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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    ग्राउंड दलित रिपोर्ट -8

    उदलपुरा ( भीलवाड़ा )

    जहाँ पशुओं के लिये पानी है पर दलितों के लिये नहीं !

    - भंवर मेघवंशी 
    ..............................................................
    बाबा साहब अम्बेडकर ने बरषों पहले अगस्त 1926 में पानी पर दलितों के अधिकार के लिए महाड के चवदार तालाब पर सत्याग्रह किया था .इसके बाद जब देश आजाद हुआ तो संविधान ने सार्वजनिक स्थानों से छुआछूत और भेदभाव को कानूनन ख़त्म कर दिया .बाद में अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण कानून ने दलितों के जल पर अधिकार को बाधित करने को अपराध घोषित कर दिया .देश में सत्ताएं बदल गई ,मगर मानसिकता नहीं बदली .भारत को विश्व आर्थिक शक्ति बनाने के दावे करने वालों और तरक्की के मापदंड सकल घरेलु उत्पाद को लेकर लगातार ढोल पीटने वालों से अगर कहा जाये कि आज भी भारत में लाखों गांवों में दलितों को सार्वजनिक पेयजल स्त्रोतों से पानी लेने का अधिकार नहीं है तो वे इस बात की यह कह कर खिल्ली उड़ायेंगे कि ये सब पुरानी बातें हो चुकी है .आज के दौर में यह सब नहीं होता है .
    आजकल अक्सर ऐसा भी सुनने को मिलता है कि अब जातिगत छुआछूत बीते ज़माने की बात हो गई है ,अब भेदभाव जैसी बातें सिर्फ जातिवादी लोग करते है .जिन्हें दलितों के मसीहा बनने की इच्छा होती है ,वे ही लोग समाज को बांटने के लिए ऐसी विघटनकारी बातें उछालते रहते है ,जिनके कोई सर पैर नहीं होते है ,क्योंकि अब भेदभाव जैसी कोई बात नहीं बची है .
    जिन्हें जाति के आधार पर हो रहे भेदभाव को अपने क्रूर और नग्न स्वरुप में देखना हो ,उन्हें राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की आसीन्द पंचायत समिति की गांगलास पंचायत के उदलपुरा गाँव का दौरा करना चाहिये .छुआछूत की जमीनी हकीकत से रूबरू होने के लिए यह एकदम उपयुक्त गाँव है .इस गाँव में तक़रीबन 145 परिवार निवास करते है ,जिनमें 55 परिवार दलित समुदाय के है और शेष 90 परिवार अन्य पिछड़े वर्ग की कुमावत ,गुर्जर ,गाडरी तथा वैष्णव जाति के परिवार है .सर्वाधिक 80 परिवार कुमावत समाज के है .ब्राह्मण ,बनिया और राजपूत जिन्हें हम पानी पी पी कर रात दिन मनुवाद के लिये कौसते रहते है ,उनका एक भी परिवार यहाँ निवास नहीं करता है .पूरा गाँव ही दलितों और पिछड़ों का है .85 फीसदी बहुजनों और मूलनिवासियों की एकता की बात करने वालों को भी इस गाँव का दौरा करना चाहिये . दलित और पिछड़ों की एकता का राग अलापने वालों को भी जरुर उदलपुरा एक बार आना ही चाहिये ताकि वे जान सके कि आज तथाकथित पिछड़े ही दलितों पर अत्याचार ,भेदभाव और छुआछूत करने में सर्वाधिक आगे है .वर्णव्यस्था के शूद्र आज के नव सामंत ,नव ब्राह्मण और नए धन पिशाच बन गए है .वे हिंदुत्व प्रणीत ब्राह्मणवाद के शव को सिर पर लादे हुए घूम रहे है और श्रेष्ठता की ग्रंथि से ग्रसित हो चुके है .
    मैं यह बात अपने अनुभवों के साथ पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि देश भर में दलित समुदाय इन कथित पिछड़ों के अत्याचारों से त्रस्त है और वे इनसे मुक्ति चाह रहे है ,इसलिये उन्हें बहुजन और मूलनिवासी की अवधारणा अब अप्रासंगिक लगने लगी है और जगह जगह पर अब दलित कथित अगड़ों के साथ जाता हुआ दिखाई पड़ रहा है .
    खैर ,उदलपुरा के पिछड़े वर्ग के लोग यहाँ के दलितों को सार्वजनिक सरकारी नल से पानी नहीं भरने देते है ,पिछले एक वर्ष से दलित महिलाएं पेयजल के गंभीर संकट से जूझ रही है ,उन्हें डेढ़ किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर किया जा रहा है .गाँव में पीने के पानी की अलग अलग व्यवस्था है ,पिछड़े शूद्र अपने आप को ऊँचा समझते है और वे अपने मोहल्ले में स्थित नल पर दलितों को फटकने भी नहीं देते है .गाँव की दलित महिलाएं बताती है कि जब वे पानी लेने कुमावतों के मोहल्ले में जाती है तो उन्हें भद्दी भद्दी जातिगत गालियाँ दे कर अपमानित किया जाता है और उनके मटके फोड़ने की कोशिस की जाती है .बार बार के अपमान और धमकियों के चलते उदलपुरा की दलित औरतें अब पानी के लिए सरकारी नल पर नहीं जाती बल्कि इधर उधर भटकती रहती है .दलितों के पेयजल की समस्या के समाधान को लेकर वहां की सरकारी एजेंसियां बिलकुल भी संवेदनशील नहीं है .तीन साल पहले विधायक निधि से दलित बस्ती में एक पानी की टंकी स्वीकृत हुई थी ,जो सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ कर जस की तस ताबूत बने खड़ी है ,उसका काम पूरा भी नहीं हुआ कि फंड खत्म हो गया .उदलपुरा के जानवरों एक ही प्याऊ से पानी पी लेते है ,ग्राम पंचायत भी पशुओं की इस प्याऊ में टेंकर से पानी डलवाती है .उसे दलितों से ज्यादा पशुओं की चिंता अधिक है . 
    भेदभाव का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता बल्कि महात्मा गाँधी नरेगा में भी यह बदस्तूर जारी है .अव्वल तो दलितों को नरेगा में काम ही नहीं दिया जाता है .आज भी 15 से अधिक दलित परिवार रोजगार गारंटी में काम के इच्छुक है ,मगर उन्हें बार बार मांगने पर भी काम नहीं दिया जा रहा है ,जिन छह परिवारों को महिलाएं काम पर नियोजित की गई है ,उनके साथ कार्यस्थल पर भयंकर छुआछूत किया जाता है .नरेगा श्रमिक पारसी बलाई का कहना है कि हमसे पूरा काम लिया जाता है जबकि दुसरे समुदाय की औरतें बैठी रहती है ,इसके बदले में काम जे सी बी मशीन से करवाया जाता है ,जिसका पैसा श्रमिकों से वसूला जाता है .इन दलित महिलाओं का आरोप है कि उनसे हर माह 100 रुपये वसूला जाता है जबकि वे हर दिन अपना काम पूरा करती है .नरेगा का काम में मशीनों का इस्तेमाल कानूनन अवैध है ,लेकिन यहाँ पर मेट शम्भू लाल कुमावत की ओर से यह काम बेख़ौफ़ किया जा रहा है और इसके बदले में चौथ वसूली की जा रही है .
    नरेगा में पानी पिलाने के काम में यहाँ पर सिर्फ पिछड़े वर्ग की महिलाओं को ही रखा जाता है .दलित स्त्रियों को पानी के काम पर रखने पर अघोषित प्रतिबन्ध लगा हुआ है ,उदलपुरा में भी ऐसा ही है ,यहाँ पर कुमावत या गुर्जर समुदाय को ही पानी के काम पर रखा जाता है ,नतीजतन दलित नरेगा श्रमिकों को पानी नहीं पिलाया जाता है ,उदलपुरा की छह दलित महिला नरेगा श्रमिक अपने साथ घर से पानी की बोतलें ले कर जाती है .अगर दिन में उनकी बोतलों में से पानी ख़त्म हो जाता है तो उन्हें ऊपर से दूर से पानी डाला जाता है ,साथ ही जातिगत उलाहने दिए जाते है कि इनकी वजह से उनका पानी अशुद्ध हो गया है ,इस तरह दिन में कईं बार अपमानित होते हुए यहाँ की दलित महिलाएं नरेगा पर काम करती है ,जहाँ पर उनका मेजरमेंट कम लिखा जाता है ताकि पूरी मजदूरी भी नहीं मिल सके .
    उदलपुरा के दलितों के साथ अन्याय की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती ,बरसात के दिनों में पूरे गाँव का पानी बहकर दलित बस्ती की तरफ आता है ,जिस नाले से पानी निकलता था ,उसे भी इस साल बंद कर दिया गया ,इसके चलते यह सम्भावना बन गई है कि जिन दलितों के कच्चे मकान है ,वे इस बार की बारिश में ढह जायेंगे .शेष दलितों को कीचड में रहने को मजबूर होना पड़ेगा .
    गाँव के गैरदलितों के मोहल्ले में सरकारी सी सी रोड बना हुआ है ,जबकि दलितों को इससे जानबूझ कर वंचित किया गया है ,आज अगर देखा जाये तो यह साफ दिखाई पड़ता है कि उदलपुरा के दलित समुदाय को रोड ,पानी जैसी सुविधाओं से योजनाबद्द तरीके से वंचित किया जा रहा है ,यहाँ के दलितों ने इस अन्याय के खिलाफ कई बार कईं स्तर पर आवाज भी उठाई मगर कहीं भी कोई सुनवाई नहीं हुई ,इस बार यहाँ की दलित महिलाओं ने मोर्चा संभाला है ,आज ही दलित बस्ती की सार्वजनिक सराय में यहाँ की महिलाएं अपने पुरुषों के बराबर बैठी और उन्होंने मामले को उच्च स्तर पर ले जाने की योजना को अंतिम रूप दिया है ,कल वे जिला कलक्टर से मिलकर अपनी समस्याएं रखेगी ,उन्होंने अब एक भी और दिन अन्याय को सहने से इंकार किया है और छुआछूत ,भेदभाव और अन्याय ,अत्याचार के खात्में तक संघर्ष करने का मन बनाया है .
    - भंवर मेघवंशी 
    ( लेखक 'ग्राउंड दलित रिपोर्ट'के सम्पादक है )


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    ग्राउंड दलित रिपोर्ट -9 
    कोटड़ी ( भीलवाड़ा ) 
    जातिगत अपमान की अंतहीन दास्तान 

    - भंवर मेघवंशी 
    ...............................................................
    राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बनेड़ा थाना क्षेत्र का कोटडी गाँव आज भी सामंती अत्याचारों का गढ़ बना हुआ है .इस गाँव के निवासी पन्ना लाल बलाई ने आज भीलवाड़ा के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के समक्ष पेश हो कर अपनी व्यथा बयान की ,उनका कहना था कि जब से उसने अपने गाँव में एक अच्छा सा सुन्दर पक्का मकान बनाया है तब से वह गाँव के सामंतों के निशाने पर आ गया है ,वे उसे तरह तरह से परेशान करने में लगे है .दरअसल पन्नालाल बलाई का मकान पडौसी सामंतों से ऊँचा जो है ,क्या वह बर्दाश्त किया जा सकता है ? ऐसे प्रदेश में जहाँ पर घरों के दरवाजे तक जाति की साईज पर रखने की मजबूरी हो ! 
    पन्ना लाल के परिवार पर विगत कई वर्षों से सामंती कहर बरपा है ,कभी उनका चारा जलाया गया तो कभी उनके यहाँ आये मेहमानों को पीटा गया .इस बार 24 मई को लक्षमण सिंह ने भरी दोपहरी दिन दहाड़े पन्नालाल के घर पर हमला किया ,घर के खिड़की दरवाजे तोड़ दिए .फर्श उखाड़ दिया और घर के बाहर खड़ी एक्सल गाड़ी के भी कांच तोड़ दिये .इतना ही नहीं बल्कि घर में रखे पांच हज़ार रूपये और भामाशाह कार्ड जैसे सारे दस्तावेज भी चुरा कर ले जाने लगा ,जब उसे रोकने की कोशिस की गई तो लक्ष्मण सिंह पथराव करने लगा और कांडी तथा बलाईटा जैसी अपमानजनक गलियाँ देकर अपमानित करने लगा . 
    बर्षों तक इस तरह का अत्याचार सहते सहते तंग आ चुके पन्नालाल ने इस बार दलित अधिकार कार्यकर्ताओं की मदद लेने की सोची और उन्होंने जयपुर स्थित सामाजिक न्याय समिति के सचिव गोपाल वर्मा से सम्पर्क स्थापित कर मदद मांगी .श्री वर्मा ने पीड़ित दलित पन्नालाल की अर्जी ड्राफ्ट कर दी और उन्हें बनेड़ा थाने में भेजा ताकि मुकदमा दर्ज हो सके .
    पीड़ित पक्ष जब अपनी शिकायत ले कर थाने पर पंहुचा तो वहां पर पोस्टेड अधिकारी एस पी हटवाल ने जो कि खुद भी दलित है और बाबा साहब के रहमो करम से सरकारी नौकरी में है ,उसने दलित पन्नालाल की मदद करने के बजाय उसे ही धमकाया और खुले आम कहा कि जा कोई कार्यवाही नहीं होगी ,जयपुर से कार्यवाही करवा लेना .ये दलितों के नेता बनने वाले कागलों ( कव्वों ) से ही कार्यवाही करवाना ,मैं नहीं करूँगा .और उसने अपना वचन निभाया ,घटना के नौ दिन बीत जाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की .डॉ अम्बेडकर ने ऐसे ही लोगों के लिए आगरा में कहा था कि – मुझे मेरे ही समाज के पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दिया है .सही बात है शासन और प्रशासन में ऐसे हजारों धोखेबाज दलित बहुजन अधिकारी कर्मचारी बैठे है ,मगर वे बाबा साहब की संतानों को न्याय देने का काम नहीं करते ,बल्कि गैरदलितों के तलुवे चाटने को ही अपनी ज़िन्दगी का उद्देश्य बनाये हुए रहते है .इसलिये इन नाकारा महाशय से भी क्या उम्मीद की जा सकती थी .
    खैर ,जब पीड़ित पन्नालाल के सब्र का बांध टूट गया तो वह आज अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ज्योतिस्वरूप शर्मा के पास अपनी व्यथा ले कर पंहुचा ,उसने अपने साथ हुए पूरे घटना क्रम से पुलिस के आला अफसरान को अवगत कराया ,अंततः आरोपी लक्षमण सिंह के खिलाफ कार्यवाही के त्वरित दिशा निर्देश प्रदान किये गए .बरषों बाद आज पन्नालाल बलाई के चेहरे पर उम्मीद की भी एक झुर्री दिखलाई पड़ने लगी है ,हालाँकि न्याय और समानता का लक्ष्य अभी बहुत बहुत दूर है ,मगर उसकी तरफ कदम बढ़ चूका है और पन्नालाल ने जान लिया है कि बिन लड़े यहाँ कुछ भी नहीं हासिल हो सकता है ,इसलिए उसने संघर्ष के लिए कमर कस ली है .दशकों से दमित पन्नालाल के इस जज्बे को सलाम और क्रांतिकारी जय भीम कहना तो बनता ही है .
    - भंवर मेघवंशी 
    ( लेखक राजस्थान में दलित ,आदिवासी ,घुमन्तु और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रश्नों पर कार्यरत है )


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    कितनी भी यातनाएं दे ले पुलिस हम अपना नियामगिरी पर्वत नहीं छोड़ेगे : डोंगरिया कोंध

    संघर्ष संवाद


    ओड़ीशा के नियमगिरि पर्वत पर नियमगिरि सुरक्षा समिति के तत्वाधान में सात दिवसीय पदयात्रा का आयोजन किया गया। 29 मई से 5 जून 2016 तक चली इस पदयात्रा में आस-पास के सैकड़ों गांवों के डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने भाग लिया। पदयात्रा में मौजूदा विकास की अवधारणा तथा उससे प्रभावित हो रहे डोंगरिया कोंध आदिवासियों तथा समुदाय के लोगों पर किया जा रहा पुलिसिया दमन के संदर्भ में बात-चीत की गई। पदयात्रा के अंतिम दिन 5 जून 2016 को लांजीगढ़ में वेदांता रिफाइनरी और पुलिसिया दमन के खिलाफ एक विशाल जन समावेश का आयोजन किया। ओड़ीशा के कालाहांडी और रायगढ़ जिले के नियमगिरि के विभिन्न गांवों से आए हजारों डोंगरिया कोंध आदिवासियों की उपस्थिति में प्रफुल्ला समन्तरे, मेधा पाटकर, संजय पारीख, अशोक चौधरी, लिंगराज आज़ाद, सत्या महार आदि ने भी अपनी बाते रखी;


    नियामगिरी सुरक्षा समावेश के नाम से आयोजित इस क्रार्यक्रम के तहत लांजीगढ़ के एक जंगल में एकत्रित डोंगरिया जनजाति के लोगों ने, जिनमें से ज्यादातर युवा थे, बॉक्साइट से भरपूर नियामगिरी पर्वत को वेदांता कंपनी को बेचने की साजिश के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई। डोंगरिया कोंध जनजाति ने लगातार नाचते गाते हुए एक अनोखे तरीके से अपना विरोध प्रदर्शित किया।

    सरकार द्वारा नियामगिरी पर्वत को वेंदाता कंपनी को बेच देने की साजिश रची जा रही है और इसका विरोध करने पर पुलिस हमें तरह-तरह से यातनाएं दे रही है। हमें माओवादियों के नाम पर और फर्जी मामलों में गिरफ्तार किया जा रहा है। किंतु हम अपना आंदोलन इसके बावजूद जारी रखेंगे।

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    মতুয়া ধর্ম , মতুয়া আন্দলন, মতুয়া আদর্শ অপহরন হয়ে যাচ্ছে , মতুয়ারা কি বুঝতে পারছেন না? উড়াকান্দি অপহরন হয়ে লক্ষি খালি চলে যাচ্ছে । হরি লিলামৃত অপহরন হয়ে তৈরি হচ্ছে গোপালচাঁদ লিলামৃত।

     রিপন বিশ্বাস 


    নমস্কার, আজ মতুয়া ভাই বোনদের কাছে ভারতীয় রাজনীতি নিয়ে কিছু কথা
    বলব। ভারতীয় রাজনীতিতে স্বাধীনতা আন্দলন চলাকালীন সময় থেকে রাজনৈতিক 
    মতাদর্শের অপহরণ চলছে। আপনারা আমার কথা শূনে একটু অবাক হবেন জানি।
    তবে এই অপহরণ সম্বন্ধে কিছু কথা বললে আপনারা নিশ্চয়ই বুঝতে পারবেন
    রাজনৈতিক মতাদর্শ কি করে অপহরন হয়। স্বাধীনতা আন্দলনে নিতাজি সুভাষ চন্দ্র 
    বোসের অবদান বা রাজনৈতিক স্থান সম্বন্ধে ভারতীয় উপমহাদেশের মানুষের 
    কাছে কিছু বলা মানে মায়ের কাছে মাসির গল্প করার মত। তবে অনেকেই
    একটা কথা কিছুতেই মিলাতে পারেন না জহরলাল নেহেরু কি করে স্বাধীন
    ভারতের প্রধান মন্ত্রী হলেন? ইতিহাস বিশ্লেষণ করে দেখলে বুঝা যায় এটা
    আর কিছুই না , এটা ছিল রাজনৈতিক মতাদর্শ ও ক্ষমতা অপহরণ । প্রচুর
    অর্থ ও মোসাহেবই ছিল এর প্রধান অস্ত্র । আমার কথা পরিস্কার করে বুঝাতে
    চলুন স্বাধীন ভারতের কিছু রাজনৈতিক ঘটনা মনে করিয়ে দেই। ৭০এর 
    দশকে জয়প্রকাস নারায়ন নামে একজন স্বাধীনতা সংগ্রামী মহান রাজনৈতিক 
    ব্যক্তি স্বরাজ নামে একটি আন্দোলন শুরু করেন। যার উদ্দেশ্য ছিল ভারতের
    সিস্টেম পরিবর্তন । জয়প্রকাস নারায়ণের মন্তব্য ছিল ভারতে অনাচার দারিদ্রতা
    দুর্নীতি এসবই সিস্টেমের দান। তাই তাঁর স্লোগান ছিল সিস্টেম পরিবর্তন করতে 
    হবে।এই আন্দোলন শুরু হয়েছিল বিহার থেকে কারন জয়প্রকাস নারায়ন ছিলেন
    বিহারের নাগরিক । এই আন্দলনে জুবসমাজ রাস্তায় নেমে মিছিলে যোগদান 
    করেছিল। হাজার হাজার মানুষ এই আন্দলনে সামিল হয়ে ব্যবস্তা পরিবর্তনে 
    উৎসাহ দেখিয়েছিল। এই আন্দলনে কিছু স্বার্থান্বেষী মানুষও যোগদান করেছিল
    তাদের নাম সকলেই জানেন ,তবুও নামগুল আপনাদের মনে করিয়ে দেই।
    এরা হল লালু প্রসাদ যাদব , রাম বিলাস পাসবান, নিতিস কুমার, সুশীল মোদি।
    এবার বুঝতে পারছেন কি করে মতাদর্শ ও রাজনৈতিক সক্তি 
    অপহরণ হয়। এরা ছিল আন্দলনের সিপাহী কিন্তু আন্দলন সপাপ্ত হওয়ার 
    পরে এদের মধ্যে থেকে নতুন নতুন রাজনৈতিক দল তৈরি হয় এবং এরাই 
    বিহারের মুখ্য মন্ত্রী হয় । কিন্তু এরা মুখ্যমন্ত্রী হয়ে ব্যবস্থা পরিবর্তনের 
    জন্য কিছুই করেন নাই। এরা সুধু মাত্র নিজেদের আখের ঘুছিয়েছে।
    আপনারা হয়তো এখনো বুঝতে পারছেন না মতাদর্শ ও রাজনৈতিক সক্তি
    কি করে অপহরণ করলো ? তবে আসুন আর একটি উধাহরন দেই।
    ২০১১ সালে আন্না নামে একজন গান্ধিবাদি সমাজসেবী লোকপালের জন্য
    আন্দোলন সুরু করেন । খবরের চ্যনেলে ২৪ ঘন্টা এই আন্দলনের সম্বন্ধে 
    বিভিন্ন খবর শূনতে শূনতে মানুষ মনে করেছিল এবার হয়তো ভারতের
    মাটিথেকে দুর্নীতি ধুয়ে মুছে যাবে। দিল্লির আকাশে বাতাসে আন্না আন্না ধ্বনি 
    মুখরিত হয়ে উঠেছিলো । এই আন্দোলন সমর্থন করতে মানুষের ঢল নেমেছিল
    দিল্লির রাস্থায়। রামলীলা ময়দানে তিল পরিমান জায়গা ছিল না। এ ঘটনা সবাই
    জানেন। এই আন্দলনের সঙ্গে এবং আন্নার সঙ্গে যোগদান করেছিল
    অরবিন্দ কেজিরিবাল, কুমার বিশ্বাস , মনিষ সিসদিয়া, প্রমুখ। 
    যখন এরা দেখলো মানুষের সমর্থন আছে এই আন্দলনের সঙ্গে তখন এরা আন্দলন কে অপহরন করে মানুষের সমর্থন অপহরন করে 
    নতুন রাজনৈতিক দল তৈরি করে এবং ইলেকশনের মধ্যদিয়ে অরবিন্দ 
    কেজরিবাল এখন দিল্লির মুখ্যমন্ত্রী কিন্তু মুক্ষমন্ত্রি হওয়ার পরে আর লোকপালের
    কথা একবার ও উচ্ছারন করেন নাই। যেমন লালু প্রসাদ যাদব ও নিতিস কুমার
    বিহারের মুখ্যমন্ত্রী হওয়ার পরে ব্যবস্থা পরিবর্তনের চেষ্টা তো দুরের কথা ব্যবস্তা 
    পরিবর্তনের নাম একবারও উচ্চারন করেন নাই। এভাবেই হয় মতাদর্শের ও 
    মানুষের সমর্থনের অপহরন,। নেতাজীর আন্দোলনকে অপহরন করে
    নেহেরু প্রধানমন্ত্রী হলেন সঙ্গে সঙ্গে পরবর্তী প্রজন্মের জন্য রেখে গেলেন
    রাজনৈতিক ঘরানা ও বিশাল রাজনৈতিক সাম্রাজ্য । জয়প্রকাসের ব্যবস্থা
    পরিবর্তন আন্দোলন, নিতিস লালু অপহরন করে হলেন বিহারের মুখ্যমন্ত্রী আর পরবর্তী প্রজন্মের জন্য রেখে যাবেন রাজনৈতিক ঘরানা আর অর্থের প্রাচুর্য তো থাকবেই। তেমন অরবিন্দ কেজিরিবাল ও আন্নার আন্দলন অপহরন করে
    রেখেযাবেন পরবর্তী প্রজন্মের জন্য রাজনৈতিক ঘরানা। এখন হয়তো্
    ভাবছেন এসব কথা আমি মতুয়াদের কেন সুনাচ্ছি? তবে আসুন বুঝিয়ে দেই কেন আমি মতুয়াদের এই ইতিহাস সুনাচ্ছি। যেমন করে নিতাজি, জয়প্রকাস নারায়ন,ও আন্নার আন্দলন অপহরন হয়েছিল তেমন করে মতুয়া ধর্ম , মতুয়া আন্দলন, মতুয়া আদর্শ অপহরন হয়ে যাচ্ছে , মতুয়ারা কি বুঝতে পারছেন না? উড়াকান্দি অপহরন হয়ে লক্ষি খালি চলে যাচ্ছে । হরি লিলামৃত অপহরন হয়ে তৈরি হচ্ছে গোপালচাঁদ লিলামৃত।
    হরি সংগীত অপহরন হয়ে তৈরি হচ্ছে গোপালচাঁদ সংগীত । হরিচাঁদ গুরুচাঁদ মতুয়া মিশন অপহরন হয়ে তৈরি হয়েছে মতুয়া মহাসঙ্গ। এখন তো আবার সর্বভারতীয় গোপালচাঁদ মিশন তৈরি হচ্ছে। একেই বলে বাসের চেয়ে কঞ্চি শক্ত । মতুয়াদের এখন যদি চোখ না খোলে তবে হরিচাঁদ গুরুচাঁদের মতুয়া ধর্ম গোপাল চাঁদ মতুয়া ধর্ম হতে আর বেশি দেরি নাই। আর এটাই হওয়া স্বাভাবিক কারণ ইতিহাস তাই বলে। 
    ( রিপন বিশ্বাস )

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    चाहे आम हो या चाहे खास

    अगर दुनिया बदलने की जिद नहीं है

    अगर राष्ट्र सत्ता राजनीति धर्म और बाजार से लड़ने का दम नहीं है

    अगर अस्पृश्यता और रंगभेद के खिलाफ,सामंती साम्राज्यवादी नरसंहारी  वर्चस्व की दुनिया में लहूलुहान इंसानियत और कायनात के हक में लामबंद होने का जज्बा नहीं है तो कृपया किसी मुहम्मद अली को याद न करें

    पलाश विश्वास




    सत्ता से नत्थी लोकतंत्र और मानवाधिकार के परिंदों, मुझे माफ करना कि मुहम्मद अली को विदा कहने वाले तमाम प्रथम नागरिकों और सत्ता प्रमुखों के सुभाषित के मुकाबले आप तक इस नाचीज की लिखी ये पंक्तियां पहुंच रही हैं।


    मुहंजुबानी प्रगति और धर्मनिरपेक्षता की जुगाली से आत्मरति सुखी सामंतों और पाखंडियों,मौकापरस्तझेडवरदारो,सिपाहसालारों,पैदल फौडों और हजारों पीढ़ियों के पुरखों की विरासत से गद्दारी करने वाले पढ़े लिखे विद्वानों बुद्धिकारोबारियों, मुझे माफ करना कि मुहम्मद अली को विदा कहने वाले तमाम प्रथम नागरिकों और सत्ता प्रमुखों के सुभाषित के मुकाबले आप तक इस नाचीज की लिखी ये पंक्तियां पहुंच रही हैं।


    सतह पर मेरा वजूद अभी बना नहीं है और जनमजात जमींदोज हूं और खिला भी नहीं हूं जंगल की आग की तरह,और न ब्रांडेड कोई खुशबू है या सुर्खियों में कही हूं या किताबों में कहीं चर्चा है,फिरभी समय को पल दर पल हमारी चुनौती है और इसी चुनौती के पीछे उस महानतम महाबली की मुक्केबाजी की वही ताकत फिर फिर है कि कुछ न होकर भी हम सरदर्द का सबब बने रहेंगे हमेशा चाहे हमसे किसी को मुहब्बत हो न हो।


    जिनसे हमें बपनाह मुहब्बत रही है और जिनने कभी मुड़कर देखा भी न हो,उस अस्पृश्यता और रंगभेद का नाम है ज्वालामुखी की तरह सुलगता अली,अछूत अश्वेत दुनिया का मुक्मल वजूद मुहम्मद अली,जिसमें जान अनजाने हम भी शामिल हैं।


    राजनीति चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने ही नही देती क्योंकि राजनीति आखिरकार स्थाई मनु्मृति है और उसकी सीमाओं में न स्वतंत्रता है,न लोकतंत्र है और न मानवाधिकार।राजनीतिकरण की वजह सै ही इतनी असहिष्णुता और इतनी घृणा और इतनी आत्मघाती हिसा और इतनी खून की नदियां।वंचितों और उत्पीड़तों का इतना दमन,यह सैन्यराष्ट्र,मुक्त बाजार,गगन घटा गहरानी आपदाएं दस दिगंत,पृथ्वी पर सर्वत्र यह नरसंहार।


    सत्ता की इस राजनीति के प्रतिपक्ष जनपक्षधर राजनीति सिरे से लापता हैं तो अस्पृश्य अश्वेत हर वजूद वही मुहम्मद अली,विश्वविजेता हो न हो या पिर कोई धमाका हो न हो,हर सथ्गित महाविस्फोट का नाम मुहम्मद अली।


    कोई ओबामा और किसी कल्कि अवतार के लिए मुहम्मद अली के होने न होने का मतलब ठीक ठीक वैसा नहीं है जैसा इस दुनिया में पल दर पल नारकीय अमावस्या जैसी अस्पृश्यता और रंगभेद जीने वाले अरबों मामूली लोगो के लिए है।


    आपने अनेक विद्वानों और अनेक गुणी मानी संपादक लेखक कवि को पढ़ा ही होगा तो हम हद से हद एक गैरमामूली उपसंपदक है और जिसका लिखा हुआ कहा हुआ कुछ भी पूरे तैतालीस साल तक कभी खास या गौरतलब माना नहीं गया,तो आप फिरभी हमारे लिखे कहे पर तनिको गौर फरमायें तो हम पाषणवत अहिल्या को प्राणस्पर्श मिले।


    दि ग्रेटेस्ट मुहम्मद अली ने 1960 में रोम ओलंपिक में मुक्केबाजी में स्वर्णपदक जीतने के बाद उसे जब रंगभेद के खिलाफ ओहियो नदी में विसर्जित कर दिया,तब मेरी उम्र इतनी नहीं थी कि उनके इस करतब को समझ सकूं।


    कुछ ऐसा हुआ जरुर कि वियतनाम युद्ध में सामिल होने से इंकार करने वाले और कैसियस क्ले से मुहम्मद अली  बन जाने वाले दि ग्रेटेस्ट के बारे में घर में डाक से  आने वाले बांग्ला स्वाधीनता और दैनिक बसुमति के अलावा हिंदी अंग्रेजी अखबारों और दिनमान धर्मयुग साप्ताहिक हिदुस्तान के जरिये मुझे लगातार खबर होती रही और न जाने वे कब मेरे वजूद के हिस्से में तब्दील हो गये।


    उनके अवसान के बाद मेरे भीतर भी किरचों की तरह कुछ टूटा बिखरा है क्योंकि दुनियाभर में अश्वेत अस्पृश्य मेहनतकश मनुष्यता के लिए अली का अवसान किसी मार्टिन लुथर किंग,जार्ज वाशिंगगटन,लेनिन, अंबेडकर, गांधी या नेल्सन मंडेला या माओ के अवसान से बड़ा नुकसान है क्योंकि नरंसहारी मुक्तबाजार के वधस्तल के मुकाबले अब कहीं कोई अली नहीं है।आपके भीतर भी शायद कुछ हुआ हो।


    1960 में दिनेशपुर में अखिल भारतीय शरणार्थी सम्मेलन का आयोजन हुआ था और उसके ढेरों पोस्टर घर में पड़े हुए थे,जिनका मैंने बरसों लिखने और कलाकारी करने में इस्तेमाल किया।ढिमरा ब्लाक किसान विद्रोह का सैन्य दमन इतना जबरदस्त था कि जेलयात्रा करने वाले किसान नेताओं के घर कोई पर्चा पोस्टर पूरी तराई भर में खोजने के बावजूद हमें नहीं मिला।


    फिरभी कैसियस क्ले से मुहम्मद अली तक के सफर की त्रासदी और दुनिया बदलने की जिद को लेकर महानतम महाबलि बनने वाले उस जीवंत किंवदंती को मैंने हमेशा जीने की कोशिश की है।हम सत्तापक्ष के किसी गृहयुद्ध युद्ध महायुद्ध में शामिल नहीं हैं और न हम कुरुक्षेत्र में सव्जन वध के गीतोपदेश के कर्मफल सिंद्धात के मुताबिक जन्म जन्मंतार का अभिशाप जीने को तैयार हैं और इसीलिए महाभारत की शतरंज बाजी को मुहम्मद अली की फुर्तीली मु्केबाजी से बदल देने की महात्वाकांक्षा जीता हूं।


    रोम ओलंपिक के विजय मंच से उतकर रंगभेद के खिलाफ युद्ध घोषणा और फिर वियतमनाम युद्ध के अंध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के खिलाफ खड़े होकर नीग्रो अछूत दुनिया की ओर से श्वेत जायनी साम्राज्यवादी सत्ता और राष्ट्र के खिलाप महाविद्रोह के बाद जेलयात्रा के वे दृश्य बचपन के छपे आखरों की स्मृतियों में धूमिल हैं,लेकिन फ्रेजियर और फोरमैन के खिलाफ उनकी बेमिसाल मोर्चाबंदी की जीत के बीज में फिर हमारी वही व्यूह रचना है निरंकुश सत्ता के सैन्यतांत्रिक मनुस्मृति के विरुद्ध।


    जहां फिर हममें और मुहम्मद अली में कोई फर्क नहीं है जीत के सिवाय।वे जीत हासिल करने वाले महानतम महाबलि है और हम लड़ाई शुरु भी नहीं कर सके हैं।सतह से नीचे ही पनपना बीज की नियति है और महाअरण्य में बीज कहीं नजर आते नहीं हैं।


    बीज बनकर भी हम महाअरण्य में तब्दील हो सकते हैं और यह पृथ्वी पिर हरियाली बन सकती है और मनुष्यता और प्रकृति के साहचार्य में इस घृणा हिंसा असमता अन्याय का अंत हो सकता है,मुहम्मद अली की जीत इसी यकीन का नाम है।


    हालांकि यह पढ़कर आपको हंसी ही आयेगी क्योंकि न उनकी तरह मैं कोई विश्वविजेता तो क्या गली मुहल्ला जीता भी नहीं हूं और न व्यवस्था और राष्ट्र,धर्म और सत्ता से लोहा नलेने का जिगर या दम हममें से किसी भारतीय में है।


    फिरभी अमेरिका की नीग्रो बस्तियों से बेहतर भारत विभाजन की लहलहाती फसल शरणार्थी विस्थापित बस्तियों की आज भी नहीं है और उस वैश्विक रंगभेद के शिकंजे में हम जनमजात जैसे बंध होते हैं आखिरी सांस तक तो अली से बेहतर कोई और करिश्मा का ख्वाब तो जिया ही नहीं जा सकता कि मुक्केबाजी के धमाके से इस दुनिया की तस्वीर बदलकर रंगभेदी साम्राज्यवाद के खिलाफ कोई मोर्चाबंदी में अपना वजूद खपा दिया जाये।मोर्चाबंदी संभव है तो जीत भी असंभव है नहीं।इसी असंभव मोर्चाबंदी का नाम है मुहम्मद अली महानतम।


    भले ही हमारी कद काठी ऐसी कभी नहीं रही कि हम किशोरावस्था में भी किसी से भयंकर रोमानी दिवास्वप्न में भी प्रेम निवेदन करने का दुस्साहस कर सकें क्योंकि कोई भी प्रेमिका सबसे निचले पायदान पर खड़े अछूत परिदृश्य में हमें सत्ता की मूरत ही नजर आती थी।


    हमें किसी से कभी प्रेम हुआ ही नहीं है।क्योंकि प्रेम का अधिकार भी अस्पृश्यों को तब तक होता नहीं है जबतक कि न यह दुनिया सेरे से बदल दी जाये और इसके लिए किसी मुहम्मद अली की विजेता मुक्केबाजी अनिवार्य है।हम मुक्केबाज बन नहीं सके।


    मेरे पिता अंबेडकरी,कम्युनिस्ट,तेभागा के लड़ाके,ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह के नेता और शरणार्थियों के नेता थे और मेरी मां के नाम बसे बसंतीपुर गांव के साझा परिवार में किसी की कोई कुंडली बनाने का रिवाज नहीं रहा है।1956 में रुद्रपुर में हुए शरणार्थी आंदोलन के नतीजतन बसंतीपुर,पंचानन पुर और उदयनगर के गांव बसे।


    पूर्वी बंगाल के तेभागा आंदोलन की विरासत से जुड़े दलित शरणार्थियों और किसान आंदोलन के मेरे अंबेडकरी कम्युनिस्ट पिता के वे तमाम साथी जो बंगाल और उड़ीशा के शरणार्थी कैंपों में बवाल मचाते रहने की वजह से तराई के घने जंगल में फेंक दिये गये थे।


    उन लोगों ने बंगाल और पंजाब के शरणार्थियों के साथ प्लेग हैजा मलेरिया जैसी महामारियो से सात बार उजड़ी तराई को फिर से दोबारा आबाद किया जो अब विकास की अंधी दौड़ में सीमेंट के जंगल में तब्दील है और मैं उनसे हजार मील दूर जड़ों से कटा जिदगी गुजर बसर कर रहा हूं।


    वे सबकुछ खोकर भी सबकुछ हासिल करने की लड़ाई लड़ रहे थे।हमने कुछ भी नहीं खोया और न कुछहासिल करने की हमारी तमन्ना है।वे योद्धा रहे हैं और हम लोग असरक्षित शुतूरमुर्ग प्रजाति में तब्दील,जिनकी कोई रीढ़ होती है नहीं है।फिर भी मुहम्मद अली के होने से रीढ़ का अहसास होता रहा है।


    किसी को उम्मीद नहीं थी कि हम आखिरकार पढ़ लिख पायेंगे।शरणार्थी बस्तियों की वह अपढ़ अधपढ़ दुनिया थी। तराई के स्कूल कालेजों से नैनीताल जाकर पढने लिखने वाले तमाम बंगाली पंजाबी सिख शरणार्थी के बच्चों के बारे में किसी को कुछ कोई खास उम्मीद कभी नहीं रही होगी।पढ़ाई लिखाई की बजाय खेती मे खपने की हमारी अनिवार्य प्राथमिकता थी और विडंबना यह है कि हम अपने खेत पर खेत नहीं हो सके।


    उस वक्त तराई में जन्मे बच्चों की जन्मतिथि या तो 1956 के शरणार्थी आंदोलन या फिर 1958 के ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह के आगे पीछे दर्ज की जाती रही है।


    आंदोलन के बाद दिनेशपुर में अस्पताल ,आईटीआई और जूनियर हाई स्कूल बनने के साथ साथ साथ तीन नये गांवोंकी बसावट के बाद सुंदरपुर में मेरे दोस्त हरिकृष्ण ढाली और मेरा जन्म हुआ।इस हिसाब से किसी रविवार को कुंभ राशि में शायद दिसंबर 1956 में 16,23 या 30 तारीख को मेरा जन्म हुआ होगा।मेरे बाद बसंतीपुर में टेक्का नित्यानंद मंडल और हरि का साल भर के भीतर जन्म हुआ।


    स्कूल में दाखिला कराते वक्त उन दिनों प्राइमरी टीचरों को इस बात की खास परवाह ती कि हाईस्कूल की परीक्षा अगर कई दफा फेल हो जाये कोई बच्चा तो आगे वह ओवर एज न हो जाये,इस तरह जन्मतिथि दर्ज करायी जाये।


    चित्तरंजनपुर बालिका विद्यालय की मैडम ख्रिष्टी नहीं बल्कि हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल के हमारे पहले गुरुजी पीतांबर पंत जी ने 1956 के बजाये 1958 के 18 मई को मेरा जमन्म तिथि करीब डेढ़ साल के अंतर से दर्ज कराया और जब मैं पांचवी पास करके हाईस्कूल में दाखिला लेने गया तो मेरी उम्र नौ साल से कम रह गयी।


    फिरभी स्मृतियां कभी कभी जन्म जन्मांतर देश काल पात्र के आर पार समय और इतिहास की स्मृतियों में भी तब्दील हो जाती है और उसी बिंदू पर मुहम्मदअली विश्वविजेता और बिना लड़े हमारी हारी हुई प्रजातियों की स्मृतियां एकाकार हैं।


    चाहे आम हो या चाहे खास

    अगर दुनिया बदलने की जिद नहीं है

    अगर राष्ट्र सत्ता राजनीति धर्म और बाजार से लड़ने का दम नहीं है

    अगर अस्पृश्यता और रंगभेद के खिलाफ,सामंती साम्राज्यवादी नरसंहारी  वर्चस्व की दुनिया में लहूलुहान इंसानियत और कायनात के हक में लामबंद होने का जज्बा नहीं है तो कृपया किसी मुहम्मद अली को याद न करें


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    बहुजन चाहेंगे तभी टूटेगी जाति,चाहे ब्राह्मण चाहे या न चाहे!

    जाति तोड़ने को कहां तैयार हैं बहुजन?

    गुरुजी, हम आपसे सहमत हैं और भारत में प्रगतिशील आंदोलन का विमर्श भी यही है लेकिन जाति उन्मूलन के लिए बहुजनों को वर्गीय चेतना से लैस करना बाकी है!

    उन उत्पीड़ितों वंचितों के जीवन यापन के समाज वास्तव की जमीन पर उन्हीं में से एक बने बिना हम उन्हें जाति तोड़ने के लिए प्रबुद्ध कैसे करे, चुनौती यही है।क्योंकि जाति उन्हीं लोगों ने बनाये रखी है।

    मैं जन्मजात भारतीय  नागरिक हूं।

    भारतीय नागरिकता की हैसियत से जिदगी मैंने जी है और मरुंगा भी भारतीय नगरिक या उससे भी ज्यादा जमीन पर कदम जमाये  एक अदद आम आदमी की तरह।

    मेरी कोई जाति नहीं है और न मेरा कोई धर्म है।

    हर भाषा और हर बोली मेरी मातृभाषा है।

    मेरा धर्म या धर्मांतरण में कोई आस्था नहीं है और पितृसत्ता के मैं विरुद्ध हूं।

    पलाश विश्वास

    हस्तक्षेप की मरम्मत जारी है और हमारे पास इतने पैसे नहीं है कि फौरन बड़ी रकम का निवेश करके बेहतर सर्वर लगा लें।अमलेंदु ने फतवा जारी किया है कि हस्तक्षेप में लगने से पहले हम कोई कांटेंट किसी फोरम में शेयर न करें क्योंकि मेरा लिखा सबसे ज्यादा स्पैम मार्क होता है।इसके बावजूद चूंकि हस्तक्षेप में फिलहाल यह सामग्री लग नहीं सकती,तो यह आलेख अन्यत्र भी साझा कर रहा हूं।


    हमारे आदरणीय गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी पल दर पल सजग सक्रिय हैं और आज भी वे हमारे प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।वे नहीं होते तो हम हम हर्गिज नहीं होते।


    जाति उन्मूलन की परिकल्पना उनकी बेहद स्पष्ट है जैसा कि उनका ताजा फेसबुक स्टेटस है।


    हल है जाति के स्थान पर वर्ग की प्रतिस्थापना. और देश के शीर्ष पद पर मार्क्सवादी गांधी का चयन। वैचारिक धरातल पर मार्क्सवादी और आचरण में गांधी। ऐसे लोग दुर्लभ भले ही हों अलभ्य नहीं हैं । पन्त जी यह ऊंटोपिया

    भले ही लगे आचरण के रेगिस्तान से निकलने का कोई और विकल्प नहीँ है।



    गुरुजी,हम शत फीसद सहमत हैे।


    गुरुजी,हम आपके हजारों कामयाब और सितारा शिष्यों के मुकाबले एकदम सिरे से नाकामयाब नाकारा और नाचीज शिष्य हैं।फिरभी हमने आपका कोई पाठ मिस नहीं किया है और आपके हर पाठ को आजमाने की भरसक कोशिश की है,सामाजिक यथार्थ के मुकाबले।आज भी हम आपकी फेसबुकिया कक्षा में रोज हाजिर रहते हैं कि आपसे ही दिशाबोध की प्रतीक्षा रहती है।


    जाति उन्मूलन की बात तो बाबासाहेब कह गये लेकिन उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे महात्मा गौतम बुद्ध की तरह कोई पंथ नहीं छोड़ गये और बौद्ध धर्म भी महात्मा गौतम बुद्ध का धम्म नहीं है।


    हाल में संस्थागत हत्या के शिकार रोहित वेमुला ने इस दिशा में बड़ा काम किया है और जाति उन्मूलन की उनकी अपनी परिकल्पना रही है जिसके मुताबिक एकतरफा उद्यम से जाति नहीं टूटने वाली है।


    धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद मनुस्मृति स्थाई बंदोबस्त के मुक्तबाजारी तिलिस्म क मजबूत कर रही है तो फासिज्म के राजकाज और फासिस्ट अश्वमेधी नरसंहार राजसूय के प्रतिरोध में देश दुनिया जोड़ना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।


    हम जाति उन्मूलन की परिकल्पना तब तक लागू नहीं कर सकते और उत्पीड़ितों और वंचितों को वर्गचेतना से लैस करके अंध राष्ट्रवाद के मुकाबले वर्गीय ध्रूवीकरण का आधार बनाकर समता और न्याय का लक्ष्य तब तक हासिल नहीं कर सकते ,जबतक न हम बहुजन देहाती अपढ़ अधपढ़ जनता को संबोधित करते।


    हाथीदांत के मीनार में आबाद पोलित ब्यूरो के मसीहावृंद भी वर्ण वर्चस्व के रंगभेदी दृष्टि के शिकार हैं और बहुजनों को संबोधित करना उनका कार्यभार नहीं है।


    अछूत हुए बिना अछूतों को संबोधित करना दी हुई परिश्थितियों में जाति सर्वस्व भारतीय समाज और जातिवादी राजनीति और अर्थव्यवस्था में तमाम उदात्त विचारधाराओं के बावजूद असंभव है और इन विचारधाराओं के मार्फत उत्पीड़ितों और वंचितों के दिलोदिमाग तक हम पहुंच ही नहीं सकते जबतक कि हम उस नरक का ब्यौरा पेश न करें जिसमें वे पल दर पल जी रहे हैं या मर रहे हैं।


    जाति उन्मूलन मिशन का प्रस्थानबिंदू यही होना चाहिए कि सबसे पहले हम बहुजनों को जाति उन्मूलन के लिए तैयार करें जो हजारों जातियों और उपजातियों में बंटकर कुरुक्षेत्र जी रहे हैं और पल दर पल राजनीतिक और आर्थिक मजबूरियों के बंधुआ बने इसी नर्क की दीवारों को वे मजबूत बना रहे हैं।


    बहुजन आंदोलन में भी सत्ता वर्ण और वर्ग के अंध विरोध बतौर ध्रूवीकरण की राजनीति और वोटबैंक में तब्दील बहुजन समूहों के केसरियाकरण के रणनीतिक ध्रवीकरण की परस्परविरोधी जटिल परिस्थितियों में यह कार्यभार महज सैद्धांतिक नहीं है बल्कि इसे हकीकत की जमीन पर आजमाना बेहद जरुरी है।


    रोहित वेमुला भी जाति उन्मूलन के बाबासाहेब के मिशन को अंजाम देने के लिए  बहुपक्षीय व्यक्तिगत और सामूहिक पहल की परिकल्पना बना गये हैं और इसलिए हम किसी व्यक्ति रोहित की बात नही कर रहे हैं बल्कि बाबासाहेब के जाति उन्मूलन की परिकल्पना को हकीकत की जमीन पर अंजाम देने की बात कर रहे हैं और इसके लिए बहुजनों को इस परिकल्पना का सक्रिय प्रतिबद्ध हिस्सा बनाना जरुरी है।


    इसीके मद्देनजर यह समझने वाली बात है कि शिक्षित प्रबुद्ध,उदार,बहुलता और विविधता के पक्षधर,जनपक्षधर प्रगतिशील तत्वों की जाति से उतनी परेशां होने की जरुरत नहीं है क्योंकि पहले से वे कमोबेश वर्गचेतना से लैस हैं और अपनी तरफ से वे पहल भी करते रहे हैं।इसके विपरीत बहुजनों को बदलाव के लिए अभ्यस्त करना जरुरी है क्योंकि वे गुलामी की नर्क में जीने मरने को अभ्यस्त है और आजादी की कोई तमन्ना उनमें अब बची भी नहीं है क्योंकि गुलामी का अहसास भी नहीं है।


    हम दरअसल बार बार जमीन पर खड़े उन्हीं अमावस्या जीने वाली बहुसंख्य बहुजन आबादी को संबोदित करने की हर जुगत आजमा रहे हैं कि प्रबुद्ध जनो के लिए हमारे लिखे कहे का न कोई मतलब है और न यह उनके वर्गीय वर्ण हित में है और अपने वर्ग और वर्ण हित के मुताबिक उन्हें हमारी दलीलें मंजूर हो ही नहीं सकती और इसीलिए किसी भी माध्यम या विधा में हमारे लिए कोई जगह बची है।हमारी भाषा  भी सत्तावर्ग के व्याकरण और सौन्दर्यशास्त्र,उनकी कला और दक्षता के मुताबिक बराबर नहीं है।


    मनुस्मृति बंदोबस्त के तहत जो शत्रुता और अनास्था,घृणा और हिसां का सर्वव्यापी माहौल तिलिस्मी तैयार है,उसके तहत निकट भविष्य में जाति और धर्म को तोड़ने की क्रांति के लिए उत्पीड़ित वंचित बहुजन तैयार होंगे,इसकी न्यूनतम संभावना नहीं है।


    हम सीधे तौर पर वर्गचेतना की बात कैसे करें और करें भी तो उसका असर क्या होना है।वे हारेंगे लेकिन वर्ग वर्ण वर्चस्व छोड़ेंगे नहीं।तो बहुजनों से जाति छोड़ने या आरक्षण का रक्षाकवच छोड़कर वामपंथी बनने की उम्मीद करना कितना वास्तव है,यह बार बार साबित हो रहा है और बार बार ऐतिहासिक भूलों की पुनरावृत्ति मनुस्मृति स्थाई बंदोबस्त के हित में हो रही है।


    मसलन मुक्तबाजार की संसदीयराजनीति के सिपाहसालार बने कामरेडों ने संपूर्ण निजीकरण और संपूर्ण विनिवेश के खिलाफ कोई नाममात्र प्रतिरोध पिछले पच्चीस सालों में नहीं किया है तो जाति उन्मूलन का एजंडा उनका हो ही नहीं सकता।


    यथार्थ यह भी है कि बहुजनों को जति के सामाजिक यथार्थ की जमीन पर खड़े होकर संबोधित करने का कोई विकल्प रास्ता हमारी नजर में नहीं है क्योंकि मनुस्मृति स्थाई बंदोबस्त में यह विडंबना है कि जिस जाति की वजह से जन्म जन्मांतर के कर्मफल के तहत वे नरक जी रहे हैं,वही जाति उनका रक्षा कवच है।


    मसलन इस पर गौर करें कि अगर मैं सरकारी नौकरी में होता और मुझे आरक्षण का लाभ भी मिला होता तो क्या में 36 साल की नौकरी के बावजूद सबसे छोटे पद से ही रिटायर करता।जब सामान्य वर्ग की क्या कहें,आरक्षित वर्गों में भी लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद इंटरव्यू और नियुक्तियों में बड़े पदों के लिए अनुसूचितों और अल्पसंख्यकों को कोई मौका ही नहीं है।


    बहुजन पचासी फीसद जनता के लिए आरक्षित पदों पर भी जब नियुक्तियां और प्रोमोशन नहीं हो रहे हैं हैं तो हम आरक्षण खत्म करके जाति उन्मूलन की परिकल्पना और वर्गीय ध्रूवीकरण की परिकल्पना कैसे कर सकते हैं।


    इस भोगे हुए यथार्थ के बरअक्श सारी दिशाएं जब बंद हैं और कोई दैवी कवच कुंडल भी नहीं हैं,तब इस युद्धभूमि में रथी महारथी वाणवर्षा के मुकाबले सांस सांस को मोहताज मैं अपने इस कर्मफल की चर्चा भी न करुं और इसकी भी चर्चा न करुं कि सारस्वत वर्चस्व का शिकार मैं हूं तो सच को बताने का तरीका और क्या हो सकता है।


    बहुजनों के दिलोदिमाग को स्पर्श किये बिना इस महादेश में किसी भी बदलाव की कोई संभावना नहीं है और इसीलिए संस्थागत फासीवाद का हिंदुत्व का एजंडा इन्ही बहुजनों को वानरसेना में तब्दील करने का है।जबकि उनका असल एजंडा का धर्म कर्म से कोई दूर दूर का नाता नहीं है और उनका वैश्विक राजनीतिक आर्थिक राजनयिक और रणनीतिक गठबंधन मुक्तबाजारी नरसंहार का है।जिक यथार्थ को हमारे पढ़े लिखे कामरेड लगातार उसीतरह नजरअंदाज कर रहे हैं ,जैसे उनने बाबासाहेब को वामपंथी आंदोलन से काटकर रख दिया उनके श्रम सुधारों,पितृसत्ता विरोधी  और जाति उन्मूलन के वर्गीय ध्रूवीकरण के लिए अनिवार्य एजंडा और श्रमिक आंदोलन से उनके लगातार जुड़ाव के बावजूद।


    साम्यवादी आंदोलन के जतिवादी नेतृत्व और दृष्टि ने मेहनतकशों और सरवहारा वर्ग के सबसे बड़े मसीहा को नजरअंदाज किया और बहुजनों को संबोधित किया ही नहीं,इसीलिए आज फासिज्म का राजकाज और कारोबार है।जिम्मेदार वामपंथ है।


    यह समाज वास्तव है।इसे माने बिना नई शुरुआत नहीं हो सकती और इसके लिए भी अपने जाति धर्म के सत्ता से नत्था अवस्थान छोड़े बिना कोई पहल केसरियाकरण को तेज करेगा और धर्मोन्माद जीतेगा।वही हो रहा है।वामपक्ष का लगातार हाशिये पर चले जाने का रहस्य उनका वामपंथी ब्राह्मणवाद है जो इतिहास की भौतिकवादी व्याखा या द्वंदात्मक विज्ञान कतई नहीं है।


    न कामरेड नेतृत्व में किसी भी स्तर पर सभी समूहों और वर्गों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व देना चाहते हैं और अब तो वाम नेतृत्व पर बंगाली और मलयाली भाषी सवर्णों का ए


    इसे आप बहुजनों को अर्थशास्त्र राजनीति विक्षान कला साहित्य और दर्शन के सौंदर्यबोध से समझा नहीं सकते और लोक लोकभाषा में गहरे पैठकर उनके मुहावरों को आजमाये बिना उनसे संवाद भी असंभव है।


    विडंबना यह है कि भाषातत्व और लोक दोनों लिहाज से भारतीय बहुजनों के समझ में आने वाला मुहावरा फिर वही जाति है।


    इसलिए अपनी पृष्ठभूमि की बात जब हम आपबीती के तौर पर करते हैं तो यह कोई दलित आत्मकथा नहीं होती बल्कि बहुजनों को उन्हींके मुहावरे में संबोधित करने की कोशिश होती है।


    गुरुजी,आपका कोई शिष्य जाति धर्म और भाषा की दीवारों में कैद नही हो सकता और मैं अगर जाति की बात कर रहा हूं तो वह समामाजिक यथार्थ है,जिसे बदलने की वर्गचेतना आपने ही हमें दी है।हम तो बहुजनों को उनके ही मुहावरे में संबोधित करने की कोशिश कर रहे हैं।


    कोलकाता में 1991 में किसी समाजावदी गांधीवादी प्रगतिशील मानुष ने अगर प्रभाष जोशी को मेरे सामने न कहा होता कि ये पूर्वी बंगाल के अछूत नमोशूद्र बंगाली शरणार्थी है तो मरा कैरियर यकायक बंद गली में तब्दील न होता क्योंकि मुझे केंद्रित प्रभाष जोशी की योजना कुछ और थी जिसे एक झटके से कोलकाता के धर्मनिपरपेक्ष प्रगतिवादी समाजवाद ने खत्म कर दी और तब तक जाति न जाननेवाला मैं न जाति और न जाति उन्मूलन और न बाबासाहेब के बारे में कभी कुछ जानने समझने की कोशिश करता।


    फिर भी बाबसाहेब को उस हादसे के ठीक दस साल बाद हमने पढ़ा अपने अंबेडकरी किसान कम्युनिस्ट तेभागा योद्धा शरणर्थी पिता के निधन के बाद,क्योंकि मुझे पिता के बाद उनके साथियों के जीने मरने की लड़ाई में शामिल होना ही था।


    यह हालांकि मेरी जाति चेतना नहीं है,यह आज भी मेरी वर्ग चेतना है और जाति उन्मूलन का एजंडा वर्गचेतना का प्रस्थानबिंद है जाति के रहते वर्गचेतना सिर्फ एक अवधारणा है,हद से हद एक नपुंसक विचारधारा है जो बदलाव नहीं कर सकती।


    गुरुजी, हम आपसे सहमत हैं और भारत में प्रगतिशील आंदोलन का विमर्श भी यही है लेकिन जाति उन्मूलन के लिए बहुजनों को वर्गीय चेतना से लैस करना बाकी है

    उन उत्पीड़ितों वंचितों के जीवन यापन के समाज वास्तव की जमीन पर उन्हीं में से एक बने बिना हम उन्हें जाति तोड़ने के लिए प्रबुद्ध कैसे करें ,चुनौती यही है।क्योंकि जाति उन्ही लोगों ने बनाये रखी है।


    हम इस जाति व्यवस्था को बनाये रखने के लिए किसी खास जाति या वर्ग को जिम्मेदार नहीं ठहराते हैं।बल्कि अभियुक्तों में अनेक लोग वर्गीय ध्रूवीकरण की दिशा में सतत प्रयत्नशील हैं जैसे जन्मजात ब्राह्मण हमारे गुरुजी।


    हम छात्रावस्था में जाति के दंश के शिकार नहीं रहे हैं और नैनीताल की तराई में बाकी समुदाय के लोग हमें प्रगतिशील सवर्ण ही मानते रहे हैं और हमारे जीवन यापन और आचरण में अस्पृश्यता का संक्रमण नहीं हुआ है।


    मैं जन्मजात भारतीय  नागरिक हूं।

    भारतीय नागरिकता की हैसियत से जिदगी मैंने जी है और मरुंगा भी भारतीय नगरिक या उससे भी ज्यादा जमीन पर कदम जमाये  एक अदद मनुष्य की तरह।

    मेरी कोई जाति नहीं है और न मेरा कोई धर्म है।

    हर भाषा और हर बोल मेरी मातृभाषा है।

    मेरा धर्म या धर्मांतरण में कोई आस्था नहीं है और पितृसत्ता के मैं विरुद्ध हूं।


    वैसे भी हमारे आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़े जाति विमर्श और जाति उन्मूलन के मुद्दे पर खुलकर लिख रहे हैं  जो संजोग से बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर की एक मात्र पोती के पति हैं और बिना आरक्षण के रिटायरमेंट के एक दशक बाद भी देश और दुनिया में विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ हैं,लेकिन बहुजन आम जनता तक उनकी बातें पहुंचती नहीं हैं।


    खालिस वर्ग चेतना के तहत सामाजिक विषम वास्तव के मुकाबले अपढ़ अधपढ़ बहुजनों के साथ कोई संवाद असंभव है।उनकी तुलना में मैं निहायत अपढ़ हूं और वे जिसतरह से चीजों को रखते हैं,वैसी विधि और दक्षता मेरी नहीं है।


    उन्हीं तेलतुंबड़े के मुताबिक बंगाल में बाकी देश की तरह अस्पृश्यता कमसकम भारत विभाजन के वक्त नहीं रही है।इसी वजह से बंगाल में आरक्षण लागू करना असंभव था तो सिर्फ बंगाल के लिए बाबासाहेब ने अस्पृश्यता के बजाय जाति के आधार पर भेदबं

    बंगाल से बाहर बंगाली शरणार्थी को उड़ीसा,असम और त्रिपुरा के अलावा  अन्यत्र कहीं आरक्षण न मिलने से आजादी के बाद जन्मे बंगाल से बाहर बसे अछूत शरणार्थियों के लिए उनका एकमात्र परिचय भारतीय नागरिकता का रहा है।


    आरक्षण न मिलने की सबसे बड़ी वजह भी यही है कि बाकी दलितों की तरह वे अस्पृश्यता के शिकार नहीं हैं और जातिके आदार पर रंगभेदी भेदभाव बंगाल के बाहर आरक्षण का पैमाना नहीं है।


    अब जब वे ही लोग खुलकर खुद को दलित कह रहे हैं और बंगाल जैसा आरक्षण मांग रहे हैं तो सामाजिक यथार्थ यही है कि बिना आरक्षण सामान्यवर्ग में उन्हें अबतक जो नौकरियां मिलती रही है,दलित बतौर पहचान लिये जाने के बाद उन्हें वे नौकरियां मिल नहीं  रही है।अब ये लोग आपबीती के तौर पर जाति की बात करेंगे और हम उन्हें वर्ग चेतना समझायेंगे तो उस संवाद का भविष्य समझ लीजिये।


    यही भारतीय वामपंथ का सामाजिक राजनीतिक यथार्थ है और कमसकम मेरा इससे कोई संबंध नहीं है।


    गौरतलब है कि नैनीताल में हमारी छात्रावस्था और उत्तर भारत में हमारी पत्रकारिता के दौरान इस जाति विमर्श से हम अलग थे और वर्ग चेतना के मुताबिक ही रचनाकर्म या सामाजिक सक्रियता में निष्णात थे।पिता के अंबेडकरी कम्युनिस्ट होने के बावजूद मैेॆंने जाति के बारे में जानकारी न होने के कारण अंबेडकर को पढ़ा भी नहीं और वर्गचेतना की बातें ही करता रहा जो अब मैं नहीं कर सकता और इसका मतलब यह नही कि मैं जाति को बनाये रखने के पक्ष में हूं या मैं जब जाति के सामाजिक यथार्थ की बात कर रहा हूं तो जाति से बाहर निकल नहीं पा रहा हूं।




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    मुद्राराक्षस नहीं रहे। नमन।

    रचनाकर्म जैसी असहिष्णुता राजनीति में भी नहीं है।

    तनिक विवेचना भी करें कि रचनाकारों के साथ उनकी जिंदगी और मौत में हम कितना मानवीय आचरण करते हैं।


    मुद्राराक्षस की मृत्यु के बाद फिर शोक संदेशों की रस्म अदायगी है और हम भूल रहे हैं कि कला साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में भी ब्रांडिंग अब अनिवार्य है।ब्रांडेड न हुए और बाजार के मुताबिक न हुए तो कहीं से कोई भाव नहीं मिलता है और यहां भीरचनाकर्म अब शेयर बाजार है।शेय़रों की उछाल के लिए बिजनेस फ्रेंडली राजनीति का समर्थन बी जरुरी होता है।मुद्राराक्षसे के ऐसे कोई शेयर बाजार में नहीं थे।

    पलाश विश्वास

    रचनाकर्म जैसी असहिष्णुता राजनीति में भी नहीं है।राजकाज की असहिष्णुता का विरोध हम करते हैं लेकन माध्यमों और विधाओं में वर्चस्ववादी प्रवृत्तियों के किलाफ हमारी कोई आवाज होती नहीं है।


    मुद्राराक्षस की मृत्यु के बाद फिर शोक संदेशों की रस्म अदायगी है और हम भूल रहे हैं कि कला साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में भी ब्रांडिंग अब अनिवार्य है।ब्रांडेड न हुए और बाजार के मुताबिक न हुए तो कहीं से कोई भाव नहीं मिलता है और यहां बी रचनाकर्म अब शेयर बाजार है।शेय़रों की उछाल के लिए बिजनेस फ्रेंडली राजनीति का समर्थन बी जरुरी होता है।मुद्राराक्षसे के ऐसे कोई शेयर बाजार में नहीं थे।


    पोलिटिकली करेक्टनेस के बिना विशुध रचनाधर्मिता की कोई प्रासंगिकता स्वीकृत नहीं हो सकती।चाहे वह कितनी ही जमीन से जुड़ी हो या कितना ही जनपक्षधर हो।


    यह सत्य शैलेश मटियानी जी के हाशिये पर चले जाने के बाद हमें लगातार पीड़ा देती रही है कि उनके रचनाकर्म का सिर्प राजनीतिक मूल्यांकन ही होता रहा और वंचितों उत्पीड़ितों की रोजमर्रे की जिंदगी जो वब सुनामी की जैसी हलचल है,उसका कोई मूल्यही नहीं है।


    भारतीय दलित साहित्य में नामदेव धसाल के बारे में भी यही कहा जा सकता है।


    हाल के बरसों में बहुजन आंदोलन से नत्थी होने के बाद जैसे मुद्राराक्षस मुख्यधारा में अछूत हो गये,उसके मद्देनजर अब तमाम शोक संदेश मुझे कागज के पूल नजर आ रहे हैं तो आदरणीय मित्रों मित्राणियों,मुझे माफ करना।


    अभी कुछ बरस ही हुए,इंडियन एक्सप्रेस समूह से रिटायर होते न होते हमारे फाइनेंसियल एकस्प्रेस के साथी समाचार संपादक पद से रिटायर हुए अप्पन राय चौधरी साळ भर के बीतर चल दिये।कार्यस्तल से एक झटके से अलग हो जाने और दिनचर्या टूट जाने का सदमा प्राण घातक होता है।


    मुझे अभी बची खुची जिंदगी में बार बार इस सदमे से लड़ते रहना है क्योंकि पेशेवर जिंदगी से निकलने के बाद मेरा पुनर्वास असंभव है और किसी और अखबार या किसी विश्विद्यालय में स्टेटस के दम से या पहचान की नींव के जरिये घुसना मेरे लिए असंभव है।


    मुद्राराक्षस जी आज चल दिये और मेरे बीतर बहुत कुछ टूट रहा है।


    साहित्य और कला के क्षेत्र में उपलब्धिया या रचनाकर्म की प्रासंगिकता का मूल्यांकन अस्मिताधर्मी जो है सो है,इसका राजनीतिक पक्ष भी अत्यंत घातक है।


    नोबेल पुरस्कार से पहले रवींद्र को बंगाल में कवि तक मानने से इंकार करते रहे प्रबुद्धजन लेकिन बाजार का ठप्पा लग जाने के बाद वे कालजयी हो गये जबकि भयंकर लोकप्रियता के बावजूद काजी नजरुल इस्लाम और शरतचंद्र का मूल्यांकन अभी हुआ ही नहीं है तो सत्ता से नत्थी ताराशंकर बंद्योपाध्याय भारतीय साहित्य के दिग्गज हैं।


    हिंदी में प्रेमचंद्र और मुक्तिबोध को आजीवन प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी और मरने के बाद ही आलोचको को समझ में आया कि वे दोनों कालजयी रहे हैं।जीवित रचनाकरारों के राजनीतिक मठीय जातिवादी तानाबाना इतना प्रलयंकर है कि हाशिये पर रचनाधर्म की प्रासंगिकता पर कोई विवेचना की गुंजाइश ही नही होती तो विश्वविद्यालयों में खुल्ला आखेटगाह है और वहां बहेलिया बिरादरीका जाल बिछा हुआ है इसतरह कि परिेंदे अपने पंख जबतक गिरवी पर न रखें कोई उड़ान संभव है ही नहीं।


    फणीश्वर रेणु और शैलेश मटियानी और शानी जैसे जमीन से जुडे़ रचनाधर्मियों को आंचलिक कथाकार बताकर खारिज किये जाने के धतकरम पर मैंने कई दफा लिखा भी है।अब यह मौका अत्यत प्रिय  मुद्राराक्षस जी के अवसान का है तो अप्रिय वक्तव्य के लिए खेद है।फिरभी तनिक विवेचना भी करें कि रचनाकारों के साथ उनकी जिंदगी और मौत में हम कितना मानवीय आचरण करते हैं।


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    Absolute Power of Fascism might kill me but it dares not to stop the Public hearing for which I live and die!

    Thus,Hastakshep would continue with me or without me!

    Just Defriend me!Marking spam might not stop me!If you hate me that much!I am tired of unknown enemies in friendship disguise!

    Palash Biswas

    Absolute Power of Fascism might kill me but it dares not to stop the Public hearing for which I live and die!


    Just Defriend me!Marking spam might not stop me!


    If you hate me that much!I am tired of unknown enemies in friendship disguise!


    I am copyright Free.


    My voice is bound to echo irrespective of life and death.


    I am habitual to break patterns and format and would continue to break the ground because I belong to the peasantry which survives whatsoever might come!


    I always tried to be the loudspeaker for my people.


    I always tried to reflect the social realism.


    I always tried to echo the screams created in gas chambers,valleys of death.


    I am the solitary reaper who is dislodged from the valley and has no harvest to reap anymore.


    Thus,Hastakshep would continue with me or without me!


    Better let me connect to the masses who never belong to the elite class just because I am no more a part of the completely privatized media network in auto mode or creativity adventure!


    Let me echo the voices of the underclasses with which you might not identify.


    Better Defriend me!


    You have not to remember me.No one remembers me in the field where I worked for almost 43 years without a break.It had been a cut throat and survive race all the way.I failed to cut the throats.Have no regrets.


    I never belonged to the elite intelligentsia as I never deserved.I never belonged to you,my friends! 


    I have been always treated as trespasser in the sphere of creativity and journalism.


    In fact,I stand now liberated and I have not to care about so called intelligentsia anymore.


    Whereas I may not get back to the peasantry where I did belong,where I should have been,living or dead.


    I may not touch the Jal Jangal Jameen of my Hisse ka.


    I am on the street and purchasing power is the survival kit ultimate.


    I have to wait for nothing but the last train available to unknown destination.


    No more Akhbaar Sakhbaar!No more Kitab Sitab!


    Because the intelligentsia in its aircooled Ivory towers have to do nothing with the plight of the masses.


    In fact,I had to do nothing with either creativity or journalism which i opted for self destruction never feeling it until licking the dust.


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    Why Bahujans always remain divided & quarrelsome

    while Brahmins stay united & solid?

    Tata Sivaiah

    This is a country-wide problem with all the parties of the oppressed communities. There are numerous political outfits calling themselves Ambedkarite, Phule-Ambedkarite or Phule-Periyar-Ambedkarite. But these organisations and their leaders make a limited impact on the lives of the masses. Each organisation and its leader has so much ego and there is no inter-organisational understanding. Each leader projects only himself but the cause or mission becomes secondary.

    Politics as master key: Compare this with the Hindu nazi organisations like the RSS. They do not nurse personal ego. They have carved for themselves a "national" agenda. their own "nation's" policy. The RSS, co-secretary. Mohan Bhagwat. says: "Rashtra Niti not Rajnit is important for the Sangh". (Organiser, March 19.2000).

    Thus, they have a Rashtra Niti (national policy) above Rajnit (politics). BJP is secondary to RSS and not vice-versa. RSS dictates the terms not the BJP. Their political wing is just a part of their Sangh Pariwar

    We may have fundamental differences with these Hindu nazi organisations. They may be our oppressor-enemies. That does not mean we should not admit the fact that they give top priority to "cultural revolution" - whatever they mean by it. They have built their socio- ctiltiiral -religious, literary, media fronts and enslaved the Indian masses. They do not call "politics as the master key". In their view political power is only one of the keys. So, even if the BJP is defeated the nazis are not defeated. On the other hand it acts with renewed vigor. RSS is an all-embracing organisation. It is the mother of many organisations. It gave birth to Jan Sangh then to the BJP. Socio-cultural organisation is the mother of BJP. What about other political parties? Have they such a origin? Are they having the Pariwar to handle all other branches of human activities?

    Periyar E.V.R. example: We have somewhat similar example of the DK and DMK. Periyar E.V. Ramaswamy launched a socio-cultural movement under the Dravida Kazagham(DK). DMK, its political front, was formed not by the DK but because of the differences between Periyar and Annadurai. Periyar did not take the initiative to form the political party (DMK). So, the comparison between RSS-BJP and DK-DMK is not correct. DK does not have or had no control over DMK or the ADMK. But both DMK and ADMK exploited the work done by Periyar and his Dravida Kazagham all these years. For that matter no political party has such a rich background like the BJP in the whole of India

    Congress Party: The Congress Party, the original brahminical party of India was born out of a political movement. It had no defined "national' social policy as the RSS. Dr. Babasaheb Ambedkar called it a brahminic organisation. It too was to some extent the mother of the Hindu nazi party. Because, the leaders. who were heading the Congress Party like Bal Gangadhar Tilak were the pioneers of the RSS or Hindu Mahasabha. Though the Congress today calls itself "socialist", "secular" etc. the persons who led the party so far were all the same brahminical forces. Sometimes the RSS opposed it but many times it supported the Congress. Openly the Congress leaders criticised the RSS and BJP but secretly they supported it because the leadership of both came from the same Brahminical Social Order (BSO).

    Today, the Congress is dying because the BSO has virtually shifted to BJP. The Indian communists did not have a separate socio-cultural agenda. They did not create any organisation to counter the RSS organisations. On the contrary, the communists and the socialists derived inspiration from the vedic literature, smritis and puranas. Even today the socialists and communists praise the Vedas Gita, Ramayan etc. (Examples of E.M.S. Namboodripad and S.A. Dange are enough to prove this point). So, they too are birds of the same BSO father. Their secularism is "liberal brahminism". They pretend to be secular. But this is a bogus claim. Both the socialists and communists had no alternate socio-cultural philosophy.

    Bogus communists: Thus, the RSS alone stands unique - its socio-cultural organisation in the "nation" is unparalleled in strength and the area covered. All other political parties, specially the upper caste parties like the Congress, communists or socialists derived inspiration from the RSS ideology. The upper caste Left parties could not create any alternatives in cultural or other fields worth the name. These parties had no strong values contradictory to the RSS.

    In Maharashtra, the satyashodhak Movement of Mahatma Jyotirao Phule took an uncompromising stand. He not only opposed brahminism but tried to project the alternate Rashtra Niti; i.e. Bahujan Rashtra Niti. He declared that India was a Balisthan (Bali's kingdom) and the alien Aryans destroyed it and imposed their own values.

    Our Bahujan leaders suffer from too much ego. They do not come together even on a common cause. But the RSS Pariwar does not project or worship the personality cult beyond a point. The Brahmin as a caste is greater than any non-Brahmin personality. Others have only personalities but no cause. Dr. Babasaheb Ambedkar worked for the Dalit cause because very few among Dalits were able to reach that height. When Babasaheb was alive he was followed and adored by millions. Today. he is a Cult Figure. Worshiped by millions.

    Is there such a personality cult among Brahmins? No. Why? Because, Brahmin as a jati itself is a cult and does not need a great person around whom they can flock. They only use "a great person" to fool the Bahujans. They are not worshipers of Rama. They used Rama during his time to establish Brahmin supremacy. They also used Shivaji calling him a great hero of Hindu Rashtra.

    But the same Shivaji who is lionized by Brahmins was dubbed a shudra by the Brahmins at the time of his coronation. He bowed before Brahmins or was made to bow before Brahmins. This was to fool the non-Brahmins. Because, by using Rama Krishna and Shivaji, the Brahmins got their job done. That is why the Brahmins need no great personality. M.K Gandhi too was used as he was useful to fool the masses. Even Bal Gangadhar Tilak being projected as a great man was not accepted fully. When he wrote in the Arctic Home in the Vedas that the original abode of Aryans was near the north-pole, he was disowned. Thus, the Brahmins defy their own great Jatiman when he goes against their Jati interests. This is the secret of a Brahmin not producing a great man. They do not need a great man because they as king-makers make or unmake great men.

    Brahmins don't produce great men: Each Brahmin considers he is above all other great men among non-Brahmins To them their jati (caste) is greater than a personality. They maintain the high status of their caste. Non Brahmins must also see that their castes rise, above a personality. An inch of collective progress of the masses is greater than a single great man. If the non-Brahmins rise by an inch it will be a bigger challenge to Brahmins.

    Our duty today is not simply to worship these personalities. Our duty is to translate their teachings into reality. I have seen many Dalits who do not read the writings of Babasaheb, who do not think on his lines but simply regard him as a god. They are ready to get killed if Babasaheb's statue is broken or defaced. Brahmins have found out this weakness. That's why they always encourage the personality cult, idol worship and then mislead us. Babasaheb Ambedkar's thoughts are greater than his statues.

    Burn constitution: My point is Bahujans should not be blind worshipers. Compared to Babasaheb's or Phule's time our people are better educated in thousands. If we take up his mission, take his thoughts jointly, we can create miracles. But, if we simply worship Babasaheb and keep our brains limited to that act, we cannot rise, we cannot face the challenges thrown daily by the Brahmins.

    Dalits will be hurt it somebody says anything against the Constitution. But how many of them know the Articles of the Constitution? How many know that Babasaheb himself has said: "I myself will burn the Constitution if it did not serve the masses". What was the spirit behind his speaking like that? We should he assertive and aggressive in implementing the Constitution, which professes social justice, equality and fraternity. Without assertion, without becoming aggressive to implement the egalitarian Articles in the Constitution, we have become over sensitive and mere worshipers of the Constitution. This has given the nazis the chance to start demolishing the Constitution. Had we been aggressive since the beginning, the Hindu nazis would not have dared to dump the Constitution. Here too, our weakness for hero worship has come in the way of Bahujan assertion.

    Damage done by personality cult: We only react when the enemy acts (attacks). Ours is always a reaction to their action. On our own we take no action. We keep silence, nurse our ego until we are attacked. It is surprising that those who are against the Truth and Justice, who are for inequality, who are against all human rights are always on their toes to be aggressive but those on whose side is the Justice. Truth and the nobility are only reacting and put on the defensive.

    The policy "offence is the best form of defense" is adopted by the nazis but we the Bahujans are engaged in defending and not offending. We worship the personality. They worship the policy. They are always engaged in planning the strategy. An attack on our personality engages us for days together. Attack on their heroes, is not similarly reacted to by them. Because they are not for the personality, they are for the cause.

    To repeat, Brahmins do not promote personality cult. They only promote their jati. Anybody among them can head the nazi party. K.C. Sudarshan is not popular, learned or a great figure. So was Rajju Bhaiya who became the chief of RSS. They can name any Tom, Dick or Harry and work with him as a figurehead. Because in the hindu nazi party of RSS everybody has equal stature. A.B. Vajpayee's case is similar.

    How about Dalit or BC organisations? Our numerous organisations are like those tribes. There are numerous organisations or parties for each caste. For example among the Mahars in Maharashtra we can find a large number of organisations - social, religious, cultural and political. Each organisation has a "leader". He looks after his flock. He is the leader for his sheep. To keep his flock together he will abuse everybody else and every other organisation. He will claim that he alone has understood Babasaheb correctly. This is the case with our leaders. That is why one leader hates the other leader of that same caste. They will never come together.

    Similar is the case in their political parties. Kanshi Ram's BSP is the biggest party. The RPI is divided into many factions. Each RPI leader has a following only in certain pockets or among a certain sub-caste. All are followers of Babasaheb Ambedkar but divided. They hate each other more than they hate the upper castes. They do not compete for the uplift or progress of the Dalits but spend all their time and energy in fighting each other.

    To brahmins, Jati is above personality: So also is the case with Backward Caste organisations and their political parties. Why there are differences between Laloo Prasad Yadav, Mulayam Singh Yadav, Sharad Yadav? Why there are differences between Sharad Pawar and S.B. Chavan both Marathas, because, neither the Dalits nor the BCs have any "national" or social, cultural policy. Kanshi Ram, Mayawati can sit with the BJP but not with Mulayam Singh. Nitish Kumar Ram Vilas Paswan can go with BJP but not with Laloo. Are there any policy differences between them? Or only personal clashes? When Kanshi Ram calls for unity of the 85% Bahujan Samaj, why he cannot sit with Mulayam Singh Yadav and vice-versa?

    Because to us personality is greater then the policy. Bahujans do not have a policy "Rashtra niti". Their personal ego is above the people, their castes. Exactly opposite is the case with Brahmins. They kill their personal ego to promote their caste and their "national cause".

    Intellectual pygmies; I have seen many Dalit, BC leaders who fight among themselves but behave like dogs before Brahmins. A Brahmin can easily handle warring non-Brahmin chelas. Brahmins thrive only because non-Brahmins fight among themselves. This is because we are intellectual pygmies. Only the dwarfs need a big personality to be worshiped.

    My aim in writing this piece is to rouse these pygmies. Do not indulge in inter-tribal fights. Do not simply be blind worshipers. Worshipers cannot be warriors. Just worshiping a personality will make you a sheep and a sheep can never lead. It needs a lamb. I want the sheep also to think of coming out of their sheepish mentality. Study the enemy. Study his strategy. Study his moves and policies. It you want to usher in the Bahujan national era, you will have to develop a Bahujan "national policy" (Bahujan RashtraNiti) exactly opposed to that of the Aryans.

    The Brahmins have instilled in you not only a personality cult but have also made monkeys out of you by making you fight among yourselves. When you (SQ IST/RO) tight a Muslim, Christian or a Sikh you are playing into the hands of the Brahmin.

    Identifying Enemy is not an easy task. Many Dalits, BCs organise their caste just to hate their immediate higher or lower caste. This creates hatred within the Backward Castes. The fight remains within Bahujan castes. Instead of identifying and fighting the Enemy, we indulge in brothers fighting brothers.

    All castes have caste consciousness. They are conscious to some extent but they have not identified the Enemy. Some Dalit intellectuals call BCs as their Enemy No.1. Some BC sections hate higher BC castes. So much so, all these Bahujan castes because of this internal contradiction cannot get anything except division. Caste unions should be formed to identify the common Enemy. If you do not identify the Enemy who made you lowly, who made you untouchable, who made you Shudra and thereby denied you your human rights, your share, your dignity, you can not achieve your goal.

    Common Agenda: The actual fight should be between the Aryan brahminical forces and the rest of the Bahujans. Such a Bahujan caste-consciousness should lead us to unite all these castes. We know that a whole caste cannot be made conscious. Only a few among each caste are able to identify the common Enemy. These few in each caste, if they come together will become a force to fight the Aryan machinations. But if these conscious, alert intellectuals stick to their own caste, the force to fight the common enemy will get reduced. There can be caste-based social and other organisations. Let them continue to work within each Jati as they are doing now. But can we not evolve a pariwar and form a joint front that will unite on a common minimum Bahujan National Agenda? How the VHP, Bajrang Dal, Shiv Sena, ABVP, Goraksha Samiti, Durga Wahini have all united on a common program?

    The most recent striking examples are of the "Mandal Commission" and the demolition of Babri Masjid. They did not have any differences over these issues. They fought together. But we Bahujans did not act together. Even, the common cause of defending reservation and the Constitution is seen as a separate program by each party. BSP will have its own meetings and morchas for the issue, the different RPIs will have separate protests and morchas. Thus, the cause of defending the Constitution has become a factional cause. These factions cannot come together and launch a joint attack. In today's situation no single person can command respect of all sections. We should learn from the Brahmins how they all combine and act unitedly.

    The situation is such that everybody tries to project himself above the cause, his leadership above the goal. This is not the case with the Brahmins. On the contrary they use SC/ST/BCs for their cause. Why not combine your energy? Why all those groups being exploited by brahminism cannot come together and put up a joint struggle?

    Fake historians created: The Bahujans are unable to utilise/use the Truth which they possess in plenty. They were the people who built the great glorious Indus culture. That means they were far advanced than the Aryans in every aspect. Yet they could not build their own future based on facts. Whereas, the Aryans have built their history on fiction and falsehood. They have no support of Justice and Truth. They do not have any history, any historical creation. Yet they have created such gigantic fake castles before which Bahujan history is lost in oblivion. The problem is the Bahujans do not think and act together; their intellectuals are divided. Their interests are divided. They can not see their historical unity.

    Dalits, Adivasis and BCs are one and the same people. This is an established fact. History tells this great Truth. We only have to join the disjointed and fabricated history.

    Aryans by their cunning ways have diverted our minds. Compelled us to look into our sectarian interests. There were no Untouchables as a separate group. There were no Adivasis, the jungle-dwelling people as they are today during the Indus Culture and there were no Backward Caste people. All of them were one stock. The Indus Culture was based on human equality. There were no four varnas, so there was no untouchability. Babasaheb Ambedkar in his book "The untouchables" has given us the historic truth that untouchability as we see today, is post-4th century AD. That means untouchability was absent before that. There was no untouchability during the Buddhist period not prior to that in the Vedic period and certainly not during the Indus Culture period.

    Brahmins are confusing us on each and every historical fact. They have started creating fake historians to prove that Indus Culture was Aryan and that the varna system was the product of Indus Culture. When they can create such fake theories, it is easier for them to obliterate the "Truth", because, they are the greatest enemies of "Truth" in the whole world.

    Inferiority complex: Bahujans admit they have "lower status". They are graded under the hierarchically placed bhrahminic scheme. It is because of this hierarchy they keep on fighting between themselves. They suffer from inferiority complex. Their ego is blended with inferiority. This blending is the cause for their typical infighting. This is the cause of their personal ego over-riding the social ego. They do not have social status. i.e. social ego compared to Brahmins and. therefore, only personalities try to assert. These puffed-up personalities then claim that they are the 'leaders' of the caste, the subcaste. Sometimes there are numerous leaders in one subcaste, region-wise. They try to overcome another leader through unhealthy competition. One does not see eye to eye with another. That is why there are many RPIs within a caste, within a subcaste. There are different parties of Yadavas, Kunbis, Kurmis, Chamars, Mahars etc. It is all chaos. But the Brahmins are a single party Brahmin Jati Party (BJ P).

    Gavai - Prakash Ambedkar fight: Brahmins also have many jatis and subcastes but they all have one party. They have long back broken the barriers of subcastes. BJP is the party of all varieties of Brahmins. That is why they do not fight among themselves. In BJP, there are no intra-Brahmin fights. Fights are there only between Brahmins and non-Brahmins: Vajpayee-Advani, Vajpayee- Kalyan Singh, Vaghela, Khurana-Sahib Singh Verma etc.

    Bahujan ego being inferiority-blended it takes the shape of personality cult. Because of this personality cult the cause of strengthening "caste identity" and caste consolidation suffers. Because of caste, people fight among themselves on behalf of the faction leaders. R.S. Gavai and Prakash Ambedkar belong to the same subcaste of "Mahar". They head two factions of RPI. The competition is because of their inferiority-blended ego and personality cult. Such examples are there among BC leaders also. Because of this sectional ego, even one single caste cannot be organised. The organisational rivalry between BCs and Dalit is also of the same type. Dalits hate BCs and vice-versa. Bahujan leaders whether they be Dalits or BCs crave for recognition by the Brahmins. A non-Brahmin scholar will rebuff another non-Brahmin scholar but at the same time these very scholars claim that they are the best non-Brahmin scholars. Such a duplicity, self deception is the reason for no Bahujan entity gaining ground.

    There are numerous BC, Dalit, Adivasi organisations all over the country. BC organisations hate Dalit organisations. They do not jointly oppose brahminic machinations. This Bahujan inferiority-blended ego is the most damaging one. They cannot get a vision of forming a Bahujan India. Infighting within Dalits, within the BCs and infighting between Dalits and BCs is the outcome of this inferiority-blended ego. That is why they cannot carve out an India free from Aryan Brahmin domination.

    Cultural revolution: Who will lead the Bahujan cultural revolution? Can a political leader lead it? The head of a political party is engaged day and night in manipulating political equations. He has no time for cultural-revolution. Who are upholding the brahminic culture? It is not the BJP. It is not Atal Behari Vajpayee as the Prime Minister. No Prime Minister or President can alter the brahminical culture. They are all products of the established culture. What V.P. Singh did by partially implementing the Mandal Commission? He okayed the demand of a vast majority of the BCs, Dalits brewing in the society through social and political organisations. That means the society should have the desire for a change. A willing and committed head of the state can then fulfil the desire.

    DS4 & BAMSEF discarded: I see a bleak future for non-BJP political parties, because, these parties are without the backing of any socio-cultural movement. Whereas the BJP is not only -supported but is actually controlled by the RSS the most powerful cultural organisation. I repeat. This is not the case with any other party. Laloo Prasad, Mulayam Singh Yadav have no political future. Laloo Prasad and Kanshi Ram compared to others have taken the anti-brahminic stand but they too do not have the backing of any socio-cultural movement. Dalit parties, BSP or RPIs, also sail in the same boat. Kanshi Ram once created DS-4 and BAMCEF and then discarded both. BAMCEF has broken into many factions. Dalit Panthers was formed as a protest movement against the RPI inactiveness in the light of atrocities. Its existence today has to be searched.

    There was a good Dalit literary movement in the 70's started by the Dalit Panthers but that too is now divided into groups or around numerous personalities.

    Non-Dalit BCs do not have any such cultural organisations. There arose many organisations of BCs at the time of Mandal Commission but they too could not sustain the test of time. There are some talks of revival of "Satyashodhak Movement". But the moment it starts politicians will jump into it and divert it or use it for personal and political game. The Dravida Kazagham in Tamil Nadu has still some fire in it because of the pioneering and well founded work of Peryar E.V. Ramaswamy. Today K. Veeramani is holding the DK movement. But it does not control the Dravida parties as the RSS has the control over the BJP.

    Muslims and Christians have their religious and cultural identity but politically they are weak.

    After the ] 956 conversion, lakhs of Mahars embraced Buddhism. The Bhikkus are keeping Buddhism alive. But there is no organic relationship between them and the socio-political movement. They play second fiddle to political parties and personalities.

    Grim picture: Is this not a grim picture? No Dalit or BC organisation takes up an aggressive or militant posture like the RSS pariwar. The Hindu nazis speak in one voice, they act in unison for a cause, they indulge in deliberate, calculated violence. But this is not the case with the Bahujan organisations, who speak in different voices, in different tones, and often opposed to each other. They do not act together, take no offensive posture unitedly. They only show re-active militancy in selected cases, such as renaming of Marathwada University or after the killing of Dalits in Bombay (1997) or insult to or desecration of Babasaheb's statue. They become sentimental, emotional when Babasaheb is insulted or the Dalits are killed. They do not initiate an offensive attack so that upper castes are made to react.

    Any sundry cause is sufficient for the RSS pariwar to become aggressive but howsoever big a cause may be the Bahujans will not be consistently aggressive. The source of inspiration has to be non-political. Will the Dalit and BC leaders of different parties sit down and ponder over this problem?

    How to keep BSO as ruling class: There are many organisations in almost all the states that are working on Babasaheb, Phule or Periyar thoughts. But non-Brahmin political leaders do not have faith in them. They do not consult non-political intellectuals. They do not support non-political intellectuals and organisations. On the contrary many of them seek advice from Brahmins only. This is the problem. Are Dalits, who have the legacy of Dr. Babasaheb Ambedkar ideology, an awakened conscious community? If so what is the extent of their awareness, consciousness? The Dalits are the most divided people. So is the case with their organisations. Their parties are personality-oriented. Division increases as you go down the scale of caste.

    But division cannot be the yardstick of awakening. Look at Brahmins. Division is minimum among them. That is why they are the real awakened people. They only follow the dictum "united we stand, divided we fall". This is not true of Dalit political parties and BC and other non-Brahmin parties and organisations. Exactly opposite is the case with Brahmins. Their cause is above parties or organisations and above all personalities. Brahmins are never divided ideologically.

    Every Aryan Brahmin has one single ideology: how to sustain and keep the Brahmins as the ruling class. (DV Dec.16, 1996, p.9: "Brahmin as a sociological/ wonder': V.T. Rajshekar).

    They do not worship any one towering personality like Mahatma Phule or Babasaheb Ambedkar. Still they are united. Brahmins, whichever be their party, they all respect and refer to RSS as their ideologue and strategy-determining centre of power. Bahujans have no such centralised non-political organisation. They consider politics as the master key that will open all locks. This is not the case with Brahmins. Even if their political party fails their other organisations will remain intact. A Brahmin can rise from the ashes. Neither Dalits nor BCs have the backing of non-political roots to keep them upright. When will the Bahujans (SC/ST/BCs) learn that the cause is greater than the personality and political Parties and the organisations? Until they learn it they will continue to be slaves.

    The ego they carry is the out come of their inferiority complex. Or is it the outcome of their selfish, personality-oriented nature? Is it because of the wide gap between these leaders and the masses? There is no such gap between Brahmin leaders and their jatwalas. Individuals do not matter. Their individual status is determined by Jati. But a non-Brahmin leader has no such caste status. This is the cause of all problems.

    But what prevents them from coming together for the cause? This question still remains unanswered. The awakened leaders, if they come together can form formidable force. The masses will he more happy if they come together. The masses will also find that they arc not deceived by their leaders. Leaders take for granted the urges of the masses, and, therefore, there is no dialogue between them and the masses.

    With regards Tata Sivaiah



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    Latest Orlando Genocide in United States of America has emerged as the latest Trump Card for ethnic cleansing worldwide.

    If Bangaldesh Bahujan and minorities might stand United against ethnic cleansing,why should we not?

    The plight of partition victim refugees from erstwhile East Bengal,now Bangladesh seems to continue as refugee influx never ends across the border.The worldwide religious politics and economics has inflicted Indian subcontinent as well.Latest Orlando Genocide in United States of America has emerged as the latest Trump Card for ethnic cleansing worldwide.

    We need not any Saviour as No saviour stood for us sice partition of India and everyone has to convert himself or herself as the Saviour of the refugees irrespective of identities.It is the only escape route from the eternal gas chamber!

    Palash Biswas

    Our organization should convert as the last life boat and no one should destroy it lest we die!At any cost ,the Dalit Refugees must unite as situation gets worser every day and Refugees may not expect alms or mercy,relief or respite from the Manusmriti Hegemony of Ethnic cleansing and apartheid.


    Only passions may not change this scenario!Had it been,we had the best of slogans floated by no one else than the OMNIPOWER woman in Indian politics,Mrs Indira Gandhi.

    It has proved that partition of Pakistan has not helped India to solve the inherent problems of Partition and Population transfer. 


    Every time Bangladesh bleeds ,it is our blood spilling in the lost homeland and we dare not to mourn!


    As we never have been the sovereign citizen like the greatest Moh.Ali who could stand against the state,the religion,the hegemony of Apartheid and could say, NO to Vietnam War to opt imprisonment.


    More over,the Black law,citizenship Amendment Act 2003 enacted by NDA government and modified in 2005 by Congress government has deprived us of citizenship.


    It is ironical that the Dalit refugees are resettled in the Adivasi landscape and they may not stand to gather lest the Bengali Dalit Refugees should face salwa Judum as the Adivasi landscape is already a war zone.


    Rather,refugees resettled in Umarkot in Navrangpur district of Orissa under Dandyakarany project were siezed within as the aftermath of Adivasi Bengali Clash for years and Politics was the villain which wanted to make Bengalise as well as Adivasi population bonded Vote Bank.


    Even in Gargh Chirolly district in Maharashtra the Bengali Refugee Villages were subjected to Mass Arson to subordinate them to the Hindutva agenda.


    In Malkangiri,the refugees living in the resettlement area may not move in life and death without permission.


    Why to blame RSS only?


    RSS managed majority only with the OBC incarnation to the helms of Power as late as in the last Loksabha Election.


    The Communists in Bengal has been playing with refugee vote Bank since partition.After the demise of the Left Rule for thirty five years,Mamata Captured the Refugee and Matua Votebank and now,she does not need it.Romping home in the last election she skipped the Matua as well as Refugee faces in her ministry.

    Mind you,Citizenship Amnedment Act was passed and modified with consensus in the Parliament as every political party of India branded Bengali dalit refugees ilegal migranst!


    Hence,No Politics please.

    Unity should be the Beej mantra and whoever may be able to lead and unite us,we should stand with him or her without question if we want to live like human beings!


    However,the refugees happen to be the most suffering minorities stripped of basic civic and human rights,the victims of war,civil war,riots,development,politics,economics,religion ,caste,identity and partition and every refugee has to fight alone!It makes their plight impossible mission all the way.India has not signed the UN Charter for the refugees as yet and it makes us empty handed on humanitarian ground.


    We need not any Saviour as No saviour stood for us sice partition of India and everyone has to convert himself or herself as the Saviour of the refugees irrespective of identities.It is the only escape route from the eternal gas chamber!


    Only partition victim Sikh Refugees could stand united Rocjk Solid and just compare the Bangali refugees,the victims of the same partition,same holocaust,same bloodshed,where they stand.We are the most degenerated community ,thus we must suffer and we must subordinate ourselves to the Hegemony and live or die as beggars.


    No government of India has ever tried to intervene in the continuous holocaust for humanity across the border and the situation as far as genocide and persecution,explained by Taslima Nasrin or Salam Azad,unchanged.


    Latest Trump Card of the Global Order has worsened the sceanrio and sealing off the border would not stop refugee influx as Latest Refugee Tsunami in Americas and Europe proves it better.


    I am attaching a face book post by by some Apurba Kunar Mondal on 

    Sudra Samachar!Irerespective of inherent ideological bias the naration reflects the day to day genocide and persecution in Bangladesh and it also reflects the inactive Indian politics and diplomacy as it has always been since 15,August 1947 just because the suffering victims are Dalit Hindus meaning Non Hindus to be used as Hindu Votebank to sustain the hegemony.


    বাংলাদেশ হিন্দু- বৌদ্ব- খৃস্টান ঐক্য পরিষদ, বরিশাল, পূজা উযযাপন পরিষদ বরিশাল ও জাগো হিন্দু পরিষদ( বরিশাল বিভাগ) সহ অন্যান্য সংগঠনের উদ্যোগে আজ ১২/০৬/১৬ তারিখ বিকালে বরিশাল অশ্বিনী কুমার টাউন হলে অনুষ্ঠিত হলো হাজারো জনগনের উপস্থিতিতে মানব বন্ধন ও বিক্ষোভ র্যালী।

    দেশ ব্যাপী জঙ্গি সংগঠনের খুন, ধর্ষন, গুপ্ত হত্যার প্রতিবাদে এ প্রোগ্রাম। বিভিন্ন মন্দিরের পুরোহিত, মসজিদের ঈমাম, পুলিশ সুপারের স্ত্রীকে হত্যা সহ শত শত সাধারন সুন্দর মনের নিরাপরাধ মানুষ খুন করাকে কোনো ভাবে মেনে নেয়া যায়না।জাগো হিন্দু পরিষদের বরিশাল বিভাগীয় আহবায়ক অপূর্ব কুমার বলেন, সরকারের অসাধারন উন্নয়ন, সাফল্যে একটি চক্র ঈর্ষান্নিত হয়ে, আন্তর্জাতিক ভাবে সুনাম নস্ট ও বিতর্কিত করার জন্য একটি সন্ত্রাসী চক্র এ কাজ গুলো করে চলছে। জাগো হিন্দু পরিষদের পক্ষ থেকে ের তীব্র নিন্দা ও প্রতিবাদ জনাই এবং দ্রুত আইনের আওতায় এনে এর গডফাদারদের ধরে সমুলে বিনাশ দাবী করছি। এদেশের প্রতিটা সাধার শান্তিপ্রিয় মুসলিম, হিন্দু সহ সকল, পুরোহিত, ইমাম, ভিক্ষু, বুদাবিজীবী,ছাত্র- ছাত্রি,শিল্পী,শিক্ষক, মুক্তমনা উদারপন্থি লেখক,ডাক্তার, ইঞ্জিনিয়ার,সহ আজ ঝুকির মুখে জীবন যাপন করছেন।কারো জীবন এখন নিরাপত্তায় নেই। প্রত্যেকেই মত্যুর প্রহর গুনছে। সরকারের সাথ সাথে আমরাও প্রতিকার নয় প্রতিরোধ করবো, হয়তো দেশে জঙ্গি থাকবে নয়তো স্বাধীনতার- মুক্তিযুদ্বের পক্ষের লোক থাকবে। এভাবে দেশটাকে চোখের সামনে ধ্বংস হতে দেয়া যায়না আসুন জনগনকে সচেতন করি, । হয় মরবো নয়তো অধিকার নিয়েই বেচে থাকবে। 


    The plight of partition victim refugees from erstwhile East Bengal,now Bangladesh seems to continue as refugee influx never ends across the border.The worldwide religious politics and economics has inflicted Indian subcontinent as well.Latest Orlando Genocide in United States of America has emerged as the latest Trump Card for ethnic cleansing worldwide.


    I have been insisting since my childhood that why all the refugees have to stay in transit camps and have to live on dole and why civic and human rights should not be ensured for all refugees irrespective of identity.


    I used to fight with my late father why he should work for the Dalit Bengali refugees only.


    In recent years,I have been insisting why the Adivasi and Refugees living together in Central India and Adivasi landscape countrywide should not stand together to ensure civic and human rights and citizenship.I have been talking to refugee and adivasi leaders and sat with them in Chattisgargh to discuss the issue.


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    নীল ঢেউয়ের প্রতীক্ষায়ঃ জয় ভীম, রোহিত স্বাধিকার আন্দোলন জিন্দাবাদ

    Saradindu Uddipan 

    ভারতবর্ষের বর্তমান রাজনৈতিক অবস্থার প্রেক্ষিতে রোহিত স্বাধিকার আন্দোলনকে যথেষ্ট গুরুত্ব এবং আন্তরিকতা দিয়ে অনুভব করছেন বর্তমান প্রজন্মের উচ্চ শিক্ষিত ছত্রছাত্রী এবং গবেষকেরা। তারা তাত্ত্বিক ভাবেই বিশ্লেষণ করে বলতে চাইছেন যে রোহিতের স্বাধিকার আন্দোলন আসলে বাবাসাহেব আম্বেদকরেরই অসমাপ্ত কাজের অবিচ্ছেদ্য অংশ। নব প্রজন্মের গবেষকেরা মার্ক্স, এঙ্গেলস, লেনিন, স্ট্যালিন, চে-গুয়েভারা মাওসেতুং, নেলসন মেন্ডেলার সাথে বাবাসাহেবকেও সমান গুরুত্ব দিয়ে ভাবিকালের রাজনৈতিক আঙিনায় এক নবতর দিগন্ত উন্মোচন করেছেন। অনেকে বাবাসাহেবের ভাগিদারী দর্শনের মধ্যে সমস্ত নিপীড়িত মানুষের উত্থানের এক যুগান্তকারী মানবতাবাদী দর্শনের উন্মেষ দেখতে পেয়েছেন।

    অধিকাংশ বিশ্ববিদ্যালয়ের উচ্চ শিক্ষিত ছাত্র ছাত্রী গবেষকদের মধ্যে আম্বেদকরবাদের প্রতি এই অনুরাগ আকস্মিক ভাবে তাল পড়ার মত কোন বিষয় নয়। এর প্রেক্ষাপ্টেও রয়েছে সুদীর্ঘ ভাগিদারী লড়াইয়ের ইতিহাস। আর সংবিধান নামক একটি রক্ষাকবচের মাধ্যমে সমস্ত নিপীড়িত মানুষের এই ভাগিদারীও সুনিশ্চিত করেছেন ডঃ বি আর আম্বেদকর। তিনিই দলিত, অচ্ছুৎ, শোষিত, বঞ্চিত নিপিড়িতদের উচ্চ শিক্ষা গ্রহণের বাঁধা স্বরূপ ব্রাহ্মন্যবাদ নামক জগদ্দল পাথরকে গুড়িয়ে দিয়েছেন। ফলে বিপুল সংখ্যক আর্থ-সামাজিক-মানসিক ভাবে পিছিয়ে রাখা ছাত্রছাত্রীরা উঠে আসছে উচ্চ শিক্ষার আঙিনায়। তারা ভাগীদারীর নীলা নিশান ও বাবাসাহেবকে সামনে রেখে শুরু করছেন ছত্র রাজনীতির এক নতুন ঘরানা। যাকে কিছুতেই প্রগতিশীল ছাত্রছাত্রীরা অন্যায় বা অপাংক্তেয় মনে করছেন না।

    আর এটাই হয়েছে ব্রাহ্মন্যবাদী রাজনৈতিক একাধিপত্যের সব থেকে বড় বিপদ। তারা রাজনৈতিক ভাবে সমাজের প্রগতিশীল অংশের এই ভাগিদারী আন্দোলনের কাছে পরাজিত হয়ে নক্কারজনক ভাবে প্রশাসনকে কাজে লাগিয়ে এই আন্দোলনের বিরুদ্ধে নানা ষড়যন্ত্র রচনা করে চলেছেন। ছাত্রছাত্রীদের অন্যায় ভাবে দেশ বিরোধী তকমা দিয়ে আক্রোশ মেটাতে চাইছে।

    আশার কথা এই যে প্রতিক্রিয়াশীল শাসকেরা যত চক্রান্ত করছে ততই লড়াইয়ের ভীত শক্ত হয়ে উঠছে। আন্দোলনের ঢেউ ক্রমশ ছড়িয়ে পড়ছে আপামর জনসাধারণের মধ্যে। 
    আমরা সেই নীল ঢেউয়ের প্রতীক্ষায় যা সমস্ত মানুষকে জাগ্রত করবে। মানুষ জাগ্রত হলে এই ঢেউ আরো প্রবল আকার ধারণ করবে। জনগণ তার নিজের কল্যাণের জন্যই ভেঙ্গে ফেলবে আজন্ম লালিত ব্রাহ্মন্যবাদের শিকল। 
    জয় ভীম, রোহিত স্বাধিকার আন্দোলন জিন্দাবাদ


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    এই ভাবে গ্রামের পর গ্রাম উজাড় হয়ে গেছে হিন্দুরা।আমরা সবাই নীরব দর্শক।ভালইতো আছি...Refugee Leader in India,Dr.Subodh Biswas claimed!


    No way to stop refugee influx as Minority Persecution promoted by Ruling Awami league in Bangladesh!

    Palash Biswas


    Persecution of minorities continue in Bangladesh and most of them in exodus mode.Further refugee influx might not be sealed off as claimed.


    It would make the plight of partition victim refugees in India as Government of India or state governments concerned seem to be quite detached whatever might come to the minorities in Bangladesh which is bound to complicate the refugee problem in India.In absence of political will,refugee influx is rather promoted across the border and it might not stop.Not only minorities,democratic and secular forces are subjected for merciless killling.In troubled Bangladesh,the Ruling Awami league believed to be pro India is behaving like the enemies ahgainst the minorities as they are always the softest target.Any political calsh in Bangladesh has to paid dearly by the minorities and the trend has not changed.

    Look at this news item!Reported by 


    RTI NEWS!


    बंगलादेश में फिर हिन्दू शिक्षक पर जानलेवा हमला, हमलावर गिरफ्तार..!


    ढाकाः बंगलादेश के मदारीपुर जिले में एक हिन्‍दू शिक्षक को अज्ञात हमलावरों ने उनके घर में घुसकर गम्‍भीर रूप से घायल कर दिया।  45 वर्षीय रिपन चक्रवर्ती सरकारी निजामुद्दीन कॉलेज में गणित पढ़ाते हैं। तीन हमलावरों ने दरवाजा खुलवाकर धारदार हथियार से उन पर हमला किया। स्‍थानीय लोगों ने एक हमलावर को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया।

    इस बीच ढाका के रामकृष्‍ण मिशन के एक पुजारी को आई एस समर्थकों की ओर से मौत की धमकी मिली है। हमारी संवाददाता ने बताया है कि बुधवार प्राप्‍त पत्र में पुजारी को हुकम दिया गया है कि वह धर्म का प्रचार बंद कर दे अन्‍यथा उसे जान से मार दिया जायेगा।

    खुफिया सूत्रों ने बताया है कि विभिन्‍न जिलों के कम से कम 13 हिंदू शिक्षकों को प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अंसारूल्‍लाह बंगला टीम ने जान से मारने की धमकी दी है। इस साल जनवरी से अब तक कम से कम पांच हिंदू पुजारी और मठ कर्मचारी मारे गए हैं। 

    हालांकि अंतरराष्‍ट्रीय आतंकी संगठन आईएस और अलकायदा ने इन वारदातों की जिम्‍मेदारी ली है, लेकिन बंगलादेश सरकार ने अपने यहां आईएस की उपस्‍थिति से इंकार किया है। सरकार ने हाल की हत्‍याओं में विपक्ष का हाथ होने आरोप लगाया है। 

    NIKHIL BHARAT BANGALI UDBASTU SAMANWAY SAMITEE President Dr.Subodh Biswas has shared this photo from Bangladesh and wrote just a single line which expresses th insecurity inflicted refugee psyche in India as not only BNP,the ruling Awami League is not far behind in Minority persecution in Bengladesh as Chairman Shahajahan,prominent leader of Awmi leage claims to capture minority property.

    Palash Biswas


    Dr.Subodh Biswas wrote that it is trending and minorities in Bangladesh have to lose everything!Whereas in India,we remain quite detached and self indulged!Village after Village with Hindu minority deserted and No action taken!


    এই ভাবে গ্রামের পর গ্রাম উজাড় হয়ে গেছে হিন্দুরা।আমরা সবাই নীরব দর্শক।ভালইতো আছি...


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    Sayan Bhattacharjee

    হায়দ্রাবাদ বিশ্ববিদ্যালয়ে অনশনরত শিক্ষকদের পাশে থেকে আজ JU র 8bব তে PDSF র পথসভা ও স্কোয়্যাড মিছিল.... দুপুরের মুষলধারে বৃষ্টিও পারে নি আমাদের ভেতরে জলা আগুন কে নিভিয়ে দিতে তাই বৃষ্টির মধ্যেই শুরু হলো আমাদের প্রতিবাদ... রোহিতের মৃত্যুর আগুন তার স্বপ্ন পূরণের দিকে দ্রুততার মধ্য দিয়ে নিয়ে যাচ্ছে... লড়াই চলছে চলবে.... ইনকিলাব জিন্দাবাদ



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    नाश हो मुक्तबाजार के इस महाविनाश का!धर्मोन्माद का!


    ढाका के रामकृष्ण मिशन को भी उड़ाने की धमकी।

    यूरोप और अमेरिका की बेलगाम हिंसा और विकास की अंधी पागल दौड़ और फासीवादी धर्मोन्मादी मुक्तबाजार का यह अंजाम हम भारत में भी दोहराने की कगार पर हैं क्योंकि भारत की केसरिया सुनामी के बदले बांग्लादेश में जिहादी सुनामी चल रही है और वहां एक करोड़ हिंदुओं की जान माल दांव पर हैं और हिंदुत्व के सिपाहसालारों को उन हिंदुओं की कोई परवाह नहीं है।


    बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील तत्वों पर निरंतर हमले की संस्कृति वहां की सत्ता की राजनीति है तो अब यह भारत में हमारी भी राजनीति है।


    बांगलादेश में अल्पसंख्यकों के साथ वहीं हो रहा है जो भारत में होता रहा है या हो रहा है।वहीं हिंसक असहिष्णुता हमारी राष्ट्रीयता है।


    बांग्लादेश में धर्मोन्माद की सुनामी उतनी ही ताकतवर है जितनी हमारे यहां और विडंबना है बांग्लादेश के एक करोड़ हिंदी फिर शरणार्थी बनने की तैयारी में हैं और भारत की राजनीति और राजनय को कानोंकान खबर नहीं है।



    पहले से भारत में आ चुके पांच से लेकर सात करोड़ बंगाली शरणार्तियों के लिए यह बहुत बुरी खबर है क्योंकि बांग्लादेस में तेजी से बिगडते हालात के मद्देनजर अगर फिर शरणार्थी सैलाब आया तो पहले से बसे पुराने शरणार्थियों केलिए कोई रियायत या रहम नहीं मानेंगे भारत के बाकी  नागरिक जैसे आदिवासी को भारत को कोई नागरिक नागरिक नहीं मानता वैसा ही सच बंगाली शरणार्थियों के भूत भविष्य और वर्तमान  बारे में भी ज्वलंत सामाजिक राजनीतिक आर्थिक यथार्थ का रंगभेद मनुस्मृति दोनों हैं।


    इस अभूतपूर्व हिंसा और प्रतिहिंसा के दुष्चक्र से अंततः इस महाभारत में कोई नहीं बचेगा अगर हम अभी से मुक्तबाजार के खिलाफ लामबंद न हों।


    हमारा इहलोक परलोक हिंसा का बीज गणित और प्रतिहिंसा का रसायन शास्त्र है तो हमारी राष्ट्रीयता अभूतपूर्व अराजक हिंसा की भौतिकी है क्योंकि आतंक के खिलाफ साम्राज्यवादी महायुद्ध के महाबलि बनकर हम टुकड़ा टुकड़ा गृहयुद्ध के असंख्य कुरुक्षेत्र से घिरे हुए हैं।हम सारे लोग चक्रव्यूह में जाने अनजाने घुसे हुए लोग हैं और मारे जाने को नियतिबद्ध हैं।निमित्तमात्र हैं।


    पलाश विश्वास

    জঙ্গি নিশানায় ঢাকার রামকৃষ্ণ মিশন

    চিঠি পাঠিয়ে এ বার ঢাকার রামকৃষ্ণ মিশনের সহ-সম্পাদক স্বামী সেবানন্দকে খুনের হুমকি দিল সন্দেহভাজন আইএস জঙ্গিরা।


    आईएस की धमकी : ढाका में रामकृष्ण मिशन की सुरक्षा बढ़ी

    आतंकी संगठन इस्‍लामिक स्‍टेट के आतंकियों की फाइल फोटो


    ताजा सिलसिला है बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न का जो वैश्विक जिहादी आंतकवाद की मजबूत होती नेटवर्किंग की वजह से थमने के आसार नहीं हैं।


    पुरोहितों और मंदिरों पर हमलों की खबरों में बांग्लादेश में धर्मनिरपक्षता और पर्गति का आंदोलन थम सा गया है और भारतबंधु मुजीब की बेटी शेख हसीना की पार्टी के महासचिव शाहजहां हुसैन भी रजाकर तेवर में हिंदुओं को उनकी जमीन और जान माल से बेदखल करने की धमकी दे रहे हैं और शेख हसीना जैसे खामोश हैं वैसे ही खामोश है भारत में हिंदुत्व की राजनीति,राजनय और सैन्य सत्ता।यह बेहद खतरनाक है।


    ढाका के रमना कालीबाड़ी पर बार बार हमले होते रहे हैं और इससे बांग्लादेश के हिंदुओं का मनोबल टूटा नहीं है और वे अबतक एकदम प्रतिकूल परिस्थितियों में रहते आये हैं लेकिन रोज रोज हिंदू होने की वजह से हमले का शिकार होने का रोजनामचा से बाहर निकलने के लिए उनके लिए तसलिमा नसरीन की लज्जा में दर्शाया भारत का रास्ता ही बचा है क्योंकि अब ढाका के रामकृष्ण मिशन को भी उड़ाने की धमकी मिली है।


    नई दिल्ली से मीडिया की यह खबर है: बांग्लादेश सरकार ने ढाका स्थित रामकृष्ण मिशन के एक पुजारी को इस्लामिक स्टेट (आईएस) के संदिग्ध आतंकवादियों से मौत की धमकी मिलने के बाद मिशन की सुरक्षा बढ़ा दी है। इसके साथ ही पूरा सहयोग एवं संरक्षण का भरोसा दिया है।

    भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने शुक्रवार को एक बयान में कहा कि ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग ने बांग्लादेश पुलिस और विदेश मंत्रालय, दोनों से संपर्क किया और रामकृष्ण मिशन के इस कर्मचारी को पूरा सहयोग व संरक्षण देने का आश्वासन दिया है।


    स्वरूप ने कहा, "हम भी ढाका के रामकृष्ण मिशन के साथ सीधा संपर्क बनाए हुए हैं।" उन्होंने कहा कि बांग्लादेश सरकार ने भारतीय आध्यात्मिक आंदोलन के कार्यालय रामकृष्ण मिशन के आसपास पुलिस की तैनाती बढ़ा दी है। एक दिन पहले रामकृष्ण मिशन के एक पुजारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि आईएस की बांग्लादेश शाखा ने एक पत्र भेजकर जान से मारने की धमकी दी थी।


    उल्‍लेखनीय है कि बांग्लादेश सरकार ने देशभर में अल्पसंख्यक नेताओं को निशाने पर लेकर हत्या किए जाने के बाद से आतंकवादियों के खिलाफ देशव्यापी कार्रवाई शुरू कर दी है। हाल में एक हिंदू मठ के स्वयंसेवी नित्यरंजन पांडेय की हत्या कर दी गई थी। पांडेय बांग्लादेश के राजशाही क्षेत्र में पाबना सदर स्थित श्री श्री ठाकुर अनुकूलचंद्र सत्संग आश्रम से जुड़े थे।


    बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील तत्वों पर निरंतर हमले की संस्कृति वहां की सत्ता की राजनीति है तो अब यह भारत में हमारी भी राजनीति है।


    बांगलादेश में अल्पसंख्यकों के साथ वहीं हो रहा है जो भारत में होता रहा है या हो रहा है।वहीं हिंसक असहिष्णुता हमारी राष्ट्रीयता है।


    बांग्लादेश में धर्मोन्माद की सुनामी उतनी ही ताकतवर है जितनी हमारे यहां और विडंबना है बांग्लादेश के एक करोड़ हिंदी फिर शरणार्थी बनने की तैयारी में हैं और भारत की राजनीति और राजनय को कानोंकान खबर नहीं है।



    पहले से भारत में आ चुके पांच से लेकर सात करोड़ बंगाली शरणार्तियों के लिए यह बहुत बुरी खबर है क्योंकि बांग्लादेस में तेजी से बिगडते हालात के मद्देनजर अगर फिर शरणार्थी सैलाब आया तो पहले से बसे पुराने शरणार्थियों केलिए कोई रियायत या रहम नहीं मानेंगे भारत के बाकी  नागरिक जैसे आदिवासी को भारत को कोई नागरिक नागरिक नहीं मानता वैसा ही सच बंगाली शरणार्थियों के भूत भविष्य और वर्तमान  बारे में भी ज्वलंत सामाजिक राजनीतिक आर्थिक यथार्थ का रंगभेद मनुस्मृति दोनों हैं।


    1971 मे भारत में युद्धभूमि पूर्वी बंगाल से एक करोड़ शरणार्थी आये थे और उस अभूतपूर्व संकट को हम हमेशा बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भारत के सैन्य हस्तक्षेप की गौरवशाली उपलब्धि मानते रहे हैं।


    1971 क उस युद्धोन्माद की वजह से भारत में कृषि संकट गहरा गया और मंहगाई मियादी बुखार बन गया है जो उतरता ही नहीं है।


    1971 के उस युद्धोन्माद की वजह से आत्मरक्षा के नाम हमारा रक्षा खर्च इतना भढ़ता चला गया है कि हम परमाणु बम बना लेने के बाद भी राष्ट्र का लगातार सैन्यीकरण कर रहे हैं आंतरिक सुरक्षा की आड़ में अबाध पूंजी के हित में प्राकृतिक संसाधनों के साथ साथ लोकंत्र,संविधान,कानून का राज,अखंडता और एकता,विविधता और बहुलता,स्वतंत्रता और संप्रभुता ,नागरिकता,नागरिक और मानवाधिकार की नीलामी ही राजकाज है मुक्तबाजार का। बाकी धर्मोन्माद।नरसंहारी अश्वमेध। नतीजा महाविनाश।


    1971 से लेकर 2016 की विकास यात्रा के मद्देनजर कल्पना करें कि बांग्लादेश में बाकी बचे एक करोड़ हिंदू और उनके साथ राजनीतिक उत्पीड़ने के शिकार करीब एक करोड़ मुसलमान भी भारत में बतौर शरणार्थी सैलाब उमड़ पड़े तो क्या होगा।हमने ही ये हालात बनाये हैं,समझ लें।


    अभी फ्रांस शरणार्थियों के कब्जे में है जहां यूरो कप फुटबाल प्रतियोगिता चल रही है और आइफल टावर असुरक्षा के मद्देनजर बंद है तो देश भर में मेहनतकशों की हड़ताल से ट्रेन सेवा,परिवाहन से लेकर सफाई और बुनियादी सेवाएं बंद हैं।


    फुटबाल मैचों का ब्यौरा छाप रहे मीडिया इन समाचारों से कन्नी काट रहा है कि फ्रांस के शहरों में पेरिस समेत सर्वत्र लाखों का हुजूम सत्ता के खिलाफ बदलाव के लिए मुक्तबाजारी सत्ता के प्रतिरोध में रोज सड़कों पर हैं।मेहनतकश हर अनाज का हिसाब मांग रहे हैं और मेहनतकश,युवा छात्र कटेहुए हाथ पांव वापस मांग रहे हैं तो स्त्रियां भी सड़कों पर हैं लेकिन भारत के मीडिया के लिए यह कोई खबर नहीं है।फ्रांस के इस अभूतपूर्व संकटमें उनका पोकस मुक्ता बाजार और विज्ञापन की चकाचौंध पर है तो समझ लें भारत में यथार्थ के प्रतिउकी प्रतिबद्धता कैसी और कितनी है।


    संपूर्ण विनिवेश और संपूर्ण निजीकरण और सेवा क्षेत्र के जरिये बाजार के हवाले उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था के साथ साथ पृथ्वी,प्रकृति और मनुष्यता को अबाध पूंजी की नरसंहारी संस्कृति के हवाले करने की परिणति यूनान है जिसका इतिहास भारत, चीन,मिस्र,रोम और मेसोपोटामिया से कम गौरवशाली नहीं है।


    हम अच्छे दिनों की उम्मीद में यूनान,यूरोप और अमेरिका बनकर दुनियाभर की मौजमस्ती लूटने के फिराक में मौत को दावत दे रहे हैं।


    मुक्तबाजार के तंत्र मंत्र तिलिस्म में यूरोप और अमेरिका बेतरह फंसा हआ है और दुनियाभर में हिंसा,मुनाफा,नशा,युद्ध और गृहयुद्ध का विनाश रचनेवाले तमाम देशों में उन्ही के रचे युद्ध और गृहयुद्ध के शरणार्थियों ने न सिर्फ धावा बोला है बल्कि चमचमाते उनके मुक्तबाजार में कीड़े मकोड़ों की तरह ये शरणार्थी ऐसे फैल गये हैं कि उनका सामान्य जनजीवन और बुनियादी जरुरतें संकट में हैं।

    भारत का राजधर्म कुलमिलाकर हूबहू वही है और यह पूरे महादेश,पृथ्वी मनुष्यता और सभ्यता के लिए खतरा है।


    यूरोप और अमेरिका की बेलगाम हिंसा और विकास की अंधी पागल दौड़ और फासीवादी धर्मोन्मादी मुक्तबाजार का यह अंजाम हम भारत में भी दोहराने की कगार पर हैं क्योंकि भारत की केसरिया सुनामी के बदले बांग्लादेश में जिहादी सुनामी चल रही है और वहां एक करोड़ हिंदुओं की जान माल दांव पर हैं और हिंदुत्व के सिपाहसालारों को उन हिंदुओं की कोई परवाह नहीं है।


    मुक्तबाजार में अर्थव्यवस्था को गिरवी रखकर राष्ट्र  को सैन्य राष्ट्र बनाकर निरंकुश फासीवादी राजकाज और धर्मोन्मादी अंध राष्ट्रवाद अगर आपके लिए विकास है,अगर आदिवासी भूगोल का सफाया विकास है,अगर स्त्री आखेट विकास है,अगर मेहनतखसों के कटे हुए हाथ पांव विकास हैं,युवाओं की बेरोजगारी और भविष्य की अंधी सुरंग में उनके कटे हुए दिलदिमाग विकास है तो तनिक समझ लें कि रोम,मेसोपोटामिया,यूनान ,मिस्र का गौरवशाली इतिहास से न भविष्य बचा है और न वर्तमान।चीन में विकास का तिलिस्म तेजी सेढह रहा है।


    अब सनातन इतिहास के मिथकों से कितना हमारा इहलोक परलोक बचेगा तो यूरोप अमेरिका का धर्म कर्म और चीन के मुक्त बाजार के साथ साथ मध्यपूर्व के तेलयुद्ध में स्वाहा मिस्र और मेसोपोटामिया की महान सभ्यताओं का हालचाल से समझ लें।लातिन अमेरिका का हश्र देख लें।


    चाहे हम गली गली में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर बना लें या चाहे हम समूचे भारत को एक झटके से बौद्धमय बना दें,मुक्तबाजार के शिकंजे से हमारी मुक्ति नहीं है।यूनान ही नहीं,समूचा यूरोप और अमेरिका का हाल दिवालिया है और मुट्ठीभर सत्तावर्ग के मजबूत शिकंडे में दुनियाभर की संपत्ति.दुनियाभर की सरकारें,दुनियाभर की सियासतें,दुनियाभर की मजहबें और कायनात की तमाम बरकतें,नियामतें और रहमतें कैद हैं।


    यही कयामत का असल मंजर है जिसे हम देख रहे हैं,लेकिन उसके मुकाबले के लिए शुतुरमुर्ग की तरह रेत की आंधी गुजर  जाने का इंतजार कर रहे हैं।


     हम ठीक ठीक जानते भी नहीं हैं मुक्त बाजार की जन्नत अमेरिका के हालचाल क्योंकि असल खबरें भारत में जैसे छपती या दिखती नहीं है वैसा ही यूरोप और अमेरिका का सच भी छपा हुआ  है और इस आत्मघाती सूचना बाजार का आयात हमने वहीं से किया है।


    बांग्लादेश में अब भी एक करोड़ हिंदू बचे हैं और भारत विभाजन के बाद इस महादेश में बांग्लादेश के उत्पीड़ित हिंदुत्व का सच भारत में लोकतंत्र के अवसान के साथ मुक्तबाजारी धर्मोन्मादी सुनामी से कितना भयंकर कितना आत्मघाती हो रहा है,उसका अंदाजा हो तो हम समझ सकते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनाने से किस तेजी से पूरी दुनिया के गुजरात में तब्दील होने की आशंका है और आतंक के खिलाफ युद्ध में शामिल होने की वजह से किस तेजी से हमने इस महादेश को अखंड तेलयुद्ध में झुलसता आखेटगाह में तब्दील कर दिया है।हमें झुलसने का अहसास भी नहीं है।


    भारत में होने वाली हर हलचल बांग्लादेश में सबसे पहले सुनामी बनती है और बंगाल की खाड़ी में बन रही यह सुनामी दुनियाभर में हिंदुओं के जान माल के लिए सबसे बड़ी आपदा बन जाती है।चूंकि बांग्लादेश बनने से पहले पूर्वी बंगाल की हिंदू आबादी को हिंदू मानने से लगातार भारत और पश्चिम बंगाल की सत्ता ने इंकार किया है और राजनीति ने हमेशा सीमापार से आने वाले शरणार्थी सैलाब को बंधुआ वोट बैंक बनाया है तो बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न भारत या इसके किसी राज्य के लिए या पश्चिम बंगाल के लिए कभी सरदर्द का सबब रहा है।


    विडंबना है कि महात्मा गौतम बुद्ध के सत्य और अहिंसा की भावभूमि में रवींद्र और गांधी का भारत तीर्थ हिंसा और प्रतिहिंसा का अखंड महाभारत है और भरतीयता के गौरवशाली इतिहास भूगोल का निर्णायक नरसंहारी निष्कर्ष ग्लोबल मुक्तबाजार है।


    धर्म और नैतिकता का हमसे कोई दूर दूर का वास्ता नहीं है।अर्थशास्त्र की भाषा में कहे तो हमारी नागरिकता अखंड उपभोक्तावाद है और हम सीमेंट के जंगल में आबाद द्वीपों के इकलौते वाशिंदे हैं तो हमारा स्वजन भी कोई नहीं है।


    उत्पीदन प्रणाली है ही नहीं है।जो है बाजार है और बाजार लबालब बेहतरीन ब्रांड का स्वादिष्ट जायका है और हमारी सारी लड़ाई इस बाजार में बने रहने के लिए अखंड नकदी का है और इस खातिर अबाध पूंजी की सैन्य सत्ता से हमारा नाभि नाल जुड़ा है।इसी वजह से चूंकि हमारे कोई उत्पादक संबंध है ही नहीं और न हमारा अब कोई कोई समाज है और न कोई संस्कृति है।सनातन और सत्य तो कुछ है ही नहीं।


    हमारा इहलोक परलोक हिंसा का बीजगणित और प्रतिहिंसा का रसायनशास्त्र है तो हमारी राष्ट्रीयता अभूतपूर्व अराजक हिंसा की भौतिकी है क्योंकि आतंक के खिलाफ साम्राज्यवादी महायुद्ध के महाबलि बनकर हम टुकड़ा टुकड़ा गृहयुद्ध के असंख्य कुरुक्षेत्र से घिरेर हुए हैं।हम सारे लोग चक्रव्यूह में जाने अनजाने घुसे हुए लोग हैं और मारे जाने को नियतिबद्ध हैं।निमित्तमात्र हैं।


    इस अभूतपूर्व हिंसा और प्रतिहिंसा के दुष्चक्र से अंततः इस महाभारत में कोई नहीं बचेगा अगर हम अभी से मुक्तबाजार के खिलाफ लामबंद न हो।


    राजनीति और राजकाज लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुताबिक हम जब चाहे तब बदल सकते हैं,लेकिन दसों दिशाओं में घृणा और हिंसा का जो मनुष्यविरोधी प्रकृति विरोधी पर्यावरण है,उसे बदलना असंभव है।


    मैं किन्हीं अमूर्त अवधारणाओं की बात नहीं कर रहा हूं और न दर्शन और जीवन दर्शन का ज्ञान बघारने जा रहा हू।हमने विकास के बहाने जो रौरव नौरक का कुंभीपाक चुना है,उसका ब्यौरा पेश करके आने वाले संकट की तरफ आपका ध्यान खींच रहा हूं।


    बांग्लादेश के मुख्य दैनिक जुगांतर ने रामकृष्ण मिशन पर हमले की धमकी पर भारत के प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाली की मुख्यमंत्री की फिक्र पर खबर बनाया है जो इस प्रकार हैः


    ঢাকার রামকৃষ্ণ মিশনে আইএস হুমকিতে মোদী-মমতার উদ্বেগ

    ঢাকার রামকৃঞ্চ মিশনের সহ-সম্পাদক স্বামী সেবান্দকে চিঠি পাঠিয়ে হত্যার হুমকি দিয়েছে সন্দেহভাজন জঙ্গি সংগঠন আইএস। এতে গভীর উদ্বেগ প্রকাশ করেছেন ভারতের প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদী ও পশ্চিমবঙ্গের মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।


    কলকাতার বাংলা দৈনিক আনন্দবাজার পত্রিকার এক প্রতিবেদনে তাদের এ উদ্বেগের কথা তুলে ধরা হয়েছে।


    প্রতিবেদনে বলা হয়েছে, চিঠি পাঠিয়ে ঢাকার রামকৃষ্ণ মিশনের সহ-সম্পাদক স্বামী সেবানন্দকে খুনের হুমকি দিল সন্দেহভাজন আইএস জঙ্গিরা।


    এ ঘটনায় বাংলাদেশে যেমন আতংক ছড়িয়েছে, প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদী ও মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ও উদ্বিগ্ন। প্রধানমন্ত্রীর দফতর থেকে ভারতীয় হাই কমিশনের মাধ্যমে ঢাকার রামকৃষ্ণ মিশনের সঙ্গে যোগাযোগ করে আশ্বস্ত করা হয়েছে।


    বাংলাদেশের স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী আসাদুজ্জামান খান কামাল বিষয়টিকে রাজনৈতিক চক্রান্ত বলে উল্লেখ করেন। বলেন, সংখ্যালঘুদের নিশানা করে সরকার ও দেশের ভাবমূর্তি কলঙ্কিত করার চক্রান্ত হচ্ছে। বাংলাদেশ শুধু মুসলমানদের দেশ নয়। হিন্দু-বৌদ্ধ-খ্রিস্টানরাও এ দেশের সম্মাননীয় নাগরিক। সরকার তাদের পাশে রয়েছে।


    বৃহস্পতিবার আইএস (ইসলামিক স্টেটস)-এর নামে এ বি সিদ্দিকের লেখা একটি চিঠি ঢাকার রামকৃষ্ণ মিশনে আসে। তাতে মিশনের সহ সম্পাদককে অবিলম্বে ভারতে চলে যেতে বলা হয়। না হলে ২০ থেকে ৩০ জুনের মধ্যে কুপিয়ে হত্যা করার হুমকি দেয়া হয় তাকে। মিশনের তরফে ঢাকার ওয়ারি থানায় ডায়েরি করে চিঠির একটি অনুলিপি তুলে দেয়া হয়। এর পরে পুলিশ মিশনের নিরাপত্তার জন্য বাহিনী মোতায়েন করেছে। ঢাকেশ্বরী মন্দিরের নিরাপত্তাও জোরদার করা হয়েছে।


    ঢাকায় হুমকির পরিপ্রেক্ষিতে এ দিন বেলুড় রামকৃষ্ণ মিশনের সাধারণ সম্পাদক স্বামী সুহিতানন্দ প্রধানমন্ত্রী ও মুখ্যমন্ত্রীকে চিঠি দিয়ে উদ্বেগ প্রকাশ করেন। চিঠিতে বলা হয়, 'বাংলাদেশে মিশনের ১৪টি কেন্দ্র রয়েছে। এগুলো সে দেশে বিভিন্ন সেবামূলক কাজ করে। কিন্তু গত কয়েক মাস ধরে সেই কাজে বার বার বিঘ্ন ঘটছে।'


    চিঠিচিঠিতে বলা হয়েছে, গত কয়েক মাস ধরেই মিশনের সন্ন্যাসীদের ফোন করে বা চিঠি পাঠিয়ে 'কোতল করার'হুমকি দেয়া হচ্ছে। মানিকগঞ্জে মিশনের সাটুরিয়া বালিয়াটি মিশনে এর আগে গত ডিসেম্বরের ১৫ তারিখে চিঠি দিয়ে মহারাজকে খুনের হুমকি দেয়া হয়েছিল। বিষয়টি অবিলম্বে কেন্দ্রের গোচরে আনার নির্দেশ দিয়েছেন মুখ্যমন্ত্রী।


    প্রধানমন্ত্রী মোদীর সঙ্গে রামকৃষ্ণ মিশনের সম্পর্ক দীর্ঘদিনের। কিছু দিন আগেও মোদী কলকাতায় এসে বেলুড় মঠে ঘুরে গেছেন। তার দফতরে চিঠি পৌঁছানোর পরে প্রধানমন্ত্রী নিজে বিষয়টি নিয়ে তৎপর হন। দফতরের সহকারী সচিব ভাস্কর খুলবেকে বিষয়টি সমন্বয়ের দায়িত্ব দেয়া হয়। অবহিত করা হয় বিদেশমন্ত্রী সুষমা স্বরাজকেও। ঢাকায় ভারতীয় হাই কমিশনের তরফে সেখানকার মিশনের প্রধান স্বামী ধ্রুবেশানন্দের সঙ্গে যোগাযোগ করা হয়। বাংলাদেশের পরিস্থিতি নিয়ে ঢাকার হাই কমিশনার হর্ষবর্ধন স্রিংলা বিদেশ মন্ত্রককে একটি রিপোর্ট দেন, যা প্রধানমন্ত্রীর দফতরে পাঠানো হয়েছে।


    বিদেশ মন্ত্রক সূত্রে খবর, তাদের রিপোর্টে বলা হয়েছে— জঙ্গি দমনে শেখ হাসিনা সরকার সম্প্রতি সর্বাত্মক অভিযান শুরু করেছে। এর ফলে মৌলবাদী ও জঙ্গিদের মনোবলে যথেষ্ট চিড় ধরেছে। এই কারণে সংখ্যালঘুদের ওপর চোরাগোপ্তা হামলা ও হুমকি দিয়ে আতংক ছড়ানোর কৌশল নিয়েছে জঙ্গিরা। গত দেড় মাসে হিন্দু, খ্রিস্টান, বৌদ্ধ ধর্মস্থানে বেশ কয়েকটি হামলা হয়েছে। কয়েক জন পুরোহিত ও ধর্মগুরুকে চোরাগোপ্তা হামলায় হত্যাও করা হয়েছে। বুধবারও মাদারিপুরে এক সংখ্যালঘু কলেজ শিক্ষকের বাড়িতে ঢুকে তার ওপর হামলা করা হয়েছে। কিন্তু বাংলাদেশ সরকার বিষয়টি যথেষ্ট গুরুত্ব দিয়েই দেখছে। জঙ্গিদের বিরুদ্ধে অভিযান শুরু করেছে। রিপোর্টে বলা হয়েছে, আইএস-এর নাম করে নাশকতা চালানো জেএমবি ও আনসারুল্লা জঙ্গিদের বহু নেতাকর্মীকে পুলিশ গ্রেফতার করেছে। পড়শি দেশে জঙ্গিবিরোধী এই অভিযান ভারতের নিরাপত্তার পক্ষেও বিশেষ গুরুত্বপূর্ণ।


    বাংলাদেশের স্বরাষ্ট্রমন্ত্রী অবশ্য সংখ্যালঘুদের আশ্বস্ত করছেন। তিনি জানান, সংখ্যালঘুদের নিরাপত্তার দায়িত্ব সরকারের। তার ভাষায়, বাংলাদেশকে জঙ্গি অধ্যুষিত দেশ বলে তুলে ধরার জন্যই এই চোরাগোপ্তা হামলা চলছে, যার পেছনের রাজনৈতিক মাথাদের চিহ্নিত করা গেছে। এ বার ধরার পালা।


    মাস দুয়েক পরে বাংলাদেশে আর এমন ঘটনা ঘটবে না, দাবি কামালের।

    http://www.jugantor.com/online/national/2016/06/17/16551/%E0%A6%A2%E0%A6%BE%E0%A6%95%E0%A6%BE%E0%A6%B0-%E0%A6%B0%E0%A6%BE%E0%A6%AE%E0%A6%95%E0%A7%83%E0%A6%B7%E0%A7%8D%E0%A6%A3-%E0%A6%AE%E0%A6%BF%E0%A6%B6%E0%A6%A8%E0%A7%87-%E0%A6%86%E0%A6%87%E0%A6%8F%E0%A6%B8-%E0%A6%B9%E0%A7%81%E0%A6%AE%E0%A6%95%E0%A6%BF%E0%A6%A4%E0%A7%87-%E0%A6%AE%E0%A7%8B%E0%A6%A6%E0%A7%80-%E0%A6%AE%E0%A6%AE%E0%A6%A4%E0%A6%BE%E0%A6%B0-%E0%A6%89%E0%A6%A6%E0%A7%8D%E0%A6%AC%E0%A7%87%E0%A6%97


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    Sujatha Surepally

    Suspension on Prof. K.Y Ratnam and Tathagath is revoked!! This is the power of peoples movement and also perhaps another strategy to divert the issue as Apparao and all ministers, supporters are supposed to be arrested by now as Rohith was declares as dalit officially. They always want to test the pulse and they fail..‪#‎justiceforrohith‬

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    आदिवासी लड़की की पुलिस द्वारा बलात्कार के बाद हत्या के मामले पर साथी संकेत ठाकुर नें आज छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में रिट दायर करी है 


    Sanket Thakur

    1 hr · 

    The First PIL of My Life in High Court

    The suspected encounter of Madkam Hidme has brought a serious blow in war against Maoists in decades old troubled Bastar division of Chhattisgarh.

    On 13th June a victorious police officer informed the media that one woman Maoist Madkam Hidme killed in encounter between Maoists and District Reserve Guard & STF near Gompad and Gorkha Jungle of PS Konta in Sukma district of Bastar. Another jubilant police officer posted the photo of dead body of Madkam Hidme claiming her the Kistaram Area Platoon Commander.

    This photo clearly depicts that Madkam's dress was changed after death and was dressed up with new Maoists uniform. Police claimed she suffered 10 bullets injury, however her dress was not affected at all ! How this miracle would have happened ?

    On the otherhand, villagers of Gompad contacted AAP State Campaign Committee incharge Soni Sori, the fearless tribal leader of Bastar. The villagers told Soni Sori that 20 year old Madkam was captured by security forces at 4 pm while she was milling paddy at home. She was taken to nearby jungle where other women heard her screaming due to gang rape being done by forces. Later the forces shot her 10 bullets and next morning police informed the village panchyat secretary to collect Madkam's dead body from Sukama.

    Family members of Madkam Hidme and villagers wanted fair probe of the incidence and refused to cremate her body. Soni Sori rushed to Sukama on 15th June with 4 members of party to visit the village and meet the villagers for primary investigation of the incidence. However the local police stopped the team and forced to not to go beyond district HQ. On 16th June AAP State team and Bastar Team members joined Soni Sori and made another attempt to visit Gompad, but again local police officer didn't allow them to go beyond Konta. The team stayed at Konta with determination to visit the village. 
    I spoke to Soni Sori last night and we decided to file a PIL in high court requesting postmortem of Madkam, medical examination reg rape traces, SIT constitution, Judicial enquiry and compensation of Rs 20 lakh to Madkam's family.
    Today I went to Bilaspur for writ petition filing, and I was informed by Soni Sori that around 12 noon a group of sponsored mob attempted to attack the AAP leaders in the presence of police and SDM. The unprecedented behavior and desperate efforts to stop Soni Sori and other AAP leaders at Sukama and Konta indicates something fishy in Gompad. This appears to be acceptance of police forces being involved in unfortunate rape and murder of a young tribal girl of Bastar whose marriage was due in the coming month.
    Tribals of Bastar are waiting for fair justice with their entire community. How long they will suffer no body knows because its just a dirty politics and lust for grabbing the natural enriched resources which seems to have become a curse to tribals !

    My first PIL, I hope, will provide justice to Madkam and her family whom I never met but feel if I lost my younger sister.

    Sorry Madkam ! Only this much I could do for you !! Be in peace where ever you are now Madkam !! and lets pray Bastar to be in peace soon !!


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