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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    ক্ষমা চাইল প্রেসি

    25 Aug 2015, 0823 hrs IST,
    • ক্ষমা চাইল প্রেসি

    ঘরে-বাইরে প্রবল নিন্দা ও সমালোচনার ঝড়ে বিক্ষোভের 'পদ্ধতি'নিয়ে পিছু হটল প্রেসিডেন্সি ..

    ইনফো উইন্ডো


    আপাতত জারি থাকবে বৃষ্টিআপাতত জারি থাকবে বৃষ্টি

    কিছু দিন রেহাই দেওয়ার পর আবার ফিরছে বৃষ্টি৷ ভারী বর্ষণের সম্ভাবনা কম থাকলেও...

    ব্যবসা বাণিজ্য

    'আচ্ছে দিন'-র ঘোর কাটছে শিল্পমহল...'আচ্ছে দিন'-র ঘোর কাটছে শিল্পমহলের

    আশাহত ভারতীয় শিল্পমহল! এক বছর আগে প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদীর নেতৃত্বাধীন

    এই শহর

    saugata-ritabrataসংসদে সম্মান রাখছে শিক্ষক-ছাত্র জুটিএকজন যখন ছাত্র ছিলেন, অন্যজন তাঁর শিক্ষক৷ সেই শিক্ষক যখন দাপুটে বিধায়ক, তখনই ছাত্রের প্রবেশ রাজনীতিতে৷



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    Indian Express reports Rajan RBI Resilience!
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    Asian StocksOpen Lower After Massive Selloff in U.S. Markets

    4 hours ago


    "The U.S. stock market is in a mode of uncertainty, at best," DoubleLine Capital's co-founder Jeffrey Gundlach told Reuters. "You don't correct all of this in three days." 

    After opening with an historic 1,000-point drop on Monday, the Dow Jones Industrial Average swung wildly throughout the session before closing down 3.6% or 584 points. The S&P 500officially entered correction territory, falling 11% from its May peak, after dropping more than 3.9% over the session. The S&P 500 and Dow are on track for their worst month since February 2009.

    Volatility peaked over the session on the huge moves on benchmark indexes. The Volatility Index, otherwise known as the 'fear index', rocketed 47% higher to 41.14.

    High-momentum tech stocks pulled the Nasdaq 3.8% lower. Major losers included Apple , Netflix , Amazon , Google , Facebook , and Twitter .

    The selloff was fueled by 8.5% plunge in Chinese stocks Monday, which was quickly dubbed 'Black Monday.' The drop was its biggest one-day percentage decline since early 2007, pushing the index into negative territory for 2015. The index crumbled more than 10% last week after manufacturing data reinforced fears the world's second-largest economy was undergoing a significant slowdown.

    But some economists, and investors, believe the selloff was overdone.

    "The current panic is essentially 'made in China.' The recent data from other major economies have generally been good and there is little to justify fears of a major global downturn," Capital Economics analysts wrote in a note. "Worries about the economic fallout from the slump in Chinese equities are overdone -- even in respect of the impact on China itself. What's more, the recent slump has simply taken the Shanghai composite index back to where it was earlier in the year."

    World markets fell in-step with China's stock market. European markets such as Germany's DAX, France's CAC 40, and the FTSE 100 in London plummeted more than 4%, while Japan's Nikkei fell 4.6% and the Hang Seng slid 5.2%.

    Global volatility could give the Federal Reserve pause in deciding when to raise interest rates from crises levels, according to Barclays analysts. The investment firm pushed out its forecast for the first hike from September 2015 to March 2016, though a December hike would be possible if volatility proves transitory.

    "We believe the FOMC will delay the start of the rate hike cycle beyond September as a means to offset tighter financial conditions while it evaluates the effect of recent volatility," Barclays analysts wrote in a note. "In addition to worsening financial market conditions, our decision to delay our outlook for the tightening cycle stems from the effects of a stronger U.S. dollar, lower oil prices, and weak global demand on our outlook for US inflation."

    The energy sector led markets lower on Monday as crude oil closed below $39 a barrel for the first time since 2009. Crude oil plummeted to its lowest level in six-and-a-half years on fears a slowdown in China would hurt demand while the Organization of Petroleum Exporting Countries continued to pump out supply at record highs. West Texas Intermediate crude was down 5.5% to $38.24 a barrel.

    Exxon Mobil , Chevron , Schlumberger , ConocoPhillips , Royal Dutch Shell andBP were among the worst performers in the energy sector. The Energy Select Sector SPDR ETF dropped 5.4%.

    More From The Street: Black Monday Poll: Where Do You Think Stocks Are Headed?

    >> Track markets live with MSN Money

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    क्या संयुक्त संस्थान को आरक्षण
    को समाप्त करवाने ठेका मिला है?
    नोट : हो सकता है कि इस खबर के बाद पहले की तरह से फिर से मेरे को जान से मारने की धमकियां मिलें और मेरी जानमाल को खतरा भी पहुंचाया जाये, लेकिन समय रहते समाज को सच से अवगत करवाना मेरा व्यक्तिगत फर्ज है।

    दो दशक पहले सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे से अनेकानेक असंवैधानिक और मनमाने फैंसले जारी हुए। जिनके कारण अजा एवं अजजा के आरक्षण को मृतप्राय कर दिया गया था। हमने अजा/अजजा संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ के बैनर पर देशभर में जनान्दोलन करके, संसद और सु्प्रीम कोर्ट का घेराव करके अधिकांश फैसलों को संसद द्वारा संविधान संशोधन करवाकर निष्प्रभावी करवा दिया था। अब जब कि परिसंघ के अध्यक्ष को संघ/भाजपा ने अपने पाले में बिठा लिया है और परिसंघ भी संघ की भाषा बोलने लगा है तो देशभर का अजा एवं अजजा संगठन बिखर सा गया है। ऐसे में बेशक हमने 'हक रक्षक दल सामाजिक संगठन' का गठन किया है, लेकिन हम अभी प्रारम्भिक दौर में हैं। इसके अलावा हमारे विरोध में मनुवादियों द्वारा संचालित धनकुबेर समता आन्दोलन समिति खुद है और उसके इशारों पर चलने वाले सजातीय मनुवादी, समता आन्दोलन के हित साधन के लिये काम कर रहे हैं। इसके बावजूद चुप तो नहीं ही रहा जा सकता!

    राजस्थान में सुप्रीम कोर्ट के माधुरी पाटिल प्रकरण की सिफारिशें को लागू करवाने में समता आन्दोलन के साथ—साथ, जनजाति संयुक्त संस्थान भी आश्चर्यजनक रूप से रुचि दिखा रहा है! यह वही माधुरी पाटिल प्रकरण है जिसके चलते महाराष्ट्र में एक ही दिन मेंं लाखों लोगों के जाति प्रमाण—पत्र निरस्त हुए थे।

    सर्वाधिक आश्चर्य तो इस बात का है कि समता आन्दोलन समिति खुद चाहती है कि राजस्थान में माधुरी पाटिल केस की सिफारिशें लागूू की जावें, जिससे किसी दलित—आदिवासी का जाति प्रमाण बने ही नहीं और जो बन चुके हैं वे तत्काल निरस्त हो जावें। जिसके लिये समता समिति समिति ने पूर्वी राजस्थान के जिलों के लिये पांच हजार करोड़ से अधिक धन आबंटित कर रखा है, उनकी ओर से हर प्रकार का रास्ता अपनाया जा रहा है।

    इसके ठीेक विपरीत आदिवासियों के हितों के लिये लड़ने का दवा करने वाले पूर्व न्यायाधीश याद राम मीणा और जनजाति आयोग के पूर्व निदेशक डॉ. गोविन्द सिंह सोमावत के नेतृत्व में संचालित जनजाति संयुक्त संस्थान की ओर से भी माधुरी पाटिल केस की सिफारिशों को उस समय लागू करवाया जा रहा है, जबकि मीणा या मीना नाम से जनजाति प्रमाण—पत्र नहीं बन पा रहे हैं।

    इसे क्या कहा जाये—राजस्थान सरकार माधुरी पाटिल केस की सिफारिशों को लागू करने के लिये समय मांग रही है और समता आन्दोलन समिति और संयुक्त संस्थान तुरन्त इसे लागू करवाना चाहते हैं। ऐसे में आरक्षित वर्गों को और विशेषकर राजस्थान की मीणा/मीना जन जाति के प्रबुद्धजनों को विचार करना होगा कि क्या संयुक्त संस्थान को मीणा/मीना आरक्षण को समूल समाप्त करवाने का ठेका दे रखा है? जिनकी ओर से माधुरी पाटिल केस की आत्मघाती और मनमानी सिफारिशें लागू करवाने के लिये कोर्ट में याचिक दायर की हुई है।

    यही नहीं मीणा नहीं, बल्कि मीना नाम से राजस्व जमीन/रिकॉर्ड वाले मीनाओं को जाति प्रमाण—पत्र जारी करवाने के आदेश जारी करवाने की हाई कोर्ट में याचिका दायर की जा चुकी है। जिसका साफ अर्थ है कि जिन मीनाओं/मीणाओं के राजस्व रिकॉर्ड में मीणा लिखा होगा या जिनके पास जमीन ही नहीं होगी, उनको जनजाति प्रमाण—पत्र नहीं मिलेगा।

    अब राजस्थान के विशेष रूप से मीणा—मीना समाज को शीघ्रता से तय करना होगा कि समाज चाहता क्या है? एक ओर तो हम दिन रात आरक्षण बचाने के लिये लगे हुए हैं, दूसरी ओर संयुक्त संस्थान आरक्षित वर्गों, विशेष रूप से मीना, भील, भील मीना, बैरवा सहित अनेक जाति के आरक्षण को समाप्त करवाने के लिये माधुरी पाटिल केस की सिफारिशों को लागू करवाना चाहता है। क्योंकि कम्प्यूटर द्वारा अंग्रेजी में दर्ज राजस्व रिकॉर्ड में मीणा/मीना को Meena भील को Bheel भील मीना को Bheel Meena बैरवा को Berva/Berva/Berba दर्ज कर रखा है। जबकि अजा एव अजजा की सूची में इन जातियों के नाम Mina, Bhil, Bhil Mina एवं Bairwa/ Berwa दर्ज है। ऐसे में माधुरी पाटिल केस की सिफारिशों के लागू होते ही ऐसी सभी जातियों को जाति प्रमाण—पत्र मिलना असम्भव हो जायेगा। क्या अब भी आरक्षित और वंचित वर्गों को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना होगा?—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख—हक रक्षक दल समााजिक संगठन।

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    No need to panic, India to gain from global adjustment, says MoS Jayant Sinha
    Jayant Sinha, minister of state for finance, spent a hectic day on Monday, assuring market participants about the strength of the Indian economy.
    Tokyo shares plunge 4.13% in early trade
    The Nikkei-225 index at the Tokyo Stock Exchange dropped 643.80 points to 17,896.88 in early trade, following a 4.61 per cent slump on Monday, when it saw its lowest finish in six months.
    Global turmoil: US stocks end sharply lower
    US stocks finished sharply lower on Monday, but far above the session's floor, following a bruising day in global financial markets sparked by mounting worries over the Chinese economy.
    New e-way in Gurgaon may get 7th underpass
    A seventh underpass on the 16-lane DLF-HUDA expressway project has been proposed near Belaire Apartments at the Genpact intersection.
    Madurai couple tries to revive eco-friendly bags tradition
    In a noble cause to promote eco-friendly bags, a couple from Madurai has been distributing yellow bags (Manja Pai)in occasions like marriage.
    Navi Mumbai Jains protest against court ban on 'Santhara'
    Over 500 members of Jain community took out a protest morcha from Vashion Monday morning to object against the recent order of the Rajasthan high court banning their age old religious practice of Santhara, or the fast-to-death ritual.
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    Here's why Flipkart has put its app-only plans on hold
    Flipkart, the country's top online retailer, has decided to put on hold its plans to go app-only because it has yet to assess how the move will impact sales in big-ticket categories such as large appliances and furniture.
    How to fix all your Facebook 'mistakes'
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    Adani group to invest Rs 25,000 crore in Chhattisgarh
    Adani Enterprises, the flagship firm of Adani Group, has inked a pact with the Chhattisgarh government to invest over Rs 25,000 crore for setting up urea and power project as well as rice bran oil extraction plant in the state.
    Sebi approves commodities market norms
    Setting September 28 as the date for merger of Forward Markets Commission (FMC) with itself, Sebi on Monday announced new norms for commodities derivatives market under which exchanges and brokers in this segment will need to comply with rules applicable to their stock market peers.
    Royal Enfield enters Indonesian market
    Royal Enfield on Monday announced its entry into the Indonesian market, which is the third largest two-wheeler market in the world.
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    Die hard romantic: That one look which melts your heart and that one touch which runs shivers in your body, who doesn't want a boyfriend like Shah Rukh Khan?
    Katrina Kaif: Films she rejected
    Let's take a look at films Katrina said no to

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    Ashok Bhowmick
    In his Tebhaga Diary, Somnath Hore (1921-2006) recorded the activities of landless peasants , landlords, black marketeers , hoarders , political activists, children and women against the backdrop of historical ' Tebhaga Movement ' . Being an art college student and an activist , he not only narrated the details of this movement , also recorded the events in his sketch book . His powerful sketches that complimented the text of Tebhaga Diary are an important part of the history of progressive art movement of India . Though on your visit to the National Gallery of Modern Art ( New Delhi ) you find a separate section for the artists belonging to Progressive Artist Group (1947- 1056) . I have always looked into such ' branding' by NGMA , as a part of a dubious design to promote ( or market ) some select artists as 'progressives' by the 'government- gallery- auction house' nexus .
    We will talk on this issue some other day ! Here is a woodcut by Somnath Hore, showing the close door strategy meeting of political activists and peasant leaders during the movement . The lamp placed in the center of the room is the only source of light ( reminding us of ' The Potato eaters ' by Van Gogh) not only creating large shadows on the walls of the hut , but also highlighting the chill of the weather ! Being a print (woodcut) , we do not expect grey areas in between blacks and whites , but this work of master printer Somnath Hore creates the magic by using the strokes of different thickness and we see the light ( whites) fading out as it goes away from the light source ( though invisible in this woodcut ) . For this effect , he has masterly etched ( almost cross hatched ) the textured walls of the hut in a way that we can feel the light diminishing at the edges of the painting ! We also locate the artist in this painting as a non participating member of this meeting , sitting in the dark and outside the circle !
    Our salute to Somnath Hore , one of the foremost peoples' artist of our time .

    Ashok Bhowmick's photo.
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    6 hrs · 
    Samik Basu's photo.
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    Posted by The Himalayan Voice:
    [As the end of the Constituent Assembly  approaches near with no hope of constitution being promulgated by May  the 28th, Dr. Krishna Bahadur Bhattachan, a University of California at Berkley trained sociologist,  an expert on Nepal's socio-political issues,  paints an alarming picture of the country below in vernacular Nepali. He sees an intense ethnic fight impending ahead. He is the expert who, as a member of a Government Task Force for the study of indigenous people's issues, offered a definition for the indigenous peoples of Nepal, according to which Nepalese Parliament  passed a bill offering all ethnic peoples a new collective name -  Janajatis - 'the indigenous peoples' in English. He says, ' ethnic federalism is the sole cause for the delay in the promulgation of the constitution'. He is widely regarded as 'a vocal scholar' for Nepal's social change and development. - The Blogger.]

    "नेपालमा भीषण जातीय संघर्ष चर्कन सक्छ" : डा. कृष्ण भट्टचन (समाजशास्त्री तथा राजनीतिक विश्लेषक)
    [समयमा संविधान जारी नहुनुमा राज्य पुनःसंरचनाकै कारण मुख्य हो । काँग्रेस जातिय राज्य दिनुहुन्न भन्ने स्पष्ट छ भने एमाले झालेमाले देखिएको छ । माओवादीले पनि भित्री रुपमा भौगोलिक आधार नै उपयुत हुने ठम्याइसकेको छ । राज्य पुनःसंरचनाको विषय त्यसै राखे पछि हावाले बढार्छ भनेर दलहरु लागिरहेको अवस्था छ । तर पहिचानको राजनीति बढिरहेको अहिलेको अवस्थामा माओवादीले भौगोलिक आधारमा संघीयता स्वीकार गरेपनि १४ जेठमा संविधान वन्दैन । भारतले पनि जातिय स्वायत्तता दिन मान्दैन एक तराई एक मधेश एक मधेश एक प्रदेश नै उसको चहाना हो । भौलिक आधारमा संघीयता स्वीकार गर्दा त्यसको असर तल्लो तहमा के पर्ला भन्ने दलहरुले कल्पना गरेकै छैनन् । आदिवासी मधेशी र जनजाति त्यसै चुप वस्दैनन् । मधेशमा भिषण संघर्ष हुन्छ । पहिचानको मुद्धा ठीक ढङ्गवाट स्वीकार अनि सम्वोधन नगर्नु हिंसालाई निम्ता दिनु हो ।]

    A Chettri  wields his sword and  shield during 
    a protest rally in Kathmandu
    पहिचान (आइटेन्टी) आदिवासीहरुसँग भूमि, भाषा, संस्कार, परम्परा, प्राकृतिक स्रोत र साधनहरुसँग जोडिएको हुन्छ । समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणमा आफ्नै समूह भित्र  आफू आफूमा अन्र्तक्रिया गरिरहेको छ भने त्यहाँ हाम्रो समूह यो र ऊँ भनेर पहिचान खोजिराख्नु पदैन । आफू भन्दा भिन्न समूहसँग अन्र्तक्रिया गर्नु परेमा मात्र पहिचान खोजिन्छ । फरक समूहमा तं को म को भनेर अस्तित्व खोजिन्छ । जस्तैःकाठमाडौमा नेवारहरु आफ्नो समुदायमा अस्तित्व उति खोज्दैनन् वरु नेवार भित्रको उप पहिचानमा घोत्लिलान् । तर नेवारले अरु समुदायसँग अन्तक्रिया गर्दा आफ्नो पहिचान देखाउँछ । म चाहि नेवार तपाइँ चाहि के भन्ने हुन्छ । थारु, मधेशी, दलित हो कि बाहुन क्षेत्री कि आदिवासी भन्ने कुरा त्यहाँ निर आउँछ । त्यसकारण पहिचानको तह भिन्न भिन्न हुन्छ । नेपालको सन्र्दभमा पहिचानको राजनीति पहिला त्यति देखिएको थिएन । फरक समूहबीच परिचयमा आफ्नो परिचय दिन्थे । चार कोशे झाडी भित्र थारुको पहिचान के भनेर आफ्नो समूहमा भन्नु पर्ने अवस्था थिएन जव अरु समूहसँग परिचय र अन्तक्रिया हुन्थ्यो तब पहिचान दिने काम हुन्थ्यो । तर अहिले पहिचानको राजनीति ह्वात्तै बढेकोछ ।

    कसरी बढ्यो पहिचानको राजनीति

    लिगलिगकोटबाट षड्यन्त्रपूर्वक रुपमा राज्य गुम्न शुरु भयो । त्यसपछि गोर्खा राज्यको विस्तार सगै आदिवासी जनजातिका राज्यहरु खोसिने क्रम वढयो । त्यसको परिणाम के  भयो भने आदिवासी जनजातिको पहिचान मेटाएर चार जात छत्तीस वर्णको फूलवारीको नाममा एउटै भाषा, एउटै सस्कृतिको एकाधिकार गराइयो । विविध पहिचानलाई नास्न,े मास्ने र ध्वस्त पार्ने काम राज्य संयन्त्रबाट भयो । त्यसको उत्कर्ष जंगबहादुरको पालामा बनेको मुलुकी ऐनबाट भयो ।तागाधारी र आदिवासी जनजातिहरुलाई पनि चार वर्ण ब्यवस्थामा राखेर मलवाली भनेर राखियो । पानी नचल्ने छोइ छिटो हाल्नु पर्ने भनेर परम्परागत वर्ण ब्यवस्था भन्दा भिन्न तर चार वटा वर्ण ब्यवस्थाभित्र राखियो । छोइछिटो हाल्नुपर्ने ब्यवस्था वनाएर सामाजिक संरचनाको पुनःसंरचना गरिएको थियो । त्यसपछि आदिवासी जनजातिको पहिचानको संकट निकै गहिरिएर गयो । राजा महेन्द्रको पालामा एउटै राजा एउटै भेष भनेर एकल भाषा एकल संस्कृति विकास गरेर आदिवासी जनजातिको पहिचान नष्ट गर्ने काम भयो । एकल संस्कृतिको हालीमुहाली हुन गयो ।  

    पृथ्वी नारायण शाहको पाला देखि नै आदिवासीका राज्यहरु सन्धी गरेरै नेपाल राज्यमा गाभिए । विगतमा कुनै न कुनै अधिनायकवादी शासन सत्ता रहेकोले आदिवासी जनजातिले आफ्नै प्रयासले वचाउ गर्न खोजेपनि राज्यको अतिक्रण र हस्तक्षेपको कारण नासिने क्रम वढेर गयो र त्यसको प्रतिरोधमा केही आन्दोलन गर्ने प्रयास पनि बीच बीचमा भएको हो । तर राज्यशक्ति दमनकारी भएकोले त्यस्तो संगठित प्रयासलाई उठ्न नदिन राज्यको भएभरको साधन शक्ति लगाउने काम भयो । ०४६ सालको जनआन्दोलनपछि निरंकुश राजतन्त्रबाट संवैधानिक राजतन्त्रमा गएको अवस्थामा वहुभाषा, वहुसंस्कृति र मान्यतालाई संविधानले पनि आत्मसात गरेपछि त्यसलाई ब्यवहारमा प्रयोग गरिएन । सिद्धान्ततः त्यसलाई स्वीकार गरेकोले आदिवासी जनजाति महिला र अन्य वहिष्करणमा पारिएका समुुदायको आवाजहरु संगठित रुपमा मुखरित हुन जाने अवसर सृजना भयो । यसले सदियौ देखि दवाइ राखेको भएपनि पहिचानको मुद्दा प्रखर रुपमा अगाडि वढेर गयो । नेपालमा मात्र होइन कि विश्व भरि नै खास गरेर १९ औ शताब्दीपछि धार्मिक, सास्कृतिक र जातिय द्वन्द्व बढेर गएको देखिन्छ साथै पहिचानमा आधारित द्धन्द्ध पनि वढेर गएको देखिन्छ ।

    ०४६ सालको जनआन्दोलनले नेपालमा पनि पहिचानको राजनीतिलाई ढोका त खोल्यो तर जव माओवादीहरु ०५२ सालमा हतियार उठाएर जनयुद्ध गरे । उनीहरुको वर्गिय जनयुद्ध दुई वर्षसम्म छेउ न टुप्पा भयो । त्यो कुरा माओवादी नेतृत्वले स्वीकार ग-यो । त्यसपछि माओवादीले आप्नो रणनीति वदल्यो । नेपालको विशिष्ट परिस्थिति र भौगोलिक अवस्थालाई आधार वनाएर वर्गिय भन्दा पनि भाषिक, धार्मिक र सांस्कृतिक, क्षेत्रगत, लैगिक विभेदहरु चरम छ भनेर ति मुद्धाहरुलाई माओवादी पार्टीले उठाएन भने वास्तविक मुक्ति हुन्न भन्ने महशुस उनीहरुले गरे । माओवादीले जव ति मुद्धा उठाए, जातिय राज्यका कुरा पनि त्यही वेला उठेको हो । पहिचान सहितको आत्मनिर्णयको अधिकार, अग्राधिकारको कुराहरु, लैगिक समानताका कुराहरु,जातिय छुवाछुत अन्त्यको कुराहरु, मधेशीको पहिचान सहितको कुराहरु उठ्न थालेपछि यसले राजनीतिक रुप पायो । यस अगाडि पहिचानको मुद्धा सामाजिक सांस्कृतिक रुपमा मात्र सिमित थियो । त्यो राजनीतिक रुपमा मुखरित हुन सकेको थिएन । माओवादी जनयुद्धले राजनीतिक रुपमा मुखरित पा-यो । आदिवासी जनजातिहरुले मगरात ,थरुहट, लिम्वुवान, ताम्सालिड., अनि पछि लामा र शेर्पा राज्यको कुरा पनि उठ्यो । माओवादीहरुले त्यसलाई १४ प्रदेशको रुप त्यही आधारमा गरे । अहिले संविधान सभामा १४ ओटै जातिय र संघीय एकाइहरुको राज्यको पुनःसंरचना तथा राज्य शक्तिको बाँडफाँट समितिको प्रतिवेदनमा समेत उल्लेख गरेको अवस्था छ । खासमा पहिचानको सवाल राज्यको संगठित रुपमा मुखरित गरेर देश भरि ब्याप्त पार्नमा खास गरि माओवादीहरुको योगदान वढी छ । तर त्यसको अर्थ माओवादीहरुको कारण चाहि आएको होइन यो कुरामा स्वयम् माओवादीहरु पनि सहमत छन् । माओवादीले यसलाई राजनीतिक रुप चाहि दिएको हो । माओवादी नेता प्रचण्ड डा. बाबुराम भट्टराईहरुले समेत आदिवासी जनजातिको आत्मनिर्णयको अधिकार र प्राकृतिक स्रोतसाधनमा स्वामित्वका कुराहरु अथवा दलितको छुवाछुत अन्त्य गर्ने विषयमा पनि महिलाको सन्र्दभमा लैगिक विभेदका कुराहरुमा र क्षेत्रगत विभेद अन्त्य गर्ने कुराहरु धेरै पहिल्यै देखि उठिरहेको कुरा हो । पहिचानको आन्दोलनको नेतृत्व आदिवासी जनजातिले लिदैं आएकाहुन् । तर ती आन्दोलन सामाजिक सास्कृतिक धरातलमा सिमित भए । मुद्धाहरु चाहि राजनीतिक तर त्यसको समाधान गर्ने चाहि सामाजिक सांस्कृतिक हुदा खेरी त्यो आन्दोलन कही कतै प्रभावकारी अथवा फलदायी र परिणामुखी भएनन् । त्यसकारणले माओवादीले आदिवासी जनजातिको मुद्धालाई राजनीतिक रुपमा उठाएर सहयोगी भूमिकामा देखिएको मात्र हो । 

    माओवादी पनि वाहुनवादी

    आदिवासी जनजातिको मुद्धा उठाएरै माओवादीको आन्दोलन सफल मात्र भएन उनीहरु यो अवस्थासम्म आएका छन् । किन भने रोल्पा र रुकुमको कुरा त त्यो मगरहरुको कुरा हो । मगर थारु,राई लिम्वूू र अरु दलित लडाकूहरु नै माओवादीमा धेरै थिए । लिडर पनि जनजातिका समावेश थिए । नेपाल आदिवासी जनजाति महासंघको आन्दोलन सामजिक र सांस्कृतिक थियो । जातिय संस्थाहरुले गरेको आन्दोलन पनि सामाजिक सांस्कृतिक आन्दोलन थियो । नेपालको सदियौ देखिको शोषण दमनको मात्रा छ त्यसको लागि सामजिक सास्कृतिक तहको प्रयासले मात्र छेउ टुप्पो नलाग्ने भएको हुनाले अलि क्रान्तिकारी तरिकाले र विद्रोही तरिकाले रुपान्तरण गर्ने हिसावले नगइकन नहुने भएकोले हतियार उठाएर आमूल परिर्वतनका लागि भनेर लागि परेको अवस्था हो । तर माओवादीमा नेतृत्व तहमा वाहुन क्षेत्री नै छन् । २००७ सालमा राजनीतिक आन्दोलन सुरु गर्दा खेरी नारद मुनी थुलुङ र रामप्रसाद राईको पनि उपयोग गरिएकै हो । हतियार चाहि आदिवासी जनजातिलाई उठाउन दिइयो तर राजनीतिक निर्णय चाहि वाहुन क्षेत्रीलाई गर्न दिइयो । त्यसैले २००७ सालको क्रान्ति र परिर्वतन पनि अपुरो अधुरो रह्यो । त्यसमा बाहुन क्षेत्री खास गरि विपि कोइरालाले भारत र राणाहरुसँग सम्झौता गरेका छन् । त्यही इतिहास अहिले पनि दोहोरिएर आएको छ । खाली समय मात्र फरक हो पात्र फरक हो तर प्रवृति उही हो  । जनयुद्ध पछि १२ वुदे सहमति भएर उही भारतसँग सहमति भयो । राज्य पुनःसंरचना गर्ने, समावेसी तरिकाले अघि वढने, लोकतान्त्रिक गणतन्त्र अगाडि ल्याउने भन्ने सहमति राजनीतिक दलले गरे । अहिले जनजाति मधेशी दलितले आफ्ना मुद्धा उठाइरहेका छन् तर राजनीतिक दलहरु उही पुरानो सोच अनुसार अगाडि वढेको  देखिन्छ । दलहरुमा वाहुनवादी सोच र ब्यवहार देखिन्छ । नयाँ संविधानमा संघीय राज्यहरु र संघीय इकाइ वनाउदा दुई वटा आधारहरुलाई सवै दलहरुले सहमति जनाएको अवस्था छ । पहिचान र सामथ्र्यलाई आधार वनाइएको छ । वास्तवमा पहिचान अहम् हो सामथ्र्य चाहि गौण हो । सामथ्र्यमा जोड दिनुमा चाहि विभिन्न किसिमको भौतिक संरचनाहरु, आर्थिक पक्षहरु, प्राकृतिक पक्षहरुका कुराहरु हुने हुनाले त्यो कुरालाई प्राथमिकतामा राखेर जातिय राज्य दिनु नपर्ने दुरासयबाट यो काम भएको छ ।

    पहिचानको मुद्धालाई पहिलो मानेर आर्थिक आधार दोस्रो मानेको हुदा संविधान सभाको राज्य पुनःसंरचना तथा बाँटफाँट समितिले १४ वटा संघीय इकाईहरु निर्माण ग-यो त्यसमा पहिचानलाई आधार वनाइएको छ । माओवादीको एक्लो प्रयासले मात्र १४ प्रदेशको खाका वनेको चाहि होइन । एमालेका पनि जनजाति सभासद् थिए उनीले पनि संविधान सभामा त्यो मुद्धा छिराइहाले । पछि एमालेको स्थायी समिति र पोलिटब्युरोमा त बाहुनहरुकै वहुमत छ । त्यसैले उनीहरु आफ्नै पार्टीले वुझाएको प्रतिवेदनको विरोध गरिहेको अवस्था छ । आदिवासी मधेशी जो थिए उनीहरुले समर्थन गरे । माओवादीको त आफ्नै खाका र नीतिगत निर्णय नै भएकाले ब्यक्तिगत रुपमा चित नवुझेपनि जस्तो लेखनाथ भट्टले सेती महाकाली र थारुहट भनेर छुट्याउन हुन्न भन्दै आएका थिए । तर पार्टीको निर्णय भएकाले नमानि पनि सुख छैन । एमालेको त पार्टीगत निर्णय भन्दा पनि कार्यदलले प्राविधिक कुरा मिलाएर उता छिराइदिएको हो ।

    डरलाग्दो समयक्रम

    The  red letters read (हाम्रो माग पुरा गर्न  सक्कली हतियार उठाउन नपरोस) 
    Indigenous peoples of Nepal brandishing Gurkha Knives
    during a Khukuri Rally in Kathmandu (Photo: Ujir Magar)
    अहिले पहिचानको राजनीति तल वा न्युनिकरण भएर जाने भन्दा पनि यसले झन् वढी उचाइ लिएको छ । राजनीतिक दलको यसलाई रोक्ने प्रयास जुन छ त्यो उल्टो वाटो हिडिरहेकोछ । पहिचानको मुद्धालाई दवाएर पहिचानको सट्टा भौगोलिक क्षेत्रको आधारमा संघीय एकाइ निर्माण गर्ने प्रयास भैरहेको छ त्यसले स्पष्ट रुपमा  पहिचानको आधारमा हिंसा प्रतिहिंसा निम्त्याउँन सक्छ । जुन अनेक मुलुकमा गाजिरहेको छ । त्यस आधारमा विश्लेषण गर्ने हो भने नेपालमा गएको दश वर्षमा वर्गिय आधारमा हिंसा प्रतिहिंसा भयो । अव वर्गिय हिंसा हुन्न, भयो भने पहिचानको आधारमा हिंसा प्रतिहिंसा हुन्छ । सव भन्दा वढी आदिवासी जनजातिको भन्दा पनि मधेशीको पहिचानसँग सम्वन्धीत लडाइँ अझ वढी फैलिने खतरा छ । पहाडे र मधेशीकोबीचमा हिंसा प्रति हिंसा भयो भने माओवादी जनयुद्धमा १५ हजार मान्छेको ज्यान गए भन्दा वढी जनताको रगत एकै दिन र एकै रातमा जान सक्छ । त्यसको स– साना घटना विगतमा पनि नदेखिएका होइनन् ऋतिक रोशन काण्ड, नेपालगञ्ज र कपिलवस्तुमा भएका घटनाले पनि यी कुरालाई इगिंत गर्दछ । मधेशीको पहिचानको कुरा गर्दा पहाडीया र मधेशीबीच अन्तर विरोध होइन । मधेश भित्रका अन्य आदिवासी जनजाति मुश्लिम र दलितबीचमै पनि अन्तर विरोधको कुराहरु छ । थारु लगायत तराईका दर्जनौ आदिवासी जनजातिहरु पनि त्यस खालको आमुन्ने सामुन्ने हुने अवस्था आयो भने पनि हिंसाको रुप लिन सक्छ । मधेशी मधेशीकैबीचमा पनि मधेशी दलितवीच पनि अन्तरद्वन्द्व छ । पहिचानको मुद्धा ठीक ढंगवाट सम्वोधन गरिएन भने यसले भयङ्कर रुप लिन्छ । जनजातिहरुले अहिलेसम्म आफ्नो पहिचानका लागि वन्दुक उठाएका छैनन् । आफ्नो लागि उठाईयो भने त्यसले धेरै ठूलो हानी पु-याउँछ । माक्सले वर्ग संघर्षको कुरा उठाएका हुन् समाजवाद हुदै साम्यवाद सम्म पुग्ने परिकल्पना गरेका छन् । मुक्ति नै वास्तवममा त्यसैलाई मानिएको छ । माक्र्सवादमा इतिहास र सिद्धान्त वलियो छ तर मुक्तिको सवाल कमजोर छ । विश्वमा जनजातिलाई वामपन्थी शक्तिले प्रयोग गरेको छ । पेरु वोलिभिया देखि नेपालमा पनि वामशक्तिकै पछाडि धेरै जनजाति छन् ।  तर पहिचानको राजनीतिले यो टुट्दो छ । त्यसैले अब युद्ध माक्र्सवाद अर्थात वर्गीय हैन जातीय हुने प्रवल संभावना छ । नेपालमा संघीय लिम्वुवान पार्टी नेवा राष्ट्रिय पार्टी पनि यसैका उदाहरण हुन् । पहिचानको राजनीति सव भन्दा खतनाक हुन्छ यसले मर्न मार्न तयार गराउँछ । यो ब्यक्तिको अस्तित्वसँग गासिएको कुरा पनि हो । मानव विशिष्टता नै पहिचान हो ।

    मानवमा एउटै संस्कृति भाषा र संस्कार भयो भने त्यो मानव जिवन निरस हुन्छ । विविधता आदिवासीसँग धेरै छ । उनीहरु प्रकृतिसँग जोडिएका छन् । खुम्वुले ३८ वटा भाषा वोल्छ । प्रकृतिसँग तादाम्य सम्वन्ध कायम गर्दछ । त्यही भएर पनि आफ्नो मूल्य मान्यता र पहिचान कायम राख्ने आन्दोलन बलियो हुने पक्का छ । मुलुकमा २४० वर्ष विविधतालाई कुरुप वनाउने काम गरियो तर त्यसो भएन । अहिले मानवअधिकार र समावेशी न्यायको आधारवाट पहिचानको मुद्धा उठ्ने र प्राप्त गर्ने आधार छ  । अब पहिचान गुमाउनुपर्ने अवस्था छैन । यो अन्तराष्ट्रिय कानुनले पनि प्रत्याभूत गरेको छ ।माओवादीको क्रियाकलाप अहिले भारतको माओवादीहरुले सिकेका छन् । त्यसैले पहिचानको नाराले भारतलाई पनि असर पार्दछ । अनि छिमेकी चीनमा पनि नेपालमा उठेको जातिय आन्दोलनको प्रभाव छाड्छ । यसको प्रत्यक्ष प्रभाव नेपालको पहिचानको आन्दोलनमा पर्छ । संविधान निर्माणमा पर्छ । माओवादी १० वर्षे जनयुद्धमा इमान्दार थियो । तर जनजाति र पहिचानको मुद्धामा अहिले माओवादी नेतृत्व इमान्दार देखिन्न । तल्लो तहमा कार्यकर्ता जम्मा गर्न जातिय आधार खोज्छ माओवादी तर माथि चाहि सम्झौता गर्दछ । समयमा संविधान जारी नहुनुमा राज्य पुनःसंरचनाकै कारण मुख्य हो । काँग्रेस जातिय राज्य दिनुहुन्न भन्ने स्पष्ट छ भने एमाले झालेमाले देखिएको छ । माओवादीले पनि भित्री रुपमा भौगोलिक आधार नै उपयुतm हुने ठम्याइसकेको छ । राज्य पुनःसंरचनाको विषय त्यसै राखे पछि हावाले बढार्छ भनेर दलहरु लागिरहेको अवस्था छ । तर पहिचानको राजनीति बढिरहेको अहिलेको अवस्थामा माओवादीले भौगोलिक आधारमा संघीयता स्वीकार गरेपनि १४ जेठमा संविधान वन्दैन । भारतले पनि जातिय स्वायत्तता दिन मान्दैन एक तराई एक मधेश एक मधेश एक प्रदेश नै उसको चहाना हो । भौलिक आधारमा संघीयता स्वीकार गर्दा त्यसको असर तल्लो तहमा के पर्ला भन्ने दलहरुले कल्पना गरेकै छैनन् । आदिवासी मधेशी र जनजाति त्यसै चुप वस्दैनन् । मधेशमा भिषण संघर्ष हुन्छ । पहिचानको मुद्धा ठीक ढङ्गवाट स्वीकार अनि सम्वोधन नगर्नु हिंसालाई निम्ता दिनु हो ।

    प्रस्तुति : गोविन्द लुइँटेल 

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    Dalits Media Watch

    News Updates 22.08.15

    ·         Clamour for stern action against Made Gowda gets louder in Mandya - The Hindu

    ·         Dalit pilgrims barred from entering temple in UP - India Today

    ·         UP Scheduled Caste and Scheduled Tribe staff to be demoted - Asian Age

    ·         NCSC member visits Bhagana after conversion row - The Times Of India

    ·         Cops Thwart Petrol Bomb Attack on VCK Chief - The New Indian Express

    ·         AAP MLA held for assaulting NDMC worker - Asian Age

    ·         KCR: SC, ST given fallow land by previous governments - The Hans India

    ·         SC asks Punjab & Haryana HC to decide on rehab - The Tribune

    ·         Manjhi The Mountain Man review: Inspiring story of a common man - The Hindustan Times

    Note : Please find attachment for DMW Hindi (PDF)


    Please Watch:

    Dashrath Manjhi - The Man Who Broke A Mountain Alone

    Save Dalit Foundation:

    Educate, agitate & organize! - Dr. Ambedkar.

    Let us all educates to agitate & Organize to Save Dalit Foundation !

    Please sign petition by click this link :

    The Hindu


    Clamour for stern action against Made Gowda gets louder in Mandya




    Pressure is mounting on the Police Department to initiate stern action against G. Made Gowda, former MP, for allegedly abusing Mandya Deputy Commissioner M.N. Ajay Nagabhushan and Revenue Minister V. Srinivas Prasad.


    Earlier, Mr. Made Gowda had allegedly abused Mr. Ajay Nagabhushan and Mr. Prasad on Tuesday in foul language just because the district administration was stated to have rejected his plea for allotting 25 acres of land to the 'Mahatma Gandhi Memorial Trust'.


    Mr. Made Gowda is the president of the trust.


    Meanwhile, Mr. Nagabhushan has filed a complaint against Mr. Made Gowda for his 'unruly behaviour' and the Police Department should initiate action against him, said the members of the Mandya district unit of the Karnataka State Government Employees Association.


    Mr. Made Gowda had "threatened to kill the duo", association's president K. Nagesh told presspersons here on Friday.

    Chandru, Appajappa, D. Thammanna Gowda and Mahesh, and office-bearers of the association also condemned the 'behaviour' of Mr. Made Gowda.


    While Dalit Sangharsh Samiti (DSS) leader M.B. Srinivas criticised Mr. Made Gowda for his alleged misbehaviour, leader of the Karnataka Dalit Sangharsh Samiti (KDSS) Venkatagiriaiah condemned the 'feudal mentality' of the former MP.


    Meanwhile, with the demand for initiating action against Mr. Made Gowda rising by the day, the Bharati Education Trust, owned by Mr. Made Gowda, launched a damage-control exercise here on Friday.


    The trust secretary Nanje Gowda and others told presspersons here that Mr. Made Gowda's statements were made in a fit of rage. He had no intention to kill anyone, Mr. Nanje Gowda said.


    India Today


    Dalit pilgrims barred from entering temple in UP


    The Dalit kanwariyas have filed the complaint against Gopal Mishra, the priest of Gauri Shankar temple, and his son.


    Piyush Shrivastava   |    |   Mail Today  |   Lucknow, August 22, 2015 | UPDATED 09:37 IST


    A group of 50 Dalit kanwariyas have filed a police complaint, alleging that they were stopped from entering a temple to offer Ganga jal in Bareilly.


    The incident occurred in the district's Chaudhary Talab area on Thursday.


    The Dalit kanwariyas have filed the complaint against Gopal Mishra, the priest of Gauri Shankar temple, and his son.


    "When we tried to protest, they snatched our kanwars and threw them away," said Rishi Kumar Diwakar, one of the Dalit devotees.


    Talking about the complaint, Superintendent of Police Sameer Saurabh said: "It is a serious complaint. I have ordered a probe and sought a report within 24 hours."


    Mishra, however, claimed the charges were false. "It is a false allegation that I or my son stopped them from offering prayers or ganga jal at the temple," he said.


    But Umesh Valmiki, one of the Dalit devotees, said: "They have kept insulting us for many years now, but we didn't know that they will stop us at the gate of the temple."


    Asian Age


    UP Scheduled Caste and Scheduled Tribe staff to be demoted


    Aug 21, 2015 - Amita Verma | Lucknow


    Scheduled Caste and Scheduled Tribe employees who had been promoted under the reservation in promotion policy will now be demoted after the Akhilesh government was pulled up by the Supreme Court.


    The move will affect the employees in different cadres who were promoted through the reservation provisions after November 15, 1997 and before April 28, 2012.


    The Akhilesh government, which had been delaying the implementation of the Supreme Court order of April 2012 in this regard, has now been asked by the top court to comply and report by September 15. The SC order came in response to a contempt petition filed by some government employees.


    The SC order which has already led to the demotion of 64 engineers of the irrigation and water resources department in the state is bound to take on political overtones in a state that is drive by caste politics.


    BSP president Mayawati has already accused the Akhilesh government of wrongly interpreting the SC order.


    "The Supreme Court had not disapproved of reservation in promotion. It had only laid down stringent conditions for it. Instead of following the condition, the Samajwadi Party government has completely done away with it," she had said when the 64 engineers were demoted in June.


    Mr Shailendra Dubey, president of the Sarvjan Hitaye Sanrakshan Samiti that has been fighting against the reservation in promotion policy, meanwhile, said, "The Supreme Court order is historic. One cannot be allowed to take the advantage of reservation twice — once at the time of getting the job and then in getting promotions. We welcome the court order and are confident that the state government would ensure its compliance at the earliest." The government spokesman said the government would ensure implementation of the order but considering the fact that UP is a vast state, the government may need some more time to complete the process of demotion.


    Meanwhile, an executive engineer in a government department , who had benefited from the reservation in promotion policy, said that demoting officers at this stage would lead to a lot of problems and also lead to bad blood which would affect the working of the state machinery.


    "We will take legal opinion and then appeal to the court to make the policy effective from the present date so that demotions can be prevented," he said.


    The Times Of India


    NCSC member visits Bhagana after conversion row


    TNN | Aug 22, 2015, 03.32 AM IST


    Sirsa: Two weeks after around 50 dalit families of Bhagana village in Hisar district converted to Islam at Jantar Mantar in New Delhi, National Commission for Scheduled Castes (NCSC) member Ishwar Singh visited the village and promised to sort out the problems being faced by the community.

    "The district administration is trying to solve the problems and I have also visited the village thrice to check the situation," he said.

    The dalit families have been sitting on a dharna since May 2012 outside the mini-secretariat in Hisar and at Jantar Mantar, demanding action against khap panchayat members for casteist remarks against them and provoking upper class people to attack the community.

    They were also protesting against their eviction from the village common land, which is being acquired to construct a sports stadium.

    "They would be given 100sqft plots in the village, but villagers have demanded plots 3km away from the place," the NCSC member said. He has also sought a report from the government on the issue.


    The New Indian Express


    Cops Thwart Petrol Bomb Attack on VCK Chief

    THANJAVUR:  Alert cops preempted an attack planned on VCK chief Thol Thirumavalavan who was to hoist the party flag at Vadaseri village near Orathanadu on Thursday.


    As many as 12 youth were held with petrol bombs. Two police special sub-inspectors were injured by blue metal used by the group.

    Police said, Thol Thirumavalavan who participated in a wedding in Pattukkottai, Tiruchitrambalam on Thursday, planned to hoist the party flag at Vadaseri bazaar on his way to Vadapathy in Tiruvarur district.


    Meanwhile, police was tipped that a group, belonging to a dominant caste from Vadaseri village, had planned an attack on Thirumavalavan as they resented the hoisting of VCK flag in an area where caste Hindus lived.


    Following this, security in the Vadaseri bazaar and surrounding areas was intensified and police also patrolled the area. It was then that the SSIs of Pattukkottai taluk police, Rajendran and Gandhi, spotted a group on the banks of Pudhu Eri at Alathur village between Pattukkottai and Vadaseri, the route that was to be taken by Thirumavalavan.


    As the SSI approached them, the group began fleeing after pelting blue metal stones at the policmen. In the attack, Rajendran sustained injuries on his head and arm. Gandhi also escaped with mild injuries.


    Police found three Molotov cocktail made from beer bottles, two plastic bottles with petrol and a few empty beer bottles. They also alerted police in nearby areas.


    When Meganathan, the Special Branch sub-inspector of Pattukkottai taluk police station spotted another group at Mullurpattikkadu village between Vadaseri and Alathur, he asked them to disperse.


    The group first damaged his bike and then fled. Meanwhile, police diverted Thirumavalavan's car through another route for him to reach Vadapathy.


    The Pattukkottai taluk police registered two cases based on complaints by the injured SI Rajendran and Meganathan, the Special Branch SI.


    In the meantime, when the police were on the lookout for the gangs gathered at two places, they picked up two youth who attempted to board a bus at Ambalapattu branch road in Thanjavur-Pattukkottai Road.


    The arrest was based on the information given by the SSIs who were injured when blue metal stones were thrown on them.


    The police identified them as D Divakar (23) of Mahadevapattinam near Mannargudi and M Saranraj (25) of South Street, Vadasery who has been working in Chennai for the past few years.


    Based on their confession, police arrested six youths from Vadaseri.


    They also arrested another six persons including the two who were picked up from Ambalapattu bus stop who had gathered at Mullurpattikkadu village.


    A car used by the gang was also seized. The police are also on the lookout for 20 others involved in the case.


    Asian Age


    AAP MLA held for assaulting NDMC worker


    Aug 22, 2015 | 


    More than two weeks after Aam Aadmi Party MLA from Delhi Cantonment, Surinder Singh, was booked for beating an NDMC employee and accused of hurling casteist abuses at another person, the Delhi police arrested the legislatoron Friday.


    Sources in the police said that the MLA, who was served four notices to join the probe until Friday, arrived at the Parliament Street police station in the afternoon and was arrested after his questioning. Two more persons, including his driver, were also apprehended. "All three were taken to Ram Manohar Lohia Hospital for medical examination," said a senior police officer, adding, "They will be kept in the lockup for the night and will be produced before a Delhi court on Saturday."


    On August 4, NDMC sanitary inspector R.J. Meena along with his junior colleague Mukesh Kumar was conducting a surprise check in an area under their jurisdiction. "They spotted an e-rickshaw plying on the road and stopped its driver for verification. Seeing this, the AAP MLA, who was passing by in his car, intervened and started questioning the NDMC officials, which led to an argument amongst the three men.


    The AAP MLA and his driver then allegedly beat up Mr Mukesh Kumar and hurled derogatory abuses at Mr Meena after which a police complaint was filed and they were booked under Sections 332, 353, 367, 186, 511, 506, 34 of the IPC and SC/ST Act provisions by the Tughlak Road police. The legislator's anticipatory bail was already rejected by a city court on August 12. Senior counsel H.S. Phoolka, who had appeared for Mr Singh, had sought bail saying the MLA has been falsely implicated in the case. The prosecutor, on the other hand, had argued that Mr Singh has been evading the notices sent by the police to join the investigation and his interrogation was required.


    The police added that former Army commando was being questioned at length on Friday. The AAP MLA also faces allegations of possessing fake degrees, an inquiry into which is also going on.


    The Hans India


    KCR: SC, ST given fallow land by previous governments


    August 22,2015, 09.40 AM  IST | | PTI


    Sangareddy: Telangana Chief Minister K Chandrasekhar Rao today said various governments ruling Andhra Pradesh before its division last year had offered fallow lands to SC and ST communities that cannot be used for agricultural activity.


    Previous governments assigned fallow lands with huge boulders to members of SC and ST communities which cannot be used for agriculture. Government will carry a survey on these lands and verify the status, location and feasibility for agriculture.

    We will extend maximum support to turn them into profitable agriculture land, Rao said. The chief minister participated in cleanliness programme under 'Grama Jyothi', the flagship programme of TRS government, at Erravalli village under his Gajwel Assembly constituency.

    'Grama Jyothi' programme is aimed at planned and comprehensive development of villages. God will support every good work and definitely God will bless Telangana Government for its unique welfare and developmental activities, he said.


    The Tribune


    SC asks Punjab & Haryana HC to decide on rehab


    R Sedhuraman  Legal Correspondent   New Delhi, August 21


    The Supreme Court today asked the Punjab and Haryana High Court to look into rehabilitation of the Dalit victims of Mirchpur village in Hisar district. About 150 families had fled the village following an attack on them in April 2010.


    The apex court's Social Justice Bench comprising Justices MB Lokur and UU Lalit passed the order while transferring a public interest litigation filed by the victims to the HC. The Bench pointed out that the Haryana Government had accepted the recommendations of the Justice Iqbal Singh Commission, which had gone into the violence and the relief work, and decided to place it in the state Assembly as required under the Inquiry Commission Act.


    Tara Chand, a 70-year-old Dalit, and his physically-challenged teenage daughter were killed in the violence by a mob that set ablaze the houses of the Balmiki community on April 21, 2010.

    Appearing for the state, advocate Nupur Choudhary said the inquiry commission had acknowledged in its report that the government had compensated the victims in excess of their entitlement under the SC/ST Atrocities Prevention Act and did not have to do anything more. 


    The state had spent more than Rs 20 crore on them, she said. The Bench wanted to dispose of the PIL in view of the commission's report, but senior advocate Colin Gonsalves, arguing for the victims, pleaded that the SC should ensure the resettlement of his clients who were not in a position to return to their village as they feared for their lives. 


    After hearing the case for over five years, the apex court should not leave the victims at the mercy of the government, he said.


    At this, the Bench asked the victims to file a fresh PIL in the HC. Gonsalves pleaded that the poor victims who were staying in make-shift camps did not have the means to file a fresh case. Accepting the contention, the Bench transferred the PIL pending with it to the HC, but clarified that the HC would deal only with rehabilitation.

    A trial court in Delhi had convicted 15 of the 97 persons charged with the assault on the Dalits. Three of them were given life sentence, while five got imprisonment for varying periods up to five years. Additional Sessions Judge Kamini Lau let off the remaining seven convicts on probation for one year. The convicts have gone to the Delhi HC in appeal.


    The Hindustan Times


    Manjhi The Mountain Man review: Inspiring story of a common man


    Sweta Kaushal, Hindustan Times, New Delhi    Updated: Aug 22, 2015 12:41 IST


    Manjhi The Mountain Man 


    If you have the will, you can move mountains. Bihar's Dashrath Manjhi proved this adage when he did the unthinkable and actually carved a path through a mountain with just a hammer and a chisel after toiling away for 22 years. Ketan Mehta's biopic Mountain Man tells this powerful story of a common man from Gehlaur village in Bihar's Gaya district. With a spirited story and talented actors like Nawazuddin Siddiqui and Radhika Apte, Mehta has ensured that the film is true to its hero.

    Nawazuddin plays Dashrath Manjhi while Radhika essays the role of his wife, Faguniya. Their village lacks even the basic amenities like schools and hospitals because of the mountain that lies in its path. Faguniya dies after falling off the mountain and succumbs to her injuries for the want of timely medical attention. Before dying she tells Dashrath, "Hum pahad paar nahi kar pae, bahut uncha hai." It does not take much time for Dashrath to decide that he must break through the mountain to carve an accessible path for the villagers. Manjhi The Mountain Man traces his tumultuous journey as he struggles to make the path and has to fight friends, family and bureaucrats alike.

    Nawazuddin is definitely the most crucial and impressive part of the movie. During promotions the actor, who was last seen in Salman Khan's superhit Bajrangi Bhaijaan, had said that this was his most difficult role yet. But in Manjhi, you see an effortless performance. There isn't a single moment in the entire film where you can separate Siddiqui from Dashrath! Be it revolting against the zamindar or toiling for decades in the memory of his wife, Siddiqui brings out all the emotions to the fore with his facial expressions and emotes through his eyes. One of the most striking scenes is the one where Dashrath is arrested and told that he might rot in jail for the rest of his life. As he talks to himself and says, "Hum haar gaye Faguniya, lagta hai bina rasta banae hi mar jayenge," the helplessness in his eyes breaks your heart.


    There is another scene where Dashrath is bitten by a snake that finds its way out in the open after he has cut through half of the mountain. He staggers, cries out in pain and soon cuts out the thumb that was bitten. Thanks to Siddiqui's acting, you can actually feel the pain he must face at the moment and his determination to live on. This is undoubtedly the kind of performance where you can say that Siddiqui deserves all the awards out there. 

    Nawaz also has the most powerful and touching dialogues in the film. Sample some of these:  

    "Hum tose itta pyaar karte hain, itta pyaar karte hain, itta pyaar karte hain, kitta pyaar karte hain? Hanuman jee ki tarah seena cheer ke dikhayein?"

    "Bhagwan ke bharose mat baitho, ka pata u humre bharose baitha ho!" 

    And of course, the one that we've heard in trailers: "Pahad tode se bhi mushkil kaam hai ka?" 

    Manjhi The Mountain Man is also one of the most touching and inspiring love stories in Bollywood. Married in childhood, Dashrath and Faguniya hardly spent four-five years together before she dies. The bond that the duo develops during that short period can be clearly seen as the reason behind the 22-year-long struggle Dashrath undertakes to ensure that no one else dies the way his wife did. Mehta, too, has brought out that romance perfectly. Every time Dashrath is about to lose his patience, Falguniya's spirit appears and reminds him why he needs to do it, charging him up all over again. And, when the villagers are celebrating after he has cut away the mountain, Dashrath sees Faguniya once again dancing along the others in a colourful attire. 

    As they say, God lies in details and same applies for the art of cinema. Mehta's brilliant use of minute details of the socio-political milieu of Dashrath Manjhi's world helps the story along. He has made apt use of these details to highlight the politics of caste and class with remarked expertise. Dashrath was born a Musahar (the caste of bonded farm labourers once known for killing and eating rats or moos). They are one of the most marginalised groups in India and have suffered all kinds of discrimination at the hands of the upper caste including untouchability. As a young child, Dashrath ran away from his village to escape being a bonded labourer at the mercy of the zamindar (played by Tigmanshu Dhulia) and comes back to his village after seven years, when untouchability is declared to be illegal. Dashrath is colourfully clad in bright pink trousers, yellow shirt and black shades to show that he has returned from the city - Dhanbad in this case. We see the zamindar greeting him warmly but the moment he gets to know that Dashrath is the son of one his former bonded labourers, he instinctively backs off as if from a shock! 

    There is one sequence where prime minister Indira Gandhi arrives in Gaya and while she is delivering her speech and raising the famous slogan of 'Gareebi hatao', the stage crumbles. People from the crowd are asked to support the stage to ensure Gandhi can continue with her speech. And there we see Gandhi as the great leader of change, only to rise up on the shoulders of the common man. The excesses committed during of Emergency is also shown in the movie, with cops and the ruling class telling Dashrath he has chosen the wrong time to revolt against corrupt bureaucrats and threatening that they can simply put him in jail, without any proof.  

    Manjhi The Mountain Man also touches upon the menace of Maoist violence. Fed up with the atrocities of the 'upper caste', especially the village head Nirbhay Singh, one of Manjhi's friends turns a rebel. He returns to the village with a group of men flashing guns and hangs Singh to death. And no, just because a poor man is the hero here, Mehta does not end up advocating violence. Dashrath is seen arguing with the friend-turned-Maoist and telling him that guns are no solution only to be hit for his advice. 

    The main themes that run throughout the movie are love, passion and the strength of a man's willpower. From fighting corrupt bureaucrats to over-indulging villagers and annoying family members, Dashrath fights all odds to ensure that he completes the task he took upon himself, one that will serve the mankind and just not a selfish emotion. 

    It's not that the film is without jarring points. Most of the character artists goof up with the accent while mouthing the dialogues in the dialect spoken in the region. In fact, except Siddiqui, Dhulia, Apte and Pankaj Tripathi, everyone seems to have put on a fake and forced 'Bihari' accent. The very Bollywood-ised romance between Siddiqui and Apte seems out of place as well. At best, this should have been part of dream sequences. Given the realism of the story, the flying sarees and Apte roaming around without blouses do not quite fit into the cultural milieu.


    However, in Manjhi The Mountain Man, ignoring the small bloopers is quite easy. The inspiring narrative, the powerful love story and hard-hitting performances make for a wonderful cinematic experience. Watch it for Siddiqui and Apte's acting, watch it for Dashrath Manjhi's empowering will power, watch it for the sheer realism with which Mehta has put it all together.


    And we would say that if there's one movie you want to watch this year, let it be Manjhi.


    News monitored by AMRESH & AJEET



    .Arun Khote
    On behalf of
    Dalits Media Watch Team
    (An initiative of "Peoples Media Advocacy & Resource Centre-PMARC")

    Peoples Media Advocacy & Resource Centre- PMARC has been initiated with the support from group of senior journalists, social activists, academics and  intellectuals from Dalit and civil society to advocate and facilitate Dalits issues in the mainstream media. To create proper & adequate space with the Dalit perspective in the mainstream media national/ International on Dalit issues is primary objective of the PMARC.
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    UK Dalit Groups Seek PM's Action Against BJP Men Involved in Bihar Dalit Massacre

    Dalit groups demand action against Ranveer Sena which has been involved in several massacres of Dalits in Bihar.

    Dalit groups protest demanding action against the dreaded Ranveer Sena which has been involved in several massacres of Dalits in Bihar.


    LONDON — In the run up to Prime Minister Narendra Modi's visit to the UK, four of UK's foremost Dalit organizations have written to the Indian leader, expressing their dismay about the recent revelations by investigative news portal Cobrapost. Their letter notes that senior  BJP politicians were involved in the massacres of some 144 Dalit men, women and children in Bihar and that Modi has so far neither spoken out against  the self-confessed killers and their accomplices nor taken any action against them.

    Spokespersons from the UK-based organizations have urged the Prime Minister to act because his "lack of action on this issue gives the shocking message that Dalit and oppressed caste lives do not matter in India." They urged him to act urgently to ensure that the self-confessed killers are brought to justice and that all the politicians, including senior BJP politicians, are dismissed from their posts and arrested and charged.

    Following is the text of the letter:
    Dear Shri Narendra Modi,

    We are deeply shocked by the recent horrifying revelations about the massacres of Dalit and other oppressed-caste people in Bihar and are writing to you to express our dismay that  you have so far neither spoken out against  the killers and their accomplices nor taken any action against them.

    The revelations caught on camera by the news portal Cobrapost's are briefly as follows:

    ·         The Ranveer Sena, the upper caste landlord army in Bihar, perpetrated a number of major massacres of Dalits and oppressed caste people including at Bathani Tola, Laxmanpur Bathe, Shankarbigha, Miyanpur and Ekwari, between 1994 and 2000, brutally murdering some 144 men, women and children simply for demanding basic rights and dignity and for supporting the Communist Party of India(Marxist- Leninist) .

    ·         Ranveer Sena commanders (formerly acquitted by the Patna High Court) boasted in recorded interviews not only that they committed these massacres but that they were backed by top BJP leaders who were their political patrons and funders. They also confessed that powerful politicians helped them get arms and military training from serving and retired Indian Army men and that they had the support of former Prime Minister (the late Chandrashekhar), and top BJP leaders including former Finance Minister Yashwant Sinha, former Human Resources Development Minister Murli Manohar Joshi, former Deputy Chief Minister of Bihar, Sushil Kumar Modi and Vice President of the BJP, CP Thakur.

    ·         The Ranveer Sena commanders also said on camera that Brahmeshwar Mukhiya masterminded all the massacres of poor Dalit women and children. Yet, as you know, the BJP's Giriraj Singh has shamelessly described Brahmeshwar as Bihar's Gandhi.

    The Amir Das Commission, which was set up in 1997, after the Laxmanpur Bathe killings, to investigate these massacres was disbanded in 2005 by Chief Minister Nitish Kumar of the JDU, then in alliance with the BJP, in order to appease and shield his erstwhile BJP allies.

    As you may know the Patna High Court acquitted all the perpetrators claiming there was 'no evidence', and that eyewitnesses were lying. The statements of the acquitted men to Cobrapost prove that the eyewitnesses told the truth.

    Can such horrific violence be tolerated in a democratic country? Unfortunately your lack of action on this issue gives the shocking message that Dalit and oppressed caste lives do not matter in India. We urge you therefore to act urgently to ensure:

    ·         That the Ranveer Sena commanders who continue to walk free and boast about the murders they have committed are arrested and charged

    ·         That all the politicians including senior BJP politicians who are named in the Amir Das Commission report are dismissed from their posts, arrested and charged

    ·         That the Army and ex-Army personnel who trained and armed the banned Ranveer Sena terrorists are also brought to justice.


    Signed by

    Meena Varma (Dalit Solidarity Network)
    Arun Kumar  (Federation of Ambedkarite and Buddhist Organization, UK)
    Davinder Prasad (CasteWatchUK)
    Ramesh Klair (Sri Guru Ravidass Global Organization for Human Rights)
    Amrit Wilson (South Asia Solidarity Group)

    Caravan Daily
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    আমি যুবলীগ-ছাত্রলীগের দেশব্যাপী হাজার হাজার অপকর্মের মধ্যে মাত্র দু'টি উল্লেখযোগ্য কেইস এখানে উল্লেখ করতে চাই। একটি হচ্ছে মতিঝিল মেট্রোপলিটান পুলিশ সদর দফতরের অতি নিকটে ৮৯ ও ৮৯/১, আরামবাগে। ডিসিসি দক্ষিণের একজন কাউন্সিলার ও যুবলীগ নেতার নেতৃত্বে যুবলীগ-ছাত্রলীগের কিছু নেতা-কর্মী উপরোক্ত দু'টি হোল্ডিং -এ অবস্থিত বাংলাদেশ পাবলিকেশন্স লিমিটেডের তিনটি ভবন জবর-দখল করে গত দেড় মাস ধরে ভাড়াটিয়াদের জিম্মি করে রেখেছে। প্রতিষ্ঠানটির কর্মকর্তা-কর্মচারীদের নিরাপত্তা প্রদান, অপরাধীদের শাস্তি প্রদান এবং স্বাভাবিক কাজকর্ম চালিয়ে যাবার পরিবেশ সৃষ্টির জন্য স্থানীয় আইনশৃঙ্খলা রক্ষাকারী কর্তৃৃপক্ষের সহযোগিতা প্রয়োজন। তারা সেই সহযোগিতা এখনো পাচ্ছে না

    প্রাসঙ্গিক ভাবনা ॥ ড. মোঃ নূরুল আমিন
    ছাত্রলীগ-যুবলীগ প্রসঙ্গ : আইনের শাসন প্রতিষ্ঠায় করণীয়
    অধুনা ছাত্রলীগ-যুবলীগের কিছুসংখ্যক নেতাকর্মীর উচ্ছৃঙ্খল আচরণ, সন্ত্রাস, চাঁদাবাজি, দখলবাজি ও প্রকাশ্যে পিটিয়ে মানুষ হত্যার ঘটনা তাদের পিতৃ ও মাতৃ সংগঠন ক্ষমতাসীন দল আওয়ামী লীগ ও সরকারকে বিব্রতকর অবস্থায় ফেলে দিয়েছে বলে মনে হয়। বলাবাহুল্য, তাদের অপরাধমূলক কর্মকাণ্ডে এতদিন পর্যন্ত দেশবাসী ত্যক্তবিরক্ত হলেও দল ও সরকার ছিলেন নির্বিকার। অনেকের মতে তাদের অপরাধ আমলে নেয়া এবং অপরাধীদের শাস্তি দেয়া অথবা সংশোধন করার ব্যাপারেও তাদের মধ্যে একটা অনীহা সর্বদা পরিলক্ষিত হয়েছে। গত ৭ বছরের অভিজ্ঞতায় দেখা যায় যে, যখনি ছাত্রলীগ, যুবলীগ অথবা ক্ষমতাসীন দলের কোনও অঙ্গ সংগঠনের নেতাকর্মীরা কোনও বড় ধরনের অপরাধপ্রবণতায় জড়িয়ে পড়েছে তখনি দায়িত্বশীল মহল থেকে তার সাথে তাদের সম্পৃক্ততা অস্বীকার করে হয় বলা হয়েছে যে শিবির, ছাত্রদল অথবা জামায়াত বিএনপির লোকেরা ছাত্রলীগ-যুবলীগ-আওয়ামী লীগে অনুপ্রবেশ করে ঐ জঘন্য অপরাধ করেছে অথবা অপরাধীদের অপরাধকে আমলে না নিয়েই তাদের আরো অপরাধ করার 'লাইসেন্স'দিয়ে দেয়া হয়েছে। কোন কোন ক্ষেত্রে জামায়াত-শিবির-বিএনপির অনুপ্রবেশকারী ব্যক্তিদের চিহ্নিত করার জন্য সরকারি দল কমিটিও গঠন করে দিয়েছিল। কিন্তু এই কমিটির রিপোর্ট আর কখনো পাওয়া যায়নি। আর যাবেই বা কেমন করে? অপরাধী জন্ম ও রক্ত সূত্রে যেখানে আওয়ামী পরিবারের সেখানে বিএনপি-জামায়াত আসবে কোত্থেকে? অবশ্য এর মধ্যে ক্ষমতাসীন দলের কোন কোন নেতাকর্মীর মধ্যে যে বাস্তব অনুভূতি মোটেই ছিল না তা নয়। ছিল বলেই সাবেক একজন মন্ত্রী ২০১০ সালে পাবনায় ছাত্রলীগের নেতৃত্ব নির্বাচন করতে গিয়ে অদ্ভূত একটি প্রথার প্রবর্তন করেছিলেন এবং তা হচ্ছে নেতৃত্বে ইচ্ছুক ছাত্রদের রক্তের বিশুদ্ধতা পরীক্ষা। তার হয়ত ধারণা ছিল এর মাধ্যমে মাদকাসক্তদের নেতৃত্বে আসা তিনি বন্ধ করতে পারবেন। কিন্তু তিনি তা করতে পারেননি। বরং তার এই প্রচেষ্টার পর ছাত্রলীগ-যুবলীগের অপরাধপ্রবণতা আরো বৃদ্ধি পেয়েছে। দেখা গেছে যে, যেখানে চাঁদাবাজি, সন্ত্রাস, দখলবাজি, যৌনাচার তথা ইভটিজিং সেখানেই ছাত্রলীগ-যুবলীগ মাদক ব্যবসা, ইয়াবা ব্যবসা, ভর্তি বাণিজ্য, চাকরি বাণিজ্য, স্কুল, কলেজ, বিশ্ববিদ্যালয়ের ছাত্রীদের বলপূর্বক অনৈতিক কাজে ব্যবহার সর্বত্রই তাদের অবাধ বিচরণ। তাদের অপকর্মে যে যেখানে বাধা হয়ে দাঁড়িয়েছে তারা তাদের মারধর-অপদস্ত করতে পিছপা হয়নি। শিক্ষক, পুলিশ-বিজিবি-র‌্যাব কর্মকর্তা, উপজেলা নির্বাহী কর্মকর্তা, জেলা প্রশাসক, অতিরিক্ত জেলা প্রশাসক, ম্যাজিস্ট্রেটসহ সরকারি কর্মকর্তারাও ছাত্রলীগ-যুবলীগের লাঞ্ছনার শিকার হয়েছেন। এর কোনও বিচার হয়নি। আবার দলীয় নেতা বা এমপিরা যেখানে তাদের ঠেকানোর কথা, তারা তা না করে তাদের কেউ কেউ নিজেরাই নানা অপকর্মে জড়িয়ে পড়ায় অবস্থার আরো অবনতি ঘটেছে। ফলে তারা ধরাকে সরা জ্ঞান করা শুরু করেছে। যেনতেন প্রকারে অর্থবিত্ত উপার্জন, ভোগ-লালসা, নারীর সম্ভ্রমহানি, চাঁদা ভাগাভাগি ও আধিপত্য প্রতিষ্ঠার প্রতিযোগিতায় তারা এতই লিপ্ত হয়ে পড়ে যে তাদের মধ্য থেকে দলীয় ঐক্য ও ভ্রাতৃত্ব সম্পূর্ণভাবে লোপ পায় এবং তারা একে অন্যের হত্যাকারীতে পরিণত হয়। গত তিন সপ্তাহে অভ্যন্তরীণ কোন্দলে যারা হত্যাকা-ের শিকার হয়েছে অথবা যাদের পিটিয়ে মারা হয়েছে তাদের প্রত্যেকের কেসগুলো আলাদাভাবে বিশ্লেষণ করলে এটাই প্রতিভাত হয় যে, ক্ষমতাসীনদের আস্কারায় তারা নিজেদের এতই ক্ষমতবান মনে করা শুরু করেছিল যে, তাদের দৃষ্টিতে দেশটি তাদের সা¤্রাজ্য এবং তারা নিজেরা এর স¤্রাটে পরিণত হয়েছিল, যেখানে বসবাস করতে হলে তাদের কথায় উঠতে বসতে হবে এবং সেখানে তাদের কথাই চূড়ান্ত হবে। এ জন্যে যদি কারুর সম্পত্তি, সম্মান-সতীত্ব ও জীবন দিতে হয় তা হলে তাদের কিছু আসে যায় না। এই অবস্থায় মানুষের মধ্যে হতাশার সৃষ্টি হয়েছে; সারা দেশে ঘূর্ণিঝড়-পূর্ব গুমোট আবহাওয়া বিরাজ করছে। এটা কারুর জন্যই শুভ হতে পারে না।
    কয়েক মাস আগে ছাত্রলীগের সম্মেলন উপলক্ষে আওয়ামী লীগের সাধারণ সম্পাদক সৈয়দ আশরাফ বলেছেন যে, দেশের শ্রেষ্ঠ সন্তানরাই ছাত্রলীগ করে। প্রধানমন্ত্রী এক সম্মেলনে ছাত্রলীগকে তার ঐতিহ্য পুনরুদ্ধারের আহ্বান জানিয়েছেন। গত কয়েক দিনে মন্ত্রীদের অনেকেরই গলার সুর বদলে গেছে। এটা তাদের অভিজ্ঞতাপ্রসূত বাস্তব উপলব্ধিগত অনুভূতি না সস্তা পপুলারিটি কুড়ানোর কৌশল তা বলা মুশকিল। যদি বাস্তব উপলব্ধি হয় তাহলে তাদের অনেক কিছুই করার আছে বলে মনে হয়। কেননা বানরকে মাথায় তুলতে নেই। অবশ্য তাদের সবাই যে বানর তা আমি মনে করি না।
    সম্প্রতি সমাজকল্যাণ মন্ত্রীর একটি উক্তি দেশবাসীকে হতাশ করেছে। তিনি বলেছেন যে, লম্পট ছেলেরাই শুধু ছাত্রলীগ-যুবলীগ করে। কথাটার তাৎপর্য কি তিনি নিশ্চয়ই তা বুঝেন। তার এই মন্তব্যের পর অন্য কোন মন্ত্রী, এমপি অথবা ছাত্রলীগ-যুবলীগের কোনও নেতাকর্মী প্রতিবাদ করেননি। এই দু'টি সংগঠনের অপরাধের মাত্রা হয়ত এত তুঙ্গে উঠেছে যে তার মন্তব্যটির প্রতিবাদ করার ক্ষেত্র ও যৌক্তিকতা তারা খুঁজে পাচ্ছেন না। বাস্তবতা যাই হোক আমি এ ধরনের প্রান্তিক মন্তব্যে হতাশ। ছাত্রলীগ-যুবলীগ আওয়ামী লীগের নেতৃত্ব সরবরাহকারী দু'টি প্রতিষ্ঠান। এই প্রতিষ্ঠান দু'টি যদি লম্পটদের প্রতিষ্ঠান হয় তাহলে আওয়ামী লীগের ভবিষ্যৎ কি তা সহজেই অনুমেয়। আমার ধারণা, প্রতিষ্ঠান দু'টিতে অনেক ভাল ভাল ছেলেও আছে, তবে তাদের মূল্যায়ন নেই, এখানে গ্রেসাম্স্ ল্ হয়ত কাজ করেছে। ইধফ সড়হবু ফৎরাবং মড়ড়ফ সড়হবু ড়ঁঃ ড়ভ পরৎপঁষধঃরড়হ.  যারা নষ্ট হয়ে গেছে তাদের সংখ্যা এত বেশি যে হয়ত ভাল ছেলেরা নিজেদের এসার্ট করতে পারছে না। আওয়ামী লীগকে তার প্রয়োজন ও অস্তিত্বের স্বার্থে ভাল ছেলেদের উপরে তুলে আনা প্রয়োজন। প্রতিদ্বন্দ্বী দলের নেতা-কর্মীদের জেল-জুলুম-হত্যা, গুম প্রভৃতির মাধ্যমে ক্ষমতাসীন দল নেতৃত্ব শূন্য করছেন। নিজ দলও যদি গুণী নেতৃত্ব হারায় তাহলে এদেশের ভবিষ্যৎ অন্ধকার হয়ে পড়তে বাধ্য।
    গত ২০ আগস্ট দৈনিক ইত্তেফাকসহ জাতীয় দৈনিকগুলোতে প্রকাশিত একটি খবর অনেকের দৃষ্টি আকর্ষণ করেছে। 'একশানে সরকার : প্রধানমন্ত্রীর নির্দেশনা, ভাবমূর্তি নষ্টকারীদের কোনও ছাড় নয়। কঠোর ব্যবস্থা নিতে এসপিদের কাছে পুলিশ সদর দফতরের ই-মেইল'শিরোনামে প্রকাশিত রিপোর্টটি তাৎপর্যপূর্ণ। কথাটি যদি সত্য হয় এবং দল-মত-নির্বিশেষে প্রকৃত অপরাধীরা শাস্তি পায় তা হলে শুধু সরকার নয় দেশের ইমেজও উদ্ধার হবে। একটি স্বাধীন দেশের সরকার বাইরের শক্তির উপর নির্ভর করে বেশি দিন টিকে থাকতে পারে না। নিজ দেশের জনগণের সমর্থন তার বেশি দরকার। দেশে সুশাসন প্রতিষ্ঠিত হলে এই সমর্থন নিশ্চিত হয়। এই মুহূর্তে সরকারের জন্য এটাই সবচেয়ে বেশি প্রয়োজন।
    সম্প্রতি পুলিশ-র‌্যাবের সাথে বন্দুকযুদ্ধে কয়েকজন ছাত্রলীগ-যুবলীগ নেতার নিহত হবার ঘটনা রাজনৈতিক অঙ্গনকে আলোড়িত করে তুলেছে। ক্ষমতাসীন দলের সাথে সম্পৃক্ত কিছু কিছু নেতা বলবার চেষ্টা করছেন যে আমরা একশন শুরু করে দিয়েছি। নিজ দলের লোকদেরও ক্ষমা করছি না। কেউ কেউ আবার বলছেন যে, বিষয়টি লেফাফাদুরস্তির মতো হচ্ছে। এতোদিন বিরোধীদলীয় কর্মীদের বিচারবহির্ভূত হত্যার শিকার বানানো হয়েছে এবং এতে সরকার দেশে-বিদেশে বিরাট সমালোচনার মুখে পড়েছে। এখন নিজ দলের কিছু লোককে বিচারবহির্ভূত হত্যার শিকার বানিয়ে তারা বিরোধী নিধনযজ্ঞকে আরও শক্তিশালী করতে চায়। আমি বিচারবহির্ভূত যে কোন হত্যাকাণ্ডের বিরোধী। প্রতিটি গুলীর হিসাব থাকা দরকার। যারা অপরাধী তাদের গ্রেফতার করে আইনের আওতায় এনে আইন অনুযায়ী জেল-ফাঁসি দেয়াই আইনের শাসনের চাহিদা। এর ব্যতিক্রম হলে দেশ মগেরমুল্লুক হয়ে যায়। আইনী প্রক্রিয়ার বাইরে মানুষের জীবন যাতে বিপন্ন না হয় তা দেখা সরকারের দায়িত্ব। ছাত্রলীগ-যুবলীগের কেউ যদি অপরাধী হয় আইন অনুযায়ীই তাদের বিচার হওয়া উচিত এবং এ ক্ষেত্রে কারুর প্রভাব যাতে বিচারের পথে বাধা হয়ে না দাঁড়ায় তা দেখা সরকারের দায়িত্ব। এ প্রেক্ষিতে প্রধানমন্ত্রীর নির্দেশনা, অপরাধী কাউকে ছাড় না দেয়ার ঘোষণা এবং কঠোর ব্যবস্থা নেয়ার জন্য এসপিদের পুলিশ সদর দফতরের ই-মেলকে আমি ইতিবাচক বলে মনে করি। অবশ্য এ ধরনের নির্দেশনা ও ঘোষণার কথা আমরা আগেও শুনেছি। কিন্তু তার আমল হতে দেখিনি। ফলে হতাশ হতে হয়েছে। আমি যুবলীগ-ছাত্রলীগের দেশব্যাপী হাজার হাজার অপকর্মের মধ্যে মাত্র দু'টি উল্লেখযোগ্য কেইস এখানে উল্লেখ করতে চাই। একটি হচ্ছে মতিঝিল মেট্রোপলিটান পুলিশ সদর দফতরের অতি নিকটে ৮৯ ও ৮৯/১, আরামবাগে। ডিসিসি দক্ষিণের একজন কাউন্সিলার ও যুবলীগ নেতার নেতৃত্বে যুবলীগ-ছাত্রলীগের কিছু নেতা-কর্মী উপরোক্ত দু'টি হোল্ডিং -এ অবস্থিত বাংলাদেশ পাবলিকেশন্স লিমিটেডের তিনটি ভবন জবর-দখল করে গত দেড় মাস ধরে ভাড়াটিয়াদের জিম্মি করে রেখেছে। প্রতিষ্ঠানটির কর্মকর্তা-কর্মচারীদের নিরাপত্তা প্রদান, অপরাধীদের শাস্তি প্রদান এবং স্বাভাবিক কাজকর্ম চালিয়ে যাবার পরিবেশ সৃষ্টির জন্য স্থানীয় আইনশৃঙ্খলা রক্ষাকারী কর্তৃৃপক্ষের সহযোগিতা প্রয়োজন। তারা সেই সহযোগিতা এখনো পাচ্ছে না। দ্বিতীয় কেইসটি হচ্ছে ফেনী জেলার দাগনভূঞা উপজেলার গজারিয়া বাজারের। সেখানে যুবলীগ-ছাত্রলীগের কিছু নেতাকর্মী কয়েকটি হিন্দু পরিবারের সম্পত্তি জবর-দখল করে রেখেছে। সেখানে থানা পুলিশ দখল মুক্ত করার জন্য গিয়ে হামলা ও মারধরের শিকার হয়ে থানায় এসে মামলা করেছে। ইনসেটে এই মামলার বিবরণী পাঠকদের সুবিধার জন্য প্রকাশ করা হয়েছে। এই ঘটনাগুলো অতি সাম্প্রতিক। আমি আশা করি সংশ্লিষ্ট কর্তৃপক্ষ কোনও প্রকার অনুরাগ-বিরাগের বশবর্তী না হয়ে অপরাধীদের বিরুদ্ধের ব্যবস্থা গ্রহণ করবেন। এতে আইনের শাসন শক্তিশালী হবে। সরকারের দুর্নাম ঘুচবে।­

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    Released Postage Stamp on the great King of Magadh Chakravarti Samrat Ashok under whose illustrious leadership our civilisation acquired new levels of economic and cultural glory. Postage stamps represent cultural diversity and we will soon issues stamps in memory of personalities like Dr. A.P.J. Abdul Kalam, Mountain man Dashrath Manjhi, Sachidanand Sinha and Kailashpati Mishra etc.

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      NEPAL: Situational update from Bhardah, Saptari District. The police did not follow any standard procedure before using lethal force. They should...

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      Ashutosh Kumar 

      भारत के फासीकरण के खिलाफ पहले राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध की जबरदस्त कामयाबी। देश भर में लगभग सौ केंद्रों पर ' मुजफ्फरनगर बाकी है' के प्रदर्शनों में नौजवानों , नागरिकों और लेखकों - कलाकारों की भीड़ उमड़ी। यह एक स्वतःस्फूर्त मगर सुसंयोजित प्रतिरोध था।

      प्रकासि ( प्रतिरोध का सिनेमा) की पहल पर देश भर के अनगिनत समूहों ने दिल्ली विवि के एक कालेज में इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर हुए हमले के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हुए प्रतिरोध प्रदर्शन किए और बहस मुबाहिसे किए।

      फ़िल्म देख कर समझ में आता है कि फासिस्ट समूह दो घण्टे की इस दस्तावेज़ी फ़िल्म से क्यों घबराए हुए हैं। आज हर सच्चे देशभक्त को एक बार यह फ़िल्म जरूर देखनी चाहिए। यह फ़िल्म साफ़ दिखाती है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे किस तरह मोदीविजय की पटकथा लिखी गई और उसमें कथित सेकुलर / समाजवादी पार्टियों ने किस तरह भरपूर सहयोग किया।
      फ़िल्म में एक सभा में अमित शाह कहते दिखाए गए हैं - जो गुजरात को भूल गए , वे मुज़फ्फरनगर नहीं भूल पाएंगे । इस एक जुमले से समझ आता है कि चुनावों के आसपास देश भर में क्यों नए नए मुजफ्फरनगर सुगबुगाने लगते हैं।
      अगर इस प्रक्रिया को तत्काल रोका नहीं गया तो हम जल्दी ही अपने प्यारे भारत को हमेशा के लिए खो देंगे , और हमारे पास पड़ोसी की तरह का आतंकग्रस्त हिन्दूस्थान बचा रहा जाएगा। 
      फ़िल्म के निर्देशक Nakul Singh Sawhney और प्रकासि के संयोजक Sanjay Joshiऔर उनके साथियों को क्रांतिकारी सलाम। फासीकरण के खिलाफ FTII के जुझारू दोस्तों ने जो मुहिम शुरू की है , उसे एक नए मुकाम पर ले जाने के लिए। फ़िल्म के लिए इन में किसी से भी से सम्पर्क किया जा सकता है। देश भर में इस फ़िल्म के हज़ारो लाखों प्रदर्शन होने चाहिए।


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      Branding Adivasis And Activists As Maoists The Govt Has Declared A War On Its Own People

      By Arundhati Roy

      Following is the text of a note by writer-activist, Arundhati Roy, which she read out during a press conference at Press Club of India, Delhi, to express solidarity with Soni Sori & Linga Kodopi and the People of Bastar. Adv. Prashant Bhushan, Adv. Vrinda Grover,Annie Raja and Himanshu Kumar also addressed the Press Conference.

      The Mining companies are getting restless. The MOUs that were signed handing over Adivasi land to them have not been actualized because of the resistance from local people. Operation Green Hunt continues as Operation No-Name. The Salwa Judum is being re-constituted. Once again SPOs are beginning to kill villagers and call them Naxalites. Anybody who criticizes or impedes the implementation of State policy is called a Maoist. Thousands of Dalits and Adivasis, thus labeled, are in jail absurdly charged with crimes like Sedition and Waging War against the State under the Unlawful Activities Prevention Act (UAPA. While villagers languish for years in prison, with no legal help and no hope of justice, often not even sure what crime they have been accused of, the State has turned its attention to what it calls 'OGWs'—Overground Workers.

      The Ministry of Home Affairs spelled out its intentions clearly in its 2013 affidavit filed in the Supreme Court. It said: "The ideologues and supporters of the CPI(Maoist) in cities and towns have undertaken a concerted and systematic propaganda against the State to project it in a poor light…it is these ideologues who have kept the Maoist movement alive and are in many ways more dangerous than the cadres of the People's Liberation Guerilla Army."

      The harassment of Soni Sori, Linga who have already spent many years in jail, the arrest of Professor G.N. Saibaba who was recently released on bail and is still in hospital, the harassment of Himanshu Kumar who has been hounded out of Bastar, are all part of this Operation. I have just heard that the Odisha Police in Malkangiri District are hunting down a documentary filmmaker and human rights activist Deba Ranjan. I know Deba Ranjan very well. He has made excellent films on the communal violence I Kandhamal and the assault on adivasi homelands in Malkangiri. He has worked with K, Balagopal on several fact-finding missions. He is in Malkangiri, in South Odisha, the district abutting Sukma in Bastar—so roughly the same area. The police have filed seven criminal cases against him. He is underground now, fearing for his life. Either way, whether they arrest him or they do not, they have stopped his work.

      The last time Soni Sori and Linga came to Delhi, addressed tribunals and Press conferences, we were unable to save them. Soni was arrested and despite pleading with the magistrate in a Delhi Court to not be sent back to Jagdalpur for fear of torture, she was sent back. And both she and Linga were brutally tortured. They have spent years in prison, both of them came close to death. The media did play a part in managing to get them released. And now they are here again. Hounded by the same terror that is backed by the same commercial interests.

      Ankit Garg, the policeman who Soni Sori says supervised her torture—which included, among other things, pushing stones up her vagina—in police custody, was awarded a Police Gallantry Award by the President of India, on Republic Day in 2012. Many people were outraged and condemned this. Personally, given the state of affairs in this country, I thought it was an honest declaration of intent by the Indian State. I only wish the award citation had been honest too. In cases like this one, the citation could have said: "This Award is hereby conferred on Officer XYZ for bravely supervising the torture and sexual molestation of a dangerous Adivasi school teacher."

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