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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    फासिस्ट ताकतों का बाप अब अमेरिका है तो मां इजराइल।

    नवउदारवाद के बच्चे और मसीहावृंद उन्हींकी संतानें हैं।

    फासिज्म का चेहरा सिर्फ संघ परिवार नहीं,अमेरिका और इजराइल भी उसमें शामिल हैं!

    पलाश विश्वास

    फासिज्म का चेहरा सिर्फ संघ परिवार नहीं,अमेरिका और इजराइल भी उसमें शामिल हैं!

    फासिज्म अब ग्लोबल आर्डर है और हिंदुत्व सिर्फ उसका एक अदद रंग है।

    जाति उन्मूलन अनिवार्य है और इंसानियत का मुल्क बनाना बेहद जरुरी है तो देश दुनिया को जोड़े बिना हम अपने अपने द्वीपों में सही सलामत मारे जाने को नियतिबद्ध है और किसी मसीहा हमें मुक्ति नहीं दिला सकता जबतक हम खुद मुक्ति संग्राम में शामिल न हों।

    मेरे पिता जमीनी कार्यकर्ता थे और जैसे हमारे पुरखों की फितरत थी कि किसी मसले या मुद्दे को लेकर उनकी प्रतिक्रिया त्वरित होती थी और वे सीधे सत्ता से भिड़ जाते थे।ब्रिटिश राज के दौरान यह बार बार हुआ।तमाम आदिवासी और किसान विद्रोहों का कुल किस्सा यही है।दमन के जरिये सत्ता ने ऐसे तमाम विद्रोहों को रफा दफा कर लिया।


    मेरे पिता ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह के नेता भी थे,जो नैनीताल की तराई में लालकुंआ रेलवे जंक्शन के पास तराई के सभी किसानों और भूमिहीनों की जल जमीन जंगल की लड़ाई थी और उस आंदोलन का नतीजा दमन के मुकाबले बिखराव में हुआ।


    हमारे पुरखे हमेशा हारते रहे और लड़ते रहे और हमेशा सत्ता जीतती रही और आभिजात आधिपात्य ने अंततः प्रकृति से जुडे़,कृषि से जुड़े तमाम समुदायों,नस्लों और इलाकों पर एकाधिकार कायम कर लिया।पहले लड़ाकों का दानवीकरण हुआ और आजादी के बाद वही सिलसिला जारी है।


    हारने की ऐसी बुरी लत लगी है कि हम जीतने का ख्वाब भी नहीं देखते।


    एकमुश्त अंबेडकरी और कम्युनिस्ट पिता जब तक जिंदा थे,तब तक राजनीतिक मतभेद के बावजूद हमारी उनसेमुख्य बहस इसीको लेकर होती रही कि अगर लड़ना ही तो रणनीति और तैयारी के साथ क्यों न लड़े।


    स्वाध्याय के बूते जितना वे जानते थे,मैं देश दुनिया से जुड़ने की उनकी कोशिशों की वजह से हमेशा कुछ ज्यादा जानता रहा हूं और पिता जमीनी हकीकत के हवाले से मेरी हर दलील को किताबी कहकर खारिज कर दिया करते थे।


    भाववादी तौर तरीके से बुनियादी बदलाव की किसी परिकल्पना के बिना हम कोई भी लड़ाई जीत नहीं सकते क्योंकि सत्ता के आभिजात्य वर्ग के पास सत्ता के अलावा राष्ट्र का समूचा सैन्य तंत्र है और दमन पर उतारु उसकी फौजें लोकतंत्र और संविधान, कानून के राज,नागरिक और मानवाधिकार की बात रही दूर,मनुष्यता और प्रकृति की परवाह भी नहीं करता।


    अर्थशास्त्र पर एकाधिकार और राजनीतिक सत्ता के दम पर सत्ता वर्ग हर आंदोलन और प्रतिरोध को खत्म कर देता है।हम तमाम भावों और भाववादों,मिथकों और धर्मोन्माद,अस्मिताओं और प्रतीकों के अमूर्त संसार मुक्त बाजार का कार्निवाल के हिस्से ही हैं जहां हर चेहरा या तो कंबंध है या सिर्ऎप मुखौटा।


    हकीकत की जमीन पर खड़े होने का न हमारा विवेक है और न साहस और मनुष्य हम नामवास्ते हैं और दरअसल हम रीढ़विहीन विचित्र प्रामी हैं,जिसकी सारी संवेदनाएं मरी हुई बासी सड़ी गली मछलियां हैं।


    व्यवस्था और राष्ट्र में परिवर्तन का यह कोई प्रस्थानबिंदू हो ही नहीं सकता बशर्ते कि हममें से कुछ लोग जुनून की हद तक बिल्कुल मेरे पिता की तरह सत्ता और आभिजात्य के चक्रव्यूह को अकेले अभिमन्यु की तरह तोड़ने की कोशिश करते रहे।


    पिछले दिनों देशभर के मित्रों से आमने सामने और फोन और दूसरे माध्यमों पर मेरी बहस का प्रस्थानबिंदू यही रहा है कि अब समस्याएं,मुद्दे और मसले स्थानीय नहीं हैं।राष्ट्रीय भी नहीं है।


    सारी समस्याएं ग्लोबल है और उनके मुकाबले सारी दीवारे गिराकर मोर्चाबंदी करने की अगर हमारी तैयारी नहीं है तो बेहतर हो कि इसी लूटतंत्र का हिस्सा बनकर जितना चाहे उतना बटोर लें या बजरंगी बनकर मोक्ष प्राप्त कर लें।


    हम जात और धर्म ही पूछते रहेंगे तो हमें याद रखना चाहिए क्रयशक्ति पर वर्चस्व जिनका है,उनकी न कोई जाति है और न उनका कोई धर्म है।


    उन सबमें रिश्तेदारी है चाहे उनकी जाति कोई हो या धर्म कोई हो या नस्ल या देश कुछ भी हो।


    हम पीड़ित उत्पीड़ित अछूत वंचित मारे जाने को अभिशप्त लोग ही जाति धर्म के नर्क में रोज रोज महाभारत जी रहे हैं और वे हर महाभारत न सिर्फ रच रहे हैं,बिना प्रतिरोध जीत रहे हैं और हमारे संसार में विधवा विलाप के अलावा कोई वसंत राग नहीं है और न बहार है।


    हमारे हिस्से में कोई जन्नत नहीं है और हम सिर्फ कयामतों के वारिसान हैं जो कयामतों की विरासत के शरीक हैं और अपनी तबाही का सामान जुटाने के लिए घमासान कर रहे हैं।हम अपने बच्चों को बलि चढ़ाने वाले हैवान हैं।


    पूंजीवाद के पतन के साथ साथ लोककल्याणकारी राज्य का अवसान हो गया है और मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों सट्टाबाजी की मुनाफावसूली में तब्दील है जबकि देश गैस चैंबर और मृत्यु उपत्यका ही नहीं,बल्कि एक अनंत कैसिनो है।


    इस महान जुआघर में हमारी जानमाल,जल जंगल जमीन से लेकर पूरी कायनात दांव पर है और इंसानियत का कोई वजूद ही नहीं है।


    यह अभूत पूर्व संकट है कि सत्तावर्ग ग्लोबल है और हिंदुत्व एजंडा की तरह उनका हर कार्यक्रम ग्लोबल है विश्व बैंक,अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और संयुक्त राष्ट्रसंघ से लेकर नोबेल पुरस्कार और यूनेस्को तक कुल किस्सा यही है।


    जो विदेशी वित्तपोषित संस्थाएं है उनके कार्यकर्ता देश में नहीं विदेश से कार्य करती है तो हमारी सरकार और संसद का आधारक्षेत्र भी वाशिंगटन है।


    हम किसी स्थानीय मोर्चे पर किलेबंदी से पाषाणकालीन हथियारों के दम पर जाति धर्म और नस्ल,भाषा और संस्कृति के गृहयुद्ध में निष्णात होकर वैश्विक सत्ता और वैश्विक सत्तावर्ग से लड़ ही नहीं सकते।


    इसी वजह से हम हर जंग हारने के इतिहास की पुनरावृत्ति करते हैं बार बार और सत्ता से टकराने के बजाय आपस में कभी मंडल तोकभी कमंडल के नाम लड़ते हैं और लहुलुहान होते रहते हैं जबकि समस्याएं हमेशा जस की तस नहीं रहती,विकास दर और आंकड़ों,रेटिंग और तकनीक की तरह यूजर फ्रेंडली सशक्तीकरण समावेश और समरसता की आड़ में वे निरंतर जिटिल से जटिल होती रहती हैं।


    संकट अभूतपूर्व है क्योंकि फासिज्म किसी एक देश का अंधराष्ट्रवाद नहीं है और यह एक वैश्विक तंत्र है,जिसकी पूरी संरचना मुक्तबाजार है।


    फासिस्ट ताकतों का बाप अब अमेरिका है तो मां इजराइल।


    नवउदारवाद के बच्चे और मसीहावृंद उन्हींकी संतानें हैं।


    यह महज संदजोग नहीं है कि ट्रंप जो बकते हैं वह हमारे बजरंगी ब्रिगेड की किसी भी सिपाही या सिपाहसालार की मौलिक बकवास है और उसका सौंदर्यशास्त्र खुल्लमखुल्ला मनुस्मृति और रंग भेद दोनों हैं।


    और फासिज्म से जुड़़े सारे संगठन विशुद्धतावादी नरसंहारी कि क्लाक्स क्लान है।


    अब जैसे अमरीका ने कहा है कि परमाणु हथियारों और सामग्री की जिम्‍मेदारी से निगरानी करने में भारत की भूमिका महत्‍वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की वाशिंगटन यात्रा से पहले राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ बैठक में अमरीका के विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा कि भारत विश्‍व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और प्रौद्योगिकी और ऊर्जा संबंधी अनेक मुद्दों पर अमरीका का सच्‍चा भागीदार है।


    दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद का आचरण और इतिहास देख लीजिये और भारत को अस्थिर करने वाली तमाम गतिविधियों की फाइलें निकाल लीजिये तो इस बयान का आशय समझ में आयेगा।बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम में अमेरिकी सातवें नौसैनिक बेड़ा का मकसद भी भारत को इराक, अफगानिस्तान, वियतनाम,लातिन अमेरिका,सीरिया लीबिया जैसा कुछ बना देना ही था।


    किसी कन्हैया के बयान पर हम सिखों के नरसंहार और गुजरात नरसंहार के अंतर को लेकर राष्ट्रीय विमर्श में शामिल हो जाते हैं बिना इसकी परवाह किये कि गुजरात नरसंहार और सिख संहार के सारे युद्ध अपराधी न सिर्फ छुट्टा घूम रहे हैं बल्कि वे देश और देश की जनता के भाग्य विधाता बन गये हैं जबकि पीड़ितों को न्याय अभी उसीतरह नहीं मिला जैसे भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों कि नियत पीढ़ी दर पीढ़ी विकलांग होते जाने की है और हम हरित क्रांति की कोख से पैदा इसी त्रासदी का विस्तार मनसेंटो साम्राज्य की ठेके पर खेती के जरिये करने जा रहे हैं जबकि हर साल तोक भाव से देशके कोने कोने में किसान आत्म हत्या करने को मजबूर हैं।


    भारत में फासिज्म के मुकाबले के लिए भारत अमेरिका संबंध की विरासत को समझना बेहद जरुरी है  तो यह भी समझना अनिवार्य है कि फलीस्तीन का समर्थन करते रहने के बावजूद हमने फलस्तीन की कीमत पर इजराइल से प्रेम पिंगें किस अभिसार के लिए बढ़ा ली है।


    भारतीय सत्ता से ही आपका मुकाबला नहीं है क्योंकि इस फासिस्ट सत्ता का प्राण पाखी उसीतरह अमेरिका और इजराइल में हैं जैसे हमारे तमाम आदरणीय राष्ट्रनेता अप्रवासी भारतीय हवा हवाई लख टकिया बूट सूट प्रजाति है,जिनके लिए भाड़ में जाये देश,बाड़ में जाये देश के लोग,विदेशी पूंजी और विदेशी हितों का अबाध प्रवाह बना रहे ताकि वे सुखीलाला की महाजनी के साथ साथ ब्रिटिश राज से तोहफे में मिली जमींदारियों और रियासतों का कारोबार लाशों के समंदर में और आसमान में भी जारी रख सकें।


    अब इसे बी समझ लीजिये कि अमेरिका ने भारत की नेतृत्व क्षमता और जिम्मेदारपूर्ण रवैए की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए गुरुवार को कहा कि परमाणु हथियार और परमाणु सामग्री के जिम्मेदार प्रबंधन में भारत को अति महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।


    केरी ने कहा कि मौजूदा परिदृश्य में जहां हम देखते हैं कि कुछ ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं जिससे हथियारों की होड़ को तेज गति मिल सकती है तो ऐसे में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हमने इस मसले को अन्य साझीदारों के समक्ष भी उठाया है। उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन कम करने में भारत की भूमिका की तारीफ की ।

    केरी ने उम्मीद जताई कि शिखर सम्मेलन सभी देशों को विश्व के प्रति उनकी जिम्मेदारी और उनके द्वारा उठाए गए कदमों के परिणाम की बेहतर समझ पैदा करेगा। डोभाल ने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका का संबंध नई ऊंचाइयों को छुएगा और इसे और मजबूती मिलेगी। भारत और अमेरिका के सामने कई समस्याएं एक जैसी हैं जैसे आतंकवाद, साइबर हमले और दोनों देश इससे निपटने के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं।  


    कैरी ने कहा कि पेरिस में जलवायु समझौता कराने में भारत के नेतृत्‍व के लिए अमरीका विशेष रूप से आभारी है। अमरीकी विदेश मंत्री ने कहा कि राष्‍ट्रपति ओबामा ने भारत के साथ संबंधों को इस शताब्‍दी का सबसे अहम संबंध बताया है, और उनके ऐसा कहने के पीछे कई कारण है। अमरीका के साथ सहयोग बढ़ने की आशा करते हुए श्री डोभाल ने कहा कि दोनों देश आतंकवाद जैसी समस्‍याओं से निपटने के लिए मिलकर काम करेंगे।


    इस जलवायु विमर्श का हश्र हम बढ़ते हुए तापमान,बदलते मौसम के कयामती मंजर में पिघलते हुए ग्लेशियरों के साथ क्या समझते सुनामियों भूकंपों से बार बार घिरकर,तबाह होतर भी समझ नहीं पा रहे हैं और न इनसे निपटने की हमारी कोई इच्छा शक्ति है।

    ANIVerified account@ANI_news

    #WATCH: Statements by U.S. Secretary of State John Kerry and NSA Ajit Doval after their meeting in Washington.






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  • 04/01/16--01:13: Re: लेख
  • दरकार एक अदद 'स्पेस'की…

    मुकेश कुमार साहू

    युवा पत्रकार

    अभी कुछ दिनों से देख रहा हूं कि लोगों को किसी के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने के लिए हर कदम पर प्रमाण देने की आवश्यकता पड़ रही । कभी तो सच्चे देशभक्त प्रमाण दो तो कभी सच्चे हिन्दु होने का। यहां तक कि सच्चे मुस्लमान होने का भी। इसके अलावा अन्य के प्रति भी जिनमें व्यक्तियों के बीच आपस के संबंध हो । यदि आप प्रमाण नहीं देते तो आप देशद्रोही या अन्य करार दिए जाते हैं। हाल के घटनाक्रमों से कुछ ऐसा ही जाहिर हो रहा है। इसे साजिश कहें या कुछ और...। कई बार लगता है कि इसकी तुलना में कई मुख्य और ज्वलंत मुद्दों पर से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ऐसा किया जाता है। पर इस तरह कि गतिविधियां तो देश व समाज में लोगों के बीच का स्पेस ही खत्म कर रही है, जिस 'स्पेस'में नये विचारों और विभिन्नताओं को पल्लवित होने मौका मिलता है । ऐसा लग रहा है कि दुनिया एक 'हार्ड एंड फास्ट रूल 'पर टिकी है और इसी से संचालित होती है। जबकि वास्तविकता में तो ऐसा हो ही नहीं सकता। क्योंकि प्रकृति भी तो नये पौधों, लताओं और पुष्पों को पल्लवित होने का 'स्पेस'प्रदान करती है। इसी से ही तो वो बहुत खूबसूरत लगती है और जिसे देखने पर आंखों व दिल को सुकुन मिलता है।

      हाल ही में मैं अलग-अलग जगह के बहुत से लोगों से मिला और मिल भी रहा हूं तो मैंने पाया कि अब यह प्रवृत्ति लोगों के व्यवहार में आने लगा है जो अब उनकी लाइफ स्टाइल से जुड़ती जा रही है। जो कि चिंतनीय है। क्योंकि वास्तविक जीवन में तो एक स्पेस की दरकार हमेशा से बनी रहती है जहां नये विचार और जीवन में एक नयापन पल्लवित हो साथ ही कुंठाएं नष्ट हो । यदि ऐसा न हुआ तो ये कुंठाएं ही घर कर जाएंगी।

      यूं तो हमारे साइबर वर्ल्ड की दुनिया को वर्चुअल (आभासी) दुनिया की संज्ञा दी जाती है पर अब यह उस तरह से आभासी नहीं रहा। क्योंकि अब तो खासकर युवा जो इस दुनिया का दीवाना भी है और कर्ता-धर्ता भी। जहां स्पेस तो है अपनी बातों व विचारों को कहने का, पर नहीं है तो ज्यादातर के पास सिर्फ सही विवेक के साथ विचारशील, तर्कशील और आधुनिक समुन्नत समाज बनाने की दृष्टि। चूंकि अब तो इस आभासी दुनिया तेजी से युवाओं के बीच पैर पसार रही है और जिनका असर अब समाज में दिखने लगा है । कहीं कहीं तो यह लोगों के बीच आपसी वैमनस्य को इस हद तक बढ़ा दे रही है कि लोग एक-दूसरे को मरने-मारने लग जाते हैं। जिसकी परिणति कभी दादरी तो कभी शटडाउन जेएनयू में नजर आती है। यदि एक अदद 'स्पेस'हम अपने समाज लेकर व्यक्तिगत संबधों के बीच रहे तो कुंठाएं शायद पनपे ही न, साथ ही नये विचारों व और भी नई चीजों को पल्लवित होने का मौका मिले व पल्लवित हों भी।



    2016-04-01 11:17 GMT+05:30 MUKESH KUMAR SAHU <mukesh.ksahu10@gmail.com>:
    डियर पलाशदा
                   नमस्कार
    मैंने राष्ट्रवाद पर एक आर्टिकल लिखा था जिसका जिक्र मैं आपसे संभावना संस्थान में कर रहा था उसे मैं आपके पास मेल कर रहा हूं।
    धन्यवाद!
    आपका
    मुकेश कुमार
    मो. 9582751771



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    Top trending from Bangladesh #Defeat Mamata#Bangladesh wants no more

    Excalibur Stevens Biswas

    HASTAKSHEP

    The democrat and secular forces have been fighting against fascism in Bangladesh. 


    Bangladesh Dalit Movement comprises of SC,ST,OBC,Minorities,intelligentsia,communists and left and secular forces.It demands to hang Jammat and RSS to be hanged with the same rope.It expresses solidarity of the deprived and deprived and exploited working class.


    Bangladesh never voiced its opinion in West Bengal political affairs since its birth.


    But Mamata Modi alignment and RSS JAMAT BNP alliance though never confirmed,have irritated the democrat and secular forces as never before.


    Mind you Bangladesh secular and democrat forces have sacrificed in millions to uphold Bengali nationalism and Bengali language since the historical fight for freedom era which has intensified as persecution of minorities continue even after independence.


    But they united with unprecedented Shahbagh movement and ensured that all the war criminals against humanity and nature should be hanged and the hanging continues even as Islam is declared as national religion religion.They have united as never before.


    Having said that it should be understood why the persons like Mohsin who belongs to Bangladesh Intelligentsia tries to intervene in West Bengal politics.


    Simply the trending #Defeat Mamata means that those fighting for Bengali Nationalism,Bengali language,secular and democrat forces have singled out Mamata Banerjee as the greatest danger for Bengalies across the border.


    Never before in History any Indian leader had to face such a campaign!


    Well,it might not change the mandate at home!But this campaign justifies the logic of democrate and secular front to defeat Mamata aligned with RSS as it is very dangerous for Bengali nationalism also as it is threating the idea of India!





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  • 04/01/16--05:17: दुर्घटना की जिम्मेदारी से बचने के लिए परियोजना शुरु करने का श्रेय वाम शासन को दे दिया दीदी ने। उन्हींके आदेश से कोलकाता में मतदान से पहले शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले इलाके को चीरकर सेंट्रल एवेन्यू को 2.2 किमी लंबे इस फ्लाईओवर को हावड़ा ब्रिज से किसी भी कीमत पर पूरा करके चालू कर देने के फैसले की वजह से हुई इस दुर्घटना के कारण पहलीबार किसी परियोजना का श्रेय दीदी ने कट्टर दुश्मन वाममोर्चा की पूर्ववर्ती सरकार को दे डाला वरना उनका तो दावा यही है कि चार साल में उनने चारसौ साल का विकास कर डाला।उनका बस चलता तो वे हावड़ा ब्रिज,विक्टरिया मेमोरियल और फोर्ट विलियम भी अपने नाम कर लेतीं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने तो इससे बड़ा सनसनीखेज खुलासा किया है कि छेका जिसको मिला ,काम उसके बजाय सब कंट्राक्ट पर कई और स्थानीय छोटे बडे ठेकेदार कर रहे थे और ये तमाम बेनामी कंपनियों के मालिक तृणमूल कांग्रेस के नेता हैं। अब कोलकाता ने इस विकास से बहते जिस खून को देखा है,वही खून फिर बाकी जगह भी लोगों को दीखने लगे तो समझ में आयेगी कि इस मुक्तबाजारी विकास का असली चेहरा फिर बिल्डर, प्रोमोटर,सिंडिकेट,
  • दुर्घटना की जिम्मेदारी से बचने के लिए परियोजना शुरु करने का श्रेय वाम शासन को दे दिया दीदी ने।


    उन्हींके आदेश से कोलकाता में मतदान से पहले शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले इलाके को चीरकर सेंट्रल एवेन्यू को 2.2 किमी लंबे इस फ्लाईओवर को हावड़ा ब्रिज से किसी भी कीमत पर पूरा करके चालू कर देने के फैसले की वजह से हुई इस दुर्घटना के कारण पहलीबार किसी परियोजना का श्रेय दीदी ने कट्टर दुश्मन वाममोर्चा की पूर्ववर्ती सरकार को दे डाला वरना उनका तो दावा यही है कि चार साल में उनने चारसौ साल का विकास कर डाला।उनका बस चलता तो वे हावड़ा ब्रिज,विक्टरिया मेमोरियल और फोर्ट विलियम भी अपने नाम कर लेतीं।


    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने तो इससे बड़ा सनसनीखेज खुलासा किया है कि छेका जिसको मिला ,काम उसके बजाय सब कंट्राक्ट पर कई और स्थानीय छोटे बडे ठेकेदार कर रहे थे और ये तमाम बेनामी कंपनियों के मालिक तृणमूल कांग्रेस के नेता हैं।



    अब कोलकाता ने इस विकास से बहते जिस खून को देखा है,वही खून फिर बाकी जगह भी लोगों को दीखने लगे तो समझ में आयेगी कि  इस मुक्तबाजारी विकास का असली चेहरा फिर बिल्डर, प्रोमोटर,सिंडिकेट,माफिया के साथ सत्ता का अधबना ढहता हुआ फ्लाईओवर है।

    एक्सकैलबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप

    बंगाली राष्ट्रीयता के सर्वकालीन श्रेष्ठ आइकन रवीन्द्र नाथ ठाकुर के जन्मस्थल जोड़ासांको की नाक पर कोलकाता के व्यवसाय के केंद्र बड़ाबाजार,मुख्य सड़क सेंट्रल एवेन्यू और हावड़ा को सीधे निकलने के रास्ते पर गुरुवार को दिनदहाड़े अधबना फ्लाईओवर जब गिरा,तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले चरण के मतदान के जंगल महल इलाके में चुनाव प्रचार को निकली थी।


    जैसी कि उनकी बहुत अच्छी आदत शुरु से है.उनने सबकुछ पीछे छोड़ दिया और खड़गपुर से हेलीकाप्टर में उड़कर कोलकाता पहुंच गयी।वही ब्रांडेड हवाई चप्पल और साड़ी में लिपटी।


    इससे पहले मृतकों और घायलों को अनुदान की घोषणा उनने कर दी थी।दुर्घटना के तीन घंटे के भीतर कोई आधिकारिक बचाव और राहत अभियान कोलकाता में सेना के पूर्वी कमान के मुख्यालय, पुलिस मुख्यालय,चुनाव की वजह से केंद्रीय वाहिनी की मौजूदगी,आपदा प्रबंधन कार्यालय वगैरह वगैरह होने के बावजूद शुरु हुआ नहीं था।


    मुख्यमंत्री ने मौके पर पहुंचते ही सबसे पहले यही कहा कि यह फ्लाई ओवर तो वाम जमाने का है और 2009 से बन रहा है।


    जाहिर है कि इस दुर्घटना की जिम्मेदारी वाम शासन पर डालकर अपनी सरकार की जिम्मेदारी से उनने सबसे पहले पल्ला झाड़ लिया।


    चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले छपे अखबारों के विज्ञापनों से लदे फंदे पन्नों पर गौर करें तो देखा जा सकता है कि वाम जमाने की शुरु और अधूरी सारी परियोजनाओं का श्रेय अकेले ममता बनर्जी ने लेने में कोई कोताही नहीं की।


    पहले से जिन परियोजनाओं का शिलान्यास हो चुका है,नये सिरे से उनका शिलान्यास कर दिया गया।वाम जमाने में पूरी हो चुकी परियोजनाओं पर अपनी नाम पट्टी लगवाने में और बंगाल के अभूतपूर्व विकास का नक्शा पेश करने में वाम का नामोनिशां मिटाने में उनने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।


    यह हैरतअंगेज है कि उन्हींके आदेश से कोलकाता में मतदान से पहले शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले इलाके को चीरकर सेंट्रल एवेन्यू को 2.2 किमी लंबे इस फ्लाईओवर को हावड़ा ब्रिज से किसी भी कीमत पर पूरा करके चालू कर देने के फैसले की वजह से हुई इस दुर्घटना के कारण पहलीबार किसी परियोजना का श्रेय दीदी ने कट्टर दुश्मन वाममोर्चा की पूर्ववर्ती सरकार को दे डाला वरना उनका तो दावा यही है कि चार साल में उनने चारसौ साल का विकास कर डाला।


    उनका बस चलता तो वे हावड़ा ब्रिज,विक्टरिया मेमोरियल और फोर्ट विलियम भी अपने नाम कर लेतीं।


    जिस संस्था को पीपीपी माडल के तहत इस निर्माण का ठेका दिया गया,आईवीआरसीएल नामक वह संस्था रेलवे की काली सूची में रही है और जिस समय यह फ्लाईओवर का निविदा तय हुआ,उससे पहले बतौर रेलमंत्री उन्हें इसकी जानकारी होनी चाहिए थी।


    फिर इस निर्माण की देखरेख की जिम्मेदारी कोलकाता नगर निगम और राज्य सरकार दोनों की थी।


    परियोजना वोट से पहसे पूरी हो जाये और इसका श्रेय लेकर कोलकाता जीत लिया जाये,इसकी तो बड़ी जल्दी और फिक्र थी,लेकिन इस परियोजना को कैसे अंजाम दिया जा रहा है,इसकी कोई निगरानी नहीं की गयी।


    विकास का दावा करने वाली सरकार दोबारा जनादेश का दावा कर रही है और ऐन चुनाव से पहले हुई दुर्घटना की जिम्मेदारी से बचने के लिए 2009 के ठेके का हवाला दे रही है।


    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने तो इससे बड़ा सनसनीखेज खुलासा किया है कि छेका जिसको मिला ,काम उसके बजाय सब कंट्राक्ट पर कई और स्थानीय छोटे बडे ठेकेदार कर रहे थे और ये तमाम बेनामी कंपनियों के मालिक तृणमूल कांग्रेस के नेता हैं।


    गौरतलब है कि कोलकाता नगर निगम के मेयर से लेकर बंगाल के नगर विकास मंत्री तक नारद स्टिंग में काम के लिए घूस लेते दिखाये गये हैं और इस प्रकरण की कोई जांच भी नहीं हो रही है।


    अधीर चौधरी के मुताबिक कोलकाता में इतना बड़ा हादसा हो गया और मौके पर पहुंचे ही नहीं शहरी विकास मंत्री।


    उनकी हिम्मत ही नहीं हुई।


    कोलकाता में निजी मकान बनाने का काम भी अब प्रोमोटर करते हैं।क्योकि सरिया, ईंट,सीमेंट,रेत से लेकर बांस,मिट्टी,पानी तक सारी निर्माण सामग्री सिंडेकेट से लेनी होती है और ये सारे सिंडिकेट सत्तादल के होते हैं और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और दाम पर कोई सवाल करने की हिम्मत कोई कर ही नहीं सकता।


    पूरा कोलकाता और कोलकाता से जुड़े सारे उपनगरों और जिला शहरों से लेकर प्रस्तावित बंदरगाह सागरद्वीप तक इन्हीं बिल्डरों,प्रोमोटरों और सिंडिकेटों का अबाध राज है।जो सारे के सारे सत्ता दल के साथ जुडे होते हैं।


    अधबने फ्लाईओवर के मलबे से निर्माण सामग्री का नमूना फोरेंसिक जाच के लिए गया है और लाशों की कुल गिनती 24 तक पहुंची है औ जख्मी भी कुल 89 बताये जा रहे हैं।


    मौके पर हाजिर मीडिया ने देखा और दिखाया कि जो हिस्सा गिरा ,उसकी ढलाई पिछली रात को हुई थी और ढलाई के लिए सीमेच नदारद थी।मलबे में रेत ही रेत मिला है।


    हाल यह है कि जिन खंभों के भरोसे अभी गिरने से बचा फ्लाई ओवर खड़ा है,वे उसके नीचे फंसी दो गाड़ियों के हारे खड़ी है और उन गाडडियों में भी लाशें हैं,लेकिन बचाव कर्मी उन्हें तुरंत निकाल नहीं सकते वरना अधबने फ्लाईओवर का बाकी हिस्सा भी भरभराकर गिर जाने का अंदेशा है।


    क्या मां माटी मानुष की सरकार अंधे कानून की तरह अंधी है कि मुख्यमंत्री से पहले रेलमंत्री होने के बावजूद दीदी को 2009 के बाद अब उस दागी निर्माण संस्था के दामन में दाग दीख रहे हैं,जिसे हैदराबाद में बी काली सूची में डाला गया है और रेलवे में भी वह काली सूची में है?


    कोलकाता में वाम दलों का सूपड़ा साफ ही है जब से परिवर्तन हुआ और सारे एमएलए,सारे एमपी और काउंसिलर तक सत्तादल के हैं,जिनके मधुर ताल्लुकात बिल्डर प्रोमोटर सिंडिकेट राज से है कहवने से बेहतर यह कहना शायद उचित होगा कि वे ही उनकी सत्ता और ताकत के मौलिक स्रोत हैं तो आ. के स्रोत भी वे ही हैं।


    मान लेते हैं कि सारे आरोप बेबुनियाद है लेकिन उनकी जनप्रतिबद्धता और नुमाइंदगी और रहनुमाई का तकाजा तो यह था कि उनकी नाक के नीचे कोलकाता के सबसे कमाउ,सबसे बिजी इलाके में निर्माणके नाम पर आम जनता की जान माल के साथ पिछले चार पांच साल से जो खेल होता रहा है,उसपर उनकी निगरानी ही न हो।


    इसके बाद यह खबर एकदम बेमानी है कि निर्माण संस्था इस दुर्घचना को दैवी प्रकोप बता रही है,जो शायद देर तक चलने वाली जांच पड़ताल से साबित हो भी जाये।


    कोलाकाता शहर का भूगोल वैसे ही जराजीर्ण है और उसकी हालत खुले बाजार की बूढ़ी वेश्या जैसी है जिसका रंगरोगण गिराहक पटाने के लिए किया जा रहा है।


    वैसे ही अंधाधुंध शहरीकरण को एकमुश्त विकास और औद्योगीकरण मान लेने का यह पीपीपी माडल का चरित्र सर्वकालीन और सर्वव्यापी है,जिनपर स्मार्ट शहर का तमगा अच्छे दिनों के क्वाब के साथ टांगा जाना है।


    अब कोलकाता ने इस विकास से बहते जिस खून को देखा है,वही खून फिर बाकी जगह भी लोगों को दीखने लगे तो समझ में आयेगी कि  इस मुक्तबाजारी विकास का असली चेहरा फिर बिल्डर,प्रोमोटर,सिंडिकेट,माफिया के साथ सत्ता का अधबना ढहता हुआ फ्लाईओवर है।



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    Washington voices Kashmir dissidence!

    Would America be considered as anti Hindu,anti India?

    Palash Biswas

    Washington voices Kashmir dissidence.Would America be considered as anti Hindu,anti India?Is it the neat result of Doval hi fi visit to Washington?


    Indian Prime Minister landed in Washington yet again to cement Indo US relations afresh.He is speaking the language of the Global hegemony as Kashmir stad off reminds us about the rot within.Mind you,Members of separatist Kashmiri groups held a demonstration in front of the Washington DC Convention Centre Thursday afternoon.


    Separatist Kashmiri groups protested near venue of the Nuclear Security Summit here which is being attended by leaders from more than 50 countries including Prime Minister Narendra Modi.Members of separatist Kashmiri groups held a demonstration in front of the Washington DC Convention Centre Thursday afternoon, seeking the world leaders' intervention to resolve the Kashmir issue.


    RSS shares power with PDF which considers Afjal Guru a martyr while RSS controlled government brands everyone anti national whoever voices the grievances of the people in the valley as civic and human rights violated daily without any question.


    Our students concerned with unity and integrity of India and engaged in democrat discourse to break through the mess created by vested political game are persecuted in our universities and institutions.


    But the voices from Kashmir which are not allowed to be raised in rest of India,expressed freely in America which boasts to be the best friend of India and the Indian Prime Minister is said to be enjoying personal chemistry with the US President.


    Well,Prime Minister Narendra Modi arrived in the United States to attend the 4th Nuclear Security Summit, in which leaders of more than 50 countries will assess the threats of nuclear terrorism.We all know who created the terror networl worldwide and it is not the best place to speak peace and security,Mr,Prime Minister! 


    Global terrorism has evolved over time and terrorists are now using modern technology and devices while national and international efforts to counter them have become outdated, Prime Minister Narendra Modi told a gathering of global leaders at a dinner.No security,no technolgy might ensure safety and peace until state nations address the grass root problems to delete the apps of dissidence resultant in clash. 


    "All those leaders attending the Nuclear Summit and those who are interested in the world peace are urged to persuade both India and Pakistan to help resolve the Kashmir dispute for the sake of international peace and security," said Ghulam Nabi Fai, secretary general, World Kashmir Awareness.


    Fai has served two years' imprisonment in the US on the charges of working on behalf of Pakistan's ISI.


    Had the Indian Prime Minister who is attending 4th global nucear summit addressed the dissidents with this gesture we could have considered it a positive initiative and would also consider RSS ploy to share share governance in Kashmir as an initiative to include tahat part of India into the mainstream.It did not happen.


    Prime Minister Narendra Modi met the members of the Indian community in Washington today, where he reached late in the night from Brussels. 


    But he failed to address the grieved,persecuted,deprived,uprooted humanity at home.He seems rather more responsible to Indian communities abroad and does not mind whatever waits for those for whom he promised good days ahead and those poor fellows have to opt for suicide or insurrection as rule of law is absent in most part of India and India has been limited within the National Capital Zone.Every other part of India is far away from New Delhi.


    Diplomatic sources did not rule out the possibility of a bilateral meeting with President Obama but no details of other meetings that Mr. Modi may have on his first day in Washington were available. He has met US President so many times after his VISA is cleared after Gujarat Genocide but he has no time to meet the people of India anywhere anytime and his Mon key Baaten is considered enough for discourse.


    Every other type of discourse is rather banned or restricted,


    Thus, Kshmir dissidents cry in Washington as crying in India is branded as sedition.


    However,it is known that India and the US discussed ongoing counter-terrorism cooperation in the lead up to Prime Minister Narendra Modi's arrival on Thursday for the Nuclear Security Summit. 



    "Terrorism is globally networked. But, we still act only nationally to counter this threat," Modi said at a working dinner hosted by President Barack Obama Thursday night to kick off the two-day Nuclear Security Summit.


    "Nuclear security must remain an abiding national priority and all states must completely abide by their international obligations," Modi told the world leaders meeting in the shadow of Brussels and Lahore terror attacks. .


    "Without prevention and prosecution of acts of terrorism, there is no deterrence against nuclear terrorism," he warned lamenting that while "the reach and supply chains of terrorism are global, genuine cooperation between nation states is not".


    Obama, who is hosting his fourth and last such summit to discuss how to prevent terrorists and other non state actors from gaining access to nuclear materials, was flanked by Modi to the right and Chinese President Xi Jinping on the left.


    The "dinner table" ran along the circumference of the East Room of the White House. In the middle were three big boxes of flowers, according to a pool report.


    Modi, who has come to Washington after attending the India-EU summit in the Belgian capital, said: "Brussels shows us how real and immediate is the threat to nuclear security from terrorism.


    "Terror has evolved. Terrorists are using 21st century technology. But our responses are rooted in the past," he said asking the leaders to focus on three contemporary features of terrorism.


    "First, today's terrorism uses extreme violence as theatre. Second, we are no longer looking for a man in a cave, but we are hunting for a terrorist in a city with a computer or a smart phone.


    "And third, state actors working with nuclear traffickers and terrorists present the greatest risk."


    By putting spotlight on nuclear security, Obama has done great service to global security, Modi said and "this legacy of President Obama must endure".


    Earlier, in an opinion piece in the Washington Post on Thursday Obama said: "Of all the threats to global security and peace, the most dangerous is the proliferation and potential use of nuclear weapons."


    Outlining how to make the vision of a world without nuclear weapons a reality, he wrote: "We're clear-eyed about the high hurdles ahead, but I believe that we must never resign ourselves to the fatalism that the spread of nuclear weapons is inevitable."


    "Even as we deal with the realities of the world as it is, we must continue to strive for our vision of the world as it ought to be," Obama wrote.


    Secretary of State John Kerry and Secretary of Energy Ernest Moniz co-hosted a separate working dinner for other members of the visiting delegations.


    "In recent years, 13 countries, plus Taiwan, have given up weapons-usable plutonium and highly-enriched uranium entirely," Kerry noted. "An additional 12 countries have decreased their stockpiles of nuclear material."


    Since 2009, through various lines of effort, we have removed or eliminated enough weapons-grade fissionable material to supply nearly 7,000 nuclear bombs," he said.


    India and other participating nations will present their national progress reports on steps taken by them to strengthen nuclear security since the last summit on Friday.


    The first of these biennial nuclear security summits was held in Washington in April 2010 followed by the summits in Seoul in March 2012 and The Hague in March 2014.

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  • 04/02/16--09:08: कब कहां सर पर गिरेगा आसमां, जमींदोज होगा कौन? जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।मुख्यमंत्री भी। क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है। बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।गजब अच्छे दिन हैं।कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।मेकिंग इन जारी है। एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप

  • क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


    क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?

    पलाश विश्वास

    उत्तर प्रदेश में निर्णायक चुनाव से पहले इस दौर में जिन पांच राज्यों बंगाल, तमिलनाडु,असम,केरल और पुडुचेरी में चुनाव हो रहे हैं,उन सभी में मुसलमान मतदाता कम से कम कुल मतदाताओं की एक चौथाई हैं।इनमें से सबसे ज्यादा असम में चौतीस फीसद वोटर मुसलमान हैं।


    कश्मीर और लक्षद्वीप के बाद भारत में कहीं भी मुसलमान वोटर असम में सबसे ज्यादा हैं तो बंगाल,केरल और तमिलनाडु के चुनावों में भी मुसलमान वोटरों के वोटों से सत्ता के खेल में बाजी उलट पुलट हो सकती है।


    क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


    क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?


    इस सवाल के जवाब में हां या न कहने की कोई जरुरत नहीं है।1952 से लेकर अब तक विधानसभाओं और संसदीय चुनावों के नतीजे देख लीजिये।


    इसी संसदीय प्रणाली में हिंदुत्व की राजनीति का भ्रूण है और धार्मिक ध्रूवीकरण के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की जड़ें भी वही है।


    चूंकि बहुसंख्य का जनमत इतना निर्णायक है कि अल्पसंख्यकों का मतामत निमित्तमात्र है तो अल्पसंख्यक भी बहुमत के साथ सत्ता में भागेदारी की राजनीति के तहत अपने हक हकूक की लड़ाई लड़ने का इकलौता विकल्प चुनने को मजबूर है।


    यह मुसलमानों की ही नहीं,सिखों,ईसाइयों, बौद्धों से लेकर अछूतों और पिछड़ों की राजनीतिक मजबूरी है और इसीलिए मजहबी और जाति पहचान के तहत सारे समुदायअलग अलग गोलबंद हो रहे हैं।इसीलिए सियासत अब मजहबी है और इसी वजह से निरंतर मंडल कमंडल गृहयुद्ध है।


    इसीलिए जाति उन्मूलन और धर्म निरपेक्षता पर लगातार लगातार विमर्श और आंदोलन के बावजूद हो उलट रहा है और वह इतना भयानक है कि राष्ट्रवाद अब मुकम्मल धर्मोन्माद है और जाति सत्ता की चाबी है।


    स्वतंत्र मताधिकार चुनाव नतीजों में आता कही नहीं है।

    आता तो जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व तय हो जाता।


    अल्पसंख्यकों का वजूद ही सत्ता के रवैये पर निर्भर है।

    इसीलिए धर्मोन्माद और जातिवाद के कैदगाह से मुक्ति का कोई रास्ता नजर नहीं आता है।क्योंकि सत्ता वर्ग के पास धर्मोन्माद और जातिवाद के तहत सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम कऱने का इकलौता विकल्प है और सत्ता पलट का जो ख्वाब देखते हैं,उनके पास बी कोई दूसरा विकल्प नहीं है।


    यही वजहहै कि सामाजिक आंदोलन में किसीकी कोई दिलचस्पी है ही नहीं और न हो सकती है और हर किसीकी कोशिश अंततः यही होती है कि सत्ता की राजनीति से नत्थी होकर अपने लिए और हद से हद अपने कुनबे के लिए अवसरों और संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा बटोर लिया जाये।तमाम क्रांतियों और भ्रांतियों, जनांदोलनों,प्रतिरोध और मसीहाई का अंतिम लक्ष्य यही है।


    अब इस गुत्थी पर बहस करने के लिए भी किसीकी कोई दिलचस्पी नहीं हैक्योंकि मौजूदा सियासत शार्ट कट है कामयाबी का।सिर्प अपने माफिक समीकरण भिड़ा लें।


    मसलन अगर हमारे पास पूंजी नहीं है।आजीविका नहीं है और न रोजगार है।मसलन हमारा चरित्र अगर समाजविरोधी धर्मविरोधी घनघोर अनैतिक है और हम राजनीतिक विकल्प चुनते हैं और उसमें कामयाबी भी मिलती है तो हमारे लिए न सिर्फ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा है,बल्कि तमाम अवसर और संसाधन हमारे हैं और हम सीधे अरबपतियों और करोड़पतियों की जमात में है।


    ये तमाम अवसर जाति और मजहब के नाम,भाषा और क्षेत्र के नाम वोटरों की गोलबंदी या वोटबैंक से संभव है।लोग वही कर रहे हैं।सामाजिक आंदोलन में जो त्याग,समर्पण और प्रतिबद्धता की जरुरत है,जो बदलाव का जुनून चाहिए,वह जिंदगी को बेहद मुश्किल बना देती है और उसके नतीजे व्यक्ति और परिवार के लिए बेहद घातक हो सकते हैं।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सामाजिक आंदोलन के लिए अनिवार्यजन समर्थन जुटाना भी मुश्किल है।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में पूंजी अबाध है और सारा तंत्र ग्लोबल है,जिसका मुकाबला स्तानिक तौर तीरों से करना असंभव है।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में जनमत बनाने की कोई राह नहीं है।अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ उस हद तक है,सहिष्णुता की बाड़ेबंदी सिर्फ उस हद तक है,जहां तक आप रंगभेदी मनुस्मृति बंदोबस्त की जमींदारियों और रियासतों को चुनौती नहीं देते।


    व्यवस्था चूंकि राष्ट्र से जुड़ी है और राष्ट्र चूंकि विश्व व्यवस्था का उपनिवेश है और कानून का राज कहीं नहीं है तो संविधान के प्रावधान लागू होते ही नहीं है और भिन्नमत के विरुद्ध डिजिटल निगरानी,तकनीकी नियंत्रण और सैन्यदमनतंत्र है तो आप व्यवस्था परिवर्तन के लिए संवाद बी नहीं कर सकते,आंदोलन तो दूर की कौड़ी है।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में वंचितों, पीड़ितों, बहिस्कृतों और मारे जाने को नियतिबद्ध बहुसंख्य जनगण भी जाति और धर्म के तिलिस्म में कैद है और हर नागरिक के लिए अलहदा अलहदा चक्रव्यूह है।जिससे बच निकलने के लिए या जिसे तोड़ने का कोई मंत्र हमने सीखा नहीं है और हमारे सारे मंत्र ओ3म स्वाहा के समर्पण का स्थाईभाव है।


    तो बचाव का रास्ता आम लोगों के लिए बहुत सरल है कि जीतने वालों का साथ दो और उनसे मौकों की उम्मीद करो और अच्छे दिनों की उम्मीद में जैसे तैसे चादर खींचखांचकर टल्लीदार चिथड़ा चिथड़ा जिंदगी जीने का विकल्प चुन लो।


    चुनावों में यही होता है कि जो बदलाव कर सकते हैं,जैसे मुसलमान,जैसे सिख,जैसे आदिवासी,जैसे पिछड़े , जैसे रंगबिरंगे शरणार्थी,जैसे जल जंगल जमीन से बेदखल लोग,जैसे दलित वे सारे के सारे अलग अलग मोबाइल वोटबैंक है और वे जीतने वाली पार्टी का दमन पकड़कर किसी तरह नागरिक और मानवाधिकार के बिना जी लेने का समझौता कर लेने को मजबूर है।


    यानी बालिग मताधिकार का वास्तव में इस्तेमाल हो ही नहीं सकता।होता तो हम भारतीय आजाद नागरिक चोरों,डकैतों,भ्रष्टों,हत्यारों,बलात्कारियों,गुंडों वगैरह वगैरह को चुन नहीं रहे होते और वे ही लोग मंत्री से संतरी तक के पदों पर काबिज नहीं हो रहे होते।बाहुबलियों और धनपशुओं के हाथों लोकतंत्र,देश और समूचा कायनात बिक नहीं रहा होता।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सारे माध्यम,सारी विधायें और यहां तक की सारे लोकरंग राजनीति से नत्थी है और एकाधिकार राजनीतिक हितों के खिलाफ जनता के पक्ष में, पीड़ितों, उत्पीड़ितों, वंचितों, गरीबों, मेहनतकशों के पक्ष में,बच्चों और स्त्रियों के पक्ष में कुछ भी नहीं है और ये तमाम सामाजिक वर्ग और शक्तियां निःशस्त्र असहाय है और राष्ट्र,व्यवस्था और निरंकुश सत्ता की मार से बचने के लिए संरक्षक माई बाप मसीहा राजनेताओं का पक्ष चुनने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है।


    भारतीय संविधान में स्वतंत्र बालिग मताधिकार का प्रावधान है।दरअसल आजादी से पहले गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1919 और 1935 के  सिखों के स्वतंत्र मातधिकार समेत विभिन्न प्रावधानों के तहत संसदीय प्रणाली के तहत जनप्रतिनिधित्व की मौजूदा प्रणाली की नींव पड़ी।इससे पहले इंग्लैंड में समस्त बालिग नागरिकों को मताधिकार दे दिया गया।बाबासाहेब अंबेडकर ने अछूतों के लिए स्वतंत्र माताधिकार मांगे तो पुणे करार के तहत इस मांग का पटाक्षेप हो गया और नतीजतन भारतीय संविधान के तहत बाद में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के और फिर मंडल आयोग के मार्फत पिछड़ों को भी आरक्षण दे दिया गया।


    गौरतलब है कि बालिग मताधिकार ने सभी नागरिकों को समानता और न्याय के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली का विकल्प दिया और इसीके नतीजतन गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट भारत में लागू होने से पहले अस्पृश्यता के तहत हजारों सालों से बहुसंख्य शूद्रों और अछूतों को मनुस्मृति अनुशासन के तहत हिंदुत्व की पहचान से जो वंचित रखा गया,उसे भारत के हिंदू नेताओं ने हिंदू समाज के लिए घातक माना और इसी के तहत हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे गांधीजी ने भी हिंदू समाज की बंटवारे की आशंका से अछूतों के लिए स्वतंत्र मताधिकार की मांग को कारिज कर दिया।


    जाहिर है कि शूद्रों और अछूतों को पहलीबार हिंदू समाज का अंग मान लिया गया क्योंकि इस्लामी राष्ट्रीयता का मुकाबला विशुद्ध हिंदुत्व के जरिये करना असंभव था।अगर अछूत और शूद्र हिंदू नहीं माने जाते तो सवर्ण हिंदू समाज मुसलमानों के मुकाबले अल्पसंख्यक ही होता और तब स्वतंत्र मताधिकार के तहत सत्ता पर सवर्णों का कोई दावा ही नहीं बनता।


    बालिग मताधिकार का मुकाबला करने के लिए इस्लामी राष्ट्रीयता के मुकाबले विशुद्धतावादी ब्राहमणवादी हिंदुत्व ने अछूतों समेत तमाम शूद्रों को लेकर व्यापक हिंदू समाज की रचना करके हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना की,जिसमें बाद में आदिवासियों के हिंदूकरण का एजंडा भी शामिल हो गया और बिना मांगे आदिवासियों को आरक्षण दे दिया गया।


    इसका नतीजा निरंकुश हिंदुत्व करण और हिंदू राष्ट्र है और आज देश के हालात,ये धर्मोन्मादी घृणा और हिंसा का माहौल,यह मुक्तबाजार,मंडल कमंडल गृहयुद्ध वगैरह वगैरह हैं।


    इन सबको बदलने के लिए एक ही विकल्प समाजिक आंदोलन का है और हालात दिनोंदिन बिगड़ इसीलिए रहे हैं कि हमारे पास फिलहाल कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है।गिरोहबंद धर्मोन्मादी और अस्मितावादी राजनीति में हम लोकतंत्र का उत्सव मना रहे हैं।जिससे हम नर्क ही जी रहे हैं या जीविक सशरीर स्वरगवास कर रहे हैं।


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    क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


    क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?

    पलाश विश्वास

    उत्तर प्रदेश में निर्णायक चुनाव से पहले इस दौर में जिन पांच राज्यों बंगाल, तमिलनाडु,असम,केरल और पुडुचेरी में चुनाव हो रहे हैं,उन सभी में मुसलमान मतदाता कम से कम कुल मतदाताओं की एक चौथाई हैं।इनमें से सबसे ज्यादा असम में चौतीस फीसद वोटर मुसलमान हैं।


    कश्मीर और लक्षद्वीप के बाद भारत में कहीं भी मुसलमान वोटर असम में सबसे ज्यादा हैं तो बंगाल,केरल और तमिलनाडु के चुनावों में भी मुसलमान वोटरों के वोटों से सत्ता के खेल में बाजी उलट पुलट हो सकती है।


    क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?


    क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?


    इस सवाल के जवाब में हां या न कहने की कोई जरुरत नहीं है।1952 से लेकर अब तक विधानसभाओं और संसदीय चुनावों के नतीजे देख लीजिये।


    इसी संसदीय प्रणाली में हिंदुत्व की राजनीति का भ्रूण है और धार्मिक ध्रूवीकरण के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की जड़ें भी वही है।


    चूंकि बहुसंख्य का जनमत इतना निर्णायक है कि अल्पसंख्यकों का मतामत निमित्तमात्र है तो अल्पसंख्यक भी बहुमत के साथ सत्ता में भागेदारी की राजनीति के तहत अपने हक हकूक की लड़ाई लड़ने का इकलौता विकल्प चुनने को मजबूर है।


    यह मुसलमानों की ही नहीं,सिखों,ईसाइयों, बौद्धों से लेकर अछूतों और पिछड़ों की राजनीतिक मजबूरी है और इसीलिए मजहबी और जाति पहचान के तहत सारे समुदायअलग अलग गोलबंद हो रहे हैं।इसीलिए सियासत अब मजहबी है और इसी वजह से निरंतर मंडल कमंडल गृहयुद्ध है।


    इसीलिए जाति उन्मूलन और धर्म निरपेक्षता पर लगातार लगातार विमर्श और आंदोलन के बावजूद हो उलट रहा है और वह इतना भयानक है कि राष्ट्रवाद अब मुकम्मल धर्मोन्माद है और जाति सत्ता की चाबी है।


    स्वतंत्र मताधिकार चुनाव नतीजों में आता कही नहीं है।

    आता तो जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व तय हो जाता।


    अल्पसंख्यकों का वजूद ही सत्ता के रवैये पर निर्भर है।

    इसीलिए धर्मोन्माद और जातिवाद के कैदगाह से मुक्ति का कोई रास्ता नजर नहीं आता है।क्योंकि सत्ता वर्ग के पास धर्मोन्माद और जातिवाद के तहत सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम कऱने का इकलौता विकल्प है और सत्ता पलट का जो ख्वाब देखते हैं,उनके पास बी कोई दूसरा विकल्प नहीं है।


    यही वजहहै कि सामाजिक आंदोलन में किसीकी कोई दिलचस्पी है ही नहीं और न हो सकती है और हर किसीकी कोशिश अंततः यही होती है कि सत्ता की राजनीति से नत्थी होकर अपने लिए और हद से हद अपने कुनबे के लिए अवसरों और संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा बटोर लिया जाये।तमाम क्रांतियों और भ्रांतियों, जनांदोलनों,प्रतिरोध और मसीहाई का अंतिम लक्ष्य यही है।


    अब इस गुत्थी पर बहस करने के लिए भी किसीकी कोई दिलचस्पी नहीं हैक्योंकि मौजूदा सियासत शार्ट कट है कामयाबी का।सिर्प अपने माफिक समीकरण भिड़ा लें।


    मसलन अगर हमारे पास पूंजी नहीं है।आजीविका नहीं है और न रोजगार है।मसलन हमारा चरित्र अगर समाजविरोधी धर्मविरोधी घनघोर अनैतिक है और हम राजनीतिक विकल्प चुनते हैं और उसमें कामयाबी भी मिलती है तो हमारे लिए न सिर्फ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा है,बल्कि तमाम अवसर और संसाधन हमारे हैं और हम सीधे अरबपतियों और करोड़पतियों की जमात में है।


    ये तमाम अवसर जाति और मजहब के नाम,भाषा और क्षेत्र के नाम वोटरों की गोलबंदी या वोटबैंक से संभव है।लोग वही कर रहे हैं।सामाजिक आंदोलन में जो त्याग,समर्पण और प्रतिबद्धता की जरुरत है,जो बदलाव का जुनून चाहिए,वह जिंदगी को बेहद मुश्किल बना देती है और उसके नतीजे व्यक्ति और परिवार के लिए बेहद घातक हो सकते हैं।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सामाजिक आंदोलन के लिए अनिवार्यजन समर्थन जुटाना भी मुश्किल है।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में पूंजी अबाध है और सारा तंत्र ग्लोबल है,जिसका मुकाबला स्तानिक तौर तीरों से करना असंभव है।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में जनमत बनाने की कोई राह नहीं है।अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ उस हद तक है,सहिष्णुता की बाड़ेबंदी सिर्फ उस हद तक है,जहां तक आप रंगभेदी मनुस्मृति बंदोबस्त की जमींदारियों और रियासतों को चुनौती नहीं देते।


    व्यवस्था चूंकि राष्ट्र से जुड़ी है और राष्ट्र चूंकि विश्व व्यवस्था का उपनिवेश है और कानून का राज कहीं नहीं है तो संविधान के प्रावधान लागू होते ही नहीं है और भिन्नमत के विरुद्ध डिजिटल निगरानी,तकनीकी नियंत्रण और सैन्यदमनतंत्र है तो आप व्यवस्था परिवर्तन के लिए संवाद बी नहीं कर सकते,आंदोलन तो दूर की कौड़ी है।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में वंचितों, पीड़ितों, बहिस्कृतों और मारे जाने को नियतिबद्ध बहुसंख्य जनगण भी जाति और धर्म के तिलिस्म में कैद है और हर नागरिक के लिए अलहदा अलहदा चक्रव्यूह है।जिससे बच निकलने के लिए या जिसे तोड़ने का कोई मंत्र हमने सीखा नहीं है और हमारे सारे मंत्र ओ3म स्वाहा के समर्पण का स्थाईभाव है।


    तो बचाव का रास्ता आम लोगों के लिए बहुत सरल है कि जीतने वालों का साथ दो और उनसे मौकों की उम्मीद करो और अच्छे दिनों की उम्मीद में जैसे तैसे चादर खींचखांचकर टल्लीदार चिथड़ा चिथड़ा जिंदगी जीने का विकल्प चुन लो।


    चुनावों में यही होता है कि जो बदलाव कर सकते हैं,जैसे मुसलमान,जैसे सिख,जैसे आदिवासी,जैसे पिछड़े , जैसे रंगबिरंगे शरणार्थी,जैसे जल जंगल जमीन से बेदखल लोग,जैसे दलित वे सारे के सारे अलग अलग मोबाइल वोटबैंक है और वे जीतने वाली पार्टी का दमन पकड़कर किसी तरह नागरिक और मानवाधिकार के बिना जी लेने का समझौता कर लेने को मजबूर है।


    यानी बालिग मताधिकार का वास्तव में इस्तेमाल हो ही नहीं सकता।होता तो हम भारतीय आजाद नागरिक चोरों,डकैतों,भ्रष्टों,हत्यारों,बलात्कारियों,गुंडों वगैरह वगैरह को चुन नहीं रहे होते और वे ही लोग मंत्री से संतरी तक के पदों पर काबिज नहीं हो रहे होते।बाहुबलियों और धनपशुओं के हाथों लोकतंत्र,देश और समूचा कायनात बिक नहीं रहा होता।


    सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सारे माध्यम,सारी विधायें और यहां तक की सारे लोकरंग राजनीति से नत्थी है और एकाधिकार राजनीतिक हितों के खिलाफ जनता के पक्ष में, पीड़ितों, उत्पीड़ितों, वंचितों, गरीबों, मेहनतकशों के पक्ष में,बच्चों और स्त्रियों के पक्ष में कुछ भी नहीं है और ये तमाम सामाजिक वर्ग और शक्तियां निःशस्त्र असहाय है और राष्ट्र,व्यवस्था और निरंकुश सत्ता की मार से बचने के लिए संरक्षक माई बाप मसीहा राजनेताओं का पक्ष चुनने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है।


    भारतीय संविधान में स्वतंत्र बालिग मताधिकार का प्रावधान है।दरअसल आजादी से पहले गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1919 और 1935 के  सिखों के स्वतंत्र मातधिकार समेत विभिन्न प्रावधानों के तहत संसदीय प्रणाली के तहत जनप्रतिनिधित्व की मौजूदा प्रणाली की नींव पड़ी।इससे पहले इंग्लैंड में समस्त बालिग नागरिकों को मताधिकार दे दिया गया।बाबासाहेब अंबेडकर ने अछूतों के लिए स्वतंत्र माताधिकार मांगे तो पुणे करार के तहत इस मांग का पटाक्षेप हो गया और नतीजतन भारतीय संविधान के तहत बाद में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के और फिर मंडल आयोग के मार्फत पिछड़ों को भी आरक्षण दे दिया गया।


    गौरतलब है कि बालिग मताधिकार ने सभी नागरिकों को समानता और न्याय के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली का विकल्प दिया और इसीके नतीजतन गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट भारत में लागू होने से पहले अस्पृश्यता के तहत हजारों सालों से बहुसंख्य शूद्रों और अछूतों को मनुस्मृति अनुशासन के तहत हिंदुत्व की पहचान से जो वंचित रखा गया,उसे भारत के हिंदू नेताओं ने हिंदू समाज के लिए घातक माना और इसी के तहत हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे गांधीजी ने भी हिंदू समाज की बंटवारे की आशंका से अछूतों के लिए स्वतंत्र मताधिकार की मांग को कारिज कर दिया।


    जाहिर है कि शूद्रों और अछूतों को पहलीबार हिंदू समाज का अंग मान लिया गया क्योंकि इस्लामी राष्ट्रीयता का मुकाबला विशुद्ध हिंदुत्व के जरिये करना असंभव था।अगर अछूत और शूद्र हिंदू नहीं माने जाते तो सवर्ण हिंदू समाज मुसलमानों के मुकाबले अल्पसंख्यक ही होता और तब स्वतंत्र मताधिकार के तहत सत्ता पर सवर्णों का कोई दावा ही नहीं बनता।


    बालिग मताधिकार का मुकाबला करने के लिए इस्लामी राष्ट्रीयता के मुकाबले विशुद्धतावादी ब्राहमणवादी हिंदुत्व ने अछूतों समेत तमाम शूद्रों को लेकर व्यापक हिंदू समाज की रचना करके हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना की,जिसमें बाद में आदिवासियों के हिंदूकरण का एजंडा भी शामिल हो गया और बिना मांगे आदिवासियों को आरक्षण दे दिया गया।


    इसका नतीजा निरंकुश हिंदुत्व करण और हिंदू राष्ट्र है और आज देश के हालात,ये धर्मोन्मादी घृणा और हिंसा का माहौल,यह मुक्तबाजार,मंडल कमंडल गृहयुद्ध वगैरह वगैरह हैं।


    इन सबको बदलने के लिए एक ही विकल्प समाजिक आंदोलन का है और हालात दिनोंदिन बिगड़ इसीलिए रहे हैं कि हमारे पास फिलहाल कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है।गिरोहबंद धर्मोन्मादी और अस्मितावादी राजनीति में हम लोकतंत्र का उत्सव मना रहे हैं।जिससे हम नर्क ही जी रहे हैं या जीविक सशरीर स्वरगवास कर रहे हैं।


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  • 04/03/16--04:54: कब कहां सर पर गिरेगा आसमां, जमींदोज होगा कौन? जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।मुख्यमंत्री भी। क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है। बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।गजब अच्छे दिन हैं।कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।मेकिंग इन जारी है। एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप
  • कब कहां सर पर गिरेगा आसमां, जमींदोज होगा कौन?


    जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।मुख्यमंत्री भी।


    क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है।


    बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।गजब अच्छे दिन हैं।कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।मेकिंग इन जारी है।


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप


    स्मार्ट डिजिटल देश में बजट से लेकर शेयर बाजार तक विकास से लेकर राजनीति तक,सड़क से लेकर संसद तक प्रोमोटर बिल्डर सिंडिकेट माफिया राज के तहत किस भारत माता की जै जै कहकर कैसे अच्छे दिन आ गये हैं,तनिक कोलकाता के उन लोगों से आज ही पूछ लीजिये, जो बन चुके या अधबने फ्लाई ओवर, पुल, बहुमंजिली इंफ्रास्ट्रक्चर के अंदर बाहर कहीं रहते हैं।


    यह अभूत पूर्व है गुरुवार को 2.2 किमी लंबे अधबने फ्लाईओवर के मलबे से अभी सरकारी तौर पर 24 लाशें निकली हैं और जख्मी भी सिर्फ 89 बताये जा रहे हैं।मारवाड़ी अस्पताल में कराहती मनुष्यता की कराहों से बड़ाबाजार की कारोबारी दुनिया दहल गयी है तो मलबे में दफन लावारिश लाशों की सड़ांध से बड़ाबाजार तो क्या पूरे कोलकाता की हवाएं और पानियां जहरीली हैं।रातदिन सारा हादसा लाइव चलते रहने और बाकी खतरों के खुलासे से यह दहशत अभी वायरल है।


    खुद मुख्यमंत्री दहशतजदा है,जिनका बयान यह है ःदो दो फ्लाईओवर गिर गये हैं।ऐसे टेंडर पास हो गये कि धढ़ाधड़ ढह रहे हैं।लोग बेमौत मारे जा रहे हैं  और मुझे बहुत डर लगाता है जब मैं राजारहाट की तरफ जाती हूं कि कहीं फ्लाईओवर ढह न जाये।मेदिनीपुर के दांतन में दीदी का यह उद्गार है।


    जाहिर है कि इन हादसों के लिए दीदी पिछली वाम सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही हैं।


    जबकेि तथ्य बता रहे हैं कि हर निर्माणाधीन परियोजना में नई सरकार आने के बाद राजनीतिक वजह से फेरबदल हुआ है और हादसों की मुख्य वजहों में से यह भी एक वजह है।फिर जिन्हें टेंडर मिला,वे भी काम नहीं कर रहे हैं।


    पुराने टेंडर की आड़ में सबकंट्राक्टर ही काम कर रहे हैं और वे कायदा कानून ताक पर रखकर काम कर रहे हैं और उन्हें किसी बात का कोई डर भी नहीं है क्योंकि वे सीधे तौर पर सत्तादल के बाहुबली हैं।बाकी मामला रफा दफा तो होना ही है.

    मसलन पहले तो निर्माम संस्था दैवी कृत्य बता रही थी और अब अफसरों की गिरफ्तारी के बाद तोड़ फोड़ और धमाके की कथा बुनी और लाइव प्रसारित है।जाहिर है कि काली सूची में होने के बावजूद,अपने ही शहर और राज्य में प्रतिबंधित होने के बावजूदऐसी निर्माण संस्थाएं बाकी देश में तबाही मचाने के लिए आजाद है।


    सत्ता या सियासत  को इस पर तबतक ऐतराज कोई ऐतराज नहीं होता जबतक सफाई देने की नौबत बनाने लायक लाशें किसी हादसे से न निकलें।फिर जिन्हें मुनाफावसूली के हजार तौर तरीके मालूम होते हैं,ले देकर मामला रफा दफा करने के हजार रास्ते भी उन्हें मालूम है।जबतक परदे पर खबर रहेगी,तब तकआफत होगी।फिर कोई बड़ा हादसा हुआ तो पुराना किस्सा खत्म।


    इस निर्माण  की देखरेख तृणमूल संचालित कोललकाता नगर निगम के प्रोजेक्ट इंजीनियर कर रहे थे,बलि का बकरा खोजने के क्रम में ुनमें से दो निलंबित भी कर दिये गये है।कहा यह जा रहा कि हादसे से पहले हुई ढलाई के व्कत कोई इंजीनियर मौके पर नहीं था।जबकि हकीकत यह है कि अबाध प्रोमोटर बिल्डर माफिया राज में सरकारी या प्रशानिक निगरानी या देखरेख का कोई रिवाज नहीं है।मेकिंग इन की यह खुली खिड़की है।


    इंजीनियर,अफसरान या प्रोमोटर बिल्डर भी नहीं,विकास के नाम ऐसी तमाम परियोजनाएं सीधे राजनीतिक नेताओं के मातहत होती हैं।पिर वे ही नेता अगर अपनी ही कंपनियों के मातहत ऐसी परियोजनाओं को अंजाम देते हों तो किसी के दस सर नहीं होते कि कटवाने को तैयार हो जाये।


    बड़ा बाजार में यही हुआ।उन नेताओं के नाम भी सत्ता के गलियारे से ही सार्वजनिक है कि दूसरे प्रतिद्वंद्वी बिलडर प्रोमोटर राजनेता इस मौके का फायदा  उठायेंगे ही।यह स्वयंसिद्ध मामला है,लेकिन किसी एफआईआर या चार्जशीट में असल गुनाहगारों के नाम कभी नहीं होते।


    जैसे बड़ाबाजार के तृणमूल के पूर्व वधायक व कद्दावर नेता के भाई इस परियोजना की निर्माण सामग्री की सप्लाई कर रहे थे।


    हादसे से पहले तक बड़ा बाजार में ही उनके सिंडिकेट दफ्तर में कोलकाता जीत लेने की रणनीति बनाने में मसगुल ते सत्ता दल के नेता कार्यकर्ता।हादसे के बाद वह दफ्तर बंद है और बाईसाहेब भूमिगत हैं।


    वे सतह पर बी होंगे तो कम से कम बंगाल पुलिस उन्हें हिरासत में लेने की हिम्मत नहीं कर सकती।


    बलि के बकरे मिल गये तो आगे ऐसा विकास जारी रहना लाजिमी है।असली गुनाहगार तक तो  अंधे कानून के लंबे हाथ कभी पहुंचते ही नहीं हैं।


    बकरों की तलाश है ।

    जिसके गले की नाप का फंदा है,जाहिर है,फांसी पर वही चढ़ेगा।


    ऐसे निर्माण विनिर्माण  का तकाजा जनहित भी नहीं है।सीधे ज्यादा से ज्यादा मुनाफावसूली है और काम पूरा होने की टाइमिंग वौटबैंक साधने के समीकरण से जुड़ी है।


    जैसे कि बड़ा बाजार के इस फ्लाई ओवर के साथ हुआ।


    मुख्यमंत्री का फतवा था कि मतदान से पहले फ्लाईओवर उद्घाटन के लिए तैयार हो जाना चाहिए।


    खंभे माफिक नहीं थे।


    सुरक्षा के लिए कोई एहतियात बरती नहीं गयी।


    ढांचे के तमाम नाट बोल्ट खुले थे और महज रेत से भारी भरकम लोहे के ढांचे पर हड़बड़  में ढलाई कर दी गयी।


    अभी डर यह है कि मलबा हटाने से बाकी हिस्से फ्लाईओवर के कहीं गिर न जाये या जैसे यह हिस्स गिरा ,वैसे ही दूसरा कोई हिस्सा कहीं गिर न जाये।इससे पहले आधीरात के बाद उल्टाडांगा में भी एक नया बना फ्लाई ओवर हाल में ढहा है,लेकिन सुनसान सड़क होने के कारण तब इतनी मौते नहीं हुई।


    इस हादसे से उस हादसे की याद भी हो ताजा हो गयी है।


    फ्लाई ओवर पर आने जाने वालों पर शायद कोई फ्रक पड़ता न हो,लेकिन इऩ फ्लाईओवरों के आसपास कोलकाता की घनी आबादी में कहां कहां घात लगाये मौत शिकार का इंतजार कर रही है,जान माल की हिफाजत की फिक्र में महाबली बड़ाबाजार की तरह बाकी कोलकाता और बाकी बंगाल दहशत में है।


    क्योंकि विकास की आंधी प्रोमोटर बिल्डर राज की मुनाफावसूली के सिवाय़ कुछ नहीं है,इस हकीकत से पहली बार बंगाल के लोगों का वास्ता बना है।


    बाकी देश भी स्मार्टशहरों के ख्वाब बुनते हुए असलियत समझने से पहले इसीतरह के हादसों का इंतजार कर रहा होगा।


    गजब अच्छे दिन हैं,कोई शक की गुंजाइश राष्ट्रद्रोह है।

    मेकिंग इन जारी है।


    दीदी भले ही कोलकाता के इस हादसे की जिम्मेदारी से बचने के लिए ठेके देने का वक्त वाम शासन का 2009 बता रही हैं,वामदलों को इस बारे में खास कैफियत देने की जरुरत नहीं है क्योंकि गिरोहबंद तृणमूल के अपने प्रोमोटर नेता एक दूसरे को घेरने के फिराक में हैं।


    इस इलाके के पूर्व विधायक संजयबख्शी को घेरने की पूरी तैयारी है तो सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने तो दावा ही कर दिया कि फ्लाईओवक के नक्शे में भारी खामियां थी ,जिसके बारे में उनने अपनी सरकार को आगाह कर दिया था।


    मां माटी मानुष की सरकार ने आधा काम हो गया तो इसका श्रेयभी लूट लिया जाये,इस गरज से मौत का सर्कस जारी रखा।


    अब कयास यह है कि मौत का सर्कस और कहां कहां चल रहा है।


    इसी बीच इस अधबने अधगिरे फ्लाईओवर के आस पास पांच मकान भारी खतरे की वजह से खाली कराने का आदेश हुआ है जबकि निर्माणाधीन फ्लाईओवर के नीचे से सालों रात दिन ट्रेफिक बिना एहतियात चलती रही और कभी किसी खतरे से किसी को आगाह भी नहीं किया गया।


    इस दमघोंटू माहौल में कोई अचरज नहीं कि दमदम एअर पोर्ट से सीधे मौके और अस्पताल में कुल मिलाकर आधे घंटे ही बिता सके राहुल गांधी और उनसे कहा कुछ भी नहीं गया।


    उन्होंने पीड़ितों से मुलाकात की और प्रेस के सामने राजनीतिक बयान देने से साफ इंकार कर दिया है।


    बड़ा बाजार जैसे इलाकों में सत्तर के दशक में नक्सल पुलिस मुठभेड़ों और राजनीतिक गृहयुद्ध के माहौल में कभी एक पटाखा भी नहीं फूटा।आजादी से पहले और आजादी के बाद बड़ाबाजार से कोलकाता और बंगाल की राजनीति चलती है।


    इसी बड़ा बाजार इलाके में कटरा बाजारों और पुरानी इमारतों में अग्निकांड मौसमी बुखार जैसी सामान्यघटना है और बंगाल की राजनीति चलाने वाले इन लोगों की सेहत पर कोलकाता,बंगाल यादेश दुनिया की किसी भी हलचल का कोई असर कभी होता नहीं है।


    मसलन बड़ा बाजार के एक फर्जी अखबार को एक राष्ट्रीय पार्टी ने पहले चरण के मतदान से पहले पेशगी बतौर बिना बात के नकद एक करोड़ रुपये नकद दे दिये सिर्फ इसलिए कि वह मुफ्त अखबार बांटकर उसके लिए बड़ा बाजार का समर्थन जुटाये।


    ऐसे तमाम अखबार देश के हर बड़े शहर से निकलते हैं,जिनका धंधा घाटे में दिखाकर काले धन को सफेद करने का कारोबार चलता है।


    इस अखबार के किसी पत्रकार गैर पत्रकार को अबी तक वेतन मिला नही है,जबसे यह अखबार निकला है।हर दो तीन महीने के भीतर कई संस्करणों वाले इस अखबार के कर्मचारी निकाल बाहर कर  दिये जाते हैं और अखबार भी अलग अलग प्रेस से छपता है।


    मूल पूंजी भी किसी चिंटफंड का बताया जाता है।खबर है कि इस अखबार ने बिहार चुनाव में खासी कमाई की है और यूपी पंजाब लूटने की तैयारी है।इसका सारे पन्ने हिंदुत्व एजंडे को समर्पित हैं।


    चूंकि उस राष्ट्रीय दल का कोई प्रवक्ता अखबार नहीं है तो कमसकम बड़ा बाजार को साधकर पूरे बंगाल की राजनीति हो ही है।




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    बंगाल में हिंदी भाषी वोटर भी हार जीत का फैसला कर सकते हैं और असम में भी उनका असर होना है।

    केसरिया बजरंगी बन जाने की वजह से ही जात पांत में बंटी हिंदीभाषी जनता गैरहिंदीभाषी राज्यों में हाशिये पर है

    पलाश विश्वास

    अपने साथी रणधीर सिंह सुमन से आज हुई बातचीत के सिलसिले में बातों ही बातों में यह मामला सामने आया कि सभी लोग बंगाल में मुसलिम वोट बैंक के समीकरण को निर्णायक मान रहे हैं लेकिन बंगाल में हिंदी भाषी वोटर भी कम नहीं हैं।


    दरअसल धर्म जाति के समीकरण और ध्रूवीकरण की जो राजनीति है ,मीडिया की दृष्टि भी वही है और राजनीति धर्म और जाति के अलावा कुछ देखती नहीं हैं।


    वरना बंगाल में जितने मुसलमान वोटर हैं ,कायदे से गिनती कर लें तो हिंदी भाषी दोयम दर्जे के नागरिक उनसे ज्यादा ही होंगे।


    वे मुसलमानों की तरह असुरक्षाबोध के शिकार नहीं है कि आखिरी वक्त तक टोह लगाते रहे कि जीतने वाल कौन है और फिर फैसला करे उनके वजूद के लिए कौन ज्यादा खतरनाक है और उसे हराना है,तब जाकर तय होता है कि किसे वोट देना है और किसे वोट न दें।


    कल हमने भारतीय लोकतंत्र की इस गुत्थी के बारे में लिखा भी है कि मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का इ्स्तेमाल कर सकते हैं या नहीं।उस पर पहले गौर कर लीजियेगा तो आगे हमारी बात आपको कायदे से समझ में आनी चाहिए।


    हिंदीभाषियों की ऐसी कोई मजबूरी नहीं है और जाति के नाम वे हजार टुकड़ों में बंटे हैं तो मताधिकार के प्रयोग में भी वे स्वतंत्र है और विभिन्न दलों,पक्षों में उनके वोट स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति की वजह से बंट जाते हैं।


    इसी वजह से देशभर में अहिंदी बाषी राज्यों में जहां हिंदी भाषियों की तादाद भारी है,वे अपनी संख्या के मुताबिक चुनाव नतीजे को बनाते बिगाड़ते नहीं है।


    बंगाल में इनकी ताकत पर बहुत गौर किया था पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु और तत्कालीनमाकपा सचिव अनिल विश्वास ने और बड़ी संख्या में हिंदी भाषी वामदलों से जुड़े थे या कल कारखानों, उद्योग धंधों से जुड़े होने की वजह से वाम मजदूर संघों से जुड़े थे।


    बाद के नेताओं ने हिंदी वोटरों को खास तवज्जो नहीं दी तो हिदी भाषी वोटर भी बिखर गये।


    कल कारखाने बंद हुए तो यूनियनों से नाता भी टूट गया और उनकी हालत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों जैसी हो गयी है जिनका कोई माई बाप नहीं है।


    अब बंगाल के हिंदी भाषी अपनी जड़ों से पूरीतरह कटे होने के बावजूद जात पांत और हिंदुत्व के मामले में गायपट्टी से पीछे कतई नहीं है और उनकी फिक्र भी बंगाल की वजह से दिल्ली के भव्य राममंदिर कार्यक्रम की हिंदुत्व राजनीति को लेकर है ।


    बंगाल के केसरिया कायाकल्प की जमीन भी यही है क्योंकि इन्ही हिंदी भाषियों के एक तबका दबंग और बाहुबलि है तो एक फीसद से भी कम दूसरा सबसे खास तबका वह है ,जिसके हाथों में बंगाल की समूची पूंजी,कारोबार,उद्यम और उद्योग है।


    असम के हालात भी कमोबेश बंगाल जैसा ही है लेकिन असमिया अस्मिता और दंगाई सियासत की वजह से गैरअसमिया जनता के प्रति घृणा और हिंसा के साठ के दशक से शुरु हिंदुत्व अभियान के कारण पहले बंगाली शरणार्थियों के घर जले,फिर राजस्थानियों के और अब हिंदी भाषियों के प्रति भी वही वैमनस्य है।


    क्योंकि गुजरात के बाद असम अब हिंदुत्व की प्रयोगशाला है।हिंदुत्व कीआग से असम में बंगाली और हिंदी भाषी गैर मुसलिम जनता भी कतई बची नहीं है और दंगाइयों के निशाने पर वे भी हैं जैसे मुसलमान हैं।


    असम में भी हिंदीभाषी बिखरे बिखरे हैं और हिंदुत्व राजनीति के लगातार हमलों की वजह से वजूद के जोखिम की वजह से मुलमान संगठित हैं और चुनाव नतीजे परइसका असर भी होगा।  


    कामरेड ज्योति बसु,कामरेड सुभाष चक्रवर्ती और कामरेड अनिल विश्वास ने हिंदीभाषियों के इन दोनों तबके को कायदे से साधा था और वाममोर्चे की यह एक बड़ी ताकत थी।


    इन तीनों नेताओं के अवसान के बाद कामरेडों ने हिंदी भाषियों को कोई ज्यादा भाव नहीं दिया और दबंग और पैसे वाले तबके अपने अपने हितों के मुताबिक दीदी की सत्ता से नत्थी हो गये तो बाकी हिदीभाषियों की अनाथ दशा है।


    बंगाल में चाहे उनकी जो हालत हो वे पूरे देश में राज करने के लिए जियादातर रामरज्या चाहते हैं और जात पांत धर्म कर्म में उलझे हैं या बिरादरी को गोलबंद करके रंग बिरंगे नेताओं की निजी फौजे हैं।


    मुसलमान अपनी जान माल की फिक्र में संगठित हैं और इनकी सियासत अपना वजूद बचाने की जंग में हार जीत का मामला है।


    इसके विपरीत हिंदी भाषी भव्य राममंदिर और अच्छे दिनों का ख्वाब भी देखते हैं तो कामरेड भी हैं और आपस में मूंछ की लड़ाई और मारकाट अलग है और सत्ता से नत्थी रहने का मौका भी नहीं चूकते।फिरभी जिन इलाकों में हिंदी भाषी वोट ज्यादा है,वहां वे संगठित तौर पर वोट दें,तो मुसलमानों के मुकाबले कम ताकतवर हिदीभाषी भी नहीं हैं।


    एक जमाने में बंगाल औद्योगीकरण और कारोबार में अव्वल नंबर था।एक जमाने में बिहार बंगाल और ओड़ीशा पूरा एक मुलक था,जिसमें पूर्वी बंगाल और असम भी था।


    तेरहवीं सदी से लेकर ब्रिटिश प्रेसीडंसी तक यह सिलसिला रहा है।


    नवाब सिराजदौल्ला के साहूकार उमीचंद मारवाड़ी थे और जैनी हिंदी भाषियों का नवाबी जमाने से बंगाल के कारोबार में पकड़ रही है और बाद में राजस्थानी कारोबारियों के अलावा गुजराती कारोबारी भी कोलकाता में जम गये।


    कयोंकि कारोबार और उद्योग में बांग्लाभाषी थे ही नहीं।


    आभिजात वर्ग के लोग या जमींदार थे या दरबारी या नौकरीपेशा और इसीलिये बंगाली बाबूमोशाय हुआ करते हैं।


    आम बंगाली कृषि के अलावा सत्तर के दशक तक सरकारी नौकरियों की जुगाड़ में गुजर बसर करते रहे हैं।


    चायबागान हो या जूट मिल या बंगाल का मशहूर सूती उद्योग, दुर्गापुर आसनसोल  के शिल्पांचल और कोलकाता हावड़ा हुगली के बंद कल कारखानों में सर्वत्र भारी संख्या हिंदी भाषी मजदूरों की रही है तो कोलकाता के बड़ाबाजार से लेकर सारे बंगाल में कारोबार में लगा मजदूर संप्रदाय भी हिंदीभाषी हैं।जो पीढ़ीदर पीढ़ी बंगाल में बसे हैं और वे अब विशुध हिंदी भाषी भी नहीं हैं उनकी भाषा और संस्कृति कोलकाता और बंगाल के मिजाज के मुताबिक बदल गयी है और वे हिंदी भाषी है।


    बिहार और झारखंड  से जुड़े आसनसोल और सिलीगुड़ी में भी हिंदी भाषी बांग्लाभाषियों से कहीं अधिक हैं और कोलकाता और हावड़ा में भी कमोबेश ये हालात है।


    यहां तक कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चुनाव क्षेत्र में भी हिंदी भाषी वोटर ही हार जीत तय करेंगे।


    आज सुबह अरसे बाद बाराबंकी से लोकसंघर्ष के रणधीर सिंह सुमन जी का फोन आया।उनसे लंबी बातचीत हुई।


    दरअसल उनसे राज्यसभा के किसी मुसलमान सांसद ने कहा है कि बंगाल में दीदी का मुसलिम वोट बैंक तेजी से टूट रहा है और अब कम से कम एक तिहाई मुसलमान सत्तादल को वोट नहीं देंगे।वे हमसे जानना चाहते थे कि दीदी क्या हार रही हैं।


    इसका कोई सीधा जवाब हमारे पास नहीं है।


    नारद का दंश कितना दीदी की साख को बनायेगा,बिगाड़ेंगा ,यह कहना मुश्किल है।


    आज सुबह ही बांग्ला के सबसे बड़े दैनिक आनंद बाजार पत्रिका में नारद स्टिंग की दूसरी किश्त के तहत सहरी विकास मंत्री के कारनामों का खुलासा हुआ है कि कैसे विकास के नाम पर तमाम ठेके उन्हींके दफ्तर से ले देकर दे दिये जाते हैं।


    पहले खुलासे की जांच भी शुरु नहीं हुई है तो जंगलमहल में मतदान की पूर्व संध्या को हुए इस नये खुलासा में दीदी के दागी मंत्रियों के खिलाफ जो सबूत पेश किये गये हैं।


    अगर इसमें तनिक सच्चाई है तो इसे सत्ता दल के अंदर बैठे तमाम लोग समझ रहे होंगे और उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी और दीदी को लोग अब भी कितना और किस हद तक कब तक ईमानदार मानते रहेंगे,इस पर बहुत कुछ तय होगा।


    अभी कल ही अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ और बांग्ला दैनिकों में बड़ाबाजार फ्लाईओवर हादसे के सिलसिले में दीदी के दावों की धज्जियां उड़ाकर तमाम सबूत और तथ्य पेश किये गये जिससे साप है कि ठेका चाहे किसी कंपनी को मिला हो,सारी निर्माण सामग्री के ठेके,सारे काम करने वाले लोग,तकनीशियन और विशेषज्ञ,सारी निगरानी और देखरेख सत्तादल के ही प्रोमोटर बिल्डर सिंडिकेट बाहुबलि नेताओं के नियंत्रण में थे और बुनियादी नक्शे में फेरबदल सुरक्षा और ट्रेफिक नियमों का उल्लंघन भी सत्तादल की सरकार और नगरनिगम की वजह से हुए।


    होने को तो शारदा चिटफंड मामले के सारे दागी सत्ताई चेहरे तृणमल स्तर से लेकर शीर्ष स्तर तक कटघरे में थे लेकिन इस मामले के खुलासे के बावजूद बदला कुछ नहीं है।


    इसलिए कहना मुश्किल है कि मुनाफावसूली और घूस,भ्रष्टाचार और बेईमानी से वोटरों की सेहत पर बंगाल और बाकी देश में कोई असर होता है या नहीं और हुआ भी तो जनादेश पर कितना असर उसका होता है।


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    उदय प्रकाश के फेसबुक वाल से

    फ़िलहाल, 'बालिका बधू' टीवी सीरियल में आनंदी का रोल निभाने वाली, तीन अभिनेत्रियों में से एक अभिनेत्री प्रत्यूषा बनर्जी की ख़ुदकुशी को हिंदी-अंग्रेज़ी कार्पोरेट टीवी चैनल 'राष्ट्रीय महत्व' का प्राइम न्यूज़ बता रहे हैं। यह कल से आज तक सोशल मीडिया, प्रिंट और टीवी की सबसे बडी खबर है। 
    टी-२० और कोलकाता के पुल के ढहने के साथ। 
    शक की सुई हर कोई उसके बॉयफ़्रेंड राहुल राज सिंह की ओर घुमा रहा है, जिसके साथ प्रत्यूषा 'लिव इन रिलेशनशिप' में थी और दोनों एक-दूसरे से प्यार करने की बातें करते थे। 
    मान लिया जाय, कि यह 'राष्ट्रीय महत्व' की खबर है। 
    लेकिन जो राष्ट्रीय महत्व की खबर नहीं है, वह है किसानों, दलितों, आदिवासियों, बेरोज़गार नौजवानों की आत्महत्याएँ। 
    हज़ारों की तादाद में, हर हफ्ते। 
    राहुल राज सिंह की तरह ही हर राजनीतिक पार्टी उनसे 'प्यार' करने के दावे करती है। 
    विडंबना हमारे समय की यह है कि ये सारे के सारे, जिसमें किसान, आदिवासी ही नहीं, रोहित वेमुला समेत हज़ारों ख़ुदकुशी करने वाले दलित, अल्पसंख्यक भी शामिल हैं, वे सब सत्तर साल ही नहीं, इसके बहुत पहले से, सवर्णवादी, ब्राह्मणवादी, मनुवादी निरंकुश ठग सत्ता के साथ ' लिव इन रिलेशनशिप' में बने हुए हैं। 
    लेकिन उनकी बेइंतहा खुदकुशियां और हत्याएँ सिर्फ 'मनोरंजक सनसनी' है। 
    राष्ट्रीय महत्व की प्राइम न्यूज़ नहीं। 
    चुप रहिये, वर्ना .... रोहित सरदाना, अर्नब गोस्वामी, चौरसिया जैसे पेड एंकर वग़ैरह ही नहीं, सारा कार्पोरेट सूचनातंत्र तैयार बैठा है, हर नागरिक आवाज़ को 'एंटीनेशनल' साबित करने के लिए। 
    किसका ये नेशन है भाईजियो ? 
    smile emoticon 
    बताइये बंधु, शालीन, तार्किक, तथ्यपरक भाषा में।


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  • 04/04/16--04:26: असम में असम गण परिषद के कंधे पर बंदूक रखकर भाजपा हिंदुत्व के इस प्रयोगशाला का विस्तार करना चाहती है हिंदुत्व के एजंडे का ग्लोबल कार्यान्वयन के लिए तो बंगाल में उसकी मुख्य चुनौती सत्ता में खुद आने की नहीं है बल्कि ममता दीदी को सत्ता में बहाल रखकर वाम और कांग्रेस गठबंधन के उभार को रोकने की है। जाहिर है कि इस लिहाज से यह चुनाव बेहद खास है कि बंगाल और असम में तय होने जा रहा है कि वोट की ताकत से केसरिया अश्वमेधी घोड़ों को रोका जाना संभव है या नहीं है। इस प्रयोग के बाद यूपी में भी समाजवादियों के साथ दीदीमार्का तालमेल संघपरिवार का फौरी कार्यक्रम हो सकता है।
  • जंगल महल में दीदी का केसरिया रंग वसंत बहार
    शालबनी में माकपा प्रत्याशी के साथ मीडियाकर्मियों को धुन डाला सत्तादल के गुंडों ने, एक मीडियाकर्मी का अपहरण भी
    पनामा पेपर्स लीक और अफजल को शहीद मानने वाली महबूबा की ताजपोशी के बाद संघ परिवार दीदी की सत्ता की बाहली में जुटा

    असम में असम गण परिषद के कंधे पर बंदूक रखकर भाजपा हिंदुत्व के इस प्रयोगशाला का विस्तार करना चाहती है हिंदुत्व के एजंडे का ग्लोबल कार्यान्वयन के लिए तो बंगाल में उसकी मुख्य चुनौती सत्ता में खुद आने की नहीं है बल्कि ममता दीदी को सत्ता में बहाल रखकर वाम और कांग्रेस गठबंधन के उभार को रोकने की है।

    जाहिर है कि इस लिहाज से यह चुनाव बेहद खास है कि बंगाल और असम में तय होने जा रहा है कि वोट की ताकत से केसरिया अश्वमेधी घोड़ों को रोका जाना संभव है या नहीं है।

    इस प्रयोग के बाद यूपी में भी समाजवादियों के साथ दीदीमार्का तालमेल संघपरिवार का फौरी कार्यक्रम हो सकता है।
    पलाश विश्वास
    बंगाल के संवेदनशील जंगल महल और असम में विधानसभाओं के चुनाव के पहले चरण का मतदान शुरु हो चुका है।जंगलमहल के शालबनी में माकपा प्रत्याशी के साथ मीडियाकर्मियों को धुन डाला सत्तादल के गुंडों ने और इस प्रकरण में एक मीडियाकर्मी का अपहरण भी हो गया।इन पंक्तियों को लिखने तक उसके साथ अंतिम वक्त तक रहे पत्रकारों ने कहा कि उसे बुरी तरह मारपीट कर ले गये और उसका अता पता नहीं है।

    बहरहाल सरकारी सूत्रों के मुताबिक हिंसा की कोई खबर अभी लीक नहीं हुई है।

    सरकारी सूत्रों के मुताबिक  पश्चिम बंगालमें सोमवार सुबह सात बजे कड़ी सुरक्षा के बीच विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदानशुरू हो गया। शुरुआती दो घंटों में करीब 23 फीसदी मतदानहुआ। विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 18 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदानशुरू हुआ। ये निर्वाचन क्षेत्र राज्य के तीन जिलों पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुड़ा व पुरुलिया में आते हैं। इस चरण में जिन 18 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदानहो रहा है, उनमें से नौ पुरुलिया, तीन बांकुरा और छह पश्चिम मिदनापुर में पड़ते हैं।

    निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी ने कहा, ''शुरुआती दो घंटों में 23 फीसदी से थोड़ा ज्यादा मतदानदर्ज किया गया।

    असम से अभी किसी बड़ी खबर नहीं आयी है।लेकिन वहां कभी भी बंगाल से बड़ी घटना हो जाने का अंदेशा बना हुआ है।बंगाल में हिसां सत्ता दल का विशेषाधिकार है तो असम में धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण चरम पर है और वहां सियासत सांप्रदायिक दंगों की पूंजी के दम पर चलती है।असम में कांग्रेस सरकार के चुने जाने का भरोसा जाहिर करते हुए मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने कहा है कि केवल उनकी पार्टी ही राज्य में विकास के जरिए बेहतर बदलाव लायी है जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने वादों को पूरा करने में 'विफल 'रहे हैं ।

    बहरहाल इन दो राज्यों में मुख्य चुनौती संघ परिवार की सत्ता दखल की है।असम में असम गण परिषद के कंधे पर बंदूक रखकर भाजपा हिंदुत्व के इस प्रयोगशाला का विस्तार करना चाहती है हिंदुत्व के एजंडे का ग्लोबल कार्यान्वयन के लिए तो बंगाल में उसकी मुख्य चुनौती सत्ता में खुद आने की नहीं है बल्कि ममता दीदी को सत्ता में बहाल रखकर वाम और कांग्रेस गठबंधन के उभार को रोकने की है।

    जाहिर है कि इस लिहाज से यह चुनाव बेहद खास है कि बंगाल और असम में तय होने जा रहा है कि वोट की ताकत से केसरिया अश्वमेधी घोड़ों को रोका जाना संभव है या नहीं है।

    इस प्रयोग के बाद यूपी में भी समाजवादियों के साथ दीदीमार्का तालमेल संघपरिवार का फौरी कार्यक्रम हो सकता है।इसमें समाजवादियों की कितनी मजबूरी होगी और संघ परिवार मुलायम को खुश करने के लिए क्या क्या कर सकता है, मसलन मुलायम का राष्ट्रीय कद केसरियाकरण से किस हद तक ऊंचा किया जा सकता है और यूपी के भाजपाइयों की महात्वांकांक्षाओं की बलि चढ़ाकर अखिलेश को ही अगला मुख्यमंत्री बनाये रखने में भाजपा सहमत है या नहीं,यह सबकुछ निर्भर करेगा।

    यह सारा खेल संघ परिवार की रणनीति की असम और बंगाल में कामयाबी नाकामयाबी पर निर्भर है।

    भारतीय जनता के लिए शायद यहकिस्मत आजमाने का मौका जैसा है कि लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत फासिज्म को रोकने का आखिरी रास्ता अभी खुला है या बंद हो गया है निरंकुश सत्ता के मुक्तबाजार में।

    इसी बीच पनामा पेपर्स में विकीलिक्स से बड़ा खुलासा हुआ है,जो आज इंडियन एक्सप्रेस में विस्तार से छपा है और उसकी कुछ खास बाते हम इस रपट के आखिर में नत्थी कर रहे हैं।

    टैक्स बचाने के लिए दूसरे देशों में पैसा छिपाने के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा खुलासा हुआ है। पनामा की लॉ फर्म के 1.15 करोड़ टैक्स डॉक्युमेंट्स लीक हुए हैं। ये बताते हैं कि व्लादिमीर पुतिन, नवाज शरीफ, शी जिनपिंग और फुटबॉलर मैसी ने कैसे अपनी बड़ी दौलत टैक्स हैवन वाले देशों में जमा की। सवालों के घेरे में आए बड़े भारतीय नामों में अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और डीएलएफ के प्रमोटर केपी सिंह शमिल हैं।

    इन दस्तावेजो में नयी केसरिया अंध राष्ट्रवाद की हिंदुत्व सत्ता में कालेधंधे का गोरखधंधा से लेकर रक्षा सौदों और सेना के महिमामंडन की भारत माता की जय महिमामंडन के तहत अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार के देसी सौदागरों के कुछ नकाब उतरे हैं। अमिताभ बच्चन और उनकी बहू के चमकदार चेहरे से लेकर प्रधानमंत्री की सत्ता के सबसे मजबूत खंभा अडाणी कुनबे की रंग बिरंगी छवियां पिर चमकने लगी हैं।

    इसके साथ ही देशभर में हमारे बच्चों को अफजल गुरु की फांसी पर कथित तौर पर सवाल खड़े करने के एवज में राष्ट्रद्रोही करार देने और गोमांस वसंत,शटडाउन जेएनयू शट डाउन जादवपुर शट डाउन हैदरा बाद शटडाउन इलाहाबाद वगैरह वगैरह के ट्रंप मार्का बजरंगी मुहिम चलाने के बाद संघ परिवार की अभूतपूर्व सहिष्णुता के तहत अफजलगुरु को शहीद माने वाली महबूबा मुप्ती को निःशर्त समर्थन के साथ कश्मीर की महिला मुख्यमंत्री बतौर ताजपोशी हो गयी है।

    अगर देशभक्ति और भारतमाता की जय के लिए यह पहल है तो इसके लिए संघ परिवार का शुक्रिया अदा से किसी को परहेज नहीं करना चाहिए।महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की पहली महिला सीएम बन गई हैं। राज्यपाल एनएन वोहरा उन्हें 13 वें सीएम के तौर पर शपथ दिलवाई। पीडीपी-बीजेपी की इस सरकार में 22 एमएलए ने शपथ ली। बीजेपी विधायक दल के नेता डॉ. निर्मल सिंह डिप्टी सीएम बने। मुफ्ती मोहम्मद सईद की मौत के बाद 9 जनवरी को राज्य में गवर्नर रूल लगा दिया गया था। कांग्रेस ने इस गठबंधन को 'अपवित्र'बताते हुए इसका बॉयकॉट किया।

    इस सिलसिले में हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि हम बी शरणार्थी हैं भले ही अछूत हिंदी बांगाली विभाजन पीड़ित परिवार से हैं तो हम कश्मीर के पंडितों की घर वापसी के हिमायती भी हैं।इसके सात ही हम कश्मीर में सारे हिंदुओं को पंडित मान लेने की जाति उन्मूलन की पहल को भी सकारात्मक मानते हैं।

    सिर्फ हमें यह पहेली अब भी समझ में नहीं आती कि कश्मीरी पंडित सारे के सारे सवर्ण हैं तो कश्मीर में अछूतआदिवासी और पिछड़े हिंदू भी कम नहीं है जो पंडित नहीं है लेकिन पंडितों की जुबानी हम उनकी कोई खता व्यथा सुनते नहीं है जो हम यकीनन जानना चाहते हैं।

    बहरहाल बंगाल में संघ समर्थित वाम कांग्रेस विरोधी तृणमूली हिंसा का यह लोकतंत्र उत्सव किस किस्म का जनादेश पैदा करेगा कहना मुश्किल है।जबकि वाम व लोकतांत्रिक गठबंदन के तेजी से जनता के बीच पैठ बनाने के बावजूद मतदान शुरु होने से पहले तक समझा जा रहा था कि दीदी इस चुनौती का समाना कर लेंगी।

    इसके विपरीत अब  जिस तरह जंगल महल में भी आदिवासी स्त्री पुरुषं को डराने धमकाने, मारने पीटने और माकपा प्रत्याशी समेत मीडिया कर्मियों पर हमला करने की गलतियां कर रहा है सत्तादल , उससे तो यही लगता है कि दीदी फ्लाईओवर गिरने के सदमे से उबर नहीं पायी है और शहरी विकास मंत्री के स्टिंग के मुताबिक सारे वोट लूट लेने के एजंडा के तहत ही फिर वे सत्ता में वापस लौटना चाहती है।

    इन हिंसा की घटनाओं में सर्वत्र शांतिपूर्ण मतदान के लिए ढाक ढोल पीटकर जिस केंज्रीय वाहिनी को तैवनात किया गया है,वह तमाशबीन है और पीड़ितों की गुहार को अनसुनी कर रही है।

    इसके अलावा इस हिंसा के खिलाफ सत्तादल और संघ परिवार दोनों ओर से निंदा के कोई शब्द नहीं हैं जबकि बूथों में पीटे जाने वाले वोटरों में भाजपा समर्थक भी हैं।

    जाहिर है कि तृणमूल कांग्रेस नंदीग्राम केशपुर नानुर सिंगुर का हवाला देते हुए चीख चीखकर कहने की कोशिश कर रहे हैं कि सत्ता में रहते हुए वामदलों ने अगर हिसा का रास्ता अखितयार किया तो तृणमूली हिंसा पर सहबको जुबान तालाबंद रखना चाहिए।

    अजीब संजोग है कि संघ परिवार और हिदुत्व ब्रिगेड का भी बंगाल और बाकी देश में यही रवैया है।वे भी माकपाई हिंसा का हवाला जोर शोर से दे रहे हैं और केद्रीय वाहिनी से लेकर भाजपा की सरकार और पार्टी तृणमूल की हिंसा का समर्थक बतौर सामने आ रही है।

    पिछले बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले माओवादी नेता किशनजी ने फतवा दिया ता तृणमूल कांग्रेस को जिताने के लिए और किसनजी ने तब ऐलान किया था कि वे ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बतौर देखना चाहते हैं।

    उन्होंने ममतादीदी को मुख्यमंत्री बनते हुए देखा जरुर,लेकिन दीदी की ही पुलिस ने उन्हें मार डाला।किशनजी के दाहिने हाश माओवादी दस्ता के कमांडर विकास और उनकी पत्नी को ऐन चुनाव से पहले गिरफ्तार कर लिया है।

    इसीसिलसिले में हालफिलहाल तक चर्चित लालगढ़ प्रकरण की याद जरुरी है,जहां जनगणेर पुलिसिया अत्याचार समिति के आंदोलन की वजह से आपरेशन ग्रीन हंट की नौबत बनी थी।

    इस समिति के नेता थे युधिष्ठिर महतो।जिनके साथ जमीन आंदोलन के दौर में जंगल महल में न सिर्फ दीदी बल्कि उनके मंत्री संतरी बंग भूषण बंगविभूषण सुशील समाज के चमकदार तमाम चेहरे मंच साझा कर रहे थे।

    छत्रधर महतो परिवर्तन होते न होते माओवादी करार दिये गये और जेल में सड़ रहे हैं।उनके नाम पूर्व तृणमूल सांसद कबीर सुमन ने अपनी सांसदी को दौरान एक पोपुलर गाना भी लिखा थाःछत्रधरेर गान।हो सके तो इस मतदान के साथ उन्हें भी तनिक याद कर लें।

    पनामा लीक्स : दुनियां के टैक्स चोरों में शामिल पुतिन, नवाज, अमिताभ, ऐश्वर्या सहित 500 हस्तियां

    वाशिंगटनःआपने अब तक कई वार सुर्खियों में रह चुकी विकीलीक्स के बारे में सुना होगा, लेकिन राजनेता, खिलाड़ियों और बॉलीबुड के रसूखदारों की पोल खोलने की लिए विकीलीक्स की तर्ज पर अब आपके सामने पनामा लीक्स नाम के पनामा की लॉ फर्म मोसेक फोंसेका के कुछ दस्तावेज लीक होने से दुनियां में अब तक के सबसे बड़े टैक्स लीक का खुलासा हुआ है। इन दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि कैसे दुनिया की सबसे ताकतवर हस्तियां और लोगों के दिलों में रोल मॉडल बने सेलीब्रिटी कैसे अपना टैक्स बचाने के लिए टैक्स हेवन का इस्तेमाल करती है

    पनामा लीक्स दस्तावेजों के मुताबिक टैक्स बचाने के लिए टैक्स हैवन का इस्माल करने वाले प्रमुख ररसूखदारों में रूसी राष्‍ट्रपति ब्‍लादिमीर पुतिन, मिश्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्‍नी मुबारक, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद, लीबिया के पूर्व लीडर मोहम्मद गद्दाफी, पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो और वर्तमान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आदि शामिल हैं। ये दस्‍तावेज 70 से ज्‍यादा वर्तमान या पूर्व राष्‍ट्राध्‍यक्षों और तानाशाहों से जुड़े हैं। इन दस्तावेजों से पता चलता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के बेटे हुसैन और उनकी बेटी मरियन सफदर ने टैक्स हेवेन माने जाने वाले ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड में कम से कम 4 कंपनियां डालीं। इन कंपनियों से इन्होंने लंदन में छह बड़ी प्रॉपर्टीज खरीदी। जांच में यह खुलासा हुआ कि पाकिस्तान के शरीफ परिवार ने इन प्रॉपर्टीज को गिरवी रखकर डॉएचे बैंक से करीब 70 करोड़ रुपये का लोन लिया। इसके अलावा, दूसरे दो अपार्टमेंट खरीदने में बैंक ऑफ स्कॉटलैंड ने वित्तीय मदद की।


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    बाकी देश में जाति और धर्म के नाम,मंडल कमंडल गृहयुद्ध महाभारत रचने वाले अश्वमेधी केसरिया सिपाहसालारों के सारे अचूक रामवाण बंगाल में फेल

    केंद्रीय वाहिनी तूणमूली बाहुबलियों के लिए छाता का काम कर रही है और दीदी को भी वाकओवर

    साख कोई नहीं बची,गुपचुप गठबंधन का खुलासा हो गया तो संघी आपस में ही भिड़ने लगे

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    हस्तक्षेप

    बाकी देश में जाति और धर्म के नाम,मंडल कमंडल गृहयुद्ध महाभारत रचने वाले अश्वमेधी केसरिया सिपाहसालारों के सारे अचूक रामवाण बंगाल में फेल हो गये हैं।


    छत्तीस इंच का सीना तानकर धर्मोन्मदी ध्रूवीकरण का ब्रह्मस्त्र भी इस बार काम नहीं करने वाला है ।


    मां दुर्गा की शरण में जाकर असुरों के वध का आवाहन भी बेकार हो गया।अब संघ परिवार के नेता कार्यकर्ता नेता  आपस में ही घमासान करने लगे हैं।


    संघ परिवार के अंध राष्काट्रवाद और फर्जी हिंदुत्व का  तिलिस्म टूटा तो आगे आगे बाकी देश में बी यही नजारा गुले गुलशन होने वाला है।


    हावड़ा में द्रोपदी रूपा गांगुली को प्रत्याशी बनाये जाने का इतना ज्यादा विरोध हुआ कि वहां कार्यकर्ताओं की पहली बैठक में ही टिकट के दावेदार रायसाहब के समरथकों ने कुर्सियों से पंतगबाजी कर दी और रूपा और दूसरे नेताओं के सामने वंदेमातरम और भारत माता की जय के उद्घोष के साथ रूपा समर्थकों को धुन डाला ,जिससे कमसकम दो तीन लोगं को अस्पताल में भरती करना पड़ा।


    यह वाकया खासा गौरतलब है क्योंकि  इन्हीं रूपा गांगुली को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुकाबले विकल्प नेतृत्व बतौर पेश करते हुए  सिर्फ उनके मेकअप वैन पर लाखों का खर्च पार्टी कर रही थी।


    संघ समर्थित रूपा  गांगुली संघ परिवार की सबसे बड़ी स्टार है और पूरे प्रदेश में उन्हें कमल की खेती करनी थी।वे हावड़ा में हुगलीकिनारे कमल कीचड़ में बुरी तरह फंस गयी हैं।


    इससे बुरा हाल तो यह है कि दुर्गापुर आसनसोल के भाजपाई गढ़ों में भी भाजपा के केद्रीय मंत्रियों और नेताओं को सुनने के लिए किराये की भीड़ जुटाना भी मुश्किल हो रहा है।


    हालत इतनी खराब है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा की जोड़ासांको विदानसभा इलाके में भाजपा के गढ़ में हालत पतली है।जहां बड़ा बाजार चीरकर सेंट्रल एवेन्यू से हावड़ा को निकाले जाने वाले अधबने फ्लाईओवर का मलबा अभी हटाया नहीं जा सका है और वहां सत्तादल की उम्मीदवार स्मिता बक्शी मौजूदा एमएलए हैं,जिनका कुनबा इस हादसे के लपेटे में हैं।उनकी पार्टी के नेता ही उन्हें कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और उनके कई परिजन जमीन की दहकती आंच से परेशां न जाने कहां कहां भूमिगत हैं।


    स्मिता को जनसमर्थन नहीं मिल रहा है क्योंकि मलबे से अभी भारी सड़ांध हैं और सिंडिकेट के सारे तार उनसे उलझे हैं।


    इसका कोई फायदा बड़बोले राहुल सिन्हा को हो नहीं रहा है।उनकी पदयात्रा में न भीड़ हो रही है औरकार्यकर्ता उनके साथ हैं।प्रदेश नेतृत्व तो उनके बागी तेवर से परेशान है।


    मां दुर्गा काआवाहन करके बेहतरीन अदाकारी मनुस्मृति संसद में और संसद के बाहर सड़कों में और बंगल में भी रो धो कर दुर्गाभक्तों को जगा नहीं सकीं तो नेताजी फाइलों के बहाने नेहरु वंश को कठघरे में खड़ा करके नेताजी की विरासत हड़पने की मंशा भी पूरी होती नहीं दीख रही।


    नेताजी के वंशज चंद्र कुमार बोस ममता बनर्जी के मुकाबले बंगाल में संघ परिवार की ओर से घोषित पहले प्रत्याशी हैं और वे न टीवी के परदे पर हैं और न अखबारों में।जबकि मुख्यमंत्री के इस विधानसभा क्षेत्र में पिछले लोकसभा में भाजपा को बढ़त मिली हुई थी ।


    जैसे जैसे दीदी मोदी गठबंधन का खुलासा हो रहा है और दीदी केसरिया वसंत बहार हो रही हैं,कोई ताज्जुब भी नहीं होना चाहिए कि भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने चंद्र कुमार बोस को डमी बतौर खड़ा करके दीदी को वाकओवर दे दिया है।


    संघ परिवार के कबाड़ से उठाकर प्रदेश इकाई का नेतृत्व सौंपकर उग्र हिंदुत्व की लाइन का बंगाल में बसे गाय पट्टी के हिंदीभाषियों पर भी असर नहीं हुआ।


    देश के बाकी हिंदी भाषियों को जितनी जल्दी ऐसी शुभ विवेक का आसरा मिले,उतना ही भला है।कयामती मंजर बदल जायेगा।


    इन नये प्रदेश अध्यक्ष का अता पता नहीं चल रहा है जो कल तक विश्वविद्यालयों में घुसकर शिक्षकों और छात्रों को कालर पकड़कर खींच लाने और देशभक्ति का सबक देने के लिए गुर्रा रहे थे।


    जेएनयू की तर्ज पर यादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों पर राजद्गोह का मुकदमा शुरु करने के लिए राजभवन में सर्वोच्च नेतृत्व के कैंप का असर यह हुआ कि आईआईटी आीआईएम यादवपुर और कोलकाता के बाद विश्वभारती में भी फासिज्म के खिलाफ आवाजें गूंजने लगी हैं।


    असम और गुजरात और देश के बाकी हिस्सों की तरह बंगाल में दंगों की आग सुलगाना भी मुश्किल है तो अंध राष्ट्र वाद के तीर भी चल नहीं सकते।


    शारदा चिटफंड घोटाले में सीबीआई,सेबी,ईडी समेत तमाम केंद्रीय एजंसियों ने बहुत कुछ हिला डुलाकर,पूछताछ गिरफ्तारी इत्यादि दिखाकर मामला रफा दफा कर दिया और अब नारद स्टिंग के रोज रोज रोज हो रहे धमाकों में सत्ता दल के मत्री सांसद इत्यादि घूस लेते हुए दिखाये जाने के बावजूद,सारा वोट लूट लेने का दावा करते दिखाये जाने के बावजूद न चुनाव आयोग और न केंद्रीय एजंसियों और न केंद्र सरकार ने किसी जांच पड़ताल की नौबत आने दी है।


    नकली जिहाद की पोल खुल ही गयी थी।


    अब बाकी कलर शांतिपूरण मतदान कराने के बहाने बूथों पर तैनात केंद्रीय बलों के सत्तादल के बाहुबलियों का छाता बनकर दीखने से पूरी हो गयी है।

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    Prize won for peace,but peace missing and Child Labour persists as the worst form of bonded labour!

    Excalibur Stevens Biswas

    HASTAKSHEP



    Government does say lot of things about laws but still it takes no action against child labour as the picture of a child burning his innocence in a petrol pump shows.It is daylight violation of law as well as civic sense!


    Let us fight against poverty!

    Let us fight against bonded labour!

    Let us fight against apartheid and discrimination in any form!

    Let us fight against communalism!

    Let us fight against terror!

    Let us fight against inequality!

    Let us fight against gender bias!

    Let us fight against injustice!


    We all know the reality of this zingled slogan and on the same line it is quite a hollow sound-let us fight against child labour.We cry to save the children but that child should belong to our caste,our class our community.We have nothing to do with the children belong to underclasses!Thus,Child labour is the practice of having children engage in economic activity, on part- or full-time basis. The practice deprives children of their childhood, and is harmful to their physical and mental development. Poverty, lack of good schools and growth of informal economy are considered as the important causes of child labour in India. The 1998 national census of India estimated the total number of child labour, aged 4–15, to be at 12.6 million, out of a total child population of 253 million in 5–14 age group.


    In India,The 2011 national census of India found the total number of child labour, aged 5–14, to be at 4.35 million, and the total child population to be 259.64 million in that age group.The child labour problem is not unique to India; worldwide, about 217 million children work, many full-time.


    We are not ashamed to debate on child care and child welfare in these circumstances!

    These photos from Kolkata should be very disturbing for any sensitive Indian as the child is misused as a worker in a petrol pump which is not safe for any child.Rather he or she should be engaged in his or her studies.


    Any comment from the nobel laureate?Let us hear from me about the latest status of child labour since he has not spoken in public to Indian people for long!


    We are habitual to see innocent child workers earning their bread and butter in our daily live in every segment of unorganised sector.


    Set ahead the law of the land,on ground zero,Children are being engaged in catering, shops,begging,crimes and even in illegal mining at large scale.


    But then the petrol pumps should be protected area under continuous surveillance.And we do not react while seeking fuel when we see a child pumping oil.


    It is a shame that we have a nobel laureate who got the peace prize for his achievement to liberate bonded labour but India is not liberated from bonded labour at all.The nobel laureate seems to be absconding as far as Indian scenario is concerned.India is torn within in intolerance inflicted by unprecedented caste communal clash and it is almost a civil war like situation but we have not heard anything from the nobel laureate latest.

    Wikipedia says:

    Indian law specifically defines 64 industries as hazardous and it is a criminal offence to employ children in such hazardous industries.[8] In 2001, an estimated 1% of all child workers, or about 120,000 children in India were in a hazardous job.[9]Notably, Constitution of India prohibits child labour in hazardous industries (but not in non-hazardous industries) as a Fundamental Right under Article 24.[10]UNICEF estimates that India with its larger population, has the highest number of labourers in the world under 14 years of age, while sub-saharan African countries have the highest percentage of children who are deployed as child labour.[11][12][13]International Labour Organisation estimates that agriculture at 60 percent is the largest employer of child labour in the world,[14] while United Nation's Food and Agriculture Organisation estimates 70% of child labour is deployed in agriculture and related activities.[15] Outside of agriculture, child labour is observed in almost allinformal sectors of the Indian economy.[16][17][18]

    Companies including Gap,[19]Primark,[20]Monsanto[21] have been criticised for child labour in their products. The companies claim they have strict policies against selling products made by underage children, but there are many links in a supply chain making it difficult to oversee them all.[21] In 2011, after three years of Primark's effort, BBC acknowledged that its award-winning investigative journalism report of Indian child labour use by Primark was a fake. The BBC apologised to Primark, to Indian suppliers and all its viewers.[22][23][24]



    Here you are!

    It is a worldwide Save the Children launched by UNESCO!

    WHY SHOULD I CARE

    • 13,40,000 children below 5 die in a year, that is 3671 under 5 child deaths per day

    • Nearly half of all child deaths under 5 in India are attributed to undernutrition

    • 1 in every 11 children in India is working, when they should be at school

    • More than half (56%) of the under 5 deaths occur within the first 28 days of life, we work to prevent these lives

    • India accounts for more than 3 out of 10 stunted children in the world

    • 47% of the women in India are married when they are a child (before the age of 18), and 30% bear a child when they are a child (adolescent mothers)

    • 17.7 million children and adolescents are out of school in India, this is 14% of world's population of children out of school

    • 20% of grade 2 children in India cannot recognize numbers 1-9; 53% of children drop out of school at elementary level

    • 49.5% of grade 5 children cannot do subtraction and 55% of grade 8 children cannot solve 3 digits by 1 digit division problem;51.09% of grade 5 children cannot read grade 2 English and 25.4% children of grade 8 cannot read grade 2 text







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    BJP betrayed Mother India by inviting ISI to probe Pathankot: Kejriwal

    मुँह में राम बग़ल में छुरी। BJP/RSS वाले मुँह से "भारत माता की जय" बोलते है और ISI को बुलाकर भारत माता की पीठ में छुरा भोंक देते हैं।

    The BJP government has stabbed "Mother India" in the back by allowing Pakistan's Inter-Services Intelligence (ISI) inside the country to probe the Pathankot attack, Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal said on Tuesday.

    "Even though BJP/RSS chants 'Bharat Mata ki Jai,' but by inviting ISI to India they have stabbed Mother India in the back," Kejriwal tweeted in Hindi. 

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    2. @ArvindKejriwalसर जी... 100% 👌हमको तो अपनों ने ही बेज्जत किया... गेरो में कहा दम था..!! #ModiSellsIndiaToPak

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    © Provided by Hindustan Times

    The government allowed a Joint Investigation Team (JIT) from Pakistan, including an ISI official, to visit India last month to probe the terrorist attack in January on Pathankot air force station in Punjab. The JIT has concluded, according to media reports in Pakistan, that the Pathankot attack was staged by India to spread "viciuos propaganda" against Pakistan. 

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    2. #ModiSellsIndiaToPak"मूँह मे राम बगल मे छुरी" पर दिल्ली के CM @ArvindKejriwalजी की प्रेस कॉन्फ्रेंस दिन मे दो बजे

      29 retweets12 likes
       
       

    "It is very shameful. It is for the first time that any Prime Minister has insulted the country before Pakistan," Kejriwal said in another tweet. Kejriwal's Aam Aadmi Party (AAP) has been protesting against allowing Pakistan's JIT a role in the investigation on the ground that the ISI, a state actor, has long been the instigator of terrorism in India. 

    @ArvindKejriwalसर जी...आप भी है ना 😃यही ( #PathankotAttack ) तो था जन्म दिवस का रिटर्न गिफ्ट या डील 😃

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    2. सारी दुनिया मे आतंकवाद फैलाने वाली ISI को भारत बुलाकर प्रधानमंत्री जी ने दी क्लीन चिट : CM @ArvindKejriwal

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    राजस्थान में दलित बच्चों को नंगा करके पीटा गया

    प्रधानमंत्री को विदेश यात्रा से लौटने के बाद फिर दलितों ऐर आदिवासियों की याद आयी है और उनका राजधर्म तो गुजरात माडल से ही जगजाहिर है।उनके समावेश का असल अंदाज कुछ निराला ही कहा जाना चाहिए जैसे नागौर में केसरिया राजकाज में दलित महिलाओं से बलात्कार का न्याय तो मिला ही नहीं ,अब बच्चों को भी समता और न्याय का मनुस्मृति पाठ का नजारा यहींच है।

    पलाश विश्वास

    आई.के मानव ने दिल दहलाने वाली यह यह तस्वीर साझा की है।यह हिंदूराष्ट्र में  लोकतंत्र की असली तस्वीर समरस है।

    राजस्थान में दलित बच्चों को नंगा करके पीटा गया पर बीजेपी सरकार अंधी बहरी है.....

    भूखे नंगों को भी जीने की इजाज़त दे दो 
    और कुछ ना दो हमें थोड़ी सी इज्ज़त दे दो.
    हम इसी देश में जन्मे हैं हम मरेंगे यहीं
    रोटी मत दो हमें थोड़ी सी मुरव्वत दे दो .


    प्रधानमंत्री को विदेश यात्रा से लौटने के बाद फिर दलितों ऐर आदिवासियों की याद आयी है और उनका राजधर्म तो गुजरात माडल से ही जगजाहिर है।उनके समावेश का असल अंदाज कुछ निराला ही कहा जाना चाहिए जैसे नागौर में केसरिया राजकाज में दलित महिलाओं से बलात्कार का न्याय तो मिला ही नहीं ,अब बच्चों को भी समता और न्याय का मनुस्मृति पाठ का नजारा यहींच है।

    मशहूर पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा हैः

    सचमुच, अचरज हो रहा है-दलित समाज से आने वाली होनहार छात्रा डेल्टा मेघवाल की हत्या(घटनास्थल बाड़मेर, राजस्थान) के मामले पर बड़े सियासी दलों और मुख्यधारा मीडिया की खामोशी देखकर। ये कहां हैं, 'भारत माता की जय' वाले! उनके शासन में 'भारत बाला' के हत्यारों पर यह रहस्यमय खामोशी क्यों? दूसरा सवाल, मीडिया से जुड़ा: भारतीय मीडिया, खासकर चैनलों के मौजूदा न्यूज-रूम्स में थोड़ी-बहुत सामाजिक-वैचारिक विविधता रहती तो क्या ऐसा होता! हरियाणा में बीते कुछ बरसों के दौरान दलित-महिलाओं के साथ बदसलूकी और बलात्कार की दर्जनों घटनाएं दर्ज हुईं। पर कुछ ही कि.मी.पर अवस्थित राष्ट्रीय मीडिया के मुख्यालयों में कोई हरकत नहीं हुई। इस बारे में विस्तार से जानना है तो RSTV के कार्यक्रम Media Manthan का वह खास एपिसोड देख सकते हैं, जिसमें मीडिया और दलित मुद्दे पर चर्चा हुई थी। You tube से वह खोजा जा सकता है।



    आज तुम्हारे सिर पर बैठ कर संविधान के सहारे जो राज कर रहे हैं। याद करो.. वो कभी तुम्हारे जूते साफ किया करते थे। आज तुम्हारे हुजूर हो गये हैं..। क्यों..? हम बंट गए..। हम विभाजित हो गये.. BJP महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष मधु मिश्रा

    अलीगढ़। भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष मधु मिश्रा ने रविवार को परशुराम सेवा संस्थान…
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    प्रभाकर ग्वाल एक जज थे .
    वे दलित हैं .
    प्रभाकर ग्वाल हद दर्जे के ईमानदार इंसान हैं .
    प्रभाकर ग्वाल आज भी साईकिल से कोर्ट जाते हैं .
    कल ही उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है .
    उनकी गलतियां क्या थीं .
    छत्तीसगढ़ के भाजपा के भ्रष्ट मंत्री अमर अग्रवाल नें जमीन का घोटाला किया
    मंत्री नें पटवारी तहसीलदार और पुलिस वालों के साथ मिल कर आदिवासियों की ज़मीन हडप ली
    जज प्रभाकर ग्वाल नें आदिवासियों की शिकायत पर मंत्री ,तहसीलदार और पुलिस वालों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ कर दिया
    जज प्रभाकर ग्वाल को वहाँ से हटा दिया गया
    जज प्रभाकर ग्वाल रायपुर आ गए
    तबादले से भी जज प्रभाकर ग्वाल का ईमानदारी का जोश कम नहीं हुआ
    तभी रायपुर में पीएमटी का पर्चा लीक हो गया
    जज प्रभाकर ग्वाल नें एसपी दीपांशु काबरा और भाजपा के विधायक को नोटिस जारी कर दिया
    जज साहब को धमकी दी गयी कि तुम्हें इसकी सज़ा मिलेगी
    जज प्रभाकर ग्वाल का तबादला बस्तर के सुकमा ज़िले में कर दिया गया
    जज प्रभाकर ग्वाल नें वहाँ भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कर लिया
    कलेक्टर नें जज प्रभाकर ग्वाल को फोन कर के कहा कि आप मुकदमा करने से पहले मुझ से पूछा करिये
    जज प्रभाकर ग्वाल नें कलेक्टर की फोन रिकार्डिंग सार्वजानिक कर दी
    जज प्रभाकर ग्वाल से पूरा भ्रष्ट तंत्र कांपने लगा
    भ्रष्ट तंत्र नें गिरोहबंदी करी
    हाई कोर्ट नें जज प्रभाकर ग्वाल को कल एक पत्र भेज दिया
    जिसमें लिखा है कि जनहित में आपको बर्खास्त किया जाता है
    जाओ प्रभाकर ग्वाल घर जाओ
    ईमानदारी अब एक अपराध है
    वो भी उस राज्य में जहाँ का मुख्यमंत्री तक भयानक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है
    छत्तीसगढ़ का शासन तंत्र भारतीय लोकतंत्र पर एक काला दाग है
    छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं को भगाया जा रहा है
    वकीलों को भगाया जा रहा है
    पत्रकारों को जेल में डाला जा रहा है
    अब ईमानदारी के अपराध में जजों को बर्खास्त किया जा रहा है
    "जज प्रभाकर ग्वाल को न्याय दो "
    "प्रभाकर ग्वाल को जज के पद पर बहाल करो"

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  • 04/06/16--05:00: सारी पवित्र गायें वहीं पनाामा पेपर्स!वह फूल क्या, गुलशन या बहार क्या,जो जमीन की आग की आंच से दहके ना! अच्छे दिन अब पनामा पेपर्स हैं। हिंदुत्व का राजकाज भी वही पनामा पेपर्स। भारत माता की जय पनामा पेपर्स। धर्म कर्म राजकाज राजकरण पनामा पेपर्स। मुक्त बाजार पनामा पेपर्स।लोकतंत्र,संविधान,समता न्याय सब पनामा पेपर्स। देशभक्ति और राष्ट्रवाद पनामा पेपर्स। मन की बातें और यह सैन्यत्त्र पनामा पेपर्स। आर्थिक सुधार विकास मेकिंग इन और स्मार्ट इंडिया भी पनामा पेपर्स। सिनेमा कला साहित्य मीडिया पनामा पेपर्स। संघवाद और नमनुस्मृति अनुशासन पनामा पेपर्स। मर गया अखबार और मरा भी नहीं है अखबार,अब भी सत्ता से टकराने वाला वही अखबार! सारी पवित्र गायें वहीं पनाामा पेपर्स पलाश विश्वास
  • सारी पवित्र गायें वहीं पनाामा पेपर्स!

    वह फूल क्या, गुलशन या बहार क्या,जो जमीन की आग की आंच से दहके ना!

    अच्छे दिन अब पनामा पेपर्स हैं।

    हिंदुत्व का राजकाज भी वही पनामा पेपर्स।

    भारत माता की जय पनामा पेपर्स।

    धर्म कर्म राजकाज राजकरण पनामा पेपर्स।

    मुक्त बाजार पनामा पेपर्स।लोकतंत्र,संविधान,समता न्याय सब पनामा पेपर्स।

    देशभक्ति और राष्ट्रवाद पनामा पेपर्स।

    मन की बातें और यह सैन्यत्त्र पनामा पेपर्स।

    आर्थिक सुधार विकास मेकिंग इन और स्मार्ट इंडिया भी पनामा पेपर्स।

    सिनेमा कला साहित्य मीडिया पनामा पेपर्स।

    संघवाद और नमनुस्मृति अनुशासन पनामा पेपर्स।

    मर गया अखबार और मरा भी नहीं है अखबार,अब भी सत्ता से टकराने वाला वही अखबार!


    पलाश विश्वास

    हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने 1979 में हमारे नैनीताल छोड़कर मैदानों में आने के बाद हर बार जब भी पहाड़ों में उनसे मुलाकात करने गये,हमसे पूछा है कि तुझमें फिर वही आग सही सलामत है या नहीं।हमें अपने गुरुजी पर फख्र है जो हमारी आग की खबरदारी करते हैं और उन्हें हमारे या हमारे कुनबे के सही सलामत होने की उतनी परवाह भी नहीं है।


    ये वहीं गुरुजी है कि देशभर से जब वैकल्पिक मीडिया के लिए हमने हस्तक्षेप को जनसुनवाई का मंच बनाने के लिए बार बार अपील करने के बाद खाली हाथ ही रहे,तो उनने सीधे मेल करके पूछ लिया कि हस्तक्षेप का एकाउंट नंबर भेजो और बताओ कि कितनी रकम चाहिए।अब हम संसाधन की फिक्र नहीं कर रहे हैं और हमें फिर उसी आग की फिक्र है।गुरुजी सात है तो बाकी लोग भी साथ आयेंगे।देर सवेर।हम पेड़ लगा रहे हैं।फल तुरतफुरत मिलने के आासर नहीं हैं।


    वह फूल क्या ,गुलशन या बहार क्या,जो जमीन की आग की आंच से दहके ना!


    हमारे लिए ऐसे गुरुजी का आशीर्वाद ही काफी है और हम भले बड़े संपादक वगैरह वगैरह ना हुए और न प्रतिष्ठित वगैरह वगैरह  हुए लेकिन जीआईसी नैनीताल 1975 में छोड़ने के बावजूद हमारे गुरुजी को यकीन है कि उनने हमारे दिलोदिमग में जो आग सुलगाई थी , उसकी आंच सही सलामत है।करीब इकतालीस साल से पल पल वे उस आग के पहरेदार बने हुए हैं।आग यह बुझ नहीं सकती।


    हमारे अंबेडकरी मित्रों को हम कभी नहीं समजा सकते कि जाति और धर्म के रिश्तों के अलावा इंसानियत का रिश्ता भी है और हम हिमालय से हैं जहां जात पांत के दायरों से बाहर भी हमारे रिश्ते जस के तस हैं और हम जाति और धर्म की पहचान के तहत रिश्तों को तौल ही नहीं सकते।


    हम इंसानियत के मुल्क के वाशिंदे हैं और हमारे लिए कोई सरहद सरहद नहीं है न इतिहास का ,न भूगोल का और न इंसानियत का और हम सियासत या मजहब के नागरिक नही हैं।


    मर गया अखबार और मरा भी नहीं है अखबार,अब भी सत्ता से टकराने वाला वही अखबार!सूचना का एकाधिकार और वर्चस्व तोड़ने वाला भी वही अखबार।


    पल पल लाइव प्रसारण के झूठ और तिलिस्म को एक डटके से तहस नहस करने वाला भी वही अखबार।


    आधिकारिक झूठ के खिलाफ जनपक्षधर सच का चेहरा भी फिर वहीं अखबार।कि निरंकुश सत्ता की भी घिघ्घी बंध जाये और घुटनों पर पनाह मांगते नजर आये निर्मम जनसंहारी तानाशाह भी।


    इंडियन एक्सप्रेस समूह की ऋतु सरीन की अगुवाई में पच्चीस पत्रकारों की चीम ने पनामा पेपर्स का खुलासा करके सारे चमकदार चेहरे के मुखौटे उतारकर बीच कार्निवाल में उन्हें नंगा खड़ा कर दिया है और कारपोरेट वकील महाशय भी कहने को मजबूर हो गये कि कोई पवित्र गाय दरअसल है ही नहीं।


    जाहिर है कि मुक्त बाजार के नये ईश्वर कल्कि महाराज को अबाध पूंजी प्रवाह के कालेधन के मुक्तबाजार के तिलिस्म की तंत्र मंत्र यंत्र की साख और ख्वाबों का मुलम्मा बचाने की कवायद में जांच पड़ताल का ऐलान करना पड़ता है।


    अच्छे दिन अब पनामा पेपर्स हैं।

    हिंदुत्व का राजकाज भी वही पनामा पेपर्स।

    भारत माता की जय पनामा पेपर्स।

    धर्म कर्म राजकाज राजकरण पनामा पेपर्स।

    मुक्त बाजार पनामा पेपर्स।लोकतंत्र,संविधान,समता न्याय सब पनामा पेपर्स।

    देशभक्ति और राष्ट्रवाद पनामा पेपर्स।

    मन की बातें और यह सैन्यत्त्र पनामा पेपर्स।

    आर्थिक सुधार विकास मेकिंग इन और स्मार्ट इंडिया भी पनामा पेपर्स।

    सिनेमा कला साहित्य मीडिया पनामा पेपर्स।

    संघवाद और नमनुस्मृति अनुशासन पनामा पेपर्स।

    सारी पवित्र गायें वहीं पनाामा पेपर्स


    हम 17 मई को रिटायर करने वाले हैं और चलाचली की बेला में हम इंडियन एक्सप्रेस के साथियों के लिए फख्र महसूस कर रहे हैं कि उनने साबित कर दिया कि हम अखबार की नौकरी में घास छील नहीं रहे थे।


    हम अखबारों के अलावा भी बहुत कुछ हैं।इसीलिए चाहे कुछ भी हो अखबार न मरा है और न मरेगा।कारपोरेट की चहारदीवारी तोड़कर फिरभी अखबार बोलेगा।


    इंडियन एक्सप्रेसइसीलिए बाकी अखबारों से अलहदा है और इसीलिए हमने जीरो हैसियत के बावजूद इंडियन एक्सप्रेस से ही रिटायर होने का विकल्प चुना है।


    हमारा कारोबार हकीकत का है और हम हमेशा हकीकत बताते रहे हैं।रिटायर हो जाने के बाद भी यह आदत बदलने वाली नहीं है।फिर जिसके साथ उसके गुरुजी का साथ है त,उसे फिर किस बात की क्यों परवाह होनी चाहिए। हम यकीनन हालात बदलेंगे।


    हम जानते हैं और जनता भी जानती है कि बड़े बड़े खुलासे इस आजाद देश में लगातार होते रहे हैं और न दोषियों को कभी फांसी पर चढ़ाने का कोई अंजाम इतिहास बना है और न लूटतंत्र और दिनदहाड़े डकैती का सिलसिला कभी थमा है।


    क्योंकि जो दागी,अपराधी और मनुष्यता के खिलाफ ,प्रकृति के खिलाफ युद्ध अपराधी हैं,लोकंत्र का यह तामझाम उन्हीं वतनफरोशों के कब्जे में हैं।


    जो हमारे सियासत और मजहब के मसीहा हैे,वे ही हमारे कातिल हैं और उनके हाथों में खून की नदियां  अनंत हैं और उन्हीं निदियों में तारकर हम मोक्ष की खोज में नर्क जीकर भी सशरीर स्वर्गवासी हैं।


    क्योंकि हम हालात बदलने को तैयार नहीं हैं और हमें भी इस लूटतंत्र में बराबर हिस्सा चाहिए और इसके लिए हम कुछ भी करेंगे चाहे स्वजनों का वध ही क्यों नकरने पड़े और चाहे अपने जिगर के टुकड़ों से दगा ही क्यों न करना पड़े।यही हमारा धर्म है।यही हमारी सियासत है।यही रास्ता है और मंजिल भी यही है।


    हमें अफसोस सिर्फ यह है कि हाय,हम क्यों नहीं लूटेरो कातिलों के उस सफेदपोध विशुध खून और ऊंचे कद,ऊंचे अहदे वालों के तबके में शामिल नहीं हुए।हमारी पूरी लड़ाई उसी अंधियारे की दुनिया में अपना मकाम हासिल करने को लेकर है।रोशनी से हमारा कोई वास्ता नहीं है।हम अपने मां बाप को,अपने जनम को और अपनी किस्मत को कोसने वाले लोग ख्याली पुलाव के वारिशान हैं।


    रक्षा सौदों में कमीशनखोरी का मामला भारतमाता के अनिवार्य जयघोष,सेना के सतत महिमामंडन के साथ रक्षा,प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा,राष्ट्रीयएकता और अखंडता के खुल्ला खेल फर्रूखाबादी कारोबार का अंध केसरिया राष्ट्रवाद है और बाजार के सारे दल्ला देशभक्त हैं तो हर दूसरा नागरिक या तो राष्ट्रद्रोही है या माओवादी है या आतंकवादी या फिर संदिग्ध।


    अभी अभी सोलह और सरकारी उपक्रमों के विनिवेश की घोषणा हुई है।इसका सच सिलसिलेवार न जाने कब हम खोल पायेंगे कि किस सरकारी कंपनी के निजीकरण,देश के किस हिस्से की जल जंगल जमीन की खुली नीलामी की वजह से विदेश में दर्ज हमारी कौन कौन देशी कंपनियों के नाम कितनी अरब विदेशी मुद्रा किन विदेशी खातों में जमा हैं और देश विदेश में इस देश की निनानब्वे फीसद जनता का खून पसीना,खून और हड्डियां किस किसके नाम किन बैंकों में जमा है।जानंगे भी तो हम क्या उखाड़  लेंगे।हम गुलाम।


    गोवध निषेध अरबिया वसंत बहार भी होता रहेगा और मंडल कमंडल महाभारत के कुरुक्षेत्र में स्वजनों के खिलाफ  मारे जाने तक लड़ते रहेंगे और गीता के अमोघ प्रवचन और बीज मंत्र के उच्चारण के साथ सारे के सारे देशद्रोही राजकाज करते रहेंगे पवित्र राष्ट्र,पवित्र गाय,विशुध धर्म,विशुध रक्त,विशुध भाषा और विशुध रंग के वर्चस्व की नरसंहारी संस्कृति के तहत।


    कभी किसी पवित्र गाय का अता पता चलेगा नहीं और चला तो धर्म और मनुस्मृति अनुशासन के राजकाज के तहत गोवध निषिद्ध है।नरसंहार वैदिकी हिंसा है।


    फिरभी सच आखिर सच है।

    सच नंगा उजागर है और हम सच के मुखातिब है लेकिन हम मनुष्य के नाम अद्भुत रीढ़हीन प्रजाति हैं,जिसके रगों में आत्मध्वंस का उबाल तो समुंदर की मौजें हैं लेकिन जिनकी आंखें मरी हुई मछलियों की सड़ांध है,जहां बदलाव के कोई ख्वाब हैं ही नहीं।


    हम जड़ों से कटे लोग हैं जिनके न हाथ हैं और न पांव ,न दिल हैं और न दिमाग हैं,हम तंत्र के कलपुर्जे हैं,डिफाल्टेड हैं हमारे आचरण और हम वजूद के तौर पर बायोमेट्रिक नंबर हैं,जो गोत्र,जाति,धर्म नस्ल,भाषा,रंग,क्षेत्र नजाने कितने किस्म के वायरल से आक्रांत हैं।


    न सच का दोष है और न सच उजागर करने वालों का दोष है कि हम वैसे नागरिक हैं,जिन्हें अपने वजूद,अपने हक हकूक के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है।


    मालूम है भी तो हम लड़ने के लिए तैयार है नहीं क्योंकि जो आग कहीं हमारे दिलो दिमाग में होनी चाहिए थी ,वह है नही और हर गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी नहीं हैं कि आग कहीं सुलगी हो तो उस आग की पल पल हिफाजत भी करें।बूझने ही न दें।


    न सच का दोष है और न सच उजागर करने वालों का दोष है कि हम वैसे नागरिक हैं,जिनकी पहचान है,क्रयशक्ति है,तकनीक है,डिग्रियां हैं,अंध भक्ति है,लेकिन न दिल है और न दिमाग है।


    न हमारी कोई आत्मा है और न हमारी कोई मनुष्यता है।


    हम रक्त मांस के पुतले रोबोटिक हैं और रोबोट नियंत्रित है जो दिल्ली नाम की एक राजधानी के चंद शातिर सौदागरों के मुर्दा गुलाम हैं।


    जिन्हें जरुरत के मुताबिक वे मार देते हैं और फिर जिंदा भा कर देते हैं।हमारा सारा कारोबार,हमारा सारा वजूद,हमारा जीवन यापन, हमारा प्रेम,हमारा आक्रोश,हमारा उत्सव सबकुछ उन्हींके मर्जी मुताबिक है।हमारी गुलाम जिंदाबाद और लोकतंत्र गुलामतंत्र है।


    हम अतीत में भी कुछ नहीं कर सके  हैं और आगे भी हम किसी का कुछ उखाड़ नहीं सकेंगे।


    कहने को हम आजाद है और हर गुलाम की यही खुशफहमी है और आजादी दरअसल हमारे लिए गुलामी की इमारत है बुलंद,जिसमें पुश्त दौर पुश्त हम खुशी खुशी मरते खपते रहेंगे।


    सत्तर साल का इतिहास जांच लें,बाकी तो हम जानते भी नहीं हैं।न जानने की कोशिश करेंगे।हम इतिहास लिखने वाले लोग है और इतिहास बनाने या इतिहास से सीखने का अदब नहीं है।


    हम आपस में चाहे जितनी मारामारी कर लें,ग्लोबल सत्ता,ग्लोबल मुक्तबाजार के खिलाफ चूं तक करने की न हमारी कोई नीयत है और न औकात है और साथ साथ हाथ में हाथ खड़े होने की तमीज है हमें।हमारा न कोई विवेक है और न साहस है।


    जाहिर है कि सच का भंडाफोड़ हो जाने की वजह से ऐहतियाती बंदोबस्त के तहत सरकार ने पनामा पेपर्स के खुलासे पर नजर रखने के लिए विभिन्‍न विभागों का एक समूह गठित किया है।


    गौरतलब है कि सरकार ने कहा है कि पनामा पेपर्स में जिन अवैध खाताधारकों का खुलासा हुआ है उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जायेगी।


    गौरतलब है कि इंडियन एक्सप्रेस  में छपी खबर में उन पांच सौ प्रमुख भारतीयों की गोप‍नीय सूची का उल्‍लेख किया गया है जिन्होंने कर चोरी के पनाहगाह माने जाने वाले पनामा में अवैध रूप से धन जमा किया है।


    अब जनता ताकि गोलबंद न हो,जंगल में कहीं भड़क न जाये दावानल और अबाध कालाधन का प्रवाह और नरसंहारी राजकाज जारी रहे,मनुस्मृति रंगभेदी राजकाज जारी रहे ,इसलिए एहतियात के तौर पर सरकार के गठित समूह में अन्य लोगों के अलावा केंद्रीय प्रत्‍यक्ष कर बोर्ड, सीबीडीटी, वित्तीय जांच इकाई एफआईयू और भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारी शामिल हैं।


    शुक्रिया अदा कीजिये कि वित्त मंत्री अरूण जेटली ने नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे कहा है कि मामले की जांच की जानी चाहिए।हो बी जायेगी जांच और नतीजा वहीं चूं चूं का मुरब्बा।


    जैसे पहले के तमाम घोटालों और नरसंहर कांडों की जांच का इतिहास है,जैसे कि कानून का राज है कि अपराधी जब चाहे तब कानून बदल लें क्योंकि अपराधियों ने बाकायदा लोकतंत्र की हत्या कर दी है।संविधान की हत्या कर दी है और भारतमाता की जय कहते हुएवे राष्ट्र का गला रेंत रहे हैं और हमें वैसे ही मजा आ रहा है जैसे मोबाइल पर व्हट्सअप पर भेजे गये निषिद्ध दृश्य से बिस्तर गर्म हो जाने का अहसास हमें होता है।


    सच यह है कि जैसे हम जल जंगल जमीन से बेदखल हैं,ठीक उसीतरह हम कानून के राज,लोकतंत्र,संविधान,संसद और राष्ट्र से बेदखल दिवालिया नागरिक हैं।


    माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्‍वयं इसका आग्रह किया है कि इस पर पूर्ण रूप से सरकार कार्यवाही करे और जो-जो इसमें से अवैध माने जायेंगे उसके खिलाफ कानून के तहत जो भी कार्यवाही हो सकती है अलग-अलग विभाग उस संबंध में करने वाले हैं।


    No holy cows for us: Jaitley

    No holy cows for us: Jaitley

    "The Government is clear in its resolve is what I will say. There are no holy cows for us. Action will be taken against whoever is found to be in default," Arun Jaitley told Ritu Sarin, reacting to The Indian Express story. The leak of over 11 million documents of Panama law firm features over 500 Indians linked to offshore firms, finds an 8-month investigation by a team of The Indian Express led by Ritu Sarin, Executive Editor (News & Investigations).The List, Part 1: Clients who knocked on a Panama doorThe List, Part 2: Politician, industrialist, jewellerHow Mossack Fonseca stonewalled DelhiHSBC, UBS, Credit Suisse helped wealthy hide assets


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    5000 slum residents hit South Mumbai's streets demanding housing right, basic amenities and scientific waste management system in the city

     

    Mumbai | 6th April, 2016: Slum residents from all over Mumbai threatened by illegal forcible eviction and annoyed by lack of basic amenities in slums, marched from Carnac Bunder to Azad Maidan, Mumbai on 5th April, 2016 in a huge rally demanding housing right to be ensured with all the basic amenities. Slum residents also demanded the scientific shutting down of the Deonar Dumping ground and a scientific waste-management system in the city. 



    Over 5000 people from Mankhurd to Malad- Deonar, Govandi, Cheeta Camp, Golibar, Andheri and Malad,  took out a procession led by Ms. Medha Patkar. Winding through the narrow streets of the business district of the city, the rally brought traffic to a halt over a 2 km stretch. Children from many such threatened slums left school while men and women took leave from their work to walk in the blazing noonday sun to show solidarity raised slogans throughout the long march. 




    A delegation comprising of activists Ms. Medha Patkar, Anil Hebbar, Bilal Khan and representatives from slums were Shriram Rajbhar, Punam Kannaujiya, Abha Tandel and Uday Mohite met the Chief Minister in the Vidhan Bhavan. Delegation discussed four major demands with the Chief Minister-ensuring of the housing rights, protection of slum dwellers living on lands recently constituted as 'reserved forest', ensuring of the basic amenities in all slums and a scientific solution of waste management in the city.   The Chief Minister had listen to all the demands in details and assured action on them.

    Organized by GBGBA and well attended by various rights groups –namely NAPM, YUVA, Committee for Housing Right, Pani Haq Samiti and veteran activist and CPI (M)'s Prakash Reddy called upon the elected officials to uphold the law and ensure housing rights.

    Ghar Bachao Ghar Banao Andolan which has been fighting for the housing rights of the urban poor in Mumbai since 11 years has threatened of intense struggle if firm actions are not taken within a period of one month on the demands raised.

     

    Demands mentioned in the memorandum given to the Chief Minister are as follows:

    Mumbai is a city that functions because of the tireless labour of slum dwellers. The finance industry works on the labour of slum dwellers, from the construction workers who build new sky scrapers and office complexes, to the cleaners and municipal sweepers that maintain them.  The lives of upper and middle class families also depend on the services of slum dwellers. The average upper or middle-class Mumbai family uses the labour of several slum dwellers in their home as domestic help, and benefits from taxi drivers, rickshaw drivers, dabbawallas, washermen/women, skilled and unskilled workers like carpenters, electricians, mechanics, painters, locksmiths, fruit and vegetable vendors, municipal sweepers, watchmen, security guards, private drivers, and countless other unregulated professions. Our demands mainly focuses on urban poor of the city and the recent outbreak of fire at Deonar Dumping Ground.

     

    Demands:

    1.    1.Right to Adequate Housing

    Life in the slums of Mumbai, which constitute more than 50% population of the city in the absence of 'housing right' has become pathetic. The only mechanism the Government of Maharashtra is using to give protection to slums is of a 'cut-off-date'. The 'cut-off-date' protects only limited number of slum dwellers from getting evicted without rehabilitation. The concept of rehabilitation of slum dwellers through Slum Rehabilitation Authority of Maharashtra Government is entirely pro-privatization and least pro-people. A large chunk of public land gets privatized when it is handed over to the private builders to be exploited by them while rehabilitating the slum dwellers after demolishing their self-built structures to house themselves.  This process of rehabilitation will surely make Government loose all public lands which was earlier in the possession of poor people to few private builders.

    The perpetual practice eviction of slums deprive people of their housing right which comes under Right to Life guaranteed by the Constitution of India. The eviction causes a lot of instability in the society, affect the evicted slum dwellers emotionally, physically and psychologically.  Evictions also severely affect the livelihood of the slum dwellers.

     

    We request you to immediately pass a no eviction order for slums and consider the legalization of self-built housing in the slums of Mumbai. This could be achieved by creating "Special Housing Zones (SHZ)" in areas currently occupied by slums. People's organization, NGOs and Government will work together with the inhabitants of each SHZ to improve basic infrastructure and social services. Legal, regulated SHZs enable the provision of adequate, affordable housing to every citizen of Mumbai, and to eliminate the anti-social elements that currently take advantage of the land occupied by slums. SHZs will allow active and honest intervention by local authorities to check the unjust encroachments of land by mafias and selling huts built on them.

     

     

    2.    2.Housing Rights on the Forest Lands

    The brutal and forced evictions being carried out by Mangrove Cell of Maharashtra Forest Department has put lives of thousands of poor children, aged persons and women in jeopardy whose houses have been demolished by the Cell in Mumbai. The Mangrove Cell is taking action on the lands which the Government of Maharashtra has decided to constitute them as 'reserved forests'. However, there is a full long procedure of law to be completed first before the Mangrove Cell takes any action. The details of which are given in next paragraphs.

    The Hon. Bombay High Court passed an order dated October 6, 2005 directing the Government of Maharashtra to declare all mangrove areas and the areas within 50 meters of the mangrove areas as 'protected forest' (For Government Lands) and 'Forest' (For private lands), as per law. This exercise was to be carried out on the basis of satellite maps made by the Maharashtra Remote Sensing Application Center (MRSAC) of the mangrove areas in Mumbai and Navi Mumbai. The maps prepared by MRSAC demarcated the areas, are all post year 2005 (after the passing of the order by the Hon. Court). Hence, no question of identifying the areas in the maps which are before the year 2005.  But the Mangrove Cell is not even sparing the slums which are protected by cut-off-date of  1.1.2000 set by Housing  Department of the Maharashtra Government dated 16th May, 2015.

     

    The Maharashtra Government, apparently in order to implement the order of the Hon. Court efficiently, decided to declare all mangrove areas as 'reserved forest'. This was decided vide Government Resolution number S-10/2013/P.K. 64/ F-3dated 26/June/2013. But it has been found that the Mangrove Cell is violating the Indian Forest Act, 1927 by not allowing the Forest Settlement Officer to exercise his powers.  In Chapter II of the Indian Forest Act, 1927, there is a full procedure specified to be followed before constituting any land as 'reserved forest'. This procedure also includes the settlements of the existing rights of people over a land which the Government decides to constitute as 'reserved forest'.

    The Forest Settlement Officers of both the suburban regions-Eastern and Western that they are not recognizing housing rights of the slum dwellers who are protected by the cut-off-date. They have also not mentioned anything about recognizing housing right in the proclamation made under section 4 in chapter II of the Indian Forest Act, 1927.

     

     

    3.    3.Basic Amenities

     Generally, the basic services are denied by the government because of the wrong perception about the slums that providing of the basic services will cause the exploitation of the resources. However, it has been found that in the absence of basic service from the municipal corporation, slum dwellers are forced to depend on local mafias who sell them these services at higher rates illegally. Hence, this proves that the government refusal to provide service to the slum, indirectly supporting the mafias and costing the exchequer of the state. It is necessary that the government must regularize and provide all the basic amenities and leave no room for the mafias to breed in slums.

    3.1  Water: The problem of supplying water to slums has still not resolved till date even after clear order from the Hon. Bombay High Court's order dated 15th December, 2014. The Court had ordered to provide water in each slum in Mumbai irrespective of cut-off-date. The Court had also directed the Municipal Corporation of Greater Mumbai to formulate a policy till February 2015 specifying the mechanism of supplying water to slums. But more than one year has passed neither the MCGM formulated any policy nor has it provided water supply to slums. The MCGM is not at all prioritising the need of supplying this basic service in slums. In the absence of water supply from the municipal corporation gives water mafias an opportunity to exploit slum dwellers by charging water on higher rates. The water mafias are also responsible for making leakages in the water supply line and sell the same water in slums. If this illegal practice is stopped then surely enough of water supply can easily be supplied to slums as well as to other residents of the city.

    3.2  Toilets: The Central and the Government of Maharashtra have very clearly specified in the guidelines under the Swachh Bharat Abhiyan that whether the slum is authorized or unauthorized, toilets must be built by the urban local bodies. But the MCGM in Mumbai have made a list of exclusions for constructing toilets. This list of exclusion will ensure toilets to very less number of slums and hence the objective of the Swachh Bharat Abhiyan will not be met. This will again force people to defecate in open.  There are around Rs.8000 cr. lying unused in the last MCGM budget. This year only Rs. 1 cr. has been allocated by the MCGM in the name of Swachch Bharat Abhiyan and that too for publicity of the mission. This is a strange finding. 
    A recent finding at the Dumping ground site was not less than a shock. We found that a public toilet was left dysfunctional. Before it was shut down, it had provided service to several slum dwellers in its proximity but shutting down the only toilet block in that locality has forced people to defecate in open. 

    The MCGM can easily help slums with the public toilets if it allows the slum dwellers to construct it on their own. The MCGM only need to give them permission to construct it and facilitate them in connecting the toilet with the sewer line. 

    3.3  Electricity: Number of slums are not given No Objection Certificates (NOCs) for setting up a electric substation in slums, which again force slum dwellers to get illegal connections from the mafias. It becomes difficult for the school going children to study in dark; hence, the need of electricity connection is very important. Apart from this, there are small scale-scale industries in slum which are dependent on electricity connections, so, the denial of the electricity connection affect this small economic unit which support lives of many.

     

    4.     4.Waste Management:

    The smoke coming from the Deonar dumping ground has turned the surrounding areas into a gas chamber. More than two months have passed and the fire is still not under control. The callous attitude of the government towards addressing the real problem of waste management is worsening the situation. People are suffering from various breathe disease and developing allergies as well as becoming vulnerable to diseases like tuberculosis because of the continuous smoke from the Deonar Dumping Ground. This health hazard has made life pathetic. The residents need a scientific shutting down of the dumping ground and a scientific plan for waste management in the city.  At the same time, the question of livelihood for the number of rag-pickers who have become dependent on the dumping ground for their work also needs to be addressed. These workers need to be integrated into any future solution for Mumbai's waste management. Barring the entry of the rag-pickers into the dumping ground will only render a large number of people unemployed and further hinder stability for thousands of the city's marginalized service providers. While if we include the labour of the rag-pickers in the working scientific waste management plan, it will certainly generate more employment and improve the living standard of rag-pickers.

     

     

    Santosh Thorat, Anwari Shaikh, Shefali, Jaimati, Uday Mohite, Jainuddin Ansari

    Contact: +91 9958660556

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