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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    सैराट : जमाने की आंख में झांकता सिनेमा

    Pawan Karan

    मराठी फिल्म निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले पर हो रही चर्चाओं का दौर थम नहीं रहा है. हिन्दी, अंगरेजी सहित अन्य कई भारतीय भाषाओं में उनकी फिल्म पर लगातार लेख निकल रहे हैं. उनकी हालिया फिल्म सैराट (wild) जाति, लिंग और प्रेम के उलझे, असहज प्रश्नों को तीखे ढंग से उठाने के बावजूद 100 करोड़ के आंकड़े के पास पहुंचने वाली पहली मराठी फिल्म है. यद्यपि सिनेमा के पारखी मंजुले की बहुप्रशंसित, बहुपुरस्कृत पहली फीचर फिल्म 'फंड्री'से ही उनके मुरीद बन चुके हैं. पर मराठी जन-जन से लेकर बाकी हिंदुस्तान में मंजुले अब एक पहचान हैं. संभवतः काफी लोग यह न जानते हों कि नागराज शोलापुर के एक गरीब दलित परिवार से आते हैं. और करीब 80-90 साल पहले तक इनका कुनबा घुमंतू कबीलों की तरह रहता था. नागराज की सिनेमा की विधा में किसी भी तरह की विधिवत शिक्षा नहीं है. सिवाय इसके कि अपनी किशोरावस्था में दीवानगी की हद तक फिल्में देखने के शौक़ीन वे दिन में नियम से दो फिल्में देखा करते थे. अहमदनगर जिले के एक कॉलेज से जन-संचार में एमए के पाठ्यक्रम के तहत पंद्रह मिनट की फिल्म 'पिसतुलिया'उनकी पहली लघु फिल्म थी. जिसे 2010 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. पिसतुलिया एक दलित बच्चे की कहानी है जो स्कूल जाना चाहता है. स्कूल की ड्रेस पहनना चाहता है. पर गरीब माता-पिता को लगता है कि पढ़ाई-लिखाई से क्या होगा? बेहतर है वह काम में हाथ बटाये.

    जमाने की आंख में झांकता मंजुले का सिनेमा

    'फंड्री'में एक अत्यंत गरीब, दलित परिवार का दुबला-पतला गहरे रंग का लड़का 'जब्या', ऊंची जाति की गोरी रंग की एक लड़की को बहुत पसंद करता है जो उसके साथ स्कूल में पढ़ती है. वह उसे अपनी ओर आकर्षित करने की तरकीबें सोचता/करता है. उसके सामने अच्छे कपड़ों में आना चाहता है. और अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि उससे छुपाता रहता है. वैसे लड़की को इसकी भनक भी नहीं है. फिल्म कभी नहीं बताती कि जब्या की चाहत का क्या हुआ. क्या होता अगर जब्या गोरा होता और लड़की थोड़ा दबे रंग की होती? क्या होता अगर वह लड़की भी जब्या को पसंद करती? क्या होता अगर जब्या के सपनों की जादुई चिड़िया सचमुच उसकी चाहत को उसके करीब ला देती? इन प्रश्नों के जवाब के लिए आप सैराट देख सकते हैं. कुछ लोग सैराट को उनकी पिछली फिल्म फंड्री (सुअर) का सिक्वेल कह रहे हैं. जिसका काला-कलूटा दलित किशोर जब्या/जामवंत सैराट में आकर प्रशांत/परश्या हो जाता है.

    अलबत्ता सैराट, फंड्री का सिक्वेल नहीं है. फंड्री एक डार्क फिल्म थी. जो जवान हो रहे एक दलित किशोर की मासूम हसरतों, दोस्ती और आत्म-छवि को तोड़-मरोड़कर रख देने वाली सामाजिक सच्चाइयों और 'नियति के साथ साक्षात्कार'करती राष्ट्रनिर्माण की परियोजनाओं की परतें सहज ढंग से खोलती जाती है. फंड्री का कैमरा 14 साल के दलित किशोर की आंख और हसरतों भरा दिल है. जहां राष्ट्रगान की कीमत एक सुअर से तय होती है. और मरा हुआ सुअर जब्या के टूटे हुए मनोजगत के साथ-साथ राष्ट्र के महापुरुषों के सामने 'विडंबनात्मक यथार्थ'बनकर पसर जाता है.

    एक विलक्षण सिनेमैटिक-सबवर्जन

    सैराट मुख्यधारा के सिनेमा के रास्तों और तिकड़मों का इस्तेमाल करती हुई इस समाज का एक और सच हमारे सामने रखती है. नागराज की ताकत यह है कि वे सिनेमा के 'इडियम'और 'लोकप्रिय'होने की अहमियत जानते हैं. उनकी विलक्षणता इस बात में है कि वे मुख्यधारा के सिनेमा के तरीकों का इस्तेमाल करते तो हैं पर कहानी अपनी कहते हैं. एक ऐसे वक़्त में जब सामजिक अस्मिताएं ज्यादा से ज्यादा संकीर्ण और कठोर हो रही हैं, सैराट का सफलतम मराठी फिल्म हो जाना आशा की किरण जैसा है. दूसरी तरह से कहा जाय तो सैराट 'सिनेमैटिक सबवर्जन'का एक मॉडल है. दिलचस्प है कि इस फिल्म में बहुत कम आभासीपन है और न ही इसे अलग से आकर्षक बनाकर पेश किया गया है. पर यह उतनी ही रोचक है जितनी हमारे समाज की बारीक सच्चाईयों को उजागर करने में सक्षम. 'बम्बईया सिनेमा'अगर हमारे आस-पास बिखरे सच को नष्ट करता है या ओझल करता है तो मंजुले की सैराट 'बम्बईया सिनेमा'के सच को नष्ट कर एक नए सिनेमा की रचना करती है, सफल बने रहने की जिद पर कायम रहते हुए.

    सैराट उन चुनिंदा फिल्मों में से है जब हम कमोबेश खुद को ही सिनेमा में देख लेते हैं. हां, इस फिल्म के कर्णप्रिय, मादक, उत्सवी संगीत की कल्पना और रचना करने के लिए अजय-अतुल और मंजुले बधाई के पात्र हैं. और इसपर अलग से लिखे जाने की जरूरत है कि कैसे देशज धुनों, पदों और रूपकों के प्रयोग और संगीत के आधुनिकतम यंत्रों और तकनीकों की इस मिलावट ने फिलहाल पूरे महाराष्ट्र को झुमाकर रख दिया है. मंजुले ने साबित कर दिया कि जाति, लिंग और उत्पीड़न के विषय सिर्फ डॉक्यूमेंट्रीज के लिए नहीं है. कल्पना कीजिये कि आप एक ऐसी फिल्म देख रहे हैं जहां आप मनमोहन देसाई, आदित्य चोपड़ा, करन जोहर, माजिद मजीदी, अडूर गोपालकृष्णन और आनंद पटवर्धन को एक साथ देख लेते हैं. सैराट आपको गुदगुदाती है, हंसाती है, रुलाती है और कभी तो आपका सीट से उछल जाने का मन करता है. रेडिफडॉटकॉम पर ज्योति पुनवानी अपने लेख में तीन परिवारों का ज़िक्र करती हैं जिन्होंने सैराट देखने के बाद अंतर्जातीय प्रेम-विवाह के चलते घर से बहिष्कृत अपने बच्चों को वापस बुलाया और अपनाया.

    स्कूल, कविता, प्यार और दोस्ती – सिनेमा की नई दुनिया

    नागराज की विशेषता यह भी है वे सिनेमा की दुनिया से बाहर निकाल दिए गए दृश्यों और रूपकों को पुनर्स्थापित करते हैं. कमोबेश उनकी हर फिल्म में स्कूल का केन्द्रीय महत्व है. यही वह जगह है जहां दोस्तियां परवान चढ़ती हैं. चाहत नए-नए रंगों में सामने आती हैं. जीवन में पहली बार कविता आती है और दुनिया अपने रहस्य खोलती है. किशोरावस्था में स्कूल/कॉलेज वे जगहें होती हैं जहां हम जीवन से एक नया साक्षात्कार करते हैं. मंजुले की फिल्मों में स्कूल ही वह जगह है जहां मध्यकालीन निर्गुण कवि चोखामेला (फंड्री) या दलित कविता के हस्ताक्षर नामदेव ढसाल की कविताएं सहज रूप से चली आती हैं. वो बचपन अभागे होते हैं जिन्हें कविता लिखने या सोचने का मौका नहीं मिलता. नागराज बताते हैं कि कितना भी जटिल जीवन हो कविता साथ देती है. उनकी दोनों फिल्मों के युवा नायक कविता लिखते हैं.

    आजकल का बम्बईया सिनेमा दोस्ती के नाम पर दो प्रतिस्पर्धी चरित्रों का निर्माण करता है जो औरत या ताकत के लिए एक दूसरे से जोर आजमाइश करते रहते हैं. पर हम जानते हैं कि जीवन दोस्तियों का ही दूसरा नाम है. जहां दोस्त के लिए निःस्वार्थ भाव से कोशिशें की जाती हैं. कुर्बानियां दी जाती हैं. खासकर किशोरावस्था की दोस्तियां बगैर छल-कपट के सच्चे मानवीय और सरल मूल्यों का निर्माण करती हैं. फंड्री की मूक दोस्ती सैराट में आकर मुखर हो जाती है. सैराट को उसके मामूली लोगों की बेपनाह दोस्तियों के लिए भी याद किया जाएगा.

    भारत जैसे देश में ज्यादातर युवाओं को पहली बार स्कूलों/कॉलेजों में ही पता चलता है कि वे किसी को चाहने लगे हैं. अमूमन ये चाहतें अनकही रह जाती हैं जिनकी टीस आगे चलकर किस्सों, कहानियों में निकलती है. सैराट आपको अपने बचपन और किशोरावस्था में लेकर जाती हैं, यह आपके मन की सबसे नरम जगह छू लेती है और आप छपाक से प्यार की बावड़ी में बावले से कूद जाते हैं. जिस निर्देशक को जीवन की कोमलताओं का इतना अहसास है जाहिर वहां प्यार की चिट्ठियां मासूमियत का प्रतीक एक छोटा बच्चा ही लेकर जायेगा.

    सिनेमा का सेट और शैली में प्रयोग

    सैराट में शायद ही कोई फ्रेम है जहां कृत्रिम सेट का प्रयोग किया गया हो. सारी जगहें वास्तविक और हमारे आसपास की ही हैं. पर यह मंजुले की सिनेमाई दृष्टि का ही कमाल है कि सैराट में आई बावड़ी, नदी और डैम अब एक पर्यटक स्थल बन चुके हैं. भारत के ग्रामीण परिवेश में हो रहे बदलावों को यह फिल्म पकड़ती है और बनी-बनाई टकसाली छवियों को तोड़ती है. मंजुले यह दिखाने से नहीं चूकते कि जमाना कुछ न कुछ बदला है और उनकी फिल्मों के दलित चरित्र पाटिल (ऊंची जाति) की बावड़ी में जमकर नहाते हैं. फंड्री का अंतर्मुखी 'जब्या'सैराट में गांव का धोनी माना जाने वाला 'परश्या'बन जाता है जो किसी से दबता नहीं है, उसकी कविताएं कॉलेज के नोटिसबोर्ड पर लगती हैं. और वह क्लास में सबसे ज्यादा नंबर लाने वाले छात्रों में गिना जाता है. जब पूरी तरह से सजा-धजा परश्या अपने दोस्त को घड़ी और पर्स थमा बावड़ी में कूदने के बाद आर्ची की फटकार पर निकल रहा होता है. तब आप कैमरे के मूवमेंट पर गौर कीजिये. कैसे परश्या निचली सीढ़ी से ऊपर आता है. एक पल के लिए वह टशन में खड़ी आर्ची पर भारी पड़ जाता है. यह बहुत प्रतीकात्मक है. चाहे क्रिकेट की कमेंट्री हो या पुरस्कार वितरण में मुख्य अथिति के रूप में विराजमान एक भगवा साधु हो, स्कूटी चलाती आर्ची के पीछे बच्चे को लेकर बैठा परश्या हो या सड़क किनारे भगवा झंडा लिए कार्यकर्ता युवा 'प्रेमियों/जिहादियों'की पिटाई कर रहे हों- मंजुले की नजर से कुछ छूटता नहीं है. कुछेक मौकों पर लगता है कि फिल्म खिंच रही है पर तुरंत समझ में आ जाता है कि ऐसा संपादन की समस्या के चलते नहीं हो रहा है. जीवन की सांसारिकता का आख्यान रचने के लिए 'डिटेलिंग'में जाना ही पड़ता है. और इसी के माध्यम से निर्देशक आपको सफलतापूर्वक अपनी दुनिया में लेकर चला जाता है.

    सैराट निचली जाति के परश्या और एक सवर्ण जमींदार की बेटी आर्ची के प्यार की कहानी है. जाहिर है यह प्यार किसी को बर्दाश्त नहीं. सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो जाने वाले एक अविस्मरणीय 'रोमांटिक स्पेल'के बाद प्यार की डोर से बंध चुके इस जोड़े को जमींदार परिवार की हिंसा का सामना करना पड़ता है. जान बचाने के लिए वे दूसरे शहर भागते हैं. जहां उन्हें एक अप्रत्याशित और नेक मदद मिलती है. शक-शुबहे के भीतर तक चीर देने वाले एक दौर के बाद अपने प्रेम की पुनर्खोज कर वे शादी कर लेते हैं. और अब उन्हें एक बच्चा भी है. लगता है कि 'हैप्पी इंडिंग'होने वाली है कि अचानक सालों बाद आर्ची का परिवार उन्हें खोजकर ख़त्म कर देता है. पर उनका बच्चा बच जाता है क्योंकि नरसंहार के समय एक पड़ोसी महिला उसे घुमाने ले गयी होती है. फिल्म के अंत में लहू में डूबे अपने मां-बाप के मृत शरीरों के आतंक में वह बच्चा रोते हुए बाहर की तरफ भागता है. सीमेंट की फर्श पर बच्चे के खून सने पैरों के निशान छूटते जाते हैं. एक लहूलुहान भविष्य की ओर इशारा करते हुए.

    सिनेमा का क्राफ्ट

    सैराट के माध्यम से नागराज ने यह साबित कर दिया है कि वे 'सिनेमा के क्राफ्ट'के अनोखे कीमियागर हैं. उनकी ख़ास बात यह है कि विराट बिम्बों की रचना करते वक़्त बारीक और उपेक्षित सच्चाइयां उसकी नजर से फिसल नहीं जातीं. फिल्म का पहला हिस्सा संगीत और रंगों से भरा हुआ है और दूसरे हिस्से में यह कम होने लगता है. फिल्म के अंतिम भाग में सारे कृत्रिम उपादान धुंधले और हलके होते जाते हैं. कोई संगीत नहीं, कोई बड़ा दृश्य नहीं. अंत में सब कुछ हट जाता है, बचता है सिर्फ सन्नाटा, बच्चे का दारुण रूदन और हमारे इर्द-गिर्द का कोरस. मंजुले की शैली विराट से सूक्ष्म की तरफ जाने की है. और गहरी संवेदनशीलता, 'पोएटिक इनसाइट'और असाधारण 'डिटेलिंग'से वे इस यात्रा को इतना रोचक बना देते हैं कि लगभग तीन घंटे की लम्बी फिल्म कब ख़त्म हुई यह दर्शक को तब पता चलता है जब फिल्म का अंत उसको भीतर तक झकझोर देता है. दर्शक को थोड़ा-थोड़ा अंदाजा रहता है कि फिल्म कहां ख़त्म होगी, पर फिल्म का अंत उसके लिए एक 'शॉक'की तरह आता है. एक मंटोई पटाक्षेप! जहां आपके अंतर्मन में कांच की कोई चादर टूट जाती है. जिसकी कसक और गहरी उदासी लिए आप थिएटर से बाहर निकलते हैं.

    सैराट में (फंड्री की तरह) पेशेवर कलाकार न के बराबर हैं. और फिल्म के सारे अहम किरदार ऐसे कलाकारों द्वारा किये गए हैं जिनका सैराट से जुड़ने से पहले एक्टिंग से कोई लेना देना नहीं रहा है. इन सबमें 15 साल की रिंकू राजगुरु द्वारा अभिनीत आर्ची का किरदार सबसे अहम है. सैराट की आर्ची एक दबंग जमींदार और राजनेता की बेटी और उभरते हुए दबंग भाई की बहन है. जाहिर है उसमें भी यह ठसक है. वह बुलेट चलाती है, घुड़सवारी करती है और स्कूल के छोकरों को जब-तब 'इंग्लिश'में समझाने की धमकी देती रहती है. जीवन और आत्मविश्वास से भरी थोडा दबे रंग की आर्ची उन रेयर महिला चरित्रों में गिनी जायेगी जिन्हें हिंदुस्तान के सिनेमा में कभी फिल्माया जायेगा. मुखर और हर मौके पर हावी रहने वाली आर्ची प्यार में पड़ने के बाद सामन्ती ठसक त्याग देती है. 'जो आंख से न टपका तो लहू क्या है?'को सच साबित करता हुआ उसका चरित्र ही दरअसल फिल्म की जान है. वही अपने प्यार की रक्षा में गोली चलाती है, थानेदार से भिड़ जाती है और ट्रैक्टर चलाकर भरी दोपहर में परश्या के घर पहुंच जाती है. अब उसके लिए जाति का बंधन नहीं रहा. साफ़ तौर से असहज दिख रही परश्या की मां से वह पीने के लिए पानी मांगती है और बाजार में सबके सामने उसका पैर छूती है. आर्ची का चरित्र मुक्तिदायक है. मंजुले ने उसके चरित्र के विकास को पूरी तन्मयता से पकड़ा है. ऐश्वर्य और सामन्ती माहौल में पली-बढ़ी आर्ची, निचली जाति के गरीब लड़के के प्यार में पड़ी आर्ची, एक अजनबी शहर की झुग्गी-झोपड़ी में गटर के ऊपर बने अपने टीन के कमरे और बिना दरवाजे वाले बाथरूम से गुजरते हुए बॉटलिंग प्लांट में मजदूर की नौकरी तक कैसे बदलती है, सीखती है, मंजुले ने इसे रिंकू राजगुरु के कलाकार से निकलवाने में सफलता पायी है.

    मंजुले का सिनेमा और गांव

    राज्यसभा टीवी के इंटरव्यू में मंजुले गांव में बीते अपने बचपन की स्मृतियों का जिक्र करते हुए एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं. गांधी को उद्धृत करते हुए वे कहते हैं कि गांधी ने ग्राम-स्वराज का सपना देखा और नारा दिया 'गांव चलो'. जबकि अम्बेडकर का जोर था कि दलित शहर जायें. अम्बेडकर के लिए गांव कोई रूमानी जगह नहीं थी. वे उसके यथार्थ को अच्छे से देख रहे थे. कमोबेश शिक्षा को लेकर भी दोनों के रुख में यही फर्क था. गांधी आधुनिक शिक्षा को हानिकारक मानते थे जबकि फुले या अम्बेडकर ने दलितों की आधुनिक शिक्षा पर ज्यादा से ज्यादा जोर दिया. मंजुले कोई फैसला नहीं देते. वे गांव को उसकी गति और ठहराव दोनों में पकड़ते हैं. जाहिर है सिनेमा की राजनीति होती है पर सिनेमा का काम राजनीति करना भर नहीं है. सारी कलाओं में क्रांतिकारियों के लिए सिनेमा को सबसे महत्वपूर्ण विधा, लेनिन यूं ही नहीं मानते थे. जो हो, सिनेमा के रंगमंच पर जीवन के नायक आ पहुंचे हैं. आइये उनका स्वागत करें.......संदीप सिंह.....जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट रहे. फिर आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष

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    इसी उद्देश्य को लेकर अगस्त 2010 में हमने हस्तक्षेप.कॉम को लाँच किया।

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    আসুন প্রতিরোধে সামিল হই ..
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    রোহিত তাঁর সুইসাইড নোটে লিখেছিল "আমার জন্ম পরিচয়ই আমার মৃত্যুর কারণ"। বিজ্ঞানের ইতিহাস নিয়ে গবেষণা করা ছাত্র রোহিত ভেমুলা হায়দ্রাবাদ জাতীয় বিশ্ববিদ্যালয়ের রিসার্চ স্কলার । এই বিশ্ববিদ্যালয় গত দশ বছরে দলিত জন্ম পরিচয়ের কারণেই রোহিতের মত আরো আট জন ছাত্রকে আত্মহত্যা করতে বাধ্য করেছে । এই মৃত্যুগুলি নিছক আত্মহত্যা নয়, জাতপাত দীর্ন সমাজের দ্বারা তৈরি প্রাতিষ্ঠানিক হত্যা । এই ঘটনা সুদূর হায়দ্রাবাদ বিশ্ববিদ্যালয়ের নয় । আমাদের রাজ্যেও একই দোষে দুষ্ট । আর যারা মনে করেন যে, আমাদের রাজ্যে অর্থাৎ পশ্চিমবঙ্গে জাতপাত ভেদাভেদ নেই, তারা মুর্খের জগতে বসবাস করছেন । তাঁদের মনে করিয়ে দেই ১৯৯২ সালের ১৬ ই আগস্ট শবর জাতির প্রথম গ্রাজুয়েট চুনি কোটালের আত্মহত্যা । বর্ণহিন্দু ছাত্র-শিক্ষকের অপমান অত্যাচার সহ্য করতে না পেরে আত্মহত্যা করতে বাধ্য হয়েছিল । 
    রোহিত ভেমুলার স্বাধিকার আন্দোলন কেবল হায়দ্রাবাদ, জহরলাল নেহেরু ও যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়রে মধ্যে সীমিত আন্দোলন নয় । এ আন্দোলন বাংলা তথা ভারতের প্রত্যেকের দলিতদের স্বাধিকার আন্দোলন । রোহিতের প্রাতিষ্ঠানিক হত্যা আমাদের নির্মম দেখিয়ে দিয়েছে যে, কী নিষ্ঠুর ভাবে মনুবাদী শাসন ব্যবস্থা এখনও সমান ভাবে কার্যকারী । 
    ইতিমধ্যেই হায়দ্রাবাদ, জহরলাল নেহেরু ও যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়রের স্কলার ছাত্রছাত্রীরা রোহিত স্বাধিকার আন্দোলনকে এগিয়ে নিয়ে যাবার জন্য বাংলার কলেজ, বিশ্ববিদ্যালয়, বিভিন্ন সংগঠন ও গণ সংগঠনদের একত্রিত করে এক জন আন্দোলনের উদ্যোগ গ্রহণ করা হয়েছে । বাবাসাহেব ডঃ আম্বেদকার জাতপাত হীন ভারত গড়তে চেয়েছিলেন । আসুন আমরা সকলে মিলে জাতি-বর্ণ ব্যবস্থার বিলোপের লক্ষ্যে গণ আন্দোলন গড়ে তুলি । 
    সকলের দাবি হোকঃ 
    ১) সমাজ থেকে বর্ণব্যবস্থা/জাতপাত ব্যবস্থার সম্পুর্ণ নির্মূল করণ ।
    ২) শিক্ষাক্ষেত্র থেকে শুরু করে সবক্ষেত্রে বৈষম্য বিরোধী রোহিত ভেমুলা আইন প্রণয়ন করা ।
    ৩) দলিতদের উপর অত্যাচার বিরোধী আইন কঠোর ভাবে প্রয়োগ করা ।
    রোহিত স্বাধিকার আন্দোলনের এই কর্মসূচীকে সর্বস্তরে পৌঁছে দেবার জন্য আপনাদের সার্বিক সহযোগিতা কামনা করি । ব্রাহ্মণ্যবাদ নিপাত যাক । জয় ভীম জয় ভারত ।

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    -- Bangladesh boils,Adverse impact on refugees resettled in India.NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE President Dr.Subodh Biswas and General Secretary, Supreme court lawyer Advocate Ambika Roy have appealed every refugee leader and worker to join the meeting so that we may stand united.

    Palash Biswas

    Dateline:Nagpur,New Delhi and Kolkata.

    NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE President Dr.Subodh Biswas and General Secretary, Supreme court lawyer Advocate Ambika Roy have appealed  to the government of India as well as the governments of West Bengal,Assam,Tripura and Bihar to intervene and ensure the security of minorities in Bangladesh and preempt further refugee influx.


    Suman Mandal from Dhaka shares this news item!


    বাংলাদেশ জাতীয় হিন্দু মহাজোটের সংবাদ সম্মেলনে বর্তমান হিন্দু সম্প্রদায়ের উপর নির্যাতন, হত্যা, মঠ মন্দির ভাংচুরের প্রতিবাদে বক্তৃতা দিচ্ছেন হরি ঠাকুর সেবা মহাসংঘের মহাসচিব মতুয়াচার্য শ্রী নির্মল ঠাকুর।
    স্থানঃ ঢাকা রিপোটার্স মিলনায়তন।


    Bangldesh National Hindu alliance leaders addressed Dhaka Press to lodge their resistance against minority Hindu Persecution in Bangladesh.Refugee leader Dr.Subodh Biswas is concerned with the situation in Bangladesh and is afraid of further Refugee influx in India which would rather complicate the plight of Partition victim Bengali refugees deprived of citizenship.civic and human rights.


    In Bangladesh the Matua Movement is leading the minorities and they addressed the Dahaka press conferenece protesting continuity of persecution,murders,rapes,attacks of worship places and so on.


    It is rather different scenario in India.Despite Hindutva being the declared agenda of the ruling hegemony,the Hindu majority in India or Bengal refuse the refugees as human being at all and the mainstream discriminates Bengali Hindu Refugees in every sphere of life.More over,the refugees being mainly SC and OBC are deprived of mother tongue and constitutional safe guards everwhere out of Bengal.


    Bengal has discarded this Hindu Dalit no less than fifty million mass out of Bengali History and Politics and rather enjoys apathy against them.


    The people in different states and the political parties and civil societies countrywide stands rock solid in support and it is the only survival kit for the refugees countrywide.


    The refugees support different political parties in different states.

     NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE has achieved the goal to unite every refugee irrespective of his or her identity,ideology and politics.The samiti is a democratic organization which has workers and supporters in every state and the Samiti respects the difference of opinion.


    The situation at home is worse as Matua movement might not play a decisive role to uite and lead partition victim refugees as it should have been.Rather Matua movement stands divided and degenerated and engaged in in fight so much so fierce.Hence,the 

    NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE has to play the unifying role lest the refugees scattered countrywide have to pay very dearly.

     Thus,NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE has organized a one day meeting in Bamungachhi near Barasat in Bengal to strengthen the organization.


    NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE President Dr.Subodh Biswas and General Secretary, Supreme court lawyer Advocate Ambika Roy have appealed every refugee leader and worker to join the meeting so that we may stand united.


    The Press conference in Dhaka by Hindu Alliance:


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    অগ্নিগর্ভে বাংলাদেশে সংখ্যালযু.....নতুন উদ্বাস্তুর 


    আশন্কা!
    .....................................................................

    ড.সুবোধ বিশ্বাস

    NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE President Dr.Subodh Biswas sets red alarm against Refugee Influx in Bangladesh and presents ground report about Detention camps in Assam where refugees are detained and tortured violating human rights and media skips the information.

    Dr.Subodh Biswas appeals for unity of the refugees in Bengal and out of Bengal just for survival.

    Dr.Subodh Biswas appeals Indian Governments and civil societies to stand with democratic and secular and progressive forces in Bangaldesh who fight to protect the minorities there lest we have to face dire consequence!


    যারা গভীর রাতে শতপুরুষের ভিটায় শেষের প্রনাম জানিয়ে এক অজানা অচেনা দেশের উদ্দ্যেশ্যে পাড়ি জমিয়েছিলেন ,জীবনের সুরক্ষার জন্য । সেই সুরক্ষিত ভারতে তারা উদ্বাস্তুর নুন্নতম অধিকারটুকু হারিয়েছে।এখন তাদের বলা হয় ঘুষপেটিয়া। সেই অমানবিক নাগরিকত্ব আইনের প্যাঁচকলে আসামের ডিটেনশন ক্যাম্পে চার বৎসবের নিস্পাপ শিশু নারকীয় যন্ত্রনা ভোগকরছে।এরকম অসংখ্য উদ্বাস্তুদের ঠিকানা আসামের ডিটেনশন ক্যাম্প।তারা যানেনা,কোনদিন মুক্তি পাবে কিনা। ?


    বিশ্বের যেখানা মানবতা লঙ্ঘিত হলে,বাঙলার মানব দরদী লেখক গবেষক সমাজ কর্মীরা জেগে ওঠেন।তাদের কলম দিয়ে প্রতিবাদের ফুলকি ঝরে।কিন্তু আসামের নিস্পাপ দুধের শিশু কল্পনা বিশ্বাসকে নিয়ে তাদের কোন প্রতিকৃয়া নেই।সমস্ত লেখনি উদ্বাস্তুদের জন্য নিরব। মানবতা এখানে বধির।


    যারা ওপারে রয়েগেছেন,তাদের অবস্থা কসাই ঘরের অবোলা জীব জন্তুর মতো।কবে,কে, কখন শুলিতে চড়বে কেউ জানেনা। প্রতি মুহুর্ত মৃত্য তাদের চোখের সামনে আনাগোনা করে।সম্প্রতি নিরিহ সংখ্যালঘুরা মানবতা বিরোধী অপশক্তির হাতে নির্মম ভাবে হত্যা হচ্ছেন। মা বোনদের সম্ভ্রম নিয়ে ঘৃন্ন খেলায় মেতেউঠেছেন সন্ত্রাসিরা।


    কোথায় গেলো ৭১ হিন্দু মুসলিম ভাই ভাই....ভাষা আন্দোলনের মধুর স্মৃতি । সবই কালের অবর্তমানে অতীত ইতিহাস।


    উদ্বাস্তু লেখক বুদ্ধিজীবিরা মানবতা বাদ ও দলিত আন্দোলনের পক্ষে অনেক প্রসংশনীয় ভুমিকা রাখেন।আত্মজদের পাশে আমরা তাদের উপস্থিতি তেমন দেখতে পাচ্ছিনা। 


    আমরা যদি অন্যায়ের প্রতিবাদ না করি,বাংলাদেশের প্রগতিশীল মানুষের পাশে না দাঁড়াই, নিকট ভবিষ্্যতে আবার উদ্বাস্তুর ঢল নামবে।

     পশ্চিম বাঙার আস্তাকুড়ে নর্দমার পাশে, তাদের হবে শেষ ঠিকানা।


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    রোহিত স্বাধিকার আন্দোলন : দলিত আন্দোলনের প্রতীক

    Saradindu Uddipan

    ব্রাহ্মন্যবাদ আসলে একটি পরগাছা সংস্কৃতি। এর বিস্তারের মধ্যে লুকিয়ে আছে উপনিবেশ স্থাপন এবং মৌলিক সংস্কৃতি ধ্বংসের instinct. অন্যের সঞ্চিত রস শোষণ করে, গাত্রে অবস্থান করে, তাকে পদদলিত করে এবং আশ্রয় দাতাকে আশ্রিত বানিয়ে ব্রাহ্মন্যবাদের শিকড় বিস্তার ঘটে। 
    কোন সহায়ক ছাড়া ব্রাহ্মণ্যবাদ নিজের কলেবর বৃদ্ধি করতে পারেনা এবং সহায়ক আশ্রয়ের স্বাধীনতাও স্বীকার করেনা।

    ব্রাহ্মন্যবাদ বিস্তারের Tool তাই সাম-দাম- দণ্ড- ভেদ। জাতপাত অসহিষ্ণুতা, ষড়যন্ত্র, দাঙ্গা, গণহত্যা, যুদ্ধ এগুলি সাথে ব্রাহ্মন্যবাদের রণকৌশল নিবিড় ভাবে যুক্ত।

    অধুনা রোহিত ভেমুলার প্রাতিষ্ঠানিক হত্যাকাণ্ড ব্রাহ্মন্যবাদেরই নির্মম নিষ্ঠুরতা। দলিতের উত্থান ঘটলে ব্রাহ্মন্যবাদ নিপাত যাবে এই তাদের ভয়। দলিতের উত্থান ঘটলে আম্বেদকরবাদের উত্থান ঘটবে এই তাদের ভয়। অসহিষ্ণু কাল সাপ তাই রোহিতদের ছোবল মেরে ভারতবর্ষের দলিত অভ্যুত্থান রুখতে চাইছে। চরম ষড়যন্ত্র চলছে হায়দরাবাদ বিশ্ব বিদ্যালয়, জহরলাল নেহেরু বিশ্ব বিদ্যালয় এবং যাদবপুর বিশ্ব বিদ্যালয়ের ছাত্র ছাত্রীদের উপর। ব্রাহ্মন্যবাদ সর্বশক্তি নিয়োগ করছে "রোহিত স্বাধিকার আন্দোলন"কে খতম করার জন্য।

    আশার কথা রোহিত স্বাধিকার আন্দোলন আজ সমগ্র ভারতের দলিত (এসসি, এসটি, ওবিসি, এমবিসি এবং মাইনরিটি) আন্দোলনে রূপান্তরিত হয়েছে। স্তিমিত না হয়ে দিকে দিকে ছড়িয়ে পড়ছে। 
    "Dalit Solidarity Movement for ROHIT VEMULA" সারা পশ্চিমবঙ্গে আপামর জনসাধারণের মধ্যে এই আন্দোলনকে ছড়িয়ে দেবার জন্য শপথ গ্রহণ করেছে।

    মূল কর্মসূচীর অংশ হিসেবে গতকাল দক্ষিণ ২৪ পরগণার হৃদয়পুরে দলিত আন্দোলনের নেত্রী মাননীয়া স্মৃতিকানা হাওলাদারের বাড়িতে অনুষ্ঠিত হল এই আন্দোলনের প্রথম সভা।

    আর কোন রোহিতের এই নির্মম পরিণতি আমরা চাইনা। চাইনা আর কোন রাধিকা মায়ের পাজড় ভাঙ্গা কান্না। আসুন রোহিত স্বাধিকার আন্দোলনকে সামনে রেখে ব্রাহ্মন্যবাদের বিষাক্ত বৃদ্ধি আমরা রুখে দিই। একটি মৌলিক বৃক্ষকে আগাছা মুক্ত অবস্থায় বিকশিত হওয়ার লড়াইয়ে সামিল হই। জয় ভীম, রোহিত স্বাধিকার আন্দোলন জিন্দাবাদ।


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    बांग्‍लादेशः लाखों मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने आतंकवाद के खिलाफ जारी किया फतवा


    Reporter ArunKumarRTI NEWS



    ढाकाः बांग्‍लादेश में शनिवार को राजधानी ढाका में समूचे देशभर से एक लाख से अधिक इस्‍लामी बुद्धिजीवियों द्वारा आतंकवाद विरोधी हस्‍ताक्षर वाला फतवा जारी किया गया। इसमें आतंकवाद और आत्‍मघाती हमलों को इस्‍लामी कानून के अनुसार हराम घोषित किया गया। दस्‍तावेज में हिंसा से कट्टरपंथ और आतंकवाद को कम करने के लिए 9000 से अधिक महिला उलेमाओं और मुफतियों ने 30 से अधिक पृष्‍ठ वाले इस दस्‍तावेज पर हस्‍ताक्षर किए हैं।

    मानव कल्याण के लिए अपराध और आतंकवाद विरोधी शांति फतवा- नाम के इस फतवे का काम शोलाकिया में पिछले वर्ष दिसंबर में बांग्लादेश की सबसे बड़ी ईद मण्डली जमातुल उलेमा के अध्यक्ष इमाम फरीद उद्दीन मसूद, ने शुरू किया था। 

    फतवा एक इस्लामी विचारधारा है, जिस पर विद्वान संयुक्त बैठक में व्याख्या करके कानून के रूप में उस विचार को लागू करते हैं। कट्टरपंथी इस्‍लामिक तत्‍वों द्वारा हिंसा की कुछ घटनाओं के बाद पिछले वर्ष जनवरी के शुरू में एक उलेमा सम्मेलन में इस पहल के लिए समर्थन जुटाना शुरू किया गया था। सूत्रों ने अनुसार इस फतवे की प्रतियां प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, इस्लामी सहयोग संगठन और संयुक्त राष्ट्र के लिए भेजी जाएंगी।       

    भारत ने पुजारी हत्या का उठाया मुद्दा
    वहीं भारत ने ढाका में संदिग्ध आतंकवादियों से रामाकृष्ण मिशन के एक पुजारी को हत्या की धमकी मिलने का मामला बांग्लादेश के समक्ष उठाया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कल बताया कि ढाका में भारतीय उच्चायोग ने बांग्लादेश की पुलिस और विदेश मंत्रालय से संपर्क किया और उन्हें पूरी सहायता और सुरक्षा का आश्वासन दिया गया। श्री विकास स्वरूप ने कहा कि भारतीय उच्चायोग रामाकृष्ण मिशन से साथ संपर्क में है। उन्होंने कहा कि मिशन में पुलिस की तैनाती बढ़ा दी गई है।

    संदिग्ध इस्लामिक आतंकवादियों ने हाल के महीनों में धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओ और अन्य अल्पसंख्यकों की हत्या की है। इसके कारण बांग्लादेश में आतंकवादियों की धरपकड़ के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया गया है।  
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    प्रोफेसर बीपी गुरू की गिरफ्तारी का विरोध

    Dear friend,There seems to be no end to the repression of writers and intellectuals opposing cultural domination. The arrest of Professor BP Mahesh Chandra Guru of Mysore University yesterday is the latest in the series. Prof Guru has been writing regularly for FORWARD Press.


    Some days back, Kancha Illiah was threatened by communal goons. A case was also registered against him for allegedly insulting god. After Vivek Kumar, a Chhattisgarh-based journalist and editor of a fortnightly allegedly insulted Hindu goddess Durga in his Facebook post, anti-social elements forced a bandh in the Manpur town where he lives for several days and indulged in violence. Under the pressure of these elements, Vivek Kumar was arrested under various sections of the IPC. After spending 70 days in jail, he was released on bail only two days back. You are well aware of similar incidents in the past.

    We would like to publish  articles on these incidents in FP. If you are interested, please do let us know.

    -Pramod Ranjan
    janvikalp@gmail.com 


    Pramod Ranjan

    र्नाटक पुलिस ने मैसूर विश्‍वविद्यालय के पत्रका‍रिता विभाग में प्रोफेसर व फूले-आम्‍बेडकरवादी लेखक बीपी महेश चंद्र गुरू को गिरफ्तार कर लिया है। प्रोफेसर गुरू ने पिछले दिनों अपने विश्‍वविद्यालय में रोहित वेमूला को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति इरानी पर कठोर टिप्‍पणियां की थी तथा कथित तौर पर भगवान राम का अपमान किया था। (कमेंट में खबर देखें)

    प्रोफेसर गुरू फारवर्ड प्रेस के नियमित लेखक रहे हैं तथा पिछले साल उन्‍होंने साथी कन्‍नड लेखकों के साथ मिलकर मैसूर में महिषासुर दिवस का आयोजन किया था, जिसकी व्‍यापक चर्चा कन्‍नड मीडिया में हुई थी। उसी समय से प्रो. गुरू सरकार के निशाने पर थे।

    हम सांस्‍कृतिक वर्चस्‍ववाद के खिलाफ विभिन्‍न भाषाओं में रचनारत लेखकों के दमन की निंदा करते हैं तथा लोगों के अपील करते हैं वे अपने लेखकों के पक्ष में खडे हों।



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    Abhishek Srivastava


    बहुत मज़ा आ रहा है। लाल किताब के दोनों खण्‍ड बरसों पहले चबा चुके बौद्धिक आज रघुराम राजन के लिए आंसू बहा रहे हैं। संसद को सुअरबाड़ा मानने वाले इंकलाबी आज संविधान को बचाने की जंग लड़ रहे हैं। एनआइएफटी जैसे संस्‍थानों को नव-उदारवाद की संतान मानने वाले संस्‍कृतिकर्मी आज उसके चेयरमैन के पद पर एक क्रिकेटर की बहाली को लेकर चिंतित हैं और अभिव्‍यक्ति की आज़ादी को बचाने के नाम पर उन्‍हीं गालियों का समर्थन किया जा रहा है जिन्‍हें दे-दे कर भक्‍त ट्रोल बिरादरी अपना वजूद बचाए हुए है।

    प्रधानजी का धन्‍यवाद, जो उन्‍होंने झूठे विरोधाभास खड़े कर के पढ़े-लिखे लोगों को एक ऐसी कबड्डी में झोंक दिया जहां तीसरे पाले की गुंजाइश ही नहीं है। वे जिस पाले का बचाव कर रहे हैं वह किसी दूसरे का है। उनका पाला सिरे से गायब है। नतीजतन, हम सब दो साल के भीतर उस राजमिस्‍त्री की भूमिका में आ गए हैं जो किसी दूसरे का घर बनाने में अपना पसीना बहाए जाता है। दिलचस्‍प यह है कि इस मकान को बनाने वाला ठेकेदार हमें छोड़ कर भाग गया है। पेमेंट का भी भरोसा नहीं है।

    बेहतर समाज का सपना देने वाले हे पितरों, आज फादर्स डे पर अपनी नालायक संतानों को माफ़ करना। वे नहीं जानते कि वे क्‍या कर रहे हैं। वे नहीं जानते कि वे क्‍यों कर रहे हैं। वे नहीं जानते कि वे किसके ‍लिए कर रहे हैं। वे कुछ नहीं जानते।

    Abhishek Srivastava's Profile Photo


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    JAC Mumbai's Statement on the suspension of Professors across the Universities.

    Joint Action Committee for Social Justice, Mumbai strongly condemns the politically motivated decision of University of Hyderabad administration to suspend professors Dr. K. Y. Ratnam, Head, Centre for Ambedkar Studies and faculty member, Department of Political Science and Dr. Tathagata Sengupta, faculty member, Department of Mathematics. Dr. K. Y. Ratnam and Dr. Tathagata Sengupta have been part of the struggle for justice for Rohit Vemula at the University. Both of them were targeted and arrested simply for the act of requesting the police to desist from beating and hurting the students during the brutal lathi charge on 22nd May 2016. Prof. Ratnam, a Dalit faculty member who has been a persistent support for students fighting for social justice, has been targeted in a casteist manner by Prof. Appa Rao repeatedly since 2002. We have also seen politically motivated actions taken against the faculties in other Universities such as Prof. Sandeep Pandey in Banaras Hindu University, Prof. Sanober Keshwar and Prof. Monica Sakhrani in Tata Institute of Social Sciences, Mumbai, Dr. Saibaba and others in Delhi University.
    Such harassment of faculty should be seen in context of the increasing interference of the RSS-led BJP government in affairs of the higher education. It is gradually assuming control over the administration of universities through appointment of its supporters. Dissent is being dealt with an iron hand through expulsions, boycott, suspensions and arrests.

    Joint Action Committee for Social Justice, Mumbai demands that the suspension of HCU faculties be revoked, and that Prof.Appa Rao be immediately suspended from duty and prevented from committing any further atrocity against Dalit students, faculty and staff on campus. We demand justice for Rohith Vemula and his family, and an end to caste atrocities and discrimination on university campuses. We also demand the government in power to stop actions against faculty members and staff at the Universities who are committed to the cause of social justice.
    JAC Mumbai calls for a protest demonstration on Monday, 20th June 2016, to condemn the harassment of faculty members fighting for social justice.( Venue and time will be informed soon)

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    Joint Action Committee for Social Justice - Delhi sharedJoint Action Committee for Social Justice -UoH's post.

    An Open Letter to Telangana Chief Minister KCR from Indian Citizens in US. Please read and sign the Petition!

    "On the occasion of Telangana Formation Day we are writing to you with grave concerns about the ongoing situation at the Hyderabad Central University. It is now over five months from the time that Rohith Vemula committed suicide. That the suicide was a result of ongoing discrimination and a relentless institutional apartheid is an open secret. And yet, not only has the Vice Chancellor returned to the university, but over the last two months has unleashed a fresh round of brutal violence on students and faculty. All this is happening under your watch. We are appalled that your government has consistently chosen to sidestep the issue by positioning it as a matter that concerns the central government. There is no confusion in our minds though that the police force that entered the campus and brutalized the students and faculty at the behest of the Vice Chancellor are part of the Telangana State Police under your charge. While the appointment of the Vice Chancellor is indeed the prerogative of the central government, there is no reason that you cannot have a clear position on the matter, especially in as much as the actions of such officers impact your city and your state. Let us also not forget Hyderabad Central University came into existence as part of the six-point settlement at the end of the first Telangana movement. The university is in that sense a direct product of the Telangana struggle and therefore a space over which Telangana government has moral authority.

    We demand immediate action along the following three lines.

    1. We seek immediate clarification on your conversations with the Prime Minister on the matter of the Vice Chancellor's removal, something you had promised two months ago.

    2. We demand the immediate suspension of all the responsible police officers and the constitution of a high-level commission of inquiry. You had promised a high-level inquiry into police conduct at the University. Yet again, two months later neither has a high-level commission of inquiry been instituted nor have any corrective steps been taken to discipline the police force that flagrantly violated democratic and human rights.

    3. Fast-tracking of the case against the Vice Chancellor. Once again it is your inaction on this matter that speaks loudly. While students and faculty have been brutalized and ferried across several police stations, the Vice Chancellor has remained outside the purview of the law. We demand that the state government act under the aegis of the Atrocities Act and produce the Vice Chancellor in court and ensure that the case moves forward. Failure to do so would be indicative that you condone brutal caste apartheid.

    The Telangana movement was built in significant proportion by the Dalit Community of the state. You will remember that the movement owed so much to the Dalit Community that at one point it was even anticipated that the first Chief Minister of a new Telangana would be a movement leader from the Dalit community. The world is watching the Telangana state government. The inability to respond to atrocities against the Dalit community is a blemish that a new state seeking international investments and a presence in the global economy can ill-afford. There are clear and unambiguous actions that you can take and will be held accountable for. On the occasion of Telangana Formation Day we seek your urgent cooperation and we hope that the dream of justice as a central principle of Telangana continues to hold."

    ‪#‎ArrestAppaRaoPodile‬
    ‪#‎JusticeforRohth‬


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    Dalit Adivasi Dunia

    आदिवासी महायोद्धा विरप्पन-गोंड


    ओबीसी, अनुसूचित जाति व जनजाति के लोग ही क्यों बागी बनते हैं। मनुवादी व्राह्मण व मनुवादी बनिये क्यों नहीं !
    मुफलिस और अन्याय से पीडित जुल्म की हद पार होने पर ही सामन्ती व शासन-प्रशासन से विद्रोह कर, बागी बनते हैं। इस व्यथा का कोई अंत नही है । सुल्ताना-डाकू, ,बिरसा-मुन्डा, पुतलीबाई, फूलनदेवी, विरप्पन आदि मनुवादी व्यवस्था से पीडित पहले व आखरी व्यक्ति नहीं हैं।
    आदिवासियों का शोषण, हत्या, बलात्कार, अपहरण व माँ बाप पर मनुवादी अत्याचारों से परेशान होकर विरप्पन ने मात्र दस वर्ष की उम्र में अपने डाकैत चाचा शिवा-गोंड के साथ जंगलों में चले गये थे। दस वर्ष की उम्र में भाले की नोक पर एक हाथी को घायल कर दिया और हाथी को जंगल में भागने पर मजबूर कर दिया। 
    आदिवासी विरप्पन को वहाँ के आदिवासी भगवान मानते थे। क्योंकि मनुवादी व्यवस्था व मनुवादियों के द्वारा उस क्षेत्र के आदिवासीगण उनके अत्याचार, बलात्कार, हत्या , शोषण व जर-जोरु-जमीन पर कब्जे से पीडित थे। फोरेस्टर जब चाहे आदिवासी युवतियों को जबरण उठाकर बलात्कार करते थे और हत्या करने में भी कोई संकोच नहीं करते थे। फरियाद करने वालों पर झूठे इल्जाम लगाकर जेल भेज देते थे। अनेकों आदिवासी झूठे एनकाउंटरों में मारे जाते थे। इस बर्बरता को किसी ने नहीं रोका । क्योंकि शासन-प्रशासन, कोर्ट-कचहरी, मीडिया आदि पर मनुवादियों का कब्जा था। 
    विरप्पन-गोंड ने 17वर्ष की उम्र में जंगलों में अपनी हकूमत कायम कर वहाँ के आसपास के मनुवादी शासन-प्रशासन में भय पैदा कर दिया। श्रीनिवासन ब्राह्मण ने विरप्पन की बहन को प्यार के झांसे में गर्भवती बना कर शादी से इन्कार कर दिया तो विरप्पन-गोंडर ने श्रीनिवासन की हत्या व टुकडे-टुकडे कर मछलियों को खिला दिया। विरप्पन-गोंडर के प्रभाव के कारण वहाँ के आदिवासियों को अत्याचार, बलात्कार, हत्या व शोषण से मुक्ति मिल गयी और उन्हे मजदूरी का पूरा पैसा मिलने लगा था। उस समय आदिवासियों में खुशी की लहर छा गयी थी।
    फिल्म अभिनेता व्राह्मण राजकुमार का अपहरण करने के बाद विरप्पन-गोंडर ने सरकार के सामने राज्य की दस प्रमुख समस्याएँ रखीं और मांगे पूरा करने का अल्टीमेटम सरकार को दे दिया। 
    मांगे निम्नलिखित थीं:-
    ०१ कावेरी पानी का विवाद जबतक हल नहीं होता तबतक कर्नाटक सरकार तमिलनाडु के लिये प्रतिमाह 250TMC पानी दे।
    ०२ सन 1991 में भडके कावेरी-पानी विवाद में जो तमिल परिवार पुलिस फायरिंग में मार दिये गये थे, उनके परिवारों को उचित मुआवजा दिया जावे।
    ०३ स्पेशल टास्क फोर्स की ज्यादतियों की जांच करने वाले सदाशिव-आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ज्यादतियों से पीडित आदिवासियों को प्रति व्यक्ति 10 से 15 लाख रुपए का मुआवजा दिया जावे!
    ०४ टाडा-कानून के तहत बन्द 51 आदिवासी कैदियों को फौरन रिहा किया जावे । क्योंकि पुलिस ने अपनी नाकामी की वजह से निर्दोष लोगों को टाडा के तहत जबरण बंद किया गया है।
    ०५ पुलिस ज्यादतियों में मारे गये 9 अनुसूचित व जनजाति के लोगों को उचित मुआवजा दिया जावे।
    ०६ नीलगीरि की पहाडियों पर चायपत्ती तौडने वाले मजदूरों को प्रति एक किलाग्राम पत्ती पर १५ रुपए दिये जावें।
    ०७ तमिल कवि और समाज सुधारक थिरुवेल्लुर की प्रतीमा बंगलौर में लगाई जावे।
    ०८ तमिल-नेशनल-लिब्रेशन आर्मी के तमिलनाडु जेल में बंद पांच लोगों को रिहा किया जावे।
    ०९ कर्नाटक सरकार तमिल भाषा को अतिरिक्त राजभाषा का दर्जा दे
    १० मजदूरों की मजदूरी बढाई जावे।
    ( आज का सुरेख भारत नवम्बर २०००p-2-10)
    आदिवासी विरप्पन-गोंडर को पकडने के लिये सरकार ने स्पेशल टास्क फोर्स बनाई । मगर १५० बेकसूर अनुसूचित व जनजाति के लोगों के हत्यारे रणवीर सेना व उसके मुखिया पर मनुवादी सरकार व मीडिया ने कभी-भी हायतौबा नहीं मचाई । जबकि विरप्पन-गोंडर ने किसी आदिवासी व अनुसूचित जाति के लोगों की हत्या नहीं की, बल्कि उनकी हत्या की जो मनुवादी व्राह्मण व बनिये उन्हें पकडने व मारने आये थे और उन मनुवादी को सबक सिखाया जो अत्याचारी व बलात्कारी थे। 
    (दलित वायस १६-३० नवम्बर २००२)
    अम्बेडकर मिशन पत्रिका के मुताबिक विरप्पन-गोंडर एक वीर मूलनिवासी योद्धा था और आदिवासी व आम जनमानस में राबिन-हुड के नाम से बहुत लोकप्रिय था। महानारी फूलनदेवी ने बाईस. ठाकुर मनुवादियों की हत्या कर अपने बलात्कार का बदला लिया और वहीं विरप्पन-गोंडर ने आदिवासी समुदाय की बेहतर सुरक्षा, सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा प्रदान की । जबकि भारतीय मनुवादी मीडिया ने उन्हें दस्यू-सुन्दरी व चन्दन तस्कर आदि घोषित कर वंचित-समाज के मुंह पर करारा तमाचा जड दिया था।
    जिस सादगी से विरप्पन-गोंडर की विधवा पत्नी व दो मासूम लडकियां फटेहाल जिन्दगी जी रही हैं, उन्हें देखकर क्या आप यकीन करेंगे कि उसने करोडों रुपए कमाए होंगे। यही स्थिति आदिवासी महा क्रांतिकारी बिरसा-मुन्डा के परिवार की है। मगर अधिकांश वंचित-समाज के लोग या तो उन्हें जानते नहीं हैं और ना ही कभी उन्हें जानने व समझने की कोशिश की है।
    तमिलनाडु के धर्मपुरी स्थित अस्पताल में विरप्पन की लाश को देखने आये ग्रामीणों ने एसटीएफ से विरप्पन की हत्या किये जाने पर बेहद आक्रोश जताया। ६२ साल के के वेंकटम्माल को लगता है कि उसने अपना बेटा खो दिया है( नवभारत टाईम्स २० अक्टूबर २००४)
    पुलिस ने विरप्पन के रिश्तेदारों को धमकी देते हुए, उसी रात को चारों लाशों को जलाने की कोशिश की, प्रशासन तीन लाशें जलाने में कामयाब हो गये, मगर मानवाधिकार संस्थाओं के पदाधिकारियों व विरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी भाई मदैयन व आदिवासियों के विरोध के कारण विरप्पन की लाश को दफनाया गया था। मगर पुलिस प्रशासन ने आखिरी संस्कार करने की अनुमति विरप्पन के परिवार को नहीं दी। मय्यत के रिश्तेदारों व डाक्टरों से हासिल जानकारी के मुताबिक पुलिस के अधिकारियों द्वारा विरप्पन के हाथपैर कुचले गये थे तथा मनुस्मृति के अनुसार उसका लिंग काटा गया था। विरप्पन की हथेलियां जलाई हुई पायी गयीं। उनके कुल्हे की हड्डी चूर-चूर पाई गयी थी, गर्दन पर सुईयां चुभोने के गहरे निशान थे। मगर रिश्तेदार यह बात किसी को भी उजागर नहीं कर पाए । क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं जयललिता सरकार एसटीएफ के हाथों उनका एनकाउंटर करवा कर उन्हें, विरप्पन का साथी घोषित न कर दे।
    दीगर सूत्रों से इकट्ठा की गयी जानकारी के मुताबिक विरप्पन को उनके मुखबिर हुए साथियों ने विरप्पन को बेहोशी की दवा दी और विरप्पन को गिरफ्तार कर बुरी तरह से यातनाएँ देकर मारा गया। एनकाउंटर की झूठी कहानी गढी गयी। बैंगलोर की प्रेस कान्फ्रेंस में एसटीएफ प्रमुख विजयकुमार ने खुलेआम धमकाते हुए कहा कि "हम सच्चाई की खोज करने वाली टीमों से निपटना अच्छी तरह से जानते हैं" ब्राह्मणवादी अखबार दिनारमाला में झूठे नामों से धमकियां दी गयी कि अगर किसी ने विरप्पन की हत्या की सच्चाई की खोज करना जारी रखा तो, उन्हें गिरफ्तार होना पडेगा। मरने वालों के रिश्तेदारों को धमकियां दी गयी कि वे सच्चाई की खोज करने वाली टीमों को कुछ नहीं बताएं।
    हाईकोर्ट में मुकदमा दर्ज करने के बाद ही रिश्तेदारों को पोस्टमार्टम की रिपोर्ट बहुत मुश्किल के बाद मिल पाई थी। एम्बुलेंस व सबूतों का मौका-मुआयना करने नहीं दिया गया और मानवाधिकार आयोग की प्रार्थना ठुकरा दी गयी।
    एसटीएफ ने पूरे जंगल को ही यातना शिवर में बदल दिया गया था। एडवोकेट तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता मान-बालामुरुगन ने अपनी किताब "सोलागार-डोड्डी " में क्रूर यातनाओं की तस्वीरें छापी हैं और बताया है कि एसटीएफ किसी भी आदिवासी को पकडकर और क्रूर यातनाएं देकर मार डालती है तथा आदिवासियों को एनकाउंटर में मरा हुआ घोषित कर देती है। यातनायें देने का विवरण बहुत डरावना है , जिसमें युवतियों से बलात्कार, अंगभंग करना, योनि अत्याचार, हत्या, विभिन्न यातनाएं आदि शामिल हैं। तमिलनाडु सरकार ने सदाशिव-आयोग की जांच बन्द कर दी । क्योंकि शासन-प्रशासन पर मनुवादी व्यवस्था कायम है और हकीकत उजागर नहीं करना चाहती थी ।
    उपरोक्त हालात कश्मीर से कन्याकुमारी और असम, पूर्वी व पश्चिमी आदिवासी व अनुसूचित जातियों के लोगों के साथ आज भी जारी हैं। मनुवादी व्यवस्था आज शहरों व नगरों में विभिन्न संस्थाएँ, संगठन, संघ व सेना बनाकर आतंकवादी कार्यवाही कर रही है । क्योंकि किसी न किसी रुप में शासन-प्रशासन, कानून, मीडिया व सेना में मनुवादियों का वर्चस्व है और अधिकांश वंचित-समाज के लोग, मनुवादियों की बन्दरसेना, अंधभक्त, विभीषण व वोटबैंक बनी हुई है। 
    हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में अधिकांश दलित-समाज व आदिवासी लोग हैं जो मनुवाद से पीडित होकर मुसलमान बन गये हैं और पूर्वी, पश्चिम, दक्षिणी व उत्तरी भारत में आदिवासियों को आतंकवादी, उग्रवादी, नक्सलवादी, माओवादी के नाम पर मारा जा रहा है और समस्त भारत में जनजाति व अनुसूचित जातियों के लोगों का सामाजिक, धार्मिक, मानसिक, आर्थिक व शैक्षणिक रुप से शोषण, हत्या, बलात्कार व मानसिक रुप से प्रताडित किया जा रहा हैं
    क्या आप शहर में आकर सुरक्षित हों गये हैं! यह आपका भ्रम मात्र हैं क्योंकि यहाँ भी किसी न किसी रुप में आपका व आपके बच्चों का सामाजिक, धार्मिक व मानसिक शोषण हो रहा है और आप प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से मनुवादी व्राह्मणों के बाडीगार्ड, बन्दरसेना व वोटबैंक द्वारा सहयोग कर रहे हैं
    त्रि-इब्लिसी शोषण-व्यूह-विध्वंस से साभार
    कथावाचक 
    बाबा-राजहंस
    जय-भीम जय-मीम जय-मूलनिवासी
    #Hansraj Dhanka


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    Bhaskar Upreti
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    यहाँ तो कैराना ही कैराना है..आओ तो तुम्हारी चल पड़ेगी

    कैराना पर विकास के बिल से बाहर आ गए हिन्दू-गृह मंत्री राजनाथ सिंह से देहरादून के पत्रकारों ने ठीक ही पूछा- साब हमारे राज्य में पहाड़ के सैकड़ों गाँव खाली हो गए, उस पर क्यों नहीं कुछ करते? आज से नहीं 1980 में भाजपा के बनने से ही यह सिलसिला शुरू हो गया था. जो यहाँ से बाहर गए हैं वे जल, जंगल, जमीन, जानवर और शुद्ध वायु छोड़कर गए हैं. यहाँ तक कि शिशु मंदिरों के देशभक्त आचार्य तक पहाड़ों से भाग गए. उन साब को पिथौरागढ़ लौटाओ जो उधमसिंह नगर के सांसद बन गए हैं. हिन्दू नववर्ष का पोस्ट कार्ड भेजने वाले उस दाड़ीवान को लौटाओ जो आजकल लालकुंवा में खूंटा गाड़े बैठा है. उन साब को कर्णप्रयाग को लौटाओ जो हरिद्वार के सांसद हो गए हैं. उन साब को भी वापस लौटाओ जो कानपुर के सांसद होकर गत ख़राब कर रहे हैं. कोटद्वार के उस बिगडैल लौंडे को भी वापस करो, जो योगी बनकर गोरखपुर की फिजा ख़राब कर रहा. 
    भारतवर्ष, आपके गृह मंत्री बनने से पहले से और आपके गृह-मंत्री न रहने के बाद भी यहाँ के दूरस्थ गांवों से कश्मीर और उत्तरपूर्व की सीमाओं पर गए सैनिकों के हाथ में सुरक्षित है. लेकिन उन युवकों को वापस दे दो जो पांच हज़ार की पगार के लिए 'मेक इन इंडिया' के भंवर में फंस गए हैं. या अपने बाग़-बगीचे, खेत-खलिहान, आडू-प्लम, हिसालू-किल्मड़, बुरांश-काफल छोड़ 'स्किल इंडिया' में भरमाये हैं. 
    ये सब के सब हिन्दू हैं साब...देश से प्यार करने के चक्कर में ही हिन्दू बन गए थे. आप पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए क्यों झेंप गए? आपको मालूम नहीं केरल से आकर शंकराचार्य ने यहीं के पहाड़ों से हिन्दू धर्म का पुनरुद्धार किया था. 
    बस मिलम गाँव को लौटा दो जहाँ के कम-हिन्दू, अधिक-बौद्ध लोगों ने भारत सरकार का भरोसा किया था, चीन के साथ सदियों से 'वर्ल्ड ट्रेड' करने वाला यह एतिहासिक गाँव वीरान पड़ा है. गौरा देवी के गाँव के लोगों को वापस लौटा दो जो पेड़ों को बचाने निकल पड़े थे. आज तक नहीं लौटे हैं. 
    हिंदू- गृह मंत्री को इत्तिला होना चाहिए, पहाड़ से हिंदू-जनता ही नहीं, उनके देवता-लोकदेवता-ग्रामदेवता भी मैदानों को पलायन कर चुके हैं. पता नहीं किस दिन बोर होकर वहां से बदरी-केदार भी चल पड़ें. और वहां चीनी ड्रेगन देवता अपना योग-ध्यान शुरू कर दे. 
    सोचना..सोचकर देखना..यहाँ कैराना ही कैराना हैं..तुम्हारी चल पड़ेगी...


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    अब छाती कूटकर जितनी मर्जी स्यापा कर लीजिये,देश को तो उनने बेच दिया!


    बीजमंत्र का अखंड जाप करें,दुनिया की सबसे मुक्त अर्थव्यवस्था सनातन धर्म का सनातन भारत!


    यह कोई भगवा झंडा वह नहीं है जो शिवाजी महाराज ने फहराया, यह भगवा वह  भगवा भी नहीं है।

    शिवसेना का भगवा भी यह नहीं है।

    लाल नील लापता है और फर फर फहराता फर्जी फगवा केसरिया।



    हम जियें या न जियें,इससे फर्क पड़ता नहीं लेकिन बच्चों की सांस के लिए हमने कोई पृथ्वी बचायी नहीं हैं।हमारे बच्चे हमारे जीते जी कब कहां लावारिश मारे जायेंगे,कहना मुश्किल है। हम शोक भी मनाने की हालत में न होंगे।अपनी अति प्रिय स्त्रियों को हमने बाजार के हवाले कर दिया है।यही हिंदुत्व का असल एजंडा है।


    कालजयी साहित्य लिखने वालों के कलाउत्कर्ष पर सांस्कृतिक उत्सव करते रहिये क्योंकि सत्तर के दशक से साहित्य और पत्रकारिता ने जनता को यह मुक्तबाजार दिया है!


    देश रहे न रहे,मेहनतकश और किसान,दलित और आदिवासी जिये या मरे,आपका हमारा क्या?


    नई पीढ़ी का समूचा संसार उड़ता पंजाब परिदृश्य है और हमने अपने बच्चों को बलि चढ़ाने की रस्म अदायगी कर दी है!

    पलाश विश्वास

    मीडिया की खबरों के मुताबिक आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि ग्रोथ के मामले में भारतीय अर्थव्यवस्था कई देशों से पीछे है। रघुराम राजन ने चेताया है कि दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है उसका असर भारत पर पड़ना तय है। अगर ब्रेक्सिट हुआ तो भारतीय इकोनॉमी को नुकसान होगा। रघुराम राजन ने मुंबई में एक लेक्चर के दौरान ये बातें कही।


    बेहद अफसोस के साथ यह लिखना पड़ रहा है कि हमारे बदलाव के ख्वाब,हमारी क्रांति,हमारी विचारधारा का हश्र कुल मिलाकर यही है कि हम बिना प्रतिरोध हजारों साल से सनातन भारत का सवा सत्यानाश के राजसूय में शामिल हुए और बाजार के कार्निवाल में कबंधों के जुलूस में अपनी भावी पीढ़ियों के कटे हुए हाथ पांव और लहूलुहान दिलोदिमाग को देखने की हमारी कोई दृष्टि ही नहीं है।


    बहरहाल बाजार के महानतम उपभोक्ताओं,नागरिकता के महाश्मसान में महोत्सव मनायें कि वंदनवार की तरह सुर्खियों में अब सिर्फ उड़ान है और इस पृथ्वी पर जमीन कहीं बची नहीं है।



    बीजमंत्र का अखंड जाप करें,दुनिया की सबसे मुक्त अर्थव्यवस्था सनातन धर्म का सनातन भारत।


    ताजा सुर्खियां इस मृत्यु उपत्यका में अखंड महोत्सव का समां बांध रही हैं क्योंकि भरत दुनियाभर में निवेश के लिए सर्वोत्तम स्थान है और हमने सारे दरवाजे और सारी खिड़कियां विदेशी पूंजी और विदेशी सेनाओं के लिए खोल दिये हैं।


    क्योंकि भारतीय लोकगणराज्य में 130 करोड़ जनता की किस्मत सोने से मढ़ दी गयी है और अच्छे दिन लहलहा रहे हैं ।क्योंकि वैदिकी राजसूय के महाजनों ने एविएशन और फूड प्रोसेसिंग में 100 फीसदी विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया है।


    गौरतलब है कि  डिफेंस, फार्मा, सिंगल ब्रांड रिटेल, ब्रॉडकास्टिंग कैरेज सर्विस और पशुपालन में भी एफडीआई के नियम आसान किए दिए हैं।


    सोमवार को वैदिकी सभ्यता के सर्वोच्च पुरोहित की अध्यक्षता में हुई बैठक में ये फैसले हुए। बाजार का दावा है कि कटे हुए हाथं,पांवों,लहूलुहान दिलो दिमाग और सर्वव्यापी उड़ता पंजाब के लिए इनसे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।


    केंद्रीय वैदिकी कार्यालय ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि दूसरे चरण के इस आर्थिक सुधार से भारत एफडीआई के लिए दुनिया की सबसे मुक्त अर्थव्यवस्था बन गया है।


    बयान में कहा गया है कि अब तक के उठाए गए कदमों से विदेशी निवेश बढ़ा है। यह 2013-14 में 36.04 अरब डॉलर था जो 2015-16 में 55.46 अरब डॉलर हो गया है।


    यह अब तक का रिकॉर्ड है। सरकार ने इतने बड़े फैसले तब लिए हैं जब लगातार कहा जा रहा है कि रघुराम राजन के आरबीआई गवर्नर पद पर नहीं रहने से विदेशी निवेशक मायूस हो सकते हैं।


    बयान में कहा गया है कि अब तक के उठाए गए कदमों से विदेशी निवेश बढ़ा है। यह 2013-14 में 36.04 अरब डॉलर था जो 2015-16 में 55.46 अरब डॉलर हो गया है।


    यह अब तक का रिकॉर्ड है। सरकार ने इतने बड़े फैसले तब लिए हैं जब लगातार कहा जा रहा है कि रघुराम राजन के आरबीआई गवर्नर पद पर नहीं रहने से विदेशी निवेशक मायूस हो सकते हैं।



    बीजमंत्र का अखंड जाप करें,दुनिया की सबसे मुक्त अर्थव्यवस्था सनातन धर्म का भारत।




    हम मेहनतकशों के हक हकूक,आम जनता के दुःख दर्द की क्या परवाह करें, परिवार, समाज, लोक, संस्कृति, भाषा, सभ्यता, अर्थव्यवस्था और धर्म,विचारधारा,इतिहास और दर्शन से हमारा क्या लेना देना,हम तो इतने निर्मम उपभोक्त हो गये हैं कि अपने ही बच्चों की लाशों को रौंदते हुए हम सरपट बाजार में हाथों में लपलपाती क्रयशक्ति लेकर भाग रहे हैं


    राजकमल चौधरी साठ के दशक में कुछ इसी तेवर में सोनागाछी की सड़कों पर राज करते थे।अपनी अपनी जीपें खोल लें।


    यह कोई भगवा झंडा वह नहीं है जो शिवाजी महाराज ने फहराया, यह भगवा वह  भगवा भी नहीं है।

    शिवसेना का भगवा भी यह नहीं है।

    लाल नील लापता है और फर फर फहराता फर्जी फगवा केसरिया।


    गौर करें कि हमारे खून का रंग अब भगवा है और हमारी सत्तर दशक से अब तक की पीढ़ियों ने सिर्प इस महादेश,बल्कि इसकी जमीन पर जनमने वाली भावी पीढ़ियों और कायनात की तमाम रहमतों,बरकतों और नियामतों की एकमुश्त हत्या कर दी है।


    संघ परिवार को अहंकार होगा और कसरिया जनता को गुमान होगा कि भारत अब हिंदू राष्ट्र है और उनके विरोधियों का पाखंड धर्मनिरपेक्षता और प्रगति के नाम,विचारधारा और आंदोलन के नाम बेमिसाल हैं,लेकिन सच यही है कि किसी को देश दुनिया या मेहनतकश आवाम,आदिवासियों,दलितों,पिछड़ों और वर्गहीन सर्वहारा की परवाह क्यों होगी क्योंकि हम सबके हाथ अपने ही बच्चों और अपनी ही स्त्रियों के खून से रंगे हैं।


    जो मारे गये या मर गये,जो बलात्कार के शिकार होते रहे हैं,जो नशे में उड़ता पंजाब हैं,उनकी छोड़िये,बची खुची स्त्रियां और जिनका फोटो खूबसूरत नजारों के मध्य शेयर करते अघाते नहीं है,उनमें से कोई भी सुरक्षित नहीं है और किसी को इसका अहसास तक नहीं है।


    कल तक मैं हिंदी के गौरवशाली अखबार जनसत्ता के संपादकीय में काम कर रहा था और उसअखबार का कायाक्प इतना घनघोर हुआ है कि हमारे इलाके में जो एकमात्र प्रति मरे हिस्से की थी,25 साल की नौकरी के बाद सबसे पहले उसे बंद कराया है।एक झटके के साथ पच्चीस साल के नाभि नाल का संबंध तोड़ दिया है तो समझ लीजिये कि मेरा दिलोदिमाग कितना लहूलुहान होगा।


    अब इससे शायद कोई फर्क पड़े कि हम जियें या मरे,जो शुतुरमुर्ग जिंदगी हम साठ के दशक से जीते रहे हैं,इस दुस्समय में हमारी पीढ़ी की पुरस्कृत,सम्मानित,प्रतिष्टित माहमहिमों,रथि महारथियों का कुल जमा कालजयी कृतित्व यही है कि हम अब अमेरिकी उपनिवेश है और हम लगातार चीखे जा रहे थे,अमेरिका से सावधान,तो हमारी कोई औकात ही नहीं है।


    सबसे खतरनाक बात यह है कि हमारे जीते जी किस हादसे के शिकार होंगे हमारे बच्चे,कैसी दुर्गति होगी हमारी स्त्रियों की,हमें इसकी फिक्र नहीं है।जिन्हें आदिवासी भूगोल,दलित जमीन, हिमालयी पर्यावरण,बस्तर और दांतेवाड़ा,मणिपुर और कश्मीर की परवाह नहीं है,वे समझ लें कि आखेटगाह है देश का चप्पा चप्पा अब और अगला शिकार कौन होगा,हम नहीं जानते।


    महावीर अर्जुन का गांडीव भी अपने स्वजनों को बचाने में नाकाम रहा।एकलव्य की अंगूठी की कीमत पर वह स्रवश्रेष्ठ धनुर्विद्या भी किसी स्वजन के काम नहीं आया तो परमेश्वर श्रीकृष्ण भी महाभारत में निमित्तमात्र की नियति के गीतोपदेश के बाद कुरुक्षेत्र के विधवा विलाप से तटस्थ रहने के बाद मूसल पर्व में अपने स्वजनों का नरसंहार रोक नही सके।


    हिंदुत्व के एजंडे में सिर्फ  संघ परिवार या बजरंगी सेना शामिल हैं,यह कहना सरासर गलत है।

    जाने अनजाने हम भी उसी सेना के कल पुर्जे हैं।

    न होते तो हालात कुछ और होते,फिजां कुछ और होती।हमने अपना अपना कुरुक्षेत्र रच दिया है और मूसल पर्व में स्वजनों का वध देखने के लिए नियतिबद्ध हम हैं।


    हम जियें या न जियें,इससे फर्क पड़ता नहीं लेकिन बच्चों की सांस के लिए हमने कोई पृथ्वी बचायी नहीं हैं।हमारे बच्चे हमारे जीते जी कब कहां लावारिश मारे जायेंगे,कहना मुश्किल है।

    हम शोक भी मनाने की हालत में न होंगे।

    अपनी अति प्रिय स्त्रियों को हमने बाजार के हवाले कर दिया है।यही हिंदुत्व का असल एजंडा है।


    अपने सनातन धर्म,अपनी प्राचीन सभ्यता और गौरवशाली इतिहास के लिए महान यूनानियों,मेसोपोटामिया,मिस्र,इंका,माया सभ्यता के वंशजों की तरह सीना छप्पन इंच का तान लीजिये और अब कुछ करने को नहीं है ,पल पल योगाभ्यास कीजिये क्योंकि चक्रवर्ती सम्राट विश्वविजेता कल्कि महाराज ने दूसरे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह में शिरकत की है। कल्कि महाराज ने  कड़ी सुरक्षा के बीच दूसरे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर 30,000 लोगों के साथ समारोह में शिरकत की। वहीं राजधर्म के 57 मंत्रियों ने अलग-अलग शहरों में योग कार्यक्रम में हिस्सा लिया।


    इस मौके पर कल्कि महाराज  ने कहा कि आज पूरे विश्व में योग दिवस मनाया जा रहा है। देश के हर कोने में योग का कार्यक्रम हो रहा है और समाज के हर तबके का समर्थन मिला है।कल्कि महाराज  ने कहा कि योग मुक्ति का मार्ग तो है ही साथ में योग जीवन अनुशासन का अनुष्ठान भी है।


    मुक्तिमार्ग पर आप हम अडिग है।अपने पूर्वजों और उनकी महान विरासत को याद करना छोड़ दें। हम इसके लायक भी नहीं है।


    अब छाती कूटकर जितनी मर्जी स्यापा कर लीजिये,देश को तो उनने बेच दिया।


    कालजयी साहित्य लिखने वालों के कलाउत्कर्ष पर सांस्कृतिक उत्सव करते रहिये क्योंकि सत्तर के दशक से साहित्य और पत्रकारिता ने जनता को यह मुक्तबाजार दिया है।


    देश रहे न रहे,मेहनतकश और किसान,दलित और आदिवासी जिये या मरे,आपका हमारा क्या?


    तनिको आंखों में भरकर पानी याद करें कि नई पीढ़ी का समूचा संसार उड़ता पंजाब परिदृश्य है और हमने अपने बच्चों को बलि चढ़ाने की रस्म अदायगी कर दी है।


    तनिको आंखों में भरकर पानी याद करें कि इस देश में हरित क्राति से विदेशी पूंजी का जो खुल्ला खेल फर्रूखाबादी जारी है,नक्सल और माओवादी जनविद्रोह,पंजाब में अभूतपूर्व कृषि संकट,खालिस्तान आंदोलन,आपरेशन ब्लू स्टार और समूचे अस्सी के दशक में रक्तरंजित देश ने उसकी भारी कीमत चुकायी है।


    तनिको आंखों में पानी भर कर याद करें देश में दंगा फसाद,नरसंहार,बलात्कार सुनामी,बेदखली से लेक बाबरी विध्वंस और गुजरात नरसंहार,भोपाल गैस त्रासदी।हमं कभी कोई फर्क नहीं पड़ा।


    तनिको आंखों में भरकर पानी दृष्टि अगर सही सलामत है,दिव्यांग अगर नहीं हैं और अब भी इंद्रियां कामककर रही हैं  कि लोगों को दसों दिशाओं में केसरिया सुनामी नजर आती है और इसके विपरीत हम पल पल खून के लबालब समुंदर में सत्तर के दशक से अबतक जी और मर रहे हैं।


    तनिको आंखों में भरकर पानी याद करें कि हमने लगातार इस दुस्समय को संबोधित किया है।पहले पहल लघु पत्रिकाओं में,जिन अखबारों में पिछले 43 सालों के दौरान हमने काम किया है, उनमें,याहू ग्रूप से लेकर ब्लागों पर हमारे रोजनामचे में भी।


    जाहिर है कि फासिज्म का यह राजकाज और राजधर्म किसी एक व्यक्ति या एक रंग तक सीमाबद्ध नहीं हैं और न सारा किया धरा 16 मई 2014 के बाद का है।


    हमने समय रहते किसी भी स्तर पर अबाध पूंजी के इस सर्वव्यापी नरसंहारी साम्राज्यवादी अश्वमेध अभियान का विरोध नहीं किया है।


    हम 2005 से विशेष तौर पर सरकारी गैरसरकारी श्रमिकों कर्मचारियों और श्रमिक संगठनों को संबोधित करते रहे हैं सीधे उनके बीच जाकर देशभर में,नतीजा वही सिफर।जो लोग शिकार है इस अनंत आखेट के,वे नोटबटोरने में अछ्छे दिन का इंतजार कर रहे हैं ताकि मौज मस्ती का स्वर्ग वास हो जायेय़तो लीजिये अखंड स्वर्गवास है।


    जोर से चीखते रहें,इंक्लाब जिंदाबाद।

    जोर से चीखते रहें,हमारी मांगे पूरी करो।

    जोर से चीखते रहें,तानाशाही मुर्दाबादष

    जोर से चीखते रहें,लाल सलाम।लाल सलाम।

    जोर से चीखते रहें,जय भीम कामरेड।

    जोर से चीखते रहें,जयश्री राम।

    जोर से चीखते रहें,भव्य राम मंदिर वहीं बनायेंगे।

    जोर से चीखते रहें,सौगंध राम की खाते हैं।ज

    जोर से चीखते रहें,बाबासाहेब अमर रहे।

    जोर से चीखते रहें,गान्ही बाबा की जै।

    जोर से चीखते रहें,नमो बुद्धाय।


    जोर लगाकर हेइया।

    मंझधार डूब गई रे नैय्या।

    यह हिंदू राष्ट्र नहीं है। नहीं है।नहीं है।

    यह दरअसल कोई राष्ट्र ही नहीं है।

    यह विशुध पतंजलि मार्का अमेरिकी उपनिवेश है।

    मत कहो जय श्री राम।


    जोर लगाकर हेइया।

    मंझधार डूब गई रे नैय्या।

    मत कहो जय श्री राम।

    मत कहो हर हर महादेव

    मत कहो अकबर हो अल्लाह

    सब उपासना,सब इबादत,नमाज अदायगी,तीज त्योहार,पर्व,तमाम धर्म और तमाम आस्ताें अब विशुध मुक्तबाजार।



    हम बार बार चेता रहे थे।कांग्रेस जमाने से।नवउदारवादी सुधार अश्वमेध शुरु होने से पहले पहले तेल युदध के समय से।


    वीरेनदा और राजेश श्रीनेत,दीप अग्रवाल और तसलीम के साथ समकालीन नजरिया हम बरेली के रामपुर बाग से तब निकाल रहे थे,जब हम अमर उजाला बरेली में थे।


    उसी वक्त हमने एक कहानी लिखी थी,उड़ान से ठीक पहले का क्षण।मौडोना की फंतासी के मार्फत मुक्त बाजार की परिकल्पना के बारे में।कहीं उपलब्ध हैं तो मेरे दोनों कथा संग्रह अंडे सेंते लोग और ईश्वर की गलती पढ़ लें,जिनकी अबतक कोई चर्चा नही हुई है और उनकी हर कहानी में हमने इस दुस्समय के चित्र ही पेश किये हैं।


    चाहे तो नई दिल्ली में भारत मुक्त मोर्चा के पहली खुली रैली में जारी मेरी किताब बजट पोटाशियम पढ़ लें.जो मूलनिवाल ट्रस्टपुणे के पास उपलब्ध होनी चाहिए।जिसमेंआज के दिन की तस्वीरें हमने 2010 में ही लगा दी थी।चिड़िया चुग गयी खेत रे बचवा।


    अमर उजाला में खाड़ी युद्ध के दरम्यान दिवंगत अतुल माहेश्वरी, दिवंगत वीरेन डंगवाल,दिवंगत सुनील साह,दिवंगत उदित साहू के सान्निध्य में माननीय राजुल माहेश्वरी के सक्रिय समर्थन से पहले पेज पर लगभग रोज लिखे गये मेरे आलेखों को आप 1990 और 1991 की अमर उजाला फाइलों में बरेली या मेरठ में देख सकते हैं,अगर वे सुरक्षित हैं।


    फिर जो मैंने 2001 तक लगातार अमेरिका से सावधान लिखा बरेली से कोलकाता तक उसके प्रकाशित सौ से ज्यादा अध्यायों में से किसी को भी उठा लीजिये।जो दैनिक आवाज में श्याम बिहारी श्यामल के संपादकत्व में हर रविवार को 1995 से लगातार छपता रहा तब तक जबतक वह अखबार चालू रहा।


    यही नहीं,हम 2005 से 2010 तक देशभर में बामसेफ के सक्रिय कार्यकर्ता की हैसियत से जो बोल रहे थे,मूलनिवासी ट्रस्ट में उसके तमाम डीवीडी वीसीडी उपलब्ध हैं और हाल तक हमने यूट्यूब में भी इस सिलसिले में लगातार प्रवचन दिया है।


    बहरहाल,विश्वबैंक ने उम्मीद जताई कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन द्वारा शुरू किए गए बैंकिंग सुधार उनके सितंबर में जाने के बाद भी जारी रहेंगे क्योंकि भारत की वृहद आर्थिक नीतियां मजबूत हैं। विश्वबैंक के कंट्री डायरेक्टर इंडिया ओन्नो रूही ने आज कहा, 'मैं इस बात को वास्तव में विशेष रूप से कहना चाहता हूं कि भारत की वृहद आर्थिक नीतियां बहुत मजबूत हैं। उसके पास एक प्रभावी और पारंपरिक सोच वाला पर्यवेक्षक है। ऐसे में वहां (बैकिंग सुधारों) के रास्ते में बदलाव का कोई कारण नहीं दिखता।' …


    मीडिया की खबरों के मुताबिक,आर्थिक सुधारों को मोदी सरकार ने बड़ा बूस्टर डोज दिया है। एफडीआई पॉलिसी में बड़े बदलाव किए गए हैं। एविएशन और डिफेंस सेक्टर को अब पूरी तरह से विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया गया है। इसके अलावा ई-कॉमर्स, फूड प्रोसेसिंग, डीटीएच, केबल जैसे तमाम सेक्टरों में भी 100 एफडीआई तक एफडीआई मंजूर हो गई है।


    सरकार ने फार्मा सेक्टर में ऑटो रूट से 74 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दी है। फार्मा सेक्टर में ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड दोनों में ऑटोमैटिक रूट से पूरी तरह एफडीआई मंजूर हो गई है। डिफेंस सेक्टर में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी का एलान किया गया है, लेकिन डिफेंस में ऑटोमैटिक रूट के जरिए 49 फीसदी एफडीआई मंजूर होगी।


    एविएशन सेक्टर में भी एफडीआई नियमों में बदलाव का एलान हुआ है। एविएशन सेक्टर में एयरपोर्ट के ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट में 100 फीसदी एफडीआई का एलान किया गया है। सरकार ने एविएशन में शेड्यूल्ड एयरलाइंस में एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 100 फीसदी कर दी है। शेड्यूल्ड एयरलाइंस में 49 फीसदी एफडीआई ऑटोमैटिक रूट से होगा, और 49 फीसदी से ज्यादा एफडीआई के लिए सरकार की मंजूरी लेनी होगी।


    सरकार ने ई-कॉमर्स फूड सेक्टर में मंजूरी के बाद 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दी है। फूड प्रोसेसिंग में भी 100 फीसदी तक एफडीआई मंजूर की गई है। सिंगल ब्रांड रिटेल सोर्सिंग के नियमों में ढ़ील दी गई है। केबल नेटवर्क, डीटीएच और मोबाइल टीवी में ऑटोमैटिक रूट के जरिए 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दी गई है।


    मोदी सरकार का दूसरा सबसे बड़ा रिफॉर्म बताए जाने वाले इस कदम के तहत एफडीआई की कुछ सीमाएं भी तय की गई हैं। डिफेंस सेक्टर में आर्म्स एक्ट 1959 के मुताबिक छोटे हथियार और उसके पार्ट्स में ही एफडीआई लागू होगा। वहीं सिविल एविएशन सेक्टर में ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट प्रोजेक्ट के लिए 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी मिल गई।


    केंद्र सरकार ने फूड प्रोडक्ट बनाने सहित ऑनलाइन व्यापार में भी एफडीआई को मंजूरी दी है। इसके साथ ही डीटीएच, मोबाइल टीवी, केबल नेटवर्क व्यापार में भी एफडीआई का रास्ता खुल गया है। फार्मा सेक्टर में ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड दोनों में ऑटोमेटिक रूट से पूरी तरह एफडीआई मंजूर हो गई है।


    प्राइवेट, सिक्योरिटी एजेंसी में 49 फीसदी, वहीं एनिमल हस्बेंडरी में नियंत्रित पर 100 फीसदी एफडीआई के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया गया है। सिंगल ब्रांड खुदरा कारोबार में नियमों में ढील देते हुए 3 और 5 सालों के लिए टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट में पहले से 49 फीसदी एफडीआई को बढ़ाकर 100 फीसदी कर दिया गया है।


    आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांता दास ने कहा है कि एविएशन सेक्टर को विदेशी निवेश के लिए खोलना बड़ा कदम है हालांकि उन्होंने ये भी साफ किया कि एफडीआई लाना है या नहीं इसका फैसला एविएशन इंडस्ट्री को ही करना है।


    एफडीआई में बड़े बदलाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्रांतिकारी कदम बताया है। उन्होंने कहा है कि ऑटो रूट के जरिए अब ज्यादातर सेक्टर एफडीआई के लिए खुल गए हैं और एफडीआई से जुड़े इन रिफॉर्म के बाद अब भारत दुनिया की सबसे खुली इकोनॉमी वाला देश बना गया है। उन्होंने कहा है कि रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए एफडीआई में बड़े बदलाव किए गए हैं। भारत में सुधारों को देखते हुए ही कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत को नंबर 1 एफडीआई डेस्टिनेशन की रेटिंग दी है।


    वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि तमाम सेक्टर में एफडीआई का रास्ता खोलने का मकसद रोजगार बढ़ाना है। साथ ही मेक इन इंडिया को भी बढ़ावा देना है और भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के सपने को हकीकत में बदलना है।


    डिफेंस सेक्टर में 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी पर डिफेंस एक्सपर्ट उदय भास्कर ने कहा है कि अगर इस सेक्टर में मेक इन इंडिया को कामयाब बनाना है तो निवेशकों को छूट देनी होगी। मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन के मोहनदास पई एफडीआई खोलने के फैसले को सही मानते हैं। उनकी दलील है कि इससे देश में अच्छी टेक्नोलॉजी आएगी।


    कई सेक्टरों में 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी मिलने की खबर का फिक्की ने स्वागत किया है। फिक्की के महासचिव डॉ दीदार सिंह ने कहा है कि इस फैसले ने भारत में निवेश के नए रास्ते खोल दिए हैं। इंडस्ट्री ने कई सेक्टरों में एफडीआई का दिल खोलकर स्वागत किया है लेकिन कांग्रेस का कहना है कि ये पैनिक में उठाया गया कदम है।



    अब छाती कूटकर जितनी मर्जी स्यापा कर लीजिये,देश को तो उनने बेच दिया!


    बीजमंत्र का अखंड जाप करें,दुनिया की सबसे मुक्त अर्थव्यवस्था सनातन धर्म का भारत!



    राजन के गम पर एफडीआई का मरहम

    शुभायन चक्रवर्ती और निवेदिता मुखर्जी / नई दिल्ली June 20, 2016





    राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने सोमवर को हरकत में आते हुए विमानन, फार्मा, खाद्य कारोबार, रक्षा से लेकर रिटेल और टेलीविजन प्रसारण के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों को और उदार बनाने का ऐलान किया। सरकार ने इसके पीछे मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन करने का तर्क दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के पद से विदाई की खबरें दो दिनों से सुर्खियों में रहने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी वाली एकल ब्रांड रिटेल कंपनियों को एफडीआई सीमा और शर्तों में ढील देने के लिए आज चुनिंदा कैबिनेट मंत्रियों और सचिवों के साथ बैठक बुलाई।

    सूत्रों का कहना है कि यह बैठक पहले से प्रस्तावित थी लेकिन अचानक उच्च स्तरीय बैठक बुलाने की वजह राजन मसले से लोगों का ध्यान हटाना था। करीब दो घंटे तक चली बैठक के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने ट्वीट कर कहा कि एफडीआई के लिहाज से भारत अब दुनिया में सबसे ज्यादा खुली अर्थव्यवस्था बन गई है। इसके बाद मंत्रियों और सचिवों ने भी एक के बाद एक संवाददाता सम्मेलन कर सरकार द्वारा उठाए गए सुधारवादी कदमों की जानकारी दी। स्थानीय स्तर पर आपूर्ति नियमों में ढील से ऐपल को सीधे लाभ होगा। दरअसल इसी मसले की वजह से अमेरिकी आईफोन निर्माता कंपनी को भारत में अपनी रिटेल योजना टालनी पड़ी थी। शर्तों में संशोधन के बाद ऐपल को कुल आठ साल के लिए स्थानीय स्तर पर आपूर्ति नियमों में छूट मिलेगी। यह निर्णय ऐपल के मुख्य कार्याधिकारी टिम कुक के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नई दिल्ली में मुलाकात के करीब एक माह बाद लिया गया है।

    सरकार ने कहा कि स्थानीय स्तर पर आपूर्ति नियमों में सभी एकल ब्रांड कंपनियों को छूट मिलेगी, वहीं अत्याधुनिक और विशिष्टï प्रौद्योगिक वाली कंपनियों को अतिरिक्त पांच साल की छूट दी जाएगी। खाद्य उत्पादों का ई-कॉमर्स के जरिये खाद्य कारोबार करने के लिए सरकार की मंजूरी के साथ 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति दी गई है।

    इसी तरह रक्षा क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई के लिए अत्याधुनिक तकनीक की जगह आधुनिक प्रौद्योगिकी को शामिल किया गया है। मीडिया क्षेत्र में केबल से लेकर डीटीएच में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी होगी, जिससे स्टार जैसी विदेशी कंपनियों को पूर्ण परिचालन में सहूलियत होगी। विमानन में पुराने हवाई अड्डïा परियोजनाओं में स्वत: मंजूरी मार्ग के जरिये 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति दी गई है जबकि विदेशी विमानन कंपनियों के लिए 49 फीसदी निवेश की सीमा होगी।

    आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास ने कहा कि एफडीआई को स्वत: और प्रक्रिया आधारित बनाने का यथासंभव प्रयास किया गया है। इस कदम से न केवल देश में ज्यादा एफडीआई आएगा, बल्कि रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। दास ने कहा विमानन क्षेत्र में नए नियमों को व्यापक बदलाव लाने वाला करार दिया और कहा कि इससे घरेलू विमानन कंपनियां ज्यादा दक्ष होंगी और रोजगार का सृजन होगा।ऐपल पर निर्णय के बारे में दास ने कहा कि अगले कुछ दिनों में इस पर स्पष्टïता आएगी। ऐपल भारत में अपना आधार बढ़ाने को इच्छुक है। हालांकि इस बारे में बिजनेस स्टैंडर्ड की ओर से भेजे गए सवालों का कंपनी की ओर से खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं आया।स्थानीय स्तर पर आपूर्ति नियमों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है।

    पहले सभी एकल ब्रांड रिटेल कंपनियों के लिए 30 फीसदी स्थानीय खरीद को अनिवार्य बनाया गया। लेकिन बाद में डीआईपीपी ने मामला-दर-मामला अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी वाली कंपनियों को इसमें छूट देने का दिशानिर्देश जारी किया। लेकिन यह कभी प्रभावी नहीं हुआ। बाद में राजग सरकार मेक इन इंडिया के तहत देश में विनिर्माण को बढ़ावा देने का अभियान चलाया और आपूर्ति में रियायत नहीं देने का निर्णय किया। हालांकि अब इसमें आठ साल के लिए छूट का प्रावधान किया गया है।

    ऐपल पहले ही स्पष्टï कर चुकी थी कि कंपनी के लिए आपूर्ति नियमों का पालन करना संभव नहीं होगा। इसके बाद वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के साथ ही साथ वित्त मंत्रालय अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी वाली कंपनियों के लिए आपूर्ति नियमों में संशोधन की कवायद में जुट गए, लेकिन कोई निर्णय नहीं किया गया। हालांकि सोमवार को वाणिज्य मंत्री निर्माला सीतारामण ने कहा कि भारत में रिटेल शृंखला शुरू करने वाली कंपनियों को नए सिरे से आवेदन करना होगा।

    http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=120819



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    Mabood Ahmad
    June 21 at 1:17pm
     
    आरएसएस के लोगो से ये 16 प्रश्न आप कीजिये इनके जवाब ये लोग नही दे पायेगे उलटा आप को गाली देगे या ब्लॉक करके भाग जायेगे या विरोधियो का फोटोशॉप पोस्ट डालेगे पर फिर भी आप ये सवाल करते रहे 

    (1) आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई क्यों नही लड़ी ? 

    (2) आरएसएस हिन्दू हित की बात करता है उसकी वेशभुषा विदेशी क्यों है 

    (3) सुभाषचन्द्र बॉस आज़ाद हिन्द सेना का गठन कर रहे थे तब संघ ने सेना में शामिल होने से हिन्दू युवकों को क्यों रोका 

    (4) संघ के वीर सावरकर अंग्रेजो से 21 माफ़ी देकर जेल से क्यों छूटे जबकि 436 लोग और थे सेलुलर जेल में सिर्फ इन्होंने ही क्यों माफ़ी नामे लिखे ऐसी क्या विपदा आ गई थी 

    (5) आरएसएस के पहले अधिवेशन में 1925 में द्विराष्ट्र सिद्धान्त हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र का प्रस्ताव क्यों पारित किया गया जबकि एक तरफ आप लोग अखंड भारत की बात करते है 

    (6) 1942 में असहयोग आंदोलन का बहिष्कार करता है संघ ऐसा पत्र ब्रिटिश गवर्मेंट को क्यों लिखा अगर ये पत्र न लिखते तो देश 1942 में आज़ाद हो जाता 

    (7) गांधी जी के हत्या के प्रयास संघ आज़ादी के पूर्व से कर रहा था क्यों ? गांधी जी पर आज़ादी के पूर्व 5 बार संघियों ने हमले किये क्यों 

    (8) संघ प्रमुख केशव बलिराम हेडगांवकर ने कहा हे हिंदुओ को अपनी ताकत का उपयोग अंगेजो के खिलाफ न करते हुए देश में मुस्लिम क्रिश्चियन और दलितों के खिलाफ करना चाहीये ऐसा क्यों ? 

    (9) कहते हे दो धार्मिक शक्तिया एक दूसरे के खिलाफ काम करती है तो देश टूटने की कगार पर होता है संघ और मुस्लिम लीग एक दूसरे के विपरीत थी इस कारण देश टुटा में संघ के लोगो से पूछना चाहता हूँ आप तो अखंड भारत की बात करते हो ऐसा क्यों हुआ 

    (10) आरएसएस हिन्दू हित की बात करती है 1925 से 1947 के बीच ईसाई धर्मान्तरण के खिलाफ कोई आंदोलन क्यों नही चलाया ? 

    (11) जब देश आज़ाद हुआ 15 अगस्त 1947 को संघ के लोग राष्ट्रध्वज तिरँगे को पेरो में कुचल रहे थे तिरँगा जला रहे थे क्यों ? 

    (12) संघ के स्वयंसेवक अटल बिहारी बाजपाई ने क्रन्तिकारी लीलाधर बाजपई के खिलाफ क्यों गवाही दी जिससे उन्हें 2 वर्ष का कारावास हुआ 

    (13) पिछड़ा दलित आदिवासी भी संघी हे तो नासिक के काला राम मंदिर में प्रवेश मुद्दे पर बाबा डॉ अम्बरेडकर जी ने आन्दोलन किया तो उस आन्दोलन का विरोध क्यों किया ? 

    (14) संघ ने हिन्दू समाज के हित में किया कोई एक कार्य बताये जिससे हिन्दू समाज का निम्नवर्ग का तबका लाभान्वित हुआ हो 

    (15) संघ के लोग अपने आप को राष्ट्रवादी समझते है 1925 से 1947 के बीच वन्देमातरम् का नारा क्यों नही लगाया अंग्रेजो का इतना डर था क्या 

    (16) संघ / विहिप / और अन्य हिंदूवादी संघटन के प्रमुख दलित आदिवासी समूह से क्यों नही बने क्या ये हिन्दू नही है ? 

    कृपया इन सवालो के जवाब जरूर पूछ्येगा

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    Sunil Khobragade

    डॉ.बाबासाहेब आंबेडकरांनी संविधानाच्या माध्यमातून भारतात घडवून आणलेली लोकशाही क्रांती नष्ट करून भारताचा पुन्ह:श्च हिंदुस्तान करण्याच्या दिशेने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाची आगेकूच सुरु आहे. यामुळे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रजासत्ताक लोकशाही भारताच्या अस्तित्वाला असलेला सर्वात मोठा धोका आहे. आंबेडकरवादी बुद्धीजीवी,कार्यकर्ते,राजकीय नेते, सामान्य आंबेडकरी जनता हा धोका ओळखून आहेत. यामुळे संघाशी भिडले पाहिजे,संघाचा मुकाबला केला पाहिजे ही सर्व स्तरातील आंबेडकरी जनतेची तीव्र भावना आहे. यामुळे संघावर टीका करणारे कम्युनिष्ट,समाजवादी,काही काँग्रेसी, प्रागतिक विचारांचे लेखक,साहित्यिक,अभिनेते किंवा अन्य जे कोणी असतील अशा सर्व लोकांना बहुसंख्य आंबेडकरी जनता नेहमीच पाठींबा देत आली आहे. आंबेडकरी जनतेच्या या संघविरोधी मानसिकतेचा सद्य:स्थितीत पुरेपूर वापर विविध कम्युनिष्ट पक्ष-संघटना करीत आहेत. यामुळे संघाच्या विरोधात आक्रमक बोलणारा बोलघेवडा नेताही लोकांना लढाऊ,खंबीर,विद्वान,धाडसी,निर्भीड वगैरे सर्वगुणसंपन्न वाटतो. मात्र, रा.स्व.संघाच्या विरोधात नुसते आक्रमक बोलून कोणतीही व्यक्ती, किंवा कोणताही राजकीय पक्ष संघाचे काहीही बिघडवू शकत नाही ही वस्तुस्थिती सामान्य आंबेडकरी माणूस लक्षात घ्यायला तयार नाही. संघाचा सर्वोच्च ध्येयसंकल्प काय आहे ? या ध्येयसंकल्पाचे सैद्धांतिक अधिष्ठान काय आहे ? संघाची कार्यपद्धती कशी आहे ? संघाच्या कार्यपद्धतीची अंमलबजावणी कशी केली जाते ? संघपरिवार व त्याच्या पिलावळ संघटना यांचे संघटनात्मक स्वरूप,अंतरसंबंध व कार्यपद्धती इत्यादी अनेक पैलूविषयी रा.स्व.संघाला नामोहरण करण्याची इच्छा बाळगून असणाऱ्या बहुसंख्य आंबेडकरवाद्यांना नेमकी आणि वस्तुस्थितीवर आधारित अशी माहिती नाही. ज्या शत्रूशी लढायचे आहे त्याची बलस्थाने,कमजोरी,त्यांचे लढाईचे तंत्र, त्यांच्या संघटनेचे स्वरूप इत्यादीविषयी माहिती नसेल तर केवळ .... मुडदे पाडू ! ....उखडून फेकू ! ....अमुक करू ! इत्यादी प्रकारच्या वल्गना करून काहीही साध्य होणार नाही. यामुळे रा. स्व. संघाशी खरेच मनापासून भिडायचे असेल तर सर्वप्रथम संघाचे अंतर्बाह्य स्वरूप समजून घेणे आवश्यक आहे.


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    Anand Patwardhan

    Today's news was another bombshell. They killed Gandhiji in 1948 but they won't stop killing the ideals of our freedom struggle on a daily basis. FDI gates flung open say the headlines. In what? In Defense ! We will now allow foreign companies to manufacture and export weapons from our soil. That includes even small arms and ammunition. Which will fuel world wars and also find their way to the streets and villages of India. In the hands of those who have the money to buy. The daily macabre shootings we hear of in America will not take long to be reproduced here.

    Arms makers and dealers need war and violence to sustain them. War and violence needs polarization. That is the core job assigned to ISIS and Hindutva, both sustained by the same sinister plan.

    The USA is the largest exporter of weapons in the world. India is now their blood brother. Can there be anything more shameful or foolish?

    What else? Pharma ! So out go the ideals that allowed us to make generic AIDs medicines at a fraction of the costs, thus saving millions of lives in Asia and Africa. Now we are partners in the Medicine for Profit business.

    While they make us sing Jana Gana Mana at attention and shout Bharat Mata Ki Jai, they are selling every vestige of sovereignty that Gandhi, Nehru, Bhagat Singh, Ambedkar, Badshah Khan and Allah Baksh fought for, to name just a very few. Will a new generation rise up to take their place and take back this country from the moron fascists who have captured it ?

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    सतीश जमाली नहीं रहे! कहानी तो वे ही निकालते थे!

    पलाश विश्वास

    अभी अभी जनवादी लेखक संघ के ताजा स्टेटस से पता चला कि सतीश जमाली नहीं रहे।हम बचपन से कविताएं लिखते रहे हैं बांग्ला में।नैनीताल में गुरुजी की प्रेरणा से हिंदी में लिखना शुरु हुआ तो कहानी लिखने की हिम्मत जुटाने में करीब दो साल बीत गये।कहानी हमारी बीए प्रथम वर्, से छपनी शुरु हो गयी।

    ताराचंद्र त्रिपाठी के घर में कपिलेश भोज और मैं संग संग रहते थे।

    भोज इंटर से ही लगातार कहानियां लिख रहा था और मुझ पर लगातार दबाव बनाये हुए था कि मैं भी कहानी लिखूं।तो नई कहानी के बारे में जानने समझने के लिए उन दिनों इलाहाबाद से प्रकाशित कहानी पत्रिका के अंकों के पाठ का सिलसिला शुरु हुआ।चूंकि श्रीपत राय इसके संपादक थे।

    यूं तो पिताजी बांग्ला पत्रिका देश के साथ साथ साठ के दशक में छपने वाली पत्रिका उत्कर्ष के आजीवन सदस्य थे और बांग्ला और हिंदी कहानियों के बारे में मेरी डरी सहमी राय बनी हुई थी और मैं समझ रहा ता कि कविताएं लिखना ज्यादा आसान है लेकिन कहानियों के पचड़े में पड़ना नही चाहिए।

    नई कहानी के दिग्गजों को पढ़ने से पहले,नैनीताल में होते हुए शिवानी,बटरोही,बल्लभ डोभाल,शेखर जोशी और शैलेश मटियानी को पढ़ने से पहले मैंने इंटर ेसे ही विश्वसाहित्य के लगभग सभी कहानीकारों को पढ़ डाला था।हिंदी में नई कहानी को समझने का प्रयास कहानी पत्रिका से शुरु हुआ।

    तब हिंदी जगत के बारे में गुरुजी के अलावा हमारे गाइड कपिलेश भोज ही थे।भोज ने कह दिया कि  श्रीपत जी की उम्र हो गयी है तो सतीश जमाली ही कहानी संपादित करते हैं।इसी बीच गुरुजी के निर्देश के मुताबिक ज्ञान रंजन को पड़ने के बाद मोहन राकेश राजेंद्र यादव और कमलेश्वर से हमारा मोहभंग हो गया था।
    बतौर लेखक सतीश जमाली को बाद में जाना।

    इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मैं पीएचडी के लिए गया था और डां.मानस मुकुल दास के मातहत अंग्रेजी कविता पर शोध करने का इरादा लेकर मैं नैनीताल के पहाड़ों से सीधे इलाहाबाद पहुंचा था।मटियानी जी के घर में जगह नहीं थी तो 100 लूकर गंज में शेकऱ जोशी के घर रुका तो इलाहाबाद की पूरी साहित्यिक बिरादरी से रुबरु हो गया।लूकरगंज में ही मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल  रहते थे।वहीं नीलाभ और उनके पिता उपेंद्र नाथ अश्क रहते थे।
    शेखर जी से दूधनाथ सिंह की खास दोस्ती थी तो भैरव जी,अमरकांत,नरेश मेहता,रवींद्र कालिया ममता कालिया,मार्केंडय से उनके ताल्लुकात बेहद पारिवारिक थे।कहानी के दफ्तर में मंगलेश जी के साथ  सतीश जमाली के साथ मुलाकात हुई।उनका चेहरा काफी हद तक ओम पुरी जैसा लगता था।तब तक उनका लिखा भी पढ़  चुका था।
    नई पीढ़ी के रचनाकारों को सत्तर के दशक में ज्ञानरंजन से जितनी प्रेरणा मिली,बजरिये कहानी सतीश जमाली ने भी उन्हें काफी हद तक प्रभावित किया।
    ऐसे संपादक लेखक के अवसान पर बहुत खराब लग रहा है।
    जनवादी लेख संघ का स्टेटस इस प्रकार हैः

    सतीश जमाली नहीं रहे 
    (21.06.2016)

    हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार और 'कहानी'तथा 'नयी कहानियाँ'पत्रिका के सम्पादन से सम्बद्ध रहे श्री सतीश जमाली के निधन की सूचना अत्यंत दुखद है. इन दिनों कानपुर में रह रहे सतीश जमाली कुछ दिन पहले अपने पुश्तैनी शहर पठानकोट गए थे जहां बताते हैं कि ठोकर लगने से उन्हें चोट आयी थी और नाक से खून आने लगा था. दिल्ली लाकर एम्स में उन्हें भरती कराया गया. यहाँ वे कुछ दिन कोमा में रहे, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया न जा सका. आज सुबह उनका निधन हुआ. वे लगभग 77 वर्ष के थे.

    श्री सतीश जमाली 'जंग जारी', 'नागरिक', 'बच्चे तथा अन्य कहानियां', 'ठाकुर संवाद', 'प्रथम पुरुष'जैसे कहानी-संग्रहों और 'प्रतिबद्ध', 'थके-हारे', 'छप्पर टोला'तथा 'तीसरी दुनिया'जैसे उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं. साहित्यिक पत्रकार के रूप में तो उनकी पहचान थी ही.

    जनवादी लेखक संघ दिवंगत कथाकार को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.


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