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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    नैनीझील की गहराई में अभी जिंदा हैं व्यवस्था बदलने के ख्वाब।

    फिर वही हुड़के की थाप है मालरोड पर,पहाड़ ने लौटाया पद्मश्री।

    पलाश विश्वास

    उत्तराखंड के नामी इतिहासकार शेखर पाठक ने लौटाया पद्मश्री पुरस्कार

    शेखर पाठक को वर्ष 2007 में पद्मश्री दिया गया था



    मुझे मालूम है कि मेरे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी का सनेह और समर्थन मेरे साथ हैं तो नैनीताल में मरे लोग भी मेरे साथ खड़े हैं।यह अहसास मेरा वजूद है।जिसदिन यह अहसास खत्म,उसदिन समझो मैं मर गया।


    हीरा भाभी और शेखर पाठक ने मुझे फिर ताकत दी है और हम जानते हैं कि देश दुनिया जोड़ने की इस मुहिम में मेरे अपने लोग बी हमेशा की तरह मेरे साथ है।


    नैनीझील की गहराई में अभी जिंदा हैं व्यवस्था बदलने के ख्वाब।

    फिर वही हुड़के की थाप है मालरोड पर,पहाड़ ने लौटाया पद्मश्री।


    देहरादूनसे मीडिया की खबर है: उत्तराखंड के रहने वाले नामी इतिहासकार शेखर पाठक ने देश में 'बढ़ती असहिष्णुता' के चलते सोमवार को अपना पद्मश्री पुरस्कार लौटा दिया।


    पर्यटन नगरी नैनीताल में चल रहे चौथे नैनीताल फिल्म महोत्सव में अपना पद्मश्री पुरस्कार लौटाने की घोषणा करते हुए पाठक ने कहा कि उन्होंने यह फैसला देश में बढ़ रहे 'असहिष्णुता' के वातावरण और हिमालयी क्षेत्र की उपेक्षा के विरोध में लिया है।


    उन्होंने कहा कि हिमालय का पुत्र होने के नाते पुरस्कार लौटाकर यहां के संसाधनों की लूट का विरोध दर्ज कराने का उनका यह एक तरीका है। उत्तराखंड में रहने वाले जाने-माने इतिहासकार, लेखक और शिक्षाविद शेखर पाठक को वर्ष 2007 में पद्मश्री दिया गया था।

    Shekhar Pathak - Wikipedia, the free encyclopedia

    https://en.wikipedia.org/.../Shekhar_Pat...


    Dr. Shekhar Pathak is an Indian historian, writer and academician from Uttarakhand. He is a founder of People's Association for Himalaya Area Research (PAHAR), established in 1983, former professor of History at Kumaun University, Nainital and a Nehru Fellow at the Centre for Contemporary Studies at Teen Murti in ...

    PAHAR | People's Association for Himalaya Area Research

    pahar.org/


    This edition is devoted to the experiences of different participants of Askot – Arakot Abhiyaan's of 1974, 84, 94, 2004 and other study tours. This is special volume for knowing the journey of Himalayan region in last 3-4 decades from the lenses of Travellers. Limited prints of this book are available so you can order the print ...



    मुझे बेहद खुशी है कि डीएसबी से एमए पास करने के बाद जिस नैनीताल को मैं पीछे छोड़ आया,सत्तर की दशक की तरह उसकी आवाज भले बाबुलंद न हो,भले ही नैनीताल समाचार की बहसें अब उतनी गरमागरम न हो,भले ही तमाम पुराने साथी बिछुड़ गये हों,भले ही गिरदा अब हमारे बीच नहीं हों,नैनीझील की गहराई में अभी जिंदा हैं व्यवस्था बदलने के ख्वाब।हमारी घाटी अब भी न केवल नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य की धरोहर है,बल्कि वह अब भी राष्ट्र के विवेक के सुर में सुर मिलाने के यथार्थबोध के साथ संगीतबद्ध है।


    मुझे अब भी गिरदा के हुड़के की थाप सुनायी दे रही है।


    मुझे मालूम नहीं है कि मेरे परिवार के लोग जो पूरे देश में बिखरे हुए हैं,मेरे कितने साथ हैं।


    मेरी मामूली हैसियत से वे शर्मिंदा हो सकते हैं या फिर खुश भी हो सकते हैं कि मैं मरा नहीं हूं अभी कि फासिज्म के राजकाज और बजरंगी ब्रिगेड ने अभी मेरा नोटिस लिया नहीं है या मुझे नजरअंडाज कर दिया है  कि चींटी की आवाज से अश्वमेध के घोड़े थमते भी नहीं होंगे।


    मैं आनलाइन ही लिखता हूं और मेरे गांव बसंतीपुर में यदा कदा जब नेट पर मेरा लिखा खुल जाता है तो पढ़ भी लेते हैं।लेकिन वे इतने व्यस्त हैं अपनी अपनी जिंदगी में,अपनी अपनी समस्याओं को सुलझाने में उलझे हुए हैं कि उनकी राय जानने की कोई सूरत नहीं है।


    वैसे पहाड़ में केसरिया सुनामी पुरअसर है और तराई भाबर में पुरजोर।वे मेरे लोग हजार मील की दूरी के बावजूद जो मेरे वजूद से जुड़े हैं,मेरी जड़ों के लोग कितनी सूचनाएं सही सही पाते होंगे और चीजों को,मुद्दों को कितना कुछ देश के बाकी हिस्से की बहुसंख्य जनता कीतरह समझ रहे होंगे या नहीं समझ रहे होंगे,हम जान नहीं सकते।वे मेरे पक्ष में भी हो सकते हैं और विपक्ष में भी हो सकते हैं।


    जब पूरे देश में नफरत की फिजां है और मुहब्बत के किस्से सिरे से गुमशुदा है,हम नही जानते कि हमारी मुहब्बत के क्या हाल हैं या केसरिया सुनामी के मध्य तराई,भाबर और पहाड़ में मेरे लिए मरे अपने लोगों का बेइंतहा प्यार का मूलधन कितना सुरक्षित है।रुद्रपुर अब सिडकुल है तो किछा सितारगंज से लेकर देहरादून तक सिडकुल का विस्तार है।


    बंगाली विस्थापितों के इलाके दिनेशपुर और शक्तिफार्म असुरक्षाबोध के तहत जाहिरातौर पर सत्ता के खिलाफ नहीं ही होंगे।


    तराई के शहरों कस्बों में अब जल जंगल जमीन नागरिकता से बेदखल विस्थापित भारतीय जनसमूहों का नया भारततीर्थ बन रहा है जो पहसे से ही लघु भारत का भूगोल रहा है।हर रंग के फूल वहीं खिलते हैं और हर खुशबू से गुलशन का कारोबार है।


    फिरभी सिडकुल की छांव में,एकाधिकारवादी पूंजी के सर्वव्यापी वर्चस्व के मुक्तबाजार में अब भी मेरे अपने लोग,जिनके बीच में गोबर पानी कीचड़ में पला बढ़ा,अब वे मेरे कितने अपने रह गये,यह जान पाना मेरे लिए सचमुच मुश्किल है।अंधाधुंध बाजारीकरण और बेतरतीब शहरीकरण के सीमेंट के जंगल में कहां कितना घर बचा है,कितना बचा है साझा चूल्हा,ठीक ठीक अंदाजा भी नहीं है मुझे।


    लेकिन मेरा शहर नैनीताल जिसने मुझे दृष्टि दी,जिसने मुझे आंधियों से लड़ने की हिम्मत दी,जिसने मुझे रोशनी के लिए अंधियारे के खिलाफ लड़ने के गुर सिखाये,वह हरगिज नहीं बदला है।मैं 1979 से नैनीताले से निकला और साल दो साल पांच साल में इस दरम्यान जाता रहा पहाड़ को छूने,नेनीझील की लहरों से बतियाने और एक एक करके हमारे तमाम साथी बिछुड़ गये।हमने गिरदा को भी खो दिया।विपिन चचा.निर्मल जोशी,भगत दाज्यू से लेकर पहाड़ के चप्पे चप्पे में हमारे साथी चलते बने आहिस्ते आहिस्ते, फिरभी पहाड़ पर लालटेन अभी जल रहा है।


    हाल में हीरा भाभी ने कारपोरेट लिटरेचर फेस्टिवल में गिरदा को दिये  गये मरणोपरांत लाइफटाइम पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया है जबकि वह नैनीताल में अकेली और असहाय है।अब असहिष्णुता के खिलाफ हमारे शेखर पाठक ने भारत सरकार के दिये पद्मश्री सम्मान लौटा दिया है।


    आज ही फेसबुक वाल पर इस बगावत की शुरुआत करने वाले कवि उदय प्रकाश ने लिखा हैः

    मुग़ल सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक थे अत्यंत लोकप्रिय हिंदी सूफ़ी कवि अब्दुल रहीम खानखाना। 'रहिमन' के नाम से उनके पद आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाक़े में उनका स्मारक संसार के बडे सूफ़ी कवियों के स्मारकों में गिना जाता है, जो संभवत: जहांगीर के शासनकाल में निर्मित हुआ। उन्हीं का एक पद याद आ गया, अचानक। " रहिमन आह गरीब की, कबहुँ न निसफल जाय, मरे मूस की चाम से, लौह भसम होइ जाय। " महात्मा गांधी ने इस देश के शासकों को कोई भी नीति अपनाने के पहले जिस ' अंतिम आदमी' के आँसू पोंछने की बात कही थी, उसी की 'आह' तख़्त-ओ-ताज पलटती है।


    इसी बीच इंडियन एक्सप्रेस की खबर हैः

    BJP leader compares SRK with Hafiz Saeed; Shiv Sena defends actor

    BJP leader compares SRK with Hafiz Saeed; Shiv Sena defends actor

    Even as he came under attack from sections in BJP, Bollywood actor Shah Rukh Khan today received support from ruling ally Shiv Sena which said the superstar should not be targeted only because he is a Muslim and that the minority community in India is "tolerant".

    Politicians should stop talking rubbish about Shah Rukh Khan: Anupam Kher

    Politicians should stop talking rubbish about Shah Rukh Khan: Anupam Kher

    Anupam Kher has come out in support of Shah Rukh Khan after Yogi Adityanath compared SRK with Pakistani terrorist Hafiz Saeed for his comments over intolerance in India.

    बाकी ,कातिलों का काम तमाम है

    अगर हम कत्ल में शामिल न हों!

    KADAM KADAM BADHAYE JA...

    https://www.youtube.com/watch?v=qQxWFawxbqc



    https://www.youtube.com/watch?v=ym-F7lAMlHk



    फिल्में फिर वही कोमलगांधार,

    शाहरुख  भी बोले, बोली शबाना और शर्मिला भी,फिर भी फासिज्म की हुकूमत शर्मिंदा नहीं।

    https://youtu.be/PVSAo0CXCQo

    KOMAL GANDHAR!



    गुलामों,फिर बोल कि लब आजाद हैं!


    कदम कदम बढ़ाये जा,सर कटे तो कटाये जा

    थाम ले हर तलवार जो कातिल है

    फिक्र भी न कर,कारंवा चल पड़ा है!


    उनेक फंदे में फंस मत

    न उनके धंधे को मजबूत कर

    जैसे वे उकसा रहे हैं जनता को

    धर्म जाति के नाम!


    जैसे वे बांट रहे हैं देश

    धर्म जाति के नाम!


    उस मजहबी सियासत

    की साजिशों को ताकत चाहिए

    हमारी हरकतों से

    उनके इरादे नाकाम कर!

    उनके इरादे नाकाम कर!


    कोई हरकत ऐसी भी न कर

    कि उन्हें आगजनी का मौका मिले!


    कोई हरकत ऐसा न कर कि दंगाइयों

    को फिर फिजां कयामत का मौका मिले!


    फासिज्म के महातिलिस्म में फंस मत

    न ही बन उनके मंसूबों के हथियार!


    यकीनन हम देश जोड़ लेंगे!

    यकीनन हम दुनिया जोड़ लेंगे!


    यकीनन हम इंसानियत का फिर

    मुकम्मल भूगोल बनायेंगे!


    यकीनन हम इतिहास के खिलाफ

    साजिश कर देंगे नाकाम!


    हम फतह करेंगे यकीनन

    अंधेरे के खिलाफ रोशनी की जंग!


    गुलामों,फिर बोल कि लब आजाद हैं!

    पलाश विश्वास

    यही सही वक्त है सतह से फलक को छू लेने का।

    जमीन पक रही है बहुत तेज

    जैसे साजिशें भी उनकी हैं बहुत तेज


    तलवार की धार पर चलने का

    यही सही वक्त है,दोस्तों


    भूमिगत आग के तमाम ज्वालामुखियों के

    जागने का वक्त है यह सही सही,दोस्तों


    गलती न कर

    गलती न कर

    मत चल गलत रास्ते पर


    मंजिल बहुत पास है

    और दुश्मन का हौसला भी पस्त है

    अब फतह बहुत पास है ,पास है


    कि जुड़ने लगा है देश फिर

    कि दुनिया फिर जुड़ने लगी है

    कि तानाशाह हारने लगा है


    गलती न कर

    गलती न कर

    मत चल गलत रास्ते पर


    कदम कदम उनके चक्रव्यूह

    कदम कदम उनका रचा कुरुक्षेत्र

    कदम कदम उनका ही महाभारत


    जिंदगी नर्क है

    जिंदगी जहर है

    जिंदगी कयामत है


    हाथ भी कटे हैं हमारे

    पांव भी कटे हैं हमारे

    चेहरा भी कटा कटा

    दिल कटा हुआ हमारा

    कटा हुआ है दिमाग हमारा


    बेदखली के शिकार हैं हम

    उनकी मजहबी सियासत

    उनकी सियासती मजहब

    कब तक सर रहेगा सलामत


    कटता है तो सर कटने दे

    दिलोदिमाग चाहिए फिर

    कटे हुए हाथ भी चाहिए

    कटे हुए पांव भी चाहिए

    लुटी हुई आजादी भी चाहिए


    गुलामों,फिर बोल कि लब आजाद हैं!


    कदम कदम बढ़ाये जा,सर कटे तो कटाये जा

    थाम ले हर तलवार जो कातिल है

    फिक्र भी न कर,कारंवा चल पड़ा है!


    उनेक फंदे में फंस मत

    न उनके धंधे को मजबूत कर

    जैसे वे उकसा रहे हैं जनता को

    धर्म जाति के नाम!


    जैसे वे बांट रहे हैं देश

    धर्म जाति के नाम!


    उस मजहबी सियासत

    की साजिशों को ताकत चाहिए

    हमारी हरकतों से

    उनके इरादे नाकाम कर!

    उनके इरादे नाकाम कर!


    कोई हरकत ऐसी भी न कर

    कि उन्हें आगजनी का मौका मिले!


    कोई हरकत ऐसा न कर कि दंगाइयों

    को फिर फिजां कयामत का मौका मिले!


    फासिज्म के महातिलिस्म में फंस मत

    न ही बन उनके मंसूबों के हथियार!


    यकीनन हम देश जोड़ लेंगे!

    यकीनन हम दुनिया जोड़ लेंगे!


    यकीनन हम इंसानियत का फिर

    मुकम्मल भूगोल बनायेंगे!


    यकीनन हम इतिहास के खिलाफ

    साजिश कर देंगे नाकाम!


    हम फतह करेंगे यकीनन

    अंधेरे के खिलाफ रोशनी की जंग!


    गुलामों,फिर बोल कि लब आजाद हैं!

    अंधियारे के खिलाफ जीत का तकादा है रोशनी के लिए तो अंधेरे के तार तार को रोशन करना चाहिए।अंधियारे के महातिलिस्म से बचना चाहिए।उनकी ताकत है कि हम बंटे हुए हैं।हम साथ हैं तो कोई तानाशाह,कोई महाजिन्न,कोई बिरंची बाबा फिर हमें बांट न सके हैं।लब आजाद हैं।


    लोग बोल रहे हैं क्योंकि लब आजाद हैं।

    जो खामोश है,उनका सन्नाटा भी होगा तार तार,जब सारे गुलाम उठ खड़े होंगे।हर तरफ जब गूंज उठेंगी चीखें तो जुल्मोसितम का यह कहर होगा हवा हवाई और थम जायेगी रंगारंग सुनामी तबाही की।


    इस भारत तीर्थ में सरहदों के आरपार मुकम्मल मुल्क है इंसानियत का।कायनात की तमाम बरकतों,नियामतों,रहमतों से नवाजे गये हैं हम।उस इंसानियत की खातिर,उस कायनात की खातिर,जो हर शख्स,आदमी या औरत हमारे खून में शामिल हैं,हमरे वजूद में बहाल है जो साझा चुल्हा,जो हमारा लोक संसार है,जो हमारा संगीत है,जो कला है,जो सृजन और उत्पादन है,जो खेत खलिहान हैं,जो कल कारकाने हैं,जो उद्योग,कारोबार और काम धंधे हैं- उनमें जो मुहब्बत का दरिया लबालब है,उसे आवाज दो,दोस्तों।


    फासिज्म अपनी कब्र खुद खोद लेता है।इतिहास गवाह है।

    इतिहास गवाह है कि हर तानाशह मुंह की खाता है।

    उनके सारे गढ़,किले और तिलिस्म तबाह होते हैं।

    उनका वशीकरण,उनका तंत्र मंत्र यंत्र बेकार हैं।


    हम सिर्फ पहल करेंगे मुहब्बत की तो जीत हमारी तय है।

    हम सिर्फ पहल करेंगे अमन चैन की तो जीत हमारी है।

    हम सिर्फ पहल करेंगे भाईचारे की तो जीत हमारी है।

    हम तमाम साझा चूल्हा सुलगायेंगे और फिर देखेंगे कि कातिलों के बाजुओं में फिर कितना दम है।


    सिंहद्वार पर दस्तक बहुत तेज है

    वरनम वन चल पड़ा है

    कारवां भी निकल पड़ा है


    प्रतिक्रिया मत कर

    मत कर कोई प्रतिक्रिया

    फिर तमाशा देख


    उनके फंदे होंगे बेकार

    अगर हम न फंसे उस फंदे में


    उनके धंधे होंगे बेकार

    अगर हम न फंसे उनके धंधे में

    उनकी साजिशें होंगी बेकार

    अगर हम उनके हाथ मजबूत न करें


    सियासती मजहब हो या मजहबी सियासत हो

    या फिर हो वोट बैंक समीकरण

    हर कातिल का चेहरा हम जाने हैं

    हर कत्ल का किस्सा हम जाने हैं

    हर कत्लेाम का किस्सा हम जाने हैं


    कातिलों का साथ न दें कोई

    तो कत्ल और कत्लेआम के

    तमाम इंतजाम भी बेकार


    प्रतिक्रिया मत कर

    मत कर कोई प्रतिक्रिया

    फिर तमाशा देख


    बस, गोलबंदी का सिलसिला जारी रहे।

    बस, लामबंदी का सिलसिला जारी रहे।

    बस,चीखों का सिलसिला जारी रहे।


    बाकी ,कातिलों का काम तमाम है

    अगर हम कत्ल में शामिल न हों!


    बस,चीखों का सिलसिला जारी रहे।


    जेएनयू को जो देशद्रोह का अड्डा बता रहे हैं,उन्हें नहीं मालूम कि जनता जान गयी हैं कि देशद्रोहियों की जमात कहां कहां हैं और कहां कहां उनके किले,मठ,गढ़,मुक्यालय वगैरह वगैरह है।


    वे दरअसल छात्रों और युवाओं के अस्मिताओं के दायरे से बाहर ,जाति धर्म के बाहर फिर गोलबंदी से बेहद घबड़ाये हुए हैं।


    वे दरअसल मंडल कमंडल गृहयुद्ध की बारंबार पुनरावृत्ति की रणनीति के फेल होने से बेहद घबड़ाये हुए हैं।


    वे बेहद घबड़ाये हुए हैं कि तानाशाही हारने लगी है बहुत जल्द।


    वे बेहद घबड़ाये हुए हैं जो इतिहास बदलने चले हैं कि उन्हें मालूम हो गया है कि इतिहास के मुकबले तानाशाह की उम्र बस दो चार दिन।


    वे बेहद घबड़ाये हुए हैं जो इतिहास बदलने चले हैं कि दिल्ली कोई मुक्मल देश नहीं है और देश जागने लगा है दिल्ली की सियासती मजहब के खिलाफ,मजहबी सियासत के खिलाफ।


    वे बेहद घबड़ाये हुए हैं कि सिकरी बहुत दूर है दिल्ली से और अश्वमेधी घोड़े,बाजार के सांढ़ और भालू तमामो,तमामो अंधियारे के कारोबारी तेज बत्ती वाले, तमामो नफरत के औजार अब खेत होने लगे हैं।


    वे बेहद घबड़ाये हुए हैं कि न वे बिहार जीत रहे हैं और न वे यूपी जीत रहे हैं।


    राष्ट्र का विवेक बोलने लगा है।

    फिर लोकधुनें गूंजने लगी हैं।

    फिर कोमलगांधार हैं हमारा सिनेमा।

    फिर दृश्यमुखर वास्तव घनघटा है।


    फिर शब्द मुखर है फासिज्म के राजकाज के खिलाफ।

    फिर कला भी खिलखिलाने लगी है आजाद।

    फिर इतिहास ने अंगड़ाई ली है।

    फिर मनुष्यता और सभ्यता,प्रकृति और पर्यावरण के पक्ष में है विज्ञान।

    कि अर्थशास्त्र भी कसमसाने लगा है।

    कि जमीन अब दहकने लगी है।

    कि जमीन अब पकने लगी है।


    कि ज्वालामुखी के मुहाने खुलने लगे हैं।

    हार अपनी जानकर वे बेहद घबड़ाये हुए हैं और सिर्फ कारपोरेट वकील के झूठ पर झूठ उन्हें जितवा नहीं सकते।

    न टाइटैनिक वे हाथ जनता के हुजूमोहुजूम को कैद कर सकते हैं अपने महातिलिस्म में।

    बादशाह बोला तो खिलखिलाकर बोली कश्मीर की कली भी।संगीत भी ताल लय से समृद्ध बोला बरोबर।तो बंगाल में भी खलबली है।


    बंगाल में भी हार मुंह बाएं इंतजार में है।

    खौफजदा तानाशाह बेहद घबराये हैं।

    बेहद घबराये हैं तमामो सिपाहसालार।

    बेहद घबराये हैं हमारे वे तमामो राम जो अब हनुमान हैं,बजरंगी फौजें भी हमारी हैं।


    देर सवेर जान लो,धर्म जाति का तिलिस्म हम तोड़ लें तो समझ लो,यकीनन वे फौजें फिर हमारी हैं।

    इकलौता तानाशाह हारने लगा है।सिपाहसालार मदहोश आयं बायं बक रहे हैं।खिलखिलाकर हंसो।


    खिलखिलाकर हंसो।

    उनके जाल में हरगिज मत फंसो।

    जीत हमारी तय है।



    कदम कदम बढ़ाये जा,सर कटे तो कटाये जा

    थाम ले हर तलवार जो कातिल है

    फिक्र भी न कर,कारंवा चल पड़ा है!

    कदम कदम बढाये जा

    रचनाकार: राम सिंह ठाकुर  

    कदम कदम बढ़ाये जा, खुशी के गीत गाये जा

    ये जिन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा


    शेर-ए-हिन्द आगे बढ़, मरने से फिर कभी ना डर

    उड़ाके दुश्मनों का सर, जोशे-वतन बढ़ाये जा

    कदम कदम बढ़ाये जा ...


    हिम्मत तेरी बढ़ती रहे, खुदा तेरी सुनता रहे

    जो सामने तेरे खड़े, तू ख़ाक मे मिलाये जा

    कदम कदम बढ़ाये जा ...


    चलो दिल्ली पुकार के, क़ौमी निशां सम्भाल के

    लाल किले पे गाड़ के, लहराये जा लहराये जा

    कदम कदम बढ़ाये जा...

    बाकी ,कातिलों का काम तमाम है

    अगर हम कत्ल में शामिल न हों!

    KADAM KADAM BADHAYE JA...

    https://www.youtube.com/watch?v=qQxWFawxbqc



    https://www.youtube.com/watch?v=ym-F7lAMlHk



    फिल्में फिर वही कोमलगांधार,

    शाहरुख  भी बोले, बोली शबाना और शर्मिला भी,फिर भी फासिज्म की हुकूमत शर्मिंदा नहीं।

    https://youtu.be/PVSAo0CXCQo

    KOMAL GANDHAR!



    गुलामों,फिर बोल कि लब आजाद हैं!


    कदम कदम बढ़ाये जा,सर कटे तो कटाये जा

    थाम ले हर तलवार जो कातिल है

    फिक्र भी न कर,कारंवा चल पड़ा है!


    उनेक फंदे में फंस मत

    न उनके धंधे को मजबूत कर

    जैसे वे उकसा रहे हैं जनता को

    धर्म जाति के नाम!


    जैसे वे बांट रहे हैं देश

    धर्म जाति के नाम!


    उस मजहबी सियासत

    की साजिशों को ताकत चाहिए

    हमारी हरकतों से

    उनके इरादे नाकाम कर!

    उनके इरादे नाकाम कर!


    कोई हरकत ऐसी भी न कर

    कि उन्हें आगजनी का मौका मिले!


    कोई हरकत ऐसा न कर कि दंगाइयों

    को फिर फिजां कयामत का मौका मिले!


    फासिज्म के महातिलिस्म में फंस मत

    न ही बन उनके मंसूबों के हथियार!


    यकीनन हम देश जोड़ लेंगे!

    यकीनन हम दुनिया जोड़ लेंगे!


    यकीनन हम इंसानियत का फिर

    मुकम्मल भूगोल बनायेंगे!


    यकीनन हम इतिहास के खिलाफ

    साजिश कर देंगे नाकाम!


    हम फतह करेंगे यकीनन

    अंधेरे के खिलाफ रोशनी की जंग!


    गुलामों,फिर बोल कि लब आजाद हैं!

    पलाश विश्वास



    --
    Pl see my blogs;


    Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

    क्या यही असहिष्णुता अब हमारी राष्ट्रीयता है?

    कमल हसन ने रोजी रोटी का सवाल भी उठाये हैं,गौर करें।


    एक पिता की लहूलुहान रुह को समझ सकें तो समझ लीजिये।

    जवाब में हमारी जितनी गोलबंदी है,उससे कहीं ज्यादा संगठित,सुनियोजित,संस्थागत सत्ता प्रायोजित गोलबंदी है असहिष्णुता विरोधी आंदोलन के खिलाफ।

    https://www.youtube.com/watch?v=7OhKSEBJsBc

    पलाश विश्वास

    असहिष्णुता विरोधी आंदोलन के जरिये दुनियाभर के संस्कृतिकर्मियों,फिल्मकारों, वैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों, इतिहासकारों की अभूतपूर्व गोलबंदी का कितना असर सत्ता के फासीवादी नस्ली रवैये पर होगा,कहना काफी मुश्किल है।


    क्योंकि जिस वैश्विक इशारों के तहत उसका राजकाज है,उसकी भी यह मनुस्मडति सत्ता की अटूट जमींदारी हुक्मउदुली कर रही है।


    अमलेंदु ने लिखा है कि मूडीज की तो सुन लें,वह किसी की सुनने के मूड में नहीं है।वह बेलगाल सांढ़ पर सवार नंगी तलवार से सबके सर कलम कर देने के तेवर में है।


    फासिज्म के एजंडे को विश्व व्यवस्था की भी परवाह नहीं है ,जाहिर है और उसकी मंशा विश्वव्यवस्था  को भी अपने राजसूय का बलिप्रदत्त अश्व बनाकर सारी दुनिया मुट्ठी में करके सारी दुनिया पर मनुस्मृति राज बहाल करना है।


    नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी की राजनयइस मंसा का इजहार है बेशर्म।यह अमानवीय कृत्य वहां मनुस्मडति की बहाली के लिए हैं और विडंवना है कि वहां भी हथियार उनके मधेसी और आदिवासी हैं।हम गुलामों की यही गत है कि हम उनके गुलाम ही रहेंगे और कुत्तों की तरहमारे जायेंगे,जनरल साहेब बरोबर बोले हैं।


    शर्म तो खैर है ही नहीं।


    अटल जमाने में विश्व के पहले विनिवेश मंत्री अरुण शौरी एक तरफ तो दूसरी तरफ रिजर्व बैंक के गवर्नर,नारायणमूर्ति जैसे लोग जिनका इस मुक्तबाजारी तामझाम में खासा योगदान है,उनकी तक कोइ सुनवाई नहीं हो रही है।


    राष्ट्रपति कई दफा अमन चैन के लिए सहिष्णुता और विविधता की विरासत के हक में हस्तक्षेप कर चुके हैं।ऐसे में कमल हसन शायद सही कह रहे होंगे कि कुछ भी नहीं होगा।


    प्यारे कमल हसन हमारे दिल के करीब हैं।फिल्में उनकी दो कौड़ी की नहीं होती और वे शोकेस बनकर हर फ्रेम में फोटोबांबिंग करके दृश्यों को बंधुआ बना देते हैं और पात्रों को विकलांग।


    शब्दविन्यास गायब है।

    लोक भी गायब है वहां।

    सरोकार वाणिज्यिक नारे हैं।


    वाणिज्यिक मसालों से पटकथा सरोबार है और दृश्यमय संगीतबद्धता जो भारतीयपिल्मों की आत्मा है,सिरे से आखिर तक अनुपस्थित है।


    फिरभी चामत्कारिक स्क्रीन प्रेजेंस है कमलहसन की जो बाकी कलाकारों को उछाकर बेरहमी से फ्रेम के बाहर कर देता है।


    वे हमारे दिल के बहुत करीब हैं और हमने सत्तर के दशक से उनकी कोई फिल्म मिस नहीं की जैसे हम दिलीप कुमार और आमिर कान की कोई फिलम मिस नहीं करते।शबाना,वहीदा और स्मिता की कोई फिल्म मिस नहीं करते।


    ऐसे अजीज कलाकार को भी आज सुबह हमने खरी खोटी सुनायी।


    Is intolerance killing  Humanity and Nature all about Nationalism? Never!What do you mean by Nation,Mr Kamal Hassan?

    'The Great Dictator' speech by Charlie Chaplin (Subtitles - Best Version)
    https://www.youtube.com/watch?v=LBpX0pkWKDY

    Palash Biswas

    Gandhiji's address to nation after India - Pakistan 1947 Partition (Original Voice)
    https://www.youtube.com/watch?v=9S_TfLNhk0U

    Charlie Chaplin : The Great Dictator's Speech

    The Great Dictator's Speech. I'm sorry, but I don't want to be an emperor. That's not my business. I don't want to rule or conquer anyone. I should like to help ...

    The Great Dictator - speech - YouTube

    Oct 12, 2006 - Uploaded by Zach Gates
    This is the climax to the 1940 Charlie Chaplin film "The Great Dictator". ... The Great Dictator (1940 ...

    The Great Dictator (1940) - Charlie Chaplin - Final Speech ...

    Aug 4, 2011 - Uploaded by Daniel M. Kobayashi
    PLEASE BUY THIS MOVIE!! New video herehttps://www.youtube.com/watch?v=JjOkvxMHapo (had to remove ...

    Charlie Chaplin final speech in The Great Dictator - YouTube

    Jun 18, 2006 - Charlie Chaplin final speech in The Great Dictator Get it on BluRay from Amazon ...

    The Great Dictator - Wikipedia, the free encyclopedia

    The Great Dictator is a 1940 American satirical political comedy-drama film .... speechnear the end of the film, delivered in German-sounding gibberish, is a ...


    जब कोई राष्ट्रपति की सुन नहीं रहा है और निवेशकों की ढुलमुल आस्था से शेयर बाजार में तब्दील अर्थव्यवस्था की परवाह भी नहीं कर रहा है तो राष्ट्र के अमूर्त विवेक की आवाज सुनने की सोहबत की,अदब की उनसे उम्मीद रखना हमारी खुशफहमी भी हो सकती है।जब राष्ट्रपति की सुनवाई नहीं तो सच ही बोले हैं कमल हसन ने। पुरस्कार लौटाने से कुछ नहीं होगा।


    हम भी शुरु से यही कह रहे हैं।


    हमारी फौजें बेदखल गुलामों की फौजें है,मजहब और जातपांत,नल्स के नाम बटी हुई और विरोध से कयामत हारती नहीं है जब तक न हम जनता के बीच जाने की तकलीफ भी न करें।


    सच यह है कि हम देश और दुनिया को देहात में जाकर जोड़ने की कवावद से दूर है जबकि जंगल जंगल दावानल,अमंगल घनघोर प्रलयंकर है और फिजां अब भी कयामती है।


    सारा मुल्क और सरहदों के आर पार इंसानियत का मुल्क मय कायनात आग के हवाले हैं।


    सच तो यह है कि पिछले ढाई दशक से जनांदोलनों के झंडेवरदार हैं,वे चुप्पी साधे हुए हैं।स्वामी अग्निवेश भी नोबेल पुरस्कार के दावेदार थे,वे खामोश हैं।


    लाठियां,गोलियां खाने के लिए जनता को सड़क पर उतारने वाले ,जेल यात्रा करने वाले लोग क्यों खामोश हैं,हमें उनकी कोई मजबूरी समझ में नहीं आती।


    शांति के नाम नोबेल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी न जाने कहां खो गये हैं।


    हम दो कौड़ी की हैसियतवाले भी नहीं हैं,लेकिन दुनियाभर में जिनकी जय जयकार है,वे डा.अमर्त्य सेन भी खामोश हैं।


    इसीतरह डाक्टर,इंजीनियर भी खामोश हैं और मजदूरों, कामगारों के हक हकूक के खात्मे के बाद भी मजदूर यूनियनें अखंड सन्नाटा की बर्फीली कब्रों में दफन है।


    देहात औरकिसानों के जनसंगठनों मेंं कोई हलचल भी नहीं है।

    छात्र युवा गोलबंद हो रहे हैं और उनका मोहभंग भी हुआ है।


    किंतु बलात्कार संस्कृति की शिकार शूद्र और दासी,भोग्या नारी अब भी आजाद पंखों की अंतरिक्ष उड़ान के बावजूद घरों में कैद हैं।


    सामाजिक शक्तियों की गोलबंदी न हुई,जमीन पर हरकतें भी नहीं हैं,तो हम देश दुनिया को जोड़ने का ख्वाब ही देख सकते हैं।


    पढ़े लिखे सरकारी कर्मचारियों,अफसरों से उम्मीद करके बाबासाहेब बीआर अंबेडकर और माननीय कांशीराम पीठ पर छुरी खाकर सिधार गये।नीली क्रांति जाति युद्ध और मजहबी जिहाद में खत्म।


    सारा भारत अब कुरुक्षेत्र है।हम मोड़ पर चक्रव्यूह है या फिर वही मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में हैं हम।


    विचारधारा और आदर्श धरे के धरे रहे,गांधी धर्म की बात करते हुए,हे राम कहते हुए राम के नाम गोलियों से छलनी हो गये।


    हमारे कामरेड भी फासिज्म के रास्ते चल पड़े और आखिरकारमुक्तबाजार में सौदा बटरने लगे हैं।


    मनुष्य की नियति हो या नहीं,विचारधारा नियतिबद्ध है।


    जमींदारी के स्थाई बंदोबस्त जारी रखने की कवायद यह मनुस्मृति मजहबी सियासत,सियासती मजहब और अर्थव्यवस्था का आखेटगाह है,भारत विभाजन का रहस्य अभी हम खोल नहीं पाये हैं अभी।साजिशों और सौदेबाजी के दस्तावेज हमारे हाथ अभी लगे नहीं हैं।तो सत्ता और सरकारी महकमों में मलाई उड़ाने वाले लोगों का अपना अपना पक्ष होगा।


    इस अनंत हिंसा और घृणा के माहौल में एक बाप का बयान भी आया है,उसके शब्दों के भीतर जो असुरक्षाबोध है,उसे महसूस करने के लिए दिल भी चाहिए और दिमाग भी।जो फिलहाल हैं नहीं।


    क्योंकि हम नागरिक कहीं किसी कोण से नहीं हैं,हम कबंध हैं।पता नहीं,कौन किसका चेहरा टांगे फिर रहा है।किसके लब किसकी जुबान बोल रहा है।बाजारु कार्निवाल में हर चेहरा मुखौटा है।


    सरोकार धरे रहिये,सारे लोग बागदीवाली और धनतेरस की तैयारी में हैं जोर शोर से।मंहगाई हो या न हो,सौदे जारी हैं।खेती रहे या नरहे,नौकरी रहे या न रहे,कारोबार चले या न चले,कामधंधे हो या न हो,रोजी रोजी हो न हो,परवाह किसे हैं।


    रोज सुबह लुंगी उठायेबाजार में हाजत रफा के अभ्यस्त हैं सीमेट के जंगल में कैद लोग, लुगाइयां।बच्चे और जवान।


    अब सारा देश सीमेंट का जंगल हैं,जहां किसी भी पेड़ या वनस्पति की जड़ें हैं ही नहीं।

    वैसे ही हमारे वजूद में इंसानियत की कोई रुह बाकी नहीं है।

    नहीं है।


    शाहरुख खान तो आग में कूद चुके हैं।

    मां शर्मिला की साफगोई के बावजूद बेटा सैफ अली खान खामोश है।अमजद अली खान के बयान को फिर देखें और उनके सुर ताल में लापता आजाद लबों की खोज भी करें कि कितना थम थम कर बोलना पड़ा उनको।


    हुसैन जैसे कलाकार के देस निकाले के बाद शाहरुख तो बादशाह की तरह आग में कूद पड़े हैं।लेकिन असहिष्णुता भारत विभाजन के समय से जारी है,कहकर भी कमल हसन हमारे साथ नहीं है।


    बालीवूड के किंवंदती कलाकार अमिताभ बच्चन से लेकर दिलीप कुमार तक खामोश हैं।

    सांसद रेखा और जया बच्चनभी खामोश।


    अदूरगोपाल कृष्णन और रजनीकांत और चिरंजीवी और मोहनलाल भी खामोश हैं।


    सौमित्र चटर्जी और अपर्णा सेन के बोल खुलने लगे हैं और बंगाल के भद्रजन टीवी पर नजर आने लगे हैं।


    कमल हसन ने शायद सच ही कहा है,कुछ भी नहीं होगा।


    बालीवूड पर फिलहाल राज करने वाले सलमान और आमीर खान खामोश हैं और संजोग से वे मुसलमान भी हैं।


    शाहरुख की क्या गति हो रही है मन्नत के अंदरमहल में गौरी की मौजूदगी के बावजूद। हम देख रहे हैं।


    कामधंधे,रोजी रोटी से परेशान देश की आम जनता के हाल से नावाकिफ भी हम नहीं हैं।


    रोजी रोटी की फिक्र हमारे करोडपति अरबपति कलाकारों को भी होती है।कमल हसन ने साफ साफ कहा भी है कि फिल्मों से उनकी रोजी रोटी है।जो कमाया है,उसे वापस नहीं दे सकते।सच भी है।

    मजबूरी भी है।कौन क्यों क्या बोल रहा है,समझ बी लीजिये हुजूर।


    देशभर में तमाम सम्मानीय लोगों की यह मजबूरी हो सकती है,लेकिन शरणार्थी हूं और इसलिए बेहतर जानता हूं कि अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ें लोगों को कितना नाप तौल कर बोलना होता है।वरना जलजला आ जाता है।


    शाहरुख उस जलजले में फंस गये हैं।सलमान,सैफ,आमिर या दिलीप कुमर फंस नहीं सकते।कमसकम इस वाकये के बाद।


    मुंबई से मीडिया की खबर है: बॉलीवुड एक्टर सलमान खान के पिता सलीम खान ने असहिष्णुता के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचाव किया है।


    गौर करें, सलीम खान एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी कम्यूनल नहीं हैं। मुसलमानों के रहने के लिए भारत से अच्छा देश पूरी दुनिया में नहीं हो सकता है।


    गौरतलब है कि सलीम खान का कहना है कि अगर मुसलमान इस देश में रहना चाहते हैं तो उन्हें देश और इसकी संस्कृति का सम्मान करना होगा। उन्होंने कहा कि वह पूरे यकीन के साथ कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी सांप्रदायिक नहीं है। मोदी सबका साथ-सबका विकास में यकीन रखते हैं। सलीम खान ने कहा कि विश्व में अल्पसंख्यकों के रहने के लिहाज से भारत से अच्छा कोई देश नहीं हो सकता है।

    सलीम खान ने कहा,  'मैं मुसलमानों से पूछना चाहता हूं कि क्या वह पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक या ईरान में जाकर रहना पसंद करेंगे। अगर भारत ही वह अकेला देश है जहां आप रहना चाहते हैं, क्योंकि आपको यही घर लगता है तो देश और इसके कल्चर का सम्मान कीजिए। आपसी प्रेम से रहिए।'

    एक पिता की लहूलुहान रुह को समझ सकें तो समझ लीजिये।


    इस आलोक में आत्मसुरक्षा के लिए घनघोर असुरक्षाबोध की जो भाषा हो सकती है,उसी भाषा में भारतीय फिल्मों के बेहतरीन संवादलेकक सलमान खान के पिता ने लिखा हैः



    कमल हसन की हमने अपने वीडियो में निर्मम आलोचना की है और उनकी फिल्मों को फ्रेम बाई फ्रेम सोलो परफर्मेंस भी साबित किया है।


    उनसे पूछा भी है कि यह दिगंत व्यापी असहिष्णुता ही हमारी राष्ट्रीयता है।


    अगर असहिष्णुता है और वह नरसंहार संस्कृति है, मनुष्यता और सभ्यता के खिलाफ अंधियारा का राजकाज है तो हम वह असहिष्णुता खत्म क्यों नहीं कर देते,हमने यह भी पूछ लिया।


    अव्वल तो यह सवाल वे देखेंगे नहीं,जवाब भी नहीं देंगे,जाहिर है।

    जाहिर है कि ये सवाल हमने दरअसल कमल हसन से नहीं,आपसे ही पूछा है।


    जवाब में हमारी जितनी गोलबंदी है,उससे कहीं ज्यादा संगठित,सुनियोजित,संस्थागत सत्ता प्रायोजित गोलबंदी है असहिष्णुता विरोधी आंदोलन के खिलाफ।

    बाकी ,कातिलों का काम तमाम है

    अगर हम कत्ल में शामिल न हों!

    KADAM KADAM BADHAYE JA...

    https://www.youtube.com/watch?v=qQxWFawxbqc



    https://www.youtube.com/watch?v=ym-F7lAMlHk



    फिल्में फिर वही कोमलगांधार,

    शाहरुख  भी बोले, बोली शबाना और शर्मिला भी,फिर भी फासिज्म की हुकूमत शर्मिंदा नहीं।

    https://youtu.be/PVSAo0CXCQo

    KOMAL GANDHAR!



    गुलामों,फिर बोल कि लब आजाद हैं!


    कदम कदम बढ़ाये जा,सर कटे तो कटाये जा

    थाम ले हर तलवार जो कातिल है

    फिक्र भी न कर,कारंवा चल पड़ा है!


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    ऐ मालिक तेरे बन्दे हम...Ae Malik Tere Bande Hum!Get ready for the Final Kill,Reforms Agro!

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    Hey Ram!We have to stand with Sharukh Khan,the real Indian!

    An Indian who is not afraid of speaking human! Truth! Tolerance!Diversity!

    Lest we become Bangladesh, Pakistan and an Islamist regime all on the name of Ram! Maryada Puroshottama!We are Indian!

    Thanks comrades!That you correct and restrict BEEF Festival which helps Religious polarization!

    Ae maalik tere bande hum
    https://www.youtube.com/watch?v=m2CJZiP4_Sc

    Palash Biswas


    ऐ मालिक तेरे बन्दे हम...Ae Malik Tere Bande Hum!Get ready for the Final Kill,Reforms Agro!

    Big Bang reforms to be pushed ahead subjective to parliamentary consensus which is always pet as we have been seen since 1991 irrespective of the fact that mandate lost!

    This BEEF BAN,BEEF Gate not to be limited to set Vote Bank equation setting ablaze Humanity and Nature,it activates total mind control default!


    It is the ultimate head hunting launched against the religious,ethical,moral honest peasantry,the rural India and the Nature associated communities to kill the GREEN!


    Song title: Ae Malik Tere Bande Hum

    Movie: Do Aankhen Barah Haath

    Singer(s):  Lata Mangeshkar

    Music: Vasant Desai

    Lyrics: Bharat Vyas

    Star Cast: V. Shantaram, Sandhya

    Year: 1957


    Lyrics of Ae Malik Tere Bande Hum in Hindi from movie Do Aankhen Barah Haath:


    ऐ मालिक तेरे बन्दे हम

    ऐसे हों हमारे करम

    नेकी पर चलें और बदी से टलें

    ताकि हंसते हुए निकले दम


    ये अँधेरा घना छा रहा तेरा इंसान घबरा रहा

    हो रहा बेखबर, कुछ न आता नज़र

    सुख का सूरज छुपा जा रहा

    है तेरी रौशनी में जो दम

    तू अमावास को कर दे पूनम

    नेकी पर चलें और बदी से टलें

    ताकि हंसते हुए निकले दम ...


    जब जुल्मों का हो सामना तब तू ही हमें थामना

    वो बुराई करे हम भलाई भरें

    नहीं बदले की हो कामना

    बढ़ उठे प्यार का हर कदम और मिटे बैर का ये भरम

    नेकी पर चलें और बदी से टलें

    ताकि हंसते हुए निकले दम ...


    बड़ा कमज़ोर है आदमी, अभी लाखों हैं इसमें कमी

    पर तू जो खड़ा है दयालू बड़ा

    तेरी किरपा से धरती थमी

    दिया तूने हमे जब जनम

    तू ही झेलेगा हम सबके ग़म

    नेकी पर चलें और बदी से टलें

    ताकि हंसते हुए निकले दम ...


    This intolerance kills religion, humanity, nature, peace,medium,genre,art,culture,music as well as free flow of capital,investment,agrarian communities,business and industries!

    It happened once again.Last day,load shedding ended my analysis and it happened yet again today that I could not finish the last stanza.I used the soundtrack and clipping of Bhakti Sangeet and opened it with Ae Malik Tere Bande Hum to highlight the musicality,the soul of Indian Cinema,based from which Shaharukh dares to jump into the Aag ka Dariaya!


    Here you are! It is Dilwale Dulhania Le Jayenge yet again.We should remember the first film by SRK Bajigar in which he played a negative anti hero type role and launched his evergreen career in Indian Cinema and look he rules as Badshah of Hindustani DILODIMAG!SRK played the Anti Hero Roles in Darr as well as in Anjaam!Let us salute his courage!


    We have to stand with Sharukh!

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    Thanks comrades!That you correct and restrict BEEF Festival which helps Religious polarization!I had written about this GOMANGS BIPLOB in Bengali and I appreciate the positive response!


    Neither Amjad ali Khan nor Salim Khan could speak aloud nor Dilip Kumar,Big B, Amir, Salman, RjniKat,Benegal,Girish karnad and those who led so called mass movements could speak out.I analysed ET column written by Chaitnya Kalbag:Forget Bihar! In reference to civil society procession in Dhaka against killings of free speech which was joined by professionals. Professionals remain silent and why,Kamal Hassan explained it very well!They might not afford bread and butter!


    Read the article logging in ET.


    The economy has been inflicted with individual,social,political and religious disorder!It is degeneration all the way.As Indian Express reported,Rajan warned:

    Raghuram Rajan repeats: We need to resist bid to close our society


    Reserve Bank of India Governor Raghuram Rajan reiterated on Wednesday that India would be "crazy to lose" its biggest advantage and emphasised the "need to keep an open society" and "resist all attempts at closing it down".


    RBI governor has to sustain the free flow of economy!He has to manage the turmoil as well as volatile dices!But GOI has dismissed the Moody`s report to prove that it is rather adament to accomplish Global Manusmriti order or racist apartheid.


    Social sector schemes have to reduced to 30 from 50.Seventh pay commission is linked to productivity and it is complete privatization.GOI has to drive hard to push the final reforms in agrarian sector to make it Monsanto Raj all over.But it has to face stiff resistance in the Parliament.Thus,RBI Governor has to speak out.


    I am afraid that sooner or later he has to lose his job as all windows and doors for investment have been closed with infinite hate and killings.


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    Chairman of National Institution for Transformation of India (NITI) Aayog's expert committee on land reforms T Haque on Wednesday stressed on simplifying land leasing laws that will lead to inclusive growth and enhance agricultural growth!


    "The comprehensive report talks about the need for reforms in the agriculture sector in a big way to address issues of bad weather, fluctuation in crop prices, and demand and supply problems in the long term," NITI Aayog member Ramesh Chand told ET.

    Experts stress need for tenancy reforms

    November 4, 2015

    Odisha Channel Bureau

    BHUBANESWAR: An expert group consultation was held here today to come up with a set of recommendations to be submitted to NITI Aayog at the national level for developing a Model Agricultural Land leasing Act.

    NITI Aayog has constituted an Expert Group with a view to prepare a model agricultural land leasing act in consultation of states. The panel of experts will review tenancy laws and practices in majority of the states to design a model tenancy guideline for the country.

    T. Haque, chairperson of the Expert Group on land leasing constituted by National Institution for Transformation of India (NITI) Aayog was present on the occasion to lead the discussion and gather recommendations for the central government.

    cultivation

    The consultation framework was around the broad premises of increased productivity, inclusive approach to address the owners and tenants insecurities, also work on liberalising tenancy by land tenure reforms.

    Haque stressed on simplifying land leasing laws that will lead to inclusive growth and enhance agricultural productivity. He added that there is a need to review the existing laws in the present context.

    Sanjoy Patnaik, Country Director, Landesa, suggested for an alternative framework that addresses tenant insecurities and apprehensions of the land owners resulting into a win-win situation for both.

    Experts suggested that the entire exercise is not intended to increase the existing insecurities of the tenants or the owners; this in fact is directed to mitigate the existing fear on both sides to create a win-win situation.

    The experts agreed on creating a mechanism to record tenants through engagement with the local community level organisations, Panchayats, SHGs, Government institutions and financial institutions with a progressive intention of increasing visibility of the tenants.

    This exercise will help the tenants to access credit from the financial institutions however, the experts suggested for an appropriate procurement policy to enable tenants to get a fair price for their produce.

    Experts also suggested that addressing one aspect of the issue is not the solution to the entire gamut of problems that tenants are facing and recording tenancy will address the input level barriers, credit, protective measures including insurance against crop loss as well as increase market linkages.

    Experts also deliberated on the longer lease period having an impact on land productivity and improved production and suggested that the lease periodicity should not be binding, rather be flexible and mutually agreed upon.

    There was a thorough discussion on Licensed Cultivators Act. This is important in the context that the Odisha Government has recently formed a High level Committee to visit Andhra Pradesh and Telangana to study its implementation and submit recommendations.

    Experts also suggested that there are some land leasing best practices by Joint Liability Groups in Kerala and Chhattisgarh which should be reviewed.

    The consultation was organised by Landesa in the wake of number of farmers' suicides in the state over the last two months.

    Recently, Odisha has been experiencing the worst ever agrarian crisis with drought like situation triggering farmers to take an extreme step like resorting to end their lives being over burdened by debt.

    On the occasion eminent experts from diverse fields including former Member Board of Revenue Aurobindo Behera, DGM NABARD B.K. Mishra, R.K. Mishra from OUAT, eminent agriculturist Natabar Khuntia, economists Padmaja Mishra and Mamata Swain, Sibabrata Choudhury, State Director (Landesa, Odisha), Suneel Kumar, State Director (Landesa, AP/Telengana) Researcher Pranab Choudhury, Former District Judge Subhendra Mohanty were present among others.


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    हाफपैण्‍ट के पैदा होने की कहानी

    आर.एस.एस की स्थापना 1925 में नागपुर में हुई थी जि‍सके संस्थापक केशव बलि‍राम हेडगेवार था जि‍नका जन्म 1 अप्रैल को हुआ था। लेकि‍न हाफपेन्‍ट की रामलीला शुरू होती है डा. मुंजे की इटली के फासीवादी मुसोलि‍नी से हुई मुलाकात के बाद से। भारत आने पर मुंजे ने हेडगेवार को बताया की कैसे मुसोलि‍नी युवाओं के दि‍मागों में जहर घोलकर उन्हें फासीवादी संगठन में शामि‍ल कर रहे है। साथ ही मुंजे ने इटली फासीवादी द्वारा इस्तेामाल ड्रेसकोड तथा डण्डे का भी एक सेम्पल हेडगोवार को दि‍या। ड्रेसकोड खाकी पेन्ट थी जो अगले दि‍न हेडगेवार को पहनकर शाखा में जाना था मगर वो खाकी पेन्ट हेडगेवार की लम्बाई से ज्यादा थी इसलि‍ए हेडगेवार ने अपने नौकर से कहा की वे पेन्ट को एक फुट छोटा कर दे मगर उनके नौकर ने कहा आप का संघ दलि‍तों और गरीब वर्गों के हि‍न्दुओं के लि‍ए कुछ नहीं करता है इसलि‍ए मैं आपकी पेन्ट छोटी नहीं करूंगा । इसके बाद हेडगेवार अपनी पत्नी के पास पेन्ट एक फुट छोटा कराने पहुंचे। लेकि‍न उनकी पत्नी जानती थी कि संघ की राजनीति‍ महि‍ला वि‍रोधी है इसलि‍ए उन्होंने भी पेन्ट एक फुट छोटा करने से मना कर दि‍या। इसके बाद हेडगेवार थक-हार कर सोने चले गए और सोचा की लम्बी‍ पेन्ट को मोड़कर पहन लेंगे। लेकि‍न रात को नौकर ने सोचा कि चलो मालि‍क के नमक का कर्ज उतारने के लि‍ए पेन्ट एक फुट छोटा कर देता हूं। इसके बाद सुबह 5 बजे पत्नी ने भी सोचा कि चलो पत्नी होने के नाते अपना फर्ज पूरा कर देती हूँ और पेन्ट को एक फुट छोटा कर दि‍या। जि‍सके बाद वो पेन्ट हाफपेन्ट बन गई और सुबह 6 बजे हेडगेवार जी शाखा में उसी खाकी हाफपेन्ट को पहनकर पहुंचे । जि‍सके बाद से खाकी हाफपेन्ट आर.एस.एस की गणवेश 'ड्रेसकोड'घोषि‍त हो गई।


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    Ae maalik tere bande hum
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    Palash Biswas
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    Dearest Dictator!Fascism would not work in India!It failed in 1977.it has failed yet again!

    24 artists, including filmmaker Kundan Shah, return their national awards over FTII row

    But the government hit back saying it is an agenda against them


    ऐ मालिक तेरे बन्दे हम...Ae Malik Tere Bande Hum!

    'The Great Dictator' speech by Charlie Chaplin (Subtitles - Best Version)
    https://www.youtube.com/watch?v=LBpX0pkWKDY



    Palash Biswas

    Just before the scheduled March to the Raisina Hills to impeach the President of Democrat Secular Indian Republic for his continuous cry to sustain inherent tolerance and Diversity in this land of one of the oldest civilization always engaged in quest of knowledge where religion always meant humanity and love,the Bharat Tirth as Gurudev Tagore described it,no less than 24 artists including film makers returned the award!


    This morning I had said in my daily video talk that we have to stand with Shahrukh Khan who dares to speak human and an intensive hate campaign launched against the evergreen daring artist branding him anti national!


    I used the eternal musicality of Indian Cinema which has always contributed to national integrity and unity and united the humanity worldwide expressing love,fraternity,peace,equality,justice and each value of Indian civilization,its day to day life, aspirations, ambition,struggles,folk,festivals breaking the barriers of language, identity, caste,religion ans race.


    Indian Cinema had been the last home of artists who launched Indian People`s Theater like Baalraj Sahani,AK Hangal,Ritwik Ghatak,Salil Chowdhari and others,thetre personalities like Amrish Puri,Shriram Lagu,Nasiruddin Shah and so many of them.


    FTTI remained the grooming institute of artists and film makers and it had to be killed as other institutions of Indian democracy have been killed as Pansare ,Davolkar and Kalburgi have been killed to make this globe subordinate to Manusmrity discipline of Racist Apartheid brute for which an Arabian Spring has been imported for religious Polarization.


    This Morning I used the Ae Malik Tere Bande Hain Hum,earlier I used Kadam Kadam Badhaye Jaa and then the masterpiece, the Charlie Chaplin speech in the Great Dictator explaining musicality, sound design and aesthetics of social realism frame to frame!


    Thus,I am very happy after my Professor and close friend Dr,Shekhar Pathak,the historian returned Padmshree as the famous Nainilake in my home town in Nainital echoed the voice of conscience of light,progress,civilization and humanity.


    I had been insisting that each and everyone from Indian intelligentsia and Indian Cinema specifically has to speak human and I am happy yet again after my teacher in GIC,Nainital, Tara Chandra Tripathi endorsed our campaign Desh Jodo Dunia Jodo only this morning.


    Indian Cinema despite some voices of dissent stand rock solid to defend humanity and civilization ,the legacy of inherent diversity and pluralism.

    We are not reactionaries and being democrat we respect every note of dissent as we fight for freedom of speech and right to dissent.


    It is mandatory to dismiss the self destructive Mandate that we invested in an inefficient,unworthy dictator as Germany also committed the Himalayan blunder and still suffring.We would not allow to repeat the history of Nazi Regeime and fascism!

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    Virendra Saini
    I am returning this award in sincere hope that the government will solve all the problems of the Film andTelevision Institute of India with an open mind.
     National Film Award for Best Cinematography, Salim Langde Pe Mat Ro, 1990; National Film Award for Best Children's film, Kabhi Paas Kabhi Fail, 1999
    Manoj Lobo
    I received the National Award from Our former President Mr APJ Abdul Kalam for cinematography in2005 for my F.T.I.I diploma film Girni . It still remains a most cherished and valued experience in my life.My cinematography career subsequently was in a big way influenced by the recognition I received gettingthis awardToday , I return this award in protest of the devaluing of our academic institutions specifically F.T.I.I byappointing people without solid past commitment to cinema, culture and history of India . It is ahumiliation I cannot bear .I stand for an India that's multi culturally vibrant, secular and intellectually rich.Am awaiting my country and my award backJai Hind
     Director of photography of Jaane tu ya jaane na, jhootha hi Sahi, Nautanki Saala, shaadi ke side effects.
    Vivek Sachidanand 
    I am an alumnus of FTII and I received a National Award in 2005 for Audiography. I have no doubt in mymind that I owe the National Award or any other award or recognition that I have received in myprofessional career, entirely to the time I spent in FTII and the education I received from my teachers andfellow students during that time. So for me its heart breaking to see that the posts of Chairman and Governing Council members of such areputed institute is being filled up with people with no qualifications whatsoever. It's indeed sad that ademocratically elected government would distribute such posts, seemingly as gifts to undeserving people,for their affiliation to a political party or its wings with no transparency. What's even more disturbing to meis that this seems to be happening with many such institutes in the country, which have built theirreputation over decades. When I hear repeated instances of people in the government saying that FTII has not produced any realtalent in years and that the students are 'naxals and anti-nationals', I feel it's necessary to make my voiceheard and return the awards that the same Indian government has given me as an 'FTII product'. It goes without saying that this award means a lot to all of us and we are not rejecting the recognition thatthe jury has bestowed upon us, nor are we belittling the honour given to us by the people of our country inthe form of the National Award. I don't have any affiliation to any political party and my raising these questions at this point of time doesn'tmean no wrong has happened before under any other governments. However, past mistakes cannot be used
     
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    as justification by any current government. And when artists, writers, film makers, historians, scientists andgeneral public are speaking in support of a cause, it should not be brushed aside by calling it politicallymotivated. I understand that this is a democratically elected government and has the right to make appointments togovernment funded institutions but this cannot be without due process or transparency. I urge you to find a solution to the FTII issue at the earliest and put a system in place for the selection ofsuch posts so that this, or any future government cannot make such arbitrary appointments.
     National Award for Best Audiography for 'Ksha Tra Gya', 2005
    Sudhakar Reddy Yakkanti
    It is very disheartening to see so many eminent scholars who have been an inspiration for the followinggenerations had given up the honors they have received from government of India. I received a 'Special jury National award' For Short film 'EK AAKASH' (2004) which talks about the "Communicationbetween cultures, communities and necessary for peace and dialogue". When I see there is nocommunication and dialogue happening for more than 4 months in spite of students strike at FTII and allthe communities of one country are being pitted against another, I feel that any 'opinion' or 'belief ' otherthan the 'office bearers' are not valued in this democratic country any more. Despite the High regard &respect I pay for these awards given to encourage the values imbibed in our constitution and culture, I willhave to return it back to express my effort in showing solidarity to the enraged friends who are fighting forthe 'Freedom of Expression'.
    'Special Jury National Award' for EK AAKASH (2004) DOP: Deool, Highway( Marathi films)
    Ajay Raina
    I return my National Award in support of the students of my alma mater FTII and also in solidarity with allthe writers, filmmakers, artists, historians, scientists and people of eminence who have spoken up as onevoice to protest the deliberate silence of the present government at the centre on the current regime of fearand intolerance being permitted against the vulnerable minorities all over the country.Given up my National Award is not an easy decision for me. My cameraman and I shot the documentaryfilm 'WAPSI', for which I won the award in 2005, undercover, at grave risk and almost life-threateningcircumstances in Pakistan without any official permission from the host government. In this film I revisitthe events of Partition and the consequent effects of Hindu - Muslim divide upon Hindu and Sikhminorities living in Pakistan as well on the Muslim, Sikh and Kashmiri Pandit minorities in India. Myearlier film in Kashmir (Golden Conch 2002, MIFF) shot in 2000 under similar circumstances of fear isabout my journey home to Kashmir a decade after the forced exodus of my own community. Subsequently,all my work as a filmmaker and writer has been about documenting Kashmir and its devastation.I have never shied away from speaking up for any minority issue in my films and writings, so I feelconscience bound to speak up even now as the idea of a secular, tolerant and pluralist India seems to beunder threat once again. I do this with hope that many more people will speak up now so that the presentregime is compelled to rethink its agenda of 'manufacturing hate' among communities that have strived topull along each other in peace and harmony despite the tragedies of the past.
     
     3
    Irene Dhar Malik
    I'm giving up my National Award in protest against the unmistakable interference of the presentgovernment in appointments to institutions of academia and culture. I am also protesting the generalatmosphere in the country where the Prime Minister does not care enough to categorically andunequivocally condemn incidents of intolerance and take clear and swift action against members of hisgovernment and party who seek to belittle or justify such incidents. It's not been an easy decision. TheNational Award is very precious to me, and I have great respect and gratitude for the jury members whoconsidered me worthy of this honour. I'm giving it up to join the group of people who are trying to getheard, a group of people who are voicing their worries about what is happening in the country, and whohope that things will change for the better. A lot of citizens had great hopes from the new government. Ihope they are not let down by indifference, by attempts to justify present injustices by talk of what hashappened in the past. Any wrong that happened in the past cannot justify a wrong being done in the present.The present is the time to undo wrongs. If a Gajendra Chauhan's appointment is a mistake, as it clearly is,is it so difficult to undo this?I have thought long and hard and it has been a difficult decision to return the National Award. But as I wasdebating about this, my fourteen year-old daughter told me that she would be proud of me if I gave it upand joined the protest. And so, I made up my mind.-
     National Film Award for Best editing, Celluloid Man, 2013
     
    Satya Rai Nagpaul
     I forfeit my National Award, given to me for the cinematography of Anhe Ghode Da Daan, in protestagainst the systematic dismantling of Indian public institutions, including the Film & Television Institute ofIndia [FTII]. The value of this award is not only for me but for all cinematographers, who as artists,struggle daily with the ugly & inhumane levels of commercialization that has taken over our practice, withthe government continuing to recede from its responsibility to promote & produce public spirited culturalworks.It is not easy to give up a recognition, that means a validation from the most esteemed in the practice of ourcinema. I do this in gratitude of the recognition and faith they have bestowed to such cinema, that continuesto struggle and somehow sustain. I do it in solidarity with the writers, artists, fellow filmmakers, historians& scientists, who have registered their vigilance, by forfeiting to the current government, the recognitionsbestowed on them.I call upon the current government to state in no uncertain terms, that the highest standards of publicwelfare, institutional autonomy of public bodies, freedom of expression, freedom of dissent, due process inlaw, right to privacy and constitutional values will be upheld.I dedicate my award money to the emerging concerns of the trans-masculine, intersex & intergendercommunities, who barely survive at the cross-roads of discriminations of gender identity & expression, sex,class and caste.
     National Award for Director of Photography: Anhe Ghoda Da Daan A GRAFTII member, Satya is the Director of Photography for the following films - Gattu, Zinda Bhaag,Chauthi Koot, Aligarh

    Indian express reports:

    24 artists, including filmmaker Kundan Shah, return their national awards over FTII row

    But the government hit back saying it is an agenda against them


    y: PTI | Mumbai | Updated: November 5, 2015 7:20 pm
    artists, BJP, BJP government, Narendra Modi, Narendra Modi government, Arundhati Roy, Saeed Mirza, FTII, FTII row, FTII crisis
    Students at the institution over the last four months have been agitating against the appointment of Gajendra Chauhan as the chairman of the esteemed body.

    Another 24 filmmakers including Kundan Shah of "Jaane Bhi Do Yaaro" fame and Saeed Mirza and Booker winning writer Arundhati Roy on Thursday returned their National Awards in an escalation of protests by intellectuals against "growing intolerance" in the country.


    With this, at least 75 members of the intelligentsia have either returned national or literary awards even as writer Nayantara Sahgal reiterated that "secularism was under threat" like never before. Sahgal, niece of Jawaharlal Nehru, was among the first to return the honours when she gave back the Sahitya Akademi award.

    FTII row: artists return their national awards

    The filmakers also strongly rallied behind students of the prestigious Film and Television Institute of India(FTII) who recently called of their 136-day strike, saying their battle went beyond the manipulation of education to include "intolerance, divisiveness and hate". 

    As they added to the voice against the "growing disregard" for freedom of speech and the murder of three intellectuals, Roy was quoted as having said that she was returning the honour in protest against "ideological viciousness". 

    She had received the 1989 National Film Award for Best Screenplay for the documentary "In which Annie Gives it to those Ones". 

    Other prominent names in the list of those who have returned the awards today included documentary filmmaker Anwar Jamal, director Virendra Saini, Pradip Krishnen, Manoj Lobo, sound designers Vivek Sachidanand, P M Satheesh, Ajay Raina, director Sudhakar Reddy Yakkanti, editor Irene Dhar Malik, cinematographer Satya Rai Nagpaul, director Amitabh Chakraborty, filmmaker Tapan Bose and Madhusree Dutta. 

    Shah, an FTII alumnus, said to give up his only National Award which he received for cult film "Jaane Bhi Do Yaaro" was very sad but was a necessary decision to protest against the appointment of Gajendra Chauhan as the chairman of FTII.

     "This is the only National Award I have for 'Jaane Bhi Do Yaaro' am I feel very sad to part with it. I owe this award to my alma mater FTII- there would've been no JBDY if I had not studied at FTII," Shah said. Mirza, a former chairman of FTII and known for his films like "Albert Pinto Ko Gussa Kyoon Aata Hai" and TV show "Nukkad", said the protest started by the students has become bigger to turn into movement against "intolerance, divisiveness and hate".


     Union Minister Venkaiah Naidu hit back at those who had returned their awards at a "Know the Truth" briefing in Delhi stating that " efforts are being made to derail the Modi government's development agenda." 

    The "award wapasi" campaign has faced criticism from some quarters, who call it selective protest but Shah countered the argument saying his films were against the then ruling government, Congress too. 

    - See more at: http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/protesting-against-ftii-crisis-24-artists-return-their-national-awards/#sthash.ZM8Nv4X6.dpuf



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  • 11/06/15--02:13: https://youtu.be/HTPcgI6usZk गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता। हमें फिजां यही बदलनी है! Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again! https://www.youtube.com/watch?v=QZTvF_1AN8A पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ? बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद। हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा। पलाश विश्वास
  • https://youtu.be/HTPcgI6usZk


    गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।

    हमें फिजां यही बदलनी है!

    Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!

    https://www.youtube.com/watch?v=QZTvF_1AN8A



    पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?

    बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।


    हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।


    पलाश विश्वास

    Thanks You Tube for Garm Hawa clippings.I am using the Webcam.I have to handle it manually.I have not the technical expertize to edit it and exclude the mistakes ,errors and disturbances.While talking instant, some time my tongue slips or memory fails.If I note it,I correct it later in the same video or in yet another video.Please forgive me for those mistakes and try to get the points I raise and expect you to share!

    बिहार से फैसला आनेवाला है।हो सकता है कि सिपाहसालार और अश्वमेधी घोड़ों और सांढ़ों की उधमी उछलकूद फेल हो जाये और बिहार की जनता का फैसला केसरिया सुनामी के खिलाफ हो जाये।चाणक्य टीवी चैनल ने ऐसी ही भविष्यवाणी की है।हमें तो धर्म या जाति की अस्मिता में से किसीको चुनकर गुलामी की जिंदगी नर्क करने की आदत है।यह आदत बदलनी चाहिए।तूफां खड़ा करना मकसद नहीं हमारा,हालात ये हर हाल में बदलने हैं।


    'गर्म हवा'का आरंभ फिल्म को सही परिप्रेक्ष्य देता है। कास्टिंग रोल में आजादी का साल 1947 बताने के बाद भारत का अविभाजित नक्शा उभरता है। सबसे पहले महात्मा गांधी की तस्वीर आती है। फिर माउंनबेटेन और लेडी माउंटबेटेन के साथ महात्मा गांधी दिखते हैं। आजादी के संघर्ष में शामिल पटेल, नेहरू, जिन्ना की तस्वीरों के बाद पर्दे पर सत्ता हस्तांतरण की तस्वीरें, लाल किले से नेहरू का संबोधन, हर्ष और उल्लास की छवियों के बीच देश के विभाजित नक्शे को हम देखते हैं।

    हमें किसी किस्म की भविष्वाणी का भरोसा नहीं है।जैसे हम तंत्र मंत्रयंत्र या तिलिस्म की परवाह नहीं करते।देश कुरुक्षेत्र है,तो लड़ना  ही होगा।इस लड़ाई की आग से बच नहीं सकते।फिजां बदलने के लिए महब्बत हथियार है और आग की दरिया में छलांगा मारना है।


    रविवार को नतीजा आ जायेगा।गुजरात के महादंगाई बाचुओं की ताकत तौल रहे हैं कि नतीजा उनके फेवर में हो या खिलाफ,कैसे वे मनुस्मृति शासन और राजकाज के विरोधियों और असहिष्णुता आंदोलन से निपटेंगे,होशियार।वे आगे भी बख्शेंगे नहीं,तेवर देश लें।ग्लोबल ट्रेंड की परवाह नहीं उन्हें,दुनिया को मनुस्मृति बनायेंगे।


    बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।


    गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।

    हमें फिजां यही बदलनी है!


    हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।


    यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।

    यही मानसिकता लेकिन गर्म हवा है।यही केसरिया सुनामी फिर वही गर्म हवा है।जिसके मुकाबले हम हैं।मिर्जा साहेब आगरा के थे।

    मिर्जा साहेब के रोल में हैं इप्टा के बलराज सहनी।इप्टा के एके हंगल और फारुख शेख भी हैं इस फिल्म में।


    नवंबर 2014 में चार दशक बाद एक बार फिर से फिल्म 'गर्म हवा'रिलीज की गई। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी है। फिल्म विभाजन के समय के आगरा के एक मुस्लिम परिवार की दास्तान बयां करती है। इस फिल्म में मशहूर अभिनेता बलराज साहनी ने मुख्य किरदार सलीम मिर्जा की भूमिका निभाई,  वहीं ए. के. हंगल और फारुख शेख भी फिल्म में अन्य मुख्य किरदार में दिखाई दिए हैं।

    आगरा और इस देश के तमाम कस्बों शहरों में देशी उद्योग धंधे

    के लिए तबाही का आलम तबसे है।हमने मेरछ दंगों के आंखों देखा हाल पर उनके मिशन के पाठ पर तीन वीडियो जारी किये हैं।देखेंः





    ऋत्विक घटक ने तीन फिल्में भारत विभाजन के माहौल और असर पर बनायी।1960 में मेघे ढाका तारा,1961 में कोमल गांधार और 1962 में सुवर्णरेखा।बांग्ला में यह भारत विभाजन के सिकार पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों की कथा व्यथा है।जो हमारा भोगा हुआ यथार्थ है।


    हमने इससे पहले कोमल गांधार का फ्रेम टु फ्रेम विश्लेषण पर वीडियो जारी किया है।

    https://www.youtube.com/watch?v=PVSAo0CXCQo



    हालात इस लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश के ये है कि साझा चूल्हे सारे के सारे ठंडे हो गये हैं।


    हिंदुओं की हिम्मत नहीं होती की किसी मुस्लिम इलाके में बसेरा डालें और न मुसलमानों की हिम्मत होती है कि वे अपने दड़बों से बाहर निकलकर हिंदुओं के बीच रहें।


    Sabita Babu speaks from the Heart of the India,where Dilon kaa Bantwara naa huaa hai naa Hoga.Please share as much as you can to save India!The Real India,the greatest pilgrimage of humanity merging so many streams of humanity!

     1:02:41

    পুরানো সেই দিনের কথা: Memoirs of a Hindu Daughter of a Muslim Family which gave up BEEF!

    • 2 weeks ago
    • 42 views
    আমরা এক বৃন্তে দুটি ফুল-হিন্দু মুসলমান!
    মন্ত্রহীন,ব্রাত্য,জাতিহারা রবীন্দ্রনাথ,রবীন্দ্র সঙ্গীতঃ দীনহীনে কেহ চাহে না, তুমি তারে 


    हालात ये है कि भरतीय सिनेमा के सबसे लोकप्रिय स्टार शाहरुख खान असहिष्णुता के खिलाफ बोलने के लिए भारी संकट में है और उनके खिलाफ पाकिस्तानी होने का फतवा जारी कर दिया गया है।


    अब जाति धर्म वर्ग वर्चस्व की सत्ता उनकी हिफाजत के लिए चोकचौबंद इंतजाम कर रह है।


    गर्म हवा देखना इसलिए जरुरी है कि गांधी की हत्या के बाद सरहदों के आरपार जो कयामत का सिलसिला जारी था वह अब भी जारी है।तब भी गैरहिंदुओं के लिए हिंदुस्तान में जगह नहीं थी ,आज भी जगह नहीं है।जिनने पाकिस्तान आंदोलनचलाया,लेकिन जिनने पाकिस्तान कारिज करके हिंदुस्तानी बनकर रहने का फैसला किया है,वे भी उतने ही इंसान हैं,जितने हम हैं।


    फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन के सहयोग से साल 1973 में बनी यह फिल्म आजादी के बाद पहली बार विभाजन की विकृतियों को उभारती है। फिल्म को तकरीबन चार दशक बाद फिर से रिलीज करने को लेकर निर्देशक एम.एस. सथ्यू ने कहा, 'मैं चाहता हूं कि आज के समय की पीढ़ी भी इस फिल्म को देखे और जाने कि उस समय वास्तव में आखिर हुआ क्या था।'

    फिल्म 'गर्म हवा'बेहद सादगी और सच्चाई से विभाजन के बाद देश में रह गए मुसलमानों के द्वंद्व और दंश को पेश करती है। कभी देश की राजधानी रहे आगरा के ऐतिहासिक वास्तु शिल्प ताजमहल और फतेहपुर सिकरी के सुंदर, प्रतीकात्मक और सार्थक उपयोग के साथ यह मिर्जा परिवार की कहानी कहती है।

    हलीम मिर्जा और सलीम मिर्जा दो भाई मां के साथ पुश्तैनी हवेली में रहते हैं। हलीम मुस्लिम लीग के नेता हैं और पुश्तैनी मकान के मालिक भी। सलीम मिर्जा जूते की फैक्ट्री चलाते हैं। सलीम के दो बेटे हैं बाकर और सिकंदर। एक बेटी भी है अमीना। अमीना अपने चचेरे भाई कासिम से मोहब्बत करती है। विभाजन की वजह से उनकी मोहब्बत कामयाब नहीं होती। हलीम अपने बेटे को लेकर पाकिस्तान चले जाते हैं। कासिम शादी करने के मकसद से आगरा लौटता है, लेकिन शादी की तैयारियों के बीच कागजात न होने की वजह से पुलिस उन्हें जबरन पाकिस्तान भेज देती है। दुखी अमीना को फूफेरे शमशाद का सहारा मिलता है, लेकिन वह मोहब्बत भी शादी में तब्दील नहीं होती।

    दूसरी तरफ सलीम मिर्जा आगरा न छोडऩे की जिद्द पर अमीना की आत्महत्या और पाकिस्तानी जासूस होने के लांछन तक अड़े रहते हैं। संदेह और बेरूखी के बावजूद उनकी संजीदगी में फर्क नहीं आता। उन्हें उम्मीद है कि महात्मा गांधी की शहादत बेकार नहीं जाएगी। सब कुछ ठीक हो जाएगा।


    वे भी उतने ही हंदुस्तानी हैं,जितने हम हैं।पाकिस्तान जिनने बनाया,उनने लेकिन नहीं बनाया।लेकिन हम लगातार सन सैंतालीस से देश के गैरहिंदुओं को इसकी सजा देने पर आमादा है।


    पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?


    पाकिस्तान बना तो क्याइसकी सजा हम मुहब्बत को देंगे,ख्वाबों को देंगे,उम्मीदों को देंगे,तयकर लीजिये!


    हम सिखों को जिंदा जला चुके हैं और हम मुसलमानों को जिंदा जला रहे हैं।


    हम दलितों,आदिवासियों और पिछड़ों का कत्लेआम खामोश देख रहे हैं।


    अब हम किस किसका कत्लेआम करेंगे?


    रिजर्वेशन और कोटे के बावजूद कितने मुसलमान नौकरियों, कारोबार और उद्योग धंधे में है?


    कितन मुसलमान सेना और अर्द्धसैनिक बलों में हैं?


    कितने मुसलमान पुलिस में हैं?


    फिरभी हम मुसलमानों को तमाम मसलों और मुद्दों की वजह मानते हैं क्योंकि पाकिस्तान बना और हम कतई नहीं जानते कि पाकिस्तान बनाने के गुनाहगार मुसलमान नहीं,जमींदारियां और रियासतें बचाने के लिए बना हिंदुत्व का गठबंधन है,उनका मजहबी सियासत,सियासती मजहब और मनुस्मडति शासन है।चुनाव नतीजे चाहे जो हो,जो भी चाहे हुकूमत में हो,जनादेश चाहे किसी को मिला हो,सनसैतालीस से यह आलम नहीं बदला है।


    यही गर्म हवा है।


    जाति धर्म अस्मिता के ध्रूवीकरण की जीत या हार से कुछ नहीं बदलेगा,जैसे आजतक कुछ नहीं बदला है,जब तक न हम देश दुनिया जोड़ ने लें।


    डा.शेखर पाठक के पद्म श्री लौटाने के बाद हमारे लिए सबसे खुशी कीबात है कि हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने देश दुनिया जोड़ने की हमारी मुहिम का समर्थन किया है और नैनीताल का गिरदा गैंग हमारे साथ हैं।कोलकाता से नैनीताल और कुमायूं कीयात्रा पर गये कोलकाता के प्तरकारों ने एक बेहतरनी फिल्म पहाड़ों, झीलों, घाटियों और जंगल पर बनायी है,जिसमें हमारे जयनारायण प्रसाद,हमारे साथी सहकर्मी खास हैं।उनका वीडियो भी हम जारी करेंगे।


    कल अरुंधती राय जिनने मैसी साहेब की हिरोइन का रोल भी किया है,जिन्हें बुकर पुरस्कार मिला है,जिनने नियमागिरि पहाड़ को पूजने वाले कौंध आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ आवाज उठायी और सलवा जुड़ुम के खिलाफ जो जंगल जंगल भटकी,जिनने हाल में भारत के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो बाबासाहेब के जाति उन्मूलन वाले आलेख को नये सिरे से अपनी प्रस्तावन के साथ जारी किया है,अब असहिष्णुता विरोधी देश जोड़ो,दुनियाजोड़ो आंदोलन के मोर्चे पर हैं।


    कल अरुंधति ने भी अपना पुरस्कार लौटा दिया।कल 24 फिल्मकारों,कलाकारों ने असहिष्णुता के खिलाफ अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटा दिये।जिनमें कुंदन शाह और सईद मिर्जा जैसे फिल्मकार भी शामिल हैं।


    इससे पहले दिवाकर बंदोपाध्याय और आनंद पटवर्द्धन की अगुवाई में 12 पिल्मकारों ने पुरस्कार लौटाये हैं।फिलहाल भारतीय फिलमों से 36 लोगों ने पुरस्कार लौटा दिये हैं।दूसरी तरफ साहित्य अकादमी के पुरस्कार और पद छोड़ने वाले कम से कम 42 लेखक और कवि हैं।कलाकारों ने भी पुरस्कार लौटाये हैं।


    शुरुआत हिंदी के कवि उदय प्रकाश ने की।यह हमार गर्व है।150 देशों का विवेक हमारे साथ है और राष्ट्र का विवेक बोल रहा है।कारवां लगातार लबा होता जा रहा है।किसी की हार जीत से हमारे लिए उम्मीत की बात यही है और बदलाव की पकी हुई जमीन भी यही है।


    भयानक असुरक्षाबोध है।असुरक्षा हमारी राष्ट्रीयता है,असुरक्षा हमारी मानसिकता है।असुरक्षित हैं अल्पसंख्यक तो बहुसंख्यक भी असुरक्षित है।मजहबी सियासत और सियासती मजहब की मचायी तबाही का यह आलम है।इसे अब बदलना ही होगा।


    सेनसेक्स की दशा हाजतरफा का संकट है।सेनसेक्स निफ्टी में तहलका है बिरंची बाबा की हार के दहशत से।


    राजन नारायणमूर्ति,अरुण शौरी जैसे लोगों की चिंता भारतीयजनता के जीवन मरण को लेकर नहीं है और न वे इस कयामत के मंजर को लेकर फिक्र मंद हैं क्योंकि वे भी महाजिन्न और कारपोरेट वकील के संग संग हैं।थोड़ा हैरतशुदा और दंग हैं बजरंगी ब्रिगेड के हुड़दंग से जो सारा खेल फर्रूखाबादी का काम तमाम करने पर आमादा हैं।


    मूडीज की भी चिंता यही है कि कंहीं मुक्त बाजार का ही अंत न हो जाये क्योंकि बिना अमन चैन के निवेशकों की आस्था न अटल रह सकती है और न अबाध पूंजी प्रवाह संभव है और न कायदा कानून बदलने के लिए अनिवार्य सर्वदलीय सहमति संभव है।


    उनके यही सरोकार यही हैं,खुशफहमी न रहें कि संपूर्ण निजीकरण और संपूर्ण विनिवेश के प्रवक्ता नये सिरे से रिफार्मेट हो गये हैं।




    सत्यजित राय ने इस फिल्म के बार में लिखा है, 'विषयहीन हिंदी सिनेमा के संदर्भ में 'गर्म हवा'ने इस्मत चुगताई की कहानी लेकर दूसरी अति की। यह फिल्म सिर्फ अपने विषय की वजह से मील का पत्थर बन गई, जबकि फिल्म में अन्य कमियां थीं। सचमुच, इस फिल्म में तकनीकी गुणवत्ता और बारीकियों से अधिक ध्यान कहानी के यथार्थ धरातल और चित्रण पर दिया गया। सथ्यू की 'गर्म हवा'पहली बार विभाजन के थपेड़ों का हमदर्दी और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ पर्दे पर पेश करती है।

    'गर्म हवा'के निर्माण के बाद आरंभ में इसे सेंसरशिप की मुश्किलों से गुजरना पड़ा। सेंसर बोर्ड के अधिकारियों की राय थी कि ऐसे विषय से हम बचें। इसके विपरीत फिल्मकार और सचेत सामाजिक एंव राजनीतिक कार्यकर्ता विभाजन के बाद से दबे विषयों पर बातें करने के लिए तत्पर थे। छह महीनों तक फिल्म अटकी रही। दिल्ली में फिल्म के पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश में राजनीतिक हलकों और सांसदों के बीच फिल्म का प्रदर्शन किया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सूचना प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल की पहल और समर्थन से फिल्म सेंसर मुक्त हुई और दर्शकों के बीच पहुंची।




    Thanks You Tube for Garm Hawa clippings.I am using the Webcam.I have to handle it manually.I have not the technical expertize to edit it and exclude the mistakes ,errors and disturbances.While talking instant, some time my tongue slips or memory fails.If I note it,I correct it later in the same video or in yet another video.Please forgive me for those mistakes and try to get the points I raise and expect you to share!

    I am not bothered!


    We,the Indian people have to chose religious partition or caste war.It is civil war yet again!It is inhuman!Come Sunday,RSS lost or won,it would not change the scenario of intolerance,unprecedented violence,Quamati MANJAR,psyche of insecurity,the continuous holocaust unless we succeed to unite India and humanity to sustain peace, pluralism, intolerance and the Nature intact,the civilization, progress,secularism!It is all about Garm Hawa!

    Garm Hava

    From Wikipedia, the free encyclopedia


    Garam Hava

    Garm Hava.jpg

    Directed by

    M. S. Sathyu

    Produced by

    Abu Siwani

    Ishan Arya

    M. S. Sathyu

    Written by

    Kaifi Azmi

    Shama Zaidi

    Story by

    Ismat Chughtai

    Starring

    Balraj Sahni

    Farooq Shaikh

    Dinanath Zutshi

    Badar Begum

    Geeta Siddharth

    Shaukat Kaifi

    A. K. Hangal

    Music by

    Bahadur Khan

    Kaifi Azmi (lyrics)

    Cinematography

    Ishan Arya

    Edited by

    S. Chakravarty

    Release dates

    • 1973

    Running time

    146 minutes

    Country

    India

    Language

    Hindi/Urdu

    Budget

    1 million (US$15,000)


    Garam Hava (Hindi: गर्म हवा; translation: Hot Winds or Scorching Winds)[1] is a 1973 Urdu drama film directed by M. S. Sathyu, with Balraj Sahni as the lead. It was written by Kaifi Azmi and Shama Zaidi, based on an unpublished short story by noted Urdu writer Ismat Chughtai. The film score was given by noted classical musician Ustad Bahadur Khan, with lyrics by Kaifi Azmi, it also featured a qawwali composed and performed by Aziz Ahmed Khan Warsi and his Warsi Brothers troupe.

    Set in Agra, Uttar Pradesh, the film deals with the plight of a North IndianMuslim businessman and his family, in the period post partition of India in 1947. In the grim months, after the assassination of Mahatma Gandhi in 1948, film's protagonist and patriarch of the family Salim Mirza, deals with the dilemma of whether to move to Pakistan as many of his relatives or stay back. The film details the slow disintegration of his family, and is one of the most poignant films made on India's partition.[2][3] It remains one of the few serious films dealing with the post-Partition plight of Muslims in India.[4][5]

    It is often credited with pioneering a new wave of Art cinema movement in Hindi Cinema, and alongside a film from another debutant film director,Shyam Benegal, Ankur (1973), are considered landmarks of Hindi Parallel Cinema which had already started flourishing in other Indian languages like Kannada and Malayalam. The movie also launched the career of actor,Farooq Shaikh, and also marked the end of Balraj Sahni's film career, who died before its release. It was India's official entry to the Academy Award's Best Foreign Film category, nominated for the Palme d'Or at the Cannes Film Festival, won a National Film Award and three Filmfare Awards. In 2005,Indiatimes Movies ranked the movie amongst the Top 25 Must See Bollywood Films.[2]

    Contents

     [hide]

    Plot[edit]

    The Mirzas are a Muslim family living in a large ancestral house and running a shoe manufacturing business in the city ofAgra in the United Provinces of northern India (now the state of Uttar Pradesh). The story begins in the immediate aftermath of India's independence and the partition of India in 1947. The family is headed by two brothers; Salim (Balraj Sahni), who heads the family business, and his elder brother Halim, who is mainly engaged in politics and is a major leader in the provincial branch of the All India Muslim League, which led the demand for the creation of a separate Muslim state of Pakistan. Salim has two sons, the elder Baqar, who helps him in the business, and Sikander (Farooq Shaikh), who is a young student. Halim's son Kazim is engaged to Salim's daughter, Amina. Although he had publicly promised to stay in India for the sake of its Muslims, Halim later decides to quietly emigrate to Pakistan with his wife and son, believing that there was no future for Muslims in India. Salim resists the notion of moving, believing that peace and harmony would return soon, besides which, he has to care for their ageing mother, who refuses to leave the house of her forefathers. This puts Kazim and Amina's marriage plans on hold, although Kazim promises to return soon to marry her. Halim's stealthy migration affects Salim's standing in the community. In the aftermath of partition, the sudden migration of many Muslims from Agra left banks and other lenders deeply reluctant to lend money to Muslim businessmen like Salim Mirza, who had previously been held in high esteem, over fears that they would leave the country without repaying the loan. Unable to raise capital to finance production, Salim Mirza's business suffers. Salim Mirza's brother-in-law, formerly a League supporter, now joins the ruling Indian National Congress in an attempt to get ahead in independent India while his son Shamshad unsuccessfully woos Amina, who is still devoted to Kazim and hopeful of his return.

    Halim's migration to Pakistan makes the family home an "evacuee property" as the house is in Halim's name and Halim did not transfer it to Salim Mirza. The Indian government mandates the take over of the house, forcing Salim Mirza's family to move out of their ancestral home, which is very hard on Mirza's aged mother. Salim's wife blames him for not raising this issue with his brother Halim before he left for Pakistan. Mirza resists his wife's hints that they also move to Pakistan and his elder son's calls for modernising the family business. Mirza finds it difficult to rent a house, facing discrimination owing to his religion and fears that a Muslim family would skip out on rent if they decided to leave for Pakistan. He finally succeeds in finding a smaller house to rent, but his business is failing and despite his son's exhorting, refuses to change with the times, believing that Allah would protect them. Salim Mirza's passiveness and disconnection from the outside world leaves his wife and son frustrated. The Mirza family house is bought by a close business associate, Ajmani, (A.K. Hangal) who respects Mirza and tries to help him. Despite growing troubles, the family is briefly buoyed by Sikander's graduation from college.

    Amina and her family have almost given up on her marrying Kazim after Halim breaks his promise to return soon from Pakistan. Kazim returns on his own, and reveals that his father had become opposed to his marrying Amina, preferring that he marry the daughter of a Pakistani politician. Having received a scholarship from the Government of Pakistan to study in Canada, Kazim desires to marry Amina before he leaves, but before the marriage can take place, he is arrested by police and repatriated to Pakistan for travelling without a passport and not registering at the police station, as is required of all citizens of Pakistan. Amina is heart-broken, and finally accepts Shamshad's courtship. Sikander undergoes a long string of unsuccessful job interviews, where the interviewers repeatedly suggest that he would have better luck in Pakistan. Sikander and his group of friends become disillusioned and start an agitation against unemployment and discrimination, but Salim prohibits Sikander from taking part. Despite his political connections, Salim Mirza's brother-in-law ends up in debt over shady business practices and decides to flee to Pakistan. Amina again faces the prospect of losing her lover, but Shamshad promises to return and not leave her like Kazim. Salim Mirza's reluctance to modernise and cultivate ties with the newly formed shoemakers union results in his business not receiving patronage and consequently failing. Disillusioned, his son Baqar decides to migrate to Pakistan with his son and wife. Salim's aged mother suffers a stroke, and through his friend, Salim is able to bring his mother to her beloved house for a final visit, where she dies. While Salim is travelling in a horse-drawn carriage, the carriage driver, a Muslim, gets into an accident and a squabble with other locals. The situation deteriorates into a riot, and Salim is hit by a stone and suffers injuries. With his business and elder son gone, Salim begins to work as a humble shoemaker to make a living. Shamshad's mother returns from Pakistan for a visit, leading Amina and her mother to think that Shamshad would also come soon and their marriage would take place. However, Shamshad's mother merely takes advantage of Salim Mirza's connections to release some of her husband's money, and reveals that Shamshad's marriage has been arranged with the daughter of a well-connected Pakistani family. Shattered with this second betrayal, Amina commits suicide, which devastates the whole family.

    Amidst these problems, Salim Mirza is investigated by the police on charges of espionage over his sending plans of their former property to his brother in Karachi, Pakistan. Although acquitted by the court, Mirza is shunned in public and faces a humiliating whisper campaign. Mirza's long aversion to leaving India finally breaks down and he decides in anger to leave for Pakistan. Sikander opposes the idea, arguing that they should not run away from India, but fight against the odds for the betterment of the whole nation, but Salim decides to leave anyway. However, as the family is travelling towards the railway station, they encounter a large crowd of protestors marching against unemployment and discrimination, which Sikander had planned to join. Sikander's friends call out to him, and Salim encourages him to join the protestors. Instructing the carriage driver to take his wife back to their house, and the film ends as Salim Mirza himself joins the protest, ending his isolation from the new reality.

    Cast[edit]

    Production[edit]

    The film was based on an unpublished short story by writer-screenwriter Ismat Chughtai and later adapted by Kaifi Azmiand Shama Zaidi.[6] Chugtai narrated the story to Sathyu and his wife Zaidi, deriving from the struggles of her own relatives during the Partition before some of them migrated for Pakistan. While developing the screenplay, poet-lyricist Azmi added his own experiences of Agra and the local leather industry. Later, he also wrote in the dialogues.[7]

    The film was shot in location in the city of Agra, with scenes of Fatehpur Sikri as well. Due to repeated local protests owing to its controversial theme, a fake second unit with unloaded cameras were sent to various locations to divert attention from film's actual locations. As the film's commercial producers had early on backed out fearing public and governmental backlash, and 'Film Finance Corporation' (FFC), now National Film Development Corporation (NFDC), stepped in later with a funding of Rs 250,000. Sathyu borrowed the rest 750,000 of the budget from friends.[8][9] The film was co-produced and shot by Ishan Arya, who after making ad film made his feature film debut, using an Arriflex camera, loaned by Homi Sethna, Sathyu's friend. As Sathyu couldn't afford recording equipment, the film was shot silent, and the location sounds and voices were dubbed in post-production. Shama Zaidi also doubled up as the costume and production designer.[9]

    Sathyu had long been associated with leftist Indian People's Theatre Association (IPTA), thus most roles in the film were played by stage actors from IPTA troupes in Delhi, Mumbai and Agra. The role of family patriarch, Salim Mirza was played by Balraj Sahni, also known to Sathyu through IPTA, and for whom this was to be his last important film role, and according to many his finest performance.[10] The role his wife was play by Shaukat Azmi, wife of film's writer Kaifi Azmi, and also associated with IPTA. Farooq Shaikh, a law student in Mumbai, till then had done small roles in IPTA plays, made his film debut with the role of Salim Mirza.[9] The role of Balraj Sahni's mother was first offered to noted singer Begum Akhtar which she refused,[11] later Badar Begum played the role. The locale of Mirza mansion was an old haveli of R S Lal Mathur in Peepal Mandi who helped the whole unit throughout the shooting. Mathur helped Sathyu find Badar Begum in a city brothel. Badar Begum was then in her 70s and almost blind due to cataract. However, when she was sixteen years old, she ran away to Bombay to work in Hindi films, but soon ran out of money and only managed to get work as an extra in a Wadia Movietone film. She used the money to return to Agra, eventually ended up in the red-light area of the city and ran a brothel in the area. Her voice was later dubbed in by actress Dina Pathak.[7][9] Film's lead, Balraj Sahni however died the day after he finished dubbing for the film.[12] The soundtrack included a qawwali"Maula Salim Chishti" by Aziz Ahmed Khan Warsi, ofWarsi Brothers.[13]

    Themes and allusions[edit]

    The title alludes to the scorching winds of communalism, political bigotry and intolerance, that blew away humanity and conscience from across North-India in the years after the partition of India in 1947, and especially after the assassination of Mahatma Gandhi to the which the film opens. In its prologue, poet Kaifi Azmi narrates a couplet summing up the theme, "Geeta ki koi sunta na Koran ki sunta, hairan sa eemaan vahan bhi tha yahan bhi" (Nobody listens to Gita or Quran, shocked conscience was here as well as there.)[6] Just like his ageing mother is reluctant to leave the ancestral haveli where she came a young bride, her son Salim Mirza, the protagonist is also holding on to his faith in new India. Despite the fact, his shoe manufacturing business is suffering in the new communally charged environment, and the family had to sell off their haveli to move into a rented house. Yet, he struggles to keep his faith in secularism and idealism alive, along with his optimistic son.[6]

    Release and reception[edit]

    Prior to its release the film was held by Central Board of India, for eight months, fearing communal unrest, but film's director persisted and showed it to government officials, leaders and journalists. Finally the film was released to both critical and commercial success.[14]

    The film first opened at two theatres Sagar and Sangeeth in Bangalore. Positive response at these theatres paved way for a subsequent nationwide release.[15]The Indian premiere was held at Regal Cinema in Colaba, Mumbai in April 1974. However, prior to this Bal Thackeray, head of Shiva Sena had threatened to burn down the cinema, if the premier was allowed, calling it 'pro-Muslim' and 'anti-India' film. On the day of the premiere, Thackeray was persuaded to attend a special screening of the film in the afternoon, and allowed the film to be screened. Subsequently, the film had a limited pan-India release.[12][16] Ironically, in the 1974 National Film Awards, it was awarded the Nargis Dutt Award for Best Feature Film on National Integration.

    Today it is noted for its sensitive handling of the controversial issue, dealt with in only a few Indian films,[1] like Kartar Singh(1959) (Pakistani film),[17]Manmohan Desai's Chhalia (1960), Yash Chopra's Dharmputra (1961), Govind Nihalani's Tamas(1986), Pamela Rooks' Train to Pakistan (1998), Manoj Punj's Shaheed-e-Mohabbat Boota Singh (1999) and Chandra Prakash Dwivedi's Pinjar (2003).

    Restoration and re-release[edit]

    In 2009, a privately funded restoration work of the film started at Cameo Studios in Pune.[18] Subsequently, the restoration budget climbed to over Rs 10 million, and restoration work was done by Filmlab, Mumbai and the sound quality enhancement by Deluxe Laboratories in Los Angeles, US.[9] The restoration process, which included restoration of original soundtrack took over three years to complete and the print was re-released on 14 November 2014 across 70 screens in eight metro cities in India.[19][13]

    Awards[edit]

    Academy Awards[edit]

    Cannes Film Festival[edit]

    National Film Awards[edit]

    Filmfare Awards[edit]

    Bibliography[edit]

    See also[edit]

    References[edit]

    External links[edit]



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    कल अरुंधती राय जिनने मैसी साहेब की हिरोइन का रोल भी किया है,जिन्हें बुकर पुरस्कार मिला है,जिनने नियमागिरि पहाड़ को पूजने वाले कौंध आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ आवाज उठायी और सलवा जुड़ुम के खिलाफ जो जंगल जंगल भटकी,जिनने हाल में भारत के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो बाबासाहेब के जाति उन्मूलन वाले आलेख को नये सिरे से अपनी प्रस्तावन के साथ जारी किया है,अब असहिष्णुता विरोधी देश जोड़ो,दुनियाजोड़ो आंदोलन के मोर्चे पर हैं।


    कल अरुंधति ने भी अपना पुरस्कार लौटा दिया।कल 24 फिल्मकारों,कलाकारों ने असहिष्णुता के खिलाफ अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटा दिये।जिनमें कुंदन शाह और सईद मिर्जा जैसे फिल्मकार भी शामिल हैं।


    इससे पहले दिवाकर बंदोपाध्याय और आनंद पटवर्द्धन की अगुवाई में 12 पिल्मकारों ने पुरस्कार लौटाये हैं।फिलहाल भारतीय फिलमों से 36 लोगों ने पुरस्कार लौटा दिये हैं।दूसरी तरफ साहित्य अकादमी के पुरस्कार और पद छोड़ने वाले कम से कम 42 लेखक और कवि हैं।कलाकारों ने भी पुरस्कार लौटाये हैं।


    शुरुआत हिंदी के कवि उदय प्रकाश ने की।यह हमार गर्व है।150 देशों का विवेक हमारे साथ है और राष्ट्र का विवेक बोल रहा है।कारवां लगातार लबा होता जा रहा है।किसी की हार जीत से हमारे लिए उम्मीत की बात यही है और बदलाव की पकी हुई जमीन भी यही है।

    पलाश विश्वास


    मैं यह सम्मान क्यों लौटा रही हूं: अरुंधति रॉय

    Posted by Reyaz-ul-haque on 11/06/2015 03:09:00 AM


    एक पुरस्कार लौटाते हुए अरुंधति रॉय यहां उन सब बातों को याद कर रही हैं जिन पर हमें नाज करना चाहिए और उन सब पर भी, जिनसे हमें शर्म आनी चाहिए और जिसके खिलाफ उठ खड़े होना चाहिए. अनुवाद: रेयाज उल हक.

    हालांकि मैं इसमें यकीन नहीं करती कि सम्मान हमारे किए गए कामों का पैमाना हैं, लेकिन मैं लौटाए जा रहे सम्मानों की बढ़ती हुई तादाद में सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए मिले राष्ट्रीय सम्मान (नेशनल अवार्ड फॉर बेस्ट स्क्रीनप्ले) को शामिल करना चाहूंगी, जो मुझे 1989 में मिला था. मैं यह साफ भी करना चाहूंगी कि मैं इसे इसलिए नहीं लौटा रही हूं कि उस सबसे मैं 'हिल'गई हूं जिसे मौजूदा सरकार द्वारा फैलाई जा रही 'बढ़ती हुई असहिष्णुता'कहा जा रहा है. सबसे पहले, अपने जैसे इंसानों को पीट-पीट कर मारने, गोली मारने, जलाने और सामूहिक कत्लेआम के लिए 'असहिष्णुता'एक गलत शब्द है. दूसरे कि हमारे सामने जो आने वाला था, उसके काफी आसार हमारे पास पहले से थे – इसलिए भारी बहुमत से डाले गए उत्साही वोटों के साथ सत्ता में भेजी गई इस सरकार के आने के बाद से जो कुछ हुआ है, उससे मैं हिल जाने का दावा नहीं कर सकती. तीसरे, ये खौफनाक हत्याएं एक कहीं गहरी बीमारी के ऊपर से दिखने वाले आसार भर हैं. जो लोग जिंदा हैं, जिंदगी उनके लिए भी जहन्नुम है. पूरी की पूरी आबादी, दसियों लाख दलित, आदिवासी, मुसलमान और ईसाई खौफ की एक जिंदगी में जीने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं और कुछ पता नहीं कि कब और कहां से उन पर हमला हो जाए.

    आज हम एक ऐसे मुल्क में रह रहे हैं, जहां नए निजाम के ठग और कारकुन 'गैरकानूनी हत्याओं'की बात करते हैं, तो उनका मतलब एक काल्पनिक गाय से होता है जिसको मारा गया है – उनका मतलब एक सचमुच के इंसान की हत्या से नहीं होता. जब वे अपराध की जगह से 'फोरेंसिक जांच के लिए सबूतों'की बात करते हैं तो उसका मतलब फ्रिज में रखे गए खाने से होता है, न कि पीट पीट कर मार दिए गए इंसान की लाश से. हम कहते हैं कि हमने 'तरक्की'की है, लेकिन जब दलितों का कत्ल होता है और उनके बच्चों को जिंदा जलाया जाता है, तो आज कौन ऐसा लेखक है जो हमले, पीट-पीट कर मारे जाने, गोली या जेल से डरे बिना आजादी से यह कह सकता है कि 'अछूतों के लिए हिंदू धर्म सचमुच में खौफ की एक भट्टी है'जैसा बाबासाहेब आंबेडकर ने कभी कहा थाॽ कौन सा लेखक वह सब लिख सकता है, जिसे सआदत हसन मंटो ने 'चचा साम के नाम'में लिखा थाॽ यह बात मायने नहीं रखती कि जो कहा जा रहा है उससे हम सहमत हैं कि नहीं. अगर हमें आजादी से बोलने का हक नहीं है, तो हम एक ऐसा समाज बन जाएंगे, जो बौद्धिक कुपोषण का शिकार, बेवकूफों का राष्ट्र होगा. इस पूरे उपमहाद्वीप में नीचे गिरने की होड़ मची हुई है – और यह नया भारत बड़े जोशोखरोश के साथ इसमें शामिल हुआ है. यहां भी अब भीड़ को सेंसरिशप का जिम्मा दे दिया गया है.

    मुझे इससे खुशी हो रही है कि मुझे (अपने अतीत में किसी वक्त का) एक राष्ट्रीय सम्मान मिल गया है, जिसे मैं लौटा सकती हूं, क्योंकि यह मुझे इस मुल्क के लेखकों, फिल्मकारों और अकादमिक दुनिया द्वारा शुरू की गई सियासी मुहिम का हिस्सा बनने की इजाजत देता है, जो एक तरह की विचारधारात्मक क्रूरता और सामूहिक समझदारी पर हमले के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं. अगर हम अभी उठ खड़े नहीं हुए तो यह हमें टुकड़े-टुकड़े कर देगा और बेहद गहराई में दफ्न कर देगा. मैं यकीन करती हूं कि कलाकार और बुद्धिजीवी जो अभी कर रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ, और उसकी तारीख में कोई मिसाल नहीं मिलती. यह भी सियासत का एक दूसरा तरीका है. इसका हिस्सा बनते हुए मुझे बहुत फख्र हो रहा है. और इतनी शर्म आ रही है उस सब पर जो आज इस मुल्क में हो रहा है.

    आखिर में: ताकि सनद रहे कि मैंने 2005 में साहित्य अकादेमी सम्मान को ठुकरा दिया था जब कांग्रेस सत्ता में थी. इसलिए कृपया मुझे कांग्रेस-बनाम-भाजपा की पुरानी घिसी-पिटी बहस से बख्श दीजिए. बात इससे काफी आगे निकल चुकी है. शुक्रिया.

    https://youtu.be/HTPcgI6usZk


    गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।

    हमें फिजां यही बदलनी है!

    Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!

    https://www.youtube.com/watch?v=QZTvF_1AN8A



    पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?

    बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।


    हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।


    पलाश विश्वास


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    गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।
    हमें फिजां यही बदलनी है!
    Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!


    पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?
    बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।


    हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।


    पलाश विश्वास


    आई.आई.टी. मुंबई में प्राध्यापक रहे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित राम पुनियानी का लेख. अनुवाद: अमरीश हरदेनिया.

    "पिछले कुछ हफ्तों में लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों के सम्मान लौटाने की बाढ़ देखी गई। पुरस्कार लौटाने के जरिये ये सम्मानित और पुरस्कृत लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए खड़े हुए हैं। बढ़ती असहिष्णुता और हमारे बहुलतावादी मूल्यों पर हो रहे हमलों पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए इन शिक्षाविदों, इतिहासकारों, कलाकारों और वैज्ञानिकों के कई बयान भी आए हैं। जिन्होंने अपने पुरस्कार लौटाए हैं  वे सभी साहित्य, कला, फिल्म निर्माण और विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों में से हैं। इस तरह सम्मान लौटाकर उन सभी लोगों ने सामाजिक स्तर पर हो रही घटनाओं पर अपने दिल का दर्द बयान किया है।

    बढ़ती असहिष्णुता की वजह से दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्या कर दी गई। गोमांस खाने के मुद्दे पर एक मुस्लिम की पीट-पीट कर हत्या कर दिए जाने की घटना भी हुई है, जिसने समाज के विवेक को हिलाकर रख दिया। समाज के विभिन्न वर्गों के इस तरह का कड़ा संदेश देने के कारण भाजपा से जुड़े लोग, उसके मूल संगठन आरएसएस और उससे संबंधित कई संगठन तथ्यहीन आधार पर इन लोगों की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। 

    इन घटनाओं से चिंतित भारत के राष्ट्रपति बार-बार देश को बहुलतावादी सामाजिक मूल्यों की याद दिला रहे हैं। उपराष्ट्रपति ने भी कहा है कि नागरिको के जीने के अधिकार की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है। मूडीज जैसी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि अगर मोदी अपने सहयोगियों पर लगाम नहीं लगाते हैं तो भारत अपनी विश्वसनीयता खो देगा। हाल के दिनों में असहिष्णुता के बढ़ते माहौल से चिंतित देश के प्रबुद्ध नागरिक बेचैनी महसूस कर रहे हैं। जुलियस रिबेरो का यह बयान इसकी बानगी है कि भारत में एक ईसाई होने की वजह से वह परेशान महसूस कर रहे हैं। अब नसीरुद्दीन शाह ने कहा है कि देश में पहली बार उन्हें उनके मुस्लिम होने का एहसास कराया जा रहा है। शायर और फिल्मकार गुलजार ने कहा कि आज ऐसा वक्त आ गया है कि लोग आपका नाम पूछने से पहले आपका धर्म पूछते हैं। नारायण मूर्ति और किरण मजूमदार शॉ जैसे प्रख्यात उद्यमियों ने भी बढ़ती असहिष्णुता पर अपनी चिंता जाहिर की है। इसी तरह आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन जैसे लोग भी बहुलता के मूल्यों को संरक्षित करने के लिए आवाज उठाने वालों के साथ खड़े हैं। 
        
    सत्ताधारी समूह भाजपा के नेताओं द्वारा इन रचनाकारों-वैज्ञानिकों पर हमला बोलते हुए इनके कदम को बनावटी विद्रोह करार दिया गया है, जैसा कि अरुण जेटली ने किया। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि जो लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं वे वामपंथी हैं या कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान विशेषाधिकारों के लाभार्थी रहे हैं और अब पिछले एक साल से भाजपा के सत्ता में आ जाने की वजह से ये लोग चकित होकर हाशिये पर हैं इसलिए यह विरोध हो रहा है। आरोप यह लगाया जा रहा है कि ये लोग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा लिखी जा रही विकास की कहानी को पटरी से उतारने या बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जेटली तो यहां तक कह गए कि खुद नरेंद्र मोदी इन सम्मान लौटाने वालों की असहिष्णुता का शिकार रहे हैं। राजनाथ सिंह जैसे कुछ लोगों का कहना है कि ये लोग मोदी सरकार को निशाना बना रहे हैं जबकि ये कानून व्यवस्था की मामूली घटनाएं हैं जो राज्य सरकार की जिम्मेवारी है। 

    जो घटनाएं हुई हैं वे न तो कानून व्यवस्था की समस्याएं हैं न ही वह संरक्षण के विश्वास के खत्म होने से संबंधित हैं क्योंकि ये घटनाएं समाज के तीव्र सांप्रदायिकरण की अधिक वृहद प्रक्रिया से संबंधित हैं। इस बार सांप्रदायिकरण की सीमा ने सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर दिया है। पुरस्कार लौटाने वालों पर आपातकाल, सिख विरोधी दंगों, कश्मीरी पंडितों के पलायन और 1993 के मुंबई बम धमाकों के वक्त अपना पुरस्कार नहीं लौटाने का जो आरोप लगाया जा रहा है वह बढ़ती असहिष्णुता की प्रकृति और इसकी सीमा के स्तर पर होने वाली सामाजिक प्रतिक्रिया से निबटने का एक कृत्रिम प्रयास है। वापस किए गए पुरस्कारों और विभिन्न वर्गों द्वारा जारी बयान में इसके जो कारण बताए गए हैं वे कारण इस तरह की सभी घटनाओं में मौजूद हैं। जेटली और उनकी मंडली द्वारा रेखांकित की गईं ये सभी घटनाएं भारत के हालिया इतिहास के दुखद हिस्से हैं। बहुत सारे लेखकों ने इन घटनाओं के खिलाफ प्रतिरोध किया था। उनमें से कई लोग तो उस समय तक पुरस्कृत भी नहीं हुए थे। 

    आज के समय की घटनाओ की तुलना कई वजहों से पहले की घटनाओं से नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए आपातकाल के मामले को देखें। आपातकाल भारतीय इतिहास का काला अध्याय था, यह मुख्य रुप से ऊपर से थोपी गई तानाशाही थी। वर्तमान समय में सबसे खतरनाक बात सत्ताधारी पार्टी से संबंधित संगठनों का सघन जाल या तंत्र है जिसके कार्यकर्ता या तो खुद ही समाज में नफरत फैलाते हैं या वे जहर भरे भाषण के जरिये सामाजिक वर्गों को उद्वेलित करते हैं। जिसका नतीजा हिंसा होती है। वर्तमान समय में सहिष्णुता के मूल्यों और और उदार विचारों के ऊपर दोहरा हमला हो रहा है। सत्ताधारी समूह में योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति जैसे नेता हैं जो सत्ता का मजा लेते हुए लगातार नफरत भरे भाषण दे रहे हैं और सामाजिक स्तर पर इस तरह के तोड़ने वाले बयान प्रचलित हो रहे हैं।      
      
    इसका दूसरा स्तर, सांप्रदायिक विचारधारा के द्वारा सांस्थानिक नियंत्रण करना है। हमारे विज्ञान और तकनीक के अग्रणी क्षेत्रों को दिन रात बर्बाद किया जा रहा है। अंधविश्वास को बढावा देना इस नीति का एक उपफल है। वर्तमान राजनीतिक सत्ता में अंधविश्वास और धार्मिक उद्यमियों (बाबा और आधुनिक गुरु) का बड़ा प्रभाव है। आरएसएस द्वारा फैलाई जा रही हिंदू राष्ट्र की विचारधारा सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों पर हावी है। और अंतत: घर वापसी, लव जिहाद और गोमांस जैसे मुद्दों का इस्तेमाल कर विभिन्न जरियों से समाज की सोच में दूसरों से नफरत की विचारधारा फैलाई जा रही है। ये घटनाएं धार्मिक अल्पसंख्यकों में सामाजिक असुरक्षा की तीव्र भावना पैदा कर रही हैं। इसी की वजह से दादरी जैसी घटनाएं घट रही हैं। लोकतांत्रिक क्षेत्रों में हो रहे अतिक्रमण को जानबूझकर नजरअंदाज करते हुए इन घटनाओं को कानून व्यवस्था की समस्या साबित किया जा रहा है। 

    मूलतः सांप्रदायिक हिंसा के पागलपन की जड़ें उस पूर्वाग्रह में हैं जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत पैदा करती हैं। और यही जहर हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा या किसी भी धर्म या जाति के नाम की अन्य सांप्रदायिक राष्ट्रवाद से बहता है। वर्तमान समय में हिंदू राष्ट्रवाद क स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जो एक प्रमुख ताकत है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि मुस्लिम सांप्रदायिकता के अंदर खुद अपना ही विभाजनकारी और अनुपूरक प्रभाव है। अन्य जरियों के माध्यम से इस तरह की विचारधारा दूसरों से नफरत की भावना पैदा करती है और गोहत्या और गोमांस खाना लोगों की हत्या करने का आधार बन जाता है। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के कारकून संकल्प लेते हैं कि अपनी पवित्र मां, गौमाता की हिफाजत करते हुए हम मारेंगे और मारे जाएंगे। 

    इस तरह का यह सिर्फ एक मामला है। आज के माहौल का प्रमुख कारण दूसरों के लिए नफरत के गुणात्मक परिवर्तन में निहित है। अल्पसंख्यकों को एक खास छवि में पेश करने का चलन जो हिंदू राष्ट्रवाद के साथ शुरू हुआ था भीषण तरीके से बढ़ चुका है, जहां गुलजार जैसे लोगों को वो सब कहना पड़ा जो उन्होंने कहा है। इसलिए जब जेटली जैसे लोगों द्वारा इन लोगों के उठाए गए कदमों को कमतर आंका जा रहा है और राजनाथ सिंह जैसे लोग इसे कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में दोहरा रहे हैं तो लोकतंत्र की आवाज उठा रहे लोगों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है और उदारवादी सोच और सहिष्णुता सिकुड़ती जा रही है। हमारे लोकतांत्रिक समाज पर मंडराते सांप्रदायिक प्रचार और लोकतांत्रिक विचारों की दमघोंटू राजनीति के बड़े खतरे की ओर समाज के बड़े वर्गों का ध्यान आकर्षित करने के लिए हमें और अधिक तरीकों के बारे में सोचना जारी रखना होगा। और ये कोई मामूली समय नहीं हैं, विभाजनकारी प्रक्रियाओं ने खतरनाक अनुपात ले लिया है और उन्हें भ्रामक विकास की कहानी से छिपाया नहीं जा सकता है। 

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    फिर देश बोलेगा और आपको सुनना होगा!

    Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2015 07:46:00 PM


    देश चला रहे शख्स के संवेदनशील मामलों पर चुप रहने और उनके सहयोगियों की गैरजिम्मेदाराना बयानबाज़ी पर मानव अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का लेख. 

    आज देश के हर क्षेत्र के नामचीन लोग यह कह रहे है कि देश में सहिष्णुता का माहौल नहीं है, लोग डरने लगे हैं. अविश्वास और भय की स्थितियां बन गई हैं, फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान के अधिपति इस बात को मानने को राजी नहीं दिखाई दे रहे हैं. साहित्यकारों द्वारा अवार्ड लौटाए जाने को उन्होंने साज़िश करार दिया है. उनका कहना है कि ये सभी साहित्यकार वर्तमान सत्ता के शाश्वत विरोधी रहे हैं तथा एक विचारधारा विशेष की तरफ इनका रुझान है, इसलिए इनकी नाराजगी और पुरस्कार वापसी कोई गंभीर मुद्दा नहीं है. 

    सत्ताधारी वर्ग और उससे लाभान्वित होने वाले हितसमूह के लोग हर असहमति की आवाज़ को नकारने में लगे हुए हैं. ऐसा लगता है कि नकार इस सत्ता का सर्वप्रिय लक्षण है. शुरुआती दौर में जब वर्तमान सत्ता के सहभागियों के अपराधी चरित्र पर सवाल उठे और एक मंत्री पर दुष्कर्म जैसे कृत्य का आरोप लगा तो सत्ताधारी दल ने पूरी निर्लज्जता से उसका बचाव किया और उन्हें मंत्रिपद पर बनाए रखा. इसके बाद मानव संसाधन जैसे मंत्रालय में अपेक्षाकृत कम पढ़ी लिखी मंत्री महोदया के आगमन पर बात उठी तो वह भी हवा में उड़ा दी गयी. ललित गेट का मामला उठा और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का इस्तीफ़ा माँगा गया तब भी वही स्थिति बनी रही. व्यापमं में मौत दर मौत होती रही मगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान निर्भयता से शासन का संचालन करने के लिए स्वतंत्र बने रहे. 

    महंगाई ने आसमान छुआ. सत्ता के सहयोगी बेलगाम बोलते रहे, मगर फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा दहाड़ने वाले मोदी लब हिलाने से भी परहेज़ करने लगे. गोमांस के मुद्दे पर जमकर राजनीति हुई, सिर्फ संदेह के आधार पर देश भर में तीन लोगों की जान ले ली गयी. एक पशु जिसे पवित्र मान लिया गया, उसके लिए तीन तीन लोग मार डाले गए. पर इसका सिंहासन पर कोई असर नहीं पड़ा. सत्ताधारी दल के अधिकृत प्रवक्ता इन हत्याओं की आश्चर्यजनक व्याख्याएं करते रहे, कई बार तो लगा कि वे हत्याओं को जायज ठहराने का प्रयास कर रहे है. भूख और गरीबी के मुद्दे गाय की भेंट चढ़ गए, फिर भी प्रधानमंत्री नहीं बोले. शायद मारे गए लोगों की हमदर्दी के लिए मुल्क के वजीरे आज़म के पास कोई शब्द तक नहीं बचे थे, इस सत्ता का कितना दरिद्र समय है यह? 

    तर्कवादी, प्रगतिशील, वैज्ञानिक सोच के पैरोकार और अंधविश्वासों के खिलाफ़ जंग लड़ रहे तीन योद्धा नरेंद्र दाभोलकर, कामरेड गोविन्द पानसरे एवं प्रोफेसर कलबुर्गी मारे गये. यह सिर्फ तीन लोगों का क़त्ल नहीं था, यह देश में तर्क, स्वतंत्र विचार और वैज्ञानिक सोच की हत्या थी, मगर प्रधानमंत्री फिर भी नहीं बोले. 

    देश भर में दलित उत्पीड़न की वारदातों में बढ़ोतरी हुई, दक्षिण में विल्लपुरम से लेकर राजस्थान के डांगावास तथा हरियाणा के सुनपेड़ तक दलितों का नरसंहार हुआ, दलित नंगे किए गए, महिलाओं को बेइज्जत किया गया, दलित नौजवान मारे गए, मोदी जी को उनके आंसू पूंछने की फुर्सत नहीं मिली. हर जनसंहार पर सत्ता के अहंकारियों ने या तो पर्दा डालने की कोशिश की या उससे अपने को अलग दिखाने की कवायद की. एक केन्द्रीय मंत्री ने तो मारे गए दलित मासूमों की तुलना कुत्तों से कर दी और हंगामा होने पर यहाँ तक कहने में भी कोई संकोच नहीं किया कि जब मैं मीडिया से बात कर रहा था, तब वहां से कुत्ता गुजरा, इसलिये मैंने उसका नाम ले लिया, अगर भैंस निकल आती तो भैंस का नाम ले लेता! यह गाय, भैंस सरकार है या देश की सरकार है? 

    महिलाओं की अस्मत पर खतरे कम नहीं हुए, बल्कि बढ़े हैं. डायन बता कर हत्या करने, अपहरण, बलात्कार के मामलों में कई प्रदेश भयंकर रूप से कुख्यात हुए. मासूमों से दुष्कर्म और उनकी निर्मम हत्याओं की देशव्यापी बाढ़ आई हुई है, जिनकी जिम्मेदारी है इन्हें रोकने की, वो सत्तासीन लोग उलजलूल बयानबाज़ी करके पीड़ितों के घाव कुरेदते रहे फिर भी हमारे महान देश के पंतप्रधान मौनी बाबा बने रहे. लोग यह कह सकते है कि उनका ज्यादातर समय बाहर के मुल्कों की यात्रा में बीता है, इसलिए वो पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए. मगर जब घर में आग लगी हो तो कोई घूमने नहीं जाता सिवाय हमारे प्रधानमंत्री जी के. 

    मोदीजी आप किस तरह के प्रधानमंत्री हैं. क्या वाकई आपको कुछ भी पता नहीं है, या आपको सब कुछ पता है और आप ऐसा होने देना चाहते हैं. आपके देश में साहित्यकार धमकियों के चलते लिखना छोड़ देते हैं, तर्क करने वाले मार दिये जाते हैं. पड़ोसी मुल्क के कलाकार अपने फन की प्रस्तुति नहीं कर सकते हैं. कहीं खेल रोके दिये जाते हैं तो कहीं किसी के चेहरे पर स्याही छिड़की जाती है. प्रतिरोध के स्वरों को विरोधी दल की आवाज कह कर गरियाया जाता है. जाति और धर्म के नाम पर मार काट मची हुई है. वंचितों के अधिकार छीने जा रहे हैं. अल्पसंख्यकों को भयभीत किया जा रहा है. बुद्धिजीवियों को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है, मगर आप है कि 'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया' और 'विकास' का ढोल पीट रहे हैं. जब पूरा मुल्क ही अशांत हो तो वह कैसे विकास करेगा? कैसा विकास और किनका विकास? किनके लिए विकास? सिर्फ नारे, भाषण और नए नए नाम वाली योजनाओं की शोशेबाजी, आखिर इस तरह कैसे यह देश आगे बढ़ेगा. यह देश एक भी रहेगा या बांट दिया जायेगा. कैसा मुल्क चाहते हैं आपके नागपुरी गुरुजन? शुभ दिनों के नाम पर कैसा अशुभ समय ले आए आप? और आपके ये बेलगाम भक्तगण जिस तरह की दादागिरी पर उतर आये हैं वे आपातकाल नामक सरकारी गुंडागर्दी से भी ज्यादा भयानक साबित हो रही है. 

    बढ़ती हुई असहिष्णुता और बिगड़ते सौहार्द पर देश के साहित्यकार, चित्रकार, फ़िल्मकार, उद्योगपति, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर और यहाँ तक कि राष्ट्रपति तक बोल रहे हैं. आप कब बोलेंगे? कब आपकी ये अराजक वानर सेना नियंत्रित होगी? चुप्पी तोड़िए पीएम जी, केवल रेडियो पर मन की बात मत कीजिए, देश के मन की बात भी समझिए और उसके मन से अपने मन की बात को मिला कर बोलिए, ताकि देशवासियों का भरोसा लौट सके. देश के बुद्धिजीवी तबके की आवाज़ों को हवा में मत उड़ाइए. असहमति के स्वरों को कुचलिए मत और अपने अंध भक्तों को समझाइए कि सत्ता का विरोध देशद्रोह नहीं होता है, और ना ही प्रतिरोध करने वालों को पड़ोसी मुल्कों में भेजने की जरूरत होती है. एक देश कई प्रकार की आवाज़ों से मिलकर बनता है. हम सब मिलकर एक देश है, ना कि नाम में राष्ट्रीय लगाने भर से कोई राष्ट्र हो जाता है. 

    भारत अपनी तमाम बहुलताओं, विविधताओं और बहुरंगी पहचान की वजह से भारत है. इसलिए यह भारत है क्योंकि यहाँ हर जाति, धर्म, पंथ, विचार, वेश, भाषा और भाव के व्यक्ति मिलकर रह सकते हैं. तभी हम गंगा जमुनी तहज़ीब बनाते हैं. सिर्फ गाय का नारा लगाने और गंगा की सफाई की बातें करने और देश विदेश के सैर सपाटे से राष्ट्र नहीं बनता, ना ही आगे बढ़ता है. सबको साथ ले कर चलना है तो भरोसा जीतिएगा. डर पैदा करके सत्ताई दमन के सहारे दम्भी शासन किसी भी मुल्क को ना तो कभी आगे ले गया है और ना ही ले जा पाएगा.  उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाया जा रहा कट्टरपंथ हमें एक तालिबानी मुल्क तो बना सकता है मगर विकसित राष्ट्र नहीं. यह आप भी जानते है और आपके आका भी, फिर भी अगर आप चुप रहना चाहते हैं तो बेशक रहिये, फिर यह पूरा देश बोलेगा और आप सिर्फ सुनेंगे.

    गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।
    हमें फिजां यही बदलनी है!
    Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!


    पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?
    बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।

    हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।

    पलाश विश्वास
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    गर्म हवा,कुछ भी नहीं बदला।नफरतें वहीं,सियासतें वहीं बंटवारे की,अलगाव और दंगा फसाद वहीं,चुनावी हार जीत से कुछ नहीं बदलता।

    हमें फिजां यही बदलनी है!

    Garm Hawa,the scorching winds of insecurity inflicts Humanity and Nature yet again!



    पाकिस्तान बना तो क्या इसकी सजा हम अमन चैन,कायनात को देंगे और कयामत को गले लगायेंगे ?

    बिरंची बाबा हारे तो नीतीश लालू के जाति अस्मिता महागबंधन की जीत होगी और मंडल बनाम कमंडल सिविल वार फिर घनघोर होगा और भारत फिर वही महाभारत होगा।फिर वहीं दंगा फसाद।


    हमारे लिए चिंता का सबब है कि हमारे सबसे अजीज कलाकार शाहरुख खान को पाकिस्तानी बताया जा रहा है और उनकी हिफाजत का चाकचौबंद इतजाम करना पड़ रहा है।यही असुरक्षा लेकिन गर्म हवा है।सथ्यु की फिल्म गर्म हवा।


    पलाश विश्वास



    आई.आई.टी. मुंबई में प्राध्यापक रहे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित राम पुनियानी का लेख. अनुवाद: अमरीश हरदेनिया.

    प्रकृति के नियम, मानव समाज पर लागू नहीं किए जा सकते। परंतु कई बार इनका इस्तेमाल सामाजिक ज़लज़लों का कारण स्पष्ट करने या उनका औचित्य सिद्ध करने के लिए किया जाता है। ''जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है'' (1984 के सिक्ख कत्लेआम के बाद) और ''हर क्रिया की समान व विपरीत प्रतिक्रिया होती है'' (2002 के गुजरात दंगों के दौरान), इसके दो प्रसिद्ध उदाहरण हैं। मैं पिछले करीब एक माह से इस बात से हैरान हूं कि जिन विद्वानों और लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटायें हैं उनसे यह पूछा जा रहा है कि उन्होंने यह तब क्यों नहीं किया था जब आपातकाल लगाया गया था या सिक्ख-विरोधी दंगे हुए थे या कश्मीर से पंडितों ने पलायन किया था या मुंबई ट्रेन धमाकों में सैंकड़ों मासूमों ने अपनी जानें गवाईं थीं। मुझे भौतिकी का ''क्वालिटेटिव ट्रांसफार्मेशन'' (गुणात्मक रूपांतर) का सिद्धांत याद आता है, जिसके अनुसार पानी को गर्म या ठण्डा करने पर तापमान में बिना कोई परिवर्तन के पानी या तो भाप बन जाता है या बर्फ।

    जब डाक्टर दाभोलकर, कामरेड पंसारे और फिर प्रो. कलबुर्गी की हत्याएं हुईं तभी से खतरे के संकेत मिलने लगे थे। परंतु गौमांस के मुद्दे को लेकर मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि हमारा समाज एकदम बदल गया है। इसके बाद साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लौटाने का क्रम शुरू हुआ। राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार लौटाए गए। यह समाज में बढ़ती असहिष्णुता के प्रति विरोध का प्रदर्शन था। इसी दौरान और इसके बाद, उतनी ही भयावह घटनाएं हुईं। एक ट्रक चालक को इस संदेह में मार डाला गया कि वह वध के लिए गायों को ढो रहा था। भाजपा विधायकों ने कश्मीर विधानसभा में एक विधायक की पिटाई लगाई और देश के कई हिस्सों में गौमांस खाने के मुद्दे को लेकर मुसलमानों पर हमले हुए। आज हमारे देश में हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई भी व्यक्ति यदि मटन या कोई और मांस देखकर यह कह भर दे कि यह गौमांस है, तो हिंसा शुरू हो जाएगी। देश में ऐसा माहौल बन गया है कि अगर कोई गाय हमारे बगीचे में घुसकर पौधों को चरने भी लगे तो उसे भगाने में हमें डर लगेगा।

    वातावरण में ज़हर घुलने से सामाजिक सोच में भी बदलाव आया है। अल्पसंख्यकों में असुरक्षा के भाव में तेज़ी से बढोत्तरी हुई है। हम सब जानते हैं कि एनडीए के शासन में आने के बाद से, ज़हर उगलने वाले अति-सक्रिय हो गए हैं। हर एक अकबरूद्दीन ओवैसी के पीछे दर्जनों साक्षी महाराज, साध्वियां और योगी हैं। इन भगवा वस्त्रधारी, हिंदू राष्ट्रवादियों की सेना को संघ परिवार में उच्च स्थान प्राप्त है। प्रधानमंत्री ने स्वयं हिंदू युवकों का आह्वान किया है कि वे महाराणा प्रताप के रास्ते पर चलते हुए गौमाता के सम्मान की रक्षा करें। पिछले लगभग एक वर्ष में हरामज़ादे जैसे शब्दों का सार्वजनिक मंचों से इस्तेमाल आम हो गया है। केवल संदेह के आधार पर पुणे के एक आईटी कर्मचारी को मौत के घाट उतार दिया गया, चर्चों पर हुए श्रृंखलाबद्ध हमलों को चोरियां बताया गया, लवजिहाद के भूत को जिंदा रखा गया और उत्तरप्रदेश के शीर्ष भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अगर एक हिंदू लड़की, किसी मुसलमान से शादी करती है तो उसके बदले हिंदुओं को सौ मुसलमान लड़कियों को पकड़ कर ले आना चाहिए। मुस्लिम युवकों के नवरात्रि पर होने वाले गरबा उत्सवों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। भाजपा के मुस्लिम चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी ने फरमाया कि जो लोग गौमांस खाना चाहते हैं वे पाकिस्तान चले जाएं। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन और जोरशोर से शुरू हो गया और उसके मंदिर बनाए जाने के प्रस्ताव सामने आने लगे। केरल के एक भाजपा सांसद ने कहा कि गोडसे ने काम तो ठीक किया था परंतु उसने गलत व्यक्ति को अपना निशाना बनाया। पिछले एक वर्ष में साम्प्रदायिक हिंसा में भी तेजी से वृद्धि हुई।

    पुरस्कार लौटाने का सिलसिला शुरू होने के बाद, भाजपा के नेतृत्व ने उन कारणों पर ध्यान देने की बजाए, जिनके चलते पुरस्कार लौटाए जा रहे थे, संबंधित लेखकों व विद्वानों को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश शुरू कर दी। इन लेखकों का मज़ाक बनाने के लिए ''बुद्धि शुद्धि पूजा''के आयोजन हुए और भाजपा के प्रवक्ता टीवी कार्यक्रमों में उन्हें अपमानित करने और उनका मज़ाक उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री, जो कि एक पुराने आरएसएस प्रचारक हैं, ने कहा कि मुसलमान भारत में रह सकते हैं परंतु उन्हें गौमांस खाना बंद करना होगा। ऐसा बताया जाता है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इन नेताओं को बुलाकर डांट पिलाई। परंतु यह सब नाटक प्रतीत होता है क्योंकि इन नेताओं ने यह दावा किया कि वे अपने अध्यक्ष से किसी और काम के संबंध में मिलने आए थे और इनमें से किसी ने भी न तो अपने कथनों पर खेद व्यक्त किया और ना ही माफी मांगी।

    इस घटनाक्रम से व्यथित राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने तीन मौकों पर राष्ट्र का आह्वान किया कि बहुवाद, सहिष्णुता और हमारे देश की सभ्यता के मूल्यों की रक्षा की जानी चाहिए। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने सरकार को याद दिलाया कि नागरिकों के''जीवन के अधिकार''की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। बदलते हुए सामाजिक वातावरण पर देश के दो प्रतिष्ठित नागरिकों की टिप्पणियां काबिले-गौर हैं। जूलियो रिबेरो ने अपने दर्द को बयां करते हुए कहा कि ''मैं ईसाई हूं और मैं अचानक मेरे अपने देश में अपने आपको अजनबी पा रहा हूं''। जानेमाने कलाकार नसीरूद्दीन शाह ने कहा कि ''मैं अब तक अपनी मुसलमान बतौर पहचान से वाकिफ ही नहीं था''।

    ये सामान्य दौर नहीं है। बहुवाद और सहिष्णुता के मूल्यों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। इस सरकार के राज में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों ने अपने पंख फैला दिए हैं और वे कुछ भी करने पर उतारू हैं। अब साम्प्रदायिकता का मतलब केवल दंगों में कुछ लोगों की हत्या नहीं रह गया है। उसका बहुत विस्तार हो गया है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में मिथक प्रचारित किए जा रहे हैं। ऐतिहासिक घटनाओं और वर्तमान समाज के चुनिंदा पहलुओं की मानव-विरोधी व्याख्याएं की जा रही हैं। इनका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है और दंगे भड़काए जा रहे हैं। हिंसा बड़े पैमाने पर हो सकती है, जैसी कि गुजरात, मुंबई, भागलपुर या मुजफ्फरनगर में हुई या फिर जैसा कि दादरी में हुआ-किसी एक व्यक्ति को चुनकर उसकी जान ली सकती है। इससे समाज बंटता है और धीरे-धीरे ध्रुवीकृत होता जाता है। यही ध्रुवीकरण उस पार्टी की सत्ता पाने में मदद करता है जो धर्म के नाम पर राष्ट्र का निर्माण करना चाहती है। येल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में कहा गया है कि साम्प्रदायिक हिंसा से भाजपा को चुनावों में फायदा होता है।

    भारत में सांप्रदायिकता के बीज करीब डेढ़ शताब्दी पूर्व बोए गए थे। अंग्रेज़ों ने अपनी फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने के लिए इतिहास के साम्प्रदायिक लेखन का इस्तेमाल किया। इतिहास की इसी व्याख्या को साम्प्रदायिक संगठनों ने अपना लिया और उसे हिंदू-विरोधी या मुस्लिम-विरोधी जामा पहना दिया। हिंसा की हर घटना के बाद इन संगठनों की ताकत में इजाफा होता है। साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है। मंदिर तोड़ने से लेकर लवजिहाद और उससे लेकर गौमांस का इस्तेमाल घृणा को और गहरा करने के लिए किया जा रहा है। जो लोग यह सब कर रहे हैं, वे जानते हैं कि वे सुरक्षित हैं क्योंकि वे ठीक वही कर रहे हैं जो वर्तमान सरकार चाहती है-फिर चाहे सरकार के नुमांइदे सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहें।

    एक ओर हिंदू राष्ट्रवाद सरकार का पथप्रदर्शक बना हुआ है तो दूसरी ओर इसी विचारधारा में विश्वास रखने वाले ''कट्टरपंथी''तत्व हैं। इन दोनों का विस्तृत जाल है और उनकी पहुंच हर जगह तक है। सत्ताधारी पार्टी को लाभ यह है कि उसे अपने हाथ गंदे नहीं करने पड़ रहे हैं और विभिन्न संगठन व व्यक्ति उसके एजेण्डे को स्थानीय स्तर पर लागू कर रहे हैं। इन ''कट्टरपंथी''तत्वों के देश की राजनीति के रंगमंच के केंद्र में आ जाने से स्थिति में ''गुणात्मक''परिवर्तन आया है। पुरस्कारों को लौटाने का सिलसिला, समाज के अति-साम्प्रदायिकीकरण का नतीजा है। असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है, बहुवाद पर हमला हो रहा है और अल्पसंख्यक भयभीत हैं। सवाल यह है कि हम इस दौर में भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा कैसे करेंगे?



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    Kashmir is burning,My Nation!Senior journalist attacked by Police under RSS Governance!

    Neither Modi's visit nor Geelani's million man march will help Kashmir

    For Muslims and Hindus alike, New Delhi's response is similar: 'We are willing to give you bribes, but don't expect justice, not ever.'

    Massive Crackdown in Kashmir to Guarantee 'Peaceful' Modi Visit

    Palash Biswas

    Senior journalist attacked by Police in Anantnag : Daily : 

    Chattan " Srinagar :

    Bad news from Kashmir!


    Kashmir times reports:


    Doyen of journalism in J&K, the founder editor and chairman Kashmir Times group of publications Ved Bhasin passed away late this evening after a brief illness.

    He was 86. 

    Bhasin breathed his last at his residence at Gandhi Nagar at around 11.00 PM with all the members of his family by his side.

    His cremation will take place tomorrow at Jogi Gate Cremation Ground at 4.00 PM.

    Bhasin is survived by his two daughters Dr Anju Bhasin the Professor of Physics at the University of Jammu, Anuradha Bhasin Jamwal senior journalist and Executive Editor `Kashmir Times', son-in-law Prabodh Jamwal Editor Kashmir Times and its other publications and grand-daughter Saba Jamwal.

    His wife Vimal Bhasin stood by him and supported him in his struggle for creating an egalitarian society till she lost her struggle against cancer 25 years back.

    A distinguished journalist, a human being par excellence, who will always be remembered for fearlessly upholding the freedom of the press, Bhasin was born on May 1 in 1929 in Jammu. An alumnus of Prince of Wales College, Jammu (now G G M Science College), Bhasin was known for his fearless, bold and independent journalism. He is regarded as a pioneer and a legend in the field in Jammu and Kashmir who maintained highest standards and ethics in journalism.

    With the firm belief that humanity is the core of life, he always sided with the oppressed and down-trodden and took up their cause.

    He was active for almost 70 years in active journalism and was also close to politics. Politics, in fact, was his first love, that eventually gave way to journalism. He had been close to players that mattered in Kashmir and witness to unreported histories. His journo-political career gave him the privileged inside out view of many events. He was also known for his contribution to the field of literature and culture and was engaged in social movements.


    Condolence!


    Ground Zero report should be looked into.If 


    we want to unite India I agree with Omair 


    Ahmad,OMAIR AHMAD

    @omairtahmad !

    Neither Modi's visit nor Geelani's million man march will help Kashmir

    For Muslims and Hindus alike, New Delhi's response is similar: 'We are willing to give you bribes, but don't expect justice, not ever.'


    Whoever is committed to the causes of humanity and Nature he should be worried!


    Mr Narendra Modi will visit the Kashmir Valley. The hardline Kashmiri ideologue, and former MLA, Syed Ali Shah Geelani, has called a "Million Man March" to protest Mr Modi's presence!


    The Prime Minister is not welcome in Kashmir!It does not mean everyone in Kashmir should be engaged in sedition or everyone of them should be treated as anti national and Pro Pak elements despite some Pak or ISIS flags are hoisted.

    Media prints those flags only and skips or underplays the plight of Indian citizens who have never been treated as Indian citizens and we claim that Kashmir remains an integral part of India.


    We have made an enemy of Nepal and pushed it into Chinese lap to make it Hindu regime yet again rejecting sovereign Nepal`s democrat and Secular constitution and using the Madheshi and Adivasi grievances as tools of Hindutva Agenda.


    We are doing exactly the same case and Hindu as well as Muslim,whoever live in Kashmir are subjected to infinite repression.


    For Muslims and Hindus alike, New Delhi's response is similar: 'We are willing to give you bribes, but don't expect justice, not ever.'


    It is the point we always did miss!Media reports:

    Security forces have detained nearly 400 Kashmiri separatists to prevent them marching in protest during Prime Minister Narendra Modi's visit on Saturday, police said, raising tension in the disputed territory.

    Modi is making his first trip this year to Kashmir where militant violence continues, although it is nowhere near the level of the 1990s when armed revolt against Indian rule erupted.

    Nuclear powers India and Pakistan have fought two of their three wars since independence over Kashmir. India has long accused Pakistan of pushing separatist Muslim militants into India's part of Kashmir to foment revolt in the disputed Muslim-majority region. Pakistan denies those accusations.

    Kashmiris have in addition been protesting about the lack of federal government aid more than a year after the worst flooding in over a century devastated half a million homes.

    Police rounded up top separatists after hardline leader Syed Ali Shah Geelani called for a million people to walk to the centre of summer capital, Srinagar, near a stadium where Modi will address a rally on Saturday.

    "Our rally will be a message to India to read the writing on the wall that Kashmiris are against Indian occupation," said Ayaz Akbar, a spokesman for the All Parties Hurriyat Conference, an umbrella group of separatist political and religious parties.

    Over the past week, 389 people have been taken into preventive custody, most of them separatists but also activists who have in the past led stone-throwing crowds in anti-government protests, an officer said.

    Soldiers patrolled the streets of Srinagar on Friday while police set up barriers around the city, inspecting vehicles. Cellphones will be blocked during Modi's visit, the Indian army said.

    Militants have in the past sought to carry out high-profile attacks whenever a top Indian leader has visited the Kashmir Valley. On Thursday, militants attacked a paramilitary camp in Srinagar with grenades, wounding 11 soldiers.

    Modi, whose party shares power in the Jammu and Kashmir region, is expected to unveil an economic package to help the state recover from the floods. But a state government minister said he expected the Indian leader to also reach out to the disaffected youth.

     

    "The PM's visit can't be described in economic terms alone," said Education Minister Naeem Akhtar. "It is true that Kashmir needs economic impetus but it is equally true that political engagement especially with youth is essential."

    OMAIR AHMAD WRITES FOR DAILY O :

    On November 7, Mr Narendra Modi will visit the Kashmir Valley. The hardline Kashmiri ideologue, and former MLA, Syed Ali Shah Geelani, has called a "Million Man March" to protest Mr Modi's presence - although none of us know what the prime minister has to say. In response, dozens of people have been put under "preventive detention" aka arrested, and the police and security forces are deployed at their peak.

    What will happen tomorrow is that Mr Modi will give a speech, announce another package or two and lambast his opponents. His supporters will call it "very generous", "statesman-like", "in the footsteps of - or even better than - Vajpayee".

    Geelani's supporters will say, this is how India treats Kashmiris, "locks us up, and then tries to appease the easily-bribed by some money." Both sides will be happy to be unhappy, their points proved, and go back to sulking at each other.


    Senior journalist attacked by Police in Anantnag : Daily : Chattan " Srinagar :

    KPCC today said People arescared due rising intolerance in country.
    Statement added continuous statement by BJP leaders attacking various personalities is a deliberate move to disturb the peace. "BJP leaders want to make people feel their existence and show that India is being run by Saffron Party (BJP),"General Secretary, J&K Pradesh Congress Committee (PCC) Surinder Singh Channi said."Returning of awards by prominent personalities of the country aiming to agitate their anger against rising intolerance under BJP's rule is quite genuine, which the BJP leaders are unable to digest, for the fact, they do not believe in secular India and religious tolerance which is very unfortunate, Surinder Singh Channi said. Expressing concern over the continuous   efforts by "anti peace forces"vitiating atmosphere of communal harmony, he said,"India being a largest democracy of the world have always been secular, but it is quite anguishing that efforts are being made to affect the secular identity of the country."Referring to  statement against famous film actor Shah Rukh Khan by "some BJP leader", Surinder Singh Channi said, "The so called BJP leader wanted to prove as he was the only patriot and there was no one else in the country, but the fact remains that such type of leaders are doing such things to vitiate the atmosphere of brotherhood for the vested interests."Blaming BJP leaders for creating atmosphere of discord in the country, Surinder Singh Channi said that Prime Minister NarinderModi should clarify his stand.

    -- 

    Massive Crackdown in Kashmir to Guarantee 'Peaceful' Modi Visit

      REPORTED FOR THE WIRE ON 06/11/2015

    The government is arresting separatists and shutting down social media to thwart the 'Million March' challenge to Modi's Srinagar rally tomorrow

    A CRPF jawan stands guard outside the venue of Narendra Modi''s forthcoming rally outside the Sher-e-Kashmir Stadium in Srinagar on Thursday. Credit: PTI

    Srinagar: In his last public rally in Srinagar in December 2014, Prime Minister Narendra Modi had talked of fulfilling his predecessor Atal Bihari Vajpayee's Kashmir vision. "I will fulfil Ataljis' dream of Insaniyat (humanity) Kashmiriyat and Jamhooriyat (democracy)," he had promised his audience at the BJP's election rally at Sher-e-Kashmir stadium on December 8.

    Soon after, the People's Democratic Party in Kashmir shook hands with the BJP, which had swept the parliament elections, claiming that it saw an "opportunity" in the alliance to end political uncertainty in the state. In the past nine months, however, almost nothing that has happened on the Valley's political front has followed the PDP's script; from failing to shrink the space for separatists to pushing for dialogue with Islamabad and the latest debate over the intolerance, the party has been continuously drawing flak for allying with the right-wing BJP.

    Given this growing criticism, the PDP is now pinning its hopes on Modi's visit to Srinagar on Saturday, when he will address the first joint public rally of the alliance partners and is expected to announce a one lakh crore rupee development package for the flood-hit state.

    However, even before the package has been announced, questions are being raised about its intent and effect. As a close aide of PDP President Mehbooba Mufti put it, "An economic package alone will give the impression that the Modi government too is continuing the policy of treating J&K as an economic problem. That's disappointing as we want things to move on the political front as well."

    "High hopes"

    Chief Minister Mufti Mohammad Sayeed has been repeatedly invoking Vajpayee's historic Srinagar visit when he offered friendship to Islamabad and an olive branch to separatists, in a bid to stress that the path shown by the former Prime Minister is the only way to resolve the Kashmir issue.

    Speaking to reporters in Srinagar on Tuesday, Sayeed said, "I am hopeful that Modi's visit to Kashmir will be path-breaking and help in building an atmosphere of trust that could pave the way forward on political issues." He then proceeded to praise Modi as being "all inclusive" and "not at all intolerant" at a time when the Prime Minister is being criticised over his silence on the various acts of intolerance and violence in the country.

    Sayeed's showering of praises on Modi invited criticism from separatists and former Chief Minister Omar Abdullah's National Conference, who described his remarks as "surrender of his conscience to the RSS for power".

    The Chief Minister and PDP are hoping that Modi's Saturday visit would give a new impulse to the 'Agenda of Alliance', a framework worked out by the coalition partners for governing the state. The opinion within the party is that the "settling period" for the government was over and now the time has come to set rolling the agenda that has political and peace components as well.

    A senior PDP leader and a close aide of the Muftis told The Wire, "Vajpayee became Vajpayee in Kashmir only when he talked of resolving the Kashmir issue within the ambit of humanity (Insaniyat ke daiyray mein). November 7 can be the Prime Minister's (Modi's) Vajpayee moment if he chooses to."

    Political analyst Rekha Choudhary believes that the Prime Minister's visit is "very important" and "a matter of survival" for the PDP in the Valley after the party's failure to deliver anything concrete on the political and economic front. "These aren't good times in Kashmir…the 2014 flood has left people helpless, there is revival of militancy, separatists are gaining ground in the absence of any political initiative and the youth are getting disillusioned. All this could end up threatening the PDP," Choudhary pointed out. According to her, only a comprehensive political package by the Prime Minister could help the PDP regain popular trust.

    That helps explain Mehbooba Mufti's call to people on Wednesday to replicate the peaceful atmosphere that existed during Vajpayee's 2003 visit, when Modi arrives. At the same time, Mehbooba, who is expected to take over the reins of the state from her father next year, did not fail to emphasise the need for a political initiative on Kashmir. She has talked of "high hopes" riding on the Prime Minister's visit in reviving the stalled political process.

    The 'Million March' and the crackdown

    What threatens to upset the PDP's plans is the call for a 'Srinagar Million March' on November 7 by separatist leader Syed Ali Shah Geelani, which has found support from other separatists as well. To make matters worse, the march is expected to culminate at the TRC Ground, just metres away from the Sher-e-Kashmir Stadium, the Prime Minister's venue.

    Sensing a major challenge, the state government is now attempting to pre-empt the march, with the J&K police launching one of the biggest crackdowns on separatists in recent times, and detaining hundreds of pro-azadi political activists. Separatist leaders including Geelani, Mirwaiz Umer Farooq and Shabir Shah have been put under house arrest, while JKLF Chairman Yaseen Malik, Nayeem Khan and others are in police custody.

    Geelani, who has been served a notice by the government to refrain from taking out the rally, has stated, "Our aim is not to sabotage Modi's rally, but to present to the world the reality of Kashmir." Unfazed, Geelani has said that the rally would be held as planned despite the arrests and the "oppressive measures".

    The police is also keeping a close eye on social networking sites as the Million March call has generated a lot of support on social media. Around 200 Facebook pages advocating support for Geelani have already been blocked and many known "internet warriors" are on the police radar.

    Former Chief Minister Omar Abdullah termed the arrests as proof of the PDP-led government's growing "intolerance and authoritarianism". "Modi's Srinagar rally will be historic – for the number of people arrested to make the rally possible. There couldn't be a more tragic end to the 'battle of ideas' hoax," Omar tweeted.

    The state police, maintains that the crackdown is just a part of the "security drill" ahead of Modi's visit, given apprehensions that people might come out to breach the peace. However, a senior police official wishing anonymity confided, "The raids are meant to detain potential trouble makers across Kashmir to ensure Modi's rally passes off peacefully." Whether it will or not, remains to be seen.

    http://thewire.in/2015/11/06/massive-crackdown-in-kashmir-to-guarantee-peaceful-modi-visit-14890/

    Security further beefed up for PM's visit
     
    SYED YASIR reports for Kashmir Times:
    SRINAGAR, Nov 5: Security has been further beefed up in Kashmir ahead of prime minister Narinder Modi public rally on Saturday. 

    As part of the security measure, there would be likely restrictions in the various areas of downtown Srinagar tomorrow to prevent separatist parties to hold protest demonstrations.

    In various areas of uptown and downtown areas of Srinagar city, security forces laid cordon and started search operation to prevent any untoward incident.

    The NSG has taken control of the venue of prime minister. The building and the road leading to the venue are been closely checked by the special protection force and no one except the security men are been allowed to enter the venue. Scores of check-points have been set-up in and around Srinagar to carry out frisking of vehicles in order to foil any attempts by militants to bring in arms or explosives ahead of the prime minister's visit to Kashmir on Saturday.

    Forces today cracked off General Bus Stand at Batamaloo and passengers, drivers and office bearers of Transport Office were asked to come out and assemble in bus yard. Forces suddenly cordoned off General Bus Stand Batamaloo and launched a thorough search operation in the bus yard. Security forces are carrying out thorough checking of the vehicles entering the city from other districts and keeping a record of such vehicles and their drivers.

    Security forces have set-up check-points along the roads connecting Srinagar with other districts and entry of vehicle as well as passenger details, including phone numbers of the drivers and the time of their entry into the city. Many CCTV cameras have been installed in and around the venue to keep an eye on the movement of people.

    Barricades have been erected at all the entry and exit points of the city with police and paramilitary personnel manning them. In various parts of Srinagar city, mostly in sensitive areas the concentration of troops has been increased to a significant level while the commuters are frisked at various points.
    http://www.kashmirtimes.com/newsdet.aspx?q=46535

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    Enter Hamlet! Kashmir all Over INDIA! BURNING!

    GREEK Tragedy! Set! Ready!

    Go for the Final Kill and it is intolerance all about!

    No one should be deprived of INFORMATION!


    PM as well as EX Pm have to do nothing with INTOLERANCE,Humanity or Nature.The want peace now just for the Free Market!Manusmriti Rule! Pl get it!Get it or surrender to the predestined Hell losing!


    Ik Taraf MILLION MARCH Hay Aur Ik Taraf MODI Ki RALLY! Mout See Khamoshi Wadi Mein Kuch Din Se Lekin Chaee: DARR, Qadghan Aur Pehra Hay Ab Khouf Zada Her Chehra Hay : PDP Bhi Khush Hay Aur Masroor Hay!BJP Bhaee!

    Curfew-like restrictions ahead of PM's Srinagar rally, mobile internet suspended!Massive crake Down all over the Valley to ensure Modi visit!

    Look around it is all over Kashmir Valley, Burning! Our senses deactivated to feel!

    I am least bothered about Bihar Election outcome and it would be intensive Mandal v/s Kamandal Civil war yet again to make in Mahabharat!


    Mandate to be mutilated! Mandate made manipulated with money and muscle power,religious polarization or caste identities would rather kill humanity,Nature and India,us,the Indian People waiting the tsunami to be over.The Rape Tsunami to destroy us.We chose silence!


    Palash Biswas

    Enter HAMLET

    HAMLET

    To be, or not to be: that is the question:

    Whether 'tis nobler in the mind to suffer

    The slings and arrows of outrageous fortune,

    Or to take arms against a sea of troubles,

    And by opposing end them? To die: to sleep;

    No more; and by a sleep to say we end

    The heart-ache and the thousand natural shocks

    That flesh is heir to, 'tis a consummation

    Devoutly to be wish'd. To die, to sleep;

    To sleep: perchance to dream: ay, there's the rub;

    For in that sleep of death what dreams may come

    When we have shuffled off this mortal coil,

    Must give us pause: there's the respect

    That makes calamity of so long life;

    For who would bear the whips and scorns of time,

    The oppressor's wrong, the proud man's contumely,

    The pangs of despised love, the law's delay,

    The insolence of office and the spurns

    That patient merit of the unworthy takes,

    When he himself might his quietus make

    With a bare bodkin? who would fardels bear,

    To grunt and sweat under a weary life,

    But that the dread of something after death,

    The undiscover'd country from whose bourn

    No traveller returns, puzzles the will

    And makes us rather bear those ills we have

    Than fly to others that we know not of?

    Thus conscience does make cowards of us all;

    And thus the native hue of resolution

    Is sicklied o'er with the pale cast of thought,

    And enterprises of great pith and moment

    With this regard their currents turn awry,

    And lose the name of action.--Soft you now!

    The fair Ophelia! Nymph, in thy orisons

    Be all my sins remember'd.

    William Shakespeare wrote great tragedies including Hamlet on the line of Greek Tragedy!Greek tragedy is a form of theatre from Ancient Greece and Asia Minor. It reached its most significant form in Athens in the 5th century BC. Greek tragedy is an extension of the ancient rites carried out in honor of Dionysus, and it heavily influenced the theatre of Ancient Rome and the Renaissance. Tragic plots were most often based upon myths from the oral traditions of archaic epics. In tragic theatre, however, these narratives were presented by actors. The most important authors of Greek tragedies are Aeschylus, Sophocles and Euripides.


    Vishal Bharadwaj's third Shakespearean adaptation,` Haider' urf `Hamlet' is a spectacular looking film, each little detail of set and setting perfect. ... Cast: Shahid Kapoor, Tabu, Shraddha Kapoor, Kay Kay Menon, Narendra Jha, Irrfan. ... Shahid has a couple of break-out moments ...To be or not to be! it is kashmir!Just see the Film and you would have some idea how the Nation is set ablaze!Thanks Vishal!Thanks Indian Cinema to be Human!Intoerant!Shahid kapoor Hamlet! Ophelia Shraddha Kapoor!Excellent performance to tell the Truth on Kashmir where hegemony deals the valley as subhuman irrespective of religious identity,Hindu and Muslim,it is killing Humanity!


    My Nation! Kashmir is set on Fire as it happens to be,the rest of the Bharat Teerth due to intolerance,I beg your pardon!RSS agenda of Manusmriti Kills the Nation!

    And it would be the Final Kill during the Winter session as they,the EX PM as well PM intervenes suddenly as Bihar Elections over under UNPLUGGED BEEF GATE, the imported Arab Spring to push hard to enact and replicate the great Greek Tragedy at HOME!


    It is false reconciliation for the Parliamentary Consensus mandatory for Total Privatization,Total Disinvestment, Large Scale Retrenchment killing the right to the working class and peasantry,total destruction of indian economy and production system defined as reforms,called inclusion and development to accomplish the RSS agenda of a Manusmriti Globe of racist apartheid patriarchal!It is Greek Tragedy all over!


    Former Prime Minister Manmohan Singh made a strong intervention in the discourse against 'growing intolerance' by asserting "suppression of dissent and free speech posed grave danger to economic development" and that "there can be no free market


    "Capital is likely to be frightened away by conflict… There can be no free market without freedom," Singh, who is credited with ushering in economic reforms in 1991 as then finance minister, said in an indirect hint to Prime Minister Narendra Modi


    Prime Minister Narendra Modi said the Indian economy was in much better shape than it had been when he took over thanks to his government's policy changes and that this improvement had come about despite a deteriorating global situation.Is it?


    PM as well as EX Pm have to do nothing with INTOLERANCE,Humanity or Nature.The want peace now just for the Free Market!Manusmriti Rule! Pl get it!Get it or surrender to the predestined Hell losing!

    Thus,the hatred continue as we have discarded love and universal fraternity!We are not religious either!We the citizens,robotic faceless clones have nothing to do with faith,religious ideology,sacred script, ethics, morality and values.


    We are biometric clients,consumers empowered with plastic money but deprived of sovereignty, privacy,civic and human rights and citizenship.


    Look around it is all over Kashmir Valley,Burning! Our senses deactivated to feel!


    Thus,it is all the way intolerance justified more than enough!


    Thus,it is overwhelming campaign to correct Ancient History of India embedded with inherent pluralism and diversity!


    Thus,Saffornities to run and take a right turn to History,Science,Knowledge,mediums and genres!


    I am least bothered about Bihar Election outcome and it would be intensive Mandal v/s Kamandal Civil war yet again to make in Mahabharat!


    Mandate to be mutilated! Mandate made manipulated with money and muscle power,religious polarization or caste identities would rather kill humanity,Nature and India,us,the Indian People waiting the tsunami to be over.The Rape Tsunami to destroy us.We chose silence!


    Meanwhile as media reports,Arun Jaitley declared: Draft legislation to give legal backing to Aadhaar ready!

    Mind you, Currently, according to the Supreme Court's order last month, the government can use Aadhaar number for MGNREGA.

    See

    http://indianexpress.com/article/business/business-others/arun-jaitley-draft-legislation-to-give-legal-backing-to-aadhaar-ready/#sthash.zWwNAA1Q.dpuf



    Enter Hamlet!GREEK Tragedy!Set!Ready!Go for the Final Kill and it is intolerance all about!No one should be deprived of INFORMATION!


    Haider Trailer (Official) | Shahid Kapoor & Shraddha Kapoor ...

    Video for haider▶ 2:24

    https://www.youtube.com/watch?v=xakmvJ0WPa4

    Jul 8, 2014 - Uploaded by UTV Motion Pictures

    Vishal Bhardwaj's adaptation of William Shakespeare's 'Hamlet',Haider - a young man returns home to ...


    Poetic News By : Makbool Veeray : Daily " Chattan " Srinagar : Ik Taraf MILLION MARCH Hay Aur Ik Taraf MODI Ki RALLY: Mout See Khamoshi Wadi Mein Kuch Din Se Lekin Chaee: DARR, Qadghan Aur Pehra Hay Ab Khouf Zada Her Chehra Hay : PDP Bhi Khush Hay Aur Masroor Hay!BJP Bhaee! :



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    Indian Express reports LIVE: PM Modi pledges Rs 80,000 crore special package for J&K

    LIVE: PM Modi pledges Rs 80,000 crore special package for J&K

    It is Prime Minister Narendra Modi's fourth visit to the state of Jammu and Kashmir after the NDA was voted to power at the Centre

    http://indianexpress.com/

    J&K police detains Engineer Rashid for waving black flags before PM arrived in valley

    Rashid had earlier threatened to welcome, PM Modi with black flags against the growing intolerance against the Muslims in India.

    - See more at: http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/jk-police-detains-engineer-rashid-for-waving-black-flags-before-pm-arrived-in-valley/#sthash.EDcvvnI6.dpuf



    ORIGINAL TEXT

    MODERN TEXT




    45





    50

    POLONIUS

    Ophelia, walk you here. (to CLAUDIUS) Gracious, so please you,

    We will bestow ourselves. (to OPHELIA)Read on this book

    That show of such an exercise may color

    Your loneliness.—We are oft to blame in this,

    'Tis too much proved, that with devotion's visage

    And pious action we do sugar o'er

    The devil himself.

    POLONIUS

    Ophelia, come here.—(to CLAUDIUS) Your Majesty, we will hide. (to OPHELIA)—Read from this prayer book, so it looks natural that you're all alone. Come to think of it, this happens all the time—people act devoted to God to mask their bad deeds.







    55

    CLAUDIUS

    (aside) Oh, 'tis too true!

    How smart a lash that speech doth give my conscience!

    The harlot's cheek, beautied with plastering art,

    Is not more ugly to the thing that helps it

    Than is my deed to my most painted word.

    O heavy burden!

    CLAUDIUS

    (to himself) How right he is! His words whip up my guilty feelings. The whore's pockmarked cheek made pretty with make-up is just like the ugly actions I'm disguising with fine words. What a terrible guilt I feel!


    POLONIUS

    I hear him coming. Let's withdraw, my lord.

    POLONIUS

    I hear him coming. Quick, let's hide, my lord.


    CLAUDIUS and POLONIUS withdraw

    CLAUDIUS and POLONIUS hide.


    Enter HAMLET

    HAMLET enters.





    60





    65





    70

    HAMLET

    To be, or not to be? That is the question—

    Whether 'tis nobler in the mind to suffer

    The slings and arrows of outrageous fortune,

    Or to take arms against a sea of troubles,

    And, by opposing, end them? To die, to sleep—

    No more—and by a sleep to say we end

    The heartache and the thousand natural shocks

    That flesh is heir to—'tis a consummation

    Devoutly to be wished! To die, to sleep.

    To sleep, perchance to dream—ay, there's the rub,

    For in that sleep of death what dreams may come

    When we have shuffled off this mortal coil,

    Must give us pause. There's the respect

    That makes calamity of so long life.

    HAMLET

    The question is: is it better to be alive or dead? Is it nobler to put up with all the nasty things that luck throws your way, or to fight against all those troubles by simply putting an end to them once and for all? Dying, sleeping—that's all dying is—a sleep that ends all the heartache and shocks that life on earth gives us—that's an achievement to wish for. To die, to sleep—to sleep, maybe to dream. Ah, but there's the catch: in death's sleep who knows what kind of dreams might come, after we've put the noise and commotion of life behind us. That's certainly something to worry about. That's the consideration that makes us stretch out our sufferings so long.

    http://nfs.sparknotes.com/hamlet/page_138.html


    http://epaper.jansatta.com/634341/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-07112015#page/5/1



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  • 11/07/15--06:22: मुसोलिनी की राह पर चलनेवाले सिर्फ असहमत लोगों की हत्या करने की भाषा ही जानते हैं. इसलिए सिर्फ एक ही जवाब है जो इन कायरों के गिरोह को उनकी मांद में धकेल सकता है और वह है अवाम की मजबूत ताकत, उस अवाम की ताकत जो ब्राह्मणवाद की सताई हुई है और जो जटिल अक्लमंदी से दूर है. लेखकों को यह समझना ही होगा कि हिंदू राष्ट्र बुनियादी तौर पर ब्राह्मणों के एक गिरोह की पुनरुत्थानवादी परियोजना है, जो अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने के बेवकूफी भरे सपने देख रहे हैं. इसे बस मिनटों में हराया जा सकता है, अगर इन लेखकों में सिर्फ कुछेक दलीलों की बजाए अपनी मुट्ठी तान कर खड़े हो जाएं! इन बेशर्मों को शर्म नहीं आएगी
  • हम अपने आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़े का यह अत्यंत महत्वपूर्ण आलेख मूल अंग्रेजी में और रेयाज का हिंदी अनुवाद साथ साथ जारी कर रहे हैं।आनंद ने यह आलेख पहले ही भेज दिया था और हम इसके प्रिंट में प्रकाशित होने का इंतजार कर रहे थे।जो इकोनामिक एंड पालिटिकल वीकली में उनके नियमित स्तंभ में छपा।हिंदी अनुवाद भी समयांतर में आ रहा है।


    आज संघ परिवार के शाखा संगठन वर्ल्ड ब्राह्मण फेडरेशन ने इतिहास केसरिया बनाने के अभियान का ऐलान कर दिया है और आज के इकोनामिक टाइम्स के पहले पन्ने पर पूरा ब्योरा छपा है।देख लें।ब्राह्मणों को गरियाने वाली बहुजन राजनीति को इस रंगभेदी ब्राह्मणतंत्र और मनुस्मृति शासन की गुलामी में जीना मरना मंजूर है,हिंदुत्व का नर्क जीना मंजूर है,लेकिन बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के एजंडे से कोई मतलब नहीं है।

    इसी केसरिया सुनामी में नीली और लाल दोनों क्रातियां निष्णात है और बहुजन समाज की छह हाजर जातियां और अल्पसंख्यक समुदाय भी, हिंदुत्व की पैदल फौजें हैं और उनके तमाम राम जो दरअसल हनुमान हैं,जाति और धर्म के नाम पर जाति व्यवस्था को ही मजबूत करने में तन मन धन जान जहां और कायनात की बरकतें,नियामतें और रहमतें ओ3म स्वाहा कर रहे हैं।

    आनंद सिलिलेवार तरीक से वस्तुगत विधि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सामाजिक यथार्थ की परतें तार तार साफ कर रहे हैं।केसरिया सुनामी और हमारी दिमागी गुलामी के बारे में उनका यह आलेख आप जिस भाषा में बेहतर समझते  हैं,पढ़ें।यह आलेख मराठी में अलग से जारी किया जा रहा है तो दूसरी भारतीय भाषाओं में भी इसका अनुवाद जारी होना है।
    पलाश विश्वास

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    मुसोलिनी की राह पर चलनेवाले सिर्फ असहमत लोगों की हत्या करने की भाषा ही जानते हैं. इसलिए सिर्फ एक ही जवाब है जो इन कायरों के गिरोह को उनकी मांद में धकेल सकता है और वह है अवाम की मजबूत ताकत, उस अवाम की ताकत जो ब्राह्मणवाद की सताई हुई है और जो जटिल अक्लमंदी से दूर है. लेखकों को यह समझना ही होगा कि हिंदू राष्ट्र बुनियादी तौर पर ब्राह्मणों के एक गिरोह की पुनरुत्थानवादी परियोजना है, जो अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने के बेवकूफी भरे सपने देख रहे हैं. इसे बस मिनटों में हराया जा सकता है, अगर इन लेखकों में सिर्फ कुछेक दलीलों की बजाए अपनी मुट्ठी तान कर खड़े हो जाएं!

    इन बेशर्मों को शर्म नहीं आएगी

    इन बेशर्मों को शर्म नहीं आएगी

    Posted by Reyaz-ul-haque on 11/07/2015 06:31:00 PM



    आनंद तेलतुंबड़े. अनुवाद: रेयाज उल हक

    'जो हमसे असहमत होते हैं, हम उनसे बहस नहीं करते, उन्हें खत्म कर देते हैं.'
    -बेनितो मुसोलिनी [द लासियो स्पीचेज (1936), अंतोनियो सांती द्वारा द बुक ऑफ इतालियन विज्डम में उद्धृत, सितादेल प्रेस, 2003, पृ.88.]

    देश में एक सचमुच की क्रांति शुरू हुई है. देश को फासीवादी गिरफ्त में जाने के इस पूरे वक्फे में जो बुद्धिजीवी तबका रीढ़विहीन दिखने की हद तक चुप रहता आया है, वह अचानक जाग उठा और उसने साहित्यिक पुरस्कारों को लौटाना शुरू कर दिया. जो बात 4 सितंबर को उदय प्रकाश द्वारा कुछ दिन पहले ही एक दूसरे साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त साथी लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ पुरस्कार लौटाया जाना जमीर की एक हल्की झलक के रूप में दिखी, वह अब एक तूफान बन गई है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बहा ले गई और उन्हें अपने कुशासन के खिलाफ लोगों की गुहार पर अपनी रणनीति चुप्पी तोड़ने पड़ी. जब उदय प्रकाश ने अपना पुरस्कार लौटाया, उसके करीब एक महीने के बाद दो साहित्यिक दिग्गजों नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने अपने पुरस्कार लौटा दिए, जिसने विरोध की बाढ़ को और तेज कर दिया. जब मैं यह लिख रहा हूं, 35 से अधिक उल्लेखनीय लेखक अपने पुरस्कार लौटा चुके हैं और यह गिनती अभी बढ़ती जा रही है. दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा चौतरफा हमलों के माहौल में यह सचमुच उल्लेखनीय है.

    मोदी ने अब तक जो कहा है, उससे ऐसा लगता है कि उन्हें यह अंदाजा है कि यह उत्तर प्रदेश में महज इस अफवाह की बिना पर कि उन्होंने गोमांस खाया था और अपने घर में रख रखा था, एक बेकसूर 52 वर्षीय मुसलमान मो. अखलाक की भीड़ द्वारा पीट पीट कर की गई हत्या और उसके 22 स