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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    माकपा का धर्मसंकट यह है कि येचुरी और बुद्धदेव अगर हट जाते हैं तो प्रकाश कारत से लेकर विमान बोस तक को हटना पड़ेगा।


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



    माकपा का धर्मसंकट यह है कि येचुरी और बुद्धदेव अगर हट जाते हैं तो प्रकाश कारत से लेकर विमान बोस तक को हटना पड़ेगा।बुद्धदेव ने राज्य कमिटी की बैठक में तो सीताराम येचुरी ने सर्वशक्तिमान सेंट्रल कमिटी की बैठक में ही सारे पद छोड़ने की पेशकश करके माकपा महासचिव को चारों दिशाओं से घेर लिया है।जिस पार्टी ने कामरेड ज्योति बसु को पूरे देश की इच्छा को दुत्कारते हुए कभी प्रधानमंत्री बनने से रोकने का पराक्रम दिखाया था,जिस पार्टी ने अपने दल के लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को स्पीकर पद से इस्तीफा देने से इंकार करने के कारण बेरहमी से कामरेड बसु की प्रबल आपत्ति के बावजूद पार्टी बाहर कर दिया,उसकी यह दुर्गति है कि आपस में आम बुर्जुआ दलों की तरह सत्ता संघर्ष घमासान है।विचारधारा धरी की धरी रह गयी देश में सिरे से अप्रासंगिक बन गये वामपंथियों की।


    लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद माकपा के सीताराम येचुरी समेत पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेताओं ने एक बार फिर पोलित ब्यूरो की सदस्यता से इस्तीफे की पेशकश की है। नई दिल्ली में शनिवार को शुरू हुई पार्टी की सेंट्रल कमेटी की बैठक के पहले दिन विभिन्न राज्यों से पहुंचे नेताओं ने हार पर चर्चा की और अपने-अपने विचार रखे। लगभग एक सप्ताह पहले माकपा के पूर्व दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी ने पार्टी नेतृत्व में बड़े स्तर पर परिवर्तन की वकालत की थी।

    सूत्रों का कहना है कि येचुरी समेत पश्चिम बंगाल के दूसरे नेताओं ने बंगाल में पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए पोलित ब्यूरो की सदस्यता से इस्तीफे की पेशकश की। हालांकि, इसकी हालांकि आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी, लेकिन बैठक में पार्टी नेताओं के बीच चर्चा के दौरान गरमा गरम बाताबाती हो गयी।




    बंगाल में विधानसभा चुनावों में सत्ता से बेदखल होने के बाद वामदलों में इतनी भगदड़ नहीं मची थी,जो लोकसभा चुनावों में चारों खानों चित्त वामदलों का हो रहा है।पश्चिम बंगाल में 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत किया था। जिसके बाद इस लोकसभा चुनाव में 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सिर्फ दो सीटें ही जीतने में कामयाब हो पाई।


    ममता बनर्जी के मुख्यमंत्रित्व में भी वामदलों को सत्ता में वापसी की उम्मीद थी।लेकिन अचानक राज्य में शुरु केसरिया सुनामी में वामदलों का समूचा जनाधार उसीतरह केसरिया होता जा रहा है ,जैसे पूरे गैरतृणमूली जमीन कमल से लहलहाने लगी है। हालत इतनी खराब हो गयी कि नेतृत्व का फैसला मानने को हमेशा तत्पर कैडर कामरेड खुली बगावत पर उतारु है और कोलकाता में माकपा की राज्य कमेटी की बैठक के दौरान कमेटी के सदस्यों ने नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर दी। इतना ही नहीं माकपा नेताओं ने लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए पार्टी महासचिव प्रकाश करात के गलत राजनीतिक फैसलों को जिम्मेदार बताया।


    इसी बीच वामदलों में नेतृत्व के खिलाफ अभूतपूर्व विद्रोह शुरु हो चुका है और माकपा महासचिव की मौजूदगी में नेतृत्व बदल की मांग राज्य कमिटी की बैठक में ही बुलंद आवाज में ज्यादातर जिला प्रतिनिधियों ने उठा दी है। इसी परिदृश्य में पूर्व मुख्यमंत्री कामरेड बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश करके नेतृत्व पर भारी दबाव पैदा कर दिया है।लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बुरी तरह पराजय का मुंह देख चुकी माकपा में रार थमने का नाम नहीं ले रही। स्थिति यह है कि जहां एक ओर सांगठनिक और नेतृव में फेरबदल की मांग तेज होती जा रही हैं वहीं पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने यह कह कर सबको चौंका दिया है कि वह पार्टी से जुड़े सभी पदों को छोड़ना चाहते हैं। हालांकि, राय कमेटी की दो दिवसीय बैठक में प्रदेश सचिव विमान बोस ने हार की जिम्मेदारी ली है।लेकिन हार की जिम्मेवारी लेने से ही वाम नेतृत्व को माफ करने को तैयार नहीं हैं कार्यकर्ता,नेता और समर्थक।घटक दलों की ओर से भी आपरोपों की फेहरिस्त सार्वजनिक है।




    माकपा का धर्मसंकट यह है कि बुद्धदेव अगर हट जाते हैं तो प्रकाश कारत से लेकर विमान बोस तक को हटना पड़ेगा।क्योंकि पार्टी के नेता कार्यकर्ता एक के बाद एक निष्कासन और बहिस्कार के बावजूद पार्टी नेतृत्व में न केवलजाति वर्चस्व तोड़ने की मांग करते हुए सभी समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे हैं,वे तुरंत प्रकाश कारत समेत बंगाल राज्य कमिटी का इस्तीफा भी मांग रहे हैं। बुद्धदेव माकपा की पोलित ब्यूरो के सदस्य होने के साथ ही केंद्रीय कमेटी और राज्य कमेटी के भी सदस्य हैं। कोलकाता में राज्य कमेटी की बैठक में बुद्धदेव ने अपने इस प्रस्ताव से सबको सन्न कर दिया। बुद्धदेव ने सिर्फ इच्छा ही नहीं जताई बल्कि दृढ़ता से पदों को छोड़ने की बात शीर्ष नेतृव के सामने रखी।



    इसीलिए संगठन में जमीनी स्तर पर छिटपुट बदलाव करने को तैयार पार्टी नेतृत्व बुद्धदेव को पदत्याग की इजाजत देनेकी हालत में नहीं है।जैसे नेतृत्व बदलकी मांग खारिज कर दी गयी,उसी तरह पार्टी नेतृत्व बुद्धदेव के इस्तीफे की पेशकश भी तुरंत खारिज कर दी है।लेकिन मुश्किल यह है कि नंदीग्राम सिंगुर प्रकरण की वजह से पार्टी की हार का ठीकरा उनके ही मत्थे फोड़े जाने से नाराज बुद्धदेव विधानसभा चुनावों के तुरत बाद से लगातार पदमुक्त होने का दबाव बना रहे हैं और अबकी दफा वे बने  रहने को तैयार नहीं हैं।बुद्धदेव भट्टाचार्य पोलित ब्यूरो सदस्य होने के बावजूद 2011 से अब तक कोलकाता के बाहर होनी वाली किसी भी बैठक में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन मंगलवार की बैठक में उनके रुख का गहरा अर्थ निकला जा रहा है। प्रदेश माकपा सचिव मंडली के एक सदस्य ने कहा कि प्रकाश करात समझाने के बावजूद बुद्धदेव आश्वस्त नहीं हो सके और पूरी बैठक के दौरान वे मौन रहे। इसके उनकी गंभीरता का पता चलता है।



    दूसरी तरफ 1960 के दशक से चुनाव मैदान में आई माकपा का प्रदर्शन इस लोकसभा चुनाव में अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है। जिसके चलते पिछले कुछ दिनों से अयोग्य नेतृत्व को बदलने की मांग तेज होने लगी है। राज्य कमेटी के नेताओं ने पार्टी के बड़े नेताओं प्रकाश करात, प्रदेश सचिव विमान बोस, पोलित ब्यूरो के सदस्य व पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य और प्रदेश में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्रा पर चुनाव के दौरान बेहतर नेतृत्व नहीं दे पाने का आरोप लगाया। इस बैठक में करात के साथ साथ त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार और पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी भी मौजूद थे।


    इस पर तुर्रा यह कि इसी बैठक में बुद्धदेव ने साफ साफ कह दिया है कि कि वह किसी पद पर अब नहीं बने रहना चाहते, बल्कि एक साधारण पार्टी सदस्य के तौर ही पर जुड़े रहना चाहते हैं। बैठक के दौरान सभी पार्टी पदों को छोड़ने पर आमादा बुद्धदेव को माकपा के शीर्ष नेता प्रकाश करात ने किसी तरह पद न छोड़ने पर आश्वस्त करना चाहा, लेकिन वह फिर आश्वस्त नहीं हुए और बैठक में खामोश रहे।


    पत्रकारों से बाद में करात ने बुद्धदेव के इस्तीफे के प्रस्ताव का खंडन किया। उन्होंने कहा लोग अपनी बात कहते सकते हैं, लेकिन माकपा में निर्णय पार्टी स्तर पर ही लिया जाएगा।


    संस्कृति प्रेमी पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य बतौर पद पर रहते अपने को सांगठनिक गतिविधियों और काम काज में कब तक जोड़े रखेंगे, इस पर राय माकपा मुख्यालय के आला नेताओं को ही संदेह है।




    राजनीतिक जानकार मानते हैं कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बुद्धदेव माकपा के राज्य में बेहतर स्थिति रहने की उम्मीद पाले हुए थे। लेकिन, बुरी तरह पराजय ने उन्हें निराश कर दिया है। खास कर बुद्धदेव इस बात से भी क्षुब्ध हैं कि माकपा के वोट प्रतिशत में गुणात्मक तौर पर कमी आ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बुद्धदेव के पद छोड़ने पर माकपा के राज्य सचिव विमान बोस भी पद पर नहीं बने रह पाएंगे। बताते हैं कि विमान ने भी लोकसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय के बाद पद छोड़ने की पेशकश की थी, लेकिन करात ने उन्हें भी मना कर दिया था।


    वहीं अगले हफ्ते से राज्य में माकपा की विभिन्न जिला कमेटियों की बैठक के साथ ही 7 और 8 जून को नई दिल्ली में केंद्रीय कमेटी की बैठक में विरोध और मतभेद के स्वर अभी और उभर सकते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद माकपा के लिए अब 2016 का राज्य विधानसभा चुनाव अंतिम लाइफलाइन जैसा हो सकता है। इसमे न उबर पाने पर बंगाल में उसके राजनीतिक अस्तिव पर ही प्रश्न चिन्ह लग सकता है।


    কারাটের চাপ বাড়ল, সরতে চান সীতারামও

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি, ৭ জুন, ২০১৪, ০৩:৩৭:১৮


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    নেতা বদলের দাবি উঠেছিল আলিমুদ্দিন স্ট্রিটে রাজ্য কমিটির বৈঠকেই। বিমান বসু থেকে বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য কেউই সমালোচনার হাত থেকে রেহাই পাননি। এ বার সীতারাম ইয়েচুরিও পলিটব্যুরোর বৈঠকে জানিয়ে দিলেন, তিনি লোকসভা নির্বাচনের খারাপ ফলের দায় নিয়ে পলিটব্যুরো থেকে সরে দাঁড়াতে তৈরি। দলের হাল শোধরাতে তিনি পদ ছাড়তে রাজি আছেন।

    দলের নিয়ম মেনে এমনিতেই প্রকাশ কারাটকে আগামী বছর দলের সাধারণ সম্পাদকের পদ ছাড়তে হবে। কিন্তু ভোটে বিপর্যয়ের পরপরই তিনি যে ভাবে ব্যক্তিগত ভাবে দায় নেওয়ার বিরুদ্ধে বলে এসেছেন, সেই অবস্থানকে আজ ফের প্রশ্নের মুখে ফেলে দিল সীতারামের ঘোষণা।

    লোকসভা নির্বাচনে ভরাডুবির পরেই রাজ্য সম্পাদক বিমান বসু জানিয়েছিলেন, তিনি হারের দায় নিয়ে সরে দাঁড়াতে রাজি আছেন। বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যও জানিয়ে দেন, তিনি আর পলিটব্যুরো বা কেন্দ্রীয় কমিটির কোনও পদে থাকতে চান না। এত দিন সিপিএমের কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের তরফেও তাঁদের নিরস্ত করা হয়েছিল। বলা হয়েছিল, এখনও ভোটে হারের কারণই বিশ্লেষণ হয়নি। আগে জেলা ভিত্তিক রিপোর্ট আসুক। রাজ্য কমিটি থেকে কেন্দ্রীয় কমিটি পর্যন্ত সব স্তরে ভোটের ফলাফল নিয়ে আলোচনা হোক। তার পরে দায় নেওয়ার প্রশ্ন।

    সেই ভোটের ফলাফল বিশ্লেষণেই আজ থেকে পলিটব্যুরো ও কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠক শুরু হয়েছে দিল্লিতে। চলবে তিন দিন। আলোচসূচিতে না থাকায় ইয়েচুরির পলিটব্যুরো ছাড়ার ইচ্ছা নিয়ে এ দিন কোনও আলোচনা হয়নি। দিনের শেষে কারাটও জানিয়ে দেন, আজকের বৈঠকে নেতৃত্ব বদল নিয়ে কোনও কথা হয়নি।"তবে ইয়েচুরিও শেষ পর্যন্ত বিমান-বুদ্ধদেবের পথ ধরায় যথেষ্টই অস্বস্তিতে পড়েছেন কারাট। বাকি সবাই পদ ছাড়তে রাজি আছি বললেও কারাটের পক্ষে এখন আর সে কথা বলা সম্ভব নয়।

    কারণ ভোটের ফল প্রকাশের পরেই কারাট বলেছিলেন, "সিপিএমে সমষ্টিগত ভাবে সব সিদ্ধান্ত হয়। কেউ ব্যক্তিগত ভাবে কোনও সিদ্ধান্ত নেয় না। তাই নির্দিষ্ট কোনও ব্যক্তির উপর ভোটের ফলাফলের দায় বর্তায় না।"পশ্চিমবঙ্গের সিপিএম নেতাদের এতে খুশি হওয়ারই কারণ ছিল। কারণ সমষ্টিগত সিদ্ধান্তের কথা বলে কারাট এক দিকে যেমন নিজে দায় নেননি, তেমনই আলিমুদ্দিনের নেতাদের ঘাড়েও দায় চাপাননি।

    সিপিএম নেতারা মনে করছেন, কারাটের সেই অবস্থানই এখন 'ব্যুমেরাং'হয়ে দাঁড়িয়েছে। দলে বার্তা যাচ্ছে, বিমান, বুদ্ধদেব, সীতারামরা পার্টির নিচুতলার দাবি মেনে পদ ছাড়তে রাজি। অথচ কারাট গদি আঁকড়ে ধরে থাকতে চাইছেন।

    কারাটের ঘনিষ্ঠ-মহল থেকে অবশ্য বলা হচ্ছে, তিনি মোটেই গদি আঁকড়ে থাকতে চান না। দলের গঠনতন্ত্র অনুযায়ী টানা তিন বারের বেশি শীর্ষ পদে থাকতেও পারবেন না তিনি। আগামী বছরের পার্টি কংগ্রেসেই তাঁকে সরতে হবে।

    তবে চাপটা অন্য। সিপিএম সূত্রে বলা হচ্ছে, কারাট ও তাঁর অনুগামীরা সাধারণ সম্পাদক পদে এস আর পিল্লাইকে নিয়ে আসতে চাইছেন। কারাট-বিরোধী শিবিরের মত, পিল্লাই সাধারণ সম্পাদক পদে বসলেও দলের নিয়ন্ত্রণ কার্যত কারাটের হাতেই থাকবে। তাই কারাট-বিরোধী শিবির যতটা না কারাটকে সরাতে উদ্যোগী, তার থেকেও বেশি আগ্রহী পিল্লাইকে আটকাতে। কারাট-বিরোধী শিবিরের মতে, কারাট ও তাঁর অনুগামীদের ভুল রাজনৈতিক লাইনের ফলেই দলের ভরাডুবি হয়েছে। নতুন চিন্তাভাবনা,  ও রাজনৈতিক কৌশলেরও প্রয়োজন। নেতৃত্বের ভরকেন্দ্র বদল হলেই তা সম্ভব। ভরকেন্দ্র বদলের এই দাবি আলিমুদ্দিনেই শুনে এসেছিলেন কারাট। রাজ্য কমিটির বৈঠকে ইয়েচুরি, মানিক সরকার ও তাঁর সামনেই বুদ্ধদেব জানিয়েছিলেন, দলের ভিতরে-বাইরে এত লোক যখন মনে করছেন নেতৃত্বে মুখ বদল না হওয়াটাই হারের কারণ, তখন তিনি আর বোঝা হয়ে থাকতে চান না। কারাট তাই নিচুতলার ক্ষোভকেও অস্বীকার করতে পারছেন না। আগামী বছর পার্টি কংগ্রেস হওয়ার কথা। কিন্তু পার্টি কংগ্রেসের সম্মেলন দুর্গাপুজোর আগেই সেপ্টেম্বর মাস থেকে শুরু করে দেওয়ার কথা ভাবা হচ্ছে। লক্ষ্য হল, দলের কর্মীদের ক্ষোভ নিরস্ত করতে এই বার্তা দেওয়া যে, তাঁদের দাবি মেনে নেতৃত্ব বদলের প্রক্রিয়া শুরু হয়ে গিয়েছে।

    তবে নিচুতলায় যে দাবিই উঠুক, সিপিএমের কোনও নেতাই অবশ্য এখনই নেতৃত্বে মুখ বদলের সম্ভাবনা দেখছেন না। সকলেই একমত, এই ভাবে সিপিএমে নেতা বদল হয় না। হলে হবে আগামী বছরের পার্টি কংগ্রেসে দলের সব স্তরে আলোচনা করে। পলিটব্যুরোর এক নেতার বক্তব্য, যাঁরা পদ ছেড়ে দেওয়ার কথা বলছেন, তাঁরা নেহাৎই আবেগের বশে এ কথা বলছেন। শুধু কয়েক জন নেতা সরে দাঁড়ালেই পার্টি ঘুরে দাঁড়াবে, এমনও নয়। কঠিন অবস্থার মধ্যে রয়েছে দল। ঘুরে দাঁড়ানোর লড়াইয়ের মধ্যে দিয়েই নতুন নেতৃত্ব তৈরি হবে। রাতারাতি নেতা বদলে লাভ হবে না।


    পদ্ম ফুটছে সিপিএমের জমিতে

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    রাজ্যে এ-ও এক পরিবর্তন! ঘটনা ১: শুক্রবার উত্তর ২৪ পরগনার দুই কলেজে তৃণমূল ছাত্র পরিষদের সঙ্গে সংঘর্ষে জড়াল বিরোধী ছাত্র গোষ্ঠী৷ এসএফআই নয়, বিজেপির ছাত্র সংগঠন অখিল ভারতীয় বিদ্যার্থী পরিষদ! ঘটনা ২: এদিনই জেলার বিভিন্ন সমস্যা নিয়ে বর্ধমানের জেলাশাসককে স্মারকলিপি দিতে গিয়ে ব্যাপক জমায়েত করেছে বিজেপি৷ ঘটনা ৩: সিপিএম-সহ বাম দলগুলি থেকে দলে দলে কর্মী-সমর্থকদের নরেন্দ্র মোদীর দলে নাম লেখানোর পালা তো জারি আছেই৷ পার্টি অফিস আক্রান্ত হলেও কোনও কর্মসূচি নিচ্ছে না দল, এই অভিযোগ তুলে বৃহস্পতিবারই দল ছেড়েছেন নদিয়ার বেশ কিছু সিপিএম সদস্য৷ এ বার গেরুয়া শিবিরে নাম লেখাচ্ছেন মধ্য কলকাতা জেলা কংগ্রেসের সভাপতি, কলকাতা পুরসভায় কংগ্রেসের কাউন্সিলর প্রদীপ ঘোষ৷ আবার কংগ্রেসের প্রাক্তন বিধায়ক দেবকীনন্দন পোদ্দারের ছেলে মনোজ পোদ্দার বিজেপিতে যোগ দিয়েছেন৷ আর আপ? পশ্চিমবঙ্গে আপ-এর পুরো শাখাটাই শুক্রবার বিজেপিতে যোগ দিয়েছে! রাজ্য-রাজনীতিতে পরিবর্তনের নতুন ট্রেন্ড এটাই!


    দু'দিন আগে পর্যন্ত যাদের অস্তিত্ব দূরবিন দিয়ে খুঁজতে হত, উপরের তিনটে ঘটনাই এখন রাজ্যে তাদের রমরমা প্রমাণ করছে৷ বিশেষ করে, রাজ্যে দিশেহারা ও ভরাডুবির মুখোমুখি সিপিএম এতটাই হতোদ্যম যে, তাদের তরফে আন্দোলনের সিকিভাগও দেখা যাচ্ছে না৷ সেই সুযোগটাই কাজে লাগিয়ে সিপিএমের ছেড়ে যাওয়া ফাঁকা মাঠ দখলে পুরোদমে কাজে নেমে পড়েছে বিজেপি৷ বামেদের এই শীতঘুমের সুযোগ নিয়ে ঘর গোছাতে তত্‍পর হয়ে উঠেছেন রাহুল সিনহা, তথাগত রায়রা৷ আজ শনিবার থেকে শুরু হচ্ছে রাজ্য বিজেপির দু'দিনের রাজ্য কমিটির বৈঠক৷ বৈঠকে লোকসভা ভোটে দলের সব প্রার্থীকেই হাজির থাকতে বলা হয়েছে৷


    বাম শিবিরেরও দখল অনেকাংশে চলে যাচ্ছে গেরুয়া শিবিরের হাতে৷ শুধু ক্ষমতালোভী নেতাই নন, বাম শিবিরের অনেক অসহায় এবং সাধারণ কর্মী-সমর্থকেরাও বিজেপিতে ভিড়ছেন৷ রাজ্যের এক বাম নেতার কথায়, এটা অনেকটা ঝড়ের মুখে কুঁড়েঘর ছেড়ে পাকা বাড়িতে আশ্রয় নেওয়ার মতো ঘটনা৷ তিনি বলছেন, 'আমরা না করছি আন্দোলন, না দিতে পারছি কর্মীদের নিরাপত্তা৷ এই পরিস্থিতিতে বিজেপির শক্তিবৃদ্ধি অত্যন্ত স্বাভাবিক ঘটনা৷


    একসুর দলত্যাগী বাম কর্মী-সমর্থকদেরও৷ যেমন, বৃহস্পতিবার বিজেপিতে যোগ দেওয়া নদিয়ার চাকদহের সিরিন্ডা (১) গ্রাম পঞ্চায়েতের সদস্য পার্থ সরকার বলছেন, 'আমাদের নিরাপত্তা তো দূরের কথা, পার্টি অফিস আক্রান্ত হলেও কোনও কর্মসূচি নিচ্ছে না দল৷ সিপিএমে কোনও নেতা নেই৷ তাই দল ছেড়েছি৷' এ জেলারই সিপিএমের শিক্ষক সংগঠনের প্রথম সারির নেতা ছিলেন কানুরঞ্জন ঘোষাল৷ তিনিও লাল ঝান্ডা ছেড়ে গেরুয়া শিবিরে নাম লিখিয়েছেন৷ তাঁর কথায়, 'সিপিএম প্রতিবাদের ভাষা ভুলে গেছে৷ পার্টি এখন প্রতিরোধ করার কথাও বলে না৷ এমন পরিস্থিতিতে তো মানুষ প্রধান প্রতিপক্ষ শিবিরেই থাকতে পছন্দ করে৷'


    আর এক বাম দল আরএসপির শক্ত ঘাঁটি দক্ষিণ ২৪ পরগনার বাসন্তীর ঝড়খালিতেও বইছে গেরুয়া হাওয়া৷ ঝড়খালি গ্রাম পঞ্চায়েতের প্রধান দিলীপ মণ্ডল এবং সদস্য পার্বতী মণ্ডলও বিজেপিতে যোগ দিয়েছেন, মোদী মানুষের ভালো করবেন এই প্রত্যাশায়৷ পার্বতীদেবীর কথায়, 'নরেন্দ্র মোদীকে দেখে মনে হয়েছে, এই অস্থির অবস্থা থেকে পশ্চিমবঙ্গকে তিনি মুক্ত করতে পারবেন৷' বিজেপির তত্‍পরতার প্রমাণও মিলছে পদে পদে৷ এদিন বারাসত এবং গোবরডাঙায় রাজ্যের শাসকদলের ছাত্র সংগঠনকে কেন্দ্রের শাসকদলের ছাত্র সংগঠন যে ভাবে জবাব দিয়েছে, তা প্রশ্নের মুখে ফেলে দিয়েছে এসএফআইয়ের অস্তিত্বকে৷ বাম শিবিরে ভাঙন এবং বিজেপির উত্থানের এই চিত্র স্পষ্ট রাজ্য পুলিশ-প্রশাসনের আইনশৃঙ্খলা সম্পর্কিত হালের রিপোর্টেও৷ সেখানে সিপিএম-তৃণমূল সংঘর্ষের পরিচিত রিপোর্ট বদলে গিয়েছে৷ শুধু সন্দেশখালিই নয়, পুলিশ রিপোর্ট বলছে, কোচবিহার থেকে কাকদ্বীপ সমস্ত থানা এলাকাতেই রাজ্য ও কেন্দ্রের শাসকদলের বিরোধ-গোলমাল প্রায় নিত্যদিনের ঘটনা হয়ে উঠেছে৷ কারণ, নারী নির্যাতন থেকে কলেজে ভর্তিতে অনলাইন ব্যবস্থা চালুর দাবি, সব ইস্যুতেই বিজেপি এখন পথের দখল নিয়েছে৷


    গত শতকের নয়ের দশকের গোড়ায় রামমন্দির নির্মাণ আন্দোলনকে সামনে রেখে এ রাজ্যে বিজেপির উত্থান হয়েছিল৷ কিন্ত্ত সে বারের সঙ্গে এবারের দু'টি উল্লেখযোগ্য ফারাক লক্ষ্য করা যাচ্ছে৷ তখন বিজেপির উত্থানের খেসারত দিতে হয়েছিল মূলত কংগ্রেসকে৷ তা ছাড়া, তখনকার গেরুয়া-ঢেউ আজকের মতো এত ব্যাপক ছিল না৷ এই সুযোগে দলে বেনোজল ঢুকে পড়ার আশঙ্কা করছেন বিজেপির একাংশ৷ তবে রাহুল সিন্হা সেই সম্ভাবনা খারিজ করে দিয়ে বলছেন, 'অন্য দল থেকে বিজেপিতে আসছে মানেই বেনোজল ঢুকছে তা নয়৷ কারণ, যাঁরা আমাদের দলে আসছেন, তাঁরা পুরোনো দলের দক্ষ ও স্বচ্ছ ভাবমূর্তির নেতা-কর্মী৷ তাঁদের পরীক্ষা দেওয়ার দরকার নেই৷'


    বিজেপির শক্তিবৃদ্ধির কথা মেনে নিচ্ছে সিপিএমও৷ দলের রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর সদস্য রবীন দেব বলছেন, 'যার যে কোনও দলে যোগ দেওয়ার স্বাধীনতা আছে৷ বিজেপি দরজা খুলে দিয়েছে তাই অনেকে যাচ্ছে৷ তবে আমাদের দল থেকে কেউ গিয়েছে বলে শুনিনি৷' রবীনবাবু এ কথা বললেও এদিন দক্ষিণ ২৪ পরগনার কাকদ্বীপে রামচন্দ্র নগর এলাকায় সিপিএমের জেলা সম্পাদক সুজন চক্রবর্তীর নেতৃত্বে এক প্রতিনিধি দল গিয়েছিলেন বিজেপিতে চলে যাওয়া কর্মীদের ঘরে ফেরার আর্জি জানাতে৷ তাতে কাজ কতটা হয়েছে, তা জানা যায়নি এখনও৷ কারণ, তৃণমূলের হামলায় আক্রান্ত ওই গ্রামে গিয়ে এদিন নিরাপত্তার আশ্বাস দিয়েছে বিজেপির প্রতিনিধি দলও৷ রাজ্যে এখন পরিবর্তন এটাই!


    উপরতলায় না হলেও নিচুতলায় কোপ পড়তে চলেছে সিপিএমে


    CPM

    এই সময়: নির্বাচনী বিপর্যয়ের পর নেতৃত্ব বদল নিয়ে তুমুল বিতর্ক সত্ত্বেও সিপিএমের উপরতলায় পরিবর্তনের সম্ভাবনা আপাতত খারিজ হয়েছে৷ কিন্ত্ত কোপ পড়তে চলেছে নিচুতলায়৷ শাখা থেকে জেলা স্তরের নেতাদের একাংশ 'দলবিরোধী' কাজের অভিযোগে শাস্তি পেতে চলেছেন৷ দলের রাজ্য কমিটির সর্বশেষ বৈঠকে এই বিষয়ে সিদ্ধান্ত হয়েছে৷ কিন্ত্ত প্রশ্ন উঠছে, বার বার শুধু নিচুতলাতেই কোপ কেন! দলের রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর এক সদস্যের অবশ্য দাবি, লোকসভা ভোটে সিপিএমের নজিরবিহীন বিপর্যয়ের পিছনে বিজেপির উত্থান, শাসকদলের সন্ত্রাসের মতো বিষয় ছাড়াও নিচুতলার নেতৃত্বের একাংশের দলবিরোধী কার্যকলাপও বড় ভুমিকা নিয়েছিল৷ নেতাদের এই অংশের বিরুদ্ধে ভোটে অন্তর্ঘাতের অভিযোগও জমা পড়েছে আলিমুদ্দিনে৷ সেই অংশকে চিহ্নিত করে দ্রুত ব্যবস্থা নেওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন রাজ্য নেতৃত্ব৷


    লোকসভা ভোটে ভরাডুবির পর দলের কেন্দ্রীয় ও রাজ্য নেতৃত্বের দিকেই অবশ্য বিশেষ ভাবে আঙুল তোলা হয়েছে৷ সে কাজে এমনকি সামিল হয়েছিলেন মইনুল হাসান, শমীক লাহিড়ি, তড়িত্‍ তোপদার, মানব মুখোপাধ্যায়, অমল হালদারের মতো রাজ্য কমিটির প্রথম সারির নেতারাও৷ যদিও পাল্টা মত পেশ করেন অঞ্জু কর, নিরঞ্জন চট্টোপাধ্যায়, অসীম দাশগুপ্তরা৷ তবে প্রকাশ কারাট, বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য, বিমান বসুদের পদ থেকে সরানোর দাবিতে রাজ্য কমিটির সদস্যদের একটা বড় অংশ সরব হওয়ায় পরিস্থিতির গুরুত্ব উপলব্ধি করেছেন শীর্ষ নেতৃত্ব৷ তাই রাজ্য সম্পাদক বিমান বসু ও সাধারণ সম্পাদক প্রকাশ কারাটকে এই বিষয়ে 'জবাব' দিতে হয়েছে৷ দু'জনেরই বক্তব্য, তাঁরা দলের নেতা-কর্মীদের মনোভাব বুঝতে পারছেন৷ কিন্ত্ত কমিউনিস্ট পার্টিতে হঠাত্‍ করে কোনও সিদ্ধান্ত হয় না৷ দলকে নির্দিষ্ট প্রক্রিয়া মেনে চলতে হয়৷ কেন্দ্রীয় কমিটির আসন্ন বৈঠকে এই বিষয়ে আলোচনা হবে বলেও ইঙ্গিত দিয়েছেন কারাট৷


    রাজ্য কমিটির দু'দিনের বৈঠকে তড়িত্‍ তোপদারের মতো কয়েক জন শীর্ষ নেতৃত্বে রদবদলের প্রসঙ্গে এ কথাও বলেন, নেতা পরিবর্তনের সময় শুধু যেন নিচুতলায় কোপ না পড়ে৷ কিন্ত্ত ভোটের ফল পর্যালোচনা করতে গিয়ে বিভিন্ন জেলা কমিটির তরফেই দলের সাংগঠনিক দুর্বলতার কথা কবুল করে নিচুতলার একাংশকে আসামির কাঠগড়ায় দাঁড় করানো হয়েছে৷ শীর্ষ নেতৃত্ব বারে বারে সংগঠন সুদৃঢ় করার কথা বললেও তা যে বাস্তবে হচ্ছে না, সেটা কার্যত স্বীকার করে নেওয়া হয়েছে কয়েকটি জেলা কমিটির রিপোর্টে৷ সেখানে বলা হয়েছে, নিচুতলার বিভিন্ন স্তরের বেশ কয়েক জন নেতা এ বার নির্বাচনে যথাযথ ভূমিকা পালন করেননি৷ একাংশের বিরুদ্ধে অন্তর্ঘাতে জড়িত থাকার মতো গুরুতর অভিযোগও রয়েছে৷ কেউ কেউ দলীয় শৃঙ্খলা মেনে চলেননি৷ এঁদের মধ্যে জেলা কমিটির নেতাও আছেন৷ পূর্ব মেদিনীপুর জেলা পার্টির তিন জন যেমন ভোট পর্যন্ত দেননি৷ কয়েক জন জেলা সম্পাদকও ভোটে সক্রিয় ভূমিকা নিতে 'পারেননি'৷ রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর এক সদস্যের কথায়, 'অভিযুক্তদের চিহ্নিত করার কাজ চলছে৷ এর পর প্রয়োজন মতো ব্যবস্থা নেওয়া হবে৷'


    কিন্ত্ত উপরের মহল রেহাই পেলেও শুধু নিচুতলায় কেন কোপ পড়ছে? ওই নেতার বক্তব্য, 'নিচুতলার নেতা-সদস্য বলেই ব্যবস্থা নেওয়া হচ্ছে, তা নয়৷ আসলে যাঁদের বিরুদ্ধে অভিযোগ প্রমাণ হবে তাঁরাই শাস্তি পাবেন৷ শীর্ষ কোনও নেতার বিরুদ্ধে এখনও দলবিরোধী কার্যকলাপে জড়িত থাকার অভিযোগ অন্তত ওঠেনি৷' দলবিরোধিতা প্রসঙ্গে পূর্ব মেদিনীপুর নিয়ে তদন্ত কমিটির বিষয়টিও ওঠে রাজ্য কমিটির সভায়৷ প্রার্থী তালিকা ঘোষণার পরেই সেখানে সভা করতে গিয়ে জেলা পার্টির সদস্য-কর্মীদের একাংশের হাতে হেনস্থার শিকার হয়েছিলেন রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর সদস্য রবীন দেব৷ ওই ঘটনার তদন্তের জন্য জেলা কমিটিকেই নির্দেশ দেয় রাজ্য কমিটি৷ কিন্ত্ত জেলা কমিটি তদন্তে টালবাহানা করায় এ বার তদন্তের ভারও নিজেদের হাতে নিয়েছে রাজ্য কমিটি৷ রবীন দেব, তাপস সিন্হারা আগামী এক মাসের মধ্যেই রিপোর্ট দেবেন৷



    সিপিএম ধর্মসঙ্কটে, নেতৃত্ববদল আন্দোলনের ফলে ইয়েচুরি এবং বুদ্ধদেবের ইস্তীফা মন্জুর হলে প্রকাশ কারাত থেকে বিমান বসু কেউ রেহাই পাবেন না।

    माकपा का धर्मसंकट यह है कि येचुरी और बुद्धदेव अगर हट जाते हैं तो प्रकाश कारत से लेकर विमान बोस तक को हटना पड़ेगा।


    এক্সকেলিবার স্টিভেন্স বিশ্বাস

    জাতপাতের বজ্জাতিতে সমান দক্ষতায় বুর্জুয়া ক্ষমতা দখলের রাজনীতিতে কেন্দ্রে ও রাজ্যে প্রত্যক্ষ অপ্রত্যক্ষ রাজত্বের জন্য ভারতবর্ষে বাম মতাদর্শের সঙ্গে এ যাবত বিশ্বাসঘাতকতা করে লাল ঝান্ডার অন্তর্জলি যাত্রা বের করেছেন যারা,তাঁদের এখন মহাবিপদ


    বাংলার কমরেডদের স্বার্থ রক্ষার্থে সারা দেশের সমর্থন সত্বেও কমরেড জ্যোতি বসুকে ভারতবর্ষের এবং সারা বিশ্বে প্রথম নির্বাচিত প্রধানমন্ত্রী হতে যারা আটকে দিয়েছিলেন মতাদর্শের নামে,তাঁদের মতাদর্শ ও পার্টি অনুশাসন তাসের ঘরে পরিণত।


    এই সেদিনও ভারত মার্কিন পরমাণু চুক্তির লোক দেখানো সংসদীয় থেটারে স্পীকারপদ থেকে পার্টি নির্দেশ অনুযায়ী ইস্তীফা না দেওয়ায় অপরাধে সোমনাথ চ্যাটার্জিকে বহিস্কৃত করা হল এবং লোকসভা ভোটের ঠিক আগে বাংলার সংখ্যালঘু মুখ ও কিষানসভার সর্বভারতীয নেতা,বাম সরকারের প্রাক্তন দাপুটে মন্ত্রী রেজ্জাক মোল্লাকে বের করে দেওয়া হল,অথচ রাজ্য কমিটী থেকে কেন্দ্রীয কমিটির বৈঠকে নেতৃত্ব বদল আন্দোলন থামানোই যাচ্ছে না।


    নন্দীগ্রাম সিঙ্গুরে জমি অধিগ্রহণ আন্দোলনের দায সরাাসরি তার ঘাড়ে চাপিয়ে দিয়ে নষ্কলন্ক যারা এ যাবত রাজ্যপাট ভোগ রেছেন,রামরাজত্বে তাহাদেরই মহাবিপদে ফেলে দিয়েছেন প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী ও পোলিট ব্যুরো সদস্য বুদ্ধদেব ভট্টাতচার্য,সব পদ ছেড়ে দেবেন বলে গোঁ ধরে।


    ইহাই শেষ নয়,পার্টিতে কমরেড জেনারেল সেক্রেটারির পর যিনি সর্বভারতীয বাম রাজনীতিতে সেকন্ড ইন কমান্ড,সেই সীতারাম ইয়েচুরিও সেন্ট্রাল কমিটির বৈঠকে ইস্তীফা টাঙিয়ে দিয়েছেন সর্বজনসমক্ষে।


    কংগ্রেসের ভরা়ডুবিতে খড়কুটো ধরে বাঁচার চেষ্টাও ব্যর্ত৤বিশেষ ভাবে উল্লেক্য,কংগ্রেসের সঙ্গে নতুন করে সখ্য বাড়ানোর কাজ শুরু করেছিল  সিপিআই(এম)। সংসদে প্রায়ই কংগ্রেস সহসভাপতি রাহুল গান্ধীর সঙ্গে সাক্ষাতও করেছেন সিপিআই(এম) নেতা সীতারাম ইয়েচুরি।


    সিপিআই(এম) সূত্রেরই খবর, সাংসদ তথা দলের পলিটব্যুরো সদস্য সীতারাম ইয়েচুরিকে বিশেষভাবে দায়িত্ব দেওয়া হয়েছিল কংগ্রেসের সঙ্গে নির্দিষ্টভাবে রাহুল গান্ধীর সঙ্গে সুসম্পর্ক গড়ে তোলার। এসব করা হচ্ছিল ২০১৪ সালের লোকসভা নির্বাচনের কথা মাথায় রেখে।


    দ্বিতীয়ত. লোকসভা নির্বাচনে যাতে কংগ্রেস এবং তৃণমূল কংগ্রেসের মধ্যে আবার জোট তৈরি হতে না পারে সেদিকেও নজর রেখেছে সিপিআই(এম)। দিলি্লর রাজনৈতিক মহলের মতে, সে কারণেই রাহুলের সঙ্গে সীতারামের ঘন ঘন সাক্ষাত।


    কংগ্রেসের সঙ্গে রাজনৈতিক মতভেদ হলেও ব্যক্তিগতভাবে সভানেত্রী সোনিয়া গান্ধীর সঙ্গে এখনো সুসম্পর্ক রয়েছে তৃণমূল কংগ্রেস নেত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের। কিন্তু দিলি্লর রাজনৈতিক মহলের দাবি, আগামীদিনে তৃণমূল কংগ্রেসের সঙ্গে কোনো রকম রাজনৈতিক অাঁতাতে যেতে নারাজ ছিলেন রাহুল গান্ধী।


    বাংলায় বামকে ক্ষমতায় ফিরিয়ে আনার শেষ উদ্যোগও কংগ্রেসের লজ্জাজনক হারের সঙ্গে সঙ্গে বাংলায় বামেদের মাত্র দুটি আসন প্রাপ্তিতে বানচাল।


    বাংলায় এখন বিপ্লব ও মতাদর্শ পদ্ম প্রলয়ে আত্মস্থ।দলে দলে কমরেডগণ বামে আর আশা নেই বলেই দিল্লীর মুদিখানার রেশন হাসিল করতে গৌরিক শিবিরে নাম লেখাচ্ছেন।


    সিপিএম ধর্মসঙ্কটে,নেতৃত্ববদল আন্দোলনের ফলে ইয়েচুরি এবং বুদ্ধদেবের ইস্তীফা মন্জুর হলে প্রকাশ কারাত থেকে বিমান বসু কেউ রেহাই পাবেন না।


    আনন্দ বাজারের প্রতিবেদন অনুযায়ীঃনেতা বদলের দাবি উঠেছিল আলিমুদ্দিন স্ট্রিটে রাজ্য কমিটির বৈঠকেই। বিমান বসু থেকে বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য কেউই সমালোচনার হাত থেকে রেহাই পাননি। এ বার সীতারাম ইয়েচুরিও পলিটব্যুরোর বৈঠকে জানিয়ে দিলেন, তিনি লোকসভা নির্বাচনের খারাপ ফলের দায় নিয়ে পলিটব্যুরো থেকে সরে দাঁড়াতে তৈরি। দলের হাল শোধরাতে তিনি পদ ছাড়তে রাজি আছেন।


    দলের নিয়ম মেনে এমনিতেই প্রকাশ কারাটকে আগামী বছর দলের সাধারণ সম্পাদকের পদ ছাড়তে হবে। কিন্তু ভোটে বিপর্যয়ের পরপরই তিনি যে ভাবে ব্যক্তিগত ভাবে দায় নেওয়ার বিরুদ্ধে বলে এসেছেন, সেই অবস্থানকে আজ ফের প্রশ্নের মুখে ফেলে দিল সীতারামের ঘোষণা।

    লোকসভা নির্বাচনে ভরাডুবির পরেই রাজ্য সম্পাদক বিমান বসু জানিয়েছিলেন, তিনি হারের দায় নিয়ে সরে দাঁড়াতে রাজি আছেন। বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যও জানিয়ে দেন, তিনি আর পলিটব্যুরো বা কেন্দ্রীয় কমিটির কোনও পদে থাকতে চান না। এত দিন সিপিএমের কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের তরফেও তাঁদের নিরস্ত করা হয়েছিল। বলা হয়েছিল, এখনও ভোটে হারের কারণই বিশ্লেষণ হয়নি। আগে জেলা ভিত্তিক রিপোর্ট আসুক। রাজ্য কমিটি থেকে কেন্দ্রীয় কমিটি পর্যন্ত সব স্তরে ভোটের ফলাফল নিয়ে আলোচনা হোক। তার পরে দায় নেওয়ার প্রশ্ন।


    সেই ভোটের ফলাফল বিশ্লেষণেই আজ থেকে পলিটব্যুরো ও কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠক শুরু হয়েছে দিল্লিতে। চলবে তিন দিন। আলোচসূচিতে না থাকায় ইয়েচুরির পলিটব্যুরো ছাড়ার ইচ্ছা নিয়ে এ দিন কোনও আলোচনা হয়নি। দিনের শেষে কারাটও জানিয়ে দেন, আজকের বৈঠকে নেতৃত্ব বদল নিয়ে কোনও কথা হয়নি।"তবে ইয়েচুরিও শেষ পর্যন্ত বিমান-বুদ্ধদেবের পথ ধরায় যথেষ্টই অস্বস্তিতে পড়েছেন কারাট। বাকি সবাই পদ ছাড়তে রাজি আছি বললেও কারাটের পক্ষে এখন আর সে কথা বলা সম্ভব নয়।

    P.B Communiqué

    Sunday, May 18, 2014

    Press Communiqué

    The Polit Bureau of the Communist Party of India (Marxist) met in New Delhi today. It has issued the following statement:

    The Polit Bureau discussed the results of the Lok Sabha elections and the post-election situation. It conducted a preliminary review of the elections and the performance of the Party. It examined the various factors which led to the poor results for the Party and the Left.

    The Polit Bureau will meet again on June 6 to finalise the election review and the political-organisational steps to be taken in the present political situation. This will be placed before the Central Committee meeting on June 7 and 8 for discussion and adoption.

    The Polit Bureau condemned the continuing attacks on the CPI(M) and the Left Front workers and supporters in West Bengal.

    West Bengal Verdict "Distorted"

    Friday, May 16, 2014

    CPI(M) General Secretary Prakash Karat termed the results of the Lok Sabha elections from West Bengal as "distorted". Addressing the press in New Delhi today, he said that there was widespread rigging and violence during the last three phases of the elections in the state and the entire democratic process was vitiated. "The results do not reflect the strength and support of the people for the Left Front in West Bengal".

    Prakash Karat said that in 32 out of 42 constituencies in the state, there was widespread rigging and violence and these have been widely reported in the Bengali media. But the Election Commission has failed in its duty of ensuring a free and fair poll. "The Left, the Congress and the BJP together had demanded repoll in 3200 booths where rigging was done, but the EC had ordered repoll only in 16 booths. There is something wrong with the election machinery." He said that during the 2004 and 2009 Lok Sabha elections the Party had raised the issue about the role of observers who are sent to the constituencies. Prakash Karat pointed out that "there is something defective as there are no clear guidelines about how these observers should act".

    Answering a question about the fall in percentage of votes polled by the Party in Bengal, Prakash said that "the percentage of votes does not reflect the correct picture as there was widespread rigging." He termed the drop of over 11 per cent vote since the last assembly elections as "unacceptable". This does not reflect the true situation, he said.

    Our immediate concern will be taking our Party and the movement ahead in West Bengal, irrespective of the election results, he added.

    About the outcome of the elections at the national level, Prakash said though the Party had worked for the rejection of the Congress, it is not happy with the outcome, as the main benefit of the anti-Congress mood has gone to the BJP.

    On Lok Sabha Verdict

    Friday, May 16, 2014

    The verdict of the people in the 16th Lok Sabha election has been clear and decisive.  There has been an anti-Congress wave which has routed the Congress and the UPA.  The BJP has gained from this anti-Congress wave resulting in a big victory for the BJP and the NDA.  There was an unprecedented use of money power in these elections.


    The results for the CPI(M) and the Left parties have been disappointing.  The Left Democratic Front made gains in Kerala and the Left Front in Tripura won with increased margins. However, the widespread rigging,  violence and intimidation targeting the Left Front  in the elections in West Bengal has led to a distorted result which does not reflect the popular support for the CPI(M) and the Left Front. The Election Commission failed to intervene  to rectify the situation from the third to the fifth round of polling in West Bengal.


    The Polit Bureau of the CPI(M) greets the thousands of cadres and supporters of the CPI(M) and the Left Front in West Bengal who have worked courageously in the face of ceaseless attacks in these elections.  The Party will identify the weaknesses and take steps to overcome them.


    The people have voted against the policies of the Congress-led UPA government which resulted in price rise, agrarian distress and corruption.  They voted for a change and for relief from the problems afflicting them.  The CPI(M) will continue to work to defend the interests of the working people and to safeguard the secular democratic framework of the country.


    কিন্তু সেদিনও

    2013

    নেতা বদল নয়, প্রয়োজন নীতি বদলের : ইয়েচুরি

    13 ডিসেম্বর 2013 15:27

    নেতৃত্ব এক রেখে নীতিতে পরিবর্তন ঘটাতে চায় সিপিআইএম

    কেন্দ্রে নেতা বদল নয়, প্রয়োজন নীতি বদলের। ত্রিপুরায় সিপিআইএম পলিটব্যুরো বৈঠক শেষে একথাই বললেন সীতারাম ইয়েচুরি। ত্রিপুরায় এই প্রথম বৈঠকে বসল সিপিআইএম পলিটব্যুরো। আলোচনা হয় লোকসভা ভোটে দলের রণনীতি নিয়ে। শুক্রবার থেকে আগরতলায় শুরু হল সিপিআইএমের তিন দিনের পলিটব্যুরো ও কেন্দ্রীয় কমিটি বৈঠক। চাররাজ্যের ভোটের ফলাফল এবং লোকসভা নির্বাচন। আলোচনার কেন্দ্রে মূলত এই দুটিই এজেন্ডা।

    চার রাজ্যের ভোটে ধরাশায়ী কংগ্রেস। নরেন্দ্র মোদীকে সামনে রেখে অনেকটাই উজ্জীবিত বিজেপি। মোদীর দলের থিঙ্কট্যাঙ্ক মনে করছে দিল্লিতে মসনদ বদল এখন শুধু সময়ের অপেক্ষা। তবে, দিল্লিতে কংগ্রেসের বদলে বিজেপি আসলে সমস্যা মিটে যাবে এমনটা মনে করছে না সিপিআইএম শীর্ষ নেতৃত্ব।

    এই পরিস্থিতিতে বিকল্প নীতির সন্ধান ইতিমধ্যেই করতে শুরু করেছে বামেরা। ৩০ অক্টোবর দিল্লিতে কনভেনশনে যোগ দিয়েছিলেন মুলায়ম সহ অনেকেই। আগামী দিন এই বিকল্পকে আরও কীভাবে সংহত করা যায় তা নিয়েও আলোচনা হচ্ছে বৈঠকে।


    माकपा का धर्मसंकट यह है कि येचुरी और बुद्धदेव अगर हट जाते हैं तो प्रकाश कारत से लेकर विमान बोस तक को हटना पड़ेगा।बुद्धदेव ने राज्य कमिटी की बैठक में तो सीताराम येचुरी ने सर्वशक्तिमान सेंट्रल कमिटी की बैठक में ही सारे पद छोड़ने की पेशकश करके माकपा महासचिव को चारों दिशाओं से घेर लिया है।जिस पार्टी ने कामरेड ज्योति बसु को पूरे देश की इच्छा को दुत्कारते हुए कभी प्रधानमंत्री बनने से रोकने का पराक्रम दिखाया था,जिस पार्टी ने अपने दल के लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को स्पीकर पद से इस्तीफा देने से इंकार करने के कारण बेरहमी से कामरेड बसु की प्रबल आपत्ति के बावजूद पार्टी बाहर कर दिया,उसकी यह दुर्गति है कि आपस में आम बुर्जुआ दलों की तरह सत्ता संघर्ष घमासान है।विचारधारा धरी की धरी रह गयी देश में सिरे से अप्रासंगिक बन गये वामपंथियों की।


    लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद माकपा के सीताराम येचुरी समेत पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेताओं ने एक बार फिर पोलित ब्यूरो की सदस्यता से इस्तीफे की पेशकश की है। नई दिल्ली में शनिवार को शुरू हुई पार्टी की सेंट्रल कमेटी की बैठक के पहले दिन विभिन्न राज्यों से पहुंचे नेताओं ने हार पर चर्चा की और अपने-अपने विचार रखे। लगभग एक सप्ताह पहले माकपा के पूर्व दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी ने पार्टी नेतृत्व में बड़े स्तर पर परिवर्तन की वकालत की थी।

    सूत्रों का कहना है कि येचुरी समेत पश्चिम बंगाल के दूसरे नेताओं ने बंगाल में पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए पोलित ब्यूरो की सदस्यता से इस्तीफे की पेशकश की। हालांकि, इसकी हालांकि आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी, लेकिन बैठक में पार्टी नेताओं के बीच चर्चा के दौरान गरमा गरम बाताबाती हो गयी।




    बंगाल में विधानसभा चुनावों में सत्ता से बेदखल होने के बाद वामदलों में इतनी भगदड़ नहीं मची थी,जो लोकसभा चुनावों में चारों खानों चित्त वामदलों का हो रहा है।पश्चिम बंगाल में 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत किया था। जिसके बाद इस लोकसभा चुनाव में 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सिर्फ दो सीटें ही जीतने में कामयाब हो पाई।


    ममता बनर्जी के मुख्यमंत्रित्व में भी वामदलों को सत्ता में वापसी की उम्मीद थी।लेकिन अचानक राज्य में शुरु केसरिया सुनामी में वामदलों का समूचा जनाधार उसीतरह केसरिया होता जा रहा है ,जैसे पूरे गैरतृणमूली जमीन कमल से लहलहाने लगी है। हालत इतनी खराब हो गयी कि नेतृत्व का फैसला मानने को हमेशा तत्पर कैडर कामरेड खुली बगावत पर उतारु है और कोलकाता में माकपा की राज्य कमेटी की बैठक के दौरान कमेटी के सदस्यों ने नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर दी। इतना ही नहीं माकपा नेताओं ने लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए पार्टी महासचिव प्रकाश करात के गलत राजनीतिक फैसलों को जिम्मेदार बताया।


    इसी बीच वामदलों में नेतृत्व के खिलाफ अभूतपूर्व विद्रोह शुरु हो चुका है और माकपा महासचिव की मौजूदगी में नेतृत्व बदल की मांग राज्य कमिटी की बैठक में ही बुलंद आवाज में ज्यादातर जिला प्रतिनिधियों ने उठा दी है। इसी परिदृश्य में पूर्व मुख्यमंत्री कामरेड बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश करके नेतृत्व पर भारी दबाव पैदा कर दिया है।लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बुरी तरह पराजय का मुंह देख चुकी माकपा में रार थमने का नाम नहीं ले रही। स्थिति यह है कि जहां एक ओर सांगठनिक और नेतृव में फेरबदल की मांग तेज होती जा रही हैं वहीं पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने यह कह कर सबको चौंका दिया है कि वह पार्टी से जुड़े सभी पदों को छोड़ना चाहते हैं। हालांकि, राय कमेटी की दो दिवसीय बैठक में प्रदेश सचिव विमान बोस ने हार की जिम्मेदारी ली है।लेकिन हार की जिम्मेवारी लेने से ही वाम नेतृत्व को माफ करने को तैयार नहीं हैं कार्यकर्ता,नेता और समर्थक।घटक दलों की ओर से भी आपरोपों की फेहरिस्त सार्वजनिक है।




    माकपा का धर्मसंकट यह है कि बुद्धदेव अगर हट जाते हैं तो प्रकाश कारत से लेकर विमान बोस तक को हटना पड़ेगा।क्योंकि पार्टी के नेता कार्यकर्ता एक के बाद एक निष्कासन और बहिस्कार के बावजूद पार्टी नेतृत्व में न केवलजाति वर्चस्व तोड़ने की मांग करते हुए सभी समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे हैं,वे तुरंत प्रकाश कारत समेत बंगाल राज्य कमिटी का इस्तीफा भी मांग रहे हैं। बुद्धदेव माकपा की पोलित ब्यूरो के सदस्य होने के साथ ही केंद्रीय कमेटी और राज्य कमेटी के भी सदस्य हैं। कोलकाता में राज्य कमेटी की बैठक में बुद्धदेव ने अपने इस प्रस्ताव से सबको सन्न कर दिया। बुद्धदेव ने सिर्फ इच्छा ही नहीं जताई बल्कि दृढ़ता से पदों को छोड़ने की बात शीर्ष नेतृव के सामने रखी।



    इसीलिए संगठन में जमीनी स्तर पर छिटपुट बदलाव करने को तैयार पार्टी नेतृत्व बुद्धदेव को पदत्याग की इजाजत देनेकी हालत में नहीं है।जैसे नेतृत्व बदलकी मांग खारिज कर दी गयी,उसी तरह पार्टी नेतृत्व बुद्धदेव के इस्तीफे की पेशकश भी तुरंत खारिज कर दी है।लेकिन मुश्किल यह है कि नंदीग्राम सिंगुर प्रकरण की वजह से पार्टी की हार का ठीकरा उनके ही मत्थे फोड़े जाने से नाराज बुद्धदेव विधानसभा चुनावों के तुरत बाद से लगातार पदमुक्त होने का दबाव बना रहे हैं और अबकी दफा वे बने  रहने को तैयार नहीं हैं।बुद्धदेव भट्टाचार्य पोलित ब्यूरो सदस्य होने के बावजूद 2011 से अब तक कोलकाता के बाहर होनी वाली किसी भी बैठक में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन मंगलवार की बैठक में उनके रुख का गहरा अर्थ निकला जा रहा है। प्रदेश माकपा सचिव मंडली के एक सदस्य ने कहा कि प्रकाश करात समझाने के बावजूद बुद्धदेव आश्वस्त नहीं हो सके और पूरी बैठक के दौरान वे मौन रहे। इसके उनकी गंभीरता का पता चलता है।



    दूसरी तरफ 1960 के दशक से चुनाव मैदान में आई माकपा का प्रदर्शन इस लोकसभा चुनाव में अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है। जिसके चलते पिछले कुछ दिनों से अयोग्य नेतृत्व को बदलने की मांग तेज होने लगी है। राज्य कमेटी के नेताओं ने पार्टी के बड़े नेताओं प्रकाश करात, प्रदेश सचिव विमान बोस, पोलित ब्यूरो के सदस्य व पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य और प्रदेश में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्रा पर चुनाव के दौरान बेहतर नेतृत्व नहीं दे पाने का आरोप लगाया। इस बैठक में करात के साथ साथ त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार और पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी भी मौजूद थे।


    इस पर तुर्रा यह कि इसी बैठक में बुद्धदेव ने साफ साफ कह दिया है कि कि वह किसी पद पर अब नहीं बने रहना चाहते, बल्कि एक साधारण पार्टी सदस्य के तौर ही पर जुड़े रहना चाहते हैं। बैठक के दौरान सभी पार्टी पदों को छोड़ने पर आमादा बुद्धदेव को माकपा के शीर्ष नेता प्रकाश करात ने किसी तरह पद न छोड़ने पर आश्वस्त करना चाहा, लेकिन वह फिर आश्वस्त नहीं हुए और बैठक में खामोश रहे।


    पत्रकारों से बाद में करात ने बुद्धदेव के इस्तीफे के प्रस्ताव का खंडन किया। उन्होंने कहा लोग अपनी बात कहते सकते हैं, लेकिन माकपा में निर्णय पार्टी स्तर पर ही लिया जाएगा।


    संस्कृति प्रेमी पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य बतौर पद पर रहते अपने को सांगठनिक गतिविधियों और काम काज में कब तक जोड़े रखेंगे, इस पर राय माकपा मुख्यालय के आला नेताओं को ही संदेह है।




    राजनीतिक जानकार मानते हैं कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बुद्धदेव माकपा के राज्य में बेहतर स्थिति रहने की उम्मीद पाले हुए थे। लेकिन, बुरी तरह पराजय ने उन्हें निराश कर दिया है। खास कर बुद्धदेव इस बात से भी क्षुब्ध हैं कि माकपा के वोट प्रतिशत में गुणात्मक तौर पर कमी आ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बुद्धदेव के पद छोड़ने पर माकपा के राज्य सचिव विमान बोस भी पद पर नहीं बने रह पाएंगे। बताते हैं कि विमान ने भी लोकसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय के बाद पद छोड़ने की पेशकश की थी, लेकिन करात ने उन्हें भी मना कर दिया था।


    वहीं अगले हफ्ते से राज्य में माकपा की विभिन्न जिला कमेटियों की बैठक के साथ ही 7 और 8 जून को नई दिल्ली में केंद्रीय कमेटी की बैठक में विरोध और मतभेद के स्वर अभी और उभर सकते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद माकपा के लिए अब 2016 का राज्य विधानसभा चुनाव अंतिम लाइफलाइन जैसा हो सकता है। इसमे न उबर पाने पर बंगाल में उसके राजनीतिक अस्तिव पर ही प्रश्न चिन्ह लग सकता है।


    কারাটের চাপ বাড়ল, সরতে চান সীতারামও

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    নয়াদিল্লি, ৭ জুন, ২০১৪, ০৩:৩৭:১৮


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    নেতা বদলের দাবি উঠেছিল আলিমুদ্দিন স্ট্রিটে রাজ্য কমিটির বৈঠকেই। বিমান বসু থেকে বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য কেউই সমালোচনার হাত থেকে রেহাই পাননি। এ বার সীতারাম ইয়েচুরিও পলিটব্যুরোর বৈঠকে জানিয়ে দিলেন, তিনি লোকসভা নির্বাচনের খারাপ ফলের দায় নিয়ে পলিটব্যুরো থেকে সরে দাঁড়াতে তৈরি। দলের হাল শোধরাতে তিনি পদ ছাড়তে রাজি আছেন।

    দলের নিয়ম মেনে এমনিতেই প্রকাশ কারাটকে আগামী বছর দলের সাধারণ সম্পাদকের পদ ছাড়তে হবে। কিন্তু ভোটে বিপর্যয়ের পরপরই তিনি যে ভাবে ব্যক্তিগত ভাবে দায় নেওয়ার বিরুদ্ধে বলে এসেছেন, সেই অবস্থানকে আজ ফের প্রশ্নের মুখে ফেলে দিল সীতারামের ঘোষণা।

    লোকসভা নির্বাচনে ভরাডুবির পরেই রাজ্য সম্পাদক বিমান বসু জানিয়েছিলেন, তিনি হারের দায় নিয়ে সরে দাঁড়াতে রাজি আছেন। বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যও জানিয়ে দেন, তিনি আর পলিটব্যুরো বা কেন্দ্রীয় কমিটির কোনও পদে থাকতে চান না। এত দিন সিপিএমের কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের তরফেও তাঁদের নিরস্ত করা হয়েছিল। বলা হয়েছিল, এখনও ভোটে হারের কারণই বিশ্লেষণ হয়নি। আগে জেলা ভিত্তিক রিপোর্ট আসুক। রাজ্য কমিটি থেকে কেন্দ্রীয় কমিটি পর্যন্ত সব স্তরে ভোটের ফলাফল নিয়ে আলোচনা হোক। তার পরে দায় নেওয়ার প্রশ্ন।

    সেই ভোটের ফলাফল বিশ্লেষণেই আজ থেকে পলিটব্যুরো ও কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠক শুরু হয়েছে দিল্লিতে। চলবে তিন দিন। আলোচসূচিতে না থাকায় ইয়েচুরির পলিটব্যুরো ছাড়ার ইচ্ছা নিয়ে এ দিন কোনও আলোচনা হয়নি। দিনের শেষে কারাটও জানিয়ে দেন, আজকের বৈঠকে নেতৃত্ব বদল নিয়ে কোনও কথা হয়নি।"তবে ইয়েচুরিও শেষ পর্যন্ত বিমান-বুদ্ধদেবের পথ ধরায় যথেষ্টই অস্বস্তিতে পড়েছেন কারাট। বাকি সবাই পদ ছাড়তে রাজি আছি বললেও কারাটের পক্ষে এখন আর সে কথা বলা সম্ভব নয়।

    কারণ ভোটের ফল প্রকাশের পরেই কারাট বলেছিলেন, "সিপিএমে সমষ্টিগত ভাবে সব সিদ্ধান্ত হয়। কেউ ব্যক্তিগত ভাবে কোনও সিদ্ধান্ত নেয় না। তাই নির্দিষ্ট কোনও ব্যক্তির উপর ভোটের ফলাফলের দায় বর্তায় না।"পশ্চিমবঙ্গের সিপিএম নেতাদের এতে খুশি হওয়ারই কারণ ছিল। কারণ সমষ্টিগত সিদ্ধান্তের কথা বলে কারাট এক দিকে যেমন নিজে দায় নেননি, তেমনই আলিমুদ্দিনের নেতাদের ঘাড়েও দায় চাপাননি।

    সিপিএম নেতারা মনে করছেন, কারাটের সেই অবস্থানই এখন 'ব্যুমেরাং'হয়ে দাঁড়িয়েছে। দলে বার্তা যাচ্ছে, বিমান, বুদ্ধদেব, সীতারামরা পার্টির নিচুতলার দাবি মেনে পদ ছাড়তে রাজি। অথচ কারাট গদি আঁকড়ে ধরে থাকতে চাইছেন।

    কারাটের ঘনিষ্ঠ-মহল থেকে অবশ্য বলা হচ্ছে, তিনি মোটেই গদি আঁকড়ে থাকতে চান না। দলের গঠনতন্ত্র অনুযায়ী টানা তিন বারের বেশি শীর্ষ পদে থাকতেও পারবেন না তিনি। আগামী বছরের পার্টি কংগ্রেসেই তাঁকে সরতে হবে।

    তবে চাপটা অন্য। সিপিএম সূত্রে বলা হচ্ছে, কারাট ও তাঁর অনুগামীরা সাধারণ সম্পাদক পদে এস আর পিল্লাইকে নিয়ে আসতে চাইছেন। কারাট-বিরোধী শিবিরের মত, পিল্লাই সাধারণ সম্পাদক পদে বসলেও দলের নিয়ন্ত্রণ কার্যত কারাটের হাতেই থাকবে। তাই কারাট-বিরোধী শিবির যতটা না কারাটকে সরাতে উদ্যোগী, তার থেকেও বেশি আগ্রহী পিল্লাইকে আটকাতে। কারাট-বিরোধী শিবিরের মতে, কারাট ও তাঁর অনুগামীদের ভুল রাজনৈতিক লাইনের ফলেই দলের ভরাডুবি হয়েছে। নতুন চিন্তাভাবনা,  ও রাজনৈতিক কৌশলেরও প্রয়োজন। নেতৃত্বের ভরকেন্দ্র বদল হলেই তা সম্ভব। ভরকেন্দ্র বদলের এই দাবি আলিমুদ্দিনেই শুনে এসেছিলেন কারাট। রাজ্য কমিটির বৈঠকে ইয়েচুরি, মানিক সরকার ও তাঁর সামনেই বুদ্ধদেব জানিয়েছিলেন, দলের ভিতরে-বাইরে এত লোক যখন মনে করছেন নেতৃত্বে মুখ বদল না হওয়াটাই হারের কারণ, তখন তিনি আর বোঝা হয়ে থাকতে চান না। কারাট তাই নিচুতলার ক্ষোভকেও অস্বীকার করতে পারছেন না। আগামী বছর পার্টি কংগ্রেস হওয়ার কথা। কিন্তু পার্টি কংগ্রেসের সম্মেলন দুর্গাপুজোর আগেই সেপ্টেম্বর মাস থেকে শুরু করে দেওয়ার কথা ভাবা হচ্ছে। লক্ষ্য হল, দলের কর্মীদের ক্ষোভ নিরস্ত করতে এই বার্তা দেওয়া যে, তাঁদের দাবি মেনে নেতৃত্ব বদলের প্রক্রিয়া শুরু হয়ে গিয়েছে।

    তবে নিচুতলায় যে দাবিই উঠুক, সিপিএমের কোনও নেতাই অবশ্য এখনই নেতৃত্বে মুখ বদলের সম্ভাবনা দেখছেন না। সকলেই একমত, এই ভাবে সিপিএমে নেতা বদল হয় না। হলে হবে আগামী বছরের পার্টি কংগ্রেসে দলের সব স্তরে আলোচনা করে। পলিটব্যুরোর এক নেতার বক্তব্য, যাঁরা পদ ছেড়ে দেওয়ার কথা বলছেন, তাঁরা নেহাৎই আবেগের বশে এ কথা বলছেন। শুধু কয়েক জন নেতা সরে দাঁড়ালেই পার্টি ঘুরে দাঁড়াবে, এমনও নয়। কঠিন অবস্থার মধ্যে রয়েছে দল। ঘুরে দাঁড়ানোর লড়াইয়ের মধ্যে দিয়েই নতুন নেতৃত্ব তৈরি হবে। রাতারাতি নেতা বদলে লাভ হবে না।

    সিপিএম ছেড়ে দলে দলে বিজেপিতে যোগ দিচ্ছে সংখ্যালঘুরাওJune 5, 2014, 10:18 pm | তৌসিফ মণ্ডল, স্টিং নিউজ করেসপনডেন্ট | Print| 29 views

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    রাজ্যে বিজেপির পদ্ম ফুলের শিকড় যেন একটু একটু করে বাড়ছে আর রাজ্য রাজনীতিতে নিজেদের অন্যতম শক্তি হিসেবে তুলে ধরতে কোন রকম কসুর ছাড়ছেন না বিজেপি নেতৃত্ব। পশ্চিমবঙ্গের প্রত্যন্ত এলাকাতে দলীয় সমর্থকদের পাশে থাকতে পৌঁছে যাচ্ছেন কেন্দ্রীয় কমিটির তাবড় নেতারা। ঠিক তখনই  উল্টো ছবি দেখা যাচ্ছে বামপন্থী সিপিএম নেতাদের ক্ষেত্রে। এমনিতেই লোকসাভা ভোটে বিপর্যয়ের পর রাজ্যের নেতৃত্ব নিয়ে চলছে দলীয় কোন্দল। ভোটের সময় হাড়য়ায় দলীয় কর্মী সমর্থকরা উপর আক্রমণ হলে চটজলদি দেখা যায়নি নেতাদের, তা নিয়ে সমালচিত হন উপর মহলের নেতারা।

    সম্প্রতি সিপিএম থেকে বহিষ্কৃত নেতা ঠোঁট কাটা বলে পরিচিত রেজ্জাক মোল্লা বলেন, 'এসি ঘরে বসে রাজনীতি হয়না, গায়ে ঘামের গন্ধ না থাকলে গরিব মানুষের নেতা হাওয়া যায়না'। তিনি আর বলেন, কর্মী সমর্থকরা মার খাচ্ছে আর ওরা কলকাতায় বসে সাংবাদিক সস্মেলন করছেন, এরা বামপন্থী থেকে একেবারে সরে এসেছে। যত দিন যাচ্ছে সিপিএমের কাস্তে যেন ভোঁতা হয়ে যাচ্ছে। সংখ্যালঘু সম্প্রদায়ের মানুষ আগেই মুখ ফিরিয়েছে তা ভোটের পরই স্বীকার করে সিপিএম নেতৃত্ব। কিন্তু ভোটের পর যারা ছিল তারাও আস্তে আস্তে দল ছাড়ছেন। সিপিএমের নিচু তলার কর্মী সমর্থকরা আর আস্থা রাখতে পারছে না দলের উপর ও দলের উপর তলার নেতাদের উপর।

    রাজ্যেরে বিভিন্ন প্রান্তে তাই দল ত্যাগের হিড়িক হয় শাসক দল নয়তো রাজ্যের উদীয়মান শক্তি বিজেপিতে যোগ দিচ্ছে সিপিএমের নিচু তলার কর্মী সমর্থকরা। লোকসভা ভোটের পর থেকেই নদীয়ায় নিজেদের শক্তি বাড়াচ্ছিল বিজেপি, জেলার বিভিন্ন প্রান্ত থেকে দলে দলে বিজেপিতে যোগ দিচ্ছিল সাধারণ মানুষ ও অন্য দলের কর্মীরা। এদিন নদীয়ার করিমপুর ব্লকের পিপুলবেড়িয়া গ্রাম পঞ্চায়েতের পাকশি গ্রামের প্রায় ১২০০ সিপিএম কর্মী সমর্থকরা বিজেপিতে যোগ দিলেন। রাজ্যের শাসক দলের অত্যাচার থেকে বাঁচতেই বাংলাদেশ সীমান্ত লাগয়া কাঁটাতার ঘেঁষা এই গ্রামের সিপিএম কর্মী সমর্থকরা বিজেপিতে যোগ দিয়েছে বলে জানান সদ্য দলত্যাগীরা। এদের অধিকাংশই সংখ্যালঘু সম্প্রদায়ের।

    গ্রামের আনিসুর রহমান, জয়নাল সেখ, লিটন সেখ, রাজ্জাক মোল্লা,তসলিমা বিবি,ইয়াসমিন বিবি, বিপ্লব মোল্লারা এক জোটে জানান, ''গ্রামের প্রায় সকলেই সংখ্যালঘু সম্প্রদায়ের। আমরা দীর্ঘ দিন ধরে সিপিএম সমর্থক ছিলাম কিন্তু রাজ্যে নতুন সরকার আসার পর থেকেই শাসক দলের লোকজন আমাদের বাড়িঘর ভেঙে দিচ্ছে। থানায় গেলে পুলিশ অভিযোগ নিচ্ছেনা। আমাদের আগেই তৃণমূল নেতারা থানায় গিয়ে বসে থাকছে। আমাদের ছেলেদের পুলিশ ধরে নিয়ে যাচ্ছে কিন্তু নিরাপত্তা দেওয়ার কেউ নেই। আর সিপিএম নামে দলটার কোন অস্তিত্ব আছে কিনা সেটাই বুঝতে পারছিনা। তাই আমরা বিজেপিতে যোগ দিয়েছি''।

    বিজেপিতে সাম্প্রদায়িকতার গন্ধ থাকলেও মূলত তৃনমূলের বিরধিতা মনে রেখেই বিজেপিতে যোগ দিচ্ছেন সংখ্যালঘু মানুষরা। অনেকে মনে করছেন রাজ্যে বিরধিতা করতে গেল সিপিএম করে লাভ নেয়। মঙ্গলবার সন্ধ্যায় দলবদলের এই অনুষ্টানে উপস্থিত ছিলেন বিজেপির জেলা সভাপতি কল্যাণ নন্দি, করিমপুর ১ ব্লকের সভাপতি সুভাষ মুখোপাধ্যায়, নদীয়া জেলা সহ সভানেত্রী অজিতা রায়, বিজেপির সংখ্যালঘু সেলের সভাপতি মহম্মদ মারফত আলী শেখ। জেলা সভাপতি কল্যাণ বাবু বলেন, "কিছু রাজনৈতিক দল নিজেদের স্বার্থে বিজেপিকে সাম্প্রদায়িক দল বলে। তাদের সেই অপপ্রচারকে ভুল তা আজ মানুষ বুঝছে তাই সীমান্ত এলাকার বিভিন্ন সম্প্রদায়ের মানুষ দলে দলে বিজেপিতে যোগ দিচ্ছেন"।

    করিমপুরের সিপিএম বিধায়ক সমরেন্দ্রনাথ ঘোষ বলেন,"পাকশিতে সিপিএম ছেড়ে বিজেপিতে যোগ দেওয়ার খবর আমার জানা নেই। তবে বেশ কিছু এলাকায় শাসক দলের অত্যাচারে বাধ্য হয়ে কেউ কেউ বিজেপিতে যোগ দিচ্ছেন"।


    পদ্ম ফুটছে সিপিএমের জমিতে

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    রাজ্যে এ-ও এক পরিবর্তন! ঘটনা ১: শুক্রবার উত্তর ২৪ পরগনার দুই কলেজে তৃণমূল ছাত্র পরিষদের সঙ্গে সংঘর্ষে জড়াল বিরোধী ছাত্র গোষ্ঠী৷ এসএফআই নয়, বিজেপির ছাত্র সংগঠন অখিল ভারতীয় বিদ্যার্থী পরিষদ! ঘটনা ২: এদিনই জেলার বিভিন্ন সমস্যা নিয়ে বর্ধমানের জেলাশাসককে স্মারকলিপি দিতে গিয়ে ব্যাপক জমায়েত করেছে বিজেপি৷ ঘটনা ৩: সিপিএম-সহ বাম দলগুলি থেকে দলে দলে কর্মী-সমর্থকদের নরেন্দ্র মোদীর দলে নাম লেখানোর পালা তো জারি আছেই৷ পার্টি অফিস আক্রান্ত হলেও কোনও কর্মসূচি নিচ্ছে না দল, এই অভিযোগ তুলে বৃহস্পতিবারই দল ছেড়েছেন নদিয়ার বেশ কিছু সিপিএম সদস্য৷ এ বার গেরুয়া শিবিরে নাম লেখাচ্ছেন মধ্য কলকাতা জেলা কংগ্রেসের সভাপতি, কলকাতা পুরসভায় কংগ্রেসের কাউন্সিলর প্রদীপ ঘোষ৷ আবার কংগ্রেসের প্রাক্তন বিধায়ক দেবকীনন্দন পোদ্দারের ছেলে মনোজ পোদ্দার বিজেপিতে যোগ দিয়েছেন৷ আর আপ? পশ্চিমবঙ্গে আপ-এর পুরো শাখাটাই শুক্রবার বিজেপিতে যোগ দিয়েছে! রাজ্য-রাজনীতিতে পরিবর্তনের নতুন ট্রেন্ড এটাই!


    দু'দিন আগে পর্যন্ত যাদের অস্তিত্ব দূরবিন দিয়ে খুঁজতে হত, উপরের তিনটে ঘটনাই এখন রাজ্যে তাদের রমরমা প্রমাণ করছে৷ বিশেষ করে, রাজ্যে দিশেহারা ও ভরাডুবির মুখোমুখি সিপিএম এতটাই হতোদ্যম যে, তাদের তরফে আন্দোলনের সিকিভাগও দেখা যাচ্ছে না৷ সেই সুযোগটাই কাজে লাগিয়ে সিপিএমের ছেড়ে যাওয়া ফাঁকা মাঠ দখলে পুরোদমে কাজে নেমে পড়েছে বিজেপি৷ বামেদের এই শীতঘুমের সুযোগ নিয়ে ঘর গোছাতে তত্‍পর হয়ে উঠেছেন রাহুল সিনহা, তথাগত রায়রা৷ আজ শনিবার থেকে শুরু হচ্ছে রাজ্য বিজেপির দু'দিনের রাজ্য কমিটির বৈঠক৷ বৈঠকে লোকসভা ভোটে দলের সব প্রার্থীকেই হাজির থাকতে বলা হয়েছে৷


    বাম শিবিরেরও দখল অনেকাংশে চলে যাচ্ছে গেরুয়া শিবিরের হাতে৷ শুধু ক্ষমতালোভী নেতাই নন, বাম শিবিরের অনেক অসহায় এবং সাধারণ কর্মী-সমর্থকেরাও বিজেপিতে ভিড়ছেন৷ রাজ্যের এক বাম নেতার কথায়, এটা অনেকটা ঝড়ের মুখে কুঁড়েঘর ছেড়ে পাকা বাড়িতে আশ্রয় নেওয়ার মতো ঘটনা৷ তিনি বলছেন, 'আমরা না করছি আন্দোলন, না দিতে পারছি কর্মীদের নিরাপত্তা৷ এই পরিস্থিতিতে বিজেপির শক্তিবৃদ্ধি অত্যন্ত স্বাভাবিক ঘটনা৷


    একসুর দলত্যাগী বাম কর্মী-সমর্থকদেরও৷ যেমন, বৃহস্পতিবার বিজেপিতে যোগ দেওয়া নদিয়ার চাকদহের সিরিন্ডা (১) গ্রাম পঞ্চায়েতের সদস্য পার্থ সরকার বলছেন, 'আমাদের নিরাপত্তা তো দূরের কথা, পার্টি অফিস আক্রান্ত হলেও কোনও কর্মসূচি নিচ্ছে না দল৷ সিপিএমে কোনও নেতা নেই৷ তাই দল ছেড়েছি৷' এ জেলারই সিপিএমের শিক্ষক সংগঠনের প্রথম সারির নেতা ছিলেন কানুরঞ্জন ঘোষাল৷ তিনিও লাল ঝান্ডা ছেড়ে গেরুয়া শিবিরে নাম লিখিয়েছেন৷ তাঁর কথায়, 'সিপিএম প্রতিবাদের ভাষা ভুলে গেছে৷ পার্টি এখন প্রতিরোধ করার কথাও বলে না৷ এমন পরিস্থিতিতে তো মানুষ প্রধান প্রতিপক্ষ শিবিরেই থাকতে পছন্দ করে৷'


    আর এক বাম দল আরএসপির শক্ত ঘাঁটি দক্ষিণ ২৪ পরগনার বাসন্তীর ঝড়খালিতেও বইছে গেরুয়া হাওয়া৷ ঝড়খালি গ্রাম পঞ্চায়েতের প্রধান দিলীপ মণ্ডল এবং সদস্য পার্বতী মণ্ডলও বিজেপিতে যোগ দিয়েছেন, মোদী মানুষের ভালো করবেন এই প্রত্যাশায়৷ পার্বতীদেবীর কথায়, 'নরেন্দ্র মোদীকে দেখে মনে হয়েছে, এই অস্থির অবস্থা থেকে পশ্চিমবঙ্গকে তিনি মুক্ত করতে পারবেন৷' বিজেপির তত্‍পরতার প্রমাণও মিলছে পদে পদে৷ এদিন বারাসত এবং গোবরডাঙায় রাজ্যের শাসকদলের ছাত্র সংগঠনকে কেন্দ্রের শাসকদলের ছাত্র সংগঠন যে ভাবে জবাব দিয়েছে, তা প্রশ্নের মুখে ফেলে দিয়েছে এসএফআইয়ের অস্তিত্বকে৷ বাম শিবিরে ভাঙন এবং বিজেপির উত্থানের এই চিত্র স্পষ্ট রাজ্য পুলিশ-প্রশাসনের আইনশৃঙ্খলা সম্পর্কিত হালের রিপোর্টেও৷ সেখানে সিপিএম-তৃণমূল সংঘর্ষের পরিচিত রিপোর্ট বদলে গিয়েছে৷ শুধু সন্দেশখালিই নয়, পুলিশ রিপোর্ট বলছে, কোচবিহার থেকে কাকদ্বীপ সমস্ত থানা এলাকাতেই রাজ্য ও কেন্দ্রের শাসকদলের বিরোধ-গোলমাল প্রায় নিত্যদিনের ঘটনা হয়ে উঠেছে৷ কারণ, নারী নির্যাতন থেকে কলেজে ভর্তিতে অনলাইন ব্যবস্থা চালুর দাবি, সব ইস্যুতেই বিজেপি এখন পথের দখল নিয়েছে৷


    গত শতকের নয়ের দশকের গোড়ায় রামমন্দির নির্মাণ আন্দোলনকে সামনে রেখে এ রাজ্যে বিজেপির উত্থান হয়েছিল৷ কিন্ত্ত সে বারের সঙ্গে এবারের দু'টি উল্লেখযোগ্য ফারাক লক্ষ্য করা যাচ্ছে৷ তখন বিজেপির উত্থানের খেসারত দিতে হয়েছিল মূলত কংগ্রেসকে৷ তা ছাড়া, তখনকার গেরুয়া-ঢেউ আজকের মতো এত ব্যাপক ছিল না৷ এই সুযোগে দলে বেনোজল ঢুকে পড়ার আশঙ্কা করছেন বিজেপির একাংশ৷ তবে রাহুল সিন্হা সেই সম্ভাবনা খারিজ করে দিয়ে বলছেন, 'অন্য দল থেকে বিজেপিতে আসছে মানেই বেনোজল ঢুকছে তা নয়৷ কারণ, যাঁরা আমাদের দলে আসছেন, তাঁরা পুরোনো দলের দক্ষ ও স্বচ্ছ ভাবমূর্তির নেতা-কর্মী৷ তাঁদের পরীক্ষা দেওয়ার দরকার নেই৷'


    বিজেপির শক্তিবৃদ্ধির কথা মেনে নিচ্ছে সিপিএমও৷ দলের রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর সদস্য রবীন দেব বলছেন, 'যার যে কোনও দলে যোগ দেওয়ার স্বাধীনতা আছে৷ বিজেপি দরজা খুলে দিয়েছে তাই অনেকে যাচ্ছে৷ তবে আমাদের দল থেকে কেউ গিয়েছে বলে শুনিনি৷' রবীনবাবু এ কথা বললেও এদিন দক্ষিণ ২৪ পরগনার কাকদ্বীপে রামচন্দ্র নগর এলাকায় সিপিএমের জেলা সম্পাদক সুজন চক্রবর্তীর নেতৃত্বে এক প্রতিনিধি দল গিয়েছিলেন বিজেপিতে চলে যাওয়া কর্মীদের ঘরে ফেরার আর্জি জানাতে৷ তাতে কাজ কতটা হয়েছে, তা জানা যায়নি এখনও৷ কারণ, তৃণমূলের হামলায় আক্রান্ত ওই গ্রামে গিয়ে এদিন নিরাপত্তার আশ্বাস দিয়েছে বিজেপির প্রতিনিধি দলও৷ রাজ্যে এখন পরিবর্তন এটাই!


    উপরতলায় না হলেও নিচুতলায় কোপ পড়তে চলেছে সিপিএমে


    CPM

    এই সময়: নির্বাচনী বিপর্যয়ের পর নেতৃত্ব বদল নিয়ে তুমুল বিতর্ক সত্ত্বেও সিপিএমের উপরতলায় পরিবর্তনের সম্ভাবনা আপাতত খারিজ হয়েছে৷ কিন্ত্ত কোপ পড়তে চলেছে নিচুতলায়৷ শাখা থেকে জেলা স্তরের নেতাদের একাংশ 'দলবিরোধী' কাজের অভিযোগে শাস্তি পেতে চলেছেন৷ দলের রাজ্য কমিটির সর্বশেষ বৈঠকে এই বিষয়ে সিদ্ধান্ত হয়েছে৷ কিন্ত্ত প্রশ্ন উঠছে, বার বার শুধু নিচুতলাতেই কোপ কেন! দলের রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর এক সদস্যের অবশ্য দাবি, লোকসভা ভোটে সিপিএমের নজিরবিহীন বিপর্যয়ের পিছনে বিজেপির উত্থান, শাসকদলের সন্ত্রাসের মতো বিষয় ছাড়াও নিচুতলার নেতৃত্বের একাংশের দলবিরোধী কার্যকলাপও বড় ভুমিকা নিয়েছিল৷ নেতাদের এই অংশের বিরুদ্ধে ভোটে অন্তর্ঘাতের অভিযোগও জমা পড়েছে আলিমুদ্দিনে৷ সেই অংশকে চিহ্নিত করে দ্রুত ব্যবস্থা নেওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন রাজ্য নেতৃত্ব৷


    লোকসভা ভোটে ভরাডুবির পর দলের কেন্দ্রীয় ও রাজ্য নেতৃত্বের দিকেই অবশ্য বিশেষ ভাবে আঙুল তোলা হয়েছে৷ সে কাজে এমনকি সামিল হয়েছিলেন মইনুল হাসান, শমীক লাহিড়ি, তড়িত্‍ তোপদার, মানব মুখোপাধ্যায়, অমল হালদারের মতো রাজ্য কমিটির প্রথম সারির নেতারাও৷ যদিও পাল্টা মত পেশ করেন অঞ্জু কর, নিরঞ্জন চট্টোপাধ্যায়, অসীম দাশগুপ্তরা৷ তবে প্রকাশ কারাট, বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য, বিমান বসুদের পদ থেকে সরানোর দাবিতে রাজ্য কমিটির সদস্যদের একটা বড় অংশ সরব হওয়ায় পরিস্থিতির গুরুত্ব উপলব্ধি করেছেন শীর্ষ নেতৃত্ব৷ তাই রাজ্য সম্পাদক বিমান বসু ও সাধারণ সম্পাদক প্রকাশ কারাটকে এই বিষয়ে 'জবাব' দিতে হয়েছে৷ দু'জনেরই বক্তব্য, তাঁরা দলের নেতা-কর্মীদের মনোভাব বুঝতে পারছেন৷ কিন্ত্ত কমিউনিস্ট পার্টিতে হঠাত্‍ করে কোনও সিদ্ধান্ত হয় না৷ দলকে নির্দিষ্ট প্রক্রিয়া মেনে চলতে হয়৷ কেন্দ্রীয় কমিটির আসন্ন বৈঠকে এই বিষয়ে আলোচনা হবে বলেও ইঙ্গিত দিয়েছেন কারাট৷


    রাজ্য কমিটির দু'দিনের বৈঠকে তড়িত্‍ তোপদারের মতো কয়েক জন শীর্ষ নেতৃত্বে রদবদলের প্রসঙ্গে এ কথাও বলেন, নেতা পরিবর্তনের সময় শুধু যেন নিচুতলায় কোপ না পড়ে৷ কিন্ত্ত ভোটের ফল পর্যালোচনা করতে গিয়ে বিভিন্ন জেলা কমিটির তরফেই দলের সাংগঠনিক দুর্বলতার কথা কবুল করে নিচুতলার একাংশকে আসামির কাঠগড়ায় দাঁড় করানো হয়েছে৷ শীর্ষ নেতৃত্ব বারে বারে সংগঠন সুদৃঢ় করার কথা বললেও তা যে বাস্তবে হচ্ছে না, সেটা কার্যত স্বীকার করে নেওয়া হয়েছে কয়েকটি জেলা কমিটির রিপোর্টে৷ সেখানে বলা হয়েছে, নিচুতলার বিভিন্ন স্তরের বেশ কয়েক জন নেতা এ বার নির্বাচনে যথাযথ ভূমিকা পালন করেননি৷ একাংশের বিরুদ্ধে অন্তর্ঘাতে জড়িত থাকার মতো গুরুতর অভিযোগও রয়েছে৷ কেউ কেউ দলীয় শৃঙ্খলা মেনে চলেননি৷ এঁদের মধ্যে জেলা কমিটির নেতাও আছেন৷ পূর্ব মেদিনীপুর জেলা পার্টির তিন জন যেমন ভোট পর্যন্ত দেননি৷ কয়েক জন জেলা সম্পাদকও ভোটে সক্রিয় ভূমিকা নিতে 'পারেননি'৷ রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর এক সদস্যের কথায়, 'অভিযুক্তদের চিহ্নিত করার কাজ চলছে৷ এর পর প্রয়োজন মতো ব্যবস্থা নেওয়া হবে৷'


    কিন্ত্ত উপরের মহল রেহাই পেলেও শুধু নিচুতলায় কেন কোপ পড়ছে? ওই নেতার বক্তব্য, 'নিচুতলার নেতা-সদস্য বলেই ব্যবস্থা নেওয়া হচ্ছে, তা নয়৷ আসলে যাঁদের বিরুদ্ধে অভিযোগ প্রমাণ হবে তাঁরাই শাস্তি পাবেন৷ শীর্ষ কোনও নেতার বিরুদ্ধে এখনও দলবিরোধী কার্যকলাপে জড়িত থাকার অভিযোগ অন্তত ওঠেনি৷' দলবিরোধিতা প্রসঙ্গে পূর্ব মেদিনীপুর নিয়ে তদন্ত কমিটির বিষয়টিও ওঠে রাজ্য কমিটির সভায়৷ প্রার্থী তালিকা ঘোষণার পরেই সেখানে সভা করতে গিয়ে জেলা পার্টির সদস্য-কর্মীদের একাংশের হাতে হেনস্থার শিকার হয়েছিলেন রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর সদস্য রবীন দেব৷ ওই ঘটনার তদন্তের জন্য জেলা কমিটিকেই নির্দেশ দেয় রাজ্য কমিটি৷ কিন্ত্ত জেলা কমিটি তদন্তে টালবাহানা করায় এ বার তদন্তের ভারও নিজেদের হাতে নিয়েছে রাজ্য কমিটি৷ রবীন দেব, তাপস সিন্হারা আগামী এক মাসের মধ্যেই রিপোর্ট দেবেন৷

    পদ ছাড়তে বার্তা বুদ্ধ-বিমানকে, বিপাকে কারাটও

    কলকাতা: নেতৃত্ব বদলের যে দাবিতে এতদিন সোচ্চার ছিলেন নিচুতলার কর্মীরা, এবার দলের সাধারণ সম্পাদক প্রকাশ কারাট ও ত্রিপুরার মুখ্যমন্ত্রী মানিক সরকারের উপস্থিতিতে সেই দাবি উঠল সিপিএম রাজ্য কমিটির বৈঠকে৷ নির্বাচনী বিপর্যয়ের জন্য নেতাদের সরে যাওয়ার আহ্বান জানালেন রাজ্য কমিটির চার সদস্য৷ সরে যাওয়ার স্পষ্ট বার্তা দেওয়া হলো, প্রকাশ কারাত, বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য এবং বিমান বসুদের৷

    একদল সদস্য যখন নেতৃত্ব বদলের পক্ষে সওয়াল করলেন, তখন হুড়োহুড়ি করে নেতৃত্ব বদল না করে নেতৃত্বর কর্মপদ্ধতি উন্নত করার পক্ষে পালটা সওয়াল করলেন রাজ্য কমিটির তিন হেভিওয়েট সদস্যও৷ রাজ্য কমিটির সভায় নেতৃত্ব বদল নিয়ে এই নজিরবিহীন মতপার্থক্য প্রকাশ্যে এলেও দলের রাজনৈতিক লাইনের ব্যর্থতা নিয়ে কমবেশি সহমত সকলেই৷ নরেন্দ্র মোদীকে ঠেকানোর জন্য তৃতীয় বিকল্প সরকার গঠনের স্লোগান জনমানসে কোনও দাগ কাটেনি তা এই বিকল্পর প্রধান হোতা প্রকাশ কারাটের সামনেই খোলাখুলি বললেন রাজ্য কমিটির সংখ্যাগরিষ্ঠ সদস্য৷ বিমান বসুর পেশ করা লোকসভা নির্বাচনের খসড়া পর্যালোচনা রিপোর্টেও উল্লেখিত হল তা৷ সোমবার থেকে শুরু হয়েছে সিপিএমের দু-দিনের রাজ্য কমিটির বৈঠক৷ দলের সাধারণ সম্পাদক প্রকাশ কারাট ছাড়াও মানিক সরকার, সীতারাম ইয়েচুরি সহ পলিটব্যুরোর ছয় সদস্য উপস্থিত রয়েছেন রাজ্য কমিটির এই বৈঠকে৷

    এবার লোকসভা ভোটে সিপিএম যে বিপর্যয়ের মুখোমুখি হয়েছে পার্টির জন্মের ৫০ বছরে তার নজির নেই৷ আবার নির্বাচনী বিপর্যয়ের কারণে রাজ্য কমিটির বৈঠকে নেতৃত্ব বদলের দাবি তোলার নজিরও খুব একটা নেই৷ কারণ, কমিউনিস্ট পার্টি যৌথ নেতৃত্বে বিশ্বাস করে৷ বস্ত্তত কমিউনিস্ট পার্টিতে মতাদর্শগত বিরোধেই তেমন দাবি উঠে থাকে৷ যেমন, ইন্দিরা গান্ধী ও জরুরি অবস্থাকে সমর্থন সিপিআই এসএ ডাঙ্গেকে বহিষ্কার করেছিল৷ ১৯৭৭-এর নির্বাচনী বিপর্যয়ের পর এই সিদ্ধান্ত হয়ে থাকলেও শাস্তিমূলক ব্যবস্থা নেওয়া হয়েছিল মতাদর্শগত কারণেই৷ কিন্ত্ত এবার নির্বাচনে ভরাডুবির পর থেকেই নেতৃত্ব বদলের দাবি এতটাই জোরালো হয়েছে যে ভোট পরবর্তী পলিটব্যুরোর বৈঠকে বিমান বসু নৈতিক দায় নিয়ে সরে যাওয়ার প্রস্তাব দেন৷ তবে তা খারিজ করে পলিটব্যুরো৷

    লোকসভা নির্বাচনে ঐতিহাসিক বিপর্যয়ের জন্য নেতৃত্ব বদলের দাবিতে কয়েক দিন আগে আলিমুদ্দিন স্ট্রিটে সিপিএম রাজ্য দপ্তর মুজফফর আহমেদ ভবন থেকে ঢিল ছোঁড়া দূরত্বে প্রকাশ্যে বিদ্রোহ করেছিলেন নিচুতলার একদল নেতা কর্মী৷ নির্বাচনী বিপর্যয়ের দায় নিয়ে অবিলম্বে দলের শীর্ষ নেতৃত্ব সরে যাওয়া উচিত বলে প্রকাশ্যে সোচ্চার হয়েছিলেন আলিমুদ্দিন স্ট্রিট-মল্লিকবাজার লোকাল কমিটির সদস্যরা৷ নিচুতলার এই নেতা-কর্মীদের এই ক্ষোভের আঁচ এবার রাজ্য কমিটির সভায় বসে টের পেলেন প্রকাশ কারাট, বিমান বসু, বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যর মতো সিপিএমের শীর্ষ নেতারা৷

    রাজ্য কমিটির সভার প্রথম দিনেই বর্ধমানের জেলা সম্পাদক অমল হালদার, উত্তরবঙ্গের হেভিওয়েট নেতা অশোক ভট্টাচার্য, প্রাক্তন দুই সাংসদ শমীক লাহিড়ি ও মইনুল হাসান খোলাখুলি নেতৃত্ব বদলের পক্ষে সওয়াল করেন৷ তাত্পর্যপূর্ণ বিষয় অমল হালদার ছাড়া কোনো জেলা সম্পাদক কিংবা জেলাওয়াড়ি রিপোটিংর্ যে নেতারা করেছে তাদের কেউ নেতৃত্ব বদলের পক্ষে সওয়াল করেননি৷ জেলা সম্পাদকের দায়িত্বে না থাকা নেতারা মূলত সরব হয়েছেন নেতৃত্ব বদলের দাবিতে৷ যার কারণ ব্যাখ্যা করতে গিয়ে রাজ্য কমিটির এক সদস্যর যুক্তি, 'নেতৃত্ব বদলের পক্ষে জেলা সম্পাদকরা সওয়াল করলে নিজেদের জেলায় তাদেরও একই দাবির মুখে পড়তে হবে৷ তাই কৌশলগত কারণে জেলা সম্পাদকের পদে যে নেতারা নেই তারা নেতৃত্ব বদলের পক্ষে সওয়াল করেছেন৷'

    এ দিনের সভায় এই পরিবর্তনের দাবিতে প্রথম সোচ্চার হন অমলবাবু৷ বর্ধমান জেলায় ফল খারাপ হওয়ার জন্য শাসক দলের রিগিংকে মুখ্যত দায়ী করার পাশাপাশি বিজেপি পক্ষে জনসমর্থনের চোরাস্রোত যে এতটা মারাত্মক ভাবে বইছে তা যে বোঝা যায়নি বলে মেনে নিয়েছেন তিনি৷ শাসক দলের রিগিং প্রতিরোধ করার কথা ভাবা হলেও তা শেষ পর্যন্ত বাস্তবায়িত করা যায়নি বলেও মেনে নেন তিনি৷ জেলা সম্পাদক হিসেবে নিজের এই ব্যর্থতার কথা মেনে নিয়ে অমলবাবু বলেন, 'এই বিপর্যয়ের জন্য প্রয়োজনে যদি আমাদের সরে যেতে হয় তা হলে তা করা বাঞ্ছনীয়৷' এখানেই থেমে না থেকে তিনি সরাসরি বিমান বসুকে আক্রমণ করেছেন৷ লোকসভা ভোটের ফল প্রকাশের দিন আলিমুদ্দিন স্ট্রিটে সাংবাদিক বৈঠক করতে গিয়ে অপ্রিয় প্রশ্নের মুখে বিমানবাবু যে ভাবে উত্তেজিত হয়ে সংবাদমাধ্যমকে আক্রমণ করেছিলেন তা দলের ভাবমূর্তিকে আরও নষ্ট করেছে বলে মন্তব্য করেন তিনি৷

    নিজে থেকে জেলা সম্পাদকের পদ ছেড়ে দেওয়ার কথা বলে আদতে বিমান বসু, বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যকে নেতৃত্ব থেকে সরে যাওয়ার জন্য কৌশলী চাপ তৈরি করেছেন বর্ধমানের এই দাপুটে নেতা৷ অমল হালদারের পথে হেঁটে পরপর আরও খোলাখুলি নেতৃত্ব বদলের দাবি করেন অশোক ভট্টাচার্য, মইনুল হাসান, শমীক ভট্টাচার্য৷ ঘুরিয়ে একই বার্তা দিয়েছেন মানব মুখোপাধ্যায়৷ এদের মধ্যে শমীক লাহিড়ি ও মইনুল হাসান দলের সাংগঠনিক সম্মেলন এগিয়ে এনে সর্বস্তরে র্যাংক অ্যান্ড ফাইলকে বদল করার কথা বলেন৷ একদা, একের পর এক রাজ্য কমিটির সভায় এই নেতৃত্ব বদলের পক্ষেসওয়াল করতেন রেজ্জাক মোল্লা৷ পরবর্তী সময়ে লক্ষ্মণ শেঠের মতো নেতারা রেজ্জাক মোল্লার সঙ্গে প্রকাশ্যে নেতৃত্ব বদলের পক্ষে করা শুরু করেন তিনি৷ যদিও তাদের সেই দাবিতে গ্রাহ্য করা হয়নি উল্টে বহিষ্কৃত রেজ্জাক ও লক্ষ্মণ শেঠ দু-জনে বহিষ্কৃত হয়েছেন৷ তাদের সেই দাবি এবার রাজ্য কমিটির সভায় ওঠায় রেজ্জাক মোল্লা এ দিন বলেন, 'আমি যখন নেতৃত্ব বদলের কথা বলতাম তখন অমলরা তাকে গ্রাহ্য করত না, নেতারা অবজ্ঞা করতেন৷ এখন ওরা ঠেকে শিখেছে৷ এর ফলে একটা ধাক্কা অন্তত দেওয়া যাবে৷' যদিও তাড়াহুড়ো করে নেতৃত্ব বদল করলে আদতে কোনও ফল হবে না বলে পালটা যুক্তি দিয়েছেন অসীম দাশগুপ্ত, বাসুদেব আচারিয়া, বিপ্লব মজুমদারের মতো কয়েক জন নেতা৷ এদের যুক্তি, নেতৃত্ব বদল করলে অবস্থার পরিবর্তন হবে এর কোনও বাস্তব ভিত্তি নেই৷ বরং নেতৃত্বর কর্মতত্পরতা আরও বাড়ানোর পক্ষে তারা৷

    নেতৃত্ব বদলের দাবির পাশে ভোটের মুখে জোড়াতালি নিয়ে তৃতীয় বিকল্প গঠনের রাজনৈতিক লাইন সম্পূর্ণ ভুল বলে সাফ জানিয়েছেন মানব মুখোপাধ্যায়৷ পরমানু চুক্তির মতো দুরূহ বিষয়ে সমর্থন তুলে নিয়ে তা আমজনতাকে বোঝাতে যেমন বেগ পেতে হয়েছিল তেমনই নির্বাচনী আঁতাত যে দলগুলির মধ্যে হয়নি তাদের নিয়ে তৃতীয় বিকল্প সরকার গড়ার ডাককে মানুষ কোনও গুরুত্ব দেয়নি বলে মন্তব্য করেছেন তিনি৷ একই ভাবে বিজেপি পক্ষে যে সমর্থনের চোরাস্রোত বইছে তা পুরোপুরি আঁচ করা যায়নি বলে একাধিক নেতা কবুল করেছেন৷ এই সমালোচনার মুখে আজ মঙ্গলবার রাজ্য কমিটির সভায় জবাবি ভাষণ দেবেন বিমান বসু, প্রকাশ কারাট ও বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য৷ নেতৃত্ব বদলের দাবির মুখে নেতৃত্ব কী বলেন সেই দিকে এখন তাকিয়ে রয়েছে সমগ্র সিপিএম৷- ওয়েবসাইট।

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    জেএনইউ-তে ঘুরে দাঁড়াতে মরিয়া ইয়েচুরি-বৃন্দা ময়দানে

    Sep 12, 2013, 10.40AM IST

    brinda

    প্রসেনজিত্‍ বেরা


    আঁতুড়েই কোণঠাসা!


    ধাক্কা সামলাতে ময়দানে সীতারাম ইয়েচুরি স্বয়ং৷ সঙ্গী বৃন্দা কারাট, ঋতব্রত বন্দ্যোপাধ্যায়, শিবদাসনরা৷


    'বিদ্রোহী'দের দাপটে জওহরলাল নেহরু বিশ্ববিদ্যালয়ে কর্তৃত্ব হাতছাড়া হয়েছে এসএফআই-র৷ অথচ এ চত্বরেই ছাত্র রাজনীতি করে উত্থান ইয়েচুরির৷ প্রসেনজিত্‍ বোসেরও৷ এই অনুজটিকে সামাল দিতেই জেএনইউ-র ছাত্র সংসদের নির্বাচনে ফের সক্রিয় ভূমিকায় অবতীর্ণ সীতারাম ইয়েচুরি৷ 'মেন্টরে'র বিরুদ্ধে কোমর বাঁধছেন প্রসেনজিত্‍ও৷


    আগামিকাল, শুক্রবার জেএনইউ-র ছাত্র সংসদ নির্বাচন৷ বিদ্রোহী নেতাদের দাপটে গতবার প্রায় ধুয়েমুছে গিয়েছিল এসএফআই৷ এবার সাফল্য পেতে মরিয়া সিপিএম৷ ইতিমধ্যেই সীতারাম নিজে ক্যাম্পাসে গিয়ে এসএফআই সমর্থকদের সঙ্গে কথা বলেছেন, প্রচার করেছেন৷ তিনি প্রচার করে যাওয়ার পর ক্যাম্পাসে যান বৃন্দা কারাট৷ পাল্টা লড়াইয়ে তৈরি সিপিআইএমএলের (লিবারেশন) ছাত্র সংগঠন এআইএসএ (আইসা) এবং প্রসেনজিত্‍ বোসের ডিএসএফ৷ দুই সংগঠনের শীর্ষ নেতানেত্রীরা মাটি কামড়ে পড়ে রয়েছেন ক্যাম্পাসে৷

    তুঙ্গে কথার যুদ্ধও৷ এসএফআই যখন আইসা ও ডিএসএফের মধ্যে 'গোপন আঁতাতে'র অভিযোগ আনছে, তখন ডিএসএফের পাল্টা প্রশ্ন, 'কেন যুগ্ম-সম্পাদকের পদে এসএফআই প্রার্থী দিল না?', 'কেন সীতারাম ইয়েচুরি ক্যাম্পাসে এলেও ছাত্রছাত্রীদের গুরুত্বপূর্ণ প্রশ্ন এড়িয়ে গেলেন?' সব মিলিয়ে সরগরম ক্যাম্পাস৷


    গত বছর ছাত্র সংসদ নির্বাচনের কিছু দিন আগে প্রণব মুখোপাধ্যায়কে রাষ্ট্রপতি পদে সিপিএমের সমর্থনের প্রশ্নে জেএনইউ-র এসএফআই ভেঙে যায়৷ প্রসেনজিত্‍ বোস, ভি লেনিন কুমার, জিকো দাশগুপ্তর নেতৃত্বে বিদ্রোহীরা ডিএসএফ নামে নতুন ছাত্র সংগঠন গড়ে তোলেন৷ ছাত্র সংসদ নির্বাচনে সাধারণ সম্পাদক, সহ-সভাপতি ও যুগ্ম সম্পাদক পদ আইসা দখল করলেও, সভাপতি পদে ডিএসএফ জয়ী হয়৷ কোনও গুরুত্বপূর্ণ পদে জয়ী হতে পারেনি এসএফআই৷ স্কুল ও সেন্টারের ছাত্র প্রতিনিধিদের মধ্যে মাত্র একটি পদে এসএফআই জয়ী হয়৷ এককথায়, সীতারাম ইয়েচুরির খাসতালুকে এসএফআই-র ভিত নড়ে যায়৷


    তার পর বেশ কয়েক মাস ক্যাম্পাসে এসএফআই ইউনিটই তৈরি করতে পারেনি৷ অবস্থা এমন হয় যে, শেষ পর্যন্ত বাধ্য হয়ে কেরল ও পশ্চিমবঙ্গ সিপিএম বাছাই করা ছাত্র নেতাদের জেএনইউ-তে পাঠায় এসএফআই ইউনিট তৈরি করার জন্য৷ অর্জুন সেনগুপ্তের নেতৃত্বাধীন নতুন সেই ছাত্র ইউনিটকে হাতিয়ার করে এবার জেএনইউতে ঘুরে দাঁড়াতে চাইছে এসএফআই৷ যদিও সীতারাম ও বৃন্দা প্রচারে আসায় বিন্দুমাত্র চিন্তিত নয় ডিএসএফ বা আইসা৷ ডিএসএফ নেতা জিকো দাশগুপ্তর কথায়, 'ইয়েচুরি ও বৃন্দা কারাট এলেও, তার কোনও প্রভাব পড়বে না৷ প্রণব মুখোপাধ্যায়কে সমর্থন বা টিপি চন্দ্রশেখরন হত্যা মামলা নিয়ে ছাত্রদের কোনও প্রশ্নের যুক্তিযুক্ত উত্তর দিতে পারেননি সিপিএম নেতারা৷' আইসার মুখপাত্র সুচেতা দে'র বক্তব্য, 'সিপিএম ও এসএফআই এখানে ঠুঁটো জগন্নাথ৷ আমরা গতবারের থেকে ভালো ফল আশা করছি৷' অন্য দিকে, এসএফআই-র সাধারণ সম্পাদক ঋতব্রত বন্দ্যোপাধ্যায়ের দাবি, 'বিশ্বাসঘাতকদের জন্য গতবার ফল খারাপ হয়েছিল৷ আমরা এখনও সংগঠন গড়ে তোলার প্রক্রিয়ায় আছি৷ স্কুল অব সোশ্যাল সায়েন্সের মতো শাখায় আমাদের ফল দেখে অনেকে চমকে যাবেন৷' ঘটনা হল, ত্রিমুখী লড়াইয়ে স্কুল অফ সোশ্যাল সায়েন্সে এসএফআই ভালো ফলের আশা করলেও, ছাত্র সংসদ নির্বাচনে গুরুত্বপূর্ণ সব পদই আইসা-র হাতে যাওয়ার সম্ভাবনা জোরালো৷

    http://eisamay.indiatimes.com/city/kolkata/jnu/articleshow/22507667.cms



    বি জে পি-র পথে কংগ্রেসের প্রদীপ ঘোষ

    যোগ দিল রাজ্য আপ-এর একাংশ




    আজকালের প্রতিবেদন: কয়েক দিন ধরেই সহকর্মীদের বলছিলেন, কংগ্রেসকে মানুষ ত্যাগ করেছে৷‌ আমি আর এ দলে থাকব না৷‌ কংগ্রেসের কোনও ভবিষ্যৎ নেই৷‌ ভাবছি, বি জে পি-তেই চলে যাব৷‌ ৫০ ওয়ার্ডের কয়েকজন কংগ্রেস নেতার সঙ্গেও প্রদীপ কথা বলেন৷‌ কথা হয় তাঁর শঙ্কর সিং, কনক দেবনাথের মতো নেতাদের সঙ্গে৷‌ তাঁরা প্রদীপকে বলেন, তুমি বি জে পি-তে যেতে চাইছ যাও, এ ব্যাপারে আমাদের কিছু বলার নেই৷‌ বৃহস্পতিবার প্রদীপ স্হির করে ফেলেন, শুক্রবার দুপুরে বি জে পি অফিসে যাবেন৷‌ এর মধ্যে দলের সহকর্মীদের কাছে মোদির বারবারই প্রশংসা করেছেন৷‌ রাহুল সিন‍্হার সঙ্গেও তিনি কথা বলেছেন৷‌ শুক্রবার দুপুরে বি জে পি দপ্তরে গিয়ে রাহুলের সঙ্গে প্রদীপ দীর্ঘক্ষণ কথা বলেছেন৷‌ বি জে পি-তে তিনি যোগ দেবেন ঠিকই কিন্তু এ ব্যাপারে কয়েকদিন সময় চেয়েছেন৷‌ কংগ্রেস সূত্রে জানা যায়, প্রদীপ ঘোষ বি জে পি-র কাছে চৌরঙ্গি আসনটি চান৷‌ শিখা মিত্র ইস্তফা দেওয়ায় চৌরঙ্গি আসনে উপনির্বাচন হবে৷‌ বি জে পি তাঁকে এ ব্যাপারে কোনও প্রতিশ্রুতি দিয়েছে কি না, তা জানা যায়নি৷‌ গত কলকাতা পুরসভা নির্বাচনে শুধু প্রদীপই নন, তাঁর পুত্রবধূও কংগ্রেসের প্রতীকে দাঁড়িয়ে তৃণমূলের কাছে হেরে যান৷‌ মধ্য কলকাতার সংগঠন বাড়াতে বি জে পি একজন নেতা খুঁজছে৷‌ রাজনৈতিক মহলের ধারণা, বি জে পি-র নেতারা মনে করেন প্রদীপকে দিয়ে সংগঠনের কাজ করানো যাবে৷‌ তার কারণ, দীর্ঘদিন ধরে তিনি মধ্য কলকাতায় রাজনীতি করছেন৷‌ আগামী বছর কলকাতা পুরসভা নির্বাচন৷‌ বি জে পি-র এক নেতা বলেন, বি জে পি-র হাওয়ায় কলকাতা পুরসভা নির্বাচনে দল বেশ কিছু আসন পাবে৷‌ এ ক্ষেত্রে প্রদীপের প্রয়োজন হবে৷‌ জানা গেছে, চৌরঙ্গি না পেলেও প্রদীপ বি জে পি-র হয়েই পুরসভায় দাঁড়াবেন৷‌ দল যদি ভাল করে, তা হলে তাঁকে গুরুত্বপূর্ণ পদ দেওয়া হবে৷‌ অন্য দিকে এদিনই বি জে পি-তে যোগ দিলেন রাজ্য আপ-এর দুই নেতা মেহমুদ জাফরি এবং অমিত কুমার৷‌ বি জে পি-তে যোগ দিয়েছেন কংগ্রেস নেতা দেওকীনন্দন পোদ্দারের ছেলে মনোজ পোদ্দার৷‌ পরে রাহুল সিন‍্হা সাংবাদিক বৈঠকে প্রদীপ সম্পর্কে বলেন, উনি রাজ্য দপ্তরে এসেছিলেন৷‌ কয়েকদিনের মধ্যেই উনি বি জে পি-তে যোগ দেবেন৷‌ রাহুল এ-ও জানিয়েছেন, বহু মানুষ বি জে পি-তে আসতে আবেদন করছেন৷‌ মেহমুদ জাফরি, অমিত কুমার-সহ আপের সব রাজ্য নেতারাই বি জে পি-তে যোগ দিয়েছেন৷‌ এখন রাজ্যে আর আপ-এর কোনও অস্তিত্বই রইল না৷‌ রাহুল সিন‍্হা জানিয়েছেন, রাজ্য বি জে পি-র কার্য সমিতির দু'দিনের বৈঠক শনিবার থেকে শুরু হচ্ছে৷‌ থাকবেন রামলালজি এবং সিদ্ধার্থনাথ সিং৷‌ তিনি অভিযোগ করে বলেন, অনলাইনে ছাত্র ভর্তি থেকে হিন্দমোটর বন্ধ হয়ে যাওয়া– কোনও ক্ষেত্রেই সদর্থক মনোভাব নিচ্ছে না রাজ্য সরকার৷‌ হিন্দমোটরের মতো বড় সংস্হা বন্ধ হয়ে গেল, অথচ রাজ্য সরকার নীরব৷‌ ৪ হাজার শ্রমিক বেকার হয়ে গেলেন৷‌ তাঁরা কী করবেন? তাঁর অভিযোগ, হিন্দমোটরকে আরেকটি ডানলপে রূপাম্তরিত করার চেষ্টা চলছে৷‌ হিন্দমোটরের জমি গোপনে বিক্রি করা হয়েছে৷‌ কিছু তৃণমূল নেতা জড়িত৷‌ অশুভ আঁতাত রয়েছে৷‌ তিনি রাজ্যের শিল্প ও শ্রমমন্ত্রীর কাছে আবেদন করেছেন, অবিলম্বে ত্রিপাক্ষিক বৈঠকের আয়োজন করে সমাধানের পথ খুঁজে বের করতে হবে৷‌ বীরভূমের কো-অপারেটিভ ব্যাঙ্ক বন্ধ হয়ে যাওয়ায় গ্রাহকেরা সমস্যায় পড়েছেন৷‌ রাহুলবাবু অভিযোগ করে বলেন, কবিগুরু রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর প্রতিষ্ঠিত এই ব্যাঙ্কটির ৩৫৫ কোটি টাকা আমানত ছিল৷‌ তৃণমূল নেতারা লুটপাট করে নিয়েছে৷‌ যাঁরা ওই সংস্হার সঙ্গে যুক্ত ছিলেন তাঁরাও গ্রাহকদের মতোই সমস্যায় পড়েছেন৷‌



    কোথায় দাঁড়িয়ে সিপিএম

    সূচনা রহমান

    ভারতের পশ্চিমবঙ্গের বিধানসভা নির্বাচনে ভরাডুবির পর পঞ্চায়েতেও বড় পরাজয় হয়েছে সিপিএমের। এ অবস্থায় ঘনিয়ে আসছে লোকসভা নির্বাচন। বিশ্লেষকদের ধারণা এ নির্বাচনকে কেন্দ্র করে নানা ধরনের সঙ্কটের মুখোমুখি দলটি। তারা বলছেন, মুখে কংগ্রেস ও বিজেপির বিরোধিতার কথা বলা হলেও রাজনৈতিক বাস্তবতার কারণে সিপিএমকে আবার কংগ্রেসের মুখাপেক্ষী হতে হবে। শুধু সিপিএমই নয়, অন্য বামেরাও নরেন্দ্র মোদি, বিজেপিকে রোখার নামে আবার কংগ্রেসের সহযোগী হবার সম্ভাবনাকে মাথায় রেখে এগিয়ে যেতে চাইছে।


    ১৯৬৪ সালে সিপিআই ভাগ হয়ে সিপিআই ও সিপিএমে পরিণত হয়। এরপর ১৯৬৭ সালে প্রয়াত সিপিআই নেতা শ্রীপাদ অমৃত ডাঙ্গে ঠিক একইভাবে 'হিন্দু ফ্যাসিবাদী' জনসংঘকে রুখতে ইন্দিরা গান্ধীর নেতৃত্বাধীন কংগ্রেসের সঙ্গে আঁতাতের আহ্বান জানিয়ে সিপিএমের কাছে কংগ্রেসের দালাল বলে চিহ্নিত হয়েছিলেন। আজ বামপন্থি আন্দোলনের বড় পরিহাস সেই সিপিএম নেতাদের সোনিয়া গান্ধীর বন্দনা গাইতে ও কংগ্রেসকে গণতান্ত্রিক, ধর্মনিরপেক্ষ শক্তি হিসেবে সার্টিফিকেট দিতে হচ্ছে নরেন্দ্র মোদি ও বিজেপিকে রোখার নামে।


    ১৯৬৪ সালে তেনালি পার্টি কংগ্রেসের পর সিপিএম কংগ্রেস বিরোধিতাকে লক্ষ্য রেখে ভারতীয় রাজনীতিতে যে উগ্র বামপন্থার জন্ম দিয়েছিল তা আজ স্তিমিত। মূলত সিপিএমের দুই কংগ্রেস ঘেঁষা প্রয়াত নেতা জ্যোতি বসু ও হরকিষাণ সিং সুরজিত সিপিএমের সত্ আদর্শবাদের দাবিদার বাম—মার্কসবাদী শক্তিকে কংগ্রেসের সহযোগী শক্তিতে পরিণত করে ফেলেছিলেন। অতীতে প্রথম ইউপিএ সরকার থেকে ভারত- মার্কিন পরমাণু চুক্তির ইস্যুতে সিপিএম ও বামেরা সমর্থন প্রত্যাহার করলেও রাজনৈতিক মহল মনে করছেন, সামনের লোকসভা নির্বাচনের পর সিপিএম আরো বেশি করে কংগ্রেস নির্ভরশীল রাজনীতি করবে। দেশজুড়ে কংগ্রেসের নেতৃত্বে সেকুলার ফ্রন্ট গঠনেও সিপিএমের সমর্থন জুটবে। সিপিএমের রাজনৈতিক লাইন পর্যবেক্ষণ করলে দেখা যাবে যে, তাদের ৪৯ বছরের সুদীর্ঘ রাজনীতিতে বিভিন্ন সময়ে তারা আদর্শগত ও নীতিগত অবস্থান থেকে সরে সুবিধাবাদী রাজনৈতিক লাইন গ্রহণ করেছে। ১৯৬৪ সালে পার্টি তৈরির পর উগ্র কংগ্রেস— বিরোধিতা ও সিপিআই বিরোধিতার রাজনীতি চালানো হয়। আন্তর্জাতিক কমিউনিস্ট আন্দোলনের বিভেদে রুশ বিরোধী ও চীনপন্থি অবস্থান গ্রহণ করা হয়। ১৯৬৭ তে পশ্চিম বাংলায় কংগ্রেস রাজের অবসানে যুক্তফ্রন্ট রাজনীতির সূচনা হয়। সিপিএম এ সময় অতুল্য ঘোষ, প্রফুল্ল সেন বিরোধী কংগ্রেস নেতা অজয় মুখোপাধ্যায়, সুশীল ধাড়াদের সঙ্গে হাত মেলায় এবং চলতে থাকে তাদেও কংগ্রেস তথা ইন্দিরা গান্ধী বিরোধিতার রাজনীতি।


    ১৯৬৯ সালে কংগ্রেসের বিভাজন ঘটলে সিপিএম সুর পাল্টিয়ে ইন্দিরা গান্ধীর কংগ্রেস গোষ্ঠীকে প্রকাশ্যে রাজনৈতিক মদদ জোগাতে শুরু করে। ইন্দিরা গান্ধীর বিভিন্ন কর্মসূচিকে 'প্রগতিশীল' বলে গাওনা গাওয়াও শুরু হয়। এর পরিণতিতে সিপিএমের পশ্চিম বাংলা শাখার উগ্রপন্থি গোষ্ঠী মূলতঃ চীনা কমিউনিস্ট পার্টির প্রত্যক্ষ সমর্থনে সিপিআই (এমএল) তৈরি করে সিপিএমের কংগ্রেস ঘেঁষা রাজনীতিকে প্রকাশ্যে চ্যালেঞ্জ জানায়।


    ১৯৭০'র দশকে পশ্চিম বাংলা জুড়ে প্রবল নকশাল আন্দোলন শুরু হয়ে যায়। ১৯৭১'র নির্বাচনে সিপিএম বড় রকমের ধাক্কা খায়। কংগ্রেস সিপিআই ও অজয় মুখার্জির সাহায্যে রাজ্যে 'গণতান্ত্রিক কোয়ালিশন' সরকার গঠন করে। রাজ্য জুড়ে নকশালী সন্ত্রাস ও কংগ্রেসের আক্রমণের সামনে সিপিএম বিপদ বুঝে আবার কংগ্রেস বিরোধিতার রাজনীতি শুরু করে দেয়। সোভিয়েত রাশিয়ার মদদে ও জাতীয় পুঁজিপতিদের সাহায্যে ইন্দিরা গান্ধী পশ্চিম বাংলায় সিপিএম নিধনে ব্রতী হন। তখন তার প্রধান সহযোগী হয়ে ওঠে সিপিআইএম।


    সিদ্ধার্থ রায়ের আমলে ধারাবাহিক আক্রমণে সিপিএমের এগারোশ' নেতা ও কর্মী খুন হয়; এলাকা ছাড়া হয় হাজার হাজার কর্মী ও সমর্থক। এ সময় ইন্দিরা গান্ধীর ফ্যাসিবাদের বিরুদ্ধে লড়তে সিপিএম লোকনায়ক জয়প্রকাশ নারায়ণের ছাতার তলায় আশ্রয় নেয়। ১৯৭৪'র এক সকালে কংগ্রেসের 'আধা-ফ্যাসিবাদে'র বিরুদ্ধে লড়তে জয়প্রকাশ নারায়ণের নেতৃত্বে সিপিএমসহ কংগ্রেস বিরোধী শক্তিগুলো বিশাল গণমিছিল বের করে। ১৯৭৫ সালের ২৫ জুন গভীর রাতে ভারতে জাতীয় জরুরি অবস্থা ঘোষিত হয় ইন্দিরা গান্ধীর রাজনৈতিক অস্তিত্ব রক্ষার প্রশ্নে। এর আগে এলাহাবাদ হাইকোর্ট নির্বাচনে অবৈধ উপায় অবলম্বনের দায়ে ইন্দিরা গান্ধীর নির্বাচন বাতিল করে দেন। এই সময়েই গুজরাটে জনসংঘ, সোশালিস্ট পার্টি, আদি-কংগ্রেসের সমন্বয়ে বিধানসভার নির্বাচনে জনতা ফ্রন্ট বিশাল জয় পায়। সিপিএমসহ অন্যান্য বামপন্থিরাও জনতা ফ্রন্টকে সমর্থন জানায়। জরুরি অবস্থার অবস্থানে ১৯৭৭-এ দেশে ঐতিহাসিক নির্বাচনে দিল্লির মসনদে প্রথম অকংগ্রেসী সরকার গঠন করে জনতা পার্টি। সিপিএম ও অন্যান্য বামপন্থিরা এই সরকারকে সমর্থনে এগিয়ে আসে। পশ্চিম বাংলায় জনতা পার্টি ও সিপিএম নেতৃত্বাধীন বাম দলগুলোর মধ্যে 'ফ্যাসিবাদী কংগ্রেস বিরোধী জোট' গঠিত হয় ও পশ্চিম বাংলার নির্বাচনে কংগ্রেস শোচনীয় ফল করে, জনতা পার্টি- বাম জোট বিশাল সাফল্য পায়। জনতা পার্টিতে জনসংঘ থাকা সত্ত্বেও সিপিএম কোন সময়ই সাম্প্রদায়িকতার কথা তোলেনি। হঠাত্ মস্কোর কমিউনিস্ট নেতাদের নির্দেশে সিপিএম মোরারজি দেশাই'র নেতৃত্বে জনতা পার্টি ও সরকার পতনে কংগ্রেসের সঙ্গে একাত্ম হয়। ১৯৭৯ তে জনতা সরকারের পতন ঘটে এবং ১৯৮০ সালে নির্বাচন অনিবার্য হয়ে ওঠে। ১৯৮০'র নির্বাচনে কংগ্রেস ইন্দিরা গান্ধীর নেতৃত্বে ক্ষমতায় ফেরে। সিপিএম ও অন্য কমিউনিস্টদের তখন নরম সুর দেখা যায়।


    সাম্প্রদায়িকতা ও আরএসএস প্রশ্নে জনতা পার্টি বিভাজিত হয়ে বিজেপির উত্থান ঘটে। এ পরিস্থিতিতে সিপিএম আবার বিজেপি বিরোধিতায় নামে এবং হঠাত্ করে সাম্প্রদায়িকতার প্রশ্ন তোলা হয়। জ্যোতি বসু ও সুরজিতরা এই সময় থেকে দলকে কংগ্রেসমুখী করতে শুরু করেন। ১৯৮৪ সালে শিখ বিচ্ছিন্নতাবাদীদের হাতে ইন্দিরা গান্ধী নিহত হলে দেশে অকাল নির্বাচন অনুষ্ঠিত হয়। এ সময় রাজিব গান্ধী ক্ষমতায় ফিরলে রাজিব শাসনে বোফর্স কেলেঙ্কারি নিয়ে কংগ্রেসী বিক্ষুব্ধ নেতা বিশ্বনাথ প্রতাপ সিংয়ের সঙ্গে রাজিব বিরোধী, কংগ্রেস বিরোধী অবস্থান নেয় সিপিএম। দেশ জুড়ে ওঠে কংগ্রেস বিরোধী হাওয়া। নতুন করে জনতা দল, বামপন্থি শক্তি ও বিজেপির মধ্যে আঁতাত গড়ে ওঠে। ১৯৮৯'র নির্বাচনের মাধ্যমে বিশ্বনাথ প্রতাপ সিং ক্ষমতায় আসলে সিপিএম ও বিজেপি একত্রেই কংগ্রেস বিরোধী অবস্থান নেয়। এ সময় অটল বিহারী বাজপেয়ীর হাত ধরে জ্যোতি বসু কলকাতার ময়দানে সমাবেশ করেছিলেন। ভি পি সিং সরকারকে পরিচালনা করতে সমর্থনকারী সিপিএম, বিজেপি প্রভৃতি দল নিয়ে সমন্বয় কমিটিও গঠিত হয়। এরপর মন্ডল কমিশন ও অযোধ্যা প্রশ্নে সামাজিক ও ধর্মীয় উত্তেজনা বৃদ্ধি পায়। বিজেপি সমর্থন প্রত্যাহার করায় ভি পি সিং সরকারের পতন ঘটলে মধ্যবর্তী নির্বাচন অনিবার্য হয়ে ওঠে। ১৯৯১-এ কংগ্রেসের সংখ্যালঘু সরকার নরসীমা রাওয়ের নেতৃত্বে ক্ষমতায় আসে। তখন বিশ্ব ব্যাংক ও আইএমএফের শর্ত মেনে উদার অর্থনীতি ও শিল্পনীতি গৃহীত হয়।


    ১৯৯৬'র নির্বাচনের পর কংগ্রেসের সমর্থনে ও সিপিএমের সক্রিয়তায় প্রথমে দেবগৌড়া ও পরে আই কে গুজরালের যুক্তফ্রন্ট ক্ষমতায় আসে। দু'বারই সোনিয়া গান্ধী যুক্তফ্রন্ট সরকারের পতনের কারণ হয়ে ওঠেন। এরপর ১৯৯৮ সালে অটল বিহারী বাজপেয়ীর নেতৃত্বে বিজেপি জোট ক্ষমতায় ফেরে। ১৩ মাসের মাথায় কংগ্রেস ও কমিউনিস্টরা সাম্প্রদায়িকতা ও 'হিন্দু ফ্যাসিবাদে'র বিরুদ্ধে বিপদের কথা বলে নির্বাচিত সরকারের পতন ঘটিয়ে মধ্যবর্তী নির্বাচন অনিবার্য করে তুলেছিলো।


    ১৯৬৪ সালে উগ্র বামপন্থা থেকে সিপিএমের উত্থান। সেই সিপিএমই এখন সুর নরম করে কংগ্রেসের নেতৃত্বে কেন্দ্রে ধর্মনিরপেক্ষ ফ্রন্ট সরকার গঠনের আওয়াজ তুলছে। সমালোচকরা বলছেন মার্কসবাদ নয়, সংসদীয় ক্ষমতা দখলই এখন তাদের রাজনীতির মূল লক্ষ্য। বিভিন্ন সময়ে এজন্য সুবিধাবাদী রাজনীতির পথ গ্রহণ করা হয়েছে। সিপিএম আজ এক গভীর রাজনৈতিক সঙ্কটের সামনে দাঁড়িয়ে। দলীয় আদর্শ ও নীতি থেকে সরে আগামী লোকসভা নির্বাচনে যে সিপিএম ও অন্য বামেরা বিজেপি তথা নরেন্দ্র মোদি বিরোধিতায় কংগ্রেসমুখী হবে তা বলাই বাহুল্য।

    নন্দীগ্রামে তৃণমূল নেতা খুনে গ্রেফতার সিপিএম নেতা অশোক গুড়িয়া

    নন্দীগ্রামে তৃণমূল নেতা খুনে গ্রেফতার সিপিএম নেতা অশোক গুড়িয়া

    তমলুক, ০৫ ফেব্রুয়ারি- তৃণমূল নেতা সমর মাইতি হত্যাকাণ্ডে গ্রেফতার করা হল সিপিএমের পূর্ব মেদিনীপুর জেলা সম্পাদকমণ্ডলীর সদস্য তথা নন্দীগ্রামের নেতা অশোক গুড়িয়াকে। মঙ্গলবার গভীর রাতে তাঁকে রেয়াপাড়ার বাড়ি থেকে গ্রেফতার করা হয়। তাঁর সঙ্গে আরও তিন জনকে গ্রেফতার করা হলেও পুলিশ তাঁদের নাম জানাতে চায়নি।

    মঙ্গলবার সন্ধ্যাবেলা মোটর সাইকেলে যাওয়ার সময় আততায়ীর ছোড়া গুলিতে নিহত হয়েছিলেন সমরবাবু। তাঁর পিঠের ডান দিকে দু'টি, ডান হাতের কনুইতে এবং বাঁ চোখে একটি করে মোট চারটি গুলি লাগে। রেয়াপাড়া থেকে তমলুক জেলা হাপাতালে নিয়ে যাওয়ার পথেই তাঁর মৃত্যু হয়। তমলুকের তৃণমূল সাংসদ শুভেন্দু অধিকারী এই খুনের ঘটনায় 'সিপিএমের দুষ্কৃতীরা জড়িত'বলে ওই দিন দাবি করেছিলেন। তার পর অশোক গুড়িয়ার গ্রেফতার যথেষ্ট তাৎপর্যপূর্ণ। যদিও নিহত নেতার বাবা তথা তৃণমূল নেতা বাদল মাইতি এই ঘটনার জন্য দলের গোষ্ঠীদ্বন্দ্বকেই দায়ী করেছিলেন। শেখ নাজিমুদ্দিন নামের বিক্ষুব্ধ এক তৃণমূল নেতার দিকে আঙুলও তুলেছিলেন তিনি। সিপিএম নেতৃত্ব অবশ্য দাবি করেছেন, সম্পূর্ণ মিথ্যা অভিযোগে অশোকবাবুকে ফাঁসানো হয়েছে।

    এই খুনের ঘটনার সঙ্গে সিপিএমের কোনও যোগ নেই, বরং তৃণমূলের গোষ্ঠীদ্বন্দ্বের জেরেই ঘটনাটি ঘটেছে, বলে বুধবার মন্তব্য করেছিলেন অশোকবাবু। কিন্তু এই ঘটনায় তাঁকেই গ্রেফতার করায় বিস্মিত তাঁর দল। এর আগে তাঁকে নন্দীগ্রাম নিখোঁজ মামলায় ২০১২ সালের ১৭ মার্চ মুম্বই থেকে গ্রেফতার করে পুলিশ। ওই বছরেরই ২৩ জুলাই জামিনে মুক্তি পেয়েছিলেন তিনি। সেই মামলা এখনও শেষ হয়নি, তার মধ্যে ফের অশোকবাবু গ্রেফতার হলেন।

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    বিপর্যয়ের পেছনে মূল কারণ সাংগঠনিক দুর্বলতা : মানছে সিপিএম

    বিপর্যয়ের পেছনে মূল কারণ সাংগঠনিক দুর্বলতা : মানছে সিপিএম

    May 21, 2014

    ভিনিউজ ডেস্ক:

    লোকসভা নির্বাচনে বিপর্যয়ের পর দলের সাংগঠনিক দুর্বলতার কথা স্বীকার করে নিয়েছে সিপিএম পলিটব্যুরো। সদ্য সমাপ্ত নির্বাচনে দল ধরাশায়ী হওয়ার পেছনে শুধু সন্ত্রাস নয়, নড়বড়ে সংগঠনকেও অন্যতম বড় কারণ হিসেবে দেখছেন দলটির নেতারা। অথচ ভোটের প্রচার চলাকালে বিভিন্ন ইস্যুতে সরব হলেও সংগঠন নিয়ে একটি শব্দও খরচ করেননি সিপিএমের শীর্ষ নেতৃত্ব। গণপ্রতিরোধের কথা বললেও সে ক্ষেত্রে দলের তৃণমূল পর্যায়ের ভূমিকা কী হবে, তা নিয়ে খোলাখুলি কোনো নির্দেশনাও দেননি তারা। বরং সংগঠনের শক্তি নিয়ে আগাগোড়াই ছিলেন তৃপ্তির সুরে।

    দিলি্লতে গত রোববার ছিল পলিটব্যুরোর বৈঠক। সেখানে সিপিএমের সামগ্রিক ফল নিয়ে প্রাথমিক আলোচনা করেন প্রকাশ কারাত, বিমান বসু এবং সূর্যকান্ত মিশ্রসহ শীর্ষস্থানীয় নেতারা। সেখানে সাংগঠনিক দুর্বলতা নিয়ে আলোচনা প্রসঙ্গে ঠিক হয়েছে, এবার এ বিষয়ে কয়েকটি কড়া ব্যবস্থা নেয়া হতে পারে। এ ব্যাপারে ভবিষ্যতের রূপরেখা ঠিক করতে আগামী ৬ জুন আবারো বৈঠকে বসবেন পলিটব্যুরোর সদস্যরা।

    এদিকে, সর্বোচ্চ নেতৃত্ব যখন কর্মীদের ওপর দোষ চাপাতে চাইছে, তখন তৃণমূল পর্যায় থেকে নেতা বদলের দাবি জোরদার হতে শুরু করেছে। এ ব্যাপারে সবচেয়ে সরব দলের ছাত্র-যুবদের একাংশ। লোকসভা ভোটের ফল প্রকাশের পরই ছাত্র-যুব সংগঠনের একাধিক নেতাকর্মী পার্টির নেতৃত্ব বদলের দাবি ফেসবুকসহ অন্যান্য সোশ্যাল নেটওয়ার্কিং সাইটে পোস্ট করছেন। রাজাবাজার সায়েন্স কলেজের একজন এসএফআই নেতা নিজের প্রোফাইলে বলেছেন, 'রক্ত আর হাঁটুর জোর বাড়াতে হবে। লড়াইটা কঠিন, বড়দের আশীর্বাদ নিয়ে ছোটদের আরো বেশি করে কাজ করতে দিন।'প্রেসিডেন্সি বিশ্ববিদ্যালয়ের এসএফআই ইউনিটের এক সাবেক প্রেসিডেন্ট নিজের ওয়ালে কবিতা লিখে দলে নেতৃত্বের বদল দাবি করেছেন। তিনি লিখেছেন, 'শত কমরেড, গড়ে ব্যারিকেড নেতাদের নেই চিহ্ন, দূরে সরে গেছ জনগণ থেকে, হয়ে গেছ বিচ্ছিন্ন; পদ ছাড় আজ, হয়েছে অনেক, আসুক তরুণ রক্ত।'

    তবে ফোনে তাদের প্রতিক্রিয়া চাওয়া হলে দলীয় শৃঙ্খলার কথা মাথায় রেখে কেউই সংবাদমাধ্যমের সামনে মুখ খুলতে চাননি। কিন্তু যাদবপুর বিশ্ববিদ্যালয়ের এসএফআই নেতা সৈনিক শূর নেতৃত্বের প্রতি আস্থাভাজন হয়েও বলেছেন, 'এটা ঠিক, আরো ছাত্র-যুবকের দলে উঠে আসা উচিত। সেই কথা পার্টিও বিশ্বাস করে।'দলের একাংশের বক্তব্য, সেই দাবিকে আড়াল করতে সাংগঠনিক দুর্বলতার তত্ত্বকে খাড়া করছে পলিটব্যুরো। শীর্ষ পর্যায়ের পাল্টা বক্তব্য, বুর্জোয়া দলের মতো কমিউনিস্ট পার্টিতে এভাবে নেতা বদলের পরম্পরা নেই। তাছাড়া তৃণমূল পর্যায়ের কর্মীরা নেতৃত্ব বদলের দাবি তুললেও তারা তাদের দায়িত্ব পালন করছে কিনা, সেই প্রশ্নও রয়েছে। ওপর মহলের মতে, তৃণমূল পর্যায়ের কমিটি তাদের কাজ করলে এর প্রভাব ভোটে পড়ত। সাধারণ কর্মীরা অবশ্য দলের নীতিনির্ধারক নেতাদের অপসারণের দাবি থেকে সরতে নারাজ। এ অবস্থায় পলিটব্যুরোর পরবর্তী বৈঠকে কী পদক্ষেপ নেয়া হয়, তার অপেক্ষায় রয়েছে দলের বাকি অংশ।

    প্রাথমিক আলোচনার পর পলিটব্যুরোকে ভাবিয়ে তুলেছে সন্ত্রাস, বিজেপির উত্থানের পাশাপাশি দলের সাংগঠনিক ফাটল। ২০০৯ সালের লোকসভা ভোটের পর থেকেই সংগঠনকে ঢেলে সাজানোর কথা বার বার বলেছে পলিটব্যুরো। তারপর পশ্চিমবঙ্গ বিধানসভা, পৌরসভা, পঞ্চায়েত নির্বাচনের পর সদ্য শেষ হলো লোকসভার ভোট। কিন্তু সংগঠন চাঙ্গা হওয়া তো দূরের কথা, প্রাপ্ত আসনের নিরিখে দলের রক্তক্ষরণ বেড়েই চলেছে। সংবাদসূত্র : ইনডিয়া টাইমস

    বদলের বার্তা পশ্চিমবঙ্গের বাম শিবিরে

    অবশেষে বিদ্রোহ ঘোষণা করেছেন পশ্চিমবঙ্গের তৃণমূলস্তরের বামপন্থি কর্মীরা৷ প্রকাশ কারাট থেকে শুরু করে রাজ্যস্তরে বুদ্ধ-বিমান, সবার অপসারণ দাবি করেছেন তাঁরা৷

    পশ্চিমবঙ্গে বামপন্থি আন্দোলনের ইতিহাসে সম্ভবত এই প্রথম নেতৃত্ব বদলের দাবি উঠল!

    ভারতের মার্ক্সবাদী কমিউনিস্ট পার্টি অর্থাৎ সিপিআইএম দলের কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের প্রধান দুই মুখ প্রকাশ কারাটএবং সীতারাম ইয়েচুরিরসঙ্গে পশ্চিমবঙ্গের বামপন্থি নেতাদের মতবিরোধ দীর্ঘদিনের৷ সেই যবে থেকে কেন্দ্রে বহুদলীয় জোট সরকারের সর্বসম্মত প্রার্থী হওয়া সত্ত্বেও প্রয়াত জ্যোতি বসুর প্রধানমন্ত্রিত্বে বাদ সেধেছিলেন এঁরা দুজন৷ তার পর থেকে নানা ইস্যুতে বারবার প্রকাশ হয়ে পড়েছে সিপিএম পলিটব্যুরোর তথাকথিত কারাট লাইনের সঙ্গে মূলত বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যের বেঙ্গল লাইনের তীব্র মতপার্থক্য৷ যদিও সাংগঠনিক শৃঙ্খলাবদ্ধতার কারণে এই বিরোধ কখনও দলীয় কোন্দলের চেহারা নেয়নি৷

    কিন্তু এবার সরাসরি কারাট লাইন নিয়ে প্রশ্ন উঠল সিপিএমের রাজ্য সম্পাদকমন্ডলীর বৈঠকে৷ এই প্রথম জানতে চাওয়া হল, সর্বভারতীয় রাজনীতিতে তথাকথিত তৃতীয় ফ্রন্ট তৈরির কোনও সম্ভাবনা না থাকা সত্ত্বেও প্রতিবার কেন তৃতীয় শক্তির ধুয়ো তুলে নির্বাচনি লড়াইয়ের অভিমুখ নষ্ট করা হয়!

    প্রকাশ কারাট

    অবশ্য শুধু কেন্দ্রীয় নেতৃত্ব নয়, দলের মধ্যে জোরদার বিরোধিতার আওয়াজ উঠল রাজ্য এবং জেলাস্তরের নেতা-কর্মীদের মধ্যেও, লক্ষ্য হলেন প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য, বামফ্রন্ট সভাপতিবিমান বসুএবং বিধানসভায় বিরোধী দলনেতা সূর্যকান্ত মিশ্র৷ পশ্চিমবঙ্গে বামপন্থি আন্দোলনের ইতিহাসে সম্ভবত এই প্রথম নেতৃত্ব বদলের দাবি উঠল!

    ২০১১ সালে পশ্চিমবঙ্গের বিধানসভা নির্বাচনে শোচনীয় হার এবং ৩৪ বছর পর রাজ্যে ক্ষমতাচ্যুত হওয়ার পর যে ব্যাপক হতাশা ছড়িয়েছিল, তাও সামলে ওঠার চেষ্টা করছিলেন সাধারণ বাম কর্মী-সমর্থকরা৷ কিন্তু সাম্প্রতিক লোকসভা নির্বাচনে পশ্চিমবঙ্গ থেকে প্রায় নিশ্চিহ্ন হয়ে গিয়েছে বামফ্রন্ট৷ ৪২টি লোকসভা আসনে প্রার্থী দিয়ে মাত্র দুটিতে জিততে পেরেছেন বামপ্রার্থীরা৷ পশ্চিমবঙ্গের রাজনৈতিক মহলে একটা আলোচনা তখন থেকেই শুরু হয়েছিল যে, এমন ভরাডুবির কী কারণ হতে পারে৷ একটা বড় কারণ অবশ্যই এই রাজ্যে বিজেপির রাজনৈতিক জমি পাওয়া৷ ভোটের আগে ধারণা ছিল, বিজেপির ভোট বাড়লে তা আসবে মূলত বামবিরোধী, তথাকথিত দক্ষিণপন্থী ভোটব্যাংক থেকে৷ সুতরাং খারাপ ফল করবে তৃণমূল এবং কংগ্রেস, কিন্তু বাম ভোট অক্ষত থাকবে৷

    ৪২টি লোকসভা আসনে প্রার্থী দিয়ে মাত্র দুটিতে জিততে পেরেছেন বামপ্রার্থীরা

    কিন্তু কার্যত হল তার ঠিক উল্টো৷ বিজেপির সম্ভাব্য হিন্দুত্ববাদী হুমকির মুখে এই রাজ্যের সংখ্যালঘু মুসলিম ভোট সঙ্ঘবদ্ধ হল, না, চিরাচরিত নিয়মে বামপন্থীদের পতাকার নীচে নয়, বরং তৃণমূল কংগ্রেসের শিবিরে৷ অন্যদিকে নিম্নবর্গীয় অনুন্নত শ্রেণির হিন্দুদের যে ভোট বামপন্থীরা এতদিন পেয়ে আসছিল, তা ব্যাপকহারে চলে গেল বিজেপির দিকে৷ ফলে বামেদের ভোটব্যাঙ্কে ধস নামল৷ অথচ ২০১১ সালে ক্ষমতায় আসার পরের তিন বছরে মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের সরকার এমন কোনও সাফল্যের নজির রাখতে পারেনি, যা তাদের পক্ষে জনসমর্থনকে আরও জোরদার করতে পারত৷ সুতরাং ভোটের ফলে এটাই বরং পরিস্কার হল যে, এ রাজ্যের মানুষের আস্থা এবং বিশ্বাস তো আগেই হারিয়েছিল বামপন্থীরা, এবার তৃণমূল কংগ্রেসের রাজনৈতিক বিরোধী হওয়ার যোগ্যতাও তারা হারিয়েছে৷

    এই পরিস্থিতিতে রাজ্য সম্পাদকমন্ডলীর বৈঠক ডেকে হারের কারণ পর্যালোচনা করার সাংগঠনিক ভড়ংই সম্ভবত ক্ষিপ্ত করে তোলে বাম কর্মীদের৷ প্রথম পোস্টার পড়ে বাঁকুড়া জেলায় দলের দফতরের বাইরে৷

    সীতারাম ইয়েচুরি

    নেতাদের পরামর্শ দেওয়া হয় – এসি লাগানো গাড়ি ছেড়ে, রোদের মধ্যে পায়ে হেঁটে ঘোরার জন্য৷ সিপিএমের জেলা এবং রাজ্য নেতৃত্ব কিন্তু এই পোস্টারের কথা প্রথমে অস্বীকার করে৷ রাজ্য সম্পাদক বিমান বসু চিরাচরিত ভঙ্গিতে, শাস্তিমূলক ব্যবস্থা নেওয়ার হুমকি দেন৷ এর পর পোস্টার পড়ে বিতাড়িত নেতা ও প্রাক্তন সাংসদ লক্ষণ শেঠের পূর্ব মেদিনীপুরে৷ তাতে উচ্চতর নেতৃত্বের বিরুদ্ধে কথা বলার পাশাপাশি আরও গুরুতর অভিযোগ তোলা হয় যে, দলের একাংশ তলে তলে হাত মিলিয়েছে তৃণমূল কংগ্রেসের সঙ্গে৷

    এর পর সরাসরি রাজ্য সম্পাদকমন্ডলীর বৈঠকেই অভিযোগ তোলেন শমীক লাহিড়ি, নেপালদেব ভট্টাচার্যের মতো নেতারা৷ এবং অভিযোগ আনেন বামফ্রন্টের প্রাক্তন মন্ত্রী মানব মুখোপাধ্যায়৷ প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য, বামফ্রন্ট সভাপতি বিমান বসু এবং রাজ্য বিধানসভায় বামফ্রন্টের নেতা সূর্যকান্ত মিশ্রের বিরুদ্ধে৷ এদিকে বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য গত বিধানসভায় দলের বিপর্যয়ের পর যেমন দলীয় পদ থেকে অব্যাহতি চেয়েছিলেন, এবারও তাই করেছেন৷ কিন্তু যথারীতি তাঁর দায়িত্ব ছাড়ার ইচ্ছা দলীয় অনুমোদন পায়নি৷ অন্যদিকে বিমান বসুও লোকসভা ভোটে ফ্রন্টের খারাপ ফলাফলের দায় স্বীকার করেছেন৷ কিন্তু সমস্যা হচ্ছে, এসব সাংগঠনিক ছলাকলায় সাধারণ কর্মীদের আস্থা ফেরানো যাচ্ছে না৷ এমনকি যে নেতারা বর্তমান নেতৃত্বের যোগ্যতা নিয়ে প্রশ্ন তুলেছেন, তাদের আদৌ সেই নৈতিক বৈধতা আছে কিনা, সেই প্রশ্ন বরং উঠছে৷

    DW.DE

    ভারত

    বিজেপি পশ্চিমবঙ্গে দ্বিতীয় শক্তি!

    ভারতের পূর্বাঞ্চলীয় রাজ্য পশ্চিমবঙ্গ থেকে প্রায় নিশ্চিহ্ন হয়ে গেল বামফ্রন্ট আর ভোট বাড়িয়ে দ্বিতীয় রাজনৈতিক শক্তি হিসেবে উঠে এলো বিজেপি৷ অন্যদিকে সফল হয়েও দুশ্চিন্তায় থাকল তৃণমূল কংগ্রেস৷

    সারা ভারতে বিজেপিএবং নরেন্দ্র মোদীর পক্ষে জনসমর্থনের যে হাওয়া, পশ্চিমবঙ্গেও তার ঝাপটা এসে পৌঁছাল৷ যদিও এবারের লোকসভা ভোটে পশ্চিমবঙ্গের ৪২টি আসনের মধ্যে দুটিতে জিতেছে বিজেপি, যা গত লোকসভা ভোটের থেকে একটি আসন বেশি৷ কিন্তু এ রাজ্যে বিজেপির ভোট বেড়েছে ১১ শতাংশ এবং বেশ কিছু কেন্দ্রে দ্বিতীয় রাজনৈতিক শক্তি হিসেবে তাদের উত্থান হয়েছে, যা ২০১৬ সালে পশ্চিমবঙ্গে নির্ধারিত বিধানসভা নির্বাচনের জন্য নিশ্চিতভাবেই গুরুত্বপূর্ণ হয়ে উঠতে চলেছে৷ বিশেষ করে যখন কেন্দ্রে একক সংখ্যাগরিষ্ঠতা নিয়ে ক্ষমতায় থাকবে নরেন্দ্র মোদীর নেতৃত্বে বিজেপি সরকার৷ অথচ এই নরেন্দ্র মোদীকেই কিছুদিন আগে কোমরে দড়ি দিয়ে ঘোরানোর হুমকি দিয়েছিলেন তৃণমূল নেত্রী ও রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৷

    একক শক্তিতে তৃণমূল কংগ্রেসঅবশ্য ভালো ফল করেছে পশ্চিমবঙ্গে৷ ২০০৯ সালের লোকসভা ভোটে ২৭টি আসনে প্রার্থী দিয়ে ১৯টিতে জিতেছিল তৃণমূল৷

    • Bildergalerie Indien Wahlen 30.04.2014

    • একজন নরেন্দ্র মোদী

    • চা ওয়ালা

    • ১৯৫০ সালে গুজরাটের নিম্নবিত্ত এক ঘাঞ্চি পরিবারে জন্ম নেয়া নরেন্দ্র মোদী কৈশরে বাবাকে সাহায্য করতে রেল ক্যান্টিনে চা বিক্রি করেছেন৷ ঘাঞ্চি সম্প্রদায়ের রীতি অনুযায়ী ১৭ বছর বয়সে যশোদাবেন নামের এক বালিকার সঙ্গে তাঁর বিয়ে হয়, যদিও বেশিদিন সংসার করা হয়নি৷ ছাত্র হিসেবে সাদামাটা হলেও মোদী বিতর্কে ছিলেন ওস্তাদ৷ ১৯৭১ সালে রাষ্ট্রীয় স্বয়ংসেবক সংঘ বা আরএসএস-এর প্রচারক হিসাবে রাজনীতির দরজায় পা রাখেন মোদী৷

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    এবার মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৪২টি আসনের সবকটিতেই প্রার্থী দিয়েছিলেন৷ মুখে ৪২টি আসনে জেতার কথা বললেও, অধিকাংশ আসনেই বামফ্রন্ট, কংগ্রেস এবং বিজেপির সঙ্গে চতুর্মুখী লড়াইয়ে ৩৬ থেকে ৩৮টির বেশি আসনে জেতার আশা মমতা করছিলেন না৷ সেখানে ৩৪টি আসন জিতেছে তৃণমূল এবং রায়গঞ্জ লোকসভা কেন্দ্রে কংগ্রেসের ভোট কেটে বামফ্রন্ট প্রার্থী মহম্মদ সেলিমের জয়ের সম্ভাবনা নিশ্চিত করেছেন৷ হার হয়েছে কংগ্রেস প্রার্থী, কট্টর মমতা-বিরোধী বলে পরিচিত দীপা দাসমুন্সির৷

    তৃণমূল কংগ্রেসের বিরুদ্ধে, তাঁদের নেতাদের বিরুদ্ধে সম্মিলিত কুৎসা সত্ত্বেও মানুষের অকুণ্ঠ সমর্থন পেয়েছেন বলে ধন্যবাদ জানিয়েছেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৷ এই বিজয়কে মানুষের প্রতি উৎসর্গ করেছেন তিনি৷ প্রসঙ্গত সংবাদমাধ্যমকে দুষেছেন তৃণমূল নেত্রী, তাঁদের বিরুদ্ধে একজোটে, একতরফা প্রচার চালানোর জন্য৷ বিজেপির প্রচারে কোটি কোটি টাকা খরচের দিকে ইঙ্গিত করে মমতা প্রশ্ন তুলেছেন, মূল্যবোধের রাজনীতির যুগ কি তা হলে শেষ হয়ে গেল? এবার কি পয়সা ছড়িয়ে প্রচার করেই ভোট কেনা হবে!

    অন্যদিকে বিজেপির রাজ্য সভাপতি রাহুল সিনহা বলেছেন, শাসকদল তৃণমূল যেরকম ব্যাপক হারে রিগিং করে, সন্ত্রাস ছড়িয়ে ভোট করল পশ্চিমবঙ্গে, তা তাঁদের কাছেও এক জরুরি শিক্ষা হয়ে থাকল৷ ২০১৬ সালে বিধানসভা ভোটের সময় এই শিক্ষা তাঁরা মনে রাখবেন৷ আসানসোল লোকসভা কেন্দ্র থেকে ৭৪ হাজার ভোটে জেতা বিজেপির প্রার্থী বাবুল সুপ্রিয়-ও একই অভিযোগ এনেছেন শাসকদলের বিরুদ্ধে৷ দক্ষিণ কলকাতা কেন্দ্রে বিজেপি নেতা তথাগত রায় জিততে না পারলেও পশ্চিমবঙ্গে তাঁদের দলের ভোটের হার বৃদ্ধির জন্য ভোটারদের অভিনন্দন জানিয়ে ইঙ্গিত দিয়েছেন, এ রাজ্যে বিজেপির কাছে পাখির চোখ এখন পরের বিধানসভা নির্বাচন৷

    আগের লোকসভা ভোটে জাতীয় কংগ্রেস জিতেছিল পশ্চিমবঙ্গের ছয়টি আসনে৷ এবার তারা জিতেছে চারটি আসনে৷ বহরমপুরে অধীর চৌধুরী, মালদা উত্তরে মৌসম বেনজির নুর, মালদা দক্ষিণে আবু হাসেম খান চৌধুরি, এবং জঙ্গিপুরে ভারতের রাষ্ট্রপতি প্রণব মুখোপাধ্যায়ের পুত্র অভিজিৎ মুখোপাধ্যায়৷

    পশ্চিমবঙ্গের ৪২টি আসনের মধ্যে দুটিতে জিতেছে বিজেপি

    বাকি দেশে কংগ্রেসের নির্বাচনি ভরাডুবির মধ্যে বরং পশ্চিমবঙ্গেই তাদের ফল কিছুটা ভালো৷ এর মধ্যে অধীর চৌধুরী রাজ্যের সমস্ত বিজয়ী প্রার্থীদের মধ্যে সবথেকে বেশি ব্যবধানে জিতেছেন৷ অধীর এদিন বলেছেন, এই রাজ্যে এতদিন রাজনীতি হতো দ্বিমুখী, বামপন্থি এবং অবামপন্থিদের মধ্যে৷ এবার এই লড়াইটা বহুমুখী হয়ে গেল৷

    তবে এই লোকসভা ভোটের পর পশ্চিমবঙ্গ থেকে প্রায় নিশ্চিহ্ন হয়ে গেল বামফ্রন্ট৷ গত লোকসভা ভোটে ১৫টি আসনে জিতেছিলেন বাম প্রার্থীরা৷ সেখানে এবার অন্তত ছয়টি আসন বামেরা দখলে রাখতে পারবে বলে প্রাক-নির্বাচনি জনমত সমীক্ষায় মনে হয়েছিল৷ কিন্তু বামেদের হাতে এসেছে মাত্র দুটি আসন৷ তার মধ্যেও রায়গঞ্জে কংগ্রেসের ভোটে তৃণমূল ভাগ বসানোয় ও সংখ্যালঘু ভোটের কারণে মহম্মদ সেলিম জিততে পেরেছেন, তাও অতি সামান্য ব্যবধানে৷

    তবে বিজেপি-বিরোধী লড়াইয়ে রাজ্যের সংখ্যালঘু ভোটের বেশিটাই সম্ভবত গিয়েছে তৃণমূলের পক্ষে৷ ৩৪টি আসনে নিশ্চিন্ত জয়ের সেটা একটা বড় কারণ হতে পারে৷ অন্যদিকে তফশিলি, উপজাতি ও অন্যান্য অনুন্নত শ্রেণির ভোটের এক বড় অংশ সম্ভবত টেনে নিয়েছে বিজেপি, যা কার্যত বাম ভোটব্যাংকে ধস নামিয়েছে৷

    মাওবাদী অঞ্চলে ভোটের হার বৃদ্ধি কিসের ইঙ্গিত?

    ভারতে এবারের নির্বাচনের সবথেকে আশাব্যঞ্জক দিক হলো, মাওবাদী এলাকাগুলিতে ভোটের হার উল্লেখযোগ্যভাবে বেড়েছে৷ তাতে এটাই সূচিত হচ্ছে মাওবাদীদের বজ্রমুষ্টি ক্রমশই ঢিলে হচ্ছে৷

     Indien Wahlen in Kashmir

    ভারতের সাতটি রাজ্য ছত্তিশগড়, ঝাড়খন্ড, মহারাষ্ট্র, বিহার, অন্ধ্রপ্রদেশ, ওড়িষা এবং পশ্চিমবঙ্গ মাওবাদীদের শক্ত ঘাঁটি৷ প্রতিবার নির্বাচনের আগে মাওবাদীদের ভোট বয়কটের ডাকে আদিবাসী ও উপজাতি জনগোষ্ঠী সাড়া দিতে বাধ্য হত ভয়ে এবং আতঙ্কে৷ কিন্তু ২০১৪ সালের সাধারণ নির্বাচনে ভোটদানের অষ্টম পর্বে ৫০২টি আসনের ভোটের পর দেখা গেছে মাওবাদী জঙ্গিদের রক্তচক্ষু এবং ভোট বয়কটের ডাক অগ্রাহ্য করে ৬২ শতাংশ ভোট পড়েছে ঐসব অঞ্চলে৷ গত ২০০৯ সালের সাধারণ নির্বাচনে এই হার ছিল ৪৭ শতাংশের মত৷

    মাওবাদী গেরিলা বাহিনীর নিয়ন্ত্রিত ক্ষেত্র বলে পরিচিত মহারাষ্ট্রের গডচিরোলী এবং দন্ডকারণ্য স্পেশাল জোন কমিটি নিয়ন্ত্রিত এলাকায় ভোট পড়ে ৬৯ শতাংশের মত৷ ২০০৯ সালের নির্বাচনে এই হার ছিল বেশ কম৷ উল্লেখ্য, দন্ডকারণ্য ঘন জঙ্গল ঘেরা এক দুর্গম ভূখন্ড৷ ছত্তিশগড়, ওড়িষা, মহারাষ্ট্র ও অন্ধ্রপ্রদেশ এই চারটি রাজ্য জুড়ে এই ভূখন্ড বিস্তৃত৷

    Wahl in Indien 2009

    গত ২০০৯ সালের সাধারণ নির্বাচনে এই হার ছিল ৪৭ শতাংশের মত

    অনুরূপভাবে বিহারের জামুই ও মুঙ্গের সংসদীয় আসনগুলিতে ভোটের হার বেড়েছে ১০ শতাংশ৷ ওড়িষার মালকানগিরিতে অবশ্য এই হার কিছুটা কম৷

    ছত্তিশগড়ের বস্তার অঞ্চল মাওবাদীদের দুর্ভেদ্য গড়৷ গত ১০ এপ্রিল সেখানকার আদিবাসীদের মধ্যে ভোট দেবার প্রবণতা বেড়ে যাওয়ায় কপালে চিন্তার ভাঁজ পড়েছে মাওবাদীদের৷ এর কারণ খুঁজতে আদিবাসী এবং উপজাতি প্রতিনিধিদের ডেকে বিভিন্ন জায়গায় গোপন মিটিং করেছে মাওবাদীরা৷

    পশ্চিমবঙ্গের মাওবাদী অধ্যুষিতপশ্চিম মেদিনীপুর, পুরুলিয়া, বাঁকুড়ার জঙ্গলমহলে ৭ মে পর্যন্ত চতুর্থ দফার ভোট পর্বে ভোটের হার ছিল যথাক্রমে ৮১.৪১, ৭৮.৭৫ ও ৮০.৫৫ শতাংশ৷ আর ঝাড়গ্রামের মাওবাদী এলাকায় ভোট পড়ে ৮৮ শতাংশের মত৷

    সমাজবিজ্ঞানীদের মতে, আপাত কারণ হলো, আদিবাসী ও উপজাতি জনগোষ্ঠী এতদিন সুদিনের আশায় মাওবাদীর ওপর আস্থা রেখেছিল৷ কিন্তু দীর্ঘদিন ধরে হিংসা, রক্তপাত এবং আতঙ্কের আবহে থাকতে থাকতে তাঁরা ক্লান্ত ও হতাশ৷ এর পরিবর্তনে তাঁরা মরিয়া৷ উন্নয়নের জন্য, শান্তি ও নিরাপত্তার জন্য দিন বদলের আশায় তাঁরা চাতক পাখির মত তৃষ্ণার্ত৷

    • ভারতের নির্বাচন ২০১৪

    • জনগণের সরকার

    • ভারতের সংসদের মেয়াদ পাঁচ বছর৷ পার্লামেন্টে দুটি কক্ষ রয়েছে৷ উচ্চকক্ষকে বলা হয় রাজ্যসভা আর নিম্নকক্ষ লোকসভা হিসেবে পরিচিত৷ নিম্নকক্ষে যে দল বা জোট সংখ্যাগরিষ্ঠতা পায় তারাই দেশের পরবর্তী প্রধানমন্ত্রী নির্বাচন করে৷

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    সম্প্রতি ডয়চে ভেলে মাওবাদী ঘাঁটি জঙ্গলমহল সফরে গিয়ে এটাই দেখেছে, সেখানকার গরিব, নিরন্ন আদিবাসী পরিবারগুলো কীভাবে সুদিনের আশায় ছটফট করছে৷ শুনে এসেছে মাওবাদীদের হাতে কীভাবে দিনের পর দিন অত্যাচারিত হয়েছে৷ কীভাবে রক্ষকরাই হয়েছে ভক্ষক৷

    প্রান্তিক আদিবাসী গ্রামগুলির জওয়ান ছেলেদের টাকা আর ক্ষমতার লোভ দেখিয়ে নিয়ে গিয়ে গেরিলা ট্রেনিং দিয়ে ক্যাডার বানিয়েছে মাওবাদী নেতারা৷ তোলা আদায় করেছে গরিব মানুষদের কাছে৷ দিতে না পারলে উনুন জ্বালানো বন্ধ আর অরন্ধনের আদেশ দিয়েছে৷ পুলিশের চর সন্দেহে ঘর থেকে তুলে নিয়ে গিয়ে খুন করে রাস্তার পাশে ফেলে রেখে গেছে লাশ৷ জ্বালিয়ে দিয়েছে আদিবাসীদের ঘর আর সরকারি প্রাথমিক স্কুল৷ নিরাপত্তা বাহিনীকে আটকাতে রাস্তাঘাট কেটে মাইন পুঁতে রাখে৷ আধা সামরিক বাহিনীর হাতে মাওবাদীদের শীর্ষ নেতারা নিহত বা ধরা পড়ার পর তাঁরা এখন বুক ভরে নিঃশ্বাস নিতে পারছে৷ নিরাপত্তাবোধ কিছুটা ফিরে এসেছে৷ স্বাধীনভাবে চলাফেরা করতে পারছে৷ দু টাকা কিলো দরে নিয়মিত চাল পাচ্ছে৷ ঘর তোলার জন্য সাহায্য পাচ্ছে৷ তাই ভোটে তাঁদের উৎসাহ বেড়েছে৷ এটাকে টিকিয়ে রাখতে হলে নতুন সরকারের উচিত নিরাপত্তার পাশাপাশি সর্বাত্মক উন্নয়নে গতি আনা৷

    DW.DE

    ভারতের নির্বাচন ২০১৪

    ভারতে ১৬তম লোকসভা নির্বাচন অনুষ্ঠিত হচ্ছে৷ ৭ এপ্রিল থেকে ভোট গ্রহণ শুরু হয়েছে৷ চলবে ১২ মে পর্যন্ত৷ ভোট গণনা হবে ১৬ মে৷ ৮০ কোটি ভোটার এই নির্বাচনে অংশ নিচ্ছেন৷ (21.04.2014)

    আসামে বড়োভূমি সহিংসতার জন্য দায়ী কে?

    আসামের বড়োভূমিতে গণহত্যার জন্য প্রকৃত অপরাধী কে বা কারা, নাগরিক সমাজের চাপে তার আসল কারণ খুঁজতে নেমে পড়েছে জাতীয় তদন্ত সংস্থা এনআইএ৷ বড়োভূমিতে বর্তমান গোষ্ঠী সংঘর্ষে গত সোমবার পর্যন্ত মৃতের সংখ্যা দাঁড়িয়েছে ৩৪৷ (07.05.2014)

    ৪১ জন কোটিপতি, ২৬ জনের বিরুদ্ধে ফৌজদারি মামলা

    খুন বা খুনের চেষ্টা থেকে শুরু করে অপহরণ, মহিলাদের বিরুদ্ধে অপরাধ, কিছুই বাদ নেই৷ আবার জনসেবার বাসনা নিয়ে ভোটে দাঁড়িয়েছেন, এমন অনেকেই কোটিপতি! (11.05.2014)

    ভারতের নির্বাচন ২০১৪

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    Peoples Democracy

    Vol. XXXVIII No. 22

    June 01, 2014

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    Defend the Party, Left in West Bengal

    Prakash Karat

    THE brutal violence against the CPI(M) and the Left Front in West Bengal is continuing after the Lok Sabha elections. For about fifteen days after the polling ended on May 12, there have been widespread attacks targeting the CPI(M) workers and Left Front supporters in various districts. A report of such attacks is published in this issue of People's Democracy. In the post-poll violence, so far three CPI(M) workers have been killed, more than a thousand Left Front supporters were injured in the attacks, and several hundreds have been forced to leave their villages and homes by the violence unleashed by the TMC goons.

    These are not some sporadic clashes or acts of violence in the aftermath of the elections. These are planned and targeted attacks on the grassroots level party cadres and supporters who stood firmly for the Left Front, worked in the elections and mobilised people to support and vote for Left Front candidates. Even ordinary people who identified and voted for the CPI(M) or the Left Front were targeted in this terror campaign.

    What is being witnessed is the planned and diabolic attempt by the Trinamool Congress to eliminate the CPI(M) as an organisation and to suppress the Left Front by repression and violence. In this effort, the police and the administration are being utilised to play a partisan role. Thousands of false cases have been foisted on those attacked while the attackers go free.

    This pattern of attacks began in some areas after the panchayat elections in 2008. It assumed statewide proportions after the Lok Sabha elections in 2009. Between then and the assembly elections in May 2011, 388 men and women were killed by the TMC gangs. After an election, the TMC identifies the areas where the CPI(M) and the Left Front has retained mass support and their cadres have worked among the people. They are targeted for further attacks to eliminate the organisation. By this they aim to suppress the organised movement of the workers, peasants and the working people.

    In the weeks following the May 2011 assembly elections, 30 Left Front leaders and workers were killed, of these 28 were from the CPI(M) and two from the RSP. Further, 23 women were raped and 508 molested; 3,785 persons were injured and had to be hospitalised; 40,000 people had to leave their homes. The drive to eliminate the CPI(M) and the Left Front saw 758 offices of the party, trade unions and mass organisations captured.

    The pattern was repeated after the panchayat elections in July 2013 --- 24 CPI(M) cadres and supporters were killed between June 3 and July 25. In the present bout of violence directed against the CPI(M) and the Left Front after the Lok Sabha elections, the pattern is the same. Party offices are being attacked, damaged and destroyed. Those who dared to stand up to the TMC threats and worked for the Left Front candidates are being punished with physical attacks and even murdered.

    Among the three who have died in this round of violence, a 65-year old woman, Bela Dey, got serious injuries trying to protect her two sons who had worked as CPI(M) volunteers in the elections in Nadia district. She later died. Another CPI(M) worker, Kajal Mallick, was beaten to death in Manteswar of Burdwan district. The third killing was of Ashmira Begum. She was a former CPI(M) elected panchayat member who had courageously defied the TMC threats and mobilised people to vote in a village in Ketugram in Burdwan district. She was stabbed to death when the TMC goons attacked her house. With these three deaths, the number of cadres and supporters who were killed since the Assembly elections in May 2011 has reached 157.

    Thousands of cadres and supporters like Ashimira Begum had campaigned for the CPI(M) and the Left Front courageously defying the threats and intimidation of the TMC goons. It is these valiant comrades who are being subjected to attack and their means of livelihood being destroyed. Another type of attack is on the livelihood of CPI(M) and Left activists. In some places, they are prevented from going to work in the unorganised sector. In many places, the peasants and agricultural workers are forcibly stopped from working in the fields. In other instances, their shops and establishments have been looted or damaged.

    What is being experienced in West Bengal is not only a wholesale attack on democracy but a concerted fascistic attempt to suppress the CPI(M) and the Left Front by systematic violence and terror. The brunt of this violence is borne by the working people who have stood with the party and the Red Flag – the rural poor, agricultural workers, adivasis and women.

    The paramount task today is to defend the party and protect its cadres and supporters. The state and central leadership have to urgently take steps in this direction. It is essential to mobilise the people and build resistance against these attacks on democracy. This is not a battle of the CPI(M) and the Left in West Bengal but of the entire party and the Left movement of the country. All the democratic forces in the country must be rallied to express solidarity and support for the struggle against these fascistic attacks.

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    क्या हम लता मंगेशकर की भी नहीं सुनेंगे?

    তবে কি আমরা লতা মঙ্গেশকরকে ও শুনব না?


    वह जीवन संगीत बाजार ने खत्म कर दिया है।किंवदंती लता मंगेशकर को ही लीजिये,जरुरी नहीं कि वे सारे लोग जो मौदी के कट्टर समर्थक हैं,वे मुक्त बाजार के महाविनाश कार्यक्रम के भी समर्थक होंगे!


    पलाश विश्वास

    বিয়ে করে আবেগে ভাসলে চলবে না

    নতুন গায়িকাদের প্রতি পরামর্শ আশা ভোঁশলে-র। কারণ সময় পাল্টেছে। 'সারেগামাপা'র শ্যুটিংয়ের জন্য খুব মন দিয়ে প্রসাধন সারতে সারতে আজকের গান নিয়ে বলছিলেন অনেক কথা। পার্পল মুভি টাউনে তাঁর মুখোমুখি স্রবন্তী বন্দ্যোপাধ্যায়।


    কম্পিউটারের ওপর আপনার এত রাগ?

    শুনুন, যখন থেকে এই যন্ত্রটা আমার, আপনার জীবনের মধ্যে ঢুকেছে, তখন থেকে মানুষের ভাবনা, কিছু সৃষ্টি করার ইচ্ছে সবই বন্ধ হয়ে গেছে। না কোনও কবিতা লেখা হচ্ছে, না ভাল গান তৈরি হচ্ছে, না কলম থেকে শব্দ ঝরছে! এই যে আগামী প্রজন্ম, তারা আর কিচ্ছু করবে না। মিলিয়ে নেবেন আমার কথা। শুধুমাত্র কম্পিউটারের সঙ্গে জীবন কাটিয়ে দেবে এরা। আপনাকে যদি জিজ্ঞেস করা হয় আপনার ফোন নাম্বার কী? আপনি হোঁচট খাবেন। কারণ ওটা আপনার ফোনে আছে। আমাদের মস্তিষ্ক কাজ করা বন্ধ করে দিয়েছে। শুধু কম্পিউটারের ইশারায় আমরা উঠি বসি। বাচ্চারা মাঠের গন্ধই চিনল না। খেলছে তো কেবল কম্পিউটার। নামতা শিখছে কম্পিউটারে। ওদের কল্পনাশক্তিকে তো আমরাই মেরে ফেলছি।


    http://www.anandabazar.com/supplementary/anandaplus


    लता मंगेशकर ने कहा हैः

    सुनिये, जबसे इस यंत्र(कंप्यूटर) का प्रवेश हुआ है हमारे आपके जीवन में,तब से मनुष्य की भावना,उसकी सृजन की इच्छा की मौत हो गयी है। न कोई कविता लिखी जा रही है और न कोई अच्छा गीत तैयार हो रहा है।कलम से शब्दों का झरना बंद है।भावी पीढि़यां अब कुछ भी नहीं करेंगी।आप मेरी चेतावनी याद रखे और उसे भविष्य में परख भी लें।अगली पीढ़ियां सिर्प कंप्यूटर के साथ जीवन बिता देंगी।आपसे मैं आपका फोन नंबर मांग लूं तो आप दुविधा में पड़ जायेंगे।क्योंकि वह आपको याद है ही नहीं,वह तो आपके फोन में दर्ज है।हमारे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है।हम सिर्फ कंप्यूटर के इशारे पर उठ बैठ करते रहते हैं।बच्चोे खुले मैदान की गंध से अनजान हैं।हमने उनकी कल्पनाशक्ति की हत्या कर दी है।


    साभार आनंद बाजार पत्रिका


    अखबार तो खूब पढ़ना होता है,लेकिन आजकल टीवी देखना नहीं होता।सविता को खास तरह की एलर्जी है।जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे,तो राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संक्रमणकाल के उस संक्रामक दौर में वह प्रधानमंत्री का चेहरा देखना नहीं चाहती थीं और चूंकि किराये के घर में अलग अलग टीवी सेट रखना संभव होता नहीं है,तब हम समाचार नहीं देखते थे।लोकसभा चुनावों में नमोमय भारत निर्माण के मध्य ही आक्रामक धर्मोन्मादी कारपोरेट सरकार के जनादेश सुनिश्चित बताकर सविता ने फिर चेतावनी दे दी थी कि अब फिर समाचार चैनलों का बायकाट है।


    गनीमत है कि इस वक्त हम आनलाइन हैं और समाचार देखने जानने के लिए टीवी पर निर्भर नहीं हैं।रियल टाइम मीडिया फेसबुक ट्विटर से हर पल समाचार ब्रेक होता रहता है किसी भी टीवी अखबार से ज्यादा तेजी से।


    सविता मजे में एनीमल प्लानेट,डिस्कवरी देखती रहती है।


    लेकिन घटनाओं और दुर्घटनाओं,सामाजिक सांस्कृतिक संक्रमण,अर्थव्यवस्था,राजनीति और इतिहास के शिकंजे में हम फंसे हैं तो मुंह चुराकर उनके सर्वव्यापी असर से बच नहीं सकते हम।


    अखबार पढ़े या नहीं,दसों दिशाओं में जो लबालब खून की नदियां हैं,जो ज्वालामुखी जमीन के अंदर दफन है और जो जल सुनामियां हमारे इंतजार में हैं,घात लगाये मौत की तरह हमें घेरे हुए हैं।


    बंगाल में दीदी ने पर्वतारोही छंदा गायेन को लाने के लिए नेपाल तक जाने का वायदा किया था,दरअसल बिना आक्सीजन,बिना भोजन आठ हजार मीटर के उस तुषार आंधी मध्य जीवित बचने की कोई चामत्कारिक संभावना भी नहीं बचती।


    नेपाल सरकार ने तीन दिन बीतते न बीतते मृत्यु प्रमामपत्र परिजनों को थमा दिया लेकिन सारा बंगाल छंदा की वापसी के इंतजार में है,ठीक उसीतरह जैसे धर्मोन्मादी हिंदू करपोरेटराज का सिलसिलेवार समर्थन धर्मनिरपेक्षता के नाम करते हुए जनविश्वासघाती पाखंडी वाम अब भी विचारधारा की जुगाली करते हुए जनांदलनों की हत्या करने के बाद खोये हुए जनाधार की वापसी में लगा है।



    हम आत्मवंचना के चकाचौंधी कार्निवाल में कबंधों के जुलूस में शामिल विष्ण खरे जी के शब्दों में आत्ममुग्ध अमानवीयजंबो हैं जो मानवीय संवेदना से कोई रिश्ता रखता ही नहीं है।


    बांग्ला के बड़े अखबार में आज देश में सबसे बड़ी सेलिब्रिटी मोदी समर्थक जीवित किंवदंती सुरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर जी का साक्षात्कार पढ़कर लहूलुहान हूं।


    जो उन्होंने बताया है,वह हमारे रोजमर्रे का अनुभव है।


    चालीस सालों की पत्रकारिता में हम सूचनाओं को शायद ही कभी भूले हों।


    बिना नोट लिये, बिना रिकार्ड किये हमने बेहद तकनीकी,बेहद जटिल दो दो पेज के साक्षात्कार कंप्यूटर विप्लव से पहले यूं ही करते रहे हैं और वीपी जैसे धुरंधरों को बिना कलम दिखाये परेशान करते रहे हैं कि आखिर हम लिख क्या रहे हैं।


    कभी गलती नहीं हुई।


    लेकिन कंप्यूटर आते ही दिमाग ने काम करना आहिस्ते आहिस्ते बंद कर दिया है।


    तकनीकी सावधानी बरतने के बवजूद मामूली सी तकनीकी त्रूटि की वजह से भारी सी भारी छूट निकल जाती है।


    चाहकर भी सृजनधर्मी लिखा नहीं जाता।


    हरे जख्म के बावजूद भरे बाजार में आह तक करने की इजाजत नहीं है।


    लता जी ने इस साक्षात्कार में हैरतअंगेज तरीके से मुक्त बाजार की धज्जियां बिखेर दी हैं।आधुनिक संगीत चर्चा की पद्धति और विज्ञापनी सेलिब्रेटी निर्माण प्रक्रिया पर प्रत्याघत करते हुए।


    लता जी  के मुताबिक आधुनिक संगीत में जीवन यापन का अनुभव सिरे से लापता है और सारे गीत आइटम संगीत है।


    लता जी  के मुताबिक अलग अलग ट्रैक पर डुयेट गाया जाता है प्राणहीन।रिद्म शोरशराबा है लेकिन सुर नहीं है।


    लता जी  के मुताबिक जीवन से सरगम गायब हो गया है।


    मुक्त बाजार का अरुंधती लहजे में उल्लेख नहीं किया है लता दीदी ने,लेकिन मुक्त बाजार बंदबस्त की कारुणिक उपस्थिति को हर पंक्ति में वेदनामयअभिव्यक्ति दी है।


    लता जी आज के किसी गायक गायिका का नाम नहीं ले सकतीं।


    लता जी  आज का कोई गीत याद नहीं कर सकतीं।


    लता जी  के मुताबिक गीत संगीत सिर्फ वह नहीं है जो रियेलिटी शो में है या फिल्मों सीरियल में है।वह जीवन संगीत बाजार ने खत्म कर दिया है।


    लता जी  के मुताबिक सरगम सिरे से लापता है।


    अरसे बाद शास्त्रीय सगीत के व्याकरण और अनुशासन पर बोलते हुए लता दीदी ने बेहद दर्दभरे शब्दों में कह दिया कि हम अब एक अदद कंप्यूटर या मोबाइल पर निर्भर हैं और हम इतने ज्यादा तकनीक निर्भर हैं कि हमारी स्मृति नहीं है कोई।ह


    लता जी  के मुताबिक हम अपना फोन नंबर तक मोबाइल से चेक करते हैं।


    लता जी  के मुताबिक सारी सृजनशीलता रचनाधर्मिता ग्रैफिकल चकाचौंध है। प्राणहीन चामत्कारिक।


    लता जी  के मुताबिक मौलिकता गायब है।रेडीमेड हेराफेरी है यह तकनीकी दक्षता।


    इस इंटरव्यू के आलोक में मुझे बहुत कुछ नये सिरे से सोचना पड़ रहा है।


    जैसे कि जो आस्थावान लोग धर्मोन्मादी हिंदुत्व के नाम पर नमोमय भारत के निर्माण में शरीक हैं,वे सारे लोग लतादीदी की तरह ही मुक्त बाजार से समामाजिक सांस्कृतिक कायाकल्प के फक्षधर हों,यह जरुरी भी नहीं है क्योंकि मुक्तबाजारी आखेट से वे अपने प्रियतम को खो रहे हैं हर पल।


    सिर्फ खोने का वह अहसास नहीं है।


    मोबाइल,टीवी, एसी,कंप्यूटर, इंटरनेट के जाल में फंसे हमें अपनी देह की सुध बुध नहीं है और न हमें मन की थाह है।


    हम सिरे से असामाजिक असांस्कृतिक हैं और अराजक भी हैं।


    लता जी अद्वितीय संगीत शिल्पी हैं और उन्हें उनके सुदीर्घ अभिज्ञता,सुर और सरगम के प्रति आजीवन कुमारी प्रतिबद्धता ने सत्य का साक्षात्कार करना सिखाया है।


    लता मंगेशकर का यह साक्षात्कार तब आया है जब अमेरिका में मोदी विरोधी संगीत शिल्पी शुभा मुद्गल को बजरंगियों का पराक्रम दरशन करना पड़ा और देश भर में सामाजिक सांस्कृतिक जीवन में स्त्री पुरुष साहचार्य और सहअस्तित्व, हिंदू मुसलिम भाईचारा अद्भुत वर्चस्वी दंगाई बलात्कारी संस्कृति में समाहित है ।


    ऐसे चरम संक्रमणकाल में  लता जी के इस वक्तव्य का नोट अवश्य लिया जाना चाहिए कि अब कोई कविता नहीं लिखी जायेगी और न कोई सुरबद्ध सरगमी गीत गाया जायेगा।


    मुक्त बाजार के आतंकवादी परिदृश्य का इससे हृदय विदारक अभूतपूर्व विस्फोट हमने कहीं नहीं देखा।


    मुझे संगीत अच्छा लगता है।


    बिहु से मुझे ऩई ऊर्जा मिलती है और लोकधुनों में अपनी जमीन पर होने का अहसास जगता है।लेकिन मैं बेहद बेसुरा हूं।एक पंक्ति गा नहीं सकता।अलग अलग स्वर पहचान नहीं सकता।बमुश्किल लता, आशा ,संध्या, बेगम अख्तर,केएल सहगल,मोहम्मद रफी मन्ना डे,किशोर कुमार जैसे चुनिंदा संगीतशिल्पियों की आवाज पहचान लेता हूं।अलका,श्रेया या सुनिधि को अलग अलग पहचान नहीं पाता।इस नाकाबिलियत के बावजूद सुर ताल में होना अच्छा सुहाना लगता है और सुर ताल कटने का अंदाजा हो ही जाता है।


    भारत निर्माण और कारपोरेट जीवन यापन में जो सुरतालछंद का यह विपर्यय है,बेशक इसे लता मंगेशकर ही हम सबसे बेहतर महसूस और अभिव्यक्त कर सकती हैं। लेकिन क्या हमें इसका तनिक अंदाजा भी नहीं होनी चाहिए?


    मेरी पत्नी सविता ने मेरी मां की तरह मेरे गांव में सीमाबद्ध जीवन नहीं बिताया है। लेकिन वह जहां रहती है,उस इलाके से उतना ही प्यार है उसे,जितना कि मेरी मां को मेरे गांव से था।


    हम कोलकाता में 1991 में आये और 1995 में सविता की ओपन हर्ट सर्जरी हो गयी।अनजान इलाके के अनजान अनात्मीय लोगों ने तब उसे खून दिया,यह किसी भी कीमत पर नहीं भूलती।


    खुद अस्वस्थ होने पर इलाके भर में किसी भी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए वह सबसे पहले भागती है।मौका हो तो अस्पताल से लाश लेकर श्मशान तक चली जाती है।


    फिरभी वह समाज सेवी नहीं है और न प्रतिबद्धता का कोई पाखंड है उसमें।


    वह अपने हिसाब से कर्ज निपटा रही है।


    अब तो हमारे इलाके में पंद्रह बीस लाख का कट्टा है लेकिन जब आस पास दो दो हजार का कट्ठा था तब भी अपनी रिहाइश बदलने का विकल्प उसने उसी तरह ठुकरा दिया जिस तरह उसकी जिद की वजह से मैं बार बार बेहतर  विकल्प मिलने के बावजूद जनसत्ता छोड़ नहीं सका क्योंकि जनसता और इंडियन एक्सप्रेस के सारे लोग हमेशा हमारा साथ देते रहे हैं।


    इस अपनापे के आगे उसे हर चीज बेकार लगती है।


    संजोग से वह भी शौकिया तौर पर सुर साधती है।स्थानीय महिलाओं के साथ सांस्कृतिक प्रयास में शामिल है।


    सविता हमारी नास्तिकता के विपरीत बेहद आस्तिक है।सारे देव देवियों को मानती है।लेकिन कर्म कांडी नहीं है।


    पर्व और त्योहारों पर गंगास्नान अवश्य करती है।रामकृष्ण मिशन के बेलुड़ मठ में जाती है लेकिन प्रवचन नहीं सुनती और न ही बाबा रामदेव के योगभ्यास में यकीन करती है और न ही आस्था,संस्कार वगैरह वगैरह चैनल देखती है।


    मैं स्वभाव व चरित्र से जितना अधार्मिक और नास्तिक हूं,वह उतनी ही धार्मिक और आस्थामयी है।लेकिन तंत्र जंत्र मंत्र में उसकी कोई आस्था नहीं है और न ही ज्योतिष में।


    हमने एक दूसरे पर अपने वितचार थोंपने के प्रयास नहीं किये और साथ साथ जीते इकतीस साल हो गये।


    स्वभाव से हिंदू और धार्मिक होने के बावजूद सविता लेकिन हिंदू राष्ट्र के विरोध में मुझसे ज्यादा कट्टर है।


    मैं तो नरेंद्र मोदी के वक्तव्य को ध्यान से सुनता पड़ता हूं और संघियों का रचा लिखा समझने की कोशिश करता हूं,लेकिन सविता सीधे बहिस्कार करती है।


    अर्थशास्त्र से वह एमए है लेकिन मुक्त बाजार के बारे में वह कुछ नहीं बोलती और अनार्थिक होने के बावजूद मुक्त बाजार का मैं लगातार मुखर विरोध कर रहा हूं।


    वह मुक्त बाजार के विरोध में बोलती कुछ नहीं है लेकिन कारपोरेट राज के पक्ष में वह भी नहीं है।


    हम धर्म निरपेक्षता के नाम पर उस जनता के जीवन यापन की घोर उपेक्षा कर रहे हैं जो मोदी समर्थक  होते हुए या न होते हुए प्रबल भाव से हिंदू हैं और कारपोरेट राज और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था,बाजारु संस्कृति के सख्त खिलाफ हैं।


    चूंकि हम खुद मुक्त बाजार और कारपोरेट राज के खिलाफ कोई जोखिम उठाकर खुद को संकट में डालना नहीं चाहते,बहुसंख्य जनगण को हम धर्मोन्मादी मानकर चल रहे हैं।


    संघ परिवार के साथ चल रहे और घनघोर मोदी समर्थक सारे लोग इस मुक्त बाजारी अर्थ व्यवस्था के समर्थक नहीं हैं और न ही इस राज्यतंत्र की तरह वे किसी अंबानी, टाटा, जिंदल, मित्तल, हिंदुजा, पास्को, वेदांत के गुलाम है।


    कंधमाल के बेजुबान अपढ़ आदिवासियों ने अपने प्रतिरोध से बार बार ऐसा बता दिया है,उन अजनबी स्वरों को हमने लगातार नजर्ंदाज किया है।


    क्या हम लता मंगेशकर की भी नहीं सुनेंगे?

    इसी सिलसिले मेरी एक पुरानी कविता फिर नये सिरे से पढ़ लेंः


    ई-अभिमन्यु


    पलाश विश्वास


    बच्चा अब खुले मैदान में नहीं भागता, भूमंडलीकरण के

    खुले बाजार में चारों तरफ सीमेंट का जंगल, फ्लाईओवर।

    स्वर्णिम चतुर्भुज सड़कें। आयातित कारें। शापिंग माल।

    सीमाहीन उपभोक्ता सामग्रियां। आदिगन्त कबाड़खाना,

    या युध्द विध्वस्त रेडियो एक्टिव रोगग्रस्त जनपद,

    बच्चे के लिए कहीं कोई मैदान नहीं है दौड़ने को।


    बच्चा किताबें नहीं पढ़ता, मगज नहीं मारता अक्षरों में।

    अक्षर की सेनाएं घायल, मरणासन्न। कर्णेद्रिंय भी

    हुए इलेक्ट्रानिक मोबाइल। वर्च्युअल पृथ्वी में

    यथार्थ का पाठ प्रतिबंधित है और एकान्त भी नहीं,

    चैनलों के सुपर सोनिक शोर में कैसे पढ़े कोई।


    बच्चा कोई सपना नहीं देखता, बस, कभी-कभी

    बन जाता वह हैरी पाटर, सुपरमैन स्पाइडरमैन,

    या फिर कृष। इंद्रधनुष कहीं नहीं खिलते इन दिनों

    हालांकि राजधानी में होने लगा है हिमपात,

    मरुस्थल में बाढ़ें प्रबल, तमाम समुन्दर सुनामी,

    रुपकथा की राजकन्याएं फैशन शो में मगन,


    नींद या भूख से परेशान नहीं होता बच्चा अब

    ब्राण्ड खाता है। पीता है ब्राण्ड जीता है ब्राण्ड॥

    ब्राण्ड पहनकर बच्चा अब कामयाब सुपर माडल।

    इस पृथ्वी में कहीं नहीं है बच्चों की किलकारियां,

    नन्हा फरिश्ता अब कहीं नहीं जनमता इन दिनों


    सुबह से शाम तलक तितलियों के डैने

    टूटने की मानिन्द बजती मोबाइल घंटियां

    पतझड़ जैसे उड़ते तमाम वेबसाइट

    मेरे चारों तरफ शेयर सूचकांक की बेइन्तहा

    छलांग, अखबारों के रंगीन पन्नों के बीच

    शुतुरमुर्ग की तरह सर छुपाये देखता रहता मैं,

    मशीन के यन्त्राश में होते उसके सारे

    अंग-प्रत्यंग। उसकी कोई मातृभाषा नहीं है,

    उसके होंठ फड़कते हैं, जिंगल गूँजता है।


    डरता हूं कि शायद किसी दिन बच्चा

    समाहित हो जाये किसी कम्प्यूटर में,

    या बन जाये महज रोबो कोई।

    सत्तर के दशक में विचारधारा में

    खपने का डर था। अब विचारधारा

    नहीं है। पार्टी है और पार्टीबध्द हैं बच्चे।


    इतिहास और भूगोल के दायरे से

    बाहर है बच्चा विरासत, परम्परा और

    संस्कारों से मुक्त अत्याधुनिक है बच्चा,

    क्विज में चाक चौबन्द बच्चा हमें

    नहीं पहचानता कतई। हम बेबस देखते

    हैं कि तैयार कार्यक्रमों के साफ्टवेअर

    से खेलता बच्चा चौबीसों घंटों,

    नकली कारें दौड़ाता है तेज, और तेज,

    लड़ता है नकली तरह-तरह के युध्द

    असली युध्दों से अनजान एकदम,


    एक गिलास पानी भरकर पीने

    की सक्रियता नहीं उसमें, भोजन की

    मेज पर बैठने की फुरसत कहाँ।

    चैटिंग के जरिये दुनियाभर में दोस्ती, पर

    एक भी दोस्त नहीं है उसका, उसके साथी

    बदल जाते हैं रोज-रोज, एकदम नाखुश,

    बेहद नाराज आत्मध्वंस में मगन बच्चा,

    उसके कमरे का दरवाजा बंद, खिड़कियां बंद,

    मन की खिड़कियां भी बंद हमेशा के लिए।


    शायद रोशनी से भी डरने लगा है बच्चा,

    सूरज का उगना, डूबना उसके लिए निहायत

    बेमतलब है इन दिनों, बेमतलब दिनचर्या,

    चाँद सितारे नहीं देखता बच्चा आज कल

    नदी, पहाड़, समुंदर आकर्षित नहीं करते।

    उसका सौंदर्यबोध चकाचौंध रोशनी

    और तेज ध्वनि में कैद है हमेशा के लिए।

    दिसम्बर 2006

    http://www.aksharparv.com/kavita.asp?Details=368



    इस अनुभव शेयरिंग के साथ देहात और कृषि जमीन पर प्रोमोटर बिल्ड राज के खलासे के लिए रोज सर्वत्र विज्ञापित आपरों में से एक आपसे शेयर करना चाहुंगा।


    Dear Sir,


    Hope you are doing well.


    I would request to you to take out your 2 minutes from your busy schedule for reading this message. It may be beneficial for you & amazing.


    Aravali Fantasia - the group endeavors to bring people back to nature. We believe in endless possibilities.

    We offer you "The Premium Farm Land" free from pollution and traffic still just few KMs. from Delhi & Gurgaon. The perfect place for you and your family to live in, the home in the lap of nature relived from the hustle and bustle.


    Points to Choose Aravali Fantasia: Because.

    1.       Development: Done 70-80%

    2.      Sizes: 1 Acre to 5 Acres (few small sizes also available)

    3.      Three Tier Securities with CCTV Cameras

    4.      33 t. Wide Cemented Roads

    5.      24x7 Power Backup & Water Supply

    6.      LED Street Lights

    7.      Cricket Ground with Night Vision Facilities

    8.      Children's Play Area

    9.      d Club House well-Equipped



    I hope you follow,

                        Seeing is believes.


    Project Location: Faridabad - Sohna Road, Faridabad

    Note: - Kindly let us know, if you are interested to see the location, facilities & more information so you are most welcome, you are free to check it.


    Kind Regards,


    Deepak Kumar


    Sales Manager


    বিয়ে করে আবেগে ভাসলে চলবে না

    নতুন গায়িকাদের প্রতি পরামর্শ আশা ভোঁশলে-র। কারণ সময় পাল্টেছে। 'সারেগামাপা'র শ্যুটিংয়ের জন্য খুব মন দিয়ে প্রসাধন সারতে সারতে আজকের গান নিয়ে বলছিলেন অনেক কথা। পার্পল মুভি টাউনে তাঁর মুখোমুখি স্রবন্তী বন্দ্যোপাধ্যায়।

    ৯ জুন, ২০১৪, ০০:০০:০০

    আত্মজীবনী লিখছেন? আমরা কবে পড়তে পারব?

    লেখা প্রায় শেষ। রোজই রাতে চেষ্টা করি লেখার। আশা করছি খুব তাড়াতাড়ি আপনাদের হাতে তুলে দিতে পারব বইটা।

    আজকের ফিল্ম ইন্ডাস্ট্রি, ফিল্ম মিউজিকের কথা আপনার লেখায় থাকবে?

    আজকের ফিল্ম মিউজিক বলে কিছু হয় না।

    কেন, এখনকার হিন্দি ছবি দেখেন না?

    নাহ্। আমার ইচ্ছেও করে না।

    হিন্দি ছবির গান বা কোনও অ্যালবামের গান কেমন লাগে?

    খুব খারাপ। না ভাল কোনও কথা আছে। না কোনও সুর মনে ধরে। আমাদের সঙ্গীতশাস্ত্র বলে ছেলেরা নীচের পর্দায় গাইবে। আর মেয়েরা উঁচু পর্দায়। সেখানেই তো শিল্পীর পারদশির্র্তা। আমাদের সময় তো আমরা উঁচু পর্দাতেই গাইতাম। রেওয়াজের জাদু তো সেখানেই ধরা পড়ত। এখন উল্টো। ছেলেরা চড়া গাইছে, মেয়েরা নীচে। কেন, মেয়েরা কি আজকাল চড়াতে গাইতে পারে না?

    এখন ডুয়েট গাওয়ার ক্ষেত্রেও কি ছেলে-মেয়ের গানের ফারাক বোঝা যায়?

    আমাদের সময় ডুয়েট গাওয়া একটা দারুণ ব্যাপার ছিল। এখন ডুয়েট গানও লোকে একা গায়। ট্র্যাক করা থাকে। শিল্পীরা যে যার সুবিধা মতো আলাদা আলাদা গান রেকর্ড করে। ডুয়েটের সেই প্যাশনটা গানে পাওয়া যায় না। আসলে ভাল গান গাইবার লোকেরই বড় অভাব।

    সে কী! ইন্ডাস্ট্রিতে এত লোক নাম করেছে!

    (থামিয়ে দিয়ে) দেখুন, নাম করা আর গান গাওয়া এক নয়। নাম তো যে কেউ, যে ভাবেই হোক করে ফেলে। ওটা কোনও কাজের কথা নয়। এখন সব আইটেম সং। শুধুই রিদম। গানে কোনও অনুভবও নেই। গানের কথা অন্তরকে নাড়া দিয়ে যায় না।

    এখনকার কোনও গানই আপনার পছন্দ হয় না?

    মাঝে সামান্য একটু বদল চোখে পড়েছিল। পাকিস্তানি সঙ্গীতশিল্পীরা গান গাইছিলেন। কথা ভাল হচ্ছিল। ওই যে 'যব সে তুনে দেখা হ্যায় সনম'বা 'তেরে নয়নো সে নয়না লাগে রে'শুনে ভেবেছিলাম আরও ভাল গান আসবে বুঝি। কিন্তু কই? এখন তো সব ধুম ধাড়াক্কার গান। নাচ আছে। সুর নেই। এখন মনেও হয় না সঙ্গীতের ক্ষেত্রে ভাল কিছু আর হবে!

    অরিজিত্‌ সিংহ-র গান শুনেছেন? উনি তো ভীষণ জনপ্রিয়...

    কে? নাহ্। অরিজিত্‌ সিংহ-র গান ঠিক মনে পড়ছে না। তবে হানি সিংহ-র নাম শুনেছি। গান যদিও শুনিনি। এ রকম প্রচুর নাম আসে। কিন্তু কেউ নিজস্ব গায়কি নিয়ে, ঘরানা নিয়ে অনেক দিন ধরে টিকে গিয়েছে, এমনটা তো দেখিনি।

    এখন তো শিল্পীদের ফিল্মের গানের নিরিখে রেটিং করা হয়। এটা কি ঠিক?

    এটা একদমই ভুল। ফিল্মে গান না গাইলে যে শিল্পী হবে না এমনটা আমি মনে করি না। নিজেদের গান গাইতে হবে। এইচ.এম.ভি যখন থেকে রেকর্ড করা বন্ধ করে দিল, মানুষের সিডি কেনা বা রেকর্ড শোনার আগ্রহই চলে গেল। তার পরে গানের চোদ্দোটা বাজিয়ে দিল আপনাদের এই কম্পিউটার। যে যেমন খুশি গান ডাউনলোড করছে, অ্যালবাম কপি করছে। আরে! শিল্পীদের কোনও সম্মানই নেই? সফটওয়্যার সুর, লয় বসিয়ে দিচ্ছে। কিন্তু বোধটা কেমন করে আনবে?

    কম্পিউটারের ওপর আপনার এত রাগ?

    শুনুন, যখন থেকে এই যন্ত্রটা আমার, আপনার জীবনের মধ্যে ঢুকেছে, তখন থেকে মানুষের ভাবনা, কিছু সৃষ্টি করার ইচ্ছে সবই বন্ধ হয়ে গেছে। না কোনও কবিতা লেখা হচ্ছে, না ভাল গান তৈরি হচ্ছে, না কলম থেকে শব্দ ঝরছে! এই যে আগামী প্রজন্ম, তারা আর কিচ্ছু করবে না। মিলিয়ে নেবেন আমার কথা। শুধুমাত্র কম্পিউটারের সঙ্গে জীবন কাটিয়ে দেবে এরা। আপনাকে যদি জিজ্ঞেস করা হয় আপনার ফোন নাম্বার কী? আপনি হোঁচট খাবেন। কারণ ওটা আপনার ফোনে আছে। আমাদের মস্তিষ্ক কাজ করা বন্ধ করে দিয়েছে। শুধু কম্পিউটারের ইশারায় আমরা উঠি বসি। বাচ্চারা মাঠের গন্ধই চিনল না। খেলছে তো কেবল কম্পিউটার। নামতা শিখছে কম্পিউটারে। ওদের কল্পনাশক্তিকে তো আমরাই মেরে ফেলছি।

    আর রিয়্যালিটি শো? সেখানে যোগদান করেও কি কিশোর কিশোরীরা নিজেদের সম্ভাবনাকে নষ্ট করছে?

    রিয়্যালিটি শো-এ বাচ্চারা যখন গান করে তখন স্ক্রিনে নিজেদের দেখতে দেখতে ওরা ভাবে যে আমরা স্টার হয়ে গেলাম। স্টার ওই ভাবে তৈরি হয় না। রিয়্যালিটি শোয়ের প্রতিযোগীরা অন্যের গান রেকর্ড থেকে তুলে গায়। যেদিন ওরা নিজেদের গান গাইবে, শাস্ত্রীয় সঙ্গীতে ইম্প্রোভাইজ করতে পারবে সেদিন ওরা স্টার হতে পারবে। সেটা দীর্ঘদিনের সাধনার ফলেই সম্ভব। সবাইকেই যে প্লে ব্যাক করতে হবে এমনটাও বলতে চাইছি না। কিন্তু স্টেজ-এ পারফর্ম করার সময় যেন একটা ছাপ রাখতে পারে। রিয়্যালিটি শো-এর অ্যাচিভারদের কাছে আমি এটা আশা করি। রিয়্যালিটি শো স্টার হওয়ার সম্ভাবনাকে কেবলমাত্র জাগিয়ে দেয়। সেদিক থেকে সঙ্গীতের ক্ষেত্রে এর গুরুত্ব আছে।

    সেই গুরুত্বের কারণেই আপনি কলকাতায়? কোন রিয়্যালিটি শো-এর জন্য আপনি এসেছেন?

    আমি জি-বাংলার 'সারেগামাপা'-র জন্য কলকাতায় এসেছি। ১২ জুন থেকে আপনারা সকলে আমাকে জি বাংলার 'সারেগামাপা'-র 'মাস্টারক্লাস উইথ আশাজি'-র এপিসোডে দেখতে পাবেন। আমি মাসে দু'বার 'সারেগামাপা'-‍র বিচারক হয়ে আসব। আগের বার 'সারেগামাপা'-র ফাইনালে একদিনের জন্য এসেছিলাম। খুব ভাল লেগেছিল। ভাল গান শুনতে পেয়েছিলাম। এ বার তো মনে হচ্ছে আরও অনেক অনেক বার আসতে হবে আমায়। আসলে কলকাতায় আসার অজুহাত খুঁজতে থাকি আমি।

    কেন, কলকাতা আপনাকে টানে?

    শরত্‌চন্দ্র চট্টোপাধ্যায় আমায় কলকাতাকে, বাংলা আর বাঙালিকে প্রথম চিনিয়েছেন। কী অনায়াস ওঁর লেখা। আজও চোখে জল এসে যায়। আমার বাড়িতে ওঁর সব লেখা আছে। ওঁর লেখা পড়েই তো মুড়ি যে এমন লোভনীয় খাবার আমি জানতে পারি। তার পরে তো বর্মন সাব ওঁর স্কুল, কলেজ, কলকাতার রাস্তা চেনাতে চেনাতে, কলকাতায় গান বাঁধতে বাঁধতে, কলকাতাকে আমার নিজের জায়গা করে দিয়ে চলে গেলেন। সেই স্মৃতির তরতাজা গন্ধ আজও কলকাতা এলে আমি পাই।

    বাংলার টানেই কি বড় ছেলের নাম রেখেছিলেন হেমন্ত?

    বাংলা আর হেমন্ত মুখোপাধ্যায়ের প্রতি শ্রদ্ধায়, ভালবাসায়। সে সব কবেকার কথা! কলকাতা আসলে 'আর্টিস্ট হাব'। যেখানে আশাপূর্ণা দেবীর মতো লেখিকাও আছেন, আছেন অবশ্যই রবীন্দ্রনাথ। ওঁর 'গোরা'আমার খুব প্রিয়।

    রবীন্দ্রনাথের গানের অ্যালবাম করার ইচ্ছে নেই? শ্রোতারা আজও আপনার কণ্ঠে 'জগতে আনন্দযজ্ঞে'শুনে মুগ্ধ হন।

    আজই প্রথম প্রকাশ্যে বলছি, নতুন প্রজন্মের জন্য রবীন্দ্রনাথের গান নিয়ে অ্যালবাম করব ভাবছি।

    নতুন প্রজন্মের জন্য যখন, তখন নিশ্চয়ই কোনও এক্সপেরিমেন্ট করবেন?

    কথা, সুর সব কিছু এক রেখে অর্কেস্ট্রেশন করার কথা ভাবছি।     

                                                

    লতাজি আপনার রিয়্যালিটি শোয়ের এই এপিসোড দেখবেন?

    হ্যাঁ। ওখানে বাংলা চ্যানেল এলে নিশ্চয়ই দেখবেন।

    উনি কোনও রিয়্যালিটি শো-এ আসেন না কেন?

    লতাদিদি অসুস্থ। ওঁর পক্ষে দৌড়ঝাঁপ করা সম্ভব না।

    এখন লতাজির সঙ্গে আপনার সম্পর্ক কেমন?

    এখন বলতে?

    আসলে শোনা যায় আপনাদের সম্পর্ক না কি ভাল ছিল না...

    আজও, এত দিন পরেও আপনারা বস্তাপচা গসিপ নিয়ে বসে আছেন? শুনুন তা হলে, লতাদিদি আমার মায়ের মতো। মা চলে যাওয়ার আগে আমায় বলে গিয়েছিলেন লতাদিদিই আমাদের সকলের মা। বাড়ির সকলেই ওঁকে আমরা অসম্ভব শ্রদ্ধা করি।

    নতুন প্রজন্মের মেয়েরা যাঁরা সঙ্গীতশিল্পী হিসেবে প্রতিষ্ঠা পেতে চাইছেন, তাঁদের কেরিয়ার না বিয়ে কোনটা বেছে নেওয়া উচিত?

    আমাদের সময় আলাদা ছিল। আজকে যাঁরা সঙ্গীতশিল্পী হিসেবে প্রতিষ্ঠা পেতে চাইছেন তাঁদের কেরিয়ারকেই গুরুত্ব দেওয়া উচিত। বিয়ে করে আবেগে ভেসে গেলে চলবে না।



    क्या हम आशा भोंसले मंगेशकर  की भी नहीं सुनेंगे?

    তবে কি আমরা আশা ভোঁশলে মঙ্গেশকরকে ও শুনব না?


    वह जीवन संगीत बाजार ने खत्म कर दिया है।किंवदंती लता मंगेशकर की बहन आशा भोंसले को ही लीजिये,जरुरी नहीं कि वे सारे लोग जो मौदी के कट्टर समर्थक हैं,वे मुक्त बाजार के महाविनाश कार्यक्रम के भी समर्थक होंगे!


    पलाश विश्वास

    বিয়ে করে আবেগে ভাসলে চলবে না

    নতুন গায়িকাদের প্রতি পরামর্শ আশা ভোঁশলে-র। কারণ সময় পাল্টেছে। 'সারেগামাপা'র শ্যুটিংয়ের জন্য খুব মন দিয়ে প্রসাধন সারতে সারতে আজকের গান নিয়ে বলছিলেন অনেক কথা। পার্পল মুভি টাউনে তাঁর মুখোমুখি স্রবন্তী বন্দ্যোপাধ্যায়।


    কম্পিউটারের ওপর আপনার এত রাগ?

    শুনুন, যখন থেকে এই যন্ত্রটা আমার, আপনার জীবনের মধ্যে ঢুকেছে, তখন থেকে মানুষের ভাবনা, কিছু সৃষ্টি করার ইচ্ছে সবই বন্ধ হয়ে গেছে। না কোনও কবিতা লেখা হচ্ছে, না ভাল গান তৈরি হচ্ছে, না কলম থেকে শব্দ ঝরছে! এই যে আগামী প্রজন্ম, তারা আর কিচ্ছু করবে না। মিলিয়ে নেবেন আমার কথা। শুধুমাত্র কম্পিউটারের সঙ্গে জীবন কাটিয়ে দেবে এরা। আপনাকে যদি জিজ্ঞেস করা হয় আপনার ফোন নাম্বার কী? আপনি হোঁচট খাবেন। কারণ ওটা আপনার ফোনে আছে। আমাদের মস্তিষ্ক কাজ করা বন্ধ করে দিয়েছে। শুধু কম্পিউটারের ইশারায় আমরা উঠি বসি। বাচ্চারা মাঠের গন্ধই চিনল না। খেলছে তো কেবল কম্পিউটার। নামতা শিখছে কম্পিউটারে। ওদের কল্পনাশক্তিকে তো আমরাই মেরে ফেলছি।


    http://www.anandabazar.com/supplementary/anandaplus


    लता मंगेशकर की बहन आशा भोंसले ने कहा हैः

    सुनिये, जबसे इस यंत्र(कंप्यूटर) का प्रवेश हुआ है हमारे आपके जीवन में,तब से मनुष्य की भावना,उसकी सृजन की इच्छा की मौत हो गयी है। न कोई कविता लिखी जा रही है और न कोई अच्छा गीत तैयार हो रहा है।कलम से शब्दों का झरना बंद है।भावी पीढि़यां अब कुछ भी नहीं करेंगी।आप मेरी चेतावनी याद रखे और उसे भविष्य में परख भी लें।अगली पीढ़ियां सिर्प कंप्यूटर के साथ जीवन बिता देंगी।आपसे मैं आपका फोन नंबर मांग लूं तो आप दुविधा में पड़ जायेंगे।क्योंकि वह आपको याद है ही नहीं,वह तो आपके फोन में दर्ज है।हमारे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है।हम सिर्फ कंप्यूटर के इशारे पर उठ बैठ करते रहते हैं।बच्चोे खुले मैदान की गंध से अनजान हैं।हमने उनकी कल्पनाशक्ति की हत्या कर दी है।


    साभार आनंद बाजार पत्रिका

    कंप्यूटर की महिमा से फिर भारी चूक हो गयी है,लता बंगेशकर की बहन आशा भोंसले की जगह सर्वत्र लता मंगेशकर ही लिखा गया है।हाथ कंगन को आरसी क्या,पढ़े लिखे को आरसी क्या!इस भयंकर भूल की ओर कई पाठकं ने ध्यान खींचा है।वे पढ़ते हुए दिलोदमािमाग से काम लेेते हैं,यह साबित हुआ और यह भी साबित हुआ कि सबकुछ खत्म हुआ नहीं है।हमें गलती का खेद है और ऐसे जागरुक लोगों का हम आभार व्यक्त करते हैं।


    संशोधित रोजनामचा दुबारा पोस्ट कर रहा हूं


    अखबार तो खूब पढ़ना होता है,लेकिन आजकल टीवी देखना नहीं होता।सविता को खास तरह की एलर्जी है।जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे,तो राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संक्रमणकाल के उस संक्रामक दौर में वह प्रधानमंत्री का चेहरा देखना नहीं चाहती थीं और चूंकि किराये के घर में अलग अलग टीवी सेट रखना संभव होता नहीं है,तब हम समाचार नहीं देखते थे।लोकसभा चुनावों में नमोमय भारत निर्माण के मध्य ही आक्रामक धर्मोन्मादी कारपोरेट सरकार के जनादेश सुनिश्चित बताकर सविता ने फिर चेतावनी दे दी थी कि अब फिर समाचार चैनलों का बायकाट है।


    गनीमत है कि इस वक्त हम आनलाइन हैं और समाचार देखने जानने के लिए टीवी पर निर्भर नहीं हैं।रियल टाइम मीडिया फेसबुक ट्विटर से हर पल समाचार ब्रेक होता रहता है किसी भी टीवी अखबार से ज्यादा तेजी से।


    सविता मजे में एनीमल प्लानेट,डिस्कवरी देखती रहती है।


    लेकिन घटनाओं और दुर्घटनाओं,सामाजिक सांस्कृतिक संक्रमण,अर्थव्यवस्था,राजनीति और इतिहास के शिकंजे में हम फंसे हैं तो मुंह चुराकर उनके सर्वव्यापी असर से बच नहीं सकते हम।


    अखबार पढ़े या नहीं,दसों दिशाओं में जो लबालब खून की नदियां हैं,जो ज्वालामुखी जमीन के अंदर दफन है और जो जल सुनामियां हमारे इंतजार में हैं,घात लगाये मौत की तरह हमें घेरे हुए हैं।


    बंगाल में दीदी ने पर्वतारोही छंदा गायेन को लाने के लिए नेपाल तक जाने का वायदा किया था,दरअसल बिना आक्सीजन,बिना भोजन आठ हजार मीटर के उस तुषार आंधी मध्य जीवित बचने की कोई चामत्कारिक संभावना भी नहीं बचती।


    नेपाल सरकार ने तीन दिन बीतते न बीतते मृत्यु प्रमामपत्र परिजनों को थमा दिया लेकिन सारा बंगाल छंदा की वापसी के इंतजार में है,ठीक उसीतरह जैसे धर्मोन्मादी हिंदू करपोरेटराज का सिलसिलेवार समर्थन धर्मनिरपेक्षता के नाम करते हुए जनविश्वासघाती पाखंडी वाम अब भी विचारधारा की जुगाली करते हुए जनांदलनों की हत्या करने के बाद खोये हुए जनाधार की वापसी में लगा है।



    हम आत्मवंचना के चकाचौंधी कार्निवाल में कबंधों के जुलूस में शामिल विष्ण खरे जी के शब्दों में आत्ममुग्ध अमानवीयजंबो हैं जो मानवीय संवेदना से कोई रिश्ता रखता ही नहीं है।


    बांग्ला के बड़े अखबार में आज देश में सबसे बड़ी सेलिब्रिटी मोदी समर्थक जीवित किंवदंती सुरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर जी की सगी बहन आशा भोंसले का साक्षात्कार पढ़कर लहूलुहान हूं।


    जो उन्होंने बताया है,वह हमारे रोजमर्रे का अनुभव है।


    चालीस सालों की पत्रकारिता में हम सूचनाओं को शायद ही कभी भूले हों।


    बिना नोट लिये, बिना रिकार्ड किये हमने बेहद तकनीकी,बेहद जटिल दो दो पेज के साक्षात्कार कंप्यूटर विप्लव से पहले यूं ही करते रहे हैं और वीपी जैसे धुरंधरों को बिना कलम दिखाये परेशान करते रहे हैं कि आखिर हम लिख क्या रहे हैं।


    कभी गलती नहीं हुई।


    लेकिन कंप्यूटर आते ही दिमाग ने काम करना आहिस्ते आहिस्ते बंद कर दिया है।


    तकनीकी सावधानी बरतने के बवजूद मामूली सी तकनीकी त्रूटि की वजह से भारी सी भारी छूट निकल जाती है।


    चाहकर भी सृजनधर्मी लिखा नहीं जाता।


    हरे जख्म के बावजूद भरे बाजार में आह तक करने की इजाजत नहीं है।


    आशा जी ने इस साक्षात्कार में हैरतअंगेज तरीके से मुक्त बाजार की धज्जियां बिखेर दी हैं।आधुनिक संगीत चर्चा की पद्धति और विज्ञापनी सेलिब्रेटी निर्माण प्रक्रिया पर प्रत्याघत करते हुए।


    आशा जी   के मुताबिक आधुनिक संगीत में जीवन यापन का अनुभव सिरे से लापता है और सारे गीत आइटम संगीत है।


    आशा जी  के मुताबिक अलग अलग ट्रैक पर डुयेट गाया जाता है प्राणहीन।रिद्म शोरशराबा है लेकिन सुर नहीं है।


    आशा जी  के मुताबिक जीवन से सरगम गायब हो गया है।


    मुक्त बाजार का अरुंधती लहजे में उल्लेख नहीं किया है आशा  दीदी ने,लेकिन मुक्त बाजार बंदबस्त की कारुणिक उपस्थिति को हर पंक्ति में वेदनामयअभिव्यक्ति दी है।


    आशा जी आज के किसी गायक गायिका का नाम नहीं ले सकतीं।


    आशा जी आज का कोई गीत याद नहीं कर सकतीं।


    आशा जी  के मुताबिक गीत संगीत सिर्फ वह नहीं है जो रियेलिटी शो में है या फिल्मों सीरियल में है।वह जीवन संगीत बाजार ने खत्म कर दिया है।


    आशा जी  के मुताबिक सरगम सिरे से लापता है।


    अरसे बाद शास्त्रीय सगीत के व्याकरण और अनुशासन पर बोलते हुए आशा जी ने बेहद दर्दभरे शब्दों में कह दिया कि हम अब एक अदद कंप्यूटर या मोबाइल पर निर्भर हैं और हम इतने ज्यादा तकनीक निर्भर हैं कि हमारी स्मृति नहीं है कोई।ह


    आशा जी के मुताबिक हम अपना फोन नंबर तक मोबाइल से चेक करते हैं।


    आशा जी  के मुताबिक सारी सृजनशीलता रचनाधर्मिता ग्रैफिकल चकाचौंध है। प्राणहीन चामत्कारिक।


    आशा जी  के मुताबिक मौलिकता गायब है।रेडीमेड हेराफेरी है यह तकनीकी दक्षता।


    इस इंटरव्यू के आलोक में मुझे बहुत कुछ नये सिरे से सोचना पड़ रहा है।


    जैसे कि जो आस्थावान लोग धर्मोन्मादी हिंदुत्व के नाम पर नमोमय भारत के निर्माण में शरीक हैं,वे सारे लोग आशा जी की तरह ही मुक्त बाजार से समामाजिक सांस्कृतिक कायाकल्प के फक्षधर हों,यह जरुरी भी नहीं है क्योंकि मुक्तबाजारी आखेट से वे अपने प्रियतम को खो रहे हैं हर पल।


    सिर्फ खोने का वह अहसास नहीं है।


    मोबाइल,टीवी, एसी,कंप्यूटर, इंटरनेट के जाल में फंसे हमें अपनी देह की सुध बुध नहीं है और न हमें मन की थाह है।


    हम सिरे से असामाजिक असांस्कृतिक हैं और अराजक भी हैं।


    आशा जी अद्वितीय संगीत शिल्पी हैं और उन्हें उनके सुदीर्घ अभिज्ञता,सुर और सरगम के प्रति आजीवन कुमारी प्रतिबद्धता ने सत्य का साक्षात्कार करना सिखाया है।


    मोदी समर्थक लता मंगेशकर की सगी बहन आशा भोंसले का यह साक्षात्कार तब आया है जब अमेरिका में मोदी विरोधी संगीत शिल्पी शुभा मुद्गल को बजरंगियों का पराक्रम दरशन करना पड़ा और देश भर में सामाजिक सांस्कृतिक जीवन में स्त्री पुरुष साहचार्य और सहअस्तित्व, हिंदू मुसलिम भाईचारा अद्भुत वर्चस्वी दंगाई बलात्कारी संस्कृति में समाहित है ।


    ऐसे चरम संक्रमणकाल में  आशा जी के इस वक्तव्य का नोट अवश्य लिया जाना चाहिए कि अब कोई कविता नहीं लिखी जायेगी और न कोई सुरबद्ध सरगमी गीत गाया जायेगा।


    मुक्त बाजार के आतंकवादी परिदृश्य का इससे हृदय विदारक अभूतपूर्व विस्फोट हमने कहीं नहीं देखा।


    मुझे संगीत अच्छा लगता है।


    बिहु से मुझे ऩई ऊर्जा मिलती है और लोकधुनों में अपनी जमीन पर होने का अहसास जगता है।लेकिन मैं बेहद बेसुरा हूं।एक पंक्ति गा नहीं सकता।अलग अलग स्वर पहचान नहीं सकता।बमुश्किल लता, आशा ,संध्या, बेगम अख्तर,केएल सहगल,मोहम्मद रफी मन्ना डे,किशोर कुमार जैसे चुनिंदा संगीतशिल्पियों की आवाज पहचान लेता हूं।अलका,श्रेया या सुनिधि को अलग अलग पहचान नहीं पाता।इस नाकाबिलियत के बावजूद सुर ताल में होना अच्छा सुहाना लगता है और सुर ताल कटने का अंदाजा हो ही जाता है।


    भारत निर्माण और कारपोरेट जीवन यापन में जो सुरतालछंद का यह विपर्यय है,बेशक इसे लता मंगेशकर ही हम सबसे बेहतर महसूस और अभिव्यक्त कर सकती हैं। लेकिन क्या हमें इसका तनिक अंदाजा भी नहीं होनी चाहिए?


    मेरी पत्नी सविता ने मेरी मां की तरह मेरे गांव में सीमाबद्ध जीवन नहीं बिताया है। लेकिन वह जहां रहती है,उस इलाके से उतना ही प्यार है उसे,जितना कि मेरी मां को मेरे गांव से था।


    हम कोलकाता में 1991 में आये और 1995 में सविता की ओपन हर्ट सर्जरी हो गयी।अनजान इलाके के अनजान अनात्मीय लोगों ने तब उसे खून दिया,यह किसी भी कीमत पर नहीं भूलती।


    खुद अस्वस्थ होने पर इलाके भर में किसी भी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए वह सबसे पहले भागती है।मौका हो तो अस्पताल से लाश लेकर श्मशान तक चली जाती है।


    फिरभी वह समाज सेवी नहीं है और न प्रतिबद्धता का कोई पाखंड है उसमें।


    वह अपने हिसाब से कर्ज निपटा रही है।


    अब तो हमारे इलाके में पंद्रह बीस लाख का कट्टा है लेकिन जब आस पास दो दो हजार का कट्ठा था तब भी अपनी रिहाइश बदलने का विकल्प उसने उसी तरह ठुकरा दिया जिस तरह उसकी जिद की वजह से मैं बार बार बेहतर  विकल्प मिलने के बावजूद जनसत्ता छोड़ नहीं सका क्योंकि जनसता और इंडियन एक्सप्रेस के सारे लोग हमेशा हमारा साथ देते रहे हैं।


    इस अपनापे के आगे उसे हर चीज बेकार लगती है।


    संजोग से वह भी शौकिया तौर पर सुर साधती है।स्थानीय महिलाओं के साथ सांस्कृतिक प्रयास में शामिल है।


    सविता हमारी नास्तिकता के विपरीत बेहद आस्तिक है।सारे देव देवियों को मानती है।लेकिन कर्म कांडी नहीं है।


    पर्व और त्योहारों पर गंगास्नान अवश्य करती है।रामकृष्ण मिशन के बेलुड़ मठ में जाती है लेकिन प्रवचन नहीं सुनती और न ही बाबा रामदेव के योगभ्यास में यकीन करती है और न ही आस्था,संस्कार वगैरह वगैरह चैनल देखती है।


    मैं स्वभाव व चरित्र से जितना अधार्मिक और नास्तिक हूं,वह उतनी ही धार्मिक और आस्थामयी है।लेकिन तंत्र जंत्र मंत्र में उसकी कोई आस्था नहीं है और न ही ज्योतिष में।


    हमने एक दूसरे पर अपने वितचार थोंपने के प्रयास नहीं किये और साथ साथ जीते इकतीस साल हो गये।


    स्वभाव से हिंदू और धार्मिक होने के बावजूद सविता लेकिन हिंदू राष्ट्र के विरोध में मुझसे ज्यादा कट्टर है।


    मैं तो नरेंद्र मोदी के वक्तव्य को ध्यान से सुनता पड़ता हूं और संघियों का रचा लिखा समझने की कोशिश करता हूं,लेकिन सविता सीधे बहिस्कार करती है।


    अर्थशास्त्र से वह एमए है लेकिन मुक्त बाजार के बारे में वह कुछ नहीं बोलती और अनार्थिक होने के बावजूद मुक्त बाजार का मैं लगातार मुखर विरोध कर रहा हूं।


    वह मुक्त बाजार के विरोध में बोलती कुछ नहीं है लेकिन कारपोरेट राज के पक्ष में वह भी नहीं है।


    हम धर्म निरपेक्षता के नाम पर उस जनता के जीवन यापन की घोर उपेक्षा कर रहे हैं जो मोदी समर्थक  होते हुए या न होते हुए प्रबल भाव से हिंदू हैं और कारपोरेट राज और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था,बाजारु संस्कृति के सख्त खिलाफ हैं।


    चूंकि हम खुद मुक्त बाजार और कारपोरेट राज के खिलाफ कोई जोखिम उठाकर खुद को संकट में डालना नहीं चाहते,बहुसंख्य जनगण को हम धर्मोन्मादी मानकर चल रहे हैं।


    संघ परिवार के साथ चल रहे और घनघोर मोदी समर्थक सारे लोग इस मुक्त बाजारी अर्थ व्यवस्था के समर्थक नहीं हैं और न ही इस राज्यतंत्र की तरह वे किसी अंबानी, टाटा, जिंदल, मित्तल, हिंदुजा, पास्को, वेदांत के गुलाम है।


    कंधमाल के बेजुबान अपढ़ आदिवासियों ने अपने प्रतिरोध से बार बार ऐसा बता दिया है,उन अजनबी स्वरों को हमने लगातार नजर्ंदाज किया है।


    क्या हम लता मंगेशकर की बहन आशा भोंसले की भी नहीं सुनेंगे?

    इसी सिलसिले मेरी एक पुरानी कविता फिर नये सिरे से पढ़ लेंः


    ई-अभिमन्यु


    पलाश विश्वास


    बच्चा अब खुले मैदान में नहीं भागता, भूमंडलीकरण के

    खुले बाजार में चारों तरफ सीमेंट का जंगल, फ्लाईओवर।

    स्वर्णिम चतुर्भुज सड़कें। आयातित कारें। शापिंग माल।

    सीमाहीन उपभोक्ता सामग्रियां। आदिगन्त कबाड़खाना,

    या युध्द विध्वस्त रेडियो एक्टिव रोगग्रस्त जनपद,

    बच्चे के लिए कहीं कोई मैदान नहीं है दौड़ने को।


    बच्चा किताबें नहीं पढ़ता, मगज नहीं मारता अक्षरों में।

    अक्षर की सेनाएं घायल, मरणासन्न। कर्णेद्रिंय भी

    हुए इलेक्ट्रानिक मोबाइल। वर्च्युअल पृथ्वी में

    यथार्थ का पाठ प्रतिबंधित है और एकान्त भी नहीं,

    चैनलों के सुपर सोनिक शोर में कैसे पढ़े कोई।


    बच्चा कोई सपना नहीं देखता, बस, कभी-कभी

    बन जाता वह हैरी पाटर, सुपरमैन स्पाइडरमैन,

    या फिर कृष। इंद्रधनुष कहीं नहीं खिलते इन दिनों

    हालांकि राजधानी में होने लगा है हिमपात,

    मरुस्थल में बाढ़ें प्रबल, तमाम समुन्दर सुनामी,

    रुपकथा की राजकन्याएं फैशन शो में मगन,


    नींद या भूख से परेशान नहीं होता बच्चा अब

    ब्राण्ड खाता है। पीता है ब्राण्ड जीता है ब्राण्ड॥

    ब्राण्ड पहनकर बच्चा अब कामयाब सुपर माडल।

    इस पृथ्वी में कहीं नहीं है बच्चों की किलकारियां,

    नन्हा फरिश्ता अब कहीं नहीं जनमता इन दिनों


    सुबह से शाम तलक तितलियों के डैने

    टूटने की मानिन्द बजती मोबाइल घंटियां

    पतझड़ जैसे उड़ते तमाम वेबसाइट

    मेरे चारों तरफ शेयर सूचकांक की बेइन्तहा

    छलांग, अखबारों के रंगीन पन्नों के बीच

    शुतुरमुर्ग की तरह सर छुपाये देखता रहता मैं,

    मशीन के यन्त्राश में होते उसके सारे

    अंग-प्रत्यंग। उसकी कोई मातृभाषा नहीं है,

    उसके होंठ फड़कते हैं, जिंगल गूँजता है।


    डरता हूं कि शायद किसी दिन बच्चा

    समाहित हो जाये किसी कम्प्यूटर में,

    या बन जाये महज रोबो कोई।

    सत्तर के दशक में विचारधारा में

    खपने का डर था। अब विचारधारा

    नहीं है। पार्टी है और पार्टीबध्द हैं बच्चे।


    इतिहास और भूगोल के दायरे से

    बाहर है बच्चा विरासत, परम्परा और

    संस्कारों से मुक्त अत्याधुनिक है बच्चा,

    क्विज में चाक चौबन्द बच्चा हमें

    नहीं पहचानता कतई। हम बेबस देखते

    हैं कि तैयार कार्यक्रमों के साफ्टवेअर

    से खेलता बच्चा चौबीसों घंटों,

    नकली कारें दौड़ाता है तेज, और तेज,

    लड़ता है नकली तरह-तरह के युध्द

    असली युध्दों से अनजान एकदम,


    एक गिलास पानी भरकर पीने

    की सक्रियता नहीं उसमें, भोजन की

    मेज पर बैठने की फुरसत कहाँ।

    चैटिंग के जरिये दुनियाभर में दोस्ती, पर

    एक भी दोस्त नहीं है उसका, उसके साथी

    बदल जाते हैं रोज-रोज, एकदम नाखुश,

    बेहद नाराज आत्मध्वंस में मगन बच्चा,

    उसके कमरे का दरवाजा बंद, खिड़कियां बंद,

    मन की खिड़कियां भी बंद हमेशा के लिए।


    शायद रोशनी से भी डरने लगा है बच्चा,

    सूरज का उगना, डूबना उसके लिए निहायत

    बेमतलब है इन दिनों, बेमतलब दिनचर्या,

    चाँद सितारे नहीं देखता बच्चा आज कल

    नदी, पहाड़, समुंदर आकर्षित नहीं करते।

    उसका सौंदर्यबोध चकाचौंध रोशनी

    और तेज ध्वनि में कैद है हमेशा के लिए।

    दिसम्बर 2006

    http://www.aksharparv.com/kavita.asp?Details=368



    इस अनुभव शेयरिंग के साथ देहात और कृषि जमीन पर प्रोमोटर बिल्ड राज के खलासे के लिए रोज सर्वत्र विज्ञापित आपरों में से एक आपसे शेयर करना चाहुंगा।


    Dear Sir,


    Hope you are doing well.


    I would request to you to take out your 2 minutes from your busy schedule for reading this message. It may be beneficial for you & amazing.


    Aravali Fantasia - the group endeavors to bring people back to nature. We believe in endless possibilities.

    We offer you "The Premium Farm Land" free from pollution and traffic still just few KMs. from Delhi & Gurgaon. The perfect place for you and your family to live in, the home in the lap of nature relived from the hustle and bustle.


    Points to Choose Aravali Fantasia: Because.

    1.       Development: Done 70-80%

    2.      Sizes: 1 Acre to 5 Acres (few small sizes also available)

    3.      Three Tier Securities with CCTV Cameras

    4.      33 t. Wide Cemented Roads

    5.      24x7 Power Backup & Water Supply

    6.      LED Street Lights

    7.      Cricket Ground with Night Vision Facilities

    8.      Children's Play Area

    9.      d Club House well-Equipped



    I hope you follow,

                        Seeing is believes.


    Project Location: Faridabad - Sohna Road, Faridabad

    Note: - Kindly let us know, if you are interested to see the location, facilities & more information so you are most welcome, you are free to check it.


    Kind Regards,


    Deepak Kumar


    Sales Manager


    বিয়ে করে আবেগে ভাসলে চলবে না

    নতুন গায়িকাদের প্রতি পরামর্শ আশা ভোঁশলে-র। কারণ সময় পাল্টেছে। 'সারেগামাপা'র শ্যুটিংয়ের জন্য খুব মন দিয়ে প্রসাধন সারতে সারতে আজকের গান নিয়ে বলছিলেন অনেক কথা। পার্পল মুভি টাউনে তাঁর মুখোমুখি স্রবন্তী বন্দ্যোপাধ্যায়।

    ৯ জুন, ২০১৪, ০০:০০:০০

    আত্মজীবনী লিখছেন? আমরা কবে পড়তে পারব?

    লেখা প্রায় শেষ। রোজই রাতে চেষ্টা করি লেখার। আশা করছি খুব তাড়াতাড়ি আপনাদের হাতে তুলে দিতে পারব বইটা।

    আজকের ফিল্ম ইন্ডাস্ট্রি, ফিল্ম মিউজিকের কথা আপনার লেখায় থাকবে?

    আজকের ফিল্ম মিউজিক বলে কিছু হয় না।

    কেন, এখনকার হিন্দি ছবি দেখেন না?

    নাহ্। আমার ইচ্ছেও করে না।

    হিন্দি ছবির গান বা কোনও অ্যালবামের গান কেমন লাগে?

    খুব খারাপ। না ভাল কোনও কথা আছে। না কোনও সুর মনে ধরে। আমাদের সঙ্গীতশাস্ত্র বলে ছেলেরা নীচের পর্দায় গাইবে। আর মেয়েরা উঁচু পর্দায়। সেখানেই তো শিল্পীর পারদশির্র্তা। আমাদের সময় তো আমরা উঁচু পর্দাতেই গাইতাম। রেওয়াজের জাদু তো সেখানেই ধরা পড়ত। এখন উল্টো। ছেলেরা চড়া গাইছে, মেয়েরা নীচে। কেন, মেয়েরা কি আজকাল চড়াতে গাইতে পারে না?

    এখন ডুয়েট গাওয়ার ক্ষেত্রেও কি ছেলে-মেয়ের গানের ফারাক বোঝা যায়?

    আমাদের সময় ডুয়েট গাওয়া একটা দারুণ ব্যাপার ছিল। এখন ডুয়েট গানও লোকে একা গায়। ট্র্যাক করা থাকে। শিল্পীরা যে যার সুবিধা মতো আলাদা আলাদা গান রেকর্ড করে। ডুয়েটের সেই প্যাশনটা গানে পাওয়া যায় না। আসলে ভাল গান গাইবার লোকেরই বড় অভাব।

    সে কী! ইন্ডাস্ট্রিতে এত লোক নাম করেছে!

    (থামিয়ে দিয়ে) দেখুন, নাম করা আর গান গাওয়া এক নয়। নাম তো যে কেউ, যে ভাবেই হোক করে ফেলে। ওটা কোনও কাজের কথা নয়। এখন সব আইটেম সং। শুধুই রিদম। গানে কোনও অনুভবও নেই। গানের কথা অন্তরকে নাড়া দিয়ে যায় না।

    এখনকার কোনও গানই আপনার পছন্দ হয় না?

    মাঝে সামান্য একটু বদল চোখে পড়েছিল। পাকিস্তানি সঙ্গীতশিল্পীরা গান গাইছিলেন। কথা ভাল হচ্ছিল। ওই যে 'যব সে তুনে দেখা হ্যায় সনম'বা 'তেরে নয়নো সে নয়না লাগে রে'শুনে ভেবেছিলাম আরও ভাল গান আসবে বুঝি। কিন্তু কই? এখন তো সব ধুম ধাড়াক্কার গান। নাচ আছে। সুর নেই। এখন মনেও হয় না সঙ্গীতের ক্ষেত্রে ভাল কিছু আর হবে!

    অরিজিত্‌ সিংহ-র গান শুনেছেন? উনি তো ভীষণ জনপ্রিয়...

    কে? নাহ্। অরিজিত্‌ সিংহ-র গান ঠিক মনে পড়ছে না। তবে হানি সিংহ-র নাম শুনেছি। গান যদিও শুনিনি। এ রকম প্রচুর নাম আসে। কিন্তু কেউ নিজস্ব গায়কি নিয়ে, ঘরানা নিয়ে অনেক দিন ধরে টিকে গিয়েছে, এমনটা তো দেখিনি।

    এখন তো শিল্পীদের ফিল্মের গানের নিরিখে রেটিং করা হয়। এটা কি ঠিক?

    এটা একদমই ভুল। ফিল্মে গান না গাইলে যে শিল্পী হবে না এমনটা আমি মনে করি না। নিজেদের গান গাইতে হবে। এইচ.এম.ভি যখন থেকে রেকর্ড করা বন্ধ করে দিল, মানুষের সিডি কেনা বা রেকর্ড শোনার আগ্রহই চলে গেল। তার পরে গানের চোদ্দোটা বাজিয়ে দিল আপনাদের এই কম্পিউটার। যে যেমন খুশি গান ডাউনলোড করছে, অ্যালবাম কপি করছে। আরে! শিল্পীদের কোনও সম্মানই নেই? সফটওয়্যার সুর, লয় বসিয়ে দিচ্ছে। কিন্তু বোধটা কেমন করে আনবে?

    কম্পিউটারের ওপর আপনার এত রাগ?

    শুনুন, যখন থেকে এই যন্ত্রটা আমার, আপনার জীবনের মধ্যে ঢুকেছে, তখন থেকে মানুষের ভাবনা, কিছু সৃষ্টি করার ইচ্ছে সবই বন্ধ হয়ে গেছে। না কোনও কবিতা লেখা হচ্ছে, না ভাল গান তৈরি হচ্ছে, না কলম থেকে শব্দ ঝরছে! এই যে আগামী প্রজন্ম, তারা আর কিচ্ছু করবে না। মিলিয়ে নেবেন আমার কথা। শুধুমাত্র কম্পিউটারের সঙ্গে জীবন কাটিয়ে দেবে এরা। আপনাকে যদি জিজ্ঞেস করা হয় আপনার ফোন নাম্বার কী? আপনি হোঁচট খাবেন। কারণ ওটা আপনার ফোনে আছে। আমাদের মস্তিষ্ক কাজ করা বন্ধ করে দিয়েছে। শুধু কম্পিউটারের ইশারায় আমরা উঠি বসি। বাচ্চারা মাঠের গন্ধই চিনল না। খেলছে তো কেবল কম্পিউটার। নামতা শিখছে কম্পিউটারে। ওদের কল্পনাশক্তিকে তো আমরাই মেরে ফেলছি।

    আর রিয়্যালিটি শো? সেখানে যোগদান করেও কি কিশোর কিশোরীরা নিজেদের সম্ভাবনাকে নষ্ট করছে?

    রিয়্যালিটি শো-এ বাচ্চারা যখন গান করে তখন স্ক্রিনে নিজেদের দেখতে দেখতে ওরা ভাবে যে আমরা স্টার হয়ে গেলাম। স্টার ওই ভাবে তৈরি হয় না। রিয়্যালিটি শোয়ের প্রতিযোগীরা অন্যের গান রেকর্ড থেকে তুলে গায়। যেদিন ওরা নিজেদের গান গাইবে, শাস্ত্রীয় সঙ্গীতে ইম্প্রোভাইজ করতে পারবে সেদিন ওরা স্টার হতে পারবে। সেটা দীর্ঘদিনের সাধনার ফলেই সম্ভব। সবাইকেই যে প্লে ব্যাক করতে হবে এমনটাও বলতে চাইছি না। কিন্তু স্টেজ-এ পারফর্ম করার সময় যেন একটা ছাপ রাখতে পারে। রিয়্যালিটি শো-এর অ্যাচিভারদের কাছে আমি এটা আশা করি। রিয়্যালিটি শো স্টার হওয়ার সম্ভাবনাকে কেবলমাত্র জাগিয়ে দেয়। সেদিক থেকে সঙ্গীতের ক্ষেত্রে এর গুরুত্ব আছে।

    সেই গুরুত্বের কারণেই আপনি কলকাতায়? কোন রিয়্যালিটি শো-এর জন্য আপনি এসেছেন?

    আমি জি-বাংলার 'সারেগামাপা'-র জন্য কলকাতায় এসেছি। ১২ জুন থেকে আপনারা সকলে আমাকে জি বাংলার 'সারেগামাপা'-র 'মাস্টারক্লাস উইথ আশাজি'-র এপিসোডে দেখতে পাবেন। আমি মাসে দু'বার 'সারেগামাপা'-‍র বিচারক হয়ে আসব। আগের বার 'সারেগামাপা'-র ফাইনালে একদিনের জন্য এসেছিলাম। খুব ভাল লেগেছিল। ভাল গান শুনতে পেয়েছিলাম। এ বার তো মনে হচ্ছে আরও অনেক অনেক বার আসতে হবে আমায়। আসলে কলকাতায় আসার অজুহাত খুঁজতে থাকি আমি।

    কেন, কলকাতা আপনাকে টানে?

    শরত্‌চন্দ্র চট্টোপাধ্যায় আমায় কলকাতাকে, বাংলা আর বাঙালিকে প্রথম চিনিয়েছেন। কী অনায়াস ওঁর লেখা। আজও চোখে জল এসে যায়। আমার বাড়িতে ওঁর সব লেখা আছে। ওঁর লেখা পড়েই তো মুড়ি যে এমন লোভনীয় খাবার আমি জানতে পারি। তার পরে তো বর্মন সাব ওঁর স্কুল, কলেজ, কলকাতার রাস্তা চেনাতে চেনাতে, কলকাতায় গান বাঁধতে বাঁধতে, কলকাতাকে আমার নিজের জায়গা করে দিয়ে চলে গেলেন। সেই স্মৃতির তরতাজা গন্ধ আজও কলকাতা এলে আমি পাই।

    বাংলার টানেই কি বড় ছেলের নাম রেখেছিলেন হেমন্ত?

    বাংলা আর হেমন্ত মুখোপাধ্যায়ের প্রতি শ্রদ্ধায়, ভালবাসায়। সে সব কবেকার কথা! কলকাতা আসলে 'আর্টিস্ট হাব'। যেখানে আশাপূর্ণা দেবীর মতো লেখিকাও আছেন, আছেন অবশ্যই রবীন্দ্রনাথ। ওঁর 'গোরা'আমার খুব প্রিয়।

    রবীন্দ্রনাথের গানের অ্যালবাম করার ইচ্ছে নেই? শ্রোতারা আজও আপনার কণ্ঠে 'জগতে আনন্দযজ্ঞে'শুনে মুগ্ধ হন।

    আজই প্রথম প্রকাশ্যে বলছি, নতুন প্রজন্মের জন্য রবীন্দ্রনাথের গান নিয়ে অ্যালবাম করব ভাবছি।

    নতুন প্রজন্মের জন্য যখন, তখন নিশ্চয়ই কোনও এক্সপেরিমেন্ট করবেন?

    কথা, সুর সব কিছু এক রেখে অর্কেস্ট্রেশন করার কথা ভাবছি।     

                                                

    লতাজি আপনার রিয়্যালিটি শোয়ের এই এপিসোড দেখবেন?

    হ্যাঁ। ওখানে বাংলা চ্যানেল এলে নিশ্চয়ই দেখবেন।

    উনি কোনও রিয়্যালিটি শো-এ আসেন না কেন?

    লতাদিদি অসুস্থ। ওঁর পক্ষে দৌড়ঝাঁপ করা সম্ভব না।

    এখন লতাজির সঙ্গে আপনার সম্পর্ক কেমন?

    এখন বলতে?

    আসলে শোনা যায় আপনাদের সম্পর্ক না কি ভাল ছিল না...

    আজও, এত দিন পরেও আপনারা বস্তাপচা গসিপ নিয়ে বসে আছেন? শুনুন তা হলে, লতাদিদি আমার মায়ের মতো। মা চলে যাওয়ার আগে আমায় বলে গিয়েছিলেন লতাদিদিই আমাদের সকলের মা। বাড়ির সকলেই ওঁকে আমরা অসম্ভব শ্রদ্ধা করি।

    নতুন প্রজন্মের মেয়েরা যাঁরা সঙ্গীতশিল্পী হিসেবে প্রতিষ্ঠা পেতে চাইছেন, তাঁদের কেরিয়ার না বিয়ে কোনটা বেছে নেওয়া উচিত?

    আমাদের সময় আলাদা ছিল। আজকে যাঁরা সঙ্গীতশিল্পী হিসেবে প্রতিষ্ঠা পেতে চাইছেন তাঁদের কেরিয়ারকেই গুরুত্ব দেওয়া উচিত। বিয়ে করে আবেগে ভেসে গেলে চলবে না।



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    মমতাম্ শরণম্ গচ্ছামি! ভেনটিলেটারে বাম!

    অসলি বাম চেয়ারম্যান মমতার অক্সিজেন!

    ममताम् शरणम् गच्छामि!वेंटिलेटर पर मरणासण्ण वाम,दीदी से आक्सीजेन की उम्मीद।


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


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    আবার পরিবর্তনের লক্ষ্যে মিশন ২০১৬

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ০৯ জুন, ২০১৪

    সাম্প্রদায়িক-অস্ত্রে কাজ

    হবে কি, ধন্দে বামেরা

    সন্দীপন চক্রবর্তী

    বামেদের ভোটে ভাগ বসিয়ে লোকসভা ভোটে নিজেদের শক্তিবৃদ্ধি ঘটিয়েছে বিজেপি। তার পরেও রাজ্যে তাদের উত্তরোত্তর শ্রীবৃদ্ধি ঘটছে। জেলায় জেলায় নিচু তলার বাম কর্মী-সমর্থকদের অনেকে নাম লেখাচ্ছেন গেরুয়া শিবিরে। রাজ্যে বিরোধী পরিসরের অনেকটাই দখল করে নিচ্ছে বিজেপি। এই অবস্থায় বিজেপি-র রাজনৈতিক মোকাবিলা এখন কোন পথে হবে, সেই প্রশ্নে গভীর উদ্বেগের মধ্যে পড়েছে দুই বাম দল সিপিএম এবং সিপিআই।

    ০৯ জুন, ২০১৪


    সংস্কারের পথেই সেরা ভারত, প্রণবের বক্তৃতায় বার্তা মোদীর

    আগামী দিনগুলিতে কোন পথে এগোবে তাঁর সরকার, আজ রাষ্ট্রপতির অভিভাষণের মাধ্যমে এই প্রথম তা নথি আকারে পেশ করলেন প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদী। মন্ত্রক ধরে ধরে মোদী বলে দিলেন, ভোট প্রচারে তিনি যে নতুন ভারতের স্বপ্ন দেখিয়েছেন, কী ভাবে তার রূপায়ণ করতে চাইছেন তিনি। রাষ্ট্রপতির মুখ দিয়েই বলিয়ে দিলেন নিজের তিনটি স্লোগান, 'সর্বনিম্ন সরকার, সর্বোচ্চ প্রশাসন', 'এক ভারত, শ্রেষ্ঠ ভারত'ও 'সকলের সহযোগ, সকলের বিকাশ'। এর মাধ্যমেই মোদী তুলে ধরলেন একটি ব্র্যান্ড-ভারতের রূপরেখা।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ১০ জুন, ২০১৪

    ঘর সামলান, মমতা বললেন বিমানদের

    মেলালেন তিনি মেলালেন! যুযুধান দুই প্রতিপক্ষের মধ্যে এনে দিলেন সৌহার্দ্যের বাতাবরণ! তিনি নরেন্দ্র দামোদরদাস মোদী! মোদী হাওয়ায় রাজ্যে বিজেপি-র উত্থান চিন্তায় ফেলে দিয়েছে তৃণমূল এবং বাম, দু'পক্ষকেই। বামেদের ভোটব্যাঙ্ক ভেঙে বিজেপি-তে গিয়েছে। তৃণমূলের ততটা ক্ষতি না হলেও কলকাতা ও তার লাগোয়া এলাকায় তারা চাপে। এই আবহেই সোমবার সন্ধ্যায় মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় নবান্নে নিজের ঘরে সাদর আপ্যায়ন করলেন বিমান বসুর নেতৃত্বাধীন বামফ্রন্টের প্রতিনিধি দলকে।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ১০ জুন, ২০১৪

    ইলামবাজারে সুব্রত, বোঝালেন অভিযুক্তের পাশেই দল

    বীরভূমে বিজেপি সমর্থক রহিম শেখের খুনের ঘটনায় অন্যতম অভিযুক্ত তৃণমূল নেতা জাফারুল ইসলামকেই সোমবার দিনভর দেখা গেল দলের রাজ্য সভাপতি সুব্রত বক্সীর পাশে! পাড়ুই-কাণ্ডের মতোই এ ক্ষেত্রেও দল যে অভিযুক্ত-পক্ষের পাশেই থাকছে, কার্যত তা-ও বুঝিয়ে দিয়েছেন তৃণমূল নেতৃত্ব। সিউড়ি হাসপাতালে গিয়ে ইলামবাজারের গণ্ডগোলে জখম এক তৃণমূল কমর্ীর্কে সব সহযোগিতার আশ্বাসও দিয়েছেন।

    নিজস্ব সংবাদদাতা

    ১০ জুন, ২০১৪

    http://www.anandabazar.com/state



    ममताम् शरणम् गच्छामि!वेंटिलेटर पर मरणासण्ण वाम,दीदी से आक्सीजेन की उम्मीद।सोमवार को वाम दलों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की और चुनाव बाद हिंसा और पूरे राज्य में वाम कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों को रोकने के लिए उनसे हस्तक्षेप की मांग की। दोनों पक्ष के बीच घंटेभर चली बातचीत हालांकि राजनीतिक हिंसा के एजंडे से हटकर बंगाल में केसरिया विपर्यय पर केंद्रित हो गयी।


    सही मायने में राष्ट्रीय वाम मोर्चे की चेयरमैन सरीखी हो गयी है ममता बनर्जी।


    जाहिर है कि वाम विडंबना की इंतहा हो गयी,दोस्तों।गौरतलब है कि ममता बनर्जी के मई, 2011 में सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री और किसी भी उच्च स्तरीय वाम प्रतिनिधिमंडल के बीच यह  पहली बातचीत हुई।माकपा के राज्य सचिव व बंगाल वाम मोर्चा चेयरमैन सचिव बिमान बोस ने इस ग्यारह सदस्यीय  प्रतिनिधिमंडल में वाम नेताओं की अगुवाई की जो खासतौर पर ममता के विरुद्ध कटुवाणी और व्यंगवाण के विशेषज्ञ माने जाते हैं।


    यह बैठक केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन जाने के बदा बदले हुए सत्ता समीकरण और राज्य में लोकसभा चुनावों में 17.69 फीसद वोटहासिल करके कांग्रेस और वामदलों के साइनबोर्ड बन जाने के साथ ही तृणमूल में भी सेंध लग जाने की पृष्ठभूमि में हुई।जाहिरा तौर पर बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सोमवार को ऐसी घटनाएं हुईं, जो आज तक राज्य में नहीं हुई थ। बंगाल में अचानक ही भाजपा की बढ़ती शक्ति से सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी ही चिंतित नहीं, बल्कि दूसरे विपक्षी पार्टियों में भी खलबली मची है।


    जिस ममता बनर्जी के आंदोलन की वजह से सत्ता बेदखल होना पड़ा,अब बंगाल में जारी अभूतपूर्व केसरिया सुनामी और पद्म प्रलय की वजह से उन्हीं वामासुरमर्दिनी ममता बनर्जी के शरणागत हो गये वाम नेता सारे के सारे।ऐसा तब हुआ जबकि वाम कार्यकर्ता राज्य नेतृत्व और माकपा महासचिव तक से इस्तीफे की मांग लेकर आंदोलन तेज करते जा रहे हैं और पार्टी से या निलंबित या निष्कासित हो रहे हैं और राज्यभर में वामदलों के कार्यकर्ताओं की धुनायी हो रही है और वे बेमौत मारे जा रहे हैं।तृणमूल के नेताओं ने खुल्लमखुल्ला वामदलों के खिलाफ न केवल युद्धघोषणा कर रखी है बल्कि वामसमर्तकों के सामाजिक बायकाट का फतवा भी जारी कर रखा है।


    मजा तो यह है कि वाम नेताओं से सार्वजनिक गपनीय मुलाकात से परहेज करने वाली दीदी को भी अगले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा को रोकने का कोई और उपाय नहीं सूझ रहा है।


    जिस मुसलिम वोट बैंक के भरोसे दीदी का जनाधार है,वह भी केसरिया होने लगा है।


    केंद्र में मोदी सरकार और वाम अवसान के बावजूद मुसलमानों की दशा जस की तस,ऐसे हालात में बंगाल के मुसलमान भी केसरिया विकल्प आजमाने के मूड में है।


    अब हालत यह है कि वाम और ममता को एक दूसरे के साथ हुए बिना केसरिया परिवर्तन रोकने का कोई दूसरा तरीका नहीं है।


    लोकसभा चुनाव से पहले ममता बर्जी फेडरल फ्रंट बना रही थीं, लेकिन उसमें वामदलों के लिए कोई जगह नहीं थी तो वामनेतृत्व में तीसरे मोर्चे की कवायद में ममता कहीं नहीं थीं।


    बंगाल में सत्ता स्वार्थ के लिए साथ आ रहे ये लोग भारत देश के बारे में सोचे होते तो शायद बात कुछ और होती।दोनों पक्ष एक दूसरे के सफाये के लिए कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ते लड़ते ध्वंस प्राय हैं और अब कयामत से बचने की कोशिश में है।


    वाम दलों के नेता गये थे बंगाल में राजनीतिक हिंसा की शिकायत करने,जिसका आरोप मुख्यतः सत्ता दल के खिलाफ है।


    वे गये थे यह चेतावनी देने कि हिंसा न रुकी तो आंदोलन होगा।


    लेकिन वे बंगाल में केसरिया सुनामी के लिए ज्यादा चिंता जता आये।


    दीदी ने भी पलटकर कहा कि वाम अपना घर संभाले,वे खुद भाजपा और कांग्रेस दोनों से निपट लेंगी।


    लेकिन वाम नेताओ के स्वागत में उन्होंने जिस अंदाज में पलक पांवड़े बिछा दिये,जैसे अपने कमरे से बाहर चली आयीं और विदा करने के लिए जिस तरह लिफ्ट तक वाम नेताओं को छोड़ने आयी साफ जाहिर है कि बर्फ पिघलने लगी है।सत्ता में आने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्षी पार्टी को तरजीह दी है।


    यह पहला मौका था, जब वाममोरचा चेयरमैन बिमान बसु, सीएम से मिलने के लिए हुगली पार हावड़ा स्थानांतरित राज्य सचिवालय पहुंचे।दीदी की माकपाइयों से नफरत इतनी घनी समझी जाती है कि वाम दलों से अपवित्र राइटर्स का कायाकल्प किये बिना वह वहां से राजकाज चलाना नहीं चाहती और इसीलिए तुरत फुरत नवान्न को राइटर्स में तब्दील कर दिया गया।माकपा नेता गौतम देब ने इसी नवान्न के घेराव की धमकी भी दे रखी है।


    जाहिर सी बात है कि भाजपा की बढ़त रोकने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों के साथ भी समझौता करने का मन बनालिया है।


    कहने को तो वाम मोर्चा नेता तृणमूल कांग्रेस द्वारा राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे हमलों के खिलाफ शिकायत करने पहुंचे थे, लेकिन जिस तरह नवान्न में उनका स्वागत दीदी की ओर से गर्मजोशी के साथ किया गया, इससे राजनीतिक विशेषज्ञ किसी और नजर से ही देख रहे है।


    मुख्यमंत्री खुद वाममोर्चा के प्रतिनिधि दल का स्वागत करने के लिए लिफ्ट के बाहर इंतजार कर रही थीं। बैठक के बाद तृणमूल कांग्रेस के प्रदेश महासचिव वाम नेताओं को छोड़ने उनके वाहन तक आये थे।


    यही नहीं,कभी वाम मोरचा के खिलाफ आग उगलनेवाली मुख्यमंत्री ने चुनाव में माकपा को मिले कम वोट पर चिंता भी जता दी. मुख्यमंत्री ने चिंता जताते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा को कम वोट मिले हैं।


    यही नहीं, साथ ही मुख्यमंत्री ने चिंता जताई कि वाम समर्थक लगातार भाजपा में शामिल हो रहे हैंवाम नेताओं को सलाह भी दी कि  इसे रोकने के लिए उन्हें खास प्रयास करना चाहिए।


    यहां तक कि मुर्शिदाबाद जिले में कांग्रेस को मिली जीत पर भी मुख्यमंत्री ने वाम मोर्चा नेताओं से कहा कि उनके समर्थकों ने सही कार्य नहीं किये है.।


    यह अजीब ही लगता है,लेकिन विचित्र किंतु सत्य हैकि  कि वाम को फिर से शक्तिशाली बनाने के लिए मुख्यमंत्री ही वाम नेताओं को सुझाव देने लगी हैं।


    और तो और, मुख्यमंत्री ने वाममोर्चा नेताओं को दो सदस्यीय समन्वय कमेटी के गठन  का परामर्श दिया और इस कमेटी को तृणमूल कांग्रेस के प्रदेश महासचिव पार्थ चटर्जी के साथ-साथ खुद उनके साथ लगातार संपर्क में रहने की बात कही।


    इस वाकये से फिर साबित हो गया कि विचारधारा,प्रतिबद्धता,जनसरोकार और आंदोलन वामपक्ष के लिए अब दिखावे के सिवाय कुछ भी नहीं है।


    सत्ता सुख के लिए वे दशकों तक कांग्रेस से नत्थी रहे तो सत्ता समीकरण साधने के लिए वे उस तृणमूल कांग्रेस की शरण में है,जिसने उसका सफाया कर दिया।


    दूसरी ओर बंगाल नेतृत्व के बाद आखिरकार  माकपा महासचिव कामरेड प्रकाश कारत ने भी लोकसभा चुनावों में पराजय के लिए नेतृत्व को जिम्मेदर मान लिया है।


    लेकिन इसके बावजूद बंगाल राज्य कमिटी से लेकर पोलति ब्यूरो और केंद्रीय कमिटी तक में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर उठे तूफान के बावजूद,बुद्धदेव भट्टाचार्य और प्रकाश कारते के इस्तीफे की पेशकश के बावजूद बेशर्म वाम नेतृत्व- कुछ दोष हमारा कुछ दोष तुम्हारा- की तर्ज पर विचारधारा बघारते हुए संगठनात्मक फेरबदल करने को कतई तैयार नहीं है।बल्कि वजूद बचाने की रघुकुल रीति मुताबिक सत्ता की सौदेबाजी में जुट गया है वाम नेतृत्व।


    याद करें कि लोकसभा चुनावों के दौरान  मुख्यमंत्री ममता बनर्जीने पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाए जाने के बाद यह कहकर जवाबी हमला किया था  कि कभीवाममोर्चा शासन 'भ्रष्टाचार का पहाड़' था।फिर लोकसभा चुनावों में वाम सफाया के बाद शानदार जीत से उत्साहित तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जीने माकपा के नेतृत्व वाले वाममोर्चे की हार को लोकतंत्र और शांति की जीत बताया।


    गौरतलब है कि नई दिल्ली में माकपा ने आज कहा कि लोकसभा चुनाव के समाप्त होने के बाद से एक दर्जन से अधिक सांप्रदायिक हिंसा के मामले हो चुके हैं और जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को समाप्त करने जैसे ''विभाजनकारी''मुद्दों को राजग सरकार उठा रही है।

    पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा, ''जहां लोग महंगाई, बेरोजगारी, किसानों के कष्ट और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध जैसी गंभीर समस्याओं के समाधान की उम्मीद कर रहे हैं, वहीं भाजपा नीत सरकार की ऐसे मुद्दे उठाने में ज्यादा दिलचस्पी लगती है जो विभाजनकारी हैं।''

    उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की एक मंत्री के चर्चा करने की बात ने ''गंभीर डर''पैदा किया है। उन्होंने कहा, ''इससे कश्मीर की जनता का और अधिक विलगाव होगा। माकपा नेता ने कहा, ''ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जो जम्मू कश्मीर को दिए गए विशेष राज्य के दर्जे को कमजोर करेगा। भारतीय संघ में राज्य को शामिल करते वक्त यह एकमात्र वादा राज्य की जनता से किया गया था।


    लोकसभा चुनाव के समाप्त होने के समय से ''गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और अन्य स्थानों पर देश में एक दर्जन से अधिक सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं। एक युवा मुस्लिम आईटी पेशेवर की हिंदू राष्ट्र सेना के लोगों ने पुणे में हत्या कर दी थी।''

    करात ने कहा, ''ऐसा लगता है कि जीत के मूड से सांप्रदायिक घटनाएं हो रही हैं जिसके तहत अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।''

    उन्होंने कहा कि पार्टी सांप्रदायिकता के सभी रूपों का मुकाबला करने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा के लिए काम करेगी।

    उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चों का यौन उत्पीड़न जारी है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। करात ने कहा, ''पश्चिम बंगाल में भी महिलाओं पर बढ़ते हमले से कोई राहत नहीं है।''

    आर्थिक मोर्चे पर उन्होंने कहा कि सरकार रक्षा उत्पादन और बीमा जैसे अन्य क्षेत्रों में एफडीआई बढ़ाने जैसे कदम भी उठा रही है। उन्होंने कहा, ''माकपा इस तरह के कदमों के खिलाफ है।''

    उन्होंने कहा, ''खनन और बिजली क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं जिसका पर्यावरण और इन क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकारों पर गंभीर प्रभाव है।''

    उन्होंने कहा कि सरकार ''पर्यावरण कारकों और आदिवासियों के अधिकारों पर गौर किए बिना इस तरह के कदम उठाने से बचे।''




    বিমানকে ঘর সামলানোর পরামর্শ, সিপিএমকে অক্সিজেন দিয়ে বাঁচিয়ে রাখার কৌশল মমতার,জল্পনা

    বিতনু চট্টোপাধ্যায়, সুমন ঘরাই, এবিপি আনন্দ

    Monday, 09 June 2014 08:33 PM



    রাজ্যে বিজেপির উত্থানে যে তিনি সিদুঁরে মেঘ দেখছেন, তা সোমবার নবান্নয়, বাম প্রতিনিধি দলের সামনে কার্যত প্রকাশ করে ফেললেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৷ এ দিন, তৃণমূলের বিরুদ্ধে সন্ত্রাসের অভিযোগে, মুখ্যমন্ত্রীর কাছে স্মারকলিপি জমা দিতে যায় বিমান বসুর নেতৃত্ব বাম প্রতিনিধি দল৷ সেই বৈঠকেই বিজেপিকে রুখতে বাম নেতাদের ঘর সামলানোর পরামর্শ দিলেন মুখ্যমন্ত্রী৷ সূত্রের খবর, বিমান বসুদের উদ্দেশে তিনি বলেন,

    আমার দলকে আমি দেখে নিচ্ছি৷ বিজেপি-মোদিকেও দেখে নেব৷ কিন্তু, আপনাদের দল থেকে এত লোক বিজেপিতে যাচ্ছে কেন? এটা সামলান৷ অধীর চৌধুরী এত ভোটে জেতেন কীভাবে? আপনাদের ভোট পেয়েছেন অধীর চৌধুরী৷ নিজেদের ঘর সামলান৷

    কিন্তু, অতীতে বামেরা একাধিকবার সন্ত্রাসের অভিযোগে মুখ্যমন্ত্রীর সঙ্গে দেখা করার সময় চাইলেও, তখন সাক্ষাতের অনুরোধ খারিজ করে দেন তিনি৷ তাহলে, হঠাত্‍ এমন কী হল, যে নিজের দলের বিরুদ্ধেই সন্ত্রাসের অভিযোগ শুনতে রাজি হয়ে গেলেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়! শুধু অভিযোগই শুনলেন না, যে সিপিএমের ঘর ভাঙলে তিনি এতদিন খুশি হতেন, সেই সিপিএমকেই ঘর সামলানোর পরামর্শ দিলেন!

    রাজনৈতিক মহলের একাংশ মনে করছে, বামেদের প্রতি মমতার এই পরিবর্তিত মনোভাবের পিছনে রয়েছে রাজনৈতিক অঙ্ক৷ আর সেই অঙ্ক হল, বিজেপির উত্থ্বান আটকাতে মৃতপ্রায় সিপিএমকে অক্সিজেন যুগিয়ে বাঁচিয়ে রাখা৷ কারণ, সিপিএম রাজ্য রাজনীতিতে পুরোপুরি অপ্রাসঙ্গিক হয়ে গেলে আলিমুদ্দিন যেমন হতাশার অন্ধকারে তলিয়ে যাবে, তেমনই চিন্তা বাড়বে তৃণমূলেরও৷ এর কারণ হিসাবে রাজনৈতিক পর্যবেক্ষকদের একাংশের বক্তব্য, লোকসভা নির্বাচনে বিজেপির ভোট শতাংশ এক লাফে প্রায় ১৭ শতাংশ হয়ে যাওয়ার পর, বহু জায়গাতেই সিপিএম থেকে বিজেপিতে যোগ দেওয়ার খবর আসছে৷ আর এমনটা চলতে থাকলে, ২০১৬-র বিধানসভা নির্বাচনের আগে যদি বিরোধী ভোটের পুরোটাই কার্যত বিজেপির দিকে চলে যায়, সেক্ষেত্রে সমস্যায় পড়তে পারে তৃণমূল৷ কারণ, পর্যবেক্ষকদের মতে, বিরোধী ভোট ভাগভাগি হওয়ার জেরেই এবার ৩৯ শতাংশ ভোট পেলেও, ৪২টির মধ্যে ৩৪টি লোকসভা আসনেই জিতেছে তৃণমূল৷ উল্টোদিকে বিরোধীরা প্রায় ৬১ শতাংশ ভোট পেলেও, তা ভাগাভাগি হওয়ায় তারা মাত্র ৮টি আসন পেয়েছে৷ আর এই পরিস্থিতিতে বামেদের ভোটবাক্সে ধস অব্যাহত থেকে যদি ২০১৬-র বিধানসভা নির্বাচনের আগে তার সিংহভাগটাই বিজেপিতে চলে যায়, তাহলে আর এবারের মতো বিরোধী ভোট ভাগাভাগি হবে না৷ সেক্ষেত্রে আসন সংখ্যার নিরিখে বিজেপির শক্তি এক ধাক্কায় আরও অনেকটাই বেড়ে যেতে পারে৷ কারণ, এবারের লোকসভা নির্বাচনের ফল থেকেই স্পষ্ট, যেখানেই সিপিএমের ভোট অত্যাধিক হারে কমেছে, সেখানে ভোট বাড়িয়ে তৃণমূলের ঘাড়ের কাছে নিঃশ্বাস ফেলেছে বিজেপি৷ আসালসোলে পদ্ম ফোটার কারণও সেটা৷ তাই রাজনৈতিক মহলের একাংশের মতে, বিজেপির সামনে দেওয়াল হিসাবে দাঁড় করাতেই সিপিএমকে অক্সিজেন দিয়ে বাঁচিয়ে রাখতে চাইছেন মমতা৷ সে কারণেই বাম প্রতিনিধি দলের সঙ্গে দেখা করার তাঁর এই সিদ্ধান্ত৷ কারণ, সিপিএম শেষ হয়ে গেলে, তৃণমূলের দাপটও ভবিষ্যতে কমবে৷ এমনটাই মত রাজনৈতিক পর্যবেক্ষকদের একাংশ৷

    নেতৃত্বের ভুলেই ভরাডুবি, অবশেষে মানলেন কারাট

    প্রেমাংশু চৌধুরী

    নয়াদিল্লি, ৯ জুন, ২০১৪, ০৩:২৫:১৩


    লোকসভা নির্বাচনে সিপিএমের মুখ থুবড়ে পড়ার দায় দলের কেন্দ্রীয় নেতৃত্বেরই। প্রকাশ কারাট এই প্রথম সে কথা কবুল করে নিলেন।

    তিন দিনের পলিটব্যুরো ও কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠকে প্রবল সমালোচনার মুখে পড়তে হয়েছে প্রকাশ কারাট তথা সিপিএমের কেন্দ্রীয় নেতৃত্বকে। রাজনৈতিক রণকৌশলের ভুলেই একের পর এক লোকসভা নির্বাচনে সংসদে সিপিএমের শক্তি কমছে বলে মুখর হয়েছেন দলের নেতারা। কেন্দ্রীয় কমিটির প্রস্তাবেও স্বীকার করে নেওয়া হয়েছে, লোকসভা নির্বাচনে দলের ভরাডুবির দায় সিপিএমের কেন্দ্রীয় নেতৃত্ব এড়াতে পারেন না।

    গত ২০০৯ সালের লোকসভা নির্বাচন ও পশ্চিমবঙ্গে বিধানসভা নির্বাচনে সিপিএমের দুর্গ পতনের দায় কার, তা নিয়ে দলে প্রবল বিতর্ক হয়েছিল। সে সময় রাজ্যের খারাপ ফলের দায় পুরোপুরিই রাজ্য নেতৃত্বের উপরে চাপিয়েছিলেন কারাট। বলা হয়েছিল, সাংগঠনিক, রাজনৈতিক ও প্রশাসনিক ভুলভ্রান্তির ফলেই পশ্চিমবঙ্গে সিপিএমকে মুখ থুবড়ে পড়তে হয়েছে। এ বারের লোকসভা নির্বাচনের পর্যালোচনায় পশ্চিমবঙ্গের সাংগঠনিক দুর্বলতার কথা বলা হলেও কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের রাজনৈতিক কৌশলেরও যে দায় রয়েছে, তা মেনে নেওয়া হয়েছে।

    আলিমুদ্দিন স্ট্রিটের নেতারা এটাকে যথেষ্ট তাৎপর্যপূর্ণ বলেই দাবি করছেন। তাঁদের বক্তব্য, এই দায় স্বীকার কার্যত কারাটের নিজের ভুল স্বীকার। সিপিএমে ব্যক্তিবিশেষকে দায় নিতে হয় না। কাজেই কারাটকেও ব্যক্তিগত ভাবে দায় নিতে হয়নি। কিন্তু কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের ভুলের অর্থ সাধারণ সম্পাদক হিসেবে তাঁর রাজনৈতিক লাইনের ভুল। পরমাণু চুক্তিতে সমর্থন প্রত্যাহার, মায়াবতীকে সামনে রেখে তৃতীয় ফ্রন্টের সরকার গঠনের ডাক থেকে সেই ভুলের শুরু। গত পাঁচ বছরে তারই মাসুল দিতে হচ্ছে দলকে। নরেন্দ্র মোদীর উত্থান মোকাবিলারও কোনও রাস্তা খুঁজে পাননি কারাট।

    লোকসভার ভোটের পর্যালোচনা করতে বসে পশ্চিমবঙ্গ ও কেরলে বিজেপির উত্থান নিয়েই সব থেকে বেশি সময় ব্যয় হয়েছে। সাম্প্রদায়িক শক্তির বিরুদ্ধে ১১টি দলকে এক মঞ্চে নিয়ে এসেছিলেন কারাট। তাতে ছিলেন মুলায়ম সিংহ যাদব, জয়ললিতা, নীতীশ কুমার, নবীন পট্টনায়করা। কিন্তু তাঁদের সঙ্গেই রাজ্য স্তরে জোট বা আসন সমঝোতায় পৌঁছতে পারেননি কারাট। ওড়িশা, বিহার, তামিলনাড়ু, উত্তরপ্রদেশ বা অবিভক্ত অন্ধ্রপ্রদেশে ঠিকমতো আসন সমঝোতা বা জোট তৈরি করতে না পারার জন্যও কারাটকে সমালোচনার মুখে পড়তে হয়েছে। এবং সে কারণেই কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের দায় মেনে নিয়েছেন কারাট।

    বারাণসীতে মোদীর বিরুদ্ধে সিপিএমের প্রার্থী দেওয়াও ঠিক হয়েছিল কি না, সেই প্রশ্নের মুখে পড়েছেন কারাট। তিনি নিজে সেখানে দলীয় প্রার্থী হীরালাল যাদবের হয়ে সভা করেছিলেন। এতে ধর্মনিরপেক্ষ ভোটেরই বিভাজন হয়েছে। অন্য ধর্মনিরপেক্ষ দলগুলিকে একজোট করে কোনও প্রার্থীকে সমর্থন করা উচিত ছিল বলে যুক্তি এসেছে। প্রয়োজনে আম আদমি পার্টির অরবিন্দ কেজরিবালকেও সমর্থন করা যেত বলে অনেকে যুক্তি দিয়েছেন।

    কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের দায় স্বীকার করলেও, নিজে ব্যক্তিগত ভাবে দায় নিচ্ছেন না বলে অন্য কাউকেও দায় নিতে দিচ্ছেন না কারাট। লোকসভা ভোটের ফল প্রকাশের পরেই দিল্লিতে পলিটব্যুরো বৈঠকে এসে পশ্চিমবঙ্গে খারাপ ফলের দায় নিতে চেয়েছিলেন রাজ্য সম্পাদক বিমান বসু। তাঁকে সেই দায় নিতে দেওয়া হয়নি। বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যও জানিয়ে দিয়েছেন, তিনি আর পলিটব্যুরো বা কেন্দ্রীয় কমিটিতে থাকতে চান না। একই ভাবে সীতারাম ইয়েচুরিও জানিয়ে দিয়েছেন, খারাপ ফলের দায় নিয়ে তিনি পলিটব্যুরো থেকে সরে দাঁড়াতে রাজি আছেন। আর এক পলিটব্যুরো সদস্য, কেরলের এম এ বেবিও রাজ্যের বিধায়ক পদ থেকে ইস্তফা দিতে চেয়েছিলেন। যাবতীয় পদত্যাগের প্রস্তাবই খারিজ করে দেওয়ার সিদ্ধান্ত নিয়েছে পলিটব্যুরো। কেন্দ্রীয় কমিটিও তাতেই সিলমোহর বসিয়েছে।

    কিন্তু দলের মধ্যে যে নেতৃত্বের মুখবদলের দাবি উঠছে, তাকেও অস্বীকার করতে পারছেন না সিপিএম নেতৃত্ব। কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠকে বৃদ্ধ ভি এস অচ্যুতানন্দনও আজ দাবি তোলেন, সাংগঠনিক স্তরে ব্যাপক রদবদল করে নতুন রক্তের আমদানি প্রয়োজ। কেরলের রাজ্য নেতৃত্বের কড়া সমালোচনা করার পাশাপাশি তিনি বলেন, পশ্চিমবঙ্গে কী ভাবে দল ঘুরে দাঁড়াবে, তা রাজ্য নেতৃত্বকেই ঠিক করতে হবে। পশ্চিমবঙ্গের তুলনায় এ বার কেরলে দলের ফল ভাল হয়েছে। ২০টির মধ্যে ৮টি আসন জিতেছেন বামেরা। কিন্তু সিপিএমের আশা ছিল, ১০ থেকে ১৪টি আসন ঝুলিতে আসবে। কিন্তু কোল্লম আসনে সিপিএম পলিটব্যুরোর এম এ বেবিকে প্রার্থী করায় বাম জোট ছেড়ে কংগ্রেসের জোটে চলে যায় আরএসপি। ওই আসনে আরএসপি-র নেতা এন কে প্রেমচন্দ্রনই বেবিকে হারিয়েছেন। সিপিএমের রাজ্য সম্পাদক পিনারাই বিজয়ন প্রেমচন্দ্রনকে 'স্কাউন্ড্রেল'বলে আক্রমণ করেছিলেন। বিজয়নের ওই মন্তব্যেরও কড়া সমালোচনা করেছেন অচ্যুতানন্দন।

    ঠিক হয়েছে, আগামী ৮ থেকে ১০ অগস্ট পলিটব্যুরো ও কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠক বসবে। সেখানেই নেতৃত্বের মুখবদল কী ভাবে করা যায়, তার রূপরেখা নিয়ে আলোচনা হবে। সেই অনুযায়ীই পার্টি কংগ্রেসের সম্মেলন পর্বের মাধ্যমে ধাপে ধাপে নিচু তলা থেকে আলিমুদ্দিন স্ট্রিট হয়ে একেবারে এ কে গোপালন ভবন পর্যন্ত নেতৃত্বের মুখ বদলের চেষ্টা হবে। পার্টি কংগ্রেসের দিনক্ষণও ওই কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠকেই ঠিক হবে।



    আসল পরিবর্তন ২০১৬: বি জে পি

    বিধানসভায় বি জে পি-র টার্গেট অম্তত ১৪৯ আসন

    আজকালের প্রতিবেদন: আগামী বিধানসভায় বি জে পি-র টার্গেট অম্তত ১৪৯ আসন জয়৷‌ ওই সব আসনে বি জে পি লোকসভা ভোটে ৩৫ হাজার বা তার বেশি ভোট পেয়েছে৷‌ মানুষকে আরও কাছে টানতে তাই তৈরি হয়েছে বুথ কমিটি৷‌ দলের ২ দিনের রাজ্য কার্য সমিতির বৈঠকে এ বিষয়ে সিদ্ধাম্ত হয়েছে৷‌ বিধানসভা থেকে বুথ ভিত্তিক ফলের পর্যালোচনা হয়৷‌ দলের পক্ষে দাবি করা হয়েছে লোকসভা ভোটের ফলাফলে ২৪টি আসনে বি জে পি এগিয়ে৷‌ ২৬টিতে জয়ের কাছাকাছি ছিল৷‌ বি জে পি-র রাজ্য পর্যবেক্ষক সিদ্ধার্থনাথ সিংও বলেন, ২০১৬ বিধানসভায় অভাবনীয় ফল করবে তাঁর দল৷‌ আর আসল পরিবর্তন হবে সেই সময়ই৷‌ গড়া হবে 'তৃণমূল মুক্ত'বাংলা৷‌ বলেন, লোকসভার ফলের ভিত্তিতে বি জে পি রাজ্যে প্রধান বিরোধী দলে পরিণত হয়েছে৷‌ ৩৪ আসনে জিতে মমতার খুশি হওয়ার কথা৷‌ কিন্তু উনি নার্ভাস হয়ে পড়েছেন৷‌ সন্ত্রাস না হলে বি জে পি এ রাজ্য থেকে আরও ৮৷‌৯টি আসনে জিততে পারত৷‌ রিগিং না করলে তৃণমূল ১০ শতাংশ ভোট কম পেত৷‌ সেই ভোট আসত বি জে পি-র পক্ষে৷‌ বি জে পি, তৃণমূলের ভোটের ফারাক হত মাত্র ২ শতাংশের৷‌ তার পরও বি জে পি বিধানসভা ভিত্তিক ১৪৯ আসনে ভাল ফল করেছে৷‌ মুসলিম ভোটও বি জে পি-র দিকে ঝুঁকেছে৷‌ তাই মমতা ৩৯ শতাংশ ভোট পেয়েও নিশ্চিম্ত থাকতে পারছেন না৷‌ বি জে পি নেতা-কর্মীদের ওপর হামলা হচ্ছে৷‌ ইলামবাজারে বি জে পি-র এক মুসলিম কর্মীকে মারধর করা হয়৷‌ তিনি মারা গেছেন৷‌ পরিস্হিতি দেখতে রাজ্যে আসবে কেন্দ্রীয় কমিটির দল৷‌ তারা কেন্দ্রীয় মাইনরিটি কমিশনকে রিপোর্ট দেবে৷‌ সন্ত্রাসের প্রতিবাদে ২০ জুন জেলাশাসকদের স্মারকলিপি দেবে বি জে পি৷‌ ২৩ জুন রাজ্য সভাপতি রাহুল সিন‍্হার নেতৃত্বে বি জে পি অফিস থেকে ধর্মতলা পর্যম্ত হবে 'বাংলা বাঁচাও'পদযাত্রা৷‌ সেদিন থেকে শ্যামাপ্রসাদ মুখার্জির জন্মদিন, ৬ জুলাই পর্যম্ত ব্লক পর্যায়ে 'গ্রামে চলো'কর্মসূচি নেওয়া হয়েছে৷‌ কেন্দ্রীয় সরকারকে কর্মসূচি জানানো হবে৷‌ রাজ্যের কী করা উচিত, তাও বলা হবে৷‌ এস এস সি-র দুর্নীতি নিয়ে জেলায় হবে বিক্ষোভ৷‌ সিদ্ধার্থনাথ বলেন, ফেডেরাল পরিকাঠামোয় উন্নয়ন নিয়ে কেন্দ্র-রাজ্য কথা হবে৷‌ মমতা ব্যানার্জিকেও অদক্ষতার জবাব দিতে হবে৷‌ লোকসভা নির্বাচনে কী কী প্রতিকূলতা এসেছে, কোথায় সন্ত্রাস বেড়েছে, নির্বাচন কমিশনের ভূমিকা আলোচিত হয় দু'দিনের রাজ্য কার্য সমিতির বৈঠকে৷‌ বলেন, মুসলিমরাও ভারতীয়৷‌ তাঁদের উন্নতির জন্য সব রকম চেষ্টা করতে হবে৷‌ বাংলাদেশ থেকে আসা অনুপ্রবেশকারীরা তাঁদের অধিকার হরণ করছে৷‌ এটা থামাতে হবে৷‌ নরেন্দ্র মোদির উদ্দেশ্য বুঝতে পেরে মুসলিমরাও বি জে পি-তে আসছেন৷‌ ওঁরা চলে গেলে তৃণমূল শূন্য হবে৷‌ নরেন্দ্র মোদিকে আমেরিকার আমন্ত্রণ প্রসঙ্গে বলেন, ওরা বুঝতে পেরেছে ভুল করেছিল৷‌

    তৃণমূলের অভিযোগ, বি জে পি সরকার পাশে না দাঁড়িয়ে বাংলাকে অশাম্ত করার চেষ্টা করছে


    দীপঙ্কর নন্দী

    মোদির সরকারকে আক্রমণ করল তৃণমূল৷‌ রবিবার তৃণমূল ভবনে দলের মহাসচিব পার্থ চ্যাটার্জি অভিযোগ করেন, কেন্দ্রের সরকার রাজ্যের পাশে না দাঁড়িয়ে বাংলাকে অশাম্ত করার চেষ্টা করছে৷‌ এর জবাব সাধারণ মানুষই দেবেন৷‌ পার্থ বলেন, ইলামবাজারের ঘটনার পেছনে গ্রাম্যবিবাদ রয়েছে৷‌ এটাতে রাজনৈতিক রঙ লাগানো হচ্ছে৷‌ বাংলাকে ভাগাভাগির চেষ্টা করা হচ্ছে৷‌ দাঙ্গা লাগানোর পরিকল্পনা করা হচ্ছে৷‌ পার্থ বলেন, ২৯ শতাংশ ভোট পেয়ে এরা কেন্দ্রে বসে আছে৷‌ মমতার বাংলাকে অশাম্ত করা যাবে না৷‌ সাম্প্রদায়িক দাঙ্গা এ রাজ্যে লাগানোর চেষ্টা করা হলে মানুষ রুখে দাঁড়াবেন৷‌ বি জে পি-র সর্বভারতীয় নেতা সিদ্ধার্থনাথ সিং এদিন কলকাতায় এসে সরকারের সম্পর্কে অভিযোগ করে যাওয়ার পর পার্থ বলেন, বিমানে করে এসে কিছু বুলি দিয়ে গেছেন ওই নেতা৷‌ বাংলার মাটিতে এসে মমতাকে চ্যালেঞ্জ করার অধিকার এদের নেই৷‌ মমতাকে ভয় দেখিয়ে কোনও লাভ হবে না৷‌ বি জে পি-কে নিয়ে তৃণমূলের যে কোনও দুশ্চিম্তা নেই, তা-ও এদিন পার্থ সাংবাদিক বৈঠকে বুঝিয়ে দেন৷‌ সাংবাদিক বৈঠকে তাঁর সঙ্গে ছিলেন বৈশ্বানর চট্টোপাধ্যায়৷‌ এক প্রশ্নের উত্তরে পার্থ বলেন, বাংলাকে অশাম্ত করলে এখানকার সাধারণ মানুষ ওদের ছাড়বে না৷‌ দিল্লি জুজু দেখিয়ে লাভ হবে না৷‌ এই বাংলায় মমতার নেতৃত্বে যখন উন্নয়ন চলছে, সেই সময় উন্নয়নকে স্তব্ধ করে দেওয়ার পরিকল্পনা নেওয়া হয়েছে৷‌ এই বাংলাকে আমরা বিচ্ছিন্ন করতে দেব না৷‌ এখানে সমস্ত ধর্মের মানুষ শাম্তিতে রয়েছেন৷‌ লোকসভা নির্বাচনে সাধারণ মানুষ আমাদের আশীর্বাদ করেছেন৷‌ ৩৪টি আসনে আমরা জয়ী হয়েছি৷‌ লোকসভা নির্বাচনের পরই মমতা আবার উন্নয়নের কাজ শুরু করেছেন৷‌ এর মধ্যে তিনি উত্তরবঙ্গ ঘুরে এসেছেন৷‌ আরও উন্নয়ন হবে৷‌ আমাদের বিরুদ্ধে কুৎসা, অপপ্রচার করে কোনও লাভ হবে না৷‌ পার্থ এদিন জানান, মমতা সমস্ত ঘটনার ওপর নজর রাখছেন৷‌ আমরাও খবর জোগাড় করছি৷‌ ইলামবাজারের ঘটনা আমরা জানি৷‌ ওখানকার জেলার নেতাদের সঙ্গে কথা হয়েছে৷‌ বি জে পি-র নাম না করে পার্থ বলেন, ইলামবাজারের ঘটনা নিয়ে ওরা রাজনীতি শুরু করেছে৷‌ লোকসভা নির্বাচনের আগেও আমরা এই সাম্প্রদায়িক দলের বিরুদ্ধে প্রতিবাদ করেছি৷‌ মানুষের কাছে গেছি৷‌ এখন এদের বিরুদ্ধে আরও বলতে হবে, তার কারণ, ২৯ শতাংশ ভোট পেয়ে এরা এমন একটা ভাব করছে যেন, হাতে স্বর্গ পেয়ে গেছে৷‌ পার্থর বক্তব্য, এরা বাঙালি-অবাঙালি খেলা শুরু করেছে৷‌ আমরা এখনও বলব, এদের শুভবুদ্ধি জাগ্রত হোক৷‌ আমাদের যাঁরা ভোট দেননি, তাঁদের কাছেও আমার বিনয়ের সঙ্গে অনুরোধ, মমতার উন্নয়নের সঙ্গে আপনারাও সামিল হোন৷‌ মোদির সরকারকে আক্রমণ করে বলেন, এরাও নানারকমের উসকানিমূলক মম্তব্য করছে৷‌ আমার সি পি এমের আমল দেখেছি৷‌ নেত্রীর চুলের মুঠি ধরে মহাকরণ থেকে বের করে দেওয়া হয়েছে৷‌ সুতরাং আমরা অভ্যস্ত হয়ে গেছি৷‌ এটুকু বলব, শাম্ত বাংলা কেউ যেন অশাম্ত করার চেষ্টা না করে৷‌


    কিছু শিক্ষিত বাম মধ্যবিত্তের স্বেচ্ছায় ভোট বি জে পি-কে


    গৌতম রায়


    কলকাতায় শিক্ষিত, মধ্য থেকে উচ্চবিত্ত বামপম্হী সমর্থকদের একটি অংশই এতদিনের বামপম্হা ছেড়ে বি জে পি-কে ভোট দিয়েছে৷‌ সম্প্রতি সি পি এম রাজ্য কমিটির বৈঠকে এই অভিযোগ উঠে এসেছে৷‌ কিন্তু, রাজ্য কমিটির বৈঠকে জমা দেওয়া সি পি এমের কলকাতা জেলা কমিটির রিপোর্টে বিশেষ করে দক্ষিণ কলকাতায় দলের যে-ভোট বি জে পি-র বাক্সে গেছে তার কারণ হিসেবে রাজনৈতিক অশিক্ষার কথা বলা হয়নি৷‌ বরং এমনই ইঙ্গিত করা হয়েছে যে জেনেবুঝে, দলের রাজনৈতিক লাইনের প্রতি অনাস্হায় এঁরা মোদির সাম্প্রদায়িক পুঁজিবাদী লাইন মাথায় করে নিয়েছেন৷‌ সি পি এমের কলকাতা জেলা কমিটির দায়িত্বপ্রাপ্ত হলেন নিরঞ্জন চ্যাটার্জি৷‌ রাজ্য কমিটির বৈঠকে তিনি দক্ষিণ কলকাতা জেলায় দলের নির্বাচনী ফলের হাল-হকিকৎ নিয়ে কথা বলেন৷‌ কলকাতা জেলার সামগ্রিক ফলের হাল- হকিকৎ নিয়ে রাজ্য কমিটির সভায় বলেন মানব মুখার্জি৷‌ জানা গেছে, এই শিক্ষিত মধ্যবিত্তদের একটি অংশ পার্টির না হলেও নানা গণসংগঠনের ছোট থেকে মাঝারি নেতা বিশেষ৷‌ পার্টি ক্ষমতায় ফিরতে না পারায় এঁদের কর্মক্ষেত্রে ও পাড়ায় সামাজিক মর্যাদায় ঘা লেগেছে৷‌ আগের অবস্হা আর নেই৷‌ সেই হতাশা থেকেই এঁরা এই কাজ করেছেন কিনা তা-ও খতিয়ে দেখা হচ্ছে৷‌ যাঁরা কর্মক্ষেত্রে এই বিপদের দিনে সংগঠনের সঙ্গে যোগাযোগ রাখা ছেড়েছেন সন্দেহের আঙুল তাঁদের দিকেই৷‌ অন্যদিকে, উত্তর কলকাতায় পার্টির দায়িত্বে আছেন অনাদি সাহু৷‌ তিনি রাজ্য কমিটির সভায় উত্তর কলকাতায় বি জে পি-র পুরনো জনসঙেঘর সময়কার ভোট বেসের কথা তুলে জানান, এঁরা কংগ্রেস বিরোধী৷‌ এঁদের পরিবার থেকে অনেক কমিউনিস্ট কর্মী পুরনো দিনে বেরোলেও বি জে পি ফ্যা'র হয়ে উঠলে তাঁদের সমর্থন করতে দেখা গেছে৷‌ দলের প্রবীণ রাজ্য কমিটির সদস্যদের অভিযোগ, একটি অংশ, যারা ৮০-র দশকে বামফ্রন্টের প্রবল ক্ষমতার দিনে পার্টিতে এসে বর্তমানে জেলা কমিটির নেতৃত্বে, কোটা পূরণের রাজনীতির ব্যস্ততায় রাজনৈতিক শিক্ষার প্রতি অবহেলায় দিশাহীন অবস্হায় আছে৷‌ রাজনীতির নীতি আদর্শের প্রতি আগ্রহ না থাকায় এঁরা ক্ষমতাহারা হয়ে মাছ জলের বাইরে এলে যে অবস্হা হয় সেই অবস্হায় আছেন৷‌ বহু আগে প্রয়াত সি পি এম নেতা ও দলের তাত্ত্বিক মুখপাত্র 'দেশহিতৈষী'র সম্পাদক সুধাংশু দাশগুপ্ত, সরকার সংগঠনের কাজে অতিব্যস্ত, তাই এঁদের রাজনৈতিক শিক্ষার অভাব নিয়ে বই লিখেছিলেন 'কমরেড সময় কোথায়'৷‌




    'সংঘর্ষ'-সংলাপে সন্ধি মমতা-বিমানে


    mambi

    এই সময় ডিজিটাল ডেস্ক: বাম প্রতিনিধিদলকে নিরাশ করলেন না মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। তবে নিরাপত্তার আশ্বাসের সঙ্গে সঙ্গে বিমান বসুদের প্রতি তাঁর পরামর্শ, নিজেদের ঘর গোছানোয় মন দিন।


    এদিন প্রায় এক ঘণ্টা ধরে বিমানবাবুর সঙ্গে আলোচনা হয় মুখ্যমন্ত্রীর। রাজ্যে বেড়ে চলা হিংসা নিয়ে বাম নেতাকে মমতার আশ্বাস, কড়া হাতেই সন্ত্রাস দমন করবে সরকার। তিনি জানান, কোনও অবস্থাতেই রাজ্যের শান্তি-শৃঙ্খলা নষ্ট করতে দেওয়া হবে না।


    একই সঙ্গে রাজ্যে বিজেপির সাম্প্রতিক আগ্রাসন সম্পর্কে উদ্বেগ প্রকাশ করলে বামফ্রন্ট নেতাকে মুখ্যমন্ত্রী আশ্বাস দেন, কংগ্রেস ও বিজেপিকে সামলে নেওয়ার দায়িত্ব তিনি নিজেই পালন করবেন। উল্টে বর্ষীয়ান নেতাকে তাঁর পরামর্শ, বিজেপিকে নিয়ে মাথা না ঘামিয়ে বরং বামেরা নিজেদের ঘর সামলানোয় মন দিন। বস্তুত, সম্প্রতি বাম সমর্থকদের মধ্যে গেরুয়া বাহিনীতে যোগ দেওয়ার প্রবণতার প্রতি কটাক্ষ করে মমতা বিমানবাবুকে বিষয়টির দিকে নজর দিতে পরামর্শ দেন।


    রাজ্যে একের পর এক হিংসাত্মক ঘটনার জেরে সোমবার নবান্নে মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের সঙ্গে দেখা করতে যান বামফ্রন্ট চেয়ারম্যান বিমান বসুর নেতৃত্বে ১২ সদস্যের বাম প্রতিনিধিদল। দলের তরফ থেকে বিকেল ৫-২০ নাগাদ মুখ্যমন্ত্রীর হাতে স্মারকলিপি তুলে দেওয়া হয়। স্মারকলিপিতে রাজ্যজুড়ে সাম্প্রতিক হিংসার বিরুদ্ধে অভিযোগ জানিয়ে প্রতিকারের আর্জি জানান বামেরা।




    মুখ্যমন্ত্রীর সঙ্গে বৈঠক সেরে বেরিয়ে নবান্নে দাঁড়িয়ে সাংবাদিকদের বিমানবাবু জানান, রাজ্যে ছড়িয়ে পড়া হিংসাত্মক ঘটনা সম্পর্কে মুখ্যমন্ত্রীকে বিস্তারিত জানানো হয়েছে। তিনি জানান, এ ব্যাপারে যথাযত ব্যবস্থা নেওয়ার আশ্বাস দিয়েছেন মমতা। তবে একই সঙ্গে বিমান বসুর সংযোজন, সরকার বিষয়টিতে হস্তক্ষেপ না করলে বামেরা পথে নেমে আন্দোলন করবেন।


    বিধানসভায় গরহাজির ছায়া, ভাঙনের ভয় সিপিএমে


    chhayas

    এই সময়, কলকাতা ও মেদিনীপুর: শরিক দলের পর এ বার ভাঙনের মুখোমুখি সিপিএম পরিষদীয় দলও৷ শারীরিক অসুস্থতার কারণ দেখিয়ে বিধানসভার চলতি অধিবেশনে গরহাজির থাকছেন চন্দ্রকোনার সিপিএম বিধায়ক ছায়া দোলুই৷ প্রকাশ্যে দল ছাড়ার ইঙ্গিতও দিয়েছেন তিনি৷ পশ্চিম মেদিনীপুরের সিপিএম নেতৃত্বের সঙ্গেও নিয়মিত যোগাযোগ রাখছেন না ছায়াদেবী৷ মোবাইলও বন্ধ থাকছে প্রায়ই৷ ফলে ছায়াদেবী সিপিএম ছেড়ে দেবেন কি না তা নিয়ে প্রবল জল্পনা তৈরি হয়েছে৷


    সিপিএম নেতৃত্বের আশঙ্কা বেড়েছে পরপর বাম বিধায়করা শিবির পাল্টে তৃণমূলে যোগ দেওয়ায়৷ সমাজবাদী পার্টির চাঁদ মহম্মদ, ফরওয়ার্ড ব্লকের সুনীল মণ্ডল এবং আরএসপির অনন্তদেব অধিকারী ও দশরথ তিরকে বাম পরিষদীয় দল ভেঙে তৃণমূলে চলে যাওয়ায় বোঝা যাচ্ছে পরিষদীয় দলের উপর বাম নেতৃত্বের নিয়ন্ত্রণ অনেকটাই আলগা হয়েছে৷ এই প্রেক্ষাপটে ছায়া দোলুইয়ের গরহাজিরা প্রবল চাপে ফেলেছে সিপিএম নেতৃত্বকে৷ যদিও ছায়াদেবী দল ছাড়ছেন বলে খবর নেই, এমনই দাবি করছেন পশ্চিম মেদিনীপুরের সিপিএম জেলা সম্পাদক দীপক সরকার৷ দীনেন রায় কিংবা মৃগেন মাইতির মতো জেলা তৃণমূল নেতারা এখনই এ নিয়ে আগ বাড়িয়ে কোনও মন্তব্য করতে নারাজ৷


    দীপকবাবু যতই দাবি করুন না কেন ছায়াদেবী এ দিন বলেন, 'মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের সঙ্গে থাকলে আমার এলাকার উন্নয়নের অনেক কাজ করা সম্ভব হবে৷ সেই জন্য আমি তৃণমূলে যাওয়ার ইচ্ছে প্রকাশ করেছি৷ তবে কবে যাব এখনই বলতে পারছি না৷' ছায়াদেবীর এই মন্তব্য প্রসঙ্গে দীপকবাবু বলেন, 'আমাদের কাছে ছায়া দোলুই দল ছাড়ছে বলে কোনও খবর নেই৷ তার সঙ্গে যোগাযোগ রয়েছে৷ শরীর খারাপ থাকায় সে আপাতত বিধানসভায় যেতে পারছে না৷ নিয়মিত কাজকর্ম করতে পারছে না৷'


    ছায়াদেবীর মনোভাব আন্দাজ করে গত কয়েক দিন ধরে পশ্চিম মেদিনীপুর সিপিএম জেলা সম্পাদকমণ্ডলীর একাধিক সদস্য সক্রিয় হন৷ সুবোধ রায় ও নাজমুল হক যোগাযোগ করেন তাঁর সঙ্গে৷ তখন ছায়াদেবী তাঁদের যুক্তি দেন, 'শরীর ভালো নেই৷ চিকিত্‍সক বিশ্রাম নেওয়ার পরামর্শ দিয়েছেন৷ তাই বাড়ির বাইরে যাচ্ছি না৷'


    দলীয় নেতৃত্বকে এই যুক্তি দিলেও সিপিএম জেলা নেতৃত্ব ছায়াদেবীর শিবির পরিবর্তন নিয়ে অন্য ব্যাখ্যা দিচ্ছেন৷ পশ্চিম মেদিনীপুর জেলা সম্পাদকমণ্ডলীর এক প্রবীণ সদস্যের কথায়, 'ছায়া দোলুই চন্দ্রকোনার যে এলাকায় থাকেন সেখানে তৃণমূলের প্রবল আধিপত্যের কারণে চার-পাঁচটি বুথ এলাকায় সিপিএমের কোনও সংগঠন নেই৷ ওই এলাকায় তৃণমূলের আক্রমণে দু'জন বাম সমর্থক লোকসভা নির্বাচনের প্রচারের সময় মারা গিয়েছেন৷ ফলে তৃণমূলের প্রবল চাপ সামলানোর মতো ক্ষমতা ছায়ার নেই৷ আমাদের পক্ষেও এই বিধায়ককে সে ভাবে সাপোর্ট দেওয়া সম্ভব হচ্ছে না৷' জেলা সিপিএমের আর এক নেতার কথায়, 'ছায়া দোলুই পার্টি সদস্য হলেও রাজনৈতিক ভাবে পরিপক্ক নয়৷ ওই আসন সংরক্ষিত হওয়ায় তফশিলি জাতির কোনও মহিলাকে পাওয়া যাচ্ছিল না৷ তাই ছায়াকে প্রার্থী করা হয়েছিল৷' তৃণমূলের দিকে এই বিধায়ক পা বাড়িয়ে থাকলেও হাল ছাড়ছেন না সিপিএম নেতৃত্ব৷ জেলা পার্টি থেকে দফায় দফায় ফোন করে বোঝানোর চেষ্টা চলছে ছায়াদেবীকে৷ শরিক দলগুলির পরিষদীয় দলে ভাঙন ধরলেও সিপিএমের পরিষদীয় দল এত দিন অটুট ছিল৷ ফলে ভাঙন ঠেকিয়ে বিড়ম্বনার হাত থেকে রেহাই পেতে মরিয়া দলের একাংশ৷


    সন্ত্রাস বন্ধ না হলে আন্দোলনে নামবে বামেরা, জানিয়ে এলেন মুখ্যমন্ত্রীকে

    সন্ত্রাস বন্ধের দাবি নিয়ে মুখ্যমন্ত্রীর সঙ্গে বৈঠক করলেন বামফ্রন্ট চেয়ারম্যান বিমান বসু। ঘণ্টা খানেক বৈঠক চলে দুপক্ষের। অভিযোগ খতিয়ে দেখার আশ্বাস দিয়েছেন মুখ্যমন্ত্রী। সন্ত্রাস মোকাবিলায় শাসক ও বিরোধীদের মধ্যে সমন্বয় চেয়েছেন তিনি। বৈঠক শেষে ফ্রন্ট চেয়ারম্যান জানিয়েছেন এরপরেও ব্যবস্থা না নিলে রাস্তায় নেমে আন্দোলন করবে বামফ্রন্ট।


    রাজ্যজুড়ে লাগাতার সন্ত্রাস। ঘরছাড়া তাদের বহু কর্মী,সমর্থকেরা। দীর্ঘদিন ধরেই সন্ত্রাস বন্ধের দাবিতে সরব বামেরা। মিটিং মিছিল, রাস্তায় নেমে আন্দোলন। অসংখ্যবার মুখ্যমন্ত্রীকে চিঠিও দিয়েছেন সূর্যকান্ত মিশ্র। জবাব মেলেনি। রাজ্যে সরকার ও বিরোধী দলের এই সম্পর্কের মধ্যেই বিমান বসুর নেতৃত্বে বামফ্রন্টের প্রতিনিধিদের সঙ্গে দেখা করলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। নবান্নে প্রায় একঘণ্টার বেশি সময় বাম প্রতিনিধিদের সঙ্গে বৈঠক হয় মুখ্যমন্ত্রীর। মুখ্যমন্ত্রীর হাতে তুলে দেওয়া হয় সন্ত্রাসের তালিকা। বৈঠক করলেও মুখ্যমন্ত্রী আদৌ কতটা ব্যবস্থা নেবেন তা নিয়ে সংশয়ে বাম নেতৃত্ব।


    মুখ্যমন্ত্রী এদিন বাম প্রতিনিধিদলকে প্রস্তাব দেন তাদের মধ্যে কেউএকজন রাজ্য সরকারের সঙ্গে সমন্বয় রক্ষা করবেন। বামেদের তরফে রবিন দেব সরকার পক্ষের তরফে পার্থ চট্টোপাধ্যায়ের ওপর সমন্বয় রক্ষার ভার ন্যস্ত হয়েছে। পরবর্তী সময়ে কোনও ঘটনা ঘটলেই পার্থ বাবুকে তা জানাবেন রবীন দেব। প্রয়োজনে সরাসরি মুখ্যমন্ত্রীকেও ফোন করে জানাতে পারবেন বিরোধীরা। এদিন বিধানসভাতেও রাজ্যে সন্ত্রাস নিয়ে সরব হন বাম বিধায়করা। সন্ত্রাস নিয়ে আনা হয় মুলতুবি প্রস্তাব। পরে ওয়াকআউট করেন বাম বিধায়করা।


    রাজ্যের সন্ত্রাস বন্ধের জন্য বাম প্রতিনিধিদের সঙ্গে মুখ্মন্ত্রী নিজে বৈঠক করছেন নিঃসন্দেহে তাত্‍পর্যপূর্ণ ঘটনা,বিরল ছবি। কারন বামেদের এই সন্ত্রাসের দাবিকে এরআগে কখনও আমলই দেয়নি রাজ্য সরকার। তাহলে হঠাত্‍ কেন এই ভোলবদল? তা নিয়েই রাজনৈতিকমহলে আলোচনা তুঙ্গে।

    লাগাতার আন্দোলনের পথেই

    নতুন পরিস্থিতির মেকাবিলা

    নির্বাচনী পর্যালোচনার পরে জানালো কেন্দ্রীয় কমিটি

    নিজস্ব প্রতিনিধি

    নয়াদিল্লি, ৯ই জুন- রাজনৈতিক লাইন ও সাংগঠনিক কাজের ধারার পর্যালোচনা করবে সি পি আই (এম)। লোকসভা নির্বাচনের বিশদ পর্যালোচনার পরে পার্টির কেন্দ্রীয় কমিটি এই সিদ্ধান্ত নিয়েছে। জনগণের জীবনজীবিকার প্রশ্নে ধারাবাহিক আন্দোলন গড়ে তোলার কথাও ঘোষণা করেছে পার্টি। কেন্দ্রীয় কমিটির দু'দিনব্যাপী বৈঠক হয় শনিবার ও রবিবার। সেই বৈঠকের সিদ্ধান্তের সারসংক্ষেপ সোমবার জানানো হয়েছে।


    কেন্দ্রীয় কমিটির বিবৃতিতে বলা হয়েছে: কেন্দ্রীয় কমিটি লোকসভা নির্বাচনের পর্যালোচনা রিপোর্ট নিয়ে আলোচনা করেছে, তা গৃহীত হয়েছে। কেন্দ্রীয় কমিটিতে গভীর ভাবে আলোচনা হয়েছে, পার্টির খারাপ ফলাফল নিয়ে খুঁটিয়ে মূল্যায়ন করা হয়েছে। পার্টির স্বাধীন শক্তির প্রসার ঘটাতে ব্যর্থতা এবং পার্টির গণভিত্তি হ্রাসের প্রতিফলন পড়েছে নির্বাচনী ফলাফলে। এই ব্যর্থতার মূল দায়িত্ব গ্রহণ করেছে পলিট ব্যুরো ও কেন্দ্রীয় কমিটি।


    পশ্চিমবঙ্গে পার্টি ও বামফ্রন্টের গুরুতর পরাজয় ঘটেছে। পশ্চিমবঙ্গের নির্বাচনী ফলাফলের পর্যালোচনাও করেছে কেন্দ্রীয় কমিটি। পশ্চিমবঙ্গে পার্টির কাজের ধারার পুনর্বিন্যাস এবং জনগণের সঙ্গে নিবিড় সম্পর্ক স্থাপনে কী কী রাজনৈতিক ও সাংগঠনিক পদক্ষেপ নিতে হবে, তা নিয়েও কেন্দ্রীয় কমিটি আলোচনা করেছে। শ্রমজীবী জনগণের সমস্যা নিয়ে আন্দোলন-সংগ্রাম গড়ে তোলায় অগ্রণী ভূমিকা নেবে পার্টি। ধারাবাহিক আক্রমণের মুখে থাকা পার্টিকর্মী ও সমর্থকদের রক্ষা করতে এখনই পদক্ষেপ নেওয়া হবে।


    নজিরবিহীন জয়ের জন্য ত্রিপুরা রাজ্য কমিটিকে কেন্দ্রীয় কমিটি অভিনন্দন জানিয়েছে। পার্টি ও বামফ্রন্ট সেখানে ৬৪.৪শতাংশ ভোট পেয়েছে, দুই আসনেই বিপুল ব্যবধানে জয়ী হয়েছে।


    সংশোধনাত্মক পদক্ষেপ নেবার লক্ষ্যে কেন্দ্রীয় কমিটি রাজনৈতিক লাইন এবং সাংগঠনিক কাজের ধারা পর্যালোচনা করার সিদ্ধান্ত নিয়েছে। পার্টি জনগণের মধ্যে যাবে, জনগণের সঙ্গে নিবিড় সম্পর্ক গড়ে তুলবে, জনগণের জীবনজীবিকার স্বার্থে এবং ধর্মনিরপেক্ষতা ও গণতান্ত্রিক অধিকার রক্ষায় নিরন্তর সংগ্রাম-আন্দোলন পরিচালনা করবে। দেশে নতুন রাজনৈতিক পরিস্থিতিতে উদ্ভূত চ্যালেঞ্জের মোকাবিলা করার ঐক্যবদ্ধ শপথ নিয়েছে কেন্দ্রীয় কমিটি।


    তৃণমূলের হিংসার নিন্দা


    পশ্চিমবঙ্গে পার্টির কর্মী ও বামপন্থী সমর্থকদের ওপরে তৃণমূল কংগ্রেসের লাগাতার হিংসা ও আক্রমণের নিন্দা করেছে কেন্দ্রীয় কমিটি। নির্বাচনী প্রচার এবং নির্বাচনোত্তর হিংসায় ১০ সি পি আই (এম) কর্মী ও সমর্থক খুন হয়েছেন। পশ্চিমবঙ্গে গণতন্ত্র রক্ষার দাবিতে, হিংসার বিরুদ্ধে দেশব্যাপী সংহতিমূলক প্রচারের জন্য পার্টি ও বামপন্থী শক্তির কাছে কেন্দ্রীয় কমিটি আহ্বান জানিয়েছে।




    নতুন সরকার


    নরেন্দ্র মোদী সরকার ক্ষমতায় আসার পরে জনগণ প্রত্যাশা করছেন মূল্যবৃদ্ধি, কর্মহীনতা, কৃষিতে দুর্দশা, নারীদের বিরুদ্ধে ক্রমবর্ধমান অপরাধের মতো তীব্র সমস্যাগুলির সুরাহা হবে।


    কিন্তু বি জে পি সরকারকে দেখে মনে হচ্ছে তারা বিভেদমূলক বিষয়গুলি উত্থাপনেই বেশি আগ্রহী। এক মন্ত্রী সংবিধানের ৩৭০নং ধারা বিলোপের কথা বলায় গুরুতর আশঙ্কা তৈরি হয়েছে। এর ফলে কাশ্মীরের মানুষের মধ্যে বিচ্ছিন্নতা বাড়াবে। ভারতীয় যুক্তরাষ্ট্রে সংযুক্ত হবার সময়ে জম্মু কাশ্মীরের মানুষকে দেওয়া বিশেষ মর্যাদার অঙ্গীকার খর্ব হয় এমন কোনো কিছুই করা উচিত হবে না।


    প্রতিরক্ষা উৎপাদন এবং বীমার মতো অন্যান্য ক্ষেত্রে প্রত্যক্ষ বিদেশী বিনিয়োগ বৃদ্ধির উদ্যোগ নেওয়া হচ্ছে। সি পি আই (এম) এইসব পদক্ষেপের বিরোধী। খনি এবং বিদ্যুৎ ক্ষেত্রে প্রচুর সংখ্যক প্রকল্পকে পরিবেশ ছাড়পত্র দেওয়ার উদ্যোগও নেওয়া হয়েছে। এমন প্রকল্পও আছে যার ফলে পরিবেশের ক্ষতি এবং এলাকার আদিবাসী মানুষের অধিকারের ওপরে গুরুতর প্রভাব পড়ার আশঙ্কা রয়েছে। পরিবেশের কথা বিবেচনা না করে, স্থানীয় মানুষ ও আদিবাসীদের অধিকারের কথা বিবেচনা না করে এমন পদক্ষেপ নেওয়া থেকে মোদী সরকারকে বিরত থাকতে হবে।




    পরপর সাম্প্রদায়িক ঘটনা


    লোকসভা নির্বাচন শেষ হওয়া মাত্র এবং নতুন সরকার ক্ষমতায় আসার পরে দেশজুড়ে বেশ কয়েকটি সাম্প্রদায়িক ঘটনা ঘটে গেছে। গুজরাট, মহারাষ্ট্র, উত্তর প্রদেশ, কর্ণাটক এবং অন্যান্য জায়গায় সাম্প্রদায়িক সংঘর্ষের ঘটনা ঘটেছে। পুনেয় হিন্দু রাষ্ট্র সেনার হাতে এক তরুণ মুসলিম তথ্য প্রযুক্তি কর্মীর নৃশংস হত্যার ঘটনা ঘটেছে। মনে হচ্ছে, বিজয়ের মনোভাব সাম্প্রদায়িক ঘটনা ঘটাচ্ছে এবং সংখ্যালঘু সম্প্রদায় তার লক্ষ্যবস্তু হয়ে যাচ্ছে। কেন্দ্রীয় কমিটি জোরালো ভাবে এইসব হামলার নিন্দা করেছে এবং সমস্ত ধরনের সাম্প্রদায়িকতার বিরোধিতা করার সঙ্গে সঙ্গে সংখ্যালঘু অংশকে রক্ষা করার লক্ষ্যে কাজ করার কথা ঘোষণা করেছে।


    মহিলাদের বিরুদ্ধে ক্রমবর্ধমান অপরাধ


    মহিলা ও শিশুদের বিরুদ্ধে যৌন অত্যাচারের ঘটনা ক্রমশ বাড়ছে। প্রশ্ন উঠছে ভারত কি মহিলাদের পক্ষে নিরপাদ এক দেশ? নারীদের ওপরে আক্রমণ মোকাবিলার রাজনৈতিক সদিচ্ছার অভাব প্রতিফলিত হয়েছে বাদাউনের মতো উত্তর প্রদেশে একের পর এক মহিলার ধর্ষণ ও খুনের ভয়াবহ ঘটনায়। রাজ্য সরকার নিজের পুলিস বাহিনী-সহ কোথাও আইন শৃঙ্খলার অবনতি আটকাতে পারেনি। তার বদলে সমাজবাদী পার্টির শীর্ষ স্তরের নেতারা ধর্ষণের ঘটনাকে তুচ্ছ করে দেখিয়েছেন এবং এই ধরনের ঘটনায় পুলিস ও অফিসারদের অবহেলাকে উৎসাহিত করেছেন।


    রাজস্থানে যৌন আক্রমণের ঘটনার বৃদ্ধি ঘটেছে। মুখ্যমন্ত্রীর নিজের কেন্দ্রেও আক্রান্তরা বিচার পাননি। বি জে পি শাসিত মধ্য প্রদেশ ও ছত্তিশগড়ের স্বরাষ্ট্রমন্ত্রীদের স্তম্ভিত করে দেবার মতো বিবৃতি প্রমাণ করে তাঁরা কতটা সংবেদনহীন। এই প্রশ্নও তোলে যে কোনোদিনই ওই রাজ্যের আক্রান্তরা সুবিচার পেতে পারে কিনা। পশ্চিমবঙ্গেও বিরতিহীন ভাবে মহিলাদের ওপরে আক্রমণ চলছে। কেন্দ্রীয় কমিটি দাবি জানিয়েছে এই সমস্ত ঘটনায় রাজ্য সরকারগুলি দৃঢ় ও কার্যকর পদক্ষেপ গ্রহণ করুক। এই ধরনের অপরাধ সহ্য করা হবে না, এই মর্মে কড়া বার্তা দিক।

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    রাজনৈতিক লাইনের পর্যালোচনা হবে:কারাত

    নিজস্ব প্রতিনিধি

    নয়াদিল্লি, ৯ই জুন— জনগণের কাছে যাওয়া, তাঁদের জীবন-জীবিকার সমস্যা নিয়ে নিরবচ্ছিন্ন সংগ্রাম গড়ে তোলাই মূল লক্ষ্য। সোমবার সাংবাদিক সম্মেলনে আগামী দিনের কর্মসূচী নিয়ে একথা জানালেন সি পি আই (এম)-এর সর্বভারতীয় সাধারণ সম্পাদক প্রকাশ কারাত।


    শনিবার এবং রবিবার কেন্দ্রীয় কমিটির দু'দিনের বৈঠক শেষে এদিন সাংবাদিক সম্মেলনে লোকসভা নির্বাচনের ফলাফল নিয়ে বিভিন্ন প্রশ্নের জবাব দেন কারাত। নির্বাচনে ফলাফল নিয়ে কেন্দ্রীয় কমিটিতে আলোচনা হয়েছে। কেন্দ্রীয় কমিটি পর্যালোচনা রিপোর্ট গ্রহণ করেছে। পশ্চিমবঙ্গের নির্বাচনে পার্টি এবং বামফ্রন্টের ফল ভালো হয়নি। এক্ষেত্রে পশ্চিমবঙ্গে রাজনৈতিক ও সাংগঠনিক কিছু পদক্ষেপ নেওয়ার কথাও আলোচিত হয়েছে। তবে সামগ্রিকভাবেই দেশজুড়ে পার্টির জনভিত্তি এবং নিজস্ব শক্তি হ্রাস পেয়েছে, তা স্পষ্ট জানিয়ে দিলেন কারাত। পার্টির প্রসার ঘটাতে এবং সমর্থনের ভিত্তি হ্রাসের ঘটনায় ব্যর্থতার মূল দায়িত্ব পলিট ব্যুরো এবং কেন্দ্রীয় কমিটির, তা কারাত জানিয়ে দেন। জনগণের কাছে যাওয়া, তাঁদের জীবন-জীবিকার সমস্যা নিয়ে নিরবচ্ছিন্ন সংগ্রাম গড়ে তোলার মধ্য দিয়ে পার্টির নিজস্ব শক্তি বৃদ্ধি ও জনভিত্তি বাড়ানো দরকার বলে তিনি জানান।


    লোকসভা নির্বাচনের ফলাফল থেকে স্পষ্ট, কীভাবে পার্টির জনসমর্থন প্রসারের কাজ এগোতে পারেনি। পশ্চিমবঙ্গই শুধু নয়, সারাদেশে পার্টির প্রসারের কাজে ব্যর্থতা রয়েছে। কারাত এ প্রসঙ্গে এক প্রশ্নে বললেন, 'সামগ্রিকভাবে সর্বভারতীয় ক্ষেত্রে পার্টির নিজস্ব শক্তিবৃদ্ধি এবং তার জনভিত্তি প্রসারিত করার কাজ ব্যর্থ হয়েছে। ২০১৪ সালের নির্বাচনে আরও প্রকট হয়েছে। যা ২০০৯ সালে এত প্রকট ছিলো না। এটা শুধু পশ্চিমবঙ্গের কথা নয়। সর্বভারতীয় ক্ষেত্রে এই প্রবণতা। ফলে এর দায়িত্ব পলিট ব্যুরো এবং কেন্দ্রীয় কমিটির। ব্যর্থতার এই দায় স্বীকার করছে পলিট ব্যু‍‌রো এবং কেন্দ্রীয় কমিটি।'


    এদিন পশ্চিমবঙ্গে লোকসভা ভোটের ফলাফল নিয়ে বিভিন্ন প্রশ্নের জবাব দেন কারাত। তিনি বলেন, পশ্চিমবঙ্গে ভোটে রিগিং হয়েছে। মোট ৭৭ হাজার বুথের মধ্যে ১০ হাজার বুথে পুরো রিগিং হয়েছে এবং ৭ হাজার বুথে আংশিক রিগিং হয়েছে। কিন্তু হারের কারণ শুধু রিগিংই নয়। জনসমর্থন হ্রাসের বিষয়টি ২০০৯ এবং ২০১১ সালের নির্বাচনেও লক্ষ্য করা গেছে। কিন্তু ঐ প্রবণতাকে আমরা আটকাতে সক্ষম হইনি। অন্যদিকে বি জে পি এবং নরেন্দ্র মোদীর প্রভাব পড়েছে। তাদের ঐ উত্থানকে আমরা খাটো করে দেখেছি। তৃণমূল কংগ্রেসের বিরুদ্ধে মানুষের ক্ষোভ ছিলো। তৃণমূল-বিরোধী ভোট বামপন্থীরাই পাবে বলে ভাবা হয়েছিল। কিন্তু বি জে পি ঐ ভোট অনেকটা পেতে সক্ষম হয়েছে। তিনি বলেন, দেশে কংগ্রেস-বিরোধী হাওয়া ছিল। মোদীর পক্ষে হাওয়ার বদলে কংগ্রেস-বিরোধী হাওয়া প্রবল ছিল। বি জে পি ও মোদীর নিপুণ প্রচারে ঐ ক্ষোভের বিরুদ্ধে ফসল তারা তুলতে সক্ষম হয়। কেরালার ফলাফল নিয়ে তিনি বলেন, কেরালায় বিধানসভা এবং লোকসভার ফলাফলে পার্থক্য হয়। আমরা ভেবেছিলাম এবারে তা ঘোচানো যাবে। কিন্তু তা সম্ভব হয়নি। আমরা যেরকম আশা করেছি, সেরকম ফল হয়নি, যেমন কোঝিকোড়, আলেপ্পি এবং কুইলনে আমরা জিতবো আশা করেছিলাম, তা হয়নি।


    এদিকে পার্টিতে পদত্যাগ নিয়ে প্রশ্নে কারাত বলেন, কেউ পদত্যাগ করতে চাননি। বুদ্ধদেব ভট্টাচার্যকে নিয়ে এক প্রশ্নের উত্তরে তিনি বলেন, কলকাতায় আমি ছিলাম। সেই সময় তিনি এসব পদত্যাগের কথা বলেননি। বিগত পার্টি কংগ্রেসের সময় শারীরিক অসুস্থতার জন্য তিনি সরতে চান। তারপরে আর কখনও এসব প্রসঙ্গ আসেনি। আসলে দেশে পার্টির সম্প্রসারণ ও শক্তিবৃদ্ধির কাজ রূপায়িত করার মূল দায়িত্ব হলো পলিট ব্যুরো এবং কেন্দ্রীয় কমিটির। আমরা সেই দায়িত্ব পালনে ব্যর্থ হয়েছি। এক্ষেত্রে রাজনৈতিক ও সাংগঠনিক কী কী ত্রুটি ছিল, তা বিশ্লেষণ করা হয়েছে। রাজনৈতিক লা‍‌ইনে কিছু ত্রুটি ছিল কিনা, তা দেখা হবে। রাজনৈতিক লাইন নিয়ে এক প্রশ্নে তিনি বলেন, বিগত পার্টি কংগ্রেসে যে লাইন গৃহীত হয়েছে, সেটাই আমাদের বর্তমান পার্টি লাইন। তা নিয়ে পর্যালোচনা হবে। পার্টি কংগ্রেস আগামী এপ্রিলে হওয়ার কথা। সেখানে এসব বিষয়ে আলোচনা হবে। তিনি বলেন, পার্টি কংগ্রেসের প্রস্তুতির সঙ্গে সঙ্গে এসব বিষয়ে পর্যালোচনা হবে। তিনি জানান বামপন্থী বুদ্ধিজীবীদের নিয়ে একটি টিম গঠন করা হবে। উদারনীতি ও বিশ্বায়নের সঙ্গে সঙ্গে পরিবর্তন এসেছে সামাজিক জীবনে। শ্রমিক ও মধ্যবিত্তদের মধ্যে জীবনচর্চার মধ্যে পরিবর্তন এসেছে, তা পর্যালোচনা করে এতে লড়াই-সংগ্রাম পরিচালনার মধ্যে কৌশলগত কোনো ত্রুটি আছে কিনা, তা খতিয়ে দেখবে ঐ দল। পরে আগামী পার্টি কংগ্রেসেই এ বিষয়টি চূড়ান্ত হবে।


    পশ্চিমবঙ্গে সংখ্যালঘু ভোট নিয়ে কারাত বলেন, বামপন্থীদের থেকে সংখ্যালঘু ভোট সরে গেছে, এটা বলা বোধহয় ঠিক হবে না। আমরা রায়গঞ্জ এবং মুর্শিদাবাদে জিতেছি। সেখানে সংখ্যালঘু মানুষই আমাদের সমর্থন করেছেন। তবে যেটা দেখা যাচ্ছে, তা হলো, তৃণমূল কংগ্রেস যে সমর্থন পেয়েছিল সংখ্যালঘুদের কাছ থেকে, সেটা তাদের রয়েছে।


    এদিকে সংগঠনের কাজের ধারার ক্ষেত্রে পশ্চিমবঙ্গে কোনো দুর্বলতা রয়েছে কিনা, তা নিয়ে আলোচনা হয়েছে। রাজ্যের সাংগঠনিক দুর্বলতা দূর করার মধ্যে জনগণের সঙ্গে যোগাযোগ আরও নিবিড় করে তোলার উপর জোর দেওয়া হয়েছে কেন্দ্রীয় কমিটির বৈঠকে। এক প্রশ্নে কারাত বলেন, কেন্দ্রের মোদী সরকারের ক্ষমতায় আসার সঙ্গে সঙ্গে সাম্প্রদায়িক কার্যকলাপ বেড়েছে। গুজরাট, মহারাষ্ট্র, উত্তর প্রদেশ, কর্ণাটকে সাম্প্রদায়িক সংঘর্ষের ঘটনা ঘটেছে। কেন্দ্রের উচিত, এসব ঘটনার রোধে যাবতীয় উদ্যোগ গ্রহণ করা। মোদীর আর্থিক নীতি নিয়ে এক প্রশ্নে বলেন, সরকারের পুরো নীতির বিষয়টি সামনে আসুক। তারপরে এ নিয়ে বলা যাবে।


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    বামেরা মুছে গেলে বিজেপির লাভ, আজ মমতাকে বলবেন বিমানেরা


    mamata-biman

    এই সময়: বিরোধী বামেদের উপর শাসকদলের লাগাতার হামলা-আক্রমণের ফলেই রাজ্যে বিজেপির বাড়বাড়ন্ত হচ্ছে৷ মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় অবিলম্বে মারমুখী দলীয় কর্মীদের নিয়ন্ত্রণ করতে না-পারলে রাজ্যের ধর্মনিরপেক্ষ কাঠামো ভেঙে পড়বে৷ যা আদতে তৃণমূলকেও কঠিন চ্যালেঞ্জের মুখে ফেলে দেবে৷ আজ সোমবার বিমান বসুর নেতৃত্বে বামফ্রন্টের প্রতিনিধি দল নবান্নে মুখ্যমন্ত্রীকে মুখোমুখি এই বার্তাই দিতে চাইছেন৷


    আজ বিকেল পাঁচটায় বিমানবাবুর নেতৃত্বে ১২ সদস্যর বাম প্রতিনিধি দল মুখ্যমন্ত্রীর সঙ্গে দেখা করবে৷ সে দলে থাকবেন আরএসপির রাজ্য সম্পাদক ক্ষিতি গোস্বামী, সিপিআই রাজ্য সম্পাদক মঞ্জুকুমার মজুমদার, ফরওয়ার্ড ব্লকের রাজ্য সম্পাদকমণ্ডলীর সদস্য জয়ন্ত রায়৷ যেতে পারেন বিরোধী দলনেতা সূর্যকান্ত মিশ্রও৷ নবান্নে যাওয়ার আগে দুপুরে আলিমুদ্দিন স্ট্রিটে ফ্রন্ট নেতৃত্ব ঘরোয়া বৈঠকে বসবেন৷ মুখ্যমন্ত্রীর কাছে বামফ্রন্টের তরফে যে স্মারকলিপি জমা দেওয়া হবে, তার বয়ান চূড়ান্ত করা হবে৷ এদিনই আবার বিজেপির একটি প্রতিনিধিদল দেখা করবে রাজ্য পুুলিশের ডিজির সঙ্গে৷


    রাজ্যে তৃণমূল ক্ষমতায় আসার পর বিরোধী দলনেতা সূর্যকান্ত মিশ্রের নেতৃত্বে বামেদের একটি দল মহাকরণে মুখ্যমন্ত্রীর সঙ্গে সাক্ষাত্‍ করেছিল৷ এ ছাড়া আনিসুর রহমানের মতো বাম বিধায়করা পৃথক প্রতিনিধি দল নিয়ে একাধিকবার মন্ত্রিসভার গুরুত্বপূর্ণ মন্ত্রীদের সঙ্গে সাক্ষাত্‍ করে দাবি জানিয়েছেন৷ উত্তর ২৪ পরগনার মতো জেলার বামফ্রন্ট নেতারাও নবান্নতে গিয়ে গুরুত্বপূর্ণ মন্ত্রীদের কাছে বিভিন্ন ইস্যুতে স্মারকলিপি জমা দিয়েছেন৷ কিন্ত্ত বিমান বসু তৃণমূলের এই ৩৫ মাসের শাসনে কখনও মহাকরণ কিংবা নবান্নে যাননি৷ তবে মুখ্যমন্ত্রী হিসেবে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের শপথের দিন রাজভবনে তিনি ও বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য উপস্থিত ছিলেন৷ তার পর ২০১১-র ৯ ডিসেম্বর, আমরিতে অগ্নিকাণ্ডের দিন এসএসকেএমে বিমানবাবুর সঙ্গে সাক্ষাত্‍ হয়েছিল মমতার, যেখানে সূর্যকান্তবাবুও উপস্থিত ছিলেন৷ সেই ঘটনার পর ফের আজ মুখোমুখি হতে চলেছেন রাজ্য রাজনীতির দুই প্রধান সেনাপতি৷


    মূলত লোকসভা নির্বাচন পরবর্তী রাজনৈতিক হিংসা ও সন্ত্রাস নিয়েই মুখ্যমন্ত্রীর হস্তক্ষেপ চাইবে প্রতিনিধি দল৷ স্মারকলিপির সঙ্গে হামলা-আক্রমণের একটি ঘটনাপঞ্জিও জমা দেওয়া হতে পারে৷ এর সঙ্গে ঘরছাড়াদের তালিকা জমা দেওয়া হবে কি না, তা আজকে বাম নেতাদের ঘরোয়া বৈঠকে চূড়ান্ত হবে৷ সন্ত্রাস বন্ধ করার আর্জি জানানোর পাশে ঘরছাড়াদের ঘরে ফেরানো এবং মিথ্যা মামলা প্রত্যাহারের দাবিও করবেন বাম নেতৃত্ব৷


    সিপিআই-এর রাজ্য সম্পাদক মঞ্জুকুমার মজুমদারের বক্তব্য, 'মহিলাদের উপর আক্রমণ হচ্ছে৷ যাঁরা আক্রান্ত হচ্ছেন, তাঁদের বিরুদ্ধে মিথ্যা মামলা দেওয়া হচ্ছে৷ গণতান্ত্রিক আন্দোলন করতে দেওয়া হচ্ছে না৷ পার্টি অফিস ভেঙে গুঁড়িয়ে দেওয়া হচ্ছে৷ এই পরিস্থিতি পরোক্ষে বিজেপিকে সাহায্য করছে৷ মুখ্যমন্ত্রীর সামনে এই পরিস্থিতি তুলে ধরব আমরা৷' মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় যদি নিজের দলকে নিয়ন্ত্রণ করতে না-পারেন, তা হলে বিজেপির উত্থান আটকানো তৃণমূলের পক্ষেও সম্ভব নয়, এই বার্তা মুখ্যমন্ত্রীকে সরাসরি দিতে চাইছে আরএসপি নেতৃত্বও৷ দলের কেন্দ্রীয় কমিটির সদস্য মনোজ ভট্টাচার্যের কথায়, 'ইমামভাতার মতো পদক্ষেপের জন্য ইতিমধ্যে এই সরকার সংখ্যালঘুদের তোষণ করছে বলে ধারণা তৈরি হয়েছে৷ এখন তৃণমূলের হামলার মুখে বহু বাম সমর্থকও আশ্রয়ের আশায় বিজেপির ছাতার তলায় যাচ্ছে, এমনকি মুসলিমদের একাংশ তৃণমূলের সন্ত্রাস থেকে রক্ষা পাওয়ার জন্য বিজেপিতে যাচ্ছে৷ বিজেপির এই বাড়বাড়ন্ত রাজ্যের ধর্মনিরপেক্ষ পরিমণ্ডলকে ভেঙে দিতে পারে৷' তৃণমূলের সন্ত্রাস বন্ধের দাবিতেই তাঁরা নবান্নে যাচ্ছেন বলে জানিয়েছেন ফরওয়ার্ড ব্লক নেতা জয়ন্ত রায়৷

    তৃণমূলের 'ঠ্যাঙারেদের'শিক্ষা দেওয়ার হুমকি আরএসএসের


    tatha

    এই সময়: পাল্টা মারের হুমকি রাষ্ট্রীয় স্বয়ংসেবক সংঘের৷ লোকসভা নির্বাচনের পর একের পর এক ঘটনায় বিজেপি কর্মীরা আক্রান্ত হওয়ায় প্রতিরোধে এগিয়ে আসার দায়িত্ব নিয়েছে হিন্দুত্ববাদী সংগঠনটি৷ বারুইপুরে সভা করে আরএসএস নেতৃত্ব জানিয়ে দিয়েছেন, তাঁরা গান্ধীবাদী নন৷ মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের নাম করে তাঁর উদ্দেশে আরএসএস কর্মী হিসাবে নিজেকে পরিচয় দিয়ে বিজেপি নেতা তথাগত রায় বলেন, 'আপনার ঠ্যাঙারে বাহিনীকে এমন শিক্ষা দেব যে কোন কূল খুঁজে পাবেন না৷' বিজেপির পক্ষ থেকেও সন্ত্রাসের অভিযোগ নিয়ে তৃণমূলের উপর লাগাতার চাপ সৃষ্টির কৌশল নেওয়া হচ্ছে৷


    সোমবার নবান্নে গিয়ে পুলিশের ডিজির সঙ্গে দেখা করে এর বিহিত চাইবে বিজেপির প্রতিনিধি দল৷ কোথাও দলীয় কর্মীরা আক্রান্ত হলেই সেখানে ছুটে যাচ্ছেন বিজেপি নেতারা৷ বীরভূমের ইলামবাজারে রবিবার গিয়েছিল দলের সাধারণ সম্পাদক শমীক ভট্টাচার্যের নেতৃত্বে কয়েকজন নেতা৷ তাঁদের মধ্যে ছিলেন প্রাক্তন আইপিএস অফিসার আর কে মহান্তি৷ ইলামবাজারের কানুর গ্রামে নিহত শেখ রহিমের বাড়িতে গিয়েছিলেন তাঁরা৷ তৃণমূলের হামলায় শনিবার সেখানে শেখ রহিম খুন হয়েছিলেন বলে বিজেপির অভিযোগ৷


    বিজেপির উপর হামলা অবশ্য রবিবারেও অব্যাহত৷ আরামবাগে বিজেপির এক কর্মীকে তৃণমূলের দপ্তরে ডেকে মারধর করা হয়েছে বলে অভিযোগ৷ মারের চোটে সংজ্ঞাহীন হয়ে পড়েন ওই কর্মী চিন্ময় মালিক৷ দক্ষিণ ২৪ পরগনার বাসন্তীতে আক্রান্ত হন তিন বিজেপি কর্মী৷ আহত অবস্থায় তাঁদের বাসন্তী গ্রামীণ হাসপাতালে ভর্তি করা হয়৷ তৃণমূল অবশ্য অভিযোগ অস্বীকার করে৷

    এই ঘটনাগুলির উল্লেখ করে বারুইপুরের সভায় কড়া বার্তা দেওয়া হয় আরএসএসের পক্ষ থেকে৷ বিজেপি নেতা তথাগত রায় ছিলেন ওই সভার প্রধান বক্তা৷ তিনি মুখ্যমন্ত্রীর উদ্দেশে বলেন, 'দিদি, এটা করে সিপিএম বাঁচতে পারেনি৷ আপনিও এটা করে টিঁকতে পারবেন না৷ আপনাকে উত্‍খাত হতেই হবে৷' হুমকির সুরেই তিনি বলেন, 'আমাদের গায়ে হাত দেবেন না৷ আমরা গান্ধীবাদী নই৷ আমরা পড়ে পড়ে মার খাব না৷' এমন অবস্থান নিলে কেন্দ্রীয় সরকার যে আরএসএসের পাশেই থাকবে, তাও বুঝিয়ে দেন তিনি৷


    তথাগতবাবু বলেন, 'মনে রাখবেন, দিল্লিতে এখন দুর্বল মনমোহন সিং নেই৷ আছেন নরেন্দ্র মোদী৷' বীরভূমের ইলামবাজারে দলীয় কর্মী খুনের ঘটনায় তৃণমূলের ৫ জন সমর্থককে গ্রেপ্তার করলেও বিজেপি নেতৃত্ব পুলিশের কড়া সমালোচনা করেন৷ সেখানে গিয়ে এ দিন শমীকবাবু বলেন, 'গত সোমবার থেকে ওই গ্রামে উত্তেজনা ছিল৷ আমাদের স্থানীয় নেতারা বারবার পুলিশকে তা জানিয়েও ছিলেন৷ কিন্ত্ত পুলিশ অফিসাররা আমাদের কাছে আজ স্বীকারই করলেন যে শনিবার ওই গ্রামে মোতায়েন পুলিশ পরিস্থিতি সামলাতে ব্যর্থ হয়েছিল৷ পুলিশের সামনেই শেখ রহিমকে বিদ্যুতের খুঁটিতে বেঁধে মেরে ফেলা হয়৷'


    মহিলারাও তৃণমূলের হামলা থেকে রেহাই পাননি বলে বিজেপি নেতারা জানিয়েছেন৷ তাতে সায় দেন মৃত রহিমের পরিবারও৷ নিহতের মেয়ে বলেন, 'হামলাকারীরা বাড়ির মেয়েদের জামাকাপড় ছিড়ে দেয় ও শ্লীলতাহানি করে৷' ওই পরিবারের অপর একজন মহিলা বলেন, 'আমি সম্ভ্রম বাঁচাতে একটি পুকুরে ঝাঁপ দিয়েছিলাম৷' পুলিশ এখনও ঘটনাটি তৃণমূলের হামলা বলে মন্তব্য করছে না৷ তবে তৃণমূলের কর্মী বলে পরিচিত ওই এলাকার পাঁচজনকে ধরে বোলপুর আদালতে পাঠিয়ে হেফাজতে নিয়েছে চারদিনের জন্য৷


    মিশন-২০১৬, মুসলিম মন পেতে ঝাঁপাচ্ছে রাজ্য বিজেপি


    rahul-sinha

    এই সময়: রাজ্যে ক্ষমতায় আসার লক্ষ্যে দলের গা থেকে সাম্প্রদায়িকতার তকমা ঝেড়ে ফেলতে মরিয়া বিজেপি বিপন্ন মুসলিমদের পাশে থাকার কৌশল নিচ্ছে৷ এ ব্যাপারে তারা প্রথম ধাপেই হাতিয়ার করছে ইলামবাজারের দলীয় কর্মী শেখ রহিমের খুনের ঘটনাকে৷ সেখানে আক্রান্ত মুসলিমদের পাশে দাঁড়াতে দিল্লি থেকে আসছেন বিজেপির কেন্দ্রীয় সংখ্যালঘু সেলের নেতারা৷ তাঁরা বীরভূমের পাশাপাশি রাজ্যে অন্যত্র সংখ্যালঘুদের 'দুর্দশা' ঘুরে দেখে মোদী সরকারকে রিপোর্ট জমা দেবেন৷ দলের কেন্দ্রীয় মুখপাত্র সিদ্ধার্থনাথ সিং রবিবার কলকাতায় সাংবাদিক বৈঠকে বলেন, 'লোকসভা ভোটে তৃণমূলের মুসলিম ভোটব্যাঙ্কে বিজেপি থাবা বসানোয় মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় আতঙ্কিত হয়েছেন৷ তাই মরিয়া শাসকদল সংখ্যালঘুদের উপর হামলা চালাচ্ছে৷' পাল্টা দিয়ে তৃণমূলের মহাসচিব পার্থ চট্টোপাধ্যায় বলেছেন, 'ধর্মের ভিত্তিতে ভাগাভাগির রাজনীতিকে প্রশয় দিচ্ছে বিজেপি৷ রাজ্যের বাইরে থেকে এসে ওদের নেতা উস্কানিমূলক কথা বলছেন৷'


    হিন্দুত্ববাদী দল হিসাবে পরিচিত বিজেপি থেকে স্বাভাবিক কারণেই বরাবর মুখ ঘুরিয়ে থেকেছে সংখ্যালঘু সম্প্রদায়ের সিংহভাগ মানুষ৷ এ রাজ্যেও এত কাল গেরুয়া শিবিরকে ঠেকাতে বিজেপি বিরোধীদেরই সমর্থন করেছে তারা৷ সদ্যসমাপ্ত লোকসভা ভোটেও এবার কম-বেশি সেই ছবি ধরা পড়েছে৷ কিন্ত্ত রাজ্যে এই অংশের সমর্থন ছাড়া ক্ষমতায় আসা কঠিন, তা উপলব্ধি করেছেন বিজেপি নেতৃত্ব৷ সেই কারণেই ২০১৬-র বিধানসভা নির্বাচনে তৃণমূলকে হঠিয়ে সরকার দখলের লক্ষ্যে এখন থেকেই মুসলিম ভোটব্যাঙ্ককে পাখির চোখ করছে নরেন্দ্র মোদীর দল৷ শনি ও রবিবার দলের রাজ্য কমিটির বৈঠকে লোকসভা ভোটের ফল পর্যালোচনা করতে গিয়ে আলোচনায় বারবার উঠে এসেছে সংখ্যালঘু ভোটারদের প্রসঙ্গ৷ সেখানেই সিদ্ধান্ত হয়, সন্ত্রাসের মুখে পড়ে আতঙ্কিত মুসলিমরা দিশেহারা৷ এই অবস্থায় তাদের পাশে দাঁড়িয়ে নিরাপত্তা দিতে হবে বিজেপিকে৷ তা হলেই সংখ্যালঘুদের মন পাওয়া যাবে৷


    এই সিদ্ধান্ত নেওয়ার পরেই দিল্লিতে দলের কেন্দ্রীয় সংখ্যালঘু সেলের নেতাদের সঙ্গে কথা বলেন রাজ্য নেতৃত্ব৷ রাজ্য সভাপতি রাহুল সিনহার আবেদনে সাড়া দিয়ে কেন্দ্রীয় নেতারা বীরভূমে ঘটনাস্থলে যাওয়ার সিদ্ধান্ত নিয়েছেন৷ পরে সিদ্ধার্থ বলেন, 'কংগ্রেস-সিপিএম-তৃণমূল বরাবর মুসলিমদের ভোটব্যাঙ্ক হিসাবে ব্যবহার করেছে৷ সংখ্যালঘুদের তারা দেশের নাগরিক মনে করেনি কখনও৷' আর এই অংশের ভোটারদের মন কাড়তে হলে বিজেপিকে যে ধর্মনিরপেক্ষ ভাবমূর্তি গড়তে হবে, তা বোঝাতেই সিদ্ধার্থ কার্যত মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়কে চ্যালেঞ্জ ছুড়ে দিয়ে বলছেন, 'বিজেপি কোনও বৈষম্য রাখবে না৷ মোদী মুসলিমদের উন্নয়নের জন্য বিভিন্ন প্রকল্প নিচ্ছেন৷ কারণ মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় ওদের জন্য কিছু করবেন না৷' পার্থবাবু অবশ্য বলছেন, 'বাংলার মাটিতে এসে মমতাকে চ্যালেঞ্জ করার ক্ষমতা বিজেপির নেই৷ ওই দলকে নিয়ে চিন্তা বা দুশ্চিন্তা, কোনটাই আমাদের নেই৷ আমাদের চিন্তা বাংলার মানুষকে নিয়ে৷'


    এই তত্‍পরতা যে ২০১৬-এর বিধানসভা নির্বাচনকে ঘিরে তা রাজ্য কমিটির বৈঠকে জানিয়ে দেন রাজ্য নেতৃত্ব৷ কেন্দ্রীয় স্তর থেকে তেমনই নির্দেশ এসেছে ৬ নম্বর মুরলীধর সেন লেনে৷ তার জেরেই বৈঠকে বলা হয়েছে, নেতা-কর্মীরা যেন ঘুমিয়ে সময় নষ্ট না-করেন৷ ২০১৬-এ তৃণমূলমুক্ত বাংলা গড়াই আমাদের মিশন৷ এর পাশাপাশি কর্মসূচি ঘোষণা করেছে রাজ্য কমিটি৷ সন্ত্রাস নিয়ে স্মারকলিপি দিতে ২০ জুন সব জেলাশাসকের দপ্তরে যাবেন বিজেপি নেতারা৷ ২৩ জুন শ্যামাপ্রসাদ মুখোপাধ্যায়ের মৃত্যুদিনে বাংলা বাঁচাও স্লোগান নিয়ে রাজ্য দপ্তর থেকে ধর্মতলা পর্যন্ত মিছিল করবেন রাহুল সিনহারা৷

    CPI(M) General Secretary Prakas Karat, along with other leaders.

    BREAKING NEWS

    [More Breaking News]

    Kolkata, june 4 :CPI(M) West Bengal state committee thoroughly reviewed the election results in two day meeting on 2nd- 3rd. June. CPI(M) General Secretary Prakas Karat, along with Polit Bureau members Sitaram Yechury, Manik Sarkar were present in the meeting.

    The preliminary review report and the discussion on it identified the rise of BJP to power and its strengthened support in states including West Bengal is a dangerous turn of politics. Along with them, TMC has gained seats in West Bengal. The strengthening of two rightist political forces and weakening of the Left has imposed serious dangers in front of democratic movement and the working people.

    Review report and the discussions have identified both political and organizational reasons of Left Front's unexpected setback. BJP has taken advantage of intense anti-Congress discontent among people. The national situation has affected the scenario in Bengal too and the idea of alternatives other than BJP did not find ground. There was weakness in combating BJP's aggressive campaign. BJP even took advantage of discontent against TMC government in the state. There were lapses in the election organization too. The election organization was not satisfactorily active in many areas.

    The review also took into account the impact of large scale terror in the state. In many areas, election campaign could not be conducted due to intense terror. On the day of elections large scale rigging and booth capturing took place. The Election Commission failed miserably to facilitate free, fair elections. These were reflected in vote share. In many constituencies, peoples' verdict was not reflected in the result.  The state committee decided to thoroughly examine in an objective manner the difference of vote share between Left Front and TMC and determine the impact of political reasons and rigging behind that.

    After the discussion, Prakash Karat, in his address, said that major political change has occurred in the country with BJP getting absolute majority in its own. BJP, which is backed by RSS has received unstinted support of the big bourgeoisie. On the other hand CPI(M) and the Lefts have suffered throughout the country except Tripura. Party has to take appropriate tactics to face this unprecedented situation.

    Karat said that CC would review the electoral tactical line and all related questions. The impact of BJP's campaign, though apprehended, could not be effectively combated even in states like West Bengal. TMC's three year rule in Bengal has provided a fertile ground for the communal forces. This will pose a serious danger in the future. With the weakening of the Left and weakness in class movements, identity politics has grown. Party has to adopt proper political line to meet the challenge.

    Karat said, Party and the Left movement in Bengal are facing fascistic method of terror. Elementary democratic rights are being attacked. It is an urgent task of the entire Party and the leadership to stand by the people who are being attacked. It is an urgent task to defend and protect Party's activists and supporters. Party will take up this attack on democracy in West Bengal throughout the country in a big way.

    Karat said, we have to take up peoples' issues and develop class and mass movements even in such an adverse situation. We should develop independent activities of class and mass organizations.

    Karat said that the Party will patiently listen to and grasp criticism, suggestions, and opinions of the Party members, supporters and sympathizers. We will critically process the political and organizational issues and take all necessary measures within the framework of the Party.

    Summing up the discussion, Biman Basu said that this election was fought in an entirely different situation from the past. We have to work harder to overcome the weaknesses identified in the election struggle and in Party organization. Sustained ideological campaign against the communal forces should be conducted. To combat this danger, working class and peasants' movements have to be strengthened. One of the major areas of priority will be developing the work style of the mass organizations. State Party will take up this matter urgently. Party and leaders of all levels will steadfastly stand by the victims of terror. Party will take more initiatives to support them legally. Party will collect funds to support those who have become homeless in terror.

    Meanwhile, Left Front has decided to submit deputation to the Chief Minister on 9th June demanding immediate halt of violence in the districts. On 25th June , conventions will be organized on the issue of protecting  democracy commemorating the anniversary of declaration of internal emergency. On 30th June, Hul day will be observed throughout the state. On 8th July, the birth centenary celebration of Comrade Jyoti Basu will be observed throughout the state.

    - See more at: http://ganashakti.com/english/news/top_story/5349#sthash.iJHsPK5u.dpuf



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  • 06/10/14--04:33: गरीबी उन्मूलन दरअसल गरीबों के शपाये का कार्यक्रम है ,ठीक वैसा ही जैसे आर्थिक सुधार बहिस्कार और सफाये का जनसंहारी युद्ध। আমাদের বামপন্থীরা আত্মঘাতী, কিন্তু এ দেশে বামপন্থা ছাড়া গতি নেই পার্টির এ-রকম দুর্দশা হল, তার একটা বড় কারণ, পার্টির সঙ্গে, বিশেষ করে এই রাজ্যের পার্টি নেতৃত্বের সঙ্গে বাইরের যোগাযোগ একেবারে শূন্য হয়ে গিয়েছিল। বাইরের পৃথিবীতে কী হচ্ছে, দেশের ও রাজ্যের লোকেরা কী বলছে, কী চাইছে এবং নেতাদের সম্বন্ধে কী ভাবছে, সেটা তাঁদের জানা দরকার। তা জানতে হলে খোলাখুলি সকলের সঙ্গে কথা বলতে হবে। দ্বিতীয়ত, নেতারা কী ভাবছেন, কী করতে চাইছেন সেটাও বাইরের লোককে জানানো দরকার। অশোক মিত্রের সাক্ষাত্কার নিলেন অনির্বাণ চট্টোপাধ্যায়। क्या नवान्न में कल आप थे? क्या विमानबोस के साथ दीदी ने आपको भी फिशफ्राई खिलाया? ये क्यों हमें लड़ाते हैं,लहूलुहान करते हैं जबकि ये भीतर से सत्ता के लिए एक हैं? आपने आनंद बाजार में अशोक मित्र का लिखा आज का लेख पढ़ा है? ये वाम पंथी लोग कुर्सी क्यों नहीं छोड़ना चाहते? कारत गये तो येचुरी आयेंगे,फर्क क्या पड़ने वाला है?
  • गरीबी उन्मूलन दरअसल गरीबों के शपाये का कार्यक्रम है ,ठीक वैसा ही जैसे आर्थिक सुधार बहिस्कार और सफाये का जनसंहारी युद्ध।


    আমাদের বামপন্থীরা আত্মঘাতী, কিন্তু এ দেশে বামপন্থা ছাড়া গতি নেই

    পার্টির এ-রকম দুর্দশা হল, তার একটা বড় কারণ, পার্টির সঙ্গে, বিশেষ করে এই রাজ্যের পার্টি নেতৃত্বের সঙ্গে বাইরের যোগাযোগ একেবারে শূন্য হয়ে গিয়েছিল। বাইরের পৃথিবীতে কী হচ্ছে, দেশের ও রাজ্যের লোকেরা কী বলছে, কী চাইছে এবং নেতাদের সম্বন্ধে কী ভাবছে, সেটা তাঁদের জানা দরকার। তা জানতে হলে খোলাখুলি সকলের সঙ্গে কথা বলতে হবে। দ্বিতীয়ত, নেতারা কী ভাবছেন, কী করতে চাইছেন সেটাও বাইরের লোককে জানানো দরকার। অশোক মিত্রের সাক্ষাত্কার নিলেন অনির্বাণ চট্টোপাধ্যায়।

    क्या नवान्न में कल आप थे?


    क्या विमानबोस के साथ दीदी ने आपको भी फिशफ्राई खिलाया?


    ये क्यों हमें लड़ाते हैं,लहूलुहान करते हैं जबकि ये भीतर से सत्ता के लिए एक हैं?


    आपने आनंद बाजार में अशोक मित्र का लिखा आज का लेख पढ़ा है? ये वाम पंथी लोग कुर्सी क्यों नहीं छोड़ना चाहते?


    कारत गये तो येचुरी आयेंगे,फर्क क्या पड़ने वाला है?

    पलाश विश्वास


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    আমাদের বামপন্থীরা আত্মঘাতী,

    কিন্তু এ দেশে বামপন্থা ছাড়া গতি নেই

    ১০ জুন, ২০১৪

    http://www.anandabazar.com/editorial





    कल ही राष्ट्रपति के अभिभाषण और नई सरकार के आर्थिक सुधार कार्यक्रम पर लिखने का इरादा था।दंडकारण्य के मध्य महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,ओड़ीशा और आंध्र प्रदेश के तमाम आदिवासी इलाकों को डूब में शामिल करने वाले पोलावरम बांध के बारे में तो कई दिनों से लिखने का मन था।लेकिन सुबह ही आनंद बाजार में आशा भोंसले का मुक्त बाजार में सांस्कृतिक अवक्षय पर बेहतरीन साक्षात्कार के मध्य सबकुछ गड़बड़ेै हो गया।चुनाव से  पहले लता मंगेशकर ने खुलेआम नमोमय भारत बानने का भाववेगी परिवेश सृजन में अपनी सुर सम्राज्ञी हैसियत खपा दी थी। तो हालत यह है कि हिंदुत्व के नाम नमोमय भारत बना देने वाले तमाम हिंदू जो  हिन्दू राष्ट्र के पक्ष में नहीं हैं बल्कि उसके कट्टर विरोधी हैं और हम फासीवाद के खिलाफ युद्ध में धर्मोन्मादी कहकर उन्हें हिसाब से बाहर रख रहे हैं जो कि संजोग से बहुसंख्य भी हैं,यह लिखना बेहद जरुरी हो गया।कल का दिन इसी में रीत गया।



    हाल के राजनीतिक बदलावों के बाद अब बाजार की नजर सरकार के आम बजट पर है, जिसमें आर्थिक सुधार का एजेंडा सामने आएगा। मैक्वायरी रिसर्च के वैश्विक प्रमुख (अर्थशास्त्र) रिचर्ड गिब्स ने पुनीत वाधवा को दिए साक्षात्कार में बताया कि भारत अब निवेशकों को मिलने वाले संभावित निवेश के अवसरों की तरफ देख रहा है। उन्होंने कहा कि सुधार का एजेंडा लागू होने से कंपनियों की आमदनी में इजाफा होगा।


    आज रोजनामचा फिर गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम से लिखना शुरु करना चाहता था।इंदिरा गांधी का समाजवाद का उद्घोष भी गरीबी हटाओ नारे के साथ हुआ था।जो बजरिये हरितक्रांति और आपरेशन ब्लू स्टार उनके अवसान के बाद नब्वे के दशक तक राजनीतिक अस्थिरताओं के मध्य अबाध पूंजी के कारपोरेट नरसंहार में बदल गया है।


    नमोमय भारत की दिशा दशा दुर्गावतार संघ समर्थित इंदिरायुगीन निरंकुश तानाशाह  राजनीतिक स्थिरता के परिदृश्य की याद दिला रहा है।


    हम एकमुश्त साठ के उथल पुथल और स्प्नभंग के दौर ,अस्सी के रक्तप्लावित धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण और इक्कीसवीं सदी के निरकुंश लंपट अबाध पूंजी वर्चस्व के वैश्विक मनुस्मृति राज में हैं।


    बीच में से सत्तर दशक का प्रतिरोध और पचास के मध्य के तेलंगाना और ढिमरी ब्लाक सिरे से गायब हैं।


    आशा भोंसले के मुताबिक स्मृति लोप का समय है यह और भाई लोग तो न केवल इतिहास, सभ्यता, विधाओं और विचारधारा के अंत का ऐलान कर चुके हैं,बल्कि वे तमाम प्रतिबद्ध चेहरे अब जनसंहारी व्यवस्था में समाहित समायोजित हैं।मलाईदार महिमामंडित अरबपति तबके में शामिल होकर क्रांति अता फरमा रहे हैं।


    ऐसे में इंदिरा के ही समाजवादी समय के वित्तमंत्री और मनमोहनी जनसंहारी आर्थिक नीतियों के वास्तुकार प्रणव मुखर्जी के श्रीमुख से गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रम कसमन्वित आर्थिक सुधार एजंडा मार्फतसमाजवादी हिंदुत्व का  पुनरूत्थान दुश्चक्र के उस तिलिस्म को नये सिरे से तामीर करने का भयानक खेल है,जिसमें भारतीय जनगण और भारत लोकगणराज्य का वजूद आहिस्ते आहिस्ते खत्म होता रहा है वही साठ के दशक से लगातार लगातार।


    शायद उससे पहले से धर्म के नाम पर भारत विभाजन के ब्रह्म मुहूर्त से अखंड सनातन हिंदुत्व के प्रचंड वैदिकी ताप से।जिसे हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सीमाबद्ध मानने की भूल बारंबार कर रहे हैं जबकि यह लाल नीले हरे पीले हर झंडे में समान रुप से संयोजित है।


    मैं कोलकाता में हूं लेकिन हवाओं में बारुदी गंध,हड्डियों की चिटखने की आवाजें,क्षितिज में आग और धुआं और गगनभेदी धर्मोन्मादी रणहुंकार से उसी तरह घिरा हुआ हूं जैसे अस्सी के दशक में मेरठ के मलियाना हाशिमपुरा समय में था।


    गरीबी उन्मूलन दरअसल गरीबों के सफाये का कार्यक्रम है ,ठीक वैसा ही जैसे आर्थिक सुधार बहिस्कार और जनसंख्या नियंत्रण  का जनसंहारी युद्ध।


    हम कांशीराम के फेल होने की वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं और बहुजन समाज का निर्माण होने से पहले ही उसके बिखराव को रेखांकित करते हुए अंबेडकरी आंदोलन की प्रासंगिकता बता रहे हैं।


    यह मामला आनंद तेलतुंबड़े के शब्दों में उतना सहज सपाट भी नहीं है।


    अंबेडकर को मूर्तिबद्ध करने में ही भारत में कारपोरेट राज के हित सधते हैं क्योंकि पहचान अस्मिता से खंड खंड भारतीय समाज एकता बद्ध हुए बिना हत्यारों के राजपाट राज्यतंत्र को बदल नहीं सकते।


    जाहिर है कि इस कारोबार में शेयरबाजारी दांव अरबों खरबों का है।


    तमाम झंडेवरदारों की दुकाने बंद होने वाली हैं अगर भारतीय जनगण कारपोरेट राज के खिलाफ गोलबंद हो जाये।


    हम बार बार जो कह रहे हैं कि जाति व्यवस्था दरअसल नस्ली भेदभाव है और उसका अहम हिस्सा भौगोलिक अस्पृश्यता भी है तो हम बार बार यह भी कह रहे हैं  कि मनुस्मृति कोई धर्मग्रंथ नहीं है,यह वर्ग वर्चस्व का मुकम्मल अर्थव्यवस्था है ,जो नींव बन गयी है वैश्विक जायनवादी जनसंहारी स्थाई बंदोबस्त की।


    हम बार बार कह रहे हैं कि जाति मजबूत करने से हिंदुत्व मजबूत होता है और इसीका तार्किक परिणति नमोमयभारत है।


    हम बार बार कह रहे हैं कि  जाति पहचान अस्मिता  केंद्रित धर्म निरपेक्षता दरअसल धर्मन्मादी ध्रूवीकरण की ही दिशा बनाता है,प्रतिरोध का नहीं।


    हम बार बार कह रहे हैं कि  यह विशुद्ध सत्ता समीकरण है।


    इसी सिलसिले में समाज वास्तव की चीरफाड़ बेहद जरुरी है और यह सत्य हम नजरअंदाज नहीं कर सकते कि तकनीकी वैज्ञानिक विकास के चरमोत्कर्ष समय़ में मुक्त बाजार के शापिंग माल में हम दिलोदिमाग से अब भी मध्ययुग के अंध तम में हैं और हर शख्स के भीतर सामंती ज्वालामुखी का स्थगित महाविस्फोट है और रंग बिरंगी क्रांतियों के बावजूद हम हिंदुत्व से मुक्त नहीं है।


    क्योंकि जैसे कि बाबासाहेब कह गे है कि हिंदुत्व धर्म नहीं,राजनीति है।और सत्ता की राजनीति हिंदुत्व के बिना इस भारत देश में हो ही नहीं सकती।


    पेय पानीय जहर नरम और गरम रसायन है।बाकी इंदिरा गांधी  के गले में रुद्राक्षमाला और धीरेंद्र ब्रह्मचारी के योगाभ्यास और नमो उपनिषद पुराण के साथ बाबा रामदेव में प्रकार भेद जरुर है,लेकिन गुणवत्ता और प्रभाव समान है।


    उत्पेरक वहीं शाश्वत वैदिकी मनुस्मृतिनिर्भर जाति जर्जर नस्ली हिंदुत्व और वही संघ परिवार जो सिखों और मुसलमानों,शरणार्थियों,आदिवासियों और बहुजनों के संहार और स्त्री आखेट के पुरुषतांत्रिक वर्चस्व के लिए समान रुप से जिम्मेदार है।


    इस बात को समझ लेना शायद सबसे मददगार साबित हो सकता है सत्ता की राजनीति  और अर्थव्यवस्था के अंतहीन दुश्चक्र को समझने के लिए कि हिंदू राष्ट्र किसी अकेले संघ परिवार का एजंडा नहीं है,इस राजसूय यज्ञ के पुरोहित या यजमान तो इंद्रधनुषी भारतीय राजनीति के सारे रंग हैं,केसरिया थोड़ा ज्यादा चटख है,बस।


    इस बात को समझ लेना शायद सबसे मददगार साबित हो सकता है आम जनता की गोलबंदी के लिए कि मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति प्रेम मनुष्यता और सभ्यता के अनिवार्य गुण हैं और स्वभाव से मनुष्य सामाजिक है।राजनीतिक गोलबंदी की तुलना में सामाजिक मानवबंधन ज्यादा व्यवहारिक और कारगर है।बाबासाहेब ने भी इसीलिए सामाजिक आंदोलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है तो कामरेड माओ ने सांस्कृतिक आंदोलन को।मातृभाषा की पूंजी लेकर बांग्लादेश में तो लोकतंत्र कट्टर धर्मांध राष्ट्रवाद को लगातार शिकस्त दे रहा है।


    इस बात को समझ लेना शायद सबसे मददगार साबित हो सकता है गोलबंदी के लिए अनिवार्य अलाप संलाप के लिए कि अंध राष्ट्रवाद राष्ट्रद्रोह हैं और मनुष्य स्वभाव से राष्ट्रद्रोही होता नहीं है चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान या ईसाई।


    इसीलिए यह समझना बेहतर है कि हर मुसलमान कट्टरपंथी नहीं होता और न हर हिंदू धर्मोन्मादी,चाहे राजनीतिक लिहाज से उनका रंग कुछ भी हो। आप राजनीतिक पहल के बजाये सामाजिक पहल करके तो देखिये कि रंगरोगन कैसे उड़कर फुर्र हो जायेगा।


    हालांकि हम इतने दृष्टि अंध हैं कि पंजाब की सत्ता राजनीति में अकाली सिखों के लिए न्याय की गुहार लगाते हुए जैसे सत्ता की भागेदारी के लिए हत्यारों की पांत में बैठने से हिचकते नहीं हैं वैसे ही बहुजनहिताय हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद के साथ अबाध पूंजीवाद के त्रिफला आहार का भोग लगाकर बाबासाहेब का श्राद्धकर्म कर रहे हैं बहुजन रंग बिरंगे झंडेवरदार।


    लेकिन इन सबमें सबसे भयानक वर्णवर्चस्वी पाखंडी तो विचारधारा की जुगाली और वैज्ञानिक दृष्टि के स्वयंभू अवतार जनविश्वास घाती और आत्मघाती भी, जनसंहार पुरोहित भारत में लाल झंडे को घृणा का प्रतीक बना देने वाले ,सामाजिक शक्तियों को बेमतलब बना देने वाले और जनांदोलनों को एनजीओ में तब्दील करने वाले वाम झंडेवरदार है।


    वाम झंडेवरदार सत्ता के लिए कुछ भी करेंगे लेकिन वर्ण वर्चस्व को तोड़ेंगे नहीं। पद छोड़ेंगे नहीं।दूसरी तीसरी पंक्ति के नेतृत्व को उभरने देंगे नहीं।भौगोलिक अस्पृश्यता के तहत वाम से वंचित करेंगे बंगाल ,त्रिपुरा और केरल को छोड़कर बाकी देश को।


    अब संभावना यह प्रबल है कि आगामी पार्टी कांग्रेस में प्रकाश कारत की जगह सीताराम येचुरी वाम कमान संभालेंगे।हो गया नेतृत्व परिवर्तन।बूढ़े चेहरे के बदले नयेचेहरे खोजे नहीं मिल रहे वाम को जो अवाम में जाते ही नहीं हैं।


    हम जब कहते हैं कि सारे हिंदू हिंदू राष्ट्र के पक्षधर नहीं हैं तो हम तमाम अश्वेतों की बात करते हैं जो गोरा रंग पर फिदा हैं और गोरा बनाने के उद्योग के सबसे बड़े खरीददार हैं और जिन्हें काला होने पर शर्म आती है।


    हम जब कहते हैं कि सारे हिंदू हिंदू राष्ट्र के पक्षधर नहीं हैं  तब हम उन तमाम आदिवासियों की बात करते हैं,जिनके खिलाफ अनवरत युद्ध जारी है ,जारी है देश व्यापी सलवा जुड़ुम।


    हम जब कहते हैं कि सारे हिंदू हिंदू राष्ट्र के पक्षधर नहीं हैं,तब  उन धर्मान्तरित लोगों के बारे में कह रहे हैं जो हिंदुत्व का परित्याग तो कर चुके हैं लेकिन जाति का मोह छोड़ नहीं पाये हैं और जाति को मजबूत करने के लिए पूरा दम खम लगा रहे हैं।


    हम जब कहते हैं कि सारे हिंदू हिंदू राष्ट्र के पक्षधर नहीं हैं, उन बहुजनों की बात करते हैं जो कर्मकांड वैदिकी संस्कृति में ब्राह्मणों से मीलों आगे हैं और हिंदू राष्ट्र के पैदल सेनाोओं मे तब्दील हैं।


    वे तमाम लोग  बेशक रामराज चाहते हैं।वे बेशक मर्यादा पुरषोत्तम राम के पुजारी हैं और गीता उपदेश के मार्फत कर्म सिद्धांत के मुताबिक जन्म पुनर्जन्म और मोक्ष के सबसे बड़े कारोबारी यदुवंशी कृष्ण के अनुयायी हैं।


    लेकिन हकीकत यह भी है कि वे जैसे राज्यतंत्र और अर्थव्यवस्था नहीं समझते वैसे ही वे रामराज और कारपोरेट राज के संयुक्त मनुस्मृति उपक्रम को समझते नहीं हैं और उन्हें हकीकत बताने की कोई कोशिश भी अब तक नहीं हुई है।


    इस प्रसंग की चर्चा से लेकिन जिनकी दुकानें बंद होती है,वे हमें हिंदुत्व के दलाल और ब्राह्मणों के पिट्ठू कहकर केसरिया बहुजनों के साथ संवाद की कोई गुंजाइश ही नहीं रखेंगे।


    आर्थिक मुद्दों पर बात करने की मानोपोली हमने वामपंथियों और माओवादियों के हवाले कर दी है।इसलिए अरुंधति हो या आनंद तेलतुंबड़े या यह नाचीज यह  रोजनामचाकार, सारे लोग माओवादी घोषित हैं।


    अब अगर मैं माओ को उद्धृत करके कहूं कि हमें जनता से सीखना चाहिए क्योंकि जनता अपने अनुभवों से बेहतर जानती है,तो हमें माओवादी मार्क कर देना बहुत सरल होगा।लेकिन लगभग यही बात तकनीकी क्रांति में समाहित कला साहित्य परिवेश के बारे में कही है बालीवूड में वाणिज्य के लिहाज से सुरसाम्राज्ञी से भी ज्यादा कामयाब,ज्यादा सक्रिय उनकी सगी बहन आशा भोंसले ने।


    आशा भोंसले ने साफ साफ कहा है कि कला साहित्य अब तकनीकी चकाचौंध के अलावा कुछ भी नहीं है और न कविता लिखी जा रही है और न कोई गीत तैयार हो रहा है। वे कह रही हैं कि जीवनयापन का अनुभव न होने से कला और साहित्य प्राणहीन चीत्कार का रियेलिटी शो है और कुछ भी नहीं।जैसा कि कई साल पहले हमने अपनी कविता ई अभिमन्यु में कही है।



    राजनीति के संदर्भ में भी यही चरम सत्य है।जिस जनता के प्रति उत्तरदायी यह संसदीय लोकतंत्र है,जिस जनता के आदेश से यह राज्यतंत्र का कारपोरेट मैनेजमेंट है,वोट देने के आगे पीछे वह कहीं भी नहीं है।


    उसके प्रति कोई जवाबदेह नहीं है।न राष्ट्र,न कानून व्यवस्था,न संविधान,न संसद,न भारत सरकार,न राज्य सरकारें, न्याय पालिका,न मीडिया और न वे अरबपति खरबपति या न्यूनतम करोड़पति भ्रष्ट देश बेचो काला बाजारी जमात,जिसमें उसकी अगाध आस्था अखंड हरिकथा अनंत है।


    एंटरटेइनमेंट के लिए कुछ भी करेगा,तीन प्रख्यात रामों का अत्याधुनिक रामायण गाया जा चुका है।क्षत्रपों के हवाई करतब देखे जा चुके हैं।


    अब वामपक्ष के बेपर्जा दहोने की बारी है।कलाबाजी और सत्ता सौदेबाजी में विचारधारा को तिलांजलि देने में वे भी कहीं पीछे नहीं रहे,ममताम् शरणाम् करते उन्होंने भी साबित कर दिया कि जैसे वे धर्मनिरपेक्षता के नाम दस साल तक मनमोहिनी जनसंहार के हिस्सेदार रहे,वैसे ही संघ परिवार की बढ़त रोकने के लिए वे ममता के पांव भी चूम सकते हैं,जो खुद वजूद का संकट झेलते हुए वाम सहारे के भरोसे मरणासण्ण वाम को आक्सीजन देने के लिए पलकपांवड़े बिठाये हुए हैं।


    याद करें कामरेड कि सताहत्तर में फासीवाद और तानाशाही के खिलाफ अटल आडवाणी के साथ गलबहियां ले रहे थे वाम नेता किंवदंती तमाम तो वीपी को भ्रष्टाचार विरोधी प्रधानमंत्री बनाने के लिए वाम दक्षिण एकाकार हो गये थे।


    कारपोरेट राज के लिए जरूरी हर कानून को बनाने बिगाड़ने की संसदीय सहमति निर्माण में भी वाम दक्षिण नवउदारवादी जमाने में एकाकार है।भारत में धर्म निरिपेक्षता की सौदे सत्ताबाजी का यह सार संक्षेप है।



    आज हफ्तेभर बाद सब्जी बाजार जाना हुआ।शरणार्थी दलित किसान परिवार से हूं और अपनी इस औकात के मुताबिक हवाई उड़ानें मेेरे लिए निषिद्ध हैं।इसलिए पांव जमीन पर ही रहते हैं। लगभग चौथाई शताब्दी जहां बीता दिये,उस स्थानीयता में सारे मामूली लोग मेरे परिचित आत्मीयजन हैं और खासमखास मेरे लिए तो कोई भी नहीं है।


    दफ्तर से लौटने के बाद रात ढाई बजे से सुबह साढ़े पांच बजे मैं अपने पीसी के साथ रहता हूं।इसलिए नींद से जागकर बाजार जाने से पहले मैंने अखबार नहीं देखा था।


    बाजार गये तो छोटे दुकानदारों ,सब्जीवालों और बाजार में मौजूद लोगों ने मेरी घेराबंदी कर दी।तमाम प्रश्न करने लगे लोग।मसलनः


    क्या नवान्न में कल आप थे?


    क्या विमानबोस के साथ दीदी ने आपको भी फिशफ्राई खिलाया?


    ये क्यों हमें लड़ाते हैं,लहूलुहान करते हैं जबकि ये भीतर से सत्ता के लिए एक हैं?


    आपने आनंद बाजार में अशोक मित्र का लिखा आज का लेख पढ़ा है? ये वाम पंथी लोग कुर्सी क्यों नहीं छोड़ना चाहते?


    कारत गये तो येचुरी आयेंगे,फर्क क्या पड़ने वाला है?


    मुझे खुशी है कि ज्योतिबसु के पहले वित्तमंत्री और इंदिरा गांधी के मुख्य सलाहकार अशोक मित्र की साख अब भी बनी हुई है,जिनसे समयांतर के लिए कुछ अनुवाद के सिलसिले में मेरी भी बातचीत होती रही है।


    वामोर्चा के भूमि सुधार अतीत के वित्तमंत्री अशोक मित्र और मौलिक राष्ट्रीयकरण और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार डा.असोक मित्र का साक्षात्कार छपा है आज आनंद बाजार के संपादकीय पेज में,जिसमें उन्होंने मौजूदा वाम नेतृत्व पर निर्मम प्रहार करते हुए वाम आंदोलन के तमाम अंतर्विरोधों का खुलासा करते हुए साफ साफ कहा कि आज के वामपंथी आत्मघाती है लेकिन इस देश में वाम पंथ के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है इस जनसंहार बंदोबस्त के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए।


    जाहिर है कि आदरणीय अशोक मित्र ने तमाम वामपंथियों की तरह अंबेडकर पढ़ा नहीं है और पढ़ा है तो उसे तरजीह नहीं दी है।वरना वे अंत्यज  बहुजनों की बात करते और अंबेडकर की प्रासंगिकता पर भी लिखते।


    आनंद पटवर्धन,आनंद तेलतुंबड़े,अरुंधति और हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि वामपंथ और अंबेडकरी आंदोलन की मंजिल समता और सामाजिक न्याय है और जनप्रतिरोध

    के लिए अलग अलग झंडों और पहचान,अस्मिता में बंटी जो जनता है,उसकी गोलबंदी सबसे जरुरी है और इस सिलसिले में सर्वस्वहाराओं के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें,तो अबंडकरी विचार और वाम आंदोलन में अंतरविरोध नहीं है।


    हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि बहुजन समाजका निर्माण ही वामपक्ष बहुजन अंबेडकरी पक्ष का घोषित साझा लक्ष्य हो और अंबेडकरी आंदोलन का प्रस्तानबिंदू फिर वही जाति उन्मूलन हो तो सिरे से गायब सत्तर दशक के प्रतिरोध की वापसी असंभव भी नहीं है।पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ राष्ट्रव्यापी जनांदोलन भी असंभव नहीं है। राज्यतंत्र में बदलाव भी असंभव नहीं है और न ही समता और सामाजिक न्याय का लक्ष्य असंभव है।


    आने वाले समय में आर्थिकगतिविधियों में सुधारहोने पर बाजार नई ऊचाइयां छू सकता है। इसी ल्क्ष्ये के साथ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संसद के संयुक्त सत्र में सरकार के दस साल का एजेंडा पेश किया। सरकार के आर्थिक सुधार एजेंडे से अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीदों से बाजार को बल मिला। केंद्र में नई सरकार ने संसद में अपने एजेंडे की झलक दिखाई। उसने आर्थिक मुद्दों पर जोर देते हुए पांच प्राथमिकताएं रखी हैं, जिनमें आर्थिक वृद्घि दर बढ़ाना और मुद्रास्फीति विशेष तौर पर खाद्य मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करना शामिल हैं। इसके अलावा सरकार ने प्रशासन में सुधार, प्रमुख बुनियादी ढांचे को विकसित करने और कृषि क्षेत्र में नई जान फूंकने के लिए भी कदम उठाने की बात कही है। खाद्य मुद्रास्फीति पर लगाम कसने के लिए सरकार ने आपूर्ति सुधारने पर भी जोर देने का वादा किया है।सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली दुरुस्त करने, जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने, कृषि बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक और निजी निवेश लाने, सिंचाई बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को रियायतें देने की योजना बनाई है।अभिभाषण में फिजूल नियमों को हटाकर, अनुमतियों के लिए राज्य व केंद्र स्तर पर सिंगल विंडो मुहैया कराकर  'कारोबार को आसान' बनाने की भी बात कही गई। इसके अलावा कर नियमनों को सरल बनाने और वस्तु एवं सेवा कर लागू करने पर भी आगे बढऩे का जिक्र किया गया। अभिभाषण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को खासी तवज्जो दी गई। सरकार ने कहा कि उन क्षेत्रों में एफडीआई को अनुमति दी जाएगी, जो रोजगार सृजन में मदद करेंगे, जबकि रक्षा उपकरणों के देसीकरण को बढ़ावा देने के लिए रक्षा में भी एफडीआई पर विचार किया जाएगा।


    गरीबी उन्मूलन का नजारा यह है कि रामरज्य की आहट से ही  इस साल शेयर बाजार की रैली में निवेशक मालामाल हो गए हैं। जिनके शेयर लंबे अर्से से निगेटिव रिटर्न दे रहे थे उन्होंने भी इस तेजी में मुनाफा काट लिया। वैसे, बाजार की असली रैली शुरू हुई थी 14 फरवरी से। तब से लेकर अब तक जहां सेंसेक्स-निफ्टी ने 27-28 फीसदी रिटर्न दिए हैं, वहीं मिडकैप इंडेक्स ने 38 फीसदी का रिटर्न दिया है।


    अब तो रामराज्य फूल ब्लूम है। कमल खिलखिला रहा है बाजार में।दिग्गजों के मुताबिक निवेश का यही सही मौका है। आज का निवेश 5 साल में आपको करोड़पति बना सकता है।


    आपका दिवालिया भी तय है अगर आप अर्थव्यवस्था समझते नहीं हैं।हाल के वर्षों में साल 2014 भारतीय इक्विटी निवेशकों के लिए बेहतर वर्षों में से एक रहा है। बेंचमार्क एसऐंडपी बीएसई सेंसेक्स हर हफ्ते नई ऊंचाई को छू रहा है और साल की शुरुआत से अब तक 20 फीसदी से ज्यादा उछल चुका है। साथ ही इसके और ऊपर जाने की संभावना है। दलाल स्ट्रीट के तेजडिय़े अब नई तेजी की शुरुआत की बात कर रहे हैं, जो नरेंद्र मोदी की अगुआई में विकासोन्मुखी सरकार के सत्ता संभालने के कारण देखने को मिल सकती है। उम्मीद यही है कि मोदी सरकार आर्थिक विकास दर में तेजी से सुधार लाएगी। इसके साथ-साथ कंपनियों की आय में इजाफे की भी संभावना है, जिससे शेयरों की ऊंची कीमत उचित दिखेगी।


    शुक्रवार को सेंसेक्स के बंद का स्तर देखें तो सूचकांक की 30 कंपनियों की संयुक्त आय (जो पिछले 12 महीने से इंडेक्स का हिस्सा हैं) के करीब 19 गुना पर कारोबार कर रहा है।


    राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में अपने अभिभाषण में मोदी सरकार का रोडमैप पेश किया। उन्होंने ऐसा वातावरण तैयार करने का वादा किया जिसमें स्थायित्व हो और जो पारदर्शी व निष्पक्ष हो। उन्होंने कहा कि कर व्यवस्था को युक्तिसंगत और सरल बनाया जाएगा जो निवेश, उद्यम और विकास के खिलाफ नहीं होगी बल्कि उसे बढ़ाने में सहायक होगी।राष्ट्रपति ने कहा कि राज्य सरकारों से परामर्श करके राष्ट्रीय योजना तैयार की जाएगी ताकि वामपंथी चरमपंथ से उत्पन्न चुनौतियों और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर प्रभावी तरीके से अंकुश लगाया जा सके। सरकार सुरक्षा बलों को आधुनिकतम तकनीक से सुसज्जित करने और इनके कामकाज की स्थिति सुधारने के लिए कदम उठाएगी।


    अभिभाषण में कहा गया कि सरकार गरीबों के प्रति समर्पित है। गरीबी का कोई धर्म नहीं होता है। भूख का कोई पंथ नहीं होता और निराशा का कोई भूगोल नहीं होता। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत में गरीबी के अभिशाप को समाप्त करना है। मेरी सरकार केवल निर्धनता हटाने से संतुष्ट नहीं होगी बल्कि यह गरीबी के समग्र उन्मूलन के लक्ष्य के प्रति वचनबद्ध है। विकास पर पहला हक गरीब का है और सरकार अपना ध्यान उन पर केंद्रित करेगी, जो जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं। सरकार सहानुभूति, सहायता और सशक्तीकरण द्वारा सभी नागरिकों को हर तरह की सुरक्षा मुहैया कराने के लिए जरूरी उपाय करेगी।


    इस गरीबी उन्मूलन घोषणा का तात्पर्य इस सेनसेक्सी साड़भाषा में समझे कि  लगातार चौथे कारोबारी सत्र में शेयर बाजार में तेजी का रूख जारी रहा। नई सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों के लिए अपना एजेंडा पेश किए जाने से उत्साहित विदेशी निवेशकों की लिवाली से बीएसई सेंसेक्स 25,711.11 अंक की नई ऊंचाई को छू गया।समझिये कि गरबी उन्मूलन की उदात्त घोषणा से शेयर बाजार बम बम क्यों हैं और दुनियाभर के विदेशी निवेशक मय बाराक ओबामा तक कैसे कैसे केसरियाहुए जा रहे हैं।


    जाहिर है कि  अगर आप ऐसे कुत्ते को देख रहे हैं जो नहीं भौंकता है तो फिर आपको सरकार के हालिया आर्थिकनीति की घोषणाओं को  अलग हटकर देखने की जरूरत नहीं है।कारोबारी धारणा में सुधार से उत्साहित भारतीय कंपनियों ने अगले तीन महीने में विश्वभर में जबरदस्त नियुक्तियों की योजना बनाई है। आज जारी मैनपावर एंप्लायमेंट आउटलुक सर्वे के मुताबिक, एक स्थायी सरकार बनने के साथ कारोबारी धारणा में सुधार की उम्मीद में कई क्षेत्रों में नियुक्ति गतिविधियों में तेजी आ रही है।


    विनिर्माण के मोर्चे पर सरकार ने कहा कि वह निवेश और औद्योगिक क्षेत्र विशेष रूप से डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर स्थापित कर विनिर्माण को बढ़ावा देगी। माना जा रहा है कि ये गुजरात में स्थापित धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र और गिफ्टी सिटी के ही संस्करण हो सकते हैं। बुनियादी ढांचा उद्योग को मजबूती देने के लिए सरकार सार्वजनिक निजी भागीदारी प्रणाली, फास्ट टै्रक व निवेश के लिए माकूल व्यवस्था लाने की खातिर 10 वर्ष की अवधि के लिए बुनियादी ढांचा विकास योजना तैयार कर रही है।


    बुनियादी ढांचा उद्योग में भी सरकार का ध्यान रेलवे के आधुनिकीकरण, हाई स्पीड ट्रेन के लिए हीरक चतुर्भुज परियोजना, फ्रेट कॉरिडोर का नेटवर्क , बंदरगाह के विकास और जहां मुमकिन हो नदियों को जोडऩे पर रहेगा। सरकार ने पारंपरिक और गैर-पारंपरिक तरीकों की मदद से बिजली उत्पादन बढ़ाने, कोयला क्षेत्र में निजी निवेश आकर्षित करने और परमाणु ऊर्जा विकसित करने का वादा किया। इसके अतिरिक्त सरकार ने स्पष्टï कर दिया कि उसके एजेंडे में शहरीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की सुरक्षा और रक्षा आधुनिकीकरण पर भी काफी जोर दिया जाएगा।


    हालांकि अभिभाषण में राजकोष के बारे में कुछ नहीं कहा गया, जो अर्थशास्त्रियों के मुताबिक चिंता का विषय है। भाषण में इसका भी जिक्र नहीं था कि सरकार सब्सिडी में कटौती के लिए क्या करेगी या फिर करों में कटौती करेगी या बढ़ोतरी। लेकिन अभिभाषण में स्पष्टï कहा गया कि केंद्र विभिन्न राज्यों की विशिष्टï जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके साथ मिलकर काम करेगा न कि अलग फैसले करेगा।

    সাক্ষাৎকার

    আমাদের বামপন্থীরা আত্মঘাতী, কিন্তু এ দেশে বামপন্থা ছাড়া গতি নেই

    পার্টির এ-রকম দুর্দশা হল, তার একটা বড় কারণ, পার্টির সঙ্গে, বিশেষ করে এই রাজ্যের পার্টি নেতৃত্বের সঙ্গে বাইরের যোগাযোগ একেবারে শূন্য হয়ে গিয়েছিল। বাইরের পৃথিবীতে কী হচ্ছে, দেশের ও রাজ্যের লোকেরা কী বলছে, কী চাইছে এবং নেতাদের সম্বন্ধে কী ভাবছে, সেটা তাঁদের জানা দরকার। তা জানতে হলে খোলাখুলি সকলের সঙ্গে কথা বলতে হবে। দ্বিতীয়ত, নেতারা কী ভাবছেন, কী করতে চাইছেন সেটাও বাইরের লোককে জানানো দরকার। অশোক মিত্রের সাক্ষাৎকার নিলেন অনির্বাণ চট্টোপাধ্যায়।

    ১০ জুন, ২০১৪, ০০:৩৯:১৭


    আপনি সম্প্রতি একটি প্রবন্ধে লিখেছেন, লোকসভা নির্বাচনে বামপন্থীদের এই ব্যর্থতা একটা গভীর সংকটের পরিণাম, তার মোকাবিলা করতে না পারলে সিপিআইএমের ভবিষ্যৎ অত্যন্ত অনিশ্চিত। এই সংকট কি অনেক দিন ধরেই জমে উঠছিল না?


    একটু পুরনো কথায় ফিরে যাই। আমি ১৯৮৪ সালে হঠাৎ কেন বাম মন্ত্রিসভা ছেড়ে বেরিয়ে এলাম? আমি তখনই ওঁদের জানিয়ে দিয়েছিলাম যে, আপনারা নিশ্চিন্ত থাকুন, পার্টির বিরুদ্ধে আমি বাইরে একটা কথাও উচ্চারণ করব না, কিন্তু আমার পক্ষে আর থাকা সম্ভব নয়। কারণ আমি দেখছিলাম, যে আদর্শের কথা ভেবে আমি নিজের বৃত্তি ছেড়ে বামপন্থী আন্দোলনের সঙ্গে একাত্ম হয়েছিলাম, তা ছেড়ে পার্টি আস্তে আস্তে সরে যাচ্ছে। প্রবীণ এবং অভিজ্ঞ নেতারা কেউ কেউ প্রয়াত, কেউ কেউ অবসন্ন, ক্লান্ত, পার্টির ভিতরে কী হচ্ছে তা যেন তাঁরা ঠিক দেখছেন না, বা দেখার ক্ষমতা হারিয়ে ফেলেছেন। শেষ পর্যন্ত যখন আমাকে বলা হল, বেসরকারি কলেজের যাঁরা অধ্যক্ষ, তাঁদের সরকারি কলেজের অধ্যক্ষদের সমান বেতন দিতে হবে, তখন আমি ঠিক করলাম, ঢের হয়েছে, আর নয়।

    কেন, আমি সেটা বলি। আমি এমন অনেক বিশিষ্ট শিক্ষাব্রতী মানুষের কথা জানতাম, যাঁরা সুযোগ পেয়েও সরকারি কলেজের অধ্যক্ষের পদ নেননি, পড়ানো ভালবাসতেন বলে শিক্ষকতাতেই থেকে গিয়েছিলেন, যদিও অধ্যক্ষ পদে বেতন ও অন্যান্য সুবিধে অনেক বেশি ছিল। তখন নানা বেসরকারি কলেজে এমন অনেক অধ্যক্ষ ছিলেন, যাঁদের যোগ্যতা যথেষ্ট ছিল না, দলীয় নেতারা তাঁদের সেখানে বসিয়ে দিয়েছিলেন। আমাকে বলা হচ্ছিল, তাঁদের সুশোভন সরকার, তারকনাথ সেন, সুবোধ সেনগুপ্তদের চেয়ে বেশি মাইনে দিতে হবে। আমি বলেছিলাম, 'এটা ঠিক হবে না, আপনারা মুড়িমিছরির দর এক করতে যাবেন না, তাতে দক্ষতা চুলোয় যাবে, আখেরে শিক্ষার সর্বনাশ হবে, সমাজের সর্বনাশ হবে। আপনারা তো গোটা দেশকে সীমিত সামর্থ্যের মধ্যে একটা সুষ্ঠু সৎ প্রশাসনের উদাহরণ দেখাতে চান। কিন্তু অন্যায় দূর করতে গিয়ে যদি আপনারা অন্যায়কেই প্রশ্রয় দেন, তা হলে আমরা কোথায় গিয়ে দাঁড়াব?'কিন্তু ওঁরা সেটা শুনতে চাইলেন না।

    আসলে পার্টি এক সময় বশ্যতা আর দক্ষতার তফাত করতে ভুলে গেল। আরও অনেক সমস্যা ছিল, কিন্তু আমার মনে হয় এটাই আসল। পদত্যাগের কিছু দিন পর দিল্লি গেলে দলের এক প্রবীণ নেতা, একদা দলের সাধারণ সম্পাদক ছিলেন, আমাকে বিশেষ স্নেহ করতেন, ঝেড়ে বকুনি দিলেন, 'তুমি একটা গাধা, পার্টির ভেতরে থেকে আন্দোলন চালিয়ে যাওয়া তোমার কর্তব্য ছিল।'স্বীকার করি, অন্তর্দলীয় কোঁদল চালাবার মতো প্রতিভা বা মানসিকতা কিছুই আমার নেই।

    আপনি অনেক দিন আগে কমিউনিস্ট পার্টির দুটি ধারার কথা লিখেছিলেন। প্রাকৃত এবং সংস্কৃত। মুড়িমিছরি এক করে ফেলার মধ্যে কি প্রাকৃত ধারার একটা প্রভাব ছিল?

    বামফ্রন্টের প্রধান দলে যাঁরা যোগ দেন, তাঁদের মধ্যেও কিছু বিশিষ্ট, সংস্কৃতিমান মানুষ ছিলেন। স্বয়ং জ্যোতি বসু অত্যন্ত দায়িত্বশীল, সৌজন্যপূর্ণ এবং বিচক্ষণ ব্যক্তি ছিলেন। কিন্তু সামগ্রিক নেতৃত্বের যে চাপ, উঁচুদরের প্রবীণ নেতারা সেই চাপটা আটকালেন না।

    এখানে কি সরকার আর পার্টির মধ্যে বিরোধ ঘটল? পার্টি নিজের মতটা চাপিয়ে দিল?

    ব্যাপারটা অনেকটা এ-রকমই। দলের সিদ্ধান্ত হয়েছে, ফ্রন্টের সিদ্ধান্ত হয়েছে, সুতরাং প্রশাসনকে তা মানতে হবে। প্রশাসনের যে কতকগুলো আলাদা বক্তব্য থাকতে পারে, সেটা ধৈর্যের সঙ্গে শোনার সময় সেই মুহূর্তে কারও ছিল না। তত দিনে, বিশেষত পঞ্চায়েত নির্বাচনের মধ্যে দিয়ে গ্রামাঞ্চলে ব্যাপক জনসমর্থন গড়ে তোলার পরে, তাঁরা তো ধরে নিয়েছিলেন, 'চিরকাল পশ্চিমবঙ্গে শাসন করে যাব।'সোজা কথা, এই সাফল্যে তাঁদের মাথা ঘুরে গিয়েছিল। এবং সেটাই মারাত্মক হয়ে দাঁড়াল। আশির দশকের মাঝামাঝি থেকেই দেখা যাচ্ছিল পার্টির মধ্যে নেতারা কেউ কেউ একটু অহঙ্কারে ভুগছেন, চাটুকারদের দ্বারা পরিবৃত হচ্ছেন, চাটুকাররা বাছা বাছা ক্ষমতার জায়গায় পৌঁছচ্ছেন, তাঁরা আবার তাঁদের চাটুকার তৈরি করছেন। এই ভাবে বৃত্তের মধ্যে বৃত্ত তৈরি হল, পুরো দলটায় ঘুণ ধরল।

    কিন্তু তার পরেও তো দীর্ঘ দিন বিরাট জনসমর্থন ছিল। ২০০৬-এও। সাফল্য। তার দু'তিন বছরের মধ্যে ধস নামল কেন?

    এটার কারণ হচ্ছে, উনিশশো নব্বইয়ের দশকে এবং এই শতাব্দীর প্রথম দশকের গোড়ার দিকে বামফ্রন্টের প্রশাসন এবং তার নানান শাখাপ্রশাখা যে ধরনের মানসিকতা নিয়ে কাজকর্ম করছিলেন, তাতে কিছু লোকের মনে গভীর অসন্তোষ এবং বিরক্তি জন্ম নিয়েছিল। কিন্তু তাঁরা কোনও বিকল্প দেখছিলেন না। মন্দের ভাল হিসেবে তাঁরা বামফ্রন্টকে সমর্থন করছিলেন। জ্যোতি বসু তখনও বেঁচে। তাঁর সম্বন্ধে বাঙালির, বিশেষত মধ্যবিত্ত সমাজের মনে এক আশ্চর্য স্বপ্নালু মায়াবোধ ছিল। এখনও আছে। আমি এই সমস্ত কথাগুলো বলছি এই কারণে যে, আমি আমার দীর্ঘ জীবনে এই আন্দোলনের সঙ্গে, এই পার্টির সঙ্গে একাত্ম থেকেছি। বর্তমান বিপর্যয়ের গ্লানি আমাকেও সমান স্পর্শ করেছে, তার দায়ও। ১৯৮৪ সালে মন্ত্রিসভা ছেড়ে দেওয়ার পরেও আমি দলের বাইরে নিজেকে ভাবিনি। আমি এটাও সবিনয় দাবি করব যে, পার্টির ভেতরে যাঁরা আছেন, যাকে আমি বলব পার্টির সমর্থনের বৃত্ত, তাঁদের অনেকে আমাকে পার্টির এক জন বলেই মনে করেন, যদিও নেতৃত্ব তা মনে করেন না। এমনকী ১৯৯৩ সালে পার্টি থেকে যখন আমাকে রাজ্যসভায় যেতে আহ্বান জানানো হল, আমি খানিকটা উৎসাহের সঙ্গেই সম্মত হলাম, প্রধানত দুটি কারণে। প্রথমত, যে কেন্দ্র-রাজ্য সম্পর্কের পুনর্বিন্যাস বিষয়ে মন্ত্রিসভায় থাকাকালীন— জ্যোতিবাবুর পূর্ণ সমর্থন নিয়ে— দেশে এক বিশেষ ধরনের আলোড়ন তুলতে অংশত সফল হয়েছিলাম, সংসদে গিয়ে ফের তা নিয়ে উত্তাল হব, কারণ ইতিমধ্যে বামফ্রন্ট সরকার এ বিষয়ে কেমন যেন ঝিমিয়ে পড়েছে। দ্বিতীয় বড় কারণ, দু'বছর আগে, তথাকথিত মুক্ত অর্থনীতি প্রবর্তনের পর দেশ জুড়ে আর্থিক সংকট যে ক্রমশ ঘনীভূত এবং এই পথে দেশের যে মুক্তি নেই, তা গোটা দেশের প্রতিনিধিদের সামনে উচ্চারণের সুযোগ পাব। দলীয় বিচ্যুতির কথাগুলি আমি বরাবরই আত্মসমালোচনা হিসেবে বলেছি।

    পার্টি নতুন পৃথিবী, নতুন বাস্তবের মোকাবিলা করতে পারল না বলেই কি এ বিচ্যুতি ঘটল?

    প্রথম কথা, যে কঠোর নিয়মের বেড়াজালে পার্টিতে নতুন আগমনপ্রার্থীদের যাচাই করা হত, আমার মনে হয়, আশির দশকের মাঝামাঝি থেকে সেটা ঢিলে হয়ে গেল। প্রবীণ নেতারা একটু অন্যমনস্ক, একটু শ্রান্ত, তার সুযোগ গ্রহণ করলেন কিছু কিছু নবীন, ভূতপূর্ব ছাত্রনেতা কিংবা যুবনেতা, তাঁরা এই প্রবীণ নেতাদের প্রধান উপদেষ্টা ও সহায়ক হলেন, এবং তাঁদের যারা সমর্থক ও পেটোয়া মানুষ, তারা কাতারে কাতারে পার্টিতে ঢুকে পড়ল।

    অন্য আর একটা দিক আছে। যদিও গণতান্ত্রিক কেন্দ্রিকতার কথা বলা হয়, এবং এখনও পর্যন্ত নিয়ম হল, কেন্দ্রই শেষ কথা বলবে, অন্তত পশ্চিমবঙ্গে তা-ই হয়, কিন্তু পশ্চিমবঙ্গ এবং কেন্দ্রের পার্টির মধ্যে যে সম্পর্ক, তা একটু অন্য রকম। কেন্দ্রে যাঁরা হাল ধরে আছেন, তাঁদের নিজেদের অঞ্চলে প্রভাব অত্যন্ত সীমিত। অন্য দিকে পশ্চিমবঙ্গ থেকে যাঁরা যাচ্ছেন কেন্দ্রীয় নেতৃত্বে, তাঁদের পেছনে এত জমাট একটা আন্দোলন, এত সম্ভ্রান্ত একটি প্রশাসন। তাই অনেক ক্ষেত্রেই কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের পছন্দ হোক বা না হোক, এ রাজ্যের নেতৃত্বের ইচ্ছা-অনিচ্ছার ওপর পার্টির সিদ্ধান্ত অনেকটাই নির্ভর করত। যদিও কোনও কোনও কেন্দ্রীয় নেতৃত্ব জানতেন, পশ্চিমবঙ্গে এখানে ওখানে অনেক গলদ ঢুকছে, তাঁদের কিছু করার ছিল না। তাঁরা অসহায় বোধ করতেন।

    পশ্চিমবঙ্গে পার্টির দীর্ঘ নির্বাচনী সাফল্যই কি কেন্দ্রীয় নেতৃত্বের কিছু না করার একটা কারণ ছিল? তাঁরা কি মনে করতেন, রাজ্য নেতৃত্ব যখন ভোট আনছেন, তখন তাঁরা যে ভাবে পার্টি চালাচ্ছেন সে-ভাবেই চালান?

    তাঁরা ভাবতেন, আমরা দূর থেকে কী সিদ্ধান্ত চাপিয়ে দেব? ওরা এতগুলো নির্বাচনে জয়ী হয়েছে, ওরা জানে স্থানীয় অবস্থা কী রকম, কী করা উচিত। সিঙ্গুর নিয়ে হট্টগোলের পরে অবস্থাটা প্রকট হয়ে গেল।

    কিন্তু একটা কমিউনিস্ট পার্টির তো কেবল ভোটের হিসেব কষার কথা নয়। তার আদর্শ সে কতটা অনুসরণ করতে পারছে, বাস্তব অনুযায়ী সেই আদর্শের পরিমার্জন দরকার কি না, এগুলোও তার ভাবার কথা। তেমন চিন্তার লক্ষণ তো দেখা গেল না!

    একটা উদাহরণ দিই। ভূমিসংস্কারের কথা ধরা যাক। বর্গাদারদের আইন করে অধিকার পাইয়ে দেওয়া হল। কিছু কিছু ভূমিহীন মানুষ এক ছটাক দু'ছটাক করে জমি পেতে শুরু করলেন। ব্যাঙ্কের ওপর চাপ দিয়ে কিছু কিছু টাকার ব্যবস্থাও হল। কিন্তু এর পরে কী হবে? ওই যে ছোট ছোট জমি, তার উৎপাদনশীলতা তো অত্যন্ত সীমিত। এবং আজ যাকে একটু জমি দিলাম, কাল গিয়ে তো তাকে বলতে পারি না যে, এসো, তোমার জমির সঙ্গে পাশের জমি মিলিয়ে দিয়ে একসঙ্গে চাষ-আবাদ করো, তা হলে উন্নতি হবে। সমবায় আন্দোলনের মধ্য দিয়ে এগোনোর চেষ্টা করা উচিত ছিল। বীজ, সার, ফসল ইত্যাদি ক্রয়বিক্রয়ের ক্ষেত্রে সমবায় আন্দোলনকে কাজে লাগাতে পারলে কৃষিজীবীর লাভ হত, এবং সেই অভিজ্ঞতা থেকে তাঁরা উৎপাদনের ক্ষেত্রেও সমবায়ের প্রয়োজন অনেক ভাল বুঝতে পারতেন। কিন্তু সে দিকে নজর দেওয়া হল না। তার পরে ফ্রন্টের সব ভাগাভাগি ব্যাপার ছিল, সমবায় ছিল এক শরিক দলের হাতে। নানা সমস্যা।

    একটা উদাহরণ দিই। ভার্গিস কুরিয়েন আমার অনেক দিনের বন্ধু, একসঙ্গে কাজ করেছি, তাঁকে বললাম, 'তুমি পশ্চিমবঙ্গের জন্যে একটা মাদার ডেয়ারি তৈরি করে দাও।'তিনি বললেন, 'তুমি বলছ, আমি নিশ্চয়ই করে দেব।'দিলেনও। কিন্তু দু'বছর যেতে না যেতেই দেখা গেল অদ্ভুত ব্যাপার। যে ধারণাটা কুরিয়েনের বরাবর ছিল, তা হল, ছোট বড় সবাই মিলে সমান অধিকার প্রয়োগ করবে, ক্ষুদ্রতম কৃষক বা দুধওয়ালাও দাবি করতে পারবেন যে, 'এই যে দুধ, মাখন, পনির, এমনকী মিষ্টি দই তৈরির মস্ত ব্যবস্থাটা দেখছ, এটা আমারও।'কিন্তু এখানে মাদার ডেয়ারিতে প্রথম থেকেই কে কত মাইনে পাবে, সে সব নিয়ে দল থেকে নাক গলানো শুরু হল। এই নিয়ে আর একটা গল্প শুনেছিলাম। পশ্চিমবঙ্গে তিনি আরও মাদার ডেয়ারি খুলছেন না কেন, এই প্রশ্নের জবাবে কুরিয়েন নাকি বলেছিলেন, 'দেয়ার আর টু মেনি বেঙ্গলিজ ইন বেঙ্গল'!

    ছোট ছোট জমিতে চাষের জন্য অন্যান্য ব্যবস্থাও তো ঠিক মতো হয়নি, কৃষিঋণ...

    মহারাষ্ট্র, গুজরাত, কর্নাটক, এই সব রাজ্যে নাবার্ড থেকে বছরে চার হাজার, পাঁচ হাজার, ছ'হাজার, আট হাজার, দশ হাজার কোটি টাকা ঋণ দেওয়া হচ্ছে। পশ্চিমবঙ্গে সেখানে বড়জোর পাঁচ-সাতশো কোটি। এটাই তফাত।

    নীচের থেকে কোনও চাপ এল না? কৃষক সভা এ সব নিয়ে পার্টিকে চাপ দিল না?

    তত দিনে কৃষক সভায় পঞ্চায়েতের প্রাধান্য বেড়ে গিয়েছিল। কারণ পঞ্চায়েতের হাতে টাকা আছে, কৃষক সভার হাতে টাকা নেই। এবং আর একটা ব্যাপার— কোনও কোনও জেলায় বর্গা বিলির ফলে পার্টির সমর্থকদের মধ্যে শ্রেণিবিন্যাসেরও একটা পরিবর্তন দেখা দিল। যাঁরা ছোট বর্গাদার ছিলেন তাঁরা মধ্য বর্গাদার হলেন, যাঁরা মধ্য বর্গাদার ছিলেন তাঁরা বড় বর্গাদার হয়ে গেলেন। তাঁদের গোষ্ঠীস্বার্থ পার্টির ঘোষিত আদর্শ থেকে একটু সরে গেল। একটা গল্প মনে পড়ছে। ১৯৬২ সালে পঞ্জাবের সাধারণ নির্বাচনের প্রাক্কালে ছ'জন কমিউনিস্ট বিধায়ক পার্টি ছেড়ে দিলেন। এবং কমিউনিস্ট পার্টি ছেড়ে তাঁরা কংগ্রেসে যোগ দিলেন না, যোগ দিলেন স্বতন্ত্র পার্টিতে। কমিউনিস্ট পার্টি এত দিন সেচের ওপর কর বসানোর বিরুদ্ধে লড়াই করেছে, জমি পাইয়ে দেওয়ার আন্দোলনগুলোও সফল হয়েছে, এঁরাও আর ছোট কৃষক নেই, মাঝারি কৃষক হয়ে গেছেন, বিত্তবান হয়ে গেছেন...

    এ বার শ্রেণিস্বার্থ...

    শ্রেণিস্বার্থটা পালটে গেছে। এটা পঞ্জাবে তো চোখের সামনে দেখেছি। সম্ভবত সেই কারণেই, যদিও পার্টি ভারতের অন্য প্রায় সর্বত্র খেতমজুর ফেডারেশন তৈরি করেছিল, পশ্চিমবঙ্গে রাজ্য নেতৃত্ব থেকে তা করার অনুমতি মেলেনি।

    পশ্চিমবঙ্গের শিল্প উন্নয়ন সম্পর্কেও তো দীর্ঘ দিন বামফ্রন্ট প্রয়োজনীয় সচেতনতার পরিচয় দেয়নি।

    শিল্পায়নের জন্য পুঁজিপতিদের কাছে ভিক্ষাপাত্র নিয়ে যাওয়ার পরিবর্তে একটি আদর্শসম্মত বিকল্প সুযোগ বামপন্থী নেতা-মন্ত্রীরা হাতছাড়া করেছিলেন। ২০০৪ সালে কেন্দ্রে সরকার গঠনে কংগ্রেস দলকে সমর্থনের সুবাদে বামফ্রন্ট তিনটি সুস্পষ্ট শর্ত আরোপ করতে পারত: (১) পাঁচ বছরের মধ্যে পশ্চিমবঙ্গ সহ গোটা পূর্ব ভারতে ব্যাঙ্ক ঋণ অন্তত দশগুণ বাড়াতে হবে; (২) পশ্চিমবঙ্গ সহ পূর্ব ভারতে কৃষি শিল্প পরিষেবা ইত্যাদি বিভিন্ন ক্ষেত্রে কেন্দ্রীয় সরকারের প্রত্যক্ষ বিনিয়োগ পাঁচ বছরে দশ গুণ বাড়াতে হবে; (৩) বামদের পূর্বসম্মতি ছাড়া অর্থ কমিশন ও যোজনা কমিশনের সদস্য নির্বাচন নিয়ে সিদ্ধান্ত গ্রহণ করা যাবে না। পাশাপাশি, জমি অধিগ্রহণের সমস্যা নিরসনের জন্য যে কৃষকদের জমি নেওয়া হল, আর্থিক ক্ষত