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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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  • 05/20/16--07:32: बंगाल और केरल में बदल गयी राजनीति तृणमूल कांग्रेस को 45 फीसद वोट पड़े तो भाजपा को दस फीसद दीदी ने भाजपा को राष्ट्रहित में सोनार बांग्ला गढ़ने के लिए समर्थन का कर दिया ऐलान विजयन बनेंगे केरल के मुख्यमंत्री। जहां मुसलमानों ने दीदी के खिलाफ वोट डाले जैसे पूरे मुर्शिदाबाद जिले में,वहां दीदी का सूपड़ा खाली ही निकला। जाहिर है कि उग्रतम हिंदुत्व और मुसलमानों के थोक असुरक्षाबोध का रसायन वाम कांग्रेस बेमेल विवाह पर भारी पड़ा है। खड़गपुर सदर से 1969 से लगातार दस बार विधायक रहे चाचा ज्ञानसिंह सोहन पाल भाजपा के संघी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से चुनाव हार गये हैं।खड़गपुर के मतदाताओं में कुल पांच हजार भी सिख नहीं हैं ततो पहले उनकी लगातार जीत का मतलब समझ लीजिये और फिर संघी सिपाहसालार से उनकी हार का मतलब। केरल में वाम की वापसी तो हो गयी,लेकिन केसरिया संक्रमण से केरल भी नहीं बचा।हालांकि वहां बंगाल की तरह तीन नहीं,भाजपा को एक ही सीट मिली है। एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप
  • बंगाल और केरल में बदल गयी राजनीति

    तृणमूल कांग्रेस को 45 फीसद वोट पड़े तो भाजपा को दस फीसद

    दीदी ने भाजपा को राष्ट्रहित में सोनार बांग्ला गढ़ने के लिए समर्थन का कर दिया ऐलान

    विजयन बनेंगे केरल के मुख्यमंत्री।


    जहां मुसलमानों ने दीदी के खिलाफ वोट डाले जैसे पूरे मुर्शिदाबाद जिले में,वहां दीदी का सूपड़ा खाली ही निकला।


    जाहिर है कि उग्रतम हिंदुत्व और मुसलमानों के थोक असुरक्षाबोध का रसायन वाम कांग्रेस बेमेल विवाह पर भारी पड़ा है।


    खड़गपुर सदर से 1969 से लगातार दस बार विधायक रहे चाचा ज्ञानसिंह सोहन पाल भाजपा के संघी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से चुनाव हार गये हैं।खड़गपुर के मतदाताओं में कुल पांच हजार भी सिख नहीं हैं ततो पहले उनकी लगातार जीत का मतलब समझ लीजिये और फिर संघी सिपाहसालार से उनकी हार का मतलब।


    केरल में वाम की वापसी तो हो गयी,लेकिन केसरिया संक्रमण से केरल भी नहीं बचा।हालांकि वहां बंगाल की तरह तीन नहीं,भाजपा को एक ही सीट मिली है।


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप


    खड़गपुर सदर से 1969 से लगातार दस बार विधायक रहे चाचा ज्ञानसिंह सोहन पाल भाजपा के संघी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से चुनाव हार गये हैं।खड़गपुर के मतदाताओं में कुल पांच हजार भी सिख नहीं हैं ततो पहले उनकी लगातार जीत का मतलब समझ लीजिये और फिर संघी सिपाहसालार से उनकी हार का मतलब।


    पूरे बंगाल में वे चाचाजी हैं और अब केसरिया बंगाल ने अपने चाचा को भी नहीं बख्शा तो समझ लीजिये कितना भारी बदलाव है और यह बदलाव किस तरह का बदलाव है।


    वहीं,बीबीसी के मुताबिक केरलमें सीपीएम की बैठक में पिनराई विजयन को नया मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला लिया गया है। वो पार्टी की पोलित ब्यूरो के सदस्य भी हैं। यह फ़ैसला सर्वसम्मति से हुआ है, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, पूर्व मुख्यमंत्री 92 वर्षीय वीएस अच्युतानंदन इससे खुश नहीं हैं और वो बैठक को बीच में ही छोड़कर निकल गए। सीपीएम की बैठक में पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी के अलावा, पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य भी मौजूद थे। रिपोर्ट के मुताबिक़ पार्टी ने चुनावों में एलडीएफ़ की जीत होने पर अच्युतानंदन को मुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दिया था।


    गौरतलब है कि हाल में यादवपुर विश्विद्यालय की बागी आजाद छात्राओं के खिलाफ दिलीप घोष के सुभाषित खूब चरचे में रहे हैं और इसी से समझा जा सकता है कि बंगाल में राजनीति की दशा दिशा अब क्या है।मालदा के वैष्णवघाट और अलीपुर द्वार के मदारी हाट से भी वोटबाक्स में कमल ही कमल खिले हैं।


    केरल की राजनीति में भी संघ परिवार की घुसपैठ हो गयी।केरलका यह चुनाव खास इसलिए भी था कि लोगों की नजरें लोकसभा चुनाव में जीत के बाद दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में हार देख चुकी बीजेपी पर टिकी थी जिसने इस बार राज्य में अपना खाता खोलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। यही नहीं, 2014 लोकसभा चुनाव में करारी हार के चलते केरलमें जहां सत्ता बचाए रखना कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न था, वहीं एलडीएफ के लिए भी यह प्रतिष्ठा की लड़ाई थी क्योंकि मार्क्स्वादी मोर्चे की अब केवल त्रिपुरा में ही सरकार रह गई है। के लिए भी केरलविधानसभा में खाता खोलना काफी अहम माना जा रहा है।


    बहरहाल केरल में वाम की वापसी तो हो गयी,लेकिन केसरिया संक्रमण से केरल भी नहीं बचा।हालांकि वहां बंगाल की तरह तीन नहीं,भाजपा को एक ही सीट मिली है।


    चाचा ने पिछला चुनाव भी बत्तीस हजार वोटों से जीता था और 92 साल के हो जाने की वजह से इसबार लड़ने के मूड में कतई नहीं थे।जिस जनता की जिद पर वे फिर मैदान में डट गये,उसी जनता का केसरिया कायाकल्प हो गया और बूढ़ापे में चाचा हार गये।चाचा बंगाल विधानसभा के स्पीकर और मंत्री भी रह चुके हैं।


    चुनाव जीतते ही प्रचार के दौरान दीदी और उनकी सरकार पर बिजली गिराने वाले केसरिया बादल मानसून बनकर बरसने लगे तो दक्षिण के बजाय पश्चिम की सारी खिड़कियां खोलकर दीदी ने भा भाजपा के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया कि राष्ट्रहित में,बंगाल के हित में सोनाल बांग्ला गढ़ने के लिए वे भाजपा के साथ ही हैं।बहरहाल  बंगाल में ममता बनर्जीको तृणमूल कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया है. ममता वहां से सीधे गवर्नर से मिलने पहुंची और सरकार बनाने का दावा पेश किया है।


    दीदी की भारी जीत एकदम प्रतिकूल परिस्थितियों में हुई।शारदा से नारदा तक के सफर में उनकी साख खत्म सी हो गयी थी सलेकिन अंतिम वक्त पर वाम कांग्रेस का गठजोड़ बना तो वासमर्थकों और कांग्रेस समर्थकों के वोटजहां उनके उम्मीदवार खड़े नहीं हुए,एक दूसरे को हस्तांतरित हुए नहीं और विपक्ष ने सत्ता विरोधी हवा बनाने में कोई कामयाबी हासिल नहीं की।


    विपक्ष में नेतृत्व का अभाव रहा तो दीदी हर विधानसभा क्षेत्र में जाकर कहती रही,प्रत्याशी को भूल जाओ।मैं खड़ी हूं।मुझे वोट दो।खुलकर गलतियों के लिए वे माफी भी मांगती रही।हर सीटमें दीदी अकेली लड़ रही थी और विपक्ष हवाबाजी को जीत मान चुका था।मैदान में उतरकर दीदी को जवाब देने वाला नेतृत्व कहीं न था।


    तृणमूल का फूल बंगाल के चप्पे-चप्पे पर इस तरह खिलेगा, ममता दी के लिए वोटों की ऐसी रिमझिम बारिश होगी ये तो शायद तृणमूल पार्टी के नेताओं ने भी नहीं सोचा होगा. आखिर नारदा-शारदा के नारों का शोर इस तरह कैसे गुम हो गया?


    अब इसका आशय कुछ इसतरह समझिये कि बंगाल में सत्तादल तृणमूल कांग्रेस को 45 फीसद वोट पड़े तो भाजपा को दस फीसद से ज्यादा वोट मिल गये।यानी दीदी मोदी गठबंधन को 55 फीसद वोट मिले।भाजपा को पिछले लोक सभा चुनाव में सत्रह फीसद वोट मिले थे लेकिन वही 2011 के विधानसभा चुनाव में बंगाल में सिर्फ चार फीसद भाजपाई वोट थे।


    गौरतलब है कि  पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने सत्ताविरोधी लहर को धता बताते हुए तथा वाम-कांग्रेस के विपक्षी गठबंधन को काफी पीछे छोड़कर विधानसभा चुनाव में दो तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े को पार कर लिया और 294 सदस्यीय विधानसभा में ममता बनर्जीकी पार्टी ने 211 सीटें हासिल कर ली।


    गौरतलब है कि  मतदान से काफी पहले कांग्रेस वाम गठबंधन के आकार लेने से पहले दीदी ने सिदिकुल्ला चौधरी और जमायत की अगुवाई में तमाम मुसलमान संगठनों की बाड़ेबंदी कर दी थी।


    जहां मुसलमानों ने दीदी के खिलाफ वोट डाले जैसे पूरे मुर्शिदाबाद जिले में,वहां दीदी का सूपड़ा खाली ही निकला।


    जाहिर है कि उग्रतम हिंदुत्व और मुसलमानों के थोक असुरक्षाबोध का रसायन वाम कांग्रेस बेमेल विवाह पर भारी पड़ा है।


    हालांकि पब्लिक में दीदी का भाजपा विरोधी जेहादी तेवर अभी बरकरार है। प्रचंड बहुमत के लिए ममता बनर्जीने जनता का धन्यवाद किया, उन्होंने कहा कि दिल्ली से उन्हें भरपूर हराने की कोशिश की गई। लेकिन जनता का विश्वास उनपर था और उसका फल मिला है।


    वहीं माकपा नेता सीताराम येचुरी ने पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के लिए कांग्रेस और टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया।


    टीएमसी की जीत पक्की होने पर सीएम ममता बनर्जीने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने कहा कि यह जनता की जीत है। उन पर जो आरोप लगे उन्हें जनता ने खारिज कर दिया। ममता ने कहा, 'मैंने अकेले लड़कर सबको हराया है। विरोधियों ने मुझे बदनाम करने की कोशिश की।'


    दूसरी तरफ ,ममता बनर्जीने माकपा और कांग्रेस के गठजोड़ के फैसले को एक बड़ी भूल करार देते हुए कहा है कि लोगों ने तृणमूल कांग्रेस को जिता कर विपक्ष के कुप्रचार अभियान का करार जवाब दे दिया है। उन्होंने इस अप्रत्याशित जीत के लिए आम लोगों के प्रति आभार जताते हुए कहा है कि लोगों ने विपक्षी दलों के झूठे आरोपों को नकार दिया है। ममता ने एक सवाल पर कहा कि वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं हैं। उनको राज्य के लोगों ने जिताया है और वे यहां रह कर बंगाल के विकास के लिए में काम करना चाहती हैं।


    राजनीति सिरे से बदल रही है।मसलन केरल में CPI(M) ने दिग्गज नेता वीएस अच्युतानंद को साइडलाइन कर पी विजयन को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया है।कई घंटे की माथापच्ची के बाद एलडीएफ ने केरलके मुख्‍यमंत्री के तौर पर 72 साल के पिनारयी विजयन के नाम पर अपनी सहमति दे दी।


    पोलित ब्यूरो की बैठक में विजयन को विधायक दल का नेता चुना गया। पार्टी के इस फैसले से नाराज अच्युतानंदन बीच में ही बैठक छोड़कर चले गए।गौरतलब है कि  केरलमें चुनाव प्रचार से पहले सीएम पद के दावेदारी के लिए एक तरह से भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। विजयन और अच्युतानंदन खेमा एक दूसरे का विरोध कर रहा था।


    शाम में माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने पिनराई विजयन को मुख्यमंत्री बनाये जाने की पुष्टि कर दी है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल माकपा के 93 वर्षीय नेता वीएस अच्युतानंदन को आज सुबह राज्य सचिवालय बुलाया गया था और उन्हें फैसले के बारे में जानकारी दी गयी जिसके बाद वह अपने घर लौट गए।


    हालांकि  बैठक के बाद कामरेड महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा, अच्युतानंदन पार्टी के फिदेल कास्त्रो हैं। वे पार्टी को गाइड और प्रेरित करते रहेंगे।


    गौरतलब है कि  पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जीऔर तमिलनाडु में सत्तारूढ़ ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की महासचिव जे. जयललिता सत्ता में वापसी कर चुकी हैं।


    वहीं असम में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया, जबकि वाम मोर्चा ने केरल में जीत दर्ज की है। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए निराशाजनक रहा। असम में 15 वर्षो से सत्ता में रहे कांग्रेस को भाजपा के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।


    केरलमें 140 विधानसभा सीटों के नतीजे घोषित हो चुके हैं। राज्य में लेफ्ट डेमोक्रटिक फ्रंट (LDF) को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। LDFयहांसबसे ज्यादा 85 सीटेंजीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। यूडीएफ यानी कांग्रेस गठबंधन को 46 सीटें मिली हैं। बीजेपी को 1 और अन्य को 8 सीटों पर जीत मिली है।केरलमें पहली बार भारतीय जनता पार्टी का कमल खिला। यह सीट पूर्व केंद्रीय मंत्री ओ राजागोपाल ने जीती है। राज्य में लेफ्ट के हाथों कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। असम की तरह केरलभी कांग्रेस के हाथ से फिसल गया है।




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  • 05/20/16--13:13: मुर्दाघर में तब्दील है मीडिया। इस मीडिया का मिशन मुनाफावसूली है।सिर्फ मुनाफावसूली है,कोई सरोकार उसके नहीं हैं। मुक्त बाजार में सत्ता का खेल कारपोरेट का चाकचौबंद बंदोबस्त और मीडिया की औकात दो कौड़ी की भी नहीं। सूचना विस्फोट और सूचना तकनीक की वजह से यह अंधत्व अब लाइलाज है।क्योंकि अब जनमत बनाने के बदले कारपोरेट हितों के मुताबिक कारपोरेट मीडिया जनादेश बनाने लगा है या बनानने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।ताजा उदाहरण बंगाल है। बंगाल ने साबित कर दिया कि सर्व शक्तिमान मीडिया की औकात दो कौड़ी की है और देहात के बवंडर ने मीडिया के रचे जनादेश के भरोसे हाथ पर हाथ धरे कामरेडों को औंधे बल धुल चटा दिया। मीडिया को अब धंधेबाज पत्रकार चाहिए,कुशल मैनेजर चाहिए,चीफ एक्जीक्युटिव चाहिए जबकि संपादन खत्म है और संपादक का अवसान हो गया है। हम अंध राष्ट्रवादी हैं,इसीलिए हम यह समझ ही नहीं सकते कि #Shut Down JNU, #Shut down Jadav pur Universiateis, #Shut doen all universities,# Making in# Statertup India,# Digital India,# Smart India की आंड़ में कयामत में बदलती फिजां,दावानल में दहकते ग्लेशियर,महाभूकंप की चेतावनी.
  • मुर्दाघर में तब्दील है मीडिया।


    इस मीडिया का मिशन मुनाफावसूली है।सिर्फ मुनाफावसूली है,कोई सरोकार उसके नहीं हैं।


    मुक्त बाजार में सत्ता का खेल कारपोरेट का चाकचौबंद बंदोबस्त और मीडिया की औकात दो कौड़ी की भी नहीं।


    सूचना विस्फोट और सूचना तकनीक की वजह से यह अंधत्व अब लाइलाज है।क्योंकि अब जनमत बनाने के बदले कारपोरेट हितों के मुताबिक कारपोरेट मीडिया जनादेश बनाने लगा है या बनानने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।ताजा उदाहरण बंगाल है।


    बंगाल ने साबित कर दिया कि सर्व शक्तिमान मीडिया की औकात दो कौड़ी की है और देहात के बवंडर ने मीडिया के रचे जनादेश के भरोसे हाथ पर हाथ धरे कामरेडों को औंधे बल धुल चटा दिया।


    मीडिया को अब धंधेबाज पत्रकार चाहिए,कुशल मैनेजर चाहिए,चीफ एक्जीक्युटिव चाहिए जबकि संपादन खत्म है और संपादक का अवसान हो गया है।


    हम अंध राष्ट्रवादी हैं,इसीलिए हम यह समझ ही नहीं सकते कि #Shut Down JNU, #Shut down Jadav pur Universiateis, #Shut doen all universities,# Making in# Statertup India,# Digital India,# Smart India की आंड़ में कयामत में बदलती फिजां,दावानल में दहकते ग्लेशियर,महाभूकंप की चेतावनी.अनिवार्यसूखा और भूखमरी,बेहताशा बेरोजगारी,अनंत बेदखली और विस्थापन,जल युद्ध और पेयजल संकट का आशय समझ ही नहीं सकते और मीडिया हमें बजरंगी बनाने में लगा है।उसे देश दुनिया के संकट से कोई मतलब नहीं है।


    मीडिया भी इन दिनों आईपीेएल है।मीडियाकर्मी चीयरलीडर।


    पलाश विश्वास


    हम अंध राष्ट्रवादी हैं,चाहे हम वामपंथी हों,मध्यपंथी हों ,उदार मध्यपंथी हों या धुर दक्षिणपंथी।बजरंगी अंध धर्मोन्मादी हिंदुत्व राष्ट्रवाद जितना कट्टर है,अस्पृश्य आदिवासी पिछड़ा बहुजन अल्पसंख्यक राष्ट्रवाद उससे तनिको कम उन्मादी नहीं है।कम कट्टर भी नहीं है।इसे समझे बिना इस अंधत्व का इलाज नहीं है।


    सूचना विस्फोट और सूचना तकनीक की वजह से यह अंधत्व अब लाइलाज है।क्योंकि अब जनमत बनाने के बदले कारपोरेट हितों के मुताबिक कारपोरेट मीडिया जनादेश बनाने लगा है या बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।ताजा उदाहरण बंगाल है।


    राजनीति को भी जनगण से कोई मतलब नहीं है और जनता के बीच जाने की बजाय वे मीडिया के गाल बजाकर सत्ता दखल करने के अभ्यस्त हो गये हैं और मीडिया और राजनीति दोनों को खुशफहमी है कि वे ही मौसम बदल रहे हैं,जबकि सबकुछ मु्क्तबाजार का बंदोबस्त चाकचौबंद है और जनता को हाशिये पर रखकर हवा हवाई क्रांति की कोई जमीन नहीं है।इस राजनीति की कोई जड़े नहीं है जैसे मीडिया की भी कोई हवा पानी मिट्टी नहीं है।


    इसीलिए पेइड मीडिया को इतना बोलबाला है कि मीडिया साध लिया तो जनता की परवाह किये बिना मैदान मार लेने का शार्टकट आजमाने से अब न सत्ता और न राजनीति को कोई शर्म है।


    मीडिया को अब धंधेबाज पत्रकार चाहिए,कुशल मैनेजर चाहिए,चीफ एक्जीक्युटिव चाहिए जबकि संपादन खत्म है और संपादक का अवसान हो गया है।


    इस कारपोरेट मीडिया में अबाध पूंजी का एकाधिकार वर्चस्व है और उसने जनपक्षधरता से कन्नी काटते हुए उसने पत्रकारिता का स्पेस ही खत्म कर दिया।तो पत्रकारों,गैरपत्रकारों और मीडियाकर्मियों का भी कत्लेआम अब चालू फैशन है।जिसकी खबर मीडियावालों को नहीं है और है तो कोई अपनी खाल उतरवाने का जोखिम उठायेगा नहीं।रोजी रोटी के अलावा वातानुकूलित रोजनामचा खतरे में है।


    मुर्दाघर में तब्दील है मीडिया।


    इस मीडिया का मिशन मुनाफावसूली है।सिर्फ मुनाफावसूली है,कोई सरोकार उसके नहीं हैं।


    मीडिया में चमकता दमकता जो कांटेंट है,जो पत्रकारिता का जोश है,जो खोजखबर और स्टिंग है,वह सबकुछ विज्ञापन में शामिल है और अभिव्यक्ति से कोसों दूर है यह सूचना महाविस्फोट,जहां जनता का कोई एफआईआर दर्ज हो ही नहीं सकता।


    सबकुछ पार्टीबद्ध बाजार नियंत्रित और सत्ता का खेल है।सबकुछ ग्लोबल आर्डर है और बजरंगी हिंदू केसरिया अंध राष्ट्रवाद वही है जिसके तहत मीडिया सैन्यराष्ट्रतंत्र का ग्लेमर है,वाइटल स्टेटिक्स है,किलेबंदी है,मोर्चा है और यह मोर्चा जनता का नहीं है।


    बंगाल ने साबित कर दिया कि सर्व शक्तिमान मीडिया की औकात दो कौड़ी की है और देहात के बवंडर ने मीडिया के रचे जनादेश के भरोसे हाथ पर हाथ धरे कामरेडों को भी औंधे बल धुल चटा दिया।


    मीडिया के पांख पर सवार लोग धम से मुंह के बल धूल फांक रहे हैं।मीडिया लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें जिता नहीं सका।


    जिता भी नहीं सकता।लोकतंत्र में सत्ता कितनी ही निरंकुश हो जाये,तुरुप का पत्ता जनता के हाथों में ही होता है और किसी भी सूरत में मीडिया जनादेश बना नहीं सकता।


    सुनामी बनाने और सुनामी खत्म करने में जनता का मीडिया से कोई मुकाबला नहीं है और बाजार के तिलिस्म के बावजूद निरंकुश सत्ता के अवसान का अचूक रामवाण वही प्रबल जनमत है,जिसे तैयार करने में अब न राजनीति की कोई भूमिका है और न मीडिया का।जनमत और जनादेश दोनों अब सीधे मुक्तबाजार के नियंत्रण में है।मीडिया अब कोई चौपाल नहीं है बल्कि वह मुकेश अंबानी का अंदरमहल है।


    बंगाल में नंदीग्राम सिंगुर लालगढ़ समय में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन का झंडवरदार बना हुआ था मीडिया और तब मीडिया की वजह से जो वामविरोधी हवा बंगाल में बनी,उसकी जमीन पर ममता बनर्जी की ताजपोशी हो गयी।बाजार ने की वह ताजपोशी जिसे मीडियाअपना करिश्मा मानता रहा है।जो प्रचंड जनांदोलन उस वक्त हुआ,उसी की वजह से परिवर्तन हुआ।बाजार ने तो उस जनांदोलन के मुताबिक अपने हित साधने के लिए पक्ष चुना।


    वही मीडिया जो कल तक ममता के पक्ष में था,इस बार कारपोरेट हितों के मुताबिक ममता की नीतिगत विकलांगकता की वजह से वैसे ही ममता के खिलाफ हो गया,जैसे दस साल के सुधार अश्वमेध के सिपाहसालार मनमोहन के खिलाफ हो गया मीडिया।


    मीडिया को खुशफहमी है कि उसीने मनमोहन का तख्ता पलटदिया और उसीने केसरिया सुनामी पैदा कर दी।जबकि ग्लोबल आर्डर और मुक्त बाजार के हित में अबाध पूंजी का यह करिश्मा है।


    नाभि नाल से वैश्विक व्यवस्था से जुड़ी सत्ता का तखता पलट मीडिया के दम पर हो ही नहीं सकता।न मीडियाजनमत बाने की जहमत उठा सकता है क्योंकि जनमत बाजार का उत्पादन होता नहीं है।जनमत उत्पादन संबोधों के मुताबिक होता है और उत्पादकों की गोलबंदी से आंदोलन खड़ा होता है जो जनमत बनाता है।सिंगुर और नंदीग्राम के किसानों ने जो आंदोलन किया और जो जनमत तैयार हुआ,उसीका नतीजा परिवर्तन है।


    उत्पादकों की राजनीतिक गोलबंदी के बिना,सामाजिक यथार्थ से टकराये बिना,आंदोलन के लिए कोई तैयारी किये बिना न आंदोलन संभव हुआ और न जनमत का निर्माण हुआ तो मीडिया हाउस के गर्भ से जो जनादेश निकल सकता था,वही निकला जो हैरतअंगेज नहीं है।जनमत की परवाह किये बिना जड़ों से कटी वातानुकूलित हवा हवाई राजनीति का यह अंतिम हश्र है।शोक कैसा?


    राष्ट्र के कारोबार में मीडिया ही नहीं तमाम माध्यमों और विधाओं की भूमिका होनी चाहिेए और यह भूमिका कुल मिलाकर राष्ट्र के लोकतांत्रिक लोककल्याणकारी चरित्र को बहाल रखने का कार्यभार है।इस प्रस्थानबिंदू के बदले बाजार के मुताबिक कारपोरेट हितों के मुताबिक जोड़तोड़ करके पूंजी के दम पर बाजार में महाबलि हो सकता है मीडिया या मीडियाघराना,जनता को उसकी कोई परवाह नहीं।इसीलिए मीडिया और ममताकी लड़ाई में जनता ने ममता का साथ दिया और मीडिया के भरोसे कुरुक्षेत्र का महाभारत जीत लेने के भ्रम में तमाम रथी महारथी खेत हो गये।


    राष्ट्र को लोकतांत्रिक और लोककल्याणकारी बनाये रखने के अक्लांत अविराम जनसंघर्ष की बजाय कारपोरेट मीडिया और चुनावी गठबंधन के बीजगणित पर जिनका ज्यादा भरोसा है,वे लोग दरअसल सैन्य राष्ट्र के ही सिपाहसालार है और वे अपने आचरण से खुद जनता की नजर में मनुस्मृति के सिपाहसालार हैं जो असमता और अन्याय,रंगभेद और असहिष्णुता के पुरोहित भी हैं।वर्चस्ववाद के ये सिपाहसालार आम जनता के लिए मुक्ति की राह नहीं बना सकते तो आम जनता क्यों उनका समर्थन करेगी मीडियाभरोसे।


    सत्ता वर्ग के रंगबिरंगे राजनेता सैन्यत्ंत्र के ही तंत्र मंत्र यंत्र के कलपुर्जे बने हुए हैं और इसीलिए हमने स्वतंत्रता के सात दशक पूरे होने के बावजूद राष्ट्र के चरित्र पर कोई संवाद अभी तक शुरु ही नहीं किया है और जो लोग इस संवाद को अनिवार्य मानते हैं,हमारी नजर और राष्ट्र के नजरिया के मुताबिक वे तमाम लोग लुगाई राष्ट्र के लिए बेहद खतरनाक हैं और उनके सफाये के पवित्र कर्म में हम राष्ट्रवादियों का पूरा समर्थन रहता है।


    हमारे आदरणीय मित्र हिमांशु कुमार के रोजनामचे में आदिवासी दुनिया की जो भयावह तस्वीर सामने आ रही है रोज रोज,उससे हम तनिक विचलित नहीं होते क्योंकि हम कमोबेश विकास के लिए आदिवासियों के कत्लेआम के समर्थक हैं।


    इसीलिए हम किसी भी बिंदू पर मणिपुर की इरोम शर्मिला या बस्तर की सोनी सोरी के साथ खड़े हुए दीख नहीं सकते और न यादवपुर विश्विद्यालयमें पढ़ रही अपनी बेटियों की बेइज्जती पर हमें कोई ऐतराज है।उलटे हम जेएनयू के छात्रों को फांसी पर लटकाने पर आमादा हैं।


    हम अंध राष्ट्रवादी हैं,इसीलिए हम यह समझ ही नहीं सकते कि #Shut Down JNU, #Shut down Jadav pur Universiateis, #Shut doen all universities,# Making in# Statertup India,# Digital India,# Smart India की आंड़ में कयामत में बदलती फिजां,दावानल में दहकते ग्लेशियर,महाभूकंप की चेतावनी.अनिवार्यसूखा और भूखमरी,बेहताशा बेरोजगारी,अनंत बेदखली और विस्थापन,जल युद्ध और पेयजल संकट का आशय समझ ही नहीं सकते और मीडिया हमें बजरंगी बनाने में लगा है।उसे देश दुनिया के संकट से कोई मतलब नहीं है।


    मीडिया भी इन दिनों आईपीेएल है।मीडियाकर्मी चीयरलीडर।


    हमारी देश भक्ति राष्ट्र के जनविरोधी सैन्यतंत्र और अर्थव्यवस्था के नरसंहारी अश्वमेध और सामाजिक अन्याय,अत्याचार,उत्पीड़न और दमन के पक्ष में है।


    सलवा जुड़ुम के पक्षधर हैं हम और सशस्त्र सैन्य बल विशेषाधिकार का हम उतना ही अंध समर्थन करते हैं जितना किसी विदेशी सेना के खिलाफ युद्ध में राष्ट्र का।


    हम अपने ही नागरिकों पर राष्ट्र के सैन्य हमलों के विरोध में खड़े ही नहीं हो सकते और इसीलिए हम कमोबेश सहमत है कि कश्मीर और मणिपुर,समूचा पूर्वोत्तर और मध्यभारत का आदिवासी भूगोल राष्ट्रविरोधी है जैसे हमाल में हम तमाम विश्वविद्यालयों को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र मानते हैं और वहां मनुस्मृति अनुशासन लागू करने के विरुद्ध चूं तक नहीं करते हैं।


    हमारी देश भक्ति और हमारा अंध राष्ट्रवाद लोकतंत्र और संविधान,नागरिक और मानवाधिकार के खिलाफ है और सामाजिक आर्थिक राजनीतिक समानता,कानन के राज और न्याय के विरुद्ध हैं तो भी हमें किसी खास किस्म की तकलीफ नहीं है।दर्द का कोई अहसास नहीं है हमें।हमारी इंद्रियां बेकल हैं और हम दिव्यांग।


    हम विकास के नाम तमाम आदिवासियों को और किसानों को उजाड़ने के सुधारवादी नवउदार मुक्तबाजार के उपभोक्ता हैं और सेवा से संतुष्ट हैं और हमें फर्क नहीं पड़ा कि संपूर्ण निजीकरण, संपूर्ण विनिवेश और अबाध पूंजी,परमाणु ऊर्जा,अंधाधुंध शहरीकरण के मेकिंग इन इंडिया के कारपोरेट बहुराष्ट्रीय उद्यम में ही हम अच्छे दिनों की उम्मीद लगाये बैठे हैं।


    यह इसलिए है कि सूचना विस्फोट से हम ग्लोबल हैं और राष्ट्रवाद के अंधत्व के बावजूद राष्ट्रविरोधी मुक्त बाजार के हम नागरिक हैं किसी राष्ट्र के नागरिक हम कतई नहीं है और इस देश की मिट्टी पानी जल जंगल जमीन और पर्यावरण के साथ साथ बाकी नागरिकों की हमें कोई परवाह नहीं है और न अपने स्वजनों के वध से बह निकली खून की गंगा में क्रयशक्ति और हैसियत की लालच में गहरे पैठकर सत्ता से नत्थी हो जाने में हमें कोई शर्म है।


    हम न जनमत बना सकते हैं और न जनादेश।हम मीडियाभरोसे हैं।


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    Indresh Maikhuri

    उत्तराखंड में जिस सिडकुल और उसमे लगे उद्योगों को यहाँ की सरकार विकास के मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती है,उसकी असलियत आज रूद्रपुर में घटित घटना से एक बार फिर उजागार हुई.इस घटना से साफ़ हो गया कि ये औद्यागिक आस्थान और इनमे लगी फैक्ट्रियां मजदूरों के अधिकारों की कब्रगाह है.ये मालिक,पूजीपतियों और सरकारी पुलिस के षड्यंत्रकारी गठजोड़ की ऐशगाह है.सरकार कांग्रेस की हो या भाजपा की,सिडकुल का यह सत्य नहीं बदलता.
    ताजातरीन घटना यह है कि ट्रेड यूनियन-एक्टू(ए.आई.सी.सी.टी.यू.-आल इंडिया सेन्ट्रल काउन्सिल ऑफ ट्रेड यूनियंस) के प्रदेश महामंत्री और भाकपा(माले) के राज्य कमेटी सदस्य कामरेड के.के.बोरा की अगुवाई में रुद्रपुर(उधमसिंह नगर) की मिंडा ऑटोमोबाइल्स नामक कंपनी में पिछले तीन महीने से मजदूरों के उत्पीडन के खिलाफ आन्दोलन चल रहा है.इसी आन्दोलन के क्रम में कल श्रम कार्यालय(लेबर ऑफिस) जाते समय पुलिस ने कामरेड के.के.बोरा को उठाने की कोशिश की.वारंट दिखाने को कहने पर पुलिसकर्मी जबरदस्ती करने की कोशिश करने लगे.लेकिन मजदूरों के प्रतिरोध के सामने पुलिस कर्मियों को हार माननी पडी.आज टेम्पो से रुद्रपुर जाते समय,स्कार्पियो गाडी में आये नकाबपोश बदमाशों ने लाठी-डंडों से कामरेड के.के.बोरा पर हमला कर दिया.पहले दिन पुलिस के जरिये बिना किसी कारण उठाने की कोशिश और फिर अगले ही दिन गुंडों द्वारा हमला दर्शाता है कि मजदूर आन्दोलन के खिलाफ पूंजीपति,पुलिस और गुंडे सब एकजुट हो गए हैं.जब पुलिसिया रास्ता नहीं चला तो गुंडों से हमले का रास्ता अपनाया गया.इसका अर्थ यह है कि गुंडे बिना वर्दी के हों या बावर्दी,वे मालिकों की सेवा में मुस्तैद हैं,किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं.जिस तरह से बीच रास्ते में दिन-दहाड़े टेम्पो रोक कर कामरेड के.के.बोरा पर हमला किया गया,उससे साफ़ है कि हमला एक पूर्वनियोजित षड्यंत्र था.
    कामरेड के.के.बोरा सिडकुल में मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले नेता हैं.इससे पहले भी मजदूरों के हक़ में खड़े होने के लिए उनपर फर्जी मुक़दमे लादे गए.लेकिन मालिकों और उनकी लठैत की भूमिका में उतरी सरकार को जब लगा कि फर्जी मुक़दमे से कामरेड के.के.बोरा से पार पाना मुमकिन नहीं है तो भाड़े के गुंडों द्वारा हमला करवाने का रास्ता चुना गया. मजदूर अधिकारों के लिए निरंतर संघर्षरत एक मजदूर नेता पर इस तरह का कातिलाना हमला,इस बात की तस्दीक करता है कि उत्तराखंड में पूंजीपति,पुलिस और गुंडों को सरकारी संरक्षण हासिल है.इसलिए वे बेख़ौफ़ मजदूरों के अधिकारों के हक़ में खड़े होने वालों पर हमला बोल रहे हैं. अभी कुछ दिनों पहले हरीश रावत मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के बाद लोकतंत्र की दुहाई देते घूम रहे थे.आज मुख्यमंत्री जवाब दें कि मजदूर नेताओं पर हमला और मजदूरों का उत्पीडन किस लोकतंत्र का प्रदर्शन है?
    अगर मेहनतकशों के हक़ में खड़े होने से रावत जी, आपका स्वयम्भू लोकतंत्र हमलावर हो उठता है तो आपके इस गुंडातंत्र को मेहनतकशों के हक़ के लिए लड़ने वाले नेस्तानाबूद करके ही दम लेंगे.आप पुलिस भेजो,गुंडों से हमले करवाओ,क्रांतिकारी लाल झंडे के वारिस डिगने वाले नहीं हैं.



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    Cyclone or no cyclone,it is lotus tsunami all the way!

    Thus, we opt for extreme Hinudtva! Survive as Bajrangi!

    Just because Free Market kills the State,Didi and Amma have to become the resorts where the deprived seek welfare as survival kit!

    The masses subjected to ethnic cleansing has no option as no Politics seems relevant in this valley of death!

    Just remember the sixties and sevenities in recent history!Freedom fighters achieved freedom but the masses missed the liberation as equality and justice denied.In sixties it was the explosion of disillusionment. Nehru succumbed under pressure and Mrs Indira Gandhi emerged as a phoenix from the ashes to face the seveties and earier eighties with her magic wand of socialism to make India a welfare state meaning to maintain cash flow with socialist pattern of development to make herself the Saviour.

    As we,the empowered and enlightened people failed the Republic and its democracy,failed the mission of freedom fighters to make equality and justice the ultimate destination,we have no right to blame the dying masses for their attempt to survive at this critical juncture where most of us attach ourselves to the ruling hegemony!

    Climate change becomes the game changer and we have not any escape route whatsoever!

    10 most vulnerable countries worldwide are in the Asia Pacific region.India tops the chart with nearly 40 million people in the country projected to be at risk from rising sea levels, followed by more than 25 million in Bangladesh, over 20 million in China and nearly 15 million in the Philippines.

    As in the Himalayan state Himachal Pradesh inflicted with extreme corruption,the Politics is all about cash liquidity,it is going to be the trend in rest of the None State Indian State nation.


    Palash Biswas


    Thus, we opt for extreme Hinudtva! Survive as Bajrangi!

    As Indian Express reports this morning and just imagine the boosting of Hindutva agenda!


    The weather department has issued warning of heavy rains along coastal Andhra Pradesh and Odisha as cyclone Roanu is expected to move towards the Indian coastal region after wreaking havoc in Sri Lanka.


    Cyclone or no cyclone,it is lotus tsunami all the way!

    Coming to avenge Babri, Kashmir, Gujarat, Muzaffarnagar: ISIS video

    Coming to avenge Babri, Kashmir, Gujarat, Muzaffarnagar: ISIS video

    The video, released online early on Friday, is the first propaganda the Islamic State has produced with content focused on India and South Asia. Video features Thane resident Fahad Sheikh, slams Indian Muslim leaders.

    In photos: Cyclone Roanu's fearsome journey off the coast of India

    After causing devastation in Sri Lanka, the storm is racing towards Bangladesh.

    In photos: Cyclone Roanu's fearsome journey off the coast of IndiaImage credit:  ANI

    Cyclone or no cyclone,it is lotus tsunami all the way!

    As in the Himalayan state Himachal Pradesh inflicted with extreme corruption,the Politics is all about cash liquidity,it is going to be the trend in rest of the None State Indian State nation.


    Free Market kills the State and converts it into a None State to be ruled with Absolute Power.Purchasing capacity is the citizenship of this Free Market State.Haves would always do everything to sustain the ruling hegemony and Not Haves would have no choice but to bank on their vote for the saviour who might bail out them as ethnic cleansing is the name of the economy and the Nation becomes a foreign territory, a peripherry of the super colonial Global order.On the other hand,the ruling calss must do anything for its survival!As the Ruling Hegemony has to survive with its global strategic alliance lest it would end in a revolution.Thus,the hegemony opted for extreme Hindutva to enslave the masses so that they might not dream for freedom.No More liberation.End of history.


    Just remember the sixties and sevenities in recent history!Freedom fighters achieved freedom but the masses missed the liberation as equality and justice denied.In sixties it was the explosion of disillusionment.Nehru succumbed under pressure and Mrs Indira Gandhi emerged as a phoenix from the ashes to face the seveties and earier eighties with her magic wand of socialism to make India a welfare state meaning to maintain cash flow with socialist pattern of development to make herself the Saviour.


    Didi and Amma,being woman opted for the emotional iconic freebee system under free market to replicate Mrs Gandhi making themselves as much saviour as she was.


    It is the ultimate chemistry to make onself relevant in a None Sate Free Market that the masses should not care for cash inflow and the rural India under unprecedented agrarian crisis inflicted with calamities, displaced for indiscriminate urbanisation,unemployed in a NONE Production system has no survival kit but to vote for the clan of Didi and Amma.It has to be the trend as politics is funded by corporate money and run with corporate control in corporate interest and media corporate!


    The masses subjected to ethnic cleansing has no option as no Politics seems relevant in this valley of death!


    The intelligentsia has not to fight for day to day survival and hence it may not have the slightest idea about the phenomenon of public psyche in a free market where State exists  no more.The masses have no choice to look for asaviour.Not only the masses,a section of the elite civil society and those responsible for creating public opinion and witness unprecedentd violence and cash crunch all the way,may opt for a better life to cling the last string of musicality in life.

    As we,the empowered and enlightened people failed the Republic and its dmocracy,failed the mission of freedom fighters to make equality and justice the ultimate destination,we have no right to blame the dying masses for their attempt to survive at this critical juncture where most of us attach ourselves to the ruling hegemony!


    After causing heavy destruction in Sri Lanka, the cyclonic storm Roanu has moved north-east and currently lies centred off the coast of Andhra Pradesh, about 80 km south southeast of Machilipatnam in Krishna district.

    The weather system, currently moving at 25 km per hour, is expected to intensify into a severe cyclonic storm by Friday night.

    According to Skymet, the cyclone will move along and off the north Andhra and Odisha coasts, bringing heavy rains, before making "a landfall over Bangladesh between evening of May 21 and early morning of May 22".

    Fishermen in Odisha, Andhra and Tamil Nadu coasts have been warned not to venture into the sea. Over the next 12 hours, wind speeds are predicted to reach 90-110 kmph in north Andhra and 60-80 kmph in Odisha.

    Cyclone Roanu had brought torrential rains in Sri Lanka earlier this week, affecting thousands of people. The rainfall resulted in landslides, burying scores of people, and on Friday soldiers were still searching for survivorsnorth of Colombo.

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    China Xinhua News

    ‎@XHNews

    Death toll from flash floods, landslides in Sri Lanka climbs to 63; nearly half a million affected

    10:42 AM - 20 May 2016

    As Roanu moved towards Andhra Pradesh from Sri Lanka, Kerala's capital Thiruvanathapuram recorded 129 mm rain in 24 hours, the highest in a decade.

    19 May

    Manish ‎@journomanish

    When it rains, Vizag becomes so much more beautiful. :)

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    Manish ‎@journomanish

    #CycloneROANU#Vizag (Pix: N Kanaka, TOI) pic.twitter.com/pL1KIy9ji4

    7:49 PM - 19 May 2016

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    In Hyderabad, the Disaster Management Department hasopened a control room to monitor the situation as torrential rains batter coastal parts of the state. Along with heavy rainfall, isolated extremely heavy rainfall might occur over coastal Andhra Pradesh in next 24 hours.

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    chitralekha ‎@chitralekhamag

    #CycloneROANU#andhrapradeshના વિઝાગથી 60 કિમી ઉત્તર-પૂર્વ તરફ ફંટાયુ, ભારે વરસાદની આગાહી

    1:38 PM - 20 May 2016

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    NDMA India

    ‎@ndmaindia

    Wind speed reaching 90-100 kmph gusting to 110 kmph is likely to prevail along & off N.coastal #AP during next 12hrs

    1:11 PM - 20 May 2016

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    RAJEEV LOCHAN NAYAK ‎@rajeevnayak1985

    #CycloneROANU hit #Odisha inter areas, Jai Jagannath 🙏. @htTweets@timesofindia@otvnews@ANI_news

    8:41 AM - 20 May 2016

    Areas that are most likely to be affected include Visakhapatnam, Machilipatnam, Kalingapatnam and Kakinada.

    Rains are expected to intensify over Kolkata as the system comes closer to West Bengal coast. The city is expected to record heavy to very heavy rains and thundershowers.

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    LUCKY BRO ‎@LUCKYBROtweet

    #CycloneROANU#Odisha The alert has been issued in 12 districts in coastal, southern and northern regions.

    10:34 AM - 20 May 2016

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    ANI

    ‎@ANI_news

    Heavy rainfall in Bhubaneswar (Odisha), temperature dips.

    11:08 AM - 20 May 2016

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    Ketan Sheth ‎@ketan72

    #CycloneROANU Puts Andhra, Odisha on High Alert; RAF Team Prepared http://n.mynews.ly/!8M.D3J05

    10:32 AM - 20 May 2016

    Photo published for Cyclone Roanu Puts Andhra, Odisha on High Alert; RAF Team Prepared

    Cyclone Roanu Puts Andhra, Odisha on High Alert; RAF Team Prepared

    The deep depression in the Bay of Bengal converted into a cyclonic storm on 19 May, causing heavy rains in Andhra Pradesh and Odisha. The...

    nr.news-republic.com

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    Eric Holthaus

    ‎@EricHolthaus

    Latest (18Z) HWRF still intensifies TC #Roanu before landfall in Bangladesh on Saturday. pic.twitter.com/ZqgG4WxWaP

    10:23 AM - 20 May 2016

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    Sudarsan Pattnaik

    ‎@sudarsansand

    On #CycloneROANU alert , my appeal " Do not panic ! " One of my SandArt on #cyclone

    8:12 AM - 20 May 2016· Puri, India, भारत

    W


    Climate change becomes the game changer and we have not any escape route whatsoever.As Hindustan Times reports:


    Nearly 40 million Indians will be at risk from rising sea levels by 2050, with people in Mumbai and Kolkata having the maximum exposure to coastal flooding in the future due to rapid urbanisation and economic growth, according to a UN environment report.


    The Global Environmental Outlook (GEO-6): Regional Assessments said that the worst impacts of climate change are projected to occur in the Pacific and South and Southeast Asia.


    It said seven of the 10 most vulnerable countries worldwide are in the Asia Pacific region.India tops the chart with nearly 40 million people in the country projected to be at risk from rising sea levels, followed by more than 25 million in Bangladesh, over 20 million in China and nearly 15 million in the Philippines.

    It said that changes in settlement patterns, urbanisation and socio-economic status in Asia have influenced observed trends in vulnerability and exposure to climate extremes.

    The report said that in many coastal areas, growing urban settlements have also affected the ability of natural coastal systems to respond effectively to extreme climate events, rendering them more vulnerable.

    "Some countries, such as China, India and Thailand, are projected to face increased future exposure to extremes, especially in highly urbanised areas, as a result of rapid urbanisation and economic growth," it said.


    It listed Mumbai and Kolkata in India, Guangzhou and Shanghai in China, Dhaka in Bangladesh, Yangon in Myanmar, Bangkok in Thailand, and Ho Chi Minh City and Hai Phong in Vietnam as projected to have the largest population exposure to coastal flooding in 2070.

    "Many of these cities are already exposed to coastal flooding, but have limited capacity to adapt due to their fixed location," it said.

    The report, published ahead of the UN Environment Assembly taking place in Nairobi next week, said the worst impacts of climate change are projected to occur in the Pacific and South and Southeast Asia.

    In 2011, six of the ten countries most vulnerable to climate change worldwide were in Asia and the Pacific.

    © Provided by Hindustan Times

    The report said livelihoods can be impacted negatively by natural disasters, economic crises and climate change.

    On coastal areas highly exposed to cyclones and typhoons the poor tend to be more exposed to natural disasters because they live on hazardous land.

    Evidence suggests that climate change and climate variability and sea-level rise will exacerbate multi- dimensional poverty in most developing countries.

    By 2050, areas of storm surge zones are expected for Bangladesh, China, India, Indonesia, and the Philippines, with a combined total of over 58 million people at risk.



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    Just remember the sixties and sevenities in recent history!Freedom fighters achieved freedom but the masses missed the liberation as equality and justice denied.In sixties it was the explosion of disillusionment. Nehru succumbed under pressure and Mrs Indira Gandhi emerged as a phoenix from the ashes to face the seveties and earier eighties with her magic wand of socialism to make India a welfare state meaning to maintain cash flow with socialist pattern of development to make herself the Saviour.

    As we,the empowered and enlightened people failed the Republic and its democracy,failed the mission of freedom fighters to make equality and justice the ultimate destination,we have no right to blame the dying masses for their attempt to survive at this critical juncture where most of us attach ourselves to the ruling hegemony!

    Climate change becomes the game changer and we have not any escape route whatsoever!

    10 most vulnerable countries worldwide are in the Asia Pacific region.India tops the chart with nearly 40 million people in the country projected to be at risk from rising sea levels, followed by more than 25 million in Bangladesh, over 20 million in China and nearly 15 million in the Philippines.

    As in the Himalayan state Himachal Pradesh inflicted with extreme corruption,the Politics is all about cash liquidity,it is going to be the trend in rest of the None State Indian State nation.


    Palash Biswas


    Thus, we opt for extreme Hinudtva! Survive as Bajrangi!

    As Indian Express reports this morning and just imagine the boosting of Hindutva agenda!


    The weather department has issued warning of heavy rains along coastal Andhra Pradesh and Odisha as cyclone Roanu is expected to move towards the Indian coastal region after wreaking havoc in Sri Lanka.


    Cyclone or no cyclone,it is lotus tsunami all the way!

    Coming to avenge Babri, Kashmir, Gujarat, Muzaffarnagar: ISIS video

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    The video, released online early on Friday, is the first propaganda the Islamic State has produced with content focused on India and South Asia. Video features Thane resident Fahad Sheikh, slams Indian Muslim leaders.

    In photos: Cyclone Roanu's fearsome journey off the coast of India

    After causing devastation in Sri Lanka, the storm is racing towards Bangladesh.

    In photos: Cyclone Roanu's fearsome journey off the coast of IndiaImage credit:  ANI

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    As in the Himalayan state Himachal Pradesh inflicted with extreme corruption,the Politics is all about cash liquidity,it is going to be the trend in rest of the None State Indian State nation.


    Free Market kills the State and converts it into a None State to be ruled with Absolute Power.Purchasing capacity is the citizenship of this Free Market State.Haves would always do everything to sustain the ruling hegemony and Not Haves would have no choice but to bank on their vote for the saviour who might bail out them as ethnic cleansing is the name of the economy and the Nation becomes a foreign territory, a peripherry of the super colonial Global order.On the other hand,the ruling calss must do anything for its survival!As the Ruling Hegemony has to survive with its global strategic alliance lest it would end in a revolution.Thus,the hegemony opted for extreme Hindutva to enslave the masses so that they might not dream for freedom.No More liberation.End of history.


    Just remember the sixties and sevenities in recent history!Freedom fighters achieved freedom but the masses missed the liberation as equality and justice denied.In sixties it was the explosion of disillusionment.Nehru succumbed under pressure and Mrs Indira Gandhi emerged as a phoenix from the ashes to face the seveties and earier eighties with her magic wand of socialism to make India a welfare state meaning to maintain cash flow with socialist pattern of development to make herself the Saviour.


    Didi and Amma,being woman opted for the emotional iconic freebee system under free market to replicate Mrs Gandhi making themselves as much saviour as she was.


    It is the ultimate chemistry to make onself relevant in a None Sate Free Market that the masses should not care for cash inflow and the rural India under unprecedented agrarian crisis inflicted with calamities, displaced for indiscriminate urbanisation,unemployed in a NONE Production system has no survival kit but to vote for the clan of Didi and Amma.It has to be the trend as politics is funded by corporate money and run with corporate control in corporate interest and media corporate!


    The masses subjected to ethnic cleansing has no option as no Politics seems relevant in this valley of death!


    The intelligentsia has not to fight for day to day survival and hence it may not have the slightest idea about the phenomenon of public psyche in a free market where State exists  no more.The masses have no choice to look for asaviour.Not only the masses,a section of the elite civil society and those responsible for creating public opinion and witness unprecedentd violence and cash crunch all the way,may opt for a better life to cling the last string of musicality in life.

    As we,the empowered and enlightened people failed the Republic and its dmocracy,failed the mission of freedom fighters to make equality and justice the ultimate destination,we have no right to blame the dying masses for their attempt to survive at this critical juncture where most of us attach ourselves to the ruling hegemony!


    After causing heavy destruction in Sri Lanka, the cyclonic storm Roanu has moved north-east and currently lies centred off the coast of Andhra Pradesh, about 80 km south southeast of Machilipatnam in Krishna district.

    The weather system, currently moving at 25 km per hour, is expected to intensify into a severe cyclonic storm by Friday night.

    According to Skymet, the cyclone will move along and off the north Andhra and Odisha coasts, bringing heavy rains, before making "a landfall over Bangladesh between evening of May 21 and early morning of May 22".

    Fishermen in Odisha, Andhra and Tamil Nadu coasts have been warned not to venture into the sea. Over the next 12 hours, wind speeds are predicted to reach 90-110 kmph in north Andhra and 60-80 kmph in Odisha.

    Cyclone Roanu had brought torrential rains in Sri Lanka earlier this week, affecting thousands of people. The rainfall resulted in landslides, burying scores of people, and on Friday soldiers were still searching for survivorsnorth of Colombo.

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    China Xinhua News

    ‎@XHNews

    Death toll from flash floods, landslides in Sri Lanka climbs to 63; nearly half a million affected

    10:42 AM - 20 May 2016

    As Roanu moved towards Andhra Pradesh from Sri Lanka, Kerala's capital Thiruvanathapuram recorded 129 mm rain in 24 hours, the highest in a decade.

    19 May

    Manish ‎@journomanish

    When it rains, Vizag becomes so much more beautiful. :)

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    Manish ‎@journomanish

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    7:49 PM - 19 May 2016

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    chitralekha ‎@chitralekhamag

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    RAJEEV LOCHAN NAYAK ‎@rajeevnayak1985

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    8:41 AM - 20 May 2016

    Areas that are most likely to be affected include Visakhapatnam, Machilipatnam, Kalingapatnam and Kakinada.

    Rains are expected to intensify over Kolkata as the system comes closer to West Bengal coast. The city is expected to record heavy to very heavy rains and thundershowers.

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    LUCKY BRO ‎@LUCKYBROtweet

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    ANI

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    Ketan Sheth ‎@ketan72

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    Eric Holthaus

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    Sudarsan Pattnaik

    ‎@sudarsansand

    On #CycloneROANU alert , my appeal " Do not panic ! " One of my SandArt on #cyclone

    8:12 AM - 20 May 2016· Puri, India, भारत

    W


    Climate change becomes the game changer and we have not any escape route whatsoever.As Hindustan Times reports:


    Nearly 40 million Indians will be at risk from rising sea levels by 2050, with people in Mumbai and Kolkata having the maximum exposure to coastal flooding in the future due to rapid urbanisation and economic growth, according to a UN environment report.


    The Global Environmental Outlook (GEO-6): Regional Assessments said that the worst impacts of climate change are projected to occur in the Pacific and South and Southeast Asia.


    It said seven of the 10 most vulnerable countries worldwide are in the Asia Pacific region.India tops the chart with nearly 40 million people in the country projected to be at risk from rising sea levels, followed by more than 25 million in Bangladesh, over 20 million in China and nearly 15 million in the Philippines.

    It said that changes in settlement patterns, urbanisation and socio-economic status in Asia have influenced observed trends in vulnerability and exposure to climate extremes.

    The report said that in many coastal areas, growing urban settlements have also affected the ability of natural coastal systems to respond effectively to extreme climate events, rendering them more vulnerable.

    "Some countries, such as China, India and Thailand, are projected to face increased future exposure to extremes, especially in highly urbanised areas, as a result of rapid urbanisation and economic growth," it said.


    It listed Mumbai and Kolkata in India, Guangzhou and Shanghai in China, Dhaka in Bangladesh, Yangon in Myanmar, Bangkok in Thailand, and Ho Chi Minh City and Hai Phong in Vietnam as projected to have the largest population exposure to coastal flooding in 2070.

    "Many of these cities are already exposed to coastal flooding, but have limited capacity to adapt due to their fixed location," it said.

    The report, published ahead of the UN Environment Assembly taking place in Nairobi next week, said the worst impacts of climate change are projected to occur in the Pacific and South and Southeast Asia.

    In 2011, six of the ten countries most vulnerable to climate change worldwide were in Asia and the Pacific.

    © Provided by Hindustan Times

    The report said livelihoods can be impacted negatively by natural disasters, economic crises and climate change.

    On coastal areas highly exposed to cyclones and typhoons the poor tend to be more exposed to natural disasters because they live on hazardous land.

    Evidence suggests that climate change and climate variability and sea-level rise will exacerbate multi- dimensional poverty in most developing countries.

    By 2050, areas of storm surge zones are expected for Bangladesh, China, India, Indonesia, and the Philippines, with a combined total of over 58 million people at risk.


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  • 05/21/16--08:45: भीम यात्रा में एक भी ‘आंबेडकरी’ इसके आसपास नहीं देखा गया जबकि इसके एक प्रेरक प्रतीक के रूप में अंबेडकर की प्रभावशाली मौजूदगी वहां थी. सभी उल्लेखनीय प्रगतिशील व्यक्तियों ने गरीब सफाईकर्मियों के संघर्ष के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन स्वयंभू अंबेडकरी ही वो खास लोग थे जो वहां से नदारद थे. आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ आंबेडकर के जश्न के मौके पर दलितों के आंसू और ये भी पढ़ें मौजूदा छात्र संघर्षों पर आनंद तेलतुंबड़े से एक बातचीत An Interview with Anand Teltumbde on Current Student Struggles
  • भीम यात्रा में एक भी 'आंबेडकरी'इसके आसपास नहीं देखा गया जबकि इसके एक प्रेरक प्रतीक के रूप में अंबेडकर की प्रभावशाली मौजूदगी वहां थी. सभी उल्लेखनीय प्रगतिशील व्यक्तियों ने गरीब सफाईकर्मियों के संघर्ष के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन स्वयंभू अंबेडकरी ही वो खास लोग थे जो वहां से नदारद थे. आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ

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    भीम यात्रा में एक भी 'आंबेडकरी'इसके आसपास नहीं देखा गया जबकि इसके एक प्रेरक प्रतीक के रूप में अंबेडकर की प्रभावशाली मौजूदगी वहां थी. सभी उल्लेखनीय प्रगतिशील व्यक्तियों ने गरीब सफाईकर्मियों के संघर्ष के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन स्वयंभू अंबेडकरी ही वो खास लोग थे जो वहां से नदारद थे. आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ. अनुवाद:रेयाज उल हक

    जिस वक्त दुनिया बाबासाहेब आंबेडकर की 125वीं जयंती के धूम-धड़ाके से भरे उत्सव के लिए तैयार हो रही थी, उन्हीं दिनों सफाईकर्मी कहे जाने वाले दलितों का एक तबका राजधानी में जमा हुआ ताकि वो भारत में आजादी के सात दशकों के बाद भी और आंबेडकर के गुजरने के छह दशकों के बाद भी दलितों की बेचैन कर देने वाली हकीकत दिखा सके. भीम यात्रा कहे जाने वाले उनके जुलूस ने 125 दिनों में 35,000 किमी का सफर तय किया था जो असम में डिब्रूगढ़ से शुरू हुआ और करीब 500 जिलों और 30 राज्यों से होते हुए 13 अप्रैल, 2016 को नई दिल्ली में जंतर मंतर पर खत्म हुआ. उन्हें इस अमानवीय काम से मुक्ति दिलाने के संघर्ष की रहनुमाई कर रहे सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) के बैनर तले निकाले गए जुलूस में दर्द भरे तरीके से वे पुकार रहे थे 'हमारी जान मत लो'. ऐसा कहते हुए वे हर साल होने वाली 22000 सफाईकर्मियों की गुमनाम मौतों का हवाला दे रहे थे (आखिरकार भाजपा के सांसद तरुण विजय ने राज्य सभा में अभी पिछले महीने ही इसे कबूल किया है). यह तादाद 1990 से लेकर 17 वर्षों में जम्मू-कश्मीर में हथियारबंद संघर्ष से लड़ते हुए मारे जाने वाले सभी सैनिकों, पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों की सुर्खियों में होने वाली मौतों से 4.5 गुना ज्यादा है! अपने गालों पर बहते हुए आंसुओं के साथ, रुंधे हुए गले से अनेक बच्चों ने इसकी खौफनाक कहानियां सुनाईं कि कैसे उनके परिवारवाले इस नुकसानदेह प्रथा के शिकार होते हैं.

    इसने विरोधाभासों की इस धरती पर एक निहायत ही बड़ा विरोधाभास पेश किया कि जब आंबेडकर को एक महा प्रतीक की हैसियत में उठाया जा रहा था, अवाम के उस हिस्से को अपनी बुनियादी जिंदगी के लिए फरियाद करनी पड़ रही थी, जिसके लिए आंबेडकर जिए और लड़ाई लड़ी.

    बेपनाह दोमुंहापन

    भारत के संविधान ने छुआछूत का अंत कर दिया, लेकिन उन स्थितियों के लिए उसने कुछ नहीं किया जो छुआछूत को पैदा करती थीं. यहां ऐसे लोग थे जो न सिर्फ सवर्ण हिंदुओं के लिए, बल्कि दूसरी दलित जातियों के लिए भी अछूत होने की वजह से छूने से परहेज किया जाता था. इस मामले पर अपने रूढ़िवादी विचारों के बावजूद गांधी ने वाजिब ही भंगी (सफाई के काम से पहचानी जाने वाली जाति) को दलितों के प्रतिनिधि के रूप में पहचाना और इस मुद्दे को उठाने के लिए खुद को एक भंगी के रूप में पेश किया. वे उनके लिए अपने प्यार को जाहिर करने के लिए भंगी कॉलोनी में रहे. इसलिए गांधी के नाम की कसमें खाने वाले राज्य के लिए जरूरी था कि वो इस अमानवीय काम को गैरकानूनी करार दे और इसमें लगे लोगों की बहाली को अपनी प्राथमिकताओं में ऊपर रखे. लेकिन इसकी जगह इसने इस मुद्दे को टाल देना पसंद किया, जिसके लिए इसने समितियों और आयोगों के गठन की अपनी आजमाई हुई तरकीब की मदद ली. इससे पता लगता है इस मुद्दे को लेकर राज्य के सरोकार क्या हैं और इसी के साथ साथ किस तरह ये पूरे 46 बरस इससे निबटने से बचती रही.

    खेल 1949 में ही शुरू हो गया था और अब भी जारी है. तब की बंबई सरकार ने 1949 में वी.एन. बर्वे की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जिसको स्कैवेंजर्स लिविंग कंडिशन्स इन्क्वायरी कमेटी के नाम से जाना जाता था. इसे सफाईकर्मियों की जीवन स्थितियों का अध्ययन और पड़ताल करना था और उनके काम की मौजूदा स्थितियों को बेहतर करने के रास्ते और साधनों के सुझाव देने थे. समिति ने 1952 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी. 1955 में गृह मंत्रालय ने इस समिति की मुख्य सिफारिशों की एक प्रति सभी राज्य सरकारों को यह गुजारिश करते हुए भेजी कि वे इन सिफारिशों को अपनाएं. लेकिन कुछ नहीं हुआ. 1957 में, गृह मंत्रालय ने खुद एन. आर. मल्कानी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की ताकि मैला साफ करने की प्रथा को खत्म करने के लिए एक योजना तैयार की जा सके. समिति ने 1960 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. इसकी सिफारिशों में से एक में यह सुझाव दिया गया था कि विभिन्न सिफारिशों को लागू करने के लिए राज्य और केंद्र सरकार को मिल कर चरणबद्ध योजना बनानी होगी ताकि इस प्रथा को तीसरी पंचवर्षीय योजना के अंदर ही खत्म किया जा सके. यह सुझाव अपनी मौत मर गया और 1965 में सरकार ने सफाईकर्मियों की जजमानी के खात्मे के सवाल की जांच-पड़ताल करने के लिए एक और समिति नियुक्त की. अपनी रिपोर्ट में समिति ने अपनी सिफारिशों में जजमानी के उस ढांचे को खत्म करने को कहा जिसमें नगर निगम से अलग निजी शौचालयों की सफाई सफाईकर्मियों की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलती रहती थी. यह सिफारिश भी ठंडे बस्ते में डाल दी गई. 1968-69 में राष्ट्रीय श्रम आयोग ने सफाईकर्मियों के कामकाज, सेवाओं और जीवन स्थितियों के नियमन के लिए व्यापक कानून बनाने की सिफारिश की. गांधी जन्मशती वर्ष (1969) के दौरान सूखे शौचालयों को फ्लश वाले शौचालयों में बदलने की एक विशेष योजना शुरू की गई लेकिन यह पांचवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान अपने पायलट स्टेज में ही नाकाम रही और इसलिए छठी योजना के दौरान इसे छोड़ दिया गया. 1980 में गृह मंत्रालय ने सूखे शौचालयों को बंद गड्ढों वाले सेनिटरी शौचालयों में बदलने और काम से छुटकारा पाए सफाईकर्मियों और उनके आश्रितों की चुने हुए शहरों में सम्मानजनक पेशों में बहाली की एक योजना शुरू की. 1985 में योजना को गृह मंत्रालय से कल्याण मंत्रालय के हाथों में दे दिया गया. 1991 में योजना आयोगन ने इसे दो हिस्सों में बांट दिया; शहरी विकास और ग्रामीण विकास के मंत्रालयों को सूखे शौचालयों को बदलने का जिम्मा दिया गया और कल्याण मंत्रालय (मई 1999 में इस मंत्रालय का नाम बदल कर सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय कर दिया गया) को सफाईकर्मियों की बहाली का जिम्मेदार बनाया गया. 1992 में कल्याण मंत्रालय ने सफाईकर्मियों और उनके आश्रितों के लिए मुक्ति और पुनर्वास की राष्ट्रीय योजना की शुरुआत की लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ. यह थोड़ा सा ब्योरा ही मैला साफ करने के इस घिनौने मुद्दे पर राज्य के दोमुंहेपन को उजागर करने के लिए काफी है.

    आपराधिक अनदेखी

    जैसा कि देखा जा सकता है, भारत के संविधान के अनुच्छेदों 14, 17, 21 और 23 को मैला साफ करने की प्रथा को रोकने के संदर्भ में लिया जा सकता है. मिसाल के लिए अनुच्छेद 17 को अमल में लाने के लिए लागू की गई नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (पहले इसे अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 के रूप में जाना जाता था) की धाराएं 7 ए और 15 ए सफाईकर्मियों को मुक्ति के प्रावधान मुहैया कराती हैं और जो लोग मैला साफ करने प्रथा को जारी रखे हुए हों, उनके लिए सजा का भी प्रावधान था. इस तरह यह दलील दी जा सकती है कि इम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट, 1993 की जरूरत नहीं थी. इस अधिनियम पर 5 जून, 1993 को राष्ट्रपति की मुहर लगी लेकिन यह भारत के राजपत्र (गजट) में 1997 तक प्रकाशित नहीं हो पाया और 2000 तक किसी भी राज्य ने इसकी घोषणा नहीं की थी. सरकार के लगातार बने हुए नाकारेपन से आक्रोशित एसकेए ने, जिसे सफाईकर्मियों के बच्चों ने 1994 में शुरू किया था, नागरिक समाज के छह दूसरे संगठनों और सफाईकर्मियों के समुदाय के सात व्यक्तियों के साथ मिल कर दिसंबर 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करनी पड़ी, जिसमें दिशानिर्देशों और सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की मांग की गई. एसकेए तो विभिन्न राज्य सरकारों के नकारने वाले रुख का मुकाबला 12 बरसों की लड़ाई के दौरान भारी मात्रा में आंकड़ों के साथ करना पड़ा, जिसके बाद आखिर में उसे 27 मार्च 2014 को सर्वोच्च न्यायालय से एक सहानुभूति से भरा फैसला हासिल हुआ.

    अदालत ने बाकी बातों के अलावा सरकार को इस बात के निर्देश दिए कि 1993 से सफाई (सीवर की सफाई समेत) के दौरान हुई हरेक मौत पर 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए. भीम यात्रा के दौरान 1268 ऐसी मौतें दर्ज की गई थीं, जिसमें से सिर्फ 18 को ही मुआवजा मिला था. एक साल पहले सरकार ने एक और अधिनियम में इजाफा किया, हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 [प्रोहिबिशन ऑफ इम्प्लॉयमेंट एज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देअर रिहैबिलिटेशन एक्ट, 2013]. लेकिन जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया. जहां राज्य सरकारें 1993 अधिनियम की घोषणा के बाद इस प्रथा के वजूद से ही इन्कार करती रही हैं, 2011 की जनगणना में भारत भर में 794,000 मामले पाए गए हैं. इस कानून के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता सरकार के अपने ही विभाग हैं. मिसाल के लिए भारतीय रेल में ऐसे डिब्बे हैं जिनके शौचालयों से मल इसकी पटरियों पर गिरता है, जिसको अनगिनत सफाईकर्मियों द्वारा साफ किया जाता है. प्रधानमंत्री ने आडंबरपूर्ण तरीके से अपने स्वच्छ भारत अभियान के तहत भारत को 2019 तक मैला ढोने वालों से मुक्त करन देने की घोषणा तो की है, और वे भारत में बुलेट ट्रेन नेटवर्क लाने की बातें भी कर रहे हैं, लेकिन वे इसका कोई समय नहीं बता पाए हैं कि रेलवे कब तक अपने मौजूदा शौचालयों को बदल कर उनकी जगह जैव-शौचालय लाएगा.

    यह बेपरवाही क्यों?

    केंद्र सरकार के बयान में उनकी राजनीतिक इच्छा की कमी को साफ देखा जा सकता है, जो उन्होंने 19 अप्रैल को बजाहिर एसकेए की भीम यात्रा के जवाब में जारी किया है कि चूंकि वे राज्यों से आंकड़े नहीं जुटा पाए हैं, इसलिए वे किसी एजेंसी के जरिए देश भर में मैला साफ किए जाने की घटनाओं का सीधा सर्वेक्षण कराएंगे. इसका अंदाजा लगाने के लिए समझदार होना भी जरूरी नहीं है कि यह सर्वेक्षण संघर्षरत सफाई कर्मचारियों को थका देने के लिए सरकार को एक और दशक की तोहफे में दे देगा. लेकिन आखिर एक ऐसी सरकार अपने इस हमेशा से चले आ रहे शर्म के साथ जीना क्यों चाहती है, जो दुनिया भर के मामलों में एक नेतृत्वकारी भूमिका हासिल करने के सपने देख रही है? जवाब बहुत मुश्किल नहीं है. भारत में राजनीतिक इच्छा की बुनियाद में चुनावी गुणा-भाग होता है. सफाईकर्मियों का छोटा सा समुदाय निराशाजनक रूप से बिखरा हुआ है, वे हरेक जगह घेरे में बंद हैं. वे सिर्फ व्यापक समाज से ही नहीं बल्कि दलित समुदाय से भी अलग थलग हैं. अपने आप में यह समुदाय किसी भी राजनीतिक दल के चुनावी हिसाब-किताब के लिहाज से गैर अहम है. शासक वर्गों के लिए मुश्किल सिर्फ एक ही है और वो ये है कि यह एक राष्ट्रीय शर्म की बात है, जैसे कि शुरुआती सुधारकों के लिए छुआछूत हुआ करती थी. छुआछूत की तरह, मैला साफ करने की प्रथा सामंती संस्कृति से बंधी हुई है, जिसको छेड़ने का मतलब बहुसंख्यक समुदाय की नाराजगी को मोल लेना है. चूंकि ये छुआछूत के खात्मे के साथ हो चुका है, यह मैला साफ करने की प्रथा के खात्मे के साथ भी हो सकता है, जो असल में छुआछूत का ही सबसे गंभीर चेहरा है! बेहतर यही है कि उन्हें वक्त के भरोसे रख कर थका दिया जाए और साथ में एक चुनावी झुनझुना भी दे दिया जाए ताकि इस मुद्दे के साथ खेलना मुमकिन रहे. 

    इस तरह जहां इस समस्या पर शासक वर्ग के रुख को समझना आसान है, वहीं मैला साफ करने वाले कर्मचारियों के प्रति दलित आंदोलन की बेपरवाही कहीं ज्यादा उलझन में डालने वाली है. मुख्यधारा के दलित आंदोलन ने कभी भी उतनी गंभीरता से मैला साफ करने के मुद्दे को नहीं उठाया, जितनी गंभीरता की मांग यह करता है. दलित आंदोलन की बुनियादी रणनीति प्रतिनिधित्व की रही है. इसलिए बाबासाहेब आंबेडकर ने राजनीति में आरक्षण को हासिल किया और इसके बाद इसे सार्वजनिक रोजगार में भी लागू किया (क्योंकि रोजगार के लिए शिक्षा पूर्वशर्त है). उन्होंने उम्मीद की थी कि दलित राजनेता दलित जनता के राजनीतिक हितों की हिफाजत करेंगे और नौकरशाही में दाखिल होनेवाले ऊंची शिक्षा पाए दलित उनके लिए एक बचाव की ढाल का काम करेंगे. इस तरह, दलित जनता की भौतिक समस्याओं से सीधे तौर पर नहीं निबटा गया. इसलिए आरक्षण दलित आंदोलन की अकेली चिंता बन गई जिसने मेहनत करनेवाले दलितों से जुड़े मुद्दों से दूरी बना ली. पिछले सात दशकों में दलितों में मध्य वर्ग की जो एक पतली सी परत वजूद में आई है, उसने सचमुच में खुद को दलित जनता से अलग कर लिया है और इसे अपनी एक सनक में तब्दील कर दिया है.

    यह बात आंखें खोल देने वाली थी कि भीम यात्रा में एक भी 'आंबेडकरी'इसके आसपास नहीं देखा गया जबकि इसके एक प्रेरक प्रतीक के रूप में अंबेडकर की प्रभावशाली मौजूदगी वहां थी. सभी उल्लेखनीय प्रगतिशील व्यक्तियों ने गरीब सफाईकर्मियों के संघर्ष के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन स्वयंभू अंबेडकरी ही वो खास लोग थे जो वहां से नदारद थे.

    Posted by Reyaz-ul-haque on 5/08/2016 03:50:00 PM




    जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और चिंतक आनंद तेलतुंबड़े ने यह इंटरव्यू हाल ही में मलयालम साप्ताहिक माध्यमम को दिया था.  अनुवाद: रेयाज उल हक
     

    सवाल: आपने अक्तूबर 2015 के ईपीडब्ल्यू में अपने लेख में इसे सटीक तरीके से दर्ज किया है कि डॉ. बीआर आंबेडकर की जिंदगी के मुख्य मकसद जाति के खात्मे को भुला कर उनके स्मारक खड़े करने के क्या खतरे हैं. हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहिथ वेमुला का हादसा और फिर देश भर में उसके बाद हुई घटनाओं ने बिना किसी संदेह के इसे साबित कर दिया कि जाति का जो खात्मा आंबेडकर के विचारों का मर्म था, वो अभी भी अधूरा सपना बना हुआ है.

    जवाब: सचमुच ऐसा ही है. जबकि आंबेडकर ने साफ साफ जातियों के उन्मूलन को लक्ष्य के रूप में देखा था; उनकी कार्यनीति (टैक्टिक्स) प्रतिनिधित्व पर निर्भर थी. इन दोनों के बीच जो तीखा विरोधाभास है उसे नरम करने के लिए मैं जानबूझ कर इसे 
    कार्यनीति कह रहा हूं. शुरू से ही उन्होंने देखा और शायद उन्हें अपने खुद के अनुभवों से हौसला भी मिला था कि अगर कुछ दलितों को कानून बनानेवाली संस्थाओं (विधायिका) में भेजा गया तो वे दलित जनता के हितों का खयाल रखेंगे. इस नजरिए के साथ, उन्होंने दलितों के लिए उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए संघर्ष किया. यह अलग बात है कि इस जीत को गांधी की ब्लैकमेलिंग की रणनीति ने नाकाम कर दिया, जिसने उन्हें पूना समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर कर दिया. लेकिन इसी पूना समझौते ने जैसे शैक्षणिक संस्थाओं और सार्वजनिक रोजगारों जैसे दूसरे आरक्षणों की राह खोल दी. शुरू शुरू में वे तरजीही नीतियां बने रहे (जिसमें कुछ लोगों को आगे बढ़ाने में तरजीह दी जाती थी) क्योंकि ऐसा माना गया कि आरक्षण को संस्थागत बनाने के लिहाज से उतने दलित नहीं थे. लेकिन जब आंबेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य बने, तो उन्होंने एक सीधा-सा नोट लिखा, जिसे वायसराय ने मंजूर कर लिया और इस तरह 1943 में एक कोटा सिस्टम लागू हुआ. मैं यह दलील दे सकता हूं कि इन दोनों में कोई विराधाभास नहीं था, क्योंकि जातियों को उनके हिंदू कुनबे से अलग कर दिया गया था और अब वे 'अनुसूचित जातियों'की एक प्रशासनिक श्रेणी बन गई थीं. बदकिस्मती से, नतीजा इसी अर्थ में सामने नहीं आया. उपनिवेशवाद के बाद के भारत में, जिन देशी अभिजातों के हाथ में सत्ता की बागडोर आई, उनके पास ब्राह्मणवादी चालाकी और उसके भीतर औपनिवेशिक मालिकों से सीखी गई तरकीबें थीं और वे आसानी से इस बात को यकीनी बना सके कि संविधान में प्रतिष्ठित जातियां और धर्म (एक दूसरा कारक) अवाम को बांटने का एक हथियार बने रहें. जातियों पर आधारित आरक्षण जातियों के उन्मूलन का विरोधाभासी बन गया, क्योंकि इसने ऊपर जाने की उम्मीद कर रहे दलितों के एक तबके में निहित स्वार्थ विकसित कर दिए, और फिर यह अवाम के लिए एक आदर्श (रोल मॉडल) बन गया. इसमें मदद किया चुनाव की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट की व्यवस्था ने, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को प्रतिनिधि चुन लिया जाता है. यह असल में भारत जैसे एक देश के लिए सबसे प्रतिकूल व्यवस्था है, जो निराशाजनक रूप से जातियों, समुदायों, भाषाओं, जातीयताओं वगैरह में बंटा हुआ था और यहां इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक शासन के एक औजार के रूप में अपनाया गया. इन दोनों का मेल जातियों के खात्मे के खिलाफ एक खतरनाक मोर्चाबंदी बन गया.

    हैदराबाद विश्वविद्यालय में हुई घटनाओं और रोहिथ की बदकिस्मत खुदकुशी ने शासक वर्गों के रवैए को साफ-साफ उजागर किया है, जो दलितों से पिछले किसी भी समय के मुकाबले सबसे ज्यादा प्यार दिखा रहे हैं. और जब वे यह सब कर रहे हैं और सब कुछ को दांव पर लगा कर आंबेडकर को एक प्रतीक के रूप में स्थापित कर रहे हैं, वहीं वे रेडिकल दलित नजरिए के उभरने को बर्दाश्त नहीं करेंगे. वो उन्हें उग्रवादी, राष्ट्र-विरोधी वगैरह कह कर बदनाम करेंगे, और यह इसके लिए काफी है कि दलित उन्हें नकार दें. दलित जनता ने, राज्य के छिपे हुए समर्थन से अपने मध्य वर्ग के असर में आंबेडकर का सरलीकरण कर दिया है. इस सरलीकृत आंबेडकर की एक धारणा यह है कि वे किसी भी तरह के उग्रवाद और रेडिकलिज्म के खिलाफ थे. इस धारणा के साथ वे आसानी से उन दलित नौजवानों को खारिज कर देंगे, जो रेडिकल आवाजें उठाते हैं. रोहिथ की मौत ने असल में भावनाओं को झकझोरा, लेकिन वो अभी भी दलितों में अपना रेडिकल संदेश नहीं जगा पाया जो जातियों के खात्मे की बात करता है. सभी छात्र संगठनों से मिले भारी समर्थन के बावजूद, जिसने एक वक्त पर एबीवीपी को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया था, इसको रेडिकल संभावनाओं के बिना बस पहचान (आइडेंटिटी) के आधार पर ही उठाया जा रहा है.

    सवाल: रोहिथ वेमुला के हादसे और जेएनयू में संघर्ष ने कम से कम कैंपसों में वामपंथ और आंबेडकरी आंदोलनों के बीच गठबंधन की संभावनाओं को पेश किया है. क्या आप सोचते हैं कि दोनों धाराओं के बीच बनी इस नई नई करीबी को भाजपा और संघ परिवार की सांप्रदायिकता को कारगर तरीके से चुनौती देने और उसका मुकाबला करने के लिए एक संगठित शक्ल दी जा सकती है.

    जवाब: बेशक, मैं सोचता हूं कि हमारे कैंपसों के नौजवान ही वो अकेली ताकत हो सकते हैं जो उत्पीड़ित अवाम की राजनीति की विचारधारात्मक गड़बड़ियों को साफ कर सकते हैं. हमारे कैंपसों से आने वाले संकेत खासे हौसला बढ़ाने वाले हैं. हैदराबाद विवि का मामला भाजपा की रणनीति का हिस्सा था कि राष्ट्रवाद-विरोध, उग्रवाद वगैरह के हौवे को खड़ा करके छात्रों को दो अलग अलग खेमों में बांट दिया जाए. उन्होंने हैदराबाद विवि को चुना क्योंकि यह दलित छात्रों की रेडिकल आवाजों का केंद्र बन गया था. अगर वो यहां कामयाब रहे तो उनके छात्र संगठन के लिए दूसरे कैंपसों में और खास कर दलित छात्रों के बीच जगह बनाना बहुत आसान हो जाएगा. लेकिन उनकी बदकिस्मती से, रोहिथ की बदकिस्मत मौत ने पूरे मामले को पलट दिया. फिर सावधानी बरतते हुए उन्होंने जेएनयू को चुना और उन्होंने ऐसा ही मामला वहां गढ़ा, लेकिन इससे दलित पहलू को बाहर रखा. वहां यह सिर्फ राष्ट्रवाद-विरोध, देशभक्ति वगैरह का मामला था. लेकिन इसने वहां कन्हैया पैदा कर दिया. जेएनयू छात्रों ने जो सबसे अच्छी बात की, वो ये थी कि उन्होंने इसे रोहिथ के संघर्ष के साथ जोड़ दिया. इसने विचारधारात्मक बंटवारों (मैं इसे गड़बड़झाला कहूंगा) को दबा दिया और संघर्ष को उन सवालों पर टिकाया, जिनका सामना आज जनता कर रही है. ऐसा करने के लिए मैं कन्हैया को पूरे अंक दूंगा क्योंकि मैं सोचता हूं कि जनसंघर्षों का आज यही तरीका होना चाहिए. मार्क्स और आंबेडकर में से कोई भी (किसी और को तो छोड़ ही दीजिए) आपको इन शासक वर्गों से लड़ने के सारे साधन नहीं दे सकता है, जिनका जानकारियों और आधुनिक तकनीक से लैस राज्य 
    अभूतपूर्व ढंग से ताकतवर है. हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, उसे न तो मार्क्स ही पहचान पाएंगे और न आंबेडकर और इसलिए हमें अपने संघर्षों के लिए अपनी रणनीतियां खुद बनानी होंगी. मार्क्स, आंबेडकर और उनके जैसे अनेक महान लोग हमें राह दिखा सकते हैं, हमें प्रेरणा दे सकते हैं लेकिन हमें अपनी लड़ाइयों के लिए बने बनाए औजार और साज-सामान नहीं मुहैया करा सकते. 

    इस प्रक्रिया में मुश्किलें आ सकती हैं. मिसाल के लिए, जब हैदराबाद विवि में सभी छात्र संगठन एक साथ आए, तो मैंने वहां छात्रों के कुछ नेतृत्वकारी लोगों को सलाह दी थी कि एबीवीपी को अलग करके इस एकता को एक संगठनात्मक शक्ल दें. यह हिंदुत्व या सांप्रदायिकता के खिलाफ मोर्चा या ऐसा ही कोई नाम हो सकता था. यह बड़ी आसानी से हो सकता था, जब हैदराबाद विवि में लोहा गर्म था और फिर उसको आसानी से दूसरी जगह अपनाया जा सकता था. लेकिन बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया. मैंने अपने तरीके से इसमें कोशिश की, लेकिन वह कारगर नहीं रही. इसकी जगह पर 'जस्टिस टू रोहिथ'के लिए बनाई गईं ज्वाइंट एक्शन कमेटियां धीरे धीरे और भीतर ही भीतर पहचान (आइडेंटिटी) की पुरानी लीक पर चलने लगीं जिन्होंने प्रतिक्रियावादी तत्वों का हौसला बढ़ाया कि वे कन्हैया को भूमिहार के रूप में देखें. मौजूदा हालात में इससे ज्यादा बदकिस्मत बात कुछ नहीं हो सकती है. लेकिन अभी भी मुझे इसका भरोसा है कि छात्र इन मुश्किलों को पार कर लेंगे. इस राह में अनेक और बाधाएं हो सकती हैं. मिसाल के लिए, शासक वर्ग ने जेएनयू के छात्रों पर कड़ी सजाएं थोप दी हैं, जिसके खिलाफ वे भूख हड़ताल पर हैं. उन्हें इसका अहसास होगा कि आने वाले कल में क्या करना बेहतर होगा. मुझे यकीन है कि वे भाजपा/एबीवीपी की मिली जुली शैतानी साजिशों को हरा देंगे. जहां तक आंबेडकर और मार्क्स के बीच अनोखी एकता की बात है, जेएनयू के छात्र इस मामले में एकदम सही रास्ते पर हैं. उन्होंने जो तरीका अपनाया है, वो मायावतियों और उनके चेलों की जातिवादी दलीलों को अप्रासंगिक बना देगा. मुझे इसको लेकर खासी उम्मीद है कि ये लड़के और लड़कियां वह करेंगे जो अब तक नहीं किया गया है. क्योंकि अगर वे नाकाम रहे, तो भारत के लिए उम्मीद ही खत्म हो जाएगी.


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  • 05/21/16--15:24: अस्सी नब्वे के दशक में संपादक की रीढ़ भी होती थी। पूरे सूबे में आग की तरह भड़के महतोष आंदोलन के सिलसिले में तत्काकालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने एकदम लाचारी में धीरेंद्र मोहन को नहीं,सीधे दैनिक जागरणके प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन को एकबार नहीं दो दो बार फोन मुझे तुरंत हटाने के लिए किया था और दोनों बार उनने मुख्यमंत्री को दो टुक शब्दों में नहीं कह दिया था।जबिक वे मुख्यमंत्री के बेहद करीब थे। पत्रकारिता की नौकरी छोड़ने के बाद एक ऐसे संपादक का शुक्रिया अदा करने और दैनिक जागरण में मेरी हैसियत के बारे में किसी गलतफहमी को खत्म करना मेरी जिम्मेदारी बनती है।यह साफ करना भी जरुरी है कि जनसत्ता ने मुझे आजादी दी है,भले कुछ और न दिया हो।इसके लिए मैं तहे दिल से आभारी हूं। मेरी हैसियत चाहे जो हो जनसत्ता में मुझे इतनी आजादी मिली है कि अपने पुराने साथियों के साथ आगे और पच्चीस साल काम करने का मौका बने तो मैं तैयार हूं बशर्त कि मेरी जनपक्षधरता को आंच न आये।शर्त इकलौती है। अशोक अग्रवाल के सिवाय अमर उजाला के बाकी तमाम लोग मेरे कोलकाता आने से नाराज थे लेकिन अशोक अग्रवाल के रवैये की
  • अस्सी नब्वे के दशक में संपादक की रीढ़ भी होती थी।

    पूरे सूबे में आग की तरह भड़के  महतोष आंदोलन के सिलसिले में तत्काकालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी  ने  एकदम लाचारी में धीरेंद्र मोहन को नहीं,सीधे दैनिक जागरणके प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन को एकबार नहीं दो दो बार फोन मुझे तुरंत हटाने के लिए किया था और दोनों बार उनने मुख्यमंत्री को दो टुक शब्दों में नहीं कह दिया था।जबिक वे मुख्यमंत्री के बेहद करीब थे।


    पत्रकारिता की नौकरी छोड़ने के बाद एक ऐसे संपादक का शुक्रिया अदा करने और दैनिक जागरण में मेरी हैसियत के बारे में किसी गलतफहमी को खत्म करना मेरी जिम्मेदारी बनती है।यह साफ करना भी जरुरी है कि जनसत्ता ने मुझे आजादी दी है,भले कुछ और न दिया हो।इसके लिए मैं तहे दिल से आभारी हूं।



    मेरी हैसियत चाहे जो हो जनसत्ता में मुझे इतनी आजादी मिली है कि अपने पुराने साथियों के साथ आगे और पच्चीस साल काम करने का मौका बने तो मैं तैयार हूं बशर्त कि मेरी जनपक्षधरता को आंच न आये।शर्त इकलौती है।


    अशोक अग्रवाल के सिवाय अमर उजाला के बाकी तमाम लोग मेरे कोलकाता आने से नाराज थे लेकिन अशोक अग्रवाल के रवैये की वजह से और खासकर रामजन्मभूमि आंदोलन के सिलसिले में उनकी विशुध  हिंदू वादी पत्रकारिता की वजह से मैंने उनकी एक नहीं सुनी।वीरेनदा अकेले मेरे इस फैसले के पक्ष में थे बल्कि उनकी बात मानकर ही मैं कोलकाता चला आया।अडे सेंते लोग इसी दौर की कहानियां हैं तो धनबाद की कहानियां ईश्वर की गलती है।


    मैंने पहले ही निवेदन किया है कि मेरा जैसा तुच्छ प्राणी किसी सम्मान पुरस्कार के योग्य नहीं हैं और कृपया मुझे किसी सम्मान और पुरस्कार के लिए विवेचना में न रखें।हमारे साथियों तक शायद यह बात नहीं पहुंची और लगे हाथों मेरे रिटायर करने के मौके पर उनने प्यार की जिद में मेरा सम्मान कर डाला।


    बहरहाल यह अंतिम मौका है।कृपया अपने प्यार और समर्थन को सम्मान या पुरस्कार में बदलने का कोई और प्रयास न करें।मुझे बेवजह लज्जित न करें।


    पलाश विश्वास

    आज बुद्ध पूर्णिमा है और मुझे और सविता जी को यह दिन कोलकाता के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ बिताने का मौका मिला है।


    रात से साइक्लोन की खबर थी और सुबह बूंदाबांदी होने लगी थी।लेकिन शनिवार होने की वजह से पटना से लौटे लेफ्टिनेंट कर्नल सिद्धार्थ बर्वे के न्यौते पर दक्षिण कोलकाता के विजयगढ में आसानी से पहुंचकर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा देखकर बेहद खुशी हुई।


    बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाने के अलावा उन लोगों ने मुझे शाल वगैरह देकर सम्मानित भी किया और इसके लिए लज्जित हूं मैं।


    मैंने पहले ही निवेदन किया है कि मेरा जैसा तुच्छ प्राणी किसी सम्मान पुरस्कार के योग्य नहीं हैं और कृपया मुझे किसी सम्मान और पुरस्कार के लिए विवेचना में न रखें।हमारे साथियों तक शायद यह बात नहीं पहुंची और लगे हाथों मेरे रिटायर करने के मौके पर उनने प्यार की जिद में मेरा सम्मान कर डाला।


    बहरहाल यह अंतिम मौका है।कृपया अपने प्यार और समर्थन को सम्मान या पुरस्कार में बदलने का कोई और प्रयास न करें।मुझे बेवजह लज्जित न करें।


    इस मौके पर हमने आज की परिस्थितियों पर जो कहा ,वह सुबह अंग्रेजी और हिंदी में लिख ही चुका हूं और आगे दोहराने की जरुरत नहीं है।


    मैंने इंडियन एक्सप्रेस समूह की नौकरी से रिटायर भले किया हो,समाज.देश और दुनिया से रिटायर नहीं किया है और न मेरी जनपक्षधरता में कुछ कमी होने वाली है।मैंने वैकल्पिक मीडिया के लिए उन सबसे सहयोग मांगा।सविता जी ने भी कह दिया कि गुजारे के लिए चाहे हमें आलू बेचना पड़े,हम जनपक्षधरता का रास्ता किसी भी कीमत पर छोड़ने वाले नहीं हैं।


    घर लौटकर बहुत थका हुआ हूं लेकिन अपडेट करते हुए आदतन मैंने भड़ास का पेज खोला तो अमर उजाला में हमारे पुरान साथी इंद्रकांत मिश्र का आलेख वहां टंगा पाया।उनने मुझे और मेरे साथ पुराने साथियों को याद किया,मेरे लिए यह बेहद खुशी की बात है।रीता बहुगुणा के बारे में उनने साफ कियाहै कि वे छात्र राजनीति में नहीं थी और पीएसओ की तरफ से कुमुदिनी पति इलाहाबाद विश्वविद्यलय छात्र संघ की उपाध्यक्ष थीं।लगता है कि थोड़ा स्मृतिभ्रम हुआ होगा।मिश्र जी का आभार।यह लंबा चौड़ा संस्मरण मेरे ही संदर्भ में लगाने के लिए यशवंत का भी आभार।


    बाकी उनने मेरी जो भयंकर तारीफें की हैं,मुझे कभी नहीं लगा कि मुझमें सचमुच ये गुण हैं,होते तो यकीनन मैं सब एडीटर पर रिटायर  न करता ।


    कमसकम अमर उजाला जागरण जैसे अखबारों में मेरी जो हैसियत थी,वह बनी रहती।


    इंद्रकांत जी ने पुराने दोस्त के प्यार में कुछ ज्यादा ही हमारी तारीफ कर दी है और यकीन मानें कि इसके लायक मैं नहीं हूं।


    मुझे तुरंत इसका जवाब लिखना इसलिए पड़ रहा है कि यह साफ करना बेहद जरुरी है कि अस्सी नब्वे के दशक में संपादक की रीढ़ भी होती थी।


    मेरी जानकारी में पूरे सूबे में आग की तरह भड़के  महतोष आंदोलन के सिलसिले में तत्काकालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी  ने  एकदम लाचारी में धीरेंद्र मोहन को नहीं,सीधे दैनिक जागरणके प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन को एकबार नहीं दो दो बार फोन मुझे तुरंत हटाने के लिए किया था और दोनों बार उनने मुख्यमंत्री को दो टुक शब्दों में नहीं कह दिया था।जबकि वे मुख्यमंत्री के बेहद करीब थे।यह स्मृति भ्रम का मामला भी नहीं है।तिवारी जी और महतोष मोड़ के बारे में दिल्ली यूपी वालों को लबकुछ मालूम है।मरे कहानी सागोरी मंडल जिंदा है,लोगों ने पढ़ी भी होगी।


    पत्रकारिता की नौकरी छोड़ने के बाद एक ऐसे संपादक का शुक्रिया अदा करने और दैनिक जागरम में मेरी हैसियत के बारे में किसी गलतफहमी को खत्म करना मेरी जिम्मेदारी बनती है।यह साफ करना भी जरुरी है कि जनसत्ता ने मुझे आजादी दी है,भले कुछ और न दिया हो।इस आजादी के लिए मैं तहे दिल से आभारी हूं।


    उसीतरह मेरी हैसियत चाहे जो हो जनसत्ता में मुझे आजादी मिली है तो अपने पुराने साथियों के साथ आगे और पच्चीस साल काम करने का मौका बने तो मैं तैयार हूं बशर्त कि मेरी जनपक्षधरता को आंच न आये।शर्त इकलौती है।


    अगर ध्यान से देखा जाये तो जनसत्ता का माहौल दूसरे हिंदी अखबारों में माननीय प्रभाष जोशी से लेकर ओम थानवी तक काफी लोकतांत्रिक रहा है।एकदम अलग।


    माननीय मुकेश भारद्वाज नये आये हैं और दूसरे किस्म के प्रयोग कर रहे हैं और उन्हें मैं कायदे से जानने से पहले रिटायर कर चुका हूं तो उनसे मेरी कोई शिकायत नहीं है। आगे उनके कामकाज की समीक्षा करने की कभी जरुरत हुई तो करुंगा।अभी नहीं।


    जनसत्ता में जैसे प्रभाष जोशी लिखा करते थे या जैसे बेबाक बोल नये संपादक मुकेशजी लिख रहे हैं,उनके अलावा बाकी संपादकीय में से किसी के लिखने का रिवाज नहीं है।संवाददाताओं को ही अखबार के लिए लिखना होता है।जाहिर है कि लेखन को लेकर कोई टकराव कभी नहीं रहा है।मैं तो ब्लागिंग ही करता रहा हूं।वैसे भी मैंने एक पंक्ति भी बिना मकसद कभी लिखा नहीं है और न आगे लिखना है।


    बाकी अखबारों की तुलना में जनसत्ता के पत्रकारों पर अब तक कोई बंदिश नहीं है और न गतिविधिोयों पर अंकुश रहा है।बहरहाल मैंने अमर उजाला छोड़ने के बाद फिर अखबार के लिए नहीं लिखा है लेकिन मुझे अपने हिसाब से लिखने पढ़ने की आजादी मिलती रही है और मेरी जनपक्षधरता पर  अंकुश भी नहीं रहा है।मेरे लिए यह सबसे बड़ी बात है जो मैं जनसत्ता में पच्चीस साल तक टिका रहा और ऐसा टकराव नहीं हुआ कि मुजे नौकरी छोड़नी पड़ जाये।जनसत्ता के तमाम संपादकों का आभारी हूं इसीलिए।


    माननीय प्रभाष जोशी से  लेकर माननीय ओम थानवी से मेरे मतभेद जरुर रहे हैें और मैंने उनके खिलाफ भी खूब उन्हींके कार्यकाल में लिखा है,नौकरी करते हुए लिखा लेकिन मुझे किसी ने रोका टोका नहीं है।इस आजादी की कीमत कम नहीं है।


    जब उम्र कम थी तो सही है कि संपादक बनने की महत्वाकांक्षा मेरी भी थी लेकिन संपादक बनने के बजाय मैंने हर कीमत पर जनपक्षधरता का विकल्प चुना जो कारपोरेट मीडिया के माफिक नहीं है।इसका मुझे कोई अफसोस नहीं है।


    मुझे नौकरी से हटाया नहीं गया है और प्रोमोशन वगैरह नीतिगत फैसले हैं और जनसत्ता में यह संपादक का एकाधिकार है।


    बाकी कलकाता में मैंने जिन लोगों के साथ पच्चीस साल बिताये,जैसा अन्यत्र सर्वत्र रहा है,इन सबको मैंने अपना परिवार माना है और किसी से मेरी कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है।


    आगे एक्सप्रेस समूह इजाजत दें तो अपने पुराने साथियों के साथ किसी भी हैसिटत से 25 साल और काम करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है।मैं तो अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, मराठी और गुजराती भाषाओं में भी काम करने को तैयार हूं।


    दूसरी तरफ,अमर उजाला में नौकरी के अलावा दिवंगत वीरेनदा के साथ मिलकर हम दूसरी किस्म की पत्रकारिता भी करते थे और अखबार से बाहर हमारी इन गतिविधियों में दिवंगत सुनील साह की तरह इंद्रकांत मिश्र जी का भी सहयोग रहता था।प्रेस से बाहर हम वीरेनदा के साथ राजेश श्रीनेत और दीप अग्रवाल को लेकर दसरी किस्म की पत्रकारिता भी कर रहे थे।तब प्रभात  और तसलीम भी हमारे साथ थे।


    दिवंगत सुनील साह और इंद्रकांत मिश्र के साथ अशोक अग्रवाल के सिवाय अमर उजाला के बाकी तमाम लोग मेरे कोलकाता आने से नाराज थे लेकिन अशोक अग्रवाल के रवैये की वजह से और खासकर रामजन्मभूमि आंदोलन के सिलसिले में उनकी विशुध  हिंदू वादी पत्रकारिता की वजह से मैंने उनकी एक नहीं सुनी।वीरेनदा अकेले मेरे इस फैसले के पक्ष में थे बल्कि उनकी बात मानकर ही मैं कोलकाता चला आया।


    अतुल माहेश्वरी के अलावा राजुल माहेश्वरी से भी मेरे निकट संबंध थे तो इसकी वजह कुल इतनी थी कि दोने बरेली कालेज में वीरेनदा के छात्र थे और वीरेनदा और मेरी बात वे मान लेते थे।इसीतरह दैनिक जागरण में भी मानीय दिवंगत प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन जी से मेरे बहुत अच्छे संबंध थे।


    1984 से लेकर 1990 तक दैनिक जागरण में मेरठ में दर्जनों नियुक्तियां करने के अलावा प्रशिक्षु पत्रकारों को प्रशिक्षित करने का जिम्मा बी उनने मुझ पर छोड़ा था।मैं कानपुर में हुई मुलाकात के बाद उनके मौखिक निर्देश के तहत मेरठ पहुचा तो बिना लिखित नियुक्तिपत्र के धीरेंद्र मोहन और तब वहां मेरठ संस्करण के प्रभारी संपादक भगवत शरण ने मुझे ज्वाइन करने की इजाजत नहीं दी थी।


    नरेंद्र मोहन जी कानपुर से आये तो उनने मुझे जागरण में लगा दिया।जैसा कहा था ,उसी मुताबिक।जबकि माननीय प्रभाष जी ने इसके उलट मुझे बुलाकर छह महीने बाद उपसंपादक का लेटर थमा दिया।


    इस नजरिये से नरेंद्र मोहन भी मेरे लिए जोशी जी से बड़े हैं।


    दरअसल नरेंद्र मोहन जी को ही तत्कालीन कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने जागरण से निकालने के लिए दो दो बार फोन किया था।


    वैसे तो नरेंद्र मोहन जी तिवारी की हर बात मानते थे और उनकी इज्जत भी खूब करते थे लेकिन मेरठ में नरेंद्र मोहन ने मुझे हर किस्म की आजादी दी हुई थी और मेरे हर कदम का वे समर्तन करते थे।


    नरेंद्र मोहन ने  दोनों बार तिवारी जी को सीधे मना कर दिया।इस प्रकरण में धीरेंद्र मोहन जी की भूमिका मुझे नहीं मालूम है लेकिन अमर उजाला और जागरण के पत्रकारों को मालूम था कि हर कीमत पर तिवारी तब मुझे जागरण से हटाने के लिए तुले हुए थे क्योंकि तब उनके खिलाफ महतोष मोड़ सामूहिक बलात्कार कांड के खिलाफ जो आंदोलन तेज होकर उनकी कुर्सी डांवाडोल कर रहा था,उस आंदोलन के पीछे वे मेरा ही हाथ मानते रहे थे और उस आंदोलन के पीछे मैंने उनके खास दोस्त अपने पिता की परवाह भी नहीं की।यह मामला विशुद्ध पत्रकारिता का न था।


    उस आंदोलन में मेरी भूमिका  के बारे में उत्तराखंड के सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं, बीबीसी के संपादक राजेश जोशी,दिल्ली के तमाम पत्रकारों और यूपी और उत्तराखंड के राजनेताओं को सबकुछ मालूम था और उस आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था प्रगतिशील महिला संगठन।


    हालत यह हो गयी कि आंदोलन के समर्थन में हल्दानी और रुद्रपुर में महिलाओं और छात्रो पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पडा़ तो आंदोलन यूपी के हर जिले में चालू हो गया था और नैनीताल में जब महिलाओं ने डीएसबी की प्राध्यापिकाओं की अगुवाई में मुख्यमंत्री का घेराव किया तो तिवारी ने प्राध्यापिकाओं को अलग बुलाकर कुमांयूनी में कहा कि जो कुछ हुआ वह तो तराई में दलित बंगाली शरणार्थियों का मामला है ,आप पहाड़ में आंदोलन क्यों कर रही हो।


    नैनीताल में महिलाओं ने इसके जवाब में मुख्यमंत्री की सार्वजनिक भर्त्सना की और आंदोलन और तेज कर दिय।हम अपनी इन इजाओं और वैणियों को भूल नहीं सकते जिन्होंने मुझे सिखाया कि जात पांत भाषा और मजहब के आर पार इंसनियत का मुल्क बड़ा होता है और नागरिक और मानवाधिकार,जल जंगल जमीन और पर्यावरण के लिए, मेहनतकशों के हक हकूक के लिए बाहैसियत मनुष्य तमाम नागरिकों की गोलंबदी जरुरी है।देश प्रदेश को जोड़े बिना कोई आंदोलन होता नहीं है।


    मेरी इन्हीं इजाओं और वैणियों ने चिपको माता गौरा पंत के नेतृत्व में देश और दुनिया को प्रयावरण का पाठ पढ़ाया तो उन्होंने ही तराई में महतोष आंदोलन के दौरान मेहनतकश दलित शरणार्थियों के हक हकूक के लिए अखंड उत्तर प्रदेश में जनता को गोलबंद किया ।इन्हीं महिलाओं ने फिर अलग राज्य के लिए मुलायम सरकार की पुलिस और गुंडोें से लड़ाई जारी रखी और खटीमा और मजप्परनगर में कुर्बानियां दीं।


    मेरे पिता के के साथ तमाम बंगाली नेता तब महतोष आंदोलने से इसलिए अलग हो गये कि तिवारी के गिरोहबंद लोगों ने गांव गांव घर घर जाकर बंगालियों को यूपी से खदेड़ने की धमकिां देनी शुरु कर दी और वे गहन असुरक्षाबोध के कारण आंदोलन जारी रखने की हालत में न थे और इसी वजह से आंदोलन टूटा भी।


    तिवारी की कुर्सी बच गयी।अपराधियों को सजा भी नहीं हो पायी।जिस वजह से पिता से मेरी बरसों तक बातचीत बंद रही और उनके अंतिम दिनों तक सत्ता के हक में उनकी भूमिका मैं भूला नहीं।उनकी मजबूरी तो मैंने बहुत बाद में महसूस की।शरणार्थी आंदोलन में।अपने लोगों के हक में उनकी लड़ाई की विरासत ढोते हुए।


    मेरा अपराध यह था कि मैं हर कीमत पर आंदोलन का साथ दे रहा था।तिवारी मुझे बचपन से जानते रहे हैं और तराई के अलावा पहाड़ में मेरे जनादार से वे अपरिचित भी न थे।पिताजी आजीवन उनकी मित्रता बनी हुई थी और पिताजी जब कैंसर से मरने लगे तो वे नई दिल्ली से बसंतीपुर आकर उनका हाथ पकड़कर बच्चों की तरह फूट फूटकर रो रोये भी।जाहिर है कि निजी संबंधों से बेपरवाह तिवारी ने सत्ता के लिए यह हरकत की।


    नरेंद्र मोहन ने तब सत्ता की और मुॆक्यमंत्री से निजी संबंधों की परवाह नहीं की और वे बेहिचक मेरे साथ खड़े हुए।नरेंद्र मोहन की मर्जी के खिलाफ धीरेंद्र मोहन जी ने मुझे हटाने के लिए सहमति दी होगी,अगर ऐसा हमारे मित्रों का मानना है तो गलत है।


    धीरेंद्र मोहन जी से हमारी कभी नहीं बनी जैसे अशोक अग्रवाल से मेरी नहीं बनी.असोक जी के भाई अजय अग्रवाल मेरे सबसे बड़े समर्थक थे अमर उजाला में।लेकिन अजय अग्रवाल या अतुलज या राहुल जी की भी कोई खास परवाह नहीं थी अशोक अग्रवाल को।इसी वजह से अमर उजाला से मेरे संबंध कायम नहीं रह सके।


    इसके उलट दैनिक जागरण में नरेंद्र मोहन जी ही सर्वेसर्वा थे और उनके समर्थन के बावजूद मैेंने दैनिक जागरण निजी कारण से छोड़ा।


    कमलेश्वर जी जब नई दिल्ली जागरण के संपादक बने तो उनने मुझे नई दिल्ली के लिए चुन लिया लेकिन धीरेन्द्र मोहन  ने मुझे दिल्ली जाने की इजाजत नहीं दी और इस मामले में नरेंदर मोहन जी ने हस्तक्षेप नहीं किया।


    इसके अलावा धीरेंद्र मोहन ने मेरी बहन के विवाह के मौके पर जागरण से मेरे कर्जे की अर्जी को अंतिम वक्त तक लटकाये रखा तो मैंने सीधे अतुल जी को फोन करके कह दिया कि मेरठ में मैंने अखबार जमाया है तो मेरठ में नहीं,मैं बरेली अमरउजाला ज्वाइन कर रहा हूं।


    मेरे अमर उजाला जाने के फैसेले के बाद ही धीरेंद्र मोहन ने क्रजे की अर्जी मंजूर की।कर्जा मैंने ले लिया लेकिन कर्जा लेने से पहले मैंने धीरेंद्र मोहन से कह दिया कि अब मैं जागरण में रहुंगा नहीं।मुझे जागरण छोड़ने में देरी हुई क्योंकि मंगल जायसवाल छुट्टी पर चले गये और मैं इंचार्ज था।मैंने उन्हें चार्ज सौंपकर ही जागरण छोड़ा और अतुल जी ने मोहलत दे दी।


    दिवंगत नरेंद्र मोहन जी ने जागरण छोड़ने के बाद मेरा नाम लेकर जागरण गये हर शख्स को नौकरी दी तो दिवंगत अतुल जी ने अमर उजाला छोड़ने के बाद भी मेरी हर सिफारिश मानी।राजुल जी को मैंने कभी आजमाया नहीं।इसलिए नरेंद्र मोहन और अतुल माहेश्वरी कमसकम मेरे लिए बेहद खास हैं।बाद के लोगों से रिश्ते अब नहीं हैं।


    मैं रिटायर हुआ हूं और आय के स्रोत बंद होने से निजी समस्याएं मुझे सुलझानी है लेकिन इसके बावजूद जैसे मैं 36 साल की अखबारी पत्रकारिता से पहले छात्र जीवन में लगातार जनपक्षधर पत्रकारिता करता रहा हूं,वह सिलसिला अब भी  टूटेगा नहीं।पत्रकारिता मेरे लिए आजीविका या नौकरी कभी नहीं थी क्योंकि मैंने कभी सरकारी गैरसरकारी दूसरी नौकरी के लिए आवेदन किया ही नहीं है और न मुझे कुछ खो देने या अपनी बेहद छोटी हैसियत या मामूली उपलब्थि के लिए शर्म है।


    पत्रकारिता मेरे लिए मिशन रहा है और आज भी है।

    क्योंकि पत्रकारिता मेरे लिए जनपक्षधरता है आजभी।


    हमारी कालजयी बनने की कोई इच्छा नहीं है ,ज्वलंत मुद्दों को संबोधित करना और सूचनाओं से वंचित उत्पीड़ित जनता को लैस करना बचपन से मेरी आदत रही है और अभिव्यक्ति के लिए जोखिम न उठा सकूं,ऐसा मेरे जीते जी होगा नहीं।


    बेहतर है कि वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर हमारे साथी हमारे साथ खड़े हों,तो यह मेरा सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार होगा।जो भी मुझसे प्यार करते हैं या मेरा समर्थन करते हैं,उनसे निवेदन है कि बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के एजंडे के साथ गौतम बुद्ध के समता और न्याय के धम्म में वे मेरा साथ दें।


    यही बुद्ध पूर्णिमा का मेरा पर्व और मेरा धम्म है और मैेने धर्म परिवर्तन भी नहीं किया है।गौतम बुद्ध और बाबासाहेब के अंतिम लक्ष्य समानता और न्याय है और इसके लिए धम्म और पंचशील का अनुशीलन जरुरी है,धर्म परिवर्तन नहीं।दीक्षा लेने से ही कोई बौद्ध नहीं हो जता और अछूत होने से ही कोई अंबेडकर का अनुयायी नहीं हो जाता।


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  • 05/22/16--10:04: बंगालभर में अराजकता फैलाने वाले बजरंगी ब्रिगेड की महानायिका रूपा गांगुली सत्ता के हमले में बुरी तरह पिट गयी है और सत्ता ने उनकी गाड़ी का भा कबाड़ा बना दिया रूपा गांगुलीके सिर में चोटें आई हैं और उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। गौरतलब है कि मौका शोक का है और मिजाज उग्रतम हिंसक है और यह सत्ता का चेहरा है।गौरतलब है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट अभियान के दौरान बंगाल के तीन पर्वतारोही के लापता होने की खबर है। इनमें एक महिला पर्वतारोही भी हैं। शनिवार की सुबह से ही उनसे बेस कैंप का संपर्क टूट गया। लापता पर्वतारोही के नाम गौतम घोष, परेश नाथ और सुनीता हाजरा बताये गये हैं। माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई में उनके साथ बंगाल के अन्य पर्वतारोही भी साथ थे। बताया गया है कि अचानक तीन पर्वतारोही अपने दल से बिछड़ गये। सूत्रों के अनुसार दुर्गापुर के रहनेवाले परेश नाथ दिव्यांग हैं। बंगाल में नजारे सत्ता के हक में बहार हैं और इंच इंच बदला है। यादवपुर विश्वविद्यालय में इन्हीं रूपा गांगुली की अगुवाई में बजरंगी धावे पर दीदी खामोश हैं तो मध्य कोलकाता में एक सेमिनार में जेएनयू के छात्रनेता के
  • बंगालभर में अराजकता फैलाने वाले बजरंगी ब्रिगेड की महानायिका रूपा गांगुली सत्ता के हमले में बुरी तरह पिट गयी है

    और सत्ता ने उनकी गाड़ी का भा कबाड़ा बना दिया


    रूपा गांगुलीके सिर में चोटें आई हैं और उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है।


    गौरतलब है कि मौका शोक का है और मिजाज उग्रतम हिंसक है और यह सत्ता का चेहरा है।गौरतलब है कि  दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट अभियान के दौरान बंगाल के तीन पर्वतारोही के लापता होने की खबर है। इनमें एक महिला पर्वतारोही भी हैं।


    शनिवार की सुबह से ही उनसे बेस कैंप का संपर्क टूट गया। लापता पर्वतारोही के नाम गौतम घोष, परेश नाथ और सुनीता हाजरा बताये गये हैं। माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई में उनके साथ बंगाल के अन्य पर्वतारोही भी साथ थे। बताया गया है कि अचानक तीन पर्वतारोही अपने दल से बिछड़ गये। सूत्रों के अनुसार दुर्गापुर के रहनेवाले परेश नाथ दिव्यांग हैं।


    बंगाल में नजारे सत्ता के हक में बहार हैं और इंच इंच बदला है।

    यादवपुर विश्वविद्यालय में इन्हीं रूपा गांगुली की अगुवाई में बजरंगी धावे पर दीदी खामोश हैं तो मध्य कोलकाता में एक सेमिनार में जेएनयू के छात्रनेता के आने के मौके पर बजरंगियों ने बाकायदा आम जनता के लिए कर्प्यू जैसे हालात बना दिये।मतदान के दौरान रूपा गांगुली और भाजपा के दूसरे स्टार लाकेट चटर्जी के तेवर बेहद आक्रामक रहे हैं और चुनाव आयोग ने दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया।


    अब बंगाल में हर दसवां वोटर भाजपाई है और संघ परिवार के  तमाम भूमिगत स्लीपिंग सेल सतह पर अपनी हलचले से फिजां केसरिया बना रहे हैं।फिरभी रूपा गांगुली पर सत्ता के इस हमले का मतलब यह समज लीजिये कि बाकी विपक्ष का क्या हाल होने वाला है।बंगाल में नजारे सत्ता के हक में बहार हैं और इंच इंच बदला है।



    केंद्रीय वाहिनी के हटने के बाद बंगाल पुलिस के पुनर्मूशिको दशा है।मतदान के दौरान जिन पुलिस अफसरों ने अमन चैन बहाल रखने में खास भूमिका निभायी वे सारे चुनाव प्रचार के दौरान हिसाब बराबर करने की चेतावनी के तहत हाशिये पर फेंके जा रहे हैं और राजीव कुमार समेत दीदी के तमाम चहेते अफसरान अपनी पुरानी ड्यूटी पर बहाल है।


    इसका कुल नतीजा यह है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद से ही राज्यभर में हिंसा की छिटपुट घटनाएं शुक्रवार रात से लेकर अब तक लगातार जारी है। राज्य में अभी तक दर्जनों जगहों पर विपक्षी पार्टियों पर हिंसा और लूट की खबरें है।


    भूत नाच हुआ नहीं और कांग्रेस वाम गठबंधन को बंगाल में ही शिकस्त देने के लिए संघ परिवार ने पूरी ताकत झोंक दी।कमसकम सौ सीटों में अंतर से ज्यादा भाजपा के वोट हैं और दर्जनों सीटों में यह अंतर दो सौ से लेकर तीन हजार के बीच है।केंद्रीय वाहिनी और चुनाव आयोग की सख्ती से ईवीएम में सिर्फ घासफूल और कमल ही खिले तो समझा जा रहा था कि अब चांदनी रात होगी लेकिन चांद को ही लहूलुहान होना पड़ा है तो समद लें अमावस्या है।



    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप

    हाथे गरम ताजा खबर यही है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार रहीं फिल्मस्टार  रूपा गांगुलीपर रविवार को तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया।इस हमले में रूपा गांगुली के सिर में चोटें आई हैं और उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हालांकि पुलस के मुताबिक अज्ञात लोगों ने हमला किया है ।जाहिर है कि भूतनाच थमा नहीं है।


    भूत नाच हुआ नहीं और कांग्रेस वाम गठबंधन को बंगाल में ही शिकस्त देने के लिए संघ परिवार ने पूरी ताकत झोंक दी।कमसकम सौ सीटों में अंतर से ज्यादा भाजपा के वोट हैं और दर्जनों सीटों में यह अंतर दो सौ से लेकर तीन हजार के बीच है।केंद्रीय वाहिनी और चुनाव आयोग की सख्ती से ईवीएम में सिर्फ घासफूल और कमल ही खिले तो समझा जा रहा था कि अब चांदनी रात होगी लेकिन चांद को ही लहूलुहान होना पड़ा है तो समद लें अमावस्या है।


    आम नजारा यह है कि बंगालविधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजनीतिक हिंसा ने उग्र रूप धारण कर लिया है। जगह-जगह बंपर जीत का जश्न है तो दूसरी ओर विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं। माकपा के दफ्तरों को खासकर निशाना बनाया जा रहा है।


    बहरहाल  पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजा घोषित होने के बावजूद राजनीतिक हिंसा का सिलसिला जारी है। अब तक कार्यकर्ताओं व समर्थकों को ही निशाना बनाया जाता रहा था, लेकिन अब बड़े नेताओं पर भी जानलेवा हमले शुरू हो गए हैं। रविवार को दक्षिण 24 परगना जिले के काकद्वीप इलाके में घायल पार्टी समर्थक का हाल-चाल जान कर कोलकाता लौटने के क्रम में 20 से 25 लोगों द्वारा भाजपा प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष रूपा गांगुलीपर जानलेवा हमला किया गया। हमले में उनका सिर फट गया है। सहयोगियों की मदद से रूपा को पहले काकद्वीप अस्पताल ले जाया गया।


    रूपा गांगुली दक्षि‍णी 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर इलाके में  ईश्वरपुर गांव मेंएक जख्मी भाजपा  कार्यकर्ता को देखने गयी थीं, तभी उनकी कार पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। घायल हालत में गांगुली को अस्पताल में भर्ती किया गया।


    रूपा पर यह हमला उस वक्त हुआ जब वह काकद्वीप में घायल कार्यकर्ता से मिलकर डायमंड हारबर के रास्ते कोलकाता  लौट रही थीं। रिपोर्टों के मुताबिक टीएमसी कार्यकर्ताओं ने शनिवार को कथित रूप से भाजपा कार्यकर्ताओं को पीटा था और घायल कार्यकर्ताओं को काकद्वीप अस्पताल में भर्ती कराया गया था। गांगुली उनसे मिलकर कोलकाता लौट रही थीं तो उनके काफिले को रोका गया और उन पर हमला किया गया।


    गौरतलब है कि मौका शोक का है और मिजाज उगंरतम हिंसक है और यह सत्ता का चेहरा है।


    गौरतलब है कि  दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट अभियान के दौरान बंगाल के तीन पर्वतारोही के लापता होने की खबर है। इनमें एक महिला पर्वतारोही भी हैं।


    शनिवार की सुबह से ही उनसे बेस कैंप का संपर्क टूट गया। लापता पर्वतारोही के नाम गौतम घोष, परेश नाथ और सुनीता हाजरा बताये गये हैं। माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई में उनके साथ बंगाल के अन्य पर्वतारोही भी साथ थे। बताया गया है कि अचानक तीन पर्वतारोही अपने दल से बिछड़ गये। सूत्रों के अनुसार दुर्गापुर के रहनेवाले परेश नाथ दिव्यांग हैं।




    नई  सरकार अभी आयी नहीं है और मुख्य चुनौतियों के मुकाबले के बजाय इंच इंच हिसाब बराबर किया जा रहा है और इस सिलसिले में बंगालभर में अराजकता फैलाने वाले बजरंगी ब्रिगेड की महानायिका रूपा गांगुली सत्ता के हमले में बुरी तरह पिट गयी है और सत्ता ने उनकी गाड़ी का भा कबाड़ा बना दिया है।


    यह वारदात हैरतअंगेज है क्योंकि संघ परिवार ने दीदी की जीत के तुरंत बाद उन्हें राजग में  न्यौता है तो दीदी ने भी संघ परिवार के लिए बंदाल के तमाम दरवाजे और खिड़किया खोल दिये।


    यादवपुर विश्वविद्यालय में इन्हीं रूपा गांगुली की अगुवाई में बजरंगी धावे पर दीदी खामोश हैं तो मध्य कोलकाता में एक सेमिनार में जेएनयू के छात्रनेता के आने के मौके पर बजरंगियों ने बाकायदा आम जनता के लिए कर्प्यू जैसे हालात बना दिये।मतदान के दौरान रूपा गांगुली और भाजपा के दूसरे स्टार लाकेट चटर्जी के तेवर बेहद आक्रामक रहे हैं और चुनाव आयोग ने दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया।


    हुआ यह कि  उत्तर हावड़ा में एक मतदान केंद्र परभाजपाउम्मीदवार रूपा गांगुली ने एक टीएमसी कार्यकर्ता को मतदान केंद्र में धक्का देकर बाहर कर दिया। इस मामले में रूपा गांगुली के खिलाफ केस दर्ज किया गया । उत्तर हावड़ा विधानसभा सीट के कुछ बूथों पर वोटर के बदले तृणमूल कार्यकर्ता द्वारा मतदान करने का आऱोप लगा। इसके बाद भाजपाप्रत्याशी रूपा गांगुली व कांग्रेस-वाममोर्चा के प्रत्याशी संतोष पाठक मौके पर पहुंचे । केंद्रीय बलों ने कार्रवाई शुरू की तो स्थिति सामान्य हुई।


    बहराहल  उत्तर हावड़ा में रूपा गांगुली तीसरे नंबर पर ही रही और उनके वोट काटने से गठबंधन का उम्मीदवार हार गया।


    उन्हीं रूपा गांगुली पर  मोदी दीदी गठबंधन के महौल में हमले का मतलब कुछ अलग ही होना है।जिसे समझना मुश्किल है।


    गौरतलब है कि खड़गपुर से 1969 से लगातार चुनाव जीतने वाले चाचा को हराने वाले प्रदेश भाजपाके संघी अध्यक्ष दिलीप घोष ने जादवपुर विश्वविद्यालय की छात्राओं के बारे में दिए गए अपने विवादित बयान को न्यायोचित ठहराते हुए कहा कि उन्होंने जो कुछ भी कहा वह सही था। दूसरी ओर, घोष के इस बयान की विभिन्न हलकों में कड़ी निंदा हो रही है।


    मालूम हो कि दिलीप घोष ने शनिवार (14 मई) को पत्रकारों के साथ बातचीत में जादवपुर विश्वविद्यालय की छात्राओं को 'बेहया' की संज्ञा दी थी। रविवार( 15 मई) को भी उन्होंने कहा- इस विश्वविद्यालय के छात्र विरोध के नाम पर लड़कियों के अंर्तवस्त्र पहनते हैं, जबकि छात्राएं सैनेटेरी नैपकिंस लेकर नारेबाजी करती हैं।


    वीसी पर कैंपस में कथित देशविरोधी तत्‍वों कोसमर्थन देने का आरोप देने का आरोप लगाते हुए घोष ने मांग की कि उनकी भूमिका की जांच होनी चाहिए। घोष ने कहा, "हम केंद्र सरकार को जाधवपुर यूनिवर्सिटीमें चल रही गतिविधियों के बारे में केंद्र सरकार कोजानकारी देंगे।"बता दें कि शुक्रवार कोकैंपस में हुई मारपीट के दौरान कुछ लड़कियों से कथित तौर पर छेड़छाड़ हुई थी।


    इसके अलावा, बीजेपी नेता और पूर्व एक्‍ट्रेस रूपा गांगुलीभी मौके पर पहुंची थीं। हालांकि, उन्‍होंने कैंपस में घुसने की इजाजत नहीं दी गई थी।उनका मिजाज दीदी उन्नीस हैं तो वे बीस हैं,ऐसा ही है।


    अब बंगाल में हर दसवां वोटर भाजपाई है और संघ परिवार के  तमाम भूमिगत स्लीपिंग सेल सतह पर अपनी हलचले से फिजां केसरिया बना रहे हैं।फिरभी रूपा गांगुली पर सत्ता के इस हमले का मतलब यह समज लीजिये कि बाकी विपक्ष का क्या हाल होने वाला है।बंगाल में नजारे सत्ता के हक में बहार हैं और इंच इंच बदला है।


    रूपा गांगुली संघ परिवार का चमकता दमकता आक्रामक चेहरा है जिस ममता बनर्जी के विकल्प के तौर पर पेश किया जा रहा है और संघ परिवार उनके मेकअप वैन पर बेहिसाब खर्च कर रहा है।हांलाकि यह बताना बेहद मुश्किल है कि उनका फिल्मी अवतार कितना बचा है लेकिन उनका राजीतिक अवतार संग परिवार के लिए केसरिया सुनामी पैदा करने की डीआरपी है।


    केंद्रीय वाहिनी के हटने के बाद बंगाल पुलिस के पुनर्मूशिको दशा है।मतदान के दौरान जिन पुलिस अफसरों ने अमन चैन बहाल रखने में खास भूमिका निभायी वे सारे चुनाव प्रचार के दौरान हिसाब बराबर करने की चेतावनी के तहत हाशिये पर फेंके जा रहे हैं और राजीव कुमार समेत दीदी के तमाम चहेते अफसरान अपनी पुरानी ड्यूटी पर बहाल है।


    मसलन राज्य सचिवालय में पदभार संभालने से पहले ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपना वादा निभा दिया है। अपने वादे के अनुसार, उन्होंने राजीव कुमार को फिर से कोलकाता पुलिस आयुक्त के पद पर नियुक्त कर दिया है। चुनाव आयोग की ओर से तैनात वर्तमान आयुक्त सोमेन मित्रा को यहां से हटा कर एडीजी व आइडीजी, ट्रेनिंग, पश्चिम बंगाल का पदभार सौंपा गया है।

    वहीं, राजीव कुमार जो फिलहाल एडीजी व आइजीपी, एसीबी, पश्चिम बंगाल के पद पर थे, उनके स्थान पर एडीजी व आइडीजी, सीआइडी को इस पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है.।


    गौरतलब है कि राज्य में चुनाव प्रक्रिया के दौरान आयोग नेराजीव कुमार  उनके पद से हटा दिया था। आयोग के इस निर्देश का मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विरोध किया था और वादा किया था कि चुनाव खत्म होते ही वह राजीव कुमार को फिर से काेलकाता पुलिस आयुक्त बनायेंगी।


    वहीं, मतदान के दौरान कोलकाता पुलिस आयुक्त सोमेन मित्रा ने आयोग के निर्देशानुसार शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराने के लिए कड़े इंतजाम किये थे, जिस पर सत्तारूढ़ पार्टी ने पुलिस पर अधिकार से अधिक क्षमता का प्रयोग करने का आरोप लगाया था।उन्हें दीदी ने हटा दिया।



    इसका कुल नतीजा यह है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद से ही राज्यभर में हिंसा की छिटपुट घटनाएं शुक्रवार रात से लेकर अब तक लगातार जारी है। राज्य में अभी तक दर्जनों जगहों पर विपक्षी पार्टियों पर हिंसा और लूट की खबरें है।


    कास बात यह है कि आरोप है कि हिंसा की ज्यादातर घटनाओं में टीएमसी के ही कार्यकर्ता शामिल हैं। जो खासकर वामपंथियों से चुनाव के दौरान पर कहासुनी का सत्ता में आते ही सत्ता समर्थक बलि महाबलि बदला लेने पर उतारु हो गए है।



    दूसरी ओर जनादेश निर्माण को लोकतंत्र महोत्सव के बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुद्दुचेरी में भी नई सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल में सुश्री ममता बनर्जी 27 मई को मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेंगी।


    माहौल अभूतपूर्व हैः


    27 मई को रेड रोड पर होगा भव्य समारोह।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आमंत्रण।

    बांग्लादेश की प्रधानमंत्री, भूटान के प्रधानमंत्री व राजा भी आमंत्रित।

    राज्यों के मुख्यमंत्री और उद्योपतियों को भी न्योता।

    लेफ्ट फ्रंट के किसी भी नेता को नहीं बुलाया।

    अखिलेश, नीतीश, केजरीवाल लालू, जयललिता, जेटली, गडकरी भी रहेंगे उपस्थित।  





    बीते 24 घंटे में बंगाल के जमूरिया, आरामबाग, नारायणगढ़, बारजोरा, नानूर, उत्‍तरी दिनाजपुर में गंगारामपुर, कल्‍याणी और चंदननगर में वामपंथियों के कार्यालयों और स्‍थानीय नेताओं के आवासों को लूटने और हमले की खबर है।  


    कोलकाता में न्‍यू टाउन और श्‍यामपुर, बेलघाटा, टॉलीगंज, गरिया और कामारहाटी से भी ऐसे हमलों की खबरें मिली हैं। सत्‍ताधारी दल के कथित समर्थकों द्वारा मार्क्‍सवादी कम्‍युनिरस्‍ट पार्टी के समर्थकों के मकानों व दुकानों को लूटने की खबर है।


    तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों का खंडन किया है। जमूरिया में एक हमले में माकपा समर्थकों के पांच घर नष्‍ट कर दिये गए और तीन लोग बुरी तरह घायल हो गए।




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    Raja Bahuguna

    23 मई एक्टू के कार्यक्रम की मुख्य मांगें हैं-एक्टू नेता केके बोरा के हमलावरों को गिरफ्तार करो,19 मई को श्रम कार्यालय रूद्रपुर में कामरेड बोरा पर दबंगई करने वाले पुलिस कर्मियों को दंडित करो,सिडकुल में लोकतंत्र की हत्या पर रोक लगा श्रम कानूनों का उल्लंघन बंद करो।



    Kailash Pandey

    23 मई को सभी जगह होगा ऐक्टू के उत्तराखण्ड प्रदेश महामंत्री के. के. बोरा पर हमले का विरोध
    हल्द्वानी में सुबह 10 बजे से अम्बेडकर पार्क में होगा विरोध-प्रदर्शन,,,,सभी साथी समय से पहुँचें


    ऐक्टू के उत्तराखण्ड प्रदेश महामंत्री कामरेड के. के.बोरा पर कल हुए कातिलाना हमले के ख़िलाफ़ गाँधी पार्क, रुद्रपुर में आंदोलन की रणनीति बनाते विभिन्न यूनियनों के प्रतिनिधि। बैठक में 23 मई को ऐक्टू द्वारा राज्यव्यापी विरोध-प्रदर्शन के आवाहन का समर्थन करते हुए पूरी ताकत से जुटने का संकल्प लिया गया। बैठक में हमले के आरोपियों की गिरफ़्तारी तक लड़ाई लड़ने का भी संकल्प लिया गया। के.के. बोरा के बाद मजदूर नेता और ऐक्टू के जिला सचिव कामरेड दिनेश तिवारी को भी आज धमकाने की घटना की तीव्र निंदा करते हुए उनकी ओर से प्राथमिकी दर्ज करने के लिये सिडकुल चौकी में जाने का फैसला लिया गया।



    एक्टू के प्रदेश महामंत्री और भाकपा(माले) की उत्तराखंड राज्य कमेटी के सदस्य कामरेड के.के.बोरा पर कल रुद्रपुर में हुए जानलेवा हमले के दोषियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर श्रीनगर(गढ़वाल) में आइसा द्वारा राज्य सरकार का पुतला दहन किया गया.इस विरोध प्रदर्शन में डी.एस.ओ.के साथी भी शामिल हुए.गौरतलब है कि कामरेड के.के.बोरा पर रुद्रपुर में नकाबपोश बदमाशों ने जानलेवा हमला किया.मिंडा फैक्ट्री के मजदूरों के संघर्ष की कामरेड बोरा अगुवाई कर रहे हैं.परसों पुलिस ने उन्हें बिना वारंट उठाने और मुकदमे के उठाने की कोशिश की और कल गुंडों ने जान से मारने की कोशिश की
    विरोध प्रदर्शन में साथी योगेन्द्र कांडपाल, आइसा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अतुल सती,आइसा की नगर अध्यक्ष शिवानी पाण्डेय,अंकित उछोली सुबोध डंगवाल; मनीष रावत ;चन्द्रप्रकाश रौंतियाल; सुभाष पंवार और डीसओ के मुकेश सेमवाल ; परमेंन्द्र पंवार; देवेन शुक्ला ; दीपक जोशी और वैभव चौहान आदि शामिल थे.






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  • 05/22/16--14:20: यह दरअसल स्त्री के बारे में सुमंत की सतीत्व कौमार्य समर्थक की मनुस्मृति नैतिकता है जो दरअसल पितृसत्ता की जमीन है।इस जमीन पर हम खड़े नहीं हो सकते।संपादक बनने के बावजूद यह मनसिकता किसी पुरोहित या मौलवी की ही हो सकती है। चंदन ने न जाने कोई सुमंत भट्टाचार्य लिखा है जो सरासर गलत है क्योंकि वह सामान्य मनुष्य होता तो बात आयी गयी हुई रहती क्योंकि पितृसत्ता में प्रगतिशील मनुष्यों के उच्च विचारों के मुताबिक भी स्त्री की स्वतंत्रता निषिद्ध है और भद्र समाज नारी वादियों को वेश्या से कम नहीं मानता जैसे तसलिमा नसरीन के साथ आम तौर पर मनुष्यविरोधी सलूक होता है। आम आदमी तो विशुद्ध शास्त्रसम्मत तरीके से वैदिकी कर्मकांड के तहत स्त्री के अस्तित्व को ही खत्म करने की मानसिकता के साथ जनमता है और स्त्री को मनुष्य समझने के लिए पढ़ा लिखा या संपादक होना भी काफी नहीं होता ,उसके लिए समाज,व्यवस्था और राष्ट्र के समूचे ताने बाने के बारे में जानकार होने के साथ सात पितृसत्ता से मुठभेड़ करने की कूवत भी होनी चाहिए। पलाश विश्वास
  • यह दरअसल स्त्री के बारे में सुमंत की सतीत्व कौमार्य समर्थक  की मनुस्मृति नैतिकता है जो दरअसल पितृसत्ता की जमीन है।इस जमीन पर हम खड़े नहीं हो सकते।संपादक बनने के बावजूद यह मनसिकता किसी पुरोहित या मौलवी की ही हो सकती है।

    चंदन ने न जाने कोई सुमंत भट्टाचार्य लिखा है जो सरासर गलत है क्योंकि वह सामान्य मनुष्य होता तो बात आयी गयी हुई रहती क्योंकि पितृसत्ता में प्रगतिशील मनुष्यों के उच्च विचारों के मुताबिक भी  स्त्री की स्वतंत्रता निषिद्ध है और भद्र समाज नारी वादियों को वेश्या से कम नहीं मानता जैसे तसलिमा नसरीन के साथ आम तौर पर मनुष्यविरोधी सलूक होता है।

    आम आदमी तो विशुद्ध शास्त्रसम्मत तरीके से वैदिकी कर्मकांड के तहत स्त्री के अस्तित्व को ही खत्म करने की मानसिकता के साथ जनमता है और स्त्री को मनुष्य समझने के लिए पढ़ा लिखा या संपादक होना भी काफी नहीं होता ,उसके लिए समाज,व्यवस्था और राष्ट्र के समूचे ताने बाने के बारे में जानकार होने के साथ सात पितृसत्ता से मुठभेड़ करने की कूवत भी होनी चाहिए।
    पलाश विश्वास

    Reference:


    का सम्मान करेंगी कविता।
    कविता जी, फ्री सेक्स का प्रदर्शन हम दोनों
    इण्डिया गेट पर करें तो केसा रहेगा ?
    भारत की शालीनता और नैतिकता की
    चुप्पी को कमजोरी समझने की भूल
    कतई ना करें कविता जी।
    अनैतिक को अनैतिक जवाब
    देना हमको भी आता है ।
    ना हो तो आजमा लीजिए।

    सिवाय सनातन और कोई विकल्प नहीं है।
    फ्री सेक्स में हस्तक्षेप क्या किया
    वामपंथी से लेकर दलित और मुल्ले तक
    कोसने के लिए सनातन मूल्यों का ही
    आश्रय ले रहे हेँ।
    ब्रह्मांड हित में सनातन ही सर्वश्रेष्ठ है।
    नैतिक अनैतिक की अंतिम परिभाषा
    सनातन ही दे सका है।
    सुमंत भट्टाचार्य जनसत्ता में हमारे सहकर्मी रहे हैं और प्रभाष जोशी,अमित प्रकाश सिंह और श्याम आचार्य के बहुत प्रिय रहे हैं।

    हम लोगों की कोई हैसियत जनसत्ता में कभी थी नहीं।सुमंत और दिलीप मंडल दोनों एसपी सिंह के शिष्य काबिल पत्रकार है जो कारपोरेटमीडिया में बेहद कामयाब भी हैं।

    सुमंत ने एक अत्यंत भद्र लड़की से विवाह किया,जो हर दृष्टि से प्रबुद्ध है और यह हमारे लिए हमेशा खुशी की बात रही है।

    हमारी किसी भी चुक से उसकी मर्यादा का हनन होता है,तो यह बेदह शर्म और अफसोस की बात है।क्योंकि विचाधाराओं की लड़ाई अलग है और इस लड़ाई में अगर स्त्री का अधिकार मुद्दा बनता है,तो हमारे परिजनों में भी स्त्री हैं और हम जाने अनजाने फिर अपने ही परिजनों के असम्मान की स्थित बना चुके होते हैं।यह हम सबका सबसे बड़ा अपराध है कि सार्वजनिक और निजी जीवन में भी हमारी सारी गालियों में स्त्री का असम्मान है तो हमारे आपसी संवाद में भी जाने अनजाने उस स्त्री की ही मर्यादा दांव पर है।जीत के लिए स्त्री के चेहरे को जिस हद तक चाहे विकृत करने की सत्ता संस्कृति है और इससे शायद ही कोई बचा है।

    मुझे गहरा अफसोस है कि मर्दों के इस विवाद में अगर किसी निरपेक्ष अत्यंत सम्मानीया स्त्री पर आंच आये और वह भी तब हमारी तथाकथित वैचारिक लड़ाई में उसका कोई पक्ष नहीं है।

    सुमंत मेरा भाई है।लेकिन मैंने अपने पिता की सार्वजनिक  आलोचना से और विवादित मुद्दों पर कोई स्टैंड लेने से कभी परहेज नहीं है।कविता कृष्णन तो सार्वनिक जीवन में हैं,उने्हे स्त्री के हकहकूक और खास तौर पर पितृसत्ता में देहमुक्ति और यौन स्वतंत्रता के बारे में बोलने की कीमत चुकानी पड़ेगी और इसे मैं रोक नहीं सकता क्योंकि आप जब लड़ाई में होते हैं तो वार आप पर होते हैं।

    महाभारत में यूं देखा जाये तो सत्ता की लड़ाई में  शतरंज की बाजी पर सजी द्रोपदी का कोई पक्ष नहीं है लेकिन सारे महाभारत में सत्ता और विचार की लड़ाई में वहीं है।

    हम इस देश में जब सारी मर्दानगी स्त्री के असम्मान पर आधारित है, किसी वाद विवाद में स्त्री के असम्मान के प्रति थोड़ा संवेदनशील हो तो अने परिजनों की मर्यादा भी बचा सकेंगे वरना जाने अनजाने लपेडे में आखिरकार परिजन ही आ जाते हैं।

    अपने भाई के विवाद में फंस जाने की वजह से मुझे स्टैंड मजबूरन लेना पड़ रहा है क्योंकि मैं स्त्री के पक्ष में हूं और सबसे पहले मुझे अपने ही परिवार की स्त्रियों के सम्मान असम्मान का ख्याल हो रहा है,जिसमें मेरी बेहद प्रिय और सममानीया सुमंत की पत्नी भी शामिल हैं।मेरे इस लेखन से उसके दिलो दिमाग में अगर छेस पहुंचती है तो इस विवाद में उलझने का यह मेरा निजी नुकसान है।

    क्योंकि पितृसत्ता के महाभारत में शक्ति परीक्षण में हर बार स्त्री पर दांव हम चाहे या न चाहे,जाने या अनजाने लग जाता है और सड़क से लेकर संसद तक हमारे लिए हिसाब बराबर करने का सबसे बड़ा हथियार अंततः स्त्री ही होता है और इस पितृसत्ता में लोक संस्कृति और लोगजीवन में संवाद की भाषा में हमने स्त्री का सम्मान करना अपनी सनातन वैदिकी अवैदिकी संस्स्कृति की विविध बहुल परंपरांओं में सीखा भी नहीं है।

    विवाद शुरु होते ही सबसे पहले मां बहन बेटी पत्नी उस विवाद में घसीट ली जाती है।इस विवाद में भी घर में बैठी निरपेक्ष स्त्रियों का चेहरा मुझे नजर आ रहा है,जिनका इस विवाद से कोई लेना देना नहीं है और वे अपने रोजमर्रे के कामकाज के प्रति इतना प्रतिबद्ध हैं और अपने कार्यभार और दायित्व के प्रति उनकी निष्ठा इतना प्रबल है कि उन्हें अपना या किसी विचारधारा या सत्ता पक्ष या विपक्ष का वर्चस्व साबित नहीं करना है।

    मेरी टिप्पणी और मेरे लेखन में अगर ऐसी चूक हो जाती है तो संबद्ध स्त्री ही नहीं स्त्री पक्ष का ही मैं अपराधी हूं।मुझे अपने जीवन में स्त्रियों का जितना समर्थन और प्यार मिला है,उससे हमारे दिलो दिमाग में हिमालयऔर तराई की तमाम इजाएं और वैणियों का ही वर्चस्व है।

    मेरे भाई सुमत ने इसका ख्याल रखा होता तो ऐसे अनावश्यक विवाद में उसके साथ मेरे बी फंस जाने की नौबत नहीं आती।यह बेहद तकलीफ देह है।

    एक अत्यंत प्रबुद्ध सशक्त स्त्री  के पति होने और एकदा  जनसत्ता में रहने के बावजूद सुमंत ऐसी टिप्पणी कर सकते हैं ,मुझे यकीन नहीं आता।

    स्त्री का सम्मान करने की तहजीब सुमंत को नहीं है,यह अगर सच है तो मुझे इसका गहरा अफसोस है।क्योंकि हम अपने परिवार में किसी स्त्री के सार्वजनिक नामोल्लेख से भी लहूलुहान होते हैं तो स्त्री के मुद्दे पर अनावश्यक विवाद में फंसने से हमें बचना चाहिए।मैं अब तक यही प्रयत्न ही कर रहा था.पक्ष विपक्ष में इतना बड़ा महाभारत चल रहा है और उसमें परिजन जैसी स्त्रियों का असम्मान हो रहा है,तो मुझे यह टिप्फणी करनी पड़ रही है।

    मेरा पक्ष स्त्री पक्ष है और हर सूरत में स्त्री के पक्ष में खड़ा हो  रहा हूं।


    पिछले दिनों सुमंत सुनते हैं कि जनसत्ता आये थे और फतवा दे गये थे कि जनसत्ता में बचे खुचे लोग किसी काबिल नहीं हैं और उसने हमलोगों को डफर कह दिया।

    दफ्तर गया तो कई साथियों ने शिकायत की और हमने कहा कि उसके पैमाने पर हम किसी लायक नहीं है क्योंकि हम पच्चीस साल से एक ही पोस्ट पर रहने के बावजूद मौका देखकर जनसत्ता से भाग नहीं सके।

    जो भागे और बेहदकामयाब भी है,हमें उनकी कामयाबी को सलाम भी करना चाहिए।नाकाम लोगों के बारे में कामयाब लोगों की किसी टिप्पणी का बुरा नहीं मानना चाहिए।

    सुमंत इंडियन एक्सप्रेस के लिए रिपोर्टिंग भी की है तो हम संजय कुमार  जी की तरह यह भी नहीं मानते कि उसकी अंग्रेजी इतनी कमजोर है कि पितृसत्ता के विरोध के परिप्रेक्ष्य में स्त्री के यौन संबंध की संवतंत्रता का क्या मतलब है।

    ऐसा है तो बाकी मीडिया में उसने जहां जहां काम किया है,उसके बारे में हम कह नहीं सकते लेकिन मुझे यकीन है कि इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में उसके इस मंतव्य का कम ही लोग समर्थन कर सकते हैं।लेकिन उसकी नासमझी से परेशां ज्यादा होंगे।

    यह दरअसल स्त्री के बारे में सुमंत की सतीत्व कौमार्य समर्थक  की मनुस्मृति नैतिकता है जो दरअसल पितृसत्ता की जमीन है।इस जमीन पर हम खड़े नहीं हो सकते।संपादक बनने के बावजूद यह मनसिकता किसी पुरोहित या मौलवी की ही हो सकती है।

    मान लेते हैं कि कविता कृष्णन जी जैसी सुलझी हुई सामाजिक कार्यक्रता अपनी बात कायदे से समझा नहीं सकी तो अस्पष्टता के संदर्भ में उनसे संवाद किया जा सकता है,असहमत हुआ जा सकता है या उनका विरोध भी करने की स्वतंत्रता असहमत लोगों को हो सकती है लेकिन संपादकी के स्टेटस से नत्थी किसी बेहद कामयाब पत्रकार के इस मंतव्य से हम जैसे मामूली सब एडीटर का दुःखी होना लाजिमी है।

    वैसे कोलकाता में जबतक सुमंत और साम्या रहे,वे हमारे परिवार की तरह ही रहे और हमें उनसे कभी कोई शिकायत नहीं रही और न सुमंत से हमारा कोई विवाद रहा है।अब भी मानते हैं हम कि वह शुरु से बेहद हड़बड़िया रहा है,कोई धमाकेदार टिप्पणी से ध्यान खींचने की जुगत में उसने ऐसी गलती भयंकर कर दी है और उसकी इसतरह कविता कृष्णन या किसी स्त्रीका अपमान करने की मंशा नहीं रही है।अपने वक्तव्य के आसय से जो अनजान हो,ऐसे ज्ञानी के बेबाक बोल का नोटिस न लें तो बेहतर।

    उसका जन्म उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के मुंश्यारी में  हुआ है और उसके पिाता मजिस्ट्रेट थे और इसके उलटहम शरणार्थी किसान अछूत परिवार से हैं।

    फिरभी उसके अपनापे में कोई कमी नहीं दिखी और हिमालयी रिश्ते के लिहाज से अब तक हम उसे अपना भाई ही मानते रहे हैं।

    हमने पहले तो इस टिप्पणी को उसकी नासमझी समझते हुए नजरअंदाज किया और जनसत्ता के किसी साथी के मंतव्य को तुल देकर विवाद बढ़ाने से बच रहा था।

    सुमंत के लिए  न जाने कोई सुमंत भट्टाचार्य लिखना भी सरासर गलत है क्योंकि वह सामान्य मनुष्य होता तो बात आयी गयी हुई रहती क्योंकि पितृसत्ता में प्रगतिशील मनुष्यों के उच्च विचारों के मुताबिक भी  स्त्री की स्वतंत्रता निषिद्ध है और भद्र समाज नारी वादियों को वेश्या से कम नहीं मानता जैसे तसलिमा नसरीन के साथ आम तौर पर मनुष्यविरोधी सलूक होता है।

    आम आदमी तो विशुद्ध शास्त्रसम्मत तरीके से वैदिकी कर्मकांड के तहत स्त्री के अस्तित्व को ही खत्म करने की मानसिकता के साथ जनमता है और स्त्री को मनुष्य समझने के लिए पढ़ा लिखा या संपादक होना भी काफी नहीं होता ,उसके लिए समाज,व्यवस्था और राष्ट्र के समूचे ताने बाने के बारे में जानकार होने के साथ सात पितृसत्ता से मुठभेड़ करने की कूवत भी होनी चाहिए।

    संजय ने संस्कार की बात कही है तो वैदिकी संस्कृति में स्त्री के साथ जो आचरण के प्रावधान हैं या अन्यधर्ममत में जो स्त्रीविरोधी वैश्विक रंगभेद है,उसके मद्देनजर संस्कारबद्ध लोगों की दृष्टि ही उनके  अंध राष्ट्रवाद की तरह इतनी स्त्रीविरोधी हो सकती है कि भाषा,माध्यम और विधा भी लज्जित हो जाये।

    सुमंत का असल नजरिया क्या है और नैतिकता की उसकी अवधारणा कौमार्य और सतीत्व से कितना पृथक है,संवादहीनता के कारण हम नहीं जानते।

    खास तौर पर यह समझना चाहिए कि इस दुस्समय में बेहद सही लोगों की भाषा भी बिगड़ रही है तो सुमंत के कहे का इतना बुरा मानकर और उसके मंतव्य को तुल देकर हम दरअसल उसीका पक्ष ही मजबूत बनाते हैं क्योंकि निदा और विरोध से बाजार आइकन बनाता है और यह मुक्तबाजार का व्याकरण है।

    कविता जी बेहद सक्षम हैं और किसी भी मंतव्य का वे जवाब दे सकती हैं और हमें उनके जवाब का इंतजार करना चाहिए और वे इस मंतव्य को जवाब देने लायक भी नहीं समझतीं तो यह उनका अधिकार है। 

    हम बेवजह सुमंत को नायक या खलनायक न बनायें तो पितृसत्ता की भाषा के प्रत्युत्तर में  हमारी चुप्पी ज्यादा मायनेखेज जवाब है।

    मुझे सुमंत भाई माफ करें कि बेहद दुःखी होकर हमें उनके बारे में यह सब लिखना पड़ रहा है।



    एक हैं सुमंत भट्टाचार्य। इलाहाबाद के जन्तु हैं। आत्मा में कूड़े की दुर्गंध व्याप्त है। इनके लिए 'फ्री-सेक्स'का मतलब है किसी का सार्वजनिक यौन उत्पीड़न। बजबजाती लंपट कुंठा की बानगी देखिये कि किसी महिला को सार्वजनिक स्थल पर सेक्स के लिए बुला रहे हैं और नैतिकता बूक रहे हैं। ऐसे ही दिमाग समाज में रेप-कल्चर के लिए खाद-पानी बनाते हैं।
    Kavita जी ने कहा, उसका साफ मतलब था- बिना दोनों पक्षों की सहमति के, बिना आजादी के बने या बनाए गए संबंध अत्याचार हैं, उत्पीड़न है। जैसे जीवन के हर क्षेत्र में मुक्ति की जरूरत है, वैसे ही सेक्स के क्षेत्र में भी। जीवन के तमाम क्षेत्रों की तरह ही यहाँ भी सदियों से पुरुष सत्ता ने स्त्री को गुलाम बना कर रखा है। बंधुवा या गुलाम या उत्पीड़क या हत्यारा या आततायी या वर्चस्ववादी सेक्स नहीं, फ्री-सेक्स। लेकिन गर आप जिंदगी भर सेक्स का मतलब जबर्दस्ती या पुरुष की निर्बाध इच्छा भर समझते रहे हों, तो आपके दिमाग के सड़े हिस्से को जर्राही की जरूरत है। असल में आप वैवाहिक बलात्कार जैसे अन्यायों के पुरस्कर्ता हैं।
    असल बात यह है कि किसी महिला की बराबरी या आजादी, हर रूप में, इन खापिस्ट भाईयों को अपच हो जाती है। यही दिमाग हैं, जो किसी भी महिला के आगे बढ्ने, समाज में दिखने, आजाद होने पर चरित्र-हनन का अमोघ अस्त्र (?) चलाते हैं।
    जो भी साथी इन्हें जानते हों, कृपया जर्राही करवाने में इनकी मदद करें।



    जो बात सार्वजनिक पटल पर की जाती है
    वो अनैतिक कैसे हो सकती है ?
    गुनाह हमेशा अँधेरे में होता है
    उजाले में तो विमर्श होता है।
    -
    अब फिर एक बात कहता हूँ
    यौन क्रीड़ा सनातन भारत में
    सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही है।
    यौन क्रीड़ा योगाभ्यास है।
    इनकी 64 कलाओं को कोई
    योग साधक ही कर सकता है।
    यह साधारण मानव के वश की बात नहीं।
    फिर एक साधक को अपनी साधना के
    सार्वजनिक प्रदर्शन से संकोच क्यों हो ?
    तभी मैं फ्री सेक्स का भारतीयकरण करने
    और लोककल्याण हेतु
    इण्डिया गेट पर सार्वजनिक प्रदर्शन के पक्ष में हूँ।
    फिर भी आपकी आस्था कहीं आहत
    हो रही हो तो बता दें।
    सनातन ही है जो संशोधन को सम्मान देता है।


    दुनिया की तमाम संस्कृतियों में सनातन ही है
    जो "कोख पर नारी"के अधिकार को
    धर्म और आस्था में सम्मानित जगह देता है।
    आचरण में कमिया जरूर हो सकती है
    लेकिन सैद्धान्तिकी में सनातन का जोड़ नहीं।
    इससे बड़ी लकीर खींचने की औकात किसी
    में हे तो सामने आए।

    आज जो "फ्री सेक्स"से "लैंगिक भेदभाव"
    खत्म करना चाहते हेँ वो कोख पर नारी
    के अधिकार से बड़ी रेखा खींच कर दिखाएँ।
    लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे
    क्योंकि इस्लाम इस पर विरिध करेगा
    और इनका छिपा मकसद सिर्फ भारत को तोड़ना भर है।

    सनातन की हल्की सी चपत क्या लगी
    फ्री सेक्स हरावल दस्ते की "नायिका"से
    मोहतरमा "पीड़ित याचक"बन बैठी।
    गुहार लगा कर "समर्थन"मांग रही हैं।

    दरअसल, जाति और मजहब के आधार पर
    "महिला आरक्षण बिल"रोकने वालों के साथ
    खड़ी ये नायिका अब फ्री सेक्स की बात कर
    "लैंगिक विभेद'खत्म करने का परचम लहरा रही हैं।
    दुस्साहस तो देखिए, महिला को जाति और मजहब
    की तराजु पर तौलने वाले भारत को
    नारी सम्मान सिखा रहे हेँ ?
    गजब
    सन् 1947 में भारत को मजहब से तोडा गया।
    सन् 1990 में भारत की जाति से तोडा गया।
    फिर भी ना टूटा भारत तो अब
    "नारी"के खिलाफ "मादा"को खड़ा किया जा रहा है।
    फ्री सेक्स की ओट में परिवार को तोड़ने की साजिश है।
    लेकिन अब सनातन जाग चुका है।
    हम नारी को पूजते हेँ
    मादा की नाक काटते हैं।
    अनैतिक का जवाब अब अनैतिक से देंगे हम।
    कल यही बात पोस्ट में भी लिखी थी।
    अनैतिक का जवाब अनैतिक से दे रहा हूँ।
    लेकिन समझ का फेर है भाई लोगो में।
    जो बात में खुद कह रहा हूँ, वही बात
    कमबख्त मुझे समझा रहे हेँ।
    तो कुंठित कौन ?
    चटक सुतिया कौन ?
    लंपट कौन ?
    मादाखोर कौन?


    सनातन का एक थप्पड़ क्या पड़ा
    सुश्री कविता कृष्णन 'फ्री सेक्स"के
    हरावल दस्ते की "नेता"की बजाय
    "याचक'की भाव मुद्रा में आ गईं।
    पोस्ट लगाकर मुझसे बचने की "फ्री सलाह"दे रही हेँ।

    यदि फ्री सेक्स 'लैंगिक विभेद"है तो भी
    कविता जी आप उन्हीं में से एक हेँ जो
    महिला आरक्षण बिल के खिलाफ
    जातिवादी ताकतों के साथ खड़ी हेँ।
    दरअसल आप उन्हीं में से एक हेँ जो
    महिला को हिन्दू और मुसलमान देखती
    और उसी हिसाब से सियासत में तौलती हेँ।
    क्या गजब है
    महिला को जाति और मजहब के चश्में से
    नापने-जोखन वाले आज
    फ्री सेक्स की वकालत कर रहे हैं ?
    बहरहाल, प्रस्ताव पर आपकी
    हाँ और ना का अभी भी इंतजार है।
    साहस दिखाइए ना।

    भगवा प्रणाम

    রাজনৈতিক লড়াই-এ মতাদর্শগত বিরোধ থাকেই.. কিন্তু যাদের মতাদর্শই নেই.. ?? তারা যুক্তি দিয়ে বিরোধিতা করে না, করে খিস্তি দিয়ে.. patriarchal society এর সর্বগুন সম্পন্ন উন্নত মানের product এই নর্দমা কীটগুলো (কীট রাও better).. আর সে জন্যই patriarchal ভোটবাজ party গুলোর খুবই গুরুত্বপূর্ণ সদস্য এরা.. এদের নোংরামো ভাঙিয়ে খিস্তি ভাঙিয়ে বীর্য ভাঙিয়ে লাম্পট্য ভাঙিয়ে খুনি-রক্তমাখা হাতের উপর দাঁড়িয়ে সুখে বাঁচে ওপর মহল আর মাঝে মধ্যেই ঢাকাই জামদানী স্যুট বুট গটগটিয়ে "শালীনতা" ,"নিরাপত্তার"কেতাদূরস্ত ভাষণ খাইয়ে দিয়ে যায়.. মুখে বললেও আদ্যপান্ত patriarchal এই পার্টিগুলো দেবে নিরাপত্তা ?? তাদের কারোর স্পর্ধা আছে তাদেরই পালন করা আয়তুতু লালুভুলুদের দল থেকে ঘাড় ধরে বার করে দেওয়ার বা পরিস্কার জানিয়ে দেওয়ার যে এরকম supporters তাদের চাইনা???? না নেই.. এই লম্পট গুলো না থাকলে ভোট আদায় করে দেবে কে ?? অনমনীয় শিড়দাড়া ভাঙতে পরিবার পরিজনের উপর হামলা বা রেপ করবে কে??সহজলব্ধ "sex toy" (নারী) রা দুস্প্রাপ্য মানবী হয়ে উঠলে, অধিকার বুঝে নিতে শিখে গেলে অ্যাসিড ঢেলে ঠান্ডা করবে কে ?? এদেরই বিরুদ্ধে step নিতে হলে এত খরচা করে এদের আর পোষা কেন বাপু??
    এই লম্পটগুলো মাথায় রক্ত উঠলে বিরুদ্ধ মত খুন করবে আর মাথায় sex উঠলে বিরোধী (নিজের দল বাদ যায় কিনা doubt আছে) মেয়েদের "কমরেন্ডি ","বেশ্যা"বলবে মলেস্ট করবে রেপ করবে এতে অবাক হওয়ার কি আছে???
    যাদের মস্তিস্কটাই আস্ত যৌনাঙ্গ তারা কি বুঝবে মানবী কাকে বলে?? তারা হাজারবার জন্মালেও হাজারটা দলের পতাকা চিবোলেও বুঝবেনা কমরেড কাকে বলে...
    তাদের ঘৃণ্য চিন্তনের দ্রুত মৃত্যু কামনা করি...




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  • 05/22/16--21:55: हमारी किसी भी चुक से उसकी मर्यादा का हनन होता है,तो यह बेदह शर्म और अफसोस की बात है।क्योंकि विचाधाराओं की लड़ाई अलग है और इस लड़ाई में अगर स्त्री का अधिकार मुद्दा बनता है,तो हमारे परिजनों में भी स्त्री हैं और हम जाने अनजाने फिर अपने ही परिजनों के असम्मान की स्थित बना चुके होते हैं।यह हम सबका सबसे बड़ा अपराध है कि सार्वजनिक और निजी जीवन में भी हमारी सारी गालियों में स्त्री का असम्मान है तो हमारे आपसी संवाद में भी जाने अनजाने उस स्त्री की ही मर्यादा दांव पर है।जीत के लिए स्त्री के चेहरे को जिस हद तक चाहे विकृत करने की सत्ता संस्कृति है और इससे शायद ही कोई बचा है।
  • यह दरअसल स्त्री के बारे में सुमंत की सतीत्व कौमार्य समर्थक  की मनुस्मृति नैतिकता है जो दरअसल पितृसत्ता की जमीन है।इस जमीन पर हम खड़े नहीं हो सकते।संपादक बनने के बावजूद यह मनसिकता किसी पुरोहित या मौलवी की ही हो सकती है।


    चंदन ने न जाने कोई सुमंत भट्टाचार्य लिखा है जो सरासर गलत है क्योंकि वह सामान्य मनुष्य होता तो बात आयी गयी हुई रहती क्योंकि पितृसत्ता में प्रगतिशील मनुष्यों के उच्च विचारों के मुताबिक भी  स्त्री की स्वतंत्रता निषिद्ध है और भद्र समाज नारी वादियों को वेश्या से कम नहीं मानता जैसे तसलिमा नसरीन के साथ आम तौर पर मनुष्यविरोधी सलूक होता है।


    आम आदमी तो विशुद्ध शास्त्रसम्मत तरीके से वैदिकी कर्मकांड के तहत स्त्री के अस्तित्व को ही खत्म करने की मानसिकता के साथ जनमता है और स्त्री को मनुष्य समझने के लिए पढ़ा लिखा या संपादक होना भी काफी नहीं होता ,उसके लिए समाज,व्यवस्था और राष्ट्र के समूचे ताने बाने के बारे में जानकार होने के साथ सात पितृसत्ता से मुठभेड़ करने की कूवत भी होनी चाहिए।

    पलाश विश्वास


    Reference:



    का सम्मान करेंगी कविता।

    कविता जी, फ्री सेक्स का प्रदर्शन हम दोनों

    इण्डिया गेट पर करें तो केसा रहेगा ?

    भारत की शालीनता और नैतिकता की

    चुप्पी को कमजोरी समझने की भूल

    कतई ना करें कविता जी।

    अनैतिक को अनैतिक जवाब

    देना हमको भी आता है ।

    ना हो तो आजमा लीजिए।


    सिवाय सनातन और कोई विकल्प नहीं है।

    फ्री सेक्स में हस्तक्षेप क्या किया

    वामपंथी से लेकर दलित और मुल्ले तक

    कोसने के लिए सनातन मूल्यों का ही

    आश्रय ले रहे हेँ।

    ब्रह्मांड हित में सनातन ही सर्वश्रेष्ठ है।

    नैतिक अनैतिक की अंतिम परिभाषा

    सनातन ही दे सका है।

    सुमंत भट्टाचार्य जनसत्ता में हमारे सहकर्मी रहे हैं और प्रभाष जोशी,अमित प्रकाश सिंह और श्याम आचार्य के बहुत प्रिय रहे हैं।


    हम लोगों की कोई हैसियत जनसत्ता में कभी थी नहीं।सुमंत और दिलीप मंडल दोनों एसपी सिंह के शिष्य काबिल पत्रकार है जो कारपोरेटमीडिया में बेहद कामयाब भी हैं।


    सुमंत ने एक अत्यंत भद्र लड़की से विवाह किया,जो हर दृष्टि से प्रबुद्ध है और यह हमारे लिए हमेशा खुशी की बात रही है।


    हमारी किसी भी चुक से उसकी मर्यादा का हनन होता है,तो यह बेदह शर्म और अफसोस की बात है।क्योंकि विचाधाराओं की लड़ाई अलग है और इस लड़ाई में अगर स्त्री का अधिकार मुद्दा बनता है,तो हमारे परिजनों में भी स्त्री हैं और हम जाने अनजाने फिर अपने ही परिजनों के असम्मान की स्थित बना चुके होते हैं।यह हम सबका सबसे बड़ा अपराध है कि सार्वजनिक और निजी जीवन में भी हमारी सारी गालियों में स्त्री का असम्मान है तो हमारे आपसी संवाद में भी जाने अनजाने उस स्त्री की ही मर्यादा दांव पर है।जीत के लिए स्त्री के चेहरे को जिस हद तक चाहे विकृत करने की सत्ता संस्कृति है और इससे शायद ही कोई बचा है।


    मुझे गहरा अफसोस है कि मर्दों के इस विवाद में अगर किसी निरपेक्ष अत्यंत सम्मानीया स्त्री पर आंच आये और वह भी तब हमारी तथाकथित वैचारिक लड़ाई में उसका कोई पक्ष नहीं है।


    सुमंत मेरा भाई है।लेकिन मैंने अपने पिता की सार्वजनिक  आलोचना से और विवादित मुद्दों पर कोई स्टैंड लेने से कभी परहेज नहीं है।कविता कृष्णन तो सार्वनिक जीवन में हैं,उने्हे स्त्री के हकहकूक और खास तौर पर पितृसत्ता में देहमुक्ति और यौन स्वतंत्रता के बारे में बोलने की कीमत चुकानी पड़ेगी और इसे मैं रोक नहीं सकता क्योंकि आप जब लड़ाई में होते हैं तो वार आप पर होते हैं।


    महाभारत में यूं देखा जाये तो सत्ता की लड़ाई में  शतरंज की बाजी पर सजी द्रोपदी का कोई पक्ष नहीं है लेकिन सारे महाभारत में सत्ता और विचार की लड़ाई में वहीं है।


    हम इस देश में जब सारी मर्दानगी स्त्री के असम्मान पर आधारित है, किसी वाद विवाद में स्त्री के असम्मान के प्रति थोड़ा संवेदनशील हो तो अने परिजनों की मर्यादा भी बचा सकेंगे वरना जाने अनजाने लपेडे में आखिरकार परिजन ही आ जाते हैं।


    अपने भाई के विवाद में फंस जाने की वजह से मुझे स्टैंड मजबूरन लेना पड़ रहा है क्योंकि मैं स्त्री के पक्ष में हूं और सबसे पहले मुझे अपने ही परिवार की स्त्रियों के सम्मान असम्मान का ख्याल हो रहा है,जिसमें मेरी बेहद प्रिय और सममानीया सुमंत की पत्नी भी शामिल हैं।मेरे इस लेखन से उसके दिलो दिमाग में अगर छेस पहुंचती है तो इस विवाद में उलझने का यह मेरा निजी नुकसान है।


    क्योंकि पितृसत्ता के महाभारत में शक्ति परीक्षण में हर बार स्त्री पर दांव हम चाहे या न चाहे,जाने या अनजाने लग जाता है और सड़क से लेकर संसद तक हमारे लिए हिसाब बराबर करने का सबसे बड़ा हथियार अंततः स्त्री ही होता है और इस पितृसत्ता में लोक संस्कृति और लोगजीवन में संवाद की भाषा में हमने स्त्री का सम्मान करना अपनी सनातन वैदिकी अवैदिकी संस्स्कृति की विविध बहुल परंपरांओं में सीखा भी नहीं है।


    विवाद शुरु होते ही सबसे पहले मां बहन बेटी पत्नी उस विवाद में घसीट ली जाती है।इस विवाद में भी घर में बैठी निरपेक्ष स्त्रियों का चेहरा मुझे नजर आ रहा है,जिनका इस विवाद से कोई लेना देना नहीं है और वे अपने रोजमर्रे के कामकाज के प्रति इतना प्रतिबद्ध हैं और अपने कार्यभार और दायित्व के प्रति उनकी निष्ठा इतना प्रबल है कि उन्हें अपना या किसी विचारधारा या सत्ता पक्ष या विपक्ष का वर्चस्व साबित नहीं करना है।


    मेरी टिप्पणी और मेरे लेखन में अगर ऐसी चूक हो जाती है तो संबद्ध स्त्री ही नहीं स्त्री पक्ष का ही मैं अपराधी हूं।मुझे अपने जीवन में स्त्रियों का जितना समर्थन और प्यार मिला है,उससे हमारे दिलो दिमाग में हिमालयऔर तराई की तमाम इजाएं और वैणियों का ही वर्चस्व है।


    मेरे भाई सुमत ने इसका ख्याल रखा होता तो ऐसे अनावश्यक विवाद में उसके साथ मेरे बी फंस जाने की नौबत नहीं आती।यह बेहद तकलीफ देह है।


    एक अत्यंत प्रबुद्ध सशक्त स्त्री  के पति होने और एकदा  जनसत्ता में रहने के बावजूद सुमंत ऐसी टिप्पणी कर सकते हैं ,मुझे यकीन नहीं आता।


    स्त्री का सम्मान करने की तहजीब सुमंत को नहीं है,यह अगर सच है तो मुझे इसका गहरा अफसोस है।क्योंकि हम अपने परिवार में किसी स्त्री के सार्वजनिक नामोल्लेख से भी लहूलुहान होते हैं तो स्त्री के मुद्दे पर अनावश्यक विवाद में फंसने से हमें बचना चाहिए।मैं अब तक यही प्रयत्न ही कर रहा था.पक्ष विपक्ष में इतना बड़ा महाभारत चल रहा है और उसमें परिजन जैसी स्त्रियों का असम्मान हो रहा है,तो मुझे यह टिप्फणी करनी पड़ रही है।


    मेरा पक्ष स्त्री पक्ष है और हर सूरत में स्त्री के पक्ष में खड़ा हो  रहा हूं।



    पिछले दिनों सुमंत सुनते हैं कि जनसत्ता आये थे और फतवा दे गये थे कि जनसत्ता में बचे खुचे लोग किसी काबिल नहीं हैं और उसने हमलोगों को डफर कह दिया।


    दफ्तर गया तो कई साथियों ने शिकायत की और हमने कहा कि उसके पैमाने पर हम किसी लायक नहीं है क्योंकि हम पच्चीस साल से एक ही पोस्ट पर रहने के बावजूद मौका देखकर जनसत्ता से भाग नहीं सके।


    जो भागे और बेहदकामयाब भी है,हमें उनकी कामयाबी को सलाम भी करना चाहिए।नाकाम लोगों के बारे में कामयाब लोगों की किसी टिप्पणी का बुरा नहीं मानना चाहिए।


    सुमंत इंडियन एक्सप्रेस के लिए रिपोर्टिंग भी की है तो हम संजय कुमार  जी की तरह यह भी नहीं मानते कि उसकी अंग्रेजी इतनी कमजोर है कि पितृसत्ता के विरोध के परिप्रेक्ष्य में स्त्री के यौन संबंध की संवतंत्रता का क्या मतलब है।


    ऐसा है तो बाकी मीडिया में उसने जहां जहां काम किया है,उसके बारे में हम कह नहीं सकते लेकिन मुझे यकीन है कि इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में उसके इस मंतव्य का कम ही लोग समर्थन कर सकते हैं।लेकिन उसकी नासमझी से परेशां ज्यादा होंगे।


    यह दरअसल स्त्री के बारे में सुमंत की सतीत्व कौमार्य समर्थक  की मनुस्मृति नैतिकता है जो दरअसल पितृसत्ता की जमीन है।इस जमीन पर हम खड़े नहीं हो सकते।संपादक बनने के बावजूद यह मनसिकता किसी पुरोहित या मौलवी की ही हो सकती है।


    मान लेते हैं कि कविता कृष्णन जी जैसी सुलझी हुई सामाजिक कार्यक्रता अपनी बात कायदे से समझा नहीं सकी तो अस्पष्टता के संदर्भ में उनसे संवाद किया जा सकता है,असहमत हुआ जा सकता है या उनका विरोध भी करने की स्वतंत्रता असहमत लोगों को हो सकती है लेकिन संपादकी के स्टेटस से नत्थी किसी बेहद कामयाब पत्रकार के इस मंतव्य से हम जैसे मामूली सब एडीटर का दुःखी होना लाजिमी है।


    वैसे कोलकाता में जबतक सुमंत और साम्या रहे,वे हमारे परिवार की तरह ही रहे और हमें उनसे कभी कोई शिकायत नहीं रही और न सुमंत से हमारा कोई विवाद रहा है।अब भी मानते हैं हम कि वह शुरु से बेहद हड़बड़िया रहा है,कोई धमाकेदार टिप्पणी से ध्यान खींचने की जुगत में उसने ऐसी गलती भयंकर कर दी है और उसकी इसतरह कविता कृष्णन या किसी स्त्रीका अपमान करने की मंशा नहीं रही है।अपने वक्तव्य के आसय से जो अनजान हो,ऐसे ज्ञानी के बेबाक बोल का नोटिस न लें तो बेहतर।


    उसका जन्म उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के मुंश्यारी में  हुआ है और उसके पिाता मजिस्ट्रेट थे और इसके उलटहम शरणार्थी किसान अछूत परिवार से हैं।


    फिरभी उसके अपनापे में कोई कमी नहीं दिखी और हिमालयी रिश्ते के लिहाज से अब तक हम उसे अपना भाई ही मानते रहे हैं।


    हमने पहले तो इस टिप्पणी को उसकी नासमझी समझते हुए नजरअंदाज किया और जनसत्ता के किसी साथी के मंतव्य को तुल देकर विवाद बढ़ाने से बच रहा था।


    सुमंत के लिए  न जाने कोई सुमंत भट्टाचार्य लिखना भी सरासर गलत है क्योंकि वह सामान्य मनुष्य होता तो बात आयी गयी हुई रहती क्योंकि पितृसत्ता में प्रगतिशील मनुष्यों के उच्च विचारों के मुताबिक भी  स्त्री की स्वतंत्रता निषिद्ध है और भद्र समाज नारी वादियों को वेश्या से कम नहीं मानता जैसे तसलिमा नसरीन के साथ आम तौर पर मनुष्यविरोधी सलूक होता है।


    आम आदमी तो विशुद्ध शास्त्रसम्मत तरीके से वैदिकी कर्मकांड के तहत स्त्री के अस्तित्व को ही खत्म करने की मानसिकता के साथ जनमता है और स्त्री को मनुष्य समझने के लिए पढ़ा लिखा या संपादक होना भी काफी नहीं होता ,उसके लिए समाज,व्यवस्था और राष्ट्र के समूचे ताने बाने के बारे में जानकार होने के साथ सात पितृसत्ता से मुठभेड़ करने की कूवत भी होनी चाहिए।


    संजय ने संस्कार की बात कही है तो वैदिकी संस्कृति में स्त्री के साथ जो आचरण के प्रावधान हैं या अन्यधर्ममत में जो स्त्रीविरोधी वैश्विक रंगभेद है,उसके मद्देनजर संस्कारबद्ध लोगों की दृष्टि ही उनके  अंध राष्ट्रवाद की तरह इतनी स्त्रीविरोधी हो सकती है कि भाषा,माध्यम और विधा भी लज्जित हो जाये।


    सुमंत का असल नजरिया क्या है और नैतिकता की उसकी अवधारणा कौमार्य और सतीत्व से कितना पृथक है,संवादहीनता के कारण हम नहीं जानते।


    खास तौर पर यह समझना चाहिए कि इस दुस्समय में बेहद सही लोगों की भाषा भी बिगड़ रही है तो सुमंत के कहे का इतना बुरा मानकर और उसके मंतव्य को तुल देकर हम दरअसल उसीका पक्ष ही मजबूत बनाते हैं क्योंकि निदा और विरोध से बाजार आइकन बनाता है और यह मुक्तबाजार का व्याकरण है।


    कविता जी बेहद सक्षम हैं और किसी भी मंतव्य का वे जवाब दे सकती हैं और हमें उनके जवाब का इंतजार करना चाहिए और वे इस मंतव्य को जवाब देने लायक भी नहीं समझतीं तो यह उनका अधिकार है। 


    हम बेवजह सुमंत को नायक या खलनायक न बनायें तो पितृसत्ता की भाषा के प्रत्युत्तर में  हमारी चुप्पी ज्यादा मायनेखेज जवाब है।


    मुझे सुमंत भाई माफ करें कि बेहद दुःखी होकर हमें उनके बारे में यह सब लिखना पड़ रहा है।




    एक हैं सुमंत भट्टाचार्य। इलाहाबाद के जन्तु हैं। आत्मा में कूड़े की दुर्गंध व्याप्त है। इनके लिए 'फ्री-सेक्स' का मतलब है किसी का सार्वजनिक यौन उत्पीड़न। बजबजाती लंपट कुंठा की बानगी देखिये कि किसी महिला को सार्वजनिक स्थल पर सेक्स के लिए बुला रहे हैं और नैतिकता बूक रहे हैं। ऐसे ही दिमाग समाज में रेप-कल्चर के लिए खाद-पानी बनाते हैं।

    Kavita जी ने कहा, उसका साफ मतलब था- बिना दोनों पक्षों की सहमति के, बिना आजादी के बने या बनाए गए संबंध अत्याचार हैं, उत्पीड़न है। जैसे जीवन के हर क्षेत्र में मुक्ति की जरूरत है, वैसे ही सेक्स के क्षेत्र में भी। जीवन के तमाम क्षेत्रों की तरह ही यहाँ भी सदियों से पुरुष सत्ता ने स्त्री को गुलाम बना कर रखा है। बंधुवा या गुलाम या उत्पीड़क या हत्यारा या आततायी या वर्चस्ववादी सेक्स नहीं, फ्री-सेक्स। लेकिन गर आप जिंदगी भर सेक्स का मतलब जबर्दस्ती या पुरुष की निर्बाध इच्छा भर समझते रहे हों, तो आपके दिमाग के सड़े हिस्से को जर्राही की जरूरत है। असल में आप वैवाहिक बलात्कार जैसे अन्यायों के पुरस्कर्ता हैं।

    असल बात यह है कि किसी महिला की बराबरी या आजादी, हर रूप में, इन खापिस्ट भाईयों को अपच हो जाती है। यही दिमाग हैं, जो किसी भी महिला के आगे बढ्ने, समाज में दिखने, आजाद होने पर चरित्र-हनन का अमोघ अस्त्र (?) चलाते हैं।

    जो भी साथी इन्हें जानते हों, कृपया जर्राही करवाने में इनकी मदद करें।




    जो बात सार्वजनिक पटल पर की जाती है

    वो अनैतिक कैसे हो सकती है ?

    गुनाह हमेशा अँधेरे में होता है

    उजाले में तो विमर्श होता है।

    -
    अब फिर एक बात कहता हूँ
    यौन क्रीड़ा सनातन भारत में
    सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही है।
    यौन क्रीड़ा योगाभ्यास है।
    इनकी 64 कलाओं को कोई
    योग साधक ही कर सकता है।
    यह साधारण मानव के वश की बात नहीं।
    फिर एक साधक को अपनी साधना के
    सार्वजनिक प्रदर्शन से संकोच क्यों हो ?
    तभी मैं फ्री सेक्स का भारतीयकरण करने
    और लोककल्याण हेतु
    इण्डिया गेट पर सार्वजनिक प्रदर्शन के पक्ष में हूँ।
    फिर भी आपकी आस्था कहीं आहत
    हो रही हो तो बता दें।
    सनातन ही है जो संशोधन को सम्मान देता है।



    दुनिया की तमाम संस्कृतियों में सनातन ही है

    जो "कोख पर नारी" के अधिकार को

    धर्म और आस्था में सम्मानित जगह देता है।

    आचरण में कमिया जरूर हो सकती है

    लेकिन सैद्धान्तिकी में सनातन का जोड़ नहीं।
    इससे बड़ी लकीर खींचने की औकात किसी
    में हे तो सामने आए।

    आज जो "फ्री सेक्स" से "लैंगिक भेदभाव"
    खत्म करना चाहते हेँ वो कोख पर नारी
    के अधिकार से बड़ी रेखा खींच कर दिखाएँ।
    लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे
    क्योंकि इस्लाम इस पर विरिध करेगा
    और इनका छिपा मकसद सिर्फ भारत को तोड़ना भर है।


    सनातन की हल्की सी चपत क्या लगी

    फ्री सेक्स हरावल दस्ते की "नायिका" से

    मोहतरमा "पीड़ित याचक" बन बैठी।

    गुहार लगा कर "समर्थन" मांग रही हैं।


    दरअसल, जाति और मजहब के आधार पर
    "महिला आरक्षण बिल" रोकने वालों के साथ
    खड़ी ये नायिका अब फ्री सेक्स की बात कर
    "लैंगिक विभेद' खत्म करने का परचम लहरा रही हैं।
    दुस्साहस तो देखिए, महिला को जाति और मजहब
    की तराजु पर तौलने वाले भारत को
    नारी सम्मान सिखा रहे हेँ ?
    गजब
    सन् 1947 में भारत को मजहब से तोडा गया।
    सन् 1990 में भारत की जाति से तोडा गया।
    फिर भी ना टूटा भारत तो अब
    "नारी" के खिलाफ "मादा" को खड़ा किया जा रहा है।
    फ्री सेक्स की ओट में परिवार को तोड़ने की साजिश है।
    लेकिन अब सनातन जाग चुका है।
    हम नारी को पूजते हेँ
    मादा की नाक काटते हैं।
    अनैतिक का जवाब अब अनैतिक से देंगे हम।
    कल यही बात पोस्ट में भी लिखी थी।
    अनैतिक का जवाब अनैतिक से दे रहा हूँ।
    लेकिन समझ का फेर है भाई लोगो में।
    जो बात में खुद कह रहा हूँ, वही बात
    कमबख्त मुझे समझा रहे हेँ।
    तो कुंठित कौन ?
    चटक सुतिया कौन ?
    लंपट कौन ?
    मादाखोर कौन?



    सनातन का एक थप्पड़ क्या पड़ा

    सुश्री कविता कृष्णन 'फ्री सेक्स" के

    हरावल दस्ते की "नेता"की बजाय

    "याचक' की भाव मुद्रा में आ गईं।

    पोस्ट लगाकर मुझसे बचने की "फ्री सलाह" दे रही हेँ।

    यदि फ्री सेक्स 'लैंगिक विभेद" है तो भी
    कविता जी आप उन्हीं में से एक हेँ जो
    महिला आरक्षण बिल के खिलाफ
    जातिवादी ताकतों के साथ खड़ी हेँ।
    दरअसल आप उन्हीं में से एक हेँ जो
    महिला को हिन्दू और मुसलमान देखती
    और उसी हिसाब से सियासत में तौलती हेँ।
    क्या गजब है
    महिला को जाति और मजहब के चश्में से
    नापने-जोखन वाले आज
    फ्री सेक्स की वकालत कर रहे हैं ?
    बहरहाल, प्रस्ताव पर आपकी
    हाँ और ना का अभी भी इंतजार है।
    साहस दिखाइए ना।

    भगवा प्रणाम


    রাজনৈতিক লড়াই-এ মতাদর্শগত বিরোধ থাকেই.. কিন্তু যাদের মতাদর্শই নেই.. ?? তারা যুক্তি দিয়ে বিরোধিতা করে না, করে খিস্তি দিয়ে.. patriarchal society এর সর্বগুন সম্পন্ন উন্নত মানের product এই নর্দমা কীটগুলো (কীট রাও better).. আর সে জন্যই patriarchal ভোটবাজ party গুলোর খুবই গুরুত্বপূর্ণ সদস্য এরা.. এদের নোংরামো ভাঙিয়ে খিস্তি ভাঙিয়ে বীর্য ভাঙিয়ে লাম্পট্য ভাঙিয়ে খুনি-রক্তমাখা হাতের উপর দাঁড়িয়ে সুখে বাঁচে ওপর মহল আর মাঝে মধ্যেই ঢাকাই জামদানী স্যুট বুট গটগটিয়ে "শালীনতা" ,"নিরাপত্তার" কেতাদূরস্ত ভাষণ খাইয়ে দিয়ে যায়.. মুখে বললেও আদ্যপান্ত patriarchal এই পার্টিগুলো দেবে নিরাপত্তা ?? তাদের কারোর স্পর্ধা আছে তাদেরই পালন করা আয়তুতু লালুভুলুদের দল থেকে ঘাড় ধরে বার করে দেওয়ার বা পরিস্কার জানিয়ে দেওয়ার যে এরকম supporters তাদের চাইনা???? না নেই.. এই লম্পট গুলো না থাকলে ভোট আদায় করে দেবে কে ?? অনমনীয় শিড়দাড়া ভাঙতে পরিবার পরিজনের উপর হামলা বা রেপ করবে কে??সহজলব্ধ "sex toy" (নারী) রা দুস্প্রাপ্য মানবী হয়ে উঠলে, অধিকার বুঝে নিতে শিখে গেলে অ্যাসিড ঢেলে ঠান্ডা করবে কে ?? এদেরই বিরুদ্ধে step নিতে হলে এত খরচা করে এদের আর পোষা কেন বাপু??
    এই লম্পটগুলো মাথায় রক্ত উঠলে বিরুদ্ধ মত খুন করবে আর মাথায় sex উঠলে বিরোধী (নিজের দল বাদ যায় কিনা doubt আছে) মেয়েদের "কমরেন্ডি ","বেশ্যা" বলবে মলেস্ট করবে রেপ করবে এতে অবাক হওয়ার কি আছে???
    যাদের মস্তিস্কটাই আস্ত যৌনাঙ্গ তারা কি বুঝবে মানবী কাকে বলে?? তারা হাজারবার জন্মালেও হাজারটা দলের পতাকা চিবোলেও বুঝবেনা কমরেড কাকে বলে...
    তাদের ঘৃণ্য চিন্তনের দ্রুত মৃত্যু কামনা করি...





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     Patriarchy is Manusmriti.I would never stand with Patriarchy whatever may come!

    As far as Sumanta`s act,I am rather surprised and more shocked to see this happen to divert the basic and burning  issues as Sandhya Navodita rightly said.Rather we should focus on the basic issues so that it is very important that we should not focus on a diversion and it would waste our time and energy.

    I am quite clear about my ultimate destination.The Humanity equipped with equality and justice.I always stand for the fight for equality and justice.For which we have to fight the Absolute Fascism and we may not afford to waste time for an ignorant.We are trapped in such artificial Free market issues we may not activate our resources as Hegemony wants us to continue such false discourse.


    Palash Biswas



     I am not supporting Sumanat Bhattacharya anyway.But I was pointing out the psyche of patriarchy which changes our language to justify the way we often abuse woman and it has becomce culture and ideology.I always spoke and wrote that Patraarchy is Manusmriti.I would never stand with Patriarchy whatever may come.


    I do not remember to have patriarchal crime at any point as Ashutosh Kumar hinted.


    As far as Sumanta`s act,I am rather surprised and more shocked to see this happen to divert the basic and burning  issues as Sandhya Navodita rightly said.Rather we should focus on basic issues so that it is very important that we should not focus on a diversion and it would waste our time and energy.


    I am just pointing out the media link and status which changed so violently and has been affliated to the patriarchal hegemony.It is rather very important for me.


    I always try to speak human and I am not detached from the society.


    I am quite clear about my ultimate destination.The Humanity equipped with equality and justice.I always stand for the fight for equality and justice.


    I may not defend anyone who speak or write againt woman and  my ideals are Rabindra and Sharat who favoured feminism at every level in any circumstance and suppored freedom of woman.


    This morning I talked to Sumanta  and I told him that difference of opinion in a democratic society is always welcome but the language he used,it surprised me  and it does not reflect his opinion at all.He should change the language first.This debate is nonsense.


    Freedom of Sex and Free Sex are quite different points.The woman should have full freedom and she has every right to have her final say in sex ,too just because the society, economy, politics and religion and even technology and medium and genre,aesthetics and linguistic in a patriarchal society makes woman a sex slave.


    Kabita Krishanan means exactly that.


    On the other hand, FREE SEX is rather the free market culture which makes the celebration of life an affair of purchasing power and it makes man and woman irrespective of identity,status and gender a commodity and denies the freedom of selection, conscience,love and passions,humanity.


    Free Sex is Just marketing!It is Humanity free.Free sex is not freedom nor it is celebration of life.Freedom of Sex is essential to recognize the humanity of anyone irrespective of gender!


    I was making it clear that I protest this inhuman linguistics of fascism from a professional journalist who incidentally has far better status than me and with whom I was linked in my job as I personally did not imagine that he changed so violently.


    I am pained and the ritual of protest and condemn is not enough to get over the passionate loss which my friends who know me do not understand and brand me as a lawyer of patriarchy and fascism.I am even more shocked for my failure in a discourse that I could not clarify my point.

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  • 05/23/16--10:23: मतुआ माता मारामारी में जख्मी मदन मित्र के समर्थक आपसे में भिड़े रेड अलर्ट!रूपा गांगुली पर हमले के बाद दिलीप घोष ने चुनौती दी है कि तृणमूल सासंद दिल्ली तक कैसे पहुंचेंगे वे देखेंगे! भाजपा नेत्री रूपा गांगुली के पिटे जाने पर जश्न मनाना सरासर गलत है।दीदी मोदी गठबंधन के मद्देनजर यह एक बहुत बड़े खतरे का रेड अलार्म है।खासकर जब दीदी बार बार कार्यकर्ताओ और समर्थकों को सख्ती से आदेश जारी कर रही हैं कि हिंसा का सिलसिला तुरंत बंद होना चाहिए तब संघ परिवार के चेहरे को जख्मी कर देने का मतलब यह है कि बंगाल में अब इतनी ज्यादा अराजकता है कि सत्तादल सुप्रीमो और मुख्यमंत्री का अपने हिंसक बाहुबलि कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर कोई नियंत्रण नहीं है। ममता दीदी ने चुनाव के दौरान जो इंच इंच बदला लेने का ऐलान किया ,उसी पर अमल हो रहा है।रूपा गंगागुली और भाजपा के संघी बंगाल अध्यक्ष इस बेलगाम हिंसा और अराजकता के लिए कम जिम्मेदार नहीं है क्योकि दोनों उग्रतम हिंदुत्व का रास्ता अखितयार करके बंगाल में केसरिया सुनामी पैदा करने के चक्कर में इसी हिंसा और अराजकता को लगातार तेज करने में सत्तादल से कोई कम नहीं है।विडंबना तो

  • তৃণমূল সাংসদরা কীভাবে দিল্লি যান-আসেন, দেখব ; হুঁশিয়ারি দিলীপের

    কলকাতা, ২৩ মে : রাজ্যে ক্রমবর্ধমান ভোট পরবর্তী সন্ত্রাস নিয়ে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়কে সরাসরি হুঁশিয়ারি দিলেন BJP রাজ্য সভাপতি, জয়ী প্রার্থী দিলীপ ঘোষ। তিনি বলেন, রাজ্যে হিংসা বন্ধ না হলে তাঁরা চুপ করে বসে থাকবেন না। বলেন, "বাংলায় কী হবে জানি না, বাংলার বাইরে আমরা আছি।…

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    मतुआ माता मारामारी में जख्मी

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    रेड अलर्ट!रूपा गांगुली पर हमले के बाद दिलीप घोष ने चुनौती दी है कि तृणमूल सासंद दिल्ली तक कैसे पहुंचेंगे वे देखेंगे!

    भाजपा नेत्री रूपा गांगुली के पिटे जाने पर जश्न मनाना सरासर गलत है।दीदी मोदी गठबंधन के मद्देनजर यह एक बहुत बड़े खतरे का रेड अलार्म है।खासकर जब दीदी बार बार कार्यकर्ताओ और समर्थकों को सख्ती से आदेश जारी कर रही हैं कि हिंसा का सिलसिला तुरंत बंद होना चाहिए तब संघ परिवार के चेहरे को जख्मी कर देने का मतलब यह है कि बंगाल में अब इतनी ज्यादा अराजकता है कि सत्तादल सुप्रीमो और मुख्यमंत्री का अपने हिंसक बाहुबलि कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर कोई नियंत्रण नहीं है।

    ममता दीदी ने चुनाव के दौरान जो इंच इंच बदला लेने का ऐलान किया ,उसी पर अमल हो रहा है।रूपा गंगागुली और भाजपा के संघी बंगाल अध्यक्ष इस बेलगाम हिंसा और अराजकता के लिए कम जिम्मेदार नहीं है क्योकि दोनों उग्रतम हिंदुत्व का रास्ता अखितयार करके बंगाल में केसरिया सुनामी पैदा करने के चक्कर में इसी हिंसा और अराजकता को लगातार तेज करने में सत्तादल से कोई कम नहीं है।विडंबना तो यह है कि बंगाल में कमसकम सौ सीटों पर भाजपा के भारी वोट काटने से दीदी जो 45 फीसद वोट से जीत गयी कांग्रेस वाम गठभंधन के खिलाफ क्योंकि उन्हें जिताने के मकसद से गठबंधन को हराने के लिए संग परिवार ने अपनी सारी ताकत झोंक दी और दीदी और मोदी नये सिरे से राजग में एकजुट होने की प्रक्रिया में हैं तो ऐसे वक्त में संग परिवार के बंगाली चेहरे पर ही सत्तादल का हमला हो गया।

    इसी बीच असम के भावी मुख्यमंत्रियों ने असम के बांग्लादेशियों को खदेड़ने के लिए युद्ध घोषणा कर दी है।

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप


    भाजपा नेत्री रूपा गांगुली के पिटे जाने पर जश्न मनाना सरासर गलत है।दीदी मोदी गठबंधन के मद्देनजर यह एक बहुत बड़े खतरे का रेड अलार्म है।खासकर जब दीदी बार बार कार्यकर्ताओ और समर्थकों को सख्ती से आदेश जीरी कर रही हैं कि हिंसा का सिलसिला तुरंत बंद होना चाहिए तब संघ परिवार के चेहरे को जख्मी कर देने का मतलब यह है कि बंगाल में अब इतनी ज्यादा अराजकता है कि सत्तादल सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपने हिंसक बाहुबलि कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर कोई नियंत्रण नहीं है।


    हालात इतने भयंकर है कि मतुआ आंदोलन की दखलदारी के लिए ठाकुरबाड़ी में अभूतपूर्व हंगाम हो गया और इस मारामारी में नब्वे साल से ज्यादा उम्र की मतुआ माता बड़ो मां जख्मी हो गयी तो कमरहट्टी में जेल में बंद पूर्व मंत्री मदन मित्र की हार के बाद वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में तृणमूल बाहुलि आपस में भिड़ गये।भाजपा ने ममता बनर्ज के घर तक जुलूस निकालने की कोशिश की तो पुलिस ने रोक दिया तो वाम कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों की जान माल बचाने के लिए राजभवन पहुंचकर राज्यपाल से एकसाथ वाम नेता सूर्यकांत मिश्र और प्रदेश कांगेर्स अध्यक्ष गुहार लगाकर आये हैं।फिरभी हमले थमने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।


    इसी बीच असम के संघी सिपाहसालार सर्बानंद सोनोवाल ने असम के बांग्लादेशियों को खदेड़ने के लिए युद्ध घोषणा कर दी है।गौरतलब है कि असम विधानसभा चुनावों में शानदार जीत दर्ज करने वाली बीजेपी के विधायकों ने रव‍िवार को सर्बानंद सोनोवाल को विधायक दल के नेता के रूप में चुना। सर्बानंद 24 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।


    असम के भावी मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने शनिवार को कहा कि घुसपैठ पर रोक लगाने के लिए बांग्लादेश से लगती सीमा को दो साल के अंदर सील कर दिया जाएगा. 1980 के दशक के दौरान हुए विदेशी विरोधी आंदोलन के दौरान हुए छात्र आंदोलन से राजनीतिक पटल पर उभरे सोनोवाल ने चुनाव में बीजेपी को जीत दिलाई। उन्होंने घुसपैठ और उसे रोकने की कोशिश के मुद्दे को अपनी सरकार की प्राथमिकता में रखा है।


    बहरहाल ममता बनर्जी चुनाव के दौरान जो इंच इंच बदला लेने का ऐलान किया ,उसी पर अमल हो रहा है।रूपा गंगागुली और भाजपा के संघी बंगाल अध्यक्ष इस बेलगाम हिंसा और अराजकता के लिए कम जिम्मेदार नहीं है क्योकि दोनों उग्रतम हिंदुत्व का रास्ता अखितयार करके बंगाल में केसरिया सुनामी पैदा करने के चक्कर में इसी हिंसा और अराजकता को लगातार तेज करने में सत्तादल से कोई कम नहीं है।विडंबना तो यह है कि बंगाल में कमसकम सौ सीटों पर भाजपा के भारी वोट काटने से दीदी जो 45 फीसद वोट से जीत गयी कांग्रेस वाम गठभंधन के खिलाफ क्योंकि उन्हें जिताने के मकसद से गठबंधन को हराने के लिए संग परिवार ने अपनी सारी ताकत झोंक दी और दीदी और मोदी नये सिरे से राजग में एकजुट होने की प्रक्रिया में हैं तो ऐसे वक्त में संग परिवार के बंगाली चेहरे पर ही सत्तादल का हमला हो गया।


    जाहिर है कि बजरंगियों और संघियों के लिए भी निरंकुश सत्ता उसीतरह खतरनाक है जैसे कि बाकी नागरिकों के लिए।बंगाल में जनादेस के बाद भाजपा समेत समूचे विपक्ष को तहस नहस करने का जो माहौल बना है,वह गणतंत्र के लिए खतरा तो है ही,अलग विचारधारा अलग राजनीति करने वाले तमाम नागरिकों की जान माल की सुरक्षा के लिए भी बेहद खतरनाक है।बजरंगियों और संघियों के लिए भी।


    गौरतलब है कि  भाजपा ने बंगाल में  सिर्फ  तीन ही सीटें जीत सकी है लेकिन ममता बनर्जीने जीएसटी बिल का समर्थन किया है। ममता बनर्जीने कहा कि भारतीय जनता पार्टी से उनकी पार्टी के वैचारिक मतभेद हैं, लेकिन वह मोदी सरकार को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक पारित करने में सहयोग देगी। जाहिर है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में भाजपा बेशक कोई खास करिश्मा न कर सकी हो लेकिन वहां ममता और जया की जीत ने केंद्र में उसकी राह जरूर आसान कर दी है।


    गौरतलब है कि चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जीने घोषणा कि तृणमूल कांग्रेस राज्‍य सभा में जीएसटी बिल का समर्थन करेगी। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां इस बिल की सबसे बड़ी विरोधी हैं।जाहिर है कि लगातार दो चुनावी जीत के बाद ममता बनर्जीऔर जयललिता की केंद्र में धमक बढ़ना तय माना जा रहा है। केंद्र सरकार को तृणमूल और अन्नाद्रमुक से राज्यसभा में अटके पड़े जीएसटी समेत कई महत्वपूर्ण बिलों पर समर्थन की जरूरत पड़ेगी।


    हालांकि लेफ्ट केरल में सत्‍ता पाने में कामयाब रही लेकिन कांग्रेस को असम और केरल दोनों गंवाने पड़े। इसके चलते उनकी स्थिति राज्‍य सभा में कमजोर होगी।


    ममता की पार्टी अगर राज्‍य सभा में जीएसटी का समर्थन करती है तो एनडीए के पास 12 सांसदों का समर्थन और मिल जायेगा।बाकी लटके हुए विधेयकों को पास कराने में दीदी की भूमिका अहम होगी।इसी के मद्देनजर केंद्र  सरकार राज्यसभा में वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) बिल के पारित होने को लेकर आश्वस्त है। वित्त मंत्री अरुण जेटली का मानना है कि देश का राजनीतिक समीकरण अब बदल चुका है लिहाजा कांग्रेस समर्थन करे या न करे संसद के अगले सत्र में जीएसटी बिल पारित होकर रहेगा।


    बहराहल 2011 के विधानसभा चुनाव में चार प्रतिसत के बदले दस फीसद वोट हासिल कर लेने और असम समेत पूर्वोत्तर में केसरिया सुनामी रच देने के बाद ंबगल के केसरियाकरण अभियान को तेज करने की ताकीद के कारण रूपा गांगुली पर इस हमले के बावजूद संघ परिवार हर हालत में उग्र हिंदुत्व का विकल्प चुन रहा है।


    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बावजूद कांग्रेस और माकपा के नेताओं ने कहा है कि राज्य में उनका गठबंधन बना रहेगा।


    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने कहा, ''हमने केवल इस चुनाव के लिए गठबंधन नहीं बनाया। आने वाले दिनों में गठबंधन बना रहेगा। हम भविष्य में भी साथ लड़ेंगे।''उनके साथ माकपा के प्रदेश सचिव सूर्यकांत मिश्रा मौजूद थे।


    मिश्रा ने कहा, ''हम जनमोर्चे के साथ बने रहेंगे। हमें तृणमूल कांग्रेस के आतंक के खिलाफ मिलकर लड़ना होगा। तृणमूल कांग्रेस बंगाल में विपक्ष के सफाए की कोशिश कर रही है और हम सब को उसके खिलाफ मिलकर लड़ना होगा।''माकपा नेतृत्व वाला वाम मोर्चा और कांग्रेस के नेताओं ने आज संयुक्त रूप से राज्यपाल के एन त्रिपाठी से मुलाकात की जिसके बाद दोनों नेताओं ने संवाददाताओं से बात की।


    दोनों दलों ने राज्य में 'चुनाव के बाद हुई हिंसा'को लेकर राज्यपाल को एक ज्ञापन भी सौंपा।


    यह पूछे जाने पर कि क्या दोनों दल ममता बनर्जी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे, चौधरी और मिश्रा ने कहा, ''राज्य में जिस तरह की स्थिति है, विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमला हो रहा है, वह किसी भी तरह के समारोह में शामिल होने के अनुकूल नहीं है। हालांकि हमें अब तक किसी भी तरह का निमंत्रण नहीं मिला है। हम समारोह में शामिल ना हो पाएं।''तृणमूल कांग्रेस ने 294 सदस्यीय विधानसभा की 211 सीटें जीतकर हालिया चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया जबकि कांग्रेस-वाम गठबंधन को महज 76 सीटों से संतोष करना पड़ा।


    खड़गपुर से विधानसभा पहुंचने वाले बंगाल भाजपा के संघी अध्यक्ष दिलीप घोष ने यादवपुर विश्वविद्यालय के बजरंगी हमले के अपने बेहया बयान का सिलसिला जारी रखकर अब चुनौती दी है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसद नई दिल्ली कैसे पहुंचेंगे,वे देख लेगे जबकि दूसरी तरफ भाजपा समेत समूचे विपक्ष पर सत्ता दल का सिलसिलेवार हमले जारी है।


    गौरतलब है कि छेड़छाड़ का आरोप लगाने वाली यादवपुर विश्व विद्यालय (जेयू) की छात्राओं को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोषकी ओर से बेहया कहे जाने पर भाजपा नेता रुपा गांगुली और लॉकेट चटर्जी ने अलग-अलग रास्ता अपनाया है।भाषाई शालीनता बरतने की नसीहत देते हुए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोषको खुद सीमाएं लांघते देखे गये जब उन्होंने छेड़छाड़ का आरोप लगाने वाली यादवपुर विश्वविद्यालय (जेयू) की छात्राओं को बेहया कहा।गौरतलब है कि उनके इस तेवर के मद्देनजर इस मुद्दे पर संघपरिवार की महिला नेताओं को भी मुंह चुराना पड़ रहा है।दिलीप घोषने कहा कि ऐसे छात्रों की पिटाई की जानी चाहिए. एहसानफरामोश की तरह हैं कुछ छात्र।


    घोष ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गठबंधन के उम्मीदवार ज्ञान सिंह सोहनपाल को हराकर खडगपुर सदर सीट जीती है। इसके अलावा भाजपा ने मालदा की वैष्णवनगर सीट और मादारीहाट सीट पर गठबंधन के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की है।


    बहरहाल सैकड़ों पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास की तरफ मार्च करने का असफल प्रयास किया। वे पार्टी नेता रूपा गांगुली पर कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के कल के हमले के विरोधस्वरूप मुख्यमंत्री आवास की तरफ जा रहे थे।


    दक्षिण कोलकाता के हाजरा चौराहे पर बड़ी संख्या में पुलिस मौजूद थी जहां भाजपा के नेताओं ने रैली की जिनमें बंगाल इकाई के पूर्व अध्यक्ष राहुल सिन्हा और वर्तमान अध्यक्ष दिलीप घोष मौजूद थे। इन नेताओं ने कालीघाट स्थित मुख्यमंत्री के आवास की तरफ मार्च करने का प्रयास किया।


    पुलिस ने रैली को आशुतोष मुखर्जी मार्ग के पास रोक दिया जिसमें रूपा गांगुली और लॉकेट चटर्जी भी शामिल थे।


    दूसरी ओर नई दिल्ली में दिल्ली प्रदेश भाजपा प्रभारी श्याम जाजू व प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के नेतृत्व में रविवार को पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं ने गोल मार्केट में स्थित मॉर्क्‍सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के कार्यालय के बाहर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता पार्टी व स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं पर केरल में हो रहे हिंसक घटनाओं के विरोध सीपीएम कार्यालय के बाहर हल्ला बोला था।

    प्रदर्शन के दौरान स्थिति पर काबू करने के लिए भारी संख्या में सुरक्षा बल की तैनाती की गई थी, लेकिन जब प्रदर्शनकारी उग्र होने लगे और कार्यकर्ता वहां लगे तीनों बैरिकेट्स को तोड़ कर कार्यालय की और बढ़ने लगे, तो इसी बीच पुलिस ने पानी की बौछार की। इस पर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश उपाध्याय के साथ पार्टी के कार्यकर्ता सीपीएम ऑफिस से चंद कदमों की दूरी पर धरने पर बैठ गए और सीपीएम के खिलाफ नारेबाजी करने लगे।

    सतीश उपाध्याय ने कहा कि केरल एवं पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास है और पिछले 25 वर्ष में वामपंथियों ने 200 से अधिक संघ कार्यकर्ताओं की हत्या की है। केरल में सीपीएम की जीत के बाद से भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा में तेजी आई है और दो कार्यकर्ताओं की हत्या के अलावा 60 अलग-अलग घटनाओं में कार्यकर्ताओं और उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया है।

    पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन जब नहीं मानें तो मंदिर मार्ग थाना पुलिस ने सैकड़ों कार्यकर्ताओं समेत पार्टी के पदाधिकारियों को हिरासत में ले लिया। हालांकि, कुछ समय बाद सभी को रिहा कर दिया गया। इस बीच भाजपा कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन पर कार्यालय के अंदर से बोतल व पत्थर फेंकी गई।


    इसी बीच बंगाल में भाजपा के राज्य प्रमुख ने कहा, ''हम यहां मुख्यमंत्री से मिलने और राज्य में चुुुनावों के बाद भी जारी हिंसा के बारे में बताने आए। लेकिन पुलिस ने हमें रोक लिया.. लेकिन मैं उन्हें :पुलिस: सलाह देता हूं कि हमें रोकने के बजाए उन्हें गुंडों को रोकना चाहिए।''उन्होंने कहा कि अगर राज्य प्रशासन ''चुनाव बाद हिंसा पर रोक लगाने के लिए उपयुक्त कदम''नहीं उठाता है तो भाजपा जिलों में धरना..प्रदर्शन करेगी।


    घोष ने कहा कि पार्टी 27 मई को ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार करने और इसे ''काला दिवस''के तौर पर मनाने का विचार कर रही है।


    गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कुछ हद तक अपना प्रभाव खो चुकी भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया है और इस बार उसने 70 से अधिक सीटों पर विपक्षी वाम मोर्चे और कांग्रेस के गठबंधन का खेल बिगाडने का काम किया है। हालांकि पश्चिम बंगाल में भाजपा को हासिल हुए मतों का प्रतिशत वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के 17.5 प्रतिशत की तुलना में गिरकर इन विधानसभा चुनावों में 10.2 प्रतिशत पर आ गया लेकिन पहली बार पार्टी ने इस राज्य में अपने दम पर चुनाव लडकर तीन सीटें हासिल की हैं। इससे पहले, भाजपा वर्ष 2011 में उपचुनावों में दो बार जीत चुकी है और उसका मत प्रतिशत 4.06 रहा था।


    आंकडों और भाजपा के मतप्रतिशत से पार्टी के प्रदेश नेतृत्व का हौसला बुलंद है जो उनके अभूतपूर्व आक्रामक तेवर से साफ है।क्योंकि इन्हों