Are you the publisher? Claim or contact us about this channel


Embed this content in your HTML

Search

Report adult content:

click to rate:

Account: (login)

More Channels


Channel Catalog


Articles on this Page

(showing articles 361 to 380 of 6050)
(showing articles 361 to 380 of 6050)

Channel Description:

This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

older | 1 | .... | 17 | 18 | (Page 19) | 20 | 21 | .... | 303 | newer

    0 0

    एक जरुरी संशोधनःआदरणीय आनंद तेलतुंबड़े जी ने एक टाइपिंग चूक की ओर ध्यान दिलाया है।कोलकाता जलमग्न होने के कारण चार दिनों तक मेरा पीसी नेट से डिसकनेक्ट रहा।नेटखुलते ही आलेख जल्दी से खत्म करने की हड़बड़ी में मनमाड की जगह महाड़ लिखा गया।दरअसल विदर्भ के भुसावल के पास मनमाड में रेलवे कर्मचारियों के सम्मेलन में बाबासाहेब ने कहा था कि भारतीय मजदूरो के दो समान दुश्मन हैं,एक ब्राह्मणवाद और दूसरा पूंजीवाद।आलेख में मनमाड के बदले महाड़ चला गया है,इसे भुसावल के पास मनमाड ही पढ़ें।इसीतरह लोखांडे का पूरा नाम है नारायण मेघाजी लोखांडे। लोखांडे को भारतीयमजदूर आंदोलन का जनक माना जाता है जो बाबासाहेब के सहयोगी और महात्मा ज्योतिबा फूले के अनुयायी हैं।

    0 0

    कश्मीर से ही क्यों हुआ भारतीय रेलवे के निजीकरण का ऐलान?

    पलाश विश्वास

    कश्मीर से ही क्यों हुआ भारतीय रेलवे के निजीकरण का ऐलान?


    रेल बजट से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के बारामूला जिले के कटरा से रेलवे के निजीकरण का ऐलान कर दिया।उन्होंने हालांकि  संकेत भर  दिया है  कि रेलवे के विकास में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ सकती है।


    बेसरकारीकरण को विनिवेश का नाम देने वालों ने जोर काझटका धीरे से गे,जाहिर है कि ऐसा ही चाक चौबंद इंतजाम कर दिया है।पूरा देश ही अब शाक एबजार्बर है।


    लोकप्रिय थीमसांग है कि बजट में यह प्रावधान हो कि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को बढ़ावा मिले, इसके लिए आवश्यक माहौल बनाया जाए। विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए निवेश से जुड़े कानूनों को उदार बनाया जाए।


    कौन है माई का लाल जो बेसरकारीकरण और विनिवेश,प्रत्यक्ष विदेशी विनिवेश के खिलाफ बलकर अपनी हैसियत दांव पर लगा दें?


    धर्मयोद्धा मोदी ने कहा हम चाहते हैं कि रेलवे स्टेशन पर हवाईअड्डों से बेहतर सुविधा हो। यह हमारा सपन है और ऐसा करना मुश्किल काम नहीं है और यह आर्थिक रूप से भी व्यावहारिक भी है। मैंने रेलवे से जुड़ मित्रों से इस संबंध में विस्तार से बात की है। आप निकट भविष्य में बदलाव देखेंगे।


    गौरतलब है कि धर्मयोद्धा मोदी ने खुल्लमखुल्ला हाट में हड़िया तोड़ दी और कह दिया कि ऐसी स्थिति में निजी कंपनियां भी निवेश के लिए तैयार होंगी क्योंकि यह आर्थिक रूप से अच्छी परियोजना है और इससे सभी को फायदा होगा। यह दोनों के लिए फायदेमंद परियोजना होगी और हम चाहते हैं कि आने वाले दिनों में इस दिशा में आगे बढ़ें।निजी कंपनियों को तो फायदा ही फायदा होगा,बैशक,आम जनता का क्या हो गा,बस तेल देखिये,तोतेल की दार भी देखिये।


    बहरहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के बारामूला जिले में नियंत्रण रेखा के पास 240 मेगावाट की उरी-2 पनबिजली परियोजना (एचईपी) का उद्घाटन किया।


    प्रधानमंत्री ने जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एन एन वोहरा, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और राष्ट्रीय जलविद्युत उर्जा निगम :एनएचपीसी: के शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी में परियोजना को राष्ट्र के नाम समर्पित किया।


    गौर करें कि  रेलवे और ऊर्जा क्षेत्र हमारी विकास प्राथमिकताओं में शामिल हैं। जल्द ही इसमें आपको बदलाव नजर आएगा। निजी क्षेत्र की भागीदारी से यह बदलाव होगा। हमारा मकसद है कि विकास का लाभ आखिरी छोर तक बैठे व्यक्ति को भी मिले। अटलजी ने जिस विकास यात्रा को शुरू किया है, हम उसे आगे बढ़ाएंगे। हमारा मकसद राजनीतिक जय-पराजय का नहीं है, मैं जम्मू- कश्मीर के नागरिकों का दिल जीतना चाहता हूं। यह कार्य विकास के माध्यम से पूरा होगा। शुक्रवार को यह बात जम्मू-कश्मीर के दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही।



    भारत में बुलेट ट्रनों का इंतजार वे लोग सबसे ज्यादा बेसब्री से कर रहे हैं जो स्लीपर क्लास में रिजर्वेशन करने तक का पैसा जुटा नहीं पाते और भेड़ बकरियों की तरह एक्सप्रेस ट्रेनों के दो अदद जनरल डब्बों में सीट पाने के लिए घंटों कतारबद्ध रहते हैं।


    आगरा एक्सप्रेसवे में दो घंटे के फर्राटे के बाद दिल्ली से आगरा तक की रेलयात्रा नब्वे मिनट में सिमट जाने से वे ब्राजील के विश्वकप विजय की तरह उन्माद हुए जा रहे हैं।


    जिस पश्चिम उत्तर प्रदेश में सबसे पंडित,सबसे जुझारु खेती विशेषज्ञ किसानों का वास है और जहां के किसान देश के महानगरों से ज्यादा राजस्व देते रहे हैं,उन्हें अब भट्टा परसौल की याद नहीं सताती।


    कोई नहीं सोच रहा है,सोचने को तैयार भी नहीं है,क्या देश में यात्रियों का कोई ऐसा तबका है जो लगभग हवाई जहाज जितनी खर्चीली इसकी यात्रा का नियमित बोझ उठा सके? अभी तो मध्य वर्ग और साधारण तबका रेल किराये में मामूली बढ़ोतरी भी नहीं झेल पाता। फिर बुलेट ट्रेन किसके लिए चलेगी?


    मीडिया विशेषज्ञ सपना बुनने में लगे हैं कि निश्चय ही बाधाएं बहुत हैं पर इनसे घबराकर हम विकास की दौड़ से बाहर नहीं हो सकते। सपना चाहे जितना भी खर्चीला हो, लंबे समय में वह सस्ता ही साबित होता है। इसलिए बुलेट ट्रेन चलाने के लक्ष्य को सामने रखकर रेलवे में सुधार जारी रखना होगा, ताकि एक दिन देश के सभी शहरों को एक-दूसरे के करीब लाया जा सके।


    कोई नहीं बताता कि ये बुलेट ट्रेन भविष्य के कत्लगाहों को ही जोडेंगे ,इस देश के जनसामान्य इन्हीं बुलेट ट्रेनों के पहियों के नीच जमींदोज होंगे।


    हमने यूरोप में  औद्योगिक क्रांति के सिलसिले में धर्म राजनीति और पूंजी के त्रिभुजाकार वर्चस्ववादी आक्रमण में किसानों के सफाये के बारे में पहले ही चर्चा की है।


    कश्मीर से ही क्यों हुआ भारतीय रेलवे के निजीकरण का ऐलान,इस सवाल का जवाब खोजने के लिए इस नापाक गठबंधन का खुलासा होना जरुरी है।


    ध्यान योग्य बात तो यह है कि यूरोपीय नवजागरण से अभिभूत हम क्रुसेड से यूरोप की औद्योगिक क्रांति का संबंध समझने से अमूमन परहेज करते हैं,वैसे ही जैसे भारतीय नवजागरण की चर्चा करते हुए मनीषियों के व्यक्तित्व कृतित्व की चर्चा करते हुए हम सत्रहवीं और अठारवीं शताब्दियों में आदिवासी और किसान जनविद्रोह की शानदार विरासत की चर्चा करना भूल जाते हैं।


    इसीलिए राजा राममोहन राय और ब्रह्मसमाज की चर्चा करते हुए हम भूलकर भी हरिचांद ठाकुर,वीरसा मुंडा,रानी दुर्गावती,टांट्या भील,बीरसा मुंडा,सिधो कन्हो,महात्मा ज्योतिबा फूले,अयंकाली को भूलकर भी याद नहीं करते हैं।


    खास बात तो यह कि मध्य एशिया से गुजरने वाले रेशम पथ का नजदीकी रिश्ता सोने की चिड़िया भारत के मुहावरे और एशियाई मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था से है।


    उस एशियाई अर्थव्यवस्था के मुकाबले यूरोप कंगाल था औययूरोप के लोग कृषि का मतलब पशुचारण समझते थे।


    इंग्लैंड में संसद में महारानी के सिंहासन के सामने लार्ड चांसलर की कुर्सी के नीचे ऊन का बोरा बताता है कि भेड़ों के मार्फत जीते थे तब यूरोप के लोग।


    जो सोना चांदी का ख्वाब ही सजोते थे और जलदस्युओं के जरिये महासागर के रास्त बाकी दुनिया को लूटने का कारोबार चलाते थे।


    एशियाई रेशम पथ की अर्थव्यवस्था पर कब्जा करने के लिए सौ साल का धर्मयुद्ध लड़ा गया,वह उसी तरह दो संस्कृतियों या दो धर्मों की लड़ाई नहीं थी जैसे उत्तरआधुनिक ग्लोबल दुनिया के मध्यपूर्व में साम्राज्यवादी तेलयुद्ध कोई इस्लाम के विरुद्ध पोप का जिहाद नहीं है।


    सौ साल के उस महायुद्ध में मौलिक भूमंडलीकरण की शुरुआत हुई जो चरित्र से धार्मिक और सामंती था।आज का उत्तर आधुनिक भूमंडलीकरण भी चरित्र से उतना ही धर्मोन्मादी और सामंती हैं।आज के धर्मयोद्धा यूरप के वे मासूम से दिखने वाली भेड़ें हैं, जिन्होंने चारा के साथ ही यूरोप की किसान आबादी को चबा लिया।


    इसी धर्म युद्ध से आभिजात नाइटों का नया तबका तैयार हुआ और इन्हीं धर्मयोद्धाओं ने यूरोप में ही किसानों और देहात का सर्वनाश नहीं किया बल्कि दुनिया भर में सोना,चांदी हीरा जवाहिरात और दूसरे बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों के लिए जलदस्युओं के बेड़े के जरिये पूरे अमेरिका,पूरे आस्ट्रेलिया,पूरे अफ्रीका महाद्वीपों में स्थानीय जनसमुदायों का सफाया कर दिया।


    वास्कोडिगामा,कप्तान कुक,मैडेलिन और कोलंबस को हमारे अंग्रेजीपरस्त इतिहासकारों ने महानायकों का दर्जा दे दिया है लेकिन वे कैरेबियन पाइरेट के मुकाबले ज्यादा खूंखार जलदस्यु और हत्यारे थे।


    कैरेबियन पाइरेट में तो फिर भी मानवीय तमाम गुण है।कोलबंस और वास्कोडिगामा में ऐसा कोई गुण नहीं था।


    हम तैमूर लंग और सिकंदर के हमलों की चर्चा करते हैं,लेकिन यूरोपीयहमलावरों को महान बनाने से बाज नहीं आते।विदेशी निवेशकों में जो खून का जायका  है,इंद्रियविकल हवाओं में उसकी कोई सुगंद नहीं है।


    हमारे धर्मांध इतिहासकार जो तमाम इस्लामी धर्मस्थलों पर हिंदुत्व के दावे को पुष्ट करने में सबसे ज्यादा व्कत गंवाते हैं, वे यह तथ्य स्वीकार ही नहीं कर सकते कि भारत में तोपों से गोला बरसाते हुए और दरिया में सेरा जहाजों को लूटते डुबोते हुए भारत में दाखिल होने वाले वास्कोडिगामा अमेरिका,अफ्रीका और आस्ट्रेलिया महाद्वीपों में जा पहुंचे दूसरे जलदस्युओं की तरह स्थानीयजनसमूहों का सफाया सिर्फ इसलिए नहीं कर सकी कि तब वैस्विक अर्थव्यवस्था पर काबिज मुगलिया सल्तनत की केंद्रीय सत्ता इन जलदस्युओं को अपनी औकात बताने के लायक बेहद मजबूत थी।


    गौरतलब है कि कंपनी राज के खिलाफ अठारवी सदीं के महाविद्रोह के नेता भी दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ही थे।


    अब कोई इकलौती ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं है कोई,हजारों देशी विदेशी कंपनियां हैं और वे आपस में मारकाट में लगी भी हों तो जनसंहार के मोर्चे पर लामबंद हैं और जनता के मोर्चे पर कोई सांकेतिक प्रतिरोध की हलचल तक नहीं है।


    नवजागरण के गौरवगान में औद्योगिक क्रांति के दौरान धर्म,राजनीति और पूंजी के प्रलंयकारी ब्रह्मा विष्णु महेश ने धर्मयोध्धाओं के जरिये कैसे यूरोप में जनसंहार को अंजाम दिया,ऐसा विश्वविद्यालयों में पढ़ाया नहीं जाता।


    कैसे कैरेबियन द्वीपों, उत्तरी,मध्य और उत्तरी अमेरिका में भौगोलिक खोज के बहाने पूरी आबादी खत्म कर दी गयी और हालत यह हो गयी कि अफ्रीका के आदिवासी गांवों में आग लगाकर स्त्री पुरुष बच्चों को जंगली जानवरों की तरह हांककर अमेरिकागामी जहाजों के मालखाने में भूखों प्यासे लादकर अमेरिका में श्रमशक्ति की आपूर्ति की गयी,कैसे भारत से भी कैरेबियन द्वीपों में गिरमिटिया मजदूरों का निर्यात किया गया,स्कूली विश्वविद्यालयी  पाठ में इसका कोई स्थान है ही नहीं।


    सिलेबस मठाधीशों की दुकाने तो इन्हीं की चाटने से चलती है।इतिहास और पुरात्व विभागो की क्या कहें।वे वैसे ही हैं जैसे हमारे माहन अर्थशास्त्री।


    उतने ही देश भक्त मौसेरे भाई हैं अकादमिक जगत और आइकनिक सिविल सोसाइटी के सेलिब्रेटी लोग जैसे थोक दरों पर संसद में जा रहे अरबपति करोड़पति रंग बिरंगे जनप्रतिनिधि।ये तमाम लोग वैश्विक व्यवस्था के मुफ्त के विश्व पर्यटक हैं।


    इसलिए मध्ययुगीन उस धर्म,राजनीति और पूंजी के संंहारक त्रिभुज के बारे में हमारे लोगों को कोई आइडिया ही नहीं है।


    हम यह समझने में हमेशा चूक जाते हैं कि दस साल तक जो शख्स इस देश का प्रधानमंत्री था और विश्वबैंक से लगातार पेंशन उठाता रहा और सत्ता कुनबा में तमाम अति शीर्षस्थानीय लोग जो पेंशनधारी रहे हैं विश्वबैंक के,अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के, विश्वव्यापार संघ के,यूरोपीय समुदाय के,युनेस्को के,एशिया विकास बैंक के,उस गुलाम गिरमिटिया मजदूरों के शासक तबके को एकमुश्त खारिज करके अचानक क्रुसेड के बाद के यूरोप की तर्ज पर नाइटों यानि धर्मयोद्धाओं को सत्ता सौंपने के लिए वैश्विक कारपेरटजायनी शैतानी बंदोबस्त ने लाखों करोड़ रुपये क्यों खर्च कर डाले।


    क्शमीर से रेलवे के निजीकरण के धर्मयोद्धा प्रधानमंत्री का ऐलान समझ लें कि मध्ययुग के सौ साल के धर्मयुद्ध का आवाहन ही है।


    यूरोप में तो भेड़ों के मार्फत सामंतों ने पहले सारी जमीन का बाड़ाबंदी कर दी और नगरों महानगरों में विस्थापित किसानों को मजदूर बनाकर औद्योगिक क्रांति कर दी।


    उपन्यास विधा ही उस औद्योगिक नरसंहार का आख्यन है और इस हिसाब से तो भारत में इने गिने उपन्यासकार ही हैं जैसे माणिक बंद्योपाध्याय,जैसे समरेश बसु,जैसे भैरव प्रसाद गुप्त,जैसे यशपाल।


    बाकी देहकथा है।मिटते हुए जनपदों का लोक  महाकाव्य हालांकि कम नही लिखा गया हालांकि वह सिलसिला भी अब बंद हो गया।


    यूरोप और अमेरिका में हुई कयामत की वह महागाथा विक्टर ह्युगो,चार्ल्स डिकेंस और टामस हार्डी के उपन्यासों में पढ़ी जा सकती है,जो इतिहास से कमतर कतई नहीं है।रुसी साहित्य में भी इसका ब्यौरा सिलसिलेवार है।दास्तावस्की से काफ्का,सार्त्र से कामु तक के साहित्य में उस विध्वंस की गूंज है।


    लेकिन हमारे मीडिया और साहित्य में बाजार की देहकथा और कंडोम कार्निवाल के अलावा बाकी क्या बचा है,इसकी तफतीश जरुरी है।


    हैरतअंगेज हैं कि कश्मीर और मणिपुर में मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के हनन के तमाम मामलों,यूपी और गुजरात में तमाम फर्जी मुठभेड़ों,गोंडवाना और मध्यभारत और देशभर में खनिज समृद्ध इलाकों में आदिवासियों के खिलाफ अविराम जारी सलवा जुडुम को संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बताकर पत्रपाठ खारिज करने वाले और ऐसे मुद्दे को उठानेवाले इने गिने लोगों को तत्काल राष्ट्रद्रोही घोषित करने वाली धर्मयुद्ध की धर्मोन्मादी पैदल सेनाओं को भारत अमेरिकी परमाणु संधि,अमेरिका और इजराइल के नेतृत्व में पारमाणविक सैन्य गठजोड़ बनाकर मध्यपूर्व के युद्धक्षेत्र को हिंद महासार की हर लहर में विस्तृत करने की कार्रवाई तो समझ में नहीं आयी,तकनीकी क्रांति से सिक कबाब बनी जिंदगी को लेकर भी वे बेफिक्र हैं तो प्रतिरक्षा में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विनिवेश को वे राष्ट्रहित मानने लगे हैं।


    ऐसा है यह धर्म राजनीति और पूंजी का संहारक त्रिभुज।


    धर्मयोद्धा प्रधानमंत्री ने बाकायदा राजसूयकर्मकांड विधि से रेलवे के निजीकरम का ऐलान कश्मीर से इसलिए किया है कि ताकि यह मामला भी अघोषित तौर पर निषिद्ध पाठ में शामिल हो जाये।


    हमने कल रात इस प्रकरण पर अंग्रेजी में अपने आलेख में डिसइनवेस्टमेंट एजेंडा का खुलासा डिसइनवेस्टमेंट कौसिल की निजी कंपनियों के मालिकान का सरकारी उपक्रमों के खिलाफ युद्धघोषणा के दस्तावेज के साथ किया है।


    जाहिर है,वह कहीं छपना नहीं है।चाहें तो मेरे ब्लागों में देख लें।


    Long time before Budget,it is Killing time!PM hints at increased private sector role in Railways! Get bullet to destroy your rural India! If private players are allowed to harvest in the most sensitive defence arena,why should the private players not to be allowed to play on Railway pitch!In fact,they have already captured most of the structural Railway services skipping Railway staff and the workforce in Railway is getting size zero with greater speed than the Bullet train.

    http://ambedkaractions.blogspot.in/2014/07/long-time-before-budgetit-is-killing.html



    हम दृष्टिंअंध है।


    सावन के गधों की तरह हमें दसों दिशाओं में हरियाली ही हरुयाली नजर आती है।

    पतझड़ का रंग और मिजाज हम जानते नहीं है।


    रैप म्युजिक और रीमिक्स में समयबद्ध विशुद्ध भारतीय राग आधारित शास्त्रीय संगीतसुनने का मन और कान दोनों हम खो चुके हैं।


    हम देख नहीं रहे हैं कि अघोषित तौर पर पिछले तेइस सालों से विमानन,रेलवे, परिवहन,शिक्षा,चिकित्सा,डाक तार संचार,ऊर्जा, बैंकिंग, बीमा,बंदरगाह,शहरी विकास,निर्माण विनिर्माण,खुदरा कारोबार,खाद्य आपूर्ति,पेयजल,तेल और गैस,खनन, विज्ञान और आविस्कार,मीडिया और तकनीक,इंजीनियरिंग,प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा  समेत तमाम सेक्टरों और सेवाओं के साथ रेलवे का अघोषित बसरकारीकरण विश्वबैंक और वैश्विक व्यवस्थाओं के गुलामों ने कर दी है।


    हम देख नहीं रहे हैं, ग्राम्यभारत का महाश्मशान जहां स्वर्णिम राजमार्गों और एक्सप्रेस हाईवे के नेटवर्क के जाल मे महासेजों,शैतानी औद्योगिक गलियारों और दसलखिया महानगरों के उत्थान का प्रेतसमय।


    रेलवे कर्मचारियों की तादाद लगातार कम होती रहीं है।


    रेलवे में निर्माण और तमाम जरुरी सेवाओं का निजीकरण पहले से हो चुका है और अब रेलपथों को निजी कंपनियों को सौंपने की बारी है।


    बैकिंग और बीमा में निजी पूंजी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिये सरकारी उपक्रमों को बहुत पहले बाट लग चुकी है।


    सारे के सारे बंदरगाह बिकने लगे हैं।


    एअर इंडिया का काम तमाम।रिलायंस को अंबानी को सौंपने की देर है,बस।


    मीडिया,ऊर्जा,निर्माण विनिर्माण,टेलीकाम से लेकरतेल और गैस तो रिलायंस के हवाले हैं ही।


    चाय और जूट उद्योग का कबाड़ा हो गया है दशकों पहले।


    कपास से सिर्फ आत्महत्याओं का अनंत चरखा काता जा रहा है।


    कपड़ा उद्योग तो इंदिरा गांधी ही धीरूभाई अंबानी को सौंपकर हावड़ा के मैनचेस्टर को तबाह कर चुकी हैं।


    इंजीनियरिंग खत्म है।


    तकनीकी क्रांति और सेवा विस्फोट।


    रोजगार खत्म।


    खेती तबाह।


    सिर्फ सेवा क्षेत्र और आयात निर्यात पर निर्भर विकास दर और भुगतान संतुलन।


    निवेशकों की आस्था कुलमिलाकर इस कर्मकांडी अंधविश्वासी कुसंस्कारी देश में आस्था और धर्म कर्म पर भारी।


    बाकी बचा सेनसेक्स और सेक्स,जसमें सांढ़ों का राज है।


    हम एक दशक से वाणिज्य राजधानी मुंबई में रेलवे,ऊर्जा,बैंकिंग,पोर्ट,बीमा,विमानन, तेल गैस समेत तमाम सेक्टरों के शीर्ष अधिकारियों और ट्रेड युनियनों के अलावा आम व्रक्र्स के मुखातिब होते रहे हैं।


    मुंबई में ही वर्षों से बजट की व्याख्या करते रहे हैं।


    बंदरगाहों की धूल फांकते रहे हैं।


    बाकी देश में भी दौड़ लगाते रहे हैं।


    लेकिन मलाईदार तबकों का वर्चस्व इतना प्रबल है कि हमारी आवाज अनसुनी रह गयी।


    अब तमाम कायदे कानून को खत्म करने की योजना है।


    संसद पहले से हाशिये पर है।


    लोकतांत्रिक ढांचा खत्म है।

    अस्मिताओं और अलगाव के अलावा देश में कुछ बचा ही नहीं है।


    हर गली में नये नये धर्मयोद्धा।


    हर गली में एंकाउटर का माहौल।


    सब्सिडी खत्म तो सामाजिक योजनाओं के साथ लोककल्याणकारी राज्य भी खत्म।


    भड़ुवा सिविल सोसाइटी।


    कारपोरेट मीडिया।


    दल्ला साहित्य।


    ऐसे महातिलिस्म में इस धर्म युद्ध के मुकाबले हम सभी इक्के दुक्के प्रतिवादी स्वर का हश्र वहीं अभिमन्यु है।


    हम अब भी ब्राजील फुटबाल कार्निवाल  में लहूलुहान ब्राजील को देख नहीं रहे हैं।नहीं सुन रहे हैं सदियों से जारी आदिवासियों की अनंत चीखें।हम रोते हुए खिलाड़ियों को देखकर देश प्रेम से गदगद हैं पर उन आंसुओं के रसायन की पहचान की तमीज हमें नहीं है।


    हम बल्कि चिंतित हैं कि मेसी मारादोना बनेगा या नहीं। ब्राजील और अर्जेंटीना का फािनल होगा कि नहीं।


    हम बल्कि चिंतित हैं कि अपनी मेजबानी में विश्वकप जीतने का ख्वाब देख रही ब्राजील की टीम को उस समय तगड़ा झटका लगा जब उसका सबसे चर्चित खिलाड़ी नेमार रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर के कारण टूर्नामेंट से बाहर हो गया। नेमार को यह चोट कल क्वार्टर फाइनल में कोलंबिया पर मिली 2-1 से जीत के दौरान लगी। कोलंबियाई डिफेंडर जुआन जुनिग के साथ यहां मैच के अंतिम मिनटों में गेंद लपकने के प्रयास में नेमार इस कोलंबियाई खिलाड़ी के घुटने से टकराकर मैदान पर गिर गए और उन्हें दर्द से कराहते हुए स्ट्रेचर पर बाहर ले जाया गया।


    जाहिर है कि नेमार की चोट और कप्तान थिएगो सिल्वा के अगले मैच के निलंबन जैसी बुरी हैं ब्राजील के लिए और हम ब्राजील प्रेमी अपने देश के आदिवासियों के जीने मरने की खबर नहीं रखते ,ब्राजील के बेदखल आदिवासियों को क्यों रोयें।





    अकारण नहीं किआगामी आम बजट में सुधारवादी एवं विकासोन्मुखी कदम उठाए जाने की उम्मीद में तेल व गैस क्षेत्र सहित प्रमुख शेयरों में लिवाली समर्थन से बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स आज 138 अंक की बढ़त के साथ नई रिकार्ड ऊंचाई 25,962.06 अंक पर बंद हुआ।


    अकारण नहीं है कि देश के शेयर बाजारों में पिछले सप्ताह प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी में तीन फीसदी से अधिक तेजी रही। बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक सेंसेक्स पिछले सप्ताह 3.43 फीसदी या 862.14 अंकों की तेजी के साथ शुक्रवार को 25,962.06 पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का 50 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक निफ्टी 3.23 फीसदी या 242.8 अंकों की तेजी के साथ 7,751.60 पर बंद हुआ।


    तीस शेयरों के भव से देश की आर्थिक सेहत बताते हैं अर्थशास्त्री और उसी मुताबिक नीति निर्धारम होता है।एक सौ बीस कराड़ की जनता तो जनगणना,आधार परियोजना या सिटीजन कार्ड और सचल वोटबैंक वास्ते हैं।


    क्या फर्क पड़ता है कि आनेवालों दिनों में एलपीजी सिलेंडर के दाम में भारी इजाफा हो सकता है। पेट्रोलियम मंत्रालय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के अनुरूप मिट्टी के तेल व रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव मंत्रिमंडल की राजनीतिक मामलों की समिति (सीसीपीए) के पास भेजेगा।


    भरोसा कीजै,अच्छे दिनों के ख्वाब रचिये कि वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि हर साल जुलाई-दिसंबर के दौरान जमाखोरी के कारण कुछ खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ती है। बढ़ती महंगाई के लिए जमाखोर जिम्‍मेवार हैं।वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली को जल्द लागू करने के लिये केन्द्र सरकार राज्यों के साथ राजस्व क्षतिपूर्ति से जुड़े मुद्दे का समाधान करेगी। जीएसटी नई कर व्यवस्था है जिसमें मौजूदा अप्रत्यक्ष करों को समाहित किया जायेगा।


    बहरहाल,जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू कश्मीर का आर्थिक विकास काफी हद तक रेलवे पर निर्भर है । उन्होंने जम्मू-बारामुला रेलवे ट्रैक के उन हिस्सों को जल्द पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया जो अब तक नहीं जुड़ पाए हैं ।

    उमर ने कहा कि जम्मू कश्मीर को शेष देश से आर्थिक रूप से जोड़ा जाना रेलवे पर निर्भर करता है और इस पहल के जरिए इसे समग्र बढ़ावा मिलेगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कटरा रेल लाइन परियोजना के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में जम्मू खंड में पुंछ-राजौरी, डोडा-किश्तवाड़ को जोड़ने तथा कश्मीर घाटी में विभिन्न स्थानों, खासकर तंगमार्ग, पहलगाम और अन्य पर्यटन क्षेत्रों में रेल पटरी के विस्तार की आवश्यकता भी जताई ।

    उमर ने कहा कि कश्मीर में रेल सेवाएं एक सपना थीं । उन्होंने लोगों की इस इच्छा को अमली जामा पहनाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भी जिक्र किया । उन्होंने उधमपुर से कटरा तक रेलवे लाइन के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा किया और उम्मीद जताई कि विभिन्न स्थानों पर रेल लाइन के विस्तार की राज्य की मांग को इसके व्यापक आर्थिक एवं विकास हितों के लिए पूरा किया जाएगा ।उमर ने जम्मू रेलवे स्टेशन को उन्नत करने और देश के मॉडल शहरों जम्मू एवं श्रीनगर में विभिन्न पर्यटन और सौंदर्य परियोजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए भी प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की मांग की ।

    कटरा तक ट्रेन संपर्क महत्वाकांक्षी कश्मीर रेल लिंक परियोजना का हिस्सा है जो घाटी को शेष देश से जोड़ेगी । कटरा और बनिहाल र्दे के बीच अंतिम लिंक के वर्ष 2018 तक पूरा हो जाने की उम्मीद है । कुल 25 किलोमीटर लंबी उधमपुर-कटरा लाइन लंबे इंतजार के बाद शुरू हुई है जिसके निर्माण पर 1,132.75 करोड़ रूपये की अनुमानित लागत आई है ।

    यह ट्रेन 7 सुरंगों और 30 से अधिक छोटे-बड़े पुलों से गुजरेगी । उधमपुर और कटरा के बीच एक छोटा स्टेशन चक्रख्वाल होगा । ट्रेनें अब सीधे कटरा तक पहुंचेंगी क्योंकि 53 किलोमीटर लंबी जम्मू-उधमपुर रेल लाइन पहले ही परिचालन में आ चुकी है । इससे वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आने वाले लाखों श्रद्धालु सीधे आधार शिविर कटरा पहुंच सकेंगे ।


    रेलवे की ऊंची उड़ान

    नवभारत टाइम्स | Jul 5, 2014, 01.00AM IST


    दिल्ली और आगराके बीच सेमी हाई स्पीड ट्रेन के सफल परीक्षण के जरिए भारतीय रेलवे ने एक ऊंची उड़ान की शुरुआत की है। बुलेट ट्रेन चलाने की दिशा में इसको एक छोटा कदम माना जा सकता है। वैसे यह स्वप्न अभी बहुत दूर है और इस तक पहुंचने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ेगा। बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इसका वादा किया है और कहा है कि बड़े शहरों को तेज गति के रेल नेटवर्क से जोड़ऩे के लिए 'हीरक चतुर्भुज' बनाया जाएगा। भारत में बुलेट ट्रेन चलाने की चर्चा नई नहीं है लेकिन इसकी ख्वाहिश पालने के बावजूद इस मामले में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई है।


    आज भी देश में सबसे तेज चलने वाली ट्रेन भोपाल शताब्दी की रफ्तार दिल्ली और आगरा के बीच कहीं-कहीं 150 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है। वैसे इसकी औसत गति केवल 86 किलोमीटर प्रति घंटा ही है। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो दिल्ली-आगरा के बीच प्रस्तावित ट्रेन सितंबर से 160 किलोमीटर की गति से दौड़ती दिखेगी। हालांकि बुलेट ट्रेन से जुड़ी भारतीय महत्वाकांक्षा को कई लोग संदेह से देखते हैं। उनका सवाल है कि जो भारतीय रेलवे बुनियादी समस्याओं से ही नहीं उबर पा रही, वह क्या हाई स्पीड ट्रेन आराम से चला ले जाएगी?



    बुलेट ट्रेन चलाने वाले चीन, जापान, फ्रांस और इटली जैसे मुल्कों ने अपने सामान्य रेल तंत्र को पहले ही काफी मजबूत बना लिया था। भारत इस मामले में उनसे काफी पीछे है। भारतीय रेल अपने नेटवर्क में सालाना औसतन 220 किलोमीटर का ही विस्तार कर पा रही है जबकि चीन में रेलवे का सालाना फैलाव 1,000 किलोमीटर का है। हाई स्पीड ट्रेन के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत पड़ेगी। सामान्य ट्रेनों की एक किलोमीटर पटरी बिछाने पर तीन करोड़ का खर्च आता है, जबकि बुलेट ट्रेन के लिए यह खर्च 8 करोड़ बैठता है। फिर उसके लिए बड़े पैमाने पर बिजली की व्यवस्था भी एक समस्या है। फिर खर्चे और आमदनी का हिसाब देखते हुए क्या यह समझदारी भरा प्रोजेक्ट साबित होगा?



    0 0

    अच्छे दिन का सौंदर्यशास्त्र भी गोरा बनाने के कारोबार का सौंदर्यशास्त्र है।


    आंकड़ों और परिभाषाओं से जब अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकते हैं, तो बजट की कवायद आखिर क्यों है और जब नीतिगत घोषणाएं बजट से पहले हो जाती है तो संसद में बजट पेश करने का औचित्य नवधनाढ्यों को मामूली राहत देने और पूंजी को हर संभव छूट और रियायत देने के अलावा क्या हो सकती है?


    अब यह भी समझने वाली बात है कि इस मुक्त बाजारी अश्वमेध की जो अवैध संतानें हैं,अकूत धन संपत्ति बिना किसी उत्पादन या बिना किसी लागत या बिना किसी पूंजी के यूंही हासिल कर रहे हैं जो लोग,जो मलाईदार तबका बनकर तैयार है और जो लोग इस नवधनाढ्य समय में उड़ते हुए नोटों के दखल खेल में निष्णात हैं, आजादी, दूसरी आजादी और क्रांति,समता और सामाजिक न्याय की उदात्त घोषणाोओं के बावजूद व्यवस्था परिवर्तन में उनकी क्या दिलचस्पी हो सकती है,समझने वाली बात है।



    पलाश विश्वास


    imggallery

    भारत में अब सत्ता की भाषा विज्ञापनी सौंदर्यशास्त्र और व्याकरण के मुताबिक है।

    इसी इस तरह से समझें,बालीवूड के बादशाह आजकाल पुरुषों को गोरा बनाने के एक विज्ञापन क लिए माडलिंग कर रहे हैं।पूर्व पीएमईएसी चेयरमैन सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली एक समिति ने देश में गरीबी के स्तर के तेंदुलकर समिति के आकलन को खारिज कर दिया है और कहा है कि भारत में 2011-12 में आबादी में गरीबों का अनुपात कहीं ज्यादा था और 29.5 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे। रंगराजन समिति के अनुसार, देश में हर 10 में से 3 व्यक्ति गरीब है।रंगराजन साहेब ने जैसे ही तेंदुलकर साहेब के प्रतिमानों और आंकड़ों में थोड़ा फेरबदल किया तो दस करोड़ लोग और गरीबी रेखा के नीचे चले आये।इसका मतलब यह हुआ कि तेंदुलकर साहेब ने मंटेक राज के दौरान गरीबी रेखा की परिभाषा बदलकर बिना कुछ किये एक झटके से दस करोड़ लोगो को गरीबी केभूगोल से बाहर निकाल दिया था।जाहिर है कि अच्छे दिन आ गये हैं तो इन दस करोड़ के साथ बाकी गरीबों का कल्याण भी हो जायेगा।


    भारत में गोरा बनने की ललक पहले महिलाओं में थी,गोरा न होकर भी पुरुष वर्चस्व और पुरुषतांत्रिक सामंती समाज व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया है।


    हालांकि बेरोजगारी और अंधेरे भविष्य के मद्देनजर अब युवा समाज को सेक्स और नशे के नेटव्रक में कैद कर लेने का चाकचौबंद इतजाम हो चुका है,जिसके तहत वर्च्युअल सेक्स यानी बिना शारीरिक संबंध के तकनीकी सक्स का कारोबार चल रहा है।


    पुरुषों की उत्कट सौंद्रर्य चेतना अब स्त्रियों को भी लज्जित कर सकती है।


    सुगंध,तेल और कंडोम का कारोबार तो था ही,अब गोरा बनाने का कारोबार भी चल निकला है।


    अब एक पुरुषों को गोरा बनाने का एक प्रोडक्ट लांच हुआ है ,जिसमें बादशाह सीना ठोककर कह रहे हैं कि संघर्ष के दिनों में इस उत्पाद को हमेशा साथ रखने में ही उनकी कामयाबी का राज है।


    अब जो प्रोडक्ट अभी अभी लांच हुआ है,दो दशक पहले उसे संघर्ष के दिनों में वे कैसे सात रखते हैं,यह सवाल कोई पूछ नहीं रहा है।


    अच्छे दिन का सौंदर्यशास्त्र भी गोरा बनाने के कारोबार का सौंदर्यशास्त्र है।


    बजट के दिनों में आंकड़ों की कलाबाजी कुछ ज्यादा ही निखर जाती है।आंकड़ों के मार्फत नीतिगत घोषणाएं होती हैं और योजनाएं भी उसी मुताबिक बनती है। विकास दर का आंकड़ा ग्लोबीकरण समय में विकास और सभ्यता के प्रतिमान हैं तो सेनसेक्स की उछाल अर्थव्यवस्था की सेहत का वेदर क्लाक हैं।


    भारत की राजनीति अस्मिताओं के मुताबिक चलती हैं,यह तो सारे लोग बूझ ही गये हैं।


    बूझी हुई पहले गरीबी भी है।


    एक रेखा खींच देने से ही जब गरीब खत्म हो जाती है,तो गरीबी उन्मूलन की इतना घोषणाओं और कार्यक्रमों की क्या जरुरत है,समझ से बाहर हैं।तेंदुलकर साहेब ने गरीबी घटा दी थी और नई परिभाषा गढ़कर रंगराजन ने गरीबी बढ़ा दी।मजा तो यह है कि आर्थिक नीतियों की निरंतरता बनी हुई है और जनसंहारक सुधारों का दूसरा चरण निर्माय़क निर्ममता से जारी है।


    तो सवाल है कि जिन नीतियों के चलते यह गरीबी बढ़ी और जिसे छुपाने का काम परिभाषा और आंकड़ों से हुआ,उन्हीं नीतियों से यह बढ़ी हुई गरीबी कैसे दूर होगी और कैसे आयेंगे अच्छे दिन।


    अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ जमीनी हकीकत से जुड़ने के लिए शीत ताप नियंत्रित महलों से बाहर नहीं निकलते तो हमारे निर्वाचित जन प्रतिनिधि करोड़पति कम से कम हैं और थोक दरों पर अरबपति भी बन रहे हैं।लेकिन इंदिरा समय से बिना कृषि या औदोगिक उतापादन प्रणाली में सुधार किये सिर्फ परिभाषाओं और आंकड़ों से गरीबी उन्मूलन का यह महती कार्यक्रम इंदिरा समय से चला आ रहा है।रंगराजन रपट से इस अनंत धारा में कोई बदलाव के आसार नहीं है।


    उत्पादक शक्तियों की इस देश की अर्थव्यवस्था में कोई भूमिका नहीं है।नई सरकार के श्रम कानून संशोधन एजंडा से साफ जाहिर है।तो अतिरिक्त दस समेत आंकड़ों में मौजूद गरीबों की गरीबी दूर करने का ठेका फिर वही बिल्डर प्रमोटर कारपोरेट राज,क्रययोग्य अनुत्पादक सेवा उपभोग क्षेत्रों,अबाध पूंजी प्रवाह के लिए विनियमन,विनिवेश,निवेशकों की अटल आस्था और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के भरोसे पर ही अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का उपक्रम है।सारे कानून बदलकर पूरे देश को आखेटगाह बनाकर और औद्योगीकरण के नाम पर मुक्तबाजार के मेगा कत्लगाहों ,कत्ल गलियारों के निर्माण जरिये अंधाधुध शहरीकरण और जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता मानवाधिकार नागरिक अधिकार से बेदखली का फिर वही निरंतर जारी धर्मोन्मादी खेल।


    फिर वही धर्म राजनीति और पूंजी का संहारक गठजोड़।आर्थिक अंग्रेजी अखबारों की तो कहिये मत,भाषाई मीडिया में बजट पूर्व प्राथमिकताओं में कारपोरेटलाबिइंग की धार देख लीजिये और इस त्रिभुज में बढ़ते धर्मोन्मादी तड़की की गंध समझ लीजिये।अमित साह और जावड़ेकर कम पड़ गये,देश की राजनीति दुरुस्त करने के लिए राममाधव का आवाहन है।


    समांतर सत्ता चलाने वाले कारपोरेट मीडिया का गरीबों से कोई वास्ता नहीं है।


    अब यह भी समझने वाली बात है कि इस मुक्त बाजारी अश्वमेध की जो अवैध संतानें हैं,अकूत धन संपत्ति बिना किसी उत्पादन या बिना किसी लागत या बिना किसी पूंजी के यूंही हासिल कर रहे हैं जो लोग,जो मलाईदार तबका बनकर तैयार है और जो लोग इस नवधनाढ्य समय में उड़ते हुए नोटों के दखल खेल में निष्णात हैं, आजादी, दूसरी आजादी और क्रांति,समता और सामाजिक न्याय की उदात्त घोषणाओं के बावजूद व्यवस्था परिवर्तन में उनकी क्या दिलचस्पी हो सकती है,समझने वाली बात है।


    विश्व के इतिहास में जनविद्रोहों और क्रांतियों के इतिहास को देखें तो समझा जा सकता है कि व्यवस्था के शिकार लोग जब सड़कों और खेतों,कारखानों,जंगलों और पहाड़ों में गोलबंद होकर प्रतिरोध करते हैं,तभी परिवर्तन होता है।


    नेतृत्व भी उन्हीं तबकों से उभर कर आता है।


    मौजूदा व्यवस्था को यथावत रखने या उसको और ज्यादा जनसंहारक तत्व परिवर्तन के पक्षधर कैसे हो सकते हैं,यह समझने वाली बात है।


    देश में उत्पादक और सामाजिक शक्तियों के मौजूदा तंत्र के विरुद्ध लामबंद होने की हलचल नहीं है।


    जनांदोलन विदेशी वित्त पोषित कार्यक्रम है और सब्जबाग सजोकर,मस्तिष्क नियंत्रण मार्फत राजकाज और नीति निर्धारण की तमाम सूचनाओं को सिरे से अंधेरे में रखकर विज्ञापनी भाषा में जो सत्ता की राजनीति चल रही है,देश का हर तबका,विंचिक निनानब्वे फीसद जनता भी उसी आभासी ख्वाबगाह के तिलिस्म में कैद है।


    अर्थशास्त्री तेंदुलकर और अर्थशास्त्री रंगराजन के दोनों मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था के महान प्रवक्ता है,दूसरी तमाम रपटों और आंकड़ों को जारी करने वालों की तरह।रंगराजन की यह रपट बल्कि केसरिया समय की पहल है,जिसका मुख्यकार्यभार इस गरीबी का ठीकरा पर्ववर्ती सरकार के मत्थे डालना है,गरीबी उन्मूलन का कतई नहीं।


    देश में हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं।


    न कृषि और न औद्योगिक उत्पादन में कोई चाम्कारिक वृद्धि हुई है।


    अर्थव्यवस्था की बुनियाद में भी कोई बेसिक परिवर्तन नहीं हुआ है,विदेशी रेटिंग और सेनसेक्स की बढ़त के अलावा।


    कोई परिवर्तन हुआ नहीं है विदेशी निवेशकों की आस्था मुताबिक धर्मोन्मादी जनादेश माध्यमे बिजनेस फ्रेंडली सरकार के अलावा।


    कोई परिवर्तन हुआ नहीं है चुनी हुई सरकार और सत्ता पार्टी,संसद के हाथों से सत्ता संघ परिवार में केंद्रित होने के अलावा।


    कोई परिवर्तन हुआ नहीं है दूसरे चरण के नरमेधी राजसूय को रिलांच करने के अलावा।


    प्रतिमानों में फेरबदल भी खास नहीं है लेकिन गरीबी की परिभाषा से ही दस करोड़ लोगों की गरीबी खत्म हो गयी।तो परिभाषा बदलकर दस करोड़ लोगं को और गरीब बता दिये जाने से,तमाम कायदे  कानून खत्म कर दिये जाने से,दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों से यह बड़ीहुई गरीबी दूर हो जायेगी,ऐसा किस अर्थशास्त्त्र में लिखा है,इसके पाठ के संदर्भ तो डां.मनमोहन सिंह, मंटेक सिंह आहलूवालिया,राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और चिदंबरम जैसे लग दे सकते हैं,जिनके बीस साल के किये धरे कोखारिज किया जा रहा है।


    बुनियादी मसला तो यह है कि  आंकड़ों और परिभाषाओं से जब अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकते हैं, तो बजट की कवायद आखिर क्यों है और जब नीतिगत घोषणाएं बजट से पहले हो जाती है तो संसद में बजट पेश करने का औचित्य नवधनाढ्यों को मामूली राहत देने और पूंजी को हर संभव छूट और रियायत देने के अलावा क्या हो सकती है,गैर अर्थ विशेषज्ञों के लिए समझना मुश्किल है।


    लेकिन इस जनविरोधी,जनसंहारक सर्वनाशी अर्थ शास्त्र के तिलिसम को समझे बिना उत्पादक और सामाजिक शक्तियों की गोलबंदी पीड़ितों और वंचितों की अगुवाई में असभव ही है।


    बहरहाल योजना मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को सौंपी गई रिपोर्ट में रंगराजन समिति ने सिफारिश की है कि शहरों में प्रतिदिन 47 रुपए से कम खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, जबकि तेंदुलकर समिति ने प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 33 रुपए का पैमाना निर्धारित किया था।


    रंगराजन समिति के अनुमानों के अनुसार, 2009-10 में 38.2 प्रतिशत आबादी गरीब थी जो 2011-12 में घटकर 29.5 प्रतिशत पर आ गई। इसके विपरीत तेंदुलकर समिति ने कहा था कि 2009-10 में गरीबों की आबादी 29.8 प्रतिशत थी जो 2011-12 में घटकर 21.9 प्रतिशत रह गई।

    सितंबर, 2011 में तेंदुलकर समिति के अनुमानों की भारी आलोचना हुई थी। उस समय, इन अनुमानों के आधार पर सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में कहा गया था कि शहरी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति रोजाना 33 रुपए और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति रोजाना 27 रुपए खर्च करने वाले परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर समझा जाए।

    सरकार ने तेंदुलकर समिति के मानकों और तरीकों की समीक्षा के लिए पिछले साल रंगराजन समिति का गठन किया था ताकि देश में गरीबों की संख्या के बारे में भ्रम दूर किया जा सके। रंगराजन समिति के अनुमान के मुताबिक, कोई शहरी व्यक्ति यदि एक महीने में 1,407 रुपए (47 रुपए प्रति दिन) से कम खर्च करता है तो उसे गरीब समझा जाय, जबकि तेंदुलकर समिति के पैमाने में यह राशि प्रति माह 1,000 रुपए (33 रुपए प्रतिदिन) थी।

    रंगराजन समिति ने ग्रामीण इलाकों में प्रति माह 972 रुपए (32 रुपए प्रतिदिन) से कम खर्च करने वाले लोगों को गरीबी की श्रेणी में रखा है, जबकि तेंदुलकर समिति ने यह राशि 816 रुपए प्रति माह (27 रुपए प्रतिदिन) निर्धारित की थी।

    रंगराजन समिति के अनुसार, 2011-12 में भारत में गरीबों की संख्या 36.3 करोड़ थी, जबकि 2009-10 में यह आंकड़ा 45.4 करोड़ था। तेंदुलकर समिति के अनुसार, 2009-10 में देश में गरीबों की संख्या 35.4 करोड़ थी जो 2011-12 में घटकर 26.9 करोड़ रह गई।


    निर्धनता रेखा

    http://hi.wikipedia.org/s/4mn

    मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

    गरीबी रेखाया निर्धनता रेखा (poverty line) आयके उस स्तर को कहते है जिससे कम आमदनीहोने पे इंसान अपनी भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने मे असमर्थ होता है । गरीबी रेखा अलग अलग देशों मे अलग अलग होती है । उदहारण के लिये अमरीकामे निर्धनता रेखा भारतमे मान्य निर्धनता रेखा से काफी ऊपर है ।

    यूरोपीय तरीके के रूप में परिभाषित वैकल्पिक व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें गरीबों का आकलन 'सापेक्षिक' गरीबी के आधार पर किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत आय के 60 फीसदी से कम है, तो उस व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वाला माना जा सकता है। औसत आय का आकलन विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है।

    उदाहरण के लिए माध्य निकालने का तरीका। यानी 101 लोगों में 51वां व्यक्ति यानी एक अरब लोगों में 50 करोड़वें क्रम वाले व्यक्ति की आय को औसत आय माना जा सकता है। ये पारिभाषिक बदलाव न केवल गरीबों की अधिक सटीक तरीके से पहचान में मददगार साबित होंगे बल्कि यह भी सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो गरीब नहीं है उसे गरीबों के लिए निर्धारित सब्सिडी का लाभ न मिले। परिभाषा के आधार पर देखें तो माध्य के आधार पर तय गरीबी रेखा के आधार पर जो गरीब आबादी निकलेगी वह कुल आबादी के 50 फीसदी से कम रहेगी।

    योजना आयोग ने 2004-05 में 27.5 प्रतिशत गरीबी मानते हुए योजनाएं बनाई थी। फिर इसी आयोग ने इसी अवधि में गरीबी की तादाद आंकने की विधि की पुनर्समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने पाया कि गरीबी तो इससे कहीं ज्यादा 37.2 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह हुआ कि मात्र आंकड़ों के दायें-बायें करने मात्र से ही 100 मिलियन लोग गरीबी रेखा में शुमार हो गए।

    अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं।

    भारत में योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर पर दी। इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर किए थे। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा कि दिल्ली, मुंबई, बंगलोर और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता।

    बाद में जब इस बयान की आलोचना हुई तो योजना आयोग ने फिर से गरीबी रेखा के लिये सर्वे की बात कही।



    नई गरीबी रेखा

    टी. एन. नाइनन / नई दिल्ली July 04, 2014

    दो वर्ष पहले रंगराजन समिति का गठन किया गया था ताकि वह गरीबी के मसले पर नए सिरे से विचार कर सके। खबरों के मुताबिक उसने गरीबी का निर्धारण करने के लिए एक नया तरीका खोज निकाला है। हालांकि यह तरीका केवल भारत के लिए नया है, अमेरिका और यूरोप में इसे पहले से ही आजमाया जा रहा है। इसके तहत गरीबी का निर्धारण आय के विशिष्टï स्तर के आधार पर नहीं बल्कि उसके औसत स्तर के सापेक्षिक आधार पर किया जाएगा।

    अमेरिका की बात करें तो वहां जिसकी आय औसत से 40 फीसदी अथवा उससे कम होगी वह गरीब है। वहीं यूरोप में और अधिक उदार तरीका अपनाते हुए इसे औसत मध्य से 60 फीसदी कम रखा गया है। हमने अपने स्तम्भों में अक्सर इस तरीके की वकालत की है। यह देखते हुए कि देश में आय का स्तर कम है, हमें गरीबी रेखा का निर्धारण करते वक्त अधिक उदार यूरोपीय मॉडल अपनाना चाहिए और गरीबी रेखा की निर्धारक दर मध्य आय के 60 फीसदी के बराबर रखनी चाहिए (इसका आकलन भी समुचित ढंग से किया जाना चाहिए न कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की तर्ज पर)। अगर ऐसा किया गया तो देश की गरीबी रेखा मौजूदा स्तर से काफी ऊपर निकल जाएगी।

    एक अनुमान के मुताबिक अगर किसी ग्रामीण इलाके में पांच सदस्यों वाले परिवार की मासिक आय 6,000 रुपये से कम है और किसी बड़े शहरी इलाके में रहने वाले ऐसे ही परिवार की मासिक आय 11,000 रुपये से कम है तो उसे आधिकारिक तौर पर गरीब माना जाएगा।  देश में गरीबी रेखा को कई बार नए सिरे से निर्धारित किया जा चुका है। वर्ष 1993 की परिभाषा के मुताबिक वर्ष 2011-12 में देश की कुल आबादी का 11 फीसदी हिस्सा गरीब था। ऐसे दावे का समर्थन करना कतई आसान नहीं है। वर्ष 2005 की परिभाषा के हिसाब से देखा जाए (जो मोटे तौर पर 1.25 डॉलर रोजाना की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्य दर के करीब थी) तो यह आंकड़ा 22 फीसदी पर जा टिकता है।

    रंगराजन द्वारा दिए गए नए फॉर्मूले के बाद यह आंकड़ा 30 फीसदी को पार कर सकता है। यह हकीकत के अधिक करीब नजर आता है। नई व्यवस्था के दो अन्य लाभ भी हैं। पहली बात, गरीबों के लिए उल्लिखित योजनाओं का लाभ अब सीधे गरीबों के पास जाएगा। दूसरी बात, राष्टï्रीय आय में बढ़ोतरी होने के साथ-साथ गरीबी रेखा में स्वत: इजाफा होने लगेगा। ऐसे में हम कितने भी समृद्घ हो जाएं, हमारे पास गरीबों का स्पष्टï आंकड़ा होगा जिनका ख्याल रखे जाने की आवश्यकता होगी। एक और मसला है। गरीबी के स्तर वाली आय (या खर्च) का आकलन परिवार के स्तर पर किया जाना चाहिए न कि निजी तौर पर क्योंकि खर्च इकाई परिवार को माना गया है।

    पांच सदस्यीय परिवार के लिए 10,000 रुपये का प्रबंधन करना आसान होगा बजाय कि दो व्यक्तियों वाले परिवार के द्वारा 4,000 रुपये का। हालांकि दोनों घरों के लिए प्रति व्यक्ति आय का स्तर एक ही होगा। लेकिन हमारे पास ऐसे आंकड़े नहीं हैं जो परिवारों के हिसाब से आय या खर्च का आकलन कर पाएं। इस दिशा में हमें काम करना होगा। इसके अलावा कौन सा परिवार किस श्रेणी में आता है, यह भी निर्धारित करना होगा और इसमें भी तमाम जटिलताएं हैं। ऐसा इसलिए कि हर राज्य अपने यहां गरीबों का आंकड़ा बढ़ाचढ़ाकर पेश करना चाहता है। कुछ राज्यों ने अपने यहां कुल परिवारों से भी अधिक बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) कार्ड जारी कर रखे हैं।

    वित्त मंत्री ने कहा है कि वे सब्सिडी की समस्या से निपटने की कोशिश करेंगे। ऐसा करने के लिए यह जरूरी है कि समझदारी से तय की गई गरीबी रेखा हो ताकि यह तय हो सके कि सरकार की ओर से मिलने वाली छूट और लाभ किसे दिए जाने चाहिए तथा किसे नहीं। उदाहरण के लिए यह बात मूर्खतापूर्ण है कि खाद्य सुरक्षा कानून  के तहत देश की आधी शहरी आबादी और तीन चौथाई ग्रामीण आबादी के लिए खाद्यान्न रियायती दर पर उपलब्ध  कराया जाए। दूसरा उदाहरण लें तो घरेलू गैस का इस्तेमाल करने वाले 29 फीसदी परिवार उन 69 फीसदी परिवारों से बेहतर हैं जो ईंधन के रूप में लकड़ी, फसल के अवशेष अथवा गोबर के कंडों पर निर्भर हैं। उनमें से किसी को कोई सब्सिडी नहीं मिलती। तो फिर घरेलू गैस पर इतनी अधिक सब्सिडी क्यों? अगर सब्सिडी को नियंत्रित करना है तो सही पहचान करना और फिर उन तक ही लाभ पहुंचाना असल चुनौती है। यह आसान काम नहीं है।



    गरीबी की बहस

    अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष सी रंगराजन ने गरीबी की रेखा निर्धारित करने के लिए नए मानदंड तय किए हैं और इन मानदंडों के आधार पर भारत में लगभग 30 प्रतिशत लोग गरीब हैं। इसके पहले अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर ने गरीबी की जो रेखा निर्धारित की थी, उसकी काफी आलोचना हुई थी। तेंदुलकर समिति के मुताबिक, शहरों में 33 रुपये और गांवों में 27 रुपये रोज से कम खर्च करने वाला व्यक्ति गरीबी-रेखा के नीचे है। तेंदुलकर समिति के आकलन के अनुसार, देश में सन 2009-10 में 29.8 प्रतिशत लोग गरीब थे और सन 2011-12 में इनका प्रतिशत घटकर 21.9 फीसदी पर आ गया था। तेंदुलकर समिति की आलोचना मुख्यत: इस बात पर हुई थी कि उसने गरीबी की सीमा रेखा काफी नीचे निर्धारित की है। इसी आलोचना के मद्देनजर रंगराजन समिति का गठन किया गया कि वह गरीबी-रेखा के निर्धारण के लिए तेंदुलकर समिति के मानदंडों की समीक्षा करे और नए मानदंड तय करे। रंगराजन समिति ने शहरों में 47 रुपये और गांवों में 32 रुपये रोजाना को गरीबी-रेखा तय किया है। इस नई रेखा के हिसाब से 2009-10 में गरीबी की रेखा के नीचे 38.2 प्रतिशत जनसंख्या थी, जो 2011-12 में 29.5 प्रतिशत हो गई। इसका मतलब है कि नए मानदंडों से 10 करोड़ लोग गरीबी-रेखा के नीचे आ गए।

    इस गरीबी की रेखा पर भी विवाद हो सकता है। हालांकि, यह तेंदुलकर समिति की गरीबी की रेखा से काफी ऊंची है। फिर भी हर मानदंड पर यह बहस तो होगी ही कि यह गरीबी को बढ़ा-चढ़ाकर या घटाकर दिखाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि चाहे तेंदुलकर समिति हो या रंगराजन समिति, दोनों के ही आकलन से 2009-10 और 2011-12 के बीच गरीबी में कमी का प्रतिशत तकरीबन बराबर ही रहा है, यानी यह बात पर्याप्त विश्वसनीय तौर पर कही जा सकती है कि इन दो सालों में भारत में लगभग नौ प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से उबरे हैं। यह बड़ी उपलब्धि है और आंकड़े बताते हैं कि पिछले करीब डेढ़ दशक में गरीबी से उबरने की रफ्तार काफी तेज रही है। यह सही है कि भारत में आर्थिक असमानता बढ़ी है, लेकिन यह भी सच है कि आर्थिक नीतियों का फायदा गरीबों को भी मिला है और उनकी तादाद घटी है। अगर गरीबी में कमी की यह रफ्तार बनाई रखी जाए या तेज की जा सके, तो अगले दशक के खत्म होने से पहले भारत में गरीबी-रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत बहुत कम हो जाएगा, भले ही जो भी मानदंड अपनाए जाएं। यह आजाद भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

    गरीबों की तादाद में कमी के लिए उदार आर्थिक नीतियों के अलावा गरीबी कम करने के वास्ते लागू की गई योजनाओं ने भी काम किया है। लेकिन प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने से ज्यादा जरूरी जीवन-स्तर की बेहतरी है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और आवास की बेहतर सुविधाएं समाज के गरीब तबकों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं और इन तमाम क्षेत्रों में हमारा रिकॉर्ड बहुत खराब है। भारत स्वास्थ्य के मानदंडों पर अपने तमाम पड़ोसियों से पीछे है और इलाज के खर्च की वजह से लगभग एक करोड़ सीमांत परिवार सालाना गरीबी की रेखा के नीचे चले जाते हैं। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं इस स्थिति को सुधार सकती हैं। शिक्षा गरीबी से उबरने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है, इसलिए इस पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। गरीबी की रेखा और उसके मापदंड पर मीन-मेख निकालने से ज्यादा जरूरी हमारे देश के नागरिकों को जरूरी बुनियादी सुविधाओं से संपन्न गरिमामय जीवन मिलना है।



    किसके दिन अच्छे निकलने वाले हैं।इकोनामिक टाइम्स के इस रपट से समझ लीजिये।

    चूंकि सेनसेक्स 31 हजार पार निकलने के आसार हो गये हैं तो समझ लीजिये कि गरीबी भी खत्म।संसद में पेश होने वाली बजट की दशा और दिशा भी तय हो चुकी है और उस पर सिर्फ संसदीय मुहर लगना बाकी है।


    Jul 07 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    ET EXCLUSIVE - Sensex may Scale 31,000 Peak by March Next Year


    MUMBAI

    OUR BUREAU

    

    

    Economic growth expected to rebound from multi-year lows and a new business cycle may emerge from the rubbles of the old one

    India's stock market may continue to scale new highs in the next six to nine months as a confluence of easy liquidity, rising retail investor interest and improving investment climate is expected to drive growth in multiples, a panel of top equity strategists and fund managers said at a roundtable organised by ET.

    Economic growth is expected to rebound from multi-year lows and a new business cycle may still emerge from the rubbles of the old one, though its expansion could be curbed by stubbornly high inflation and a weak and indifferent monsoon, they added.

    The Sensex, the best performer among recognised global markets in 2014, could scale 31,000 by March 2015 in a bull case scenario, according to Ridham Desai, Managing Director and India Equity Strategist of Morgan Stanley. It could double in three years, said S Naganath, president and chief investment officer of DSP Blackrock Investment Managers.

    Participants at the round table, held in Mumbai on Friday, July 4, felt that all ingredients of a continued bull

    run are firmly in place though the Sensex has jumped 45% since its August 2013 lows of 17,903 and the priceto-earnings multiples have moved up to about 16 times now from about 13 times last year.

    "From the valuations point of view one cannot say we are overvalued, but of course it's no longer cheap, and the index is fairly valued," said Nilesh Shah, managing director and CEO, Axis Capital. "Market capital to GDP ratio is not expensive as it used to be during the peak of the bull markets.

    So there is some room for expansion."

    A return of risk appetite in global markets has fuelled much of the rally with FIIs investing about Rs 64,000 crore into equities so far this year on top of the ` . 113,000 crore invested in 2012. "If you look at the global bond markets there has been a surprising return of risk appetite duration and euphoria and I think that that has a big role to play in the valuations," said Neelkanth Mishra, managing director India Equity Strategist at Credit Suisse. ""The second thing is the bottoming of the Indian economy which is something we have not seen happen elsewhere."

    Indian companies have raised about $2.5 billion through qualified institutional placement programme in the past one month, much more than what they raised in 2013. A buoyant market may give a fillip to fund-raising, helping some companies pay off debt though heavily indebted companies may not get money as easily as others. The members of the panel were Ridham Desai, Neelkanth Mishra, Nilesh Shah, Saurabh Mukherjea, CEO Institutional Equities, Ambit Capital, S Naganath and Anoop Bhaskar, head equity UTI Asset Management Company.

    The economy may grow over 5% in FY15 while earnings growth may of the Nifty/Sensex companies may cross 16% in FY16. Desai of Morgan Stanley said he was bullish on cyclicals which include eneergy, materials and auto in the shorter time frame, that is one year to 18 months. Consumer staples will struggle but in the longer time frame that is five to seven years, financials and consumer stocks will be the best bet.

    S Naganath said that he expects GDP to touch 7% in FY16 and earnings to grow by 20% while Mishra of Credit Suisse expects price to earnings ratio to touch 18 times by next year.







    Jul 07 2014 : The Times of India (Ahmedabad)

    Rs 47 a day spent in cities breaches poverty line

    Mahendra Kumar Singh

    New Delhi:

    TNN

    

    

    Rangarajan Panel Pegs No. Of Poor At 363M In '11-12

    Those spending over Rs 32 a day in rural areas and Rs 47 in cities should not be considered poor, a panel headed by former RBI governor C Rangarajan said in a report submitted to the BJP-led NDA government last week.

    The recommendation, which comes just ahead of the budget session of Parliament, is expected to generate fresh debate over the poverty measure as the committee's report has only raised the bar marginally .

    Based on the Suresh Tendulkar panel's recommendations in 2011-12, the poverty line had been fixed at Rs 27 in rural areas and Rs 33 in urban areas, levels at which getting two meals may be difficult.

    The panel was tasked with revisiting the Tendulkar formula for estimation of poverty and identification of the poor after a massive public outcry erupted over the abnormally low poverty lines fixed by the UPA government.

    The panel's recommenda tion, however, has resulted in a nearly 35% increase in the BPL population. Estimated at 363 million in 2011-12, compared to the 270 million estimate based on the Tendulkar formula, the increase in the BPL population is almost 35%.

    This means 29.5% of India's population lives below the poverty line as defined by the Rang arajan committee, as against 21.9% according to Tendulkar.

    For 2009-10, Rangarajan has estimated that the share of BPL group in total population was 38.2%, translating into a decline in poverty ratio by 8.7 percentage points over a two-year period.

    The real change is in urban areas where the BPL number is projected to have nearly doubled to 102.5 million based on Rangarajan's estimates, compared to 53 million based on the previous committee's recommendations.

    In the case of rural areas, the rise is 20% to 260.5 million, compared to around 217 million based on the Tendulkar formula. Rangarajan's estimates would put the BPL share of total population in rural areas at 30.9%, compared to 39.6% in 2009-10. Documents accessed by TOI show that the Rangarajan panel has suggested to the government that those spending more than Rs 972 a month in rural areas and Rs 1,407 a month in urban areas in 2011-12 do not fall under the definition of poverty . If calculated on a daily basis, this translates into a per capita expenditure of Rs 32 per day in rural areas and Rs 47 per day in urban areas in 2011-12. According to the Tendulkar methodology for 2011-12, the poverty line was Rs 816 in rural areas and Rs 1,000 in urban areas, which if calculated on a daily basis come out at Rs 27 per day in rural areas .


    Jul 07 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    India has 100 Million More Poor: Rangarajan Committee

    YOGIMA SETH SHARMA

    NEW DELHI

    

    

    The number of India's poor may rise by 100 million if the recommendations of the C Rangarajan committee on poverty, which comes just ahead of the maiden budget of the Narendra Modi government, are accepted by the government.

    The Rangarajan committee, which has retained consumption expenditure as the basis for determining poverty , has pegged the total number of poor in the country at 363 million or 29.6% of the population against 269.8 million (21.9%) by the Suresh Tendulkar committee, as per the presentation made by Rangarajan to planning minister Rao Inderjit Singh last week.

    The previous UPA government had set up a technical expert group under Rangarajan in 2012 after all-round criticism that the poverty line had been pegged much lower than it should have been by the Tendulkar committee amidst demands to revisit the methodology. Rangarajan headed the Prime Minister's Economic Advisory Council at the time.

    However, the committee hasn't detailed the methodology used to arrive at the new numbers in its nine-page presentation made to the minister.

    The poverty line is significant as social sector programmes are directed towards those below it and will be something that will factor into finance minister Arun Jaitley's budget-making exercise.

    The budget will be announced on July 10.

    The Rangarajan committee raised the daily per capita expen . 32 from ` diture to ` . 27 for the rural . 47 from ` poor and to ` . 33 for the urban poor, thus raising the poverty line based on the average monthly per capita expenditure to ` . 972 in rural India and `. 1,407 in urban India. The earlier methodology, devised by Tendulkar, had de fined the poverty line at `. 816 and . 1,000, respectively, based on the ` National Sample Survey Office (NSSO) data for 2011-12.

    Thus, for a family of five, the allIndia poverty line in terms of consumption expenditure, as per the Rangarajan committee, would amount to ` . 4,760 per month in rural areas and ` . 7,035 per month in urban areas. The Tendulkar committee had pegged this at ` . 5,000.

    . 4,080 and ` As per the Rangarajan committee, the percentage of people below the poverty line in 2011-12 was 30.95 in rural areas and 26.4 in urban areas as compared to 25.7 and 13.7, according to the Tendulkar methodology. The respective ratios for the rural and urban areas were 41.8% and 25.7%, respectively, and 37.2% for the country as a whole in 2004-05. It was 50.1% in rural areas, 31.8% in urban areas and 45.3% for the country as a whole in 1993-94.

    Experts said the difference could be explained by variations in assumptions, such as increased expenditure on health and education or following the system of developed countries where the poverty line is defined as a fraction of the average expenditure level or purely going by normative expenditure, thus ignoring actual expenditure on health and education.

    Lowering the poverty line could cut out those who need assistance. But reducing the number of poor means governments can claim success for welfare programmes.

    The Planning Commission had last year released poverty figures based on the Tendulkar methodology, which had claimed a reduction of 137 million persons over a seven-year period. In 201112, India had 270 million persons below the Tendulkar-stipulated poverty line as compared to 407 million in 2004-05, the commission had said.



    ভারতে ১০ জনের মধ্যে তিনজন দরিদ্র



    প্রতি দশজন ভারতীয়র মধ্যেই তিনজনই দরিদ্র। এ কথা জানিয়েছে সি রঙ্গরাজন কমিটি। তাঁদের মতে, ২০১১-১২ আর্থিক বছরে মোট জনসংখ্যার ২৯.৫ শতাংশ মানুষই দরিদ্র। এই রিপোর্ট খারিজ করে দিয়েছে দারিদ্র নিয়ে সুরেশ তেণ্ডুলকর কমিটির রিপোর্টকেও। খবর জি নিউজের।

    রঙ্গরাজন কমিটির রিপোর্ট জানিয়ে দিয়েছে, শহরাঞ্চলের ক্ষেত্রে ৩৩ টাকা, যাঁরা ৪৭ টাকার নীচে দৈনিক খরচ করেন, তাঁদেরকেই গরীব বলে চিহ্নিত করা যাবে। আর গ্রামাঞ্চলের ক্ষেত্রে অঙ্কটা সাতাশ টাকা নয়, বত্রিশ টাকার নীচে। গত বছর তেণ্ডুলকর কমিটির রিপোর্ট খতিয়ে দেখতে রঙ্গরাজন কমিটি তৈরি করা হয়। পরিকল্পনা মন্ত্রী ইন্দ্রজিত রাওয়ের হাতে কমিটি রিপোর্ট তুলে দিয়েছে।


    भारत में ग़रीबी रेखा के निर्धारण का दर्शन, अर्थशास्त्र और राजनीति


    फ्रांसीसी क्रान्ति से कुछ पहले फ़्रांस की रानी मैरी एण्टॉइनेट को जब बताया गया कि लोगों के पास खाने के लिए रोटी तक नहीं है तो उसने कहा था कि अगर उनके पास रोटी नहीं तो वे केक क्यों नहीं खा लेते! इसके पहले और बाद भी तमाम शासकों ने ऐसे चमत्कारिक बयान दिये हैं। रोम के ज़ालिम हुक्मरान नीरो ने तो कुछ कहना भी ज़रूरी नहीं समझा था और जब रोम जल रहा था तो वह बांसुरी बजा रहा था। ऐसे बयान हमेशा उन शासकों की ज़ुबान से निकले हैं जिनकी व्यवस्था पतनशीलता के शिखर पर पहुँच चुकी होती है। जब 2000 के दशक की मन्दी ने पहली बार अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर अपनी वक्रदृष्टि डालनी शुरू की थी तो जॉर्ज बुश ने कहा था कि जनता जमकर ख़रीदारी क्यों नहीं करती! अगर वह जमकर ख़रीदारी करे तो मन्दी से निजात मिल जायेगी! हमारे देश के हुक्मरानों ने अपनी शैली में बार-बार ऐसे काम किये हैं। 1989-90 के दौर में जब भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह डगमगायी हुई थी, तो देश के भूख से तड़पते लोगों को संवेदनशील प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर ने पेट पर पट्टी बाँधकर देश के अमीरज़ादों की समृद्धि को बढ़ाने की सलाह दी थी। निश्चित रूप से देश की तरक्की उनके अनुसार धनपशुओं की तरक्की की ही पर्यायवाची थी!


    भारत में मैरी एण्टॉइनेट के वंशज


    अब पतनशील, मरणासन्न और मानवद्रोही हो चुकी व्यवस्था के पैरोकारों ने ऐसे ही बयानों और दावों की फेहरिस्त में एक नया इज़ाफ़ा किया है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूछे गये एक सवाल के जवाब में दायर एक हलफ़नामे में देश के योजना आयोग ने दावा किया कि देश में जो भी व्यक्ति गाँव में रु. 26 प्रतिदिन (रु. 781 प्रति माह) और शहर में रु. 32 प्रतिदिन (रु. 965 प्रति माह) कमा लेता है वह ग़रीब नहीं है! इस दावे का तर्कों से खण्डन करना वक़्त की बरबादी है। इसका खण्डन करने के लिए योजना आयोग के उच्च नौकरशाहों को, जिनका वेतन तमाम सुविधाओं को छोड़कर करीब रु. 80,000 है या फिर रु. 60,000 से अधिक वेतन पाने वाले सांसदों और विधायकों को रु. 26/32 की प्रतिदिन की आय पर महीने भर के लिए छोड़ देना चाहिए! और उसके बाद उनसे पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने अपने आपको ग़रीबी रेखा से ऊपर अनुभव किया या फिर नीचे!

    http://ahwanmag.com/archives/443

    ग़रीबी रेखा के निर्धारण का दर्शन, अर्थशास्त्र और राजनीति

    1973-74 के बाद सरकार ने कभी भी सीधे तौर पर नहीं देखा कि देश के कितने प्रतिशत लोग 2100/2400 किलो कैलो…





    गरीबी रेखा: नए आंकड़े और एक कदम आगे

    मंगलवार, 20 मार्च, 2012 को 01:59 IST तक के समाचार

    भारत ग़रीबी

    आंकड़ों के मुताबिक भारत की आबादी का 37 फीसदी हिस्सा ग़रीबी रेखा से नीचे है.

    सोमवार को योजना आयोग की ओर से जारी पिछले पांच साल के तुलनात्मक आंकड़ें कहते हैं कि 2004-05 से लेकर 2009-10 के दौरान देश में गरीबी 7 फीसदी घटी है और गरीबी रेखा अब 32 रुपये प्रतिदिन से घटकर 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन हो गई है.

    योजना आयोग की ओर से सोमवार को जारी गरीबी के आंकड़े एक बार फिर उस बहस को छेड़ सकते हैं जिसका दारोमदार इस बात पर है कि भारत के शहरी और ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा की परिभाषा क्या हो.

    इससे जुड़ी ख़बरें

    इससे जुड़ी ख़बरें

    इसी विषय पर और पढ़ें

    सोमवार को जारी योजना आयोग के साल 2009-2010 के गरीबी आंकड़े कहते हैं कि पिछले पांच साल के दौरान देश में गरीबी 37.2 फीसदी से घटकर 29.8 फीसदी पर आ गई है.

    यानि अब शहर में 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन और गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता. नए फार्मूले के अनुसार शहरों में महीने में 859 रुपए 60 पैसे और ग्रामीण क्षेत्रों में 672 रुपए 80 पैसे से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है.

    इससे एक बार फिर उस विवाद को हवा मिल सकती है जो योजना आयोग द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर किए गए हलफनामे के बाद शुरू हुआ था. इसमें आयोग ने 2004-05 में गरीबी रेखा 32 रुपये प्रतिदिन तय किए जाने का उल्लेख किया था.

    इसके बाद भारत में खाद्य सुरक्षा अधिकारों को लेकर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने योजना आयोग के प्रमुख मोंटेक सिंह अहलूवालिया को चुनौती दी थी कि वो अपने बयान पर अमल करते हुए ख़ुद 32 रुपए में एक दिन का ख़र्च चला कर दिखाएं.

    'मकसद ग़रीबों की संख्या को घटाना'

    विश्लेषकों का कहना है कि योजना आयोग की ओर से निर्धारित किए गए ये आंकड़े भ्रामक हैं और ऐसा लगता है कि आयोग का मक़सद ग़रीबों की संख्या को घटाना है ताकि कम लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा देना पड़े.

    भारत में ग़रीबों की संख्या पर विभिन्न अनुमान हैं. आधिकारिक आंकड़ों की मानें, तो भारत की 37 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है. जबकि एक दूसरे अनुमान के मुताबिक़ ये आंकड़ा 77 प्रतिशत हो सकता है.

    भारत में महंगाई दर में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है.

    कई विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे में मासिक कमाई पर ग़रीबी रेखा के आंकड़ें तय करना जायज़ नहीं है.

    साल 2011 मई में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि ग़रीबी से लड़ने के लिए भारत सरकार के प्रयास पर्याप्त साबित नहीं हो पा रहं हैं.

    रिपोर्ट में कहा गया था कि भ्रष्टाचार और प्रभावहीन प्रबंधन की वजह से ग़रीबों के लिए बनी सरकारी योजनाएं सफल नहीं हो पाई हैं.

    http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/03/120320_poverty_line_pa.shtml


    রেল বাজেটের আগে চোখ বিদেশ লগ্নির দিকেই

    অনমিত্র সেনগুপ্ত

    এক দিকে লোকসানের বোঝা কমিয়ে আয় বাড়ানোর দায়। অন্য দিকে বিশ্বমানের পরিষেবা দেওয়ার সংকল্প। মূলত এই জোড়া লক্ষ্য সামনে রেখেই রেলে বিদেশি বিনিয়োগের ক্ষেত্রে এ বার সুনির্দিষ্ট নীতি আনতে চাইছে কেন্দ্র। আসন্ন রেল বাজেটেই এই সংক্রান্ত ঘোষণা থাকতে পারে বলে মন্ত্রক সূত্রে খবর। সংসদের বাজেট অধিবেশেন শুরু হচ্ছে সোমবার। আর তার পরের দিন, ৮ জুলাই রেল বাজেট।

    ০৬ জুলাই, ২০১৪

    eee


    ভর্তুকির বোঝা কমবে কী ভাবে, দিশাহীন জেটলি

    মুখে বলা যতটা সহজ, কাজে করা ঠিক ততটাই কঠিন। বাজেটে ভর্তুকির জগদ্দল পাথর সরাতে গিয়ে সেটাই টের পাচ্ছেন অর্থমন্ত্রী অরুণ জেটলি। ডিজেল-রান্নার গ্যাস-কেরোসিনের মতো জ্বালানিতে এবং সর্বোপরি খাদ্য ও সারে ভর্তুকি কমাতে চাইছেন তিনি। কিন্তু কী ভাবে তা কমানো হবে, সেটাই হল প্রশ্ন।

    প্রেমাংশু চৌধুরী

    ০৭ জুলাই, ২০১৪

    eee


    লক্ষ্য বাণিজ্য বৃদ্ধি, ব্রাজিল যাচ্ছেন মোদী

    প্রধানমন্ত্রিত্বের প্রথম মাসে সার্ক ও দক্ষিণ পূর্ব এশিয়ার দেশগুলোকে অগ্রাধিকার দিয়েছিলেন নরেন্দ্র মোদী। এ বার লাতিন আমেরিকার সঙ্গে বাণিজ্যিক সম্পর্ক বিস্তারে আগ্রহ প্রকাশ করলেন প্রধানমন্ত্রী। এ ছাড়া, চিনের শীর্ষ নেতৃত্বের সঙ্গেও একটি অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ বৈঠকে বসছেন তিনি।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ০৭ জুলাই, ২০১৪

    eee


    সূচককে পথ দেখাবে জেটলির আসন্ন বাজেট

    বাজেটের দূরত্ব আর মাত্র তিন দিন। সেনসেক্সের ২৬ হাজার ছুঁতে আর মাত্র ৩৮ পয়েন্ট। বৃহস্পতিবার প্রযুক্তিগত গোলযোগে মুম্বই স্টক এক্সচেঞ্জ ঘণ্টা আড়াই বন্ধ না-থাকলে ওই দিনই পর্দায় সম্ভবত ২৬ হাজার দেখতে পেতাম। এর ঠিক আগে সূচক স্পর্শ করেছিল ২৫,৯৯৯ অঙ্ক। শুক্রবার বাজার বন্ধের সময়ে সেনসেক্সের অবস্থান ছিল ২৫,৯৬২ অঙ্কে।

    অমিতাভ গুহ সরকার

    ০৭ জুলাই, ২০১৪

    eee



    Jul 07 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    ET Pre-Budget Markets Roundtable - FASTEN YOUR SEAT BELTS: WE'RE IN FOR A BULL RUN FASTEN YOUR SEAT BELTS: WE'RE IN FOR A BULL RUN



    

    

    Monsoon may play truant and the Middle East may explode in an orgy of violence, but Indian investors need not be too worried. A rebounding economy and the return of risk appetite could send the Sensex up to 30,000 by March.

    ET Given the various headwinds the government is facing, be it on the in flation front, fiscal front, the economy and investments. What do you think will be the priorities of finance minister Arun Jaitley when he steps in to announce the Budget?

    NEELKANTH MISHRA: My view on the budget is -it's actually a lot less important exercise as it's made out to be. The states matter a lot more than the Central government. Hence, from sheer economic impact, the budget is an arithmetic exercise. If you look at it from a fiscal deficit prospective, there is not much the government can really do. Say, for example, in the US, about 11% of the taxes are corporate taxes.

    In India, it's 34%, so a large part of the tax is hugely unstable. In government expenditure, 10-15% is discretionary, and the rest is salary, interest payments, defense, etc. There is limited room for announcements. If you look at the budget speech itself for the last 20 years, they remain the same, they are written by the same set of bureaucrats. There will be finetuning, some sectors will benefit and some sectors won't. As a policy statement there could be important updates like GST, DTC and so on. With the government less than six weeks in power, I really don't expect too much. The markets have run-up thinking that the budget is going to do great things. Do you think they will be disappointed?

    ANOOP BHASKAR: I think, more than the economy, we have this confluence of events that has happened. If you look at various markets, there is no alternative to India today. For one, we have had good elections in India. Now, going ahead, we have elections in Indonesia, if the outcome is good, then the market attention might shift there. Right now, everyone is looking at India as the only alternative, since there is no other alternative. But these things don't last for too long. Second, we have this confluence of economic cycle which has bottomed out, and the new political cycle is coming at the same time which has lead to huge expectations. In the short term, the markets have voted that things will change very fast. And I don't think there will be any big correction after this budget. I think the real correction, if it would ever to happen, will happen after the next budget. Because, the government then will not have any excuse that they didn't have any time to settle things. So, over the next six months, the government will have enough ammunition, whether in terms of policy reforms to keep the markets up.

    So, only in the next budget, the market is going to decide whether we are going to grow at 6% or it's going to take time longer than that. This budget is just the semifinal. The next budget will be the final which will be more crucial for the markets. Ridham, your views on what will be Jaitley's priorities in this budget.

    RIDHAM DESAI: I agree that the budget will be about government spending which is about one-seventh of the GDP, which is certainly not the biggest driver of the economy. Government spending is at its near low since the revenues have dried up. Now, this quality of spending is crucial to the economy, it matters a lot. Cumulatively, the government has spent about $35 billion in the last five years. To me, the single factor driving inflation is that the Centre on an annual basis is spending $35 billion on subsidies It's a crucial thing -the quality of spending which I would expect the finance minister to do something about. I would not undermine the importance of the budget from the economic stand point. So, if you want to ride on inflation and growth, monetary policy can only do half the job, the other half has to be done by the quality of fiscal spending. My believe is that this is what investors are currently focused on. The level of spending is already low, but how the government spending will determine the outcome of the economy over the next 20-24 months. And this budget is as important as the next one. It's important to know that how the government is going to us its balance sheet -it's not a small number and it's a big balance sheet. Historically, the government has not used its balance sheet well. The markets are talking about divestment programme which is important. For the government, it's important to se up aggressive divestment targets and put money to kick start projects, as private investments are not coming in. Many balance sheets are broke due to which they are not able to raise capital. And these are two important things which the finance minister should focus on in the budget. And these are the two things that will set the stage for recovery in the next 9-12 months. What are the other means to lift investment in the economy?

    RIDHAM DESAI: I think there is a role for the government to play by kick-starting the investment cycle.

    People talk about FDI. Actually, I don't think it's important to increase FDI limits. If you look at FDIs, companies are happy to buy stakes in existing businesses and pay up a very large price. But they are very fearful of setting up new green-field projects, because you need 80 different clearances.

    Instead of liberalising limits, if the government just reduces the number of limits, it will be easier for foreign investors to come and set up green-field projects which will rebound investment climate. . And these things are outside the budget. In the budget itself, the government can kick-start some of the infrastructure spending, which will change the mix of economic spending that is skewed towards consumption to more towards investments. Saurabh, what is the message you are hearing from foreign investors?

    SAURABH MUKHERJEA: Investors have realised that the fiscal room available is very limited. We are half way through the year. And fiscally, we are challenged. I don't think anybody out there is expecting any sort of miracle this year on the fiscal e front. That being said there are three areas where there is a real desire in terms of road maps. The first is the fiscal consolidation road map; there is a great deal of curiosity that how the FM will deliver on this front. From the outside, none of us have the sense t about the pace of fiscal consolidation, and ways and means of consolidation. The second is the GST road map -we are all looking forward to GST to be an nounced whether it's a March 2015 event, or March 2016 event. The third road map is the PSU bank holding company. The government is not in position to recapitalise PSU banks, and we know that Prime minister Narendra Modi is not in favour of priva tisation. We are hopeful that through the Finance Act, the PSU bank holding company will be set up, and we look forward to the timeline when it will be done. These are the three road maps that the inves tors are expecting. If you see two out of the three road maps in the budget, it will be a good budget.

    And if you see one out of the three road maps, then one has to answer foreign investors why we are so keen about this new Dawn of India. And if it's three out of three, then there is nothing like it. I think, this year, fiscal arithmetic will make a difference.

    The history will remember this budget, not because of the big-bang, but because of the process we have began to lay down road maps on the fiscal side, GST side as well as the public sector bank holding com pany side. We have seen the Sensex going up from 17,000 to around 26,000 and the valuations also going up 16 times to its forward earnings. Is there any leg left in this rally or the markets are reaching near to an overvaluation stage?

    NILESH SHAH: From the historical prospective, we are just above the historical valuation. The movement of 17,000 to around 26,000 in a year also tells you that earnings have multiplied in five years. From the valuations point of view, one cannot say we are overvalued. But of course, it's no longer cheap and the index is fairly valued. Now, a lot depends on the government -what steps are being taken to revive growth and investments. Market capital to GDP ratio is not expensive as it used to be dur ing the peak of bull markets.

    There is some room for expansion. The bulk of the problem lies with the revenues as they are limited.

    How do you think the government can achieve the 7% economic growth rate?

    S NAGANATH: I think the key thing is if you infuse clarity in policy-making, streamline and speed up the approval process, they will get investors and industry to start investing. The other thing is psychology. For example, today, we are very bullish. We weren't so bullish 8-9 months ago. Once the corporates are able to raise risk capital, it will help revive the investment cycle. Household savings have gone into properties and gold. What we need now is to move savings into financial assets. Real rates have been flat to negative. One needs to give a positive real rate of return. I would term a proposal -that rather than giving tax incentives to depositors, give them a higher rate of interest. For borrowers, provide them tax incentives, if they repay loans properly. And through this way, the depositor is happy because he is getting a higher rate of return. The bank is happy, because it has got its spreads protected. And though the borrower pays a higher rate of interest, he gets a concession. If the borrower pays the interest on-time, the bank doesn't have any issues since it doesn't have NPAs. From the government point of view, the government saves because it has to less infuse capital into banks, so it matches up.

    In the last few days, about $2.5 billion has been raised through QIPs and many companies have announced their intentions to raise funds though this route. Given the state of the market, is it a good step forward in resolving India Inc's indebtedness problem?

    NEELKANTH MISHRA: If you look at the debt-tomarket cap of the companies that have been declared as NPAs is about 20 times -it was 21 times two weeks back, and now, it may be 18 times. Any amount of equity-raising is not going to be easy. We ran a screen of BSE 500 companies (non-financial) with a market cap of over $400 million and an EBITDA-to-interest of less than 2.5. There are 60 companies in this universe. I think these overleveraged companies need to go up another 100-200%. So, speculation is an art in many ways. If you have to catch the right stock and you move the stock up, if you have moved it high enough that the fund-raising can happen with a minimum dilution and still some balance-sheet repairing happens, then the guy who entered first has made a lot of money. Now, I think the speculators need to move some of these overleveraged stocks up another 150-200% before they start to reach a level where balance sheet repairs.

    NILESH SHAH: We have helped a couple of companies raise money and when you do just a theoretical analysis what you miss out is that where is this latest equity raised going to be used. If it's going to be raised for completing a project which is going to start cash flows and once you hit the cash-flow numbers into projections, things start changing completely.

    Second, if you see India Inc, it's been far more dividend than what it has been raising by way of equity. We expect them to invest with equity and with debt. So, until unless they have access to the equity markets, they are unlikely to come back to the investment mode. In this current cycle, where people can see that they are able to raise equity capital, it will lift the sentiment. This is far better than the September 2013 period when people didn't have the hope that they can raise equity.

    RIDHAM DESAI: Let me just add one point to what Nilesh said. We did an exercise on top 100 companies in India. Their return on assets is well below the mean. That means there is a 50% upside to current consensus estimates for FY16. So, it would not happen in two years.

    But presumably, it happens over three or four years. It is still a significant upside. So don't underestimate the power of a new investment cycle to that extent you know all these calculations and therefore answering your point boils down to specific stocks and companies is that you can end up under estimating all of this a great deal because stocks have gone up and you don't actually see that the earnings can change tremendously over the next 3-4 years. Has the new business cycle started?

    RIDHAM DESAI: It looks at least that the previous one has ended. The jury is still out whether the new one has started or not. If the government does the right things, changes the quality of expenditure and does a few moves on the revenue side, I think you can get a new business cycle going.

    The jury is out and the markets are betting that the new business cycle has started.

    Therefore, the markets could be dead right and we will only know in a year or two from now.

    What about the new credit cycle? Do you think that it has started?

    RIDHAM DESAI: The loan-to deposit (L/D ratio) for banks has maxed out. We don't have room on the balance sheet. So, unless you lift deposit growth, they can't actually lend. On the private sector side, balance sheet debt is sitting right up here. The borrower doesn't have the capacity to borrow, the lender doesn't have capacity to lend. So, how do you get a new credit cycle. The credit cycle will start, but first, I need to see credit deposit growth going up. I need to see deleveraging.

    Both the processes have started now, because real rates are positive, deposit growth is slowly inching higher and deleveraging has started.

    We will get a new credit cycle, but it's not hap pening next quarter.

    SAURABH MUKHERJEA: As I was saying in the CP rate market, you see rates coming down, you see NBFCs becoming a bit more willing to lend. In the FCCB market, we are getting the first signs of the market opening up. That's always the sign that there is a degree of risk appetite out there. You see Indian companies do foreign bond issuances after a long time.

    These signs are there that the credit cycle might turn, but the unfortunate part in all this is for the reader of your newspaper is that in each of these cycles for the first four years con tains 70% of the stock market gains. So, what happens is that people like us debate the PE and the financial statements and intellectu alise it but the really savvy investor out there doesn't really wait for our analysis and as a re sult a ten year economic cycle gets discounted in three max four years. So 3-4 years will con tain 70-80% of the stock market gains. So if you take the election year as T from T to T+4 is pretty much your stock market gains so we can sort of have very clever analysis of PE and do our own forensic analysis but the more aggressive FIIs that I'm seeing the first time in four years they are calling me up and saying look just get the stock pay a 10% premium get the stock we have the intellectual discussion a year later.

    NEELKANTH MISHRA: If you look at the global bond markets there has been a surprising return of risk appetite duration and euphoria and I think that that has a big role to play in the valu ations and the second thing is the bottoming of the Indian economy which is something we have not seen happen elsewhere so those are issues and if I talk to some of the really long term fundamental guys they are only excited about India forget about the elections we only worry about the elections because there is some volatility but what we are excited about India is that the growth has bottomed. See we like to com pare ourselves to Russia, Brazil, Mexico and China, per capita GDP wise we are one-fifth to one-seventh of those economies many of these economies are caught in the middle-income trap. We have a straight run of 20 years before we get into that middle-income trap so let's not equate ourselves to that but we have to under stand that it's a return of global risk appetite which is also driving up the markets and geopolitics is becoming incredibly difficult to project right now.

    What do you think of PSU stocks? Should inves tors buy into them ?

    SAURABH MUKHERJEA: I think we have to break the PSU's up there is the banks and the oil & gas complex, there is the metals, mining type complex. Let me just take one by one.

    On the bank PSUs my reckoning is unless we have some visibility on the PSU bank hold-co there is very little basis for calling up clients and say buy a PSU bank because unless there is visibility on what exactly is the road map for the capitalization and perhaps ultimately the professionalization you really can't jus tify a one times book value for most of these entities so the budget will be relatively a sig nificant event or some pronouncement from the FM on the Nayak committee report. I find it very interesting the Nayak committee report came out on the 14th May we are one and half months into it and New Delhi has not said one word about it. Coming to the oil & gas complex, I think ONGC and Oil is relatively clear that the subsidy burden throttles off and the fuel gradually gets deregulated over 2-3 years period ONGC and Oil will be natural beneficiaries. The question then becomes once the balance sheet becomes stronger what will that surplus be used for will that surplus be used for buying gas blocks in Angola or Columbia and so on in which case we will have to figure out will that be a good thing for shareholders but just taking it very simplistically if get visibility on fuel deregu lation those two stocks become relatively interesting I'm not so sure about the oil mar keting companies my reckoning is that if you deregulate the fuel then the Reliance and the Essars will start competing for equal footing with the OMCs and I'm not so sure that peo ple should be buying those stocks given how much they have run up. Finally the natural resources complex, where Coal India is natu rally focused for the government, my reck oning is this as close to a one way bet as you can get over a one year I see coal production volumes go up. Once again you come to key issue Coal India's cash surplus will become big number 1-2-3 years down what would this government do with the cash surplus. If I look at what GSFC and GMDC have done with their cash surplus is not a very happy story that makes me hesitate a bit on Coal India but the near term story will be volume growth steps up and Coal India has a decent run but there is a big question mark on all the PSUs what would be this government's stance on the cash surplus on the balance sheets of the PSUs we don't know that yet, that I think is the big uncertainty.

    Oil and gas stocks seem to be everybody's fa vourite. What are your views?

    RIDHAM DESAI: I don't think there is much of an ambiguity, I think we are on our way to dereg ulation. I think the question is about timing whether it happens in the next month or it hap pens in the next 6-8 months, but largely I think the sector will be deregulated. So I expect die sel to be price-control free, petrol is already there.

    I think at some point of time you will see kerosene price hikes. I'm not sure if it happens on the budget day, but if it happens the markets would love it. But it will happen over time, government has to do. The NDA in its previous avatar had recommended deregulation of fuel and then it got all derailed and we have lost 10 years now. So I think the oil & gas sector will see normalisation of earnings over the next 3-4 years, which would represent a big upside to earnings and the stocks still are cheap and so investors should stay invested there.

    How will the poor monsoon impact industry?

    NEELKANTH MISHRA: It depends on whether the monsoon will be below 40% or 7% of the normal as IMD has predicted. If it is 7% below normal, it's not going to be a big worry, but if its 40% below normal, then it will be a big worry as it will impact agricultural production and lead to a rise in prices of essential commodities. From an impact perspective, I think the lack of water will impact many industries.

    Food inflation will remain high. In this scenario, the central bank may think of hiking rates. The cost of producing vegetable or milk or eggs will also go up. Labour is not cheap.

    Labour is expensive in China too. So why is it that their inflation is not so high? Because their productivity is improving. In our case, the productivity is not improving even while the cost of labour is going up. So that is the challenge as labour is a big input.

    RIDHAM DESAI: Productivity is key. I agree with Neelkanth. But there can be short-term improvement there as well. So, I would not completely rule out a deceleration in food inflation. If inflation stays high, then growth will be difficult to come by. So it is imperative for the inflation to go down. I do see there is scope for productivity improvement in the near term. I do see a role of demand management and not just supply, which is a longerterm thing that will take 3-5 years to fix. In the meanwhile, if you can address the demand side and productivity, you can lower inflation.

    The RBI has set very realistic target and they are not impossible to achieve. But if we get there as per the RBI estimate of 4% by January 2015, I expect some steps in rate cut direction.

    What are the sectors that you think that investors should look out for now?

    ANOOP BHASKAR: I think one should let go of the two extremes and choose the middle path.

    Only when you play the middle ground, you tend to miss the extreme moves of the market.

    So for us, we are telling investors that when you see markets discounting 2-3 years, one should be realistic and cautious. Because a lot can happen in 18 months. We have moved up too fast too soon based on expectations that only time will tell. So investors should play the market more realistically. Mutual fund investors should understand that there has been no mutual fund investor who has become Rakesh Jhunjhunwala. The problem is that investors in India eschew equities and fall in love with it at the wrong time. So our advice is that they should do it more gradually like PF or PPF. The problem is that everyone wants to be a fund manager and time the market. We are in for good days but the extent of it can be debated.

    S NAGANATH: I think there is high probability that the Sensex will double from the current levels in three years.

    RIDHAM DESAI: I can back it up with numbers.

    Right now the profit share of corporate India in GDP is about 4.9%, which at its peak was 6.7%. There is a good chance we will be somewhere between the trough and the top in three years from now. Let's assume for the argument purpose that we are at 6%.

    GDP growth nominal growth, assume only 12%. Because that sets the ball for nominal profit growth. 3-4 years whatever is the time frame nominal growth would be about 22%.

    Because when corporate profit and GDP go up, nominal GDP grows. So you calculate this with the Sensex and you will arrive at a level that is double from here. That too without any change in valuations and even if you take the PE multiple down from 18 to 16.

    NILESH SHAH: Look at it from the other way. Till now most of our rallies are driven by FIIs.

    In the month of May alone, we got Rs1,800 crore in domestic mutual funds. In June, I think it is around `7,000 crore. Now, domestic retail investors generally invest based on the performance of the past one year.

    For the last 1-2 years, equities have outperformed real estate, fixed income significantly.

    So, I believe that this trend of `7,000-crore inflow a month would continue and accelerate.

    So are you saying that retail investor is coming back and he will continue to come back in increasing numbers?

    NILESH SHAH: They are coming for wrong reasons, but they are coming to the right place at the right time. I would like to share a SMS that I got this morning (no bias to anyone). It says that if you had invested `5 lakh in HDFC Equity Fund in January 1, 2003, its value on June 30, 2014, is `92 lakh. Another example is Sundaram Select Midcap, whose value has moved from `5 lakh to `1.26 crore in the same period. So you would have moved from Dzire to Jaguar. Such is the power of equities. And this is after we have seen worst of the crisis and inflation.

    So do you agree with Nagnath that the Sensex would double in three years?

    NILESH SHAH: My feeling is that we are in a multi-year bull run and if the inflow of money into market continues then we will go from fair value (of stocks) to over value.

    SAURABH MUKHERJEA: The only reason that I'm trying to inject a word of caution there is that the Indian investor's investment is more like hot money compared to even foreign flows. Foreign money coming to India has been relatively steady. And, hence, the fact that the foreign investor remains resolute is a source of comfort given the domestic investors' jittery behavior.

    NILESH SHAH: We have to divide domestic investors in three parts -retail, HNI and institutions. If you see the IPO analysis, which is more reliable, you would notice that every single IPO, which has delivered good returns, has seen an increase in the retail investor base. Take the analysis of last eight years in any company where management has delivered and the stock price has gone up, the retail investor base has kept expanding.

    Some of the best delivery has actually come in PSU banks because these shares were issued at relatively cheap levels. In all PSU banks, despite all the issues, the shareholder base has kept expanding as the stocks have delivered from their IPO price. It is the high net worth individuals segment where the flip-flop occurs. They are momentum chasers and smart guys, but they end up coming in at the wrong time, exiting at the wrong time and losing money.

    RIDHAM DESAI: The point that Anoop made is more important for retail investors which is systematic investment. It's not about trying to be smart and say that oh this is the bottom or peak. We really don't know bottom or top, but if you keep investing every month like PF, it helps, which I think is a great example.

    What sectors do you recommend?

    RIDHAM DESAI: I think cyclical sectors should do well, but it's all a question of time frame actually.

    Cyclical seems too broad.

    RIDHAM DESAI: I will elaborate. If the time frame is 1 year to 18 months, then cyclicals like energy, materials, banks and autos could do well. I think consumer staples would struggle on a 1-2 year time frame. If you are looking for longer term (5-7 year period), then you have to buy financial services and consumptionrelated stocks. These are the sectors that will do the best.

    What about IT?

    RIDHAM DESAI: I'm bullish on IT on a 1-2 year basis. I think the US growth story looks very strong. IT orders will look good. I don't think the rupee is going to appreciate a lot. On a real account basis, the rupee is losing value on inflation differentials. So, if you let the rupee appreciate on a nominal basis, the gap widens.

    So, instead of that the RBI would buy dollars and accumulate reserves. Therefore, I think IT should do well over a 1-2 year time frame.

    Stocks of infrastructure owners and not necessarily builders will do well. Those who own the asset.

    Naganath, your favourite sectors?

    S NAGANATH: I agree with what Ridham said.

    Is there a chance of earnings upgrade in the next 1-2 quarters?

    ANOOP BHASKAR: I expect that earning cuts will continue. I think FY15-16 will end up at around 10% (earnings) growth. So earning cuts will continue.

    So what would be the consensus for earnings estimate for FY16?

    NEELKANTH MISHRA: I think FY15 is right now at about 14% and FY16 is at about 17-18%. But I expect both to be below estimates. I would expect that this year we settle at about 8-10%.

    What about the Sensex and the Nifty target?

    NEELKANTH MISHRA: I would expect the PE multiples can go up to about 18 times and I think EPS growth about 10%. Depends on whether it happens in 12 months or six months. S NAGANATH: I think this year it will be like 5 to 5 and ½% GDP, and earnings growth at about 13-14%. The next year is what I see the big impact on GDP when it could go up to 7% and earnings growth to 20%.

    RIDHAM DESAI: I'm not very differently positioned than Neelkanth. I think it could be 8% earnings growth for the broader marker (BSE 500) for the next 12 months. I have greater confidence in broader market numbers than I have in the Sensex and the Nifty. Both are very concentrated and 1-2 companies can make a huge difference. The share of global-related stocks is much higher than in the broader market. For FY16, the number accelerates to 1314% and up to 20% earnings growth by FY17. We have a Sensex forecast which is a lot higher and it is 19% for FY16.

    So, actually it is higher than the consensus. It is driven by belief that larger companies will benefit first from the revival of the economic cycle than the broader market.

    In the second year, the broader market will overtake the large-cap companies in earnings growth. So, in FY16, the Sensex to have 19% earnings growth but broader market at 13%.

    In FY17, both of them are estimated to go to 20% earnings growth.

    My printed Sensex target is 26,300, which looks conservative now, but it's a bit dated. It was for March next year, but it was published a while back. But I have a bull case of 31,000 Sensex, which was based on a very simple model. In 2009 May, the market was trading at 18 times earnings and by October 2010 the price-to-earnings multiple went to 24. It was primarily driven by very strong global revival and very surprising election results. Though we had such a big multiple revision, we did not get such a big earnings cycle. But the markets went up a lot because of that. So why would that not happen now? So in the bull case, the market in my view is 31,000 Sensex by March 2015, which is another decent upside from here. But we will wait for the budget and see what kind of policy action we get before we take any action.

    SAURABH MUKHERJEA: In Indian market case, neither forward PE nor EPS has any predictive bar in terms of calling the market. So con sensus revision to EPS, as my counterparts are pointing out, often tends to go in opposite direction of the market. So, we will all like to have crystal balls and predict the market, but unfortunately we can't.

    What is your number for Sensex?

    SAURABH MUKHERJEA: My number is 30,000 for the Sensex, but I haven't based it on EPS and PE multiples because there doesn't seem to be any logical way to use PEs to arrive at the Sensex targets. The best that we have been able to do is use historical experience to say that the first three years of recovery tend to be roughly 30% return. But giving out Sensex target is the most difficult part of the job.

    For full interview, log on to http://www.economictimes.com











    

    




    0 0

    निनानब्वे फीसद जन गण पर घात लगाकर हमला बाजार का

    पलाश विश्वास


    हमने इस बीच सरकारी महकमों और उपक्रमों के अफसरान और कर्मचारियों से कोलकाता,दिल्ली और मुंबई में बात की है।लिख तो रहे हैं लगातार।


    मुंबई में रेलवे वालों से रेल बजट पेश होने के बाद रेलवे के निजीकरण के बारे में पूछा तो उनका कहना है कि मुंबई में निजीकरण की कोई चर्चा नहीं है।यही हाल कोलकाता और दिल्ली का है। हम सिर्फ अपने लिक्खाड़ प्रतिबद्ध मित्रों से बाकी गौण मुद्दों को छोड़ आर्थिक नरसंहार के मुद्दों पर फोकस करने का निवेदन कर रहे हैं।


    इससे जन जागरण हो या नहीं,किसी एक अंबेडकर,गांधी,नेल्सन मंडेला या मार्टिन लूथर किंग की दृष्टि के बंद दरवाजे खुलें तो भी हालात बदलने की पहल हो सकती है।


    इस उम्मीद के सिवाय जो हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं,उनमें किसी तरह का हस्तक्षेप अस्मिताओं के घटाटोप में असंभव है।


    रेल मंत्री ने जहां अहमदाबाद-मुंबई रूट पर बुलेट ट्रेन चलाने का ऐलान किया, वहीं रेलवे को विश्वस्तरीय बनाने के लिए टेक्नोलॉजी और एफडीआई के भरपूर इस्तेमाल की इच्छा भी जाहिर कर दी।रेल बजट आने के बाद आज के अहम ऐलानों पर रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने न सिर्फ रेलवे में उम्मीद से ज्यादा निवेश आने की बात कही, बल्कि जल्द से जल्द एफडीआई पर फैसला होने का भरोसा भी जताया।


    रेलवे में एफडीआई पर रेल मंत्री ने कैबिनेट से मंजूरी मांगी है। लेकिन, रेलवे ऑपरेशंस में सरकार की विदेशी निवेश लाने की योजना नहीं है। रेलवे के बड़े प्रोजेक्ट पीपीपी के जरिए पूरे किए जाएंगे।रेल मंत्री ने पीपीपी के जरिए बड़े प्रोजेक्ट लाने पर जोर दिया है। साथ ही रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में एफडीआई लाने के लिए कैबिनेट से मंजूरी मांगी है। पोर्ट को रेलवे से जोड़ा जाएगा और सब्जियों-फलों के लिए स्पेशल स्टोरेज होगा। कोयला खानों के लिए अलग लाइन बनाई जाएगी। यही नहीं अब ट्रेनों में ब्रांडेड खाना मिलेगा और खराब खाने की शिकायत के लिए हेल्पलाइन बनाई जाएगी।


    बुलेट ट्रेनों का डायमंड चतुर्भुज बनाया जाएगा और मुंबई-अहमदाबाद के बीच पहली बुलेट ट्रेन चलेगी। बुलेट ट्रेन के लिए 9 लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा। आरपीएफ में 17,000 नई भर्तियां होंगी, तो महिला बोगी में महिला सिपाही की तैनाती होगी। रेलवे की ओर से 4,000 महिला कांस्टेबलों की भर्ती की जाएगी।


    हालांकि रेलवे की हकीकत पर भा एक नजर डालने की जरूरत है। बुलेट ट्रेन के लिए 9 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है, लेकिन इस साल रेलवे को 1.49 लाख करोड़ रुपये की आमदनी की उम्मीद है। पैसे की कमी के रेलवे के 359 प्रोजेक्ट लटके हैं और 9 साल में 99 योजनाओं का ऐलान हुआ है।



    रेल राज्यमंत्री के मुताबिक रेलवे में एफडीआई पर वाणिज्य मंत्रालय को प्रस्ताव दिया है और जल्द एफडीआई पर फैसला होगा। साथ ही बुलेट ट्रेन सपना नहीं बल्कि इसे हकीकत बनाएंगे। फ्रेट कॉरिडोर की हर महीने मॉनिटरिंग होगी और जल्द से जल्द फ्रेट कॉरिडोर का काम पूरा होगा।



    नमोमय देश के नई सरकार के रेल बजट से बहरहाल यह भी साफ हो ही गया  कि रेलवे के अलावा इस पूरे देश का किस हद तक निजीकरण किया जाएगा और कहां तक आर्थिक सुधार लागू किए जाएंगे। लेकिन यह संपूर्ण निषिद्ध विषय है और इसी स्थायी गपनीयता प्रयोजन से सूचना निषेदध की गरज से रेलबजट जरिये निजीकरण का ऐलान धर्मयोद्धा प्रधानमंत्री ने कश्मीर से ही किया है।


    नीतीश कुमार की प्रतिक्रिया से तस्वीर भले ही कुछ साफ नजर आती है लेकिन दृष्टि्ंध धर्माध देश के पढ़े लिखे लोग आयकर छूट का कयास लगा रहे हैं या मरणासम्ण ब्राजील फुटबाल के लिए मरसियापढ़ रहे हैं।बहरहाल पूर्व रेलमंत्री का यह बया दलचस्प है कि रेलवे का हेल्थ सही कर दो फिर बुलेट ट्रेन लाओ। अहमदाबाद और मुंबई के बीच क्या कमी है? वहां पहले से ट्रेनें उपलब्ध हैं, तो बुलेट ट्रेन का मतलब क्या? जो इलाके पहले से पिछड़े हैं जैसे छत्तीसगढ़, बिहार, असम, राजस्थान, मध्य प्रदेश वहां के बारे में रेल बजटमें कुछ नहीं है।


    मोदी सरकार के पहले रेल बजटमें उम्मीद के मुताबिक यात्री सुविधाओं पर काफी जोर दिया गया है। केंद्रीय रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने मंगलवार को लोकसभा में बजट पेश करते हुए लोगों के लिए नई सुविधाओं के साथ ही पुरानी सुविधाओं को बेहतर बनाए जाने की घोषणा की। इसमें ट्रेनों में लोगों के लिए पेड वर्कस्टेशन से लेकर ब्रैंडेड खाने जैसी सुविधाएं शामिल हैं। बजट में स्टेशनों पर कई बेहतर सुविधाओं की घोषणा की गई। यात्री अब रिटायरिंग रूम की ऑनलाइन बुकिंग करा सकेंगे। बजट में दी गई मुख्य यात्री सुविधाएं- - इंटरनेट के जरिए प्लैटफॉर्म टिकट बुक हो सकेंगे।

    दरअसल ये सहूलियते निजीकरऩ की सार्थक दलीलें हैं और निजीकरण मार्फत ही प्राप्त होनी है ये सुविधाएं।इसीके तहत हाल में ही किराए भाड़े में अच्छी खासी बढोतरी के बाद रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने अपने पहले रेल बजटमें किराये-भाड़े का बोझ और नहीं बढाया है। बजट में रेलवे की हालत दुरूस्त करने के लिये सुधारवादी कदमों पर जोर देते हुए निजी तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने के प्रस्ताव किए गए हैं ताकि परियोजनाओं के लिए धन की कमी से निपटा जा सके। लोकसभा में 2014-15 का बजट पेश करते हुए गौड़ा ने यात्री सेवाओं में सुधार, बुलेट ट्रेन की शुरुआत, रेलवे के बुनियादी ढांचे में विदेशी और निजी पूंजी निवेश आकर्षित करने की कई अभिनव पहल की घोषणा की।


    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि इस बार का रेल बजट देश की ग्रोथ बढ़ाने वाला रेल बजट है। नए बजट से यात्रियों के लिए सुविधाएं बढ़ेगी और रेल बजट से यात्रा और सुखद बनेगी। अब तक रेलवे पर ध्यान नहीं दिया गया जिसका खामियाजा रेलवे भुगत रहा है।


    इस योगाभ्यास का मतलब भी वही पीपी माडल।


    अब प्रचार सुनामी यह है कि यह रेलवे बजटभविष्यवादी, वृद्धि आधारित और आम आदमी के लिए है। प्रधानमंत्री के अनुसार रेल बजटमें बेहतर सेवा, गति और सुरक्षा को ध्यान में रखा गया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि रेल बजटनई सोच के साथ आगे बढ़ने की जरूरत को प्रस्‍तुत करता है। ये बजट रेलवे को आधुनिक बनाने वाला और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। इसमें नए विजन का समावेश है। उन्‍होंने यह भी कहा कि आजादी के बाद से रेलवे पर समुचित ध्‍यान नहीं दिया गया। जबकि देश के विकास में रेलवे अहम भूमिका निभाता है। पीएम ने कहा कि ये 21वीं सदी का बजट है। इस बजट में जो पहल की गई हैं, उससे विकास की अलग रुपरेखा सामने आएगी।


    वहीं विपक्ष ने मोदी सरकार के रेल बजट को बहुत अव्यावहारिक बताया है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने मोदी सरकार ने सीधा सवाल करते हुए कहा कि योजनाएं तो बहुत बना ली हैं, लेकिन पैसे कहां हैं। कांग्रेस ने मोदी सरकार के पहले बजट की ये कहते हुए आलोचना की है कि इसमें नया कुछ नहीं है। पूर्व रेल मंत्री पवन बंसल ने कहा कि एफडीआई, आईटी के अधिक से अधिक इस्तेमाल की बात पहले से ही चल रही है।


    बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने हाईस्पीड ट्रेन का तो स्वागत किया है लेकिन साथ ही ये भी पूछा है कि खराब पटरियों को सरकार कैसे ठीक करेगी।


    हांलाकि रेल बजट के उम्मीदों पर फेल होने से बाजार में 2 फीसदी की गिरावट आई। सेंसेक्स 518 अंक टूटकर 25582 और निफ्टी 164 अंक टूटकर 7623 पर बंद हुए। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर 3.6-4.2 फीसदी लुढ़के।रियल्टी शेयर 7 फीसदी और पावर शेयर 6.5 फीसदी लुढ़के। कैपिटल गुड्स, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, मेटल, ऑयल एंड गैस शेयर 5-3 फीसदी टूटे। ऑटो, बैंक, हेल्थकेयर, तकनीकी, आईटी शेयर 2.2-1 फीसदी गिरे। एफएमसीजी शेयर 0.5 फीसदी फिसले।


    जबकि बाजार ने आज शुरुआत तेजी के साथ की। बाजार लगातार चौथे दिन नई रिकॉर्ड ऊंचाई पर खुले। निफ्टी ने पहली बार 7800 का स्तर पार किया। सेंसेक्स ने भी तेजी का नया रिकॉर्ड बनाया।सेंसेक्स ने 26190.4 और निफ्टी ने 7808.8 के नए लाइफ हाई बनाए। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी मजबूती दिखी।रेल बजट के बाद बाजार में गिरावट हावी हुई। सेंसेक्स 250 अंक से ज्यादा टूटकर 25900 के नीचे पहुंचा। निफ्टी करीब 100 अंक गिरकर 7700 के नीचे फिसल गया। मिडकैप-स्मॉलकैप शेयर भी टूटे।


    दोपहर 2 बजे के बाद बाजार लड़खड़ा गए। कारोबार खत्म होने तक बाजार में गिरावट गहराती चली गई। सेंसेक्स 605 अंक टूटकर 25500 के नीचे पहुंचा। निफ्टी 191 अंक टूटकर 7600 के नीचे फिसला।



    कितने लोगों की नौकरियां छिनी जा रही हैं और कितनों की आजीविका ,पिछले तेइस सालों में इसका कोई हिसाब किताब मिला नहीं है।


    कितने लोग जल जमीन जंगल आजीविका नागरिकता मनावाधिकार और नागरिक अधिकारों से बेदखल हो गये,किसी के पास यह हिसाब नहीं है।


    ममता दीदी ने करोड़ नौकरियां  देने का वायदा किया था। क्या हुआ सबको मालूम है।

    रेल बजट में नई रेलगाड़ियों,नई परियोजनाओं,बुलेट ट्रेनों के साथ रेलवे में इक्कीस हजार नौकरियों का झुनझुना बजाने के अलावा विनिवेश,निवेश,विनियंत्रण,विनियमन और निजीकरण की कोई चर्ची कहीं नहीं है।


    आम जनाता को तो यह मालूम नहीं है कि यह पीपीपी माडल किस सौंदर्य प्रसादन का नाम है और इसे लगाना है .खाना है या पीना है।


    बहरहाल यह गुजरात माडल है।मुक्त बाजार का माडल यानी निनानब्वे फीसद जनता पर घात लगाकर बाजार का हमला।


    मुक्त बाजार की एंबुश मार्केटिंग है यह और पूंजी का राजसूयवैदिकी महायज्ञ।


    धर्म राजनीति और पूंजी के त्रिभुज से रसायनिक युद्ध है यह जन गण और गणतंत्र के विरुद्ध।


    जबकि खबर कुछ इसतरह लिखी जा रही है कि रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने मोदी सरकार का पहला रेल बजट बुलेट ट्रेन और सेमी बुलेट ट्रेन की सौगात से किया। साथ ही भारतीय रेलवे की स्थिति को सुधारने के लिए निजी निवेश को आमंत्रित करने की बात की।


    नरेंद्र मोदी ने चुनाव में भारतीय रेलवे का जो ब्लू प्रिंट देश के सामने रखा था, कुछ वैसा ही रेल बजट रेल मंत्री ने पेश किया। मोदी सरकार यात्रियों के लिए सुविधाएं बढ़ाने और सुरक्षा पर ध्यान दिया है। रेलवे को आधुनिक बनाने के लिए सरकार पीपीपी मॉडल पर जोर देगी।


    यानी पीपीपी माडल महाअमृत है और इसे चाखने से ही श्रद्धालु जनता को मोक्ष मिल जायेगा और सारी भव बाधाें दूर हो जायेंगी।


    श्रमकानूनों में सुधार के बारे में किसी की कोई धारणा नहीं है।


    मीडिया के मित्रों ने श्रमसुधारों के बारे में आज एक बड़े अंग्रेजी अखबार में लीड छपने के बाद इस पर अभी आपस में चर्चा शुरु की है,कब लिखेंगे,बता नहीं सकते।


    सरकारी उपक्रम ओएनजीसी के सेल आफ पर 35 हजार करोड़ का सौदा फाइनल है।कोल इंडिया को बेचने की पूरी तैयारी है।दूसरी कंपनियों और सस्थानों का सौदा भी तय समझिये।तेल गैस,कोयला,इस्पात,खनन, ऊर्जी,औषधि,बैंकिंग,रेलवे,पोर्ट में आगजनी के बाद रक्षा और आंतरिक सुरक्षा से राष्ट्रद्रोह के  बाद यह जंगल की आग खेतों, खलिहानों, घाटियों, नदियों और समुंदर को भी जलाकर खाक करने वाली है।


    लेकिन देश के लोग आंखों पर पट्टी डाले,कानों में रुई ठूंसे बुलेट ट्रेन की धर्मोन्मादी अनंत शपर के ख्वाबगाह में है और कत्लगाहों की कोई खबर उन्हें है नहीं।श्मशान और कब्रिस्तान का दायरा बेहिसाब बढ़ता जा रहा है और हमें सिर्प अपनी सहूलियतों की चिंता है।


    इसी बीच सरकार ने सरकारी उपक्रमों की पूंजी का चालीस फीसद हिस्सा म्युच्यल फंड में डालना तय कर लिया है।


    सेबी के नियम ऐसे बन रहे हैं कि विदेशी पूंजी विनियमन और विनियत्रण के मारफत पूरा देश और देश के सारे संसाधन विदेशी लूटेरों के हवाले कर दिये जाये।


    रेलमंत्री ने एक पंक्ति में बता दिया है कि परिचालन को छोड़कर रेलवे में सर्वत्र निजी पूंजी का स्वागत है।


    इसके बावजूद खुद रेलवे वालों को माजरा समझ में नहीं आ रहा है।रेलवे के परिचालन में कितने लोग लगे हैं और बाकी रेलवे में कितने लोग,इसका भी अंदाजा किसी को नही है।


    यह बजट इस मायने में अभूतपूर्व है कि बजट सीधे प्रधानमंत्री की निगरानी में बन रहा है और उसमें योजना आयोग की कोई भूमिका नहीं है।


    वित्त मंत्री की भूमिका कितनी है और कारपोरेट लाबििंग की कितनी बदली परिभाषाओं, आंकड़ों,रेटिंग और साढ़ों की उछलकूद में उसका भी सही सही अंदाजा लगाना मुश्किल है।


    नई सरकार का कोई मुख्य आर्थिक सलाहकार भी नहीं है।


    पहलीबार व्यय सचिव और राजस्व सचिव बजट तैयार में खास भूमिका निभार रहे हैं और आर्थिक समीक्षा भी खानापूरी है।


    जिस अंदाज में रेलवे के निजीकरण को अंजाम दिया गया और ओएनजीसी का बंटाधार पाइनल हो गया,जनता को सूचना हो या नहीं,शेयर बाजार में हड़कंप मच गया।


    सरकारी उपक्रमों और कंपनियों के तमाम शेयरों का सफाया शुरु हो गया है क्योंकि बाजार में उनके शेयर खरीदने वाले लोगों को मालूम हो गया कि बजट अब बूम बूम प्राइवेटाइजेशन है और विनिवेश की बुलेट ट्रेन चल पड़ी है।


    हम शुरु से कह रहे हैं कि दाम और भाड़ा बढ़ना कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं है।


    परिवर्तन है विनियमन और विनियंत्रण का।


    परिवर्तन है रक्षा समेत सारे संवेदनशील सेकटरों में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का।


    परिवर्तन है निजीकरण और श्रम कानूनों को खत्म करके श्रमिक तबके की आजीविका छीनने और निजी पूंजी के जरिये पीपीपी माडल मार्फत कृषि जीवी जनगण का नरसंहार का।


    बुलेट ट्रेन इसका जीता जागता प्रतीक है।


    एक बुलेट ट्रेन पर साठ हजार करोड़ रुपये खर्च होने हैं।


    विमानभाड़े से दोगुणी रकम का भाड़ा चुकाने वाले देश के एक फीसद मलाईदार सत्ता वर्ग के अलावा कौन है,किसी को नहीं मालूम।


    मुकम्मल रेलबजट में कुल राशि अंतरिम चुनावी रेल बजट से कम है और तमाम पुरानी योजनाएं शुरु न होने के बहाने खारिज है।


    मेट्रो और बुलेट ट्रेन परियोजनाओं पर जिसका वर्चस्व होगा,ओएनजीसी की हत्या से फायदा उसीको होगा।


    रेलवे निर्माण विनिर्माण कंपनियों में हड़कंप इस भावी एकाधिकार से भी मचा है।


    रेलवे की पुरानी परियोजनाएं नई बेशकीमती बुलेट ट्रेन सरीखी परियोजनाओं में निजी देशी विदेशी पूंजी के इंतजार में खारिज की जा रही हैं तो विकास के लंबित लाखों करोड़ की परियोजनाओं को तमाम कायदा कानून के निजी पूंजी के हक में हरी झंडी दे दी जा रही है।


    जल जंगल जमीन आजीविका और नागरिकता,मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों से बेदखली के लिए राष्य्र की युद्ध घोषणा भी निजी पूंजी के हक में है।


    बजट सत्र की पूरी प्राविधि और प्रक्रिया,संसदीय राजनीति कुल मिलाकर नब्वे फीसद जनता के खिलाफ घात लगाकर हमला है।क्योंकि जनता को इस एकाधिकारवादी जसंहारक हमले के बारे में कोई खबर ही नहीं है।अब जनांदोलन से बड़ा कार्यभार तो मूक वधिर बहुसंख्य जनगण को हकीकत बता देने की है, जिसकी हिम्मत पढ़ा लिखा तबका कर नहीं रहा है।


    लोग प्रत्यक्ष विदेशी निवेश,विनियमन और विनियंत्रण का विरोध नहीं कर रहे हैं।


    विनिवेश के खिलाफ कोई आवाज बुलंद नहीं हो रही है।


    रेलवे भाड़े को फ्यूल सरचार्ज से जोड़ दिया गया है और तेल गैस की कीमतें विनिंत्रित हैं, जो बाजार दरों से संबध्द होने के कारण बिना सरकारी हस्तक्षेप के बदलती रहती हैं।


    इस तरह बिना रेलवे भाड़े को विनियंत्रित किये फ्यूल चार्ज के जरिये रेलभाड़े को भी डीरेगुलेट डीकंट्रोल कर दिया।


    जैसे मुंबई मेट्रों के किराये रिलायंस ने तय किये हैं,उसीतरह रेलभाड़ा और तमाम सेवाओं की कीमतें निजी पूंजी के पीपीपी माडल जरिये देशी विदेशी निजी कंपनियां करेंगी।


    रेल भाड़ा के खिलाफ राजनीतिक नौटंकी में ये मुद्दे सिरे से अनुपस्थित हैं।


    जबकि भारतीय रेल नेटवर्क को विश्वस्तरीय बनाने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन आज के रेल बजट में साफ दिखा। रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने बजट भाषण में कई ऐसे ऐलान किए जो मोदी विजन को पुख्ता करते हैं। इनमें पहला ऐलान है- देश में बुलेट ट्रेन चलाने का। रेल मंत्री ने बताया कि मुंबई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन चलाई जाएगी। यही नहीं, हाई स्पीड ट्रेनों का एक डायमंड चतुर्भुज भी बनाने का ऐलान हुआ है, जो देश के चार महानगरों को एक-दूसरे से जोड़ेगा। इस प्रोजेक्ट पर 9 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। रेलवे की योजना 9 चुनिंदा सेक्टरों में ट्रेनों की स्पीड को 160 से 200 किलोमीटर प्रति घंटा तक करने की भी है।


    नरेंद्र मोदी के विजन के मुताबिक कई स्टेशनों को इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के मुताबिक विकसित किया जाएगा। साथ ही, पूरे देश में रेलवे की सर्विस को विश्वस्तरीय बनाने के लिए जिन सुविधाओं की बात की जा रही है, उनके लिए बड़े पैमाने पर संसाधनों की जरूरत है। इसके लिए सरकार पीपीपी मॉडल को बढ़ावा देने के अलावा रेलवे के आंतरिक संसाधनों और एफडीआई का भी सहारा लेगी। रेल मंत्री ने साफ किया कि रेलवे के जो भी नए प्रोजेक्ट आएंगे, उनके लिए संसाधन पीपीपी मॉडल के जरिए ही जुटाए जाएंगे।


    रेल मंत्री ने इस बजट में ज्यादा नई ट्रेनों का ऐलान नहीं किया। कुल 58 नई ट्रेनों का ऐलान किया गया जिनमें बुलेट ट्रेन के अलावा 5 जनसाधारण, 5 प्रीमियम और 6 एसी एक्सप्रेस ट्रेन और 27 नई एक्सप्रेस ट्रेन चलाने की घोषणा की गई है। इसके अलावा 8 नई पैसेंजर ट्रेनें चलाई जाएंगी और 11 ट्रेनों के दायरे बढ़ाए जाएंगे। कुल मिलाकर इस रेल बजट के जरिए मोदी सरकार ने ये संकेत दे दिए कि रेलवे को विश्वस्तरीय बनाने के उसके फॉर्मूले में तीन चीजों- स्पीड, सिक्योरिटी और सर्विस पर ही सबसे ज्यादा जोर रहेगा।



    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मंगलवार को संसद में पेश रेल बजट में पारदर्शिता और ईमानदारी पर ध्यान दिया गया है। उन्‍होंने कहा कि रेलवे बजट भारत के विकास को जहन में रखता है।

    यह रेलवे बजट भविष्यवादी, वृद्धि आधारित और आम आदमी के लिए है। प्रधानमंत्री के अनुसार रेल बजट में बेहतर सेवा, गति और सुरक्षा को ध्यान में रखा गया है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि रेल बजट नई सोच के साथ आगे बढ़ने की जरूरत को प्रस्‍तुत करता है। ये बजट रेलवे को आधुनिक बनाने वाला और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। इसमें नए विजन का समावेश है।

    उन्‍होंने यह भी कहा कि आजादी के बाद से रेलवे पर समुचित ध्‍यान नहीं दिया गया। जबकि देश के विकास में रेलवे अहम भूमिका निभाता है।   

    पीएम ने कहा कि ये 21वीं सदी का बजट है। इस बजट में जो पहल की गई हैं, उससे विकास की अलग रुपरेखा सामने आएगी। हमने बहुत कम समय में ज्‍यादा काम किया है और पहली बार रेलवे के लिए विकास वाला बजट पेश किया गया। उन्‍होंने कहा कि रेल के माध्‍यम से देश को ऊंचाइयों पर पहुंचाने का हमारा मकसद है। इसमें विकास के साथ विस्‍तार पर भी ध्‍यान दिया गया है। विकास की गति को, विकास की ऊंचाई को आरंभ किया गया है। इससे देश के विकास को काफी तेज गति मिलेगी।

    उन्होंने बाद में अपने एक वक्तव्य में कहा, '----लंबे समय के बाद देश अनुभव करेगा कि हमारी रेलवे वाकई भारतीय रेलवे है।'उन्होंने कहा कि रेलवे सिर्फ परिवहन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह 'विकास का इंजन'है और यह बजट साबित करेगा कि रेलवे देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    मोदी ने कहा, '2014 से हमने विकास को नई ऊंचाई पर ले जाने की प्रक्रिया शुरू की है। मुझे विश्वास है कि रेल यात्रियों को सुखद अनुभव होगा।'उन्होंने कहा कि यह बजट आम आदमी के लिए है क्योंकि इसमें देश के विकास पर ध्यान केंद्रित करने के साथ बेहतर सेवा, गति और सुरक्षा प्रदान करने की आकांक्षा है।

    उन्होंने कहा कि यह बजट दर्शाता है कि सरकार रेलवे के लिए भारत को आगे ले जाना चाहती है क्योंकि इसमें सांस्थानिक तंत्र, पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा को मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि बजट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर ध्यान देता है।

    उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि रेलवे जैसी संस्थाओं को तदर्थ तरीके से नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने कहा, 'फैसला करने, दृष्टि और पहल के लिए सांस्थानिक तंत्र की आवश्यकता है।'



    PRIVATE Railway

    The BSE Sensex and Nifty slumped more than 2 percent on Tuesday, marking their biggest single-day fall in over 10 months and retreating from record highs hit earlier in the session, after the railway budget raised worries the government would slash spending.

    The railways budget has revised up the plan outlay to 654.45 billion rupees for 2014/15, up 1.8 percent compared with the interim budget's estimate of 643.05 billion rupees, but lower than market's expectations, traders said.

    Analysts also said the plan in the railway budget to seek private funding for new projects did not provide enough details on how it would attract investors.

    The railway plans set up expectations the government would slash spending when it unveils its federal budget on Thursday. Although equity investors are keen to see fiscal discipline, analysts also warn that big cuts in spending could hurt earnings in sectors such as railways that depend on state investments.

    Finance Minister Arun Jaitley reiterated his message of fiscal discipline on Tuesday by separately saying a "judicious balance" should be struck between expenditure and tax collections.

    Profit-taking after a string of record highs in previous sessions coupled with overseas institutional investors' sales of 14.87 billion rupees ($248.45 million) in equity derivatives on Monday, also aided risk aversion.

    "The budgeted outlay in railway is just in line with the inflation rate. One should expect the federal budget to be even tighter on spending as situation for broader economy is much worse than for railways," said G. Chokkalingam, founder of Equinomics, a research and fund advisory firm.



    India says private funds will help rail system, but details unavailable

    BY TOMMY WILKES

    NEW DELHI Tue Jul 8, 2014 4:07pm IST

    Railway Minister Sadananda Gowda (C) poses after giving the final touches to the railway budget for the 2014/15 fiscal year, in New Delhi July 7, 2014. REUTERS/Adnan Abidi

    Railway Minister Sadananda Gowda (C) poses after giving the final touches to the railway budget for the 2014/15 fiscal year, in New Delhi July 7, 2014.

    CREDIT: REUTERS/ADNAN ABIDI

    (Reuters) - Prime Minister Narendra Modi's new government has nudged up spending on India's wobbly railways and will seek private funding for new projects, the rail minister said without giving details on how he will attract investors.

    Markets reacted negatively to the railways budget presented on Tuesday, after high expectations that Modi's government would use its first major economic policy statement to detail widespread reform.

    The state-owned railway, the world's fourth-largest, has suffered from years of low investment and populist policies that have kept fares low. This has turned a once-mighty system into a slow, badly-congested network that crimps economic growth.

    The railway costs the government's public finances around 300 billion rupees ($5 billion) a year in subsidies.

    "The bulk of our future projects will be... by the PPP model," Railway Minister Sadananda Gowda told the parliament in his first budget, referring to public-private partnerships.Gowda's speech promised to get the railway's finances in order, complete long-delayed projects and jumpstart ambitious plans for high-speed rail, but was short on details of how these goals would be met and how foreign direct investment (FDI) would be attracted.

    The government revised up planned spending to 654.45 billion rupees ($10.95 billion) for the year ending in March 2015, up 1.8 percent from an interim budget made in February by the last government.

    It calculates investment in the network through public-private partnerships in 2014/15 to total 60.05 billion rupees, more than in the interim budget, but a fraction of the cash needed to overhaul the network.

    RELIC FROM BRITISH RULE

    The use of a railway budget separate from the national one is a relic of British rule, when the network was the country's major industrial asset and a major revenue earner. Finance Minister Arun Jaitley presents the full federal budget on Thursday.

    "There is nothing in this entire budget which tells you how they will make it attractive for private sector," said Manish R. Sharma, executive director of capital projects and infrastructure at PwC India.

    "Given that in the past PPP has not taken off in railways...it would be very important to see how they come up with implementable mechanisms which the private sector will buy," he said.

    Stock investors also expressed doubts about the prospects for PPPs, with shares in railway-related stocks falling after the speech. Texmaco Rail & Engineering fell 8 percent and was down 20 percent by 0940 GMT while Titagarh Wagons dropped 5 percent.

    "Budgeted outlay is looking below expectations as the government is looking for more private partnerships now than in previous occasions," said Deven Choksey, managing director at KR Choksey securities.

    Reform of the railways has long proven politically sensitive. Successive governments have backed away from modernization, preferring instead to use the system to provide cheap transport for voters, and jobs for 1.3 million people.

    ($1 = 59.7400 Indian Rupees)

    (Additional reporting by Malini Menon, Manoj Kumar, Aditya Kalra, Suvashree Dey Choudhury and Abhishek Vishnoi; Editing by Frank Jack Daniel and Richard Borsuk)



    Sensex slumps in late trade

    Capital Market  

    July 8, 2014 Last Updated at 15:45 IST

    Key benchmark indices tumbled in late trade. The barometer index, the S&P BSESensex, fell below 26,000 level after hitting record high in early trade. The Sensex hit one-week low. The 50-unit CNX Nifty hit its lowest level in more than a week. The Sensex was provisionally down 578.32 points or 2.22%, off close to 670 points from the day's high and up about 25 points from the day's low. The market breadth indicating the overall health of the market was weak, with more than two losers for every gainer on BSE. The BSE Mid-Cap index dropped almost 4%. The BSE Small-Cap index plunged over 4%. The sharp decline on the bourses came after Railway Budget 2014-15 was tabled by Railway Minister Sadananda Gowda in Lok Sabha. The sharp slide on the bourses comes just two days ahead of the Presention of the Union Budget for 2014-15 on Thursday, 10 July 2014.

    Bank stocks dropped. Rail stocks plunged after the announcement of Railway Budget 2014-15.

    Major announcements in Railway Budget 2014-15 include prioritizing completion of the ongoing projects, proposal to mobilise resources for Railways through surplus of Railway PSUs, FDI and PPP, periodic revision in passenger fare and freight rates which is linked to revisions in fuel prices, proposal to launch bullet trains starting with Mumbai-Ahmedabad sector and a Diamond Quadrilateral Network of High Speed Rail connecting major metros and growth centers of the country. To help mobilization of resources for the railways, the Ministry of Railways is seeking Cabinet approval to allow FDI in rail sector. The bulk of the future projects of the Railways will be financed through PPP mode, including the high-speed rail which requires huge investments. With an increase in both passenger fare and freight rate already announced last month, there was no change in passenger fare and freight rates in the Rail Budget.

    As per provisional figures, the S&P BSE Sensex was down 578.32 points or 2.22% to 25,521.76. The index dropped 605.04 points at the day's low of 25,495.04 in late trade, its lowest level since 1 July 2014. The index rose 90.36 points at the day's high of 26,190.44 in early trade, a lifetime high of the index.

    The CNX Nifty was down 184.30 points or 2.37% to 7,602.85, as per provisional figures. The index hit a low of 7,595.90 in intraday trade, its lowest level since 30 June 2014. The index hit a high of 7,808.85 in intraday trade, a lifetime high of the index.

    The total turnover on BSE amounted to Rs 4279 crore, higher than Rs 4205.06 crore on Monday, 7 July 2014.

    The market breadth indicating the overall health of the market was weak, with more than two losers for every gainer on BSE. On BSE, 2,230 shares declined and 769 shares rose. A total of 97 shares were unchanged.

    The BSE Mid-Cap index was down 346.93 points or 3.63% at 9,210.21. The BSE Small-Cap index was down 442.77 points or 4.19% at 10,128.01. Both these indices underperformed the Sensex.

    Among the 30 Sensex shares, 27 fell and only three shares rose. Bharat Heavy Electricals (Bhel) (down 7.84%), NTPC (down 5.33%) and Tata Power Company (down 5.27%) edged lower from the Sensex pack.

    Bank stocks dropped. Among PSU bank stocks, State Bank of India (SBI) (down 3.94%), Canara Bank (down 4.64%), Union Bank of India (down 8.86%), Bank of India (down 5.74%), Bank of Baroda (down 3.97%) and Punjab National Bank (down 3.98%) declined.

    Among private sector banks, ICICI Bank (down 3.58%), Yes Bank (down 3.42%), Federal Bank (down 6.24%), HDFC Bank (down 1.18%), Kotak Mahindra Bank (down 0.65%) and Axis Bank (down 2.95%), declined.

    IndusInd Bank dropped 1.47%. The bank announces Q4 results tomorrow, 9 July 2014.

    Shares of companies whose fortunes are linked to orders from Indian Railways edged lower after the presentation of Railway Budget. Texmaco Rail & Engineering (down 19.84%), Titagarh Wagons (down 4.99%), Kernex Microsystems (India) (down 4.94%), BEML (down 5%), Kalindee Rail Nirman (Engineers) (down 4.99%), Stone India (down 4.92%), NELCO (down 4.99%), Simplex Casting (down 8.45%), Zicom Electronic Security Systems (down 4.96%) and Container Corporation of India (down 7.12%) edged lower.

    A bout of volatility was witnessed as key benchmark indices trimmed gains after opening on a firm note. The barometer index, the S&P BSE Sensex, and the 50-unit CNX Nifty, both scaled record high. Volatility continued as key benchmark indices reversed initial gains in morning trade. Volatility continued as key benchmark indices weakened once again after cutting entire intraday losses in early afternoon trade as Railway Minister Sadananda Gowda started presenting the final Railway Budget for 2014-15 in Lok Sabha today, 8 July 2014. Key benchmark indices extended losses in afternoon trade. The Sensex extended losses and hit fresh intraday lows in mid-afternoon trade. The Sensex slumped in late trade.

    With Railway Budget over, the focus will shift to final Union Budget for 2014-15 due on Thursday, 10 July 2014. Finance Minister Arun Jaitley will present the final Union Budget for 2014-15 in Lok Sabha at 11:00 IST on Thursday, 10 July 2014. Before that, the Finance Ministry will table Economic Survey for 2013-14 tomorrow, 9 July 2014.

    There are expectations that the finance minster will announce measures in the Budget aimed at bolstering economic growth. Increase in outlay on infrastructure sector with focus on stricter and time-bound implementation of projects, initiatives towards investments in agriculture and irrigation aimed at easing supply bottlenecks for food-grains, fiscal prudence with roadmap to reduce the fiscal deficit, a roadmap for reducing the subsidy burden and timeline for implementation of the Goods and Services Tax are some of the expectations from the Budget.

    In the foreign exchange market, the rupee edged higher against the dollar. The partially convertible rupee was hovering at 59.865, compared with its close of 60.0125/0225 on Monday, 7 July 2014.

    European shares were trading lower on Tuesday, 8 July 2014, before earnings announcements. Key benchmark indices in UK, France and Germany were down by 0.42% to 0.78%.

    Most Asian stocks edged higher in choppy trade on Tuesday, 8 July 2014. Key benchmark indices in China, South Korea, Taiwan and Indonesia rose 0.08% to 0.72%. Hong Kong's Hang Seng was flat. Key benchmark indices in Singapore and Japan were off 0.25% to 0.42%.

    Trading in US index futures indicated that the Dow could fall 21 points at the opening bell on Tuesday, 8 July 2014. US stocks fell Monday, 7 July 2014, on profit booking after Dow Jones Industrial Avergae and the S&P 500 index hit record high last week.




    রেল বাজেটে পশ্চিমবঙ্গের ঝুলি কার্যত শূন্য

    নরেন্দ্র মোদী সরকারের প্রথম রেল বাজেটে প্রাপ্তির ঝুলি কার্যত শূন্যই রইল মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের পশ্চিমবঙ্গে। রেল বাজেট নিয়ে আপামর বাঙালির প্রত্যাশা ছিল রেলমন্ত্রীর কাছে। দেশ জুড়ে রেলের উন্নয়ন, যাত্রী সুরক্ষা, নতুন ট্রেন চালু করার মতো বিষয়গুলি বাজেটে থাকলেও পশ্চিমবঙ্গ কিন্তু পারতপক্ষে বঞ্চিতই। প্রাথমিক ভাবে হাওড়া-বেলদা মেমু সম্প্রসারণ ও শালিমার-চেন্নাই প্রিমিয়াম ট্রেন চালু করার কথা বলা হয়েছে রেল বাজেটে।

    ০৮ জুলাই, ২০১৪

    পদ খালিই, বাজেট তৈরিতে উদ্যোগী মোদী

    2

    ইলা পট্টনায়ক


    প্রেমাংশু চৌধুরী

    নয়াদিল্লি, ৮ জুলাই, ২০১৪, ০৩:২৩:২২

    অর্থ মন্ত্রকে কোনও মুখ্য অর্থনৈতিক উপদেষ্টা নেই। প্রধানমন্ত্রীর আর্থিক উপদেষ্টা পরিষদ বলেও কিছু নেই। নেই পরিষদের চেয়ারম্যানও। যোজনা কমিশনের উপাধ্যক্ষ হিসেবেও কাউকে নিয়োগ করা হয়নি।

    কেন্দ্রীয় সরকারেরই বিভিন্ন মন্ত্রকের অন্দরমহলের আড্ডার অন্যতম বিষয়, এ বার তা হলে বাজেট তৈরি করছেন কারা?

    প্রশ্ন ওঠা স্বাভাবিক। কারণ প্রতি বছর বাজেটের সময় উপরে বলা তিন চরিত্রই গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করেন। অথচ নরেন্দ্র মোদী সরকারের প্রথম বাজেট তৈরির সময় এই পদগুলিতে কেউই নেই। বাজেটের ক্ষেত্রে চিরাচরিত নীতি হচ্ছে, যোজনা কমিশনের উপাধ্যক্ষ ও প্রধানমন্ত্রীর আর্থিক উপদেষ্টা পরিষদের চেয়ারম্যান বাজেট তৈরির সময় অভিভাবকের ভূমিকা পালন করেন। অর্থ মন্ত্রকের মুখ্য অর্থনৈতিক উপদেষ্টা অর্থমন্ত্রীকে নীতি সংক্রান্ত পরামর্শ দিয়ে থাকেন। তিনিই অর্থনৈতিক সমীক্ষা তৈরির দায়িত্বে থাকেন। ১০ জুলাই বাজেট পেশের আগের দিন সংসদে অর্থনৈতিক সমীক্ষা পেশ হবে। যাতে দেশের অর্থনীতির হালহকিকত ফুটে উঠবে।

    মন্টেক সিংহ অহলুওয়ালিয়ার ছেড়ে যাওয়া পদে নরেন্দ্র মোদী সরকার এখনও কাউকে যোজনা কমিশনের উপাধ্যক্ষ হিসেবে নিয়োগ করেনি। মনমোহন সিংহের আর্থিক উপদেষ্টা পরিষদের চেয়ারম্যান সি রঙ্গরাজনও পদত্যাগ করেছেন। সেখানেও কাউকে নিয়োগ করা হয়নি। তা হলে বাজেট তৈরিতে এ বার মুখ্য ভূমিকায় রয়েছেন কারা? অর্থ মন্ত্রক সূত্রের খবর, বাজেট তৈরির প্রস্তুতিতে মূলত তিনটি দল কাজ করছে। প্রথম সারিতে রয়েছেন প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদী নিজে। তাঁর সঙ্গে রয়েছেন অর্থমন্ত্রী অরুণ জেটলি এবং প্রতিমন্ত্রী নির্মলা সীতারামন। দ্বিতীয় দলে রয়েছেন অর্থসচিব অরবিন্দ মায়ারাম, রাজস্বসচিব শক্তিকান্ত দাস, ব্যয়সচিব রতন ওয়াতাল ও অন্যান্য সচিব। এঁদের মধ্যে সব থেকে গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা নিচ্ছেন রাজস্বসচিব ও ব্যয়সচিব। কারণ তাঁদেরকেই আয় বাড়ানো, করের নতুন উৎস সন্ধান এবং ব্যয় ছাঁটাই নিয়ে মাথা ঘামাতে হচ্ছে। তৃতীয় দলটিতে রয়েছেন প্রধান আর্থিক উপদেষ্টা ইলা পট্টনায়ক। তিনিই সমীক্ষা তৈরির কাজটি দেখাশোনা করছেন। কেন্দ্রীয় মন্ত্রীদের পাশাপাশি ইলা পট্টনায়ক ও শক্তিকান্ত দাস বাজেটে কী ভূমিকা নেন, তা দেখার অপেক্ষায় রয়েছে শিল্পমহল।

    ইলা পট্টনায়ক দিল্লির 'ন্যাশনাল ইনস্টিটিউট অব পাবলিক ফিনান্স'-এর অধ্যাপক। তাঁকে প্রধান অর্থনৈতিক উপদেষ্টার পদে নিয়োগ করা হলেও মুখ্য অর্থনৈতিক উপদেষ্টার পদে কাউকে বসানো হয়নি। বস্তুত ইউপিএ জমানার শেষ পর্বেও ওই পদটি খালি ছিল। আসলে রঘুরাম রাজন রিজার্ভ ব্যাঙ্কের গভর্নরের দায়িত্বে চলে যাওয়ার পর থেকেই পদটি ফাঁকা। ইলা অর্থ মন্ত্রকে যোগ দেওয়ার আগে পর্যন্ত রঘুরামের নেতৃত্বে রিজার্ভ ব্যাঙ্কের নীতি নিয়ে সমালোচনায় মুখর ছিলেন। তিনিই এ বার প্রধান অর্থনৈতিক উপদেষ্টা হিসেবেই অর্থনৈতিক সমীক্ষা তৈরির কাজ দেখছেন।

    এ বারের বাজেটে রাজস্বসচিব শক্তিকান্ত দাসের ভূমিকা যথেষ্ট তাৎপর্যপূর্ণ। মোদী ক্ষমতায় আসার পরেই রাজস্বসচিবের পদ থেকে রাজীব টাকরুকে সরিয়ে তামিলনাড়ু ক্যাডারের আইএএস অফিসার শক্তিকান্ত দাসকে নিয়ে আসা হয়। তিনি তামিলনাড়ুতে শিল্পসচিব হিসেবে এসইজেড তৈরিতে অগ্রদূতের ভূমিকায় ছিলেন। মোদী সরকার যখন দেশের এসইজেড-গুলিকে চাঙ্গা করার চেষ্টা করছেন, সে সময় শক্তিকান্তর অভিজ্ঞতা গুরুত্বপূর্ণ হয়ে উঠবে। শক্তিকান্ত থেকে শুরু করে অর্থ মন্ত্রকের শ'খানেক আমলা অবশ্য এখন নর্থ ব্লকে বন্দি। কারণ ২ জুলাই থেকে বাজেট নথি ছাপানোর কাজ শুরু হয়ে গিয়েছে। বাজেট পেশের পরেই তাঁরা পরিবারের সঙ্গে দেখা করতে পারবেন।

    http://www.anandabazar.com/national/%E0%A6%AA%E0%A6%A6-%E0%A6%96-%E0%A6%B2-%E0%A6%87-%E0%A6%AC-%E0%A6%9C-%E0%A6%9F-%E0%A6%A4-%E0%A6%B0-%E0%A6%A4-%E0%A6%89%E0%A6%A6-%E0%A6%AF-%E0%A6%97-%E0%A6%AE-%E0%A6%A6-1.48431


    লাইভ খবর

    08 Jul, 2014 , 11.38AM IST

    LIVE: রেল বাজেট ২০১৪

    03:20 PM'বাংলা বঞ্চিত হলে চুপ করে থাকব না।' রেল বাজেটের পর এমনই প্রতিক্রিয়া দিলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।

    02:06 PM'সদানন্দ গৌড়াকে যা লিখে দেওয়া হয়েছিল, তা তিনি তাড়াতাড়ি পড়ে শুনিয়েছেন।' -- আরজেডি সু্প্রিমো লালু প্রসাদ যাদব

    02:05 PM'এই বাজেট ভারতের জন্য অত্যন্ত লাভবান প্রমাণিত হবে।' -- কেন্দ্রীয় মন্ত্রী রবিশঙ্কর প্রসাদ

    02:04 PM'কয়েক জন হজম করতে পারছে না যে, অসাধারণ রেল বাজেট পেশ করা হয়েছে।' - কেন্দ্রীয় মন্ত্রী বেঙ্কাইয়া নায়ডু

    02:03 PMরেল বাজেটে প্রতিক্রিয়া দিতে গিয়ে রাহুল গান্ধী বললেন, 'রেলবাজেট দিশাহীন, বাস্তবসম্মত নয়। কংগ্রেসশাসিত রাজ্যগুলি কিছুই পায়নি। কেরালা, পশ্চিমবঙ্গ বঞ্চিত।'

    01:43 PMএটি একবিংশ শতাব্দীর বাজেট। এটি আধুনিক বাজেট, যেখানে বিজ্ঞান এবং তথ্য-প্রযুক্তির ওপর জোর দেওয়া হয়েছে- প্রধানমন্ত্রী

    01:43 PM'দের আয়ে দুরুস্ত আয়ে'-- রেল বাজেটের পর নিজের প্রতিক্রিয়ায় এমনই মন্তব্য প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদীর। বললেন, '২০১৪ থেকে রেলের উন্নতির যাত্রা শুরু হবে। এই বাজেট স্বচ্ছতা এবং উন্নয়নে জোর দিয়েছে। বহু দিন পর ভারতবাসী অনুভব করবেন যে এটি ভারতীয় রেল বাজেট। নাগরিককে অধিক সুরক্ষা এবং পরিষেবা দেবে এই রেল বাজেট।'

    01:20 PMরেলমন্ত্রীর বাজেট ভাষণ শেষের পর সংসদে হাঙ্গামা। ২টো পর্যন্ত সংসদের কাজকর্ম স্থগিত।

    01:18 PMবাংলার ঝুলিতে মাত্র ২টি এক্সপ্রেস ট্রেন। হাওড়া-পারাদ্বীপ সাপ্তাহিক এক্সপ্রেস এবং শালিমার-চেন্নাই এসি এক্সপ্রেস।

    01:15 PM৩০ সেপ্টেম্বরের পর এক্সপ্রেস ট্রেনের সমস্ত অপ্রয়োজনীয় স্টপেজ বন্ধ করা হবে। বেশি স্টেশনে দাঁড়াবে না এক্সপ্রেস ট্রেন।

    01:14 PMবেঙ্গালুরুতেও লোকাল ট্রেন চালুর কথা বললেন সদানন্দ গৌড়া।

    01:13 PMচালু হবে ৫টি জনসাধারণ ট্রেন।

    01:12 PMরেলমন্ত্রীর ভাষণের মাধপথেই সংসদে হাঙ্গামা।

    01:12 PM

    01:10 PM১৮টি নতুন লাইনের জন্য সার্ভে করা হবে। কেদারনাথ এবং বদ্রীনাথের জন্যও রেললাইনের সার্ভে করা হবে।

    01:09 PMরেলের কাজে ডিজিটাইজেশন। ৫ বছর কোনও কাগজ ব্যবহার করা হবে না। যাত্রীদের জন্য এসএমএস পরিষেবা। সমস্ত তথ্য পাওয়া যাবে এখানে। এসএমএস-এ রেলের ওয়েক-আপ কল।

    01:08 PMউত্তর-পূর্বাঞ্চলের জন্য প্রকল্প। ৫ হাজার কোটি টাকা ব্যয় বরাদ্দ।

    01:07 PMমুম্বইয়ের জন্য ২ বছরে বাড়তি ৮৬৪টি ইএমইউ।

    01:04 PMরেল বিশ্ববিদ্যালয় গড়ে তোলা হবে।

    01:04 PMবিশেষ মিল্ক ট্যাঙ্কার ট্রেন আনা হবে।

    01:03 PMসবজি এবং ফলের জন্য তাপনিয়ন্ত্রিত স্টোরেজ ব্যবস্থা।

    01:03 PMই-টিকিট বুকিংয়ের গতি মিনিটে ৭২০০ করা হবে। এক সঙ্গে ১ লক্ষ ২০ হাদার জন লগ-ইন করতে পারবেন।

    01:00 PMবিশ্বস্তরীয় সুবিধার জন্য প্রাইভেট সেক্টরের সাহায্য নেওয়া হবে। বিমানবন্দরের জন্য ১০টি বড় স্টেশনের দেখাশোনা পিপিপি মডেলে করা হবে।

    12:56 PMএবার রেল ১.৪৯ লক্ষ কোটি টাকা আয় করতে পারে। যাত্রীসংখ্যাও ২ শতাংশ বাড়বে।

    12:55 PMA-1 এবং A ক্যাটাগরির স্টেশনে এবং কয়েকটি ট্রেনে ওয়াই-ফাই সুবিধা থাকবে।

    12:53 PMতীর্থস্থানের জন্য বিশেষ ট্রেন শুরু করার পরিকল্পনা।

    12:53 PMটিকিট বুকিংয়ের সুবিদা বাড়ানো হবে। পোস্ট অফিসেও রেল টিকিট পাওয়া যাবে।

    12:52 PMমুম্বই-আমেদাবাদে চালানো হবে বুলেট ট্রেন।

    12:52 PM৯টি রুটে চালানো হবে হাই স্পিড ট্রেন। দিল্লি-চণ্ডীগড়, দিল্লি-আগরা, দিল্লি-কানপুর রুট এর মধ্যে সামিল। ১৬০-২০০ কিমি প্রতিঘণ্টার স্পিড থাকবে।

    12:50 PMরেলে হবে হীরক চতুর্ভূজ প্রকল্প। ১০০ কোটি টাকা ঘোষণা এই প্রকল্পের জন্য।

    12:47 PMশিক্ষা-ক্রীড়ায় নজির গড়লে রেলকর্মীদের বাড়ত সুবিধা। রেলকর্মীদের জন্য স্বাস্থ্য যোজনা।

    12:45 PMপরিচ্ছন্নতায় নজর রাখতে সিসিটিভি ব্যবস্থা।

    12:44 PM১৩ লক্ষ ১০ হাজার রেল কর্মীর উন্নতির জন্য, কর্মী প্রতি ৮০০ টাকা ব্যয় করা হবে।

    12:42 PMপরীক্ষামূলক ভাবে অটোমেটিক টিকিট ভেন্ডিং মেশিন চালু করা হবে।

    12:42 PMআরপিএফের রেসকিউ টিম তৈরি করা হবে। তাঁদের মোবাইল নম্বর দেওয়া থাকবে। যাতে যাত্রীরা যোগাযোগ করতে পারেন।

    12:41 PMজ্বালানির দাম বাড়লে ভাড়া বাড়বে, জানালেন সদানন্দ গৌড়া।

    12:41 PMক্রসিংগুলিকে আল্ট্রাসনিক গেট বসবে।

    12:40 PMনিরাপত্তার খাতিরে আরপিএফ-এ ১৭ হাজার পুরুষ এবং ৪০০০ মহিলা কনস্টেবলও নিযুক্ত করা হবে।

    12:39 PM১১,৫৬৬টি রক্ষিবিহীন লেভেল ক্রসিংয়ে রক্ষী দেওয়া হবে।

    12:38 PM৫০টি স্টেশনে পরিচ্ছন্নতার কাজ আউটসোর্স করা হবে। লাগানো হবে সিসিটিভি।

    12:37 PMবেডরোলের পরিচ্ছন্নতার জন্য মেকানাইজড লন্ড্রির ব্যবস্থা।

    12:36 PMভাড়াবৃদ্ধিতে রেলের ৮ কোটি টাকা অতিরিক্ত আয় হয়েছে।

    12:36 PMপরিচ্ছন্নতার বিষয়ে রেলের কাছে বড় চ্যালেঞ্জ।

    12:35 PMপরিষেবা এবং সুবিধার জন্য প্রাইভেট সেক্টরের সাহায্য নেওয়া হবে। বড় ব্র্যান্ডের প্যাকড রেডি টু ইট খাবার পাওয়া যাবে। খাদ্যের গুণমান বৃদ্ধির প্রস্তাব। স্টেশনে ফুডকোর্ট স্থাপনের প্রস্তাব। এ জন্য নয়াদিল্লি-অমৃতসর এবং নয়াদিল্লি-জম্মু তাওয়াই স্টেশনগুলিতে পাইলট প্রোজেক্ট।

    12:34 PMঅফিস-অন-হুইলস: বিশেষ ট্রেনে ইন্টাপনেট এবং ওয়ার্ক স্টেশনের ব্যবস্থা। চালানো হবে পাইলট প্রোজেক্ট।

    12:33 PMযাত্রী সুবিধার জন্য এক্সকেলেটর এবং ব্যাটারি চালিত গাড়ি।

    12:33 PMরেল প্রকল্পের জন্য বিদেশি বিনিয়োগ দরকার। এফডিআই-র জন্য ক্যাবিনেটের মঞ্জুরি নেওয়া হবে-- রেলমন্ত্রী

    12:31 PMরেলের আয় লক্ষ্যমাত্রা থেকে ৪২০০ কোটি টাকা কম-- রেলমন্ত্রী

    12:31 PMপুরনো প্রকল্প শেষ করতে ৫ লক্ষ কোটি টাকা খরচ হবে।

    12:30 PMআয়ের ৯৪ শতাংশ অর্থ খরচ হয়েছে, শুধু ৬ শতাংশ উদ্বৃত্ত রয়েছে, জানানলেন রেলমন্ত্রী।

    12:30 PMভাড়া পুনর্বিন্যাস সত্ত্বেও বিশেষ লাভ হয়নি।

    12:26 PMস্ট্র্যাটেজিক পার্টনারশিপ এবং নিরাপদ যাত্রায় জোর।

    12:24 PMপিপিপি মডেলে বিনিয়োগ হবে। দ্রুতগতি সম্পন্ন রেল চালানোর ক্ষেত্রেও এই মডেল কাজে লাগানো যাবে।

    12:24 PMপরিকাঠামো গড়ে তোলার জন্য আরও মূলধন বিনিয়োগের প্রয়োজন রয়েছে।

    12:23 PMযাত্রী সুরক্ষার ক্ষেত্রে কোনও আপস নয়। জানালেন সদানন্দ গৌড়া।

    12:20 PMনতুন প্রকল্পের জন্য ৫০ হাজার কোটি টাকা দরকার।

    12:18 PMনতুন প্রকল্প চালুর পরিবর্তে অসম্পূর্ণ প্রকল্প পুরো করায়ে বেশি জোর।

    12:16 PMপ্রস্তাবে থাকছে নতুন রেললাইন। চ্যালেঞ্জ অতিক্রম করতে সক্ষম হবে ভারতীয় রেল। জানালেন রেলমন্ত্রী।

    12:13 PM'নরেন্দ্র মোদীর প্রতি কৃতজ্ঞ'-- বাজেট ভাষণে জানালেন রেলমন্ত্রী।

    12:10 PMরেল বাজেট পেশ করছেন সদানন্দ গৌড়া।

    11:57 AMআর কিছু ক্ষণের মধ্যেই মোদী সরকারের প্রথম রেল বাজেট পেশ করবেন মন্ত্রী সদানন্দ গৌড়া।

    11:57 AMরেল বাজেট প্রসঙ্গে সদানন্দ গৌড়ার স্ত্রী দত্তি সদানন্দ বললেন, 'রেল বাজেটে মহিলা নিরাপত্তা এবং পরিচ্ছন্নতার ওপর বিশেষ নজর দেওয়া হোক।'

    11:45 AMরেল বাজেট পেশ করার জন্য প্রতিমন্ত্রী মনোজ সিন্‌হার সঙ্গে সংসদে রেলমন্ত্রী সদানন্দ গৌড়া।

    http://eisamay.indiatimes.com/rail-budget-2014/liveblog/38002667.cms




    Jul 08 2014 : The Times of India (Ahmedabad)

    Factories Act revamp signals labour reforms


    New Delhi

    TIMES NEWS NETWORK

    

    

    Just days before the 2014-15 Union Budget, the government on Monday said it plans to amend the archaic Factories Act, 1948 — the first move in more than a decade to revamp labour laws.

    Companies have cited obsolete labour laws as a key hurdle for doing business. The government's move is expected to send positive signals as it gets down to the business of attracting investment. It also fits in with its pledge to ease the processes of doing business and make India an attractive destination, revive the manufacturing sector and create jobs.

    Minister of state for mines, steel and labour Vishnu Deo told the Lok Sabha in a written reply that the proposed major amendments would include relaxing restrictions on night

    ubject to certain conditions nd increase in the limit of vertime to 100 hours (existing 0 hours) in a quarter.

    It would also include proviion of protective equipment or the safety of workers and more precautions against umes and gases. The Central government would be empowered to make rules, a departure from the current practice where states frame the rules.

    Experts said the proposed changes to the Factories Act would benefit workers and employers and ensure health safeguards for employees.

    The plan to allow women to work in night shifts would also benefit several sectors such as textiles and garments. They, however, said adequate safeguards need to be put in place to ensure security of women workers.

    "Changes to the Factories Act will help reduce red tape, end inspector raj and also bring in transparency for workers and employers," said Sanjay Bhatia, president, Ficci confederation of micro, small and medium enterprises.

    The intention to amend the obsolete Factories Act, 1948 comes shortly after the Vasundhara Raje government in Rajasthan moved to amend four Central laws. Current rules stipulate that the Factories Act would be applicable to manufacturing units employing 10 workers and operating on power and 20 employees for those units without power.

    Industry experts said the intention to move ahead with labour reforms augured well for the manufacturing sector but cautioned that it would take some time before the reforms kick in.

    "It sends a strong signal to global investors to come and invest and set up manufacturing units to create jobs," said Rituparna Chakraborty , senior VP at staffing firm Teamlease. TNN For full report , log on to http://www.timesofindia.com



    Jul 08 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    India Gets a Money Order

    DHEERAJ TIWARI & RACHITA PRASAD

    NEW DELHI MUMBAI

    

    

    Rise & Shine Already on a high, Sensex may get more reasons to scale new peaks with the govt planning to offload 10% in blue-chip PSU ONGC and top hedge funds taking an avid interest in share sales by desi firms Selloff Furnace to be Rekindled with Rs35kcr ONGC Sale `

    With the government expected to announce a big-bang privatisation programme in the July 10 budget, the loudest pop could come from the sale of a 5-10% stake in ONGC that would raise as much as ` . 35,000 crore at current market prices, a record for stake sales in stateowned companies.

    This would make it much bigger than the Coal India initial public offering of 2010, in which the government raised . 15,500 crore.

    ` An inter-ministerial cabinet note has been floated in this regard, according to two government officials. In 2012, the sale of a 5% stake in the firm had fetched the government around Rs 12,000 crore. It's not clear however what amount of stake the government will eventually put on sale.

    "We will go ahead with ONGC in this year itself. The process of appointing merchant bankers will soon be initiated," said one of the officials. The government currently holds a 68.94% stake in the explorer.

    A draft proposal of the finance ministry's Department of Divestment to the cabinet committee on economic affairs has suggested a 5% divestment. The proposal, of which ET has a copy, suggests offering another 0.25% of equity to employees at a possible discount of 5%. The offer for sale based on this plan would raise Rs 18,000 crore.

    "Keeping in view the number of disinvestment cases in the pipeline, the market appetite and the present shareholding of the government, it is proposed that 5% paid up capital of ONGC may be divested in the domestic market as per Sebi Rules and Regulations," the note said.

    The 2012 share sale took place at a time when the government badly needed the money to plug the holes in revenue but market sentiment was poor.

    The country's largest insurer, stateowned Life In surance Corp. (LIC) of India, had to bail out the government at the time, picking up 88% of the offer for sale (OFS).

    "LIC had picked up shares at around Rs 304, now the shares are trading at above Rs 400, so that proves that PSU stocks have good standing in the long term. We expect good participation from both financial institutions and retail investors," said the second official.

    There has been a turnabout in market sentiment.



    

    



    Jul 08 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    ET EXCLUSIVE Q&A - Modi's Started Well... Right Policy Choices will Bring in Fresh Funds

    PIYUSH GUPTA CHIEF EXECUTIVE, DBS


    

    

    It is a flying start for Narendra Modi in the eyes of international investors, says Piyush Gupta, chief executive, DBS Bank, Singapore. Doubts about his ability to execute at the national level should be buried, Gupta tells in an interview with ET's MC Govardhana Rangan.

    Fiscal consolidation, privatisation should top agenda, says Gupta. Edited excerpts: There is a sudden burst of optimism about India? What has changed?

    India is a long-term play and I am pretty optimistic about it over the long term.

    There are many things. First is to do with the sentiment. If you think about business opportunities, particularly investment, a lot of it is confidence-driven. Confidence will feed optimism. You will see investment picking up and that in itself will generate growth. The big challenge facing the country is purely related to implementation and execution. If you can get 20 big projects going.... the last mile done, and execute, you will start creating a big source of demand, and that will also address some supply infrastructure bottleneck issues.

    Nothing much has changed on the ground. So, is the market running ahead of itself?

    The Modi administration, and Modi himself, has demonstrated a capacity to execute. You can argue that it is only one state, Gujarat. But it is still 60-70 million people, and that is not small. That is bigger than many countries. It is bigger than many countries in Asia. Once you have done it with 60-70 million people, demonstrated you can execute, it is good enough.

    What should be the priority for him?

    There are legislative challenges. Whether tax code reform, land reform, or labour reform. He has got a majority, and there is no coalition. He has got the capacity to do that as well. I am positive about that. What is in him that has been impressive in the first few days?

    He has made a fantastic start. The whole approach has been inclusive. It is not about the right noises and calling the countries' neighbours. All that is helpful.

    His agenda has been not vindictive. He believes: "I need to include and bring in all the chief ministers." To me, in India, states are crucial. Everything he has done so far, aligning to get non-BJP states on board, is good. He is going to try to create a coalition of chief ministers. That is a fantastic way to operate. India can only work on a federal structure with a lot of decentralised stuff. Modi knows it, and is comfortable doing that. He was a chief minister for 12 years. He knows the pulse.

    After a bitter fight during the elections, he seems to be turning friendly to the likes of Jayalalithaa?

    That is really pragmatic politics. Getting Jayalalithaa, getting Mamata, getting others on board for a common economic agenda is a great move. That is the way forward, and he is doing that. Many things are politically right, but a the economy is still in a mess. The L government finances are a wreck. How s can he deliver?

    The economic situation is challenging. i Two things which are not helpful -mon e soon which has been slow, and oil, which is near $110-115 a barrel. God forbid, if Iraq-Syria blows up, those will be major headwinds. It is to be accepted. If you for a get the cyclical issues on a secular basis, what is India's challenge? It is the supply side. All of these headwinds are there, but a if you get infrastructure and investments c going, cycles will come and go. That is what needs to be done.

    Who would invest in creating infrastructure? All those who did in the t previous cycle are debt-laden.

    There is a lot of money in the world. The a pools of savings even in Asia are huge. The r thing about Asian savings is they are cycli e cal to the US treasuries right now. China has $4 trillion, of that $2 trillion is lying in t US treasuries now. They hate the idea. Sin e gapore and all of these surplus countries i in Asia can invest. Leave alone the surpluses in the world, the US corporates are s sitting on trillion dollars of cash. There is no shortfall of money. You need to build t confidence. You need to have stability, T getting like consistency in tax policy.

    What are the two or three things that c you want to see this government do? l The budget is important. You have got to have credible budget which recognises I the fiscal issues. It should lay a very clear c pathway which consolidates the fiscal. e Getting 10 or 20 projects up and running I will create a visible change. You create a massive confidence that the government is working. The other things you can do to t address the fiscal situation are -subsidy on fertilisers and fuel. Those are not easy c things. They are politically tough to do.

    T But these have to be done. How do you go c about actually taking on those challenges?

    Labour policy reform. They have already started addressing it. Politically, it is always a hot potato. If you need investment into the country, you have got to create an environment of active labour policy.

    How does it fix its finances with expenditure far outpacing revenue?

    Privatisation programme is helpful. Look at the banking sector in India. With state banks controlling 60-70%, you can continue to drive significant amount of state agenda with a lot lesser stake. You can come down to 25%. That is a massive state disinvestment programme that can work.

    You can do that in several of the government enterprises. That is the other thing that you crucially need. China did that. Zhu Rongji (Chinese premier between 1998 and 2003) did that 15 years ago. They got rid of a lot of people. They changed the orientation of state enterprises. It was not without resistance, lot of push back. Even the British did it. The previous NDA government did it. In the last 10 years, nothing happened.

    The Indian banking system is capital starved and is troubled with bad loans.

    Why would investors buy? How could they fund an economic recovery?

    That is one of the challenges. China has bad loans problem as well. The issue is capitalisation gap. That is one of the challenges for the government. That is why divestment in banks is crucial to me. The Indian government will find it difficult to capitalise the banks if you recognise the extent of the problem. China can do it, but India can't. For the Indian government, disinvestment may be the best way to recognise the problem than putting capital into banks.

    Even the interest regime is not conducive for banks in India.

    Tight monetary policy is always a challenge to businesses. The RBI governor is clear that you need to take care of inflationary expectations. With (poor) monsoon, it will not be easy to lower rates. Structural, supply-side adjustments are what will help create scope for an easy monetary policy.

    Sooner or later, you will start seeing interest rates climb across the world. It will be even more difficult for India to drop interest rates if there is a general rise in rates.


    

    



    Jul 08 2014 : The Economic Times (Kolkata)

    BUDGET 2014-15 LOOKING AHEAD - Sebi Wants Safe Harbour for Foreign Inflows

    JWALIT VYAS & REENA ZACHARIAH

    ET INTELLIGENCE GROUP

    

    

    Wants to segregate fund & its manager

    Capital markets regulator Sebi has sought a clear distinction between a fund and its fund manager, asking the finance ministry to introduce `safe harbour' rules in the upcoming budget to overcome anomalies in the existing tax provisions.

    Sebi has written to the government saying that the existing provisions are driving away most foreign portfolio investors (FPI) to places such as Singapore and Hong Kong which is proving detrimental to the domestic asset management industry , a senior official told ET.

    If a foreign fund is managed by somebody residing in India, the FPI can be exposed to a number of taxes in the country irrespective of where it is based. This is not the case if the fund manager resides outside India. Global funds prefer to have asset managers based in locations that are not under India's jurisdiction so as to avoid their worldwide income being subject to taxes in the country.

    Sebi has sought a level playing field for FPIs irrespective of the residential status of their fund managers.

    "If the income of the fund is characterised as business income, the fund manager's presence may constitute a business connection or a permanent establishment of the fund in India, thus subjecting the fund to tax exposure in India because of the presence of the manager in India," said Gautam Mehra, executive director, PricewaterhouseCoopers.

    Mehra said that introduction of a `safe harbour' rule which will not expose the fund to taxes in India merely because of the presence of the manager in the country could significantly contribute to promoting India as a global asset management hub.

    "In such a case, taxation of fund's profits by reasons other than that of the manager's Indian presence would continue as per the normal provisions of Indian tax laws," he added.

    In Hong Kong, for example, the asset management industry flourished after similar tax changes were made in 2006 and assets under management swelled by 57% within a year.

    According to fund managers, the government can help generate billions of dollars by way of asset management fees annually, besides contributing handsomely to direct taxes and providing an indirect multiplier effect on economic activity .

    Foreign institutional investors have pumped in nearly $300 billion in India, for which management fees is $3 billion or 1% of assets under management, said an Indian fund manager of a leading global investment bank who had to move to Singapore last year on the request of his clients. "If the portfolio managers operate from India, the government can earn at least up to $1 billion or . 6,000 crore ` as tax," said the fund manager, who did not wish to be named.

    Sebi has said that allowing portfolio managers and their teams to be physically based in India will increase job opportunities and reverse the talent drain seen in the past. Besides, it will provide additional avenues for asset managers in India to earn fees and manage a more global pool of funds investing in India and other countries.

    "Presence of fund manager in India could potentially expose foreign funds to taxation in India either on the grounds that such fund manager is regarded as private equity of the fund in India or the fund manager being regarded as `controlling and managing' the foreign fund out of India. A careful structuring is required to avoid such a situation by taking certain appropriate measures," said Sanjay Sanghvi, partner, Khaitan & Co.




    0 0

    अभी दुल्हन घुंघट की ओट में हैं।शाही ताजपोशीमध्ये आर्थिक समीक्षा,सुधार बजट के मोहताज नहीं लेकिन।

    हर तरह से अब साफ है कि देश के विकास का एक अकेला रास्ता है , एफडीआई (विदेशी पूँजी निवेश) और प्राइवेटाइजेशन (निजीकरण) ।

    पलाश विश्वास


    Narendra Modi's confidant Amit Shah replaces Rajnath Singh as BJP president; marks a new beginning for party

    Narendra Modi's confidant Amit Shah replaces Rajnath Singh as BJP president; marks a new beginning for party


    अभी दुल्हन घुंघट की ओट में हैं।मुंहदिखायी की रस्म के साथ गाली गीतों का अलाप जारी है।कल खुलेगा नये सपेरे का पिटारा।सपेरों और जादूगरों के देश में तमाशबीन जनता है।हालांकि लोकसभा में विपक्ष ने महंगाई, नेता प्रतिपक्ष जैसे मुद्दों पर खूब शोरशराबा किया। महंगाई के मुद्दे पर विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नारे लगाए तो दूसरी ओर संसद के बाहर कांग्रेस ने प्रदर्शन किया। विपक्ष ने सरकार पर जनता से वादाखिलाफी का आरोप लगाया। वहीं बीजेपी ने बढ़ती कीमतों के लिए यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहराया। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने आरोप लगाया कि चुनाव में बीजेपी के लिए व्यापारी वर्ग ने पैसा लगाया और अब दाम बढ़ाकर बीजेपी वो पैसा ब्याज समेत वापस कर रही है।


    अच्छे दिनों का सपना दिखाकर सत्ता में आई मोदी सरकार का कल कड़ा इम्तिहान है। एक तरफ करोड़ों उम्मीदों का दबाव है तो दूसरी तरफ खस्ताहाल इकोनॉमी। आज आए आथिर्क सर्वे में इकोनॉमी की डर्टी पिक्चर ही पेश की गई है। अब सवाल उठता है कि मोदी के पहले बजट में चौंकाने वाले एलान होंगे या वो दूर की सोच वाला होगा। वैसे रेल बजट के बाद ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि मोदी बैलेंस्ड बजट पर ही फोकस रखेंगे। कुछ बोल्ड फैसले भी होंगे और कुछ मलहम लगाने ऐलान।


    माना जा रहा है कि बजट में मौजूदा 2 लाख के बजाए 2.5 लाख रुपये की आय टैक्स फ्री हो सकती है। टैक्स छूट सीमा को महंगाई दर से जोड़ सकते हैं। 80सी के तहत 1 लाख रुपये की छूट की सीमा बढ़ सकती है। इंफ्रा बॉन्ड को 80सी में शामिल किया जा सकता है। इंफ्रा बॉन्ड में 30,000 रुपये तक के निवेश पर छूट मिल सकती है। होम लोन के ब्याज पर छूट की सीमा बढ़कर 2.5 रुपये लाख संभव  है। होम लोन के ब्याज छूट बढ़ाने से सरकार के खर्चे पर दबाव नहीं आएगा।


    शाही ताजपोशीमध्ये आर्थिक समीक्षा हो गयी रस्म अदायगी के लिए,सुधार बजट के मोहताज नहीं लेकिन।दरअसल आने वाले वर्ष में 7 से 8% की उच्च आर्थिक वृद्धि हासिल करने के लिये मुद्रास्फीति पर अंकुश, कर वसूली और व्यय क्षेत्र में सुधार तथा बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के लिये कानूनी एवं नियामकीय ढांचा सहित तीन स्तरीय रणनीति अपनाये जाने का सुझाव दिया गया है।

    संसद में आज पेश 2013-14 की आर्थिक समीक्षा में सरकार को यह सुझाव देते हुये कहा गया है, भारत की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि संभावनाओं की बेहतरी के लिये रोजगार और आय के अवसर बढ़ाने और निवेश गतिविधियों में फिर से तेजी लाने के लिये तीन स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।



    गौरतलब है कि धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण माध्यमे पूरे देश को गुजरात बनाने के आधार बतौर  लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश से सर्वाधिक सीट दिलाकर संघ परिवार का दिल जीतनेवाले गुजरात के पूर्व मंत्री अमित शाह को आज पार्टी का नया अध्यक्ष बना दिया गया।


    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अमित शाह के नाम पर भाजपा संसदीय बोर्ड ने आज मुहर लगाई। अमित शाह, जावड़ेकर और राममाधव की तिकड़ी के जरिये राजकाज को अंजाम देंगे धर्मयोद्धा नरेंद्र मोदी।


    जारी है धर्म युद्ध प्रलयंकर तो जारी है जनसंहारी ग्लोबीकरण कारपोरेट राजनीति के साथ और छिनाल पूंजी छइया छइया बुलेट बूम बूम है नागपुर और नई दिल्ली के केसरिया एक्सप्रेसवे पर एफडीआई प्राइवेटाइजेशन की बुलेट धूम है।


    आर्थिक समीक्षा से पहले रेल बजट ने समां बांध दिया है।जनसंहार समर्थने निनानब्वे फीसद जनगण और गणतंत्र के विरुद्ध मोर्चाबंद है क्रयशक्ति संपन्न एक फीसद सत्ता वर्ग की नस्ली व्चस्ववादी अस्मिता धारक वाहक कारपोरेट राजनीति की जाति स्थाई व्यवस्था।


    समीक्षा का यह वैदिकी कर्मकांड संस्कृत कूट मंत्रों से भी कठिन है।ओंग बोंग धूम धड़ाका है आंकड़ों का,संख्याओं और ग्राफिक के स्पेशल एफेक्ट है और अवतार क परिवेश है।


    समीक्षा में कहा गया है कि पहले कदम के तौर पर सरकार को मौद्रिक नीति के लिये खाका तैयार कर, राजकोषीय मजबूती और खाद्य बाजार में सुधार लाकर मुद्रास्फीति को नीचे लाना होगा। दूसरे कदम के तौर पर समीक्षा में कर और व्यय क्षेत्र में सुधार पर जोर दिया गया है। इसमें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू करते हुये लोक वित्त को सतत् मजबूती के रास्ते पर लाने को कहा गया है।

    व्यय क्षेत्र के सुधार में सार्वजनिक वस्तुओं और सब्सिडी कार्यक्रम के लिये नये तौर तरीके अपनाने पर जोर दिया गया है। समीक्षा के अनुसार बाजार अर्थव्यवस्था के लिये भारत में कानूनी और नियामकीय ढांचे की भी आवश्यकता है। इसके लिये पुराने कानूनों को निरस्त करने और बाजार असफलता के समय स्थिति संभालने के लिये सरकारी क्षमता मजबूत बनाने की आवश्यकता है।

    समीक्षा में कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान आर्थिक वृद्धि के 5.4 से 5.9% के दायरे में रहने का अनुमान है। इससे पहले लगातार दो वर्ष आर्थिक वृद्धि पांच प्रतिशत से नीचे रही।



    मीडिया नीति निर्धारण पर खामोश है।रेल बजट को तो शास्त्रीय तक बता दिया गया है और लंबी रेस के गौड़ा के रेलवे पथ पर पलक पांवड़े बिछा दिये गये हैं।


    अर्थ और प्रतिरक्षा मंत्रालय का नदी जोड़ों अभियान प्रतिरक्षा में शत प्रतिशत एफडीआई को न्यूटन के गति नियमों के मुताबिक त्वरा देने के प्रयोजन से है तो भारत अमेरिकी परमाणु शंधि के कार्यान्वयन के लिए भी।


    साथ ही अमेरिका और इजराइल के नेतृत्व में प्रतिरक्षा आंतरिक सुरक्षा के जायनवादी कायाकल्प के लिए भी।


    मोदी और अमित शाह के निर्देशन में विनिवेश की तरह किस रिफाइंड ब्रांड के धीमे मारक जहरीला रसायन से ङमारी सांसें चुराने की भोपाल गैस त्रासदी की रचना हो रही है, सिख संहार और बाबरी विध्वंस के रसायन से अनजान आम जनता के लिए कार्निवाल मध्ये मुखौटा नृत्य और कबंधों के सांबा के वातावरण में समझ पाना असंभव है।


    पढ़े लिखे डिग्रीधारी मलाईदार तबका इस कयामती अर्थव्यवस्था के ज्वालामुखी मुहाने आशियाना बनाये बकरे की अम्मा की खैर मना रहे हैं।


    बजट से आर्थिक समीक्षा का संबंध जाहिर है उतना होना जरुरी भी नहीं है।


    संसद के प्रति जिम्मेदार अल्पमत सरकारों ने पिछले तेईस साल में नीति निर्धारण से भारत की संसद और संविधान को अप्रासंगिक बना दिया है।


    मसलन जेटली अपने मिशन इंपासिबल को अंजाम देने के लिए आयकर छूट की परिधि पांच लाख कर दें तो सारी सब्सिडी खत्म कर दिये जाने के बाद भी,सारे सरकारी विभागों, सेवाओं और उपक्रमों का विनिवेश कर देने के बाद भी,कर सुधार से आम जनता पर अर्थव्यवस्था का सारा बोझ लादकर पांच लाख छह लाख करोड़ के सालाना करराहत के बजाय एकमुश्त पूंजी को कर मुक्त कर देने,रोजगार और आजीविका प्रत्यक्ष विनिवेश हवाले करने और कृषि की शवयात्रा निकालने के बावजूद क्रिकेट फुटबाल से ग्लोबल हुई यह मलाईदार तबका आह तक नहीं करेगा।


    जल जंगल जमान नदी समुंदर और अंतरिक्ष तक को आग के हवाले करने पर भी उसकी आंच मलाईदार गैंडा तबके की घनी गोरियायी फेयर एंड लवली हैंडसम डियोड्रेंट महकी खाल को किसी भी स्तर तक नहीं छुयेगी और विडंबना है कि हम इसी तबके की क्रांतिधर्मिता,मुक्ति कामना,गणतांत्रिक अस्मिता स्वतंत्रता पावक चेतना और प्रतिबद्धता पर इस ग्लोबल कयामत से आजादी के लिए दांव लगाये हुए हैं और आम जनता को बुरबकै मानकर उन्हें संबोधित करने का कोई प्रयास अब भी नहीं कर रहे हैं।


    मनोरंजन मीडिया के वर्चुअल सेक्स की तो कहिये मत,बाकी कवायद भी आत्मरति तक सीमाबद्ध है।


    एफडीआई और निजीकरण के मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए राहुल गांधी की खुमारी सेल पर है जैसे वे तरणहार हैं और जैसे वे दस साल क जैसे जनता का उद्धार कर रहे हैं,उसीतरह इस विपर्यय से भी बचा लेंगे उनके जैसे तमाम अवतार और फरिश्ते और बोधिसत्व।ईश्वर का कोई वरद पुत्र नहीं है और सरस्वती की सारी संतानें सारस्वत विशुद्ध वैदिकी है,जिनके लिए वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।लेकिन मीडिया का फोकस देखें।


    लोकसभा चुनाव में बुरी हार के बावजूद कांग्रेस इन नतीजों से कोई सबक सीखती नजर नहीं आ रही। आज लोकसभा में महंगाई के मुद्दे पर बहस के दौरान राहुल गांधी झपकी लेते नजर आए। महंगाई से पूरे देश की जनता परेशान है और इस अहम मुद्दे पर देश की जनता का ध्यान देने के लिए कांग्रेस इसे लगातार उठा रही है। लेकिन आज जब लोकसभा में इस मुद्दे पर चर्चा हो रही थी, तब राहुल गांधी सदन में झपकी लेते देखे गए।


    पहले भी राहुल पर अहम मसलों पर बहस में हिस्सा नहीं लेने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन इस बार सदन में सोने की तस्वीर कैद होने से उनके विरोधियों को आलोचना का मौका मिल गया है। राहुल को सदन में जम्हाई लेते भी देखा गया। बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन ने इसपर ट्वीट कर चुटकी ली।



    अमेरिकी विध्वंस के इतिहास के संदर्भ में कई दिनों से धर्म राजनीति और पूंजी के संहारक त्रिभुज का चित्रायन कर रहा हूं।


    उस त्रिभुज का वृत्त अब तीन सौ साठ है।बीच में नागपुर नई दिल्ली का घना आलंब है और बाकी बचा गुजरात माडल है।


    ब्राजील का विलाप लेकिन विश्वकप फाइनल में सात सात गोल हजम करने का कतई नहीं है।


    चमकदार वैश्विक बंदोबस्त का रंग रोगन धुल जाने के बाद बेपरदा नंगा टाट खुल जाने की रुदाली है वह,जिसके मुखातिब हम अब भी नहीं है।


    अब भी महाद्वीपों के आर पार मध्ययुग के धर्मयुद्ध से अविराम जारी ग्लोबीकरण मार्फत विकास के अश्वमेधी विध्वंस के भूगोल इतिहास से हमारा वास्ता नहीं है।


    तकनीक, शोध और अंतरिक्ष तलक आविस्कारों और अनुसंधान की धूम, इस ब्रह्मंड की रचना प्रक्रिया की पुनर्रचना के बिग बैंग के बावजूद वैज्ञानिक दृष्टि उपभोग उपकरण, तकनीक संचार माध्यम,कंप्यू रोबो वीडियो गेम गेजेट विजेट साप्टवेयर टेंप्लेट की आभासी दुनिया तक सीमाबद्ध है।विज्ञान और समाज वास्तव के सरोकार अब अलग थलग परस्परविरोधी हैं।डिग्रियां है लेकिन ज्ञान की तरफ पीठ है।ज्ञानपीठ है।अकादमी और संस्थान हैं वर्चस्व और एकाधिकार के, न विवेक है और न साहस।


    केशरिया अश्वमेधी राजसूय के कर्म कांड के मध्य अपने देश का ब्राजील भी हार रहा है।


    एकाधिकारी आक्रमण के मुकाबले ब्राजीली रक्षण है ही नहीं कहीं।


    बंजरंगियों की अंधी दौड़ में पूंछ उठाने की कवायद में आत्मरक्षा और वजूद की फिक्र ब्राजीली उन्मुक्त सेक्स की कार्निवाली संस्कृति के विरुद्ध है।


    हम उसी कार्निवाल के मध्य हैं।


    ब्राजील का कार्निवाल तिलिस्म को बेनकाब भी करने लगा है।


    लेकिन हमारे कार्निवाल में तिलिस्म अभी चक्रव्यूह है।


    आखिर ब्राजीली कार्निवाल के लिए तीस करोड़ कंडोम भारत से ही भेजे गये थे।


    कंडोम संस्कृति में अर्थशास्त्र की चर्चा निषिद्ध है।


    वैदिकी मंत्र की तरह अबूझ हैं परिभाषाएं,आंकड़े,तत्व और तथ्य।


    हम विकास कामसूत्र के अनंत आसन का अभ्यास करते रहेंगे बहरहाल।


    दुल्हन की घुंघट उठाये बिना सुहागरात से पहले भागे दूल्हों के हवाले है राजकाज और दुल्हन अभी भी घुंघट में हैं सिर्फ हवाओं में कंडोम गुब्बारे हैं सुगंधित।


    इसी के मध्य बजट और उससे पहले आर्थिक समीक्षा के कर्मकांड अबूझ।


    आथिर्क सर्वे में बड़ी चुनौतियां सामने आई हैं। वित्त वर्ष 2015 में 5.4-5.9 फीसदी ग्रोथ का अनुमान है। वित्तीय घाटे को लेकर चिंता बरकरार है, महंगाई में कमी आई, लेकिन अब भी ज्यादा है। महंगाई की वजह से दरें घटाने की गुंजाइश कम है। इसके अलावा खराब मॉनसून दिक्कतें बढ़ा सकता है। इराक संकट से देश की इकोनॉमी में दबाव की आशंका है।


    आथिर्क सर्वे में बड़ी चुनौतियों के रूप में सुस्त ग्रोथ, कमजोर मॉनसून, महंगाई, वित्तीय घाटा हैं। वहीं सब्सिडी घटाना, ऊंची ब्याज दरें और कमजोर मैन्यूफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल ग्रोथ के मुद्दे पर सरकार को कोशिश करनी है।


    बजट में उम्मीद है कि आगे की अच्छी तस्वीर सामने आएगी। माना जा रहा है कि वित्त वर्ष 2015 में मैन्युफैक्चरिंग में सुधार की उम्मीद है और साथ ही करेंट अकाउंट घाटे में सुधार की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2015 में करेंट अकाउंट घाटा जीडीपी का 2.1 फीसदी रहने का अनुमान है।


    इंडस्ट्री जानकारों का मानना है कि बजट में सब्सिडी कम करने पर जोर होना चाहिए और वित्तीय घाटे के लिए एफआरबीएम कानूनों में बदलाव किया जाना चाहिए। वित्तीय घाटे पर लगाम के लिए कड़े फैसले लिए जाने चाहिए।


    वहीं आर्थिक जानकारों का मानना है कि बजट में पीडीएस सिस्टम में सुधार होना चाहिए। डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम के कारगर इस्तेमाल की कोशिश होनी चाहिए। सरकार को महंगाई कम करने पर जोर देना चाहिए और आय बढ़ाने के लिए टैक्स सिस्टम में सुधार करना चाहिए। बजट में विनिवेश का रोडमैप, जीएसटी का ठोस रोडमैप आना चाहिए। टैक्स नियमों की दुविधा खत्म की जानी चाहिए और पावर, माइनिंग, इंफ्रा सेक्टर के लिए बड़े ऐलान होने चाहिए। रोजगार बढ़ाने के लिए छोटे उद्योगों पर फोकस किया जाना चाहिए।



    2014-15 में देश की विकास दर 5.4-5.9 फीसदी रहने की संभावना है।

    विकास दर की यह भविष्यवाणी का खुलासा उसीतरह नहीं हुआ है जैसे कि 63 करोड़ की लागत से पूर देश को बुलेट हीरक चतुर्भुज बनाकर निजी और विदेशी निवेश,विनिवेश और बेसरकारी करणसे भारत के कायाकल्प का असली बनिया कार्यक्रम का खुलासा नहीं किया गया है।

    इसी के साथ महंगाई चिंता का विषय बना रहेगा।रेलभाड़ा और तेल गैस बिजली की कीमतें विनियंत्रित करके बाजार और समाज को छुट्टा सांढ़ों के हवाला करके विकास दर,मुद्रा स्फीति,वित्तीय घाटा, भुगतान संतुलन पर नियंत्रण की अबाध पूंजी करिश्मा के मुखातिब होकर बाजारों में पल पल झुलस रही निनानब्वे फीसद के लिए इस रहस्य का खुलासा जाहिर है कभी होना नहीं है।

    संसद में बुधवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा 2013-14 के लिए पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया कि नकद सब्सिडी भुगतान उर्वरकों पर सब्सिडी देने का सही तरीका है और ईंधन की कीमतें बाजार पर आधारित होनी चाहिए। पहले आधार परियोजना थी तो अब सिटिजन कार्ड।मकसद एकमेव,सब्सिडी का खात्मा।

    इस सर्वेक्षण में वित्तीय घाटा कम किए जाने के लिए सिर्फ खर्च-जीडीपी अनुपात घटाने की जगह अधिक कर-जीडीपी अनुपात का सुझाव दिया गया है। 2013-14 में वित्तीय घाटा जीडीपी का 4.5 फीसदी रहा तथा आक्रामक नीतिगत पहल ने 2013-14 में सरकार को वित्तीय घाटा कम करने में मदद की।परिभाषाओं और आंकड़ों की कलाबाजी का नायाब कर्मकांड है।

    दावों पर यकीन करें तो वर्ष 2013-14 में देश के बकाया-भुगतान की स्थिति काफी सुधरी है। चालू खाता घाटा 32.4 अरब डॉलर, जीडीपी का 1.7 फीसदी रहा, जो 2012-13 में 88.2 अरब डॉलर, जीडीपी का 4.7 फीसदी था।

    इस सर्वेक्षण में कहा गया है कि रुपये की वार्षिक औसत विनिमय दर 2013-14 में प्रति डॉलर 60.50 रुपये रही, जो 2012-13 में 54.41 रुपये थी और जो 2011-12 में 47.92 रुपये थी। देश का विदेशी पूंजी भंडार मार्च 2014 के आखिर में बढ़कर 304.2 अरब डॉलर हो गया, जो मार्च 2013 के आखिर में 292 अरब डॉलर था।

    देश में योजना एवं पूंजी खर्च में कटौती के जरिए वित्त वर्ष 2013-14 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी का 4.5 प्रतिशत पर किसी तरह रोका गया, जो कि अपने आप में अस्थिर है। यह बात सरकार द्वारा बुधवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2013-14 में कही गई है. इसमें कहा गया है कि देश की राजकोषीय स्थिति जितनी बुरी दिख रही है, वाकई में उससे भी अधिक बुरी है।


    अब इस अर्थ संकट और वित्तीय घाटा के अविरम अलाप के मध्य आर्थिक सुधारों के महायज्ञ में शामिल रंग बिरगे पुरोहितों के विरुद्ध जनमोरच पर खड़े होने की हिम्मत करें कौन।

    इस वक्तव्य का आशय कल के बजट में स्पष्ट होने के आसार कतई नहीं है कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए कहा कि अर्थव्यवस्था के लिए आर्थिक मजबूती आवश्यक है, मौजूदा संदर्भ में और आगामी वर्षो के संदर्भ में भी।

    वित्त मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार इला पटनायक द्वारा तैयार वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी के जोखिम से निपटना जरूरी है।

    सर्वेक्षण में कहा गया है, "एक अन्य चुनौती कर आधिक्य को सुधारने की है, और गैर-डेट प्राप्तियां में गिरावट को धन उगाही और सुधारों में अधिक प्रयासों के जरिए रोका जा सकता है।"


    अमेरिकी राष्ट्रपति के इस अमृत वचन को याद रखेंःलोग कम टैक्स नहीं चुकाते, दरअसल सरकारें खर्च बहुत करती हैं।



    हमारे आदरणीय साहित्यकार उदय प्रकाश ने बेहतर लिखा है।पहले उनको पढ़ लें।



    Status Update

    By Uday Prakash

    रेलवे बजट के बाद ।

    अब यह स्पष्ट है कि देश के विकास का एक अकेला रास्ता है , एफडीआई (विदेशी पूँजी निवेश) और प्राइवेटाइजेशन (निजीकरण) ।

    ब्रिटिश राज के दौर से यह विकास मार्ग किस रूप में भिन्न है ?


    दूसरा, है 'पीपीपी' यानी पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर की साझेदारी ।

    (यह नेहरू युग के 'मिक्स्ड एकानमिक पॉलिसी ' (मिश्रित अर्थ व्यवस्था) से कैसे अलग है ? )


    रहा 'भ्रष्टाचार', तो प्राइवेट या कार्पोरेट सेक्टर का भ्रष्टाचार रिश्वत या ग़बन से नहीं, जबरिया भूमि-अधिग्रहण, किसानों के विस्थापन और खनिज उत्कर्षण के लिए नदियों, जंगलों के विनाश, आदिवासियों के दमन के पैमाने से नापी जाती है ।

    क्या यह रेलवे बजट जनता के लिए कम और उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रख कर बनाया नहीं गया है ?

    फिर तेज़ रफ़्तार रेलगाड़ी को ' बुलेट ट्रेन' (गोली गाड़ी) ही क्यों कहा जा रहा है? 'भारतीय संस्कृति की परंपरानुसार' इन्हें 'पवन गाड़ी' क्यों नहीं कहा गया ? 'गोली-बारूद' तो विदेशी लेकर आये थे । अगर हमारे पास बुलेट- बंदूक़, तोप-तमंचे रहे होते, तो पानीपत की पहली लड़ाई हम क्यों हारते ?


    फिर, रेल का विदेशीकरण क्या भारत के ' भारतीयकरण' का प्रतिलोम नहीं है ?

    यही तो पहले संघ का नारा हुआ करता था ।


    आगे हमारे युवा तुर्क अभिषेक को भी पढ़ लें।अभिषेक और रियाज को कई दिनों से रिंग कर रहा हूं और हमारे रिंगते रहने के जवाब में उनकी आवाज का इंतजार भी है।बहरहाल अभिषेक के ताजा अपडेट और उदयजी के कथन को आर्थिक समीक्षा के परिप्रेक्ष्य में संदर्भित कीजै तो बजट का आशय समझ में आवै।अभी दुल्हन घुंघट की ओट में है।



    Abhishek Srivastava

    5 hrs·

    देखिए भाई, कुछ बातें अभी समझ ली जाएं तो जीवन से तनाव कम किया जा सकेगा। पहली बात, भाजपा हमारी पार्टी नहीं है इसलिए उसका अध्‍यक्ष कोई हत्‍यारा हो, उठाईगीर हो, गुंडा हो या संत, यह हमारा मुद्दा नहीं है। दूसरी बात, चूंकि न हमने अच्‍छे दिन मांगे थे और न ही उसके लिए भाजपा को वोट दिया था, इसलिए केंद्र सरकार के कड़े या मुलायम फैसले पर कोई भी बहस हमारी अपनी बहस नहीं हो सकती। तीसरे, हम लोग सनातन स्‍लीपर क्‍लास से चलने वाले लोग रहे हैं इसलिए बुलेट ट्रेन आदि के रेटॉरिक पर हमारे भड़कने का कोई अर्थ नहीं है।

    दरअसल, भाजपा का बहुमत आने पर हमें इसलिए सदमा लगा था क्‍योंकि पिछले साल भर से बिछाई जा रही चुनावी बिसात में हमें जबरन खींच लिया गया था। हम लोग एक ऐसी लड़ाई का हिस्‍सा चाहे-अनचाहे बना लिए गए थे जो हमारी थी ही नहीं। चूंकि नकली लड़ाई का नतीजा हमारी असली अपेक्षाओं से उलट रहा, तो तनाव होना ही था।

    प्रचार के जाल से बचें, दोबारा वही गलती न दुहराएं। अपनी असली लड़ाई को पहचानें। अगर अपनी लड़ाई समाज में मौजूद न हो, यहां अपना स्‍टेक न दिखता हो तो चैन से बैठ कर पढ़ें-लिखें। टीवी मत देखें। अखबार एकाध दिन में देख लें। इस अनचाहे पांच साल की लंबी अवधि का इस्‍तेमाल बुरे दिनों से लड़ने की तैयारी में लगाएं।


    बहरहाल वित्त मंत्री अरूण जेटली कल अपना पहला बजट पेश करेंगे। मध्यम वर्ग व उद्योग जगत को नई सरकार के इस पहले बजट से काफी उम्मीदें हैं। माना जा रहा है कि बजट में वेतनभोगी वर्ग के लिए कुछ रियायतों की घोषणा हो सकती है। इसके अलावा इसमें विवादास्पद पिछली तारीख से कर को समाप्त किया जा सकता है तथा वृद्धि के लिए निवेश व विनिर्माण में नई जान फूंकने के उपायों की घोषणा हो सकती है।

    वित्त मंत्री अरूण जेटली ने आज कहा कि कौशल विकास, महिला सशक्तिकरण में तथा देश के सामाजिक बुनियादी ढांचे को गति देने के लिए भारी निवेश की जरूरत है।

    इसी बीच बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स आज 137 अंक की गिरावट के साथ बंद हुआ। आर्थिक समीक्षा में जतायी गयी चिंता तथा नरेंद्र मोदी सरकार के कल पेश होने वाले बजट से उम्मीद घटने से बाजार में गिरावट दर्ज की गयी। वैश्विक शेयर बाजारों में कमजोर रूख से भी धारणा प्रभावित हुई। शुरूआती कारोबार में सेंसेक्स मजबूती के साथ खुला और 25,683.97 अंक तक चला गया। हालांकि आईटी, वाहन, बिजली, रीयल्टी तथा पूंजीगत वस्तुओं में मुनाफावसूली से सूचकांक एक समय दिन के निम्नतम स्तर 25,364.77 अंक तक चला गया।

    संसद में पेश किए जाने वाले 2014-15 के बजट को लेकर काफी उम्मीदें जताई जा रही हैं। हालांकि इसमें कर स्लैब या आयकर छूट की सीमा बढ़ने की संभावना नहीं है, लेकिन चर्चा है कि इसमें बचत को प्रोत्साहन के जरिये लोगों को राहत दी जा सकती है। निवेश को प्रोत्साहन को जेटली उद्योग के लिए कर राहत की घोषणा कर सकते हैं। इसी के तहत सरकार वाहन व टिकाउ उपभोक्ता उद्योग के लिए उत्पाद शुल्क रियायत की समयसीमा को पहले ही दिसंबर तक बढ़ा चुकी है।

    इसके अलावा वित्त मंत्री सोने के आयात पर शुल्क घटाने का भी प्रस्ताव कर सकते हैं। पिछले साल बढ़त चालू खाते के घाटे पर अंकुश के लिए सरकार ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ाया था।

    इसके अलावा वित्त मंत्री मानसून की कमी के प्रभाव को कम करने के लिए किसानों को राहत प्रदान कर सकते हैं। भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में मूल्य स्थिरीकरण कोष का वादा किया है। बजट में इसकी घोषणा हो सकती है। जारी भाषा अजय वित्त मंत्री वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लिए रूपरेखा भी पेश कर सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) पर उनका रख क्या रहेगा। आर्थिक समीक्षा में इसका उल्लेख है।

    घरेलू व विदेशी निवेशकों का भरोसा बहाल करने के लिए जेटली कारपोरेट विलय व अधिग्रहण के लिए पिछली तारीख से कर के प्रावधान को समाप्त कर सकते हैं। आज प्रस्तुत 2013-14 की आर्थिक समीक्षा में मुद्रास्फीति पर अंकुश रखने और राजकोषीय स्थिति को मजबूत करने पर बल दिया गया है ताकि देश को उच्च आर्थिक वृद्धि की राह पर ले जाया जा सके।


    फिर जानिए, किन पांच बड़े सुधारों पर है इकोनॉमी में अच्छे दिन लाने का दारोमदार


    क्या होना चाहिए

    • जीएसटी लागू के लिए अंतिम तिथि निश्चित हो और जीएसटी को लागू करने का रोड़मैप।

    बजट में संभावना

    • केंद्र सरकार सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स को लागू करने की घोषणा कर  सकती है। जो जीएसटी की शुरुआत होगी।  

    ये पड़ेगा असर

    • उत्पादन की लागत में कमी आएगी जिससे एक्सपोर्ट को बढ़ावा मिलेगा।

    • देश को सरल और पारदर्शी टैक्स ढांचा मिल सकेगा।

    2.सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी की बिक्री

    क्या होना चाहिए

    • अगले तीन सालों में सभी सरकारी कंपनियों में सरकारी की हिस्सेदारी 75 फीसदी करने का रोडमैप।

    • पिछले साल के मुकाबले विनिवेश लक्ष्य 36 हजार करोड़ से बढ़ाया जाए। पिछले साल कुल विनिवेश लक्ष्य 54000 करोड़ का था।

    बजट से संभावना

    • सेबी के प्रस्ताव के मद्देनजर सरकार बड़े विनिवेश लक्ष्य कर सकती है और तकरीबन 2 दर्जन कंपनियों में हिस्सा बिक्री की घोषणा कर सकती है।

    ये पड़ेगा असर

    • शेयर बाजार में निवेशकों को बेशकीमती सरकारी कंपनियों में निवेश का मौका मिलेगा।

    • वित्तीय घाटा कंट्रोल करने में सरकार को मदद मिलेगी।

    • शेयर बाजार में बड़ी मात्रा में पूंजी आ सकेगी जिससे बाजार में बड़ी तेजी की उम्मीद बनती है।

    3.विदेशी निवेश बढ़ाने के नए प्रस्ताव

    क्या होना चाहिए

    • देश में बड़ी मात्रा में निवेश लाने के लिए विभिनन क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाना और नए क्षेत्र खोलना।

    बजट में संभावना

    • डिफेंस सेक्टर में एफडीआई सीमा 49 फीसदी हो सकती है।

    • बीमा और बैंकिंग में विदेशी निवेश का उदारीकरण

    • रेलवे, इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल्टी, नगर विकास, तेल-गैस और पावर में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन।

    ये पड़ेगा असर

    • घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा

    • रुके हुए प्रोजेक्ट जल्द शुरू हो जाएंगे

    • इंपोर्ट कम हो जाएगा और ट्रेड बैलेंस बनेगा

    • नौकरियां बढ़ाने में मदद मिलेगी

    4. सब्सिडी में कटौती

    क्या होना चाहिए

    • एलपीजी और कैरोसिन सब्सिडी में कमी।

    • फर्टिलाइजर सब्सिडी को कम करने की कार्ययोजना

    • फूड सिक्योरिटी बिल पर संतुलित आवंटन

    बजट में संभावना

    • फर्टीलाइजर सब्सिडी को कम करने की योजना लाई जा सकती है।

    • फ्यूल सब्सिडी कम करने के लक्ष्य तय किए जा सकते हैं।

    ये होगा असर

    • सब्सिडी का बोझ कम होने से सरकार की वित्तीय सेहत में सुधार होगा।

    • वित्तीय घाटे में कमी आएगी।

    5. टैक्स में बदलाव होना चाहिए

    क्या होना चाहिए

    • 80 सी के तहत टैक्स छूट सीमा बढ़नी चाहिए

    • होम लोन, मेडिकल और बच्चों की पढ़ाई पर टैक्स छूट बढ़े

    • नया डायरेक्ट टैक्स कानून लागू करने का रोडमैप

    बजट में संभावना

    • आयकर में छोटी रियायत संभव। बचत बढ़ाने को मिल सकता है प्रोत्साहन।

    • वेल्थ टैक्स की दर बढ़ सकती है।

    क्या पड़ेगा असर

    • बड़ी संख्या में टैक्स देने वाले लोगों को राहत मिलेगी

    • खर्च को प्रोत्साहन मिलेगा।

    http://money.bhaskar.com/article/MARK-STMF-five-top-reform-initiative-to-be-taken-by-modi-government-in-budget-4674791-NOR.html?google_editors_picks=true



    Economic Survey: Inflation expected to moderate by end 2014


    WPI inflation rose to a five-month high of 6.01 per cent in May due to higher prices of food items. (Reuters)WPI inflation rose to a five-month high of 6.01 per cent in May due to higher prices of food items. (Reuters)


    As the new government battles stubbornly high food inflation, the pre-budget economic survey today predicted that the headline inflation would ease by year end, providing room to the RBI to cut interest rates.

    "Headline WPI (wholesale price index) inflation is expected to moderate by the end of 2014. However, risks to the outlook stems from possible sub-normal monsoon and higher crude oil prices (on account of the crisis in Iraq)," the Economic Survey 2013-14 tabled in Parliament by Finance Minister Arun Jaitley said.

    As inflation eases, it is expected that the RBI would adopt a more accommodative stance and bring down interest rate.

    "The monetary management challenge will also be helped by fiscal consolidation and addressing of supply side constraints that exacerbate food inflation. All these factors, in tandem, are expected to create room for monetary easing later this fiscal year," it said.

    However, WPI inflation rose to a five-month high of 6.01 per cent in May from 5.20 per cent in the previous month mainly driven by higher prices of food items.

    Talking about the challenges, the Survey said, the Meteorological Department has predicted below-normal rainfall at 93 per cent of the long period average with 70 per cent probability of an El Nino occurring.

    The odds of a drought are 60 per cent now, compared with 25 per cent in April, Skymet, a private forecaster said.

    Besides, the other most prominent risk (to price rise) is the impact on oil prices on account of the crisis in Iraq.

    Crude oil prices are hovering around USD 110 per barrel. Two-thirds of India's oil needs are met through imports. Iraq is the second-largest oil supplier after Saudi Arabia.

    The survey said inflation showed signs of receding with average wholesale price index (WPI) inflation falling to a three-year low of 5.98 per cent during 2013-14 compared to 7 and 9 per cent over the previous two years.

    Consumer price inflation, though higher than the WPI, has also exhibited signs of moderation with CPI (new-series) inflation declining from 10.21 per cent during 2013-14 to about 9.49 per cent in 2013-14, the survey said.

    Food inflation, however, remained stubbornly high during 2013-14, reaching a peak of 11.95 per cent in third quarter.

    Highlighting reasons, the survey said, high inflation, particularly food inflation, was the result of structural as well as seasonal factors.

    Contribution of the commodity sub-groups, fruits and vegetables, as well as egg, meat and fish to the food inflation has been very high, it said.

    However, inflation in Non Food Manufactured Product (WPI core) has remained benign throughout the year, with average inflation moderated to four year low of 2.9 per cent in 2013-14, which indicates that underlying pressures of broad-based inflation have somewhat eased, it said.

    IMF has projected that most global commodity prices are expected to remain flat during 2014-15, which augurs well for inflation in emerging market, including India.

    The survey noted that the course of gradual monetary easing that had started alongside some moderation of inflationary pressures at the beginning of the financial year 2013-14 was disrupted in May 2013, following indications of possible tapering of the US Fed's quantitative easing.

    Following the ebbing of volatility in the foreign exchange market, it said, RBI initiated normalisation of the exceptional measures in a calibrated manner since its mid-quarter review (MQR) of September 20, 2013.

    The interest rate corridor was realigned to normal monetary policy operations with the MSF rate being reduced in three steps to 8.75 per cent between September 20, 2013 and October 29, 2013, it said.

    RBI in its Third Quarter Review of Monetary Policy on January 28, 2014, hiked the repo rate by 25 basis points to 8 per cent on account of upside risks to inflation, to anchor inflation expectations and to contain second round effects, it said.

    The move was intended to set the economy securely on the disinflationary path, it added.










    0 0

    धर्म, राजनीति और पूंजी के बरमुडा त्रिभुज में कत्ल की इस रात की कोई सुबह नहीं!


    पलाश विश्वास

    7700 के पार निफ्टी, सेंसेक्स 440 अंक उछला

    मोदी सरकार का पहला बजट बाजार को खुश कर गया है। सेंसेक्स-निफ्टी 1.75 फीसदी चढ़े हैं।


    फिर वही विकास का कामसूत्र।फिर वही योगाभ्यास।फिर वही वैदिकी मंत्र।इस कूटिल सेक्सी तंत्र यंत्र मंत्र के कूट रहस्य का खुलासा रियल टाइम में असंभव है।खास बात यह है कि मलाईदार तबके की सेहत और जेबों का खास ख्याल रखा गया है और चादर से बाहर पैर न फैलाने के ऐलान के बावजूद नौकरीपेशा,कारोबारी लोगों को ढाई लाख तक की आय पर कोई इनकाम टैक्स न देना पड़े,इसका इंतजाम कर दिया गया है।अपढ़,अदक्ष जनगण के विकास के मंत्रोच्चार के लिए देशी विदेशी पूंजी प्रवाह को निर्बाध निरंकुश बनाने और छिनाल संस्कृति को छइया छइया करके कार्निवाल का माहौल जमजमाट कर दिया गया है।ब्राजील के हारने से दुःखी और अर्जेंटीना के लिए प्रार्थनारत क्रयशक्ति संपन्न जनगण और कारपोरेट मीडिया के लिए यह बजट नमोमय भारत का भूदान यज्ञ है।


    इस भूदान यज्ञ के तहत बजट में सौ स्मार्ट नगरों के लिए 7060 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया गया है जो शैतानी औद्योगिक गलियारों और हीरक बुलेटी चतुर्भुज के मुताबिक है।यानी देहात के सर्वनाश को सर्वोच्च प्रथमिकता दी गयी है और कृषिजीवी भारत के मृत्यु परवाने पर दस्तखत है यह केसरिया कारपोरेटबजट।


    गौरतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का संकल्प व्यक्त करते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने आज अपने पहले बजट में विदेशी निवेश को सरल बनाने की अनेक घोषणाएं की और कालेधन को वापस लाने के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई।


    विनिवेश का रोडमैप चूंकि पहले से तैयार है और उस पर तेजी से अमल भी हो रहा है,इस सिलसिले में खास खुलासा नहीं हुआ,जिससे प्रतिकूल असर होता और इस सिलसिले में वित्तमंत्री ने तथ्यों और सूचनाओं को सार्वजनिक करने से परहेज किया है।

    लेकिन पीपीपी गुजरात माडल को महिमामंडित करते हुए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के राष्ट्रवाद का आवाहन पूरी वैदिकी रस्मअदायगी के साथ हो गया है। जैसा कि आर्थिक समीक्षा में संकेत दिया गया था।

    इस रामवाण के बाद राजनीतिक बाध्यताओं की आंच से जले छाछ भी फूंककर पीने वाले बाजार में जान आ गयी है और बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर देखने को मिल रहा है। वित्त मंत्री के बजट भाषण के बाद लाल निशान में आए बाजार अब बढ़त के साथ आगे बढ़ रहे हैं। सेंसेक्स और निफ्टी हरे निशान में आ गए हैं। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी खरीदारी लौटी है। रियल्टी, मेटल और पावर शेयरों में सबसे ज्यादा खरीदारी नजर आ रही है।

    फिलहाल बीएसई का 30 शेयरों वाला प्रमुख इंडेक्स सेंसेक्स 180 अंक यानि 0.7 फीसदी की मजबूती के साथ 25,625 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। वहीं एनएसई का 50 शेयरों वाला प्रमुख इंडेक्स निफ्टी 51 अंक यानि 0.7 फीसदी की बढ़त के साथ 7,636 के स्तर पर कारोबार कर रहा है।



    बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री तनिक अस्वस्थ भी हो गये।जिसकी वजह से उन्‍हें पांच मिनट का ब्रेक लेना पड़ा। बाद में ब्रेक से लौटने पर उन्‍होंने बाकी का बजट भाषण बैठकर पढ़ने का फैसला किया। हालांकि, बजट स्‍पीच के आखिर में उनकी तबीयत सुधरने के बाद उन्‍होंने दोबारा से खड़े होकर अपना भाषण पूरा किया। जानकार मानते हैं कि संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है, जब‍ किसी वित्‍त मंत्रीने बजट स्‍पीच के दौरान ब्रेक लिया हो।  मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जेटली डायबिटिक हैं और उनकी एक बार बायपास सर्जरी भी हो चुकी है। खबरों के मुताबिक, गुरुवार को भाषण पढ़ते वक्‍त जब उन्‍हें सांस लेने में दिक्‍कत होने लगी तो उन्‍होंने दो गिलास पानी पीया। करीब बैठीं विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने उन्‍हें सदन से माफी मांगकर कुछ मिनट का ब्रेक लेने की सलाह दी, लेकिन शुरू में जेटली इसके लिए तैयार नहीं हुए। हालांकि, बाद में वह इसके लिए राजी हो गए।


    हम शुरुआती रुझान पर ही आज चर्चा करेंगे और बाकी सूचनाएं जैसे जैसे आयेंगी,उसका कूट तिलिस्म का पासवर्ड निकालने की कोशिश करते रहेंगे।


    फिर वही बरमुडा त्रिभुज धर्म,राजनीति और पूंजी का।आज अंग्रेजी और भाषाई अखबारों के मुखपन्नों और संपादकीय में देश को कड़वी दवाई के लिये तैयार रहने की नसीहत देते हुए धर्मयोद्धा प्रधानमंत्री के पक्ष में फिर जनादेश सुनामी की रचना तो की ही गयी है,इसके साथ ही कारपोरेट लाबिइंग के रास्ते मीडिया  ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।


    वाशिंगटन से सैम अंकल ने खबरदार भी किया कि नई सरकार लोक लुभावन तौर तरीकों को तिलांजलि दें तो अमेरिकी कंपनियां भारतीय मुक्त बाजार में अरबों अरबों डालर का निवेश कर सकते हैं।अमेरिकी और वैश्विक निवेशकों की आस्था और कारपोरेटइंडिया के एकमुश्त समर्थन की नींव पर बजट रचना की गयी है।


    गौरतलब है कि इससे पहले बजट कू पूर्व संध्या पर इकनॉमिक सर्वे ने अधिकारों से लैस एक नया फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी ऐंड बजट मैनेजमेंट ऐक्ट बनाने, राज्य सरकारों के हस्तक्षेप से मुक्त नैशनल फूड मार्केट बनाने, राशन कार्ड्स के बजाय फूड स्टैंप्स या कैश ट्रांसफर सिस्टम अपनाने और बेहतर डिलीवरी तथा जवाबदेही तय करने के लिए सोशल सेक्टर की स्कीम्स में बदलाव की वकालत की है। आशावादी लोग इसे एक अच्छा रिफॉर्म प्रोग्राम बताएंगे, लेकिन हवाई बातों से परहेज करने वाले लोग साफ और ठोस कदमों की जानकारी मिलने पर ही संतुष्ट होंगे।


    बजट प्राविधि,संसदीय प्रक्रिया और अर्थशास्त्र की धज्जियां उधेडने का यह अभूतपूर्व करिश्मा सहलाने और रतिसुख प्राप्त करने की कामकला सिद्धांत के तहत हुआ है।बजट निर्माण प्रक्रिया के सामान्यत: पांच चरण हैं। प्रथम चरण में बजट की रूपरेखा बनाई जाती है। दूसरे में इसका दस्तावेज तैयार किया जाता है। तीसरे चरण में इसे संसद में स्वीकृति के लिए लाया जाता है। चौथे चरण में बजट का क्रियान्वयन तथा पांचवें चरण में वित्त कोषों का लेखांकन तथा परीक्षण होता है।बजट केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों का आईना है। इसके जरिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार का एक कोर ग्रुप आर्थिक नीतियां तय करता है। इस कोर ग्रुप में प्रधानमंत्री के अलावा वित्त मंत्री, वित्त मंत्रालय के अधिकारी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहते हैं। वित्त मंत्रालय की ओर से प्रशासनिक स्तर पर जो अधिकारी होते हैं, उनमें वित्त सचिव के अलावा राजस्व सचिव और व्यय सचिव शामिल होते हैं। यह कोर ग्रुप वित्त मंत्रालय के सलाहकारों के नियमित संपर्क में रहता है। सरकारें अपने हिसाब से इस कोर ग्रुप का ढांचा बदलती भी रहती हैं।


    धर्मयोद्धा नमोमहाराज और एकमुश्त वित्त प्रतिरक्षा मंत्री ही बजट प्रक्रिया में मुख्यभूमिका निबाहते रहे ,जाहिर है।इस प्रक्रिया में पहली बार योजना आयोग का उल्लेखनीयभूमिका नहीं है क्योंकि मोंटेक के इस्तीफे के बाद नये उपाध्यक्ष की नियुकति नहीं हुई और न ही नई सरकार के आर्थिक विशेषज्ञों और सलाहकारों का कोई देशी नेटवर्क बना है।गौरतलब है कि  बजट की रूपरेखा बनाने में योजना आयोग, नियंत्रक महालेखा परीक्षक व प्रशासनिक मंत्रालयों की मदद ली जाती है। प्रत्येक मंत्रालय अपनी आवश्यकताओं की जानकारी वित्त मंत्रालय को देता है। योजना आयोग सरकारी योजनाओं की प्राथमिकताओं से वित्त मंत्री को अवगत कराता है और नियंत्रक लेखा परीक्षक लेखा-जोखा उपलब्ध कराता है।


    यह बजट अपने आप में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है जो वैश्विक निर्देशन और संघ परिवार मुख्यालय के निर्देशन में तैयार हुआ।


    यह बूंबाट डर्टी पिक्चर सिर्फ विकास और एंटरटेनमेंट के लिए है,जहां जनकल्याणकारी राज्य और गणतंत्र की सड़ती लाशों की बदबू विदेशी तेल और गंध से छुपायी गयी है।


    और इस धर्म, राजनीति और पूंजी के बरमुडा त्रिभुज में कत्ल की इस रात की कोई सुबह नहीं।


    केसरिया जायनवादी धर्मोन्मादी कारपोरेट सरकार और शाही बजरंगियों के पहले बजट में आयकर में छूट के मार्फत मलाईदार तबके को मलहम और सुधार एजंडे का निरमम वास्तव।


    खास बात तो यह है,जो केसरिया संहारक बजट की थीमसांग है, विनिवेश ,प्रत्यक्ष निवेश और निजीकरण के जरिये भारत के उनतीस राज्यों को केंद्रीकृत बाजार में तब्दील करने के कार्यभार के संकल्प के साथ लोकसभा चुनावों में पराजित लेकिन नमो सरकार में अमित शाह की शाही सवारी के मुकाबले सबसे अहम कारपोरेट वकील अरुण जेटली,जो वित्तमंत्री के साथ साथ रक्षा मंत्री भी हैं,यानी वैश्विक व्यवस्था के हित साधने का कम्प्लीट पैकेज, न बजट पेश करते हुए पूंजी की तमाम भव बाधाएं दूर करने और निनानब्वे फीसद जनता की गंगाप्राप्ति का भव्य आयोजन कर सुधारों के मार्फत कर दिया है,जैसा कि मध्ययुग से जारी ग्लोबीकरण के अर्थशास्त्र की चर्चा करते हुए हम बार बार लिखते बोलते रहे हैं।


    आयकर राहत का हिसाब करते हुए हमारे पढ़ लिखे तबके को यह बात शायद समझ में नहीं आयेगी और आयेगी भी तो उनकी गैंडाई त्वचा में दावानल की आंच महसूस नहीं की जायेगी कि प्रतिरक्षा (इसके साथ आंतरिक सुरक्षा और खुदरा बाजार से लेकर आधारभूत आर्थिक उत्पादन संरचना समवेत भी नत्थी है),और बीमा(इसके साथ बैंकिग और तमाम वित्तीय क्षेत्र,सेवा क्षेत्र) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की हदबंदी तोड़ने की धर्मोन्मादी घोषणा की है।पूरे देश को एकीकृत करने के हिंदुत्व जायनवादी अभियान के नरमेध राजसूय के जरिये कर प्रणाली और वित्तीय सुधार का अंगीकार भी है।


    मोदी सरकार के पहले बजट के बाद जूते-चप्पल, छोटे फ्लैट टीवी, स्पोर्ट्स का सामान, साबुन, कंप्यूटर, ब्रांडेड कपड़े, पैकेज्ड फूड और सोलर प्रोडक्ट्स सस्ते हुए हैं।


    हालांकि, सरकार ने तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ाया है। सिगरेट, तंबाकू, पान मसाला महंगे होंगे। साथ ही कोल्ड ड्रिंक, इंपोर्टेड मोबाइल, रेडियो टैक्सी सेवा महंगे हो गए हैं।

    इंडस्ट्री देखना चाहती थी कि बजट में सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए क्या कदम उठाती है।


    एचसीसीकेचेयरमैन, अजीत गुलाबचंदका कहना है कि ये मोदी सरकार का पहला बजट है। इंडस्ट्री की नजर इस पर होगी कि बजट में आर्थिक सुधार के क्या कदम उठाए जाते हैं और देश की तरक्की के रास्ते पर ले जाने के लिए क्या दिशा होगी। इंडस्ट्री को बजट से सिर्फ दिशा की उम्मीद है। सरकार के पास बजट बनाने के लिए वक्त कम था। सरकार नई है, इसलिए विशिष्ट ऐलानों की उम्मीद नहीं है।


    फीडबैक इंफ्राकेचेयरमैन, विनायक चटर्जीके मुताबिक बजट में विशिष्ट रोडमैप का उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हालांकि, ये देखना जरूरी होगा कि इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए निवेश बढ़ाए जाने के लिए सरकार की क्या योजना है।


    सीआईआईकेडायरेक्टर जनरल, चंद्रजीत बनर्जीका कहना है कि बजट में सरकार की नीतियों में रिफॉर्म के ऐलान की उम्मीद है। लेकिन, अहम है ऐलानों को लागू कैसे किया जाएगा इस पर नजर होगी। वित्तीय अनुशासन की दिशा वाले बजट की उम्मीद है।


    प्रभुदास लीलाधरकेज्वाइंट एमडी, दिलीप भट्टका कहना है कि बाजार सिर्फ ये जानना नहीं चाहता है कि सरकार की क्या योजना है। बाजार की नजर ठोस आंकड़ों पर होगी। इकोनॉमी में रिवाइवल, ग्रोथ को बढ़ावा, महंगाई को बढ़ाए बिना निवेश कैसे बढ़ेगा, ये बाजार देखेगा। बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। लेकिन, सभी निवेशक गिरावट पर खरीदारी का मौका तलाश रहे हैं। अगर एसटीटी कम किया जाता है तो बाजार की ओर रिटेल निवेशकों का रुझान बढ़ेगा।


    एडेलवाइज फाइनेंशियल सर्विसेजकेसीईओ (होलसेल कैपिटल मार्केट्स), विकास खेमानीके मुताबिक नई सरकार बने हुए अभी कुछ ही वक्त हुआ है, इसलिए बजट से ज्यादा उम्मीद नहीं है। लेकिन जीएसटी, रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स, पीपीपी, डीटीसी को लेकर ऐलानों या सफाई आने की उम्मीद है। बाजार में बजट के बड़ी गिरावट आने की आशंका कम है। निवेशकों के लिए गिरावट पर खरीदारी का मौका होगा। बजट में जीएसटी का रोडमैप साफ होने से बैंकिंग और कैपिटल गुड्स सेक्टर का अच्छा प्रदर्शन देखने को मिल सकता है।


    मोतीलाल ओसवालके चेयरमैन, मोतीलाल ओसवालका कहना है कि मोदी सरकार का पहला बजट लोगों की उम्मीदों पर जरूर खरा उतरेगा। वहीं अगर सरकार ने पॉलिसी को सही तरीके से लागू कर लिया तो फिर 1 लाख करोड़ रुपये तक का विनिवेश लक्ष्य हासिल हो सकता है। रिटेल निवेशकों को वापस बाजार में लाने के लिए सरकार को पीएसयू कंपनियों के विनिवेश में इन्हें ज्यादा छूट देनी चाहिए।


    मोतीलाल ओसवाल एसेट मैनेजमेंटके मनीष सोंथालियाका कहना है कि अगर बजट उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा तो बाजार में 5 फीसदी की गिरावट संभव है। उम्मीद के मुताबिक बजट नहीं रहने पर निफ्टी 7200 तक गिरने की आशंका है। लेकिन उम्मीद के मुताबिक बजट रहने पर निफ्टी 8000 तक जाने की उम्मीद है।



    आइए जानते हैं कि बजट में वित्त मंत्री ने अब तक क्या घोषणाएं की हैं -


    वित्त मंत्री: वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत

    वित्त मंत्री: महंगाई कम करने पर पूरा जोर

    वित्त मंत्री: 7-8 फीसदी की जीडीपी दर हासिल करने की उम्मीद

    वित्त मंत्री: इकोनॉमी सुधार के लिए कदम उठाएंगे

    वित्त मंत्री: इस बजट में ग्रोथ के लिए प्रतिबद्ध

    वित्त मंत्री: कड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हटेगी सरकार

    वित्त मंत्री: 4.1% वित्तीय घाटे का लक्ष्य हासिल करेंगे

    वित्त मंत्री: वित्त वर्ष 2016 में 3.6% वित्तीय घाटे का लक्ष्य

    वित्त मंत्री: वित्त वर्ष 2017 के लिए 3% वित्तीय घाटे का लक्ष्य

    वित्त मंत्री: नई यूरिया पॉलिसी बनाई जाएगी

    वित्त मंत्री: फूड और ऑयल सब्सिडी सिर्फ जरूरतमंदो के लिए

    वित्त मंत्री: इसी साल जीएसटी का अंतिम फॉर्मूला

    वित्त मंत्री: पुरानी तारीख से टैक्स वसूलने का इरादा नहीं

    वित्त मंत्री: कड़े कदम उठाने के अलावा विकल्प नहीं

    वित्त मंत्री: उच्च स्तरीय कमेटी सभी रेट्रोस्पेक्टिव मामलों की जांच करेगी

    वित्त मंत्री: डिफेंस में एफडीआई सीमा बढ़ाकर 49%

    वित्त मंत्री: इंश्योरेंस में एफडीआई सीमा बढ़ाकर 49%

    वित्त मंत्री: मैनेजमेंट कंट्रोल के साथ इंश्योरेस में 49% एफडीआई

    वित्त मंत्री: सस्ते घरों के नियमों में बदलाव किया जाएगा

    वित्त मंत्री: सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी बेचेंगे

    वित्त मंत्री: 100 स्मार्ट शहरों के लिए 7060 करोड़ रु आवंटित

    वित्त मंत्री: देश में रोजगार के मौके बढ़ाने की जरूरत

    वित्त मंत्री: इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में सुधार की जरूरत

    वित्त मंत्री: 9 एयरपोर्ट पर ई-वीजा लागू करेंगे

    वित्त मंत्री: स्किल इंडिया, ग्राम ज्योति योजना शुरू होंगी

    वित्त मंत्री: प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के लिए 1000 करोड़ रु

    वित्त मंत्री: नए ग्रामीण ऊर्जा योजना को 500 करोड़ रु

    वित्त मंत्री: आरईआईटी को टैक्स-पास-थ्रू स्टेटस

    वित्त मंत्री: मनरेगा के बजट में बदलाव नहीं

    वित्त मंत्री: प्रधानमंत्री सड़क योजना के लिए 14389 करोड़ रु

    वित्त मंत्री: ग्रामीण आवास योजना के लिए 8000 करोड़ रु

    वित्त मंत्री: रूरल आंत्रप्रनर के लिए 1000 करोड़ रु

    वित्त मंत्री: 4 नए एम्स बनाने पर विचार जारी

    वित्त मंत्री: नए एम्स के लिए 500 करोड़ रु आवंटित

    वित्त मंत्री: 5 नए आईआईटी, आईआईएम बनाए जाएंगे

    वित्त मंत्री: ग्रामीण पानी आपूर्ति के लिए 3600 करोड़ रु

    वित्त मंत्री: 12 नए सरकारी मेडिकल कॉलेज

    वित्त मंत्री: 600 नए कम्यूनिटी रेडियो शुरू होंगे

    वित्त मंत्री: नए आईआईटी, आईआईएम के लिए 500 करोड़ रु



    वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने संसदमें मोदी सरकार का पहला आम बजट पेश किया। उन्‍होंने इनकम टैक्‍स छूट की सीमा मौजूदा दो लाख रुपए से बढ़ा कर ढाई लाख करने की घोषणा की। वरिष्‍ठ नागरिकों के लिए तीन लाख रुपए (मौजूदा से 50 हजार रुपए ज्‍यादा) तक की आय टैक्‍स से मुक्‍त रखी गई है। होम लोन पर अब दो लाख रुपए तक के ब्‍याज पर टैक्‍स छूट मिलेगी। पहले यह सीमा डेढ़ लाख रुपए थी। सेक्‍शन 80 सी के तहत टैक्‍स में छूट पाने के लिए निवेश की सीमा भी एक लाख रुपए से बढ़ा कर डेढ़ लाख कर दी गई है। वित्‍त मंत्री ने टैक्‍स रेट में कोई बदलाव नहीं किया है, बस स्‍लैब बदला है। पीपीएफ स्‍कीम में अब लोग साल में एक लाख के बजाय अधिकतम डेढ़ लाख रुपए निवेश कर सकेंगे। नए टैक्‍स प्रावधानों से 6 लाख रुपए सालाना आय वालों के 5150 रुपए की बचत होगी।


    वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आज अपना पहला बजट पेश कर दिया। बजट पेश करते हुए जेटली ने कहा कि हमारी सरकार को सिर्फ 45 दिन हुए हैं ऐसे में बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद न करें। आम बजट में विदेशी निवेश को सरल बनाने और 100 नए स्मार्ट सिटी बनाने का ऐलान किया गया है। हालांकि बजट पेश होते ही संसेक्स में गिरावट देखी गई।



    वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के पहले बजट को आज लोकसभा में पेश करते हुए कहा कि भारत को विकास के पथ पर ले जाना होगा। उन्होंने कहा पूर्ववर्ती सरकार द्वारा निर्णय लेने की धीमी गति से संभावनाएं कम होती गई और पिछले दो वित्त वर्ष में विकास दर पांच प्रतिशत से नीचे बनी रही।

    उन्होंने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिल रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था को 7 से 8 प्रतिशत के विकास पथ पर लाने के बजट में उपाय किए गए हैं। वर्तमान आर्थिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है। इसके मद्देनजर वित्तीय अनुशासन और वित्तीय सुदृढ़ीकरण अपनाने की जरूरत है।



    महंगाई पर काबू पाना मुश्किल

    जेटली ने कहा कि यह एनडीए का पहला बजट है और महंगाई पर काबू पाना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा देश में गरीबों के लिए काफी काम करना है। साथ ही उन्होंने कहा कि विकास दर को दो अंकों में लाना सरकार का लक्ष्य है। जेटली ने कहा कि दुनिया में वित्तीय गिरावट का असर भारत पर भी पड़ा है। उन्होंने कहा कि विकास के लिए बड़ा फंड जरूरी है।


    बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई

    जेटली ने बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई का प्रस्ताव दिया साथ ही कहा कि सरकार एफडीआई को प्रोत्साहित करेगी। जेटली ने कहा कि सरकार रक्षा क्षेत्र में 26 फीसदी एफडीआई को मंजूरी देगी। टैक्स से जुड़े झगड़े सीबीडीटी कमेटी के जरिए निपटाए जाएंगे। जीएसटी लाने पर भी विचार हो रहा है। बैंकों को जवाबदेह और स्वायत्त बनाया जाएगा।


    100 नए स्मार्ट सिटी का प्लान

    जेटली ने कहा कि 100 नए स्मार्ट सिटी बनाने का प्लान है जबकि 100 शहरों का आधुनिकीकरण भी किया जाएगा। स्मार्ट शहरों के लिए 7060 करोड़ रुपये का प्रस्ताव है। पर्यटन बढ़ाने के लिए ई वीजा की जरूरत है। देश के नो हवाई अड्डों पर ई वीजा की सुविधा दी जाएगी।


    नई यूरिया नीति लाएंगे

    सरकार पेट्रोलियम पर सब्सिडी की समीक्षा करेगी साथ ही नई यूरिया नीति लाएगी। काले धन पर जेटली ने कहा कि ये अर्थव्यवस्था के लिए अभिशाप है। काला धन वापस लाना होगा। वित्त मंत्री ने कहा कि तीन साल में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चुनौती होगा। विकास के लिए बड़े फंड की जरूरत होगी। हमारा लक्ष्य विकास दर को दो अंकों में लाना है।


    बाजार में तेजी

    नरेंद्र मोदी सरकार का पहले बजट पेश होते ही शुरुआती तेजी के बाद बजट की घोषणाओं से निराश निवेशकों की बिकवाली से बाजार ने गोता लगाना शुरू कर दिया। लेकिन जैसे जैसे बजट अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ने लगा सेंसेक्स ने भी रफ्तार पकड़ ली। बजट खत्म होने पर सेंसेक्स करीब 300 अंक ऊपर चढ़ गया।


    वित्‍त मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीके 'ड्रीम प्रोजेक्‍ट' (सरदार पटेल की विश्‍व की सबसे ऊंची मूर्ति बनाना) के लिए दो सौ करोड़ रुपए देने का प्रस्‍ताव किया है, लेकिन मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए सौ करोड़ रुपए का ही प्रावधान रखा है। उन्‍होंने सरकार का खर्च घटाने के लिए आयोग बनाने का प्रस्‍ताव भी किया है। बजट में घोषित अहम बातेंये हैं-

    • गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा 'स्‍टैट्यू ऑफ यूनिटी' बनाने के लिए 200 करोड़ रुपए का प्रावधान

    • नौ एयरपोर्ट्स पर ई-वीजा दिए जाने की सुविधा

    • कौशल विकास के लिए 'स्किल इंडिया' नाम से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर योजना चलाई जाएगी।

    • सौ स्‍मार्ट सिटीज बनाने के लिए 7060 करोड़ रुपए का प्रावधान।

    • साफ-सफाई को बढ़ावा देने के लिए स्‍वच्‍छ भारत अभियान चलाया जाएगा।

    • रक्षा क्षेत्र में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा 49 फीसदी कर दी गई है।

    • गांवों तक बिजली पहुंचाने के लिए दीन दयाल उपाध्‍याय ग्राम ज्‍योति योजना शुरू की जाएगी।

    • बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ योजना के लिए सौ करोड़

    • दिल्‍ली में क्राइसिस मैनेजमेंट सेंटर खोलने का प्रावधान, इसके लिए पैसा 'निर्भया फंड' से दिया जाएगा।

    • प्रधानमंत्री सड़क योजना के लिए 14389 करोड़ रुपए

    • 500  करोड़ रुपए खर्च कर आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, विदर्भ और पूर्वांचल में एम्‍स खोले जाएंगे। जम्‍मू, छत्‍तीसगढ़, गोवा, आंध्र प्रदेश और केरल में आईआईटी खोले जाने का भी एलान।

    • मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए सौ करोड़ का प्रावधान

    • अहमदाबाद और लखनऊ में पीपीपी मॉडल के जरिए मेट्रो रेल शुरू की जाएगी। इसके लिए सौ करोड़ रुपए रखे गए हैं।

    • चालू वर्ष में ही किसानों को समर्पित टीवी चैनल 'किसान टेलीविजन' लॉन्‍च किया जाएगा।

    • नाबार्ड के जरिए पांच लाख किसानों को कर्ज दिया जाएगा।

    • 'सॉयल हेल्‍थ कार्ड' मुहैया कराने की स्‍कीम शुरू  की जाएगी। इसके लिए सौ करोड़ रुपए रखे गए हैं। 56 करोड़ रुपए की लागत से देश भर में मिट्टी जांचने के लिए प्रयोगशालाएं बनवाई जाएंगी।

    बजटपेश करने से पहले वित्‍त मंत्री ने पार्लियामेंट हाउस के कमरा नंबर 9 में कैबिनेट की बैठक में हिस्‍सा लिया। जेटली ने कैबिनेट को बजट का सार बताया। इसके बाद कैबिनेट ने बजट को मंजूरी दे दी।

    01:19 PM

    प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों पर सर्विस टैक्स नहीं

    01:16 PM

    सिगरेट पर एक्साइज ड्यूटी 11-72% बढ़ाई

    01:16 PM

    गुटखा पर एक्साइड ड्यूटी बढ़ाकर 70%

    01:16 PM

    सर्विस टैक्स का दायरा बढ़ेगा

    01:15 PM

    मोबाइल, इंटरनेट के विज्ञापनों पर सर्विस टैक्स

    01:11 PM

    पैकेजिंग मशीनरी पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर 6 फीसदी की गई

    01:07 PM

    तंबाकू पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ी

    01:06 PM

    फुटवेयर पर एक्साइज ड्यूटी घटेगी

    01:05 PM

    सोलर पावर इक्विपमेंट पर कस्टम ड्यूटी में छूट से मोजर-बेयर को फायदा

    01:05 PM

    चुनिंदा सोलर पावर इक्विपमेंट पर कस्टम ड्यूटी में छूट

    01:05 PM

    सभी तरह के इंपोर्टेड कोल पर 2.5% कस्टम ड्यूटी

    01:03 PM

    विंड पावर इक्विपमेंट पर कस्टम ड्यूटी घटाकर 6%

    01:03 PM

    फ्लैट स्टील प्रोडक्ट्स पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाकर 7.5%

    01:01 PM

    होम लोन पर ब्याज छूट सीमा बढ़ने से दीवान हाउसिंग, एचडीएफसी जैसी कंपनियों को फायदा

    01:00 PM

    डायरेक्ट टैक्स कोड की समीक्षा होगी

    01:00 PM

    19 इंच से छोटे एलसीडी, एलईडी टीवी पर कस्टम ड्यूटी खत्म

    12:59 PM

    कलर पिक्चर ट्यूब पर बेसिक कस्टम ड्यूटी खत्म

    12:59 PM

    इथेन, प्रोटेन पर कस्टम ड्यूटी घटाकर 2%

    12:59 PM

    स्पैंडेक्स यार्न पर कस्टम ड्यूटी खत्म

    12:59 PM

    आरबीडी, पामोलिन पर कस्टम ड्यूटी खत्म

    12:54 PM

    वित्त वर्ष 2015 में 17.94 लाख करोड़ रु का कुल सरकारी खर्च

    12:53 PM

    पावर जेनरेशन कंपनियों को 31 मार्च 2017 तक टैक्स छूट

    12:52 PM

    पावर जेनरेशन कंपनियों के लिए टैक्स छूट बढ़ाई गई

    12:51 PM

    डायरेक्ट टैक्स पर लगने वाले सरचार्ज में बदलाव नहीं

    12:50 PM

    25 करोड़ रु से ज्यादा निवेश करने वाली मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को टैक्स छूट

    12:47 PM

    होम लोन पर ब्याज छूट सीमा बढ़ाकर 2 लाख रु

    12:46 PM

    80सी के तहत निवेश सीमा बढ़ाकर 1.5 लाख रु

    12:46 PM

    सीनियर सिटीजन के लिए आयकर छूट सीमा 3 लाख रु

    12:45 PM

    आयकर छूट सीमा बढ़ाकर 2.5 लाख रु की गई

    12:44 PM

    वित्त वर्ष 2015 में योजनागत खर्च 5.7 लाख करोड़ रु

    01:20 PM

    प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों पर सर्विस टैक्स नहीं लगने से जागरण प्रकाशन, डीबी कॉर्प को फायदा

    01:17 PM

    सिगरेट पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ने से आईटीसी, गॉडफ्रे फिलिप्स और गोल्डन टोबैको को नुकसान

    01:10 PM

    सभी तरह के इंपोर्टेड कोल पर 2.5% कस्टम ड्यूटी से कोल इंडिया को फायदा

    01:07 PM

    तंबाकू पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ने से आईटीसी को नुकसान

    01:06 PM

    फुटवेयर पर एक्साइज ड्यूटी घटने से मिर्जा इंटरनेशनल, लिबर्टी शूज को फायदा

    01:05 PM

    सभी तरह के इंपोर्टेड कोल पर 2.5% कस्टम ड्यूटी से बिजली और खाद कंपनियों को नुकसान

    01:03 PM

    विंड पावर इक्विपमेंट पर कस्टम ड्यूटी घटने से सुजलॉन एनर्जी को फायदा होगा

    http://hindi.moneycontrol.com/budget2014/


    आर्थिक सर्वे के मुख्य बिंदु

    नई दिल्ली।संसद में आज प्रस्तुत आर्थिक सर्वे के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं: - पिछले दो सालों के दौरान पांच फीसदी से नीचे रही विकास दर को पीछे छोड़ते हुए 2014-15 में आर्थिक विकास दर 5.4-5.9 फीसदी रह सकती है।

    - बैलेंस ऑफ पेमेंट की स्थिति 2013-14 में, और खास कर पिछली तीन तिमाहियों में काफी सुधरी। निकट भविष्य में इसे बरकरार रख पाना एक चुनौती होगी।

    - 2001-2012 के बीच देश के सेवा क्षेत्र की चक्रवृद्धि सालाना विकास दर चीन के बाद सर्वाधिक नौ फीसदी रही। इस दौरान चीन की दर 10.9 फीसदी थी।

    - जीडीपी के मामले में दुनिया के शीर्ष 15 देशों में सेवा क्षेत्र के जीडीपी के मामले में 2012 में भारत का स्थान 12वां। इसी दौरान वैश्विक जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 65.9 फीसदी और रोजगार में सेवा क्षेत्र का योगदान सिर्फ 44 फीसदी रहा, जबकि भारत के मामले में यह क्रमश: 56.9 फीसदी और 28.1 फीसदी रहा।

    - 2013-14 में फैक्टर लागत (मौजूदा मूल्य) पर जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 57 फीसदी रहा, जो 2000-01 के मुकाबले छह फीसदी अधिक है।

    - 2013-14 में सेवा क्षेत्र में एफडीआई प्रवाह 37.6 फीसदी गिरावट के साथ 6.4 अरब डॉलर रहा, जबकि एफडीआई में समग्र तौर पर 6.1 फीसदी वृद्धि रही।

    - निर्यात: विश्व सेवा निर्यात में भारत का योगदान 1990 के 0.6 फीसदी से बढ़कर 2013 में 3.3 फीसदी हो गया और यह योगदान वस्तु निर्यात के मुकाबले अधिक है। देश के कुल सेवा निर्यात में 46 फीसदी योगदान करने वाले सॉफ्टवेयर सेवा निर्यात की वृद्धि दर 2013-14 में घटकर 5.4 फीसदी रह गई। करीब 12 फीसदी योगदान करने वाले यात्रा सेक्टर में 0.4 फीसदी गिरावट रही।

    - पीएफआरडीए अधिनियम, कमोडिटी वायदा कारोबार को वित्त मंत्रालय के तहत लाना और एफएसएलआरसी रिपोर्ट पेश किया जाना 2013-14 में मील के तीन पत्थर रहे।

    - एफएसएलआरसी ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक स्तर पर सुझाव दिए हैं। ये मुख्य रूप से शासन व्यवस्था में सुधार के सिद्धांतों की प्रकृति से संबंधित हैं।

    - बैंकों की सकल गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में वृद्धि। समग्र तौर पर बैंकिंग सेक्टर का एनपीए मार्च 2011 के कुल ऋण के 2.36 फीसदी से बढ़कर दिसंबर 2013 में 4.40 फीसदी हो गया।

    - आरबीआई ने अधोसंरचना, लौह और इस्पात, कपड़ा, उड्डयन और खनन क्षेत्र की पहचान संकटग्रस्त क्षेत्र के रूप में की है।

    - नई पेंशन प्रणाली (एनपीएस), जिसे अब राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली कहा जा रहा है, के साथ देश की पेंशन प्रणाली का व्यापक सुधार हुआ है। यह देश में वृद्धावस्था के टिकाऊ समाधान की बुनियाद प्रस्तुत करता है।

    - सात मई 2014 तक एनपीएस के तहत 67.11 लाख सदस्य थे और उनकी कुल संपत्ति 51,147 करोड़ रुपये थी।

    - असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए 2010 में शुरू की गई स्वावलंबन योजना को 2010-11, 2011-12 और 2012-13 में दाखिला लेने वाले लाभार्थियों के लिए विस्तारित किया गया। सह-योगदान का लाभ 2016-17 तक उपलब्ध होगा।

    - दीर्घावधि विदेशी कर्ज दिसंबर 2013 के अंत में कुल विदेशी कर्ज का 78.2 फीसदी था, जो मार्च 2013 के अंत में 76.1 फीसदी। दीर्घावधि कर्ज दिसंबर 2013 के अंत में मार्च 2013 के अंत के मुकाबले 25.1 अरब डॉलर

    (8.1 फीसदी) बढ़ा, जबकि लघु-अवधि कर्ज चार अरब डॉलर (4.1 फीसदी) घटा, जिससे आयात घटने का पता चलता है।

    - 20113-14 में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर घटकर तीन साल के निचले स्तर 5.98 फीसदी पर आ गई।

    - उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर में भी गिरावट का रुझान।

    - थोक और उपभोक्ता दोनों प्रकार की महंगाई दर में गिरावट की उम्मीद।

    - वित्तीय घाटा कम किया जाना देश के लिए जरूरी बना रहा।

    - वित्तीय घाटा कम किए जाने के लिए सिर्फ खर्च-जीडीपी अनुपात घटाने की जगह अधिक कर-जीडीपी अनुपात का सुझाव।

    - आक्रामक नीतिगत पहल ने 2013-14 में सरकार को वित्तीय घाटा कम करने में मदद की।

    - 2013-14 में वित्तीय घाटा जीडीपी का 4.5 फीसदी।

    - केंद्र और राज्य सरकारों की कुल देनदारी जीडीपी के अनुपात में कम हुई।

    - वर्ष 2013-14 में देश के बकाया-भुगतान की स्थिति काफी सुधरी है। चालू खाता घाटा 32.4 अरब डॉलर (जीडीपी का 1.7 फीसदी) रहा, जो 2012-13 में 88.2 अरब डॉलर (जीडीपी का 4.7 फीसदी) था।

    - रुपये की वार्षिक औसत विनिमय दर 2013-14 में प्रति डॉलर 60.50 रुपये रही, जो 2012-13 में 54.41 रुपये थी और जो 2011-12 में 47.92 रुपये थी।

    -2012-13 में उद्योग का विस्तार सिर्फ एक फीसदी हुआ और 2013-14 में यह दर और कम 0.4 फीसदी हो गई।

    - देश का विदेशी पूंजी भंडार मार्च 2014 के आखिर में बढ़कर 304.2 अरब डॉलर हो गया, जो मार्च 2013 के आखिर में 292 अरब डॉलर था।




    नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली मोदी सरकार का पहला बजट पेश कर रहे हैं। जेटली ने बजट पेश करते हुए कहा कि देश में महंगाई को कम करना सबसे बड़ी चुनौती है। पढ़ें-जेटली के आम बजट की मुख्य बिंदु।

    -रेडिमेड कपड़े, श्रृंगार का सामान महंगा

    -मोबाइल फोन सस्ता

    -तंबाकू, पान मसाला, सिगरेट महंगा

    -तेल, टीवी और साबुन हुआ सस्ता

    -इनकम टैक्स छूट सीमा 2 से बढ़कर 2.5 लाख रुपये

    -दिल्ली में बिजली सुधार के लिए 200 करोड़ रुपये

    -दिल्ली में जल सुधार के लिए 500 करोड़ रुपये

    -एशियाई खेलों के प्रशिक्षण के लिए 100 करोड़ रुपये

    -कश्मीरी विस्थापितों के पुनर्वास के लिए 500 करोड़

    -जम्मू-कश्मीर में स्टेडियम के लिए 200 करोड़

    -नेशनल स्पोर्ट्स एकेडमी का निर्माण होगा

    -सारनाथ, बोधगया सर्किट का विकास

    -नए जलमार्ग के लिए 4200 करोड़

    -थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए 100 करोड़

    -NHAI के लिए 37880 करोड़ का प्रस्ताव

    -6 नए टेक्सटाइल क्लस्टर, 200 करोड़ का प्रस्ताव

    -पश्मीना संवर्धन के लिए 50 करोड़

    -वाराणसी के बुनकरों के विकास के लिए 50 करोड़

    -जनता को गरीबी मुक्त बनाना हमारी प्राथमिकता

    -हमारा लक्ष्य विकास दर को दो अंकों में लाना है

    -विकास के लिए बड़ा फंड जरूरी

    -तीन साल में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चुनौती

    -काला धन वापस लाना प्राथमिकता

    -नई यूरिया नीति लाएंगे

    -पेट्रोलियम पर सब्सिडी की समीक्षा होगी

    -जीएसटी लाने पर भी विचार हो रहा है

    -टैक्स से जुड़े झगड़े सीबीडीटी कमेटी निपटाएगी

    -रक्षा क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई को मंजूरी

    -एफडीआई को प्रोत्साहित करेगी सरकार

    -बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई का प्रस्ताव

    -बैंकों को जवाबदेह और स्वायत्त बनाएंगे

    -100 स्मार्ट शहरों का विकास करेंगे

    -गांवों तक बिजली पहुंचाने के लिए 500 करोड़

    -देश में 24 घंटे बिजली सप्लाई की योजना

    -सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए 200 करोड़ रुपये

    -पीएम सिंचाई योजना के लिए 1 हजार करोड़

    -टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए 9 शहरों में ई-वीजा सुविधा

    -स्मार्ट शहरों के लिए 7060 करोड़ रुपये का प्रस्ताव

    -बैंकों को जवाबदेह और स्वायत्त बनाएंगे

    -राष्ट्रीय पेयजल योजना को 3600 करोड़ रुपये

    -राष्ट्रीय बैंक को 8000 करोड़ रुपये

    -महिला बैंक को 100 करोड़ रुपये

    -पीएम सड़क योजना को 14389 करोड़

    -बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना को 100 करोड़

    -आदिवासी वन बंधु योजना को 100 करोड़

    -वरिष्ठ नागरिक पेंशन योजना जारी रहेगी

    -गांवों तक बिजली पहुंचाने के लिए 500 करोड़

    -नए मेडिकल कॉलेज बनाए जाएंगे

    -शहरी गरीबों के सस्ते आवास के लिए 4000 करोड़ रुपये

    -लखनऊ, अहमदाबाद में मेट्रो के लिए 100 करोड़ रुपये

    -सर्व शिक्षा अभियान के लिए 28635 करोड़ रुपये

    -नए एम्स के लिए 500 करोड़ रुपये

    -5 ग्रामीण हेल्थ रिसर्च सेंटर खोलने का प्रस्ताव

    -मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए 100 करोड़ रुपये

    -5 नए IIT, 5 नए IIM खोलने का प्रस्ताव

    -आंध्र प्रदेश, राजस्थान में कृषि यूनिवर्सिटी

    -कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन के लिए 100 करोड़ रुपये

    -कृषि ऋण के लिए 8 लाख करोड़

    -भूमिहीन किसानों के लिए 5 लाख का कर्ज

    -कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए 5 हजार करोड़ रुपये

    -सौर ऊर्जा के लिए 500 करोड़


    Finance Minister Arun Jaitley wasted no time on preambles or poetry as he presented his first Union Budget, stressing on fiscal prudence and making it clear that "we cannot spend beyond our means." (Budget 2014: Highlights)


    To encourage savings, Mr Jaitley said as he reached his tax proposals, he announced some relief for individual tax payers, though he left tax rates and slabs unchanged. Mr Jaitley has raised the exemption limit by Rs. 50,000 to Rs. 2.5 lakh a year. This means that anyone who earns less than 2.5 lakh will not be taxed; those earning more than that will save Rs. 5,150 a year.


    The finance minister also raised the exemption limit for senior citizens to Rs. 3 lakh; he hiked the exemption limit on long-term financial savings by Rs. 50,000 to Rs. 1.5 lakh a year and raised the tax-free cap on home loan interest from Rs. 1.5 to Rs. 2 lakh. (Arun Jaitley Provides Big Relief to Income Tax Payers)


    Mr Jaitley also enhanced the Public Provident Fund (PPF) ceiling from the current Rs. 1 lakh to Rs. 1.5 lakh in a financial year.   


    Earlier in his speech, the minister underscored the challenges the government faces to revive a rundown economy and said he had "no option but to take bold steps to spur growth." He said his government was bound to usher in policies for higher growth and to lower inflation. (Rs. 1000 Crore Set Aside to Improve Irrigation Facilities)


    The only break in his brisk reading came when the Lok Sabha saw an unprecedented five-minute adjournment at his request as he reportedly had a severe backache. He resumed his speech sitting. (Finance Minister Arun Jaitley Takes Break During Budget Speech)


    The markets, that had been flat since morning as they held their breath, cheered when the Finance Minister announced that he was retaining the fiscal deficit target at 4.1 per cent and that he saw the fiscal deficit for the next year at 3.6 per cent and down to 3 per cent by 2016-17. (Budget 2014: 5 New IITs and IIMs, Says Finance Minister)


    They plummeted when he indicated that the controversial retrospective tax was not being scrapped, but recovered some time later.  On most other counts Mr Jaitley seemed to meet market expectations. As of 1.15 p.m., the Sensex traded with over 300 points gain.


    He promised more clarity on the goods and services tax (GsT) before the year end. The GST is seen as the single-biggest fiscal reform in the country - it aims to widen the tax base, improve tax compliance and reduce transaction costs of businesses. It can add as much as 2 per cent of GDP to India's economy, analysts say.


    Mr Jaitley also made announcements on foreign direct investment in several sectors noting it would help manufacturing and employment. In bold steps, Mr Jaitley has proposed that FDI be raised from 26 per cent to 49 per cent in both defence and insurance. He announced FDI and an outlay of Rs. 7000 crore for the Prime Minister's vision of 100 smart cities, saying that the new middle class needed new cities.


    He proposed setting up five more IITs, five more IIMs, allotting Rs. 500 crore for this. He also resolved to ensure an AIIMS in every state soon, allocating Rs. 500 crore more to set up four such hospitals for now.  


    Mr Jaitley also reiterated his government's commitment to providing 24x7 electricity in all homes and sanitation in all house by 2019 when India celebrates Mahatma Gandhi's 150th birth anniversary.

    http://profit.ndtv.com/news/budget/article-budget-2014-arun-jaitley-targets-fiscal-consolidation-announces-income-tax-sops-586406



    Finance Minister Arun Jaitley (C) poses as he leaves his office to present the federal budget for the 2014-15 fiscal year, in New Delhi July 10, 2014. REUTERS-Stringer

    Indian security personnel stand guard near sacks containing the papers of the budget for the 2014-15 fiscal year, at the parliament in New Delhi July 10, 2014. REUTERS-Adnan Abidi-Files

    Security personnel stand guard near sacks containing the papers of the federal budget for the 2014-15 fiscal year, at the parliament in New Delhi July 10, 2014.  REUTERS-Adnan Abidi

    1 OF 3. Finance Minister Arun Jaitley (C) poses as he leaves his office to present the federal budget for the 2014/15 fiscal year, in New Delhi July 10, 2014.

    CREDIT: REUTERS/STRINGER



    Modi's first budget targets growth, curbs deficit

    BY MANOJ KUMAR

    NEW DELHI Thu Jul 10, 2014 12:41pm IST


    (Reuters) - Prime Minister Narendra Modi's new government on Thursday unveiled a budget it said can revive growth after the longest slowdown in a quarter of a century even while curbing borrowing.

    Modi's government, in office for less than two months, said it would raise caps on foreign investment in the defence and insurance sectors, and launch a tax reform to unify India's 29 states into a common market.

    Delivering his maiden budget, Finance Minister Arun Jaitley told parliament that India's 1.2 billion people were "exasperated" after two years of economic growth below 5 percent.

    He vowed that Asia's third largest economy would expand at an annual rate of 7-8 percent within three to four years.

    "We shall leave no stone unturned in creating a vibrant and strong India," Jaitley, 61, told lawmakers after climbing the steps of parliament and showing his budget briefcase to TV cameras.

    Modi, 63, won a landslide general election victory in May with a pledge to create jobs for the 1 million people who enter India's workforce every month.

    He has since warned that "bitter medicine" is needed to nurse the economy back to health from high inflation and the worst slowdown since free-market reforms in the early 1990s unleashed an era of rapid growth.

    At the same time, Jaitley vowed to adhere to the "daunting" budget deficit target - of 4.1 percent of gross domestic product for the fiscal year ending March 2015 - that the government inherited from its predecessor.

    "I have decided to accept this challenge - one fails when one stops trying," Jaitley told a hushed lower house of parliament. He said the budget deficit would be reduced to 3.6 percent in the following two fiscal years.

    'PARAMOUNT IMPORTANCE'

    Jaitley's commitment to fiscal discipline was stronger than many independent economists had expected. With the deficit already approaching half of the annual target just three months into the fiscal year, they expected him to raise the borrowing target to 4.4 percent for the current fiscal year.

    "Fiscal prudence is of paramount importance," Jaitley said. "We cannot leave behind a legacy of debt for our future generations."

    The government's other major policy initiatives had been broadly flagged in advance.

    Jaitley said he wants a solution by December on how India would impose a national Goods and Services Tax (GST), promising that the government would be "more than fair" in its dealings with the country's states on how revenue would be allocated.

    He also said he would set up a high-level committee to review retrospective tax claims blamed for choking off foreign investment after companies such as Britain's Vodafone (VOD.L) were hit with massive demands.

    Jaitley raised limits on foreign investment in defence and insurance ventures to 49 percent from 26 percent. Foreign defence contractors had sought a higher threshold to justify sharing technology when they site operations in India, a major arms buyer.

    The budget for the fiscal year to March 2015 was delayed by this year's general election, which handed Modi's Bharatiya Janata Party (BJP) the strongest electoral mandate in India in three decades.

    (Writing by Douglas Busvine; Editing by Richard Borsuk)

    Budget 2014: Highlights of Finance Minister Arun Jaitley's Budget speech

    Express News Service | July 10, 2014 1:32 pm

    Finance Minister Arun Jaitley presents the Narendra Modi government's first budget. Here are the highlights:

    1. Two years of sub-five per cent growth has led to challenges to the economy

    2. Green shoots of recovery seen in global economy

    3. Slow decision making has resulted in loss of opportunity

    4. We look forward lower level of inflation

    5. Will usher in policy regime that will usher in higher growth, low inflation

    6. Aim to achieve 7-8 per cent economic growth rate in next 3-4 years

    7. Will leave no stone unturned to create a vibrant India

    8. Budget proposes Plan expenditure of Rs 5,75,000 crore for current ficsal

    9. Anti-poverty programmes will be targeted well.

    10. We need to revive growth particularly in manufacturing sector and infrastructure

    11. There is urgent need to generate more resources

    12. Should we allow economy to suffer because of indecisiveness and populism

    13. Task before us is challenging

    14: We must continue to be watchful of CAD

    15. Target of 4.1 per cent fiscal deficit is daunting but accepting it as a challenge

    16. Finance Minister emphasizes on fiscal prudence, need to generate more resources.

    17. Iraq crisis having impact on oil prices

    18. We must address the problem of black money fully

    19. We must take bold steps to enhance economic activity

    20. Expenditure Management Commission will be constituted to look at expenditure reforms

    21. We are for minimum government, maximum governance

    22. Overall subsidy regime will be reviewed, especially food and oil. Marginalised sections and SC/ST to be protected

    23. New urea policy will be formulated

    24. We have no option but to take some bold steps to spurt economy; these are only the first steps and are directional

    25. This govt will not ordinarily change policies retrospectively which creates a fresh liability

    26. All future indirect transfers under the retro tax regime will be scrutinised by a high level committee of CBDT before action is taken

    27. We are committed to providing stable tax regime which is investor friendly

    28. Govt to set up a high-level Committee to interact with industry to bring about changes in tax laws if required

    29. FM Proposes to enhance the scope of income tax settlement commission.

    30. Govt proposes to strengthen authority for advance ruling in tax, set up more benches

    31. Transfer pricing regulations for residents and non-residents being done

    32. FDI in Defence sector raised to 49 per cent

    33. Finance Minister Arun Jaitley takes 5-minute break; Lok Sabha adjourned for 5 minutes

    34. Financial stability is foundation of rapid recovery

    35. Our domestic manufacturing is still at nascent stage

    36. Manufacturing units will be allowed to sell their products through retail and e-commerce

    37. Budget proposes 49 per cent FDI in insurance through FIPB route.

    38. Our Banking system needs to be further strengthened. Need to infuse rs 2.40 lakh crore in our banks

    39.Bank capital to be raised through retail sale of shares; Govt to continue to hold majority in PSU banks

    40. Govt proposes to provide finance to 5 lakh landless farmers through NABARD

    41. Will examine proposal to give additional autonomy to banks and make them more responsible

    42. E-visa to be introduced at 9 airports in the country

    43. Govt proposes to set up 100 smart cities. Govt to provide Rs 7,060 crore for development of such cities

    44. Public sector banks need Rs 2.40 lakh crore equity to conform with Basel-III norms by 2018

    45. Rs 50 cr set aside for indigenous cattle breed and blue revolution for inland fisheries

    46. We expect PSUs to invest Rs 2,47941 crore this fiscal

    47. Infrastructre Investment Trust being set up to finance infra projects and reduce burden on banks

    48. Total sanitation by 2019

    49. Budget proposes Rs 1,000 crore for Pradhanmantri Krishi Seechai Yojana to improve irrigation facility

    50. National multi-scale programme 'Skill India' to be introduced to provide training and support for employment

    51. Rs 200 cr set aside for the Sardar Patel statue project in Gujarat

    52. Deen Dayal Upadhaya Gram Jyoti Yojana to be launched to augment power supply in rural areas

    53. Pension scheme for senior citizens being revived

    54. Govt committed to providing 24×7 power supply to all homes

    55. Rs 50,548 cr proposed for SC development

    56. EPFO will launch a unified account scheme for portability of Provident Fund accounts

    57. Govt proposes to set up committee to examine how to utilise large funds lying unused in postal schemes

    58. Govt approves minimum monthly pension of Rs 1,000 per month under EPS-95 scheme run by EPFO

    59. Committee will be set up to examine how unused money in postal schemes can be utilised

    60. Govt announces schemes for disabled persons; to set up 15 new Braille press and revive 10 existing ones

    61. Rs 14,389 crore provided for Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana.

    62. Govt to launch 'Beti Bachao, Beti Padhao' scheme; sets aside Rs 100 crore for it

    63. Crisis Management Centres for women to be set up at all government hospitals in NCR region

    64. Govt increases wage ceiling for EPFO schemes to Rs 15,000 from existing Rs 6,500 per month

    65. Rs 3,600 crore provided for safe drinking water in 20,000 habitations in villages facing problem of impure drinking water

    66. Budget proposes National Housing Banking programme; sets aside Rs 8,000 crore

    67. Rs 2.29 lakh crore allocated for Defence budget.

    68. 4 more AIIMS in Andhra Pradesh, West Bengal, Vidharba and Purvanchal are under consideration; Rs 500 cr provided

    69.  Each state where there is no AIIMS will be added in the coming years

    70. Govt proposes to add 12 more medical government colleges

    71. 5 new IIMs and 5 new IITs proposed to be set up

    72. 'Kisan' TV channel to be launched by DD at cost of Rs 100 crore: Rs 100 crore for Community radio stations proposed

    73. FM proposes National Rural Internet and Technology Mission; Rs 500 crore set aside.

    74. Metro rail services to be launched in Lucknow and Ahmedabad; Rs 100 crore set aside for it

    75. Budget proposes to set up agri-infrastructure fund at a cost of Rs 100 crore; two more agri-research intitutes in

    Jharkhand and Assam

    76. FM announces Rs 100 crore for modernisation of madrasas

    77. Govt sets aside Rs 200 cr for setting up of agriculture university in AP and Rajasthan, and horticulture university in Haryana, Telangana

    78. Rs 100 crore provided for providing soil card to every farmer

    79. Govt committed to achieve 4 per cent farm growth; to use new technologies to boost crop yields

    80. Rs 500 crore price stabilisation fund to be set up

    http://indianexpress.com/article/india/politics/budget-2014-highlights-of-finance-minister-arun-jaitleys-budget-speech/3/








    0 0

    Full Speech: Arun Jaitley's maiden Union Budget

    Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)

    Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)

    Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)
    Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)Union Finance Minister Arun Jaitley with MOS for Finance Nirmala Sitharaman and officials outside Finance Ministry. (Source: PTI)

    Finance Minister Arun Jaitley presented his maiden budget of the BJP-led NDA government amid high expectations from common man to macro business players of the country. Jailetly in his budget left income tax rates unchanged while promising not to bring tax changes with retrospective effect.

    Here's the full text of the speech:

    Madam Speaker,
    I rise to present the Budget for the year 2014-15.

    I. STATE OF THE ECONOMY

    2. The people of India have decisively voted for a change. The verdict represents the exasperation of the people with the status-quo. India  unhesitatingly desires to grow. Those living below the poverty line are anxious to free themselves from the curse of poverty. Those who have got an opportunity to emerge from the difficult challenges have become aspirational. They now want to be a part of the neo middle class. Their next generation has the hunger to use the opportunity that society provides for them. Slow decision making has resulted in a  loss of opportunity. Two years of sub five per cent growth in the Indian economy has resulted in a challenging situation. We look forward to lower levels of inflation as compared to the days of double digit rates of food inflation in the last two years. The country is in no mood to suffer unemployment, inadequate basic amenities, lack of infrastructure and apathetic governance.

    CLICK HERE FOR FULL SPEECH

    http://pib.nic.in/archieve/others/2014/jul/gbEngSpeech.pdf


    0 0

    बजट 2014: कितना बचेगा आपका टैक्स


    सिगरेट महंगी, टीवी सस्ताः जानिए, मोदी के पहले बजट से आपको क्‍या मिला
    प्रकाशित Thu, जुलाई 10, 2014 पर 20:24  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

    मोदी सरकार के पहले बजट से सभी बड़ी उम्मीदें लगाएं बैठे थे, ऐसे में सरकार ने आम आदमी को टैक्स छूट के रूप में बड़ा तोहफा दिया है। बजट 2014 में जहां टैक्स छूट 2.5 लाख रुपये तक की आमदनी टैक्स फ्री कर दी गई है, वहीं 80 सी के तहत मिलने वाली टैक्स छूट की सीमा को भी बढ़ा दिया है।


    वहीं अलग-अलग योजनाओं में 80 सी के तहत अब 1.5 लाख रुपये तक के निवेश पर टैक्स छूट का फायदा मिलेगा। हालांकि टैक्स दरों में कोई बदलाव नहीं किए गए हैं। वित्त मंत्री के इन चंद कदमों से क्या वाकई बचत करने वालों के अच्छे दिन आ गए, टैक्स छूट में दी गई ये रियायत कितनी बड़ी है, इन मुद्दों पर लेंगे एक्सपर्ट्स की राय।


    मोदी सरकार के पहले बजट में आम आदमी को राहत देने की कोशिश की गई है। अब 2.5 लाख रुपये तक की सालाना आय पर आयकर नहीं लगेगा। इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटीजन) के लिए आयकर छूट सीमा 3 लाख रुपये की गई है। आयकर छूट की सीमा बढ़ने से टैक्स बोझ में 5000 रुपये की कमी आएगी। 

    सेक्शन 80सी के तहत निवेश पर टैक्स छूट सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 1.5 लाख रुपये कर दी है। साथ ही होमलोन के ब्याज पर बड़ी छूट भी दी है। अब 1.5 लाख रुपये के बजाए 2 लाख रुपये तक के होमलोन के ब्याज पर टैक्स छूट मिलेगी। पीपीएफ में निवेश की सीमा बढ़ाकर 1.5 लाख रुपये हुई है।


    फाइनेंशियल प्लानर अर्णव पंड्या का कहना है कि फाइनेंशियल प्लानिंग के नजरिए से देखा जाएं तो इन छोटे छूट से कोई ज्यादा बदलाव आने की उम्मीद नहीं है। आम जनता पर महंगाई का इतना बोझ पड़ता है कि वो बचत नहीं कर पाते हैं। अतिरिक्त बचत करना आम जनता के लिए मुश्किल होता जा रहा है।


    80 सी लिमिट को पूरा करने के लिए जरूरी नहीं कि लोग ज्यादा बचत कर पाएंगे। क्योंकि अब भी महंगाई बहुत ज्यादा है और लोगों के लिए बचत करना मुश्किल है। दूसरी तरफ ब्याज दरें भी काफी ज्यादा है। पीपीपएफ में निवेश की सीमा 1 लाख रुपये बढ़ाकर से 1.5 लाख रुपये कर दी गई है। लिहाजा जिनका लंबी अवधि के लिए निवेश करने का नजरिया हो और लंबी अवधि का फायदा उठाना हो तो पीपीएफ अच्छा विकल्प होगा। फाइनेंशियल प्लानिंग के हिसाब से आपको अपनी बचत का एलोकेशन करना चाहिए।


    टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया के मुताबिक आयकर पर टैक्स छूट की सीमा 2 लाख रुपये से बढ़कर 2.5 लाख रुपये हुई, 80सी के निवेश पर छूट 1 लाख रुपये से 1.5 लाख रुपये हो गई और होमलोन ब्याज पर छूट 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 2 लाख रुपये की गई है जिससे सभी वर्ग के करदाताओं को फायदा देगा। जिन लोगों की इनकम 30 फीसदी से ज्यादा के स्लैब में आती है उनके लिए करीब 30-35,000 रुपये की टैक्स की बचत होगी। इन सबको देखते हुए अच्छे दिन आने की आशा तो पूरी हो गई है लेकिन वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए कोई भी अतिरिक्त फायदा नहीं हुआ है।


    वित्त मंत्री चाहते तो आम आदमी को और राहत दे सकते थे। टैक्स में कमी, विदेशों से भारत के पैसों को लाना, ब्लैक मनी, टैक्स चोरी करने वाले लोगों के खिलाफ कोई कड़े कदम उठाएं जाते तो ज्यादा फायदेमंद हो सकता था।


    अब होम लोन, सेविंग्‍स के साथ 6 लाख रु. तक की इनकम होगी टैक्‍स फ्री

    • होम लोन के ब्‍याज पर कर छूट बढ़ी
    इस बजट में इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 24 के तहत होम लोन के ब्याज की अदायगी पर टैक्स से छूट की अधिकतम सीमा दो लाख रुपए की गई। इस प्रावधान से लोगों को कर बचाने में मदद मिलेगी। पहले यह सीमा 1.5 लाख रुपए थी। 
    • सेक्शन 80 सी के तहत विभिन्‍न बचत पर भी बढ़ी छूट की सीमा
    इस बजट में पीपीएफ में निवेश की अधिकतम सीमा को एक लाख रुपए से बढ़ा कर डेढ़ लाख रुपए कर दिया गया है। अब इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80 सी के तहत 1.5 लाख रुपए की बचत पर कर छूट मिलेगी। इसकी वजह से लोग और अधिक बचत कर सकेंगे। इस सेक्शन के तहत ईएलएसएस, एनएससी, यूलिप, ईपीएफ, पीपीएफ, जीपीएफ, एनपीएस आदि में बचत को शामिल किया जाता है। इसका मतलब यह है कि लोग इन विकल्पों में अधिक बचत कर सकेंगे। पहले सेक्शन 80 सी के तहत छूट की सीमा एक लाख रुपए होगी।
     
    छह लाख तक की आमदनी पर कोई टैक्स नहीं
     
    अगर किसी व्यक्ति की आमदनी छह लाख रुपए है और वह ऊपर बताई गई तीनों रियायतों का पूरा इस्तेमाल करता है, तो उसे कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा।
     
    बजट से कितना बचेगा आपका टैक्स 
     
    अगर आपकी सालाना आमदनी तीन लाख रुपए है-
     
      पूर्व स्थिति अब क्या होगा
    टैक्सेबल इनकम
    एक लाख रुपए 50,000 रुपए
    टैक्स 10,000 रुपए 5,000 रुपए
    सेस 300 रुपए 150 रुपए
    कुल टैक्स 10,300 रुपए 5,150 रुपए
     
    अगर आपकी सालाना आमदनी छह लाख रुपए है-
     
      पूर्व स्थिति अब क्या होगा
    टैक्सेबल इनकम चार लाख रुपए 3.50 लाख रुपए
    टैक्स
    50,000 रुपए 45,000 रुपए
    सेस 1500 रुपए 1350 रुपए
    कुल टैक्स 51,500 रुपए 46,350 रुपए
    अगर आपकी सालाना आमदनी 11 लाख रुपए है-
     
      पूर्व स्थिति अब क्या होगा
    टैक्सेबल इनकम 9 लाख रुपए 8.5 लाख रुपए
    टैक्स 1.6 लाख रुपए 1.55 लाख रुपए
    सेस 4,800 रुपए 4,650 रुपए
    कुल टैक्स 1,64,800 रुपए 1,59,650 रुपए
     
    यानि आप देख सकते हैं कि बजट की नई रियायतों से हर टैक्स स्लैब में आने वाले टैक्सपेयर को 5,150 रुपए की बचत होगी।
     
    ये हैं आयकर के नए स्लैब
     
    आय  टैक्‍स दर 
    Upto Rs.2,50,000  Nil
    Rs. 2,50,001 to Rs. 5,00,000 10%
    Rs. 5,00,001 to Rs. 10,00,000 20%
    Above Rs. 10,00,000  30%
     
    सीनियर सिटीजन: 60 वर्ष से अ‍धिक 
     
    Upto Rs.3,00,000  Nil
    Rs. 3,00,001 to Rs. 5,00,000 10%
    Rs. 5,00,001 to Rs.10,00,000 20%
    Above Rs. 10,00,000  30%
     
     
    सीनियर सिटीजन - 80 वर्ष से अधिक 
    Upto Rs. 5,00,000  Nil
    Rs. 5,00,001 to Rs. 10,00,000 20%
    Above Rs. 10,00,000 30%
     

    0 0



    नेशनल हाउसिंग बैंक को 12 हजार करोड़ रुपए

    बजट में नेशनल हाउसिंग बैंक को 12 हजार करोड़ रुपए दिए गए हैं। इसकी वजह से भावी ग्राहकों को कम कीमत के घर के लिए सस्ते कर्ज मिल सकेंगे। इसका व्‍यापक असर आने वाले दिनों में रियल एस्‍टेट सेक्‍टर पर देखने को मिलेगा। कम ब्‍याज दर पर लोन मिलने से घर खरीददारों की संख्‍या में इजाफा होगा। हालांकि, यह रकम बहुत ही कम है। 125 करोड़ की आबादी के इस देश में शहरी जनसंख्‍या काफी तेजी से बढ़ रही है। शहरों में घर की मांग भी उसी तेजी से बढ़ रही है। उसको देखते हुए यह रकम काफी नहीं है।
     
    पीपीपी मॉडल से 500 आदर्श सिटी का निर्माण

    शहरी नवीनीकरण कार्यक्रम के तहत पीपीपी मॉडल के जरिए काम किया जाएगा। बजट में पीपीपी मॉडल के जरिए कम से कम 500 आदर्श सिटी बनाने की बात कही गयी है। लेकिन, ये घोषणा यह नहीं बताती कि इस लक्ष्य को कैसे पूरा किया जाएगा। पीपीपी मॉडल के साथ पिछला अनुभव कुछ खास नहीं रहा है। ऐसे में इस घोषणा का क्रियान्वयन संदेह के घेरे में है।

    आरआईटीएस ट्रस्ट पर टैक्स छूट

    सरकार ने आरआईटीएस ट्रस्‍ट पर टैक्‍स छूट देने को कहा है। यह रियल एस्‍टेट सेक्‍टर को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए सबसे कारगर उपाय सिद्ध होगा। फंड की कमी से जूझ रहे इस सेक्‍टर को सरकार ने बड़ी राहत दी है। इस ट्रस्‍ट पर टैक्स छूट मिलने से छोटे निवेशक भी रियल एस्टेट में निवेश का मौका पा सकेंगे। विदेशी निवेश्‍ाक भी इस ट्रस्‍ट के माध्‍यम से रियल एस्‍टेट सेक्‍टर में निवेश कर पाएंगे। इसका फायदा डेवलपर्स के साथ घर खरीददार को भी मिलेगा। प्रोजेक्‍ट को तय समय पर पूरा करने में मदद मिलेगी। वहीं घर खरीददार को समय पर उनका घर मिलेगा।

    होम लोन पर टैक्स छूट

    बजट में होम लोन पर मिलने वाली छूट की सीमा बढ़ा दी गई है। इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 24 के तहत पहले 1.5 लाख रुपए पर ब्‍याज छूट को बढ़ा कर 2 लाख रुपए कर दिया गया है। इसके अलावा ग्रामीण आवास की जरूतर को पूरा करने के लिए 8000 करोड़ रुपए और शहरी आवास की जरूरत को पूरा के लिए 4000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए है। कम कीमत के घरों के निर्माण में एफडीआई की अनुमति और 100 नए स्‍मार्ट शहरों के लिए 7060 करोड़ रुपए भी बजट में आवंटित किए गए है। 

    हवाई अड्डों का निर्माण

    पीपीपी मॉडल से टियर टू और थ्री शहरों में हवाई अड्डों का निर्माण होगा। अभी यह कहना जल्‍दबाजी होगा कि यह मॉडल कितना सफल होगा है क्योंकि निवेशक छोटे शहरों में पैसा लगाने से कतराएंगे। यदि योजना सफल हुई तो इसका बड़ा व्‍यापक असर देखने को मिलेगा। छोटे शहरों में निवेश आने से विकास तेजी से होगा। कनेक्टिवटी अच्‍छी होने से शहर की तस्वीर बदलेगी। डेवलप हो रहे एयरपोर्ट के आसपास नए शहर डेवलप हो सकते हैं। इससे इन छोटे शहरों में प्रॉपर्टी की कीमत में इजाफा होगा।

    0 0

    22 हजार करोड़ की रियायतों के साथ वोटरों का आभार, रिफॉर्म के लिए करें इंतजार


    22 हजार करोड़ की रियायतों के साथ वोटरों का आभार, रिफॉर्म के लिए करें इंतजार
    नई दिल्‍ली
    मोदी सरकार ने 22,200 करोड़ रुपये की कर रियायतों के साथ मध्‍यवर्गीय वोटरों को धन्‍यवाद दिया है। बजट में कोई कड़वी दवा नहीं है। बड़े आर्थिक सुधारों का इंतजार करना होगा। अलबत्‍ता महंगाई से जूझने और करने की इच्‍छा बहुत कुछ है लेकिन अभी ब्‍योरा तैयार नहीं है। पूरे बजट भाषण में बमुश्किल 8 ऐसी बड़ी घोषणाएं मिलती हैं जिनमें दूर की कुछ सूझ नजर आती है अलबत्‍ता इनमें बिग बैंग रिफॉर्म, कोई गेम चेंजर आइडिया नहीं है। 
     
    बजट की अाठ बड़ी घोषणायें
     
    1. आयकर में  रि‍यायत
    • इनकम टैक्स से छूट की सीमा दो लाख रुपए से बढ़ा कर 2.5 लाख रुपए की गई। इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80 सी के तहत छूट की सीमा 1.5 लाख रुपए की गइ और होम लोन ब्‍याज पर कर छूट सीमा 1.5 लाख रुपये 2 लाख रुपये कर दी गई है।  
    असर : महंगाई के मारे मध्‍य वर्ग को राहत मिलेगी। बचत पर रियायत के जरिेये  ईएलएसएस, एनएससी, यूलिप, ईपीएफ, पीपीएफ, जीपीएफ, एनपीएस आदि में बचत बढ़ेगी। होम लोन लेने को प्रोत्‍साहन मिलेगा।  
     
    2. कृषि क्षेत्र के लिए पैकेज   
    • 1000 करोड़ रुपये की प्रधानमंत्री किसान सिंचाई योजना, नेशनल कॉमन मार्केट, महंगाई रोकने के लिए 500 करोड़ रुपये का मूल्य स्थिरीकरण कोष, किसानों को 100 करोड़ रुपए का हेल्थ कार्ड और कृषि भंडारण के लिए 5000 करोड़ रुपये के साथ बजट में एक मजबूत एग्री पैकेज दिखता है। 
    असर 
    सिंचाई पर खर्च की वापसी हुई है अलबत्‍ता सिंचाई सुविधायें राज्‍यों  के हाथ हैं। नेशनल कॉमन मार्केट से बिचौलियों को खत्‍म करके नेशनल मंडी को बढ़ावा मिलेगा। मूल्य स्थिरीकरण कोष की मदद से राज्य सरकारें जरूरी सामान बाजार से खरीदकर उन्हे रियायती दरों पर उपभोक्ताओं को बेचेंगी। उन्हे इस फंड के तहत सब्सिडी दी जाएगी।
     
    3.. 10,000 करोड़ रुपये का स्‍टार्ट अप  फंड  
    छोटे कारोबारि‍यों और युवा उद्य‍मियों को मिलेगा अपने कारोबार श्‍ुारु करने के लिए वेंचर कैपिटल, इक्विटी और सस्‍ते कर्ज, रिस्‍क कैपिटल मिलेगी। 
    असर 
    रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और युवा उद्यमि‍यों को कारोबार करने के लि‍ए प्रोत्‍साहन मि‍लेगा। अलबत्‍ता सीड कैपिटल व वेंचर कैपिटल देने वाली अन्‍य सरकारी संस्‍थायें भी सक्रिय हैं। 
     
    4- शहरों के वि‍कास पर फोकस 
    • सात शहरों में स्मार्ट इंडस्ट्रियल सिटी शहरी नवीनीकरण कार्यक्रम के तहत पीपीपी मॉडल के जरिए काम किया जाएगा। पीपीपी मॉडल के जरिए कम से कम 500 आदर्श शहर बनाए जाएंगे। टियर टू और थ्री सिटी में पीपीपी मॉडल से हवाई अड्डों का निर्माण होगा
    असर
    रियलिटी उद्योग और कंस्‍ट्रक्‍शन को बढ़ावा। स्मार्ट औद्योगिक सिटी में वे सारी सुविधा मिलेंगी जो किसी भी उद्योग को जरूरत होती है। रोजगार सृजन करने में भी ये शहर योगदान करेंगे। हालांकि शहरों के नि‍र्माण में पीपीपी मॉडल के साथ पिछला अनुभव कुछ खास बेहतर नहीं रहा है। ऐसे में इस घोषणा का क्रियान्वयन संदेह के घेरे में है। टियर टू और थ्री सिटी में हवाई अड्डों के निर्माण की योजना सफल हुई तो इसका असर देखने को मिलेगा।
     
    5. सस्‍ते मकानों के लिए 4000 करोड़ रुपये 
    • ससते मकानों के लिए 4000 करेाड़ रुपए रखे गए हैं। यह पैसा कैसे मिलेगा यह स्‍पष्‍ट नहीं है। नेशनल हाउसिंग बैंक को 12000 करोड़ रुपये मिलेंगे। 
    असर :
    देश में करीब 2.5 लाख घरों की कमी है, जिसमें से 90 फीसदी घर कम कीमत आय वर्ग को चाहिए। ऐसे में 4000 करोड़ की रकम बहुत ही कम है। इस रकम से मोदी सरकार सभी को घर देने के सपने को पूरा नहीं कर सकती है।

    6. बीमा व डिफेंस में विदेशी निवेश 
    • डिफेंस में 49 प्रतिशत तक एफडीआई लाया जाएगा। बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी हुआ।
    असर : रक्षा क्षेत्र के लिए विदेशी निवेश खोला जाना बड़ा फैसला है। इससे देश में ज्यादा विदेशी मुद्रा आ सकेगी। देश की रक्षा क्षेत्र के लिए आयात पर निर्भरता कम होगी। बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ने से विदेशी कंपनियां का रुझान देश में बढ़ सकेगा। इससे पहले 26 फीसदी से ज्यादा निवेश नहीं कर सकती थी कंपनियां। बीमा क्षेत्र में कंपटीशन बढ़ेगा जिससे ग्राहकों के लिए बेहतर प्रोडेक्ट बाजार में आ सकेंगे। बीमा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां जैसे रिलायंस कैपिटल, आदित्य बिरला नुवो, मैक्स इंडिया को फायदा होगा।
     
    7- लघु उद्योगों के लिए पैकेज 
    • एमएसएमई की परिभाषा बदलेगी और निवेश सीमा बढ़ेगी। छह नए टेक्सटाइल क्लस्टर्स बनाने की भी बात कही गई। छोटे कारोबारि‍यों के लि‍ए पेमेंट बैंकों को शुरू कि‍या जाएगा। एसएमई के लिए कारोबार से आसानी से निकलने के लिए नया बैंकरप्सी फ्रेमवर्क डेवलप किया जाएगा।
    असर 
    एमएसएमई की परिभाषा बदलने मौजूदा 2.6 करोड़ एमएसएमई की संख्या में इजाफा होगा। साथ ही देश में निर्माण गतिविधियां भी तेजी से बढ़ेंगी। रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त होंगे। देश में माइक्रो इंडस्ट्री के लिए मौजूदा सीमा 25 लाख, लघु उद्योग के लिए 5 करोड़, मध्यम उद्योग के लिए 10 करोड़ है।

    8; राष्‍ट्रीयकृत बैंकों के लिए  8000 करोड़ रुपए की पूंजी 
    • सरकारी बैंकों को वि‍त्‍तीय जरूरतें पूरी करने के लि‍ए सरकार की ओर से 8,000 करोड़ रुपए मि‍लेंगे। इसके अलावा, सरकारी बैंकों के शेयरों को बेचने की बात कही गई है।
    असर 
    पीएसयू बैंकों की एसेट क्‍वालि‍टी में सुधार आएगा। वहीं, उनकी वि‍त्‍तीय हालत भी बेहद होगी। बैकों के विनिवेश का रासता भी खुला है हालांकि सरकार इन पर स्‍वामित्‍व में बड़ी कमी नहीं करेगी। 

    0 0

    सरकार ने वित्त वर्ष 2015 के लिए वित्तीय घाटे का लक्ष्य 4.1 फीसदी रखा है। लेकिन सरकार के लिए इसे हासिल करने के लिए सब्सिडी बोझ घटाना होगा, ये कहना है कि प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार समिति के चेयरमैन सी रंगराजन का। उन्होंने ने वित्तीय घाटे के लक्ष्य का स्वागत किया है। उनके मुताबिक वित्तीय घाटे का लक्ष्य आय पर निर्भर करेगा और आय को लेकर चिंताजनक स्थिति नहीं है।

    बजटः कॉरपोरेट जगत की उम्मीदें कितनी पूरी

    प्रकाशित Thu, जुलाई 10, 2014 पर 18:35  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

    वित्तमंत्री ने आज उम्मीदों का बजट पेश किया। कोई बड़ा ऐलान तो नहीं हुआ लेकिन सभी वर्गों को खुश करने की कोशिश की गई। किसी को ज्यादा मिला तो किसी के पकवान में मीठा थोड़ा कम था- लेकिन कोई मायूस नहीं हुआ। अच्छे दिन का वादा करनेवाले मोदी के बजट में कुछ ठोस ऐलान हैं तो आगे इकोनॉमी को सुधारने का रोड मैप भी है।  इंफ्रा सेक्टर पर बड़ा फोकस किया गया है। रियल इस्टेट, हाउसिंग, पावर, और एग्रीकल्चर जैसे अहम सेक्टर को भी तवज्जो दी गई है। मोदी को सिंहासन में बिठाने वाले मिडिल क्लास को भी टैक्स छूट देकर बड़ी राहत देने की कोशिश की गई है। मोदी सरकार का बजट क्या इंडस्ट्री की उम्मीदों पर खरा उतरा है, इस पर सीएनबीसी आवाज़ की खास पेशकश।


    एचएसबीसी इंडिया की चेयरपर्सन नैना लाल किदवई का मानना है कि रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स पर सरकार का फैसला अनुमानित ही था। इन मामलों को जल्दी से सुलझाना संभव नहीं है लेकिन सरकार ने इसपर जांच की बात कही है जो अच्छा ही है। बजट में विनिवेश के ऊपर कोई ऐलान ना होने से थोड़ी निराशा है क्योंकि इसके लिए काफी ऐलान की उम्मीद थी और बाजार भी इसके लिए अनुकूल है। देश को नए बैंकों की जरूरत है और सरकारी पीएसयू बैंकों को मिलाने पर सैद्धांतिक मंजूरी मिलने से बैंकों के लिए अच्छा होगा। वित्त वर्ष 2017 से अकाउंटिंग के नए नियम जारी होने से भी सरकारी काम में पारदर्शिता आएगी।


    बजट में कंपनी एक्ट पर तो नहीं लेकिन डीटीसी के ऊपर आश्वासन जरूर दिए गए हैं कि इसकी समीक्षा होगी। वहीं जीएसटी के ऊपर भी राज्यों के बीच सहमति बनाने की बात कही गई है जो सकारात्मक है। हालांकि ऐलान करने से ज्यादा इन कामों को पूरा करना ज्यादा मुश्किल है।


    महिंद्रा एंड महिंद्रा के डायरेक्टर अरुण नंदा का कहना है कि बजट से काफी सारी उम्मीदें पूरी हुई हैं और आगे भी इस दिशा में काम होने की उम्मीद है। अपने पहले बजट में सरकार ने अच्छे दिनों का वादा पूरा करने की पूरी कोशिश की है। मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को टैक्स छूट बढ़ाने से देश का इंडस्ट्रियल प्रोडेक्शन बढ़ेगा लेकिन इसमें काफी वक्त लगेगा। बजट की दिशा तो ठीक है तो लेकिन तुरंत ही देश की तस्वीर बदल जाएगी ऐसा नहीं है। डिफेंस में एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 49 फीसदी करना बहुत बड़ा कदम है। डिफेंस में नीचे से शुरू करके ऊपर तक जाएंगे और बहुत सी बड़ी कंपनियां आकर यहां निवेश करेंगी। सालोंसाल मामले पेंडिंग रहने की कार्यपद्धति में बदलाव आएगा और इससे सेक्टर की हालत सुधरेगी। इसके अलावा डिफेंस में आगे चलकर और एफडीआई को मंजूरी दी जा सकती है।


    आईसीआईसीआई बैंक की एमडी और सीईओ चंदा कोचर का कहना है कि बजट में काफी सकारात्मक ऐलान हुए हैं। रोड, पोर्ट, शिपिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अच्छी पूंजी दी गई है। डिफेंस और इंश्योंरेंस में एफडीआई बढ़ाया गया है जो काफी समय से अपेक्षित था। इसके अलावा बैंकों को सीनियर बॉन्ड जारी करने की मंजूरी दी गई है जिससे बैंक पूंजी जुटा पाएंगे। बजट में सरकार का फोकस साफ है और ग्रोथ पर फोकस करना पॉजिटिव है। इस बजट को 10 में से 9 अंक दिए जा सकते हैं।


    बीसीजी के एशिया पैसेफिक के चेयरमैन जन्मेजय सिन्हा का कहना है कि देश में संस्थागत और विदेशी निवेश नहीं आ रहा है जिसे आकर्षित करने के लिए इस बजट में कोशिश की गई है। डिफेंस और बीमा में 49 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी देना इसी दिशा में बड़ा कदम है। इसके अलावा इस साल वित्तीय घाटे को 4.1 फीसदी के लक्ष्य हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है जो सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाता है। रोड, पोर्ट, स्मार्ट सिटी, आईआईएम खोलने, आईआईटी खोलने और एजुकेशन पर खर्चा बढ़ाने की बात कहकर रोजगार को पैदा करने की भी कोशिश की है। रेलवे बजट से पहले ही रेल किराए बढ़ाकर सरकार ने अपना विजन साफ कर दिया था और इसे ही बजट में दिखाने की कोशिश की गई है।


    बजट 2014: बाजार को क्या लगा अच्छा

    प्रकाशित Thu, जुलाई 10, 2014 पर 15:47  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

    मोदी सरकार का पहला बजट आम टैक्स पेयर के लिए अच्छी खबर लेकर आया है। अब सालाना 2.5 लाख तक की आमदनी पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। 80सी के तहत टैक्स छूट की सीमा भी 1 लाख से बढ़ाकर 1.5 लाख कर दी गई है। साथ ही होम लोन पर मिलने वाली ब्याज छूट भी 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दी गई है।


    लगता है बाजार को भी बजट काफी पसंद आया था क्योंकि बजट भाषण के वक्त 300 अंको तक लुढ़क चुके सेंसेक्स ने 400 अंक की जोरदार मजबूती दिखाई थी। तो इंडस्ट्री और बाजार को वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट में क्या बातें अच्छी लगी और कौन सी उम्मीदें पूरी नहीं हो पाईं, आइए जानते हैं।


    आनंद राठी फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन आनंद राठी का कहना है कि इस बजट में बडी बारीकीयों से हर सेक्टर पर ध्यान दिया गया है। रियल एस्टेट, इंफ्रा और पावर सेक्टर को बढ़ावा दिया गया है। वहीं ट्रांसपोर्ट टुरिज्म सेक्टर के बारे में बात की गई है। एज्यूकेशन के मामले में स्कील डेवलपमेंट को भी बढ़ावा दिया गया है।   

    इस बजट में कुछ प्रतिबंधों के कारण निवेश भले कम हो लेकिन बड़ी बात यह थी कि फिस्कल कंसोलिडेशन की तरफ वित्तमंत्री का शुरु से फोकस था। इसके अलावा महंगाई काबू में लाने की भी कोशिश की गई है और टैक्स छूट की सीमा बढ़ाकर आम जनता को भी राहत पहुंचाई है। जीएसटी इस साल के अंत तक नीचे लाने की कोशिश की जाएगी। एफडीआई बढ़ने और फंडफ्लो आने पर भारतीय बाजारों में ग्रोथ दिखाई देगी। मौजूदा बजट सभी स्तर पर बाजार के उम्मीदों पर खरा उतरा है।


    मार्केट एक्सपर्ट संदीप सभरवाल का कहना है कि इस बजट में काफी सकारात्मक एलान किए गए है और इससे ग्रोथ बढ़ने और महंगाई मे कमी आने कि उम्मीद है। टैक्सपेयर्स को जो रियायते दी गई है उससे आम जनता को भी राहत मिली है। हाउसिंग और 80सी में जो रियायत दी गई है इससे सेविंग बढ़ेगी।


    इक्विटीरश के कुणाल सरावगी का कहना है कि निफ्टी का चार्ट काफी अच्छा लग रहा है और इसमें ऊपरी रुझान बना हुआ है। जबतक निफ्टी 7500 के नीचे नहीं जाता तबतक मंदी आने की उम्मीद नहीं है। ऊपर में 7800 का स्तर पार होने पर बाजार दोबारा तेजी दिखाएगा।


    बजट से कितने खुश बाजार और इंडस्ट्री


    वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सबकी उम्मीदों का बजट पेश कर दिया है और बाजार के साथ साथ इंडस्ट्री के जानकारों का मानना भी यही है कि ये बजट आगे की सोच को दिखाने वाला है। आइये इंडस्ट्री और बाजार के जानकारों से जानते हैं कि उनके मुताबिक इस बजट से क्या मिला है।


    आईडीएफसी के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव लाल का कहना है कि इस बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर सेगमेंट को काफी तवज्जो दी गई है जो अभी तक नजरंदाज किया जा रहा था। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, भू जलमार्ग के लिए पूंजी, एनएचएआई का 8000 किलोमीटर सड़क बनाने का लक्ष्य इन सब बातों से इंफ्रा सेक्टर के लिए काफी अच्छे संकेत निकलकर सामने आ रहे हैं।


    इन सब कदमों से इंफ्रास्ट्रक्चर सेगमेंट के लिए निवेश अवश्य आएगा। इसमें कुछ समय लग सकता है लेकिन घरेलू निवेश के साथ साथ विदेशी निवेश भी अवश्य बढ़ेगा। राजीव लाल ने इस बजट को 10 में से 8 अंक दिए हैं।


    ब्लू ओशन कैपिटल एडवाइजर्स के निपुण मेहता का कहना है कि बाजार को जिस बजट का इंतजार था वो आ चुका है और बाजार की उम्मीदों के अनुरूप ही आया है। आज बाजार ने इससे तेजी की दिशा भी ली है। सरकार ने हाउसिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए काफी कदम उठाए हैं। सेविंग्स बढ़ाने के लिए जो कदम लिए हैं उनसे भी कुछ खास सेगमेंट जैसे हाउसिंग और रियल सेक्टर के लिए काफी अच्छी शुरुआत हो सकती है।


    एमएंडएम के ऑटोमोटिव डिवीजन के ईडी और प्रेसिडेंट पवन गोयनका का कहना है कि बाजार में कोई बहुत बड़ा ऐलान ना होने के बावजूद सभी वर्गों के लिए काफी कुछ कहा गया है। डायरेक्ट टैक्स में कटौती की उम्मीद ना होने के बाद भी इनमें कमी की गई है जो काबिलेतरीफ है। इसके अलावा वित्तीय घाटा को भी काबू करने की बात कही गई है जिससे निवेशकों का भरोसा बाजार में बनेगा। इस बजट से ग्रोथ के लिए एक दिशा मिल रही है और सरकार की निवेशक को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्धता नजर आ रही है।


    पवन गोयनका के मुताबिक इस बजट से इंडस्ट्री को अच्छे संकेत मिल रहे हैं और भरोसा है कि ज्यादा से ज्यादा निवेशक इंडस्ट्री में निवेश करने के लिए आगे आएंगे।


    बीएसई के मेंबर दीपेन मेहता का कहना है कि बजट में कोई बहुत बड़ी घोषणा नहीं हुई है और कोई नए स्कीम, प्रोग्राम का ऐलान नहीं किया है। सब्सिडी के मोर्चे पर भी कुछ खास निकलकर नहीं आया है। सरकार अपने खर्चे और वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए कहां से पैसा लाएगी इस पर स्पष्टता नहीं आई है। बजट में सभी सेक्टर के लिए कुछ ना कुछ देने की असफल कोशिश की गई है और किसी खास सेक्टर को उबारने के लिए कुछ नया नहीं है। मोदी बजट का जितना इंतजार था उसके विपरीत इस बजट को कुल मिलाकर बस ठीकठीक कहा जा सकता है।


    सबसे ज्यादा फायदा एफआईआई को हुआ है और घरेलू निवेशकों के लिए कोई साफ ऐलान नहीं किया गया है। एफआईआई को पूरी छूट दी गई है कि वो जो भी निवेश करेंगे वो कैपिटल गेन्स में जाएंगे। लेकिन 80सी के तहत निवेश सीमा बढ़ाने को एक अच्छा कदम माना जा सकता है।


    भारतीय बाजार विदेशी बाजारों के मुकाबले आकर्षक लग रहे हैं और इस बजट में एफआईआई को ही आकर्षित करने की कोशिश की गई है। बजट के बाद भी कोई नए स्टॉक और सेक्टर आकर्षक नहीं लग रहे हैं। हां तंबाकू इंडस्ट्री को थोड़ा धक्का जरूर लगा है जिससे इस सेक्टर में गिरावट देखी जा सकती है।


    हीरानंदानी ग्रुप के निरंजन हीरानंदानी का कहना है कि हालांकि सरकार ने हाउसिंग सेक्टर और रियल एस्टेट सेक्टर के लिए काफी कुछ ऐलान किए हैं लेकिन इसके बावजूद कुछ कमियां रह गई हैं। चीन से हाउसिंग सेक्टर से मुकाबला करने के लिए अभी भी कुछ कदम उठाने की जरूरत है। सरकार ने इसके लिए शुरुआत जरूर की है और दिशा देने की कोशिश की है। 2.5 करोड़ घर बनाने के लिए काफी पूंजी की जरूरत है जिसकी उपलब्धता कहां से होगी इसके बारे में अभी स्पष्टता नहीं है।


    हालांकि आरईआईटी का ऐलान होने से रियल्टी सेक्टर के लिए भारी पूंजी आएगी और बैंकों को भी रियल एस्टेट सेक्टर में पूंजी लगाने के लिए भरोसा मिलेगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली के इस बजट को 10 में से 7 अंक दिए जा सकते हैं।


    प्रभुदास लीलाधर की अमीषा वोरा का कहना है कि सरकार ने कई सेक्टर पर ध्यान देने की कोशिश की है। जैसे रियल एस्टेट सेक्टर के लिए आरईआईटी की बात कही है तो उससे रियल्टी सेक्टर को फायदा होगा और उसके कर्ज कम होंगे। रियल्टी सेक्टर के कर्ज कम होने से बैकों के एनपीए भी घटेंगे। सरकार ने इंफ्रा, हाउसिंग, रियल एस्टेट, पावर, एग्रीकल्चर जैसे कई महत्वपूर्ण सेक्टर के लिए अच्छे ऐलान किए हैं और इनका फायदा इकोनॉमी की ग्रोथ बढ़ने के रूप में आगे चलकर मिलेगा।


    0 0

    गांवों को इंटरनेट से जोडऩे के लिए 500 करोड़ रूपए का आवंटन

    गांवों को इंटरनेट से जोडऩे के लिए 500 करोड़ रूपए का आवंटन

    नई दिल्ली : सरकार ने 'डिजिटल भारत'पहल के तहत 500 करोड़ रूपए  का आवंटन करने की घोषणा की है। इसके तहत गांवों में ब्रॉडबैंड नेटवर्क लगाया जाएगा और हार्डवेयर तथा भारतीय साफ्टवेयर उत्पादों के स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। 
     

     'डिजिटल भारत'पहल के तहत राष्ट्रीय ग्रामीण इंटरनेट एवं प्रौद्योगिकी मिशन, सरकार गांवों में ब्रॉडबैंड की स्थापना पर ध्यान केंद्रित करेगी। हार्डवेयर व भारतीय साफ्टवेयर उत्पादों के स्थानीय विनिर्माण को प्रोत्साहन देगी। 

     जेटली ने संसद को सूचित किया ''साफ्टवेयर क्षेत्र के स्टार्टअप पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। गांवों में राष्ट्रीय ग्रामीण इंटरनेट एवं प्रौद्योगिकी मिशन सेवा तथा आईटी में प्रशिक्षण के लिए मैं 500 करोड़ रूपए आवंटित करने का प्रस्ताव करता हूं।'' 

    एक अन्य कदम जिससे प्रौद्योगिकी फमो'को ज्यादा अवसर उपलब्ध होगा, वित्त मंत्री ने 100 स्मार्ट सिटी का प्रस्ताव किया है। इसके लिए सरकार 7,060 करोड़ रपये प्रदान करेगी। लघु व मझोले उपक्रमों की आमदनी बढ़ाने के लिए वित्त मंत्री ने कहा कि विनिर्माण इकाइयों को अपने उत्पाद रिटेल व ई कामर्स प्लेटफार्म के जरिये बेचने की अनुमति होगी।


    0 0

    बकरे की अम्मा खैर मनाओ की कयामत जारी है।गुप्त तंत्रविधि के बजट में बोले खूब,कहा कुछ नहीं और जनता मस्त,भारत ध्वस्त,अमेरिका स्वस्थ।

    पलाश विश्वास


    एक अत्यावश्यक सूचनाः

    जब यह आलेख लिख रहा हूं और समूचे बजट डाक्यूमेंट की पड़ताल करते हुए प्रासंगिक तथ्य आलेख से पहले अपने ब्लागों में पोस्ट करने में लगा हूं,इसके मध्य मेरठ के एसएसपी का फोन आया कि उन्हें मेरा कोई मेल मिला होगा,उसे दुबारा भेजने के लिए उन्होंने कहा है।मैंने निवेदन किया कि मुझे जो मेल आते हैं,मैं फारवर्ड करके डिलीट कर देता हूं।तब उन्होने कहा कि किसी को भी मेरठ मंडल से संबंधित कोई शिकायत हो तो वे सीधे उन्हें,यानी एसएस मेरठ को सीधे फोन कर सकते हैं इस नंबर परः911212660548

    जनहित में यह सूचना जारी की जा रही है।

    एसएसपी मेरठ का आभार इस पहल के लिए।


    विशुद्ध गुप्त तंत्र विधि है भारत सरकार का मुक्ताबाजारी बजट।इसका कूट रहस्य खोलना मुश्किल ही नहीं,नामुमकिन है।डान के मुखातिब है पूरा देश,लेकिन डान की शिनाख्त असंभव।अपराध के प्रत्यक्षदर्शी है सारा जहां।कत्ल हो गया।लेकिन लहू का कोई सूराग नहीं।कातिल हाथों में महबूब की मेंहदी है।


    गुप्त तंत्रविधि के बजट में बोले खूब,कहा कुछ नहीं और जनता मस्त,भारत ध्वस्त,अमेरिका स्वस्थ।


    गौरतलब है कि अमेरिकी विशेषज्ञों व कारपोरेट जगत के लोगों ने भारत की मोदी सरकार के पहले बजट का स्वागत किया है और कहा है कि यह सही दिशा में है तथा इससे रोजगार एवं आर्थिक वृद्धि में तेजी आएगी। भारतीय अर्थ नीतियों पर निगाह रखने वाले इंडिया फस्र्ट ग्रुप के रोन सोमर्स ने वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा कल पेश बजट को मोदी सरकार का पहला शानदार बजट बताते हुए कहा कि  'यह संतुलित, नपा-तुला और सूझबूझ वाला बजट है।'


    सोमर्स ने कहा, 'इससे अमेरिकी निवेशक भारत में हो रहे सकारात्मक बदलाव से फिर से उत्साहित हुए हैं।Ó उल्लेखनीय है कि नई सरकार ने बीमा और रक्षा क्षेत्र में विदेशी हिस्सेदारी सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी तक ले जाने की अनुमति दी है। सोमर्स ने कहा कि रक्षा क्षेत्र को खोलने से ही प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण में सुविधा होगी। सेंटर फार स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के रिक रोसो ने कहा कि सरकार को इस अवसर का फायदा उठाकर रक्षा क्षेत्र में विदेशी भागीदारी को और ऊपर करना चाहिए था तथा आयकर धिनियम में 2012 में किए गए उस संशोधन को रद्द करना चाहिए था जो पिछली तारीख से प्रभावी बनाया गया है।


    लेकिन उन्होंने कहा कि इस बजट से निश्चित रूप से कुछ सुखद आश्चर्य मिले हैं जिसमें विदेशी निवेश की शर्तों में दी गई ढील शामिल है। 'मुझे लगता है कि इससे आने वाले वर्षों में भारत की विकास योजनाओं में अमेरिकी निवेश के लिए राह और चौड़ी हुई है।'  यूएस-इंडिया चैंबर आफ कामर्स के अध्यक्ष करूण रिशी ने कहा, 'यह बजट रोजगार सृजन एवं वृद्धि दर में तेजी लाने की दिशा में उठाया गया सही कदम है।'



    कारोबारी जगत की दृष्टि से किसी नई सरकार के पहले बजटको उससे इकनॉमी को मिलने वाली दिशा के आधारपर आंका जाता है, न कि आंकड़ेबाजी के आधारपर। 2014-15 के लिए अरुण जेटली के बजटमें एक साफ विजन है कि नई सरकार आने वाले वर्षों में इकनॉमी में इनवेस्टमेंट को बढ़ावा कितना मिलेगा,मुनाफा कितना गुणा बढ़ेगा,उसके नजरिये से राष्ट्रहित यह है।


    कारपोरेट केसरिया बजट में इसका पूरा ख्याल रखा गया है।


    पीपीमाडल का लोकलुभावन जलवाःआम बजटपेश करते हुए वित्त मंत्री ने भारत के सभी राज्यों में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे संस्थान खोले जाने की घोषणा की। जेटली ने कहा कि चार नए एम्‍स (आंध्र प्रदेश, पूर्वांचल, पश्चिम बंगाल और विदर्भ के लिए) की स्‍थापना की जाएगी. हर साल बिना एम्‍स वाले राज्‍यों में नए एम्‍स खोले जाएंगे। 12 नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे. 12 मेडिकल कॉलेजों में डेंटल सुविधा मुहैया कराई जाएगी। पांच नए आईआईटी, पांच नए आईआईएम की स्‍थापना होगी। इसके अलावा, मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए 100 करोड़ रुपये का प्रस्‍ताव है।


    इनमें दाखिले के लिए और बाकी नालेज इकोनामी में अपने वजूद के लिए लाखों की फीस और डोनेशन निनानब्वे फीसद की औकात से बाहर है,जाहिर है।


    लोकलुभावन जलवाःभोग संस्कृति के मुताबिककोल्ड ड्रिंक्स और पान मसाला महंगे होंगे। तंबाकू उत्पादों पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई गई। सिगेरट, सिगार महंगी। विदेश से 45 हजार रुपये तक का सामान लेने पर कोई टैक्स नहीं। कंप्यूटर्स पार्ट्स और 1000 रुपए तक के जूते सस्ते होंगे। स्टील के सामान सस्ते होंगे। सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरण सस्ते होंगे। सभी तरह के टीवी सस्ते होंगे, 19 इंच से कम के एलसीडी में कस्टम ड्यूटी शून्य करने का प्रस्ताव। म्यूचुअल फंड्स पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स 10% से बढ़कर 20% होगा।


    मीडिया के मुताबिक दरअसल, वित्त मंत्री ने मुश्किल दौर में बजटपेश किया है। इसके बावजूद उन्होंने ऐसे कदमों की घोषणा की है, जो अगले दो-तीन साल के दौरान विकास दर में रफ्तार का आधारबन सकती हैं।


    मीडिया के मुताबिक वर्ष 2014-15 के बजटमें वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अर्थव्यवस्था की मरम्मत काआधारतैयार किया है। भारतीय अर्थतंत्र के हर संबद्ध क्षेत्र के भरोसे को मजबूत करने के लिए बजटप्रस्तावों में लघु और दीर्घकालिक उपायों का समावेश है।समग्र आर्थिक विकास यात्रा के प्रारंभ की आधारशिला है इस सत्र का आम बजट। हानिकारक वस्तुओं पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर खाद्य एवं अन्य वस्तुओं पर एक्साईज घटाकर कल्याण समाज की संरचना को सुदृढ़ीकरण का संकेत प्राप्त हुआ है।लोकसभा चुनावों के परिणाम सामने आते ही मोदी सरकार के आम बजटकी प्रतीक्षा शुरू हो गई थी। ... ये अतिरिक्त प्रयास योजनाओंऔर सुधार के उपायों के क्रियान्वयन में दिखने चाहिए।


    अल्पमती नवउदारवादी धारा की सरकारों के मुकाबले जनादेश सुनामी मार्फत सत्ता में आयी गुजरात माडल की सरकार के चरित्र में केसरिया रंग के सिवाय कुछ भी बदलाव नहीं है,यह वाकई सत्तावर्ग के वर्णवर्चस्वी नस्ली संहारक चरित्र का रंगबदल है।बाकी जादू टोना टोटका टोटेम हुबहू वही।


    जैसे मनमोहिनी ,प्रणवीय,चिदंबरमी बजटसुंदरी के होंठें में केसरिया रंगरोगन।


    बंगाल में दो सदियों की भूमि सुधार आंदोलन की फसल बतौर बनी कृषक प्रजा पार्टी के स्थाई बंदोबस्त और जाति वर्ण नस्ल एकाधिकार के विरुद्ध जनविद्रोह से देशव्यापी राष्ट्रीय आंदोलन के गर्भपात हेतु जिन  महामना श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के अल्पसंख्यकों को बंगाल की खाड़ी में फेंक देने और भारत विभाजन हो या नहीं,बंगाल का विभाजन जरुर होगा,की सिंह गर्जना की थी और विभाजन एजंडा पूरा होने के बाद भारतीयजनसंघ के जरिये भारतीयकरण मार्फते हिंदू राष्ट्र की नींव डाली थीं,यबह कारपोरेट केसरिया बजट पहली बार गांधी,नेहरु और अंबेडकर के साथ साथ समूचे वाम पर उन्हीं श्यामाप्रसाद का ब्राजीली गोल पर जर्मन धावा है।


    जाहिर है नमो महाराज से बड़ा कोई रंगरेज नहीं है भारतीय इतिहास में जो सबकुछ इसतरह केसरिया बना दें।अपनी दीदी भी बंगाल को सफेद नील अर्जेंटीना बनाने की मुहिम में हैं और उन्हें लोहे के चने चबान पड़ रहे हैं।


    कल्कि का जलवा इतना जानलेवा,इतना कातिलाना कि सावन भी केसरिया हुआ जाये रे।घुमड़ घुमड़कर मेघ बरसै केसरिया।


    जैसे कि उम्मीद थी,वोटरों को संबोधित करने की रघुकुल रीति का पालन हुआ है एकमुश्त वित्तीय प्रतिरक्षामंत्री के एफडीआई विनिवेश प्राइवेटाइजेशन बजट में।


    गला रेंत दिया और बकरे को मरते दम चारा चबाने से फुरसत नहीं।


    हमने पहले ही लिखा है कि मध्य वर्ग और निम्नमध्यवर्ग के साथ उच्चवित्तीय नवधनाढ्य मलाईदार तबके को खुश रखिये और मुक्तबाजारी जनसंहार नीतियों की अविरल गंगाधारा की निरंतरता निरंकुश छिनाल छइया छइया पूंजी का निखालिश कत्लेआम जारी रखिये,बजट के जरिये रणनीति यही अपनायी गयी है।इसी मुताबिक  वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को नरेंद्र मोदी सरकार का पहला बजटपेश किया। बजटमें जेटली ने नौकरीपेशा लोगों को थोड़ी राहत पहुंचाने की कोशिश की। आयकर में छूट की सीमा 50 हजार रुपये बढ़ा दी यानी अब ढाई लाख रुपये तक की कमाई पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। हालांकि टैक्स की दरों में वित्त मंत्री ने कोई बदलाव नहीं किया है। इसी तरह 80C के तहत निवेश पर छूट की सीमा एक लाख रुपये से बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये कर दी है। कर्ज पर घर खरीदने वालों को राहत पहुंचाते हुए वित्त मंत्री ने ब्याज पर छूट की सीमा डेढ़ लाख रुपये से दो लाख रुपये तक कर दी है।वहीं निवेश पर छूट की सीमा में भी इजाफा किया गया है। महिलाओं और बच्चों को सुविधाओं पर विशेष जोर, विश्वस्तर के शहरों का निर्माण, वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजना गंगा की धारा को अविरल बनाने के लिए बजटमें विशेष प्रावधान किया गया है।


    हमने लिखा था कि आर्थिक समीक्षा का आइना हो बजट,कोई जरुरी नहीं है।यह सिर्फ संसद और जनता के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वाह की वैदिकी विधि है और बाकी बचा वही गुप्त तंत्र विधि।


    बोले तो बहुत,लेकिन कहा कुछ भी नहीं।वैसे कहने बोलने को रहा क्या है,देश में लोकतंत्र और संविधान का तो सत्यानाश कर दिया है।हालांकि वित्त मंत्री ने रोजगार के अवसर और आर्थिक वृद्धि बढ़ाने तथा निवेशकों का विश्वास बहाल करने के लिए अनेक उपायों की घोषणा की है। महिलाओं और बच्चों को सुविधाओं पर विशेष जोर, विश्वस्तर के शहरों का निर्माण, वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजना गंगा की धारा को अविरल बनाने के लिए बजटमें विशेष प्रावधान किया गया है।इसी सिलसिले में आवास ऋण पर ब्याज की कटौती की सीमा डेढ़ लाख से बढ़कर दो लाख रुपए। ---छोटे उद्यमों को प्रोत्साहन के लिए वर्ष में 25 करोड़ रुपए से अधिक के निवेश पर 15 प्रतिशत निवेश भत्ते का प्रस्ताव। ---स्मार्ट सिटी के लिए 7,060 करोड़ रुपए का आवंटन। ---धार्मिक शहरों के लिए प्रसाद व विरासत वाले शहरों के लिए ह्दय का शुभारंभ।


    जनता खुश कि बजटमें 7060 करोड़ रुपये नए शहरों के लिए। 1,000 करोड़ रुपये से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरूआत। 2019 तक स्वच्छ भारत अभियान के तहत सभी घरों में शौचालय सुविधा। दीनदयाल ग्रामीण ज्योति योजना के तहत बिजली उपलब्ध कराने के लिए 500 करोड़ रुपये के साथ शुरूआत होगी। 100 करोड़ रुपये के साथ आदिवासियों के लिए वनबंधु कल्याण योजना। सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए 200 करोड़ रुपये। बीमा क्षेत्र में एफडीआई 26 से बढ़ाकर 49 फीसदी किए जाने का प्रस्ताव। ईपीएफ योजना के तहत श्रमिकों के लिए न्यूनतम 1000 रुपये की पेंशन। 2014-15 में वित्तीय घाटा कम करके 3 फीसदी पर लाएंगे।


    देहात और कृषिजीवी बहुसंख्य मूक भारत के चौतरफा सत्यानाश का जो एजंडा आया है,वह अंध भक्त बजरंगी पैदल भेड़ सेनाओं की निर्विकल्प समाधि और सत्ता वर्ग से नत्थी चेतस तेजस केसरिया मलाईदार तबके के चरवाहों और गड़ेरियों के चाकचौबंद इंतजामात के मद्देनजर निर्विरोध है।


    वोटबैंक समीकरपण साधने के लिए लेकिन  दिल्ली में पानी क्षेत्र में सुधार के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया। जेटली ने कहा कि दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए बिजली क्षेत्र में सुधार के लिए 200 करोड़ रुपये और पानी क्षेत्र में सुधार के लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। अरुण जेटली ने आम बजट 2013-14 प्रस्तुत करते हुए अहमदाबाद और लखनऊ की मेट्रो परियोजनाओं के लिए 100 करोड़ रुपये की राशि आवंटित करने की भी घोषणा की।


    उम्‍मीदों की इस बजटमें अरुण जेटली ने उत्‍तर प्रदेश का ध्‍यान रखा और करते हुए लखनऊ की मेट्रो परियोजनाओं के लिए 100 करोड़ रुपये की राशि आवंटित करने की घोषणा की। हालांकि ये पूरी राशि अहमदाबाद और लखनऊ में मेट्रो कार्य के लिए दी गई है। बजटपेश करने के दौरान अरुण जेटली ने कहा कि मैं सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) के अंतर्गत अहमदाबाद और लखनऊ की मेट्रो रेल परियोजनाओं के विकास के लिए 100 करोड़ रुपये की राशि आवंटित किए जाने की घोषणा करता हूं।


    बजट में आपका टैक्स कितना बचेगा,मीडिया का थीमसांग यही है। आज के तमाम अखबारों में कड़वी दवा न मिलने का विश्वकप वंचित ब्राजीली हाहाकार है।


    अर्थव्यवस्था के कायाकल्प के लिए सब्सिडी असुरों का एकमुश्त वध ने होने का क्रंदन है।बाजार की सारी उछलकूद है।


    मजा देखिये,जनता बचे हुए नोटों का हिसाब लगाकर मस्त,असली भारत ध्वस्त और अमेरिका स्वस्थ।


    गौरतलब है कि अमेरिका जब राजनीतिक बाध्यताओं के बहाने पूर्ववर्ती गुलामवंशीय सरकार की नीतिगत विकलांगकता के बहाने केसरिया कारपोरेट सुनामी की पहल कर रहा था,तब भी अमेरिका और उसके सहयोगी देश में अवांछित था गुजरात माडल।


    आज उसी गुजरात माडल से समूचा पश्चिम बल्ले बल्ले है।


    इस बजट में श्यामाप्रसाद मुखर्जी के युद्धविजय की खुशबू जितनी है,भारत अमेरिकी परमाणु संधि,आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका और इजराइल के वैश्विक युद्ध में महाबलि गौरिक भारत की भागेदारी से नियत अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था की जमानत पर रिहा होने का नशा उससे कहीं ज्यादा है।


    भारतीय उद्योग,वाणिज्य,कारपोरेट के सुधार सांढ़ों के उतावलेपन के मुकाबले में अंकल सैम की गुलमोहर हुई मुस्कान को समझिये।


    बजट में जो निर्विरोध सत्ता जाति वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी वर्ग वर्चस्वी बुनियादी एजंडा पास हो गया,वह प्रतिरक्षा बीमा समेत सारे क्षेत्रों,महकमों और सेवाओं में निरंकुश विदेशी पूंजी प्रवाह की सहस्रधारा है,जिसे संभव न बना पाने की सजा बतौर मुक्तबाजार के ईश्वर से स्वर्ग का सिंहासन छीन लिया गया।


    इस पर अब सर्वानुमति है।


    बजट में जो निर्विरोध सत्ता जाति वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी वर्ग वर्चस्वी बुनियादी एजंडा पास हो गया,वह गुजरात का पीपीपी माडल है जो बिना बजट के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश माध्यमे कृषिजीवी भारत के महाश्मशान कब्रिस्तान रेगिस्तान पर अंधाधुंध शहरीकरण का लक्ष्य हासिल करेगा।


    इसीलिए एक साथ स्मार्ट सिटीज की सेंचुरी तेंदुलकरी।1930 तक दस लखिया पचास शहर बनेंगे इसीतरह।


    इन्ही उन्मुक्त कत्लगाहों को जोड़ने के लिए एफडीआई प्लस पीपीपी माडल,जिसका कोई खुलासा