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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    And now preparation of 1st Cinema of Resistance Garhwal Film Festival 
    September 26, 27, 2015 
    ALC Auditorium, Birla Campus, HNB Garhwal University, Shrinagar, Garhwal


    Cinema of Resistance added 9 new photos.

    सितम्बर का यह सप्ताह प्रतिरोध का अभियान के लिए बहुत उत्साहजनक है . आज ही हमारे उदयपुर चैप्टर ने अपने तीसरे उदयपुर फिल्म फेस्टिवल की शानदार शुरुआत प्रख्यात नारीवादी चिन्तक, इतिहासकार और फ़िल्मकार उमा चक्रवर्ती के वक्तव्य से हुई है.

    आज ही हमारे पहले गढ़वाल फिल्म फेस्टिवल की तैय्यारियाँ भी जोरो से चल रही हैं. पहले गढ़वाल फिल्म फेस्टिवल का उदघाटन कल सुबह 11 बजे श्रीनगर शहर के हेमवती नंदन बहुगुणा विश्विद्यालय के ए एल सी सभागार में हिंदी के प्रखर आलोचक आशुतोष कुमार के वक्तव्य से होगा .

    इस अवसर पर गढ़वाल के प्रसिद्ध चित्रकार बी मोहन नेगी और देवेन्द्र नैथानी के कविता पोस्टर और योगेन्द्र कांडपाल के रेखांकनों की प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है. इस आयोजन को सुन्दर बनाने के लिए दिल्ली से पीपुल्स आर्टिस्ट ग्रुप के कलाकार अनुपम रॉय भी शहर में आ चुके हैं. आयोजन को सफल बनाने के लिए छात्र संगठन आइसा के युवा दिन - रात जुटे हैं जिन्हें उनके सीनियर साथी कान्ति चंदोला, मदन मोहन चमोली, इन्द्रेश मैखुरी, अतुल सती, योगेन्द्र कांडपाल, मालती हालदार और शिवानी पांडे का सहयोग मिल रहा है .

    आयोजन में गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संस्थापक सदस्य अशोक चौधरी, मनोज सिंह और देवरिया के पत्रकार अनिल राय भी आ चुके हैं. फिल्म फेस्टिवल में बंगलुरु फिल्मकार निर्विकल्प और पटकथाकार रमेश पन्त भी शहर में आ चुके हैं.

    इस आयोजन का पूरा विवरण नीचे दिया जा रहा है. उम्मीद है आप इस आयोजन में जरुर शामिल होंगे और प्रतिरोध का सिनेमा को मजबूत बनायेंगे.


    प्रो एम एम कलबुर्गी और स्वर्गीय भवानीशंकर थपलियाल की याद में 
    और 
    फिल्म एंड टी वी इंस्टीट्युट ऑफ़ इंडिया, पुणे के छात्रों के संघर्ष के समर्थन में 
    प्रतिरोध का सिनेमा का पहला गढ़वाल फ़िल्म फ़ेस्टिवल

    पहला दिन, शनिवार 26 सितम्बर 2015

    सुबह 11 से दुपहर 12.15 बजे 
    उदघाटन समारोह 
    मुख्य अतिथि : डा आशुतोष कुमार
    आलोचक व एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्विद्यालय

    भोटिया जन जाति की सांस्कृतिक झलक

    नया भारतीय दस्तावेज़ी सिनेमा
    गांव छोड़ब नाही 
    5 मिनट/ 2011/ हिंदी/ रंगीन/ निर्देशक: के पी ससी 
    ये हिटलर के साथी
    9 मिनट/ 2015/ हिंदी/ रंगीन/ प्रस्तुति: शम्भाजी भगत

    गाड़ी लोहरदगा मेल 
    27 मिनट / 2005 / नागपुरी और हिंदी / रंगीन / निर्देशक : बीजू टोप्पो और मेघनाथ

    स्मार्ट सिटी, हमारे शहर और दलित कामगार 
    कचरा व्यूह 
    59 मिनट/ 2005 / हिंदी/ रंगीन/ निर्देशक: अतुल पेठ

    दुपहर 2 से 3 
    लंच ब्रेक

    दुपहर 3 से 5 
    विकास, विस्थापन और संघर्ष 
    ओडीशा के बहाने पूरे देश में चल रहे विकास के मॉडल पर सिने एक्टिविस्ट संजय जोशी की प्रस्तुति 
    60 मिनट/ 2000 से अब तक/ सूर्य शंकर दाश द्वारा निर्मित विभिन्न लघु फिल्में

    रेफरेंडम 
    64 मिनट/ 2015/ कुई और उड़िया अंगरेजी सब टाइटल्स के साथ/ निर्देशक: तरुण मिश्र 
    शाम ५ से ५.३० 
    चाय 
    शाम 5.30 से रात 8 
    भारतीय कालजयी सिनेमा 
    गरम हवा 
    146 मिनट/ 1974/ हिंदी/ रंगीन/ निर्देशक: एम एस सथ्यू


    दूसरा दिन, रविवार 27 सितम्बर 2015

    पहला सत्र 
    सुबह 9 से दुपहर 2 बजे

    विश्व सिनेमा
    सुबह 9 से 11.30 
    द ग्रेट डिक्टेटर 
    124 मिनट/ 1940/ अंग्रेजी/ ब्लेक एंड व्हाइट/ निर्देशक: चार्ली चैपलिन

    11.30 से 11.40 
    ब्रेक

    सुबह 11.40 से दुपहर 2.20

    हिमालयी संस्कृति, पर्यावरण और संकट

    क्षेत्रीय सिनेमा 
    गढ़वाली फिल्मों की विकास यात्रा पर डॉ डी आर पुरोहित की प्रस्तुति 
    30 मिनट/ हिंदी

    आपदा

    देवी की दुविधा 
    47 मिनट / 2015 / हिंदी, अंगरेजी और गढ़वाली / रंगीन / निर्देशक: निर्विकल्प

    फ़िल्म के निर्देशक निर्विकल्प और पटकथा लेखक रमेश पन्त के साथ बातचीत

    दस्तावेज

    माघ मेला

    72 मिनट / 1980/ हिंदी/ ब्लेक एंड व्हाईट/ निर्देशक: नेत्र सिंह रावत और अरुण सकट

    दुपहर 2.20 से 3 
    लंच ब्रेक

    दुपहर 3 से शाम 5

    हमारा स्वास्थ्य और नयी पहल

    पहली आवाज़ 
    52 मिनट/ 2014/ हिंदी/ रंगीन/ निर्देशक: अजय टी जी

    शाम 4.15 से 5 
    गढ़वाल में फिल्म सोसाइटी आंदोलन की संभावना

    शाम 5 से 5.30 
    चाय 
    शाम 5.30 से शाम 7.45

    नया भारतीय सिनेमा 
    कोर्ट 
    116 मिनट/ 2015/ मराठी अग्रेज़ी सब टाइटल्स के साथ/ रंगीन/ निर्देशक: चैतन्य तम्हाने

    शाम 7.45 से 8 
    पहले गढ़वाल फिल्म फेस्टिवल का समापन और प्रतिरोध का सिनेमा अभियान की शुरुआत की घोषणा.


    गढ़वाल इकाई, जन संस्कृति मंच और प्रतिरोध का सिनेमा द्वारा आयोजित 
    संपर्क : 9410563996, 9412120571, 9639338433
    thegroup.jsm@gmail.com , Facebook: cinema of resistance






    --


    Pl see my blogs;


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    https://youtu.be/XibeTjOuvnc

    फासिज्म मुकम्मल है और परिंदों को भी चहचहाने की इजाजत नहीं हैं!

    हमने लड़ाई अभी शुरु भी नहीं की है,और हार मानकर हाथ पांव छोड़ दिये।डूब रहे हैं तो तैरने की कोशिश भी तो करनी चाहिए।

    वीरेनदा चले गये तो  क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है।फासिज्म के खिलाफ हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जबतक न हम उसे मुकम्मल शिकस्त नहीं दे पाते।


    वीरेनदा को लाल नील सलाम।

    पलाश विश्वास

    https://youtu.be/XibeTjOuvnc

    फासिज्म मुकम्मल है और परिंदों को भी चहचहाने की इजाजत नहीं हैं!

    हमने लड़ाई अभी शुरु भी नहीं की है,और हार मानकर हाथ पांव छोड़ दिये।डूब रहे हैं तो तैरने की कोशिश भी तो करनी चाहिए।

    वीरेनदा चले गये तो  क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है।फासिज्म के खिलाफ हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जबतक न हम उसे मुकम्मल शिकस्त नहीं दे पाते।


    वीरेनदा को लाल नील सलाम।

    पलाश विश्वास

    वीरेनदा चले गये तो  क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है।फासिज्म के खिलाफ हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जबतक न हम उसे मुकम्मल शिकस्त नहीं दे पाते।


    वीरेनदा को लाल नील सलाम।


    लिख तो दिया हमने,क्योंकि लिखना उतना मुश्किल भी नहीं है।लेकिन अपनों को विदा करने के बाद जिंदगी के ढर्रे पर वापसी बेहद मुश्किल होती है।


    वीरेनदा के जाने के बाद मन मिजाज काबू में नहीं हैं कतई।


    कल रात अपने डा.मांधाता सिंह ने कहा कि भड़ास खुल नहीं रहा।तो पहले तो सोचा कि जैसे मेरे ब्लाग डिलीट हो रहे हैं,वैसा ही कुछ हो रहा होगा या फिर दलित वायस की तरह ससुरा साइट ही हैक हो गया होगा।


    डाक्साहब ने कहा कि यशवंत को फोन लगाकर देखिये।


    लगा दिया फोन।उधर से उसकी आवाज लगाते ही,मैंने दन से गोला दाग दिया,यह क्या कि वीरेनदा के जाते ही मोर्चा छोड़कर भाग खड़े हुए?


    उसने कहा कि मन बिल्कुल ठीक नहीं है।नई दिल्ली में वीरेनदा इतने अरसे से कैंसर से जूझ रहे थे और बरेली जाकर उनने इसतरह दम तोड़ा।हम फिलहाल कुछ भी लिख पढ़ नहीं पा रहे हैं और न भड़ास अपडेट करने की हालत में हैं।


    कल सुबह ही वीरेनदा के ही नंबर पर रिंग किया था।प्रशांत और प्रफुल्ल के नंबर हमारे पास नहीं हैं।


    सविता बोली कि वह फोन तो चालू होगा।बच्चों से और भाभी से बात तो कर लो।


    फोन उठाया बड़ी बहू,प्रशांत की पत्नी रेश्मा ने।वह मुझे जानती नहीं है।बोली कि मां तो बाथरूम में हैं।


    मैं भाभी जी के निकलने के इंतजार में अपनी बहू से बातें करता रहा तो उसने बहुत दुःख के साथ कहा कि वे बरेली आना चाहते थे और एक दिन भी बीता नहीं,अस्पताल दाखिल हो गये।बहुत मलाल है कि हम उन्हें बरेली ले आये।


    उनके अस्पताल में दाखिल होते ही मैंने दिनेश जुयाल से पूछा भी था कि वीरेनदा को दिल्ली वगैरह किसी और अस्पताल में शिफ्ट करने की कोई गुंजाइश है या नहीं।


    दिनेश ने तब कहा था कि हालत इतनी कृटिकल है कि उन्हें सिफ्ट कराने का रिस्क ले नहीं सकते।वैसे इस अस्पताल में सारी व्यवस्था है और आपरेशन के बाद खून बहना रुक गया है और बीपी भी ट्रेस हो ही है।वे सुधर भी रहे हैं।


    उनके अवसान से एकदिन पहले जुयाल ने कहा कि एक दो दिन में उन्हें आईसीयू से निकालकर बेड में दे देंगे।इलाज में व्यवधान न हो,इसलिए हम घरवालों से बात नहीं कर रहे थे।


    अगले ही दिन वीरेनदा चले गये।


    मेरे ताउजी का आपरेशन दिल्ली में हुआ।भाई अरुण वहीं हैं।हम जब मिलने गये तो ताउजी ने कहा कि अब मुझे घर ले चल।मैं बसंतीपुर में ही मरना चाहता हूं।


    मैंने कहा कि मैं घर जा रहा हूं और वहा जाकर सारा बंदोबस्त करके आपको वही लिवा ले जायेंगे।


    ताउजी ने मेरे घर पहुंचने से पहले दम तोड़ दिया।


    मैंने यशवंत और रेश्मा,दोनों से यही कहा कि वीरनदा की आखिरी इच्छा बरेली आने की थी।वह पूरी हो गयी।उनकी आखिरी इच्छा पूरी न हो पाती तो अफसोस होता।मैंने अपने पिता को कैंसर के दर्द में तड़पते हुए तिल तिल मरते देखा है।उनका या वीरेनदा का दर्द हम बांट नहीं सकते थे।वीरेनदा अगर बरेली लौटे बिना दिल्ली में दम तोड़ देते तो यह बहुत अफसोसनाक होता।वैसा हुआ नहीं है।


    वीरेनदा तो बहुत बहादुरी के साथ कैंसर को हरा चुके थे क्योंकि दरअसल वे सच्चे कवि थे और कविता को कोई हरा ही नहीं सकता।कैंसर भी नहीं।


    हम शुरु से वीरेनदा से यही कहते रहे हैं कि आपकी कविता संजीवनी बूटी है।आपकी दवा भी वही है और आपके हथियार भी वहीं।


    वीरेनदा ने दिखा दिया कि कैंसर को हराकर कविता कैसे समय की आवाज बनकर मजलूमों के हकहकूक के हक में खड़ी होती है।


    इससे पहले अपने दिलीप मंडल की पत्नी हमारी अनुराधा ने भी दिखा दिया कि कैंसर को कैसे हराकर सक्रिय जीवन जिया जा सकता है।


    https://youtu.be/XibeTjOuvnc

    जनपद के कवि वीरेनदा,हमारे वीरेन दा कैंसर को हराकर चले गये!लड़ाई जारी है इंसानियत के हक में लेकिन,हम लड़ेंगे साथी!

    आज लिखा जायेगा नहीं कुछ भी क्योंकि गिर्दा की विदाई के बाद फिर दिल लहूलुहान है।दिल में जो चल रहा है ,लिखा ही नहीं जा सकता।न कवि की मौत होती है और न कविता की क्योंकि कविता और कवि हमारे वजूद के हिस्से होते हैं।वजूद टूटता रहता है।वजूद को समेटकर फिर मोर्चे पर तनकर खड़ा हो जाना है।लड़ाई जारी है।

    Let Me Speak Human!

    https://youtu.be/XibeTjOuvnc



    कैंसर से लड़ते हुए सोलह मई के बाद की कविता के मुख्य स्वर वीरेनदा रहे हैं तो सोलह मई के खिलाफ ,इस मुकम्मल फासिज्म की लड़ाई हमारी है।


    वीरेनदा चले गये तो  क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है।


    आज प्रवचन दे नहीं पाया।वीरेनदा अपराजेय हैं,जैसा कि मंगलेशदा ने लिखा है।लेकिन हम उनके भाई बंधु उतने भी अपराजेय नहीं हैं।


    निजी गम,निजी तकलीफों से निजात कभी मिलती नहीं है।उनमें उलझते ही जाना है।गौतम बुद्ध सिद्धार्थ से गौतम बने तो इसीलिए कि दुःख रोग शोक ताप का नाम ही जीवन है।


    यह उनकी वैज्ञानिक सोच थी कि उन्होंने इस पर खास गौर किया कि दुःख रोग शोक ताप हैं तो उनकी वजह भी होगी।


    उनने फिर सोच लिया कि दुःख रोग शोक ताप का निवारण भी होना चाहिए।इसके जवाब में उनने अपने मोक्ष,अपनी मुक्ति का रास्ता नहीं निकाला।सत्य,अहिंसा,प्रेम और समानता का संकल्प लिया।


    हम गौतम बुद्ध को भगवान मानकर उनकी पूजा करते हैं उनकी मूर्ति बनाकर,लेकिन उनके अधूरे संकल्पों को पूरा करने की सोचते भी नहीं हैं।हम भारत को बौद्धमय बनाना चाहते हैं और न पंचशील से हमारा कोई नाता है और न हम अपने को बौद्धमय बना पाये।


    लोग इस देश में पगला गये हैं क्योंकि धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का सियासती मजहबी और हुकूमत त्रिशुल हर किसी के दिलोदिमाग में गढ़ा हुआ है और कत्ल हो गया है मुहब्बत का।फिजां ऩफरत की बाबुंलंद है तो चारों तरफ कत्लेआम है,आगजनी हैं।


    जाहिर सी बात है कि हम न गौतम बुद्ध हैं और न बाबासाहेब अंबेडकर।बाबासाहेब ने भी निजी सदमों और तकलीफों को कभी तरजीह नहीं दी।


    सदमा  बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर को मौलिक जो लगा जाति व्यवस्था, मनुस्मृति राजकाज,असमता और अन्याय की व्यवस्था से, तजिंदगी वे उसके खिलाफ गौतम बुद्ध की तरह समता,न्याय और स्वतंत्रता का संकल्प लेकर जाति उन्मूलन का एजंडा लेकर जो भी वे कर सकते थे,अपनी तमाम सीमाबद्धताओं के बावजूद वही करने की उनने हरसंभव कोशिश की।


    हमने लड़ाई अभी शुरु भी नहीं की है,और हार मानकर हाथ पांव छोड़ दिये।डूब रहे हैं तो तैरने की कोशिश भी तो करनी चाहिए।


    यक्षप्रश्न जितने थे,युधिष्ठिर को संबोधित,वे धर्म की व्याख्या ही है।


    संत रैदास ने तो टुक शब्दों में कह दिया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।धर्म के लिए,आस्था के लिए न किसी धर्मस्थल की जरुरत है।न पुरोहित ईश्वर के सेल्स एजंट हैं किसी भी मजहब में।


    हर धर्म के रस्मोरिवाज अलग अलग हैं।

    हर धर्म की उपासना पद्धति अलग अलग हैं।

    धर्मस्थल अलग अलग हैं।

    भूगोल और इतिहास अलग अलग हैं।


    धर्म चाहे कुछ हो,पहचान चाहे कुछ हो,मनुष्य की बुनियादी जरुरतें एक सी हैं।रोजनामचा एक सा है।हमारी धड़कनें,सांसें एक सी हैं।


    रोजगार के तौर तरीके भी अलग अलग नहीं हैं।


    यह दुनिया अगर कोई ग्लोबल विलेज है तो वह गांव साझे चूल्हे का है।जिसमें रिहाइश मिली जुली है।सूरज की रोशनी एक है।अंधियारा एक है।खुशी और गम के रंग भी एक से हैं।

    दर्द तड़प और तकलीफें भी एक सी हैं।


    रगों में दौड़ता खून भी एक सा है।लाल चटख और अनंत अंतरिक्ष नीला यह फलक है।उड़ान के लिए आसमां है तो तैरने के लिए समुंदर हैं।स्वर्ग की सीढ़ी हिमालय है।


    हिंदुत्व के झंडेवरदार कर्म के सिद्धांत को मनुस्मृति शासन, जातिव्यवस्था, जनमतजात विशुद्धता अशुद्धता और वर्ण,पुनर्जन्म,जन्म से मृत्यु तक के संस्कार,धर्मस्थल और देवमंडल के तमाम देवदेवियों के आर पार मनुष्यता के सरोकार और सभ्यता के सरोकार,कायनात की बरकतों और नियामतों के नजरिये से देख पाते तो हमारा राष्ट्रवाद हिंदुत्व का नही होता।


    हो सकें तो रामचरितमानस दोबारा बांच लें।

    अपने अपने धर्मग्रंथ दोबारा बांच लें।

    संतों फकीरों की वाणी फिर जांच लें।


    गोस्वामी तुलसीदास,दादु,संत तुकाराम,चैतन्य महप्रभु,कबीर, सुर, तुलसी, रसखान, मीराबाई, ललन फकीर किसी दैवी सत्ता या किसी धर्मराष्ट्र की जयगाथा कहीं नहीं सुना रहे हैं।बल्कि राष्ट्र की सत्ता के खिलाफ देव देवियों का मानवीकरण उनका सौंदर्यबोध है।


    आप संस्कृत को सबकी भाषा बताते हैं।संस्कृत का मतलब तंत्र मंत्र यंत्र तक सीमाबद्ध नहीं है।संस्कृत साहित्य की विरासत है और आप यह भी बताइये कि किस संस्कृत भाषा या साहित्य में धर्मराष्ट्र या फासिज्म का जनगणमन या वंदेमातरम हैं?


    बहुत चर्चा की जरुरत भी उतनी नहीं है।

    संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम में सत्ता के खिलाफ लोकतंत्र के उत्सव को समझ लीजिये।


    खजुराहो से लेकर कोणार्क के सूर्य मंदिर के भाष्कर्य में खालिस मनुष्यता के उकेरे हुए पाषाण चित्रों को गौर से देख लीजिये।


    महाकवि कालिदास का कोई भी नाटक पढ़ लीजिये।

    अभिज्ञान शाकिंतलम् में दुष्यंत के आखेट के विरुद्ध तपोवन का वह सौंदर्यबोध समझ लीजिये और विदा हो रही शकुंतला की  विदाई के मुहूर्त में मुखर उस प्रकृति के विछोह को याद कर लीजिये और सत्ता के दुश्चक्र में नारी की दुर्दशा कहीं भी, किसी भी महाकाव्य में देख लीजिये अमोघ निर्मम पितृसत्ता के पोर पोर में।


    मेघदूत फिर निर्वासित यक्ष का विरह विलाप है,जो विशुद्ध मनुष्यता है राष्ट्र और तंत्र की शिकार।कुमार संभव भी पितृसत्ताविरुद्धे।


    फिर संस्कृत काव्यधारा के अंतिम कवि जयदेव के श्लोक में बहते हुए लोक पर गौर कीजिये।


    छंद और अलंकार तक में देशज माटी की गंध महसूस कर लीजिये और दैवी सत्ता को मनुष्यता में देख लीजिये जो राष्ट्र और राष्ट्रवाद के उन्माद के विरुद्ध अपराजेय मनुष्यता का जयगान है।


    उन तमाम कवियों और उनकी कविताओं का फासिज्म के इस दौर में राष्ट्र या धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद कुछ बिगाड़ नहीं सकता जैसे कवि वाल्तेयर को मृत्युदंड देने सुनाने वाली राजसत्ता और दार्शनिक सुकरात को जहर की प्याली थमाने वाली सत्ता या अपने भारत मे ही बावरी मीरा को मौत की नींद सुलाने वाली पितृसत्ता मनुष्यता के इतिहास में कहीं दर्ज नहीं हैं,लेकिन वाल्तेयर आज भी जीवित हैं और सुकरात को पढें बिना कोई भी माध्यम या विधा की गहराई तक पैठना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हैं।मीरा के भजन भी हैं।

    उन्हें मौत के गाटउतारने वाला राष्ट्र और सत्ता कहीं नहीं है।


    कल हमसे अपने डाक्साहब मांधाता सिंह ने पूछा कि आप अमुक लेखक को जानते हैं जिनकी सैकड़ों किताबें छपी हैं और वे अनेक भाषाओं के विद्वान हैं।हमने पूछा कि उनने लिखा क्या है।


    जाहिर सी बात है कि विद्वता की पांत में हम कहीं नहीं हैं और न भद्रलोक संस्कृति के सौंदर्यबोध और भाषाशास्त्र और अनुशासन से मुझे कोई लेना देना है।


    विद्वान चाहे कितना महान कोई हो,कोई खुदा भी हो बेइंतहा ताकतवर,साहिबेकिताब भी हों बेमिसाल या फिर कोई नोबेलिया हों,हमें उनसे कोई मतलब तबतक नहीं है जबतक न कि वे टकरा रहे हों वक्त से और वक्त के हकीकत से और न वे कोई हरकत कर रहे हों इंसानियत और कायनात की बेहतरी के लिए।


    हमारे एक आदरणीय साथी जो रोजाना भड़ास बांचते हैं।आज भड़ास बंद होने से बेहद दुःखी थे।हमने उनसे रात दस बजे के करीब कहा कि यशवंत को फोन लगाओ।


    वे बोले कि वो कहीं दारु पीकर पड़ा होगा और उससे बात हम क्या करें।फिर थोड़ी देर बाद उनने अभिषेक के एक आलेख पर मंतव्य किया कि ये कौन हैं और क्या उलट पुलट लिखता है।


    खून फिर वहीं चंडाल खून है,उबल ही जाता है।हमारे दोस्तों और दुश्मनों का खासतौर पर मालूम है कि हमें किस तरह उकसाया जा सकता है।हमारे पूर्वज भी गर्म खून के शिकार होते रहे हैं क्योंकि जहरीले सांपों के ठंडे खून की तरह हमारा खून शीतलपेय नहीं है।


    कल रात फिर उबल गया खून।लेकिन हालात ने हमें सिखा दिया है कि खून जब उबाला मारे हैं तो प्रवचन कर दिया करें।कह सकते हैं हैं कि यह प्रवचन का रचनाकौशल और सौंदर्यबोध दोनों हैं।


    पहले तो हमने कहा कि यह समझ लो अच्छी तरह कि दिल्ली में फिलहाल हमारे कलेजे के चार टुकड़े हैं।अमलेंदु,यशवंत,रेयाज और अभिषेक तो इन पर टिप्पणी करने से पहले दो बार सोच जरुर लें।


    फिर हमने पूछा कि मीडिया में माई का लाल कौन है वह जो मीडिया में मालिकान और संपादक जो पत्रकारों और गैरपत्रकारों का खून चूसे हैं रोज रोज,सबको चिथड़ा चिथड़ा बना देते हैं,उसके खिलाफ एक लफ्ज भी लिखें या बोलें।


    भड़ास के मंच पर मीडिया का कोई सच नहीं छुपा है और इसके लिए वीरेनदा को भी गर्व था यशवंत पर और हमें भी उससे मुहब्बत है।


    कोई सात्विक हो,शाकाहारी हो,धार्मिक हो और दारु भी न पीता हो और वह बलात्कार भी करें। हत्या करें या नकरें ,हत्याओं की साजिश करें,अपने साथियों के हकहूक मारे तो उनसे बेहतर हैं दारुकुट्टा।


    शरतचंद्र सोनागाछी में रहते थे और दरअसल वे ही थे आवारा मसीहा देवदास आत्मध्वंस के ।लेकिन आप बता दें कि स्त्री की वेदना,स्त्री के अंतर्मन  को शरत से बेहतर किसी स्त्री ने भी अगर लिखा हो और वह भी सामंती पितृसत्ता के खिलाफ हर हालत में स्त्री का पक्ष लेते हुए।


    फिल्मकार ऋत्विक घटक शराब पीकर धुत पड़े रहते थे,लेकिन उनसे बड़ा फिल्मकार इस महादेश में कोई दूसरा हो तो बताइये।


    उसीतरह बेलगाम थे सआदत हसन मंटो,उनसे बेहतर अफसाना लिखने वाला कोई हुआ तो बताइये।


    अभिषेक बेरोजगार है लेकिन वही अकेला पत्रकार है जो  जिदाबान बीजमंत्र की तरह जापते हुए नियामागिरी के लड़ाकू आदिवासियों की नब्ज टटोलकर आया है और उसीने मराठवाडा़ के दुष्काल को संबोधित किया है और वही देश भर में दौड़ रहा है हर मसले के पीछे और हर मुद्दे पर बेखौफ स्टैंड ले रहा हैं।हमें तो ऐसे पत्रकार हजारों हजार चाहिए मुकम्मल फासीवाद के खिलाफ।


    रेयाज का भाषा पर इतना दखल है और इतिहास में दाखिले की खातिर उसकी तनिको दलचस्पी है ही नहीं।दुनियाभर में जो कुछ जनता के हक हकूक बहाली के लिए लिखा जा रहा है,तुरतफुरत वह उसे हिंदी में अनूदित कर रहा है।कितने लोग हैं इतने समर्पित।


    अभिषेक,अमलेंदु या रेयाज, तीनों  यशवंत की तरह पीने के लिए बदनाम भी नहीं हैं।उनका साथ आप कितना देते हैं,बताइये।


    हम सारे लोग कमपोर्ट जोन के परिंदे हैं और दरअसल हमारी उड़ान पर कोई रोक भी नहीं है और शौकिया हम बगावत कर रहे हैं लेकिन ये लोग अपना समूचा वजूद दांव पर लगा रहे हैं।


    हम अमलेंदु की क्या तारीफ करें और शायद अब तारीफ करने का हक भी नहीं हैं हमें।


    हमने अपने तमाम नजदीकी मित्रों से, देशभर में अपने लोगोेें से और जिन संगठनों को जनपक्षधर मानता रहा हूं,उनसे हस्तक्षेप को जारी रखने के लिए न्यूनतम मदद करने की लगातार गुहार लगाता रहा हूं और लगाता है कि इन तमाम लोगों और संगठनों की नजर में हमारी हैसियत दो कौड़ी की भी नहीं है कि वे सिरे से अनसुना कर रहे हैं।या वे हमारे काम को जात पांत के समीकरण से तौल रहे हैं।


    मोहल्ला लाइव कब से बंद पड़ा है।अपडेट होता नहीं है।

    रविवार बंद है।

    बहुजनइंडिया अपडेट होता नहीं है।

    अब भड़ास भी न जाने कब शुरु हो पायेगा।


    अमलेंदु फिर भी बिना किसी की मदद के हस्तक्षेप ताने जा रहा है बेखौफ और वह खुद बेरोजगार है और उसकी पत्नी भी नौकरी कहीं कर नहीं रही हैं।हम उसकी कोई मदद करने की हालत में नहीं हैं और रोज सुबह सवेरे उसे हांके जा रहे हैं बेशर्म।


    हममें से कोई सोचता ही नहीं कि हस्तक्षेप के अलावा उसे घर भी चलाना होता है।उसकी पत्नी से बात नहीं हुई,लेकिन अमलेंदु के कारनामे के लिए हमारी उस बहन को लाल नील सलाम कि उनने उसे रोका नहीं है।वे ही उसकी असली ताकत हैं।


    प्रिंट से,साहित्य संस्कृति से भाषाओं बोलियों से ,माध्यमों और विधाओं से बेदखल हम लावारिश लोग हैं जो बेहद तन्हाई में हैं और हम एक दूसरे हाथ थाम कर मजबूती से साथ खड़े भी नहीं है और जनता को भेड़धंसान बनाकर धर्मोन्मादी कायाकल्प हो रहा है मुल्क का।यह मुकम्मल  फासीवीद है,जिसमें चिड़िया को चहचहाने की इजाजत भी नहीं है।हम भी आत्मध्वंस पर तुले हैं देवदास मोड में।


    https://youtu.be/XibeTjOuvnc



    कैंसर से लड़ते हुए सोलह मई के बाद की कविता के मुख्य स्वर वीरेनदा रहे हैं तो सोलह मई के खिलाफ ,इस मुकम्मल फासिज्म की लड़ाई हमारी है।


    वीरेनदा चले गये तो  क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है।


    आज प्रवचन दे नहीं पाया।वीरेनदा अपराजेय हैं,जैसा कि मंगलेशदा ने लिखा है।लेकिन हम उनके भाई बंधु उतने भी अपराजेय नहीं हैं।


    निजी गम,निजी तकलीफों से निजात कभी मिलती नहीं है।उनमें उलझते ही जाना है।गौतम बुद्ध सिद्धार्थ से गौतम बने तो इसीलिए कि दुःख रोग शोक ताप का नाम ही जीवन है।


    यह उनकी वैज्ञानिक सोच थी कि उन्होंने इस पर खास गौर किया कि दुःख रोग शोक ताप हैं तो उनकी वजह भी होगी।


    उनने फिर सोच लिया कि दुःख रोग शोक ताप का निवारण भी होना चाहिए।इसके जवाब में उनने अपने मोक्ष,अपनी मुक्ति का रास्ता नहीं निकाला।सत्य,अहिंसा,प्रेम और समानता का संकल्प लिया।


    हम गौतम बुद्ध को भगवान मानकर उनकी पूजा करते हैं उनकी मूर्ति बनाकर,लेकिन उनके अधूरे संकल्पों को पूरा करने की सोचते भी नहीं है।हम भारत को बौद्धमय बनाना चाहते हैं और न पंचशील से हमारा कोई नाता है और न हम अपने को बौद्धमय बना पाये।

    हमने लड़ाई अभी शुरु भी नहीं की है,और हार मानकर हाथ पांव छोड़ दिये।डूब रहे हैं तो तैरने की कोशिश भी तो करनी चाहिए।

    वीरेनदा चले गये तो  क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है।फासिज्म के खिलाफ हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जबतक न हम उसे मुकम्मल शिकस्त नहीं दे पाते।


    वीरेनदा को लाल नील सलाम।




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    Organise Protests Against Kolkata Lathicharge


    Press Statement



    The Polit Bureau of the Communist Party of India (Marxist) has issued the
    following statement:





    Organise Protests Against Kolkata Lathicharge





    The Polit Bureau of the Communist Party of India (Marxist) condemns the
    brutal lathicharge on peaceful protesters in Kolkata on October 1. The
    Kolkata Left Front had organized a march to the Kolkata Police Headquarters
    at Lalbazar protesting against the deteriorating law and order in the city,
    police atrocities against Left Front workers and the hooliganism indulged in
    by the Trinamul Congress.



    More than 200 leaders and cadres of the Left Front including CPI(M) Central
    Committee Member Dipak Dasgupta and RSP leader Sukumar Ghosh were injured in
    the unprovoked and merciless lathicharge.



    The Polit Bureau also condemns the use of male policemen to attack the women
    who were participating in the procession.



    The Polit Bureau calls upon all its units throughout the country to organize
    protest actions and express solidarity with the people of West Bengal who
    are fighting for restoration of democratic rights. It appeals to all
    democratic minded people to raise their voices against the attempts to
    muzzle democratic dissent in the state of West Bengal.

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    Hindutva leader caught red handed throwing beef in a temple!
    মন্দিরে গরুর মাংস ছুড়তে গিয়ে হাতেনাতে ধরা খেল হিন্দু উগ্রবাদী নেতা



    মন্দিরে গোমাংসখণ্ড ছোড়ার অভিযোগে হাতেনাতে ধরা পড়ল বোরখার আড়ালে থাকা আরএসএস কর্মী। আজমগড়ের ঘটনায় বিফ বিতর্কে যোগ হল নয়া মাত্রা।হিন্দু মন্দির চত্বরে গোমাংস ছুড়ে ফেলে সাম্প্রদায়িক বিভেদ উস্কে দেওয়ার ঘটনা সাম্প্রতিক কালে দেশের নানা প্রান্তে দেখা দিচ্ছে। সম্প্রতি এমনই এক ঘটনা ঘটেছে উত্তরপ্রদেশের আজমগড়ে। 

    প্রত্যক্ষদর্শীরা জানিয়েছেন, মন্দিরের ভিতর মাংসখণ্ড ছুড়ে পালানোর সময় ধরা পড়ে বোরখা পরা এক ব্যক্তি। আবরণ উন্মোচনের পর পোশাকের আড়াল থেকে বেরিয়ে আসে এক তরুণ। টুইটারে সেই ছবি প্রকাশের সঙ্গে সঙ্গে তা ভাইরাল হয়ে যায়। 


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    Dear Friend,

    If you think the content of this news letter is critical for the dignified living and survival of humanity and other species on earth, please forward it to your friends and spread the word. It's time for humanity to come together as one family! You can subscribe to our news letter here http://www.countercurrents.org/subscribe.htm. You can also follow us on twitter, http://twitter.com/countercurrents and on Facebook, http://www.facebook.com/countercurrents

    In Solidarity
    Binu Mathew
    Editor
    www.countercurrents.org


    The Lynching Of Mohammad Akhlaq And The Undoing Of The Idea Of India
    By Suhail Qasim Mir

    http://www.countercurrents.org/mir011015.htm

    The lynching of Mohammad Akhlaq and brutally beating up his son, Danish by a mob in Dadri, UP for allegedly consuming and storing beef marks the travesty of the democratic and non-violent credentials of India. The culture of tolerance and secularism, which India is boastful about, is fast eroding. When endeavours are being made all over the world to embark new journeys towards peace and reconciliation, India seems to be moving back into history. Imposing ideals from a mythic past, which are objectionable to a large section of the population, seems to be the course that India has chosen


    Assault On Syncretic Traditions Of India
    By Ram Puniyani

    http://www.countercurrents.org/puniyani011015.htm

    How do we restore the complex cultural, religious, literary pluralism of India is something which the social movements need to ponder over in times to come


    Obama Lied About Syria
    By Eric Zuesse

    http://www.countercurrents.org/zuesse011015.htm

    U.S. President Obama's central case against Syria's Bashar al-Assad (and his central argument against Assad's supporter Russia on that matter) is that Assad was behind the sarin gas attack in Ghouta Syria on 21 August 2013 — but it's all a well-proven lie, as will be shown here


    The Gas Wars
    By Kenneth Eade

    http://www.countercurrents.org/eade011015.htm

    The "gas wars" are also the current impetus behind the anti-terrorist rhetoric in fighting ISIS in Syria. Dubbed the "Islamic Pipeline," a planned 3480 mile long Iran-Iraq-Syria natural gas pipeline going toward Europe from the Middle East, has the full support of the current Assad government. This pipeline project is competing with U.S. and European dreams to build a similar pipeline, originally contemplated to run from Qatar and Saudi Arabia through Syria to Turkey, to to supply European customers through Austria


    Seven Points Not On The Arab Media Agenda - What Is There To Celebrate?
    By Ramzy Baroud

    http://www.countercurrents.org/baroud011015.htm

    It has been recently announced that Arab 'media experts' plan to 'celebrate' Arab Media Day on April 21, 2016. The theme for the first day, of what is meant to be an annual tradition, is: "The Role of the (Arab) Media in Combatting Terrorism". The mockery is surely multi-faceted. One is the clearly politicized choice of the theme of the proposed event. The term 'terrorism' is a political one, and is rarely applied to violence committed by Arab regimes: it only applies to their detractors


    Flaming Middle East Finds End Of Single Pole
    By Farooque Chowdhury

    http://www.countercurrents.org/chowdhury011015.htm

    Ever flaming Middle East is turning a tough spot for the world imperialism. The region with widening conflict zones is now a formal confirmation of the end of single-polar world. Imperialism now can't dictate rules of games on its own there in the increasingly volatile area. Political developments in New York and Moscow on the last day of September carry the message


    Refugees Don't Cause Fascism, Timmermann – You Do
    By Dan Glazebrook

    http://www.countercurrents.org/glazebrook011015.htm

    Sustainable solutions are available, and always have been; namely 1) stop destabilising Africa and the Middle East: which means, precisely, stop arming sectarian insurgencies (Syria, Libya and Somalia), stop sabotaging diplomatic solutions by insisting on one side's surrender as a precondition to talks ('Assad must go') and stop forcing vulnerable economies to adopt regressive neoliberal policies which impoverish small producers ('structural adjustment programmes' and 'free trade areas'); and 2) implement the 1951 UN Convention on Refugees, and give refuge to all those fleeing persecution and war


    Iran And Appeasement At UN General Debate Also No Call For
    Justice via Nuremberg Prosecution of US
    By Jay Janson

    http://www.countercurrents.org/janson011015.htm

    Article is in regard to the address of President Hassan Rouhani of Iran before the UN General Assembly during its 2015 General Debate, the general atmosphere of appeasement during the debate, and an unwillingness, even by delegates of nations bombed and invaded by US or NATO, to uphold the UN Charter that contains the Nuremberg Principles of international law. Part of a series of articles on the UN General Debate


    Pope Francis In Philadelphia
    By Linh Dinh

    http://www.countercurrents.org/dinh011015.htm

    Lapsed Catholics take only what they like from the church, but political and business leaders can simply ignore the Vatican. They haven't gotten where they are by paying attention to popes. With Francis, though, they can even use his teachings about humility, forebearance, tolerance and charity to make us better endure the coming years of suffering and austerity as orchestrated by them, our true rulers. As Simone Weil points out, Catholicism is the religion par excellence for slaves


    Trumpocrisy
    By Nomi Prins

    http://www.countercurrents.org/prins011015.htm

    The Donald's Finances and the Art of Ignoring Conflicts and Contradictions


    Migration As A Means of Livelihood or An Escape Route: An Empirical Analysis
    By Roli Misra

    http://www.countercurrents.org/misra011015.htm

    The out migration from the state of Assam is continuing because the returns from the agriculture are low. The government policy which is supposed to maintain and preserve their identity of this religious minority is non effective in the state of Assam


    Anarchy In Kashmir!
    By Mohammad Ashraf

    http://www.countercurrents.org/ashraf011015.htm

    Total anarchy in every sphere of life seems to have taken hold of entire Kashmir. There is absolute free for all without even a semblance of accountability!

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    Bollywood – Mumbai and TV Industry declares indefinite strike

    Posted by :kamayani On : October 2, 2015

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    THE  FILM &  INDUSTRY DECLARES A STRIKE!

    pandey

     

    Come October 3 onwards, all workers of this  industry, including directors, actors, music directors, cinematographers, all other technicians, junior artistes, screenwriters and lyricists are going on an indefinite strike. 

    Anjum Rajabali

    We were hoping to avoid this, and did our damdest for that, but unfortunately, in the face of demeaning obduracy, we failed. Hence, the only way out of a rather grim situation is to continue the struggle by striking work!

    So, all the workers of this industry, including directors, actors, music directors, cinematographers, all other technicians, junior artistes, AND screenwriters & lyricists are going on strike from October 3, 2015.

     

    Background for screenwriters
    The vulnerable position and condition of screenwriters in the film industry is no secret. And, the primary reason for that is that writers' contracts are unfair, are totally one-sided in favour of producers, exploitative, and violate the Copyright Act, as we explain below. Writers' contracts humiliate the writer! In too many contracts, even credit is not assured. Shockingly, the contracts of even some established writers say, 'Final credit will be on the discretion of the producer'! And, 'This contract can be terminated by the producer at any time, without assigning any reason whatsoever'! This allows the producer to throw you out, snatch your written work, take your credit away, and deny you your balance fees. (Some contracts even state that the writer will return the fees, if the producer is unhappy with the work!!) Wow!

    Plus, it is a known fact that new writers, no matter how good their work and how talented they may be, are paid a pittance, often less than Rs. 1 lakh for the entire script. Even successful writers are paid much much less than the worth of their work. This, when film budgets are ballooning rapidly and proudly, all the time. And, star salaries have hit the sky!

    Copyright Law
    The amended Copyright Act was unanimously passed by parliament in June 2012. It now contains sections that are protective of writers' rights. According to this law now

    – When a writer writes, s/he creates intellectual property of which s/he is the first owner
    – S/he then has the right to assign it to the producer to make a film, making him the second owner
    – The right to be called the author of that work is permanently his/hers
    – While the producer is free to commercially exploit the script, when the film based on your script is shown on TV, on the Internet or on any platform outside of a cinema hall, you are entitled to royalties (a percentage of such earnings). If the film is remade or adapted or dubbed or converted into a TV serial or book or commercially exploited in any way whatsoever, you are entitled to royalties from such exploitation. This right to receive royalties cannot be assigned or sold to anyone, including to the producer. No one can take it away!
    – This royalty is separate from the writing fee. And, you are to receive it for your entire lifetime, after which your heirs get it for 60 years after your death. (Royalty rates are formulated by the writers' copyright society and confirmed by the Copyright Board. While HRD Ministry is still to appoint a Copyright Board, do know that you will get your royalties in retrospect from June 21, 2012, and writing contracts have to acknowledge that.) Royalty does not depend on the generosity of the producer. It is your legal right.
    This is the clear and unambiguous copyright law of this country.

    Illegal contracts
    How many writers' contracts have these clauses? None! Instead, they term the writing fee 'advance royalty', or flatly write that the writer forgoes his/her right to receive royalty. This is blatantly illegal.

    For too long have all screenwriters suffered such practices that deny them the due value of their work, their credit and royalty!

    Why do they do this? Simple answer: Because they can! As businessmen, their aim is to squeeze costs wherever possible, and writers are soft, unprotected targets. Their high-sounding words about writers being very important never seem to translate into contracts, fees and rights!

    FWA's Minimum Basic Contract
    To rectify this situation, and regulate the writer-producer relationship, FWA insisted on a basic standard contract for film & TV writers and lyricists, which would have some essential protective clauses, and a schedule for minimum fees, production slab-wise. After intensive consultations with several IP lawyers and about 25 film screenwriters including Javed Akhtar, Vishal Bhardwaj, Jaideep Sahni, Sriram Raghavan, Rajat Aroraa, Shridhar Raghavan, Abbas Tyrewala, Amole Gupte, Saket Chaudhary and others, a Minimum Basic Contract (MBC) was formulated.

    – It is based on the principles of mutuality and fairness.

    – Holds both, the producer and the writer, accountable to their respective commitments

    – Guarantees your credit.

    – Confirms your right to receive royalty.

    – Protects you against arbitrary termination.

    – Has a schedule of minimum writing fees, budget-wise.

    Our MBC was examined by senior Indian and international writers, other writers' guilds, senior IP lawyers, and most importantly by producers themselves. It was termed reasonable by all of them! In fact, three years ago, when FWA officially negotiated this MBC with the Film and TV Producers Guild, all the above clauses were mutually agreed to! They even wrote to us confirming this!! And, yet, when the copyright act was amended, they summarily backtracked.

    The solution: Collective Bargaining
    Screenwriters the world over envy the status and rewards that Hollywood writers enjoy. Why do they get this and Indian writers don't? The only, and we repeat, the only difference is collective bargaining! The bargaining power of an individual writer is grossly unequal compared to that of the producer. So, the Writers Guild of Americaenforces their own Minimum Basic Agreement with the collective support of all its members. And, even they've had 3 strikes since the 40s before achieving their currently enviable position.

    FWICE's MoU
    The Federation of Western India Cine Employees (FWICE, the mother-body of all 23 unions) signs a Memorandum of Understanding (MoU) with Producers' bodies to ensure a wage-increase and improved working conditions for workers. But, this was mainly for the physical workers. This year, FWA and other talent-based unions, including cinematographers, editors, art directors, sound recordists, etc. decided that our proposed standard contracts should be included in that collective MoU.

    The Producers' representatives agreed, in principle, that negotiation meetings with all the unions would be concluded and the MoU signed by January 2015.

    Why strike?
    But, that has not happened. Unending prevarications, procrastinations, cancellations, and excuses have been used to not sign it. The sub-text is clear: On their own, they will not grant us our rights. Not until, we resolve to struggle and fight for it.

    After 14 months of suffering delaying tactics, FWICE was left with no choice but to declare a general strike. All the 23 unions, actors, directors, music directors, every single worker of the Film & TV industry, including FWA, are going on strike!

    Of course it is going to be difficult to sustain the strike. In a relationship-based industry, telling one's producer that I am on strike and won't write is deucedly awkward. You fear for your job. A writer's strike in  is unprecedented, and hence fraught with doubts, misgivings, anxiety and questions.

    Entirely understandable. But, the alternative of a no-strike seems clear too. You continue to be denied the fair value of your work. You get exploited for ever. You continue to suffer the humiliation of unfair contracts, which take away your rights AND your dignity.

    On the other hand, if screenwriters remain united and speak in one voice and action through this strike, they can compel producers to collectively negotiate a fair and just MBC, which will assure every screenwriter of a decent status. So, while we don't want a strike, it seems clear that we need it. Moreover, as members of their union, screenwriters are bound by it.

    All working writers, please feel free to feel free to write in your questions and issues to filmwritersassociation@gmail.com. Please cc anjumrajabali@gmail.com

     

    It's time to stop being helpless. It's time to make a difference. And, if we stand together, we can!

    In solidarity

    Anjum Rajabali (Convener, Film MBC)
    Saket Chaudhary (Member, Film MBC)
    Abhijeet Deshpande (Member, Film MBC)
    Manisha Korde (Member, Film MBC and Jt. Secretary FWA)
    Sanyuktha Chawla-Shaikh (Member, Film MBC)
    Pooja Varma (Member, Film MBC)
    Vinod Ranganath (Convener, TV MBC and Vice President FWA)
    Rajesh Dubey (Member, TV MBC)
    Zaman Habib (Member, TV MBC and Jt. Secretary FWA)
    Preiti Mamgain (Member, TV MBC and Treasurer FWA)
    Rajita Sharma (Member, TV MBC)
    Mayur Puri (Convener, Lyricists' MBC)
    Kamlesh Pandey (General Secretary FWA and President FWICE)

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    Jammu and Kashmir a symbol of diversity , It holds special place as the only Muslim majority State in the federal structure of the country. Mufti : Daily : Chattan : Srinar : Friday, October 02 : By : Makbool Veeray :

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    आत्म-स्वीकारोक्ति

    मैं असली अम्बेडकरवादी नहीं हूँ!

    मैं किसी भी अविवेकी उन्मादी भीड़ का हिस्सा होने से इंकार करता हूँ

    bhanwar meghwanshiहिंदुत्व का छद्म चमचा, सवर्णों के तलुवे चाटने वाला तथा दलित बहुजन आंदोलन का गद्दार है, दलित विरोधी है तथा शेर की खाल में भेड़िया है।''आजकल सोशल मीडिया पर मैं इन्हीं अनंत विभूषणों से विभूषित हूँ, क्योंकि मैंने सच को सच कहने का दुःसाहस कर दिया, एक जमीन की लड़ाई को प्रॉपर्टी का संघर्ष कह दिया और दलित अत्याचार नहीं माना, जिससे बाबा साहब के नाम पर दुकानें चला रहे दलितों के ठेकेदार खफा हो गए हैं तथा उन्होंने फतवा जारी कर दिया है कि- भँवर मेघवंशी एक नकली अंबेडकरवादी है।

    भंवर मेघवंशी

    यह अभियान इन दिनों दलित बहुजन आंदोलन के जिम्मेदार साथियों की जानिब से मेरी मुखालफत में भीलवाड़ा जिले में लांच किया गया है जो मुझे 'दलित द्रोही'सवर्ण हिंदुओं के तलवे चाटने वाला, गद्दार, दलितों के नाम पर दुकान चलाने वाला घोषित कर रहा है।

         पिछले दिनों के एक घटनाक्रम की वजह से मुझे 'दलित विरोधी'ही नहीं बल्कि 'दलितों का घोर दुश्मन'भी घोषित किया गया है, वह मेरे निवास अम्बेडकर भवन से 30 किलोमीटर दूर स्थित करेड़ा कस्बे में स्थित एक धर्मस्थल हरमंदिर की भूमि को लेकर हो रहा एक विवाद से जुड़ा हुआ है। हुआ यह कि करेड़ा में चारभुजानाथ व हरमंदिर की जमीनें जो कि 92 बीघा के करीब है, उन पर बरसों से खटीक, कलाल तथा वैश्य जाति के काश्तकार 'खड़मदार'के नाते खेती कर रहे थे तथा वे लगान मंदिर के पुजारी को जमा करवाते आ रहे थे, इनमें से कईयों को सामंतशाही के दौरान के राजा-महाराजाओं ने कुछ पट्टे आदि भी जारी कर रखे थे, मगर जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन के साथ ही इन सामंतों द्वारा जारी तमाम पट्टे शून्य हो गए तथा राजस्थान काश्तकारी अधिनियम के तहत तमाम भूमियों की मालिक राजस्थान सरकार हो गई, खातेदार मंदिर के पुजारी तथा खड़मदार के रूप में विभिन्न जातियों के लिए लोगों के नाम भी दर्ज कर दिये गए।

          बाद के घटनाक्रम में सन् 1991 में भैरोंसिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व काल में राजस्थान सरकार ने पुजारियों द्वारा मंदिर माफी की जमीनों को खुर्दबुर्द किए जाने की व्यापक शिकायतों के मद्देनजर एक परिपत्र जारी कर मंदिर माफी की जमीनों को पुजारियों तथा खड़मदारों के बजाय मंदिर मूर्तियों के नाम दर्ज करने के आदेश जारी कर दिए, फलस्वरूप 1992 में करेड़ा में चारभुजानाथ तथा हरमंदिर की भूमियों पर बरसों से काबिज तमाम खड़मदारों  के नाम विलोपित किए जाकर उक्त भूमि का स्वामित्व मंदिर मूर्तियों को दे दिया गया तथा उनके बेचान पर, खुर्द बुर्द करने, रेहन रखने या बटाई अथवा खड़मदारी पर देने पर भी रोक लगा दी गई। इस तरह सभी खड़मदार काश्तकारों का मालिकाना हक स्वतः ही राजस्व रिकोर्ड में समाप्त हो गया। इस बारे में विगत 22 सालों से कोई हलचल नहीं हुई, विभिन्न जाति के पूर्व खड़मदार देवस्थान की जमीनों पर ही काबिज रहे और उक्त जमीन का उपयोग उपभोग करते रहे।

       हाल ही में चम्पाबाग तथा हनुमान बाग के महंत सरजूदास महाराज के महंताई समारोह के पश्चात् उन्होंने सभी जमीनों को कब्जे में लेने की कार्यवाही प्रारंभ की तथा काबिज काश्तकारों व ग्रामीणों के सहयोग से हरमंदिर की 15 बीघा जमीन को भी अतिक्रमण मुक्त करवा कर तारबंदी कर दी गई। इस पूरी कार्यवाही में करेड़ा के खटीक समाज तथा कलाल समाज व अन्य समुदाय के लोगों ने स्वेच्छा से अपने कब्जे खुद ही हटाए तथा सार्वजनिक रूप से यह उद्घोषणा भी की कि अगर महंत सरजूदास महाराज इस खाली करवाई गई जमीन पर सार्वजनिक हित के लिए चिकित्सालय बनाते हैं तो वे तन, मन, धन से पूरा सहयोग करेंगे।

    शुरू-शुरू में तो सब कुछ सामान्य था पर अचानक स्थितियां बदलने लगी तथा स्वयं कब्जा हटाने वाले सामान्य तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के कुछ लोगों ने दलित जाति के काश्तकारों के कंधों पर बंदूक रखकर इस लड़ाई को 'दलित उत्पीड़न'का रंग देने की कोशिश शुरू कर दी।

        मैं इस घटनाक्रम से अपरिचित ही रहता अगर 20 सितंबर 2015 को ग्रामीणों व खटीक समुदाय के लोगों के मध्य प्रशासन की मौजूदगी में 'हिंसक झड़प'के समाचार सोशल मीडिया में नहीं देखता। करेड़ा के दलित व सवर्ण सभी समुदाय के लोग आपसी समन्वय से सभी चीजें कर रहे थे, तब तक मुझ जैसे 'दलितों के नाम पर दुकान चलाने वाले'व्यक्ति तक कोई समाचार ही नहीं आ रहे थे। आज जो दलित अत्याचार के बड़े-बड़े आरोप लगाकर पीड़ित बने घूम रहे हैं, वे महाशय भी अपनी जमीनें स्वेच्छा से खाली करके महंत सरजूदास महाराज के शिष्य बालकदास को नासिक के कुंभ में घुमा रहे थे, तब तक मुझसे किसी ने कोई सम्पर्क नहीं किया, सब अच्छा ही चल रहा था। सैंकड़ों लोगों के सामने उन्होंने स्वेच्छा से अपने कब्जे वाली मंदिर की जमीन खाली करने के स्टांप तक दिए, फिर अचानक ही उन्हें अहसास हुआ कि महंत हम पर अत्याचार कर रहे हैं और हमारी पैतृक जमीन हमसे छीन रहे हैं।

       एक और तथ्य ध्यान में लाने की बात है कि उक्त अतिक्रमण मुक्त करवाई गई जमीन के तीन बिस्वा हिस्से पर कुछ दलितों व कुछ अन्य समाजों के मकान व दुकानें बनी हुई हैं, जिन्हें खाली करवाने या तोड़ने के बारे में मंहत सरजूदास महाराज ने कभी कोई इच्छा नहीं दर्शाई, मगर इसी दौरान 20 सितम्बर की हिंसक झड़प हो गई। इससे पहले 10 कलाल तथा 27 खटीक काश्तकारों ने अपने कब्जे रही जमीन के सम्बन्ध में एसडीएम कोर्ट मांडल में एक वाद दायर करके कानूनी लड़ाई भी प्रारंभ कर दी जो अभी विचाराधीन है। मगर शायद कोर्ट के मार्फत उन्हें राहत मिलने की संभावना कम लगी तो इस मामले को अलग रंग देने तथा इसे 'दलित उत्पीड़न'बताकर राजनीतिक समर्थन जुटाने की कवायद शुरू कर दी।

    20 सितम्बर को एक मूर्तिकार द्वारा खाली किए भूखण्ड पर कब्जा करने की कोशिश शुरू हुई, इसका प्रतिरोध महंत सरजूदास के दो साधुओं व दो ग्रामीणों द्वारा किया गया, प्रतिक्रिया में दलित स्त्रियों द्वारा किये गए पथराव में चार लोग घायल हो गए, जिससे मामला अत्यंत संगीन हो गया और विरोधस्वरूप लोग एकजुट होने लगे।

     इस हादसे के बाद उसी दिन करेड़ा थाने में 53 लोगों के विरुद्ध अजा जजा (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराने हेतु अर्जी दी गई जिसमें घटना का कवरेज करने गए तीन पत्रकारों, एक वकील तथा गांव के ऐसे लोग जो गाँव में उस दिन मौजूद ही नहीं थे, ऐसे दर्जनों लोगों के नाम भी शामिल कर दिए गए, यहां तक कि एक दलित जनप्रतिनिधि को भी इसमें आरोपी बनाया गया। इस प्रकार के मनगढ़ंत आरोपों ने आग में घी डालने का काम किया. पूरा गांव उबल पड़ा और आस-पास के गांवों से सवर्ण युवाओं के एकजुट होकर प्रतिक्रिया करने के समाचार मिलने लगे.

       दलितों के विरुद्ध हिंसा की संभावना बनते देखकर मैंने इस मामले में दखल करने का मानस बनाया और मैं घटना के एक दिन बाद 21 सितंबर को करेड़ा पहुंचा, विभिन्न लोगों से मिला तो मुझे पता चला कि करेड़ा के आम नागरिकों से लेकर प्रशासन तक में यह बात किसी सुनियोजित षड्यंत्र के तहत पहुंचाई गई कि 'दलित उत्पीड़न'का यह झूठा मामला बनवाने तथा दलित पक्ष को उकसाने में मैं प्रमुख भूमिका निभा रहा हूँ तथा दलितों को भड़काने तथा गांव के निर्दोष लोगों को फंसाने के काम में अग्रणी भूमिका में हूँ।

    मेरे लिए अपनी भूमिका का स्पष्टीकरण देना इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि इस मामले से आक्रोशित सवर्ण हिंदू जातियों की संभावित प्रतिक्रिया काफी खतरनाक रूप ले सकती थी और जहां पर धर्म, आस्था का सवाल हो तो भीड़ बिना सोचे विचारे उन्मादी होकर कुछ भी कर सकती है।

    मैंने तय किया कि मैं इस मामले में एक सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करूं ताकि दलितों पर किसी भी संभावित खतरे को टाला जा सके।

      मैंने करेड़ा के रेगर, खटीक, जीनगर, सालवी, सरगरा तथा वाल्मीकि जैसी दलित समुदाय की जातियों के मोतबीरों से मुलाकात की तथा उनसे फीडबैक लिया कि क्या उनके साथ महंत सरजूदास तथा ग्रामीणों की ओर से कोई भेदभाव किया जा रहा है? क्या वहां हो रहे धार्मिक आयोजन में किसी प्रकार की छुआछूत या उत्पीड़न अथवा रोकटोक की जा रही है?

    मुझे यह जानकर तसल्ली मिली कि हनुमान बाग स्थित हरमंदिर की जमीन पर चल रहे आयोजन इत्यादि में सभी जातियों के लोग अपनी सहभागिता निभा रहे है तथा महंत सरजूदास का रवैया दलितों के प्रति समानतापूर्ण व बंधुत्व का है।

    मुझे करेड़ा के दलित समाज तथा आस-पास के गांवों के दलित समाज के लोगों ने महंत सरजूदास महाराज की प्रशंसा के ही शब्द कहे तथा यह भी कहा कि इन संत की वजह से हम सब जाति समुदाय के लोग पहली बार एक साथ एक जाजम पर बैठ पाए हैं और गांव में सामाजिक समरसता व सौहार्द्र का माहौल बना है। जिसे अब कुछ वो लोग जिनका जमीन संबंधी स्वार्थ है, वे बिगाड़ना चाह रहे हैं और इसे जातीय संघर्ष में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि अनुचित है।

     मैं महंत सरजूदास से मिलने उनके मचान पर पहुंचा तथा उन्हें अपनी इस चिंता से अवगत कराया कि कहीं आपके शिष्य, भक्त या समर्थक दलितों के प्रति किसी प्रकार की हिंसक प्रतिक्रिया नहीं कर दें।

    मैंने कहा कि जमीन के हक की लड़ाई अपनी जगह है, मगर दलितों पर किसी प्रकार का अन्याय, अत्याचार नहीं होना चाहिए।

    महंतजी ने इस बात का वचन दिया कि किसी भी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। साथ ही उन्होंने भी मुझसे भी यह सहयोग चाहा कि जिन ग्रामीणों के विरुद्ध एससी एसटी एक्ट में झूठा मुकदमा दर्ज करवाया गया है, उसकी भी निष्पक्ष जांच हो। कोई बेवजह नहीं फंसाया जाए।

    मैंने उन्हें तथा वहां मौजूद आक्रोशित हजारों ग्रामीणों जिसमें सैंकड़ों दलित भी मौजूद थे, के समक्ष माइक पर कहा कि-अजा जजा (अत्याचार निवारण) कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा तथा जरूरत पड़ने पर जिले के आला अधिकारियों से मिलकर उन्हें भी झूठे फंसाने वाले मामलों में कार्यवाही नहीं करने का आग्रह किया जाएगा।

      यह करके मैं उस रात घर लौट गया, लोग भी शांत होकर अपने-अपने घरों को लौट गए। अगर मैं हल्की सी भी चूक करता या भड़काने वाली भाषा का इस्तेमाल करता तो वहां पर जातीय संघर्ष तय था, मगर वक्त की नजाकत को देखते हुए मैंने हिंसक टकराव को टालने की पूरी कोशिश की तथा क्या मैंने गलत काम किया ? मुझे दलितों की सुरक्षा के प्रति चिंतित नहीं होना चाहिए ? दूसरे दिन 22 सितम्बर 2015 को करेड़ा से तकरीबन 200 लोग जिसमें दलित समुदाय के भी 50-60 लोग शामिल थे, वे भीलवाड़ा जिला मुख्यालय पहुंचे तथा उन्होंने करेड़ा में चल रहे घटनाक्रम की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच की मांग की। मैं भी अपने पूर्व वादे के मुताबिक उनके साथ प्रशासन व मीडिया से मिला तथा मैंने जिले के आला अधिकारीयों से आग्रह किया कि -'यह जमीन के अधिकार का विवाद है, इसे दलित उत्पीड़न बताना एक दुखद कदम है, इससे क्षेत्र की शांति भंग हो सकती है और भाईचारा खत्म होने से होने वाले जातीय संघर्ष से सर्वाधिक नुकसान दलितों का होने की सम्भावना है ।'

      मैं जिला प्रशासन से मिल कर अपने घर लौट गया तथा करेड़ा का जनजीवन पटरी पर आने लगा, लोगों का गुस्सा भी शांत होने लगा, मेरी भूमिका किसी भी तरह से हिंसक टकराव से दलितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की थी, मैं अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए अपने लोगों को किसी भी प्रकार के हिंसक संघर्ष में धकेलने के पक्ष में नहीं था। मुझे खुशी है कि मेरे साथ खड़े होने से सवर्ण हिंदुओं का गुस्सा काफी कुछ कम हुआ। मगर 'दलितों के ठेकेदार'इस  समन्वयन, सौहार्द्र, भाईचारे और मोहब्बत को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे ? उन्होंने आनन-फानन में सोशल मीडिया पर क्रांतिकारी लेखन चालू कर दिया।

    एक हिन्दू धर्म छोड़ चुके एक सज्जन ने मुझे लिखा कि- ''मैं 'ढोंगी महाराज'के जरिए हिंदू धर्म को बढ़ावा दे रहा हूँ तथा दलितों को 'सीताराम सीताराम'कहने के लिए मजबूर कर रहा हूँ।''

    मैंने उनसे पूछा कि- आप ईमानदारी से बताएं कि क्या मैं वाकई ऐसा कर रहा हूँ और क्या करेड़ा के दलितों पर कोई जातिगत अत्याचार हो रहा है अथवा यह महज जमीन सम्बन्धी विवाद है ?

    वे कोई तथ्यात्मक जवाब देने के बजाय मेरी निष्ठाओं पर सवाल उठाने लगे तथा कहने लगे कि मैं दलित समाज के खिलाफ हूँ, सवर्णों के हाथों बिका हुआ हूँ, हिंदुत्व को बढ़ावा दे रहा हूँ।

    मैंने यथासंभव उनके प्रश्नों का जवाब दिया, मगर वे यह मन बना चुके थे कि मैं इस मसले से दलित विरोधी हो चुका हूँ, उनका तो यहाँ तक कहना था कि अगर दलित गलत भी हो तब भी मुझे दलितों के ही पक्ष में बोलना चाहिए क्योंकि मेरा काम है दलितों की आवाज़ बुलंद करना ना कि सवर्णों के प्रति सहानुभूति रखना।

    उन्होंने कहा कि –"दलित कभी भी गलत नहीं हो सकता है। अगर मैं इस मसले में उनके साथ नहीं खड़ा होता हूँ तो वे दलित अधिकारों के लिए नेटवर्क चलाने वाले एनजीओ के साथ मिलकर मेरा राष्ट्रव्यापी पर्दाफाश कर देंगे तथा मुझे झूठा, फर्जी व नकली अंबेडकरवादी घोषित करवा कर मेरी दलित दुकान पर ताला लगवा देंगे।''

      मैंने उनसे कहा कि वे जो भी उचित समझे, करने को स्वतंत्र हैं। मुझे जो भी उचित लगा वह मैंने किया है तथा आगे भी करूंगा। मेरे लिए दलित प्रश्न जीवन मरण का प्रश्न हैमैं आम गरीब दलित के हक में खड़ा हूँना कि करोड़ों रुपए की फण्डिंग लेकर दलितों के नाम पर कारोबार चलाने वालों अथवा ढाई किलो सोने की झंझीरों का गले व हाथों में लटका कर वैभव का भौंडा प्रदर्शन करने वाले अवास्तविक दलितों का पक्षधर ! मेरे सरोकार सदैव ही स्पष्ट थे और आज भी है।

    मैंने उन महाशय को कहा कि आपको लोगों को यह भी बताना चाहिए कि करेड़ा में मंदिर माफी की जमीन से सिर्फ दलित ही नहीं हटाए गए हैं बल्कि अन्य जाति समुदाय के लोग भी हटे हैं, सब लोग स्वेच्छा से हटे हैं, यह किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती या अन्याय -अत्याचार का मामला कतई नहीं था। आज की तारीख में जमीन का स्वामित्व व कब्जा हरमंदिर के पास है तथा एक कानूनी लड़ाई के जरिए जीत कर इसको वापस पाया जा सकता है।

    मेरा उन्हें सुझाव था कि किसी भी प्रकार का सड़क का संघर्ष इन दलितों को कुछ भी राहत नहीं देगा। हां यह नाटकबाजी कुछ सामाजिक कारोबारियों का प्रोजेक्ट पूरा कर सकती है तो कुछ मृतप्रायः विफल राजनेताओं को राजनीतिक संजीवनी भी दे सकती है, मगर करेड़ा के दलितों को राहत नहीं दिला सकती है।

    मेरी इस तरह की बात उन्हें पसंद नहीं आई, उन्होंने मुझे अम्बेडकरवाद से बाहर निकालने की कवायद प्रारम्भ कर दी। फेसबुक, व्हाट्स एप, ट्वीटर आदि सोशल मीडिया पर उन्माद फैलाया जाने लगा था और देखते ही देखते मुझे 'दलित विरोधी'व 'सवर्णों के तलुवे चाटने वाला'घोषित करने की होड़ सी मच गई।

       मित्रों, मुझे इन आलोचनाओं और असहमति के स्वरों से कतई दुख नहीं हैमैं इनका स्वागत करता हूँमैं किसी भी अविवेकी उन्मादी भीड़ का हिस्सा होने से इंकार करता हूँमैंने कभी स्वयं को महान अंबेडकरवादी घोषित नहीं किया, मैं बहुत अच्छी तरह से यह जानता हूँ कि मैं अंबेडकर की बताई राह का पथिक मात्र हूँ, मुझमें असली अंबेडकरवादी होने के गुण अभी मौजूद नहीं हैं। मैं बाबा साहब की 22 प्रतिज्ञाओं का पालन नहीं कर रहा हूँ, मैं अंबेडकर का अध्येयता हूँ,उनका प्रशंसक और समर्थक हूँमगर मैं असली अंबेडकरवादी नहीं हूँ। आज भी मैं सैंकड़ों ऐसे काम करता हूँ जो एक सच्चे अंबेडकरवादी को नहीं करने चाहिए। मेरा पूरा परिवार हिंदू रीति-नीति से जीवन जीता है, कई प्रकार के देवी-देवताओं की तस्वीरें मेरे तथा मेरे रिश्तेदारों के घरों की शोभा बढ़ा रही है। प्रतिवर्ष मैं दर्जनों रामरसोड़ों के उद्घाटन व समापन में हिस्सा लेता हूँ, अब तक हजारों सत्संगों में शिरकत कर चुका हूँ, जिसमें अलखनामी, वेदान्ती, रामस्नेही तथा कबीरपंथी संतों की उपस्थिति रहती है। मैं सूफी संतों से प्यार करता हूँअजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती से लेकर दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया व करेड़ा के सैलानी सरकार तक के उर्सों में सक्रिय भागीदार रहा हूँजैन मुनियोंरागियोंग्रंथियोंभिक्खुओंतिब्बती लामाओंरेव्रेण्डस,पास्टर्सफ़ादर ,ओझागुणीभोपातांत्रिकमांत्रिकसिद्ध आदि ना जाने कौन-कौन लोग अब तक की जीवन यात्रा में मिल चुके हैसबसे मैंने कुछ ना कुछ सीखा ही है। मैं वैचारिक कट्टरपंथ का भी कभी आग्रही नहीं रहा, मार्क्सवाद, बुद्धिज्म, गांधी विचार, अम्बेडकर, फुले, पेरियार तथा कांशीराम, जेपी और राममनोहर लोहिया जैसे तमाम सारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक विचारों व देशनाओं को करीब से जानने-समझने की कोशिश करते रहा हूँ। विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संगठनों से मेरा लंबा जुड़ाव रहा है। पेशे से पत्रकार और आदत से एक्टिविस्ट हूँजिंदगी को पूरे अल्हड़पनमस्तीआनंद तथा खुलेपन से जीने में यकीन करता हूँ। विगत दो दशक से जो भी देखा, जाना, सोचा व समझा, उसके बारे में किसी की नाराजगी या खुशी की परवाह किए बगैर अपने विचार व्यक्त करते आया हूँ, कभी भीड़ की परवाह नहीं की, लोकप्रियता, गालियों व गोलियों की तरफ ध्यान नहीं दिया, मानवतावाद, समतावाद, प्रगतिशीलता के साम्यवादी व मुक्तिकामी मूल्यों का गुणगाहक रहा हूँ।

       रही बात मुझ पर ढोंगी बाबाओं, हिंदुत्व को बढ़ावा देने के आरोपों की तथा दलितों के विरुद्ध काम करने के की तो इन बातों का जवाब वक्त देगा, लोग देंगे और दस्तावेज देंगे। मुझे इस बारे में बहुत कुछ नहीं कहना है। यह सही है कि मैं आज भी दलित हिंदुओं की एक बड़ी आबादी के मध्य कार्यरत हूँ, मेरा विश्वास धर्म परिवर्तन के जरिए सामाजिक बदलाव में नहीं हैक्यूंकि मुझे किसी भी धर्म में मुक्ति का रास्ता नहीं दिखता। मैं मंदिर प्रवेश, यज्ञों में भागीदारी, बेवाण निकालने जैसे तरीकों में दलितों की आजादी के प्रयत्नों की विफलता से वाकिफ हूँ, मैं जमीन के झगड़ों की व्यक्तिगत लडाई और दलितों के स्वाभिमान, हको हकूक की रक्षा के सामूहिक जनआंदोलन के मध्य के फर्क को बहुत अच्छी तरह समझ सकता हूँ। मैंने कभी भी 24 कैरेट शुद्ध अंबेडकरवादी होने का दावा नहीं किया। कई बार मुझे लगता है कि मेरे विचार भले ही अंबेडकरवादी हो मगर व्यवहार में तो मैं सिर्फ एक नकली अंबेडकरवादी हूँ, आज भी मैं बाबा रामदेव के मंदिरों में जाता हूँ, सूफी संगीत सुनता हूँ, कबीर सत्संगों में तिलक लगवाता हूँ, हिंदू पर्व-त्यौहारों को अपने परिवार के साथ मिलकर आराम और उल्लास से मनाता हूँ, हाल ही में मेरी बहनों ने मेरी कलाई पर राखी का धागा बांधा था। दीवाली पर मेरे घर आंगन में दीप जलते हैं, गांव में मेरे घर के पास होलिका दहन होता है, गुरू पूर्णिमा के उत्सवों में मैं शिरकत करता हूँ। दलित समुदाय की विभिन्न जाति समाज के मंदिरों पर आयोजित सभाओं में शामिल होता रहता हूँ, अपने मुस्लिम दोस्तों को ईद की मुबारकबाद देता हूँ तो ईसाईयों को  हैप्पी क्रिसमस कहता हूँ, बुद्ध जयंती, महावीर जयंती, नानक, कबीर, रैदास की जयंती पर बधाई व शुभकामना के संदेश भेजता हूँ।

    कुल मिलाकर मैं वह सब करता हूँ जो एक आम सक्रिय सेकुलर उदारवादी भारतीय नागरिक करता हैइसलिए भी मैं  संभवतः असली अंबेडकरवादी होने का दावा करने में सक्षम नहीं हूँआगे भी मेरा चरित्र कमोबेश यही रहने वाला है, इसलिए मैं भीलवाड़ा व राजस्थान के कुछ असली अम्बेडकरवादियों से क्षमा प्रार्थी हूँ कि मैं उनके जैसा शुद्ध व परम पवित्र टंच अंबेडकराईट नहीं बन पाया हूँ।

    रही बात मुझ पर हिंदुत्व को बढ़ावा देने और सवर्ण हिंदुओं के तलवे चाटने का आरोप लगाने के लिए बुलाई गई समाज विशेष की मीटिंग की तो इस मीटिंग के विरोधाभासी चरित्र पर भी ध्यान देना जरूरी है, जैसे कि मुझे सवर्ण हिन्दुओं का चमचा बताने के लिए आयोजित यह मीटिंग ही एक प्रसिद्ध हिंदू धर्म स्थल जगदीश मंदिर पर बुलाई गई, जहाँ सारे दलित क्रांतिवीर 'जगदीश भगवान'के मंदिर में इकट्ठा हुए, तस्वीरें देखने पर पता चलता है कि उनके सिर पर 'ऊँ'लिखा हुआ था, ईर्द-गिर्द 'जय जगदीश', 'जय विश्वकर्मा'तथा 'जयश्रीराम'लिखा साफ दिखता है, इनके नेता सार्वजनिक रूप से बण्डी-बनियान धारण करते हैं तथा गरीब दलितों का रोना रोने के लिए ढाई किलो सोने की जंजीरें गले में लटका कर आवारा पूंजी का भौंडा प्रदर्शन करते है। अवैध शराब, अवैध गैस, अवैध ठेके, अवैध भूमि माफिया के काम करने वाले, ब्लैकमेलिंग के जरिए पैसा ऐंठने वाले, आरटीआई का दुरुपयोग करने वाले, विदेशी पूंजी लेकर भारतीय समाज में दरारों को और चौड़ा करने वाले साम्राज्यवाद के ट्रोजन होर्सी एनजीओ वादी और चूक चुके राजनीतिक दलों के विफल राजनेता तक शामिल है।

    ऐसे लोग इनके रहनुमा हैं जो अपनी पत्नी को उत्पीड़ित करने के आरोपी रहे हैं अथवा अपने ही स्टाफ की महिलाओं के यौन उत्पीड़न के घृणित भागीदार रहे हैं। इनके कुकृत्यों की काफी फेहरिस्त लंबी है, मगर फिर भी ये सभी सच्चे अंबेडकरवादी हैं, दलितों के देवता हैं, गरीबों के रहनुमा हैं, इन्हें इसी काम के लिए देश-विदेश से पैसा मिल रहा है। ये धार्मिक व जातीय घृणा के सौदागर अब सड़कों पर ज्ञापन, धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह तथा महापड़ाव डालने की घोषणा कर चुके हैं, इस क्षेत्र में बसने वाले लाखों दलितों की शांति, सुरक्षा व भाईचारे को पलीता लगाकर इन्हें अपनी-अपनी राजनीति, कारोबार अथवा प्रोजेक्ट चमकाने हैं, इन्हें अंबेडकर तथा दलित अधिकारों का टेंडर मिल चुका है, ये ठेकेदार हैं, इनके हाथ में दलितों का भविष्य है, इनमें लाख ऐब हो सकते हैं, ये गलत मुद्दे तथा अधूरी जानकारियों के जरिए देशभर के दलित बहुजन आंदोलन को गुमराह कर सकते हैं, क्योंकि ये स्वघोषित महान अंबेडकरवादी हैं, हालांकि इनमें से प्रत्येक को मैं व्यक्तिगत रूप से विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिरों में मूर्तियों के समक्ष साष्टांग दण्डवत करते देखते रहा हूँ, इनके घरों की दीवारों पर उसी हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की तस्वीरों व पोस्टरों की लाइनें लगी हुई है, जिनको ये पानी पी-पी कर कोस रहे हैं।

    मेरी बला से ये ढोंगी छद्म दलित नेता स्वयं को दलितों का स्वयंभू नेता घोषित करते रहें, अपने एनजीओ के प्रोजेक्ट चलाते रहें, अपने-अपने लैटरपेड चमकाते रहें, रात-दिन मुझे गालियां निकालते रहें। इससे मेरी सेहत ना अच्छी होती है और ना ही खराब होती है, ना ही मुझे कोई फर्क पड़ता है।

      मैं सदैव सच्चे, वास्तविक मुद्दों में पीड़ितों के साथ था, हूँ और रहूँगा, मुझे ना वोट चाहिए, ना चंदा चाहिए और ना ही किसी प्रकार की दुकान या प्रोजेक्ट मुझे चलाना है, मैं अपनी जिंदगी अपनी शर्तों व अपनी आजादी के साथ जीता हूँ, मुझे दलित नेता कहलाने का भी कोई शौक नहीं है, मुझे किसी प्रकार की नेतागिरी नहीं करनी है, जिसे करनी है वो करे, मैं मानवता, शांति, सहिष्णुता, भाईचारे, समानता तथा स्वतंत्रता जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों का पक्षधर हूँ और रहूँगा, मुझे असली अंबेडकरवादी होने का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

    नफरत फैलाने, अशांति पैदा करने तथा एक-दूसरे को लड़ाने की ओछी हरकतों को मैं सामाजिक चेतना कहना गवारा नहीं करता, मुझे विदेश और देश में बैठे किन्हीं आकाओं को अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं पेश करनी है, मेरी मर्जी होगी और मैं उचित समझूंगा उन मुद्दों में मैं भाग लूंगा, वर्ना नहीं। सब अपना काम करें तो अच्छा होगा।

    मेरी कोशिश है कि करेड़ा के दलितों को उनके हक बिना किसी जातीय संघर्ष के हासिल हो, इलाके का भाईचारा बरकरार रहे, जिसकी जो श्रद्धा है, उसके वो भजन करे, जो नास्तिक है, वे अपना काम करे। सबकी आजादी बनी रहे, लड़ाई-झगड़े नहीं हो, सब कुछ प्रेम और शांति से निपटे ताकि करेड़ा के सभी निवासी आगे भी मिल-जुल कर एक साथ रहे। ..और हाँ अगर मुझे दलित विरोधी, सवर्ण समर्थक, गद्दार, वर्गद्रोही कहने से अगर किसी का भला होता हो, किसी की रोजी-रोटी चलती हो तो मुझे ये गालियां भी आभूषण लगेगी। मेरी गुजारिश है कि मेरे खिलाफ गाली देने का अखण्ड कीर्तन कुछ और बर्ष जारी रखा जाए। मैं आभारी रहूँगा।

    भंवर मेघवंशी

    (लेखक स्वतंत्र पत्रकार है,)

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    03.10.2015

    संघ परिवार: बदलाव और निरंतरता

    -इरफान इंजीनियर

    हमारे प्रधानमंत्री पूरी दुनिया में घूम-घूमकर ''मेक इन इंडिया''के लिए वैश्विक पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। वे ऐसी घोषणाएं भी कर रहे हैं जिनसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की ओर आकर्षित हों और उन्हें लगे कि वे यहां मनमाफिक मुनाफा कमा सकती हैं। हाल में, प्रधानमंत्री ने डिजीटल इंडिया के लिए विभिन्न कंपनियों के सीईओ से मुलाकात की। कंपनियों के सीईओ-चाहे वे भारतीय मूल के हों या अन्य देशों के नागरिक-केवल अपने शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह होते हैं और उनका लक्ष्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। अगर वे भारत आना चाहते हैं तो उसका कारण केवल यह है कि यहां उन्हें सस्ता श्रम, ज़मीन व प्राकृतिक और अन्य संसाधन उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय करदाताओं के धन से उन्हें अनुदान और अन्य कई सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं। भारत सरकार के साथ विभिन्न कंपनियों के व्यावसायिक समझौतों की घोषणा तो होती है परंतु यह नहीं बताया जाता कि इन समझौतों की शर्तें क्या हैं। शायद इसलिए, क्योंकि इससे अगले दिन की हेडलाईनों के खराब हो जाने की आशंका रहती है।

    जिस तेज़ी से आरएसएस, भाजपा और संघ परिवार ने अपने स्वदेशी आंदोलन से पल्ला झाड़ा है, वह सचमुच चकित कर देने वाला है। उनका स्वदेशी अभियान, विदेशी निवेश और विदेशी वस्तुओं के उपभोग का नीतिगत आधार पर विरोधी था। संघ परिवार से जुड़े अनेक संगठनों ने नवंबर 1991 में एक मंच पर आकर ''स्वदेशी जागरण मंच''का गठन किया था।  इस मंच का लक्ष्य, तत्कालीन कांग्रेस सरकार की उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों का विरोध करना था। स्वदेशी जागरण मंच शायद अब भी जिंदा है परंतु उसकी आवाज़ सुनाई नहीं देती। स्वदेशी जागरण मंच ने 1990 के दशक में उसी अभियान को आगे बढ़ाया था, जिसे भारतीय जनसंघ, स्वाधीनता के तुरंत बाद से लेकर 1970 के दशक तक चलाता रहा था।

    कानपुर में आयोजित भारतीय जनसंघ की अखिल भारतीय सामान्य सभा की बैठक में 31 दिसंबर 1952 को पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि''यह खेदजनक है कि स्वतंत्रता के बाद से लोगों का ध्यान स्वदेशी आंदोलन पर से हट गया है और विदेशी कपड़ों, सौंदर्य प्रसाधनों व अन्य सामग्री के इस्तेमाल में बढ़ोत्तरी हो रही है। सरकार ने इस नुकसानदेह प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं। उलटे, अनावश्यक विदेशी सामान का आयात बेरोकटोक बढ़ रहा है। अतः यह सत्र, अखिल भारतीय सामान्य सभा और केंद्रीय कार्यसमिति को यह निर्देश देती है कि अर्थव्यवस्था को स्वस्थ बनाए रखने के लिए, वे लोगों का ध्यान एक बार फिर स्वदेशी की तरफ आकर्षित करें और अपनी रचनात्मक गतिविधियों में इस अभियान को प्रमुख स्थान दें'' (भारतीय जनसंघ, 1973, पृष्ठ 5)। इसी प्रस्ताव में स्वदेशी को ''आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के पुनर्निमाण और देश के अपने सामान के प्रति प्रेम''के रूप में परिभाषित किया गया था।

    भारतीय जनसंघ के अंबाला सत्र में 5 अप्रैल, 1958 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 58.03 में कृषि उत्पादन को प्राथमिकता देने और सिंचाई, बेहतर बीज और कृषि जोत की अधिकतम सीमा के निर्धारण के कार्य पर फोकस करने की बात कही गई थी। इसी प्रस्ताव में आयात घटाने का आह्वान भी किया गया था।

    लखनऊ में 1 जनवरी, 1961 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 61.05 में विदेशी ऋण व विदेशी पूंजी संबंधी नीतियों पर पुनर्विचार करने की बात कही गई थी। वाराणसी में जनसंघ की अखिल भारतीय सामान्य परिषद की बैठक में 12 नवंबर, 1961 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 61.17 में यह सलाह दी गई थी कि तीसरी पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों को पाने के लिए ''यंत्रीकृत लघु उत्पादन इकाईयों को औद्योगीकरण का आधार बनाया जाना चाहिए''।

    गुवाहाटी में जनसंघ की केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में 4 जून, 1968 को पारित प्रस्ताव में चैथी पंचवर्षीय योजना के संदर्भ में यह कहा गया था कि वह ''हमारे अपने संसाधनों''पर आधारित होनी चाहिए और स्वदेशी संसाधनों को ही देश का विकास का आधार बनाया जाना चाहिए। प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि हमें ''हमारी अपनी''देशी टेक्नोलोजी का विकास भी करना चाहिए।

    सन 1990 के दशक की शुरूआत में भाजपा और संघ परिवार, तत्कालीन सरकार की उदारीकरण व वैश्विकरण की नीतियों का जमकर विरोध करतीं थीं। वे केंटकी फ्राईड चिकिन (केएफसी) की दुकानों पर हमला करती थीं क्योंकि उनका मानना था कि इस तरह की दुकानें ''भारतीय संस्कृति''के विरूद्ध हैं। इसके कुछ समय बाद, संघ परिवार ने अपना रंग बदल लिया। उसने यह कहना शुरू कर दिया कि विदेशी टेक्नोलोजी का तो स्वागत है परंतु विदेशी संस्कृति का नहीं। जैसा कि एलके आडवाणी ने कहा था, ''हमें कम्प्यूटर चिप्स चाहिए आलू के चिप्स नहीं''।

    अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रथम वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा (13 अक्टूबर 1999 से 1 जुलाई 2002) और उसके बाद जसवंत सिंह (1 जुलाई 2002 से 22 मई 2004) ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की प्रक्रिया को जारी रखा। परंतु इसके समानांतर, स्वदेशी जागरण मंच लोगों को स्वदेशी की अच्छाई के संबंध में शिक्षा भी देता रहा। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का आक्रामक अभियान चलाया जा रहा है और स्वदेशी अभियान को तिलाजंलि दे दी गई है।

    हिंदू राष्ट्रवादियों की आर्थिक नीतियों में ये जो बदलाव आए हैं, उनका उद्देश्य रोज़गार के नए अवसरों का सृजन नहीं है और ना ही इनके पीछे कोई अन्य पवित्र उद्देश्य है।

    अरबपतियों के क्लब में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस समय इनकी संख्या करीब 100 है। सात भारतीय कंपनियां, दुनिया की सबसे बड़ी 'फार्च्यून ग्लोबल 500'कंपनियों की सूची में शामिल हो गई हैं। वे दुनिया की सबसे बड़ी 500 कंपनियों में इसलिए शामिल हो पाईं क्योंकि उन्हें देश के प्राकृतिक संसाधन, मिट्टी के मोल उपलब्ध करवाए गए। इनमें शामिल हैं देश की खनिज संपदा, प्राकृतिक गैस, स्पेक्ट्रम व सस्ता श्रम। ये बड़ी कंपनियां अब विदेशी ब्राण्डों को खरीदने में रूचि लेने लगी हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समझौते कर रही हैं। भारतीय करोड़पतियों की संख्या में भी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है। धनी भारतीयों की संख्या, पिछले साल के 1,96,000 से बढ़कर 2,50,000 हो गई है। इसका अर्थ है कि एक वर्ष में धनी भारतीयों की संख्या में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हिंदू राष्ट्रवादी इसी वर्ग के हितों की रक्षा करना चाहते हैं और उन्हें करदाताओं के धन की कीमत पर और रईस बनाना चाहते हैं। वे ऐसी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछा रहे हैं जिनके बारे में यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनके भारत में पूंजी निवेश से रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे अथवा नहीं। दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र, सरकार की उपेक्षा का शिकार है और किसानों की आत्महत्याएं जारी हैं।

    संघ परिवार का वैचारिक यू-टर्न

    भाजपा गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। जब वह विपक्ष में होती है तब उसकी नीति कुछ होती है और सरकार में आने पर कुछ और।

    जहां संघ परिवार ने आर्थिक मसलों पर अपनी नीतियां पूरी तरह से बदल दी हैं वहीं उसकी विचारधारा के मूलभूत सिद्धांतों में कोई परिवर्तन नहीं आया है। ये मूलभूत सिद्धांत हैं : 1. एकाधिकारवादी ढांचा - संघ परिवार के अंदर और देश में भी, 2. हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर देश पर पितृसत्तात्मकता व पदानुक्रम पर आधारित चुनिंदा सांस्कृतिक परंपराएं लादना, 3. समतावादी भारतीय परंपराओं और संस्कृतियों को नज़रअंदाज़ करना व 4. अल्पसंख्यकों को कलंकित करना।

    एकाधिकारवादी ढांचा

    हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा, भावनात्मक प्रतीकों का निर्माण करने में सिद्धहस्त है। अनुयायियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बिना कोई प्रश्न पूछे उस प्रतीक के आगे नतमस्तक हों। अगर एक बार किसी व्यक्ति के मन में किसी भी प्रतीक के प्रति असीम श्रद्धा उत्पन्न कर दी जाए तो उसे, इस आधार पर किसी भी एकाधिकारवादी व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए राज़ी किया जा सकता है कि ऐसी व्यवस्था, उस प्रतीक की रक्षा के लिए आवश्यक है। भगवा ध्वज ऐसा ही एक प्रतीक है। भगवा ध्वज का अर्थ क्या है, यह आरएसएस के मुखिया सरसंघचालक तय करते हैं। आरएसएस ''एक चालक अनुवर्तिता'' (एक नेता के पीछे चलो) के सिद्धांत में विश्वास रखता है और इस नेता का चुनाव किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं होता।

    आरएसएस के सभी अनुशांगिक संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सरसंघचालक के हर निर्देश और आदेश का पूर्ण रूप से पालन करें। आरएसएस के सभी कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता है।

    इस प्रशिक्षण के बावजूद, कई अनुयायी विद्रोह कर देते हैं। जनसंघ के सहसंस्थापक और बाद में अध्यक्ष रहे बलराज मधोक को जनसंघ से निष्कासित किए जाने पर उन्होंने कहा था कि उनका निष्कासन, संघ के फासीवादी रवैये का एक और उदाहरण है। उन्होंने यह भी कहा था कि आरएसएस, जनसंघ का इस्तेमाल अपने उपकरण बतौर कर रहा है। एलके आडवाणी ने जून 2013 में भाजपा के सभी पदों से इस्तीफा देने के बाद यह आरोप लगाया था कि आरएसएस, भाजपा का ''सूक्ष्म प्रबंधन''कर रहा है। परंतु तत्कालीन सरसंघचालक मोहन भागवत ने आडवाणी को उनका इस्तीफा वापिस लेने के लिए राज़ी कर लिया था।

    प्रजातंत्र, हिंदू राष्ट्रवादियों को कभी पसंद नहीं आया। गोलवलकर (1939, पृष्ठ 56) लिखते हैं ''...देश में 'वास्तविक'प्रजातांत्रिक 'राज्य'की मृगतृष्णा के पीछे भागते हुए हम हमारे सच्चे हिंदू राष्ट्रवाद को पूरी तरह भुला बैठे हैं।''इंटेलिजेंस ब्यूरों के मुखिया टीवी राजेश्वर ने दावा किया था कि आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने का समर्थन किया था और उनसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश भी की थी।

    हिंदू राष्ट्रवादी चिंतक, हिंदू राष्ट्र को एक संस्कृति, एक इतिहास व एक भाषा के आधार पर परिभाषित करते हैं। तथ्य तो यह है कि राष्ट्र की अवधारणा ही पश्चिमी है। हिंदू परंपरा तो वसुधैव कुटुम्बकम (पूरा ब्रह्मंड एक परिवार है) में विश्वास रखती है।

    ऐसी कोई एक भाषा नहीं है, जिसे सभी भारतीय बोलते हों और भारत में बहुआयामी सांस्कृतिक विविधताएं हैं। कई धर्म हैं, जातियां हैं, पंथ हैं और उनके अपने-अपने विश्वास और परंपराएं हैं। भाषायी, धार्मिक व जातिगत विभिन्नताओं के अतिरिक्त, क्षेत्रीय विभिन्नताएं भी हैं। गोलवलकर, गैर-हिंदुओं का आह्वान करते हैं कि वे हिंदू संस्कृति को अपनाएं और ''विदेशी''न बने रहें। वे कहते हैं कि उन्हें हिंदू राष्ट्र की महिमा के अतिरिक्त और किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिए। और अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें नागरिक का दर्जा नहीं मिलेगा और उन्हें बिना किसी अधिकार के देश में रहना होगा। संघ परिवार मुसलमानों को विश्वासघाती, विध्वंसक और क्रूर मानता और बताता है। हिंदू राष्ट्रवादी चिंतक, लोगों को एक धर्म, संस्कृति व भाषा के अलावा, श्रेष्ठता के भाव के आधार पर भी बांधना चाहते हैं।

    हिंदू राष्ट्र की वह ''एक''संस्कृति, धर्म और भाषा क्या होगी? वह विजेता आर्यों की परंपराओं और उनके ग्रंथों पर आधारित होगी। वह वेदों, उपनिषदों और अद्वैत वेदांत दर्शन पर आधारित होगी। वह भारतवर्ष से बौद्ध धर्म का सफाया होने के बाद, शंकराचार्य द्वार विकसित दर्शन पर आधारित होगी। गोलवलकर (1939, पृष्ठ 48) लिखते हैं ''उस महान आत्मा की शिक्षाओं की गलत समझ के कारण, बौद्ध धर्म, लोगों को उनकी आस्था के प्रति वफादारी की राह से डिगाने वाली शक्ति बन गया।''हिंदू राष्ट्रवादियों ने तुकाराम, रविदास, कबीर, मीराबाई, सिक्ख धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, चार्वाक दर्शन, सिद्ध व नाथ पंथ और कई अन्य तर्कवादी धार्मिक-दार्शनिक परंपराओं को नज़रअंदाज़ किया। इनमें से अधिकांश परंपराएं, समतावादी थीं। एक धर्म और एक संस्कृति की तलाश में, हिंदू राष्ट्रवादी चिंतकों ने उन ग्रंथों और परंपराओं  को चुना, जो समाज में ऊँचनीच की हामी हैं, जो जाति व्यवस्था को औचित्यपूर्ण मानती हैं और जो शुद्धता-अशुद्धता में विश्वास रखती हैं।

    हिंदू राष्ट्रवादियों को जाति प्रथा से कोई शिकायत नहीं है। दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद का सिद्धांत, जाति व्यवस्था को आदर्श सामाजिक संगठन बताता है। बलराज मधोक ने जाति व्यवस्था को औचित्यपूर्ण ठहराते हुए कहा था कि जिस प्रकार मानव शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग कार्य करते हैं, उसी तरह विभिन्न जातियां अपने-अपने कर्तव्य निभाती हैं और सब मिलकर समाज का निर्माण करती हैं।  

    अल्पसंख्यकों को कलंकित करने की नीति

    हिंदू राष्ट्रवादी चिंतक, अल्पसंख्यकों को विदेशी और हिंदू राष्ट्र के लिए खतरा मानते हैं। यद्यपि अल्पसंख्यक भारत की सांझा संस्कृति में भागीदार हैं परंतु फिर भी उन्हें बाहरी बताया जाता है। आरएसएस, अल्पसंख्यकों की संस्कृति को स्वीकार नहीं करता। अल्पसंख्यकों से वह यह अपेक्षा करता है कि वे बहुसंख्यकों की संस्कृति को स्वीकार करें और वह भी उसके एकसार स्वरूप को। आरएसएस के पास यह निर्धारित करने के लिए कोई मापदंड नहीं है कि बहुसंख्यकों की विविधवर्णी संस्कृतियों में से किसे ''राष्ट्रीय संस्कृति''के रूप में स्वीकार किया जाए। संघ और उससे जुड़े संगठन, अल्पसंख्यकों को देशद्रोही बताते हैं। मुसलमान पुरूष और हिंदू स्त्री के बीच विवाह को मुस्लिम समुदाय का षड़यंत्र बताया जाता है। वे  ऐसे विवाहों को लव जिहाद कहते हैं। उनके अनुसार इसका उद्देश्य हिंदू महिलाओं को बहला-फुसलाकर मुसलमान बनाना है।

    केन्द्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री के भारतीय संस्कृति को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त करने संबंधी हालिया वक्तव्यों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। मंत्री केवल हिंदू राष्ट्रवादियों की दृढ़ मान्यताओं को दोहरा रहे थे। हिंदू राष्ट्रवादियों का राजनैतिक लक्ष्य रूढि़वाद को बढ़ावा देना, समाज को धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत करना और हिंदू राष्ट्रवाद की दुहाई देकर एकाधिकारवादी, अनुदार राज्य की स्थापना करना है। संघ परिवार चाहे आर्थिक उदारीकरण की कितनी ही बात कर ले राजनैतिक अनुदारता उसकी विचारधारा की मूल आत्मा है। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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    हिंदुत्व की अराजकता का दौर 


    विद्या भूषण रावत 


    उत्तर प्रदेश में पिछले बीस वर्षो में नॉएडा सभी सरकारों के लिए 'धन उगाही ' का एक बेहतरीन अड्डा बन गया है।  देश के सभी बड़े टीवी चैनल्स के बड़े बड़े स्टूडियोज और दफ्तर यहाँ है, कई समाचार पत्र भी यहाँ से प्रकाशित हो रहे हैं और बड़ी बड़ी कम्पनियो के कार्यालय भी यहाँ मौजूद है।  शॉपिंग माल्स, सिनेमा हॉल्स, बुद्धा इंटरनेशनल सर्किट , आगरा एक्सप्रेस हाईवे और क्या नहीं, नॉएडा, उत्तर प्रदेश के 'समृद्धता' का 'प्रतीक' बताया जाता है, ठीक उसी प्रकार से जैसे गुडगाँव की ऊंची इमारते और लम्बे चौड़े हाइवेज देखकर हमें बताया जाता है के हरयाणा में बहुत तरक्क़ी हो चुकी है।  लेकिन महिलाओ और दलितों पर हो रहे अत्याचार बताते हैं के मात्र नोट आ जाने से दिमाग नहीं बदलता  और आज भारत को आर्थिक बदलाव से अधिक सामजिक और सांस्कृतिक बदलाव की  जरुरत है।  बिना सांस्कृतिक बदलाव के कोई भी राजनैतिक और आर्थिक बदलाव एक बड़ी बेईमानी है और हम उसका नतीजा भुगत रहे हैं। 

    अभी स्वचछ भारत और सशक्त भारत के नारे केवल विदेशो में रहने वाले भारतीयों और देशी अंग्रेजो को खुश करने की जुमलेबाजी हैं हालाँकि प्रयास पूरा है के 'भारतीय' नज़र आएं और इसलिए संयुक्त रास्त्र महासभा को भी बिहार की चुनाव सभा में बदलने में कोई गुरेज नहीं है।  जुमलेबाजी केवल इन सभाओ में नहीं है अपितु दुनिया भर में इवेंट मैनेजमेंट करके उसको 'बौद्धिकता' का जाम पहनाया जा रहा है ताकि जुमलों को ऐतिहासिक दस्तावेज और आंकड़ों की तरह इस्तेमाल कर अफवाहों को बढ़ाया जाए और मुसलमानो को अलग थलग किया जाए ताके दलित पिछड़े सभी हिन्दू बनकर  ब्राह्मण-बनिए नेतृत्व के अंदर समां जाये। 

    मोदी के सत्ता सँभालने पर हिंदुत्व के महारथी अब खुलकर गालीगलौज पर उत्तर आये हैं और इसके लिए उन्होंने कई मोर्चे एक साथ खोल लिए हैं।  उद्देश्य है अलग अलग तरीके से विभिन्न जातियों को बांटा जाए और जरुरत पड़े तो उन्हें मुसलमानो के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए।  मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया जाए और पाकिस्तान, इस्लाम आदि के नाम पर मुसलमानो पर दवाब डाला जाए. दूसरी और आरक्षण को लेकर दलितों और पिछडो को बदनाम करने वाली बाते और आलेख टीवी और प्रिंट मीडिया में छापे जाएँ।  जातिगत आंकड़ों की बात करने वालो को जातिवादी घोषित कर दिया जाए ताकि 'ब्राह्मणवादी' 'सत्ताधारी अपनी जड़े मज़बूत कर सके। सत्ता में आने पर संघ ने दलित पिछडो के दो चार नेताओ को कुछ दाना तो फेंका पर सत्ता पर ब्राह्मण, बनियो का बर्चस्व इतना पहले कभी नहीं था  जितना आज है। 

    सबसे पहले चालाकी थी जनसँख्या के आंकड़ों को धार्मिक आधार पर प्रकाशित करना और उसके जरिये मुस्लिम आबादी के बढ़ने को दिखाकर गाँव गाँव उस पर  बहस चलाने की कोशिश करना जब के पुरे देश में दलित पिछड़े और आदिवासी जनसंख्या के आंकड़ों को  जातीय आधार पर प्रकाशित करने की बात कर रहे थे और उसके विरूद्ध आंदोलन कर रहे थे ? आखिर जनसँख्या के आंकड़े जातीय आधार पर न कर धार्मिक आधार पर क्यों किये गए ? मतलब साफ़ है , संघ के ब्राह्मण बनिए अल्पसंख्यक धर्म के आधार पर ही बहुसंख्यक होने का दावा कर दादागिरी कर सकते हैं क्योंकि जाति के आधार पर उनकी गुंडई हर जगह पर नहीं चल पाएगी और बहुसहंक्यक होने के उनके दावे की पोल खुल जायेगी। इसलिए मैं ये बात दावे से कह रहा हूँ के भारत के हिन्दू रास्त्र बनाने से सबसे पहले शामत इन्ही जातियों की आ सकती है इसलिए वे हिन्दू रास्त्र का शोर मुसलमानो के खिलाफ ध्रुवीकरण और ब्राह्मण बनिए वर्चस्व को बरक़रार करने के लिए करेंगे। 

    हकीकत यह है के मुसलमानो पर हमले होते रहेंगे ताकि उनके दलित विरोधी, आदिवासी विरोधी और पिछड़ा विरोधी नीतियों और कानूनो पर कोई बहस न हो।  संघ प्रमुख ने आरक्षण पर हमला कर दिया है और ये कोई नयी बात 
     नहीं है के साम्प्रदायिकता के अधिकांश पुजारी सामाजिक न्याय के घोर विरोधी है और उनका ये चरित्र समय समय पर दिखाई भी दिया है।  १९९० के मंडल विरोधी आंदोलन को हवा देने वाले लोग ही राम मंदिर आंदोलन के जनक थे। आखिर ये क्यों होता है के संघ परिवार का हिन्दुवाद दलितों, पिछडो और आदिवासियों के अधिकारों को लेकर हमेशा से शक के घेरे में रहा है।  ये कब हुआ के संघ के लोगो ने छुआछूत, जातिप्रथा, दलितों पे हिंसा, महिला उत्पीड़न, दहेज़, आदिवासियों के जंगल पर अधिकार और नक्सल के नाम पर उनका उत्पीड़न के विरुद्ध कभी कोई आवाज उठाई हो।  उलटे इसके आरक्षण उनके दिलो को कचोटता रहता है आज तक मोहन भगवत ने ब्राह्मणो के लिए मंदिरो में दिए गए आरक्षण को  ख़त्म करने की बात नहीं की है।  क्या सारे ब्राह्मण संस्कृत के  प्रकांड विद्वान है ? क्या मंदिरो में पुजारी होने के लिए उनका ज्ञानवान होना जरुरी है या ब्राह्मण होना।  मेरिट का आर्गुमेंट ब्राह्मणो पर क्यों नहीं लगता।  लेकिन क्योंकि ब्राह्मणो को मंदिरो में आरक्षण और अन्य ऐताहिसिक सुविधाएं ब्रह्मा जी की कारण मिली हुई है इसलिए भारत का कानून उसके सामने असहाय नजर आता है. दूसरी और दलितों, आदिवासियों और पिछडो को आरक्षण भारतीय संविधान ने दिया है इसलिए ब्रह्मा के भक्त इस संविधान से खार खाए बैठे हैं। दलितों, पिछडो और आदिवासियों को केवल 'गिनती' के लिए हिन्दू माना जा रहा है। 

    हम सवाल पूछते है के भूमि अधिग्रहण बिल को क्यों इतनी जोर शोर से लागु करना चाहती है।  क्या सरकार इतने वर्षो  हुए आदिवासी उत्पीड़न और बेदखली पर कोई श्वेत पत्र लाएगी ? क्या ये  बताएगी के नक्सलवाद के नाम पर कितने आदिवासियों का कत्लेआम हुआ है और कितने लोग अपने जंगल और जमीन से विस्थापित हुए है।  उस सरकार से क्या उम्मीद करें जो सफाई के नाम पर इतनी बड़ी नौटंकी कर रही है लेकिन मैला धोने वाले लोगो के साथ हो रहे दुर्व्यवहार, अत्याचार, छूआछूत पर मुंह खोलने को तैयार नहीं।  क्या सफाई अभियान भारत में व्याप्त व्यापक तौर पर हो रहे  मानव मल ढोने के कारण हिन्दू समाज के वर्णवादी नस्लवादी दैत्य रूप को छुपाने की साजिश तो नहीं है। भगाना के दलितों ने अत्याचार से परेशान होकर इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन वो रास्ता भी अधिकांश स्थानो पर बंद कर दिया गया है।  धर्मान्तरण के कारण न तो दलितों को नौकरी में आरक्षण मिलेगा और न ही  अन्य सरकारी योजनाओ में उनके लिए कोई व्यवस्था होगी।  ऊपर से संघ के ध्वजधारी धर्मान्तरण को लेकर अपना हिंसक अभियान जारी रखेंगे। 

    इसलिए जब भी आप इन प्रश्नो का  उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे तो हमें एक अख़लाक़ की लाश मिलेगी।  क्योंकि आज दलितों, पिछडो और आदिवासियों के हको की लड़ाई से ध्यान बटाने के लिए हमें मुसलमानो के संस्कृति और उनकी संख्या का भय दिखाया जाएगा और यह बड़ी रणनीति के तहत हो रहा है।  छोटे कस्बो और गाँव में अफवाहों के जरिये दलितों और पिछडो को मुसलमानो के  खिलाफ खड़ा करो।  दादरी की घटना कोई अकेली घटना नहीं है और ये अंत भी नहीं है।   जिस संघ परिवार ने अफवाहों के जरिये दुनियाभर में गणेश जी को दूध पिलवा दिया वो आज फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप के जरिये अपनी अफवाहों को फ़ैला रहा है।  दादरी में अखलाक़ के मरने को हादसा बताकर वहाँ के सांसद  और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने प्रशाशन को पहले ही आगाह कर दिया के हिंदुत्व के आतताइयों के विरूद्ध कोई कदम उठाने की कोशिश न करें।  और याद रहे इस प्रकार की अफवाहे फैलाकर दंगे फ़ैलाने का कार्यक्रम  चलता रहेगा। 

    कल हमीरपुर की घटना में एक ९० वर्षीया दलित को मंदिर प्रवेश करने पर जिन्दा जला दिया गया और  शंकराचार्य और हिंदुत्व के ध्वजधारी शासक चुप हैं।  जो व्यक्ति सेल्फ़ी और ट्विटर के बगैर जिंदगी नहीं जी सकता वो दलितों पर बढ़ रहे हिन्दू अत्याचार पर लगातार खामोश रहा रहा है।  एक भारतीय नागरिक को जिसका बेटा एयरफोर्स में कार्यरत है लोग उसके घरके अंदर मार देते हैं और हमारे संस्कृति के ध्वजवाहक हमसे कहते हैं  इसका 'राजनीतिकरण' न करें  . खाप पंचायते देश भर में अंतर्जातीय विवाहो के विरोध में हैं क्योंकि इसके कारण से जातीय विभाजन काम होंगे और ब्राह्मणीय सत्ता मज़बूत रहेगी इसलिए संघ और उसके कोई भी माननीय बाबा या दार्शनिक ने कभी भी छुआछूत और जातीय उत्पीड़न के विरुद्ध कुछ नहीं कहा अपितु उन्होंने  ऐसी बातो को सामजिक परम्पराओ के नाम पर सही साबित करने के प्रयास  किये हैं। 

    आज देश आराजकता की और है और हिंदुत्व के ये लम्बरदार साम दाम दंड भेद इस्तेमाल करके भारत में धार्मिक विभाजन करना चाहते हैं ताकि उनकी जातिगत सल्तनत बची रहे।  मुसलमान इस वक़त ब्राह्मणवाद को बचाने और बनाने के लिए सबसे बड़ा हथियार हैं।  उनके नाम पर अफवाहे फैलाओ और राजनीती की फसल काटो लेकिन ये देश के लिए बहुत खतरनाक हो सकती है।  इन्हे नहीं पता के इन्होने देश और सामाज का कितना बड़ा नुक्सान कर दिया  है।  सैकड़ो सालो से यहाँ रहने वाले लोगों ने जिन्होंने इस देश को अपनाया आज अपने ही देश में बेगाने महसूस कर रहे हैं।  समय आ गया है के हम अपने दिमाग की संकीर्णताओं से बाहर निकले और ये माने के हमारे खान, पान, रहन सहन, प्रेम सम्बन्ध इत्यादि हमारी अपनी व्यक्तिगत चाहत है और सरकार और समाज को उसमे दखलंदाजी का कोई हक़ नहीं है।  मतलब ये के यदि अख़लाक़ बीफ भी खा रहा था तो उसको दण्डित करने का किसी  की अधिकार नही क्योंकि अपने घर के अंदर हम क्या खाते  हैं और कैसे रहते है ये हमारी इच्छा है।  क्या हिंदुत्व के ये ठेकेदार तय करेंगे के मुझे क्या खाना है और कहाँ जाना है , कैसे रहना है।  सावधान, ऐसे लोगो के धंधे चल रहे हैं और उन पर लगाम कसने की जरुरत है।  भारत को बचाने की जरुरत है क्योंकि ये घृणा, द्वेष देश को एक ऐसे गली में ली जाएगा जिसका कोई अंत नहीं। अखलाक़ को मारने के लिए दस बहाने ढूंढ निकाले  गए और कहा गया राजनीती न करें परन्तु ये जातिवादी सनातनी ये बताएं हमीरपुर में एक दलित के मंदिर प्रवेश पर उसे क्यों जिन्दा जला दिया गया, उसका कोई बहाना है क्या ? 

    ऐसा लगता है के हिंदुत्व के महारथियों के लिए तालिबान, इस्लामिक स्टेट और साउदी अरब सबसे अच्छे उदहारण हैं जो विविधता में यकीं नहीं करते और जिन्होंने असहमति को हिंसक कानूनो के जरिये कुचलने की नीति अपनायी है।  भारत जैसे विविध भाषाई,  धार्मिक और जातीय राज्य में इस प्रकार की रणनीति कब तक चलेगी ये देखने वाली बात है लेकिन ये जरूर है के लोकतंत्र में ब्राह्मणवाद के जिन्दा रहने के लिए मीडिया और तंत्र की जरुरत है और वह उसका साथ भरपूर तरीके से दे रहा है इसलिए इन सभी कुत्सित चालो का मुकाबला हमारे संविधान के मुलचरित्र को मजबूत करके और एक प्रगतिशील सेक्युलर वैकल्पिक मीडिया के जरिये ही किया सकता है. ये सूचना का युग है और हम ऐसे पुरातनपंथी ताकतों का मुकाबला उनकी वैचारिक शातिरता को अपनी बहसों और वैकल्पिक प्लेटफॉर्म्स के जरिये ही कर सकते हैं और इसलिए जरुरी है के हम चुप न रहे और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखे चाहे उसमे हमारी  जाति बिरादरी या धर्म का व्यक्ति क्यों न फंसा हो।  वैचारिक अनीति का मुकाबला  वैचारिक ईमानदारी से ही दिया जा सकता है जो हमारे समाज के अंतर्विरोधों को समझती हो और उन्हें हल करने का प्रयास करे न के  उनमे घुसकर अपनी राजनीती करने का।   ये सबसे खतरनाक दौर है और हर स्तर  पर इसका मुकाबला करना होगा।  अफवाहबाजो से सावधान रहना होगा और संवैधानिक नैतिकता को अपनाना होगा क्योंकि केवल जुमलेबाजी से न तो बदलाव आएगा और न ही पुरातनपंथी ताकतों की हार होगी। दलित पिछड़ी मुस्लिम राजनीती के लम्बरदारो को एक मंच पर आने के अलावा कोई अन्य रास्ता अभी नहीं है क्योंकि इस वक़त यदि उन्होंने सही निर्णय नहीं लिए और जातिवादी ताकतों के साथ समझौता किया तो भविष्य की पीढ़िया कभी माफ़ नहीं करेंगी। 

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    बंद करें बेगुनाहों के कत्ल का सिलसिला,बदले में हमारी जान ले लें!

    We live in a global village.We are technically empowered and connected people worldwide!

    But we are restricted to speak! We are restricted to write.Our friendship is restricted!


    Is it globalization?


    Universal humanity is skipped.Man is skipped and excluded and it is class rule.Caste war all over.Unprecedented violence worldwide. Continuous holocaust endless! Continuous refugee influx as civic and human rights remain suspended!


    Is it globalization?


    Tagore called for universal fraternity!


    It is all about the agenda of Hindutva!


    We may have not a friend in Pakistan because Pakistan is an enemy nation.


    We dare not to seek friendship is China as China remains an enemy nation.


    We liberated Bangladesh,we boast but we should not have friend sin Bangladesh lest we might be branded as terrorist.


    I am afraid that I have to delete the names of Ex PM Bhattarai and Ex Pm Prachanda from my friend list because Nepal becomes the latest enemy nation!


    Not enough we should have not Muslim friends as they are treated as the enemies of the Nation!


    We may not connect Kashmir as Kashmir Valley is a prohibited geography and every Kashmiri is treated as the enemy of the nation!


    We dare not have any friend in either Salwa Judum or AFSPA region.We may not have friends in central India,Adivasi geography or North East as we might be banded as anti national,enemies of the nation!


    Children no more wants to live in with parents!

    Parents despise the children in return!

    We have no relationship!


    No Love left.

    It is hatred all over!


    Amusing logic! Quite funny as they claim that Saudi Arabia has banned PORK! Why should we not ban Beef?I do not know whether Saudi Arabia banned Pork at all.But I know that Saudi Arabia is a monarchy ruled Islamic nation while we are People`s democracy.


    We have a democratic and secular constitution irrelevant to the governance of fascism in business friendly desguise. Irrelevant to the agenda of making Hindu Nation within 2030 and Hindu Globe within 2030.


    we have been reduced to a Hindu Nation!

    Humanity is reduced to Hindutva only.

    It is the valley of death.It is gas Chamber!


    It is all about Gujarat Killings.It is not mere the reaction of Godhra,an accident or planned.It is ethnic cleansing!

    It is not event the aftermath of Babri demolition.


    Is is ethnic cleansing .

    We wanted it and we justify it as we justify the Beef Ban and th killing of humanity for meat!


    मुकम्मल फासीवाद है

    और चिड़ियों को चहचहाने की आजादी नहीं है।


    In Bihar,it is not an election but it is a Mahabharat of  caste war,caste alliances as Lalu explains very well!

    In Bengal,it is unprecedented violence for the power to hold on class rule and caste Hegemony!


    শাসকের সব চাই!

    Is it globalisation?


    Please see the video as my heart is pierced and I may not sing like a nightingale!


    Oct 03 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    Diwali Dhamaka: Strategic Sale of PSUs may Kickstart Soon

    Dheeraj Tiwari

    New Delhi:

    

    

    Modi Sarkar begins work on formal policy on sale of stakes

    The government is drawing up a formal policy regarding the sale of stakes, including transfer of control, in state-run companies as it revives the idea of privatising non-strategic public sector enterprises (PSUs).

    The initial emphasis of the policy though is likely to be on loss-making companies. Officials of the finance ministry and the department of public enterprises, a nodal agency for all state-run companies, met last week to discuss details such as rules for identifying companies and processes involved.

    This is in line with PM Narendra Modi's statement at the Facebook town hall last week in the US that the government shouldn't be in the "business of doing business", referring especially to state-owned hotels.

    The government especially aims to exit all loss-making firms except for those that have strategic importance, a senior official told ET. There were 71 loss-making state-run companies in 2013-14 with aggregate losses of more than Rs 20,000 crore. "Preliminary discussions were held on how to approach strategic sales" at last week's meeting, said the official, requesting anonymity ."As of now, we have only a policy for diluting minority stakes in profitmaking companies and to meet the 25% public holding norms."

    The government has set itself an ambitious disinvestment target for this fiscal year of Rs 69,500 crore, of which Rs 28,500 crore is expected to come from strategic stake sales. The capital market regulator's listing norms stipulate that there should be a public holding of at least 25% in state-owned companies.

    "Any proposal for strategic sale has to come from the ministry concerned. At present, we are looking to set up some parameters which will define whether the government should support such firms or exit," said another official.

    NOT MUCH PROGRESS ON STRATEGIC SALES

    The Modi regime hasn't been able to make much progress on strategic sales despite reiterations by senior Cabinet ministers that the government may be open to the idea.

    Strategic sales, including in profitmaking public-sector undertakings, were common during the Atal Behari Vajpayee-led National Democratic Alliance administration, a period that saw the government hand control of a string of blue-chip firms such as VSNL, IPCL, Balco and Hindustan Zinc to private companies. n May, Finance Minister Arun aitley had said the government Jaitley had said the government will proceed with strategic sales in some state-run enterprises.

    "There are some companies in which there is no difficulty (in strategic sales). Ministry of tourism is already moving ahead," he had said.

    Tourism Minister Mahesh Sharma had later ruled out any disinvestment in India Tourism Development Corp but said the government was exploring exits in eight lossmaking hotels through public-private partnerships or leases.

    The heavy industries ministry has already floated Cabinet notes on the closure of four entities, including units of Hindustan Machine Tools and Tungabhadra Steel Products.Discussions are also on with the de fence ministry on Hindustan Cables. As part of the new framework, "we are moving ahead with winding up of Board for Reconstruction of Public Sector Enterprises (BRPSE)", said one of the officials cited above. "The new policy will take cognisance of these parameters for any revival proposal."

    BRPSE was set up in 2004 to prepare plans to revive sick state-owned companies.

    The Vajpayee government had sold four loss-making entities, including two hotels. It sold Modern Food Industries to Hindustan Unilever while Paradeep Phosphates was acquired by Zuari Industries.Modern was recently sold to Nimman Foods, which is backed by private equity fund Everstone Capital.


    http://epaperbeta.timesofindia.com/Article.aspx?eid=31817&articlexml=Diwali-Dhamaka-Strategic-Sale-of-PSUs-may-Kickstart-03102015001054



    Indian poet Rabindra Nath Tagore preached global peace and universal fraternity. In his writings he vehemently criticized narrow parochialism, and urged his fellow human-beings to unite for the progress of humanity. Tagore has often been highly critical of fundamentalists, whom he dubbed as worshipping the "devil". In one of his poems he wrote :

    "Who is obsessed by religion

    He is blind

    He only kills and gets killed.

    Even an atheist is blessed

    Because he doesn't have the vanity of any faith.

    Humbly he lights up his reason

    Defies the authority of scriptures

    And seeks only the good of men."

    [ Dharmamoha – from the collection Parishesh by Rabindranath Tagore.]

    Tagore opined that universal fraternity could be achieved only through proper education of the people. He felt that India lacked western progressive thought, and was bogged down by the shackles of centuries-old traditions. There was a need to break free from these bondage of ideas. He said "Freedom of mind is needed for the reception of truth". In his drama "Chandalika" (about the Untouchable's daughter), Tagore condemned the caste system and wrote :

    "By preventing the touch of Man

    You have hated the God of man's heart

    For anguished rage of the Creator, on the door of famine

    You shall have to take food and drink sharing with others

    ………………………………

    Whom you have pushed downward, will bind you down

    Whom you have left behind, will draw you back."

    As a panacea for all the ills of disharmony, Tagore prescribed cultivating the spirit of progressive thought. He advised, unlike Mahatma Gandhi, that India should not boycott the west, but rather learn from it. To achieve a cultural-intellectual revitalization ; India should open up to the western liberal philosophies and not become mired in narrow nationalism. "We of the Orient should learn from the Occident . . . to say that it is wrong to cooperate with the West is to encourage the worst form of provincialism and can produce nothing but intellectual indigence"

    [ Kripalani, Krishna. Rabindranath Tagore: A Biography. Oxford: Oxford UP, 1962. page 294].

    In fact Tagore favored a grand inter-civilisational alliance; a majestic symbiosis of the Orient and the Occident. By doing so, he was walking along a long line of ancient Indian intellectuals who came before him. Buddha, Mahavira, Emperor Ashoka, Emperor Akbar, Chaitanya and Kabir all spoke of fostering universal harmony. However, what sets Tagor apart from others is his logic of taking the ideology of global harmony to its logical end by denouncing all forms of extremist nationalism and decrying fundamentalism.

    One of the most famous poems of Tagore is his song of inclusiveness — entitled "Bharat Tirtha" (the Pilgrimage of India), wherein he exhorts all compatriots to come together in their quest for universal fraternity.

    "Where men of all races have come together,

    Awake, O my mind!

    Standing here with outstretched arms,

    I send my salutations to the God of Humanity,….

    Come, O Aryan and Non-Aryan, Hindu and Muslim,

    Come, O English and Christian,

    Come, O Brahmin,

    Purify your mind and clasp the hands of all;

    Come, O Downtrodden, let the burden

    Of every insult be forever dispelled."

    This is one of the main themes of Tagore: on a superficial level, the different religions seem all different. But to a liberal mind, they reveal themselves to be the same. True Spiritualism is intimately connected with finding the "magic of life". As they say, all roads lead to Rome. The Roads of Spirituality however, according to Tagore, always leads to love, and not to any other destination. Tagore often cited Sufi saints and Vaishnava Gurus to emphasize his message of universal love. In his "Bhanu Singher Padavali", Tagor adopted the Vaishnava ideal of "transcendental love" by allegorically expressing it through the earthly love of Radha and Krishna. Truly it was a rather great spiritual revolution on the part of Tagore to say that all religions in essense speaks of love. Not understanding this profound realization leads to erroneous conclusions. This is the inclusive-philosophy which people need to promote peace, and not the jingoistic parochial policy of fundamentalists of excluding all, which some people talk about. Tagore indicates that any person who thinks exclusiveness needs to 'purify' his own mind and 'clasp the hands of all'.

    https://secularvedanta.wordpress.com/2015/03/


    Oct 03 2015 : The Economic Times (Kolkata)

    ET EXCLUSIVE - Caste is the Biggest Star in Bihar: Lalu

    BhavnaVij Aurora

    Patna

    

    

    KEEPING THE POT BOILING Determined to keep focus on caste divide in Bihar, RJD boss claims BJP-led Centre not concerned about poor

    Lalu Prasad is determined to keep the focus on caste divide in election-bound Bihar, throwing a spanner in the works of Bharatiya Janata Party, which is seeking to dissociate itself from Rashtriya Swayamsevak Sangh chief Mohan Bhagwat's recent suggestion of a review of the reservation policy and betting primarily on PM Narendra Modi's promise of development.

    Caste is central to Bihar politics, the Rashtriya Janata Dal leader and former chief minister told ETin an exclusive interview, projecting the upcoming assembly elections as a battle between the upper castes represented by the BJP-led alliance and the backward castes under the Grand Alliance, which includes his party. "You cannot ignore caste. It is a reality in India," Prasad said, seemingly undeterred by an Election Commission inquiry that he faces or raking up caste in an election rally. "There are castes in animal world too. Elephants have castes. It is not a dirty word," Prasad said on Friday morning, sitting under a makeshift shed in the garden of his Circular Road house in Patna, before heading out on a day packed with eight election rallies.

    Prasad, who was quick to latch on to Bhagwat's suggestion and slam BJP for its alleged attempt to deny backward caste communities the fruits of the reservation policy , has sharpened his attack even as RSS has said its chief was misunderstood and BJP was quick to clarify that it would not tinker with reservation. His tirade has put BJP so much on the defensive that the party has had to declare that if it wins its chief minister will be from a backward caste.

    "The match is over for BJP. Both guru and chela (Modi and BJP president Amit Shah) will have to pack their bags after their defeat in Bihar," he said.

    Prasad denied any differences with Chief Minister Nitish Kumar, Janata Dal (United) leader and his ong-time foe-turned-partner, who is leading the Grand Alliance. He said he simply walked next door to his neighbour Kumar's house if there was an issue to be discussed.

    LINKING CASTE TO BACKWARDNESS

    Linking caste to economic backwardness and reservation, Prasad quoted from the Constitution, Par iament debates and statistics culled from the centre's Socio-Eco nomic Caste Census.

    Armed with statistics from the caste census, he reeled off the figures -manual casual labourers, 51%; families living in one-room kuchcha house, 14%; landless households, 30%.

    "Go and ask people living in these conditions their caste and you will know. The government does not give even a second glance at the poor," he said.

    Equating caste with economic status, Prasad repeated his demand that the BJP government at the Centre make the caste data public. "The government is behaving like Soordas. How can they plan properly without taking the caste figures into account? The Constitution says that reservation has to be as per population," he said. "Bhagwat blurted out the mann ki baat (real view) of RSS and BJP."

    Prasad said BJP has already started the process of scrapping reservation in Rajasthan. "In Haryana, only a class-X pass person can contest panchayat elections.We all know, who all will be excluded in the process," he said.

    Pointing out that attempts were made earlier to introduce graduation as a criterion for contesting Lok Sabha elections, he said, "Thankfully that did not happen.Atal Behari Vajpayee lost elections to a less-educated candidate."

    He further said, referring to his wife, "When Rabri won elections and became chief minister, they ridiculed her. First, you keep all backwards and weaker sections on the back bench, and then say they don't require reservations. A total revolution is needed to bring them into the mainstream."


    http://epaperbeta.timesofindia.com/Article.aspx?eid=31817&articlexml=ET-EXCLUSIVE-Caste-is-the-Biggest-Star-in-03102015001087




    Violence Mars Bengal Civic Polls

    রকেট ক্যাপসুল নিবেদিত শারদোত্সবে সংবাদ মাধ্যম মহিসাসুর নিধন পর্ব!

    যদি কেহ শুধাইতে লাগে মা দুগ্গারে যে এত্তো কাল মহিষাসুর বধ ত হইলো,কটা খাট ভাঙ্গা হইলো,বল দিকিনি,দোষ ধরা যাবে না!

    শাসকের নিশানায় সংবাদমাধ্যম, ধর্ষণের হুমকি মহিলা সাংবাদিককে, নেতৃত্বে বিধায়ক সুজিত বোস

    পলাশ বিশ্বাস

    পুজোর আগেই সাংবাদিক ক্যালানো জমে দই,প্যানালে প্যানেলে জোর বাহেস চলিতেছে,শাসকের সব চাই!


    সাংবাদিক না ক্যালাইলে গণতন্ত্র উত্সব হয় না,কেহ কহিছেনা!


    ক্যালানির চোটে রকেট ক্যাপসুল তত্সহ জাপানী তেলের মম গন্ধে শারদোত্সবে মা দুগ্গার আ মরি আবাহন,যতেক অসুর বেটা আছেক মা এই বঙ্গে,এি ভারতবর্ষে,এই মহাদেশে,রকেচ ক্যাপসুল দিতাছি যত চাই,জাপানী তেল দিয়া যন্ত্র পাতি মাজিয়া ঘসিয়া,সব ব্যাটারে নিকেশ করহ মা!



    পিতৃপক্ষ সবে শুরু হল!

    শরতের গন্ধ বাতাস কিছুই নাই!

    কাশফুল ফুটেছে কি ফোটে নাই,দেখি নাই!


    গরমে হাসফাঁস প্রাণ!

    সকাল হতে না হতেই গ্রীষ্মের দাবদাহ!


    কেন্দ্র সরকারের কর্মচারিদের সপ্তম বেতনমান লাঘু হওয়ার কথা!

    সমান সমান বেতন রাজ্য সরকারের কর্মচারিদেরও জুটিবে,বড় আশা!


    বাজারে টাকা কম পড়িতেছে না!

    উপরন্তু রিজার্ভ ব্যান্ক সদয়,সুদের হার কমিয়াছে!


    কেনা কাটার ঠ্যলায় আত্মারাম খাঁচা ছাড়া হোক বা না হোক,ভিড়ের গুঁতোয় রাস্তায় চলা দায়!


    পকেটমারের পোয়া বারো উপরন্তু ঠ্যাঙাড়ে বাহিনীর আয় কম হইতেছে না!


    এই বঙ্গে একন বড় রঙ্গ,বঙ্গ ভঙ্গের পর থেকেই রঙ্গ তরঙ্গ!


    রাজনীতির ঠ্যালায় জীবন জীবিকার বারোটা অলরেডি বাজিয়াছে,কল কারখানা লাটে!


    ব্যবসা বাণিজ্য সারা বছর পুজো মত্সব সর্বস্ব,পুজোর বিরাম নেই!


    সংবাদ মাধ্যম বাজার বাজার কইরা পিত্তি জ্বালানোয় কম যায় না!


    তাহার উপর এই জাপানী তেল তত্সহ সংবাদ শিরোনামের আগে জাপানী তেল!

    সবকিছু ফুলিয়া ফাঁপিয়া ঢোল!


    দুগ্গা বিশ্বের সব চেয়ে বড় প্রতিমা!

    এখন রকেট ক্যাপসুল জাপানী তেল নিবেদিত শারদোত্সব!


    প্যান্ডেলে প্যান্ডেলে ঘইরা ফিইরা যদি কেহ শুধাইতে লাগে মা দুগ্গারে যে এত্তো কাল মহিষাসুর বধ ত হইলো,কটা খাট ভাঙ্গা হইলো,বল দিকিনি, দোষ ধরা যাবে না!

    https://youtu.be/Qn-briKVC3c

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    Diwali Dhamaka: Strategic Sale of PSUs may Kickstart Soon



    Violence Mars Bengal Civic Polls

    Trinamool goons attacking CPIM candidate's booth agent at Saltlake on Saturday.

    Amid reports of violence and alleged malpractices, over 40 per cent polling was recorded till afternoon for election to two municipal corporations and Siliguri Mahukuma Parishad in West Bengal as the CPI(M) called a bandh in Rajarhat-Bidhannagar area on Monday in protest.

    State Election Commissioner S R Upadhaya told PTI, "Till one pm, over 40 per cent polling was recorded. 43 per cent polling was registered in Bidhannagar and Siliguri while Asansol recorded 47 per cent polling."

    Upadhaya said that the SEC has been receiving numerous complaints about malpractices, rigging and violence.

    "We have received complaints of rigging and violence both from political parties and individuals. In some places media personnel were also attacked, we have seen the video footages.

    We have asked the police to take necessary action," he said.

    Accusing TMC of unleashing a reign of terror to loot votes in the Bidhannagar Municipal Corporation, CPI(M) called 12-hour bandh in Bidhannagar-Rajarahat area on Monday protesting against alleged violence and malpractices.

    Announcing his party's decision to call a bandh on Monday, CPIM leader Gautam Deb said, "We will organise protest march tomorrow against rigging and malpractices by TMC. They are trying to take away the democratic rights of the masses".

    Senior officials of SEC and state police said there were reports of outsiders trying to jam booths in various wards of Bidhannagar and Asansol municipal corporations.

    "There were reports of bombs being hurled in Jamuria and Bidhanagar and people being stopped from casting their votes.

    We are taking stock of the stutation," an official said.

    Few media personnel were also beaten up while covering the incidents of malpractices.

    The polls are a precursor to next year's assembly elections in Bengal with ruling Trinamool Congress and its arch rival Left Front once again pitted against each other.



    শাসকের নিশানায় সংবাদমাধ্যম, ধর্ষণের হুমকি মহিলা সাংবাদিককে, নেতৃত্বে বিধায়ক সুজিত বোস


    য়েব ডেস্ক: সকাল থেকেই সল্টলেকের কোথাও ভোট লুঠ, কোথাও বহিরাগতদের দিয়ে বুথ জ্যাম়ের অভিযোগ আসছিল। বিদ্যুত্‍গতিতে সেইসব খবর করছিলেন ২৪ ঘণ্টার সাংবাদিকরা। আর তাতেই শাসকদলের রোষের মুখে সংবাদমাধ্যম। হেলমেট দিয়ে মাথায় আঘাত করা হয় ২৪ ঘণ্টার চিত্র সাংবাদিক মিন্টু বসাককে। হুমকি দেওয়া হয়, ছবি তুললে ধর্ষণ করে দেব। "ক্যামেরা বন্ধ করতে না পারলে আপনাদের অবস্থা খারাপ হয়ে যাবে", পুলিসকে হুমকি তৃণমূল বিধায়ক সুজিত বোসের। কার্যত এরপরই ঠুঁটো জগন্নাথের ভূমিকা পালন করে পুলিস।  

    চিত্রসাংবাদিকদের অপরাধ ছিল শাসকদলের দাদাগিরির ছবি তুলছিলেন তাঁরা। সেই অপরাধে পেটানো হল চব্বিশ ঘণ্টার মিন্টু বসাক ও পার্থসারথি চক্রবর্তীকে। বাদ গেলেন না রিপোর্টাররাও। চব্বিশ ঘণ্টার মহিলা সাংবাদিক দেবারতি ঘোষকে ধর্ষণ করার হুমকি শাসক ক্যাডারদের। চব্বিশ ঘণ্টারই আরেক সাংবাদিক বিক্রম ঘোষকে লক্ষ্য করে ঢিল ছোড়া হল। মেরে মুখ ফাটিয়ে দেওয়া হল এবিপি আনন্দের সাংবাদিক অরিত্রিক ভট্টাচার্যের। আর পুরো ঘটনাই সামনে দাঁড়িয়ে দেখলেন শাসক দলের দুই ডাকসাইটে বিধায়ক সুজিত বসু ও পরেশ পাল। লেকটাউনের বাসিন্দা সুজিত বসু আর বেলেঘাটর বাসিন্দা পরেশ পাল কী করতে গিয়েছিলেন সল্টলেকে? প্রশ্নের মুখে পড়তে হবে জেনে দুই বিধায়কের মোবাইলই সুইচড অফ।

    http://zeenews.india.com/bengali/zila/saltlake-media-attack_132150.html

    সল্টলেকে বুথের দরজা বন্ধ করে ছাপ্পা, সাংবাদিকদের লক্ষ্য করে বোমা


    বুথে ঢুকে ইভিএম ভেঙে দেওয়ার অভিযোগ তৃণমূলের বিরুদ্ধে। ২১৭ নম্বর বুথে ভোট গ্রহণ বন্ধ। নিস্ক্রিয় পুলিস। সাধারণ ভোটাররা ক্ষুব্ধ। ভোট গ্রহনকেন্দ্রে ঢুকে পরে ২০-২৫ জনের একটি দল, তারপর পুলিসের সামনেই ইভিএম ভাঙে তাঁরা। টুকরো টুকরো হয়ে যায় ইভি এম মেশিন।

    http://zeenews.india.com/bengali/zila/saltlake-41-ward_132147.html

    ভোটের দিনে ভিআইপিতে জ্বলছে বাইক, সল্টলেকে বোমাবাজি, বালিতে দেদার ছাপ্পা

    ভোটের দিনে ভিআইপিতে জ্বলছে বাইক, সল্টলেকে বোমাবাজি, বালিতে দেদার ছাপ্পা

    ভিআইপিতে কংগ্রেস-তৃণমূল দুই পক্ষের সংঘর্ষ। রাস্তায় দাউ দাউ জ্বলছে বাইক। চলল গুলি। ফুটপাথের ধারে পড়ে রয়েছে বোমা। ঘটনায় আটক ৮ জন। কোন রাজনৈতিক দলের সমর্থক তাঁরা, তা এখনও স্পষ্ট জানা যায়নি। অতি সংবেদনশীল জায়গায় এই ঘটনায় পুরো এলাকা জুড়েই তৈরি হয়েছে সন্ত্রস্ত পরিবেশ।


    http://zeenews.india.com/bengali

    LIVE CRICKET

    http://abpananda.abplive.in/

    'দাদার' কথায় ৫০০ টাকার বিনিময়ে সল্টলেকে ভোট দিতে এসে পাকড়াও বহিরাগত 'ভাই'  

    'দাদার' কথায় ভোট দিতে এসে পাকড়াও বহিরাগত 'ভাই'! ক্যামেরার সামনে স্বীকারোক্তি, ছাপ্পা দিতে এসেছেন ৫০০ টাকার জন্য। ...আরও»

    পরিকল্পিত হামলা! বিধাননগরে আক্রান্ত ৭ সংবাদমাধ্যমের ১৭ সাংবাদিক  

    রক্তাক্ত সংবাদমাধ্যম! অবাধ ছাপ্পা। ভূপতিত গণতন্ত্র! এটাই শনিবারের পুরভোটে বিধাননগরের ছবি! পথের কাঁটা সরাতে বেপরোয়া শাসক আশ্রিত দুষ্কৃতীরা। ৫ ঘণ্টায় আক্রান্ত ৭ সংবাদমাধ্যমের ১৭ সাংবাদিক। ...  আরও»

    সল্টলেকে এবিপি আনন্দর সাংবাদিককে মেরে মুখ ফাটিয়ে দিল তৃণমূলের গুণ্ডাবাহিনী  

    সল্টলেকে ভোটের খবর করতে গিয়ে এবিপি আনন্দর সাংবাদিক অরিত্রিক ভট্টাচার্যকে নির্মমভাবে পেটাল তৃণমূল আশ্রিত দুষ্কৃতীরা। মেরে তাঁর মুখ ফাটিয়ে দেওয়া হল। মার খেলেন চিত্র সাংবাদিক পার্থ সারথি চক্রবর্তী। তাঁর ক্যামেরা ক ...  আরও»

    http://abpananda.abplive.in/kolkata/


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    Indian Express Reports:

    Kill policemen, never commit suicide: Hardik tells Patel youth

    Kill policemen, never commit suicide: Hardik tells Patel youth

    Later, Hardik Patel denied that he gave such an advice. "I have not given any advice to kill policemen. This is an attempt to misguide the people." Sardar Patel Group (SPG) convener Lalji Patel, who was the first to start the agitation for reservation for Patels in OBC quota, distanced himself from Hardik's advice.


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    Holy cow! India is the world's largest beef exporter 


    india beef exports

    India was the world's top beef exporter last year according to the U.S. Department of Agriculture, widening its lead over other more established suppliers such as Brazil and Australia.

    Cow is revered in Hindu culture, the religion observed by roughly 80% of India's 1.3 billion people, and restrictions on cattle slaughter apply in most states.


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    90 Year Old Dalit Denied Temple Entry And Burnt Alive By Countercurrents.org
    http://www.countercurrents.org/cc021015.htm
    02 October, 2015, Countercurrents.org

    [dalit-panther.jpg.pagespeed.ce.uThbRQciqF.jpg]

    Close on the heels of the lynching of a man to death following a rumour that he and his family ate beef, a 90-year-old Dalit man was brutally attacked with an axe and set on fire for trying to enter a temple at Hamirpur in Uttar Pradesh, India. The elderly man died on the spot.

    The Hindustan Times reported that

          The victim, identified as Chimma, had gone to the Maidani Baba
          temple with his wife, son Durjan and brother on Wednesday evening.
          He was stopped from entering the temple by a man named Sanjay
          Tiwari.

          When Chimma did not relent, Tiwari allegedly attacked him with an
          axe and then set him on fire.

          The incident took place in the presence of several other worshippers
          in Bilgaon, a village on the boundary between Hamirpur and Jalaun
          districts located 140km from Kanpur.

          Police said Tiwari had been arrested after he was nabbed by other
          people present in the area. They said he was drunk at the time of
          the incident.

          An eyewitness said Tiwari had asked Chimma and several others not to
          enter the temple but they refused.

          He said Tiwari became furious and attacked the Dalit man with an
          axe. While Chimma's wife screamed for help, Tiwari doused the
          elderly man with kerosene and set him afire, the eyewitness said.

          Two aides of Tiwari, who were named in the FIR filed by police, are
          on the run.

          Hindu religion, which is still governed by a highly hierarchical
          caste system, denied temple entry to majority of its members
          belonging to the lower castes until early half of the 20th century.
          It was movements led by Hindu reformers, especially the temple entry
          movement in Kerala, starting with the Vaikom Satyagraha struggle in
          1924 that led to the abolition on the restriction of temple entry.
          It was vehemently resisted by the upper caste Hindus.

          When India won Independence from the British and the new
          Constitution was adopted, untouchability and its practice in any
          form was abolished under Article 17 of the Constitution.
          Untouchability means the practices evolved as social restrictions in
          sharing food, access to public places, offering prayers and
          performing religious services, entry in temple and other public
          places and denial of access to drinking water sources, etc.

          Hinduism is generally believed world over as a religion of tolerance
          and peace, mainly taking the life and practices of Mahatma Gandhi as
          an example. But people living in the strictly hierarchical caste
          structure of Hindusism tell a tale of oppression severe than racism.
          Untouchability is still practiced in many parts of India. Caste
          violence, rapes and killings still occur regularly in India. One of
          the demands of the Dalit groups in the "World Conference against
          Racism" held in Durban, South Africa 2001 was to term caste system
          as racism. But the Durban declaration failed to term caste
          discrimination as racism.

          On Monday night in Dadri village, North Western Uttar Pradesh (UP),
          around 45 km from the capital city of India, New Delhi, A fifty year
          old Muslim man was beaten to death, and critically injured his 22
          year old son by a mob of about 100 people alleging that the family
          ate beef in the house. 

    -- https://youtu.be/Qn-briKVC3c

    Let Me Speak Human!My Heart Pierced but I may not sing like a nightingale!

    Diwali Dhamaka: Strategic Sale of PSUs may Kickstart Soon

    Pl see my blogs;


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    Dalits Media Watch

    News Updates 01.10.15

    -- Dalit man, 90, hacked, burnt to death in UP - The Times Of India

    http://timesofindia.indiatimes.com/City/Lucknow/Dalit-man-90-hacked-burnt-to-death-in-UP/articleshow/49202047.cms

    UP boy, 9, booked for raping 6-year-old - The Times Of India

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/UP-boy-9-booked-for-raping-6-year-old/articleshow/49201930.cms

    Mulayam sheds his ideals, fields son of Ranvir Sena founder - Catch News

    HTTP://WWW.CATCHNEWS.COM/POLITICS-NEWS/MULAYAM-SHEDS-HIS-IDEALS-FIELDS-SON-OF-RANVIR-SENA-FOUNDER-1443820877.HTML

    HC dismisses petition challenging barber shops for non-dalit people - The Times Of India

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/chennai/HC-dismisses-petition-challenging-barber-shops-for-non-dalit-people/articleshow/49187719.cms

    More Muslims, Dalits in Prison, Says NCRB Data - The New Indian Express

    http://www.newindianexpress.com/states/tamil_nadu/More-Muslims-Dalits-in-Prison-Says-NCRB-Data/2015/10/03/article3059767.ece

    Narrating the discrimination against Dalits - The Hindu

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/NATIONAL/KARNATAKA/NARRATING-THE-DISCRIMINATION-AGAINST-DALITS/ARTICLE7717866.ECE

    Durga puja by Kolkata's transgender women - Zee News

    http://zeenews.india.com/news/west-bengal/durga-puja-by-kolkatas-transgender-women_1805092.html

    Odisha to provide subsidised rice to SC/ST schools - The Statesman  

    http://www.thestatesman.com/news/odisha/odisha-to-provide-subsidised-rice-to-sc-st-schools/94277.html

    SC/BC employees protest outside DC office - The Tribune

    http://www.tribuneindia.com/news/jalandhar/sc-bc-employees-protest-outside-dc-office/140912.html

    SC body condemns RSS chief's remarks - The Tribune

    http://www.tribuneindia.com/news/jalandhar/sc-body-condemns-rss-chief-s-remarks/140913.html

    Creaming the people: Caste-based reservations need to be recast for the sake of a fairer society - The Times Of India

    http://blogs.timesofindia.indiatimes.com/The-underage-optimist/creaming-the-people-caste-based-reservations-need-to-be-recast-for-the-sake-of-a-fairer-society/

     

    Please Watch:

    The Dalit Voice

    https://www.youtube.com/watch?v=wAgU6EKvljo

     

    Note: Please find attachment for DMW Hindi (PDF)

     

    The Times Of India

     

    Dalit man, 90, hacked, burnt to death in UP

    http://timesofindia.indiatimes.com/City/Lucknow/Dalit-man-90-hacked-burnt-to-death-in-UP/articleshow/49202047.cms

     

    Arindam Ghosh,TNN | Oct 3, 2015, 06.17 AM IST

     

    JHANSI: A drunk allegedly killed a 90-year-old dalit in a village in UP's Hamirpur district on Wednesday after the latter refused to part with his money. Accused Sanjay Tiwari later set the body on fire. 


    On Friday, Hamirpur police said the killing took place in Bilgaon village when Khimma Ahirwar was going to a temple. He was accompanied by his wife, Basanti, and a relative. 


    On the way, they encountered a drunken Tiwari, who demanded money from Ahirwar. When Ahirwar refused, the accused attacked him with an axe.


    Basanti and the relative fled from the spot. After Ahirwar died, Tiwari burned the body. Alerted by Basanti, villagers went to the crime scene, overpowered Tiwari and handed him over to the police. 


    The police denied an earlier report that Ahirwar was killed because he was entering a temple. They lodged an FIR against Tiwari and three of his associates under the IPC and SC/ST Act. "The accused was under the influence of alcohol at the time he committed the crime," Hamirpur SP Muniraj G told TOI. "We've arrested him and are further investigating the matter." 


    According to villagers, Tiwari is a drug addict and a troublemaker. He was reported to the police several times, but no action was taken against him. 

     

    The Times Of India

    UP boy, 9, booked for raping 6-year-old

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/UP-boy-9-booked-for-raping-6-year-old/articleshow/49201930.cms

     

    Kanwardeep Singh,TNN | Oct 3, 2015, 05.46 AM IST

     

    PILIBHIT: Cops in UP are calling him the youngest ever person booked for rape. In a shocking incident, a nine-year-old boy has been charged with the rape of a six-years-old girl in Maithi, Pilibhit. Medical examination of the girl on Friday confirmed the sexual assault, following which an FIR was registered and the boy sent to a juvenile home in Bareilly. 


    A case has also been registered against the boy under the SC/ST Act as the girl belongs to the Jatav community.


    Nirmal Bisht, the circle officer who is investigating the case, told TOI, "We have presented the boy in front of the magistrate. He has been sent to the juvenile home in Bareilly. The boy has accepted the charges and medical examination of the girl has confirmed rape. The age of the boy is yet to be confirmed but can't be more than 10 years." 

    The incident took place on Thursday, when the two children were playing in a field. The brother of the girl told TOI, "My sister, who is around six years old, went out to buy chocolate when the boy asked her to play with him. He took her to a nearby field, where he raped her. When my sister returned after some time, she was crying in pain and bleeding. She narrated her entire ordeal to us." 


    According to the police, the boy, who along with his family, had been on the run since the incident came to light on Thursday, was caught on Friday. "The boy looked quite scared. His first reaction to police questioning was, 'khel khel mai ho gaya' (we were just playing)," said Dalbeer Verma, station officer, Neuria police station. "It is really unbelievable as I wasn't convinced with the allegations of rape by a nine-year-old kid, but he admitted to the charges." 


    Parents of the girl alleged that cops were reluctant to file the FIR and acted only after a group of people from the Jatav community protested outside the police station. Verma, however, explained that cops were initially reluctant to lodge an FIR as the allegations sound unbelievable. "But since the matter comes under the SC/ST Act, we filed the complaint." 


    According to activists, there has been a drastic increase in the number of juvenile crimes in the country. A Bareilly-based woman activist, Praveen Bhandari, said, "Children are over-exposed to pornography on internet, TV and movies." 


    State president of All India Democratic Women's Association Madhu Garg said, "There is a need to provide counselling to children and give them proper sex education. In most of the instances of juvenile crimes related to rape, it has been observed that children, who reside in one-room houses, are exposed to sex from an early age. In the absence of proper guidance, it creates a desire for sex among minors, which may instigate child rape."

     

    Catch News

     

    Mulayam sheds his ideals, fields son of Ranvir Sena founder

    HTTP://WWW.CATCHNEWS.COM/POLITICS-NEWS/MULAYAM-SHEDS-HIS-IDEALS-FIELDS-SON-OF-RANVIR-SENA-FOUNDER-1443820877.HTML

     

    N KUMAR@CATCHNEWS

    |3 OCTOBER 2015

     

    The deviation

    ·                     SP has given a ticket to the son of Ranvir Sena founder Brahmeshwar Mukhia

    ·                     Ranvir Sena is involved in several massacres of Dalits

    ·                     Clearly, SP has forgotten its ideal of social justice

     

    The candidate

    ·                     Mukhia's son Indu Bhushan Singh is openly pro-BJP

    ·                     By fielding him, SP seems to be invoking Mukhia's legacy

     

    More in the story

    ·                     What does Mulayam Singh Yadav really want?

    ·                     Who is Indu Bhushan Singh

     

    Taking political about-turns appears to have become a habit with Samajwadi Party chief Mulayam Singh Yadav. Yadav, who claims to be a follower of Ram Manohar Lohia's principles of social justice and equality, appears to have forgotten all that he learnt from him.

     

    Mulayam's party has given a ticket to the son of Ranvir Sena founder Brahmeshwar Mukhia for the upcoming Bihar Assembly elections.

     

    Mukhia's son, Indu Bhushan Singh, will be contesting from the Tarari Assembly constituency. Tarari is in Arrah district, where Mukhia hailed from. It was in Arrah that Mukhia was gunned down in 2012. It is evident the the SP is trying to cash in on Mukhia's popularity in the area.

     

    Singh is considered the de-facto heir of his father's controversial legacy.

     

    Mulayam's gameplan

     

    Critics say that the SP has deviated from its core principles by invoking the Bhumihar warlord's legacy.

     

    JD(U) General Secretary KC Tyagi said that the SP will gain nothing by fielding Mukhia's son. "SP and their allies are non-entities in the Bihar elections. It makes no difference whom they give tickets to," Tyagi said.

     

    Mukhia's son Indu Bhushan Singh is openly pro-BJP. Yet the SP has given him a ticket

    It is believed that the SP's sole aim in the elections is to defeat the Grand Alliance of the RJD, JD(U) and the Congress. He has joined hands with Lalu Prasad's bete noire Pappu Yadav and has even deputed his son, Uttar Pradesh Chief Minister Akhilesh Yadav, to campaign against the Grand Alliance.

     

    His nephew, Mainpuri MP Tej Pratap Yadav, will also be campaigning in the state, even though he is married to Lalu's youngest daughter.

     

    Who is Indu Bhushan Singh?

    Singh had contested the Lok Sabha elections from the Patliputra constituency. There was speculation that this was Lalu's way of splitting Bhumihar votes to ensure the victory of his daughter Misa Bharti. But this didn't work out and his friend-turned-foe Ram Kripal Yadav rode to victory on a BJP ticket.

     

    During his Lok Sabha campaign, Singh was quite open about being "a BJP supporter at heart, irrespective of which party fields him". Yet the SP, which claims to be anti-BJP, had no qualms in adopting him.

     

    Tarari is one of the high-profile seats in the Bhojpur region. It was represented by JD(U) strongman Sunil Pandey, who was arrested a few months ago.

     

    The BJP shied away from fielding Singh, despite his professed loyalty to the party. This could be due to the fear of a backlash from Dalit voters.

     

    Ranvir Sena's bloody past

    The Ranvir Sena's bloody history is well known. It conducted several massacres of Dalits through the late 1990s. The most gruesome massacre was in in 1997 when 61 Dalits were butchered in Lakshmanpur Bathe in Jahanabad.

     

    It hit the headlines recently after a Cobrapost expose alleged that BJP leaders like Sushil Modi tried to scuttle the probe into the massacres.

     

    There are allegations that the Ranvir Sena was behind the gangrape of six Mahadalit women in Bhojpur's Kurmuri Bazar, some months ago.

     

    The Times Of India

     

    HC dismisses petition challenging barber shops for non-dalit people

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/chennai/HC-dismisses-petition-challenging-barber-shops-for-non-dalit-people/articleshow/49187719.cms

     

    Manish Raj,TNN | Oct 1, 2015, 10.59 PM IST

     

    CHENNAI: Madras High Court has dismissed a petition challenging construction of barber shops exclusively for non-dalit people in Cuddalore district. The petitioner's argument that such shop would foster the practice of untouchability also failed to cut ice with the court. 


    B Ragothanan said three people were collecting funds to construct barber shop exclusively for the non-dalits in government land in Adhiyur village, near Veppur in Cuddalore. After he sent a representation to the tahsildar, a peace committee meeting was held between dalit and non-dalit communities in the village. Despite this, there was no decision to allow dalits in the barber shop. As he failed to get a response from the RDO, he moved the Madras high court. 


    On Thursday, the first bench of Chief Justice Sanjay Kishan Kaul and Justice T S Sivagnanam said if the construction was to begin on government land, the complaint had to be made in accordance with revenue department Government Order dated April 12, 2014. Ragothanan had also said there was a possibility of discriminating against a community. "If such a situation arises, naturally the cause would arise to any person against whom discrimination is practiced and necessary proceedings can be taken," said the bench dismissing the petition.

     

    The New Indian Express

     

    More Muslims, Dalits in Prison, Says NCRB Data

    http://www.newindianexpress.com/states/tamil_nadu/More-Muslims-Dalits-in-Prison-Says-NCRB-Data/2015/10/03/article3059767.ece

     

    By Rohan Premkumar Published: 03rd October 2015 06:03 AM Last Updated: 03rd October 2015 06:03 AM

    COIMBATORE:The percentage of Muslims, Dalits and OBCs lodged in prisons in India is disproportionate to their population, if one were to go by the data of prisoners compiled by the National Crime Records Bureau and the latest Census figures.

     

    While the NCRB report reveals that 26.4% of the prisoners in the country were Muslims, the total population of Muslims in the country is lesser at 14.2% as per the Census data. Likewise, 60.3% of the jail inmates belonged to Other Backward Classes and Scheduled Castes/Tribes. Also, 38.1% of the detenues in prisons were OBCs and STs. 'Detenues' are persons detained in prison on the orders of a competent authority under relevant preventative detention laws. "While Muslims constitute around 30% of all prisoners, in the 'pre-trial phase', the proportion of convicted Muslim prisoners stands at only 16.4%," said an activist. National Confederation of Human Rights Organisations chairperson A Marx alleged that these figures reflected that the criminal justice system was inherently prejudiced against members of the backward classes and Muslims. "Since 1980, Muslim men are being detained unjustly by the police. There have been demands to establish fast track courts to deal with Muslim under-trial prisoners and award compensation to the wronged and punish police officers who wrongfully detained them," he added.

     

    Manithaneya Makkal Katchi leader and legislator M H Jawahirullah alleged that every time there is a terror attack invariably Muslim youth get picked up the police.  To substantiate this, he cited the Malegaon blast in 2008 where action based on suspicions of involvement of Muslims backfired. "Just because the statistics show that more Muslims are in prison it does not necessarily mean that members of the community are prone to be criminals. Muslims are also the targets of biased police officers," he charged.

     

    The Hindu

     

    Narrating the discrimination against Dalits

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/NATIONAL/KARNATAKA/NARRATING-THE-DISCRIMINATION-AGAINST-DALITS/ARTICLE7717866.ECE

     

    SATHISH G.T.

     

    Incidents of humiliation and atrocity witnessed since childhood days prompted Vijaykumar Sigaranahalli to write a book, "Boodiyagada Kenda", which means fuel that has not become ash. Native of Sigaranahalli in Holenarsipur taluk, the writer has seen poverty, bonded labour system, atrocities on Scheduled Castes in the name of religion and blind beliefs throughout the 30 years of his life.

     

    Interestingly, his book is ready for release, even as his native village, Sigaranahalli, is in the news for upper caste people allegedly imposing penalty on four Dalit women for entering a temple in the village.

     

    "Many people around me often spoke as if atrocities on Dalits have ended. Their views actually prompted me to record the day-to-day experiences of my family members and neighbours in the Dalit colony in my village, besides what I witnessed since my childhood days, in the form of a book," said Mr. Kumar, who is also a journalist.

     

    Farm labourers

    Born in a family of Scheduled Caste agricultural labourers, he grew up with elder brothers, who worked as bonded labourers.

     

    In a family of eight children, he was the youngest and he could only complete graduation with the support of his elders. "Even today, people living in my colony are restricted from entering temple and a community hall in the village. I and my family members have faced difficulty in getting houses for rent in places like Hassan. A few years ago, my sister's family was forced to vacate the house within minutes, after the house-owner learnt about her caste. I too faced such ordeal, when I moved to Hassan after getting a job," he said. He has narrated these incidents in his book.

     

    As a journalist, he has travelled across the district and witnessed how Dalits are being treated. Dalits were never given entry into Chowdeshwari temple at Kaginahare in Sakleshpur taluk. Members of the temple management committee have maintained that even Sakleshpur MLA, a Dalit, had not entered the temple.

     

    "These are not old stories, but happening every day. In my village, upper caste people do not have meals with Dalits. The upper caste people have to be served food in hotels, when they attend Dalit marriages," he said.

     

    The book will be released at a function organised by Bayalu Sahitya Vedike, in association with Hampi University, at Hampi in Ballari district on Saturday. Aharnishi has published the book.

     

    Zee News

     

    Durga puja by Kolkata's transgender women

    http://zeenews.india.com/news/west-bengal/durga-puja-by-kolkatas-transgender-women_1805092.html

     

    Last Updated: Friday, October 2, 2015 - 10:17

     

    Kolkata: Transgender women here have come together this year to organise a special Durga puja in an "attempt to re-claim social space" in the face of "ostracism".

     

    Spurred by the discriminatory gaze they are subjected to during pandal visits, women of the transgender community have taken matters into their own hands.

     

    Organised by Pratyay Gender Trust in association with a local club, all arrangements are being made by the transgender women from Kolkata and suburbs.

     

    "Whenever we visit pandals, we are seen in a derogatory way. We are trying to end this discrimination and create scope for conversation between communities where we and our families live," a member of the organising body told IANS.

     

    "Every one is welcome to visit our pandal," the member said.

     

    They will also, apart from trying to carve a niche for themselves in the society, seek to dissolve gender disparity.

    Activities that are traditionally male dominated, the theme, specifications about the idol, marquee decoration, collection of subscription, puja committee formation, will see the participation of transgender women.

     

    Budgeted at Rs 1.5 lakh, the celebrations will be held at Jay Mitra street (off Rabindra Sarani), near Sovabazar in north Kolkata.

     

    A performance by troupe of a senior transgender artist will inaugurate the puja onOctober 18

     

    The Statesman      

     

    Odisha to provide subsidised rice to SC/ST schools

    http://www.thestatesman.com/news/odisha/odisha-to-provide-subsidised-rice-to-sc-st-schools/94277.html

     

    PTI Bhubaneswar, | 02 October, 2015

     

    Chief Minister Naveen Patnaik on Friday said that the Odisha government would take the burden of supplying subsidised rice to the inmates of residential schools run by the Scheduled Caste and Scheduled Tribe department of the state.

     

    Patnaik made this announcement while launching the distribution of digitised ration cards among beneficiaries under the National Food Security Act at a function here. Other ministers distributed the NFSA ration cards in 14 districts.

     

    The state government had been supplying subsidised rice at the rate of Re 1 a kg to all the SC-ST residential schools since 2008. However, there is no provision under the NFSA whether these residential schools could get benefit, a senior official said.

    "The state government will take the burden of the expenditure to be made for supply of subsidised rice to SC-ST residential schools," Patnaik said.

     

    Stating that his government accords priority to proper implementation of the NFSA, Patnaik said poor would need to get the food security in order to maintain inclusive growth of the state. "The poor people have gained confidence by getting food security in Odisha," the Chief Minister said.

     

    Patnaik said the NFSA ration cards were being issued in the name of elder women members of families in Odisha, which he said indicated his government's commitment towards woman empowerment.

     

    Food Supplies and Consumer Welfare Minister Sanjay Das Burma, who was present during the launch, said, "Transparency has been maintained in preparing the list of beneficiaries.

     

    Errors, if any, regarding the beneficiaries can be corrected within three months."

     

    The state government has decided to implement NFSA across the state in two phases. While first phase will be implemented in 14 districts from November 1, the second phase will come into force from December 1 in the remaining 16 districts.

     

    The districts which will be covered in the first phase comprises Malkangiri, Koraput, Kalahandi, Nuapada, Balangir, Kandhamal, Boudh, Angul, Sonepur, Bargarh, Sambalpur, Deogarh, Jharsuguda and Gajapati.

     

    A total of 3.26 crore beneficiaries will be eligible to get benefits under the NFSA in Odisha, the minister said.

     

    The Tribune

     

    SC/BC employees protest outside DC office

    http://www.tribuneindia.com/news/jalandhar/sc-bc-employees-protest-outside-dc-office/140912.html

     

    Tribune News Service   Jalandhar, October 2

     

    SC/BC employees along with the Lok Ekta Front, Punjab, held a dharna outside the Deputy Commissioner's office here to reiterate their demand for seniority lists and promotions to be done in the state on the basis of 85th constitutional amendment.

     

    While the SC/BC cadres and general cadres are already in a tussle over the reservation policy and promotions, the SC employees also demanded increase in reservation for the cadres under B and C category from 14 to 20 per cent through promotion.

     

    The front also demanded the taking back of the government letter regarding seniority lists released on October 10, 2014.

     

    Convener and co-convener of the front, Gurmail Sigh Chadar and Avtar Singh Kainth, said the state the government was trying to rob the Dalits of their constitutional rights.

     

    They termed the October 10, 2014, letter against the reservation policy and demanded that it should be taken back.

     

    They said the children belonging to lower strata were not being given concession in fees and various schemes meant for the poor were also not being implemented.

     

    The Tribune

     

    body condemns RSS chief's remarks

    http://www.tribuneindia.com/news/jalandhar/sc-body-condemns-rss-chief-s-remarks/140913.html

     

    Tribune News Service  Jalandhar, October 2

    The recent statement of Rashtriya Swayamsevak Sangh chief Mohan Bhagwat regarding an end to reservation is aimed at polarising the Indian society, said the National Scheduled Castes Alliance (NSCA). It also amounts to violation of the Indian Constitution, the NSCA added.

     

    "Dalits and OBCs form 80 per cent of the population. In fact it is being felt that reservation should be increased in proportion to the population of OBCs and Dalits. The RSS is talking about putting an end to it," said NSCA president Paramjit Singh Kainth.

     

    The party said the recent incidents targeting the Muslim and Christian communities were also creating tension across the country.

     

    "A number of right wing organisations in Punjab and other states are trying to create an anti-reservation mood. This is posing a danger to the delicate fabric of peace in the country," he said.

     

    "The reservation policy has not yet achieved its goal of empowering the weaker sections and providing social justice," said Kainth.

     

    Even the Rashtriya Lok Samta Party, BJP's ally in Bihar, has clarified that reservation is a settled issue in India as mandated by the Constitution, he claimed.

     

    He said Bhagwat's remarks had instigated reactions from across the political spectrum. The RSS's media in-charge Manmohan Vaidya was given the duty to carry out damage control exercise, he added.

     

    "The Sangh had to issue a statement on Bhagwat's damaging remarks maintaining that Bhagwat didn't make any comment on the reservation being given at present to various weaker sections of society," added Kainth.

     

    The Times Of India

     

    Creaming the people: Caste-based reservations

    need to be recast for the sake of a fairer society

    http://blogs.timesofindia.indiatimes.com/The-underage-optimist/creaming-the-people-caste-based-reservations-need-to-be-recast-for-the-sake-of-a-fairer-society/

     

    October 3, 2015, 12:02 AM IST Chetan Bhagat in The Underage Optimist | India | TOI

     

    In India, we stay away from certain issues in the name of political correctness. Sadly, those are the issues that most need attention. One such contentious issue in India is caste-based reservations. While often dormant in people's minds, it doesn't take long for the issue to flare up again. Patel community protests in Gujarat are an example. They attracted so many people that the state government had to ban internet and SMS services to contain the wildfire. While protests may have stopped spilling over on the streets for now, the issue remains in people's hearts.

     

    You cannot ban the internet every time. If at all the protests had a lesson, it is that the current reservation policy, although well intentioned when it was formulated, needs a relook. This is exactly what RSS supremo Mohan Bhagwat suggested when he asked for a review of reservation policies so they become fairer.

     

    Of course, his comment was seen as a political mistake. It may help consolidate the anti-BJP dalit vote in Bihar. Hence it is no surprise that nobody from BJP or any other party actually concurred with the RSS supremo's view.

    However, we must factor in the longterm interest of the nation. We must also have a reservation policy that best achieves the primary objective – to have a fairer, more equal society. We must also accept that reservation is a short cut. It is a stopgap, artificial albeit quick way to create equality in society.

     

    It doesn't create opportunity. It simply takes opportunity from someone deserving and hands it to another, purely on the basis of birth. In doing so it divides society, fosters mediocrity and demotivates the talented. Hence, reservation is neither victimless nor costless to society.

     

    Around 50% of enrollment in central government educational institutions as well as government job placements are reserved for OBCs, SCs and STs. OBCs have a concept of creamy layer, where families with incomes of more than Rs 6 lakh per annum cannot be eligible for reservation benefits. This does not apply to SCs and STs.

    Historically, and in parts of India even to this date, people from backward castes have been denied opportunity and discriminated against. However, this sentence was valid even in say, 1965. Has nothing changed in the last 50 years? Haven't these same reservation policies, which were meant to create a fairer society, achieved their goal to a certain extent? Of course things have changed.

     

    One National Commission for Scheduled Castes and Scheduled Tribes study reveals that SC candidates (not including ST/OBC) comprised around 1% of Class I (the more elite) government jobs in 1965. This share of Class I jobs had increased to 10% of total Class I jobs by 1995. The number is probably higher in 2015.

     

    This dramatic rise of the share of people from backward communities in top government jobs shows the reservation policy has been successful. However, do note that children of these high-grade SC/ST officers still get reservation benefits. This feudal upper class within the SC or ST category will inherit the benefits of growing up in an affluent environment from their previous generations and also be eligible for a quota like any other below poverty line SC/ST candidate.

     

    The cream in the creamy layer is only going to get thicker, denying benefits to the truly needy. The solution lies in linking reservation benefits to something more quantifiable as an indicator of denied opportunity – income.

     

    Household income is a pretty good indicator of whether a child in that house would have had the opportunity to study for an IIT or prepare for IAS as much as a middle and upper class student. It also seems fair.

     

    What is wonderful about having economic criteria is that as per capita incomes rise, the pool of people eligible for reservation will automatically decline. We may even see a day when we won't need reservation at all.

     

    Today technology allows us to measure, track and monitor household income like never before. Imagine an India where your caste was irrelevant, only your talent mattered, and if you were born to a poor family, you would get help to develop your talent. That seems like a much fairer India than now, where a list of castes gets reservation, and so-called upper castes kill themselves to fight for the leftover seats.

     

    Some argue that reservation is not only for economic uplift but also to increase the social status of a caste. But a better solution is to eliminate the caste system.

     

    Don't use it in government. Let society look down on people who enquire about someone else's caste. If we can make it illegal to make disparaging comments ab

     

    out people from the northeast or backward castes, why not make it illegal to talk about caste?

     

    Most of the world operates very well without caste. Surnames just need to be names, they don't have to place you in society. What use is the caste system today anyway?

     

    Enough has changed and the time has come to recast reservations. Modern technology allows us to do so. If we don't do it, the youth from who we steal opportunities in the name of fairness won't like it. You don't create fairness by doing something unfair.

     

    News monitored by AMRESH & AJEET

     

     

     .Arun Khote

    On behalf of
    Dalits Media Watch Team
    (An initiative of "Peoples Media Advocacy & Resource Centre-PMARC")
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  • 10/03/15--09:55: The Color Of Human Flesh!

  • CC News Letter 013 Oct - The Color Of Human Flesh!
    -- Dear Friend,

    If you think the content of this news letter is critical for the dignified living and survival of humanity and other species on earth, please forward it to your friends and spread the word. It's time for humanity to come together as one family! You can subscribe to our news letter here http://www.countercurrents.org/subscribe.htm. You can also follow us on twitter, http://twitter.com/countercurrents and on Facebook, http://www.facebook.com/countercurrents

    In Solidarity
    Binu Mathew
    Editor
    www.countercurrents.org


    Syria-Battle Lines Create Tough Questions In Geopolitics: Lessons Not To Be Missed
    By Farooque Chowdhury

    http://www.countercurrents.org/chowdhury031015.htm

    The entire Middle East is in a volatile situation as coming days may find wider confrontation, and a few more actors are in the wings. New battle lines are being drawn almost everyday in the Kurdistan-Iraq-Syria-Turkey (KIST) region. Whatever news is coming from the region bears elements of uncertainty and increased tension with far-reaching implications in geopolitics. Many of the major geopolitical-players in the region are finding it difficult to estimate the total account


    US, Allies Blast Russia For Attacking Al Qaeda In Syria
    By Bill Van Auken

    http://www.countercurrents.org/auken031015.htm

    In a joint statement Friday, Washington and its allies in the war for regime change in Syria issued a condemnation of Russia's recent airstrikes in that country, demanding that Moscow confine any military action to attacks on Islamic State of Iraq and Syria (ISIS) targets. "These military actions constitute a further escalation and will only fuel more extremism and radicalization," the statement warned.In reality, the forces on the ground that the US and its allies are defending and which they are demanding that Russia stop bombing are dominated by the Al-Nusra Front, Al Qaeda's Syrian affiliate


    Confronting 'Looting To Order' And 'Cultural Racketeering' In Syria
    By Franklin Lamb

    http://www.countercurrents.org/lamb031015.htm

    Damascus: One of the many gut-wrenching dimensions of the soon to be five-year Syrian crisis is that whenever one surveys the conflict on the ground and concludes that the maelstrom can't possibly get any worse, it plummets deeper into the abyss. The condition of people in Syria has never been worse in modern times


    Hillary Offers Syria A Libyan-Iraqi-Style Paradise
    By David Swanson

    http://www.countercurrents.org/swanson031015.htm

    The criminal acts of overthrowing the governments of Iraq and Libya resulted in millions of people being killed, injured, traumatized, and turned into refugees, and the creation of not only worse governments but deadly chaos in those nations and spilling out into the rest of the region. This cannot be a model for what to do to Syria


    Obama's Presidential 'Legacy' Heads To Failure
    By Eric Zuesse

    http://www.countercurrents.org/zuesse031015.htm

    Europe is being overrun by refugees from American bombing campaigns in Libya and Syria, which created a failed state in Libya, and which threaten to do the same in Syria. Europe is thus being forced to separate itself from endorsing the U.S. bombing campaign that focuses against the Syrian government forces of the secular Shiite Syrian President Bashar al-Assad, instead of against his fundamentalist Sunni Islamic opponents, the jihadist groups (all of which are Sunni), such as ISIS, and Al Qaeda in Syria (al-Nusra)


    Poets' Talk: Pope Francis, Masilo, Marc Beaudin, et. al.
    By Gary Corseri and Charles Orloski

    http://www.countercurrents.org/corseri031015.htm

    A talk between two poets depicting a composite view of where we are at this moment--politically, spiritually, artistically--in the whirling Zeitgeist!


    Pope Francis vs The Cardinals
    By David Anderson

    http://www.countercurrents.org/anderson031015.htm

    The visit of Pope Francis to the United States was a very powerful one, but with two serious flaws; the Sainthood of Californian Junípero Serra, reopening wounds of Colonialism (insensitivity to American Indigenous Peoples) and as now being reported; the meeting with the Kentuckian anti-gay marriage county clerk Kim Davis. These flaws were all the more tragic as they obscured his great achievement, the 'Laudato Si' Encyclical laying out a moral case for addressing climate change


    Who's Trying To Silence Cindy Sheehan?
    By Mickey Z.

    http://www.countercurrents.org/mickeyz031015.htm

    I last interviewed Cindy in 2010 and was planning to do so again soon. When I recently learned she was being targeted by a new disinformation campaign, I knew the time was right


    The Color Of Human Flesh!
    By Prof. Shah Alam Khan

    http://www.countercurrents.org/khan031015.htm

    How many of you know the color of human flesh? It is lilac colored. Believe me it is and I know because I am a surgeon and I see raw human flesh every day! So you think it's useless to know the color of human flesh? No, not in today's India


    Beneath The Surface: Racism In India
    By Dr. Alana Golmei

    http://www.countercurrents.org/golmei031015.htm

    With retired parents and younger siblings still studying, she had been the breadwinner of the family, a huge responsibility to carry along with the burden and torture of being discriminated against. She talked about the many other women from Northeast Indiain similar situations, who work and earn for their families but are still underestimated in a lot of spaces in their lives and are deemed inferior


    The Changing Face Of 'Publicity'– 'Digital Diplomacy'
    By Priyanka Dass Saharia

    http://www.countercurrents.org/saharia031015.htm

    The 'Digital Drive' driving the dream of a 'Digital India' clearly isn't only hinging on economic or political motives, as many would tell but also cultural ones, the larger purpose of striking chords with the local communities and diasporas by extending the hand of the land to enhance the sense of 'belongingness'. Thus, it calls for a deeper and sensitive understanding of the dynamics of digital diplomacy as a social phenomenon, which uses 'publicity' as a method for change management and a re-evaluation of the conventional understandings of 'public', 'public sphere' and the process of 'publicity'
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    • त्यौहारों के समय विस्फोट करवा सकती है मोदी सरकार- रिहाई मंच

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 18:43:23 +0000
      अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए त्यौहारों के समय विस्फोट करवा सकती है मोदी सरकार- रिहाई मंच भागवत और अजित डोभाल देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा- राजीव यादव योगी को मुसलमानों की आबादी की...

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    • साम्प्रदायिकता का जहर घुलने देने में देश की न्यायपालिका, पुलिस- प्रशासन सर्वाधिक जिम्मेदार

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 18:00:14 +0000
      उन्हें सलीके के साथ नफरत के बीज बोते हुए बीस साल से अधिक हो गए हैं। लगातार दिन रात यह काम किया है। सरे आम … देश की संसद, संविधान, न्यायपालिका और नौकरशाही की नाक के नीचे डंके की चोट पर। जो आज घट...

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    • Modi's Foreign Policy is an Absolute Failure

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 17:12:23 +0000
      A nation's foreign policy is judged by the result not by the management of domestic media. Conducting diplomatic business requires a sophisticated and nuanced approach, especially with...

      पूरा आलेख पढने के लिए देखें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/
          
    • दादरी हत्याकाण्ड के विरूद्ध एसडीपीआई ने किया मुलायम सिंह के घर पर प्रदर्शन

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 16:49:34 +0000
      नई दिल्ली। दादरी में हुए अखलाक हत्याकांड के विरूद्ध आज दिल्ली में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के घर पर एसडीपीआई ने प्रर्दशन किया। प्रदर्शन के माध्यम से एसडीपीआई ने इस मामले...

      पूरा आलेख पढने के लिए देखें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/
          
    • वीरेनदा चले गये तो क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 16:22:55 +0000
       राष्ट्र या धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद कुछ बिगाड़ नहीं सकता  वीरेनदा चले गये तो क्या, वीरेनदा की लड़ाई जारी है हमने लड़ाई अभी शुरु भी नहीं की है, और हार मानकर हाथ पांव छोड़ दिये। डूब रहे हैं तो तैरने की...

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    • THE MUMBAI FILM & TV INDUSTRY DECLARES A STRIKE!

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 16:10:24 +0000
      Bollywood – Mumbai and TV Industry declares indefinite strike Come October 3 onwards, all workers of this film industry, including directors, actors, music directors, cinematographers, all other...

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    • फासिज्म मुकम्मल है और परिंदों को भी चहचहाने की इजाजत नहीं हैं!

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 15:54:58 +0000
      कल हमसे अपने डाक्साहब मांधाता सिंह ने पूछा कि आप अमुक लेखक को जानते हैं जिनकी सैकड़ों किताबें छपी हैं और वे अनेक भाषाओं के विद्वान हैं। हमने पूछा कि उनने लिखा क्या है। जाहिर सी बात है कि विद्वता की...

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    • पिछले दंगे में जो शख्स मरा अब्दुल हमीद ही था

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 13:36:25 +0000
      अब्दुल हमीद पिछले दंगे में जो शख्स मरा अब्दुल हमीद ही था उसके पिछले और उसके पिछले में भी अब्दुल हमीद ही था अब के जो मरा अब्दुल हमीद ही था खुदा की मार मुझ पर क्या बयां करूं अगली बार मरेगा जो शख्स लिखा...

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    • BJP should stop playing communal politics in the name of cow- Swami Agnivesh

      Posted:Fri, 02 Oct 2015 04:49:47 +0000
      DO NOT MAKE COW PROTECTION COMMUNAL AND VIOLENT DHARNA AT JANTAR MANTAR FROM 11  AM ON GANDHI JAYANTI DAY New Delhi. World Council of Arya Samaj leader Swami Agnivesh has condemned in the strongest...

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    • Police brutally attacked Left Front rally in Kolkata

      Posted:Thu, 01 Oct 2015 18:51:27 +0000
      Kolkata. Police brutally attacked Left Front rally in Kolkata. More than 200 activists belonging to Left Parties were injured. Even activists were not spared by police . Women and elders injured in...

      पूरा आलेख पढने के लिए देखें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/
          
    • उत्तर प्रदेश में कानून नहीं बल्कि जंगल राज व्याप्त है – दारापुरी

      Posted:Thu, 01 Oct 2015 17:52:16 +0000
      दादरी में बीफ और कानपुर में आतंकवादी के नाम पर मुसलमानों को मारने वालों के विरुद्ध हो सख्त कार्रवाई – आइपीएफ लखनऊ 1 अक्तूबर, 2015। उत्तर प्रदेश में हाल में भीड़ द्वारा दो लोगों को पीट-पीट कर...

      पूरा आलेख पढने के लिए देखें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/
          
    • संघी गिरोह लगातार मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ रहा है

      Posted:Thu, 01 Oct 2015 17:34:40 +0000
      देश में बढ़ रही साम्प्रदायिक हमले की कार्यवाही के खिलाफ माकपा ने धरना दिया लखनऊ 1 अक्टूबर। देश भर में संघी गिरोह द्वारा मुस्लिमों को निशाना बना कर बढ़ रही घटनाओं के खिलाफ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी...

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    • शुरू हुई झारखंड में जन अधिकार यात्रा

      Posted:Thu, 01 Oct 2015 17:11:39 +0000
      रांची। आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकारों पर हो रहे हमलों के विरुद्ध लोगों को संगठित करने के उद्देश्य से आज झारखंड में एक दस दिवसीय जन अधिकार यात्रा शुरू हुई। यह यात्रा मुख्य रूप से निम्न मुद्दों...

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    • P.M. Modi: India's Greatest Embarrassment

      Posted:Thu, 01 Oct 2015 16:41:39 +0000
      Opinion on Narendra Modi's achievement may vary, but not on his lowly conduct and pettiness. It was most embarrassing for us as Indians to watch our Prime Minister   asking the Indian community...

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    • हिन्दू राष्ट्र में हिन्दू बनने की चाह में शम्बूक वध भूल गए

      Posted:Thu, 01 Oct 2015 16:20:35 +0000
      दलितों को हिन्दू न मानने की परंपरा बहुत पुरानी है। उसी परंपरा का निर्वाह नागपुरी मुख्यालय करता है… हिन्दू बनने की चाह में शम्बूक वध को भूल कर एक दलित मंदिर चला गया और उसकी हत्या कर दी गयी। कहने...

      पूरा आलेख पढने के लिए देखें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/
          
    • अकाल का धनकुबेरों को भी इंतजार होता है मुनाफा पैदा करने के लिए

      Posted:Thu, 01 Oct 2015 15:17:36 +0000
      भूख से होने वाली मौतें और किसान आत्महत्याएं कभी भी सत्ता के लिए चिंता का विषय नहीं बनती आत्महत्या करने वाले हर 10 किसानों में एक किसान छत्तीसगढ़ का छत्तीसगढ़ देश में सबसे गहरे कृषि संकट से गुजर रहा है...

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