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This is my Real Life Story: Troubled Galaxy Destroyed Dreams. It is hightime that I should share my life with you all. So that something may be done to save this Galaxy. Please write to: bangasanskriti.sahityasammilani@gmail.comThis Blog is all about Black Untouchables,Indigenous, Aboriginal People worldwide, Refugees, Persecuted nationalities, Minorities and golbal RESISTANCE.

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    आखिर क्यों है बंगाल अपराधियों के लिए जन्नत?क्यों मुठभेड़ को आखिरी विकल्प मानने लगे हैं अफसरान?

    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



    आखिर क्यों है बंगाल अपराधियों के लिए जन्नत?


    क्यों मुठभेड़ को आखिरी विकल्प मानने लगे हैं अफसरान?


    क्योंकि बंगाल में  अपराधकर्म  पर कोई अंकुश  नहीं है!अपराधी गिरोह बाकायदा प्रतिष्ठानिक और संस्थागत हैं बंगाल में। हर गैरकानूनी काम का ठेका उन्हें ज्यादातर राजनैतिक दलों से मिलता है!ऊपर से पुलिस के भी हाथ बंधे हुए है।


    राजनीतिक संरक्षण की वजह से अपराधी खुलेआम आजाद घूमते हैं।राजनीतिक मंचों पर शिखरस्थ राजनेताओं के साथ अमूमन मौजूद अपराधियों को छूने की भी जुर्रत नहीं कर पाता पुलिस प्रशासन।


    आपराधिक गिरोहबंदी बाकायदा राजनीतिक संस्कृति बन गयी है और कानून के रखवालों का हौसला पस्त है।


    अपराध को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है डर। अब पुलिस महकमे में इस बात की खास चर्चा है कि बंगाल में एंकाउंटर होता ही नहीं है। कानूनी प्रक्रिया में जहां अपराध पर अंकुश लगाना बेहद पेचीदा है और राजनीतिक हस्तक्षेप से अपाऱाधी आसानी से छूट भी जाते है,वहां मुठभेड़ के अलावा कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं।


    बंगाल में राजनीतिक वर्चस्व से आम जनता और उद्योग कारोबार की हालत जो है ,वह है,लेकिन इससे सीधे तौर पर पुलस प्रशासन का हौसला पस्त हो रहा है।कानून व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को जब आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा तिलांजलि देकर आपराधिक तत्वों के साथ घुटने टेकने पड़े,तो कम से कम आईपीएस और आईएएस कैडर के लोगों को फिर मुंबई में गैंगस्टार सफाये की एंकाउंटर पद्धति इस मकड़जाल से निकलने की एकमात्र राह दिखायी देती है।


    वैसे बंगाल में एंकाउंटर पद्धति का प्रयोग नहीं हुआ है,ऐसा कहना भी इतिहास से मुंह चुराना होगा।मुंबई में माफिया गिरोह के खिलाफ एंकांउटर शुरु होने से काफी पहले, गुजरात और यूपी के एंकांउटर बूम धूम से भी पहले खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ बंगाल के ही सिर्द्धार्थ शंकर राय के निर्देशन में केपीएस गिल ने मुठभेड़ को सर्जिकल पद्धति से अंजाम दिया है।


    गौरतलब है कि मौलिक मुठभेड़ संस्कृति भी सिद्धार्थ शंकर राय और उनके तत्कालीन पुलिस मंत्री और इस वक्त मां माटी मानुष सरकार के पंचायतमंत्री सुब्रत मुखर्जी का आविस्कार है,जिसके जरिये बंगाल भर में लोकप्रिय जनविद्रोह नक्सलबाड़ी आंदोलन में घुसपैठ के जरिये पहले गैंग वार के परिदृश्य रचे दिये गये और एक के बाद एक सारे के सारे नक्सली मार गिराये गये।


    हाल में इसी मां माटी मानुष की सरकार ने भी परिवर्तन के बाद माओवादी नेता किशनजी को मुठभेड़ में मार गिराने में सफलता अर्जित की।


    विडंबना यह है कि राजनीतिक हस्तक्षेप से मुठभेड़ को अपराध से निपटने की सर्वश्रेष्ठ पद्धति मानने वाले पुलिसवाले यह तथ्य सिरे से भूल रहे हैं कि मुठभेड़ संस्कृति भी राजनीतिक वर्चस्व की ही सुनहरी फसल है।


    राजनीतिक फायदे के लिए ही हस्तक्षेप के बदले मुठभेड़ के तौर तरीके अपनाती हैं सरकारें और इस महायज्ञ में भवबाधा की स्थिति में इसी यज्ञ में पुर्णाहुति भी अंततः पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की दे दी जाती है।


    ऐसा मुंबई में अक्सर होता है।गुजरात और यूपी में होते रहे हैं।बंगाल में तो खूब हुआ है,पंजाब में भी बखूब।कश्मीर में तो रोज हो रहा है और उत्तरपूर्व में रोजमर्रे की जिंदगी है मुठभेड़ संस्कृति।


    फिर भी न कहीं अपराधकर्म पर अंकुश लगा है और न दो चार अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिरा देने से कानून और व्यवस्था की स्थिति सुधरती है और न राजनीतिक हस्तक्षेप से रोज मर मर कर जीने की अफसरान की तकदीर बदलती है।



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    वाह रे कारपोरेट मीडिया का 'लोकतंत्र' ! मेक्सिको के कुछ सबक

    Posted by Reyaz-ul-haque on 4/15/2014 05:28:00 PM

    पी. कुमार मंगलम का यह लेख मेक्सिको में चुनावों और प्रायोजित आंदोलनों तथा दलों के जरिए फासीवादी, जनविरोधी उभारों और जन संघर्षों को दबाने के साम्राज्यवादी प्रयोगों की रोशनी में भारत में पिछले कुछ समय से चल रही लहरों की (पहले 'आप'की लहर और अब मोदी की) पड़ताल करता है. एक जरूरी लेख.

    नरेंद्र मोदी या फिर अरविंद केजरीवाल/राहुल गांधी (यहाँ  कभी अगर क्रमों की अदला-बदली होती है, तो वह आखिरकार मीडिया कुबेरों के स्वार्थोँ से ही तय होती है)? आजकल अगर आप दोस्तों-रिश्तेदारों, लोकतंत्र के अपने अनुभवों का रोना रोते बुजुर्गों और अतिउत्साहित 'नये'वोटरों को सुनें, तो बात यहीं शुरु और खत्म हुआ करती है। जब 2014 के लोकसभा चुनावों का दौर शुरू हो चुका है, तब सभी संभावित राजनीतिक विकल्पों की गहरी पड़ताल के बजाए पूरी बात का सिर्फ़ इन चेहरों पर टंग जाना क्या स्वाभाविक है! आदि-समाजवाद से लेकर'ग्लोबलाईज़्ड'समय के बीच की खिचड़ी सच्चाइयों से निकलते अनेकों जनसंघर्षों के इस दौर में सिर्फ़ 'परिवार', 'संघ-परिवार'और "अपनी ईमानदारी"की 'उपलब्धि'लिए घूमते इन चेहरों का यूं छाया रहना तो और भी अचरज भरा है! हालांकि, अगर इन दिनों चारों ओर से आ रही 'पल-पल की खबरों' पर गौर करें, तो चुनावों के मीडियाई नियंत्रण की कड़ियाँ अपने-आप खुलने लगती हैं। साथ ही, दुनिया के 'सबसे बड़े'भारतीय लोकतंत्र का खोखलापन भी नजर आता है। वैसे, बात सिर्फ भारत की ही नहीं है। 'विकासशील'या फिर 'तीसरी दुनिया'का ठप्पा झेलते देशों में 'जनता का शासन'अक्सर न दिखने वाले या फिर दिखने में लुभाऊ लगने वाले ऐसे ही फंदों से जकड़ा है। यहाँ हम लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको में जनतंत्र के पिछले कुछ दशकों के अनुभवों की चर्चा करते हुए अपनी बात स्पष्ट करेंगे।

    मेक्सिको: हड़प लिए गए लोकतंत्र की त्रासदी

    हम शायद ही कभी यह सोचते हैँ कि सिर्फ एक देश संयुक्त राज्य अमरीका का आम प्रयोग (हिदी में और ज्यादा) में अमरीका कहा जाना एक शब्द के गलत प्रयोग से कहीं ज्यादा है। जैसाकि समकालीन लातीनी अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो का कहना है, यह इस एक देश (अब से आगे यू.एस.) के द्वारा अपनी दक्षिणी सीमा के बाद शुरू होते लातीनी अमरीका का भूगोल, इतिहास, संस्कृति और राजनीति हथियाकर इस पुरे क्षेत्र को "एक दोयम अमरीका"में बदल देने की पूरी दास्तान है। यहाँ हम इस भयावह सच के पूरे ताने-बाने और अभी तक चल रहे सिलसिले की बात तो नहीँ कर सकते, लेकिन मेक्सिको की बात करते हुए इसके कई पहलू खुलेँगे।

    भूगोल के हिसाब से उत्तरी अमरीका मेँ होने और यू.एस. से बिल्कुल सटे होने के बावजूद मेक्सिको स्पानी भाषा और स्पानी औपनिवेशिक इतिहास के साथ सीधे-सीधे दक्षिणी अमरीका का हिस्सा है। इस जुड़ाव की सबसे अहम बात यह है कि 1810-25 के बीच स्पानी हुकूमत से बाहर निकले मेक्सिको, मध्य और दक्षिणी अमरीका के देशों (इन तीनों को मिलाकर बना क्षेत्र ही लातीनी अमरीका कहलाता है) में बोई गई सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी, धनिकोँ के राजनीतिक वर्चस्व और यू.एस. की दादागिरी की नर्सरी भी यही देश रहा है। बात चाहे इस 'आज़ादी'के बाद भी स्पेनवंशी क्रियोल और मिली-जुली नस्ल के स्थानीय पूँजीपतियों के पूरे देश के संसाधन, संस्कृति और सत्ता पर कब्जे की हो या 1844-48 में यू.एस द्धारा मेक्सिको की आधी जमीन लील लिये जाने की हो, मेक्सिको कल और आज के लातीनी अमरीका की कई झाँकिया दिखलाता है।

    'आज़ाद'मेक्सिको की लगातार भयावह होती गैरबराबरियों के खिलाफ वहां के भूमिहीन किसानों और खान मजदूरोँ का गुस्सा 1910 की मेक्सिको क्रांति बनकर फूटा। हालांकि, बहुत जल्द ही ब्रिटिश, फ्रांसीसी और आगे चलकर यू.एस. के बाज़ार और पैसे पर पलते क्रियोल वर्ग ने बदलाव के संघर्षों को बर्बरता से कुचल डाला था। 1930 के दशक मेँ उत्तर के पांचो विया और दक्षिण मेँ चियापास क्षेत्र के एमिलियानो सापाता जैसे क्रांतिकारी नेताओं की हत्या कर बड़ी पूँजी और सामाजिक भेदभाव की शक्तियों ने पूरे राज्य तंत्र पर कब्जा कर लिया था। 1929 में राष्ट्रपति रहे प्लूतार्को कायेस ने पीआरआई (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन इंस्तितुसियोनाल-व्यवस्थागत क्रांति का दल) बनाकर इन शक्तियों को संगठन और वैचारिक मुखौटा दिया। जैसाकि नाम से ही जाहिर है, यह पार्टी क्रांति के दौर में जोर-शोर से उठी समानता और न्याय की मांगों[1] को एक अत्यधिक केंद्रीकृत राष्ट्रपति प्रणाली वाली व्यवस्था में दफनाने की शुरुआत थी। 

    प्लुतार्को कायेस के बाद आए सभी राष्ट्रपतियों ने जनआकांक्षाओं का गला घोंटने वाली इस व्यवस्था को मजबूत किया। मजेदार बात यह कि यह सब लगातार जनता के नाम पर, लोकप्रिय नायकों की मूर्तियां वगैरह बनवाकर तथा लोकगीतों-लोककथाओं के कानफोड़ू सरकारी प्रचार के साथ-साथ किया गया! यह भी बताते चलें कि मूलवासियों सहित अन्य वंचित तबकों की कीमत पर विदेशी पूंजी का रास्ता बुहारती पीआरआई सरकारें यू. एस. शासन-व्यवस्था की सबसे करीबी सहयोगी बन गईं थी। आश्चर्य नहीं कि जब 1950 के दशक में हालीवुड में "कम्युनिस्ट" कहकर चार्ली चैपलिन जैसे कलाकारों को निशाना बनाया जा रहा था, तब वहां के सरकारी फिल्मकारों ने मेक्सिको क्रांति के नायकों को खलनायक दिखा कई फिल्में ही बना डाली! 1953 में आई एलिया काज़ान की ऐसी ही एक फिल्म में चियापास के भुमिहीन किसानों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता को बातूनी और छुटभैया गुंडा बना दिया गया था! 

    'आज़ाद'मेक्सिको के आर्थिक-राजनीतिक हालातों की कुछ बारीकियाँ 1947 के बाद के भारत को समझने में मदद करती हैं। मसलन, जहां मेक्सिको में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, सत्ता और समाज में हावी रहे क्रियोल वर्ग ने नए निज़ाम पर जबरन कब्जा किया, वहीं भारत में अंग्रेजी राज से उपजे सवर्ण जमींदार 1947 के बाद "देशभक्ति"और खादी ओढ़कर पूरी व्यवस्था पर पसर गए! फिर, जहां मेक्सिको में शासक वर्गों ने पीआरआई का लुभावना सरकारी मुखौटा तैयार किया, वहीं 'आज़ाद'भारत की कांग्रेस ब्राह्मणवादी सामंतों के हाथों कैद होकर रह गई थी। यह जरूर है कि मेक्सिको में चियापास के मूलवासियों सहित भूमिहीनों-छोटे किसानों पर खुलेआम चली राजकीय हिंसा (जिसकी जड़ें अत्यधिक हिंसक औपनिवेशिक इतिहास में हैं) के बरअक्स भारत में यह हिंसा 'लोकतंत्र', 'विकास'और 'राष्ट्रवाद'के दावे से दबा दी जाती रही है। स्वरूप जो भी रहा हो, पूरी व्यवस्था पर गिनती के शोषक वर्गों के कब्जे ने दोनों ही देशों की बड़ी आबादी को अपनी ही जमीन पर तिल-तिल कर खत्म होने को मजबूर किया। इस पूरी प्रक्रिया में अपनी जीविका, भाषाओं और संस्कृतियों पर रोज 'विकास'के हमले झेलते भारत और मेक्सिको के मूलवासी बहुल क्षेत्र "सत्ता-केंद्र से पूरी योजना के साथ थोपे गये पिछड़ेपन" की जीती-जागती मिसाल बने (विलियम्स 2002)। वैसे,1991 के बाद से 'जनहित'के नाम पर बड़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुलकर किसानों-मजदूरों की जमीन और रोजगार छिनते भारतीय लोकतंत्र का 'मानवीय'मुखौटा अपने-आप उतर गया है। इस पूरे दौर की एक खास बात यह रही है कि बड़े मीडिया समुह नव-उदारवादी नीतियों के सबसे बड़े पैरोकार बन पूरे देश में इन्हें लागू करने वाले दलों को एकमात्र राजनीतिक विकल्प बना कर पेश कर रहे हैं। 'ग्लोबल'कहकर खुद पर इठलाती कारपोरेट मीडिया के इस गोरखधंधे को समझने के लिये भी मेक्सिको एक अच्छा उदाहरण है, जो वैश्वीकरण की उलटबासियाँ  काफी पहले से झेल रहा है। 

    मेक्सिको: वैश्वीकरण और मीडियाक्रेसी का मकड़जाल

    यू. एस. से सटे होने के कारण मेक्सिको और फिर मध्य अमरीकी देश वैश्वीकरण के पहले शिकारों में रहे हैं। 'उदारीकरण''आर्थिक सुधार'आदि का लुभावना चेहरा देकर वैश्वीकरण की जो नीतियां आज पूरी दुनिया में लागू की जा रही हैं, मेक्सिको काफी पहले से उन सबकी प्रयोगशाला रहा है (शायद यहीं से यह कहावत भी निकलती है: मेक्सिको, भगवान से इतना दूर और यू.एस. के इतना करीब!)। एक और खास बात यह कि लातीनी अमरीका के ज्यादातर देशों के उलट, जहां नव-उदारवादी नीतियां भयानक तानाशाहियों के द्धारा थोपी गईं [2], मेक्सिको में देश बेचने का काम छ्ह साला चुनावों के साथ और संसाधनों की लूट का हिस्सा मध्यवर्ग में बांटकर किया गया। हालांकि, 1980 के बीतते-बीतते शोषित तबकों को हथियार और कभी-कभी 'भागीदारी'के सरकारी झुनझुने तथा मध्यवर्ग को 'राष्ट्रवाद'और 'विकास'के दावे से साधते रहने की पीआरआई की रणनीति चूक गई थी। तब, जहां महंगाई और मेक्सिकन मुद्रा पेसो की कीमत में भारी गिरावट से कंगाल हुए उच्च और मध्य वर्ग सरकार को नकारा घोषित कर रहे थे, वहीं सालों की लूट और अनदेखी से बरबाद आबादी का बड़ा हिस्सा अपने आंदोलन खड़ा कर रहा था। 

    1988 के राष्ट्रपति चुनावों में वंचित तबकों के जमीन और जीवन की मांगों को साथ लेकर तेउआनतेपेक कार्देनास पीआरडी (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन देमोक्रातिका-लोकतांत्रिक क्रांति का दल)  के झंडे के साथ पीआरआई उम्मीदवार कार्लोस सालिनास गोर्तारी के खिलाफ़ लड़े। व्यापक जनसमर्थन और जबरदस्त लोकप्रियता, कार्देनास के पिता पूर्व समाजवादी राष्ट्रपति लासारो कार्देनास थे, के बावजूद वे चुनाव हार गए। जीत और हार का बहुत कम फासला किसी राजनीतिक उलटफेर से नहीं, बल्कि सोची-समझी सरकारी साजिश से तय हुआ था। इलेक्ट्रॉनिक मतों की गिनती में कार्देनास शुरू से आग चल रहे थे कि ठीक आधी रात को मशीनें 'अचानक'खराब हो गईं। और जब उन्हें 'ठीकठाक'कर अगली सुबह नतीजों का एलान किया गया, तो कार्देनास राष्ट्रपति के बजाय राष्ट्रपति के भूतपूर्व उम्मीदवार बन चुके थे! लोकतंत्र के खुल्लम-खुल्ला अपहरण में इस बार सरकारी भोंपू बने बड़े मीडिया ने 1994 के चुनावों में अपनी भूमिका निर्णायक रूप से बढ़ा ली थी। तब, पहले से ज्यादा संगठित पीआरडी की चुनौती को एक-दूसरे का पर्याय बने पीआरआई और राज्यसत्ता (जैसे अपने यहां कांग्रेस/बीजेपी/संस्थागत 'वाम'और सरकार) तथा सबसे बड़े मीडिया समूह तेलेवीसा ने मिलकर खत्म कर डाला था। श्रम 'सुधार'और 'उदार'कर-व्यवस्था के नाम पर पूरी तरह से यू.एस. का हुक्म बजाते नाफ्टा [3] करार पर पीआरआई की बलैयाँ  लेने वाली तेलेवीसा ने अपने कारनामों से जनमत सरकार के पक्ष में या ठीक-ठीक कहें तो पीआरडी के खिलाफ़ मोड़ दिया था।

    सबसे पहले, तेलेवीसा ने अपने बड़े नेटवर्क और उसपर आम लोगों के भरोसे को भंजाते हुए पीआरआई उम्मीदवार एर्नेस्तो सेदियो को अन्य उम्मीदवारों के मुकाबले 10 गुना ज्यादा प्रचार दिया। फिर, पीआरआई विरोधी मतों को बांटने के लिए 1980 में खड़ी हुई कट्टर कैथोलिक रुझानों वाली पार्टी पीएएन (पार्तिदो दे ला आक्सियोन नासियोनाल- राष्ट्रीय कारवाई का दल) को पीआरडी से ज्यादा तवज्जो देकर 'विपक्ष'बनाया गया। इतना ही नहीं, पीआरडी की राजनीतिक चुनौती को कुंद करने के लिए बिल्कुल उसी के सुर में मजदूर-किसान हित और व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाली पीटी (पार्तिदो दे लोस त्राबाखादोरेस-मजदूर दल) को रातों-रात सनसनीखेज तरीके से देश का'हीरो'बना दिया गया! यह और बात है कि इस पार्टी का न तो पहले कभी नाम सुना गया था और न ही देश में इसका कोई संगठन था! यह सब करते हुए बाकी खबरें (हां, कहने के लिए तो वे खबरें ही थी!) भी पीआरआई की जीत के हिसाब से तय हो रहीं थी। मसलन, चुनाव से ठीक पहले सर्बिया-बोस्निया गृहयुद्ध और दूसरे देशों के अंदरूनी झगड़ों को बार-बार बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। इशारा साफ था, अगर मेक्सिको को टूटने या कमजोर होने से बचाना है, तो देशवासियों को 'अनुभवी'और 'सबको साथ लेकर चलने वाली'पीआरआई का साथ देना ही चाहिए! यहां पीआरडी, जिसके हजारों कार्यकर्ता सरकारी हिंसा का शिकार हुए, और चियापास में भूमिहीन मूलवासियों के हथियारबंद सापातिस्ता आंदोलन को बतौर 'खलनायक'पेश किया गया।   

    तेलेवीसा की अगुआई में बड़ी मीडिया की इन सब कलाबाजियों का नतीजा पीआरडी की एक और हार तथा पीआरआई की 'जीत'के रूप में सामने आया। पहले से ही विदेशी पूंजी पर टिके और नाफ्टा में प्रस्तावित कर 'सुधार'आदि से अपनी कमाई कई गुना बढ़ाने को आतुर बड़ी मीडिया ने इस जीत को को तुरत-फुरत 'ऐतिहासिक'भी बता दिया था! वैसे इस जीत का असली खिलाड़ी तो सिर्फ रेफरी होने का ढोंग कर रहा यही मीडिया था, जिसने अपनी और अन्य धनकुबेरों की बेशुमार दौलत की खातिर मुनाफे की एक और सरकार बनवा दी थी। यहां बताते चलें कि पीआरआई के लिए चंदे की खातिर रखे गए सिर्फ़ एक रात्रि-भोज के दौरान 750 मिलियन डालर (करीब 45 सौ करोड़ रु.) जुटाए गए, जिसमें 70 मिलियन डालर (करीब 4 सौ 27 करोड़ रू.) तो तेलेवीसा के मालिक एमीलीयो इसकारागा ने ही दिए थे!

    लैटिन अमेरिका इन क्राइसिस (संकटग्रस्त लातीनी अमरीका) के लेखक जान डब्ल्यू शेरमान ने मेक्सिको में बडी मीडिया के द्वारा रचे गए 'लोकतंत्र'के इस नाटक को 'मीडियाक्रेसी'कहा है। इस 'मीडियाक्रेसी'में आबादी के बड़े हिस्से की सोच पर हावी एक या एक से अधिक कॉरपोरेट मीडिया, जैसे मेक्सिको में तेलेवीसा, अपने फायदे की सरकार बनाते-गिराते रहते हैं। यहां इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता में कौन सी पार्टी आ रही है, बस इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि जो भी आए इस मीडिया के काम आए! अपने मतलब के लिए सत्तासीन पार्टियों की अदला-बदली तो यहां की खास रवायत है! साल 2000 आते-आते मेक्सिको यह सब कुछ देख चुका था, जब राष्ट्रपति चुनावों में जीत का सेहरा पीआरआई के बजाय पीएएन के सिर बांधा गया। धार्मिक कट्टरता के अपने सभी दावों को बड़ी चालाकी से छुपा पीएएन अब बाजार की सबसे बड़ी हिमायती पार्टी बन गई थी और देश को नए राष्ट्रपति के रूप में कोका-कोला (मेक्सिको) के मुखिया रहे विसेंते फाक्स का ब्रांडेड तोहफा दिया था! 

    निष्कर्ष: भारत और मीडियाक्रेसी की 'लहरें'

    चुनावों से ठीक पहले ज्यादातर टी.वी. और अखबार मोदी तथा उनके मनपसंद प्रचार-हथकंडों, जैसे गुजरात में 'विकास'की विडंबनाओं पर घुन्ना चुप्पी और आतंकवाद (मतलब आई. एम. मतलब मुसलमान!) की तोतारटंत, से सज गए हैं। पूरी दुनिया का 'सच'"सबसे पहले" बताने-दिखाने का दावा करने वाली बड़ी मीडिया भला "हर-हर मोदी" के उन्माद में बौड़ाए संघी लगुओं-भगुओं-सा व्यवहार क्यों कर रही  है! वैसे, कल तक यही मीडिया अस्सी-नब्बे के दशक से नेहरुवादी समाजवाद का अपना ही बुना भ्रमजाल (जिसमें चलती स्थानीय जमींदारों-पूंजीपतियों की ही थी) तोड़कर बाजार के 'मनमोहनी'छ्लावे बेचती कांग्रेस पर फिदा था। हो भी क्यों न, 'खबर'बेचने के अपने कारोबार में ठेका-प्रथा और अधिकतम काम के लिए कम-से-कम पगार जैसे उदारीकरण के 'वरदानोँ'का सबसे ज्यादा फायदा भी तो इसी मीडिया ने उठाया है! और आज जब शोषण और लूट की इन्हीं सब नीतियों के लिए मनमोहन सिंह "अंडरएचीवर"बन चुके हैं, तब यह मीडिया पूरी पेशेवर सफाई और 'निष्पक्षता'से कारपोरेट पूंजी के नए, 'सख्त', 'कठोर'आदि, आदि...सेवक बने नरेंद्र मोदी के साथ हो लिया है! 

    यहां मेक्सिको के जिन अनुभवों को रखा गया है, उनकी नजर से देखें तो कांग्रेस से बड़ी मीडिया का इस तरह किनारा कर लेना ज्यादा बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। मसलन, मेक्सिको के पीआरआई की तरह कांग्रेस भी जहाँ सत्ता के सभी खुले-छुपे हिस्सों पर वर्षों की अपनी पकड़ के बावजूद (या शायद इसी वजह से) वंचित तबकों के बुनियादी मुद्दे हल नहीं कर सकी, वहीं लोकप्रिय दिखने की चुनावी मजबूरियों के चलते वह आज कॉरपोरेट मुनाफे को खुली छूट भी नहीं दे सकती। इस तरह, 'विकास'और 'सबका साथ'के दावों के अपने ही अंतर्विरोधों में टूटी-फूटी यह पार्टी सिर्फ मुनाफे के लिए 'प्रतिबद्ध'बड़ी पूंजी की पहली पसंद नहीं रह गई है। वहीं, एकमुश्तिया वोट बटोरने के अपने हिंदू सांप्रदायिक एजेंडे को कारपोरेटी विकास की चकमक चाशनी में पेश करते मोदी बड़ी मीडिया के लिए ज्यादा जिताऊ-बिकाऊ खिलाड़ी (जैसे मेक्सिको में पीएएन) बन चुके हैं! 

    आजकल (या कम से कम मोदी को सीधे-सीधे चुनौती देने तक) बड़ी मीडिया की लाडली बनी आम आदमी पार्टी के हो-हल्ले के पीछे झांके, तो लोकतंत्र पर भारी पड़ते पूँजी का खेल यहाँ भी दिख जाता है। सबसे पहले, सिर्फ़ पैसों के हेरफेर को भ्रष्टाचार समझने के चलताऊ नजरिए से लैस 'आप'ने भ्रष्टाचार की टी.वी. पर नहीं दिखने वाली, लेकिन हमारी पूरी व्यवस्था की जड़ में बैठी सच्चाइयों (आबादी का बड़ा हिस्सा भूमिहीनों का है, जिसमें ज्यादातर दलित हैं) से लोगों का ध्यान हटा दिया है। फिर, इतिहास की कई नाइंसाफियों की उपज ऐसी सच्चाइयों को 'सामान्य'समझने-समझाने वाले हमारे समाज के बड़े हिस्से को बिना कोई जनांदोलन खड़ा किए 'ईमानदार'होने और व्यवस्था 'बदलने'का फास्टफुडिया इल्हाम भी दे दिया गया है! यह तब जब दलितों-मुसलमानों-स्त्रियों सहित व्यवस्था के सभी शिकारों पर 'आम आदमी'के इस पार्टी का रवैया बिल्कुल सतही और आखिरकार शोषक सत्ताओं और विचारों को ही आगे बढ़ाने वाला है। मसलन, औरतों के सवालों को उनकी पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक  गहराई में उठाने की बजाय यहाँ इन सवालों का निशाना रही पुरुषसत्ता को ही "महिलाओं की कमांडो फोर्स"का नया हथियार दे दिया गया है! वहीं, धार्मिकता, पूरी राजनीतिक व्यवस्था और पुलिस आदि के जरिए वार करती सांप्रदायिकता पर सीधी बहस न खड़ी कर इसे सिर्फ़ मोदी विरोध और मुसलमानों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अभी तक चल रहे सरकारी छलावे के चुनावी तोतारटंत के भरोसे छोड दिया गया है। लोकतंत्र के तमाम दावों के बावजूद आप का अंदरूनी ढाँचा (जिसमें चलती सिर्फ़ पोस्टर ब्वाय अरविंद केजरीवाल और उन्हीं के चुने कुछ टेक्नोक्रेट लोगों की ही है) और स्वराज का इसका मंत्र (जहां सर्वशक्तिशाली लोकपाल न तो जनता द्वारा चुना जाएगा और न ही उसकी कोई जन-जवाबदेही होगी) भी भागीदारी और जनवाद के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं देते। 

    इस तरह, सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण तथा पूँजीपतियों के ही हित साधने वाली मौजूदा आर्थिक नीतियों पर पूरी सहमति (याद करें केजरीवाल के "अच्छे"उद्योगपतियों के 'बिजनेस'में दखल न देने की वह चारों तरफ छापी गई टिप्पणी!) के साथ 'आप''मुख्यधारा'की राजनीति के लिए कोई खतरा नहीं है। बल्कि, आज कॉरपोरेट व्यवस्था के लिए भी चंद नामों पर चलती और और देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजाना उठ रही प्रतिरोध की अनगिनत आवाजों से कोई भी गहरा जुड़ाव न रखने वाली यह पार्टी एक वफादार और 'ईमानदार''विरोधी'बन रही है।आश्चर्य नहीं कि इसी व्यवस्था की जय-जयकार करती बड़ी मीडिया, जो जनांदोलनों को "अराजक", "माओवादी"आदि बताकर खबरों से गायब कर दिया करती है, शुरू से ही 'आप'को चमका-दमका कर खड़ा करती आई है (बहुत-कुछ मेक्सिको के पीटी की तरह)! यह जरूर है कि जबर्दस्त संगठन और हिंदुत्व के वोटखींचू ताकत की वजह से लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा इस मीडिया से 'आप'से ज्यादा तरजीह पा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब मोदी का खूनी चेहरा रोज नए ग्राहक ढूँढ़ती बड़ी पूँजी के काम का नहीं रहेगा, तब 'साफ-सुथरी''आप'को दुबारा हीरो बनते देर नहीं लगेगी!

    कुल मिलाकर, चौबीसो घंटे की प्राईम टाईम खबर बने मोदी (जिनकी रैलियों और वहां जुटाई गई भीड़ को कई-कई कैमरों से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है), फिलहाल सिर्फ़ विज्ञापनों की तरह बीच-बीच में दिखाए जाते केजरीवाल और छोटू बना दिए गए कांग्रेस और अन्य दलों के साथ बड़ी मीडिया लोकतंत्र का एक और "महापर्व"रचने मॆ जुट गई है। हालांकि, इस महापर्व को रचने-बेचने के लिए महाभारत और दबंग के नायकों (सभी मर्द और सवर्ण!) की आदि हो चुकी जनता को मुट्ठी बाँधे, लड़ने को तैयार मोदी और केजरीवाल/राहुल दिखाकर इनके "सीधे मुकाबले"का भुलावा भी दिया जा रहा है! और, मेक्सिको की ही तरह यहाँ भी 'भविष्य'के इन चेहरोँ की नूराकूश्ती मेँ हमारे जल-जंगल-जमीन को डकारते बडी पूँजी के खतरे पर कहीँ कोई बात नहीँ होती!


    टिप्पणियां:

    1. इन मांगों को उनकी पूरी गहराई और तफ़सील में मेक्सिको की दीवारों पर दर्ज करने का काम दिएगो रिबेरा, दाविद सिकिएरोस और उनके साथियों ने किया। 

    2. दुनिया में पहली बार लोकप्रिय समर्थन से चुनी गई साल्वादोर आयेंदे की साम्यवादी सरकार के 1973 में तख्तापलट के साथ चिली इन देशों का सबसे कुख्यात उदाहरण बना। यू.एस. के तब के विदेश मंत्री किसिंगर ने कहा था: "हम चुपचाप हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेंगे, जब चिली की जनता की गैर-जिम्मेदारी से वहां कोई कम्युनिस्ट सरकार आ जाए"! 1973 में चिली के तानाशाह बने आगोस्तो पिनोचे यू.एस. के हथियारों और सैनिकों के बल पर ही सत्ता हथिया पाए थे।

    3.  North Atlantic Free Trade Agreement: उत्तर अटलांटिक मुक्त व्यापार संगठन 1 जनवरी, 1994 को यू.एस., मेक्सिको और कनाडा को शामिल करते हुए अस्तित्व में आया। ठीक इसी दिन भूमिहीन मूलवासियों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता के नारों को उठाते हुए चियापास के जंगलों और गलियों पर एकदम से छा जाने वाले सापातिस्ता फ्रंट के लड़ाकों ने इस तारीख को सचमुच ऐतिहासिक बना दिया था। सापाता के ये नए साथी गुलामी की नई शर्तें थोपने वाले इस करार को रद्द करने के साथ-साथ मेक्सिको की पूरी शासन व्यवस्था को बदलने के लिए भी लड़ रहें हैं।


    संदर्भ सूची:

    Canclini, Garcia Nestor. Hybrid Culture: Strategies for Entering and Leaving Modernity. Minneapolis, London: University of Minnesota Press. 1995.

    Galeano, Eduardo. Memoria del fuego (II): las caras y las mascaras. Madrid: Siglo Veintiuno de España Editores. 1984.

    Galeano, Eduardo. Upside Down: A Primer for the Looking Glass World(translation by Mark Fried). New York: Metropolitan Books. 2000

    Sherman, W. John. Latin America in Crisis. Colorado: Westview Press. 2000.

    Williams, Gareth. The Other Side of the Popular. Durham & London: Duke University Press. 2002


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    সারদার কাটা দুধ জমে দই,নির্বাচনে জিতেও কুণালদশা অসম্ভব নয়


    তৃণমূল এবং সি পি এম-কে বাদ দিয়ে রাজ্যে একটি নতুন তৃতীয় বিকল্পের সম্ভাবনার কথা জানালেন সি পি এম থেকে বহিষ্কৃত নেতা রেজ্জাক মোল্লা৷‌

    बासी कढ़ी में उबाल,फिर शारदा फर्जीवाड़े का बवाल!

    এক্সকেলিবার স্টিভেন্স বিশ্বাস


    एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

    সারদা কাণ্ডে জনসমক্ষে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের নাম নিয়ে কি কুণাল ঘোষ নেত্রীর সততার ভাবমূর্তির উপর বড় প্রশ্ন তুলে দিলেন?

    হ্যাঁ

    না

    এবার মিলবে জবাব



    টাকা সরাতে খোলা হয় লোকসানের সংস্থা

    মাত্র ছ'বছরে আমানতকারীদের কাছ থেকে প্রায় ২৪৬০ কোটি টাকা তুলেছিল সারদা গোষ্ঠী। চার বছরের মধ্যে এই গোষ্ঠীর অধীনে জন্ম নিয়েছিল ২৩৯টি সংস্থা। এবং সেই প্রতিটি সংস্থাই নাকি লোকসানে চলত! সরকারি সংস্থা রেজিস্ট্রার অব কোম্পানিজ (আরওসি)-এর কাছে সুদীপ্ত সেনের সারদা গোষ্ঠী ফি বছর যে অডিট রিপোর্ট পেশ করেছে, সেখানেই এমন দাবি করা হয়েছে।

    ২৬ এপ্রিল, ২০১৪

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    ফাঁসে মৃত্যু সারদার আমানতকারীর

    সারদা-সহ তিনটি বেসরকারি অর্থলগ্নি সংস্থায় মেয়ের বিয়ের জন্য টাকা রেখেছিলেন ক্যানিংয়ের পরানিখেকো গ্রামের সুশান্ত সর্দার (৪২)। সেই টাকা যে ফেরত পাবেন না, তা প্রায় নিশ্চিত হয়ে যাওয়ার ইস্তক মানসিক অবসাদে ভুগছিলেন তিনি। শারীরিক অসুস্থতাও ছিল। শুক্রবার সকালে বাড়ির কাছেই একটি গাছ থেকে তাঁর মৃতদেহ ঝুলতে দেখেন গ্রামবাসী।

    ২৬ এপ্রিল, ২০১৪

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    সিবিআই হলে তৈরি মুকুল, প্রশ্ন মমতার, সরব বুদ্ধদেব

    সারদা-কাণ্ডে বিরোধীদের লাগাতার আক্রমণের মুখে এ বার ভিন্ন সুর ধরা পড়ল মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় এবং শাসক দলের সর্বভারতীয় সাধারণ সম্পাদক মুকুল রায়ের গলায়। পুরনো উদাহরণ দিয়ে মুখ্যমন্ত্রী যখন সিবিআই তদন্তের যুক্তি নিয়েই প্রশ্ন তুললেন, তখন দলের দ্বিতীয় সর্বোচ্চ নেতা মুকুলবাবু ঘোষণা করলেন সিবিআই কেন, যে কোনও তদন্তের মুখোমুখি হতে তাঁরা প্রস্তুত!

    ২৬ এপ্রিল, ২০১৪

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    ইডির সওয়ালের জবাব লিখে এলেন অর্পিতা

    তিনি বলেছিলেন, নিজের কেন্দ্রে ভোট মিটে যাওয়ার পরের দিনই হাজিরা দেবেন এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেট (ইডি)-এর সামনে। কথা রাখলেন অর্পিতা ঘোষ। বৃহস্পতিবারই ভোট হয়েছে বালুরঘাটে। আর শুক্রবার সল্টলেকে ইডি-র অফিসে হাজির হয়ে আড়াই ঘণ্টা ধরে তদন্তকারীদের নানা প্রশ্নের জবাব দিলেন বালুরঘাটের তৃণমূল প্রার্থী। সমস্ত প্রশ্নের উত্তর হাতে লিখে জমা দিয়ে আসতে হয়েছে তাঁকে।

    ২৬ এপ্রিল, ২০১৪

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    উধাও কত, জানেই না সারদা কমিশন

    বাজার থেকে ঠিক কত টাকা তুলেছে সারদা গোষ্ঠী, এক বছর পরেও তা জানাতে পারল না শ্যামল সেন কমিশন! সারদা কেলেঙ্কারির পরে গত বছর শ্যামল সেনের নেতৃত্বে তিন সদস্যের কমিশন গঠন করে রাজ্য সরকার। গত এক বছরে তারা কী কী কাজ করেছে, শুক্রবার রীতিমতো সাংবাদিক বৈঠক ডেকে তার ফিরিস্তি পেশ করেন কমিশনের চেয়ারম্যান শ্যামল সেন।

    ২৬ এপ্রিল, ২০১৪

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    লাইসেন্সের দানছত্র, ইডিতে অভিযুক্ত পুরসভা

    সারদা গোষ্ঠীর বিভিন্ন সংস্থার নামে কলকাতায় একটি ঠিকানায় ৪৩টি লাইসেন্স দেওয়া হয়েছে বলে আগেই অভিযোগ উঠেছিল। এ বার সেই বিষয়ে কলকাতা পুরসভার বিরুদ্ধে অভিযোগ দায়ের করা হল এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেট বা ইডি-র কাছে। গত বছর সারদা গোষ্ঠীর আর্থিক কেলেঙ্কারি ফাঁস হওয়ার পরে পুরসভায় এই নিয়ে সরব হন কংগ্রেস কাউন্সিলর প্রকাশ উপাধ্যায়।

    ২৬ এপ্রিল, ২০১৪

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    সারদার কাটা দুধ জমে দই,নির্বাচনে জিতেও কুণালদশা অসম্ভব নয়

    মনে হচ্ছিল ঈলিশ ভোজে সারদা ভ্যানিশ,কোথায় কি গরমে হাস ফাঁস,কালবৈশাখীর দেখা নেই,শরীর জ্বালা জ্বালা,সারা বাংলা এখন মরুভূমি,বৃষ্টির পূর্বাভাষও নৈব নৈব চ- ইহার মধ্যেই চতুষ্কোণীয় নির্বাচন দাবপ্রবাহের মধ্যে সারদা মুর্তিমান কালবৈশাখী৷‌লাফিয়ে লাফিয়ে চড়ছে পারদ৷ বৃহস্পতিবার দুপুরে ৪১.১ ডিগ্রি সেলসিয়াসে পৌঁছে যায় আলিপুরের সর্বোচ্চ তাপমাত্রা৷ ২০০৯ সালের ১৯ এপ্রিল ৪১.২ ডিগ্রিতে পৌঁছেছিল শহরের পারদ৷ দশ বছরে এপ্রিল মাসেই পারদের এতটা উত্থানের নজির আর নেই৷ ১৯৮০ সালের ২৫ এপ্রিল ৪১.৭ ডিগ্রির গরমের সাক্ষী থেকেছে শহর৷ সাড়ে তিন দশকের সেই রেকর্ড কি ভেঙে যাবে আজ?

    বাংলার সবচেয়ে বড় আর্থিক কেলেঙ্কারি সারদা-কাণ্ডে সিবিআই তদন্ত চাইছে মানুষ৷ অধিকাংশ সাধারণ মানুষ চাইছেন নিরপেক্ষ তদন্তের স্বার্থে এই মামলার দায়িত্ব দেওয়া উচিত কেন্দ্রীয় তদন্তকারী সংস্থা সিবিআইয়ের হাতে৷ তাহলেই উঠে আসবে প্রকৃত তথ্য৷ সন্ধান মিলবে বাংলা-বিহার-অসম-ত্রিপুরা-ওডিশায় কীভাবে সাম্রাজ্য বিস্তার করেছিলেন সুদীপ্ত সেন৷ বুধবার দিনভরের জনমত সমীক্ষায় জোরাল দাবি উঠে এল সারদা-কাণ্ডের সিবিআই তদন্তের৷


    স্পষ্ট করে আবহবিদরা কিছু বলতে নারাজ৷ পূর্বাভাস বলছে, আজ, শুক্রবারও মহানগরের সর্বোচ্চ তাপমাত্রা ৪০ ডিগ্রির আশপাশেই থাকবে৷ সেক্ষেত্রে পর পর চার দিন ৪০ ডিগ্রির কাঁটা ছুঁয়ে থাকবে পারদ৷ এমনটাও শেষ বার হয়েছিল ২০০৯ সালেই৷ সে বার অবশ্য টানা ছ'দিন ৪০ ডিগ্রি ছুঁয়ে ছিল পারা৷ সেই রেকর্ডও কি ভেঙে যাবে?


    সবিশেষ উল্লেখ্য, চিটফান্ড নিয়ে শুক্রবার মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি দলের অবস্হান পরিষ্কার করে দিলেন৷‌ তিনি বলেন, তৃণমূল চিটফান্ডের টাকা নেয় না৷‌ গরিবের দল৷‌ নিজের টাকায় আমরা খুব কষ্ট করে দল চালাই৷‌ পচাদের টাকা আমরা নিই না৷‌ সি পি এমকে আক্রমণ করে মমতা বলেন, সি পি এমের আমলেই চিটফান্ডের বাড়বাড়ম্ত হয়৷‌ কোটি কোটি টাকা ওদের কাগজে বিজ্ঞাপন দেওয়া হত৷‌ আমরা এ সব করি না৷‌ এর আগেই মমতা বলেন, তিন বছরের মধ্যে কোনও চিটফান্ড তৈরি হয়নি৷‌ যারা মানুষকে ঠকিয়েছে, তাদের আমরা গ্রেপ্তার করেছি৷‌ আমানতকারীদের টাকা ফিরিয়ে দেওয়ারও ব্যবস্হা করা হয়েছে৷‌ সরকার থেকেই কমিশন তৈরি হয়৷‌ মমতা এদিন বলেন, আমাদের বিরুদ্ধে চিটফান্ড নিয়ে মিডিয়ার একাংশ প্রচার করছে৷‌ যদিও আমার এতে কিছু এসে যায় না৷‌ তৃণমূল স্বচ্ছ রাজনীতি করে৷‌ মানুষের কথা ভাবে৷‌ মানুষের সঙ্গে থাকে৷‌ তাই যখনই মানুষ বিপদে পড়ে, আমরা তাদের পাশে গিয়ে দাঁড়াই৷‌ এখনও বলছি, চিটফান্ডের সঙ্গে তৃণমূলের কোনও সম্পর্ক নেই৷‌ মমতা এদিন জোরের সঙ্গে বলেন, সরকার কাউকে আড়াল করার চেষ্টা করবে না৷‌ যখনই কোনও ঘটনা ঘটছে, সঙ্গে সঙ্গে আমরা তদম্ত শুরু করছি৷‌ সমাজবিরোধীদের ধরা হচ্ছে৷‌ আইন আইনের পথে চলছে৷‌ আমরা এ নিয়ে কারওর সঙ্গে আপস করব না৷‌


    সারদা কেলেঙ্কারিতে ধৃত সংস্থার অন্যতম ডিরেক্টর ও সুদীপ্ত সেনের দ্বিতীয় পক্ষের স্ত্রী পিয়ালি সেন ৩০ হাজার টাকা ব্যক্তিগত বন্ডে জামিন পেলেন। শুক্রবার সুদীপ্ত সেনের স্ত্রী পিয়ালি এবং পুত্র শুভজিত্‍কে নিজেদের হেফাজত থেকে ফের আদালতে হাজির করে ইডি৷ এদিন আদালতে তোলা হলে শর্তসাপেক্ষে জামিন পান পিয়ালি সেন। অন্যদিকে শুভজিত্‍ সেন জামিনের আবেদন করলে তা বাতিল হয়ে যায়। ৩০ এপ্রিল পর্যন্ত তাকে জেল হেফাজতে রাখার নির্দেশ দিয়েছেন নগর দায়রা আদালতের বিচারক।


    এদিন ইডি-র দপ্তরে নাট্যকর্মী এবং বালুরঘাটের তৃণমূল প্রার্থী অর্পিতা ঘোষও ইডির দপ্তরে হাজিরা দেন। অর্পিতাদেবী নিজেই বালুরঘাটে জানিয়েছিলেন, তিনি ইডি-র নোটিস পেয়েছেন এবং ভোট মিটলে ইডি-র দপ্তরে হাজির হবেন৷ কেন্দ্রীয় সংস্থার আধিকারিকরা বৃহস্পতিবার জানিয়েছেন,আগামী কয়েকদিনের মধ্যে ধাপে ধাপে বেশ কয়েকজনকে নোটিস পাঠানো হবে৷ তবে তাঁদের নাম জানাতে চাননি ইডি-র গোয়েন্দারা৷ কলকাতার একটি কাগজের সম্পাদক এবং তৃণমূলের রাজ্যসভা সাংসদ ইমরান হাসানকেও ইডি তলব করেছে৷ তিনি সুদীপ্ত সেনের কাছ থেকে ওই কাগজটি কিনে নেন গত বছর৷


    অপরদিকে, এদিন সারদার এক আমানতকারী আত্মহত্যা করেছেন বলে জানা গিয়েছে। মৃতের নাম সুশান্ত সর্দার। ক্যানিংয়ের বেলেখালির বাসিন্দা সুশান্ত একদিকে যেমন আমানতকারী ছিলেন,আবার সারদার এজেন্টও ছিলেন।



    ৪০ ডিগ্রি সেলসিয়াসে পৌঁছে গেল কলকাতার তাপমাত্রা৷‌ মরশুমে এই প্রথম৷‌ চার বছর পর৷‌ গরমে হাঁসফাঁস শুধু শহর কলকাতা নয়, দক্ষিণবঙ্গের বিস্তীর্ণ এলাকায় দাবদাহে নাজেহাল মানুষ৷‌ কালবৈশাখী কবে? তারও আগাম খবর দিতে পারছে না আবহাওয়া দপ্তর৷‌ তবে তীব্র এই গরমের মধ্যেই ভোটপ্রচার সারতে হচ্ছে নেতা-কর্মীদের৷‌ আজ, বুধবার কলকাতা-সহ দক্ষিণবঙ্গের কয়েকটি জায়গায় তাপপ্রবাহের সতকর্তা জারি হয়েছে৷‌ সর্বত্রই আরও বাড়বে তাপমাত্রা৷‌ রাজ্যের বাইরে থেকে আসা গরম উত্তর-পশ্চিম হাওয়ার জন্যই এই অবস্হা৷‌ এদিকে বর্ধমানের কাটোয়ায় গরমে মৃত্যু হল এক কাঠমিস্ত্রির৷‌ কাটোয়ার দাঁইহাটের বাসিন্দা স্বপন বারুই কাজ থেকে ফেরার সময় সানস্ট্রোকে আক্রাম্ত হন৷‌ আগামী দু'তিন দিনেও পরিস্হিতির বিশেষ পরিবর্তন হবে না৷‌ মেঘ সেভাবে তৈরি হতে না পারার জন্যই এই অবস্হা তৈরি হচ্ছে৷‌ আসলে কয়েকদিন ধরেই বাতাসে জলীয় বাষ্পের পরিমাণ কমতে শুরু করেছে৷‌ সর্বনিম্ন আপেক্ষিক আদ্রর্তা কম থাকার জন্যই গরম হাওয়া বইতে থাকে৷‌ এদিন তার পরিমাণ ছিল মাত্র ২৮ শতাংশ৷‌ আগামী কয়েকদিনে তা আরও কমার সম্ভাবনা রয়েছে৷‌ আসলে এর পরিমাণ যত কমবে গরম হাওয়া ততই বাড়বে৷‌ এই গরমের সঙ্গে বিশেষ পরিচয় নেই কলকাতার৷‌ অল্প রোদেই ঘর্মাক্ত হওয়াই যেন দস্তুর৷‌ কিন্তু এবার মার্চের শেষ থেকেই কিছুটা অচেনা গরম সঙ্গী হয়েছে শহর কলকাতার৷‌ এখন ঘাম হয় না৷‌ চোখ-নাক-মুখ জ্বলে যাচ্ছে৷‌ এপ্রিলের মাঝামাঝি থেকেই অপরিচিত গরম আরও বেশি করে জাঁকিয়ে বসেছে৷‌ রাজ্যের পশ্চিমাঞ্চলের জেলাগুলিতে বিশেষ করে বাঁকুড়া, আসানসোলের শিল্পাঞ্চল, পুরুলিয়া– সর্বত্রই তাপমাত্রার পারদ যথেষ্ট চড়া৷‌ সেখানকার পরিস্হিতি আরও খারাপ৷‌ প্রসঙ্গত, প্রবল গরমে আসানসোলে সোমবারই এক বৃদ্ধের মৃত্যু হয়েছিল৷‌ গরমকালে সর্বোচ্চ তাপমাত্রা যদি স্বাভাবিকের থেকে ৫ ডিগ্রি বা তার বেশি থাকে, তা হলে তাপপ্রবাহের পরিস্হিতি তৈরি হয়৷‌ ঠিক উল্টোটা হয় শীতের সময়৷‌ তাপমাত্রা স্বাভাবিকের থেকে ৫ ডিগ্রি বা তার কম হলে তখন শৈত্যপ্রবাহের পরিস্হিতি তৈরি হয়৷‌ তবে সেক্ষেত্রে সর্বনিম্ন তাপমাত্রা থাকতে হয় ১০ ডিগ্রির নিচে৷‌ সেই মতো রাজ্যের বেশ কিছু জেলায় ইতিমধ্যেই তাপপ্রবাহের পরিস্হিতি তৈরি হয়েছে৷‌ কলকাতায় শেষ বার সর্বোচ্চ তাপমাত্রা ৪০ ডিগ্রি সেলসিয়াস হয়েছিল ২০১০ সালে– পৌঁছেছিল ৪০.১ ডিগ্রি সেলসিয়াসে৷‌ এপ্রিলে কলকাতার রেকর্ড তাপমাত্রা ছিল ১৯৪৫ সালের ২৫ এপ্রিল– পৌঁছেছিল ৪৩.৩ ডিগ্রি সেলসিয়াসে৷‌ মঙ্গলবারের কলকাতার সর্বোচ্চ তাপমাত্রা স্বাভাবিকের থেকে ৫ ডিগ্রি বেশি ছিল৷‌ তাই তাপপ্রবাহ শুরু হয়েই গেছে৷‌ সকাল থেকে অনেকেই চোখেমুখে জ্বালা অনুভব করেছেন৷‌ কলকাতার রাস্তায় সকালেই চোখে পড়েছে নানারকমের সুদৃশ্য মাস্ক৷‌ চিকিৎসকের পরামর্শমতো অনেকেই এই মাস্ক ব্যবহার করেছেন৷‌ আপাতত কয়েক দিন এই গরম হাওয়ার দাপট থাকবে৷‌ বেলা একটু বাড়তেই রাস্তায় ভিড় কমতে শুরু করে৷‌ ভিড় বাড়ে বিভিন্ন ঠান্ডা পানীয়ের দোকানে৷‌ এপ্রিলে গরম হাওয়া বওয়াটাই স্বাভাবিক৷‌ কিন্তু এই হাওয়ার মধ্যে পার্থক্য আছে৷‌ সাধারণত রাজ্যবাসী যে গরম হাওয়ার সঙ্গে পরিচিত, তা দখিনা হাওয়া৷‌ সেই হাওয়ায় জলীয় বাষ্পও থাকে৷‌ কিন্তু এই হাওয়া আসছে ছোট নাগপুরের মালভূমি থেকে৷‌ এতে কোনও জলীয় বাষ্প থাকে না৷‌ তাই এটি অনেক বেশি রুক্ষ হয়৷‌ আর বঙ্গোপসাগরের ওপরও নিম্নচাপ অক্ষরেখা থাকায় জলীয় বাষ্প পরিমাণমতো ঢুকতে পারছে না৷‌ এই অক্ষরেখা সরে গেলে অবশ্য জলীয় বাষ্প বেশি করে ঢুকবে৷‌ যার ফলে বৃষ্টির সম্ভাবনা তৈরি হবে৷‌ আর এদিকে চলতি সপ্তাহেই বর্ষার প্রাথমিক পূর্বাভাস দেবে মৌসম ভবন৷‌ তখন বোঝা যাবে, এই তীব্র গরম থেকে রেহাই দিতে কবে নামবে বর্ষা, আর কতটাই-বা তীব্র হবে৷‌ রাজ্যে বর্ষা আসে ১০ জুনের পরে৷‌


    কোথায়কত


    বাঁকুড়া৪১.৩


    আসানসোল৪০.৫


    কলকাতা৪০.০


    ডায়মন্ডহারবার৪০.০


    মেদিনীপুর৪০.০


    শ্রীনিকেতন৩৯.৯


    সর্বোচ্চ তাপমাত্রা ডিগ্রি সেলসিয়াসে


    যে সাংসদ সারদা কর্তার টিভি চ্যানেল,খবরের কাগজ দখল করেছেন,এক দফায় জোর করে তিনশ কোটির লগ্নি দস্তখত করিয়েছেন,তাঁর মুখচ্ছবি আবিস্কারের জন্য কৌন বনেগা করোড়পতি প্রতিযোগিতারও প্রযোজন নেই৷‌


    মন্ত্রী সাংসদ আমলা শামলা চিত্রকর মায় রাষ্ট্রপতির নাম মুখে মুখে

    সিবিআইয়ে অসম,উড়ীষ্যা,ত্রিপুরা এবং পূর্ববর্তী বাম শাসনের মুখ্যমন্ত্রীও প্রস্তুত,মা মাটি মানুষ সরকারের চোখে শুধুই চক্রান্ত

    হেরে গেলে ল্যাঠা চুকে যাবে,পিয়ালীর ওকালতি নিয়ে ভূতের ভবিষতও হবে না,কিন্তু দাগিরা জিতলে পর কুণালদশা যদি পাইকারি সমাজবাস্তব হয়,বিধানসভা নির্বাচন গেরুয়া সুনামি হলেও মুলনিবাসী বহুজনদেরও কিছু করার থাকছে না৷‌


    অন্যদিকে তৃণমূল এবং সি পি এম-কে বাদ দিয়ে রাজ্যে একটি নতুন তৃতীয় বিকল্পের সম্ভাবনার কথা জানালেন সি পি এম থেকে বহিষ্কৃত নেতা রেজ্জাক মোল্লা৷‌ নীতি-আদর্শের ভিত্তিতে গড়ে-ওঠা এই ফ্রন্ট আগামী বিধানসভা নির্বাচনে লড়াই করবে রাজ্যে৷‌ এবং সেই ফ্রন্টই পারবে বাংলায় বদল আনতে৷‌ শুক্রবার সরিষাতে ডায়মন্ডহারবার কেন্দ্রের পি ডি এস প্রার্থী সমীর পুততুন্ডের সমর্থনে একটি সভায় ভাষণ দিতে গিয়ে রেজ্জাক এই মম্তব্য করেন৷‌ রেজ্জাক বলেন, 'পি ডি এসের মতো রাজ্যে আরও অনেক ছোট দল আছে৷‌ এই দলগুলো তৃণমূল এবং সি পি এমের বিরুদ্ধে লড়াই করছে৷‌ নীতি ও আদর্শের ভিত্তিতে এই দলগুলোকে এক করে একটি তৃতীয় বিকল্প গড়ে তুলতে হবে৷‌ রাজ্যের সেই তৃতীয় ফ্রন্ট আগামী বিধানসভা ভোটে লড়াই করবে৷‌ রাজ্যের দুই বড় পুঁজিবাদী ও নীতিহীন দলের বিরুদ্ধে গরিব মানুষদের নিয়ে লড়াই করলে বাংলায় বদল আসবেই৷‌'অন্যদিকে, লোকসভা নির্বাচনে তৃতীয় বিকল্পকে সমর্থন করে রেজ্জাক বলেন, 'শিল্পপতিদের কালো টাকায় দেশের বড় দুটি দল কংগ্রেস এবং বি জে পি ভোট করে৷‌ নির্বাচনী ব্যবস্হাকে গ্রাস করেছে কালো টাকা৷‌ টাকার খেলার জোরে পুঁজিপতিরা দেশকে কিনে নিচ্ছে৷‌ পুঁজিবাদী শক্তির বিরুদ্ধে লড়াই করতে দিল্লিতে তৃতীয় বিকল্প প্রয়োজন৷‌'এদিন সাড়ে পাঁচটা নাগাদ সভাস্হলে আসেন রেজ্জাক৷‌ তিনি আগেই সমীরের হয়ে প্রচারে আসার জন্য কথা দিয়েছিলেন৷‌ একদা দক্ষিণ ২৪ পরগনা জেলার সি পি এমের সম্পাদক ছিলেন সমীর৷‌ সেই সময় রেজ্জাক দলের জেলা সদস্য ছিলেন৷‌ সেই সম্পর্কের সূত্র ধরে এদিন সমীরের হয়ে তিনি প্রচারে আসেন বলে জানান রেজ্জাক৷‌ সিঙ্গুর-নন্দীগ্রাম প্রসঙ্গে বর্তমান মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জিকে তোপ দেগে কৃষক আন্দোলনের প্রবীণ নেতা রেজ্জাক বলেন, 'মমতা কোনওকালে জমি নিয়ে কারবার করেননি৷‌ ওঁর মাথায় কিছু ঢোকে না৷‌ সমীররা ওঁর পিছনে ছিলেন বলে আজ মুখ্যমন্ত্রী হয়েছেন৷‌'এদিন সভায় উপস্হিত ছিলেন সমীর পুততুন্ড, অনুরাধা দেব৷‌


    দিল্লি থেকে পুলিস এসে সারদা-কাণ্ড নিয়ে তৃণমূল নেতাদের ধরছে৷‌ এবার তাঁদের ৩ হাজার কোটি টাকার হিসেব দিতে হবে৷‌ নেতা-মন্ত্রীরা কেউ বাদ যাবেন না৷‌ শুক্রবার মেমারির সাতগাছিয়ায় এক নির্বাচনী জনসভায় এই মম্তব্য করেন সি পি এম নেতা প্রাক্তন মন্ত্রী গৌতম দেব৷‌ এদিন তিনি মেমারির সাতগাছিয়া ও কালনা শহরে দলীয় প্রার্থী সাইদুল হক এবং ঈশ্বরচন্দ্র দাসের সমর্থনে দুটি সভা করেন৷‌ গৌতম দেব বলেন, ১৬ মে-র পর থেকেই তৃণমূলের উঠে যাওয়ার শুরু হবে৷‌ থাকবে বামেরা আর কংগ্রেস, বি জে পি৷‌ মমতা ব্যানার্জি ও তৃণমূল কংগ্রেসের সৌজন্যবোধ নিয়েও প্রশ্ন তুলে গৌতমবাবু বলেন, আমি মন্ত্রী থাকার সময় পার্থ চ্যাটার্জি বারবার আমার কাছে আসতেন৷‌ সিঙ্গুর আন্দোলনের সময় সমস্যা মেটানোর জন্য মদন মিত্র আমাকে বারবার ফোন করতেন৷‌ ওই দলের শীর্ষ নেতৃত্ব থেকে শুরু করে বহু জনকেই আমি বহুবার জ্যোতিবাবু, বুদ্ধদার কাছে নিয়ে গেছি৷‌ অথচ মমতা ব্যানার্জি বা তাঁর সরকারের মন্ত্রীরা ন্যূনতম সৌজন্য দেখান না৷‌ হাওয়াই চটি পরে কপ্টার চেপে মমতা ব্যানার্জির ভোট-প্রচারকেও কটাক্ষ করে গৌতমবাবু বলেন, দলটার মধ্যে গণতন্ত্রের বালাই নেই৷‌ বিরোধী নেতাদের সম্মান দেয় না৷‌ তৃণমূলের তীব্র সমালোচনার পাশাপাশি আত্মসমালোচনাও করেন গৌতমবাবু৷‌ বলেন, ২০০৯ সাল থেকেই বামেদের পতন শুরু হয়৷‌ আমাদের নীতি ও কর্মপদ্ধতিতে বেশ কিছু ভুলভ্রাম্তি হয়েছে৷‌ সে সব আমরা চিহ্নিত করেছি৷‌ বহু ক্ষেত্রে শোধরানোও হয়েছে৷‌ এর পরই বলেন, তিন বছরে পরিবর্তনের সরকার সম্পর্কে মানুষের মোহভঙ্গ হয়েছে৷‌ বামেদের প্রতি মানুষের আস্হা ফিরছে৷‌


    ইতিমধ্যে সারদা-কাণ্ডে তদম্তে নেমে এনফোর্সমেন্ট ডিপার্টমেন্ট (ই ডি) দুটি গুরুত্বপূর্ণ চিঠি পেয়েছে৷‌ সেই চিঠিতে টাকা লেনদেনের প্রসঙ্গ রয়েছে৷‌ এ ছাড়াও পাওয়া গেছে বেশ কিছু ক্যাশ ভাউচার৷‌ সুদীপ্ত সেনের স্ত্রী ও ছেলেকে গ্রেপ্তার করার পর জেরায় তাঁরা এমন কিছু তথ্য দিয়েছেন, যা তদম্তে চাঞ্চল্যকর৷‌ ই ডি ইতিমধ্যেই সারদা গোষ্ঠীর সঙ্গে যোগাযোগ সন্দেহে ১৫ জনকে চিঠি দিয়েছে৷‌ প্রায় ৪০ জন বিভিন্ন ব্যবসায়ীকে চিঠি দেওয়া হয়েছে৷‌ সারদার টাকা ওঁরা ব্যবসার কাজে লাগিয়েছেন, বলে তদম্তে পাওয়া গেছে৷‌ আজ, শনিবার সারদা-কাণ্ডের তদম্তে শহরে আসছেন ই ডি-র যুগ্ম্মঅধিকর্তা সত্যেন্দ্র মাথুরিয়া৷‌ ই ডি সূত্রের খবর, যাঁদের চিঠি দেওয়া হয়েছে, তাঁরা এই মুহূর্তে ব্যস্ত৷‌ ই ডি-র চিঠিতে জানানো হয়েছে, তাঁরা দিল্লি অথবা কলকাতায় যে কোনও জায়গায় ই ডি দপ্তরে দেখা করে, তাঁদের বক্তব্য রেকর্ড করতে পারেন৷‌ ই ডি-র তদম্তে নতুন কিছু দিক উঠে আসছে৷‌ মূলত টাকা কীভাবে, কোন পথে বাইরে পাঠানো হয়েছিল, তার হদিশই পেতে চাইছে ই ডি৷‌ যাঁদের চিঠি দেওয়া হয়েছে, তাঁদের ২০০৯-১৩ পর্যম্ত ব্যাঙ্ক অ্যাকাউন্টের তালিকা নেবে ই ডি৷‌ অর্থাৎ, যাতে হঠাৎ করে কোনও মোটা অঙ্কের টাকা এলে, তার উৎস কী, সেটাই জানতে চায় ই ডি৷‌ তাঁদের সঙ্গে ওই সময়ে সারদা কর্তা সুদীপ্ত সেনের কীভাবে যোগাযোগ হল৷‌ যাঁরা সারদায় বড় বড় পদে কাজ করতেন, তাঁদের অম্তত তিনজন এখনও পলাতক৷‌ তাঁদেরও খোঁজ করছে ই ডি৷‌ মূলত, ভুয়ো সংস্হা দেখিয়ে টাকা এক সংস্হা থেকে অন্য সংস্হাকে ঋণ দেওয়া হত৷‌ এই 'ঋণ'দেওয়ার বিষয়টি আসলে টাকা সরিয়ে ফেলার ছক৷‌ তারপর ঋণ নিল যে সংস্হা, তারা এই পরিমাণ টাকা বিভিন্ন ব্যাঙ্কে সরিয়ে ফেলত৷‌ এবং সেই টাকা আবার তুলে অন্য বেশ কয়েকটি ব্যাঙ্কে সরিয়ে ফেলা হত৷‌ আবার এক সংস্হা অন্য সংস্হাকে হঠাৎ করে ঋণের টাকা শোধও দিয়ে দিত৷‌ টাকা সংক্রাম্ত যাবতীয় চাবিকাঠি অবশ্য থাকত খোদ সুদীপ্ত সেনের হাতেই৷‌ বিভিন্ন ব্যাঙ্কের কয়েকজন ম্যানেজারের সন্ধান পেয়েছে ই ডি, যাঁরা সারদার টাকাপয়সা লেনদেনের ব্যাপারে জড়িত ছিলেন৷‌ শুধু তাই নয়, সারদা থেকে তাঁরা মাসোহারা নিতেন বলেও ই ডি জানতে পেরেছে৷‌ সারদার টাকা নানাভাবে সরিয়ে দেওয়া হয়েছে, দেশের কয়েকটি রাষ্ট্রায়ত্ত ব্যাঙ্কে৷‌ এমনকী দক্ষিণ-পূর্ব এশিয়ার কয়েকটি ব্যাঙ্কেও টাকা সরিয়ে রাখা হয়েছিল৷‌ ই ডি সূত্রের খবর, তাই টাকার খোঁজখবর নিতে সুদীপ্ত ও তাঁর বিশ্বস্ত লোকেরা যেতেন৷‌ ই ডি-র সন্দেহ, বিভিন্ন প্রোজে'তৈরির নামে বিদেশে যাতায়াত আসলে সরিয়ে রাখা টাকার খোঁজ নিতেই৷‌ সুদীপ্ত সেনের ছেলে যে ফেরারি গাড়ি ব্যবহার করতেন, সেটিরও খোঁজ চলছে৷‌ যদি বিক্রি করে থাকেন, তাহলে কাকে বিক্রি করা হয়েছে, তা-ও জানতে চায় ই ডি.


    সারদা গোষ্ঠী বাজার থেকে যে টাকা তুলেছিল, তার মধ্যে ১২৮০ কোটি টাকা দেশেই আছে৷‌ সেই টাকা উদ্ধার করা সম্ভব বলেই মনে করছে এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেট (ই ডি)৷‌ সারদা-কাণ্ডে ধৃত সংস্হার কর্ণধার সুদীপ্ত সেনের স্ত্রী ও ছেলেকে জেরা করে এই টাকার হদিশ পেতে চাইছেন ই ডি-র আধিকারিকরা৷‌ দফায় দফায় জেরা করা হচ্ছে এই দু'জনকে৷‌ শুক্রবার তাঁদের জেরা করার জন্য দিল্লি থেকে কলকাতায় এসেছেন এই কেন্দ্রীয় তদম্তকারী সংস্হার অ্যাসিস্টেন্ট ডিরেক্টর পদমর্যাদার এক অফিসার৷‌ বৃহস্পতিবার রাতে ই ডি-র আধিকারিকরা সুদীপ্তর স্ত্রী পিয়ালিকে নিয়ে হানা দিয়েছিলেন বিধাননগরের একটি ব্যাঙ্কে৷‌ ওই ব্যাঙ্কে অ্যাকাউন্ট ও লকার আছে পিয়ালির৷‌ তদম্তে জানা গেছে, সুদীপ্তর ছেলে শুভজিৎ সেন ও স্ত্রী পিয়ালির ব্যাঙ্ক অ্যাকাউন্ট থেকে সাড়ে ৪ কোটি টাকা কিছুদিন আগে সরানো হয়েছে৷‌ প্রায় ২০০টি অ্যাকাউন্টে চালান করা হয়েছে এই টাকা৷‌ সেই টাকার সন্ধান চলছে৷‌ পাশাপাশি ইতিমধ্যেই শুভজিৎ, পিয়ালিকে নিয়ে গুরুত্বপূর্ণ বেশ কিছু নথিপত্র, বিভিন্ন সংস্হার শেয়ার, ফ্ল্যাটের মালিকানার কাগজপত্র পাওয়া গেছে৷‌ জানা গেছে, পিয়ালির ছেলে ও মেয়ের নামেও ব্যাঙ্কে রয়েছে বেশ কয়েক কোটি টাকা৷‌ গুরুত্বপূর্ণ আরও কিছু সূত্র মিলেছে বলেও এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেট সূত্রে খবর৷‌ তদম্তের অগ্রগতিতে তা সাহায্য করবে বলে মনে করছেন তদম্তকারী আধিকারিকরা৷‌ ই ডি সূত্রের খবর, প্রাথমিক তথ্য অনুযায়ী বাজার থেকে প্রায় ২৪৬০ কোটি টাকা তোলে সারদা চিটফান্ড সংস্হা৷‌ এর মধ্যে ৪৫৩ কোটি টাকা আমানতকারীদের ফেরত দেওয়া হয়েছিল৷‌ বাকি টাকার মধ্যে ৭২০ কোটি টাকার কোনও হদিশ নেই৷‌ বিদেশে এই টাকা পাচার করা হয়েছে বলে মনে করা হচ্ছে৷‌ তবে ১২৮০ কোটি টাকা রয়েছে দেশেই৷‌ নামে-বেনামে নানা সম্পত্তি, বিমার মাধ্যমে এই টাকার একটি অংশ গচ্ছিত আছে৷‌ এ ছাড়া প্রভাবশালী কিছু ব্যক্তিকেও মোটা টাকা দেওয়া হয়েছে সারদা গোষ্ঠীর পক্ষ থেকে৷‌ কোথায় কোথায় সারদার সম্পত্তি বা টাকা রয়েছে, কাদের টাকা দেওয়া হয়েছে, তা খুঁজে বের করাই এখন লক্ষ্য ই ডি-র৷‌


    আমানতকারীর টাকা ফেরত না পাওয়া পর্যম্ত সারদা কেলেঙ্কারি নিয়ে আমরা সরকারকে ছাড়ব না৷‌ আমানতকারীদের স্বার্থ সুরক্ষিত করতেই হবে৷‌ কংগ্রেসের সঙ্গে তৃণমূলের ভেতরে ভেতরে একটা যোগাযোগ আছে জানি৷‌ কিন্তু সারদার ব্যাপারে আমরা সরকারকে ছাড়ব না৷‌ শুক্রবার বর্ধমানে এক নির্বাচনী সভায় এ কথা বলেছেন রাজ্যের বিরোধী দলনেতা ডাঃ সূর্যকাম্ত মিশ্র৷‌ এদিন বর্ধমানে পর পর দুটি জনসভা করেন সি পি এমের পলিটব্যুরো সদস্য সূর্যকাম্ত মিশ্র৷‌ বিকেলে খণ্ডঘোষে সূর্যকাম্তবাবু প্রথম সভাটি করেন বর্ধমান পূর্ব লোকসভা কেন্দ্রের সি পি এম প্রার্থী ঈশ্বরচন্দ্র দাস ও বাঁকুড়ার বিষ্ণুপুর লোকসভা কেন্দ্রের সি পি এম প্রার্থী সুস্মিতা বাউরির সমর্থনে৷‌ পরে সন্ধেয় বর্ধমান শহরে উৎসব ময়দানে বর্ধমান-দুর্গাপুর লোকসভা কেন্দ্রের সি পি এম প্রার্থী অধ্যাপক সাইদুল হকের সমর্থনে আরও একটি জনসভা করেন তিনি৷‌ সেখানে তিনি সারদা প্রসঙ্গে সাংবাদিকদের বলেন, সুপ্রিম কোর্ট বলার পরই দিল্লি মনে করেছে সারদা নিয়ে আবার নাড়াচাড়া দেওয়ার দরকার আছে৷‌ কংগ্রেসের সঙ্গে তৃণমূলের একটা হটলাইন আছে৷‌ সেটা সবাই জানে৷‌ যা-ই হোক আমরা ছাড়ব না৷‌ এটা পঞ্চায়েত বা পুরসভার নির্বাচন নয়৷‌ এই নির্বাচন রাজ্য নির্বাচন কমিশন নয়, পরিচালনা করছে ভারতের নির্বাচন কমিশন৷‌ তাই যদি ভাবেন, পঞ্চায়েত নির্বাচনে যা করেছেন তা-ই করবেন, তা হলে মূর্খের স্বর্গে বাস করছেন৷‌


    সারদা-কাণ্ডের সামান্য একটু প্রকাশিত হওয়ায় মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি ধৈর্য হারিয়েছেন৷‌ অসহিষ্ণু হয়ে পড়ে৷‌ নাম না করে মুখ্যমন্ত্রীকে এভাবেই বিঁধলেন বামফ্রন্ট চেয়ারম্যান বিমান বসু৷‌ তাঁর অভিযোগ, সারদা-কর্তা সুদীপ্ত সেনকে ছবি কিনতে বাধ্য করা হয়েছে৷‌ মঙ্গলবার সি পি এম রাজ্য দপ্তরে তিনি বলেন, অসহিষ্ণু হয়ে উনি যা মম্তব্য করছেন, তা বাংলার সংস্কৃতির সঙ্গে মানায় না৷‌ উনি তো সবাইকে মুখে লিউকোপ্লাস্ট লাগানোর পরামর্শ দেন৷‌ এখন তো মনে হচ্ছে মুখ্যমন্ত্রীর মুখে লিউকোপ্লাস্ট লাগানো উচিত৷‌ এদিন সাংবাদিক-বৈঠকে বিমানবাবু অভিযোগ করেন, সারদা-কর্তা সুদীপ্ত সেন বছরখানেক আগে গ্রেপ্তার হলেও এতদিন তাঁর পরিবারের কাউকে জিজ্ঞাসাবাদ, গ্রেপ্তার করা হল না৷‌ এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেট (ই ডি)-কে আসতে হল৷‌ ডাল মে কুছ কালা হ্যায়৷‌ যে তদম্তের খেলা রাজ্য সরকার খেলছিল, তার পেছনে গূঢ় রহস্য রয়েছে৷‌ এক প্রশ্নের জবাবে তিনি বলেন, ই ডি নির্বাচনের সময় সুদীপ্ত সেনের পরিবারকে জিজ্ঞাসাবাদ করছে, এটা ঠিক৷‌ রাজ্য সরকার তৎপর হয়নি, এটাও ঠিক৷‌ রাজ্য কেন তৎপর হয়নি, তার জবাব দিক৷‌ রাজ্য করলে ই ডি বাধ্য হত না৷‌ নাম না করে মুখ্যমন্ত্রীর সমালোচনার পাশাপাশি তাঁকে বাক‍্-সংযমী হওয়ার পরামর্শও দেন বিমানবাবু৷‌ তাঁর কটাক্ষ, উনি আম্তর্জাতিক মানের চিত্রশিল্পী৷‌ কিন্তু তাঁর গুণ বোঝার যোগ্য আমি হয়ত নই৷‌ তাঁর দুটি ছবি ১ কোটি ৮৬ লক্ষ টাকায় বিক্রি করা হয়েছে৷‌ বিক্রির সময় সেখানে কেনার লোক ছিল৷‌ অনেক রথী-মহারথীরা ছিলেন৷‌ এখন জানা যাচ্ছে সেই অর্থ সুদীপ্ত সেনের স্ত্রীর অ্যাকাউন্ট থেকে দেওয়া হয়েছে৷‌ আসলে ছবি কিনতে বাধ্য করা হয়েছিল৷‌ তৃণমূল গরিবের দল৷‌ ছবি বিক্রি করে দল চালানো হয়, এগুলি দেখাতেই৷‌ সারদা-কাণ্ডে তৃণমূলের এক প্রার্থীকে সমন দিয়েছে ই ডি৷‌ নির্বাচনের পর উত্তর দেবেন বলে জানিয়েছেন ওই প্রার্থী৷‌ সারদা-কাণ্ড সামান্য একটু প্রকাশিত হওয়ায় মুখ্যমন্ত্রী অসহিষ্ণু হয়ে পড়েছেন৷‌ যা মম্তব্য করছেন বাংলার সংস্কৃতির সঙ্গে মানায় না৷‌ অর্থমন্ত্রী পি চিদম্বরমকে চিদু বলা যায়? সমবয়সীদের যা বলব, বয়সে বড়দেরও তা বলা যায়? মুখ্যমন্ত্রীর বক্তব্যে কোনও সংযম থাকবে না? তিনি বলেন, নির্বাচনে দুটো ভোট পাওয়ার জন্য বাজার গরম করতে বলা হচ্ছে বামফ্রন্ট সরকারের সময় চিটফান্ড হয়েছে৷‌ তাই যদি হয়, সি বি আই-কে দিয়ে তদম্ত করানো হোক৷‌ বামফ্রন্টের কোনও নেতা দোষী প্রমাণিত হলে জেলে পোরা হোক৷‌ সেই সঙ্গে তৃণমূলের নেতা-মন্ত্রীদের কেউ দোষী থাকলে তাঁদেরও৷‌ সোজাভাবেই তো বলছি৷‌ বামফ্রন্ট সরকারের সময় চিটফান্ডে লাগাম টানতে কড়া আইন তৈরির চেষ্টা হয়েছিল৷‌ বিল বানানো হয়েছিল৷‌ নির্বাচন ঘোষণা হওয়ায় তা পাস করানো যায়নি৷‌ তাঁর অভিযোগ, তৃণমূল শাসন ক্ষমতায় আসার পরই সেই বিল প্রত্যাহার করে নেয়৷‌ এখান থেকেই শুরু হয় চক্রাম্তের জাল৷‌ এদিন বামফ্রন্টের পক্ষে সি পি এম নেতা রবীন দেব সারদা-কাণ্ড নিয়ে রাজ্য সরকারের সমালোচনা করেন৷‌ বলেন, সারদা-কাণ্ডে নাম জড়িয়েছে অর্পিতা ঘোষের৷‌ অথচ তাঁর হয়ে প্রচার করছেন মুখ্যমন্ত্রী৷‌ সারদা-কাণ্ডে যাঁর নাম জড়িয়েছে, তাঁকেই প্রার্থী করা হল? সারদা গোষ্ঠীর এক কর্মীকে জেতাতে তৃণমূলের এত তৎপরতা কেন? সুদীপ্ত সেনের গ্রেপ্তারের পর প্রায় এক বছর হয়ে গেল৷‌ এতদিন তাঁর পরিবারের কাউকে গ্রেপ্তার করতে পারল না রাজ্য সরকার৷‌ ই ডি দায়িত্ব নিল৷‌ আর ই ডি-র এক সমনেই ক্ষিপ্ত হয়ে উঠেছেন মুখ্যমন্ত্রী৷‌ সব রাজনৈতিক দলকে হুমকি দিচ্ছেন৷‌ তৃণমূল নেতারাও হুমকি দিচ্ছেন, আবার পিছিয়ে যাচ্ছেন৷‌ অভিযোগ রবীনবাবুর৷‌ তাঁর অভিযোগ, মুখ্যমন্ত্রী যত কেন্দ্রীয় গোয়েন্দা সংস্হার জালে জড়িয়ে পড়ছেন, তত তিনি ধৈর্য হারাচ্ছেন৷‌ কোটি কোটি টাকা আত্মসাৎ করা হয়েছে৷‌ রাজ্য সরকার কোনও নিষ্পত্তি করল না কেন? উল্টে তৃণমূল নেতা-কর্মীদের নাম জড়িয়ে যাচ্ছে৷‌ যারা মানুষের সঙ্গে প্রতারণা করল, তাদের আড়াল করার চেষ্টা চলছে৷‌ কুণাল ঘোষ যাদের নাম বলেছিলেন, তাদের মধ্যে কেউ গ্রেপ্তার হল না কেন? কুণালবাবু রাজ্য সরকারের বিরুদ্ধে মুখ খুলতেই তাঁকে গ্রেপ্তার করা হয়৷‌ সারদা-কাণ্ডের দোষীদের শাস্তির ব্যবস্হা করা হচ্ছে না৷‌ তৃণমূল সব রাজনৈতিক দলকেই হুমকি দিচ্ছে৷‌ কিন্তু মানুষ হুমকি উপেক্ষা করে ভোটাধিকার প্রয়োগ করবেন৷‌


    আবার ওদিকে রাজনীতির রঙ না দেখে ই ডি যেন নিরপেক্ষভাবে কাজ করে৷‌ মঙ্গলবার সারদা নিয়ে প্রশ্ন করা হলে সাংবাদিকদের কাছে এ মম্তব্য করেন তৃণমূলের মহাসচিব পার্থ চ্যাটার্জি৷‌ তৃণমূল ভবনে সাংবাদিক বৈঠকে বিভিন্ন প্রশ্নের উত্তর দেন পার্থবাবু৷‌ তিনি বলেন, ই ডি-র কাজ নিয়ে আমরা কিছু বলছি না৷‌ সারদা-কাণ্ড নিয়ে পার্থবাবু বলেন, এর পেছনে রাজনৈতিক ষড়যন্ত্র রয়েছে৷‌ চিটফান্ড সি পি এমের আমলে তৈরি হয়েছে৷‌ চিটফান্ড-কাণ্ডে তৃণমূলের কেউ যুক্ত নন বলে পার্থবাবু দাবি করেন৷‌ সি পি এম-কে কটাক্ষ করে পার্থবাবু বলেন, ২০০১ থেকে ২০১১ পর্যম্ত তারা কোনও আইন করতে পারেনি৷‌ মমতার নেতৃত্বে সরকার গঠিত হওয়ার পর সারদার প্রধানকে গ্রেপ্তার করা হয়েছে৷‌ আমানতকারীদের টাকা ফেরত দেওয়ার ব্যবস্হা করা হয়েছে৷‌ তৈরি করা হয়েছে শ্যামল সেনের নেতৃত্বে কমিশন৷‌ মমতা আমানতকারীদের পাশে দাঁড়িয়েছেন৷‌ পার্থবাবু বলেন, পঞ্চায়েত নির্বাচনের সময় সারদা-কাণ্ড নিয়ে হইচই করা হল৷‌ নির্বাচনে তার কোনও প্রভাব পড়ল না৷‌ মানুষ মমতার পাশে দাঁড়াল৷‌ এবারও নির্বাচনে তার কোনও প্রভাব পড়বে না বলে জানিয়েছেন পার্থবাবু৷‌ নির্বাচনের সময় উদ্দেশ্যপ্রণোদিতভাবে ইস্যু তৈরি করা হচ্ছে৷‌ মানুষকে বোকা ভাবা ভুল৷‌ ঠিক সময় তারা জবাব দেবে৷‌ পার্থবাবুর অভিযোগ, সি পি এম রাজনৈতিক কুৎসা করছে৷‌ ওদের আমলে নেতারা সারদার সঙ্গে যুক্ত ছিলেন বলে তিনি অভিযোগ করেছেন৷‌ তিনি বলেন, কংগ্রেস দুর্নীতিতে ডুবে রয়েছে৷‌ আগে নিজেদের গদি সামলাক তারপর বড় বড় কথা বলুক৷‌ তাঁর অভিযোগ, তদম্তকারী সংস্হাগুলির ওপর জোর করে চাপ সৃষ্টি করা হচ্ছে৷‌


    সারদা-কাণ্ডে বালুরঘাটের তৃণমূল প্রার্থী অর্পিতা ঘোষকে জেরা করছে ইডি। সারদা-কাণ্ডের তদন্তে তাঁকে সমন পাঠানো হয়েছিল। শাসকদলের ঘনিষ্ঠ এক চিত্রশিল্পীকেও তলব করতে পারে ইডি। তদন্তে, ইডি জানতে পেরেছে বাজার দরের চেয়ে বেশি দামে ওই চিত্রশিল্পী সুদীপ্ত সেনকে টিভি চ্যানেল বিক্রি করেন। সেই চ্যানেলেই কাজ করতেন অর্পিতা ঘোষ।


    তদন্তে নেমে ইতিমধ্যেই এক প্রাক্তন পুলিসকর্তাকে জেরা করেছে ইডি। সারদার কর্মী, ডিজি পদমর্যাদার ওই প্রাক্তন পুলিসকর্তা সংস্থায় কার্যত ডিরেক্টরের ভূমিকা পালন করতেন। পুলিসের সঙ্গে যোগাযোগ রাখতেন তিনি। ওই প্রাক্তন পুলিসকর্তাকে জেরায় সন্তুষ্ট নন ইডি-র আধিকারিকরা। তার ভিত্তিতে এবার আরও কয়েকজনকে সমন পাঠাতে পারেন তাঁরা। গতকাল, সল্টলেকে সুদীপ্ত সেনের ফ্ল্যাটে তল্লাসি চালায় ইডি। উদ্ধার হয় দলিলের ছেঁড়া পাতা। সেগুলি, সারদার সম্পত্তির দলিল হতে পারে বলে মনে করছে ইডি। সুদীপ্ত সেনের ছেলে শুভজিত সেনকে জেরা করে তাঁর কয়েকজন বন্ধুর খোঁজ পেয়েছে ইডি। জানা গেছে, ওই বন্ধুদের মাধ্যমে টাকা খাটাতেন শুভজিত। এ বিষয়ে খোঁজখবর করতে দক্ষিণ কলকাতার বিভিন্ন জায়গায় তল্লাসি চালান ইডি-র আধিকারিকরা।


    সারদাকাণ্ডে যোগ রয়েছে মৃত আইনজীবী পিয়ালি মুখার্জির। ইডির তদন্তে চাঞ্চল্যকর তথ্য। সংস্থার আইনি দিক দেখতেন পিয়ালি। তাঁর ভূমিকা খতিয়ে দেখছে ইডি। তদন্তে উঠে আসতে পারে পিয়ালীর অস্বাভাবিক মৃত্যুর বিষয়টিও।অন্যদিকে, জামিন পেলেন সুদীপ্ত সেনের স্ত্রী। তবে প্রয়োজনীয় অর্থ জমা দিতে না পারার দরুণ আজ মুক্তি পেলেন না তিনি। ৩০ তারিখ অবধি জেল হেফাজত হয়েছে সুদীপ্ত সেনের পুত্র শুভজিতের।


    আজ আদালতে তোলা হল সুদীপ্ত সেনের ছেলে শুভজিত্‍ সেন ও সুদীপ্ত সেনের স্ত্রী পিয়ালি সেনকে। আজ তাদের ব্যঙ্কশাল কোর্টে তোলা হয়। পিয়ালি ও শুভজিত্‍ সেন দুজনেই আদালতে জামিনের আবেদন জানান। পিয়ালির আইনজীবী বলেন পিয়ালির দুই সন্তান রয়েছে,তার জামিনের আর্জি মঞ্জুর করা হোক। এরপর ইডি পিয়ালির জামিনের বিরোধিতা করেনি। তবে শুভজিত্‍ সেনের জামিনের বিরোধিতা করেছে। শুভজিত্‍ সেনের দুদিনের জেল হেফাজত চেয়েছে এনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেট।


    বাঁকুড়ায় এসে সারদা-দুর্নীতির প্রসঙ্গ টেনে কংগ্রেস ও সি পি এমকে তুলোধোনা করলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি৷‌ মঙ্গলবার কোতুলপুর থানার সিহর অধরচন্দ্র মিত্র হাই স্কুল মাঠে এক নির্বাচনী জনসভায় মুখ্যমন্ত্রী বলেছেন, 'কংগ্রেস সি পি এমের দালালি করছে৷‌ নির্বাচন এলেই কংগ্রেস, সি পি এম এবং বি জে পি-র সারদা-কাণ্ডের কথা মনে পড়ে যায়৷‌ পঞ্চায়েত নির্বাচন চলাকালেও এই তিন দল সারদা-কাণ্ড নিয়ে শোরগোল বাধিয়েছিল৷‌ তার যোগ্য জবাব পেয়েও তাঁদের শিক্ষা হয়নি৷‌ এবার তাই ওই তিন দলকে ভোট না দিয়ে সমুচিত শিক্ষা দিতে হবে৷‌ সি পি এম, কংগ্রেস, বি জে পি-র ম্যাচ ফিক্সিং বন্ধ হোক৷‌ ওদের গটআপ গেম বন্ধ করতে হবে৷‌'আরামবাগের সভাতে মুখ্যমন্ত্রী বলেন,'সি পি এম সারদা দেখাচ্ছে, ওরা হল সারদার বড়দা৷‌ সি পি এম-কে টাকা দিয়েছে, আর সি পি এম তাদের মুখপত্রে সব সারদার বিজ্ঞাপন ছেপেছে৷‌ সব সি পি এমের দালালি৷‌'এদিন জয়রামবাটি, আরামবাগ ও শ্রীরামপুরে লোকসভা ভোটের প্রচারে তিন জায়গাতেই বড় মাপের সভা করেন মমতা৷‌ আরামবাগ লোকসভা কেন্দ্রের তৃণমূল প্রার্থী অপরূপা পোদ্দারের সমর্থনে স্হানীয় পারুল মাঠে এবং আর শ্রীরামপুরে দলের প্রার্থী কল্যাণ ব্যানার্জির সমর্থনে সভা করেন৷‌ কংগ্রেস দলের বিরুদ্ধে তীব্র আক্রমণ করে মমতা আরও বলেন, ওরা তাদের পতাকাটা সি পি এম-কে বিক্রি করে দিয়েছে৷‌ বি জে পি-কে আরও তীব্র ভাষায় আক্রমণ করে বলেন, তাঁদের বিরুদ্ধে কুৎসা করার জবাব এই নির্বাচনে তারা পাবে৷‌ দার্জিলিং-সহ সারা রাজ্যে তারা এবারেও জিরো হবে৷‌ উল্লেখ্য সিহর এলাকাটি বিষ্ণুপুর লোকসভা কেন্দ্রের মধ্যে পড়ে৷‌ সেখানেই জনসভার আয়োজন করা হয়েছিল৷‌ একটু দূরে ফাঁকা মাঠে মুখ্যমন্ত্রীর কপ্টার নামে দুপুর ১-২০ মিনিটে৷‌ এই এলাকাটি বাঁকুড়া, হুগলি ও পশ্চিম মেদিনীপুরের বর্ডার৷‌ তাই তিন জেলা থেকেই এসেছিলেন মানুষ৷‌ তাপমাত্রাও ছিল ৪১ ডিগ্রি৷‌ তীব্র গরম সত্ত্বেও জনসমাগম ছিল ভালই৷‌ দেড়টা নাগাদ মুখ্যমন্ত্রী আসেন সভামঞ্চে৷‌ সভায় অবশ্য অন্য কোনও ওজনদার নেতা ছিলেন না৷‌ ছিলেন জেলা নেতারা ও বিষ্ণুপুর কেন্দ্রের দলীয় প্রার্থী সৌমিত্র খাঁ এবং কোতুলপুর বিধানসভার দলীয় প্রার্থী শ্যামল সাঁতরা৷‌ সৌমিত্র বিধায়ক পদে ইস্তফা দেওয়ায় কোতুলপুর বিধানসভার এই উপনির্বাচন হতে চলেছে৷‌ মমতা সেখানে বলেন, 'সারদা-দুর্নীতি নিয়ে সি পি এম, কংগ্রেস এবং বি জে পি মাতামাতি করছে৷‌ আমাদের নামে মিথ্যা রটাচ্ছে৷‌ কুৎসা করছে৷‌ ওদের জানা উচিত, চার লক্ষ মানুষের টাকা ফেরত দিয়েছি৷‌ টাকা নেই৷‌ থাকলে আরও দিতাম৷‌ আরও ২ লক্ষ মানুষকে ক্ষতিপূরণ দেব৷‌'আরামবাগের পারুল মাঠের জনসভাতেও মুখ্যমন্ত্রী সারদা প্রসঙ্গে সি পি এম-কে আক্রমণ করেন৷‌ তাঁর অভিযোগ, ১৯৮০ সালে যখন চিটফান্ড তৈরি হয় তখন মুখ্যমন্ত্রী জ্যোতি বসু৷‌ আর সারদা যখন ২০০৫-এ তৈরি হয় তখন মুখ্যমন্ত্রী ছিলেন বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য৷‌ আর কেন্দ্রে কংগ্রেস৷‌ কংগ্রেস আর সি পি এম কি তখন দুধভাত খাচ্ছিল? তিনি প্রশ্ন তোলেন, কেন তখন তাদের বিরুদ্ধে ব্যবস্হা নেওয়া হয়নি? মুখ্যমন্ত্রী বলেন, 'ক্ষমতায় এসেছি ২০১১-র মে-তে৷‌ ২০১২-তে আমাদের নজরে আসে সারদার দুর্নীতি৷‌ সঙ্গে সঙ্গে ব্যবস্হা নিই৷‌ মূল অভিযুক্তকে কাশ্মীর থেকে গ্রেপ্তার করে আনি৷‌ চার্জশিটও হয়ে গেছে৷‌ অথচ আমাদের বিরুদ্ধে এই তিন দল ক্রমান্বয়ে কুৎসা করে বেড়াচ্ছে৷‌ ওদের বলব, আমাকে বেশি ঘাঁটাবেন না৷‌ কে কোথা থেকে টাকা নিয়েছে সব আমার জানা আছে৷‌ দরকার হলে সব ফাঁস করে দেব৷‌ আমার কাছে সব ডকুমেন্টস আছে৷‌'মুখ্যমন্ত্রী এদিনও তীব্র ভাষায় আক্রমণ করেন কেন্দ্রীয় অর্থমন্ত্রী পি চিদম্বরমকে৷‌ বলেন, 'দিল্লির কনট প্লেসে তাঁর অফিস৷‌ তাঁর অফিস থেকে ঢিল-ছোঁড়া দূরত্বে রমরমিয়ে চলছে একটি চিটফান্ড পি এ পি এল৷‌ তারা সাধারণ মানুষের কাছ থেকে ৪৫ হাজার কোটি টাকা তুলেছে বলে অভিযোগ৷‌ অথচ পুলিসের কাছ থেকে আমি যতটুকু জেনেছি, সারদা-কাণ্ডে তোলা হয়েছে প্রায় আড়াই হাজার কোটি টাকা৷‌'তাঁর অভিযোগ, পি এ সি এলের দুর্নীতির ব্যাপারে এখনও পর্যম্ত কোনও ব্যবস্হা নেননি তিনি৷‌ অথচ লোকসভা নির্বাচনের মুহূর্তে বাজার গরম করতে ই ডি-কে বাংলায় পাঠিয়েছেন তিনি৷‌ তিনি হুমকি দিয়ে বলেন, চিদম্বরমবাবু, আপনি ভুলে যাবেন না, সারদা-দুর্নীতির অভিযোগপত্রে আপনার স্ত্রীরও নাম আছে৷‌ সি পি এমের বিরুদ্ধে বিষোক্কার করে বলেন, ৩৪ বছর ক্ষমতায় থেকেও ওরা রাজ্যের উন্নয়নে কিছুই করেনি৷‌ ওদের নেতারা এখন বড় বড় কথা বলছেন৷‌ কংগ্রেস এবং বি জে পি-কে নিয়ে মহাজোট করছেন৷‌ এক দল লাগিয়ে দিচ্ছে অন্য দলের পতাকা৷‌ মমতার কথায়, বাংলা কারও পায়ে পড়তে যাবে না৷‌ নির্বাচনের পর দিল্লিকেই বাংলার পায়ে পড়তে হবে৷‌ বি জে পি-র বিজ্ঞাপন দেওয়া নিয়েও এদিন তিনি সরব হন৷‌ বলেন, বি জে পি ৫০০০ কোটি টাকা শুধু বিজ্ঞাপনেই খরচ করছে৷‌ চিম্তা করা যায়? ওই টাকা থাকলে ৫ লক্ষ, ১০ লক্ষ ছেলের চাকরি হত৷‌ বি জে পি-র একটাই কাজ, হিন্দু-মুসলমানকে বিভক্ত কর৷‌ বাংলাটাকে ভাগ করে দাও৷‌ দার্জিলিংটাকে ভাগ করে দাও৷‌ গোর্খাল্যান্ড করে দাও৷‌ সমতলটাকে ভাগ করে দাও৷‌ রাজ্যের উন্নয়ন প্রসঙ্গে মমতা বলেন, বর্তমানে কৃষকরা ধান, আলু-সহ সমস্ত সবজির যথাযথ দাম পাচ্ছেন৷‌ তাই দেখে সি পি এম, কংগ্রেস হিংসায় মরে যাচ্ছে৷‌ এই হিংসার কোনও মেডিসিন নেই৷‌ তবে একটা আছে– বিছুটি পাতা৷‌ পঁয়ত্রিশ বছর ধরে বাংলার সর্বনাশ করেছে৷‌ সভায় অন্যদের মধ্যে উপস্হিত ছিলেন মন্ত্রী বেচারাম মান্না, জেলা তৃণমূল সভাপতি তপন দাশগুপ্ত, জেলা সভাধিপতি মেহবুব রহমান, বিধায়ক পারভেজ রহমান, ইকবাল আহমেদ, কৃষ্ণচন্দ্র সাঁতরা, স্বপন নন্দী এবং প্রার্থী অপরূপা পোদ্দার৷‌



    পাওনাদারদের গঞ্জনা সহ্য করতে না পেরে আত্মঘাতী সারদার এজেন্ট

    পাওনাদারদের গঞ্জনা সহ্য করতে না পেরে আত্মঘাতী সারদার এজেন্টএনফোর্সমেন্ট ডিরেক্টরেটের তদন্তে নতুন রূপে সামনে এসেছে সারদা কেলেঙ্কারি। সামনে আসছে, দুহাজার চারশো কোটির প্রতারণা নিয়ে নিত্যনতুন তথ্য। এরইমাঝে আত্মঘাতী হলেন সারদার এক এজেন্ট। নিহতের নাম সুশান্ত সর্দার। বাড়ি ক্যানিংয়ের বেলেখালি গ্রামে। তিনি সারদার আমানতকারীও ছিলেন।


    আজ সকালে সুশান্ত সর্দারের ঝুলন্ত দেহ উদ্ধার হয়েছে। পাওনাদারদের তাগাদা ও গঞ্জনা সহ্য করতে না পেরেই সুশান্ত সর্দার আত্মঘাতী হয়েছেন বলে ক্যানিং থানায় অভিযোগ জানিয়েছেন তাঁর স্ত্রী ছায়া সর্দার। সুশান্ত সর্দারকে ধরে সারদার আত্মঘাতী এজেন্ট-আমানতকারীর সংখ্যা বেড়ে হল তেষট্টি। তার মধ্যে নদিয়া জেলাতেই সবচেয়ে বেশি মানুষ আত্মঘাতী হয়েছেন।


    সরকারের সাহায্য নিয়েই সারদা সাধারণের টাকা লুঠেছে, ইসলামপুরে তোপ সোনিয়া গান্ধীর

    সারদা-কাণ্ডে রাজ্য সরকারকে কড়া আক্রমণ করলেন সোনিয়া গান্ধী। ইসলামপুরের জনসভায় তাঁর অভিযোগ, "সরকারের সঙ্গে যোগসাজশে চিটফান্ড সংস্থাগুলি আঠারো লক্ষ মানুষের টাকা লুঠ করেছে।" সারদা-কাণ্ডে ইডি-র তদন্ত নিয়ে কেন্দ্রীয় সরকারের বিরুদ্ধে তোপ দাগছেন মুখ্যমন্ত্রী সহ তৃণমূলের অন্য নেতারা। এ সবের মধ্যেই ভোটের প্রচারে রাজ্যে এসে তৃণমূল সরকারকে পাল্টা বিঁধলেন কংগ্রেস সভানেত্রী।


    উন্নয়ন নিয়ে রাজনীতি করছে রাজ্য সরকার। দীপা দাশমুন্সির সমর্থনে ইসলামপুরের জনসভায় এই অভিযোগ করলেন কংগ্রেস সভানেত্রী সোনিয়া গান্ধী। রায়গঞ্জে এইমস না হওয়ার জন্য তৃণমূল ও বামফ্রন্টকে দায়ী করেন তিনি।

    পশ্চিমবঙ্গে ভোট প্রচারে এসে চিটফান্ড, এইমস ও ১০০ দিনের কাজ নিয়েই মূলত রাজ্য সরকারের কড়া সমালোচনা করে গেলেন কংগ্রেস সভানেত্রী সোনিয়া গান্ধী৷‌ তবে এই সমালোচনায় একবারের জন্য মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির নাম নেননি সোনিয়া৷‌ সারদার নাম উল্লেখ না করে চিটফান্ড প্রসঙ্গে সোনিয়া এদিন রায়গঞ্জে বলেছেন, '১৮ লক্ষেরও বেশি পরিবারের টাকা লুট করা হয়েছে৷‌ বেশিরভাগই কৃষিজীবী পরিবার৷‌ রাজ্য সরকার এই সব চিটফান্ডের বিরুদ্ধে কোনও ব্যবস্হা নেয়নি৷‌'রায়গঞ্জে এবারের ভোটের অন্যতম ইস্যু এইমস প্রসঙ্গও উঠে আসে কংগ্রেস নেত্রীর কথায়৷‌ বলেন, 'রাজ্য সরকার এইমস নিয়ে রাজনীতি করছে৷‌ উন্নয়ন নিয়েও রাজনীতি করা হচ্ছে৷‌ ইউ পি এ সরকার রায়গঞ্জে এইমস করার সিদ্ধাম্ত নিয়েছিল৷‌ কিন্তু রাজ্য সরকার এখনও পর্যম্ত জমি দিতে পারেনি৷‌ আগের সি পি এম সরকারও জমি দেয়নি৷‌ ১০০ দিনের কাজ এখানে ভাল হচ্ছে না বলেই এই জেলার মানুষ কর্মসংস্হানে পাড়ি দিচ্ছে ভিন রাজ্যে৷‌'এদিকে সি পি এম প্রার্থী মহম্মদ সেলিমের জোর প্রচারে কিছুটা হলেও মুষড়ে পড়েছিলেন রায়গঞ্জ কেন্দ্রের কংগ্রেসকর্মীরা৷‌ মঙ্গলবার প্রচারের শেষ মুহূর্তে ঝটিকা সফরে এসে এই কেন্দ্রের দলীয় কর্মীদের অনেকটাই চাঙ্গা করে গেলেন সোনিয়া গান্ধী৷‌ স্বস্তি পেলেন প্রার্থী দীপা দাসমুন্সিও৷‌ দুপুরে রায়গঞ্জ কেন্দ্রের গোয়ালপোখরের পাঞ্জিপাড়া মঞ্জক ময়দানে দীপা দাসমুন্সির হয়ে প্রচারসভা করলেন সোনিয়া৷‌ তাঁর আগে একই মঞ্চ থেকে মায়ের জন্য ভোট চায় দীপা ও প্রিয়রঞ্জনের কিশোর পুত্র প্রিয়দীপ ওরফে মিছিলও৷‌ ২০০৯ সালেও শিশু প্রিয়দীপ ইসলামপুরের জনসভায় ভোট চেয়েছিল মায়ের জন্য৷‌ মা জিতেওছিলেন৷‌ বি জে পি-র প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী নরেন্দ্র মোদির কড়া সমালোচনা করে কংগ্রেস সভানেত্রী আরও বলেন, 'গদির জন্য প্রধানমন্ত্রী হওয়ার জন্য বি জে পি নেতা এমন উঠেপড়ে লেগেছেন, যাতে সাংবিধানিক ও সামাজিক সঙ্কট সৃষ্টি হচ্ছে৷‌ কীভাবে দেশ সুরক্ষিত থাকবে তা নিয়ে ভাবছেন না বি জে পি নেতারা৷‌ একমাত্র কংগ্রেসই দেশের কথা ভেবে এসেছে৷‌ কোটি কোটি লোক আত্মবলিদান দিয়েছেন দেশের জন্য৷‌ কংগ্রেসকর্মীদেরও বলিদান ভোলার নয়৷‌ দেশের উন্নয়নে লড়াই করেছেন প্রিয়রঞ্জন দাসমুন্সি৷‌ এখন লড়াই করছেন দীপা দাসমুন্সি৷‌'এরপর সোনিয়া একে একে ইউ পি এ সরকারের নানা উন্নয়নমূলক কাজের ফিরিস্তি দেন৷‌ গ্রামে গ্রামে বিদ্যুৎ, পানীয় জল, মিড-ডে মিল, খাদ্য সুরক্ষা বিল, লোকতন্ত্র প্রতিষ্ঠা, নারীর অধিকার রক্ষা ও সংখ্যালঘু উন্নয়ন কাজগুলির উল্লেখ করেন৷‌ কংগ্রেসের নির্বাচনী ইস্তাহার তুলে ধরে বলেন, যেখানে পুলিস নিয়োগের ক্ষেত্রে ২৫ শতাংশ মহিলা পুলিস নিয়োগের কথা বলা হয়েছে৷‌ উদ্যোগ নেওয়া হয়েছে কর্মসংস্হানেরও৷‌ তুলে ধরেন রাজীব গান্ধীর আমলের কম্পিউটার ও যোগাযোগ ব্যবস্হার ক্ষেত্রে বৈপ্লবিক পরিবর্তনের কথা৷‌ বলেন অসংগঠিত ক্ষেত্রে সামাজিক সুরক্ষার কথাও৷‌ বলেন, দেশের সাম্প্রদায়িক সম্প্রীতি রক্ষা করে দেশকে উন্নয়নের দিশা দিতে পারে একমাত্র কংগ্রেসই৷‌ তাই কংগ্রেস ও এখানকার প্রার্থী দীপা দাসমুন্সিকে বিপুল ভোটে জেতানোর অনুরোধ জানাচ্ছি আপনাদের কাছে৷‌ সোনিয়ার বক্তব্যের আগে বক্তব্য পেশ করেন প্রার্থী দীপা দাসমুন্সি৷‌ ধন্যবাদ দেন জেলা কংগ্রেস সভাপতি মোহিত সেনগুপ্ত৷‌


    জঙ্গিপুর মহকুমার সুতির ছাবঘাটি ময়দানে আয়োজিত সভায় সোনিয়া বলেন, অন্য রাজ্যগুলির সঙ্গে পশ্চিমবঙ্গের ক্ষেত্রেও অর্থ দিতে কখনই কাপর্ণ্য করেনি কেন্দ্রীয় সরকার৷‌ বাংলার উন্নতির জন্য আগে বাম সরকারের আমলেও যেমন অর্থ দেওয়া হত, বর্তমান তৃণমূল সরকারের ক্ষেত্রেও সেভাবেই চলছে৷‌ প্রসঙ্গত, মুর্শিদাবাদে জনসভা করতে এসে মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি বহুবার কেন্দ্রীয় সরকারের সমালোচনা করে অর্থের বিষয়ে পশ্চিমবঙ্গকে কেন্দ্র বঞ্চনা করছে বলে অভিযোগ তোলেন৷‌ আসন্ন লোকসভা নির্বাচনের কংগ্রেস প্রার্থীদের সমর্থনে জঙ্গিপুরে এসে মমতার অভিযোগ ভিত্তিহীন প্রমাণ করতে সোনিয়া গান্ধী কড়া ভাষায় তারই জবাব দেন৷‌ তিনি বলেন, উন্নয়ন নিয়ে কংগ্রেস কখনই রাজনীতি করে না৷‌ রাজনীতি ও মানুষের উন্নয়ন দুটি পৃথক৷‌ মানুষের জন্য উন্নয়ন করতে চাইলে তা নিয়ে কখনই রাজনীতি করা উচিত নয়৷‌ কংগ্রেস তাদের ইস্তাহারে যে সব কথা লেখে, তা বাস্তবায়িত করে দেখায়৷‌ তৃণমূলের মতো বড় বড় কথা বলে নির্বাচনের আগে ভোটব্যাঙ্ক বাড়ায় না৷‌ সমাজকে ভেঙে দিয়ে নয়, তা জুড়ে উন্নয়ন করতে হয়– সেটাই পরম্পরা৷‌ যেটা কংগ্রেস করে৷‌ কংগ্রেস যে লক্ষ্য নিয়ে এগিয়েছিল, তা থেকে তারা সরে আসেনি৷‌ তা বাস্তবায়িত করার নিরম্তর চেষ্টা চালিয়ে যাচ্ছে৷‌ এদিন জঙ্গিপুরের সভার আগে রায়গঞ্জের সভায় যান সোনিয়া৷‌ সেখান থেকে আকাশপথে সাড়ে তিনটে নাগাদ জঙ্গিপুরে আসেন তিনি৷‌ মাত্র ১৫ মিনিট বক্তব্য পেশ করেন তিনি৷‌ সোনিয়া জানান, অন্যান্য দেশে ভারতের সংস্কৃতি সমৃদ্ধ করেছে তার মাটিকে৷‌ কিন্তু বর্তমানে কিছু ক্ষমতালোভী লোক তা বিনষ্ট করতে চাইছে৷‌ নরেন্দ্র মোদি সকলের সামনে নিজেকে দেশপ্রেমিক হিসেবে তুলে ধরতে চাইছেন৷‌ আতঙ্কবাদ, দাঙ্গা থেকে রক্ষা করাকে দেশপ্রেম বলে৷‌ যেটা কংগ্রেস এতদিন করে এসেছে৷‌ কিন্তু মোদির কার্যকলাপ আমাদের ভয় পাইয়ে দিচ্ছে৷‌ সোনিয়া এদিন কেন্দ্রীয় সরকারের বিভিন্ন উন্নয়নের কথা জানিয়ে বলেন, মাদ্রাসা শিক্ষার আধুনিকীকরণ এই সরকারই করেছে৷‌ পশ্চিমবঙ্গে গত ৩৪ বছরে কী হয়েছে, বর্তমানে কী হচ্ছে, তা আপনাদের কাছে পরিষ্কার৷‌ রাজীব গান্ধী গ্রামীণ যোজনায় দরিদ্রদের ঘর আলো হয়েছে৷‌ ফরাক্কায় বিদ্যুৎ উৎপাদন ক্ষমতা ৫০০ মেগাওয়াট বাড়ানো হয়েছে৷‌ জাতীয় সড়ক সম্প্রসারণে ২২০০ কোটি টাকা বরাদ্দ, তারাপুর হাসপাতালে উন্নত পরিষেবা, জঙ্গিপুরে পেনশন অফিস, নবগ্রামে সেনাছাউনি প্রভৃতি কেন্দ্রীয় সরকার করেছে৷‌ ভবিষ্যতে আরও কিছু করার জন্য সমর্থন দরকার জনগণের৷‌ ভবিষ্যতে যুবকদের কাজের ট্রেনিং দিয়ে রোজগারের বন্দোবস্ত, কৃষি ও চিকিৎসায় উন্নতির প্রসার ঘটানো হবে৷‌ আসন্ন নির্বাচন কোনও প্রদেশ নয়, দেশ গঠনের নির্বাচন৷‌ জনসাধারণ কংগ্রেসের পাশে থাকুন৷‌ এদিন সোনিয়ার সঙ্গে জনসভায় ছিলেন অধীর চৌধুরি, আবু হেনা, আবু হাসেম খান চৌধুরি-সহ অন্য কংগ্রেস নেতারা উপস্হিত ছিলেন৷‌





    সততার প্রতীক এখন সারদার প্রতীকে পরিণত হয়েছেন৷‌ নাম না করে মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি এবং তাঁর দল তৃণমূলকে এভাবে বিঁধলেন রাজ্যের প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য৷‌ শুক্রবার শ্রীরামপুরের গান্ধী ময়দানে নির্বাচনী জনসভায় তিনি বলেন, দু'বছরের মাথায় মুখ্যমন্ত্রী বলেছিলেন ৯০ ভাগ কাজই শেষ হয়ে গেছে৷‌ আসলে উনি নিজেই জানেন না মুখ্যমন্ত্রীর কাজ কী! এই সরকারের একটাই কাজ, শুধু ধার করো আর উৎসব করো৷‌ কার টাকায় কীসের উৎসব হচ্ছে? এদিন এই কেন্দ্রের সি পি এম প্রার্থী তীর্থঙ্কর রায়ের সমর্থনে ভাষণ দিতে গিয়ে বুদ্ধদেববাবু রাজ্য সরকারের কড়া সমালোচনা করেন৷‌ এদিন সভায় হাজির ছিলেন সি পি আই নেতা মঞ্জুকুমার মজুমদার, আর এস পি নেতা মনোজ ভট্টাচার্য, ফরওয়ার্ড ব্লকের নরেন দে, সি পি এমের জেলা সম্পাদক সুদর্শন রায়চৌধুরি প্রমুখ৷‌ বুদ্ধবাবু বলেন, রাজ্যে মহিলাদের ওপর একের পর এক নির্যাতনের ঘটনা ঘটছে৷‌ এই সরকারের ওপর থেকে নিচুতলা পর্যম্ত অনেকে অপরাধীদের সঙ্গে যুক্ত৷‌ সেই অপরাধীদের নিয়েই মিটিং-মিছিল করছেন তিনি৷‌ নাম না করে অনুব্রত মণ্ডলের প্রসঙ্গ টেনে বলেন, মুখ্যমন্ত্রী মঞ্চে বলছেন, কী করেছিস? নারকেল-মুড়িখাওয়াতে পারছিস না৷‌ এ-সব শুনে মাথা লজ্জায় নিচু হয়ে যায়৷‌ টেট কেলেঙ্কারি প্রসঙ্গে বলেন, কিছু ছেলে মাস্টার হতে চেয়েছিল৷‌ রাস্তায় ফেলে তাদের মারধর করা হল৷‌ তিনি বলেন, কংগ্রেসের পাপ এবং অপরাধ সবই তৃণমূল সমর্থন করেছে৷‌ এখন তৃণমূল চাইছে দিল্লি গিয়ে আমি 'রাজা'তৈরি করব৷‌ একবারও বলছে না কংগ্রেসে গিয়ে ভুল করেছি৷‌ বি জে পি-তে যাব না৷‌ ক্ষমতার জন্য সুযোগ পেলেই আবার ওই দলে যাবে৷‌ ক্ষমতা ছাড়া উনি কিছু জানেন না৷‌ কিন্তু মানুষ কংগ্রেস, তৃণমূল এবং বি জে পি-র বিরুদ্ধে রায় দেবে৷‌ দেশের পরিস্হিতি নিয়ে তিনি বলেন, রাজস্হান, বিহার, উত্তরপ্রদেশে কোটি কোটি গরিব মানুষ রয়েছে৷‌ জমি নেই৷‌ সারা ভারতে কৃষকদের জমি দিতে হবে, এটাই আমাদের কর্মসূচি৷‌ গরিব মানুষকে আমরা জমি দিতে চাই৷‌ গরিব মানুষদের রেশন দিতে চাই৷‌ নিত্যপ্রয়োজনীয় জিনিসের দাম বেঁধে দিতে হবে৷‌ শ্রমিকদের ন্যূনতম মজুরি ১০ হাজার টাকা করতে হবে৷‌ এর জন্য আইন তৈরি করতে হবে৷‌ পিছিয়ে-পড়া মানুষের জন্য একগুচ্ছ কর্মসূচি নিয়েছি আমরা৷‌ জমি, রেশন, মজুরি ছাড়াও পেনশন দিতে হবে৷‌ লেখাপড়ার সুযোগ বাড়াতে হবে৷‌ এ-সবের ওপর দাঁড়িয়ে নির্বাচন হোক৷‌ তিনি বলেন, আমরা সবাই বুঝতে পারছি কংগ্রেস থাকছে না৷‌ দশ বছর মানুষ কংগ্রেসকে সময়, সুযোগ দিয়েছিল৷‌ কিন্তু কংগ্রেস পারেনি৷‌ আমরা বামপম্হীরা চাইছি কংগ্রেস সরে যাক৷‌ তার কারণ, কংগ্রেস বেকারি, দারিদ্র্য, ক্ষুধায় ভরিয়ে দিয়েছে দেশটাকে৷‌ কংগ্রেসের নীতি, সরকারের সম্পত্তি সব বেচে দাও৷‌ বিলগ্নীকরণ ওদের কাছে খুব বড় কথা৷‌ ওদের নীতি হল বিনিয়ন্ত্রণ৷‌ মানুষ যদি কিনতে না পারে, ওদের কিছু করার নেই৷‌ আমরা বলছি নিয়ন্ত্রণ চাই৷‌ এক সময় দেশের পুঁজিপতি ছিলেন ৮ জন৷‌ মনমোহন সিং ১০ বছরে পুঁজিপতি বানিয়েছেন ১২২ জন৷‌ মানে ৫ হাজার কোটি টাকার ওপরে যাঁরা মালিক, তাঁদেরতিনি তৈরি করে দিয়ে গেছেন৷‌ কেন্দ্রীয় সরকারের এই নীতি অনুসরণ করে নরেন্দ্র মোদিও ওই কথাই বলছেন৷‌ ১২২ জনের মাথায় তেল দিচ্ছেন৷‌ আমরা বলছি ওপথে দেশ বাঁচবে না৷‌ সর্বনাশ হবে৷‌ পুঁজিপতিরা বড়লোকদের দল কংগ্রেসকে সমর্থন করেছেন৷‌ এখন পুঁজিপতিরা বলছেন, তাঁদের প্রার্থী নরেন্দ্র মোদি৷‌ যেখান থেকে মনমোহন সিং ছেড়ে গেছেন সেখান থেকেই মোদির শুরু৷‌ তাই ওঁদের বিরুদ্ধে আমাদের লড়াই৷‌ কংগ্রেস এবং বি জে পি-র মোট ভোট মেলালেও দেশের ৫০ শতাংশ ভোট হবে না৷‌ এই কথা মাথায় রেখেই বিকল্প সরকার হিসেবে বামফ্রন্টের নীতির কথাই তুলে ধরেন তিনি৷‌ বলেন, আর এস এস হল আমাদের দেশে সব থেকে পিছিয়ে-পড়া সংগঠন৷‌ তারা বলছে, আমরা মোদিকেই চাই৷‌ এখানেই বিপদ৷‌ শ্রীরামপুরের প্রার্থী তীর্থঙ্কর রায় বলেন, বাম সরকারের নীতি, আদর্শকে সামনে রেখে আমাদের সংগ্রাম ও লড়াই৷‌ জুট মিল, কলকারখানার শ্রমিকদের কথা আমি সংসদে গিয়ে তুলে ধরব৷‌ আপনারা আমাকে সেই সুযোগ করে দিন৷‌




    बासी कढ़ी में उबाल,फिर शारदा फर्जीवाड़े का बवाल! एक के बाद एक गढ़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। वामपक्ष, भाजपा और कांग्रेस तीनों तरफ से इस रफा दफा मामले को लेकर घेराबंदी हो रही है मां माटी मानुष की सरकार की।सीबीआई जांच के लिए असम,ओड़ीशा और त्रिपुरा तीनतीन राज्य सरकारें राजी हैं।ऐतराज सिर्फ बंगाल को है,जबकि बतौर विपक्षी नेता हर छोटे बड़े मामले में दीदी सीबीआई जांच के लिए केंद्र सरकार से गुहार लगाती रही है।


    बंगाल सरकार का अजब तर्क है कि बाकी राज्यों में तो सीबीआई जांच करें लेकिन बंगाल में जांचराज्य सरकार की ओर से गठित विशेष जांच दल करे।


    इस जांच दल यानी सिट का फंडा तो ऐसा है कि साल भर में सुदीप्त की पत्नी पियाली सेन का फ्लैट को सील कर रखा है ,जहां छापा मारकर इडी ने गहने और नकदी के अलावा बेहद खास दस्तावेज अपने कब्जे में कर लिये,जिसकी कोई गंध भी सूंघ नहीं पाया।फिर एक बैंक में इडी के पहुंचने से पहले ही पियाली सेन के लाकर खोल कर जब्ती कर ली जांच दल ने।


    दीदी ने चुनाव के नाजुक मौके पर रफा दफा इस मामले के अचानक मुद्दा बन जाने से पहले की तरह आक्रामक मुद्रा में अपने दागी मंत्रियों,सांसदों और नेताओं का बचाव करने लगी है और हर आरोप को चक्रांत कहकर खारिज करने लगी हैं।


    विपक्ष कम से कम शारदा मामले में सीबीआई जांच की मांग के सिलसिले में एकजुट है।जाहिरा तौर पर चुनाव आयोग के खिलाफ जिहादी तेवर अपनायी दीदी सीबीआई जांच को लेकर भी बेहद आक्रामक हैं।मुश्किल यह है कि मामले की सुनवाई पूरी हो गयी है।


    फैसला सुरक्षित है।इस फर्जीवाड़े में किस किसको फायदा हुआ,यह पूछकर सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही दीदी की साख को दांव पर चढ़ा दिया है ।


    अब अगर सुप्रीम कोर्ट सीबीआई जांचका आदेश जारी कर दें, तो क्या दीदी अवमानना का जोखिम उठायेंगी,सवाल यह है और उसका सीधा जवाब है ,नहीं।अफसरान के तबादले के चुनावी आदेश पर उबल चुकी दीदी ने आखिर चुनाव आयोग का आदेश मान ही लिया।


    मालूम हो कि प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पिछले हफ्ते सुदीप्त की पत्नी व बेटे की गिरफ्तारी के बाद इस चुनावी सीजन में शारदा घोटाला अचानक एक मुद्दा बन गया है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपने रैलियों में शारदा घोटाले के बहाने ममता बनर्जी पर करारे हमले कर चुके हैं। राहुल ने कहा कि इसकी जांच सीबीआई से होने पर सबकुछ साफ हो जाएगा।


    इस मामले में जेल में दिन काट रहे तृणमूल कांग्रेस के निष्कासित सांसद कुणाल घोष ने भी मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है।


    उधर, दीदी पहले ही आरोप लगा चुकी हैं कि वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की पत्नी इस घोटाले में शामिल हैं। उन्होंने उनको गिरफ्तार करने की मांग करते हुए कहा है कि अगर प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों में हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार कर के दिखाए।



    अभी बंगाल में कुल मिलाकर दस ही सीटों के लिए मतदान हुआ है।अभी शारदा पोंजी स्कीम में पैसा झोंके एक और निवेशक ने खुदकशी कर ली।जस्टिस श्यामल सेन आयोग ने तमाम मामलो की सुनवाई भी पूरी कर ली।लेकिन  शारदा समूह की संपत्ति बेचकर जो मुआवजा देना था,वह संभव नहीं हुआ है। क्योंकि शारदासमूह में जमा करीब छह सौ करोड़ रुपये का कोई हिसाब ही नहीं है।


    तो दूसरी ओर जब्ती और रिकवरी हुई ही नहीं।राज्य सरकार ने जो पांच सौ करोड़ रुपये का फंड बनाया पीड़ितों को राहत के वास्ते,उसका न्यारा वारा हो गया। करीब तीन लाख शारदा पीड़ितों को मुावजा दिया जा चुका है राजकोष से।


    अब श्यामल सेन आयोग ने दूसरी चिटफंड कंपनियों के खिलाफ लाखों शिकायतों को भी सही पाया है और अदालती आदेश उन सबको मुआवजा देने का है।यानी राजकोष से फिर पोंजी पापस्खलन होना है।


    सीबीआई जांच का आदेश हो गया तो दीदी की मुश्किलें इस चौतरफा चुनाव में बढ़ने वाली हैं।मीडिया के मुताबिक जहां कांग्रेस को साइनबोर्ड में तब्दील हो जाना चाहिए था,उत्तर बंगाल की रपटों के मद्देनजर वैसा होते नहीं दीख रहा है।


    खबर है कि भाजपा के हक में व्यापक मतदान हो रहा है।समझा जा रहा है कि तृणमूल वोटबैंक में सेंध के लिए कांग्रेस और वामदल भगवा लहर को बंगाल में खूब हवा दे रहे हैं।


    सबसे बड़ी बात तो यह है कि दीदी खुद ऐसा ही आरोप लगा रही हैं।


    अब साफ नही है कि भाजपा सिर्फ वोट काटेगी या फिर दो चार सीटें भी झटक लेगी। फिर वोट काटेगी तो किसके वोट।वोटों में कटौती होने पर मीडिया के मुताबिक तृणमूल के लिए बंगाल में विपक्ष का सफाया करना संभव नहीं होगा।


    उससे बड़ा खतरा यह है कि ईडी ने पहले ही ढेरों सबूत जुटा लिये हैं।इडी और सीबीआई युगलबंदी हो गयी तो दागियों का बच निकलना मुश्किल है।


    पियाली सेन  के बैंक लाकर से दो ड्राफ्ट मिले हैं,जो शारदा समूह के टीवी चैनल और अखबार बेचने के एवज में हुए भुगतान से संबंधित है।


    समझा जाता है कि एक अति शक्तिशाली सांसद ने यह सौदा किया। उसी सांसद का खास आदमी शारदा समूह के लेखा विभाग में था,बताया जाता है।जो नकदी की आवक की अग्रिम जानकारी सांसद को देता था और सांसद फौरन वसूली कर लेते थे।


    इडी ने ऐसे एक वसूली का ब्यौरा भी जुगाड़ लिया है जिसमें तीन सौ करोड़ तक के भुगतान बिना मोहलत दिये तुरंत करने के लिए सुदीप्तो को मजबूर किया गया।


    इसी बीच  प्रवर्तन निदेशालय (इडी) का शिकंजा कसता जा रहा है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने बालुरघाट से तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार व पेशे से नाट्यकर्मी अर्पिता घोष समेत तीन लोगों को नोटिस जारी किया है।एक विशवविख्यात चित्रकार भी केंद्रीय एजंसियों के निशाने पर हैं।


    और तो और,इडी को मिले सबूत के मुताबिक दीदी के बनाये चित्रों की अप्रत्याशित कीमत भी पियाली सेन के खाते से हुआ,जबकि अपने  चित्र बेचकर दीदी ने विधानसभा का चुनाव फंड और चुनावखर्च जुगाड़ करने का दावा करती रही हैं।


    सांसद का चेहरा आम जनता के बीच उजागर हो चुका है तो एक मंत्री भी बुरी तरह फंसे हैं।जिनके एक महिला वकील से मधुर संबंध थे।पियाली नाम की उस महिला वकील की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी,जो राजनेताओं और दूसरे लोगों को  भुगतान के मामले देखती थीं और अपनी आय के मुकाबले बेहद आलीशान जिंदगी जीते हुए मर गयी।एक आईपीएस अफसर हैं जो सत्तादल के खासमखास है ,जिनको हम महीने फर्जी बिल पर एक लाख का भुगतान होता था।उनका भी पियाली से संबंध बताये जाते हैं।आरोप है कि वे मौत से पहले पियाली के साथ उसके फ्लैट में देखे गये।इडी ने गैरकानूनी भुगतान के मामले में पियाली प्रकरण से जुड़े सबूत भी इकट्ठे कर लिये हैं।


    जवाबी हमला बतौर विवादित परिवहन मंत्री मदन मित्र ने तत्कालीन केंद्रीय वित्तमंत्री बतौर मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को इस विवाद में घसीट लिया है और आरोप लगाया है कि पोंजी स्कीम के तहत उन्होंने ही शारदा को लाइसेंस दिलवाया। मित्र के आरोप में देश के सर्वोच्च व्यक्तित्व के परिजनों को शारदा समूह से भुगतान हुआ।


    दरअसल शारदा चिटफंड घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (इडी) का शिकंजा कसता जा रहा है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने तृणमूल कांग्रेस के पांच नेताओं को सम्मन जारी किया है। इन्हें 25 अप्रैल तक बयान दर्ज कराने को कहा गया है। हालांकि अभी तक इनके नामों का खुलासा नहीं हुआ है।


    हालत इतनी नाजुक है कि  इडी ने ऐसे 15 लोगों की सूची तैयार की है, जिनसे वह पूछताछ करना चाहता है। इसमें तृणमूल कांग्रेस के मंत्री और नेताओं सहित पूर्व अधिकारी भी शामिल हैं।


    इडी ने चलाया तलाशी अभियान

    इडी ने शारदा समूह के मालिक जेल में बंद सुदीप्त सेन की पत्नी पियाली चक्रवर्ती व उसके बेटे शुभोजीत सेन को हिरासत में लिया है। इनसे पूछताछ के बाद शनिवार को जांच एजेंसी ने तलाशी अभियान चलाया। जानकारी के अनुसार, शनिवार को विधाननगर के एक बैंक में इडी अधिकारियों ने जांच पड़ताल की। बैंक में सुदीप्त सेन की पत्नी पियाली सेन का एकाउंट है। हालांकि उस एकाउंट में कितने रुपये थे, इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है।


    सुदीप्त से पूछताछ कर सकता है इडी

    प्रवर्तन निदेशालय घोटाले के मुख्य आरोपी सुदीप्त सेन से पूछताछ कर सकती है। सेन को अपनी हिरासत में लेने के लिए इडी अदालत का दरवाजा खटखटाने जा रहा है।


    गौरतलब है कि शारदा कांड में कुल 2500 करोड़ रुपये के घोटाले का मामला सामने आया था। 1900 करोड़ रुपये का हिसाब पता लगाने में राज्य सरकार पीछे रह गयी है। इसलिए इडी अब इस मामले में जिन-जिन लोगों का नाम सामने आया है, उनसे पूछताछ करने जा रहा है।


    कथित सीडी का रहस्य गहराया

    सुदीप्त सेन की पत्नी ने पूछताछ में बताया है कि गिरफ्तार होने के पहले तक तृणमूल कांग्रेस सांसद कुणाल घोष उनके संपर्क में थे। कुणाल घोष हमेशा एक सीडी के बारे में पूछ रहे थे, हालांकि पियाली ने दावा किया कि वह उस सीडी के बारे में कुछ नहीं जानती हैं। इस संबंध में भी जानकारी हासिल करने के लिए इडी अब सुदीप्त सेन को हिरासत में लेना चाहती है।


    इडी दफ्तर पहुंचे सुदीप्त सेन के वकील

    शनिवार को सुदीप्त सेन के वकील समीर दास साल्टलेक स्थित इडी कार्यालय पहुंचे और उनकी पत्नी पियाली व बेटे शुभजीत से मिलने की मांग की। लेकिन इडी के अधिकारियों ने उनको मिलने का मौका नहीं दिया। इडी अधिकारियों से सुदीप्त सेन के वकील ने बातचीत की। उन्होंने इडी अधिकारियों से पूछा कि सारधा कंपनी के किसी भी व्यवसाय में उनकी पत्नी व बेटे का कोई नाम नहीं है, फिर उन्हें क्यों गिरफ्तार किया गया है।



    दीदी और उनके सिपाहसालार शुरु से इस मामले में पूर्ववर्ती वाम सरकार को घेरती रही हैं।राष्ट्रपति का नाम पहलीबार सामने  आया है।जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सीधे सीबीआई जांच की मांग करते हुए दावा किया कि वाम पक्ष का कोई भी इस घोटाले में शामिल नहीं है।अगर है तो सीबीआईउसका खुलासा करके दोषियों को सजा दिलाये,यह उनकी खुली चुनौती है।


    परिवर्तन और भूमि आंदोलन में दीदी के सबसे करीबी और शारदा समूह के मीडिया प्रभारी कुणाल घोष को दीदी ने राज्यसभा भेजा तो उसी कुणाल घोष ने दीदी को भी शारदा फर्जीवाड़ा मामले में लपेटा।राज्यसरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया। वे अब भी जेल में है और शारदा समूह से अपनी ही पार्टी के नेताओं के मधुर संबंधों का कच्चा चिट्ठा खोलने को तैयार बैठे हैं।खास बात यह है कि अपने दागी सांसदों और नेताओं को दीदी ने लोकसभा चुनावों में  मैदान में उतारा है।वे हार जायें तो नुकसानकम होगा।लेकिन वे जीते और कुणाल जैसा उनका भी हश्र हुआ तो सत्तादल पर मुश्किलों का ऐसा पहाड़ टूटने वाला है,जिसके नीचे से निकलकर अगली विधानसभा चुनावों में सत्ता कीराह बनाना बहुत बड़ी चुनौती होगी।


    हाल यह है कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और माकपा नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य ने शुक्रवार को शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर एक दूसरे पर निशाना साधा। ममता ने जहां माकपा के धन के स्रोत पर सवाल उठाया तो पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सीबीआई जांच की मांग कर दी। इस पर ममता बनर्जी ने भट्टाचार्य पर निशाना साधते हुए कहा, ''आपके कार्यकाल में 2006 में यह घोटाला हुआ था। क्या मैं नाम बताउं? जैसे कि आपको कुछ पता ही नहीं है।''गौरतलब है कि     वाम मोर्चा की सरकार के शासनकाल में ही शारदा समूह ने अपना कारोबार शुरु किया था।


    तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ने हुगली जिले के तारकेश्वर में चुनावी सभा में कहा, ''चोरों की मां सबसे तेज बोलती है और खाली बर्तन ज्यादा बजते हैं। माकपा के पास हजारों करोड रपये कहां से आये।'' उन्होंने कहा, ''वाम मोर्चा सरकार के वित्त मंत्री ने किसके बैंक खाते से अपना चुनाव अभियान चलाया।''

     ममता ने कहा, ''किसने चोरी की है और किसे जिम्मेदार ठहराया जा रहा है? अगर आप तृणमूल कांग्रेस में दोष निकालने की कोशिश करेंगे तो केवल अच्छे लोग ही दिखाई देंगे।''



    ताजा खबरों के मुताबिक करोड़ों रुपये के शारदा  चिटफंड घोटाले के सूत्रधार सुदीप्त सेन का बेटा शुभोजित सेन प्रतिदिन गाड़ियों के काफिले पर 60 हजार रुपये खर्च करता था। शुभोजित शारदा समूह के 17 निदेशकों में से एक था।

    शुभोजित के साथ उसकी मां पियाली सेन भी लग्जरी कारों का भरपूर इस्तेमाल करती थी। ईडी अधिकारियों के अनुसार 35 लग्जरी कारों का इस्तेमाल सुदीप्त की पत्नी व पुत्र करते थे। इसमें पांच विदेशी कारें भी थीं। शुभोजित ने गत तीन वर्षों में 20 करोड़ रुपये में सिर्फ गाड़ियों का काफिला तैयार किया था।

    शारदा  समूह से जुड़े वित्तीय अधिकारियों ने बताया कि सुदीप्त ने निर्देश दे रखे थे कि शुभोजित जितने भी रुपये मांगता है उसे दिए जाएं। ईडी के अधिकारियों का कहना है कि शुभोजित व पियाली सेन को मनी लांड्रिंग में गिरफ्तार किया गया है।

    शारदा  के एक और निवेशक ने दी जान

    शारदा  चिटफंड घोटाले में रुपये डूबने से एक और पीड़ित ने फांसी लगा ली। पश्चिम बंगाल के दक्षिण चौबीस परगना जिले के कैनिंग थाना इलाके में सुशांत सरदार (42) ने आत्महत्या कर ली। वह पेशे से राज मिस्त्री था। उसने करीब डेढ़ लाख रुपये शारदा  में निवेश किए थे।



    गौरतलब है कि  परिवहन मंत्री मदन मित्र ने प्रवर्तन निदेशालय को इस बात का खुलासा करने की चुनौती दी है कि शारदा घोटाले में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे और बेटी ने कितनी रकम ली थी। उन्होंने रविवार देर शाम बर्दवान जिले के केतुग्राम में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए यह चुनौती दी।

    मित्र ने कहा कि वे निदेशालय को यह खुलासा करने की चुनौती देते हैं कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन पूर्व कांग्रेस नेता के बेटे व बेटी ने शारदा से कितने करोड़ रुपए लिए हैं। कांग्रेस ने मित्र के आरोपों का खंडन किया है। उसी रैली में मित्र ने सवाल उठाया कि रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर ने शारदा समूह को शुरू करने की अनुमति दी थी। ऐसे में इसके लिए उनको भी क्यों नहीं गिरफ्तार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र या कांग्रेस 15 मई तक जो चाहे कर सकती है। 16 मई के बाद बंगाल के दस करोड़ लोग जेलों का घेराव करेंगे।

    दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने मित्र के आरोपों को निराधार करार देते हुए कहा है कि पार्टी इस बारे में चुनाव आयोग से शिकायत करेगी। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि शारदा से नजदीकी की वजह से मित्र को निजी तौर पर काफी फायदा हुआ है। वे समूह के कई कार्यक्रमों में मालिक सुदीप्त सेन के साथ देखे गए थे। सेन ने ही उनको शारदा समूह की कर्मचारी यूनियन का नेता मनोनीत किया था।

    शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि उसकी (राज्य सरकार) चिटफंड कंपनियों के साथ मिलीभगत है जिन्होंने 18 लाख से अधिक लोगों को लूटा है।


    सोनिया गांधी ने ऐसे समय में पश्चिम बंगाल सरकार पर हमला किया है जब कुछ ही दिन पूर्व उनके बेटे और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसी मुद्दे पर प्रदेश सरकार को निशाना बनाया था।


    उत्तर दिनाजपुर जिले में रायगंज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहीं पार्टी प्रत्याशी दीपा दासमुंशी के समर्थन में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए सोनिया ने कहा कि यहां की सरकार की मिलीभगत से चिटफंड कंपनियों ने 18 लाख से भी अधिक परिवारों को लूटा, उन्हें बरबाद किया है।'


    उन्होंने कहा, 'गरीब लोग पैसा जोड़ने के लिए काफी संघर्ष करते हैं ताकि वे जरूरत के समय इसका इस्तेमाल अपने तथा अपने बच्चों के लिए कर सकें।'उन्होंने कहा कि शारदा मामले में प्रवर्तन निदेशालय और सेबी ने राज्य सरकार को कई बार गड़बड़ी के प्रति अगाह किया था, लेकिन राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। राज्य सरकार लोगों की मूल धन तक वापस नहीं कर पायी हैं।



    इससे तीन दिन पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तृणमूल कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि यह सरकार उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है जो करोड़ों रुपये के शारदा पोंजी घोटाले में शामिल थे। इसके बजाय यह उन्हें बचाने का प्रयास कर रही है।


    সারদা মামলার শুনানি শেষ হলেও সুপ্রিম কোর্ট বুধবার কোনও রায় দিল না৷ বিচারপতি টি এস ঠাকুর এবং বিচারপতি সি নাগাপ্পনের ডিভিশন বেঞ্চ মামলার শুনানি শেষ করে এ দিন জানিয়ে দেয়, ওডিশাতেও সারদা-সহ বেশ কিছু বেআইনি অর্থলগ্নি সংস্থার বিরুদ্ধে সিবিআই তদন্ত চেয়ে আবেদন করা হয়েছে৷ কেন্দ্রীয় সরকার সেই আবেদন এখনও মঞ্জুর করেনি৷ ত্রিপুরাতে সিবিআই তদন্তের কাজ শুরু করে দিয়েছে৷ তাই বিচারপতিরা ওডিশার মামলাও শুনতে চান৷ জানতে চান সে ব্যাপারে সিবিআইয়ের বক্তব্য৷ ২৩ এপ্রিল ওডিশার শুনানি হবে৷ সেদিনই রায় ঘোষণা করা হতে পারে বলে বিভিন্ন মহল মনে করছে৷ শুনানির শুরুতেই বেঞ্চ জানিয়ে দেয়, এ দিনই শুনানি শেষ করা হবে৷


    সর্বোচ্চ আদালত সারদা-মামলার রায় ঘোষণা না-করায় রাজ্য সরকার আজ, বৃহস্পতিবার রাজ্যে প্রথম দফার ভোটের আগে সামান্য হলেও স্বস্তি পেল৷ তবে পশ্চিমবঙ্গের সারদা-মামলার সঙ্গে অন্য রাজ্যের মামলাকে এক সঙ্গে না জড়ানোর ব্যাপারে রাজ্য সরকারের আবেদন মানেনি সুপ্রিম কোর্ট৷ তাতে সরকার ধাক্কাও খেয়েছে৷ বিচারপতি ঠাকুর বলেন, 'আমরা যদি সারদা-মামলার তদন্তভার সিবিআইয়ের হাতে তুলে দিই, তা হলে ওডিশার সব মামলার তদন্তের দায়িত্বও তাদের হাতে যাবে৷ ২৩ এপ্রিল ওডিশা-মামলার শুনানি৷ সেই শুনানি শেষ করে আমরা রায় দেব৷' সিবিআই তদন্ত চেয়ে যাঁরা সুপ্রিম কোর্টে আবেদন করেছিলেন, তাঁদের আইনজীবী বিকাশরঞ্জন ভট্টাচার্যের বক্তব্য, 'ওডিশার শুনানি শেষ করে আদালত সিবিআই তদন্তের পক্ষেই রায় দেবে বলে আমাদের আশা৷' তবে রাজ্য সরকারের আইনজীবীরা এ দিনও সিবিআই তদন্ত ঠেকানোর মরিয়া চেষ্টা চালিয়ে গিয়েছেন৷


    সারদা-কাণ্ডে সমস্যায় পড়া হাজার হাজার মানুষের কৌতূহল ছিল, বুধবার সুপ্রিম কোর্ট কী রায় দেয়, তা জানার জন্য৷ কিন্ত্ত রায় ঘোষণা না-হওয়ায় তাঁরা কিছুটা হতাশই হয়েছেন৷ অন্যদিকে তৃণমূল নেতৃত্ব তথা রাজ্য সরকারেরও আশঙ্কা ছিল, বুধবারই হয়তো সিবিআই তদন্তের নির্দেশ হয়ে যাবে৷ কিন্ত্ত সেটা না-হওয়ায় তারা কিছুটা দম ফেলার সুযোগ পেল৷


    সারদা-মামলার সিবিআই তদন্ত চাওয়ার পক্ষে বিকাশ ভট্টাচার্যদের অন্যতম যুক্তি হল, সারদা-কেলেঙ্কারিতে অনেকগুলি রাজ্যের মানুষ জড়িত৷ তাই রাজ্যের তদন্তকারীরা তার পূর্ণাঙ্গ তদন্ত করতে পারবেন না৷ রাজ্যের আইনজীবী বৈদ্যনাথন এর বিরোধিতা করে বলেন, 'পশ্চিমবঙ্গের সঙ্গে ওডিশার কেলেঙ্কারির চরিত্র আলাদা৷ দু'টি কেলেঙ্কারির কোনও সম্পর্ক নেই৷' বিচারপতি তখন ওডিশার আইনজীবীর কাছে জানতে চান, তাঁদের রাজ্যের কেলেঙ্কারিতে সারদা গোষ্ঠী অভিযুক্ত কি না? ওই আইনজীবী জানান, ওডিশাতেও সারদা অভিযুক্ত৷


    অসম ও ত্রিপুরা সরকার সারদা-সহ বিভিন্ন সংস্থার কেলেঙ্কারি নিয়ে তদন্তের দায়িত্ব ইতিমধ্যেই সিবিআইকে দিতে চেয়েছে৷ ত্রিপুরায় সিবিআই কাজ শুরুও করে দিয়েছে৷ অসমের ক্ষেত্রে কেন্দ্রীয় সরকার এখনও অনুমতি দেয়নি৷ বিচারপতিরা কেন্দ্রীয় সরকারের কাছে জানতে চান, কেন তারা এখনও এই অনুমতি দেননি৷ আবেদনকারীদের আইনজীবী বিকাশবাবু জানান, তিনি সব রাজ্যের আর্থিক কেলেঙ্কারি নিয়েই রায় চান৷ কারণ, সব রাজ্যে একই ধরনের কেলেঙ্কারিতে একই সংস্থা, একই ধরনের লোকজন জড়িত৷ হাজার হাজার সাধারণ মানুষকে প্রতারণা করার পদ্ধতিও এক৷ তাঁর অভিযোগ, সব জায়গায় সেবি, রিজার্ভ ব্যাঙ্ক-সহ নিয়ন্ত্রকরা ওই কেলেঙ্কারি রুখতে ব্যর্থ হয়েছে৷ সে জন্যই তিনি সিবিআই তদন্ত চাইছেন৷


    তবে বিচারপতিরা যাতে সিবিআই তদন্তের নির্দেশ না দেন, তার জন্য রাজ্য সরকারের আইনজীবী বৈদ্যনাথন আগাগোড়া সচেষ্ট ছিলেন৷ এই প্রসঙ্গে আগের দিন রাজ্যের প্রাক্তন রাজ্যপাল গোপালকৃষ্ণ গান্ধীর সিবিআইকে সমালোচনা করার প্রসঙ্গও টেনে আনেন তিনি৷ তাঁর বক্তব্য, 'রাজ্যে তদন্তকারীরা অত্যন্ত সঠিক পথে ও স্বচ্ছতার সঙ্গে তদন্ত হচ্ছে৷ আমাদের চূড়ান্ত রিপোর্টের জন্য অপেক্ষা করুন৷ আমরা যে কোনও ধরনের নজরদারিতে রাজি৷ দেখুন, গোপালকৃষ্ণ গান্ধী কী বলেছেন সিবিআই সম্পর্কে৷' বিচারপতি ঠাকুর বলেন, 'আমরা এ নিয়ে কিছু বলছি না৷' বিকাশবাবুর মন্তব্য, 'কে কী বললেন, সেটা আদালতে প্রমাণ হিসাবে গ্রাহ্য হয় না৷ এর পরই বৈদ্যনাথন বলেন, 'রাজনীতিবিদদের মামলায় সিবিআই কী ভূমিকা নিচ্ছে তা সকলে জানেন৷ লালু, মুলায়ম, মায়াবতীর মামলা আমাদের সামনে আছে৷' কিন্ত্ত বিচারপতি ঠাকুরের পর্যবেক্ষণ হল, অভিযাগ দু-তরফেই রয়েছে৷ সিবিআই নিয়ে যেমন আশঙ্কা রয়েছে, তেমনই রাজ্যের তদন্ত নিয়েও রয়েছে৷ বেঞ্চ এ দিন রিজার্ভ ব্যাঙ্ক এবং সেবিকেও ভত্‍র্‌সনা করে বলে, 'এত বড় একটা কেলেঙ্কারি হল, আপনারা কি এতদিন চোখ বুজে ছিলেন? আপনাদের আচরণ সুদীপ্ত সেনের থেকে কম আপত্তিজনক নয়৷' এর আগেই রাজ্য সরকার আদালতে জানিয়েছিল, সেবি, রেজিস্ট্রার অফ কোম্পানিজ ও আরবিআই-এর অফিসাররা সারদার কাছ থেকে মাসে ৭০ লক্ষ করে টাকা নিতেন৷ চার বছর বা তার বেশি সময় ধরে তাঁরা এই টাকা নিয়ে গিয়েছেন৷ বিচারপতিরা জানতে চান, রিজার্ভ ব্যাঙ্ক ও অন্য সংস্থাগুলির কাদের জেরা করা হয়েছে? কেন রিজার্ভ ব্যাঙ্কের এক প্রাক্তন অফিসার ছাড়া অন্যদের জেরা করা হল না?


    রাজ্য সরকারের আর্জি ছিল, এখন নির্বাচন চলছে, এখন যেন এ ব্যাপারে কোনও সিদ্ধান্ত না নেওয়া হয়৷ কিন্ত্ত বিকাশবাবু বলেন,'জনস্বার্থ মামলার সঙ্গে রাজনীতির, ভোটের কী সম্পর্ক? সারদার টিভি চ্যানেলগুলি এখন কারা চালাচ্ছে? কারা টাকা দিচ্ছে?' তিনি বলেন, 'কুণাল ঘোষকে যখন অঢেল টাকা দিতেন সুদীপ্ত, তখন তিনি সাংসদ হননি৷ সেই টাকা রাজনৈতিক উদ্দেশ্যে লাগানো হত৷ তার পুরস্কার হিসাবে কুণাল সাংসদ হতে পেরেছিলেন৷ অন্য একজনও এ ভাবে সাংসদ হয়েছেন৷ রাজ্য সরকার কেন সিবিআইকে ভয় পাচ্ছে?' শুনানি শেষে দুই বিচারপতি বলেন, 'আপনাদের সকলকে ধন্যবাদ৷ ওডিশার মামলা শুনে আমরা রায় দেব৷'



    কলকাতার চিঠি

    সারদা-কাণ্ডে উত্তাল পশ্চিমবঙ্গ

    আবার কুণাল ঘোষ তাঁর ফেসবুকে সারদা-কাণ্ডের কথা জানেন, এমন ১২ জনের নাম উল্লেখ করে যান। এই তালিকায় রয়েছেন স্বয়ং মুখ্যমন্ত্রীও।

    আর এসব ঘটনায় এবার চরম অস্বস্তিতে পড়েছেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। ২০১১ সালে পশ্চিমবঙ্গ বিধানসভা নির্বাচনে জয়ের পর কুণাল ঘোষ হয়ে যান মমতার ছায়াসঙ্গী। যেখানে মমতা, সেখানে কুণাল ঘোষ। আর মমতাও কুণাল ঘোষের ওপর প্রচণ্ড আস্থা রেখে চলছিলেন। এর পুরস্কারও দেন মমতা কুণাল ঘোষকে। ভারতের আইনসভার উচ্চকক্ষ রাজ্যসভার সাংসদ বা এমপি করেন তাঁকে।

    এদিকে কুণাল ঘোষকেও কাছে টেনে নেন সারদা গোষ্ঠীর কর্ণধার সুদীপ্ত সেন। সুদীপ্ত সেনও স্বপ্ন দেখতে শুরু করেন মিডিয়াজগৎকে হাতে নেওয়ার। কিনতে থাকেন এক এক করে বিভিন্ন মিডিয়া। প্রিন্ট থেকে ইলেকট্রনিক মিডিয়া। এমনিভাবে সারদার হাতে চলে আসে ১০টি মিডিয়া। কলকাতা ও আসামে বাংলা, ইংরেজি, হিন্দি ও উর্দু ভাষার ছয়টি দৈনিক এবং তারা, চ্যানেল-১০সহ চারটি টিভি চ্যানেল। আর মিডিয়া সেলের সিইও হয়ে যান তিনি।

    হঠাৎ ওলটপালট হতে থাকে সারদার সাজানো বাগান। সারদার মালিকানাধীন তারা মিউজিক ও তারা নিউজ চ্যানেলের কর্মীদের অনিয়মিত বেতন দেওয়া শুরু হয়। খবরটি চলে আসে অন্য মিডিয়ায়। কর্মীদের বেতন বাকিও পড়ে। আন্দোলনে নামেন তারা টিভির কর্মকর্তা ও কর্মীরা। এরই মধ্যে এ বছরের ১০ এপ্রিল হঠাৎ গা ঢাকা দেন সারদার কর্ণধার সুদীপ্ত সেন। তোলপাড় হতে থাকে কলকাতার রাজনীতিতে। উঠে আসে সারদার সঙ্গে সংশ্লিষ্ট থাকা শাসক দলের বেশ কজন মন্ত্রী, সাংসদ ও বিধায়কের নাম। উত্তপ্ত হয়ে ওঠে পশ্চিমবঙ্গের রাজনীতি।

    সুদীপ্ত সেন কলকাতা থেকে পালিয়ে যাওয়ার সময় একটি চিঠি লিখে যান ভারতের কেন্দ্রীয় গোয়েন্দা সংস্থা সিবিআইকে। ১৮ পাতার ওই চিঠিতেই সুদীপ্ত সেন জানিয়ে যান, কেন তাঁর এত বড় সাম্রাজ্যের পতন হলো। এ জন্য তিনি দায়ী করেছেন শাসক দলের বেশ কজন নেতা, মন্ত্রীসহ ২২ ব্যক্তিকে, যাঁরা তাঁর ওপর চাপ প্রয়োগ করে দিনের পর দিন আর্থিক সুবিধা নিয়েছেন সারদা গোষ্ঠী থেকে।

    এই চিঠিকে সুদীপ্ত সেন এফআইআর হিসেবে গণ্য করে মামলা দায়ের করার জন্য অনুরোধও জানিয়ে যান সিবিআইকে। ইতিমধ্যে অর্থলগ্নিকারীদের সাড়ে ১৮ লাখের বেশি আবেদন পড়ে সরকারের কাছে।

    এদিকে কুণাল ঘোষ গ্রেপ্তার হওয়ার পর সারদা-কাণ্ড সিবিআইকে দিয়ে তদন্তের জোর দাবি ওঠে। বামফ্রন্ট, কংগ্রেস, বিজেপি—সব দলই এক দাবিতে অনড় থাকে। যদিও মুখ্যমন্ত্রী মমতা জানেন, এই কেলেঙ্কারির তদন্তভার যদি সিবিআইয়ের হাতে চলে যায়, তবে আরও বেরিয়ে পড়বে শাসক দলের কেলেঙ্কারির নানা কাহিনি। ফলে তিনি শুরু করেন সিবিআই তদন্তের বিরোধিতা। অন্যদিকে বিরোধীরাও নাছোড়বান্দা। তাঁরাও শুরু করেন রাজ্যব্যাপী সিবিআই তদন্তের দাবিতে আন্দোলন। সেই আন্দোলন এখনো চলছে। দিনে দিনে জোরদার হচ্ছে।

    অমর সাহা: প্রথম আলোর কলকাতা প্রতিনিধি।



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    हरियाणा में हो रहे दलित और स्त्री उत्पीड़न के खि़लाफ़ आवाज़ उठाओ!


    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे!

    इंसाफ़पसन्द नौजवान साथियो!
    अभी इस बात को ज़्यादा समय नहीं हुआ है जब हरियाणा में लगातार एक दर्जन से भी अध्कि बलात्कार और स्त्री उत्पीड़न की घटनाएँ सामने आयी थी। एक बार फिर से मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। 23 मार्च को घटी यह घटना हिसार के भगाना गाँव की है जहाँ सवर्ण जाति के युवकों ने चार दलित लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया। पाँच अभियुक्त गिरफ्ऱतार हो चुके हैं किन्तु पीडि़त, दोषियों को कड़ी सजा दिलाने तथा अपने पुनर्वास व मुआवजे को लेकर अभी तक संघर्षरत हैं। यह वही भगाना गाँव है जिसके करीब 80 दलित परिवार समाज के ठेकेदारों की मनमानी और बहिष्कार के कारण निर्वासन झेल रहे हैं। दलित उत्पीड़न के पूरे सामाजिक और आर्थिक शोषण-उत्पीड़न में मुख्य भूमिका निभाने वाली खाप पंचायत ही है जो सामन्ती अवशेषों और सड़े मुध्ययुगीन रीति-रिवाजों का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही पूँजीवादी चुनावी पार्टियाँ वोटबैंक बटोरने के लिए खाप पंचायत का इस्तेमाल करती है। तभी कोई भी चुनावी पार्टी खाप पंचायतों से बैर नहीं लेती।
    दूसरा दलित उत्पीड़न के मामलों में क़ानून व्यवस्था और पुलिस प्रशासन का रवैया आमतौर पर दोयम दर्जे का ही होता है। उफँची जातियों की खाप पंचायतें और विभिन्न जातीय संगठन दलितों के प्रति लोगों के दिमागों में पैठी भेद-भावपूर्ण सोच को मजबूत करने का ही काम करते हैं, बदले में तमाम दलितवादी संगठन भी अपने चुनावी और संकीर्ण हितों के लिए मुद्दा ढूंढ लेते हैं। दोस्तो! आज यह वक्त की ज़रूरत है कि हम तमाम जातीय भेदों से उफपर उठें क्योंकि तभी हम शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार आदि जैसी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए लड़ सकते हैं और संगठित होकर ही उन्हें हासिल कर सकते हैं। तमाम चुनावी पार्टियों और जातीय संगठनों के झांसे में आये बिना मेहनतकश आवाम को वर्गीय आधार पर एकजुट होना होगा। समाज से भेद-भाव और जातीय उत्पीड़न के कूड़े को साफ़ कर देना होगा तथा जहाँ कहीं भी इस प्रकार की घटनाएँ नज़र आयें सभी न्यायप्रिय इंसानों को इनका पुरजोर विरोध करना चाहिए।
    अब आते हैं स्त्री उत्पीड़न पर। भगाना गाँव की सामूहिक बलात्कार की यह हृदय विदारक घटना पहली घटना नहीं है बल्कि स्त्री विरोधी ऐसी घटनाएँ आए दिन हमारे समाज में घटती रहती हैं। विरोध में देश का संवेदनशील तबका उतर भी जाता है, टीवी-अखबारों में कुछ सुर्खियाँ भी बन जाती हैं किन्तु नासूर की तरह स्त्री उत्पीड़न का रोग हमारे समाज का पीछा छोड़ता नजर नहीं आता। बल्कि इस नासूर की पीव और गन्दगी हर दिन हमारे सामने रिस-रिस कर आती रहती है। अभी तरुण तेजपाल जैसे प्रतिष्ठित पत्रकार के मामले को ज्यादा समय नहीं हुआ है, और पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश पर भी यौन उत्पीड़न का आरोप लगा था। हमें यह सोचना होगा कि ये स्त्री विरोधी घटनाएँ तमाम विरोध के बावजूद रुकने की बजाय क्यों लगातार बढ़ रही हैं? क्या 16 दिसम्बर की घटना का विरोध कम हुआ था? क्या ये महज एक क़ानूनी मुद्दा है जो कड़ी दण्ड व्यवस्था और जस्टिस वर्मा जैसी कमेटी से हल हो जायेगा? जिस देश में थानों में बलात्कार की घटनाएँ हो जाती हों वहाँ क्या पुलिस के भरोसे सब-कुछ छोड़ा जा सकता है? क्या हमें संसद में बैठे अपने तथाकथित जनप्रतिनिधियों पर भरोसा करना चाहिए जिनमें से बहुतों पर पहले ही बलात्कार और संगीन अपराधिक मामले दर्ज हैं? हमें इस सवाल की पूरी पड़ताल करनी होगी। सरकार, विपक्ष, खाप पंचायतों के अलावा मीडिया भी इन घटनाओं की भट्ठी पर अपनी रोटी सेंकने का ही काम करता है। इन दर्दनाक घटनाओं को मीडिया सनसनीखेज़ तौर पर मसाला लगाकर पेश करता है। नतीजतन, टेलीविज़न देखने वाली आबादी के भीतर ऐसी घटनाएँ नफरत नहीं पैदा करती। ऐसी घटनाएँ भी सनसनीखेज मनोरंजन का मसाला बना दी जाती हैं। और देश के काॅरपोरेट बाज़ारू मीडिया से और कोई उम्मीद की भी नहीं जा सकती, जिसके लिए इंसान की तकलीफ, दुख-दर्द भी बेचा-ख़रीदा जाने वाला माल है।
    आज एक तरफ़ जहाँ स्त्री उत्पीड़न के दोषियों का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए व उन्हें सख़्त सजाएँ दिलाने के लिए एकजुट आवाज़ उठानी चाहिए वहीं स्त्री उत्पीड़न की जड़ों तक भी जाया जाना चाहिए। इन घटनाओं का मूल कारण मौजूदा पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक ढांचे में नजर आता है। पूँजीवाद ने स्त्री को एक माल यानी उपभोग की एक वस्तु में तब्दील कर दिया है जिसे कोई भी नोच-खसोट सकता है। मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था ने समाज में अपूर्व सांस्कृतिक-नैतिक पतनशीलता को जन्म दिया है और हर जगह इसी पतनशीलता का आलम है। समाज के पोर-पोर में पैठी पितृसत्ता ने स्त्री उत्पीड़न की मानसिकता को और भी खाद-पानी देने का काम किया है। आम तौर पर मानसिक रूप से बीमार लोगों को ग़रीब घरों की महिलाएँ आसान शिकार के तौर पर नज़र आती हैं। खासकर 90 के दशक में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियाँ लागू होने के बाद एक ऐसा नवधनाड्य वर्ग अस्तित्व में आया है जो सिर्फ'खाओ-पीओ और मौज करो'की पूँजीवादी संस्कृति में लिप्त है। इसे लगता है कि यह पैसे के दम पर कुछ भी ख़रीद सकता है। पुलिस और प्रशासन को तो यह अपनी जेब में ही रखता है। यही कारण है कि 1990 के बाद स्त्री उत्पीड़न की घटनाओं में गुणात्मक तेजी आयी है। यह मुनाफ़ाकेन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था सिर्फ सांस्कृतिक और नैतिक पतनशीलता को ही जन्म दे सकती है जिसके कारण रुग्ण और बीमार मानसिकता के लोग पैदा होते हैं।
    जाहिरा तौर लूट, अन्याय और गैर-बराबरी पर टिकी व्यवस्था में कोई कानून या सुधार करेगें ऐसी घटनओं का कोई स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता है क्योंकि अमीर-गरीब में बंटे समाज में हमेशा न्याय-कानून अमीर वर्ग की बपौती रहती हैं। इसलिए हमें समझना होगा कि हमारी असली दुश्मन मनावद्रोही पूँजीवादी व्यवस्था है। जिसको ध्वंस किये बिना मज़दूर,गरीब किसान, दलितों, स्त्रियों की मुक्ति सम्भव नहीं है जैसे शहीदेआज़म भगतसिंह ने कहा था ''लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकश व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाह वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग,नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंज़ीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।''
    हम देश के उन बहादुर, इंसाफ़पसन्द युवाओं और नागरिकों से मुख़ातिब हैं जो कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में रीढ़विहीन केंचुए नहीं बने हैं, जिन्होंने अपने ज़मीर का सौदा नहीं किया हैऋ जो न्याय के पक्ष में खड़े होने का माद्दा रखते हैं। साथियो! हमें उठना ही होगा और तमाम तरह के दलित और स्त्री उत्पीड़न का पुरजोर विरोध करना होगा। सड़ी और मध्युगीन सोच को उसकी सही जगह इतिहास के कूड़ेदान में पहुँचा देना होगा।
    क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ-

    भगतसिंह को याद करेगें! जुल्म नहीं बर्दाश्त करेगें!!

    नौजवान भारत सभा  दिशा छात्र संगठन

    सम्पर्क- योगेश-9289498250 सनी-9873358124 नवीन-8750045975
    नौजवान भारत सभा की ओर से योगेश द्वारा जनहित में जारी। 21 अप्रैल,2014


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    [LARGE][LINK=/article-comment/19262-2014-04-26-06-54-24.html]मजीठिया पाने की जंग लंबी है, लेकिन लड़ना हमें ही होगा, आइए जानें कैसे लड़ें[/LINK][/LARGE]

    [*][LINK=/article-comment/19262-2014-04-26-06-54-24.html?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/gk_twn2/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK][/*]
    [*][LINK=/component/mailto/?tmpl=component&template=gk_twn2&link=4c6f8b728c9f0b7586b0a6fcae8337b49f746676][IMG]/templates/gk_twn2/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK][/*]
    DetailsCategory: [LINK=/article-comment.html]सुख-दुख...[/LINK]Created on Saturday, 26 April 2014 12:24Written by B4M
    मित्रों, मैं भी आपकी ही तरह एक पत्रकार हूं, जो देश के एक तथाकथित प्रतिष्ठित समाचार पत्र के लिए काम कर रहा है। आज किसी भी समाचार पत्र के दफ्तर जाएं, सभी साथी एक कॉमन विषय पर चर्चा करते मिलेंगे। कहीं खुलेआम, तो कहीं दबे स्वर में। वह विषय है, क्या मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों का हमें लाभ मिलेगा? अगर मिलेगा तो कब मिलेगा? कैसे मिलेगा? कितना मिलेग? अगर, नहीं मिलेगा तो क्यों नहीं मिलेगा? क्या चारा है अखबार मालिकों के पास? ऐसा कैसे हो सकता है कि ना मिले? आप ट्रेनी हों या संपादक? दिल पर हाथ रख कर पूछिये कि क्या इन विषयों पर अपने साथियों से चर्चा नहीं हो रही इन दिनों?

    लेकिन, साथ ही एक और कॉमन सी बात उभर कर सामने आ रही है कि हमारे यहां मजीठिया लागू नहीं हो रहा है। कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया है हमारे मालिकों ने। हमारे वरिष्ठ जो कभी हमारे ही तरह मुफलिसी भरी जिंदगी से गुजरे हैं आज मालिकों के हाथ में कुछ हजार की अतिरिक्त पगार के लिए खिलौने की तरह खिलाये जा रहे हैं। निराशा होती है। मन में असंतोष जागता है। गुस्सा आता है। हम आखिर में मन को समझाते हैं कि हम कर भी क्या सकते हैं। रोजी-रोटी का सवाल है। लोन की इन्स्टॉलमेंट का सवाल है। बच्चों की स्कूल फीस का सवाल है। मकान के किराये का सवाल है। घर में अनाज जुटाने का सवाल है। केबल वाले को मासिक बकाया देने का सवाल है। दवा-दारु पे खर्च का सवाल है। मोबाइल खर्च। इंटरनेट खर्च। सप्ताहांत होने वाले खर्च। बिजली बिल। फलाना बिल। ढिमकाना बिल। इन सब के बारे में सोच कर हम चुप हो जाने का फैसला करते हैं। मन को समझाते हैं कि किसी भी तरह गुजारा तो हो रहा है। जिंदगी कट तो रही है। आपका ऐसा सोचना गलत नहीं है। हम सभी के साथ ऐसा हो रहा है और अगर कोई कहे कि उसे नौकरी गंवाने का डर नहीं तो वह गलत कह रहा है।

    तो क्या हमारे पास कोई रास्ता नहीं है? क्या हम सरकार के फैसले और इस धरती पर मौजूद सबसे बड़े न्यायालय के निर्देश को न मानने वाले मुनाफाखोर मालिकों और उसके टट्टू संपादकों की मनमानी मानने को मजबूर हैं? नहीं। ऐसा नहीं है। अपने अधिकार को हासिल करने की हमारी लड़ाई लंबी और मुश्किल जरूर है लेकिन इसे लड़ना हमें ही है। कोई और आकर हमें हमारे हक दिला दे ऐसा नहीं होने वाला। अब बड़ा सवाल उठता है कि हम अपनी नौकरी बचाए रखते हुए इस कठिन लड़ाई को कैसे लड़ें। मेरे विचार से इसके लिए हमारे पास रास्ते हैं। मैं यह गारंटी नहीं ले सकता है कि ये सफल होंगे लेकिन हमें इन्हें आजमाना होगा। मैं एक-एक कर सभी विकल्पों को रख रहा हूं। आप सब इन पर विचार करें। फिर हम मिलजुल कर नई रणनीति तैयार करेंगे।

    1)   सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नाम पत्र

    जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मजीठिया मामले पर सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने फैसला दिया है उसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश ने की है। वह कुछ दिनों में रिटायर होने वाले हैं। लेकिन, हमें इससे हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। व्यक्ति रिटायर हो रहा है, पद नहीं। हम सब ज्ञात-अज्ञात (अपनी इच्छानुसार) रहते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखें। इसमें हम अपनी पुरानी सैलरी स्लिप और अप्रैल महीने की सैलरी स्लिप लगा कर भेंजें और बतायें कि हमें मजीठिया नहीं दिया गया। अगर सैलरी स्लिप देना बंद कर दिया जाता है तो पहले के महीनों के और नये महीने का बैंक स्टेटमेंट पत्र के साथ भेजें। अगर हजारों पत्रकार-गैर पत्रकार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखते हैं तो इसका असर जरूर होगा।

    2)  लेबर कोर्ट में गुमनाम रहते हुए अपने नियोक्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था है। इस पर विचार करें।

    3)  किसी भी तरह की शिकायत, चाहे वह मुख्य न्यायाधीश को पत्र के माध्यम से की जा रही हो या लेबर कोर्ट में गुमनाम रहते की जा रही हो उसमें अपने संपादक को भी आरोपी बनाएं। चंद हजार रुपये अतिरिक्त लेकर अपने जमीर को बेचने वाले ये संपादक हमारी राह में मालिकों से भी बड़ा रोड़ा हैं। इन्हें हर हाल में सबक सिखाया जाना जरूरी है। अगर मालिकों को जेल भेजना है तो साथ में उन्हें पंखा झेलने के लिए इन चमचे संपादकों को भी जेल भेजना होगा। जैसे राजस्थान पत्रिका जयपुर हो तो आशुतोष, भुवनेश जैन, भास्कर का नेशनल आइडिएशन न्यूज रूम हो तो कल्पेश याग्निक, हिंदुस्तान दिल्ली हो तो शशि शेखर, अमर उजाला मेरठ हो तो राजीव सिंह, प्रभात खबर हो तो हरिवंश, अनुज सिन्हा जैसे संपादकों के खिलाफ भी शिकायत की जानी चाहिए. दुनिया भर के सामने महान बनने वाले ये संपादक कितने दोयम दर्जे के इंसान हैं यह दुनिया के सामने आना चाहिए।

    4)  फ्लेक्स पर विज्ञापन – किसी शहर में बड़े फ्लेक्स पर कुछ दिन विज्ञापन देने का खर्च कुछ हजार रुपये आता है। हर शहर के पत्रकार चंदा जमा कर ऐसा कर सकते हैं। उस विज्ञापन पर लिखा हो कि जो अखबार अपने कर्मचारियों के हितों का ध्यान नहीं रखता क्या वह पाठकों के हितों का ध्यान रखेगा। उसमें वजाप्ता अखबार के नाम दिये जायें। जब तक ये फ्लेक्स हटाये जायेंगे तब तक हजारों लोग इससे वाकिफ हो चुके होंगे। ऐसा पंपलेट छपवाकर भी किया जा सकता है। और इन पंपलेटों को अखबार के माध्यम से ही लोगों तक पहुंचाया भी जा सकता है। इन पंपलेटों पर पाठकों से अपील की जा सकती है कि वह अपने अखबार से पूछें कि क्या वह अपने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत अपने पत्रकारों के हितों का ध्यान रख रख रहा हैं?

    5)  गूगल एडवडर्स के माध्यम से वेबसाइटों पर यह विज्ञापन डाला जा सकता है कि कैसे देश के अखबार अपने कर्मचारियों का शोषण कर रहे हैं।

    6)  पत्रकार समाज में मौखिक रूप से इन बातों का प्रचार-प्रसार कर सकते हैं और अपने मालिकों व संपादकों की वास्तविक छवि (जो कि वाकई घिनौनी है) को समाज के सामने रख सकते हैं।

    मित्रों ये चंद उपाय मेरे जेहन में सरसरी तौर पर आये हैं। आप भी इन पर विचार करें और जनसत्ता, भड़ास और फेसबुक के माध्यम से कोई एक राय बनाकर आगे की रणनीति तय करें। इन बेहद बुद्धिमान बन रहे मालिकों को बुद्धिमानी के साथ ही मात दिया जा सकता है और इसके लिए अपनी पहचान जाहिर करना भी जरूरी नहीं है। इनके बीच रहकर इनके अभिमान और घमंड के सर को कलम करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। हम ऐसा अपनी नौकरी को बचाये रख कर भी कर सकते हैं। हमें इस तरह काम करना होगा कि हमारे बगल की कुर्सी पर बैठा साथी भी न जान पाये कि हम भी इस अभियान में शामिल हैं। भले ही वह भी इसमें शामिल क्यों न हो। आइए अलग-अलग रहते हुए भी इस कॉमन काउज (साझा लक्ष्य) के लिए गुमनाम रहते हुए एकजुट हुआ जाये और मालिकों की ईंट से ईंट बजा दी जाये।

    आपका ही एक साथी

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    [LARGE][LINK=/vividh/19250-dalit-vote-and-modi.html]इतनी आसान नहीं दलित वोटों में सेंधमारी[/LINK][/LARGE]

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    [*][LINK=/component/mailto/?tmpl=component&template=gk_twn2&link=4ff866dbf54a520cd378c65cffa75c5654e9765c][IMG]/templates/gk_twn2/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK][/*]
    DetailsCategory: [LINK=/vividh.html]विविध[/LINK]Created on Saturday, 26 April 2014 01:40Written by अनिता सिंह
    [B]नरेन्द्र मोदी के अम्बेडकर प्रेम के निहितार्थ[/B]

    [B]अखिल[/B] हिन्दूवादी मजबूत राष्ट्र के निर्माण का सपना दिखाकर भारतीय जनता पार्टी सदैव बहुसंख्यक हिन्दूओं के भावात्मक मुद्दों की राजनीति करती रही है। लेकिन इस राजनैतिक एजेंडे के बल पर लगभग 27 दलों के गठबंधन के सहारे पहले 13 दिनों और बाद में 13 महिनों के लिए अपना राज्याभिषेक करवाकर वह पिछले दस सालों से केन्द्र की सत्ता से वनवास भोग रही है। कुर्सी से दूरी की पीड़ाएँ एवं सत्ता पाने की भाजपा की छटपटाहट अब पूरी शिद्दत से सामने आ रही है। इसी के चलते नेतृत्व के स्तर पर इस बार उसने सवर्ण हिन्दू कैंडिडेट के स्थान पर अन्य पिछड़ा वर्ग से सम्बद्ध नरेन्द्र मोदी को आगे किया है। जाति के आधार पर अन्य पिछड़ा लेकिन वफादारी के स्तर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संध का कट्टर हिन्दूवादी सच्चा सिपाही।


    [B]सत्ता[/B] प्राप्ति के लिए ब्राह्मणवादी संघ और भाजपा ने अपनी आंतरिक कलह के बावजूद भी अपनी नजरों से सही हीरे की खोज कर ली है। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के तुरन्त बाद ही इस नायाब हीरे ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। जनता को भावनात्मक मुद्दो के आधार पर उकसाकर, अवसर के अनुकूल उनके प्रतीकों का राजनैतिक इस्तेमाल मोदी की जानी-पहचानी प्रविधि है। इसकी शुरूआत मोदी ने सरदार पटेल की सबसे बड़ी लौह-प्रतिमा बनवाने की घोषणा के साथ की।

    [B]गौरतलब[/B] है कि कॉरपोरेट घरानों द्वारा संरक्षित एवं पोषित श्री नरेन्द्र मोदी चाहते तो इस प्रतिमा का निर्माण सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातु से भी करवा सकते थे। या मूर्ति-निर्माण में अधिकांशतः प्रयुक्त कांस्य धातु का भी प्रयोग किया जा सकता था। लेकिन ऐसा करके वह राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जाना सम्भव नहीं था जो संघ और भाजपा अपने विश्वस्त सिपाही मोदी से चाहते थे। मोदी ने इस भव्य प्रतिमा के निर्माण के लिए उन तमाम मेहनतकश हाथों में चलने वाले औजारों का एक घिसा हुआ लौह का टुकड़ा दान देने की अपील की ताकि एकीकृत भारत के निर्माता लौह पुरूष सरदार पटेल की सर्वाधिक ऊँची लौह-प्रतिमा बन सके। प्रतिमा निर्माण के लिए मेहनतकश हाथों के लौह का एक टुकड़ा वस्तुतः मेहनतकश ओ.बी.सी. वर्ग का एक वोट था जिसके आधार पर भाजपा सत्ता पर काबिज होना चाहती थी। खैर प्रतिमा निर्माण की मोदी की यह महत्वाकांक्षी परियोजना अभी शुरू नहीं हो पाई है इसलिए ओ.बी.सी. वोट-बैंक भी उनके खाते में आ गया होगा उसे भाजपा का अधूरा व असंगत सपना ही समझा जाना चाहिए।

    [B]भावनात्मक [/B]मुद्दों की राजनीति करने वाली कोई भी पार्टी या व्यक्ति अपना प्रायोजित ईमानदार एवं नैतिकतावादी ऐजेंडा ही सामने लाती है जिसमें खुद के अलावा तमाम दूसरे लोगों के पापी होने का अभियोजन पत्र भी शामिल रहता है। 14 अप्रैल को बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की 123वीं जयन्ती पर नरेन्द्र मोदी ने ऐसा ही फरमाया। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर को उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का प्रतीक पुरूष बताते हुए कहा कि "कांग्रेस विगत 60 वर्षों से बाबा साहब का अपमान करती आ रही है। कांग्रेस ने हमें कोई कानून नहीं दिया है। सारे कानून हमारे संविधान निर्माता बाबा साहब की देन है। यदि एक चाय बेचने वाला आज प्रधानमंत्री बनता है तो यह बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की देन है। ऐसे महान व्यक्ति को कांग्रेस ने भारत रत्न नहीं दिया। उनको भारत रत्न उनकी पार्टी की सरकार ने दिया है।''

    [B]श्री नरेन्द्र मोदी[/B] की इस बात से कोई प्रतिबद्ध दलित-चिंतक भी असहमत नहीं हो सकता कि दलितों और पिछड़ों को मानवोचित जरूरी कानूनी अधिकार दिलाने का श्रेय केवल और केवल बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर और उनके संघर्ष को है। लेकिन सवाल उठता है कि बाबा साहब का संघर्ष किसके विरोध में था? आज दलित और पिछड़ा समाज किस व्यवस्था या विचारधारा के कारण शोषित, पीड़ित एवं अपमानित है? जाहिर है कि दलितों व पिछड़ों के शोषण और अपमान के लिए हिन्दूवादी वर्ण व्यवस्था जिम्मेदार है और बाबा साहब का समूचा संघर्ष इसी व्यवस्था व विचार के विरोध में खड़ा है। वर्तमान भारत की दलित राजनीति में इस हिन्दूवादी वर्णव्यवस्था की घोषित नुमाइंदगी विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित भाजपा करती है। जिसके प्रतिनिधि चेहरे नरेन्द्र मोदी है। तब नरेन्द्र मोदी किस मुँह बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की प्रशंसा कर दलित वोट-बैंक को पाने की अपेक्षा रखते है? बाबा साहब अम्बेडकर का संसद एवं सार्वजनिक राजनीति में घोर विरोध करने वाले नरेन्द्र मोदी के आदरणीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी किस दल के सदस्य थें? दलितों और पिछड़ों को जरूरी मानवाधिकार एवं प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करने वाले मण्डल आयोग के खिलाफ कमण्डल की राजनीति करके दंगे फैलाने वाले लोग किस दल या विचारधारा के सदस्य थे? क्यों भाजपा के घोषण पत्र में मजबूत हिन्दूवादी राष्ट्र का नाम देखकर ही दलित समुदाय की रूह काँप जाती है?

    [B]14 अप्रैल[/B] को ही मोदी की सजातीय विचाराधारा के अरविन्द केजरीवाल को भी बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की याद आ गई। उन्होंने भी 65 वर्ष बाद अम्बेडकर के संविधान के फॉलो न होने की स्थिति पर अपना अफसोस जाहिर किया। उनसे भी पूछे जाने ही जरूरत है कि जब दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर उनका जरूरी प्रतिनिधित्व एवं न्यूनतम जीवन स्तर को सुनिश्चित करने के प्रयास हो रहे थे तब आप 'आर्ट ऑफ लिविंग'के संस्थापक श्री रविशंकर के साथ 'यूथ फॉर इक्वलिटी'की मुहिम चलाकर क्या अम्बेडकरवाद को ही मजबूत कर रहे थे? आम-आदमी के नाम पर राजनीति करने वालों के यहाँ आम-आदमी कौन है और किसी दलित, पिछड़े या स्त्री को उनकी पार्टी में क्या स्पेस है इस पर अधिक कहने की जरूरत नहीं है।

    [B]नरेन्द्र मोदी[/B] जहाँ अपने भाषणों में लच्छेदार और अलोकतांत्रिक भाषा प्रयोग के लिए कुख्यात हैं उतने ही ऐतिहासिक तथ्यों के विकृतिकरण और उनकी असंगत प्रस्तुती के लिए भी। मुझे लगता है कि भाषा-प्रयोग कि दृष्टि से यह चुनाव आज तक का सर्वाधिक भ्रष्ट और लिजलिजा चुनाव है। स्थान और अवसर विशेष की जरूरतों के अनुसार नरेन्द्र मोदी अपनी लच्छेदार भाषा में अपने परिष्कृत इतिहास ज्ञान का परिचय भी देते रहते है। कभी वे तक्षशिला को बिहार में बताते है तो कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 1930 में लंदन में मरा हुआ बताते है। कभी चन्द्रगुप्त मौर्य को गुप्त वंश का मशहूर शासक बताते हैं तो कभी सिकन्दर को गंगा नदी के किनारे से भगा दिया गया बताते है और भगत सिंह को अण्डमान जेल में फाँसी दिया गया कहते है। ऐसी ही गलती उन्होंने 14 अप्रैल को भी कर दी। उन्होंने खुद की पार्टी की सरकार द्वारा अम्बेडकर को 'भारत रत्न'देने की बात कह दी। इतना सच अवश्य है कि वी.पी. सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन था। लेकिन अम्बेडकर को भारत-रत्न देने वाली वहीं वी.पी. सिंह सरकार जब दलितों को मजबूत कर रही थी तो कमण्डल और रथयात्रा के साथ वी.पी. सिंह की सरकार गिराने वाले भी तो मोदी ही की पार्टी के थे।

    [B]प्रसंगवश[/B] एन.डी.टी.वी. के कार्यक्रम 'प्राइम टाईम'में उत्तर-प्रदेश की बसपा रैली का रविश का एक कवरेज मुझे याद आ रहा है। जिसमें दलित महिलायें दिन में कठोर मजदूरी करने के बाद शाम को रैली में शामिल होते हुए अपने घरों से थैले में खाना लाना नहीं भूलती है। वे जानती हैं कि जिस पार्टी की रैली में वे शामिल होने जा रही है उसे कॉरपोरेट घरानों का समर्थन हासिल नहीं है। जिसकी बदौलत रैलियों में बिसलेरी का पानी व पाँच सितारा होटलों का खाना उपलब्ध होता है। रविश द्वारा मोदी की लहर के बारे में पूछे जाने पर वे स्पष्ट जबाव देती है कि 'उनका व उनके वर्ग का कल्याण केवल बहन जी से ही सम्भव है।'आज के दिन दलित वोटर इतना सजग है कि वह अपना हित और राजनीतिक ताकत समझता है। केवल अम्बेडकर जयन्ती पर बाबा साहब का नाम ले लेने वालों के साथ वह नहीं जाने वाला है। यह बात नरेन्द्र मोदी व केजरीवाल को समझ लेनी चाहिए। उदित राज और रामविलास पासवान के साथ आ जाने से यह समझने की भूल मोदी को नहीं करनी चाहिए कि उन्होंने दलित वोटर को भी साथ लिया है। उदित राज और पासवान रास्ता भूले हुए लोग है जिनकी शीघ्र घर-वापसी की प्रतिक्षा आज भी उनके दलित बन्धुओं को है।

    [B]अनिता सिंह
    मो- 8447787065
    ई-मेलः [LINK=-singhdharmveeranita1981@gmail.com]-singhdharmveeranita1981@gmail.com[/LINK][/B]

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    हमलावर चढ़े चले आ रहे हैं हर कोने से तो पहचान की राजनीति को प्रतिरोध की राजनीति में बदल दिया जाये

    हमलावर चढ़े चले आ रहे हैं हर कोने से तो पहचान की राजनीति को प्रतिरोध की राजनीति में बदल दिया जाये


    HASTAKSHEP

    पलाश विश्वास

    शुक्र है कि कैंसर ने वीरेनदा को कविता से बेदखल कर पाने में कोई कामयाबी हासिल नहीं की है। इसीलिये राष्ट्रव्यवस्था के नस नस में वायरल की तरह दाखिल होते कैंसर के विरुद्ध वे हमें आगाह करते हैं-

    हमलावर चढ़े चले आ रहे हैं हर कोने से

    पंजर दबता जाता है उनके बोझे से

    मन आशंकित होता है तुम्हारे भविष्य के लिये

    ओ मेरी मातृभूमि ओ मेरी प्रिया

    कभी बतला भी न पाया कि कितना प्यार करता हूँ तुमसे मैं .

    समकालीन तीसरी दुनिया के ताजा अंक में वीरेनदा की कविताएं छपी हैं जो पहले कबाड़खाना में प्रकाशित हुयी हैं।

    कबाड़खाना में प्रकाशित वीरेनदा की इन पंक्तियों में बखूब साफ जाहिर है कि जो सत्ता संरचना हमने तैयार की है, आज फासीवादी महाविनाश का मूसल उसी के ही गर्भ में पला बढ़ा है और वही है आज का कल्कि अवतार। वीरेनदा ने लिखा है।

    वह धुंधला सा महागुंबद सुदूर राष्ट्रपति भवन का

    जिसके ऊपर एक रंगविहीन ध्वज

    की फड़फड़ाहट

    फिर राजतंत्र के वो ढले हुये कंधे

    नॉर्थ और साउथ ब्लॉक्स

    वसंत में ताज़ी हुयी रिज के जंगल की पट्टी

    जिसके करील और बबूल के बीच

    जाने किस अक्लमंद – दूरदर्शी माली ने

    कब रोपी होंगी

    वे गुलाबी बोगनविलिया की कलमें

    जो अब झूमते झाड़ हैं

    और फिर उनके इस पार

    गुरुद्वारा बंगला साहिब का चमचमाता स्वर्णशिखर

    भारतीय व्यवस्था में लगातार बढ़ती धर्म की अहमियत से

    आगाह करता.

    तीसरी दुनिया के ताजा अंक में सत्ता बिसात की परतें जो आनंदस्वरूप वर्मा ने खोली है, उसे सर्वजनसमक्षे जारी किया जा सका है। लेकिन इसी अंक में एक बेहद महत्वपूर्ण आलेख छपा है, वह है, पहचान की राजनीति और प्रतिरोध की राजनीति।

    दरअसल इस छापेमार समय में जब वीरेनदा के शब्दों में हमलावर बढ़े चले आ रहे हर कोने से, हमारे बच निकलने की राह एक ही है और वह यह है कि कुछ भी करें, इस पहचान की राजनीति को प्रतिरोध की राजनीति में बदल दिया जाये।

    मुश्किल यह है कि पहचान मिटाये बिना प्रतिरोध के लिये न्यूनतम गोलबंदी भी असम्भव है।

    मुश्किल यह है कि राजकरण पर अब भी पहचान का झंडा ही बुलंद है। उसे वहाँ से उतारकर प्रतिरोध का उद्घोष भी फिलहाल असम्भव है।

    मसलन अच्छे समय का वायदा करने वाले मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस यानि न्यूनतम सरकार अधिकतम राजकाज का नारा लगाने वाले गुजरात मॉडल के संघ परिवारी बिजनेस आइकन नरेंद्र मोदी अपना असली एजेंडा बार बार जगजाहिर करते हुये धर्मोन्मादी जो सुनामी पैदा करने में रोज अडानी उड़नखटोले में देश भर में छापामार भगवा युद्ध में विकासोन्मुख तोपदांजी करके अमदावाद में नींद पूरी करने वाले नमो कल्कि अवतार के उदात्त हिन्दुत्व का रसायन को समझना बेहद जरूरी है, जिसकी परत दर परत जातिव्यवस्था और नस्ली भेदभाव, सुतीव्र घृणा कारोबार, सर्जिकल माइंड कंट्रोल, जायनवादी विध्वंस, संस्थागत महाविनाश, अंबेडकरी आंदोलन के अपहरण बजरिये वर्णवर्चस्वी उत्तर आधुनिक मनु व्यवस्था के साथ चिरस्थाई औपनिवेशिक भूमि सत्ता बंदोबस्त का तेजाबी रसायन है। जाहिर है कि उनके वक्तव्य के हर पायदान में वैदीकी हिंसा राजसूय आयोजन है।

    मसलन घंटों चले भव्य रोड शो के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को वाराणसी लोकसभा सीट से नामांकन पत्र दाखिल किया। उन्होंने बनारस के ब्राण्ड को पूरे विश्व में पहुँचाने का वादा किया। नामांकन के बाद मोदी ने कहा-पहले मैं सोचता था कि भाजपा ने मुझे यहाँ भेजा है। कभी मुझे महसूस होता था कि मैं काशी जा रहा हूँ। लेकिन यहाँ आने के बाद मैं महसूस कर रहा हूँ कि मुझे किसी ने नहीं भेजा और न ही मैं खुद यहाँ आया हूँ। माँ गंगा ने मुझे यहाँ बुलाया है। मैं ऐसा ही महसूस कर रहा हूँ जैसे एक बच्चा अपनी माँ की गोद में आने पर महसूस करता है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर मुझे इस नगर की सेवा करने की शक्ति दे।

    भाजपा को सिरे से संस्थागत संघ शुंग परिवार के फासीवादी वर्णवर्चस्व के लिये गंगा गर्भ में जलांजलि देने का यह राजकीय उद्घोष है। धर्मनिरपेक्ष खेमे के बजाय, अब तक भाजपा के झंडे पर मर मिटने वाले लोगों को उनके इस वक्तव्य का ज्यादा नोट लेना चाहिए।

    अब एक किस्सा इसी संदर्भ में बताना प्रासंगिक होगा। भोपाल से 20 अप्रैल की सुबह हम दिल्ली से चेन्नै जाने वाली जीटी एक्सप्रेस में सवार हुये। तो उसमें उत्तर प्रदेश के ढेरों मुसलमान नौजवान थे। मुरादाबाद रामपुर के लोग और बिजनौर के भी। जिन दूर दराज के गांवों से वे लोग हैं, वहाँ बचपन से हमारी आवाजाही है। बिजनौर में तो सविता का मायका भी है। हमारे साथ नागपुर के लोग भी थे। कुल बीस पच्चीस लोगों की टोली होगी। हम लोग यूपी में मोदी सुनामी की हकीकत जानना चाहते थे। उन बंदों ने सीधे ऐलान कर दिया कि यूपी में पचास सीटें जीते बिना मोदी का भारत भाग्यविधाता बनना असम्भव है।

    बता दें कि हम लोग भोपाल से रवाना होने के तुरंत बाद आजादी के बाद हुये तमाम राजनीतिक परिदृश्य की सिलसिलेवार चर्चा में लगे थे और नेहरु और इंदिरा के मुकाबले अटल से लेकर, सिंडिकेट समाजवादी मॉडल से लेकर समय समय पर हुये राजनयिक आर्थिक निर्णयों के दूरगामी परिणामों का विश्लेषण भी कर रहे थे। बातचीत संघ परिवार या भाजपा के विरुद्ध न होकर पूरे भारतीय स्वतंत्रोत्तर राजकाज और आर्थिक विकास विनाश पर केंद्रित थी। उन बंदों ने साफ साफ दो टूक शब्दों में कहा कि कोई मोदी सुनामी कहीं नहीं है। मीडिया सुनामी है। माडिया के बखेड़ा है। जमीन पर यूपी में भाजपा को पंद्रह सीटें भी मिलने के आसार नहीं है।

    जनसत्ता में अंशुमान शुक्ल की रपट से इस आरोप की पुष्टि भी हो गयी। देखेंः

    खबरिया चैनलों ने सोलहवीं लोकसभा चुनाव के सातवें चरण में देश की 117 लोकसभा सीटों पर हो रहे मतदान के दौरान भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का जिस तरह प्रचार कियावह हैरतअंगेज है। मोदी की शान में कसीदे पढ़ने की संवाददाताओं और टेलीविजन एंकरों में होड़ मची रही। चैनलों के पत्रकारों ने ढूँढ-ढूँढ कर शब्दों का मायाजाल बिछायाअपनी सभी जिम्मेदारियों को दरकिनार कर। देश के किसी भी समाचार चैनल को इस बात की याद तक नहीं रही कि सातवें चरण में देश की 117 और उत्तर प्रदेश की 12 लोकसभा सीटों पर मतदान हो रहा है। जहाँ के मतदाताओं पर नरेंद्र मोदी के इस रोड शो का असर भी हो सकता है।

    उत्तर प्रदेश के एक करोड़ 98 लाख मतदाता आज एक दर्जन सांसदों का चुनाव करने घरों से निकलेलेकिन सुबह से ही सभी टेलीविजन चैनलों पर सिर्फ एक ही समाचार प्रमुखता से प्रसारित किया जाता रहा और वह था वाराणसी में नरेंद्र मोदी का नामांकनलाइव। विरोधी दलों के वरिष्ठ नेता भी दम साधे खामोशी से पूरा तमाशा देखते रहे। चैनलों के संवाददाताओं ने बार-बार यह बताने की कोशिश की कि वाराणसी में नरेंद्र मोदी के रोड शो के दरम्यान जो भीड़ एकत्र हुयीवह वाराणसी के अपने लोग थे। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं थी। पूर्वांचल की 20 लोकसभा सीटों में से कम से कम दस के प्रत्याशी एक दिन पूर्व से अपने समर्थकों के साथ वाराणसी आ धमके थे। इनकी संख्या हजारों में थी।

    उन बंदों ने साफ साफ दो टूक शब्दों में कहा कि यूपी बाकी देश से अलग है क्योंकि यहाँ राजनीतिक समीकरण चुनाव प्रचार से मीडिया तूफान से बदलने वाले नहीं हैं। जिसे जहाँ वोट करना है, किसे जिताना है और किसे हराना है, उसकी मुकम्मल रणनीति होती है। बाकी देश की तरह हवा में बहकर यूपी वाले वोट नहीं डालते।

    उन बंदों ने साफ साफ दो टूक शब्दों में कहा कि यूपी अकेला सूबा है, जहाँ आम आदमी कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ है और लोग खुलकर बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी और यहाँ तक कि आम आदमी पार्टी को वोट करके उन्हें सत्ता से बाहर रखने की हर चंद कोशिश में जुटे हैं। मीडिया चूँकि पेड न्यूज वाले हैं, इसलिये अन्दर की इस हलचल पर उसकी कोई खबर नहीं है।

    पश्चिम उत्तर प्रदेश के इन मुसलमानों ने मीडिया के इस कयास को कि मुसलामान सपा का साथ छोड़ चुके हैं, कोरी बकवास बताया। वे बोले कैराना और मुजफ्फरनगर में जरूर मुसलमान सपा से नाराज हैं। लेकिन यह नाराजगी भगवा जीत का सबब नहीं बन सकती। उन बंदों ने साफ साफ दो टूक शब्दों में कहा कि मुसलमान हर कहीं यह देख रहे हैं कि कौन उम्मीदवार भाजपा को हरा सकता है। इसके अलावा मुसलमान भाजपा के सही उम्मीदवारों के हक में वोट डालने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं।

    उन बंदों ने साफ-साफ दो टूक शब्दों में कहा कि भेड़ धंसान की तर्ज पर या किसी फतवे के मुताबिक भी मुसलमान वोट नहीं डाल रहे हैं। कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा को अपने हितों के मद्देनजर वोट डाल रहे हैं मुसलामान। कौमी हिसाब किताब से से जो चुनाव नतीजे ऐलान कर रहे हैं, वे सिरे से गलत हैं। उन्होंने साफ साफ कहा कि बनारस में किसी मुख्तार की जागीर नहीं है मुस्लिम आबादी और काशी की तहजीब हजारों साल पुरानी है। वहाँ लोग हिन्दू हो या मुसलमान, कौमी भाईचारे और अमनचैन की गंगा जमुनी विरासत के खिलाफ वोट हरगिज नहीं करेंगे। वे अपनी बेरोजगारी और वोट बैंक बन जाने की लाचारी की शिकायत भी कर रहे थे। शिया सुन्नी और पसमांदा समीकरण पर भी बात कर रहे थे। करीब पांच घंटे यह खुली बातचीत चली।

    इसी के मध्य एक तीसेक साल का नौजवान ने आकर सीधे मेरे मुखातिब होकर कहा कि अंकल, आप मोदी के खिलाफ हैं क्या जो मोदी के खिलाफ इतना बोल रहे हैं।

    मैंने विनम्रता पूर्वक कहा कि हम मोदी के खिलाफ नहीं हैं। मोदी तो इस्तेमाल किये जा रहे हैं। मोदी ब्राण्डिग में जो देशी विदेशी पूँजी का खेल है, हम उसके खिलाफ हैं। हमने पूछा कि अगर वाजपेयी मुकाबले में होते तो क्या वे मदी की सरकार बनाने की बात करते।

    उसने कहा, हरगिज नहीं।

    हमने कहा कि मुकाबला तो भाजपा और संघ परिवार के बीच है। संघ परिवार सीधे सत्ता हासिल करने की फिराक में है और भाजपा को खत्म करने पर तुला है।

    उसने काफी आक्रामक ढंग से बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं के कत्लेआम के बारे में पूरे संघी तेवर से हमारी राय पूछी तो हमने यकीनन गुजरात नरसंहार का मामला नहीं उठाया, बल्कि बांग्लादेश और पाकिस्तान केलोकतान्त्रिक प्रतिरोध आंदोलनों का हवाला देते हुये बताया कि मध्य भारत और बाकी देश में नरसंहार संस्कृति क्या है। हमने बताया कि देश के हर हिस्से में, हर सूबे में, हर शहर में कश्मीर है और अधिसंख्य नागरिकों के नागरिक और मानवाधिकार कारपोरेटहित में खत्म है और यही गुजरात मॉडल है।

    उसकी तारीफ करनी होगी कि बेहद आक्रामक मिजाज का होने के बावजूद वह हमारी दलीलों को धीरज से सुन रहा था। हमने उससे कहा कि अगर शिवराज सिंह चौहान को प्रधानमंत्रित्व का उम्मीदवार बनाया जाता तो मध्यप्रदेश के लोग क्या नमोममय भारत की रट लगाते, उसने बेहिचक कहा, हरगिज नहीं। तो हमने कहा कि अगर मोदी रुक गये तो भाजपा का अगला दांव इन्हीं शिवराज पर होगा।

    इस पर उसने जो कहा, वह हमें चौंकानवाली बात थी। उसने सीधे कहा कि शिवराज तो अंबानी से रोज मिलते हैं और मध्यप्रदेश में निवेश की पेशकश करते हैं। शिवराज भी तो बेदखली के कारोबार में है। न्यूक्लीअर प्लांट भी वे एमपी में लगा रहे हैं। तो मोदी और शिवराज में फर्क कहां है।

    फिर उसको रोजगार और कारोबार के संकट पर बातें हुयी और अंततः वह भी सहमत हुआ कि पहचान की इस सुनामी में युवाशक्ति को मालूम ही नहीं है कि कैसे उसके हाथ पांव दिलोदिमाग काटे जा रहे हैं।

    हमें फिर एकदफा लगा कि हम अपने युवाजनों से संवाद के हालात नहीं बना सके हैं और बदलाव की राह में यह शायद निर्णायक रुकावट है। फिर उसने हमारी चर्चा में कोई हस्तक्षेप भी नहीं किया।

    हमने लगातार लगातार विचारधारा और आंदोलन के नाम पर उन्हें पहचान की राजनीति में उलझाये रखा क्योंकिप्रतिरोध की राजनीति में हम अपनी खाल उधेड़ जाने से बेहद डरे हुये हैं। हम संपूर्ण क्रांति के नारे उछालकर उन्हें सड़कों पर उतार तो लेते हैं, लेकिन पीछे से चुपके से खिसक लेते हैं और मौका मिलते ही उन्हें दगा देकर सत्ता में शरीक होते हैं और उसके वैचारिक औचित्य की बहस में बदलाव के ख्वाब की निर्मम हत्या कर देते हैं।

    बाकी फिर वही पहचान के अलावा कुछ हाथ में नहीं होता। पहचान चेतस युवाजनों के आक्रामक तेवर को समझने की जरूरत है जिसकी मूल वजह हमारी मौकापरस्ती और सत्तापरस्ती है जिससे हम इस कायनात को हमारे बच्चों के लिये खत्म करने पर तुले हुये हैं सिर्फ अपनी मस्ती खातिर बेहतर क्रयशक्ति के लिये।

    विडंबना तो यह कि संस्थागत महाविनाशी फासीवादी ध्रुवीकरण इसी पहचान के गर्भ से हो रहा है, सुनामी का प्रस्थानबिंदु वही है और उसी से प्रतिरोध की रेतीली दीवारें खड़ी की जा रही हैं, जिनका दरअसल कोई वजूद है ही नहीं, न हो सकता।

    सीधे तौर पर कहे कि ध्रुवीकरण का मतलब है कि सिक्के के दो पहलुओं में से किसी एक को ठप्पा लगाओ, जो समान रुपेण कयामत ही कयामत है। तीसरा कोई विकल्प है ही नहीं। राजकरण की कोई तीसरी दशा या दिशा है ही नहीं। तस्वीर का रुख बदल देने से तस्वीर नहीं बदल जाती। ध्रुवीकरण का तभी मतलब है कि जब कांग्रेस का विकल्प भाजपा हो या भाजपा का विकल्प कांग्रेस हो। जबकि दोनों दरअसल एक है।

    आप भाजपा को वोट देते हैं तो वोट कांग्रेस की सर्वनाशी नीतियों को ही वोट दे रहे होते हैं, जिन्हें भाजपा जारी रखेंगी। कांग्रेस को वोट देते हैं भाजपा को रोकने के लिये तो यथास्थिति बनी रहती है। दरअसल यथास्थिति और बदतर स्थिति ही दो विकल्प बचते हैं ध्रुवीकरण मार्फत जिसका नतीजा समान है। आपको तबाही की फसल काटनी है।

    हमारे प्रिय मित्र आनंद तेलतुंबड़े सही कहते हैं कि वेस्ट मिनिस्टर प्रणाली अपनाकर हम औपनिवेशिक स्थायी बंदोबस्त ही जारी रखे हुये हैं और इस बंदोबस्त की बुनियादी खामियों को आँख में ऊँगली डालकर चिन्हित करने पर भी हमारा नजरिया बदलता नहीं है। विडंबना यह है कि धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद और पहचान की राजनीति दोनों सत्तावर्ग के कुलीनतंत्र के वर्णवर्चस्वी तंत्र मंत्र यत्र के माफिक है। अब धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद को रणनीतिक मतदान के माध्यम से या फौरी साझा मोर्चा बनाकर आप कैसे रोक सकते हैं, इस पहेली में उलझकर क्या कीजिये। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर पकी पकायी फसल तो धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सबसे बेहतरीन शराब है। फिरकापरस्ती और धर्मनिरपेक्षता के बहाने हम उसी पहचान के खड्ड में जा गिरते हैं, जिसमें जाति भी है, क्षेत्र भी, भाषा भी और धर्म भी। जिसमें गूँथी हमारी सोच बुनियादी बदलाव के लिये तैयार ही नहीं है।

    हम इसी दलदल में हाथ के साथ हैं या कमल खिलाकर सांपों की फसल तैयार कर रहे हैं। जबकि मूल नस्लवादी मनुवादी व्यवस्था सत्तावर्ग का है और जनसंख्या के समानुपातिक कोई नुमाइंदगी सिरे से असम्भव है तो अवसरों और संसाधनों के बँटवारे की कोई गुंजाइश ही नहीं बनती। आपका समाज तो विखंडित है ही और आपकी राजनीति भी विखण्डित। देश भी खण्ड खण्ड। अर्थव्यवस्था पाताल में है और उत्पादन प्रणाली है ही नहीं। खेती को तबाह कर जल जंगल जमीन और आजीविका से बेदखली के मार्फत अश्वमेधी अभियान के तहत हर हाल में आप न्याय,समानता और भ्रातृत्व, समरसता और विविधता की उम्मीद पाले हुये हैं जबकि आनंद तेलतुंबड़े की मानें तो चुनावी नतीजे इस बंदोबस्त में जो भी होंगे, उसके सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक नतीजे एक दूसरे से बेहतर तो हो ही नहीं सकते। क्योंकि यह स्थाई बंदोबस्त सत्ता वर्ग के लिये है, सत्ता वर्ग द्वारा है और सत्ता वर्ग का ही है। आप जैसे हजारों सालों से बहिष्कृत और वध्य हैं, जैसा भी जनादेश रचे आप, आप नियतिबद्ध हैं मारे जाने के लिये।

    हमारे तमाम मित्र चुनाव खर्च का हवाला दे रहे हैं। आंकड़े भी उपलब्ध है कि कैसे पांच साल में चुनावों पर पांच लाख करोड़ खर्च हो गये। अब जायज सवाल तो यही है करीब दस करोड़ रुपये चुनाव जीतने के लिये लगाने वाले हमारे जनप्रतिनिधि अरबपति बनने के अलावा सोच भी क्या सकते हैं।

    अरुंधति राय ने पहले ही लिखा था कि हमें दरअसल यही चुनना है कि देश की बागडार हम किसे सौंपे, अंबानी को या टाटा को। अपने ताजा इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि हम दरअसल उसे चुन रहे हैं जो लाचार निःशस्त्र जनताविरुद्धे सैन्य कार्रवाई का आदेश जारी करें।

    About The Author

    पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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    For sharing Sunderlalji`s personal moment with his son,our dear Rajeev Nayan Bahuguna.
    Thanks to share this very very personal as well as most public society relevant moment.Posting on my blogs to circulate this>just because the media and politics sidelined all those personalities who tried to save this good earth and global warming makes us sing in the boiling desert as we sunk in heatwave right in metro cosmopolitan Kolkata.We opted for this concreet jungal deforesting,deharvesting the mother nature.We killed our mother earth and we are predestined to immerse into the hell!Amidst Modi Tsunami,this is the best thing we got on FBPalash Biswas




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    युद्ध, आशाओं और आशंकाओं के बीच!

    युद्ध, आशाओं और आशंकाओं के बीच!


    क़मर वहीद नक़वी


    एक रहिन ईर, एक रहिन बीर, एक रहिन फत्ते और एक रहिन हम! ईर कहिन, चलो चुनाव लड़ आईं, बीर कहिन चलो हमहूँ चुनाव लड़ आईं, फत्ते कहिन चलो हमहूँ चुनाव लड़ आईं, हम कहिन चलो हमहूँ चुनाव लड़ आईं! युद्ध है कि खेल है, कि अदल है कि बदल है, कि दल है कि दलबदल है, कि नारा है कि निवाला है, कि मेला है कि ठेला है, कि तमाशा है कि नौटंकी है, कि नूरा कुश्ती है कि गलथोथरी है, कि सारा देश लड़ रहा है! जी हाँ, हर मनई चुनाव लड़ रहा है! क्या कहा? चुनाव तो नेता लड़ते हैं! पता नहीं कहीं लड़ते हैं या नहीं, लेकिन अपने यहाँ तो चुनाव जनता ही लड़ती है! घर, बाज़ार, चौपाल, पंचायत, खेत-खलिहान, दफ़्तर, गली, नुक्कड़ और चाय के चुक्कड़ पर, ट्विटर, फ़ेसबुक और काफ़ी मग पर, ताश की बाज़ी पर, शतरंज की बिसात पर, सटोरिये के भाव पर ईर, बीर, फत्ते, हम, तुम, ये, वो, सबके सब, सारी जनता मुँहतोड़ और जीतोड़ लड़ती है! अजब लड़ाई है यह! हर बार एक ही नतीजा होता है! बार-बार वही नतीजा होता है! कुछ नेता हारते हैं, कुछ जीतते हैं। लेकिन जनता हर बार हारती है! जनता हर बार जूझ के लड़ती है, नेता जीत जाता है, जनता हार जाती है!

    पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था। तेरह साल की उम्र में। और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैंजो इससे पहले कभी नहीं देखा! 67 में जनता पहली बार निराश हुई थी और छह राज्यों से काँग्रेस साफ़ हो गयी थी! फिर 1977 और 1989 भी देखासमझा और भुगता! ये सब बड़ी-बड़ी आशाओं के चुनाव थे। बड़े बदलावों की आशाओं के चुनाव! वे आशाएँ अब निराशा के कफ़न ओढ़ इतिहास के ताबूत में दफ़न हैं। वैसे चुनाव कोई भी हों, कैसे भी हों, छोटे हों, बड़े हों, वह आशाओं के चुनाव ही होते हैं। वोट या तो किसी निराशा के विरुद्ध होते हैं या किसी नयी आशा के तिनके के साथ! लेकिन यह पहला चुनाव हैजहाँ युद्ध आशाओं और आशंकाओं के बीच है! एक तरफ़ बल्लियों उछलती, हुलसती गगनचुम्बी आशाएँ हैं, दूसरी तरफ़ आशंकाओं के घटाटोप हैं! पहली बार किसी चुनाव में देश इस तरह दो तम्बुओं में बँटा है! और पहली बार ही शायद ऐसा हो रहा है कि नतीजे आने के पहले ही आशावादियों ने नतीजे घोषित मान लिये हैं! वैसे तो चुनावों के बाद अकसर कुछ नहीं बदलता, लेकिन यह चुनाव वैसा चुनाव नहीं है कि कुछ न बदले! अगर सचमुच वही आशावादी नतीजे आ गये, तो देश इस बार ज़रूर बदलेगा! आशाओं का तो कह नहीं सकते कि जियेंगी या हमेशा की तरह फिर फुस्स रह जायेंगी। लेकिन आशंकाओं के भविष्य को देखना दिलचस्प होगा! सिर्फ़ अगले पाँच साल नहीं, बल्कि अगले पचास साल का देश कैसा होगा, कैसे चलेगा और संघ-प्रमुख मोहन भागवत के 'परम वैभव'की भविष्यवाणी सच हो पायेगी या नहीं!

    और 'परम वैभवका स्वप्न सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही दुःस्वप्न नहीं है। अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते। कर्नाटक की बीजेपी सरकार के दौर में 'पश्चिमी संस्कृतिके विरुद्ध श्रीराम सेने और हिन्दू वेदिके की'नैतिक पहरेदारीने कैसे लोगों का जीना दूभर कर दिया था। उन्हीं प्रमोद मुतालिक को बीजेपी में अभी-अभी शामिल कराया गया था, हो-हल्ला मचा तो फ़िलहाल चुनाव के डर से उन्हें दरवाज़े पर रोक दिया गया। और यह तो तय है कि अगर 'आशावादी नतीजे'आ गये तो चुनाव के बाद बीजेपी वही नहीं रहेगी, जो अब तक थी! बीजेपी की 'ओवरहालिंग'होगी, यह तो कोई बच्चा भी दावे के साथ कह सकता है! लेकिन वह ओवरहालिंग कैसी होगी, इसी से तय होगा कि कैसे दिन आनेवाले हैं? और 'पश्चिमी संस्कृति'से 'भारतीय संस्कृति'का 'रण'होगा या नहीं?

    और इस चुनाव के बाद काँग्रेस भी बदलेगी! नतीजे तय करेंगे कि काँग्रेस को आगे का रास्ता कैसे तय करना है? काँग्रेस का भविष्य क्या होगा? काँग्रेस कई बार बड़े-बड़े झंझावातों के दौर से गुज़री, टूटी, बँटी, बनी, पिटी, और फिर धूल झाड़ कर खड़ी हो गयी। लेकिन अबकी बार? बड़ा सवाल है! काँग्रेस में राहुल गाँधी के अलावा प्रियंका की कोई भूमिका होगी क्या? और होगी तो किस रूप में? वैसे ही, जैसे अभी है, पर्दे के पीछे महज़ चुनावी खेल की कप्तानी या फिर राहुल के शाना-ब-शाना? यह सवाल आज के पहले महज़ एक अटकल से ज़्यादा नहीं था, लेकिन आज यह एक वाजिब सवाल है! इसलिए कि बीच मँझधार में जब से प्रियंका ने चुनावी कामकाज की कमान सम्भाली है, तबसे पार्टी में कुछ-कुछ बदला-सा तो दिखा है! क्या काँग्रेस इस तरफ़ आगे बढ़ना चाहेगी? कठिन डगर है! चुनाव बाद शायद काँग्रेस भी इस पर चर्चा करने को मजबूर होगी और हम भी!

    और इस चुनाव में एक और बड़ी बात शायद पहली बार होने जा रही है। वह है चुनाव के बाद राष्ट्रीय पटल पर एक नये राजनीतिक विकल्प की सम्भावना का उदय! इस पर भले ही अटकलें लग रही हों कि आम आदमी पार्टी कितनी सीटें जीत पायेगी, दहाई का आँकड़ा पार कर पायेगी या नहीं, वग़ैरह-वग़ैरह। सीटें उसे मिलें या न मिलें, लेकिन इतना तो तय है कि देश के राजनीतिक विमर्श में उसकी उपस्थिति गम्भीरता से दर्ज हो चुकी है। बीजेपी और काँग्रेस के बाद वह अकेली ऐसी पार्टी है जो क्षेत्रीय सीमाओं और आग्रहों से मुक्त है। हालाँकि उसके नेतृत्व के अपने ज़िद्दी आग्रहों के चलते 'आप'ने एक बहुत बड़े राजनीतिक अवसर और अपने लाखों समर्थकों को रातोंरात गँवा दिया, फिर भी देश में अब भी करोड़ों ऐसे लोग हैं जो अरविन्द केजरीवाल को एक ईमानदार सम्भावना मानते हैं और इसीलिए उनके अराजकतावाद, अनाड़ीपन, अड़ियल अहंकार को भी बर्दाश्त करने को तैयार हैं। ऐसा इसलिए कि ये लोग काँग्रेस और बीजेपी में न तो ईमानदारी का कोई संकल्प पाते हैं और न ही उन्हें इन पार्टियों से किसी ईमानदार बदलाव की कोई उम्मीद है।

    इसलिए देश के इतिहास में पहली बार हो रहे आशाओं और आशंकाओं के इस चुनावी मंथन के नतीजे चाहे जो भी हों, इसकी एक उपलब्धि तो'आप'है ही। कमज़ोर हो रही काँग्रेस की जगह 'आप'अपने आपको पेश कर सकती है, बशर्ते कि वह अपनी बचकानी ज़िदों, भावुक जल्दबाज़ियों, अटपट कलाबाज़ियों और अड़-बड़ बोलियों से बच सके! बशर्ते कि उसके पास कोई स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि हो, कोई आर्थिक-सामाजिक रूपरेखा हो, स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य हों और निर्णय लेने के लिए कोई कुशल विवेकशील तंत्र हो। अरविन्द केजरीवाल मानते हैं कि दिल्ली में सरकार से हट कर उन्होंने बड़ी ग़लती की। वैसे यह उनकी पहली ग़लती नहीं थी। मुख्यमंत्री का एक ग़लत बात के लिए धरने पर बैठना भी कम बड़ी ग़लती नहीं थी! उन्होंने ऐसी कम ग़लतियाँ नहीं की हैं, वरना 'आप'शायद आज ही बड़ी ताक़त बन चुकी होती! उनके पास बड़ी धाकड़, विविध प्रतिभासम्पन्न, प्रबन्ध-कुशल समर्पित और बड़ी अनुभवी टीम है। उस टीम को सामूहिक फ़ैसला लेने दें तो 'आप'से उम्मीद की जा सकती है! वरना……

    (लोकमत समाचार, 26 अप्रैल 2014)

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    क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार व हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता के जनक में से एक हैं। हिंदी को गढ़ने में अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सही अर्थों में कहा जाए तो आधुनिक हिंदी को अखबारों ने ही गढ़ा (यह दीगर बात है कि वही अखबार अब हिंदी की चिंदियां बिखेर रहे हैं), और यह भी उतना ही सत्य है कि हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को भाषा की तमीज़ सिखाने का काम क़मर वहीद नक़वी ने किया है। उनका दिया गया वाक्य – यह थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक – निजी टीवी पत्रकारिता का सर्वाधिक पसंदीदा नारा रहा। रविवार, चौथी दुनिया, नवभारत टाइम्स और आज तक जैसे संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे नक़वी साहब आजकल इंडिया टीवी में संपादकीय निदेशक हैं। नागपुर से प्रकाशित लोकमत समाचार में हर हफ्ते उनका साप्ताहिक कॉलम राग देश प्रकाशित होता है।

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    বাংলাদেশী জিগির তুলে ভারত ভাগের বলি মানুষদেরই নাগরিকত্ব থেকে বন্চিত করে সারা দেশ ব্যাপী অভিযান চলছে কংগ্রেস বিজেপি যোগসাজসে



    বাংলাভাগের পর হিন্দূ রাষ্ট্রের নয়া জিগির আবার ভারত ভাগের বলি বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অশনিসংকেত বাংলার বুকে দাঁড়িযে সঙ্ঘ পরিববারের কুলশিরোমণি বাংলাদেশী অনুপ্রবেশ ইস্যুক সর্বাধিক গুরুত্ব দিয়ে আবার হিন্দূ মুসলিম বিভাজনে বাংলা জয়ের ঘোষণা করে গেলেন


    আসলে নজরুল ইসলাম ও রেজ্জাক মোল্লার নেতৃত্বে যে দলিত মুসলিম সংগঠন আগামি বিধানসভা নির্বাচনে ব্রাহ্মণ্যতান্ত্রিক আধিপাত্যের অবসাণে অন্ত্যজদের ক্ষমতায়ণের যুদ্ধঘোষণা করেছে,তাঁরই প্রতিক্রিয়া ও ক্ষমতাগোষ্ঠির রণকৌশল হল গৌরিক পতাকার এই আক্রামক আস্ফালন,হিন্দু মুসলিম বিভাজন ও কখনো ভারত ভাগের আগের মত দলিত মুসলিম একতায় ক্ষমতাবেদখল হতে না দেওয়ার জোর প্রস্তুতি।

    Narendra Modi threatens to deport Bangaldeshis if BJP comes to power



    পলাশ বিশ্বাস


    Last Updated: Sunday, April 27, 2014, 23:55  

    Zee Media Bureau/Hemant Abhishek


    New Delhi: Bharatiya Janata Party's prime ministerial candidate Narendra Modi made scathing attacks on West Bengal chief minister Mamata Banerjee at an election rally in Shrirampur and said that the National Democratic Alliance (NDA) would investigate the Saradha chit-fund scam when it comes to power.



    Addressing over the issue of the chit-fund scam — one of the major rallying points in the state, Modi said, "I assure those who lost money in Sharda chit fund scam that after forming the government there will be tough investigation on it."


    Modi accused the Trinamool Congress government in the state of playing votebank politics and claimed that Mamata Banerjee supported illegal Bangaldeshi migrants for their votes. He said, "Mamata ji has made Bengal a ground for vote-bank politics. People from Odisha, Bihar are considered outsiders, but Bangladeshis come and her face shines."


    "I want to warn from here, brothers and sisters write down, that after May 16, will send these Bangladeshis beyond the border with their bags and baggages," Modi added.


    "You are spreading the red carpet for the Bangladeshis for the sake of votebank politics," he said in this largely mixed constituency, where there is a large chunk of Hindi-belt population who are the main work force in the jute mills here.


    He charged the TMC government of playing politics of vendetta and claimed that Mamata used the state's police force to settle scores. He said, "Mamata ji times have changed. You cannot use police to make cases against people. This is not the right path."


    The Gujarat chief minister also said that Mamata had not fulfilled the promises she had made when taking over the reins and said, "Mamata Ji people expected better. I always have high regard for you but the dreams of people of Bengal lie shattered."


    And in same vein, added, "Mamata ji, kaha gayi aapki mamata? Bengal ne aapko mamata dee aapne us mamta ka kya kar diya? (Mamata ji Bengal invested its faith in you, but wheres' your kindness gone?)"


    Taking a dig at the crores that Mamata's paintings sold for, he commented, "Mamata ji I respect you that is why I want to tell you something — you paint well. Earlier your paintings sold for four lakhs but now they sell above a crore. We are very proud that you paint well but who bought your painting for over a crore?"


    Modi hailed Subhash Chandra Bose —one of Bengal's most popular heroes— and tweaked his famous slogan to suit the times. "Subhash Chandra Bose said you give me blood and I will give you freedom. I say give me your support and I will give you 'surajya'," said Modi as he signed off.


    Trinamool Congress hit back at his attack calling him 'the butcher of Gujarat'.


    In a series of tweets originating from its Twitter handle, the TMC claimed that Modi could not take care of his wife and used this to question his candidature for a national role.

    http://zeenews.india.com/news/general-elections-2014/narendra-modi-attacks-mamata-banerjee-rakes-up-illegal-bangladeshi-migrants-issue_927781.html



    বাংলাভাগের পর হিন্দূ রাষ্ট্রের নয়া জিগির আবার ভারত ভাগের বলি বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অশনিসংকেত বাংলার বুকে দাঁড়িযে সঙ্ঘ পরিববারের কুলশিরোমণি বাংলাদেশী অনুপ্রবেশ ইস্যুক সর্বাধিক গুরুত্ব দিয়ে আবার হিন্দূ মুসলিম বিভাজনে বাংলা জয়ের ঘোষণা করে গেলেন।ইতিপূর্বে ভারতের হিন্দুত্ববাদী বিজেপি-র প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী নরেন্দ্র মোদী কলকাতায় প্রথম নির্বাচনী জনসভায় বলেন, বাংলাদেশী অনুপ্রবেশকারীদের জন্য স্থানীয় মানুষরা চাকরী সহ বিভিন্ন সুযোগ সুবিধা থেকে বঞ্চিত হচ্ছে।নির্বাচনের আগে বিজেপি এবং অন্যান্য কট্টরপন্থী দলগুলোর প্রচার প্রচারণায় বাংলাদেশীদের অনুপ্রবেশ নিয়ে কথা শোনা যায়।আজকের টাটকা বক্তব্য হিন্দী ভাষী ও ভিনরাজ্যের মানুষদের প্রতি পশ্চিম ঙ্গীয় বিদ্বেষ প্রসঙ্গে বাংলাদেশিদের প্রতি বিশেষ পক্ষপাতের কথা তুলে শুধু ধর্মোন্মাদী নয়,বরং বাঙ্গালি বিরোধী মেরুকরণের কাজ করে গেলেন মোদী বিনা প্রতিবাদে,যেমন গোরখাল্যান্ড আন্দোলনকে লাগাতার সমর্থন জুগিয়ে বাংলা জাতি সত্তাকে খন্ডিত ভূগোলে কয়েদি করার এজন্ডা নিয়েই এই রাজ্যে এখন রীতিমত গৌরিক ঝড়,তাও আবার ব্রাহ্মণ্যতান্ত্রিক ক্ষমতা রাজনীতির একতরফা ওয়াক ওভারে



    মোদ্দা কথা হল বাংলার বর্ণবিদ্বেষী ব্রাহ্মণ্যতান্ত্রিক ক্ষমতার রাজনীতি মেরুকরণের এই রাজনীতিতে গৌরিক হিন্দুত্ব রাজনীতির জমি তৈরি করতে,দল মত নির্বিশেষ অতিশয় সক্রিয়,বাংলা বিজেপি সমর্থক ভোট চার শতাংশের বেশি নয়,কিন্তু সিপিএম,কংগ্রেস ও তৃণমূল কগ্রেস সহযোগিতায় মেরুকরমের ফলে এই ভোট পনেরো থেকে কোথাও কোথাও চল্লিশ শতাংশ হতে চলেছে।



    কলকাতার ব্রিগেড প্যারেড গ্রাউন্ডে প্রথম  জনসভায় প্রাইম মিনিস্টার ওয়েটিং নরেন্দ্র মোদী বলেছিলেন, "পশ্চিমবঙ্গ হোক বা আসাম, বাংলাদেশীদের অনুপ্রবেশের ফলে দুই রাজ্যেই সমস্যা বাড়ছে। ভারতীয় যুবক-যুবতীদের অন্ন সংস্থানের সুযোগ ছিনিয়ে নেওয়া হয়েছে।"

    জনসভায় এ বক্তব্য দেওয়ার সময় উপস্থিত বিজেপি সমর্থকদের হাত তুলে সমস্বরে মোদীর বক্তব্যে সায় দিতে দেখা গেছে।আজও হিন্দুত্ব উন্মাদে বাঙ্গালি সারা দেশ জুড়ে বাঙালি ও বহুসংখ্যক বহিস্কৃত মানুষদের সর্বনাশ প্রকল্পে আগুয়ান পয়দলবাহিনী।মনে রাখা দরকার,ভারতের গুজরাট রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদি ২০০২ সালের মুসলিম বিরোধী দাঙ্গার জন্য অনুতপ্ত নন বলে ঘোষণা করেছেন। একই সঙ্গে তিনি বলেছেন, তাকে বহনকারী মোটরগাড়ি কোনো কুকুর ছানাকে চাপা দিলে সে জন্য দুঃখ অনুভব করবেন তিনি। বার্তা সংস্থা রয়টার্সকে দেয়া সাক্ষাতকারে এ সব কথা বলেছেন উগ্র হিন্দুত্ববাদী দল ভারতীয় জনতা পার্টি ও সংঘ পরিবারের হিন্দু হ্রদয় সম্রাট


    আসলে নজরুল ইসলাম ও রেজ্জাক মোল্লার নেতৃত্বে যে দলিত মুসলিম সংগঠন আগামি বিধানসভা নির্বাচনে ব্রাহ্মণ্যতান্ত্রিক আধিপাত্যের অবসাণে অন্ত্যজদের ক্ষমতায়ণের যুদ্ধঘোষণা করেছে,তাঁরই প্রতিক্রিয়া ও ক্ষমতাগোষ্ঠির রণকৌশল হল গৌরিক পতাকার এই আক্রামক আস্ফালন,হিন্দু মুসলিম বিভাজন ও কখনো ভারত ভাগের আগের মত দলিত মুসলিম একতায় ক্ষমতাবেদখল হতে না দেওয়ার জোর প্রস্তুতি।


    আসল কথাঃ

    অন্ত্যজ, ব্রাত্য, উদ্বাস্তু, উপজাতি, অস্পৃশ্যের বাংলায় কোনও অস্তিত্ব নেই।থাকলেও তারা সংখ্যালঘু শাসকশ্রেণীর কন্ঠেই অভিব্যক্ত হবেন, তাঁদের নিজস্ব কন্ঠস্বরেরে, বাক্ স্বাধীনতার প্রশ্নই ওঠে না। এই একচেটিয়া আধিপাত্যবাদের সংস্কৃতিকে ব্রাহ্মণ্যতন্ত্রের বুনিয়াদ হিসাবে রক্ষা করতেই যারা বদ্ধপরিকর,তাঁরাই আবার ধর্মনিরপেক্ষতার অজুহাতে প্রগতিবাদ জাহির করার কোনও মোকা হাত ছাড়া করতে চান না।বন্চিত শ্রেণীর স্বার্থে একটি কথাও যাদের মুখে শোনা যায় না, বর্ণ ব্যবস্থা কায়েম রাখতে, বর্ণশ্রেষ্ঠত্বের দোহাই দিয়ে সবকিছুই দখল করতে যারা নির্মম মৌলবাদী, তাঁরাই আবার মৌলবাদের কের্তনে আকাশ বাতাশ মুখরিত করছেন। হুতোম বেঁচে থাকলে এই রঙ্গ নিয়ে কি নক্সা পেশ করতেন জানা নেই।তবে বাংলা থেকে নির্বাসিত হওয়ার আগেই কিন্তু বিতর্কিত লেখিকা তসলিমা নাসরিন বলেছিলেন , যতক্ষন ধর্ম থাকবে, স্ত্রী মুক্তি  অসম্ভব।সমতা ও সামাজিক ন্যায় অসম্ভব।জাতি উন্মুলনের প্রশ্ন ওঠে না।ধর্মনিরপেক্ষতার অবকাশ নেই। এমনকি স্বাধীনতা, ভ্রাতৃত্ব, নাগরিকত্ব,নাগরিক ও মানব অধিকার অপ্রাসঙ্গিক এই ধর্মরাজ্যে।পশ্চিমবঙ্গ ব্রাঙ্মণ্যতান্ত্রিক ধর্মরাজ্য।সেখানে ব্যতিক্রমী কন্ঠস্বর থাকার কথাই নয়।কিন্তু কি আশ্চর্য্য দেখুন, যারা ওবিসি, এসসি এসটি সংখ্যালঘুদের মানুষের মর্যাদা দিতে অস্বীকার করেন তাঁরাই ধর্ম নিরপেক্ষতার মুখোশ পরে তা ত তা থৈ নাচছেন।


    বাংলাভাগের পর হিন্দূ রাষ্ট্রের নয়া জিগির আবার ভারত ভাগের বলি বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অশনিসংকেত বাংলার বুকে দাঁড়িযে সঙ্ঘ পরিববারের কুলশিরোমণি বাংলাদেশী অনুপ্রবেশ ইস্যুক সর্বাধিক গুরুত্ব দিয়ে আবার হিন্দূ মুসলিম বিভাজনে বাংলা জয়ের ঘোষণা করে গেলেন


    মনে রাখা দরকার মুখে মুসলিম বিদ্বেষী রাজনৈতিক বিভাজনের ভোট সমীকরণ রসায়ণ বললেও হিন্দু বাঙ্গালি দলিত শরণার্থীদের বিরুদ্ধেই সারা দেশে আক্রমণ চালিয়ে যাচ্ছে সংঘ পরিবার


    আসাম ত্রিপুরা শুধু নয়,সারা দেশে বাঙ্গালি বিদ্বেষের মূল কর্মকর্তা এই সঙ্ঘপরিবার


    ইদানিং মুম্বাইয়ে বাংলাদেশী খেদাও অভিযান কিন্তু আসলে ষাটের দশকের অসমে বাঙাল খেদাওএরই কন্টিনিউটি মুম্বাইয়ের বাঙালি বিদ্বেষী শিবসেনা বিজেপিরই দোসর


    ভারতীয় নাগরিকত্ব আইন সংশোধন বিল সংসদে পেশ করেছিলেন তত্কালীন গৃহমন্ত্রী লৌহপুরুষ লালকৃষ্ণ আডবাণী এবং বাংলার বাম দক্ষিণ ব্রাহ্মণ্য রাজনীতি দুহাত তুলে সমর্থন করেছিল এই আইনেরই


    তারপর উড়ীষ্যার কেন্দ্রাপাড়ায় উদ্বাস্তু উপনিবেশে 1950 সালের পূর্বে,যখন পালপোর্ট ভিসার প্রচলণ হয়নি এ দেশে,যখন আডবানী নিজে ভারত ও পাকিস্তান দু দেশেরই নাগরিক ছিলেন,নোয়াখালি দাঙ্গার শিকার যে বাঙ্গালি দলিত উদ্বাস্তুদের পুনর্বাসন দেওয়া হয়েছিল,তাঁদের ডিপোর্টেশন শুরু হল


    উত্তরাখন্ড,ঝারখন্ড ও ছত্তিশগড় নূতন রাজ্য গঠন করে এনডিএ সরকার এবং তিনটি রাঝেরই জাতি সত্তার রাজনীতিকে টেক্কা দিয়ে তিনটি রাজ্যেই ক্ষমতা দখল করে বিজেপি


    উল্লেখ্য উড়ীষ্যা,মহারাষ্ট্র ও আন্দামান বাদে উত্তরাখন্ড,উত্তরপ্রদেশ,ছত্তিশগড় ও মধ্রপ্রদেশে সপচেয়ে বেশি উদ্বাস্তু বসতি


    উত্তরাখন্ডে প্রথম সরকার বিজেপির ক্ষমতা দখল করেই 1950 সালে উত্তরাখন্ড ও উত্তরা প্রদেশে পুনর্বাসিত উদ্বাস্তুদের বাংলাদেশী অনুপ্রবেশকারী ও বেনাগরিক ঘোষিত করে বিজেপি,যার বিরুদ্ধে উত্তরাখন্ডের উদ্বাস্তুদের আন্দোলনকে যেমন বাংলা সমর্থন করেছিল তেমনিই সমর্থন করেছিল উত্তরাখন্ডের আম জনতা কিন্তু আজ অবধি কোথাও বাঙালি উদ্বাস্তুদের  নাগরিকত্ব স্বাকীর করেনি কেন্দ্র ও রাজ্য সরকার যে মনমোহন সিংহ এই আইনের বিরোধিতা করেছিলেন সংসদে, তিনি নিজে প্রধানমন্ত্রী হওয়ার পর সেই আইন আরও জোরদার করা হয়


    বাংলার বাইরে হয়নামি যা হবার,হচ্ছেই,বাংলার প্রতিটি জেলায় বেনাগরিক হিসাবে পাইকারি হিসেবে চিন্হত হচ্ছে ভারতভাগের বলি দলিত মানুষেরাই,অথচ আজ কাল পরশু যারা অনুপ্রবেশ মার্ফত কোলকাতা,শহরতলি ও জেলায় জেলায় সবচেয়ে দামি সম্পত্তি কিনে নিচ্ছেন,তাঁদের নাগরিকত্ব নিয়ে প্রশ্ন উঠছে না


    সহজেই চোখে আঙ্গুল না দিয়েও বোঝা সম্ভব বাংলাদেশী জিগির তুলে ভারত ভাগের বলি মানুষদেরই নাগরিকত্ব থেকে বন্চিত করে সারা দেশ ব্যাপী অভিযান চলছে কংগ্রেস বিজেপি যোগসাজসে


    অনুপ্রবেশ ও রাষ্ট্রের নিরাপত্তার প্রশ্ন উদ্বাস্তু বিতাড়নকে ন্যায়সঙ্গত করতেই

    এই প্রসঙ্গে উল্লেখ্য,সারা দেশে মুক্ত বাজার অর্থনীতি ও সংস্কার অভিযানে দেশী বিদেশী পুঁজি ও প্রমোটার রাজের স্বার্থে সারা দেশে বেদখলি অভিযান চলছে


    ৩০ মার্চ  ২০১৪ জর্জিয়া স্ট্রেইটে ভারতের প্রখ্যাত লেখিকা অরুন্ধতী রায়  এর একটি সাক্ষাৎকার প্রকাশিত হয়। আমেরিকার ভ্যানকুভারে এপ্রিলের ১ তারিখে একটি পাবলিক লেকচার দেওয়ার জন্য নিউইয়র্কে অবস্থান করছিলেন তিনি। নিউইয়র্ক থেকে টেলিফোনে সাক্ষাৎকারটি দেন তিনি। সাক্ষাৎকারে ভারতের নির্বাচন, কর্পোরেটদের নিয়ন্ত্রণ, প্রধান দুই দলের রাজনীতি, ভারতে ধনী-গরীবের অসমতা, দলগুলির রাজনৈতিক কৌশল, আন্না হাজারে, ভারতের এলিটদের অসমতা নিয়ে কথা না বলা ইত্যাদি বিষয়ে কথা বলেন। তাঁর কথায় ভারতের রাজনীতির অনেক গুরুত্বপূর্ণ দিক উঠে এসেছে। অরুন্ধতী রায় মনে করেন, ভারতের কর্পোরেট শক্তি চায় নরেন্দ্র মোদীকে প্রধানমন্ত্রী হিসাবে দেখতে। তিনি মনে করেন, নরেন্দ্র মোদী প্রধানমন্ত্রী হলে ভারতের গ্রামের গরীব জনগোষ্ঠীর উপর সেনাবাহিনী ছেড়ে দিবেন।

    মোদীর বাংলাদিশী বক্তব্য ও নাগরিকত্ব সংশোধণী আইন এই প্রসঙ্গে বুঝতে হবে

    দন্ডকারণ্য ও অন্যত্র যে সমস্ত আদিবাসী অন্চলে উদ্বাস্তু পুন্রবাসন হয়েছে,সেখানেই সবচেয়ে বেশি লগ্নী করপোরেট পূঁজি- শুধু আদিবাসীদের উত্খাত করলেই চলবে না,বাঙালি উদ্বাস্তুদেরও উত্খাত করা চাই - এই জন্যই ভারত ভাগের বলি উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্ব ছিনতাই লক্ষ্যে নাগরিকত্ব সংশোধণী আইন প্রথম পদক্ষেপ, যা সমান ভাবে আদিবাসী ও শহরান্চলে বস্তি এলাকার কোটি টাকা কাঠা জমি থেকে ছিন্নমূল মানুষদের উত্খাতের করপোরেট প্রকল্প।এই জন্যই নাগরিকত্ আইনে সংশোধণী। সর্বদলীয় সম্মতিতে। বাংলার রাজনীতি আপত্তি করে নি। হাত তুলে সমর্থন করেছে। বাংলা দেশি বিতাড়ণে। আদিবাসী উত্খাত করতে হলে বেওয়ারিশ উদ্বাস্তুদের উত্খাত করার অনিবার্য সেই প্রথম পদক্ষেপ। তার পর তো রীতিমত  মহিষাসুর বধ পালা। বেনাগরিক সাব্যাস্ত হলেই অসুর নিধনের বৈদিকী পন্থা।পাইকারি জমি দখল অবাধ বিদেশি দেশি পুঁজির মোচ্ছবে নিজের হিস্সা বুঝে পাওয়া, তাঁরই ডিজিটাল ফর্ম্যাট।


    উত্তরাখন্ড ও উত্তরান্চলেও বাঙালি উদ্বাস্তুদের জমি দখলের খেলা চলছে

    ভারতীয় লেখিকা অরুন্ধতী রায় সারা পৃথিবীকে জানাতে চান তার দেশ সে দেশের সবচেয়ে বড় কর্পোরশনগুলির নিয়ন্ত্রণে আছে।

    অরুন্ধতী নিউইয়র্ক থেকে জর্জিয়া স্ট্রেইটকে ফোনে বলেন, "সব সম্পদ খুব অল্প সংখ্যক হাতে জমা হয়েছে। এবং এই অল্প সংখ্যক কর্পোরেশন এখন দেশ চালায় এবং কোনো কোনো ক্ষেত্রে তারা রাজনৈতিক দলগুলিকেও নিয়ন্ত্রণ করে। তারা মিডিয়াও চালায়।"

    দিল্লীর এই ঔপন্যাসিক এবং লেখিকা বলেন, মধ্যবিত্তদের কথা বাদ দিলে, এর ফলে ভারতের শত শত লক্ষ গরীব মানুষের উপর মারাত্মক ক্ষতিকর প্রভাব পড়ছে।

    অরুন্ধতী স্ট্রেইটের সাথে এপ্রিলের ১ তারিখ সন্ধ্যা আটটায় অনুষ্ঠিত একটি পাবলিক লেকচারের ব্যাপারে কথা বলেন। পাবলিক লেকচারটি হয়েছিল নেলসন স্ট্রিট এবং বারার্ডের কোণায় সেইন্ট অ্যান্ড্রু'স উয়ীসলী ইউনাইটেড চার্চে। তিনি বলেন এটা হবে তাঁর প্রথম ভ্যানকুভার ভ্রমণ।

    গত কয়েক বছর ধরে তিনি গবেষণা করে দেখেছেন ভারতের বড় বড় কর্পোরেশনগুলি–যেমন রিলায়েন্স, টাটা, এসার, এবং ইনফোসাইস–কীভাবে তারা মার্কিন যুক্তরাষ্ট্র ভিত্তিক রকফেলার ফাউন্ডেশন এবং ফোর্ড ফাউন্ডেশনের মত কৌশল অবলম্বন করছে।

    তিনি বলেন, রকফেলার ফাউন্ডেশন এবং ফোর্ড ফাউন্ডেশন দীর্ঘদিন যুক্তরাষ্ট্র সরকারের স্টেট ডিপার্টমেন্টে, সেন্ট্রাল ইন্টেলিজেন্স এজেন্সিতে  এবং পরে কর্পোরেট উদ্দেশ্য নিয়ে অতীতে অনেক কাজ করেছে।

    তিনি বলেন, এখন ভারতীয় কোম্পানিগুলি জনগণের এজেন্ডা নিয়ন্ত্রণ করার জন্য দাতব্য ফাউন্ডেশনগুলির মাধ্যমে টাকা বিতরণ করছে। এই পদ্ধতিকে তিনি বলেন 'পারসেপশন ম্যানেজমেন্ট'বা 'উপলব্ধির জায়গা নিয়ন্ত্রণ'। এই পদ্ধতির মধ্যে পড়ে বেসরকারী সংস্থাগুলিকে চ্যানেলিং ফান্ড প্রদান, চলচ্চিত্র এবং সাহিত্য উৎসব এবং বিশ্ববিদ্যালয়।

    তিনি আরো উল্লেখ করেন যে টাটা গ্রুপ এটা গত কয়েক দশক ধরে করছে কিন্তু অন্যান্য বড় সংস্থাগুলি এই ব্যাপারটি অনুসরণ করতে শুরু করেছে।

    পাবলিক ফান্ডিং-এর জায়গা নিচ্ছে ব্যক্তিগত সম্পত্তিঅরুন্ধতী রায়ের মতে, এ সবকিছুর উদ্দেশ্য আসলে অসমতা বাড়িয়ে তোলে এমন নিওলিবারেল পলিসির সমালোচনাকে চাপা দেওয়া।

    আস্তে আস্তে তারা কী কী কাজ হবে তা নির্ধারণ করে। তারা জনগণের চিন্তা-ভাবনা নিয়ন্ত্রণ করে। ফলে জনগণের জন্য নির্ধারিত স্বাস্থ্যখাত এবং শিক্ষাখাতের টাকা সেসব খাত থেকে বাদ পড়ে যায়। এসব বড় বড় কর্পোরেশনগুলি এনজিওদের ফান্ড দিয়ে এবং অন্যান্য অর্থনৈতিক কার্যক্রমের মাধ্যমে ঔপনিবেশ আমলে মিশনারিরা যা করত তাই করে। আর নিজেদের দাতব্য সংস্থা হিসাবে প্রতিষ্ঠা করে। কিন্তু তারা আসলে পৃথিবীকে কর্পোরেট-পুঁজির মুক্ত বাজারে পরিণত করার কাজটা করে।




    শ্রীরামপুরে মোদী ঝড়, মমতাকে `সারদা ভয়` দেখিয়ে গেলেন নমো


    ফটো সৌজন্য 24 ঘন্টা




    24 ঘন্টার রিপোর্টঃ লোকসভা নির্বাচনের প্রচারে এসে ব্রিগেডে দাঁড়িয়ে মমতা ব্যানার্জির দিকে সম্প্রীতির বার্তা দিয়ে টেনেছিলেন লাড্ডুর কথা। এরপর শিলিগুড়িতে দাঁড়িয়ে মমতার বিরুদ্ধে আক্রমণের সুর শুনিয়েছিলন। আর রবিবার শ্রীরামপুরে দাঁড়িয়ে কটাক্ষের সুর একেবারে সপ্তমে তুললেন বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী।


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    শ্রীরামপুরের নির্বাচনী প্রচারে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়কে তীব্র আক্রমণ নরেন্দ্র মোদীর। কোথায় গেল মমতার মমতা? মুখ্যমন্ত্রীকে কটাক্ষ বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থীর। মা সারদাকে চিটফান্ড বানালেন কী করে মমতা? প্রশ্ন নরেন্দ্র মোদীর।


    মমতা বন্দ্যোপাধ্যায় রাজ্যের কথা কম ভাবেন। বেশি ভাবেন কুর্সির কথা। কোটি টাকার বেশিতে মুখ্যমন্ত্রীর ছবি কে কিনল? তীব্র কটাক্ষ নরেন্দ্র মোদীর। ষোলোই মের পর বাংলাদেশ থেকে অনুপ্রবেশ বন্ধ করে দেবেন। আশ্বাস বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থীর।


    সাধারণ মানুষ তাজমহল দেখতে যান। রাহুল গান্ধী যান গরিব দেখতে। সঙ্গে মিডিয়া নিয়ে যান। শ্রীরামপুরের জনসভা থেকে মোদীর তীব্র কটাক্ষ কংগ্রেসের সহ সভাপতিকে।


    এদিকে, উত্তর হাওড়ার সালকিয়ায় নরেন্দ্র মোদীকে তীব্র আক্রমণ মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়ের। যে সংসার সামলাতে পারে না। সে দেশ কি সামলাবে? কটাক্ষ মুখ্যমন্ত্রীর। পরিকল্পনা করে ভোটের মুখে তৃণমূলের বিরুদ্ধে কুত্সা রটাচ্ছে কংগ্রেস-বিজেপি-সিপিআইএম। অভিযোগ মুখ্যমন্ত্রীর।


    মমতাকে বিঁধতে সারদাই অস্ত্র, আ-মোদীত শ্রীরামপুর

    গোটা শ্রীরামপুর স্টেডিয়াম কানায় কানায় ভর্তি তো বটেই। উল্টো দিকের ক্লাবের মাঠেও তিলধারণের জায়গা নেই! জি টি রোড থেকে সভাস্থল পর্যন্ত রাস্তার দু'ধারে কাতার দিয়ে লোক দাঁড়িয়ে!

    মাঠের জনতা বলতে মূলত ১৮ থেকে ২৮। যতক্ষণ ভাষণ চলল, 'মোদী, মোদী'চিৎকারে তারা ভরিয়ে তুলল রাতের আকাশ!

    ভোট-মরসুমে তৃতীয় বারের জন্য এ রাজ্যে এসে এমন মঞ্চকে সদ্ব্যবহার করতে ছাড়লেন না নরেন্দ্র মোদী। রামকৃষ্ণ মিশনের সূত্রে বাংলা যে তাঁর কাছে 'তীর্থভূমি', সেই আবেগ ছুঁয়ে ভোটের ময়দানে ঢুকে 'মা সারদা'-কে চিট ফান্ড বানিয়ে তোলার প্রশ্ন তুলে হাততালা কুড়োলেন বিপুল। ফালাফালা করলেন তৃণমূলের সরকারকে! তিন বারের মধ্যে প্রথম বার ব্রিগেড যদি দেখে থাকে 'নরম'মোদীকে এবং দ্বিতীয় বারে অপেক্ষাকৃত 'গরম'মোদীকে, তা হলে তৃতীয় বারে শ্রীরামপুর দেখল বিধ্বংসী মোদীকে!

    রাজ্য রাজনীতির চাকা এখন ঘোরাচ্ছে সারদা-কাণ্ডই। রাজ্যে এসে রবিবার সেই সারদা-কাণ্ডকে হাতিয়ার করেই তৃণমূল নেত্রী তথা মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়কে তীব্র আক্রমণ শানিয়েছেন বিজেপি-র প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী। সারদায় ক্ষতিগ্রস্ত প্রতিটি মানুষের প্রতিটি পাই-পয়সার হিসাব দাবি করেছেন। মুখ্যমন্ত্রীর উদ্দেশে বলেছেন, "মমতাজি, যে বাংলায় মা সারদার পুজো হত, সেই মা সারদাকে চিট ফান্ড বানালেন কী ভাবে!"কটাক্ষ করেছেন, "আপনার আঁকা ছবি ১ কোটি ৮০ লাখ টাকায় বিক্রি হয়েছে। আপনার ছবি কে কিনল, আর কার কার ছবি কিনেছে, তা বাংলার মানুষ জানতে চায়। আপনার মতো এমন চিত্রকরের জন্য দেশ গর্বিত!"দলীয় তহবিলের জন্য তৃণমূল নেত্রীর নিজের আঁকা ছবির প্রদর্শনী থেকে সারদা-কর্তা সুদীপ্ত সেন ছবি কিনেছিলেন, এমন অভিযোগ গত এক বছর ধরে বারেবারেই উঠেছে। অন্য বিরোধীদের মতোই সেই অভিযোগ এ দিন শোনা গিয়েছে মোদীর গলায়। এবং শুধু সেখানেই না থেমে মোদী হুঁশিয়ারি দিয়ে গিয়েছেন, "দিল্লিতে আমাদের সরকার হওয়ার পরে এই কেলেঙ্কারির ব্যাপারে কড়া ব্যবস্থা নেওয়া হবে। কাউকে ছাড়া হবে না!"


    Narendra Modi attacks Mamata Banerjee; TMC hits back, calls him 'butcher of Gujarat'

    by Sushmita Dutta

    Zee Media Bureau


    New Delhi/Kolkata: Hitting back at Bharatiya Janata Party's (BJP) prime ministerial candidate Narendra Modi over a personal comment made by him on West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee, the ruling Trinamool Congress on Sunday termed him as 'the Butcher of Gujarat'.


    In a series of tweets attacking Modi, Trinamool Congress termed Modi as 'The Butcher of Gujarat' who could not take care of his wife.


    Trinamool national spokesperson Derek O'Brien today wrote on party website, "The butcher of Gujarat could not take care of his own wife. How will he take care of this great nation?"


    "Modi has no answers to Bengal's development model and was therefore making personal attacks," he added.


    Heavily criticising Modi for defaming Mamata Banerjee over the amount being received after selling paintings of the West Bengal CM, O'Brien said, "TMC asks Modi to prove his charge that Mamata Banerjee 'pocketed' Rs 1.8 crore by selling one painting of hers or face defamation."


    Sarcastically lauding Banerjee's talent for painting, Modi today said, "Your paintings used to be sold for Rs four lakh, Rs 8 lakh or Rs 15 lakh, but what is the reason that one of your paintings sold for Rs 1.80 crore. I respect art. But who was the person who bought the painting for Rs 1.80 crore."




    He added, "Saradha is the other name of Saraswati, she is worshipped everywhere, and this Saradha turned into a chit fund? Mamataji, we did not expect this from you."


    "Personally, I have always respected you. But what have you done, you have broken the dreams of the people of Bengal," Modi said.


    "So much lust for the chair? The people of Bengal had so much expectations from you and gave you so much love, and you could have done so much for the state, but you are doing what the Left had been doing.


    You are walking on their footsteps only. You have imbibed the bad things of both the Left and the Congress," said Modi, who had in the beginning gone soft on Banerjee, but stepped up his attack on her recently.


    Turning to the large gathering, Modi asked whether those involved in the scam should be punished and whether the sufferers should not be paid back their investments.


    He further accused the Trinamool Congress government in the state of playing votebank politics and claimed that Mamata Banerjee supported illegal Bangaldeshi migrants for their votes.


    "Mamata ji has made Bengal a ground for vote-bank politics. People from Odisha, Bihar are considered outsiders, but Bangladeshis come and her face shines," Modi said.


    Taking on P Chidambaram, the Gujarat CM said, "You are the finance minister of the country, who are you trying to shield, who are you helping? Mamataji and Chidambaramji, the people of Bengal want to know who are you together trying to save?


    "I want to draw your attention that owing to some people, your image is getting sullied. This is not good for you and not for the country's democracy also," he said.

    গুজরাট সরকারে নরেন্দ্র মোদীর 'ডানহাত' যারা

    অঞ্জন রায় চৌধুরী, নয়াদিল্লি

    ভারতীয় জনতা পার্টির (বিজেপি) প্রধানমন্ত্রী প্রার্থী নরেন্দ্র মোদী ২০০১ সাল থেকে গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রীর দায়িত্ব পালন করছেন। চলতি লোকসভা নির্বাচনে তার গুজরাট মডেলটি বহুল প্রচারিত। গুজরাটে তার শাসনামল ভাল ছিল বলেই প্রচার করা হচ্ছে। গুজরাট সরকারে তিনি পূর্ণ কর্তৃত্বও স্থাপন করেছেন। আর এটা সম্ভব হয়েছিল কেবল তার কিছু বিশ্বস্ত লোকের জন্য। যারা তার 'ডানহাত' বলে পরিচিত।


    মোদী ভারতের প্রধানমন্ত্রী হলে তার এসব বিশ্বস্ত লোক দিল্লিতে বদলি হয়ে আসতে পারেন। তারাই মোদীকে নানা পরামর্শ দিয়ে সরকার পরিচালনায় সাহায্য করতে পারেন যেমনটি গুজরাটে করেছেন। এরা ভারতের সিভিল সার্ভিসের (আইএএস) উচ্চপদস্থ কর্মকর্তা। মোদীর সবচেয়ে বিশ্বস্ত ব্যক্তিটি হলেন আইএএস'র ১৯৭৯ ব্যাচের কর্মকর্তা কুনিল কৈলাসনাথান যিনি গুজরাটে মোদীর প্রধান মুখ্য সচিব হিসেবে দায়িত্ব পালন করছেন। মোদীর অত্যন্ত বিশ্বস্ত এই ব্যক্তিটি কে.কে নামে নামে পরিচিত। রাজনৈতিক বিষয়গুলো তিনিই দেখভাল করেছেন এবং তার মাধ্যমেই মোদী গুজরাটের আমলাতন্ত্রকে নিয়ন্ত্রণ করেছেন। ২০১৩ সালের ৩১ মে তিনি অবসরে গেলেও ওই বছরের পহেলা জুন থেকে তাকে দুই বছরের জন্য চুক্তিভিত্তিক নিয়োগ দেওয়া হয়।


    গুজরাটের গত দুটি বিধানসভা নির্বাচনে গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা রেখেছেন কুনিল। চলতি লোকসভা নির্বাচনে মোদীর রাজনৈতিক সমঝোতার ক্ষেত্রে পরামর্শদাতা হিসেবে কাজ করছেন এই কুনিল। মোদীর জন্য গুরুত্বপূর্ণ আরেকজন কর্মকর্তা হলেন জিসি মুর্মু যিনি গুজরাট মুখ্যমন্ত্রীর প্রধান সচিব হিসেবে দায়িত্ব পালন করছেন। ১৯৮৫ ব্যাচের এই কর্মকর্তা মোদী এবং তার অন্যতম ডানহাত অমিত শাহের আইনগত বিষয়গুলো দেখাশোনা করছেন। গুজরাটে মোদীর উন্নয়ন কাজ নিয়ে ব্যাপক প্রচারণা চালনা হচ্ছে লোকসভা নির্বাচনে। মোদীর এই উন্নয়নের ভাবমূর্তির পেছনে কাজ করেছেন ১৯৮৮ ব্যাচের আইএএস কর্মকর্তা এ কে শর্মা। তিনি এর আগে উত্তরপ্রদেশে কর্মরত ছিলেন। পরে তাকে গুজরাটে মুখ্যমন্ত্রীর অতিরিক্ত প্রধান সচিব হিসেবে নিয়ে আসা হয়। তিনিই গুজরাটে ব্যবসায় সম্মেলন এবং গুজরাটের অবকাঠামো খাত উন্নয়ন বোর্ডের প্রধান নির্বাহী হিসেবে দায়িত্ব পালন করেছেন। মোদীর কাছে গুরুত্বপূর্ণ সবচেয়ে জুনিয়ন কর্মকর্তা হচ্ছেন বিজয় নেহরা। ২০০১ ব্যাচের এই আইএএস কর্মকর্তা গত বছর পর্যন্ত আহমেদাবাদের ডিসি হিসেবে কর্মরত ছিলেন। তাকে গুজরাটের স্বরাষ্ট্রমন্ত্রণালয়ে যুগ্ন সচিব (আইনশৃঙ্খলা) হিসেবে বদলি করা হয়। তিনি অতিরিক্তি দায়িত্ব হিসেবে মোদীর অফিসের যুগ্ম সচিব হিসেবেও দায়িত্ব পালন করেন। এরপর তাকে মুখ্যমন্ত্রীর অফিসের অতিরিক্ত সচিব হিসেবে নিয়োগ দেওয়া হয়।



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  • 04/29/14--00:38: বাংলা ভাষায় কথা বললেই 'বাক্স-প্যাঁটরা সমেত ছুড়ে ফেলে দেবে'?১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-র পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে।” আসুন সংকল্প করি ,এই পৃথীবীতে বাংলা ভাষায় যারা কথা বলেন,তারা পৃথীবীর কোথাও এই বর্ণবিদ্বেষী নররক্তপিপাষুর সমর্থনে একটি ভোটও দেব না। ভোট 12 মেতে শেষ হচ্ছে,কিন্তু সারা ভারতে বাঙালির অস্থ্ব বিপর্যয়ে বাটের রাজনীতির উর্ধে বাঙালি জাতিসত্তার সব সীমান্ত ভেঙে ফেলার এই সংক্রমণকালে বাঙালি একজোট না হলে সারা ভারতবর্ষ কিন্তু পর্ব বঙ্গ হয়ে যাবে।
  • বাংলা ভাষায় কথা বললেই 'বাক্স-প্যাঁটরা সমেত ছুড়ে ফেলে দেবে'?১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-র পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে।"



    আসুন সংকল্প করি ,এই পৃথীবীতে বাংলা ভাষায় যারা কথা বলেন,তারা পৃথীবীর কোথাও এই বর্ণবিদ্বেষী নররক্তপিপাষুর সমর্থনে একটি ভোটও দেব না।

    ভোট 12 মেতে শেষ হচ্ছে,কিন্তু সারা ভারতে বাঙালির অস্থ্ব বিপর্যয়ে বাটের রাজনীতির উর্ধে বাঙালি জাতিসত্তার সব সীমান্ত ভেঙে ফেলার এই সংক্রমণকালে বাঙালি একজোট না হলে সারা ভারতবর্ষ কিন্তু পর্ব বঙ্গ হয়ে যাবে।


    পলাশ বিশ্বাস

    শ্রীরামপুরের স্টেডিয়াম মাঠে রবিবার সন্ধ্যায় এ রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রীকে কটাক্ষ করে মোদী বলেছিলেন, "মমতাজি ভোটব্যাঙ্কের দিকে তাকিয়ে এই রাজ্যে রাজনীতি শুরু করেছেন। বিহার, ওড়িশা থেকে এই রাজ্যে গরিব মানুষ কাজে এলে ওঁর রাগ হয়। তাঁদের পর মনে হয়। হেনস্থা হন তাঁরা। কিন্তু বাংলাদেশ থেকে সীমান্ত পেরিয়ে কেউ এলে উনি তাঁদের 'আদর'করে এই রাজ্যে রেখে দেন। ১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-র পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে।"


    তার প্রতিক্রিয়ায় এ দিন নবান্নের সামনে দাঁড়িয়ে মুখ্যমন্ত্রী বলেন, "দেশে কালো দিন টেনে আনা হচ্ছে। কাউকে কাউকে প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী ভাবা হচ্ছে। যিনি দেশের ইতিহাস জানেন না, ভূগোল জানেন না! তিনি বলছেন, বাংলাদেশীদের বাক্স-প্যাঁটরা নিয়ে ফিরে যেতে হবে। এমন অধিকার ওঁকে কে দিয়েছে?"


    বাংলা ভাষায় কথা বললেই 'বাক্স-প্যাঁটরা সমেত ছুড়ে ফেলে দেব' বলে ঘোষণা করেন মোদী।ভোটের ফল যা হোক,সারা দেশে বাঙালি বিতাড়ণের যে নক্সা নমোর,তাঁর ঘনিষ্ঠ ওবিসি সন্ত রামদেব যেমন দলিত উদিতরামরাজ-রামবিলাস পাসওয়ান-রামদাস আঠাওয়ালের গেরুয়াভোগেও ওবং উত্তর প্রদেশ ও অন্যত্র গৈরিক বহুজন আন্দোলন সংগঠনের দলিত ভোট ব্যান্ক  ভাঙ্গার খেলা ব্যর্থ হওয়ায় ওবিসি গৈরিকীকরণ এজেন্ডাপূরণে দলিত ঘরে রাহুল গান্ধীর হনীমুন মন্তব্য করেছেন,তারই অতিজঘণ্য বাস্তবায়ন বাঙালিদের বিরুদ্ধে বর্ণবিদ্বেষী যুদ্ধঘোষণায মোদীর।


    করপোরেট জাযনবাদী ফ্যাসিস্ট ধর্মান্ধ নরহত্যাধর্ষণদাঙ্গাবাজ রাজনীতির এই ন্যাংটা নাচে কথিত ভাবী প্রধানমন্ত্রী যে ভাষায় বাঙালি জাতির বিরুদ্ধে বর্ণবিদ্বেষী যুদ্ধঘোষণা করেছেন,তাঁর তুলনা ভারতভাগে বাঙালি ও পান্জাবি জাতিসত্তাকে খুন কারার চক্রান্ত এবং পুর্ব বঙ্গে বাঙালিদের বিরুদ্ধে বাংলা ভাষার বিরুদ্ধে জবরদস্তি উর্দু ভাষা চাপানোর ইতিহাস।বাঙালি একজোট হয়ে জাতি ধর্ম ভাষা দল মত নির্বিশেষ রুখে দাঁডালে কি হতে পারে,তার প্রমাণ জলজ্যান্ত বাংলাদেশ।


    2003 সালে নাগরিকত্ব সংশোধণী বিল পাশের আগেই সারা উত্তরাখন্ড ও উত্তরপ্রদেশে দলিত উদ্বাস্তু বাঙালি,দেশভাগের বলি যারা 1950 সালে সেখানে পুনর্বাসিত ভারতীয় নাগরিক,তাঁদের উত্তরাখন্ডের প্রথম বিজেপি সরকার বাংলাদেশী ঘুসপেঠিয়া তকমা দিয়েছিল,সেদিন সারা উত্তারাখন্ড একজোট হয়ে বিরোধিতা করেছিল,ঔ সময়ের বাংলা কাগজ খুলে দেখুন বাংলাও কিন্তু প্রথম বার বাংলার বাইরের স্বজনদের অস্তিত্ব রক্ষায় দলমতনির্বিশেষ গর্জে উঠেছিল,তাই উড়ীষ্যা বা মহারাষ্ট্রের মত উত্তরাখন্ড ও উত্তরপ্রদেশে বাঙালি বিতাড়ণের সংঘ পরিবারের এজেন্ডা পূরণ হয়নি।


    উত্তর প্রদেশ,উত্তরাখন্ড, বিহার, ঝারখন্ড, উড়ীষ্যা, ছত্তিশগড়, তামিলনাডু, অসম, মণিপুর,রাজস্থান,মহারাষ্ট্র,মধ্যপ্রদেশ,অন্ধ্র,কর্ণাটক,আন্দামান,নয়া দিল্লী,গুজরাত ও মুম্বাইয়ে এবং সারা দেশে উদ্বাস্তু বাঙালি ছাড়াও জীবন জীবিকার তাকীদে বহুসংখ্যক পশ্চিমবঙ্গীয় বাঙালি প্রবাসিরা স্বাধীনতাউত্থর ভারতে বংশানুক্রমে বসবাস করেন।নাগরিকত্ব সংশোধণী আইন ও ইউনিক আইডেন্টেটির আড়ালে বাঙালির জমি দখল করে করপোরেটহস্তান্তরণের যে চক্রান্ত চলছে বিগত এনডিএ জমানা থেকে,বাঙালি তাঁর বিরুদ্ধে এক জোট হয়ে আন্দোলন প্রতিবাদ করে থাকত যদি ,তবে বাংলার বূকে দাঁড়িয়ে কোথাকার কে হরিদাশ,রক্তে টোবানো যার জুবান,ছাপ্পান্ন ইন্চি ছাতি, তাঁ হিম্মতই হতনা অবাঙালিদের লেলিয়ে দিয়ে বাংলার বিরুদ্ধে,বাঙালির বিরুদ্ধে এই বর্ণবিদ্বেষি যুদ্ধগোষমা করার।


    আমি রাজনীতি করি না।

    আমি তৃণমুলি নই।আমি সিপিএম ও করিনা।

    আমরা যারা বাংলায় বাস করি,এমনকি যারা বামপন্থী আদর্শে বিশ্বাস করি নন্দীগ্রাম নরহত্যার বিরুদ্ধে সিঙ্গুর আন্গোসন পর্বে পথে পথে বাংলার অগ্নিকন্যা মমতা ব্যানার্জির নেতৃত্ব মেনে নিয়ে বাম অপশাসণের বিরুদ্ধে প্রতিবাদে গর্জে উঠেছিলাম।

    পরিবার্তন হল।বাম জমানা সাঙ্গ হল।

    ক্ষমতার লড়াইয়ে আমরা যারা বাংলা নাগরিক সমাজের মাথা মহাশ্বেতাদেবির সঙ্গে অত্যন্ত পারিবারিকভাবেও জড়িত,দিদির রাজত্বে ভাগ চাইনি কোনো দিন।


    বাম অপশাসণের বিরোধিতা করেছি কিন্তু বামপন্থী আদর্শ ত্যাগ করিনি,ক্ষমতার রাজনীতির চুলচেরা হিসাব আমাদের বোধশক্তির বাহিরে,কিন্তু আমরা সবাই বাঙালি,বাংলা ভাষার বিপর্যয়ে একতাবদ্ধ বাংলার মুখ দেখতে চাই আবার।


    আসুন সংকল্প করি ,এই পৃথীবীতে বাংলা ভাষায় যারা কথা বলেন,তারা পৃথীবীর কোথাও এই বর্ণবিদ্বেষী নররক্তপিপাষুর সমর্থনে একটি ভোটও দেব না।


    বিজেপির এই আস্ফালনের কিন্তু জবাব চাইঃ


    নরেন্দ্র মোদির বিরুদ্ধে তৃণমূল যা খুশি করতে পারে৷‌ ওরা আদালতে যেতে পারে৷‌ এতে আমাদের কিছু এসে যায় না৷‌ সোমবার বি জে পি রাজ্য সভাপতি ও উত্তর কলকাতার প্রার্থী রাহুল সিনহা এই মম্তব্য করেন৷‌ তিনি বলেন, সোমবার তৃণমূলের নেতারা বলেছেন, মোদির বিরুদ্ধে মানহানির মামলা করবেন৷‌ আদালতের দরজা খোলা আছে৷‌ মামলা করার স্বাধীনতা সকলেরই আছে৷‌ মামলা করলে মোদির কিছু এসে যাবে না৷‌ এবার বি জে পি নির্বাচনে ভাল ফল করবে৷‌ দিল্লি থেকেও কড়া বিবৃতি দিয়েছে বি জে পি৷‌ পশ্চিমবঙ্গের দায়িত্বে থাকা নেতা সিদ্ধার্থ সিং বলেছেন, মোদি-লহর জব্বর ধাক্কা দিয়েছে তৃণমূলনেত্রীকে৷‌ তাই মানসিক ভারসাম্য হারিয়ে ফেলেছেন তিনি৷‌ বুঝতে পেরেছেন, এবার জমি হারাচ্ছেন৷‌ তাঁর সরকার কোনওরকম উন্নয়নমূলক কাজ করছে না৷‌ তাই সাম্প্রদায়িক অ্যাজেন্ডা নিয়ে চলতে চাইছেন তিনি৷‌ এদিকে বুধবার পশ্চিমবঙ্গে তৃতীয় পর্যায়ের নির্বাচন৷‌ রাহুল সিনহা বলেন, আমরা মনে করি, ভোট সুষ্ঠুভাবে করার জন্য নির্বাচন কমিশন সবরকম উদ্যোগ নেবে৷‌ বীরভূম নিয়ে দলের রাজ্য সভাপতি কিছুটা আশঙ্কা প্রকাশ করে বলেন, আমরা নির্বাচন কমিশনের কাছে বীরভূম সম্পর্কে অভিযোগ করেছি৷‌ আমরা আমাদের আশঙ্কার কথা জানিয়েছি৷‌ আমরা আবার বলছি, শাম্তিপূর্ণ ভোট চাই৷‌ অবাধ ও সুষ্ঠু নির্বাচন হলে বাংলায় বি জে পি কয়েকটি আসন পাবে৷‌ এদিন বিকেলের পর রাহুল উত্তর কলকাতায় বিভিন্ন জায়গায় প্রচার করেন৷‌


    মমতা ব্যানার্জির আমরাও সমালোচণা করি।


    তাঁর রাজকার্য,রাজনীতি সমালোচণার উর্ধে নয়।


    কিন্তু বাঙালি বিদ্বেষের বিরুদ্ধে তিনি যে গর্জে উঠেছেন পুরাতণী  অগ্নিকন্যাকন্ঠে,বাঙালির বেঁচে বর্তে থাকারই ইহা জলজ্যান্ত প্রমাণ।


    পশ্চিমবঙ্গে নির্বাচনী জনসভায় বাংলাদেশি খেদাওয়ের জিগির তোলার পাশাপাশি বিভিন্ন ভাষাভাষী মানুষের ভাবাবেগে আঘাত করায় বিজেপির প্রধানমন্ত্রী প্রাথীর নরেন্দ্র মোদীর তীব্র সমালোচনা করেছেন তৃণমূল নেত্রী মমতা ব্যানার্জি।

    সোমবার কোলকাতার নবান্নে প্রবেশদ্বারের কাছে এক সংবাদ সম্মেলনে মমতা অভিযোগ করেন, "জাতপাতের নোংরা রাজনীতি করছেন মোদী। বাংলার মাটিতে দাঁড়িয়ে বিদ্বেষ ছড়াচ্ছেন। বাংলাকে বাঙালি-অবাঙালিতে ভাগ করতে চাইছেন। দাঙ্গা লাগিয়ে পালিয়ে যেতে চাইছেন। ভয়ঙ্কর কালো দিনের স্বপ্ন দেখাচ্ছেন। কিন্তু বাংলায় তা কোনোভাবেই সফল হবে না।"

    মমতা বলেন, "বাংলাদেশ পশ্চিমবঙ্গের প্রতিবেশী। তার সঙ্গে সুসম্পর্ক থাকবেই। যারা সেখান থেকে এ রাজ্যে এসেছেন, তারা ১৯৭১ সালে  মুজিবের সঙ্গে চুক্তি অনুযায়ী এসেছেন। তারা সবাই এ দেশেরই নাগরিক। পাকিস্তান থেকেও অনেকে পাঞ্জাবে এসেছেন। কিন্তু 'প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী' সেই ইতিহাস জানেন না।"

    রোববার শ্রীরামপুরে বিজেপি'র জনসভা থেকে পশ্চিমবঙ্গে বসবাসকারি কথিত বাংলাদেশিদের লোকসভা নির্বাচনের পর বাক্স গুছিয়ে নিয়ে তৈরি থাকার হুমকি দেন মোদী। জানিয়ে দেন, ১৬ মে'র পর এ রাজ্যে তাদের জায়গা হবে না।

    এমন বিদ্বেষমূলক উস্কানির পরই মোদীকে হুঁশিয়ারি দিয়ে মমতা বলেন, "রাজনীতি করতে গিয়ে বাংলায় জাতপাতের রাজনীতি টেনে আনার চেষ্টা করবেন না। গুজরাটে রক্তের নদী বইয়ে এসেছে, এখানে কী রক্তের সমুদ্র বওয়াবে? কে দিয়েছে তাকে এই কথা বলার অধিকার?"

    মোদী দার্জিলিংকে বাংলা থেকে ভাগ করতে চেয়েছে অভিযোগ করে পশ্চিমবঙ্গের মুখ্যমন্ত্রী বলেন, "বাংলার ঐক্য যে ভাঙতে আসবে, জনগণ তাকে ভেঙে দেবে। বাংলার মানুষ ভোটের মাধ্যমেই এমন কথার জবাব দেবে। - দাঙ্গাবাজদের কাছ থেকে কোনো জ্ঞান শুনতে চাই না।"

    মোদীর নাম উল্লেখ না করে তিনি বলেন, "গুজরাটের দুর্ভাগ্য একটা শয়তান, ডেঞ্জারাস লোক বসে আছে। এই মানুষ যদি দেশের প্রধানমন্ত্রী হন  দুঃসহ, ভয়ঙ্কর কালো দিন আসবে। এই মানুষ যদি চেয়ারে বসেন তাহলে অন্ধকূপ হত্যার  ঘটনা ঘটবে। সারা দেশটাকে জ্বালিয়ে দেবেন।"

    গতকাল রোববার রাতে পশ্চিমবঙ্গের হুগলি জেলার শ্রীরামপুরে সংগীতশিল্পী বাপ্পী লাহিড়ীর এক নির্বাচনী জনসভায় মোদী বলেছিলেন, "বিজেপি ক্ষমতায় যাওয়ার পর পশ্চিমবঙ্গের চাঞ্চল্যকর সারদা কেলেঙ্কারির সঠিক তদন্ত করবে। দোষীদের কাউকে ছাড়া হবে না।" তিনি আরো বলেন, "মমতা ভীষণ লোভী। বামেদের পথে হাঁটছে। তাই কংগ্রেস, বাম ও তৃণমূল-এই চক্রের বাইরে যেতে হবে বাংলাকে। আমার সঙ্গে থাকুন। আমি আপনাদের স্বরাজ দেব।"

    মমতা ব্যানার্জিকে কটাক্ষ করে গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রী বলেন, "আপনার আঁকা ছবি ১ কোটি ৮০ লাখ টাকায় বিক্রি হয়েছে। আপনার ছবি কে কিনল, তা বাংলার মানুষ জানতে চায়। আপনার মতো এমন চিত্রকরের জন্য দেশ গর্বিত!"

    মোদীর এই বক্তব্যের পর তৃণমূলের বিভিন্ন মহলে তীব্র ক্ষোভ ছড়িয়ে পড়ে। তৃণমূলের সর্বভারতীয় সাধারণ সম্পাদক মুকুল রায় এক সংবাদ সম্মেলনে বলেন, ছবি বিক্রির টাকা আত্মসাতের অভিযোগ প্রমাণ করতে না পারলে মোদীকে নিঃশর্ত ক্ষমা চাইতে হবে। তিনি ক্ষমা না চাইলে মানহানির মামলা করা হবে। এরইমধ্যে তৃণমূল কংগ্রেস বিষয়টি নিয়ে নির্বাচন কমিশনে অভিযোগ দায়ের করেছেন বলে মুকুল রায় জানান।

    এদিকে, তৃণমূলের অভিযোগের পর নরেন্দ্র মোদীর জনসভার সিডি তলব করেছে নির্বাচন কমিশন।#

    রেডিও তেহরান/এআর/২৯    


    নরেন্দ্র মোদির বিরুদ্ধে ক্ষোভে ফেটে পড়েছেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। বাংলায় বিভাজনের বিষ ছড়াচ্ছেন বলে সোমবার বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থীকে উদ্দেশ করে বলেছেন মুখ্যমন্ত্রী।


    শ্রীরামপুরে নমোর উসকানিমূলক ভাষণের তীব্র প্রতিক্রিয়ায় সোচ্চার হলেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। এ দিন নবান্নে সাংবাদিক বৈঠকে তিনি অভিযোগ জানান, বাংলায় বাঙালি-অবাঙালির বিভেদ তৈরিতে সচেষ্ট মোদি। উল্লেখ্য, রবিবার শ্রীরামপুরের সভায় মমতার বিরুদ্ধে আচমকা আক্রমণ শানিয়েছিলেন নমো। আসানসোলে মুখ্যমন্ত্রীর ভাষণ উদ্ধৃত করে এ দিন তিনি অভিযোগ করেন, হিন্দিভাষীদের 'বাংলার অতিথি' বলে মনে করলেও বাংলাদেশিদের প্রতি যথেষ্ট দুর্বল মুখ্যমন্ত্রী। এরপরই বাংলাদেশি অনুপ্রবেশকারীদের 'বাক্স-প্যাঁটরা সমেত ছুড়ে ফেলে দেব' বলে ঘোষণা করেন মোদি।


    গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রীর ঔদ্ধত্যকে চ্যালেঞ্জ জানিয়ে এদিন মমতার পাল্টা হুংকার, বাংলার বুকে জাত-পাতের রাজনীতি কোনো দিনই সমর্থন করা যাবে না। মোদির নামোচ্চারণ না করে তিনি বলেন, ইতিহাস বিশ্রুত হয়েছেন নমো। অখণ্ড বাংলার উদ্ধৃতি দিয়ে তিনি জানান, নানান জাতি ও ধর্মের মানুষকে চিরকাল বাংলা ঠাঁই দিয়েছে। তিনি দাবি করেন, গুজরাটের মতো বাংলায় বিভাজনের রাজনীতি করার চেষ্টা সফল হবে না। তাঁর প্রশ্ন, 'গুজরাটে রক্তগঙ্গা বইয়ে এসেছে। এখানে কি সমুদ্র বওয়াবে?' একই সঙ্গে তিনি সাবধান করে দেন, 'এই মানুষটা যদি দেশের প্রধানমন্ত্রী হয়, তবে দেশে কালো দিন ফিরে আসবে।'


    বস্তুত বিজেপি প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থীর বিরুদ্ধে এ দিন একের পর এক তোপ দাগেন মমতা। গোধরা কাণ্ডের স্মৃতি উসকে দিয়ে তাঁর দাবি, এখনো পর্যন্ত গুজরাট যা করে দেখাতে পারেনি, বাংলা সেই সাম্প্রদায়িক সম্প্রীতি বরাবর রক্ষা করে চলেছে। শ্রীরামপুরের সভামঞ্চ থেকে বাংলায় জাতিদাঙ্গার বাণী প্রচার করে লাভ হবে না বলে কটাক্ষ করেন তিনি। গেরুয়া নেতাকে এ দিন সরাসরি 'শয়তান ও দাঙ্গাবাজ' বলে অভিহিত করেন মুখ্যমন্ত্রী। একই সঙ্গে সংবাদ মাধ্যমকে এক হাত নিয়ে নমোর প্রচারে 'পেইড নিউজ' সম্পর্কেও কটাক্ষ করেন তিনি।


    এদিকে, এ দিনই নরেন্দ্র মোদির সভার সিডি তলব করল নির্বাচন কমিশন। অভিযোগ, এই ভাষণে সাম্প্রদায়িক উসকানি দিয়েছেন গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রী। মমতা ও কমিশনের জোড়া ফলায় বিঁধে কী রক্ষাকবচ এবার ব্যবহার করেন নমো, সেটাই এখন দেখার বিষয়।

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    মমতার প্রতিদ্বন্দ্বী বুদ্ধদেব ভট্টাটার্য ও একই সুরে এই নমো ,যুদ্ধঘোষণার প্রতিবাদ করেছেন।স্বাগত।


    ভোট 12 মেতে শেষ হচ্ছে,কিন্তু সারা ভারতে বাঙালির অস্থ্ব বিপর্যয়ে বাটের রাজনীতির উর্ধে বাঙালি জাতিসত্তার সব সীমান্ত ভেঙে ফেলার এই সংক্রমণকালে বাঙালি একজোট না হলে সারা ভারতবর্ষ কিন্তু পর্ব বঙ্গ হয়ে যাবে।



    বুদ্ধবাবু বলেছেনঃ


    সম্প্রতি রাজনৈতিক ঘটনাবলী বিশ্লেষণ করছি আমরা


    কংগ্রেসের অবস্থা ভাল নয়


    মনমোহন সমলাতে পারছেন না


    অন্য দিকে উঠে আসছেন মোদী


    রাজ্যের মানুষকে যতটা চিনি, তাকে মেনে নেবেন না মানুষ


    কংগ্রেস নয় বিজেপি নয়


    বিকল্প চাইছেন রাজ্যের মানুষ


    মানুষের জীবন দুর্বিসহ হয়ে উঠেছে


    জিনিসের দাম এখন লাগামছাড়া


    রাজ্যের সরকার চুপ করে রয়েছে


    তাঁরা উৎসব নিয়ে ব্যস্ত


    পেট্রোল ডিজেলের দামবৃদ্ধিতে মানুষ অতিষ্ট


    মহিলাদের ওপর আক্রমণ বাড়ছেই


    অপরাধীরা বেপরোয়া হয়ে উঠছে


    এটা মানুষ মেনে নেবে না


    বললেন বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য

    মেহমান-তরজায় মোদীকে আক্রমণ মুখ্যমন্ত্রীর

    নিজস্ব প্রতিবেদন

    ২৯ এপ্রিল, ২০১৪, ০৩:৩৪:৩৯

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    সাংবাদিক বৈঠকে মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। সোমবার নবান্নে। ছবি: সুদীপ আচার্য

    ভিন্ রাজ্য থেকে আসা মানুষকে বলেছিলেন 'মেহমান'। সপ্তাহতিনেক আগে। সেই মন্তব্য নিয়ে প্রশ্ন তোলায় এ বার ভিন্ রাজ্যের এক মুখ্যমন্ত্রীকে বললেন 'হরিদাস'! 'ভয়ঙ্কর লোক'এবং 'শয়তান'বিশেষণও বাদ গেল না!

    প্রশ্নকর্তার নাম নরেন্দ্রভাই দামোদরদাস মোদী। জবাবে পাল্টা আক্রমণকারীর নাম মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়!

    সারদা-কাণ্ড নিয়ে চাঁছাছোলা আক্রমণ করে ২৪ ঘণ্টা আগেই রাজ্যে নির্বাচনী লড়াইয়ের পারদ চড়িয়ে দিয়ে গিয়েছিলেন বিজেপি-র প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী। এ বার মোদীকে ব্যক্তিগত স্তরে ঝাঁঝালো পাল্টা আক্রমণ করে তাতে নতুন মাত্রা জুড়লেন রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রী। তবে এই আক্রমণের উপলক্ষ সারদা নয়। বিষোদগারের কেন্দ্রে ভিন্ রাজ্যের বাসিন্দা ও বাংলাদেশি সংক্রান্ত মোদীর মন্তব্য।

    মোদী পশ্চিমবঙ্গে ভিন্ন ভাষাভাষী এবং ধর্মীয় সংগঠনের মধ্যে ভেদাভেদ সৃষ্টি করে সংঘর্ষ বাধাতে চাইছেন বলে অভিযোগ করে এ দিন নবান্ন চত্বরে মমতা বলেছেন, "বাঙালি-অবাঙালি ভাগ করে দিচ্ছে। এত বড় সাহস? এত বড় বুকের পাটা! কে তুই! কে ভাই! কোন হরিদাস?"মোদীকে মমতার হুঁশিয়ারি, "বাংলায় জাতপাতের রাজনীতি আনার চেষ্টা করবেন না! রাজনীতি করছেন করুন, কিন্তু এই ধরনের কথাবার্তা কেন? কোনও ইতিহাস জানে না!"

    মোদীর কোন মন্তব্যের প্রেক্ষিতে মমতার এ হেন আক্রমণ?

    শ্রীরামপুরের স্টেডিয়াম মাঠে রবিবার সন্ধ্যায় এ রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রীকে কটাক্ষ করে মোদী বলেছিলেন, "মমতাজি ভোটব্যাঙ্কের দিকে তাকিয়ে এই রাজ্যে রাজনীতি শুরু করেছেন। বিহার, ওড়িশা থেকে এই রাজ্যে গরিব মানুষ কাজে এলে ওঁর রাগ হয়। তাঁদের পর মনে হয়। হেনস্থা হন তাঁরা। কিন্তু বাংলাদেশ থেকে সীমান্ত পেরিয়ে কেউ এলে উনি তাঁদের 'আদর'করে এই রাজ্যে রেখে দেন। ১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-র পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে।"

    তার প্রতিক্রিয়ায় এ দিন নবান্নের সামনে দাঁড়িয়ে মুখ্যমন্ত্রী বলেন, "দেশে কালো দিন টেনে আনা হচ্ছে। কাউকে কাউকে প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী ভাবা হচ্ছে। যিনি দেশের ইতিহাস জানেন না, ভূগোল জানেন না! তিনি বলছেন, বাংলাদেশীদের বাক্স-প্যাঁটরা নিয়ে ফিরে যেতে হবে। এমন অধিকার ওঁকে কে দিয়েছে?"

    তৃণমূল নেত্রীর এমন মন্তব্যের আবার তীব্র সমালোচনা করা হয়েছে বিজেপি-র তরফে। পাশাপাশি দেওয়া হয়েছে মোদীর মন্তব্যের কিছু ব্যাখ্যাও। বিজেপি-র রাজ্য সভাপতি রাহুল সিংহের কথায়, "বাংলাদেশ থেকে আসা শরণার্থী আর অনুপ্রবেশকারীদের মধ্যে ফারাক আছে। আমাদের এই অবস্থান বহু দিনের। শরণার্থীদের জন্য কিছুই বলেননি মোদী। তিনি বলেছেন অনুপ্রবেশকারীদের ব্যাপারে।"সম্প্রতি অসমে গিয়ে মোদী এ ব্যাপারে আরও স্পষ্ট করে তাঁর মত জানিয়েছিলেন বলেও রাহুলবাবু উল্লেখ করেছেন। বিজেপি-র অভিযোগ, মোদীর কথাকে হাতিয়ার করে পূর্ববঙ্গের মানুষজনের ভাবাবেগ উস্কে দেওয়ার চেষ্টা করছেন তৃণমূল নেত্রী। কিন্তু মোদী আদৌ ও'পার বাংলা থেকে সব মানুষকে এক করে কিছু বলেননি বলে তাদের দাবি।

    মমতা অবশ্য মোদীর বিরুদ্ধে তোপ দেগে বলেছেন, "প্রথম দিন বলল, দার্জিলিং ভাগ করে দাও। এ বার বাঙালিদের, বাংলাকে ভাগ করার কথা বলছে। হিন্দু-মুসলমান ভাগ করতে চাইছে। বাংলার মাটিতে দাঁড়িয়ে বিদ্বেষ ছড়াচ্ছে। দেশের লোককে যে ভালবাসতে পারে না, সে দেশের নেতৃত্ব দেবে?"মোদীকে হুঁশিয়ারি দিয়ে মমতা বলেন, "দাঙ্গা লাগানো থেকে বিরত থাকা উচিত। তিনি বলেন, "দার্জিলিঙের ভাইবোনেরা এ বার ওঁর বাক্সপ্যাঁটরা গুটিয়ে ওঁকে বুঝিয়ে দেবেন!"

    কিন্তু মোদী শ্রীরামপুরের সভায় ওই কথা বললেন কেন?

    রাজ্য বিজেপি সূত্রের বক্তব্য, গত ৪ এপ্রিল তৃণমূল নেত্রী কুলটির জনসভায় বিহার, উত্তরপ্রদেশ-সহ অন্য রাজ্য থেকে যে সব মানুষ এখানে আসেন, তাঁদের 'মেহমান'বলে অভিহিত করেছিলেন। ওই সভায় মমতা বলেছিলেন, "উত্তরপ্রদেশ, বিহার থেকে যাঁরা এসেছেন, তাঁরা আমাদের মেহমান। তাঁদের দেখতে হবে, ভাল ভাবে রাখতে হবে।"

    বিজেপি-র মুখপাত্র সিদ্ধার্থনাথ সিংহ আসানসোলে সাংবাদিক সম্মেলনে মুখ্যমন্ত্রীর ওই মন্তব্যের প্রতিবাদ জানিয়েছিলেন। সিদ্ধার্থনাথ ওই দিন বলেছিলেন, "এখানে ভিন্ রাজ্যের প্রচুর পরিবার বংশ পরম্পরায় বাস করছেন, সৌভ্রাতৃত্বের সঙ্গে রয়েছেন। তাঁরা হঠাৎ মেহমান কেন হয়ে যাবেন?"রাজ্য বিজেপি ওই বক্তব্যকে আপত্তিকর বলে নির্বাচন কমিশনের কাছে অভিযোগও দায়ের করেছিল। মমতার ওই মন্তব্যের প্রেক্ষিতেই রবিবার শ্রীরামপুরের সভায় মোদী ওই মন্তব্য করেন বলে রাজ্য বিজেপি-র অভিমত। দলের রাজ্য সভাপতি রাহুলবাবু এ দিনও বলেছেন, "নিজেদের রাজ্যের পাট চুকিয়ে অনেক মানুষ এ রাজ্যেই রয়েছেন অনেক বছর ধরে। পশ্চিমবঙ্গের উন্নয়ন প্রক্রিয়ায় তাঁরাও সামিল। মুখ্যমন্ত্রীর মন্তব্যে তাঁদের অনেকেই খুব আঘাত পেয়েছেন বলে আমাদের জানিয়েছিলেন। মোদী সেই কথাই বলেছেন।"রাহুলবাবুর আরও দাবি, "তার জবাব দিতে গিয়ে মুখ্যমন্ত্রীই এ দিন বুঝিয়ে দিয়েছেন, বিভাজন তিনিই করছেন!"

    এ রাজ্যে বাঙালিদের সঙ্গে অন্য ভাষাভাষীদের যে কোনও বিরোধ নেই, তা বোঝাতে মমতা এ দিন বলেন, "প্রেসিডেন্সির প্রধান পদে অনুরাধা লোহিয়াকে বসানো হয়েছে। তিনি এক জন মাড়োয়ারি মহিলা। রাজ্যের ডিজি অন্ধপ্রদেশের মানুষ। অনেক আধিকারিক আছেন, যাঁরা অন্য রাজ্যের। তাঁরা ভাল কাজ করছেন। আমার গাড়ির চালকও বিহারী। তাতে কী হয়েছে!"অ-বাংলা ভাষাভাষীদের দিকে তাঁর সরকার কী ভাবে নজর দিচ্ছে, তা বোঝাতে মমতা বলেন, "এখানে ছট পুজোয় ছুটি দেওয়া হচ্ছে। আমি গঙ্গাপুজো করি। সবেবরাতেও যাই।"তাঁর দাবি, গুজরাতে ছট পুজোয় কোনও ছুটি দেওয়া হয় না। ইন্টারনেট ঘেঁটে জানার পরেই তিনি এই দাবি করছেন বলে মমতা জানান। তাঁর মন্তব্য, "বাংলা, হিন্দি, উর্দু কোনও ভাষাতেই কথা বলা অপরাধ নয়।"

    প্রতিবেশী রাষ্ট্র বাংলাদেশের সঙ্গে ঝগড়া করা উচিত হবে কি না, সেই প্রশ্নও তুলেছেন মুখ্যমন্ত্রী। তিনি বলেন, ইন্দিরা-মুজিব চুক্তি, নেহরু-লিয়াকত চুক্তি অনুযায়ী ১৯৭১ সাল পর্যন্ত যাঁরা এ দেশে এসেছেন, তাঁরা সবাই ভারতীয় নাগরিক। তার পরেও কেউ বিপদে পড়ে এলে তাঁদের ঠেলে ফিরিয়ে দেওয়া যাবে না। এ ব্যাপারে রাষ্ট্রপুঞ্জের একটা নিয়ম আছে। মুখ্যমন্ত্রীর বক্তব্য, "কোচবিহারেও অনেক বাংলাদেশি আছেন। তাতে কী হয়েছে! অসমেও গোলমালের পরে অনেকে এ রাজ্যে আশ্রয় নিয়েছে। এটাই মানবিকতার ধর্ম।"

    ভিন্ রাজ্য থেকে এসে এ রাজ্যের বাসিন্দাদের কাছে তৃণমূল নেত্রীর আহ্বান, মোদীর কথার প্রতিবাদে তাঁরা জোট বেঁধে বিজেপি-র বিরুদ্ধে ভোট দিন। গরিব মানুষের উন্নয়নে পশ্চিমবঙ্গ গুজরাতের চেয়ে অনেক এগিয়ে আছে বলে দাবি করে সে রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রীর প্রতি মমতার কটাক্ষ, "উনি প্রধানমন্ত্রীর চেয়ারে বসলে দুঃসহ দিন আসবে। অন্ধকূপ হত্যার মতো সারা দেশকে জ্বালিয়ে দেবেন। যে ভাবে গুজরাতে শিশু, গর্ভবতী মহিলাদের জ্বালিয়ে দেওয়া হয়েছে!"সঙ্গে আরও সংযোজন, ''তাকানোটাই ভয়ঙ্কর! তাকাচ্ছে আর সব জ্বালিয়ে দিচ্ছে! দাঙ্গারাজের কাছ থেকে আমি কোনও কথা শুনতে চাই না!"

    এরই সঙ্গে মমতার প্রশ্ন, নির্বাচনী প্রচারে এত হাজার হাজার কোটি টাকা বিজেপি খরচ করছে কোথা থেকে? তাঁর দাবি, "নির্বাচনে জেতার জন্য এখানে জাতপাতের ব্যবসা করছে। বাঙালিদের মধ্যে বিভেদ ঘটানোর যে কথা তিনি (মোদী) এ রাজ্যে এসে বলে গিয়েছেন, সেটা নির্বাচন কমিশনের দেখা উচিত। কমিশন শুধু তৃণমূলের দোষ দেখে বেড়াচ্ছে!"


    ই সময় ডিজিটাল ডেস্ক: নাম না-করে নরেন্দ্র মোদীর বিরুদ্ধে ক্ষোভে ফেটে পড়লেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। বাংলায় বিভাজনের বিষ ছড়াচ্ছেন বলে সোমবার বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থীকে তোপ দাগলেন মুখ্যমন্ত্রী।


    শ্রীরামপুরে নমোর উস্কানিমূলক ভাষণের তীব্র প্রতিক্রিয়ায় সোচ্চার হলেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। এদিন নবান্নে সাংবাদিক বৈঠকে তিনি অভিযোগ জানান, বাংলায় বাঙালি-অবাঙালির বিভেদ তৈরিতে সচেষ্ট মোদী। উল্লেখ্য, রবিবার শ্রীরামপুরের সভায় মমতার বিরুদ্ধে আচমকা আক্রমণ শানিয়েছিলেন নমো। আসানসোলে মুখ্যমন্ত্রীর ভাষণ উদ্ধৃত করে এদিন তিনি অভিযোগ করেন, হিন্দিভাষীদের 'বাংলার অতিথি' বলে মনে করলেও বাংলাদেশিদের প্রতি যথেষ্ট দুর্বল মুখ্যমন্ত্রী। এরপরই বাংলাদেশি অনুপ্রবেশকারীদের 'বাক্স-প্যাঁটরা সমেত ছুড়ে ফেলে দেব' বলে ঘোষণা করেন মোদী।


    গুজরাতের মুখ্যমন্ত্রীর ঔদ্ধত্যকে চ্যালেঞ্জ জানিয়ে এদিন মমতার পাল্টা হুংকার, বাংলার বুকে জাত-পাতের রাজনীতি কোনওদিনই সমর্থন করা যাবে না। মোদীর নামোচ্চারণ না করে তিনি বলেন, ইতিহাস বিশ্রুত হয়েছেন নমো। অখণ্ড বাংলার উদ্ধৃতি দিয়ে তিনি জানান, নানান জাতি ও ধর্মের মানুষকে চিরকাল বাংলা ঠাঁই দিয়েছে। তিনি দাবি করেন, গুজরাতের মতো বাংলায় বিভাজনের রাজনীতি করার চেষ্টা সফল হবে না। তাঁর প্রশ্ন, 'গুজরাতে রক্তগঙ্গা বইয়ে এসেছে। এখানে কি সমুদ্র বওয়াবে?' একই সঙ্গে তিনি সাবধান করে দেন, 'এই মানুষটা যদি দেশের প্রধানমন্ত্রী হয়, তবে দেশে কালো দিন ফিরে আসবে।'


    বস্তুত বিজেপি প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থীর বিরুদ্ধে এদিন একের পর এক তোপ দাগেন মমতা। গোধরা কাণ্ডের স্মৃতি উস্কে দিয়ে তাঁর দাবি, এখনও পর্যন্ত গুজরাত যা করে দেখাতে পারেনি, বাংলা সেই সাম্প্রদায়িক সম্প্রীতি বরাবর রক্ষা করে চলেছে। শ্রীরামপুরের সভামঞ্চ থেকে বাংলায় জাতিদাঙ্গার বাণী প্রচার করে লাভ হবে না বলে কটাক্ষ করেন তিনি। গেরুয়া নেতাকে এদিন সরাসরি 'শয়তান ও দাঙ্গাবাজ' বলে অভিহিত করেন মুখ্যমন্ত্রী। একই সঙ্গে সংবাদ মাধ্যমকে একহাত নিয়ে নমোর প্রচারে 'পেইড নিউজ' সম্পর্কেও কটাক্ষ করেন তিনি।


    এদিকে, এদিনই নরেন্দ্র মোদীর সভার সিডি তলব করল নির্বাচন কমিশন। অভিযোগ, এই ভাষণে সাম্প্রদায়িক উস্কানি দিয়েছেন গুজরাতের মুখ্যমন্ত্রী। মমতা ও কমিশনের জোড়া ফলায় বিঁধে কী রক্ষাকবচ এবার ব্যবহার করেন নমো, সেটাই এখন দেখার।


    এই সময়: রাজ্যের যে সমস্ত কেন্দ্রে বিজেপির কিছু পকেট ভোট আছে, হাওড়া লোকসভা তার অন্যতম৷ সেখানে প্রচারে গিয়ে নরেন্দ্র মোদীকে ব্যক্তিগত এবং রাজনৈতিক, দু'রকম আক্রমণই করলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়৷ শ্রীরামপুরের সভায় মোদী তাঁকে আক্রমণ করার আগেই মমতা নাম না করে গুজরাটের মুখ্যমন্ত্রী সম্পর্কে বলেন, 'এক জন বড় নেতা তার স্ত্রীকেই সম্মান দেয় না৷ যারা নিজের ঘর সামলাতে পারে না, তারা আবার দেশ কী চালাবে?' নাম না-করে তাঁকে 'গ্যাস বেলুনবাবু' বলে কটাক্ষও করেন মুখ্যমন্ত্রী৷ বাংলার জন্য বিজেপির সাম্প্রতিক দরদকে কটাক্ষ করে মমতা বলেন, 'ইলেকশনের সময় বলতে এসেছেন বাংলার টাকা পাওয়া উচিত৷ সাড়ে তিন বছর ধরে আমরা যখন সংসদে এই দাবি জানিয়ে এসেছি তখন একবারও বলেননি কেন?'


    লোকসভা উপনির্বাচনের ফলাফলেই স্পষ্ট, হাওড়ায় তৃণমূলের এ বার 'অ্যাসিড টেস্ট'৷ বিজেপি প্রার্থী প্রত্যাহার করে নেওয়ার পরেও মাত্র ২৭০০ হাজার ভোটে জিতেছিলেন তৃণমূল প্রার্থী প্রসূন বন্দ্যোপাধ্যায়৷ এ বার আক্ষরিক অর্থেই এই কেন্দ্রে চতুর্মুখী লড়াই৷ সেখানে মোদীর দলকে মমতা কতটা সমীহ করতে বাধ্য হচ্ছেন, তা তাঁর বক্তৃতা থেকেই স্পষ্ট৷ রবিবার সালকিয়ার জনসভায় মমতা বলেন, দেশের নেতা তিনিই হন যিনি সবাইকে সঙ্গে নিয়ে চলেন৷ যেমন নেতাজি, গান্ধীজি৷ যারা ভাগাভাগি করে, তারা দেশনেতা নয়৷'


    চরিত্রে অনেকটা বড়বাজার বা মধ্য কলকাতার মতো এই কেন্দ্রেও অবাঙালি ভোট বড় ফ্যাক্টর৷ মমতার অভিযোগ, বিভাজনের রাজনীতিতে হিন্দিভাষীদের ভোট টানতে চাইছে বিজেপি৷ এই প্রশ্নেই বিজেপিকে তাঁর হুঁশিয়ারি, 'বাঙালি-বিহারি ভাগ করতে দেব না৷ রাম-রহিম ভাগ করছ? যদি দুষ্ট চোখ নিয়ে তাকাও, বাংলার মানুষ ভস্ম করে দেবে৷' লোকসভা নির্বাচনের প্রচারে বিজেপি যে বিপুল অর্থব্যয় করছে তার উত্‍স নিয়েও প্রশ্ন তুলেছেন মুখ্যমন্ত্রী৷ তিনি এও বলেন, বিজেপি সরকারি ভাবেই বলছে, ওদের নির্বাচনী ব্যয় পাঁচ হাজার কোটি টাকা৷ একাধিক শিল্পগোষ্ঠীর আর্থিক মদতেই নরেন্দ্র মোদী ও তাঁর দলের আঙুল ফুলে কলাগাছ হয়েছে৷ বিদেশ থেকেও অর্থসাহায্য আসছে বলে অভিযোগ করেন মুখ্যমন্ত্রী৷ তাঁর কথায়, 'দু'টো রিফাইনারি ওদের আছে৷ রিলায়্যান্স আর এসার৷ এনআএরআইদের থেকেও টাকা আসে৷'


    বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থীর নাম না করে তিনি বলেন, 'গ্যাস বেলুনে পাম্প দেওয়া হয়েছে৷ গ্যাস বেলুনবাবু ১০০ দিনের কাজে আপনার রাজ্যে কত টাকা খরচ করেছেন?' শিশু মৃত্যুরোধ, সংখ্যালঘু উন্নয়ন, ক্ষুদ্রশিল্পে কর্মসংস্থান সৃষ্টি- সমস্ত ক্ষেত্রেই বাংলা গুজরাটের চেয়ে এগিয়ে আছে বলেও প্রতিটি জনসভায় পরিসংখ্যান-সহ দাবি করছেন মুখ্যমন্ত্রী৷


    মোদীর বিরোধিতায় সিংহভাগ সময় ব্যয় করলেও কংগ্রেস সম্পর্কেও ভোটারদের সতর্ক করেছেন তৃণমূল নেত্রী৷ বলেছেন, 'মিলিয়ে নেবেন, ভোটে জিতলে ওরা আবার তেল এবং গ্যাসের দাম বাড়াবে৷' অবশ্য কেন্দ্রে বিজেপি সরকার এলেও এর অন্যথা হবে না বলে দাবি মমতার৷ তবে তাঁর শেষ কথা, 'কংগ্রেস-বিজেপি-সিপিএম চায় না যে, দেশে অন্য কোনও নতুন শক্তি উঠে আসুক৷ কিন্ত্ত আমরা তৃতীয় বৃহত্তম শক্তি হিসেবে আত্মপ্রকাশ করবই৷'


    তৃণমূলের ভোট ভাগের অঙ্কে জেতার স্বপ্ন দেখছে সিপিএম


    HOOGHLY

    প্রচারে হুগলি কেন্দ্রের তৃণমূল প্রার্থী রত্না দে নাগ

    কৌশিক প্রধান ও প্রদীপ চক্রবর্তী


    হুগলি: দুপুর তিনটে৷ গনগনে গরমের দুপুরে রাস্তায় লোকজন না থাকাটাই স্বাভাবিক৷ হঠাত্‍ই কোলাহল শুনে ধনিয়াখালি ব্লকের কাঁটুল গ্রামে পুকুরের পাশের এক ফালি রাস্তা পার হতেই দেখা গেল একটা ছোট্ট মাঠে জনা পঞ্চাশ গ্রামবাসীর ভিড়৷ তাঁদের মাঝখানে কয়েক জন সঙ্গী-সহ হুগলি কেন্দ্রের সিপিএম প্রার্থী প্রদীপ সাহা৷ ধনিয়াখালি ব্লকের যে গুটিকয়েক গ্রামে এখনও সিপিএমের প্রভাব রয়েছে, তার মধ্যে কাঁটুল অন্যতম৷ হুগলি জেলা পরিষদের প্রাক্তন সভাধিপতি প্রদীপবাবুকে কাছে পেয়ে তাঁর কাছে তখন বিস্তর নালিশ জানাতে ব্যস্ত গ্রামবাসীরা৷ 'দেখছেন তো কী অবস্থা! তিন-চার মাস ধরে এঁরা ১০০ দিনের কাজের টাকা পায়নি৷ ১০০ দিনের কাজে প্রথম হতে হবে বলে কাজ করিয়ে নিয়েছে, অথচ মানুষের প্রাপ্য টাকা দেওয়ার ব্যাপারে নৈব নৈব চ৷' ঘাড় নাড়তে নাড়তে বললেন প্রদীপবাবু৷


    ৩৫ মাসে রাজ্যে তৃণমূল সরকারের কাজের 'নমুনা'ই তাঁকে হুগলি কেন্দ্রে জেতার স্বপ্ন দেখাচ্ছে৷ এই কেন্দ্রের অন্তর্গত সাতটি বিধানসভা কেন্দ্রের মধ্যে ৬টিতেই তৃণমূলের বিধায়ক৷ বামেদের পক্ষে শিবরাত্রির সলতে বলতে শুধুমাত্র পান্ডুয়া বিধানসভা কেন্দ্র৷ তাতেও দমছেন না প্রদীপবাবু৷ কর গুনতে গুনতে বললেন, 'আমরা পান্ডুয়া, বলাগড়, সপ্তগ্রামে ভাল লিড পাব৷ আর ধনিয়াখলিতে শাসক দলের সন্ত্রাস অগ্রাহ্য করে মানুষ ভোট দিতে পারলে সেখানেও সবচেয়ে বেশি ভোটে এগিয়ে থাকব৷ সিঙ্গুরের মানুষ দেখেছেন কী ভাবে তাঁরা প্রতারিত হয়েছেন৷ তাই ওখানেও লিড হবেই৷'


    এ সব কথা শুনে হো হো করে হেসে উঠলেন তপন দাশগুপ্ত৷ তৃণমূলের জন্মলগ্ন থেকে হুগলি জেলায় দলের সভাপতি৷ '১৯৯৮-তে হুগলিতে হেরেছিলাম পাঁচ হাজার ভোটে৷ ১৯৯৯-তে ১১ হাজার ভোটে৷ ২০০৯-তে ৮০ হাজারের বেশি ভোটে আমাদের প্রার্থী রত্না দে নাগ জেতার পর সিপিএমের সংগঠন কোথায়? তার পর থেকে সিপিএম, কংগ্রেসের কর্মী-সমর্থক তো পাল বেঁধে আমাদের দলে আসছে৷ এ বার আমরা কম করে ১ লক্ষ ২৫ হাজার ভোটে জিতব,' দাবি তপনবাবুর৷


    কিন্ত্ত, জয়ের ব্যবধান কি এ বার সত্যিই বাড়বে তৃণমূলের? সারা রাজ্যে এ বার যা অবস্থা, হুগলিতেও তাই৷ ভোটের ময়দানে প্রবল পরাক্রমে হাজির বিজেপি৷ জয়-পরাজয়ের নিষ্পত্তিতে এই আসনে একমাত্র ফ্যাক্টর বিজেপি৷ এই কেন্দ্রে বিজেপি প্রার্থী সাংবাদিক চন্দন মিত্রের ভোট সেনাপতি ইন্দ্রনীল রায়চৌধুরীর কথায়, 'আমরা গত লোকসভা ভোটে এই কেন্দ্রে ৪০ হাজারের মতো ভোট পেয়েছিলাম৷ নরেন্দ্র মোদীজির নামে মানুষের থেকে এ বার যে সাড়া পাচ্ছি, তাতে মনে হচ্ছে আমাদের ভোট দু'লক্ষ পেরিয়ে যাবে৷' বাংলার মাটিতে বিজেপির এই আত্মপ্রত্যয় এল কোথা থেকে? চন্দনবাবুর জবাব, 'কী করেছে তৃণমূল হুগলিতে? চটকলগুলো ধঁুকছে৷ সাহাগঞ্জে ডানলপের দরজা এখনও বন্ধ৷ উপযুক্ত সংরক্ষণের অভাবে ফসল মাঠেই নষ্ট হচ্ছে৷ আমি জিতলে এই সমস্যাগুলির সমাধান করব৷ আর সিঙ্গুরে আইটি পার্ক গড়ার ব্যাপারে টিসিএসের সঙ্গে কথা বলব৷'


    সিপিএম, তৃণমূল নেতারাও আড়ালে আবডালে মানছেন চুঁচুড়া, চন্দননগরের মতো শহরকেন্দ্রিক বিধানসভা আসনগুলিতে বিজেপি এ বার ভালোই বেগ দেবে৷ আর বিজেপির ভোট যদি দু'লক্ষর জায়গায় এক লক্ষও হয়, তা হলেও আসনের যাবতীয় সমীকরণ বদলে যাবে৷ বিশেষ করে রবিবার শ্রীরামপুরে নরেন্দ্র মোদীর সভার পর বিজেপির পালে হাওয়া আরও বেড়েছে বলেই মনে করা হচ্ছে৷


    সিপিএমের আশা, বিজেপি ভোট কাটবে তৃণমূলের৷ আর তার জেরেই সামান্য ব্যবধানে হলেও বেরিয়ে যাবেন প্রদীপবাবু৷ এই অবস্থায় জয় নিশ্চিত করতে তৃণমূলের লক্ষ্য ধনিয়াখালি থেকে যথাসম্ভব লিড বাড়িয়ে নেওয়া৷ বিরোধীদের অভিযোগ, শাসক দলের শাসানি, হাঙ্গামায় তারা ধনিয়াখালিতে প্রচারই করতে পারছে না৷ যদিও ধনিয়াখালি এলাকার তৃণমূল নেতা সৌমেন ঘোষ (পটল)-এর দাবি, বাম আমলের থেকে এলাকা এখন অনেক শান্ত৷ তাঁর কথায়, 'বিরোধীদের সভায় লোক হচ্ছে না বলেই ওরা এ সব বলছে৷'


    হুগলি কেন্দ্রে কংগ্রেস প্রার্থী করেছে প্রীতম ঘোষকে৷ কিছু দেওয়াল লিখন এবং পোস্টার ছাড়া গোটা হুগলি কেন্দ্রে তাঁর অস্তিত্বই বোঝা যাচ্ছে না৷ কংগ্রেস প্রার্থীর সমর্থনে পথসভা, মিটিং-মিছিলও তেমন একটা হয়নি৷ কয়েকটি রাস্তার মোড়ে শুধু বাজছে প্রীতমবাবুর রেকর্ড করা বক্তব্যের ক্যাসেট৷ ১৬ মে-র আগে ফল জানা যাবে না ঠিকই, তবে কংগ্রেস যে একেবারেই লড়াইয়ে নেই, সে কথা বলাই যায়৷

    http://eisamay.indiatimes.com/state/copy-on-hoogly-lok-sabha-constituency/articleshow/34340364.cms

    কংগ্রেস ডুবন্ত জাহাজ, মা-ছেলের দিন শেষ, জি নিউজ EXCLUSIVE

    Last Updated: Monday, April 28, 2014, 23:40  

    কংগ্রেস ডুবন্ত জাহাজ, মা-ছেলের দিন শেষ, জি নিউজ EXCLUSIVEদেশে শুরু হয়ে গেছে লোকসভা নির্বাচন। আর মাত্র দুদিন পরই সপ্তম দফার নির্বাচন। তার আগে জি নিউজ এক্সক্লুসিভ সাক্ষাতকার দিলেন বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী নরেন্দ্র মোদী।


    মোদী বলেন, "যখন নির্বাচনের দিন ঘোষিত হয়েছিল, কংগ্রেস ভেবেছিল ফলাফল ত্রিমুখী হবে। ওরা বলছিল মোদীকে কখনই প্রধানমন্ত্রী হতে দেব না। আমরাই ফিরব তৃতীয় ফ্রন্ট হিসেবে। ওদের কথা থেকেই মনে হচ্ছে যে ওরা হেরে গেছে। মা, ছেলে জুটির খেল শেষ। ওরা বুঝে গেছে যে জাহাজ ডুবতে চলেছে। ওদের কোনও লক্ষ্য নেই, তাই আমাকে অপমান করে।"


    জানালেন তাঁর চোখে ২০১৪-র লোকসভা নির্বাচন পুরোটাই মোদী বনাম বাকিদের লড়াই। যদিও ভাল সরকার গড়াই তাঁর উদ্দেশ্য বলে দাবি করেছেন প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী। ষষ্ঠ দফা নির্বাচনের দিন বারানসীতে বিপুল জনসমাবেশের মধ্যে মনোনয়ন জমা দেন মোদী।


    মোদী মনে করেন গোটা দেশ অবসাদের মধ্যে দিয়ে যাচ্ছে। বলেন, "মানুষ বুঝতে পেরেছে গুজরাতে সত্যিই বাল কিছু হয়েছে। তবে সারা দেশেই ভাল কিছু হতে পারে। গুজরাত যদি ভূজের স্মৃতি থেকে বেরোতে পারে, দেশও খারাপ সময় কাটিয়ে উঠতে পারবে।"


    মমতা: দাঙ্গাবাজের কাছ থেকে কোনও সার্টিফিকেট চাই না

    মোদি ক্ষমা না চাইলে মামলা করবে তৃণমূল




    দীপঙ্কর নন্দী, রীনা ভট্টাচার্য



    সোমবার নরেন্দ্র মোদিকে সরাসরি দাঙ্গাবাজ বলে কড়া আক্রমণ করলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি৷‌ ক্ষুব্ধ মমতা মোদি সম্পর্কে এও বলেন, 'তাঁর কাছ থেকে কোনও সার্টিফিকেট নেওয়ার প্রয়োজন নেই৷‌ হাঁড়ি খুলে দিলে একটি ভাতও আর থাকবে না৷‌ আমি সব উত্তর জনগণের কাছে দেব৷‌ আমি কী, তা আমি নিজেই জানি৷‌'রবিবার শ্রীরামপুরে নরেন্দ্র মোদি প্রচার করতে এসে মমতাকে আক্রমণ করেন৷‌ সোমবার মমতা নবান্ন থেকে ফেরার সময় সাংবাদিকদের কাছে তার জবাব দেন৷‌ অন্যদিকে, এদিন তৃণমূল ভবনে সাংবাদিক বৈঠক করেন অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র, দলের সর্বভারতীয় সাধারণ সম্পাদক মুকুল রায় ও সাংসদ ডেরেক ও'ব্রায়েন৷‌ মুকুল বলেন, মমতার ছবি বিক্রি নিয়ে মিথ্যা কথা বলেছেন মোদি৷‌ তিনি যদি প্রমাণ করতে না পারেন, তাহলে তাঁর প্রকাশ্যে ক্ষমা চাওয়া উচিত৷‌ ক্ষমা না চাইলে মোদির বিরুদ্ধে মানহানির মামলা করা হবে বলে মুকুল জানিয়ে দেন৷‌ মোদিকে দাম্ভিক, অহঙ্কারী বলেও মম্তব্য করেন মুকুল৷‌ তিনি বলেন, মমতা ছবি বিক্রি করে ১ লক্ষ ৮০ হাজার টাকা নিয়েছেন বলে মিথ্যা অভিযোগ করেছেন মোদি৷‌ গল্প ফাঁদা হচ্ছে৷‌ মমতা নিজের লেখা বই থেকে ও তাঁর আঁকা ছবি থেকে যে টাকা পেয়েছেন তা সবই দলের জন্য আর স্প্যাস্টিক সোসাইটির জন্য দিয়ে দিয়েছেন৷‌ সব টাকার হিসাব আছে৷‌ আয়কর দপ্তরকেও হিসাব দেওয়া হয়েছে৷‌ নির্বাচন কমিশনও সব জানে৷‌ নবান্নে দাঁড়িয়ে এদিন মমতা বলেন, 'মোদি দেশের ইতিহাস জানেন না৷‌'মিডিয়ার একাংশের উদ্দেশে মমতা বলেন, 'একজনের হয়ে প্রচার করছেন আপনারা৷‌ সংবাদ বিক্রি করে দেশে কালো দিন টেনে আনছেন৷‌ একজনকে প্রধানমন্ত্রী বানিয়ে দিচ্ছেন, যিনি কোনও ইতিহাস জানেন না৷‌ বাংলাদেশ থেকে যাঁরা এখানে এসেছেন, তাঁদের তিনি বা'-প্যাটরা নিয়ে ফেরত যেতে বলেছেন৷‌ তিনি বলার কে?'মিডিয়ার একাংশের উদ্দেশে তিনি বলেন, 'আপনারা যাঁরা ওঁর হয়ে প্রচার করছেন, তাঁরা কালো দিনের স্বপ্ন দেখাচ্ছেন৷‌ কেন স্বপ্ন দেখাচ্ছেন?'মোদিকে একসময় মমতা তুই করেও সম্বোধন করেন৷‌ বাংলাদেশ প্রসঙ্গ এনে মমতা বলেন, 'কেন এঁরা আবার ফিরে যাবেন? এসব কথা বলার সাহস তিনি পান কোথা থেকে? এত বড় বুকের পাটা? কে ভাই তুমি? কোন হরিদাস? বাঙালি-অবাঙালির মধ্যে বিভেদ করতে এসেছেন তিনি৷‌ আমি বলি, বাংলায় জাতপাতের রাজনীতি করবেন না৷‌ বাংলাদেশ আমার প্রতিবেশী৷‌ তাদের সঙ্গে ঝগড়া করব? না কি তাদের ভালবাসব?'বি জে পি-কে আক্রমণ করে মমতা বলেন, তাদের একটি ভোটও দেবেন না৷‌ মোদি সম্পর্কে বলেন, ঔদ্ধত্য, সাহস থাকা ভাল৷‌ দুঃসাহস থাকা ভাল নয়৷‌ তদম্ত না করে যা খুশি বলছেন৷‌ নির্বাচনের সময় এসে বাংলার শাম্তি নষ্ট করতে চাইছেন৷‌ বাংলায় বহু ভাষাভাষী লোকেরা এখানে থাকেন৷‌ আমাদের এখানে প্রেসিডেন্সি বিশ্ববিদ্যালয়ের নতুন উপাচার্য যিনি হয়েছেন, তিনি তো মাড়োয়ারি৷‌ রাজ্যের ডি জি অন্ধ্রপ্রদেশের মানুষ৷‌ একসঙ্গে কাজ করতে আমাদের কোনও অসুবিধা হয় না৷‌ তবে এটা সকলকেই বলব, ঐক্যরক্ষার স্বার্থে মিলেমিশে থাকুন৷‌ মোদি সম্পর্কে মমতা ক্ষোভ উগরে দিয়ে বলেন, তিনি যদি দিল্লির আসনে বসেন, তাহলে দেশে দুঃসহ কালো দিন, ভয়ঙ্কর দিন আসবে৷‌ গুজরাটের মানুষদের আমি ভালবাসি৷‌ ওখানকার মানুষের দুর্ভাগ্য যে, এমন একজন ভয়ঙ্কর, শয়তান লোক ওঁরা পেয়েছেন৷‌ এখানে শিল্প হয়নি৷‌ মোদিকে তিনি দাঙ্গাবাজ, দাঙ্গারাজ বলে মম্তব্য করেন৷‌ মমতা বলেন, ওঁর তাকানো যেন ভয়ঙ্কর৷‌ শুধু তাকাচ্ছেন আর ধ্বংস করছেন৷‌ সংখ্যালঘুদের তিনি গালিগালাজ করছেন৷‌ এসব করলে ভোটের বাক্সে জবাব পাবেন৷‌ দার্জিলিং ভাগ করতে চাইছে৷‌ আমরা ভাগ করতে দেব না৷‌ সারদা নিয়ে তদম্ত হবে বলে মোদির বক্তব্যের পরিপ্রেক্ষিতে মমতা বলেন, একজন চোর কী বললেন, তার উত্তর দেব না৷‌ এসবের উত্তর দেওয়ার জন্য আমার দলে পাঁচ হাজার নেতা আছেন৷‌ আমি অনেক কিছু জানি, পরে বলব৷‌ মিডিয়ার যাঁরা তাঁর হয়ে প্রচার করছেন, তাঁরাও কিন্তু সাবধানে থাকবেন৷‌ পরে কিন্তু আপনাদেরও ছেড়ে কথা বলবেন না৷‌ মমতা বলেন, সি পি এম এবং কংগ্রেস বি জে পি-কে টেনে নিয়ে আসছে৷‌ বি জে পি-র পা ধরে বাঁচতে চাইছে ওরা৷‌ এদিন মমতা বলেন, আমরা কোনও দিন এন ডি এ-তে থেকেও বি জে পি করিনি৷‌ শুধুমাত্র বাজপেয়ীজিকে সমর্থন করেছি৷‌ মোদি সম্পর্কে মমতা বলেন, আমিও ব্যক্তিগত আক্রমণে যেতে পারতাম৷‌ পরিষ্কার জানিয়ে দিচ্ছি, বাংলার মাটিতে কোনও ধান্দাবাজির রাজনীতি চলবে না৷‌ বাংলার মানুষ দাঙ্গা, অপপ্রচার পছন্দ করে না৷‌ গুজরাটে রক্তের নদী তিনি বইয়ে দিয়ে এসেছেন৷‌ এখানে রক্তের সমুদ্র তৈরি করতে চান৷‌ আবার বলেন মমতা, এই মানুষটি যদি কখনও দেশের নেতৃত্বে আসেন, তাহলে ভয়ঙ্কর কালো দিন ফিরে আসবে৷‌ কংগ্রেসের উদ্দেশে মমতা বলেন, এরা দাঙ্গা ঠেকাতে পারেনি৷‌ এটা সত্যি দুর্ভাগ্যের৷‌ গুজরাটের সঙ্গে বাংলার তুলনা করে মমতা বলেন, গুজরাট বহু টাকা পায়৷‌ তা সত্ত্বেও ওখানে কোনও উন্নয়ন হয়নি৷‌ বাংলা কোনও সাহায্য না পেয়েই অনেক এগিয়ে গেছে৷‌ আমরা গুজরাটের মতো এন আর আই এবং রিলায়েন্স থেকে টাকা পাইনি৷‌ অন্যদিকে, এদিন তৃণমূল ভবনে সাংবাদিকদের মুকুল বলেন, আমাদের দলের মুখপত্র 'জাগো বাংলা'থেকে মমতার সব ছবি অল্প দামে কেনা হয়েছে৷‌ মোদির উদ্দেশে মুকুল বলেন, যাঁর হাত গুজরাটের রক্তে লাল হয়ে রয়েছে, তিনি কোন মুখে এসব কথা বলেন? ইউ টি আই কেলেঙ্কারির টাকা কোথায় গেল? মোদি কি নির্বাচনের কাজে এই সব টাকা খরচ করছেন? ইউ টি আইয়ের প্রতারিতরা কোথায় গেলেন? বালকো ৬ হাজার কোটি টাকার পরিবর্তে ৫৫০ কোটি টাকায় বিক্রি হল৷‌ কোথায় গেল সেসব টাকা? মোদির মুখে এসবের উত্তর নেই কেন? মুকুল বলেন, ১৯৭৭-এর মতো সি পি এম-বি জে পি আঁতাত হয়েছে৷‌ অমিতবাবু বলেন, মমতার আঁকা ছবি বিক্রি করা টাকা অডিট হয়েছে, সব হিসেব রয়েছে৷‌ তিনি নিজেই বলে যাচ্ছেন প্রধানমন্ত্রী হবেন৷‌ মমতা সরকার থেকে কোনও বেতন নেন না৷‌ সরকারি গাড়ি চড়েন না৷‌ মোদির ঔদ্ধত্য দেখে আমরা অবাক হয়ে যাচ্ছি৷‌ তিনি আত্মকেন্দ্রিক, উন্নাসিক, অহঙ্কারী, একনায়কতন্ত্রের প্রতীক৷‌ মুকুল বলেন, মোদি ব্যক্তিগত আক্রমণ করছেন৷‌ মমতার চরিত্র হনন করা হচ্ছে৷‌ বাংলার মানুষ আগামী দিনে এর জবাব দেবে৷‌ এদিন প্রদেশ কংগ্রেস দপ্তরে কেন্দ্রীয় মন্ত্রী আনন্দ শর্মা মোদিকে কটাক্ষ করেন৷‌ তিনি বলেন, মোদির পক্ষে প্রধানমন্ত্রী হওয়া সম্ভব নয়৷‌ ১০ হাজার কোটি টাকা খরচ করে মোদি প্রচার করছেন, এর উত্তর তাঁকে দিতে হবে৷‌ গুজরাটে কোনও উন্নয়ন হয়নি৷‌ সারদা নিয়ে আনন্দ শর্মা বলেন, তদম্ত হওয়া উচিত৷‌ এর সঙ্গে তৃণমূলের কয়েকজন মন্ত্রীর নাম জড়িয়ে গেছে৷‌ তাই জন্য কি মমতা তদম্তে আপত্তি করছেন? তিনি বলেন, বি জে পি জিতলে মমতা কিন্তু নির্বাচনের পরে ওদের সঙ্গে হাত মেলাবে৷‌ এদিন শ্রীরামপুরে তৃণমূল প্রার্থী কল্যাণ ব্যানার্জি বলেন, রবিবার মোদির সভায় লোক এসেছিল ব্যারাকপুর, হুগলির বিভিন্ন জায়গা থেকে৷‌ শ্রীরামপুর থেকে কোনও লোক মোদির সভায় যায়নি৷‌ মোদি দাঙ্গাবাজ, ওকে মানুষ ভালভাবে নেবে না৷‌





    "১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-র পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে।"

    মোদির এই হুংকার থেকে ক্রমশই বেরিয়ে আসছে আরএসএস, বিশ্ব হিন্দু পরিষদ, সারা ভারত ব্রাহ্মণ সভা, বজরং দল প্রভৃতি গৈরিক সন্ত্রাসবাদীদের প্রলয় মিশনের গোপন এজেন্ডা।


    পলাশ বিশ্বাস

    প্রিয়বন্ধু শরদিন্দু উদ্দীপন আমার তুলনায় অনেক ভালো,ঝরঝরে বাংলা লিখতে পারেন,আমি বরং বাংলা লেখায় অভ্যস্ত নই।শরদিন্দু একেবারে যথার্থ লিখেছেন,আসলে বাংলায় এসে ভোটের বাজারে তুবড়ি জ্বালানোর কিস্সা নয় বাংলাদেশি বিতাড়নের নমো সংকল্প।প্রবাসী বাঙালি ও উদ্বাস্তু বাঙালির সম্পত্তি,জায়গা জমি দখল করার হিন্দুত্ব করপোরেট এজেন্ডা হল এই।পারাদ্বীপ ও মহাকালপাড়া,ভিতরকণিকা অভয়ারণ্য সন্নিকট অন্চলসমুহে পুনর্বাসিত ভারত ভাগের পর পরই ভারতে আসা নোয়াখালির বাঙালিদের বিতাড়ন ঔ অন্ছলেক যাবতীযজমি করপোরেট স্বার্থে দখল করার প্রকল্প।ঠিক সেই মত সারা দন্ডকারণ্যের খণি ঐশ্বর্য্য অন্চল গুলিতে আদিবাসীদের উত্খাত করা হলেও বাঙালিকা জমি কামড়ে পড়ে আছেন,তাঁদের উত্খাত করতেই নাগরিকত্ব সংশোধণী আইন ও বায়োমেট্রিক ডিজিটাল ইউনিক আইডেন্টিটি অসংবৈধাণিক নজরদারি বন্দোবস্ত।আন্দামান থেকে উত্তরাখন্ড,উত্তরপ্রদেশ,বিহার,ঝারখন্ড,রাজস্থান,নয়াদিল্লী ,মুম্বাই,গুজরাত,মহারাষ্ট্র,অন্ধ্র,তামিলনাডু,কর্ণাটক,অসম,মণিপুর সর্বত্র হিন্দুত্ব ও বাঙালি বিদ্বেষকে হাতিয়ার করে বাঙালি উত্খাতের চক্রান্ত।


    সবচেয়ে দর্ভাগ্যজনক হল যে আসম,বাংলা ঔ সারা দেশের বাঙালি ও অবাঙালি মানুষ সংঘ প্রচারকদের এই মুসলিম বিরোধী প্রচারে আরএসএস এর করপোরেট এজেন্ডা দেখতেই পাচ্ছে না যে বাংলাদেশী বলতে শুধু মুসলমান।ভারতভাগের পর ভারতে আসা মুসলিমদের বিতাড়নরের অসংবৈধাণিক মানবাদিকারবিরোধী বেআইনি এই রণহুন্কারকে বাঙালিও হিন্দুত্বের মুসলিম বিরোধী যুদ্ধ মেনে নিয়ে বাংলার মাটিতে পদ্ম ফোটাতে ব্যস্ত। সংঘ পরিবারের বাঙালি বিরোধী বর্ণবিদ্বেষী বাঙালি খেদাও এজেন্ডায় বাঙালির অস্তিত্ব এি উপ মহাদেশে বিপর্যস্ত সে কথা তাঁরা বুঝতেই চাইছেন না।

    এমনকি পশ্চিমবঙ্গের হাঁড়ির হালের জন্য যারা বাঙালদের দায়ী মনে করেন আজও,তাঁরাও দুহাত তুলে নমোময় হিন্দু রাষ্ট্রের স্বপ্ন দেখছেন বাঙালি জাতি সত্তার সমুঙ সর্বনাশ নজরঅন্দাজ করে।


    শরদিন্দু ঠেকই লিখেছে।

    মোদি আসলে মনুবাদীদের প্রলয় মিশনের নরপিশাচ

    "১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-র পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে।"

    মোদির এই হুংকার থেকে ক্রমশই বেরিয়ে আসছে আরএসএস, বিশ্ব হিন্দু পরিষদ, সারা ভারত ব্রাহ্মণ সভা, বজরং দল প্রভৃতি গৈরিক সন্ত্রাসবাদীদের প্রলয় মিশনের গোপন এজেন্ডা। এবং এটাও পরিষ্কার হয়ে যাচ্ছে যে, কাঁটা দিয়ে কাঁটা তোলার সেই প্রাচীনতম হিংস্রতার পথে মূলনিবাসীদের ধ্বংস করার কাজে কিছু দাস, গোলাম, চাটুকার, চরণামৃত ও উচ্ছিষ্ট ভোগীদের সন্ধান মনুবাদীরা খুব সহজেই পেয়ে যাচ্ছে। রামবিলাস, আতাউলে, উদিতরাজ এবং সর্বোপরি নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি এরকমই কিছু কুলংগার যারা ব্রাহ্মন্যবাদীদের উচ্ছিষ্ট ভক্ষণ করার জন্য ভ্রাতৃঘাতি প্রলয় মিশনে বামুনদের পক্ষ নিয়েছে। — withপ্রজন্ম শাহবাগ.

    মহাকাল বিয়ন্ড দ্যা টাইমমনে হয় মোদী মানসিক ভারসাম্য হারিয়ে ফেলেছে। ..............নত কারো পক্ষ্যে এইরকম উন্মাদের বক্তব্য রাখা সম্ভব হয় কি করে //////////////

    Jyotish Kumar Debপলাশ বিশ্বাস নিশ্চয় আসামবাসী নন !


    বাংলাদেশে ইসলাম আক্রান্ত আর ভারতে হিন্দু ধর্ম আক্রান্ত বললে মনে হয় যেন ভাবান্দোলন কোথাও গিয়ে একি মোহনাতে মিশে যায়। যাই হোক , মনে হচ্ছে বাবা রামদেব এবারে জেলেই যাবেন এবং আমরা চাইব তিনি জেলেই যানঃhttp://timesofindia.indiatimes.com/videos/news/SC/ST-Act-slapped-yoga-guru-Ramdev-faces-arrest/videoshow/34365263.cms


    Biplob Rahman shared Arup Rahee's post.

    4 hrs

    ‪#‎Protest‬

    Arup Rahee's photo.

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    কুমিল্লা ও নেত্রকোনায় সাম্প্রদায়িক হামলার প্রতিবাদে নাগরিক সমাবেশ

    Wednesday, April 30 at 5:00pm in UTC+06

    জাতীয় জাদুঘর in Dhaka, Bangladesh437 people are going

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    'হানিমুনে'র জেরে গ্রেপ্তার হতে পারেন রামদেব

    'হানিমুনে'র জেরে গ্রেপ্তার হতে পারেন রামদেব

    |কংগ্রেসের সাধারণ সম্পাদক রাহুল গান্ধী সম্পর্কে বিতর্কিত মন্তব্য করায় গ্রেপ্তার হতে পারেন এই যোগগুরু। তিনি বলেছিলেন, 'দলিত গ্রামগুলিতে রাহুল পিকনিক ও মধুচন্দ্রিমা করতে যান'।


    এবার ঘোড়া মুখে শুনুনঃ


    PLEASING RSS

    RSS Cheers Modi's Anti B'deshi Rant

    Modi separates Bangladeshi 'refugees' (Hindus) & 'infiltrators' (Muslims)

    BHAVNA VIJ-AURORA NEW DELHI


    When Narendra Modi asked 'Bangladeshi immigrants' to be ready to leave India after May 16, at a rally in West Bengal's Serampore on Sunday, he was trying to please RSS apart from polarising voters on religious lines.

    Modi, who has been changing his tone and tenor to suit the political landscape, donned his Hindutva poster-boy avatar in West Bengal. He tore into Trinamool Congress chief Mamata Banerjee, accusing her of vote bank politics and "rolling out the red carpet for the Bangladeshis."

    Though he refrained from specifying whether the threat was only for Bangladeshi Muslims, Modi had made the distinction at an earlier rally in Assam. Addressing a rally in Silchar in February, he had announced that Hindu migrants from Bangladesh must be accommodated in the country and promised to do away with their detention camps.

    This was in keeping with RSS view that has always made the distinction between Bangladeshi refugees (Hindus) and Bangladeshi infiltrators (Muslims). A senior RSS functionary said that Muslim immigrants have over 30 countries in the world where they can go but the Hindus can only come to India. He said that unabated illegal immigration from Bangladesh had changed the demographic and political profile of neighbouring Indian states of West Bengal, Assam and Tripura. Assam has 34% Muslim population as per the 2011 census, up from 23% in 1971.

    The RSS has talked about this issue during several internal meetings, and even passed resolutions on it. In fact, one of the resolutions passed after the RSS national executive council meeting in November 2012 stated that the "unabated influx" of Bangladeshi infiltrators posed a serious threat to national integration. Condemning the July 2012 ethnic violence in Assam, the resolution alleged that migrant Bangaldeshi Muslims had perpetrated it.

    Claiming that Bangladeshi infiltrators had "spread all over the country", the RSS demanded that the Centre and state governments take steps to check the border, detect and deport them.

    The RSS, in fact, had been asking states run by BJP governments to take urgent steps to identify and deport them. Of all the BJP-run states, maximum number of Bangladeshis are believed to be settled in Chhattisgarh. "Chief minister Raman Singh has been asked several times what he is doing about it," said the RSS leader. A spokesman for the Chhattisgarh government confirmed that Bangladeshi infiltrators settled in the state were a serious issue. "The Muslim population in the state has gone up from two to three per cent in the past decade, and it is mostly owing to illegal immigrants," the spokesman said.

    RSS spokesperson Manmohan Vaidya said Modi raising the issue of Bangladeshi immigrants was a positive thing. "Is there any country in the world that will allow illegal immigrants to stay? It is the duty of any country, first of all, to prevent their entry but if they do come in, then the government has to find them and send them back," Vaidya told ET.



    read the article and share your views on economictimes.com

    বাংলা ভাষায় কথা বললেই 'বাক্স-প্যাঁটরা সমেত ছুড়ে ফেলে দেবে'?১৯৪৭ সালের পরে যাঁরা ভারতে এসেছেন, তাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ মে-র পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে।"আসুন সংকল্প করি ,এই পৃথীবীতে বাংলা ভাষায় যারা কথা বলেন,তারা পৃথীবীর কোথাও এই বর্ণবিদ্বেষী নররক্তপিপাষুর সমর্থনে একটি ভোটও দেব না। ভোট 12 মেতে শেষ হচ্ছে,কিন্তু সারা ভারতে বাঙালির অস্থ্ব বিপর্যয়ে বাটের রাজনীতির উর্ধে বাঙালি জাতিসত্তার সব সীমান্ত ভেঙে ফেলার এই সংক্রমণকালে বাঙালি একজোট না হলে সারা ভারতবর্ষ কিন্তু পর্ব বঙ্গ হয়ে যাবে।

    http://shudhubangla.blogspot.in/2014/04/12.html

    বাংলাদেশী জিগির তুলে ভারত ভাগের বলি মানুষদেরই নাগরিকত্ব থেকে বন্চিত করে সারা দেশ ব্যাপী অভিযান চলছে কংগ্রেস বিজেপি যোগসাজসে।



    বাংলাভাগের পর হিন্দূ রাষ্ট্রের নয়া জিগির আবার ভারত ভাগের বলি বাঙালি উদ্বাস্তুদের জন্য অশনিসংকেত বাংলার বুকে দাঁড়িযে সঙ্ঘ পরিববারের কুলশিরোমণি বাংলাদেশী অনুপ্রবেশ ইস্যুক সর্বাধিক গুরুত্ব দিয়ে আবার হিন্দূ মুসলিম বিভাজনে বাংলা জয়ের ঘোষণা করে গেলেন।


    আসলে নজরুল ইসলাম ও রেজ্জাক মোল্লার নেতৃত্বে যে দলিত মুসলিম সংগঠন আগামি বিধানসভা নির্বাচনে ব্রাহ্মণ্যতান্ত্রিক আধিপাত্যের অবসাণে অন্ত্যজদের ক্ষমতায়ণের যুদ্ধঘোষণা করেছে,তাঁরই প্রতিক্রিয়া ও ক্ষমতাগোষ্ঠির রণকৌশল হল গৌরিক পতাকার এই আক্রামক আস্ফালন,হিন্দু মুসলিম বিভাজন ও কখনো ভারত ভাগের আগের মত দলিত মুসলিম একতায় ক্ষমতাবেদখল হতে না দেওয়ার জোর প্রস্তুতি।

    Narendra Modi threatens to deport Bangaldeshis if BJP comes to power


    http://shudhubangla.blogspot.in/2014/04/blog-post_8983.html


    Sushanta Kar

    8 hrs

    অসমে এসে নমো বলেছিলেন উদ্বাস্তু হিন্দু বাঙালিদের গোটা দেশে বসতি করে দেবেন। তো কেমন আছেন তেলেঙ্গানার দলিত বাঙালি প্রতিবেদনে দেখুন, সেই সঙ্গে নমো বিজ্ঞাপন এবং বাস্তবতা। দু'টোই এখানে আছেঃhttp://www.dainikjugasankha.in/index.php?city=2&edition=29042014#

    Sushanta Kar's photo.

    Sushanta Kar's photo.

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    তিন বছরে ভারত থেকে ২৩ হাজার বাংলাদেশি শরণার্থী বিতাড়িত

    অনলাইন ডেস্ক | তারিখ: ১৭-০৮-২০১২

    ২০০৯ থেকে ২০১১ সাল—এই তিন বছরে ভারত থেকে ২৩ হাজার ৬০০ বাংলাদেশি শরণার্থীকে বিতাড়ন করা হয়েছে বলে জানিয়েছেন ভারতের পররাষ্ট্র প্রতিমন্ত্রী প্রীনিত কাউর। প্রেস ট্রাস্ট অব ইন্ডিয়া জানিয়েছে, আজ শুক্রবার ভারতীয় সংসদের নিম্নকক্ষ লোকসভায় এক প্রশ্নের উত্তরে এ তথ্য জানান তিনি।

    প্রীনিত কাউরের তথ্যমতে, ভারতে বাংলাদেশি শরণার্থীর সংখ্যা ৮৩ হাজার ৪০০। এ ছাড়া ২০০৯ সালে ১০ হাজার ৬০২, ২০১০ সালে ৬ হাজার ২৯০ ও ২০১১ সালে ৬ হাজার ৭৬১ জন বাংলাদেশি শরণার্থীকে ভারত থেকে বিতাড়িত করেছে ভারত।

    প্রীনিত কাউর আরও জানিয়েছেন, তাঁদের তালিকায় ভারতে মোট ৪০টি দেশের ৬৭ হাজার ৯৪৫ জন শরণার্থী রয়েছে। এর মধ্যে বাংলাদেশের পাশাপাশি আফগানিস্তানের ১৩ হাজার ৭৪৪, পাকিস্তানের ৮ হাজার ৩৭, যুক্তরাষ্ট্রের দুই হাজার ১৬৮, ইরাকের দুই হাজার ৩৮ এবং যুক্তরাজ্যের এক হাজার ৯৪ জন দেশটিতে অবস্থান করছে।

    বাংলাদেশি শরণার্থীদের ইউনিক আইডেন্টিফিকেশন অথরিটি অব ইন্ডিয়া বা আধার নম্বর দেওয়া হবে কি না, এ প্রশ্নের সরাসরি কোনো উত্তর দেননি ভারতের পররাষ্ট্র প্রতিমন্ত্রী প্রীনিত কাউর।

    কাউর বলেন, আধার ভারতে বসবাসরত প্রত্যেক মানুষের একটি স্বতন্ত্র শনাক্তকারী নম্বর, আধার নাগরিকত্ব সনদ নয়।

    'দেশে কালো দিন টেনে আনা হচ্ছে। কাউকে কাউকে প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী ভাবা হচ্ছে। যিনি দেশের ইতিহাস জানেন না, ভূগোল জানেন না! তিনি বলছেন, বাংলাদেশীদের বাক্সপেটরা নিয়ে ফিরে যেতে হবে। এমন অধিকার ওকে কে দিয়েছে?' বললেন পশ্চিমবঙ্গের মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। নরেন্দ্র মোদী বাংলাদেশীদের বিতাড়নের যে হুমকি দিয়েছেন তার প্লাটা জবাব দিয়েছেন তিনি।

    তিনি আরও বলেন, 'পশ্চিমবঙ্গে ভিন্ন ভাষাভাষী এবং ধর্মীয় সংগঠনের মধ্যে ভেদাভেদ সৃষ্টি করে সংঘর্ষ বাঁধাতে চাইছেন মোদী। রীতিমতো হুঁশিয়ারি দিয়ে মমতা বলেন, বাংলায় জাতপাতের রাজনীতি আনার চেষ্টা করবেন না! রাজনীতি করছেন করুন, কিন্তু এই ধরনের কথাবার্তা কেন?'

    - See more at: http://www.bd-pratidin.com/2014/04/29/2691#sthash.dcHrQWw5.dpuf


    পশ্চিমবঙ্গের মাটিতে দাঁড়িয়ে বিজেপির প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী নরেন্দ্র মোদী বাংলাদেশীদের বিতাড়নের যে হুমকি দিয়েছেন তার প্লাটা জবাব দিয়েছেন পশ্চিমবঙ্গের মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। গত সোমবার সন্ধ্যায় সচিবালয় নবান্নে সাংবাদিকদের কাছে মুখ্যমন্ত্রী বলেন, দেশে কালো দিন টেনে আনা হচ্ছে। কাউকে কাউকে প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী ভাবা হচ্ছে। যিনি দেশের ইতিহাস জানেন না, ভূগোল জানেন না! তিনি বলছেন, বাংলাদেশীদের বাক্সপেটরা নিয়ে ফিরে যেতে হবে। এমন অধিকার ওকে কে দিয়েছে? প্রতিবেশী দেশের সঙ্গে ঝগড়া করা সমীচীন কিনা সেই প্রশ্ন তুলে মমতা বলেছেন,  ইন্দিরা-মুজিব চুক্তি, নেহরু-লিয়াকত চুক্তি অনুযায়ী ১৯৭১ সাল পর্যন্ত যারা এদেশে এসেছেন, তারা সবাই ভারতীয় নাগরিক। তারপরও কেউ বিপদে পড়ে এলে তাদের ঠেলে ফিরিয়ে দেয়া যাবে না। এ ব্যাপারে রাষ্ট্রপুঞ্জের একটা নিয়ম আছে। মুখ্যমন্ত্রীর বক্তব্য, কোচবিহারেও অনেক বাংলাদেশী আছেন। তাতে কি হয়েছে! আসামের গোলমালের পরে অনেকে এ রাজ্যে আশ্রয় নিয়েছে। এটাই মানবিকতার ধর্ম। গত রোববারই কলকাতার পার্শ¦বর্তী শ্রীরামপুরে দলীয় প্রার্থীদের পক্ষে নির্বাচনী প্রচারে এসে মোদী বলেন, মমতাজি ভোটব্যাংকের দিকে তাকিয়ে এই রাজ্যে রাজনীতি শুরু করেছেন। বিহার, ওড়িশা থেকে এই রাজ্যে গরিব মানুষ কাজে এলে ওঁর রাগ হয়। তাদের পর মনে হয়। হেনস্থা হন তারা। কিন্তু বাংলাদেশ থেকে সীমান্ত পেরিয়ে কেউ এলে উনি তাদের 'আদর'করে এই রাজ্যে রেখে  দেন। ১৯৪৭ সালের পরে যারা ভারতে এসেছেন, তারা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন! ১৬ই মে'র পরে তাদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে। মোদীর সমালোচনা করতে গিয়ে তাকে 'হরিদাস'সম্বোধন করে মমতা বলেন, পশ্চিমবঙ্গে ভিন্ন ভাষাভাষী এবং ধর্মীয় সংগঠনের মধ্যে ভেদাভেদ সৃষ্টি করে সংঘর্ষ বাঁধাতে চাইছেন মোদী। রীতিমতো হুঁশিয়ারি দিয়ে মমতা বলেন, বাংলায় জাতপাতের রাজনীতি আনার চেষ্টা করবেন না! রাজনীতি করছেন করুন, কিন্তু এই ধরনের কথাবার্তা কেন? কোন ইতিহাস জানে না! তবে মোদীর বক্তব্যে ব্যাখ্যা দিতে গিয়ে বিজেপির পশ্চিমবঙ্গ কমিটির সভাপতি রাহুল সিংহ বলেন, বাংলাদেশ থেকে আসা শরণার্থী আর অনুপ্রবেশকারীদের মধ্যে ফারাক আছে। আমাদের এই অবস্থান বহু দিনের। শরণার্থীদের জন্য কিছুই বলেননি মোদী। তিনি বলেছেন, অনুপ্রবেশকারীদের ব্যাপারে। সম্প্রতি আসামে গিয়ে মোদী এ ব্যাপারে আরও স্পষ্ট করে তার মত জানিয়েছিলেন বলেও রাহুলবাবু উল্লেখ করেছেন। বিজেপি'র অভিযোগ, মোদীর কথাকে হাতিয়ার করে পূর্ববঙ্গের মানুষজনের ভাবাবেগ উস্কে দেয়ার চেষ্টা করছেন তৃণমূল নেত্রী। কিন্তু মোদী আদৌ ওপার বাংলা থেকে সব মানুষকে এক করে কিছু বলেননি বলে তাদের দাবি।

    "আরএসএস একটা বিষাক্ত সংগঠন"

    সর্দার পটেলের এই বক্তব্যটাই তুলে ধরলেন রাহুল গাঁধী। সর্দার পটেল সঙ্ঘ পরিবার নিয়ে কি বলেছিলেন সেটাই দাবি করলেন রাহুল।

    ভিডিও: এবিপি আনন্দ , কলকাতা, ২০ মার্চ, ২০১৪

    http://youtu.be/r7hZxG9-8GM


    'মোদী হল আরএসএস-এর গুন্ডা'

    বেণীপ্রসাদ বর্মা

    ভোটের আগে `হেট স্পিচ`-এর তালিকায় নয়া সংযোজন। এ বার বক্তা হলেন কংগ্রেস নেতা তথা কেন্দ্রীয় ইস্পাত মন্ত্রী বেণীপ্রসাদ বর্মা। ৭১ বছরের এই কংগ্রেস শীর্ষস্থানীয় বর্ষীয়ান নেতা বললেন, নরেন্দ্র মোদী আসলে আরএসএস-এর পোষা গুন্ডা। সঙ্গে বেণীপ্রসাদ বলছেন, বিজেপি সভাপতি রাজনাথ সিং হলেন আসলে নরেন্দ্র মোদীর ক্রীতদাস।


    এরপর মোদীর বিরুদ্ধে আক্রমণের সুর চড়িয়ে এই কেন্দ্রীয় মন্ত্রী বলেছেন, আরএসএস আর বিজেপির জন্যই মহাত্মা গান্ধীকে খুন হতে হয়েছে।


    জসবন্ত সিংয়ের বহিষ্কার প্রসঙ্গে বেণীপ্রসাদ বলছেন, আসলে বিজেপি এখন সম্পূর্ণভাবে মোদীর কাছে বিক্রি হয়ে গিয়েছে। তাই অভিজ্ঞ, বর্ষীয়ান নেতাদের এভাবে অপমান করা হচ্ছে। সঙ্গে বলেন, কংগ্রেস কখনো তাদের বর্ষীয়ান নেতাদের এভাবে অপমান করে না।


    বিজেপিকে ফ্যাসিস্ট শক্তি বলেও কটাক্ষ করেন তিনি। বিজেপিকে দেশ সহ্য করবে না বলেও জানান উত্তরপ্রদেশের এই সাংসদ।


    নির্বাচনী বিধিভঙ্গের দায়ে বেণীপ্রসাদের বিরুদ্ধে এফআইআর দায়ের করা হয়েছে। সূত্র: জিনিউজ।

    - See more at: http://www.timenewsbd.com/news/detail/8495#sthash.hoMVJzaf.dpuf


    ভারতের আরএসএস আল-কায়েদার চেয়ে হাজারগুণে ভয়ঙ্কর-----উইকিলিকস

    ১২ ই ডিসেম্বর, ২০১০ বিকাল ৩:৫৪ |

    শেয়ারঃ

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    ভারতীয় সমাজবাদী দলের সংসদ সদস্য আবু অসীম আজামীর বলেছেন, ভারতের মহারাষ্ট্র বিধানসভায় উগ্রবাগী হিন্দু সংগঠন রাষ্ট্রীয় সেবক সংঘ (আরএসএস) আল-কায়েদার চেয়ে হাজারগুণে ভয়ঙ্কর।


    বিশ্বজুড়ে তোলপাড় করা উইকিলিকস-এর ফাঁস করে দেয়া তথ্যের সূত্র ধরে আজামী রাষ্ট্রীয় সেবক সংঘ আরএসএসকে আল-কায়েদার চেয়ে হাজার গুণ বেশি বিপজ্জনক বলে উল্লেখ করেন। আর এতেই তেলেবেগুনে জ্বলে ওঠে আর এসএসএর। আজামীর বক্তব্যের তীব্র প্রতিবাদ করে ভারতীয় জনতা পার্টি (বিজেপি), শিবসেনা (এসএস) এবং মহারাষ্ট্র নবনির্মাণ সেনা (এমএনএস)'র সংসদ সদস্যরা। উত্তেজনা এমন পর্যায়ে পৌঁছায় যে, তিনি অধিবেশন ছেড়ে চলে যেতে বাধ্য হন। উত্তেজিত আজমী বলেন, বিধানসভার নিয়ম-কানুন লঙ্ঘন করে আমাকে এই ইস্যুতে বক্তব্য দিতে বাঁধা দেয়া হচ্ছে।

    বিধানসভায় আজামী বলেন, আরএসএস'এর মুখোশ খুলে দিয়েছে উইকিলিকস। ভয়ঙ্কর এই সংগঠনটি কেন আল-কায়েদার চেয়ে হাজার গুণ বেশি বিপজ্জনক তা জনসম্মুখে প্রমাণ করে দিয়েছে উইকিলিকস।

    আজামীর বক্তব্যের প্রতিবাদ করে এনজিপির সংসদ সদস্য দেবেন্দ্র পদনাভিস প্রচন্ড উষ্মা প্রকাশ করে বলেন, ''আজামী অপ্রাসঙ্গিক এবং অবান্তর বিষয় সামনে এনে বিধানসভাকে বিভ্রান্ত করতে চাইছেন। বিজেপির অন্যান্য সংসদ সদস্যরা এ সময় আজামীর বিরুদ্ধে দেয়া দেবেন্দ্রর বক্তব্যকে সমর্থন করেন।

    বক্তৃতাকালে বিরোধীদের পক্ষ থেকে লাগাতার বাধা আসায় হতাশা প্রকাশ করে আজামী তার বক্তব্য দিতে সুযোগ করে দেয়ার জন্য বিধানসভার ডেপুটি স্পিকার বসন্ত পুরককে অনুরোধ করেন। এ সময় ডেপুটি স্পিকার বলেন, তিনি যে বিষয়টি উপস্থাপন করছেন সেটা অপ্রাসঙ্গিক। তবে বিষয়টির সাথে জনস্বার্থ জড়িত রয়েছে বিধায় তিনি আলোচনার অনুমতি দেন। কিন্তু এরপরও শিবসেনা এবং বিজেপির সংসদ সদস্যরা প্রচন্ড হৈ চৈ করতে থাকে এবং আজামীর বিরুদ্ধে স্লোগান দিতে থাকে। বক্তব্য দিতে না পেরে গেরুয়া বসনধারী সংসদ সদস্যদের ঘৃণ্য আচরণের প্রতিবাদে 'ওয়াক আউট' করেন আজামী। এর আগে কংগ্রেস দলীয় সংসদ সদস্য বাবা সিদ্দিকীর এক বক্তব্যকে কেন্দ্র করে সংসদ উত্তপ্ত হয়ে ওঠে।

    সিদ্দিকী অভিযোগ করেন শিবসেনার ভারপ্রাপ্ত সভাপতি উদ্ধব থ্যাকারে মুম্বাইভিত্তিক দু'টি বৃহৎ বাণিজ্যিক প্রতিষ্ঠানের নিকট থেকে অবৈধভাবে অর্থ গ্রহণ করেছেন। টাটা গ্রুপের মুখপাত্র শাহলানী এবং গণসংযোগ প্রধান নিরা রাধিয়ার রেকর্ড করা ফোনালাপ থেকে এটা জানা গেছে। সিদ্দিকী অভিযোগ করেন উদ্ভব রিলায়েন্স এবং টাটা গ্রুপ থেকে অর্থ গ্রহণ করেছেন। তবে তিনি তার এ বক্তব্য ইংরেজিতে দেয়ায় তাৎক্ষণিকভাবে তা বুঝতে ব্যর্থ হন সেনার সংসদ সদস্যরা। সেজন্য তাৎক্ষণিকভাবে এর কোন প্রতিবাদ হয়নি। তবে বিজেপির সংসদ সদস্য পদনভিস সিদ্দিকীর বক্তব্যের জবাব দিয়ে বলেন, এর সাথে উদ্ধভের কোন সংশ্লিষ্টতা নেই।

    তিনি বলেন, সিদ্দিকী উদ্ধভের বিরুদ্ধে মিথ্যা, বানোয়াট এবং উদ্দেশ্যপ্রণোদিতভাবে এই অভিযোগ করছেন।

    http://www.somewhereinblog.net/blog/pushpo123/29288254


    বিজেপির কৌশল ও সংখ্যালঘু মুসলিম ভোট

    আবদুল গাফফার চৌধুরী


    বিলাতে একসময় এশিয়ান ভোটব্যাংকটি লেবার পার্টির করায়ত্ত ছিল। অর্থাৎ এশিয়ানদের (সঙ্গে আফ্রিকানদের সংখ্যাগরিষ্ঠ অংশেরও) ভোট টোরিরা পাবে না, লেবার পার্টি পাবে- এটা এক প্রকার নিশ্চিত ছিল। লেবার পার্টি বর্ণবৈষম্যের বিরোধী, ইমিগ্রেশন আইন শিথিল করার পক্ষপাতী, ওয়েলফেয়ার স্টেটের কল্যাণমূলক ধারাগুলো তারা অব্যাহত রাখতে চায় ইত্যাদি কারণে লেবার পার্টির একটা নিশ্চিত দখল ছিল আফ্রো-এশিয়ান ভোটের ওপর।

    বিজেপির কৌশল ও সংখ্যালঘু মুসলিম ভোট

    বাঙালি অধ্যুষিত পূর্ব লন্ডনে বাঙালি ও সোমালিয়ান ভোটের ওপর নির্ভর করে প্রয়াত পিটার শোর (পরে লেবার দলীয় লর্ড হয়েছেন) ৩০ বছর একটানা পূর্ব লন্ডনের একটি নির্বাচনকেন্দ্র থেকে লেবার পার্টির এমপি ছিলেন এবং লেবার গভর্নমেন্টের মন্ত্রীও ছিলেন। এশিয়ান ভোটব্যাংক নিয়ে ব্রিটিশ লেবার পার্টির সেই রমরমা যুগ আর নেই। যদিও আফ্রো-এশিয়ান ভোটের সংখ্যাগরিষ্ঠ অংশ এখনো লেবার পার্টির সঙ্গে রয়েছে; কিন্তু এই ভোটে এখন ভাগ বসিয়েছে টোরি ও লিবারেল দলও।

    লেবার পার্টির সেই সমাজতান্ত্রিক ও আদর্শনিষ্ঠ চরিত্রটি এখন নেই। টনি ব্লেয়ার প্রধানমন্ত্রী থাকাকালে লেবার পার্টিতে যে ব্লেয়ারপন্থীদের অভ্যুদয় ঘটে, তাঁরা দলটিকে নীতি ও চরিত্রের ক্ষেত্রে অনেকটাই টোরি দলের কাছাকাছি নিয়ে আসেন। যদিও এখন নতুন নেতা ব্লেয়ারপন্থীদের কবজা থেকে দলকে অনেকটা মুক্ত করেছেন, কিন্তু দলে বাম সোশ্যালিস্ট অংশ এখনো কোণঠাসা। ওয়েলফেয়ার কাট থেকে শুরু করে ইমিগ্রেশন আইন ক্রমাগত কঠোর করার ব্যাপারে টোরিদের সঙ্গে বর্তমান লেবার পার্টির পার্থক্য খুব কম।

    এখন লেবার পার্টির ভোটব্যাংকে ভাগ বসানোর জন্য টোরি দলও ব্রিটেনের বাঙালি অধ্যুষিত বিভিন্ন এলাকায় নির্বাচনে কাউন্সিলর ও এমপি পদে বাঙালি প্রার্থী দাঁড় করায়। বাঙালি ভোটও এভাবে ভাগ হয়ে গেছে। বাংলাদেশেও আমরা প্রায় একই অবস্থার অনুবৃত্তি দেখি। আগে হিন্দু, বৌদ্ধ, খ্রিস্টান ও পাহাড়িয়া সম্প্রদায়গুলোর মধ্যে আওয়ামী লীগের একটি শক্তিশালী ভোটব্যাংক ছিল। সেটি এখন আগের মতো নেই। সে জন্য আমরা সাম্প্রতিক উপজেলা নির্বাচনে সংখ্যালঘু সম্প্রদায় অধ্যুষিত এলাকায়ও আওয়ামী লীগ প্রার্থীকে পরাজিত হতে দেখেছি।

    এর প্রধান কারণ দেশের সংখ্যালঘুদের অধিকার ও নিরাপত্তা রক্ষায় আওয়ামী লীগ তেমন সাফল্য দেখাতে পারেনি। সাম্প্রতিক সংখ্যালঘু নির্যাতনের সময়ও দেখা গেছে এলাকার এক শ্রেণির আওয়ামী লীগ এমপি নির্বিকার। তাঁরা নির্যাতিত সংখ্যালঘুদের পাশে দাঁড়াননি। বরং তাঁদের অনেকের বিরুদ্ধে নির্যাতনকারীদের সঙ্গে নানা ধরনের স্বার্থসংশ্লিষ্ট যোগসাজশের অভিযোগ উঠেছে। শেখ হাসিনা একা কত দিক সামলাবেন? তাঁর প্রশাসন ও এক শ্রেণির মন্ত্রী ও এমপির ঢিলেঢালা অবস্থার জন্য সংখ্যালঘুরা এখনো দেশে তেমন শান্তি ও স্বস্তিতে বাস করতে পারছে না।

    ফলে বাংলাদেশের সংখ্যালঘু সম্প্রদায়গুলোর একটা বড় অংশ মনে করে, আওয়ামী লীগ ক্ষমতায় বসেও যখন তাদের নিরাপত্তা দিতে পারছে না, বরং আওয়ামী লীগকে ভোট দিলে বিএনপি ও জামায়াতের হাতে নির্যাতিত হতে হয় (সেই নির্যাতন আওয়ামী লীগ ঠেকাতে পারে না) তখন বিএনপি-জামায়াতের প্রার্থীকেই নির্বাচনে ভোট দিয়ে তারা অন্তত নিজেদের নিরাপত্তার একটা বলয় তৈরি করতে পারে।

    দেখা গেছে, সংখ্যালঘুদের বাড়িঘর, মন্দির, বিগ্রহ ভাঙচুর করার পর আওয়ামী লীগ সরকার তা দ্রুত মেরামত করার ও আরো উন্নত বাড়িঘর, মন্দির তৈরি করে দেওয়ার ব্যবস্থা করে দেয়। কিন্তু সংখ্যালঘুরা তো নতুন ও সুন্দর বাড়িঘর চায় না। তারা চায় নিরাপত্তা, নির্যাতন থেকে মুক্তি। তাদের পুরনো বাড়িঘর, মন্দিরের সুরক্ষার ব্যবস্থা। মার খাওয়ার পর আহত শরীরে মলম লাগিয়ে তো তাদের খুশি করা যায় না।

    বাংলাদেশের মতো ভারতেও সংখ্যালঘুদের স্বার্থ, অধিকার ও নিরাপত্তা রক্ষায় অতীতের ও বর্তমানের কংগ্রেস সরকারগুলোর ব্যর্থতা খুবই প্রকট। অধিকৃত কাশ্মীরে 'সন্ত্রাসী ও বিচ্ছিন্নতাবাদীদের' দমনের নামে বছরের পর বছর ধরে মুসলিম নির্যাতন ভারতের মুসলমানদের মনে একটি ক্ষোভের কারণ। বাবরি মসজিদটি ভাঙা হয়েছিল দিলি্লতে কংগ্রেসের নরসিমা রাওয়ের কংগ্রেস সরকারের আমলে। এই মসজিদ রক্ষা ও সংখ্যালঘু নির্যাতনের ব্যাপারে কংগ্রেস সরকার কোনো ব্যবস্থাই গ্রহণ করেনি। বলেছে, এটা কেন্দ্রীয় সরকারের এখতিয়ারভুক্ত বিষয় নয়। এটা রাজ্য সরকারের বিষয়। রাজ্য সরকার এই মসজিদ ভাঙা ও দাঙ্গার সময় নির্বিকার ছিল।

    গুজরাট দাঙ্গার সময় যেমন কংগ্রেস দল দাঙ্গা প্রতিরোধে এগিয়ে যায়নি, তেমনি দিলি্লতে ক্ষমতায় প্রত্যাবর্তনের পর তারা এই দাঙ্গা বাধানোর জন্য অভিযুক্ত রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রী নরেন্দ্র মোদির দ্রুত বিচারের কোনো ব্যবস্থা করেনি। বরং নরেন্দ্র মোদি পুচার অব গুজরাট আখ্যা পাওয়ায় যখন মার্কিন সরকার তাঁকে আমেরিকায় যেতে ভিসা দেয়নি; তখন মনমোহন সরকার তার প্রতিবাদ করেছে ও আমেরিকা মোদিকে ভিসা না দেওয়ায় অসন্তোষ প্রকাশ করেছে। এটা অনেকটা সামরিক শাসক জিয়াউর রহমান কর্তৃক একাত্তরের ঘাতক ও যুদ্ধাপরাধী গোলাম আযমকে বাংলাদেশে ডেকে এনে বিচার না করে রাজনীতিতে পুনঃপ্রতিষ্ঠাদানের মতো।

    তা ছাড়া ইন্দিরা গান্ধী হত্যার পর হাজার হাজার সংখ্যালঘু শিখ নিধনের কলঙ্ক জড়িয়ে আছে পরবর্তী কংগ্রসে সরকারের শরীরে। ভারতে দলিত নির্যাতন আমেরিকায় এককালের অশ্বেতাঙ্গ নির্যাতনের মতোই ভয়াবহ। কংগ্রেস সরকার এই দলিত সম্প্রদায়গুলোর অধিকার ও নিরাপত্তা রক্ষার ব্যাপারেও তেমন সাফল্যের পরিচয় দিতে পারেনি। ১০ বছর আগে বিজেপিকে ক্ষমতা থেকে উচ্ছেদ করে কংগ্রেসের সোনিয়া-মনমোহন সরকার দেশটির কেন্দ্রীয় ক্ষমতায় বসেছিল সেক্যুলারিজম বা ধর্মনিরপেক্ষতার স্লোগান মুখে নিয়ে। কিন্তু এই ধর্মনিরপেক্ষতার নীতিকেও ভারতের রাজনীতিতে তেমন প্রতিষ্ঠা দিতে পারেনি কংগ্রেস সরকার।

    তথাপি বছরের পর বছর সংখ্যালঘুদের একটা বিশাল ভোটব্যাংক ছিল, যা বহুকাল কংগ্রেসের নির্বাচন-বিজয় নিশ্চিত করেছে। দিলি্লর জামে মসজিদের খতিব প্রতিবছরই খুতবা পাঠের সময় ভারতের মুসলমানদের আহ্বান জানিয়েছেন কংগ্রেসকে ভোট দেওয়ার জন্য। ভারতে বিজেপির মাধ্যমে উগ্র হিন্দুত্ববাদের অভ্যুদয় ও ক্ষমতা দখলের ভয়ে মুসলমানরা কংগ্রেসকে তাদের নিরাপত্তার আশ্রয় ভেবে দলে দলে ভোট দিয়েছে।

    ভারতের আসন্ন লোকসভা নির্বাচনেও মুসলিম ভোটদাতাদের সংখ্যাগরিষ্ঠ অংশ হয়তো কংগ্রেসকেই ভোট দিতে চাইবে। কারণ এবারের নির্বাচনে উগ্র হিন্দুত্ববাদের উলঙ্গ প্রতীক স্বয়ং নরেন্দ্র মোদি ভারতের প্রধানমন্ত্রী পদে নির্বাচন-প্রার্থী। ফলে দিলি্লর জামে মসজিদের খতিব আগে কংগ্রেসকে সরাসরি সমর্থনদানে কিছুদিনের জন্য বিরত থাকলেও এবার বিজেপি সম্পর্কে ভারতের মুসলমানদের সুস্পষ্ট ভাষায় সতর্ক করে দিয়েছেন।

    তা সত্ত্বেও ভারতের সংখ্যালঘু, বিশেষ করে মুসলিম ভোটব্যাংক এখন আর কংগ্রেসের জন্য সুরক্ষিত নয়। সংখ্যালঘুরা নিজেদের অস্তিত্ব ও অধিকার রক্ষার জন্য তাদের দেশে দ্বিতীয় বৃহত্তম দল হিসেবে গড়ে ওঠা বিজেপির সঙ্গে একটা সমঝোতার ভাব রক্ষা করে চলতে চায়। এর প্রথম প্রমাণ পাওয়া যায়, যখন কংগ্রেসের প্রয়াত নেতা মওলানা আবুল কালাম আজাদের নাতনি বিজেপি একটি সাম্প্রদায়িক দল জেনেও তাতে যোগ দেন। তারপর আরো কিছু মুসলিম নেতা তাতে যোগ দেন।

    বিজেপিও ক্রমশ বুঝতে পারে, ভারতে ক্ষমতায় যেতে হলে সংখ্যালঘু, বিশেষ করে মুসলিম ভোট তাদের দরকার। ফলে বিজেপির প্রবীণ নেতৃত্ব- যেমন অটল বিহারি বাজপেয়ি, লালকৃষ্ণ আদভানি, যশোবন্ত সিং তাঁদের উগ্র হিন্দুত্ববাদের নখর লুকিয়ে ফেলে উদারপন্থী সাজেন। ক্ষমতায় থাকার শেষদিকে বাজপেয়ি পাকিস্তান সফরে গিয়ে জিন্নাহ যে ধরনের শেরওয়ানি ব্যবহার করতেন, সে ধরনের ছয়টি শেরওয়ানির অর্ডার দিয়ে তৈরি করে দিলি্লতে এসে ব্যবহার করা শুরু করেন। সাংবাদিক সভায় বলেন, কৈশোরে শেরওয়ানি পরা জিন্নাহকে দেখে তিনি শেরওয়ানি ব্যবহারে আগ্রহী হন।

    অন্যদিকে লালকৃষ্ণ আদভানি করাচি সফরে গিয়ে মোহাম্মদ আলী জিন্নাহর সমাধিতে যান শ্রদ্ধাঞ্জলি জানাতে এবং জিন্নাহ সেক্যুলার নেতা ছিলেন বলে ঘোষণা দেন। বিজেপির আরেক নেতা যশোবন্ত সিং জিন্নাহর ওপর বই লিখে তাঁকে মহান অসাম্প্রদায়িক নেতা বলে প্রশংসা করেন। বিজেপির কট্টরপন্থী শিবসেনা ও আরএসএস অবশ্য এই উদ্ধারপন্থা পছন্দ করেনি। ফলে আদভানির আর বাজপেয়ির পর প্রধানমন্ত্রী হওয়ার সম্ভাবনা থাকেনি। যশোবন্ত সিং দল থেকে বহিষ্কৃত হন। তিনি বর্তমান নির্বাচনে স্বতন্ত্র প্রার্থী।

    এই পরিস্থিতিতেই মূলত শিবসেনা ও আরএসএসের পছন্দের প্রধানমন্ত্রী পদপ্রার্থী হিসেবে গুজরাট দাঙ্গার নায়ক নরেন্দ্র মোদির অভ্যুদয়। তা জেনেও ভারতীয় মুসলমানদের এলিট শ্রেণি বা সুধীসমাজের কিছু শীর্ষ ব্যক্তি বিজেপিতে সম্প্রতি যোগ দিয়েছেন। তাঁদের মধ্যে রয়েছেন বিখ্যাত সাংবাদিক এম জে আকবর। বাংলাদেশের একটি সুধীসমাজের মতোই ভারতের মুসলিম সুধীসমাজের এই অংশটি সুযোগসন্ধানী ও সুবিধাবাদী। নরেন্দ্র মোদি যত কট্টর হিন্দুত্ববাদী হোন, তিনি এবার ক্ষমতায় যেতে পারেন, এটা ভেবে এই সুবিধাবাদীরা নিজেদের সামাজিক কায়েমি স্বার্থ অক্ষুণ্ন রাখার জন্য বিজেপির দিকে ঝুঁকেছেন। প্রমাণ হয়েছে ভারতেও মুসলিম গয়েশ্বর রায়দের অভাব নেই।

    নরেন্দ্র মোদি ভারতের সংখ্যাগরিষ্ঠদের ভোট কুড়ানোর আশায় বারবার ঘোষণা করেছেন, তিনি হিন্দু জাতীয়তাবাদী। অন্যদিকে মুসলিম ভোট পাওয়ার আশায় দলের সভাপতিকে দিয়ে বলিয়েছেন, মুসলমানদের ওপর অন্যায়-অবিচার করা হয়ে থাকলে তাঁরা নত মস্তকে ক্ষমা চাইতে প্রস্তুত। যদিও আরএসএসের ধমকে বিজেপিকে এই বক্তব্য সঙ্গে সঙ্গে সংশোধন করতে হয়েছে।

    নরেন্দ্র মোদি তাঁর উগ্র সাম্প্রদায়িকতা ও মুসলিমবিদ্বেষ ঢেকেছেন এক নতুন কৌশলে। তিনি আগামী ১৬ মের পর (নির্বাচন শেষে ক্ষমতায় বসতে পারলে) ভারত থেকে বাংলাদেশি বিতাড়ন শুরু করবেন বলে ঘোষণা দিয়েছেন। এখানে মুসলিম বিতাড়ন কথাটি উহ্য রাখা হয়েছে। বাংলাদেশেও বিএনপি 'হিন্দুবিদ্বেষ' প্রচার করে না। বরং ভারতবিদ্বেষ প্রচারের আড়ালে এই বিদ্বেষ প্রচারকে ঢাকা দিয়েছে। ভারতের সংখ্যালঘুরা, বিশেষ করে মুসলমান ভোটদাতারা যদি নরেন্দ্র মোদির এই কৌশল বুঝতে না পেরে কংগ্রেসের প্রতি তাদের হতাশা প্রকাশের জন্য বিজেপিকে ভোট দেয়, তাহলে তা পরিণামে তাদের জন্য কল্যাণ বয়ে আনবে না।

    এখন দেখার রইল, বিজেপি এই নির্বাচনে তাদের সংখ্যালঘু-তাসটি কেমন খেলে এবং তাতে কতটা সফল হয়!

    - See more at: http://www.deshebideshe.com/news/details/32124#sthash.HZnQIWO0.dpuf



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    বাংলাদেশিদের তল্পিতল্পা গুটিয়ে চলে যেতে হবে, হুঁশিয়ারি মোদীর

    কাঁটাতার পেরিয়ে টুক করে ঢুকে এ দেশে যারা সেঁধিয়ে যায়, সেই বাংলাদেশি অনুপ্রবেশকারীদের কপাল খারাপ হতে চলেছে। অন্তত নরেন্দ্র মোদী যে হুঁশিয়ারি দিয়েছেন, তা থেকে এটাই বোঝা যাচ্ছে। রবিবার শ্রীরামপুরে একটি জনসভায় বলেছেন, ১৬ মে-র পর বাংলাদেশিদের তল্পিতল্পা গুটিয়ে ফিরে যেতে হবে।
    নরেন্দ্র মোদী ভালোই জানেন, অনুপ্রবেশের কারণে পশ্চিমবঙ্গ কী ভয়ানক অবস্থায় রয়েছে! তাই বলেছেন, "লিখে নিন, ১৬ মে-র পর এই বাংলাদেশিদের তল্পিতল্পা গুটিয়ে তৈরি হতে হবে। এ দেশে আর থাকা চলবে না।"
    http://bengali.oneindia.in/news/west-bengal/come-16-may-bangladeshi-infiltrators-must-pack-up-warns-modi-001462.html
     — with Rajib Sengupta,Raja Prodipto PurkayasthaKirtibijoy BhattacharjeePartha Sarathi ChowdhuryRanjit ChakrabortyKishore KarJishnu Prasad SenAshim Pal AryaAyan DeySubrata RajaAjoy KonwarAmit Kumar Sharma Sun,Shreehari BorikarRini RoyGautam PaulPrasenjit ChakrabortyDr-Indranil GangulySourav AcharyaAbhijit Kumar DasAbhijit NaMo Nath,Dipti BaroiNandan ChakrabortySubhradeep DasDebopam PurkayasthaIndranil Khan and Bunibroto Dasgupta.
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    • 22 people like this.
    • Sushanta Kar গালি ছাড়া কিছু শিখেছেন? মাঝে মধ্যে নিজেদের পাপ কর্মও কিছু দেখে নেবেন। মুসলমান বাদ দিন হিন্দুদের বিরুদ্ধে হিন্দুত্ববাদীদের পাপ। এন ডি এ সরকার ছিল না ছ বছর? কী করেছে উদ্বাস্তুদের জন্যে? ন্যুনতম নাগরিক অধিকার টুকুও দেয় নিঃ These refugees have settled and ...See More
      www.indiankanoon.org
      SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA):  Mr. Chairman, Sir,  I am raising an issue pert... See More
      3 hours ago · Like · 1
    • Sushanta Kar হিম্মত থাকত তো মোদীর উচিত ছিল বলা মরিচঝাঁপি হত্যার বিচার করবেন। বলেন নি। কারণ দলিতদের সুবিচার দেয়া তাঁর উদ্দেশ্য নয়।http://empireslastcasualty.blogspot.in/.../rebirth-of...
      empireslastcasualty.blogspot.com
      SirMy name is Sonjib, son of Mr Mukul Mukhopadhyay. I spent my childhood at Kora... See More
    • Sushanta Kar ছত্রিশ গড়ে আপনাদের হিন্দু সরকার কেমন হিন্দু বাঙালি দলিত উচ্ছেদ করে দেখে নিনঃhttp://www.peasantautonomy.org/iron-factories-bengali.html
      www.peasantautonomy.org
      photo series Bengali community, problems with a mine project;Dharamjaigarh, Raigarh district of Chhattisgarh
    • Sushanta Kar Exactly 30 years ago, Dalits, in West Bengal, came to realize the true nature of Indian state that is being dominated, in every sense, by a tiny section of population but at a great personal cost. It was in 1979, when thousands of Dalits, refugees from...See More
      dalitandtribe.wordpress.com
      Exactly 30 years ago, Dalits, in West Bengal, came to realize the true nature of... See More
    • Chiranjit Sinha Aj bangladesh r abidho anuprobes karider jonno,w.b r simanto borti district gulir abostha sochonia,,law and order r abostha ekbare talanite pou6eche,simanto borti gramer manus dr rater ghu ude ge6e bangladesi dakat dr voi,aboidho goru pachar,sona pacha...See More
      2 hours ago · Like · 2
    • Jobeda Khaton আপনাকে বলছি। মন দিয়ে পড়েন।

      যেখানে সভ্য পৃথিবী ইসলামের রক্ত দিয়ে গোসল করে। যেখানে সভ্য পৃথিবী মুসলিম মেরে ফেলা একটা মহা পূর্নের কাজ হিসাবে বিবেচিত হয়। খোদ ভারতীয় দর্শণ বৌদ্ধদের রাষ্ট চীন-জাপান-কোরিয়া ইত্যাদি রাষ্ট্র সমূহে ইসলামের প্রশ্রয় আশ্রয় তো দুরের
      ...See More
      2 hours ago · Like · 2
    • Sushanta Kar "আপনাকে বলছি। মন দিয়ে পড়েন।" এই সব বাজে কথা বার্তা শুনে শুনে আর পড়ে পড়ে বড় হয়েছি তো। নতুন করে আর কী পড়ব? এগুলো কোনো সভ্য মানুষের পড়বার জিনিস?Saradindu UddipanPalash BiswasJagadish Roy কথা বলুন , দেখি।
      2 hours ago · Like · 1
    • Jobeda Khaton সৌদি, ইরান, ইরাক, আফগান, কুয়েত ইত্যাদি প্রতিটা ইসলামরাষ্ট্রে হিন্দুদের জন্য মন্দির, মূর্তিপূজা, অগ্নিপূজা, শাস্ত্রীয় সঙ্গীত, নিরামিষ খাদ্য ইত্যাদি হিন্দু সংস্কৃতির ব্যবস্থা গ্রহন করাকে আপনি কি যুক্তসঙ্গত মনে করেন? হিন্দুরা আমাদের মুসলিমদের জন্য তাদের র...See More
      2 hours ago · Like · 3
    • Arun Mukhopadhyay যাঁদের ঘরের নিরন্নদের ছেড়ে illegal immigrants from bangladesh দের জন্য এত দরদ,কে মাথার দিব্বি দিয়েছে তাদের এই ভারতে থাকতে? বেশক্ চলে যেতে পারেন বাংলাদেশে। কিন্তু সেখান থেকে বিতাড়িত হয়ে আবার ল্যাজ গুটিয়ে ভারতে এসে,আবার যারই শীল যারই নোড়া তারই ভাঙ্গি দাঁতের গোড়া করে ভারতকে গাল দেবার সময় মনে রাখবেন আপনি না ঘর কা না ঘাটকা জগৎ শেঠ ভারত dictatorial country হলে treason এর দায়ে মুন্কাডু টা না গেলেও নিশ্চয় কারাবদ্ধ থাকতেন ।
      2 hours ago · Like · 1
    • মহাকাল বিয়ন্ড দ্যা টাইম এই Jobeda Khaton RSS মার্ক করা পাবলিক, এরা এককটা নর পিষাস, এদের সাথে কথা বলার কোনো মানেই হয় না।
      2 hours ago · Like · 1
    • Sushanta Kar আরে মশাই এতো ভাবনা কিসের? আপনাদের মহান নেতারা তো বলেই দিয়েছেন, আমাদের বাংলাদেশ বা পাকিস্তানে পাঠিয়ে দেবন। তা দিন কইয় সবুর করুন, আগে ক্ষমতাতে আসতে দিন না। যাব আর কি এতো ব্যস্ত কিসের?
    • Sushanta Kar সেই তো মানে হয়ই না তো। গোটা ভারত জুড়ে আর এস এস-এর হিন্দুত্ববাদী ক্যাডারদের লাগানোই হয়েছে আন্তর্জালে এভাবে ত্রাস ছড়াতে। জানা নেই! সমাজের আবর্জনা সব।
    • মহাকাল বিয়ন্ড দ্যা টাইম মন্দির, মূর্তিপূজা, অগ্নিপূজা, শাস্ত্রীয় সঙ্গীত, নিরামিষ খাদ্য ইত্যাদি কে কি Jobeda Khaton বাংলাদেশে ব্যান্ড করতে চাইছে ?
    • Hrithik Rohit jdi india abr muslim der dkhole jay,ami indiar sb secular hindu k age mere felbo..den muslim @sushant
      2 hours ago · Edited · Like · 1
    • Arun Mukhopadhyay যখন আপনাদের হিন্দু সরকার মুসলমানদের কি অত্যাচার বলে বিশেষ সুবিধা হল না,এষে গেল দলিত card. Rini Roy why you have kept this person in your friends list. Birds of the same feather can only flock together. If you continue having him in your friend list, sorry I will have to unfriend you. I do not want my home page filled with garbage.
    • Chiranjit Sinha ei,j mr. Susanta kar or whatever u may be,,kotha sune to jamater dalal mone hoi,jai hok apni denna nijer barite apnar piriter vai bangladesi der asroy,age ekta example creat kartn,thn anyodr sekhaben,ekhane sokoleri mathai budhi r bastob bodh a6e,apnar...See More
      2 hours ago · Like · 1
    • মহাকাল বিয়ন্ড দ্যা টাইম নিরামিষ খাদ্য আবার কবের থেকে হিন্দু সংস্কৃতির মধ্যে এল ? আর না বুঝে হিন্দু না বুঝে সংস্কৃতির। শুধু ধর্ম দিয়ে দাঙ্গা বাঁধাতে ভালবাসে ?
      2 hours ago · Like · 1
    • মহাকাল বিয়ন্ড দ্যা টাইম সবচেয়ে বড় কথা Jobeda Khaton এন্ড কং রা ভারতকে আরবের মত গড়া ধর্মীয় রাষ্ট্র ভেবে বসে আছে। ..............হয়েছে !!!!!!!!........
    • Chiranjit Sinha To apnader mto pak premider dr pakistane pathia deoa tai to valo,j des apnar ekdom valo lagena,sekhane theke ki maraben?janna piriter vaidr ka6e,everyday malaun bole jutor bari marbe,r thutu phelbe mukhe setai to valo apnar,susanto..amra na samprodiek jan apnar asampro daik vaidr ka6e.
      2 hours ago · Like · 1
    • Sushanta Kar কী সব ভাষা মাইরি , এক এক জনের কথা বলবার । সব আর এস এস-এর স্কুলে শিখে আসে।
    • Jobeda Khaton হিন্দুরা আজীবন ভেজিট্যারিয়ান।http://agniveerinbanla.com/Vedic%20Food.html
      agniveerinbanla.com
      " পাষণ্ড তারা যারা প্রানি-মাংস ভোজন করে। তারা যেন প্রকারান্তরে বিষপান করে। ইশ্বর তাদের যেন উপযুক্ত শাস্তি প্রদান করেন।" ঋগ্বেদ ১০.৮৭.১৬-১৯
    • মহাকাল বিয়ন্ড দ্যা টাইম মনে রাখবেন এটা মোদী'র বাপের জমিদারি নয়। এবং এটা গুজরাত নয়। এটা আমাদের পশ্চিমবঙ্গ। মনে হয় মোদী মানসিক ভারসাম্য হারিয়েছে। ভয় নেই মোদী আর মোদী প্রামিদের খুব তাড়াতাড়ি মানসিক চিকিত্সার জন্য পাঠানো হবে .......
      2 hours ago · Like · 1
    • Sushanta Kar Chiranjib Lahiri আপনাদের দালাল নই সেতো বুঝতেই পারছেন। এই জনমে হবার সাধও নেই।
    • Chiranjit Sinha tar age tor mto jamat premi dr ,,todr pobirtro jahan bangladese pathano hbe,mahakal.
      2 hours ago · Like · 1
    • মহাকাল বিয়ন্ড দ্যা টাইম তাহলে যারা আমিস খায় তারা হিন্দু নয় ? হয় কি সর্বনাশ ? কিন্তু রিক বেদে প্রমাণ আছে সেই সময় ব্রাহ্মণরা গরুর মাংশ খেত।
    • Chiranjit Sinha Apnar mto 4th class desdrohider edser citizen hobar jogotao nei,susanta.
      2 hours ago · Like · 1
    • Vikramaditya Chandragupta  ভারতকে মুছলিমরাই ধব্ংস করে দিল। তাহলে প্রশ্ন উঠতে পারে, খৃষ্টানরা নয় কেন? কারণ খৃষ্টানরা সংস্কারপন্থী। খৃষ্টানরা বাইবেল থেকে সড়েছে এবং তার বৈদিক চর্চাও করে। ইওরোপের রাষ্ট্রে বৈদিক সংস্কৃতির চর্চ হয়।

      কংগ্রেস নামক কিছু অসুর ও দূর্যোধনের জাত ভাইরা এই সব বিদেশী ইরান-সৌদি পন্থীদের আশ্রয় দিয়ে গোটা ভারতটাকে একটা বিজাতী কালচারে রূপ দিল। তবে এটা আশার সংবাদ যে, নিজের অজান্তে হলেও হিন্দুরা জেগে উঠেছে।
      2 hours ago · Like · 1
    • Vikramaditya Chandragupta  ভারতের ১০০% মুছলিম চায় ভারতে ইসলাম কায়েম হোক।

      বাইবেল-কোরানপন্থীদের নিয়েই আমাদের সমস্যা। খৃষ্টারা বাইবেল থেকে সড়ে এসেছেন এবং তার জন্য আমরা তাদেরকে ধন্যবাদ জানাই। ইওরোপ রাষ্ট্রগুলিতে বৈদিক ধর্ম চর্চার সুযোগও দিয়েছেন ওনারা।
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      2 hours ago · Like · 1
    • Sushanta Kar "ভারতের ১০০% মুছলিম চায় ভারতে ইসলাম কায়েম হোক।"--বেশতো আপনারা চান হিন্দু ধর্ম কায়েম থাক, হিন্দু ধর্মও নয় ব্রাহ্মণ আদিপত্যবাদ। তো তারা কি অপরাধ করল? এই দেশ তাদেরও। তাই তাদের ধর্ম কায়েম করতে চায়। আপনাদের খৃষ্টান প্রেম দেখেছি তো গ্রাহাম স্টেইন হত্যা লীলা আর দেশ জূরে নান দের ধর্ষণ করবার বেলা। ভুলে কি গেছি, সুযোগ পেলে কী সব কারবার করতে পারে আপনাদের মানুষজন।
    • Vikramaditya Chandragupta  i agree 100% all above comments of Jobeda Khaton Jobeda
    • Jobeda Khaton --by Ishaimoon Moonishai.
      Jobeda Khaton's photo.
    • Sajal Paul besh koreche, bangladeshe hindu kelabe ar ekhane ese mourasipatta!! keliye tarano habe.
    • Sajal Paul অনুপ্রবেশের কারণে পশ্চিমবঙ্গ কী ভয়ানক অবস্থায় রয়েছে! তাই বলেছেন, "লিখে নিন, ১৬ মে-র পর এই বাংলাদেশিদের তল্পিতল্পা গুটিয়ে তৈরি হতে হবে। এ দেশে আর থাকা চলবে না।" মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়কে নিশানা করে তিনি বলেন, "ভোটব্যাঙ্ক রাজনীতির স্বার্থে আপনি ওদের লাল কার্...See More
    • Rahul Banerjee due to speech in shreerampur modi losing popularity in asansol due the bangal(post 1946) voters are scared they may be targeted.
    • Sajal Paul jadi kono burbak ulto mane kore tahole kichu bolar nei. original ki bola hoyeche seta jana proyojon. "বাংলাদেশ থেকে একটি নির্দিষ্ট সম্প্রদায়ের লোকজন কীভাবে এ দেশে ঢুকছে আর পাকাপাকিভাবে বসবাস করছে, সেটা তদন্ত করে দেখা হবে।"