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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    Times of India
    Daily Newsletter | Friday, September 04, 2015
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    TOP HEADLINES MORE »
    'Humanity' must bear blame for Syria's tiny child's death: Turkey president
    As mortifying images of the lifeless body of three-year-old Aylan Kurdi at the Turkish beach resort of Bordum went viral on Thursday, a furious Turkey President Recep Erdogan, hosting the G-20 meet of global business leaders, broke from summitteering to say Europe and "the rest of humanity" must bear the blame for the tiny child's death.

    Delhi's air reaches 'poor' levels a month early
    The monsoon dried up early over north India this year and Delhiites are already facing the consequences.
    11 Indians under detention in UAE for IS 'links'
    As many as 11 Indian nationals are under detention in the UAE since early August on charges of planning to join the Islamic State (IS) and recruiting, financing and providing logistics to those willing to joining the terror outfit.
    CITIES MORE »
    Hyderabad bizman says Uber driver hit him, abused his lady friend
    A 27-year-old businessman from Secunderabad has lodged a complaint with the Begumpet police against an Uber cab driver, alleging that the latter assaulted him and misbehaved with his female friend.
    NCP corporator stabbed to death in Chinchwad
    Nationalist Congress Party corporator Avinash Tekawade (45) was stabbed to death by two unidentified men on the steps leading up to his rented flat in Mohannagar, Chinchwad, at 2pm on Thursday.
    No power in Bareilly schools to broadcast PM's speech
    Lack of electricity and other basic arrangements in a majority of government schools might prevent students from listening to Prime Minister Narendra Modi's 'Maan Ki Baat' radio address on the occasion of Teachers' Day.
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    Here's what you can earn working at Facebook
    Using data from Glassdoor, we compiled a list of the highest salaries you can earn while working at Facebook, ranked from highest to lowest.
    5 hot smartphones under Rs 7,000
    Nowadays, you can pick up an entry-level smartphone with a 5-inch display and which handles Full-HD movie playback, almost every productivity task, and even social networking.
    Sony Xperia Z5 Premium first impressions
    Sony's new Xperia Z5 Premium is the world's first 4K-resolution display-equipped smartphone. Packing more than 800 pixels per inch, the phone's display features 4 times the pixels of a full-HD phone screen.
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    Kohli's aggression has rubbed off on Ishant: Coach Shravan
    Ishant Sharma's childhood coach Shravan Kumar said his ward was unusually aggressive and captain Virat Kohli played a role in it.
    Live Scorecenter: US Open 2015, Day 4
    Live: US Open 2015, Day 4
    State-level boxer forced to work as garbage collector
    In yet another case which highlights the apathy that sportspersons face in India, a state-level former boxer is forced to work as a garbage collector to sustain himself.
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    Govt vows secrecy on black money
    The tax department on Thursday vowed complete confidentiality of information filed under the new black money law as it unveiled the second set of clarifications on a range of queries.
    Tata Sons moves SC on Rs 300cr tax demand in Maha
    Tata Sons, the principal company of the tea-to-telecom conglomerate, has moved the Supreme Court challenging the sales tax demand by the Maharashtra government on the royalty amount it collects from Tata Group entities.
    Maggi shock bigger than what it seems: Suresh Narayanan
    As Nestle India managing director Suresh Narayanan settles down in the Maggi Creative Kitchen, used for cooking demonstration and new recipe development at the company's headquarters in Gurgaon, the talk centres around the instant noodle brand, which went off the shelves in June after the food safety regulator FSSAI slapped a ban citing high lead content and labelling problems.
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    Ranbir-Kats to unite with Kapoors in London
    Both Ranbir Kapoor and Katrina Kaif are currently in the British capital. Ranbir, who begins filming his next in London, is likely to be stationed overseas (though not at a stretch) for at least a couple of months.
    30k hours gone in making of SRK's spaceship
    When Bollywood Badshah Shah Rukh Khan sought a futuristic spaceship for himself, he called up DC Design, the famous design studio whom he has faith in.
    When John Abraham left Anil Kapoor bleeding
    John telling us that he's super protective of Anil, Shruti saying that she got her butt kicked with her debut, and Anil just being Anil, was a super-fun chat at the DT office – and yeah, serious and engaging too.

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    (हिंदी के लेखक उदय प्रकाश के साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार लौटाने पर थोड़ी ही देर पहले हिंदी के कवि विष्‍णु खरे का यह पत्र ई-मेल से प्राप्‍त हुआ है और इसे छापने का आग्रह किया गया है। नीचें पढ़ें विष्‍णु खरे जी की पूरी पाती - मॉडरेटर) 


    विष्‍णु खरे 


    मैं श्री उदय प्रकाश के साहित्य, विचारों, वक्तव्यों, कार्यों,मनःस्थितियों और कार्रवाइयों पर कुछ  भी नहीं कहता हूँ क्योंकि उसे भी वह उसी वैश्विक षड्यंत्र का हिस्सा मान लेंगे जो अकेले उनके खिलाफ मुसल्सल चल रहा है, किन्तु मुझे उनका यह साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाना बिलकुल समझ में नहीं आया।

    अकादेमी और अन्य संदिग्ध पुरस्कारों पर मैं वर्षों से लिखता रहा हूँ। कुछ पुरस्कारों को लेकर मेरी भी भर्त्सना हुई है। प्रस्तावित होने पर कुछ पुरस्कार मैंने लेने से इन्कार भी किया है।

    मैं अकादेमी पुरस्कारों और प्रो. मल्लेशप्पा मदिवलप्पा कलबुर्गी की नृशंस हत्या के बीच कोई करण-कारण सम्बन्ध नहीं देख पा रहा हूँ। यदि उदय प्रकाश साहित्य अकादेमी को केन्द्रीय सरकार का एक उपक्रम मान रहे हैं और इस तरह मोदी शासन, भाजपा, आर.एस.एस., विहिप, बजरंग दल आदि को किसी तरह प्रो. कलबुर्गी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार मानकर उसका विरोध कर रहे हैं तो 2011 के उनके पुरस्कार के पहले और बाद में भी सभी केन्द्रीय सरकारें और उनके समर्थक कई हत्याओं और अन्य अपराधों के लिए नैतिक रूप से ज़िम्मेदार रहे हैं और होंगे। सच तो यह है कि केन्द्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार अपने आप में वर्षों से इतना कुख्यात हो चुका है कि उसे स्वीकार ही नहीं किया जाना चाहिए - न कांग्रेस के शासन में, न भाजपा के शासन में।

    और भी विचित्र यह है कि डॉ. दाभोलकर की हत्या 20 अगस्त 2013 को की गई थी और कॉमरेड गोविन्द पानसरे को 20 फ़रवरी 2015 को मारा गया लेकिन यह दोनों क़त्ल श्री उदय प्रकाश को इस योग्य नहीं लगे कि उनके प्रतिवाद में वह अकादेमी पुरस्कार लौटा दें। शायद उन्हें रघुवीर सहाय की तर्ज़ पर बता यह दिया गया था फिर एक हत्या होगी। लेकिन हत्याएँ तो अनिवार्यतः और होंगी ही। सब हो लेने देते।

    मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मैं उदय प्रकाशजी की इस कार्रवाई को an insult to intelligence समझने और प्रो. कलबुर्गी की हत्या को exploit करने जैसा मानने के लिए विवश हूँ। यह एक तरह से उनका दूसरा क़त्ल है। लेकिन कल 5 सितम्बर को प्रगतिकामी-वामपंथियों की एक सार्वजनिक प्रतिवाद-सभा दिल्ली में है और संभव है उदय प्रकाशजी ने यह कार्रवाई एक उम्दा sense of timing के तहत आयोजकों का मनोबल बढाने के लिए की हो। तब यदि वह राजधानी में हों तो उन्हें बोलने के लिए बुलाया जाना चाहिए। बहुत असर पड़ेगा।


    विष्णु खरे

    -- जनपथ
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    प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या के विरोध में उदय प्रकाश ने साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया


    (हिंदी के नामचीन लेखक उदय प्रकाश ने हिंदुत्‍ववादी ताकतों द्वारा कन्‍नड़ के विद्वान प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या के विरोध में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाने की घोषणा की है। उन्‍होंने शुक्रवार की सुबह अपने फेसबुक वॉल पर इस संबंध में निम्‍न पोस्‍ट लिखा है)





    पिछले समय से हमारे देश में लेखकोंकलाकारोंचिंतकों और बौद्धिकों के प्रति जिस तरह का हिंसकअपमानजनकअवमानना पूर्ण व्यवहार लगातार हो रहा हैजिसकी ताज़ा कड़ी प्रख्यात लेखक और विचारक तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है,उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है।

    अब यह चुप रहने का और मुँह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है। वर्ना ये ख़तरे बढ़ते जायेंगे।

    मैं साहित्यकार कुलबर्गी जी की हत्या के विरोध में 'मोहन दासनामक कृति पर २०१०-११ में प्रदान किये गये साहित्य अकादमी पुरस्कार को विनम्रता लेकिन सुचिंतित दृढ़ता के साथ लौटाता हूँ।

    अभी गॉंव में हूँ। ७-८ सितंबर तक दिल्ली पहुँचते ही इस संदर्भ में औपचारिक पत्र और राशि भेज दूँगा।

    मैं उस निर्णायक मंडल के सदस्यजिनके कारण 'मोहन दासको यह पुरस्कार मिलाअशोक वाजपेयी और चित्रा मुद्गल के प्रति आभार व्यक्त करते हुएयह पुरस्कार वापस करता हूँ।

    आप सभी दोस्तों से अपेक्षा है कि आप मेरे इस निर्णय में मेरे साथ बने रहेंगेपहले की ही तरह।

    आपका

    उदय प्रकाश।
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  • 09/04/15--12:26: यार बड़ा घनचक्कर है. पुरस्कार लेने पर विवाद, न लेने पर विवाद. लौटाने पर विवाद, न लौटाने पर विवाद. विरोध करने पर विवाद, चुप रहने पर विवाद. एक फेसबुकिया फूहड़ कामरेड थानवी जी के पक्ष में झंडा उठाए घूम रहे हैं कि पुरस्कार ले लिया, अब कोई कुछ तो वह संदिग्ध है. यदि विरोध की राजनीति इतनी कन्फ्यूज और इतनी अश्लील है तो अतिवादियों की हर कार्रवाई सही है. कठमुल्लों में एका है. विरोध करने वाले अपनी क्षुद्रता से ही दबे एक दूसरे की लंगोट खींच रहे हैं. चौरासी हुआ था तो गुजरात अनिवार्य है. तब विरोध नहीं किया था तो अब नहीं करना है चाहे आईएस मार्का संहार ही क्यों न हों. अबके पहले दोनों हत्याओं के समय खरे जी क्या कर रहे थे? उन्होंने कोई पहलकदमी क्यों नहीं की? उन मुसलसल हो रही हत्याओं पर कुछ नहीं कहना था. इस विरोध पर बहुत कुछ कहना है.
  •    
    Krishna Kant
    September 5 at 12:26am
     
    यार बड़ा घनचक्कर है. पुरस्कार लेने पर विवाद, न लेने पर विवाद. लौटाने पर विवाद, न लौटाने पर विवाद. विरोध करने पर विवाद, चुप रहने पर विवाद. एक फेसबुकिया फूहड़ कामरेड थानवी जी के पक्ष में झंडा उठाए घूम रहे हैं कि पुरस्कार ले लिया, अब कोई कुछ तो वह संदिग्ध है. यदि विरोध की राजनीति इतनी कन्फ्यूज और इतनी अश्लील है तो अतिवादियों की हर कार्रवाई सही है. कठमुल्लों में एका है. विरोध करने वाले अपनी क्षुद्रता से ही दबे एक दूसरे की लंगोट खींच रहे हैं. चौरासी हुआ था तो गुजरात अनिवार्य है. तब विरोध नहीं किया था तो अब नहीं करना है चाहे आईएस मार्का संहार ही क्यों न हों. अबके पहले दोनों हत्याओं के समय खरे जी क्या कर रहे थे? उन्होंने कोई पहलकदमी क्यों नहीं की? उन मुसलसल हो रही हत्याओं पर कुछ नहीं कहना था. इस विरोध पर बहुत कुछ कहना है.

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    Prashant Tandon
    September 5 at 12:42am
     
    देखिये फसिस्ट ताकतो - खासकर सवर्णो के खिलाफ इस लड़ाई को हिंदी के लेखको के आपसी झंझटो से से दूर रखंगे तो बेहतर होगा. राजेंद्र यादव और शानी को छोड़ कर सभी डगमगाये हैं या उस वक्त चुप रहे जब बोलने की ज़रूरत थी. अरुंधत्ती रॉय का सौवां हिस्सा भी नही हैं ये सरकारी नौकर.

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    Ashutosh Kumar
    September 5 at 12:35am
     
    जाहिर है , भेजा है तो छापने के लिए भेजा होगा।लेकिन छापने न छापने का अंतिम निर्णय सम्पादक को करना होता है। हैरत है कि हम अब भी आपसी रंजिशों में बेसुध हैं । क्या हर आदमी गोली खाने के बाद ही समझेगा कि फासीवाद आ चुका है। सिचुएशन को एक्सप्लॉयट करने का काम खरे जी भी कर सकते हैं। उन्हें भी कुछ पुरस्कार मिले होंगे। लौटा दें। कब तक यह तर्क दिया जाता रहेगा कि साहित्य अकादमी सरकार की नहीं है , कि सरकार भी सरकार की नहीं है जनता की है , कि पुरस्कार जनता देती है - सरकार या उसका कोई नुमाइंदा नहीं।हद है। यानी कि लेने की छोड़िए , किसी को पुरस्कार लौटाने तक का हक़ नहीं है? अगर वह किसी भी स्थिति का विरोध करना चाहे। अगर अकादमी इतनी ही आज़ाद है तो वह क्लबर्गी पर एक शोकप्रस्ताव तक पास करने से क्यों मना कर रही है , जो खुद अभिषेक जी ने हमें बताया है। मैं उदय प्रकाश के फैसले का स्वागत करता हूँ।
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  • 09/04/15--12:33: विष्णु खरे जबरन विवाद को बढ़ा रहे हैं यह किसी लेखक की स्वतन्त्रता है कि वह किस क्षण कोई फैसला ले. उदय ने पुरस्कार तब लौटाया जब देख लिया लेखकों की हत्या लगातार बढ़ रही है. यह ह्त्या जिन कारणों से हुई वह भी सामने है, वो लोग भी पकडे गये जिन्होंने हत्या श्रीराम सेना की विचारधारा क्या है ये बात हम सभी जानते हैं. कोई भी संस्था जो लेखकों से जुडी हैं उन्हें अपने समामानित लेखकों की हत्या पर विरोध करना नैतिक दायित्व है. अगर ऐसा नहीं होता तो ये संस्थाएं भी व्ही काम कर रही हैं जो हत्यारे कर रहे हैं. संस्थाओं का चुप रहना हत्या करने वालों के पक्ष में उन्हें खड़ा करती है ऐसे में अगर उदय ने पुरस्कार लौटाया है तो क्या गलत किया? विष्णु खरे किसी पूर्वाग्रह से ये बातें कह रहे हैं. जोकि लेखकों के बीच गलत असर दाल सकती हैं ऐसे समय में सच्चे और जनवादी लेखक की पहचान करना जनता का दायित्व है.

  •    
    Anil Pushker
    September 5 at 1:01am
     
    विष्णु खरे जबरन विवाद को बढ़ा रहे हैं यह किसी लेखक की स्वतन्त्रता है कि वह किस क्षण कोई फैसला ले. उदय ने पुरस्कार तब लौटाया जब देख लिया लेखकों की हत्या लगातार बढ़ रही है. यह ह्त्या जिन कारणों से हुई वह भी सामने है, वो लोग भी पकडे गये जिन्होंने हत्या श्रीराम सेना की विचारधारा क्या है ये बात हम सभी जानते हैं. कोई भी संस्था जो लेखकों से जुडी हैं उन्हें अपने समामानित लेखकों की हत्या पर विरोध करना नैतिक दायित्व है. अगर ऐसा नहीं होता तो ये संस्थाएं भी व्ही काम कर रही हैं जो हत्यारे कर रहे हैं. संस्थाओं का चुप रहना हत्या करने वालों के पक्ष में उन्हें खड़ा करती है ऐसे में अगर उदय ने पुरस्कार लौटाया है तो क्या गलत किया? विष्णु खरे किसी पूर्वाग्रह से ये बातें कह रहे हैं. जोकि लेखकों के बीच गलत असर दाल सकती हैं ऐसे समय में सच्चे और जनवादी लेखक की पहचान करना जनता का दायित्व है.
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    देश
    04, SEP, 2015, FRIDAY 09:44:43 PM

    नई दिल्ली ! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने शुक्रवार को कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार सही रास्ते पर है, और सरकार के ..

    विदेश

    बच्चे का शव मिलने के मामले में चार मानव तस्कर गिरफ्तार

    04, SEP, 2015, FRIDAY 11:13:04 PM

    अंकारा ! तुर्की के तट पर सीरियाई अप्रवासियों से भरी एक नौका पलटने से मारे गए 12 लोगों में से एक तीन साल के बालक का शव पाए जाने के मामले में तुर्की के अधिकारियों ने चार संदिग्ध मानव तस्करों को गिरफ्तार किया है। समुद्र तट पर औंधे मुंह 

    खेल

    रहाणे टेस्ट में पांचवें क्रम पर करें बल्लेबाजी : द्रविड़

    04, SEP, 2015, FRIDAY 09:24:39 PM

    मुंबई ! भारत-ए अंडर-19 क्रिकेट टीम के मुख्य कोच दिग्गज बल्लेबाज राहुल द्रविड़ का मानना है कि युवा बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे को टेस्ट मैच में पांचवें क्रम पर बल्लेबाजी करना चाहिए। द्रविड़ ने पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ रहाणे की 

    प्रादेशिकी

    राज्य का दूसरा पशु चिकित्सा कॉलेज बिलासपुर में शुरू

    04, SEP, 2015, FRIDAY 10:31:41 PM

    रायपुर ! प्रदेश का दूसरा शासकीय पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय बिलासपुर के कोनी में शुरू हो गया। कृषि एवं पशुपालन मंत्री बृहमोहन अग्रवाल ने कल शासकीय पशु प्रजनन प्रक्षेत्र कोनी सरकण्डा में इसका शुभारंभ ..

    अर्थजगत

    सेंसेक्स में 563 अंकों की गिरावट

    04, SEP, 2015, FRIDAY 05:22:46 PM

    मुंबई । देश के शेयर बाजारों में आज गिरावट रही। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 562.88 अंकों की गिरावट के साथ 25,201.90 पर और निफ्टी 167.95 अंकों की गिरावट के साथ 7,655.05 पर बंद हुआ। बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 

    

    सम्पादकीय

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    हड़ताल का असर

    04, SEP, 2015, FRIDAY 11:00:05 PM

    भारत में श्रम कानूनों में संशोधन के विरोध में 10 श्रमिक संगठनों द्वारा बुलाई गई एक दिवसीय हड़ताल का असर देश भर में देखने मिला, कहींकम तो 

    कोल कामगारों की भी सुनें

    04, SEP, 2015, FRIDAY 12:27:44 AM
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    श्रमिक हितों के प्रति नियोक्ताओं का रवैया हमेशा सवालों के घेरे में रहा है। विशेषकर असंगठित क्षेत्र के श्रमिक इसका गंभीर खामियां भुगतने को मजबूर हैं। श्रम अधिनियम को लागू 

    पूंजीवादी आर्थिक नीतियां महंगाई बढ़ाती ही हैं

    03, SEP, 2015, THURSDAY 12:10:58 AM

    प्याज की महंगाई की बातचीत से शुरू हुई महंगाई की चर्चा अब देश के आर्थिक विमर्श का स्थाई भाव बन गई है। मौजूदा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के तहत शेयर बाजार को आर्थिक विकास का 

    स्वाभिमान बनाम परिवर्तन

    02, SEP, 2015, WEDNESDAY 11:14:22 PM

    बिहार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करना, भाजपा और राजद-जदयू गठबंधन के लिए प्रतिष्ठा से ज्यादा जीवन-मरण का प्रश्न बनता जा रहा है। अब तक प्रचार के लिए जितनी भी रैलियां और 

    मानसून और सरकार के बीच बेबस 'अन्नदाता'

    02, SEP, 2015, WEDNESDAY 04:45:05 AM
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    प्रदेश के अन्नदाता दोहरी मार झेल रहे हैं। मानसून की बेरुखी और सरकार की उदासीनता ने उनको पस्त कर दिया है। अल्पवर्षा के कारण धान की रोपाई और बियासी का काम रुका है। 

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    कालाधन और विगत चुनाव

    04, SEP, 2015, FRIDAY 11:04:12 PM
    Posted by:डॉ. गिरीश मिश्र

    गिरीश मिश्र : पिछले आम चुनाव में देश के बाहर पड़े कालाधन को एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की गई। इस अभियान की शुरुआत लालकृष्ण आडवाणी ने की थी, जिन्होंने 

    पाटीदार और आरक्षण आंदोलन

    04, SEP, 2015, FRIDAY 11:02:14 PM
    Posted by:अन्य

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    मंगलौर और मडि़केरी के आसपास

    03, SEP, 2015, THURSDAY 12:15:20 AM
    Posted by:ललित सुरजन

    ललित सुरजन : मंगलौर का हवाई अड्डा देश के अन्य मंझोले विमानतलों की तरह ही है। वैसे इसे अंतरराष्ट्रीय विमानतल का दर्जा मिला है क्योंकि यहां से प्रतिदिन �

    झुग्गीवासियों को सुविधाएं दीजिए, ख्वाब नहीं

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    Posted by:डॉ. भरत झुनझुनवाला

    डॉ. भरत झुनझुनवाला : केन्द्रीय हाउसिंग मंत्रालय ने गरीबों के लिए मकान बनाने को राज्य सरकारों से आग्रह किया है। मंत्रालय ने तीस लाख घर प्रतिवर्ष बनाने �

    संबंध सुधरने की कोई उम्मीद नहीं

    02, SEP, 2015, WEDNESDAY 11:18:34 PM
    Posted by:कुलदीप नैय्यर

    कुलदीप नैय्यर : मुझे लगता है कि प्रमुख सुरक्षा सलाहकारों की बैठक की तारीख तय करने के बाद भारत-पाक बातचीत के बारे में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का विचार बद

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    Prashant Mishra
    September 5 at 1:16am
     
    बहुत ही शर्मनाक स्थिति है। प्रो. कालबुर्गी की हत्या करने वालों का विरोध करने के बजाय हत्यारों का विरोध करने वालों का विरोध किया जा रहा है। सारी पुरानी उधारी का हिसाब किया जा रहा है। सबसे असंवेनशील हो चुके हे.... डिहोमनाइज प्रगतिशीलों, क्रांतिकारी कुकुरमुत्तों ....खाओ लाशों को नोच नोच कर.......

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    कबीर दास होते तो क्या उन्हें मजहबी लफंगे बख्श देते?

    फासीवाद का विरोध उतना आसान भी नहीं है,दोस्तों।

    जन्माष्टमी से बड़ा किसी अध्यापक का जन्मदिन न हो,हिंदू राष्ट्र ने चाकचौबंद इंतजाम किया और जन्मष्टमी से एक दिन पहले,देश के सबसे बड़े शिक्षक का जनमदिन मना लिया गया।

    निर्णायक लड़ाई हर हाल में जनता लड़ती है।

    बन सको तो बन जाओ जनता के हथियार।


    पलाश विश्वास

    फासीवाद का विरोध उतना आसान भी नहीं है,दोस्तों।

    कबीर दास होते तो क्या उन्हें मजहबी लफंगे बख्श देते?


    फिरभी सच यही है कि जब कोई कबीर बाजार में खड़ा हो जाता है अपना घर फूंकने के तेवर में तो जमाना ठहर जाता है।


    वक्त भी ठहर जाता है।

    वक्त आज भी ठहरा हुआ है।


    आज भी मध्ययुग का वही अंधियारा है।

    कोई कबीरदास किसी बाजार में खड़ा नहीं है।


    कबीर दास होते तो क्या उन्हें मजहबी लफंगे बख्श देते?


    आज जन्माष्टमी है।हिंदू राष्ट्र का बड़ा उत्सव है और द्वारिका में कृष्ण कन्हैया का राजकाज है।


    जन्माष्टमी से बड़ा किसी अध्यापक का जन्मदिन न हो,हिंदू राष्ट्र ने चाकचौबंद इंतजाम किया और जन्मष्टमी से एक दिन पहले,देश के सबसे बड़े शिक्षक का जनमदिन मना लिया गया।


    कल शिक्षक दिवस का भी अवसान हो गया पांच सितंबर वाला।

    हम चूंकि मजहबी नहीं है और न रंग बिरंगी सियासत से हमारा वास्ता है तो हमारा शिक्षक दिवस आज है।


    तब शायद मैं कक्षा दो में भी नहीं पढ़ रहा था।तब भारत के राष्ट्रपति थे सर्वपल्ली डा.राधाकृष्णन।


    पंतनगर विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह था और डा.राधा कृष्णन आने वाले थे।पिताजी उस दीक्षांत समारोह में जाने वाले थे।मैं जिद पकड़ ली थी कि मुझे भी जाना है।

    पिताजी ने हां कह दी थी।


    सुबह का स्कूल था।घर में बस्ता फेंक मैं दोस्तों के साथ कबड्डी खेलने निकल गया।पिताजी खेत का काम निबटाकर नहा धोकर पंतनगर को निकल लिये।सोचा कि मैं भूल गया।


    भूल गया था।ऐन मौके पर याद आयी।दौड़कर घर पहुंचा तो देखा वे निकल गये।मैं दौड़ पड़ा उनके पीछे।वे साईकिल से जा रहे थे।करीब दो मील दौड़कर रास्ते में मैंने पकड़ लिया उन्हें।चड्डी में लथपथ मैंने कहा कि मैं भी जा रहा हूं।


    पिताजी मेरी दौड़ जानते थे।लौट आये बसंतीपुर।नहा धोकर तैयार होकर पिताजी के साथ निकला मैं दीक्षांत समारोह के लिए।


    पंतनगर पहुंचा तो पहाड़ों से बादल टकराने लगे थे।

    बिजलियां कड़कने लगी थीं और हम पर बिजली तब गिरी जब हमने जान लिया कि डां राधाकृष्णन नहीं आ रहे हैं।


    हमने तब उपराष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन को सुना।

    लौटते हुए रात हो गयी।

    मूसलाधार बारिश।


    तेज आंधी और तराई का जंगल।

    आदमखोर बाघ का डर।

    साठका दशक।


    पंतनगर से रुद्रपुर।

    रुद्रपुर से जाफरपुर और फिर जाफरपुर से बसंतीपुर।

    हम डरे नहीं।


    साईकिल के कैरीयर पर भीगते हुए,ठंड से कांपते हुए हमने राम राम भी नहीं कहा।


    हमने डा.राधाकृष्णन को नहीं देखा।

    यह सदमा चूंकि डर से बड़ा था।


    वह सदमा आज भी जिंदा है कि फिर हमें डा.राधाकृष्णन को नहीं देखा।


    जब डा.जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने,जिन्हें मैंने देखा था,तब भी मुझे कोई खास खुशी नहीं हुई।

    क्योंकि मैंने डा.राधाकृष्णन को नहीं देखा।

    बेहद अफसोस की बात है कि फिर किसी राष्ट्रपति में मैंने डा.राधाकृष्णन को नहीं देखा।वे जो दर्शन के प्रोफेसर थे।


    और अनजाने में अपने अवचेतन में मैं कहीं न कहीं प्रेसीडेंसी का वह छात्र बन गया जिसने उनके व्याख्यान के मध्य उन्हें टोका कि सर,अंधियारा है और हम नोट्स ले नहीं पा रहे हैं।


    तेज चकाचौंध के बावजूद फिर वहीं अंधियारा है।

    आज भी डा.राधाकृष्णन के व्याख्यान के नोट्स अधूरे हैं।


    फिर भी कहते हुए मुझे बेहद गर्व है कि मैंने अपने अध्यापकों में नारी पुरुष लिंग भेद निरपेक्ष उन्हीं डा.राधा कृष्णन को बार बार देखा है।


    आज भी अपढ़ हूं उसीतरह।

    आज भी अज्ञानी हूं उसी तरह।


    आज भी हर रोज अपने बचपन की तरह पहले पाठ के पहला सबक इंतजार होता है बेसब्री से आखर और अंक को रोज नये सिरे से सीखना होता है।


    रोज नये सिरे से ज्ञान की खोज में उड़ान पर होता हूं मैं और मेरे ये डैने मेरे शिक्षकों,शिक्षिकाओं के डैने हैं।


    उन सबको नमन।


    कुछ नाम बहुत प्रिय हैं।

    उनका नाम लेकर मैं अपने तमाम प्रिय अध्यापक अध्यापिकाओं को कमतर बताना नहीं चाहता जो सारे के सारे बेहद आदरणीय होते हैं हमेशा।क्योंकि वे न होते तो हम यकीनन नहीं होते हम।


    वे सारे लोग न होते तो मेेरे पांव आज भी कीचड़ गोबर में धंसे न होते और न मेरा दिलोदिमाग या बसंतीपुर या फिर हिमालय होता।


    सीरिया के अनाथ पिता ने दरिया में दो मासूम बच्चों के डूबने के बाद सच कहा है कि शरणार्थी का कोई देश नहीं होता।


    ठप्पा एकबार लगा गया फिलीस्तीनी होने का तो वह फिर नागरिक होता नहीं है।


    ठप्पा एकबार लगा गया अश्वेत अछूत होने का तो वह फिर नागरिक होता नहीं है।


    अश्वेत अछूत शरणार्थी का देश कोई होता नही है।

    मुक्त बाजार का सच भी नहीं है यह।

    यह सिर्फ मनुस्मृति का सच भी नहीं है।


    यह इतिहास का सच है।

    यह सरहदों का सच है।

    यह हिमालय,समुंदर और नदियों का सच है।


    यह सच न बाजार का सच है और न मजहब का सच है।

    यह सियासत का सच है।


    सियासत हमेशा अश्वेत अछूत और शरणार्थी के खिलाफ है।


    इसलिए सियासत से मुझे सख्त नफरत है।

    मैं नहीं मानता कि सियासत का सच आखिरी सच होता है।


    सच कहने के लिए बहुत जरुरी भी नहीं कि सियासती तौर पर सही होना जरुरी है।


    मुझे न कोई बड़ी कुर्सी हासिल करनी है और न किसी पुरस्कार सम्मान से अपना कद बड़ा करना है कि लोगों की पसंद का,उनकी सियासत का मैं लिहाज करुं।


    मुझे कोई इलेक्शन भी जीतना नहीं है और न किसी इतिहास में दाखिल होना है और न किसी अजायब घर में मोम का पुतला बनकर खड़ा हो जाना है।

    मैं बूतपरस्ती के खिलाफ हूं।


    फिरभी दुनिया का दस्तूर है बूतपरस्ती का।

    यकीन रब का करते हैं,इबादत भी उसी का करते हैं।

    फिरभी रब को बूत बनाते बनाते कातिलों को रब बना देते हैं।


    हम शख्सियतों की इबादत के अभ्यस्त हैं दरअसल।

    हम शख्सियतों की इबादत में रब को भुला देते हैं।


    हम शख्सियतों की इबादत में किसी न किसी फासिस्ट की गुलाम फौज में तब्दील हो जाते हैं।

    यह इंसानियत की सबसे बड़ी त्रासदी है।


    पथेर पांचाली हमारी नजर से उतनी महान फिल्म भी नहीं है जितनी कोमलगांधार या गर्म हवा या तमस या तीसरी कसम।


    पथेर पांचाली के लेखक विभूति भूषण बंद्योपाध्याय के रचनासंसार में कोई खलनायक या खलनायिका कहीं है ही नहीं।


    ऐसा होता तो सर्वजाया,दुर्गा की मां किसी और की कलम से खूंखार खलनायिका होती,दुर्गा की मां बनकर याद न बन रही होती।


    चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों में भी किसी बदमाश किरदार की मौत होती है तो दिल चीखता है,अरे ,किसी इंसान की मौत हो रही है।


    तालस्ताय और विक्टर ह्युगो के उपन्यास इसीलिए महाकाव्य है।

    हर श्रेष्ठ उपन्यास इसीलिए निर्णायक तौर पर महाकाव्य हैं।

    इसीतरह हर महाकाव्य दरअसल मुकम्मल उपन्यास है।


    सच को वस्तुनिष्ठ तरीके से देखने की आंखें हों तो शख्सियत पर फोकस होना नहीं चाहिए।


    गौर करें कि हमने बार बार लिखा है कि ओम थानवी प्रभाष जोशी से बेहतर संपादक हैं।


    हमने यह भी साफ किया जब वे हमारे बास थे,तबभी कि वे मुझे सख्त नापसंद हैं और मैं उनसे बात भी नहीं करता और उनसे मुलाकात की नौबत बनती दिखे तो कैजुअल लेकर घर बैठ जाता हूं।


    शैलेंद्र करीब चार दशक से मेरा दोस्त है।कोलकाता में मेरा बास है सोलह साल से।न ओम थानवी मेरी फ्रेंडलिस्ट में है और न शैलेंद्र। क्योंकि अखबार के मामले में मेरी राय उन सबसे अलग है।


    प्रभाष जोशी न होते तो मैं जनसत्ता में नहीं होता,यह जितना सच है,उससे बड़ा सच है कि रघुवीर सहाय,उर्मिलेश,मदनकश्यप और आवाज के संपादक ब्रह्मदेवसिंह शर्मा और धनबाद के बंकिम बाबू न होते तो मैं पत्रकारिता में ही नहीं होता।


    मुद्दों की बात होती है तो मुद्दों की बात करने से चूकता नहीं हूं।

    जब प्रभाष जोशी संपादक थे तो उनके सारस्वत ब्राह्मणवाद के खिलाफ हमने हंस में लिखा है।


    दरअसल हम ओम थानवी की बात कर ही नहीं रहे थे और हमें इससे कोई मतलब नहीं है कि उनने किससे किस किस मौके पर कितनी बदतमीजी की या उनने मेरे साथ क्या सलूक किया।


    ये हमारे निजी मामलात है कोई मसला या मुद्दा दरअसल है नहीं। उनने कल्याण सिंह से पुरस्कार लिया या नहीं,इससे भी हमें खास मतलब नहीं है।मैं किसी पुरस्कार को किसी के किये धरे का प्रतिमान नहीं मानता।


    यूं समझें कि नवारुण भट्टाचार्य को साहित्य अकादमी मिल गया और उनकी मां महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ मिला है और हो सकता है कि नोबेल भी मिल जाये।


    महाश्वेता दी नहीं होतीं तो भाषा और साहित्य,कला और संस्कृति के बारे में मेरी सोच मेरी होती ही नहीं।


    फिरभी हर मायने में नवारुण दा महाश्वेता दी से बड़े रचनाकार हैं कि जनता की बदलाव की लड़ाई में वे बेहतर हथियार हैं।


    किसी दो कौड़ी के रचनाकार को नोबेल मिल गया तो हम उन्हें उसीतरह बड़ा नहीं मानते जैसे नोबेल मिल जाने से अमर्त्य सेन को हम बड़ा अर्थशास्त्री नहीं मानते।उनसे बड़ा अर्थशास्त्री तो हमारी चिपको माता गौरा पंत हैं या फिर सुंदर लाल बहुगुणा।इंसानियत और कायनात से ऊपर अर्थशास्त्र होता नहीं है।


    इसीलिए रोज रोज शेयरों के उतार चढ़ाव से,ग्लोबल इशारों से  निवेशकों का लाखों करोड़ का चूना लगने के बावजूद रिजर्व बेकं के गवर्नर राजन के रेट कट से मुझे सख्त एलर्जी है और उन्हें मैं दुनिया का सबसे बड़ा झूठा,दिवालिया मानताहूं।


    ऋत्विक घटक को आस्कर नहीं मिला,मंटो,प्रेमचंद,शरत,मुक्तिबोध वगैरह पुरस्कृत न हुए तो उनका कद बौना हुआ नहीं है।


    न सिर्फ विश्वसुंदरियां सुंदरियां हैं और न हम लोग सिर्फ विश्वसुंदरियों से मुहब्बत करते हैं।


    खासी बदसूरत कन्या भी हमारे लिए विश्वसुंदरी होती है,जब हमें उससे मुहब्बत हो जाती है।



    हमें पचास साठ की हिरोइनें बहुत अच्छी लगती हैं तो हम करीना,दीपिका,प्रियंका,कंगना,वगैरह वगैरह को हरवक्त शबाना और स्मिता के मुकाबले खड़ा नहीं भी करते हैं।


    दिलीपकुमार और आमीर खान का मुकाबला असंभव है तो अमिताभ जैसा शाहरुख भी नहीं है।


    सबकी अपनी भूमिका है।


    हर फिल्म में अलग किरदार होता है।


    हम किरदार के दीवाने होते हैं।


    कलाकारों के हरगिज नहीं।


    रघुवीर सहाय,प्रभाष जोशी या ओम थानवी के बारे में जब हम बात करते हैं तो उनकी निजी जिंदगी से हमें कोई मतलब नहीं होता।वे किस दर्जे के इंसान  हैं,सेकुलर हैं या नहीं,यह पैमाना नहीं है।


    उनने मीडिया का क्या बनाया,मुद्दा दरअसल यही है।


    पुरस्कार कल्याणसिंह से लिया हो या नहीं,ओम थानवी ने जनसत्ता को जनसत्ता बनाये रखा है और हमें लोग जनसत्ता की रोशनी से पहचानते रहे हैं।

    हमारे लिए मुद्दा इतना है।


    आदमी वह घटिया यकीनन हो सकता है,लेकिन जब तक संपादक की कुर्सी पर बैठा था,उसकी रीढ़ मुकम्मल थी और जनसत्ता सिर्फ खबरों का अखबार नहीं था और न सिर्फ अखबार था जनसत्ता,वह हिंदी दुनिया का आइना बना रहा।


    थानवी ने अखबार में किसी औरत को नंगा किया हो,हमारी जानकारी में नहीं है। निजी जीवन में वे कितने वफादार हैं और कितने लंपट.हमारा मसला यह नहीं है।


    जनसत्ता को ओम थानवी ने जनसत्ता बनाये रखा,इसीलिए वे प्रभाष जोशी से बड़े संपादक है।क्योंकि विरासत बनाने से ज्यादा मुश्किल काम विरासत बचाये रखने का है।


    प्रभाष जोशी ने जनसत्ता रचा।हम सबको खोज खोज कर जोड़ा उनने।वे जनसत्ता के जनक हैं।लेकिन आखिर तक,जनसत्ता को जनसत्ता बनाये रखना उनके काम से बेहद ज्यादा मुश्किल काम रहा है।आगे आगे यह काम बेहद मुश्किल होने वाला है।


    अब भी जनसत्ता में हूं चंद महीने और,जो थानवी पर धुँधाधार गोले बरसा रहे हैं,इस गोलाबारी में मुझे एकदम हाशिये पर धकेलने वाले इंसान के हक में खड़ा हूं तो समझ लें कि हमारा मुद्दा जनसत्ता है क्योंकि जनसत्ता से फिलहाल हमारा वजूद अलग नहीं है।


    जनसत्ता निकालने के अलावा कोई बाहर क्या क्या गुल खिला रहा है,हमें इससे मतलब नहीं है।लेकिन अपने वजूद में खरोंच पड़ जाये तो हम खामोश रहनेवालों में नहीं हैं।


    उस आइने को किरचों में बिखेरने से बचाना अब मुकेश भारद्वाज की जिम्मेदारी है,मुद्दा यही है।मुकेश को भी जांचना हुआ कभी तो मेरा पैमाना बदलने वाला नहीं है।कोई और हो,तो भी नहीं।



    मेर दोस्तों को मेरे मातहत काम करने में भले शर्म आती हो लेकिन मुझे किसी के मातहत काम करने से शर्म नहीं आती।


    कल कोई नया ताजा छोकरा मेरा बास बनेगा तो भी मैं उसके मातहत काम करने से झिझकुंगा नहीं।

    हमें पत्रकारिता से मतलब है,चेहरों से नहीं।


    जो चेहरे हमें पसंद नहीं है,वे अगर मीडिया और जनहित के मापिक हों तो हमें उनसे परहेज नहीं है।


    बाकी मैं उधार खाता हूं नहीं।न उधार की जिंदगी जीता हूं।

    मौका आता है तो किसी को भी नकद भुगतान से चूकता भी नहीं हूं।


    मैं रिफ्यूजी हूं।

    मैं अश्वेत हूं।

    मैं काला हूं।

    मैं बौना भी हूं।

    यूं कहें खासा बदसूरत हूं

    और बददिमाग भी हूं।


    मुझे अपने वजूद के लिए कोई शर्म नहीं है।

    अपनी पहचान के दायरे में मैं बंधा भी नहीं हूं।


    मेरे गुरुओं ने हमेशा मुझे पहचान,दायरा,दीवारों और सरहदों के आर पार इंसानियत का पाठ पढ़ाया है और छात्र मैं उतना जहीन नहीं हूं, लेकिन एक रत्ती भर वफा कम नहीं है। न वफा मुहब्बत में कम है।


    कल रात मैंने अभिषेक को फोन पर कहा कि उदय प्रकाश ने पुरस्कार लौटाकर सही काम किया है।


    कल रात मैंने अमलेंदु को फोन पर कहा कि उदय प्रकाश की खबर को कहीं मिस न कर देना।


    उदय प्रकाश को मैं लेखक मानता हूं या नहीं,वह मेरा दोस्त है या दुश्मन है,मैं उसका चेहरा पसंद करता हूं या नहीं,उसकी क्या टाइमिंग है और गिमिक क्या है,इससे हमें कोई मतलब नहीं है।


    फासीवाद के खिलाफ,एक साहित्य अकादमी पुरस्कारविजेता की हत्या के खिलाफ उसने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का फैसला लिया है।यह शहादत भी नहीं है।सही वक्त सही फैसला है।


    क्योंकि साहित्य अकादमी ने बतौर संस्था इस जघन्य हत्याकांड पर कोई आधिकारिक विरोध जताया नहीं है।


    जो संस्था फासीवाद से नत्थी हो,उसके पुरस्कार को लौटा देने में कोई परहेज नहीं है।हर्ज भी नहीं है।


    हालांकि पुरस्कार लौटाने से बदलेगा कुछ भी नहीं।

    लेकिन जैसा विष्णु खरे ने लिखा है,हम जो लोग इस केसरिया फासीवाद के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं,उनका हौसला बुलंग होगा।


    बाकी लोग जिन्हें परस्कार मिला है ,वे चाहे तो बाशौक रखें अपना अपना सनद पुरस्कार अपनी हिफाजत में,मना किसने किया है।


    फिर यह बेमतलब का हंगामा क्यों खड़ा है।हम कलबुर्गी के हत्यारों के खिलाफ लामबंद होने के बजायक्यों उदय प्रकाश के खिलाफ खड़े हो रहे हैं और अपना अपना निजी हिसाब बराबर करने में लगकर फासीवाद के हाथों को मजबूत करने में लगे है,मुद्दा यह है।


    देर रात मैं हैरत में पड़ गया कि हो क्या रहा है कि दरअसल मलसा क्या है और बहस क्या हो रही है।

    फासीवाद के बदले सारी बहस उदय प्रकाश पर हो रही है।


    सारे लोग लोगों से पुरस्कार लौटाने की अपील कर रहे हैं।

    उदय प्रकाश ने लौटाया तो यह हाल है कि मुद्दा उदय प्रकाश के सिवाय कोई दूसरा नहीं है।


    मंगलेशदा,वीरेन दा वगैरह वगैरह जब लौटा देंगे तो हाल फिर समझ लीजिये।


    मैं तो बदतमीज हूं।

    किसी मुकाम पर हूं नही कि परवाह भी करुं अपनी हैसियत का।


    मेरी नजर से किसी पुरस्कार से इंसानियत,इतिहास को तो कोई फर्क पड़ता ही नहीं है और सियासत के लिए पुरस्कार बेमायने है जैसे कि साहित्य,संस्कृति,कला और भाषा की मुक्त बाजार और मनुस्मृति में जो औकात है,उससे कोई कम ज्यादा सियासत में नहीं है।बाजार में तो और बुरा हाल है जहां बाजार का अपना सौंदर्यशास्त्र है और बाजार का भाषावित्ज्ञान अलग है।व्याकरण भी अलग है।


    सियासत अपने हिसाब से साहित्य,संस्कृति,कला और भाषा गढ़ लेती है।


    हुकूमत अपने हिसाब से साहित्य,संस्कृति,कला और भाषा चुन लेती है।


    मजहब भी अपने हिसाब से साहित्य,संस्कृति,कला और भाषा जायज या नाजायज ठहरा देता है।


    हम न हुक्मरान हैं,न हम सियासत में हैं और न हम कोई फतवाबाज मौलवी हैं जिहादी - तो हम इसे बहस का मुद्दा क्यों बना रहे हैं।


    हम गोरख पांडेय के दोस्त रहे हैं।तो जाहिर सी बात है कि निजी तौर पर उदयप्रकाश के किये धरे से मेरा कोई लेना देना नहीं है।


    बसंतीपुर के वाशिंदे हैं हिमालय के तमाम लोग और इस देश के तमाम आदिवासी,कश्मीर,पूर्वोत्तर और समूचा दक्षिण भारत भी मेरे लिए बसंतीपुर है।


    मैं अपने बसंतीपुर में जहां देखूं वहां नजर आते हैं गोरखवा,वहीं कहीं हैं मुक्तिबोध और प्रेमचंद,शरत भी और मंटो और नवारुण भी तो तालस्ताय से लेकर शेक्सपीअर तक सारे के सारे।वहीं हमारे साथ हैं आनंद स्वरुप वर्मा,पंकज बिष्ट,आनंद तेलतुंबड़े,अमलेंदु उपाध्याय, अभिषेक श्रीवास्तव और रेयाज।लेकिन उदय प्रकाश कहीं नहीं है।


    फिरभी उदय का जादुई यथार्थ और उत्तरआधुनिकवाद ग्लोबल दर्शन हमारी समझ नहीं आता और हमें उससे खास मुहब्बत भी नहीं है,सिर्फ इस वजह से वह मेरा दुश्मन भी नहीं है।इसका मतलब यह भी नहीं है कि उसका साहित्य सिरे से खारिज है या फिर उसका कोई मुकाम नहीं है।


    हमारी कसौटी एकमात्र है,बदलाव में प्रासंगिकता।इस हिसाब से गैर जरुरी चीजों पर हम बहस नहीं करते।


    हम कलबुर्गी की हत्या का विरोध कर रहे हैं।

    हम फासीवाद का विरोध करते हैं।


    हम रणवीर सना से लेकर तमाम निजी और मजहबी सेनाओं के कत्लेआम का विरोध करते हैं।जितना गुजरात नरसंहार के विरोध में हैं हम ,उतना ही विरोध हम सिखों के नरसंहार का करते हैं और भोपाल गैस त्रासदी ,परमाणु संयंत्रों का विरोध भी करे हैं,जलजंगल जमीन से बेदखली और हिमालय की हत्या का विरोध भी करै हैं हम। हमारे लिए सत्ता और हुकूमत के रंग बेरंग हैं।


    हम मुक्त बाजार का विरोध करते हैं।

    यह विरोध एक काफिला है।

    हर तरह के लोग इसमें शामिल हैं।

    कोई हमें पसंद नहीं तो हम उसे पाबंद कर दें तो यह भी फासीवाद से कम भय़ंकर नहीं है।

    फासीवाद के विरोध से भी जरुरी यह है कि हम लोग खुद फासीवादी तौर तरीके अख्तियार तो नहीं कर रहे हैं,इसका ख्याल रखना।


    फिर हम अपने दुश्मनों से भी नफरत नहीं करते हैं।हमें फासिज्म के सिपाहसालारों,सिपाहियों की अभिव्यक्ति की आजादी का भी सम्मान करते हैं।


    हमें कोई गालियां देता है तो यह उसकी तहजीब है,हमारे सरदर्द का सबब नहीं है।हमने आजतक किसीको डीफ्रेंड नहीं किया है और न डीएक्टिवेट के हक में हूं।मुझे जो लगातार गरियाते हैं,वे बखूब जानते हैं कि उन्हें हमारी परवाह हो या न हो,हमें उनकी परवाह है।


    आज भी मैं साहित्य का छात्र हूं और मेरे लिए आदमी हाड़ मांस खून और खताओं का पुतला है।औरतें भी वहीं।


    हमें आज भी पक्का यकीन है कि नफरत किसी मर्ज का इलाज नहीं है।आज भी हमें टूटकर मुहब्बत की आदत है,जो छूटती नहीं है।




    इंसानियत अच्छी भी होती है और बुरी भी होती है इंसानियत।

    मुकम्मल अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं होता।


    पुरस्कारों से कुछ बना बिगड़ता दरअसल है नहीं।


    यह बहुत आसान होता कि सारे पुरस्कार सम्मान वगैरह लौटा दिये जाते और मुक्त बाजार का जलवा राख हो जाता।


    पुरस्कारों से कुछ बना बिगड़ता दरअसल है नहीं।


    यह बहुत आसान होता कि सारे पुरस्कार सम्मान वगैरह लौटा दिये जाते और सियासत हुकूमत और मजहब का त्रिशुल हमारे दिलोदिमाग वजूद को बिंध  नहीं रहा होता।


    पुरस्कारों से कुछ बना बिगड़ता दरअसल है नहीं।


    यह बहुत आसान होता कि सारे पुरस्कार सम्मान वगैरह लौटा दिये जाते और बेदखल जल जंगल जमीन पर हमारे लोग दोबारा काबिज हो जाते और बंटवारे में जो कुछ हमने खो दिया,वापस मिल जाता।


    निर्णायक लड़ाई हर हाल में जनता लड़ती है।

    बन सको तो बन जाओ जनता के हथियार।


    फासीवाद का विरोध उतना आसान भी नहीं है,दोस्तों।

    कबीर दास होते तो क्या उन्हें मजहबी लफंगे बख्श देते?


    फिरभी सच यही है कि जब कोई कबीर बाजार में खड़ा हो जाता है अपना घर फूंकने के तेवर में तो जमाना ठहर जाता है।


    वक्त भी ठहर जाता है।

    वक्त आज भी ठहरा हुआ है।


    आज भी मध्ययुग का वही अंधियारा है।

    कोई कबीरदास किसी बाजार में खड़ा नहीं है।


    कबीर दास होते तो क्या उन्हें मजहबी लफंगे बख्श देते?


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    'সংখ্যালঘুদের ৯০% জমি দখলে করেছে আ'লীগ'


    'সংখ্যালঘুদের ৯০% জমি দখলে করেছে আ'লীগ'

    হিন্দু-বৌদ্ধ-খ্রীষ্টানদের ৯০% জমি ক্ষমতাসীন দলের নেতাকর্মীরা দখল করে রেখেছে বলে অভিযোগ করেছেন হিন্দু-বৌদ্ধ-খ্রীষ্টান কল্যাণ ফ্রন্টের নেতারা। তারা অভিযোগ করেছেন, 'আওয়ামী লীগের ক্ষমতা যখনই নড়বড়ে হয়ে যায়, তখনই তারা সংখ্যালঘুদের ওপর নির্যাতন করে ক্ষমতা পাকাপোক্ত করতে চায়।'

    জাতীয় প্রেস ক্লাবের সামনে শুক্রবার বিকেলে সংগঠনটির মানববন্ধন থেকে এই অভিযোগ করেন হিন্দু-বৌদ্ধ-খ্রীষ্টান কল্যাণ ফ্রন্টের উপদেষ্টা এ্যাডভোকেট নিতাই রায় চৌধুরী।
    মানববন্ধনে সভাপতিত্ব করেন কল্যাণ ফ্রন্টের আহ্বায়ক এডভোকেট গৌতম চক্রবর্তী। বক্তব্য রাখেন- ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের অধ্যাপক ড. সুকোমল বড়ুয়া, সাবেক ছাত্রনেতা জয়ন্তু কুমার কুণ্ডু, বৌদ্ধ নেতা সুশীল বড়ুয়া, মিল্টন বৈদ্য প্রমুখ।

    ড. সুকোমল বড়ুয়া বলেন, 'সরকার একদিকে বলে তারা সকল সম্প্রদায়ের নিরাপত্তা নিশ্চিত করছে, অন্যদিকে তাদের এমপি-মন্ত্রীরাই হিন্দুদের সম্পত্তি দখল করছে। এই সরকার দ্বিমুখী আচরণ করে মানুষদের ধোঁকা দিচ্ছে।'

    জয়ন্তু কুমার কুণ্ডু বলেন, 'এই দেশ সকল সম্প্রদায়ের মানুষ একসঙ্গে যুদ্ধ করে স্বাধীন করেছে। আজ হিন্দুদের বুকে পা দিয়ে ক্ষমতায় এসে আওয়ামী লীগ হিন্দুদের সম্পত্তি দখল করছে। এ দেশের কোনো বিবেকবান মানুষ আওয়ামী লীগের এই অন্যায় মেনে নেবে না।'
    এ্যাডভোকেট গৌতম চক্রবর্তী সারাদেশে হিন্দু-বৌদ্ধ ও খ্রীষ্টানদের সম্পত্তি দখল ও তাদের বিরুদ্ধে নির্যাতনের বিরুদ্ধে দেশবাসীকে সোচ্চার হওয়ার জন্য আহ্বান জানান।

     
     
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    'সংখ্যালঘুদের ৯০% জমি দখলে করেছে আ'লীগ'
    দ্য রিপোর্ট প্রতিবেদক : হিন্দু-বৌদ্ধ-খ্রিস্টানদের ৯০% জমি ক্ষমতাসীন দলের নেতাকর্মীরা দখল করে রেখেছে বলে অভিযোগ করেছেন হিন্দু-বৌদ্ধ-খ্রিস্টান কল্যাণ ফ্রন্টের নেতারা।
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    আওয়ামী লীগের কীর্তিস্তম্ভ এই মন্বন্তর

    - আহমদ ছফা 
    bangla_famine

    "... এই মন্বন্তরের আসল কারণ বন্যা নয়, সাইক্লোন নয়, খরা, জলোচ্ছাস কিংবা আকস্মিক নৈসর্গিক বিপদাপদ এর কোনটাই নয়। এই মন্বন্তর সরকারের পৃষ্ঠপোষকতায়, আওয়ামী লীগারদের একটানা তিন বছরের নির্মম লুন্ঠন, হৃদয়হীন চৌর্যবৃত্তি, তুলনাবিহীন সম্পদ পাচার্, অপচয়, ধ্বংস এবং অদূরদর্শী পররাষ্ট্রনীতির সমূহ ফলশ্রুতি।

    বন্যা না হলেও এই মন্বন্তর ঠেকাবার কোন যাদুমন্ত্র শেখ মুজিব সরকারের ছিল না। সাম্প্রতিক বন্যা শুধু আওয়ামী লীগের প্রসিদ্ধ তস্করদের দেশে-বিদেশে জাহির করার মত একটা অছিলা এনে দিয়েছে। তাই শেখ মুজিব মনের সুখে গোঁফে তা দিয়ে দেশবাসীর কাছে সেদিন কাঁদো কাঁদো মুখ করে বললেন, ভাইসব, অনেককিছু দেবার ইচ্ছে ছিল, কিন্তু বন্যা এসে আমার সব সাধ, সব সাধনা ভাসিয়ে নিয়ে গেল। আমাকে ভুল বুঝবেন না ইত্যাদি ইত্যাদি। আর বিদেশিদের কাছে পরম নিশ্চিন্তে বলে বেড়াচ্ছেন, আমরা তো দেশ গঠনের কাজ বেশ সুন্দরভাবেই করে আসছিলাম, কিন্তু সর্বনাশা বন্যায়ই আমাদেরকে হালে একটু বেকায়দায় ফেলে দিয়েছে।
    এই মন্বন্তর বাংলাদেশের জন্য অবধারিত ছিল। কিছুই একে ঠেকাতে পারত না। তবে বন্যার ফলে যে মন্বন্তর আশ্বিন মাসে স্বরূপ প্রকাশ করেছে, হয়ত আরো দুয়েক মাস সময় নিত। ফাগুনের শেষে চোতে-বোশেখে অবশ্যই দেখা দিত। বাংলাদেশে উনিশশো উনসত্তর সালের জল প্লাবনের সময় প্রাণ এবং সম্পদের যে ক্ষয়-ক্ষতি হযেছে, বর্তমান বন্যায় ক্ষয়-ক্ষতি কি তার চেয়ে ভযাবহ? সেই প্রবল সামুদ্রিক জলোচ্ছাসের স্মৃতি এখনো একেবারে মিলিয়ে যায়নি। একটা তুলনামুলক হিসেব কষাও বোধকরি অসম্ভব নয়। উনসত্তরের সামুদ্রিক জলোচ্ছাসের পর দেশব্যাপী হা-অন্ন হা-অন্ন এমন হাহাকার ওঠেনি, মানুষের লাশ এমনি পথে-ঘাটে পড়ে থাকতে দেখা যায়নি, অর্ধমৃত কঙ্কালসার নয়, উদোম নর-নারীর ক্লান্তিহীন মিছিল শহরের রাজপথে ধুঁকে ধুঁকে মরবার জন্য এমন মরিয়া হয়ে ছুটে আসেনি। জিনিসপত্রের দাম একলাফে আকাশে চড়ে নাগরিক সাধারণের জীবনকে এমন বিপর্যস্ত করে তোলেনি।

    গ্রাম-গ্রামান্তরে পাঁচ টাকায় মা ছেলে বিক্রি করছে, সরলা কিষাণ বালাও আট আনায় বিকোচ্ছে ইজ্জত। বাবা ছেলেকে ফেলে দিয়ে প্রাণ ধারনের নিষ্ঠুর তাগিদে ছুটে পালাচ্ছে। স্ত্রী স্বামীকে ছেড়ে চলে যাচ্ছে, স্বামী স্ত্রীকে।

    এই মন্বন্তর বন্যার কারনে হয়েছে, কি আওয়ামী লীগারদের কারনে হয়েছে, সে কথা আজ ঠান্ডা মাথায় বিচার করে দেখবার মতো মানসিক স্থৈর্য খুব কম মানুষেরই আছে। সমাজের স্থিরবুদ্ধিসম্পন্ন মানুষদেরও বুদ্ধি-বিবেচনা আজ গুলিয়ে একাকার হয়ে গেছে। চূড়ান্ত হতাশ, অসহায় দৃষ্টিতে তারাও নীরব দর্শকের মত তাকিযে তাকিয়ে দেখছেন। বাংলাদেশের শহরগুলোতে স্রোতের জলের মত কঙ্কালসার নর-নারী, শিশু-বৃদ্ধের ঝাঁক এসে ভিড় করছে। কানায় কানায় ভরিয়ে তুলছে সমগ্র শহর। নগরীর বাতাসে মানুষ পঁচা লাশের ঘ্রাণ, নগরীর রাজপথে মুখ থুবড়ে পড়ে থাকা লাশ, ফাঁকা জায়গাগুলোতে কিলবিল করছে ভুখা-নাঙ্গা মুমূর্ষ মানুষের জটলা। এদের অল্পকদিন আগেও ঘর ছিল, ঘরের মায়া ছিল, সংসার ছিল, সংসারের বাঁধন ছিল, বুকে স্বপ্ন ছিল, ছিল অন্তরে মমতা। সুখে-দু:খে, সম্পদে-বিপদে গ্রাম বাংলার ছোট ছোট কুটিরে স্ত্রী পুত্র পরিজন বেষ্টিত পরিবারগুলোতে প্রাণ-প্রবাহের যে রস, যে মাধুর্য উছলে উঠত সব পেছনে ফেলে এরা শহরের রূঢ় রৌদ্রে এসে দাঁড়িয়েছে। আজ তাদের ঘর নেই - ঘরের মায়া উধাও, সংসার নেই, সঙ্গম নেই, বুকের স্বপ্ন কচি মুকুলের মত কবে ঝরে গেছে। জীবন ধারণের নিষ্ঠুর গ্লানি অবনত মস্তকে বয়ে দোরে দোরে ঘুরে বেড়াচ্ছে। ভাত চাই। ভাত নেই তো ফ্যান দাও। ফ্যান যদিও বা না দেবে অন্য কিছু দাও। 

    ঘর-দোর সমাজ-সংসার সব গেছে - এই কষ্টক্লিষ্ট প্রাণটাকে বাঁচিয়ে রাখার তাগাদা আমাদেরকে শহরে ছুটিয়ে নিয়ে এসেছে। নগরী নিষ্ঠুর্, নগরী ফলে ফলে হেসে ছলছল স্রোতে বয়ে যায়। আর ভাদ্র মাসে তেজালো রোদে পুঁটি মাছ যেমন মরে, তেমনি করে প্রতিদিন শয়ে শয়ে হাজারে হাজারে মানুষ অমৃতের পুত্র মানুষ মৃত্যুর হিমশীতল কোলে ঢলে পড়ছে।
    শেখ মুজিবের সরকার বলবার মত একটা কথা পেয়েছে। দেশের মানুষ মরছে তার কারণ বন্যা। দেশে মন্বন্তর কালো ছায়া প্রসারিত করেছে তার কারণ বন্যা। জিনিসপত্রের দাম লাফে লাফে চন্দ্রলোকের দিকে ধাবমান - তার কারন বন্যা। 

    আপনি বাঙালি জাতির পরম শ্রদ্ধেয় পিতৃদেব। রক্ষীবাহিনী, ঠেঙ্গারেবাহিনী দিয়ে গোটা জাতির সাড়ে সাতকোটি মানুষকে বেয়নেট বুলেটের মুখে দাবিয়ে রেখে তিন বছর তিন বছর গত হবার পূর্বেই আপনার পিতৃস্নেহের স্বরূপ প্রকটিত হল। বাংলাদেশকে আপনি ইতিহাসে নজিরবিহীন একতা মন্বন্তর উপহার দিলেন। আশ্চর্য শক্তিমান পুরুষ আপনি, তুলনাবিহীন আপনার বাকচাতুরী, যাদুময় আপনার কন্ঠধ্বনি। এই বাংলাদেশে যখন আপনার সুশাসনে হাজার হাজার মানুষ প্রতিদিন মারা যাচ্ছে - আর আপনার দলের লোকেরা সেই মৃত, অর্ধমৃত মানুষের হাড়-গোড়, চর্বি-মাংশ সাম্রাজ্যবাদী বন্ধুদের কাছে বেঁচে দিয়ে অর্জিত সম্পদের পরিমাণ আরো বৃদ্ধি করবার পরিকল্পনা করছে /

    এই প্রাকৃতিক দূর্যোগ বন্যা আর আপনার আওয়ামী লীগ দু'য়ের মধ্যে কে বেশি ভয়ংকর? গ্রাম-বাংলাকে নগ্ন করে গতরের মাংশ কে বেশি খুবলে নিয়েছে? জল-বন্যার ডাকাত আর আওয়ামী লীগের ডাকাত উভয়ের মাঝে কে বেশি হিংস্র? জিজ্ঞেস করুন, জবাব পাবেন; জিজ্ঞেস করুন একফোঁটা দুধের অভাবে মরনের মুখে ঢলে পরা শিশুর কাছে; জিজ্ঞেস করুন গ্রাম বাংলার প্রত্যন্ত অঞ্চল থেকে আগত আট আনায় ইজ্জত বিকানো সরল কিষাণ বউয়ের কাছে; জিজ্ঞেস করুন অচল কল-কারখানার লোহালক্করের কাছে; জিজ্ঞেস করুন আওয়ামী লীগকে মোটা চাঁদা দেয়া চোরাচালানীদের কাছে; জিজ্ঞেস করুন আপনাদের সঞ্চিত সোনাদানার আমানতদার বিদেশী ব্যাংকের ম্যানেজারদের কাছে; জিজ্ঞেস করুন আপনার মন্ত্রীসভার স্ফীতোদর, স্থূলকায় মন্ত্রীদের কাছে; জিজ্ঞেস করুন আঙ্গুল ফুলে কলাগাছ হওয়া আওয়ামী লীগের কর্মীদের, জিজ্ঞেস করুন অর্থনীতি শাস্ত্রের কাছে। স্পষ্ট জবাব পাবেন - এই মন্বন্তর, এই দুর্ভিক্ষ, এই মাৎস্যন্যায় আওয়ামী লীগের তিন বছরের শাসনকালের অনুপম কীর্তিস্তম্ভ॥" - গণকন্ঠ / ১৫ই অক্টোবর, ১৯৭৪ইং
    - আহমদ ছফা / প্রবন্ধ সমগ্র - তৃতীয় খন্ড ॥ [ হাওলাদার প্রকাশনী - জুন, ২০১৪ । পৃ: ২৩১-২৩৩ ]

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    কাউকেই মানে না ছাত্রলীগ

    কাউকেই মানে না ছাত্রলীগ!

    ক্ষমতাসীন দল আওয়ামী লীগের ভ্রাতৃপ্রতিম ছাত্রসংগঠন ছাত্রলীগ বেপরোয়াই রয়ে গেছে। নেতৃত্ব বদল, সাংগঠনিক শাস্তি, অভিভাবক নেতাদের অনুরোধ, আইনশৃঙ্খলা রক্ষাকারী বাহিনীর কঠোর পদক্ষেপ- এসব কোনো কিছুই বাগে আনতে পারছে না সংগঠনটির বেপথু নেতাকর্মীদের। দেশের বিভিন্ন স্থানে একের পর এক ন্যক্কারজনক ঘটনা ঘটিয়েই চলেছে সংগঠনটি। এতে সরকারের ভাবমূর্তি ক্ষুণ্ন হচ্ছে মারাত্মকভাবে। ছাত্রলীগের ঘটানো চাঞ্চল্যকর বিভিন্ন ঘটনায় বারবার বিব্রতকর অবস্থায় পড়তে হচ্ছে সরকারকে। 

    আওয়ামী লীগ সভাপতি ও প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনার পরামর্শও কানে তুলছে না ছাত্রলীগের নেতাকর্মীরা।
    বঙ্গবন্ধু ও তাঁর পরিবারের সদস্যদের নির্মম হত্যাকাণ্ডের শোকাবহ মাস আগস্ট। বঙ্গবন্ধুর ৪০তম শাহাদাতবার্ষিকী উপলক্ষে এবার ৪০ দিনের কর্মসূচি ঘোষণা করে আওয়ামী লীগ। অথচ এ শোকের মাসে দেশের বিভিন্ন স্থানে ছাত্রলীগের নেতাকর্মীরা নিজেদের মধ্যেই কমপক্ষে ১৩টি সংঘর্ষের ঘটনা ঘটিয়েছে। এসব ঘটনায় দুই কর্মী নিহত ও শতাধিক আহত হয়। এ ছাড়া আগস্ট মাসে রাজধানীতে চুরির অজুহাত তুলে এক কিশোরকে পিটিয়ে হত্যা এবং মাগুরায় মাতৃগর্ভে শিশু গুলিবিদ্ধ হওয়ার ঘটনায় ছাত্রলীগের সম্পৃক্ততা নিয়ে সমালোচনার ঝড় ওঠে।
    সম্প্রতি শাহজালাল বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রলীগের হাতে শিক্ষক লাঞ্ছিত হওয়ার এক দিন পরই প্রধানমন্ত্রী ছাত্রলীগ নেতাদের সংগঠন থেকে 'আগাছা' উপড়ে ফেলতে পরামর্শ দিয়েছেন। কিন্তু এর দুই দিনের মাথায় গত বৃহস্পতিবার এক ছাত্রীকে উত্ত্যক্ত করার প্রতিবাদ করায় বরিশালে সরকারি বিএম কলেজের দুই শিক্ষার্থীকে গাছে বেঁধে পিটিয়েছে ছাত্রলীগের কর্মীরা।
    ছাত্রলীগের লাগামহীন বিতর্কিত কর্মকাণ্ডে ক্ষুব্ধ আওয়ামী লীগের অনেক কেন্দ্রীয় নেতাও। শাহজালাল বিশ্ববিদ্যালয়ে শিক্ষকদের ওপর ছাত্রলীগের হামলা প্রসঙ্গে আওয়ামী লীগের উপদেষ্টা পরিষদের সদস্য ও প্রবীণ নেতা সুরঞ্জিত সেনগুপ্ত বলেন, 'শিক্ষকদের ঘটনায় ছাত্রলীগের নাম জড়িয়ে পড়ায় আমরা বিব্রত। আমি মনে করি, ছাত্রলীগের কেন্দ্রীয় নেতাদের এই বিষয়ে ব্যবস্থা নেওয়া উচিত।'
    জানতে চাইলে আওয়ামী লীগের সভাপতিমণ্ডলীর সদস্য নূহ-উল আলম লেনিন কালের কণ্ঠকে বলেন, 'এখন ছাত্রলীগের যে রাজনীতির প্রবণতা চলছে তা দল বা ব্যক্তি কোনো হিসেবেই গ্রহণযোগ্য মনে করি না। এর পরও এগুলো চলছে। শাস্তিমূলক ব্যবস্থা নিয়েও বন্ধ করা যাচ্ছে না।' তিনি আরো বলেন, 'ছাত্ররাজনীতি তার গৌরবোজ্জ্বল ভূমিকা হারিয়েছে। এটিকে যদি সঠিক পথে ফিরিয়ে আনতে হয়, তবে একটি নির্দিষ্ট সময় পর্যন্ত ছাত্ররাজনীতি বন্ধ রাখতে হবে। কয়েক বছর ছাত্রসংগঠন বন্ধ রাখার পর শিক্ষাপ্রতিষ্ঠানগুলোতে ছাত্রসংসদ নির্বাচন দিতে হবে। এরপর ছাত্ররাজনীতি উন্মুক্ত করে দিতে হবে।'
    ভ্রাতৃপ্রতিম সংগঠনের নেতাকর্মীদের ওপর চড়াও : নিজেদের মধ্যে হানাহানি, শিক্ষকদের ওপর হামলা ছাড়াও ভ্রাতৃপ্রতিম অন্যান্য সংগঠনের নেতাকর্মীদের ওপরও চড়াও হচ্ছে ছাত্রলীগ। গত বৃহস্পতিবার এক সংবাদ সম্মেলনে শেরপুর সদর উপজেলা পরিষদের ভাইস চেয়ারম্যান ও সাবেক ছাত্রলীগ নেতা বায়েযীদ হাসান ছাত্রলীগের দুই নেতার বিরুদ্ধে প্রাণনাশের চেষ্টার অভিযোগ আনেন। তিনি অভিযোগ করেন, শেরপুর জেলা ছাত্রলীগের সাধারণ সম্পাদক নাজমুল ইসলাম সম্রাট ও কর্মী আব্দুল মতিন বুধবার রাতে মীরগঞ্জ এলাকায় হত্যার উদ্দেশ্যে হামলা চালায় তাঁর ওপর। জাতীয় শোক দিবস উপলক্ষে গাজীপুরের কালিয়াকৈরে ২১ আগস্ট এক আলোচনা সভায় যুবলীগ নেতা রফিকুল ইসলাম খুনের অভিযোগে কালিয়াকৈর পৌর ছাত্রলীগের সভাপতি শেখ রিয়াদকে বৃহস্পতিবার গ্রেপ্তার করে পুলিশ। রিয়াদ রফিকুল হত্যা মামলার এজাহারভুক্ত আসামি।
    শোকের মাসেও চাঁদাবাজির অভিযোগ : শোকের মাস উপলক্ষে চাঁদাবাজির অভিযোগও আছে ছাত্রলীগের নেতাকর্মীদের বিরুদ্ধে। রাজধানীতে চাঁদাবাজির অভিযোগে গ্রেপ্তার হওয়া রাকিব ও ইব্রাহিম রিমান্ডে অপরাধ স্বীকার করেছেন বলে দাবি করেছে রামপুরা থানার পুলিশ। তবে খিলগাঁও থানার ৩ নম্বর ওয়ার্ড ছাত্রলীগের সভাপতি আবু তাহেরের নির্দেশে তাঁরা ওই চাঁদা দাবি করেছেন বলে পুলিশকে জানান। এক দিনের রিমান্ড শেষে দুজনকে গতকাল শুক্রবার আদালতে হাজির করে দেওয়া প্রতিবেদনে মামলার তদন্ত কর্মকর্তা রামপুরা থানার উপপরিদর্শক (এসআই) মো. মাজহারুল আমিন এসব কথা উল্লেখ করেছেন।
    শিক্ষক লাঞ্ছনায় প্রথমে দায় এড়ানোর চেষ্টা, পরে শাস্তি : শিক্ষাপ্রতিষ্ঠানে শিক্ষকদের ওপরও চড়াও হচ্ছে ছাত্রলীগের নেতাকর্মীরা। গত ৩০ আগস্ট সিলেটে শাহজালাল বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয়ে শিক্ষকদের ওপর হামলা চালায় ছাত্রলীগের নেতাকর্মীরা। ওই সময় অধ্যাপক ইয়াসমিন হককেও হেনস্তা করা হয়। ইয়াসমিন হক জনপ্রিয় লেখক ও একই বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষক অধ্যাপক ড. জাফর ইকবালের স্ত্রী। এ ঘটনায় ঘটনাস্থলের পাশে থাকা জাফর ইকবাল তীব্র ক্ষোভ প্রকাশ করেন। বিষয়টি নিয়ে সারা দেশে ধিক্কার ওঠে।
    ওই ঘটনায় ছাত্রলীগ কেন্দ্রীয় কমিটি শুরুতে আগের কমিটির মতোই দায় এড়ানোর চেষ্টা করে। ঘটনার দিন ছাত্রলীগের কেন্দ্রীয় সাধারণ সম্পাদক গণমাধ্যমে বলেন, 'এতে ছাত্রলীগ জড়িত নয়।' যদিও হামলাকারীদের মধ্যে সংগঠনের বিশ্ববিদ্যালয় কমিটির একাধিক নেতা ছিলেন। দলীয় সূত্রে জানা যায়, পরে প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনার চাপে হামলায় জড়িত তিন ছাত্রলীগ নেতাকে সাময়িক বহিষ্কার করা হয়।
    শোকের মাসে হানাহানি : গত আগস্ট মাসের প্রায় পুরোটা জুড়েই ছাত্রলীগের নেতাকর্মীদের বেপরোয়া কর্মকাণ্ড দেখা যায়। তারা বিভিন্ন সময়ে নিজেদের মধ্যেও সংঘর্ষে জড়ায়। ২৮ আগস্ট শুক্রবার কুমিল্লা বিশ্ববিদ্যালয় ছাত্রলীগের সভাপতি ও সাধারণ সম্পাদকের নেতৃত্বাধীন দুই পক্ষের মধ্যে কয়েক ঘণ্টাব্যাপী সংঘর্ষে দুজন গুলিবিদ্ধসহ ছয়জন আহত হয়। ২৫ আগস্ট জগন্নাথ বিশ্ববিদ্যালয় ক্যান্টিনের সামনে মারামারিতে লিপ্ত হয় ছাত্রলীগের দুই পক্ষ। ওই সময় এক ছাত্রলীগকর্মীর মাথা ফাটিয়ে দেওয়া হয়। ২৪ আগস্ট সন্ধ্যায় রংপুরে বেগম রোকেয়া বিশ্ববিদ্যালয়ে আধিপত্য বিস্তারের লক্ষ্যে সংঘর্ষে জড়িয়ে পড়ে ছাত্রলীগের দুই পক্ষ। এতে বিশ্ববিদ্যালয় কমিটির দুই নেতাসহ ১০ জন আহত হয়। ২৩ আগস্ট রাজশাহী মেডিক্যাল কলেজ মিলনায়তনে জেলা ছাত্রলীগের আয়োজনে জাতীয় শোক দিবসের আলোচনা চলাকালে ছাত্রলীগের দুই পক্ষের সংঘর্ষে পাঁচ নেতাকর্মী আহত হয়। ২২ আগস্ট ঢাকা মহানগর দক্ষিণ ছাত্রলীগের আয়োজনে জাতীয় শোক দিবসের আলোচনা সভায় নিজেদের মধ্যে মারামারিতে লিপ্ত হয় ছাত্রলীগের নেতাকর্মীরা। তখন ঘটনাস্থলে ছাত্রলীগের সভাপতি ও সাধারণ সম্পাদক এবং দুই মন্ত্রী উপস্থিত ছিলেন।
    ১৯ জুলাই চট্টগ্রাম বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রলীগের কমিটি গঠিত হওয়ার পর মাস না পেরোতেই গত মঙ্গলবার সভাপতি ও সাধারণ সম্পাদক গ্রুপ সংঘর্ষে জড়িয়ে পড়ে। এতে সাতজন আহত হয়। পরিস্থিতি নিয়ন্ত্রণে আনতে পুলিশকে শতাধিক রাউন্ড টিয়ার শেল ও গুলি ছুড়তে হয়।
    এর আগে ১২ আগস্ট সিলেটে মদনমোহন কলেজে আধিপত্য বিস্তারের জের ধরে ছাত্রলীগের এক কর্মী ছুরিকাঘাতে নিহত হন। ১০ আগস্ট নোয়াখালীর কবিরহাট সরকারি কলেজে দরিদ্র শিক্ষার্থীদের জন্য তহবিলের টাকার ভাগবাটোয়ারা নিয়ে ছাত্রলীগের দুই গ্রুপের মধ্যে সংঘর্ষে আহত হয় কমপক্ষে ২০ জন।
    ৮ আগস্ট রাতে বরিশাল ইনস্টিটিউট অব হেলথ টেকনোলজিতে আধিপত্য বিস্তার নিয়ে মহানগর ছাত্রলীগের সভাপতি ও সাধারণ সম্পাদকের সমর্থক গ্রুপের মধ্যে সংঘর্ষ হয়। এতে আহত হয় উভয় পক্ষের পাঁচ কর্মী। ৭ আগস্ট বরিশালের গৌরনদীতে মাদকের টাকা ভাগাভাগি নিয়ে বিরোধে ছাত্রলীগের প্রতিপক্ষের নেতাকর্মীদের হাতে খুন হন রাসেল ব্যাপারী নামের এক কর্মী। একই ঘটনায় রিংকু সরদার নামে আরেক কর্মী মারাত্মক আহত হন। ৬ আগস্ট রাতে ঠাকুরগাঁও জেলা ছাত্রলীগের কমিটি গঠন নিয়ে দুই পক্ষের নেতাকর্মীরা সংঘর্ষে লিপ্ত হয়। এতে ছাত্রলীগের দুই কর্মী আহত হয়। একই দিন বরিশাল বিএম কলেজে ছাত্রলীগের দুই পক্ষের সংঘর্ষে আহত হয় দুজন। কলেজ ছাত্র সংসদের ভিপি ও জিএস সমর্থকদের মধ্যে এ সংঘর্ষ ঘটে।
    ১ আগস্ট রাজশাহী বিশ্ববিদ্যালয়ের আমির আলী হলে সিট দখলকে কেন্দ্র করে ছাত্রলীগের দুই পক্ষের মধ্যে সংঘর্ষে আহত হয় চার নেতাকর্মী। পরদিন হল কমিটি স্থগিত ঘোষণা করা হয়।
    সোহরাওয়ার্দী উদ্যান ঘিরে ছিনতাইয়ে ছাত্রলীগকর্মী : শোকের মাসে ছিনতাইয়ে জড়িয়েও সরকারের ভাবমূর্তি ক্ষুণ্ন করেছে ছাত্রলীগের নেতাকর্মীরা। ১৬ আগস্ট রাতে রাজধানীর সোহরাওয়ার্দী উদ্যানে লিমন নামের এক নাট্যকর্মী ও তার বান্ধবীকে আটকায় ছাত্রলীগের কয়েক সন্ত্রাসী। পরে নাট্যকর্মীর বান্ধবীকে ধর্ষণের হুমকি দিয়ে লিমনের কাছ থেকে ব্যাংকের এটিএম কার্ড ও এর পিন নম্বর নিয়ে টাকা তুলে নেয় ছাত্রলীগের ওই সন্ত্রাসীরা। এ ঘটনায় জড়িত থাকার অভিযোগে গত সোমবার ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয় ছাত্রলীগের কর্মী রাজীব বাড়ৈ এবং জগন্নাথ বিশ্ববিদ্যালয় ছাত্রলীগের কর্মী অমিত কুমার দাসকে গ্রেপ্তার করা হয়।
    বাগে আনতে 'বন্দুকযুদ্ধ' : বেপরোয়া ছাত্রলীগকে বাগে আনতে অবশেষে কঠোর ব্যবস্থা নিতে আইনশৃঙ্খলা রক্ষাকারী বাহিনীকে নির্দেশ দেওয়া হয় সরকারের শীর্ষপর্যায় থেকে। আগস্টে আইনশৃঙ্খলা রক্ষাকারী বাহিনীর সঙ্গে 'বন্দুকযুদ্ধে' ছাত্রলীগের দুই নেতা মারা গেছেন। ১৭ আগস্ট গভীর রাতে রাজধানীর হাজারীবাগ থানা ছাত্রলীগের সভাপতি আরজু মিয়া এবং মাগুড়ার ছাত্রলীগ নেতা মেহেদী হাসান আজিবর নিহত হন এমন 'বন্দুকযুদ্ধে'। আরজু মিয়া হাজারীবাগে কিশোর রাজা মিয়া হত্যা মামলার আসামি ছিলেন। আর আজিবর ছিলেন মাগুড়ায় বহুল আলোচিত মাতৃগর্ভে শিশু গুলিবিদ্ধ হওয়ার মামলার আসামি।
    সন্ত্রাস চাঁদাবাজি খুনোখুনি আগেও ছিল : ছাত্রলীগের বিগত কমিটির মেয়াদের প্রায় পুরোটাজুড়েই নানা সমালোচনার জন্ম দিয়েছে সংগঠনটির নেতাকর্মীরা। সে সময় শিক্ষাপ্রতিষ্ঠান ও এর বাইরে খুনোখুনি, সন্ত্রাস, চাঁদাবাজির অসংখ্য ঘটনা ঘটে। এসব ঘটনায় বেশির ভাগ ক্ষেত্রেই কেন্দ্রীয় ছাত্রলীগ দায় এড়িয়ে বলত, এতে ছাত্রলীগের কেউ জড়িত নয়।
    ২০১২ সালের ৯ ডিসেম্বর সকালে জগন্নাথ বিশ্ববিদ্যালয়ের কাছে ছাত্রলীগ নেতাকর্মীরা বিশ্বজিৎ দাশ নামে এক যুবককে প্রকাশ্যে কুপিয়ে হত্যা করে। ২০১৩ সালের ১৯ জানুয়ারি বাংলাদেশ কৃষি বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রলীগের দুই পক্ষের সংঘর্ষে রাব্বী নামের এক শিশু নিহত হয়। ওই দুটি ঘটনা তখন ব্যাপক সমালোচিত হয়। ২০১৪ সালের ২০ নভেম্বর শাহজালাল বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রলীগের দুই পক্ষের সংঘর্ষে সুমন রায় নামে এক কর্মী নিহত হন। সে বছর ১৪ ডিসেম্বর শহীদ বুদ্ধিজীবী দিবসে চট্টগ্রাম বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রলীগের নিজেদের মধ্যে সংঘর্ষে নিহত হন সংগঠনের কর্মী তাপস সরকার। ওই বছর ১ এপ্রিল বাংলাদেশ কৃষি বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রলীগের প্রতিপক্ষের হাতে নিহত হন সাদ ইবনে মমতাজ।
    ওই কমিটির মেয়াদের শেষদিকেও বেশ কয়েকজন নিহত হয়। গত ১২ মে মাওলানা ভাসানী বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয়ে অভ্যন্তরীণ কোন্দলে নিহত হন একজন। ১৬ এপ্রিল দিনাজপুরে হাজী দানেশ বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয়ে ছাত্রলীগের কোন্দলে নিহত হয় দুই কর্মী।
    প্রধানমন্ত্রীর আহ্বানও উপেক্ষিত : আওয়ামী লীগের কেন্দ্রীয় অনেক নেতার আশা ছিল, গত জুলাই মাসে অনুষ্ঠিত ছাত্রলীগের ২৮তম জাতীয় সম্মেলনের মধ্য দিয়ে ছাত্রলীগ হয়তো নিয়ন্ত্রণে আসবে। আশা ছিল, প্রধানমন্ত্রীর আহ্বান কেন্দ্র থেকে তৃণমূল পর্যন্ত নেতাকর্মীরা গুরুত্ব সহকারে নেবে।
    ছাত্রলীগের নতুন কেন্দ্রীয় কমিটি গঠনের পর গত ২৭ জুলাই নবনির্বাচিত নেতারা আওয়ামী লীগ সভাপতি ও প্রধানমন্ত্রী শেখ হাসিনার সঙ্গে সাক্ষাৎ করতে গেলে তাদের মানুষের আস্থা অর্জনের দিকে গুরুত্ব দিতে বলেন প্রধানমন্ত্রী। তিনি বলেন, 'এ দেশের ছাত্রদের প্রতি যে মানুষের একটা আস্থা, বিশ্বাস ছিল সেটা আবারও ফিরিয়ে আনতে হবে। আমি কখনো কোনো অন্যায়কে প্রশ্রয় দেইনি, আর কোনোদিন দেবও না। ভোগের মধ্যে সুখ নয়, ত্যাগের মাধ্যমেই নিজেকে গড়ে তুলতে হবে।' প্রধানমন্ত্রী আরো বলেন, 'নবনির্বাচিত ছাত্রলীগ সভাপতি ও সাধারণ সম্পাদককে লোভ-লালসার ঊর্ধ্বে উঠে ত্যাগের মনোভাব নিয়ে জনগণের সেবা করতে হবে।'
    কিন্তু প্রধানমন্ত্রীর আহ্বান যে ছাত্রলীগের নেতাকর্মীরা গুরুত্বের সঙ্গে নেয়নি তা তাদের গত এক মাসের কর্মকাণ্ড থেকেই স্পষ্ট।
    বিশিষ্টজনদের অভিমত : ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষক অধ্যাপক মুনতাসীর মামুন কালের কণ্ঠকে বলেন, 'সব সময়ই সরকারি দলের ছাত্রসংগঠনের মধ্যে এ ধরনের প্রবণতা দেখা গেছে। সরকারে থাকা দল বরাবরই তাদের ছাত্র সংগঠনের কর্মকাণ্ডের প্রতি নমনীয় থাকে। ছাত্র সংগঠনের অপকর্মের মাত্রা বেড়ে গেলে প্রতিষ্ঠান, সংগঠন, সরকার সব পক্ষই জনবিচ্ছিন্ন হয়ে পড়ে। এগুলোর কারণ হচ্ছে নেতৃত্বের সংগঠনের প্রতি শৈথিল্যের প্রকাশ। কোনো কোনো ক্ষেত্রে বিভিন্ন অপঘটনার পেছনে নেতৃত্বের যোগাযোগ থাকে।' তিনি বলেন, 'কোনো সময়ই সমাজ এগুলো সঠিকভাবে গ্রহণ করে না। সংগঠনকে শক্তিশালী ও ভাবমূর্তি উজ্জ্বল করতে হলে এসব কার্যক্রমকে কোনোভাবেই প্রশ্রয় দেওয়া ঠিক নয়। এসব বিষয়ে যদি মূল দল ব্যবস্থা না নেয় তবে এ ধরনের ঘটনা ঘটতেই থাকবে এবং একটি সময় এরা মূল দলের জন্য বিপজ্জনক হয়ে উঠবে। এর উদাহরণ আমরা স্বাধীনতার আগে আইয়ুব খানের সময়ে এনএসএফ এবং বিএনপি-জামায়াতের সময়ে ছাত্রদল-শিবিরের ক্ষেত্রে দেখেছি।'
    একাত্তরের ঘাতক দালাল নির্মূল কমিটির ভারপ্রাপ্ত সভাপতি শাহরিয়ার কবির বলেন, 'ছাত্রলীগের এসব কর্মকাণ্ড কোনোভাবেই কাম্য নয়। যারা এসব করে তারা কোনোভাবেই ঐতিহ্যবাহী এ সংগঠনের সদস্য হতে পারে না।' তিনি বলেন, 'ছাত্রলীগের নামে যেসব ঘটনা ঘটছে তা অত্যন্ত গুরুত্বের সঙ্গে নিয়ে পর্যালোচনা করা প্রয়োজন। যারা দায়ী তাদের শুধু সংগঠন থেকে বহিষ্কার নয়, আইনানুগ শাস্তির ব্যবস্থা করতে হবে। তাদের এসব কর্মকাণ্ডের দায় ১৬ আনা সরকারের ওপর বর্তায়।'
    'ছাত্রলীগে কেউ অপরাধ করে পার পাবে না' : তবে সব ঘটনায় ঢালাওভাবে ছাত্রলীগকে দোষ দেওয়া ঠিক নয় বলে মনে করেন ছাত্রলীগ সভাপতি সাইফুর রহমান সোহাগ। তিনি কালের কণ্ঠকে বলেন, 'অপরাধীদের কোনো দল নেই। তারা বিভিন্ন সময় সুযোগ বুঝে দলের পরিচয় দিয়ে অপকর্ম করে থাকে। আমরা দায়িত্ব নেওয়ার পর থেকে যেখানেই কারো বিরুদ্ধে অভিযোগ পাচ্ছি সঙ্গে সঙ্গে ব্যবস্থা নিচ্ছি। ছাত্রলীগে কেউ অপরাধ করে পার পাবে না।'
     
     
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    কাউকেই মানে না ছাত্রলীগ! | প্রথম পাতা | কালের কণ্ঠ
    ক্ষমতাসীন দল আওয়ামী লীগের ভ্রাতৃপ্রতিম ছাত্রসংগঠন ছাত্রলীগ বেপরোয়াই রয়ে গেছে। নেতৃত্ব বদল, সাংগঠনিক শাস্তি, অভিভাবক নেতাদের অনুরোধ, আইনশৃঙ্খলা রক্ষাকারী বাহিনীর
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    Dalits Media Watch

    News Updates 05.09.15

    12-yr-old girl found hanging from tree, kin allege rape - The Times Of India

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/agra/12-yr-old-girl-found-hanging-from-tree-kin-allege-rape/articleshow/48809181.cms

    Marriage triggers violence in Dalit colony - The Hindu

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/NATIONAL/KARNATAKA/MARRIAGE-TRIGGERS-VIOLENCE-IN-DALIT-COLONY/ARTICLE7617611.ECE

    Ex-student barges into classroom, applies vermilion on girl - Deccan Herald

    http://www.deccanherald.com/content/499256/ex-student-barges-classroom-applies.html

    Court directive to resolve row between communities - The Hindu

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/CITIES/MADURAI/COURT-DIRECTIVE-TO-RESOLVE-ROW-BETWEEN-COMMUNITIES/ARTICLE7618273.ECE

    HC upholds ruling against quota benefits for migrant SC candidates - The Hindu

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/CITIES/CHENNAI/HC-UPHOLDS-RULING-AGAINST-QUOTA-BENEFITS-FOR-MIGRANT-SC-CANDIDATES/ARTICLE7617673.ECE

    Dalit group wants farmer's name back on Sambhaji memorial board - The Times Of India

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/pune/Dalit-group-wants-farmers-name-back-on-Sambhaji-memorial-board/articleshow/48831501.cms

    SC summons Labour Secy over unused funds - The Tribune

    http://www.tribuneindia.com/news/nation/sc-summons-labour-secy-over-unused-funds/128915.html

    Redesigning reservations: Why removing caste-based quotas is not the answer -Scroll.in

    http://scroll.in/article/753490/redesigning-reservations-why-removing-caste-based-quotas-is-not-the-answer

     

    Please Watch:

    Dr Babasaheb Ambedkar BBC Interview 1955 – Exposin

    https://www.youtube.com/watch?v=ZJs-BJoSzbo

     

    Note : Please find attachment for DMW Hindi (PDF)

     

    The Times Of India

     

    12-yr-old girl found hanging from tree, kin allege rape

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/agra/12-yr-old-girl-found-hanging-from-tree-kin-allege-rape/articleshow/48809181.cms

     

    Ishita Mishra,TNN | Sep 4, 2015, 04.14 PM IST

     

    Agra: A 12-year-old Dalit girl was found hanging from a tree at Alipurkherda village in Mainpuri. Relatives say she was raped and murdered. The girl's relatives insisted that police call the district magistrate to the spot where the body was found, but policemen would not oblige. Villagers initially refused to hand the body over for post-mortem examination. The stand-off created tension. A huge posse of policemen were called in to stand guard. The minor girl had lost her father, and was living with her mother and grandparents at Alipurkherda. "She went out of the house last evening and never returned. We searched high and low, but there was no trace of her. Villagers told us she was hanging from a tree," said the girl's uncle, who found the body on Thursday morning. Police faced stiff resistance as they tried to bring the body down. "She was sexually assaulted and killed. We saw the blood oozing out when the body was brought down," a villager said. Policemen from nearby police stations were called in to stand guard as villagers initially refused to hand the body to police for post-mortem. SSP Mainpuri Uday Shankar Jaiswal reached the spot and pacified angry villagers. The SSP said the post-mortem had shown hanging as cause of death. He added that the girl had been scolded by her mother, and could have committed suicide. "The dog squad that was part of the investigations went straight to the girl's home from the crime spot, indicating that she did not go anywhere else," the SSP said. Relatives of the girl, however, claimed she could not have climbed such a tall tree to hang herself. "The tree is about 15 feet tall. How did the four-foot girl get so high and hang herself? The police is just shrugging off its responsibility by claiming she was not murdered," the girl's mother said. 

     

    The Hindu

     

    Marriage triggers violence in Dalit colony

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/NATIONAL/KARNATAKA/MARRIAGE-TRIGGERS-VIOLENCE-IN-DALIT-COLONY/ARTICLE7617611.ECE

     

    SPECIAL CORRESPONDENT

     

    An inter-caste marriage by two consenting adults belonging to Huliwana village in Mandya taluk resulted in violence and stone-pelting, in which a few Dalits and policemen were injured on Thursday night.

     

    What triggered the violence was the marriage of Santosh, from a Scheduled Caste community, with a girl of a different community. According to a source, the parents of the girl gave their consent to the marriage reluctantly, but barred her from visiting them and community leaders gave an undertaking to the police that they would not indulge in violence. However, some miscreants went ahead and damaged property in a Dalit colony.

     

    During the power shutdown, the miscreants damaged two dozen houses of the Dalit community, vehicles were torched and a woman was attacked. About eight persons, apart from 15 policemen, were injured. Additional forces were rushed to the village and around 40 persons have been taken into custody by the Keregodu police, which has registered a case and are investigating. The affected families have been provided with food and other relief material. A peace meeting is slated to be held.

     

    Deccan Herald

     

    Ex-student barges into classroom, applies vermilion on girl

    http://www.deccanherald.com/content/499256/ex-student-barges-classroom-applies.html

     

    Bijnore (UP), Sep 5, 2015, (PTI)

     

    A former student of a co-educational institute here barged into a classroom and applied vermilion on the forehead of a tenth class student in front of her classmates and teacher before fleeing the spot.


    A case has been registered against Sonu Kumar (18) on the the complaint of the girl's parents and the principal of the inter-college, police said today.


    S.O Kadrabad Satya Pal Singh said efforts were being made to nab the accused.

     

    Sonu Kumar, a resident of Murliwala village, was a student of class XI but left the college last year after failing in the annual examination, Singh said.


    According to police, Kumar was in relationship with the girl, who belongs to the Dalit community and is two years his junior. "Their relationship had ended due to caste difference," a police official said


    On Friday, Kumar reached the inter-college with vermilion in his pocket and a rakhi in hand and entered the girl's classroom. "When the teacher tried to stop him, Kumar said he had come to get rakhi tied by his 'adopted sister' and instead applied sindoor (vermilion) on her forehead," the official said.

     

     

    The Hindu

     

    Court directive to resolve row between communities

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/CITIES/MADURAI/COURT-DIRECTIVE-TO-RESOLVE-ROW-BETWEEN-COMMUNITIES/ARTICLE7618273.ECE

     

    SPECIAL CORRESPONDENT

     

    The Madras High Court Bench here has directed Virudhunagar Collector to convene a meeting of Caste Hindus and Dalits of T. Veppankulam village in Kariapatti Taluk and resolve a dispute between them over utilising water drawn from a public bore well since one group insisted on using it for drinking and the other for irrigation.

     

    Passing orders on a writ petition filed by a Caste Hindu individual to prevent a Dalit couple from utilising the water for irrigation, Justices R. Sudhakar and V.M. Velumani said: "There appears to be a serious case of allegation of untouchability and difficulties faced by people belonging to Scheduled Caste in utilising the water… The underlying problem is that there is a deep distress between the two caste groups."

     

    In his affidavit, the writ petitioner R. Sengai accused the Dalit couple V. Mayan and Malarkodi Mayan of illegally drawing water from the bore well to irrigate their fields and also that of adjacent landowners though the Block Development Officer had categorically stated, in reply to petitioner's application under the Right to Information Act, that the bore well was sunk to meet drinking water needs.

     

    However, Mr. Mayan's counsel N. Sathish Babu told the court that the bore well had been sunk on five cents of land donated by his client on March 5, 2010, to the State government specifically for the purpose of sinking a bore well to irrigate the lands belonging to Dalits. He said that the Caste Hindus were jealous of the growth of Dalits and were bent upon preventing sources of irrigation.

     

    The Hindu

     

    HC upholds ruling against quota benefits for migrant SC candidates

    HTTP://WWW.THEHINDU.COM/NEWS/CITIES/CHENNAI/HC-UPHOLDS-RULING-AGAINST-QUOTA-BENEFITS-FOR-MIGRANT-SC-CANDIDATES/ARTICLE7617673.ECE

     

    SPECIAL CORRESPONDENT

     

    Reiterating the legal position that when a Scheduled Caste individual migrates from one State or Union Territory to another, he can only claim to belong to the community in relation to the State or Union Territory from which he has migrated, the Madras High Court on Friday upheld a single judge order on the issue.

     

    Dismissing an appeal against a single judge order, which had rejected pleas to allow migrant SC candidates in Puducherry for reservation in institutions meant for the community, a Division Bench comprising Justices Satish Kumar Agnihotri and K.K. Sasidharan said the appellants had not produced any material to prove that the Puducherry government had framed a policy to extend the benefits in the field of education to the migrants.

     

    Maintaining that the appellants were entitled to benefits of reservation only in the State from where they migrated, the Bench said, "There is no question of considering them as Scheduled Caste in relation to the Union Territory of Puducherry in view of their migration after the cut-off date."

     

    "Even if the government of Puducherry wanted to extend other benefits to those who have migrated to the Union Territory from other States, it would be possible only by way of passing appropriate legislation as indicated in Marri Chandra Shekhar Rao (a similar case)," the Bench said, adding that no one could compel the government to initiate such legislation. A single judge earlier dismissing pleas by two students and an association, which sought to treat migrant SC candidates as resident SC candidates defined in the Constitution (Pondicherry) Scheduled Castes Order, 1964, to seek admission in professional courses in Puducherry.

     

    "No question of considering them as SC in relation to Puducherry in view of their migration after cut-off date"

     

    The Times Of India

     

    Dalit group wants farmer's name back on Sambhaji memorial board

    http://timesofindia.indiatimes.com/city/pune/Dalit-group-wants-farmers-name-back-on-Sambhaji-memorial-board/articleshow/48831501.cms

     

    TNN | Sep 5, 2015, 05.12 AM IST

     

    PUNE: A reference about Govind Gopal Mahar (Gaikwad), the dalit farmer who had made arrangements for the last rites of Chhatrapati Sambhaji Maharaj along with other villagers, has allegedly been wiped out from the notice board located near the memorial in Vadhu Budruk, Pune district.


    On Thursday, while submitting a memorandum to the resident district collector, Suresh Jadhav, Buddhist Prerna Group demanded that Govind Gopal's name be restored on the notice board at the earliest.


    Sambhaji Maharaj was the heir to the Maratha Empire after Chhatrapati Shivaji Maharaj. In 1689, he was captured by the Mughal force and Aurangzeb ordered his execution. The Mughal emperor had threatened to kill anyone who attempted to perform the last rites.


    Kiran Shinde, president of the Buddhist Prerna Group, stated that a note, providing historical details about Sambhaji Maharaj, had been put up on a notice board near the memorial. Details included a reference to Govind Gopal, who belonged to the Mahar community and was one of three people to serve at the memorial.


    "A particular sentence, which elaborates Govind Gopal's contribution, has been edited from the freshly painted board," Shinde mentioned in a memorandum submitted to Jadhav. Shinde further claims that the Dharmaveer Sambhaji Maharaj Smruti Samiti, which looks after the memorial, has neglected a smaller monument dedicated to Govind Gopal Gaikwad. "The name and the reference should be restored," Shinde told TOI. The group has also submitted other reference material related to Govind Gopal Gaikwad to Jadhav.


    Somnath Bhandare, president of the samiti clarified that the notice board has not been put in place by a government agency. "Removal of the name has no relation with any community, religion or any person," he said.

     

    The Tribune

     

    SC summons Labour Secy over unused funds

    http://www.tribuneindia.com/news/nation/sc-summons-labour-secy-over-unused-funds/128915.html

     

    Rs 27,000 cr unutilized At least Rs 27,000 crore meant for the welfare of casual workers in the construction sector remains unutilised despite SC orders

     

    Legal Correspondent New Delhi, September 4

     

    The Supreme Court today directed the Union Labour Secretary to be present in the court on September 11 and explain as to why the huge sum of Rs 27,000 crore, meant for the welfare of casual workers in the construction sector, continued to remain unutilised despite the court's orders.

     

    The Social Justice Bench comprising Justices MB Lokur and UU Lalit summoned the Secretary as the Centre failed to submit a plan of action for utilisation of the fund collected in the form of 1 per cent cess on the construction industry.

     

    The Bench said it had made a remark earlier that going by the "casual attitude" of the Centre and the state governments it would be better if they stopped levying the cess. This observation was aimed at making the government get into action. But even such strong remarks had failed to have any impact on the authorities, it lamented.

     

    The Bench had also noted that some of the states had misused the funds, instead of spending the money for providing health care to the workers' families and education to their children.

     

    It had directed the Delhi government to return to the welfare fund of about Rs 2.7 crore utilised for publicity over the years. Today, the Delhi government sought a recall of this directive, but the Bench rejected the plea.

     

    Scroll.in

     

    Redesigning reservations: Why removing caste-based quotas is not the answer

    http://scroll.in/article/753490/redesigning-reservations-why-removing-caste-based-quotas-is-not-the-answer

     

    Instead, India needs to exclude groups that are no longer backward.

    Ajaz Ashraf  · Today · 10:30 am

     

    The fury of the Patidar movement in Gujarat has broadly elicited two types of responses. One, that reservation in government jobs and educational institutes should be based on economic criteria, not caste. And two, that the caste-based reservation should stay but the extant system should be rethought and redesigned to not only make it a more effective tool of social justice, but also ensure that those outside the reservation pool don't feel discriminated against.


    The demand for reservation based exclusively on economic criteria arises from the popular confusion over its philosophy. Affirmative action, also known as positive discrimination, is not a tool for economic mobility, aiming to bump up individuals from a lower to higher class. Its goal is to create a level playing field, equipping individuals from disadvantaged groups to overcome their socially imposed disabilities to compete in a sharply unequal society.

    These groups are disadvantaged not because they willingly shun, say, education, or are inherently less endowed to compete, or are plain foolish and lazy, precisely the arguments offered to justify the tirade against reservation. They are marginalised because they were located in the social system specifically designed to justify, and perpetuate, social inequality. They were pushed to the margins of society not out of their own volition, or failings, but under compulsion.


    This social dynamic underlies racism, leading to the marginalisation of Blacks in the United States and South Africa. They were marginalised because the society imposed its discriminatory system on them.

    The caste system


    In India, the systemic discrimination against certain social groups was practised over centuries through the caste system, which was based on the idea of purity and pollution. Social groups were arranged in a hierarchy, dependent on their occupations measured, so to speak, on the scale of purity and pollution. Those at the top of the caste hierarchy were the Brahmins, deemed pure because they were allowed to read and interpret the scriptures and conduct religious rituals. At the bottom were the Shudras, or peasant castes.


    Outside the four-fold Varna system (Kshatriyas and Vaishyas were the other two) were the 'untouchables', that is, those whose occupation was considered polluting, and who lived, quite literally, outside the village precinct. These occupations were hereditary, circumscribing for centuries both the choice and will of the individual born into a particular group. Social mobility was not of the individual, but of the group, achieved over decades, if not centuries.

    Obviously, the impulse of modernity, industrialisation and urbanisation loosened the caste system considerably. Nevertheless, centuries of discrimination practised against social groups rendered their individuals incapable of competing on an equal footing with those who possessed what is called social, cultural and economic capital. The system also spawned a subculture which imbibed in the disadvantaged an acceptance of their fate, not the least because it was said to be divinely ordained.


    In other words, the past inequalities arising from the caste system continued to replicate in the modern era, despite the Indian Constitution recognising the inherent equality of men and women. This is precisely why reservation is caste-based. It seeks to remove the backwardness arising from the discriminatory social system and to empower and instil confidence in them to compete in the open system.


    This backwardness is of the group. It is not of the individual, arising from his or her economic position, which is subject to upward and downward mobility in their own lifespan or over two generations. The nature of this backwardness is social and educational, which may or may not have economic basis to it.


    It is the twin features of social and educational backwardness which hobble individuals from competing in a modern, open society. To put it rather simplistically, an individual from an upper caste will have greater life chances than a lower caste person even though the two might be sharing the same economic position.

    Reservation experience


    Indeed, after nearly seven decades of reservation for Scheduled Castes and Scheduled Tribes and over two decades for Other Backward Classes, these three social groups in 2011 together comprised just 23.2% of Group A services, considered the most prestigious, powerful and lucrative of government employment. Imagine what the representation of these three groups must have been in 1947, despite their constituting over 75% of India's population.

    Reservation also seeks to make the middle class more socially heterogeneous, realising in real terms the idea of equality of all. Affirmative action is indeed bringing about this change in the Indian middle class, albeit gradually.

    Thus, in 2013-2014, 46% of those who cleared the Union Public Service Commission examination and interview came through SC, ST and OBC reservations. Interestingly, out of the 2576 candidates who were recommended against reserved posts, 397 qualified in the general category as well – that is, their total marks were above the qualifying standard for those outside the reservation pool. Has reservation in educational institutes skilled the 397 to compete on an equal footing? Possibly.


    Greater controversies


    Nevertheless, reservation for the OBCs has triggered greater controversies than that for SCs and STs. One reason is that SCs and STs encountered discrimination that was far more severe in nature than what other groups were subjected to, and which, in many ways, persists even today.


    Second, the OBCs, particularly those engaged in agriculture, did benefit from state policies such as the abolition of the zamindari system and Green Revolution, to dramatically improve their economic position.  Can they still be socially and culturally backward, critics ask. Third, some non-upper caste groups, such as the Jats, who gained enormously post-Independence, feel aggrieved at having been left out of the reservation pool and vociferously demand economic-based reservation.


    The economic argument


    Yet, it must be pointed out that for classifying socially and educationally backward classes, that came to be known as the OBCs, the Mandal Commission developed 11 indicators or criteria, of which four were economic. There were four indicators for social and three for educational backwardness. However, economic indicators were given a weightage of one point each, as against three points each for social and two points each for educational criteria.


    Perhaps the Mandal Commission had foreseen the backlash that could transpire if it did not include economic criteria, for it noted:

     

    "Economic, in addition to social and education indicators, were considered important as they directly flowed from social and education backwardness. They also helped to highlight the fact that socially and educationally backward classes were economically backward also."


    Take two of the four economic indicators the Mandal Commission developed. The Commission sought to identify "caste/classes where the average value of family assets is at least 25 per cent below the state average" and "where the number of families living in kuccha houses is at least 25 per cent above the state average." Unless it is held the Commission's survey was poorly conducted or biased, the Mandal list of the OBCs did have an element of economic criteria built into it.


    In addition, the concept of creamy layer was introduced for OBC reservation to ensure the wealthier among them did not corner the benefits of affirmative action. In 1993, it was determined that children of parents having an annual income of Rs one lakh would not qualify for reservation benefits. The income-criterion of creamy layer was subsequently revised upwards over the years, and is now currently pegged at Rs six lakh a year.

    From the perspective of poverty prevailing in India, Rs 6 lakh a year or Rs 50,000 a month might appear substantially high. But there is also the counter-argument that a very low income cut-off for defining creamy layer might lead to not enough OBC students having adequate education, given its rising cost, competing for government jobs and seats in educational institutes reserved for them. (The creamy layer doesn't operate in SC and ST reservation, which has enabled, perhaps unjustifiably, for even children of second-generation government officials to enjoy its benefits).


    Periodic surveys


    The belief that the still-too-high creamy layer income enables the relatively rich to corner the benefits of reservation underscores the need for designing OBC reservation to fulfil better the goals of affirmative action. It should be noted that the Mandal Commission conducted its survey 35 years ago. It is possible that its data on socially and educationally backward classes may have become out-dated, with some of them no longer in need of affirmative action.


    But therein lies the problem – reservation is looked upon as a benefit which, once granted, cannot be relinquished. The philosophy of affirmative action demands carrying out periodic socio-economic surveys to weed out social groups from OBC category, for ensuring the benefits of reservation percolate to the more depressed groups. Such periodic surveys will also enable policy-makers to gauge whether or not affirmative action has removed or diminished the discriminatory nature of social structures.


    However, the reverse is happening – there is a veritable race to claim backwardness among social groups, regardless of their social advancement and relative economic prosperity. The demand for reservation by the Patels and Marathas is an apt example of this trend, as is the clamour among the Jats to be included in the Central OBC list.


    Undoubtedly, their entry into the OBC reservation pool will be inimical to the interests of groups which require affirmative action more than them. But it is also true that one of the reasons for their disquiet, as also that of the upper castes, is their belief that reservation is bound to exist in perpetuity Some upper castes believe they are being victimised for the "sins" of their forefathers. No wonder, reservation continues to trigger social upheaval, particularly as job opportunities diminish, competition becomes stiffer, and aspirations of people soar.


    This is precisely the reason why India needs a third Backward Commission – the Mandal Commission was second – not to remove caste-based reservation, but to exclude groups no longer backward and make the instrument of affirmative action sensitive to the larger social good. Some sense about the state of backwardness among social groups could also be had through the release of caste data generated by the 2013 socio-economic caste census. But to redesign reservation requires a sense of daring and sagacity, the two attributes not seen in the political class. 


    Ajaz Ashraf is a journalist from Delhi. His novel, The Hour Before Dawn, published by HarperCollins, is available in bookstores.

     

    News monitored by AMRESH & AJEET

     

     

    .Arun Khote
    On behalf of
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    (An initiative of "Peoples Media Advocacy & Resource Centre-PMARC")

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    Peoples Media Advocacy & Resource Centre- PMARC has been initiated with the support from group of senior journalists, social activists, academics and  intellectuals from Dalit and civil society to advocate and facilitate Dalits issues in the mainstream media. To create proper & adequate space with the Dalit perspective in the mainstream media national/ International on Dalit issues is primary objective of the PMARC.
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    05 सितंबर 2015

    कलबुर्गी की हत्या तार्किकता का गला घोंटने का प्रयास

    -राम पुनियानी

    गत 30 अगस्त 2015 को प्रोफेसर मलीशप्पा माधीवलप्पा कलबुर्गी की हत्या से देश के उन सभी लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है जो उदारवादी समाज के हामी हैं, तार्किकता के मूल्यों का आदर करते हैं और अंधश्रद्धा के खिलाफ हैं। प्रोफेसर कलबुर्गी, जानेमाने विद्वान थे और उन्होंने 100 से भी अधिक पुस्तकें लिखीं थीं। वे 12वीं सदी के कन्नड़ संत कवि बस्वना की विचारधारा को जनता के सामने लाए। वे मानते थे कि लिंगायत - जो कि बस्वना के अनुयायी हैं - को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि वे वैदिक परंपरा का हिस्सा नहीं हैं। बस्वना के छंदों में निहित शिक्षाओं, जिन्हें ''वचना''कहा जाता है, का उन्होंने गहराई से अध्ययन किया था और इसने उनकी तार्किकतावादी सोच को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

    कलबुर्गी द्वारा बस्वना की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार और मूर्तिपूजा व ब्राह्मणवादी धार्मिक अनुष्ठानों की उनकी खिलाफत ने बजरंग दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों को उनका शत्रु बना दिया। तथ्य यह है कि पुरातनकाल से नास्तिकतावादी परंपरा, हिंदू धर्म का हिस्सा रही है। इस परंपरा के एक प्राचीन उपासक थे चार्वाक। मूर्तिपूजा का विरोध भी हिंदू धर्म के लिए कोई नई बात नहीं है। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने मूर्तिपूजा न करने का आह्वान किया था।

    कलबुर्गी की हत्या से कुछ समय पहले, पड़ोसी बांग्लादेश में तीन धर्मनिरपेक्ष युवा ब्लॉगर्स की हत्या कर दी गई थी। सीरिया में इस्लामिक स्टेट के कट्टरवादियों ने खालिद अल-असद नामक अध्येता को जान से मार दिया था। महाराष्ट्र में लगभग दो वर्ष पहले, प्रसिद्ध तार्किकतावादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश में हलचल पैदा कर दी थी। उनके प्रयासों से ही महाराष्ट्र में काला जादू और अंधश्रद्धा विरोधी कानून लागू हुआ था। एक अन्य सम्मानित कार्यकर्ता कामरेड गोविंद पंसारे को लगभग एक वर्ष पहले मौत के घाट उतार दिया गया था। पंसारे जिन कई क्षेत्रों में सक्रिय थे, अंधश्रद्धा का विरोध उनमें से एक था। महाराष्ट्र में अत्यंत सम्मान से देखे जाने वाले शासक शिवाजी पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी जो खासी लोकप्रिय हुई थी। पंसारे अपनी पुस्तक में बताते हैं कि शिवाजी किसानों के हितैषी थे व सभी धर्मों का सम्मान करते थे। शिवाजी के चरित्र का यह प्रस्तुतिकरण, हिंदुत्ववादियों को रास नहीं आया।

    डॉ. कलबुर्गी की हत्या, धारवाड़ में उनके घर पर हुई। प्रोफेसर कलबुर्गी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे हंपी स्थित कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे। वे राष्ट्रीय और कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कारों के विजेता थे। इस विद्वान प्राध्यापक ने वीरशैव व बस्वना परंपरा का विशद अध्ययन किया था। विवादों ने उनका कभी पीछा नहीं छोड़ा और ना ही कट्टरपंथियों की धमकियों ने। वीरशैव व बस्वना सहित कन्नड़ लोकपरंपरा पर आधारित आलेखों का उनका संग्रह 'मार्ग'सबसे पहले विवादों के घेरे में आया। उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियाँ मिलीं। उन्हें पुलिस सुरक्षा प्रदान की गयी, जिसे उनके ही अनुरोध पर कुछ समय पहले वापस ले लिया गया। उन्होंने मूर्तिपूजा बंद करने के मुद्दे पर यूआर अनंथमूर्ति का समर्थन किया था। उनके द्वारा विहिप नेताओं और विश्वेश्वरतीर्थ स्वामी को सार्वजनिक बहस के लिए निमंत्रित करने से एक नए विवाद का जन्म हुआ। कर्नाटक सरकार के अन्धविश्वास विरोधी विधेयक का समर्थन करने के कारण उन्हें बजरंग दल जैसे संगठनों के कोप का शिकार बनना पड़ा। उनका जमकर विरोध हुआ और कई स्थानों पर उनके पुतले जलाये गए।     

    दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्याओं में कई समानताएं हैं। यद्यपि वे अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय थे तथापि तीनों तार्किकतावादी थे, अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट के कहते थे और उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती थीं। उनके हत्या के तरीके में भी कई साम्य हैं। तीनों की हत्या अलसुबह हुईं, हत्यारे मोटरसाइकिल सवार थे, जिनमें से एक बाइक चला रहा था और दूसरे ने ताबड़तोड़ ढंग से गोलियां चलाईं और फिर दोनों भाग निकले। यह भी क्या अजीब नहीं है कि इतना समय बीत जाने के बाद भी, दाभोलकर और पंसारे के हत्यारे पुलिस की पहुँच से दूर हैं।

    कलबुर्गी की हत्या के बाद, बजरंग दल के एक कार्यकर्ता भुविथ शेट्टी ने ट्वीट किया, "पहले यूआर अनंथमूर्ति और अब एमएम कलबुर्गी। हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाओ और कुत्ते की मौत मरो। और प्रिय केएस भगवान, अब तुम्हारी बारी है"। इस ट्वीट को बाद में वापस ले लिया गया। इसके बाद, हिन्दू दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े कई लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि कलबुर्गी द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किये जाने से उनके प्रति हिन्दुओं के मन में रोष था और इसलिए उनकी हत्या हुई। यह एक तरह से उस असहिष्णुता को औचित्यपूर्ण ठहराने का प्रयास है, जो हमारे समाज में जड़ें जमाती जा रही है। इस मामले में सभी धर्मों के कट्टरपंथियों की सोच एक-सी है। सलमान रूश्दी को धमकियाँ दीं गयीं थीं और तस्लीमा नसरीन संकुचित सोच वालों के निशाने पर थीं। बांग्लादेश में ब्लॉगरों की हत्या हुई तो पाकिस्तान में सलमान तासीर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। तासीर का कसूर यह था कि वे ईशनिंदा की आरोपी एक ईसाई महिला का बचाव कर रहे थे।

    तार्किकता का विरोध, मानव इतिहास का अंग रहा है। चार्वाक ने हमारी दुनिया के प्रति ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण और विशेषकर वेदों को दैवीय बताए जाने पर प्रश्न उठाए। चार्वाक का कहना था कि वेदों को मनुष्यों ने लिखा है और वे सामाजिक ग्रंथ हैं। इस कारण चार्वाक को प्रताडि़त किया गया। समय के साथ, पुरोहित वर्ग द्वारा अपने विचारों को समाज पर लादने की प्रक्रिया ने संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लिया। गौतमबुद्ध, जो अनीश्वरवादी थे और मनुष्यों की समस्याओं का हल इसी दुनिया में खोजने के हामी थे, की शिक्षाओं का जबरदस्त विरोध हुआ। मध्यकालीन भक्ति संत तार्किक सोच के हामी थे और धर्म के नाम पर प्रचलित सामाजिक रीति-रिवाजों और पाखंडों के विरोधी। महाराष्ट्र के तुकाराम जैसे कई संतों को पुरोहित वर्ग के हाथों प्रताड़ना सहनी पड़ी।

    दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसा ही हुआ। यूरोप में कई वैज्ञानिकों को चर्च के कोप का शिकार बनना पड़ा। जब गैलिलियों ने यह कहा कि धरती गोल है तो चर्च ने उन्हें नरक में जाने का श्राप दिया। इसी तरह की प्रताड़ना, कष्ट और सज़ाएं कई वैज्ञानिकों को भोगनी पड़ीं। चर्च अपनी ''दैवीय सत्ता''का इस्तेमाल, सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को रोकने और वैज्ञानिक सोच को बाधित करने के लिए करता रहा। शनैः शनैः तार्किक सोच के विरोधी कमज़ोर पड़ते गए। पुरोहित वर्ग का तर्क यह रहता है कि वे सारे ज्ञान का भंडार हैं क्योंकि हमारे ''पवित्र ग्रंथों''में सारा ज्ञान समाहित है। इस सोच का विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में अलग-अलग ढंग से प्रकटीकरण हुआ है। पाकिस्तान में कुछ मौलानाओं ने यह दावा किया कि देश में बिजली की कमी को जिन्नात की मदद से दूर किया जा सकता है क्योंकि जिन्नात असीमित ऊर्जा के स्त्रोत हैं। उन्होंने अपने इस दावे का आधार धर्म को बताया।

    भारत में स्वाधीनता संग्राम के दौरान, सामाजिक परिवर्तन के हामियों ने तार्किक सोच को बढ़ावा दिया और धार्मिक ग्रंथों को तार्किकता की कसौटी पर कसना शुरू किया। परपंरावादी, जो पुरातन सामाजिक समीकरणों को बनाए रखना चाहते थे, ने ''ज्ञान की हमारी महान प्राचीन विरासत''का राग अलापना शुरू कर दिया। आस्था पर आधारित सोच और वैज्ञानिक पड़ताल एक-दूसरे के सामने आ गए। स्वतंत्रता के बाद, मुख्यतः पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री होने के कारण, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिला और उच्च शिक्षा व शोध के कई संस्थान स्थापित हुए। इससे देश न केवल आर्थिक दृष्टि से आगे बढ़ा वरन् उसके चरित्र का भी प्रजातांत्रिकरण हुआ। यह वह युग था जब देशवासी भारत के समग्र विकास की कल्पना को साकार करने में जुटे हुए थे और तार्किक सोच को प्रोत्साहित करना, इस प्रक्रिया का आवश्यक अंग था। सन् 1958 में संसद ने राष्ट्रीय वैज्ञानिक नीति संकल्प पारित किया।

    सन 1980 के दशक के बाद से स्थितियां बदलने लगीं। धर्म के नाम पर राजनीति का उभार हुआ। सामाजिक उद्विग्नता को कम करने के लिए आस्था के भावनात्मक सहारे का इस्तेमाल होने लगा। कुछ राजनैतिक ताकतों ने धार्मिक पहचान और आस्था पर राजनीति करनी शुरू कर दी। जैसे-जैसे सामाजिक रूढि़वाद बढ़ा, तार्किक सोच का विरोध भी बढ़ने लगा। लगभग इसी समय ऐसे समूह व संगठन भी उभरे जो तार्किक व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहते थे और अंधश्रद्धा के विरोधी थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण था केरल शास्त्र साहित्य परिषद। बाद में, महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर ने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का गठन किया।

    अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्यकर्ता, गांव-गांव जाकर यह प्रदर्शित करने लगे कि किस प्रकार बाबाओं और तथाकथित साधुओं द्वारा दिखाए जाने वाले ''चमत्कार''केवल हाथ की सफाई हैं। और यह भी कि ये बाबा, गरीब ग्रामीणों के असुरक्षा के भाव का लाभ उठाकर उनका शोषण करते हैं। अंधश्रद्धा का विरोध करने के अतिरिक्त, पंसारे ने शिवाजी का एक ऐसे शासक के रूप में चित्रण करना शुरू किया जो कि सभी धर्मों का समान रूप से आदर करता था। दक्षिणपंथी इस प्रचार को पचा नहीं पा रहे थे परंतु उनके पास दाभोलकर के धारदार तर्कों का कोई जवाब भी नहीं था। कर्नाटक में यूआर अनंथमूर्ति ने मूर्तिपूजा और अंधश्रद्धा के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। कलबुर्गी ने न केवल अनंथमूर्ति का समर्थन किया वरन उन्होंने अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित करने संबंधी विधेयक का समर्थन भी किया। उन्होंने अपने विचारों का प्रचार करने के लिए कई पुस्तकें और पेम्फलेट लिखे।

    इसके कुछ समय पहले, पहली एनडीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने पौरोहित्य व ज्योतिषशास्त्र के पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों में लागू किए। इससे उन तत्वों को बढ़ावा मिला जो हिंदू धर्म की राजनीति करने वाली ताकतों के साथ थे और ''आस्था''के नाम पर आमजनों को बेवकूफ बनाने में लगे हुए थे। सन् 2014 में भाजपा सरकार के दिल्ली में शासन में आने के बाद से पौराणिकता को इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्राचीन भारत में हवाई जहाज हुआ करते थे और प्लास्टिक सर्जरी की जाती थी, इस तरह के बेसिरपैर के दावे किए जा रहे हैं। इस सरकार के सत्ता में आने से हिंदुत्ववादी राजनीति का अतिवादी तबका बहुत उत्साहित है व काफी आक्रामक हो गया है। समाज में उदारवादी सोच के लिए स्थान कम होता जा रहा है और बहस का स्थान हिंसा ने ले लिया है। असहमत होने के अधिकार को तिलांजलि देने की कोशिश हो रही है और जो आपसे असहमत है, उसे बल प्रयोग और डराधमका कर चुप करने की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी हुई है। दाभोलकर, पंसारे व कलबुर्गी जैसे साधु प्रवृत्ति के विद्वानों की हत्या यह बताती है कि हमारे देश में प्रतिगामी व कट्टरपंथी तत्वों का बोलबाला बढ़ रहा है। ये तत्व तार्किक सोच को समूल उखाड़ फेंकना चाहते हैं।

    हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथियों द्वारा अत्यंत आक्रामकता से उन लोगों का विरोध किया जा रहा है जो तार्किक सोच के पैरोकार हैं और जातिप्रथा व मूर्तिपूजा के विरोधी हैं। ये तत्व, हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति को मज़बूती दे रहे हैं। हालिया वर्षों में राममंदिर व गौहत्या जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों को सीढ़ी बनाकर यह राजनीति सत्ता तक पहुंची है। यह राजनीति ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म, जो कि जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराता है, पर आधारित है। दाभोलकर, पंसारे व कलबुर्गी जैसे व्यक्तियों की विचारधारा, हिंदुत्ववादी राजनीति की जड़ों पर प्रहार करती है। हिंदुत्ववादी, धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि हिंदू धर्म में ही अनेक विविध और परस्पर विरोधाभासी विचारधाराएं मान्यताएं सदियों से विद्यमान रही हैं। कलबुर्गी की हत्या, यथास्थितिवादियों और परिवर्तनकामियों के बीच चल रहे संघर्ष का प्रतीक है।

    यह सुखद है कि इन नृशंस हत्याओं का जबरदस्त विरोध हो रहा है। विविधता और तार्किकता के समर्थक समूह सोशल मीडिया में इनका विरोध कर रहे हैं और इनके पीछे की विचारधारा का पर्दाफाश कर रहे हैं। इससे यह साफ है कि अभी भी देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो तार्किकतवादी मूल्यों में आस्था रखते हैं और यही हम सबके लिए आशा की किरण है। दाभोलकर की हत्या के बाद से कई ऐसे संगठन एक मंच पर आए हैं। वे असहिष्णु, परंपरावादी, आक्रामक दक्षिणपंथी राजनीति का विरोध करने के प्रति दृढ़संकल्पित हैं और सामाजिक परिवर्तन के इन पैरोकारों के अधूरे कार्य को पूरा करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)



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    CC News Letter 04 September - Time To End The Refugee Shame

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    In Solidarity
    Binu Mathew
    Editor
    www.countercurrents.org

     Time To End The Refugee Shame
    By Gauri van Gulik

    http://www.countercurrents.org/gulik040915.htm

    A solemn moment of silence. The world over, this is the traditional response when lives are cut short by tragedy. It has also been a common response to tragedies in Europe and off its shores which have ended the lives of thousands of refugees and migrants. Not killed by bombs in Syria, but killed while making terrifying journeys in search of safety and better lives in Europe. But the scale and rapid succession of these tragedies calls for breaking the silence


    Europe's Refugee Crisis and the Warped Morality of David Cameron
    By Colin Todhunter

    http://www.countercurrents.org/todhunter050915.htm

    UK Prime Minister David Cameron this week said "as a father I felt deeply moved" by the image of a Syrian boy dead on a Turkish beach. As pressure mounts on the UK to take in more of those fleeing to Europe from Syria and elsewhere. Cameron added that the UK would fulfil its "moral responsibilities." On hearing Cameron's words on the role of 'morality', something he talks a lot about, anyone who has been following the crisis in Syria would not have failed to detect the hypocrisy


    When Brinda Karat Became Emotional In Kandhamal
    By Binu Mathew

    http://www.countercurrents.org/mathew040915.htm

    Why such a strong woman like Brinda Karat became so emotional in Kandhamal? It is a story that needs to be told and it will tell the the state of Criminal Justice System in Kandhamal


    Teaching Torture In The Homeland
    By Elizabeth Hayes

    http://www.countercurrents.org/hayes040915.htm

    We need to find a way to teach our children, and each other, because the corporatocracy has taken over the state schools from kindergarten on, and all too few are strong enough to pass through without being deformed into their oh-so-useful cogs


    U.S. Has Now Retrospectively Joined Fascist Side in WW II
    By Eric Zuesse

    http://www.countercurrents.org/zuesse040915.htm

    At a commemorative celebration in Beijing on Thursday September 3rd, marking the 70th Anniversary of China's freedom from the aggressor Japan ending World War II in China, the United States conspicuously avoided siding with its former WW II ally China, which had been one of the pro-democracy Allies during that war, and instead retrospectively switched sides, to the former fascist Axis powers, Japan itself, and also Germany


    Our Supposed Democracy
    By Steve Dustcircle

    http://www.countercurrents.org/dustcircle040915.htm

    In this country, we really don't have open choice. All choices are closed, the choices those in charge have given us. It's like parents who would ask would the kids in the back seat rather be grounded or abused. Of course, the kids would prefer neither, but if the choice had to be made, they'd choose the lesser of the two evils


    NYT Not "Descending" Into Propaganda
    By Robert Barsocchini

    http://www.countercurrents.org/barsocchini040915.htm

    The New York Times says in an article today that, although the US won't join the majority of the world by signing the treaty banning cluster bombs, it has "abided by its provisions". Glenn Greenwald published an article in response documenting that, in fact, the US "continually violates all" of the provisions of the cluster bomb treaty, "systematically and as a matter of policy doing exactly that which the treaty expressly bans."


    The Sheena Bora Murder In The Context of A Culture of Free Market Greed
    By Vidyadhar Date

    http://www.countercurrents.org/date050915.htm

    The sensational murder case concerning Indrani and Peter Mukerjea, corporate figures, needs to be seen in the wider context of a society created by neoliberalism. A culture of free market greed and neoliberalism has created a world in which psychopathic personality traits are rewarded, says Paul Verhaeghe, a widely respected psychologist and professor of psychology at the university of Ghent
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  • 09/06/15--00:06: मैडम ख्रिस्टी जैसी खूबसूरत कोई सुपर माडल या विश्वसुंदरी या दिलों को लूटने वाली सुपर हिरोइन भी नहीं! आज सविता बाबू से सुबह सुबह मैंने कहा कि साहिबेकिताब नहीं हूं और न कोई तोप हूं और न नोबेलिया कोई,लेकिन गलत मत समझना मेरी औकात भी कोई कम नहीं है।मेरे पास मेरे टीचर हैं। ताराचंद्र त्रिपाठी ने लिखा है,कबीरदास को तब भी कलबुर्गी की तरह मजहबी लफंगों ने ही मारा।उनके खिलाफ इब्राहीम लोदी से सजाएमौत की गुहार लगाने वाले जैसे तमाम पंडित थे,वैसे ही मौलवी भी थे तमाम। मेरे मरने के बाद किसी को मेरी याद आये तो मेरे शिक्षकों और शिक्षिकाओं को याद जरुर कर लें।मुझ पर उनका जो कर्जा है अनंत अनंत,शायद इस बेमिसाल पूंजी से अबाध पूंजी के इस मुल्क का थोड़ा विकास हो जाये! पलाश विश्वास


  • मैडम ख्रिस्टी
    जैसी खूबसूरत कोई सुपर माडल या विश्वसुंदरी या दिलों को लूटने वाली सुपर हिरोइन भी नहीं!

    आज सविता बाबू से सुबह सुबह मैंने कहा कि साहिबेकिताब नहीं हूं और न कोई तोप हूं और न नोबेलिया कोई,लेकिन गलत मत समझना मेरी औकात भी कोई कम नहीं है।मेरे पास मेरे टीचर हैं।
    ताराचंद्र त्रिपाठी ने लिखा है,कबीरदास को तब भी कलबुर्गी की तरह मजहबी लफंगों ने ही मारा।उनके खिलाफ इब्राहीम लोदी से सजाएमौत की गुहार लगाने वाले जैसे तमाम पंडित थे,वैसे ही मौलवी भी थे तमाम।
    मेरे मरने के बाद किसी को मेरी याद आये तो मेरे शिक्षकों और शिक्षिकाओं को याद जरुर कर  लें।मुझ पर उनका जो कर्जा है अनंत अनंत,शायद इस  बेमिसाल पूंजी से अबाध पूंजी के  इस मुल्क का थोड़ा विकास हो जाये!
    पलाश विश्वास
    मेरे मरने के बाद किसी को मेरी याद आये तो मेरे शिक्षकों और शिक्षिकाओं को जरुर याद कर लें।मुझ पर उनका जो कर्जा है अनंत अनंत,शायद इस बेमिसाल पूंजी से अबाध पूंजी के इस मुल्क का थोड़ा विकास हो जाये!

    मेरा कोई कालजयी बनने का शौक नहीं है लेकिन जिनने भी मुझे कोई सबक पढाया वे मेरे टीचर कालजयी हो जायें,तो अपनी बुरी तरह फेल जिंदगी का मुझे कोई अफसोस न होगा।

    मुझे सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि इस देश में शायद वैसे शिक्षक और वैसी शिक्षिकाएं अब नहीं हैं,जिनने अपने खून पसीने और समूचे दिलोदिमाग से हमारी पीढ़ी को इंसानियत का सबक पढ़ाया है।

    नसीब का गुलाम नहीं हूं। फिरभी कहना होगा कि हमारे बच्चे बेहद बदनसीब हैं कि उन्हें हमारे टीचरों जैसे टीचरों से कोई वास्ता नहीं पड़ा।वरना उनकी क्या मजाल कि वे यूं अंधेरे में भटक रहे होते।वे होते तो कान खेंचकर उन्हें रास्ते पर ले आते।

    आज सविता बाबू से सुबह सुबह मैंने कहा कि साहिबेकिताब नहीं हूं और न कोई तोप हूं और न नोबेलिया कोई,लेकिन गलत मत समझना मेरी औकात भी कोई कम नहीं है।मेरे पास मेरे टीचर हैं।

    मैंने उनसे निवेदन किया कि कल मैंने कबीरदास होते तो मजहबी लफंगे क्या उन्हें बख्श देते।

    रात को मेलबाक्स में ब्रह्मराक्षस आकर खड़े हो गये।
    ताराचंद्र त्रिपाठी ने लिखा है,कबीरदास को तब भी कलबुर्गी की तरह मजहबी लफंगों ने ही मारा।

    ताराचंद्र त्रिपाठी ने लिखा है,उकबीर दास के खिलाफ इब्राहीम लोदी से सजाएमौत की गुहार लगाने वाले जैसे तमाम पंडित थे,वैसे ही मौलवी भी थे तमाम।

    रात को फोन लगाकर अमलेदु से कहा कि अब कोई सूरत नहीं है कि हम जनता को कनेक्ट कर सकें।

    शाम को आनंद तेलतुंबड़े से भी लंबी चौड़ी बातें हुई।हम दोनों माथापच्ची कर रहे थे कि सूचनाओं से जनता को लैस कैसे किया जाये।कैसे तमाम आर्थिक मसलों को  मसलों डीकोड करके जनता के बीच वाइरल बना दिया जाये।

    क्योंकि गाली गलौज से लेकर हत्या और कत्लेआम के फतवे तक वाइरल हैं।

    वाइरल है रेप और गैंगरेप के तौर तरीके और उसके तमामो साजोसामान और सार्वजनिक तौर पर नीलाम हो रहा है औरत तब्दील मांस का दरिया।

    वीडियो लबालब हैं।

    चुटकुले और खुदाई किस्से बेपनाह हैं वाइरल।

    उनपर कोई रोक नहीं है।

    नफरत के मजहबी सियासती सैलाब पर रोक नहीं है।
    दूसरी ओर, इकोनामिक टाइम्स में छपे शेयर बाजार के धंसने की खबर की लिंक भी डीएक्टीवेटेड है।

    सियासत से हुकूमत निबट लेती है लेकिन हुकूमत को बहुत डर है कि जनता हिसाब किताब में कहीं दिलचस्पी न लें।

    जनता को इस अजनबी अर्थशास्त्र मं दिलचस्पी है नहीं,ऐसा भी नहीं है।खुल्ला हाट में जब चाहूं तब मैंने संडे के तेल से बड़ा मजमा खड़ा किया है और उस मजमे के मुखातिब अर्थशास्त्र के तिलिस्म को खोला है।लेकिन यह एक दो वाकया का मामला नहीं है।

    यह सिलसिला होना चाहिए जैसे कविता 16 मई के बाद।
    या यह सिलसिला होना चाहिए जैसे प्रतिरोध का सिनेमा।

    हमें यकीनन संगठन बतौर यह काम करना चाहिए।जिनके पास बाकायदा संगठन है,उनकी दिलचस्पी सिर्फ सियासत में हैं और उनके मंचों पर कोई जहरीले सांपों का पिटारा खोला नहीं गया है।

    ध्यान रखे रिजर्वेशन के बारे में आनंद का खुलासा मेइनस्ट्रीम के अगले दो अंकों में दो किश्तों में होना है।

    हिंदी अनुवाद के लिए देखते रहे हमारे ब्लागों को और पढ़ते रहे हस्तक्षेप।

    दुनिया भर की खास चाजें रेयाज और अभिषेक अनूदित करके परोस रहे हैं।देखते रहे उनके हाशिया और जनपथ भी।

    हमने अमलेंदु से कहा कि साधन संसाधन हमारे पास कोई है नहीं।कहने को सारा देश है।सारे अपने हैं।

    हकीकत में कोई साथ नहीं है और न किसी का हाथ हमारे हाथ में है।फिर भी लड़ेंगे।

    हमने कहा कि चाहो तो हमारे प्रवचन थाम लिया करो लेकिन जबभी जो भी सूचना हाथ लगे,तुरंत जनता के बीच फेंक दिया करो कि जनता उसे तभी लपक ले,मीडिया के गुड़ गोबर करने से पहले।

    मैंने सविता बाबू और अमलेंदु दोनों को बताया कि नोबेलिया हम कभी न होंगे लेकिन हमारे जैसे खुशकिस्मत भी कोई नहीं है।

    हमारे गुरुजी जो भी हम लिखते हैं जब भी,अब भी जांच दिया करते हैं।मौका हुआ तो जब तब कान खेंच लिया करते हैं।

    मैंने सविता बाबू और अमलेंदु दोनों को बताया कि नोबेलिया हम कभी न होंगे लेकिन हमारे जैसे खुशकिस्मत भी कोई नहीं है।हमारे गांव के लोग रोज मेरा लिखा पढ़ते हैं।

    मैंने सविता बाबू और अमलेंदु दोनों को बताया कि नोबेलिया हम कभी न होंगे लेकिन मेरा हिमालय मेरे साथ साथ है।

    यह वरदान मेरे शिक्षकों और शिक्षिकाओं का है।
    जो किसी इच्छा मृत्यु से भी बड़का वरदान है।

    पिछली दफा नैनीताल गया तो त्रिपाठी जी तो नहीं मिले।कैप्टेन एलएम साह से भी मुलाकात होते होते रह गयी।

    मैडम अनिल बिष्ट से घंटाभर फोन पर बातें होती रही और हम दोबारा डीेएसबी जीते रहे।

    फोन छोड़ते छोड़ते सत्तर दशक में नैनीताल की सबसे खूबसूरत कन्या ने कह दिया कि अगली बार आओ तो मिलकर जरुर जाना।

    इतनी बेपनाह मुहब्बत भी होती नहीं है किसीसे किसी को जो मेरी शिक्षिकाओं से मुझे मिली है।

    मैडम मधुलिका दीक्षित जैसी मीठी आवाज मुझे लता मंगेशकर की भी नहीं लगती।बीए से एमए तक उनने हमें पोएट्री पढ़ाई है।प्रोज भी पढ़ाया है।

    सबक के मध्य कभी भी वे पुकारती थीं,मिस्टर बिश्वास,व्हाटॊस युओर ओपिनियन।

    फिर जो मैं शुरु हो जाता था, वे मुझे रोकती न थीं।

    उन्हें हर वक्त सही सही मालूम होता था कि मैं कुछ डिफरेंट सोच रहा होता हूं।ऐन मौके पर मुझे भी सारे क्लास को अपनी सोच बताने का मौका वे बना देती थीं।आज भी वह पुकार सुनने को तड़प रहा हूं।

    डीएसबी छोड़ने के बाद उन्होंने ही कहा था कि नौकरियां तो सभी करते रहते हैं,तुम अलग कुछ कर सकते हो।करो।

    डा. मानस मुकुल दास इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनके गुरु थे और डीएसबी में उनके उस गुरु से पोएट्री पर मेरी अविराम बहस चली थी दिनरात।उनने कहा कि इलाहाबाद जाओ और डा. दास के मातहत रिसर्च करो तो खुलेंगे सारे दरवाजे।

    मैं खाली हाथ इलाहाबाद चला गया और खाली हाथ जेएनयू गया मंगलेश के कहने पर उर्मिलेश के साथ।फिर धनबाद होकर दुनिया में कहां कहां न भटका।खाली हाथ ही रह गया।

    फिर नैनीताल या इलाहाबाद जब भी गया अपनी प्यारी मैडम जिनकी आंखें तीर कमान थीं और जो किसी भी हीरोइन से खूबसूरत थीं,उन्हें हर मोड़ पर खोजता रहा।फिर वे कभी नहीं मिलीं।

    मैंने इस बार भी मैडम अनिल बिष्ट से पूछा कि मैडम मधुलिका कहां हैं और उनने कहा कि तुम्हारे जाने के बाद उनने नौकरी छोड़ दी थी और अपने पति के साथ चली गयी थी।फिर उनका अता पता नहीं है।मैडम बिष्ट उनकी सबसे पक्की सहेली थीं।

    शेक्सपीअर पढ़ाती थीं मिसेज नीलू कुमार और उन्हें देखते हुए हमें नूतन की तमाम फिल्में याद आ जाती थीं।तब भी वे पचास पार थीं।शिवानी और जयंती पंत की बहन थीं सबसे छोटी।पुष्पेश,मृगेश और मृणाल की मौसी।तब भी उनके गालों पर पहाड़ों के तमाम सेब बगीचे थे।वे नहीं होतीं तो मैं न ग्रीक त्रासदी समझता और न कैथार्सिस और न कभी समझ पाता कि आखिर दिल क्या चीज है।

    चित्रा कपाही फाइनल में थीं जब मैं प्रीवियस में था।उनकी बहन नीना हमारे साथ थीं।एमए करते ही वे डीएसबी हमें पढ़ाने चली आयीं।उनका पेपर ऐस्से था और एमए में मैं अकेला उनका स्टुडेंट था।बाकी लोग अमेरिकन लिटरेचर पढ़ रहे थे।

    चित्रा को मेरे दिलोदिमाग का अता पता खूब था।वे कहती थीं तुम तो खुद लिखते हो।पढ़ने की क्या बात है और मसला यह भी है कि तुम्हें पढ़ाया क्या जाये।आओ,हम बातें करें।

    हिमपात और मूसलाधार बारिश में हम बातें ही करते रहे।हमने डीएसबी छोड़ा और वे शादी करके लंदन में बस गयीं।

    गीता शर्मा बेहद खूबसूरत थीं।डीएसबी में जब हम फर्स्ट ईअर में दाखिल हुए तो वे एमए फाइनल में थी।जब हम एमए फाइनल में थे तब वे हमें पोएट्री पढ़ाती थी।

    बीच में ही लेक्चर रोक कर वे कहती थीं कि ये तुम मुझे ही क्यों देखते रहते हो।या फिर कि तुम बादलों मे कहां खो जाते हो।


    एक थीं वीणा पांडेय दिनेशपुर हाईस्कूल में हमें साइंस और बायोलाजी पढ़ाने वाली।तब वे बाइस तेइस की होंगी शायद बीएससी करके देहात में आ गयी थीं।

    मेरे रिजल्ट के लिए वे मुझसे ज्यादा बेचैन हुआ करती थीं।
    हम देहाती बच्चों के लिए वे कुर्बान थीं।

    कीचड़ों से लथपथ थे हमारे रास्ते।हम उन्हें अमूमन चड्डी और नेंकर में नंगे बदन टकरा जाते थे,लेकिन उनके दिल में फिर भी हमारे लिए बेपनाह मुहब्बत थी।

    मेरे हाईस्कूल पास करने के बाद वे लापता हो गयीं।
    मैने नैनीताल और अल्मोड़ा में उन्हें खोजा।
    वे लाला बाजार अल्मोड़ा की थीं।लेकिन वे फिर नहीं मिली।

    इन तमाम खूबसूरत महिलाओ को हमारी औकात के बारे में मालूम था।उन्हें मालूम था कि बंटवारे से जो खून की नदियां बह निकली, उसके मध्य खून से लबालब कोई द्वीप हूं मैं बेहद बदसूरत, बौना,काला ,अछूत।

    मैं कोई रब का बंदा भी नहीं हूं लेकिन रब की सौं,उन टीचरों जैसी खालिस मुहब्बत मेरे दिल ने कभी नहीं देखा।

    जिनने चिथड़ों में लिपटे मेरे वजूद को निखारने की हर संभव कोशिश की और उनकी आंखों में मैंने मुहब्बत के सिवाय कभी कुछ नहीं देखा।

    उन सबने अपने अपने तरीके से सतह से नीचे किन्हीं गहराइयों से मुझे खींचकर निकाला अपने खूबसूरत हाथों से और हमें हिम्मत तलक न हुई कि हम शिकायत भी करें कि मैम,हमारे डैने नहीं हैं।

    वे सारी की सारी परियां थीं,जिनने बिन मांगे अपने डैने मुझे दे दिये।फिर पीछे मुड़कर देखा तलक नहीं।

    कौन कहता है कि मुहब्बत किसी महजबीं से होती है और किसी से नहीं।हमें तो अपने स्कूल कालेज में तमाम परियां मिली थीं।

    उनकी मुहब्बत के आगे सारी मुहब्बतें फीकी हैं।
    उनके बिना बेरंग है कायनात सारी।
    उन सबको पता था कि मुझे कुछ ना कुछ जरुरी जरुर करना है।

    मैडम मधुलिका कहती थीं,तुम जैसा किसी को कहीं नहीं देखा।
    रुकना नहीं किसी कीमत पर।हर जंग जीतने का यकीन रखो अपने दिलो दिमाग में।मेरी अब औकात ही क्या कि उनका कहा ना मानूं।

    मुझे सख्त अफसोस है कि जिनके कहे का मेंने हमेशा अक्षरशः पालन किया,अब वे शिक्षा क्षेत्र में हैं नहीं और हमारे बच्चे इस खुल्ला बाजार में बारुदी सुरंगों के बीच जान हथेली पर लिए दिशाहीन भटक रहे हैं।

    और उनकी दृष्टि निखारने के लिए कोई टीचर नहीं है।
    उनकी दुनियाको खूबसूरत बनाने वाली कोई टीचर नहीं है।

    जैसी मेरी पहली टीचर मैडम ख्रिस्टी और जैसे मेरे पहले अध्यापक पीतांबर पंत।मैडम ख्रिस्टी का जब तबादला हुआ तो वे बहुत बहुत रोयी जैसे वे अपने बच्चों से अलग हो रही हों।

    वे बेहद खूबसूरत थीं।इतनी खूबसूरत कि कायनात ने उनसे हसीन किसीको शायद बनाया ही न हो।

    मैडम ख्रिस्टी जैसी खूबसूरत कोई सुपर माडल या विश्वसुंदरी या दिलों को लूटने वाली सुपर हिरोइन भी नहीं!

    मुझसे बदमाश बच्चा कोई न था।
    घर में संगीत का शिक्षक अलग थे।
    मैंने कभी सुर न साधा लेकिन आजीवन उस शिक्षक ने याद रखा मुझे।नेत्रहीन हुए जब तबभी मेरी आजाज सुनकर मुझे पहचानते रहे दशकों बाद मुलाकात के बावजूद।

    बसंतीपुर में शिक्षक अलग होता था।बसंतीरपुर के बच्चों के लिए।जहां बसंतीपुर का सिलेबस था।हिंदी,बांग्ला और अंग्रेजी अनिवार्य।फतवा था कि हमारे बच्चों को इंसान बना देना है।

    भोर तड़के ही सीनियर बच्चे दूधमुंहों को उठाकर टीचर के हवाले कर देते थे।हमारी आदत थी सुबह बिना गांव का पूरा च्ककर लगाये मेरी नींद खुलती ही न थी।इस नींद में खलल पड़ जाये तो समझो कि दुनिया एक तरफ और मैं एक तरफ और सारा गांव कुरुक्षेत्र।
    मुझे खींच टांगकर स्कूल में ले जाते न जाते इंटरवेल हो जाता।

    वहां भी मैं सीधे टीचर जी के कंधे सवार हो जाता था, तब तक न उतरता था जबतक न कि वे मुझे सकुशल घर छोड़ आते।

    फिर आयी मैडम ख्रीस्टी।थीं वे टीचर पड़ोस के गांव चित्तरंजनपुर के बालिका विद्यालय में।

    हमारे यहां कुंडु परिवार ने तराई की आबोहवा को अपने माफिक गलत समझते हुए सरकारी क्वार्टर और जमीन छोड़कर एकदिन रात के अंधेरे में चोरों की तरह निकल भाग लिया फिर वही बंगाल।बसंतीपुर में वह पहला बिछोह था।

    वही क्वार्टर स्कूल था जो कुंवारी मैडम ख्रीस्टी का डेरा था।
    शायद वे जादू जानती थीं या फिर हैमलिन की बांसुरी उनके पास थी।आसपास के सारे गांवो के बच्चों को वे खींचकर बिना लिंगभेद चित्तरंजन बालिका विद्यालय ले गयीं।

    मैडम ख्रीस्टी का जादू ऐसा चला जो मैंने फिर स्कूल कालेज को ही हमेशा के लिए जन्नत मान लिया।ख्वाहिश तो थीकि उसी जन्नत में मरुं,हुआ यह कि पत्रकार बना और कुत्ते की मौत मरना है।

    उन दिनों तराई में बाढ़ भी आती थी।चित्तरंजनपुर के रास्ते बंद हो जाते थे क्योंकि नदी नाले तमाम तब भी बंधे न थे।

    बगल में नदीपार अर्जुनपुर था सिखों का गांव।
    जहां सारे गांवो के बच्चे आ जात थे।
    वहीं किसी भी सरदार के गर स्कूल लग जाता था।
    तभी से हर सिख का घर मेरा घर है।

    किसी बिल्ली की तरह बसंतीपुर के बच्चों को उठाकर वे नदी किनारे ले जाती थीं।तब अर्जुन पुर के बड़े सिख बच्चे गुड़ उबालने की कड़ाही लेकर तैरकर इस पार आते और बारी बारी उसपार ले जाते।

    इसीतरह वापसी होती।
    भरी बरसात में भी मैडम ख्रीस्टी का स्कूल लगता था।
    में तब आधी कक्षा का छात्र था और पक्का पढ़ाकू और लढ़ाकू दोनों था।

    हमें सबसे ज्यादा सदमा तब लगा अस्सी के दशक के सिख नरसंहार के बाद,जब अर्जुनपुर के हमारे सहपाठी भी आतंकवादी करार दिये गये और मुठभेड़ में मार दिये गये।

    तब तक इंदिरा गांधी ने गूलरभोज के पास  हरिपुरा जलाशय का उद्घाटन कर दिया था और वह बरसाती नदी भी मर गयी थी।

    जब भी उस मरी हुई नदी को छूता हूं मेरा दिलोदिमाग आतंकवादी बना दिये गये मेरे बचपन के लहू से लहूलुहान हो जाता है।इसीलिए कत्लेआम के किसी भी कातिल को मैं माफ नहीं कर सकता।

    हम आधी कक्षा पार करके पहली में दाखिला कर गये तो बिना मेघ वज्रपात हो गया।मैडम ख्रीस्टी का तबादला हो गया।

    जाते जाते मैडम ख्रीस्टी बसंतीपुर के बच्चों को उठाकर हरिदासपुर में पीतंबर पंत के अखाड़े में डाल गयीं और उन्हें हिदायत देती गयीं कि हर बच्चे का ख्याल कैसे रखना है।

    वह हमारी कुछ लगती न थीं।
    किसी मुकम्मल मां से कम न थी वह मुकम्मल कुंवरी मां,न जाने कितने उनके बच्चे थे और तब परिवार नियोजन भी न था।

    किसी मुकम्मल मां से कम न थी वह मुकम्मल कुंवरी मां,जो हर बच्चे का अलग अलग ख्याल रखती थीं इसतरह कि किसी बच्चे को कभी कहते हुए नहीं सुना कि उसके हिस्से में मुहब्बत थोड़ी कम हो गयी।

    हरिदासपुर से पीतांबर पंत ने हमने दुनिया के मुकाबले खड़े होने को तौर तरीके बताये। वह लंबा किस्सा है।
    फिर कभी मेरे उस टीचर के बारे में।

    फिलहाल इतना ही कि मैडम ख्रिस्टी जैसी खूबसूरत कोई सुपर माडल या विश्वसुंदरी या दिलों को लूटने वाली सुपर हिरोइन भी नहीं!

    हमने जब तक प्राइमरी की दहलीज पार नहीं की कहीं भी हुईं मैडम ख्रीस्टी,बिल्ली की तरह चली आती थीं जानने के लिए कि हमारी पढ़ाई ठीक से हुई कि नहीं।

    फिलहाल इतना ही कि

    मैडम ख्रिस्टी जैसी खूबसूरत कोई सुपर माडल या विश्वसुंदरी या दिलों को लूटने वाली सुपर हिरोइन भी नहीं!
    मेरे मरने के बाद किसी को मेरी याद आये तो मेरे शिक्षकों और शिक्षिकाओं को याद जरुर कर  लें।मुझ पर उनका जो कर्जा है अनंत अनंत,शायद इस  बेमिसाल पूंजी से अबाध पूंजी के  इस मुल्क का थोड़ा विकास हो जाये!

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    • कबीर दास होते तो क्या उन्हें मजहबी लफंगे बख्श देते?

      Posted:Sun, 06 Sep 2015 02:18:06 +0000
      फासीवाद का विरोध उतना आसान भी नहीं है, दोस्तों। जन्माष्टमी से बड़ा किसी अध्यापक का जन्मदिन न हो, हिंदू राष्ट्र ने चाकचौबंद इंतजाम किया और जन्मष्टमी से एक दिन पहले, देश के सबसे बड़े शिक्षक का जनमदिन...

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    • तार्किकता का गला घोंटने का प्रयास कलबुर्गी की हत्या

      Posted:Sun, 06 Sep 2015 01:26:51 +0000
      कलबुर्गी की हत्या तार्किकता का गला घोंटने का प्रयास गत 30 अगस्त 2015 को प्रोफेसर मलीशप्पा माधीवलप्पा कलबुर्गी की हत्या से देश के उन सभी लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है जो उदारवादी समाज के हामी हैं,...

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    • राम रहें टाट में-संघी ठाठ में

      Posted:Sun, 06 Sep 2015 01:00:29 +0000
      राम रहें टाट में-संघी ठाठ में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद राम लला टाट में और उनको टाट में पहुँचाने वाले लोग ठाठ में हैं। जब-जब चुनाव आता है तो संघ के एजेंडे में राम मंदिर निर्माण की बात...

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    • भोपाल में विश्व हिन्दी पंचायत [सम्मेलन]

      Posted:Sun, 06 Sep 2015 00:38:54 +0000
      मध्य प्रदेश के व्यापम प्रसिद्ध मुख्यमंत्री पंचायतें जोड़ने के लिए भी चर्चित हैं और उन्होंने समय समय पर, विशेष रूप से चुनाव का समय निकट होने पर घरेलू काम करने वाली महिलाओं, ठेले वालों, दर्जियों, बस...

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    • बिहार में सपा का हठयोग, जो सच था, वह हो गया

      Posted:Sun, 06 Sep 2015 00:16:58 +0000
      नई दिल्ली। जो सच था, वह हो गया। सच यह है, कि समाजवादी कभी भी एक साथ खड़े नहीं हो सकते, कारण सभी पार्टियां व्यक्तिवादी हैं और परिवार के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। राजनीति का आधार नीतियां नहीं, जातियां...

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    • लेखक की हत्या के विरोध में विशाल प्रदर्शन

      Posted:Sat, 05 Sep 2015 23:51:16 +0000
      नई दिल्ली। अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज उठाने वाले कन्नड लेखक प्रो. एम एम कलबुर्गी, गोविंद पानसरे रहा नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के विरोध में शनिवार को जंतर-मंतर पर विशाल प्रदर्शन हुआ।...

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    • नेपाल में संविधान निर्माण-अंतर्राष्ट्रीय जगत से प्रेरणा लेने की जरूरत

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 18:40:42 +0000
      नेपाल में संविधान निर्माण अंतर्राष्ट्रीय जगत से प्रेरणा लेने की जरूरत नेपाल में संविधान का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। किन्तु भारत के अखबारों में छपी ख़बरों के अनुसार नेपाल के...

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    • इन्साफ की मशाल जलाने वाले हम लोग मर थोड़े ही गए हैं

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 17:40:28 +0000
      वैसे ये इत्तेफाक ही होगा कि दो तारीख को जनवादी ताकतों ने अपनी ताकत दिखाई और दो दिन के भीतर ही दो जनवादी कार्यकर्ताओं हेम मिश्रा और रोमा बहन को ज़मानत पर जेल से रिहा कर दिया गया अरे जज साहेबान मोदी कोई...

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    • इस्लामिक कटरपंथ के खिलाफ रोजावा की क्रांति-समकालीन तीसरी दुनिया

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 17:19:31 +0000
      इस्लामिक कटरपंथ के खिलाफ रोजावा की क्रांति अंक: सितंबर 2015 इस अंक में: अपनी बात समकालीन तीसरी दुनिया के बारे में कन्नड़ विद्वान कलबुर्गी की हत्या का विरोध् करो! आवरण कथा रोजावा की क्रांति –...

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    • False claims On Sardar Sarovar Rehabilitation challenged

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 17:11:31 +0000
      False claims On Sardar Sarovar Rehabilitation challenged With 40000+ families yet to be rehabilitated. Corruption in rehabilitation can not be suppressed, Modi government can't put up and close...

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    • सभ्यता की तलाश

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 17:03:51 +0000
      सभ्यता की तलाश """""""""""मैं अंडमान के सेंटीनल द्वीप पर रहना चाहता हूँ सबसे अलग थलग जहाँ भाषा नही है स्कूल नहीं है मैं बोली और भाषा...

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    • गृह मंत्रालय ने ग्रीनपीस का एफसीआरए लाइसेंस निरस्त किया

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 16:57:38 +0000
      ग्रीनपीस ने जवाब में राष्ट्रव्यापी सिविल सोसाइटी पर सरकारी दमन के खिलाफ किया बॉलीवुड पोस्टर अभियान का ऐलान नई दिल्ली। 4 सितंबर 2015। आज गृह मंत्रालय ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि ग्रीनपीस इंडिया के...

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    • उप्र में मिड डे मील को अक्षयपात्र को देने की हो जांच- आइपीएफ

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 16:40:21 +0000
      बच्चों की जिदंगी से खेल रही अखिलेश सरकार लखनऊ, 04 सितंबर। आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) ने मिड डे मील को "अक्षयपात्र"को देने की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। आइपीएफ के प्रदेश संगठन महासचिव...

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    • Modi Government: Political Arm of the RSS

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 16:25:06 +0000
      Modi Government: Political Arm of the RSS New Delhi. the Communist Party of India (Marxist) strongly condemned and opposed the blatant  violation of constitutional norms by Central Government. Party...

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    • हिंदी के लेखक ने दम दिखाया- उदय प्रकाश ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 16:00:43 +0000
      नई दिल्ली। सरकार बदलने के बाद तमाम हिंदी के साहित्यकार की लेखनी कहानियां और कविता लिखने में व्यस्त हैं, लेकिन हिंदुत्ववादियों द्वारा किये जा रहे लेखन का जवाब नहीं दिया जा रहा है। बड़े-बड़े लेखक सत्ता...

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    • …ये दास्तान अधूरी है।

      Posted:Fri, 04 Sep 2015 15:39:26 +0000
      …………….ये दास्तान अधूरी है। बारह बरस कूकर जीवे तेरह बरस जिए सियार। बरस अठारह क्षत्रिय जीवे आगे के जीवन को धिक्कार। (ये प्रसिद्ध पक्तियां वीरगाथा काल के कवि जगनकि की हैं...

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