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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    शिकारी शार्क मछलियां निगल रहीं समुंदर,कंपनियां होंगी बेदखल अब और विदेशी होगा खुदरा कारोबार

    विनिवेश का नया तरीका लाने की तैयारी

    खुदरा कारोबार में मल्टी ब्रांड एफडीआई और ईटेलिंग के ईकामर्स माध्यमे एकमुश्त कृषि और कारोबार को खत्म कर देने की जुगत है ।


    पलाश विश्वास



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    विनिवेश का नया तैयारी लाने की अब तैयारी है क्योंकि बैंकिंग ,बीमा और सारे सरकारी उपकरमं के बेसरकारी करण पूरा हुए बिना सारे संसाधनों का बंदर बांट असंभव है।

    केसरिया कारपोरेट बिल्डर प्रोमोटर जियानी धर्मोन्मादी राजकाज की सर्वोच्च प्राथमिकता इसीलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विनिवेश हैं। इसी बंदोबस्त के तहत शिकारी शार्क मछलियां निगल रहीं समुंदर,कंपनियां होंगी बेदखल अब और विदेशी होगा खुदरा कारोबार।


    न खेत बचेंगे और न बचेगा कारोबार।

    बचेगा कबंधों का हुजूम और बचेगा राजनीति व्यापार।

    अरबपति बचेंगे,मारे जायेंगे बाकी सारे लोग

    चाहे अब हो करोड़ों का कारोबार।


    खुदरा कारोबार में मल्टी ब्रांड एफडीआई और ईटेलिंग के ईकामर्स माध्यमे एकमुश्त कृषि और कारोबार को खत्म कर देने की जुगत है ।


    छोटे व्यापारियों ने खुदराक्षेत्र में बड़े औद्योगिक घरानों के प्रवेश के मद्देनजर बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए आम बजट में इस क्षेत्र पर एक विनियामक गठित करने की मांग की है।तो इसी के मध्य सीमा तोड़कर खुदरा वर्चस्व की होड़ मची है ।मसलन स्टील और बिजली क्षेत्र की कंपनी जिंदल स्टील ऐंड पावर ने टीएमटी सरिया के खुदरा कारोबारमें कदम रख दिया है।


    आम आदमी पार्टी सरकार ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार की ओर से राष्ट्रीय राजधानी में बहु ब्रांड खुदरा कारोबारमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को दी गई मंजूरी के फैसले को खारिज कर दिया तो सर आंखों ,पलक पांवड़े पर बिठाकर उसकी कदमबोशी कर रहे सत्ता तबके ने उस अरश से फर्श पर गिरा दिया और उसकी तो कमर ही तोड़ दी गयी।


    • खुदरा कारोबार के लिए चित्र परिणाम

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    लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, 'एकल ब्रांड खुदरा कारोबार में 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति है। अभी तक बहु ब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआई की कोई अनुमति नहीं दी गई है।'वर्तमान नीति के तहत बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति तब दी गई जब संप्रग सरकार ने इस नीति की घोषणा की और भाजपा ने इसका विरोध किया था।

    पदभार ग्रहण करने के बाद सीतारमण ने संकेत दिया था कि विदेशी कंपनियों को देश में मेगा स्टोर खोलने की अनुमति नहीं दी जायेगी।

    दूसरी तरफ इन वर्षों में चीन में ई वाणिज्य का तेज़ विकास हो रहा है, पिछले साल ई वाणिज्य की धनराशि 100 खरब युआन से अधिक हो गई है। जो पूरे सामाजिक खर्च का 10.9 प्रतिशत है। चीन दुनिया में सबसे बड़ा ऑनलाइन खुदराबाजार बन गया है।भारत की होड़ चीन से है।इस क्षेत्र को कितना संभावनापूर्ण माना जा रहा है, उसकी एक मिसाल यह भी है कि आज 6 अरब डॉलर के सकल बाजार मूल्य के साथ फ्लिपकार्ट की हैसियत संगठित खुदरा कारोबारकरने वाली किसी भी कंपनी से अधिक हो गई है।


    ताजा खबरों के मुताबिक सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए सरकार विनिवेश के नए तरीके अपनाने पर विचार कर रही है। सीएनबीसी आवाज़ को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक 10 तारीख को होने वाली सेबी की बोर्ड बैठक में इस नए तरीके के अलग-अलग विकल्पों पर विचार हो सकता है।


    सूत्रों का कहना है कि वित्त मंत्रालय ने सेबी से विनिवेश का नया तरीका तलाशने को कहा है। वित्त मंत्रालय और सेबी के अधिकारियों के बीच चर्चा जारी है। नए तरीके में रिटेल निवेशकों को 30-40 फीसदी तक रिजर्वेशन मिल सकता है। विनिवेश की प्रक्रिया अभी के मुकाबले काफी तेज हो सकती है। विनिवेश के लिए 3 अलग-अलग विकल्पों पर विचार मुमकिन है।


    सूत्रों की मानें तो सरकार विनिवेश का बिल्कुल नया तरीका चाहती है। ओएफएस में रिटेल निवेशकों को ज्यादा रिजर्वेशन देने का विकल्प है। वहीं एफपीओ के तहत विनिवेश की प्रक्रिया तेज करने का विकल्प है।



    डालरनत्थी सर्वनाशी अर्थव्यवस्था का पेंडुलम डोल रहा है और शिकारी शार्क मछलियां शिकार पर निकली समुंदर निगल रही हैं,बड़ी छोटी मछलियां बेखबर हैं क्योंकि बाजार के पैमाने और तथ्य सांढ़ संस्कृति के मुताबिक तिलस्मी भी हैँ और दिलफरेब भी।मसलन डॉलर के मुकाबले रुपये में आज जोरदार गिरावट देखने को मिली है। डॉलर के मुकाबले रुपया आज 4.5 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है। 1 डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 65 पैसे की जोरदार गिरावट के साथ 61.49 पर बंद हुआ है। मंगलवार को रुपया 60.84 पर बंद हुआ था। आज डॉलर 11 महीने के ऊपरी स्तर पर पहुंच गया है।


    डालरनत्थी अर्थव्यवस्था का शेयर सूचक अब यह कि कमजोर रुपये से सहारा पाकर घरेलू बाजार में कच्चे तेल का दाम करीब 1 फीसदी बढ़ गया है। एमसीएक्स पर ये 6000 रुपये के स्तर पर पहुंच गया है। एमसीएक्स पर कच्चा तेल अगस्त वायदा 1.06 फीसदी की तेजी के साथ 6011 रुपये पर कारोबार कर रहा है। जबकि नायमैक्स पर अभी भी ये 6 महीने के निचले स्तर पर है और 98 डॉलर के नीचे कारोबार कर रहा है। गौर करने वाली बात ये है कि अमेरिका में भंडार घटने के के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सुस्ती छाई हुई है। कल एपीआई की रिपोर्ट आई थी, जिसके मुताबिक वहां क्रूड का भंडार 55 लाख बैरल गिर गया है। आज अमेरिकी एनर्जी डिपार्टमेंट भी अपनी रिपोर्ट जारी करेगा।


    कॉमैक्स पर सोने का भाव 1300 डॉलर के नीचे बना हुआ है। हालांकि, रूस-यूक्रेन की बीच तनाव बढ़ने से सोने में बढ़त आने की संभावना है। वहीं, चांदी 20 डॉलर के नीचे है।


    पर्याप्त सप्लाई होने की वजह से कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव जारी है। नायमैक्स पर कच्चा तेल 98 डॉलर के नीचे है। ब्रेंट क्रूड का भाव 105 डॉलर के नीचे बना हुआ है।



    हालांकि शार्क मछलियों का हश्र भी काले अफ्रीकी गैंडों जैसा हो सकता है। काले अफ्रीकी गैंडों का तो शिकारियों ने लगभग पूरी तरह से सफ़ाया कर दिया है। अब ऐसे गैंड़े कुछ अफ्रीकी देशों के राष्ट्रीय उद्यानों में संरक्षित क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। शायद, कुछ वर्षों के बाद, शार्क मछलियों की कुछ प्रजातियों को एक्वैरियम में ही देखा जा सकेगा। हर साल लाखों शार्क मछलियों का शिकार किया जाता है। चीन और कुछ अन्य एशियाई देशों में शार्क मछलियों के परों से पके शोरबे की बड़ी मांग है। वैज्ञानिकों ने इन शार्क मछलियों को विलुप्त होने से बचाने के लिए इन्हें पकड़ने के काम पर कुछ पाबंदियाँ लगाने के लिए अपनी आवाज़ उठाई है।


    लेकिन यह आम लोगों की कथा व्यथा जैसी ही पर्यावरण जीवनचक्र की तस्वीर है खूनी नरभक्षी शार्कों के एकाधिकारी वर्चस्व की कथा किंतु अलग है।



    इसीलिए बाघों और शार्क मछलियों के विलुप्त हो जाने की कथाओं के मध्य भारतीय मुक्त बाजार व्यवस्था में शिकारी शार्क मछलियों का यह बिंब विरोधाभाषी लग सकता है।


    हमारे अग्रज आनंद स्वरुप वर्मा ने नेपाल में नरेंद्र मोदी की विलक्षण वाक् शैली का अद्भुत नजारा पेश करके बताया है कि पर्यावरण बंधु बाघ कैसे नरभक्षी हो जाते होंगे।तो युवा तुर्क अभिषेक श्रीवास्तव ने ग्राउंड  जीरो से केसरिया सत्ताकाल का जो लेखाजोखा अब तक का पेश किया है,वह विपरीतधर्मी विरोधाभासों का पुलिंदा ही हैं।


    इसीके मध्य आनंद तेलतुंबड़े ने शैफरन निओलिबरिलज्म पर ईपीडब्लू में लिखा है और हम उसकी हिंदी जल्दी पेश करने वाले हैं।


    हालीवूड फिल्मों में नरभक्षी शिकारी शार्क मछलियों की धूम है।तो भारतीय डालर उपनिवेश में इन्ही शार्क मछलियों का राज अब निरंकुश होता जा रहा है।


    न खेत बचेंगे और न कारोबार।


    मुद्दे पर आयें।आज ही बंगाल में पीपीपी माडल गुजरात के तहत निरंकुश प्रमोटर राज के लिए नई शहरीकरण नीति जारी की गयी है और सरकारी गैरसरकारी जमीन पर आवासीय व्यवसायिक निर्माण के लिए प्रोमोटरों बिल्डरों को थोक भाव से छूट दी गयी है।कहा जा रहा है कि इससे आवास की समस्या खत्म हो जायेगी।हर सर के साथ छत नत्ती हो जायेगी।


    कहा जा रहा है कि इसतरह घास को बढ़ने की इजाजत है और गधों को चरने की भी इजाजत।प्रोमोटरों के अपने प्रोजेक्ट में जलाशय वगैरह डालने होंगे तो टैक्स म्युटेशन वगैरह में भी इफरात छूट।


    इसपर हम बाद में चर्चा करते रहेंगे।


    केसरिया कारपोरेट पद्मप्रलय जारी रखने के लिए संघ परिवार अब सत्तापक्ष के अलावा विपक्ष की भूमिका भी हाईजैक करने लगा है।कांग्रेस का मामला यह जाहिर है ही नहीं।


    जिस पार्टी में माताजी अध्यक्ष, पुत्र उपाध्यक्ष,बेटी निकटभविष्य में महासचिव और शायद दामादजी कोषाध्यक्ष हों,उस पार्टी के अंधभक्तों को छोड़कर बाकी किसी को उससे किसी तरह की विपक्षा भूमिका की उम्मीद है तो हैरत होगी।


    उत्तराखंड की उलटबांसी में उपचुनावों से लेकर पंचायत चुनावों तक में ढहतीं केसरिया दीवारों से भी हालात बदलेंगे नहीं और इसका इंतजाम यूपी में हो रहे अविराम दंगों के दुश्चक्र से जाहिर है।गुजरात विशेषज्ञों को राजनीतिक  खेल में मात देना शाही जमाने में असंभव ही है।


    गौर करने वाली बात है कि अंतरराष्ट्रीय वैश्विक संगठनों से भारत में जनांदोलनों, पर्यावरण और जनअधिकारों से जुड़े बवालिया गैर सरकारी संगठनों यानि एनजीओ को फंडिग पर रोक भारतीय विदेशनीति और राजनय का मुख्य कार्यभार है क्योंकि अब प्रधानमंत्री  और भारत सरकार के पोर्टल से केसरिया एनजीओ नेटवर्क तैयार हो रहा है।आप राय बतायें।परियोजना बनायें।


    ग्राउंड वर्क करें और देशी विदेशी फंडिग का पूरा इंतजाम रहेगा।


    ताजा उदाहरणःराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का विरोध किया है। संघ ने कहा है कि अगर सरकार ने इस आशय का विधयेक पेश किया तो वह अन्य यूनियनों के साथ तत्काल हड़ताल करेगा।


    देखते रहिये अब कि  बीएमएस सहित विभिन्न केंद्रीय श्रमिक यूनियनों की सात अगस्त को बैठक होगी जिसमें बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा बढ़ाने के मुद्दे तथा श्रम कानूनों में प्रस्तावित सुधारों पर आगे के कदम का फैसला किया जाएगा। बीएमएस के महासचिव वजेश उपाध्याय ने कहा कि हम संप्रग के समय से ही बीमा विधेयक के खिलाफ हैं।



    आपमें प्रतिरोध विरोध का दम तो है नहीं,उनके भरोसे बैठे रहिये,सरगढ़ाकर शूतुरमुर्ग की तरह।लेकिन समझ लीजिये कि यह पैट्रियट मिसाइल प्रतिरोधक इसलिए क्योंकि इंश्योरेंस बिल पर तनातनी बढ़ गई है। इंश्योरेंस सेक्टर में एफडीआई सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने वाले इस बिल पर सहमति बनाने के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक टल गई है। यही नहीं, सरकार की मुश्किलें इस बात से बढ़ गई हैं कि एआईएडीएमके भी इस मुद्दे पर विपक्ष के साथ हो गई है। हालांकि सरकार को अब भी उम्मीद है कि वो इसी सत्र में बिल पास करा लेगी।


    इंश्योरेंस में एफडीआई के मुद्दे पर विपक्ष भी बंट गया है। समाजवादी पार्टी का कहना है कि वो शुरू से ही एफडीआई का विरोध कर रहे हैं। बीजेपी के करीबी समझे जाने वाले एआईएडीएमके ने कांग्रेस का साथ देने का फैसला किया है। उधर यूपीए के घटक एनसीपी ने इंश्योरेंस बिल का समर्थन किया है।


    वहीं अगर सरकार इस बिल को अपने आप पास नहीं करा पाती है तो संसद के संयुक्त अधिवेशन का विकल्प खुला है। हालांकि सरकार के मुताबिक संयुक्त अधिवेशन की नौबत नहीं आएगी। फिलहाल एनडीए को राज्य सभा में 64 सीट हासिल हैं और बिल पास कराने के लिए 122 सीटें चाहिए। एनसीपी से 6 और बीजू जनता दल 7 के सहयोग से 13 वोट और मिल सकते हैं। वहीं एआईएडीएमके से सरकार को 11 वोट की उम्मीद है। इसी के चलते बीएसपी, एसपी मिली तो 24 वोट और मिल जाएंगे और बिल पास कराया जा सकेगा।



    इसीतरह मुक्त बाजार व्यवस्था के खिलाफ चीखने चिल्लाने के लिए संघ परिवार का किसान आदिवासी आंदोलन, मजदूर महिला और छात्र युवा  आंदोलन भी पूरे जलवे में हैं।


    कोई आंदोलन नहीं है कोई आवाज बुलंद नहीं है मुक्त बाजार के खिलाफ नहीं,बाजारु हिंग्लिश के खिलाफ नहीं,नालेज इकोनामी के खिलाफ नहीं,बेइंतहा बेरोजगारी हायर फायर छंटनी और आटोमेशन के खिलाफ नहीं, न ही अविराम जारी बेदखली के खिलाफ, न ही प्रतिरक्षा से लेकर मीडिया और खुदरा बाजार  तक में एफडीआई के खिलाफ,न बेसरकारीकरण और विनिवेश के खिलाफ,न विनियंत्रण और विनियमन के खिलाफ और न ही डालर प्रभुत्व के खिलाफ कोई मुद्दा है इस प्रायोजित मुख्य विपक्ष के लिए।


    लेकिन इस फर्जी मुद्दों और फर्जी आंदोलन में सभी रंग केसरिया में सरोबार हैं और सभी झंडे खून से सराबोर हैं।


    उनका विरोध मातृभाषा को प्राथमिकता देने वाली त्रिभाषा फार्मूला को सिरे से खत्म करने पर भी नहीं है।


    सीसैट के तहत संपर्क भाषा क्रांति की दिशा में धकेली जा रही है युवा पीढ़ी।


    अंग्रेजीपरस्त सत्ता तबके के सारे हित साधते हुए अंग्रेजी भाषा के खिलाफ धर्मोन्मादी जिहाद की घोषणा है।यह हिंदी प्रेम भी नहीं है।सत्ता से नत्थी हिंदी में राजकाज भी उतना ही जनविरोधी है जितना अंग्रेजी।हिंदी में जो धर्मोन्मादी केसरिया तड़का है,वह तो अंग्रेजी और दूसरी भारतीयभाषाओं में अनुपस्थित है।


    इसी हिंदी प्रेम की आड़ में सत्तावर्ग ने लेकिन जनसंहारी नीति निर्माण की सूचनाें सिरे से गायब कर दी है।संसद का बजट सत्र है और जनता के मुद्दे पर संसद के भीतर बाहर समानधर्मी सन्नाटा है।


    आदिवासियों को जल जंगल जमीन आजीविका से उजाड़ने वाले सलवाजुड़ुम वर्ग का आंदोलन है आदिवासियों के धर्मांतरण के खिलाफ।


    यह सबकुछ अरबपति  वर्ग के उमड़ते हुए वर्णनस्ली वर्चस्व के विरुद्ध खंड खंड अस्मिता आंदोलनों के बहुपरिचित भंवर जैसा है,जिसका ग्लोबीकरण,उदारीकरण और निजीकरण से कोई विरोध है ही नहीं।


    मसलन,तेलंगना अस्मिता के मध्य आंध्र का विभाजन हो गया और तेलंगाना आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत के धारक वाहक उत्तराधिकारियों ने वहां सत्ता की कमान धारण कर ली वैसे ही जैसे बंगाल में वाम अवसान के बाद मां माटी मानुष की सरकार ने।


    जैसे कि बंगाल में माटी का धंधा अब धरती उगले सोना ही सोना है,उसीतरह तेलंगना से कृषि जीवी लोगों के हक हकूक बहाल होने की कोई खबर फिलहाल नहीं है। न तेलंगना महाविद्रोह के समय की तरह आदिवासी इलाकों में जारी निजाम के कायदे कानून खत्म होने के आसार हैं।


    तेलंगाना से ताजा खबर यह है कि अलग राज्य बन जाने के बाद वहां सौ किसानों की जानें चलीं गयीं कृषि संकट की वजह से।


    पवार समय का कारपोरेट दुष्काल खत्म हो जायेगा देश में दसों दिशाओं में पद्म प्रलय से और चुनावी विज्ञापनों की और से आसमान से अच्छे दिन बरसेंगे मूसलाधार ऐसा प्रचार अभियान लेकिन अब भी जोरों पर है।


    दूसरी ओर,सलवा जुडुम भूगोल से और सघन बेदखली की खबर ब्रेक हुई है।छत्तीसगढ़ में 4 अल्ट्रा मेगा इस्पात संयंत्रों की स्थापना की जाएगी। राज्य सरकार ने केंद्र को इन परियोजनाओं में सहयोग का आश्वासन दिया है।


    जाहिर है कि यह भी पीपीपी गुजराती विकास कामसूत्र का नया अध्याय है,जिसके पन्ने हर राज्य में हर क्षेत्र में और सीमाओं के आर पार खुल रहे हैं।बांग्लादेश और नेपाल में भी।


    अधिकारियों ने बताया कि ये अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट बस्तर जिले के डिलीमिली, बिलासपुर के दगोरी, दंतेवाड़ा जिले के गीदम और राजनंदगांव में स्थापित किये जायेंगे। आधिकारिक सूत्रों ने आज यहां बताया कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राज्य में 4 अल्ट्रा मेगा इस्पात संयंत्रों की स्थापना के लिए केन्द्र सरकार को राज्य की ओर से हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया है।


    कश्मीर की समस्याएं उलझी हुई है और उस उलझन से किसी का कोई लेना देना नहीं है लोकिन ग्यारह साल बाद वाजपेयी और लद्दाख की जनता का सपना आने वाली 12 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरा करने जा रहे हैं।


    जी हां, वाजपेयी ने लद्दाख में रहने वाले लोगों के लिए 24 घंटे बिजली देने का सपना देखा है। 11 साल बाद वाजपेयी और लद्दाख की जनता का सपना आने वाली 12 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरा करने जा रहे हैं। वह 1700 करोड़ रुपए के प्रोजैक्ट का शिलान्यास कर सपने को हकीकत में बदलेंगे।


    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कारगिल में चुतक और लेह में बाजगो जल विद्युत परियोजनाओं का भी लोकार्पण करेंगे।


    यह विकास है या नंगा युद्धोन्माद या थोक रक्षा सौदों की तैयारी या प्रितरक्षा में विदेशी पूंजी बेइंतहा झोंकने का स्थाई बंदबस्त है यह,ऐसा हम फिलहाल बता नहीं सकते।


    दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों की बेसब्र कारपोरेट वकालत की जेटली चिदंबरम युगलबंदी है तो दूसरी हरित क्रांत की बुलेट ट्रेन भी निकल पड़ी है भारतीय जनगण को रौंदने के लिए।


    हम पहले ही पीपीपी माडल के भूमि अधिग्रहण के बारे में लिखते रहे हैं और एफडीआई के इंटरनेशनल नार्म के बारे में।


    दूसरी हरित क्रांति से अभिप्राय है संपूर्म रियल्टी प्रोमोशन क्रांति और कृषिजीवी तबके का सफाया।


    बेशर्म तरीके से बताया जा रहा है कि मुक्तिकामी कृषिजीवी जनता की मुक्ति जीएम,यानि जिनेटिकेली मोडीफाइड बीजों में हैं और अमेरिका में इन बीजों के किसी दुष्प्रभाव के बारे में पता नहीं चला है।


    मनसैंटा के खिलाफ जो जनविद्रोह है,उसे सिरे से ब्लैक आउट करते हुए डंके की चोट पर बीज क्रांति की तैयारी है संपूर्ण स्वदेशी।


    जैसे केंद्र में श्रम संशोधन कानून पास होने से पहले ही राजस्थान में सारे श्रम संशोधन लागू कर दिये गये,ठीक उसीतरह बंगालमें पीपीपी गुजराती के मध्य निर्माण विनिर्माम के लिए भूमि लूट का पूरा इंतजाम कर दिया गया है सेजविरोधी सत्ताकाल में।


    फ्लिपकर्ट,अमेजन,स्नैप डील और वालमार्ट वे शार्क मछलियां हैं, जो लगती बेहद आकर्षक और निरीह हैं,लेकिन जिनकी आदतें नरभक्षी हैं। इनमें आपस में मारामारी प्रबल है।जो जाहिरा तौर पर सत्तावर्ग का स्वाभाविक आचरण है।


    एकाधिकारवादी वर्णनस्ली वर्चस्व के साथ साथ कारपोरेट प्रतिद्वंद्विता का किस्सा हरिकथा अनंत है।


    याद करें,सत्तर अस्सी के दशक में नुस्ली वाडिया और धीरुभाई अंबानी की प्रतिद्वंद्विता को तो सिंगुर छोड़ने के रतन टाटा के उस प्रेस कांफ्रेस को भी याद करें कि कैसे उन्होंने सिंगुर आंदलन की पृष्ठभूमि में कारपोरेट प्रतद्वंद्विता का आरोप लगाया था।


    अब मुक्त बाजारी पृष्ठभूमि में कारपोरेट देशी विदेशी कंपनियों में सेक्टरवाइज वर्चस्व की हिस्सेदारी तय हो गयी है।मसलन तेल गैस में रिलायंस तो पोर्ट में अदाणी, इस्पात में टाटा तो माइनिंग में वेदांता का वर्चस्व निर्विवाद है।


    टेलीकाम में वर्चस्व की लड़ाई बेहद घनघोर रही है और इसीका नतीजा नीरा राडिया टेप प्रकरण है।


    इसी तरह आटो,ऊर्जा,इंफ्रा,बीमा,प्रतिरक्षा,चिकित्सा ,शिक्षा,औषधि और रसायन, रेलवे, विमानन,परिवहन,उपभोक्ता सामग्री, सौंदर्य प्रसाधन,मीडिया,मनोरंजन और बाकी तमाम सेक्टरों में भयानक मारामारी है।


    लेकिन खुदरा बाजार में जो कुरुक्षेत्र सजा है,उसमें अबकी दफा कुरु वंश के साथ पांडवों का सर्वनाश भी तय है।


    गनीमत है कि अभी मल्टी ब्रांड सेक्टर में एफडीआई की इजाजत नहीं है लेकिन ईटेलिंग ईकामर्सके फंडे से पूरा खुदरा कारोबार और एक के साथ एक फ्री बतर्ज ईटेलिंग रिटेलिंग इंफ्रा के लिए भूमि अधिग्रहण निरंकुशका चाकचौबंद इंतजाम है।


    अब फ्लिपकार्ट,स्नैपडील,अमाजेन और वालमार्ट में जो आपसी प्रतिद्वंद्विता है वह टेक ओवर का गेस स्टार्टअप है।आवारा लपट पूंजी ईटेलिंग रिटेलिंग के जरिये खुदरा कारोबार की सारी देशी कपनियों के अलावा प्रतिद्वंद्वी दूसरी विदेशी कंपनियों को निगलने वाली हैं तो खेत बी नहीं बचेंगे।


    गुजरात में तो कारपोरेटकंपनियं को सस्ती दरों पर जमीन देना ध्येय वाक्य है और ऐसा करिश्मा बंगाल में कामरेडों ने भी सालाना 1300 रुपये के बदले एक हजार एकड़ जमीन की गिप्ट टाटामोटकर्स की दी थी और उस जमीन पर परियोजना के लिए टाटा को बैेंकों से दो सौ करोड़ रुपये महज एक प्रतिशत ब्याज पर मिला था।


    सेज से लेकर स्मार्ट बुलेट तक टैक्स होलीडे का विस्तार है तो करों में छूट का सिलसिला जारी है लेकिन मनरेगा खारिज है और सब्सिडी भी समझ लीजिये खारिज है।


    भारत में एकमुश्त कृषि आजीविका जल जंगल जमीन नागरिकता और कारोबार हड़पने के लिए अब शार्क मछलियां शिकार पर निकली हैं।बीमा,खुदराबाजार और बैंकिंग सेक्टर में विनिवेश और एफडीआई का एजंडा पूरा हो जाये तो गरीबों की क्या औकात,ज मध्यवर्ग है,उच्चमध्यवर्ग है,वह बी एअर इंडिया बने जाने को है।सामाजिक समता समरस डायवर्सिटी सामाजिक न्याय का यह केसरिया एजंडा है।


    बिजनेस स्टैंडर्ड की इस खबर को पढ़कर अंदाजा लगाये कि परिभाषाओं और पैमाने बदल देने से विकास का गल्प किस तरह लहलहाने लगता है।भारत में गरीबों का जितना आंकड़ा दुनिया गिनती है, उसमें अच्छा खासा बदलाव हो सकता है। दरअसल विश्व बैंक क्रय शक्ति समतुल्य सूचकांक (पीपीपी इंडेक्स) में बदलाव तो कर ही चुका है, अब वह वैश्विक गरीबी रेखा में भी बदलाव करने जा रहा है। इन दोनों बदलावों के बाद देश में गरीबों के आंकड़ों में भी व्यापक फेरबदल हो सकता है। माना जा रहा है कि देश में गरीबों की संख्या भारत सरकार और विश्व बैंक की मौजूदा गणना से भी काफी कम हो सकती है।

    विश्व बैंक के मुताबिक फिलहाल वैश्विक स्तर पर गरीबी की रेखा के लिए 1.25 डॉलर को आधार माना गया है। लेकिन यह 2005 के पीपीपी सूचकांक पर आधारित है। इसके आधार पर 2010 में भारत में गरीबों की संख्या करीब 40 करोड़ थी। लेकिन पीपीपी सूचकांक में बदलाव इस बात का संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से बड़ी है और इसकी क्रय शक्ति भी पहले के अनुमानों से अधिक है। इसका मतलब है कि यहां गरीबों की संख्या पिछले अनुमान से कम होगी। विश्व बैंक गरीबी की रेखा को बदले हुए सूचकांक के मुद है।ताबिक ढालने के लिए बदल ही रहा है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का शुरुआती जोड़घटाव यही बता रहा है कि भारत में गरीबों की संख्या कम होने जा रही है।

    लेकिन वे आगाह कर रहे हैं कि यह महज आंकड़ों की कवाय लेकिन नए आंकड़े जारी होने के बाद न केवल भारतीय अर्थव्यस्था के प्रति धारणा में बदलाव होगा बल्कि विकसित और विकासशील देशों के बीच वैश्विक स्तर पर संसाधनों की साझेदारी का गणित भी इससे गड़बड़ा सकता है। वैश्विक स्तर पर गरीबी के आंकड़ों का कोई खास इस्तेमाल नहीं होता है, लेकिन विकास पर बहस के दौरान ये इशारा करते हैं कि विकसित देशों को किस गरीब देश को वित्तीय मदद करनी चाहिए।


    एमडीजी ने कहा था कि 1 अमेरिकी डॉलर से नीचे की आय पर जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या 1990 से 2015 के बीच आधी की जानी चाहिए। विश्व 2015 तक दुनिया को सतत विकास के जो लक्ष्य अपनाने थे, उनमें कहा गया था कि 2030 तक गरीबी को खत्म कर दिया जाए। लेकिन अगर आंकड़ोंं की बाजीगरी से यह पहले ही काफी कम हो जाती है तो क्या होगा?


    नया पीपीपी सूचकांक, जो 2005 में संशोधित हुआ था, हलचल मचा चुका है। संशोधित सूचकांक में बताया गया है कि जितना सोचा गया था, भारत उससे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यहां के लोगों की क्रय शक्ति भी काफी ज्यादा है। पीपीपी सूचकांक अंतरराष्टï्रीय तुलना कार्यक्रम के तहत विक सित होता है, जिसे विश्व बैंक चलाता है। इस कार्यक्रम के तहत विश्व मेंसैकड़ों जिंसों और सेवाओं की कीमतों की तुलना होती है। इसके अंत में आपको पता चलता है कि विभिन्न देशों में किसी एक ही जिंस की कितनी मात्रा 1 अमेरिकी डॉलर में मिल सकती है।



    सहारा समय के मुताबिक ऑनलाइन रिटेल कंपनी फ्लिपकार्ट ने कहा कि वह विलय एवं अधिग्रहण की अपनी योजना को आगे बढ़ाएंगे।

    एक अरब डॉलर जुटाने के बाद कंपनी ने एक फॉर्मर वेंचर कैपिटिलिस्ट को हायर किया है।ऑनलाइन रिटेलिंग में फ्लिपकार्ट को टक्कर देने वाली एमेजॉन और स्नैपडील भी कुछ हफ्तों पहले विलय एवं अधिग्रहण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए वेंचर कैपिटिलिस्ट को हायर कर चुकी हैं।

    सिलिकॉन वैली की वेंचर कंपनी कैनन पार्टनर्स के दिल्ली ऑफिस में बतौर एसोसिएट काम करने वाले निशांत वर्मन को फ्लिपकार्ट ने अपनी इस बिजनेस स्ट्रैटेजी को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी है।फ्लिपकार्ट की योजना स्टार्टअप्स में भी इनवेस्ट करने की है।


    कंपनी के चीफ पीपल ऑफिसर एम माहेश्वरी ने कहा, 'फ्लिपकार्ट को हम भारत में 100 अरब डॉलर की पहली कंपनी बनाने की योजना पर चल रहे हैं। इस दिशा में विलय और अधिग्रहण हमारे विजन का हिस्सा है।'


    उन्होंने कहा कि कंपनी ने पिछले दो सालों के सीनियर पोजीशन के लिए कम से कम 20 लोगों को हायर किया है और 'इस तरह के टैलेंट से हमारी बिजनेस वैल्यू बढ़ेगी।'

    साउथ अफ्रीकी कंपनी नैस्पर्स और टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट से इनवेस्टमेंट हासिल करने के बाद पिछले हफ्ते कंपनी के को फाउंडर सचिन बंसल ने घोषणा की थी किफ्लिपकार्ट वियरेबल डिवाइसेज, फैशन टेक्नोलॉजी, मोबाइल इंटरनेट और रोबोटिक्स के क्षेत्र में दिलचस्पी दिखाने वाली कंपनियों का अधिग्रहण करेगी। बंसल ने कहा, 'हम सभी क्षेत्रों पर निगाह रखे हुए हैं।'


    फ्लिपकार्ट पहले ही फैशन पोर्टल मिंट्रा को 37 करोड़ डॉलर में खरीद चुकी है।



    इसी के मध्य  विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) ने 1,528.38 करोड़ रपये मूल्य के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के 14 प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इनमें एसीएमई सोलर एनर्जी तथा सिंकलेयर्स होटल्स का प्रस्ताव शामिल है।

    एफआईपीबी ने 4 जुलाई को अपनी बैठक में इन प्रस्तावों पर चर्चा की थी। आधिकारिक बयान के अनुसार बोर्ड ने छह कंपनियों के प्रस्तावों को खारिज कर दिया है जबकि सात अन्य के एफडीआई प्रस्ताव को टाल दिया है।

    मंजूरशुदा प्रस्तावों के तहत फार्मा कंपनी लौरस लैब्स 600 करोड़ रपये, एसीएमई 275 करोड़ रपये, सिंकलेयर्स होटल्स 41.52 करोड़ रपये तथा गोल्डन एग्री रिसोर्सेज इंडिया 485.9 करोड़ रपये निवेश करेगी। एजीलेंट टेक्नालाजीज, एचएलजी इंटरप्राइजेज, गस्टाड होटल्स व तीन अन्य के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया है।


    देश में जुलाई माह में विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की वृद्धि चीन के मुकाबले तेज रही। हालांकि, इस दौरान दुनिया के उभरते बाजारों में उत्पादन वृद्धि की गति कुल मिलाकर धीमी रही। एचएसबीसी ने यह जानकारी दी। एचएसबीसी के उभरते बाजारों के सूचकांक (ईएमआई) में यह संकेत मिला है।

    जुलाई के दौरान एचएसबीसी का भारत के लिये विनिर्माण और सेवा क्षेत्र का संयुक्त सूचकांक 53 अंक रहा जबकि इस दौरान चीन संबंधी यह सूचकांक 51.6 अंक, ब्राजील का 49.3 और रूस का 51.3 अंक दर्ज किया गया। 50 अंक से उपर के सूचकांक को गतिविधियों में विस्तार का सूचक माना जाता है।

    यह सूचकांक खरीदार प्रबंधकों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया जाता है। जुलाई में उभरते बाजारों वाला एचएसबीसी पीएएमआई सूचकांक घट कर 51.7 अंक रह गया। जून में यह 52.3 अंक पर था। इससे दुनिया के उभरते बाजारों में उत्पादन वृद्धि काफी धीमी रही है।

    एचएसबीसी के मुख्य अर्थशास्त्री क्रिस विलयम्सन ने कहा, 'उभरते बाजारों की आर्थिक वृद्धि लगातार कमजोर बनी हुई है, विशेषकर विकसित देशों के उत्पादन में आई तेजी से इनकी तुलना करने में इनमें सुस्ती दिखाई देती है।'विकसित देशों में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार जुलाई में तेज हुई है। मई 2007 के बाद यह सबसे तेज रही है।

    एचएसबीसी की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बाजारों में आने वाले समय में कमजोर रहने की संभावना है। दुनिया की सबसे बड़ी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं में जुलाई में भारत के बाद ब्राजील में उत्पादन में मजबूती रही।

    झारखंड, गोवा में अवैध खनन और निर्यात से करोड़ों का नुकसान : शाह आयोग

    नई दिल्ली : न्यायमूर्ति एमबी शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में झारखंड में 22,000 करोड़ रुपये का अवैध खनन, गोवा से 2,747 करोड़ रुपये का अवैध अयस्क निर्यात और ओड़िशा में कंपनियों द्वारा खुल्लम खुल्ला अतिक्रिमण का खुलासा किया है।

    आयोग की सोमवार को संसद में पेश रिपोर्ट में नियमों का घोर दुरपयोग किये जाने का आरोप लगाते हुये कंपनियों को दिये गये खनन पट्टे निरस्त करने, नुकसान हुये राजस्व की वसूली और खनन कंपनियों के साथ साठगांठ करने वाले अधिकारियों को दंडित करने का सुझाव दिया गया है।

    न्यायमूर्ति एम.बी. शाह आयोग का गठन देश में लौह अयस्क और मैगनीज अयस्क के अवैध खनन और निर्यात की जांच के लिये किया गया था। कई जानी मानी कंपनियों टाटा स्टील, सेल और एस्सल माइनिंग के अलावा उषा मार्टिन और रंगटा माइन्स जैसी छोटी और मध्यम दर्जे की कंपनियों का नाम नियमों का उल्लंघन और गलत कार्यों में सामने आया है।

    आयोग ने कहा है कि अकेले झारखंड में ही सार्वजनिक क्षेत्र की सेल, निजी क्षेत्र की टाटा स्टील तथा अन्य कंपनियों ने 22,000 करोड़ रुपये के लौह अयस्क और 138 करोड़ रपये के मैग्नीज अयस्क का कानून अधिकार के बिना ही अवैध खनन किया। आयोग ने अपनी पहली रिपोर्ट में कहा था कि 18 कंपनियों के पट्टे डीम्ड विस्तार के तहत चल रहे थे जिनमें पर्यावरण मंजूरी नहीं मिली थी जबकि 22 खानों में नियमों का उल्लंघन करते हुये खनन कार्य किया जा रहा था। आयोग ने कहा है कि भारतीय खान ब्यूरो और राज्य सरकार के आंकड़ों में लौह अयस्क उत्पादन में 5.34 करोड़ टन उत्पादन का अंतर है।

    ओड़िशा पर आयोग की दूसरी रिपोर्ट में कहा गया कि टाटा स्टील और आदित्य बिड़ला समूह की एस्सल माइनिंग एण्ड इंडस्ट्रीज उन्हें पट्टे पर दिये गये क्षेत्र से आगे बढ़कर खनन कार्य कर रही थी। आयोग ने कहा है कि ओडिशा में जहां पट्टा क्षेत्र के 15 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में अतिक्रमण किया गया है वहां खनन पट्टे को निरस्त किया जाना चाहिये। आयोग ने यह भी कहा है कि अतिरिक्त क्षेत्र से किये गये अवैध खनन का आकलन किया जाना चाहिये और पट्टाधारक से इसकी कीमत वसूली जानी चाहिए। इसके अलावा, उपयुक्त दंड भी लगाया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक सरकार को निर्देश दिया था कि पट्टा क्षेत्र से बाहर किये अतिक्रमण क्षेत्र में खनन से हुए नुकसान की वसूली प्रति हेक्टेयर एक करोड़ रपये के हिसाब से की जानी चाहिये। हालांकि, न्यायालय ने कहा, ओडिशा में पर्यावरण प्रणाली काफी संवेदनशील है, सघन वन है, हाथियों का सबसे बेहतर प्रवास और गलियारा है, इसलिए यहां प्रति हेक्टेयर दो करोड़ रुपये का मूल्‍य वसूला जाना चाहिए।

    अमेजन को टक्कर देता फ्लिपकार्ट

    सिर्फ सात साल में एक अरब डॉलर की कंपनी बन चुकी फ्लिपकार्ट अब भारत के बाजार में अमेजन को टक्कर देना चाहती है. इसे शुरू करने वाले दोनों भारतीय भी कभी अमेजन में ही काम करते थे.

    ई कॉमर्स में काम करने वाली फ्लिपकार्ट का कहना है कि उसने 60 अरब रुपये (एक अरब रुपये) जुटा लिए हैं और इस काम में सिंगापुर की जीआईसी कंपनी भी उसका साथ दे रही है. कभी दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन शॉप अमेजन में काम करने वाले सचिन और बिन्नी बंसल ने भारत में 2007 में फ्लिपकार्ट की शुरुआत की. इसकी कामयाबी की वजह से इसे भारत की अमेजन भी कहा जाने लगा है.

    सचिन बंसल का कहना है, "हमारी ताजा फंडिंग ई कॉमर्स के बाजार में एक बड़ी उपलब्धि है. बहुत कम इंटरनेट कंपनियां इस तरह सार्वजनिक तौर पर इतने पैसे जुटा पाती हैं." भारत में ऑनलाइन बाजार बढ़ रहा है और पिछले साल करीब 2.3 अरब डॉलर का कारोबार हुआ है. बंसल की कंपनी फ्लिपकार्ट ने म्यूजिक और किताबों के साथ अपना बिजनेस शुरू किया था. लेकिन उन्होंने बहुत तेजी से दूसरी चीजों को भी बेचना शुरू किया. उनका कहना है कि इस तरह की फंडिंग से यह साफ है कि भारत में भी कई अरब डॉलर की कंपनियां बन सकती हैं.

    भारत में अमेजन को टक्कर देता फ्लिपकार्ट

    टेक्नोपैक की एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट प्रज्ञा सिंह का कहना है कि निवेशक इस बात को समझ रहे हैं कि वे जिस कंपनी में निवेश कर रहे हैं, उन्हें मदद की भी जरूरत है. इससे पहले फ्लिपकार्ट को न्यूयॉर्क की टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट एलएलसी का समर्थन मिला था. उसने इसी साल एलान किया कि वह एक अरब डॉलर के निशान को पार कर चुकी है. उसका कहना है कि उसके 2.2 करोड़ रजिस्टर्ड यूजर हैं और वह हर महीने 50 लाख पैकेट की डिलीवरी करता है.

    मई में फ्लिपकार्ट ने अपनी प्रतिद्वंद्वी मिन्त्रा को खरीद लिया, जो भारत में फैशन की दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन दुकान थी. वहां क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने वालों की संख्या बहुत कम है और कई लोग कार्ड होते हुए भी उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं. फ्लिपकार्ट की सबसे बड़ी खूबी "पे ऑन डिलीवरी" है, यानि डिलीवरी के वक्त पेमेंट किया जा सकता है.

    अमेरिकी कंपनी अमेजन भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है. वह पिछले साल ही भारतीय बाजार में उतरी है और वहां भारी इश्तिहार देने के अलावा ऑर्डर वाले दिन ही डिलीवरी का भी वादा कर रही है. उसने एलान किया है कि वह भारत में बड़े गोदाम भी बनाने वाली है.

    टेक्नोपैक की सिंह कहती हैं कि भारत में ई कॉमर्स की कामयाबी बहुत हद तक मोबाइल फोन से जुड़ी है. भारत में ज्यादातर लोग मोबाइल से ही इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं.

    एजेए/एमजी (एएफपी, एपी)

    मर्जर, एक्विजिशन से बिजनेस बढ़ाएगी फ्लिपकार्ट

    Aug 6, 2014, 09.00AM IST

    [ माधव चंचानी | बंगलुरू ]

    एक अरब डॉलर जुटाने के बाद देश की सबसे बड़ी ऑनलाइन रिटेल कंपनी फ्लिपकार्ट ने मंगलवार को कहा कि उसने विलय एवं अधिग्रहण की अपनी योजना को आगे बढ़ाने के लिए एक फॉर्मर वेंचर कैपिटिलिस्ट को हायर किया है। ऑनलाइन रिटेलिंग में फ्लिपकार्ट को टक्कर देने वाली एमेजॉन और स्नैपडील भी कुछ हफ्तों पहले विलय एवं अधिग्रहण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए वेंचर कैपिटिलिस्ट को हायर कर चुकी हैं।

    सिलिकॉन वैली की वेंचर कंपनी कैनन पार्टनर्स के दिल्ली ऑफिस में बतौर एसोसिएट काम करने वाले निशांत वर्मन को फ्लिपकार्ट ने अपनी इस बिजनेस स्ट्रैटेजी को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी है। फ्लिपकार्ट की योजना स्टार्टअप्स में भी इनवेस्ट करने की है। कंपनी के चीफ पीपल ऑफिसर एम माहेश्वरी ने कहा, 'फ्लिपकार्ट को हम भारत में 100 अरब डॉलर की पहली कंपनी बनाने की योजना पर चल रहे हैं। इस दिशा में विलय और अधिग्रहण हमारे विजन का हिस्सा है।' उन्होंने कहा कि कंपनी ने पिछले दो सालों के सीनियर पोजीशन के लिए कम से कम 20 लोगों को हायर किया है और 'इस तरह के टैलेंट से हमारी बिजनेस वैल्यू बढ़ेगी।' साउथ अफ्रीकी कंपनी नैस्पर्स और टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट से इनवेस्टमेंट हासिल करने के बाद पिछले हफ्ते कंपनी के को फाउंडर सचिन बंसल ने घोषणा की थी फ्लिपकार्ट वियरेबल डिवाइसेज, फैशन टेक्नोलॉजी, मोबाइल इंटरनेट और रोबोटिक्स के क्षेत्र में दिलचस्पी दिखाने वाली कंपनियों का अधिग्रहण करेगी। बंसल ने कहा, 'हम सभी क्षेत्रों पर निगाह रखे हुए हैं।' फ्लिपकार्ट पहले ही फैशन पोर्टल मिंट्रा को 37 करोड़ डॉलर में खरीद चुकी है। वहीं एमेजॉन ने बेसेमर वेंचर पार्टनर्स के वाइस प्रेसिडेंट अभिजीत मजूमदार को हायर किया है जो कॉरपोरेट डिवेलपमेंट फंक्शन को देखेंगे। दिल्ली की कंपनी स्नैपडील ने वेंचर फर्म पलाश वेंचर के हेड ऑफ इनवेस्टमेंट अभिषेक कुमार को इसी जिम्मेदारी के लिए हायर किया है।

    फ्लिपकार्ट को रिकॉर्ड फंडिंग, देश की सबसे बड़ी कंपनी बनने की राह में फ्लिपकार्ट

    NDTVIndia, Last Updated: जुलाई 29, 2014 07:53 PM IST


    बेंगलुरु में फ्लिपकार्ट के सीईओ सचिन बंसल मीडिया से मुख़ातिब हुए। फ्लिपकार्ट के सीईओ बंसल का कहना है कि फ्लिपकार्ट इतने भर से संतुष्ट नहीं है। कंपनी मानती है कि अगले पांच साल में वह छह लाख करोड़ रुपये जुटा सकती है। बंसल का कहना है कि अगर ऐसा हुआ तो फ्लिपकार्ट देश की सबसे बड़ी कंपनी होगी।


    फिलहाल पांच लाख करोड़ की टीसीएस भारत की सबसे बड़ी कंपनी है। वैसे फ्लिपकार्ट की ये कामयाबी शानदार है।


    उल्लेखनीय है कि 2007 में महज चार लाख रुपयों से सचिन और बिन्नी बंसल ने कंपनी शुरू की। 2014 में यह कंपनी 30,000 करोड़ की बताई जा रही है।


    लेकिन सबसे ख़ास बात यह है कि अमेजन छोड़कर आए इन दोनों उद्यमियों सचिन और बिन्नी बंसल ने भारत में इस अलग तरह के कारोबार को बिल्कुल शून्य से शुरू कर इस मुकाम तक पहुंचाया है। ये ट्रेंड सेटर कामयाबी है जो भारत में ख़रीददारी का तरीक़ा बदल रही है।

    E-Tailers Upload New Life to Land Deals

    RAVI TEJA SHARMA

    NEW DELHI

    

    

    Online shopping creates necessity for setting up warehouses, reviving hopes for land owners disappointed by FDI deadlock

    A spurt of activity in the online shopping business in India has given a fresh lease of f life to hundreds of land owners who bought land to build warehouses a few years back but were disappointed after a much touted policy of FDI in multi-brand retail became a non-starter.

    Amid an investment war, with the American online retail giant Amazon announcing a war chest of $2 billion for India just after Flipkart raised $1 billion in a fresh round of i funding, these companies have begun a massive hunt for warehousing facilities t around the country. i While Amazon is planning to lease over a million square feet of warehousing space within this calendar year to set up what it calls fulfillment centres, Flipkart has recently leased 500,000 sq ft of space across the country and is fitting them out to commission them before this Diwali.

    "Flipkart wants to gear up its supply chain for the Diwali rush, which is the equivalent of the Christmas sale season in the US when players like Amazon do a big chunk of their business," says a property consultant who has knowledge of Flipkart's plans.

    The Indian online retailer has already sounded out property consultants about its plan to lease 2 million sq ft of warehouses for Diwali 2015. "The space will be leased by April 2015 and will be fitted out by July , just ahead of the festive season," says the consultant.

    The policy on FDI in multi-brand retail did not find many takers and eventually became a non-starter because of stiff local sourcing and upfront investment norms.

    Amazon had announced last month that it is setting up five more fulfillment centres in Delhi, Chennai, Jaipur, Ahmedabad and on the outskirts of Gurgaon and together with its existing facilities on the outskirts of Mumbai and Bangalore, it has almost doubled its total storage capacity to over half million square feet.

    According to another property consultant, Amazon has already leased 16,000 sq ft of warehousing space in Delhi's Mohan Cooperative area and 250,000 sq ft of space in Bhiwandi near Mumbai. It is now looking for space in other cities too.

    A spokeswoman for Amazon said, "As a company policy, we do not comment on what we may or may not do in the future." CBRE which did the Mohan Cooperative deal declined to comment. JLL, which did the Bhiwandi deal, also declined to comment. Flipkart was not available for comment.

    Another online retailer Snapdeal currently has 40 fulfillment centres in 15 cities. This will be expand to 30 cities within a year.

    "We're looking at building 500,000 sq ft of warehousing space in the next one year," says Rohit Bansal, co-founder and chief operating officer of Snapdeal.com The property consultant quoted earlier said Amazon is looking at warehousing space in Jaipur, Ludhiana, Chennai, Hyde rabad, Ahmedabad, and another one in the NCR near Gurgaon. Flipkart too is looking at spaces in newer cities such as Ahmeda bad, Hyderabad, Kochi and Chennai to ex pand its presence.

    Finding quality warehousing space, how ever, is a tough task, especially if companies are looking outside of the NCR and Mumbai towards smaller centres. "Developers in Mumbai and NCR have matured enough and are building warehouses with specifi cations matching international company requirements. It is now starting to catch up in other cities as well," says Nirav Kothary head industrial services at property con sultancy JLL.

    In cities such as Bangalore, Chennai, Hyd erabad, Jaipur, Lucknow and others a bulk of the large deals are for built-to-suit ware houses, says Anckur Srivasttava, chairman of GenReal Property Advisers, which is working with a few online retailers to lock in space.

    According to an estimate, about 70% of the investment by these ecommerce companies goes into setting up the back-end infrastruc ture that includes the warehouse and logis tics facilities.


    

    



    Aug 06 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    First of Distress Cries from Newborn Telangana: 100 Farmers Take Lives

    RAJI REDDY KESIREDDY

    HYDERABAD

    

    

    New govt fails to help its agrarian populace with waivers, proper power

    Telangana is witnessing an epidemic of suicides by farmers who are struggling to repay loans and cope with the distress caused by deficient monsoon rainfall. At least 100 farmers are reported to have taken their lives in the last two months in India's newest state, where the Telangana Rashtra Samithi came to power aided by a promise to write off farm loans.

    The revival of monsoon in recent days has bypassed parts of south India, particularly Telangana where the deficit was 48% until August 5. The national shortfall was 19%. No significant progress has been made on loan waivers in a state where some 50 lakh farmers . 50,000 crore in crop owe at least ` loans to banks. Last fortnight, the TRS government announced it would write off up to ` . 1 lakh per farmer, aggregating ` . 19,000 crore.

    The distress situation appears more alarming in Telangana as agriculture is largely borewell-dependent in the state where power shortage is severe. Banks have stepped up pressure on farmers to repay loans, apart from declining new loans and threatening to declare them defaulters to initiate recovery of money .

    Thousands of irate farmers across Telangana took to the streets protesting erratic power supply to agriculture pumpsets and threatening to attempt suicide. In some cases, the protests became violent and the police used batons to disperse crowds of farmers.

    "The most affected in rural India are tenant farmers who do not have access to the formal banking system and are left to de pend on the mercy of private moneylenders," said All India Kisan Sabha vice president Sarampally Malla Reddy .

    Reddy accused the public sector research organisations of failing to bring out quality seeds to help farmers attain high yields at affordable prices.

    "The farming community is forced to depend on private seed producers and in the process fall prey to sellers of spurious seeds."

    Accusing the Telangana government of displaying "reckless apa thy," Donthi Narasimha Reddy, a member of the consultative committee of the Cotton Advisory Board, said that cotton growers have been worst affect but farmers growing other commercial crops are starting to also take their lives.

    Kisan Sabha's Malla Reddy said that out of the more than 2,000 suicides reported last year in undivided Andhra Pradesh, nearly 1,400 deaths were in Telangana region and the rest in coastal Andhra and Rayalaseema.

    Telangana agriculture minister Pocharam Srinivas Reddy refused to acknowledge the rise in suicides and accused opposition parties of instigating farmers.

    Congress legislature party leader K Jana Reddy demanded that the government must "act responsibly" by releasing new loans and subsidising interest on loans over ` .1 lakh availed.

    BJP's floor leader G Kishan Reddy said the government should speak to New Delhi and ensure at least nine hours of uninterrupted power supply to agriculture.

    "Many farmers are being compelled to sow seeds once again, thereby increasing overall cost of farm inputs sizeably ."



    

    Aug 06 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    SWAMI SPEAK - Green Revolution 2.0

    Honour Norman Borlaug on his centenary by approving GM crops Swaminathan S Anklesaria Aiyar


    

    

    The most conclusive evidence is that three trillion meals with genetically-modified foods have been eaten in the US with no evidence at all of ill-effects

    Patrick Moore, co-founder of Greenpeace but now a strong critic of that organisati on, is livid about the hypocrisy and pseudoscience of activists opposing genetically-modified (GM) foods. These, he says, are critical to increasing agricultural yields, reducing hunger and conquering poverty . He seeks to raise funds to prosecute Greenpeace and other GM opponents for crimes against humanity in international courts.

    This is relevant in today's debate in India on GM crops. Many Indian activists have long opposed GM foods, claiming to be saviours of humanity against wicked multinationals promoting monster foods. But Moore would say that the real monsters are the activists. He sees them as ideologues of pseudoscience determined to hurt farm incomes and yields, thus prolonging hunger. These, he says, are crimes against humanity .

    Guilty Without Evidence The last UPA government didn't approve even field trials, let alone commercial cultivation, of GM foods. But now the Genetic Engineering Approval Committee has cleared field trials (under stringent controls) of 15 GM crops including rice, brinjal, mustard and chickpeas. This is not approval for commercial sales. It is simply approval to test the varieties. Yet, ideologues oppose even testing.

    In effect, they have declared GM foods guilty of being dangerous without evidence, and refuse to permit tests that would establish the evidence.

    A major farmers' group like Chengal Reddy's Federation of Farmers Associations has long campaigned in favour of GM crops, saying these are essential to raise farm incomes, and reduce pesticide use. Chengal Reddy points out that farmers spray conventional brinjal with pesticide 30-35 times per crop, whereas Bt brinjal will require only five sprayings.

    Far from being more dangerous, Bt brinjal is much safer because of lower pesticide content. Environment minister Prakash Javadekar says no final decision has yet been taken.

    Umbilical Cord Called Funds International NGOs now have enormous budgets and channel millions of dollars into developing countries to spread their ideas, good or bad.

    Many Indian NGOs now depend critically on dollar inflows for their fortune, fame and future prospects. This explains why they exude so much passion on western agendas like GM crops, while saying relatively little about environmental disasters that India actually needs to focus on, like millions of deaths and disease caused by polluted water and air, the destruction of acquifers by farmers using free electricity to pump excessive amounts of water, and fertiliser misapplication that ruins our soil.

    There is no space in this column to go into all the issues relating to GM crops. Suffice to say that the same activists opposing GM foods earlier opposed Bt cotton, a GM variety , as dangerous and useless. In fact, Bt cotton helped double cotton yields, greatly reduced pesticide use and converted India into a major cotton exporter. Over 90% of cotton farmers switched to the Bt variety . Instead of admitting their folly, the activists keep insisting that Bt cotton is actually a disaster, and that poor farmers have been misled by the propaganda of seed companies into adopting Bt cotton. The activists have told repeated lies and published bogus research -which has consistently been proved false in detailed reviews in top scientific magazines like Nature.

    It's worth highlighting Mark Lynas, once a famous crusader against GM crops. He has now reversed his anti-GM beliefs as unscientific and untenable given growing evidence that GM foods are potential saviours of the human race, not dangers. The most conclusive evidence, he says, is that three trillion meals with GM foods have been eaten in the US with no evidence at all of ill-effects. Europeans who oppose GM foods conveniently forget their fears when visiting the US as tourists, and happily eat GM food there -with no ill-effects.

    In Nature's Footsteps Indian activists who once embraced Lynas now sneer that he is not a scientist and so cannot judge the matter.

    However, Moore is a scientist of high repute, and says the same thing. 2014 is the 100th anniversary of the birth of Norman Borlaug, founder of the Green Revolution. The world faced a Malthusian food crisis after World War II, given rapid population growth after the introduction of mass vaccinations and antibiotics.

    Environmentalists like Paul Ehrlich predicted global disaster. But Borlaug's hybrid wheat experiments produced new dwarf varieties that revolutionised yields, increasing farm incomes and food availability at the same time. He has been praised for saving one billion lives, more than anybody in history .

    Borlaug was an outspoken supporter of GM crops. He blasted anti-GM activists as alarmists ignorant of nature and spreading falsehoods based on imaginary dangers. "There is no evidence that biotechnology is dangerous. After all, Mother Nature has been doing this kind of thing (crossing genes) for god knows how long."

    He dismissed anti-GM activists as people who had not produced a kilo of food but yelped about biosafety.

    Prakash Javadekar, as environment minister, you must kindly honour Borlaug on his centenary by accepting his position on GM crops, and promoting the research that he held essential for the future of humanity .







    Aug 06 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Flipkart may Ink BPO Deal with Aegis



    

    

    Flipkart is in the process of signing a call centre outsourcing deal with Essar Group's Aegis, as the e-commerce company looks to manage increasing scale of its business, reports Jochelle Mendonca from Mumbai.

    Flipkart reached $1 billion in sales last fiscal and is on track to breach the $3-billion mark this fiscal. 8



    Aug 06 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Armoury Full, Big Boys of E-tail Prepare for Battle

    MADHAV CHANCHANI

    BANGALORE

    

    

    The Rat Race Begins Flush with cash, Flipkart, Snapdeal and Amazon hire former VC pros to lead acquisition of cos and also invest in startups to steal a march over each other

    Days after mopping up $1 billion `6,000 crore) in funding, India's (.

    top online retailer Flipkart said it has hired a former venture capitalist to lead its mergers and acquisition team. Rivals Amazon and Snapdeal too in recent weeks have brought in former investors to direct a similar charge as the big boys of Indian online retail prepare to go shopping themselves.

    Nishant Verman, earlier an associate in the Delhi office of Silicon Valley venture firm Canaan Partners, will now lead the charge at Flipkart to acquire companies and also invest in startups.

    "At Flipkart, we are building India's first $100-billion compa ny and inorganic growth is a strong component of that vision," said Mekin Maheshwari, chief people officer at Flipkart.

    The online commerce company has hired at least 20 people in senior positions in the past two years and "this kind of talent adds value to our business", Maheshwari said. Last week, while announcing the investment led by South Africa's Naspers and Tiger Global Management that valued his company at $7 billion, co-founder Sachin Bansal said Flipkart will acquire "interesting companies". in wearable devices, fashion technology, mobile Internet and robotics if it finds such ventures. "We are looking across the board," said the 32-year-old entrepreneur, who set the ball rolling in May with an estimated $370-million buyout of fashion portal Myntra.

    Cross-town rival Amazon India has roped in Abhijeet Muzumdar, former vice-president at Bessemer Venture Partners, to lead its corporate development function, while Delhi-based Snapdeal chose Abhishek Kumar -the head of investments at venture firm Palaash Ventures -for a similar role.

    A spokeswoman for Amazon India declined comment for this article and the company's investment strategy in India. Experts are of the view that these three etailers, who are flush with cash, will look to buy or invest in hot technology startups as well as single-category retailers as they battle for leadership.

    "It is going to be a war," said Avnish Bajaj, managing director at venture firm Matrix Partners India. A day after Flipkart's fund-raising announcement, Amazon's Jeff Bezos said he will invest up to $2 billion to grow his India operations.

    Snapdeal, which is on the road for more money, has already received funding of $233 million this year from several investors, including eBay. These companies have picked their M&A heads with care and it is no coincidence that all three executives tasked to hunt for acquisitions are former investors skilled at evaluating emerging ventures.

    "So while what they did in a venture fund is important, what they did before is equally as relevant," said Sunit Mehra, partner at executive search firm Hunt Partners.

    For instance, Flipkart's Verman who has worked in Microsoft's corporate development team at Seattle, helped see through the acquisitions of digital marketing service aQuantative and telecom application maker Tellme. The deals were together estimated to be worth over $7 billion (Rs 42,000 crore). In India, Verman aims to "support India's thriving startup ecosystem by investing in entrepreneurs who are working on disruptive ideas."

    Muzumdar, who will look after investments and M&A in India and Southeast Asia for Amazon, was earlier an investment banker at Edelweiss Capital and UBS. He also led Bessemer's investments in Snapdeal and match-making portal Matrimony.com. Kumar, who joined as head of corporate development at Snapdeal, earlier led new ventures at media firm TV18 Broadcast.

    Analysts said that while acquiring single-category online retailers might be the immediate focus for all three leaders pitted in a race for top honours in India's online retail in dustry estimated to reach Rs 50,000 crore by 2016, they will also compete fiercely to buy key technology mak ers in areas like payments and mobile. "We will see consolidation in the market," said Saloni Nangia, head of retail at advisory Technopak.

    What is clear though is that these moves will not be made in a hurry. In a recent interview with ET, Snapdeal cofounder Kunal Bahl said "The gen eral track record of integrating large acquisitions has been poor.

    The ones that have paid off much better have been more strategic and deeply integrated."

    The online marketplace has so far bought three startups group buying site Grabbon, sports and fitness por tal esportsbuy and online market place Shopo.in.

    Apart from Myntra, Flipkart bought electronics portal Letsbuy last year and has acquired smaller ventures such as digital distribution ventureMime360, online readers community WeRead and Bollywood content portal Chakpak.


    Aug 06 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    PLAYING A NEW ROLE - BJP's Cousins from Sangh Parivaar New Opposition

    NISTULA HEBBAR

    NEW DELHI

    

    

    IT'S OUR RIGHT Just because a BJP govt is in place does not mean that organisations which have worked for years on certain issues will not raise objections..., says RSS With Cong down to 44 in LS, RSS, Swadeshi Jagaran Manch and Bharatiya Kisan Sangh confront govt on issues

    The first 65 days of the Narendra Modi-led government have not only signified a break from the old order at the centre but also thrown up a new sort of opposition. With the largest opposition party, the Congress, reduced to a stump of 44 Lok Sabha members, the more evenly balanced Rajya Sabha has turned more consequential. However, the most successful interventions in government policy have been made not by the opposition parties but the ruling BJP's student wing, ABVP, and fraternal organisations of the party's ideological mentor Rashtriya Swayamsevak Sangh ­ the Swadeshi Jagaran Manch and the Bharatiya Kisan Sangh.

    The moratorium on field trials of GM crops, the rolling back of the four-year underg raduate programme at Delhi University and, most recently, the agitation on the Civil Services Aptitude Test have all been marked by opposition from within the Sangh Parivar. In Parliament, on the other hand, the government has faced the wrath of the formal opposition in the Rajya Sabha on its stand on the Israeli bombing of Gaza and now the Insurance Bill.

    Is this the face of new oppositional politics in the era of a single party wielding majority in Parliament?

    Political scientist Zoya Hasan, whose latest work `Congress After Indira: Policy, Power and Political Change 1984-2009' seems particularly prescient now, does not quite see the interventions of the Sangh Parivar affiliates as opposition to the government.

    "The RSS and its affiliates cannot be seen as an opposition to the government. Some interventions cannot be seen as opposing a government the RSS worked so hard to get elected," Hasan said, adding, "You cannot ignore the fact important appointments in this government have been made at the behest of the RSS. At best you can say that the RSS can be an opposition within the government, and more realistically as having influence on it."

    RSS' publicity chief Manmohan Vaidya defended the interventions, telling ET, "Just because a BJP government is in place does not mean that organisations which have worked for years on certain issues will not raise objections when they see something they don't agree with."

    So if the RSS has an "influence" on the government, is the oppositional space in Parliament fated to lie in the upper house? " At the moment, it may look this way , since there is comfort in numbers here, and very credible voices from the Congress have been speaking," said Rajeev Gowda, newly-elected Rajya Sabha member and Congress spokesman. "The circumstances, however, are in no way permanent, both in terms of political development and the character of the upper house," he added.

    The government will not be able to draw comfort from the numbers in the Rajya Sabha for another two and a half years, though.

    Congress leaders admit that the party will have to increasingly play oppositional politics outside Parliament.

    "We will have to fight on ideological issues, and take to the streets," said a senior Congress leader, who did not wish to be named. "In that, we are handicapped as for the last 10 years organisational and ideological matters have been allowed to drift."

    Hasan terms Congress a "classic party of governance, which doesn't have the large flank of organisational strength that the RSS provides to the BJP". It is now forced to contend with a government as well as opposition of sorts rooted in its national rival.


    

    Aug 06 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    COUNTER Point - US Fed Rate Fears, Cheaper China may Stump Indian Markets


    MUMBAI

    

    

    When former US Fed chairman, Alan Greenspan, who enjoyed a 'rock star' status among Americans during his tenure, warned of a significant correction in stocks last week, many on Wall Street sat up and took notice. The remark came amid concerns that the Fed would increase rates soonerthan-expected, which spooked global markets last week.

    The weakness rippled through broader emerging markets including India which, so far in 2014, has enjoyed one of its best bull runs since 2009. While perennial optimists consider the recent turbulence as just a hiccup before the next round of rally starts soon, many experienced hands on Dalal Street are gearing up for an onerous toil to spot winners over the next few months.

    In short, gone are the magical days when it seemed making money in the stock market was so simple. A key reason for the runup in many stocks in the past six months was because of the limited supply of shares; there was hardly any share sales by companies until more recently, while foreign institutional investors (FIIs) and the affluent locals were lapping up whatever came their way amid the election euphoria.

    Now, this is going to change. The government is lining up huge sales of its equity in companies, while many private firms, too,

    are queuing up to tap the primary market, resulting in a huge supply of paper over the next many months. The point is if FII inflows are slowing, who will absorb this large supply of paper? Another reason for India optimists to worry is that FIIs are taking fancy to Chinese stocks, which have gained almost 8% in the last month against the 0.5% decline in the Sensex. Analysts are describing the recent gains in the battered Chinese stocks as a prelude to a bull run there. In that case, there is a possibility of FIIs increasing their allocations to cheaper China at the expense of expensive India.

    Interestingly, the quality of FII inflows has changed in the past month or so. A large chunk of the flows that have come in from overseas investors in the last month or so are from those overseas fund managers with limited experience in India.

    As a broker puts it, their knowledge about India is at best based on the returns data available on Bloomberg, which highlights the stock market's fabulous run so far this year. The experienced foreign fund managers are only too happy to dump their pricey shares in capital goods, infrastructure and power sectors on them and move to technology and pharma.

    Some of the influential Dalal Street names are taking it easy when it comes to broad bets.


    

    






    

    Aug 06 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Online Threat: Cos Tighten Offline Screws

    WRITANKAR MUKHERJEE

    KOLKATA

    

    

    Brands like Sony, Samsung and Canon ban stores from selling items via e-commerce sites

    Sony, Samsung, Panasonic and other top electronics brands are trying to crack down on brick-and-mortar stores selling their products online, threatening to cut off supplies or penalise them financially as they look to curb the practice of `predatory' discounts.

    Lenovo and Canon, along with the three named above, have issued trade advisories banning stores from selling cellphones and other items made by them online directly or indirectly via e-commerce companies.

    The yawning gap between prices quoted by popular online shopping sites such as Flipkart, Amazon and Snapdeal and their offline counterparts has added to woes of electronic goods makers in India, some of which are grappling with slipping sales at their brick-and-mortar stores. Manufacturers of electronic goods allege that while some offline traders and distributors list products on online marketplaces and sell them at lower margins, others list products at the manufacturer recommended price, but the host website ends up offering deep discounts by way of coupons and cashback schemes, creating a wide gap in pricing between products available online and offline. We are trying to weed out unhygienic practices to create a healthy environment between online and offline markets," said Amar Babu, managing director at Lenovo India. The company has asked retailers to comply with the trade agreement, which maps out a certain geographical territory where the retailer can sell, he said, adding that Lenovo is also engaging with popular online marketplaces to see how best the impact on offline retailers can be minimised. Panasonic India managing director Man ish Sharma said while the online channel is important, the current situation demands a well-considered set of terms and conditions. Panasonic is trying to maintain price levels to eliminate the confusion among consumers. Email queries sent to Samsung, Sony, Flipkart and Snapdeal remained unanswered till as of press time. A spokesperson for Amazon India said sellers determine the price of products they list and sell on its platform. Two industry executives, who did not wish to be named, said brands such as Sony and Samsung have also entered into an unwritten "gentleman's agreement" with some online stores to ensure that products are not sold below the manufacturer-recommended price or the dealer price. This initiative, formalised about a week ago, has already substantially reduced the gap between the price of some smartphones and tablets. Pulkit Baid, director of electronic retailer the great Eastern, said the move will help create a level-playing field. "The unsustainable pricing in online has been affecting profitability of the offline stores," he said. The chief executive of a leading retail chain, which was selling through online platforms, said some smartphone brands have threatened financial penalties besides supply curbs if products are sold online. However, Canon India executive vice-president Alok Bharadwaj was of the view that an unwritten agreement would not be effective in the long run. He said Canon has decided not to offer any sales incentives to offline distributors who sell online. The company will offer different models for online and offline trade, he added. "We have realised that it is not possible to reach a definite conclusion on how to curb predatory discounts online, hence we are trying to create a mechanism of co-existence with some tolerance to ensure the brand is protected and consumers don't feel cheated," Bharadwaj said. A curb on deep online discounts has been a long-standing demand of offline traders, especially top retail chains. Some brands such as Lenovo, Dell, Nikon and LG have even advised customers against specified online marketplaces, saying products may not be genuine and there



    

    






    Aug 01 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    Flipkart, Amazon Gear up to Flex New Muscles

    RADHIKA P NAIR

    BANGALORE

    

    

    Etailers plan to open more warehouses, step up hiring and acquire companies

    Deep discounts for customers and big incentives for merchants who sell on their marketplace is what Flipkart, India's largest online retailer, is planning as it aims for fourfold growth in sales over the next twelve months.

    In the aftermath of the biggest round of fund-raising in India's internet industry, Flipkart and challenger Amazon plan to open more warehouses, hire in larger numbers and acquire companies with newer products or technology as they battle for supremacy in one of the fastest growing markets for online commerce globally.

    "It is still day-one of Indian ecommerce," said Amit Aggarwal, vice-president and India

    country head at Amazon. On Wednesday, Amazon founder Jeff Bezos said he will spend $2 `12,000 crore) to build billion (.

    operations in India without offering a timeframe. The announcement coming a day after Flipkart declared funding of $1 billion from a host of global investors is viewed as the strongest call for battle be tween the two protagonists.

    This month, Amazon will add a new category and also increase the range of books and electronics ­ its two main product lines in India -as it powers ahead to reach sales of ` . 6,000 crore this fiscal. In the past year, 8,500 sellers have hawked their wares on Amazon's marketplace.

    Flipkart, which adopted a marketplace model last year, aims to increase the number of sellers to 50,000 in the next year from the current level of over 4,000.



    Aug 01 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    Searchlight - THE BATTLE ROYALE - The Game Starts Now

    ARCHANA RAI


    

    

    Prepare to be delighted this Diwali if you plan to shop online on India's top portals. In store for you will be an array of products at rock-bottom prices, a chance to try out apparel at home and return it, if you don't like and the option to pick the time when the delivery boy can come by. All this and more will be fuelled by money from the largest round of fund raising in the Indian consumer internet industry, announced this week. Within a day of Flipkart's `6,000 crore fund raising, Jeff Bezos was ready with his riposte, a war chest of `12,000 crore for India

    Top managers who learned to win at any cost during poker sessions on business school campuses around the globe will tell you that it is the chap with the most chips who wins. Ironically, as the play-off begins for top honours in India's online retail industry, it is the lone B-school graduate amongst the top three players who holds the least number of chips in a game where more money is now coming from large corporations and not risk capital investors who placed the initial bets.

    To hold his own against Jeff Bezos's Amazonian pile of $2 billion and Sachin Bansal's stash that is largely from South Africa's Naspers, which reportedly picked up half the tab in the recent $1 billion fund raise by Flipkart, Wharton Business School graduate Kunal Bahl will have to persuade his company's corporate backer eBay to shell out much more for Snapdeal than it has done so far. Or he must find new backers willing to wager money drawn from their balance sheets.

    With hopes of a quick public listing receding for India's top online retailers, risk capital investors looking for a speedy cash-out will step back while sovereign wealth funds-Singapore's GIC is an investor in Flipkart and state-owned Temasek is backing Snapdeal--remain in the game.

    This will also leave the field open for several large Indian companies that have watched from the sidelines.

    Mukesh Ambani, whose stores have sold everything from groceries to jewellery and footwear to Indian consumers, has both the money and the gumption for a long-drawn encounter. The Reliance group can also tout prior experience; it was an early investor in India's first ever online retailer, Fabmart.com. The portal which morphed into the Fabmall chain of grocery stores was bought by Kumar Mangalam Birla's group; he too is a contender to join the sweepstakes. Until now, very little rupee capital has gone into building online retail in India, billionaires like Wipro chairman Azim Premji and Infosys cofounder Narayana Murthy being the exceptions. While the Wipro chairman's family office has invested in both Snapdeal and fashion portal Myntra, now a part of Flipkart, Murthy's Catamaran has floated a joint venture with Amazon.

    Risk capital investors can point to China, where they have earned handsome returns from investments in online portals like cosmetics retailer Jumei, discount retailer Vipshop or online mall JD.com, but they are all in the shadow of Chinese giant Alibaba.

    India, with one of the fastest-growing online retail markets in the world, is the only chance that true game-players have for a shot at being number one. Bezos knows that, which is why he is rattling his pile of chips at the table.

    For IIT-Delhi's Bansal who chose a campus placement at Amazon before starting out on his own, this is a chance to best the master at his own game. His recent assertion that "we were like a little kid waiting to grow up, we now have..." appears prophetic.

    Indian online retail is indeed, an adult game.

    investors looking for a speedy cash-out will step back while sovereign wealth funds-Singapore's GIC is an investor in Flipkart and state-owned Temasek is backing Snapdeal--remain in the game.

    This will also leave the field open for several large Indian companies that have watched from the sidelines.

    Mukesh Ambani, whose stores have sold everything from groceries to jewellery and footwear to Indian conth the money and the gumption sumers, has both the money and the gumption for a long-drawn encounter. The Reliance group can also tout prior experience; it was an early investor in India's first ever online retailer, Fabmart.com. The portal which morphed into the Fabmall chain of grocery stores was bought by Kumar Mangalam Birla's group; he too is a contender to join the sweepstakes. Until now, very little rupee capital has gone into building online retail in India, billionaires like Wipro chairman Azim Premji and Infosys cofounder Narayana Murthy being the exceptions. While the Wipro chairman's family office has invested in both Snapdeal and fashion portal Myntra, now a part of Flipkart, Murthy's Catamaran has floated a joint venture with Amazon.

    Risk capital investors can point to China, where they have earned handsome returns from investments in online portals like cosmetics retailer Jumei, discount retailer Vipshop or online mall JD.com, but they are all in the shadow of Chinese giant Alibaba.

    India, with one of the fastest-growing online retail markets in the world, is the only chance that true game-players have for a shot at being number one. Bezos knows that, which is why he is rattling his pile of chips at the table.

    For IIT-Delhi's Bansal who chose a campus placement at Amazon before starting out on his own, this is a chance to best the master at his own game. His recent assertion that "we were like a little kid waiting to grow up, we now have..." appears prophetic.

    Indian online retail is indeed, an adult game.




    

    



    Aug 01 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    ET Q&A - In the Cart: Amazon 2 Flipkart 1



    

    

    Mobile will be a Focus Area: Amit Agarwal

    LOGISTICS Our investment in lo gistics and fulfillment will continue. This helps reduce costs for sellers and enables them to invest into their business further dent focus on SMBs (small and me

    INVESTMENT We have been aggressively investing all this while, in categories, in infrastructure. We just added five more fulfillment centres. We are witnessing never-seen before growth rates

    BATTLE ROYALE:

    It's been a fairytale rise so far for Indian e-comm's flagbearer Flipkart. Now enter its real enemy from Amazon with financial muscle and ready for some `junglee' fight. Who will survive to tell the tale? Watch this space... You ain't seen nothing yet.

    What is the time frame for the investment of $2 billion?

    We do not share a time frame for the investments. However, this signals our continued investment into the country. We have een aggressively investing all this while, in categories, in infrastructure. We just added five more fulfillment centres. We are witnessing never-seen before growth rates. When will you reach $1 billion in sales?

    We cannot disclose the exact time. But across all parameters, we are growing rapidly. As Jeff has clearly said India has become the fastest growing country for Amazon. What will Amazon's strategy look like in India now?

    We will keep adding more categories and bringing more sellers. You should see us expanding selection and make it easy for any seller to come online and offer the best and most convenient delivery experience for customers. Mobile will be a focus area. Right now more than 35% of our traffic is coming from mobile and that is amazing. We expect it to continue to grow. Our investment in logistics and fulfillment will continue. This helps reduce costs for sellers and enables them to invest into their business further. How about acquisitions?

    We are always looking at organic and inorganic ways to improve customer experience. Is the joint venture with Catamaran -Taurus Business and Trade Services -Amazon's answer to Flipkart's WS Retail? I can tell you what the JV is. It will have an independent focus on SMBs (small and medium businesses). We have seen a strong traction from SMBs.

    This is a JV with Amazon Asia and has nothing to do with us.


    Killer Sharks vs. Killer Whales - YouTube

    Video for Killer sharks► 4:28► 4:28

    www.youtube.com/watch?v=6zOrUT0smV8

    Mar 1, 2013 - Uploaded by ABC News

    Any shark, including the killer shark is deadly afraid of orcas and will always try ... +SneakingViper Great ...

    Shark Week - Killer Sharks | Viciously Attacked - YouTube

    Video for Killer sharks► 2:27► 2:27

    www.youtube.com/watch?v=pdjjvkdrBU0

    Aug 2, 2011 - Uploaded by Discovery

    Watch Shark Week's KILLER SHARKS Tuesday, August 2, 2011 at 9PM e/p on Discovery.

    Killer Sharks vs. Killer Whales Video - YouTube

    Video for Killer sharks► 4:28► 4:28

    www.youtube.com/watch?v=io69Du-7Eo4

    Mar 1, 2013 - Uploaded by BullsEye

    Tonight ABC's tiny Rivera brings us a look at what happens when killer whales vs killer sharks beat candidacy ...


    

    





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    यह अतिशयोक्ति नहीं, सच है!

    नई सरकार का 'रिपोर्ट कार्ड' या आरएसएस की रणनीति के 'दूसरे चरण' का आग़ाज़? 


    अभिषेक श्रीवास्‍तव 





    यह बात 1970 की है। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं का तीसरे वर्ष का प्रशिक्षण शिविर चल रहा था। यह वह चरण होता है जिसके बाद कोई व्यक्ति पूर्णकालिक संघ कार्यकर्ता बन जाता है। शिविर का संचालन यादवराव जोशी कर रहे थे जो उस वक्त समूचे दक्षिण भारत में संघ कार्यकर्ताओं के प्रमुख हुआ करते थे। एक प्रशिक्षु ने प्रश्न सत्र में जोशी से एक सवाल किया था, ''हम कहते हैं कि आरएसएस एक हिंदू संगठन है। हम कहते हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और भारत हिंदुओं का देश है। उसी सांस में हम यह भी कहते हैं कि मुसलमानों और ईसाइयों को अपना-अपना धर्म मानते रहने की छूट है और वे इसी तरह तब तक रह सकते हैं जब तक उन्हें इस देश से प्यार है। आखिर हमें उनको यह रियायत देने की जरूरत ही क्यों हैआखिर क्यों नहीं हम स्पष्ट रूप से कह देते कि चूंकि हम हिंदू राष्ट्र हैं इसलिए उनके लिए यहां कोई जगह नहीं है?'' जोशी ने इसका जवाब यह दिया, ''आरएसएस और हिंदू समाज अभी इतना सशक्त नहीं हुआ है कि वह मुसलमानों और ईसाइयों से साफ तौर पर कह सके कि अगर आप भारत में रहना चाहते हैं तो हिंदू धर्म को स्वीकार कर लो। यह कह सके कि या तो बदल जाओ या खत्म हो जाओ। लेकिन जब हिंदू समाज और आरएसएस पर्याप्त मजबूत हो जाएंगेतब हम उनसे साफ-साफ कह देंगे कि अगर वे इस देश में रहना चाहते हैं और इससे प्रेम करते हैंतो यह मान लें कि कुछ पीढ़ियों पहले वे हिंदू ही थे और इसलिए वे वापस हिंदू धर्म में आ जाएं।''  (कारवां, आरएसएस3.0, दिनेश नारायणन, 1 मई 2014)

    इस घटना के 44 साल बाद 25 जुलाई, 2014 को गोवा के उपमुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूज़ा का दिया यह बयान देखिए, ''भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की जरूरत क्या हैभारत तो पहले से ही हिंदू राष्ट्र है और हिंदुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है। मैं भी हिंदू हूंईसाई हिंदू।''यह बयान अचानक नहीं आया है। लोकसभा चुनाव से पहले बिहार के बीजेपी नेता और नवादा से उम्मीदवार गिरिराज सिंह ने 18 अप्रैल 2014 को कहा था कि जो लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकना चाहते हैंउनके लिए भारत में जगह नहीं होगी और उन्हें जल्द ही पाकिस्तान भेज दिया जाएगा। गिरिराज सिंह का बयान आए सिर्फ तीन महीने हुए हैंलेकिन इस बीच हिंदू इलाके से मुसलमान घरों को खाली कराने (19 अप्रैल, 2014) तथामुसलमानों को मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाते हुए उन पर सरे राह थूकने (19 जुलाई, 2014) की सलाह हिंदुओं को देने वाले विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया से लेकर गोवा के मंत्री दीपक धवलिकर द्वारा नरेंद्र मोदी में जताई गई उम्मीद तक- कि सबके समर्थन से वे भारत को हिंदू राष्ट्र बना देंगे (24 जुलाई, 2014)- हिंदू राष्ट्र का संदर्भ नियमित तौर से बार-बार सुर्खियों में आ रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब तक आधिकारिक तौर पर हिंदू राष्ट्र के बारे में अपनी ओर से कुछ भी नहीं कहा हैलेकिन यादवराव जोशी की 1970 में कही बात को आज याद करें तो एक सवाल ज़रूर बनता हैः क्या हिंदू समाज और आरएसएस ''पर्याप्त मजबूत'' हो चुके हैं कि वे कभी भी मुसलमानों और ईसाइयों को धर्म बदलने या खत्म हो जाने का विकल्प दे सकते होंसवाल यह है कि जिस हिंदू राष्ट्र का भय लंबे समय से इस देश के बहुलतावादी मानस में जमा हुआ हैक्या हम उसके बहुत करीब आ चुके हैंआखिर कितना करीब आ चुके हैंयह डर क्या वास्तविक है या सिर्फ संघी बयानवीरों का पैदा किया हुआ है?

    प्रस्तुत लेख का असल उद्देश्य 26 मई, 2014 को इस देश में बनी भारतीय जनता पार्टी की बहुमत वाली सरकार का बस हालचाल लेना था। मंशा यह थी कि बीते दो महीनों के दौरान इस सरकार ने जो काम किए हैं या नहीं किए हैंउन पर बात की जाए और वादों के जिस जहाज पर सवार होकर यह सरकार भारी जनादेश लेकर केंद्र में आई हैउसके बरक्स आज की तारीख में इस सरकार का पानी नापा जाए। यह लेखक जब पिछले दो महीनों के दौरान हुई घटनाओंविवादोंबयानोंउपलब्धियोंनाकामियों आदि की सूची बनाने बैठा तो आश्चर्यजनक रूप से दो विरोधी निष्कर्ष निकलकर सामने आएः

    पहलाइस सरकार ने कोई काम नहीं किया है।
    दूसराइस सरकार ने इतना काम किया है जितना पहले कभी भी इतनी कम अवधि में नहीं हुआ था।

    क्या ये दो बातें एक साथ संभव हो सकती हैंसहज जवाब 'नामें होना चाहिएलेकिन ऐसा है नहीं। वास्तव में ये दोनों बातें सही हैं। इसे समझने के लिए हमें नरेंद्र मोदी के बहुप्रचारित चुनावी नारे को एक बार याद करना पड़ेगा- ''मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस''। इसका मतलब यह था कि काम तो होगाराजकाज चलता रहेगापहले से ज्यादा गति से बढ़ेगालेकिन उसमें सरकार की भूमिका न्यूनतम रहेगी। याद नहीं आता कि तब यह सवाल कहीं पूछा गया था या नहीं कि अगर काम होगा और काम सरकार नहीं करेगी,तो कौन करेगा। हो सकता है किसी ने पूछा हो। हो सकता है इसे पहले से ही समझ लिया गया हो। इससे हालांकि फर्क क्या पड़ता है जबकि चुनावी नारा बहुमत में तब्दील हो चुका हो! बहरहालमोदी के चुनावी नारे के आईने में देखें तो उपर्युक्त दोनों निष्कर्ष समझ में आ सकते हैं। बस एक सवाल रह जाता है कि वह अदृश्य हाथ कौन सा है जो इस देश में राजकाज चला रहा हैवह इतना भी अदृश्य नहीं है। वह पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट है। कहीं ज्यादा मुखर है। वह आरएसएस है।

    भारत सरकार के चलने में आरएसएस की भूमिका समझनी हो तो जल्दी में एक अभ्यास किया जा सकता है। इन दो महीनों में जो कुछ इस देश में हुआ हैउसे अधिकतम स्मृति के आधार पर हम दर्ज करेंगे। जो मोटी सूची बनेगीवह निम्न है। सुविधा के लिए हमने इस ''रिपोर्ट कार्ड'' (अगर कह सकते हैं तो) को संसदीय लोकतंत्र के तीन स्तम्भों की तीन श्रेणियोंमीडिया और विविध में बांट दिया है ताकि सनद रहे।


    मोदी सरकार के साठ दिनों का संक्षिप्‍त लेखा-जोखा 

     अगर कुछ छूट रहा हो तो इस तालिका में जोड़ा जा सकता है। सिर्फ स्मृति के आधार पर देखें तो 26 जुलाई, 2014 तक यानी मोदी सरकार के शपथ लेने के बाद के 60 दिनों के भीतर तालिका के अनुसार ऐसे कुल 56 अलग-अलग मामले याद आते हैं जो हर अगले दिन नई बहस खड़ी करते आए हैं। बेशकऐसे और भी मसले होंगे जिनके बारे में या तो हमें सूचना नहीं है या फिर हमें सूचित नहीं किया गया। देश में नई सरकार बनने के बाद पेश किए गए बजट के प्रावधानों से लेकर कैबिनेट के फैसलों तक और नियुक्तियों से लेकर सार्वजनिक विवादों तक आप पाएंगे कि हर कहीं एक ''एजेंडा'' है। सरकारी फाइलें नष्ट करने के क्रम में महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ी फाइलों पर उठा विवाद अगर प्रत्यक्षतः इस एजेंडे को उद्घाटित नहीं कर पातातो गुजरात में दीनानाथ बत्रा (जिन्होंने एक मुकदमा कर के हिंदुओं पर लिखी वेंडी डोनिगर की पुस्तक को प्रतिबंधित करवाया है) की किताबें अनिवार्य किए जाने या फिर आइसीएचआर का मुखिया संघ से चुने जाने में इसे साफ देखा जा सकता है।

    याद नहीं आता कि ऐसा कभी हुआ होगा कि प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर रहा हो और कैबिनेट की बैठक रद्द कर दी गई हो। पिछली यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह के बाहर रहने पर प्रणब मुखर्जी (राष्ट्रपति बनने से पहले) कैबिनेट की बैठकें लिया करते थे। यही परंपरा पहले भी रही है। पहली बार ऐसा हुआ कि नरेंद्र मोदी विदेश में थे और कैबिनेट अपनी बैठक के लिए उनकी बाट जोह रही थी। इसी तरह पहली बार ऐसा हुआ है कि तमाम अन्य मंत्रियों समेत देश के गृहमंत्री को अपना निजी सचिव चुनने की अनुमति पीएमओ ने नहीं दी। इसके ठीक उलट नृपेंद्र मिश्र को प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव बनाने के लिए सारे जहान का विरोध सिर पर उठाकर भी इस सरकार ने ट्राइ विधेयक में संशोधन कर डाला। बिल्कुल वैसे ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद औपचारिक रूप से संभालने से पहले ही पूर्व गुप्तचर अधिकारी अजित डोभाल प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह की योजना बनाने में जुट गए थे। जितनी तेज़ी से नरेंद्र मोदी ने नई सरकार की कमान अपने हाथ में ली और किसी के करने के लिए कुछ नहीं छोड़ाउसका प्रभाव प्रेस में हुए इस्तीफों और मीडिया की खबरों में भी साफ देखने को मिला। इस पूरे अध्याय में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि प्रधानमंत्री लगातार चुप रहे। जिन्हें जो बोलना था वे बोलते गए। यहां तक कि संघप्रिय पत्रकार वेदप्रताप वैदिक तक माहौल ताड़कर अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफ़िज़ सईद से 'कूटनीतिक'मुलाकात कर आए जबकि संसद में अरुण जेटली ने इस मुलाकात पर पूरी नादानी से सफाई दे डाली कि इसका ''डायरेक्टलीइनडायरेक्टली या रिमोटली'' भी भाजपा या केंद्र सरकार से कोई लेना-देना नहीं है।

    कहने का अर्थ यह है कि भारत में बनी इस सरकार के दो मुंह हैं। एक मुंह बोलता है और दूसरा मुंह बचाव करता है। बोलने वाला मुंह संघ के एजेंडे पर बोलता है। बचाव करने वाला उस चुनी हुई सरकार का और उस एजेंडे का बचाव करता हैजहां जैसी ज़रूरत हो। जो अब तक बोलता रहा हैवह इसलिए चुप है क्योंकि उसे अब काम करना है। संघ के एजेंडे पर काम। और उस काम की लंबी सूची हम ऊपर देख चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनते ही अमित शाह संघ के नेताओं के यहां पार्टी और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बैठाने के लिए बैठक करते हैं। उधर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई अपने आवास पर ही संघ के अहम नेताओं को बैठक के लिए बुला लेते हैं ताकि देश-दुनिया की चर्चा की जा सके। इस तरह (भाजपा के संदर्भ में) जो तीन इकाइयां कायदे से संसदीय लोकतंत्र में स्वतंत्र अस्तित्व में होनी चाहिए थीं- चुनी हुई सरकारबहुमत वाला राजनीतिक दल और उसकी मातृ संस्था- वे कुल मिलाकर एक इकाई की ओर अग्रसर होते नज़र आते हैं। पार्टी से भी संघ तालमेल बैठा रहा है और सरकार के साथ भी। इसकी इकलौती वजह यह है कि देश का प्रधानमंत्री संघ का वह कार्यकर्ता है जिस पर संघ ने बीते दस साल में सबसे ज्यादा भरोसा जताया है। यही कारण है कि इस सरकार का रिपोर्ट कार्ड दरअसल भारत में चुनी हुई एक स्वतंत्र सरकार का रिपोर्ट कार्ड हो ही नहीं सकता। वह अनिवार्यतःः संघ का रिपोर्ट कार्ड होगा। इन दोनों के बीच में बचती है भाजपातो उसका आने वाले दिनों में क्या हो सकता हैइस पर हम बाद में सोचेंगे।  


    (साभार कारवां) 


    ज़ाहिर हैजब बात सरकार पर होगीप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर होगीतो वह संघ तक जाएगी और अंततः संघ प्रमुख मोहन भागवत पर आकर टिकेगी। सरकार को समझना है तो मोहन भागवत को समझना होगा। हो सकता है कि यह बात अतिशयोक्ति जान पड़े। हमने चुनाव से पहले तो अतिशयोक्तियां नहीं पाली थींलेकिन जो परिणाम आया वह सामने है। इसीलिए अबकी अतिशयोक्ति में बात करने में हर्ज़ नहीं होना चाहिए। कुछ लोगों का मानना रहा है कि नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और राजकाज का तरीका संघ को दरकिनार कर देगा। यदि ऐसा होता है तो पिछले दो महीनों के दौरान इसका एक भी संकेत मिलना चाहिए था। स्थिति उसके ठीक उलट दिख रही है। इसे समझने के लिए ज़रा पीछे चलते हैं। यूपीए-1 का जैसा प्रदर्शन पांच वर्षों के दौरान रहा थाभाजपा को उस हिसाब से 2009 के लोकसभा चुनाव में अपनी जीत की उम्मीद थी। लालकृष्ण आडवाणी तब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थेलेकिन भाजपा को आज तक नहीं समझ में आया कि उस चुनाव में उसकी हार कैसे और क्यों हुई। चूंकि पार्टी ने 2009 में वाजपेयी और आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था और उस वक्त तक राजनीतिक मोर्चे पर संघ उस तरह से सक्रिय नहीं था जैसा 2014 में हुआ या फिर इमरजेंसी के बाद वाले चुनाव में हुआ थाइसलिए संघ प्रमुख मोहन भागवत के दिमाग में संघ की दीर्घकालीन योजना के तहत आडवाणी के बाद प्रधानमंत्री पद का कोई उम्मीदवार अगर था तो वे राज्यसभा सांसद प्रमोद महाजन थे। तब तक नरेंद्र मोदी कहीं परिदृश्य में ही नहीं थे।

    संघ के पुराने स्वयंसेवक और कारोबारी दिलीप देवधर के साथ दिनेश नारायणन की हुई बातचीत से यह साफ पता चलता है कि मोहन भागवत और महाजन के बीच कितना करीबी रिश्ता था (कारवां, 1 मई 2014)। सन् 2000 से 2006 के बीच भागवत नागपुर में एक होमियोपैथी चिकित्सक डाॅ. विलास डांगरे के घर पर महाजन से गुप्त मुलाकातें करते रहे थे,जहां देर रात तक दोनों के बीच लंबी चर्चा चलती थी। देवधर के मुताबिक, ''महाजन नागपुर के हवाई अड्डे पर उतरते तो पीछे के दरवाज़े से डांगरे के घर में दाखिल होते और भागवत से मिलते थे।'' उनके मुताबिक महाजन में भागवत भविष्य का प्रधानमंत्री देखते थे। दुर्भाग्यवश 2006 में महाजन की हत्या हो गई। इसके बाद से ही भागवत ने नरेंद्र मोदी के सिर पर अपना हाथ रखा। संघ के नेताओं को मोदी के संदर्भ में एक आशंका बनी रहती थी कि कहीं गुजरात दंगे के मामले में अदालत से कोई प्रतिकूल फैसला न आ जाएलेकिन2007 में जब मोदी ने राज्य में भारी चुनावी जीत दर्ज की तब जाकर मोहन भागवत के साथ संघ के दूसरे नेताओं ने उन पर राष्ट्रीय भूमिका के लिए भरोसा जताना शुरू किया। भारी जनादेश मिलने के बाद मोदी ने 2007 में संघ के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और पार्टी के नेताओं के पर कतरने शुरू किए जिससे संघ की कतारों में उन्हें लेकर असंतोष फैलने लगा था। इसके बावजूद किसी की परवाह किए बगैर मोहन भागवत अहमदाबाद में मोदी की पुस्तक ''ज्योतिपुंज'' का लोकार्पण करने पहुंचे थे। यह पुस्तक मोदी के कई गुरुओं के बारे में एक संकलन है जिसमें भागवत के पिता मधुकरराव पर भी एक अध्याय शामिल है।

    प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी के नाम का जिक्र पहली बार2011 में बड़ौदा में किया गया। संघ की इस बैठक में तब तक मोदी के नाम को लेकर अधिकतर लोेगों में असहमति थीलेकिन कालांतर में चेन्नईअमरावती और जयपुर की बैठकों में उनके नाम पर बात चलती रही और विरोध कम पड़ता गया। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले संघ के भीतर दो नज़रिये काम कर रहे थे- धर्मनिरपेक्ष लाइन ली जाए या हिंदुत्व की बात भी की जाए। हिंदुत्ववादी समूह मोदी के पक्ष में था लेकिन आडवाणी का मानना था कि इस लाइन से 180 से ज्यादा सीटें नहीं जीती जा सकती हैं। उसके लिए वाजपेयी जैसा एक नरम चेहरा चाहिए। उनके विरोधियों ने 2004 का हवाला देते हुए विरोध किया कि वाजपेयी ने ही आखिर कौन सी जीत उस वक्त दिला दी थी। कुल मिलाकर सहमति यह बनी कि 2014 में हिंदुत्व वाली लाइन ही ली जाएगी। फिर जून 2013 में मोदी को बीजेपी की राष्ट्रीय प्रचार समिति का अध्यक्ष चुन लिया गया जिस फैसले में आडवाणी की सहमति नहीं थी। उसके बाद का सब कुछ इतिहास है।

    इससे यह पता चलता है कि मोदी दरअसल भागवत की पसंद थे और हैं। तानाशाही कार्यशैली के बावजूद भागवत उन्हें इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि मोदी ने कभी भी संघ की बुनियादी विचारधारा को कोई चुनौती नहीं दी है। इसके बजाय मोदी ने संघ को दिखाया है कि संघ परिवार के बुनियादी मूल्यों को नए तरीके से पैकेज कर के भी लोगों के सामने परोसा जा सकता है। उन्होंने यह दिखाया कि हिंदुत्व की कट्टर लाइन को डिज़ाइनर परिधानों और आर्थिक वृद्धि व उपभोक्तावाद के मुहावरों से कोई खतरा नहीं है और ये सब कुछ हिंदुत्व के माॅडल में फिट बैठ सकता है। एक अन्य फर्क भागवत-मोदी रिश्तों के संदर्भ में यह है कि जहां संघ के दूसरे नेताओं ने अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए लगातार मोदी का समर्थन कियावहीं अकेले भागवत ऐसे हैं जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर मोदी पर लगाम भी कसे रखी है और उन्हें इसका कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ा है। याद करें कि इसी साल मार्च में बंगलुरु में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के समापन सत्र पर स्वयंसेवकों से भागवत नेे कहा था, ''हमारा काम नमो नमो का जाप करना नहीं है। हमें अपने लक्ष्य की ओर काम करना चाहिए।'' मीडिया में इसे लेकर बहुत सी अटकलें लगाई गईं और यहां तक कहा गया कि संघ और मोदी के बीच दरारें पड़नी शुरू हो गई हैंलेकिन वास्तव में स्थिति ऐसी थी नहीं। मार्च के बाद बीते चार महीनों के घटनाक्रम से हम इस बात को लेकर मुतमईन हो सकते हैं कि भागवत और मोदी दोनों एक ही पलड़े पर बैठे हैं। यह पलड़ा विचारधारा का है जो एक साथ पार्टीसंगठन और सरकार तीनों को संचालित कर रहा है।

    इसीलिएभारत सरकार पर या भारतीय जनता पार्टी पर या नरेंद्र मोदी पर बात करने का अर्थ मोहन भागवत पर बात करना है। भारत सरकार की योजनाओं पर और उसके रिपोर्ट कार्ड पर बात करना मोहन भागवत की योजनाओं और रिपोर्ट कार्ड पर बात करना है। प्रतिष्ठित पत्रिका ''शुक्रवार'' में मई के पहले अंक में कवि ज्ञानेंद्रपति का एक साक्षात्कार इस लेखक ने लिया था जिसमें उन्होंने बहुत मार्के की बात कही थी, ''बनारस से नरेंद्र मोदी नहीं,मोहन भागवत चुनाव लड़ रहा है।'' यह बात अब स्पष्ट है। बहरहालबीते दो महीनों में जो हुआवह हम देख चुके हैं। सवाल उठता है कि मोहन भागवत का अगला एजेंडा क्या है?मोहन भागवत को 75 साल की उम्र पूरी करने में दस साल से कुछ ज्यादा वक्त बच रहा है। यही संघ में सेवानिवृत्ति की आधिकारिक उम्र भी है। संयोग है कि 2025 में संघ अपनी स्थापना के 100 साल भी पूरे कर रहा है। अब और तब यानी 2014 और 2025 के बीच संघ ने अपने काम को विस्तार देने के लिए तीन चरणों की एक रणनीति तय की है। इस रणनीति का विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं हैलेकिन जानकारों की मानें तो इसके तीन चरण संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस के दिए मंत्र ''आॅर्गनाइज़ेशन,मोबिलाइज़ेशन और ऐक्शन'' की तर्ज पर तैयार किए गए हैं। संघ का मानना है कि पहले चरण का अंत हो रहा है और दूसरे चरण की शुरुआत होने वाली है। पहला चरण राजनीतिक सत्ता हासिल करना था जिसकी ज़मीन तैयार करने में मोहन भागवत जुटे हुए थे। अगर2019 में भी बीजेपी की सरकार आती है या बीजेपी वर्चस्व में रहती हैतो संघ के विचारधारात्मक घोड़ों को एजेंडा पूरा करने के लिए खुला छोड़ दिया जाएगा। यह तीसरे चरण की शुरुआत होगी जिसके बारे में फिलहाल सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। यह चरण पूरी तरह अप्रत्याशित कार्रवाइयों का होगा जिनका उद्देश्य संघ के व्यापक सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति करना होगा। इस लेख की शुरुआत में यादवराव जोशी के जिस जवाब का ज़िक्र किया गया थाशायद वह पांच साल बाद साकार होता दिखेजैसा उन्होंने कहा था कि तब ''हिंदू समाज और आरएसएस पर्याप्त मजबूत हो जाएंगे तब हम उनसे साफ-साफ कह देंगे कि अगर वे इस देश में रहना चाहते हैं और इससे प्रेम करते हैंतो यह मान लें कि कुछ पीढ़ियों पहले वे हिंदू ही थे और इसलिए वे वापस हिंदू धर्म में आ जाएं।'' अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहातो 1970 में कही गई बात को इस देश में पूरा होने में सिर्फ पांच साल बाकी हैं।


    भागवत और मोदी की जोड़ी (साभार इंडिया टुडे) 

    बहरहालविधायिकाकार्यपालिका और न्यायपालिका में हो रहे और आगे किए जाने वाले''एजेंडा'' प्रेरित बदलावों के संदर्भ में तो बहुत कुछ किया जाना संभव नहीं है। ज्यादा से ज्यादा समाज में हो रहे बदलावों पर ही कुछ प्रतिरोध खड़ा किया जा सकता है। मीडिया की मदद ली जा सकती है। अविश्वसनीय हो चुके चैथे खंबे से झरती पपड़ियों और उसके नए-नए संस्करणों पर भी कुछ काम किया जा सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि यह भी बहुत कारगर नहीं रहने वाला है क्योंकि संघ इस मोर्चे पर अपने घोड़े बहुत पहले छोड़ चुका है। आज से ठीक एक साल पहले बीते अगस्त में संघ ने कोलकाता में एक बैठक बुलाई थी। यह कार्यशाला पत्रकारों के लिए बुलाई गई थी जिसका विषय था ''इस्लामिक कट्टरतावाद''। ऐसा पहली बार था कि अपनी स्थापना के 80 वर्षों में संघ ने पत्रकारों के लिए कोई आयोजन किया था। दिल्ली से लेकर मुंबई तक कई पत्रकार इस आयोजन में पहुंचे थे। इनमें वे तमाम चेहरे भी थे जिन्हें हम अब तक विश्वसनीय मानते आए हैं। ऐसी चार कार्यशालाएं देश भर में रखी गई थीं। एक ''जम्मू कश्मीर की राजनीति के संदर्भ में संघ की भूमिका'' पर थी। दूसरी ''अनुसूचित जातियों'' पर थी और तीसरी कार्यशाला ''विकास'' पर थी। संघ की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक कोलकाता के अलावा दिल्लीबंगलुरु और अहमदाबाद में आयोजित इन कार्यशालाओं में देश भर से 220 प्रतिभागी पहुंचे थे। कोलकाता की कार्यशाला में आयोजन के प्रमुख और संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने इसका उद्देश्य यह बताया थाः ''पत्रकारों को आरएसएस के पक्ष की जटिलताओं को समझाने में मदद करना ताकि वे हिंदू राष्ट्रवादी नज़रिये को बेहतर तरीके से मीडिया में रख सकें।''प्रतिभागियों को सख्त निर्देश दिए गए थे कि इस कार्यशाला के बारे में न तो रिपोर्ट करना है और न ही कहीं इसका जिक्र करना है। दिनेश नारायणन लिखते हैं कि एक सत्र के बाद चाय के दौरान पत्रकारों ने मोहन भागवत से बीजेपी और मोदी पर बात शुरू कर दी। भागवत ने पत्रकारों के समूह से कथित तौर पर कहा, ''मोदी इकलौते हैं जिनकी जड़ें संघ की विचारधारा में गहरी हैं। संघ ने पार्टी के नेताओं को कहा है कि वे बस अच्छे उम्मीदवार खड़े कर दें और बाकी काम हम कर देंगे।'' इसके बाद भागवत ने पत्रकारों को चलते-चलते कहा, ''यदि हम 2014 में जीत गएतो बीजेपी अगले 25 साल तक सत्ता में रह सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआतो हम सब मिलकर भी जान लगा देंतब भी सौ साल तक ऐसा नहीं हो पाएगा।'' एक पत्रकार के मुताबिक, ''जिस तरह से उन्होंने यह कहा थाऐसा लगा कि आरएसएस शायद बीजेपी को तकरीबन अंतिम मौका दे रहा है।'' (दिनेश नारायणनकारवां, 1मई 2013)

    आज अखबार और समाचार चैनलों पर खबरों को देखकर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायद मुख्यधारा के मीडिया मालिकों-संपादकों के मन में वास्तव में यह बात बैठा दी गई है कि बीजेपी अगले 25 साल तक इस देश पर राज करेगी। मालिकान इसी हिसाब से अपने संपादकों में फेरबदल कर रहे हैं और संपादक इसी हिसाब से अपनी खबरें चला रहे हैं। खबरों में हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद सुबह से लेकर रात तक छल-छल छलक रहा है। ध्यान रहे कि यह सिर्फ शुरुआत है और नई सरकार को शपथ लिए सिर्फ दो महीने हुए हैं। एक बार को अगर हम मान भी लें कि सारी आशंकाएं निर्मूल हैंजैसा कि इज़रायल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में सरकार के वोट पर कुछ मोदी आलोचकों के लिखे-कहे में दिखा या फिर 25 जुलाई, 2014 को उत्तराखण्ड के उपचुनाव में तीन सीटों पर बीजेपी की हार में दिखातब भी क्या हम यह अहम तथ्य भूल सकते हैं कि इस देश का संसदीय लोकतंत्र बिना किसी संसदीय विपक्ष के दो महीने से चल रहा हैइतना ही नहींउस विपक्ष के न होने को सुनिश्चित करने के लिए सारे विधायी प्रयास भी किए जा रहे हैंसिर्फ यह कह भर देने से कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों पूंजीवादी दल अपनी नीतियों में समान हैंसंसद में औपचारिक विपक्ष की बुनियादी संवैधानिक जरूरत के सवाल को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। जिन्होंने अच्छे दिनों का वादा इस देश से किया थाउनके अच्छे दिन बिना किसी रोकटोक के बहुत तेजी़ से आ रहे हैं। ज़ाहिर हैबाकी लोगों के लिए बुरे दिन भी उसी गति से आ रहे होंगे।

    (समकालीन तीसरी दुनिया, अगस्‍त 2014) 

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    बंगाल सरकार के शहरीकरण नई नीति ऐलान में प्रोमोटर राज निरंकुश,पीपीपी गुजरात माडल के लिए यह पहल बेदखली के लिए


    सिंगुर आंदोलन की वजह से नैनो कारखाना गुजरात स्थानांतरति करने के बाद बंगाल में फिर रतन टाटा की वापसी के मौके पर फिर नया विवाद

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस


    सिंगुर की अधिग्रहित जमीन अभी टाटा मोटर्स ने नहीं छोड़ी है और बार बार वे दोहराते रहे हैं कि बंगाल में निवेश करना और सिंगुर में प्रोजेक्ट चालू करना उनका मकसद है। बंगाल में मां माटी मानुष सरकार की ओर से नये शहरीकरण नीति के तहत पुराने मकान तोड़कर नये निर्माण पर सौ फीसद छूट के अलावा ग्रीन आवासीय परिसरों के लिए भी टैक्स में छूट का ऐलान किया गया है।वामपक्ष के मुताबिक यह निरंकुश प्रोमोटर राज का प्रारंभ है।जबकि बंगाल के पौर व शहरीकरण मंत्री का दावा है कि नई शहरीकर नीति के नतीजतन गुंडाराज और सिंडिकेटराज खत्म होगा।गौरतलब है कि बंगाल में शहरी इलाकों में वाम अवाम निरपेक्ष गुंडाराज और सिंडिकेटराज शहरी संस्कति है सत्ता की।


    दरअसल यह शहरीकरण नई नीति कुछ और नहीं है।यह नंदीग्राम सिंगुर मोड से निकलने की मां माटी मानुष सरकार की जान बचाओ कवायद है।इस सिलसिले में जनवरी में ही बिजनेस स्टैंडर्ड में एक रपट छप चुकी थी,जो इस आलेख के साथ नत्थी भी है।भूमि अधिग्रहण का विरोध मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भारी मजबूरी है क्योंकि सिंगुर नंदीग्राम भूमि आंदोलन बजरिये दीदी का ताजा यह स्टेटस है। लेकिन तीन साल बीत गये और जिन बाजारी तत्वों ने वाम अवसान के जरिये दीदी को सत्ता में पहुंचाया है,उनके सब्र का बांध टूटने लगा है।बंगाल में केसरिया प्रलय के मखोमुखी हैं दीदी और जो पूंजी अबतक दीदी से उम्माद करी रही थी,उसे नरेंद्र मोदी के स्थायित्म में दांव लगाना माफिक नजर आ रहा है।


    बंगाल में औद्योगीकरण और कारोबार की  बदहाली के आलम में कोई बदलाव लेकिन इन तीन सालों में आया नहीं है। निवेशकों के यक्ष प्रश्न जमीन अधिग्रहण पर फोकस है।पीपीपी गुजराती माडल भी राज्य सरकार की धूम अधिग्रहण नीति के कारण भी बेमतलब है क्योंकि बिना जमीन निवेश के लिए देशी विदेशी कंपनियां कतई तैयार नहीं है।जिन्होंने निवेश किया वे मैदान छोड़कर भागने लगे हैं और बाकी लोग श्रमिक अशांति का माहौर बनाकर एक के बाद एक इकाइयां बंद करते जा रहे हैं।इंतजार की इंतहा हो गयी और विधानसभा चुनावों की भारी चुनौती है।


    बाजार को खुश करने केलिए दीदी ने बिना भूमि अधिग्रहण नीति में तब्दील किये शहरीकरण नई नीति के जरिये सांप मारने की कोशिश की है।


    दरअसल वाम जनमाने में और बाकी देश में भी कांग्रेस भाजपा और दूसरी सरकारों के नवउदारवादी जमाने में औद्योगीकीकरण कहीं हुआ नही है।औद्योगीकरणके नाम पर,विकास के नाम पर उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त करने वाली शहरीकरण सुनामी है,जिसके आधारस्तंभ हैं सेज,महासेज,स्वर्णिम चतुर्भुज,औद्योगिक गलियारा, स्मार्ट सिटी,एक्सप्रेसवे,बुलेट ट्रेन,बुलेट हीरक चतुर्भुज जो दरहकीकत शहर बसाने के लिए  देहात भारत के साथ साथ,जल जंगल जमीन आजीविका के साथ साथ शहरी गरीबों के साथ साथ मध्यवर्ग और उच्चमध्यवर्ग के सफाये जरिये अरबपति तबके का कार्निवाल है और दरअसल गुजराती पीपीपी विकास माडल है।


    दीदी नये शहरीकरण नीति के मारफत दरअसल गुजराती पीपीपी माडल की बुलेट ट्रेन का ट्रैक ही बा रही हैं बंगाल में।वे शांतिनिकेतन को भी स्मार्ट शहर बनाना चाहतीं हैं और नया कोलकाता और कल्याणी समेत दस स्मार्ट सिटी के लिए केंद्र सरकार के साथ उनकी सौदेबाजी है।


    वैसे भी महानगरों और उपनगरों की क्या कहें,बाकी शहरों में भी पुश्तैनी मकान अब सारे के सारे बेदखल हो रहे हैं और वहां प्रोमोटरों की बहुमंजिली इमारतें बन रही हैं।


    मां माटी मानुष सरकार की नई शहरीकरण नीति के तहत पुराने मकानों को संकटग्रसत् साबित करके गिराने के बाद वहां नये निर्माण पर शत प्रतिशत टैक्स छूट है।ग्रीन हाउसिंग नई इंफ्रा कंपनियों का फंडा है पर्यावरण के सत्यानाश के लिए।अब इस शहरीकरण नीति के तहत आवासीय परिसर में झीलें ,स्वीमिंग पुल इत्यादि डालते ही प्रामोटरों को टैक्स,रजिस्ट्रेशन फीस और म्युटेशन में भी भारी छूट मिलने वाली है।


    शापिंग माल,निजी अस्पताल,नालेज इकोनामी के लिए भी इफरात छूट का ऐलान है।इसके अलावा रेलवे और मेट्रो लाइनों के आसपास निर्माण की शर्तों में भी ढील दी गयी है।



    कृपया इसी आलोक में टाटा बंगाल विवाद का मजा लें।


    प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने अपने बारे में की गई पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्रा की टिप्पणियों पर पलटवार करते हुए कहा कि उनका गुस्सा गैरजरूरी है। राज्य में औद्योगीकरण की कमी के बारे में रतन टाटा की टिप्पणी पर मित्रा ने आज सुबह कहा था कि लगता है कि टाटा 'भ्रांतिग्रस्त' हो गए हैं।


    टाटा ने कहा कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विकास के बारे में कभी बात नहीं की, बल्कि हवाई अड्डे से राजरहाट होकर शहर में आने की अपनी यात्रा के दौरान जो कुछ देखा उसके आधार पर ही कल कुछ टिप्पणियां की थीं।


    टाटा ने ट्विटर पर लिखा, 'कल की मेरी टिप्पणियां हवाई अड्डे से राजरहाट होकर मौर्या तक की यात्रा से जुड़ी थीं। मैंने बहुत सा आवासीय व वाणिज्यिक विकास देखा, लेकिन मुझे औद्योगिक विकास नजर नहीं आया।' उन्होंने कहा, 'मैंने राज्य के औद्योगिक विकास के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की। इसलिए मित्रा की टिप्पणियां हैरान करने वाली हैं।'


    मित्रा की टिप्पणियों पर नाराजगी दिखाते हुए टाटा ने कहा 'मित्रा को शायद लगता है कि 'मेरा दिमाग गड़बड़ा गया है'। मुझे खुशी होगी अगर वे मुझे बता सकें कि राजरहाट से गुजरते हुए मैं किस औद्योगिक गतिविधि को नहीं देख सका। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो मुझे यही निष्कर्ष निकालना पड़ेगा कि वे बहुत कल्पनाशील हैं।'


    इससे पहले भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा यहां आयोजित एक कार्यक्रम में मित्रा ने कहा, 'टाटा अब बूढ़े हो चुके हैं और भ्रम से ग्रस्त हो गए हैं। मै नहीं जानता कि वह जो कुछ हो रहा है उसे क्यों नहीं समझ पा रहे।' वहीं टाटा संस के मानद अध्यक्ष रतन टाटा ने कल टिप्पणी की थी, 'पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विकास के कोई संकेत नहीं नजर आ रहे हैं।' टाटा ने यह टिप्पणी इंडियन चैंबर ऑफ कामर्स के महिला अध्ययन समूह की बैठक में की थी।



    'নতুন নগরোন্নয়ন নীতির ফলে গুন্ডারাজ, সিন্ডিকেটরাজ বন্ধ হবে'– বুধবার মহাকরণে এ কথা জানালেন পুর ও নগরোন্নয়ন মন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম৷‌ তিনি বলেন, 'যে-সব ভাড়াটিয়া ৫০ বছর ধরে আছেন, তাঁদের কোনও ভাবে উচ্ছেদ করে দেওয়া যাবে না৷‌ তাঁদের পুনর্বাসন দিয়ে বাড়ি সংস্কার করতে হবে৷‌ যাতে মালিক এবং ভাড়াটিয়া উভয়পক্ষই লাভবান হন৷‌ এই নীতির ফলে সিন্ডিকেটরাজ বন্ধ হবে৷‌ পরিবেশ-বান্ধব আবাসন গড়ার ওপরে আমরা জোর দিচ্ছি৷‌ কোনও সমস্যা হলে আইন-শৃঙ্খলার বিষয়টি দেখবে রাজ্য৷‌'তিনি জানান, যে অংশে ভাড়াটিয়া রয়েছে, বাড়ি নকশায় তা চিহ্নিত করে দিতে হবে মালিককে৷‌ রাজ্যের নগরোন্নয়ন নীতিতে যেমন কর্মসংস্হান বাড়বে, তেমন রাজ্যের চেহারাটাই পাল্টে যাবে, মম্তব্য মন্ত্রীর৷‌ তিনি বলেন, যেভাবে আবহাওয়ার পরিবর্তন ও গতিপ্রকৃতি বদলের জন্য তাপমাত্রা বাড়ছে পৃথিবীর৷‌ বাড়ছে অসুখ৷‌ তাই আমরা পরিবেশ-বান্ধব আবাসন প্রকল্পের ওপর জোর দিয়েছি৷‌ তাতে সবুজের পরিমাণ বাড়বে৷‌ আবাসনও হবে৷‌ পাশাপাশি ডেঙ্গু, ম্যালেরিয়ার মতো রোগভোগের হাত থেকে বাঁচবেন মানুষ৷‌ এ ছাড়া হাসপাতাল, শপিং কমপ্লে', শপিং মল-এর ক্ষেত্রে গাড়ি রাখার জন্য বিশেষ সুযোগ-সুবিধা দেওয়া হবে৷‌ রাজ্যের মেট্রো রেল প্রকল্পগুলি থেকে ৫০০ মিটারের মধ্যে অথবা ১৫-২৪ মিটার চওড়া রাস্তার পাশে বাড়ি তৈরির জন্য ১৫ থেকে ২০ শতাংশ 'ফ্লোর এরিয়া রেশিও' (এফ এ আরগ্গ ছাড় দেওয়া হবে৷‌ এর পাশাপাশি তিনি বলেন, 'কর আদায়ের ক্ষেত্রে স্বচ্ছতার ওপরও বিশেষ জোর দেওয়া হয়েছে৷‌ 'হেরিটেজ'ভবনগুলিকে রক্ষণাবেক্ষণে জোর দেওয়া হয়েছে৷‌


    নতুন উপনগরী তৈরির ক্ষেত্রেও সুযোগ-সুবিধা দেওয়া হবে৷‌ যেমন রঘুনাথপুর, দুর্গাপুর, ডানকুনি, কল্যাণী গড়ে উঠবে নতুন উপনগরী৷‌


    टाटा समूह ने भारत के सबसे मूल्यवान ब्रांड के तौर पर अपनी पहचान बरकरार रखी है। 21 अरब डॉलर के साथ टाटा समूह भारत का सबसे कीमती ब्रांड बना रहा जबकि भारत के शीर्ष 100 ब्रांड की कुल संपत्ति 92.6 अरब डॉलर आंकी गई। एक अध्ययन में यह जानकारी दी गई है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) 4.1 अरब डालर के ब्रांड मूल्य के साथ दूसरे नंबर पर रही जबकि भारतीय स्टेट बैंक 4 अरब डॉलर, भारती एयरटेल 3.8 अरब डॉलर और रिलायंस इंडस्ट्रीज का 3.5 अरब डॉलर ब्रांड मूल्य आंका गया।


    टाटा समूह का ब्रांड मूल्य पिछले एक साल में 3 अरब डॉलर बढ़ गया। सलाहकर कंपनी ब्रांड फाइनेंस इंडिया के सालाना अध्ययन के अनुसार टाटा समूह की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विविधीकरण की रणनीति और अग्रणी कंपनी टीसीएस की सतत वृद्धि से समूह का ब्रांड मूल्य बढ़ा है। इसमें कहा गया है, 'टाटा समूह की कुछ कंपनियों का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं होने के बावजूद हाल ही में समूह द्वारा अगले तीन साल के दौरान 35 अरब डॉलर की निवेश योजना की घोषणा से ब्रांड को फायदा पहुंचेगा और टाटा समूह के चेयरमैन साइरस मिस्त्री को दुनिया की सबसे पसंदीदा 25 ब्रांड़ों में शामिल रखने के लक्ष्य को हासिल करेगा।'


    ब्रांड फाइनेंस इंडिया की 100 भारतीय ब्रांडों की आज जारी सूची में शीर्ष 50 कंपनियों का ब्रांड मूल्य 2013 की तुलना में 10 प्रतिशत बढ़ गया। इसमें टाटा, गोदरेज, एचसीएल और एल एण्ड टी आगे रहीं। अध्ययन के अनुसार बैंकिंग कंपनियों का प्रदर्शन इस मामले में खराब रहा। ज्यादातर बैंकिंग ब्रांड या तो स्थिर रहे या फिर उनका ब्रांड मूल्य घटा है। कमजोर संचालन और कर्ज देनदारी पर नियंत्रण नहीं रहने की वजह से ऐसा हुआ।



    14 जनवरी को बिजनेस स्टैंडर्ट की यह खबर पढ़ें तो बंगाल में शहरीकरण नीति की पृष्ठभूमि साप नजर आयेगीः


    भूमि आवंटन के लिए नीलामी की प्रक्रिया से रियल एस्टेट कारोबारियों को मदद न मिलने और नए विकास कार्यों के लिए जमीन की भारी कमी को देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार भूमि अधिग्रहण के लिए नई नीति लाने की तैयारी में है। यह नीति उस जमीन के लिए लागू होगी, जिसका मालिकाना निजी भूमि मालिकों या समूह के स्वामित्व में होगा।


    बहरहाल सूत्रों ने बताया कि सरकार शहरी भूमि सीलिंग ऐक्ट को खत्म करने पर विचार नहीं कर रही है, जिससे डेवलपरों को निराशा हो सकती है। यह रियल एस्टेट कारोबारियोंं की ओर से एक प्रमुख मांग है। राज्य के लिए नई शहरीकरण नीति तैयार करने के लिए गठित कार्यबल को की गई सिफारिशों में रियल एस्टेट कारोबारियों ने हाउसिंग परियोजनाओं में 25 प्रतिशत एलआईजी फ्लैट सुरक्षित रखने के मामलों में शहरी भूमि सीलिंग ऐक्ट खत्म किए जाने की मांग की थी।


    हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार ने सरकारी जमीन के लिए नई भूमि नीति पेश की थी। इसके मुताबिक सरकारी जमीन के वाणिज्यिक इस्तेमाल के आवंटन में नीलामी की प्रक्रिया अपनाई जानी है, जबकि पहले इसके लिए टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जाती थी। इस नीति के तहत कम आय वर्ग (एलआईजी) या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए बनाए जाने वाले मकान की जमीन को बीली की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है।


    बहरहाल रियल एस्टेट कारोबारियोंं को इससे ज्यादा लाभ नहीं हुआ। डेवलपरों का कहना है कि एक तरफ जहां सरकार रियल एस्टेट क्षेत्र के विकास के लिए ज्यादा जमीन देना चाहती है, जबकि उसके पास जमीन कम है, वहींं दूसरी ओर बोली की प्रक्रिया से भूमि की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। कॉनफेडरेशन आफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (क्रेडाई) के पूर्व अध्यक्ष और शहर के रियल एस्टेट कारोबारी संतोष रुंगटा ने कहा, 'हाउसिंग क्षेत्र की मांग पूरी करने के लिए सरकार के मालिकाना वाली पर्याप्त भूमि नहीं है। ऐसे में नई भूमि नीति डेवलपरों के लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है। हम उम्मीद कर रहे हैं कि नई शहरीकरण नीति में इस समस्या का समाधान होगा। हमने इस सिलसिले में पहले ही अपनी मांग रख दी है।Ó


    पश्चिम बंगाल में नए टाउनशिप के विकास में सबसे बड़ी समस्या शहरी भूमि (सीलिंग एवं नियमन) अधिनियम (यूएलसीए) 1976 है। इस अधिनियम के मुताबिक कोलकाता जैसे ए श्रेणी के शहरों में खाली भूमि की सीलिंग सीमा 7.5 कट्ठा या करीब 500 वर्गमीटर है। पश्चिम बंगाल देश के उन कुछ राज्यों में शामिल है, जहां यूएलसीए जैसा कानून है।


    यूएलसीए को हटाने की मांग पहली बार गोदरेज प्रॉपर्टीज के चेयरमैन आदि गोदरेज ने उठाई थी, जब मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ममता बनर्जी कारोबारियों से मिली थीं। सुरेका समूह के प्रबंध निदेशक प्रदीप सुरेका ने कहा, 'पश्चिम बंगाल में भूमि संबंधी मसलों को हल करने में नई भूमि नीति समस्याओं का समाधान नहीं कर सकी। हम आने वाली शहरीकरण नीति को लेकर आशान्वित हैं।Ó

    http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=67955

    'নতুন নগরোন্নয়ন নীতির ফলে গুন্ডারাজ, সিন্ডিকেটরাজ বন্ধ হবে'– বুধবার মহাকরণে এ কথা জানালেন পুর ও নগরোন্নয়ন মন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম৷‌ তিনি বলেন, 'যে-সব ভাড়াটিয়া ৫০ বছর ধরে আছেন, তাঁদের কোনও ভাবে উচ্ছেদ করে দেওয়া যাবে না৷‌ তাঁদের পুনর্বাসন দিয়ে বাড়ি সংস্কার করতে হবে৷‌ যাতে মালিক এবং ভাড়াটিয়া উভয়পক্ষই লাভবান হন৷‌ এই নীতির ফলে সিন্ডিকেটরাজ বন্ধ হবে৷‌ পরিবেশ-বান্ধব আবাসন গড়ার ওপরে আমরা জোর দিচ্ছি৷‌ কোনও সমস্যা হলে আইন-শৃঙ্খলার বিষয়টি দেখবে রাজ্য৷‌'তিনি জানান, যে অংশে ভাড়াটিয়া রয়েছে, বাড়ি নকশায় তা চিহ্নিত করে দিতে হবে মালিককে৷‌ রাজ্যের নগরোন্নয়ন নীতিতে যেমন কর্মসংস্হান বাড়বে, তেমন রাজ্যের চেহারাটাই পাল্টে যাবে, মম্তব্য মন্ত্রীর৷‌ তিনি বলেন, যেভাবে আবহাওয়ার পরিবর্তন ও গতিপ্রকৃতি বদলের জন্য তাপমাত্রা বাড়ছে পৃথিবীর৷‌ বাড়ছে অসুখ৷‌ তাই আমরা পরিবেশ-বান্ধব আবাসন প্রকল্পের ওপর জোর দিয়েছি৷‌ তাতে সবুজের পরিমাণ বাড়বে৷‌ আবাসনও হবে৷‌ পাশাপাশি ডেঙ্গু, ম্যালেরিয়ার মতো রোগভোগের হাত থেকে বাঁচবেন মানুষ৷‌ এ ছাড়া হাসপাতাল, শপিং কমপ্লে', শপিং মল-এর ক্ষেত্রে গাড়ি রাখার জন্য বিশেষ সুযোগ-সুবিধা দেওয়া হবে৷‌ রাজ্যের মেট্রো রেল প্রকল্পগুলি থেকে ৫০০ মিটারের মধ্যে অথবা ১৫-২৪ মিটার চওড়া রাস্তার পাশে বাড়ি তৈরির জন্য ১৫ থেকে ২০ শতাংশ 'ফ্লোর এরিয়া রেশিও' (এফ এ আরগ্গ ছাড় দেওয়া হবে৷‌ এর পাশাপাশি তিনি বলেন, 'কর আদায়ের ক্ষেত্রে স্বচ্ছতার ওপরও বিশেষ জোর দেওয়া হয়েছে৷‌ 'হেরিটেজ'ভবনগুলিকে রক্ষণাবেক্ষণে জোর দেওয়া হয়েছে৷‌


    নতুন উপনগরী তৈরির ক্ষেত্রেও সুযোগ-সুবিধা দেওয়া হবে৷‌ যেমন রঘুনাথপুর, দুর্গাপুর, ডানকুনি, কল্যাণী গড়ে উঠবে নতুন উপনগরী৷‌



    আজকালের প্রতিবেদন: রাজ্যের শিল্পায়নকে কটাক্ষ করলেন টাটা গোষ্ঠীর প্রাক্তন চেয়ারম্যান রতন টাটা৷‌ বুধবার কলকাতায় এক বণিকসভার অনুষ্ঠানে অংশগ্রহণকারীদের প্রশ্নের জবাবে তিনি বলেন, দু'বছর পর কলকাতায় এলাম৷‌ রাজারহাট থেকে কলকাতায় আসার সময় দু'ধারে অনেক কিছু দেখলাম৷‌ যদিও এখনও ওই এলাকাটিকে অনেকটা পল্লী-অঞ্চলের মতো দেখতে লাগল৷‌ এবং আবারও এ রাজ্যে শিল্পোন্নয়ন, কাজকর্ম বৃদ্ধির লক্ষণ দেখতে পেলাম না৷‌ তৃণমূলের আন্দোলনে সিঙ্গুর থেকে ন্যানো গাড়ি প্রকল্প সরিয়ে নিয়ে যাওয়া প্রসঙ্গে এক প্রশ্নের জবাবে তিনি বলেন, ওই ঘটনা হতাশাজনক৷‌ তাঁর মতে, আগেও বলেছিলাম মাথায় বন্দুক ঠেকানো হলেও মাথা সরাব না৷‌ কিন্তু এক্ষেত্রে ট্রিগার টিপে দেওয়া হয়েছিল৷‌ প্রকল্প সরিয়ে নিতে বাধ্য হয়েছিলাম৷‌ ওই পরিস্হিতিতে প্রকল্প সরানোর সিদ্ধাম্ত ছিল৷‌ গুজরাটে জমির ব্যবস্হা করে দেওয়ার জন্য সেখানকার তৎকালীন মুখ্যমন্ত্রী, বর্তমান প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদিকে ধন্যবাদ জানিয়েছেন রতন টাটা৷‌ যেহেতু সেই মুহূর্তে বিকল্প জমি ছিল না৷‌ নরেন্দ্র মোদির কাছে কৃতজ্ঞ, তিনি সানন্দে প্রকল্পের জন্য জমির ব্যবস্হা করে দিয়েছিলেন৷‌ তাঁর বক্তব্য, সরকারের উচিত শিল্পায়নের পথ সহজতর করা৷‌ এই প্রক্রিয়ায় বাধা দেওয়া নয়৷‌


    আজকালের প্রতিবেদন: শহর ও শহরতলিতে নতুন বাড়ি তৈরি এবং পুরনো বাড়ি সংস্কারের ক্ষেত্রে বেশ কিছু সুযোগ-সুবিধা দিতে চলেছে রাজ্য সরকার৷‌ এমনকি নতুন নগরী, বাণিজ্যিক কমপ্লেক্স তৈরির ক্ষেত্রে জমি-সহ বিভিন্ন ছাড় দেওয়া হবে বলে রাজ্য সরকার সিদ্ধাম্ত নিয়েছে৷‌ রাজ্যে প্রথম নতুন নগরোন্নয়ন নীতিতে এই সমস্ত সুযোগ-সুবিধা রয়েছে বলে মঙ্গলবার জানান অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র এবং পুর ও নগরোন্নয়নমন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম৷‌ এদিন এই নগরোন্নয়ন নীতি শিল্প ও পরিকাঠামো বিষয়ক মন্ত্রিসভার সাব-কমিটি থেকে অনুমোদিত হয়৷‌ কমিটির চেয়ারম্যান মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির সবুজ সঙ্কেত দেওয়ায় নতুন পশ্চিমবঙ্গ নগরোন্নয়ন নীতি কিছুদিনের মধ্যে কার্যকর করা হবে বলে জানিয়েছেন দপ্তরের মন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম৷‌ সাংবাদিকদের তিনি জানান, এই নীতির ফলে সাধারণ মানুষের যেমন সুবিধা হবে, তেমনি রাজ্যে শিল্প ও তথ্যপ্রযুক্তি ক্ষেত্রে বিনিয়োগও বাড়বে৷‌ বাড়ির মালিক এবং ভাড়াটে দু'পক্ষেরই বাসস্হানের সমস্যা মিটবে৷‌ তেমনি নিজের বাড়িতে ব্যবসা করার ক্ষেত্রেও আইনি বৈধতা মিলবে৷‌ কর্মসংস্হানের সুযোগ বাড়বে৷‌ বাড়ির কর-কাঠামোর পুনর্মূল্যায়নের সিদ্ধাম্ত নেওয়ায় পুরনো বাড়িতে কর ছাড়ের সুবিধা পাওয়া যাবে৷‌ নতুন বাড়ি করার ক্ষেত্রে নকশা অনুমোদনের জন্য 'একজানালা'পদ্ধতি চালু করার সিদ্ধাম্ত নেওয়ায় সাধারণ মানুষের হেনস্হা কমবে৷‌ নতুন নগরোন্নয়ন নীতিতে উল্লেখযোগ্য বিষয়গুলি হল: প্ত আংশিক বা পুরো ভাড়াটে ভর্তি বাড়ি যদি ৫০ বছরের পুরনো হয়, সেক্ষেত্রে বাড়ির মালিক বসবাসের জায়গা বাড়াতে চাইলে ১০০ শতাংশ বাড়াতে পারবেন৷‌ অর্থাৎ কারও যদি এরকম দোতলা বাড়ি থাকে এবং তাহলে বাড়ির মালিক আরও দু'তলা বাড়াতে পারবেন৷‌ তবে তার জন্য পুরসভা থেকে অনুমতি নিতে হবে৷‌ দিতে হবে নির্দিষ্ট পরিমাণ ফি৷‌


    প্ত যেসব বাড়ি পুরসভা 'বিপজ্জনক'বলে ঘোষণা করেছে, সেসব বাড়ি যদি মালিক নতুন করে সংস্কার করতে চান, তাহলে ১০০ শতাংশ বাড়ির এলাকা বাড়াতে পারবে৷‌ যদি সেই বাড়িতে ভাড়াটে থাকে তবে ভাড়াটেরা যে পরিমাণ জায়গা নিয়ে বসবাস করেন, নতুন বাড়ি তৈরি বা সংস্কারের পরও ওই বাড়িতে তাকে একই পরিমাণ জায়গা দিতে হবে৷‌


    প্ত পরিবেশ-বান্ধব বাড়ি বা গ্রিন বিল্ডিং করলে তারা বাড়ির বর্তমান জায়গা ১০ শতাংশ বাড়াতে পারবেন৷‌


    প্ত যাঁরা বড় আবাসন, বাণিজ্যিক কেন্দ্র, হাসপাতাল, তথ্যপ্রযুক্তি কেন্দ্র তৈরি করতে চান তাঁরা যদি সঠিক নিয়ম মানে তাহলে তাঁদের ১৫ শতাংশ বাড়তি এলাকা বাড়ানোর অনুমতি দেওয়া হবে৷‌ তবে সেক্ষেত্রে পুর পরিষেবা অর্থাৎ পানীয় জল, নিকাশি ব্যবস্হা, রাস্তা যেন ঠিকঠাক থাকে৷‌


    প্ত মেট্রো রেল করিডরের ৫০০ মিটারের মধ্যে অথবা ১৫-২৪ মিটার চওড়া রাস্তার পাশে বাড়ি যাঁদের, তাঁরাও ১৫ শতাংশ বাড়ির পরিসর বাড়াতে পারবেন৷‌ ২৪ মিটারের বেশি চওড়া রাস্তার ধারে বাড়ি হলে ২০ শতাংশ বাড়ির পরিসর বাড়াতে পারবেন৷‌


    প্ত নতুন নগরী, পরিবহণ কেন্দ্র, লজিস্টিক হাব, টার্মিনাল তৈরি করার ক্ষেত্রে ভূমি ও ভূমিসংস্কারের আইনে ১৪ (ওয়াই) ধারা অনুযায়ী জমির ঊধর্বসীমায় ছাড় পাওয়া যাবে৷‌


    প্ত কলকাতা পুরসভা-সহ পুরসভা অথবা পুরসভা এলাকায় নিজের বাড়িতে প্রতিবেশীদের অসুবিধা না করে কেউ যদি কোনও ব্যবসা করেন, তাহলে সেই ব্যবসার আইনি বৈধতা দেবে রাজ্য সরকার৷‌ তবে এক্ষেত্রে কিছু শর্ত মানতে হবে৷‌ প্রধান শর্ত হল, নিজের বাড়ির ৪৫ শতাংশ অংশের মধ্যে ব্যবসা করতে হবে৷‌ কলকাতা পুরসভা, নিউ টাউন, বিধাননগর এলাকায় এ ধরনের ব্যবসা করেন, কিন্তু ট্রেড লাইসেন্স পান না, তাঁদের এই সমস্যা থেকে মুক্তি দিতে এই সিদ্ধাম্ত নিয়েছে নগরোন্নয়ন দপ্তর৷‌


    প্ত নতুন বাড়ি তৈরি করতে গেলে নকশার অনুমোদন পেতে মাসের পর মাস পুরসভায় সাধারণ মানুষকে ছুটোছুটি করতে হয়৷‌ শুধু পুরসভা নয়, দমকল, পরিবেশ-সহ বিভিন্ন দপ্তরে ছুটোছুটি করতে হয়৷‌ এই সমস্যা দূর করতে এবং দ্রুত নকশা অনুমোদন দেওয়ার জন্য অনলাইন 'এক জানালা'নীতি নিতে চলেছে নগরোন্নয়ন দপ্তর৷‌ এই সিদ্ধাম্ত কার্যকরী হলে বাড়ির নকশার অনুমোদন পেতে অনলাইনে দরখাস্ত করলেই চলবে৷‌ কোথাও যেতে হবে না৷‌


    প্ত যেসব আবাসনে কমিউনিটি হল, খেলার মাঠ, সুইমিং পুল, পার্ক-সহ বিভিন্ন সুযোগ-সুবিধা রয়েছে, সেসব আবাসনের কর-কাঠামো পুর্নমূল্যায়ন করা হবে৷‌ আর যে সমস্ত বাড়িটে ভাড়াটে সমস্যা বা আইনি জটিলতা রয়েছে, পুরনো সেসব বাড়িগুলির কর কমানোর সিদ্ধাম্ত নিয়েছে নগরোন্নয়ন দপ্তর৷‌


    রাজ্য সরকারের এই সিদ্ধাম্তের সরকারি বিজ্ঞপ্তি এখনও জারি করা হয়নি৷‌ সরকারি বিজ্ঞপ্তি প্রকাশ হওয়ার পর বড় পুরসভা বা পুরসভার ক্ষেত্রে ৬ মাস এবং ছোট পুরসভার ক্ষেত্রে ১ বছর সময় দেওয়া হবে এই নীতি কাযর্কর করার জন্য৷‌ এই সুযোগ-সুবিধা পেতে গেলে কোন ক্ষেত্রে কী ধরনের আর্থিক ব্যয়ভার নিতে হবে তা অর্থ দপ্তর থেকে বিজ্ঞপ্তি প্রকাশ করে জানিয়ে দেওয়া হবে বলে জানিয়েছেন অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র ও পুর ও নগরোন্নয়নমন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম৷‌

    ঊর্ধ্বসীমার জগদ্দল নড়বে না জমিতে, তাই ছাড় ঘুরপথেই

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    সোজা আঙুলে ঘি ওঠানো হবে না, তাই সচেতন ভাবেই আঙুল বাঁকিয়ে সমস্যা সমাধানের চেষ্টা। রাজ্য সরকারের নতুন নগরোন্নয়ন নীতি সম্পর্কে এমনই ব্যাখ্যা শোনা যাচ্ছে প্রশাসন এবং নগর-স্থপতিদের একাংশের কাছ থেকে। মঙ্গলবার নগরায়ণ সংক্রান্ত নতুন নীতি ঘোষণা করে পুরনো বাড়ি ভেঙে নতুন বহুতল তৈরির ক্ষেত্রে ১০০ শতাংশ এফএআর (ফ্লোর এরিয়া রেশিও) ছাড় দেওয়ার কথা বলেছে সরকার।

    ০৭ অগস্ট, ২০১৪

    ABP



    রাজ্যে শিল্পে অগ্রগতি হয়নি-র জবাবে, রতন টাটার মতিভ্রম হয়েছে বলে কটাক্ষ অমিতের

    Last Updated: Thursday, August 7, 2014 - 12:28


    কলকাতা: রতন টাটার মতিভ্রম হয়েছে। তাই এই ধরনের কথা বলছেন। এমন মন্তব্য করলেন রাজ্যের শিল্পমন্ত্রী অমিত মিত্র। শিল্পমন্ত্রীর দাবি গতবছরই ওনার নিজের কোম্পানিই রাজ্যে বড় টাকা লগ্নি করার করার আর্জি জানিয়েছে। সেই খবর কেন রতন টাটার কাছে নেই তা নিয়ে বিস্ময় প্রকাশ করেছেন শিল্পমন্ত্রী। সঙ্গে শিল্পমন্ত্রী অমিত মিত্র রাজ্যের শিল্পে অগ্রগতির নানা দাবি করেন।

    শিল্পে পশ্চিমবঙ্গের অগ্রগতির কোনও চিহ্ন দেখতে পাননি। গতকাল দু-বছর পর কলকাতায় এসে মন্তব্য করেন রতন টাটা। লেডিজ স্টাডি গ্রুপের একটি অনুষ্ঠানে যোগ দিতে এদিন কলকাতায় এসেছিলেন টাটা গোষ্ঠীর প্রাক্তন চেয়ারম্যান।

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    লেডিজ স্টাডি গ্রুপের একটি অনুষ্ঠানে যোগ দিতে বুধবার কলকাতায় এসেছিলেন টাটা গোষ্ঠীর এমিরেটাস চেয়ারম্যান।  সেখানেই  রাজ্যের শিল্পোদ্যোগ নিয়ে উদ্বেগের সুর শোনা যায় তাঁর গলায়।

    মুখ্যমন্ত্রী যখন দাবি করছেন পশ্চিমবঙ্গ শিল্পে এক নম্বর হবে, তখন  রাজ্যে পা দিয়ে শিল্পোদ্যোগের কোনও চিহ্নই কিন্তু দেখতে পেলেন না রতন টাটা।  বুধবার কলকাতার লেডিজ স্টাডি গ্রুপ আয়োজিত এক আলোচনাসভায় উপস্থিত হয়েছিলেন টাটা গোষ্ঠীর এমিরেটাস চেয়ারম্যন। তাঁর উদ্দেশে প্রশ্ন ছিল, এরাজ্যে পরিবর্তনের কোনও ছবি তাঁর চোখে পড়ল কিনা।  জবাবে রতন টাটা বলেন, নতুন বাড়ি ঘর তৈরি হওয়া বা কিছু ব্যবসায়িক তত্পরতা নজরে এলেও শিল্পে অগ্রগতির কোনও চিহ্ন নেই।

    সিঙ্গুর ছাড়তে হয়েছিল বাধ্য হয়েই। তবে সানন্দে যাওয়ার সিদ্ধান্ত সঠিক ছিল। কলকাতায় এসে সিঙ্গুর প্রসঙ্গে আরও একবার একথা বললেন রতন টাটা। ছ-বছর পরেও তাঁর গলায় শোনা গিয়েছে একই ক্ষোভের সুর।তেসরা

    অক্টোবর, দু হাজার আট

    বিক্ষোভ, তৃণমূল পতাকা, মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় আন্দোলনে। তার জেরে টাটার ন্যানো কারখানা সিঙ্গুর ছেড়ে পারি দিল গুজরাতের সানন্দে।

    ছ-বছর আগের স্মৃতি ফের উসকে ফিরে এল সিঙ্গুর প্রসঙ্গ। বুধবার রতন টাটা কলকাতায় এসে আরও একবার বুঝিয়ে দিলেন, চোট পুরনো হলেও তার ক্ষত আজও তাজা। কাঁটার মতো বিঁধে রয়েছে ন্যানো প্রকল্পের সিঙ্গুর ছাড়ার ঘটনা।

    উপায় ছিল না। তাই রাজ্য ছাড়তে হয়েছিল। স্পষ্ট করে দিয়েছেন টাটা গোষ্ঠীর প্রাক্তন চেয়ারম্যান। তবে এর জেরে ক্ষতি হয়েছে তাঁর স্বপ্নের একলাখি গাড়ি প্রকল্পের। সেই ক্ষোভ এদিন উগরে দেন রতন টাটা।  রাজ্যের শিল্পায়নে গতি আনতে দিনরাত এক করছেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। বিশেষজ্ঞ মহলের মতে, এই অবস্থায় সিঙ্গুর ইস্যু ফের উসকে দিয়ে রাজ্য সরকারের অস্বস্তি কয়েকগুণ বাড়িয়ে দিলেন রতন টাটা।

    রাজ্যে শিল্পের শোচনীয় ছবিটা বদলাতে তবে সরকারের ভুমিকা কি হওয়া উচিত ? সেই পরামর্শটাও দেন টাটা গোষ্ঠীর এমিরেটাস চেয়ারম্যন।

    গত তিন বছরে একের পর এক শিল্পসম্মেলন করেও বিনিয়োগকারীদের নজর পশ্চিমবঙ্গের দিকে ঘোরাতে পারেনি রাজ্য সরকার।  উল্টে বন্ধ হয়েছে একের পর এক পুরনো কারখানা। এরমাঝেই শিল্প নিয়ে সরকারের অস্বস্তি আরও বাড়িয়েছে শাসক দলের বিরুদ্ধে তোলাবাজির অভিযোগ। কোথাও তোলা না পাওয়ায় মালিককে খুনের হুমকি কোথাও আবার ঠিকাদারকে পিটিয়ে মারার অভিযোগ, প্রায় সর্বত্রই কাঠগড়ায় কোনও না কোনও তৃণমূল নেতা। যদিও সেই সব অভিযোগই খারিজ করে একুশে জুলাইয়ের সমাবেশে মুখ্যমন্ত্রী দাবি করেছেন, পশ্চিমবঙ্গ শিল্পে একনম্বর হবে। এবারে রাজ্যের শিল্প পরিস্থিতি নিয়ে রতন টাটার মন্তব্য মুখ্যমন্ত্রীর দাবি নিয়েই প্রশ্ন তুলে দিল বলে মনে করছে বণিকমহলের একাংশ।

    http://zeenews.india.com/bengali/kolkata/amit-says-ratan-tatas-brain-not-working_119458.html


    ঊর্ধ্বসীমার জগদ্দল নড়বে না জমিতে, তাই ছাড় ঘুরপথেই

    www.anandabazar.com/.../westbengal-government-gives-exemption-in-fl...

    মঙ্গলবার নগরায়ণ সংক্রান্ত নতুন নীতিঘোষণা করে পুরনো বাড়ি ভেঙে নতুন বহুতল তৈরির ক্ষেত্রে ১০০ শতাংশ এফএআর (ফ্লোর এরিয়া রেশিও) ছাড় দেওয়ার কথা বলেছে সরকার। জমির ঊর্ধ্বসীমা আইন ... প্রশাসনের একাংশ স্বীকার করছেন কলকাতা-সহ রাজ্যের বিভিন্ন পুর এলাকায় জমির ঊর্ধ্বসীমা বজায় রাখাই যে পরিকল্পিত নগরায়ণেরমূল সমস্যা, সেটা সরকার ভালই বোঝে। এ থেকে বেরোনোর সোজা


    নয়া নগরায়ন নীতিতে মদত প্রোমোটারদেরই,

    পুরানো বাড়ি ভেঙে নির্মাণও করা যাবে সহজে

    নিজস্ব প্রতিনিধি

    কলকাতা, ৫ই আগস্ট— নগরায়নের নামে রাজ্যে প্রোমোটারি ব্যবসাকে ব্যাপক ছাড় দেওয়ার সিদ্ধান্ত নিল মমতা ব্যানার্জির সরকার। মঙ্গলবার নবান্নে রাজ্যের নয়া 'নগরায়ন নীতি'ঘোষণা করেন অর্থ ও শিল্প দপ্তরের মন্ত্রী অমিত মিত্র। সাংবাদিক সম্মেলনে উপস্থিত ছিলেন পৌর ও নগরয়োন্নন মন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম।


    দ্রুত নগরায়নের জন্য কোনো পরিকল্পিত উপনগরী গড়ার পরিকল্পনা নেই। বরং নাগরিক চাহিদার সঙ্গে পাল্লা দিতে রাজ্য সরকারের একমাত্র ভরসা প্রোমোটিং। এমনিতেই তৃণমূল সরকারের আমলে রাজ্যে গত তিন বছরে কোনো শিল্প আসেনি। শিল্পে শাসকদলের তোলাবাজি এখন এমন পর্যায়ে গেছে রাজ্য থেকে শিল্প হয় চলে যাচ্ছে নয়তো কারখানায় তালা ঝুলিয়ে দিচ্ছে শিল্প মালিকরা। এই পরিস্থিতিতে তলানিতে পৌঁছেছে রাজ্যের রাজস্ব আদায়ও।


    মঙ্গলবার মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির উপস্থিতিতে বৈঠকে বসে পরিকাঠামো উন্নয়ন সংক্রান্ত মন্ত্রিসভার স্ট্যান্ডিং কমিটি। এই সভা থেকেই চূড়ান্ত ছাড়পত্র পেল রাজ্যের নয়া নগরায়ন নীতি।


    নয়া নগরায়ন নীতিতে কী বলা হয়েছে?


    এক কথায়, কলকাতা ও অন্যান্য কর্পোরেশন ও পৌরসভা এলাকায় প্রোমোটিং করার জন্য রাজ্য সরকার ব্যাপক ছাড় দেওয়ার উদ্যোগ নিচ্ছে। একইসঙ্গে ছাড়ের সুবিধা দিয়ে বেশ কিছু ক্ষেত্রে কর আদায় করে রাজস্ব আদায় করার পরিকল্পনা নিয়েছে রাজ্য সরকার।


    নবান্ন থেকে নগরায়নের নয়া নীতি ঘোষণা করে এদিন অর্থমন্ত্রী প্রোমোটিং-এর কাজে বেশ কিছু পদক্ষেপের কথা ঘোষণা করেন। নয়া নীতিতে বলা হয়েছে, 'গ্রিন বিল্ডিং'গড়তে চাইলে অতিরিক্ত ১০শতাংশ ফ্লোর এরিয়া রেসিও (এফ এ পি) বাড়ানোর অনুমতি দেওয়া হবে। দ্বিতীয় প্রস্তাবে উল্লেখ করা হয়েছে, কলকাতাসহ গোটা রাজ্যে ৫০বছরের পুরানো বাড়ি বা বিপজ্জনক চিহ্নিত বাড়িতে প্রোমোটিং করার জন্য ব্যাপক ছাড় দিতে চলেছে রাজ্য সরকার। পুরানো বাড়িতে প্রোমোটিং করার জন্য ১০০শতাংশ 'এফ এ পি'ছাড় দেওয়ার কথা এদিন ঘোষণা করেন অমিত মিত্র। অর্থমন্ত্রীর ঘোষণা, ''পুরানো বাড়িতে যদি পুরোপুরি বা আংশিক ভাড়াটিয়া থাকলে ভাড়াটিয়ার সম্মতি নিয়ে বাড়ির মালিক প্রোমোটারের হাতে বাড়ি তুলে দিতে পারেন। নয়া নির্মাণে ১০০শতাংশ ফ্লোর এরিয়া রেসিও-তে ছাড় দেওয়া হবে।''ভাড়াটিয়া চাইলে পুরানো বাড়িতে তিনি যত স্কোয়ার ফুট জায়গায় ছিলেন নয়া নির্মাণে তাঁকে ততটাই জায়গা দেওয়ার কথা অবশ্য জানানো হয়েছে নয়া নীতিতে। কিন্তু প্রশ্ন উঠছে রাজ্যে নয়া নীতির। কলকাতা ও হাওড়ার মতো কর্পোরেশন এলাকায় পুরানো বাড়ি ভেঙে প্রোমোটিং করার কাজে বিস্তর ঝামেলা পোহাতে হয় প্রোমোটার ও রিয়েল এস্টেট সংস্থাগুলিকে। নয়া ব্যবস্থায় লোভনীয় ছাড় দিয়ে রাজ্য সরকার পুরানো বাড়ি শহর থেকে উধাও করে দিয়ে প্রোমোটিং করার রাস্তা খুলে দেওয়ার ব্যবস্থা করে দিলো। দ্বিতীয় প্রস্তাব উল্লেখ করার সঙ্গে সঙ্গেই সাংবাদিক সম্মেলনে উপস্থিত নগরোন্নয়ন মন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম জানিয়ে দেন, ''কলকাতার বড়বাজার এলাকায় প্রায় পুারনো বাড়িতে অগ্নিকাণ্ড ঘটছে। নয়া ব্যবস্থায় এইসব এলাকায় নির্মাণে কোনো অসুবিধা হবে না।''


    নয়া নগরায়ন নীতির তৃতীয় প্রস্তাবে উল্লেখ করা হয়েছে, কলকাতায় মেট্রো রেল পরিষেবা এলাকার ৫০০মিটারের মধ্যে নির্মাণ করতে চাইলে রাজ্য সরকার অতিরিক্ত ১৫শতাংশ ফ্লোর এরিয়া রেসিও-তে ছাড় দেওয়া হবে। মেট্রো রেল করিডোরের মধ্যে ১৫থেকে ২৪মিটার রাস্তা থাকলে এফ এ পি-তে অতিরিক্ত ১৫শতাংশ ছাড় দেওয়া হবে। ওই রাস্তা ২৪মিটারের বেশি হলে ফ্লোর এরিয়া রেসিও-তে অতিরিক্ত ২০শতাংশ ছাড় দেবে রাজ্য সরকার। নগরায়ণের নয়া নীতিতে টাউনশিপ, লজিস্টিক হাব, টার্মিনাল গড়তে চাইলে জমির উর্ধ্বসীমা আইন (১৪ওয়াই) প্রযোজ্য হবে না।


    কলকাতা, হাওড়াসহ রাজ্যের অন্যান্য পৌরসভা এলাকায় আবাসনের মধ্যে ৪৫শতাংশ এলাকায় ক্ষতিকারক হবে না এমন ব্যবসা করার অনুমতি দিচ্ছে রাজ্য সরকার। এরজন্য অবশ্য কর দিয়ে ছাড়পত্র আদায় করার কথা বলা হয়েছে। 'মাস-হাউসিং', আই টি হাব, হাসপাতাল, মেগা বাণিজ্য কেন্দ্র নির্মাণ করলে ফ্লোর এরিয়া রেসিও-তে অতিরিক্ত ১৫শতাংশ ছাড় মিলবে।


    নয়া নীতি দ্রুত যাতে বাস্তবায়িত করা যায় তারজন্য বাড়ির নকশা অনুমোদনে এক জানালা ব্যবস্থার কথা এদিন ঘোষণা করেন অর্থমন্ত্রী। অনলাইন রেজিস্ট্রিশেনের পরিকাঠামো গড়ছে রাজ্য। অমিত মিত্রের বক্তব্য, ''ফায়ার, পরিবেশসহ বিভিন্ন দপ্তরের ছাড়পত্র নেওয়ার জন্য দেরি যাতে না হয় তারজন্য নতুন ব্যবস্থা করা হচ্ছে।''


    নয়া নগরায়ন নীতি ঘোষণার পাশাপাশি কর আদায়ের কথাও এদিন জানান অর্থমন্ত্রী। রাজ্যের অর্থ দপ্তর এই কর আদায় করবে।


    গোটা দেশে গত ১০বছরে নগরায়ণ বেড়েছে ২৭শতাংশ হারে। এরাজ্যে সেই অগ্রগতির হার ছিল ৩১শতাংশ। বামফ্রন্ট সরকারের আমলে নগরায়নের জন্য পরিকল্পিত নীতি গ্রহণ করা হয়েছিল। গড়া হয়েছে রাজারহাটে নয়া উপনগরী। ডানকুনি, ডোমজুড়, বারুইপুরে নয়া উপনগরী গড়ার পরিকল্পনা ছিল পূর্বতন সরকারের। কিন্তু এখন এরাজ্যে নগরায়নের নামে শহরকে তুলে দেওয়া হচ্ছে প্রোমোটিং-এর কাজে।

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    নগরায়ণের নয়া নীতিতে ভূমিকম্পের সিঁদুরে মেঘ

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    কলকাতা, ৭ অগস্ট, ২০১৪, ০৩:৩৫:৪১

    শুধু পরিবেশ দূষণই নয়, রাজ্যের নতুন নগরায়ণ-নীতি বিপর্যয় ডেকে আনতে পারে বলেও ভূবিজ্ঞানী ও ভূকম্প গবেষকদের একাংশের আশঙ্কা। তাঁরা বলছেন, কলকাতায় উঁচু বহুতল গড়ার ক্ষেত্রে সতর্কতামূলক ব্যবস্থা নিতে হবে। না-হলে সামান্য ভূমিকম্পেই সেগুলি তাসের ঘরের মতো ভেঙে পড়বে।

    কেন্দ্রীয় সরকারের ভূবিজ্ঞান মন্ত্রকের সঙ্গে জোট বেঁধে কলকাতা ও তার আশপাশে ৪০০ বর্গকিলোমিটার ব্যাসার্ধ জুড়ে ভূকম্পপ্রবণ এলাকাগুলি চিহ্নিত করেছে খড়্গপুর আইআইটি। ওই সব এলাকায় মাটির নীচে কী ধরনের পাত রয়েছে, কোন এলাকার মাটির চরিত্র কেমন এ সব খতিয়ে দেখছেন তাঁরা। ভূমিকম্প হলে কোথায় ভূস্তর কাঁপতে পারে, তা খুঁজে বার করে মহানগরীর কোথায় কেমন বাড়ি হতে পারে, সেটাও সমীক্ষা করে দেখছেন আইআইটি-র গবেষকেরা।

    ওই গবেষকদলের প্রধান বিজ্ঞানী শঙ্করকুমার নাথ বুধবার জানান, মহানগরীর কোন এলাকায় কী ধরনের বাড়ি তৈরি করা যাবে, কোথায় কী কী সতর্কতামূলক ব্যবস্থা নিতে হবে এবং নির্মাণে কী কী সামগ্রী ব্যবহার করা যাবে— এ সব নিয়েই সমীক্ষা করেছেন তাঁরা। কলকাতার জন্য ইতিমধ্যেই তৈরি করে ফেলেছেন একটি ভূকম্প-মানচিত্রও। "ওই সমীক্ষা থেকে পরিষ্কার, নির্দিষ্ট এলাকার জন্য নির্দিষ্ট সতর্কতা-বিধি না মেনে বহুতল গড়লে তা কলকাতায় বিপর্যয় ডেকে আনতে পারে।"—মন্তব্য শঙ্করবাবুর। কেন?

    খড়্গপুর আইআইটি-র ওই বিজ্ঞানীর ব্যাখ্যা, সামান্য কম্পনে দুটো বাড়ি একে অন্যের সঙ্গে ধাক্কা খাবে কি না, তা নির্ভর করে ওই এলাকার ভূস্তরের উপরে। কারণ, ভূস্তরে সব সময়ে কম্পন চলছে। তাই বিভিন্ন বহুতলও কাঁপছে। কিন্তু দু'টি কম্পনের মাত্রা আলাদা। যদি ভূস্তর ও বহুতল, দু'টোর দুলুনির মাত্রাই এক হয়ে যায়, তা হলে অতি অল্প মাত্রার ভূকম্পেই (রিখটার স্কেলে ৩-৪) পেল্লায় মাপের বহুতল ভেঙে পড়তে পারে। যেমন, ১২তলা বাড়ি হলে সাধারণত তার কম্পাঙ্ক হয় ১.২ হার্জ। ওই এলাকার ভূস্তরের দোলার ছন্দও যদি ওই একই মাত্রায় হয়, তবে রিখটার স্কেলে ৩-৪ মাত্রার ভূমিকম্পেও ওই বহুতল তাসের ঘরের মতো ভেঙে পড়তে পারে।

    জিওলজিক্যাল সার্ভে অব ইন্ডিয়া-র অবসরপ্রাপ্ত বিজ্ঞানী জ্ঞানরঞ্জন কয়ালও বলেন, "কলকাতার সব জায়গায় ভূস্তরের অবস্থা এক নয়। ভূস্তরের অবস্থা বুঝে বাড়ি তৈরির নীতি তৈরি করতে হবে রাজ্য সরকারকে। না হলে সমূহ বিপদ।"

    ভূবিজ্ঞানীরা বলছেন, এই বিজ্ঞানকে অস্বীকার করা যাবে না। সে ক্ষেত্রে নতুন নগরায়ণ-নীতি তৈরির করার ক্ষেত্রে ভূকম্প-বিশারদ ইঞ্জিনিয়ারদের সঙ্গে কথা বলা জরুরি। তা না-হলে ভূকম্পের সময়ে বড় বিপদের মুখে পড়তে পারে মহানগর। কিন্তু কলকাতা কিংবা তার পার্শ্ববর্তী এলাকায় ভূমিকম্পের আশঙ্কা কতটা?

    ভূবিজ্ঞানীদের সমীক্ষা অনুযায়ী, কলকাতা-সহ গোটা দক্ষিণবঙ্গ কিন্তু মাঝারি মাত্রার ভূমিকম্পের শিকার হতেই পারে (রিখটার স্কেলে ৫-৬.৯)। খড়্গপুর আইআইটি-র এক ভূবিজ্ঞানী জানিয়েছেন, বঙ্গোপসাগরের উপকূলবর্তী এলাকায় (অবিভক্ত বাংলা) মাটির সাড়ে চার থেকে পাঁচ কিলোমিটার নীচে একটি খাত (ইয়োসিন হিঞ্জ) রয়েছে। সেই খাত থেকে মাঝেমধ্যেই কম্পন তৈরি হচ্ছে। ইতিমধ্যেই ওই খাতের বিভিন্ন অংশ থেকে ৫.৪, ৫.৬ মাত্রার কয়েকটি ভূমিকম্প সৃষ্টি হয়েছে। "সেখান থেকে সর্বোচ্চ ৬.৮ তীব্রতার ভূমিকম্প তৈরি হতে পারে।"— মন্তব্য ওই বিজ্ঞানীর।

    তবে ওই মাত্রার ভূমিকম্প কবে হবে, তার উৎসকেন্দ্র ঠিক কোথায় হবে, সে ব্যাপারে পূর্বাভাস দেওয়া সম্ভব নয় বলে জানান খড়্গপুরের ভূবিজ্ঞানীরা। তাঁদের ব্যাখ্যা, যে ভাবে যত্রতত্র মাটির নীচ থেকে জল তুলে নেওয়া হচ্ছে এবং জলাভূমি ভরাট করে ফেলা হচ্ছে, তাতে কলকাতায় ভূস্তরের ভারসাম্য নষ্ট হচ্ছে। তাই মাঝারি মানের কোনও ভূমিকম্পই (উৎসকেন্দ্র কলকাতার কাছাকাছি হলে) মহানগরীর বিপদ ঘটাতে পারে।

    শুধু কলকাতা নয়, উত্তরবঙ্গের শিলিগুড়িতেও যেখানে-সেখানে বহুতল গড়া বিপর্যয় ডেকে আনতে পারে। ২০১১ সালের সিকিমের ভূকম্পের পরে তার ইঙ্গিতও মিলেছে বলে ভূবিজ্ঞানীদের দাবি। তাঁরা বলছেন, ২০১১ সালের ১৮ সেপ্টেম্বর সিকিমে ৬.৯ মাত্রার ভূকম্প হয়েছিল। তার প্রভাবে শিলিগুড়িতে মাটি ফেটে গিয়েছিল। সেতুতেও ফাটল ধরেছিল। ওই ভূকম্পের পরে সিকিম ও উত্তরবঙ্গে সমীক্ষা করেছিল শঙ্করবাবুর নেতৃত্বাধীন খড়্গপুর আইআইটি-র একটি দল। শঙ্করবাবু বলেন, "শিলিগুড়ির এই পরিস্থিতির কথা আমরা রাজ্য সরকারকে তখনই জানিয়েছিলাম।"



    কোন কোন শিল্প উন্নয়ন প্রকল্প আমার নজর এড়িয়ে গিয়েছে, সেগুলি দেখাতে পারলে খুশি হব, টুইটারে অমিতের কটাক্ষের জবাব রতন টাটার

    ওয়েব ডেস্ক, এবিপি আনন্দ

    Thursday, 07 August 2014 08:23 PM

    নয়াদিল্লি: অমিত মিত্রের আক্রমণের জবাবে টুইটারে মুখ খুললেন রতন টাটা।বললেন,  তিনি গতকাল কখনই পশ্চিমবঙ্গের সামগ্রিক শিল্পোন্নয়ন নিয়ে কোনও কথা বলেননি, দমদম বিমানবন্দর থেকে রাজারহাট হয়ে কলকাতা শহরে যাওয়ার পথে রাস্তায় যা দেখেছেন, তার ভিত্তিতেই কিছু মন্তব্য করেছেন।

    টাটা মোটরসের প্রাক্তন কর্ণধারের গতকালের বক্তব্যে আলোড়নের মধ্যেই তাঁর 'মতিভ্রম হয়েছে'বলে আজ তাঁকে কটাক্ষ করেন পশ্চিমবঙ্গের অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র।রতন টাটা রাজ্যের শিল্পের হাল নিয়ে ঠিকঠাক খবর পাচ্ছেন না বলেও মন্তব্য করেন তিনি। এর কয়েক ঘণ্টার মধ্যেই মাইক্রোব্লগিং সাইট টুইটারে রতন টাটা বলেন, আমার গতকালের মন্তব্যে এয়ারপোর্ট থেকে রাজারহাট হয়ে মৌর্যে যাওয়ার উল্লেখ রয়েছে। বেশ কিছু আবাসন, বাণিজ্যিক কাজকর্ম আমার চোখে পড়েছে।কিন্তু শিল্প সংক্রান্ত কাজকর্ম তেমন দেখিনি।।রাজ্যের শিল্পোন্নয়ন সম্পর্কে আমি কোনও মন্তব্য করিনি, তাই শ্রী মিত্রের মন্তব্য আমার কাছে বিস্ময়কর ঠেকছে। ওনার এত রাগত হওয়ার কারণ দেখছি না।

    অমিত মিত্রের এদিনের শ্লেষাত্মক মন্তব্যে তিনি যে অখুশি, তা বুঝিয়ে দিয়ে টুইটারে রতন টাটা আরও বলেছেন, শ্রী মিত্র হয়ত মনে করেন, আমার মতিভ্রম হয়েছে।তবে রাজারহাট দিয়ে যাওয়ার সময় কোন কোন শিল্প উন্নয়ন প্রকল্প আমার নজর এড়িয়ে গিয়েছে, সেগুলি উনি যদি আমাকে দেখাতে পারেন, তাহলে আমি খুশি হব।আর যদি না পারেন, তাহলে আমাকে এই সিদ্ধান্তে আসতে হবে যে ওনার কল্পনা শক্তি খুবই উর্বর!

    গতকাল ইন্ডিয়ান চেম্বার অব কমার্সের লেডিস স্টাডি গ্রুপের এক অনুষ্ঠানে রতন টাটা কোন পরিস্থিতিতে সিঙ্গুর থেকে ন্যানো প্রকল্প সানন্দে সরিয়ে নিয়ে যেতে হয়েছিল, সেকথা উল্লেখ করে তাঁর মন্তব্যে বুঝিয়ে দেন, গাড়ি প্রকল্প গুটিয়ে ফেলার পর তাঁর আগের অবস্থান একটুও বদলায়নি।তিনি বলেন, সিঙ্গুর-পর্বে জমি অধিগ্রহণ নিয়ে বিক্ষোভের জেরে সেদিন বলেছিলাম, হয় ট্রিগার টিপুন, নয় বন্দুক সরান৷ সেই অবস্থান থেকে আজও সরছি না!

    গতকালের অনুষ্ঠানে রতন টাটাকে প্রশ্ন করা হয়, অতীতে তাঁকে কী ধরনের কঠিন পরিস্থিতির মুখোমুখি হতে হয়েছে৷ উত্তর দিতে গিয়ে দু'টি ঘটনার উল্লেখ করেন রতন টাটা৷ তার মধ্যে অন্যতম সিঙ্গুর৷ টাটা গোষ্ঠীর এমিরেটাস চেয়ারম্যান বলেন, সিঙ্গুর জীবনের সবথেকে কঠিন সিদ্ধান্ত৷ চরম প্রতিকূল পরিস্থিতির মধ্যে ন্যানো প্রকল্প সরিয়ে নিয়ে যাওয়া ছাড়া উপায় ছিল না৷ সিঙ্গুর থেকে ন্যানো প্রকল্প সরানোয় বিশ্বব্যাপী নেতিবাচক প্রভাব পড়েছে বলেও আক্ষেপ প্রকাশ করেন রতন টাটা৷ সিঙ্গুর নিয়ে তাঁর মন্তব্যের প্রেক্ষিতে শিল্পমহলের একাংশের ধারণা, সাইরাস মিস্ত্রি টাটা গোষ্ঠীর চেয়ারম্যান হওয়ার পর আদালতের বাইরে সিঙ্গুর সমস্যার সমাধানের সম্ভাবনা নিয়ে যে জল্পনা তৈরি হয়েছিল, রতন টাটা তাতে কার্যত জল ঢেলে দিলেন৷

    এই প্রেক্ষাপটে আজ রতন টাটাকে নজিরবিহীন আক্রমণ করেন অমিত মিত্র, ফিরহাদ হাকিম, মদন মিত্ররা।সবার প্রথমে অমিত মিত্র সিআইআই আয়োজিত এক সেমিনারের ফাঁকে অমিত মিত্র বলেন, রতন টাটার বয়স হয়েছে, মতিভ্রম হয়েছে।ওনার।রাজ্যে যা হচ্ছে, সেটা উনি কেন বুঝতে পারছেন না, জানি না।অমিত মিত্রের দাবি, ।টাটা গোষ্ঠীর সংস্থা টিসিএস এখানে বাড়তি ২০ হাজার কাজের ব্যবস্থা করছে।অনিল আম্বানি, ইমামি গোষ্ঠী উভয়েই রাজ্যে সিমেন্ট প্ল্যান্ট গড়ছে।সম্প্রতি টাটাদের আরেকটি সংস্থা টাটা মেটালিক্স রাজ্যে তাদের বর্তমান ইউনিটের সম্প্রসারণ ঘটাতে চেয়ে চিঠি দিয়েছে সরকারকে।তাহলে উনি কি প্রকৃত তথ্য সম্পর্কে ওয়াকিবহাল নন কেন? তাঁর নিজের দফতর তাঁকে ঠিকমত ব্রিফ করেনি?।

    তারপরই রতন টাটাকে তাঁর আরও কটাক্ষ, ওনার প্লেন চালানোর শখ, সেটাই চালান উনি।

    অমিত মিত্রের পাশাপাশি পুরমন্ত্রী ফিরহাদ হাকিমের কটাক্ষ, ওনার মাথা খারাপ হয়ে গিয়েছে! ওনার সার্টিফিকেটের দরকার নেই।

    ABP Ananad

    রাজ্যে শিল্প চোখে পড়ছে না: রতন টাটা

    1-2

    তৃণমূলের জঙ্গি আন্দোলনের জেরে ছ'বছর আগে সিঙ্গুর থেকে ন্যানো কারখানা গুটিয়ে গুজরাতের সানন্দে চলে গিয়েছিলেন তিনি। নিতান্ত অনিচ্ছায়। এত দিন পরেও সেই ক্ষত যে শুকোয়নি, বুধবার কলকাতায় এসে সে কথা বুঝিয়ে দিলেন টাটা গোষ্ঠীর প্রাক্তন কর্ণধার ও বর্তমান এমেরিটাস চেয়ারম্যান রতন টাটা। ক্ষত তাঁর মনে। ক্ষত ন্যানো প্রকল্পেও। সিঙ্গুর ঘিরে অনিশ্চয়তার জেরে ভাবমূর্তির ক্ষতি সামলে উঠতে পারেনি একলাখি ছোট গাড়ি। কার্যত তার স্বপ্নভঙ্গ হয়েছে।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ০৭ অগস্ট, ২০১৪


    কেন্দ্র সহায়, তবুও কারখানা হয়নি রাজ্যে

    আর্থিক বঞ্চনার অভিযোগ নিয়ে কেন্দ্রের বিরুদ্ধে প্রায় নিত্য সরব রাজ্য। অথচ বুধবার রাজ্যের মন্ত্রীর উপস্থিতিতেই কেন্দ্রীয় বাণিজ্য মন্ত্রকের অধীনস্থ সংস্থার কর্তা দাবি করলেন, আদপে কেন্দ্রের সহায়তা নিয়েই উঠতে পারে না পশ্চিমবঙ্গ। যেখানে সেই টাকা নিয়ে নিয়মিত খরচ করতে পারায় ওই খাতে ফি বছর বরাদ্দ বাড়িয়ে নেয় গুজরাত, মহারাষ্ট্রের মতো রাজ্যগুলি।

    নিজস্ব সংবাদদাতা


    ০৭ অগস্ট, ২০১৪


    এক মাস বন্ধ পেট্রোকেম, ধুঁকছে প্লাস্টিক শিল্পও

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    হলদিয়া পেট্রোকেমিক্যালসের দরজা বন্ধে দমবন্ধ দশা রাজ্যের প্লাস্টিক শিল্পেরও। আজ প্রায় এক মাস কারখানা বন্ধ পেট্রোকেমের। তাই সমস্যা কাটিয়ে ঘুরে দাঁড়ানো ক্রমশ কঠিন হয়ে পড়ছে তার পক্ষে। কিন্তু সেই সঙ্গে আতান্তরে রাজ্যের প্লাস্টিক শিল্পও। পেট্রোকেমের তৈরি কাঁচামাল ব্যবহার করে বালতি থেকে শুরু করে পেনের রিফিল বহু জিনিস তৈরি করে যারা।

    ০৬ অগস্ট, ২০১৪

    3

    শর্তসাপেক্ষে বাটা উপনগরী প্রকল্পে অনুমতি রাজ্যের

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ০৬ অগস্ট, ২০১৪

    b2

    জঙ্গপানা বাগানে ইউনিয়ন শর্ত না-মানলে রফা নয় কর্তৃপক্ষের

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ০৫ অগস্ট, ২০১৪

    শ্রমিক সংগঠনের শীর্ষে মন্ত্রীদের বসা নিয়ে রাজ্যের মত চাইল কেন্দ্র

    প্রভাত ঘোষ

    কোনও কারখানা বা শিল্প সংস্থার শ্রমিক সংগঠনের মাথায় মন্ত্রীদের বসা নিয়ে রাজ্যের মতামত চাইল কেন্দ্রীয় শ্রম মন্ত্রক। বহিরাগত কারও সংগঠনের পদাধিকারী হওয়া উচিত কিনা, জানতে চাওয়া হয়েছে তা-ও। যার কারণ গত ১১ অক্টোবর মাদ্রাজ হাইকোর্টের দেওয়া রায়। যেখানে কর্মী সংগঠনের কোনও পদে মন্ত্রী বা বহিরাগতদের বসার উপর নিষেধাজ্ঞা জারি করা হয়েছে।

    ০২ অগস্ট, ২০১৪




    গুন্ডারাজ বন্ধ হবে নতুন আবাসন নীতিতে: ফিরহাদ





    আজকালের প্রতিবেদন: 'নতুন নগরোন্নয়ন নীতির ফলে গুন্ডারাজ, সিন্ডিকেটরাজ বন্ধ হবে'– বুধবার মহাকরণে এ কথা জানালেন পুর ও নগরোন্নয়ন মন্ত্রী ফিরহাদ হাকিম৷‌ তিনি বলেন, 'যে-সব ভাড়াটিয়া ৫০ বছর ধরে আছেন, তাঁদের কোনও ভাবে উচ্ছেদ করে দেওয়া যাবে না৷‌ তাঁদের পুনর্বাসন দিয়ে বাড়ি সংস্কার করতে হবে৷‌ যাতে মালিক এবং ভাড়াটিয়া উভয়পক্ষই লাভবান হন৷‌ এই নীতির ফলে সিন্ডিকেটরাজ বন্ধ হবে৷‌ পরিবেশ-বান্ধব আবাসন গড়ার ওপরে আমরা জোর দিচ্ছি৷‌ কোনও সমস্যা হলে আইন-শৃঙ্খলার বিষয়টি দেখবে রাজ্য৷‌'তিনি জানান, যে অংশে ভাড়াটিয়া রয়েছে, বাড়ি নকশায় তা চিহ্নিত করে দিতে হবে মালিককে৷‌ রাজ্যের নগরোন্নয়ন নীতিতে যেমন কর্মসংস্হান বাড়বে, তেমন রাজ্যের চেহারাটাই পাল্টে যাবে, মম্তব্য মন্ত্রীর৷‌ তিনি বলেন, যেভাবে আবহাওয়ার পরিবর্তন ও গতিপ্রকৃতি বদলের জন্য তাপমাত্রা বাড়ছে পৃথিবীর৷‌ বাড়ছে অসুখ৷‌ তাই আমরা পরিবেশ-বান্ধব আবাসন প্রকল্পের ওপর জোর দিয়েছি৷‌ তাতে সবুজের পরিমাণ বাড়বে৷‌ আবাসনও হবে৷‌ পাশাপাশি ডেঙ্গু, ম্যালেরিয়ার মতো রোগভোগের হাত থেকে বাঁচবেন মানুষ৷‌ এ ছাড়া হাসপাতাল, শপিং কমপ্লে', শপিং মল-এর ক্ষেত্রে গাড়ি রাখার জন্য বিশেষ সুযোগ-সুবিধা দেওয়া হবে৷‌ রাজ্যের মেট্রো রেল প্রকল্পগুলি থেকে ৫০০ মিটারের মধ্যে অথবা ১৫-২৪ মিটার চওড়া রাস্তার পাশে বাড়ি তৈরির জন্য ১৫ থেকে ২০ শতাংশ 'ফ্লোর এরিয়া রেশিও' (এফ এ আরগ্গ ছাড় দেওয়া হবে৷‌ এর পাশাপাশি তিনি বলেন, 'কর আদায়ের ক্ষেত্রে স্বচ্ছতার ওপরও বিশেষ জোর দেওয়া হয়েছে৷‌ 'হেরিটেজ'ভবনগুলিকে রক্ষণাবেক্ষণে জোর দেওয়া হয়েছে৷‌


    নতুন উপনগরী তৈরির ক্ষেত্রেও সুযোগ-সুবিধা দেওয়া হবে৷‌ যেমন রঘুনাথপুর, দুর্গাপুর, ডানকুনি, কল্যাণী গড়ে উঠবে নতুন উপনগরী৷‌


    লজিস্টিক হাব, জিম, খেলার মাঠ রয়েছে– সেই প্রকল্প এই সুবিধার আওতায় পড়বে৷‌ 'স্ট্যাম্প ডিউটি'বাবদ রাজ্য সরকারের ভাঁড়ারে সাড়ে ৫ হাজার কোটি টাকা রাজস্ব এসেছে বলে জানান ফিরহাদ হাকিম৷‌ তিনি বলেন, বাড়ির নকশা যাতে দ্রুত পাওয়া যায় এবং হয়রানি রুখতে 'এক জানলা নীতি'কার্যকর করা হবে৷‌ ছাড়পত্র মিলবে ১৫ থেকে ৬০ দিনের মধ্যে৷‌ পাশাপাশি রাজ্যের কোথায়, কত পরিমাণ জমি রয়েছে? জমির আশেপাশে রাস্তার কী অবস্হা, সব কিছুই ওয়েবসাইটে দিয়ে দেওয়া হবে৷‌ যাতে জমি কেনার আগে বা বাড়ি তৈরির ক্ষেত্রে স্পষ্ট ধারণা থাকে রাজ্যবাসীর কাছে৷‌


    शहरीकरण का विस्फोट

    शहरीकरण का विस्फोट

    Source:

    मीडिया फॉर राईट्स

    113 शहरों द्वारा गंगा और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में हर रोज डेढ़ अरब लीटर अपशिष्ट गंदा पानी छोड़ा जाता है। ऐसे में बेतरतीब ढंगी शहरों का यह देश किसी भी ऐसी महामारी के चपेट में आ सकता है, जिसके लिये हम खुद जिम्मेदार होंगे। हम उस स्थिति में कभी नहीं आ सकेंगे जब शहरों द्वारा पैदा किये गये अरबों टन कचरे का उपचार करके उसे ठिकाने लगा सकें। यह कचरा पानी, जमीन, पेड़ और इंसानी स्वास्थ्य, सबको बीमार बना देगा।

    डिण्डोरी जिले के हरिराम बैगा को एक बार बंगलुरू जाने का मौका मिल गया। हरिराम ने जब बंगलुरू के हवाई अड्डे की ओर जाने वाली चमचमाती और दूधिया रोशनी से नहाई हुई सड़क देखी तब उसने कहा कि, तो इसीलिए अपने गाँव के लोग शहर की ओर दौड़-दौड़कर आ रहे हैं। फिर इस बैगा आदिवासी ने कहा कि ऐसी सड़कों को इतनी बिजली यहां कैसे मिल जाती है, हमारे गाँव के घरों में तो एक बल्ब भी नहीं जल पाता? वास्तव में जब शहरीकरण एक जज्बा बनकर हमारी बहस में आता है तो विकास का सबसे बड़ा लक्ष्य यही बन जाता है कि इस देश को शहरों को देश बना दो! और एक आम इंसान जब शहर की कल्पना करता है तो उसके सामने चकाचौंध कर देने वाली बसाहट होती है, आधुनिकता का भव्य प्रदर्शन होता है। अभावों में रहकर जिंदगी के एक-एक हिस्से को जोड़कर संवरने की जद्दोजहद करने वाला गाँव में रहने वाला हरिराम यह मानने लगता है कि शहर यानी आसानी से उपलब्ध पानी, कदम-कदम पर इलाज और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की सुविधायें! परन्तु उन झुग्गी बस्तियों को देखकर वह दुविधा में पड़ गये कि वैसा उजाला और सुविधायें शहर की इस आधी आबादी को क्यों नही मिली! ऐसा भेदभाव तो गाँव में भी नही होता है। यदि वह युवा हुआ तो वह मानेगा कि शहर माने रोजगार के चारों तरफ बिखरे हुये अवसर। कुल मिलाकर शहरीकरण एक काल्पनिक दुनिया तो नहीं है न!


    किस कीमत पर शहरीकरण!


    आज जब हम इस विषय पर चर्चा करते हैं तो वह थोड़ी ही देर में बहस में तब्दील हो जाती है। हम या तो शहरीकरण के पक्ष में खड़े होते हैं या फिर इसी पूरी तरह से खिलाफत करते हैं। यह बहस जायज है। जायज इसलिये क्योंकि हम जानना चाहते हैं कि हमारे देश में जो शहरीकरण हो रहा है, कहीं वह गांवों की बदहाली और वहां सिमटती जा रही जिंदगी का परिणाम तो नहीं है! हमारे मन में यह भी ख्याल आता है कि कहीं इसके पीछे कोई आर्थिक राजनीति तो नहीं छिपी हुई है। हम आंकलन करना चाहते हैं कि बदहाली, बीमारी, बेरोजगारी और असुरक्षा जैसे सवालों के जवाब क्या बेतरतीब ढंग से हो रहे शहरीकरण में मिलने वाले हैं? पूरी दुनिया की तरह ही भारत में भी शहरीकरण को आधुनिक विकास से पैदा हुई सोच नहीं माना जा सकता है। आज की परिस्थितियों पर पहल करने से पहले हमें इसका ऐतिहासिक पहलू जान लेना बहुत जरूरी है। मानव सभ्यता के जब से प्रमाण मिलते हैं तभी से शहरों के निशान भी मिलते हैं। सुनियोजित और सुव्यवस्थित शहरीकरण की परम्परा भारत को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में दुनिया के दूसरे देशों से एक अलग पहचान दिलाती है।


    दुनिया में पांच हजार साल पहले की हिंदू घाटी की सभ्यता में शहरी बसाहट की शुरूआत के प्रमाण भारत में ही देखें गये। इसके बाद मध्यकाल में भी सत्ता व्यवस्थाओं के उत्थान और पतन के फलस्वरूप शहरों की स्थापना की एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया सी नजर आती है। कई मर्तबा इसे एक सांस्कृतिक व्यवहार के साथ भी जोड़कर देखा जाता रहा है। परिभाषा के स्तर पर व्यापार, उद्योग, राज्य और सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था को चलाने के लिये शहरों के वजूद को अनिवार्य माना गया है। आधुनिक भारत में शहरीकरण का तेज दौर 18वीं सदी में तब देखा गया जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में आई। उसने व्यापार-उत्पादन के लिये बंदरगाहों का निर्माण किया और उन बंदरगाहों के आसपास शहर बसाये या उनका विकास किया। एक नजरिये से भारत की गांवों के संसाधनों को लूटकर ले जाने के लिये शहरों को जरिया बनाया गया।


    इसके बाद हमारे लिये बीसवीं सदी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। 1901 से 2001 की अवधि में यहां कुल शहरों की संख्या 1827 से बढ़कर 5161 (वर्ष 2001 में) हो गई। शहर तो बढ़े परन्तु यह बात भी साफ तौर पर उभरकर आती है भारत में छोटे शहरों से ज्यादा बड़े शहरों का विकास हुआ है। वर्ष 1901 में एक लाख की जनसंख्या वाले केवल 24 शहर थे जो वर्ष 2001 में बढ़कर 393 हो गये जबकि 5 से 10 हजार की जनसंख्या वाले शहरों की संख्या 744 से बढ़कर महज 888 हो पाई। यानी संसाधन और विकास बड़े नगरों के आसपास केन्द्रित हुआ। बड़े शहरों में रहने वाली जनसंख्या का प्रतिशत 26 से बढ़कर अब 68 हो गया है और छोटे शहरों में आबादी का अनुपात कम हुआ है। शहरीकरण का यह परिदृश्य बताता है कि कहीं न कहीं गांवों की बदहाली ने इसके लिये उर्वरक का काम किया है। वर्ष 1921 में भारत में 685665 गाँव थे और गांधी जी कहते थे कि हमारा देश 7 लाख गणराज्यों का देश है और वर्ष 2001 की जनगणना बताती है कि अब महज 593731 गाँव ही देश में आबाद हैं। कहां गये ये 92 हजार गाँव मतलब यह है 28 गाँवों की कीमत पर एक शहर खड़ा हुआ। मौजूदा दशक में ही 7863 गाँव शहरों की सीमा में शामिल कर दिए गए। आज भारत के शहरों में लगभग 34 करोड़ लोग रहते हैं और यह संख्या अगले 20 वर्षों में बढ़कर 59 करोड़ हो जायेगी।


    आज शहरी जीवन के 2 घंटे हर रोज ट्रैफिक के नाम होते हैं। वर्तमान स्थिति में भारत में एक किलोमीटर सड़क पर 170 वाहनों का घनत्व है, जो सड़कों पर जाम की स्थिति बनाता है। अगले 20 वर्षों में जाम का समय दो गुना हो जाने वाला है क्योंकि निजी परिवहन साधनों को भारत में ज्यादा विस्तार दिया गया। जिससे सार्वजनिक परिवहन सेवायें बेहद कमजोर हो गई। आज 70 प्रतिशत शहरी परिवहन निजी साधनों से होता है जिसे आधा करने की जरूरत है। कार्बन उत्सर्जन, दुर्घटनायें और तनाव भी यातायात की अव्यवस्था के बड़े परिणाम है।


    बुनियादी जरूरतों का बुनियादी संकट


    इस तथ्य को महज नकारात्मक कहकर हमें नकारना नहीं चाहिए कि देश-समाज ज्वालामुखी सरीखे विस्फोट की संभावना के मुहाने पर आ बैठा है। भारत के चार राज्यों (बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड) के 36 शहर हर रोज डेढ़ अरब लीटर अपशिष्ट मैला पानी बिना उपचार के गंगा के बेसिन में छोड़ते हैं। इतना ही नहीं भोपाल का 24 करोड़ लीटर मैला अपषिष्ट पानी खुला छोड़ दिया जाता है जो शहर की शान भोज तालाब में जाकर भी मिला है, तो इन्दौर का 12 करोड़ लीटर गंदा पानी खान और शिप्रा नदी से जा मिलता है। मध्यप्रदेश के बड़े शहर हर रोज 124.8 करोड़ लीटर मैला और गंदा पानी पैदा करते हैं परन्तु राज्य में ऐसे पानी को उपचार करने की क्षमता महज 18.6 करोड़ लीटर पानी की है। राजस्थान 138 करोड़ लीटर सीवेज उत्पादन के बदले केवल 5.4 करोड़ लीटर पानी का उपचार करने की क्षमता रखता है। छत्तीसगढ़ 35 करोड़ लीटर गंदा पानी पैदा करता है पर महज 6.9 करोड़ लीटर का उपचार करता है।


    केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मण्डल की शहरों में पानी की स्थिति पर जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 908 शहर हर रोज 3.80 अरब लीटर मैला पानी पैदा करते हैं और इसमें से 2.80 अरब लीटर मैला अपशिष्ट बिना उपचार के शेष गंदा पानी खुले मैदानों और नदियों (जैसे गंगा, नर्मदा, क्षिप्रा, चंबल आदि) में मिलने के लिये छोड़ दिया जाता है। 113 शहरों द्वारा गंगा और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में हर रोज डेढ़ अरब लीटर अपशिष्ट गंदा पानी छोड़ा जाता है। ऐसे में बेतरतीब ढंगी शहरों का यह देश किसी भी ऐसी महामारी के चपेट में आ सकता है, जिसके लिये हम खुद जिम्मेदार होंगे। हम उस स्थिति में कभी नहीं आ सकेंगे जब शहरों द्वारा पैदा किये गये अरबों टन कचरे का उपचार करके उसे ठिकाने लगा सकें। यह कचरा पानी, जमीन, पेड़ और इंसानी स्वास्थ्य, सबको बीमार बना देगा। प्रोफेसर सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 25.7 प्रतिशत शहरी गरीबी की रेखा के नीचे हैं। ये एक व्यक्ति पर 19 रूपये प्रतिदिन से भी कम खर्च करके जीवनयापन करते हैं। आज जबकि शहरों में अपनी छत का सुख हासिल करना बुनियादी जरूरत है, इन परिवारों के लिए आवास का आधार मिलना एक दूर का ख्वाब है।


    जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना के तहत झुग्गीवासियों और गरीब परिवारों को घर देने की प्रक्रिया जरूर शुरू की गई है पर इसमें एक व्यक्ति के खाते में महज 30 से 40 वर्गफिट की सतह ही आ रही है। भोपाल में इस योजना के अनुभव बताते हैं कि निर्माण तो पूरी तरह से गुणवत्ताहीन हैं और असुरक्षित भी। मौजूदा स्थिति में जबकि महज 2.7 प्रतिशत नगर पालिकायें ही 100 लीटर प्रतिव्यक्ति या उससे अधिक पानी उपलब्ध करा पा रही हैं और 28 प्रतिशत नगरीय क्षेत्र में जनता को 50 लीटर से कम पानी उपलब्ध है। यानी जकारिया समिति द्वारा तय मापदण्डों को लागू नहीं किया जा पा रहा है इसके एवज में पानी का निजीकरण कर दिया गया है जिससे शहरी गरीबों के लिये संकट गहरा रहा है। बात अब केवल पानी की खरीदी-बिक्री का ही नहीं है बल्कि पानी की तेजी से होती कमी के संदर्भ में पानी हासिल करने की है, जिसके बारे में शहरीकरण की नीतियाँ चुप हैं। वर्ष 2008 में भारत के शहरों में पानी के लिए 1738 झगड़े हुये जिनमें 19 लोग मारे गये, वर्ष 2009 में इनकी संख्या 1903 पहुंच गई।


    वर्ष 2007 में 83 बिलियन लीटर पानी की जरूरत थी पर महज 56 बिलियन लीटर पानी की आपूर्ति हो पा रही थी यानि 27 बिलियन लीटर पानी की कमी थी। वर्ष 2030 में जरूरत होगी 189 बिलियन लीटर पानी की और उपलब्ध होगा केवल 95 बिलियन लीटर। यानी कमी 27 बिलियन लीटर से बढ़कर 96 बिलियन लीटर हो जायेगी। इसी तरह वर्ष 2007 में हर रोज 66 बिलियन लीटर गंदे पानी के उपचार की जरूरत के विरूद्ध केवल 13 बिलियन लीटर पानी का उपचार हो पा रहा था। वर्ष 2030 में हम 42 बिलियन लीटर पानी का उपचार करने की क्षमता रखेंगे पर गंदे पानी का उत्पादन 151 बिलियन लीटर हो जायेगा। हर साल अभी 51 मिलियन टन कचरा हर साल पैदा होता है, कचरे की यह पैदावार 2030 में बढ़कर 377 मिलियन टन हो जायेगी। यही कमी सड़क और रेल यातायात के मामले में भी जमकर बढ़ने वाली है। आवास व्यवस्था के बारे में उभरकर आये निष्कर्ष और ज्यादा गंभीर हैं। आज जरूरत 3 करोड़ घरों की है पर केवल 50 लाख घर ही बन पायेंगे। यह अंतर 2030 के शहरों में खूब बढ़ने वाला है। तब 5 करोड़ घर चाहिये होंगे और बन पायेंगे केवल 1.20 करोड़।

    http://hindi.indiawaterportal.org/node/34854



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    Saffron Neo-liberalism

    Vol - XLIX No. 31, August 02, 2014 | Anand Teltumbde

    An aggressive drive towards neo-liberal economic reforms alongside consolidation of the Bharatiya Janata Party's political constituency with the spread of hegemonic Hindutva through sociocultural channels is on the cards.

    Anand Teltumbde (tanandraj@gmail.com) is a writer and civil rights activist with the Committee for the Protection of Democratic Rights, Mumbai.

    Narendra Damodardas Modi symbolised the finesse of Indian democracy on 26 May 2014, the day he was sworn in as India's 15th prime minister, inasmuch as he showed how a person coming from a humble background could occupy the highest executive office of the Indian state. Notwithstanding the fact that the process of catapulting him to this high pedestal has been one of the costliest in the world (estimated at Rs 10,000 crore), Modi's rise could well be flaunted by his backers as a feat of Indian democracy. The electoral process involved Modi addressing rallies at 5,800 locations, travelling a blistering 3,00,000 km, which included 1,350 locations covered by rallies using 3D holographic projection technology through which more than 100 places could be addressed simultaneously. The advertisement blitzkrieg through all possible media was so complete that even children sang "abki baar, Modi sarkar" and "achchhe din aane wale hai", and, of course, backed by an army of lakhs of Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) cadres, who ensured that, if required, specific places could be duly lubricated with blood, as in Muzaffarnagar in Uttar Pradesh and Kokrajhar in Assam. There may hardly be any parallel to this intricate process of wooing voters, even in the developed democracies.

    As such, there is nothing new in this except for the scale and that precisely makes all the difference. Indeed, the last elections have been different in many ways. Leave aside the process, the outcome has been stunning. Thanks to our wonderful first-past-the-post election system that, even in theory, makes a mockery of people's representation. The Bharatiya Janata Party (BJP) scored 282, which came to 53% the total number of seats, with 31% of the votes cast, well above the majority mark, and broke the spell of the coalition era which many people thought had come to stay. Adding the seats won by its allies, the tally rises to 334. As a matter of fact, there is hardly any opposition left to the BJP in the Lok Sabha, except for the Left, the Congress having been really a poor copy of the BJP as far as economic policy matters are concerned. Thus, BJP is in a situation where it can do what it wants. The apprehension of the spectre of fascism felt by many has turned into a veritable possibility. Will India turn into a fascist state? Will it become a Hindu state? Will it be a prison house for the religious minorities?

    Logic of Capital

    Modi ran his campaign in a presidential style, bragging and boasting about himself, but after election, he displayed a changed persona. While entering Parliament House for his confirmation as the party's parliamentary leader, he literally prostrated himself at its steps calling it a temple of democracy, and while speaking inside, swore by the Constitution as a sacred document and declared that his government would be dedicated to the poor, youth and women. He scored further points by inviting the heads of the states of all neighbouring countries and paid his first visit abroad to Bhutan, in symbolic expression that he particularly values friendly relations with neighbouring countries. The sixth Brazil, Russia, India, China and South Africa (BRICS) summit at Fortaleza in Brazil led to the creation of a development bank which could catalyse trade and development within the BRICS member countries. Internally, he has taken several steps to discipline the bureaucracy; he has even told the bureaucrats to resist political interference by ministers and Members of Parliament.

    The pheku of yesterday has gone totally silent, engaging himself with utmost seriousness in the business of governance, opening his mouth only at the end of a month in office to claim that "67 years of previous governments is nothing compared to one month, but I do want to say that in the last month, our entire team has devoted every single moment for the welfare of the people". Indeed, many things could be said in his favour that have impressed people to believe that he could act independently of the RSS or the BJP and may thereby land up doing good things for the people.

    Actually, Modi has been setting the ground for the creation of opportunities for trade and investment for the benefit of big business, which invested heavily in him. While the reforms have always been sold in the name of the people and justified with the dubious "trickle-down" theory, they are actually meant to promote the interests of capital through the laissez-faire economy and are therefore anti-labour. Privatisation of public sector units, commercialisation of public services, handing over of natural resources to the private sector, reliance on the market mechanism for pricing, fiscal measures to incapacitate the state to undertake any economic activity and thereby promote private interests, are the typical contents of neo-liberal policies.

    The people were jolted out of their "achchhe din"reverie by the railway budget that came within days, hiking the passenger railway fares and freight rates steeply by 14.2% and 6.5%, respectively, which would impose a further burden of inflation on an already troubled people. Whether it is signalling dilution of the civil Nuclear Liability Act in line with US demands, deferment of the food security scheme by three months, permitting 100% foreign direct investment in high-speed train systems, suburban corridors and dedicated freight line projects, or policy overhaul in the petroleum sector to woo foreign investment, all these policy changes conform to textbook neo-liberalism. Although these policies were introduced and implemented by the Congress, they will now witness an accelerated pace of implementation.

    Whither Hindutva?

    Modi had maintained a calculated silence on Hindutva, this in order to sharpen his projection on "development". But as an ardent RSS activist, as certified by the RSS Sarsanghchalak Mohan Bhagwat, he can never forget the Hindutva agenda of transforming India into a Hindu nation. This agenda could be advanced in many ways. While the Ram Janmabhoomi movement or the post-Godhra massacre of Muslims are the rabid ways to polarise people for direct electoral gains, there could be a softer approach to surreptitiously transform institutions in line with Hindutva. Hard Hindutva disrupts normal life and the business of profit-making. Moreover, with such a massive mandate, it is really not needed. Modi therefore would not favour communal strife vitiating the investment climate. However, the hydra-headed Sangh Parivar, already intoxicated by his win, will create such problems at the ground level, as in the case of the murder of a Muslim youth Mohsin Shaikh in Pune, which may be difficult to control. Modi will certainly take a soft approach towards Hindutva by systematically saffronising institutions, as he did in Gujarat. A clear case is the appointment of   Y Sudershan Rao, a little-known retired professor of history and tourism management from Kakatiya University, as the new chairman of the Indian Council of Historical Research. This worthy had the foolhardiness to discover goodness in the "Indian Caste System" and proclaim a research agenda to determine dates of the events in the Mahabharata.

    Contrary to the commonplace notion, neo-liberalism is not incompatible with ideological Hindutva; their proclivities with regard to individualism and the social Darwinist attitude fairly coincide. The affinity between Hindutva and fascism likewise is too well known to be elaborated upon. At its core, fascism stands for state authoritarianism, intimidation by conservative-minded extralegal groups, national chauvinism, submission of individuals and groups to a larger-than-life leader, and a Darwinian view of social life, which almost characterises the protagonists of Hindutva. You have to just think of M S Golwalkar, the venerable ideologue of Hindutva, to realise it. At their core, Hindutva, neo-liberalism and fascism are complementary. And this complementariness is exemplarily manifested in Narendra Modi. Ashis Nandy, the noted sociologist had found in him, when Modi was a nobody, "a classic, clinical case of a fascist". Whether it is asking the governors of Kerala, Gujarat, West Bengal, Rajasthan, Maharashtra, Tripura, and Uttar Pradesh to quit in blatant contravention of a Supreme Court ruling, or insinuating abrogation of the Article 370 relating to the special status to Jammu and Kashmir, or adoption of the uniform civil code, or the promulgation of an ordinance for changing the Telecom Regulatory Authority of India Act, 1997, merely to appoint Nripendra Misra as his principal secretary, the fascist streak in Modi cannot be missed. He has removed all potential opposition within the party by installing his man, Amit Shah, as the party chief and is cultivating direct rapport with the bureaucracy to drive past the political class.

    On the Cards

    Saffron neo-liberalism is an aggressive drive towards neo-liberal economic reforms with a simultaneous push towards consolidating the Sangh Parivar's political constituency with the spread of hegemonic Hindutva through sociocultural channels. It includes privatisation, liberalisation, deregulation and complete facilitation of capital, which would entail a closer relationship with the neighbouring countries to create a better business climate and expand international trade avenues. The nationalistic jingoism associated with the BJP would be calibrated by these considerations. The controversial Vaidik episode should be seen within this strategic perspective. Ved Pratap Vaidik, whether he is technically an RSS man or not, was commissioned to engage in a track-2 dialogue with Lashkar-e-Taiba chief Hafiz Saeed camouflaging it with what he blurted on Kashmir. Saffron neo-liberalism will entail a revamp of labour laws, simplification of other laws, and amendments to the Constitution in order to make India more business friendly. It would mean easing land acquisition and freeing the natural resources of the country to be plundered by capital. It would mean progressively positioning Hindutva supporters at all important nodes in the bureaucracy and saffronising educational and other research institutions. In order to stem any dissent in the bud, it would mean strengthening of the internal security apparatus and "zero tolerance" of any resistance. All this is to happen under the unified command of one supreme leader, Narendra Modi.

    Should this plan falter, it would mean switching to militant Hindutva.



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    Status Update




    By Himanshu Kumar
    वर्मा आयोग की सिफारिशों के आधार पर कानून में नयी धारा जोड़ी गयी .जिसके अनुसार अधिकार प्राप्त स्तिथी में पुरुष यदि अपनी अधीनस्थ महिला के साथ यौन शोषण करता है तो महिला की रिपोर्ट तुरंत लिखी जायेगी और महिला के बयान को ही आरोपी के विरुद्ध गवाही माना जायेगा .

    अभी हाल में ही तरुण तेजपाल को इसी धारा के तहत जेल में डाला गया है .

    सोनी सोरी के मामले में ठीक यही धारा लागू होती है . वह पुलिस अधीक्षक अंकित गर्ग की अभिरक्षा में थी .अंकित गर्ग ने उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिये . सोनी सोरी ने सुप्रीम कोर्ट को इसकी सूचना दे दी. कोलकाता के सरकारी अस्पताल ने सोनी सोरी के गुप्तांगों से पत्थर निकाल कर सर्वोच्च न्यायालय के सामने रख दिए . 
    सर्वोच्च न्यायालय ने आज तक अंकित गर्ग के विरुद्ध प्राथमिक रिपोर्ट लिखने का आदेश नहीं दिया .

    छत्तीसगढ़ के सरगुजा की लेधा नामकी आदिवासी महिला के गुप्तांगों में पुलिस अधीक्षक कल्लूरी ने मिर्चें भर दी थीं . थाने में पुलिस वालों ने महीना भर लेधा के साथ बलात्कार किया . कल्लूरी ने केस वापिस करवाने के लिए लेधा के परिवार का अपहरण कर लिया . 
    लेधा अब मजदूरी कर के अपना पेट पालती है .कल्लूरी को वीरता का प्रमोशन मिल गया .

    उड़ीसा की आदिवासी लड़की आरती मांझी के साथ पुलिस वालों ने सामूहिक बलात्कार किया . आरती मांझी पर सात फर्ज़ी केस बना कर जेल में डाल दिया . आरती मांझी सातों मामलों में बरी हो गयी है . 

    पुलिस वालों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है .

    छत्तीसगढ़ की कवासी हिड़मे के साथ थाने में पुलिस वालों ने इस बुरी तरह यौन शोषण किया कि उसका गर्भाशय बाहर आ गया . हिड़मे सात साल से जेल में है . हिड़मे की अभी आयु बाईस साल है . प्रतारणा के समय वह मात्र पन्द्रह साल की थी .

    क्या एक देश का कानून अलग अलग समुदाय के लिए अलग अलग तरह से काम करता है ? 

    अगर आप इस बात को सहन कर लेते हैं कि देश का कानून अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग तरह से ही काम करेगा तो ऐसे पक्षपात पूर्ण कानून को इस देश के करोड़ों लोग अपना कानून कैसे मानेंगे ? 

    हम चाहते हैं कि कानून का राज आये . लेकिन अगर आप अपने कानून को खुद ही लागू करने में हिचकिचाते हैं तो पूरे देश में कानून का राज कैसे लागू होगा ?

    ये कानून आदिवासी इलाकों में कब लागू होगा.

    संदर्भवश आज विश्व आदिवासी दिवस भी है .

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    अब तेलकुओं की आग भी केसरिया हुआ रे भाया।


    गब्बर पूछै बैंकिंग सेक्टर से,अब कालिया,तेरा क्या होगा रे

    अमेरिका संग रास रचायेंगे,शाही कबाब बनवाएंगे

    पलाश विश्वास

    The government had introduced the Factories (Amendment) Bill, 2014, and the Apprentices (Amendment) Bill, 2014, in Lok Sabha on Thursday .


    

    Wants NDA to junk provisions on women workers in night shifts, employing apprentices

    Congress has decided to object to four key amendments in the labour laws introduced by the government this week, setting the stage for another confrontation with the ruling party .

    Senior Congress MPs, including vice-president Rahul Gandhi, met on Friday and decided the party won't support the Bills unless the government drops these amendments which, they argue, is completely different from what the previous UPA regime had worked on.



    The Central Bureau of Investigation (CBI) arrested Singal earlier this week in the Rs 50lakh bribery scandal involving Syndicate Bank chairman S K Jain, who is also in custody .

    SBI has a Rs 6,000-crore exposure to Bhushan Steel, a sizeable chunk of the steelmaker's Rs 40,000-crore borrowings from Indian banks. Syndicate Bank has a Rs 100-crore exposure the steelmaker . Bhushan Steel's market cap stood at Rs 4,969 crore on Friday.

    IN THE RIGHT DIRECTION Issue of technology transfer also discussed with visiting US defence secretary as government is focused on manufacturing of defence equipment at home

    Prime Minister Narendra Modi on Friday told visiting US Defence Secretary Chuck Hagel that India would like to work with US defence majors on a joint development and co-production model as part of Delhi's efforts to achieve self-reliance and reduce arms import.


    वैश्विक इशारों में तो फिर कयामत की आहट है।

    गृहयुद्ध से छिन्न भिन्न इराक में फिर वहीं तेलयुद्ध का नजारा।


    अमेरिकी अगुवाई में नाटो युद्धक विमानों की चांदमारी और तेलकुंओं मे लगी अनंत ज्वालामुखी।


    दूसरी ओर अमेरिकी सैन्य राजनयिक मदद से इजराइल का विश्व जनमत को हिरोशिमा नागासाकी बनाकर गाजापट्टी में इंसानी शिक कबाब की बेलगाम दावत।


    डालरनत्थी भारतीय अरबपतियों करोड़पतियों,अब भी वक्त है,डालर पर मत इतराइयो।


    मुम्मु बेबी से काका ने कभी गा गा कहकर कहा था,गोरा रंग ढल जायेगा।


    खैर,पहले सुपरस्टार  काका तो अल्लाह को प्यारे हो गये।


    एंग्री यंगमैन अब भी थोक भाव से अरबपति बनाने वाली मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में करोड़पति बानाने की कवायद कर रहे हैं और अबकि दफा करोड़पतिया बाबा के योगाभ्यास शिविर में कहकहे लगवाकर अरबपति बने ताजातरीन हंसोड़ बादशाह भी नत्थी है।


    बेमौत मारे जाने वाली कौम की संजीवनी कामेडी कम लाटरी है।


    डालर पर घनघर संकट बदरिया छायो रे।सद्दाम की आत्मा जाग्यो री।

    पुतिनबाबा ने पश्चिमी देशों से आयात पर बंदिश लगा दी है और साइबेरिया उड़ान क्षेत्र भी निषिद्ध होने वाला है।


    1989 का वह संक्रमणकाल याद करो रे भाया।


    ब्लू स्टार से बहुमती बाहुबलि सरकार ने श्रीलंका में शांति सेना भी भेज दी थी तब।


    फिर इलेक्शन में अमेरिकापरस्त भ्रष्टाचार विरोधी जनजागरण की फसल बतौर दो संतानें एकमुश्त एकदम फिल्मी,कमंडल बनाम मंडल।


    आरक्षण युद्ध का कायकल्प बाबरी विध्वंस तक और इसीके मध्य चंद्रशेखरी भुगतान संतुलन संकट और खाड़ी युद्ध।


    तत्पश्चात नरसिंह अवतार और मनमोहनी अवतरण।


    नवउदारवाद का वह पहला चरण वह।


    अबकी दफा अमेरिका इजराइल के साथ नत्थी डालर इकोनामिक्स,पारमाणविक सैन्य गठजोड़,गाजापट्टी विध्वंस,केसरियाकारपोरेट नमोनमोमय भारत और तेलकुंओं की आग अपन यूपी में जहां हर जनपद अब इराक है,बस अमेरिकी बमवर्षकों की कसर बाकी है।


    ऊपर से सरकार पर भारी कारपोरेट शाहसवारी।


    फिर अकाली राजनीति प्रबल उसीतरह और आपरेशन ब्लू स्टार परिदृश्य घनघटा गगन घटा घहरानी अस्सी का दशक अस्सी गंगा तीरे तो ब्रह्मपुत्र में भंवर प्रबल कि उल्फा युद्धघोषणा हो गयो रे।


    नवउदारवाद का दूसरा चरण यह।


    तब बाबा बुश थे।

    अब बाबा बाराक हुसैन ओबामा।

    तब यूरो प्रवक्ता सद्दाम यूरो सहयोगे महिषासुर।

    अबकी दफा पुतिन महिषासुर।

    दुर्गाअवतार की झांकी अभी बाकी है।


    इसी पृष्ठभूमि में विदेशी निवेशकों की अटल आस्था डगमगाने लगी है।


    अब जैसे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मार्कमानक का हुआ,वैसा किसी गणितीय त्रिकोणमिति चमत्कार से असंभव अमेरिकी पराभव से मसलन यूरो के पुनरूत्थान चमत्कार से हो गया तो इस अरबपति करोड़पति जमात का क्या होगा रे।


    इसी के मध्य खैनी मसलते गब्बे बोल्या,अबे बैंक कित्ते ठैरे।


    अबी गिनती मुश्किल है।जवाब।


    का विवनिवेश विनिवेश चीख्यो,सभै सही सलामत कैसे रे।गब्बर बोल्यो।


    एसबीआई को मार दो।


    एसबीआई कांपे बुखार लागा हो जैसे।


    क्या होगा रे तेरा।बहुत नमक खायो जनता ने सर गब्बर भाया।


    मलाई चाट्यो कौन ससुरै।एसबीआई की बोलती बंद।


    नमक खायो जनता ने।मलाई चाट्यो जनता ने।


    तू अब गोली खा।


    इस मकम्मल मुक्तबाजारी कायाकल्प के दूसरे चरण की उड़ान के ठीक पहले के क्षण गाजा इराक यूपी त्रिभुजमध्ये फंसा है सार्वजनिक क्षेत्र का बैंकिग सेक्टर।


    जब तक ये बैंक असुर रहेंगे ससुरे,कोई सुधारो पोसिबिल नहीं।


    सारे के सारे पढ़ेलिक्खे दीखै।


    मुसीबतो है।


    सबै चाल बूझ लियो तो विपदा घनघोर।


    इन सारन को धूल चटादो दो कुरुक्षेत्र फतह।


    सर को खींच्यो तो कान नाक आंख सबैं हाथोंहाथ।


    विनिवेश का सारा बोझ बैंकिंग सेक्टर पर।


    एसबीआई और एलआईसी हिस्सेदारी खरीद में साझेदार।


    सारी राजनीतिक घोषणाओं,सामाजिक योजनाओं से बंटाधार वहीं एसबीआई का।

    बैड लोन की भारी शिकायत है।

    बैड लोन आखिर है क्या बला।

    बैंक वाले इतने भी गधे नहीं कि कारोबार समझते नहीं।

    कारपोरेट को बैंकलोन का फैसला राजनीतिक दबाव से होता है।

    एक फीसद दो फीसद ब्याज दर कौन तय करता है।


    विजय माल्या का किंगफिशर हो या भूषण स्टटील,बैड लोन का आखिरी फैसला किसका होता है,इसकी कभी सीबीाई जांच नहीं होगी।


    वित्तमंत्री जो है वहीं फिर रक्षा मंत्री है।

    अमेरिकी सरकार पधारो म्हारा देश।


    अमेरिका संग रास रचायेंगे।

    शौ पीसद,सौ फीसद डीफेंस एफडीआई

    इस पर तुर्रा बीमा एफडीआई

    उस पर भी तुर्रा रिटेल में विदेशी बहार


    इन सबसे ऊपर बीस ताले पर बैठो विपक्ष और क्षत्रप सारे।


    पार्टी वहीं जिसकी मय्या महतारी रिमोटधर्यो।

    बेट्टा डोलत हुंकारे।


    बिटिया रानी नाच नचाओ।


    दामाद जी  कैश धर्यो गिरधारी महाराज।


    औरतें नाइट शिप्ट में कमाई के कातिर बाहर न निकले नमो महाराज।

    अप्रेटिंस को भी जाब मिलना चाहिए।


    इतना सा राइडर है भायो।बाकी फैक्ट्री एक्ट बदल दो।


    ससुरे लेबर कमीशन को हिजड़ा बना दो।सारे कर्मचारियों का गला काट दो।


    जो भी कुछ है सरकारी चाहो तो इस सरकार का भी विनिवेश कर दो।


    श्रम कानून तो क्या चीज है,सारे कानून का हाल यही होना है।


    संविधान को फेंक देना है।


    न खाता न बही।जो शाहज्यू कहें, वही सही।


    घर घर गाजा।

    घर घर इराक।

    घर घर यूपी।


    जय जय जय बाराक बाबा की जय हो।

    जयजयजय हो।

    जय जयजय साहज्यू महारजा की जयहो।

    पांव लाग्यो रहै महाराज।

    न अगवाड़े की सोच्यो।

    नि पिछवाड़े की सोच्यो।

    दसो दिशायें केसरिया है।

    अब तेलकुओं की आग भी केसरिया हुआ रे भाया।


    Aug 09 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    To Ensure Labour Pangs for NDA, Cong sets Terms to Back Factory Bill

    CL MANOJ

    NEW DELHI

    

    

    Wants NDA to junk provisions on women workers in night shifts, employing apprentices

    Congress has decided to object to four key amendments in the labour laws introduced by the government this week, setting the stage for another confrontation with the ruling party .

    Senior Congress MPs, including vice-president Rahul Gandhi, met on Friday and decided the party won't support the Bills unless the government drops these amendments which, they argue, is completely different from what the previous UPA regime had worked on.

    In the Factories Law Act, Congress is objecting to the provisions for increasing the number of employees without giving them provident fundgratuity cover. The party also wants the government to drop the proposal to lift the ban on employing women in night shifts from 7 pm to 6 am. Congress thinks this provision goes against the spirit of increasing the safety and welfare of women workers.

    In the Apprentices Act, it is against the amendment that seeks to allow factories to enhance the minimum number of apprentices employable, per quarterly , from 50 to 100 per unit.

    The party thinks it could encourage factories to "to make increasing use of apprentices at the cost of regular workers" as a shortcut to skirt the provisions of labour laws besides affecting chances of regularisation of apprentices.

    The government had introduced the Factories (Amendment) Bill, 2014, and the Apprentices (Amendment) Bill, 2014, in Lok Sabha on Thursday . ET had reported that Sangh-affiliated trade union Bharatiya Mazdoor Sangh too had reservations about the amendments.


    

    




    Aug 09 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Let us Jointly Develop Arms: Modi to Hagel

    DIPANJAN ROY CHAUDHURY

    NEW DELHI

    

    

    IN THE RIGHT DIRECTION Issue of technology transfer also discussed with visiting US defence secretary as government is focused on manufacturing of defence equipment at home

    Prime Minister Narendra Modi on Friday told visiting US Defence Secretary Chuck Hagel that India would like to work with US defence majors on a joint development and co-production model as part of Delhi's efforts to achieve self-reliance and reduce arms import.

    Hagel, in New Delhi exactly a week after Secretary of State John Kerry made his trip to India, was told that the Modi government would like to boost defence partnership beyond a buyer-seller relationship, according to official sources.

    The issue was discussed at the Strategic Dialogue with Kerry too.

    The issue of technology transfer was also discussed as the Modi government is focused on manufacturing of defence equipment at home. "The prime minister underlined the importance of defence relations in the overall strategic partnership between the two countries and indicated his desire to see progress in defence relations, including in defence manufacturing in India, technology transfer in defence, exercises and higher studies in the field of defence," a press release issued by PMO said.

    Officials well-versed with the development told ET that Modi's mantra is to attain self-sufficiency in defence manufacturing through joint development and co-production with countries like US, France and other interested partners besides existing cooperation with Russia.

    "This collaboration helps in transfer of technology for Indian defence firms to adopt modern technologies and will reduce dependence on arms import in long run," a source said.

    T he Union Cabinet had on Wednesday approved a proposal to raise foreign direct investment in defence to 49% from 26%. En route to India, Hagel said the US was mindful of the sensitivities of India's independence and non-aligned status.

    However, officials admitted that US defence majors were not still excited about 49% FDI and would prefer a controlling stake for transfer of technology and manufacturing quality equipment. The Cabinet's decision still may not encourage big US defence firms to seek partnership here, sources hinted.

    Renewing a 10-year defence framework agreement due to expire next year is high on Hagel's agenda. Hagel who met Finance Minister Arun Jaitley, Exter nal Af fairs Minister Sushma Swaraj and NSA Ajit Doval on Friday discussed India's purchase of 22 Apache attack helicopters, 15 Chinook heavy-lift choppers and four P-81 anti-submarine aircraft. The Apache helicopters would be armed with Hellfire and Stinger missiles.

    There was also reported discussion about a US offer to jointly develop and produce the next generation of the Javelin missile in India for the Indian market as well as for export.

    Jaitley and Hagel agreed to take the Defence Technology and Trade Initiative forward. The contact person from the Indian side will be the Secretary, Department of Defence Production, and the United States will be represented by the Under Secretary for Acquisition, Technology and Licensing at the Pentagon. Jaitley said, "the development of our own indigenous capabilities is a major objective that guides our present policies. In this direction, we have taken steps to raise FDI cap in the defence sector."



    Aug 09 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    SBI Q1 Net Profit Rises 3%


    MUMBAI

    OUR BUREAU

    

    

    BEATS STREET Provisioning, treasury income a drag, but lower expenses aid profitability

    tate Bank of India reported a 3% rise in quarterly earnings as bad loan provisioning and lower treasury income slowed growth, but a cut in expenses improved profitability. The lender projected a rise in demand for loans from companies whose stalled projects get moving again under a new government and amid signs of a revival in growth.

    The bank, pummelled by high default rates in the past due to the economic slowdown, said the demand for loan restructuring is falling as activity picks up.

    The bank said that the June quarter net profit rose to .

    `3,349 crore from .

    `3,241 crore a year earlier. This was higher than the .

    `3,250 crore estimated in a poll of analysts by Bloomberg. Net interest income (NII), the difference between revenue earned from lending and cost of funds, rose 15% to .

    `13,252 crore from

    .

    `11,512 crore a year ago.

    "It is slowly starting to look up, but it is still weak," said SBI chairman Arundhati Bhattacharya. "This is also in respect of infra projects that had begun and got stuck but now get going again. As and when they finish (a) particular state of implementation, there will obviously be drawdown on the next stages. There are projects of that sort also to which we have done disbursements.'' Indian banks, especially staterun lenders that funded infrastructure at the behest of the previous government, are only slowly being able to lighten the bad loan burden that became heavy as companies defaultedamid the slowdown and projects got stuck due to indecision and lack of clearances. Although sentiment has perked up with a new government taking over, it may be a while before the economy gathers momentum.

    SBI's gross bad loans declined to .

    `60,434 crore from .

    `60,891 crore last June. Total bad loans and restructured

    debt, in which terms have been altered, have fallen to .

    `1.02 lakh crore from .

    `1.07 lakh crore in December.

    "The pipeline is definitely growing thinner," said Bhattacharya, referring to the demand for restructuring of loans. "The inflow that is coming into corporate debt restructuring has slowed down. If your asset quality improves, profitability improves,'' Bhattacharya said.

    But the bank is worried about the jump in defaults in its agriculture portfolio, mostly triggered by the Telugu Desam Party's election promise to waive farm loans in Andhra Pradesh. In fact, defaults in other states that are set to hold assembly elections, are also climbing. Fresh defaults in this group stood at .

    `1,959 crore in the quarter.

    "It begins to have a spillover effect,'' said Bhattacharya.

    "It is necessary to have credit discipline, if not, they would not be able to come up to their potential."


    

    


    Aug 09 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    Obama Nod for Airstrikes in Iraq Sends FIIs Scurrying for Cover


    MUMBAI

    OUR BUREAU

    

    

    GEOPOLITICAL WHAMMY Sell .

    `503 cr of stocks on oil surge fears; Sensex falls 260 pts

    Stock investors, who had expected tapering by the US Federal Reserve to be the biggest party-pooper this year, are battling another enemy — geopolitical concerns. US President Barack Obama's nod for targeted airstrikes in Iraq on Friday, coupled with escalating tensions between Russia and Ukraine, has heightened the risk potential, sparking a selloff on Dalal Street.

    Indian stocks lost some of their sheen as foreign institutional investors (FIIs) sold shares worth .

    `503 crore, fearing rising geopolitical worries could lead to a renewed surge in oil prices.

    "Investors are concerned that if the geopolitical crisis deepens, FII flows would take a hit," said Raamdeo Agrawal, joint managing director, Motilal Oswal Financial Services.

    The Sensex, reflecting the mood, lost 259.87 points, or 1.02%, to close at 25,329.14.

    The NSE Nifty shed 80.70 points, or 1.06%, to end the day at 7,568.55. The MSCI Asia Pacific Index, too, fell 1.4% after Obama authorised airstrikes in Iraq. Meanwhile, Russia, in response to sanctions over Uk

    raine, imposed an embargo on food imports from the European Union, the US and some other Western countries.

    But purchases by domestic institutions, including mutual funds and insurance companies, to the tune of .

    `456 crore, helped the markets contain losses on Friday. BSE's mid and small-cap indices fell over 2% as declines outnumbered advances in the ratio of 2,118:800 on the BSE. Metal, capital goods, real estate and bank stocks led the fall on Dalal Street.

    The rupee, however, strengthened against the dollar, recovering from a five-month low it had hit earlier in the day.

    The Indian currency rose 8 paise, or 0.13%, to close at 61.15 against the dollar from its previous close of 61.23. Earlier in the day, it had touched 61.74, the lowest level since March 5.

    Sentiment indicators, however, reveal investors aren't panicking over the geopoliti

    markets contain losses on Friday . BSE's mid and small-cap indices fell over 2% as declines outnumbered advances in the ratio of 2,118:800 on the BSE. Metal, capital goods, real estate and bank stocks led the fall on Dalal Street.

    The rupee, however, strengthened against the dollar, recovering from a five-month low it had hit earlier in the day.

    The Indian currency rose 8 paise, or 0.13%, to close at 61.15 against the dollar from its previous close of 61.23. Earlier in the day, it had touched 61.74, the lowest level since March 5.

    Sentiment indicators, however, reveal investors aren't panicking over the geopoliti cal tensions yet. The Volatility Index (VIX), a measure of traders' perception of nearterm risks in the market based on Nifty options prices, rose 3.4% to close at 14.61, off the day's high of 15.18. This gauge is still around the lower end of its trading band.

    "This (geopolitics) will only have a shortterm impact on the Indian market. People have so far bought on rumours and sold on news," said Agarwal. "Now investors will slowly start building their long-term portfolio as earnings are improving," he said.




    




    Aug 09 2014 : The Times of India (Bangalore)

    US in Iraq again, bombs ISIS to `prevent genocide'

    Chidanand Rajghatta & Agencies

    Washington/Irbil:

    

    

    But No Boots On Ground, Says Obama

    US warplanes bombed Islamist fighters marching on Iraq's Kurdish capital in the north on Friday after President Barack Obama said Washington must act to prevent "genocide".

    Militants of the Islamist State (formerly ISIS), who have beheaded captives in their drive to eradicate "infidel" minorities, have advanced to within a half hour's drive of Irbil, the Kurdish capital and a hub for US oil companies.

    Pentagon said two fighter jets had dropped bombs on a mobile artillery piece used by ISIS fighters to shell Kurdish forces defending Irbil. The bombing marked the deepest US engagement in Iraq since troops withdrew in late 2011 after nearly a decade of war.

    Obama had on Thursday authorized airstrikes against ISIS even as he pledged not to return US ground troops to the region. Ahead of the strike, US aircraft dropped food and water to minority Yazidis trapped on Mount Sinjar, driven out by ISIS and facing annihilation. US airlines and other commercial carriers have been barred from flying over Iraq except in emergencies.The US President, who campaigned on a platform of extricating US troops from Iraq and Afghanistan, suggested his hand was forced by barbaric militants of the ISIS advancing on Irbil, a nerve centre of US operations in Iraq.

    "People are starving. And children are dying of thirst.

    Meanwhile, ISIS forces below have called for the systematic destruction of the entire Yazidi people," Obama explained in a late-night address from the White House, saying when the US has the unique capabilities to help avert a massacre, it is the American thing to take action.

    "That's a hallmark of US leadership. That's who we are," the president told a nation that is largely sceptical of getting entangled in foreign crises again after two wars that have cost over a trillion dollars and thousands of casualties. US officials said Pentagon has been authorized to launch airstrikes against ISIS extremists if the military determines that Iraqi troops and Kurdish forces are unable to break the mountain siege and there is imminent danger of massacre of the trapped people.

    Danger to nearly 1000 US personnel in Baghdad and Irbil, both under threat from rampaging ISIS forces, will also precipitate air strikes.

    Obama's turnaround, which came after weeks of resisting military action, followed continuing ISIS advances in Iraq that a token infusion of about 700 US military personnel failed to stem.


    Aug 09 2014 : The Times of India (Ahmedabad)

    Fighting resumes in Gaza after 3-day ceasefire ends


    GazaJerusalem

    REUTERS

    

    

    Israel Launches Air Strikes After Hamas Fires 45 Rockets

    Israel launched air strikes across the Gaza Strip on Friday in response to Palestinian rockets after Egyptian-mediated talks failed to extend a 72-hour truce in a month-long war.

    Egypt later called for a resumption of the ceasefire, saying only a few points remained to be agreed. Palestinian factions said they would meet Egyptian mediators later in the day, but there was no sign of any imminent deal.

    An Israeli government official said Israel would not negotiate with Palestinians while militants continued to unleash missiles. As warning sirens sounded in southern Israel, the military said "Gaza terrorists" had fired more than 45 rockets on Friday morning and the "Iron Dome" interceptor system had brought down two.

    Islamic Jihad and the Popular Resistance Committees claimed responsibility for the salvoes from the Hamasdominated enclave.

    Accusing Hamas of breaking the ceasefire, Israel said several of the rockets had been launched about four hours before the truce was due to end at 8am (0500 GMT). By resuming the attacks, Gaza militants appeared to be trying to put pressure on Israel, making clear they were ready to fight on to end a blockade that both Israel and Egypt have imposed. In the first casualties since Friday, Palestinian medical officials said a 10-year-old boy was killed in an Israeli strike near a mosque in Gaza City . An Islamic Jihad militant was killed in a later hit.

    In Israel, police said two people were injured by mortar fire from Gaza. After a huge explosion in Gaza City, a military spokesman said Israel had responded by launching strikes at "terror site" across the Gaza Strip.

    Israel had earlier said it was ready to agree to an extension as Egyptian go-betweens pursued negotiations with Israeli and Palestinian delegates. Hamas spokesman Sami Abu Zuhri said Israel had rejected most demands.

    Hamas's refusal to extend the ceasefire could further alienate Egypt, whose government has been hostile to the group and which ultimately controls Gaza's main gateway to the world, the Rafah border crossing.


    Aug 09 2014 : The Times of India (Ahmedabad)

    SBI wants external agency to run Bhushan Steel after MD's arrest


    Mumbai:

    TIMES NEWS NETWORK

    

    

    The State Bank of India (SBI) will push for appointing a managing agency to run Bhushan Steel after the arrest of its vice-chairman and managing director Neeraj Singal.

    The Central Bureau of Investigation (CBI) arrested Singal earlier this week in the Rs 50lakh bribery scandal involving Syndicate Bank chairman S K Jain, who is also in custody .

    SBI has a Rs 6,000-crore exposure to Bhushan Steel, a sizeable chunk of the steelmaker's Rs 40,000-crore borrowings from Indian banks. Syndicate Bank has a Rs 100-crore exposure the steelmaker . Bhushan Steel's market cap stood at Rs 4,969 crore on Friday.

    SBI officials said usually a consultancy firm or an investment bank is appointed as a managing agency to look after the day-to-day affairs of a company .

    "We have talked to the consortium leader Punjab National Bank as well as other banks, in cluding private lenders. We will try to bring in a management agency , which will look at the day-to-day running of Bhushan Steel. This is a very good quality asset, it is running properly and we don't want it getting into any kind of trouble," said Arundhati Bhattacharya, SBI chairman.

    She said that the managing agen cy would be like an administrator and there was no move to change the management "This is a listed company and we cannot just ask the management to go out," said Bhattacharya.

    The SBI chairman said if approved by the consortium of lenders, the proposal would be taken to the board and that they expected the company to be conducive to it.

    "Earlier, when there had been an accident (at one of the company's plants), the consortium had advised appointing a safety adviser on the board, which the company did. Even in this case, I don't really think the borrower will have any objections," Bhatta charya said.

    Bhattacharya said the SBI was not reviewing its lending to the steelmaker as the loan was a standard asset and instalments were being paid in time. "I don't think a forensic audit is called for at this stage. If at a later date we feel it necessary , we will ask for it," said Bhattacharya.

    Founded by its chairman Brij Bhushan Singal, Bhushan Steel has the country's largest cold-rolled steel plant and is a major supplier to automotive companies -it recently increased capacity . The company has three manufacturing plants in Sahidabad (UP), Khopoli (Maharashtra) and Meramandali (Orissa).


    


    Aug 09 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    VHP HELPLINE ADDRESSES HINDUS' CONCERNS - For `Distressed' Hindus, Help is Just a Call Away

    VASUDHA VENUGOPAL

    NEW DELHI

    

    

    From clearing doubts to legal advice to `saving' Hindu girls, call centre does it all

    NEW DELHI The room in Delhi's RK Puram has three people answering phone calls, but this is no ordinary help centre. The three people answering calls are working out of a Vishwa Hindu Parishad office and this is part of the Hindu Helpline, which aims to be a one-stop shop for all things related to the faith -from advice on rituals to guidance on what's to be done if your daughter is being harassed by "Muslim boys".

    It's a helpline planned by VHP's Pravin Togadia for the country's majority community and the people staffing the phones insist India's Hindus need a service such as this.

    A caller who identifies himself as Pankaj Pradhan from Ranchi says he's in Ramanathapuram and needs help in getting a Navagraha puja conduct ed. The next is from Atmaram in Mumbai who says his plot has been taken over illegally by a Muslim builder. There are a few calls asking about the most auspicious time for rakhi.

    Then comes the kind of call that everyone at the help centre knows is important. "I am speaking from Gurgaon. A group of Muslim boys has been harassing my daughter for a while now. Can you help?" Deepak Kumar, the coordina tor of the Hindu Helpline in New Delhi, immediately takes charge and asks the caller to drop by the VHP office. Kumar, who runs a business of selling water purifiers, meticulously writes down the details. "Do they also click pictures when your daughter walks by?

    Has he talked to her yet? Does your daughter have a phone?" The call centre functions mainly out of Pune but has help centres in nearly 50 cities, including Delhi. VHP, which celebrates its 50th anniversary the dela VASUDHA next week, VENUGOPAL says the service is run by 40 peo was ins NEW DELHI ple who answer calls full time and boasts of lo least a nearly Five years 30,000-strong network after they submitted ready speakin docuto rements to any spond for adopting Hindu's a child in India, call for help. Indian Devi The and Josephproject helpline will finally was get to see a launched child f with their the sole purpose six-year-old `daughter' of showingwhen"thethe Hindu soon ha non-resident brotherhood in action", Indian settled intold couple Togadia gruellin ET. "From Dallas in the United clearing States doubts oncomes Hinduism to toJoseph, enDelhi suring a hassle-free next month to take her home.

    stay in an unknown their fir and It has city providing been a long waitadvice filledon legal prob with NRI co home lems, studies, we try to provide delays andinstant court prowith help to theth cedures.

    caller. The attempt "The is to make adoption agency in parts the Hindu feelfol proud Delhi has part of a network been regularly of being sending us adoptio of over 100 pictures of Siara, crore Hindus," but the we feel VHP leader says. Women we have missed out a good The service part of her has handled about 85,000sult, childcallsNR in two years.

    hood," said Joseph, For helpless and frustrated 43, who hails opportcallfrom Bangalore ers, the community initiative and works as soft offers in Indi hope ware analyst that their in the concerns US.

    will be addressed, "At one change Kumar says.

    point, "There we had decided have to adopt been casesa where der wh people child from have alerted China or Ethiopia, us of cows where given to being taken into madrasas," suggesting the schools r with resident could also be doublingIndians, cut proce up as illegal abatelay is much toirs. "We less, have rescued but my wife them by goingGan Maneka in groups.

    nsistent We child our are doing it for should attheworking Hindus, liketow look like us," Christians andsaid Joseph, Muslims Juvenile help their people.

    Justi Our ing overattempt is to make sure no the phone. ten to adopti Hindu feels anhelpless expatriates in this hoping to adopt country ," Kumarchild welfare says.

    d from their home Volunteers say they may country receive at least judges 80d not to havecalls daily, ranging to submit to a much less issues such as from ling Hindu experience tourists than stuck in and pilgrimage Devi Indian spots to author h, who wished about complaints to reveal only neighbours.

    Muslim ities stopped first names.curious about rituals Hindus are told accepting about couples could the be treated onprinciples""scientific a par applications that untheir resident derpin them and counter Indian advised on auspicious from NRIs in days and ollowing religious 2012 activities.

    changes timingsbeing made for to October and medical time is also ion Legal, by the Ministry rulesfinancial of help for some en provided and Child Welfare.

    to Hindus, As aaccording reto broNRI couples chures forcould have equal the helpline, which overseas has eminentchild retiredfor rtunities adopting senior civil a child of servants, adoption.

    doctors and T dia. This will lawyers on its advisory spell a major board.seas adoption ge from The the is publicised existing service rules, unby 430 in 2013-201 Hindu orga nisations, hich the first ashrams preferenceand temples.

    is often the `reje The vol tounteers India-based mostly businessmen are couples. ing fair-skinne or stu dents selected for who they know and their ssing willingness time tofrom serve the2-6Hinduyears to 10 community, besides dhi, whose ministry having access is to resources, than of age one yearsuch as bu a vehicle ards fine-tuning that can the arein be used to an be first picked by emergency.

    ce Act, has already Dealing the `harassment' with writsaid a senior offici of Hindu girls on in states, part is a significant agencies Adoption Resource of their work.

    "We get heads committee a large and number body that about handles of calls and elay the processing Muslim of tions boys harassing girls -at in India.

    Hindu adoption least 20 in applica Uttar Pradesh The and official New added, Delhi "T alone, tions. few years Aeveryday ago ," Kumarafter waiting says. for man Of course, the VHP men adoption are scrupulously agencies left to choose from c law-abid ing, he's were asked quick to add.

    to stick to "We medical don't issues, whic take these a ratio ofinto matters 80:20, with our handschoose but we tomake go to sure other the police only and a fifth of the chil the give up on community the process.

    know it and do something about it."

    dren for adoption years, over 8,000 NRI The helpline has a policy of not getting in abroad, in a move inapplied for Indian chi volved in public troduced to curb agitations, have been a few Togadia sho says.

    "In cases of trafficking the garb screen in harassment we quickly the NRIinform coupl his VHPled members and theto to a fall in overpolice keep inthe the area." v number s from 628 in As soon as2010-11 to this calls like causearewereceived, know due the t 4.

    "What helpline thealerts NRIs get is rules Bajrang Dal weactivists don't haveandma youths cts'. associated NRIs insist on havlist with thefor adoption.

    Hindu Samaj.

    We w d, Of healthy late, helpline volunteers children less list once havethealso new rules been getting calls from Hindu women married -12 mths andGROWING to Muslims POOL wanting to return to their t such families, men are couples children here," Poolsince especially of eligible many of these big-time bigamists, Kumar says.

    al "Their at Centralfamilieschildren for to accept are not ready Authority, them butthe we will try to rehabilitate them," Kumar adopmonitors says. "Theadoption set culture and to of a nature Hindu and Muslim is very different. There is NRIs, he no wayeven grow; a Hindu girl agencies will be happy in a yMuslim months, hildren are . Our women cannot even see family with their husbands welcome move laugh and talk to other hwomen, and there she has to see him share is why they countries his life with orthree or four other wives. Even tually " In the,past 10 she because NO isDELAY alone and with no sup port, she couples is left with no one to care for her."

    have ldren The but Govt may do only says it's been able to help in helpline rtlisted.

    cases where "We members of a Hindu family many eshave away with in accidents by arranging tickets times died ery and o help with be small in emergencies.

    the existing intermediary last rites. It's also been able to ny "Last year, children operatives that to a girl from Chandigarh devel ill expand oped theabdomen pain while on a train severe are notified."

    to Delhi. delay process Her father called us frantically and in an hour, our volunteers reached her in Sonepat," says Shibubhai, a member of the organisation.

    Devendra Apte from Nashik says he called the helpline once when his brother passed away in New Delhi on an official trip. "Not only did they help with the formalities of post mortem, but also arranged for the body to be sent to Nashik."

    The greatest urgency is reserved for calls related to forced conversions. "We consider every call as an emergency call and our strength is our network that we put to use instantly," Shibubhai says.

    Then there are Muslims who buy homes in Hindu areas, something Togadia himself has said needs to be actively discouraged.

    "Sometimes Hindus living in areas meant for Hindus sell their houses to Muslims, and the situation becomes grave when the latter doesn't vacate, despite neighbours having problems with him," says a volunteer.



    

    




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    नवारुणदा,हम फैताड़ु फौज के साथ लामबंद हैं और इस छिनाल कयामत के खिलाफ कोई बैरिकेड जरुर बनायेंगे,यकीनन।

    पलाश विश्वास


    Kas Turi

    August 4

    কমিউনিস্ট পার্টি ও আমি

    ~নবারুণ ভট্টাচার্য


    কেউ পেয়েছে একটা মোবাইল ফোন

    কেউ পেয়েছে লটারির জ্যাকপট

    কেউ পেয়েছে নকল পা

    কেউ আবার শিরোপা

    কিন্তু আমি

    আমি পেয়েছি একটা পার্টি

    এবং যে সে এলেবেলে নয়

    একটা আস্ত কমিউনিস্ট পার্টি


    এই বারেই নয় ছয়

    আমাকে কি নেবে

    না ঘাড় ধাক্কা দিয়ে ফিরিয়ে দেবে

    কে জানে কি হয়


    আবার এমনও তো বলা যায়

    নানা সাধু চিন্তার ফাঁকে

    কমিউনিস্টদের যে হতচ্ছাড়া পার্টি

    পেয়ে গেল ভুলভাল সেই লোকটাকে


    (নবান্ন, বই মেলা সংখ্যা, ১৪১৫/২০০৯)


    আগামী ৬ আগস্ট, ২০১৪ সন্ধে ৬টায় যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের অভ্যন্তরে ত্রিগুণা সেন প্রেক্ষাগৃহে পশ্চিমবঙ্গ গণসংস্কৃতি পরিষদ, ভাষাবন্ধন পত্রিকা ও নবারুণদার পরিবারের পক্ষ থেকে নবারুণ ভট্টাচার্যর প্রতি শ্রদ্ধা জ্ঞাপন করা হবে। একটি প্যানেল ডিসকাশনে অংশগ্রহণ করবেন, পরিচালক সুমন মুখোপাধ্যায়, গণতান্ত্রিক আন্দোলনের কর্মী অধ্যাপক শুভেন্দু দাশগুপ্ত, অধ্যাপক সঞ্জয় মুখোপাধ্যায়, জনসংস্কৃতি মঞ্চের সাধারণ সম্পাদক অধ্যাপক প্রণয় কৃষ্ণ।


    photo courtesy: Sudipto Chatterjee

    Photo: কমিউনিস্ট পার্টি ও আমি  ~নবারুণ ভট্টাচার্য    কেউ পেয়েছে একটা মোবাইল ফোন  কেউ পেয়েছে লটারির জ্যাকপট  কেউ পেয়েছে নকল পা  কেউ আবার শিরোপা  কিন্তু আমি  আমি পেয়েছি একটা পার্টি  এবং যে সে এলেবেলে নয়  একটা আস্ত কমিউনিস্ট পার্টি    এই বারেই নয় ছয়  আমাকে কি নেবে  না ঘাড় ধাক্কা দিয়ে ফিরিয়ে দেবে  কে জানে কি হয়    আবার এমনও তো বলা যায়  নানা সাধু চিন্তার ফাঁকে  কমিউনিস্টদের যে হতচ্ছাড়া পার্টি  পেয়ে গেল ভুলভাল সেই লোকটাকে    (নবান্ন, বই মেলা সংখ্যা, ১৪১৫/২০০৯)    আগামী ৬ আগস্ট, ২০১৪ সন্ধে ৬টায় যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের অভ্যন্তরে ত্রিগুণা সেন প্রেক্ষাগৃহে পশ্চিমবঙ্গ গণসংস্কৃতি পরিষদ, ভাষাবন্ধন পত্রিকা ও নবারুণদার পরিবারের পক্ষ থেকে নবারুণ ভট্টাচার্যর প্রতি শ্রদ্ধা জ্ঞাপন করা হবে। একটি প্যানেল ডিসকাশনে অংশগ্রহণ করবেন, পরিচালক সুমন মুখোপাধ্যায়, গণতান্ত্রিক আন্দোলনের কর্মী অধ্যাপক শুভেন্দু দাশগুপ্ত, অধ্যাপক সঞ্জয় মুখোপাধ্যায়, জনসংস্কৃতি মঞ্চের সাধারণ সম্পাদক অধ্যাপক প্রণয় কৃষ্ণ।    photo courtesy: Sudipto Chatterjee

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    आज की दिनचर्या की शुरुआत मैंने फेसबुक वाल पर अविरल मूत्रपातमध्ये इस पोस्ट के साथ शुरु की हैः


    Forgive me my male friends.I decided topmost priority to connect the female world.I am requesting female activists,writers,professionals mostly as they are much more committed,serious,honest and unaddressed hitherto.It is nothing to do with my gender status.No fair lady ever knocked my door.I expect none at this time.But I believe that the ladies and the generation next have the potential and the genuine explosive power to blast this bloody male imperialism fascist.I am asking all lady professional to be kind enough to listen to me.


    मेरा दांव अब सचमुच महिलाओं और युवाओं पर है।


    शास्त्रसम्मत धर्मनिरपेक्षता बतर्ज महिलाएं शूद्र अंत्यज हैं और सामाजिक आर्थिक स्टेटस के फेरबदल से उनकी मौलिक दशा बदलती नहीं हैं।साम्राज्ञी हैसियत में भी वे अंततः- सीता गीता या द्रोपदी हैं।तसलिमा हो गयी या शिमोन या हमारी हिंदी प्रभा खेतान.तो उनका सामाजिक राजनीतिक आर्थिक बहिस्कार विधवादशा तय है।


    युवासमाज सर्वकालीन बदलाव ख्वाबों का हर्बर्ट बनेने को अभिशप्त है लेकिन कीड़ा मकोड़ा बन जाने के पहले क्षण तक वह जो हाइड्रोजन बम है,उसमें दुनिया के किसी भी मुद्रा वर्चस्व,वर्ण वर्चस्व या नस्ल वर्चस्व को तोड़कर छत्तू बनाकर निगल जाने का हाजमा है क्योंकि वह वर्ग.जाति,नस्ल,धर्म,वर्ण निरपेक्ष चेतना का रचनाशील सर्जक और  धारक वाहक है।


    चाहे तो सारे मर्दवादी और प्रतिष्ठित तमाम लोग मुझे अपनी फ्रेंडलिस्ट से निकाल दें,मैं आखिरकार इस छिनाल कयामत के खिलाफ बेरिके़ड बनाने के आखिरी फैताड़ुआ प्रायस में इन्हीं दो वर्गों को साथ लेकर जीरो बैलेंस के साथ इस युद्धक समय के बरखिलाफ रीढ़ सीधी करके मरना या मारा जाना पसंद करुंगा।


    माफ करना दोस्तों,अंत्यज हूं और फैताड़ू भी।लेकिन हर्बर्ट नहीं हूं एकदम।दढ़ियल दंडवायस हूं तो फेलकवि गर्भपाती विद्रोही पुरंदर भट या मालखोर मदन जैसा कोई डीएनए मेरा भी होगा।जन्मजात बदतमीज हूं और मानता हूं कि चरण छू सांढ़ संस्कृति में निष्णात भद्रजनों की तुलना में बदतमीजी में ही रीढ़ ज्यादा पुख्ता होती है।


    मसलन सारस्वत पत्रकारिता प्रतिमाओं की तुलना में अबतक घनघोर नापसंद ओम थानवी को हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में मैं आगे रखूंगा सिर्फ मुक्ताबाजारी बंदोबस्त के खिलाफ कारपोरेट मैनेजर सीईओ या विचारधारा जुगाली मध्ये सफेद पाखंडी वर्णवर्चस्वी सत्तादलाली के इस पेइड न्यूज जमाने में हमारे जनसत्ता में बने रहने का औचित्य साबित करने के लिए।


    हो सकता है कि ओम थानवी से कभी मेरा कोई संवाद न हो,हो सकता है कि पिछले तेइस साल की तरह भविष्य में जनसत्ता के पन्नों पर मेरा नाम कभी न छपें,तो भी मेरे लिए फिलवक्त प्रभाष जोशी से बड़े पत्रकार हैं ओम थानवी।समयान्तर संपादक हमारे अग्रज थानवी आलोचक पंकज बिष्ट से जन्मजात मित्रता और आत्मीयता के बावजूद मेरा यह निष्कर्ष है।


    इस विपर्यस्त समय में यह सार्वजनिक स्वीकारोक्ति का दुस्साहस बेहद जरुरी है क्योंकि प्रिंट में हमारी कोई आवाज कहीं नहीं है।


    मेरे लिए आवाज ही अभिव्यक्ति का मूलाधार है,शब्द संस्कृति का ब्राह्मणवाद नहीं।व्याकरण नहीं और न ही अभिधान और न सौंदर्यशास्त्र का अभिजन दुराग्रह।


    मेरे लिए भाषा ध्वनि की कोख से जनमती है और आंखर पढ़े लिख्खे लोगों के वर्ण नस्ली धार्मिक सत्ता वर्चस्व का फंडा है,ज्ञान का अंतिम सीमा क्षेत्र नहीं आंखर।वह ध्वनि के उलझे तारों की कठपुतली ही है।


    इसलिए ध्वनि ही मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    ध्वनि ही मेरी अभिव्यक्ति है।

    ध्वनि ही अभिधान।ध्वनि ही व्याकरण और ध्वनि ही सौंदर्यशास्त्र।


    अरस्तू से लेकर पतंजलि तक और उनके परवर्ती तमाम पिद्दी भाषाविदों, संपादकों,प्रकाशकों, आलोचकों और विद्वतजनों  को मैं इसीलिए बंगाल की खाड़ी में या अरब सागर में विसर्जित करता हूं समुचित तिलांजलि के साथ।


    जिस आंखर में ध्वनि की गूंज नहीं,जो आंखर रक्त मांस के लोक का वाहक नहीं,जो कोई बैरिकेड खड़ा करने लायक नहीं है,उस आंखर से घृणा है मुझे।


    यह घृणा लेकिन नवारुणदा की मृत्युउपत्यका मौलिक और वाया मंगलेशदा अनूदित हिंदी घृणा के सिलसिले में है,जाहिर है कि यह घृणा मौलिकता में नवारुणदा की पैतृिक विरासत है,जिसको मात्र स्पर्श करने की हिम्मत कर रहा हूं उन्हीं की जलायी मोमबत्तियों के जुलूस में स्तब्ध वाक खड़ा हुआ।


    मैं इस मृत आंखर उपनिवेश का बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिक होने से साफ इंकार करता हूं,और यह इंकार गिरदा से लेकर मंटो, इलियस, मुक्तिबोध, दस्तावस्की, काफ्का, कामू,डिकेंस. उगो, मार्क्वेज, मायाकोवस्की,पुश्किन,शा, हकर माणिक से लेकर  नवारुण दा की मौलिक विरासत है और मैं दरअसल उसी विरासत से नत्थी होने का प्रयत्न ही कर रहा हूं।यही मेरी संघर्ष गाथा है और प्रतिबद्धता भी है जो संभ्रांत नहीं,अंत्यजलोक है।


    नवारुण दा कि तरह मेरे लिए गौतम बुद्ध और बौद्धधर्म कोई आस्था नहीं,जीवनदद्धति है और वर्चस्ववादी सत्ता के खिलाफ लोक का बदलाव ख्वाब है,जिसे साधने के लिए ध्यान की विपश्यना तो है लेकिन मूल वही पंचशील।


    पंचशील अभ्यास के लिए प्रकृति का सान्निध्य अनिवार्य है बौद्धमय होने से हामारा तात्पर्य प्राकृतिक पर्यावरण चेतना है,जिसके बिना धर्म फिर वही है जो पुरोहित कहें और आचरण में पाखंड का जश्न जो है और जो अनंत फतवा श्रंखला है नागरिक मानवाधिकारों के विरुद्ध दैवी सत्ता के लिए।


    यह पंचशील मुझे तसलिमा के साथ भी खड़ा करता है पुरुषवर्चस्व के खिलाफ उनकी गैरसमझौतावादी बगावत के लिए जबकि उनकी देहगाथा में मैं कहीं नहीं हूं।


    और चितकोबरा सांढ़ संस्कृति का तो हम सत्तर के दशक से लगातार विरोध करते रहे हैं।स्त्री वक्ष,स्त्री योनि तक सीमाबद्ध सुनामी के बजाय प्रबुद्ध स्त्री के विद्रोह में ही हमारी मुक्ता का मार्ग है और हमें उसकी संधान करनी चाहिए।

    नवारुण दा की तरह हमारे लिए वाम कोई पार्टी नहीं,न महज कोई विचारधारा है।यह शब्दशः वर्गचेतना को सामाजिक यथार्थ से वर्गहीन जातिविहीन शोषणविहीन समता और सामाजिक न्याय के चरमोतकर्ष का दर्शन है जैसा कि अंबेडकर का व्यक्तित्व और कृतित्व,उनकी विचारधारा,आंदोलन,प्रतिबद्धता,उनका जुनून,उनका अर्थशास्त्र ,धर्म और जातिव्यव्सथा के खिलाफ उनका बदतमीज बगावत और उनके छोड़े अधूरे कार्यभार।


    नवारुणदा वाम को वैज्ञानिक दृष्टि मानते रहे हैं और बाहैसियत लेखक मंटो वाम से जुड़े न होकर भी इसी दृष्टिभंगिमा से सबसे ज्यादा समृद्ध हैं जैसे अपने प्रेमचंद,जिन्हें किसी क्रांतिकारी विशव्विद्यालय या किसी क्रांतिकारी संगठन का ठप्पा लगवाने की जरुरत नहीं पड़ी।


    इलियस,शहीदुल जहीर से लेकर निराला और मुक्तिबोध का डीएनए भी यही है।शायद वाख ,वैनगाग,पिकासो,माइकेल जैक्शन,गोदार,ऋत्विक घटक,मार्टिन लूथर किंग और नेसल्सन मंटेला का डीएनए भी वही।यह डीएनए लेकिन तमाम प्रतिष्ठित कामरेडों की सत्ता से अलहदा है।


    इसीलिए हमारे लिए अंबेडकर के डीप्रेस्ड वर्किंग क्लास और कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के सर्वाहारा में कोई फर्क नहीं है और न जाति उन्मूलन और वर्गहीन समाज के लक्ष्यों में कोई अंतर्विरोध है।


    यही वह प्रस्थानबिंदू है,जहां महाश्वेता दी से एक किमी की दूरी के हजारों मील के फासले में बदल जाने के बाद भी नवारुण दा उन्हींकी कथा विरासत के सार्थक वारिस हैं तो अपने पिता बिजन भट्टाचार्य और मामा ऋत्विक घटक के लोक विरासत में एकाकार हैं उनके शब्दों और आभिजात्य को तहस नहस करने वाले तमाम ज्वालामुखी विस्फोट।


    भाषाबंधन ही पहला और  अंतिम सेतुबंधन है मां और बेटे के बीच।संजोग से इस सेतुबंधन में हम जैसे अंत्यज भी जहांतहां खड़े हैं बेतरतीब।


    महाश्वेता दी ने बेटे से संवादहीनता के लिए उनकी मत्यु के उपरांत दस साल के व्यवधान समय का जिक्र करते हुए क्षमायाचना की है और संजोग यह कि इन दस सालों में मैं दोनों से अलग रहा हूं।जब दोनों से हमारे अंतरंग पारिवारिक संबंध थे,तब हम सभी भाषा बंधन से जुड़े थे।पंकज बिष्ट,मंगलेश डबराल  से लेकर  मैं ,अरविंद चतुर्वेद और कृपाशंकर चौबे तक।

    तभी इटली से आया था तथागत,जो हमें ठीक से जानता भी नहीं है।लेकिन आज महाश्वेता दी और तथागत के स्मृतितर्पण से सुबह से कुछ भी नहीं पढ़ सका।


    अखबार भी नहीं।


    मुक्ति के लिए पीसी पर बैठा हूं।दिलो दिमाग खून से सराबोर है।


    एई समय के नवारुणदा विशेषांक ने न जाने कितने खून के प्रपात खोल दिये जिसमें सत्तर के दशक के हर्बर्ट से लेकर बिनू और महाश्वेता दी की हजारचौरासी लाशें हैं।


    महाश्वेता दी ने आज माना की वह हजारचारसवाीं लाश में छुपा युवा विद्रोही दरअसल नवारुणदा हैं।


    खून से सराबोर होने की वजह से खून का कोई कतरा मेरी उंगलियां चूं कर आपको छूने की बदतमीजी कर दें तो इस अंत्यज,हर्बर्ट,फैताड़ु,कंगाल मालसाट के चरित्र को माफ कर दीजिय़ेगा।



    इसीलिए अरबन पृष्ठभूमि में अरबन साहित्य लिखते हुए बेदखल जनपदों की भाषा बुनते है नवारुण दा व्याकरण,सौंदर्यबोध और अभिधान को तहस नहस करते हुए और अंत्यज व्रात्य सर्वहारा के पक्ष में निरंतर गुरिल्ला युद्ध है उनका साहित्य।


    कयामत के सेक्सी वक्षस्थल की विभाजक पर मशालें जनलाने का दुस्साहस है उनका परिचय और कुलीनत्व को तिलांजलि देकर पर्यावरण बंधु बौद्धमय हैं नवारुणदा लेकिन अंबेडकरवादी नहीं है।


    मार्क्सवादी होकर जिये वे और मार्क्सवादी होकर मरे वे और बिजन भट्टाचार्य के विख्यात संवाद की तरह,आमि कोनो कम्प्रोमाइज करिनि,मैंने कोई समझौता नहीं किया,उतनी ही सशक्त रीढ़ लेकर खूनी कयामत के विरुद्ध बैरिकेड बनाने के संकल्प के साथ अग्नाशय कैंसर के शिकार इस मृत्यु उपत्यका देश को अलविदा कहा उन्होंने।


    बौद्धमय विचार और अंत्यज प्रतिबद्धता के दम पर हमारे नवारुणदा किसी भी अंबेडकर अनुयायी की तुलना में ज्यादा अंबेडकरवादी हैं।


    कम से कम उनके साहित्य में मुझे मार्क्स और अंबेडकर एकाकार लगते हैं।और इसे लिए नवारुण दा का फैताड़ु होने की घोषणा करने में मुझे कोई हिचक नहीं है।


    हमने आवाज से लेकर प्रभात खबर,जागरण ,अमरउजाला होकर जनसत्ता तक दस साल पहले तक भयंकर बवाल मचाया है संपादकीय नीति के लिए अपनी न्यूनतम हैसियत के बावजूद।किसी से मेरा कोई निजी विवाद नहीं रहा।


    सारी लड़ाई आंखर को जिंदा रखने की रही है।वह लड़ाई अब कमसकम दस साल से खत्म है।क्योंकि हम सिर्प पेस्टर डिजाइनर में सीमाबद्ध हो गये हैं।


    मृत अखबारों के पेइड न्यूज समय में जनसत्ता की आंंतरिक व्यवस्था में मैं कभी ओम थानवी तो क्या किसी और संपादक के साथ खड़ा हो ही नहीं सकता।अब उनके मुखातिब हो जाने का भी कोई मतलब नहीं है।


    यह हमारे पालतू हो जाने का सबूत लेकिन नहीं है।अखबारों के गैरप्रासंगिक हो जाने की कथा व्यथा है।


    मुझे यह कहते हुए कोई द्विधा नहीं है,चाहे कोई इसका कुछ भी मतलब निकाले,मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी भी सूरत में मेरी अंत्यज जन्मजात हैसियत बदलने वाली नहीं है,एक जिंदा अखबार इस दुस्समय में नकालने के लिए मैं ओम थानवी को सलाम करता हूं।


    यह वक्त है उस सड़ी गली बाजारु मसीहा विरासत को सिरे से खारिज करने के लिए ताकि गूंज वाले आंखर और लोकध्वनि वाली अभिव्यक्ति की बहाली हो,क्योंकि इसके बिना कोई बैरिकेड हम बना नहीं सकते।


    अंध भक्तों,आपकी अनंत आस्था पर कुठारा घात के लिए मुझे माफ करना और हो सकें तो मेरी खैरियत के लिए दुआ दारु की रस्म निभाना।


    मेैं अपनी ऐसी की तैसी कराने के लिए दिवंगत जोशी की सारस्वत आत्मा को कोई तकलीफ देता नहीं, लेकिन पंजाब में और सिख समूहों में आपरेशन ब्लू स्टार के पुनरूत्थान,बाबरी विध्वंस मंडल कमंडल घमासान और तेलयुद्ध में शिककबाब गाजापट्टी और यूपी,सैन्य राष्ट्र के हमलों मे मुक्तबाजारी विध्वस्त जनगण के मध्य फैताड़ुआ गुरिल्ला प्रतिरोध के प्रस्तानबिंदू बतौर आपरेशन ब्लू स्टार समर्थक जोशी माथुर युगलबंदी की हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक शर्म और सती प्रथा समर्थक संपादकीय के बावजूद मैं किसी को मसीहा बनाने से साफ मान करता हूं।


    यह बयान आदरणीय जोशी जी या माथुर जी के खिलाफ नहीं है,बल्कि उन कारोबारी कामयाब कारपोरेट कलम के सिपाहियों के लिए हैं जो अपनी बदबू गोटी चलाने के लिए दशकों से रघुवीर सहाय को खारिज करते रहे हैं।


    Kas Turi

    August 1

    Nabarunda's last journey. ডিঙা ভাসাও সাগরে- শেষযাত্রার খন্ডচিত্র(52 photos)

    We bade farewell to Nabarunda today. The Internationale mingled with mass songs. The anarchist flag and the red flag lay side by side, wrapping his body. Hand-drawn posters with Nabarunda's poetry kindled fire as always.

    "I shall extinguish all fire with petrol"

    Kas Turi's photo.

    Students wait for Nabarunda at Creek Row office of Gana Sanskriti Parishad.

    Kas Turi's photo.

    Partha Ghosh from CPIML salutes his comrade

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  • 08/11/14--06:31: पद्म प्रलय में अमदाबाद,दिल्ली, पटना, जयपुर, कोलकाता, सर्वत्र पीपीपी ड्रोन हमला,सर्वत्र निरंकुश पूंजी,अबाध बेदखली केसरिया कारपोरेट राज में गरीबी उन्मूलन यह,सरकारी उपक्रम कसाईबाड़े में और हजार कंपनियों का मुनापा 35 फीसद,श्रम कानूनों का सफाया और भूमि अधिग्रहण जबरन रियल एस्टेट सेक्टर को राहत देने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। सेबी ने रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट (आरईआईटी) को मंजूरी दे दी है। रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट से कंपनियों की पूंजी की दिक्कत खत्म होगी। साथ ही, निवेशक बिना प्रॉपर्टी खरीदे रियल एस्टेट में निवेश का फायदा ले पाएंगे। पलाश विश्वास
  • पद्म प्रलय में अमदाबाद,दिल्ली,

    पटना, जयपुर, कोलकाता, सर्वत्र पीपीपी ड्रोन हमला,सर्वत्र निरंकुश पूंजी,अबाध बेदखली

    केसरिया कारपोरेट राज में गरीबी उन्मूलन यह,सरकारी उपक्रम कसाईबाड़े में और हजार कंपनियों का मुनापा 35 फीसद,श्रम कानूनों का सफाया और भूमि अधिग्रहण जबरन


    रियल एस्टेट सेक्टर को राहत देने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। सेबी ने रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट (आरईआईटी) को मंजूरी दे दी है। रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट से कंपनियों की पूंजी की दिक्कत खत्म होगी। साथ ही, निवेशक बिना प्रॉपर्टी खरीदे रियल एस्टेट में निवेश का फायदा ले पाएंगे।


    पलाश विश्वास

    इस मुक्तबाजारु अरथव्यवस्था का अजब तमाशा है,गजब खेला है।

    जिसको समझा गउ है,वही सांढ़ निकला है।

    लड्डु के इंतजार में रहे,मिला कच्चा केला है।


    Firm top line growth, stable costs & other income help post best profit surge in 9 quarters

    Firm top line growth, stable operating costs and higher other income are helping India Inc report possibly the best net profit growth and operating margins in recent quarters. A sample of 1,000 companies that have announced earnings for the June quarter -excluding banks, finance and oil & gas firms -has delivered a robust 35.4% increase in net profit at the aggregate level compared with the year ago -the highest growth in 9 quarters.

    मतबल ई कि सरकारी कपनियों मसलन वित्तीय,बैंकिंग,तेल गैस इत्यादि को ठोड़ पूरे एक हजार कंपनियों को नमो महाराज के माता दरबार में 35.4 फीसद मुनाफा का मुफ्त चढावा।मोदी वाहक वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेजको 556.7 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज को 278.3 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज की आय 43.1 फीसदी बढ़कर 16524 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज की आय 11547 करोड़ रुपये रही थी।


    रिलायंस बाबाओं के मुनाफे के आंकड़ों से पहले ही बाजार बम बम है तो वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में टाटा मोटर्सका मुनाफा 3.1 गुना बढ़कर 5398 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में टाटा मोटर्स का मुनाफा 1726 करोड़ रुपये रहा था।


    साफ है कि अटल आडवानी जमाने में चकाचौंध इंडिया का ग्लो साइनबोर्ड इतना डिजिल नही रहा जो गुजराती पीपीपी माडल का है।


    तो अब कहकहे लगाकर भी अरबपति बन जाने के तिलिस्मी अर्थव्यवस्था का राज समझ लीजिये।


    अंबेडकर ने ब्रिटिश हुकूमत को अकादमिक अर्थशास्त्र से गोल्ड स्टैंडर्ड लागू करने को मजबूर किया तो आजाद देश के राजनेता कोई बुरबक न थे जो अर्थव्यवस्था को डालर से नत्थी कर दियो रे।


    अंबेडकर के गोल्ड स्टैंडर्ड के मुताबिक रुपी प्राब्लम सुलाझाने ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय रिजर्व बैंक आफ इंडिया की स्थापना की जो अब कारपोरेट कंपनियों की पालतू बिल्ली है।वित्तीय नीति अनुपस्थित देश में मौद्रिक कसरत में तार पर चलती यह बिल्ली है तो दसो दिशाओं से विदेशी आवारा पूंजी की बौछार है और सांढ़ संसक्ृति की मुनाफावसूली भी बेलगाम।

    कोई ससुरे अंबेडकरी को मालूम नहीं कि उनके बाबासाहेब ने भारतीय रिजर्व बैंक की नींव भी डाली श्रम कानून और कामकाज कामगार के तमाम अधिकारों के अलावा।जयभीम का हांका इस पर ऐसा लगाया कि बाकी देश और किसानों,मजदूरों और आदिवासियों को पत्ता ही लगने नहीं दिया कि तमाम नागरिक,श्रमिक और आऱ्थिक अधिकारों के मसीहा थे बाबासाहेब जो किसी जात तबके के नहीं हर भारतीयके भी नहीं,सीमाओं के आर पार हर मनुष्य के बाबासाहेब हैं वैसे ही जैसे कार्ल मार्क्स और लेनिन।


    ससुरे कामरेडों और उनके साथ मसीहा दुकानदार अंबेडकरी दुकानदार लोगों ने न किसानों की गोलबंदी होने दी, न मजदूरों की, न महिलाओं की और न युवाओं की गोलबंद वे मालिकान के लिए हुए और मालिकान भी गोलबंद हो गये ठैरे ।


    बाम्हण को गरियाते गरियाते बनियाराज लाये और बनिया राज लाते लाते पूरा का पूरा देश आवारा पूंजी का।


    पूरा देश डालर उपनिवेश।


    पूरा देश फारेन टेरेटोरी।इंडस्ट्रियल गलियारा।स्मार्ट सिटी।शापिंग माल।कैशएंड करी कैरी। रिलायंस रिटेल पूरा देश।टाटा का नैनो पूरा देश।पूरा देश रियल्टी कारोबार।स्मारट सिटी।हर कोई शेयर दल्ला।मार्केटिंग एजंट या काल सेंटर आईटी का मुलाजिम हायरफायर।मुक्मल स्मारट सिटी पूरा देश।


    न संविधान।न लोकतंत्र। न कायदे कानून। न कानून का राज।

    डालर पीच्छे भागे चील कौव्वे हमार रहमुमा जी रौ लाख बरस।

    अरबपति करड़पति हमार झां चकचाक झकास नुमािंदे जी रौ लाख बरस।




    श्रम कानूनों के सफाये के लिए कांग्रेस अब महिलाओंको रात्रिपाली से बचाने की सिफारिश कर रही है।एप्रेंटिस को एब्जार्ब करने की मांग भी है कांग्रेसी।


    बाकी कांग्रेस या किसी दूसरी पार्टी या मजदूरों की कथा व्यथा के कीर्तनिये तमाम सांप सूंघे हैं।


    पद्मनाभ महाराज तो पहले से जल्दी जल्दी की गुहार मचाये हैं और इस पद्मप्रलय में कौन कितना केसरिया है,पता लगाना सीसैटहुआ जाय रे।


    मारुति के कर्मचारी बिगुल मजदूर वाले दिल्ली में हांका लगा सकते हैं,तो क्रांति के तमाम मुक्तांचलों में सन्नाटा क्यों है।


    जाहिर सी बात है कि हायर फायर के जलवे में अप्रेंटिस की प्लेसमेंटकी गाजर और सर्विस सेक्टर में महिलाओं के नानाविध शोषण उत्पीड़न से बेलगाम राजनीति की बंद होती जा रही मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्शन इकाइयों में उन्हें रात्रि पाली से बचाने की नौटंकी के अलावा बाकी पूर्ण राजकीय सम्मति से एकमुश्त फैक्ट्री एक्ट और लेबर कमिशन का बाजा बजाकर पूरे देश को सेजदेश टैक्स होली डे डीकंट्रोल डीरेगुलेटेड फारेन टेरेटोरी बना देने का है।


    यानी फिर वही डालर उपनिवेश का स्ताई बंदोबस्त।मालिकान को अब सरकार को कर्मचारियों के बारे में न कोई सूचना देनी है, न अदालतों को खैफियत, न वर्किंग कंडीशन,न जाब सिक्युरिटी और न सर्विस रुल,न काम के घंटे तय, न कोई वेतनमान।


    केंद्र सरकार की मंजूरी से पहले,संसदीय मुहर से पहले नया श्रम कानून राजस्थान में महारानी के हुक्म से लागू भी ठैरा जी।


    तेनु कोई फर्क पैंदा जी

    तुस्सी क्यूं लाल पीला हुआ जाये रे

    मैंनि कोई झूठ बोल्या जी



    लाल सलाम।इंक्लाब जिंदाबाद जिंदाबान।

    चोलछे ना चोलबे ना,आमादेर दाबि मानते होबे

    बस

    बाकी सबै बरोबर।जम मूलनिवासी जय भीम जय अंबेडकर।

    अंबेडकर और संविधान की हत्या के बाद समता और सामजिक न्याय का यह स्थाई बंदोबस्त.मातुश्री में जिंदा होंगे फिर बाबासाहेब जी।


    इसी तरह अब नये भूमि अधिग्रहण कानून जनवरी मां रद्द 1884 के भूमि अधिग्रहण कानून से भी भयंकर बनाने का प्रयोग चल पड़ा है म्हारा राजस्थान में।

    पधारो म्हारा देश निवेशक महाराज।

    1884 की तरह जनहित प्रयोजने भूमि अधिग्रहण का पाखंड भी नहीं।

    डायरेक्ट पीपीपी माडल गुजराती। नाममात्र जनसुनवाई की भी गुंजाइशे नेइ।

    गुजराती माडल पीपीपी लागू मायने पर्यावरण लहूलुहान,वेदांता चालू।नियमागिरि चालू।टाटा रिलायंस चालू।अदाणी चालू।माइनंगि निषिद्ध चालू।मध्यबारत में आदिवासी इलाकों में गुजराती माडल पीपीपी का सलवाजुड़ुम चालू।अभ्यारम्य सुंदरवन समुद्रतीर से लेकर उत्तुंग हिमाद्रिशिखर तक सबै पीपीपी।महानगर पीपपीपी।

    देहात पीपीपीप।

    खेत पीपीपपपी।खलिहान पीपीपपीपीप।

    जंगल पीपीपपीजा।जमीन पीपपीपखाजा।

    पहाड़ पीपीपीपीप भूस्खलन केदार जलप्रलय बाढ़ प्रलयंकर और भूकंप पीपीपी।

    नागरिक अधिकार पीजी पित्जा डायरेक्टड्रोन डेलीवरी बायोमेट्रिक डिजिटल।मानवाधिकार गाजापट्टी मोसाद साआईए अमेरिका पीजा पीजा।

    अगंरेजी में हो ज्यादा खुलासा ।सीसैट करते रहोगे भाया तो अंग्रेजी में अगवाड़ा पिछवाड़ा उठा उठाकर मारेंगे और सीलते रहना जिंदगीभर।


    बामुलाहिजा होशियार।

    खल्क खुदा का मुल्क महारानी का।

    मजहब केसरिया प्रोमोटर राज धर्मोन्मादी

    और जयपुर का ताजा नजारा आंग्ल भाषा में।

    समझ में आये समझो वरना सीसैट विहिपअभाविपभामस करते रहो आस्थासंपन्न कांवड़ियों,जलाभिषेक करते रहो।

    करते रहो जयनमो जयनमो।

    Under new law, consent of landowners may not be needed; compensation likely to be hiked

    After radical changes in labour laws, the Vasundhara Raje-led Rajasthan government is firming up plans for a new land acquisition Act that seeks to facilitate speedier acquisition of land for industry and government by scrapping some key measures, notably those requiring consent of landowners, that form part of legislation passed by UPA last year. While relaxing the consent provisions, the desert state's version of the law will hike the quantum of compensation to incentivise purchase of land from owners. According to senior officials involved in the drafting process, the new law will get rid of a provision requiring consent of 70% to 80% (in case of private projects) of land owners and a requirement to carry out a Social Impact Assessment Study (SIA). These relaxations will apply to "Core Infrastructure Projects" such as roads, power lines, bridges and pipelines regardless of whether these are being implemented by the public or the private sector.

    However, to incentivise owners to part with their lands, the quantum of compensation will be increased from two to two-and-a-half of the prevailing rates for urban areas and from four to four-and-a-half for rural areas.


    हमने पीपीपी माडल पटना का हाल पहले बताया।धर्मनिरपेक्ष विषिणुअवतारै हैं नीतीश भैया लालू को लगै दूध दुहाने। करें हुंकार घनघोर,करुक्षेत्र में मारेंगे कुरुवंश और सार अस्पताल कर दिये पीपीपी गुजराती।


    तो तमाशा देखें बंगाल का।सेजदेवी दुर्गावतार दीदी शांतिनिकेतन,कोलकाता से लेकर कल्याणी सबै बनाने चली हैं स्मार्ट सिटी सेज महासेज।


    श्रमकानून का सफाया वाया  जयपुर। हीरक बुलेट चतुर्भुज।

    भूमि अधिग्रहण नया बेददखली कानूनमुआवजा गाजर वही,नहीं होगीग सुनवाई।रजामंदी नहीं चलेगी।पांचवा छठां शिड्युल संविदान कुछ भी न चलेगा।खालिस बेदखली अभियान पीपीपी गुजराती जहर रसीला पीजा पीजा।

    वाया जयपुर।

    तो रियल्टी प्रोमोटर राज भाया कोलकाता,सिटी आफ जाय,वामासुर बौद्धमय अतीत का प्रदेश क्रांतिकारी बंगाली का जहां सबसे ज्यादा मजबूत है संग परिवार ताजा स्टेटस।बाकायदा डीएनए टेस्ट कराना पड़ेगा कि कौन ससुरा नहीं है संघी।

    वाया अमित मित्र प्रोमोटरों को पुराना मकान ढगहाने से लिए शौ फीसद टैक्स होलीडे।शापिंग कांप्लेक्स मल्टीप्लेक्स से लेकर कृषि कारखाना जमीन तक में नालेज हास्पीटल ग्रीन हाउसिंग का खुल्ला टैक्स होलीडे। पीपीपी माडल गुजराती का क्रांति बाप्तिस्मा हुआ संपन्न।इति सिद्धम।

    नतीजा देखें मजेदार।कैसे तार तारेतरै लच्छेदार।

    पिछवाड़े निकरै लाल नीला धागा लच्छेदार।



    रियल एस्टेट सेक्टर को राहत देने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। सेबी ने रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट (आरईआईटी) को मंजूरी दे दी है। रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट से कंपनियों की पूंजी की दिक्कत खत्म होगी। साथ ही, निवेशक बिना प्रॉपर्टी खरीदे रियल एस्टेट में निवेश का फायदा ले पाएंगे।

    अब आप बिना घर खरीदे प्रॉपर्टी में निवेश का फायदा उठा सकेंगे। सरकार ने रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को बड़ा बूस्ट दिया है। बोर्ड बैठक में सेबी ने रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट ट्रस्ट को हरी झंडी दे दी है। रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट के अमल में आने के बाद रियल एस्टेट कंपनियों की बड़ी दिक्कत तो खत्म होगी ही, साथ ही देश में निवेश का माहौल भी सुधरेगा। आरईआईटी में आप 2 लाख रुपये से निवेश की शुरुआत कर सकेंगे।


    सेबी के नियमों के मुताबिक आरईआईटी में न्यूनतम निवेश 2 लाख रुपये का होगा। सिर्फ पूरे हो चुके प्रोजेक्ट्स में ही आरईआईटी निवेश कर पाएंगे। एसपीवी से आरईआईटी में ट्रांसफर होते वक्त टैक्स नहीं लगेगा। सिर्फ एसेट बिकने पर ही टैक्स लगाया जाएगा। आरईआईटी का ऑफर साइज कम से कम 500 करोड़ रुपये होगा और कुल फंड कम से कम 10 करोड़ रुपये होना चाहिए। ब्रोकरों को आरईआईटी के लिए सिर्फ एक बार रजिस्ट्रेशन कराना होगा। जिन प्रोजेक्ट में कमाई हो रही है आरईआईटी का निवेश सिर्फ उन्हीं में होगा। 1 अक्टूबर से आरईआईटी के नियम लागू होने की संभावना है।


    इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट ट्रस्ट को मंजूरी मिलने से इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की पूंजी की दिक्कतें दूर होंगी। इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट ट्रस्ट सीधे या एसपीवी के जरिए निवेश करेगा। नियमों के मुताबिक तैयार प्रोजेक्ट में 80 फीसदी निवेश करने पर पब्लिक इश्यू लाना होगा। अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में निवेश के लिए क्यूआईपी करना होगा। सभी ट्रस्ट की लिस्टिंग जरूरी होगी। ट्रस्ट के लिए कम से कम 500 करोड़ रुपये का एसेट होना जरूरी होगा और ट्रस्ट के इश्यू के लिए कम से कम 250 करोड़ का ऑफर लाना अनिवार्य होगा। सब्सक्रिप्शन साइज कम से कम 10 लाख रुपये और ट्रेडिंग लॉट कम से कम 5 लाख रुपये होना चाहिए। इश्यू लाने वाले इंवेस्टमेंट ट्रस्ट एसेट वैल्यू का सिर्फ 10 फीसदी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी में निवेश कर सकते हैं।


    जानकारों का मानना है कि आरईआईटी को मंजूरी मिलने से काफी निवेश आएगा और रिटेल निवेशकों को भी फायदा होगा।


    मजबूत अंतर्राष्ट्रीय संकेत और सरकार के बड़े फैसलों की वजह से बाजार 0.75 फीसदी चढ़े। सेंसेक्स 190 अंक चढ़कर 25519 और निफ्टी 57 अंक चढ़कर 7626 पर बंद हुए। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर 0.5-0.75 फीसदी मजबूत हुए।एशियाई बाजारों से मिले मजबूती के संकेतों के दम पर घरेलू बाजारों ने शानदार शुरुआत की। निफ्टी 7600 के ऊपर खुला। सेंसेक्स में 200 अंक से ज्यादा का उछाल आया। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर 1-1.25 फीसदी चढ़े।


    वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उम्मीद जताई है कि वित्त वर्ष 2015 के लिए इनडायरेक्ट टैक्स वसूली का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा। वित्त मंत्री इनडायरेक्ट टैक्स ऑफिसरों के एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। वित्त मंत्री ने इस मौके पर सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम्स (सीबीईसी) को ये हिदायत भी दी कि वो कानूनी विवाद में उलझे टैक्स मामलों को जल्दी सुलझाएं।


    वित्त मंत्री के मुताबिक अभी जून और जुलाई के मैन्युफैक्चरिंग आंकड़ों को ट्रेंड मानना जल्दबाजी होगी। कानूनी मसलों में 1.50 लाख करोड़ रुपये अटके हुए हैं। लिहाजा सीनियर टैक्स ऑफिसर ट्रांसपेरेंट टैक्स पॉलिसी अपनाएं और सीबीईसी को ट्रेंड को बढ़ावा देना चाहिए।


    सीएनबीसी आवाज़ की एक्सक्लूसिव खबर के मुताबिक वित्त मंत्रालय एसयूयूटीआई में लिस्टेड कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने के पक्ष में नहीं है। वित्त मंत्रालय एसयूयूटीआई में एलएंडटी, आईटीसीऔर एक्सिस बैंककी हिस्सेदारी बेचने की पक्ष में नहीं है।


    वित्त मंत्रालय एसयूयूटीआई में लिस्टेड कंपनियों के अलावा एसेट्स बेचने के पक्ष में है। सरकार की एसयूयूटीआई में करीब 250 अनलिस्टेड कंपनियों में हिस्सेदारी है। दरअसल सरकार को विनिवेश का लक्ष्य आसानी से पूरा करने का भरोसा है। अगर विनिवेश का लक्ष्य पूरा नहीं  हुआ तो दूसरे विकल्पों पर विचार किया जाएगा।


    रियल एस्टेट सेक्टर को राहत देने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। सेबी ने रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट (आरईआईटी) को मंजूरी दे दी है। रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट से कंपनियों की पूंजी की दिक्कत खत्म होगी। साथ ही, निवेशक बिना प्रॉपर्टी खरीदे रियल एस्टेट में निवेश का फायदा ले पाएंगे।


    कुशमैन एंड वेकफील्डके एक्जिक्यूटिव एमडी, संजय दत्तका कहना है कि आरईआईटी को मंजूरी मिलना रियल एस्टेट सेक्टर के लिए अहम है। इससे सेक्टर में सुधार के साथ-साथ पारदर्शिता भी बढ़ेगी। आरईआईटी से रिटेल निवेशकों को भी फायदा होगा। देश में करीब 11 कंपनियों की 4-5 मिलियन स्क्वेयर फीट से लेकर 30-40 मिलियन स्क्वेयर फीट की कमर्शियल प्रॉपर्टी मौजूद है।


    संजय दत्त के मुताबिक सेबी से मंजूरी मिलने के बाद करीब 20-25 आरईआईटी की लिस्टिंग होने की उम्मीद है। छोटी अवधि में सेक्टर में 4-5 अरब डॉलर का निवेश आएगा। अगर रियल एस्टेट सेक्टर में सुधार जारी रहा और ऑफिस स्पेस की मांग बढ़ी, तो 20-30 अरब डॉलर का निवेश आने की संभावना है।


    आस्कसंदीपसभरवाल डॉट कॉमके संदीप सभरवालका मानना है कि आरईआईटी को मंजूरी मिलने और लंबी अवधि के निवेश पर टैक्स न लगने से लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अच्छा है। 1 साल के बाद विदेशी निवेशकों की ओर से आरईआईटी में रुझान बढ़ने का अनुमान है। आरईआईटी में इंश्योरेंस कंपनियों और बड़े निवेशकों का पैसा वक्त लगेगा। लेकिन, सिर्फ आरईआईटी को मंजूरी मिलने की खबर पर रियल्टी शेयरों में निवेश करने की राय नहीं है। रियल एस्टेट सेक्टर के सुधार में थोड़ा और वक्त लगेगा।


    एनआईएफसीओके एमडीऔर सीईओ,अमित गोयनकाके मुताबिक 1 अक्टूबर को अंतिम गाइडलाइंस आने पर भी मार्च 2015 के पहले किसी आरईआईटी आने की संभावना नहीं है। आरईआईटी को मंजूरी मिलना विदेशी निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत है। फेमा के अलावा कई और मुद्दों पर चर्चा होना अभी बाकी है। इक्विटी आरईआईटी में प्री-टैक्स 8-9 फीसदी से ज्यादा रिटर्न मिलने की उम्मीद नहीं है। ब्याज दरों में कमी होने पर आरईआईटी निवेश से काफी फायदा होगा।



    ऑटो शेयर 2.5 फीसदी उछले। रियल्टी और कैपिटल गुड्स शेयर करीब 1 फीसदी चढ़े। मेटल, आईटी, तकनीकी, बैंक, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, हेल्थकेयर शेयर 0.7-0.3 फीसदी मजबूत हुए। पावर और एफएमसीजी शेयर करीब 0.5 फीसदी गिरे। ऑयल एंड गैस शेयरों पर हल्का दबाव दिखा।रियल्टी शेयरों में 2.25 फीसदी की तेजी बाकी है। ऑटो शेयर 2 फीसदी और कैपिटल गुड्स शेयर 1 फीसदी चढ़े हैं। बैंक, आईटी, तकनीकी, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, मेटल शेयर 0.5 फीसदी मजबूत हैं। हेल्थकेयर, ऑयल एंड गैस, पावर शेयरों में भी बढ़त है।


    सेबी द्वारा आरईआईटी को मंजूरी मिलने से रियल्टी शेयर चढ़े। रियल्टी शेयरों में डीएलएफ, डेल्टा कॉर्प, एचडीआईएल में 2.5-1.5 फीसदी की तेजी आई।


    अश्विन पारेख एडवाइजरी सर्विसेजके मैनेजिंग पार्टनर अश्विन पारेखका कहना है कि सेबी से इस फैसले से काफी निवेश आएगा क्योंकि इंडस्ट्री ने जो भी सफाई मांगी थी वो सेबी ने दी है। प्राइम डाटाबेसके पृथ्वी हल्दियाने कहा है कि सेबी के कदम से रिटेल इन्वेस्टरों को काफी फायदा होगा।


    इंफ्रा एक्सपर्ट मोनिका पॉलका कहना है कि सरकार इस इंफ्रा ट्रस्ट से 2017 तक के इंफ्रा में निवेश के लक्ष्य को पूरा कर पाएगी। साथ ही इस फंडिंग से इंफ्रास्ट्रक्चर में ज्यादा प्रोजेक्ट शुरू हो पाएंगे। वहीं आगे इंफ्रा सेक्टर के हालात में सुधार की भी उम्मीद है। लेकिन इंफ्रा सेक्टर में फंड आने के लिए 2-3 महीनों का समय लगेगा।


    पीरामल एंटरप्राइजेजके को-हेड जयेश देसाईका कहना है कि अगले 6-8 महीने के बाद बाजार में रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट के आने की उम्मीद है। रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट, रियल एस्टेट सेक्टर में नई जान फूंकने का काम करेगा। वहीं विदेशी निवेशकों के दिलचस्पी से रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट के जरिए भारत में बड़े पैमाने पर पूंजी आएगी।


    जयेश देसाई के मुताबिक रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट के आने कमर्शियल प्रॉपर्टी में काफी पारदर्शिता आएगी और इससे कमर्शियल प्रॉपर्टी की कीमतों में गिरावट की गुंजाइश नहीं होगी। साथ ही रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट के जरिए निवेशकों की जरूरतें भी पूरी होंगी।



    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में टाटा मोटर्स का मुनाफा 2 गुना बढ़कर 3635 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। टाटा मोटर्स करीब 3.5 फीसदी उछला।


    दिग्गजों में एमएंडएम 6 फीसदी चढ़ा। बैंक ऑफ बड़ौदा, एचडीएफसी, सेसा स्टरलाइट, इंफोसिस, अल्ट्राटेक सीमेंट, कोटक महिंद्रा बैंक, आईडीएफसी, मारुति सुजुकी, एक्सिस बैंक, पीएनबी 4.2-1.5 फीसदी मजबूत हुए।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में सेल का मुनाफा 17.5 फीसदी बढ़कर 530 करोड़ रुपये रहा। सेल 2.5 फीसदी चढ़ा।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइसेज को 556.7 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ है। अदानी एंटरप्राइसेज 5 फीसदी उछला।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में गेल का मुनाफा 23.1 फीसदी घटकर 621 करोड़ रुपये रहा। गेल 4.5 फीसदी लुढ़का।


    दिग्गजों में डॉ रेड्डीज 2 फीसदी से ज्यादा टूटा। जिंदल स्टील, टेक महिंद्रा, एनटीपीसी, यूनाइटेड स्पिरिट्स, एचसीएल टेक, एशियन पेंट्स, केर्न इंडिया, विप्रो 1.6-0.75 फीसदी गिरे।



    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में टाटा मोटर्सका मुनाफा 3.1 गुना बढ़कर 5398 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में टाटा मोटर्स का मुनाफा 1726 करोड़ रुपये रहा था।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में टाटा मोटर्स की आय 38.2 फीसदी बढ़कर 64683 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में टाटा मोटर्स की आय 46796 करोड़ रुपये रही थी।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में एचपीसीएलको 46 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में एचपीसीएल को 1460.5 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेजको 556.7 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज को 278.3 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज की आय 43.1 फीसदी बढ़कर 16524 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज की आय 11547 करोड़ रुपये रही थी।


    अप्रैल-जून तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज को 126.4 करोड़ रुपये का अतिरिक्त घाटा हुआ है। तिरोडा प्लांट के शुरू होने में हुई देरी से अदानी एंटरप्राइजेज को अतिरिक्त घाटा हुआ।


    साल दर साल आधार पर अप्रैल-जून तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज का एबिटडा (एक्स-फॉरेक्स) 2066 करोड़ रुपये से बढ़कर 3156 करोड़ रुपये रहा। सालाना आधार पर पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज का ऑपरेटिंग मार्जिन (एक्स-फॉरेक्स) 17.9 फीसदी से बढ़कर 19.1 फीसदी रहा।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज का कोर एबिटा (एक्स-फॉरेक्स) 61.9 फीसदी बढ़कर 3345 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में अदानी एंटरप्राइजेज का कोर एबिटा 2066 करोड़ रुपये रहा था।


    अदानी एंटरप्राइजेजके सीएफओ अमित देसाईका कहना है कि सभी सेगमेंट से अच्छे योगदान के कारण नतीजे मजबूत रहे हैं। कोल ट्रेडिंग वॉल्यूम में इस तिमाही 63 फीसदी की बढ़त हुई है।

    गोदरेज इंडस्ट्रीजका मुनाफा 45.8 फीसदी बढ़कर 77.7 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में गोदरेज इंडस्ट्रीज का मुनाफा 53.3 करोड़ रुपये रहा था।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में गोदरेज इंडस्ट्रीज की आय 23.7 फीसदी बढ़कर 2326.2 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में गोदरेज इंडस्ट्रीज की आय 1879.8 करोड़ रुपये रही थी।


    जीएसएफसी (गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर कॉर्पोरेशन)का मुनाफा 19.5 गुना बढ़कर 108.23 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में जीएसएफसी का मुनाफा 5.54 करोड़ रुपये रहा था।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में जीएसएफसी की आय 22.1 फीसदी बढ़कर 1243.20 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में जीएसएफसी की आय 1018 करोड़ रुपये रही थी।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में जीएसएफसी का एबिटा 3.85 गुना बढ़कर 159.11 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में जीएसएफसी का एबिटा 41.31 करोड़ रुपये रहा था।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में जीएसएफसी का एबिटा मार्जिन 12.8 फीसदी हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में जीएसएफसी का एबिटा मार्जिन 4.06 फीसदी रहा था।


    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में जीएसएफसी की अन्य आय 25.5 करोड़ रुपये हो गई है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में जीएसएफसी की अन्य आय 14 करोड़ रुपये रही थी।



    वित्त वर्ष 2015 की पहली तिमाही में एचपीसीएल की बिक्री 16 फीसदी बढ़कर 59151.7 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में एचपीसीएल की बिक्री 50990.5 करोड़ रुपये रही थी।

    सद्भाव इंजीनियरिंगका मुनाफा 67.7 फीसदी बढ़कर 27 करोड़ रुपये हो गया है। वित्त वर्ष 2014 की पहली तिमाही में सद्भाव इंजीनियरिंग का मुनाफा 16.1 करोड़ रुपये रहा था।



    Aug 11 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    It's Raining Profits in India Inc

    RANJIT SHINDE & SHAILESH KADAM ET INTELLIGENCE GROUP


    

    

    Firm top line growth, stable costs & other income help post best profit surge in 9 quarters

    Firm top line growth, stable operating costs and higher other income are helping India Inc report possibly the best net profit growth and operating margins in recent quarters. A sample of 1,000 companies that have announced earnings for the June quarter -excluding banks, finance and oil & gas firms -has delivered a robust 35.4% increase in net profit at the aggregate level compared with the year ago -the highest growth in 9 quarters.

    While revenue rose 15.2%, op erating mar gin widened to the most in 3 the most in 3 years amid signs of a revival. According to ET Intelligence Group's analysis of the aggregate performance of companies in the sample, revenue growth remained in double digits for the fourth consecutive quarter. Raw material costs have also been stable relative to sales -having stayed at 30-31% over the past six quarters. The ratio fell to 29.7% in the three months to June, the lowest in as many as 13 quarters.

    Apart from sustained revenue growth and the lower proportion of input costs, higher other income has helped to sharply increase net profit.

    Other income -which derives from avenues be sides the main business, such as in vestments -grew by 17.6% year-on year, the highest in six quarters.

    These companies also reported an improvement in operating margin before considering the impact of de preciation and excluding other in come. At 19.4%, margins were the widest in any quarter over the past three years.

    Select companies from sectors in cluding automobiles, information technology, pharmaceuticals, and real estate reported better num bers. Of the total incremental net profit of Rs 12,904 crore from the year ago, more than Rs 7,000 crore was contributed by information technology and pharma companies. The picture is expected to change in the coming few days as larger companies from core sectors unveil their numbers.

    Analysts expect a turnaround in the performance of companies in core sectors such as capital goods, cement, construction and metals given the potential upside in economic activity. Ambuja Cement, Bharat Forge, Crompton Greaves, Cummins India, Voltas, Oberoi Realty and Prestige Estate Projects are some of the companies that are expected to perform better in the quarters to come.

    Bank and finance companies are excluded from the survey because of factors such as the borrowing-lending nature of the business that skews operating costs, and the uncertainty over government subsidies in the case of oil & gas companies.





    Aug 11 2014 : The Economic Times (Mumbai)

    SCRAPPING KEY UPA MEASURES - Rajasthan Drafts Biz-Friendly Land Acquisition Act

    AKSHAY DESHMANE

    JAIPUR

    

    

    Under new law, consent of landowners may not be needed; compensation likely to be hiked

    After radical changes in labour laws, the Vasundhara Raje-led Rajasthan government is firming up plans for a new land acquisition Act that seeks to facilitate speedier acquisition of land for industry and government by scrapping some key measures, notably those requiring consent of landowners, that form part of legislation passed by UPA last year. While relaxing the consent provisions, the desert state's version of the law will hike the quantum of compensation to incentivise purchase of land from owners. According to senior officials involved in the drafting process, the new law will get rid of a provision requiring consent of 70% to 80% (in case of private projects) of land owners and a requirement to carry out a Social Impact Assessment Study (SIA). These relaxations will apply to "Core Infrastructure Projects" such as roads, power lines, bridges and pipelines regardless of whether these are being implemented by the public or the private sector.

    However, to incentivise owners to part with their lands, the quantum of compensation will be increased from two to two-and-a-half of the prevailing rates for urban areas and from four to four-and-a-half for rural areas.

    "We are not against farmers or landowners at all. We are against processes which increase delay in acquiring land.

    By enhancing compensation, we will ensure land owners get a better deal as well as the project proponents who, under the current law, will otherwise have to wait for 4 years and 10 months, which is a huge delay and adds to costs. The burden of these high costs is eventually borne by the consumers, so why let that happen?" a senior official argued.

    Rural Development Minister Gulab Chand Kataria, who headed a threemember ministerial group which vetted the proposed legislation, said the draft was sent to the CMO late last week and it is now for Raje to take a call on which measures to approve. "We have proposed to clarify the urban and rural boundaries more clearly to help identify lands better. The minimum expectation is that owners should get more rates than what is mentioned in the DLC. We have also proposed a ceiling on the quantum of land which can be acquired by one project proponent in both rural and urban areas -for the former it is 1000 hectares and for the latter it is 200 hectares," Kataria said.

    Industry has been critical of the consent and Social Impact Assessment (SIA) clauses of the Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013, which is currently in force. While the industry has sought reducing the percentage of land-owners whose consent is required from 70% to 60% or 50% and limiting the SIAs to only large projects (more than 500 acres in area), a higher quantum of compensation may not be to their liking.

    The complete doing away of these contentious measures is also certain to invite criticism from farmers groups and other organisations fighting against forcible land acquisition.

    The senior official cited earlier said that a draft of the proposed legislation will be uploaded on the government's website soon after the Chief Minister's Office clears it, which could be on Monday or Tuesday.




    Aug 11 2014 : The Times of India (Ahmedabad)

    Govt eyes Aug 15 to roll out big-ticket projects

    Dipak.Dash & Surojit.Gupta @timesgroup.com

    New Delhi:

    

    

    100 Days Of Govt, Deen Dayal B'day Other Options

    The Narendra Modi government is weighing options of announcing "big ticket" projects on three key dates, including August 15.

    Government officials said the other two dates on which the government may kick off some projects include completion of 100 days of the NDA coalition and September 25, the birthday of Jan Sangh stalwart Deen Dayal Upadhyaya.

    BJP is also drawing up plans for a grand centenary celebration of Deen Dayal Upadhyaya with Modi flagging the date after taking over as prime minister.

    While details of the pro jects to be unveiled are still being fine-tuned, there is urgency in some key ministries to wrap up the work before the crucial dates for the rollout.

    Modi's speech on August 15 may signal a shift from the past where the prime minister is expected to announce specific timelines for the projects to be launched.

    He is also likely to steer clear of announcing any populist scheme and is expected to focus on implementing poll promises.

    Among the projects that the Modi administration may announce are financial inclusion to open bank accounts for 15 crore people, a comprehensive road and highways plan and projects in the vital power sector. Solar power projects could form part of the announcements as well as plans to make delivery of public services easier.


    Aug 11 2014 : The Times of India (Ahmedabad)

    Realty, infra cos can tap stock mkts


    New Delhi

    TIMES NEWS NETWORK

    

    

    Sebi Nod To Raise Funds Through Trusts To Complete Revenue-Earning Projects

    The Securities & Exchange Board of India (Sebi) on Sunday paved the way for real estate and infrastructure developers to tap the stock markets to raise funds and repay some of the loans taken by them. But it decided to limit the scope of the fund-raising exercise through Real Estate Investment Trusts (REITs) and Infrastructure Investment Trusts (IITs), mainly to complete projects that are earning revenue.

    Market experts said REITs can help real estate players raise up to $10 billion over the next four-five years although the market regulator has ensured that the focus remains on commercial real estate, with 80% of the assets in completed and revenue-generating properties. But given that the instrument is new and complex, the regulator has indicated that it is not keen on getting small investors to invest immediately by fixing the minimum investment limit for REITs at Rs 2 lakh.

    Under the new instruments, developers can set up trusts, register them with Sebi, and invest directly or through a special purpose vehicle in real estate and infrastructure assets. After registration with the regulator, the trusts can raise money through a public offer, just like a company , and can have follow-on issues, rights issues and institutional placement to raise more funds later. Units of REITs need to be listed on stock exchanges, in trading lots of Rs 1 lakh, Sebi said. It also said that for an initial offer, the minimum value of assets has to be Rs 500 crore, with minimum issue size for initial offer pegged at Rs 250 crore.

    In his maiden Budget, finance minister Arun Jaitley announced tax benefits for REITs, which set the stage for the Sebi board to clear the plan on Sunday .

    It is expected to allow infrastructure and real estate developers to use the instrument to raise resources from the domestic market in the same way that was used overseas in countries such as the US, UK, Hong Kong and Singapore. In the past, some Indian real estate developers such as Unitech and Hiranandani group's Hirco had raised funds via REITs on London Stock Exchange's Alternative Investment Market for smaller companies.

    "REITs are an avenue through which retail investors can invest in an asset class connected to real estate. This structure gives the option for developers to either exit or dilute their stakes in the commercial properties and give an entry to investors for regular income flow . Some of the developers with commercial properties in place, and sitting on a huge debt, can transfer prelease properties -such as office complexes, IT parks malls and SEZs -to REITs and reduce their debt burden," said Hemal Mehta, senior director at consulting firm Deloitte Touche Tohmatsu India.

    Experts, however, suggested that residential projects too need to be included in REITs to really make the tool attractive for realtors. Some suggested further tax sops may be needed. "Before REITs become popular, some further tax clarity would be required given issues like assets to be housed in an SPV , which will result in capital gains and stamp duty ," said Indiabulls Financial Services MD Gagan Banga.

    Aug 11 2014 : The Times of India (Ahmedabad)

    New monetary policy norms on the anvil


    New Delhi

    TIMES NEWS NETWORK

    

    

    The government on Sunday left it to the RBI to decide on interest rates even as the two have begun discussions on putting in place a new monetary policy framework, which is a fresh mechanism to fix rates.

    While the government wants Parliament to set the inflation target under the proposed plan, the RBI has already gone ahead and begun work towards a glide path, which targets 8% retail inflation by next January and 6% by January 2016.

    On Sunday , finance minister Arun Jaitley , who spoke at the RBI board meeting, did not comment directly on the RBI's plan but made it clear that it was the central bank that will decide on rates. "On the last two occasions, RBI has announced its policy on interest rates, I had, on the same evening, issued a clear statement. This is the issue which the Reserve Bank decides and I am sure they will factor in various circumstances," he told reporters after the meeting.

    Although some viewed it as a "prod" from the government to cut rates, since tak ing charge Jaitley has maintained that the RBI is the final authority on deciding when the time is ripe to tweak rates.

    After the board meeting, RBI governor Raghuram Rajan was more emphatic in saying that the time was not ripe. "At this point, uncertainty is two-way ... Then, of course, if news comes on either side, we can change what the policy is. But as of now, we think the policy is on target.

    This is contingent on data coming in," he said.

    In recent weeks, inflation, industrial production and trade data have been positive but RBI's main worry stems from food inflation due to weak monsoon rains in several parts of the country .




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    Is FDI solution of everything???


    By Excalibur Stevens Biswas


    The growth story is now linked to FDI and Disinvestment and it is the theme of the governance by the RSS ruled BJP Government of India,remote controlled by US economic interest.


    FDI in Defence, railways has been the assnce of Union budget.


    The Union Cabinet allowed foreign investment in the Railways for the first time and raised limit for such investment in the defence sector, steps intended to raise funds for expansion of the Railways and encourage domestic manufacture of arms.

    100 per cent foreign investment in railway infrastructure projects will be allowed while in the case of defence the limit has been raised to 49 per cent from the current 26 per cent, subject to the Indian owners exercising management control.



    India has opened up defence sector for FDI.

    Insurance is also subjected to FDI.


    More over,the government is proposing a major overhaul of its foreign direct investment (FDI) policy as part of the Narendra Modi-led administration's plan to woo overseas investors and improve ease of doing business in India, which ranks at a lowly 134 out of 189 global economies in this respect, according to the World Bank.


    The government is looking to adopt the international practice of linking policy with industrial codes to ensure foreign investors won't have to wade through complicated press notes or circulars to decipher the policy for a sector.


    "Discussions are on. There is merit in seeding the industrial codes with the FDI policy," said a government official aware of the deliberations. The move is in line with the BJP's election manifesto pledge to ensure "that a conducive, enabling environment is created making 'doing business' in India easy. We will focus on cutting the red tape, simplifying the procedures and removing the bottlenecks."


    Multi brand is the greatest stake for US economy in India.Political compulsion postponed this despite a declaration made by earlier UPA second government just because lacking the mandate as TMC led by Mamata Banerjee withdrew support.Ironically it united all forces of open market economy to create a Namo tsunami for the missing mandate.


    The mandate achieved. Second generation of reforms happens to be topmost priority.This government is simply by passing the parliament and policies as well as legislation are made directly by the cabinet on the recommendations made by Private parties,extra constitutional elements.


    Expressing its strong opposition to government's move to increase FDI cap in insurance sector, the CPI(M) today asked all Opposition parties to join hands in opposing the FDI policy.

    "The two-and-a-half months period of the Narendra Modi government has confirmed that it will not only pursue the same neo-liberal policies as the previous UPA government but it will do so more vigorously," the Central Committee of the CPI(M) said in a statement after its three-day meeting in New Delhi.

    It is not going to happen.

    FDI in multi brand is imminent and single brand retail FDI combined with etailing has already ensured monopolistic control of foreign money on the retail market countrywide.

    The left has lost its ground despite monopolistic control on trade unions.In parliamentary politics is has lost its relevance.

    India Incs and foreign capital ensured a solid mandate for FDI Disinvestment raj and Congress only failed to achieve second generation reform agenda for which it is kicked out.

    There is no basic difference the two main rivals of Indian polity ie Congress and Bjp.They are aligned  to destroy the working as well as agrarian classes to open up the free market economy.

    It has been always the trend.Minority governments did all the damage just because of this two party combination.



    Banking Regulation act simply omitted the provision of ceiling of voting right of the private stakeholders.It was limited to ten percent only.


    Indian PSU banks hold the key of the inclusive economy since nationalisation.


    The Nayak Committee has recommended repeal of the Bank Nationalisation Act and SBI Act, which is preposterous given the unparalleled contribution of PSBs to the economic development of the country.

    NDA government has singlehandedly targeted PSBs to generate FDI with its disinvestment plan.FOS would cut down government shares to twenty nine percent and thanks to new banking regulation act,unlimited voting right of the private and foreign investors would  make it private.


    The government has not to repeal nationalisation and rather it would simply gift the PSBs to private and foreign parties.


    For free flow of foreign capital in the dollar linked economy ,disinvestment is the prime methodology which would attract foreign investors as it is projected by the SENSEX and NIFTY bull run continued.


    It is the ultimate solution for the basic problems like growth rate,industrial and agri production,fiscal deficit,inflation and price rise.This is it.It is the ultimate balance of payment.


    Trade unions oppose FDI and disinvestment.Thus,labour reforms have to be passed sooner or later to kill factory act,trade unions and labour commission with a single stroke.


    ALL PSBs have to be sold off within three years to achieve th ultimate FDI Realty Raj of complete ethnic cleansing.

    State Bank of India happens to be lifeline network of Indian financial system.It happens to be the supreme target for the FDI Dinsinvestment regime.


    Eyeing Rs 58,425 crore this year by selling government stake in PSUs, Finance Minister Arun Jaitley on Sunday said that disinvestment process is on schedule.


    "The Department of Disinvestment (DoD) has already appointed advisors in some cases and the follow-up actions on those PSUs on some part of equity is to be divested is already progressing as scheduled," he said after addressing the Central Board of the Reserve Bank here.


    The process for disinvestment in ONGC and NHPC, among others, has already been started.


    Also, the government is looking to sell 5 percent stake in SAIL and 10 percent each in RINL and HAL in the current fiscal besides an outright sale of Tyre Corporation of India.


    The disinvestment of 10 percent through an initial public offer (IPO) in Rashtriya Ispat Nigam Ltd (RINL) is tentatively scheduled for completion in the current financial year.


    The DoD is at present engaged in outright sale of only one CPSE, Tyre Corporation of India (TCIL).


    The Cabinet has also approved sale of residual government equity in Hindustan Zinc and Balco.

    Jaitley further said: "We have certainly given the figure involved in that and the DoD is working on it."


    In the Budget, the government has estimated to collect Rs 43,425 crore from selling stake in PSUs and another Rs 15,000 crore from sale of residual stake in the erstwhile government companies.


    Of the disinvestment target of Rs 40,000 crore in 2013-14, the government had mobilised Rs 15,820 crore. In 2012-13, of the Rs 30,000 crore target, Rs 23,957 crore was raised.


    In 2011-12, only Rs 13,894 crore was raised of the Rs 40,000 crore target.


    Foreign direct investment (FDI) is a direct investment into production or business in a country by an individual or company of another country, either by buying a company in the target country or by expanding operations of an existing business in that country. Foreign direct investment is in contrast to portfolio investment which is a passive investment in the securities of another country such as stocks and bonds.


    Broadly, foreign direct investment includes "mergers and acquisitions, building new facilities, reinvesting profits earned from overseas operations and intra company loans". In a narrow sense, foreign direct investment refers just to building new facilities. The numerical FDI figures based on varied definitions are not easily comparable.


    The foreign direct investor may acquire voting power of an enterprise in an economy through any of the following methods:

    • by incorporating a wholly owned subsidiary or company anywhere

    • by acquiring shares in an associated enterprise

    • through a merger or an acquisition of an unrelated enterprise

    • participating in an equity joint venture with another investor or enterprise

    The comments in the editorial "One bad apple?" (August 8) are prejudiced against public sector banks and biased in favour of privatisation. The manner in which you have argued for the implementation of the PJ Nayak Committee's recommendations makes this clear.

    The Nayak Committee has recommended repeal of the Bank Nationalisation Act and SBI Act, which is preposterous given the unparalleled contribution of PSBs to the economic development of the country.

    The banking system was insulated from the recent global financial tsunami only because our banks were predominantly under the public sector. Further, given the present economic scenario of stagflation, PSBs have a great role to play in not only achieving total financial inclusion but catering to the needs of all segments of the economy. You have linked the SK Jain bribery episode to the inadequate pay packets of CMDs. While this needs to be substantially increased, emoluments alone do not guarantee integrity.

    What PSBs need is better regulation and monitoring by the Government and the RBI and not de-regulation and private control. The Syndicate Bank-SK Jain bribery episode is another reminder of the need to plug the loopholes in the banking system to weed out corruption. In this context, t the Nayak Committee recommendations of distancing the Government from PSBs must not be given importance.

    CH Venkatachalam, Gen Sec

    All-India Bank Employees' Association

    http://www.thehindubusinessline.com/opinion/letters/regulate-public-sector-banks/article6305104.ece?utm_source=RSS_Feed&utm_medium=RSS&utm_campaign=RSS_Syndication




    Banking Regulation Act, 1949

    [Act no. 10 of Year 1949, dated 10th. March, 1949]

    Contents


    Sections

    Particulars

    Part I

    Preliminary

    1

    Short title, extent and commencement

    2

    Application of other laws not barreds

    3

    Act to apply to co-operative societies in certain cases

    4

    Power to suspend operation of Act

    5

    Interpretation

    5A

    Act to override memorandum, articles, etc.

    Part II

    Business Of Banking Companies

    6

    Form and business in which banking companies may engage

    7

    Use of words "bank", "banker", "banking" or "banking company"

    8

    Prohibition of trading

    9

    Disposal of non-banking assets

    10

    Prohibition of employment of Managing Agents and restrictions on certain forms of employment

    10A

    Board of Directors to include persons with professional or other experience

    10B

    Banking company to be managed by whole-time Chairman

    10BB

    Power of Reserve Bank to appoint Chairman of a banking company

    10C

    Chairman and certain Directors not to be required to hold qualification shares

    10D

    Provisions of sections 10A and 10B to override all other laws, contracts, etc.

    11

    Requirement as to minimum paid-up capital and reserves

    12

    Regulation of paid-up capital, subscribed capital and authorized capital and voting rights of shareholders

    12A

    Election of new Directors

    13

    Restriction on commission, brokerage, discount, etc., on sale of shares

    14

    Prohibition of charge on unpaid capital

    14A

    Prohibition of floating charge on assets

    15

    Restrictions as to payment of dividend

    16

    Prohibition of common Directors

    17

    Reserve Fund

    18

    Cash reserve

    19

    Restriction on nature of subsidiary companies

    20

    Restrictions on loans and advances

    20A

    Restrictions on power to remit debts

    21

    Power of Reserve Bank to control advances by banking companies

    21A

    Rate of interest charged by banking companies not to be subject to scrutiny by courts

    22

    Licensing of banking companies

    23

    Restrictions on opening of new, and transfer of existing, places of business

    24

    Maintenance of a percentage of assets

    25

    Assets in India

    26

    Return of unclaimed deposits

    27

    Monthly returns and power to call for other returns and information

    28

    Power to publish information

    29

    Accounts and balance-sheet

    30

    Audit

    31

    Submission of returns

    32

    Copies of balance-sheets and accounts to be sent to Registrar

    33

    Display of audited balance-sheet by companies incorporated outside India

    34

    Accounting provisions of this Act not retrospective

    34A

    Production of documents of confidential nature

    35

    Inspection

    35A

    Power of the Reserve Bank to give directions

    35B

    Amendments of provisions relating to appointments of Managing Directors, etc., to be subject to previous approval of the Reserve Bank

    36

    Further powers and functions of Reserve Bank

    36A

    Certain provisions of the Act not to apply to certain banking companies

    Part IIA

    Control Over Management

    36AA

    Power of Reserve Bank to remove managerial and other persons from office

    36AB

    Power of Reserve Bank to appoint additional Directors

    36AC

    Part IIA to override other laws

    Part IIB

    Prohibition Of Certain Activities In Relation To Banking Companies

    36AD

    Punishments for certain activities in relation to banking companies

    Part IICA

    Cquisition Of The Undertakings Of Banking Companies In Certain Cases

    36AE

    Power of Central Government to acquire undertakings of banking companies in certain cases

    36AF

    Power of the Central Government to make scheme

    36AG

    Compensation to be given to shareholders of the acquired bank

    36AH

    Constitution of the Tribunal

    36AI

    Tribunal to have powers of a civil court

    36AJ

    Procedure of the Tribunal

    Part III

    Suspension Of Business And Winding Up Of Banking Companies

    36B

    High Court defined

    37

    Suspension of business

    38

    Winding up by High Court

    38A

    Court liquidator

    39

    Reserve Bank to be official liquidator

    39A

    Application of Companies Act to liquidators

    40

    Stay of proceedings

    41

    Preliminary report by official liquidator

    41A

    Notice to preferential claimants and secured and unsecured creditors

    42

    Power to dispense with meetings of creditors, etc.

    43

    Booked depositors' credits to be deemed proved

    43A

    Preferential payments to depositors

    44

    Power of High Court in voluntary winding up

    44A

    Procedure for amalgamation of banking companies

    45

    Power of Reserve Bank to apply to Central Government for suspension of business by a banking company and to prepare scheme of reconstitution or amalgamation

    Part IIIA

    Special Provisions For Speedy Disposal Of Winding Up Proceedings

    45A

    Part IIIA to override other laws

    45B

    Power of High Court to decide all claims in respect of banking companies

    45C

    Transfer of pending proceedings

    45D

    Settlement of list of debtors

    45E

    Special provisions to make calls on contributories

    45F

    Documents of banking company to be evidence

    45G

    Public examination of Directors and Auditors

    45H

    Special provisions for assessing damages against delinquent Directors, etc.

    45I

    Duty of Directors and Officers of banking company to assist in the realization of property

    45J

    Special provisions for punishing offences in relation to banking companies being wound up

    45K

    Power of High Court to enforce schemes of arrangements, etc.

    45L

    Public examination of Directors and Auditors, etc., in respect of a banking company under schemes of arrangement

    45M

    Special provisions for banking companies working under schemes of arrangement at the commencement of the Amendment Act

    45N

    Appeals

    45-O

    Special period of limitation

    45P

    Reserve Bank to tender advice in winding up proceedings

    45Q

    Power to inspect

    45R

    Power to call for returns and information

    45S

    Chief Presidency Magistrate and District Magistrate to assist official liquidator in taking charge of property of banking company being wound up

    45T

    Enforcement of orders and decisions of High Court

    45U

    Power of High Court to make rules

    45V

    References to Directors, etc., shall be construed as including references to past Directors, etc.

    45W

    Part II not to apply to banking companies being wound up

    45X

    Validation of certain proceedings

    Part IIIB

    Provisions Relating To Certain Operations Of Banking Companies

    45Y

    Power of Central Government to make rules for the preservation of records

    45Z

    Return of paid instruments to customers

    45ZA

    Nomination for payment of depositors' money

    45ZB

    Notice of claims of other persons regarding deposits not receivable

    45ZC

    Nomination for return of articles kept in safe custody with banking company

    45ZD

    Notice of claims of other persons regarding articles not receivable

    45ZE

    Release of contents of safety lockers

    45ZF

    Notice of claims of other persons regarding safety lockers not receivable

    Part IV

    Miscellaneous

    46

    Penalties

    46A

    Chairman, Director, etc., to be public servants for the purposes of Chapter IX to the Indian Penal Code

    47

    Cognizance of offences

    47A

    Power to Reserve Bank to impose penalty

    48

    Application of fines

    49

    Special provisions for private banking companies

    49A

    Restriction on acceptance of deposits withdrawable by cheque

    49B

    Change of name by banking company

    49C

    Alteration of memorandum of a banking company

    50

    Certain claims for compensation barred

    51

    Application of certain provisions to the State Bank of India and other notified banks

    52

    Power of Central Government to make rules

    53

    Power to exempt in certain cases

    54

    Protection of action taken under Act

    55

    Amendment of Act 2 of 1934

    55A

    Power to remove difficulties

    Part V

    Application Of The Act To Co-Operative Banks

    56

    Act to apply to Co-operative Societies subject to modifications

    Schedule III