেস করছেন সারা পৃথীবীব্যাপী,তাঁদের লেনদেনের ক্ষেত্রে কোনো বাধ্যবাধকতা থাকছে না,অথছ একটি দুহাজারটাকার নোট নিতে গিয়ে মানুষকে বেঘোরে প্রাণ হারাতে হচ্ছে ব্যান্কে টাকা থাকা সত্বেও?

    নোট বদলের আগে সারা দেশে ব্যাপক যে টাকা জমা পড়েছে,সে সম্পর্কে তথ্য কোথায়?

    বিজেপি মাফিয়া্ জনার্দন পুজারির পাঁচশো কোটির বিয়ের টাকা নোটবন্দিতে খরচ হল অথছ সাধারণ মানুষ নিজের বাড়িতে বিয়ে বাবদ টাকা পাচ্ছেন না?

    বাংলায় তিন কোটি বিজেপির একাউন্টে জমার জন্য কি পদক্ষেপ হল?

    প্রত্যেক রাজ্যে নোটবন্দীর ঠিক আগে বিজেপি দপ্তরের জন্য কোথা থেকে টাকা এল?

    বিজয় মাল্য ছাড়া আর কাকে কাকে কোটি কোটি টাকার ঋণ মাফ করা হল?

    নোটবন্দীর আগে নূতন আইন তৈরি করে কাদের লক্ষ লক্ষ কোটি টাকা বিদেশে পাচার করা হল?

    চা বাগানের কত শ্রমিককে তাঁদের পাওনা মিটিয়ে দেওয়া হল?

    নোট বাতিলের ফলে কত মানুষের চাকরি নট হল,কত উত্পাদন সংস্থার ঝাঁপ বন্ধ হল?

    পেটিএম,বিগ বাজার,জিও ইত্যাদিকে ব্যান্কের বদলে ট্রান্জেকশনের অধিকারে কার কতটা লাভ?

    পেটিএম ও জিওর বিজ্ঞাপনে কেন প্রধানমন্ত্রী ছবি?

    নূতন নোটে কেন প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ?

    একহাজারি,পাঁচশো টাকা বাতিল করে যে দুহাজারী মহার্ঘ নোট জারি করা হল,সেই নোটেই দেশে সর্বত্র বিজেপি নেতারা কালো টাকা জমা করে ফেলিছেন ইতিমধ্যে এবং ধরাও পড়ছেন সারা দেশে,এটা কেমন করে হল?

    এমন কোনো বেয়াডা় প্রশ্নের মুখোমুখি জেটলিকে হতে হয়নি।

    ইতিমধ্যে এচটিএফসি ও এসবিআই ব্যান্কের চেয়ারম্যানরাও নোট বাতিলের যৌক্তিকতা নিয়ে সরব হয়েছেন।রিজার্ভ ব্যান্কও দায় ঝেড়ে ঝাড়া হাত পা।

    জেটলি নিজে প্রধানমন্ত্রীর চওড়া কাঁধে সব দায়িত্ব পাঠিয়ে দিয়ে খালাস।

    যারা ডিজিটাল লেনদেনের ব্যবস্থা করতে পারবেন না,এমন কোটি কোটি হাটে বাজারের মানুষকে একচেটিয়া করপোরেট আগ্রাসনের সামনে ফেলে দেওয়া হল।

    বাজারে তাঁদের ফিরে আসার কোনো সম্ভাবনা নেই।

    রোজগার সৃজন ত হচ্ছেই না,চা বাগান কল কারখানার শ্রমিক থেকে অসংগঠিত সেক্টারের শর্মজীবী মানুষ বা সবচেযে বেশি গ্রামীণ ক্ষেত মজূরদের বাড়িতে হাঁড়ি কি ভাবে চলবে,কেউ বলতে পারছেন না।

    সারা দেশে মাত্র দু কোটি মানূষের নিযমিত বেতন বা পেনশন,তাঁরাই বেতন বা পেনশন পাচ্ছেন না।

    তাহলে বাকি 128 কোটি মানুষের মধ্যে কত মানুষ আছেন যারা ডিজিটাল ইন্ডিয়ায় বেঁচে বর্তে থাকতে পারবেন,এই প্রশ্ন কেউ করছেন না।

    ইতিমধ্যে জিডিপি কমতে শুরু করেছে.যা মন্দার সংকেত।

    ইতিমধ্যে উত্পাদন দু পার্সেন্ট কমেছে।

    ইতিমধ্যে ভারতের বাইরে বিলিয়ন বিলিয়ন ডলারের,পৌন্ডের ভারতীয় কম্পানী আদানী,টাটা,রিলায়েন্সের অবাধ ব্যবসা সত্বেও ভারতে বিনিয়োগ মাইনাসে।

    কৃষি ক্ষেত্রে বিকাশ দর আগেই শুন্য ছিল,একন এই একমাসেই কৃষিতে শতকরা সত্তর পার্সেন্ট লোকসান হযে গেছে।

    রবি ফসলের চাস বাধিত।খরিফ বিক্রী হচ্ছে না।

    কত লক্ষ চাষি এবছর আত্মহত্যা করতে বাধ্য হবেন,সে সম্পর্কে রাজনৈতিক নেতাদের কোনো ধারণা নেই।

    ইতিমধ্যে পান্জাবে গমের দাম প্রায় এক হাজার টাকা কুন্টলে বেড়ে গেছে।

    সারা দেশে খুচরো আটা তেল চাল ডালের মাচের মাংসের দাম বেড়েই চলেছে।

    শীতের সব্জি বাজারেও রেহাই নেই।

    ছ মাসেও পরিস্থিতির  উন্নতি না হলে,সারা দেশে বাংলার দুর্ভিক্ষ ফিরে আসবে।



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    समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना भारी चार सौ बीस है!



    अगले छह महीने तो क्या, भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है !

    यह नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली कारपरोरेट एकाधिकार की साजिश है।

    सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है।

    160 बैंक पीएसपी बनेंगे डिजिटल तो सात लाख करोड़ से ज्यादा करेंसी चलन में कतई नहीं होंगी ,डिजिटल इंडिया के रणनीतिकारों का एक्शन प्लान यही है और इसी वजह से बाकायदा सुनियोजित तरीके से बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है।

    नोट वापस ले लिये गये हैं लेकिन नोट वापस करने की कोई योजना नहीं है।न नोट जरुरत के मुताबिक छापे जा रहे हैं।न कभी फिर छापे जाएंगे।

    पलाश विश्वास

    तीन दिन बैंक बंद होने पर बहुत शोर होने लगा है।बैंक लगातार खुले हों तो भी नकदी मिलने वाली नहीं है।जैसे एटीएम बंजर हैं वैसे बैंक भी बंजर बना दिये गये हैं।बैंकों के अफसर और कर्मचारी एक बहुत बड़ी साजिश के शिकार हो रहे हैं।उनका इस्तेमाल बैंकों को दिवालिया बनाकर डिजिटल बहाने सारे लेनदेन के निजीकरण कारपोरेट वर्चस्व के लिए हो रहा है।यह नस्ली नरसंहार है।

    अगले मार्च तक 160 बैंकों के डीजीटल लेनदेन के आधारकेंद्र पीएसपी बनाये जाने की तैयारी है और सुप्रीम कोर्ट की यह खुली अवमानना है कि सरकार 10 से 15 दिनों में नकदी सुलभ करने कोई इंतजाम करने जा रही है।यह सरासर धोखाधड़ी है।

    आम जनता के हाथ में नकदी कतई न रहे,पूरी कवायद इसीके लिए है ताकि गुलामी मुकम्मल स्थाई बंदोबस्त हो और राज मनुस्मृति का।मुकम्मल हिंदू राष्ट्र।

    ताकि खेती और कारोबार,उत्पादन और सेवाओं,उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार पर पूरीतरह कारपोरेट निंयत्रण हो।

    सारे नागरिक चूहों में तब्दील हैं और हैमलिन का वह जादूगर ईश्वर है जो नागरिक चूहों को इस देश की तमाम पवित्र नदियों में उनकी आस्था के मुताबिक विसर्जित करने जा रहा है।

    सात खून माफ है। सारे नरसंहार माफ हैं। वह ईश्वर है।

    पेटीएम जिओ आदि नकदी लेनदेन का निजी बंदोबस्त बैंकों के जरिये बैंकिंग को खत्म करने के लिए हो रहा है,यह सीधी सी बात अफसरों और कर्मचारियों की समझ में नहीं आ रही है तो राजनीतिक समीकरण की भाषा में अभ्यस्त राजनीति को क्या समझ में आने वाली है,जिसके लिए मौका के मुताबिक मुद्दे रोज बदल रहे हैं और वे मौसम मुर्गा के माफिक झूठे मौसम की बांग लगा रहे हैं।

    भारत को अमेरिका ने अपना रणनीतिक पार्टनर कानून बना लिया है और यह मामला नजरअंदाज हो गया है।निजीकरण विनिवेश और एकाधिकार के लिए वाया नोटबंदी जो डिजिटल चक्रव्यूह तैयार किया है नरसंहार विशेषज्ञों ने,उसे सिर्फ संसद में शोर मचाकर बदलने की किसी खुशफहमी में वे जाहिर है कि कतई नहीं है।

    वे जानबूझकर नौटंकी कर रहे हैं और कालाधन है तो सबसे ज्यादा इन्ही रंगबिरंगी पार्टियों के सिपाहसालारों का है और पकड़े जाने वाले हर नये पुराने नोट के साथ साफ राजनीतिक पहचान वैसे ही जुड़ी है जैसे आजाद भारत में हुए हर सौदे,घोटाले,भ्रष्टाचार के साथ सत्ता और राजनीति नत्थी  हैं।

    राजनेताओं की जान आफत में है और वे अपनी अपनी जान बचा रहे हैं।

    पर्दे की आड़ में नरसंहार के सौदे तय हो रहे हैं।

    नकदी का संकट कृत्तिम है ताकि अर्थव्यवस्था को कैशलैस बनाया जा सके।

    यह डिजिटल इंडिया का फंडा है।इसी वजह से बाजार में दशकों से चलन में रहे तमाम हाईवैल्यु नोट को रद्द करके आम जनता से क्रयशक्ति छीन ली गयी है और इस नोटबंदी कवायद का कालाधन से कोई मतलब नहीं है।

    हम आगाह करना चाहते हैं कि सारी कवायद संसदीय सर्वदलीय सहमति से हो रही है।

    सात लाख करोड़ से ज्यादा करेंसी चलन में कतई नहीं होंगी ,डिजिटल इंडिया के रणनीतिकारों का एक्शन प्लान यही है और इसी वजह से बाकायदा सुनियोजित तरीके से बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है।नोट वापस ले लिये गये हैं लेकिन नोट वापस करने की कोई योजना नहीं है।

    न नोट जरुरत के मुताबिक छापे जा रहे हैं।न छापे जाएंगे।

    सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है।

    यह बेलगाम नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली एकाधिकार की साजिश है।

    यह सारा खेल निराधार आधार के बूते किया जा रहा है और नोटबंदी का विरोध करने वाली राजनीति ने आधार योजना का किसी भी स्तर पर विरोध नहीं किया है।सारा केवाईसी आधार के जरिये है और नई तकनीक का इस्तेमाल भी इसी आधार मार्फत होना है।जिसके तहत बैंको को भी डिजिटल कवायद में जबरन शामिल किया जा रहा है और बैंकों के जरिये पेटीएम कारोबार का एकाधिकार वर्चस्व स्थापित हो रहा है।लेनदेन डिजिटल है लेकिन इस लेनदेन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

    नोटबंदी से पहले जो एटीेएम डेबिट क्रेडिट कार्ड के पासवर्ड चुराये गये,उसका गेटवे आधार नंबर है और अब सारा कारोबार आधार नंबर के मार्फत करने का मतलब बेहद खतरनाक है।इस डिजिटल अर्थतंत्र में रंगभेदी वर्चस्व कायम करने का स्थाई बंदोबस्त है और इसे लागू करने के लिए ही कालाधन निकालने का लक्ष्य बताया गया है जो दरअसल कालाधन पर सत्ता वर्ग का एकाधिकार का चाकचौबंद इंतजाम है।

    हर लेनदेन के साथ आधार नत्थी हो जाने का मतलब हर लेनदेन के साथ नागरिकों के बारे में सारी जानकारी लीक और हैक होना है और उस जानकारी को कौन कैसे इस्तेमाल करेगा,यह हम नहीं जानते।

    मसलन जनधन योजना के तहत जो खाते करोडो़ं के तादाद में खोले गये,सिर्फ डाक मार्फत चेकबुक न पहुंचने के काऱण उन खातों का पासबुक और चेकबुक बैंक कर्मचारियों के दखल में हैं,जिनका नोटबंदी संकट में कालाधन सफेद बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

    तो समझ लीजिये कि आधार जानकारियां सार्वजनिक हो जाने पर नागरिकों की जानमाल गोपनीयता की क्या गारंटी होगी।

    इसे खेल की तकनीक,योजना और आधार आथेंसिटी का मामला राजनेताओं को कितना समझ में आ रहा है ,कहना मुश्किल है।लेकिन नोटबंदी के खिलाफ शोरशराबे से कुछ हासिल नहीं होना है,यह तय है।

    अगले छह महीने तो क्या भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है तो डिजिटल दुनिया के बाहर के लोगों के लिए क्रयशक्ति शून्य है और इसका सीधा मतलब यह है कि रोजमर्रे की जिंदगी में उन्हें दाने दाने को मोहताज होना पड़ेगा।

    यह खुल्लमखुल्ला नरसंहार है और अंजाम भुखमरी है।सत्तावर्ग को भूख नहीं लगती।

    बहरहाल नोटबंदी के बाद सरकार जिस तरह डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही है, उसका असर दिखने भी लगा है। पिछले 1 महीने में ही डिजिटल पेमेंट में कई गुना का उछाल आया है और इसका सबसे ज्यादा फायदा ई-वॉलेट कंपनियों को हो रहा है।

    गौरतलब है कि पेटीेएम और जिओ ने खुलकर प्रधानमंत्री की छवि अपना कारोबार बढ़ाने के लिए किया है और उनके माडलिंग से इन कंपनियों के पौं बारह हैं।

    जाहिर है कि नोटबंदी के बाद एटीएम और बैंकों के बाहर की कतारें आम हो चली हैं। बैंकों और एटीएम से लाशें निकल रही है।नकदी नहीं निकलरही हैं। इसका सीधा फायदा पेटीएम को हो रहा है क्योंकि लोग डिजिटिल पेमेंट पर जोर दे रहे हैं।

    गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद 1 महीने में डिजिटल पेमेंट 6 गुना तक बढ़ गया है।कालाधन पर खामोशी बरत कर देश के सबसे बड़े कारपोरेट वकील ने बाहैसियत संघी वित्तमंत्री कालाधन पर जो बहुप्रचारित बयान जारी किया है उसका कोई संबंध काला धन से नहीं है।न उन्होंने नोटबंदी  मुहिम में निकल कालाधन का कोई ब्यौरा दिया है।उनने ग्यारह सूत्री सरकारी निर्णय की जो जानकारी दी है ,उसका एजडा हिंदुत्व का नस्ली नरसंहार यानी डिजिटल डिवाइड है जिसके मुताबिक डिजिटल बनाने के लिए अपनी खासमखास कंपनियों के कारोबार के लिए बढा़वा देना है।

    इसी के तहत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान रुपे कार्ड से लेनदेन 500 फीसदी से ज्यादा बढ़ा है। वहीं ई-वॉलेट से पेमेंट भी करीब 3 गुना हो गया है। इस दौरान यूपीआई से 15 करोड़ रुपये की लेनदेन हुआ जो 1 महीने पहले 2 करोड़ रुपये से भी कम था। वहीं यूएसएसडी से लेनदेन भी तेजी से बढ़ रहा है। प्वाइंट ऑफ सेल यानी पीओएस से शॉपिंग के लिए पेमेंट में भी 40 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। जानकारों का मानना है कि आगे डिजिटल पेमेंट की रफ्तार और बढ़ेगी।

    हालांकि सबी जानकार डिजिटल पेमेंट में सुरक्षा के खतरों को बहुत बड़ी बाधा मानते हैं। लेकिन सरकार और कंपनियों को आम जनता की जानमाल की कोई परवाह नहीं है और उनका का कहना है कि डिजिटल पेमेंट पूरी तरह सुरक्षित हैं। अगर थोड़े बहुत खतरे हैं तो उन्हें सुलझा लिया जाएगा।उन थोड़े बहुत खतरे से आगाह भी जनता को आगाह नहीं किया जा रहा है तो समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना बारी चार सौ बीस है।

    नोटबंदी के बाद सरकार भी डिजिटल पेमेंट को जमकर बढ़ावा दे रही है और अगर ज्यादा से ज्यादा लोग इसे अपनाते हैं तो इकोनॉमी को फायदा होगा।



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    हिंदुओं के डिजिटल नस्ली नरसंहार के खिलाफ संघ परिवार खामोश क्यों है?

    सवाल यह है करोडो़ं लोगों के साइबर अपराध के शिकार होते रहने का सच जानते हुए संघ परिवार की सरकार किसके हित में डिजिटल इंडिया के लिए देश में नकद लेनदेन सिरे से खत्म करने के लिए नोटबंदी के जरिये आम जनता की क्रयशक्ति छीनकर उन्हें भूखों मारने का इंतजाम कर रही है।

    क्या संघ परिवार की सरकार और फासिज्म का राजकाज संघ मुख्यालय से संचालित नहीं हैं?

    क्या संस्थागत फासीवादी किसी संगठन का राजनीतिक नेतृत्व संस्था के नियंत्रण से बाहर हो सकता है?

    मौजूदा नोटबंदी डिजिटल इंडिया आंदोलन भी संघ परिवार का मंडलविरोधी रामंदिर मार्का कमंडल आंदोलन है और इसका सीधा मतलब है बहुजनों का सफाया।

    भस्मासुर ही बना रहे हैं तो भगवान विष्णु कहां हैं?

    यह सारा तमाशा संघ परिवार का है।

    हिंदुत्व का एजंडा चूंकि नरसंहारी कारपोरेट एजंडा है।

    पलाश विश्वास

    संघ परिवार की पूंजी परंपरागत तौर पर धर्मप्राण आस्थावान हिंदुओं की आस्था है।हिंदुओं की सहिष्णुता,उदारता को घृणा और हिंसा में तब्दील करने की उसकी सत्ता राजनीति है और घृणा के इस जहरीले कारोबार को वह हिंदुत्व का एजंडा कहता है,जिसका हिंदुत्व से कोई लेना देना नही है और उसके हिंदुत्व के इस कारोबार का मकसद हिंदुओं का सर्वनाश है और कारपोरेट एकाधिकार नस्ली राजकाज है।

    नोटबंदी से पहले कालाधन की घोषणा करने पर पैतालीस फीसद का टैक्स और नोटबंदी के बाद पचास फीसद का टैक्स।सिर्फ पांच फीसद टैक्स की अतिरिक्त आय के लिए नोटबंदी कर्फ्यू का मकसद जाहिर है कि कालाधन निकालना कतई नहीं है।

    आर्थिक गतिविधियों के खिलाफ यह कर्फ्यू है।

    बहुजनों के वजूद के खिलाफ यह कर्फ्यू है।

    संघ समर्थक बनियों, सत्ता में भागीदार ओबीसी के खिलाफ यह कर्फ्यू है।

    यह संविधान के खिलाफ मनुस्मृति अभ्युत्थान है।

    मकसद डिजिटल नस्ली नरसंहार बजरिये कारपोरेट नस्ली एकाधिकार की अर्थव्यवस्था है।

    आज सुबह हमने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांच्यजन्य के ताजा में डिजिटल सुरक्षा को लेकर प्रकाशित मुख्य आलेख फेसबुक पर शेयर किया है।

    इस आलेख के मुताबिक आप इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, आपके पास मेल एकाउंट है, सोशल साइट्स पर एकाउंट है, मोबाइल में एप्स हैं- तो समझिए कि आप घर की चाहारदीवारी में रहते हुए भी सड़क पर ही खुले में ही गुजर-बसर कर रहे हैं।आलेख में खुलकर डिजिटल सुरक्षा की खामियों की चर्चा की गयी है।

    इस बीच डिजिटल हो जाने की राजकीय हिंदुत्व की कारपोरेट मुहिम जोर शोर से चल रही है। नजारा ये है के जिन्होंने कभी भी डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, ऑनलाइन पेमेंट के बारें में सुना तक नहीं था, वो आज डिजिटल होना सीख रहे हैं।जबकि नोटबंदी से पहले लगातार चार महीने तक एटीएम,डेबिट और क्रेडिट कार्ड के पिन चुराये जा रहे थे और यह सब क्यों हुआ ,कैसे हुआ,न सरकार के पास और न रिजर्व बैंक के पास इसका कोई जवाब अभीतक है।बत्तीस लाख से ज्यादा कार्ड तत्काल रद्द भी कर दिये गये।

    संघ परिवार के मुखपत्र के ताजा विशेष लेख में जो सवाल उठाये गये हैं,उसका लब्वोलुआब यही है कि  क्या हमारे पास डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इतना दुरूस्त है कि हम आसानी और सुरक्षित तरिके से डिजिटल हो सकते हैं।

    भारतीय बैंकों की तरफ से रोज खाताधारकों को संदेश मिल रहे हैंः

    अब अपनी जेब और पर्स में भर-भर के नोट डालने का जमाना चला गया। नोटों को छोड़िए और आ जाइए कार्ड्स पर, आ जाइए इंटरनेट पर, आ जाइए ई-वॉलेट पर। अब कैश नहीं बिना कैश के जिंदगी जीना सीखिए।

    लेनदेन से बेदखल बैंक अब संघी डिजिटल मुहिम में शामिल हैं।

    यह दिवालिया बना दिये गये के वजूद का सवाल भी है क्योंकि उनके पास नकदी नहीं है और कोी बैंक ग्राहकों का अपना पैसा बैंक किसी सूरत में लौटा नहीं सकता।

    गौरतलब है कि  पिछले तीन सालों में साइबर क्राइम 350 फीसदी बढे हैं।

    मनीं कंट्रोल के मुताबिक डिजिटल लेनदेन कम लागत के साथ इस्तेमाल में आसान है। इसके इस्तेमाल से रोजमर्रा के खर्च और निवेश में आसानी होगी। साथ ही पैसों के लेनदेन में तेजी आएगी और खर्च का रिकॉर्ड रखने में भी आसानी होगी। लेकिन साथ ही डिजिटल लेनदेन में गोपनीयता और सुरक्षा भी जरुरी होगी। डिजिटल लेनदेन रेलवे, एयरलाइन और बस की टिकट बुकिंग में मुमकिन है। वहीं टोल बूथ, रोजमर्रा के सामान की खरीदारी, टैक्सी और ऑटो का किराया, निवेश और बैंकिंग, टैक्स भुगतान, फीस भुगतान और बिल भुगतान में भी संभव है।


    डिजिटल लेनदेन के फायदे तो कई हैं, लेकिन साथ ही खतरे भी ज्यादा हैं। हम देख रहे है कि साल दर साल साइबर क्राइम को लेकर केसेस बढ़ते ही जा रहे है। डिजिटल लेनदेन में आदमी जालसाजी में आसानी से फंस जाता है और फर्जी ई-मेल के जरिए गोपनीय जानकारी, पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड नंबर जैसी जानकारी चुराई जाती है। ऑनलाइन शॉपिंग में ब्राउडर आपको फर्जी वेबसाइट पर ले जाता है और वो वेबसाइट आपकी गोपनीय जानकारी चुराती है। कभी ग्राहक और मर्चेंट्स के बीच हो रहे लेनदेन को हैक किया जाता है। हैकर लॉग इन और पासवर्ड की जानकारी चुराते हैं।


    तो पांचजन्य में पाठकों से सीधा सवाल किया गया हैःआप गूगल पर 'सर्च' करते हैं, पर क्या आप जानते हैं कि गूगल भी आपको सर्च करता है? एकाउंट बनाते समय मांगी गई जानकारियां आपने दी होंगी, पर यदि फेसबुक के पास वे जानकारियां भी हों जो आपने नहीं दी थीं, तो? आपके मेल आपकी प्रेषण सूची तक ही पहुंचते हैं या उसके और भी ठिकाने हैं? आपके व्हाट्सअप संदेश कौन-कौन पढ़ सकता है आपके मित्रों के अलावा? स्मार्टफोन में डाउनलोड एप्स क्या आपकी निजता के लिहाज से सुरक्षित हैं? क्या बड़ी-बड़ी इंटरनेट कंपनियां आपको मंजे हुए खुराफाती हैकरों से बचा सकती हैं... आखिर करोड़ों लोग साइबर अपराधों के शिकार हुए हैं। खतरे की संभावनाएं बहुत लंबी-चौड़ी हैं। पर डरिए मत, सजग रहिए। सजगता ही बचाव है।

    सवाल यह है करोडो़ं लोगों के साइबर अपराध के शिकार होते रहने का सच जानते हुए संघ परिवार की सरकार किसके हित में डिजिटल इंडिया के लिए देश में नकद लेनदेन सिरे से खत्म करने के लिए नोटबंदी के जरिये आम जनता की क्रयशक्ति छीनकर उन्हें भूखों मारने का इंतजाम कर रही है।

    गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद देश में आमदनी व खर्च में कमी आई है। एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि सबसे अधिक प्रभावित बिहार, झारखंड और ओडि़शा जैसे राज्य रहे हैं। लोकल सर्किल्स के सर्वेक्षण में देश के 220 जिलों के 15,000 लोगों की राय ली गई। 20 प्रतिशत ने कहा कि इस कदम के बाद उनकी आय प्रभावित हुई है, वहीं 48 प्रतिशत ने कहा कि नोटबंदी के बाद उनका खर्च घटा है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि लोगों को इस कदम से काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है।

    रिपोर्ट में कहा गया है, बैंकों और एटीएम में कतार में काफी समय गंवाने के बाद भी लोगों को आसानी से नकदी उपलब्ध नहीं हो रही है।

    बैंक दिवालिया हैं।बैंकों और एटीएम से लाशें निकलने लगी हैं।कालाधन का कहीं अता पता नहीं है।अब डिजिटल इंडिया की मंकी बातें ही सारेगामापा है।नजारा यह है कि  देश में डिजिटल भुगतान को बढावा देने के लिए एक टीवी चैनल व वेबसाइट शुरू करने के बाद देशव्यापी टोलफ्री हेल्पलाइन नंबर 14444 शुरू किया जाएगा। इस हेल्पलाइन का उद्देश्य लोगों को नकदीविहीन लेनदेन के प्रति शिक्षित करना तथा जरूरी मदद उपलब्ध कराना है।

    यह सेवा सप्ताह भर में शुरू होने की संभावना है। साफ्टवेयर सेवा कंपनियों के संगठन नासकाम के अध्यक्ष आर चंंद्रशेखर ने पीटीआई को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा, सरकार ने देशभर में जनता की मदद के लिए नासकाम की मदद मांगी थी।

    दूसरी ओर सूचना तकनीक के माध्यम से आईटी धमाके का बैंड बाजा डिजिटल इंडिया कारपोरेट मानोपाली नस्ली नरसंहार अश्वमेधी अभियान के मध्य ही बजने वाला है।अमेरिका ने भारत को उसके दुनियाभर के युद्ध में पार्टनर बना लिया है और इसके बदले में भारत की आईटी क्रांति की हवा निकालने की जुगत में है अमेरिका।

    ताजा खबरों के मुताबिक अमेरिका में नौकरी करने के इच्‍छुक भारतीयों की राह अब आसान नहीं रहने वाली है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने इस संबंध में एक बार फिर अपना कड़ा रुख दिखाया है। उन्‍होंने कहा है कि वे राष्‍ट्रपति का पद संभालते ही अपना पहला ऑर्डर वीजा के दुरुपयोग को रोकने के लिए देंगे। इसके चलते ही विदेशी लोग विभिन्‍न जॉब्‍स में अमेरिकियों का स्‍थान ले रहे हैं।

    ट्रंप ने चेतावनी दी कि अमेरिका में नौकरी करने आने वाले भारतीयों समेत सभी विदेशियों को उनके प्रशासन में कड़ी जांच से गुजरना होगा।

    संघ परिवार की सरकार कारपोरेट एकाधिकार कायम करके बहुसंख्य बहुजनों का नरसंहार अभियान चला रही है जो संघ परिवार के मनुस्मृति एजंडा से अलग नहीं है। साइबर सुरक्षा का सवाल उठाने वाले संघ परिवार ने नागरिकों की सुरक्षा और गोपनीयता के लिए सबसे खतरनाक आधार परियोजना का अभीतक किसी भी स्तर पर विरोध नहीं किया है।जबकि डिजिटल लेनदेन और बिना इंटरनेट डिजिटल लेनदेन में आधार नंबर अनिवार्य है जबकि आधार नंबर हैक या लीक होने की स्थिति में नागरिकों की जान माल को गंभीर खतरा है।इस आलेख में भी आधार योजना की कोई चर्चा नहीं है।

    अगर संघ परिवार को जमीनी हकीकत के बारे में मालूम है तो उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि डिजिटल लेनदेन से जो किसान और मेहनतकश और व्यापारी तबाह होंगे ,उनमें बहुसंख्य हिंदू हैं और बहुजन भी हैं।

    हिंदुओं के नस्ली नरसंहार के खिलाफ संघ परिवार खामोश क्यों है?

    क्या संघ परिवार का अपनी सरकार पर कोई नियंत्रण नहीं है?

    या फिर असलियत यह है कि बहुजनों को अब भी संघ परिवार हिंदू नहीं मानता है?

    इसका साफ मतलब यह निकलता है कि यह कारपोरेट  नरसंहार कार्यक्रम संघ परिवार का है।

    विजेता आर्यों ने इस देश की सांस्कृतिक एकीकरण के लिए वैदिकी नरसंहार के इतिहास के बावजूद सभी नस्ली समुदाओं को हिदुत्व में शामिल किया,जो हिंदुत्व की विरासत है।जिसमें अनार्य और द्रविड़,शक कुषाण अहम और तमान दूसरी नस्लें हिंदुत्व में समाहित हुई है।इसके विपरीत गौतम बुद्ध से पहले ब्राह्मण धर्म और गौतम बुद्ध के बाद मनुस्मृति के जरिये नस्ली एकाधिकार कायम करने की सत्ता संस्कृति रही है और वही रंगभेदी सत्ता संस्कृति संघ परिवार की है।

    हिंदुत्व का एजंडा वोट बैंक समीकरण के अलावा कुछ नहीं है।

    संघ परिवार का राममंदिर आंदोलन भी वोट बैंक समीकरण के अलावा कुछ नहीं है।ओबीसी आरक्षण के विरोध में आरक्षण विरोधी आंदोलन की पृष्ठभूमि में मंडल के खिलाफ कमंडल युग का प्रारंभ हुआ।दलितों और ओबीसी को हिंदुत्व की पैदल फौजें बनाने के लिए राम की सौगंध ली जाती रही है।

    मौजूदा नोटबंदी डिजिटल इंडिया आंदोलन भी संघ परिवार का मंडलविरोधी रामंदिर मार्का कमंडल आंदोलन है और इसका सीधा मतलब है बहुजनों का सफाया।

    साइबर सुरक्षा को लेकर वह सत्ता वर्ग को आगाह कर रहा है लेकिन आम नागरिकों और संघ परिवार के हिसाब से बहुसंख्य हिंदुओं और बहुजनों को इस अश्वमेधी नरसंहार से बचाने की उसकी कोई गरज नहीं है और न संघ परिवार इस पर कोई सार्वजनिक बहस चला रहा है और न सार्वजनिक तौर पर वह डिजिटल इंडिया सत्यानाशी कार्यक्रम का किसी भी स्तर पर विरोध कर रहा है।

    संघ परिवार के स्वदेशी आंदोलन का कहीं अता पता नहीं है जबकि खुदरा कारोबार खत्म है और छोटे और मंझौले व्यवसाय पर कारपोरेट एकाधिकार का डिजिटल स्थाई बंदोबस्त लागू हो गया है।

    इससे पहले खेती बेदखल है और उत्पादन प्रणाली तबाह है।

    देश के सारे साधन संसाधन विदेशी पूंजी के हवाले है।

    शेयर बाजार ग्लोबल इशारों के मुताबिक है।

    सेवाक्षेत्र से लेकर रक्षा और आंतरिक सुरक्षा भी बेदखल हैं।

    बैंक बीमा संचार उर्जा परिवहन रेलवे उड्डयन जहाजरानी परमाणु उर्जा निर्माण विनिर्माण बिजली पानी भोजन सौंदर्य प्रसाधन सिनेमा संस्कृति बाजार शिक्षा चिकित्सा सबकुछ विदेशी कंपनियों के हवाले हैं।

    सबकुछ विशुद्ध आयुर्वेदिक पतंजलि ब्रांड हैं।

    निजीकरण विनिवेश छंटनी बेदखली अत्याचार उत्पीड़न बलात्कार सुनामी की वैदिकी संस्कृति कारपोरेट है।

    यही संघ परिवार का रामराज्य है।

    रामराज्य है तो शंबूक की हत्या भी होनी है।

    नस्ली दुश्मनों का वध और अश्वमेध भी तय हैं।

    दरअसल वही हो रहा है और आस्था की वजह से हम इस अधर्म को धर्म मान रहे हैं।अपने ही नरसंहार के लिए उनकी पैदल सेना में हम शामिल हो रहे हैं।

    क्या संघ परिवार की सरकार और फासिज्म का राजकाज संघ मुख्यालय से संचालित नहीं है?

    क्या संस्थागत संगठन का राजनीतिक नेतृत्व संस्था के नियंत्रण से बाहर हो सकता है?

    क्या संघ परिवार का कोई प्रधानमंत्री कारपोरेट सुपरमाडल बन सकता है?

    क्या संघ परिवार भस्मासुर बनाने का कारखाना है?

    भस्मासुर ही बना रहे हैं तो भगवान विष्णु कहां हैं?

    यह सारा तमाशा संघ परिवार का है।

    हिंदुत्व का एजंडा चूंकि नरसंहारी कारपोरेट एजंडा है।

    भारतीयता का मतलब सिर्फ मुसलमान विरोध है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ पाकिस्तान और चीन के खिलाफ युद्धोन्माद है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ ग्लोबल हिंदुत्व है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ अमेरिका और इजराइल का रणनीतिक पार्टनर है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ रंगभेद,जाति व्यवस्था की असहिष्णुता और घृणा है?

    भारतीयता का मतलब समानता और न्याय का विरोध है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ निरंकुश बलात्कारी पितृसत्ता है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ सलवा जुड़ुम है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ दलितों का उत्पीड़न है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ सैन्य दमन है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ लोकतंत्र का निषेध है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ कानून का राज निषेध है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अपहरण है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ मानवाधिकार हनन है?

    भारतीयता का मतलब सिर्फ संविधान का दिन प्रतिदिन हत्या है?

    संघ परिवार की भारतीयता के ये तमाम रंगबरंगे आयाम हैं।

    फासिज्म का राजकाज नस्ली नरसंहार है।

    डिजिटल नरसंहार अब संघ परिवार का कारपोरेट एजंडा है।

    डिजिटल नरसंहार के लिए फासिज्म का यह कारोबार है।


    हम शुरु से संघ परिवार को हिंदुत्व के हितों के खिलाफ मानते रहे हैं और उनके हिंदुत्व के एजंडे को नस्ली कारपोरेट नरसंहारी एजंडा मानते रहे हैं।

    इस देश में बहुसंख्य आबादी हिंदुओं की है।

    संघ परिवार ब्राह्मण धर्म के मुताबिक मनुस्मृति शासन भारत के संविधान के बदले लागू करना चाहता है और विशुद्ध रक्त सिद्धांत के तहत जिनके बूते हिंदू इस देश में बहुसंख्य हैं,उन दलितों,पिछडो़ं और आदिवासियों को वह हिंदू मानने से इंकार करता रहा है।बहुजनों को हिंदू न माने तो दस फीसद से कम सवर्ण और मात्र तीन प्रतिशत ब्राह्मण अल्पसंख्यक होते हैं बहुजनों के मुकाबले और मुसलमानों के मुकाबले भी।

    पूर्वी बंगाल में दलितों की गिनती हिंदुओं में नहीं होती थी।इसलिए बंगाल में आजादी से पहले मुसलमान बहुमत रहा है और तीनों अंतरिम सरकारें मुसलमानों के नेतृत्व में बनी,जिनमें दलित भी शामिल थे।

    मनुस्मृति शासन के लक्ष्य से संघ परिवार ने बहुजनों को भी हिंदुत्व के भूगोल में शामिल कर लिया।यह उसका राजनीतिक समीकरण है।

    बहुजन अगर हिंदू न माने जाते तो भारत हिंदू राष्ट्र न हुआ रहता।

    यह जितना सच है ,उससे बड़ा सच यह है कि संघ परिवार का सारा कामकाज हिंदुओं के हितों से विश्वासघात का है।

    ठीक उसीतरह जैसे सर्वहारा हितों के खिलाफ वामपक्ष की राजनीति है।

    डिजिटल बैंकिंग के फायदे पर जानकारों का कहना है कि डिजिटल इंडिया के लिए करेंसी का डिजिटाइज्ड होना जरूरी है। नोट की जगह डिजिटल करेंसी में ट्रांजैक्शन आसान होता है। बदलते वक्त के साथ  बैंकिंग बदल रही है। डिजिटल बैंकिंग बेहद सुरक्षित है। अब *999# के जरिए आम आदमी भी डिजिटल बैंकिंग कर सकता है। *999# के जरिए सस्ते मोबाइल से भी बैंकिंग संभव। डिजिटल बैंकिंग के जरिए अब 24/7 बैंकिंग ट्रांजैक्शन मुमकिन है। ट्रांजैक्शन के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहना जरूरी नहीं है।

    बैंक सेविंग अकाउंट होल्डर को डेबिट कार्ड देते हैं। डेबिट कार्ड से एटीएम से पैसा निकालना और दुकानों पर भुगतान संभव है। डेबिट कार्ड से ऑनलाइन पेमेंट भी संभव है। डेबिट कार्ड चेक-बुक की तर्ज पर काम करता है। डेबिट कार्ड से किसी दूसरे अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करना मुमकिन है।

    डेबिट कार्ड नबंरों की अहमियत होती है। डेबिट कार्ड इस्तेमाल में 3 नंबर जरूरी होते हैं। ये हैं डेबिट कार्ड नबंर, सीवीवी और पिन नंबर। इनके बिना कोई ट्रांजैक्शन संभव नहीं होता। कार्ड नंबर में खाताधारक की सारी जानकारी छिपी होती है। वहीं पिन नंबर सीक्रेट नंबर होता है। पिन नंबर कार्डधारक याद रखता है। पिन नंबर किसी को बताना नहीं चाहिए। पिन नंबर ताले की चाबी की तरह है। जबकि सीवीवी नंबर कार्ड के पिछले हिस्से पर छपा होता है।

    कार्ड इस्तेमाल में कुछ एहतियात वरतने की जरूरत होती है। कार्ड से भुगतान अपने सामने ही करें। स्किमर डिवाइस से कार्ड की क्लोनिंग होने का खतरा रहता है। कार्ड अपने सामने ही स्वाइप करवाएं। कार्ड स्वाइप करते वक्त पिन नंबर डालना जरूरी होता है। भुगतान के वक्त अपना पिन नंबर खुद ही दर्ज करें।

    कैशलेस इकोनॉमी की ओर बढ़ रहे संघी कदमों में यूपीआई एक बड़ा गेम चेजर  साबित हो सकता है। बस, जरूरत है इसे समझने की और इस्तेमाल में लाने की। मनीकंट्रोल ने लजे बिजनेस स्कूल की सीईओ पूनम रुंगटा केहवाले स इस समझाने की कोशिश की हैः

    पूनम रुंगटा का कहना है कि यूपीआई का इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले  यूपीआई पर रजिस्ट्रेशन करना होता है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के लिए सबसे पहले अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से बैंक ऐप डाउनलोड करें और बैंक ऐप में यूपीआई का विकल्प चुनें। फिर अपना वर्चुअल एड्रेस बनाएं और वर्चुअल एड्रेस से बैंक अकाउंट लिंक करें।


    यूपीआई के जरिए ई-कॉमर्स शॉपिंग आसानी से की जाती है। इसके जरिए आप पेमेंट ऑपशंस में यूपीआई का विकल्प चुनें और अपना वर्चुअल एड्रेस और भुगतान की राशि भरें। वर्चुअल एड्रेस भरने के बाद मोबाइल पर पिन आएगा और पिन भरने के बाद खरीदारी की प्रकिया पूरी होती है।


    पूनम रुंगटा के मुताबिक यूपीआई के जरिए फंड ट्रांसफर आसानी से किया जा सकता है। फंड ट्रांसफर के लिए आप बैंक ऐप के यूपीआई सेक्शन में जाएं। जिसको पैसे ट्रांसफर करना है उसका वर्चुअल एड्रेस और राशि भरें। आप जैसे ही वर्चुअल एड्रेस भरेंगे उसके बाद मोबाइल पर पिन आएगा और मोबाइल पिन भरने के बाद आपके खाते से राशि ट्रांसफर हो जाएगी।


    इतना ही नहीं यूपीआई के जरिए टैक्सी का भुगतान भी किया जा सकता है। टैक्सी भुगतान के लिए टैक्सी सर्विस के ऐप पर जाएं और राशि भरने के बाद एड मनी का विकल्प चुनें। अपना वर्चुअल एड्रेस भरें और वर्चुअल एड्रेस भरने के बाद मोबाइल पर पिन आएगा। मोबाइल पिन भरने के बाद भुगतान हो जाएगा।


    सवालः आरबीआई के नए नियम के मुताबिक जल्दी कर्ज चुकाने पर कोई चार्ज नहीं लगेगा, क्या ये नियम डीएचएफएल पर भी लागू होगा? क्या होम लोन बंद कर देना चाहिए? कर्ज बंद करने पर किन बातों का ख्याल रखना चाहिए?


    पूनम रुंगटाः 80सी के तहत टैक्स छूट पाने के लिए अभी कर्ज बंद ना करें। कर्ज लेने के 6 महीने बाद ही लोन बंद कर सकते हैं। कर्ज बंद करने से सिबिल स्कोर पर असर नहीं होता है। कर्ज लेने के 6 महीने बाद लोन बंद करने पर प्रीपेमेंट चार्ज लगेगा।



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    ये हमारे तमाम नाकाम बेरोजगार बच्चे तन्हाई में  जीने मरने को अभिशप्त हैं।

    हम इस डिजिटल उपभोक्ता मुक्त बाजार का क्या करेंगे?

    पलाश विश्वास

    पिछले जाड़ों में भी इन दिनों शाम ढलने से पहले हम रोजाना मुंबई रोड स्थित एक्सप्रेस भवन के लिए रवाना हो जाते थे।देर रात घर वापस लौटते थे।यह शाम को घर से निकल जाना और देर रात वापस हो जाना करीब 36 साल तक चलता रहा है।उससे भी पहले 1973 से 1979 तक नैनीताल के मालरोड पर हमारी शाम बीतती थी और बर्फवारी हो या घमासान बारिश माल रोड में तल्ली मल्ली नैनीताल समाचार होकर देर रात तक हम दोस्तों के साथ होते थे।उससे भी पहले बचपन में हमारे लिए अकेले घिर जाने का कोई मौका नहीं था।

    हमें अपने दफ्तर से रिटायर हो जाने से पहले कभी तन्हाई का अहसास ही नहीं हुआ।हम हमेशा मित्रों से घिरे रहने वाले प्राणी रहे हैं।घर में सविताबाबू हैं और मेरा कंप्यूटर है।टीवी मैं बहुत कम देख पाता हूं।

    ऐसी घमासान तन्हाई होती है जिंदगी में छह सात महीने में इसका अहसास खूब हो गया है।मैंने बूढ़ाते हुए भी बचपन का दामन कसकर पकड़ा हुआ था और डीएसबी के मेरे ठहाकों का सिलसिला एक्सप्रेस भवन तक जारी रहा है।पिछले छह सात महीने में मैं एकबार भी ठहाका लगा नहीं सका,खुलकर खिलखिला नहीं सका।

    हम नहीं जानते कि इस देश में हमारे राष्ट्रीय नेता खुलकर कभी ठहाके लगाते भी हैं या नहीं या वे हंसते भी हैं या नहीं।

    कामरेड ज्योति बसु हंसते नहीं थे,यह किस्सा मशहूर है।

    हालांकि ममता दीदी मुख्यमंत्री बनने के बाद मुस्कुराने भी लगी हैं।

    डा.मनमोहन सिंह को हमने कभी हंसते हुए नहीं देखा।

    बाकी लोग तो चीखते या दहाड़ते नजर आते हैं।

    जो लोग हंस नहीं सकते,उन्हें दूसरों की हंसी की क्या परवाह होगी।

    राजनीति अब आम जनता की हंसी छीन रही है।

    राजनीति को सिर्फ आम लोगों की चीखों में अपनी जीत नजर आती है।

    इस मुक्त बाजार में जिंदगी की मुस्कान सिरे से गायब है।हम नहीं जानते कि कुल कितने लोगों की इसकी परवाह है।

    नोटबंदी से लोग कालाधन निकलने की उम्मीद में थे।लोगों को लगा कालाधन वाले बुरी तरह फंसे हैं और आगे सावन ही सावन है।उन्हें लगा कि अब क्रांति हो ही गयी है।उन्हें लगा ऐसा साहसी और ईमानदार छप्पन इंच का सीना इतिहास में कही दर्ज नहीं हुआ।

    पढ़े लिखे मर्दों को सबस मजा इस बात को लेकर आया कि घर की महिलाओं का खजाना सार्वजनिक हो गया।

    किसी ने नहीं सोचा कि घर में कैद इन औरतों को उनके श्रम और निष्ठा के बदले में हम कितनी आजादी और कितनी खुशी देते हैं।

    ये वे औरते हैं जो आस पड़ोस के हाट बाजार में शौक से जाती हैं और एक एक पैसे के लिए मोलभाव करती हैं।यही मोलभाव उनका सार्वजनिक संवाद है।आजादी है।

    औरतों की शापिंग के किस्से अलग हैं।

    जिनमें हम उनकी हंसी,उनकी आजादी और उनके संवाद देखते नहीं हैं।

    नोटबंदी ने इस देश में अपने घर में कैद करोड़ों स्त्रियों की खुशी और आजादी छीन ली है।डिजिटल लेनदेन में संवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।

    मैंने छत्तीस साल तक पेशेवर नौकरी की है तो सिर्फ संवादहीन हो जाने से मेरा यह हाल है।

    अचानक बूढ़ा हो गया हूं।बूढाने की उम्र भी हो चुकी है,जाहिर है।जबकि मैं सामाजिक गतिविधियों में बचपन से अपने पिता से नत्थी रहा हूं।पत्ररकारिता को भी मैंने सामाजिक सक्रियता बतौर जिया है।यह न नौकरी रही है न यह मेरा कैरियर है।मेरे साथ काम करने वाले जानते हैं कि काम को मैंने कभी बोझ नहीं समझा।अपनी मौज में काम करने की मेरी आदत पुरानी है।वह मौज खत्म है।

    बेरोजगारी और शून्य आय की स्थितियों का सामना करते करते मैं सचमुच बूढ़ा हो गया हूं।मैं अपने आस पास तमाम लड़के लड़कियों को देखता हूं जो हमारी तरह झुंड में चलते हैं।हमारे साथ लड़कियां नहीं होती थीं।लड़कियों का झुंड अलग होता था। हालांकि स्कूल कालेज में हमारे साथ लड़कियां जरुर होती थीं,लेकिन उनसे संवाद की कोई स्थिति नहीं बन पाती थी।

    देश ने अगर सचमुच तरक्की की है तो मेरे नजरिये से यह तरक्की आज की लड़कियों का अपने इर्द गिर्द चहारदीवारी तोड़ना है और हर क्षेत्र में उनकी सशक्त और सार्थक हिस्सेदारी है।

    हम लोगों ने छात्र जीवन में कभी कैरियर नौकरी के बारे में सोचा नहीं था।हम पत्रकारिता,साहित्य और रंगकर्म के रंगों से रंगे हुए थे और हमें कुछ सोचने की फुरसत ही नहीं थी।हम कभी भी कहीं भी गिरदा की तरह झोला उठाकर चल देने की तैयारी में रहते थे।जिनका पत्रकारिता,साहित्य या रंगकर्म से नाता नहीं था,वे भी सूचना और जानकारी की कमी के बावजूद बुनियादी मुद्दों और ज्वलंत समस्याओं से जूझते थे।वे भी हमारी तरह बदलाव के ख्वाब देखते थे और देशभर में वे थे।जिनसे फेसबुक के बिना,मोबाइल के बिना हम तमाम लोगों का निरंतर संवाद जारी रहता था।

    आज भी सामाजिक सरोकार और बुनियादी मुद्दों और ज्वलंत समस्याओं से आमना सामना करने वाले छात्र कम नहीं हैं बल्कि उनके साथ बेहद सक्रिय छात्राओं की बहुत बड़ी संख्या हैरतअंगेज हैं।

    फिरभी ज्यादातर छात्र छात्राएं कैरियर और नौकरी को लेकर रात दिन बिजी हैं। तमाम परीक्षाओं प्रतियोगिताओं की तैयारी उनकी दिनचर्या है।उन्हें हंसने,सोचने या ख्वाब देखने की फुरसत नहीं है।उनका बचपन भी हमारे बचपन जैसा आजाद नहीं है।

    फिरभी हमारे समय की तुलना में इस वक्त सैकड़ों गुणा छात्र छात्राएं कैरियर और नौकरी में कामयाबी के ख्वाब देखते हैं हालांकि बदलाव के ख्वाब भी वे देखते हैं।

    पूरे छत्तीस साल पेशेवर पत्रकारिता में बिताने के बाद इन्हीं छह महीने की बेरोजगारी से इतनी तन्हाई है तो इन युवाजनों की बेरोजगारी की तन्हाई की सोचकर मैं भीतर से दहल जाता हूं।

    ये हमारे ही बच्चे हैं।

    ये ही हमारे भविष्य के निर्माता और उत्तराधिकारी हैं।

    सबसे खतरनाक बात यह है कि सत्ता ने उनकी हंसी छीन ली है।

    कैंपस में और कैंपस के बाहर हम उन्हें इस देश में उनकी मेधा और योग्यता के मुताबिक रोजगार और आजीविका न दे सकें,तो तरक्की का क्या मायने है,यह हमारी समझ से बाहर है।

    ये बच्चे हमसे कहीं ज्यादा समझदार भी हैं और लगता नहीं है कि इनमें रोमानियत का वह जज्बा है,जो हम लोगों में था।हमारे वक्त जो प्रेम करते थे वे नापतौल कर गणित लगाकर प्रेम नहीं करते थे।अब प्रेम हो या विवाह,उसके लिए कैरियर नौकरी या व्यवसाय में कामयाबी बेहद जरुरी है।

    कामयाब न हुए तो इन युवाजनों की जिंदगी में न दोस्ती संभव है,न प्रेम की कोई संभावना है और न विवाह या पारिवारिक जीवन की।

    पहली नजर में मुहब्बत या आंखों आंखों में प्यार अब मुश्किल ही है।

    प्यार और विवाह हो जाये तो दांपत्य मुश्किल है।

    मुक्तबाजार में जरुरतें बेहिसाब हैं और उसके मुताबिक न आजीविका है और न रोजगार।क्रयशक्ति के लिए अपराध बढ़ रहे हैं।घरेलू हिंसा बढ़ रही है।घृणा,ईर्षा का महोत्सव है।गला काट प्रतियोगिता है।

    हंसी गायब है।खुशी सिरे से गायब है।

    कहीं कोई ठहाका नहीं लगा रहा है।

    कही कोई खिलखिला नहीं रहा है।

    कहीं कोई हंस नहीं रहा है।

    कही कोई मुस्कुरा नहीं रहा है।

    घर भी अब बाजार है।

    संबंधों के लिए भी क्रयशक्ति अनिवार्यहै।

    ये हमारे तमाम नाकाम बेरोजगार बच्चे तन्हाई में  जीने मरने को अभिशप्त हैं।

    हम इस डिजिटल उपभोक्ता मुक्त बाजार का क्या करेंगे?

    गौरतलब है कि हमारे ये काबिल पढ़े लिखे बच्चे असंगठित क्षेत्र के मजदूर य दिनभर की दिहाड़ी कमाने वाले मेहनतकश लोग नहीं हैं।

    मुश्किल यह है कि जिन बच्चों को लाड़ प्यार से सबकुछ दांव पर लगाकर हम नौकरी और कैरियर की दौड़ में रेस का घोड़ा बना रहे हैं,वे बड़ी बड़ी डिग्रियां,डिप्लोमा हासिल करके अपनी मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद बहुत तेजी से असंगठित मजदूरों के हुजूम में शामिल होते जा रहे हैं।

    मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद उनके लिए कहीं कोई अवसर नही हैं।

    मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद उनके लिए कही न रोजगार है और न आजीविका है।

    मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद वे नौकरी या कैरियर शुरु करने से पहले ही हमारी तरह रिटायर हैं।

    निजीकरण,उदारीकरण और ग्लोबीकरण का नतीजा यह बेरोजगारी है।

    विनिवेश और अबाध पूंजी प्रवाह,संसाधनों की खुली नीलामी का यह नतीजा है।

    कारपोरेट अर्थव्यवस्था का यह नतीजा है।

    मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था का हमने पिछले पच्चीस सालों के दौरान किसीभी स्तर पर विरोध नहीं किया है,उसका यही नतीजा है।

    हमें उत्पादन प्रणाली के ध्वस्त हो जाने की कोई परवाह नहीं थी,जिसका यह नतीजा है।

    हमने जंगलों और खेतों में हो रहे लगातार बेदखली और नरसंहारों का कभी विरोध नहीं किया है,जिसका यह नतीजा है।

    हमने निजता और गोपनीयता,स्वतंत्रता,संप्रभुता और अपने नागिरक अधिकारों और मौलिक अधिकारों को बचाने के लिए कोई हरकत नहीं की है,जिसका यह नतीजा है।

    अब जंगलों और खेतों,चायबागानों और कल कारखानों के बाद बैंकों और एटीएम से लाशें निकलने लगी हैं।फिरभी हम खामोश हैं।

    अब डिजिटल लेनदेन के लिए हम अपनी आंखों की पुतलियों की तस्वीर और अपनी उंगलियों की छाप न जाने किसको किसको कितनी संख्या में बांटने को तैयार हैं।

    डिजिटल लेनदेन का आधार आधार निराधार है।

    हम खुशी खुशी कैशलैस फेसलैस इकानामी चुन रहे हैं।

    हमारी इकोनामी में हमारी जान पहचान का कोई नहीं होगा।

    हमारी इकोनामी में किसी मनुष्य का चेहरा नहीं होगा।

    हम ब्रांड खरीदेंगे और बाजार में कंपनी राज होगा।

    हमारे जो बच्चे रोजगार और आजीविका के लिए खुदरा बाजार पर निर्भर हैं,हमने उन्हें रातोंरात कबंध बना दिया है।

    हाट बाजार के तमाम लोग अब कबंध हैं।

    खेतों से लेकर बैंकों तक जो अंतहीन मृत्यु जुलूस है,वही अब भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था का रोजनामचा है।

    2009 के लोकसभा के चुनाव से पहले हम गुजरात गये थे।गांधीग्राम से वापसी के रास्ते अमदाबाद से लेकर कोलकाता तक ट्रेनों में हमने उन मजदूरों को भारी तादाद में घर लौटते देखा जो वोट डालने घर लौट रहे थे।

    2014 के चुनाव में भी मजदूर दूसरे राज्यों से वोट डालने,मोदी को चुनने ट्रेनों में भर भर कर घर लौटे।राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी ऐसा होता रहा है।

    इसबार फिलहाल बंगाल बिहार में वोट नहीं है।यूपी पंजाब उत्तराखंड में चुनाव होने वाले हैं,मौजूदा हालात में कब चुनाव होंगे,पता नहीं है।लेकिन ट्रेनों में लदकर  देश के तमाम महानगरों और औद्योगिक कारोबारी क्षेत्रों से असंगठित क्षेत्र के मजदूर घर लौट रहे हैं क्योंकि करोडो़ं की तादाद में वे नोटबंदी की वजह से, कैसलैस पेसलैस इकोनामी की वजह से बेरोजगार हो गये हैं।

    हमने पिछले दशक के दौरान देश में जहां भी गये,आते जाते ट्रेनों में हजारों की तादाद में बंगाल बिहार यूपी के तमाम बच्चों को नौकरी और आजीविका के लिए भागते देखा है।वह तादाद सरकारी नौकरियां लगभग खत्म हो जाने की वजह से अबतक दस बीस गुणा ज्यादा है।इनमें बंगाल के  मालदह मुर्शिदाबाद,नदिया,,24 परगना जैसे गरीब इलाकों के बच्चे जितने हैं,हुगली हावड़ा मेदिनीपुर वर्दवान जैसे खुशहाल जिलों के बच्चे उनसे कही कम नहीं हैं।

    नोटबंदी का महीना बीतते न बीतते वे तमाम हाथ कटे पांव कटे कंबंध बच्चे सर से पांव तक लहूलुहान बच्चे घर लौट चुके हैं या लौट रहे हैं।

    ये बच्चे भी आपके और हमारे बच्चे हैं।

    नागरिकों की जान माल इस कैशलैस फेसलैस आधार निराधार इकोनामी में कितनी सुरक्षित है,किसी को कोई परवाह नहीं है।

    हमने हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांच्यजन्य के ताजा में डिजिटल सुरक्षा को लेकर प्रकाशित मुख्य आलेख फेसबुक पर शेयर किया है।

    इस आलेख के मुताबिक आप इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, आपके पास मेल एकाउंट है, सोशल साइट्स पर एकाउंट है, मोबाइल में एप्स हैं- तो समझिए कि आप घर की चाहारदीवारी में रहते हुए भी सड़क पर ही खुले में ही गुजर-बसर कर रहे हैं।आलेख में खुलकर डिजिटल सुरक्षा की खामियों की चर्चा की गयी है।

    नोटबंदी से पहले लगातार चार महीने तक एटीएम,डेबिट और क्रेडिट कार्ड के पिन चुराये जा रहे थे और यह सब क्यों हुआ ,कैसे हुआ,न सरकार के पास और न रिजर्व बैंक के पास इसका कोई जवाब अभीतक है।बत्तीस लाख से ज्यादा कार्ड तत्काल रद्द भी कर दिये गये।

    आज की ताजा खबर वाशिंगटन पोस्ट के हवाले से है।हैकर योद्धाओं के अंतरराष्ट्रीय संगठन लीजन ने राहुल गांधी ,विजय माल्या,बरखा दत्त और रवीश कुमार के ट्विटर एकाउंट का पासवर्ड तोड़कर उनपर कब्जी कर लिया।इस हैकर योद्धा संगठन का दावा है कि उसने भारत में चालीस हजार से ज्यादा संस्थाओं,प्रतिष्ठानों और निजी कंप्यूटर सर्वरों में मौजूद तमाम तथ्य और जानकारियां हैक कर ली है और इनमें अपोलो अस्पताल समूह से लेकर भारत की संसद तक शामिल है।

    मीडिया के मुताबिक हाल के दिनों में पांच हाई प्रोफाइल ट्विटर अकाउंट हैक करने वाले ग्रुप का कहना है कि उसका अगला निशाना sansad.nic.inहै जो भारत के सरकारी कर्मचारियों को ईमेल सर्विस मुहैया कराती है. लीजन (Legion) नाम के इस ग्रुप के एक सदस्य ने यह भी दावा किया है कि उसकी पहुंच ऐसे सभी सर्वर्स तक हो गई है. इनमें अपोलो जैसे मशहूर अस्पताल भी शामिल हैं जहां तमिलनाडु की सीएम जयललिता का निधन हुआ था. लीजन इस वजह ने इन सर्वर्स का डाटा रिलीज नहीं कर रहा है क्योंकि ऐसा करने से देश में अफरातफरी मचने की आशंका है. इन हैकरों का यह भी दावा है कि भारत का डिजिटल बैंकिंग सिस्टम आसानी से साइबर हमले का शिकार हो सकता है.

    लीजन के इस दावे के बाद देश की साइबर सिक्योरिटीको लेकर गंभीर होना लाजिमी है. इस ग्रुप ने पिछले दिनों इंडियन नेशनल कांग्रेस, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, बिजनेसमैन विजय माल्या, वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त और रवीश कुमार के ट्विटर अकाउंट हैक कर लिए थे. इससे पहले देश के एटीएम नेटवर्क के जरिये करीब 32 लाख डेबिट कार्ड हैक हुए थे. केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में हैकिंग की बड़ी घटनाएं इस साल सामने आई हैं. फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, गूगल के सुंदर पिचाई और ट्विटर के सीईओ जैक दोरजी के सोशल मीडिया अकाउंट हैक हुए थे.

    संघ परिवार के मुखपत्र के ताजा विशेष लेख में जो सवाल उठाये गये हैं,उसका लब्वोलुआब यही है कि  क्या हमारे पास डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इतना दुरूस्त है कि हम आसानी और सुरक्षित तरिके से डिजिटल हो सकते हैं।

    इस बारे में हम सिलसिलेवार लिख चुके हैं।

    अब एचएल दुसाध ने भी लिखा हैः

    खुद संघ उठा रहा है :कैशलेस व्यवस्था की सुरक्षा पर सवाल

    पीएम मोदी के कैशलेस अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को लेकर खुद संघ अब सवाल खड़ा करने लगा है.उसके मुखपत्र पांचजन्य ने अपने ताजे अंक के आवरण कथा में कैशलेस अर्थव्यवस्था की राह में सबसे बड़ी समस्या पेमेंट मैकेनिज्म की सुरक्षा बताया है.उसके हिसाब से भारत में इनका कोई अपना कोई सर्वर नहीं है ,सारा डाटा विदेशी सर्वर में जाता है इसलिए डाटा चोरी होने और निजता हनन की सम्भावना ज्यादा है.सीमा पार आतंकी अड्डों और सीमा के भीतर कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक सरीखे कदमों के बाद भारत पर साइबर हमले का खतरा गहराते जा रहा है.अब युद्ध सीमा पर नहीं,बल्कि घरों के अन्दर लड़े जा रहे हैं,जो कई बार हथियारबंद युद्धों से ज्यादा खतरनाक और नुकसान पहुचाने वाले साबित होते हैं.'

    संघ की भांति ही उसके आनुषांगिक संगठन भारतीय मजदुर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने भी कैशलेस अर्थव्यस्था की खामियों की ओर इशारा किया है.हद तो दैनिक जागरण के उप संपादक राजीव सचान ने किये है.सचान साहब शुरू में नोटबंदी के फैसले की खूब तरफदारी किये,पर शायद अब उनका धैर्य जवाब दे गया है.इसिलए आज के दैनिक जागरण में 'शेर की सवारी का सबक'शीर्षक से लेख लिखकर मोदी के नोटबंदी के फैसले को प्रायः विफल करार दे दिया है.बहरहाल खुद संघ से जुड़े लोग जिस तरह नोटबंदी के फैसले की खामियां गिनाने लगे हैं,आपलोगों में से कई मित्र शायद यह मान कर चल रहे होंगे कि नोटबंदी से यूपी का चुनाव मोदी के लिए वाटर लू साबित हो सकता है ,पर मैं इससे सहमत नहीं हूँ.इसीलिए कहता हूँ मोदी की नाभि में मारो सामाजिक न्याय का तीर.

    The Indian Express की Computer hacking Legion के लिए कहानी चित्र

    Legion cyber-attack: Next dump is sansad.nic.in, say hackers

    The Indian Express-11 घंटे पहले

    Barkha Dutt hacked, Barkha Dutt Twitter, Legion, Legion Hacking, Legion Hacked, Rahul Gandhi, Barkha Dutt hacking: Legion say they have ...

    Legion hackers: Who are they and how they are hacking Indian ...

    India Today-12/12/2016

    Hacker group Legion calls Indian banking system deeply flawed

    Economic Times-11 घंटे पहले

    Legion says it will now hack government website sansad.nic.in

    International Business Times, India Edition-7 घंटे पहले

    The man hacking India's rich and powerful talks motives, music ...

    अत्यधिक उल्लिखित-Washington Post-11/12/2016

    Indian banks flawed, have been hacked several times: Legion

    गहरा-Business Standard-7 घंटे पहले

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    नोटबंदी से बैंकों का काम तमाम और अब राज्यों का खजाना खाली

    #NarcissismWikipedia

    #StatesDeprivedofRevenue

    #LongLivetheKingPeoplemustDie

    भारत की जनता की चुनी हुई सरकार पगला गयी है और यह किसी आत्ममुग्ध पागल तानाशाह का राजकाज है।

    न संविधान है।न लोकतंत्र है।न कानून का राज है।न संसदीय प्रणाली है।न स्वतंत्रता है।न संप्रभुता है।न अवसर है।ऩ आजीविका है न रोजगार।न समता है न न्याय है।न सहिष्णुता है और न उदारता है।बहुप्रतचारित विविधता और बहुलता भी सिरे से गायब हैं नरसंहार संस्कृति में।सिर्फ घृणा और हिंसा का राजकाज।

    अब यह देश को माफिया गिरोह की तरह टुकड़ा टुकडा़ बांट करके तबाह करने की राजनीति है।यह देश मृत्यु उपत्यका ही नहीं गैस चैंबर है।दम तोड़ रहे हैं लोग।लाशों से घिरे हुए हैं लोग लेकिन इस तिलिस्म का अंध राष्ट्रवाद कुछ और है।


    पलाश विश्वास

    इस देश को माफिया गिरोह की तरह टुकड़ा टुकडा़ बांट करके तबाह करने की राजनीति है।यह माफियाराज है।ग्रीक मिथकों के राजा नरसिस का राज है यह।

    राजा नरसिस को जानने के लिए पढ़ेंः#NarcissismWikipedia

    हम ग्रीक त्रासदी में आत्ममुग्ध अहंकारी  निरंकुश तानाशाह के बलिप्रदत्त प्रजाजन हैं तो हम ग्रीक अर्थव्वस्था की त्रासदी को भी मौज मस्ती में जी रहे हैं।

    मुझे शुरु से ही यह कहने में कोई हिचक नहीं हुई कि मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था का अश्वमेधी नस्ली नरसंहारी अभियान है।

    यह मैंने लगातार 1991 से ही सार्वजनिक सभाओं,सम्मेलनों,यूट्यूब पर कहा है और लिखा है।इसी वजह से कारपोरेट मीडिया की काली सूची में मैं हमेशा के लिए दर्ज हो गया और इसका मुझे कोई अफसोस नहीं है।

    मैं जब अमेरिका से सावधान लिख रहा था पहले खाड़ी युद्ध से ही,तब भी प्रबुद्धजनों को लगा कि यह बकवास है।हमने तो सृजन से छुट्टी ले ली है,सृजनशील रचनाकारों ने समाज को अपनी प्रतिष्ठा और पुरस्कारों के बदले दिया क्या है।

    नोटबंदी की शुरुआत से ही हम लिखते रहे हैं कि कालाधन बहाना है,कारपोरेट एकाधिकार के लिए कृषि के बाद व्यवसाय से भी आम जनता और खासतौर पर बहुजनों को बेदखल करके सत्तावर्ग का नस्ली वर्चस्व का यह हिंदुत्व का एजंडा है, जिसके लिए असली मकसद कैशलैस इंडिया के जरिये देश में फिर कंपनी राज बहाल करना है।

    डिजिटल इंडिया का सीधा मतलब है अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली का विध्वंस और सत्तावर्ग से बाहर मेहनतकशों,बहुजनों और आम जनता का नस्ली नरसंहार।

    नोटबंदी के बाद लगातार भारतीय बैंकों के अफसरों और कर्मचारियों से मेरी लगभग रोजाना बातचीत होती रही है।बैंकों को जानबूझकर दिवालिया बनाने और नानबैंकिंग कारपोरेट कंपनियों के हवाले करेंसी सौंपने के बारे में मैं वर्षों से लिख रहा हूं।नोटबंदी ने बैंकों में लोगों की आस्था खत्म कर दी है।

    डा.अमर्त्यसेन,कौशिक बसु,अभिरुप सरकार जैसे तमाम अर्थशास्त्री चेता चुके हैं।दीपक पारेख,अरुंधती भट्टाचार्य और एब विमल जालान भी नोटबंदी पर बोलने लगे हैं और बैंकों की समस्याओं का खुलासा करने लगे हैं।

    हम कोई अर्थशास्त्री नहीं हैं और न हम फिल्मस्टार हैं कि आप हमारी बात गौर से सुनेंगे।हम बैंकों के तमाम मित्रों को आगाह करते रहे हैं कि बैंकों को दिवालिया बनाकर उन तमाम बैंक अफसरों और कर्मचारियों का कत्लेआम है यह नोटबंदी।

    अब बैंकों के घाटे का हजारों करोड़ के आंकड़े आने लगे हैं।लोग अब अपनी नौकरियां बचा लें,बैंक तो बचेंगे नहीं।मसलन

    Public sector banks post net loss of Rs 17993 crore in last

    Economic Times

    Over 2000 Odisha cooperative banks incur losses

    India Today

    Sensex slips into red, bank, telecom lead losses

    Daily News & Analysis

    हमने जीवन बीमा निगम और भारतीय स्टेट बैंक के सत्यानाश का ब्यौरा पिछले बीस साल में बांग्ला,हिंदी और अंग्रेजी में सैकड़ों बार दिया है।

    आप हमें पढ़ने की तकलीफ नहीं उठाते।फेसबुक पर हमें लाइक भले ही कर दें तो शेयर नहीं करते।हमारे ब्लाग आप पढ़ते नहीं।अखबार हमें छापते नहीं हैं।

    हम क्या करें,हमारी समझ से बाहर है।

    लिखने के दौरान पोस्ट करने से पहले एक एक लाइन पोस्ट करता हूं कि आपकी कोई प्रतिक्रिया मिल जाये तो ज्यादा जानकारी दे सकता हूं।जो कभी नहीं होता।

    पोस्टआफिस और भारतीय स्टेट बैंक का बैंड बाजा बज गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था के नाम पर बचेगा सिर्फ भालुओं और सांढ़ों का सर्कस शेयर बाजार।

    बहराहाल नोटबंदी के पहले दिनेसे,हम शुरु से कह लिख रहे हैं कि भारत की जनता की चुनी हुई सरकार पगला गयी है और यह किसी आत्ममुग्ध पागल तानाशाह का राजकाज है।

    न संविधान है।न लोकतंत्र है।न कानून का राज है।न संसदीय प्रणाली है।न स्वतंत्रता है।न संप्रभुता है।न अवसर है।ऩ आजीविका है न रोजगार।न समता है न न्याय है।न सहिष्णुता है और न उदारता है।बहुप्रतचारित विविधता और बहुलता भी सिरे से गायब हैं नरसंहार संस्कृति में।सिर्फ घृणा और हिंसा का राजकाज।

    अब यह देश को माफिया गिरोह की तरह टुकड़ा टुकडा़ बांट करके तबाह करने की राजनीति है।यह देश मृत्यु उपत्यका ही नहीं गैस चैंबर है।दम तोड़ रहे हैं लोग।लाशों से घिरे हुए हैं लोग लेकिन इस तिलिस्म का अंध राष्ट्रवाद कुछ और है।

    राज्यों का राजस्व खत्म हुआ जा रहा है।

    नोटबंदी के बाद राज्यों का राजस्व आधा हो गया है।

    जीएसटी पर सर्वदलीय सहमति है।

    डीटीसी पर सर्वदलीय सहमति है।

    कर सुधार पर सर्वदलीय सहमति है।

    निजीकरण विनिवेश अबाध पूंजी पर सर्वदलीय सहमति है।

    कंपनी राज पर सर्वदलीय सहमति है।

    बिल्डर माफिया प्रोमोटर राज पर सर्वदलीय सिंडिकेट सहमति है।

    सैन्यदमन और सलवा जुड़ुम पर सर्वदलीय सहमति है।

    शोरशराबे की नौटंकी संसदीय प्रणाली है।

    सुधारों पर सर्वदलीय सहमति है।

    राज्य सरकारों और वहां सत्ता पर काबिज ओवरड्राप्ट पैकेज सत्ता के क्षत्रपों को कोई फिक्र नहीं है।उन्हें या कुनबा पालना है या उन्हें कैडर समृद्धि की परवाह है।मूर्तियां गढ़नी हैं।आम जनता किस खेत की मूली है।मूली का जबाव फिर गाजर है।

    रोजगार नहीं है तो रोजगार के अवसर नहीं हैं और न रोजगार सृजन है।सिर्फ अंतहीन बेदखली है।अंतहीन विस्थापन है।अंतहीन पलायन है।वोट हैं,लेकिन नागरिक मानवाधिकार नहीं है।नागरिकता भी नहीं है।वोट हैं लेकिन मनुष्य नहीं है।

    जीेएसटी लागू होने के बाद राज्य भारतीय बैंकों की तरह दिवालिया होने वाले हैं।अब कश्मीर और तमिलनाडु हमारे सामने हैं,जहां राजकाज केंद्र के पैसे से चलता रहा है।तमिलनाडु का मुख्यमंत्री चाहे कोई हो,केंद्र की सत्ता से नत्थी होना उसकी अनिवार्यता है।नये राज्यों का हाल यही होना है।उत्तराखंड,झारखंड और छत्तीसगढ़ समृद्ध हैं तो वहां सबसे ज्यादा लूटखसोट है।उनकी अकूत प्राकृतिक संपदा की खुली लूट है और जनता दाने दाने को मोहताज बेरोजगार या बेदखल हैं।अंतहीन पलायन है।

    इसी तरह कश्मीर में आजादी के बाद से तमाम सरकारें केंद्र की सत्ता से नत्थी रही है।इन दो बड़े राज्यों के अलावा असम को छोड़कर पूर्वोत्तर के सभी राज्यों का यही हाल है।पांडिचेरी और गोवा का भी यही हाल है।

    दिल्ली में सरकार किसी की हो,वहां राजकाज केंद्र का होता है।

    यूपी बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में केंद्र के पैकेज के लिए मारामारी है।केंद्र से ओवरड्राफ्ट लेकर राज्यों की सरकारें चल रही हैं।वेतन भत्ता का टोटा है।कैडर कोटा है।

    देश के संघीय ढांचे  को तहस नहस कर दिया गया है।

    राज्यों के क्षत्रप इसके खिलाफ कभी प्रतिरोध नहीं कर सकते।

    अब यह देश को माफिया गिरोह की तरह टुकड़ा टुकडा़ बांट करके तबाह करने की राजनीति है।यह देश मृत्यु उपत्यका ही नहीं गैस चैंबर है।दम तोड़ रहे हैं लोग।लाशों से घिरे हुए हैं लोग लेकिन इस तिलिस्म का अंध राष्ट्रवाद कुछ और है।


    राजनीतिक समीकरण साधने के लिए वे चाहे राजनीति जो करें,राज्यों का राजकाज केंद्र की मदद के बिना नहीं चल सकता।

    सही मायने में भारत में राज्य सरकारें केंद्र की बंधुआ सरकारों में तब्दील हैं और इसी वजह से मुक्तबाजारी अश्वमेधी अभियान इतना निरंकुश हैं।

    केंद्र की निरंकुश सरकार गिरायी नहीं जा सकती क्योंकि क्षत्रप पिछवाड़ा उठाये हुए हैं।राजनीतिक अस्थिरता है लेकिन कायदा कानून क्षत्रपों के समर्थन से लगातार बेरोकटोक बदल रहे हैं।जनविरोधी कानीन इसीतरह बन रहे हैं।लागू भी हो रहे हैं।

    यही हमारा संघीय ढांचा है।लूटखसोट डकैती का स्थाई बंदोबस्त।

    जो क्षत्रप केंद्र की मदद के बिना सरकार नहीं चला सकते,वे जनता के हक हकूक के लिए केंद्र से पंगा कैसे लेंगे,समझने वाली बात है।

    फिर ये तमाम क्षत्रप दूध के धुले भी कतई नहीं हैं,जिस वजह से सींग चाहे कितनी तेज हों,इन सबकी नकेल केंद्र के हाथ में है।

    भ्रष्टाचार के मामलों में केद्रीय जांच एंजसियों खासकर सीबीआई का इस्तेमाल संघ राज्य संबंध और देश के संघीय ढांचे के चरित्र का पैमाना है।सौदेबाजी के तहत सत्ता समीकरण बनाये ऱखना ही संघीय ढांचा है अब।

    इतने सारे मामले चल रहे हैं,इतने आरोप प्रत्यारोप हैं,लेकिन क्षत्रपों और उनके अनुयायियों पर कभी कोई छापा जैसे अबतक नहीं पडा़ है,नोटबंदी में कालाधन की तलाश करने वाले रैडर के दायरे के बाहर हैं सारे क्षत्रप और उनके तमाम कमांडर,यह हैरतअंगेज है।

    इंडिया टुडे का स्टिंग आपरेशन में दिखाया गया है कि कैसे अकेले गाजियाबाद और नोएडा में क्षत्रपों के यहां कालाधन सफेद करने का खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी चल रहा है।चालीस फीसद कमीशन पर खास दिल्ली की गोद में जब जिला स्तर के क्षत्रप सिपाहसालार दस दस करोड़ का कालाधन सफेद कर रहे हैं तो देश भर में रोजाना करोंडों की नकदी और सोना वगैरह वगैरह बरामद करने वाली सेना की नजर में या गिरफ्त में कोई क्षत्रप या उनका कोई अनुयायी उसीतरह नहीं है जैसे नोटबंदी से पहले तमाम पूंजी पति,उद्योगपति और सत्ता दल से संतरी से लेकर सिपाहसालार को कालाधन सफेद करने का आजादी मिली हुई है।

    यानी सीधे तौर पर कालेधन के खिलाप इस मुहिम का राजनेता वर्ग पर कोई असर जैसे नहीं है,वैसे ही पूंजीपति वर्ग पर भी कोई असर नहीं है।सभी भाई बिरादर हैं।मंच पर एकदम फिटमफिट अभिनय कर रहे हैं और किसी का कुछ बिगड़ नहीं रहा है।

    जनता दिलफरेब नारों से मदहोश है और नशाखुरानी बेरोकटोक है।

    आयकर में छूट देने का गाजर बजट से पहले फिर लटकाया गया है ताकि वेत और पेंशन न मिलने से नाराज सफेदकालर दो करोड़ पढ़ेलिखे लोग बाग बाग हो जाये कि जैसे आडवाणी को जुबान खोलते न खोलते संघ परिवार राष्ट्रपति पद की पेशकश करने लगा है,वैसे ही उन्हें भी घर में टैक्स में छूट की वजह से ज्यादा रकम वापस लाने की आजादी मिलने वाली है।भले ही बैंकों एटीेम की कतार में जान चली जाये।

    जिन्हें टैक्स माफी देनी है ,उन्हें अरबों का फायदा हो ही चुका है।

    जिन्हें साठ फीसद आयकर देना था,वे नोटबंदी से पहले  30 सितंबर तक कालाधन बताकर पैंतालीस फीसद टैक्स कुल देकर सफेद धन वाले हो गये।यानी पंद्रह प्रतिशत आयकर में छूट।सरचार्ज और पेनाल्टी माफ।

    नोटबंदी के बाद बाकी लोगों को कालाधन के एवज में पैंतालीस फीसद से कम कुल टैक्स आयकर, सरचार्ज,पेनाल्टी मिलाकर पचास फीसद टैक्से देना है साठ फीसद सिर्फ आयकर के बदले दस फीसद टैक्स छूट के साथ।आम जनता भले ही सफेद धन के लिए साठ फीसद तक टैक्स भरती रहे,कालाधन के लिए आम माफी आम है।

    नोटबंदी का यह खेल दरअसल कालाधन आम माफी योजना का सेल है,पचास फीसद तक छूट।

    अब आप हिसाब जोड़ते रहें कि बजट में दस बीस पचास हजार तक की सीमा बढ़ने से आपको कितने करोड़ या अरब रुपयों का फायदा होना है,जो बड़े खिलाड़ियों को अब तक हो चुका है।

    उनका लाखों करोड़ का कर्ज माफ।बैंकों को चूना।किसानों की थोक आत्मह्त्या।

    उनका लाखों करोड़ का टैक्स हर साल माफ।टैक्स फारगन।बजट घाटे में।

    उनको विदेशों में आपके इकलौते दो हजार के नोट के मुकाबले अरबों डालरषअरबों पौंड के निवेश की छूट बदले में देश में निवेश शून्य।

    अनुदान सब्सिडी प्रावधान में कटौती और उनको हर सेक्टर में लाखों करोड़ की मुनाफावसूली का चाकचौबंद इंतजाम।

    खुले बाजार की कैशलेस फेसलेस डिजिटलइकोनामी में आम लोगों के सफाया के बाद उनकी कंपनियों की मोनोपाली।

    शेयर बाजार के उछलकूद में करोड़ों आम निवेशकों की जेबें खाली और सारी अरबों अरबों की मुनाफावसूली उन्हीं की।उन्ही की बारह मास दिवाली होली।

    अब आप हिसाब जोड़ते रहे कि ऐसे सुनहले दिनों की सरकार के राजकाज में आयकर छूट से आप कितने करोड़,कितने अरब उनकरे एकराधिकार बाजार में खरीददारी के लिए बचा लेंगे।

    कृपया इस खबर पर गौर करेंः

    जीएसटी पर तलवार लटकती नजर आ रही है। तृणमूल कांग्रेस नोटबंदी का जबरदस्त विरोध कर रही है। आपको बता दें कि ये वही क्षेत्रीय पार्टी है जिसने सबसे पहले जीएसटी का समर्थन किया था। नोटबंदी से क्यों अटक सकता है जीएसटी इसके बारे में सीएनबीसी-आवाज़ ने बात की पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा से।


    पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा का कहना है कि जीएसटी से 5 साल के लिए वित्तीय अस्थिरता की आशंका थी, फिर भी हमने जीएसटी का पूरा समर्थन किया। लेकिन अब नोटबंदी से दूसरा झटका लगा है, और इससे राज्य की आमदनी घट गई है। नोटबंदी राज्यों के लिए जीएसटी से भी बड़ा झटका है।


    अमित मित्रा के मुताबिक राज्य जीएसटी के बाद नोटबंदी का दोहरा झटका नहीं सह पाएंगे। नोटबंदी से राज्यों की कर वसूली कम हो जाएगी। अमित मित्रा ने ये भी कहा कि जीएसटी में काउंसिल लगातार नए बदलाव कर रही है, ऐसे में अगली बैठक में जीएसटी पर चर्चा संभव है।


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    #कैशलैसइंडियाडिजिटलइंडियामेंसाइबरसुरक्षा की गारंटी क्या देंगे नानबैंकिंग कंपनियों के सुपरमाडल?

    किसी भी वक्त बेदखल होने वाले तथ्यों और आंकडो़ं की आभासी जमीन अब हमारी जिंदगी और अर्थव्यवस्था है।बाकी मरघट है।मृत्यु महोत्सव है।नरमेध यज्ञ।

    संसदीय नौटंकी के अलावा नोटबंदी की आग से साबूत सही सलामत बचे राजनेताओं,पत्रकारों,बुद्धिजीवियों,नौकरीपेशा लोगों,डाक्टरों,वकीलों,पेशेवर पढ़े लिखे लोगों,शिक्षकों,प्रोफेसरों,रंगकर्मियों,फिल्म स्टारों, कलाकारों, अर्थशास्त्रियों, सिद्धांतकारों, स्वेदेशियों,तमाम वाद विवादियों,सामाजिक कार्यकर्ताओं और सत्तावर्ग से संतरी से सिपाहसालारों,देश विदेस में अरबों का कारोबार करने वालों,अरबों का मुनाफावसूली करने वालों और चुने हुए रंग बिरंगे जनप्रतिनिधियों को करोड़ों की तादाद में बिना मौत मरनेवालों की कितनी परवाह है और मृत्यु अंकगणित बीजगणित त्रिकोणमिति सांख्यिकी में वे कितने दक्ष और पारंगत हैं,यक्षप्रश्न अब एकमात्र यही है।

    पलाश विश्वास


    सबसे ताजा फतवा है कि राशन भी कैशलैस होगा और स्कूल भी कैशलैस होंगे।फतवे अब तरह तरह के चित्र विचित्र हैं।केसरिया भूगोल में भूंकप के झटके हैं फतवे ।मसलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैशलेस इकॉनमी के बनाने के सपने को बढ़ावा देते हुए हरियाणा की बीजेपी सरकार ने अपने ऑफिस स्टाफ के लिए नया आदेश जारी किया है। हरियाणा की खट्टर सरकार के आदेश के मुताबिक, कर्मचारियों को अगले सात दिनों में एक बार मोबाइल फोन से डिजिटल ट्रांजेक्शन करनी होगी और इसका सबूत भी सब्मिट करना होगा।फतवों की बाहर दखते रहिये।

    दिहाड़ी कैशलैस हो जाने से देश के करोड़ों मेहनतकशों के घरों में चूल्हा सुलगना बंद है।न धुआं है और न आग है।जल रहा है दिलोदमिाग।जल रहा है इंसानियत का वजूद।जल रही है,जलकर खाक हो रही है कायनात।

    महाभारत का अंतिम संस्कार पर्व चल रहा है।जलती हुई चिताओं से,बढ़ते हुए कब्रिस्तान से बेखबर हैं और खबरदार भी हैं तो मदहोश हैं देशभक्त राष्ट्रवादी पढ़े लिखे पाखंडियों की रंगबिरंगी उपभोक्ता फौजें।जिनके दम से यह कत्लेआम पिछले पच्चीस साल से जारी हैंं।जो नख से शिख तक अपने स्वजनों के खून से लबालब हैं।यही ताजा फैशन है।हर छिद्र से आवाजें आ रही हैं भोग के परमानंद की।नरमेध महोत्सव है।

    बैंकों और एटीएम में लाशों की गिनती करने वाले गांव देहात जनपदों में लाशों के अंबार पर तनिक नजर डालें।अभी अम्मा के शोक में तमिलनाडु में सात सौ ज्यादा मौतों की खबर है तो समझ लीजिये कि नोटबंदी में कुल मरने वाले कितने होंगे।

    संसदीय नौटंकी के अलावा नोटबंदी की आग से साबूत सही सलामत बचे राजनेताओं,पत्रकारों,बुद्धिजीवियों,नौकरीपेशा लोगों,डाक्टरों,वकीलों,पेशेवर पढ़े लिखे लोगों,शिक्षकों,प्रोफेसरों,रंगकर्मियों,फिल्म स्टारों, कलाकारों, अर्थशास्त्रियों, सिद्धांतकारों, स्वेदेशियों,तमाम वाद विवादियों,सामाजिक कार्यकर्ताओं और सत्तावर्ग से संतरी से सिपाहसालारों,देश विदेस में अरबों का कारोबार करने वालों,अरबों का मुनाफावसूली करने वालों और चुने हुए रंग बिरंगे जनप्रतिनिधियों को करोड़ों की तादाद में बिना मौत मरनेवालों की कितनी परवाह है और मृत्यु अंकगणित बीजगणित त्रिकोणमिति सांख्यिकी में वे कितने दक्ष और पारंगत हैं,यक्षप्रश्न अब एकमात्र यही है।

    किसी भी वक्त बेदखल होने वाले तथ्यों और आंकडो़ं की आभासी जमीन अब हमारी जिंदगी और अर्थव्यवस्था है।

    बाकी मरघट है।मृत्यु महोत्सव है।नरमेध यज्ञ।

    याहू के एक बिलियन खाते हैक हो गये हैंं।

    हैकिंग अब दाल भात की तरह प्रचलन में है।

    मसलन अमेरिकी इंटेंलिजेंस अधिकारियों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के कैंपेन के दौरान हुई हैकिंग में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन खुद शामिल थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक पुतिन ने खुद निर्देश दिए थे कि हैकिंग को कैसे अंजाम देना है और इसे कैसे इस्तेमाल करना है।  

    भारत में नागरिक सवा बिलियन से कुछ कम बेशी है।

    समीकरण साधने वाले बतायें कि आधार नंबर एक बिलियन भी जारी हुए तो पेटीएम मार्फत हैक होने में कितना वक्त लगेगा।

    जिस पेटीएम का सुपर माडल राष्ट्रीय नेतृत्व है।जिसे रोजाना सवा अरब लोगों के लेनदेन का ढाई प्रतिशत ठेका है और कुल रकम मुनाफावसूली की कितनी है,किस किसकी मुनाफावसूली है,उसका भी हिसाब जोड़कर बतायें।

    इस पेटीएम पर गौरतलब है कि फ्राड का महाभियोग भी है।

    जिसकी महिमा से बैंकिंग का काम तमाम।

    अर्थव्यवस्था खत्म और उत्पादन प्रणाली भी खत्म।

    पेटीएम नेट बैंकिंग करने से पहले गौर करें कि कमीशन देकर ,नकदी के बदले आप कितना बड़ा जोखिम किसके फायदे के लिए उठा रहे हैं।

    आधार नंबर निराधार के आधार यह डिजिटल लेनदेन किसानों और कारोबारियों का कत्लेआम ही नहीं कर रहा है ,यह दिनदहाड़े आपकी जेबें काटने का चाकचौबंद इंतजाम है और यही हिंदुत्व का असल कारपोरेट मुनाफावसूली का एजंडा है।

    #कैशलैसइंडिया के 130 करोड़ लोग सौ रुपए रोजाना खर्च करें तो वह रकम कितनी होगी?

    #हरसौरुपयेपरपेटीएमकाकमीशनढाई रुपयेतो रोजाना इस लेनदेन बाबत पेटीएम को कितना मिलेगा?

    #पेटीएमसेकिसकोकितना फायदा?

    #नकदलेनदेन मे सौ का नोट 130 करोड़ बार चलन में होगा तो आपके जेब से कितना कमीशन जाएगा?

    #कैशलैसइंडियाडिजिटलइंडियामेंसाइबर सुरक्षासुरक्षा की गारंटी क्या देंगे नानबैंकिंग कंपनियों के सुपरमाडल?

    इंडियन एक्सप्रेस की ताजा खबर पर मुलाहिजा फरमायें

    Yahoo confirms one billion accounts hacked: Here's what happened

    Yahoo says over one billion accounts hacked in new data breach discovered from 2013. Here are all the details


    #NarcissismWikipedia

    #StatesDeprivedofRevenue

    #LongLivetheKingPeoplemustDie

    न संविधान है।न लोकतंत्र है।न कानून का राज है।न संसदीय प्रणाली है।न स्वतंत्रता है।न संप्रभुता है।न अवसर है।ऩ आजीविका है न रोजगार।न समता है न न्याय है।न सहिष्णुता है और न उदारता है।बहुप्रचारित विविधता और बहुलता भी सिरे से गायब हैं नरसंहार संस्कृति में।सिर्फ घृणा और हिंसा का राजकाज।

    अब यह देश को माफिया गिरोह की तरह टुकड़ा टुकडा़ बांट करके तबाह करने की राजनीति है।यह देश मृत्यु उपत्यका ही नहीं गैस चैंबर है।दम तोड़ रहे हैं लोग।लाशों से घिरे हुए हैं लोग लेकिन इस तिलिस्म का अंध राष्ट्रवाद कुछ और है।

    #कैशलैसइंडिया के 130 करोड़ लोग सौ रुपए रोजाना खर्च करें तो वह रकम कितनी होगी?

    #हरसौरुपयेपरपेटीएमकाकमीशनढाईरुपये तो रोजाना इस लेनदेन बाबत पेटीएम को कितना मिलेगा?किसकिसको कितना मिलेगा?

    #पेटीएमसेकिसकोकितना फायदा?

    #नकदलेनदेन मे सौ का नोट 130 करोड़ बार चलन में होगा तो आपके जेब से कितना कमीशन जाएगा?

    ताजा खबर यह है कि अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेप्सिको की चेयरमैन इंदिरा नूयी को अपनी स्ट्रेटेजिक एंड पॉलिसी फोरम में शामिल किया है। नूयी आर्थिक एजेंडे को लागू करने में सहयोग प्रदान करेंगी। फोरम का नेतृत्व निवेश कंपनी ब्लैकस्टोन के सीईओ स्टीफन स्वार्जमान कर रहे हैं और इसमें जेनरल इलेक्ट्रीक के पूर्व सीईओ जैक वेल्च, स्पेस एक्स और टेसला के सीईओ एलोन मुस्क, उबर के सीईओ कालानिक, चेज के जैमी डिमॉन और जेनरल मोटर्स के सीईओ मैरी बारा शामिल हैं।

    भारत अमेरिकी रणनीतिक समीकरण के मुक्तबाजार में ग्लोबल हिंदुत्व की फिजां में मोदी ट्रंप युगलबंदी का रसायन कैसे बन रहा है,डिजिटल कैसलैस इंडिया के अंध राष्ट्रवादियों इसपर भी जरा नजर रखना राष्ट्रहित में।



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