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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    जैसे पाकिस्तान ने पूर्वी बंगाल के खिलाफ युद्ध छेड़ा,क्या वैसे ही हम कश्मीर को युद्ध घोषणा के तहत जीतना चाहते हैं?

    पलाश विश्वास


    पूर्वी बंगाल में भारत के सैन्य हस्तक्षेप से पहले और बाद में भारतीय मीडिया में और दुनियाभर के मीडिया में क्या लिखा जा रहा था,वह कमोबेश हम लोग पढ़ चुके होंगे।पाकिस्तान में उस दौरान सत्तावर्ग और मीडिया का नजरिया खुलकर सामने नहीं आया है या हमने सिलसिलेवार उसे जाना नहीं है।बांग्लादेश में इस्लामी राष्ट्रवादी तत्वों की भारतविरोधी गतिविधियों और उनके धर्मोन्मादी ताजा साहित्य देख लें या बांग्लादेश में लगातार हो रहे अल्पसंख्यक उत्पीड़न,धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रीक ताकतों,कवियों,पत्रकारों,बुद्धिजीवियों और प्रकाशकों से लेकर ब्लागरों की हत्या और हाल में जारी आतंकवादी हमलों में उस हकीकत का सामना करने का मौका है।


    अब भी मनुष्यता आतंक पर भारी है और जो भी मारा जा रहा है,मनुष्य है,यह बा्गाल राष्ट्रवाद का बाबुलंद नारा है जिसके तहत खंडित बंगाल सांप्रदायिकता के खिलाफ अब भी मानव बंधऩ बनाने में लगा है।फिरभी आत्मघाती धर्मोन्माद पर कोई अंकुश नहीं है तो इसका कारण वैश्विक आतंक का सर्वशक्तिमान नेटवर्ग है और उसे मजबूत करता हुआ धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का मुक्तबाजारी एजंडा है।   


    बांग्लादेश युद्ध की याह्या खान और भुट्टो की युगलबंदी से  पहले भारत विभाजन के तहत दो रााष्ट्र सिद्धांत के आधार पर पूर्वी बंगाल को जिस अवैज्ञानिक तरीके से अखंड भारत के जमींदार राजसिक नेतृत्व ने पाकिस्तान का उपनिवेश बना दिया,उसका नतीजा हम आज भी भुगत रहे हैं।


    हम भूल रहे हैं कि भारत विभाजन के नतीजतन पंजाब और कश्मीर का विभाजन भी हुआ।हमें इसका शायद ही अहसास हो कि जिस सिंधु घाटी की सभ्यता के कारण हम भारत वर्ष के प्राचीन इतिहास को विश्व की तमाम सभ्यताओं के समतुल्य या अतुल्य मानते हैं,स्वतंत्रता संग्राम की इस आत्मघाती परिणति से उस सिंधु घाटी की सभ्यता का भी हमने बंटवारा कर दिया।


    जनसंख्या का आधा अधूरा स्थानांतरण हुआ और बांग्लादेश में अब भी ताजा आंकड़ों के मुताबिक दो करोड़ 39 लाख हिंदू हैं।इनमें भी कमसकम दो करोड़ लोग बहुजन हैं।


    इसीतरह पाकिस्तान में भी हिंदुओं का पूरी तरह सफाया अभी नहीं हुआ है।


    कच्छ के रण के आर पार गुजरात और सिंध में मोहंजोदोड़ो और हड़प्पा के तमाम जो नगर बसे थे,हमने एक झटके से उनका भी बंटवारा कर दिया।


    संजोग से लेकिन इस खंडित महादेश का इतिहास साझा है,चाहे उसकी जो भी व्याख्या हम करते रहे।पाकिस्तान और बांग्लादेश का इतिहास कोई 15 अगस्त,1947 से और मार्च 1971 से शून्य से शुरु नहीं हुआ है।पाकिस्तान हो या बांग्लादेश,वे अपने आजाद इतिहास हिदुस्तान के बिना बना नहीं सकते वैसे ही जैसे पाकिस्तान,बांग्लादेश या सिंधु सभ्यता के बिना हम सिर्फ रामायण, महाभारत या वैदिकी साहित्य को अपना इतिहास नहीं बना सकते या गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस, महाभारत सीरियल ,रामकथा या तमाम पुराण स्मृतियों, शतपथ, उपनिषदों, वेदों या संस्कृत काव्यधारा को ही अपना इतिहास साबित नहीं कर सकते।


    न अतीत को हम बदल सकते हैं और न हम भविष्य के शाथ खिलवाड़ करने के लिए आजाद है जबकि वर्तमान को भी संबोधित करने की हम कोई इतिहास दृष्टि नहीं हासिल कर सके हैं।हम तकनीक के गुलाम है जो रोज बदलती है लेकिन विज्ञान के बुनियादी सिद्धांत रोज रोज नहीं बदलते।तकनीक से हम विज्ञान को बदल नहीं सकते जिसतरह,धर्मोन्माद से हम इतिहास भीगोल कुछ भी बदल नहीं सकते।हां,आत्मघाती सुनामिया रच सकते हैं।रंग बिरंगे सेज या सेट न विज्ञान होता है और न इतिहास जैसे फार्मूले का मतलब भौतिकी और रसायन शास्त्र नहीं है तो राजनीति भी कोई फार्मूला नहीं है और न आंकड़े अर्थव्यवस्था का सच है।सच बहुआयामी है। सच सापेक्षिक है।


    संजोग से हमारे पुरखे भी एक हैं।

    हमारी विरासत भी एक है।

    भाषा जैसी बांग्ला सीमा के आर पार एक है वैसे ही पंजाबी, सिंधी, कश्मीरी और उर्दू भी एक है।

    खान पान रीति रिवाज रिशते संस्कृति लोकसंस्कृति सियासत मजहब हमारी साझी फिजां,हमारी जान जिगर,खून पानी और कायनात की तरह, बुनियाद की जड़ों में भी साझा है।हममें से कोई विशुध श्वेत या अश्वेत,आर्य या अनार्य,ब्राह्मण या बहुजन नहीं है।रक्तधाराएं ऐसी एकाकार हैं।


    हमारे सामने वे तमाम दस्तावेज नहीं आये हैं,जो 1971 से पहले और बाद में याह्या खान और भुट्टो के दमन, उत्पीड़न और नरसंहार की फौजी वीभत्सता के हक में लिखे जाते रहे हैं।


    बांग्लादेश में अभी भी वे तत्व बड़ी तादाद में हैं जो अंध इस्लामी राष्ट्रवाद के पक्ष में है।ऐसे तत्वों ने भारत के भीतर अनेक राज्यों में घुसपैठ की है और बिना चश्मे के हकीकत को नंगी आंखों से देखेंगे तो बंगाल और असम,बिहार और यूपी में भी हालात कश्मीर से कम संगीन नहीं है हालांकि इन राज्यों में फौजी हुकूमत नहीं है लेकिन जम्हूरियत कहीं नहीं है।


    अंध राष्ट्रवाद सिर्फ इस्लामी नहीं है।यहूदी राष्ट्रवाद और विशुध ईसाई राष्ट्रवाद का सामना भी हमसे होता रहा है और हिंदू राष्ट्रवाद तो अब हमारा समूचा वजूद है।दिलोदिमाग हिंदू है।मजहबी रष्ट्रवाद या मजहबी सियासत इंसानियत के हक में नहीं होता चाहे मजहब का नाम कुछ भी हो।


    1971 के मुक्तियुद्ध के दौरान बांग्लादेश में हिंदुओं को एकमुश्त निशाना बनाया इसलिए गया था कि पाकिस्तानी हुकूमत की नजर में वे बागी मुजीबुर रहमान और उनकी पार्टी के वोटबैंक थे।


    खानसेना और रजाकरों ने तब एक बड़ी कोशिश की थी मलाउन काफिर हिंदुओं को भारत में खदेड़ने की और उसी कोशिश का नतीजा था भारत का सैन्य हस्तक्षेप।


    उस जल्लाद रजाकर वाहिनी के तमाम सरगना युद्ध अपराधियों को फांसी की सजा हाल में दी जाती रही है।शहबाग जनांदोलन की निरंतरता और बांग्लादेश में बांग्ला राष्ट्रीयता,धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक और बहुजन एकता के दम पर।लेकिन इस्लामी अंध राष्ट्रवाद की सुनामी फिर बांग्लादेश में चल रही है।रजाकर जमायत तत्व अब भी बांग्लादेश में हद से ज्यादा मजबूत हैं और उनके निशाने पर तमाम अल्पसंख्यक और आदिवासी हैं और वे बांग्लादेश को फिर पाकिस्तान बनाने पर आमादा हैं।


    वे तमाम लोग याह्या और भुट्टो के नरसंहार के हिमायती हैं अब भी।


    खान सेना ने तब लाखों बंगाली महिलाओं और बालिकाओं को बलात्कार का शिकार बनाया था तो सिर्फ हवस के लिए नहीं,बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के डीएनए में इस्लामी राष्ट्रवाद का पाकिस्तानी खून डालने के लिए।यह निर्मम यथार्थ है।


    बलात्कार से जनमी वह पीढी अब बांग्ला राष्ट्रवाद के बदले इस्लामी बांग्लादेशी राष्ट्रवाद की बात उसीतरह कर रही है जैसे अखंड भारत के झंडेवरदार बजरंगी सत्तावर्ग और उसकी पैदल सेनाएं हिंदुत्व के एजंडे पर कुछ भी करने को तैयार है।


    हम यकीन के साथ यह कह नहीं सकते कि हमारे सत्तावर्ग के डीएनए में विदेशी हित और विदेशी खून डालने के लिए अंग्रेजों ने क्या क्या तरीके अपनाये होंगे।लेकिन नतीजे बागों में बहार है।मुक्त बाजार।


    बांग्लादेश में अभी एक अभियान बहुत भयंकर चल रहा है कि अगर 1971 के पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में पूर्वी बंगाल के लड़ाके मुक्तियोद्धा थे तो कश्मीर में भारत राष्ट्र के खिलाफ लड़ रहे कश्मीरी को आजादी के परिंदे मानने से क्यों इंकार किया जा रहा है।


    सनद रहे कि यह कैंपेन सिर्फ पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं,असम में भी जारी है बड़े पैमाने पर।


    हमने पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल के दमन,उत्पीड़न,बलात्कार,नरसंहार के पक्ष में विद्वतजनों के लेख वगैरह उसतरह देखे नही है जैसा हमने बांग्लादेश की मौजूदा इस्लामी राष्ट्रवादी तत्वों का देखते पढ़ते रहते हैं।जिन्होंने याह्या और भुट्टो का राजकाज राजधर्म नहीं देखा और उनकी महान विचारधारा और उदात्त इस्लामी राष्ट्रवाद के सिद्धांतो से जिनका साक्षात्कार न हुआ या जो सिर्फ बांग्ला या असमिया न जानने की वजह से बांग्लादेश और असम में ऐसे तत्वों के भारतविरोधी हिंदू विरोधी लोकतंत्रविरोधी धर्मनिरपेक्षता विरोधी विचारधारा के बारे में नहीं जानते,वे फिलहाल फेसबुक पर अपने विद्वतजनों के उद्गार,सुभाषित पर नजर रखें।


    आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान भारत में हिंदी के दो दिवंगत मसीहाओं ने देश के सबसे बड़े,सबसे लोकप्रिय दो राष्ट्रीय हिंदी अखबारों के मार्फत स्वर्ण मंदिर में आपरेशन ब्लू स्टार के पक्ष में इसीतरह जनमत बनाया था और वे लोग तब लिख रहे थे कि राष्ट्र आपरेशन टेबिल पर है और आपरेशन हो जाना चाहिए।उस आपरेशन के जख्म अब भी हरे हैं और हमें उसका अहसास भी नहीं है।


    हमारे विद्वतजनों को,बजरंगी बिरादरी को शायद लग रहा होगा कि भारत में फिर जनरल याह्या खान और भुट्टो की युगलबंदी से राजकाज और राजधर्म का मौजूदा दौर है और जिस तरह पूर्वी बंगाल का दमन किया गया था,वह निहायत पाक फौजों  का नाकारा प्रदर्शन है और हमारी महान फौजें याह्या और भुट्टो के अधूरे एजंडे को पूर्वी बंगाल में न सही,कश्मीर में बखूब अंजाम तक पहुंचा सकते हैं।अपने महान दिवंगत संपादकों की तर्ज पर अनेक स्वयंभू महामहिम फेसबुक रंगते नजर आ रहे हैं और उनका भी सारा जोर इसी पर है कि तुरंत कश्मीर का आपरेशन कर देना चाहिए।


    कृपया गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु जी के रोजनामचे को देखें जिसमें वे छत्तीसगढ़ में जारी सलवा जुड़ुम का किस्सा रोज एक एक गांव में सारी सैन्य अभियान का किस्सा कहकर बता रहे हैं।

    मणिपुर की मुठभेड़ों के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने आफ्सा के बारे में फैसला दे दिया है।

    फिर गौर करें कि भारत सरकार और कश्मीर सरकार भी कश्मीर में सैन्यबलों और पुलिस प्रशासन से संयम की गुहार लगा रहे हैं।लेकिन हथियार बंद जवान कोई अनुशासित स्वयंसेवक भी होता नहीं है।गोलियां जब चलती हैं तो वे किसी को भी नहीं देखतीं और न किसी की सुनती हैं।


    हालात इतने संगीन हैं कि कश्मीर के आपरेशन से पहले तनिक यह भी योजना बना लें कि कश्मीर और पंजाब की तर्ज पर क्या आप मसलन यूपी बिहार में ऐसा कोई आपरेशन के लिए तैयार हैं या बंगाल या असम में या महाराष्ट्र या तमिलनाडु में या ओड़ीशा या राजस्थान और गुजरात में।


    कश्मीर  के हालात बेहद संगीन हैं।हम किसी वानी के महिमामंडन के पक्षधर नहीं हैं और न हम सैन्य दमन के पक्षधर हैं।कश्मीर के मौजूदा हालात पूर्वी बंगाल के 1971 के हालात से ज्यादा भयंकर हैं।


    कश्मीर घाटी में पूर्वी बंगाल की अल्पसंख्यक आबादी की तरह कोई जनसंख्या नहीं है और कश्मीरी पंडित घाटी से बाहर हैं। घाटी में जो दलित, ओबीसी, आदिवासी रहते हैं,उनका अबतक कोई संघर्ष घाटी के मुसलमानों से हुआ हो,ऐसी कोई जानकारी हमारे पास नहीं है।


    अनुसूचित बहुजन वे लोग सियासत से दूर घाटी और बाकी कश्मीर में बने हुए हैं और बाकी देश को कश्मीरी पंडितों की तो फिक्र है,लेकिन इन बहुजनों की जान माल की परवाह जाहिर है किसी को नही है और मुसलमानों के साथ उन बहुजनों का सेना सफाया कर दे तो न हिंदुत्व के  सिपाहसालारों और न बजरंगी पैदल सेनाओं को उसकी कोई परवाह है।


    यह निर्मम सच पूर्वी बंगाल का भी है।पूर्वीबंगाल के जमींदार सारे राष्ट्र के नेतृत्व में अहम थे और कोलकाता में ही वे रहते थे या पश्चिम बंगाल में उनकी जमींदारियां थी।बंग भंग के खिलाफ 1905 में जिन लोगों ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया था,उन्हीं लोगों की पहल और जिद पर बंगाल का विभाजन तय करने के लिए एकमुश्त कश्मीर,पंजाब,सिंधु घाटी और भारत का विभाजन हो गया।


    विभाजन पीड़ित पूर्वी बंगाल की क्या कहे,भारत में शरणार्थी  बनने को मजबूर पांच करोड़ बहुजन हिंदू शरणार्थियों,पश्चिम बंगाल की तीन करोड़ अनुसूचितों और बांग्लादेश की आजादी के बाद वहां जारी निरंतर अल्पसंख्याक उत्पीड़न से पीड़ित वहां रह गये दो करोड़ 39 लाक हिंदुओं की न बंगाल और न भारत के जमींदारी रियासती सत्तावर्ग को कोई फिक्र है और न बाकी भारत को बहुजनों के जीने मरने की परवाह है।


    हम पूर्वी बंगाल में जारी सत्तर साला रंगेभेदी वैमनस्य का प्रयोग फिर कश्मीर में दोहरा रहे हैं।

    हमें बंगाल के सत्तावर्ग की तरह सिर्फ कश्मीरी पंडितों की परवाह है और कश्मीर  के बहुजन हिंदुओं की सेहत की हमें कोई परवाह नहीं है और हम मान कर चल रहे हैं कि पूर्वी बंगाल का अधूरा प्रयोग कश्मीर में कामयाब यकीनन होगा।


    इसीलिए प्रबुद्ध जन कश्मीर और कश्मीरियों के हक हकूक,उनके नागरिक अधिकार, उनके मानवाधिकार की बात करने वाले हर शख्स को राष्ट्रद्रोही करार देने में हिचक नहीं रहे हैं।सन 1971 से पहले पाकिस्तान में भी हो न हो,इसी तर्ज पर पाकिस्तान को मजबूत बनाने के लिए सेना के बेलगाम इस्तेमाल की दलीलें दी गयी होंगी।


    मुठभेड़ में मारे गये वानी के बारे में बाकी देश के लोग असलियत जानते नहीं हैं और हमं भी मीडिया के परस्परविरोधी दावों से ज्यादा कुछ मालूम नहीं है।वानी की असलियत कुछ भी हो,उसे कुछ भी साबित किये बिना इस त्थय पर गौर करना बेहद जरुरी है कि कश्मीर  में हालात बेहद संगीन हैं और कश्मीर का केसरियाकरण वहां मुफ्ती बाप बेटी के सौजन्य से बनी केसरिया सरकार कर पायी हो या नहीं,लेकिन वहां हालात राज्य और केंद्र सरकार के काबू में कतई नहीं है।


    सारा कश्मीर वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद जलने लगा है।

    चप्पा चप्पा बागी है।

    वजह लेकिन वही मुठभेड़ है,इस पर गौर करना जरुरी है।


    अब विद्वत जनों का आग्रह है कि कश्मीर में तुरंत राष्ट्रपति शासन लागू करके कश्मीर को सेना के हवाले कर दिया जाना चाहिए और अलगाववादी तत्वों को चुन चुनकर मार दिया जाना चाहिए।


    इन विद्वत जनों को शायद कश्मीर और पूर्वोत्तर में 1958 से लागू सशस्त्र सैन्यबल विशेषाधिकार कानून के बारे में कुछ पता नहीं है।जिसके तहत सेना किसी को भी बिना कैफियत गिरफ्तार कर सकती है।गोली से उड़ा सकती है।सैन्य अभियान को चुनौती भी नहीं दी जा सकती और न राज्य सरकार के अधीन सेना है।


    कश्मीर और मणिपुर तो 1958 से सेना के हवाले हैं।क्या हमारे ये अत्यंत मेधावी लोग चाहते हैं कि जैेसे पाकिस्तान ने पूर्वी बंगाल के खिलाफ बाकायदा युद्ध घोषणा कर दी थी,उसीतरह भारत सरकार भी कश्मीर के खिलाफ युद्ध घोषणा करके कश्मीर का वजूद ही मिटा दें ताकि न रहेगा बांस और न बजेगा बांसुरी।


    इजराइल और अमेरिका ने मिलकर तेलकुंऔं पर कब्जे के लिए मध्यपूर्व पर सीधा हमला बोला और इसके लिए सद्दाम हुसैन के प्रगतिशील रूस समर्थक हुकूमत के खिलाफ दुनियाभर की मीडिया में एकतरफा खबरों के जरिये विश्व जनमत तैयार किया और इराक अफगानिस्तान के अलावा एक के बाद एक इस्लामी राष्ट्र को ध्वस्त कर दिया आतंक के खिलाफ युद्ध के नाम,जिसके हम भी अब कास पार्टनर है।अब सारा सच खिला खिला है और नतीजा सामने है कि दुनियाभर में कोई भी कहीं भी सुरक्षित नहीं है।


    हम यूरोप और अमेरिका का नर्क अपने अखंड भारत में जीने पर आमादा है तो जाहिर है,क्योंकि हिंदुतव में जात पांत और रंगभेद का कुंभीपाक नर्क हमारे ऐसोआराम के लिए,हमारे मुक्तबाजारी अबाध भोग के लिए कम पड़ गया है।जाहिर है कि  हम यकीन के साथ यह कह नहीं सकते कि हमारे सत्तावर्ग के डीएनए में विदेशी हित और विदेशी खून डालने के लिए अंग्रेजों ने क्या क्या तरीके अपनाये होंगे।लेकिन नतीजे बागों में बहार है।मुक्त बाजार।



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    हिंदुस्तान में हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे तो कश्मीर में सेक्युलर राज्य की कल्पना न करें

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    तुर्की में अरब वसंत के तहत तख्ता पलट की अमेरिकी कोशिश नाकाम

    पलाश विश्वास

    तुर्की में सैन्य अभ्युत्थान के पीछे अमेरिकी हाथ है और यह अरब  वसंत के विस्तार की नाकाम कोशिश है,जिसे प्रबल जनसमर्थन से तुर्की ने फिलहाल नाकाम कर दिया है।शुरु में ही प्रधानमंत्री बिनअली यिलदरिम का दावा था  कि सैन्य तख्तातलट की कोशिश नाकाम कर दी गई है। लेकिन इस हिंसा में सैकड़ों की जान चली गई। प्रधानमंत्री यिलदरिम ने कहा कि जो भी इसके पीछे है उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।


    रातभर चली हिंसा में 250 से ज्‍यादा लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 1440 लोग घायल हैं। उन्‍होंने बताया कि 2839 साजिशकर्तओं को हिरासत में लिया जा चुका है।


    तख्तापलट के नाकाम उठापटक के बीच आम जनता भी सड़क पर उतर आई और खुलकर तख्ता पलट का  विरोध किया। इस पर बागी सेना ने इस्तांबुल में भीड़ पर गोलियां दागीं, जिसमें 47 लोग मारे गए।यह मुठभेड़ तब हुई जबकि  संसद के बाहर टैंकों की आवाजाही चल रही थी और आसमान पर हवाई जहाज मंडरा रहे थे।


    यही नहीं,तख्तापलट की कोशिश नाकाम होने की खबर के बाद राष्ट्रपति के समर्थकों नेे सड़ को पर उतरकर सरकार के समर्थन में नारेबाजी भी की और जश्न मनाया।


    गौरतलब है कि राष्ट्रपति अर्दोआन ने इसके लिए एक "समानांतर सत्ता" पर संदेह जताते हुए इशारा फ़तहुल्लाह गुलेन की ओर किया है। गुलेन अमरीका में रहनेवाले एक ताकतवर मुस्लिम धर्मगुरु हैं।  तुर्कीकी सरकार ने गुलेन पर सरकारी तंत्र के समानांतर व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश का आरोप लगाया है। अमरीका ने तुर्कीसे कहा है कि अगर उसके पास धर्म प्रचारक गुलेन के ख़िलाफ़ कोई भी सबूत हो तो वो उसके साथ साझा करे।



    इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए फ़तहुल्लाह गुलेन ने इस तख़्तापलट में किसी भी भूमिका से इनकार किया है।

    गौरतलब है कि 75 वर्षीय धर्म प्रचारक ने कहा कि वो तख्तापलट के षडयंत्र की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं।



    राष्ट्रपति अर्दोआन ने तख्तापलट के प्रयास की निंदा करते हुए कहा कि जिस राष्ट्रपति को 52 प्रतिशत लोग सत्ता में लेकर आए, वही इन चार्ज है। जिस सरकार को लोगों सत्ता में लेकर आए, वही इन चार्ज है। जब तक हम अपना सब कुछ दाव पर लगाकर उनके खिलाफ खड़े हैं, तब तक वह कामयाब नहीं हो सकते।'


    शुरुआती खबरों से इस आकस्मिक सैन्य अभ्युत्थान में अमेरिकी हितों को देखा जा रहा था।


    कमाल अतातुर्क के जमाने से तुर्की में जितने भी सामरिक अभ्युत्थान हुए,वह बाकी इस्लामी देशों से भिन्न है।जिनका मकसद लोकतंत्र की बहाली रहा है।


    इस बार भी सैन्य अभ्युत्थान के दौरान सेना के एक हिस्से ने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता बहाल करने के लिए सत्ता की बागडोर हाथ में लेने का ऐलान कर दिया था।


    अरब वसंत और मध्यपूर्व,अफ्रीका और लातिन अमेरिका में अमेरिकी लोकतंत्र के आयात का इतिहास और सीरिया में आइसिस की हरकतों के पीछे अमेरिकी हितों के मद्देनजर तुर्की की जनता इस झांसे में नहीं आयी और अभ्युत्थान नाकाम हो गया।


    खास बात तो यह है कि सड़कों पर दौड़ते टैंको की परवाह किये बिना,हेलीकाप्टरों से गोलाबारी से बेखौफ नागरिकों ने अमेरिकापरस्त बागी सेना को सड़क पर शिकस्त दी और इस संघर्ष में कमसकम सैंतालीस तुर्क नागरिकों ने अपनी जान कुर्बान कर दी।तुर्की के इतिहास में यह अभूतपूर्व वाकया है।


    खास बात तो यह है कि तुर्कीमें इन हालातों पर जनता का समर्थन सरकार के पक्ष में अधिक है। अर्दोअान की पार्टी हमेशा चुनावों में जीती है। उनकी पार्टी की जीत 50 से 55 फीसदी रही. इसका मतलब है कि जनता के बीच वो काफ़ी ताक़तवर हैं।


    गौरतलब है कि बाकी इस्लामी देशों के मुकाबले तुर्की में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की विरासत गहरी पैठी है।जिंदगी टीवी चैनल में हाल में दो तुर्क सीरियल दिखाये जाते रहे हैं।फेरिहा और उमरगुल। कथा जो हो सो है,लेकिन इससे तुर्क रोजमर्रे की जिंदगी की आधुनिकता और मजहब से अलहदा जम्हूरियत की खुशबू बेहद गौरतलब हैं।


    बहरहाल सैन्य अभ्युत्थान के फेल हो जाने के बाद तुर्की ने सीधे सेना में बगावत के पीछे अमेरिका में बैठे धार्मिक नेता फतहुल्ला गुलेन को जिम्मेदार बताते हुए अमेरिकी हाथ का आरोप भी लगाया है।दूसरी ओर,सेना के नवनियुक्‍त प्रमुख जनरल उमित दुंदार ने बताया, 'इस मामले में वायुसेना, सैन्‍य पुलिस और सशस्‍त्र बलों के अधिकारी मुख्‍य रूप से शामिल हैं। तख्‍तापलट के इस प्रयास के सेना के किसी भी उच्‍चपदस्‍थ अधिकारी का समर्थन हासिल नहीं था और देश के मुख्‍य विपक्षी दलों ने भी सरकार को उखाड़ फेंकने की इस कोशिश की भर्त्‍सना की।



    गौरतलब है कि देर रात तुर्की में सैनिक और टैंक सड़कों पर उतर आए तथा आठ करोड़ की आबादी वाले देश के दो सबसे बड़े शहरों अंकारा और इस्तांबुल में सारी रात धमाके होते रहे। तुर्की नाटो का सदस्य है।



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    अगर इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का ब्रेनवाश हो रहा है और इकलौता आतंकवाद नई विधि प्राविधि है,तो विनाश किताना तेज और कितना भयंकर होगा?


    पलाश विश्वास


    कालजयी फ्रांसीसी साहित्यकार विक्टर ह्यूगो का क्लासिक उपन्यास ला मिजरेबल्स पढ़ लें तो फ्रांसीसी क्रांति के बारे में अलग से इतिहास पढ़ने की जरुरत नहीं होगी।इस उपन्यास की कथा बास्तिल दुर्ग को केंद्रित है।इसी बास्तिल दुर्ग के पतन के साथ फ्रांस सांतसाही से मुक्त होकर लोकतांत्रिक देश बना और दुनियाभर में स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए बास्तिल दुर्ग का पतन प्रस्थान बिंदू रहा है।इसी बास्तिल दुर्ग के पतन के दिन लोकतंत्र, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व का उतस्व मना रहे फ्रांस के पर्यटन स्थल नीस में इकलौते एक हमलावर ने जिस तरह से 84 लोगों को मार गिराया,वह आने वाली कयामतों की शुरुआत है।अगली सुबह इस्लामी दुनिया में प्रगतिशीलता ,आधुनिकता और लोकतंत्र का मरुद्यान तुर्की में तख्ता पलट की कोशिश हुई।सड़कों पर टैंक दौड़े और हेलीकाप्टर से गोलिया बरसायी गयीं।दुनिया के ये हालात है,जहां पल दर पल इंसानियत लहूलुहान है और अमन चैन सिरे से लापता है।यह एक बेहद खतरनाक दौर है।


    अभी अभी में ब्रेक्सिट के जनमत संग्रह के बाद नई सरकार बनी है तो अमेरिका में सत्ता में फेरबदल होने जा रहा है।राजनीतिक अस्थिरता के शिकंजे में हैं बड़े से छोटे तमाम देश।ऐसे में हमारे लिए राहत सिर्फ इतनी है कि भारत में फिलहाल जैसे भी हो राजनीति,राजनीतिक अस्थिरता नहीं है।वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर यह बहुत अहम है कि कुल मिलाकर भारत में तमाम चुनौतियों के बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी हुई है।

    पेरिस हमला और दुनियाभर में तमाम दहशतगर्द वारदातों के बारे में आर रात दिन टीवी पर देख रहे होंगे या अखबारों में सिलसिलेवार पढ़ भी रहे होंगे,इसलिए उनका ब्यौरा दोहराने की जरुरत नहीं है।


    कुल मिलाकर इन हमलों से साफ जाहिर है कि सामान्य जनजीवन और सामाजिक गतिविधियों के कैंद्रों पर ये हमले बेहद तेज हो रहे हैं।सत्ता को जितनी  चुनौती है,कानून और व्यवस्था के लिए जितना सरदर्द का सबब है,उससे कहीं ज्यादा इंसानियत के वजूद को खतरा है और इस खतरे से कोई अछूता नहीं है।क्योंकि कहीं भी किसी भी वक्त घात लगाकर हमले की आशंका बनी हुई है।


    सत्ता का तख्ता पलटने की कोशिश की अपनी दलील हो सकती है तो सियासती मजहब और मजहबी सियासत के तौर तरीके अलग हो सकते हैं।लेकिन यह मामाला अब पक्ष प्रतिपक्ष का रह नहीं गया है क्योंकि हमले में मारे जाने वाले बेगुनाह लोगों का कोई पक्ष प्रतिपक्ष नहीं होता।यह विशुद्ध संकट है मनुष्यता और सभ्यता का।सत्ताकेंद्रे पर हमले हमेशा होते रहे हैं।सभ्यता का यही इतिहास है।मध्ययुग से धर्मस्थलों पर भी हमले सत्तादखल का दस्तूर बन गया है और हम उत्तर आधुनिक मध्ययुग में जी रहे हैं इन दिनों।मुक्तबाजार में भोग की सारी समामग्री है लेकिन समाज और राजनीति और धर्म के नाम जो भी हो रहा है,वैज्ञानिक औक तकनीकी विकास के बावजूद वह प्रतिक्रियावादी मध्ययुगीन मानसिकता है।


    विकास और प्रगति की अहम शर्त है अमन चैन।राष्ट्र व्यवस्था की बुनियाद कानून और व्यवस्था है।ये चीजें न हों तो न समाज संभव है,न आजीविका संभव है,न जान माल की कोई गारंटी है और यह अराजकता है।जो मनुष्यता और प्रकृति के विरुद्ध है।


    पेरिस हमले का मकसद सीधे फ्रासींसी राष्ट्रीयता और वहां के लोकतंत्र को ध्वस्त कर देने का है,यह समझना लाशों की गिनती से ज्यादा जरुरी है।दुनियाभर में ऐसा हो रहा है।यह आतंकवाद की नई विधा है।तकनीक और विधि है यह आतंकवाद की।किसी एक व्यक्ति के दलोदिमाग पर कब्जा करके उसे टरमिनेटर की तरह विध्वंसक बना दो तो वह अकेला सबकुछ तबाह कर देगा।आतंकवाद की यह संस्थागत प्रणाली राष्ट्रप्राणाली पर हावी होती जा रही है,यह सबसे बड़ा खतरा है।


    मसलन बांग्लादेश में सत्तावर्ग के बच्चे बड़ी संख्या में गायब हैं।जिनमें से इक्के दुक्के ने बांग्लादेश के हालिया दहशतगर्द वारदातों को अंजाम दिया है।पेरिस के ताजा हमलों के मद्देनजर इस खतरे को समझने की जरुरत है कि अगर इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का ब्रेनवाश हो रहा है और इकलौता आतंकवाद नई विधि प्राविधि है,तो विनाश किताना तेज और कितना भयंकर होगा!


    यह सिर्फ कानून और व्यवस्था का संकट नहीं है।उससे कहीं परिवार और समाज का संकट है।जिसे तुरंत हल करने के बारे में जितनी जल्दी हम सोचें,उतना ही बेहतर है।


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    মৌলবাদী সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে 5 ই আগস্ট কোলকাতায় মিছিল ও বাংলাদেশ হাইকমিশনে ডেপুটেশান
    বাংলাদেশ অগ্নিগর্ভ এবং ভারতবর্ষও নিরাপদ নয়,মানুষ নিরাপদ নয়,সব মানুষই এখন উদবাস্তু!
    বাংলাদেশ থেকে দু কোটি 39 লক্ষ সংখ্যালঘু মানুষের ঢল নামতে চলেছে ভারতবর্ষে এবং পরিস্থিতি ক্রমশঃ রাষ্ট্র ও আন্তর্জাতিক মনুষত্বের নিয়ন্ত্রণের বিরুদ্ধে চলে যাচ্ছে!
    ইজরায়েলর মত বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অনিবার্য হোমল্যান্ডের পরিস্থিতি তৈরি হচ্ছে,আমরা কি চাই?
    ধর্ম জাতি রাজনীতির উর্দ্ধে সংযত উদ্বাস্তু আন্দোলন সংগঠিত করা বেঁচে থাকার একমাত্র রাস্তা!
    পলাশ বিশ্বাস
    বাংলাদেশের স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী বলেন, ‘গুলশান হামলার আগে এ বিষয়ে সব ধরনের গোয়েন্দা তথ্য আমাদের কাছে ছিল। গোয়েন্দা তথ্য ছিল, গুলশান এলাকায় কিছু একটা ঘটতে পারে। এ কারণে আমাদের সব ধরনের প্রস্তুতি ছিল। এর পেছনে কারা, কারা এদের মদদ দিয়েছে, তা আমাদের জানা আছে।’---বাংলা ট্রিবিউন

    ঢাকায় 20 টি স্থানে জঙ্গী হামলার আশন্কা।ঠাকার বাইরে যে কোনো স্থানে এবং পশ্চিম বাংলা কি আসামেও চলতে পারে অবাধ স্নত্রাস যেহেতু ক্রমশঃ পরিস্থিতি রাষ্ট্রের নিয়ন্ত্রমের বাইরে চলে যাচ্ছে!

    শেখ হাসিনা সরকারের দাবি গুলশান হামলার যাবতীয়ত্থ্য তাঁদের জানা ছিল!

    তবু তাঁরা কিছুতেই আচকাতে পারছেন না অবাধ হত্যালীলা,ঘর্ষণ তান্ডব!

    ঠাকার বাইরে হামলার পূর্বাভাস নেই,যেমন ছিল না গুলশানেরও!সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে জাতীয়ঐক্যের দাবি বাংলাদেশেই অস্বীকৃত,আমাদেরই রক্ত মাংশের অংশীদার যারা,তাঁদের নিরাপত্তা নিয়ে না ভাবলে এই বাংলায়,এই ভারতবর্ষে আমাদের নিরাপত্তার কি হবে!

    সংখ্যালঘুদের হত্যা লীলা চলছে।
    চলছে ধর্ষণ।

    রাজনৈতিক হিংসা চরিতার্থে সফ্ট টারগেট সংখ্যালঘুরাই।
    রাজনৈতিক অস্থিরতার বলি আবার সেই সংখ্যালঘুরা।

    ভরতবর্ষ ও পৃথীবীর বিভিন্ন দেশের ঘটনাবলির প্রতিক্রিযার বলিও সংখ্যালঘুরা।
    সংখ্যালঘুদের বিরুদ্ধে সন্ত্রাসের অবসান না হলে,হত্যালীলা ও ধর্ষণ মহোত্সবের শেষ না হলে কতদিন প্রযন্ত বাংলাদেশে থাকতে পারবেন সংখ্যালঘুরা?
    সংখ্যালঘুরা তল্পিল্পা নিয়ে কাঁটাতারের এপারে চলে এলে বাংলা,আসমাম ও বাকী ভারতবর্ষের কি হবে ?
    এই পরিস্থিতির মোকাবিলার জন্যইমৌলবাদী সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে 5 ই আগস্ট কোলকাতায় মিছিল ও বাংলাদেশ হাইকমিশনে ডেপুটেশান!আসুন সবাই পথে নামি!বাঁচার ঠিকানা মিলবে পথেই!

    ভারতবর্ষের ভূগোল আর ইতিহাস বার বার বদল হয়েছে।ইতিহাসের পাতায় চোখ রাখলেই আমরা বুঝতে পারি যে পৃথীবীর সমস্ত প্রাচীন সভ্যতা ধ্বংস হলেও ভারতে সবসময় বিভিন্নতার মধ্যে সহিষ্ণুতা,ভ্রাতত্ব,একাত্মতা,সংস্কৃতি ও লোকসংস্কৃতির মাধ্যমে জাতি ব্যবস্থার অভিশাপ সত্বেও মানবতার স্বার্থে আমাদের পূর্বপুরুষদের ঐতিহ্যশালী জীবন দর্শন ও সংঘাতের পরিবর্তে মানবন্ধন ভারতকে রবীন্দ্রনাথের ভারত তীর্থ করে তুলেছে।মানুষের ধর্ম ,জাতি,আস্থা,সমাজ,রাজনীতি যাই হোক,মহাত্মা গৌতম বুদ্ধের ধম্ম ও পন্চশীল অনুশীলনে আজ অবধি নানা বিপর্যয় সত্বেও ভারতবর্ষ বেঁচে আছে। ভারতভাগের অত বড় বিপর্যয়ের পরও মানুষ আবার নিজের পায়ে দাঁড়াতে পেরেছে বা পারছে।ভূগোল বদলেছে রাজনীতি ও রাষ্ট্রের চরিত্র অনুযায়ী কিন্তু তাতে ভারতবর্ষের মৃত্যু হয়নি।

    মায়া,ইনকা,মিশরীয়,রোমান,গ্রীক,মেসাপোটামিয়ার বিপরীতে ভারতবর্ষে মোহনজো দোড়ো হড়প্পার সিন্ধু নগর সভ্যতার পতনের পরও হাজার হাজার বছরের মানববন্ধনই ভারতবর্ষকে আজও বাঁচিয়ে রেখেছে।আমাদের এি প্রজন্ম কি সেই ধারা অব্যাহত রাখতে পারবে,যখন সবকিছুই রাষ্ট্রের নিয়ন্ত্রণের বিরুদ্ধে চলে যাচ্ছে এবং আমরা দ্বংসের মুখোমুখি আজ।দশ দিগন্তে অশনিসংকেত।বিপর্যয়ের মোকাবিলার সমস্থ রাস্তা কিন্তু ভারতবর্ষের ঐতিহ্য রয়েছে।মীডিয়ার রং বেরং খবরাখবরের ফাঁকে আমরা যধি ভারতবর্ষের বিভিন্ন জনগোষ্ঠির ও বিভিন্ন ভাষার লোকসংস্কতিতে প্রাণভরে ডুব দিয়ে চোখ কুলে দেখি,মৃত্যুর মুখোমুখি জিয়নকাঠির সন্ধান না পাওয়ার কথা নয়।আমাদের পুন্শ্চ পুনরূত্থানের মোহ ত্যাগ করে ঐ লোক ঐতিহ্য ও লোকসংস্কৃতিকে জীবনযাপনের মূল আধার ও দর্শন মেনে নিয়ে এখনই বিপর্যয়ের মোকাবিলায় একতাবদ্ধ হতে হবে।

    পেরিসে নীস শহরে সন্ত্রাস হামলা,মক্কায় সন্ত্রাস,তুর্কিতে সৈন্য অভিযান পৃথীবীর নানা দেশে যুদ্ধ গৃহযুদ্ধ সেই সোভিয়েত পতনের পর অনিবার্য ঘচনাক্রম,যা ভারতবর্ষেও আমরা আশির ধশক থেকে পান্জাবে,কাশ্মীরে,আসামে,ত্রিপুরায় বার বার দেখেছি।রক্তপাত চলছেই।দশ দিগন্তে মনুষত্বের প্রাণ প্রকতির সমস্ত সম্পদ বিপর্যস্ত এবং লাগাতার লাগাতার নতুন নতুন রক্তনদীর উত্স খুলে যাচ্ছে আর আমরা সেই সমস্ত রক্তনদীর মোহানায় দাঁচিয়ে নিজেদের নিরাপদ মনে করছি।

    আমরা বিভিন্ন ভাষায় সারা বিশ্ব জুড়ে আত্মধ্বংসের এই সময়প্রবাহের চাক্ষুস প্রত্যক্ষদর্শী এবং আমাদের অস্তিত্ব বিপন্ন,সেই চেতনা অবলুপ্ত।

    ভারতবর্ষ সেদিনও পরাধীন ছিল।ইতিহাসের নিরিখে স্বাধীনতার এই সাত দশক অত্যন্ত ছোট একটি কালখন্ড।কিন্তু পলাশীর যুদ্ধের পর সামন্তবাদ ও সাম্রাজ্যবাদের বিরুদ্ধে অখন্ড বাংলাই আদিবাসী কৃষক বিদ্রোহের নিরন্তর যুদ্ধভূমি চুয়াড় বিদ্রোহ থেকে তেভাগা পর্যন্ত।স্বাধীনতার আগে বাংলা এবং পান্জাব স্বাধীনতার জন্য যত রক্ত দিয়েছে,স্বাধীনতার বলিকাঠে যত প্রাণ দিয়েছে,সারা পৃথীবীর ইতিহাসে তার তুলনা নেই।তারপরও মাতৃভাষা ও স্বাধীনতার জন্য দ্বিধা বিভক্ত বাংলাক ওপার যত রক্ত ,যত প্রাণ দিয়ে স্বাধীন বাংলাদেশ গঠন করেছে,ইতিহাসে তারও কোনো দ্বিতীয় নজির নেই।

    স্বাধীনতার বলি ভারতেভাগের ফলে সেই বাংলা এবং পান্জাব।স্বাধীনতার পর বাঙালি হিন্দু শরণার্থীরা ভারতবর্ষের বিভিন্ন রাজ্যে ছড়িয়ে ছিটিয়ে,মাতৃভাষা হারা ,পরিয়হীন বেনাগরিক জীবন যাপল করছেন- এমন মানুষের সংখ্যা পাঁচ কোটি এবং পশ্চিম বাংলায়  নকোটি জনসংখ্যার মধ্যে যারা বাঙালি,তাঁদের অর্ধেকের পরিচয় এখনো বাহাল তকমা ঘুচে গেলে ও সেই উদ্বাস্তু বেনাগরিক।মধ্যপ্রাচ্যে ও আফ্রিকায় যে শরণার্থীর ছল দেখা যাচ্ছে,তার চেয়ে অনেক বেশি সংখ্যক বাঙালি উদ্বাস্তু এই বাংলায় এবং ভারতবর্ষের প্রায় সব রাজ্যেই নাগরিক ও মনবিক অধিকার,জীবিকা ও নাগরিকত্ব বন্চিত রেল লাইনের ধারে,গ্রাম ও শহরের বাইরে,নদী ও ঝিলের পারে,নগর মহাগরের ফুটপথে কোনো ক্রমে দিন যাপন করছে।

    বাংলার বাইরে পাঁচ কোটি ও বাংলায় তিন কোটি এই ছন্নছাড়া ভিটেহারা মুখছাড়া কবন্ধ নামানুষের মহামিছিলে শামিল হওয়ার জন্য মুখিয়ে আছে বাংলাদেশে এখনো থেকে যাওয়া দু কোটি উনচল্লিশ  লক্ষ মানুষ।

    বাংলাদেশর অগ্নগর্ভ অবস্থার উন্নতি না হলে,বাংলা ও আসামে আবার মহাবিপর্যয়।যাদের পুনর্বাসন,নাগরিকত্ব ও সংরক্ষণ আজও হয়নি,তাঁদের সঙ্গে বাংসলাদেশের সংখ্যালঘু যোগ হলে পরিস্থিতি ভারত সরকার,পশ্চিম বঙ্গ,আসাম,ত্রিপুরা সরকার তে বটেই ভারতবর্ষের কোনো রাজ্যের নিয়ন্ত্রনের বাইরে চলে যাবে।

    বাংলাদেশ এখন যেভাবে মৌলবাদীদের দখলে,সেই ভাবেই আসমাম বাংলা সহ ভারতবর্ষের বিভিন্ন রাজ্যও দখল করার মরিয়া আত্মঘাতী প্রচেষ্টা চালাচ্ছে আন্তর্জাতিক মৌলবাদী সন্ত্রাস বাদী শক্তিগুলো।
    সন্ত্রাসের জবাব সন্ত্রাস হতে পারে না।
    হিংসার জবাব হিংসা হতে পারে না।
    মৌলবাদের জবাব মৌলবাদ হতে পারে না।

    ভারতবর্ষের ইতিহাসে বার বার বিপর্যয়ের মুখোমুখি হয়ে দেশকে বিপদের ,ধ্বংসের থেকে বাঁচিয়ে রাখার অনেক প্রসঙ্গ পাতায় পাতায় আছে।এই ইতিহাসের দৌলতে আজও ভারতবর্ষ বেঁচে আছে।আমরাও বেঁচে বর্তে আছি।ইতিহাসের সেই ধারাকে অব্যাহত রাখতে পারলেই আমাদের সন্তানরা দুধে ভাতে না হোক কোনোক্রমে বেঁচে বর্তে থাকতে পারে।

    ভবিষ্যতেে শিশুরা জন্মাবে,তাঁদের জন্যএই পৃথীবীকে আরো সুন্দর করে গড়ে তুলতে না পারলেও,পৃথীবী,ভারতবর্ষ ও সভ্যতা কে বাঁচিয়ে রাখার জন্য লোকসস্কৃতি ও ইতিহাসের মানববন্ধনকে অক্ষুন্না রাখার কাজটা আমদের করতেি হবে।

    বাংলাদেশের পরিস্থিতি না বদলালে সীমান্তে কাঁটাতারের বেড়া যতই মজবুত করুন,যতই সীমান্ত সীল করুন,যতই নিরাপত্তা বেস্টনী তৈরি করুন,বাংলাদেশের মরণাসন্ন দু কোটি উনত্রিশ লক্ষ সংখ্যালঘুদের উদ্বাস্তু ঢল নামছেই।

    তেমন অবস্থা হলে,পূর্ববঙ্গের মুলনিবাসী দশ কোটিরও বেশি মানুষের বেঁচে থাকার জন্য এই মহাদেশে বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য হোমল্যান্ড ছাড়া কোনো বিকল্প আর থকবে না৤একই সঙংগে হাজার হাজার মরিচঝাঁপির জন্য প্রস্তুত হওয়ার অশনিসংকেত যারা বুঝতে পারছেন না,তাঁরো আদৌ বাঙালি কিনা সন্দেহের অবকাশ থেকে যাচ্ছে।

    মৌলবাদী সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে 5 ই জুলাই কোলকাতায় মিছিল ও বাংলাদেশ হাইকমিশনে ডেপুটেশান।আমরা ঔদিন দলে দলে রাস্তায় বেরোব।বাংলা,আসাম,ত্রিপুরা ও ভারতবর্ষকে বাঁচনোর তাকীদ যাদের আছে,মনুষত্ব ও সভ্যতার পক্ষে যারা,তাঁরাও ঐ মিছিলে যোগ দেবেন,এই আমাদের আহ্বান।

    বাংলাদেশ অগ্নিগর্ভ এবং ভারতবর্ষও নিরাপদ নয়,মানুষ নিরাপদ নয়,সব মানুষই এখন উদবাস্তু।উদ্বাস্তু সমস্যার সমাধান না হলে,যারা এই মুহুর্তে উদ্বাস্তি নন.তাঁদের নিযতিও রবিঠঠাকুর লিখে গিয়েছেনঃ হে মোর দুর্ভাগা দেশ,যাদের করেছো অপমান--

    বাংলাদেশ থেকে দু কোটি 39 লক্ষ সংখ্যালঘু মানুষের ঢল নামতে চলেছে ভারতবর্ষে এবং পরিস্থিতি ক্রমশঃ রাষ্ট্র ও আন্তর্জাতিক মনুষত্বের নিয়ন্ত্রণের বিরুদ্ধে চলে যাচ্ছে।

    ইজরায়েলর মত বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অনিবার্য হোমল্যান্ডের পরিস্থিতি তৈরি হচ্ছে,আমরা কি চাই?

    ধর্ম জাতি রাজনীতির উর্দ্ধে সংযত উদ্বাস্তু আন্দোলন সংগঠিত করা বেঁচে থাকার একমাত্র রাস্তা!

    ভারত সরকারে নিযন্ত্রেণের বাইরে চলে যাচ্ছে পরিশ্তি ক্রমশচ যেমন ইতি মধ্যে জুলাই মাসের প্রথম সপ্তাহে সংঘটিত গুলশান ও কিশোরগঞ্জের  জঙ্গি হামলার ঘটনায় বিদেশিসহ ৩০ জন নিহত হওয়ার পর যুক্তরাষ্ট্রের পররাষ্ট্র মন্ত্রণালয়ের দক্ষিণ ও মধ্য এশিয়াবিষয়ক সহকারী পররাষ্ট্রমন্ত্রী নিশা দেশাই বিসওয়াল ঢাকা পৌঁছান। তিনি রবিবার মার্কিন প্রেসিডেন্ট বারাক ওবামা ও পররাষ্ট্রমন্ত্রী জন কেরির পক্ষ থেকে সন্ত্রাসবাদ এবং চরমপন্থার বিরুদ্ধে বাংলাদেশের লড়াই এ যুক্তরাষ্ট্রের সহযোগিতা ও সমর্থনের প্রস্তাব নিয়ে আসেন।  

    ইতিমধ্যে বাংলাদেশে জাতীয় ঐক্যের ব্যাপারে সরকারের অস্বীকৃতির কারণে দেশকে আরো চরম মূল্য দিতে হতে পারে বলে মন্তব্য করেছেন বিএনপি নেতা নজরুল ইসলাম খান। অন্যদিকে ক্ষমতা হারানোর ভয়ে সন্ত্রাস ও জঙ্গিবাদ মোকাবেলায় জাতীয় ঐক্য গঠনে সরকার সায় দিচ্ছে না বলে অভিযোগ বিএনপির স্থায়ী কমিটির সদস্য আ স ম হান্নান শাহের।
    বাংলাদেশ জাতীয় প্রেসক্লাবে এক আলোচনায় বিএনপি নেতা আ স ম হান্নান শাহ বলেন, যারা ভোট ডাকাতি করে ক্ষমতায় বসেছে তাদের দ্বারা জঙ্গীবাদ সন্ত্রাসবাদ নির্মূল সম্ভব নয়।গুলশানের ঘটনা দিয়ে প্রমাণ হয়েছে সেনাবাহিনী বাদে অন্য কোন বাহিনী সন্ত্রাস দমন করতে পারবে না। এমন পরিস্থিতিতে বেগম জিয়া জঙ্গিবাদ নির্মূলে জাতীয় ঐক্যের ডাক দিয়েছেন। জাতীয় ঐক্যের ডাকে সরকারের সম্মতি দেয়ার দায়িত্ব থাকলেও তারা তা করেনি। বরং ঐক্যের ডাক নিয়ে সরকার এখন উপহাস করছে।
    জঙ্গিবাদ-সন্ত্রাস রুখতে জাতীয় ঐক্য তৈরি হয়ে গেছে মন্তব্য করে বাংলাদেশের প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা বলেছেন, গুলশান হত্যাকাণ্ডে এমন সব তথ্য আসছে যা তাজ্জব হওয়ার মতো। আন্তর্জাতিক অঙ্গনে সরকারের তৈরি ভাবমূর্তি গুলশান হত্যাকান্ডের কারণে ক্ষুন্ন হয়েছে বলেও মন্তব্য করেন প্রধানমন্ত্রী।
    মঙ্গোলিয়ায় সফর নিয়ে রবিবার বিকালে গণভবনে সংবাদ সম্মেলন করেন প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা। দুই পৃষ্ঠার লিখিত বক্তব্যে, সন্ত্রাস ও জঙ্গিবাদের বিরুদ্ধে বাংলাদেশের জিরো টলারেন্স অবস্থানের কথা আসেম নেতাদের কাছে পুনর্ব্যক্ত করেছেন বলে জানান তিনি। তুরস্কের জনগণের উদাহরণ টেনে তিনি বলেন, আওয়ামী লীগ সরকার সবসময়ই অসাংবিধানিকভাবে ক্ষমতা দখলের বিরুদ্ধে। পরে সাংবাদিকদের প্রশ্নের উত্তরে শেখ হাসিনা বলেন, নিজের জীবন হুমকিতে রেখেও গুলশান হত্যাকাণ্ডের বিষয়টি সরকার সর্বোচ্চ গুরুত্ব দিয়ে দেখছে।
    নিশা দেশাই ঢাকায় প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা, পররাষ্ট্রমন্ত্রী এএইচ মাহমুদ আলী, স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী আসাদুজ্জামান খাঁন কামাল, প্রধানমন্ত্রীর আন্তর্জাতিক বিষয়ক উপদেষ্টা গওহর রিজভীসহ অন্যান্য উচ্চপদস্থ কর্মকর্তাদের সঙ্গে বৈঠক করেন।
    এ প্রসঙ্গে সরকারের একজন সিনিয়র কর্মকর্তা বলেন, প্রতিটি বৈঠকে নিশা সন্ত্রাসবাদ ও উগ্রবাদ দমনে বাংলাদেশ ভবিষ্যতে কী কী পদক্ষেপ গ্রহণ করবে, সে সম্পর্কে জানতে চেয়েছেন। নিশা দেশাই বাংলাদেশকে জানিয়ে গেছেন, যুক্তরাষ্ট্র সন্ত্রাসবাদ দমনে বাংলাদেশকে প্রয়োজনীয় সব ধরনের সহযোগিতা দেবে।
    ওই কর্মকর্তা আরও বলেন, বাংলাদেশের নিরাপত্তা ব্যবস্থার সঙ্গে যুক্ত হয়ে সন্ত্রাসবাদ ও উগ্রবাদ দমনে বাংলাদেশকে সহায়তা দিতে চায় যুক্তরাষ্ট্র।
    বাংলাদেশী দৈনিক জনকন্ঠের খবরঃ
    প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা জঙ্গীবাদ ও সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে যার যার অবস্থান থেকে সবাইকে ভূমিকা রাখার জন্য দেশবাসীর প্রতি উদাত্ত আহ্বান জানিয়েছেন। সন্ত্রাস-জঙ্গীবাদের বিরুদ্ধে জাতীয় ঐক্য প্রসঙ্গে তিনি বলেন, যাদের সঙ্গে ঐক্য করলে জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ নির্মূল করা যাবে, সেই জনগণের সঙ্গে ইতোমধ্যেই জাতীয় ঐক্য হয়ে গেছে। দেশের জনগণই বিপথগামীদের খুঁজে বের করে বিচারের মুখোমুখি দাঁড় করবে। যারা অগ্নিসন্ত্রাস করেছে, মানুষকে পুড়িয়ে হত্যা করেছে, যারা যুদ্ধাপরাধীÑ তাদের কথা আলাদা। তারা সর্প হয়ে দংশন করে ওঝা হয়ে ঝাড়তে চায়। তিনি ধর্মের নামে যারা তরুণদের জঙ্গীবাদে উস্কানি দিচ্ছে, অর্থ-অস্ত্র দিচ্ছে, মদদ দিচ্ছেÑ তাদের খুঁজে বের করতে দেশবাসীসহ বিশ্ব নেতৃবৃন্দকে তথ্য দিয়ে সহযোগিতা করারও আহ্বান জানান।
    রবিবার বিকেলে গণভবনে জনাকীর্ণ সংবাদ সম্মেলনে একাধিক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী এ আহ্বান জানান। জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ মোকাবেলায় সরকারের অনুসৃত ‘জিরো টলারেন্স’ অবস্থানের কথা পুনর্ব্যক্ত করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, ‘শুধু বাংলাদেশ নয়, জঙ্গীবাদ এখন বৈশ্বিক সমস্যা হয়ে দাঁড়িয়েছে। আমরা নিরলসভাবে সারাবিশ্বে দেশের ভাবমূর্তি একটি সম্মানজনক অবস্থানে নিয়ে গিয়েছিলাম। কিন্তু গুলশানে হামলার ঘটনা আমাদের কিছুটা হলেও প্রশ্নের মুখে ফেলেছে। ভাবমূর্তি কিছুটা হলেও ক্ষুণœ হয়েছেÑ এটাই হচ্ছে সবচেয়ে দুর্ভাগ্যজনক।’ গুলশানে হামলার তদন্ত প্রসঙ্গে তিনি বলেন, ‘এই জঙ্গী হামলার ঘটনার তদন্ত হচ্ছে। কিছু সময় অপেক্ষা করুন। তদন্তের স্বার্থে সবকিছু বলাও যায় না। তবে যে তথ্য আসছেÑ তাজ্জব হয়ে যাওয়ার মতো। তদন্ত শেষে সবকিছু বুঝতে পারবেন সবাই।’ প্রধানমন্ত্রী এ সময় তদন্তাধীন বিষয় নিয়ে বেশি খোঁচাখুঁচি না করার জন্যও আহ্বান জানান।
    এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, সন্ত্রাস ও জঙ্গীবাদের মূল চিন্তা-চেতনার উৎস খুঁজে বের করতে হবে। একই সঙ্গে জঙ্গী ও সন্ত্রাসের মদদদাতা, অর্থদাতা, প্রশিক্ষণদাতা, যারা পরামর্শ দিচ্ছে বা অস্ত্র সরবরাহ করছে তাদের খুঁজে করে যথাযথ ব্যবস্থা গ্রহণ করতে হবে। এ ধরনের ঘটনার পুনরাবৃত্তি রোধে বাংলাদেশ সব ধরনের ব্যবস্থা গ্রহণ করেছে। তিনি বলেন, আতঙ্ক সৃষ্টি করাই ছিল গুলশানে হামলার উদ্দেশ্য। তবে মানুষের জীবন চলমান, জীবন থেমে থাকে না।
    যারা ধর্মের নামে তরুণদের জঙ্গীবাদে জড়াতে উস্কানি দিচ্ছে তাদের চিহ্নিত করার ওপর গুরুত্বারোপ করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, বাংলাদেশ সব সময় সন্ত্রাসবিরোধী, জঙ্গীবাদবিরোধী। বাংলাদেশের মানুষকে সব সময় এর বিরুদ্ধে সচেতন থাকতে হবে। যার যার অবস্থান থেকে এর বিরুদ্ধে অবস্থান নিতে তিনি দেশবাসীর প্রতি আহ্বান জানিয়ে বলেন, যাদের কোন অভাব নেই, উচ্চবিত্ত পরিবারের সন্তান, তারাই এখন জঙ্গীবাদে জড়াচ্ছে। যেখানে তাদের কোনকিছুই অপূরণীয় থাকে না, সেখানে কেন তারা এটা করছে! তারা এখন বেহেশতের হুর-পরী পাওয়ার জন্য ব্যস্ত হয়ে পড়েছে।
    যারা ধর্মের দোহাই দিয়ে জঙ্গী কর্মকা- চালাচ্ছে তাদের উদ্দেশ করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, মানুষ খুন করলে বেহেশতের দরজা খোলে না। যারা নিরীহ মানুষকে হত্যা করে তারা কোনদিনই বেহেশতে যেতে পারবে না। তবে কারা এসব তরুণকে মিথ্যা বলে বিভ্রান্ত করছে, পেছন থেকে উস্কানি দিচ্ছে, জঙ্গীবাদে মদদ দিচ্ছেÑ এদের খুঁজে বের করতেই হবে। এই তরুণদের কারা অস্ত্র দিচ্ছে, কারা অর্থ যোগাচ্ছে, তাদের তথ্য সম্মিলিতভাবে খুঁজে বের করতে হবে। তিনি বলেন, সেদিন বেশি দূরে নয়, দেশের সব মানুষ এদের বিরুদ্ধে সোচ্চার হবে। সন্ত্রাস-জঙ্গীবাদের বিরুদ্ধে জনগণকে সজাগ ও সতর্ক থাকতে হবে। যার যার অবস্থান থেকে এদের বিরুদ্ধে পদক্ষেপ নিতে হবে।
    মঙ্গোলিয়ার উলানবাটোরে সাম্প্রতিক এশিয়া-ইউরোপ (আসেম) শীর্ষ সম্মেলনের অভিজ্ঞতা তুলে ধরতে এ সংবাদ সম্মেলনের আয়োজন করা হলেও প্রশ্নোত্তর পর্বে সাংবাদিকদের প্রশ্নগুলো ঘুরেফিরেই আসে সম্প্রতি গুলশানে জঙ্গী হামলার ঘটনা প্রসঙ্গে। প্রধানমন্ত্রী দৃঢ়তার সঙ্গেই সাংবাদিকদের এ সংক্রান্ত প্রশ্নের উত্তর দেন। সংবাদ সম্মেলনে প্রধানমন্ত্রীর সঙ্গে মঞ্চে উপস্থিত ছিলেনÑ আওয়ামী লীগের সাধারণ সম্পাদক ও জনপ্রশাসনমন্ত্রী সৈয়দ আশরাফুল ইসলাম, সভাপতিম-লীর সদস্য এ্যাডভোকেট সাহারা খাতুন, পররাষ্ট্রমন্ত্রী এ এইচ এম মাহমুদ আলী, তথ্যমন্ত্রী হাসানুল হক ইনু, প্রধানমন্ত্রীর তথ্য উপদেষ্টা ইকবাল সোবহান চৌধুরী ও পররাষ্ট্র প্রতিমন্ত্রী শাহরিয়ার আলম। এছাড়াও সরকারের একাধিক মন্ত্রী, প্রধানমন্ত্রীর উপদেষ্টা, আওয়ামী লীগ নেতৃবৃন্দ, সংসদ সদস্যবৃন্দ এ সময় উপস্থিত ছিলেন।
    দেশের ভাবমূর্তি ক্ষুণœ করতেই এ হামলা ॥ আরও হামলা হতে পারেÑ প্রধানমন্ত্রীর এমন সাম্প্রতিক মন্তব্যের প্রতি দৃষ্টি আকর্ষণ করে এক সাংবাদিক জানতে চান এ বিষয়ে সরকারের কাছে কোন তথ্য আছে কিনা? জবাবে প্রধানমন্ত্রী জঙ্গীবাদকে একটি বৈশ্বিক হুমকি হিসেবে চিহ্নিত করে বলেন, একবার যখন ঘটেছে, এরা তো বসে থাকবে না। ক্রমাগত হুমকি দিচ্ছে। তবে জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ অত্যন্ত কঠোরভাবে দমনে সরকার কাজ করে যাচ্ছে। এদের বিরুদ্ধে দেশের মানুষ আজ জেগে উঠেছে।
    তিনি বলেন, হামলার কয়েক দিনের মধ্যে সারাদেশে জঙ্গী-সন্ত্রাসীদের বিরুদ্ধে এমন জাগরণ সৃষ্টি পৃথিবীর কোন দেশই করতে পারেনি। মাত্র দুই দিনে আটটি বিভাগের ৬৪ জেলার বিভিন্ন শ্রেণী-পেশার মানুষের সঙ্গে আমি টেলিকনফারেন্সের মাধ্যমে মতবিনিময় করেছি। সারাদেশের গ্রামপর্যায় পর্যন্ত জঙ্গীবাদবিরোধী কমিটি গঠন করা হচ্ছে। প্রশাসনের পাশাপাশি দেশের জনগণই বিপথগামীদের খুঁজে বের করে বিচারের মুখোমুখি করবে।
    অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, বাংলাদেশ সবদিক থেকে এগিয়ে যাচ্ছে। বিশ্বমন্দার মধ্যেও দেশের প্রবৃদ্ধি ৬ ভাগ থেকে ৭ ভাগে উন্নীত করেছি। শুধু ব্যক্তিস্বার্থের কারণে বিশ্বব্যাংক পদ্মা সেতুর অর্থায়ন বন্ধ করে দিয়েছিল। কিন্তু সততার সঙ্গে দেশ পরিচালনা করছি বলেই আমরা চ্যালেঞ্জ নিয়ে নিজস্ব অর্থায়নে পদ্মা সেতু নির্মাণ করছি। বাংলাদেশকে বিশ্বের কাছে আমরা যখন সম্মানজনক অবস্থানে এনেছি, বাংলাদেশ যখন বিশ্বের কাছে উন্নয়নের রোলমডেল হিসেবে পরিচিতি লাভ করেছে, ঠিক তখনই দেশের ভাবমূর্তি ক্ষুণœ করতেই গুলশানে হামলার ঘটনা ঘটানো হয়েছে।
    এ প্রসঙ্গে প্রধানমন্ত্রী আরও বলেন, বাংলাদেশ সব সময় ভিক্ষার ঝুলি নিয়ে চলবে এটা যারা চায়, কিছু পদলেহনকারী ও চাটুকাররা কাউকে ক্ষমতায় বসাতে চায়, যারা চায়নি ২০১৪ সালের নির্বাচন হোকÑ তারাই নানা কর্মকা- ঘটাচ্ছে। আগে সারাবিশ্বের কাছে আমরা মাথা উঁচু করে কথা বলতে পারতাম। এটা যাতে না পারি সেজন্যই গুলশানের জঘন্য ঘটনা ঘটানো হয়েছে। আমরা দেশকে যে সম্মানজনক অবস্থানে নিয়ে গিয়েছিলাম, সেখানে এ ঘটনা ঘটিয়ে যেন একটা ছেদ এনে দিল।
    জাতীয় ঐক্য হয়ে গেছে ॥ গুলশানে হামলার পর কিছু রাজনৈতিক দল ও নাগরিক সমাজের পক্ষ থেকে জাতীয় ঐক্যের কথা বলা হচ্ছে। এ বিষয়ে এক সাংবাদিক প্রধানমন্ত্রীর অবস্থান জানতে চাইলে তিনি জানান, এ বিষয়ে ইতোমধ্যে জাতীয় ঐক্য হয়ে গেছে। জঙ্গী ও সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে দেশের জনগণ একতাবদ্ধ হয়েছে। জাতীয় ঐক্যের সৃষ্টি হয়েছে। গ্রামে গ্রামে কমিটি হচ্ছে। সর্বস্তরের মানুষ সচেতন হয়ে উঠেছে। এখন ঈদের নামাজে সনাতম ধর্মের যুবকরা পাহারা দিচ্ছে। এটা অসাম্প্রদায়িক বাংলাদেশের জন্য অভূতপূর্ব অর্জন। বিএনপি-জামায়াতের প্রতি ইঙ্গিত করে তিনি বলেন, যারা অগ্নিসন্ত্রাস করেছে, মানুষ পুড়িয়ে হত্যা করেছে, যারা যুদ্ধাপরাধীÑ তারা ছাড়া দেশের জনগণ জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে রূখে দাঁড়িয়েছে। কিছু পক্ষ আছে তারা সর্প হয়ে দর্শন করে ওঝা হয়ে ঝাড়তে চায়।
    জঙ্গী হামলা নতুন নয় ॥ অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, গুলশানের জঙ্গী হামলা বাংলাদেশে নতুন নয়। ২১ আগস্ট গ্রেনেড হামলার শিকার আমি নিজেই হয়েছি। ’৮১ সালে দেশে ফেরার পর থেকেই আমার ওপর একের পর এক হামলা হয়েছে। গাড়ি চালিয়ে ফ্রান্সে বহু মানুষ হতাহতের ঘটনা তুলে ধরে তিনি বলেন, এরকম ঘটনা আমাদের দেশেও হয়েছে। জিয়াউর রহমানের আমলে আমাদের মিছিলের ওপর গাড়ি চালিয়ে অনেক নেতাকর্মীকে হত্যা করা হয়েছিল। এরশাদ সরকারের আমলেও ট্রাক তুলে দিয়ে আমাদের নেতাকর্মীদের হত্যা করা হয়েছে।
    প্রধানমন্ত্রী বলেন, বিএনপি-জামায়াত জোট সরকারের আমলে ‘মরলে শহীদ, বাঁচলে গাজী’, ‘বৃষ্টির মতো গুলি কর’Ñ প্রকাশ্য এ স্লোগান দিয়ে কারা আওয়ামী লীগের মিছিলের ওপর গুলিবর্ষণ করে আমাদের নেতাকর্মীদের হত্যা করেছিল, সে কথা দেশবাসী ভুলে যায়নি। নির্বাচন প্রতিহত এবং অবরোধের নামে প্রকাশ্য পেট্রোলবোমা মেরে পুড়িয়ে অসংখ্য মানুষকে হত্যা করা হয়েছে। মসজিদ-মন্দির-প্যাগোডা-গীর্জা সবখানে হামলা চালানো হয়েছে, কোরান শরিফ পর্যন্ত পুড়িয়ে দিয়েছিল তারা। আমরা সবকিছু মোকাবেলা করেই দেশকে উন্নয়ন-অগ্রগতির সোপানে নিয়ে যাচ্ছি। ঠিক তখনই আবারও গুলশানে হামলার ঘটনা হলো। তবে সন্ত্রাস-জঙ্গীবাদ মোকাবেলা করতে যা যা করার সরকার থেকে তার সবই করা হবে।
    অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, গুলশানে হামলার পর বিশ্বের অনেক দেশই আমাদের সহযোগিতা করতে চেয়েছে। শুধু বাংলাদেশই নয়, অনেক উন্নত দেশও জঙ্গীবাদের হামলায় আক্রান্ত হচ্ছে। সেজন্য এ সমস্যা মোকাবেলায় বিশ্বের সব দেশকেই একে অপরকে সহযোগিতা করতে হবে। মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের সহকারী পররাষ্ট্রমন্ত্রীর সঙ্গে বৈঠকে আমি জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে গোয়েন্দা তথ্য দিয়ে সহযোগিতা করার আহ্বান জানিয়েছি। কারণ এটি এখন বৈশ্বিক সমস্যা হয়ে দাঁড়িয়েছে। কারা জঙ্গীবাদ সৃষ্টি করছে, অস্ত্রের ডিলার কারা, কারা মদদ দিচ্ছেÑ সবকিছুই সম্মিলিতভাবে খুঁজে বের করতে হবে।
    ভারতীয় এক সাংবাদিকের প্রশ্নের জবাবে শেখ হাসিনা বলেন, গুলশানে হামলার পর আমরা সম্মান হারাইনি। ভারত, পাকিস্তান, যুক্তরাষ্ট্র, ফ্রান্সসহ বিশ্বের অনেক দেশই আক্রান্ত হচ্ছে। তবে আমার কষ্ট লেগেছে, জীবনের ঝুঁকি নিয়ে কষ্ট করে যখন সবদিক থেকে দেশকে এগিয়ে নিয়ে যাচ্ছি, সম্মানজনক অবস্থানে নিয়ে গেছিÑ তখনই এ হামলা চালিয়ে ভাবমূর্তি ক্ষুণœ করার চেষ্টা করা হলো। তিনি বলেন, জঙ্গীবাদের বিরুদ্ধে সারাদেশেই প্রতিরোধ গড়ে উঠছে। দেশের জনগণের মধ্যে ব্যাপক গণসচেতনতা সৃষ্টি করছি। দেশের কোন মানুষই জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ দেখতে চায় না। এর বিরুদ্ধে সারাবিশ্বকে নাড়া দিয়েছে। শুধু নাড়া দিচ্ছে না মুষ্টিমেয় গোষ্ঠী, যারা এসব ঘটনা ঘটাচ্ছে তাদের বিবেককে। তাই কারা এসব ঘটাচ্ছে, কাদের সন্তানরা বিপথে পা দিচ্ছে, তা জনগণের সচেতনতার মাধ্যমেই খুঁজে বের করা হবে।
    তিনি বলেন, জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে দেশের সকল মানুষকে একত্রিত ও তাদের চেতনাকে জাগ্রত করতে পেরেছি, যা বিশ্বের অনেক দেশই পারেনি। তবে দুঃখ লাগে একজন শিক্ষক হয়ে ছাত্রকে কিভাবে মৃত্যুর মুখে ঠেলে দেয়। জঙ্গী বানায়। তদন্ত প্রসঙ্গে অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, কিছু ঘটলে কী এত দ্রুত সবকিছু তদন্ত শেষ করা যায়। আমি নিজেই তো ভুক্তভোগী। বাবা-মা, ভাই, পরিবারের সদস্যদের হত্যার বিচার পাওয়ার জন্য আমাকে ৩৫ বছর অপেক্ষা করতে হয়েছে। এখনকার মতো তখন তো অনেককে এজন্য এত সোচ্চার হতে দেখিনি। জীবনের ঝুঁকি নিয়ে একে একে সব হত্যাকা-ের বিচার করছি।
    আলোচনা ও ঐক্য হলেই সন্ত্রাস বন্ধ হবেÑ বিএনপি নেতাদের এমন বক্তব্য সম্পর্কে অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, তাদের (বিএনপি-জামায়াত) সঙ্গে আলোচনা করলে সব সন্ত্রাস-জঙ্গী হামলা বন্ধ হবে, না করলে তারা এসব কর্মকা- চালিয়েই যাবেনÑ এটাই কী তারা বলতে চাচ্ছেন? অনেক শীর্ষ জঙ্গীদের বিচার বছরের পর বছর আটকে থাকা প্রসঙ্গে অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, অনেক ফাঁসির দ-প্রাপ্ত শীর্ষ জঙ্গীর বিচার ঝুলে আছে, এটা সত্যিই দুঃখজনক। এদের বিচার হলে একটি দৃষ্টান্ত সৃষ্টি হতো। এখন যারা এসব কর্মকা-ে জড়িত তারা বুঝতে পারতÑ এসব করলে কঠোর শাস্তির মুখোমুখি তাদেরও হতে হবে।
    ওদেরকেও খুঁজছে পরিবার
    নতুন সাত নিখোঁজ ব্যক্তির সন্ধান চেয়েছে তাদের উৎকণ্ঠিত পরিবার। এরমধ্যে তিনজন নারী ও চারজন পুরুষ। গুলশানে হামলাকারীদের কয়েক মাস ধরে নিখোঁজ থাকার পর জঙ্গি তত্পরতায় জড়িয়ে পড়ার খবর পেয়ে এই সা
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    আ.লীগের দু'গ্রুপে গোলাগুলি, বোমায় বোমায় রণক্ষেত্র ঈশ্বরদী

    ঈশ্বরদীতে আওয়ামী লীগের দুই গ্রুপে ব্যাপক সংঘর্ষ হয়েছে। এসময় গোলাগুলি, বোমা বিস্ফোরণ ও ব্যাংক রোস্তরাঁয় হামলা চালিয়ে ভাঙচুর করা হয়েছে। এতে রণক্ষেত্রে পরিণত হয় গোটা পৌর এলাকা। রোববার বিকে
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    ‘সরকারি খুতবা’ প্রত্যাখ্যান করলো হেফাজত, কড়া ভাষায় প্রতিবাদ
    চট্টগ্রাম ইসলামিক ফাউন্ডেশন আহুত দেশব্যাপী জুমার নামাযের খুতবা প্রত্যাখ্যান করেছে ঈমান-আক্বীদাভিত্তিক অরাজনৈতিক সংগঠন হেফাজতে ইসলাম বাংলাদেশ। এ খুতবাকে ধর্মীয় বিষয়ে সরকারের অবৈধ হস্ত
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    'মেয়ে আমাকে বলেছিল, জঙ্গি কর্মকাণ্ড নিয়ে বিশ্ববিদ্যালয়ে গ্রুপ সিটিং হয়'
    বেসরকারি বিশ্ববিদ্যালয়ের কিছু শিক্ষার্থীর জঙ্গি কর্মকাণ্ডে জড়িয়ে পড়ার কথা মেয়ের মুখে শুনলেও…
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    জঙ্গিবিরোধী সভা করে ফেরার পথে সাবেক এমপির গাড়ি ভাঙচুর
    জঙ্গি ও সন্ত্রাস বিরোধী কমিটি গঠনে মতবিনিময় সভা করে ফেরার পথে মানিকগঞ্জ-১ আসনের সরকার দলীয় সাবেক সংসদ সদস্য এবিএম আনোয়ারুল হকের গাড়ির ওপর হামলা করা হয়েছে। এতে গাড়ি…
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    মৌলবাদী সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে 5 ই আগস্ট কোলকাতায় মিছিল ও বাংলাদেশ হাইকমিশনে ডেপুটেশান

    বাংলাদেশ অগ্নিগর্ভ এবং ভারতবর্ষও নিরাপদ নয়,মানুষ নিরাপদ নয়,সব মানুষই এখন উদবাস্তু!

    বাংলাদেশ থেকে দু কোটি 39 লক্ষ সংখ্যালঘু মানুষের ঢল নামতে চলেছে ভারতবর্ষে এবং পরিস্থিতি ক্রমশঃ রাষ্ট্র ও আন্তর্জাতিক মনুষত্বের নিয়ন্ত্রণের বিরুদ্ধে চলে যাচ্ছে!

    ইজরায়েলর মত বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অনিবার্য হোমল্যান্ডের পরিস্থিতি তৈরি হচ্ছে,আমরা কি চাই?

    ধর্ম জাতি রাজনীতির উর্দ্ধে সংযত উদ্বাস্তু আন্দোলন সংগঠিত করা বেঁচে থাকার একমাত্র রাস্তা!

    পলাশ বিশ্বাস

    বাংলাদেশের স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী বলেন, 'গুলশান হামলার আগে এ বিষয়ে সব ধরনের গোয়েন্দা তথ্য আমাদের কাছে ছিল। গোয়েন্দা তথ্য ছিল, গুলশান এলাকায় কিছু একটা ঘটতে পারে। এ কারণে আমাদের সব ধরনের প্রস্তুতি ছিল। এর পেছনে কারা, কারা এদের মদদ দিয়েছে, তা আমাদের জানা আছে।'---বাংলা ট্রিবিউন


    ঢাকায় 20 টি স্থানে জঙ্গী হামলার আশন্কা।ঠাকার বাইরে যে কোনো স্থানে এবং পশ্চিম বাংলা কি আসামেও চলতে পারে অবাধ স্নত্রাস যেহেতু ক্রমশঃ পরিস্থিতি রাষ্ট্রের নিয়ন্ত্রমের বাইরে চলে যাচ্ছে!


    শেখ হাসিনা সরকারের দাবি গুলশান হামলার যাবতীয়ত্থ্য তাঁদের জানা ছিল!


    তবু তাঁরা কিছুতেই আচকাতে পারছেন না অবাধ হত্যালীলা,ঘর্ষণ তান্ডব!


    ঠাকার বাইরে হামলার পূর্বাভাস নেই,যেমন ছিল না গুলশানেরও!সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে জাতীয়ঐক্যের দাবি বাংলাদেশেই অস্বীকৃত,আমাদেরই রক্ত মাংশের অংশীদার যারা,তাঁদের নিরাপত্তা নিয়ে না ভাবলে এই বাংলায়,এই ভারতবর্ষে আমাদের নিরাপত্তার কি হবে!


    সংখ্যালঘুদের হত্যা লীলা চলছে।

    চলছে ধর্ষণ।


    রাজনৈতিক হিংসা চরিতার্থে সফ্ট টারগেট সংখ্যালঘুরাই।

    রাজনৈতিক অস্থিরতার বলি আবার সেই সংখ্যালঘুরা।


    ভরতবর্ষ ও পৃথীবীর বিভিন্ন দেশের ঘটনাবলির প্রতিক্রিযার বলিও সংখ্যালঘুরা।

    সংখ্যালঘুদের বিরুদ্ধে সন্ত্রাসের অবসান না হলে,হত্যালীলা ও ধর্ষণ মহোত্সবের শেষ না হলে কতদিন প্রযন্ত বাংলাদেশে থাকতে পারবেন সংখ্যালঘুরা?

    সংখ্যালঘুরা তল্পিল্পা নিয়ে কাঁটাতারের এপারে চলে এলে বাংলা,আসমাম ও বাকী ভারতবর্ষের কি হবে ?

    এই পরিস্থিতির মোকাবিলার জন্যইমৌলবাদী সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে 5 ই আগস্ট কোলকাতায় মিছিল ও বাংলাদেশ হাইকমিশনে ডেপুটেশান!আসুন সবাই পথে নামি!বাঁচার ঠিকানা মিলবে পথেই!


    ভারতবর্ষের ভূগোল আর ইতিহাস বার বার বদল হয়েছে।ইতিহাসের পাতায় চোখ রাখলেই আমরা বুঝতে পারি যে পৃথীবীর সমস্ত প্রাচীন সভ্যতা ধ্বংস হলেও ভারতে সবসময় বিভিন্নতার মধ্যে সহিষ্ণুতা,ভ্রাতত্ব,একাত্মতা,সংস্কৃতি ও লোকসংস্কৃতির মাধ্যমে জাতি ব্যবস্থার অভিশাপ সত্বেও মানবতার স্বার্থে আমাদের পূর্বপুরুষদের ঐতিহ্যশালী জীবন দর্শন ও সংঘাতের পরিবর্তে মানবন্ধন ভারতকে রবীন্দ্রনাথের ভারত তীর্থ করে তুলেছে।মানুষের ধর্ম ,জাতি,আস্থা,সমাজ,রাজনীতি যাই হোক,মহাত্মা গৌতম বুদ্ধের ধম্ম ও পন্চশীল অনুশীলনে আজ অবধি নানা বিপর্যয় সত্বেও ভারতবর্ষ বেঁচে আছে। ভারতভাগের অত বড় বিপর্যয়ের পরও মানুষ আবার নিজের পায়ে দাঁড়াতে পেরেছে বা পারছে।ভূগোল বদলেছে রাজনীতি ও রাষ্ট্রের চরিত্র অনুযায়ী কিন্তু তাতে ভারতবর্ষের মৃত্যু হয়নি।


    মায়া,ইনকা,মিশরীয়,রোমান,গ্রীক,মেসাপোটামিয়ার বিপরীতে ভারতবর্ষে মোহনজো দোড়ো হড়প্পার সিন্ধু নগর সভ্যতার পতনের পরও হাজার হাজার বছরের মানববন্ধনই ভারতবর্ষকে আজও বাঁচিয়ে রেখেছে।আমাদের এি প্রজন্ম কি সেই ধারা অব্যাহত রাখতে পারবে,যখন সবকিছুই রাষ্ট্রের নিয়ন্ত্রণের বিরুদ্ধে চলে যাচ্ছে এবং আমরা দ্বংসের মুখোমুখি আজ।দশ দিগন্তে অশনিসংকেত।বিপর্যয়ের মোকাবিলার সমস্থ রাস্তা কিন্তু ভারতবর্ষের ঐতিহ্য রয়েছে।মীডিয়ার রং বেরং খবরাখবরের ফাঁকে আমরা যধি ভারতবর্ষের বিভিন্ন জনগোষ্ঠির ও বিভিন্ন ভাষার লোকসংস্কতিতে প্রাণভরে ডুব দিয়ে চোখ কুলে দেখি,মৃত্যুর মুখোমুখি জিয়নকাঠির সন্ধান না পাওয়ার কথা নয়।আমাদের পুন্শ্চ পুনরূত্থানের মোহ ত্যাগ করে ঐ লোক ঐতিহ্য ও লোকসংস্কৃতিকে জীবনযাপনের মূল আধার ও দর্শন মেনে নিয়ে এখনই বিপর্যয়ের মোকাবিলায় একতাবদ্ধ হতে হবে।


    পেরিসে নীস শহরে সন্ত্রাস হামলা,মক্কায় সন্ত্রাস,তুর্কিতে সৈন্য অভিযান পৃথীবীর নানা দেশে যুদ্ধ গৃহযুদ্ধ সেই সোভিয়েত পতনের পর অনিবার্য ঘচনাক্রম,যা ভারতবর্ষেও আমরা আশির ধশক থেকে পান্জাবে,কাশ্মীরে,আসামে,ত্রিপুরায় বার বার দেখেছি।রক্তপাত চলছেই।দশ দিগন্তে মনুষত্বের প্রাণ প্রকতির সমস্ত সম্পদ বিপর্যস্ত এবং লাগাতার লাগাতার নতুন নতুন রক্তনদীর উত্স খুলে যাচ্ছে আর আমরা সেই সমস্ত রক্তনদীর মোহানায় দাঁচিয়ে নিজেদের নিরাপদ মনে করছি।


    আমরা বিভিন্ন ভাষায় সারা বিশ্ব জুড়ে আত্মধ্বংসের এই সময়প্রবাহের চাক্ষুস প্রত্যক্ষদর্শী এবং আমাদের অস্তিত্ব বিপন্ন,সেই চেতনা অবলুপ্ত।


    ভারতবর্ষ সেদিনও পরাধীন ছিল।ইতিহাসের নিরিখে স্বাধীনতার এই সাত দশক অত্যন্ত ছোট একটি কালখন্ড।কিন্তু পলাশীর যুদ্ধের পর সামন্তবাদ ও সাম্রাজ্যবাদের বিরুদ্ধে অখন্ড বাংলাই আদিবাসী কৃষক বিদ্রোহের নিরন্তর যুদ্ধভূমি চুয়াড় বিদ্রোহ থেকে তেভাগা পর্যন্ত।স্বাধীনতার আগে বাংলা এবং পান্জাব স্বাধীনতার জন্য যত রক্ত দিয়েছে,স্বাধীনতার বলিকাঠে যত প্রাণ দিয়েছে,সারা পৃথীবীর ইতিহাসে তার তুলনা নেই।তারপরও মাতৃভাষা ও স্বাধীনতার জন্য দ্বিধা বিভক্ত বাংলাক ওপার যত রক্ত ,যত প্রাণ দিয়ে স্বাধীন বাংলাদেশ গঠন করেছে,ইতিহাসে তারও কোনো দ্বিতীয় নজির নেই।


    স্বাধীনতার বলি ভারতেভাগের ফলে সেই বাংলা এবং পান্জাব।স্বাধীনতার পর বাঙালি হিন্দু শরণার্থীরা ভারতবর্ষের বিভিন্ন রাজ্যে ছড়িয়ে ছিটিয়ে,মাতৃভাষা হারা ,পরিয়হীন বেনাগরিক জীবন যাপল করছেন- এমন মানুষের সংখ্যা পাঁচ কোটি এবং পশ্চিম বাংলায়  নকোটি জনসংখ্যার মধ্যে যারা বাঙালি,তাঁদের অর্ধেকের পরিচয় এখনো বাহাল তকমা ঘুচে গেলে ও সেই উদ্বাস্তু বেনাগরিক।মধ্যপ্রাচ্যে ও আফ্রিকায় যে শরণার্থীর ছল দেখা যাচ্ছে,তার চেয়ে অনেক বেশি সংখ্যক বাঙালি উদ্বাস্তু এই বাংলায় এবং ভারতবর্ষের প্রায় সব রাজ্যেই নাগরিক ও মনবিক অধিকার,জীবিকা ও নাগরিকত্ব বন্চিত রেল লাইনের ধারে,গ্রাম ও শহরের বাইরে,নদী ও ঝিলের পারে,নগর মহাগরের ফুটপথে কোনো ক্রমে দিন যাপন করছে।


    বাংলার বাইরে পাঁচ কোটি ও বাংলায় তিন কোটি এই ছন্নছাড়া ভিটেহারা মুখছাড়া কবন্ধ নামানুষের মহামিছিলে শামিল হওয়ার জন্য মুখিয়ে আছে বাংলাদেশে এখনো থেকে যাওয়া দু কোটি উনচল্লিশ  লক্ষ মানুষ।


    বাংলাদেশর অগ্নগর্ভ অবস্থার উন্নতি না হলে,বাংলা ও আসামে আবার মহাবিপর্যয়।যাদের পুনর্বাসন,নাগরিকত্ব ও সংরক্ষণ আজও হয়নি,তাঁদের সঙ্গে বাংসলাদেশের সংখ্যালঘু যোগ হলে পরিস্থিতি ভারত সরকার,পশ্চিম বঙ্গ,আসাম,ত্রিপুরা সরকার তে বটেই ভারতবর্ষের কোনো রাজ্যের নিয়ন্ত্রনের বাইরে চলে যাবে।


    বাংলাদেশ এখন যেভাবে মৌলবাদীদের দখলে,সেই ভাবেই আসমাম বাংলা সহ ভারতবর্ষের বিভিন্ন রাজ্যও দখল করার মরিয়া আত্মঘাতী প্রচেষ্টা চালাচ্ছে আন্তর্জাতিক মৌলবাদী সন্ত্রাস বাদী শক্তিগুলো।

    সন্ত্রাসের জবাব সন্ত্রাস হতে পারে না।

    হিংসার জবাব হিংসা হতে পারে না।

    মৌলবাদের জবাব মৌলবাদ হতে পারে না।


    ভারতবর্ষের ইতিহাসে বার বার বিপর্যয়ের মুখোমুখি হয়ে দেশকে বিপদের ,ধ্বংসের থেকে বাঁচিয়ে রাখার অনেক প্রসঙ্গ পাতায় পাতায় আছে।এই ইতিহাসের দৌলতে আজও ভারতবর্ষ বেঁচে আছে।আমরাও বেঁচে বর্তে আছি।ইতিহাসের সেই ধারাকে অব্যাহত রাখতে পারলেই আমাদের সন্তানরা দুধে ভাতে না হোক কোনোক্রমে বেঁচে বর্তে থাকতে পারে।


    ভবিষ্যতেে শিশুরা জন্মাবে,তাঁদের জন্যএই পৃথীবীকে আরো সুন্দর করে গড়ে তুলতে না পারলেও,পৃথীবী,ভারতবর্ষ ও সভ্যতা কে বাঁচিয়ে রাখার জন্য লোকসস্কৃতি ও ইতিহাসের মানববন্ধনকে অক্ষুন্না রাখার কাজটা আমদের করতেি হবে।


    বাংলাদেশের পরিস্থিতি না বদলালে সীমান্তে কাঁটাতারের বেড়া যতই মজবুত করুন,যতই সীমান্ত সীল করুন,যতই নিরাপত্তা বেস্টনী তৈরি করুন,বাংলাদেশের মরণাসন্ন দু কোটি উনত্রিশ লক্ষ সংখ্যালঘুদের উদ্বাস্তু ঢল নামছেই।


    তেমন অবস্থা হলে,পূর্ববঙ্গের মুলনিবাসী দশ কোটিরও বেশি মানুষের বেঁচে থাকার জন্য এই মহাদেশে বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য হোমল্যান্ড ছাড়া কোনো বিকল্প আর থকবে না৤একই সঙংগে হাজার হাজার মরিচঝাঁপির জন্য প্রস্তুত হওয়ার অশনিসংকেত যারা বুঝতে পারছেন না,তাঁরো আদৌ বাঙালি কিনা সন্দেহের অবকাশ থেকে যাচ্ছে।


    মৌলবাদী সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে 5 ই জুলাই কোলকাতায় মিছিল ও বাংলাদেশ হাইকমিশনে ডেপুটেশান।আমরা ঔদিন দলে দলে রাস্তায় বেরোব।বাংলা,আসাম,ত্রিপুরা ও ভারতবর্ষকে বাঁচনোর তাকীদ যাদের আছে,মনুষত্ব ও সভ্যতার পক্ষে যারা,তাঁরাও ঐ মিছিলে যোগ দেবেন,এই আমাদের আহ্বান।


    বাংলাদেশ অগ্নিগর্ভ এবং ভারতবর্ষও নিরাপদ নয়,মানুষ নিরাপদ নয়,সব মানুষই এখন উদবাস্তু।উদ্বাস্তু সমস্যার সমাধান না হলে,যারা এই মুহুর্তে উদ্বাস্তি নন.তাঁদের নিযতিও রবিঠঠাকুর লিখে গিয়েছেনঃ হে মোর দুর্ভাগা দেশ,যাদের করেছো অপমান--


    বাংলাদেশ থেকে দু কোটি 39 লক্ষ সংখ্যালঘু মানুষের ঢল নামতে চলেছে ভারতবর্ষে এবং পরিস্থিতি ক্রমশঃ রাষ্ট্র ও আন্তর্জাতিক মনুষত্বের নিয়ন্ত্রণের বিরুদ্ধে চলে যাচ্ছে।


    ইজরায়েলর মত বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অনিবার্য হোমল্যান্ডের পরিস্থিতি তৈরি হচ্ছে,আমরা কি চাই?


    ধর্ম জাতি রাজনীতির উর্দ্ধে সংযত উদ্বাস্তু আন্দোলন সংগঠিত করা বেঁচে থাকার একমাত্র রাস্তা!


    ভারত সরকারে নিযন্ত্রেণের বাইরে চলে যাচ্ছে পরিশ্তি ক্রমশচ যেমন ইতি মধ্যে জুলাই মাসের প্রথম সপ্তাহে সংঘটিত গুলশান ও কিশোরগঞ্জের  জঙ্গি হামলার ঘটনায় বিদেশিসহ ৩০ জন নিহত হওয়ার পর যুক্তরাষ্ট্রের পররাষ্ট্র মন্ত্রণালয়ের দক্ষিণ ও মধ্য এশিয়াবিষয়ক সহকারী পররাষ্ট্রমন্ত্রী নিশা দেশাই বিসওয়াল ঢাকা পৌঁছান। তিনি রবিবার মার্কিন প্রেসিডেন্ট বারাক ওবামা ও পররাষ্ট্রমন্ত্রী জন কেরির পক্ষ থেকে সন্ত্রাসবাদ এবং চরমপন্থার বিরুদ্ধে বাংলাদেশের লড়াই এ যুক্তরাষ্ট্রের সহযোগিতা ও সমর্থনের প্রস্তাব নিয়ে আসেন।  


    ইতিমধ্যে বাংলাদেশে জাতীয় ঐক্যের ব্যাপারে সরকারের অস্বীকৃতির কারণে দেশকে আরো চরম মূল্য দিতে হতে পারে বলে মন্তব্য করেছেন বিএনপি নেতা নজরুল ইসলাম খান। অন্যদিকে ক্ষমতা হারানোর ভয়ে সন্ত্রাস ও জঙ্গিবাদ মোকাবেলায় জাতীয় ঐক্য গঠনে সরকার সায় দিচ্ছে না বলে অভিযোগ বিএনপির স্থায়ী কমিটির সদস্য আ স ম হান্নান শাহের।

    বাংলাদেশ জাতীয় প্রেসক্লাবে এক আলোচনায় বিএনপি নেতা আ স ম হান্নান শাহ বলেন, যারা ভোট ডাকাতি করে ক্ষমতায় বসেছে তাদের দ্বারা জঙ্গীবাদ সন্ত্রাসবাদ নির্মূল সম্ভব নয়।গুলশানের ঘটনা দিয়ে প্রমাণ হয়েছে সেনাবাহিনী বাদে অন্য কোন বাহিনী সন্ত্রাস দমন করতে পারবে না। এমন পরিস্থিতিতে বেগম জিয়া জঙ্গিবাদ নির্মূলে জাতীয় ঐক্যের ডাক দিয়েছেন। জাতীয় ঐক্যের ডাকে সরকারের সম্মতি দেয়ার দায়িত্ব থাকলেও তারা তা করেনি। বরং ঐক্যের ডাক নিয়ে সরকার এখন উপহাস করছে।

    জঙ্গিবাদ-সন্ত্রাস রুখতে জাতীয় ঐক্য তৈরি হয়ে গেছে মন্তব্য করে বাংলাদেশের প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা বলেছেন, গুলশান হত্যাকাণ্ডে এমন সব তথ্য আসছে যা তাজ্জব হওয়ার মতো। আন্তর্জাতিক অঙ্গনে সরকারের তৈরি ভাবমূর্তি গুলশান হত্যাকান্ডের কারণে ক্ষুন্ন হয়েছে বলেও মন্তব্য করেন প্রধানমন্ত্রী।

    মঙ্গোলিয়ায় সফর নিয়ে রবিবার বিকালে গণভবনে সংবাদ সম্মেলন করেন প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা। দুই পৃষ্ঠার লিখিত বক্তব্যে, সন্ত্রাস ও জঙ্গিবাদের বিরুদ্ধে বাংলাদেশের জিরো টলারেন্স অবস্থানের কথা আসেম নেতাদের কাছে পুনর্ব্যক্ত করেছেন বলে জানান তিনি। তুরস্কের জনগণের উদাহরণ টেনে তিনি বলেন, আওয়ামী লীগ সরকার সবসময়ই অসাংবিধানিকভাবে ক্ষমতা দখলের বিরুদ্ধে। পরে সাংবাদিকদের প্রশ্নের উত্তরে শেখ হাসিনা বলেন, নিজের জীবন হুমকিতে রেখেও গুলশান হত্যাকাণ্ডের বিষয়টি সরকার সর্বোচ্চ গুরুত্ব দিয়ে দেখছে।

    নিশা দেশাই ঢাকায় প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা, পররাষ্ট্রমন্ত্রী এএইচ মাহমুদ আলী, স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী আসাদুজ্জামান খাঁন কামাল, প্রধানমন্ত্রীর আন্তর্জাতিক বিষয়ক উপদেষ্টা গওহর রিজভীসহ অন্যান্য উচ্চপদস্থ কর্মকর্তাদের সঙ্গে বৈঠক করেন।

    এ প্রসঙ্গে সরকারের একজন সিনিয়র কর্মকর্তা বলেন, প্রতিটি বৈঠকে নিশা সন্ত্রাসবাদ ও উগ্রবাদ দমনে বাংলাদেশ ভবিষ্যতে কী কী পদক্ষেপ গ্রহণ করবে, সে সম্পর্কে জানতে চেয়েছেন। নিশা দেশাই বাংলাদেশকে জানিয়ে গেছেন, যুক্তরাষ্ট্র সন্ত্রাসবাদ দমনে বাংলাদেশকে প্রয়োজনীয় সব ধরনের সহযোগিতা দেবে।

    ওই কর্মকর্তা আরও বলেন, বাংলাদেশের নিরাপত্তা ব্যবস্থার সঙ্গে যুক্ত হয়ে সন্ত্রাসবাদ ও উগ্রবাদ দমনে বাংলাদেশকে সহায়তা দিতে চায় যুক্তরাষ্ট্র।

    বাংলাদেশী দৈনিক জনকন্ঠের খবরঃ

    প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা জঙ্গীবাদ ও সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে যার যার অবস্থান থেকে সবাইকে ভূমিকা রাখার জন্য দেশবাসীর প্রতি উদাত্ত আহ্বান জানিয়েছেন। সন্ত্রাস-জঙ্গীবাদের বিরুদ্ধে জাতীয় ঐক্য প্রসঙ্গে তিনি বলেন, যাদের সঙ্গে ঐক্য করলে জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ নির্মূল করা যাবে, সেই জনগণের সঙ্গে ইতোমধ্যেই জাতীয় ঐক্য হয়ে গেছে। দেশের জনগণই বিপথগামীদের খুঁজে বের করে বিচারের মুখোমুখি দাঁড় করবে। যারা অগ্নিসন্ত্রাস করেছে, মানুষকে পুড়িয়ে হত্যা করেছে, যারা যুদ্ধাপরাধীÑ তাদের কথা আলাদা। তারা সর্প হয়ে দংশন করে ওঝা হয়ে ঝাড়তে চায়। তিনি ধর্মের নামে যারা তরুণদের জঙ্গীবাদে উস্কানি দিচ্ছে, অর্থ-অস্ত্র দিচ্ছে, মদদ দিচ্ছেÑ তাদের খুঁজে বের করতে দেশবাসীসহ বিশ্ব নেতৃবৃন্দকে তথ্য দিয়ে সহযোগিতা করারও আহ্বান জানান।

    রবিবার বিকেলে গণভবনে জনাকীর্ণ সংবাদ সম্মেলনে একাধিক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী এ আহ্বান জানান। জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ মোকাবেলায় সরকারের অনুসৃত 'জিরো টলারেন্স'অবস্থানের কথা পুনর্ব্যক্ত করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, 'শুধু বাংলাদেশ নয়, জঙ্গীবাদ এখন বৈশ্বিক সমস্যা হয়ে দাঁড়িয়েছে। আমরা নিরলসভাবে সারাবিশ্বে দেশের ভাবমূর্তি একটি সম্মানজনক অবস্থানে নিয়ে গিয়েছিলাম। কিন্তু গুলশানে হামলার ঘটনা আমাদের কিছুটা হলেও প্রশ্নের মুখে ফেলেছে। ভাবমূর্তি কিছুটা হলেও ক্ষুণœ হয়েছেÑ এটাই হচ্ছে সবচেয়ে দুর্ভাগ্যজনক।'গুলশানে হামলার তদন্ত প্রসঙ্গে তিনি বলেন, 'এই জঙ্গী হামলার ঘটনার তদন্ত হচ্ছে। কিছু সময় অপেক্ষা করুন। তদন্তের স্বার্থে সবকিছু বলাও যায় না। তবে যে তথ্য আসছেÑ তাজ্জব হয়ে যাওয়ার মতো। তদন্ত শেষে সবকিছু বুঝতে পারবেন সবাই।'প্রধানমন্ত্রী এ সময় তদন্তাধীন বিষয় নিয়ে বেশি খোঁচাখুঁচি না করার জন্যও আহ্বান জানান।

    এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, সন্ত্রাস ও জঙ্গীবাদের মূল চিন্তা-চেতনার উৎস খুঁজে বের করতে হবে। একই সঙ্গে জঙ্গী ও সন্ত্রাসের মদদদাতা, অর্থদাতা, প্রশিক্ষণদাতা, যারা পরামর্শ দিচ্ছে বা অস্ত্র সরবরাহ করছে তাদের খুঁজে করে যথাযথ ব্যবস্থা গ্রহণ করতে হবে। এ ধরনের ঘটনার পুনরাবৃত্তি রোধে বাংলাদেশ সব ধরনের ব্যবস্থা গ্রহণ করেছে। তিনি বলেন, আতঙ্ক সৃষ্টি করাই ছিল গুলশানে হামলার উদ্দেশ্য। তবে মানুষের জীবন চলমান, জীবন থেমে থাকে না।

    যারা ধর্মের নামে তরুণদের জঙ্গীবাদে জড়াতে উস্কানি দিচ্ছে তাদের চিহ্নিত করার ওপর গুরুত্বারোপ করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, বাংলাদেশ সব সময় সন্ত্রাসবিরোধী, জঙ্গীবাদবিরোধী। বাংলাদেশের মানুষকে সব সময় এর বিরুদ্ধে সচেতন থাকতে হবে। যার যার অবস্থান থেকে এর বিরুদ্ধে অবস্থান নিতে তিনি দেশবাসীর প্রতি আহ্বান জানিয়ে বলেন, যাদের কোন অভাব নেই, উচ্চবিত্ত পরিবারের সন্তান, তারাই এখন জঙ্গীবাদে জড়াচ্ছে। যেখানে তাদের কোনকিছুই অপূরণীয় থাকে না, সেখানে কেন তারা এটা করছে! তারা এখন বেহেশতের হুর-পরী পাওয়ার জন্য ব্যস্ত হয়ে পড়েছে।

    যারা ধর্মের দোহাই দিয়ে জঙ্গী কর্মকা- চালাচ্ছে তাদের উদ্দেশ করে প্রধানমন্ত্রী বলেন, মানুষ খুন করলে বেহেশতের দরজা খোলে না। যারা নিরীহ মানুষকে হত্যা করে তারা কোনদিনই বেহেশতে যেতে পারবে না। তবে কারা এসব তরুণকে মিথ্যা বলে বিভ্রান্ত করছে, পেছন থেকে উস্কানি দিচ্ছে, জঙ্গীবাদে মদদ দিচ্ছেÑ এদের খুঁজে বের করতেই হবে। এই তরুণদের কারা অস্ত্র দিচ্ছে, কারা অর্থ যোগাচ্ছে, তাদের তথ্য সম্মিলিতভাবে খুঁজে বের করতে হবে। তিনি বলেন, সেদিন বেশি দূরে নয়, দেশের সব মানুষ এদের বিরুদ্ধে সোচ্চার হবে। সন্ত্রাস-জঙ্গীবাদের বিরুদ্ধে জনগণকে সজাগ ও সতর্ক থাকতে হবে। যার যার অবস্থান থেকে এদের বিরুদ্ধে পদক্ষেপ নিতে হবে।

    মঙ্গোলিয়ার উলানবাটোরে সাম্প্রতিক এশিয়া-ইউরোপ (আসেম) শীর্ষ সম্মেলনের অভিজ্ঞতা তুলে ধরতে এ সংবাদ সম্মেলনের আয়োজন করা হলেও প্রশ্নোত্তর পর্বে সাংবাদিকদের প্রশ্নগুলো ঘুরেফিরেই আসে সম্প্রতি গুলশানে জঙ্গী হামলার ঘটনা প্রসঙ্গে। প্রধানমন্ত্রী দৃঢ়তার সঙ্গেই সাংবাদিকদের এ সংক্রান্ত প্রশ্নের উত্তর দেন। সংবাদ সম্মেলনে প্রধানমন্ত্রীর সঙ্গে মঞ্চে উপস্থিত ছিলেনÑ আওয়ামী লীগের সাধারণ সম্পাদক ও জনপ্রশাসনমন্ত্রী সৈয়দ আশরাফুল ইসলাম, সভাপতিম-লীর সদস্য এ্যাডভোকেট সাহারা খাতুন, পররাষ্ট্রমন্ত্রী এ এইচ এম মাহমুদ আলী, তথ্যমন্ত্রী হাসানুল হক ইনু, প্রধানমন্ত্রীর তথ্য উপদেষ্টা ইকবাল সোবহান চৌধুরী ও পররাষ্ট্র প্রতিমন্ত্রী শাহরিয়ার আলম। এছাড়াও সরকারের একাধিক মন্ত্রী, প্রধানমন্ত্রীর উপদেষ্টা, আওয়ামী লীগ নেতৃবৃন্দ, সংসদ সদস্যবৃন্দ এ সময় উপস্থিত ছিলেন।

    দেশের ভাবমূর্তি ক্ষুণœ করতেই এ হামলা ॥ আরও হামলা হতে পারেÑ প্রধানমন্ত্রীর এমন সাম্প্রতিক মন্তব্যের প্রতি দৃষ্টি আকর্ষণ করে এক সাংবাদিক জানতে চান এ বিষয়ে সরকারের কাছে কোন তথ্য আছে কিনা? জবাবে প্রধানমন্ত্রী জঙ্গীবাদকে একটি বৈশ্বিক হুমকি হিসেবে চিহ্নিত করে বলেন, একবার যখন ঘটেছে, এরা তো বসে থাকবে না। ক্রমাগত হুমকি দিচ্ছে। তবে জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ অত্যন্ত কঠোরভাবে দমনে সরকার কাজ করে যাচ্ছে। এদের বিরুদ্ধে দেশের মানুষ আজ জেগে উঠেছে।

    তিনি বলেন, হামলার কয়েক দিনের মধ্যে সারাদেশে জঙ্গী-সন্ত্রাসীদের বিরুদ্ধে এমন জাগরণ সৃষ্টি পৃথিবীর কোন দেশই করতে পারেনি। মাত্র দুই দিনে আটটি বিভাগের ৬৪ জেলার বিভিন্ন শ্রেণী-পেশার মানুষের সঙ্গে আমি টেলিকনফারেন্সের মাধ্যমে মতবিনিময় করেছি। সারাদেশের গ্রামপর্যায় পর্যন্ত জঙ্গীবাদবিরোধী কমিটি গঠন করা হচ্ছে। প্রশাসনের পাশাপাশি দেশের জনগণই বিপথগামীদের খুঁজে বের করে বিচারের মুখোমুখি করবে।

    অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, বাংলাদেশ সবদিক থেকে এগিয়ে যাচ্ছে। বিশ্বমন্দার মধ্যেও দেশের প্রবৃদ্ধি ৬ ভাগ থেকে ৭ ভাগে উন্নীত করেছি। শুধু ব্যক্তিস্বার্থের কারণে বিশ্বব্যাংক পদ্মা সেতুর অর্থায়ন বন্ধ করে দিয়েছিল। কিন্তু সততার সঙ্গে দেশ পরিচালনা করছি বলেই আমরা চ্যালেঞ্জ নিয়ে নিজস্ব অর্থায়নে পদ্মা সেতু নির্মাণ করছি। বাংলাদেশকে বিশ্বের কাছে আমরা যখন সম্মানজনক অবস্থানে এনেছি, বাংলাদেশ যখন বিশ্বের কাছে উন্নয়নের রোলমডেল হিসেবে পরিচিতি লাভ করেছে, ঠিক তখনই দেশের ভাবমূর্তি ক্ষুণœ করতেই গুলশানে হামলার ঘটনা ঘটানো হয়েছে।

    এ প্রসঙ্গে প্রধানমন্ত্রী আরও বলেন, বাংলাদেশ সব সময় ভিক্ষার ঝুলি নিয়ে চলবে এটা যারা চায়, কিছু পদলেহনকারী ও চাটুকাররা কাউকে ক্ষমতায় বসাতে চায়, যারা চায়নি ২০১৪ সালের নির্বাচন হোকÑ তারাই নানা কর্মকা- ঘটাচ্ছে। আগে সারাবিশ্বের কাছে আমরা মাথা উঁচু করে কথা বলতে পারতাম। এটা যাতে না পারি সেজন্যই গুলশানের জঘন্য ঘটনা ঘটানো হয়েছে। আমরা দেশকে যে সম্মানজনক অবস্থানে নিয়ে গিয়েছিলাম, সেখানে এ ঘটনা ঘটিয়ে যেন একটা ছেদ এনে দিল।

    জাতীয় ঐক্য হয়ে গেছে ॥ গুলশানে হামলার পর কিছু রাজনৈতিক দল ও নাগরিক সমাজের পক্ষ থেকে জাতীয় ঐক্যের কথা বলা হচ্ছে। এ বিষয়ে এক সাংবাদিক প্রধানমন্ত্রীর অবস্থান জানতে চাইলে তিনি জানান, এ বিষয়ে ইতোমধ্যে জাতীয় ঐক্য হয়ে গেছে। জঙ্গী ও সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে দেশের জনগণ একতাবদ্ধ হয়েছে। জাতীয় ঐক্যের সৃষ্টি হয়েছে। গ্রামে গ্রামে কমিটি হচ্ছে। সর্বস্তরের মানুষ সচেতন হয়ে উঠেছে। এখন ঈদের নামাজে সনাতম ধর্মের যুবকরা পাহারা দিচ্ছে। এটা অসাম্প্রদায়িক বাংলাদেশের জন্য অভূতপূর্ব অর্জন। বিএনপি-জামায়াতের প্রতি ইঙ্গিত করে তিনি বলেন, যারা অগ্নিসন্ত্রাস করেছে, মানুষ পুড়িয়ে হত্যা করেছে, যারা যুদ্ধাপরাধীÑ তারা ছাড়া দেশের জনগণ জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে রূখে দাঁড়িয়েছে। কিছু পক্ষ আছে তারা সর্প হয়ে দর্শন করে ওঝা হয়ে ঝাড়তে চায়।

    জঙ্গী হামলা নতুন নয় ॥ অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, গুলশানের জঙ্গী হামলা বাংলাদেশে নতুন নয়। ২১ আগস্ট গ্রেনেড হামলার শিকার আমি নিজেই হয়েছি। '৮১ সালে দেশে ফেরার পর থেকেই আমার ওপর একের পর এক হামলা হয়েছে। গাড়ি চালিয়ে ফ্রান্সে বহু মানুষ হতাহতের ঘটনা তুলে ধরে তিনি বলেন, এরকম ঘটনা আমাদের দেশেও হয়েছে। জিয়াউর রহমানের আমলে আমাদের মিছিলের ওপর গাড়ি চালিয়ে অনেক নেতাকর্মীকে হত্যা করা হয়েছিল। এরশাদ সরকারের আমলেও ট্রাক তুলে দিয়ে আমাদের নেতাকর্মীদের হত্যা করা হয়েছে।

    প্রধানমন্ত্রী বলেন, বিএনপি-জামায়াত জোট সরকারের আমলে 'মরলে শহীদ, বাঁচলে গাজী', 'বৃষ্টির মতো গুলি কর'Ñ প্রকাশ্য এ স্লোগান দিয়ে কারা আওয়ামী লীগের মিছিলের ওপর গুলিবর্ষণ করে আমাদের নেতাকর্মীদের হত্যা করেছিল, সে কথা দেশবাসী ভুলে যায়নি। নির্বাচন প্রতিহত এবং অবরোধের নামে প্রকাশ্য পেট্রোলবোমা মেরে পুড়িয়ে অসংখ্য মানুষকে হত্যা করা হয়েছে। মসজিদ-মন্দির-প্যাগোডা-গীর্জা সবখানে হামলা চালানো হয়েছে, কোরান শরিফ পর্যন্ত পুড়িয়ে দিয়েছিল তারা। আমরা সবকিছু মোকাবেলা করেই দেশকে উন্নয়ন-অগ্রগতির সোপানে নিয়ে যাচ্ছি। ঠিক তখনই আবারও গুলশানে হামলার ঘটনা হলো। তবে সন্ত্রাস-জঙ্গীবাদ মোকাবেলা করতে যা যা করার সরকার থেকে তার সবই করা হবে।

    অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, গুলশানে হামলার পর বিশ্বের অনেক দেশই আমাদের সহযোগিতা করতে চেয়েছে। শুধু বাংলাদেশই নয়, অনেক উন্নত দেশও জঙ্গীবাদের হামলায় আক্রান্ত হচ্ছে। সেজন্য এ সমস্যা মোকাবেলায় বিশ্বের সব দেশকেই একে অপরকে সহযোগিতা করতে হবে। মার্কিন যুক্তরাষ্ট্রের সহকারী পররাষ্ট্রমন্ত্রীর সঙ্গে বৈঠকে আমি জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদের বিরুদ্ধে গোয়েন্দা তথ্য দিয়ে সহযোগিতা করার আহ্বান জানিয়েছি। কারণ এটি এখন বৈশ্বিক সমস্যা হয়ে দাঁড়িয়েছে। কারা জঙ্গীবাদ সৃষ্টি করছে, অস্ত্রের ডিলার কারা, কারা মদদ দিচ্ছেÑ সবকিছুই সম্মিলিতভাবে খুঁজে বের করতে হবে।

    ভারতীয় এক সাংবাদিকের প্রশ্নের জবাবে শেখ হাসিনা বলেন, গুলশানে হামলার পর আমরা সম্মান হারাইনি। ভারত, পাকিস্তান, যুক্তরাষ্ট্র, ফ্রান্সসহ বিশ্বের অনেক দেশই আক্রান্ত হচ্ছে। তবে আমার কষ্ট লেগেছে, জীবনের ঝুঁকি নিয়ে কষ্ট করে যখন সবদিক থেকে দেশকে এগিয়ে নিয়ে যাচ্ছি, সম্মানজনক অবস্থানে নিয়ে গেছিÑ তখনই এ হামলা চালিয়ে ভাবমূর্তি ক্ষুণœ করার চেষ্টা করা হলো। তিনি বলেন, জঙ্গীবাদের বিরুদ্ধে সারাদেশেই প্রতিরোধ গড়ে উঠছে। দেশের জনগণের মধ্যে ব্যাপক গণসচেতনতা সৃষ্টি করছি। দেশের কোন মানুষই জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসবাদ দেখতে চায় না। এর বিরুদ্ধে সারাবিশ্বকে নাড়া দিয়েছে। শুধু নাড়া দিচ্ছে না মুষ্টিমেয় গোষ্ঠী, যারা এসব ঘটনা ঘটাচ্ছে তাদের বিবেককে। তাই কারা এসব ঘটাচ্ছে, কাদের সন্তানরা বিপথে পা দিচ্ছে, তা জনগণের সচেতনতার মাধ্যমেই খুঁজে বের করা হবে।

    তিনি বলেন, জঙ্গীবাদ-সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে দেশের সকল মানুষকে একত্রিত ও তাদের চেতনাকে জাগ্রত করতে পেরেছি, যা বিশ্বের অনেক দেশই পারেনি। তবে দুঃখ লাগে একজন শিক্ষক হয়ে ছাত্রকে কিভাবে মৃত্যুর মুখে ঠেলে দেয়। জঙ্গী বানায়। তদন্ত প্রসঙ্গে অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, কিছু ঘটলে কী এত দ্রুত সবকিছু তদন্ত শেষ করা যায়। আমি নিজেই তো ভুক্তভোগী। বাবা-মা, ভাই, পরিবারের সদস্যদের হত্যার বিচার পাওয়ার জন্য আমাকে ৩৫ বছর অপেক্ষা করতে হয়েছে। এখনকার মতো তখন তো অনেককে এজন্য এত সোচ্চার হতে দেখিনি। জীবনের ঝুঁকি নিয়ে একে একে সব হত্যাকা-ের বিচার করছি।

    আলোচনা ও ঐক্য হলেই সন্ত্রাস বন্ধ হবেÑ বিএনপি নেতাদের এমন বক্তব্য সম্পর্কে অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, তাদের (বিএনপি-জামায়াত) সঙ্গে আলোচনা করলে সব সন্ত্রাস-জঙ্গী হামলা বন্ধ হবে, না করলে তারা এসব কর্মকা- চালিয়েই যাবেনÑ এটাই কী তারা বলতে চাচ্ছেন? অনেক শীর্ষ জঙ্গীদের বিচার বছরের পর বছর আটকে থাকা প্রসঙ্গে অপর এক প্রশ্নের জবাবে প্রধানমন্ত্রী বলেন, অনেক ফাঁসির দ-প্রাপ্ত শীর্ষ জঙ্গীর বিচার ঝুলে আছে, এটা সত্যিই দুঃখজনক। এদের বিচার হলে একটি দৃষ্টান্ত সৃষ্টি হতো। এখন যারা এসব কর্মকা-ে জড়িত তারা বুঝতে পারতÑ এসব করলে কঠোর শাস্তির মুখোমুখি তাদেরও হতে হবে।

    ওদেরকেও খুঁজছে পরিবার

    বিডিটুডে.নেট:ওদেরকেও খুঁজছে পরিবার

    নতুন সাত নিখোঁজ ব্যক্তির সন্ধান চেয়েছে তাদের উৎকণ্ঠিত পরিবার। এরমধ্যে তিনজন নারী ও চারজন পুরুষ। গুলশানে হামলাকারীদের কয়েক মাস ধরে নিখোঁজ থাকার পর জঙ্গি তত্পরতায় জড়িয়ে পড়ার খবর পেয়ে এই সা

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    আ.লীগের দু'গ্রুপে গোলাগুলি, বোমায় বোমায় রণক্ষেত্র ঈশ্বরদী


    ঈশ্বরদীতে আওয়ামী লীগের দুই গ্রুপে ব্যাপক সংঘর্ষ হয়েছে। এসময় গোলাগুলি, বোমা বিস্ফোরণ ও ব্যাংক রোস্তরাঁয় হামলা চালিয়ে ভাঙচুর করা হয়েছে। এতে রণক্ষেত্রে পরিণত হয় গোটা পৌর এলাকা। রোববার বিকে

    বিডিটুডে.নেট:আ.লীগে গোলাগুলি, বোমায় রণক্ষেত্র ঈশ্বরদী

    ঈশ্বরদীতে আওয়ামী লীগের দুই গ্রুপে ব্যাপক সংঘর্ষ হয়েছে। এসময় গোলাগুলি, বোমা বিস্ফোরণ ও ব্যাংক রোস্তরাঁয় হামলা চালিয়ে ভাঙচুর করা হয়েছে। এতে রণক্ষেত্রে পরিণত হয় গোটা পৌর এলাকা। রোববার বিকে

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    'সরকারি খুতবা'প্রত্যাখ্যান করলো হেফাজত, কড়া ভাষায় প্রতিবাদ

    বিডিটুডে.নেট:'সরকারি খুতবা'প্রত্যাখ্যান করলো হেফাজত

    চট্টগ্রাম ইসলামিক ফাউন্ডেশন আহুত দেশব্যাপী জুমার নামাযের খুতবা প্রত্যাখ্যান করেছে ঈমান-আক্বীদাভিত্তিক অরাজনৈতিক সংগঠন হেফাজতে ইসলাম বাংলাদেশ। এ খুতবাকে ধর্মীয় বিষয়ে সরকারের অবৈধ হস্ত

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    'মেয়ে আমাকে বলেছিল, জঙ্গি কর্মকাণ্ড নিয়ে বিশ্ববিদ্যালয়ে গ্রুপ সিটিং হয়'

    'মেয়ে আমাকে বলেছিল, জঙ্গি কর্মকাণ্ড নিয়ে বিশ্ববিদ্যালয়ে গ্রুপ সিটিং হয়'

    বেসরকারি বিশ্ববিদ্যালয়ের কিছু শিক্ষার্থীর জঙ্গি কর্মকাণ্ডে জড়িয়ে পড়ার কথা মেয়ের মুখে শুনলেও…

    TAZA-KHOBOR.COM|BY TAZAKHOBOR : NEWS UPDATE


    জঙ্গিবিরোধী সভা করে ফেরার পথে সাবেক এমপির গাড়ি ভাঙচুর

    বিডিটুডে.নেট:জঙ্গিবিরোধী সভা করে ফেরার পথে সাবেক এমপির গাড়ি ভাঙচুর

    জঙ্গি ও সন্ত্রাস বিরোধী কমিটি গঠনে মতবিনিময় সভা করে ফেরার পথে মানিকগঞ্জ-১ আসনের সরকার দলীয় সাবেক সংসদ সদস্য এবিএম আনোয়ারুল হকের গাড়ির ওপর হামলা করা হয়েছে। এতে গাড়ি…

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    যেতে হবে
    শরদিন্দু উদ্দীপন

    যেতে হবে আরো কিছু দূরে
    আরো কিছু অগম প্রান্তর 
    আনাবিষ্কৃত মেরুচূড়া 
    পেঙ্গুইন ঈপ্সিত 
    অনন্ত আরো কিছু অসম নুড়ির সন্ধানে 
    যেতে হবে।

    পথ পড়ে আছে বিস্তর
    দুস্তর দুরন্ত উৎরাই 
    আঁতেলের অপকীর্তি 
    প্রত্যয় কুয়াশানিলীন 
    পড়ে আছে এই পথে 
    কালান্তক সাপেদের বিষাক্ত খোলস।
    বহুতর পৃথিবীর ঊর্ধ্বতন ভাঁড় 
    ভাগাড়ে ভাঁড়ার ভরে গেছে

    শ্রান্তি কেন ?
    বুকে বাঁধ সাহস কাঁচুলি 
    তারপর হেঁটে চলো 
    কেমন সহজে হাঁটা যায়।

    এখনো যক্ষের গাছে অনিকেত ফুল
    ফাগুয়ার পরাগ বাহার
    প্রজাপতি ঝিলমিল সরল বৈকালী 
    একনো অলক্ষ্যে আছে 
    জোনাকির গাঢ় তমোবোধ।

    যেতে হবে
    আরো কিছু অগম প্রান্তর 
    নীল নীল শৈবাল 
    অতলান্তিক সফেন সৈকত 
    ঈপ্সিত নুড়ির খোঁজ 
    পেঙ্গুইন পেয়ে যাবে
    চলো যেতে যেতে





    सबसे पहले कश्मीर सरकार को बर्खास्त करें!


    कश्मीर की जनता के साथ भारत की सरकार और भारत राष्ट्र का कोई संवाद नहीं है तो सिर्फ सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून के तहत कश्मीर में अमन चैन कैसे बहाल हो सकता है,यह बुनियादी सवाल है।


    कानून और व्यवस्था राज्यसरकारी की जिम्मेदारी है जिसे निभाने में पीडीएस भाजपा की सरकार एकदम फेल है तभी वहां आपातकालीन तौर तरीके आजमाये जा रहे हैं।

    पलाश विश्वास


    आपातकाल और आपरेशन ब्लू स्टार के वक्त जो न हुआ,वह कश्मीर में हो रहा है।जबकि वहां एक चुनी हुई सरकार है और सरकार में शामिल है वह सत्तादल भी ,जिसकी केंद्र सरकार है।संसद का मानसून अधिवेशन है और कश्मीरेमें न सिर्फ अखबार बल्कि सारे संचार के माध्यम बंद है।


    अखबार जब नहीं निकलते तो आम जनता को खभर भी नहीं होती कि दरअसल हो क्या रहा है।


    सरकारी पक्ष बताने के लिए भी अखबार निकलने चाहिए।


    वरना जनता को एकतरफा जो सूचनाएं अनधिकृत सूत्रों और खालिस अफवाहों से मिलेंगी,उससे कश्मीर के हालत और संगीन होने का अंदेशा है।


    कश्मीर पहले से सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून के मातहत है और वहां राजकाज इसी कानून के तहत चल रहे हैं।कानून और व्यवस्था से निपटने की जिम्मेदारी भी सेना की है।


    देश के अनेक हिस्से हैं,जहां कानून व्यवस्था सेना के हवाले का मतलब भुक्तभोगी जनता खूब जानती है।


    मसलन मणिपुर जहां कश्मीर की तरह सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून लागू है और हाल में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सेना को संयम बरतने का आदेश देते हुए बल प्रयोग का निषेध किया है।


    इसी फैसले में मणिपुर में करीब डेढ़ हजार फर्जी मुठभेडों की जांच का आदेश भी दिया गया है।देश के बाकी हिस्सों में भी ऐसे हजारों मुठभेड़ें होती रही हैं और न्याय हुआ नहीं है।मसलन यूपी में।


    जिस कश्मीर में मुठभेड के हालात इस कदर बिगड़े हैं वहां सैन्य आपरेशन और मुठभेडों का अनंत सिलसिला है।फिरभी देश को उसका ब्यौरा मालूम नहीं है।


    कश्मीर विवादों के मद्देनजर हम मान बी लें कि इन संवेदनशील सूचनाओं का सार्वजनिक खुला सा होना नहीं चाहिए।जनता को न सही ,इस देश की जनता के प्रति जिम्मेदार संसद और न्यायपालिका को इसके ब्यौरे कमसकम मिलने चाहिए।


    गौरतलब है कि मणिपुर की लौह मानवी इरोम शर्मिला इसी सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून खत्म करने की मांग लेकर चौदह साल से आमरण अनशन पर हैं।


    मेरठ और यूपी के अलावा देश के अनेकि संवेदनशील हिस्से समयसमय पर सेना के हवाले रहे हैं।


    असम और पंजाब की चर्चा न भी करें तो बेहतर।


    हम आदिवासी भूगोल में सेना के रंगबिरंगे अभियानों की चर्चा भी नहीं कर रहे हैं और न बरसों पहले मणिपुर की माताओं के भारतीय सेना के खिलाफ असम राइफल्स के मुख्यालय पर नग्न प्रदर्शन की बात कर रहे हैं।


    अगर किसी आतंकवादी की मुठभेड़ में मौत हुई है तो इतने व्यापक पैमाने पर घाटी में हिंसा भड़कने की स्थितियां कैसे बनी,भारतीय संसद को इसकी पड़ताल जरुर करनी चाहिए,खासकर तब जब वहां की सत्ता की बागडोर केंद्र में सत्तादल के हाथों में हैं।


    हम कश्मीर को लेकर ऐतिहासिक विवादों का पिटारा यहं खोलना नहीं चाहते ,जिनपर अभी लोकतांत्रिक तरीके से कोई संवाद हुआ ही नहीं है और अब तक भारत के अभिन्न अंग भूस्वर्ग कश्मीर की नर्क जैसी कथा व्यथा को सुनने के लिए,समझने के लिए बाकी भारत कभी तैयार नहीं हुआ है।


    कश्मीर की जनता के साथ भारत की सरकार और भारत राष्ट्र का कोई संवाद नहीं है तो सिर्फ सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून के तहत कश्मीर में अमन चैन कैसे बहाल हो सकता है,यह बुनियादी सवाल है।


    कानून और व्यवस्था राज्यसरकारी की जिम्मेदारी है जिसे निभाने में पीडीएस भाजपा की सरकार एकदम फेल है तभी वहां आपातकालीन तौर तरीके आजमाये जा रहे हैं।


    ऐसे में सबसे पहले उस सरकार को बर्खास्त करने की जरुरत है।


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    तसलिमा के मुताबिक बांग्लादेश में इस्लामी राष्ट्रवादी किसी हिंदू को वहां रहने नहीं देंगे!

    निशाने पर विभाजन पीड़ित दस करोड़ बंगाली हिंदू,जो सीमा के आरपार बेनागरिक अल्पसंख्यक हैं

    लिहाजा अब इजराइल की तरह होमलैंड आखिरी विकल्प है

    बांग्लादेश की पद्मा नदी के इस पार फरीदपुर,खुलना,बरिशाल,जैसोर जैसे तमाम जिलों को होमलेैंड बनाया जा सकता है और बाद में हालात और बिगड़े तो इसमें असम और बंगाल के जिले शामिल करने की मांग भी की जा सकती है

    अग्निगर्भ बांग्लादेश में और भारत के विभिन्न राज्यों,जिनमें असम और बंगाल भी शामिल हैं,कट्टर धर्मोन्माद के निशाने पर हैं हिंदू बंगाली विभाजन पीड़ित शरणार्थी और तमाम आम नागरिक।


    इस भयंकर धर्मोन्मादी सुनामी के खिलाफ दो अगस्त को त्रिपुरा की राजधानी आगरतला में रैली और जुलूस है तो पांच अगस्त कोलकाता में महाजुलूस।बांग्लादेश हाई कमीशन को डेपुटेशन।राज्यपाल और बंगाल की मुख्यमंत्री को ज्ञापन।


    फिर सत्रह अगस्त को राजधानी नई दिल्ली  के जंतर मंतर पर आंदोलन है।दिल्ली में 17 अप्रैल 2013 को भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की जान माल की सुरक्षा की मांग लेकर धरना दिया गया था।इसके बाद असम और दूसरे राज्यों की राजधानियों में भी आंदोलन की तैयारी है।


    फिरभी समस्या का समाधान न हुआ तो फिर होमलैंड का विकल्प खुला है और इसके लिए जरुरी हुआ तो बांग्लादेश में भारत के सैन्य हस्तक्षेप का भी हम समर्थन करेंगे।

    दस करोड़ विभाजन पीड़ित हिंदू बगाली शऱणार्थी विभिन्न राज्यों में भारी संख्या में हैं और इस पर सर्वे के मुताबिक हम अच्छी तरह जानते हैं कि किन विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र में बंगाली वोट बैंक निर्णायक है।हम अब बंधुआ वोट बैंक बने नहीं रहेंगे।जो हमारे साथ होगा,हम उन्हीका साथ देंगे।हम अब अपनी मर्जी के उम्मीदवारों को जितायेंगे और हरायेंगे भी।

    पलाश विश्वास

    बांग्लादेश समेत पूरा भारतीय महाद्वीप अल्पसंख्यकों का खुला आखेटगाह बन गया है।धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के निशाने पर हैं दुनियाभर के अल्पसंख्यक और दुनिया के नक्शे में इस वक्त कही कोई कोना शरणार्थी सैलाब से खाली नहीं है।


    अभूतपूर्व हिंसा और घऋणा का माहौल है और फिजां कयामत है।


    हम लगातार इसके खिलाफ आगाह करते रहे हैं।हम बांग्लादेश में फटते हुए ज्वालामुखी के मुखातिब आपको खड़ा करने की कोशिश भी लगातार करते रहे हैं।


    बांग्लादेश में परिस्थितियां बांग्लादेश सरकार,वहां की धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील ताकतों के नियंत्रण से बाहर हैं तो भारतीय राजनीति और राजनय दोनों फेल हैं।


    वैश्विक तमाम संगठन और देश,संयुक्त राष्ट्र संघ,मानवाधिकार संगठन वगैरह वगैरह अल्पसंख्यकों का अबाध नरसंहार और बांग्लादेश पर खान सेना और रजाकर वाहिनी के मुक्तिपूर्व कब्जे के लहूलुगहान समय़ की तरह अल्पसंख्यकों की जिंदगीनामा है।


    हालात कितने खतरनाक हैं,इसका अंदाजा हिंदू राष्ट्र भारत और हिंदुत्व के झंडेवरदारों को भी नहीं है और उनके नानाविध करतब हालात और संगीन बनाते जा रहे हैं।


    प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतवादी आदर्शवादी तमाम तत्व धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के खिलाफ सुविधाजनक मौकापरस्त मौन धारण किये हुए हैं।


    जबकि तसलिमा नसरीन ने साफ साफ कह दिया है कि इस्लामी राष्ट्रवादी बांग्लादेश में किसी हिंदू को नहीं चाहते।तसलिमा ने सिर्फ हिंदुओं का उल्लेख किया है।जबकि हकीकत यह है कि बांग्लादेश में बौद्ध ,ईसाई, आदिवासी के लिए भी कोई जगह नहीं है।उनपर भी लगातार हमले हो रहे हैं।उनका भी सफाया हो रहा है।


    कुल मिलाकर बांग्लादेश में इस वक्त दो करोड़ 39 लाख हिंदू अब भी है।तसलिमा नसरीन के मुताबिक बांग्लादेश की आबादी 16 करोड़ है और इनमें दस फीसद हिंदू हैं।


    वास्तव में डेढ़ करोड़ नहीं,बांग्लादेश से भारत आने को आतुर भावी शरणार्थी हिंदुओं की संख्या दो करोड़ उनतालीस लाख है।


    पश्चिम बंगाल की आबादी नौ करोड़ है।इसमें तीस फीसद मुसलमान हैं तो तीस फीसद दलित भी हैं।जाति प्रमाण पत्र और नागरिकता वंचित बहुत बड़ी आबादी की वजह से दलितों का सरकारी आंकड़ा 22 फीसद है।


    बंगाल में भी शरणार्थियों की तादाद तीन करोड़ से कम नहीं है और बाकी भारत की तरह इन शरणार्थियों में नब्वे फीसद लोग फिर बहुजन हैं।


    भारत भर में छितराये हुए मौजूदा हिंदू बंगाली शरणार्थी पांच करोड़ से कम नहीं है,जो नागरिक, मानवाधिकार, आजीविका, मातृभाषा, आरक्षण और नागरिकता से वंचित हैं।


    सीमा के आर पार यह कुल विभाजनपीड़ित हिंदू शरणार्थियों की आबादी कमसकम दस करोड़ है जिनकी जान माल अब कहीं भी सुरक्षित नहीं है।


    विचारधारा,सिद्धांत,राजनीति वगैरह वगैरह इस दस करोड़ मनुष्यता के लिए अब बेमतलब हैं।


    इनके हक हकूक के लिए 2003 के नागरिकता संशोधन कानून के बाद बने निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति तबसे संघर्ष कर रही है और अब भारत के लगभग हर राज्य.में इस संगठन का विस्तार हो चुका है।


    निखिल भारत बंगाली उद्वास्तु समन्वय समिति के नेतृत्व से मुझे कोई मतलब नहीं है।हम दस करोड़ ज्यादा विभाजन पीड़ित मनुष्यों के हक हकूक की बात कर रहे हैं और इसलिए जब तक यह लड़ाई जारी रहेगी,नेतृत्व चाहे किसी का हो,हम निखिल भारत के साथ है।


    अग्निगर्भ बांग्लादेश में और भारत के विभिन्न राज्यों,जिनमें असम और बंगाल भी शामिल हैं,कट्टर धर्मोन्माद के निशाने पर हैं हिंदू बंगाली विभाजन पीड़ित शरणार्थी और तमाम आम नागरिक।


    इस भयंकर धर्मोन्मादी सुनामी के खिलाफ दो अगस्त को त्रिपुरा की राजधानी आगरतला में रैली और जुलूस है तो पांच अगस्त कोलकाता में महाजुलूस।बांग्लादेश हाई कमीशन को डेपुटेशन।राज्यपाल और बंगाल की मुख्यमंत्री को ज्ञापन।


    फिर सत्रह अगस्त को राजधानी नई दिल्ली  के जंतर मंतर पर आंदोलन है।दिल्ली में 17 अप्रैल 2013 को भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की जान माल की सुरक्षा की मांग लेकर धरना दिया गया था।इसके बाद असम और दूसरे राज्यों की राजधानियों में भीआंदोलन की तैयारी है।


    फिरभी समस्या का समाधान न हुआ तो फिर होमलैंड का विकल्प है और इसके लिए जरुरी हुआ तो बांग्लादेश में भारत के सैन्य हस्तक्षेप का भी हम समर्थन करेंगे।


    दस करोड़ विभाजन पीड़ित हिंदू बगाली शरणार्थी विभिन्न राज्यों में भारी संख्या में हैं और इस पर सर्वे के मुताबिक हम अच्छी तरह जानते हैं कि किन विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र में बंगाली वोट बैंक निर्णायक है।हम अब बंधुआ वोट बैंक बने नहीं रहेंगे।जो हमारे साथ होगा,हम उन्हीका साथ देंगे।हम अब अपनी मर्जी के उम्मीदवारों को जितायेंगे और हरायेंगे भी।



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    শরদিন্দু উদ্দীপন

    জয় ভীম হামারা নারা হ্যায়ঃ JAI BHIM HUMARA NARA HAI

    সোজা কথা যদি না শুনতে চাও, তবে শোন "হল্লা বোল"। 
    প্রতিবাদে গর্জে উঠল দাদার। 
    হায় বাংলা !! 
    তোমার সকাল হবে কবে?


    গত ২৬শে জুন রাতের অন্ধকারে বুলডোজার লাগিয়ে সম্পূর্ণ চুরমার করে দেওয়া হয়েছে বাবা সাহেব আম্বেদকরের স্মৃতি বিজড়িত দাদারের বাড়িটি। যে বাড়ির প্রেস থেকে প্রকাশিত হত "মূকনায়ক"এবং "বহিষ্কৃত ভারত"নামে ঐতিহাসিক দুটি পত্রিকা। যে বাড়ি থেকে বাবা সাহেবে তাঁর সমস্ত আন্দোলন পরিচালনা করতেন। যে বাড়িতে গড়ে উঠেছিল দুষ্প্রাপ্য বইয়ের সমন্বয়ে একটি বিরল লাইব্রেরী, সাংঠনিক দুর্বলতাকে কাজে লাগিয়ে সেই বাড়িটিকেই চুরমার করে দিল মহারাষ্ট্রের বিজেপি শাসিত সরকার এবং তাদের বশংবদেরা।

    এই বাড়ি রক্ষণাবেক্ষণের জন্য বাবা সাহেব "পাবলিক ইমপ্রুভমেন্ট ট্রাষ্ট"গঠন করে তাদের হাতেই সমস্ত সম্পত্তি তুলে দেন। সাম্প্রতি এই ট্রাষ্টের পরিচালন সমিতিতে ঢুকে পড়ে আরএসএস এবং শিবসেনার কট্টর সমর্থকেরা। মধুকর কাম্বলে এবং রত্নাকর গাইকোয়াড় এই দলের পাণ্ডা। শোনা যাচ্ছে রামদাস আতাউলেও আছে এই আত্তহননের মূলে। এরাই তস্করদের ডেকে এনে নিজ গৃহের সুলুক সন্ধান দিয়েছে। সংস্কারের নামে বাড়িটি ভেঙ্গে ফেলেছে এবং পুনরায় নির্মাণের নামে বাড়িটিকে কর্পোরেটদের হাতে তুলে দেবার ষড়যন্ত্র করেছে। দলিত-বহুজন স্বাধিকার আন্দোলন, পশ্চিমবঙ্গের পক্ষ থেকে এই কাপুরুষ ষড়যন্ত্রকারীদের চরম ধিক্কার জানাচ্ছি।

    এই বাড়িটি ধ্বংসের মধ্য দিয়ে প্রকাশ্যে এসে গেছে নরেন্দ্র মোদির দ্বিচারিতা। তাঁর বাবাসাহেব বন্দনা যে আসলে একটি সজানো নাটক তা ধরা পড়ে গেছে। মোদি যে ব্রাহ্মন্যবাদীদের "জাতি সাফাই"(ethnic cleansing) অভিযানের জন্য ঝাঁটা হাতে তুলে নিয়েছে তা পরিষ্কার হয়ে গেছে।

    ব্রাহ্মন্যবাদ ইতিহাস ভয় পায়। ঐতিহাসিক বস্তুতে তাদের গাত্রদাহ হয়, নৃতাত্ত্বিক বস্তুতে তাদের শিরঃপীড়া হয়, বৈজ্ঞানিক পরীক্ষা নিরীক্ষায় তাদের জীনগত উত্তেজনা বাড়ে তাই এই বাড়িটি ছিল তাদের গাত্রদাহ, শিরঃপীড়া ও জেনেটিক অস্থিরতার কেন্দ্রবিন্দু। কেননা এই বাড়িতেই ছিল একটি বিরলতম লাইব্রেরী, বাবাসাহেবের অপ্রকাশিত ম্যানুস্ক্রিপ্ট, পুরানো অসংখ্য দলিল দস্তাবেজ। এই বাড়িতেই ছিল বাবাসাহেবের আন্দোলনের অসংখ্য ইতিহাস। আম্বেদকর দর্শনের মূলকেন্দ্র হিসেবে এই বাড়ির সঞ্চিত রসদ যে সকল প্রগতিশীল মেধাকে উদ্দীপনা যোগাচ্ছিল তা ব্রাহ্মণ্যবাদীদের কাছে ছিল অত্যন্ত অস্বস্তিকর শিরঃপীড়ার কারণ।

    এছাড়া যে ভাবে আইটিআই, মেডিকেল কলেজ, বিশ্ববিদ্যালয়ের ক্যাম্পাসে ক্যাম্পাসে আম্বেদকরবাদী সংগঠন বিপুল সাড়া জাগিয়ে ব্রাহ্মন্যবাদকে প্রতিহত করার জন্য নীল ঝান্ডা নিয়ে "জয় জয় জয় জয় জয় ভীম"শ্লোগানে আকাশ বাতাস মুখরিত করে তুলছে তাতে এক অশনিসংকেত দেখতে পাচ্ছে ব্রাহ্মন্যবাদী মোড়লরা।
    এই মোড়লরা পর্যুদস্ত বামপন্থীদের দেখে স্বস্তির নিশ্বাস ফেলেছিল। মার্ক্সবাদকে একটি পরিত্যক্ত বিদেশী মতবাদ বলে ছুড়ে ফেলার আহ্বান জানিয়ে পরিতৃপ্ত হয়েছিল, মার্ক্সবাদীদের অস্তিত্বহীনতা ও অকার্যকারিতা দেখে উল্লসিত হয়েছিল, তাদের মতবাদ ভারতরাষ্ট্রের বিরুদ্ধে দেশদ্রোহের সামিল বলে উচ্চকিত হয়ে কানাইয়া কুমার, অনির্বাণ, ওমর খলিদদের বিরুদ্ধে "সেডিশন"নামক সুদর্শনচক্রে শান দিতে শুরু করেছিল, তখনই বাঁধা হয়ে দাঁড়ায় আম্বেদকর এবং তাঁর হাতে তৈরি ভারতের জাতীয় পতাকা। ব্রাহ্মনবাদীরা লক্ষ্য করেন যে অতিবাম ছাত্রছাত্রীরাও হাতে ত্রিবর্ণ পতাকা নিয়ে, রোহিত পোষাকে সজ্জিত হয়ে বাবাসাহেব ভীমরাও আম্বেদকরের ছবি উত্তোলন করে সিংহনাদে উচ্চারণ করছে "জয় ভীম"। অনুরণিত হচ্ছে, "জাতপাত কি টক্কর মে, জয় ভীম হামারা নারা হ্যায়, ব্রাহ্মনবাদ কি টক্কর মে, জয় ভীম হামারা নারা হ্যায়, পুঁজিবাদ কি টক্কর মে, জয় ভীম হামারা নারা হ্যায়, ফ্যাসিবাদ কি টক্কর মে জয় ভীম হামারা নারা হ্যায়"। ব্রাহ্মণ্যবাদীরা হতচকিত হয়ে পড়েন এই Paradigm Shift এর স্বতঃস্ফূর্ত অংশগ্রহণে। ব্রাহ্মণ্যবাদীদের ঘোষিত মহাপ্রলয়ের তাণ্ডব নর্তনকে প্রতিহত করার জন্য যে আম্বেদকরবাদী মহাজনপ্লাবন প্রবল শক্তিশালী হয়ে উঠেছে এবং তার ঘূর্ণাবর্তে একেবারে ভোঁতা হয়ে যাচ্ছে সুদর্শন ও সেডিশনের ধার তা তারা হাড়ে হাড়ে বুঝতে পেরেছে।

    অন্যদিকে আম্বেদকরের ভাগীদারী দর্শন মেনে গুজারাটের প্যাটেলরাও এসসি কোটায় রিজার্ভেশনের দাবীতে স্তব্ধ করে দিচ্ছে রাম রথের চাকা। ধীরে ধীরে ওবিসি সমাজের ঘুমন্ত বিবেককে জাগিয়ে তুলছে আম্বেদকর। বিচ্ছিন্নতার ধোকাবাজী ছেড়ে নিজস্ব সংস্কৃতি রক্ষার জন্য তীব্র ভাবে এগিয়ে আসছে আদিবাসী রেজিমেন্ট। মুসলিমরাও আম্বেদকরের মধ্যে খুঁজে পেয়েছেন তাদের হারিয়ে যাওয়া দলিত স্বভিমান। সার্বিক ভাবে সর্বসমাজের এই উত্থান ব্রাহ্মন্যবাদের কাছে ভয়ঙ্কর বিপদ বলে মনে হচ্ছে। তাই সরাসরি আম্বেদকরকেই আক্রমণের সিদ্ধান্ত নিয়েছে ব্রাহ্মন্যবাদ।

    সাম্প্রতি রোহিত আন্দোলনের অন্যতম মুখ মা রাধিকা এবং রোহিতের ছোট ভাই এক ভাব গম্ভীর পরিবেশের মধ্যে এই বাড়িতেই বুদ্ধ ধর্ম গ্রহণ করেন। শোষিত, নিষ্পেষিতের আশ্রয় হিসেবে এই বাড়িটির আরো একটি দিগন্ত উন্মোচিত হয় এই অনুষ্ঠানের মধ্য দিয়ে। তাই অবিলম্বে এই বাড়িটি চূর্ণ করার সিদ্ধান্ত নেওয়া হয়।

    দাদারের এই আম্বেদকর ভবন গুড়িয়ে দেওয়া একটি সংকেত। এর মধ্য দিয়ে ব্রাহ্মন্যবাদীরা পরখ করে নিতে চাইছে দলিত-বহুজনের প্রতিক্রিয়া। পরখ করে নিতে চাইছে সর্বসমাজের গুনগত অবস্থান। এই ধ্বংসের সংকেতের জবাবে আমরা নিরবতা পালন করলে ওরা আবার সুদর্শনে শান দিতে শুরু করবে। চেপে বসবে শেষ নাগের পিঠে। শঙ্খে ফুঁ দিয়ে শুরু করে দেবে প্রলয় নাচন।

    আসুন ভারতের হৃত গৌরব পুনরুদ্ধারের জন্য এই ভ্রষ্টাচারীদের জনগণ থেকে বিচ্ছিন্ন করে ফেলি। সর্বসমাজ ভাইচারা প্রতিষ্ঠা করি।
    (পুনঃ প্রাচারিত হল)

    জয় ভীম, জয় ভারত
    দলিত-বহুজন স্বাধিকার আন্দোলন, জিন্দাবাদ।




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    अमेरिका में भी फासिज्म की दस्तक कि ट्रंप हुए राष्ट्रपति उम्मीदवार

    अमेरिका भारत को हमेशा अस्थिर बनाने में लगा है।ट्रंप ने इस्लाम के खिलाफ खुले युद्ध का ऐलान किया है लेकिन वे भारत के लिए भी बेहद खतरनाक होंगे।महादेश के हालात बेहद संगीन हैं,ट्रंप लूटेंगे मुनाफा।

    हम अब आ बैल मुझे मार की तर्ज पर इस्लाम के खिलाफ अमेरिका के आतंकविरोधी गठजोड़ में इजराइल के साथ पार्टनर है।इस पार्टनरशिप में हिंदू राष्ट्र का एजंडा भी अब शामिल हो गया है और इसका सीधा मतलब है कि भारत के मुकाबले अमेरिकी ब्रांड का इस्लामी आतंकवाद इस महादेश के युद्ध स्थल पर सबसे बड़ी चुनौती है।


    पलाश विश्वास


    तमाम विवादों को दरकिनार करते हुए रिपब्लिकन पार्टी ने आखिरकार अमेरिकी के भावी राष्ट्रपति के लिए रंगभेदी फासिस्ट अरबपति डोनाल्ड ट्रंप को उम्मीदवार बना दिया है।रिबल्किन प्रत्याशी बनने के साथ ही ट्रंप दुनिया के वजूद के लिए सबसे खतरनाक त्तव बन गये हैं,जिन्हें किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।मैडम हिलेरी के मुकाबले वे अमेरिका में नये सिरे से गृहयुद्ध के हालात में दुनियाभर के लिए श्वेत आतंक साबित हो सकते हैं।


    अमेरिका भारत को हमेशा अश्थिर बनाने में लगा है।ट्रंप ने इस्लाम के खिलाफ खुले युद्ध का ऐलान किया है लेकिन वे भारत के लिए भी बेहद खतरनाक होंगे।


    गौरतलब है कि अमेरिका में इस साल के नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए रिपब्लि‍कन पार्टी ने डोनाल्ड ट्रंपकी उम्मीदवारी का औपचारिक ऐलान कर दिया।


    जबाव में अपने निराले अंदाज में ट्रंप ने ट्विटर पर इस ओर खुशी जताते हुए कहा कि वह कड़ी मेहनत करेंगे और पार्टी का मान ऊंचा बनाए रखेंगे।


    इसके साथ ही उन्होंने 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा भी दिया।इस अमेरिका फर्ट के नारों को भारत के बारे में उनके अति उच्च विचारों के मद्देनजर समझने की जरुरत है।


    अगर हम उनके मुस्लिम विरोधी बयानों को किनारे रख दें तो भी किसी भी कोण से ट्रंप भारत के लिए दोस्त साबित होने वाले नहीं हैं।


    गौरतलब है कि  अपने 16 प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने और रिपब्लिकन पार्टी के भीतर अपने प्रति उपज रहे असंतोष से निजात पाते हुए डोनाल्‍ड ट्रंपआखिरकार पार्टी की तरफ से उम्‍मीदवारी हासिल करने में सफल रहे।


    जाहिर है कि वे अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो अमेरिका में श्वेत अश्वेत गृहयुद्ध जितना तेज होने वाला है,उससे कहीं ज्यादा तेज होगा अमेरिका का आतंक के विरुद्ध युद्ध और अपरब वसंत का सिलसिला जिसकी दस्तक इस महादेश में भी मानसून की घऩघटा है और हम आपदाओं के मध्य हैं।


    हिटलर और मुसोलिनी के उत्थान से भी भयंकर नतीजे होंगे डोनाल्ड ट्रंप का यह उत्थान क्योंकि मुक्तबाजार का मुनाफावसूली का एकतरफा नरसंहारी एजंडा के साथ दुनियाभर में राष्ट्र राज्यों का अमेरिकीकरण का कार्यक्रम है।


    फासिज्म का मुकाबला फिरभी संभव था।मुक्तबाजारी फासिज्म के ग्लोबल आर्डर की हिटलरशाही का मुकाबला उससे भी मुश्किल है।तब सिर्फ यहूदियों का कत्लेआम हुआ और आज कहना मुश्किल है कि कसका कत्लेआम नहीं होगा।


    अमेरिका फासिज्म के खिलाफ लड़ाई का शुरुआती दौर हार गया जैसे रिपब्लिकन पार्टी में उनके विरोधी उनका मुकाबला कर नहीं पाये।बाकी दुनिया के लिए यह मुकाबला बहुत ज्यादा खून खराबा करने वाला है।गौरतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी ने नैशनल कन्वेंशन में मंगलवार को अरबपति बिजनसमैन डॉनल्ड ट्रंपको औपचारिक रूप से अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित कर दिया। अमेरिका में 8 नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में अब डॉनल्डट्रंपडेमोक्रैटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलरी क्लिंटन को चुनौती देंगे। ट्रंपको लेकर पार्टी के नैशनल कन्वेंशन में भी काफी विरोध और विवाद देखने को मिला लेकिन पार्टी के पास कोई चारा नहीं था।


    • ट्रंप ने अमेरिका के लिए जो भावी एजेंडा रखा है, उसके मुताबिक उनके राष्ट्रपति बनने की स्थिति में अमेरिका में मस्जिदों पर निगरानी रखी जाएगी। इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठन के खिलाफ अमेरिका को 'कठोर पूछताछ" के लिए वटरबोर्डिंग जैसे दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करने पर बल दिया जाएगा। अवैध अप्रवासियों और सीरियाई प्रवासियों को रोकने के लिए अमेरिका व मेक्सिको के बीच एक 'बहुत बड़ी दीवार" खड़ी की जाएगी। ट्रंप अमेरिका में रहने वाले 1.1 करोड़ अवैध अप्रवासियों को वापस भेजने के पक्षधर हैं और साथ ही 'जन्म से नागरिकता" की नीति को भी खत्म करना चाहते हैं, जिसके तहत अमेरिकी धरती पर जन्म लेने वाले अवैध अप्रवासियों के बच्चों को अमेरिकी नागरिकता प्राप्त हो जाती है।



    पहले अमेरिका यानी पहले अमेरिकी हित और अमेरिकी हित क्या होते हैं लातिन अमेरिका ,वियतनाम युद्ध और काड़ी युद्ध से लेकर अरब वसंत तक इसके अनेक ज्वलंत उदाहरण हैं कि कैसे अमेरिकी हितों की बलिबेदी पर दुनियाभर के देशों के करोड़ों बेगुनाह लोग बलि चढ़ाये जाते रहे हैं।


    समझिये कि नरसंहारों का सैलाब आने वाला है जो हर राष्ट्रवादी सुनामी पर भारी पड़ने वाला है।हिंदुत्व की सुनामी हो या पिर इस्लामी राष्ट्रवाद की सुनामी,अमेरिकी नरसंहर युद्ध गृहयुद्ध और विश्वव्यापी शरणार्थी समस्या सबकुछ पर गहरा असर करने वाला है डोनाल्ड ट्रंप का यह अमेरिका फर्स्ट।


    अमेरिकी राष्ट्रपतियों के किये कराये का नतीजा सारी दुनिया को भुगतना पड़ता है।बुश पिता पुत्र ने पहले ही इस दुनिया को तेल कुँओं की आ में झोंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी।चिटपुट सैन्य हस्तक्षेप से लेकर वियतनाम युद्ध तक अमेरिकी राष्ट्रपतियों का राज काज दुनियाभर में अस्थिरत पैदा करने के साथ सात युद्ध और गृहयुद्ध का कारोबार रहा है।


    इसी कारोबर के लिए अमेरिका ने दुनियाभर में आतंकवादी संगठन तैयार किये जो खाडी युद्ध के बाद अमेरिका औययूरोप में बहुत गहरे पैठ गये हैं और नतीजतन दुनिया का नक्शा अब मुकम्मल शरणार्थी शिविर है।


    सद्दाम हुसैन को महिषाशुर बनाकर उसका वध करने का युद्ध अपराध मधयएशिया ही नहीं,एशिया से लेकर अफ्रीका और यूरोप तक को तेलकुंओं की आग में झुलसा रहा है।


    हमारे पड़ोस में बांग्लादेश में जिस तरह आतंकवाद का खुल्ला खेल चल रहा है ,वह साबित करता है कि किस हद तक हम बारुद के ढेर पर बैठे हैं।


    इस आतंक का आयात भी अमेरिका से हुआ है।तालिबान से लेकर अलकायदा और आइसिस तक अमेरिकी साम्राज्यवाद की जारज संतानें हैं।


    इसी तालिबान की मदद की आड़ में अस्सी के दशक में असम से लेकर पूर्वोत्तर तक में भारत को अमेरिका अशांत करता रहा है।जिससे हम अभी उबर नहीं सके हैं।


    कश्मीर में तो पंजाब और असम की तुलना में पाकिस्तान से होने वाले युद्धों को छोड़ दें तो छिटपुट वारदातों के अलावा हालात केंद्र में मुफ्ती सईद के गहमंत्री होने तक शांत रहा है।उनकी बेटी रुबइया के अपहरण के साथ कश्मीर में अस्थिरता का नया दौर शुरु हुआ है लेकिन अब भी असम और समूचे पूर्वोत्तर में हालात बहुत संवेदनशील है।


    अब जो हालात बन रहे हैं वे बांग्लादेश युद्ध से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि अब किसी पाकिस्तान से नहीं ,मुकाबला अमेरिका के बनाये इस्लामी राष्ट्रवाद और आतंकवाद से है,जिसकी जड़े इस देश में सर्वत्र बेहद मजबूत हैं।


    अब नये सिरे से बांग्लादेश के विभाजन का खतरा है क्योंकि होमलैंड ही वहां के अल्पसंख्यकों के बचने का एकमात्र विकल्प है क्योंकि बांग्लादेश सरकार सबकुछ जान बूझकर हालात पर काबू पाने में नाकाम है और उसके संगठन पर भी इस्लामी राष्ट्रवादियों का कब्जा हो गया है।


    बांगालदेश में होमलैंड के हालात बने तो बंगाल और असम इस आग से बच सकेंगे,इसमें शक है।त्रिपुरा तो पूर्वोत्तर में सबसे कमजोर कड़ी है,जहां नेल्ली नरसंहार के बाद शांति बनी हुई है लेकिन वहां बांग्लादेश का असर सबसे मारक हो सकता है।


    हम अब आ बैल मुझे मार की तर्ज पर इस्लाम के खिलाफ अमेरिका के आतंकविरोधी गठजोड़ में इजराइल के साथ पार्टनर है।इस पार्टनरशिप में हिंदू राष्ट्र का एजंडा भी अब शामिल हो गया है और इसका सीधा मतलब है कि भारत के मुकाबले अमेरिकी ब्रांड का इस्लामी आतंकवाद इस महादेश के युद्ध स्थल पर सबसे बड़ी चुनौती है।


    ऐसे हालात में डोनाल्डट्रंपजैसे इस्लाम के खिलाफ खुल्ला युद्ध का ऐलान करने वाले फासिस्ट शख्सियत के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने पर बुस पिता पुत्र के युद्ध अपराधों के सारे रिकार्ड तो टूट ही सकते हैं,अमेरिका और इजराइल का पार्टनर होने का खामियाजा हमें इसी महादेश में और खासतौर पर भारत के विभिन्न राज्यों में भुगतने ही होंगे।


    गौरतलब है कि एक टॉप रिपब्लिकन नेता नीट ग्रिंगिच  का कहना है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डॉनल्ड ट्रंपदुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने में स्वभाविक रूप से फिट हैं। उन्होंने कहा कि ये दोनों नेता अमेरिका और भारतके संबंधों को नए मुकाम पर ले जाएंगे। रिपब्लिकन नेता ने कहा कि मोदी और ट्रंपदुनिया को ज्यादा सुरक्षित और बेहतर बनाएंगे। पूर्व स्पीकर ऑफ द यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स नीट गिंग्रिच ने रिपब्लिकन हिन्दू कोअलिशन की तरफ से आयोजित ब्रेकफस्ट में कहा, 'डॉनल्ड ट्रंपअमेरिका की सुरक्षा को लेकर काफी टफ नेता हैं और मोदी भी इंडिया को लेकर बेहद सतर्क है।


    जाहिर है कि इस समीकरण के भी नये मायने खुलने वाले हैं।गौर कीजिये,रिपब्लिकन नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी बेहतरीन नेता हैं, जो भारतमें उद्यमियों और स्वतंत्र उपक्रमों की पैरोकारी करते हैं। गुजरात में उनके रिकॉर्ड को देखिए, वास्तव में बेहतरीन चीज हुई है।


    गौरतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी ने भारतको अमेरिका का नजदीकी सहयोगी और रणनीतिक साझीदार बताया है जबकि पाकिस्तान को अपने परमाणु हथियारों की रक्षा पर ध्यान देने के लिए कहा है। पार्टी ने भारतसरकार से आग्रह किया है कि वह अपने यहां रहने वाले सभी धर्मो के लोगों को हिंसा और भेदभाव से बचाए। राष्ट्रपति चुनाव के सिलसिले में आयोजित सम्मेलन में विदेश नीति पर घोषणा पत्र जारी करते हुए कहा गया कि भारतीय लोगों में जो काबिलियत है, उससे वह केवल एशिया नहीं बल्कि दुनिया का भी नेतृत्व कर सकते हैं।


    गौरतलब है कि क्लिवलैंड में रिपब्लिकन पार्टी के सम्मेलन के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को अमेरिका का सहयोगी बताया है। ट्रंप ने कहा कि भारत हमारा व्यापारिक साझेदार है। डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान और चीन के साथ बिगड़ते रिश्तों पर अपने 58 पेज के घोषणा पत्र में कहा है कि वह 'पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को सुरक्षित करना चाहता है।'

    रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रंप ने घोषणा पत्र में कहा है कि राष्ट्रपति बनने पर वह नेताओं के साथ मिलकर काम करेंगे और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएंगे। ट्रंप कह कहना है कि वह नशीले पदार्थों के व्यापार के खिलाफ आगे बढ़ेगे। ट्रंप ने बताया कि 'हम भारत को विदेशी निवेश और व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

    टाइम्स ऑफ इंडियाकी रिपोर्ट के मुताबिक, रिपब्लिकन पार्टी ने कहा है कि भारत, अमेरिका का एक राजनीतिक सहयोगी है। भारत की तरफ से अमेरिका के लिए किए गए सहयोग को चुनावी घोषणा पत्र में बताया है और रिपब्लिक मंच से भारत सरकार से अपील की है कि 'हम भारत के धार्मिक समुदायों को हिंसा और भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करेंगे। इस घोषणा पत्र में संबंधों को मजबूती देने के लिए सांस्कृतिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की भी बात कही है।

    ट्रंप ने कहा है कि किसी भी पाकिस्तानी व्यक्ति को आतंकवादियों के खिलाफ अमेरिका की मदद करने के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। जिस तरह डॉ. शकील अफरीदी ने ओसामा बिन लादेन की जानकारी अमेरिका को दी थी। उसकी वजह से अफरीदी को पाकिस्तानी जेल में बंद कर दिया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के साथ काम के रिश्ते जरुरी है। ट्रंप का कहना है कि वे पुराने रिश्तों को मजबूती देना चाहते हैं। इस संबंध से दोनेों देशों को फायदा मिलेगा।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान से छुटकारा पाने और पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को सुरक्षित करने के लिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अमेरिका के लोगों का सहयोग निहित है।


    वहीं नई दुनिया के मुताबिक अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या राष्ट्रपति पद के लिए ट्रंप को उम्मीदवार बनाकर रिपब्लिकन अमेरिका का चरित्र बदलने की फिराक में है? यदि ट्रंप राष्ट्रपति बने और उन्होंने उन्हीं नीतियों पर चलने का प्रयास किया, जैसा वे राजनीतिक भाषणों में कहते हुए देखे जा रहे हैं, तो अमेरिका दुनिया को किस दिशा की ओर ले जाएगा? एक नजर इसी से जुड़े तीन अहम बिंदुओं पर -

    • राष्ट्रपति बनने पर यह सब करना चाहते हैं ट्रंप: ट्रंप ने अमेरिका के लिए जो भावी एजेंडा रखा है, उसके मुताबिक उनके राष्ट्रपति बनने की स्थिति में अमेरिका में मस्जिदों पर निगरानी रखी जाएगी। इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठन के खिलाफ अमेरिका को 'कठोर पूछताछ" के लिए वटरबोर्डिंग जैसे दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करने पर बल दिया जाएगा। अवैध अप्रवासियों और सीरियाई प्रवासियों को रोकने के लिए अमेरिका व मेक्सिको के बीच एक 'बहुत बड़ी दीवार" खड़ी की जाएगी। ट्रंप अमेरिका में रहने वाले 1.1 करोड़ अवैध अप्रवासियों को वापस भेजने के पक्षधर हैं और साथ ही 'जन्म से नागरिकता" की नीति को भी खत्म करना चाहते हैं, जिसके तहत अमेरिकी धरती पर जन्म लेने वाले अवैध अप्रवासियों के बच्चों को अमेरिकी नागरिकता प्राप्त हो जाती है।

    • ट्रंप, गांधी और मुसोलिनी:ट्रंप अपने बयानों व नजरिए को लेकर लगातार विवादों में हैं। उन पर महात्मा गांधी से लेकर पोप तक पर गलतबयानी के आरोप हैं। चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप उस समय जबरदस्त चर्चा में रहे, जब उन्होंने इटली के फासीवादी नेता मुसोलिनी से जुड़े उस वाक्य को री-ट्वीट किया, जिसमें लिखा था - 100 साल तक एक भेड़ की तरह जीने से अच्छा है कि केवल एक दिन शेर की तरह जियो। ट्वीट पर जवाब में उन्होंने कहा - 'मुसोलिनी तो मुसोलिनी थे। क्या फर्क पड़ता है! उस ट्वीट ने आपका ध्यान खींचा कि नहीं?' ट्रंप का ये जवाब और फिर अमेरिकियों में उनके प्रति बढ़ा आकर्षण खतरनाक स्थिति का निर्माण करता दिखता है।

    • अमेरिकियों को पसंद हैं ट्रंप जैसे राष्ट्रपति:ट्रंप मानते हैं कि अमेरिका कागज के शेर की तरह दिख रहा है और उनके राष्ट्रपति बनने पर वह ऐसा नहीं रह जाएगा। उनके मुतााबिक, मैं अपनी सेना को इतना बड़ा और ताकतवर बना दूंगा कि कोई हमसे झगड़ने की हिम्मत न करे। इस तरह से वे अमेरिका को फिर से महान बनाने का सपना दिखा रहे हैं। एक अवधारणा यह है कि ट्रंप अपनी आक्रामक छवि के कारण आने वाले समय में और अधिक शक्तिशाली बनकर उभरेंगे। कारण यह है कि अमेरिकी एक सशक्त राष्ट्रपति को पसंद करते हैं।



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    असम में शरणार्थी आंदोलन को भारी समर्थन,अब बंगाल ,त्रिपुरा और नई दिल्ली का बारी

    विभाजन पीड़ितों की नागरिकता अनिवार्य और बांग्लादेश के हालात राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए भारी खतरा।

    असम में बंगाली शरणार्थी वोट बैंक के बिना भाजपा का सत्ता में आना असंभव था।अगर भाजपा अपने अटल जमाने के कानून को संशोधित करके शरणार्थियों को नागरिकता देती है,तो शरणार्थी आंदोलन के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है।

    पूर्वी बंगाल से बांग्लादेश बने भूखंड पर हालात भयानक बन गये हैं और वहां से आने वाले वीडियों और समाचारों से साफ जाहिर है कि बांग्लादेश पूरी तरह इस्लमी राष्ट्रवाद के शिकंजे में हैं।


    बांग्लादेश में परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर इस तरह होती रहीं तो जैसा कि पहल भी होता रहा है,जाहिर सी बात है कि हिंदू, बौद्ध,ईसाई,आदिवासी शरणार्थियों के साथ  साथ भारी संख्या में मुसलमान शरण और सुरक्षा के लिए भारत आने को मजबूर होंगे।यह भारत के लिए 1971 से बड़ा संकट बनने वाला है।



    पलाश विश्वास



    बंगाली हिंदू विभाजन पीड़ित शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए 2003 से नागरिकता संशोधन अधिनियम संसद में तत्कालीन ग-हमंत्री लाला कृष्ण आडवाणी दावारा पेश करने के बाद से लगातार देश भर में आंदोलन जारी है।तब संसद में सर्वदलीय सहमति से यह कानून पारित हुआ।राज्यसभा में डा.मनमोहन सिंह और जनरल शंकर राय चौधरी ने इस कानून के दायरे से पूर्वी बंगाल और बांगालादेश से आने वाले शरणार्थियों को बाहर रखने की मांग की थी।


    तब संसदीय समिति में जनसुनवाई के लिए शरणार्थी आंदोलन के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने बार बार व्यापक संख्या में ज्ञापन दिये।हमने भी ज्ञापन दिया था।तब इस समिति के अध्यक्ष थे,मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव कुमार मुखर्जी,जिन्होंने किसी भी तरह की सुनवाई से इकार कर दिया।


    इसी बीच मीडिया में खबर है कि मौजूदा मोदी सरकार इस कानून को संशोधित करके पूर्वी बंगाल और बांग्लादेश के विभाजन पीड़ित हिंदुओं को नागरिकता देने जा रही है।संघ परिवार और भाजपा से ऐसे वायदे लगातार किये जा रहे थे और इसी उम्मीद में देशभर में और खास तौर पर बंगाल और असम में हिंदू शरणार्थियों ने भारी तादाद में भाजपा को वोट दिये।


    मीडिया के मुताबिक पड़ोसी देश से आए शरणार्थियों को राहत प्रदान करने के वायदे को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने मंगलवार को लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 पेश किया ताकि इन देशों के हिन्दू, सिख एवं अन्य अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान की जा सके चाहे उनके पास जरूरी दस्तावेज हो या नहीं।लोकसभा में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यह विधेयक पेश किया।


    इस विधेयक के प्रावधानों को अभी सिलसिलेवार देखना बाकी है और असल में कानून क्या शक्ल अखतियार करता है,वह भी देखना बाकी है।


    गौरतलब है कि निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति ने 2011 में नई दिल् ला में नागरिकता की मांग पर बड़ा आंदोलन किया था और वह सिलसिला लगातार जारी है।


    असम में बंगाली शरणार्थी वोट बैंक के बिना भाजपा का सत्ता में आना असंभव था।अगर भाजपा अपने अटल जमाने के कानून को संशोधित करके शरणार्थियों को नागरिकता देती है,तो शरणार्थी आंदोलन के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है।


    गौरतलब है कि इस शरणार्थी आंदोलन का नेतृत्व शुरुआती दौर में मतुआ महासंघ कर रहा था और मतुआ मुख्यालय में नागरिकता की मांग पर मतुआ और शरणार्थी नेताओं ने आमरण अनशन कराया तब त्तकालीन प्रधानमंत्री का संदेशवाहक बनकर वह अनशन नागरिकता देने के वायदे पर तुड़वाया था रिपब्लिकन नेता रामदास अठावले ने जो संजोग से अब केंद्र सरकार में मत्री हैं और अंबेडकरी आंदोलन में अठावले की भूमिका,कासतौर पर अंबेडकर भवन ध्वस्त करने के सिलसिले में उनकी भूमिका को लेकर विवाद के बावजूद शरणार्थियों को उनसे बारी उम्मीदें हैं।कल रिपब्लिकन पार्टी के कोलकाता में हो रहे समता सम्मेलन में तमाम शरणार्थी नेता मौजूद रहेंगे।


    बहरहाल 2005 में शरणार्थी आंदोलन की बागडोर निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के हाथों में हैं जिसका संगठन अब पूरे भरतभर में तमाम राज्यों में सक्रिय है।


    उस आमरण अनशन के बाद मतुआ आंदोलन राजनीति धड़ों में बंट गया है तो कुछ अलग शरणार्थी संगठन भी बन गये हैं।शुरु से इस आंदोलन के साथ रहे सुकृति रंजन विश्वास का एक अलग संगठन और इस तरह के कई और संगठन भी नागरिकता के लिए आंदोलन करते रहे हैं।लेकिन राजधानी नई दिल्ली से लेकर भारत के तमाम राज्यों में आंदोलन लगातार चलाने वाला संगठन निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति ही है।


    अभी हासिल कुछ नहीं हुआ है लेकिन छिटपुट यदा कदा आंदोलन चलाने वाले लोग श्रेय लूटने के फिराक में हैं।जबकि संकट बेहद गहरा गया है और इस वक्त शरणार्थी आंदोलनजन विभाजन पीड़ितों के लिए जीवन मरण का मुद्दा बन गया है।


    बहरहाल निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति सभी शरणार्थी संगठनों को एक जुट करके आंदोलन की राह पर है।


    इस बीच बांग्लादेश में परिस्थितियां विषम हो गयी हैं।भारत में पहले से आ चुके शरणार्थियों की समस्या अभी सुलझी नहीं है कि पूर्वी बंगाल से बांग्लादेश बने भूखंड पर हालात भयानक बन गये हैं और वहां से आने वाले वीडियों और समाचारों से साफ जाहिर है कि बांग्लादेश पूरी तरह इस्लमी राष्ट्रवाद के शिकंजे में हैं।


    आतंकवादी हमले तो अब हो रहे हैं लेकिन वहां हिंदुओं की अबाध हत्याएं हो रही हैं रोज रोज।बलात्कार का शिकार हो रही हैं हिंदू महिलाएं और बच्चियां रोज रोज।हिंदुओं की व्यापक पैमाने में बेदखली हो रही है।सत्तादल और पविपक्ष के नेता कार्यकर्ता रजाकर वाहिनी में शामिल थे और अब वे सीधे तौर पर इस्लामी राष्ट्रवाद के शिकंजे में हैं।


    जिसके नतीजतन सिर्फ हिंदू नहीं,बल्कि ईसाई,बौद्ध,आदिवासी तमाम समुदायों पर कहर बरपाया जा रहा है।


    बांगालदेश में हिंदुओं की आबादी अब भी दो करोड़ 39 लाख है,जिन्हें अब तसलिमा नसरीन के मुताबिक बांग्लादेश में रहने नहीं दिया जायेगा।बांग्लादेश की सरकार उनकी कोई मदद नहीं कर पा रही है तो धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील लेखकों,पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की लगातार हत्या से अल्पसंख्यकों के हक हकूक की लड़ाई जारी रखना अब बांग्लादेश में असंभव है।


    इसीके खिलाफ निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति नागरिकता ,मातृभाषा और आरक्षण जैसी मांगों के साथ साथ बांग्लादेश में तमाम अल्पसंक्य़क समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आंदोलन चला रहा है।


    त्रिपुरा में दो अगस्त को रैसी और जुलूस है तो कोलकाता में 5 अगस्त को महाजुलूस है।5 अगस्त को कोलकाता में बांग्लादेशहाई कमीशन, बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्यपाल को ज्ञापन दिया जाने वाला है।

    इससे पहले इसी सिलसिले में असम की राजधानी गुवाहाटी में 19 जुलाई को विधानसभा पर निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति ने धरना दिया और प्रदर्शन किया।असम की संवेदनशील परिस्थितियों के मद्देनजर इसके बारे में पहले से घोषणाएं नहीं की जा सकीं।


    असम के टीवी चैनलों और अखबारों में इस सिलसिले में रपटें विस्तार से आयी हैं।


    गौरतलब है कि इस धरना प्रदर्शन के मौके पर हाजिर थे सत्ता दल और प्रतिपक्ष कांग्रेस के नेता और बड़ी संख्या में विधायक भी।जो विभाजन पीड़ित बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता के पक्ष में हैं,ऐसा उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा है।बांग्लादेश में परिस्थितियों पर नियंत्रण जरुरी है,ऐसा भी उन्होंने कहा है।


    हालात बेहद संगीन है और बांग्लादेश फिर विभाजन की कगार पर है तो इससे कमसमकम असम,बंगाल और त्रिपुरा के बहुत ज्यादा प्रभावित होने के खतरे हैं।


    जैसा कि 1971 में भी हुआ था कि राजनीतिक उथल पुथल और युद्ध परिस्थितियों के मुताबिक हिंदुओं के सात साथ बड़ी संक्या में राजनीतिक उत्पीड़न और आर्थिक संकट की वजह से बड़े पैनमाने पर मुसलमान शरणार्थी भी भारत चले आये और उनमें से अनेक लौटे बी नहीं हैं।


    जैसा कि 1971 से लगातार हो रहा है कि बांग्लादेश से आने वाले शरणर्थियों में भारी संख्या में मुसलमान भी हैं,तो समझने वाली बात है कि बांग्लादेश में इसतरह हत्या,बलात्कार,आतंक और बेदखली का तांडव जारी रहा तो इस बार भी सिर्फ दो करोड़ उनतालीस लाख हिंदू शरणार्ती ही भारत नहीं आयेंगे।


    बांग्लादेश में परिस्थितियां नियंत्रणसे बाहर इस तरह होती रहीं तो जैसा कि पहल भी होता रहा है,जाहिर सी बात है कि हिंदू, बौद्ध,ईसाई,आदिवासी शरणार्थियों के साथ  साथ भारी संख्या में मुसलमान शरण और सुरक्षा के लिए भारत आने को मजबूर होंगे।यह भारत के लिए 1971 से बड़ा संकट बनने वाला है।


    इस सुलझाने के लिए भारत सरकार को तुरंत कदम उठाने होंगे और इसी मांग को लेकर निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति असम ,त्रिपुरा और बंगाल के बाद 17 अगस्त को राजधानी नई दिल्ली में बी आंदोलन करने जा रही है।


    इसके अलावा भारत के हर राज्य में लगातार आंदोलन होने वाला है।


    यह राहत की बात है कि असम जैसे संवेदनशील राज्य में भाजपा और कांग्रेस के अलावा असम सरकार और जनता का व्यापक समर्थन हासिल हुआ है।उम्मीद है कि दूसरे राज्यों में बी समर्थन का यह सिलसिला बना रहेगा।


    जाहिर है कि यह मसला सिर्फ विभाजन पीड़ित हिदू बंगाली शरणार्थियों की समस्या नहीं है।यह भारत की एकता और अखंडता के लिए बहुत बड़ी समस्या है जिसे निपटने के लिए  बंगाली हिंदू शरणार्थियों की नागरिकता का मसला तुरंत हल करना जरुरी है क्योंकि इसके बिना आप यह तय नहीं कर सकते कि कौन नागरिक है और कौन नागरिक नहीं है।


    यह सुरक्षा कारणों से निहायत अनिवार्य कार्यभार है।इसके साथ ही जितनी जल्दी हो सकें बाग्लादेश संकट का राजनीतिक राजनयिक समाधान के लिए भारत सरकार को कदम उठाना होगा।


    1947 के बाद जैसे पंजाब से आने वाले शरणार्थियों को युद्धस्तर पर नागरिकता और पुनर्वास दिया गया,वैसा ही पूर्वी बंगाल और बांग्लादेश के शरणार्थियों के मामले में हुआ होता और उन्हें बंधुआ वोट बैंक बनायेरखने की आत्मघाती राजनीति न होती तो आज इतनी भारी सस्या का सामना नहीं करना पड़ता।


    इस भयंकर ऐतिहासिक गलती को जितनी जल्दी हो सके,तुरंत सुधरने की जरुरत है वरना राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए भारी खतरा है।


    इसी सिलसिले में  निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के अध्यक्ष डा.सुबोध विश्वास और महासचिव एडवोकेट राय ने इस बारी संकट के मुकाबले तमाम शरणार्थियों और शरणार्थी संगठनों से समिति के साथ आंदोलन में शामिल होने की अपील  की है।


    इसी सिलसिले में  निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के अध्यक्ष डा.सुबोध विश्वास और महासचिव एडवोकेट राय ने संकट के मद्देनजर सकारात्मक सहयोग के लिए असम के राजनीतिक दलों,मीडिया और जनता के प्रति आभार जताया है।


    इसी सिलसिले में  निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के अध्यक्ष डा.सुबोध विश्वास और महासचिव एडवोकेट राय ने बाकी देश में भी राजनीतिक दलों, मीडिया,सोशल मीडिया,अराजनीतिक संगठनों,शरणार्थी संगठनों,लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष ताकतों से राष्ट्रहित में शरणार्थी आंदोलन के प्रति सक्रिय समर्थन की अपील की है।


    इसी सिलसिले में  निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के अध्यक्ष डा.सुबोध विश्वास और महासचिव एडवोकेट राय ने हस्तक्षेप के प्रति आबार और समर्थन जताया है कि वहां लगातार इस समस्या पर रपटें आ रही हैं।शरणार्थी संगठन हस्तक्षेप के साथ है।हस्तक्षेप को जारी रखने के लिए उसकी अलग  मुहिम जारी है।



    https://m.facebook.com/groups/228291844172144?view=permalink&id=298063823861612

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    +3

    Hiranmay Sarkartoনিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতি। NiBBUSS

    15 hrs·

    নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির দীর্ঘ আন্দলনের কিছু ঐতিহাসিক মুহুর্ত।

    দিল্লতে ধর্না 2011.


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    Reconsider Indo US relations!Just because the balance is not in our favour!

    US created Al Qaeda to import Arabian Spring and Al Qaeda was followed up by by ISIS which has captured Bangladesh now and almost 250 million refugees might break in India as Bangladesh situation is out of control.

    It is greater danger than Bangladesh war.

    Palash Biswas


    Reconsider Indo US relations!


    Just because the balance is not in our favour!


    Indian and US media make us believe that Under Presidents Bush and Obama, the USA has demonstrated accommodation to India's core national interests and acknowledged outstanding concerns.It seems not be the reality despite media hype.


    US at no point supported Indian interests to defend its sovereignty and integrity and contrarily,it has been using and helping other forces to undermine India at every level as it had bee during cold war era.


    The  global scenario would have a turnaround if DonaldTrump becomes the next President of America not because of his most controversial hate campaign against Islam ,but his America first agenda which sounds quite racial and reminds us the rise of Hitler yet another time.Mind you, the third day of the Republican National Convention is titled "Make America First Again" which declared Trump`s candidature.


    VOX explains:


    In 1940, "America First" referred to a group that resisted America's entry into World War II before Pearl Harbor. The cause eventually came to be associated with not just antiwar objectors but also virulent anti-Semites, and the term itself became somewhat taboo. In the decades since, politicians have mostly shied away from the phrase, with a few exceptions on the fringe like Pat Buchanan.


    Then came Donald Trump. He's happily seized on an expression that once stood for isolationism and xenophobia and turned it into one of his many vague, ebullient catchphrases. Much like "Make America Great Again!" Trump uses "America First!" as an exclamation point to sum up everything from energy policy to his support for veterans.


    Yet even if he seems ignorant of the phrase's historical origins, the disquieting history of how "America First" eventually became a byword for anti-Semitism is relevant to his presidential campaign. The America First movement attracted many of the same kinds of people drawn to Trump, including racists and bigots empowered by seeing their views reflected in a national debate.


    However,it is claimed that Indian diplomacy ensured increase in bilateral trade & investment, cooperation on global security matters, inclusion of India in decision-making on matters of global governance (United Nations Security Council), upgraded representation in trade & investment forums (World Bank, IMF, APEC), admission into multilateral export control regimes (NSG, MTCR, Wassenaar Arrangement, Australia Group) and joint-manufacturing through technology sharing arrangements have become key milestones and a measure of speed and advancement on the path to closer US-India relations.


    We see no reflection in reality and United States captured Indian Market without serving India's interests.


    The strategic relationship with US has never touched the level of Indo USSR strategic relationship as US has other allies to defend for example Israel and UK.


    Fox news broke the news long before that Canada began fencing its border along with United States of America as soon as Donald Trump emerged potential enough to become the Republican Candidate for next US President lest Canada should be flooded with refugee influx just because of  Anti Islam Trump Agenda.


    We should have learnt the lesson.

    But we reject to learn.


    Indian diplomacy seemed diplomatic enough as it has never been independent and had been tagging itself with some super power with changing global trends and equation.


    Even the nonaligned movement was not so nonaligned and it was virtually and really aligned with USSR.


    Even today,despite India opened its defence sector for global market Russia has the Lion`s share in Indnian defence market after two decades since the demise of USSR.


    The logic that the globe is unipolar is not enough to defend Indian interests as we opted to tag us with United States of America since Indo US nuclear deal signed and we became the strategic partner of United States of America in US War against terror.


    It is suicidal if we keep in mind the diverse demography in the geopolitics which has more than enough population of those people who has faith in Islam


    It has complicated our internal security problems as United sates of America has waged a war against Islam since oil war and made Saddam Hussein a scapegoat to capture natural resources in Asia and Africa.


    More over,US is better known as the creator of global terror network.It created Taliban and helped it to the point that the help carried drains of poison to deestablise India since eighties and Taliban kits of weapons were handed over to extremists and terrorists in India to put India on explosive carrier of deestablizaton.


    We may look back to eighties and nineties.


    Than US created Al Qaeda to import Arabian Spring and Al Qaeda was followed up by by ISIS which has captured Bangladesh now and almost 250 million refugees might break in India as Bangladesh situation is out of control.


    It is greater danger than Bangladesh war.


    Mind you, In 1961, India became a founding member of the Non-Aligned Movement to avoid involvement in the Cold War power-play between the USA and USSR. The Nixon administration's support for Pakistan during the Indo-Pakistani War of 1971 affected relations till the dissolution of the Soviet Union in 1991. 


    In the 1990s, Indian foreign policy adapted to the unipolar world and developed closer ties with the United States.Then US sent seventh fleet to stop Indian intervention in Bangladesh.



    Now,Donald Trump has become the Republican candidate and he has declared America First.It means he has US interests on topmost which further means those interests would not be Indian interests at all despite the hyped friendship between the leadership of the two nations.


    Trump has declared his agenda in fine print and Indian diplomacy need to reconsider Indo US strategic relations afresh as Trump agenda would have serious impact on the complex demography of this geopolitics which would become calamities for us.


    It would not be reality if Trump becomes the next president of America as the Republican platform adopted by the party national convention considerably dilutes the rhetoric that fuelled presidential candidate Donald J Trump's primary campaign, and sticks to traditional U.S positions on several key foreign policy issues.


    Well,the document describes India a "geopolitical ally and a strategic trading partner" and states, with Pakistan, "a working relationship is necessary, though sometimes difficult." A Republican administration will work towards securing the nuclear arsenal of Pakistan, echoing a concern that has guided the Obama administration's South Asia policy. On Afghanistan and West Asia, the Republican document "blames the current administration's feckless treatment of troop commitments and blatant disregard of advice from commanders on the ground."


    While the customary paragraph on India in the document reflects continuity and stability, and even singles out Indian Americans for praise – "Republicans note with pride the contributions to our country that are made by our fellow citizens of Indian ancestry"– the section on immigration leaves room for concern from an Indian perspective.


    Trump's advisers say turbocharging the economy is his most urgent priority, and it's likely that shortly after taking office a President Trump would put forth an economic plan that would slash government spending, trim federal bureaucracies and radically reduce taxes.

    US media reported all about Trump agenda and it should be read thorouhly to read the psyche of the potential republican nex presidential candidate.


    While Trump remains unpredictable and often reverses himself on policy issues, here's what the candidate and his top advisers say they are going to prioritize should he win the presidency in November:


     


    Taxes


    Trump is poised to release his updated tax plan, which has been worked on for weeks by his economic advisers, including Moore and CNBC commentator Larry Kudlow.


    "It will be similar to the original plan but just more fleshed out," Moore told The Hill. "We think we've got a way to minimize the cost of it."


    Moore and Kudlow have been fixated on reducing the effect of the Trump tax plan on the deficit. The nonpartisan Tax Foundation estimated that the original iteration of Trump's tax plan — which slashed corporate and income taxes — "would end up reducing tax revenues by $10.14 trillion over the next decade when accounting for economic growth from increases in the supply of labor and capital."


    Moore said the new version will dramatically reduce that hit on the deficit, and he believes the "explosive" growth set off by the steep tax cuts, coupled with spending cuts, will create a balanced budget.


    "We're going to make the Europeans pay more for NATO; we are going to get rid of ObamaCare, that's a huge saver; we've got this Penny Plan where we're forcing agencies to cut a penny each year from its budget," Moore said.


    The Penny Plan is an idea whereby the administration would tell every agency in government, "Next year, instead of spending a dollar, you're going to spend 99 cents. ... Then you keep doing that for four or five years and you get trillions of dollars of savings because of the compounding effect," Moore said. 


    Moore added that in his meetings with Trump, the billionaire has been "hyper-obsessed with getting the middle-class [and] working-class Americans not just more jobs but better-paying jobs," and Trump has directed his economic team to pursue those goals above all else.


     


    Spending cuts 


    During the primary campaign, Trump indicated that, in the search for budget savings, he'd eliminate federal agencies, possibly including the Environmental Protection Agency and the Department of Education.


    Such promises were commonplace during the heated Republican primary race, and a source familiar with the inner workings of the Trump campaign at the highest levels told The Hill that Trump as president wouldn't do anything so radical as eliminate whole agencies. 


    "I don't think that is reasonable or actually can be done," the source said. "It's just not real."


    Trump would instead pursue spending cuts in these agencies, and the billionaire considers the easiest places to find savings to be the EPA and the Department of Education, the source said.


    "Part of his agenda is going to be doing more with less. ... Not necessarily defense spending, but he'll be asking some of these bloated bureaucracies to reel in their spending."


     


    Immigration and national security


    The wall has become synonymous with a Trump presidency, so it's safe to say that building one across the border with Mexico will be one of the Trump administration's first moves. 


    "One thing that's always brought up in talking to him ... is building that wall," said a senior Trump campaign source. 


    "He takes that extremely seriously," the source said. "Something's going to happen in that first 100 days."


    But there's still confusion about what that wall will look like. 


    The real estate magnate has gone into great detail about his pet project, noting in August it will be made from precasted concrete. But two Trump surrogates, former Texas Gov. Rick Perry and New York Rep. Chris Collins, have told reporters that they believe Trump's wall will be "virtual" instead of tangible.


    Another potential stumbling block is who will pay for the wall. Trump says Mexico, and his campaign published a policy paper showing how a Trump administration would use regulations to block remittances from illegal immigrants — an important part of the Mexican economy.


    But few Republicans in Washington believe it's likely that Mexico will pay for the wall, and still fewer among the party's corporate wing are eager to start a trade war with the United States's southern neighbor.


    Once the plans for the wall are hashed out, Trump will likely pivot to immigration. That means President Obama's immigration executive orders will likely be gone, to the joy of fellow Republicans. 


    His initial call to temporarily ban all Muslim immigrants from entering the country, one of his more controversial ideas, has recently shifted into a ban on people from countries with a "history of terrorism." Trump's executive branch would have to determine a list of which countries qualify — the State Department currently lists just three countries on its list of state sponsors of terrorism: Iran, Sudan and Syria. It's likely that he'd expand on that list to include other countries in the Middle East. 


     


    Trade


    If Trump wins the White House, he'll do so in no small part thanks to his bold pronouncements on trade that have aggravated the staunchly pro-trade GOP establishment.


    His main whipping post has been the Trans-Pacific Partnership, a deal he's described as a "death blow to American manufacturing." If elected, he'd almost certainly pull the U.S. from the deal Obama is working toward. He's also floated a withdrawal from the North American Free Trade Agreement, which has been U.S. policy since 1994. 


    His tough stance on trade would likely result in the U.S. clamping down on potential violations, especially in China, while pushing for larger tariffs on a variety of imports.


    Many of these policies worry much of the Chamber of Commerce Republican establishment, which has spent decades touting free trade and worries Trump will start trade wars with the United States's most valuable partners.


     


    Energy


    The Trump campaign's list of priorities for his first 100 days includes a call to remove restrictions on energy production, a bread-and-butter issue for conservatives looking to take the restraints off of private business. 


    He outlined his energy wish list during a May speech in North Dakota, specifically promising that in the first 100 days, he'd preserve the Keystone XL pipeline, slash executive actions and regulations, allow energy production on federal lands, scrap the Paris climate agreement and halt U.S. involvement in United Nations global warming programs. 


    For establishment conservatives, there are no surprises there. Trump's energy policies, as described, fall almost in lockstep with conservative orthodoxy. 


     


    ObamaCare


    Trump has promised, along with just about every Republican presidential hopeful, to repeal and replace ObamaCare. 


    "ObamaCare: We're going to repeal it; we're going to replace it, get something great," Trump said at a rally back in September.


    He does not have a fully fleshed-out plan to replace the healthcare system but has called for a plan that allows insurance sales across state lines, tax-deductible premiums, prioritizated health savings accounts, and federal grants to states to manage Medicaid on a state level.

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    আমরা যদি একতাবদ্ধ, সংগঠিত না হই,নাগরিকত্বের রাস্তা খোলা হলেও আমাদের নাগরিত্ব হচ্ছেনা ,যেমন 2003 সালের আগে হয়নি।

    এখনো আইন হয়নি,কার্যকরি হতে হতে অনেকি দেরি আছে।রাজনৈতিক দলগুলি কিন্তু কখনো উদ্বাস্তুদের পাশে দাঁড়ায়নি,মতুয়া মহাসঙ্ঘ ও নিখিল ভারত উদ্বাস্তু সমন্বয় সংগঠন সহ বিভিন্ন উদ্বাস্তু সংগঠনের প্রচেষ্টা ও আন্দোলনের ফলে এখন এই আইন বদল হওয়ার সম্ভাবনা দেখা দিচ্ছে।এই সারতত্ব মনে রেখেি রাজনৈতিক বিকল্প অনুসন্ধানের বদলে উদ্বাস্ত সংহতি ও সংগঠনই বাঁচার একমাত্র রাস্তা।


    সব চেয়ে বেদনার কারণ,উল্লসিত কিছু উদ্বাস্তু নেতাদের দাবি যে তাঁদের একক প্রচেষ্টাতেই নাগরিকত্ব মিলতে চলেছে। নিজেদের দাবি জোরালো করতে তারা আবার তাবড় তাবড় রাজনৈতিক নেতাদের কৃতিত্ব দিতে পিছপা হচ্ছেন নাসেই নেতারা কিন্তু সারা ভারতে কোথায় কত বাঙালি উদ্বাস্তু আছেন ,কিভাবে আছেন,সে ব্যাপারে তারা কিছুই জানেন না।ভিন রাজ্যে যাদের বসত,তাঁদের কথা না হয় বাদ দিলাম,বাঙ্গলায় খালে বিলে রেলধারে পোকা মকড়ের মত যে কোটি কোটি উদ্বাস্তুরা বাংলায় বসবাস করছেন,তাঁদেরও খোঁজ খবর তাঁরা রাখেন না।


    মনে রাখা দরকার,পান্জাবে কোনো উদ্বাস্তু সমস্যা আর নেই।কিন্ত বাংলাদেশে এখনো আমাদের স্বজন,রক্তমাংসের অংশ দু কোটি উনচল্লিশ লক্ষ মানুষের বসবাস এবং উগ্র ইসলামী সন্ত্রাসিরা তাঁদের বিরুদ্ধে লাগাতার অবাধ হত্যালীলা,অবাধ ধর্ষণ,অবাধ বেদখলী অভিযান চালেয়ে যাচ্ছে।বাংলাদেশ সরকার তাঁদের নিরাপত্তা দিতে ব্যর্থ এবং অদুরভবিষ্যতে তাঁরা এপারে চলে আসতে বাধ্য হবেন।এই যদি পরিস্থিতি হয়,তাহলে নাগরিকত্ব আইন আবার বদল হতে থাকবে।যথাস্মভব তাডা়তাড়ি সব উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্বের ব্যবস্থা করার দায়িত্ব একতাবদ্ধ সংযত দক্ষ উদ্বাস্তু সংগঠনকেই নিতে হবে।


    বাস্তবের নিরিখে আমাদের বূঝতেই হবে যে বাংলাদেশে যতদিন না মানুষের নিরাপত্তা সুনিশ্চিত হচ্ছে দু কোটি হিন্দু ছাড়াও বহু শরণার্থীদের ভারতে প্রবেশের সম্ভাবনা থাকছে এবং এখন কেন্দ্র সরকার উদ্বাস্তুদের পক্ষে আইন প্রণযন করলেও ভবিষ্যতে ক্ষমতা বদল হলে পরিস্থিতি অনুযায়ী বাংলাদেশ থেকে আগত উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্ব ও পুনর্বাসন নিয়ে আবার নূতন আইন হতে পারে,পুরোনো আইন বাতিল হতে পারে।


    যাদের দেশ কাল পরিস্থিতি সম্পর্কে কোনো ধারণা নেই,যারা সবাইকে এক সঙ্গে নিয়ে চলতে পারেন না বা যাদের সাংগঠনিক সংহতির বিবেক নেই,যাদের রাজনৈতিক পরিস্থিতি ও পালাবদলের মোকাবিলা করার দক্ষতা নেই,সুযোগ সন্ধানী সেই নেতৃত্ব অত্যন্ত আত্মঘাতী এবং আমরা যদি একতাবদ্ধ,সংগঠিত না হই,নাগরিকত্বের রাস্তা খোলা হলেও আমাদের নাগরিত্ব হচ্ছেনা ,যেমন 2003 সালের আগে হয়নি।হলেও সে নাগরিকত্ব যখন তখন আবার খারিজ হতে পারে।যদি না আমরা এক্ষনি একতাবদ্ধ না হই।



    পলাশ বিশ্বাস

    2003 সালে নাগরিকত্ব সংশোধন বিল পেশ হল৤সেই আইন সর্বদলীয় সমর্থনে আইন বলে রাতারাতি পূর্ব বাংলা থেকে আগত ভারতবর্ষের বিভিন্ন রাজ্যে ছড়িয়ে ছিটিয়ে থাকা উদ্বাস্তুদের রাতারাতি বিদেশি ঘুসপেঠিয়া সাজিয়ে দিল।


    উল্লেখযোগ্য ঘটনা হল ঔ আইনের আওতায় কিন্তু পান্জাব থেকে আগত শরণার্থীরা পড়েননি।কারণ পূর্ব বাংলার তুলনায় অনেক বিশি রক্তনদী পেরিয়ে এলেও পান্জাবিরা অত্যন্ত সঙঘবদ্ধ ছিনলেন।ভিটেহারা হওযার ক্ষতিপূরণ তাঁরা প্রত্যেকেই পেয়েছেন এবং তাঁদের পুনর্বাসনও ভারতভাগের দু এক বছরের মধ্যে সম্পূর্ণ হয়েছিল।সীমানা ডিঙ্গোতে না ডিঙ্গোতে তাঁরা ভারতের নাগরিকত্ব অর্জন করে ছিলেন।অথচ বাঙালিরা আজও যেমন আলাদা আলাদা বচ্ছিন্ন দ্বীপ হয়ে আছেন কাঁকড়ার মত একে অপরকে টেনে নামাবার প্রতিযোগিতায় আত্মধ্বংসে নিমগ্ন,সেদিনও তাঁরা তাই ছিলেন।


    ফলে ভারতভাগের পাক্কা ছাপান্ন বছর পর যখন এই আইন প্রণীত হল তখন দেখা গেল,1947 র পর পর 1956 সাল পর্যন্ত যারা এসেছেন ,তাঁদেরও নাগরিকত্ব অর্জন করা হয়নি।


    এই প্রসঙ্গে যিনি এই নাগরিকত্ব সংশোধন বিল ভারতের সংসদে পেশ করেছিেন,তাঁর বক্তব্য অত্যন্তু গুরুত্বপূর্ণ।গুয়াহাটিতে সাংবাদিকদের প্রশ্নে এই বৈমাতৃক আচরণের জন্যতত্কালীন স্বরাষ্ট্র মন্ত্রী লাল কৃষ্ণ আডওয়ানী বলেছিলেন,বাংলার বেয়াল্লিশ জন সাংসদ সহ বাঙালি নেতারা একবারও বাঙালি উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্ব নিয়ে সরব হয় নি।


    বাস্তবক্ষেত্রে উদ্বাস্তুরা ধরেই নিয়েছিল,পুনর্বাসনের সঙ্গেই সঙ্গেই তাঁদের নাগরিকতত্ব আপনাআপনি অর্জিত জন্মগত অধিকারশিক্ষিত চাকুরীজীবী বাঙালিদের মধ্যে অনেকেরই ধারণা নেই যে তাঁরা 2003 সালের আইনবলে বেনাগরিক এবং বিদেশী।


    2003 সাল থেকে 2016 সাল,ঘঙ্গায় পদ্মায় অনেক জল গড়িয়েছে এব ইতিমধ্যে 1971 সালে বাংলাদেশ বিপর্যয়ে লক্ষ লক্ষ নূতন উদ্বাস্তুরা ভারতে এসেছেন এবং বালার নেতৃবৃন্দ বা উদ্বাস্তু সংগঠন পুনর্বাসনের আন্দোলন করলেও নাগরিকত্ব নিয়ে উচ্চ বাচ্য করেননি।তার ফলে ভারতভাগের বলি সমস্ত হিন্দু বাঙালিরাই আজ বেনাগরিক।


    মোদ্দাকথা আইন সপক্ষে থাকলেও কিছু আসে যায় না,সেই আইনের অধিকার অর্জন করতে হলে সংঘবদ্ধ হতে হয়।


    তবু মন্দের ভালো,উদ্বাস্তুদের টনক শেষ প্রযন্ত নড়ল এবং 2003 সাল থেকে বিভিন্ন উদ্বাস্তু সংগঠন এবং অবশ্যই মতুয়া মহাসঙঘ টানা নাগরিকত্ব আন্দোলন চালিয়ে গিয়েছে।


    প্রথমদিকে মতুয়া মহাসঙ্ঘের নেতৃত্বে এই আন্দোলন চলছিল এবং 2011 র বিধানসভা নির্বাচনের আগে পর্যন্ত তাঁরা এই আন্দোলনের সবচেয়ে বড় শক্তি হিসেবে অনবরত কাজ করেছেন।সেই মতুয়া আন্দোলন এখন বিভিন্ন রাজনৈতিক দলের গোষ্ঠীদ্বন্দ্বে অস্তিত্ব হারা।ইতিমদ্যে নাগপুরে সারা দেশের উদ্বাস্তু প্রতিনিধিরা একটি গণ কনভেনসানে নিখিল ভারত উদ্বাস্তু সমন্বয় সংগঠন তৈরি করে যা একন সারা ভারতে ডাল পালা ছড়িয়েছে এবং সবচেয়ে বড় কথা, রাজধানী নয়া দিল্লী থেকে কোলকাতা,গুয়াহাটি সহ প্রাযসব রাজ্যেই নাগরিকত্বের দাবি লাগাতার তুলেছে।তাছাডা় বিভিন্ন উদ্বাস্তু সংগঠনও বিচ্ছিন্ন ভাবে আন্দোলন চালিয়ে গিয়েছে।


    ফলে যারা এই আইন প্রণয়ন করেছিল তাঁরাই আবার এই আইন সংশোধিত করার কথা বলছেন এবং একটি বিল সংসদে পেশ হয়েছে,যার ফলে বৈধ ডকুমেন্টনা থাকলেও নাগরিকত্বের রাস্তা খোলা থাকছে।


    এখনো আইন হয়নি,কার্যকরি হতে হতে অনেকি দেরি আছে।রাজনৈতিক দলগুলি কিন্তু কখনো উদ্বাস্তুদের পাশে দাঁড়ায়নি,মতুয়া মহাসঙ্ঘ ও নিখিল ভারত উদ্বাস্তু সমন্বয় সংগঠন সহ বিভিন্ন উদ্বাস্তু সংগঠনের প্রচেষ্টা ও আন্দোলনের ফলে এখন এই আইন বদল হওয়ার সম্ভাবনা দেখা দিচ্ছে।এই সারতত্ব মনে রেখেি রাজনৈতিক বিকল্প অনুসন্ধানের বদলে উদ্বাস্ত সংহতি ও সংগঠনই বাঁচার একমাত্র রাস্তা।


    উল্টোদিকে উদ্বাস্তুরা আজও একে অপরের বিরুদ্ধে লড়াই করে চলেছে এবং এখনো ভারতের অন্যান্য ভাষার মানুষদের মত আমরা নিজেদের স্বার্থে দল মত নির্বিশেষ একতাবদ্ধ হতে পারছি না।


    সব চেয়ে বেদনার কারণ,উল্লসিত কিছু উদ্বাস্তু নেতাদের দাবি যে তাঁদের একক প্রচেষ্টাতেই নাগরিকত্ব মিলতে চলেছে।


    নিজেদের দাবি জোরালো করতে তারা আবার তাবড় তাবড় রাজনৈতিক নেতাদের কৃতিত্ব দিতে পিছপা হচ্ছেন নাসেই নেতারা কিন্তু সারা ভারতে কোথায় কত বাঙালি উদ্বাস্তু আছেন ,কিভাবে আছেন,সে ব্যাপারে তারা কিছুই জানেন না।


    ভিন রাজ্যে যাদের বসত,তাঁদের কথা না হয় বাদ দিলাম,বাঙ্গলায় খালে বিলে রেলধারে পোকা মকড়ের মত যে কোটি কোটি উদ্বাস্তুরা বাংলায় বসবাস করছেন,তাঁদেরও খোঁজ খবর তাঁরা রাখেন না।


    মেনে নিলাম মোদী সরকার কথা রাখলেন নাগিরকত্বে আর আইনি বাধা থাকল না, তাহলেও আমরা সেই 2003 সালের অবস্থায় ফিরে যাচ্ছি।সেদিনও নাগরিকত্ব অর্জনের সাংগঠনিক ক্ষমতা বা উদ্বাস্তুগদের সার্বিক সংহতির অভাব ছিল.আজ সেই অভাব অনেক বেশি প্রকট।নেতাদের বক্তব্যই অশনি সংকেত।


    আইন বদলালেও কি সব রাজ্যে সব উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্ব দেওয়ানের মত সাংগঠনিক ক্ষমতা ও রাজনৈতিক সামাজিক নেতৃত্বের দক্ষতা আমাদের আছে কিনা,একথা ভেবে দেখলে বোধ হয আমরা আমাদের ভবিষ্যত প্রজন্মকে বারতের নাগরিক হিসেবে সুপ্রতিষ্ঠিত করতে পারব।


    মনে রাখা দরকার,পান্জাবে কোনো উদ্বাস্তু সমস্যা আর নেই।কিন্ত বাংলাদেশে এখনো আমাদের স্বজন,রক্তমাংসের অংশ দু কোটি উনচল্লিশ লক্ষ মানুষের বসবাস এবং উগ্র ইসলামী সন্ত্রাসিরা তাঁদের বিরুদ্ধে লাগাতার অবাধ হত্যালীলা,অবাধ ধর্ষণ,অবাধ বেদখলী অভিযান চালেয়ে যাচ্ছে।বাংলাদেশ সরকার তাঁদের নিরাপত্তা দিতে ব্যর্থ এবং অদুর ভবিষ্যতে তাঁরা এপারে চলে আসতে বাধ্য হবেন।


    এই যদি পরিস্থিতি হয়,তাহলে নাগরিকত্ব আইন আবার বদল হতে থাকবে।যথাসম্ভব তাডা়তাড়ি সব উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্বের ব্যবস্থা করার দায়িত্ব একতাবদ্ধ সংযত দক্ষ উদ্বাস্তু সংগঠনকেই নিতে হবে।


    ধর্মীয় সংখ্যালঘুরা যেমন বাংলাদেশে বিপর্যস্ত তেমনিই বারা বার রাজনৈতিক কারণে একিটবড় সড় মুসলিম জনসংখ্যাও ভারতে লাগাতার আসতে বাধ্য হয়েছে এবং হচ্ছে।1971 হিন্দুদের সঙগে বিপুল সংখ্যায়  মুসলমান উদ্বাস্তুরা ভারতে এসেছিলেন।


    প্রতিবার রাজনৈতিক প্রক্ষাপট বদল হলে বাংলাদেশ থেকে হিংন্দু মুসলিম  জাতি ধর্ম নির্বিশেষ মানুষ আসতে বাধ্য হচ্ছেন।পৃথীবীব্যাপী শরণার্থী সমস্যার সঙ্গে সন্ত্রাস সমস্যাও ওতপ্রোত ভাবে জড়িয়ে গিয়েছে।


    বাস্তবের নিরিখে আমাদের বূঝতেই হবে যে বাংলাদেশে যতদিন না মানুষের নিরাপত্তা সুনিশ্চিত হচ্ছে দু কোটি হিন্দু ছাড়াও বহু শরণার্থীদের ভারতে প্রবেশের সম্ভাবনা থাকছে এবং এখন কেন্দ্র সরকার উদ্বাস্তুদের পক্ষে আইন প্রণযন করলেও ভবিষ্যতে ক্ষমতা বদল হলে পরিস্থিতি অনুযায়ী বাংলাদেশ থেকে আগত উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্ব ও পুনর্বাসন নিয়ে আবার নূতন আইন হতে পারে,পুরোনো আইন বাতিল হতে পারে।


    নাগরিকত্ব আন্দোলন ছাড়াও শুধু ভারতে আগত উদ্বা্স্তুরাই নন,সমস্ত বাঙালিকে এবং সমস্ত ভারতবাসীকে ভারতবর্,ও পশ্চিম বহ্ঘের নিরাপত্তার স্বার্থে সন্ত্রাস কবলিত বাংলাদেশের মানুষের পক্ষে দাঁড়াতেই হবে।


    যাদের দেশ কাল পরিস্থিতি সম্পর্কে কোনো ধারণা নেই,যারা সবাইকে এক সঙ্গে নিয়ে চলতে পারেন না বা যাদের সাংগঠনিক সংহতির বিবেক নেই,যাদের রাজনৈতিক পরিস্থিতি ও পালাবদলের মোকাবিলা করার দক্ষতা নেই,সুযোগ সন্ধানী সেই নেতৃত্ব অত্যন্ত আত্মঘাতী এবং আমরা যদি একতাবদ্ধ,সংগঠিত না হই,নাগরিকত্বের রাস্তা খোলা হলেও আমাদের নাগরিত্ব হচ্ছেনা ,যেমন 2003 সালের আগে হয়নি।হলেও সে নাগরিকত্ব যখন তখন আবার খারিজ হতে পারে।যদি না আমরা এক্ষনি একতাবদ্ধ না হই।


    --
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    कवि और पत्रकार नीलाभ अश्क नहीं रहे

    माध्यमों की समग्र सोच और समझ वाले नीलाभ का जाना निजी और सामाजिक अपूरणीय क्षति है।
    पलाश विश्वास

    -- 

    मशहूर कवि और वरिष्ठ पत्रकार नीलाभ अश्क का 70 साल की उम्र में निधन हो गया है। नीलाभ अश्क प्रसिद्ध लेखक उपेंद्र नाथ अश्क के पुत्र थे।वे दिवंगत कवि वीरेन डंगवाल के गहरे मित्र थे और कवि मंगलेश डबराल के भी।1979 में नैनीताल से एमए पास करके मैं जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध के लिए गया तो वीरेनदा वहीं से शोध कर रहे थे।रामजी राय भी तब इलाहाबाद थे।मंगलेश डबराल उस वक्त अमृत प्रभात के साहित्य संपादक थे।अभी हाल में दिवंगत कथाकार सतीश जमाली भी कहानी में थे।

    मैं नीलाभ के खुसरोबाग के घर के बेहद नजदीक 100,लूकरगंज में मशहूर कथाकार शेखर जोशी के घर रहता था और खुसरोबाग में ही वीरेनदा और मंगलेश डबराल का घर था.नीलाभ के मार्फत ही हमारा परिचय उनके पिता उपेंद्र नाथ अश्क से हुआ।हालांकि तराई में पत्रकारिता के वक्त से अश्क जी और अमृतलाल नागर के साथ हमारे पत्र व्यवहार जारी थे।

    नीलाभ हमसे बड़े थे और तब नीलाभ प्रकाशन देखते थे।जहां हम शैलेश मटियानी और शेखर जी के अलावा वीरेनदा और मंगलेश दा के साथ आते जाते रहे हैं।

    सभी जानते हैं कि कवि, साहित्यकार और पत्रकार नीलाभ अपनी लेखनी के जरिए शब्दों को कुछ इस तरह से गढ़ते थे, कि वो कविता बन जाती थी। मुंबई में जन्मे नीलाभ की शिक्षा इलाहाबाद से हुई थी. उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एमए किया था।

    यह भी सबको मालूम है कि पढ़ाई के बाद सबसे पहले नीलाभ अश्क प्रकाशन के पेशे से जुड़े और बाद में उन्होंने पत्रकारिता को अपनाया। पत्रकारिता से जुड़ने के बाद उन्होंने चार साल तक लंदन में बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग सर्विस) की प्रसारण सेवा में बतौर प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दी।

    जो सबसे खास बात है ,वह यह है कि विभिन्न कला माध्यमों चित्रकला,संगीत और फिल्मोंके बारे में उनकी समझ बेमिसाल थी।अस्सी के दशक में बीबीसी कूच करने से पहले दूरदर्शने के लिए चार एपिसोड का एक सीरियल उन्होंने कला माध्यमों पर बनाया था और भारतीय सिनेमा के इतिहास को खंगाला था।

    फिर बीबीसी से लौटने के बाद जब पुराने मित्रों और परिजनों से बी वे अलगथलग हो गये,तब उन्होंने अश्वेत संगीत परंपरा पर बेहतरीन लेख शृंखला अपने ब्लाग नीलाभ का मोर्च के जरिये लिखा था,जिसके कुछ अंश हमने हस्तक्षेप पर हम लोगों ने धारावाहिक प्रकाशित किया था।उसमें अस्वेत जीवन और संघर्ष का सिलसिलेवार ब्यौरा है।

    हमें इसका संतोष है कि बेहद अकेले हो गये नीलाभ से हमारा लगातार संपर्क बना रहा और हम उनकी खूबियों के प्रशंसक बने रहे।

    यह सामूहिक और निजी शोक का समय है।वीरेदा गिरदा की पीढीं,नवारुण दा की पीढ़ी आहिस्ते आहिस्ते परिदृश्य से ओझल होती जा रही है और हमारी पीढ़ी के अनेक साथी भी अब दिवंगत हैं।

    माध्यमों की समग्र सोच और समझ वाले नीलाभ का जाना निजी और सामाजिक अपूरणीय क्षति है।

    कला समीक्षक अजित राय ने लिखा हैः


    नीलाभ नहीं रहे।
    नीलाभ से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी जब मैं 1989 मे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान मे एम ए का छात्र था। सिविल लाइंस मे नीलाभ प्रकाशन के दफ्तर में सार्त्र और कामू के अस्तित्ववाद पर चर्चा करने जाता था। तब वे बीबीसी लंदन से लौटे ही थे। इन 27 सालों में अनगिनत मुलाकातें हैं। अभी पिछले साल हम अशोक अग्रवाल के निमंत्रण पर कुछ दिन शिमला में थे। उनके साथ की तीखी धारदार बहसों से हमे बहुत कुछ मिलता था।वे हमारी यादों मे हमेशा अमर रहेंगे।


    अपने आप से लम्बी बहुत लम्बी बातचीत

    नीलाभ


    #

    अपने आप से एक लम्बी 
    बहुत लम्बी बातचीत करने के लिए 
    तुम ढूँढते रहे हो
    इस शहर के सम्पूर्ण विस्तार में
    कोई एक निजी और बेहद अकेली जगह
    जो कहीं भी तुम्हें अपने आप से अलग नहीं होने देगी
    2.
    सारे का सारा दिन
    एक डूबता हुआ जहाज़ है।
    अर्से से डूबता हुआ।
    सारी शक्ति से समुद्र के गहरे अँधेरे को
    अपना शरीर समर्पित करता हुआ।

    जहाज़। धूप में। डूबता हुआ।
    अर्से से डूबता हुआ।
    असफल। नाकामयाब...
    ...और रात। रात नहीं,
    चारों ओर फैला वहीं अटल और आदिम कारागार है -
    अपने अन्धकार के साथ इस धरती की उर्वरता पर छाया हुआ

    परती पर उगा कारागार
    जिसके पार
    अब कोई आवाज़ - कोई आवाज़ नहीं आती
    सच्ची बात कह देने के बाद
    कोई चीख़ नहीं... कोई पुकार नहीं....
    कोई फ़रियाद नहीं... याद नहीं...
    तुम्हारा अकेलापन इस कारागार का वह यातना-गृह है,
    जहाँ अब बन्दियों के सिवा कोई नहीं।
    कोई नहीं, चीख़ता हुआ और फ़रियाद करता हुआ और उदास...
    उदास और फ़तहयाब...
    सच्ची बात कह देने के बाद
    3.
    सच्ची बात कह देने के बाद 
    चुप हो कर तुम सहते रहोगे इसी तरह
    उस सभी 'ज़िम्मेदार और सही'लोगों के अपमान।

    नफ़रत करते हुए और जलते हुए और कुढ़ते हुए।

    क्योंकि तुम्हें लगता है,
    चालू और घिसे-पिटे मुहावरों के बिना 
    जी नहीं सकता
    तुम्हारा यह दिन-दिन परिवर्तित होता हुआ देश।

    सच्ची बात कह देने के बाद तुम पाते हो,
    तुमने दूसरों को ही नहीं,
    अपनों को भी कहीं-न-कहीं
    ढा दिया है
    और तुम चुपचाप और शान्त
    अपने साथियों की शंका-भरी नज़रें देखते हुए टूट जाते हो।

    इसी तरह टूटता रहता है हर आदमी निरन्तर
    शंका और भय और अपमान से घिरा हुआ -
    सच्ची बात कह देने के बाद
    लोगों से अपमानित होते रहने की विवशता
    नफ़रत करते, जलते और कुढ़ते रहने की आग से
    गुज़रते रहने के बावजूद - सहता हुआ।
    4.
    मैं एक अर्से के बाद अपने शहर वापस आया हूँ
    और मुझे नहीं लगता, इस बीच 
    कहीं भी कोई अन्तर आया है

    कोई अन्तर नहीं:
    मोमजामे की तरह सिर पर छाये आकाश में,
    जाल की तरह बिछी हुई सड़कों, अँधेरी उदास गलियों 
    और मीलों से आती हुई,
    गन्दे नालों और अगरबत्ती की मिली-जुली बास में

    कोई अन्तर नहीं:
    लोगों के निर्विकार भावहीन चेहरों में
    उनकी घृणा में, द्वेष में

    कोई अन्तर नहीं:
    शहर के दमघोंटू, 
    नफ़रत और पराजय-भरे परिवेश में
    सिर्फ़ शहर में जगह-जगह उग आये हैं
    कुकुरमुत्तों की तरह
    कुछ खोखले, रहस्यमय और खँडहरों जैसे टूटते हुए मकान

    क्या इस अन्तर में उतनी ही सच्चाई है
    जितनी नींद से सहसा जागने पर
    स्वप्न की सच्चाई होती है ? 
    नहीं। यह स्वप्न नहीं है।
    एक लम्बे अर्से से टूटता हुआ ताल-मेल है।

    जिसके अन्दर ज़हरीली लपटें छोड़ते 
    वही सदियों पुराने विषधर हैं
    वही दलदल है
    अन्दर और बाहर फैलता हुआ लगातार
    वही दलदल। वही रेत। वही अँधेरी गलियाँ।
    बाँझ विष-भरी बेल
    विरासत में मिला हुआ वही घातक खेल
    जिसमें हारे जा कर भी लोग
    अपना भविष्य
    ख़ाली आसमान की तरह ढोते हैं

    स्वप्न नहीं है यह। ताल-मेल है।
    टूटता हुआ। लम्बे अर्से से।
    5.
    तुम पूछते हो, मैं क्यों हूँ ?
    इस भ्रष्ट और टूटते हुए माहौल में रहने के लिए
    घृणा और द्वेष सहने के लिए
    मुझे किसने विवश किया है ?
    क्यों मैं इस विषधर-हवा में रह कर लगातार
    अन्दर और बाहर कटुता सँजोता हूँ ?

    किसी भी चीज़ पर इलज़ाम लगाना बहुत आसान है
    सहना - बहुत मुश्किल

    भाषा पर नाकाफ़ी होने का इलज़ाम
    दोस्त पर ग़द्दार होने का इलज़ाम
    सबसे आसान है: चीज़ों के, हालात के
    अपने ख़िलाफ़ होने का इल्ज़ाम 

    जबकि मैं जानता हूँ: एक सही इल्ज़ाम भी होता है
    अकर्मण्यता का
    जिसका दाग़ तुम्हारे माथे पर हो सकता है

    सुन पाते हो तुम अब अपनी ही आवाज़
    देख पाते हो अब तुम
    सिर्फ़ अपना ही सूखा और उमर-खाया चेहरा 
    पढ़ते हो अब सिर्फ़ अपनी शादी पर लिखा गया सेहरा
    (जिसमें कुछ भी सच नहीं, सिवाय नामों के)

    तुम भूल गये हो बाक़ी नाम
    भूल गये हो बाक़ी चेहरे
    अपने हमशक्ल गिरोह में खो गये हो
    ज़िन्दगी के लम्बे मैदान को बेचैनी से पार करते हुए

    नहीं। अब हम एक-दूसरे की चीख़ों में से
    नहीं गुज़र सकते - लावे की तरह

    अब सह नहीं सकते हम
    वह भय और आतंक और घृणा
    और शंका और अपमान। सब कुछ।

    क्योंकि नफ़रत आख़िर क्या है ?
    क्या वह धीरे-धीरे अपने अन्दर
    निरन्तर नष्ट  होते रहना नहीं है ?
    नष्ट होते रहना। लगातार।
    6.
    मैं जानता हूँ,
    अपने संसार से कलह
    तुम्हारा शौक़ नहीं मजबूरी है
    तुम्हारी ज़बान पर रखी गयी भाषा
    और तुम्हारे मन्तव्य के बीच
      एक अलंघ्य दूरी है
    जिससे भाषा अपने अर्थ को खो कर भी
        जीवित रहती है
    और रोज़ नये तानाशाहों के कील-जड़े बूट
    अपने सीने पर सहती है
    और तुम अपनी ओर तनी पाते हो
    अपने साथियों की आरोप-भरी उँगलियाँ।

    टूटे हुए हाथों में थामे हुए, 
    अपना जलता और सुलगता दिमाग़
    अब कहो
    क्या तुम कोई नया और कारगर झूठ रच सकते हो ?
    इस दलदल में डूबने से कैसे बच सकते हो ?
    7.
    इसीलिए मैंने अपने रंग-बिरंगे वस्त्रों को
    अजानी यात्राओं पर निकले हुए
    काफ़िलों के हाथ बेच दिया
    और इस अन्धे कुएँ में चला आया।

    यहाँ इतना सन्नाटा है कि सुनाई देता है
    और गहराती साँझ में चमकता हुआ शुक्र
    कभी-कभी आँखों में
    बर्छी की चमकती हुई नोक-सा धँसता चला जाता है।
    तुम मुझे इस अन्धे कुएँ के
    बाहर निकालने के लिए हाथ बढ़ाते हो
    जब कि मैं जानता हूँ,
    इस कुएँ से बाहर निकलना
    एक और भी ज़्यादा अँधेरे मैदान में
       ख़ूँख़ार सुनसान में
    खो जाना है

    जहाँ आदमी नहीं जानता
    कि वे राहें कहाँ जाती हैं
    जो इस तरह बिछी हुई हैं
    उसके अन्दर और बाहर
    और आँखें उठाने पर पाता है
    पुतलियों के सामने
    गहरे रंगों से पुते हुए अन्तहीन अँधियारे क्षितिज।
    और किसी भी समय अपने आपको अलग कर सकता है
    अपने एहसास से। दरकते विश्वास से।
    स्पर्श की माँग को झुठला कर।

    इसी तरह मैंने अपने चारों ओर देखा और जाना
    मैंने इसी तरह इस संसार को परखा
    और इसके घातक सौन्दर्य को पहचाना

    यही वह पहचान है। बहुत गहरी पहचान।
    आँखों की पथरायी पुतलियों से हो कर
    जलते हुए दिमाग़ के स्तब्ध आकाश तक

    मैंने तुम्हारे ताल-मेल को बदलना छोड़ दिया है
    आख़िरकार।
    और अब मुझे अपने गूँगेपन के इस अन्धकार में
    बहुत ज़्यादा - बहुत ज़्यादा आराम है।
    8.
    मुझे नहीं लगता, हमारे बीच
    किसी तरह का सम्वाद अब सम्भव है।
    मेरे साथ अब तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है
    जब से मैंने अपने लिए चुन लिया है देश
        दमन और आतंक, घृणा और अपमान और द्वेष
    तुम्हें सिर्फ़ एक आशंका है
    मैं किसी भी दिन तुम्हारे कुछ भेद खोल सकता हूँ
    सरे आम।
    और मुझे मालूम है,
    इसे रोकने के लिए तुम कुछ भी कर सकते हो।
    लेकिन मैं अभी तक निराश नहीं हुआ
    मैं अब भी तुम्हारे पास खड़ा रहता हूँ, शायद कभी
    जब तुम याद करने की मनःस्थिति में हो या फिर उदास
    मैं तुम्हें उस घर की झाँकी दिखा सकूं
    जिसे छोड़ कर तुम
    अन्धकार में उगे हुए इस कारागार में चले आये थे
    और तुमने उसे ढूँढ लिया था आख़िरकार
    वह जो तुम्हारे अन्दर बैठा हुआ
    लगातार तुम्हें सब कुछ सहने के लिए
    विवश करता रहता था
    जो अपनी तेज़ और तीख़ी आवाज़ में
    तुमसे पूछता रहता था:
    "कौन-सा रास्ता इस नरक के बाहर जाता है ?"

    निश्चय ही एक बहुत बड़ी आस
    मुझे तुम्हारे पास
    खड़े रहने पर विवश करती है
    और तुम्हारी ख़ामोशी की तराश को चुपचाप सहती है
    एक समय था, जब तुमने निरन्तर
    मेरा अपमान करने की कोशिश की थी
    पर मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया है
    आख़िरकार
    और मन पर पड़े धब्बों को
    आईने की तरह साफ़ कर दिया है।
    9.
    तुमसे कहने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है
    मैंने अपने ऊपर ओढ़ लिया है आकाश
    और हरी घास की इस विशाल चरागाह पर
    पाप की तरह फैल गया हूँ
    मुझे ख़ुद कभी-कभी आश्चर्य होता है। बहुत आश्चर्य 
    मैं तुम्हारे साथ क्यों हूँ ?
    जबकि तुम्हारे चारों ओर घिरा हुआ
    तुम्हारा परिवेश है
    दमन है। आतंक है। नफ़रत, अपमान और द्वेष है
    क्या तुम्हें कभी इस पर विश्वास होगा
    मुझे सचमुच तुमसे कोई आकांक्षा नहीं है
    तुम अब भी लौट सकते हो
    बड़े आराम से। धूप में पसरी हुई उन्हीं चरागाहों में
    जहाँ तुमने एक-एक करके छोड़ दिये थे
    अपने सारे आकाश।
    नहीं। मुझे यह कभी नहीं महसूस हुआ -
    अपने और तुम्हारे सम्बन्धों को स्पष्ट करने के लिए
    मुझे किसी व्याख्या की ज़रूरत है।
    मैं - जो तुम्हारी उस घातक सक्रियता का आखेट हूँ
    आज लौट जाना चाहता हूँ। वापस
    यात्रारम्भ के उसी स्थान पर
    जहाँ पाँसों के खेल से नियन्त्रित होता है
    द्रव्य के एक गाढ़े घोल में
    पूरा-का-पूरा वंश-वृक्ष
    10.
    तुम्हें इसका ज़रा भी आभास नहीं है पिता
    कि तुम कभी-कभी मुझे कितना उदास कर जाते हो।

    वह जो मुझसे बार-बार उप न कर बहता रहा
    वह जिसे सहा मैंने लगातार
    वह जिसकी प्रखर धूप मुझे झुलसाती रही
    वह जिसकी आभ मुझे निराभ कर जाती रही
    वही रस। लपटों के बीच से वही रस
    मुझे पुकारता है। जो मेरा शरीर है

    रौंदी हुई घास पर पैरों के निशान
    सीने पर महसूस करते हुए
    मैं आम पर फूटते बौर को देखता
    और दहकते पलाश को याद करता
    जब एक तेज़ चाकू की तरह काम करता था वसन्त
    और रंग हवा के साथ मिल कर एक ऐसी साज़िश रचते
    जिससे धूप ख़ून में उबलती हुई महसूस होती।

    बहुत-से दिन मैंने इसी तरह बिताये हैं।
    बहुत-सी रातें
    निरर्थक प्रतीक्षा की तरह लम्बे, बहुत लम्बे दिन
    जिनकी सुनहली धूप मेरी याददाश्त पर पसरी हुई है
    मेरे चाहने या न चाहने के बावजूद
    जबकि दिमाग़ आजकल बिलकुल सुन्न हो गया है
    तुम्हें इसका ज़रा भी आभास नहीं है पिता
    कि तुम कभी-कभी मुझे कितना उदास कर जाते हो

    तुमने मुझे मेरे बचपन की चित्रावलियों के काट कर
    वयस्कता के कैसे घृणा-भरे नरक में धकेल दिया है
    जहाँ सहसा और अनायास।
    मैं अपंग हो गया हूँ - और असहाय

    तुम्हें मालूम है, मैं किस तरह चुपचाप नगर में
    बिलकुल अकेला चला जाता
    और अपनी देह बार-बार खो आता

    अगले दिन मेरे मित्रों को आश्चर्य होता
    जब वे पाते मेरे चेहरे पर 
    अजाने वृक्षों की घनी, गहरी चितकबरी छाया।

    मेरे सामने से रात के पिछले पहरों में एक जुलूस गुज़रता
    असमर्थ और अशक्त हिलती हुई भुजाओं का। पैरों का।
    शराबी क़हक़हे सड़क से चाँदनी पर तैरते हुए आते।
    और मुझे सौंप जाते: उनींदी रातें। जलती हुई आँखें।
    अपने ही टूटे हुए संसार का अकेलापन।

    कभी-कभी चाँदनी मेरे कमरे में घुस आती
    निर्विरोध और चुपचाप
    और उसे पकड़ने के लिए बढ़ते हुए मेरे हाथ, मेरी बाँहें
    लहर लेते विषधरों में बदल जातीं
    मैं इसी तरह निःशब्द
    अपने कमरे के बाहर फैले कारागार में देखता रहता
    और धीरे-धीरे किसी सुनसान प्रहर में
    सामने बाग़ में लगे कचनार के पेड़
    चाँदनी में ख़ाम¨श
    एक-दूसरे में
    घुल-मिल जाते

    कभी-कभी मैं भोर मैं
    किसी लता को अपने चारों ओर लिपटी पाता
    और नींद के हलके झँकोरे से अचानक जाग पड़ता

    लेकिन वह। मेरी देह। जिसकी मुझे तलाश थी।
    कहीं उस चाँदनी में। शराबी क़हक़हों में।
    आपस में गुत्थम-गुत्था पेड़ों में।
    भुजाओं के जुलूस में। अपने चारों ओर लिपटी लता में।
    या अपने मकान के जहाज़-नुमा खँडहर में
    खोयी रह जाती।
    11.
    मैं समझता था -
    इस खँडहर के अन्दर से 
    एक विशाल इमारत खड़ी हो जायेगी
    रात के अन्तिम पहरों में।
    चाँदनी में निःशब्द घुलती हुई। अदृश्य

    कभी-कभी मैं प्रतीक्षा करता रह जाता।
    कुछ होगा। कुछ होगा,
    मैं सोचता,
    कुछ ऐसा होगा
    जो सब कुछ बदल देगा।

    जो बदल देगा उनींदी रातें। जलती हुई आँखें।
    परती पर उठे हुए अन्तहीन कारागार।
    मेरी शाखों को खाते हुए धुँधुआते अन्धकार।

    ओर। दोनों शिखरों के बीच एक गहरी घाटी उग आयेगी
    जिसकी सुनहरी शान्ति में
    अपनी सारी शक्ति के साथ
    मैं दौड़ता हुआ निकला जाउँगा
    फिर कभी इस धुँधुआते अँधेरे में वापस नहीं आऊँगा।
    12.
    तभी एक दिन।
    एक दिन अचानक,
    अनजाने ही। पिता
    तुमने मुझे खिलौनों की जगह दे दिये थे - शब्द
    जलते हुए और चीख़ते हुए और उदास।

    यह तुम्हारी अन्तिम और सबसे कामयाब साज़िश थी।

    तुमने मुझे मेरे बचपन से
    या मेरे बचपन को मुझसे
    काट कर अलग कर दिया था
    और अपनी नसों में उबलते हुए लावे को
    बरदाश्त करता हुआ
    मैं बहुत जल्द ही ज़िन्दगी के प्रति कटु हो गया था।

    मैंने तब भी तुमसे कुछ नहीं कहा था।
    मैं तो एक ऐसी स्पष्टता चाहता था
    जिससे अपने बचपन को अच्छी तरह देख सकूं ।

    क्या तुम खड़े रहोगे। इसी तरह। हमेशा-हमेशा के लिए।
    घर की एक मात्र खिड़की के सामने। बाहर से आती हुई
    सुनहरी रोशनी को झेलते हुए। रोकते हुए।
    घर को अपनी विशाल परछाईं में
    डूब जाने के लिए विवश करते हुए।

    और वह सब जो बाहर है और मोहक है,
    उसका एहसास मुझे
    तुम्हारी इस चितकबरी परछाईं पर हिलते हुए प्रकाश-धब्बों
    या टूट कर विलीन होती आकृतियों ही से होगा।
    13.
    तभी मैंने तय कर लिया था,
    दिन में अपना समय काटने के लिए
    मैं रात में दबे पाँव जा कर चुरा लाऊँगा
    दूसरों के अन्तहीन दुःस्वप्न। उनींदी रातें।
    दुरूह और उलझे हुए विचार। परेशान घातें।

    मैं सोचता, मैं चुरा लाऊँगा
    दूसरों की खिड़कियों के अन्दर आने वाला
    अवरोधहीन प्रकाश

    और इस सब में डूब कर
    अपनी उस देह की तलाश करूंगा
    जिसे मैं बहुत पहले
    घर के बाहर लगे कचनार के
    उन गुत्थम-गुत्था पेड़ों के पास
    कहीं खो आया था।
    लेकिन फ़िलहाल। फ़िलहाल तो मैं ही रह गया हूँ
    अब असमाप्त। निरुद्देश्य।
    बेचैनी के रंग को पहचानने के बाद।
    14.
    हवा के रुख़ को जानने के बाद
    काले आकाश पर छाये हुए बादलों के जहाज़
    अकस्मात बह निकलते हैं -
    एक अन्तहीन और निरुद्देश्य यात्रा को
    जहाँ हमें सभी रास्तों के अन्त में
    मिलती है वही एक निर्वासित मूर्ति
    और कहीं भी वह पहचान नहीं रह जाती।

    मैं पाता हूँ अपनी स्मृति इसी मूर्ति के ख़ून से रँगी हुई -
    एक रक्ताभ और अविस्मरणीय यात्रा -
    अस्त होते सूर्य से फीके क्षितिज की निराभ छाया में
    15
    तुम ढूँढते रहे हो निरन्तर
    इस शहर के सम्पूर्ण विस्तार में
    अन्तर के सुलगते अन्धकार में
    अपने आप से एक लम्बी
    बातचीत करने के लिए
    कोई एक निजी और अकेला स्थान
    जो तुम्हें कहीं भी अपने आप से अलग नहीं होने देगा।
    16.
    तुम्हारी आँखों से होता हुआ
    तुम्हारे अन्तर में उग आया है
    एक उदास अनमना बियाबान


    जिसे कुतरते रहते हैं बारी-बारी से
    रात और दिन। निःस्तब्धता और कुहराम
    नफ़रत। प्रेम। पाप। प्रतिकार। प्रतिशोध।

    एक उदास अनमना बियाबान
    तुम्हारे अन्तर में। तुम्हारी आँखों से

    सब कुछ उन्हें दे देने के बाद भी
    तुम्हारे अन्तर में झरता हुआ
    वही एक अछूता संगीत
    जिसमें सारे-का-सारा दिन एक डूबता हुआ जहाज़ है
    अर्से से डूबता हुआ
    जिसकी धूप से रँगे हुए मँडराते विचार
    नीली नदियों की तरह
    तुम्हारे दिमाग़ के रेतीले कछार में विलीन होते रहते हैं

    और रात...
    ... रात और एक विचित्र संसार
    अन्तर्मुखी विचित्र संसार

    दबे पाँव तुम्हारे सपनों पर
    तुम्हारे मस्तिष्क के तरल फैलाव पर
    किसी डरावनी छाया की तरह उतरता हुआ
    17.
    तुमने क्यों सौंप दिया है अपने आप को
    उनींदी रातों के इस ज़हरीले संसार के हाथों
    जबकि तुम्हारे अन्तर के गहन अन्धकार में से हो कर
    अब भी गुज़रता है
    आवाज़ों का वह अन्तहीन जुलूस।

    बार-बार वही-वही चेहरे बेनक़ाब 
    वही अजीबो-ग़रीब सूरतें
    चीख़ती हुईं और फ़रियाद करती हुईं और उदास...
    और फ़तहयाब...

    आख़िर तुम्हें कब तक
    उन्हीं चेहरों का सामना करते रहना पड़ेगा
    जो रात में अपने मुखोश उतार कर
    तुम्हारी आँखों के सामने नाचने लगते हैं।

    उन्होंने मुझे सौंप दिया है
    उनींदी रातों का यह अन्तहीन अन्धकार
    बंजरता से फूट कर निकलता हुआ
    नफ़रत और द्वेष और अपमान की दीवारों से बना
    वह अन्तर्मुखी निःस्तब्ध कारागार।
    इतने सारे दिवंगत और तुम्हारे चारों ओर - ख़ालीपन
    और अधिक - और अधिक घिरता हुआ ।
    तुम्हें क्यों महसूस होता है,
    तुम्हारे अन्दर और बाहर
    क़ब्रों का एक लगातार सिलसिला उग आया है
    और तुम्हारे पीछे वही ख़ून-सनी डोलती छाया है
    तुमने क्यों अपनी सारी याददाश्त को
    अपने जलते हुए दिमाग़ से काट कर
    अलग कर दिया है
    जबकि तुम सिर्फ़ एक ऐसी स्पष्टता चाहते थे
    जिससे अपने बचपन को अच्छी तरह देख सको।

    18.
    अक्सर तुम इस मकान के बाहर चले आये हो
    अक्सर तुम इस जलते धुँधुआते सुनसान के बाहर
    चले आये हो
    जो तुम्हारा घर है या शहर या देश

    अब तुम चुपचाप घूमते रहते हो
    शहर की नीम-अँधेरी गलियों में

    अब तुम चुपचाप और सतर्क
    देखते रहते हो बाज़ारों में उमड़ती हुई
    उस जगमगाती भीड़ को
    जिसे तुम बहुत पहले, बहुत पहले ही
    अस्वीकृत कर चुके हो

    शायद तुम कहीं-न-कहीं उन लोगों से शंकित थे
    जो तुम्हें इस जलते धुँधुआते अन्धकार से जुड़े हुए देख कर
    तुम पर छिड़क देते अपने अन्दर का
    वही कलुष-भरा मटमैला रंग।
    अपने अन्तर की सारी नफ़रत से, भय से, शंका से
    तुमने अपने आप को इस भीड़ से अलग कर दिया है
    अलग कर लिया है तुमने आपने आप को
    उन सभी दमकते हुए चेहरों से

    और अब अगर सचमुच तुम अपनी स्मृति को
    किराये पर उठाना चाहो
    तो कौन देगा तुम्हें इस यन्त्रणा के बदले में
    सुविधाओं से भरा हुआ, शान्त और सुखी,
    (और ऊब-भरा) अनुर्वर जीवन

    क्या सचमुच तुम उस जलते हुए नरक में लौट जाओगे ?
    क्या सचमुच तुम फिर कभी वापस नहीं आओगे ?
    19.
    तुम समझ गये थे, यह सब तुम्हें गूँगा बनाने की
    वही घृणा-भरी साज़िश है
    तुम समझ गये थे,
    इस सब के बावजूद
    उस कोहरे के पार कहीं एक रास्ता निकलता है

    लेकिन तुम एक लम्बे अर्से से नफ़रत करते रहे हो
    नफ़रत करते रहे हो। और प्यार।
    और इसीलिए तुम इतने दिनों तक ख़ामोश रह कर
    अपने ही तरीक़े से उन्हें पराजित करते रहे हो

    तब तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी था कुछ-न-कुछ करना
    बहुत ज़रूरी था अपने आप को लगातार
    इसी तरह - इसी तरह छलना

    मुझे याद है। तुमने मुझसे कहा था:
    'वक़्त बीत चुका है कहने का
    चुपचाप नफ़रत और शंका और अपमान
    सहने का वक़्त बीत चुका है।
    आओ, हम इस मौन में शामिल हो जायँ
    आओ, अब हम इस लगातार और निष्फल मौन में डूब जायँ
    यह हमें कहीं-न-कहीं तो ले ही जायेगा -
    अन्दर या बाहर - अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।'


    और अब तुम्हें कितनी मोहक लगती हैं
    वे सारी-की-सारी साज़िशें
    जिनसे तुम्हारा कोई भी वास्ता नही रह गया है
    20.
    उस जलते हुए ज़हर से गुज़र कर
    तुम्हें विश्वास हो गया है:
    जो तुम जानते हो
    उससे कहीं ज़्यादा तुम्हारे लिए उसका महत्व है
    जो तुम महसूस करते हो
    आग की सुर्ख़ सलाख़ों की तरह
    बर्फ़ की सर्द शाख़ों की तरह

    तुम्हें मालूम है: जब कभी तुम्हारा सच
    उनकी नफ़रत और शंका
    और अपमान से टकराता है -
    टूट जाता है

    इसी तरह टूट जाता है हर आदमी निरन्तर
    भय और आतंक, अपमान और द्वेष में रहता हुआ

    सच्ची बात कह देने के बाद
    अपने ही लोगों से अपमानित होते रहने की विवशता
    सहता हुआ।
    और अब तुम थके कदमों से
    अपने घर की तरफ़ लौटते हो
    और जानते हो कि
    तुम्हारे जलते हुए और असहाय चेहरे पर कोई पहचान नहीं।
    अब तुम लौटते हो। अपने घर की तरफ़। थके कदमों से।
    अकेले...और उदास...और नाकामयाब...
    21.
    लेकिन वह ख़ून से सना हुआ डोलता कबन्ध
    तुम कहीं भी जाओ
    तुम्हारे साथ-साथ जायेगा

    दूर, दूर, दूर
    उसे ढूँढने के लिए
    तुम्हें कहीं भी दूर नहीं जाना पड़ेगा
    वह ख़ून से सना हुआ डोलता कबन्ध
    तुम कहीं भी जाओ - तुम्हारे साथ-साथ जायेगा

    वही जिसे तुम लगातार-लगातार काट कर
    अपने से अलग करते रहते हो
    वही जिसे तुम अपने ही अलग-अलग रूप¨ं में
             गढ़ते रहते हो
    अपने अन्तर की सारी घृणा से, भय से
    शंका और अपमान और पराजय से

    वह लेकिन इसी तरह डोलता रहता है। निरन्तर।
    ख़ून से सना हुआ। तुम्हारे अन्दर और बाहर।

    तुम कहीं से भी शुरू करो: हाथों से। पैरों से।
    उसके दीर्घकाय शरीर की गठी हुई माँस-पेशियों से
    या उसकी रक्त-रंजित खाल पर गुदे हुए चिन्हों से
    तुम्हें उसे पहचानने में ज़रा भी दिक्कत नहीं होगी

    दूर, दूर, दूर
    तुम कहीं भी जाओ। तुम देखोगे:
    तुम्हारे अन्तर की सारी नफ़रत और शंका,
    अपमान और द्वेष झेल कर
    जो छाया तुमसे पीछे और विमुख
    ख़ून-सनी ज़मीन पर पड़ रही है -
    उसी कबन्ध की है
    उसी रक्त-रंजित डोलते कबन्ध की
    अन्दर और बाहर। चुपचाप। निःशब्द। निर्विकार।
    22.
    मैं एक लम्बे अर्से से तलाश कर रहा हूँ
    अपनी जड़ों की। इस यात्रा पर
    मैं जानता हूँ: सिर्फ़ मुझे ही जाना है
    सभी सम्बन्धों से कट कर
    धरती और चट्टान के अँधेरे में
    इस बार सिर्फ़ मुझे ही ढूँढना है वह स्रोत
    अपने दिमाग़ के सन्तुलन के लिए
    हाथों और शब्दों की मुनासिब कार्रवाई के लिए

    कौन-सी वह धारा थी
    जिस पर तिरती हुई यह नाव
    इतनी दूर तक चली आयी
    कौन-सी हवा इस पतंग को
    यहाँ तक खींच लायी
    जब-जब मेरे कदम बढ़े
    मेरे अन्दर से आवाज़ आयी
    रुक जाओ। रुक जाओ।
    पहले अपने चारों ओर फैली इस दुनिया को देखो और जानो

    अकसर मैंने ख़ुद से सवाल किया है
    कहाँ से ? क्यों ? किस ओर ?
    मेरे दिमाग़ में गूँजता रहा है यह शोर। निरन्तर

    इसीलिए मैं लौटा हूँ। बार-बार
    पत्तियों से टहनियों और शाख़ों से जड़ों की ओर

    और मेरा दिमाग़ अपने इस निजी संसार को
    बदल डालने की तेज़ और आशा-रहित इच्छा से
    लगातार ज़ख़्मी होता रहा है

    सोचो, क्या यह बहुत दिनों तक चल सकता है -
    सर्द बारिश में खड़े रह कर
    इतनी उपेक्षा को सह कर
    अपने अन्दर की आग को समिधा देना

    जब किसी भी चीज़ की सही पहचान
    आँखों के लिए तकलीफ़ बन जाय
    जब अन्तर का लहलहाता वन
    सुख्र्¤ा लपटों में डूब जाय
    जब एक ओर समय
    और दूसरी ओर उसका सबक़ रह जाय

    कितना मुश्किल है
    अन्तर की लहलहाती धूप की जगह
    जलते हुए अँधेरे को दाख़िल होते हुए देखना
    आँखों के नष्ट हो जाने के बाद।

    बहुत-से दिन मैंने इसी तरह बिताये हैं।
    बहुत-सी रातें।
    निरर्थक प्रतीक्षा की तरह लम्बे बहुत लम्बे दिन
    जिनकी सुनहली धूप -
    मेरी याददाश्त पर पसरी हुई है।
    मेरे चाहने या न चाहने के बावजूद
    जब कि दिमाग़ आजकल लपटों में खो गया है
    कितना मुश्किल है
    इस तरह ख़ामोश रहना और प्रतीक्षा करना
    जब कि सारी सम्भावनाएँ
    आग और लोहे की
    एक अन्तहीन हलचल में खुलती हैं
    23.
    मैंने अपने शब्दों को ख़ुद अपने निकट -
    अपने और अधिक निकट होने के लिए रचा है
    सच्ची बात कह देने के बाद

    और मुझे महसूस होता है -
    कोई भी मेरे शब्दों से हो कर
    मेरे पास नहीं आ सकेगा
    उस इन्तज़ार और सपने के टूट जाने पर
    अपने अन्दर की पहचान को ज़िन्दा रख कर
    सारी-की-सारी शंका और घृणा और अपमान झेल कर

    क्योंकि ये शब्द आख़िर क्या हैं ?

    इस दलाल सभ्यता के ख़िलाफ़ एक चीख़
    एक ऐसा शोक-गीत
    जिसकी भूमिका शोक की नहीं
    ख़ुद अपने क़रीब जाने के उल्लास की है

    क्या मैं ये शब्द लिख कर कहीं उस गहरी -
    बहुत गहरी और अन्तरंग विवशता की
    चिरपरिचित पहचान को झुठला नहीं देता ?
    आँखों की पथरायी पुतलियों से हो कर
    जलते हुए दिमाग़ के स्तब्ध आकाश तक निरन्तर
    उस सारी-की-सारी नफ़रत और शंका
    भय और अपमान को सहता हुआ
    टूटता हुआ और सिमटता हुआ और बिखरता हुआ 

    नहीं। नहीं। अपने हृदय की गहराई से
    दोनों हाथ भर-भर कर
    मैं उलीचता रहा हूँ एहसास

    इसीलिए मैं चाहता हूँ
    जो भी मेरे शब्दों को पढ़े और जाने
    जैसे आदमी अपनी पत्नी को
    निरन्तर उसके साथ रह कर जानता है
    सच्ची बात कह देने के बाद लोगों का अविश्वास सह कर
    जैसे आदमी कटुता को
     पहचानता है
    वह लगातार अपने ही लोगों के 
    और अधिक निकट हो।
    निकट हो। उल्लसित हो। और संगीतमय।
    24.
    नहीं। मैं अँधेरे में डूबती हुई शाम नहीं हूँ
    वह जो कुछ भी मैं हूँ - गुमनाम नहीं हूँ

    अब भी कहीं भीतर से आती हुई वह पुकार। वह एक पुकार
    मुझे कहीं-न-कहीं आश्वस्त करती रहती है

    और मैंने अक्सर सोचा है
    एक समय आयेगा, जब मुझे तुमसे पूछना ही पड़ेगा
    तुम्हारी इन सभी मुद्राओं का अर्थ
    जब। जब एक लम्बे अन्तराल के बाद
    आख़िरकार
    शुरू होगा - दर्शक-दीर्घा की ओर से
    नाटक का वह अन्तिम अंक।

    मुझे अब धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा है:
    तुम तक मेरी बात पहुँच नहीं सकती।
    मैंने अकसर अपने भय और आतंक
    नफ़रत और अपमान और द्वेष के
    उस अँधेरे कारागार से लौट कर
    तुम्हें अपने अन्तर की उस गहरी विवशता के बारे में
          बताने की कोशिश की है
    और हर बार ग़लत समझा गया हूँ।

    अपने अन्दर किसी एक नंगे,
    बहुत नंगे सच का सामना करते हुए
    मुझे हमेशा यह एहसास हुआ है कि
    तुमने मुझे अपने से काट कर
    किस क़दर
    असहाय और निराश और बन्दी बना दिया है

    और जैसा कि तुम मुझसे हमेशा कहते रहे हो:
    'जो हम महसूस करते हैं, वह हमारे लिए
    उस सब से कहीं ज़्यादा सच होता है
    जिसे हम जानते हैं।'

    तभी एक बार। सिर्फ़ एक बार मेरे मन में
    तुम्हारे प्रति सन्देह हुआ था।

    मुझे लगा था, कहीं कुछ बहुत ज़्यादा -
    बहुत ज़्यादा ग़लत हो गया है। प्रारम्भ
    या फिर उस कहानी में न अट सकने वाला
    पहले से तय कर लिया गया अन्त।

    और मैं सोचता: ऐसा ही होगा -
    क्या सचमुच ऐसा ही होगा अन्त -
    असहाय और बंजर और अशक्त बना कर छोड़ता हुआ ?
    क्या मैं इसी तरह अपनी सारी शक्ति के साथ
    टूट कर गिरता हुआ बिखर जाऊँगा -
    अकेला और उदास और नाकामयाब ?

    नहीं। जब भी वह बियाबान
    जब भी वह उदास अनमना बियाबान
    इसी तरह मृत्यु-सा निःशब्द
    मेरे चारों ओर फैल जायेगा

    तब मैं जाऊँगा नहीं नगर-पिताओं के पास
    अपने सपनों के अर्थ पूछता हुआ
    कमींगाह में छिपे क़ातिलों से
    हताहत मित्रों के नाम पूछता हुआ

    मैं सिर्फ़ अपना जलता हुआ एहसास
    आँखों की अथाह गहराई में सँजो कर
    सौंप जाऊँगा
    अपने हाथों और शब्दों के उत्तराधिकारियों को

    फिर मैं लौट जाऊँगा
    उसी धुँधुआते अन्धकार में
    दमन और आतंक और नफ़रत के
    उसी जलते हुए नरक में

    जहाँ आग और लोहे की कारगर कोशिश से
    टूटते हुए कारागार के खँडहरों पर
    फैल रहा होगा
    एक नयी भोर का सुर्ख़ उजाला।
    1967-70
    --
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    Bangladesh Government policies are the 


    basic cause of genocide and rape Tsunami 


    and terror against minorities in Bangaldesh.


    বাংলাদেশ সরকারের সংখ্যালঘু বিদ্বেষ নীতিই সবথেকে 


    বড়ো সন্ত্রাস।


    Recent terror strikes exposed so much so hyped Pro India image of Awami legue and its government in Bangladesh,led by Hasina Wajed.The government of Bangladesh claimed that it was aware of the terror strikes mcuh before.But it failed the rot within which the government created.The ruling party has been captured by those who fuel religious nationalism as we see it elsewhere worldwide not to mention India and United States of America. After Gulshan attackin Dhaka,it is known that the terror network is supported by the Ruling party and prominent leaders are involved.


    The next terror strike was also linked with Awami leaders.


    Day today genocide,rape and persecution events are managed by Bangaldesh ruling and opposition leaders and they behave like the war criminals of seventies all on the name of religion and they are adament to drive out 240 million Hindus out of Bangladesh as Taslima Nasrin alread said.A Bangladesh Lawyer Utpal Biswas has shared the policy documents with his write up to prove that the Anti Minority Deportation drive of Awami Legue and Bangladesh Government.We share the article to make government of India and Indian people aware of the most dangerous development to threat Indian demography as well as National unity and integrity.


    Palash Biswas



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    मरी हुई गायों के नाम पर खून खराबा खूब हो रहा है तो देहात और खेती की बेदखली के बाद जिंदा गायों की सुधि लेने वाले कौन बचे रहेंगे?


    सुंदरवन बचाओ नाम से बांग्लादेश में भी तेज हो रहा है गोरक्षा का जवाबी आंदोलन!


    अभी अभी बांग्लादेश में तूफां आया है कि असम विधानसभा में किसीने बांग्लादेश में भारत के सैन्य हस्तक्षेप की मांग कर दी है।नतीजे का अंदाज आप खुद लगा लें।


    यह कैसा हिंदू राष्ट्र है,जहां हर दूसरा नागरिक गो हत्यारा बताया जा रहा है और रोज रोज गोरक्षा के नाम पर जहां तहां बहुजनों पर धर्मोन्मादी हमला हो रहा है?


    इस्लामी राष्ट्रवाद का घोषित लक्ष्य बांग्लादेश को भारत के कब्जे से मुक्त करना है और इसीलिए जैसे पाकिस्तान दुश्मन है तो हर हिंदू का दुश्मन मुसलमान है,उसीतरह वहां भी भारत दुश्मन है तो हर हिंदू दुश्मन है।


    जिस गुजरात में पहले मुसलमानों का नरसंहार हुआ,वहां अब दलित निशाने पर हैं।गुजरात नरसंहार में जिन बहुजनों ने हिंदुत्व की पैदल फौज बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी,आज उनके लिए भी फिजांं उतनी ही कयामत है,जितनी कि मुसलमानों के लिए। फिर भी गनीमत है कि बहुजन समाज अभी बना नहीं है और दलित उत्पीड़न के खिलाफ सिर्फ दलित सड़कों पर हैं और बाकी लोग वोट बैंक साध रहे हैं।


    गुलशन हत्याकांड के बाद से भारत के सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी का अखंड पाठ चल हा है और लाइव दिखाया जा रहा है रा की गतिविधियां।हमारे यहां जैसे हर मुश्किल और हर मसले का सरकारी जबाव पाकिस्तान है।उनकी हर समस्या के पीछे उसी तरह भारत है।इस्लामी राष्ट्रवाद का घोषित लक्ष्य बांग्लादेश को भारत के कब्जे से मुक्त करना है और इसीलिए जैसे पाकिस्तान दुश्मन है तो हर हिंदू का दुश्मन मुसलमान है,उसीतरह वहां भी भारत दुश्मन है तो हर हिंदू दुश्मन है।



    पलाश विश्वास

    বাংলাদেশের বিরুদ্ধে যুদ্ধ ঘোষণার প্রস্তাব ভারতের বিধানসভায়

    বাংলাদেশের বিরুদ্ধে যুদ্ধ ঘোষণার প্রস্তাব ভারতের বিধানসভায়

    সংখ্যালঘু নির্যাতন বন্ধ না হলে বাংলাদেশের বিরুদ্ধে যুদ্ধ ঘোষণার প্রস্তাব উঠেছে ভারতের আসামের বিধানসভায়। শুক্রবার বিকালে আসামের বিধানসভায় বাজেট অধিবেশনের পঞ্চম দিনে এ প্রস্তাব দেন কংগ্রেসের বিধায়ক আব্দুল খালেক। বাজেটের ওপর আলোচনায় বেসরকারি এক প্রস্তাবে তিনি বলেন,…

    TAZA-KHOBOR.COM|BY TAZAKHOBOR : NEWS UPDATE

    जैसे हमारे देशभक्त विमर्श का अंदाज हैःआतंकवादी हमलों के पीछे पाकिस्तान, कश्मीर में बवाल के पीछे पाकिस्तान,विपक्ष के पीछे पाकिस्तान,धरमनिरपेक्ष और प्रगतिशीलता के पीछे पाकिस्तान,वैसे ही बांग्लादेश में अंध इस्लामी राष्ट्रवाद बांग्लादेश की सरकार को भारत की गुलाम सरकार मानता है और उसके तख्ता पलट की तैयारी में है।भारत की तरह बांग्लादेश में भी लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील तत्वों को भारत का दलाल और एजंट मना जाता है।


    भारत में जैसे हर मुसलमान को पाकिस्तानी मानने की रघुकुल रीति है वैसे ही बांग्लादेशी भाषा में हर मलाउन यानी माला फेरने वाला हिंदू भारत का एजंट है और उनका वध धर्मसम्मत है।वहं भी अल्पसंख्यकों का सफाया धर्मयुद्ध का एजंडा है।


    भारतवर्ष नामक अखंड हिंदू राष्ट्र का राजधर्म,राजकाज और राजनय,राजनीति और अर्थव्यवस्था अब गोरक्षकों के हवाले हैं।गोमांस निषेध आंदोलन राममंदिर आदोलन के विपरीत हिंदुत्व से बहुजनों को बेहद तेजी से अलग करने लगा है और गोरक्षकों का इसका अहसास नहीं है।


    मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के नाम हिंदुत्व का जो अभूतपूर्व ध्रूवीकरण हुआ और जिसके नतीजतन भारतवर्ष नामक अखंड हिंदू राष्ट्र का राजधर्म,राजकाज और राजनय, राजनीति और अर्थव्यवस्था अब गोरक्षकों के हवाले हैं,उसका विखंडन उतनी ही तेजी से होने लगा है।


    क्योंकि इस महादेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलावा आदिवासी,दलित और पिछड़े अपने को गोमाता की संतान मानने से इंकार कर रहे हैं तो उनके खिलाफ गोरक्षकों के हमले रोज तेज से तेज होते जा रहे हैं।



    जिस गुजरात में पहले मुसलमानों का नरसंहार हुआ,वहां अब दलित निशाने पर हैं।गुजरात नरसंहार में जिन बहुजनों ने हिंदुत्व की पैदल फौज बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी,आज उनके लिए भी फिजांं उतनी ही कयामत है,जितनी कि मुसलमानों के लिए। फिर भी गनीमत है कि बहुजन समाज अभी बना नहीं है और दलित उत्पीड़न के खिलाफ सिर्फ दलित सड़कों पर हैं और बाकी लोग वोट बैंक साध रहे हैं।


    रामरथी महारथी हिंदुत्व के सिपाहसालार सत्तावर्ग के मंत्री संत्री और तमाम सिपाहसालार ,चक्रवर्ती महाराज इस संकट पर तनिक विवेचना करें कि यह कैसा हिंदू राष्ट्र है,जहां हर दूसरा नागरिक गोहत्यारा बताया जा रहा है और रोज रोज गोरक्षा के नामपर जहं तहां बहुजनों पर धर्मोन्मादी हमला हो रहा है।


    हिंदुत्व की समरसता और एकात्मकता का बंटाधार हिंदुत्व की बजरंगी फौजे बहुत तेजी से कर रहा है और इसका तात्कालिक नतीजा पंजाब और यूपी के चुनावों में सामने आ जायेगा।बाहुबलि का नरमेधी अश्वमेध के लिए भारी खतरा है।


    यह हिंदुत्व का संकट है।हम विशुधता के पैमाने पर या रंगभेदी सौंदर्यशास्त्र के मुताबिक हिंदुत्व का दावा कर नहीं सकते और न करते हैंं।


    हिंदुत्व की मुहर लगी होती तो हमारे तमाम मुश्किलात आसान हो गये होते।

    न हम अपने को हिंदू राष्ट्र का झंडावरदार मानते हैं।


    हम हजारों साल से पीढ़ी दर पीढ़ी भारत के तमाम मूलनिवासी इंसानियत की जमीन पर कीचड़ गोबर पानी में धंसे हैं और हमें असाध्य किसी भीषण गुप्तरोग के इसाल के लिे न गोमूत्र और न शिबांबु पान करने की कोई जरुरत है।


    गोमाता,गोवंश और गोबर से उन धर्मोन्मादी हिंदुत्व राष्ट्रवादियों की तुलना में जाति धर्म नस्ल निर्विशेष भारत के किसानों का नाता बेहद गहरा है जबकि इस धर्म राष्ट्र के राजधर्म के ध्वजावाहकों का कृषि अर्थव्यवस्था से कुछ लेना देना नहीं है।


    अब यह पहेली बूझना बेहद मुश्किल है कि जब आप समूचे देहात को स्मार्ट और डिजिटल मुक्तबाजार में तब्दील करने पर आमादा है और खेतों खलिहानों और खेती के साथ साथ किसानों का श्राद्धकर्म वैदिकी पद्धति से कर रहे हैं तो मरी हुई गायों की लाशों पर हिंदू राष्ट्र का परचम कैसे फहराया जायेगा।


    मरी हुई गायों के नाम पर खून खराबा खूब हो रहा है तो देहात और खेती की बेदखली के बाद जिंदा गायों की सुधि लेने वाले कौन बचे रहेंगे,पहेली यह भी है।


    कोलकाता जैसे प्रगतिशील महानगर की क्रांति भूमि बी अब गोमूत्र की पवित्र गंध से महामहा रही है।अस्पतालों और चिकित्सालयों के भारी खर्च उठाने में असमर्थ आम जनता की बलिहारी जो हजारों साल से इलाज के अभ्यस्त नहीं है।मंत्र तंत्र ताबीज यंत्र ओझा हकीम पीर साधु संत दरगाह मजार और तमाम रंग बिरंगे धर्मस्थलों पर वे अपनी तमाम मुश्किलें आसान करने को दौड़ते हैं क्योंकि आज मुक्तबाजार में क्रयशक्ति उनकी नहीं है और भारतीय उत्पादन प्रणाली में वे हजारों साल से अपने श्रम के बलबूते जिंदा हैं,सिक्कों और अशर्पियों के दम पर नहीं।


    बलिहारी असल में तो उन तकनीक विज्ञान ऐप लैप टैब धारक क्रयक्षमता समृद्ध पढ़ी लिखी जमात की है जो रोगमुक्ति के लिए कोका कोला और पेप्सी की तरह धड़ल्ले से गोमूत्र पान कर रहे हैं और यूरिया एसिट से विटामिन प्रोटीन कैल्सियम और मिनरल्स का काम चला रहे हैं।


    विशुधता का धर्म कर्म जाहिर कि विज्ञान और तकनीक पर भारी है और कारपोरेट ब्रांडिंग और मार्केटिंग को भी ध्वस्त करने लगी है अंध आस्था को भुना रही विशुधता की मार्केटिंग।


    इसमें कोई क्या कर सकता है?जिसकी जैसी आस्था,जिसकी जितनी क्रयशक्ति ,वह उतनी आजादी के साथ अपनी अपनी आस्था में कैद रहने को आजाद है और विज्ञान तकनीक से समृद्ध इस सत्ता वर्ग को लेकर हमारी कोई फिक्र भी नहीं है।


    वे जाहिर है कि पोकमैन के पीछे भागते हुए फेसबुक पर कुछ भी पोस्ट करते हुए अपनी अपनी जिंदगी में बहार जी रहे हैं।हमें तो सदाबहार पतझड़ में जी रहे बहुसंख्य बहुजनों की चिंता है जो हिंदू हुए बिना हिंदुत्व के शिकंजे में मजबूरी या आस्था की वजह से ऐसे फंसते जा रहे हैं कि उन्हें मौत की आहट की भी खबर नहीं है।


    इस केसरिया सुनामी के मध्य चाहे हिंदुत्ववादी हो या न हो,विशुध अशुध गोरे काले प्रजाजनों के मुखातिब होकर मुझे कहना ही होगा कि भूगोल कभी एक जैसा रहा नहीं है और जमीन हो या समुंदर उसपर खींची कोई रेखा स्थाई होती नहीं है।


    यह वक्त खतरनाक और बेहद खतरनाक इसलिए है कि इंसानियत की परवाह किये बिना जो सत्ता वर्ग ने इस दुनिया में आड़ी तेढ़ी तमाम रंग बिरंगी रेखाएं खींचकर इंसानियत को बार बार लहूलुहान किया और कत्लेआम के गुनाहगारों की जिस जय गाथा को हम भूगोल और इतिहास मानते हैं और उनके बनाये नक्शे पर अपना सर कलम कराने को तैयार रहते हैं,वहीं आड़ी रेखाेओं में कयामत बहती हुई सुनामियां हैं।


    मसलन बांग्लादेश में इसवक्त सुंदरवन बचाओ अभियान सबसे बड़ा आंदोलन है।यह विदेशी हित या कारपोरेट पूजी के खिलाफ विशुध पर्यावरण आंदोलन भी नहीं है,जिसे दरअसल सीमाओं के आर पार मनुष्यता और प्रकृति के हकहकूक के लिए संगठित किया जाना चाहिए।


    यह  सुंदरवन बचाओ अभियान औपचारिक तौर पर तेजी से संगठित भारतविरोधी आंदोलन है और इसके सीधे निशाने पर है इन्हीं आड़ी तेढ़ी रेखाओं के दायरे में बसी हुई इस महादेश के तमाम मुल्कों की इंसानियत,सीधे कहे तो जनसंख्या का भूगोल ,जिसे आखिरकार तहस नहस करने का धर्मोन्मादी एजंडा वहां गोरक्षा का जवाबी आंदोलन है क्योंकि तकनीकी तौर पर गोरक्षा आंदोलन भी कोई धर्मोन्मादी अश्वमेध राजसूय होने के बजाय विशुध पर्यावरण आंदोलन होना चाहिए था और वह ऐसा कतई नहीं है,तो समझ लें कि सुंदरवन बचाओं का असल एजंडा क्या है।


    जाहिर है कि एकदम गोरक्षा आंदोलन की तर्ज पर बांग्लादेश में सुंदरवन बचाओ आंदोलन का कहर इस पूरे महादेश पर टूटने वाला है।कमसकम हिंदुत्ववादियों को इसका अंदाजा होना चाहिए क्योंकि वे लोग भी वही धतकरम कर रहे हैं।


    बांग्लादेश में इस वक्त रोज रोज दुनियाभर में हो रही आतंकवादी हमलों की खबरें बड़ी खबरें हैं नहीं।हमारे यहां राजनेताओं की राजनीति,उनके बयान,गाली गलौचआरोप प्रत्यारोप,क्रिया प्रतिक्रिया से जैसे मीडिया को फुरसत नहीं है,वैसे ही बांग्लादेश में इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा भारत का सैन्य हस्तक्षेप है।वहां यही मीडिया कारोबार है।


    गुलशन हत्याकांड के बाद से भारत के सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी का अखंड पाठ चल हा है और लाइव दिखाया जा रहा है रा की गतिविधियां।


    हमारे यहां जैसे हर मुश्किल और हर मसले का सरकारी जबाव पाकिस्तान है।उनकी हर समस्या के पीछ उसीतरह बारत है।इस्लामी राष्ट्रवाद को घोषित लक्ष्य बांग्लादेश को भारत के कब्जे से मुक्त करना है और इसीलिए जैसे पाकिस्तान दुश्मन है तो हर हिंदू का दुश्मन मुसलमान है,उसीतरह वहां भी भारत दुश्मन है तो हर हिंदू दुश्मन है।


    जैसे हमारे देशभक्त विमर्श का अंदाज हैःआतंकवादी हमलों के पीछे पाकिस्तान, कश्मीर में बवाल के पीछे पाकिस्तान,विपक्ष के पीछे पाकिस्तान,धरमनिरपेक्ष और प्रगतिशीलता के पीछे पाकिस्तान,वैसे ही बांग्लादेश में अंध इस्लामी राष्ट्रवाद बांग्लादेश की सरकार को भारत की गुलाम सरकार मानता है और उसके तख्ता पलट की तैयारी में है।


    भारत की तरह बांग्लादेश में भी लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील तत्वों को भारत का दलाल और एजंट मना जाता है।


    भारत में जैसे हर मुसलमान को पाकिस्तानी मानने की रघुकुल रीति है वैसे ही बांग्लादेशी भाषा में हर मलाउन यानी माला फेरने वाला हिंदू भारत का एजंट है और उनका वध धर्मसम्मत है।वहं भी अल्पसंख्यकों का सफाया धर्मयुद्ध का एजंडा है।


    अभी अभी बांग्लादेश में तूफां आया है कि असम विधानसभा में किसीने बांग्लादेश में भारत के सैन्य हस्तक्षेप की माग कर दी है।नतीजे का अंदाज आप खुद लगा लें।

    भारत में हिंदी मीडिया में ऐसी कोई खबर सुर्खियों में नहीं है।

    अंग्रेजी या असमिया मीडिया में ऐसी कोई खबर खंगालने के बाद हमें देखने को नहीं मिली है।गुगल सर्च में भी नहीं है।


    बहरहाल संजोग यह है कि ढाका में गुलशन हमले से पहले कोलकाता में हिंदू संहति के जुलूस में भारत के सैन्य हस्तक्षेप की मांग जोर शोर से उठी थी।


    वैसे विदशी मीडिया बांग्लादेश में किसी भी राजनीतिक तूफां के मौके पर भारत के 1971 की तर्ज पर भारत के बांग्लादेश में सैन्य हस्तक्षेप की कयास में खबरें और विश्लेषन प्रकाशित प्रसारित करने का रिवाज है।


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    #‎Guwahati‬‪#‎NEIndia‬: The total length of the Indo-Bangladesh border is 4,096 km of which 284 km falls in ‪#‎Assam‬...more details

    thenortheasttoday.com/?p=49484

    India-Bangladesh border will be secured says CM Sonowal

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    ইসলামকে গালি দিতে তসলিমাকে ডাকছে ভারতীয় টিভি চ্যানেলগুলো'

    http://rtnews24.com/…/%e0%a6%87%e0%a6%b8%e0%a6%b2%e0%a6%be…/

    'ইসলামকে গালি দিতে তসলিমাকে দিয়ে টকশো করাচ্ছে ভারতীয় টিভি চ্যানেলগুলো'

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    The India Doctrine's photo.

    The India DoctrineLike Page

    July 20 at 10:16am·

    মেঝ পুএ

    (এর জন্যই বলা হয় "চোরের মার বড় গলা"

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