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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    Shesh Nath Vernwal


    करीब 8 महीने पहले मेरी माँ से मेरा बहस हुआ था। मैंने तर्क में कह दिया था कि दहेज़ मांगने में व्यक्ति को शर्म आना चाहिए। मेरा आशय मेरी माँ से ही था।

    दूसरी बात यह भी हुई थी कि मैंने उनसे कहा था कि अगर बकरा और मुर्गा खाना गलत नहीं है, तो गाय खाना क्यों गलत है। मैं यह जानता था कि गाय खाने की बात करना एक हिन्दू के लिए घृणित और अक्षम्य समझी जाती है। फिर भी कहा था।

    मेरी माँ से बातचीत बंद थी। इस दौरान मेरे रांची स्थित आवास (किराया का कमरा) में वह 8 महीने तक नहीं आई। पर आज मेरा सर्टिफिकेट पहुँचाने के बहाने आई। उसकी शर्त थी कि वह रेलवे स्टेशन से ही लौट जाएगी। पर मेरी लाईफ पार्टनर ने उसे किसी तरह अपने कमरे ले आई। मैं माँ से मिल न सका, क्योंकि मेरी भी ट्रेन थी और मुझे रांची स्टेशन से ही कोलकाता जाना था। मेरी ट्रेन मेरी माँ की ट्रेन के पहुँचने के 10 मिनट पहले ही था।

    बहुत याद आ रही है मेरी माँ.. ऑंखें नम होने की हद तक। और खुद पर बहुत शर्म भी आ रही है। सोच रहा हूँ कैसी संतान हूँ मैं जो अपनी माँ को शर्म आने की बात कह दी।

    मेरे पिताजी भी हमारे आवास पर नहीं आते थे। कहते थे कि जबतक हम अपना कमरा नहीं बदल लेते, वो नहीं आएंगे, ऐसा ही गौरी (मेरी लाईफ पार्टनर) को उन्होंने कहा था। दरअसल हमलोग एक मुसलमान परिवार के घर किरायेदार थे।

    सोचता हूँ, क्या मेरी माँ और पिताजी सोच से संकीर्ण और पिछड़ेे हैं या उस भारत के बहुसंख्यक निवासियों की सोच के प्रतिनिधि हैं, जिनके ऐसे ही विचार जाति, धर्म, दहेज़ आदि को लेकर है और जिनमें हम-आप सब शामिल हैं।

    वैसे मेरी माँ, मेरे पिताजी से अधिक खुले विचारों एवं दूसरों की आज़ादी का ख्याल रखने वाली है। तभी तो उसने मेरा बिना दहेज़ और अंतरजातीय विवाह को स्वीकार किया था। वैसे उसे मेरी लाईफ पार्टनर का गोरी रंगत नहीं होने का दुःख था, क्योंकि गौरी रंग में सांवली थी। पर कहती थी, गोरी रंगत नहीं है तो क्या हुआ गुण में तो अच्छी है।

    यह सब लिख रहा हूँ कि शायद आप भी इन सब बातों से दो-चार होते होंगे, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में। और शायद सोच पाएंगे कि आप अकेले नहीं हैं, बहुत सारे लोग हैं। जो एक नई दुनिया बनाना चाहते हैं या ऐसा दावा करते हैं, जिसमें जाति, धर्म, लिंग आदि को लेकर कोई भेदभाव नहीं हो। आर्थिक भेद नहीं हो। भले ही यह सोच उनके दिमाग और चर्चा तक ही सीमित रह जाता है या बहुत थोड़ा जमीन पर लग पाता है।


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    महाबली की घबराहट
    ===============
    ये क्या हो रहा है !

    Laxman Singh Bisht Batrohi

    मैं कांग्रेसी नहीं हूँ, न भाजपाई. मगर मैं हरीश रावत का प्रशंसक रहा हूँ. इसके पीछे कई कारण हैं. मुझे लगता था, वही उत्तराखंड के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनमें अपनी धरती के जमीनी संस्कार हैं और तमाम विरोधी परिस्थितियों के बीच, विषम से विषम परिस्थितियों से उनका उबरते चले जाना अपने प्रदेश के लोगों की शुभकामनाओं और उनके प्रति अटूट विश्वास के कारण ही हुआ है. मेरी यह धारणा अनायास नहीं है. मैं ही नहीं, मेरे जैसे उन अनेक लोगों का, जो हर बात को तर्क और परंपरा की कसौटी में परख कर अपनाते हैं, हरीश रावत को लेकर यही धारणा निर्मित हुई थी.
    अचानक संजीवनी बूटी को लेकर उनकी घोषणा एक साथ अनेक सवाल खड़े करती है. यह मुद्दा उत्तराखंड भाजपा के सबसे अवसरपरस्त नेता निशंक का उठाया हुआ हास्यास्पद मुद्दा है जिसकी आरम्भ से ही आलोचना हुई थी. हरीश रावत का उसे हथिया कर अपने लिए इस्तेमाल करना अजीब हैरत में डालता है. यह बात तो कांग्रेस के अपने एजेंडा में भी कहीं फिट नहीं बैठती है.
    हाल में लोक देवताओं को लेकर भी उनकी पक्षधरता सामने आई थी. मुझ जैसे पूजा और कर्मकांड के विरोधी के लिए यह बात भी अजूबा थी, मगर उसमें मुझे यह बात पसंद आई थी कि पहाड़ के लोक-देवताओं की पहचान और उनके स्वरूप को लेकर पहली बार किसी राजनेता ने बात की थी. पहाड़ के देवता मुख्यधारा के मैदानी देवताओं से एकदम भिन्न हैं. पहाड़ के देवता उस रूप में अतिमानवीय शक्तियों के प्रतीक नहीं हैं, जैसे कि मुख्यधारा के देवता. पहाड़ों के सभी देवता सामान्य लोगों के बीच से उभरे हुए, स्थानीय अंतर्विरोधों का अपने सीमित साधनों से मुकाबला करने वाले मामूली लोग हैं. प्रकृति की नियामतों से भरे-पूरे ये लोग शारीरिक और भावनात्मक शक्ति के एक तरह से मानवीय रूपक हैं. इसीलिए ये मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतु और घास-फूस, लकड़ी-पत्थर भी हैं. चूंकि ये प्रकृति की सीधी निर्मिति हैं, इसलिए इनमे अतिमानवीय शक्तियां अपने सहज रूप में हैं.

    मेरा शुरू से मानना रहा है कि ग्वल्ल-हरू-सैम-गंगनाथ-महासू और राम-कृष्ण-शिव-हनुमान के मंदिरों को एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. मुझे लगता है पृथक् पहाड़ी राज्य का एक काम यह भी होना चाहिए कि वह उन सांस्कृतिक भिन्नताओं की भी बात करे जिसकी ओर मुख्यधारा की संस्कृति के आतंक की वजह से कभी ध्यान नहीं जा पाया. मगर हो एकदम उल्टा रहा है. उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़ दें, पहाड़ी राज्य के रूप में निर्मित दोनों प्रान्त - हिमांचल और उत्तराखंड - दोनों ही जगह स्थानीयता पर मुख्यधारा की संस्कृति का आतंक बढ़ता चला गया है. सारी पूजा-पद्धतियों और विश्वासों में स्थानीयता हीनता की प्रतीक बन गयी हैं और मुख्यधारा की बाहरी पद्धतियों ने उनमें कब्ज़ा करके उन्हें अनावश्यक करार दिया है, पहाड़ों का अपना स्थापत्य और पूजा-पद्धतियां अतीत की चीजें बनती चली जा रही हैं. और तो और, जो देह और शरीर से परे प्राकृतिक बिम्बों के प्रतीक देवता थे, उन्हें भी धोती, कुरता, तिलक और खड़ाऊं जैसे ब्राह्मणवादी प्रतीक पहना दिए गए हैं. यह बात समझ से परे है कि पहाड़ की ऊंची-नीची पथरीली पगडंडियों पर ये वीर नायक ऐसी पोशाकों से युद्ध करते होंगे.
    हरीश रावत जी का उत्तराखंडी राजनीति में प्रवेश मुझे इसीलिए ऐतिहासिक लगा था. मुझे लगा था कि हमारा वास्तविक नायक उभर आया है... हमारे राजनीतिक जीवन का प्रथम नायक... मेरा मजाक उड़ाया गया, मुझे संकीर्णतावादी, जातिवादी भी समझा गया, मगर मेरे विश्वासों में इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा.
    और अब निशंक की संजीवनी बूटी के एजेंट के रूप में उनका नया अवतार!... भाजपा के लिए उन्होंने उनका रास्ता कितना आसान बना दिया है... हालाँकि इससे नुकसान अंततः उत्तराखंड की जनता का ही होगा, क्योंकि हमारे नायक का एकमात्र विकल्प भी खो गया लगता है.
    फिलहाल दूसरा कोई विकल्प है नहीं. 
    अब किसके सहारे खड़ा होगा नया उत्तराखंड ?


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    Latest status of Taslima Nasrin.Taslima supports ZERO TOLERANCE agains religious Terrorists in Bangladesh!It is very important in referance to the incidents of minority persecution in Bangladesh!
    Taslima Nasreen

    ক্রসফায়ারে জঙ্গি মরলে বাংলাদেশের মানুষ কান্দে ক্যানো? জঙ্গি মরসে মরুক। ক্রসফায়ারে ওমর মতিন মরসে, তার জন্য কেউ ত কান্তাসি না। প্যারিসের জঙ্গিগুলাও ক্রসফায়ারে মরসে , কেউ কান্দে নাই। বাংলাদেশের সুশীলদের দেখি জঙ্গি অনুভূতি প্রবল।

    Taslima also blasts patriarchal hegemony in creativity where women have to starve for recognition!She wrote:

    আমি পুরুষ হলে বেশ হতো। মরে গেলে বছর বছর আমার প্রয়াণ দিবস পালন হতো । এতকাল খেটেখুটে যে ৪৩টা বই লিখেছি তা না লিখলেও চলত। কিছু কবিতা লিখতাম রাজনীতি নিয়ে, কিছু দেশ নিয়ে, কিছু কবিতা ধনী আর পুঁজিবাদীদের গালাগালি করে, কিছু কবিতা প্রেম প্রীতি নিয়ে। একখানা গান লিখতাম। ব্যস। ব্যক্তি হিসেবে যেমনই হই না কেন, যত মিথ্যুকই হই না কেন,যত চরিত্রহীনই হই না কেন , স্ত্রীকে যত এক্সপ্লয়েটই করি না কেন,যত অত্যাচারই করি না কেন, কেউ এসব নিয়ে কথা বলত না, লোকে বরং ভালবাসত আমাকে, মাথায় তুলে রাখত। আমার নামে মেলা করত বছর বছর। স্রেফ আমি পুরুষ বলে। পুরুষ হলে যৎসামান্য ট্যালেন্ট থাকলেই সেলেব্রিটি হওয়া যায়। মেয়ে হলে পাহাড় সমান ট্যালেন্ট দেখাতে হয় জাস্ট একটু রিকগনিশন পাওয়ার জন্য।

    Reading Taslima once again!


    Palash Biswas


    মেয়ে বলে, শুধু মেয়ে বলেই তুমি যখন গুরুত্বপূর্ণ কোনও কথা বলবে, কেউ তোমার চোখের দিকে বা মুখের দিকে তাকিয়ে মন দিয়ে শুনবে না তোমার কথা। বিশেষ করে পুরুষেরা। আমি আজ

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    जगत मिथ्या,अहम् ब्रह्मास्मि!

    मिथ्या हिंदुत्व के फर्जी एजंडे से राजा दुर्योधन की तरह विश्वविजेता बनने के फिराक में कल्कि महाराज ने भारत को फिर यूनान बनाने की ठान ली है।ब्रेक्सिट संकट निमित्तमात्र है।

    आत्मध्वंस से पहले,इतिहास बदलनेसे पहले इतिहास के सबक दोबारा देख लें

    अब ब्रिटिश नागरिकों को अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता बनाये रखने और यूरोप व अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं से नाभि नाल संबंध तोड़ने का फैसला करना है तो नई दिल्ली में पसीने छूट रहे हैं और भारत के तमाम अर्थशास्त्री और मीडिया दिग्गज सर खपा रहे हैं कि पौंड का अवमूल्यन हुआ तो भारत को पूंजी घरानों का होना है,शेयर बाजार का क्या बनना है और आयात निर्यात के खेल फर्रूखाबादी क्या रंग बदलता है।यह है भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती।


    इस जनमत संग्रह का मुद्रा एवं शेयर बाजार पर तो असर होगा ही, उन देसी कंपनियों पर भी फर्क पड़ सकता है, जिनका यूरोप में भारी निवेश है। इनमें टाटा स्टील और टाटा मोटर्स और सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। ये कंपनियां अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा यूरोप से हासिल करती हैं।


    भारतीय सत्ता वर्ग की नींद हराम हो गयी है।आम जनता के रोजमर्रे की जिंदगी की तकलीफों,समस्याओं की वजह से नहीं,बल्कि भारतीय पूंजी के विश्वबाजार में मुनाफावसूली पर अंकुश लगने के खौफ की वजह से क्योंकि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में  बने रहने पर जनमत संग्रह शुरु हो चुका है।

    यह सीधे तौर पर अमेरिकी हितों की चिंता है क्योंकि ब्रिटेन के यूरोपीय संग से अलग होने पर सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को है और भारतीय सत्ता वर्ग हाय तौबा इसलिए मचाये हुए हैं कि अमेरिकी और इजरायली हितों से उनके नाभि नाल  के संबंध बन गये हैं और भारत माता की जय जयकार करते हुए हिंदुत्व की दुहाई देकर यह राष्ट्रद्रोही सत्तावर्ग भारत,भारत के प्राकृतिक संसाधन,भारतीय  उत्पादन प्रणाली,भारतीय श्रम,भारतीय बाजार,तमाम सेवाएं और बुनियादी जरुरतें,शिक्षा,चकित्सा.ऊर्जा परमाणु ऊर्जा,बैंकिंग से लेकर रेलवे और उड़ान,बीमा से लेकर हवा पानी,नागरिकता,नागरिक अधिकार,मानव अधिकार सबकुछ अबाध विदेशी पूंजी के हवाले करता जा रहा है और उसी अबाध पूंजी पर मंडराते संकट के गहराते बादल से इन सबकी नींद हराम है।

    चूंकि संसाधनों और सेवाओं की नालामी है राजकाज है,वही राजधर्म है तो मुनाफावसूली के भविष्य को लेकर सत्तावर्ग की नींद हराम है।   

    पलाश विश्वास



    ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन का हिस्सा बना रहेगा या नहीं, इस सवाल पर आज ब्रिटेन में जनमत संग्रह होने जा रहा है। चूंकि

    संसाधनों और सेवाओं की नालामी है राजकाज है,वही राजधर्म है तो मुनाफावसूली के भविष्य को लेकर सत्तावर्ग की नींद हराम है।


    दरअसल इस जनमत संग्रह का मुद्रा एवं शेयर बाजार पर तो असर होगा ही, उन देसी कंपनियों पर भी फर्क पड़ सकता है, जिनका यूरोप में भारी निवेश है। इनमें टाटा स्टील और टाटा मोटर्स और सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। ये कंपनियां अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा यूरोप से हासिल करती हैं।



    कहा जा रहा है कि आज का दिन पूरी दुनिया के लिए एतिहासिक है क्योंकि आज होने वाली वोटिंग से ये फैसला हो जाएगा कि क्या यूरोपीयन यूनियन में ब्रिटेन बना रहेगा या फिर अलविदा कह देगा। ब्रेक्सिट पर घमासान मचा हुआ है। जो लोग यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के निकलने यानी ब्रेक्सिट की वकालत कर रहे हैं वो इसे अपने ही देश पर फिर से हक जमाने की लड़ाई मान रहे हैं।


    खबरों के मुताबिक बिग बुलके नाम से मशहूर रेयर एंटरप्राइजेज के राकेश झुनझुनवालाका मानना है कि अगर ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन से बाहर जाता है तो यूरोपियन यूनियन बिखर जाएगा। वहीं डब्ल्यू एल रॉस एंड कंपनी के विल्बर रॉस का कहनाहै कि यूरोपियन यूनियन से अगर ब्रिटेन बाहर होगा तो ये यूके और यूरोपियन इकोनॉमी के लिए बेहद खराब होगा।


    ब्रेक्सिट पर रिजर्व बैंक की भी नजर बनी हुई है। आरबीई गवर्नर रघुराम राजनके मुताबिक अगर ब्रेक्सिट  के चलते बाजार में लिक्विडिटी की दिक्कत आती है तो उसे दूर किया जाएगा।


    वर्जिन ग्रुपके फाउंडर रिचर्ड ब्रैनसनके मुताबिक ब्रेक्सिट के चलते ग्लोबल इकोनॉमी की ग्रोथ पर असर पड़ेगा। ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने का साइड इफेक्ट दिखेगा।



    इतिहास में कोई ऐसा शासक हुआ नहीं है जिसने इतिहास से सबक सीखा है।सारे के सारे शासकों ने हमेशा अपना इतिहास बनाने के लिए सारी ताकत झोंक दी।इसी में उनका उत्थान और इसीमें फिर उनका अनिवार्य पतन।आखिर इतिहास उन्हींका होता है।रोजमर्रे की जिंदगी में मरती खपती जनता को कोई इतिहास कहीं दर्ज नहीं होता जैसे आम जनता के रोजनामचे का कोई अखबार नहीं होता।यह काम साहित्य और संस्कृति का कार्यभार है और आज तमाम माध्यम और विधायें कारपोरेट महोत्सव है औरबाजार भी कारपोरेट शिकंजे में हैं।इस महातिलिस्म में इकलौता विक्लप आत्म ध्वंस का है जिसे हम तेजी से अपनाते जा रहे हैं।


    हमारे लिए रामायण और महाभारत कोई पवित्र धर्म ग्रंथ नहीं हैं बल्कि कालजयी महाकाव्य हैं जैसे यूनान के इलियड और ओडेशी।


    इन चारों विश्वप्रसिद्ध महाकाव्यों में मिथकों की घनघटा है तो ल पल दैवी चमत्कार और अलंघ्य नियति के चमत्कार हैं।चारों महाकाव्यों में दैवी शक्तियों के मुकाबले मनुष्यता की अतुलनीय जीजिविषा है जहां ट्राय,सोने की लंका और कुरुक्षेत्र के दृश्य एकाकार हैं।सत्ता संघर्ष की अंतिम परिणति इन चारों महाकाव्यों में आत्मध्वंस की चकाचौंध है,जो आज मुकम्मल मुक्ता बाजार है।


    भारतीय सत्ता वर्ग की नींद हराम हो गयी है।आम जनता के रोजमर्रे की जिंदगी की तकलीफों,समस्याओं की वजह से नहीं,बल्कि भारतीय पूंजी के विश्वबाजार में मुनाफावसूली पर अंकुश लगने के खौफ की वजह से क्योंकि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में  बने रहने पर जनमत संग्रह शुरु हो चुका है।


    इस जनमत संग्रह के नतीजे शुक्रवार तक आ जायेंगे।उसे हम किसी भी स्तर पर प्रभावित नहीं कर सकते लेकिन अब तय है कि इससे हम प्रभावित जरुर होगें क्योंकि इसके नतीजे के मुताबिक मुनाफावसूली का सिलसिला बनाये रखने के लिए नरसंहारी अश्वमेध अभियान और भयानक ,और निर्मम होना तय है और हम गुलाम प्रजाजन अपनी नियति से लड़ने का दुस्साहस नहीं कर सकते।


    जिन्होंने यूरोपीय यूनियन में ब्रिटेन के बने रहने का परचम थाम रखा है वो मानते हैं कि ये ब्रिटेन को बचाने का सबसे बड़ा मौका है। ब्रेक्सिट पर आज यानी 23 जून को भारतीय समय के अनुसार 11:30 बजे सुबह से रात 2:30 बजे के बीच वोटिंग होगी। जिसके नतीजे शुक्रवार (24 जून) को भारतीय समयानुसार 11:30 बजे सुबह आएंगे।


    लंदन से लेकर दिल्ली तक की नजर इस अहम दिन पर बनी हुई है। फैसला चाहे जो भी हो इससे निपटने के लिए मोदी सरकार ने पहले से ही कमर कस ली है। ब्रेक्सिट पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कल अहम बैठक ली है। इस बैठक में ब्रेक्सिट से होने वाले असर पर चर्चा की गई। इस बैठक में वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा, पीएम के मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्रा, अरविंद सुब्रमणियन, शक्तिकांता दास भी शामिल थे।



    ज्यादा दिन नहीं हुए महान यूनानी सभ्यता के उत्तराधिकारियों ने यूनान के इतिहास को जमींदोज करते हुए आत्मध्वंस की परिक्रमा अबाध पूंजी और मुक्तबाजार के तिलिस्म में संपूर्ण निजीकरण और संपूर्ण विनिवेश के रास्ते पूरी कर ली.फिर उनने अपने महाकाव्यों के किस देवता या किस देवी के नाम भव्यमंदिर कहां बनाया,एथेंसे से ऐसी कोई खबर नहीं है लेकिन महान यूनानियों की फटेहाल जिंदगी और उनकी दिलवालिया अर्थव्यवस्था जगजाहिर है।


    मिथ्या हिंदुत्व के फर्जी एजंडे से राजा दुर्योधन की तरह विश्वविजेता बनने के फिराक में कल्कि महाराज ने भारत को फिर यूनान बनाने की ठान ली है।ब्रेक्सिट संकट निमित्तमात्र है।


    बेहतर होता कि वे और भव्य राम मंदिर के उनके तमाम पुरोहित मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पुष्पक विमान से रेशम पत खी भी परिक्रमा करे लेते तो उन्हें शायद उस इतिहास के सबक से परहेज नहीं होता कि जिस सनातन भारतीय सभ्यता की बात वे करते अघाते नहीं हैं,वहां को कोई सिंधु घाटी की विश्वविजेता वाणिज्यिक नगर सभ्यता भी थी और यूरोप में सभ्यता की रोशनी पहुंचने से पहले, अमेरिका का आविस्कार होने से पहले माया और इंंका सभ्यताओं के जमाने में जब मिस्र,मेसोपोटामिया,यूनान,रोम और चीन की सभ्यताओं के मुकाबले हमारे पूर्वजों ने विश्व बंधुत्व के विविध बहुल तौर तरीके अपनाते हुए व्यापार और कारोबार, उद्यम में अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता,अपनी सभ्यता और संस्कृति के मूल्य पर कोई समझौता किये बिना रेशम पथ के जरिये पूरी दुनिया जीत ली थी और किसी पर हमला भी नही किया था यूरोप और अमेरिका की तरह।न प्रकृति से कोई छेड़छा़ड़ की थी उनने।

    गौरतलब है कि इस ब्रिटेन ने बायोमैट्रिक पहचान पत्र के सवाल पर सरकार गिरा दी थी और भारतीय आधार कार्ड परियोजना लागू होने से पहले नाटो की नागरिकों की निगरानी की इस आत्मध्वंसी प्रणाली को खारिज कर दी थी।


    अब ब्रिटिश नागरिकों को अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता बनाये रखने और यूरोप व अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं से नाभि नाल संबंध तोड़ने का फैसला करना है तो नई दिल्ली में पसीने छूट रहे हैं और भारत के तमाम अर्थशास्त्री और मीडिया दिग्गज सर खपा रहे हैं कि पौंड का अवमूल्यन हुआ तो भारत को पूंजी घरानों का होना है,शेयर बाजार का क्या बनना है और आयात निर्यात के खेल फर्रूखाबादी क्या रंग बदलता है।यह है भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती।



    बहरहाल यूरोपीय संघ में बने रहने या निकलने के मसले पर ब्रिटेन में मतदान तो गुरुवार को होगा, लेकिन भारत में मुद्रा और शेयर बाजार के साथ-साथ कंपनियों की सांसें अभी से अटकी हैं।


    हालांकि  मतदान पूर्व अनुमानों में यही बताया जा रहा है कि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में बने रहने के समर्थकों तथा उसके विरोधियों के बीच टक्कर कांटे की है। मतदान इसलिए हो रहा है क्योंकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पिछले साल अपने चुनावी घोषणापत्र में जनमत संग्रह का वायदा किया था। डीबीएस बैंंक, इंडिया में कार्यकारी निदेशक और ट्रेजरी प्रमुख अरविंद नारायण कहते हैं, 'यह अभूतपूर्व घटना होगी, जिसका असर लागत, श्रम और पूंजी पर होगा। अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर जाने का फैसला करता है तो निवेशक भारत जैसे तेजी से उभर रहे बाजारों से अपनी रकम निकालकर अमेरिका और जापान जैसे सुरक्षित बाजारों में लगाएंगे। इससे भारत को भी कुछ समय के लिए झटका लग सकता है।' वैसे असर अभी से दिख रहा है क्योंकि रुपया आज डॉलर के मुकाबले 17 पैसे गिरकर 67.49 पर बंद हुआ। बॉन्ड पर प्राप्ति कल जितनी ही बनी रही।



    इन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था,उत्पादन प्रणाली ,भारत लोक गणराज्य या भारतीय जन गण की कोई चिंता नहीं है और तमाम बुद्धि भ्रष्ट रघुपति राजन की विदाई से घड़ा घड़ा आंसू बहा रहे हैं।


    यह वैसा ही है कि कल्कि महाराज की नरसंहार संस्कृति से अघाकर हम मनमोहनी स्वर्गवास के लिए इतरा जाये।

    जहर पीने के बजाये फांसी लगा लें।

    नतीजा वही अमोघ मृत्यु है।


    राजन ने पूंजी के हितों के मुताबिक ब्याज दरों में फेर बदल के अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था को मुक्तबाजार के हिसाब से आटोमेशन में डालने के अलावा कृषि संकट,मुद्रास्फीति या उत्पादन की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने के लिए कुछ किया हो तो समझा दें।राजन भी मनमोहन के तरण चिन्ह पर चल रहे थे।


    इसी बीच संघ परिवार के बाहुबलि राजन के महिमामंडन का कैरम खेल जारी रखे हुए हैं जो बहुत बड़ाफर्जीवाड़ा है।मसलनरघुराम राजन के रेक्सिट के बाद सुब्रमणियन स्वामी के निशाने पर एक और वरिष्ठ सरकारी अफसर और प्रसिद्ध इकॉनोमिक एक्सपर्ट हैं।


    डॉ स्वामी की नाराजगी अब मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम से है और स्वामी ने इनके इस्तीफे की भी मांग कर डाली है। रघुराम राजन की ही तरह अरविंद सुब्रमणियम का सबसे बड़ा गुनाह, स्वामी के मुताबिक यही है कि वो अमेरिका के फायनेंशियल सिस्टम में काम कर चुके हैं। लेकिन इस अटैक के बाद अब सवाल पूछा जा रहा है कि स्वामी का असली निशाना कौन है।जाहिर है कि संघ परिवार जाहिर है कि वित्तीय प्रबंधन भी मुंबई और नई दिल्ल से सीधे नागपुर स्थानांतरित करना चाहता है जहां से राजकाज रिमोट कंट्रोल से चलता है।


    रघुराम राजन के बाद सुब्रमणियन स्वामी के एके-27 के पहले शिकार बने हैं मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन। ठीक राजन की तरह स्वामी ने अरविंद सुब्रमणियन की निष्ठा पर सवाल उठाए हैं। अरविंद सुब्रमणियन पर बयानबाजी के बाद विपक्षी दलों और जानकारों ने स्वामी पर सवाल उठाए हैं। उधर सरकार ने इस बार स्वामी के बयान से किनारा करने में थोड़ी भी देर नहीं की। लगे हाथ वित्त मंत्री ने ये सफाई भी दे दी कि वो राजन पर स्वामी की बयानबाजी से इत्तेफाक नहीं रखते थे। सवाल उठ रहा है कि क्या स्वामी के निशाने पर खुद वित्त मंत्री अरुण जेटली हैं।



    बहरहाल इस स्वदेशी  नौटंकी की देशभक्ति की भावभूमि में सट यह है कि भारत में वित्तीय प्रबंधन का मतलब है येन तेन प्रकारेण कालेधन को सफेद बनाकर बेलगाम मुनाफावसूली,आम जनता पर कर्ज और करों का सारा बोझ,रियायतें और योजनाएं,सुविधाएं और प्रोत्साहन सबकुछ अबाध पूंजी के वास्ते और सारा घाटा आम जनता के मत्थे।मुक्तबाजार में नकदी का प्रवाह बनाये रखना ही सर्वोच्च प्राथमिकता है तो इसका एकमात्र तरीका जल जंगल जमीन से भारतीय नागरिकों की अनंत बेदखली है।जो सलवा जुड़ुम है


    आज ब्रिटेन के 4.65 करोड़ लोग वोटिंग के जरिए अपनी राय रखेंगे। यूरोपीय संघ के पक्ष और विपक्ष में वोटिंग हो रही है।


    जाहिर है कि भारत समेत दुनियाभर के देशों की निगाहें इस जनमत संग्रह के फैसले पर टिकी हैं, जिसके नतीजे शुक्रवार को घोषित किए जाएंगे। यूरोपियन यूनियन को लेकर पूरा ब्रिटेन दो पक्षों में बंटा हुआ है। इस मुद्दे को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा जारी है क्योंकि इसका अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों और विनिमय दरों पर गहरा और दूरगामी असर होना है।


    गौरतलब है कि करीब दो सौ साल तक हम इसी महान बरतानिया के खिलाफ आजादी का जंग लड़ते रहे हैं और हमारे पुरखों ने वह जंग जीत ली तो हमने बरतानिया का दामन छोड़कर फटाक से रूस,अमेरिका और इजराइल के गुलाम बनते चले गये तो अब मुक्तबाजार का विकल्प चुनकर हम मुकम्मल अमेरिकी उपनिवेश हैं।


    अब भी भारतीय संसदीय प्रणाली,जनप्रतिनिधित्व,कानून का राज,न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक ब्रिटिस हुकूमत की विरासत के अलावा कुछ नहीं है और हमने अपनी आजादी सिर्फ नरमेधी राजसूय की रस्म अदायगी तक सीमाबद्ध रखी है और आजाद जमींदारों,राजा रजवाड़ों के मातहत हम अब भी वही गुलाम प्रजाजन हैं।


    दरअसल जो फिक्र है,वह भारत के हित के बारे में नहीं और न ही भारताय उद्योग और कारोबार के हित हैं ये।


    यह सीधे तौर पर अमेरिकी हितों की चिंता है क्योंकि ब्रिटेन के यूरोपीय संग से अलग होने पर सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को है और भारतीय सत्ता वर्ग हाय तौबा इसलिए मचाये हुए हैं कि अमेरिकी और इजरायली हितों से उनके नाभि नाल  के संबंध बन गये हैं और भारत माता की जय जयकार करते हुए हिंदुत्व की दुहाई देकर यह राष्ट्रद्रोही सत्तावर्ग भारत,भारत के प्राकृतिक संसाधन,भारतीय  उत्पादन प्रणाली,भारतीय श्रम,भारतीय बाजार,तमाम सेवाएं और बुनियादी जरुरतें,शिक्षा,चकित्सा.ऊर्जा परमाणु ऊर्जा,बैंकिंग से लेकर रेलवे और उड़ान,बीमा से लेकर हवा पानी,नागरिकता,नागरिक अधिकार,मानव अधिकार सबकुछ अबाध विदेशी पूंजी के हवाले करता जा रहा है और उसी अबाध पूंजी पर मंडराते संकट के गहराते बादल से इन सबकी नींद हराम है।   


    संसाधनों और सेवाओं की नालामी है राजकाज है ।मसलन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज बड़े पैमाने पर स्पेक्ट्रम नीलामी योजना को मंजूरी दे दी है।टेलिकॉम सेक्रेटरी जे एस दीपक की अध्यक्षता वाले इंटर-मिनिस्टीरियल पैनल द्वारा मंजूर नियम के मुताबिक 700 मेगाहट्र्ज बैंड में स्पेक्ट्रम खरीदने की इच्छुक कंपनी को मिनिमम 57,425 करोड़ रुपए कीमत पर पैन इंडिया बेसिस पर 5 मेगाहट्र्ज का एक ब्लॉक लेने की जरूरत होगी। इस बैंड में ही अकेले 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की बिड मिलने के आसार हैं।माना जा रहा है कि स्पेक्ट्रम नीलामी प्लान को मंजूरी मिलने से मोबाइल कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम की कमी नहीं रहेग। इससे वे मोबाइल पर बिना किसी रुकावट के अच्छी स्पीड के साथ इंटरनेट सर्विस दे सकेंगी। ऐसे में मोदी सरकार के डिजिटल इंडिया प्रोग्राम को भी बढ़ावा मिलेगा।

    एकीकरण के जरिये 4-5 बड़े सरकारी बैंक बनाने का इरादा

    इसी बीचखबर है कि सरकार का इरादा सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंकों के बीच एकीकरण के जरिये 4-5 बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बनाने का है। इस प्रक्रिया की शुरुआत चालू वित्त वर्ष में एसबीआई में उसके सहयोगी बैंकों के विलय से होगी।


    वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि सरकार आईडीबीआई बैंक में भी अपनी हिस्सेदारी 80 से घटाकर 60 प्रतिशत पर लाना चाहती है। यदि हिस्सेदारी बिक्री क्यूआईपी के जरिये होती है, तो सरकार की हिस्सेदारी कम होगी। अधिकारी ने कहा, 'वित्त मंत्रालय का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण के बाद कुल 4-5 बड़े बैंक होंगे। शुरुआत में एसबीआई और उसके सहयोगी बैंकों का विलय होगा। अन्य बैंकों पर फैसला समय के साथ किया जाएगा।' अधिकारी ने कहा कि एसबीआई का उसके सहयोगी बैंकों के साथ विलय इस वित्त वर्ष के अंत तक होगा। पिछले सप्ताह केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एसबीआई और सहयोगी बैंकों के विलय को मंजूरी दी है।


    अधिकारी ने कहा कि एकीकरण की प्रक्रिया से पहले ट्रेड यूनियनों के साथ सहमति बनाई जाएगी। देश के बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक और बैंक आफ इंडिया शामिल हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में कहा था कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण की रूपरेखा जारी करेगी। इन बैंकों को चालू वित्त वर्ष में 25,000 करोड़ रुपये का निवेश मिलने की उम्मीद है।


    सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्गठन के लिए 'इंद्रधनुष' योजना की घोषणा की है जिसके तहत चार साल में इन बैंकों में 70,000 करोड़ रुपये की पूंजी डाली जाएगी। वहीं इन बैंकों को वैश्विक जोखिम नियम बासेल तीन के लिए पूंजी की जरूरत को पूरा करने को बाजारों से 1.1 लाख करोड़ रुपये जुटाने पड़ेंगे। रूपरेखा के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पिछले वित्त वर्ष में 25,000 करोड़ रुपये की पूंजी मिली है। इस वित्त वर्ष में भी इतनी की राशि डाली जाएगी। योजना के तहत 2017-18 और 2018-19 में इन बैंकों को 10,000-10,000 करोड़ रुपये का निवेश मिलेगा। सरकार ने यह भी कहा है कि जरूरत होने पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को और पूंजी दी जा सकती है।




    माना जा रहा है कि यह स्पेक्ट्रम नीलामी सितंबर में होगी। मेगा स्पेक्ट्रम ऑक्शन प्लान को मंजूरी मिलने से सरकारी खजाने को 5.66 लाख करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है, जो टेलीकॉम इंडस्ट्री को होने वाले राजस्व की तुलना में दोगुना है।


    गौरतलब है कि इसमें 11,485 करोड़ रुपये के प्राइस पर सबसे ज्यादा महंगे 700 मेगाहर्ट्ज बैंड को बेचा जाएगा। इस बैंड में मोबाइल सर्विसेज डिलिवरी की लागत 2100 मेगाहर्ट्ज बैंड की तुलना में 70 फीसदी कम है, जिसे 3जी सर्विसेज देने में इस्तेमाल किया जाता है।

    बहरहाल सरकार को इस नीलामी से 5.66 लाख करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है। यह टेलिकॉम इंडस्ट्री के 2014-15 के कुल रेवेन्यु 2.54 लाख करोड़ के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है।


    कैबिनेट मीटिंग के बाद अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रैंस में इस मामले की जानकारी दी।

    एक आधिकारिक सूत्र ने बताया कि स्पेक्ट्रम नीलामी प्रस्ताव को मंजूर कर लिया गया है. सरकार को 2300 मेगाहर्टज स्पेक्ट्रम नीलामी से कम से कम 64,000 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है।

    इसके अलावा दूरसंचार क्षेत्र में विभिन्न शुल्कों तथा सेवाओं से 98,995 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे।

    नीलामी के लिए मुख्य दस्तावेज, आवेदन आमंत्रित करने का नोटिस संभवत: एक जुलाई को जारी किया जाएगा।इसके बाद 6 जुलाई को बोली पूर्व सम्मेलन होगा। बोलियां एक सितंबर से लगनी शुरू होने की उम्मीद है। हालांकि, योजना की आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई है।


    टेलीकॉम सेक्रेटरी जे एस दीपक की अध्यक्षता वाली इंटर मिनिस्ट्रियल कमेटी द्वारा मंजूर नियमों के तहत नीलामी में 700 मेगाहर्टज का प्रीमियम बैंड भी शामिल रहेगा। इस बैंड के लिए आरक्षित मूल्य 11,485 करोड़ रुपये प्रति मेगाहर्टज रखा गया है। इस बैंड में सेवा प्रदान करने की लागत अनुमानत: 2100 मेगाहर्टज बैंड की तुलना में 70 प्रतिशत कम है, जिसका इस्तेमाल 3जी सेवाएं प्रदान करने के लिए किया जाता है। यदि कोई कंपनी 700 मेगाहर्टज बैंड में स्पेक्ट्रम खरीदने की इच्छुक है, तो उसे अखिल भारतीय स्तर पर पांच मेगाहर्टज के ब्‍लॉक के लिए कम से कम 57,425 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। इस बैंड में अकेले 4 लाख करोड़ रुपये की बोलियां आकर्षित करने की क्षमता है।

    पैनल द्वारा मंजूर रूल्स के मुताबिक 700 मेगाहर्ट्ज बैंड में स्पेक्ट्रम खरीदने की इच्छुक कंपनी को मिनिमम 57,425 करोड़ रुपये कीमत पर पूरे देश के लिए 5 मेगाहर्ट्ज का एक ब्लॉक लेने की जरूरत होगी। इस बैंड में ही अकेले 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बिड मिलने के आसार हैं।


    दावा  है कि स्पेक्ट्रम ऑक्शन प्लान को मंजूरी मिलने से मोबाइल कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम की कमी नहीं रहेगी और वो मोबाइल पर बिना किसी रुकावट के अच्छी स्पीड वाली इंटरनेट सर्विस दे पाएंगी।

    अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव: विश्व बैंक

    खबरों के मुताबिक ब्रिटेन यूरोपीय संघ में रहेगा या नहीं रहेगा, इस मुद्दे पर होने वाले जनमत संग्रह से दो दिन पूर्व ब्रिटेन में अनिश्चितता, मतभेद और तनाव का माहौल है। यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर होने से संबंधित अटकलबाजी के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है और इससे संबंधित घटनाक्रमों पर लोगों की नजर टिकी हुई है। यह बात विश्व बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कही।


    विश्व बैंक के डेवलपमेंट प्रोस्पेक्ट्स ग्रुप के निदेशक ऐहान कोस ने कहा, "यह स्पष्ट है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता पैदा करने वाले कई कारकों में ब्रेक्सिट की चर्चा भी एक है।"


    भारत के बारे में नहीं कहा

    कोस ने हालांकि ब्रेक्सिट के भारत पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में कुछ नहीं कहा। उन्होंने कहा कि इस घटना पर विश्व बैंक नजर बनाए हुए है, लेकिन इसके परिणाम के बारे में कुछ भी नहीं कहना चाहता है। ब्रेक्सिट जनमत संग्रह 23 जून को है।


    विश्व बैंक ने इस महीने के शुरू में अर्धवार्षिक वैश्विक आर्थिक संभावना (जीईपी) की रिपोर्ट में जनमत संग्रह को वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के लिए प्रमुख जोखिमों में से एक बताया गया है।


    ब्रिटेन का यूरोपीय संघ के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 15 फीसदी से अधिक योगदान है, वित्तीय सेवा गतिविधियों में 25 फीसदी और शेयर बाजार पूंजीकरण में 30 फीसदी योगदान है।



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    ब्रिटेन आउट, कैमरुन आउट!

    संप्रभू ब्रिटिश नागरिकों ने यूरोपीय समुदाय के धुर्रे बिखेर दिये और कबंध अंध  देश के हमारे हुक्मरान नरमेधी सुधार तेज कर रहे हैं।

    सत्ता निरंकुश नहीं होती अगर देश के नागरिक मुर्दा न हो और लोकतंत्र जिंदा हो।

    सत्ता के झंडे लहराते हुए भारत माता की जय बोल देने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता बल्कि राष्ट्रहित में सत्ता से टकराकर सरफरोशी की तमन्ना ही असल देशभक्ति है और इसके लिए निरंकुश सत्ता से टकराने का जिगर चाहिए जो हमारे पास फिलहाल हैं ही नहीं।पुरखों के जरुर रहे होगे वरना वे हजारों साल से गुलामी के बदले शहादतों का सिलसिला नहीं बनाते।

    ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने इस्तीफे का एलान किया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अक्टूबर में अपने पद से इस्तीफा देंगे। अक्टूबर में ब्रिटेन के नए पीएम का फैसला होगा।

    मुक्तबाजार को यूरोप में शरणार्थी सैलाब ने तहस नहस कर दिया है और हमारे हुक्मरान रोज रोज शरणार्थी सेैलाब पैदा कर रहे हैं।

    ब्रेक्सिट का सबसे बड़ा कारण यह शरणार्थी समस्या है जिससे भारत विभाजन के बाद हम लगातार जूझने के बादले भुनाते रहे हैं और विकास के नाम विस्थापन का जश्न मनाते हुए बाहर से आने वाले शरणार्थियों के मुकाबले देश के भीतर कहीं ज्यादा शरणार्थी बना चुके हैं।ब्रिटेन में अल्पसंख्यक होते जा रहे ब्रिटिश मूलनिवासियों की यह प्रतिक्रिया है तो समझ लीजिये,भारत के मूलनिवासी जागे तो भारत में क्याहोने वाला है।

    सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले अपने ही बच्चों को राष्ट्रविरोधी बताकर उनपर हमला करने वाले हम,जात पांत मजहब के बहाने असमता और अन्याय के झंडेवरदार और मनुस्मृति राज की पैदलसेनाएं हम क्या सपने में भी अपने इस कबंध अंध देश में ऐसा लोकतंत्र बहाल कर सकते हैं?


    क्या हम कभी अनंत बेदखली और अनंत विस्थापन के खिलाफ मोर्चाबंद हो सकते हैं?



    पलाश विश्वास

    ब्रेक्सिट हो गया आखिरकार।दुनियाभर में रंग बिरंगी अर्थव्यवस्थाओं में सुनामी है आज।ब्रिटेन आउट।कैमरुन आउट।ब्रिटिश जनता ने यूरोपीय समुदाय के धुरेरे बिखेरने के साथ सात कैमरुन का तख्ता पलट दिया।


    सेबों की गाड़ी उलट गयीं।सेबों की लूट मची है।किसके हिस्से कितने सेब आये,हिसाब होता रहेगा।


    बहरहाल शरणार्थी समस्या और विकास के नाम विस्थापन और आव्रजन का चक्र महामारी की तरह दुनिया के नक्शे में जहां तहां जैसे संक्रमित हो रही है,उसे समझे बिना ब्रेक्सिट को समझना असंभव है क्योंकि ब्रेक्सिट का सबसे बड़ा कारण यह शरणार्थी समस्या है जिससे भारत विभाजन के बाद हम लगातार जूझने के बादले भुनाते रहे हैं और विकास के नाम विस्थापन का जश्न मनाते हुए बाहर से आने वाले शरणार्थियों के मुकाबले देश के भीतर कहीं ज्यादा शरणार्थी बना चुके हैं।ब्रिटेन में अल्पसंख्यक होते जा रहे ब्रिटिश मूलनिवासियों की यह प्रतिक्रिया है तो समझ लीजिये,भारत के मूलनिवासी जागे तो भारत में क्या होने वाला है।


    जिन्हें दसों दिशाओं में समुदरों और पानियों में,फिजाओं में लाखोलाख आईलान की लाशें नजर नहीं आती,जिन्हें खून का रंग नजर नहीं आता,वे समझ नहीं आखिर क्यों यूरोप में मुक्तबाजार से इतना भयानक मोहभंग हो रहा है,क्यों फ्रांस में भयंकर जनविद्रोह है और क्यों ब्रिटेन यूरोपीयसमुदायसे अमेरिका का सबसे बड़ा पिछलग्गू होने के कारण अलग हो रहा है।


    हम फेंकू पुराण के श्रद्धालु  पाठक हैं और सारी दुनिया से अलगाव की तेजी से बन रही परिस्थितियों पर हमारी नजर नहीं है वरना एलएसजी के लिए हम पगलाये न रहते।


    आसमानी फरिशतों के दम पर राष्ट्र का भविष्य बनता नहीं है, बल्कि उसका भूत वर्तमान भी तहस नहस हो जाता है।ऐसा बहुत तेजी से घटित हो रहा है और हम देख नहीं पा  रहे हैं।


    मुक्तबाजार को यूरोप में शरणार्थी सैलाब ने तहस नहस कर दिया है और हमारे हुक्मरान रोज रोज शरणार्थी सेैलाब पैदा कर रहे हैं।


    लोकतंत्र का ढांचा वही है लेकिन संसद में अध्यक्ष की कुर्सी के नीचे वह ऊन नहीं है जो ब्रिटेन की विरासत के साथ संसद को जोड़ती है और हमारी संसदीय प्रणाली हवा हवाई है।जबकि यह संसदीय प्रणाली भी उन्हींकी है।जिसे हम अक्सर अपनी दुर्गति की खास वजह मानते हैं।हमारे ज्यादातर कानून उन्हींके बनाये हुए हैं।हमारे संविधान में उनके अलिखित संविधान की परंपराओं की विरासत है।फर्क सिर्फ इतना है कि वे स्वतंत्र संप्रभू नागरिक हैं और हम आज भी ब्रिटिश राज के जरखरीद गुलाम राजा रजवाड़ों जमींदारों के उत्तर आधुनिक वंशजों के कबंध अंध प्रजाजन हैं।


    ब्रिटिश नागरिकों ने आधार योजना लागू करने के खिलफ पहले ही सरकार गिरा दी और नाटो की यह योजना नाटो के किसी सदस्य देश में लागू नहीं हुई।एकमात्र मनुस्मृति राजकाज के फासीवाद तंत्र मंत्र तिलिस्म में नागरिकों की निगरानी और उनके अबाध नियंत्र के लिए नरसंहारी मुक्तबाजार का यह सबसे उपयोगी ऐप लगा ली है।


    अपनी आंखों की पुतलियां और उंगलियों की चाप कारपोरेट हवाले कर देने वालों को मुक्तबाजार के नरसंहारी सलाव जुड़ुम परिदृश्य में सब मजा सब मस्ती न घर न परिवार न समाज न देश मनोदशा के कार्निवाल बाजार में क्रयशक्ति की अंधि मारकाट और सत्तावर्ग की फेकी हड्डियां बटोरने से कभी फुरसत हो तो मनुष्यता,सभ्यता,प्रकृति और पर्यावरण के बारे में सीमेंट के इस घुप्प अंधियारा जंगल में सोचें और विवेक काम करें,अब यह निहायत असंभव है।इसीलिए कही जनता की कोई आवाज नहीं है।हम न सिर्फ अंध हैं,हम मूक वधिर मामूली कल पुर्जे हैं,जिनमें कोई संवेदना बची नही है तो चेतना बचेगी कैसे।


    हम सार्वजनिक सेवाओं और संस्थानों का जैसे निजीकरण के पक्ष में हो गये हैं तो हमें लोकतंत्र और राजकाजा,राजकरण के कारपोरेट बन जाने से कोई तकलीफ उसी तरह नहीं होगी जैसे हमें भाषाओं,माध्यमों,विधायों,सौंदर्यबोध,संस्कृति और लोकसंस्कृति, जाति और धर्म,मीडिया और मनोरंजन,शिक्षा दीक्षा चिकित्सा और परिवहन के कारपोरेट हो जाने से चारों तरफ हरियाली नजर आती है और खेतों,खलिहानों,समूचे देहात,कल कारखानों,लघु उद्योगों ,खुदरा बाजार के कब्रिस्थान में बदलने से हमारी शापिंग पर असर कोई होना नही है बशर्ते कि क्रयशक्ति सही सलामत रहे।यह इस देश के पढ़े लिखे तबकों का खुदगर्ज बनने की सबसे बड़ी वजह है।उनके हिसाब से पैसा ही सबकुछ है और बाकी कुछ भी नहीं है।अपढ़ लोगों में भी यह ब्याधि अब लाइलाज है।भाड़ में जाये देश।


    अब फिर संप्रभू स्वतंत्र ब्रिटिश नागरिकों ने सत्ता का तख्ता पलट दिया है क्योंकि उन्हें यूरोपीय समुदाय में बने रहना राष्ट्रहित के खिलाफ लगता है।


    ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरनने इस्तीफे का एलान किया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अक्टूबर में अपने पद से इस्तीफा देंगे। अक्टूबर में ब्रिटेन के नए पीएम का फैसला होगा।


    ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन का हिस्सा नहीं रहेगा, इस बात की पुष्टि हो गई है। ब्रिटेन की जनता ने ब्रेक्सिट के पक्ष में मतदान किया है। वहीं ब्रेक्सिट इफेक्ट से भारतीय शेयर बाजार डगमगा गया है। भारतीय सेंसेक्स सुबह 940 अंकों की गिरावट के साथ खुला। बाद में यह आंकड़ा 1000 तक पहुंच गया। ब्रिटेन की करंसी पाउंड 31 साल के अपने न्यूनमत स्तर पर है। यूरोप समेत पूरी दुनिया के बाजार में आपाधापी का माहौल है।


    ब्रेक्सिट की मार से करेंसी भी नहीं बची। पाउंड 31 साल के निचले स्तर पर जा गिरा और रुपया भी 1 फीसदी कमजोर हुआ। कच्चा तेल भी 6 फीसदी लुढ़क गया। लेकिन ब्रेक्सिट का फायदा उठाया सोने ने और ये 6 फीसदी से ज्यादा चढ़ा। इस भारी उथल पुथल के बीच सरकार का कहना है कि भारत पर ब्रेक्सिट का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।


    घरेलू वायदा बाजार में सोना करीब 5.5 फीसदी यानि 1600 रुपये की मजबूती के साथ 31500 रुपये के पार पहुंच गया है। चांदी में भी तेजी देखने को मिली है। एमसीएक्स पर चांदी करीब 4 फीसदी उछलकर 42800 रुपये के करीब पहुंच गई है। चांदी में भी 1600 रुपये की मजबूती देखने को मिली है।


    हालांकि क्रूड में भारी गिरावट देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड का भाव 5 फीसदी से ज्यादा फिसलकर 48.3 डॉलर पर आ गया है, जबकि नायमैक्स पर डब्ल्यूटीआई क्रूड 5 फीसदी गिरकर 47.6 डॉलर पर आ गया है। फिलहाल एमसीएक्स पर कच्चा तेल 3 फीसदी फिसलकर 3250 रुपये पर आ गया है। नैचुरल गैस 0.5 फीसदी की कमजोरी के साथ 181.2 रुपये पर नजर आ रहा है।



    दूसरी ओर,ब्रिटेन द्वारा ऐतिहासिक जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ (ईयू) से बाहर निकलने के पक्ष में मतदान करने के बाद भारत ने आज कहा कि उसके लिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ दोनों से संबंध महत्त्‍वपूर्ण हैं और वह आने वाले वर्षों में दोनों से रिश्तों को और मजबूत करने का प्रयास करेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा, 'ईयू सदस्यता पर हमने ब्रिटेन का जनमत संग्रह देखा है। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के दोनों के साथ हमारे रिश्ते काफी अहम हैं। हम इन रिश्तों को और मजबूत करने का प्रयास करेंगे। स्वरूप शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में भाग लेने आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधिमंडल में शामिल हैं।


    ब्रिटिश जनता ने 28 देशों वाले यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के बाहर होने के पक्ष में वोट डाला है। 43 साल बाद हुए इस ऐतिहासिक जनमत संग्रह में ब्रिटेन की जनता ने मामूली अंतर से ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से अलग करने के पक्ष में वोट किया। 3 करोड़ लोगों की इस वोटिंग में ईयू छोड़ने के पक्ष में 52 फीसदी लोग थे जबकी इसके खिलाफ 48 फीसदी  लोग।


    सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले अपने ही बच्चों को राष्ट्रविरोधी बताकर उनपर हमला करने वाले हम,जात पांत मजहब के बहाने असमता और अन्याय के झंडेवरदार और मनुस्मृति राज की पैदलसेनाएं हम क्या सपने में भी अपने इस कबंध अंध देश में ऐसा लोकतंत्र बहाल कर सकते हैं?


    क्या हम कभी अनंत बेदखली और अनंत विस्थापन के खिलाफ मोर्चाबंद हो सकते हैं?



    विश्व इतिहास में बर्लिन की दीवार गिरने के बाद इस घटना को सबसे अहम माना जा रहा है। वो ब्रिटेन जिसने दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय देशों को करीब लाने के लिए यूरोपियन यूनियन के आइडिया को जन्म दिया, कई सालों तक उसका पैरोकार रहा और आज उसी देश ने खुद ईयू से अलग होने का फैसला किया।



    अमेरिकी नागरिक रंगभेद के खिलाफ अश्वेत रष्ट्रपति चुन सकते हैं लेकिन हम सभी समुदायों को समान अवसर और समान प्रतिनिधित्व देने के लिए किसी भी स्तर पर तैयार नहीं हैं।


    न संविधान कहीं लागू है और न कही कानून का राज है।संसद में क्या बनता बिगड़ता है,किसी को मालूम नहीं है क्योंकि कोई भी ऐरा गैरा मंत्री संत्री प्रवक्ता इत्यादी संवैधानिक असंवैधानिक नीति निर्माण संसदीय अनुमति के बिना ,संसद की जानकारी के बिना कर देता है और मुनाफावसूली के कालेधन के मनुस्मृति शासन में वह आन आनन लागू भी हो जाता है।कहीं कोई प्रतिरोध असंभव।


    अब बताइये,1991 से लेकर अब तक जितने सुधार लागू हुए हैं कायदे कानून ताक पर रखकर और संविधान के दायरे से बाहर उनके बारे में हमारे अति आदरणीय जनप्रतिनिधियों की क्या राय है और उन जनप्रतिनिधियों ने अपने मतदाताओं से कब इन सुधारों के बारे में चर्चा की है या उनका ब्यौरा सार्वजनिक किया है।


    अब बताइये,ब्रेक्सिट के बहाने जिन अत्यावश्यक सुधारों को लागू करके अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने की उदात्त घोषणाएं की जा रही हैं,उनके लिए क्या संसदीय अनुमति ली गयी है और जनता के मतामत के लिए कोई सर्वे किसी भी स्तर पर किया गया है या नीतिगत फैसलों के लिए किसी भी स्तर पर कोई जनसुनवाई हुई है।जनमत संग्रह की बात रहने दें।हमारे यहा एफआईआर तक दर्ज कराने में पीड़ितो को लेने के देने पड़ जाते हैं।हत्या बलात्कार संस्कृति है इनदिनों।बाहुबलि तो जनप्रतिनिधि हैं।


    संप्रभू ब्रिटिश नागरिकों ने यूरोपीय समुदाय के धुर्रे बिखेर दिये और कबंध अंध  देश के हमारे हुक्मरान नरमेधी सुधार तेज कर रहे हैं।


    सत्ता निरंकुश नहीं होती अगर देश के नागरिक मुर्दा न हो और लोकतंत्र जिंदा हो।


    ब्रिटेन के नागरिकों ने संवैधानिक राजतंत्र के बावजूद बायोमैट्रिक नागरिकता की योजना पूरी होने से पहले सरकार बदल दी और अहब मुक्तबाजार के सबसे शक्तिशाली तंत्र यूरोपीय यूनियन के धुर्रे बिखेर दिये।गौर करें कि ब्रिटेन में हुए जनमतसंग्रह के नतीजतन सिर्फ ब्रिटेन यूरोपीयसमुदाय से बाहर नहीं निकल रहा है,प्रबल आर्थिक संकट में फंसे जनांदोलनों की सुनामी में यूरो कप फुटबाल के जश्न में बंद आइफल टावर और रोमांस,कविता और नवजागरण व क्रांति का देश फ्रांस भी अमेरिकी मुक्तबाजार के चंगुल से निकलने के लिए छटफटा रहा है।


    फ्रांस के अलावा स्वीडन, डेनमार्क, यूनान,हालैंड और हंगरी के साथ तमाम यूरोपीय देश इस मुक्त बाजार की गुलामी से रिहा होने की तैयारी में हैं।


    हमारे हुक्मरान ने इसके बदले ब्रिटेन से उठने वाली इस सुनामी में अपने अमेरिका आकाओं के हितों को मजबूत करने के लिए शत प्रतिशत निजीकरण और शत प्रतिशत विनिवेश का विकल्प चुना है और सीना ठोकर दावा भी कर रहे हैं कि ब्रेक्सिट से भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।


    उत्पादन प्रणाली ध्वस्त है।रोजगार आजीविका खत्म है।बुनियादी सेवाएं और बुनियादी जरुरतें बेलगाम बाजार के हवाले हैं तो ये रथी महारथी न जाने किस अर्थव्यवस्था की बात कर रहे हैं जिनका वित्तीय प्रबंधन शेयर बाजार में सांढ़ों और भालुओं के खेल का नियंत्र करके बाजार को लूटतंत्र में तब्दील करने और कर्ज और करों का सारा बोझ आम जनता पर डालने के अलावा कुछ नहीं है।


    हम अमेरिका की तरह सीधे राष्ट्रपति का चुनाव नहीं करते और न हमारे यहां राष्ट्रपति सरकार के प्रधान है और न राजकाज से उनका कोई मतलब है।बकिंघम राजमहल की तर रायसीना हिल्स के प्रासाद में वे संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष मात्र हैं और अपने तमाम विशेषाधिकारों के बावजूद भरत की सरकार या राज्य सरकारों पर उनका कोई नियंत्र नहीं है।वे सिर्फ अभिभाषण के अधिकारी हैं।या अध्यादेशों और विधेयकों पर अपना टीप सही दाग देते हैं।


    न ही हम राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों के तौर तरीके या नीतिगत फैसलों के लिए जनमत संग्रह करा सकते हैं।


    सरकार संसद के प्रति जिम्मेदार है,राजनीति शास्त्र में यही पढ़ाया जाता है और संविधान भी यही बताता है और संसद में अपने प्रतिनिधि जनता चुनकर भेजती है।लेकिन भारतीय जनता के लिए उनका ही तैयार जनादेश मृत्युवाण रामवाण है क्योंकि इस जनादेश के बाद सरकारें न संसद की परवाह करती हैं और न विधानमंडलों की।घोषणाओं पर टैक्स लगता नही है।सुर्खियां अलग मिलती हैं।


    सबकुछ खुल्ला खेल फर्रूखाबादी मुक्तबाजार है,जिसके पास घोड़ों को खरीदने लायक अकूत संसाधन हैं वे गिनती के लिए चाहे जैसे भी हों,कैसे भी हों रंगबिरंगे घोड़े खरीद लें और उन घोड़ों के खुरों से आवाम को रौदता रहे।यही राजकाज है और राजधर्म भी यही ता राजकरण भी यही है।


    फिरभी सच यह भी है कि सत्ता निरंकुश नहीं होती अगर देश के नागरिक मुर्दा न हो और लोकतंत्र जिंदा हो।


    सत्ता के झंडे लहराते हुए भारतमाता की जय बोल देने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता बल्कि राष्ट्रहित में सत्ता से टकराकर सरफरोशी की तमन्ना ही असल देशभक्ति है और इसके लिए निरंकुश सत्ता से टकराने का जिगर चाहिए जो हमारे पास फिलहाल हैं ही नहीं।पुरखे जरुर रहे होंगे वरना वे हजारों साल से गुलामी के बदले शहादतों का सिलसिला नहीं बनाते।पुरखौती की भी ऐसी की तैसी।दर्जनों गांव जलाने वाले फिर पुरखौती की नौटंकी करते हैं।


    मजबूत अर्थव्यवस्था का नजारा यह है कि ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर होने के जनमतसंग्रह के नतीजे के कारण भारतीय शेयर बाजार में कुछ ही मिनटों के अंदर निवेशकों के करीब 4 लाख करोड़ रुपए डूब गए। ब्रिटेन में जनमत संग्रह के नतीजे आते ही टोटल इन्वेस्टर वेल्थ 98 लाख करोड़ के नीचे पहुंच गई। यह गुरुवार को 101.04 लाख करोड़ पर बंद हुए मार्केट से करीब 4 लाख करोड़ रुपए कम था। भारी गिरावट के साथ खुला सेंसेक्स दोपहर तक मामूली रिकवरी ही कर सका। आरबीआई और सरकार के आश्वासन के बावजूद मार्केट ज्यादा तेजी से नहीं बढ़ पाया।


    गौरतलब है कि जनमत संग्रह के नतीजे के साथ साथ ब्रिटेन में सत्ता का तख्ता पलट हो गया है और नई सरकार अक्तूबर से पहले नहीं बनेगी।नई सरकार ही अलगाव की प्रक्रिया पूरी करेगी।लेकिन संकटउससे कही बड़ा है।सोवियत संघ के पतन के बाद यूरोपीय संघ उसके मुकाबले उसीकी तर्ज पर संगठित करके मुक्तबाजार का साम्राज्य विस्तार और समूचे यूरोप को उपनिवेश में तब्दील करने का जो खेल चल रहा था,उसका दरअसल पटाक्षेप होना है क्योंकि यूरोप में सबसे बड़े अमेरिकी उपनिवेश ब्रिटेन ने आजादी का बाबुलंद ऐलान किया है और बाकी देश वही देर सवेर करने वाले हैं।


    राजन के जाने के बाद भारत का वित्तीय प्रबंधन नागपुर के संघ मुख्यालय में स्थानांतरित होना है और धर्म कर्म के मनुस्मृति राजधर्म का फर्जीवाड़ा जिन्हें समझ में नहीं आ रहा वे मुक्तबाजार के साथ फासीवादी अंध राष्ट्रवादा का,या जल जंगल जमीन से बेदखली के सलवा जुड़ुम का अर्थशास्त्र नहीं समझ सकते।


    समझ लें कि ब्रेक्सिट से पहले अगर शत प्रतिशत अबाध पूंजी है तो नागपुर से संचालित वित्तीय प्रबंधन का जलवा कितना नरसंहारी होगा।शेयर बाजार में जिनके पैसे लगे होगें वे शेयर बाजार के अपने दांव पर सोचें,लेकिन संघी राजकाज अब जब पेंशन बीमा वेतन जमा पूंजी सबकुछ वित्तीय सुधारों के बहाने शेयर बाजार से नत्थी करने जा रहा है तो समझ लीजिये आगे सिर्फ अमावस्या का अंधकार है।भोर के मोहताज होंगे हम और वह खरीद भी नहीं सकते।


    क्योंकि बाकी जनता कमायेगी जरुर लेकिन जेबें किन्हीं खास तबके की मोटी होती रहेगी और कर्ज,ब्याज और टैक्स का बोझ इतना प्रबल होने वाला है कि नौकरी और आजीविका,खेत खलिहान ,कल कारखानों की छोड़िये,जो अभूतपूर्व हिंसा और घृणा का सर्वव्यापी माहौल बनने वाला है,उसमें हर वैश्विक इशारे के साथ डांवाडोल होने वाली अर्थव्यवस्था में किसी की जान माल की कोई गारंटी अब होगी नहीं।


    गौरतलब है कि ब्रेक्सिट के झटकों से भारत पर पडऩे वाले प्रभाव की चिंता को खारिज करते हुए सरकार ने आज कहा कि अर्थव्यवस्था के पास स्थिति से निपटने के लिए 'काफी तरीके'  हैं। हालांकि, इस घटनाक्रम के बीच शेयर बाजारों तथा रुपये में भारी गिरावट आई है। आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास ने भारत की घरेलू बुनियाद का हवाला देते हुए कहा कि यही वजह है कि हमारे ऊपर ब्रेक्सिट का दीर्घावधि का असर नहीं होगा। उन्होंने कहा कि सरकार और रिजर्व बैंक पिछले कई सप्ताह से संभावित प्रभावों को लेकर काम कर रहे हैं।


    उन्होंने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार की संतोषजनक स्थिति, मुद्रास्फीति के नीचे आने तथा बुनियादी सुधारों पर आगे बढऩे की वजह से भारत इन सब झटकों को झेल जाएगा। दास ने कहा कि सरकार सभी झटकों के लिए तैयार है। एक ऐतिहासिक घटनाक्रम में ब्रिटेन ने आज 43 साल बाद यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में मत दिया। इस घटनाक्रम के बीच बंबई शेयर बाजार का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 1,050 से अधिक अंक नीचे आ गया। वहीं सभी सूचीबद्ध कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में करीब 4,00,000 करोड़ रुपये की गिरावट आई। रुपया भी 96 पैसे टूटकर 68 प्रति डॉलर से नीचे चला गया।


    दास ने कहा कि जहां तक शेयर बाजारों का सवाल है, तो यह किसी ऐसे घटनाक्रम जो उनकी उम्मीद के अनुरूप नहीं है, की वजह पर तात्कालिक प्रतिक्रिया है। यह प्रतिक्रिया अगले कुछ दिन में समाप्त हो जाएगी और मुझे उम्मीद है कि बाजार की स्थिति सुधरेगी। ब्रेक्सिट जनमत संग्रह की वजह से ही दास बीजिंग नहीं जा पाए हैं जिसके चलते भारत-चीन वित्तीय वार्ता को जुलाई तक स्थगित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि रुपये में आई गिरावट अन्य एशियाई मुद्राओं की तर्ज पर है। उन्होंने कहा, 'आप जानते हैं कि पौंड स्टर्लिंग में गिरावट आ रही है इसलिए सभी मुद्राओं में गिरावट आ रही है।


    इसके विपरीत तथ्य और आंकड़े ये हैं कि रुपये पर भी जबरदस्त असर पड़ा है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपये की कीमत में 89 पैसे की जोरदार गिरावट देखने को मिल रही है। फिलहाल एक डॉलर के बदले रूपये की कीमत 68.08 पैसे तक पहुंच गई है। वहीं जापान का स्टॉक एक्सचेंज भी 8 फीसदी लुढ़क गया।


    माना जा रहा है कि ब्रेक्सिट हुआ तो ब्रिटिश पाउंड करीब 10 फीसदी तक टूटेगा जिससे भारतीय शेयर बाजार सीधे तौर पर प्रभावित होगा क्योंकि भारत की करीब 800 ब्लूचिप कंपनियां ब्रिटेन में कारोबार कर रही हैं।


    पाउंड भी लड़खड़ाया

    पाउंड 1.50 डॉलर पर चल रहा पाउंड शुरुआती नतीजों के बाद 1.41 डॉलर पर आ गया। जैसे-जैसे ब्रिजेक्ट के पक्ष में फैसला आता रहा। पाउंड भी गोता लगाता रहा और पाउंड 31 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया। डॉलर के मुकाबले शुक्रवार को पाउंड 1.3466 पर रहा।


    दुनियाभर के बाजारों में ब्रेक्सिट का असर

    दुनियाभर के बाजारों में ब्रेक्सिट को लेकर हलचल मची हुई है। अमेरिकी बाजारों में ब्रेक्सिट को लेकर मिला जुला असर देखने को मिला है। यूएस फ्यूचर्स में 2 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है। हालांकि कल के कारोबार में अमेरिकी बाजार चढ़कर बंद होने में सफल रहे हैं। लेकिन यूरोपीय अमेरिकी बाजार के फ्यूचर्स में तेज गिरावट देखने को मिली है।


    गुरुवार के कारोबारी सत्र में डाओ जोंस 230.24 अंक यानी 1.29 फीसदी बढ़कर 18011.07 पर, एसएंडपी-500 इंडेक्स 27.87 अंक यानी 1.34 फीसदी मजबूती के साथ 2113.32 पर और नैस्डेक 76.72 अंक यानी 1.59 फीसदी की बढ़त के साथ 4910.04 पर बंद हुआ।


    दूसरी ओर,ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने से देश के 108 अरब डॉलर के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) उद्योग को कुछ समय के लिए अनिश्चितता की स्थिति से जूझना पड़ सकता है। आईटी उद्योगों के संगठन नास्कॉम ने आज यह बात कही। नास्कॉम ने कहा कि दीर्घावधि में यह कुल मिलाकर चुनौतियों तथा अवसर दोनों की स्थिति होगी, क्योंकि ब्रिटेन उसके जरिये यूरोपीय संघ के बाजारों तक पहुंच के नुकसान की भरपाई करने का प्रयास करेगा। यूरोप भारतीय आईटी-बीपीएम उद्योग के लिए दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। आईटी उद्योग की करीब 100 अरब डॉलर की निर्यात आय में यूरोप की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है। इस बाजार में ब्रिटेन महत्त्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। ब्रिटेन नास्कॉम सदस्यों की यूरोप में गतिविधियों के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। कई सदस्य यूरोपीय संघ में आगे और निवेश के लिए ब्रिटेन को गेटवे के रूप में इस्तेमाल करते हैं।


    नास्कॉम ने कहा कि ब्रिटिश पौंड में गिरावट से कई मौजूदा अनुबंध घाटे वाले हो जाएंगे और उन पर नए सिरे से बातचीत करने की जरूरत होगी। नास्कॉम ने कहा कि अनुबंध से बाहर निकलने या भविष्य में उसमें बने रहने के लिए होने वाली बातचीत को लेकर अनिश्चितता से बड़ी परियोजनाओं के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित होगी। टीसीएस ने इस मुद्दे पर टिप्पणी नहीं की जबकि इन्फोसिस ने कहा कि यह शांति का समय है। भारतीय आईटी कंपनियों को यूरोपीय संघ में परिचालन के लिए अलग मुख्यालय स्थापित करने की भी जरूरत होगी। इससे ब्रिटेन से कुछ निवेश बाहर निकलेगा। साथ ही इससे यूरोपीय संघ और ब्रिटेन में कुशल श्रम की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।


    इन दावों के विपरीत,बहरहाल ब्रिटेन की जनता ने अपना ऐतिहासिक फरमान दे दिया है। ईयू बनने के बाद से ब्रिटेन पहला ऐसा देश है जो एग्जिट कर रहा है। ब्रेक्जिट की वजह से ब्रिटेन की करेंसी पाउंड करीब 31 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। इसका असर दुनियाभर के शेयर मार्केट और करेंसी मार्केट पर भी दिख रहा है। भारतीय बाजार और रुपया दोनों में गिरावट है। हालांकि सोने की चमक बढ़ गई है।



    करीब 52 फीसदी लोगों ने ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के पक्ष में वोट दिया है। ब्रेक्सिट के फैसले से भारतीय बाजारों में कोहराम मचा और सेंसेक्स 1000 अंकों से ज्यादा लुढ़का, तो निफ्टी 7927 तक फिसल गया था।


    ब्रेक्सिट के हक में रेफरेंडम आने के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा कि फौरी तौर पर किसी भी नियम में कोई बदलाव नहीं होगा। ईयू से बातचीत की तैयारी करेंगे जिसके लिए स्कॉटिश, आइरिश सरकार से सहयोग की उम्मीद है। उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटिश इकोनॉमी अभी मजबूत है, अभी ट्रैवल, गुड्स और सर्विसेज पर कोई असर नहीं पड़ेगा।


    प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने ब्रिटेन की जनता को भरोसा दिलाया है कि उनकी जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं आएगा। न उनके आवागमन में, न सप्लाई पर और न किसी सेवा पर। वहीं ब्रिटेन, यूरोपीय यूनियन से अलग हो इस बात का पुरजोर समर्थन करने वाले यूके इंडिपेंडेंस पार्टीके नेता नाइजल फेराजका कहना है कि इस जीत से एक नाकाम प्रोजेक्ट (यूरोपियन यूनियन) का अंत होगा, यूरोपियन यूनियन के झंडे और ब्रसेल्स से छुटकारा मिलेगा।


    उधर वित्त मंत्री अरुण जेटलीने कहा है कि ब्रेक्सिट के होने वाले असर से निपटने के लिए सरकार तैयार है। सरकार का रिफॉर्म का एजेंडा जारी रहेगा, ब्रेक्सिट के पूरे असर का अभी आकलन करना जल्दबाजी होगी।



    हालांकि, दिन के निचले स्तरों से घरेलू बाजारों में अच्छी रिकवरी देखने को मिली है। सेंसेक्स में नीचे से करीब 500 अंकों की रिकवरी आई है, तो निफ्टी में 160 अंकों की रिकवरी दिखी है। बैंक निफ्टी नीचे से 480 अंकों तक रिकवर हुआ है। अंत में सेंसेक्स 26400 के आसपास, तो निफ्टी 8100 के करीब बंद हुए हैं। दरअसल यूरोप के बाजारों में शुरुआती कारोबार में 10 फीसदी तक गिरावट आई थी थे लेकिन बाद में सभी बाजारों में रिकवरी देखने को मिली। यूरोपीय बाजारों में रिकवरी के चलते ही घरेलू बाजारों में भी सुधार देखने को मिला है।


    ब्रेक्सिट के जनमत संग्रह में सबसे दिलचस्प बात ये रही है कि बुजुर्ग लोगों ने इसका समर्थन किया है, वहीं युवाओं ने इसका विरोध किया है। ब्रिटेन के अखबार द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिन क्षेत्रों में जनसंख्या का बड़ा हिस्सा 65 वर्ष की आयु के ऊपर है उन क्षेत्रों में ब्रेक्सिट के समर्थन में जबरदस्त वोटिंग हुई है। जबकि युवा जनसंख्या की बहुलता वाले क्षेत्रों में यूरोपीय यूनियन से जुड़े रहने के लिए ज्यादा वोट डाले हैं।


    ये बंटवारा क्षेत्रों और उम्र तक ही सीमित नहीं है, शिक्षा भी इस वोटिंग पैटर्न में एक बड़ा घटक है। ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट वोटरों ने जहां ईयू में बने रहने के लिए वोट दिया तो वहीं कम शिक्षित वर्गों में ब्रेक्सिट का समर्थन ज्यादा देखने को मिला है।



    ब्रेक्सिट के बवंडर का असर आने वाले वक्त में ब्रिटेन पर ही नहीं पूरी दुनिया पर दिखेगा। अब कयास लग रहे हैं कि ब्रेक्सिट के बाद दुनिया के दूसरे देशों में भी कहीं इस तरह की मांग ना उठने लगे। डर है कि कहीं दुनिया में सरहदों की नई दीवारें न बनने लगें। दुनियाभर के बाजारों में ब्रेक्सिट का असर देखने को मिला। भारतीय बाजारों में भी कोहराम मचा है।



    वाणिज्य राज्यमंत्री निर्मला सीतारामनने कहा कि ब्रेक्सिट का भारत पर असर पड़ेगा, मगर सरकार ने इससे निपटने की तैयारी कर रखी है। निर्मला सीतारामन के मुताबिक करेंसी बाजार का सीधा असर एक्सपोर्ट पर पड़ेगा, लेकिन भारतीय इकोनॉमी की स्थिति मजबूत है। आगे करेंसी के उतार-चढ़ाव पर नजर बनाए रखना जरूरी है।


    ब्रेक्सिट पर आरबीआई गवर्नर रघुराम राजनने कहा कि ब्रिटेन की जनता का यूरोपियन यूनियन से बाहर करने का फैसला चौंका देना वाला है। ब्रेक्सिट के फैसले के बाद इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि लोग अब ग्लोबलाइजेशन से थक चुके हैं। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि ब्रेक्सिट से सिस्टम में नकदी की तुरंत कोई दिक्कत नहीं होगी। आगे जाकर हालात धीरे-धीरे स्थिर हो जाएंगे। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि आरबीआई ब्रेक्सिट के फैसले से निपटने के लिए तैयार है।


    आइकैनके चेयरमैन अनिल सिंघवीका कहना है की ब्रेक्सिट का असर लम्बे समय तक दिखेगा। हालांकि यूरोप की ग्रोथ कमज़ोर होने का फायदा भारतीय और चीनी बाज़ार को मिलेगा। वहीं मार्केट एक्सपर्ट अजय बग्गा का मानना है कि ब्रेक्सिट से दुनिया भर के एक्सपोर्ट्स पर असर पड़ेगा। ट्रेड कम होगा, कमोडिटी की कीमतें गिरेंगी। आगे करेंसी वॉर होने की आशंका भी है। चीन की करेंसी युआन और कमजोर हो सकती है। अजय बग्गा की राय है कि निवेशक इस समय यूरोपीय इकोनॉमी में निर्भर करने वाले शेयरों पर नजर बनाए रखें।


    वहीं मार्केट एक्सपर्ट उदयन मुखर्जीका मानना है कि ब्रेक्सिट का बाजार पर बड़ा असर देखने को मिलेगा और इससे उभरने में बाजार को काफी वक्त लग सकता है। साथ ही यूके और यूरोपीय यूनियन में भी मंदी देखने को मिलेगी। अगले 1 साल तक ग्लोबल बाजारों में ग्रोथ धीमी रहेगी।


    जानकारों का का कहना है कि ब्रेक्सिट के पक्ष में ज्यादा वोट का मतलब ये नहीं कि ब्रिटेन तुरंत ईयू से बाहर होगा। फिलहाल के लिए ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन का सदस्य बना रहेगा। यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलने पर सरकार फैसला लेगी।


    कानूनी भाषा में जनमत संग्रह जनता की राय जानने के लिए कराए जाते हैं। सरकार या संसद वोटिंग के नतीजे को मानने के लिए बाध्य नहीं होती। हालांकि सरकार जनता की राय नहीं मानने का जोखिम नहीं लेगी।


    ईयू से निकलने की प्रक्रिया लिस्बन संधि के आर्टिकल 50 के तहत दी गई है। आर्टिकल 50 के तहत ईयू से निकलने के लिए 2 साल का वक्त चाहिए होता है। ब्रिटिश संसद में पीएम डेविड कैमरन सोमवार को इस मुद्दे पर बयान दे सकते हैं। फिर ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों में आगे की रणनीति पर चर्चा होगी। बता दें कि डेविड कैमरन यूरोपीय यूनियन में बने रहने के पक्ष में हैं। जिससे उन पर इस्तीफा देने का दबाव रहेगा।



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    कर्मचारियों की सेलरी में करीब 23.6 फीसद का इजाफा मंजूर!

    कर्मचारी भविष्य निधि कोष संगठन (ईपीएफओ) ईटीएफ के जरिये शेयर बाजारों में अपेक्षाकृत अधिक अनुपात में धन निवेश करने के बारे में 7 जुलाई की बैठक में निर्णय।

    हर मंत्री पांच सौ करोड़ तक की परियोजना बेखटके मंजूर करें तो अबाध पूंजी की गंगा बहने लगेगी सर्वत्र!

    रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दी है। 11 जुलाई से हड़ताल में जाने का एलान।




    भारत में संसदीय प्रणाली का मजा यह है कि राजकाज में और नीतिगत फैसलों में संसद की कोई भूमिका नहीं है।


    मतलब यह कि जनता के अच्छे दिन जब आयेंगे,तब आयेंगे, मंत्रालयों और मंत्रियों के दिन सुनहरे हैं और राजकाजा और राजधर्म की स्वच्छता पर मंतव्य राष्ट्रद्रोह भी हो सकता है,इसलिए यह कहना जोखिमभरा है कि अब हर मंत्री चाहे तो देश में कहीं भी नियमागिरि या बस्तर या दंडकारण्य में कहीं भी आदिवासियों के सीने पर या अन्यत्र कहीं भी समुद्र तट,अभयारण्य या उत्तुंग हिमाद्रिशिखर पर स्थानीय जनगण या स्थानीय निकायों की कोई सुनवाई किये बिना, पर्यावरण हरी झंडी के बिना, किसी संस्थागत मंजूरी के बिना,संसदीय अनुमति के बिना अबाध पूंजी की निरमल गंगा बहा सकते हैं और उस गंगा में हाथ धोने की आजादी भी होगी।

    पलाश विश्वास

    भारत में संसदीय प्रणाली का मजा यह है कि राजकाज में और नीतिगत फैसलों में संसद की कोई भूमिका नहीं है।खास खबर फिर वहीं है कि संसद का मॉनसून सत्र 18 जुलाई से शुरू होगा। कैबिनेट की बैठक में आज इस बात का फैसला लिया गया। 12 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में सरकार जीएसटी संविधान संशोधन बिल पास कराने की कोशिश करेगी। इसके अलावा 25 और बिल भी मॉनसून सत्र में पेश किए जाएंगे।


    जीएसटी बिल को इस मॉनसून सत्र में पारित करने के लिए संसदीय कार्य मंत्री वेकैंया नायडू ने विपक्ष से सहयोग की मांग की है। उनका कहना है कि इसके पारित होने से भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने में मदद मिलेगी।



    भाड़ में जाये आम जनता,वोटों के अलावा उनके जीने मरने का क्या क्या और पढ़े लिखे जो हैं,उन्हें उनकी खास परवाह करने की कोई जरुरतभी नहीं हैं क्योंकि आज का दिन केंद्रीय कर्मचारियों के लिए खुशियों भरा रहा। सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है।ब्रेक्सिट से निपटने का आसार तरीका बाजार में मांग बनाये रखने के लिए नकदी की सप्लाई जारी रहे।कर्मचारियों के वेतन में बढ़तरी से बाजार में भारी जोश इसीलिए हैं और शेयर बाजर बल्ले बल्ले है।मुनाफावसूली मस्तकलंदर खेल है।



    बताया जा रहा है कि कर्मचारियों की सेलरी में करीब 23.6 फीसद का इजाफा होगा। कर्मचारियों को 1 जनवरी, 2016 से बढ़ी हुई सैलरी का एरियर भी मिलेगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन ने ट्वीट कर बताया कि केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी में 23 फीसद से ज्यादा का इजाफा होगा। इसीके साथ  कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने देश के सभी कर्मचारियों को 2030 तक भविष्य निधि, पेंशन और जीवन बीमा के दायरे में लाने का लक्ष्य तय किया है। ईपीएफओ ने बयान में कहा कि संगठन की ओर से तैयार विजन लेटर में अनिवार्य आधार पर भविष्य निधि, पेंशन तथा बीमा के जरिये सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज का उल्लेख किया गया है।


    इसके साथ खबर यह भी है कि कर्मचारी भविष्य निधि कोष संगठन (ईपीएफओ) ईटीएफ के जरिये शेयर बाजारों में अपेक्षाकृत अधिक अनुपात में धन निवेश करने के बारे में 7 जुलाई की बैठक में निर्णय कर सकता है। ईटीएफ के जरिये निवेश पर संगठन को मुनाफा होने लगा है। यह बात आज श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कही। दत्तात्रेय ने कामकाज की जगह सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर एक कार्यक्रम में कहा, 'ईटीएफ में ईपीएफओ के निवेश पर एक रपट केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) के समक्ष रखी जाएगी। रिपोर्ट अब अच्छी है। हम निवेश का अनुपात बढ़ाने पर फैसला करेंगे और इससे निवेश की मात्रा भी बढ़ेगी।' कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ): की बैठक 7 जुलाई को होनी है। उसकी अध्यक्षता श्रम मंत्री करेंगे। निवेश पर 7 जुलाई को विस्तृत विश्लेषण होना है।


    अब केंद्रीय कर्मचारियों को कम से कम 18000 रुपये सैलरी मिलेगी, जबकि बढ़ा हुआ वेतन 1 जनवरी 2016 से मिलेगा। 7वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से सरकारी खजाने पर 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बोझ पड़ेगा। सरकार के इस कदम से 48 लाख कर्मचारी और 55 लाख पेंशनभोगियों को फायदा होगा। साथ ही केंद्रीय कर्मचारियों के ग्रैच्युएटी की रकम 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गई है। केंद्रीय कर्मचारियों की वेतन बढ़ोतरी से इकोनॉमी में 1 लाख करोड़ रुपये आएंगे। इक्रा की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर का कहना है कि 7वें वेतन आयोग के सुझावों के लागू होने से कंज्यूमर डिमांड बढ़ेगी जिससे जीडीपी को सपोर्ट मिलेगा।


    सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से नागपुर के कर्मचारी काफी खुश नजर आए, हालांकि लुधियाना के कर्मचारी 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों से नाखुश दिखें। इधर सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का विरोध भी शुरू हो गया है।


    रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दी है। उन्होंने 11 जुलाई से हड़ताल में जाने का एलान भी किया है।


    वहीं मिनरल एक्सप्लोरेशन पॉलिसी को कैबिनेट ने हरी झंडी दिखाई है, इससे माइनिंग कंपनियों को फायदा होगा। इसके अलावा मॉडल शॉप एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट को भी मंजूरी दी गई है। मॉडल शॉप एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट लागू होने से शॉपिंग मॉल्य और रेस्टोरेंट 24 घंटे खुले रहेंगे। मॉडल शॉप एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट को मंजूरी मिलने से रेस्टोरेंट, मल्टीप्लेक्स और रिटेल शेयरों में तेजी देखने को मिली। मिनरल एक्सप्लोरेशन पॉलिसी मिलने के बाद माइनिंग शेयरों में खासी तेजी देखने को मिली। 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी मिलने के बाद डिमांड बढ़ने की उम्मीद में रियल एस्टेट, ऑटो और सीमेंट कंपनियों के शेयरों में खासी तेजी देखने को मिली।


    नई दिल्ली में केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सातवां वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने के कैबिनेट के फैसले के बारे में मीडिया को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस आयोग की रिपोर्ट को लागू करने से सरकार पर सालाना 1.02 लाख करोड़ रुपये का सालाना भार आएगा।


    मीडिया के मुताबिक जेटली की कही बातों का मुख्य अंश -

    • 3 बड़े हाइवे प्रोजेक्‍टस को कैबिनेट की मंजूरी।

    • पंजाब, ओडिशा और महाराष्‍ट्र में हाइवे का प्रस्‍ताव।

    • महिलाओं के लिए रोजगार का अवसर बढ़ाने की कोशिश।

    • महिलाओं को देर तक काम करने की इजाजत का प्रस्‍ताव।

    • 5वां पे कमिशन आया था तो सरकार को उस पर निर्णय लेने के लिए 19 महीने लगे, जबकि 6वें में 36 महीने लगे थे।

    • पे और पेंशन के संबंध में कमिशन की सिफारिशों को सरकार ने स्‍वीकार किया है। 1 जनवरी 2016 से लागू होंगी।

    • 47 लाख सरकारी कर्मचारी और 56 लाख पेंशनर्स पर प्रभाव पड़ेगा।

    • निजी सेक्‍टर से सरकारी सेक्‍टर की सैलरी की तुलना की गई। निजी सेक्‍टर से तुलना के आधार पर सिफारिश की गई।

    • कमेटी की सिफारिशें आने तक मौजूदा भत्‍ते जारी रहेंगे।

    • सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को अधिकतर स्वीकार किया गया है।

    • ग्रुप इंश्‍योरेंस के लिए सैलरी से कटौती की सिफारिश नहीं मानी।

    • इस साल एरियर का 12 हजार करोड़ का अतिरिक्‍त बोझ पड़ेगा।

    • क्लास वन की सैलरी की शुरुआत 56100 रुपये होगी।

    • वेतन आयोग रिपोर्ट में जो भी कमी है उसे एक समिति देखेगी।

    • ग्रैच्युटी को 10 लाख बढ़ाकर 20 लाख किया गया।

    • एक्स ग्रेशिया लंपसम भी 10-20 लाख से बढ़ाकर  25-45 लाख रुपये किया गया।

    • वेतन आयोग द्वारा सुझाए गए भत्तों पर वित्त सचिव अध्ययन करेंगे और फिर इस अंतिम निर्णय होगा।

    • कुछ कर्मचारी संगठनों के विरोध के प्रश्न पर जेटली ने कहा कि विरोध का कोई औचित्य नहीं है।

    इससे पहले जेटली ने ट्वीट कर कहा था कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशनभोगियों के पेंशन में ऐतिहासिक वृद्धि करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी।


    मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जेटली ने एक ट्वीट में कहा, "सातवें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा केंद्र सरकार के अधिकारियों, कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को उनके वेतन और भत्तों में ऐतिहासिक वृद्धि पर बधाई।" वेतन आयोग की सिफारिशों को मिली मंजूरी का लाभ केंद्र सरकार के करीब 47 लाख कर्मचारियों और 52 लाख पेंशनभोगियों को मिलेगा। जेटली बुधवार को ही बाद में अन्य विवरणों की और जानकारी देंगे।


    बहरहाल आम नागरिकों के हक हकूक और उनके संवैधानिक, नागरिक और मानवाधिकारों के मामले में कहीं भी संसदीय हस्तक्षेप नहीं है।


    आर्थिक सुधार हों या विदेशी पूंजी निवेश या विदेशी मामलों में राष्ट्रहित या सीधे तौर पर देश के प्राकृतिक संसाधनों का मामला,हमारे जनप्रतिनिधि हाथ पांव कटे परमेश्वर हैं और अब शत प्रतिशत निजीकरण और शत प्रतिशत विनिवेश के कायाकल्प के दौर में सनातन भारत के आधुनिक यूनान बनने की पागल दौड़ में भारतीय संसद की बची खुची भूमिका भी खत्म है।


    केंद्र सरकार तो संसद की परवाह करती ही नहीं है,किसी मंत्री को भी किसी की परवाह नहीं करनी है।


    अंधाधुंध विकास के बहाने अबाध पूंजी के लिए सारे दरवाजे और खिड़कियां खोल दिये गये हैं। परियोजनाओं की मंजूरी में तेजी लाने के लिये सरकार ने विभागों और मंत्रालयों के वित्तीय अधिकार बढ़ा दिये हैं।केंद्र सरकार के मंत्री  अब 500 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं को मंजूरी दे सकेंगे। अब तक उन्हें केवल 150 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं और कार्यक्रमों को मंजूरी देने की शक्ति प्राप्त थी।


    निरंकुश सत्ता ने अभिनव आर्थिक सुधार के तहत सत्ता का अभूतपूर्व विकेंद्रीकरण कर दिया है और इसके तहत अत्यधिक केंद्रीयकरण के आरोप का सामना करने वाली केंद्र सरकार ने अपने मंत्रालयों को चार गुना अधिक वित्तीय अधिकार प्रदान कर दी है।


    मतलब यह कि जनता के अच्छे दिन जब आयेंगे,तब आयेंगे, मंत्रालयों और मंत्रियों के दिन सुनहरे हैं और राजकाजाऔर राजधर्म की स्वच्छता पर मंतव्य राष्ट्रद्रोह भी हो सकता है,इसलिए यह कहना जोखिमभरा है।


    बहरहाल  अब हर मंत्री चाहे तो देश में कहीं भी नियमागिरि या बस्तर या दंडकारण्य में कहीं भी आदिवासियों के सीने पर या अन्यत्र कहीं भी समुद्र तट,अभयारण्य या उत्तुंग हिमाद्रिशिखर पर स्थानीय जनगण या स्थानीय निकायों की कोई सुनवाई किये बिना, पर्यावरण हरी झंडी के बिना, किसी संस्थागत मंजूरी के बिना,संसदीय अनुमति के बिना अबाध पूंजी की निरमल गंगा बहा सकते हैं और उस गंगा में हाथ धोने की आजादी भी होगी।


    गौरतलब है कि उदारीकरण के ईश्वर की विदाई के लिए वैश्विक व्यवस्था का महाभियोग नीतिगत विकलांगकता का रहा है जिसकी वजह से अरबों अरबों डालर की परियोजनाएं लटकी हुई थीं।


    जाहिर है कि अब लंबित और विवादित परियोजनाओं को चालू करने के लिए कहीं किसी अवरोध को खत्म करने के लिए  सरकार या संसद के हस्तक्षेप की जरुरत भी नहीं होगी।


    कोई भी केंद्रीय मंत्री अपने स्तर पर पांच सौ करोड़ की परियोजना मंजूर करने की स्थिति में दिशा दिशा में विकास के जो अश्वमेधी घोड़े कारपोरेट लाबिंग और हितों के मुताबिक दौड़ा सकेंगे,उसपर संसद या भारतीय जनगण का कोई अंकुश नहीं होगा,मंत्री के हाथ मजबूत करने का मतलब यही है।


    वित्त मंत्रालय के अनुसार मंत्रियों को गैर-योजनागत परियोजनाओं को मंजूरी देने के संबंध में प्रशासनिक मंत्रालयों के प्रभारी मंत्री के लिए सीमा बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये तक दी है। अब केंद्रीय मंत्री 500 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं को मंजूरी दे सकेंगे।


    अब तक यह सीमा 150 करोड़ रुपये थी। मंत्रालय का कहना है कि 500 करोड़ रुपये से 1,000 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं को मंजूरी देने की शक्ति वित्त मंत्री के पास होगी। वहीं 1000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को मंजूरी के लिए कैबिनेट या कैबिनेट की आर्थिक मामलों संबंधी समिति के पास जाना पड़ेगा।


    सरकार ने यह फैसला सरकार के अलग-अलग स्तरों पर परियोजनाओं को मंजूरी देने के संबंध में प्रक्रिया में बदलाव कर लिया है। मंत्रालय का कहना है कि केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों और विभागों के सभी प्रकार के गैर-योजनागत व्यय के संबंध में मंजूरी देने का काम करने वाली समिति अब 300 करोड़ रुपये तक के व्यय के प्रस्तावों को मंजूरी दे सकेगी। अब तक इस समिति को 75 करोड़ रुपये तक के प्रस्ताव को मंजूरी देने का अधिकार था।


    वहीं संबंधित मंत्रालय की स्थाई वित्त समिति अब 300 करोड़ रुपये तक की गैर-योजनागत परियोजनाओं के प्रस्तावों पर विचार करेगी। सरकार ने परियोजनाओं की बढ़ी लागत के संबंध में भी सचिवों और फाइनेंशियल एडवाइजर्स के अधिकार बढ़ाए हैं।


    एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) की यूनिटों को बाजार में शेयरों की तरह ही खरीदा बेचा जा सकता है। इस फंड का पैसा चुनिंदा शेयरों, बांड, जिंस और सूचकांक आधारित अनुबंधों में लगाया जाता है। ईपीएफओ ने पिछले साल अगस्त में ईटीएफ में निवेश शुरू किया था पिछले वित्त वर्ष के दौरान ईपीएफओ में बढ़े हुए कोष का पांच प्रतिशत ईटीएफ में जमा किया गया था। अब इस अनुपात को और बढ़ाने का विचार चल रहा है। मंत्री ने कहा, 'ईपीएफओ के न्यासी विभिन्न संबद्ध पक्षों के साथ परामर्श करने के बाद ईटीएफ में निवेश का अनुपात बढ़ाने के संबंध में फैसला करेंगे।'


    दत्तात्रेय ने कहा, 'रपट के विश्लेषण पर विचार के बाद मैं अध्यक्ष के तौर पर सीबीटी के अन्य सदस्यों के साथ ईटीएफ में निवेश का अनुपात बढ़ाने पर चर्चा करुंगा। पिछले साल यह पांच प्रतिशत था। वित्त मंत्रालय के निवेश पैटर्न के लिहाज से यह 15 प्रतिशत तक जा सकता है।' मंत्री ने कहा कि 31 मार्च 2016 तक 6,577 करोड़ रुपये की राशि का निवेश किया था जो 0.37 प्रतिशत बढ़कर 6,602 करोड़ रुपये हो गया। 30 अप्रैल 2016 को 6,674 करोड़ रुपये का निवेश 1.68 प्रतिशत बढ़कर 6,786 करोड़ रुपये हो गया। यह प्रस्ताव कानून विभाग के पास जाएगा जिसके बाद यह मंजूरी के लिए मंत्रिमंडल के पास भेजा जाएगा।


    मंत्री ने कहा कि फैक्ट्री अधिनियम में पेशवर सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा आकलनकर्ताओं के लिए नए प्रावधान पेश करने की भी जरूरत है। सुरक्षा आकलनकर्ताओं से जुड़ा प्रस्ताव कानून मंत्रालय के पास जाएगा और फिर यह मंत्रिमंडल के पास जाएगा। श्रम मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि सुरक्षा आकलनकर्ता की अवधारणा पेश करने के लिए संबंध में त्रिपक्षीय परामर्श पेश किया जा चुका है क्योंकि इस संबंध में दो दौर की वार्ता हुई है।


    ब्रेक्सिट के बाद से दुनियाभर के बाजारों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। और अब भारत पर इसका कितना असर होगा इसपर बात करते हुए एचडीएफसी के वाइस चेयरमैनऔर सीईओ केकी मिस्त्रीने कहा कि ब्रेक्सिट का भारत पर सीधा असर होने की आशंका नहीं है। लेकिन आगे रुपया कुछ कमजोर हो सकता है। आरबीआई ने फॉरेक्स का अच्छा इस्तेमाल किया है।


    केकी मिस्त्री ने ये भी कहा कि करेंसी पर करेंट अकाउंट डेफिसिट का असर दिख सकता है। पूरी दुनिया में कहीं ग्रोथ नहीं हुई है, लेकिन भारत में हालात बेहतर नजर आ रहे हैं। बाजार में अब भी लिक्विडिटी बनी हुई है। रुपया 5-7 फीसदी और कमजोर होना चाहिए। आगे निवेश बढ़ने से एनपीए घटेगा और ग्रोथ बढ़ेगी।

    इसी बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दुकानों, शॉपिंग मॉल व अन्य प्रतिष्ठानों को साल के 365 दिन खुला रखने की अनुमति देने वाले एक मॉडल कानून को आज मंजूरी दे दी। इस कानून से इन प्रतिष्ठानों को अपनी सुविधा के अनुसार कामकाज करने यानी खोलने व बंद करने का समय तय करने की सुविधा मिलेगी। इस कानून के दायरे में विनिर्माण इकाइयों के अलावा वे सभी प्रतिष्ठान आएंगे जिनमें 10 या अधिक कर्मचारी हैं पर यह विनिर्माण इकाइयों पर लागू नहीं होगा।


    यह कानून इन प्रतिष्ठानों को खुलने व बंद करने का समय अपनी सुविधा के अनुसार तय करने तथा साल के 365 दिन परिचालन की अनुमति देता है। इसके साथ ही इस कानून में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ महिलाओं को रात्रिकालीन पारी में काम पर लगाने की छूट तथा पेयजल, कैंटीन, प्राथमिक चिकित्सा व क्रेच जैसी सुविधाओं के साथ कार्यस्थल का अच्छा वातावरण रखने का प्रावधन किया गया है।


    सूत्रों ने जानकारी देते हुए बताया, 'द मॉडल शॉप्‍स ऐंड इस्टेबलिशमेंट (रेग्यूलेशन ऑफ इंप्लायमेंट ऐंड कंडीशन ऑफ सर्विसेज) बिल 2016 को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है।' इस मॉडल कानून के लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। श्रम मंत्रालय द्वारा रखे गए प्रस्ताव के तहत राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से संशोधन करते हुए इस कानून को अपना सकते हैं। इस कानून का उद्देश्य अतिरिक्त रोजगार सृजित करना है क्योंकि दुकानों व प्रतिष्ठानों के पास ज्यादा समय तक खुले रहने की आजादी होगी जिसके लिए अधिक श्रमबल की जरूरत पड़ेगी।


    यह आईटी व जैव प्रौद्योगिकी जैसे उच्च दक्ष कर्मचारियों के लिए दैनिक कामकाजी घंटों (नौ घंटे) तथा साप्ताहिक कामकाजी घंटों (48 घंटे) में भी छूट देता है। इस कानून को विधाई प्रावधानों में समानता लाने के लिए डिजाइन किया गया है जिससे सभी राज्यों के लिए इसे अंगीकार करना आसान होगा और देश भर में समान कामकाजी माहौल सुनिश्चित होगा।


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    7th Pay Commission Pay Scale Calculator

    7TH CPC PAY CALCULATOR


    7th Pay Commission Pay Scale Calculator

    "This Pay Scale Calculator Based on the Recommendations of 7th Central Pay commission "

    At first We would like to extend our gratitude for your over whelming response for our simple 'Expected Pay Calculator as per 7th Pay Commission' provided here by us. This was done by assuming that how the Pay and Allowances will be recommended by 7th Pay Commission almost one year before.

    Like it was done before, now we have prepared a New Pay Scale Calculator based on 7th Pay Commission recommendations and You can use this calculator to know your Revised Pay and Allowances with effect from 1.1.2016.

    • Enter Your Current (6th CPC) Basic Pay (Band Pay + Grade Pay) and Select Your Pay Band with Grade Pay
    • Select Your Present HRA% and Select your Transport Allowance and also select your city as per the recommendations of 7th CPC
    • Click the 'Calculate' button to get your 7th CPC Revised Basic Pay, Matrix Level, Index Level, Revised amount of HRA, Revised amount of Travelling Allowance and the Total Revised Pay per month as per the recommendations of 7th Pay Commission.

    Write us your comments about this calculator.

    7th Pay Commission Pay Scale Calculator
    Basic Pay as on 1.1.2016
    (Including Grade Pay)
    Select Your Pay Band
    and Grade Pay
    Select Your
    Transport Allowance
    Select Your
    House Rent Allowance
    Select Your City
    Details given below*
    Non Practicing Allowance
    Note*: 7th CPC refers 19 Cities as Higher TPTA Cities:Delhi, Hyderabad, Bengaluru, Greater Mumbai, Chennai, Kolkata, Ahmedabad, Surat, Nagpur, Pune, Jaipur, Lucknow, Kanpur, Patna, Kochi, Kozhikode, Indore, Coimbatore and Ghaziabad
    Click to view the Bunching Increment Benefit Tables

    Pay Matrix Table for Central Government Employees

    Pay Matrix Table for Defence Personnel

    7th Pay Commission Fixation of Pay Initial Appointment on or after 1.1.2016

    OROP PENSION ARREARS ESTIMATOR 2016

    Disclaimer: This calculator gives only approximate value on the basis of the recommendations of 7th Central Pay Commission and also shown the estimate figures only basis on your inputs. Reader are requested to refer 7th Pay Commission Report]

    कर्मचारियों की सेलरी में करीब 23.6 फीसद का इजाफा मंजूर!
    कर्मचारी भविष्य निधि कोष संगठन (ईपीएफओ) ईटीएफ के जरिये शेयर बाजारों में अपेक्षाकृत अधिक अनुपात में धन निवेश करने के बारे में 7 जुलाई की बैठक में निर्णय।
    हर मंत्री पांच सौ करोड़ तक की परियोजना बेखटके मंजूर करें तो अबाध पूंजी की गंगा बहने लगेगी सर्वत्र!
    रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दी है। 11 जुलाई से हड़ताल में जाने का एलान।



    भारत में संसदीय प्रणाली का मजा यह है कि राजकाज में और नीतिगत फैसलों में संसद की कोई भूमिका नहीं है।



    मतलब यह कि जनता के अच्छे दिन जब आयेंगे,तब आयेंगे, मंत्रालयों और मंत्रियों के दिन सुनहरे हैं और राजकाजा और राजधर्म की स्वच्छता पर मंतव्य राष्ट्रद्रोह भी हो सकता है,इसलिए यह कहना जोखिमभरा है कि अब हर मंत्री चाहे तो देश में कहीं भी नियमागिरि या बस्तर या दंडकारण्य में कहीं भी आदिवासियों के सीने पर या अन्यत्र कहीं भी समुद्र तट,अभयारण्य या उत्तुंग हिमाद्रिशिखर पर स्थानीय जनगण या स्थानीय निकायों की कोई सुनवाई किये बिना, पर्यावरण हरी झंडी के बिना, किसी संस्थागत मंजूरी के बिना,संसदीय अनुमति के बिना अबाध पूंजी की निरमल गंगा बहा सकते हैं और उस गंगा में हाथ धोने की आजादी भी होगी।
    पलाश विश्वास
    भारत में संसदीय प्रणाली का मजा यह है कि राजकाज में और नीतिगत फैसलों में संसद की कोई भूमिका नहीं है।खास खबर फिर वहीं है कि संसद का मॉनसून सत्र 18 जुलाई से शुरू होगा। कैबिनेट की बैठक में आज इस बात का फैसला लिया गया। 12 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में सरकार जीएसटी संविधान संशोधन बिल पास कराने की कोशिश करेगी। इसके अलावा 25 और बिल भी मॉनसून सत्र में पेश किए जाएंगे।



    जीएसटी बिल को इस मॉनसून सत्र में पारित करने के लिए संसदीय कार्य मंत्री वेकैंया नायडू ने विपक्ष से सहयोग की मांग की है। उनका कहना है कि इसके पारित होने से भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने में मदद मिलेगी।


    भाड़ में जाये आम जनता,वोटों के अलावा उनके जीने मरने का क्या क्या और पढ़े लिखे जो हैं,उन्हें उनकी खास परवाह करने की कोई जरुरतभी नहीं हैं क्योंकि आज का दिन केंद्रीय कर्मचारियों के लिए खुशियों भरा रहा। सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है।ब्रेक्सिट से निपटने का आसार तरीका बाजार में मांग बनाये रखने के लिए नकदी की सप्लाई जारी रहे।कर्मचारियों के वेतन में बढ़तरी से बाजार में भारी जोश इसीलिए हैं और शेयर बाजर बल्ले बल्ले है।मुनाफावसूली मस्तकलंदर खेल है।


    बताया जा रहा है कि कर्मचारियों की सेलरी में करीब 23.6 फीसद का इजाफा होगा। कर्मचारियों को 1 जनवरी, 2016 से बढ़ी हुई सैलरी का एरियर भी मिलेगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन ने ट्वीट कर बताया कि केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी में 23 फीसद से ज्यादा का इजाफा होगा। इसीके साथ  कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने देश के सभी कर्मचारियों को 2030 तक भविष्य निधि, पेंशन और जीवन बीमा के दायरे में लाने का लक्ष्य तय किया है। ईपीएफओ ने बयान में कहा कि संगठन की ओर से तैयार विजन लेटर में अनिवार्य आधार पर भविष्य निधि, पेंशन तथा बीमा के जरिये सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज का उल्लेख किया गया है।



    इसके साथ खबर यह भी है कि कर्मचारी भविष्य निधि कोष संगठन (ईपीएफओ) ईटीएफ के जरिये शेयर बाजारों में अपेक्षाकृत अधिक अनुपात में धन निवेश करने के बारे में 7 जुलाई की बैठक में निर्णय कर सकता है। ईटीएफ के जरिये निवेश पर संगठन को मुनाफा होने लगा है। यह बात आज श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कही। दत्तात्रेय ने कामकाज की जगह सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर एक कार्यक्रम में कहा, 'ईटीएफ में ईपीएफओ के निवेश पर एक रपट केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) के समक्ष रखी जाएगी। रिपोर्ट अब अच्छी है। हम निवेश का अनुपात बढ़ाने पर फैसला करेंगे और इससे निवेश की मात्रा भी बढ़ेगी।' कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ): की बैठक 7 जुलाई को होनी है। उसकी अध्यक्षता श्रम मंत्री करेंगे। निवेश पर 7 जुलाई को विस्तृत विश्लेषण होना है।



    अब केंद्रीय कर्मचारियों को कम से कम 18000 रुपये सैलरी मिलेगी, जबकि बढ़ा हुआ वेतन 1 जनवरी 2016 से मिलेगा। 7वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से सरकारी खजाने पर 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बोझ पड़ेगा। सरकार के इस कदम से 48 लाख कर्मचारी और 55 लाख पेंशनभोगियों को फायदा होगा। साथ ही केंद्रीय कर्मचारियों के ग्रैच्युएटी की रकम 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गई है। केंद्रीय कर्मचारियों की वेतन बढ़ोतरी से इकोनॉमी में 1 लाख करोड़ रुपये आएंगे। इक्रा की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर का कहना है कि 7वें वेतन आयोग के सुझावों के लागू होने से कंज्यूमर डिमांड बढ़ेगी जिससे जीडीपी को सपोर्ट मिलेगा।



    सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से नागपुर के कर्मचारी काफी खुश नजर आए, हालांकि लुधियाना के कर्मचारी 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों से नाखुश दिखें। इधर सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का विरोध भी शुरू हो गया है।



    रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दी है। उन्होंने 11 जुलाई से हड़ताल में जाने का एलान भी किया है।



    वहीं मिनरल एक्सप्लोरेशन पॉलिसी को कैबिनेट ने हरी झंडी दिखाई है, इससे माइनिंग कंपनियों को फायदा होगा। इसके अलावा मॉडल शॉप एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट को भी मंजूरी दी गई है। मॉडल शॉप एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट लागू होने से शॉपिंग मॉल्य और रेस्टोरेंट 24 घंटे खुले रहेंगे। मॉडल शॉप एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट को मंजूरी मिलने से रेस्टोरेंट, मल्टीप्लेक्स और रिटेल शेयरों में तेजी देखने को मिली। मिनरल एक्सप्लोरेशन पॉलिसी मिलने के बाद माइनिंग शेयरों में खासी तेजी देखने को मिली। 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी मिलने के बाद डिमांड बढ़ने की उम्मीद में रियल एस्टेट, ऑटो और सीमेंट कंपनियों के शेयरों में खासी तेजी देखने को मिली।



    नई दिल्ली में केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सातवां वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने के कैबिनेट के फैसले के बारे में मीडिया को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस आयोग की रिपोर्ट को लागू करने से सरकार पर सालाना 1.02 लाख करोड़ रुपये का सालाना भार आएगा।



    मीडिया के मुताबिक जेटली की कही बातों का मुख्य अंश -
    • 3 बड़े हाइवे प्रोजेक्‍टस को कैबिनेट की मंजूरी।
    • पंजाब, ओडिशा और महाराष्‍ट्र में हाइवे का प्रस्‍ताव।
    • महिलाओं के लिए रोजगार का अवसर बढ़ाने की कोशिश।
    • महिलाओं को देर तक काम करने की इजाजत का प्रस्‍ताव।
    • 5वां पे कमिशन आया था तो सरकार को उस पर निर्णय लेने के लिए 19 महीने लगे, जबकि 6वें में 36 महीने लगे थे।
    • पे और पेंशन के संबंध में कमिशन की सिफारिशों को सरकार ने स्‍वीकार किया है। 1 जनवरी 2016 से लागू होंगी।
    • 47 लाख सरकारी कर्मचारी और 56 लाख पेंशनर्स पर प्रभाव पड़ेगा।
    • निजी सेक्‍टर से सरकारी सेक्‍टर की सैलरी की तुलना की गई। निजी सेक्‍टर से तुलना के आधार पर सिफारिश की गई।
    • कमेटी की सिफारिशें आने तक मौजूदा भत्‍ते जारी रहेंगे।
    • सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को अधिकतर स्वीकार किया गया है।
    • ग्रुप इंश्‍योरेंस के लिए सैलरी से कटौती की सिफारिश नहीं मानी।
    • इस साल एरियर का 12 हजार करोड़ का अतिरिक्‍त बोझ पड़ेगा।
    • क्लास वन की सैलरी की शुरुआत 56100 रुपये होगी।
    • वेतन आयोग रिपोर्ट में जो भी कमी है उसे एक समिति देखेगी।
    • ग्रैच्युटी को 10 लाख बढ़ाकर 20 लाख किया गया।
    • एक्स ग्रेशिया लंपसम भी 10-20 लाख से बढ़ाकर  25-45 लाख रुपये किया गया।
    • वेतन आयोग द्वारा सुझाए गए भत्तों पर वित्त सचिव अध्ययन करेंगे और फिर इस अंतिम निर्णय होगा।
    • कुछ कर्मचारी संगठनों के विरोध के प्रश्न पर जेटली ने कहा कि विरोध का कोई औचित्य नहीं है।
    इससे पहले जेटली ने ट्वीट कर कहा था कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशनभोगियों के पेंशन में ऐतिहासिक वृद्धि करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी।



    मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जेटली ने एक ट्वीट में कहा, "सातवें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा केंद्र सरकार के अधिकारियों, कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को उनके वेतन और भत्तों में ऐतिहासिक वृद्धि पर बधाई।" वेतन आयोग की सिफारिशों को मिली मंजूरी का लाभ केंद्र सरकार के करीब 47 लाख कर्मचारियों और 52 लाख पेंशनभोगियों को मिलेगा। जेटली बुधवार को ही बाद में अन्य विवरणों की और जानकारी देंगे।



    बहरहाल आम नागरिकों के हक हकूक और उनके संवैधानिक, नागरिक और मानवाधिकारों के मामले में कहीं भी संसदीय हस्तक्षेप नहीं है।



    आर्थिक सुधार हों या विदेशी पूंजी निवेश या विदेशी मामलों में राष्ट्रहित या सीधे तौर पर देश के प्राकृतिक संसाधनों का मामला,हमारे जनप्रतिनिधि हाथ पांव कटे परमेश्वर हैं और अब शत प्रतिशत निजीकरण और शत प्रतिशत विनिवेश के कायाकल्प के दौर में सनातन भारत के आधुनिक यूनान बनने की पागल दौड़ में भारतीय संसद की बची खुची भूमिका भी खत्म है।



    केंद्र सरकार तो संसद की परवाह करती ही नहीं है,किसी मंत्री को भी किसी की परवाह नहीं करनी है।



    अंधाधुंध विकास के बहाने अबाध पूंजी के लिए सारे दरवाजे और खिड़कियां खोल दिये गये हैं। परियोजनाओं की मंजूरी में तेजी लाने के लिये सरकार ने विभागों और मंत्रालयों के वित्तीय अधिकार बढ़ा दिये हैं।केंद्र सरकार के मंत्री  अब 500 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं को मंजूरी दे सकेंगे। अब तक उन्हें केवल 150 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं और कार्यक्रमों को मंजूरी देने की शक्ति प्राप्त थी।



    निरंकुश सत्ता ने अभिनव आर्थिक सुधार के तहत सत्ता का अभूतपूर्व विकेंद्रीकरण कर दिया है और इसके तहत अत्यधिक केंद्रीयकरण के आरोप का सामना करने वाली केंद्र सरकार ने अपने मंत्रालयों को चार गुना अधिक वित्तीय अधिकार प्रदान कर दी है।



    मतलब यह कि जनता के अच्छे दिन जब आयेंगे,तब आयेंगे, मंत्रालयों और मंत्रियों के दिन सुनहरे हैं और राजकाजाऔर राजधर्म की स्वच्छता पर मंतव्य राष्ट्रद्रोह भी हो सकता है,इसलिए यह कहना जोखिमभरा है।



    बहरहाल  अब हर मंत्री चाहे तो देश में कहीं भी नियमागिरि या बस्तर या दंडकारण्य में कहीं भी आदिवासियों के सीने पर या अन्यत्र कहीं भी समुद्र तट,अभयारण्य या उत्तुंग हिमाद्रिशिखर पर स्थानीय जनगण या स्थानीय निकायों की कोई सुनवाई किये बिना, पर्यावरण हरी झंडी के बिना, किसी संस्थागत मंजूरी के बिना,संसदीय अनुमति के बिना अबाध पूंजी की निरमल गंगा बहा सकते हैं और उस गंगा में हाथ धोने की आजादी भी होगी।



    गौरतलब है कि उदारीकरण के ईश्वर की विदाई के लिए वैश्विक व्यवस्था का महाभियोग नीतिगत विकलांगकता का रहा है जिसकी वजह से अरबों अरबों डालर की परियोजनाएं लटकी हुई थीं।



    जाहिर है कि अब लंबित और विवादित परियोजनाओं को चालू करने के लिए कहीं किसी अवरोध को खत्म करने के लिए  सरकार या संसद के हस्तक्षेप की जरुरत भी नहीं होगी।



    कोई भी केंद्रीय मंत्री अपने स्तर पर पांच सौ करोड़ की परियोजना मंजूर करने की स्थिति में दिशा दिशा में विकास के जो अश्वमेधी घोड़े कारपोरेट लाबिंग और हितों के मुताबिक दौड़ा सकेंगे,उसपर संसद या भारतीय जनगण का कोई अंकुश नहीं होगा,मंत्री के हाथ मजबूत करने का मतलब यही है।



    वित्त मंत्रालय के अनुसार मंत्रियों को गैर-योजनागत परियोजनाओं को मंजूरी देने के संबंध में प्रशासनिक मंत्रालयों के प्रभारी मंत्री के लिए सीमा बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये तक दी है। अब केंद्रीय मंत्री 500 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं को मंजूरी दे सकेंगे।



    अब तक यह सीमा 150 करोड़ रुपये थी। मंत्रालय का कहना है कि 500 करोड़ रुपये से 1,000 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं को मंजूरी देने की शक्ति वित्त मंत्री के पास होगी। वहीं 1000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को मंजूरी के लिए कैबिनेट या कैबिनेट की आर्थिक मामलों संबंधी समिति के पास जाना पड़ेगा।



    सरकार ने यह फैसला सरकार के अलग-अलग स्तरों पर परियोजनाओं को मंजूरी देने के संबंध में प्रक्रिया में बदलाव कर लिया है। मंत्रालय का कहना है कि केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों और विभागों के सभी प्रकार के गैर-योजनागत व्यय के संबंध में मंजूरी देने का काम करने वाली समिति अब 300 करोड़ रुपये तक के व्यय के प्रस्तावों को मंजूरी दे सकेगी। अब तक इस समिति को 75 करोड़ रुपये तक के प्रस्ताव को मंजूरी देने का अधिकार था।



    वहीं संबंधित मंत्रालय की स्थाई वित्त समिति अब 300 करोड़ रुपये तक की गैर-योजनागत परियोजनाओं के प्रस्तावों पर विचार करेगी। सरकार ने परियोजनाओं की बढ़ी लागत के संबंध में भी सचिवों और फाइनेंशियल एडवाइजर्स के अधिकार बढ़ाए हैं।



    एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) की यूनिटों को बाजार में शेयरों की तरह ही खरीदा बेचा जा सकता है। इस फंड का पैसा चुनिंदा शेयरों, बांड, जिंस और सूचकांक आधारित अनुबंधों में लगाया जाता है। ईपीएफओ ने पिछले साल अगस्त में ईटीएफ में निवेश शुरू किया था पिछले वित्त वर्ष के दौरान ईपीएफओ में बढ़े हुए कोष का पांच प्रतिशत ईटीएफ में जमा किया गया था। अब इस अनुपात को और बढ़ाने का विचार चल रहा है। मंत्री ने कहा, 'ईपीएफओ के न्यासी विभिन्न संबद्ध पक्षों के साथ परामर्श करने के बाद ईटीएफ में निवेश का अनुपात बढ़ाने के संबंध में फैसला करेंगे।'



    दत्तात्रेय ने कहा, 'रपट के विश्लेषण पर विचार के बाद मैं अध्यक्ष के तौर पर सीबीटी के अन्य सदस्यों के साथ ईटीएफ में निवेश का अनुपात बढ़ाने पर चर्चा करुंगा। पिछले साल यह पांच प्रतिशत था। वित्त मंत्रालय के निवेश पैटर्न के लिहाज से यह 15 प्रतिशत तक जा सकता है।' मंत्री ने कहा कि 31 मार्च 2016 तक 6,577 करोड़ रुपये की राशि का निवेश किया था जो 0.37 प्रतिशत बढ़कर 6,602 करोड़ रुपये हो गया। 30 अप्रैल 2016 को 6,674 करोड़ रुपये का निवेश 1.68 प्रतिशत बढ़कर 6,786 करोड़ रुपये हो गया। यह प्रस्ताव कानून विभाग के पास जाएगा जिसके बाद यह मंजूरी के लिए मंत्रिमंडल के पास भेजा जाएगा।



    मंत्री ने कहा कि फैक्ट्री अधिनियम में पेशवर सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा आकलनकर्ताओं के लिए नए प्रावधान पेश करने की भी जरूरत है। सुरक्षा आकलनकर्ताओं से जुड़ा प्रस्ताव कानून मंत्रालय के पास जाएगा और फिर यह मंत्रिमंडल के पास जाएगा। श्रम मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि सुरक्षा आकलनकर्ता की अवधारणा पेश करने के लिए संबंध में त्रिपक्षीय परामर्श पेश किया जा चुका है क्योंकि इस संबंध में दो दौर की वार्ता हुई है।



    ब्रेक्सिट के बाद से दुनियाभर के बाजारों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। और अब भारत पर इसका कितना असर होगा इसपर बात करते हुए एचडीएफसी के वाइस चेयरमैनऔर सीईओ केकी मिस्त्रीने कहा कि ब्रेक्सिट का भारत पर सीधा असर होने की आशंका नहीं है। लेकिन आगे रुपया कुछ कमजोर हो सकता है। आरबीआई ने फॉरेक्स का अच्छा इस्तेमाल किया है।



    केकी मिस्त्री ने ये भी कहा कि करेंसी पर करेंट अकाउंट डेफिसिट का असर दिख सकता है। पूरी दुनिया में कहीं ग्रोथ नहीं हुई है, लेकिन भारत में हालात बेहतर नजर आ रहे हैं। बाजार में अब भी लिक्विडिटी बनी हुई है। रुपया 5-7 फीसदी और कमजोर होना चाहिए। आगे निवेश बढ़ने से एनपीए घटेगा और ग्रोथ बढ़ेगी।
    इसी बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दुकानों, शॉपिंग मॉल व अन्य प्रतिष्ठानों को साल के 365 दिन खुला रखने की अनुमति देने वाले एक मॉडल कानून को आज मंजूरी दे दी। इस कानून से इन प्रतिष्ठानों को अपनी सुविधा के अनुसार कामकाज करने यानी खोलने व बंद करने का समय तय करने की सुविधा मिलेगी। इस कानून के दायरे में विनिर्माण इकाइयों के अलावा वे सभी प्रतिष्ठान आएंगे जिनमें 10 या अधिक कर्मचारी हैं पर यह विनिर्माण इकाइयों पर लागू नहीं होगा।



    यह कानून इन प्रतिष्ठानों को खुलने व बंद करने का समय अपनी सुविधा के अनुसार तय करने तथा साल के 365 दिन परिचालन की अनुमति देता है। इसके साथ ही इस कानून में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ महिलाओं को रात्रिकालीन पारी में काम पर लगाने की छूट तथा पेयजल, कैंटीन, प्राथमिक चिकित्सा व क्रेच जैसी सुविधाओं के साथ कार्यस्थल का अच्छा वातावरण रखने का प्रावधन किया गया है।



    सूत्रों ने जानकारी देते हुए बताया, 'द मॉडल शॉप्‍स ऐंड इस्टेबलिशमेंट (रेग्यूलेशन ऑफ इंप्लायमेंट ऐंड कंडीशन ऑफ सर्विसेज) बिल 2016 को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है।' इस मॉडल कानून के लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। श्रम मंत्रालय द्वारा रखे गए प्रस्ताव के तहत राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से संशोधन करते हुए इस कानून को अपना सकते हैं। इस कानून का उद्देश्य अतिरिक्त रोजगार सृजित करना है क्योंकि दुकानों व प्रतिष्ठानों के पास ज्यादा समय तक खुले रहने की आजादी होगी जिसके लिए अधिक श्रमबल की जरूरत पड़ेगी।



    यह आईटी व जैव प्रौद्योगिकी जैसे उच्च दक्ष कर्मचारियों के लिए दैनिक कामकाजी घंटों (नौ घंटे) तथा साप्ताहिक कामकाजी घंटों (48 घंटे) में भी छूट देता है। इस कानून को विधाई प्रावधानों में समानता लाने के लिए डिजाइन किया गया है जिससे सभी राज्यों के लिए इसे अंगीकार करना आसान होगा और देश भर में समान कामकाजी माहौल सुनिश्चित होगा।


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    -- सेज पर बैठी दीदी चली अबाध पूंजी के बुद्धदेव राजमार्ग पर
    दीदी अपनी छवि में कैद रही हैं जो अब नारदा शारदा दफा रफा हो जाने के बावजूद धूमिल हैं तो किसी महान कलाकार की तरह वे भी अब आत्म ध्वंस के मूड में अपनी तराशी हुई छवि तिलांजलि देने की तैयारी में हैं और जिस सिगूर और नंदीरग्राम से उनकी विजयगाथा की शुरुआत है वहीं उसे परिणति देने के लिए वे अब फिर बुद्धदेव के चरण चिन्ह पर चलकर सेज सवार अश्वमेधी सिपाहसालार हैं।

    चुनाव भी विकल्पहीनता,नेतृत्वविहीन वामपक्ष की अविस्वसनीयता और सक्रिय संघ  समर्थक मोदी दीदी गुपचुप गठबंधन से जीतने के बाद वोटबैंक साधने की तात्कालिक कोई अवरोध दीदी के समाने नहीं है और इसीलिए फिर बंगाल में सेज समयहै।
    अबभी  केंद्र के वेतनमान राज्यकर्मचारियों के वेतनमान की तुलना में वहीं आधा अधूरा है।इस वजह से राज्य सरकारों के लिए अभूतपूर्व कर्मचारी आंदोलन का मुकाबला करना अनिवार्य है जबकि उनका सारा राजस्व कर्मचारियों के वेतन और भत्ते में खर्च होता है और केंद्र से मिले अनुदान को भी इसी मद पर खर्च करने के सिवाय उनका राजकाज असंभव है।इसलिएअबाध पूंजी की दौड़ में राज्यसरकारें कम पगलायी नहीं है।

    আলোচনায় রাজি সরকার, 'সেজ'নিয়ে আশার আলো


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
    हस्तक्षेप
    आनंद बाजार के मुताबिकः

    আলোচনায় রাজি সরকার, 'সেজ'নিয়ে আশার আলো

    mamata

    ছবি:পিটিআই

    বিশেষ অর্থনৈতিক অঞ্চলের (সেজ) অনুমোদন দেওয়ার ব্যাপারে কোনও আশ্বাস নেই। তবে এই তকমা থাকলে একটা শিল্প সংস্থা যে সব সুবিধা পায়, তার সবই দিতে রাজি রাজ্য সরকার। এমনকী, এ ব্যাপারে ইনফোসিস এবং উইপ্রোর সঙ্গে আলোচনাতেও আগ্রহী তারা। এবং এই সংস্থার লগ্নির দরজা খোলা রইল বলেই মত শিল্পমহলের।
    গত পাঁচ বছরে একটিও শিল্প সংস্থাকে 'সেজ'অনুমোদন দেয়নি মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের সরকার। ইনফোসিস বারবার আর্জি জানানো সত্ত্বেও রাজারহাটে ৫০ একর জমিতে তাদের প্রস্তাবিত ক্যাম্পাসকে 'সেজ'তকমা দিতে রাজি হননি মুখ্যমন্ত্রী। ফলে ঝুলে রয়েছে ৫০০ কোটি টাকার লগ্নি। এ রাজ্যে উইপ্রোর প্রথম ক্যাম্পাস 'সেজ'হলেও রাজারহাটে তাদের প্রস্তাবিত দ্বিতীয় ক্যাম্পাস সেই অনুমোদন পায়নি। আটকে গিয়েছে দু'টি প্রকল্প মিলিয়ে প্রায় ৪০ হাজার কর্মসংস্থানের সম্ভাবনাও।
    কিন্তু এই ছবিতে সম্প্রতি কিঞ্চিৎ বদল এসেছে উইপ্রো কেন্দ্রীয় সরকারের সেজ সংক্রান্ত পরিচালন পর্ষদ বা বোর্ড অব অ্যাপ্রুভালসের কাছে রাজারহাটে 'সেজ'তৈরির ব্যাপারে নতুন করে আবেদন জানানোয়। তথ্যপ্রযুক্তি শিল্প মহলের অনেকেই মনে করেন, রাজ্যের থেকে ন্যূনতম ইঙ্গিত না পেলে দীর্ঘ পাঁচ বছর পরে এই আবেদন করত না উইপ্রো।
    साभार आनंद बाजार पत्रिका

    केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों का यह असर हुआ कि विदेशी पूंजी और विनिवेश के लिए राज्यसरकारों में घमासान है।केंद्र सरकार के करीब एक करोड़ कर्मचारियों के लिए सातचवें वेतन आयोग की सिफारिशें मंजूर करने की घोषणा हो गयी है जबकि राज्य कर्मचारियों के लिए अनेक राज्यों में छठे वेतन आयोग की सिफारिशें अभी तक लागू हो नहीं पायी।मसलन बंगाल में छठां वेतनमान की सिफारिशें लागू करने का ऐलान तो हो गया है लेकिन महंगाई भत्ता न मिलने की वजह से टेक होम  आधा अधूरा है।

    अबभी  केंद्र के वेतनमान राज्यकर्मचारियों के वेतनमान की तुलना में वहीं आधा अधूरा है।इस वजह से राज्य सरकारों के लिए अभूतपूर्व कर्मचारी आंदोलन का मुकाबला करना अनिवार्य है जबकि उनका सारा राजस्व कर्मचारियों के वेतन और भत्ते में खर्च होता है और केंद्र से मिले अनुदान को भी इसी मद पर खर्च करने के सिवाय उनका राजकाज असंभव है।इसलिएअबाध पूंजी की दौड़ में राज्यसरकारें कम पगलायी नहीं है।

    केंद्र से लगातार पैकेज ओवर ड्राफ्ट वगैरह वगैरह के तोहफे के बावजूद।सरकार चलानी है तो विकास के सब्जबाग दिखाने अनिवार्य है और इसीलिए विभिन्न दलों और विचारधाराओं की सरकारे अब केंद्र सरकार के अश्वमेधी अभियान में शामिल हैं।

    बंगाल में ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनावों में भीरी बहुमत हासिल करके विपक्ष का सफाया कर दिया है और सत्तादल क्या पूरे बंगाल में इनकी मर्जी कालीघाट की मां काली की मर्जी से कम निरंकुश नहीं हैं।लेकिन खाली खजाना और कर्मचारियों के वेतन भत्ते के साथ विकास के सब्जबाग को जमीन पर अंजाम देने की चुनौती उनके लिए भी बेहद मुश्किल है।

    कुछ वैसे ही संकट में वे फंसी हैं जैसे कामरेड ज्योति बसु के भूमि सुधार और विकेंद्रीयकरण की कृषि प्राथमिक राजकाज के बाद उनके चरण चिन्ह पर चलाना नये मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के लिए एकदम असंभव हो गया था।

    कोलकाता और तेजी से शहरीकरण और बढ़ती हुई बेरोजगारी के मुकाबले पहला कार्यकाल के बाद भारी बहुमत से जीते बुद्धदेव ने विचारधारा और पार्टी दोनों को तिलांजलि देकर सिंगुर नंदीग्राम के सेज अभियान के जरिये पूंजी वादी विकास का राजमार्ग पर चलाना चाहा तो नंदीग्राम में पुलिस को गोली क्या चलानी पड़ी कि तबतक शांत सिंगूर में भूमि अधिग्रहण के बाद ऐसा भयंकर जनांदोलन हो गया कि शेरनी की तरह मैदान फतह करके मुख्यमंत्री बन गयी ममता बनर्जी।

    अपने पहले कार्यकाल में दीदी शेर की पीठ से उतरने की हिम्मत नहीं कर सकी और लगातार भूमि अधिग्रहण विरोधी तेवर में रही जिस वजह से राज्य में उद्योग और कारोबार का रथ जमीनोंदोज होता चला गया।

    अब उसे पटरी पर लाने के सिवाय दीदी के लिए पहले छठा वेतनमान और फिर सातवां वेतनमान लागू करना असंभव साबित हो रहा है।

    इसलिए दीदी फिर उसी सेज पर बैठ गयीं और नंदीग्राम में दीघा के पर्यटन विकास के लिए नब्वे मील जमीन के टुकड़े के अधिग्रहण का कोई प्रतिरोध नहीं हुआ देखकर फिर भारी बहुमत से महाबिल वे बुद्धदेव के चरण चिन्ह पर चलकर पूंजी और निवेश की तलाश में हैं।

    इंफोसिस और विप्रो को सेज देने की मनुहार वे मान चुकी हैं और सेज केंद्रित स्मार्ट सिटी केंद्रित, मेट्रों केंद्रित,बुलेट केंद्रेत ,माल और हब केंद्रित विकास के रास्ते अंधी दौड़ में वे बुद्धदेव को पीछे छोड़ने की तैयारी में हैं लेकिन अब भी उनका दावा है कि जबरन भूमि अधिग्रहण वे नहीं करेंगी।

    अंडाल में विमान नगरी का विरोध सत्तादल के बाहुबल से खत्म करने के बाद किसी जनांदोलन की चुनौती जाहिरा तौर पर उनके सामने नहीं हैं।

    कांग्रेस और वामपक्ष का जनाधार धंस चुका है और वहां जमीनी स्तर पर नेतृत्व करके कोई जनांदोलन खड़ा करने लायक प्रतिपक्ष नहीं है जबकि तेजी से खिल रहे कमल वनों में हिांस और घृणा के तमाम जीवजंतुओ की भूमिगत और सतही हरकतों के बावजूद उनका एजंडा असम के बाद बंगाल को केसरिया बनाना है और जल जंगल जमीन को लेकर केसरिया वानर सेना का कोई सरदर्द वैसे ही नहीं है जैसे केसरिया राज्यों में सर्वत्र सलवा जुड़ुम अश्वमेधी अभियान से हिंदुत्व की पैदल फौजों को कोई ऐतराज नहीं है।

    रेलवे कर्मचारी हड़ताल के रास्ते रवानगी की उड़ान पर है और बाकी कर्मचारी संगठनों ने हिसाब किताब लगाकर देख लिया कि सातवां वेतन आयोग की सिफारिशों की मंजूरी दरअसल चूं चूं का मुरब्बा है और भविष्यनिधि और दूसरी सुविधाय़े सीधे बाजार में जाने की वजह से उन्हें हासिल कुछ नहीं होने वाला है।

    इस पर तुर्रा स्थाई नियुक्ति न होने के कारण और चौबीसों घंटा बाजार खुला रखकर निनिदा नियुक्ति के बाद अब अंशकालिक सेवा के जरिये रोजगार सृजन के पथ पर सब्जबाग बहुतेरे हैं लेकिन रोजगार की कोई गारंटी नहीं है।

    निजीकरण और विनिवेश की वजह से हर सेक्टर में व्यापक चंटनी अब अश्वमेधी राजसूय है।इन परिस्थियों में केद्रीय कर्मचारियों के लिए भी आगे आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

    दीदी अब राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर परिपक्व हैं और अच्छी तरह समज रही हैं कि तुरंत पूंजी और निवेश के तमाम दरवाजे नहीं खुले तो खैरात बांटकर आम जनता तो क्या अपने समर्थकों को भी बांधे रखना मु्शिकल है।

    पहले ही दीदी गुजरात के विकास माडल के तहत निजी उद्यम को प्राथमिकता देने की घोषणा करती रही हैं और उनकी सारी परियोजनाएं,परिकल्पनाएं पीपीपी माडल के मुताबिक है तो केंद्र सरकार के विकास के माडल को अंजाम देना उनके लिए सैद्धांतिक या वैचारिक कोई पहेली वैसे ही नहीं है,जैसे राज्यों में राजकाज चला रहे रंग बिरंगे क्षत्रपों का यह सरदर्द कभी नहीं रहा है।

    चुनाव भी विकल्पहीनता,नेतृत्वविहीन वामपक्ष की अविस्वसनीयता और सक्रिय संघ  समर्थक मोदी दीदी गुपचुप गठबंधन से जीतने के बाद वोटबैंक साधने की तात्कालिक कोई अवरोध दीदी के समाने नहीं है और इसीलिए फिर बंगाल में सेज समयहै।

    दीदी अपनी छवि में कैद रही हैं जो अब नारदा शारदा दफा रफा हो जाने के बावजूद धूमिल हैं तो किसी महान कलाकार की तरह वे भी अब आत्म ध्वंस के मूड में अपनी तराशी हुई छवि तिलांजलि देने की तैयारी में हैं और जिस सिगूर और नंदीरग्राम से उनकी विजयगाथा की शुरुआत है वहीं उसे परिणति देने के लिए वे अब फिर बुद्धदेव के चरण चिन्ह पर चलकर सेज सवार अश्वमेधी सिपाहसालार हैं।
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    दो करोड़ बांग्लादेशी शरणार्थी सीमापार घुसने के इंतजार में

    असम में अल्फा राज और बंगाल में उग्र हिंदुत्व के नजारे बांग्लादेश के हालात और मुॆस्किल बना रहे हैं

    यह संकट सुलझाने के लिए राजनीति से ज्यादा कारगर राजनय हो सकती है और फिलव्कत वह दिशाहीन है।भारतीय राजनीति के रंग में राजनय डूब गयी है या कारपोरेटहितों के मुताबिक कारोबारही राजनय है,ऐसा कहा जा सकता है।इसलिए भारत से बाहर भारतीयहितों के मद्देनजर हमारी राजनय सिरे से फेल है और बांग्लादेश ही नहीं,पाकिस्तान,नेपाल,श्रीलंका समेत इस महादेश में और बाकी दुनिया में भारतीयविदेश मंत्रालय,विदेसों में भरतीय दूतावास और कुल मिलाकर भारतीय राजनय प्राकृतिक संसाधनों की खुली नीलामी और अबाध पूंजी बेलगाम मुनाफावसूली के अलावा किसी काम की नहीं है।हालात इसलिए अग्निगर्भ है और भारतीय नागरिक इसीलिए कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।

    वे कौन से मुसलमान हैें जो पाक रमाजान माह में नमाज,रोजा और इफ्तार के अमन चैन के बाजाये कत्लाम में मशगुल है।बांग्लादेश की प्रधानमत्री शेख हसीना वाजेद की यह कथा व्यथा है जो निहायत दलित आत्मकथा नहीं ह।यह इस महादेश तो क्या,पूरी दुनिया का सच है।


    ढाका के राजनयिक इलाके गुलशन में आतंकी हमला,मुठभेड़ और फिर सबकुछ ठीकठाक का रोजनामचा है,मुंबई इसका भोगा हुआ यथार्थ है तो दिल्ली में चाणक्यपुरी या व्ही आईपी जोन में अभी हमला नहीं हुआ पर भारतीय संसद में हमला हो गया है और देश में कोई भी ठिकाना,कोई भी शहर,कोई भी धर्मस्थल और कोई भी नागरिक अब सुरक्षित नहीं है।


    जो मारे नहीं गये,अंत में वे मारे जायेंगे।रोज रोज के तजुर्बे के बावजूद हम पल दर पल मौत का सामान बना रहे हैं और हमारा सामाजिक उत्पादन यही आत्मध्वंस है।


    हमारा बंगाली  विभाजन पीडित शरणार्थियों से निवेदन है कि बंधुआ वोट बैंक बने रहकर उनका कोई भला नहीं हुआ है और वे आदिवासियों की तरह एकदम अलगाव में है।इसलिए बाकी जनता के साथ गोलबंदी से ही उन्हें इस नरक यंत्रणा से मुक्ति मिल सकती है।


    ऐसा हम दलितों,पिछड़ो,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों से भी कह रहे हैं कि हम अब अकेले जिंदा रह नहीं सकते इस नरसंहारी अश्वमेध समय में जबकि राजनय,राजनीति और अर्थव्यवस्था में हमारा हस्तक्षेप असंभव है और लोकतंत्रा का अवसान है।समता और न्याय के लक्ष्य बहुत दूर हैं।



    पलाश विश्वास


    रंग बिरंगे आतंकवादी हमले अब इस दुनिया को रोजनामचा लाइव है।न्यूयार्क 9/11 के ट्विन टावर विध्वंस के बाद यह दुनिया अप इंसानियत का मुल्क नहीं है और सभ्यता अविराम युद्ध या फिर गृहयुद्ध है।तेलकुओं की आग से धधक रही है पृथ्वी और सोवियत संघ के विभाजन से लेकर ब्रेक्सिट तक विभाजन नस्ली रंगभेदी अंध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद है तो वही आतंकवाद है और फासिज्म का राजकाज भी वहीं।जम्हूरियत और इंसानियत दोनों जमींदोज है तो फिजां कयामत बहार है।


    असम में अल्फा केसरिया राज है और बंगाल में संघ परिवार का कैडर भर्ती अभियान चल रहा है।यह संजोग है कि कोलकाता में बांग्लादेस हाईकमीशन पर हिंदू जागरण मंच और हिंदू संहति मच के प्रदर्शन और सीमा पर नाकेबंदी के साथ ही गुलशन ढाका में आतंकी हमला हो गया है।


    भारत में हिंदुत्व का धर्मोन्मादी कार्यक्रम अपनाकर हम बांग्लादेश को तेजी से अपने शिकंजे में ले रहे इस्लामिक बाग्लादेश राष्ट्रवाद और इस्लामिक स्टेट का मुकाबला तो कर ही नहीं सकते बल्कि हमारी ऐसी कोई भी ङरकत बांग्लादेश के दो करोड़ अल्पसंख्कों को कभी भी शरणार्थी बना सकती है।


    हमारी हर क्रिया की प्रतिक्रिया बांग्लादेश में कई गुमा ज्यादा आवेग और वेग के साथ होती है और ऐसे हालात में वहां धर्मनरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों के लिए भी भारत की तरह अल्पसंख्यकों  का रक्षाकवच बन पाना निहायत मुश्किल है।


    भारत में सत्ता का केंद्रीयकरण हो चुका है और सत्ता यहां निरंकुश है तो इसके मुकाबले बांग्लादेश में सत्ता अस्थिर डांवाडोल है और वहां विपक्ष में मजहबी धर्मोन्माद भारत के सत्ता पक्ष के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद से कहीं मजबूत है।


    इसके अलावा जैसे रंगबिरंगे बजरंगियों पर न संघ परिवार और न भारत सरकार और न कानून व्यवस्था को कोई नियंत्रण है,उसीतरह बांग्लादेश में वहां की प्रधानमंत्री,सरकार और कानून व्यवस्था का कोई नियंत्रण पक्ष विपक्ष के धर्मोन्मादी आतंकी तत्वों पर नहीं  है।


    इसके उलट हिंदुओं की बेदखली के अभियान में आवामी लीग के कार्यकर्ता और नेता रजाकर वाहिनी और जिहादियों के मुकाबले किसी मायने में कम नहीं है।हम सिलसिलेवार हस्तक्षेप पर ऐसी रपटें भी लगाते रहे हैं।


    यह संकट सुलझाने के लिए राजनीति से ज्यादा कारगर राजनय हो सकती है और फिलवक्त वह दिशाहीन है।


    भारतीय राजनीति के रंग में राजनय डूब गयी है या कारपोरेटहितों के मुताबिक कारोबारही राजनय है,ऐसा कहा जा सकता है।


    इसलिए भारत से बाहर भारतीयहितों के मद्देनजर हमारी राजनय सिरे से फेल है और बांग्लादेश ही नहीं,पाकिस्तान,नेपाल,श्रीलंका समेत इस महादेश में और बाकी दुनिया में भारतीयविदेश मंत्रालय,विदेसों में भरतीय दूतावास और कुल मिलाकर भारतीय राजनय प्राकृतिक संसाधनों की खुली नीलामी और अबाध पूंजी बेलगाम मुनाफावसूली के अलावा किसी काम की नहीं है।


    हालात इसलिए अग्निगर्भ है और भारतीय नागरिक इसीलिए कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।


    वे कौन से मुसलमान हैें जो पाक रमाजान माह में नमाज,रोजा और इफ्तार के अमन चैन के बाजाये कत्लाम में मशगुल है।बांग्लादेश की प्रधानमत्री शेख हसीना वाजेद की यह कथा व्यथा है जो निहायत दलित आत्मकथा नहीं ह।यह इस महादेश तो क्या,पूरी दुनिया का सच है।


    ढाका के राजनयिक इलाके गुलशन में आतंकी हमला,मुठभेड़ और फिर सबकुछ ठीकठाक का रोजनामचा है,मुंबई इसका भोगा हुआ यथार्थ है तो दिल्ली में चाणक्यपुरी या व्ही आईपी जोन में अभी हमला नहीं हुआ पर भारतीय संसद में हमला हो गया है और देश में कोई भी ठिकाना,कोई भी शहर,कोई भी धर्मस्थल और कोई भी नागरिक अब सुरक्षित नहीं है।


    हमले किसी भी वक्त कहीं भी हो सकते हैं तो यह समस्या सिर्फ बांग्लादेश की नहीं है।


    जब कोई सुरक्षित नहीं है ऐसे में हम मुक्तबाजारी कार्निवाल में अपनी छीजती हुई क्रयशक्ति और गहराते रोजगार आजीविका संकट,कृषि संकट,उत्पादन संकट और हक हकूक के सफाये के दौर में कैसे सुरक्षित हो सककते हैं,फुरसत में ठंडे दिमाग सेसोच लीजिये।


    बंगाल की आबादी नौ करोड़ हैं और इनमें कमसकम तीस फीसद मुसलमान हैं और बड़ी संख्या में गैरबंगाली हैं जो कोलकाता और आसनसोल दुर्गापुर शिल्पांचल से लेकर सिलिगुडीड़ी से लेकर दार्जिलिंग कलिम्पोंग  तक में गैरबंगाली आबादी बहुसंख्य है।


    इस हिसाब से बंगाल में हिंदू तीन करोड़ भी होगे या नहीं,इसमें शक हैइसके विपरीत उत्तर प्रदेश और असम,छत्तीसगढ़ और ओड़ीशा में दलित हिंदू विभाजन पीड़ित शरणार्थी, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,आंध्र के शरणार्थी और बाकी देश में बंगाली हिंदू दलित विभाजन पीड़ित शरणार्थी दोगुणा तीन गुणा ज्यादा है,जो बंगाल के इतिहास भूगोल से बाहर विभिन्ऩ राज्यों के सत्तावर्ग और राजनीतिक दलों के गुलाम हैं।हमने लगातार उनसे सपर्क बनाये रखा है और हम उन्हें गोलबंद करने का जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं।


    हमारा बंगाली  विभाजन पीडित शरणार्थियों से निवेदन है कि बंधुआ वोट बैंक बने रहकर उनका कोई भला नहीं हुआ है और वे आदिवासियों की तरह एकदम अलगाव में है।इसलिए बाकी जनता के साथ गोलबंदी से ही उन्हें इस नरकयंत्रणा से मुक्ति मिल सकती है।


    ऐसा हम दलितों,पिछड़ो,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों से भी कह रहे हैं कि हम अब अकेले जिंदा रह नहीं सकते इस नरसंहारी अश्वमेध समय में जबकि राजनय,राजनीति और अर्थव्यवस्था में हमारा हस्तक्षेप असंभव है और लोकतंत्रा का अवसान है।समता और न्याय के लक्ष्य बहुत दूर हैं।


    सच यह है कि 1947 से बंगाली हिंदू शरणार्थियों की  संख्या बिना नागरिकता,बिना नागरिक और मानव अधिकारों के लगातार बढ़ती रही है।राजधानी दिल्ली और मुंबई में कोलकाता से ज्यादा शरणार्थी है और उत्तर भारत के हर छोटे बड़े शहर में उनकी भारी तादाद है तो देश भर में मेहनत मशक्कत के तमाम कामकाज में वे ही लोग हैं


    1977 में पराजय झेल चुकी इंदिरा गांधी से पिताजी पुलिनबाबू के बहुत अच्छे ताल्लुकात थे।हम होश संभालते ही पिताजी की अविराम सक्रियता की वजह से किसावन आदिवासी आंदोलन के अलावा शरणार्थी समस्या से भी दो दो हाथ करते रहे हैं और देश भर के शरणार्थियों की समस्या हमें बचपन से सिलसिलेवार मालूम है।


    पिताजी से हमेशा हमारी बहस का यही मुद्दा रहा है कि सिर्फ बंगाली शरणार्थी के बारे में ही क्यों,हम बाकी लोगों को लेकर आंदोलन क्यों नहीं कर सकते और क्यों शरणार्थी समस्या का स्थाई हल नहीं निकाल सकते।


    अपनी जुनूनी प्रतिबद्धता के बावजूद,सबकुछदांव पर लगाकर सबकछ खो देने के बावजूद  वे कुछ खास करने में नाकाम रहे और शरणार्थी समस्या और आतंक की समस्या अब एकाकार है और यह भारत के अंदर बाहर के सभी शरणार्थियों,सभी दलितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के जीवन मरण की समस्या है,बाकी नागरिकों के लिए भी।लगता है कि लडाई शुरु करने से पहले ही हम पिता की तरह फेल हैं।


    इंदिराजी से पिताजी की हर मुलाकात से पहले उन्हें हमने बार बार आगाह किया कि वे उनपर दबाव डालें कि भारत सरकार की शरणार्थी नीति में पुनर्वास के अलावा भारतीय राजनय और राजनीति की दिशा दशा बदलने के लिए वे पहल करें।


    इंदिरा गांधी तब इंदिरा गांधी थीं और तब बंगाली शरणार्थी आज की तरह संगठित भी नहीं थे।हम नहीं जानते कि गदगद भक्तिभाव के अलावा पिताजी अपने संवाद में दबाव डालने की स्थिति में थे या नहीं,क्योंकि उनके पास धन बल बाहुबल जनबल कुछ भी नहीं था।


    वे अपने हिसाब से देश भर में जहां तहां दौड़ लगाते लगाते रीढ़ के कैंसर से दिवंगत हो गये 2001 में और तब से हम देख रहे हैं कि हालात लगातार बेकाबू होते जा रहे हैं और हमारे अपने लिए भी जिंदा रहना,सक्रियबने रहना कितना मुश्किल है।


    1971 की तरह फिर बांग्लादेश से शरणार्थी सैलाब फूटा तो बंगाल में उनके लिए मरीचझांपी नरसंहार के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।


    भारत के दूसरे राज्यों में ही वे मरने खपने पहुंचेंगे और उन राज्यों में उनकी जो गत होगी सो होगी,उन राज्यों का क्या होगा,यह हसीना वाजेद की फौरी और स्थाई समस्याओं से भारी दीर्घकालीन समस्या हमारी है।


    हम लगातार बताते रहे हैं कि बांग्लादेश में हालात कितने अग्निगर्भ है।पिछले साल आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अल्पसंख्यकों की बेदखली के लिए हत्या, लूटपाट, संघर्ष के अलावा 490 महिलाओं के साथ बलात्कार की वारदातें हुई हैं।


    गौरतलब है कि बांग्लादेश में अब भी हिंदू,ईसाई,आदिवासी और बौद्ध समुदायों के करीब दो करोड़ अल्पसंख्यक हैं और वे लगातार निशाने पर हैं।भारत में कही भी कुछ घटित होता है तो उसकी तीखी प्रतिक्रिया यही होती है कि तुरंत बांग्लादेश में साफ्ट टार्गेट अल्पसंख्यकों पर हमले शुरु हो जाते हैं।


    ऐसे व्यापक हमले हजरत बल प्रकरण के बाद 1964 के आसपास हुए जबकि 1960 में पूरे असम बांगाल खेदओ आंदोलन हुआ और फिर 1971 में भारत में 90 लाख शरणार्थी आ गये।


    बांग्लादेश की आजादी की उपलब्धि के बावजूद उस घटना की छाप हमारी राजनीति और अर्थव्यवस्ता में गहरी पैठी हुई है और 1971 से हमें निजात मिली नहीं है।जिसकी फसल हम अस्सी के दशक में बार बार काटते रहे हैं और बम धमाकों में हमारी सबसे प्रिय प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी की 31 अक्तूबर 1984 को हत्या हो गयीं और सिखों का नरसंहार हो गया।


    उनका बेटा राजीव गांधी संघ परिवार के समर्थन से प्रधानमंत्री तो बने लोकिन श्रीलंका में शांति सेना भेजने की कीमत उन्हें भी बम धमाके में अपनी जान गवांकर अदा करनी पड़ी।अस्सी के दशक में ही असम में उल्फाई तत्वों की अगुवाई में छात्र युवा आंदोलन हुए और असम और त्रिपुरा में खून का समुंदर उमड़ने लगा।


    अब वही असम अल्फा के हवाले है।


    बाबरी विध्वंस के बाद बने हालात का दस्तावेज तसलिमा नसरीन का उपन्यास लज्जा है,जिनने अपने हालिया स्टेटस में भारत में गोमांस निषेध के संघ परिवार के आत्मगाती आंदोलन की हवाला देकर धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद पर तीखे प्रहार किये और गुलशन में हुए हमले के दौरान जब नई दिल्ली में सभी भारतीयों के सुरक्षित होने के दावे किये जा हे थे,तभी तसलिमा ने ट्विटर पर संदेश दे दिया कि गुलशन में भारतीय किशोरी संकट में है,जिसे भारतीय राजनय आखिर कार बचा नहीं सकी।


    आप हस्तक्षेप या हमारे ब्लागों को देख लीजिये,हम लगातार हिंदी,बांग्ला,अंग्रेजी और असमिया में भी सरहदों के आर पार कयामती फिजां के बारे में आपको आगाह करते रहे हैं।तसलिमा नसरीन पिछले तेइस साल से बांग्लादेश के हालात और अल्पसंख्यक उत्पीड़न की वजह से भारत में सबसे मशहूर शरणार्थी हैंं तो सीमा पार से शरणार्थी सैलाब थम ही नहीं रहा है।अब दो करोड़ और इंतजार में हैं


    साल भर में कितने ब्लागरों,लेखकों,पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की हत्या बांग्लादेश में होती रहती है और वहां धर्मनिरपेश लोकतांत्रिक ताकतों की गोलबंदी कितनी और कैसी है,हम लगातार बताते रहे हैं।


    असम चुनावों के बाद अल्फा का रंग केसरिया हो जाने के बाद असम में केसरिया अल्फाई राजकाज से गुजराचत नरसंहार से वीभत्स नरसंहारी माहौल सीमा के आर पार कैसा है,हम लगातार बता रहे हैं।लगता है कि आपने गौर नहीं किया।


    हमारी औकात दो कौड़ी की है।प्रोफाइल है ही नहीं।कभी बड़ी नौकरी के लिए हमने एप्लाई नहीं की सरकारी चाकरी के लिए दस्तखत नहीं किया और बाजर में खुद को नीलमा करने के लिए बोली नहीं लगाई तो हम सीवी भी बना नहीं सके अब तक।बायोडाटा भी नहीं है अपना।1973 से जो लोग मुझे लगातार जानते रहे हैं,वे हमारे कहे लिखे को भाव नहीं देते तो कासे शिकवा करें।


    पहले खाड़ी युद्ध से हम लगातार इस देश के अमेरिकी उपनिवेश बनने की चेतावनी देते रहे हैं और संपूर्ण निजीकरण और संपू्र्ण विनिवेश के विरुद्ध अपनी औकात के मुताबिक देशभर में जनमोर्चे पर सक्रिय रहे हैं। अपना बसेरा तक नहीं बना सके और अब एकदम सड़क पर हूं और हालात ऐसे बने रहे हैं कि राशन पानी के लिए भीख मांगने की नौबत आ सकती है लेकिन मेरा लिखना बोलना न थमा है और न थमेगा।


    ताजा हालात ये है कि असम में अल्फा के राजकाज में भारत चीन युद्ध के बाद अरुणाचल की चीन से लगी सीमाओं पर जैसे चटगांव से बेदखल चकमा शरमार्थियों को ढाल के बतौर बसाया गया है,भारत बांग्ला सीमा सील कर देने के ऐलान के बावजूद बीएसएफ की मदद से सीमापार से हिंदू दलितों को असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में बसाया जा रहा है ताकि उनका इस्तेमाल भविष्य में मुसलमानों के किलाफ दंगा फसाद में बतौर ढाल और हथियार किया जा सके।


    हम हिटलरशाही की बात खूब करते हैं और यह हिटलरशाही क्या है,थोड़ा असम के डीटेंशन कैंपों में घूम लें तो पता चलेगा।यह भाजपा या संघ परिवार का कारनामा मौलिक नहीं है।कापीराइट कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का है।जिनने नागरिकता कानून के तहत अस में दशकों से रह रहे,सरकारी सेवा में काम कर रहे लोगों को कट आफ ईअर के लिहाज से संदिग्ध विदेशी होने के जुर्म में डीवोटर करके सपरिवार इन कैंपों में डालना शुरु किया और अब संघ परिवार के निशाने पर हैं असम के तमाम मुसलमान तो अल्फा की नजर में हैं बीस लाक हिंदू शरणार्थी औऱ भारतके दूसरे राज्यों से असम आकर दशकों से आजीविका कमा रहे लोग।



    हम इस नये असम के नजारे देखते हुए भी नजरअंदाज करते रहे हैं।


    आजकल रात के  दो बजे तक सो जाता हूं।फिर सुबह जल्दी उठकर कहीं कार्यक्रम न हुआ तो तत्काल पीसी पर मोर्चा जमा लेता हूं।


    आज करीब सुबह साढ़े सात बजे हमारे आदरणीय गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने फोन किया और यक्ष प्रश्न के मुखातिब खड़ा कर दिया कि क्या जाति और वर्ग की राजनीति एकसाथ चल सकती है।


    हमें उन्हें कैफियत देनी पड़ी कि जाति के नाम जिस तरह से राजनीति के शिकंजे में हैं बहुजन ,उसके मद्देनजर इस सामाजिक यथार्थ को नजरअंदाज करके हम कोई सामाजिक आंदोलन बदलाव के लिए खड़ा नहीं कर सकते और हमारा राजनीतिक सरोकार बस इतना है कि लोकतंत्र सही सलामत रहे और हम फासिज्म के राजकाज के खिलाफ तमाम सामाजिक शक्तियों को गोलबंद कर लें।


    लंबी बातचीत में वैकल्पिक मीडिया और हस्तक्षेप के बारे में भी बातें हुईं और यह स्पष्ट भी करना पड़ा कि मेरा उत्तराखंड वापसी क्यों असंभव है और कोलकाता में बने रहना क्यों जरुरी है।


    लगता है कि गुरुजी को मैंने संतुष्ट कर दिया।फोन रखते ही सविता बाबू ने टोक दिया कि व्यवहारिक बातचीत के बिना सैंद्धांतिक बहस से क्या बनना बिगड़ना है।


    उनने कह दिया कि गुरुजी ने सबसे पहले हस्तक्षेप की मदद की पेशकश की थी तो उनने अपने शिष्यों से हस्तक्षेप के लिए कोई अपील जारी क्यों नहीं की या न्यूनतम मदद क्यों नहीं की,इस पर बात हमने क्यों नहीं की।


    सही मायने में अमावस की अखंड रात है यह वक्त और काली अंधेरी सुरंग में कैद हूं.न रिहाई की राह निकलती दिख रही है और न जंजीरें टूटने की कोई सूरत है और न रेशांभर रोशनी कही नजर आ रही है।


    दिशाबोध सिरे से गड्डमड्ड है।रासन पानी बंद होने का वक्त है यह और समाज में बने रहने के बावजूद अकेले चक्रव्यूह में मारे जाने का भी वक्त है यह।


    हम मुकम्मल तेलकुंआ बने महादेश में दावानल के शिकंजे में हैं और बुनियादी जरुरतों से बड़ी प्राथमिकता अब कयामती यह फिजां जितनी जल्दी है ,उसे बदलने की है।आपदाओं से टूटने लगा है हिमालय और सारे के सारे किसानों,मजदूरों,बच्चों,युवाओं और स्तिरियों के हाथ पांव कटे हैं और दसों दिशाओं से खून की नदियां निकलती हुई दीख रही है,जबकि पीने को पानी और सांस लेने को आक्सीजन की भारी किल्लत है।


    भारत विभाजन के वक्त हुई मारकाट हमारे पुरखों की स्मृतियों में से हमारे वजूद में पीढ़ी दर पीढ़ी संक्रमित है और यह महादेश विभाजन की उस प्रक्रिया से अभीतक उबरा नहीं है।शरणार्थी सैलाब देस की सीमाओं से जितना उमड़ रहा है,उससे कही ज्यादा देश के अंदर है और अब तो गरीब बहुजनों की बेदखली हिमाचल जैसी देवभूमि में चलन हो गया है और उत्तराखंड की एक एक इंच जमीन बेदखल है।


    अर्थव्यवस्था सिरे से अंततक शेयर बाजार है और उत्पादन प्रणाली है ही नहीं तो समाज भी फर्जीवाड़ा है और सामाजिक यथार्थ भी मुक्तबाजार का केसरिया जलजला है जो आत्मध्वंस के अलावा क्या है,परिभाषित करना मुश्किल है।


    सारा सौंदर्यबोध मुक्त बाजार का सौंदर्यहबोध है।भाषाएं बोलियां,माध्यम,विधाएं सबकुछ इसी मुक्तबाजार में निष्णात।अपने समय,अपने स्वजनों और देश दुनिया को सूचना क्रांति के इस परलय समय में कैसे सच से आगाह करें,जिंदा बचे रहने से बड़ी चुनौती अभिव्यक्ति का यह अभूतपूर्व संकट है।


    भारत विभाजन रोक ना पाना हमारी आजादी की लड़ोई को बेमतलब बना गया। आजादी भी फर्जी साबित होने लगी है और हम दरअसल भारत विभाजन से कभी उबरे ही नहीं है।


    विभाजित कश्मीर में यह पल दर पल कुरुक्षेत्र का शोकस्तब्ध विलाप और अखंड सैन्यशासन है तो मध्यभारत में सलवा जुड़ुम।


    पश्चिम पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को पुनर्वासित करने में कामयाबी मिल गयी लेकिन सिखों को नरसंहार 1984 में इतना भयानक हो गया कि विभाजन की त्रासदी फीकी हो गयी।


    इसीतरह गायपट्टी में विभाजन की प्रक्रिया अभी धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण है और बहुजन आंदोलन तेज होते रहने के बावजूद सामाजिक बदलाव हो नहीं रहा है और राजनीति वही संघ परिवार की शक्ल में हिंदू महासभा बनाम अनुपस्थित मुस्लिम लीग है।


    भारत पाकिस्तान द्विपाक्षिक संबंध सरहदों पर अविराम युद्ध है और इन्ही पेचीदा राजनीतिक राजनयिक संबंधों की वजह से प्रतिरक्षा खर्च के बहाने लोकतात्रिक लोक गणराज्य और लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पनाएं ध्वस्त है और यही ऩफरत,जंग और जिहाद हमारी आंतरिक सुरक्षा,राष्ट्रीय एकता और अंखडता,बहुलता और विविधिता मध्ये एकात्मकता को सिरे से खत्म कर रही हैं और हम कुछ

    भी बचा लेने की हालत में नहीं है।


    अपनी जान माल भी नहीं।

    मौत सर पर नाच रही है।


    कोई भी कहीं भी कभी भी बेमौत मारा जा सकता है।


    जो मारे नहीं गये,अंत में वे मारे जायेंगे।रोज रोज के तजुर्बे के बावजूद हम पल दर पल मौत का सामान बना रहे हैं और हमारा सामाजिक उत्पादन यही आत्मध्वंस है।



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    #DHAKA ATTACK आतंक के राजनीतिक फर्जीवाड़ा का खुलासा

    मारे गये हमलावर सभी बेगुनाह लोग बताये जा रहे हैं और आावामी लीग के नेता का बेटा लिस्ट में होने के बावजडूद उसकी लाश नजर नहीं आ रही है।


    बांग्लादेश में जो हो रहा है,वह इस महादेश के लिए बेहद खतरनाक है।ढाका के राजनयिक इलाका गुलशन के लोकप्रिय रेस्तरां में आतंकवादी हमला का यह ड्रामा भयंकर सत्ता संघर्ष है।यह मामला गुजरात और यूपी के फर्जी मुठभेड़ और मालेगांव धमाकों की तरह है।


    मारे गये हमलावर सभी बेगुनाह छात्र युवा  बताये जा रहे हैं और बताया जा रहा है कि वे पुलिस हिरासत में थे।वारदात को अंजाम देने के बादउन्हें मारकर आंतंकवादी बना दिया गया।


    अगर हम इसे आईएस का हमला मान भी लें तो सवाल यह है कि ढाका में भारतीय दूतावास मेहमाननवाजी और दावतों के सिवाय क्या कर रहा था जो उसे भनक तक नहीं पड़ी क्योंकि बांग्लादेश की सीमा पाकिस्तान सीमा की तरह बंद नहीं है और समूचे पूर्वोत्तर, बंगाल,बिहार,असम और त्रिपुरा में बांग्लादेश से भारी संख्या में शरणार्थी सैलाब के साथ साथ भारतविरोधी तत्वोंकी ऐसी घुसपैठ संभव है जिसे हम पाकिस्तान सीमा की तर्ज पर निबटा नहीं सकते।

    इससे खतरनाक बात यह है कि अब तक भारतीय महादेश में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं बनी है,जो अब बन रही है बहुत तेजी से।मसलन बांग्लादेश में अगर अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप हुआ तो अंजाम भारत के लिए इराक और अफगानिस्तान से बहुत बुरा होगा।सीरिया से जैसे शरणार्थी सैलाब ने यूरोप कब्जा लिया है,वैसा बी नहीं होगा।सारे शरणार्थी भारत आयेंगे और तेलकुंओं की आग से भारत को बचाना असंभव होगा।


    सुबह भारत के मंत्रिमंडल में फेरबदल होने जा रहा है और नये चेहरे भी शामिल होने है तो थोड़ी बहुत छंटनी भी होनी है।यह कवायद कोई राजकाज या राजधर्म के हिसाब से नहीं होने जा रहा है।यह यूपी का चुनाव जीतने का विशुध हिंदुत्व है।ढाका का मतलब भी वही है।


    पलाश विश्वास

    सेफ को आंतंकवादी बताने के खिलाफ सोशल मीडिया में यह पोस्ट वाइरल है,जो गुलशन कांड में आतंक के राजनीतिक फर्जीवाड़ा का खुलासा करता है।

    "ক্ষমা করে দিও মা, তোমার প্রশ্নের জবাব আমার কাছে নাই" রেস্টুরেন্টের নিহত প্রধান শেফকে জঙ্গী বানানো হয়েছে। জাতির চোখে আর কত ধুলা দেয়া হবে ? জাতি কি অন্ধ ?? আসলে কি হচ্ছে এসব ??? প্রিয় স্বদেশের নাটক কি আর শেষ হবে না ????? ~ জাহিদ এফ সরদার সাদী ‪#‎dhakaattack‬

    "ক্ষমা করে দিও মা, তোমার প্রশ্নের জবাব আমার কাছে নাই"

    রেস্টুরেন্টের নিহত প্রধান শেফকে জঙ্গী বানানো হয়েছে। জাতির চোখে আর কত ধুলা দেয়া হবে ? জাতি কি অন্ধ ?? আসলে কি হচ্ছে এসব ??? প্রিয় স্বদেশের নাটক কি আর শেষ হবে না ????? ~ জাহিদ এফ সরদার সাদী

    ‪#‎dhakaattack‬

    Zahid F Sarder Saddi - জাহিদ এফ সরদার সাদী's photo.

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    Yesterday at 11:28am·

    "ক্ষমা করে দিও মা, তোমার প্রশ্নের জবাব আমার কাছে নাই"

    রেস্টুরেন্টের নিহত প্রধান শেফকে জঙ্গী বানানো হয়েছে। জাতির চোখে আর কত ধুলা দেয়া হবে ? জাতি কি অন্ধ ?? আসলে কি হচ্ছে এসব ??? প্রিয় স্বদেশের নাটক কি আর শেষ হবে না ????? ~ জাহিদ এফ সরদার সাদী

    ‪#‎dhakaattack‬




    बांग्लादेश में जो हो रहा है,वह इस महादेश के लिए बेहद खतरनाक है।ढाका के राजनयिक इलाका गुलशन के लोकप्रिय रेसतरां में आतंकवादी हमला का यह ड्रामा भयंकर सत्ता संघर्ष है।यह मामला गुजरात और यूपी के फर्जी मुठभेड़ और मालेगांव धमाकों की तरह है।


    मारे गये हमलावर सभी बेगुनाह लोग बताये जा रहे हैं और आावामी लीग के नेता का बेटा लिस्ट में होने के बावजडूद उसकी लाश नजर नहीं आ रही है।


    आतंक  के इस राजनीतिक फर्जीवाड़े का खुलासा इसलिए भी बेहद जरुरी है कि राजनयिक पहल के तहत समस्या का सथाई समाधान करने के लिए भारत के सत्तावर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं है और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के मामले का राजनीतिक इस्तेमाल के तहत पश्चिम बंगाल में उग्र हिंदुत्व के तहत सत्ता हासिल करने तक यह मामला सीमाबद्ध नहीं है।


    इसके साथ ही मुजीबउर रहमान की आवामी लीग का अंध समर्थन करते रहने की अंध विदेशनीति की वजह से भारतीय जनता और भारतीय राजनीति और भारत सरकार के लिए वहां पक रही खिचड़ी का जायजा लेना असंभव है।


    संबसे गंभीर आरोप यह है कि यह वारदात अंजाम देने में आतंकी हमलावर नहीं बल्कि बांग्लादेश की पुलिस और रैब का हाथ है और ट्विटर पर आतंकी संगठनों के नाम जिम्मेदारी लेने वाले पोस्ट करने वाले भी बांग्लादेश के सरकारी सर्वोच्च सत्र के अफसर हैं।


    इसके अलावा जिन आतंकवादियों पर हमले की जिम्मेदारी डाली गयी है,उनमें से एक आवामी लीग के बड़े नेता का बेटा है और छह हमलावरों में उसकी लाश गायब है।


    जो आधिकारिक चित्र इस वारदात के जारी किये गये हैं,उनकी प्रामाणिकता को भी चुनौती दी जा रही है।

    मसलनः


    আনসার আল ইসলামের নামের টুইটগুলি ঢাকা থেকে করেন মনিরুল- সিটিটিসির কর্মকর্তার তথ্য।

    आरोप है कि अंसार अल इस्लाम के नाम पर सारे ट्विट सिटीटीसी के अफसर मणिरुल ने जारी किये।


    इसी सिलसिले में Qamrul Islam ने लिखा है।हस्तक्षेप पर यह पोस्ट साझा किया जा  चुका है।जो बेहद खतरनाक है और अगर सच है तो पूरे महादेश के आतंक के फ्रजीवाड़े के खुल्ला खेलफर्रूखाबादी का खुलासा है।बेहतर हो कि इनआरोपों को गंभरता से लेकर बारत सरकार भारत के हितों के मद्देनजर इसके सच की जांच पड़ताल भी कर लें.इस पोस्त में कमारुल इस्लाम ने लिखा हैः

    নাম না প্রকাশ করে ডিএমপির কাউন্টার টেররিজম অ্যান্ড ট্রান্সন্যাশনাল ক্রাইম সেলের এসপি পর্যায়ের এক অফিসার জানিয়েছেন, আর্টিজানের ঘটনাটি কোনো আইএস অ্যাটাক নয়। আইএস হামলা হলে প্রধানমন্ত্রী শেখ কোনো অবস্থাতেই ফোর লেইন উদ্বোধন করতে বাইরে যেতেন না। এধরনের বড় ঘটনা ঘটলে প্রধানমন্ত্রীর নিরাপত্তা আরও জোরদার করা হয়, আউটডোর প্রোগ্রামের তো কোনো প্রশ্নই ওঠে না।

    পুলিশ কতৃক প্রকশিত ৫ হত্যাকারীর ছবির মধ্যে চার জন মুবাশ্বির, নিব্রাস, আন্দালিব, মিনহাজ পরস্পর বন্ধু। কয়েকমাস আগে সন্দেহজনকভাবে এদেরকে পুলিশ আটক করে কাস্টডিতে রেখেছিল। এদের নিখোঁজ থাকা নিয়ে কয়েকটি জিডিও হয়ছে। সম্প্রতি উত্তরার অস্ত্র উদ্ধার নাটকের স্টোরি ফাঁস হয়ে যাওয়ায় পুলিশের ভাবমুর্তি দারুনভাব ক্ষুন্ন হয়। দরকার পরে আরেকটি সাংঘাতিক ঘটনার। তখনই আর্টিজান হামলা প্রোগ্রাম হাতে নেয় ডিজি র‌্যাব ও সিটিটিসির এডিশনাল কমিশনার। এই হামলার প্লটটি তৈরী করে সেটা বিশ্বাসযোগ্য করানোর জন্য পুলিশের সাথে গুলি বিনিময় ঘটানো হয়, তবে দুর্ভাগ্যজনকভাবে দু'জন কর্মকর্তাকে প্রাণ দিতে হয়। বিপি লাগানো থাকার পরেও গলায় আঘাত লেগে তারা মারা যায়। আর্টিজানের বিষয়টাকে জিইয়ে রাখা হয় ইচ্ছা করেই, চাইলে রাতের মধ্যে নিস্পত্তি করে ফেলা যেতো। কিন্তু সিভিয়ারিটি বাড়ানোর জন্য লম্বা সময় নিয়ে বেছে বেছে বিদেশী হত্যা করা হয়, আবার সেই ঘুরে ফিরে ইতালি ও জাপানীজ। যাতে করে আন্তর্জাতিক মিডিয়ায় গুরুত্ব পায়।

    आरोप है कि हमलावर बतौर मारे गये युवक महीनों से लापता थे और उनके लापता होने की रपट लिखायी गयी थी लेकिन उन्हें खोजने की कोशिश ही नहीं हुई।आप भारत में होने वाले फर्जी मुढभेड़ के मामलो से ऐसे तथ्यों की जांच कर लें।


    फिर महज कुछ महीनों में विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले मेधावी छात्र जो सोशल मीडिया में भी खासे  सक्रिय थे,इतने जुनूनी कैसे हो गये कि उनने इस भयंकर वारदात को अंजाम जबकि इस वारदात में अभी विदेशी हाथ कहीं दीख नहीं रहा तो इस घरेलू हिंसा की तैयारियों से पुलिस और खुफिया विभाग अनजान कैसे थे,इसपर कोई सफाई नहीं है।


    इससे भी ज्यादा गंभीर आरोप यह कि हमलावर बताये जा रहे युवक पुलिस हिरासत में थे और वारदात को उन्हें मारकर आतंकवादी उन्हें सजाया जा रहा है।


    खतरनाक बात यह भी है कि  भारत के हिंदुत्ववादी सत्तावर्ग और भारतीय मीडिया पर बांग्लादेश में 1971 की तर्ज पर सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी हसीना की मिलीभगत से करने का आरोप है और इस दुष्प्रचार के जरिये इस्लामी राष्ट्रवाद न सिर्फ गैर मुसलमान दो करोड़ की आबादी पर निशाना बांध रहा है,उसके निशाने पर बांग्लादेश में सक्रिय धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतें भी हैं।


    भारत विरोधी इस अभियान में पक्ष विपक्ष की राजनीति पूरी तरह शामिल है और भारतीय राजनय को इसकी काट नहीं है।


    सुंदरवन को भारत की निजी कंपनियों के हवाले कर देने के बारत बांग्लादेश सहयोग जैसे द्विपक्षीय संबंध से आम जनता में भी इस दुस्प्रचार की साख पर कोई संदेह नही है।


    घटना के बाद हम लगातार बांग्लादेश के हालात पर नजर रखे हुए हैं।आधिकारिक बयानों के अलावा विभिन्ऩ सूत्रों से मिली जानकारी हम लगातार टुकड़ा टुकड़ा मूल बांग्ला में शेयर करते रहे हैं जो बांग्लादेश के मीडिया और सोशल मीडिया में दहक रहे हैं लेकिन भारतीय मीडिया भारत सरकार या विदेश मंत्रालय को भोंपू बना हुआ है। जो सिर्फ हसीना सराकार के आधिकारिक बयान का समर्थन कर रहा है।


    जैसा कि सुबह हमने लिखा है कि गुलशन कांड कोई आतंकवादी हमला नहीं है,उसीके मुताबिक सारे तथ्य आहिस्ते आहिस्ते सामने आ रहे हैं।


    हमलावर बताये जा रहे युवाओं का महीनों से लापता रहना और अचानक हमलावरों की लाश में तब्दील हो जाना बांग्लादेश को हजम हो नहीं हो रहा है।


    जिस रेस्तरां में यह वीभत्स हत्याकांड हुआ,उसके बेगुनाह सेफ को आतंकवादी के बतौर पेश करना खबरों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।


    सारी रात इंतजार करके मुठभेड़ को पुलिस और रैब के मातहत अंजाम देना और भोर में सेना के हवाले करने से बड़ी संख्या में विदेशियों की हत्या हो जाना बेहद रहस्यजनक है और हसीना सरकार के पास इसका कोई साफ जवाब नहीं है।


    सेना को बुलाने के लिए इतनी देर क्यों की गयी और सेना के ढाका में मौजूदगी के बावजूद दो दो पुलिस अफसरों के मारे जाने के हालात में हमलावरों को विदेशी नागरिकों का कत्लेआम करने की छूट क्यों दी गयी है,हसीन सरकार के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है।मीडिया पर सेंसर लगू कर देने की वजह से उनकी साख भी दांव पर है।


    मसलन पूछा जा रहा है कि आवामी लीग के नेता  के बेटे रोहन इम्तियाज जिंदा है कि मुठभेड में मारा गया।हमलावरों की लाशों की जो तस्वीरें जारी की गयी है,उनमें रोहन की लाश नहीं है।


    मसलन पूछा जा रहा है कि क्या आवामी लीग के नेता  के बेटे रोहन इम्तियाज  को बचाने की कवायद में बेगुनाहों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।


    हमलावरों में शामिल कर दी गयी रेस्तरां के सेफ सेफुल इस्लमाम  की लाश की तस्वीर जारी होने के बाद यह सवाल और तीखा बनकर उभरा है।


    इसके अलावा कुल कितने हमलावर थे और सरकार की तरफ से जारी उनकी तस्वीरों की प्रामाणिकता के क्या सबूत हैं,यह सवाल भी पूछा जा रहा है।सरकार या आवामी लीग के नेता बता नहीं रहे हैं कि रोहन का क्या हुआ।वह जिंदा है या मार दिया गया।मारा गया है तो उसकी लाश कहां हैः

    গুলশানে নিহত দুজনের ছবি নিয়ে প্রশ্নঃ তার মানে আওয়ামী লীগ নেতার ছেলে রোহান ইমতিয়াজ কি বেঁচে আছে বা রোহানকে বাঁচাতেই কি রেস্তোরাঁর বাবুর্চি সাইফুলকে জীবন দিতে হলো? নতুবা রোহানের লাশ কই?

    রাজধানীর গুলশানের রেস্তোরাঁয় হামলাকারী সন্ত্রাসীর সংখ্যা ও তাদের ছবি নিয়ে প্রশ্ন উঠেছে। হামলায় একটি রাজনৈতিক দলের নেতার ছেলে রোহান ইমতিয়াজ হত্যাযজ্ঞে অংশ নিলেও অভিযোগ উঠেছে, সন্ত্রাসীদের লাশের সারির ছবিতে তিনি নেই। সেই ছবিতে রয়েছে রেস্তোরাঁর বাবুর্চি সাইফুল ইসলাম চৌকিদারের মরদেহ। সাইফুলের স্বজনদের দাবি, সাইফুল ওই রেস্তোরাঁয় কাজ করতেন। তিনি সন্ত্রাসী হামলায় জড়িত নন। অন্যদিকে রোহান ইমতিয়াজের বাবার বক্তব্য জানতে একাধিকবার চেষ্টা করা হলেও তিনি ফোন ধরেননি। তার মানে আওয়ামী লীগ নেতার ছেলে রোহান ইমতিয়াজ কি বেঁচে আছে বা রোহানকে বাঁচাতেই কি রেস্তোরাঁর বাবুর্চি সাইফুলকে জীবন দিতে হলো? নতুবা রোহানের লাশ কই?

    इसीतरह मारे जाने वाले तेरह विदेशी नागरिकों की मौत तक इंतजार करने के लिए  के लिए हसीना सरकार को जिम्मेदार बताया जा रहा है और अलग से पोस्ट भी डाले जा रहे हैं कि दरअसल हसीना को भारतीय सेना के पहुंचने का इंतजार था।

    গত শুক্রবার রাত পৌনে ৯টার দিকে একদল অস্ত্রধারী গুলশানের হলি আর্টিজান বেকারি নামের রেঁস্তোরায় ঢুকে দেশি-বিদেশি অতিথিদের জিম্মি করে। জিম্মিদের উদ্ধার করতে গিয়ে সন্ত্রাসীদের গুলি ও গ্রেনেড হামলায় নিহত হন বনানী থানার ভারপ্রাপ্ত কর্মকর্তা (ওসি) সালাউদ্দিন আহমেদ খান ও গোয়েন্দা পুলিশের সহকারী কমিশনার (এসি) রবিউল ইসলাম। এ ছাড়া আহত হন অনেক পুলিশ সদস্য। প্রায় ১২ ঘণ্টা পর শনিবার সকালে সেনাবাহিনীর নেতৃত্বে 'অপারেশন থান্ডারবোল্ট অভিযান'চালিয়ে রেস্তোরাঁর নিয়ন্ত্রণ নেওয়া হয়। সেখান থেকে ১৩ জন জিম্মিকে জীবিত এবং ২০ জনের মৃতদেহ উদ্ধার করা হয়। নিহতদের মধ্যে ১৭ জনই বিদেশি বলে আন্তঃবাহিনী জনসংযোগ পরিদপ্তর (আইএসপিআর) জানায়।

    सेना और प्रशासन के आधिकारिक बयान को चुनौती जा  रही है।मसलनः

    নিবার দুপুরে 'অপারেশন থান্ডারবোল্ট'অভিযানের বিষয়ে সংবাদ সম্মেলনে মিলিটারি অপারেশনসের পরিচালক ব্রিগেডিয়ার জেনারেল নাঈম আশফাক চৌধুরী বলেন, অভিযানে সাত সন্ত্রাসীর মধ্যে ছয়জন নিহত হয়। আহত হন আইনশৃঙ্খলা বাহিনীর ২০ সদস্য। একজনকে গ্রেপ্তার করা হয়।

    এদিকে হামলার পর জঙ্গিগোষ্ঠী ইসলামিক স্টেট (আইএস) গুলশানের রেস্তোরাঁয় হামলাকারী উল্লেখ করে পাঁচ তরুণের ছবি প্রকাশ করে। শনিবার রাতে ওই ছবিগুলো প্রকাশ করা হয় বলে জানিয়েছে জঙ্গিগোষ্ঠীর ইন্টারনেটভিত্তিক তৎপরতা নজরদারিতে যুক্ত যুক্তরাষ্ট্রভিত্তিক সাইট ইন্টেলিজেন্স গ্রুপ।

    ছয় সন্ত্রাসী নিহতের কথা বলা হলেও পুলিশ সদর দপ্তর রেস্তোরাঁয় হামলাকারী উল্লেখ করে পাঁচজনের লাশের ছবি প্রকাশ করে। পুলিশ তাদের নামও জানায়, আকাশ, বিকাশ, ডন, বাঁধন ও রিপন। তবে আরেক সন্ত্রাসীর ছবি ও নাম-পরিচয় প্রকাশ করেনি তারা।

    প্রশ্ন উঠেছে, পুলিশের পাঠানো লাশের ওই ছবি ও নাম নিয়ে। পুলিশ তাদের নাম জানায় আকাশ, বিকাশ, ডন, বাঁধন ও রিপন। আর টেররিজম মনিটরের টুইটার অ্যাকাউন্টে ওই তরুণদের ছবি দিয়ে তাদের নাম উল্লেখ করা হয়েছে- আবু উমায়ের, আবু সালাম, আবু রাহিক, আবু মুসলিম ও আবু মুহারিব।

    सोशल मीडिया और मीडिया में कम से कम चार हमलावर निर्बास इस्लाम,मीर साबेह मुवास्वेर,रोहन इम्तियाज राइयान नियाज के चित्र हमलावर बतौर छापे गये हैं लेकिन अभी तक रोहन की लाश की तस्वीर नहीं मिली और न कोई आधिकारिक खुलासा हैः


    তবে সামাজিক যোগাযোগ মাধ্যম ফেসবুক ও সংবাদমাধ্যমে আসা খবরে জানা যায়, হামলাকারীদের চারজনের নাম নিব্রাস ইসলাম, মীর সাবিহ মুবাশ্বের, রোহান ইমতিয়াজ ও রাইয়ান মিনহাজ।

    তবে সাইট ইন্টেলিজেন্সের টুইটারে ছবি প্রকাশের পর সংবাদমাধ্যমের কাছে পুলিশের পাঠানো হামলাকারীদের লাশের ছবিতে রোহান ইমতিয়াজের ছবি নেই।

    রোহান ইমতিয়াজের বাবা ইমতিয়াজ খান বাবুল সদ্য বিলুপ্ত অবিভক্ত ঢাকা মহানগর আওয়ামী লীগের যুব ও ক্রীড়া সম্পাদক ছিলেন। একই সঙ্গে তিনি সাইক্লিং ফেডারেশনের সাধারণ সম্পাদক এবং বাংলাদেশ অলিম্পিক অ্যাসোসিয়েশনের উপমহাসচিব।

    ফেসবুকে প্রকাশিত আরেকটি ছবিতে দেখা যায়, হলি আর্টিজান বেকারি প্রাঙ্গণে পাঁচজনের মরদেহ পড়ে আছে। সেখানে কোনো মরদেহের গায়ে সাদা পোশাক ছিল না। অথচ পুলিশের পাঠানো ছবিতে দেখা যায়, বাবুর্চির সাদা পোশাক পরা সাইফুল চোখ বন্ধ করে চিরনিদ্রায় শুয়ে আছেন।

    এদিকে জিম্মি ঘটনার পরপর বাবুর্চি সাইফুলের বোন তাঁর ছবি নিয়ে ওই রেস্তোরাঁর সামনে যান। ভাইয়ের ছবি হাতে বোনের ছবিটি বিভিন্ন সংবাদমাধ্যম এবং টেলিভিশনে প্রচারিত হয়। সে সময় নিখোঁজ ছবি হাতে সাইফুলের বোন সেলিনা জানিয়েছিলেন, তাঁদের বাড়ি শরীয়তপুরে নড়িয়া উপজেলার কলুকাঠি গ্রামে। সেলিনার দাবি, তাঁর ভাই হলি আর্টিজানে পিৎজা তৈরির বাবুর্চি হিসেবে কাজ করেন।

    সাইফুলের গ্রামের বাড়ির সদস্যরা জানান, কলুকাঠি গ্রামের মৃত আবুল হাসেম চৌকিদারের পাঁচ সন্তানের মধ্যে সাইফুল দ্বিতীয়। তাঁর ছোট ভাই বিল্লাল মালয়েশিয়া থাকেন। তিন বোন সবার বিয়ে হয়ে গেছে। দীর্ঘ ১০ বছর সাইফুল জার্মানিতে থাকার পর দেশে ফিরে আসেন। দেড় বছর আগে তিনি হলি আর্টিজান রেস্তোরাঁয় কাজ নেন।

    এদিকে নিহতদের ছবি নিয়ে বিভ্রান্তির ব্যাপারে পুলিশ সদর দপ্তর ও ঢাকা মহানগর পুলিশের জনসংযোগের দায়িত্বে থাকা একাধিক কর্মকর্তার বক্তব্য জানতে এনটিভি অনলাইনের পক্ষ থেকে কথা বলা হলেও তাঁরা বক্তব্য দিতে রাজি হননি। নাম প্রকাশে অনিচ্ছুক পুলিশ সদর দপ্তরের জনসংযোগ শাখার এক কর্মকর্তা বলেন, 'ছবির কথা ভুলে যান। পুলিশ নিহতদের ছবি কাউকে সরবরাহ করেনি।'

    এর আগে পুলিশের মহাপরিদর্শক (আইজিপি) এ কে এম শহীদুল হক গতকাল শনিবার সাংবাদিকদের জানান, হলি আর্টিজান বেকারিতে হামলাকারী নিহত ছয়জনই বাংলাদেশি। এদের মধ্যে পাঁচজন জেএমবি সদস্য এবং তাদের খোঁজা হচ্ছিল।



    अगर हम इसे आईएस का हमला मान भी लें तो सवाल यह है कि ढाका में भारतीय दूतावास मेहमाननवाजी और दावतों के सिवाय क्या कर रहा था जो उसे भनक तक नहीं पड़ी क्योंकि बांग्लादेश की सीमा पाकिस्तान सीमा की तरह बंद नहीं है और समूचे पूर्वोत्तर, बंगाल,बिहार,असम और त्रिपुरा में बांग्लादेश से भारी संख्या में शरणार्थी सैलाब के साथ साथ भारतविरोधी तत्वोंकी ऐसी घुसपैठ संभव है जिसे हम पाकिस्तान सीमा की तर्ज पर निबटा नहीं सकते।


    बहुत तेजी से नेपाल से भारत के रिश्ते राजनयिक दिवालियापन और हिंदुत्व के अंध एजंडे के कारण खराब होते गये और अब नेपाल में जो भी कुछ होना है,वह भारतीय हितों के मुताबिक नहीं होना है और नेपाल में भारत की दादागिरि हमेशा के लिए खत्म है।हूबहू बांग्लादेश में यही होने जा रहा है।


    अगर बांग्लादेश में इस्लामी राष्ट्रवादा की इतनी भयंकर सुनामी है तो वहां दो करोड़ गैर मुसलमान देर सवेर भारत में शरणार्थी बनने को मजबूर होगे जैसा कि सन 1947 से लगातार होता रहा है और इस समस्या के समाधान में भारत के सत्तावर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं रही है क्योंकि वह गिनिपिग की तरह शरणार्थियों के इस्तेमाल के लिए अभ्यस्त हैं और असंगठित शरणार्थी भी उनके खेल में शामिल हो जाते हैं।बंगाल से बाहर छितरा दिये जाने की वजह से भारत के हर राज्य में बंगाली शरणार्थी सत्तादल के वोटबैंक में तब्दील हैं और इसलिएकिसी भी राजनीतिक पहल की कोई संभावना नजर नहीं आती।


    इससे खतरनाक बात यह है कि अब तक भारतीय महादेश में विदेशी सैन्य हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं बनी है,जो अब बन रही है बहुत तेजी से।मसलन बांग्लादेश में अगर अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप हुआ तो अंजाम भारत के लिए इराक और अफगानिस्तान से बहुत बुरा होगा।सीरिया से जैसे शरणार्थी सैलाब ने यूरोप कब्जा लिया है,वैसा बी नहीं होगा।सारे शरणार्थी भारत आयेंगे और तेलकुंओं की आग से भारत को बचाना असंभव होगा।


    गौरतलब है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों नेहरु और इंदिरा गांधी से लेकर  अटल बिहारी वाजपेयी तक सभी प्रधानमंत्रियों ने पड़ोसियों के साथ संबंध बराबर बनाये रखने को प्राथमिकता दी है और महाशक्तियों के साथ गठबंधन से बचते हुए भारतीय उपमहाद्वीप में उनके सैन्य हस्तक्षेप की कोई जमीन बनने नहीं दी।


    आज का नेतृत्व जिस रेशमपथ पर चलने के बजाय रात दिन उड़ान के जरिये विश्वनेता बनने की मुद्रा में हैं,वह रेशम पथ इन्हीं नेताओं का बनाया हुआ है।क्योंकि ये तमाम लोग राजनेता के अलावा राष्ट्रनेता और राजनयिक दोनों थे।


    अब बांग्लादेश की खतरनाक घटनाओं के मद्देनजर भारतीय सैन्य हस्तक्षेप संभव है या नहीं,वहां विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के लिए जमीन तेजी से पक रही है।


    गुलशन मुछभेड कांड का जो भी सच हो,इस कांड में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक मारे जाने की वारदात सच है और भारत की राजनयिक नाकामी भी सच है।इसकी क्रिया प्रतिक्रिया के दुष्परिणाम बेहद दूरगामी होने हैं।


    राजनेता राष्ट्रप्रधान या सरकार का मुखिया भले बन जाये,लेकिन भारी बहुमत और बारी लोकप्रियता के बावजूद वह तब तक राष्ट्रनेता बन नहीं सकता जबतक वह पार्टीबद्ध राजकाज में सीमाबद्ध रहता है और पार्टी के एजंडे से बाहर राष्ट्रहित में कदम उठाने का जोखिम वह उठा नहीं पाता।


    इसके लिए छप्पन इंच का सीना उतना जरुरी नहीं है,बल्कि देश को जोड़ने की दक्षता और सभी तबकों के प्रतिनिधित्व करने की ईमानदारी बेहद जरुरी है।सहिष्णुता,बहुलता और लोकतंत्र में एकात्म राष्ट्रीयता अनिवार्य है।समता और न्याय भी।


    सैन्य शक्ति और पारमानविक अंतरिक्ष हथियारों की अंधी दौड़ और विदेशी शक्तियों के साथ युगलबंदी से किसी राष्ट्र की एकता और अखंडता,प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा की गारंटी नहीं है जबतक सभी नागरिकों की जान माल की सुरक्षा की गारंटी न हो और राजनीति से ऊपर उठकर राजनयिक नेतृत्व का माद्दा नेतृत्व में न हो।आइने में अपना अपना चेहरा देख लें ,प्लीज।


    सुबह भारत के मंत्रिमंडल में फेरबदल होने जा रहा है और नये चेहरे भी शामिल होने है तो थोड़ी बहुत छंटनी भी होनी है।यह कवायद कोई राजकाज या राजधर्म के हिसाब से नहीं होने जा रहा है।यह यूपी का चुनाव जीतने का विशुध हिंदुत्व है।ढाका का मतलब भी वही है।


    भारत में राजनीतिक सत्तासंघर्ष के अलावा मुक्तबाजार का कारोबार ही सत्तावर्ग की देशभक्ति है।मुंबई में अंबेडकर भवन तुड़वाने में अंबेडकरी आंदोलन में संघ परिवार की खुली घुसपैठ और शिवसेना का वर्चस्व काम आया और दलितों के सारे राम संबूक हत्या में लगे हैं।दूसरी तरफ बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के एजंडे के तहत छात्र युवा वर्ग के आंदोलन से निबटने की चुनौती है।


    अंबेडकर भवन के टूटने के बाद अंबेडकरी आंदोलन में कमसकम महाराष्ट्र में नये सिरे से ध्रूवीकरण की प्रक्रिया शुरु हुई है तो सामने यूपी का चुनाव है।


    जाहिर है कि हिंदुत्व की पैदल फौजों को लामबंद करने के लिए आईएस खतरा बेहद घातक रसायन है जिसके तहत भारत में संदिग्ध आतंकवादी कहकर फिर मुसलमान युवाओं की गिरफ्तारी का सिलसिला हिंदुत्व ध्रूवीकरण के लिए आसान है।विभाजन पीड़ित हिंदू शरणार्थी बंगाल की कुल हिंदू आबादी से दो गुणा ज्यादा है और भारत भर में वे बिखरे हैं।उन्हें भी केसरिया सुनामी के शिकंजे में लेने की परियोजना पर तेजी से काम हो रहा है।


    ভারতীয় মিডিয়ার প্রশ্ন >> বাংলাদেশে জঙ্গী নিধনে ভারতীয় সেনাবাহিনীকে ডাকা হচ্ছে না কেন?

    বিডিটুডে.নেট:ভারতীয় মিডিয়ার প্রশ্ন >> বাংলাদেশে জঙ্গী নিধনে ভারতীয় সেনাবাহিনীকে ডাকা হচ্ছ�

    টুডে ডেস্ক কোলকাতা কেন্দ্রিক ভারতীয় অনলাইন পত্রিকা কোলকাতা২৪x৭ এর সম্পাদক নিখিলেশ রায় চৌধুরী প্রশ্ন করে লিখেছেন, বাংলাদেশে জজ্ঞী নিধনে ভারতীয় বাহিনীর সহায়তা নেয়া হচ্ছে না কেন?…

    BD-DESH.NET



    Chef of Dhaka cafe among dead gunmen: Family

    The family of a man, whose photo police have released as one of the Gulshan gunmen killed in rescue offensive, have claimed he was not a militant.

    BDNEWS24.COM


    Rampal contract signing likely on 11 July

    Engineering, procurement and construction (EPC) contract signing of Rampal coal-fired power plant and Bangladesh's potential joint venture investment in power sector are likely to dominate the upcoming meeting of the joint steering committee (JSC) on…

    EN.PROTHOM-ALO.COM

    মেজর রাহাত's photo.

    মেজর রাহাত's photo.

    মেজর রাহাত's photo.

    মেজর রাহাত's photo.

    মেজর রাহাত added 4 new photos.

    Yesterday at 3:55am·

    গুলশানে হামলাকারীদের একজন আওয়ামীলীগ নেতা ইমতিয়াজ বাবুলের ছেলে..সে অনেক দিন ধরেই নিখোঁজ ছিল..গত 21 তারিখে ইমতিয়াজ বাবুল ছেলেকে ফিরে আসতে ফেসবুকে আহবান করেছিলেন...

    ‪#‎DhakaTerrorAttack‬‪#‎Gulshan‬‪#‎Bangladesh‬

    মেজর রাহাত's photo.

    মেজর রাহাত

    Yesterday at 10:00am·

    গুলশানের আর্টিসান রেস্টুরেন্টের শেফকে জঙ্গি বানিয়ে দিলো পুলিশ। ঘাপলা ঠিক কোন জায়গায় ?




    Report missing members: Rab DG

    Rapid Action Battalion Director General Benazir Ahmed asks parents to inform law enforcement agencies if any of their children go missing.

    THEDAILYSTAR.NET


    Japan, Italy outraged

    Outraged at the killing of their citizens, Japan and Italy have sent high officials, counter-terrorism intelligence experts, response teams and victims' family members to Dhaka on special aircrafts.

    THEDAILYSTAR.NET


    Fasiul Alam's photo.

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    Fasiul Alam's photo.

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    Fasiul Alam added 4 new photos— with Hermann Zotenberg and 18 others.

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    গুলশানে নিহত দুজনের ছবি নিয়ে প্রশ্নঃ তার মানে আওয়ামী লীগ নেতার ছেলে রোহান ইমতিয়াজ কি বেঁচে আছে বা রোহানকে বাঁচাতেই কি রেস্তোরাঁর বাবুর্চি সাইফুলকে জীবন দিতে হ...

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    22 hrs·

    শ্রীমতি হাসিনা। আপনি কি সব লোক পালেন? এদের চিত্রনাট্য এত দুর্বল কেনো?

    ১) সেনাবাহিনী বলছে, গুলি করতে করতে ঢুকেছিল সন্ত্রাসীরা।

    ২) অথচ আপনার উপদেষ্টা গওহর রিজভি ...

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    In pictures: Floral vigil for Holey Artisan victims | Dhaka Tribune

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    NSG to help Bangladesh as Anti India sentiments boil.

    Four killed in unprecedented Eid terror attack in Bangladesh

    No doubt, Dhaka attack exposes shortcomings in Bangladesh's security apparatus.That is why Bangladesh PM Hasina is sieged within but the million dollar question yet to be answered how pragmatic would it be to intervene in Bangladesh to bail out Hasina while her party is linked with terror and she has lost control.

    No respite.Terror strikes Eid.It was a sacred Ramjan with bleeding muslims wordwide.This Islamists terror inflicts the good earth and Macca Madina not spared.Hate speeches by most possible next President of America and religious racist nationalism triggered everywhere has changed the scenaro of mass self destruction all on name of God,Religion and Jihad killing peace,humanity and civilization.It is alarming as back to back terror strikes in Bangladesh makes deeper cuts in nation bodies all over the subcontinent.Thogh,India is apared for the time being,anti India sentiments growing like the shaffron tsunamiat home heralds turmoiling time ahead which would be rather the toughest diplomacy challlenge.Meanwhile ,the Hindutva politics is engaged to revive Hindu Nation in Nepal.Horrible! Just horrible!We are making in Pakistan all around us.

    Palash Biswas


    Four killed in unprecedented Eid terror attack in Bangladesh.Terror struck Bangladesh for the second time within a week as the Muslim-majority nation celebrated the festival of Eid-ul-Fitr on Thursday.


    No respite.Terror strikes Eid.


    It was a sacred Ramjan with bleeding Muslims wordwide.This Islamist terror inflicted the good Earth and Macca Madina not spared.


    Hate speeches by most possible next President of America and religious racist nationalism triggered everywhere has changed the scenario of mass self destruction all on name of God,Religion and Jihad killing peace,humanity and civilization.


    It is alarming as back to back terror strikes in Bangladesh makes deeper cuts in nation bodies all over the sub continent. Though,India is spared for the time being,anti India sentiments growing like the saffron tsunami at home heralds turmoil time ahead which would be rather the toughest diplomacy challenge.


    Meanwhile ,the Hindutva politics is engaged to revive Hindu Nation in Nepal.Horrible! Just horrible!We are making in Pakistan all around us.


    No doubt, Dhaka attack exposes shortcomings in Bangladesh's security apparatus.That is why Bangladesh PM Hasina is siezed within but the million dollar question yet to be answered how pragmatic would it be to intervene in Bangladesh to bail out Hasina while her party is linked with terror and she has lost control.


    WHAT HAPPENED TO BANGLADESH BOMB EXPERTS AND BD MILITARY ORDINANCE EXPERT , BD MILITARY HAS THE LARGEST PEACE KEE[ONG CONTINGENT OF UN DEPLOYMENT IN THE WORLD , YET WE CANT HANDLE SOTAUTION IN OUR OW2N COUNTRY ???


    It is the mass sentiment burning in Bangladesh as media broke the news that India will send bomb experts of the National Security Group (NSG) to Bangladesh to help with investigations into two terror attacks in the country in a week.


    The Indian NSG team will "analyse and study" the bombings at an Eid prayer gathering in Kishoreganj on Thursday and the terror siege at a Dhaka cafe last Friday, say officials.


    This morning, a group of attackers hurled homemade bombs at a police team and attacked them with machetes, triggering a gun-battle near a mass gathering for Eid prayers at Kishoreganj, 140 km from Dhaka.


    The attack comes days after seven terrorists hacked to death 20 people at a Dhaka cafe.


    An explosion was followed by a gunfight between police and terrorists near a mass prayer ground in Kishoreganj area, about 100 kilometers from Bangladeshi's capital Dhaka, where around two hundred thousand people had turned up on the occasion of Eid, according to Indian media reports.


    At least four people were killed and many other injured, media reported. Among the dead was a policeman and a terrorist.


    A liberal imam or cleric, who was supposed to lead the Eid prayers, was believed to be the target of the unprecedented Eid strike which follows the Friday attack when a group of seven terrorists killed 20 hostages, including nine Italians, seven Japanese and an Indian, at a popular café in an upmarket area of Dhaka.


    The Eid day attack took place at around 9.30 am local time, while the prayers at the ground were to start at 10 am.


    In a nationwide anti-terror drive, Bangladeshi authorities recently detained several thousand people. The crackdown in Bangladesh, a country of 160 million, was launched after a series of attacks by suspected Islamic militants on liberal activists, secular bloggers and religious minorities.


    Most of the killings have been claimed by Islamic State and Al-Qaeda, but the government denies these terrorist organizations are active in Bangladesh. It says the attacks are the work of homegrown Islamic militants.

    Bangladesh has asked India to examine the speeches of controversial Mumbai-based preacher Zakir Naik after reports that two of the Dhaka attackers were inspired by him.

    An attacker detained by police said a team of eight men took part in the blast incident near Sholakia Eidgah on the Eid day morning.A police source seeking anonymity told Prothom Alo that the detainee, who is from Dinajpur and came to Sholakia on the…
    গত এক সপ্তাহে গুলশান ও কিশোরগঞ্জে সন্ত্রাসী হামলার পর ভারত ন্যাশনাল সিকিউরিটি গ্রুপের (এসএসজি) চার সদস্যের একটি বোমা বিশেষজ্ঞ দল পাঠাচ্ছে বাংলাদেশে। দলটি ওই দুই ঘটনার 'বিশ্লেষণ ও পর্যবেক্ষণ'করে বাংলাদেশকে সহায়তা করবে। তবে ওই বিশেষজ্ঞ দল বাংলাদেশে কবে আসবে, সে…
    A young man, who is suspected to be the attacker, was lying dead close to the spot after Thursday's Sholakia blast. The man, who police say was killed when fire was exchanged between them and the attackers, was wearing a blue panjabi and tight…
    News From Bangladesh shared a link.
    1 hr · 
    BNP chairperson Khaleda Zia on Thursday asked the government to quit handing over power to a neutral administration for holding a credible national election. "Since the BDR incident that killed 57 army officers, the government has failed to check the…

    বাংলাদেশে আসছে ভারতীয় নিরাপত্তা বাহিনী

    গুলশান ও শোলাকিয়ার ঘটনা তদন্তে বাংলাদেশে আসছে ভারতের অভ্যন্তরীণ নিরাপত্তা রক্ষায় নিয়োজিত সন্ত্রাসবিরোধী ফোর্স এনএসজি (ন্যাশনাল সিকিউরিটি গার্ড)। টাইমস অব ইন্ডিয়ার খবরে একজন কর্মকর্তাক

    But India's track record with Bangladesh and other South Asian countries is not too good. Pakistan can be halted at the Line of Control, but the very integrated economic and human resources relations makes such a scenario impossible with Bangladesh. But it already faces hostile public opinion. Whether India's involvement will make the matter better or worse only future can say.

    The Gulshan crisis has exposed some pretty serious fissures in Bangladesh society and politics. The laissez faire looting class which can overlook any law has come under focus. It's mostly their children who were involved in the attack, and a society…

    ওদের ঠাঁই হবে জাহান্নামে: প্রধানমন্ত্রী

    কিশোরগঞ্জে জঙ্গি হামলার তীব্র নিন্দা করলেন প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনা। দেশজুড়ে জঙ্গিদের বিরুদ্ধে প্রতিরোধ গড়ে তোলার ডাক দিয়ে হাসিনা বললেন, ঈদের দিন যারা মানুষ খুন করে, তারা ইসলামের 

    কেউ ন
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    1 hr · 

    শোলাকিয়ার ঘটনা শোনেন-
    ঈদের জামায়াত পড়াতে হাসিনার পাঠানো ইমাম ফরিদউদ্দিন মাসউদ হেলিকপ্টারে করে আসে কিশোরগঞ্জে। উঠে সার্কিট হাউজে। 
    কিন্তু এরই মাঝে মুসল্লিরা প্রতিবাদ ও শ্লোগান দিতে থাকে - শোলাকিয়া ফরিদউদ্দিনের পিছনে নামায পড়বে না কেউ। অবশেষে উপস্থিত প্রশাসনের লোকজন সিদ্ধান্ত নেয় ফরিদউদ্দিনকে আনা হবে না। এরপরে মাওলানা আবদুর রউব বিন শোয়াইব শুরু করেন বয়ান।

    এদিকে যখন নামাযের প্রস্ততি চলছে, তখন আজিমউদ্দিন হাই স্কুলের সামনে বাবুল চেয়ারম্যানের বাড়ির পাশে পুলিশ একটি টহল চৌকিতে যখন ব্যাগ তল্লাশি করতে যায় তখন একজন পুলিশ কনস্টেবলের ঘাড়ে কোপ দেয় এক হামলাকারী। সাথে সাথে শুরু হয় গোলাগুলি। পুলিশ পাল্টা গোলাগুলি করার এক পর্যায়ে অন্য পুলিশ সদস্যরা যখন আসে, তখন সন্ত্রাসীরা পালাতে চেষ্টা করে। ওই এলাকার গোলাপবাগে হামলাকারীরা যখন অবস্থান নেয়, তখন পুলিশ দুজন হামলাকারীকে চিনতে পারে। হামলাকারীদের একজন বাবুল চেয়ারম্যানের বাড়িতে ঢুকে পড়ে।

    পুলিশের দাবী, পরে ধাওয়া দিয়ে পুলিশ ওই হামলাকারীকে বন্দুক ও চাপাতিসহ আটক করে। পুলিশ ঘটনাস্থল থেকে দুটি পিস্তল, কয়েক রাউন্ড গুলি, একটি চাপাতি ও একটি ককটল উদ্ধার করেছে। বাবুল চেয়ারম্যানের বাড়ি ঘেরাও করে তাকে সহ তিনজনকে আটক করে পুলিশ।

    মাঠে তখন যথারীতি নামাজের কাজ চলছিল। মাঠের মাইকে যেহেতু তখন ইমাম মাওলানা রউফ বয়ান করছিলেন, তাই প্রচণ্ড আওয়াজের কারণে মাঠের ভেতরে বাইরের এই ঘটনার খবর কোনোভাবে পৌঁছে নাই। নামাজের পর মুসল্লিদের বলা হয় মাঠের পেছনের রাস্তা দিয়ে মাঠ ত্যাগ করতে, তখনই মুসল্লিরা ঘটনার কথা জানতে পারেন।

    নামাজের মধ্যে যদি আতঙ্ক ছড়ায়ে যেত, দৌড়াদৌড়ি শুরু হলে তখন হয়ত কয়েক হাজার মানুষ পদপিষ্ট হয়ে হতাহত হতে পারত!

    ........ও আল্লাহ, তুমি রহমানুর রহিম। আমরা তো তোমারই সেজদা করি।

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    4 hrs · 
    শাহবাগে গিয়ে ইবাদতকারী 'ওলামায়ে ছু'ফরিদউদ্দিন মাসউদ অবশেষে শোলাকিয়া থেকে বিতারিত হয়েছে। আলহামদুলিল্লাহ।
    এটাই চেয়েছিলাম। হ্যা, মাসউদকে প্রতিহত করার ডাক আমরা দিয়েছিলাম, তবে এগুলো প্রাণের বিনিময়ে চাইনি। এটা শান্তিপূর্নভাবে হতে পারত। প্রশাসন চাইলে অবৈধভাবে নিয়োগ দেয়া শয়তান মাসউদকে আগেই সরিয়ে নিতে পারত। কিন্তু সেটা হয়নি। আফসোস, আমাদের দেশের প্রশাসন কখনই বাস্তব অবস্খাটা বুঝতে চায়না। অঘটনের পরে কেবল বোঝে।


    জঙ্গি হামলা তদন্তে ঢাকায় আসছে ভারতীয় দল

    সাত দিনের ব্যবধানে পরপর ২টি জঙ্গি হামলা হয়েছে বাংলাদেশে। প্রথমটি ১ জুলাই গুলশানে, দ্বিতীয়টি ৭ জুলাই কিশোরগঞ্জের শোলাকিয়া ঈদগাহে। এই দুই জঙ্গি হামলার তদন্তে বাংলাদেশে আসছে ভারতের সন্ত্রাসবিরোধী ফোর্স ন্যাশনাল সিকিউরিটি গার্ডের (এনএসজি) ৪ সদস্যের একটি দল। টাইমস অব…
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    3 hrs · 

    "দাদারা এদেশে আসতেই গুলশানে এত্ত আয়োজন"- কথাটা ঘটনার রাতেই বলেছি। (দেখুন এখানে-https://goo.gl/QOhp5y) উনারা বোমাও মারবেন, এবার সেটা এনালাইসিসও করবেন!! বাহ বেশ ...

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    পুলিশের ওপর হামলার জন্য ছুটে যাচ্ছে দুই জঙ্গি। একজনের বাম হাতে চাপাতি, অপরজনের বাম হাতে ককটেল। ফায়ারিং পজিশনে পিস্তল প্রস্তুত দু'জনেরই ডান হাতে।
    BANGLANEWS24.COM|BY টিটু দাস, ডিস্ট্রিক্ট করেসপন্ডেন্ট

    দুটি বাসা ঘিরে রেখেছে পুলিশ

    হামলাকারী ছিল ৮ জন, দুটি বাসা ঘিরে রেখেছে পুলিশ কিশোরগঞ্জের শোলাকিয়ায় ৮ দুর্বৃত্ত হামলা চালায়। আটক তিন হামলাকারীর প্রাথমিক জিজ্ঞাসাবাদের বরাতে আইনশৃঙ্খলা বাহিনী সূত্রে এ তথ্য জানা গেছে।

    ঘরের ভেতরেই ছিলেন তিনি। হঠাৎ জানালা দিয়ে গুলি...

    জঙ্গিদের সঙ্গে লড়াই চলছিল পুলিশের। ঘরের ভেতরেই ছিলেন ঝর্না রানি ভৌমিক (৩৪)। জানালা দিয়ে হঠাৎ গুলি এসে তাকে ক্ষতবিক্ষত করে দেয়। লুটিয়ে পড়ে ঘটনাস্থলেই মারা যান তিনি। নিহত ঝর্না…
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    শোলাকিয়ায় ঈদ জামাতে হামলাকারীরা উত্তরবঙ্গের!...

    কিশোরগঞ্জে শোলাকিয়া ঈদগাহ মাঠের কাছে সন্ত্রাসী হামলায় জড়িতদের বাড়িও উত্তরবঙ্গে বলে জানিয়েছে পুলিশ। বৃহস্পতিবার (৭ জুলাই) সকাল সোয়া ৯টার দিকে দেশের সবচেয়ে বড় এ ঈদ জামাতের প্রবেশমুখে তল্লাশির সময় এ ঘটনা ঘটে। শেষ খবর পাওয়া পর্যন্ত জঙ্গিদের সঙ্গে গোলাগুলিতে ২ পুলিশ সদস্য, এক…
    BANGLAMAIL24.COM|BY BANGLAMAIL24আস্থা রাখুন বনাম ক্ষমতা ছাড়ুন
    গুলশানের হলি আর্টিসানে রক্তের দাগ না শুকোতেই আবার জঙ্গিহামলা। তাও পবিত্র ঈদুল ফিতরে। এবার কিশোরগঞ্জের শোলাকিয়ায় দেশের সবচেয়ে বড় ঈদ জামাতের মাঠের কাছে বোমাহামলায় হতাহত বেশ কয়েকজন। হামলা


    নিহত হামলাকারীর পরনে সবুজ পাঞ্জাবি ও পায়জামা। আটক এক সন্দেহভাজন হামলাকারীর পরনে লাল রঙের পাঞ্জাবি এবং মুখে তার ফ্রেঞ্চকাট দাড়ি রয়েছে।

    কিশোরগঞ্জের ঐতিহাসিক শোলাকিয়া ঈদগাহ ময়দানের পাশে বোমা হামলাকারীরা সবাই যুবক বয়সী। তাদের প্রত্যেকের বয়স ২৫ থেকে ৩০ এর মধ্যে বলে প্রত্যক্ষদর্শী সূত্রে জানা গেছে। সাত থেকে আটজনের…


    WHAT HAPPENED TO BANGLADESH BOMB EXPERTS AND BD MILITARY ORDINANCE EXPERT , BD MILITARY HAS THE LARGEST PEACE KEE[ONG CONTINGENT OF UN DEPLOYMENT IN THE WORLD , YET WE CANT HANDLE SOTAUTION IN OUR OW2N COUNTRY ???

    NEW DELHI: A special team of National Security Guard (NSG) officers will be travelling to Bangladesh to "analyse and study" the bombings at an Eid prayer gathering on Thursday and the recent terror siege at a high-end restaurant in the…
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    उग्रतम हिंदुत्व के लिए कुछ भी करेगा संघ परिवार, कोई शक?

    चाहे अपनों की बलि चढ़ा दें या फिर देश विदेश सर्वत्र गुजरात बना दें!


    मुखर्जी को गांधी का विकल्प बनाकर नाथुराम गोडसे की हत्या को तार्किक परिणति तक ले जाना है तो अंबेडकर का विष्णु अवतार का आवाहन दलितों के सारे राम के हनुमान बना दिये जाने के बाद महिषाुर वध का आयोजन है।

    सीधे नागपुर स्थानांतरित हो गया है शिक्षा मंत्रालय।


    हमारी मर्दवादी सोच फिर भी स्मृति के बहाने स्त्री अस्मिता पर हमलावर तेवर अपनाने से बाज नहीं आ रही है।


    संघ परिवार सारा इतिहास सारा भूगोल,सारी विरासत,संस्कृति और लोकसंस्कृति,विधाओं और माध्यमों,भाषाओं और आजीविकाओं, नागरिकता और नागरिक और मानवाधिकारों के केसरियाकरण के एजंडे को लेकर चल रहा है।


    नेपाल में मुंह की खाने के बाद फिर हाथ और चेहरा जलाने की तैयारी है।भारत नेपाल प्रबुद्धजनों की बैठक फिर नेपाल को हिंदू राष्ट्र भारतीय उपनिवेश बनाने की तैयारी के सिलसिले में है।जाहिर है कि अब सिर्फ पाकिस्तान से हमारी दुश्मनी नहीं है और बजरंगी कारनामों की वजह से नेपाल और बांग्लादेश भी आहिस्ते आहिस्ते पाकिस्तान में तब्दील हो रहे हैं और इस आत्मघाती उपलब्धि पर भक्त और देसभक्त दोनों समुदाय बल्लियों उछल रहे हैं।

    आज गुलशन हमले के तुंरत बाद पाक त्योहार ईद के मौके पर भी बांग्लादेश में आतंकी हमला हो गया।


    यह सबक होना चाहिए सनातन हिंदुत्व को मजहबी जिहाद की शक्ल देने वाले हिंदुत्व के बजरंगी सिपाहसालारों के लिए कि हम क्या बो रहे हैं और हमें काटना क्या है।


    पलाश विश्वास

    उग्रतम हिंदुत्व के लिए कुछ भी करेगा संघ परिवार,है कोई शक?बांग्लादेश की लगातार बिगड़ती परिस्थितियों और पूरे महादेश में आतंक की काली छाया और अभूतपूर्व धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण की वजह से मुक्तबाजारी हिंसा के मद्देनजर हिंदुत्व के एजंडे को लागू करने के लिए केसरिया सुनामी और तेज करके निःशब्द मनुस्मृति क्रांति के कार्यकर्म में संघ परिवार को रियायत करने के मूड में नहीं है।


    नेपाल में मुंह की खाने के बाद फिर हाथ और चेहरा जलाने की तैयारी है।भारत नेपाल प्रबुद्धजनों की बैठक फिर नेपाल को हिंदू राष्ट्र भारतीय उपनिवेश बनाने की तैयारी के सिलसिले में है।जाहिर है कि अब सिर्फ पाकिस्तान से हमारी दुश्मनी नहीं है और बजरंगी कारनामों की वजह से नेपाल और बांग्लादेश भी आहिस्ते आहिस्ते पाकिस्तान में तब्दील हो रहे हैं और इस आत्मघाती उपलब्धि पर भक्त और देसभक्त दोनों समुदाय बल्लियों उछल रहे हैं।


    आज ईद है और धार्मिक त्योहारों पर नेतागिरि की तर्ज पर बधाई और शुभकामनाएं शेयर करने का अपना कोई अभ्यास नहीं है।अपनी अपनी आस्था जो जैसा चाहे,वैसे अपने धर्म के मुताबिक त्योहार मनायें।लेकिन खुशी के ईद पर अबकी दफा मुसलमानों के खून के छींटे हैं।हम चाहें तो भी बधाई दे नहीं सकते।


    मक्का मदीना,बगदाद से लेकर यूरोप अमेरिका और बांग्लादेश में भी मुसलमान मजहबी जिहाद के नाम पर विधर्मियों की क्या कहें,खालिस मुसलमानों का कत्लेआम करने से हिचक नहीं रहे हैं।


    आज गुलशन हमले के तुंरत बाद पाक त्योहार ईद के मौके पर भी बांग्लादेश में आतंकी हमला हो गया।


    यह सबक होना चाहिए सनातन हिंदुत्व को मजहबी जिहाद की शक्ल देने वाले हिंदुत्व के बजरंगी सिपाहसालारों के लिए कि हम क्या बो रहे हैं और हमें काटना क्या है।


    चाहे अपनों की बलि चढ़ा दें या फिर देश विदेश सर्वत्र गुजरात बना दें!है कोई शक?


    जिस संघ परिवार ने अटल बिहारी वाजपेयी और रामरथी लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी,संघ के खासमखास मुरलीमनोहर जोशी वगैरह की कोई परवाह नहीं की,वे किसी दक्ष अभिनेत्री की परवाह करेंगे,ऐसी उम्मीद करना बेहद गलत है।


    हम लगातार भूल रहे हैं कि भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय से लेकर रिजर्व बैंक और तमाम लोकतांत्रिक संस्थान अब सीधे नागपुर से नियंत्रित हैं।सियासत और अर्थव्यवस्था,राजकाज,राजधर्म और राजनय सबकुछ अब नागपुर से नियंत्रित और व्यवस्थित हैं और इस संस्थागत केसरिया सुनामी में किसी व्यक्ति की कमसकम संघ परिवार के नजरिये से कोई खास महत्व नहीं है।


    भाजपा कोई कांग्रेस नहीं है कि वंश वृक्ष से फल फूल झरेंगे और औचक चमत्कार होगें।यहां सबकुछ सुनियोजित हैं।इस संस्थागत राजकरण की समझ न होने की वजह से हम व्यक्ति के उत्थान पतन पर लगातार नजर रखते हैं लेकिन संस्थागत विनाश के कार्यक्रम के प्रतिरोध मोर्चे पर हम सिफर है।


    विनम्र निवेदन है कि हम माननीया स्मृति ईरानी के सोप अपेरा के दर्शक कभी नहीं थे और उनकी अभिनय दक्षता की संसदीयझांकी ही हमें मीडिया मार्फत देखने को मिली है।


    स्मृति को मनुस्मृति मान लेने में सबसे बड़ी कठिनाई यहै है कि स्मृति से रिहाई के बाद ही यह जश्न बनता है कि मनुस्मृति से रिहाई मिल गयी है।ऐसा हरगिज नहीं है।


    शोरगुल के सख्त खिलाफ है संघी अनुशासन और वह निःशब्द कायाकल्प का पक्षधर है।


    शिक्षा का केसरियाकरण करके राजनीति या अर्थव्यवस्था या राष्ट्र के हिंदुत्वकरण तक ही सीमाबद्ध नहीं है संघ का एजंडा।


    संघ परिवार सारा इतिहास सारा भूगोल,सारी विरासत,संस्कृति और लोकसंस्कृति,विधाओं और माध्यमों,भाषाओं और आजीविकाओं, नागरिकता और नागरिक और मानवाधिकारों के केसरियाकरण के एजंडे को लेकर चल रहा है।


    जितना इस्तेमाल स्मृति का होना था,वह हो गया।


    अब उनसे चतुर खिलाड़ी की जरुरत है जो खामोशी से सबकुछ बदले दें तो मोदी से घनिष्ठता की कसौटी पर फैसला नहीं होना था और वही हुआ।


    सीधे नागपुर स्थानांतरित हो गया है शिक्षा मंत्रालय।


    हमारी मर्दवादी सोच फिर भी स्मृति के बहाने स्त्री अस्मिता पर हमलावर तेवर अपनाने से बाज नहीं आ रही है।


    देशी विदेशी मीडिया में उनके निजी परिसर तक कैमरे खुफिया आंख चीरहरण के तेवर में हैं।मोदी से उनके संबंधों को लेकर भारत में और भारत से बाहर खूब चर्चा रही है और फिर वह चर्चा तेज हो गयी है।यह बेहद शर्मनाक है।


    मानव संसाधन मंत्रालय में अटल जमाने में आदरणीय मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में भी सीधे नागपुर से सारी व्यवस्था संचालित होती थी और तब किसी ने उनका इसतरह विरोध नहीं किया था।


    जोशी जमाने की ही निरंतरता स्मृतिशेष है और आगे फिर कार्यक्रम विशेष है।


    भारतीय सूचना तंत्र का कायाकल्प तो आदरणीय लालकृष्ण आडवाणी ने जनता राज में सन 1977 से लेकर 1979 में ही कर दिया था,जिसके तहत आज मीडिया में दसों दिशाओं में खाकी नेकर की बहार है।संघ का कार्यक्रम दीर्घमियादी परिकल्पना परियोजना का है,सत्ता में वे हैं या नहीं,इससे खास फर्क नहीं पड़ता


    इसे कुछ इसतरह समझें।अब पहली बार इस देश में श्यामाप्रसाद मुखर्जी और बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्तिपूजा सार्वजनीन दुर्गोत्सव जैसी संस्कृति बनायी जा रही है।


    हिंदू महासभा या संघ परिवार के इतिहास में महामना मदन मोहन मालवीय की खास चर्चा नहीं होती।मुखर्जी की भी अब तक ऐसी चर्चा नहीं होती रही है और अंबेडकर को तो उनने अभी अभी गले लगाया है।मुखर्जी और अंबेडकर कार्यक्रम भिन्न भिन्न हैं।


    मुखर्जी को गांधी का विकल्प बनाकर नाथुराम गोडसे की हत्या को तार्किक परिणति तक ले जाना है तो अंबेडकर का विष्णु अवतार का आवाहन दलितों के सारे राम के हनुमान बना दिये जाने के बाद महिषाुर वध का आयोजन है।


    खास महाराष्ट्र में सारे संगठनों का कायाकल्प हो गया है और उनकी दशा बंगाल के मतुआ आंदोलन की तरह है,जिसपर केसरिया कमल छाप अखंड है।बाबासाहेब जिन खंभों पर अपना मिशन खड़ा किया था और अपनी सारी निजी संपत्ति विशुध गांधीवादी की तरह ट्रस्ट के हवाले कर दिया था,वे सारे खंभे और वे सारे ट्रस्टी अब केसरिया हैं और अंबेडकर भवन के विध्वंस के बाद महाराष्ट्र के दलित नेता रामदास अठवले को राज्यमंत्री वैेसे ही बना दिया गया है जैसे ओबीसी शिविर को ध्वस्त करने के लिए मेधाऴी तेज तर्रार अनुप्रिया पटेल को एकमुश्त प्रियंका गांधी और मायावती के मुकाबले खड़ा किया गया है।


    यूपी में संघ परिवार का चेहरा मीडिया हाइप के मुताबिक स्मृति ईरानी नहीं है।होती तो उनकी इतनी फजीहत नहीं करायी जाती।यूपी देर सवेर जीत लेने के लिए संघ ने अनुप्रिया की ताजपोशी कर दी है।इसलिए जितनी जल्दी हो सकें ,हम स्मडति ईरानी को बील जायें और आगे की सोचें तो बेहतर।स्मृति को हटा देने से निर्मायक जीत हासिल हो गयी.यह सोचना आत्मघाती होगा।


    बंगाल में फजलुल हक मंत्रिमंडल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जिस दक्षता का राष्ट्रव्यापी महिमामंडन किया जाता है,उसका नतीजा भी महिषासुर वध है।


    तब महिषासुर बनाये गये अखंड बंगाल के पहले प्रधानमंत्री प्रजा कृषक पार्टी के फजलुल हक।


    इन्हीं मुखर्जी साहेब की दक्षता से बंगाल से सवर्ण जमींदारों के हितों की हिफाजत के लिए प्रजा कृषक पार्टी का भूमि सुधार का एजंडा खत्म हुआ तो एकमुस्त हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग का उत्थान हो गया क्योंकि प्रजाजन हिंदू और मुसलनमानों ने प्रजा समाज पार्टी के भूमि सुधार एजंडा की वजह स